गीता में मानवता के लक्षण

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीत राग भय क्रोधः स्थितधिर्मु निरुच्यते॥

दुःखों की प्राप्ति में उद्वेग रहित है मन जिसका, और सुखों की प्राप्ति में दूर हो गई स्पृहा जिसकी तथा नष्ट हो गये हैं राग, भय और क्रोध जिसके, ऐसा मुनि स्थिर बुद्धि कहा जाता है।

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्ततत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

जो पुरुष सर्वत्र स्नेह रहित हुआ, शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।

यदा संहरते चार्यं कूर्मोंगानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

जैसे कछुआ अपने अंगों को समेट लेता है, वैसे ही पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।

प्रसादे सर्वदुःखानाँ हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्माशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

उस निर्बलता के होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले पुरुष की बुद्धि शीघ्र ही अच्छी प्रकार स्थिर हो जाता है।

अद्वेष्टा सर्वभूतानाँ मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहंकारः सम दुःख सुखः क्षमी॥

इस प्रकार शान्ति को प्राप्त हुआ जो पुरुष, सब भूतों में द्वेषभाव से रहित एवं स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित एवं अहंकार से रहित, सुख दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान् है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है।

संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तःस में प्रियः॥

जो ध्यानयोग में युक्त हुआ, निरन्तर लाभ हानि में संतुष्ट है तथा मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए, मेरे में दृढ़ निश्चय वाला है, वह मेरे में अर्पण किये हुये मन बुद्धि वाला मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।

यस्मान्नो द्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च में प्रियः॥

जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता है, तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगादिकों से रहित है, वह भक्त मेरे को प्रिय है।

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनों गतव्ययः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स में प्रियः॥

जो पुरुष आकाँक्षा से रहित तथा बाहर भीतर से शुद्ध और चतुर है अर्थात् जिस काम के लिए आया था उसको पूरा कर चुका है एवं पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है, वह सर्व आरम्भों का त्यागी अर्थात् मन, वाणी और शरीर द्वारा प्रारब्ध से होने वाले सम्पूर्ण स्वाभाविक कर्मों में कर्तापन के अभिमान का स्वामी, मेरा भक्त मेरे को प्रिय है।

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काँक्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स में प्रियः॥

जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ कर्मों के फल का त्यागी है, वह भक्ति युक्त पुरुष मेरे को प्रिय है।

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानपमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः संगविवर्जितः॥

जो पुरुष शत्रु मित्र में और मान अपमान में सम है तथा सर्दी गर्मी और सुख दुःखादि द्वन्द्वों में सम है और सब संसार में आसक्ति से रहित है।

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सतुष्टों येत केसंचित। अनिकेतः स्थिरमतिभक्तिमान्मे प्रियो नरः॥

तथा जो निन्दा स्तुति को समान समझने वाला और मननशील है, अर्थात् ईश्वर के स्वरूप का निरन्तर मनन करने वाला है एवं जिस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता रहित है, वह स्थिर बुद्धि वाला, भक्तिमान् पुरुष मेरे को प्रिय है।

वर्ष-13 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-1


मानवता को चुनौती


मानवता को चुनौती (Kavita)

मैं सम्राट बनूँ जगती का आकाँक्षा मानव की। एक छत्र हो राज्य हुकूमत चले कि ज्यों दानव की॥

बना रहूँ खूँखार कि जग में सभी प्रकंपित होवे। मेरी इच्छा से ही जग जगन रोवे हर्षित होवें॥

हिंसा की कर्कशता नर के रोम-रोम में छाई। बैर फूट की बुरी भावना कौम-कौम में छाई॥

नभ में अणुबम यान गैस हो! भू पर धून उड़ाते। अधम नृशंस कार्य कर दम्भी मन में मौज उड़ाते ॥

युग के उत्तम नियम पुरातन तड़क तड़क कर टूटे। बारूदों से भरे हुये बम कड़क कड़क कर फूटे॥

मानव को है खुली चुनौती, जो बर्बर पर अकड़ा। उसकी जीवन प्रगति, शाँति, सुख नाश पाश में जकड़ा॥

लौह शृंखला बद्ध घृणा विद्वेष निरन्तर बढ़ता। लोक लाज का भीना अंचल धीरे-धीरे फटता॥

किंकर्तव्य विमूढ़ मनुज बन हुआ कुपथ का राही। मानवता को कुचल बढ़ गया दानवता का चाही॥


आज मानवता रो रही है।

अपने समस्त ज्ञान, वैज्ञानिक अनुसंधान, खोज, बड़े-बड़े इंजीनियरिंग, चिकित्साशास्त्र तथा भौतिक समृद्धि के साधनों के बावजूद हम देखते हैं कि आधुनिक मनुष्यों में से मनुष्यत्व का पतन हो रहा है। उनकी मानवता का क्रमशः ह्रास होता जा रहा है। जिस चीज को हम “आदमीयत” कह कर गर्व करते हैं, वह निरन्तर क्षय होती जा रही है। मनुष्य “मनुष्य” का शत्रु हो गया है। सभ्यता का ढोंग चढ़ा कर, सफेद कपड़ों की आड़ में, वह ऐसे दुष्कर्म कर रहा है, जिन्हें देखकर उसे शैतान या हैवान ही कहना पड़ता है। मनुष्य के अन्दर बर्बर युग से सोया हुआ हैवान या शैतान जैसे आज जागृत हो गया है।

आज के दो वर्ग

आज का सम्पूर्ण संसार मोटे तौर पर दो बड़े भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) शोषक अर्थात् वह वर्ग जो आध्यात्मिक नैतिक, ज्ञान-विज्ञान की शक्तियों से शासन का आनन्द भोग रहा है। यह वर्ग हर प्रकार की ऐश-आराम, विलास का जीवन व्यतीत करता है, आज के अन्य सदस्यों द्वारा अर्जित खाद्य पदार्थों, भौतिक साधनों दैनिक व्यवहारों की चीजों की प्रचुरता का आनन्द लेता है। कल कारखाने, वायुयान, रेल, जहाज, लोहे के हथियार और औद्योगिक संस्थाओं, जमींदारों की बागडोर हाथ में है। उसे रुपये का घमण्ड है, विज्ञान द्वारा दिये गये भौतिक आनन्दों, प्रभुता, मद, ज्ञान विज्ञान का अभिमान है, मशीनों पर विश्वास है, एटम की शक्ति है। यह पूँजी पतियों का वर्ग है। इस वर्ग में बड़े बड़े अमीर, सत्ताधारी, ब्रह्मवादी, रूढ़िवादी क्षत्रिय, जागीरदार अमीर वैश्य, मठाधारी, मन्दिरों के पुरोहित, पंचायत के पंच लोग, बड़े अफसर पूँजीवादी राजनैतिक पार्टियों के प्रतिनिधि आदि सम्मिलित हैं।

दूसरा वर्ग शोषितों का है। इस वर्ग में दीन हीन गरीब मजदूर, किसान, मिलों फैक्ट्रियों में मजदूरी करने वाले, शूद्र, भंगी, चाण्डाल, चमार, होटलों, रेस्टोराँ, मोटर, रेल, सिनेमा में काम करने वाले नौकर इत्यादि अनेक प्रकार के व्यक्ति सम्मिलित हैं। पहले वर्ग की अपेक्षा इस वर्ग में अधिक व्यक्ति आते है। इसमें अछूत जातियों के लोग भी सम्मिलित हैं, जिनका कार्य उच्च वर्ग की चाकरी कर पेट पालना है। इन लोगों की गुलामी दो कारणों से हुई है-एक तो ये आर्थिक दृष्टि से दीन हीन हैं, दूसरे धर्म ग्रन्थों की आड़ में शिक्षा और सुविधाएं न देकर तलवार, लाठी, डंडों के बल इन्हें पनपने नहीं दिया गया है। उच्च वर्ग के इन्हें गुलाम बना कर इन्हें नौकरी चाकरी, घरों की सफाई, मल विष्ठा मूत्र से भरी नालियों की सफाई, उनकी स्त्रियों को विलास और मनोरंजन की वस्तु समझ कर सदियों इन्हें पशुत्व की कोटि में रखा है। इस वर्ग का निरन्तर शोषण होता रहा है। इस प्रकार हमारे समाज का आधा अंग पशुवत् अज्ञान, अशिक्षा, रूढ़िवादिता, भेदभाव, अहंकार असमर्थता में पड़ा हुआ शोषित हो रहा है।

अज्ञानान्धकार का पाप

आज के युग के भौतिक सुखों, आश्चर्यचकित कर देने वाली सुविधाओं, विलास और आराम की वस्तुओं की चर्चा की जाती है। किन्तु खेद है कि इतनी प्रचुरता में भी शोषित वर्ग में गरीबी, दुःख, अज्ञान और भयंकर भुखमरी है, इतने विस्तार और मुक्त वायु के बीच भी रोग, अशुचिता, गंदगी दयनीयता और बेबसी है, इतनी शिक्षा सुविधाओं के मध्य भी रूढ़ि जाति पांति, धर्मान्धता, दुराचार, अपहरण और अज्ञानान्धकार का साम्राज्य फैला हुआ है। हम सब मनुष्य कहलाते हुए भी दूसरे मनुष्य को छूने, प्यासे को पानी पिलाने में भूखे को अन्न देने में, बीमार की सुश्रूषा करने में सकुचाते हैं।

बिल्ली, कुत्ते का मुख चूमने में हमें कोई संकोच नहीं होता, किन्तु मनुष्य रूप में करोड़ों भारत संतानों का-शूद्र, चाण्डाल, म्लेच्छ, भंगी, चमार का स्पर्श करते हुए हमारा धर्म नष्ट होने लगता है।

जातिवाद

हिन्दू समाज का जातिवाद शोषण का एक और कारण है। इसका प्रारम्भ वर्ण व्यवस्था से किया गया था। वर्ण व्यवस्था पेशों को दृष्टि में रखकर सुविधा के कारण हुई थी। उसमें ऊँच नीच, छूतछात, ऊँचाई निचाई की संकुलित भावनाएँ न थीं। धीरे-धीरे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र जन्मजात वर्ण बन गए और प्रत्येक वर्ण की अनेक उपजातियाँ बन गई। धीरे धीरे एक जाति के लोगों ने दूसरी जाति के खानपान, रोटी बेटी के व्यवहार बन्द किए। एक दूसरे के प्रति घृणा, वैर, ऊँच नीच के विचार आ गए। ऊँची कहलाने वाली जातियाँ नीची कहलाने वाली जातियों पर अत्याचार, आर्थिक शोषण और छूतछात के विचार रखने लगीं। जाति वाद के अत्याचारों, संकुचिता, शोषण, बहिष्कार के कारण हमारा देश हजारों वर्ष तक गुलाम रहा। एक जाति और वर्ण के व्यक्ति दूसरी जाति या वर्ण के लोगों को नीचा दिखाने में ही शान समझते रहे। जातिवाद के अत्याचारों के कारण हिंदू समाज का छोटा, नीच, दबा, पिसा और शोषित हिंदू शूद्र हिंदू तिरस्कार छूतछात, हीनत्व तथा हेटेपन का जीवन व्यतीत कर रहा है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि मानव समूहों में हो रहे कठोर तम शोषण और संघर्षों के प्रधान कारण तीन रहे हैं। (1) अर्थनीतिक, (2) वर्ग या जातिगत और (3) मत या धर्म गत। प्रथम महायुद्ध में अर्थनीतिक कारण था, दूसरे में अर्थनीतिक के साथ साथ मत सम्बन्धी भी कारण संयुक्त हो रहे थे। यदि भविष्य में तृतीय महायुद्ध हुआ तो उसमें अर्थनीतिक, जाति तथा मत वैषम्य-ये तीनों ही कारण मौजूद होंगे।

आज विश्व की विचित्र दशा है। शैतानी, आसुरी, पैशाचिक शक्तियों ने मनुष्य को उसके दैवी स्वभाव तथा जन्म सिद्ध पवित्र अधिकारों से वंचित कर दिया है। अज्ञान, अविवेक, प्रलोभन, स्वार्थ, नैराश्य, संकीर्णता, ने उसकी दिव्य दृष्टि का अपहरण करके उसे क्रूर, कुकर्मी, हिंसक, हत्यारा, धूर्त, मूर्ख, पाखण्डी, एवं मोहग्रस्त बना दिया है। सृष्टि का मुकुटमणि, धर्म को धारण करने वाला महा मानव-आज निरीह एवं असहाय की तरह दुख दारिद्र की शैतानी षड़यंत्र की चक्की में पिस रहा है। हा, हन्त!


सामाजिक क्षेत्रों में मानवता का ह्रास

हमारे समाज में मानव का मूल्य निरन्तर गिरता जा रहा है। रुपये, धन, जायदाद, बाह्य प्रदर्शन का स्तर उत्तरोत्तर बढ़ा है। रुपये के लिये मनुष्य की बहुमूल्य वस्तु उसकी इन्सानियत, इज्जत, आत्मप्रतिष्ठा, सेवाएँ सब कुछ बिक रही हैं। नारियों को अपनी अस्मात् सबसे प्यारी होती है किंतु आज हम देखते हैं कि रुपये की कमी के कारण वे अपनी मान प्रतिष्ठा पवित्रता किसी की परवाह नहीं कर रही हैं।

कुछ समय पूर्व दिल्ली के एक पत्र ने लिखा था कि दिल्ली में पाँच हजार के लगभग वेश्याएं हैं और यह संख्या शरणार्थियों के आने से और बढ़ती जा रही है। दिल्ली नारी रक्षा संघ ने पता लगाया है कि इनमें से अधिकाँश ने आर्थिक कारणों से उनके पिता अथवा संरक्षकों ने उन्हें यह घृणित पेशा करने पर बाध्य किया है। कुछ के पिता अथवा संरक्षकों ने कुछ निश्चित समय के लिए रकम लेकर पेशा कराने को ठेके पर दे दिया है। स्त्रियों को बेचने की, उनके द्वारा आत्महत्या, तेल छिड़क कर जल मरने के अनेक समाचार समाज के दुराचार का परिचय दे रहे हैं।

हम देखते हैं सूदखोर साहूकार गरीबों से सूद ले लेकर रक्त चूस कर मोटे बनते जा रहे हैं, वे लोग अपनी आय बढ़ाने की फिक्र में हैं। सरकारी अफसर रिश्वत लेने के नए तरीके सोच रहे हैं। बाजार में खाद्य पदार्थों में मिलावट, घी में वनस्पति का मिश्रण दही में अरबी, दूध में खरिया, अनाज में मिट्टी, आटे में बुरादा मिलाया जा रहा है। दफ्तरों में ऊपर की आमदनी का महत्व बढ़ता जा रहा है। पुलिस विभाग तथा कचहरियों में भ्रष्टाचार, पक्षपात और अनैतिकता खूब फैल रही हैं। समाज का नैतिक स्तर नीचा होता जा रहा है।

यह दुरंगी दुनिया

श्री प्रभाकर माचवे ने ‘गली के मोड़ पर’ नामक लघु नाटक में आज के मानवीय व्यापारों का पर्दाफाश किया है। इस नाटक के तीन पात्र हैं-म्यूनिस्पल लेम्पपोस्ट, दीवार और लेटरबक्स। यदि कहीं इन तीनों को जबान मिल जाती तो वे मानव के सारे कार्य व्यापार पर क्या-क्या टीका टिप्पणी करनी पड़ी इसमें बताया गया है। कुछ अंश देखिए -

“दीवार-यह है दुनिया। आज किसी की राह साफ नहीं। कोई आँख होकर भी अन्धा है, कोई अन्धा होकर भी मन की आँखें खोले देख रहा है। किसी को अपने उद्देश्य तक पहुँचने की जल्दी पड़ी है फिर भी उसे पता नहीं है कि उद्देश्य क्या है? यह दुनिया है, ऐसा ही इसका व्यापार चल रहा है।

दीपक-चारों ओर देखता हूँ-वही बाजार है, वही खरीद फरोख्त है, वही आपाधापी है, वही छीन झपट है। स्वार्थों की लड़ाई है।

लेटर बक्स-कभी कभी ऐसा लगता है कि दो पैरों पर फुर्ती से चलने वाले ये जानवर कितनी बेमतलब हलचल करते हैं। कितने स्वार्थी हैं। कितने ओछे और छोटे दिल वाले हैं। देखो, कोई दुर्घटना हो गई। शायद ताँगा मोटर से टकरा गया या कोई उसके नीचे दब गया। देखो, आदमी भी क्या-क्या फिजूल की आशाएँ लगाए रहता है।

दीवार-ये आज के वाहन सभी खतरनाक होते हैं। आदमी ने अपनी सुविधा के लिए, वेग बढ़ाने के लिए इनका निर्माण किया-और यहाँ देखो तो वह स्वयं ही इसका शिकार बन गया।

दीपक-देखो यह अखबार का रिपोर्टर है। उसने मेरी रोशनी में जल्दी जल्दी कुछ लिखा और इस बम्बे में डाल दिया। बताओ तो भाई लेटर बक्स उसने क्या लिखा है?

