(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
जिसे देख कर सहसा वाणी है मुखरित हो जाती। वो मेरे दुखमय जीवन की है सबसे प्रिय थाती॥
प्राणों में श्रद्धा नयनों में करुणा-कण लहराते। करके जिसकी याद पन्थ के शूल सुमन बन जाते॥
गाता है मन-मोर देख जिसको तुम वह बादल हो। सागर सम अविकार व्योम के सदृश सरल निरथलहो।
स्वाति-बिन्दु तुम, जिसे बुलाता मेरा चातक प्यासा। मूर्ति मान तुममें मानस की युग-युग की अभिलाषा॥
कितने दिन हैं अभी दूर रहने को मेरे स्वामी। कितने दिन यह मन खोजेगा तुमको अन्तर्यामी॥
कितने दिन तक अभी न लय होने दोगे अपने में। कितने दिन तक छिपे रहोगे कलित काव्य सपने में॥
मेरे बिना अपूर्ण रहेगी सत्ता देव, तुम्हारी। इस मन पर अधिकार करो हे, हे मेरे अधिकारी!!
देयानि स्ववशे पुँसा स्वेन्द्रियाण्याखिलानि वै। असंयतानि खायन्तीन्द्रियाण्येतानि स्वामिनम्॥
अर्थ- अपनी इन्द्रियों को वश में रखना चाहिए। असंयत इन्द्रियाँ अपने स्वामी को वश में रखना चाहिए।
इन्द्रियाँ आत्मा के औजार हैं, घोड़े हैं; सेवक हैं। परमात्मा ने इन्हें इसलिए हमें प्रदान किया है कि इनकी सहायता से आत्मा की आवश्यकता पूरी हों और सुख मिले। सभी इन्द्रियाँ बड़ी उपयोगी हैं, सभी का कार्य जीव को उत्कर्ष एवं आनन्द प्रदान करना है। यदि उनका सदुपयोग हो तो क्षण क्षण पर जीवन का मधु रस चखता हुआ मनुष्य अपने सौभाग्य को सराहता रहेगा।
किसी भी इन्द्रिय का उपयोग पाप नहीं है। सच तो यह है कि अन्तःकरण की विविध क्षुधाओं को, तृषाओं को तृप्त करने का इन्द्रियाँ एक उत्तम माध्यम हैं। जैसे पेट की भूख प्यास को शान्त न करने से स्वास्थ्य का सन्तुलन बिगड़ जाता है वैसे ही सूक्ष्म शरीर की ज्ञानेन्द्रियों की क्षुधाएँ उचित रीति से तृप्त नहीं की जाती तो आन्तरिक क्षेत्र का सन्तुलन बिगड़ जाता है और अनेक मानसिक गड़बड़ियाँ पैदा होने लगती हैं।
इंद्रियां भोगों की बहुधा निन्दा की जाती है इसका वास्तविक तात्पर्य यह है कि अनियन्त्रित इन्द्रियाँ, स्वाभाविक एवं आवश्यक मर्यादा का उल्लंघन करके इतनी स्वेच्छाचारी एवं चटोरी हो जाती हैं कि वे स्वास्थ्य और धर्म के लिए संकट उत्पन्न करके भी मनमानी करती हैं। आज कल अधिकाँश मनुष्य इसी प्रकार के इन्द्रियों के गुलाम बने हुए हैं। वे अपनी वासना पर काबू नहीं रखते। बेकाबू हुई वासना अपने स्वामी को खा जाती है।
गायत्री का ‘दे’ अक्षर अपने ऊपर काबू रखने की शिक्षा देता है। इन्द्रियों पर अपना काबू हो, वे अपनी मनमानी करके जब चाहें तब, चाहे जिधर न घसीट सकें बल्कि जब हम स्वयं आवश्यकता अनुभव करें, जब हमारा विवेक निर्णय करे तब उचित आन्तरिक भूख को शान्त करने के लिए उनका उपयोग करें यही इन्द्रिय निग्रह है। निग्रहित इन्द्रियों से बढ़ कर मनुष्य का सच्चा मित्र, और अनियन्त्रित इन्द्रियों से बढ़ कर भयंकर शत्रु और कोई नहीं है।
इन्द्रियाँ रथ में जुते हुए घोड़े की तरह हैं, यदि घोड़ों पर नियन्त्रण न रखा जाय, उनकी लगाम छोड़ दी जाय, उन्हें चाहे जिस दिशा में, चाहे जिस गति से चलने दिया जाय तो अपने लिए, रथ के लिए, स्वामी के लिए, संकट उत्पन्न किए बिना न रहेंगे। इसलिए बुद्धिमान सारथी सदा सजग रहता है, हर घोड़े की गतिविधि पर ध्यान रखता है और किसी घोड़े को बेकाबू होने से पहले ही, उसके आरम्भिक उपद्रव देखकर ही उस पर नियन्त्रण स्थापित कर लेता है। इन्द्रियों के संबंध में भी हमारी यही नीति होनी चाहिए। अनावश्यक ढील कभी भी न छोड़ी जाय, कोई इन्द्रिय अनुचित रूप से चटोरी हो रही है, त्याज्य एवं अमर्यादित वासना में प्रवृत्त होना चाह रही हो तो उस पर बड़ा नियन्त्रण, कठोर प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता है।
दस इन्द्रियों में पाँच तो कर्मेन्द्रियाँ हैं। उनका नियन्त्रण तो इतना ही है कि न तो उन्हें निठल्ला रहने दिया जाय तो कि वे शिथिल और निष्क्रिय हो जाएँ, और न इतना अधिक कार्य ही उनसे लिया जाय कि उनकी सामर्थ्य असमय में ही शिथिल एवं समाप्त हो जाय। पाँच ज्ञानेन्द्रियों में दो विशेष प्रबल हैं। (1) रसना इन्द्रिय, (2) कर्मेन्द्रिय। जीभ के चटोरेपन के कारण लोग हानिकारक वस्तुओं को, असमय, अनावश्यक मात्रा में सेवन करते हैं। चटपटे और मीठे पदार्थों के स्वाद की क्षणिक लालसा में ऐसे पदार्थ खाते हैं जो पोषण और स्वास्थ्य का उत्कर्ष करना तो दूर उलटे उन्हें नष्ट करते हैं। भूख लगी है या नहीं, पेट को भोजन की आवश्यकता है भी या नहीं, जितना भोजन के लिए पेट में स्थान है उससे अधिक तो नहीं ठूँसा जा रहा है इन बातों पर चटोरे लोग विचार नहीं करते। जीभ के गुलाम बन कर पेट पर निरन्तर अत्याचार करते रहते हैं। फलस्वरूप स्वास्थ्य गिरता जाता है। नाना प्रकार के रोग उठ खड़े होते हैं और असमय ही काल के ग्रास बन जाते हैं।
आज अधिकाँश व्यक्ति दाँतों से अपनी कब्र खोदने में लगे हुए हैं। वे भोजन नहीं खाते- भोजन उन्हें खाता है। आरोग्य शास्त्र का मत है कि अधिकाँश रोगों की जड़ पेट में होती है। यदि मनुष्य अपने पेट के साथ अन्याय न करे- जीभ के चटोरेपन पर काबू रखे तो निस्सन्देह वह नाना प्रकार की बीमारियों से बचता हुआ दीर्घजीवी हो सकता है।
रसना के बाद विषना का नंबर आता है। गर्भाधान एक महत्वपूर्ण और उत्तरदायित्व पूर्ण क्रिया है। प्रकृति ने भूख इसलिए लगाई है कि जीव आलसी न बैठा रहे पेट की प्रेरणा से उद्योग एवं पुरुषार्थ में प्रवृत्त हो। इसी प्रकार कामेन्द्रिय में एक विशेष प्रकार की उत्तेजना इसलिए पैदा की है कि संसार में नये जीवों की उत्पत्ति होती रहे। नये प्राणी की उत्पत्ति करना एक ऐसा काम है जिसमें अत्यन्त सावधानी रखने से ही ईश्वर की इच्छा और आज्ञा पूरी की जानी संभव है। असावधानी बरतने से तो ऐसी सन्तान उत्पन्न होती है जो न तो स्वयं चैन से रहती है और न दूसरों को रहने देती है। बच्चों के अनुचित पालन पोषण, विकास, शिक्षण आदि की योग्यता एवं व्यवस्था न होने पर भी जो लोग कामेन्द्रिय के चटोरेपन के लिए काम सेवन में प्रवृत्त होते हैं वे निश्चय ही एक भारी संकट को मोल लेते हैं। आज ऐसे माता पिताओं की कमी नहीं जो स्वयं अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते हुए दुखी रहते हैं और सन्तान को भी शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से दीन हीन रखते हैं।
जैसे जीभ का चटोरापन पेट को खराब करके बीमारी और अकाल मृत्यु को बुलाता है वैसे ही कामेन्द्रिय का चटोरापन शारीरिक दुर्बलता, जननेन्द्रिय संबंधी बीमारियाँ, आर्थिक संकट, कुसंस्कारी एवं दीन हीन सन्तान उत्पन्न करके एक पारिवारिक एवं सामाजिक संकट उत्पन्न करता है। आज तो जन संख्या की अत्यधिक वृद्धि हो जाने से संसार पर भारी संकट छाया हुआ है, भुखमरी बीमारी और लड़ाई का सर्वोपरि कारण जन संख्या की अमर्यादित वृद्धि ही है। ऐसे समय में आँख मूँद कर केवल इन्द्रियों के चटोरेपन से प्रेरित होकर कामसेवन में प्रवृत्त होना एक अपराध ही कहा जा सकता है। जिसका फल उस व्यक्ति को उसके बच्चों को ही नहीं वरन् सारे संसार को भोगना पड़ता है।
आँखों से कानों से कभी-कभी मनुष्य वासना परक, निरर्थक, दुष्प्रभाव डालने वाले आकर्षक दृश्यों को देखना और मधुर ध्वनियों को सुनना चाहता है। इनमें से बुरा प्रभाव डालने वाले नाच रंग एवं बुरी प्रवृत्तियों को भड़काने वाले शब्द या गायन आदि को सुनना त्याज्य है। ऐसे दृश्य या शब्द जो प्रिय मधुर एवं आकर्षक हों साथ ही मन पर अच्छे संस्कार डालें त्याज्य नहीं कहे जा सकते हैं। उनसे प्रसन्नता, उत्साह वृद्धि एवं तुष्टि की प्राप्ति होती है।
इन्द्रिय निग्रह में मुख्य प्रश्न और विषना का है। इन पर काबू रखने की सर्वोपरि आवश्यकता है। मुख में कोई वस्तु डालने से पहले यह समाधान कर लेना चाहिए कि पेट की आवश्यकता और स्वास्थ्य की उपयोगिता की दृष्टि से ही यह खाया जा रहा है न? यदि इसमें जरा भी सन्देह हो तो कड़ाई के साथ दाँत भींच लीजिए और आगत भोजन का विष के समान बहिष्कार कर दीजिए चाहे वह कितना ही स्वादिष्ट क्यों न हो। जीभ का केवल एक परीक्षक डॉक्टर के जितना ही उपयोग कीजिए जो बुद्धि संगत एवं उपयोगी खाद्य पदार्थों में से भले बुरे की परीक्षा कर दिया करे। यही रसना का वास्तविक उपयोग है।
विषना- कामेन्द्रिय का विकार नहीं, मन का विकार है। कामसेवन का जीवन में उतना ही स्थान है जितना तीर्थयात्रा का। हम सब, रोज तीर्थयात्रा कहाँ करते हैं? यह कोई इतनी महत्वपूर्ण बात नहीं कि रोज ही या हर घड़ी, उसकी योजना को मस्तिष्क में भरे रहा जाय। तीर्थयात्रा तो कभी-कभी, सुविधानुसार संयोगवश होती है इतना ही स्थान विषना का भी होना चाहिए। धर्मपत्नी एक सच्चे मित्र या सहयोग भाई के समान अपनी सहचरी के जीवन के अनेकानेक कार्यों में सहयोग के लिए विवाह होता है। विवाह को वासना की खुली छूट मानना एक भयंकर भूल है जिसमें आज मनुष्य समाज बुरी तरह भ्रमित हो गया है। इस भूल को जितनी जल्दी हटाया जा सकेगा उतना ही अच्छा है क्योंकि विवाह को वासना प्रधान मान लेना उसके आध्यात्मिक एवं सामाजिक महत्व को ही नष्ट कर देता है। इस मान्यता के रहते पति-पत्नी सच्चे प्रेमी और सच्चे सहयोगी कदापि नहीं बन सकते।
जैसे हर पेड़ पर एक विशेष अवसर पर कोमल पल्लव एवं पुष्प आते हैं और वह सुन्दर दीखता है इसी प्रकार किशोर एवं नवयौवन अवस्था में हर स्त्री पुरुष सुन्दर दीखते हैं। यह सौंदर्य दृष्टि की शोभा है। जैसे किसी पुष्पों से खिले हुए बगीचे में जाकर हम उसको देखकर प्रसन्नता अनुभव करते हैं, पर ऐसा नहीं सोचते कि इन पुष्पों को तोड़ लें या खा जावें। इसी प्रकार सुन्दर शरीरों को देखना प्रसन्न होना तो ठीक है पर उसमें वासना की विकार बुद्धि उत्पन्न करना एवं ऐसी मनो वैज्ञानिक भूल है जिससे अपने अन्दर बेचैनी, बुराई, कुबुद्धि, एवं अनैतिकता उत्पन्न होती है। क्या हमारी बहिनें या पुत्रियाँ सुन्दर नहीं होतीं? यदि सुन्दर हो ते हुए भी उनके प्रति हम अनैतिक भाव मन में न लाने में समर्थ रहते हैं तो कोई कारण नहीं कि अपने में यदि थोड़ी सी मानसिक स्वस्थता एवं दृढ़ता हो तो दूसरी बहिन बेटियों के सौंदर्य को पवित्र आँखों से न देख सकें।
आज हम हाट बाजार में निकलती हुई बहिन बेटियों को गिद्ध दृष्टि से देखते हैं। तरुणी स्त्रियों के चित्र इसलिए खरीदे जाते हैं कि उन्हें विकार बुद्धि से देख कर शैतानी कुप्रवृत्ति को भड़कावें, सिनेमा भी प्रायः लोग इसी दृष्टि से जाते हैं, अश्लील पुस्तकों से, चित्रों से बाजार पटे पड़े हैं, हमारे फालतू समय में ऐसे ही विचार मन में घूमते रहते हैं। विषना का यह निकृष्ट रूप हमारी मानसिक पवित्रता को ही नष्ट नहीं करता वरन् समाज में भयंकर गड़बड़ी भी उत्पन्न करता है, जिसके परिणाम स्वरूप भारी अशान्ति उत्पन्न होती है।