लेटर बक्स-क्या लिखा है? वही तिल का ताड़। जरा सी बात को बढ़ा चढ़ा कर कहना। आखिर सारे कालमों को भरने के लिए कुछ न कुछ मैटर तो चाहिए समाचार इतने न हों, तो बनाये जाएं और गढ़े जाएं। पाठकों को कुछ न कुछ चटपटा, मसालेदार, तीखा और खट मीठा रोज सवेरे पढ़ने को चाहिए।

दीपक-आज कल आदमी की रुचि ही कुछ ऐसी विकृत हो गई है कि वह साधारण से सन्तुष्ट नहीं है। वह हर बात में असाधारणता पीछे लगी है। छोटी चीज से वह समाधान नहीं पा सकता। उसे कुछ विशेष और विचित्र चाहिए।

दीवार-पहले तेज भागते हैं, तेजी से दुर्घटनाएँ करते हैं और फिर हुज्जत। संसार भी एक विचित्र खेल हैं।

बना-बना के जा दुनिया मिटाई जाती है। जरूर कोई कमी है कि पाई जाती है॥

दीपक--मेरे प्रकाश में जो अच्छा बुरा हो रहा है, वह मैं बतला रहा हूँ बुरा मत मानना। बुराई वह दीमक है, जो अन्दर ही अन्दर इस समाज को खोखला कर रही है।

लेटरबक्स-परन्तु आदमी को अपनी ईमानदारी पर गर्व है।

दीपक-वही ईमानदारी न? जो केवल कल्पना है। देखो देखो, वह सामने के मकान में एक सूट-बूट डाले बाबू अपनी पत्नी से प्रमाणिक प्रेम के वायदों का अभिनय सा कर रहे हैं। उनका अन्य किसी स्त्री से मिलने का समय और स्थल निश्चित है, परन्तु वह यहाँ ऐसे बहाने अपनी पत्नी के सामने बना रहे हैं मानो उन्हें अपनी जरूरी नौकरी के काम से ही जाना है। और ये दो मित्र हैं। हजरत मिलते हैं, तो बड़ी मीठी-मीठी बातें एक दूसरे से करते हैं मगर पीठ मुड़ते ही एक दूसरे की बुराई करते हैं।

लेटरबक्स-दुनिया दुरंगी है, दीपक राज।

दीपक-दुरंगी? नहीं बहुरंगी भी है। यहाँ बहुत अधिक छूतछात का विचार करने वाले कोई बड़े अपने को धार्मिक समझने वाले सज्जन चोरी से छिप कर उस वेश्या से मिलने जा रहे हैं जिसको छूने में जाति भेद आड़े आता है, और अपनी दुकान में सब देवताओं को तस्वीरें और मोटे मोटे सिंदूरी अक्षरों में राम नाम लिखने वाला यह अपढ़ ग्रामीण को कर्जा देकर अपनी तबियत से रुका बनाकर चाहे जो सूद उसमें चढ़ाकर, उस पर गँवार का अँगूठा ले रहे हैं। इस समाज में आदमी आदमी का उपकार कर रहा है, अत्याचार भी कर रहा है। कभी कभी दोनों साथ साथ भी कर रहा है।

दीवाल-बाजार और सच्चाई साथ साथ नहीं चलती।

दीपक-और आज की मानवी सभ्यता बाजारू सभ्यता है। एक ओर आदमी को रहने के लिए मकान नहीं है, सड़क के किनारे गन्दी नालियों के पास बेघर सोते हैं, परन्तु कीमती साड़ियों या जूतों को सजाकर शोकेसों में रखने के लिए काँच के कमरे बने हुए हैं। यहाँ कई आदमियों के बच्चे दूध के बिना तड़प जाते हैं। हसरत भरी निगाहों से यह भिखारिन की बच्ची उस दूध की ओर देख रही है, जबकि रायबहादुर के घर का नौकर उनकी पाली हुई बिल्ली के लिए आध सेर दूध खरीदने आया है, क्योंकि रोज का दूध उस बिल्ली ने ढुलका दिया था।”

उपरोक्त वार्तालाप में हमें आज के समाज की दयनीय झाँकी मिल जाती है। हमारा समाज कैसा खोखला, मिथ्या प्रदर्शन और झूठे दिखावे से परिपूर्ण हो गया है। हम सारे दिन गली गली में प्रेम के गीत सुनते हैं, लेकिन यह वह दुनिया है जहाँ प्रेम वास्तविक जीवन में न होकर सिनेमा के पर्दे पर है। यहाँ आदर्श फिल्मों में दिखाया जाता है जबकि दैनिक जीवन में वह विलुप्त प्रायः हो गया है, यह वह समाज है, जिसमें पारस्परिक सद्भाव, सहानुभूति, भ्रातृभाव, प्रेम, सेवा, सहायता विनष्ट होकर उनके स्थान स्वार्थ प्रविष्ट हो गया है। सबको अपनी अपनी पड़ी है। प्रत्यक्ष जीवन में यहाँ आदमी आदमी की सीढ़ी बनाकर ऊपर चढ़ने का प्रयत्न कर रहा है। जिस प्रकार ऊपर चढ़कर सीढ़ी को ठोकर जमा दी जाती है, वही हालत हमारे नेताओं पथ प्रदर्शकों, लीडरों की बन गई है। जनता का दुख दर्द उन्हें परवाह नहीं। जिधर देखिए, उधर लोग जेब को खनखना रहे हैं। रुपयों का गर्व उन्हें सत असत् का विवेक नहीं करने देता। जीवन-मान गिरता जा रहा है। कोई मान अपमान जीवन में नहीं बचा है। आदमी आदमी के संबंध आज मानवता की पवित्र रज्जु से आबद्ध नहीं हैं, वे नगद उधार के हैं। कुछ न कुछ उन्हें निरन्तर बेचैन विक्षुब्ध किये हुए है।

जीवन की यह कृत्रिमता।

आज का जीवन दिखावे से भर गया है। बात चीत में दिखावा, पोशाक में दिखावा, संध्या-पूजा धर्म कर्म में दिखावा। हम कहते कुछ हैं, करते कुछ हैं। सामने एक व्यक्ति की प्रशंसा के पुल बाँध देते हैं, पीठ पीछे उसकी चुगली करते हैं। बेमतलब झूठी शान में न जाने क्या क्या बकते फिरते हैं! हमारा समग्र जीवन रंगमंच पर अभिनय की तरह कृत्रिम है।

श्री अनन्त गोपाल शेवड़े ने उचित ही लिखा है, “जीवन की सहजता और स्वाभाविकता मानो लोप हो गई है, और उसके स्थान पर आ गई है, घोर कृत्रिमता। अन्दर एक बात है, बाहर दूसरी। खरी बात सुनने का दम सब भरते हैं, पर सुनाता कोई नहीं, क्योंकि इसका फल जो भोगना पड़ता है, उसकी तैयारी नहीं होती। इसलिये सारे समाज में एक विचित्र परिस्थिति पैदा हो गई है। राजनैतिक जीवन में, साहित्य, समाज क्षेत्र हर जगह यही कृत्रिमता दिखाई देती है। शिष्टाचार के नाम पर असत्य और अतिरंजित बातों को प्रश्रय दिया जाता है। नकली और कृत्रिम मूल्यों का महत्व बढ़ गया है। एक प्रकार की कृत्रिम, छिछोड़ जीवन प्रणाली समाज में घर करती जा रही है। बाहरी दिखावे का प्रलोभन ज्यादा है, आन्तरिक तथ्य कम है। कल कुछ भी हो, आज तो वाहवाही में कोई कमी नहीं पड़नी चाहिये। यह वाहवाही लूटने की हविस, कृत्रिम और नकली साधनों से सुख पाने की वृत्ति हमारे सब दुःखों का कारण है। यह यथार्थ में मृग जल है। उसके पीछे कितना ही भागो, उसमें तृप्ति नहीं, पानी का नाम नहीं।”

हमें बाहरी लिफाफे का विशेष ध्यान रहता है। ऊपर से हम चिकने चुपड़े सभ्यता का आवरण पहन कर अपनी आन्तरिक कुरूपता, स्वार्थ, तृष्णा, द्रव्य लोभ, रिश्वतखोरी को ढक लेना चाहते हैं। हम झूँठा दिखावा करना सीख गये हैं। दूसरों को धोखा देते देते हम स्वयं अपने को धोखा दे बैठे हैं।

फैशन की यह गुलामी!

लाला किशनदास हमारे मुहल्ले के साधारण से पन्सारी हैं। उनकी दुकान भानवती का पिटारा समझिये। योंही एक दिन फैशन पर बात चल पड़ी, वे बोले-”प्रोफेसर साहब! फैशन की कुछ न पूछिये। दो एक दिन की बात है। एक महत रानी मेरी दुकान पर आई और मुझसे गालों की सुर्खी तथा लिपिस्टिक माँगी। लिपिस्टिक महंगी चीज है। दो आने मेरे सामने रखकर दोनों चीजों के लिये मिन्नतें करने लगी। उसे खूबसूरती बढ़ाने का भूत सवार था। दो आने में पाउडर और लिपिस्टिक कहाँ से आये? मुझे एक युक्ति सूझ गई। कुछ खरिया मामूली खुशबू डालकर पिस वाली है और दवात में डालने की लाल स्याही की टिकिया रखली हैं। बस दो आने में दोनों चीजें देता हूँ। मैं देख रहा हूँ मेहतरानियों में फैशन का रोग निरन्तर फैलता जा रहा है।”

इस कथन में गहरी सत्यता है। आज की नारियाँ फैशन की पुतलियाँ बन रही हैं। कृत्रिम सौंदर्य वृद्धि के जितने प्रसाधन आज देखने में आ रहे हैं, उतने कभी नहीं देखे गये। कहते हैं अकेली मसूरी में तीन मन पाउडर प्रति दिन व्यय होता है। कालेज स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करने वाले लड़के लड़कियों में फैशन बुरी तरह फैलते चले जा रहे हैं। बढ़िया सूट, रेशम, सिल्क या चटकीले वस्त्रों, धूप चश्मों, पालिशदार जूते, गले में बंधे हुए रुमाल, टोप, सिगरेट, पान इत्यादि का प्रचार उत्तरोत्तर बढ़ रहे है। गरीब का पुत्र-पुत्री भी अधिक व्यय करने में गर्व का अनुभव करते हैं। कैंटीन या मिठाई वालों के बिल चढ़ रहे हैं, फिर भी हमारे विद्यार्थियों का मिथ्या प्रसाद दूर नहीं होता?

फैशन समाज का गन्दा रोग है। सभ्यता के नाम पर हम फैशन और उच्छृंखलता सीखते जा रहे हैं। बालों की सजावट में वेश्याओं से छोड़ लेते हैं अनावश्यक, असुविधाजनक, बेढंगी, खर्चीली यूरोपीय फैशन की, नए-नए तर्ज की पोशाकें पहनने में आगे बढ़ते जा रहे हैं। बड़े के प्रति आदरभाव दूर हो रहा है। चाय और सिगरेट हमारे नित्य के साथी बन गये हैं। चश्मा सदा हमारे नेत्रों पर डटा रहता है। ऐसी शिक्षा और सभ्यता से क्या लाभ?

आज का यह चंचल वैभव

सामाजिक जीवन में, हम जैसा अपने पड़ौसी को करते हुए देखते हैं, स्वयं भी वैसा ही करने का प्रयत्न करते हैं। चाहे अन्दर से हम कैसे ही काले कलूटे खोखले दीन हीन क्यों न हों, बाहर से ऐसा प्रदर्शन करते हैं, कि सब प्रकार से संपन्न हैं। चाहे हमारे पास केवल दो चार वस्त्र ही हों, हम उन्हीं को पहिन कर अपना बाहरी लिफाफा शानदार रखना चाहते हैं। दैनिक जीवन में हमें सोफा सेट भी चाहिये, मेज कुर्सी और बिजली की रोशनी, कालीन और धूप का चश्मा। चाहे धूप हो या न हो, चाहे गर्मी हो या सर्दी, चाहे हम बाहर फिरें, चाहे कमरे के अन्दर हों, धूप का चश्मा हमारी नाक पर चढ़ा रहता है और हमारे कान पकड़े रहता है। घर में चाहे तन ढकने के लिये वस्त्र न हों, किन्तु खिड़कियों के लिये हमें एक खास रंग के पर्दे अवश्य चाहियें। यदि हम अपना फर्नीचर नहीं खरीद सकते, तो बजाय साधारण वस्तुओं से काम निकालने के हम किराये का फर्नीचर जरूर ले डालेंगे।

इस संबंध में मुझे अपने मुहल्ले में रहने वाले मेजर साहब का ध्यान आता है जिन्हें आठ सौ रुपये मासिक वेतन मिलता था, किन्तु जो इतने वेतन को बाहरी लिफाफा बनाये रखने में व्यय करते रहे। तीन चार नौकर भी चल रहे हैं, तीन चार सब्जियां, दो टाइम नाश्ते, मित्रों की दावतें, हर दूसरे दिन सकुटुँब सिनेमा शो, चाय सोडा बर्फ इत्यादि चलते रहे। बिना मोटर के धरती पर पग न गया। फलतः जब आपका तबादला हुआ, तो मकान के किराये की अदायगी के लिये पत्नी के आभूषण बेचने पड़े, बाजार की उधार देने में मोटर बेचनी पड़ी। असलियत प्रकट हो कर रही।

हम मिथ्या अभिनय कर रहे हैं।

आज का युग अभिनय का है। सिनेमा के पर्दे पर एक साधारण व्यक्ति राजा या मंत्री का अभिनय कर एक मिथ्या प्रभाव उत्पन्न करता है, गन्दे बदबूदार कपड़े पहिनने वाले दीन हीन मजदूर जैसे ऊपर से चटकीले रेशमी वस्त्र धारण कर शान दिखाते फिरते हैं, कुछ वैसा ही अभिनय हम मध्य श्रेणी के व्यक्ति कर रहे हैं। नये नये फैशनों की भरमार है। एक किस्म का कपड़ा एक व्यक्ति पहनता है, तो दूसरा भी वैसा ही कपड़ा, वैसी ही कटिंग, रंग इत्यादि पसन्द करता है। आवारा कपड़ा यत्र तत्र विद्यार्थियों का प्रिय बन गया है। जो निरक्षर भट्टाचार्य हैं, पढ़ाई लिखाई से दूर रहते हैं, पैन्ट पहिनते हैं और धूप चश्मा लगाकर सिनेमा के अभिनेताओं की भाँति झूमते हुए निकलते हैं। हेयर कटिंग, मूँछ कटिंग, नाखून कटिंग, की भिन्न भिन्न शैलियाँ प्रचलित हो रही हैं। जो गाँधी जी के सत्य, अहिंसा, प्रेम, कर्तव्य निष्ठा को नहीं समझते, सारे दिन झूठ काला बाजार रिश्वत, घूँस में संलग्न रहते हैं, वे ही पूँजीपति व्यापारी, शराब के ठेकेदार, बीड़ी बनाने वाले गाँधी जी की मूर्ति अपनी शेल्फ या दुकान पर सज्जित कर जनता की आँखों की मिट्टी डालते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में कृत्रिमता का भण्डार हो रहा है। कुँजियों के द्वारा सहज ही में परीक्षायें पास करने की दुष्प्रवृत्ति विद्यार्थियों में चल रही है। जो दो चार जगह भाषण दे लेता है, वह अपने आपको समाज सुधारक विद्वान भाषण कर्ता कहता है, दो चार छोटी छोटी पुस्तकें लिखकर महा लेखक का प्रोपेगेन्डा किया जाता है। दो चार तुकबांदियां कर लेने वाले अपने आपको कवि शिरोमणि कहलाना पसन्द करते हैं, साधारण दौड़ धूप करने वाले नेता गिरी का दम भरते हैं। हजारों रुपये नष्ट कर सच्चा झूठा विज्ञापन कर अनैतिक उपायों से वोट प्राप्त कर म्युनिस्पैलिटी की मेम्बरी प्राप्त की जाती है और सार्वजनिक सेवा के स्थान पर शून्य दिखा दिया जाता है। मेम्बर साहब के पास जब गरीब व्यक्ति माँगें पेश करते हैं, तो उन्हें फरियाद सुनने का अवकाश नहीं होता। जो उन्हें रिश्वत दे दे, घर के चार कार्य मुक्त कर दे, दस बार मुक्त कर सलाम झुकाता रहे, उसका कार्य अनायास ही हो जाता है, शेष दीर्घकाल तक प्रतीक्षा ही देखते रहते हैं।

शादी विवाह, जनेऊ, सालगिरह, दावतें, टी पार्टियों में बाहरी दिखावे का क्रम निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। दहेज आज भी आकर्षक ढंग से लिया जाता है। बाजे, आतिशबाजी, पंगत पार्टी, बैण्ड बाजे, शराब, इत्रों की भरमार, वाहवाही लूटने की सस्ती भावना, कर्ज लेना, ऊपर से बने ठने रहना समाज में यह प्रतियोगिता लगातार उग्र रूप में चल रही है। भौतिक सुख श्रृंगार की वस्तुएं, मोटर बंगला रेडियो, इत्यादि की होड़ लगी है। मनुष्य को अपनी आदमियत, अपनी इन्सानियत-प्रेम, उदारता, सत्य इन्द्रिय निग्रह, सहृदयता, दयालुता, निर्लोभ, तेजस्विता, आत्मचिन्तन आदि दैवी सम्पदाओं की परवाह नहीं है। उसका बाहरी लिफाफा आकर्षक होना चाहिये।


क्या यही इंसानियत है।

हमारे समाज में मानवता की हत्या कितनी पुनिर्भयता से ही रही है, इसके अनेक उदाहरण एकत्रित किये जा सकते हैं। कहीं आर्थिक यंत्रणाएं है, तो कहीं धर्म, जाति, वर्ण की संकुचिता अपनी चक्की में हमें पीसे जा रही है। कहीं पारिवारिक समस्याएँ मुँह बाँधे खड़ी हैं तो कहीं समाज की रूढ़ियां, राजनैतिक पार्टी बन्दी, धर्मान्धता, मूढ़ता, अशिक्षा, भयानक ताण्डव नृत्य कर रहीं हैं। समाज और जाति के बन्धनों में पिस कर, न जाने कितने व्यक्ति प्राण, रक्त, आँसू, सतीत्व, तारुण्य, और धन की बलि देकर, कुसंस्कार गत संकीर्णता के दुष्परिणाम सहन कर रहे हैं। श्री कृष्ण कुमार विश्नोई ने सामाजिक जीवन की कटु यथार्थता के कुछ उदाहरण इस प्रकार उपस्थित किये हैं, देखिए इनमें अक्षरशः सत्यता है-

मानव घड़ों से बदतर दशा में -

“जेठ की तपती दोपहर में जब कुपित सूर्य देव वसुंधरा पर भीष्म अग्नि की वर्षा करते हैं, तो तार कोल की सड़कें रिक्शे के पहिये को आगे बढ़ने ही नहीं देतीं। अपने शरीर पर बहती हुई पसीने की उन छोटी छोटी नालियों को रिक्शे वाला लू से तपती देह को तनिक ठंडा करने का उपकरण कह कर एक सूखी हँसी हँस देता है। शुष्क होठों पर बारबार जीभ फिराते फिराते बेचारे की जीभ में भी काँटे चुभने लगते हैं। फिर भी वह बहे ही जाता है, पापी पेट की अग्नि को शान्त करने के लिए, अपने नन्हें बच्चों को दो सूखी रोटियाँ जुटाने के लिए। कोठी पर पहुँच कर बाबू साहिब उसकी ओर एक दुअत्री फेंककर बिजली के पंखे के नीचे जा बैठते हैं। खड़ा खड़ा क्षण भर टकटकी लगाये जब रिक्शेवाला धूल में पड़ी हुई इस दुअन्नी की ओर देखकर ठण्डी आहें भरता है, तो हृदय कह उठता है, “क्या यही है हमारी मानवता।”

पत्थर तोड़ने वाले ये दीन मजदूर -

नमक की दो सूखी रोटी मैले कपड़े में बाँध कर दुधमुँहे बच्चे को गोद में लेकर एक मजदूरिन सवेरे ही पत्थर तोड़ने चल देती है। पत्थर तोड़ते तोड़ते जब थक जाती है, तो पेड़ की छाँह में विश्राम करके फिर काम में जुट जाती है। दिन भर ठेकेदार की झिड़कियाँ सहती है, कारीगर और दूसरे मजदूरों की कामुक दृष्टि से कितनी बार अपना मुख छिपाती है। थकावट से चूर धीरे धीरे चल कर घर पहुँचने पर, उसका मद्यप पति देर से लौटने के कारण अनेकों गालियाँ देकर जब उसकी पीठ पर दो दंड़ जड़ देता है, तो उसकी कराहें पूछती हैं, “क्या यही इन्सानियत है?”

सिनेमा का पागलपन -

सिनेमा हाल के बाहर सड़क के एक ओर पड़े हुए कोढ़ी की ओर, जिसके हाथ पैर गल गये हैं, आँखें नष्ट हो चुकी हैं कितने ही मानव बिना देखे चले जाते हैं। कुछ लोग देखकर भी नहीं देखते। उस मृत प्राय व्यक्ति को देखकर उनके मन में दया या ग्लानि उत्पन्न नहीं होती। उसके लाख चिल्लाने पर मेम साहब को अनमने होकर उसकी ओर भी देखना होता है पर कार में से उतर कर साहब के हाथ डालकर बिना सोचे समझे ही, ‘कुछ काम क्यों नहीं करता ?’-ऐसा कहकर जब वह सिनेमा हाल में घुस जाती है, तो हृदय कह उठता है,”क्या यही है मानवता?”

चलती फिरती कब्रें-

समाज की कठोर श्रृंखलाओं में बद्ध मर्यादा के नाम पर तिल तिल जलने वाली बाल विधवा, न जाने कितने जन्मों का अभिशाप और सन्ताप हृदय में पाले हुए, मृत्यु की प्रतीक्षा करती रहती हैं। वैवाहिक जीवन की वास्तविकता से शून्य जीवन के प्रथम चरण में ही जिसका सब कुछ लुट गया हो, उसके लिए संसार ही एक विडम्बना हो सकता है। पर स्त्री होने के नाते किसी सुन्दर बच्चे को गोद में लेकर चूमने की उसकी लालसा स्वाभाविक ही है। “तुम विधवा हो”-ऐसा कह कर, अज्ञात अनिष्ट की आशंका से जब सौभाग्यवती स्त्री उसकी गोद से अपना बच्चा छीन कर कितने ही कटु प्रहार कर डालती हैं, तो हृदय कह उठता है, “क्या यही है मानवता?”

इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से उदाहरण हमारे आधुनिक जीवन से दिये जा सकते हैं। हमारे डॉक्टर और वकीलों द्वारा समाज में कैसा दुर्व्यवहार किया जाता है, यह प्रायः प्रत्येक आधुनिक व्यक्ति जानता है। मरीज पड़ा है, पीड़ा से कराह रहा है, स्त्री प्रसूत गृह में पड़ी वेदनाओं से पीड़ित है, और उन्हें अपनी फीस चाहिए। वे मरीज के बचने की कोई परवाह नहीं करते, उन्हें रुपया चाहिए। उनका ईमान, चिकित्सा, दौड़ धूप चाँदी के कुछ टुकड़ों पर घूमता रहता है। वकील बजाय पारस्परिक सद्भाव, शान्ति, प्रेम, न्याय उत्पन्न करने के लोगों को लड़ाने, मुकदमेबाजी कराने, रुपए ऐंठने, तिल का ताड़ बनाने, कलह, फूट पैदा करने में विशेष दिलचस्पी लेते हैं। निरन्तर मुकदमों, फौजदारी के केसों के फैलाने में लोगों को उकसाकर लड़ाने, झगड़ा कराने में वकीलों का विशेष हाथ रहता है। मुकदमेबाजी आधुनिक सभ्यता का एक महा रोग है।

गुलामी अब भी पनप रही है।

भंगियों और नौकरों से हमारा आज भी वैसा ही नीचता पूर्ण अशिष्ट असभ्य व्यवहार रहता है, जैसा बर्बर युग में गुलामों से रहता था। बीमारी, गरीबी, भूख प्यास, घर तथा कर्ज की अदायगी से ग्रसित नौकर हमारे सम्मुख अपनी आवश्यकताएँ कहता डरता है। हमें अपना स्वार्थ है, हम अपने आराम में बाधा नहीं डालते। नौकर बीमार है, दवाई के लिए उसके पास पैसा नहीं है, इधर हम बीमारी के दिनों का वेतन काटने की फिक्र में हैं। वह घर में पड़ा पड़ा कराह रहा है कुछ रुपये चिकित्सा में व्यय करने से सम्भव है, वह ठीक हो जाय, पर हमें अपने काम से काम! वह फटे वस्त्र जाड़े में काँप रहा है, उधर हम गर्म कोट पतलून, स्वेटर पहिने आग ताप रहे हैं और मेवा खाते जा रहे हैं। क्या यही है मानवता!

पापी पेट के लिए-

यह राशन की दुकान है। भूखी, गरीब जनता, अधनंगे मजदूर, फटे हाल क्लर्क, नीची प्रकार के व्यक्तियों की भीड़ की भीड़ खड़ी हुई है। सबके नेत्र अनाज पर लगे हैं। और कैसा अनाज? जो आधा घुना हुआ है, जिसमें छोटे छोटे कीटाणु चल फिर रहे हैं, मिट्टी मिली हुई है, बदबू आ रही है उन्हें यही चाहिए। इसके लिए छीना झपटी है, कशमकश है और एड़ी चोटी का पसीना एक हो गया है। इसी के लिए उन्हें कन्ट्रोल अफसरों की झिड़कियाँ तथा दुकानदार के नाज नखरे सहने पड़ते हैं। घण्टे घण्टे भर में सारे दिन की मजदूरी छोड़कर यह अनाज उन्हें प्राप्त हुआ है। ऊँचा दाम, समय की बरबादी, धक्का मुक्की, झिड़कियाँ, धूप पसीना और इस पर बदबूदार अनाज बीमारियों का घर। यही है हमारी मानवता?

पुलिस की तानाशाही जिन्दाबाद!

यह रेल के टिकटघर की खिड़की है मुसाफिरों की भीड़भाड़ चिल्लपों ऊपर से सिपाही की डाट फटकार बेइज्जती और रिश्वत! चुपचाप सिपाही देवता अनाज टैक्स वसूल कर रहे हैं। यह है हमारी सचाई और नैतिकता।

ऊँचे से ऊँचा किराया देकर आप किसी प्रकार मकान किराये से लेते हैं। पगड़ी का इन्तजाम आपने किसी प्रकार कर लिया है लेकिन उससे क्या? प्रति मास नई नई फरमाइशें को हमें पूरी करने, किराया बढ़ाने के आदेश, मकान खाली कर देने की धमकी के लिये तैयार रहिए।

रेल का सफर एक विडंबना -

यह रेल का डिब्बा है। खचाखच मुसाफिर भरे हुए हैं। लेकिन अधिकाधिक आते जाते हैं। यह लीजिए यह कसे हुए ट्रंक की तरह भर गया। साँस नहीं आती, पेशाब के लिए जाना कठिन है। लोग बिखरे पड़े हैं, उनका असबाब यत्र तत्र पड़ा है। टी0 टी0 आता है और चार मुसाफिर दरवाजा खोलकर और ठूँस जाता है। आपके आराम, सुविधा, हवा, बैठने उठने उतरने की किसी को परवाह नहीं है। इतने में प्लेटफार्म पर एक वृद्ध आता है। उसके सिर पर एक गठरी है। वह सतृष्ण नेत्रों से प्लेटफार्म पर इधर उधर फिर रहा है कि किसी प्रकार किसी डिब्बे में चढ़ सके। सब जगह धकापेल है। किसे फुरसत है कि इस वृद्ध की सहायता करे। अपनी सम्पूर्ण शक्ति संचित करता है। वह अपनी गठरी इस आशा से फेंक देता है कि सम्भवतः कोई दया कर उसे घुसने देगा!.... लेकिन यह क्या? उस पर तो गालियों की बौछार पड़ रही है। वह चर्म मण्डित खोपड़ी अन्दर धकेल रहा है। युवकों की आँखें अग्नि बरसा रही हैं। व्याम, ताने गालियों का असर न देखकर एक मानव शरीर धारी राक्षस आकर उसे निर्दयता से धकेल देता है। दूसरे ही क्षण वृद्ध की गठरी बाहर फेंक दी जाती है और सूखे वृक्ष की भाँति धम्य से गिर पड़ता है। क्या यही हमारी इन्सानियत है?

कोतवाली और जेला के अत्याचार-

यह शहर की पुलिस कोतवाली है। आधी रात हो चुकी है किन्तु कोतवाली से यह मार पीट जूतों की फटकार, गालियों की बौछार सुन पड़ती है। कोई कैदी जूतों, लात, घूसों से पीटा जा रहा है। जैसे किसी दिन दूध ने देने वाली भैंस, गाय या कुत्ते को पीटते हैं, सुअर पर लकड़ी चला देते हैं, वैसे ही कोतवाली में अनेक व्यक्तियों को केवल शकसूबे में मार पीट कर सच झूँठ बातों को मंजूर करा लिया जाता है। पुलिस चाहे जिसका तिरस्कार, मानहानि, मारपीट कर सकती है। पशु की तरह चाहे जिसे पीट सकती है। आधी रात में कोतवाली के तहखानों में पिटने वाले मानव प्राणियों की चीत्कार कौन सुनता है।

जेल अथवा कारावास इसलिए है कि अपराधी प्रायश्चित करे, पाक साफ हो, समाज में रहने योग्य अच्छा नागरिक बने। लेकिन हमारी जेलों में आचरण सुधरने के बजाय और भ्रष्ट होता है। कैदी, चोर, डाकू और कातिल बन कर निकलते हैं। मामूली अपराधों या शकसूबे में अनेक गरीब जेलों में ठूँस दिये जाते हैं। उनके साथ जेल में अमाननीय व्यवहार किया जाता है हमारे कारावास नरकवास से क्या कम हैं? अपने कैदियों से, जो अपराधी होकर भी आखिर मनुष्य हैं, हम मनुष्योचित व्यवहार करना सब सीखेंगे?

विद्यार्थियों की यह उद्दंडता -

विद्यार्थियों की उदण्डता के उदाहरण हमारे सामाजिक जीवन का एक कलंक बन गए हैं। आज का विद्यार्थी अनुशासन हीन लापरवाह, फैशनपरस्त, सिगरेट पान, सिनेमा को प्रेमी, खर्चीली आदतों का होता है। अध्ययन के प्रति उसे कोई दिलचस्पी नहीं होती है। वह किसी का कहना नहीं मानना चाहता, सदाचार की शिक्षा के नाम से दूर भागता है।

विद्यार्थी अनुशासन अपने हाथ में लेना चाहते हैं। डा. कन्हैयालाल गर्ग प्रिंसिपल अलीगढ़ कालेज से जब घर लौट रहे थे, तो विद्यार्थियों ने सामूहिक रूप से उन पर आक्रमण कर दिया और उनकी अमानुषिक हत्या कर डाली। क्या यही मानवता है?

महमूद कालेज, सिकन्दराबाद के प्रिंसिपल की पत्थरों से मरम्मत करके अधमरा कर उन्हें कत्ल की धमकी उन विद्यार्थियों द्वारा दी गई जो परीक्षा में फेल हुए थे। कलकत्ता मैट्रिक का एक विद्यार्थी, जिसे नकल करने के अपराध में परीक्षा भवन से निकाल दिया था, उसने उस 60 वर्षीय वृद्ध मुख्य निरीक्षण को सख्त चोट पहुँचाई, इंटरकालेज, इटावा के अध्यापक सद्दीकी के सिर में गहरी चोट उस विद्यार्थी ने लगाई, जो दूसरे उच्च कक्षा के विद्यार्थी से अनुचित सहायता ले रहा था।

अमृतसर विद्यार्थी फेडरेशन के पन्द्रह सदस्यों को तीन वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड इसलिए दिया गया कि उन्होंने पुलिस के अधिकारियों पर घातक शस्त्रों से आक्रमण किये काँग्रेस भवन को लूटा तथा अन्य ऐसे ही दुस्साहसपूर्ण काम दिखाए। उस देश के भविष्य का आप सहज ही अनुमान कर सकते हैं जहाँ के विद्यार्थी लूट मार, हत्या, डाके, मारपीट, हमले, अनैतिकता से परिपूर्ण हों। यह देश का दुर्भाग्य है कि यह अनैतिकता उत्तरोत्तर वृद्धि पर है।

उपरोक्त उदाहरणों के अतिरिक्त सैंकड़ों के ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनमें मानवता का ह्रास हुआ है, और निरंतर होता जा रहा है। गत वर्षों में जब भारत विभाजन हुआ, तो देश में, पशुता, दानवता, प्रतिशोध, हत्या, व्यभिचार, लूटमार, मारकाट का एक बर्बर तूफान देखने में आया। विभाजन के सम्बन्ध में हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में दानवता का भयावह नृत्य हुआ उसे देख कर दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है।

भारत विभाजन सम्बन्धी मारकाट-

कलकत्ता, नौआखाली, पूर्वी बंगाल, पंजाब के झगड़ों की तह में जाइए तो आपको मनुष्य की बर्बरता, हत्या, लूट, निर्ममता, पैशाचिकता, भयंकरता, व्यभिचार, औरतों को बेआबरु करने के असंख्य उदाहरण प्राप्त हो जाएंगे। करोड़ों हिन्दू मर्द औरतें और बच्चे बर्बरता के शिकार बने, नंगी स्त्रियों के जुलूस निकाले गए, बच्चों को भून डाला गया, अपहृत स्त्रियाँ सड़ा सड़ाकर वेश्या का पेशा स्वीकार करने के लिए विवश की गई । रुपये, जायदाद, अन्न, वस्त्रों की हानि अरबों तक पहुँची। श्री राधानाथ चतुर्वेदी ने “आज” में एक वक्तव्य प्रकाशित किया था। उसे हम यहाँ उद्धृत करते हैं ः-

“मैं पाँच सौ मील से चला आ रहा हूँ बाबू। मेरे बच्चे भूखों मर जाएंगे। मुझे छोड़....” और दस लाठियों ने उसकी कपार क्रिया कर दी..... हम लोग 40-50 मील की गति से भाग रहे थे उस समय जले हुए आदमियों के ढेर, नालियों में फेंकी गई औरतों बच्चों की लाशें, स्त्री, बच्चे और वृद्धों की नंगी अधनंगी लाशें और रक्त के पनाले छाया चित्र की भांति आँखों के सामने से गुजर रहे थे अभी देखा गया कि एक इमारत में जिसमें 3-4 हजार आदमी रहते थे, आग लगा दी गई। करतूत मुसलमानों की थी, किन्तु कलकत्ते का यह दृश्य इस बात का साक्षी है कि हिंदुओं को दया का डंका पीटने का अधिकार नहीं रहा और मुसलमान पवित्र इस्लाम धर्म के सदस्य नहीं रहे।”

समाज का कोढ़ -

वर्तमान काल में मठ, मन्दिरों, धर्मशालाओं का पवित्र उद्देश्य प्रायः लुप्त हो गया है, पुजारी, मठाधिकारी, साधु का स्वाँग पहिनने वाले ढोंगी, दुराचारी मन्दिरों जैसी पवित्र जगह भी घृणित एवं कुत्सित कार्यों में प्रवृत्त हो गये हैं। उनमें, कपट, झूँठ, वासना लोलुपता, गुप्त व्यभिचार, पापमय दृष्टि की निरन्तर वृद्धि होती जा रही है। उनको रोकने वाला कौन है? उनकी पाप लीला देखकर भी जनता अन्धपरम्परा, रूढ़िवादिता, अज्ञान, कुतर्क, अशिक्षा, मूर्खता का पालन करती हुई उन्हें गुरु बना रही है।

देश में 60-62 लाख साधु हैं, जो देश का भोजन नष्ट कर निज स्वार्थ सिद्धि करते, समाज में अनैतिकता, दुष्कर्म बढ़ाते और शराब, गाँजा, भाँग, चरस, अफीम, सिनेमा, चोरी, धूर्तता, वेश्यागमन में लीन रहते हैं। आए दिन इन ढोंगी पाखंडी साधुओं द्वारा गन्दे कार्य होते रहते हैं। साधु के बाने में चोर आसानी से अपने को छुपा लेते हैं। अनेक स्थानों पर साधु लोग स्त्रियों को बहकाकर भगाते हुए, बलात्कार करते हुए, जेब कतरते हुए या चोरी कराते हुए पकड़े जा चुके हैं।

अखिल भारतीय संन्यासी परिषद के प्रधान मंत्री स्वामी प्रणव तीर्थ और महा गुजरात साधु संघ के मंत्री स्वामी नियानन्द ने पिछले दिनों सरकार से अनुरोध किया कि वह साधुओं को बेकारों या अनुत्पादक लोगों की श्रेणी में रखे, साधुओं के सम्बन्ध में आम जनता में फैले भ्रम का उल्लेख कर उन्होंने कहा कि असली साधु तो पचास हजार के लगभग ही हैं, जो सच्चे उपदेशक और मार्गदर्शक हैं। तीन मास की जाँच के पश्चात यू. पी. की खुफिया पुलिस ने पता लगाया है कि किस प्रकार एक महन्त एक गिरोह द्वारा रेलगाड़ियों को गिरवाकर यात्रियों को लूटने का पेशा करता है। इस बीभत्स कार्य के सामने उनके द्वारा घटों, जंगलों, मन्दिरों, मठों आदि में होने वाला अनाचार फीका पड़ जाता है।

धर्मशालाओं को किराये के होटल सरीखा बना दिया गया है। नए मुसाफिर को प्रायः पहले सबसे गन्दा बदबूदार कमरा दिया जाता है। फिर पैसे देने पर अधिक अच्छे कमरे में बदल दिया जाता है। आश्चर्य तो यह है कि जहाँ कठिनता से तीन चार दिन मुसाफिर रह सकता है चुपचाप किराया देने पर वर्षों निकल जाते हैं। अनेक स्थानों पर धर्मशालाएं व्यभिचार एवं जुए के अड्डे हो गए हैं। थोड़े से पैसों के लोभ से धर्मशाला के रक्षक बड़ा बड़ा पाप करने को उद्यत हो जाते हैं। पैसे से आज सब कुछ खरीदा जा सकता है। पैसे से आज सब कुछ खरीदा जा सकता है-पूजा, पाठ, जप, तप, जन्म पत्री मिलान, धर्म। यह है हमारी इन्सानियत!


नैतिकता का इतना नीचा स्तर कभी नहीं देखा गया।

इतिहास में कोई युग ऐसा नहीं हुआ जब नैतिकता का स्तर इतना नीचा रहा हो। नैतिक पतन इतना गहरा अद्भुत एवं व्यापक है कि देखकर आश्चर्य होता है। यूरोप अमेरिका की ओर देखिए। अमेरिका में सरकारी आँकड़े बताते हैं कि 1948 से वहाँ पर हर 18 सेकिंड में एक संगीन अपराध हुआ, हर दिन 36 हत्याएं हुई और 255 स्त्रियों के साथ बलात्कार किया गया। डाइसन कार्टर ने हिसाब लगाया है कि 12-13 करोड़ की आबादी के इस देश में प्रतिमास 5 करोड़ कहानियाँ व्यभिचार की हो जाती हैं। डा. टर्नर ने लिखा है “1960 तक अमेरिका की अविवाहित तरुणियों में कौमार्य जैसी वस्तु का नाम नहीं रह जायगा। दस वर्षों में अमेरिका में नैतिकता का धरातल इतना नीचा हो जायगा जितना कि इतिहास में कभी नहीं देखा गया। अमेरिका में हर वर्ष कम से कम तीस हजार बच्चे ऐसे होते हैं, जो जन्म से ही गर्मी की बीमारी साथ लेते हैं। अपने माता पिता की यौन स्वच्छंदता का मूल्य अपने सारे जीवन उन्हें घुल घुलकर चुकाना पड़ता है। इसका दूसरा परिणाम होता है गर्भ में ही या जन्मते ही लाखों शिशुओं की प्रति वर्ष हत्या। अपराधों की संख्या निरन्तर अभिवृद्धि पर है। मदिरा बेचने, वेश्या वृत्ति करने, जुए के अड्डे चलाने, हब्शियों को घेरकर मारने, मजदूरों की हड़तालें तोड़ने, विरोधियों की हत्याएं करने, दंगे कराने और लड़ाइयों तक के कारनामे इन अपराधों में शामिल हैं।

भारत में व्यसन व्यभिचार, शराब खोरी, सिगरेट, तम्बाकू इत्यादि का प्रयोग निरन्तर होते हुए सामाजिक पतन का द्योतक है। भोग विलास बलात्कारों, चोरी डकैतियों, वेश्यालयों, यौन अनैतिकता, शिशु हत्याओं, आत्म हत्याओं से होने वाले अपराधों की संख्या निरन्तर बढ़ती गई है। मठों मन्दिरों में अनैतिकता भ्रष्टाचार, धोखेबाजी का राज्य है। साधु महात्माओं के वेश में दुराचारी लोग जनता को ठग रहे हैं। मठों से भी गयी बीती दयनीय अवस्था अखाड़ों की है। साथ ही, जटा बढ़ाये हुए इधर उधर गुँडापन करने वाले, मादक वस्तुओं का सेवन करने वाले, ग्रामीण जनता से तथा मठों से धमकियाँ देकर चम्मच, संडासा पटक कर, अश्लील वाक्यों की झड़ी लगाकर द्रव्य ऐंठने वाले साधु नामधारी व्यक्तियों को देखकर मानवता के भीषण पतन का अनुमान सहज ही लग सकता है।

जुर्म, डकैती, और दंगे-

हमारे देश में जुर्मों की संख्या किस तेजी से बढ़ रही है, इसका अनुमान पुलिस की नाना रिपोर्टों को देखने से होता है। यहाँ गत वर्ष के एक प्रान्त (पंजाब) के कुछ आँकड़े प्रकाशित किये जाते हैं, जिनसे देश में बढ़ते हुए जुर्मों का सहज ही अनुमान हो सकता है-