इन्द्रिय निग्रह मानव जीवन के स्वस्थ विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक है। व्रत एवं उपवास पर मनोविकार नष्ट होते हैं ऐसा गीता में कहा गया है। गायत्री उपासना में प्रभु को माता के रूप में मानने की साधना भी विषना प्रवृत्ति पर भारी अंकुश लगाती है। स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन एवं मनोविकारों से लड़ने की तत्परता के आधार पर भी इन्द्रिय लिप्सा पर विजय प्राप्त करना सुगम हो जाता है। इन्द्रियों के चटोरेपन को कभी महत्व न दिया जाय, उनकी पूर्ति करने की सफलता को कभी पुरुषार्थ या सफलता न माना जाय। जब कभी इन्द्रियाँ प्रबल हो रही हों तो उनके समाधान के लिए उस सर्वशक्तिमान सत्ता में सच्चे हृदय से प्रार्थना करनी चाहिए और जब कभी बुद्धि को इन्द्रियाँ हरा दें तब अपने को धिक्कारते हुए उसका पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए।
गायत्री का दसवाँ अक्षर ‘दे’ हमें इन्द्रिय निग्रह की शिक्षा देता है। इस शिक्षा को अपनाकर हम माता के सच्चे आज्ञानुवर्ती पुत्र बन सकते हैं।
न इतने कठोर बनो कि लोग तुम से डरने लगें और न इतने कोमल कि सिर चढ़ें।
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पढ़ कर उसे कार्य रूप में परिणित नहीं करना जमीन जोतकर उसमें बीज न डालने के समान है।
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अगर कोई बुद्धिमान मूर्खों के साथ वाद विवाद करे तो वह अपनी प्रतिष्ठा की आशा न रखे।
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जो कुछ करो नियमानुसार करो, जो कुछ कहो ठीक-ठीक कहो, और जो कुछ सोचो युक्तिपूर्वक सोचो।
(श्री स्वामी विवेकानन्द जी)
इंग्लैण्ड में कहते हैं कि ‘अमुक मनुष्य ने आत्मा का परित्याग कर दिया, किन्तु भारतवर्ष में कहते हैं कि ‘अमुक मनुष्य ने देह का परित्याग किया।’ पाश्चात्य लोगों का यह भाव है कि मनुष्य देह है और आत्मा देह के अधीन है और प्राच्य लोगों का यह भाव है कि मनुष्य आत्मस्वरूप है और देह उसके अधीन है। इस पार्थक्य के कारण कई जटिल समस्याएँ उठती हैं। यह सहज ही समझा जा सकता हे कि जिन लोगों का मत है कि मनुष्य देहरूप है और आत्मा उसके अधीन है, उनके मत में देह पर विशेष ध्यान दिया जायगा। यदि उनसे पूछा जाय कि मनुष्य-जीवन किस लिये है तो वे कहेंगे कि इन्द्रिय- सुखभोग के लिये- देखने सुनने, भोजन पान करने, धन दौलत के अधिकारी होने के लिये-बस, मनुष्य जीवन का यही आदर्श है। इससे अधिक और कुछ नहीं-
“खाओ, पीओ, मौज उठाओ इसीलिये यह मेला है। कौन जानता कब क्या होगा चलता यही झमेला है।”
इन्द्रियातीत वस्तु की कथा वे स्वप्न में भी नहीं समझ सकते उनकी परलोक की धारणा ऐसी है कि जिस प्रकार इन्द्रिय-सुखभोग यहाँ चल रहा है परलोक में भी बराबर वैसा ही चलेगा। इसी लोक में वे चिरकाल तक इन्द्रिय-सुखभोग नहीं कर सकते, इसका उन्हें बड़ा दुःख है। वे ऐसा सोचते हैं कि मरने के पश्चात् वे एक ऐसे स्थान में जहाँ ये सब इन्द्रिय सुख फिर से प्राप्त होंगे। यही सब इन्द्रियाँ रहेंगी और यही सब सुख भोग रहेंगे, केवल सुख की तीव्रता और मात्रा बढ़ जायगी। वे ईश्वर की उपासना भी इसीलिये करते हैं कि खूब सुख मिले। उनके लिये ईश्वर इस उद्देश्य-लाभ के लिये उपाय स्वरूप है। उनके जीवन का लक्ष्य विषय-सम्भोग है, वे केवल किसी से इस बात को जान गये हैं कि एक पुरुष है जो इन सब सुख भोगों को दे सकता है, इसीलिये वे ईश्वर की उपासना करते हैं। यह तो एक भाव हुआ। दूसरा भाव यह है कि ईश्वर ही हम लोगों के जीवन का लक्ष्य-स्वरूप है। ईश्वर से अधिक श्रेष्ठ और कुछ नहीं है, और इन्द्रिय सुख भोग को छोड़कर उच्चतर वस्तु की प्राप्ति के लिये अग्रसर होना चाहिये। केवल यही नहीं, बल्कि इन्द्रिय सुख को छोड़कर संसार में और कुछ नहीं होता तो संसार बड़ा ही भयानक होता। हम लोग अपने जीवन में नित्य प्रति देखते हैं कि जिस मनुष्य में इन्द्रिय- सुखभोग जितना ही कम है, उस मनुष्य का जीवन उतना उच्चतर है। कुत्तों को देखिये- कौन मनुष्य इतनी तृप्ति के साथ खा सकता है? सूकरों की तरफ देखिये, खाते समय किस प्रकार आनन्द सूचक शब्द करते हैं। ऐसा कोई मनुष्य नहीं है जो इस प्रकार से खा सके। तिर्यग्जाति की देखने, सुनने, सूँघने आदि की शक्तियाँ कितनी प्रबल होती हैं- उनकी सब इन्द्रियाँ बहुत उत्कर्ष प्राप्त हैं। मनुष्यों की इन्द्रिय- शक्तियाँ कभी इतनी प्रबल नहीं हो सकतीं, पशुगण इन्द्रिय-सुखभोग के आनन्द में एक बार ही उन्मत्त हो उठते हैं। और मनुष्य जितना ही अनुन्नत रहेगा उसे इन्द्रिय- सुखभोग में उतना ही अधिक आनन्द मिलेगा। वह क्रमशः जैसे-जैसे उन्नत होता जायगा, उसके विचार उच्च होते जाएंगे और हृदय प्रेम से भरता जायगा। आप देखेंगे कि आप में विचार-शक्ति और प्रेम का विकार होने पर आपकी इन्द्रिय-सुखभोग-शक्ति कम होती जायगी। यदि हम लोग यह स्वीकार करें कि मनुष्य के भीतर एक निर्दिष्ट शक्ति है और इस शक्ति का प्रयोग देह, मन या आत्मा के ऊपर किया जा सकता है, मानना होगा कि यदि उस शक्ति का प्रयोग केवल किसी एक ही पर किया जाय तो दूसरों के ऊपर प्रयोग की शक्ति उतनी ही कम हो जायगी। सभ्य जाति की अपेक्षा असभ्य जाति की इन्द्रिय-शक्ति तीक्ष्णतर होती है- और सभ्य जाति का शरीर दुर्बल होता जाता है। किसी असभ्य जाति को सभ्य बनाइये- ठीक यही बात होगी। वह दुर्बल हो जायगी और कोई असभ्य जाति आकर उसको जीत लेगी। ऐसा देखा जाता है कि प्रायः बर्बर जाति ही सर्वदा जय शालिनी होती है। इस कारण यदि हम लोगों को सर्वदा इन्द्रिय सुखभोग की वासना होती है तो समझना चाहिये कि हम लोग एक ऐसे पदार्थ के लिये प्रार्थना करते हैं जिसे पाकर हम लोग पशु हो जायेंगे। मनुष्य जब कहता है कि वह एक ऐसे स्थान में जाना चाहता है जहाँ उसको इन्द्रिय-सुख भोग खूब अधिकता से मिल सके तो समझना चाहिये कि वह मनुष्य जन्म नहीं चाहता है क्योंकि पशु योनि में ही उसको ऐसा सुखभोग मिल सकता है। सूकर को कभी विचार नहीं होता कि वह अशुद्ध वस्तु का भोजन कर रहा है। और यदि ब्रह्मा, विष्णु, महेश उसके निकट आकर उपस्थित हों तो भी वह उनकी ओर देखना नहीं चाहेगा। भोजन में ही उसका मन-प्राण समग्र सत्ता नियोजित है।
मनुष्य के संबंध में भी उसी प्रकार है। वह शूकर के सदृश विषय-वासना के भारी कीचड़ में लेटा हुआ है। इसके बाहर क्या है सो वह नहीं देख सकता। वह इन्द्रिय-सुखभोग ही चाहता है और उसकी अप्राप्ति उसके निकट नर्क में गिरने के सदृश है। इस प्रकार का मनुष्य सच्चा भक्त नहीं कहला सकता। वह कभी सच्चा भगवत्-प्रेमी नहीं हो सकता। समय पाकर इस आदर्श को बदलना होगा। प्रत्येक मनुष्य जानता है कि इसकी अपेक्षा उच्चतर कोई वस्तु है जिसके संबंध में हम नहीं जानते- ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ ।’ मैं लड़कपन में जिस समय पाठशाला में पढ़ता था उस समय किसी सहपाठी के साथ एक मिठाई के लिये झगड़ा हो गया। वह मुझसे अधिक बलवान था इसलिये उसने मिठाई मेरे हाथ से छीन ली। उस समय मेरे मन में जो भाव उठा था वह इस समय भी मुझे याद है। मेरे विचार में आया था कि उसके जैसा दुष्ट लड़का संसार में कोई नहीं है मैं जब बड़ा हूँगा तो उसको दण्ड दूँगा। मन में यह भाव उत्पन्न हुआ कि उसके जैसे दुष्ट को कौन-सा दण्ड दिया जाय- सोचा कि उसको फाँसी देना ही उचित होगा- उसके चार टुकड़े कर डालना ही उचित है। इस समय हम लोग दोनों ही बालक बड़े (बालिग) हो गए हैं और दोनों के बीच में परम बन्धुत्व है। इसी प्रकार यह समग्र जगत अल्पवयस्क शिशु तुल्य मनुष्यों से परिपूर्ण है, जोकि पूड़ी-मिठाई ही को सर्वस्व समझते हैं। यदि इसमें जरा भी इधर-उधर होता है तो वे समझते हैं कि उनका सर्वनाश हो गया। वे केवल सुख-स्वप्न देखते हैं और उनकी धारणा है कि स्वर्ग में पूड़ी-मिठाई खूब मिलती है। अमेरिकन इण्डियनों की धारणा है कि स्वर्ग में आखेट करने का बड़ा सुन्दर स्थान है। हम सब अपने अपने वासनानुरूप स्वर्ग की धारणा करते हैं। किन्तु समय पाकर जितनी ही हम लोगों की अवस्था बढ़ती जाती है और जितनी ही उच्च वस्तु के दर्शन करने की शक्ति होती जाती है, उतना ही समय समय पर इन वस्तुओं से उच्चतर वस्तु का आभास मिलता जाता है।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी)
दिव्य प्रेम ही विशुद्ध प्रेम है। यह सच्चे भक्त का भगवान के प्रति उसके हृदय तल से सहज स्नेह और भक्ति का प्रवाह है। संसार में एक मात्र सार वस्तु प्रेम ही है। यह नित्य, अनन्त और क्षय रहित है। शारीरिक प्रेम तो काम का विकार, और मोह उन्माद है। विश्व प्रेम है। ईश्वर प्रेम है। और प्रेम ही ईश्वर है। स्वार्थपरता क्षोभ अहंकार मिथ्याभिमान और घृणा हृदय को संकुचित करते हैं और विश्व प्रेम के मार्ग में बाधक हैं। हमें निःस्वार्थ सेवा, महात्माओं के साथ सत्संग, प्रार्थना और गुरुमन्त्र द्वारा विश्व प्रेम को शनैः-शनैः बहाना चाहिए।
जबकि स्वार्थपरता से हृदय संकुचित हो जाता है, तो मनुष्य पहले केवल अपनी स्त्री, बच्चों, थोड़े मित्रों और रिश्तेदारों से ही प्रेम करता है जैसे-जैसे उसका विकास होता रहता है तैसे-तैसे वह अपने जिले के तथा अपने प्रान्त के लोगों से प्रेम करने लगता है। तत्पश्चात् वह अपने देश के लोगों से प्रेम बढ़ाता है, इसी प्रकार वह अन्य देशवासियों से भी प्रेम करने लगता है। अन्त में वह सबसे प्रेम करना आरम्भ करता है। इस प्रकार जब वह विश्व प्रेम का विकास करता है तब उसके प्रतिबन्ध टूट जाते हैं। उसका हृदय असीम रूप से विकसित हो जाते हैं।
विश्व प्रेम की बात करना आसान है, किन्तु जब तुम इसे कार्य रूप में लाना चाहते हो तो वह अत्यधिक कठिन हो जाता है। सब प्रकार की तुच्छ हृदयता रास्ते में आ खड़ी होती है। पुराने भ्रम पूर्ण संस्कार जिनको कि तुमने पहले अपने गलत विचारों से उत्पन्न कर लिया है, रोड़ा अटकाते हैं। सुदृढ़ निश्चय, बलवान इच्छा शक्ति, धैर्य, सन्तोष और विचार द्वारा तुम बिलकुल सरलता से सब विघ्नों को जीत सकते हो? मेरे प्रिय मित्र! यदि तुम सच्चे हो तो तुम्हें भगवत् कृपा प्राप्त होगी।
विश्व प्रेम की अन्त में आत्म दर्शी ऋषि मुनियों की औपनिषानषदिक चेतनता अथवा अद्वैत निष्ठा या एकता में समाप्त होता है। साम्य अवस्था की प्राप्ति के लिए शुद्ध प्रेम बड़ा ही शक्ति सम्पन्न होता है। वह समानता और अंतदृष्टि प्राप्त करता है। मीरा, गौरंगी महाप्रभु, तुकाराम, रामदास, हाफिज, कबीर- इन सबने इस विश्व प्रेम का आस्वादन किया था। विश्व प्रेम के एक ही आलिंगन में सब भेद भाव और तुच्छ मायिक विभिन्नतायें भूल जाती हैं। प्रेम का ही साम्राज्य रह जाता है।
हम लोगों में ऐसे कौन हैं जो ईश्वर प्रेम या दिव्य प्रेम के यथार्थ स्वरूप को जानने के लिए सचमुच में विकल रहा करते हैं। हम लोग यही जानने के लिए उत्सुक रहा करते हैं कि आपका इम्पीरियल बैंक में कितना रुपया जमा है? हमारे विरुद्ध यह बात किसने कही? क्या आप जानते हैं कि मैं कौन हूँ? आपकी स्त्री तथा बच्चे कैसे हैं? मेरे प्यारे भाइयो! इन प्रश्नों को हम पूछते हैं किन्तु यह हम में से कितने लोग पूछते हैं कि “मैं कौन हूँ? यह संसार क्या है? बन्धन क्या है? मुक्ति क्या है? मैं कहाँ से आया हूँ? ईश्वर कौन है? ईश्वर के क्या गुण हैं? हमारा ईश्वर से क्या संबंध है? मोक्ष किस प्रकार मिले?”
सत्संगति अर्थात् साधुओं और भक्तों की संगति विश्व प्रेम बढ़ाने में बहुत ही सहायक है। साधुओं की गोष्ठी में भगवत् चर्चा ही होती रहती है तो हृदय और कानों को बहुत प्रिय होती है। जगाई मधाई का उद्धार और डाकू रत्नाकर के पाप पूर्ण जीवन से छुटकारा ये साधु सन्त के परम कल्याणकारी होने के ज्वलन्त दृष्टान्त हैं।
प्यारे मित्रो! खड़े हो जाओ। खूब संघर्ष करो, दृढ़ता से अग्रसर हो। अहंकार स्वार्थपरता अभिमान और घृणा को निर्मल करो। प्रेम करो। दान दो। सेवा करो। इस त्रैत को याद कर लो “दत्तं दया दम” अर्थात् दान दो। दया करो। इन्द्रियों का दमन करो।
इस बात का भी अभ्यास डालो कि जो सेवाएँ तुम करते हो उसके बदले में कृतज्ञता स्तुति और धन्यवाद पाने की आशा मत करो। प्रत्येक वस्तु को भगवान के चरण कमलों में भेंट चढ़ा दो। इस काम के लिए ही काम करना।”
एक सच्चे वैष्णव बन जाओ। पैर से कुचली हुई घास से भी विनम्र बनो, वृक्ष से भी अधिक सहनशील बनो। दूसरों से मान प्राप्त करने की चिंता न करो। प्रत्युत अन्य सबको मान दो। इसी मार्ग पर चलने से तुम्हें शान्ति प्राप्त होगी।
(श्री धर्मपालसिंह जी, बहादुराबाद)
आत्मा- परमात्मा का ही अंश है। उसमें अपने मूल उद्गम प्रभु के समस्त गुण मौजूद हैं। परन्तु वह मायिक अपवित्रता के बन्धनों में बँधकर जीव भाव को प्राप्त हो जाता है और जन्म मरण के कर्म भोगों के चक्र में फँसकर चौरासी लाख योनियों में घूमता रहा है।
यदि मल विक्षेपों की मलीनता को शुद्ध कर दिया जाय तो आत्म अपने वास्तविक स्वरूप में पहुँच जाता है। इसी को मोक्ष या मुक्ति कहते हैं। इसके लिए सब प्रकार की शुद्धि करने के लिए जो साधनाएँ करनी पड़ती हैं उन्हें मुक्ति मार्ग कहते हैं। भगवान् मनु ने शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा की शुद्धि के लिए जो उपाय बताए हैं वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं देखिए-
अद्भर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति मनः सत्येन शुद्धयति। विद्या तपोभ्याम भूतात्मा बुद्धि र्ज्ञानेनशुद्धयति।
अर्थात्- जल से शरीर, सत्य से मन, विद्या और तप से भूतात्मा तथा ज्ञान से बुद्धि शुद्ध होती है। सत्य क्या है? साधारण रूप से सत्य विचार सत्य व्यवहार और सत्य वचन से सत्य की परिभाषा की जाती है। वेदादि सत्शास्त्र भी मनुष्य को ‘सत्यं वद’ का आदेश करते हैं। माता-पिता तथा गुरुजन भी सन्तान को सत्य बोलने का उपदेश देते हैं। यह सब होते हुए भी पूर्ण सत्य का सेवी कोई विरला ही प्रभु का प्यारा होता है। इसका क्या कारण है? जो हम उपदेश सुनकर तथा अनेक बार व्रत लेकर सुखद मार्ग से विचलित हो जाते हैं? उत्तर- हमारी भोग शक्ति से लिप्त जन्मान्तरों के दूषित संस्कार हैं। सत्य का पुजारी होने के लिए इन दूषित संस्कारों का परिमार्जन करना होगा। यह परिमार्जन कैसे होगा? धर्माचरण रूप प्रभु की भक्ति से। भक्ति का अर्थ है सेवा और भक्त कहते हैं सेवक को। संसार में देखा जाता है कि जो सेवक स्वामी के आदेशों का पालन करता है उसका अनन्य उपाय करके कठिन से कठिन कार्य संपन्न कर देता है। उस पर मालिक की ममता पुत्रों से भी अधिक होती है। और स्वामी प्रसन्न होकर उसकी सारी दरिद्रता दूर कर उसे सब चिन्ताओं से मुक्त कर देता है। अतः शास्त्र वर्णित धर्म रूप में जो हमारे लिए प्रभु के आदेश हैं। उन प्रभु की सेवा और अपने कल्याण के लिए ज्ञान प्राप्त करना अति आवश्यक है। इसी पर नीचे कुछ लिखने का प्रयत्न किया जायेगा। महाराज मनु ने धर्म को दस लक्षणों में कह कर अनन्त धर्म सागर को गागर में भर दिया है। वह इस प्रकार है-
धृति क्षमा, दमोऽस्तेयम् शौचम् इन्द्रिय निग्रह। धी र्विद्या, सत्यम् अक्रोध दशकम् धर्मलक्षणम्॥
(1) धृति- का अर्थ है धैर्य। किसी प्रकार की आपत्ति आ पड़ने पर जो बहुधा सभी के जीवन में न्यूनाधिक आती रहती हैं उस समय मनुष्य जान और माल के नष्ट होने की आशंका से अत्यन्त कातर और भयभीत हो जाता है। ऐसे समय पर धर्म का आदेश है- घबराओ नहीं धैर्य रखो परमेश्वर सर्व व्यापक है, सर्वज्ञ हैं, रक्षक हैं, परम दयालु हैं, सब कुछ करने में समर्थ हैं, उनको पुकारो, उनकी कृपा से असम्भव भी सम्भव हो जाता है। तथा विवेक पूर्वक कर्त्तव्य का निश्चय करो।
(2) क्षमा- किसी से जब अपनी कोई वस्तु नष्ट हो जाती है अथवा कोई असहनीय अपराध बन जाता है तब मनुष्य अपराधी को दण्ड देकर अपना बदला लेने को उतारू हो जाता है। उस समय धर्म की आज्ञा है कि यदि तू बदला लेने की सामर्थ्य रखता है तो इसे क्षमा कर दे क्योंकि प्रभु ने तुझे क्षमा करने को ही शक्ति प्रदान की है। इस आचरण से तेरा यश चहुँ ओर फलेगा। हानि जो होनी थी वह तो हो चुकी वह बेचारा तो केवल निमित्त था।
(3) दम- का अर्थ है मन का रोकना। मन अति चंचल है इसमें तूफानी नदी की तरह सदैव वृत्तियों की तरंगें उठती रहती हैं। इसकी इस चंचल गति ने मनुष्य को उसके जीवन के चरम लक्ष ईश्वर प्राप्ति से वंचित कर रखा है। सारे जप, तप, ज्ञान, ध्यान, भजन, संध्या, पूजा, पाठ आदि इसी की चंचलता को एकाग्र करने के लिए किए जाते हैं। इसी को अभ्यास कहते हैं। संध्या करते समय मन्त्रों के अर्थ पर और इष्ट देव का ध्यान करते समय उनकी सुन्दर छवि पर बार-बार भागते हुए मन को लगाना चाहिये तथा उन विषयों और वस्तुओं को जिनका यह स्मरण करता है अनित्य, दुख रूप और स्थिर सुख में विघ्न रूप जान उनके प्रति वैराग्य करना चाहिये। क्योंकि कहा है कि स्वर्गलोक पर्यन्त तक के सुखभोग अनित्य और और जीवन मरण के चक्कर में ही फँसाने वाले हैं।
(4) अस्तेय- का अर्थ है चोरी न करना। जीविका उपार्जन के लिए उचित परिश्रम न करके दूसरों की मेहनत से प्राप्त वस्तुओं को उनकी बिना आज्ञा और प्रसन्नता से लेना चोरी है। मन द्वारा छल कपट के भाव भी मानस चोरी है। परन्तु जब मनुष्य परमेश्वर सत्ता को स्वीकार करके उसे सर्व व्यापक रूप में समझने लगता है। तो भगवत् कृपा से उसकी नीयत ठीक हो जाती है। तब वह मन वाणी और कर्म से दूसरे की वस्तु में अनुचित लोभ को त्याग देता है। ऐसा होने पर फिर उसे भोग्य वस्तुओं की कमी नहीं रहती। उसकी हिम्मत का ताला खुल जाता है।
(5) शौच- का अर्थ है पवित्रता, शुद्धि दो प्रकार की कही गई है। अभ्यन्तर और बाह्य। जल और मिट्टी से शरीर की शुद्धि तथा सात्विक कमाई से उत्पन्न पवित्रता पूर्वक पकाया हुआ अन्न, स्वच्छ वस्त्र बाह्य शुद्धि के अंग हैं। सत्य आदि धर्माचरण से अभ्यन्तर शुद्धि कही गई है।
(6) इन्द्रिय निग्रह- का अर्थ इन्द्रियों के भोगों में संयम लाना है। स्वाद के वशीभूत न होकर वीर्य रक्षा के लिए माँस, मदिरा, प्याज, लहसुन, अत्यन्त मिर्च मसाले युक्त गरिष्ठ भोजनों का त्याग जीभ का संयम है। अपनी विवाहिता पत्नी से सन्तान उत्पत्ति के लिए धर्मशास्त्र की आज्ञानुसार वीर्य रक्षा के महत्व को समझते हुए काम सेवन गुप्तेन्द्रिय का संयम है। गाली गलौज, गन्दे गाने व्यर्थ की बकवाद त्यागकर ईश्वर के नाम का जप, स्तुति, प्रार्थना युक्त भजन तथा विनीत, कोमल, सरल वाणी से दूसरों को मान देते हुए वार्तालाप करना वाक का संयम है। कानों से परनिन्दा तथा कुसंग की चर्चा त्याग कर भगवत् चर्चा, संत चरित्र चर्चा अर्थात् आत्म कल्याण चर्चा सुनना चाहिये। आँखों से गन्दे दृश्य, नाटक, स्वाँग तमाशे, सिनेमा आदि तथा पर स्त्रियों को कामुकता की दृष्टि से देखना त्याग कर सुन्दर प्राकृतिक दृश्य, भगवत् विग्रह सत्र, महात्माओं के चित्र तथा उनके दर्शन करने चाहियें। नाक अपवित्र माँस कबाब आदि की गन्ध से घृणा करे। तथा अति सुगन्धित इत्र, तेल आदि की गन्ध में भी आसक्त न हो क्योंकि ये कामोद्दीपन हैं। हाथ हिंसा, चोरी आदि को त्याग कर सेवा, परोपकार, यज्ञ, दान आदि पुण्य के कार्य करें।
(7) धी- का अर्थ है बुद्धि। मनुष्य बुद्धि रखने से प्राणियों में सर्व श्रेष्ठ प्राणी गिना जाता है हमें कब क्या करना चाहिए क्या न करना चाहिए इसे जानने के लिये तथा ईश्वर दर्शन के लिए, दिव्य, सूक्ष्म, सतगुणी, ऋतम्भरा प्रज्ञा की ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये तथा सात्विक आहार विहार द्वारा ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर शुद्धतापूर्वक अधिक से अधिक गायत्री का जप करना चाहिये।
(8) विद्या- दो वस्तुएँ हैं विद्या और अविद्या। ईशावास्योपनिषाद में कहा गया है कि जो लोग भोगों में आसक्त होकर उनकी प्राप्ति के लिए नाना प्रकार के अनुष्ठान करते हैं वे उन कर्मों के फलस्वरूप नाना प्रकार की योनि और भोगों को भोगने के लिए जन्म मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। यही अविद्या है। परन्तु बुद्धिमान ज्ञानीजन यज्ञ, दान, तप, सेवा, परोपकार आदि कर्मों को निष्काम भाव अथवा ईश्वर प्राप्ति के उद्देश्य से करके कर्मों के फल से सदैव के लिए मुक्त हो जाते हैं और अविद्या के द्वारा विद्या को प्राप्त कर लेते हैं। विद्या का अर्थ है ब्रह्म विद्या, अध्यात्म ज्ञान देने वाली विद्या। विद्या वही है जिससे बन्धन टूटे। यों तो संसार में सैंकड़ों प्रकार की विद्या हैं। जो सब बन्धन को जकड़ने वाली हैं। ब्रह्म विद्या की प्राप्ति के लिए जिज्ञासु को अध्यात्म के रहस्य जानने वाले गुरु की शरण जाना चाहिये। तथा उनके आदेशानुसार उनके बताये मार्ग का अनुकरण करना चाहिए। साधारणतः ज्ञान बढ़ाने के लिए अध्यात्म ज्ञान संबंधी ग्रन्थों का स्वाध्याय करते रहना चाहिये। अविद्या अर्थात् कर्म के रहस्य को जान कर विद्या के द्वारा अमृत पद प्राप्त करना चाहिए।
(9) सत्य- के बारे में पूर्व प्रकाश डाला जा चुका है- मन, कर्म, वचन से प्रिय यथार्थ चेष्टा सत्य है।
(10) अक्रोध- का अर्थ है क्रोध न करना- क्रोध का संबन्ध कान से है, मनुष्य कानों से अपनी निन्दा सुनकर अथवा मन अनुकूल कार्य में विघ्न कर्त्ता पर अत्यन्त क्रोधित हो प्राण तक ले लेना जैसा जघन्य कृत्य कर डालता है इसका कारण भोगा शक्ति अविद्या है। तथा साँसारिक वस्तुओं की अनित्यता को भूल जाना है क्रोध पर विजय पाने के दो मार्ग हैं ज्ञान और प्रेम (भक्ति) अपने को शरीर भाव में न देख सदैव आत्म भाव में देखना। आत्मा-निन्दा, स्तुति, अच्छे बुरे, दुख सुख के प्रभाव से रहित है। भक्ति द्वारा सब प्राणी मात्र में इष्ट देव की भावना करना क्रोध पर विजय पाने का सरल उपाय है। क्योंकि जब सब अपने इष्टदेव ही हैं तो फिर क्रोध किस पर किया जाय। उपनिषद् में भी यही कहा है कि जो मनुष्य सब प्राणियों में ईश्वर को देखता है वह कैसे किसी से घृणा द्वेष करता है।
सर्वतो मुखी शुद्धि के लिए यह धर्म के लक्षण अत्यन्त आवश्यक हैं। यदि हम अपने व्यावहारिक जीवन में इन दस ईश्वरीय नियमों का पालन करते रहें तो वह आत्मिक शुद्धि की एक साधना ही होगी और उसके द्वारा बन्धन से मुक्ति हो सकती है।
(श्री अगरचन्द नाहटा, बीकानेर)
आत्मीयता अर्थात् अपनेपन की अनुभूति। विश्व के प्रायः समस्त प्राणियों में आत्मीयता सहज स्वभाव के रूप में पाई जाती है पर उसके परिभाषा में काफी अन्तर रहता है, किसी में वह बहुत सीमित दिखाई देती है तो किसी किसी में वह असीम प्रतीत होती है। इसी प्रकार शुद्धि एवं घनी भूतता का भी अन्तर पाया जाता है। माता का पुत्र कैसा था, इसी प्रकार पारिवारिक-कौटुंबिक आत्मीयता होती है उसमें मोह एवं स्वार्थ रहने से उतनी शुद्धि नहीं होती जबकि सन्तों की आत्मीयता में यह दोष नहीं रहने से वह शुद्ध रहती है। किसी किसी के अपने पन की अनुभूति बहुत घनीभूत पायी जाती है तो किसी में वह साधारण होती है।
प्राचीन काल में मनुष्यों में सरलता व स्नेह बहुत अधिक मात्रा में होता था। वर्तमान में सरलता की बहुत कमी हो गई है और स्नेह भी दिखाऊ ज्यादा हो गया है। कपट एवं स्वार्थ की अधिकता हो जाने से आत्मीयता का बहुत ही ह्रास हो गया है। आज भी वृद्धि एवं भोले भाले ग्रामीण मनुष्यों का अन्तराल टटोलते हैं तो उनमें आत्मीयता का भाव गहरा प्रतीत होता है। मेरे अपने अनुभव की बात है। गौरीशंकर जी ओझा व पुरोहित हरि नारायण जी आदि की स्मृति होते ही उनकी आत्मीयता का दृश्य सन्मुख आ उपस्थित होता है। आदरणीय वयोवृद्ध भैरव दत्त जी आसोपा व रावत मल जी बोथरा आज भी जब कभी मिलते हैं हर्ष से गदगद हो जाते हैं। उनकी मुरझाई हृदय कली मानो खिल सी जाती है जिसकी अनुभूति उनके चेहरे से व वाणी से भली भाँति हो जाती है। यद्यपि मेरा उनसे वैसा निकटवर्ती पारिवारिक सम्बन्ध नहीं है। अपने 40 वर्ष तक के आयु वाले निकट सम्बन्धियों में भी मुझे वैसी आत्मीयता के दर्शन नहीं होते। कई वृद्ध पुरुषों को मैंने देखा है उनमें आत्मीयता का भाव इतना गहरा होता है कि वे मिलते ही हर्षातिरेक से प्रफुल्लित हो जाते हैं।
प्राचीन काल में संयुक्त परिवार की समाज व्यवस्था इसीलिए अधिक सफल हो पाई। आज तो सगे भाई तो न्यारे-न्यारे हों तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं पर पिता व माता से भी पुत्र अलग हो रहे हैं। वहाँ एक ही कुटुम्ब में पचास पचास व्यक्तियों का निर्वाह एक साथ हो सकता था आज दो भी प्रेम से साथ नहीं रह सकते, इसका प्रधान कारण आत्मीयता का ह्रास ही है। साथ न रह सकें तो हर जगह वे भले ही अलग अलग रहें पर एक दूसरे को देखने से प्रेम के स्थान पर द्वेष भाव जागृत हो उठता है तब गृहस्थ जीवन अशान्ति का साम्राज्य बने बिना कैसे रह सकता है?