अप्रैल 1950 से अप्रैल 1951 से

मार्च 1951 तक मार्च 1952 तक

कत्ल 581 585

डकैतियाँ 81 62

राहजनी की घटनाएं 524 502

दंगे 278 303

चोरियाँ 6624 6804

आवकारी अधिनियम 5191 9626

शस्त्र अधिनियम 3023 3210

18322610

जुर्मों की कुल रिपोर्टें 3583 38501

उपर्युक्त रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि 1951-52 में जुर्मों की संख्या 1950-51 की अपेक्षा कही अधिक है। इसी अनुपात पर आप मोटे रूप से तमाम प्रान्तों के भयंकर जुर्मों का अनुमान लगा सकते हैं। पिछले वर्षों में पुलिस और अराजक तत्वों की सशस्त्र मुठभेड़ हुई है। अनेक खतरनाक डाकू गोली के शिकार हुए हैं। रेलों पर भी जुर्मों, कत्ल, डकैतियों, चोरियों गुँडों और मुसाफिर खानों में जेब कतारों की संख्या में वृद्धि हुई है। कलकत्ते में छः महीनों में चोरी एवं डकैतियों की 4767 घटनाएँ हुई हैं। कलकत्ता इस वर्ष के प्रथम 6 महीनों में चोरी, डकैती, जेब कटी, गहना चोरी की इतना संख्या मानवता के लिए कलंक स्वरूप है। गत वर्ष इस प्रकार की कुल घटनाएं मिला कर 5300 घटनाएं हुई थीं। 1952 के जनवरी मास से जून मास तक कलकत्ता में डकैती की 24 घटनाएं हुई। गत वर्ष प्रथम छः महीनों में 59 डकैतियां कलकत्ता में हुई थीं। इस वर्ष के पूर्वार्द्ध में चोरी की 744 घटनाएं पुलिस को ज्ञात हुई। बच्चों के शरीर पर से जेवर चुराने की घटनाओं में इस बार वृद्धि हुई है। गत वर्ष के पूर्वार्द्ध में ऐसी कुल 36 घटनाएं ऐसी हुई थीं जब कि इस वर्ष के 38 घटनाएँ हुई। गिरहकटी की कुल 313 घटनाएं इस अवधि में पुलिस के पास आयीं। आज जिधर देखिए, ऐसी घटनाओं का बोलबाला है। राजस्थान, बंगाल, बिहार का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन प्रदेशों में लूट पाट हत्या और डाकेजनी व्याप्त है।

नई दिल्ली 23 जून 1952 का समाचार है कि भारत सरकार के स्पेशल पुलिस विभाग ने गत वर्षों में भ्रष्टाचार के 1045 मामले हाथ में लिए जिनमें 2091 अभियुक्त साबित हुए। इनमें से 154 व्यक्ति अफसरी ग्रेड के थे। इस प्रकार इन मामलों में गजेटेडे अफसरों की संख्या का कुल अभियुक्तों के साथ अनुपात प्रायः 10 प्रतिशत रहा। सन् 1951 में जितने भ्रष्टाचार के मामले हाथ में लिए गए उनमें से 274 नये मामले थे। इनमें से 43 मामले आयात निर्यात कन्ट्रोल के अतिक्रमण और मुद्रा विनियम की चोटी से सम्बन्धित थे और 12 सप्लाइज के एक के अंतर्गत आते थे। शेष मामले घूस, गबन, ठगी आदि से सम्बंधित थे। इनमें से बहुत से मामले रेलवे विभाग से सम्बन्धित थे।

मनुष्यता का अभिशाप -

लज्जा की प्रतीक नारियों का नग्न प्रदर्शन, देश का विभाजन, पाकिस्तान का भीषण नर मेध, निर्दोष बच्चों का अंग विच्छेद तथा व्यभिचार निरंतर बढ़ते गये हैं। महायुद्धों में नर संहार जैसी ध्वंसात्मक लीलाएँ हैं, वे तो स्पष्ट हमारे सामने आ जाती हैं किन्तु इनसे भी भीषण लीला होती है मानव के नैतिक पतन की। पिछले वर्षों में नारी का नैतिक पतन किस बुरी तरह हुआ है, यह देखकर लज्जा से मस्तक झुका जाता है। व्यभिचार, भ्रष्टाचार, चोरबाजारी, वेश्या वृत्ति निरन्तर तेजी से बढ़ी है।

जापान में, वेश्यावृत्ति अर्थोपार्जन का एक प्रमुख व्यवसाय हो गया है। ऐसी वेश्याओं की संख्या 70/80 हजार है जिनसे 200,000,000 डालर उपार्जित होते हैं। कोरिया युद्ध द्वारा उपार्जित होने वाले डॉलरों के बाद उक्त व्यभिचार व्यवसाय का दूसरा स्थान है। बहुत सी अबोध जापानी बालिकाएँ वेश्या-वृत्ति अपना रही हैं। पत्रों में प्रकाशित आँकड़ों के अनुसार ऐसी स्त्रियों द्वारा उत्पन्न अवैध बच्चों की संख्या 200,000 है और इनमें से अधिकाँश परित्यक्त भी किए जा चुके हैं। मानवता का ऐसा अधःपतन किसी काल में नहीं देखा गया था।

दिल्ली की एक महिला कार्यकर्ता ने दिल्ली की स्त्रियों की नैतिकता का जाँच करने का प्रयत्न किया। वे अपनी रिपोर्ट में लिखती हैं-”दिल्ली में 1300 वेश्याएँ हैं, जिन 300 शरणार्थियों में से हैं। लेकिन दिल्ली में कोई सड़क या मोहल्ला ऐसा नहीं है, जहाँ कुटनखाने न चलते हों और वहाँ बहुत सी स्त्रियाँ जाती हैं कालेज में पढ़ने लिखने वाली लड़कियाँ भी कभी कभी वहाँ जाती हैं और अपना श्रृंगार का खर्चा निकाल लेती हैं।”

आज लोगों की नैतिकता ऐसी शिथिल हो गई है कि शरीफ लड़कियों माँ बहिनों को निकलना कठिन है। सायंकाल से ही ऐसे वासना लोलुप व्यक्ति सजीले कपड़े पहिन गले में हार डाल इत्र लगा पान खाते हुए निकल जाते हैं और हँसी दिल्लगी मजाक करने का बेहूदा प्रयत्न करते हैं। गुँडों के पंजे से इज्जत बचाना भी एक विषम समस्या बन गयी है। लड़कियों को भगा ले जाना, मजाक करना, पथ भ्रष्ट करना, अनुचित प्रेम का उद्योग करना, रोमांसवृत्ति आज कल की महा व्याधियाँ हैं।

अनर्थकारी सहशिक्षा

हमारे यहाँ अमेरिका इंग्लैंड के अनुकरण पर बालक बालिकाओं की सहशिक्षा की महाव्याधि फैल रही है। सहशिक्षा का इतिहास यह स्पष्ट करता है कि जहाँ जहाँ इसका प्रयोग हुआ है, नैतिकता सुरुचि और सत् प्रवृत्तियों की रक्षा नहीं हो सकी है। न्यूयार्क से निकलने वाले “हार्पर्स मैगज़ीन” में एक महाशय ने लिखा है-

“इस बात का पता लगाने के लिए कि हमारे कालेजों में पढ़ने वाली युवतियों में कितनी ऐसी हैं जिनके पास वह रहस्यमय वस्तु सुरक्षित है, जिसे कौमार्य कहते हैं, अमरीका के कुछ बहुत बड़े बड़े सम्भ्रान्त कालेजों में लड़कियों की गुप्त रूप से परीक्षा और गणना की गई तो मालूम हुआ कि कुमारी कन्याओं की संख्या असाधारण रूप से बहुत कम है। ऐसा प्रतीत हुआ कि अमेरिका ऐसी अविवाहिता लड़कियों से भरा पड़ा है, जिनको लोग 18 वर्ष की आयु के बाद या उससे पहले केवल सौजन्य से ही कुमारी कहते हैं।”

आधुनिक शिक्षित युवक युवतियों की उच्छृंखलता नैतिक और शारीरिक पतन, सिनेमा, प्रेम, काम-पिपासा, विकारमय मस्तिष्क, फैशन तथा सौंदर्य प्रदर्शन की अभिरुचि रोमाँस, विलासता-इस बात के प्रमाण हैं कि सहशिक्षा उन्हें किस गर्त में खींच रही है।

आधुनिक सभ्यता, जिसकी हम प्रशंसा करते नहीं थकते, वासनामय, विलासपूर्ण, चमक दमक, तामसिक वातावरण, गन्दे आमोद प्रमोद, दिखावटी रहन सहन की जननी है। यदि वासना का नग्न नृत्य देखना हो, यदि सामाजिक बन्धन तथा लाज शर्म को ताक में रखा देखना हो तो वह आज के फिल्म जगत में देखा जा सकता है। सिनेमा का जगत उच्छृंखलता का जीता जागता नमूना है।

गन्दे उत्तेजक साहित्य का यह तूफान!

विकारी उपन्यास, अश्लील खेल तमाशे, उत्तेजक साहित्य, श्रृंगारी वातावरण का जितना प्रचार आज कल है, इतना कभी नहीं रहा है। नाचने वाली, गाने वाली वेश्याएँ, विषयी गीत, अश्लील मूर्तियों का प्रचार चल रहा है। सबसे निकृष्ट उत्तेजक प्रभाव सिनेमा का है, जिसका कुत्सित प्रभाव हम आने वाली सीढ़ी पर देख रहे हैं। सिनेमा द्वारा समाज में कामुकता, वासना लोलुपता, गन्दगी, अश्लीलता, उन्मुक्त प्रेम इत्यादि को बढ़ावा दिया जा रहा है। छोटे छोटे बच्चे कामवासना के वशीभूत देखे जा रहे हैं। वे प्रायः ऐसी ऐसी गन्दी हरकतें करते हैं। जिनके समाचार पढ़कर मानवता कलंकित होती है। जितनी गन्दी हरकतों से आज सभ्य समाज कलंकित हो रहा है, उसमें से नब्बे प्रतिशत का उत्तरदायित्व अकेले सिनेमा की गन्दी, सारहीन, कामोत्तेजना, से परिपूर्ण फिल्मों पर है।

श्री राजेश्वरप्रसाद चतुर्वेदी ने ठीक ही कहा है-”सिनेमा द्वारा कामुकता का दो प्रकार से प्रचार होता है- एक गीतों एवं वार्तालाप द्वारा तथा दूसरे शारीरिक चेष्टाओं द्वारा। रेडियो द्वारा कामुकता का प्रचार प्रायः संगीत द्वारा होता है। संगीत के फरमाइशी रिकार्डों का इसमें विशेष स्थान है। गन्दे गानों को माँ बाप और बच्चे साथ साथ बैठकर सुनते हैं, मुग्ध होकर प्रोत्साहित करते हैं, तो बच्चों पर गन्दे संस्कार पड़ जाते हैं। अपरिपक्व अवस्था के ये गन्दे संस्कार प्रौढ़ावस्था की शिक्षा से और दृढ़ बन जाते हैं। इन गानों का बच्चे अनुकरण करते हैं। यह तो मार्ग ही उगती सीढ़ी को कामान्धता के गड्ढ़े में गिराने का है। कुत्सित वातावरण में पले हुए बालक बालिकाएं गलियों में आवारागर्दी भले ही कर लें उत्तरदायी नागरिक कभी न बन सकेंगे।

अश्लीलता का, कामान्ध गीत और बेहयाई का तूफान रेडियो पर बरस रहा है। वह मानवता का उपहास ही कहा जा सकता है। यदि फरमाइश करने वाले औचित्य का निर्णय नहीं कर पाते, कम से कम उत्तरदायित्व रखने वाले अधिकारियों को विवेक से काम लेना चाहिए।

भूख और गरीबी का यह ताँडव!

आज समाज में एक ओर लोग भूख से तड़प-2 कर मर रहे हैं, तो दूसरी ओर हजारों मन अनाज बनियों के भण्डारों खाइयों, दुकानों में ऊँचा भाव आने की प्रतीक्षा में सड़ गल कर बदबूदार बन रहा है। बेबसी, भूख और गरीबी का शिकार होकर विचित्र व्यवहार करने के वृत्तान्त पत्र में देखने में आते रहते हैं। कुछ उदाहरण देखिए-प्रथम केस युक्त प्रान्त के कानपुर जिले का है। कई दिनों पश्चात एक स्त्री ने तीन रोटियाँ बनाई। एक एक रोटी अपने दो बच्चों को खिला दीं और तीव्र भूख न सह सकने के कारण तीसरी रोटी उसने खुद खा ली। जब शाम को पति लौट कर आया और उसने देखा कि उसके लिए रोटी नहीं बची है, तो उसने गुस्से में आकर इतने जोर से पत्नी के पेट में लात मारी कि उसी क्षण उसका शरीरान्त हो गया।

दूसरी घटना गुजरात की है। बूढ़े चाचा ने देखा कि गरीबी से छुटकारा पाने के लिए उसका भतीजा अपनी पत्नी को बेचने को तैयार है। क्रोध में आकर उसने कृपाण लेकर पति पत्नी दोनों को सदा के लिए संसार से छुटकारा दिला दिया।

तीसरी घटना बंगाल की है। अकाल के दिनों में एक गरीब किसान को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा। जमीन बेचने से काम न चलता देख उस गरीब ने अपनी पत्नी को भी बेच दिया। लड़की बच रही थी। खुद अपना ही खर्चा चलाना मुश्किल था, किसान ने उसे भी बेच दिया। कुछ दिनों बाद उसका भी पता न लगा।

हाल ही में कलकत्ता के स्कूल के हेड मास्टर ने भूख से तंग आकर अपने छोटे छोटे शिष्यों को एकत्रित कर भिक्षा माँगी थी। उसे तीन माह से वेतन प्राप्त नहीं हुआ था।

एक भाई दिल्ली से लिखते हैं-”भारत में भुखमरी कम नहीं है, बेकारी कम नहीं है और गरीबों को पेट पालने के लिए बच्चे तक बेच देने पड़ते हैं। मध्यवर्ग को अपना गुजर चलाने के लिए अपनी बहिनों और पत्नियों को कुटनखानों में भेजना पड़ता है जबकि दूसरी तरफ सिनेमा के टिकट नहीं मिलते। नए-नए सिनेमा बनते जाते हैं, लाखों रुपये उनके पीछे बरबाद होते हैं... सिनेमा के अभिनेताओं के बड़े वेतनों के खिलाफ कुछ नहीं किया जाता और उसका सहयोग भोगविलास, व्यभिचार, जुए और शराब में होता है।”

हजारों मन भोजन का विनाश

दूसरी ओर अन्न को नष्ट करने, खाद्य सामग्री को थोड़े से चाँदी के टुकड़ों के लिए सड़ाने, बदबूदार बनाने, कीड़ों के मुख में डालने, पशुओं को खिला डालने, जूठन के द्वारा नालियों में बहा डालने के भी अनेक उदाहरण उपस्थित किए जा सकते हैं।

आज की पूँजीवादी व्यवस्था में बनिए तमाम अनाज खरीद कर खाइयों में गाड़ देते हैं, जिससे भाव बढ़े और उनकी चाँदी बन जाय। कभी कभी यह अनाज दो दो वर्ष जमीन में पड़ा सड़ा करता हैं। यदि भाव सस्ता होता है, तो अन्दर ही अन्दर घुन कर नष्ट हो जाता है, अथवा बाहर निकाल कर पशुओं को खिला दिया जाता है। यदि मानव मानव के कल्याण की वृत्ति रख इस शोषण पद्धति को छोड़ कर इस अनाज को बेचकर कम लाभ से ही संतोष कर ले, तो हमारा निर्धन वर्ग भोजन की कमी के कारण मर नहीं सकता। खाद्य समस्या को उग्र बनाने में पूँजीपतियों का प्रमुख हाथ है। उन्हें रुपया चाहिए, मानवता की समुन्नति, विकास, रक्षा से कोई सरोकार नहीं।

आगरा के एक होटल की स्मृति मेरे मन में अटकी है। एक दिन हाथ धुलाने वाला नौकर गैरहाजिर था। बर्तन साफ करने वाले स्थान पर नल से हाथ धोने गया, तो बिखरी हुई जूठन देखकर दंग रह गया। रोटी के टुकड़े, दाल तरकारियों का एक ओर ढेर पड़ा था। नाली में अन्न बह रहा था। चावलों के ढेर पर मक्खियां भिन भिना रही थीं। कितनी जूठन ये बाबू लोग छोड़ते हैं, जब कि एक-एक टुकड़े के लिए तरसते तरसते अनेक दीन हीन भारतीय मर जाते हैं।

“तुम इस जूठन का क्या करते हो?” मैंने पूछा “मेहतर ले जाता है, सरकार। बाकी नाली में बहा देते हैं। क्या करें बाबू लोग आज कल बहुत जूठन छोड़ते है। जरा कोई रोटी फूली नहीं कि उसे अलग रख देते हैं। सब्जी दाल में मिर्च नमक कम अधिक हो जाय, तो उसे यों ही छोड़ देते हैं। खीर, दाल, भाजी में मक्खियाँ गिर जाएं या कुछ बाल वगैरह निकल आये, तो वह फेंका जाता है। इसके अलावा कुछ बातों बातों में बैठे रहते हैं और गर्म रोटी की बाट देखा करते हैं। एक ठंडी हुई छोड़ी, नई आई तो उसके दो चार टुकड़े खाये। ऐसे ही चलता है सरकार आधा भोजन जूठन में सुअरों या मवेशियों को खिला दिया जाता है।”

जिस देश में खाद्य समस्या जीवन मरण का प्रश्न बन रही हो, उसमें जूठन छोड़ने का दण्ड फाँसी से क्या कम होना चाहिए।

व्यसनों की ओर बढ़ती हुई प्रवृत्तिः-

बीड़ी, सिगरेट, पान आज की सभ्यता के एक अविभाज्य अंग बन गये हैं। चाय को बुरा नहीं समझा जाता। कुछ व्यक्ति शराब और गाँजा भाँग चरस इत्यादि विषैली वस्तुओं का प्रयोग करते हैं। गली गली और छोटे बड़े बाजारों में पान सिगरेट की दुकान उत्तरोत्तर बढ़ती पर हैं। रेल के स्टेशन पर चाहे और कुछ न बिके बीड़ी सिगरेट तथा पान अवश्य बिक जायगा। आज का व्यक्ति बिना भोजन के रह सकता है, किन्तु सिगरेट पान और चाय के बिना उसे दिन व्यतीत करना कठिन है। बम्बई कलकत्ता दिल्ली इत्यादि बड़े नगरों का जीवन इतना कृत्रिम है कि अनेक व्यक्ति एक बार भोजन कर केवल चाय, पान तथा सिगरेट पर ही रह जाते हैं।

दिमागी वेश्याएं-

आज के युग में दो ऐसे वर्ग हैं, जिन्होंने सेवा के स्थान पर समाज का बड़ा अहित किया है (1) वकील (2) डॉक्टर। वकीलों का कार्य एक दूसरे के मामलों को सुलझाना, पारस्परिक मेल मिलाप कराना, घर पर ही झगड़ों का निपटारा करा देना, प्रेम, सौहार्द, सहकारिता सहानुभूति की अभिवृद्धि करना होना चाहिए। लेकिन आज हम दूसरी ही बात देखते हैं। वकील मेल के स्थान पर एक दूसरे को तनिक तनिक सी बातों के लिए लड़ाने में अधिक दिलचस्पी लेते हैं, कचहरीया मुकदमों से भरी रहती हैं, भाई भाई को, पिता पुत्र को, पति पत्नी को, लड़ा भिड़ाकर वकील समाज में विद्वेष, ईर्ष्या, स्पर्द्धा संघर्ष, कटुता, वैमनस्य की वृद्धि कर रहे हैं। साधारणतः जहाँ जरा सा सहन करने से शाँति हो सकती है, वहाँ एक दूसरे को उकसाकर वकील लड़ा देता है और दोनों का रुपया चूसता है। मुकदमे बाजी का नशा जिसे लगा, वही दूसरे को ले डूबा, घर का रुपया समाप्त हुआ झूठी गवाहियाँ देते देते वर्षों निकल जाते हैं। हाथ कुछ नहीं आता। मुकदमे बाजी ने अनीति, स्वार्थ, झूठ कपट की वृद्धि की है वकील समाज के झगड़ों पर उसी प्रकार पनपता है जैसे रक्त पर खटमल, जूँ या जोंक। यह हमारी दानवता को जगाती है। और ईर्ष्या कटुता पाप कुपथ की वृद्धि करती है।

“नया जीवन” पत्र में वकीलों के पतन पर दो बड़े महत्वपूर्ण उदाहरण प्रकाशित हुए हैं। देखिए-

अभी मद्रास में सड़क तोड़ने पर एक मोटर वाले का चालान किया गया। उचित था कि मोटर वाला अपनी भूल मान लेता, पर नहीं, उसने वकील खड़ा किया और वकील ने कहा कि मेरे मुवक्किल के खिलाफ यह अपराध लगाया जाता है कि वह पुलिस बोर्ड “रुको, सुनो और फिर आगे बढों ” देखकर भी नहीं रुका। मेरा उत्तर यह है कि बोर्ड ही गैर कानूनी है, क्योंकि पुलिस ने उसे लगाने की मंजूरी ही मजिस्ट्रेट से नहीं ली है। फिर ये बोर्ड सिर्फ सावधान करने के लिए हैं, इसलिए इनकी बात न मानने पर मुकदमा चलाया ही नहीं जा सकता! अपने कुछ पैसों के लिए ये वकील महाशय यह भूल गये कि वे समाज में कितनी गन्दी अराजकता को इस तरह समर्थन दे रहे हैं!