ऐसी ही स्थिति से मानव मानव का शत्रु बनता है, गृह-कलह पड़ता है, यावत् बड़े-बड़े महायुद्ध उपस्थित होते हैं। विश्व की वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालने से यह बात दीपकवत स्पष्ट प्रतिभासित होती है। आये दिन महायुद्ध के बादल छाये हुए नजर आते हैं। आशंका तो प्रति समय बनी हुई है कब कौन किससे लड़ पड़े युद्ध छिड़ जाय। यदि आत्मीयता का भाव विस्तृत किया जाय तो यह नौबत कभी नहीं आने की। तब प्रति-पक्षी या विरोधी कोई रहता ही नहीं है। सभी तो हमारे भाई हैं यावत् हमारे सदृश ही चैतन्य स्वरूप आत्मा होने से हमसे अभिन्न हैं अतः किससे लड़ा जाय? उसका कष्ट अपना कष्ट है। उनकी बरबादी अपने ही एक अंग का विच्छेद है। इस भावना को अधिकाधिक प्रसारित करने से इन महायुद्धों का अन्त हो सकता है।
विश्व शान्ति की बात को एक बार अलग भी रखें पर भारत में ही अपने भाइयों के साथ कितने अन्याय व अत्याचार हो रहे हैं। हमारी अलगावादी भावना से ही पाकिस्तान का जन्म हुआ और लाखों व्यक्तियों को अमानुषिक अत्याचारों का शिकार होना पड़ा। उसे भी अलग रख कर सोचते हैं तो प्रान्तीयता व गुट, पार्टी व दलबन्दी से हमारा कितना नुकसान हो रहा है। इसका एक मात्र कारण आत्मीयता की कमी ही है। आज कालाबाजार, घूसखोरी, आदि अनीति का बोलबाला है इसमें भी वही अलगाव की वृत्ति काम कर रही है।
यदि हम एक दूसरे से अभिन्नता का अनुभव करने लगें तो कोई किसी को मनसा, वाचा, कर्मणा दुख दे ही नहीं सकता। क्योंकि हमारे से भिन्न तो कोई है नहीं। उनका दुःख हमारा दुःख है। हरेक व्यक्ति यदि ऐसी आत्मीयता व अपनेपन का भाव रखे तो विश्व की समस्त अशान्ति विलोप हो जाय और सुख-शान्ति का सागर उमड़ पड़े। आखिर प्रत्येक मनुष्य जन्मा है तो वह मरना अवश्य है। तो थोड़े से क्षणिक जीवन के लिए अपने ही आत्मस्वरूप प्राणी मात्र को कष्ट क्यों पहुँचाया जाय? खुद शान्ति सी जीओ और प्राणी मात्र को सुखपूर्वक जीने दो, यही हमारा सनातन धर्म है। भारत का तो यह आदर्श ही रहा है कि-
आयं मम परो वेत्ति, गणनाहि लघु चेतसा। उदार चरितानाँतु, वसुधैव कुटुम्बकम्॥
अर्थात्- ये मेरा, ये तेरा, यह भाव तो क्षुद्र वृत्ति के मनुष्यों का लक्षण है उदार चरित्र व्यक्तियों के लिए तो समस्त विश्व ही अपना कुटुम्ब है।
भारतीय दर्शनों में विशेषतः जैन दर्शन में तो आत्मीयता का विस्तार मानव तक ही सीमित नहीं रख कर पशु पक्षी यावत् सूक्ष्मातिसूक्ष्म जन्तुओं के साथ भी स्थापित करते हुए उनकी हिंसा का निषेध किया गया है। अहिंसा की मूल भित्ति इसी भावना पर खड़ी है कि जैसे दूसरों के बुरे व्यवहार से मुझे दुःख होता है वैसा ही व्यवहार मैं दूसरों के साथ करता हूँ तो उसे भी कष्ट हुए बिना नहीं रहता।
अतः उसे कष्ट देना अपने लिए कष्ट मोल लेना है। जो मुझे अप्रिय है वैसा व्यवहार दूसरे के साथ भी नहीं किया जाय। वास्तव में वह भी मेरा अपना ही रूप है। अतः आत्मीय है।
भारतीय महर्षियों का यह आदर्श वाक्य हमारे हृदय में अंकित हो जाना चाहिये।
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषा न समाचरेत्।”
जीवन के प्रत्येक कार्य करते समय इस महावाक्य की ओर हमारा ध्यान रहे। ईश्वर को सृष्टि कर्ता मानने वाले दर्शन जीव जगत को उस परमात्मा का ही अंश मानते हैं। सभी प्राणियों में वह एक ही ज्योति प्रकाशित हो रही है। अतः उसमें से किसी को कष्ट देना परमात्मा को कष्ट देना होगा।
भारतीय मनीषी सब जीवों को अपने समान मान कर ही नहीं रुके उनकी विचारधारा तो और भी आगे बढ़ी और सब जीवों में परमात्मा के दर्शन करने तक पहुँच गये। एक दूसरे से अलगाव का तो प्रश्न ही कैसे उठ सकता है। अपितु व साथ मैत्री होती है। वर्त्तमान में हमारी आत्मीयता इने-गिने व्यक्तियों तक सीमित होने से संकुचित है उसे उदार भाव द्वारा विस्तृत कर जाति, नगर, देश यावत् राष्ट्र व विश्व के प्रत्येक प्राणी के साथ (आत्मीयता-अपनेपन का) विस्तार करते जाना है यही शान्ति का सच्चा अमोघ प्रशस्त मार्ग है।
हमारे तत्वज्ञों ने धर्म की व्याख्या करते हुए लक्षण बतलाते हुए जिससे अभ्युत्थान व निश्रेयस्र प्राप्त हो वही धर्म है कहा है। अतः आत्मीयता का विस्तार वास्तव में हमारा आत्म स्वभाव या धर्म हो जाना चाहिए। अलगाव भेदभाव को मिटाकर सब में अपनेपन का अनुभव कर तदनुकूल व्यवहार करें तो सर्वत्र आनन्द ही आनन्द दृष्टिगोचर होगा। उस आनन्द के सामने स्वर्ग के माने जाने वाले सुख कुछ भी महत्व नहीं रखते। एक दूसरे के कष्ट को अपना ही दुःख समझकर दूर करें व एक दूसरे के उत्थान को अपना उत्थान समझते हुए ईर्ष्या न होकर हमें हर्ष हो। एक दूसरे को ऊँचा उठाने में हम निरन्तर प्रयत्न करते रहें इससे अधिक जीवन की सफलता और कुछ हो नहीं सकती।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
महात्मा कन्फ्यूशियस ने कहा है- “महान व्यक्ति जो चीज ढूँढ़ते हैं, वह अपने अन्दर ही तुम्हें प्राप्त हो जाती है, जबकि कमजोर दूसरों का मुँह ताका करते हैं।” नियम का आदर्श है- “मनुष्य की दो शिक्षाएँ होती है। प्रथम वह जो अपने गुरुजनों या संसार से प्राप्त करता है, दूसरी वह जो चल कर अपने अनुभवों से संचित करता है।
चाहे व्यापार हो, खेल, कानून, प्रेम या महत्ता के लिए उद्योग, आपको यह बात गाँठ बाँध लेना चाहिये कि वह स्वयं अपने बल बुद्धि एवं उद्योग द्वारा ही अर्जित की जा सकती है संसार की सर्वोत्तम शिक्षा वह है, जो मनुष्य स्वयं सतत संसार एवं समाज में संघर्ष द्वारा प्राप्त करता है। आत्म निर्भर ही सर्वत्र पूजा जाता है। एक विद्वान ने लिखा है- “नौजवानों ! याद रखो, जिस दिन तुम्हें अपने हाथ, पैर और दिल पर भरोसा हो जायगा, उसी दिन तुम्हारी अन्तरात्मा कहेगी- बाधाओं को कुचल कर तू अकेला चल, अकेला। सफलता का शीतल आँचल तेरे माथे का पसीना पोंछने के लिए दूर हवा में फहरा रहा है।”
जिन व्यक्तियों पर तुमने आशा के विशाल महल बना रखे हैं, वे कल्पना के व्योम में विहार करने के समान अस्थिर, सारहीन, खोखले हैं। अपनी आशा को दूसरों में संश्लिष्ट कर देना स्वयं अपनी मौलिकता का ह्रास कर अपने साहस को पंगु कर देना है। जो व्यक्ति दूसरों की सहायता पर जीवन यात्रा करता है।
वह शीघ्र अकेला रह जाता है। अकेला रह जाने पर उसे अपनी मूर्खता का ज्ञान होता है।
आपकी शक्ति और सुख आप में ही है-
जो अपना सुख और प्रसन्नता दूसरों से चाहता है, उनके सुख में सुखी, उनकी नाराजगी में अन्त व्यस्त हो जाता है, वह जीवन भर दूसरों की गुलामी में फँसा रहता है। दूसरों के आदेश में हर्ष, प्रसन्नता, घृणा, क्रोध, उद्वेग का अनुभव करने वाला व्यक्ति उस बच्चे की तरह है जो दूसरे की गोदी से उतरना नहीं चाहता।
मनुष्य के सुख, साहस, उत्साह, प्रफुल्लता का केन्द्र किसी बाह्य सत्ता में नहीं है। बाह्य वस्तुओं की ओर निरन्तर दौड़ने और उनसे किसी प्रकार की सहायता या प्रेरणा की आशा रखना मृग मरीचिका मात्र है। सोचिए, आज जिस व्यक्ति की प्रसन्नता से आप भावी जीवन के सुख स्वपन् निर्मित कर रहे हैं, यदि कल वह आपसे मुख मोड़ ले, अनायास ही क्रुद्ध हो जाय, या चल बसे, तो आपका सुख कहाँ जायगा? दूसरे को अपने जीवन का संचालक बना देना ऐसा ही है, जैसा अपनी नौका को एक ऐसे प्रवाह में डाल देना, जिसके अन्त का आपको कोई ज्ञान नहीं।
अकेले चलना पड़ेगा-
संसार में दो व्यक्ति एक सी रुचि, एक स्वभाव, एक दृष्टिकोण या विचारधारा के कभी भी नहीं रहे हैं। जितने मस्तिष्क उतने ही उनके सोचने विचारने के ढंग, रहने की नाना पद्धतियाँ, पोशाक पहनने के तरीके। भोजन सबका भिन्न भिन्न है। एक सरल सीधे खाद्य पदार्थों में, सूखी रोटियों में मधुर स्वाद लेता है, तो दूसरे को मिर्च मसाले से परिपूर्ण नाना शृंगारिक उत्तेजक भोजन प्रिय है एक ठण्डा जल पीकर आन्तरिक शान्ति का अनुभव करता है, तो दूसरा बर्फ से युक्त सोडा, लैमन, शरबत, ठण्डाई या मद्यपान चाहता है। एक सात घण्टे सोकर नया जीवन लेता है, दूसरा दस घण्टे पलँग तोड़ता है। संक्षेप में, संसार विभिन्न तत्वों, मन्तव्यों तथा जीवन दर्शन वाले व्यक्ति समूहों से विनिर्मित किया गया है। फिर किस प्रकार आप अपनी योग्यता, अभिरुचि अथवा साम्य विचारधारा का व्यक्ति पाने की आशा कर रहे हैं? नहीं, कदापि नहीं। आपको अपने जैसा व्यक्ति कदापि प्राप्त न होगा! आपको जीवन- पथ पर अकेला ही अग्रसर होना पड़ेगा। कोई आपके साथ दूर तक न चल सकेगा। अकेले चले चलिये।
जीवन को एक यात्रा मानिए। यात्रा में एक दो अल्पकालीन संगी साथी आपको प्राप्त हो गए हैं। इनसे चार दिन के लिए आप बोलते बरतते हैं, हँसी ठट्ठा, संघर्ष छीना झपटी चलती है। साथ साथ कुछ समय तक आगे बढ़ते हैं, किन्तु धीरे-धीरे उनकी जीवन-यात्रा समाप्त होती चलती है। एक के पश्चात दूसरा अपने गन्तव्य स्थान पर, वे रुक कर आपको छोड़ते चलते हैं। आपके साथ अभी छः सात व्यक्तियों का परिवार साथ था। सात में से छः रह जाते हैं और फिर क्रमशः आप अकेले ही रह जाते हैं। “अरे, मैं अकेला रह गया, बिलकुल अकेला”- आपका मन कुछ काल के लिए अशान्त सा हो उठता है। उसमें एक कड़वाहट सी आ जाती है। पर वास्तव में जीवन का यह अकेलापन ही मानव-जीवन का चरम सत्य है।
सबको पाकर भी हम सब अकेले हैं, नितान्त अकेले! हमारे साथ कोई भी दूर तक चलने वाला नहीं है। जिन्हें हम भ्रम माया वश अपने साथ चलता हुआ समझते हैं, वास्तव में वे हमारे अल्पकालीन सहयात्री मात्र हैं। हमारे अकेलेपन में कोई भी हाथ बंटाने, दिलासा देने वाला नहीं है। हम अकेले आये, अकेले मृत्यु पर्यन्त चलते रहे, अकेले ही निरन्तर बढ़ते रहेंगे। हम अपने दोनों पाँवों पर ही चलना है, हमें अपने दोनों हाथों का ही सहारा हो सकता है।
नित नए नए रूप बनाकर मनुष्य इस अकेलेपन को विस्मृत करने का उद्योग करता है। भीड़-भाड़ से भरे हुए विशाल नगरों में निवास करता है, सिनेमा, थियेटर, दौड़, खेल इत्यादि देखता है, अपने परिवार इष्ट मित्रों की संख्या में विस्तार करता है। किन्तु वह मूर्ख नहीं जानता, इस माया चक्र से वह स्वयं ही उलझन में फँस रहा है। सूखी रेत से स्निग्धता की आशा रखता है, बालू में से तेल निकालना चाहता है, हवा में किले बनाना चाहता है। दूसरों के बल पर चलने, उनसे आशा उत्साह प्रेरणा या सहायता चाहने का यह माया जाल मृग मरीचिका नहीं तो क्या है?
अकेलेपन से भयभीत न हों!
ईश्वरीय ज्योति के पुण्य मानव! तू अकेला चल! बियाबान जंगल अथवा भीड़भाड़ से युक्त नगर प्रान्त में सर्वत्र अकेला चल। अकेलेपन से तुझे भयभीत नहीं होना है। महान व्यक्ति सदैव अकेले चले हैं, और इस अकेलेपन के कारण ही दूर तक चले हैं। अकेले व्यक्तियों ने अपने सहारे से ही संसार के महानतम कार्य संपन्न किए हैं। उन्हें एक मात्र अपनी ही प्रेरणा प्राप्त हुई है। वे अपने ही आन्तरिक सुख से सदैव प्रफुल्लित रहे। दूसरे से दुख मिटाने की उन्होंने कभी आशा न रखी। निज वृत्तियों में ही उन्होंने सहारा देखा। अपने दो पाँवों के बल पर ही उन्होंने समग्र यात्रा पूर्ण की। अकेलेपन से घबराना नहीं है, प्रत्युत अपने पाँवों को वहन करने, संघर्ष करने के लिए पुष्ट करना है मानव अकेला चल। अकेला अपनी यात्रा को सफल बना।
अकेलापन जीवन का चरम सत्य है। किन्तु अकेलेपन से घबराना, जी तोड़ना, कर्त्तव्यपथ में हतोत्साहित या निराश होना सबसे बड़ा पाप है। अकेलेपन से मत घबराइये। अकेलापन आपके निजी आन्तरिक प्रदेश में छुपी हुई महान शक्तियों को विकसित करने का साधन है। अपने ऊपर आश्रित रहने से आप अपनी उच्चतम शक्तियों को खोज निकालते हैं। जितना ही आप अपनी शक्तियों से कार्य लेते हैं, उतना ही उनकी अभिवृद्धि या विकास होता है। अपने हाथ पाँव, मस्तिष्क, शरीर इत्यादि से कार्य लेना अपने पाँवों पर चलना अपनी गुप्त शक्तियों को खोज निकालना है। अतः अकेलेपन में निराशा के लिए, कायरता के लिए, संसार से भाग कर एक कोने में छिप जाने के लिए कोई स्थान नहीं है। अकेले हैं, तो डरें नहीं। हतोत्साहित न हों। वरन् अपनी ही शक्तियों का इस मर्यादा तक विकास करें कि दूसरों के आश्रय की आवश्यकता न पड़े।
आत्मशक्ति जागृत करने के संकेत
दूसरों का आश्रय त्यागकर स्वयं अपनी गुप्त शक्तियाँ जागृत करने के लिए संकेत या सजेशन का प्रयोग किया कीजिए। प्रतिदिन सायंकाल अथवा प्रातःकाल शान्तचित्त हो एकान्त स्थान में नेत्र मूँद कर दृढ़ता से निम्न वाक्यों का पुनः पुनः उच्चारण कीजिए।
“मैं अकेला होते हुए भी शक्तिशाली हूँ। मेरे अन्दर वह शक्ति है, जो स्वतंत्रता पूर्वक कार्य कर सकती है। मैं दूसरों का अनुगामी न बनूँगा। मैं कभी दूसरों का अनुकरण न करूंगा। मैं अपनी महत्ता और प्रतिभा का प्रभाव दूसरों पर डाल सकता हूँ। मुझ में विशेषता है, निजी मौलिकता है। सच्ची शक्ति मेरे भीतर विद्यमान है। मुझे अपनी शक्तियों पर पूरा भरोसा है। मैंने अकेले ही सफलता प्राप्त करने की दृढ़ प्रतिज्ञा की है। मेरी प्रतिज्ञा दृढ़ व अटल है।”
सत्य, सरलता, क्रोध का त्याग, इन्द्रियों का दमन, शम, पर सन्तोष न करना, अहिंसा, पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, ये ही गुण पुण्यात्मा पुरुषों के पुरुषार्थ लाभ या अभ्युदय के साधन हैं।
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शरीर के रोगों को दूर करने के लिए आनन्द प्रद और सुखमय विचार से अधिक लाभकारी औषधि कोई नहीं है। शोक और क्लेश को हटाने के लिए अच्छे विचारों से अधिक प्रभावशाली कोई उपाय नहीं है।
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दाता की परीक्षा दुर्भिक्ष में, वीर की युद्ध में, मित्र की आपात काल में, स्त्री की पति की अशक्त स्थितियों में, अच्छे कुल की विपत्ति में, प्रेम की परोक्ष में, और सत्य की परीक्षा संकट के समय होती है।
(श्री हरिनारायण जी महतारे, बी. ए.)