कोलंबो में ग्वाले पर दूध में पानी मिलाने का मुकदमा चला। उचित था कि वह भी अपनी भूल मान कर सजा ले लेता, किन्तु नहीं, उसने भी मुकदमा लड़ाने के लिए एक वकील किया। वकील ने कचहरी में कहा, “जिस दूध में पानी मिश्रित किया गया था, वह आदमियों के पीने के लिए नहीं था, देवता पर चढ़ाने के लिए था इसलिए मेरे मुवक्किल पर मुकदमा ही नहीं चल सकता!

मजिस्ट्रेट ने हँस कर कहा- जब यह देवता को भी ठगने की हिमाकत कर सकता है, तो इसे बिना सजा कैसे छोड़ा जा सकता है? और उस पर 75 रु जुर्माना कर दिया, पर प्रश्न तो यही है कि एक ऊँचे दर्जे के शिक्षित मनुष्य का खुले आम ऐसी बात कह सकना, क्या किसी समाज व्यवस्था के लिए कड़वी से कड़वी आलोचना नहीं है?

यह सभ्य डाकेजनीः-

द्वितीय वर्ग डॉक्टर वैद्य हकीम ओझा इत्यादि का है। चिकित्सा शास्त्र का ज्ञान न होने पर दो एक नुस्खे, या चार छः दवाइयों की शीशी लेकर हर कोई डॉक्टर बन बैठा है। जितना खोखलापन, धोखा, पतन इस पेशे में है, इतना कहीं नहीं दीखता। अंग्रेजी पढ़े लिखे डाक्टरों की चिकित्सा इतनी महंगी है कि रोगी को अच्छे होते होते अपना घर बार चीजें जायदाद बेचनी पड़ जाती है। अपनी फीस, दवा फरोश से कमीशन, दवाई में पानी, मोटर ताँगे का किराया मिला कर व्यय इतना अधिक हो जाता है कि हमारे गरीब देश के अधिकाँश व्यक्ति उन्हें नहीं बुला पाते।

“नया समाज” में श्री गुरुदयाल मलिक ने एक डॉक्टर और रोगी के विषय में लिखा है-

“कहते हैं, एक बार एक डॉक्टर ने अपने एक बीमार को उसकी बहुत दिनों की बीमारी से मुक्त कर दिया। कई दिनों बाद एक दिन हठात् फिर डॉक्टर की उस रोगी से भेंट हो गई। डॉक्टर साहब ने मिज़ाज पूछे तो रोगी बोला “सब ठीक है आप की कृपा से मैं अच्छी तरह चल फिर सकता हूँ। मगर डॉक्टर साहब, मुझे अपने घर का सामान आदि सब कुछ बेचना पड़ा है।”

“वह कैसे भाई?” डॉक्टर ने पूछा

नहीं तो आपका बिल कैसे चुका सकता था? उत्तर मिला उपर्युक्त कहानी में अतिशयोक्ति रत्ती भर भी नहीं है। थोड़े ही दिन हुए मलिक जी के एक मित्र, जो मध्यम वर्ग के थे, बीमार पड़े। आपरेशन हुआ। आपरेशन डॉक्टर के घरेलू शफाखाने में हुआ था। मित्र दस दिन अस्पताल में रहे। छोड़ने पर डॉक्टर का 1250) का बिल चुकाना पड़ा, जब कि मित्र का माहवारी वेतन केवल दो सौ रुपया मात्र था।

श्री मलिक ने एक और प्रकार की भी डाक्टरों की डाकेजनी का उल्लेख किया है। आप लिखते हैं, “मैं कई डाक्टरों को जानता हूँ, जिनको माहवारी आमदनी कई हजार रुपये हैं, मगर वे सरकार को एक पाई इनकम टैक्स नहीं देते। हाँ स्वयं अपने पर अपने परिवार वालों पर खूब व्यय करते हैं, क्लबों और सिनेमा नाटकों पर पानी की तरह रुपया बहाते हैं। मगर जब कोई बीमार हाथ जोड़ कर प्रार्थना करता है कि फीस में कमी की जाय, तो उसे घुड़ककर जवाब देते हैं। ऐसे भी डॉक्टर मौजूद हैं तो आधा ऑपरेशन कर बीमार के रिश्तेदारों से पूरी फीस नकद मेज पर गिनवा लेते हैं।”

यह है हमारे सभ्य डाकुओं की डाकेजनी! जितनी हानि चोर डाकुओं से नहीं होती, उतनी इन वकील डाक्टरों से अनायास ही हो जाती है।

वकीलों ने हमें परस्पर मेल के स्थान पर जरा-जरा सी बातों के लिए कोर्ट में मुकदमे दायर करना, हजारों रुपये तबाह करना, चलते फिरते व्यर्थ के झगड़े मोल लेना, निर्बलों को कानून के पिंजरे में फाँस कर लूटना सिखाया है। जो ग्रामीण मजदूर लोग कानून नहीं जानते, उन्हें कानून की आड़ लेकर खूब उल्लू बनाया जाता है। एक एक मुकदमा कई कई वर्ष तक चलता है, जिसमें वकील जोंक की तरह मुवक्किल को खूब चूसता रहता है। वकील हमारे क्रोध, ईर्ष्या, झगड़ने की आदत पर पनपने वाला प्राणी है।


शिष्टाचार की अवहेलना और अनुशासन हीनता

अंग्रेजी की एक कहावत है-”मैनर मेक्स ए मैन” अर्थात् मनुष्य अपने शिष्टाचार, बैठने उठने बोलने, खाने पीने के तरीके से जाना जाता है। सच्चा मानव वह है, जिसमें मनुष्यों जैसे देवोंमय गुण होते हैं, जो शिष्टाचार जानता है, जिसके बैठने उठने बोलने हंसने के तरीके मानवोचित होते हैं।

आज हम शिष्टाचार की सर्वत्र कमी देख रहे हैं। हमें सभ्यों जैसे तौर तरीके नहीं आते हैं, प्रणाम नमस्ते इत्यादि आदर सूचक शब्दों का हम प्रयोग नहीं करते। एक विज्ञान ने उचित ही कहा है-

“हम बैठते हैं तो पसर कर। बोलते हैं तो चिंघाड़ कर। पान खाते हैं, तो पीक कुरते पर। खाने बैठें तो सवागज धरती पर टुकड़े और सब्जियाँ फैला दीं। धोती ऊँची पहनी तो कुरता बहुत नीचा हो गया। कुरता मैला, तो धोती साफ। बिस्तर साफ तो खाट ढीली। कमरे में झाड़ू तो दरवाजे पर कूड़ा पड़ा है। चलते हैं, तो चीजें गिराते हुए। उठते हैं, तो दूसरों को धकेलते हुए--ये सब तरीके मैनर ही किसी को संस्कृत या सभ्य बनाते हैं। हम चाहे घर पर हों या समाज में, हमें चाहिए कि इनका ध्यान रखें।”

इसी प्रकार की और सामाजिक त्रुटियों की ओर ध्यान आकृष्ट किया जा सकता है, जैसे, पुस्तकें उधार लेकर वापस न करना, वायदे पर आदमी को घर बुलाना और स्वयं घर से गायब रहना, दुकानदार से वस्तुएं उधार खरीद कर दाम देना भूल जाना, जब व्यापार चल निकले तो खराब निम्न कोटि का माल बना कर दाम पूरा चार्ज करना, पत्रों का जवाब न देना, अपने रोजाना के काम पर देरी से आना, दफ्तर की अनेक चीजें जैसे कलम, रोशनाई, निंब, पेन्सिल, कागज कार्बन, पैकिंग बक्स इत्यादि को चोरी से घर ले जाकर व्यक्तिगत काम में ले लेना, मुँह से कुछ कह कर आचरण में कुछ दूसरा ही कार्य करना-ये ऐसी अशोभनीय बातें हैं, जो मानवता की उच्च प्रतिष्ठा के किसी प्रकार भी अनुकूल नहीं हैं। मानवता की रक्षा के लिये इनका तुरन्त परित्याग कर देना चाहिये।

जाति पाती सम्बन्धी सामाजिक अत्याचार-

आये दिन जाति-पाती की संकुचिता को लेकर नए-नए अत्याचारों के समाचार आते रहते हैं। परस्पर पृथक वर्ण या जाति के युवक युवतियों में प्रेम सम्बन्ध हो जाने पर विवाह न होने पर जो आत्महत्याएँ होती हैं, वे सभी जानते हैं। जाति-पाँति ने निरन्तर भेदभाव, संकुचिता, फूट, कलह, प्रमाद पराजय, नैतिक मानसिक दुर्बलता, बंटवारा, धन सम्पत्ति का नाश, विभाजन इत्यादि दुर्गुणों की अभिवृद्धि की है। जब केवल जन्म की उच्चता (और सद्गुणों, शिक्षा, ज्ञान, सदाचरण, निष्ठा की अवहेलना) पर ही एक जाति दूसरों से उच्च समझी जाने लगती है, तो उसमें प्रमाद, झूँठी शान, नैतिक पतन और आत्मिक मानसिक अवनति आना स्वाभाविक है क्योंकि उसे उस परंपरागत उच्चता को प्राप्त करने के लिये किसी प्रकार का परिश्रम, उद्योग या साधना नहीं करनी पड़ती।

हिन्दू अछूतों का जन्म हिंदू जाति की संकुचित का परिणाम है। वह हिंदू अछूत ईसाई या मुसलमान बन कर हमारे समाज में प्रतिष्ठित बन जाता है, बड़े-बड़े तिलकधारी उससे स्पर्श कर अपवित्र नहीं होते।

जाति पाती के नियमों को ढीला करने की आवश्यकता है, जिससे मनुष्य में घृणा एवं फूट के स्थान पर प्रेम, लेन देन, सहानुभूति की धारा प्रवाहित हो। हम सब हिंदू भाई एक तन एक मन होकर हिंदुत्व एवं हिंदू राष्ट्र के संगठन को दृढ़ कर सकें। जाति पाती की वर्तमानता में भारतवासी एक राष्ट्र नहीं बन सकते।

श्री सन्तरामजी ने उचित ही लिखा है-” जात−पांत ने प्रत्येक जाति, वरन् प्रत्येक उपजाति के राष्ट्रीय, सामाजिक और आर्थिक हित दूसरी जातियों और उपजातियों के हितों से अलग कर रखे हैं, इसलिये वे सब जातियाँ देश के शत्रु को भगाने के लिये आपस में मिलकर सामना नहीं कर सकतीं, गत सहस्र वर्षों में भारत के विदेशियों से हारे जाने का प्रधान कारण जाति पाँति होती रही है। इसके कारण हिंदू किसी पराये को अपना नहीं बना सके। इसके कारण योग्य लड़कियों को योग्य वरों, और वरों को कुशल अनुकूल विचारों की लड़कियों का मिलना कठिन हो रहा है। इसके कारण भारी भारी दहेज देने पड़ते हैं। अनमेल विवाह होते हैं और दुराचार फैलता है। इससे जहाँ ब्राह्मण विद्या में बढ़े, घमण्डी भी हो गये। क्षत्रिय जहाँ मरने मारने में बढ़े, उनमें दूरदर्शिता और विजय प्राप्ति की बुद्धि नहीं रही, वैश्यों ने जहाँ धनोपार्जनी बुद्धि का विकास किया, वे मूर्तिमान कायर भी बन गए हैं। शूद्र तो इतने गिर गए हैं कि इनमें और पशुओं में बहुत कम अन्तर रह गया है। यदि जाति भेद रहेगा तो हिंदू समाप्त हो जायेंगे और यदि हिंदुओं को जीना है तो इन्हें जाति भेद को मिटाना होगा। जातिवाद सांप्रदायिकता से भी कहीं अधिक फूट का कारण है। यदि जाति पाँति रही तो आगे चलकर कई पाकिस्तान बनने की नौबत आना अवश्यंभावी हैं।”

वास्तव में, जाति पाँति से देश में निरन्तर संकुचित, परस्पर वैमनस्य और घृणा विद्वेष ऊँच नीच फूट इत्यादि बढ़े हैं। छोटी जातियों का निरन्तर शोषण हुआ है। अतः विद्या बुद्धि, योग्यता, आचरण, आर्थिक समता के बल पर विवाह इत्यादि होने भावी समाज के लिए हितकर हैं। जाति प्रथा दूर होने से ही अस्पृश्यता का महारोग हमारे समाज से दूर हो सकता है।

साम्प्रदायिकता की संकुचिता

भारत में शिक्षा की कमी है, भयंकर दरिद्रता है और पारस्परिक फूट है। इसका बहुत कुछ उत्तरदायित्व हमारे धर्म पर है, किंतु उससे अधिक इसका कारण ब्रिटिश-राज्य का साम्राज्यवाद एवं फूट डालने की नीति है। ब्रिटिश राज्य प्रारम्भ होने से पूर्व भारत में शिक्षा, सद्भाव, समृद्धि अधिक थी। जनता सबसे अधिक खुशी और समृद्धिशाली थी। उस समय इतनी पारस्परिक फूट भी न थी। जरा-जरा सी बातों पर लोग लड़ने मरने, रक्तपात करने, बेइज्जती करने को तैयार न रहते थे। ये सब बातें अंग्रेजों की भेद नीति से भारत में आई, इनका भयंकर दुष्परिणाम हुआ, आये दिन किसी न किसी पक्ष को प्रोत्साहन देकर वे हमें लड़ाते भिड़ाते रहे। उन्होंने जातिगत प्रश्न गहरे किए, ब्राह्मण और ब्राह्मणेतरों की समस्या उत्पन्न की। भारत की भयंकर दरिद्रता, साम्प्रदायिक विद्वेष, पारस्परिक फूट, मुकदमे बाजी ब्रिटिश आर्थिक नीति का परिणाम हैं। इसी प्रकार यहाँ पशुओं से भी बदतर अछूतों की सत्ता है, मन्दिरों में देवदासिया रहती हैं और अनाचार की कमी नहीं है।

धर्म के लिए, धर्म के कारण कभी कोई झगड़ा नहीं होता। झगड़ों का कारण है, साम्प्रदायिकता। साम्प्रदायिकता का अर्थ है-संकीर्णता, अनुदारता, आपपूती, स्वार्थ परता, अहंकारिता। यह दूषित मनोवृत्ति जिस क्षेत्र में प्रविष्ट हो जाती है, वहीं समाज में भारी विद्वेष, घृणा, शोषण, उत्पीड़न, क्रूरता तथा अनाचार का बोलबाला कर देती है। वह केवल धार्मिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं, वरन् हर क्षेत्र में अपना विषैला कार्य जारी रखती है। हर वर्ग दूसरे को नीचा मानता है- छूत अछूत जाति पाती, मजहब संप्रदायक के रूप में यह अनुदारता उत्पन्न करती है। आत्मिक क्षेत्र में साम्प्रदायिकता पक्षपात, स्वार्थ, मोह, ममता, शोषण, आक्रमण, घृणा, आदि उत्पन्न करती है। द्वेष ओर ईर्ष्या का परित्याग करना ही उचित है।

पहेलियाँ, जुआ, सट्टा-

आज के युग में मनुष्य बिना परिश्रम रुपया प्राप्त करने की इच्छा रखता है। अतः उसने पहेलियाँ, जुआ, सट्टा ऐसे सहज उपाय निकाले हैं, जिनमें अनेक कामचोर, शौकीन, आराम तलब, मनचले व्यक्ति बिना मेहनत के पहेलियाँ हल कर, जुआ, खेलकर, अथवा सट्टा लगाकर अनायास ही मालामाल हो जाना चाहते हैं। बड़े बड़े इनामों की घोषणा करती हुई अनेक पत्र पत्रिकायें केवल आज सुगम वर्ग पहेली के रूप में हजारों रुपया खींच रही है। शौकीन लोग बड़ी संख्या में इन पत्रिकाओं की उत्सुकता पूर्वक प्रतीक्षा में रहते हैं और पत्र आने पर उसे लेकर कमरे में बन्द हो जाते हैं। कई कई दिन तक घन्टों वे इन्हीं पहेलियों में व्यर्थ नष्ट कर देते हैं। इसी प्रकार जुआ, सट्टा, रेस कोर्स, इत्यादि अनेक प्रकार के लोभ मोह से भरे हुए अनर्थकारी मनोरंजन प्रचलित हो गये हैं।

इन मनोरंजनों के मोह जाल में आकर मनुष्य सच्चा सीधा सादा परिश्रम का मार्ग त्याग देता है। उसमें काम से बचकर मुफ्त में रुपया हड़पने की थोथी प्रवृत्ति जागृत हो जाती है। यह एक प्रकार की डाकेजनी ही है। इन्होंने मानव की कार्य शक्ति पंगु कर दी है। पाशविक वृत्तियाँ बढ़ा दी हैं। यह एक प्रकार की फिजूल खर्ची है। जब आदमी स्वाभाविक रूप में सच्चा परिश्रम करके जीविका उपार्जन करता है तो उसमें विद्या, ज्ञान, सद्गुण, प्रतिष्ठा, उदारता, परोपकार आत्मगौरव का विकास होता है। पहेलियों जुआ सट्टा इत्यादि में लगा हुआ मन अपना आत्म गौरव नष्ट कर देता है। वह धनी प्रतिष्ठित अहंकारी का दम्भ करके, ढोंग बनाकर आत्म सन्तोष करना चाहता है। यह मूर्खता है। स्मरण रखिए, जहाँ लोभ हैं, मोह का खिंचाव हैं कार्य से भागने की प्रवृत्ति है, वहाँ असत्, पाप और शैतान की धारा जोर पकड़ती जाती है। उससे अनेकों मनुष्यों के मस्तिष्क विकृति हो जाते हैं। आज वही विकृत ताण्डव नृत्य कर रही है।

पशुओं पर अत्याचार।

पशुओं पर आज जो अत्याचार हो रहा है, वह उस मात्रा में कभी नहीं हुआ है। एक तो मनुष्य में से दया भाव लुप्त हो गया है, दूसरे वह पशुओं के माँस और चमड़े का दूध से अधिक महत्व समझने लगा है। बम्बई में प्रति वर्ष औसतन 30 हजार गायें भैंसें काटी जाती हैं। इसके कई कारणों में से कुछ इस प्रकार हैं-जो व्यापारी वहाँ दूर दूर से दूध के लिए गायें भैंसें ले जाते हैं, वे उन्हें जब दूध देना बन्द कर देती हैं तो चारे की महँगी के कारण खिला नहीं सकते दूसरे रेल कर किराया भी बहुत होने से वे उन्हें यथा स्थान वापस भी नहीं भेज सकते। फलतः वे गायें भैंसे कसाइयों के हाथों पड़ जाती हैं।