यूनान के एक दार्शनिक का कथन है कि हम इसलिए दुःखी नहीं हैं कि, वास्तव में हम दुखी हैं, वरन् इस कारण दूसरा ज्यादा सुखी है, इस कारण हम दुखी हैं- कहावत है कि, शहर के अँदेशे से काजी जी दुबले हैं, यानी उनको अपनी स्वयं की घरेलू चिन्ताओं के बारे में परेशानी ही हैं।
अधिकतर प्रत्येक मानव का यह सहज स्वभाव बन गया है कि वह स्वयं की ओर न देखकर-पड़ौसी की ओर, इसलिये ताकता है कि, वह कहाँ कहाँ भूलें करता है, उसमें कौन कौन सी बुराइयाँ हैं, उसका अहित किस प्रकार हो सकता है, उसके जीवन को कटु कैसे बनाया जा सकता है, आदि-2 विघ्न सन्तोषी वृत्ति के कारण हम व्यग्र हैं- चिन्तित परेशान हैं, अगर भगवान भरोसे कहीं सात्विक भावना बस, हमें उसके दुर्गुणों को दूर करने की सूझ आ जावे, तो सुधार के हेतु नहीं वरन् प्रचार के हेतु जरूर ही- इस प्रकार उपदेश उसे करेंगे जैसे हम बड़े सुधारक हों- हम इस कहावत को चरितार्थ कर डालेंगे कि “पाँव तले की आग सूझे नहीं मूरख को कहत तेरे सिर पर बरत हैं।’
हमने अपना बाह्य ही देखा- अभ्यन्तर नहीं, बाहर घूमे घर को तलाश नहीं किया- घर अंधेरा है, पर मस्जिद में चिराग जरूर जलाने दौड़े-हम क्या करते हैं, क्या हमें मालूम है परन्तु यह ध्यान जरूर रखा कि साथी क्या करता है। परिणाम-इसका भयावह निकला-दियासलाई ने दीपक को जलाने में स्वयं का मुँह जरूर जला किया। परन्तु स्वयं जल गई। जिसकी निन्दा की गई वह उन्नत हुआ। निंदक अवनत-निन्दक का पतन हुआ परन्तु जिसकी निन्दा की गई उसका उत्थान-किसी कवि ने कितना अच्छा कहा है-
“निन्दक नियरे राखिये- आँगन कुटी छवाय”। बिना पानी, सावन बिना नियरे करे सुहाय॥
अवगुण देखने की ओर एक मर्तबा दृष्टि गई फिर उसका अपने मार्ग को छोड़ना दुष्कर हुआ। जन्म की आदत छूटना कठिन होता है, हमें चारों ओर बुराई ही बुराई दीखने लगी, हम यहाँ तक बढ़े कि भगवान की सृष्टि में भी अवगुण दिखाई दिए। अचानक बोल उठे काँटों वाले गुलाब को देखकर, वास्तव में भगवान ने बड़ी भारी भूल कर डाली कि-सुन्दर गुलाब के पुष्प के झाड़ को कंटकों से युक्त बना दिया। कितना सुन्दर, मनमोदक फूल और साथ ही में अनेक काँटों से घिरा हुआ? तुरन्त ही पास खड़े ज्ञानी का उत्तर मिला- भले आदमी “तेरा दृष्टि दोष है, अखिलेश की महानता को तो देख, उसने काँटों में फूल दिया” केवल अपना गलत दृष्टिकोण सुधार लें। बाहर कुछ नहीं है, जो कुछ है सो भीतर है। वही तो बाहर प्रतिबिम्बित होता है। यह सम्पूर्ण सृष्टि का आदि स्रोत, उद्गम स्थान तो मानव का हृदय स्थल ही तो है। वेद की ऋचा इसका ज्वलन्त प्रमाण दे रही है।
“तन्मे मनः शिव संकल्प मस्तु”
प्रत्यक्ष जो दिखाई देता है, वह प्रथम हमारे मन में कल्पना के रूप में, बीज रूप में निहित था, और उसका स्थूल साकार रूप संसार के नाम से हमारे चारों ओर फैला हुआ है। आदि काल से मानव हृदय की आन्तरिक अनुभूतियों का प्रत्यक्ष प्रमाण हम वर्तमान में दुनिया के नाम से सम्बोधित कर रहे हैं। खूब समझ लें, दूसरा वही है, जो कि आप अपने भीतर हैं, आप अपना ही प्रतिबिम्ब देख रहे हैं।
उपरोक्त कथन की सत्यता की साक्षी श्री मद्भागवत की कथा पूर्व अंशों में दे रही है। भगवान कृष्ण ने एक समय दुर्योधन को यह आदेश दिया कि वह संपूर्ण भारतवर्ष में स्वयं घूम कर सच्चरित्र, पवित्र आत्मा तथा परोपकारी व्यक्ति को लावें, तथा इस महान कार्य के हेतु छः माह की अवधि दी गई तथा युधिष्ठिर को (धर्मराज) को इसी अवधि के अंतर्गत एक महान पतित, दुष्ट तथा अन्यायी व्यक्ति को खोज वाने को कहा गया- निश्चित अवधि के बाद दुर्योधन ने आकर, महान दुःख प्रगट करते हुए कहा- कि संपूर्ण भारत में मुझे एक भी भला मानस दिखाई न दिया- अतः लाचार हूँ, क्षमा करें। धर्मराज ने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुये भगवान से क्षमा चाही। कि वे बड़े परेशान हैं सम्पूर्ण देश भर में एक भी बुरा व्यक्ति नहीं।
कितना तर्क स्पर्शी कथानक है। ज्वलन्त प्रमाण है। मनुष्य की आभ्यन्तरिक दशा का। हम बहिर्मुख हो चुके हैं, अंतर्मुख होना पड़ेगा। जब ही हमारा कल्याण होगा, अन्यथा कठिन है।
स्वामी रामदास जो कि प्रसिद्ध ज्ञानी हो गए हैं। उनका कहना था- “क्या हमारी वाणी परोपदेश तक ही सीमित रहेगी? क्या अपने कथन को, हम आचरण में उतारने का प्रयत्न नहीं कर पावेंगे? फिर बकवाद करना निरर्थक है।” राम का नाम उतना महत्व नहीं रखता, जितना कि राम ने जो काम किया है, वह अपना लिया जावे।
परोपदेशे पंडित्यं सर्वेषाँ कुशलंनृणाम। धर्मस्वीय मनुष्याणाम् बुद्ध देवे न दर्शिता॥
भगवान गौतम बुद्ध का नाम अमर इसलिए हुआ कि उन्होंने अपने कथन को करणी द्वारा सिद्ध किया था। मन, वचन तथा कर्म जब एक होते हैं, तभी मनुष्य समाज में आदर पाता है। परोपदेश पर, कविकुल चूड़ामणि तुलसीदास ने भी बड़ा मार्मिक विवेचन किया है, वे कह गये हैं-
पर उपदेश कुशल बहुतेरे। जे आचरहिं तेनर न घनेरे॥
अतः हमारा सर्वोपरि महान उत्तरदायित्व होता है कि हम अपने कथन को करनी में आत्मसात करें, मन की पवित्रता को प्राथमिकता दें। विश्व बन्धु बापू के कथन का ध्यान रखें। “सबके भले में अपना भला” इस अमर वाक्य को स्वर्णाक्षरों में लिख कर लगावें। हमारा दृष्टिकोण अंधकार को नहीं, सर्वदा प्रकाश को देखे। अधिकार के पहले कर्त्तव्य को स्थान दें, बुराई को भलाई से बदल दें। जब हम अपनी सम्पूर्ण अनुभूति मंगल की ओर मोड़ देंगे, अमंगल दूर भाग जावेगा। भावना और कर्त्तव्य ऊँचा होने पर तुम छोटे से बड़े, क्षुद्र से महान बन जाओगे।
भगवान हमें सर्वदा शुभ की ओर ही देखने का स्वभाव दे, सत्गुण को देखना हम सीखें और सत्विचार करना सीखें, तब चहुँ ओर शुभ ही शुभ तथा मंगल ही मंगल है।
(श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए., लखनऊ)
ईश्वर सर्व शक्तिमान है और उसकी इस अपार शक्ति का एक मात्र आधार प्राणी मात्र में फैला हुआ इसके प्रति विश्वास है। जीवन संघर्ष में चकित एवं पराजित सैनिक भी अपने आपको ईश्वर के सहारे छोड़ कर एक प्रकार की निश्चिन्तता का अनुभव करने लगता है। मन्दिर में मनौती मान लेने के बाद साधक को अपने कार्य की सफलता सुलभ प्रतीत होने लगती है। देयता का प्रसाद मान कर विद्यार्थी परीक्षाफल के विषय में आशावादी हो जाता है। इस प्रकार अच्छे के प्रति विश्वास ही उसे कर्म क्षेत्र में नवीन प्रेरणा एवं नूतन चेतना प्रदान करता है और इस जागरण के फलस्वरूप ही जो सफलता प्राप्त होती है इसका ही श्रेय ईश्वर को विकसित विश्वास पात्र शक्तिशाली बनाता है।
विश्वास का उदय अनेक तत्वों के सम्मिश्रण से होता है। जो चित्तवृत्तियाँ विश्वास का बीज रोपण करती हैं उनमें संस्कार सबसे प्रधान है। यह संस्कार हमारी साँस्कृतिक सम्पत्ति है। देवता, गुरु, ब्राह्मण आदि के प्रति स्वाभाविक आस्था इसी के अंतर्गत आती है। संस्कार द्वारा जगाया हुआ यह विश्वास का बीज व्यक्तिगत साथियों के अथवा श्रुति अनुभवों द्वारा पोषित होकर यथा समय पुष्पित और फलित होता है, अथवा कटु अनुभवों के फलस्वरूप समूल नष्ट हो जाता है, जैसे जैसे हमारा विश्वास बढ़ता जाता है, हमारा विश्वास पात्र विकसित शक्तिशाली होता जाता है। क्रमशः विकास पाने वाले विश्वास विचार, चिंतन एवं आदर्श पर आश्रित होते हैं तथा अधिक स्वस्थ होते हैं। एक साथ उत्पन्न होकर दिन दुगुना और रात चौगुना वृद्धि पाने वाला विश्वास लिप्सा, वासना अथवा जिज्ञासा का आधार पाता है। वह निर्बल होता है और अधिक काल जीवित नहीं रह पाता। कुछ विचारकों का विश्वास है कि प्रथम कोटि के विश्वास का क्षेत्र सज्जन हैं तथा द्वितीय कोटि के विश्वास के दुर्जन अधिकारी होते हैं।
एक बार उदित हो जाने के बाद विश्वास की रक्षा करने का प्रश्न उठता है। स्वयं विश्वास से ही विश्वास की रक्षा होती है। अपना विश्वास हिल जाने के बाद दूसरा व्यक्ति विश्वास का पात्र नहीं जान पड़ता। व्यावहारिक सिद्धान्त यह है कि हमें अपने विश्वास को कच्चे सूत का धागा नहीं बनाना चाहिए कि हम उसे खेल खेल में तोड़ डालें। एक सच्चा विश्वास उत्पन्न होकर ह्रास को प्राप्त नहीं होता और यदि स्थिति की ऐसी विषमता हो ही जावे तो हमें अत्यन्त सोच समझ कर निर्विकार वस्तु का विश्लेषण करके अपना निर्णय करना चाहिये।
दूसरी के प्रति विश्वास का आधार अंशतः आत्म विश्वास भी है। आत्म विश्वास आत्मा को सबल बनाता है और सबल आत्मा लोक-धर्म का स्पष्ट एवं निष्पक्ष निरूपण करती है। आत्म विश्वास से वंचित होकर व्यक्ति न तो दूसरों का ही विश्वास पात्र रह सकता है और न दूसरों पर विश्वास करने की क्षमता ही पा सकता है। माना व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए आत्म विश्वास का धरातल अत्यन्त आवश्यक है। आत्म-विश्वास व्यापक जीवन-दर्शन का केन्द्र बिन्दु है।
लौकिक जीवन में हमारे संबंधों की स्थिरता पारस्परिक विश्वास पर ही अवलम्बित रहती है। यह पारस्परिक विश्वास ही हमारे जीवन को आनन्द प्रदान करता है और यह आनन्द ही व्यक्तियों के बीच का चुम्बक है। पारस्परिक विश्वास से वंचित रहकर संबंध केवल दिखावा मात्र ही रह जाते हैं। इस दिखावे में मानवीय तत्वों का सर्वथा अभाव रहता है और यह वस्तुतः आत्म प्रवञ्चना के रूप में हमारे सम्मुख आता है। वर्तमान जीवन के कण कण में व्याप्त असन्तोष, अतृप्ति, छल, विडम्बना, कलह, द्वेष, उद्विग्नता, पारस्परिक विश्वास करने वाले व्यक्ति स्वयं कभी भी विश्वास के भागी नहीं हो पाते।
हम अपने दैनिक जीवन में जिन व्यक्तियों पर विश्वास करते हैं, वे हमारे लिए सब प्रकार के सहायक, उपयोगी एवं श्रद्धा के पात्र होते हैं। विश्वास प्रायः सम्मान भावना से इस प्रकार लिपटा रहता है कि उसे किसी प्रकार भी उससे पृथक नहीं किया जा सकता। विश्वास का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिये जिस व्यक्ति के प्रति हम विश्वास करें उसे हम अपने से श्रेष्ठ मानें। उसके प्रति हमारा विश्वास आत्म समर्पण के रूप में हो आदान-प्रदान अथवा व्यापार के रूप में नहीं। यद्यपि विश्वास की कल्पना प्रेम के समान एकाँगी हो पाती फिर भी विश्वास के प्रतिफल में हम साधारणतः स्नेह और कृपा के ही अधिकारी हो सकते हैं।
इस युग में संघटन शक्ति है और संघटन के लिये पारस्परिक विश्वास अनिवार्य है। यदि राष्ट्र के नागरिक परस्पर एवं राज्य के प्रति विश्वास नहीं कर पाते तो शक्तिशाली राष्ट्र की कल्पना तक नहीं की जा सकती। जाति पाँति, धर्म अथवा वर्ग के आधार पर विभाजित देश पारस्परिक विश्वास खोकर निर्बल एवं आत्म-द्रोही बन जाता है। साम्राज्यवादी राज्यों ने “आपस में फूट डालो तथा राज्य करो” के आधार पर ही शासित देशों को शताब्दियों तक निर्बल बनाकर उन पर अपना अधिकार बनाये रखा है। परिवार तथा समाज के संघटन का आधार भी यह विश्वास ही है।
विश्वास मानव का अधिकार, स्वत्व, कर्त्तव्य एवं ज्ञान है। पशु यद्यपि इससे सर्वथा वंचित नहीं रहते फिर भी अधिक मात्रा में इसके अधिकारी नहीं होते। विश्वास का प्रत्येक काम आत्मा को प्रकाश की एक नवीन किरण प्रदान करता है और आत्म विश्वास की चरम स्थिति पर आकर व्यक्ति ज्योतिर्मय होकर ब्रह्म में लीन हो जाता है। इसी स्थिति पर ‘जल में कुम्भ कुम्भ में जल है’ का अनुमान लगता है और महादेवी के शब्दों में- मैं तुम में हूँ एक, एक हैं जैसे रश्मि प्रकाश’ की आत्मचेतना प्राप्त होती है।
अतः अपने नित्य के जीवन में हम छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति छोड़ कर विश्वास को अपना अवलंब बनायें। इसके द्वारा उपार्जित शक्ति को बहुजन हिताय व्यय करें और थोड़े ही समय में हमें आत्म संतोष का जो दैवीय अनुभव होगा वह हमारे जीवन में जय और जागृति का परक एवं जनक होगा।
विश्वास से फल मिलता है और यदि हमें किसी प्रकार का भी फल पाना है तो विश्वास को ही अपना अवलंब बनायें।
(प्रो. लालजी राम शुक्ल)
मनुष्य का आध्यात्मिक विकास सदा कठिनाइयों से लड़ते रहने से होता है। जो व्यक्ति जितना ही कठिनाइयों से लड़ता है, वह उतना ही अपने आपको निकम्मा समझता है और जो उन्हें जितना ही आमन्त्रित करता है वह अपने आपको योग्य बनाता है। मनुष्य जीवन की सफलता उसकी इच्छा शक्ति के बल पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति जितना ही यह बल रखता है वह जीवन में उतना ही सफल होता है। इच्छा शक्ति का बल बढ़ाने के लिए सदा कठिनाइयों से लड़ता रहना आवश्यक है। जिस व्यक्ति का कठिनाइयों से लड़ने का अभ्यास रहता है वह नयी कठिनाइयों के सामने आने से भयभीत नहीं होता, वह उनका जमकर सामना करता है। कायरता की मनोवृत्ति ही मनुष्य के लिये अधिक दुःखों का कारण होती है। शूरवीर की मनोवृत्ति ही दुःखों का अन्त करती है। निर्बल मन का व्यक्ति सदा अभद्र कल्पनाएँ अपने मन में लाता है। उसके मन में भली कल्पनाएँ नहीं आती। वह अपने आपको चारों ओर से आपत्तियों से घिरा पाता है। अतएव अपने जीवन को सुखी बनाने का सर्वोत्तम उपाय कठिनाइयों से लड़ने के लिए सदा तत्पर रहना ही है।
मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्धमोक्षयोः।
मनुष्य की कठिनाइयाँ दो प्रकार की होती हैं-
एक बाहरी और दूसरी आन्तरिक अर्थात् भीतरी। साधारण मनुष्य की दृष्टि बाहरी कठिनाइयों की ओर ही जाती है, बिरले ही मनुष्य की दृष्टि भीतरी कठिनाइयों को देखने की क्षमता रखती है। पर वास्तव में मनुष्य की सच्ची कठिनाइयाँ आन्तरिक हैं, बाहरी कठिनाइयाँ आन्तरिक कठिनाइयों का आरोपण मात्र हैं। किसी भी प्रकार की परिस्थिति मनुष्य को लाभ अथवा हानि पहुँचा सकती है। अनुकूल परिस्थिति बुराई का काम कर सकती है और प्रतिकूल भलाई का। जो परिस्थिति मनुष्य को भयभीत करती है वही वास्तव में उसकी हानि करती है। यदि परिस्थिति कठिन हुई और उससे मनुष्य भयभीत न हुआ तो वह मनुष्य की हानि न कर उसका लाभ ही करती है।
मनुष्य का मन आन्तरिक चिन्तन से बली होता है। जिस व्यक्ति को अपने कर्त्तव्य का पूरा निश्चय है, जो उसको पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व खोने के लिए तैयार रहता है उसे कोई भी परिस्थिति भयभीत नहीं करती। मनुष्य के मन में अपार शक्ति है। वह जितनी शक्ति की आवश्यकता अनुभव करता है उतनी शक्ति उसे अपने ही भीतर से मिल जाती है। जो व्यक्ति अपने आपको कर्त्तव्य दृष्टि से भारी संकटों में डालता रहा है वह अपने भीतर अपार शक्ति की अनुभूति भी करने लगता है। उसे अपने संकटों को पार करने के लिए असाधारण शक्ति भी मिल जाती है। जैसे-जैसे उसकी इस प्रकार की आन्तरिक शक्ति की अनुभूति बढ़ती है उसकी कार्य क्षमता भी बढ़ती है।
कठिनाइयों से डरना अनुचित
जब कभी कोई मनुष्य अपने आपको कठिनाइयों में पड़े हुए पाता है तो उसे अपने कर्त्तव्य का ध्यान नहीं रहता। कर्त्तव्य का ध्यान रखने पर बाहरी कठिनाई घिर जाती है। कठिनाई में पड़े हुए व्यक्ति का कर्त्तव्य संबंधी विचार उलझे हुए रहते हैं। यदि किसी व्यक्ति की आन्तरिक कठिनाइयाँ सुलझ जाएं तो उसकी बाहरी कठिनाइयाँ भी सरलता से सुलझ जाएं। बाहरी और भीतरी कठिनाइयाँ एक दूसरे की संक्षेप हैं। मनुष्य को अपने आपका ज्ञान बाहरी कठिनाइयों से लड़ने से होता है और जैसे जैसे उसे अधिकाधिक ज्ञान होता है वह बाहरी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने में भी समर्थ होता है।
प्रत्येक कठिनाइयों से भय की अनुभूति करने वाले व्यक्ति के मन में मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति रहती है इस अंतर्द्वन्द्व के कारण मनुष्य की मानसिक शक्ति का एकीकरण नहीं होता, आपस में बंटवारा होने के कारण और व्यर्थ लड़ाई हो जाने के कारण मनुष्य का मन निर्बल होता है। ऐसी अवस्था में जब एक बाहरी भारी कठिनाई उसके सामने आ जाती है तो वह अपनी मानसिक शक्ति को बटोर नहीं पाता और उससे भयार्त हो जाता है। जिस प्रकार भीतरी संघर्ष चलने वाला राष्ट्र निर्बल होता है और बाहरी आपत्तियों का आवाहन करता है उसी प्रकार मानसिक अन्तर्द्वन्द्व वाले व्यक्ति का मन भी निर्बल होता है और अनेक प्रकार की कठिनाइयाँ उसके सामने आती रहती हैं यदि कोई व्यक्ति जम कर ऐसी कठिनाइयों का सामना करे तो उसके आँतरिक मन में भी एकता प्राप्त हो जाय। निकम्मा मन ही शैतान की क्रिया-शाला होता है। बाहरी कठिनाइयों के हल करने के प्रयत्न में अनेक कठिनाइयाँ अपने आप ही हल हो जाती हैं।
साधारणतः जो काम मनुष्य के हाथ में आ जाय और जिससे न केवल अपना ही लाभ हो वरन् दूसरे का भी लाभ हो उसे छोड़े न। वह काम पूरा करने के लिए जो त्याग और कष्ट सहने की आवश्यकता हो उसे सहे। यदि वह अपना अभ्यास इस तरह बना ले तो वह देखेगा कि उसे धीरे-धीरे ठोस आध्यात्मिक ज्ञान होता जाता है। जो ज्ञान मनुष्य को दार्शनिक चिन्तन मात्र से नहीं आता वही ज्ञान उसे अपनी परिस्थितियों से लड़ने से आ जाता है। जो मानसिक एकता और शान्ति, राग-भोग से नहीं आती वही कठिनाइयों से लड़ने से अपने आप आ जाती है।
कठिनाइयों से लड़ते रहना न केवल अपने जीवन को सफल बनाने के लिए आवश्यक है वरन् दूसरे लोगों को भी प्रोत्साहित करने के लिये आवश्यक है। जिस प्रकार मनुष्य के दुर्गुण संक्रामक होते हैं उसी प्रकार सद्गुण भी संक्रामक होते हैं। एक कायर को रण से भागते देखकर दूसरे सैनिक भी रण से भाग पड़ते हैं और एक को रण में जमकर लड़ते देखकर दूसरे व्यक्ति भी हिम्मत नहीं छोड़ते। उनके भीतर भी वीरता का भाव जागृत हो जाता। सभी मनुष्यों में सभी प्रकार के दुर्गुणों और सद्गुणों की भावना रहती है। मनुष्य जिस प्रकार के वातावरण में रहता है उसमें उसी प्रकार के मानसिक गुणों का आविर्भाव होता है। वीर पुरुष का चरित्र ही दूसरे लोगों के लिए शिक्षा है। यही उसके समाज की सबसे बड़ी देन होती है जब जोजफ मैजिनी ने इटली की स्वतंत्रता का आन्दोलन चलाया तब केवल पाँच व्यक्ति उसके साथ थे। पर धीरे-धीरे पाँच से पचास हुए और पचास से सारा देश स्वतंत्रता के भावों से ओत-प्रोत हो गया। देश में अनेक योद्धाओं का जन्म हुआ और देश उनके जीवन काल में ही विदेशी हुकूमत से मुक्त हो गया। इसी तरह जब लोकमान्य तिलक ने भारतवर्ष की स्वतंत्रता की आवाज उठाई तो इने-गिने लोग उनके साथी हुए पर उनके विचार दृढ़ थे। उन्हें सत्य की विजय में विश्वास था, अतएव एक से अनेक लोगों तक उनका विचार फैला। महात्मा गाँधी ने 1920 ई. में उनके विचार को अपना लिया और भारतवर्ष को स्वतंत्रता मिलकर ही रही। यदि कोई व्यक्ति पूरे मन से किसी काम को अपना कर्तव्य समझ कर करता है तो उसे काम में सफलता अवश्य मिलती है।
अपनी कठिनाइयों पर विजय वे ही लोग प्राप्त कर सकते है जो कठिनाइयों के आध्यात्मिक पहलू को भूल नहीं जाते। जोजफ मेज नी को बड़ा काम करना था अतएव न केवल उसने राजनीतिक संस्थाएँ बनाकर इटली की स्वतंत्रता का आन्दोलन चलाया वरन् उसने मनुष्य के कर्तव्य (डयूटी आफ मेन) नामक पुस्तक भी लिखी। यह उसके जीवन की सबसे बड़ी देन है। अपने अनुभव के आधार पर उसने बताया है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का निर्माण किस प्रकार करना चाहिए और इसमें कैसे लगना चाहिए। इसी प्रकार लोकमान्य ने भारत के पुराने कर्तव्य शास्त्र अर्थात् गीता की नयी व्याख्या की। बिना इस व्याख्या के देश को स्वतंत्रता प्रदान करने जैसे कठिन काम में सफलता मिलना असम्भव था। यदि कोई व्यक्ति राष्ट्र के सभी लोगों की गति बदल देता है, यद्यपि वह निराशा की जगह आशा का संचार कर देता है और जनता को बताता है कि केवल पूजा पाठ करने, उनका नाम रटने अथवा जंगल में उनकी खोज करने में भगवान नहीं मिलते, वरन् देश की सबसे महत्व की समस्याओं को हल करने के प्रयत्न से वे मिलते हैं तो वह राष्ट्र में नये बल का संचार कर देता है। भारतवर्ष फल की दृष्टि से काम करना सीख गया था, वह कर्तव्य की दृष्टि से काम करना भूल गया था, संसारी कामों को भी देय दृष्टि से देखा जाता था। जिन लोगों में निर्लोभ मात्र रहता था और त्याग बुद्धि में आगे थे वे प्रायः भक्ति भाव में अपने आपको खो देते थे अथवा जंगल में जा कर योगाभ्यास करते थे। इन मनो वृति को भगवान् तिलक ने बदल दिया। यही कारण है कि अनेक कठिनाइयों के होते हुए भी भारतवर्ष स्वतंत्रता प्राप्त करने में समर्थ हुआ। यहाँ हम देखते हैं कि सच्चा दर्शन कठिनाइयों से लड़ते रहने में आता है और कठिनाइयों पर विजय के लिये वह अच्छा साधन भी बनता है। मनुष्य की बुद्धि जितनी ही स्थूल जगत से उठकर सूक्ष्म जगत में अर्थात् विचारों के जगत में जाती है, उसे अपनी वस्तु स्थिति का उतना ही अधिक ज्ञान होता है और फिर वह परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करने में उतना ही सफल होता है। पर इस प्रकार विचारों को ऊँचा उठाने के लिए जान-बूझकर अपने आपको कठिनाइयों में डालना आवश्यक है। जब दूध गरम होता है तभी मलाई ऊपर आती है। ऐसे विचार तभी ऊँचे उठते हैं जब मनुष्य कठिनाई में पड़ता है।
यदि किसी व्यक्ति की उसकी कठिनाई में सच्ची सहायता करनी हो तो उसका सर्वोत्तम उपाय है कि मनुष्य अपने आपको उससे भी अधिक कठिनाइयों में डाल दे। मनुष्य की सच्ची सहायता भौतिक नहीं आध्यात्मिक है। भौतिक सहायता से मनुष्य को सामयिक लाभ भले ही हो, उससे वह अपना आत्मविश्वास खो देता है जिससे उसका विनाश ही होता है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को आध्यात्मिक सहायता दी और दुर्योधन को भौतिक। इससे अर्जुन की विजय हुई और दुर्योधन का विनाश हुआ। यदि इस आध्यात्मिक रहस्य को समझने की चेष्टा करें तो हम देखेंगे कि कृष्ण ने अपने आपको अर्जुन की सहायतार्थ जितने संकट में अर्जुन था उससे अधिक संकट में अपने आपको डाल दिया। रण में अर्जुन के कुछ संबंधी मारे जाना निश्चित था। यह उन्होंने अपने लिए भी स्वीकार किया। फिर अर्जुन के पास दुर्योधन के बराबर बल नहीं था, पर कृष्ण ने तो निःशस्त्र होकर अर्जुन का रथ हाँकने का काम अपने लिए स्वीकार किया था। यहाँ न तो रण में कुशलता की कीर्ति का प्रयोजन उनके समक्ष था और न किसी प्रकार का प्रयोजन। इतना ही नहीं अपने प्राणों की रक्षा की परवाह भी उन्होंने नहीं की। इसलिए ही अर्जुन को सच्चा आध्यात्मिक बल उनसे मिला और वे युद्ध को जीतने में समर्थ हुए। इस प्रकार एक अर्जुन को जिताकर उन्होंने संसार के सामने सब समय के लिए उदाहरण उपस्थित कर दिया कि दूसरे व्यक्तियों को उसकी कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने में उचित सहायता कैसे दी जाती है। कृष्ण का ध्येय अर्जुन के मानसिक बल को बढ़ाना था न कि घटाना। यदि हमारी सहायता से हमारा कोई मित्र परावलंबन सीखता है तो वह सहायता सच्ची सहायता नहीं है। यह तो उसके विनाश की सीढ़ी है। सच्ची सहायता मानसिक होती है। यह केवल सदुपदेश से या सद्पुरुष से ही प्राप्त नहीं होती, वरन् उसके त्याग और आचरण से भी प्राप्त होती है।
(श्री एम. जीवन मलिवा)
यह एटम बम जिसने जापान के विशाल, नगर हिरोशिमा को विध्वंस कर डाला वह परिणाम में तनिक, सा, बहुत छोटा-सा था। परन्तु उस एटम बम से भी महत्तर शक्तिमान वे अदृश्य और सूक्ष्म विचार थे जिन्होंने उसकी उत्पत्ति को सोचा। अटम बम उन विचारों का एक स्थूल प्रतीक ही तो था। वही दशा संसार के प्रत्येक मूर्त पदार्थ की है जो मनुष्य द्वारा बनाया जाता है।
कितना विशाल या क्षुद्र होता है एक विचार? हम नहीं जानते कि विचार का किसी मूर्त सत्ता से कोई संबंध है, मस्तिष्क में उसके लिए कोई रासायनिक प्रक्रिया होती है अथवा किसी प्रकार के सूक्ष्म तत्वों से ‘विचार’ उत्पन्न होता है। किन्तु यदि वास्तव में किन्हीं मूर्त तत्वों के एकत्रीकरण से विचार उत्पन्न होता है तो एक विचार कितना सूक्ष्म और क्षुद्र होता होगा? एक भाव जो किसी बड़ी से बड़ी ध्वनि को उत्पन्न करता है, अधिक से अधिक जितनी सूक्ष्म बिन्दी के बराबर हो सकता होगा जो संसार के अत्यंत शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शक यन्त्र से भी कठिनता-पूर्वक देखा जा सके।
सब ओर ही इस विश्वास के समर्थन का वृहत् प्रमाण मिलता है कि क्षुद्र पदार्थ में शक्ति निहित है। विशाल भू-पिंड, हमारा यह शरीर, महासमुद्र की गहराई से हिमालय के उत्तुँग, गगन-चुम्बी शिखर तक प्रत्येक वस्तु, जो कुछ भी हम देखते हैं अणुओं का एकत्रीकरण है। छोटे-छोटे अणु जो हमारी नग्न दृष्टि को तो दिख ही नहीं सकते, संसार में अति शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शन यन्त्र से भी नहीं देखे जा सकते, उन्हीं से सृष्टि रची गई है। आज तक कभी किसी ने ‘अटम’ (परमाणु) को नहीं देखा कि वह कितना छोटा है।
स्थापत्यकार जानता है कि छोटी वस्तु का कितना महत्व है। एक छोटी-सी इटो जो उसके हाथ में है उसी में विशाल नभचुम्बी महल का रहस्य भरा हुआ है। इटों के ढेर में से एक इट को देखकर यह कहना कि- इतनी ऊँची कुतुबमीनार, इतनी छोटी-छोटी इटों से कैसे बन सकती है- कौन सुनेगा?’