सन् 1935-36 के आँकड़े उपलब्ध हैं, जिनसे कुछ अनुमान हो सकता है। आज तक यह बहुत बढ़ चुके होंगे। सन् 1935-36 में पन्द्रह हजार भैंसें तथा अट्ठाइस हजार गायें काटी गई थीं। भैंसों का माँस मनुष्य के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक एवं अयोग्य है फिर भी बड़े परिमाण में लोग इस सस्ते माँस को खरीद कर खाते हैं। प्रतिवर्ष पच्चीस हजार दूध देने वाली मवेशी भरी जवानी में केवल एक शहर के लोग हड़प कर जाते हैं। इस प्रकार के तरुण मवेशी 15-20 वर्ष से लगातार कसाई की छुरी के नीचे कटते जा रहे हैं। यदि हम चाहें तो इन मवेशियों को बम्बई या बड़े शहरों के समीप वाले गाँवों में रख सकते हैं। सूखी गाय तथा सूखी भैंसों पर आठ नौ महीने परिश्रम करने पर दूध का अच्छा व्यापार चल सकता है।

मनुष्य को जूतों के लिए इतने अधिक चमड़े की आवश्यकता पड़ने लगी है कि वह स्वार्थ वश पशु का प्राण लेने में नहीं हिचकता। कानपुर, बाटा नगर आगरा के समीपस्थ गाँवों में चमड़ा लाने के लिये अनेक पशु बलि किये जाते हैं। मानव की बढ़ती हुई आराम तलबी, स्वार्थ, लिप्सा माँस भक्षण की दुष्प्रवृत्ति ने उसे हिंस्र जन्तु बना दिया है।

संक्षेप में, हमारा आज का समाज अजब प्रकार का स्वार्थी मतलबी, एक दूसरे की हड्डियों पर चढ़कर ऊँचा उठने वाला समाज बन गया है। चोर, बदमाश, कमजोर, धोखेबाज और झूठे व्यक्ति एक दूसरे को धोखा देने में इन्सानियत समझते हैं। जिसके माल हाथ लगा, जो रिश्वत या घूस मिली उसी को हड़प करने में, बाहरी लिफाफा बनाये रखने में मनुष्य अपने को होशियार समझता है।

एक विद्वान ने लिखा है, “आज की दुनिया में हर एक दाँव पैसे पर, माल पर और साँसारिक चीजों पर लगाया जा रहा है। रिश्ते रिश्ते में चालाकी चल पड़ी है। जिसने सहृदयता से सहायता की, वह बेवकूफ समझा जाता है और पूर्ण स्वार्थी, छोटे दायरे वाले आज अपने को होशियार और चालाक समझने लगे हैं। मनुष्यता की कोई कीमत नहीं। एक दूसरे का मूल्य आँकता है पैसे से, देने लेने से। जिसके पास कुछ नहीं, वह भूखों मरे, और उसके पास यदि जायदाद है, तो आपको बहुत खुशामदी मिल जायेंगे। किसी युवती के पास सौंदर्य है, तो लक्ष्मी उसके पैरों पर लौटेगी। साधन और ताकत जिसके हाथ में आ गये हैं, वे सब कुछ हैं। यह सारा ढांचा पूँजीवादी समाज की चोर बाजारी है।”

जो खूब काम करते हैं रात दिन परिश्रम के कारण आराम नहीं करते, वे भरपेट भोजन भी नहीं पाते हैं। बड़ी बड़ी फैक्टिरियों मिलों, कारखानों को चलाने वालों को केवल जीने मात्र का अधिकार है। सारा लाभ पूँजीपति या साहूकार के पास चला जाता है। किसान, मजदूर, श्रमिक अपने रक्त के बिन्दुओं से पूँजीपतियों को समृद्धिशाली बना रहे हैं।

श्री नरसिंह चन्द जोशी लिखते हैं, ‘वास्तव में चोर तो ये तथाकथित साहूकार, ये पूँजीपति, ये साधन सम्पन्न, ये सरकारी अफसर ये मिनिस्टर ही हैं। ये सारे चोर हैं, जो स्वयं काम नहीं करते, दूसरों के काम पर गुलछर्रे उड़ाते हैं ऐश आराम करते हैं, शराब पीते हैं, रईसों के बच्चे बने घूमते हैं। इनके लाल लाल शरीर में हमारे शहीदों का खून है, हमारे हजारों लाखों गरीब मजदूरों और किसानों का खून भरा है, ये हमारा श्रम चुकाते हैं, हमारा मेहनत हड़प लेते हैं। हमारे गरीब भाइयों की हड्डियों पर इनकी यह चकाचौंध कर देने वाली सुख समृद्धि की इमारत खड़ी है।”

-कुलटा स्त्री, जिस प्रकार माँ बाप भाई बहिन इत्यादि के बीच रह कर शरीर से घर का सब काम धन्धा करती है, पर उनका मन अपने यार पर लगा रहता है, उसी प्रकार हे मनुष्यों! तुम भी परिवार के बीच में काम काज करते हुये अपने मन को ईश्वर में लगाओ।

-बच्चा कितने ही बार गिरता और फिर उठता है, तब धीरे-धीरे खड़ा होना सीखता है। वैसे ही साधन में गिरना-उठना होता है, उससे घबड़ाना नहीं चाहिए, समय आने पर साधन ठीक हो जाता है।


हमारे परिवारों में होने वाला शोषण

सास के बहू पर अत्याचार-

पारिवारिक शोषण का आरम्भ सास बहू की समस्याओं से होता है। इतनी शिक्षा एवं प्रगति हो जाने पर भी आज हमारे समाज में नव विवाहिता वधू का शोषण निरन्तर चल रहा है। विवाह होने के कुछ दिन पश्चात् प्रायः यह शोषण प्रारम्भ हो जाता है। बहू को धीरे धीरे परिवार का सब कार्य दिया जाता है। वह बेचारी स्वयं ही परिवार में नई होती है और लज्जा के कारण किसी प्रकार की आपत्ति नहीं करती। झाडू लगाने से उसका दिन प्रारम्भ होता है, रसोई बनाना, बर्तन साफ करना, घर का पानी भरना, चक्की में आटा पीसना, दोपहर में कोई अन्य कार्य करना तथा देर रात्रि तक परिवार की सेवा का कार्य चलता रहता है। अनेक परिवारों में प्रत्येक सदस्य उसे बेपैसे का नौकर समझता है। उसके भोजन, स्वास्थ्य, मनोरंजन, विश्राम की किसी को चिन्ता नहीं होती। पति प्रायः मेहनत, मजदूरी तथा जीविका उपार्जन के सिलसिले में बाहर रहता है, घर में सास बहू से कार्य लेने के अतिरिक्त तरह तरह के ताने, व्याँम, एवं लाँछन लगाया करती है। अनेक स्थानों पर देवर या स्वयं ससुर की कुदृष्टि तथा उससे होने वाले नाना सन्देहों के दुष्परिणाम देखने में आते हैं। अनेक नव वधुएँ संकटों से तंग आकर भाग निकलती या आत्म हत्याएँ कर बैठती हैं। सास से सताई हुई ये बहुएं समय आने पर जब स्वयं सास बनती हैं, तो अपनी बहुओं पर वे ही अमानवीय अत्याचार करती हैं जो स्वयं पर हुए थे।

अब वह युग आ गया है कि सास को तथा अन्य परिवार को बहू के प्रति अपना निर्दयी शोषण करने वाला दृष्टिकोण परिवर्तित कर देना चाहिए। प्रायः छोटे छोटे कुटुम्ब अच्छी प्रगति करते देखे जाते हैं। स्वयं पतियों को पृथक रह कर इस शोषण का अन्त करना चाहिए।

पतियों द्वारा पत्नियों पर अत्याचार

आये दिन कलियुगी पतियों की वासना, लोलुपता, स्वार्थ, क्रोध, घृणा, पत्नियों के चरित्रों पर सन्देह को लेकर होने वाली हत्याओं, कलह, कटुता के दुखद समाचार प्राप्त होते रहते हैं, जिन्हें सुनकर मानवता का सिर लज्जा से नीचे हो जाता है। इन थोड़े ही दिनों के अन्दर चार नवयुवतियों की हत्या के समाचार मिले हैं।

पहली हत्या बाग मुजफ्फरखाँ मोहल्ला, आगरा की 11 जुलाई 1952 का समाचार है कि ज्योति प्रसाद जोकि बम्बई रेलवे में नौकर है, की पत्नी गृह कलह बलिवेदी पर बलिदान हो गई। दूसरी हत्या पंजे के बाबूलाल सर्राफ की पुत्र वधू की है। श्री बाबूलाल के पुत्र ने अपनी पत्नी को अमानुषिक रीति से पीटा, जिधर देखा मारता गया नतीजा यह हुआ कि बेचारी का प्राणान्त हो गया। तीसरी दर्दनाक हत्या फीरोजाबाद के मोहल्ला गडैया में हुई है। अनवर नामक एक मुसलमान ने पहले तो अपनी पत्नी को बुरी तरह पीटा, बाद में उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर उसे जीवित जला दिया। चौथी घटना वहीं की हकीमी गली की है। एक बन्द मकान में महिला को चाकूओं से गुदा हुआ लहूलुहान बेहोशी की अवस्था में पाया गया। हत्या का शक भाई पर किया जाता है, क्योंकि उस पर बहिन का तीन हजार ऋण था।

ऐसी अनेकों घटनाएँ हमारी आँखों तले गुजरती हैं। आज पत्नी का जीवन आँसुओं और वेदनाओं से परिपूर्ण है। पति भंवरा वृत्ति का अस्थिर चंचल, शकसूबे की आदत वाले बन गये हैं। स्वयं चाहे जो अनैतिकता, अविवेकपूर्ण, अप्रतिष्ठा के कार्य करते फिरें, किन्तु पत्नी को तनिक सी भूल के लिए अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है। जीवित जलाना दहेज न लाने पर नववधू पर अमानुषिक अत्याचार, मारपीट, कलह, डर दिखाना, भूखा रखना, जहर देना, परित्याग कर नया विवाह कर लेना, द्विपत्नी रखना, वेश्यागमन, व्यभिचार आदि ऐसे कलंक पूर्ण कार्य हैं, जो हमारे समाज में वृद्धि पर हैं। नारी के जीवन का मूल्य जितना कम आज है, उतना कम कभी नहीं रहा।

विवाहित जीवन में असंयम-

विवाहित हो जाने के पश्चात् यह आशा की जाती है कि पति पत्नी का जीवन सुख शान्तिमय होगा और प्रकृति की माँगे पूर्ण होती रहेंगी। आज के विकार ग्रस्त युवक युवती पति पत्नी विवाहित हो जाने पर भी स्वच्छन्द जीवन व्यतीत करना चाहते हैं। आज का वातावरण कैसा दूषित हो गया है, इसके कुछ उदाहरण श्री0 रामनारायण यादेवन्दु ने इस प्रकार दिये हैं-

एक पठान युवक हमारे सुपरिचित है। सेना में दो तीन वर्ष ठहर चुके हैं। कप्तान के पद पर काम कर चुके हैं। उन्होंने अपने पिता के आदेश से हाल ही में विवाह कर लिया है और अपनी नव विवाहिता पत्नी को दो महीने अपने पास रख कर अपने पिता के पास भेज दिया है। पूछने पर बतलाया- “बेगम के रहने से स्वच्छन्द रूप से वेश्याओं के पास जाना आना नहीं होता। यह युवक विवाह से सर्वथा असंतुष्ट है। कारण, विवाह से पूर्व स्वच्छन्द जीवन ही है। एक दूसरे कप्तान युवक हैं। सेना में रहने से गोरों के जितने भी गुण अवगुण हैं, वे सब उन्होंने सीख लिए हैं। ग्रेजुएट हैं अंग्रेजी शिष्टाचार भी खूब जानते हैं। विवाहित हैं, पुत्र पुत्रियाँ भी हैं। लेकिन उन्हें दूसरों की बहिन बेटियों के नाथ आँखें लड़ाने का शौक है। वे दर्जनों लड़कियों से प्रेम का अभिनय कर चुके हैं।

एक चौबीस वर्षीय पंजाबी युवक से मैंने पूछा कि “आप छुट्टियों में अपने घर क्यों नहीं जाते?’ युवक ने उत्तर दिया, ‘घर पर मेरा कौन है?’ मैंने कहा- ‘विवाह नहीं किया क्या?’ उत्तर मिला- ‘जी नहीं और न करने का विचार है। कौन गृहस्थी के चक्कर में पड़े। कभी बच्चे बीमार हैं, तो कभी स्त्री का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। हजारों दिक्कतें है। इसलिए मैं तो अकेला ही रहूँगा।’ इस युवक को दो सौ रुपये मासिक मिलता है परन्तु कुसंसर्ग से वेश्यागमन की लत पड़ गई है। इस प्रकार आधुनिक युवकों के आन्तरिक जीवन में प्रविष्ट होकर छानबीन की जाय, तो अनेक उदाहरण प्राप्त हो जाएंगे। विवाहित जीवन में असंयमी युवक जो न करें, थोड़ा है। विवाहित जीवन को पवित्रता एवं धार्मिक आहार पर स्थिर करने की आज बड़ी आवश्यकता है। हमें चाहिए कि इस ओर प्रयत्न करें।

नारी का यह तिरस्कार-

आज के समुन्नत युग में भारतीय नारी उसी प्रकार निरक्षर, पिछड़ी, पीड़ित और सामाजिक रूढ़ियों में पिस रही है। एक ओर कुछ भारतीय नारियाँ रुज पाउडर लिपिस्टिक, रेशमी साड़ियों से सुशोभित विदेशों में देश का मस्तक ऊँचा कर रही है, किन्तु दूसरी ओर इसी भारत में अभी तक ऐसी अभागी नारियाँ हैं, जो सामाजिक रूढ़ियों के शिकंजे में मानवी होकर भी पशु से भी गया बीता जीवन व्यतीत कर रही हैं, अज्ञान, अशिक्षा, अंधपरम्परा, सामाजिक शोषण का शिकार बनी हुई हैं।

अकाल ग्रस्त क्षेत्रों में काम और खाना प्राप्त न होने पर स्त्रियों द्वारा अपनी में संतान तथा देह को बेचने के संवाद समाचार पत्रों में प्रकाशित हुए हैं। प्रयाग की विधवा-विवाह सभा ने वृन्दावन में स्थायी रूप से चलने वाली स्त्रियों की बिक्री के जघन्य कुकर्म की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया है। बाल विवाह की गन्दी जीर्ण शीर्ण प्रथा के व्यापक रूप से प्रचलित होने के कारण बाल विधवाओं तथा उनसे किए गये अमानवीय पशुवत दुष्कर्मों की भी कमी नहीं है। वृन्दावन में बड़े बड़े मंदिरों में बृहत् संख्या में विधवाओं के रहने के स्थान हैं, जहाँ उन्हें जीने के लिए भोजन और नग्नता ढ़कने मात्र के लिए वस्त्र दिये जाते हैं। सामाजिक तिरस्कार, पीहर तथा ससुराल की अमानवीय यंत्रणाओं से दुःखी होकर ये असहाय तिरस्कृत विधवाएँ पुजारी पंडों यात्रियों तथा अन्य व्यक्तियों द्वारा छेड़ी जाती है, पग पग पर उनका मजाक बनता है और अपमान का जीवन चलता है। भली विधवाएँ तो आत्म हत्या तक कर लेती हैं, गर्भपात तथा भ्रूण हत्याएँ होती है। या तो ये स्वयं अपने आप को बेचती हैं, या भ्रष्ट करने के उपरान्त इनके पेशेवर संरक्षक इन्हें दूसरों के हाथ बेचते हैं। कहने के लिए हिन्दू विधवा कानून 1856 में पास हुआ था, पर हिन्दू समाज की रूढ़िवादिता मोहान्धता, बालविवाह की प्रवृत्ति तथा अशिक्षा के कारण यह व्यर्थ ही रहा। यह है, हमारा दुर्भाग्य।

हिन्दू विधवा एक जीवित कब्र की तरह है जिसका सर्वत्र निरादर एवं तिरस्कार होता है। जहाँ पुरुष विधुर होकर एक के पश्चात् कई विवाह कर सकता है, हिन्दु समाज में विधवा का शिष्ट सभ्य ढंग से रहना भी शक सूबे की दृष्टि से देखा जाता है। उन्हें स्वच्छ वस्त्र पहिनना, स्वास्थ्य प्रद भोजन खाना, मनोरंजन या पर्याप्त विश्राम करना समाज नहीं देख पाता। विवाह की तो बात ही बहुत दूर की है। उसका दर्शन, स्पर्श, तक अशुभ समझा जाता है।

अनेक व्यक्ति एक पत्नी पसन्द न आने पर प्रथम पत्नी को छोड़, नई शादी कर लेते हैं। ऐसी परित्यक्ताओं की दशा उनसे भी गई बीती है। कानून की दृष्टि से वे तलाक देकर न पुनः विवाह कर सकती हैं, न नौकरी या परिश्रम पर उदर पोषण करने के लिए ही मुक्त रहती हैं। फलतः अनेक परित्यक्ताएँ वेश्याएं बनकर चुप-चाप जीवन के शेष दिन काटती रहती हैं। जो स्त्रियाँ पति से पृथक होकर काम वासना का दमन करने में असमर्थ हैं, उनके लिए पुनर्विवाह का कानून बना देने में ही समाज का कल्याण है।

विधवाओं की बढ़ती हुई आत्महत्याएं, धर्म परिवर्तन, नारकीय वेश्या का जीवन व्यतीत करने देने से मानवता का ह्रास हो रहा है। अथवा विधवा विवाह का सुचारु नियम बनाकर अधिकाधिक उसका प्रचार करना श्रेयस्कर है। मनु, पराशर, नारद, अत्रि, कात्यायन, वशिष्ठ इत्यादि भारतीय विचार धारा के व्यवस्थापकों ने स्त्री के पुनर्विवाह की आज्ञा दी है। पराशर का मत है-

नष्टे मृते प्रब्रजिते कीवे च पतिते पतौ। पंचस्वा हत्सु नारीणाँ पतिरन्यों विधीयते॥

अर्थात् पति के भूल जाने, मर जाने, संन्यासी हो जाने, नपुँसक हो जाने या जातिच्यूत हो जाने-इन पाँच अवस्थाओं में दूसरे विवाह का विधान है। समाज के स्वास्थ्य के लिए, नारी जीवन को सुष्टु, शाँतिमय, सर्वांग सुन्दर एवं सबल बनाने के लिए विधवा विवाह एक बड़ी आवश्यकता है।

विवाह- हिंदू समाज का सर दर्द

हिन्दू समाज में विवाह एक भया वह समस्या होती जा रही है। अभी वह युग नहीं बीता है, जब कन्या का जन्म अशुभ समझा जाता था। आज भी कन्या का जन्म होते ही, माता पिता एक भार का अनुभव करते हैं। उन्हें शिक्षा देकर यह समझा जाता है कि विवाह समस्या कदाचित हल हो सकेगी, किन्तु शिक्षित कन्या के योग्य शिक्षित वर बहुत महंगे हैं।

जो लोग निज सन्तानों के भरण पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा में उचित मात्रा में धन व्यय नहीं कर पाते उन्हें भी उनके उपनयन और विवाहादि में दहेज या झूठा दिखावा करना पड़ता है। आज भी हमारे हिन्दू समाज में ऐसे महामूर्खों से भरा हुआ है जो जन्म से विवाह तक कन्या को भर पेट अन्न और समुचित वस्त्र नहीं देते, किंतु उसके विवाह में हजार दो हजार व्यय करने में, अच्छे अच्छे आभूषण, साड़ियाँ तथा अन्य वस्तुऐ दहेज में देने में गर्व का अनुभव करते हैं। उन आभूषणों के भार से बन्द घरों में, घूँट में बन्द रहने के कारण उनका स्वास्थ्य, यौवन, तथा सौंदर्य नष्ट हो जाता है।

एक महानुभाव लिखते हैं, ‘मैंने ऐसे भी लोग देखे हैं जो अपने गाँव के किसी बड़े आदमी की बराबरी करने की धुन में अपनी बड़ी कन्याओं के विवाह में इतना अधिक व्यय कर देते हैं कि उनका दिवाला निकल जाता है और छोटी कन्या को एक बूढ़े व्यक्ति से बिना देखे विवाह कर देना पड़ता है।”

दहेज की हत्यारी प्रथा अभी तक अपने काले कारनामे हमारे समाज में दिखा रही है। योग्य वरों को ऊँचे दामों में बेचा जा रहा है। दहेज के अभाव में अनुपयुक्त वर मिलते हैं और जीवन भर बहुसंख्या सधवाएँ छटपटाती रहती हैं। दहेज के लालची विवाह करा देते हैं, पर नारी के सुख और स्थायित्व की गारन्टी कौन दे सकता है?

पाठकों को तारपुर (मुँगेर) की 22 वर्षीया विवाहित शकुन्तला का नेहरु जी के नाम लिखा गया वह पत्र समाचारों में देखा होगा, जिसमें उसने अपने पति के साथ न रहकर एक राजपूत प्रेमी के साथ रहने की इच्छा प्रकट की थी। 14 अगस्त 1950 को सुप्रीम कोर्ट में शारदा नामक कन्या ने बताया था कि उसने स्वेच्छा से एक जाट युवक से विवाह कर लिया था। प्रचलित विवाह प्रणाली की विकृति और दहेज की अस्वाभाविकता के ये उदाहरण स्पष्ट उदाहरण हैं। इस हत्यारी प्रथा के पंजों में पड़ कर अनेक नारियाँ नारकीय जीवन व्यतीत कर रही हैं।

श्री राधेश्याम जी ने दहेज के विषय में सत्य ही लिखा है- “आज कल अपनी पुत्री की शादी क्या करना है, अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा को बेचना है। अनेक व्यक्ति दहेज की चिन्ता करते करते ही दुनिया से चले गये, अनेकों ने अनमेलविवाह करना आरम्भ कर दिया जिससे बाल विधवाओं की संख्या बढ़ गई और दुराचार फैलने लगा। अपनी लड़की के विवाह की चिन्ता में हमारे समाज के लाखों माता पिताओं को दिन रात आँसू बहाने पड़ते हैं और कन्याएं अपने यौवन काल में अपने माता-पिता को इस प्रकार आँसू बहाते देखकर अपने भाग्य को कोसती हैं और कभी-2 आत्म हत्या तक कर बैठती हैं।”

विवाह जैसे पवित्र कर्म में जब तक यह लेन देन रिश्वतखोरी, की पूँजीवादी वृत्ति समाप्त नहीं होती, तब तक हमारे विवाहित जोड़ों का चुनाव ठीक नहीं हो सकता। उपयुक्त शिक्षा, स्वास्थ्य, वय, गुण कर्म के अनुसार विवाह सम्बन्ध निश्चय होने चाहिएं।

भ्रूण हत्याएं-

भारत में सहशिक्षा तथा सिनेमा के घृणित प्रचार से निरन्तर अवैध संतानों की संख्या बढ़ती पर है। अवैध बच्चे इधर उधर फेंके हुए गर्भ मिल जाते है। पत्र पत्रिकाओं में गर्भपात करने, गर्भ रोकने, बर्थ कन्ट्रोल, घृणित रोगों को अच्छा करने, ताकत की दवाइयों के विज्ञापन बृहत् संख्या में प्रकाशित होते रहते हैं। अपने पत्र ऐसे ही संतान नियमन सम्बन्धी या सेक्स के इश्तहारों से चलते हैं। गुप्त अंगों के सम्बन्धी रोग निरन्तर वृद्धि पर हैं। ऐसा उत्तेजक साहित्य बड़ी मात्रा में छप कर खपता जा रहा है। गली-2 में ऐसी चिकित्सा की दुकानें खुल गई हैं, जो गन्दे रोगों के इलाज का ठेका लेते हैं और भ्रूण हत्याएँ कराते हैं। यह है मानवता का उपहास।

उन्मुक्त प्रेम तथा तत्सम्बन्धी जटिलताएं-

“नारी की प्रतिष्ठा” नामक एक लेख में नागपुर का यह हाल पढ़िये- “एक 16-17 वर्ष के लड़के का एक लड़की से प्रेम सम्बन्ध हो गया। लड़की के माता पिता ने अपनी पुत्री का सम्बन्ध दूसरी जगह कर दिया। इसलिए अवसर पाकर लड़के ने लड़की का खून कर दिया और पकड़ा गया। इतनी छोटी सी उम्र में प्रेम और खून करने के दुस्साहस हो जाय, ये संस्कार उसे सिनेमा की सस्ती रोमाँस पूर्ण गन्दी फिल्मों से मिला।

प्रत्येक फिल्म मोहब्बत की कहानी घुमा फिराकर युवकों के सम्मुख उपस्थित करते हैं, प्रेम व्याधि को अप्राकृतिक उत्तेजना देते हैं। कच्ची आयु में प्रेम करने की तीव्र आकाँक्षा में सत् असत्, विवेक अविवेक का मार्ग नहीं दीखता। युवक युवतियां गन्दे व्यक्ति के पंजे में फँस कर सम्पूर्ण आयु नष्ट कर डालते हैं।

रोमाँस के मर्ज के मरीज स्कूल कालेज के अधकचरे, अस्थिर चित्त, काम लोलुप युवक उन्मुक्त से फिरते हैं और हर नारी में प्रेमिका देखने का गन्दा प्रयत्न करते हैं। इसी प्रकार युवतियाँ सिनेमा की तरह समाज में प्रेमियों की खोज करती फिरती हैं। यह मानवता का पतन है, और सभ्यता का दुर्भाग्य! इतने निचले स्तर का प्रेम भारत में कभी भी नहीं रहा है।

नौकरों का शोषण-

हमारे समाज में नौकरों से अमानवीय व्यवहार की अधिकता है। छोटे बच्चों युवक युवतियों तथा वृद्ध सभी तरह के नौकर रखे जाते हैं। उनसे जी तोड़ परिश्रम कराया जाता है। उनकी सुख सुविधा स्वास्थ्य का ध्यान नहीं रखा जाता। एक स्थान पर सुना गया था कि नौकर को सारी रात जागते रखा गया तब कि मालिक सोता रहा। छोटे “बौय सर्वेन्टस” को होटलों, दुकानों, या कारखानों में आठ घण्टे खूब परिश्रम कराया जाता है। उनकी ईमानदारी पर शक कर अनेक स्थानों पर उन्हें निर्दयता से पीटा जाता है। दुःख अभाव, पीड़ा कष्टों में निरन्तर पिसते हुए ये बच्चे डीठ हो जाते हैं, बहुत से परिस्थितियों के प्रभाव से चोरी करना सीख जाते हैं। स्त्री नौकरानियों की कठिनाइयों और बेबसी का अनुचित लाभ उठाया जाता है। ठेकेदार लोग दिन भर सख्त धूप या कड़-कड़ाती सर्दी में उससे डाट कर काम लेते हैं तथा वासना लोलुप दृष्टि से निहारते हैं। इनका जीवन मानवता का एक उपहास है।

बच्चों पर अत्याचार-

हमारे माता पिताओं को शिशु प्रकृति का ज्ञान न होने के कारण घर घर में कुहराम मचा रहता है। तनिक-2 सी बातों पर उत्तेजित होकर धुल धप्पा प्रारम्भ हो जाता है, गालियों की बौछारें चलने लगती है, अशाँति कुढ़न क्लेश तथा विषाक्त स्थितिए उत्पन्न हो जाती हैं। प्रायः माता पिता डाँट फटकार या भय से काम लेते हैं। भय दिखाने से कुछ काल तो शाँति होती है। थोड़ी देर पश्चात् पुनः शोर और कुहराम प्रारम्भ हो जाता है। गालियों, मारपीट, दमन से बच्चे उद्दण्ड बनते हैं। आजकल विद्यार्थियों की उद्दण्डता के उदाहरण देखकर मानवता पर कलंक लगता है। आज की तामसी शिक्षा ने उन्हें इतना पापमय बना दिया है कि विद्यार्थी प्रायः बुराई की ओर अधिक झुक जाते हैं। अप्राकृतिक मैथुन, स्वप्न दोष, व्यभिचार, कुसंग, गन्दे गानों की भरमार देख कर सिर लज्जा से झुक जाता है।

वृद्धों के विवाह-

पत्रों में प्रकाशित हुआ था झाबुआ रियासत के राज्यच्युत नरेश ने 61 वर्ष की बूढ़ी अवस्था में अपनी छठी शादी की थी। उस समय भी राजा साहब के छः रानियाँ और कितनी ही रखेलिया मौजूद रहती थीं। राजा साहब के सब अधिकार छीन लिए गए, उनकी कोई स्त्री सुखी नहीं हो सकी। राजा साहब की कामुकता पर किसे तरस न आयेगा? युवतियों के यौवन से खेल करने वाले दुस्साहसी व्यक्तियों की आज समाज में कमी नहीं है।

सहरसा, बनगाँव के एक सत्तर वर्ष के वृद्ध ने ग्यारह वर्षीया लड़की से विवाह किया। यह बूढ़ा व्यक्ति 40 वर्षों से दाढ़ी बढ़ा कर रखता था। इसके रहस्य का अभी तक उद्घाटन नहीं हुआ है लेकिन लड़की का पिता बताया जाता है कि एक हजार रुपया और पाँच बीघे जमीन के लालच में पड़ गया और उसने अपनी लड़की का विवाह उस वृद्ध से कर दिया।

समाचार पत्रों में वृद्ध राजनैतिक नेताओं का, राजनैतिक अधिकार प्राप्त कर छोटी आयु की लड़कियों से विवाह करने के कई समाचार छपे हैं। एक राजनैतिक नेता ने स्वयं पचास वर्ष से अधिक वय का होते हुए एक बीस वर्षीय युवती से विवाह किया था। और भी कई अधिकारियों ने अपनी सत्ता एवं अधिकार का दुरुपयोग किया है।

इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि वृद्धों की वृत्तियाँ आयु की वृद्धि के साथ समुन्नत एवं परिपक्व होने के स्थान पर साधारण निम्न स्तर पर रहती हैं। उन्हें चाहिए कि आयु के साथ रुचि और प्रवृत्तियों को भी परिष्कृत करते रहें।


Quotation

-क्रोध करना बुरा है। जिसे देर में गुस्सा आवे और जल्द शाँत हो जावे वह श्रेष्ठ मनुष्य है। और जिसे जल्दी गुस्सा आवे और देर तक उसका असर दिमाग पर रहे वह नीच है।


स्वास्थ्य क्षेत्र में मानवता का यह पतन

आधुनिक सभ्यता कृत्रिम जीवन को प्रोत्साहन देती है। मनुष्य दैनिक जीवन में प्रकृति के नियमों की अवहेलना करते हैं, जिसके फलस्वरूप आज नाना रोग अभिवृद्धि पर हैं। मनुष्य की औसत आयु निरन्तर न्यून होती जा रही है, स्वास्थ्य, शक्ति, सामर्थ्य नष्ट होते जा रहे हैं और मन सदा चंचल अस्थिर, कामी, लोलुप और चिंतित रहता है।

बढ़ते हुए घृणित रोग-

आज कल जिन रोगों को ठीक रखने के लिए दवाइयों के अधिकाँश विज्ञापन छपते हैं, उनमें मुख्य गर्मी, सुजाक, स्वप्नदोष, स्नायु दौर्बल्य, मूत्र मार्ग सम्बन्धी गुप्त रोग, कार्डी इत्यादि हैं। ये गुप्त रोग समाज की आचार भ्रष्टता, कुसंस्कार एवं जननेन्द्रिय के दुरुपयोग से सम्बन्धित हैं। वेश्यागमन एवं गुप्त व्यभिचार स्त्री से विषयोपभोग तथा गुप्त रूप से जो पापाचार समाज में फैला हुआ है, उसकी तुलना में प्रकट व्यभिचार जैसी कुत्सित मनोवृत्ति समाज के मनोविनोद का एक साधन बन गई है।

एक विद्वान् लिखते हैं- “समाज में कितने ही स्त्री-पुरुषों के आपस में गुप्त रूप से बड़े गन्दे सम्बन्ध हैं। इसका कारण है विकार की अधिकता। उन्हें औचित्य, जात पाँत, सगे रिश्ते, नीच ऊँच आदि का कोई ख्याल नहीं... इसमें प्रायः लोग स्त्रियों को ही दोष देते हैं, परन्तु यह पाप रूपी राक्षस किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। आजकल इसने समाज में जो अनर्थ मचा रखा है, उसे दूर करने का सबसे उत्तम उपाय यह है कि हम उन कमजोर स्थानों को ही दूर कर दें, जहाँ इसे प्रहार करने का मौका मिलता है। हमारे अज्ञान और कुप्रथा के कारण इसके पाँच कारण हैं। (1) सदोषं विवाह पद्धति, बाल विवाह, वृद्ध विवाह बेमेल विवाह, (2) स्त्रियों के वास्तविक गौरव को न मानना, (3) पौरुष की मिथ्या कल्पना, (4) परदा, गरीबी, अन्ध धार्मिकता, (5) हमारी परिस्थिति, जड़वादिता और प्रेरक आदर्श का अभाव।”

उपरोक्त कथन में अक्षरशः सत्यता है। इनके अतिरिक्त सामाजिक गन्दगी का एक मुख्य कारण आज कल के गन्दे कामुकता पूर्ण अश्लील फिल्म, गन्दा साहित्य और उत्तेजक चित्र हैं। इनकी एक बाढ़ देश में आ गई है। आज का जैसा विकारमय वातावरण सहशिक्षा वाले स्कूलों, कालेजों, क्लबों, सोसाइटियों में है, कृत्रिम सन्तति निग्रह के साधनों का इतना प्रचार है कि चारों ओर स्वच्छन्दता, उच्छृंखलता विकार का साम्राज्य फैल गया है, स्त्री-पुरुष तेजहीन, लम्पट और अल्पायु हो रहे हैं, विषपी वातावरण में पले बच्चे आरम्भ से विषयी संस्कार लेकर गुप्त रोगों के शिकार हो रहे हैं। गृह सौख्य नष्ट हो गया है।

बम्बई, कलकत्ता, देहली, कानपुर इत्यादि बड़े नगरों की गली-गली में धूर्त और दिखावटी हकीमों तथा वैद्यों की वृद्धि हो रही है, जो गुप्त रोगों के शिकार स्त्री-पुरुषों को भला चंगा करने, निःस्वत्व को शक्तिवान करने, नपुंसक को वीर्यवान करने के बड़े बड़े आश्वासन देते हैं। बदहजमी, संग्रहणी, प्रमेह क्षय से लेकर शक्ति वृद्धि, अमर यौवन, स्तम्भन, रुकावट, पौरुष हीनता, ल्यूरोकिया, मासिक धर्म-खोल की दवाई देते हैं। अजीब नाम रख कर शक्ति वर्द्धक औषधियों के विज्ञापन किए जाते हैं, जिनमें बल और पौरुष बढ़ाने की, धातु पुष्टकर तथा स्वप्नदोष और जातीय दुर्बलता मिटाने की, खोयी हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करने की गारण्टी दी जाती है। गर्भपात कराने की मासिक-खोल की दवाइयाँ सबसे अधिक विज्ञापित की जा रही हैं। किसी को नवाब वाजिदअली शाह का नुस्खा मिल गया है, तो किसी को कोई संन्यासी नुस्खा बता गया है। धातु-पुष्टि, नेत्रों की कमजोरी, प्रमेह, प्रदर, खुजली, फोड़ा फुन्सी, शक्ति वृद्धि के बीसियों लच्छेदार विज्ञापन सबकी नजर से गुजरते हैं। सैंकड़ों हतभाग्य युवक उनके फन्दे में फंसकर अपना रहा सहा यौवन स्वास्थ्य और रुपया नष्ट करते हैं।

ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि समाज में मूत्र अवयवों और स्त्री के योनि सम्बन्धी रोग उत्तरोत्तर बढ़े हैं। व्यसन तथा व्यभिचार के फलस्वरूप देश में रोग शोक आदि व्याधि की बढ़ती हुई है। इन पापाचारों को देखकर मानवता के भीषण पतन का अनुमान किया जा सकता है।

हम प्रकृति की अवहेलना कर रहे हैं!

आधुनिक सभ्य जीवन नितान्त अप्राकृतिक है। प्रातः से सायंकाल तक हम न यथा समय खाते पीते हैं, न विश्राम करते हैं। सोने के समय जागृत रहते हैं, जागने के समय सोते रहते हैं। हमारा भोजन चटपटी भुनी हुई कब्ज पैदा करने वाली वस्तुएँ होती हैं। माँस, प्याज, लहसुन, शराब, चाय, बिस्किट, सोडा वाटर, मिर्च-मसाले युक्त अचार चटनियों के बिना हमारा भोजन नहीं होता।

हमारी वेश भूषा ऐसी कृत्रिम फैशन युक्त है कि हमें पर्याप्त प्रकाश, वायु, धूप, कसरत नहीं मिल पाती। हमारी सूती बनियानें बहुत गहरी बनी हुई होती हैं। पैरों को चमड़े के जूतों मोजों से पाश्चात्य ठण्डे देशों की तरह कसे रहते हैं। नंगे पाँवों पैदल चलने के स्थान पर हमें साइकिल, मोटर, रिक्शा का सहारा ढूँढ़ना पड़ता है। सोते समय इतने वस्त्र पहन लेते हैं कि चादर के अन्दर की हवा, शरीर से निकले भाप, और पसीने के संसर्ग में आकर गन्दी हवा निकल नहीं पाती। आज कल के लोग शयन कक्ष के फर्श पर बिछे गलीचों पर सोते हैं। देर तक राम में सिनेमाघरों, क्लबों, सैर सपाटा, नाचघरों में निरत रहते हैं। फलतः हम रोगी, दुःखी अल्पायु हो गये हैं।

श्री बिट्ठल दास मोदी ने सत्य लिखा है-

“भोग्य वस्तुएँ बढ़ीं, तो रोगों की संख्या भी बढ़ी, या यों कहिए कि मनुष्य का स्वास्थ्य गिरा। इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं है... शहर में गया हुआ मजदूर मिल मालिक की तरह अधिक से अधिक धन कमाने की इच्छा करने लगता है। श्रम के और घर से दूर रहने के गम को गलत करने के लिए मादक द्रव्यों का व्यवहार करता है। उसका सारा दृष्टिकोण भौतिक हो जाता है। जरा भी कष्ट होने पर रोगों को अपने पापों का-किए का-फल न समझ कर, दैवी चक्र समझने लगता है और उनसे छुटकारा पाने के लिए उस पीड़ा की कड़ाही में से निकलने के लिए भट्टी में जा गिरता है।”