विश्व-कोष एक-एक अक्षर जोड़कर शब्दों और वाक्यों द्वारा रचा गया है। संसार का सबसे महान ग्रन्थ महाभारत एक-एक शब्द तथा छोटे-छोटे श्लोकों का संग्रह है। वर्ष छोटे-छोटे तुच्छ मिनटों सैकड़ों का इकट्ठा रूप ही तो है। एक पेड़ में लाखों छोटे-छोटे पत्ते, टहनियाँ हैं और सबसे बड़े पेड़ का विशाल तना छोटी-छोटी, तुच्छ, सूक्ष्म पोली नलियों से भरा है।
यह कहने में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं, यह तो ध्रुव सत्य है, कि कोई बड़ी वस्तु संसार में है ही नहीं। क्योंकि बड़े से बड़ा पदार्थ केवल क्षुद्र कणों का अंगों का एक समूह मात्र है।
यही बात हमारे जीवन के संबंध में भी है। यह क्षुद्र वस्तुओं से ही बना है। हमारा जीवनकाल पलों और विपलों में गिना जा सकता है, क्योंकि बिना क्षणों के, जो एक दूसरे से बिलकुल भिन्न होते हैं, हम अपना वर्ष व्यतीत नहीं कर सकते। जो कुछ भी कार्य हम करते हैं वह सब छोटी-छोटी क्षणिक क्रियाओं की एक शृंखला है। भले ही हम मील भर चौड़ी नदी का पुल बना रहे हों, सायंकाल का भोजन तैयार कर रहे हों अथवा एक सुन्दर नाटक लिख रहे हों, है यह सब छोटी-छोटी क्रियाओं का समूह ही। जब हम यात्रा करते हैं और एक मील पहुँचते हैं तो चाहे हम अतिशीघ्र एक मिनट में ही एक मील चल लिये, परन्तु हम चले एक-एक इंच करके ही।
फिर क्या हम एक छोटी सी वस्तु की अवहेलना इसलिए कर सकते हैं कि वह तुच्छ है, निरर्थक है, निष्फल है? वास्तव में तो यदि हम से उसका तनिक भी संबंध है, तो वह अवश्य ही विशेष है, अत्यावश्यक है, विचारणीय है। छोटे से बड़े, तुच्छ से महान् अपूर्ण से ही पूर्णता की सृष्टि हुई है। यह असत्य नहीं कहा जा सकता कि अतिसाधारण-सी भूल भयंकर परिणाम की जननी है। स्याही की एक छोटी-सी बूँद यदि नव-वधु की भव्य साड़ी पर पड़ जाये तो आकार में तो वहाँ भी वह छोटी ही होगी परन्तु भव्यता में वह कितना बड़ा अंतर डाल देगी कितना विशद होगा वह तुच्छ बूँद का प्रभाव।
ठीक इसी प्रकार एक अशुभ विचार शुभ विचार के समूचे प्रभावात्मक क्षेत्र को समाप्त कर देता है। हैजे के रोग का एक अदृश्य कीटाणु कुछ क्षणों में ही असंख्य रूप धारण कर लेता है। देखते-देखते चमकते हुए लाल-लाल शरीर को मुरझा कर निचोड़े हुए नींबू सा कर देता है। निराशा भरे एक सूक्ष्म विचार का भी विस्तृत प्रभाव ठीक वैसा ही होता है जैसा कि एटम बम का, जो एक विशाल नगर को ध्वंस कर देता है।
एक ‘शब्द’ कितना तुच्छ और अचिन्त्य है। परन्तु केवल ‘एक शब्द’ ही कभी-कभी कहने वाले की नींद हराम कर डालता है और कभी सुनने वाले के जीवन को घुन बन कर लग जाता है। सोचिये तो सही, शब्द दीखते तो नहीं, पर चुभते कितने अधिक हैं। हम में से कौन है जो शब्दों के प्रभाव से अपरिचित है। शब्द जिस प्रकार घाव कर देता है वैसे ही घाव भर भी देता है।
ऐसे अनेक रोगी मिलेंगे जिनको महीनों ज्वर रहता था। वे दिन में बीस बार थर्मामीटर देखते थे और पचास बार उनकी उँगलियाँ नाड़ी की गति जानने को उतावली रहती थीं। वे दुनिया से निराश मृत्यु की बाट जोह रहे थे। परन्तु वह था केवल उनका भ्रम। उनका ‘नकारात्मक’ विचार उन्हें न जीवित रहने देता था और न चैन लेने देता था। परन्तु उन्होंने अशुभ नकारात्मक विचार छोड़ा और चंगे हो गये। वह स्वस्थ तो थे ही।
यही विचार जातियों को बड़ी प्रेरणा देते हैं। जब अनेक मनुष्यों के जीवन में ‘एक विचार’ आने लगता है तभी कल्याण होता है। किसी भी दल का जनक एक विचार विशेष होता है और वही बन जाती है जातीयता। सारे संसार में केवल एक ‘शुभ, आशाप्रद विचार’ की आवश्यकता है। जीवन को उन्नत और सुखमय बनाने के लिए विचारों पर कड़ी दृष्टि रखने से कभी कष्ट नहीं भोगना पड़ता।
अगर तुम शरीर की रक्षा करना चाहते हो तो मन की रक्षा करो, अगर तुम शरीर को जीवन देना चाहते हो तो मन को सुन्दरता दो। मत्सरता द्वेष, निरुत्साह और निराशा के विचार शरीर से स्वास्थ्य और सौंदर्य का हरण करते हैं।
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आदमी चार तरह के होते हैं- (1) मक्खी चूस- न आप खाये और न दूसरों को देवें, (2) कंजूस- आप तो खाये पर दूसरों को न दे, (3) उदार- आप भी खाये और दूसरों को दे, (4) दाता- आप न खाये और दूसरों को दे। सब लोग दाता नहीं बन सकते हैं पर उदार अवश्य होना चाहिए।
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(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम. ए., फैजाबाद)
बालक में काम, क्रोध, ईर्ष्या और प्रवृत्तियों के साथ-साथ सहानुभूति, प्रेम और दया की प्रवृत्तियाँ गुप्त रूप से विद्यमान रहती हैं। इनको वह अपने माता-पिता से परम्परा से प्राप्त करता है और उसका चरित्र इसी पर बहुत कुछ अवलम्बित रहता है। उसकी इन प्रवृत्तियों का विकास उसके सहवास के अनुसार हुआ करता है। कामी, क्रोधी तथा द्रोही मनुष्यों के सहवास में आने से वह स्वयं भी वैसा ही बन जाता है क्योंकि ऐसे लोगों के मध्य में रहने से उसकी काम, क्रोध तथा ईर्ष्या की प्रवृत्तियां प्रबल हो जाती हैं। किन्तु इसके विपरीत यदि उसका सहवास ऐसे मनुष्यों से हो जो दयालु तथा सहानुभूति पूर्ण हों तो उसकी दया, प्रेम और सहानुभूति की प्रवृत्तियाँ प्रबल हो जाती हैं। बालक, संपर्क में आने वाले पुरुषों के भावों, विचारों तथा कार्यों का अनुकरण किया करता है और जैसे आदर्श उसके समक्ष उपस्थित होते है उनके अनुसार उसकी प्रवृत्तियाँ का विकास हो जाता है केवल उन प्रवृत्तियों पर सहवास का अधिक प्रभाव नहीं पड़ता जो बालकों में जन्म से ही बहुत अधिक प्रबल होती हैं। अतः सबसे आवश्यक बात यह है कि बालक के माता पिता का चरित्र निर्दोष होना चाहिए।
यदि माता पिता चरित्र निर्दोष न हो तो उनके सन्तान के सच्च्रित्र कम संभावना होती है क्योंकि जन्मसिद्धि प्रवृत्तियों को दूर करना अत्यन्त कठिन कार्य है। इसलिए यह उक्ति प्रचलित है कि “बालक की नैतिक क्रिया उसके जन्म से पूर्व ही आरम्भ हो जाती है।” इस हेतु अपनी सन्तान को सच्चरित्र बनाने की अभिलाषा रखने वाले माता पिता का यह कर्त्तव्य है कि वे बालक के जन्म से पूर्व ही उन गुणों को स्वयं प्राप्त करने का प्रयत्न करें। जिन गुणों को वे अपनी सन्तान में होना आवश्यक समझते हैं। इस ओर ध्यान देने से चरित्र गठन सम्बन्धी कई कठिनाइयाँ स्वयमेव ही हल हो जाती हैं।
जिन बालकों के माता पिता ने इस ओर उचित ध्यान नहीं दिया उनकी प्रवृत्तियों का भी अच्छी परिस्थिति की सहायता से बहुत कुछ सुधार किया जा सकता है। मले साथियों के सहवास से बुरी प्रवृत्तियों का दमन तथा अच्छी प्रवृत्तियों को उत्तेजित किया जा सकता है। इस संबंध में बालकों के माता पिता तथा अध्यापकों का यह कर्त्तव्य है कि वे जिन नियमों का बालकों से पालन कराना चाहते हैं उनका स्वयं पालन करें। घर पर तथा पाठशाला में प्रत्येक कार्य नियत समय पर किया जावे, प्रत्येक वस्तु के लिये निश्चित स्थान हो, प्रत्येक कार्य की ओर ध्यान दिया जावे, प्रत्येक व्यवहार में शिष्टता तथा कर्त्तव्य परायणता विद्यमान हो, और भिन्न भिन्न नियमों का यथोचित रीति से पालन किया जावे। इस प्रकार की आदर्श परिस्थिति में उपर्युक्त बातें सरलता से ही बालकों के स्वभाव का अंग बन जाती हैं और वे अनायास ही सच्चरित्र बन जाते हैं जोकि मनुष्यता का प्रधान लक्षण है।
चरित्र निर्माण के लिए तीसरी आवश्यक बात “आचारिक शिक्षा” है। यदि परम्परा तथा बालक का सहवास उत्तम हो तो शिक्षा सोने में सुगन्ध का काम करती है। परम्परा तथा सहवास द्वारा प्राप्त कुप्रवृत्तियों का सुधार कुछ अंशों में आचारिक शिक्षा द्वारा हो सकता है। परन्तु इस प्रकार की शिक्षा देने में निम्नलिखित तीन बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है।
(1) कुछ सीमा के अन्दर बालकों को थोड़ी बहुत स्वतंत्रता अवश्यमेव देनी चाहिये। उनकी प्रवृत्तियों का व्यर्थ दमन करने तथा हर समय उनको सख्त कैद में रखने से बहुत हानि की आशंका रहती है। इस प्रकार बालक डरपोक बन जाते हैं और उनमें आत्म विश्वास, स्वावलंबन, दृढ़ निश्चय, उद्योग शीलता तथा मौलिकता आदि गुणों का विकास नहीं होने पाता। अतः बालकों को स्वतंत्र रीति से कार्य करने का अधिक से अधिक अवसर देना चाहिए जिससे कि उनके व्यक्तित्व और चरित्र का उचित रूप से विकास हो सके।
(2) बालकों में आत्म संयम का भाव उत्पन्न किया जावे तथा उनकी बुरी प्रवृत्तियों को रोका जावे। यह विशेषकर उन बालकों के लिए बहुत आवश्यक है जिनकी परम्परा तथा बाल्यकाल का सहवास अच्छा नहीं होता है। इस प्रकार के बालकों को उसी समय दृढ़ता पूर्वक रोकने की आवश्यकता होती है जबकि वे सीमा का उल्लंघन करने को उद्यत होते हैं। ऐसी अवस्था में यदि अन्य साधनों से सफलता प्राप्त न होवे तो दण्ड का भी प्रयोग किया जा सकता है जिससे कि बालक की कुप्रवृत्तियों का दमन होकर उसमें संयम का भाव उत्पन्न हो सके।
(3)बालकों को गुणों, नियमों, आदर्शों तथा कर्त्तव्यों से परिचित कर देना चाहिए जिनके आधार पर उनके चरित्र का निर्माण करना है जिससे उनको यह भली भाँति विदित हो जावे कि कौन सी बातें उनके लिए हितकर हैं कौन सी अहितकर, कौन सी बातें उचित हैं और कौन सी अनुचित तथा उनको किस आदर्श के अनुसार कार्य करना है। शिक्षाप्रद नाटकों, रोचक कथाओं, उत्तम-2 कविताओं, आदर्श पुरुषों के जीवन चरित्रों से बालक के आचरण संबंधी ज्ञान की वृद्धि तथा पुष्टि करें। बालकों को सुन्दर सुन्दर कविताएं, गीत, पद तथा श्लोक भी कण्ठाग्र करा देनी चाहिएं क्योंकि इनके द्वारा उचित निर्णयों पर पहुँचने और भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में उचित रीति से व्यवहार करने में बहुत सहायता मिलती है।
(4)बालकों को निषेधात्मक कार्य की अपेक्षा विधेयात्मक कार्यों का स्मरण दिलाना अधिक श्रेयस्कर है। यदि बालक को किसी कार्य को करने का निषेध किया जाता है तो उस कार्य को करने के लिए वह अधिक लालायित हो जाता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि केवल शाब्दिक रीति से अच्छी आदतों का बोध देकर ही शिक्षक तथा माता पिता को सन्तुष्ट न होना चाहिए। उनके मन में उन आदतों के प्रति श्रद्धा तथा उनको अपने जीवन में चरितार्थ करने की प्रबल इच्छा उत्पन्न की जानी चाहिए। इस प्रकार की दृढ़ इच्छा उत्पन्न हो जाने पर भिन्न-भिन्न गुणों कर्तव्यों तथा सिद्धान्तों के संबंध में बालकों के मन में स्थायी भाव (सेन्टी मेन्टस) उत्पन्न हो जाते हैं। इस भाव के उत्पन्न हो जाने से वे उन कार्यों को अपने जीवन में चरितार्थ करने का प्रयत्न करते हैं।
(5) ऐसे भावों को बालकों के मन में अवश्य उत्पन्न करना चाहिए जिनको उसके समाज में विशेष महत्व दिया जाता है। इसके साथ-साथ कुछ ऐसे गुणों के प्रति भी उसके मन में स्थायी भाव उत्पन्न कर देना आवश्यक है जिनका होना मनुष्यता का सूचक है और सभ्य समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए वाँछनीय है, जैसे- आत्म सम्मान, सभ्यता, ईमानदारी, सत्यता, स्वच्छता, स्वास्थ्य रक्षा, साहस, निर्भीकता, न्यायशीलता, दया, परोपकार, सहनशीलता आस्तिकता, कर्त्तव्यपालन, संयम, नियम पालन आदि। इसमें सबसे आवश्यक आत्म सम्मान का स्थायी भाव है। बालकों के चरित्र गठन में इससे सबसे अधिक सहायता मिलती है। जिस बालक में यह भाव उत्पन्न हो जाता हे वह कोई अनुचित कार्य कर ही नहीं सकता क्योंकि इस भाँति के व्यवहार से उसके आत्म सम्मान में धब्बा लग जाने, उसके यश के कलंकित हो जाने और अन्य लोगों की दृष्टि में उसके गिर जाने की उसको सदा आशंका रहती है। इस भाव का विकास शनैःशनैः होता है। इसको पूर्ण रूप से जागृत करने के लिए बालक पर विश्वास करना चाहिए और उसके उत्तरदायित्व के भाव को जागृत करना चाहिए।
(6) किसी अनुचित कार्य को करने पर उसे भला बुरा नहीं कहना चाहिए बल्कि ऐसा कह कर कि “इस प्रकार का व्यवहार तुम्हारे योग्य नहीं। यह कार्य तुम्हें शोभा नहीं देता। तुमसे कदापि ऐसी आशा न थी, इत्यादि -2.........।” उसके आत्म सम्मान के भाव को जागृत करना चाहिए जिससे भविष्य में वह कोई भी काम अनुचित ढंग से न करे ऐसे अवसर पर भला बुरा कहने से बालक का उत्साह सदा के लिए भंग हो जाता है और दिन प्रतिदिन उसकी अवनति होने लगती है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि सुन्दर स्थायी भावों की हमारे जीवन में कितनी महत्ता है। जिन लोगों में बुद्धि की वृद्धि अधिक हो जाती है किन्तु जिनके मन में सुन्दर स्थायी भाव नहीं बन पाते वे एक ओर बुद्धिमान होते हुए भी दूसरी ओर दुराचारी हो सकते हैं। उनका विवेक उन्हें दुराचार से रोकने में समर्थ नहीं होता है। कितने ही बड़े-बड़े बुद्धिमान दुराचरण करते हुए दिखाई देते हैं, परन्तु बहुत से अपढ़ लोग भी सदाचारी होते हैं क्योंकि अपढ़ होते हुए भी उनमें सुन्दर ‘स्थायी भाव’ होते हैं। अतः सदाचार के लिए सुन्दर स्थायी भावों का होना अनिवार्य है।
किसी आदर्श के प्रति स्थायी भाव उत्पन्न करने के लिए यह आवश्यक है कि बालकों में मन में उसका स्पष्ट चित्र खिंच गया हो तथा उसके संबंध में उचित अंत क्षोभ का संगठन कर दिया गया हो। इसके लिए अभीष्ट गुणों तथा आदर्शों की महत्ता प्रभावशाली शब्दों में प्रकट करनी चाहिए तथा उसके विपरीत गुणों पर घृणा दर्शाना चाहिए। इन गुणों से संबंध रखने वाले कार्य भी बालकों से बार-बार कराने चाहिएं। चरित्र सुधार के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि निरन्तर अभ्यास द्वारा बालकों में कुछ अच्छे स्वभाव डलवा दिये जावें।
चरित्र गठन के लिए बालकों में दृढ़ संकल्प शक्ति का होना भी आवश्यक है जिससे कि विघ्न बाधाओं तथा शारीरिक कष्टों का सामना करते हुए अपने निर्णयों को कार्य रूप में परिणित कर सकें। इस दृढ़ता को उत्पन्न करना भी बालक के माता पिता एवं गुरुजनों का आवश्यक कर्त्तव्य है।
(श्री पं. तुलसी राम शर्मा, वृन्दावन)
आयुर्वेद के प्रमुख ग्रन्थ ‘चरक’ में जहाँ अनेक औषधियों का वर्णन है वहीं सदाचार रूपी ऐसी औषधि का भी वर्णन है जिसके सेवन से वस्तुतः मनुष्य निरोग और दीर्घजीवी बन सकता है। देखिए-
सत्यं भूते दना दानं बलयो देवतार्च्नम्।
सद्वृत्तस्यानुवृत्तिश्च प्रशमोगुप्ति रात्मनः॥18॥
(चरक विमान स्यान अ॰ 3)
सत्य भाषण, प्राणियों पर दया, दान, बलि, देवताओं की पूजा, सदाचार का पालन, प्रशम (विषयों से उपराम) अपनी रक्षा ॥18॥
हितं जन पदानाँच शिवानामुप सेवनम्। सेवनं ब्रह्मचर्यस्य तथैव ब्रह्मचारिणाम् ॥19॥
कल्याणकारक देशों का सेवन, ब्रह्मचर्य का पालन, ब्रह्मचारियों का संग ॥19॥
संकथा धर्मशास्त्राणाँ महर्षिणाँ जितात्मनाम्। धार्मिकैः सात्विकै र्नित्यं सहस्यावृद्ध सम्मतैः। 20।
धर्मशास्त्रों की भले प्रकार कथा सुनना, जितेन्द्रिय महर्षियों के साथ वार्तालाप, वृद्ध पुरुषों द्वारा प्रशंसित, धार्मिक तथा सात्विक पुरुषों के साथ बैठना।
इत्येतद् भेषजं प्रोक्तमायुषः परिपालनम् ॥ 21॥
यह सब आयु के परिपालन के लिये औषधि है। ‘अष्टाँग हृदय’ में इसी प्रकार जहाँ खाद्य पदार्थों के गुण दोषों का वर्णन है वहाँ यह भी बताया गया कि भोजन कब, कैसे और किस प्रकार करना चाहिये। देखिये-
काले सात्म्यं शुचिहितं स्निग्धोष्णं लघुतन्मनाः।
षड्रसं मधुर प्रायः नाति द्रूत विलम्बितम्॥ 35॥
स्तोतः क्षुद्वान् विविक्तस्थोघौत पाद कराननः।
तर्पयित्वा पितृन् देवानतिथीन् बालकान् गुरुन् ॥36॥
प्रत्यवेक्ष्य तिरश्चोपि प्रतिपन्न परिग्रहान।
समीक्ष सम्यगात्मा नमनिन्दन् नब्रु बंद्रवम् ॥37॥
इष्ट मिष्टैः सहाश्नीयाच्छुचिभक्त जनाहृतम्।
भोजनं तृण केशादि जुष्ट मुष्णी कृतं पुनः॥
शाका वरान्नभूयिष्ठ मत्युष्ण लवणंत्यजेत् ॥38॥
(अष्टाँगहृदय सूत्रस्थान अ॰ 8)
भोजन समय में प्रकृति के माफिक, पवित्र, हितकारी स्निग्ध (घृत युक्त) गरम, लघु (हलका) छः रस वाला, मधुरस अधिक भोजन को, भोजन में मन लगाकर, न बहुत जल्दी, न बहुत धीरे, स्नान करके, भूख लगने पर, एकान्त स्थान में, हाथ पैर मुँह धोकर, भोजन करे। भोजन करने से पूर्व पितर, देवता, अतिथि, बालक, गुरुजन (पिता आदि) इनको तृप्त करके पशु पक्षी आदि तथा जिनको पालन करना है उनको भी अपने से पूर्व भोजन देवें। अपनी आत्मा के अनुकूल भोजन का विचार करके भोजन की निन्दा न करते हुए मौन होकर द्रव अधिक प्रिय भोजन को प्रियजनों के साथ, पवित्र एवं अनुरक्त जनों से लाये भोजन को पावे। परन्तु तिनके, केश आदि पड़े हुए, दुबारा गरम किए, शाक बहुल अपटान्न (कोदों आदि) बहुल, अति उष्ण अति लवण जिसमें ऐसे भोजन को न करे। 35-38।
केवल औषधि सेवन की ही नहीं, रोगों के निवारण के लिए आचरण शुद्धि करने की भी आवश्यकता है। इसी प्रकार शरीर पोषण के लिए बढ़िया भोजन ही पर्याप्त नहीं है वरन् भोजन संबंधी नियमों के पालन की भी जरूरत है। आयुर्वेद की शिक्षा में रोग निवारण एवं अस्वस्थतः की जड़ काटने के लिए सदाचार एवं नियम पालन पर बहुत जोर दिया गया है। भारतीय आरोग्य शास्त्र का मूल आधार यही है।
आदि शक्तिस्त्वियं विष्णोस्तामहं प्रणमामि हि। सर्गः स्थितिर्विनाशश्च जायन्ते जगतोऽनया॥1॥
यह गायत्री ही परमात्मा की आदि शक्ति है उसको मैं प्रणाम करता हूँ। इसी शक्ति से संसार का निर्माण, पालन और विनाश होता है।
नाभि पद्म भुवा विष्णोर्ब्रह्मणों निर्मितं जगत्। स्थावरं जंगमं शक्त्वा गायत्र्या एव वैध्रुवम्। 2।
विष्णु की नाभि कमल से उत्पन्न हुए ब्रह्मा ने गायत्री शक्ति से ही जड़ तथा चेतन संसार को बनाया।
चन्द्रशेखर केशेभ्यो निर्गता हि सुरापगा। भागीरथं ततारैव परिवारसमं यथा ॥ 3 ॥
जगद् धात्री समुद्भूत्य या हृन्मान सरोवरे। गायत्री सकुलं पारं तथा नयति साधकम् ॥ 4॥
सास्ति गंगैव गायत्री ज्ञाननीर समाकुला। ज्ञान गंगा तु ताँ भक्त्या बारं बारं नमाम्यहम् ॥ 5॥
जिस प्रकार शिव के केशों से निकलने वाली गंगा ने परिवार सहित भागीरथ को पार कर ही दिया उसी प्रकार संसार का पालन करने वाली गायत्री हृदय रूपी सरोवर में प्रकट होकर सपरिवार साधक को भवसागर से पार ले जाती है। वही गायत्री ज्ञान रूपी जल से परिपूर्ण गंगा है। उस गंगा को मैं भक्ति से बार-बार नमस्कार करता हूँ।
ऋषयो वेद शास्त्राणि सर्वे चैव महर्षयः। श्रद्धधया हृदि गायत्रीं धारयन्तिस्तुवन्ति च ॥ 6॥
ऋषि लोग वेद शास्त्र और समस्त महर्षि गायत्री को श्रद्धा से हृदय में धारण करते हैं और उसकी स्तुति करते हैं।
ह्रीं श्रीं क्लीं चेति रुपेभ्यस्त्रिभिर्वालोकपालिनी। भासते सततं लोके गायत्री त्रिगुणात्मिका ॥ 7॥
हीं, श्रीं, क्लीं, इन तीन रुपों से संसार का पालन करने वाली त्रिगुणात्मक गायत्री संसार में निरन्तर प्रकाशित होती है।
गायत्र्येव मता माता वेदानाँ शास्त्रसम्पदम्। चत्वारोऽपि समुत्पन्ना वेदास्त्वस्या असंशयम्। 8।
शास्त्रों की सम्पत्ति रूप वेदों की माता गायत्री ही मानी गई है। निश्चय से चारों ही वेद इस गायत्री से उत्पन्न हुये हैं।
परमात्मनस्तु या लोके ब्रह्म शक्तिर्विराजते। सूक्ष्मा च सात्विकी सैव गायत्रीत्यभिधीयते॥ 6॥
संसार में परमात्मा की जो सूक्ष्म और सात्विक ब्रह्म शक्ति विद्यमान है वह ही गायत्री कही जाती है।
प्रभावा देव गायत्र्या भूतानामभिजायते। अतःकरणेषु दैवानाँ तत्वानाँ हि समुद्भवः ॥10॥
प्राणियों के अन्तःकरणों में दैवी तत्वों का प्रादुर्भाव गायत्री के प्रभाव से ही होता है।
गायत्र्युपासनाकरणादात्मशक्तिर्विवर्धते। प्राप्यते क्रमशोऽजस्य सामीप्यं परमात्मनः ॥ 21॥
गायत्री की उपासना करने से आत्म-बल बढ़ता है। धीरे-धीरे जन्म बन्धन रहित परमात्मा की समीपता प्राप्त होती है।
शौचं शान्तिर्विवेकश्चैतल्लाभत्रयमात्मिकम्। पश्चादा वाप्यते नूनं सुस्थिरं तदुपासकम्॥
मन को वश में करने वाले उस गायत्री के उपासक को बाद में पवित्रता, शान्ति और विवेक ये तीन आत्मिक लाभ निश्चय ही प्राप्त होते हैं।
कार्येषु साहसः स्थैर्यं कर्मनिष्ठा तथैव च। एते लाभाश्च वै तस्माज्जातन्ते मानसास्त्रयः।13।
कार्यों में साहस, स्थिरता और वैसे ही कर्त्तव्य निष्ठा ये तीन मन संबन्धी लाभ उसको प्राप्त होते हैं।
पुष्कलं धन समृद्धिः सहयोगश्च सर्वतः। स्वास्थ्यं वा त्रय एते स्युस्तस्माल्लाभश्च लौकिकाः।
सन्तोषजनक धन की वृद्धि, सब ओर सहयोग और स्वस्थता ये तीन साँसारिक लाभ उससे होते हैं।
काठिन्यं विविधं घोर ह्यापदाँ संहतिस्तथा। शीघ्रं विनाशताँ यान्ति विविधा विघ्नराजयः ॥15॥
नाना प्रकार की घोर कठिनाई और विपत्तियों का समूह नाना प्रकार के विघ्नों का समूह इससे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
विनाशादुक्त शत्रूणामन्तः शक्तिर्विवधते। संकटानामनायासं पारं याति तथा नरः॥ 16॥
उपर्युक्त शत्रुओं के विनाश से आन्तरिक शक्ति बढ़ती है। उस आन्तरिक शक्ति से मनुष्य सहज ही संकटों से पार हो जाता है।
गायत्र्युपासक स्वान्ते सत्कामा उद्भवन्ति हि। तत्पूर्तयऽभिजायन्ते सहजं साधनान्यपि ॥ 17॥
निश्चय ही गायत्री के उपासक के हृदय में सदिच्छाएँ पैदा होती हैं। उनकी पूर्ति के आसानी से साधन भी मिल जाते हैं।
त्रुटयः सर्वथा दोषा विघ्ना यान्ति यदान्तताम्। मानवो निर्भयं याति पूर्णेन्नतिपथं तथा॥18॥
जब सर्व प्रकार के दोष, गलतियाँ और विघ्न विनाश को प्राप्त हो जाते हैं तब मनुष्य निर्भय होकर पूर्ण उन्नति के मार्ग पर चलता है।
बाह्यंचाभ्यन्तरमस्य नित्यं सन्मार्गगामिनः। उन्नतेरुभयं द्वारं यात्युन्मुक्तकपाटताम् ॥19॥
सर्वदा सन्मार्ग पर चलने वाले इस व्यक्ति के बाह्य और भीतरी दोनों उन्नति के द्वार खुल जाते हैं।
अतः स्वस्थेन चित्तेन श्रद्धया निष्ठया तथा। कर्त्तव्या विरतं काले नित्यं गायत्र्युपासना ॥ 20॥
इसलिये श्रद्धा से, निष्ठा से तथा स्वस्थ चित्त से प्रतिदिन निरन्तर ठीक समय पर गायत्री की उपासना करनी चाहिये।
दयालुः शक्ति संपन्नता माता बुद्धिमती यथा। कल्याणं कुरुते ह्येव प्रेम्णा बालस्य चात्मनः॥21॥
तथैव माता लोकानाँ गायत्री भक्तवत्सला। विदधाति हितं नित्यं भक्तानाँ ध्रुवमात्मनः॥22॥
जैसे दयालु शक्तिशालिनी और बुद्धियुक्त माता प्रेम से अपने बालक का कल्याण ही करती है उसी प्रकार भक्तों पर प्यार करने वाली गायत्री संसार की माता है वह अपने भक्तों का सर्वदा कल्याण ही करती है।
कुर्वन्नापि त्रुटीर्लोके बालको मातरं प्रति। युवा भवति कश्चिन्न तस्या अप्रीतिभाजनः। 23।
कुर्वन्नपि त्रुटीर्भक्तः कश्चिद् गायत्र्युपासने। न तथा फलमाप्नोति विपरीतं कदाचन॥ 24 ॥
जिस प्रकार संसार में माता के प्रति गलतियाँ करता हुआ कोई भी बालक उस माता का शत्रु नहीं होता उसी प्रकार गायत्री की उपासना करने में गलतियाँ करता हुआ भी कोई भक्त कभी भी विपरीत फल को नहीं प्राप्त होता।
अक्षाराणाँ तु गायञ्या गुम्फनं ह्यस्ति तद्विधम्। भवन्ति जागृता येन सर्वां गुह्यास्तु ग्रन्थयः॥ 25॥
गायत्री के अक्षरों का गुन्थन इस प्रकार हुआ है कि जिससे समस्त गुह्य योग ग्रन्थियाँ जागृत हो जाती हैं।
जागृता ग्रन्थयस्त्वेताः सूक्ष्माः साधकमानसे। दिव्यशक्तिसमद्भूतिं क्षिप्रं कुर्वन्त्य संशयम् ॥ 26॥
जागृत हुई ये सूक्ष्म यौगिक ग्रन्थियाँ साधक के मन में निःसन्देह शीघ्र ही दिव्य शक्तियों को पैदा कर देती हैं।
जनयन्ति कृते पुँसामेता वै दिव्यशक्तयः। विविधान् परिणामान्हि भव्यान्मंगलपूरितान् ॥ 27॥
ये दिव्य शक्तियाँ मनुष्यों के लिये नाना प्रकार के मंगलमय, सुन्दर परिणामों को उत्पन्न करती हैं।
मन्त्रस्योच्चारणं कार्यं शुद्धमेवाप्रमादतः। तदशक्तो जपेन्नित्यं सप्रणवास्तु व्याहृतीः॥ 28॥
आलस्य रहित होकर गायत्री मन्त्र का शुद्ध ही उच्चारण करना चाहिये। जो ऐसा करने में असमर्थ हो वह केवल प्रणय (ॐ) सहित व्याहृतियों का जाप करे।
ओमिति प्रणयः पूर्वं भूर्भुवः स्वरतदुत्तरम्। एषोक्ता लघु गायत्री विद्वद्भिर्वेदपंडितैः॥ 29॥
पहले प्रणव (ॐ) का उच्चारण करना चाहिए तत्पश्चात् भू र्भुवः स्वःका। यह पंचाक्षरी मन्त्र (ॐ भूर्भुवः स्वः) वेदज्ञ विद्वानों ने लघु गायत्री कहा है।
शुद्धं परिधान माधाय शुद्धे वै वायुमण्डले। शुद्ध देह मनोभ्याँ वै कार्या गायत्र्युपासना॥ 30 ॥
शुद्ध वस्त्रों को धारण करके शुद्ध ही हवा में देह एवं मन को शुद्ध करके गायत्री की उपासना करनी चाहिये।
दीक्षामादाय गायत्र्याः ब्रह्मनिष्ठाग्रजन्मना। आरभ्यताँ ततः सभ्यग्विधिनोपासना सता ॥ 31॥
किसी ब्रह्म निष्ठ ब्राह्मण से गायत्री की दीक्षा लेकर तब विधि पूर्वक उपासना आरम्भ करनी चाहिए।
गायत्र्युपासनामुक्त्वा नित्यावश्यक कर्मसु। उक्तस्तत्र द्विजातीनाँ नानध्यायो विचक्षणैः॥ 32॥
गायत्री उपासना को विद्वानों ने द्विजों के लिए अनिवार्य, किसी भी दिन न छोड़ने योग्य, नित्यकर्म बताया है।
आराधयन्ति गायत्री न नित्यं ये द्विजन्मनः। जायन्ते हि स्वकर्मभ्यस्ते च्युतानात्र संशय॥ 34॥
जो द्विज गायत्री की नित्य प्रति उपासना नहीं करते वे अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाते हैं।
शूद्रास्तु जन्मना सर्वें पश्चाद्यान्ति द्विजन्मताम्। गायत्र्यैव जनाः साक ह्युपवींतस्य धारणात्॥ 34॥
जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं बाद में मनुष्य गायत्री के सहित यज्ञोपवीत धारण करने से द्विजत्व को प्राप्त होता है।
उच्चता पतितानाँ च पापानाँ पापनाशम। जायेते कृपायैवास्याः वेदमातुरनन्तया॥ 35॥
पतितों को उच्चता और पापियों को उसके पापों का विनाश ये दोनों कार्य इस वेदों की माता गायत्री की अनन्त कृपा से ही होते हैं।
गायत्र्या या युता संध्या ब्रह्मसंध्या तु सा मता। कीर्तितं सर्वतः श्रेष्ठं तदनुष्ठानमागमैः ॥ 36॥
जो संध्या गायत्री से युक्त होती है वह ब्रह्म संध्या कहलाती है। शास्त्रों ने उसका उपयोग सबसे श्रेष्ठ बताया है।
आचमनं शिखाबन्धः प्राणायामोऽघमर्षणम्। न्यासश्चोवासनायाँतु पंच कोषा मता बुधैः ॥37॥
आचमन, चोटी बाँधना, प्राणायाम, अघमर्षण और न्यास, ये पाँच कोष विद्वानों ने गायत्री संध्या की उपासना में स्वीकार किये हैं।
ध्यानतस्तु ततः पश्चात् सावधानेनचेतसा। जपताँ सततं तुलसी मालायाँ सा नुहुर्मुहुः ॥ 38॥
सावधान चित्त से ध्यानपूर्वक गायत्री मन्त्र को सात्विक प्रयोजन के लिये तुलसी की माला पर जपना चाहिए।
मानव मानवता के दानी!!
ठोकर खाकर गिरे हुए जन को यदि तुरंत उठा न सके, तो क्षुधा ज्वाल से पीड़ित को यदि तुम निज भाग खिला न सके तो।
पीड़ा से व्याकुल प्राणी को यदि तुम हृदय लगा न सके तो। यदि परित्यक्त, उपेक्षित, शोषित को निशंक अपना न सके तो।
व्यर्थ तुम्हारा धन, वैभव, यश, व्यर्थ तुम्हारा कर वरदानी।
मानव! मानवता के दानी!!
सबलों से असहाय कुचलते निर्बलों को यदि बचा न पाये। अत्याचार रहे सहते चुपचाप भीरु सा बदन छिपाये।
पिसते रहे पद दलित लेकिन उनको तुमने छुड़ा न पाया। मानवता का पतन देखते रहे न जल आँखों में आया।
तो यह व्यर्थ तुम्हारा जीवन, निष्फल प्रतिभा, सत्ता, वाणी।
मानव! मानवता के दानी!!
नहीं हृदय में हूक उठी यदि देख भाग्य पीड़ित का क्रन्दन। अंतस् पिघला नहीं देखकर भूखों की नंगों की तड़पन।
संघर्षों से घबराये, हतबुद्धि हुए निष्क्रिय कायर बन। त्याग चुके कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों को कर छोटा मन।
तो धिक्कार तुम्हारे पौरुष धिक् जीवन धिक् नई जवानी।
मानव! मानवता के दानी!!
आज्ञ बुद्धि है कुँठित, व्यापक भय, दुख तिमिर निराशा-यह क्यों? आज धर्म क्रन्दन करता सा, आज पाप हँसता सा-यह क्यों?
लुप्त हुआ देवत्व, असुरता का जगती पर शासन-यह क्यों? उलटी बहती है क्यों गंगा? आग उगलता है क्यों पानी?
मानव! मानवता के दानी!!
बुझे दीप फिर जलें, आज कवियों, वह दीपक राग सुनाओ! हे वादक, सहृदयता की टूटी वीण को भी झनकाओ !
विद्वज्जनों, पढ़ाओ समता, दया, प्रेम, करुणा की गीता। अहे चारणो ! कहो-”पाप हारा,” “पशु हारा है,” “मानव जाता॥”
उठे न्याय का खड्ग रुके शैतानी की मन मानी।
मानव! मानवता के दानी!!
(श्री लक्ष्मीनारायण जी टंडन प्रेमी, एम. ए.)
*समाप्त*