मनुष्य की जीवन सीमा निरन्तर कम होती जाती है हमारी औसत आयु गिर गई है। आज का शहरी जीवन वासनामय चमक दमक, गन्दी बदबूदार गलियों सड़कों पर लगे हुए कूड़े करकट के ढेर, नालियों में टट्टी बैठते हुए बच्चे, घरों के बाहर इकट्ठे गन्दे पदार्थ, तामसिक भोजन, माँस भक्षण, हमारी दूषित रहन सहन के प्रतीक हैं। शहरों के अंधेरे घने बसे हुए मजदूरों भंगियों, गरीबों के मकान देखिए, जहाँ प्रकाश एवं स्वच्छ वायु का नाम निशान तक नहीं होता। यथासमय इनमें प्लेग हैजा, महामारी, घातक छूत से फैलने वाली बीमारियाँ बृहत् संख्या में गरीबों को यमराज के अतिथि बना रही हैं, आधुनिक सभ्यता की बड़ाई करने वालों की दृष्टि गन्दे प्रकाश-वायु-हीन इन मानवी बिलों और घोंसलों में रहने वाले बन्धुओं की कारुणिक अवस्था पर नहीं जाती। न जान कितने दीन हीन भोजन से मुहताज, मानसिक विद्रूपता, मनोविकार से युक्त निस्सहाय गरीब कंट्रोल का सड़ा हुआ बदबूदार गन्दे कीटाणु युक्त गेहूँ ज्वार चना खाकर बीमार होते हैं और अल्प आयु में मक्खियों की तरह मर जाते हैं।

युद्धों ने मानवता का ह्रास किया है। बल पौरुष से युक्त युवक फौज में भरती कर गोली के शिकार बना दिये जाते हैं। रोगी, भीरु, निर्बल व्यक्ति, जो युद्ध से भयभीत होकर बच रहते हैं, वे ही शक्तिहीन व्यक्ति सन्तान उत्पत्ति के निमित्त अवशेष रह जाते है। कमजोर की सन्तान निर्बल, अल्पायु विकारमय होनी अवश्यम्भावी है। निरन्तर युद्धों में श्रेष्ठ शारीरिक शक्ति वाले व्यक्तियों के मरते मरते आज का मानव निस्तेज और दुर्बल हो गया है। अतः मानव की पूर्ण विकास रुक सा गया है। आज की सभ्यता, जिससे घृणा, लोभ, प्रतिशोध, स्वार्थ आदि दुष्ट मनोविकारों को आश्रय मिलता है, जंगलीपन से भी अधिक घातक है। यहाँ मानव रुपये का दास होकर अल्पकाल ही में ढकेल दिया जाता है। यह अस्वाभाविक और कृत्रिमता से परिपूर्ण है। हम सभ्यता की पोशाक पहिन कर दीन, हीन, रोगी, अपंग, अल्पायु बन गए हैं।

बढ़ती हुई डाक्टरी चिकित्सा-

अंग्रेजी चिकित्सा के प्रति जनता में इतनी आस्था हो गई है कि वे छोटी-2 साधारण बीमारियों पर भी डाक्टरों के यहाँ भागते हैं। चूँकि वे जानते हैं डॉक्टर के पास प्रत्येक रोग की दवाई है, बड़े से बड़े पाप से बाज नहीं आते। डॉक्टर इन्जेक्शन द्वारा प्रत्येक रोग को ठीक करने का ठेका लेते और भोली जनता को लूटते हैं। सर्दी, जुकाम, सरदर्द, जैसी साधारण सी बीमारियों के लिए भी कीमती दवाइयाँ लेते हैं। ऐस्पिरीन का प्रचार वृद्धि पर है। कफ मिक्सचर, फीवर मिक्सचर, कारमिनेटिव मिक्सचर पर लाखों रुपये अदा किये जा रहे हैं। बहुत सी औषधियों में शराब का भी प्रयोग किया जा रहा है।

आधुनिक विलासमय जीवन तथा बीमारियाँ ः-

प्राकृतिक जीवन, भोग विलास नाना बीमारियों का जन्मदाता है। आज के रोग क्या हैं? सर्वप्रथम नेत्र रोगों को लीजिए। रात में जागरण, दौड़ धूप के कारण आज के युवकों में चश्मा एक साधारण सी चीज बन गया है। कुछ व्यक्ति धूप के चश्मे के ऐसे आदी हो गये हैं कि सारे दिन उसी का प्रयोग करते रहते हैं। पेट की बीमारियाँ चैन नहीं लेने देती। शर्करा की अधिकता के कारण मधुमेह, पेचिश, बदहजमी इत्यादि फैल रहे हैं। न्यूरिसथेनिया बुद्धिजीवियों का आम मानसिक रोग बन गया है। पान, सिगरेट, बीड़ी, बर्फ, सोडा, तम्बाकू इत्यादि के कारण पाचन शक्ति कम होती जा रही है। दाँतों के रोग उत्तरोत्तर बढ़ें हैं। कब्ज अमीरों आरामतलबों का रोगी दूर करने के लिए नये नये तरीके निकाले जा रहे हैं जब कि अप्राकृतिक जीवन ज्यों का त्यों चल रहा है। मनुष्य ने जितना अनुसंधान बीमारियों को अच्छा करने का किया है, उसके अप्राकृतिक कृत्रिम जीवन ने उतना ही बढ़ाया है यदि जीवन को सरल सीधा आडम्बर विहीन शान्त बनाया जाय, तो आधी बीमारियों को बखूबी दूर किया जा सकता है।

हरी, वरी, करी-तीन भयानक शत्रु

आधुनिक सभ्यता ने हमें तीन नए रोगों का जन्म दिया है। प्रथम रोग है-”हरी” अर्थात् जल्द बाजी, दूसरा ‘वरी’ अर्थात् चिन्ता है, तृतीय ‘करी’ अर्थात् मिर्च मसालों का शौक। इन तीनों रोगों के कारण आधुनिक जीवन अशान्त और दुखी बन गया है।

आज का सभ्य व्यक्ति सब कुछ काम जल्दी-2 कर डालना चाहता है। खाने, पीने, मनोरंजन, रोजगार, भजन पूजन प्रार्थना, दफ्तर आना जाना-प्रायः हर क्षेत्र में वह जल्द बाजी कर रहा है। बड़े नगरों में सड़कों पर चलते हुए व्यक्तियों को देखने से ऐसा प्रतीत होता है, मानों सब कहीं लगा हुई आग बुझाने भागे चले जा रहे हों! इस जल्दबाजी में न वे स्वयं अपना मन स्थिर कर पाते हैं, न कुछ स्थाई महत्व की महान् वस्तु का ही निर्माण कर सकते हैं।

दूसरा रोग चिन्ता का है। आज के व्यक्ति की आवश्यकताएँ असंख्य हैं। विलासिता, कामुकता, फैशन, झूठी शान, मिथ्या अभिमान ने अनेक आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक आवश्यकता तथा बढ़ा दी हैं। प्रत्येक आवश्यकता पूर्ण न होने से चिंता की उत्पत्ति करती है। असंख्य चिन्ताओं का बोझ लिये मनु के पुत्र आज पीड़ा दुख कसक और वेदना पूर्ण जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

तीसरा रोग ‘करी’ अर्थात् अधिक मिर्च मसालों से परिपूर्ण स्वादिष्ट भोजनों का गुलाम बनना है। जब तक दस तरह के मसाले भोजन में न हों, खटाई के लिए चटनी, अचार, मुरब्बे इत्यादि न हों, सायं काल चाट पकौड़ी समोसा चाटने के लिए न मिल जाय, तब तक आज का मनुष्य भोजन का आनन्द नहीं ले पाता। वास्तव में देखा जाय तो वह भोजन का आनन्द नहीं लेता, वह तो मिर्च मसालों का मजा लूटना चाहता हैं। जिह्वा के स्वाद के वशीभूत होकर वह खूब ठूँस ठूँस कर अभक्ष पदार्थों का सेवन करता है और बीमार बनता है। वह भोजन खाने के लिए जैसे जीवित रहता हो। जहाँ पशु भी बे भूख भोजन नहीं करते, वहाँ मनु का यह समझदार कहने वाला पुत्र-मनुष्य सारे दिन मुँह चलाया करता है।

अधिक सन्तान की उत्पत्ति तथा हमारे दुःख-

समाज में स्त्री जाति का सुन्दर, स्वस्थ और दीर्घ जीवी होना परमावश्यक है। आज की स्त्रियों की दशा शोचनीय है। उनके शरीर पर पर्याप्त माँस नहीं, शरीर में शक्ति, सौंदर्य, स्वास्थ्य, ओज, उत्साह नहीं है। अधिकाँश भारतीय नारियाँ पाश्चात्य सभ्यता के अन्धानुकरण में शृंगार की बीहड़ता, सौंदर्य के अवाँछित प्रदर्शन बहुत अंशों में विलासिता के रूप में प्रकट कर रही हैं। आलस्य, फैशन, अकर्मण्यता, भोजन में लापरवाही और अधिक सन्तान पैदा करने के कारण स्वास्थ्य और सौंदर्य से वंचित हो रही हैं।

बहु संतान उत्पत्ति हमारा कलंक है। सन्तान उत्पत्ति देश में एक प्रकार का खेल सा बन गया है। छोटे छोटे बच्चों का विवाह करना उनके ढेर के ढेर बच्चे उत्पन्न होना, बालकों की अधिक मृत्यु, नई पीढ़ी की कम होती हुई आयु शक्ति सौंदर्य हमारी मानवता के लिए कलंक है। हमारे भाई अज्ञान वासना, और गन्दगी के वातावरण में रहने के कारण इन्द्रिय संयम नहीं कर पाते, उनके पास उच्च साँस्कृतिक मनोरंजन के साधन नहीं हैं। अतः विलासिता, पत्नी व्यभिचार की ओर प्रवृत्त होते हैं। फलतः देश में सन्तान की अधिकता हो रही है। जन संख्या निरन्तर बढ़ रही है। खाद्य सामग्री उस अनुपात में बढ़ नहीं पा रही है। इसलिए देश में घोर गरीबी, अनैतिकता, भुखमरी, फैलती जा रही है।

बरेटेन्ड रशल के अनुसार देश में जो प्रतिवर्ष लाखों नए प्राणी अनियंत्रित रूप से बढ़ते चले जा रहे हैं, उन्हें रोकना आवश्यक है। जन्म नियंत्रण के बिना केवल बाहर से अनाज मँगा मँगा कर हम खाद्य समस्या का हल नहीं कर सकते। फिलहाल इसमें दुर्बल और स्वस्थ सन्तान उत्पन्न न करने वालों, भिखारियों, बीमारों, प्रमाद ग्रस्त व्यक्तियों को सन्तान पैदा न कर सकने योग्य बना देना भी इस समस्या को हल करने का एक उपाय है लम्बी आयु में विवाह संयम, कृत्रिम उपायों का भी प्रचलन होना चाहिए।

मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी के भूत पूर्व प्रधान मंत्री श्री तुलसीदास सरावगी ने अपनी अपील में उचित ही लिखा है, “रोगियों को मरने से बचाने के लिए, छोटे छोटे शिशुओं को अकाल मृत्यु मुख में जाने से रोकने के लिए, हम हर जगह अस्पताल और क्लीनिक खोलते जा रहे हैं, परन्तु इन सब बुराइयों की जड़- को अभी काटने का हमारे देश में सुसंगठित प्रयत्न नहीं किया गया हमारे सामने देश की जड़ को खोखली करने वाले ऐसे अनेक विषैले पौधे खड़े हैं, जिनको काट डालना देश और समाज की प्रथम सेवा है। संकोच, लज्जा, भय और रूढ़ियों के मायाजाल से निकल कर हमें समाज में से अंधकार को दूर करना है और फैलाना है, उस प्रकाश को, जिसके द्वारा देश सुखी हो, समाज का विकास हो, नर नारी स्वस्थ और निरोग हों, दरिद्रता और बहु सन्तानों का अभिशाप दूर हो।”

अधिक स्वस्थ सबल, बुद्धिमान पीढ़ी के लिए देश से भूख और खाद्य संकट को दूर करने के लिए सुयोजित परिवारों की परम्परा के लिए हमें आबादी की वृद्धि का नियंत्रण करना है।

ताकत की दवाइयों की यह होड़

मनुष्य की ताकत बढ़ाने वाली दवाइयों की एक प्रतियोगिता-सी लगी हुई है। बाजारों की सड़कों के किनारे ताकत की दवाइयाँ भिन्न-भिन्न प्रकार की छोटी बड़ी जड़ी बूटियाँ, शिलाजीत इत्यादि बेचने वाले बृहत् संख्या में नित्यप्रति देखे जा सकते हैं। इन दवाओं के इतने प्रचार का दूसरा मतलब यह है कि वर्तमान मनुष्य की शक्ति क्षीण हो गई है। उसने अपनी स्वाभाविक प्राकृतिक शक्ति का दुरुपयोग किया है, उचित अनुचित का विवेक हट जाने के कारण वह निरन्तर कमजोर होता जा रहा है। आत्महत्या से मरने वाले व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है, जिसका दूसरा तात्पर्य यह है कि मनुष्य का मस्तिष्क पूर्णतः स्वस्थ नहीं रहा है उसमें कोई-न-कोई रोगात्मक कारण अवश्य विद्यमान रहता है। अस्वस्थ एवं निर्बल शरीर के कारण मस्तिष्क भी अस्वस्थ हो गया है। विकार ग्रस्त मस्तिष्क में वैराग्य विषाद, आत्महत्या इत्यादि ने अपना अड्डा जमा लिया है। यह आधुनिक सभ्य मनुष्य की मनः स्थिति।

आत्महत्या, अकाल मृत्यु, उत्तेजना, शक्तिहीनता का एक कारण यह है कि व्यसनों की निरन्तर वृद्धि हो रही है। शराब, तम्बाकू, चरस, गाँजा, अफीम आदि का प्रचार तथा खपत अधिकता से हो रही है। इस अभागे देश में जब एक एक बूँद दूध को तरसते हैं, वहाँ लोग अपना बहुत धन ताड़ी और दूसरी विदेशी शराबों में व्यय कर देते हैं और साथ ही शरीर और मन की शक्तियों को भी नष्ट करते हैं। शराब की उत्तेजना में व्यभिचार होता है, साथ ही सरदर्द, बदहजमी, रीढ़ की हड्डी का दुखना, धड़कन, बहुमूत्र, नपुँसकता, क्षय और पागलपन की वृद्धि हो रही है। एक ओर गन्दे जीवन से वीर्य पात होता रहे, दूसरी ओर ताकत की दवाइयाँ खाई जाती रहें, तो किस प्रकार लाभ हो सकता है? दवाइयों या इन्जेक्शनों से शक्ति प्राप्ति का उपाय आधुनिक मनुष्य की मृग-मरीचिका मात्र है!


राजनैतिक क्षेत्रों में भयंकर पतन

आज की राजनीति स्वार्थ, भ्रष्टाचार, दूसरे राष्ट्रों को हड़पने, अपना साम्राज्य फैलाने के उपक्रम, धोखा, घृणा, विद्वेष और हिंसा से परिपूर्ण है। आज का शासन गुटबन्दी का शासन है। एक ओर ब्रिटेन-अमरीकी गुट है, तो दूसरी ओर रूस-चीन जोर मार रहे हैं। बिना किसी गुट में सम्मिलित हुए, बिना कूटनीति के प्रयोग किये किसी राष्ट्र का अस्तित्व निरापद नहीं ।

राजाओं का निरंकुश शासन-युग समाप्त हो गया है जनमत का आदर हो रहा है। जनता का राज्य गरीबी, मजदूरी, बीमारी, आर्थिक कष्टों को दूर नहीं कर पा रहा है। प्रायः जनता को भुलावे में डालकर डिक्टेटर जन्म ले रहे हैं और डिक्टेटर जनमत की परवाह नहीं कर रहे हैं। आज की राष्ट्रीयता संकुचित एवं आक्रामक राष्ट्रीयता है। फासिस्ट दल जमानत की परवाह नहीं करता। वह अपने विचार एक विशिष्ट प्रचार पद्धति से जनता पर थोप देता है। फैसिज्म कोई नई स्वयं स्थित विचार धारा नहीं, प्रस्तुत पूँजीवाद का खूनी रक्षक भर है। गरीबी दूर करने का बुलावा देकर वह जनता का ध्यान आर्थिक अधिकारों और उन्नति से हटाता है।

फासिज्म दूसरे राष्ट्रों की निर्बलता, पिछड़ेपन, निर्धनता, असभ्यता पर पनपता है। असभ्य तथा पिछड़े हुए देशों को हथिया कर अपने अधिकार में कर लिया जाता है। पिछड़े हुए राष्ट्रों पर जो भयंकर अत्याचार किए जाते हैं, उनका वर्णन नहीं किया जाता। अबीसीनियाँ और युथापिया इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं।

फासिज्म में एक देश के विरुद्ध विषैला प्रचार किया जाता है, जो प्रायः मिथ्या होता है। फासिस्ट प्रोपेगेन्डा वाला डिक्टेटर अपनी प्रजा में यह प्रचारित करता है- “अमुक राष्ट्र ने, जो हमारे पड़ौस में है, हमारे यहाँ स्थिर नागरिकों पर बड़े बड़े अत्याचार किये है। वह हमारा शत्रु है। हमें अपनी आबादी को बसाने के लिये स्थान चाहिए। अतः उस पर आक्रमण कर देना चाहिए।”

इस मनोवृत्ति से परस्पर घृणा, द्वेष, कटुता, शत्रुता की वृद्धि होती है। एक राष्ट्र दूसरे के प्रति विषैला प्रचार करता है।

कम्यूनिज्म ऐसा राजनैतिक धर्म है, जो समाज में एक पार्टी का हित चाहता है। दूसरी पार्टी में चाहे कोई कितना ही अच्छा हो, कम्यूनिज्म की दृष्टि से हेय है।

साम्राज्यवाद पूँजीवादी वृत्ति का परिणाम है। हमारा साम्राज्य बढ़ता रहे, चाहे उससे जनता को लाभ हो या न हो, इससे हमें मतलब नहीं, पूँजीवादी व्यवस्था में सबसे बड़ा दोष यह है कि उसका आधार व्यक्तिगत लोभ है। उसमें मानवता के कल्याण को कोई स्थान नहीं। समाज के लोग बिना वस्त्र घूम रहे हों, पर पूँजीवादी देश विध्वंसक गोले बन्दूक, आतिशबाजी बनाने में कपड़े की बनिस्पत अधिक दिलचस्पी लेता है।

आज प्रजातन्त्र का युग है किंतु प्रजा अशिक्षित मूर्ख, अन्य विश्वासों, रूढ़ियों, धार्मिक कुचक्रों में बंधी हुई है। अवसरवादी ढोंगी नेता, भोली जनता की अशिक्षा से लाभ उठाते हैं। प्रजा का शोषण चलता है। अधिकारी समझता है कि यह उसका अन्तिम अवसर है। अतः वह उचित अनुचित रूप से अधिकतम रुपया खींच लेना चाहता है। रुपये के बल पर वोट मिलते हैं, जनता को धोखे में डाल दिया जाता है। कल जो किसी रिश्वत-खोरी, बेईमानी या अनुचित कार्य करने पर निकाल दिया गया था, आज वही रुपये तथा प्रोपेगेन्डा के बल पर जन नेता का स्वाँग बनाता है। कुछ राजनैतिक पार्टियाँ धर्म और साम्प्रदायिकता की आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करती हैं। कोई किसान मजदूरों का नारा लगाकर जनता की सहानुभूति खींचना चाहता है। आज राजनीति के क्षेत्र में अजीब खींचतान, संघर्ष, झूठ, कपट, प्रोपेगेन्डा, स्वार्थसिद्धि चल रही है। युद्ध के बादल मंडरा रहे है। जब तक ऐसा कुटिल वातावरण चलता रहेगा, तब तक मानवता पतित होती रहेगी।

प्रान्तीयता का विष

“यह हमारे प्रान्त का व्यक्ति है। अतः इसकी उचित शिक्षा अपने ही प्रान्त के व्यक्तियों का प्रोत्साहन, आधिक सहायता या तरक्की नौकरी देनी चाहिए” यह प्रान्तीयता की भावना आज अपने घृणात्मक रूप में देखी जा रही है।

सरकारी नौकरियों में यदि कोई मद्रासी अफसर है तो उसकी दृष्टि में मद्रास के अतिरिक्त अन्य प्रान्त वाले किसी योग्य नहीं हैं। बंगाली सज्जन अपने बंगालियों को ही लेना पसन्द करते हैं। पंजाबी पंजाबियों, सिंधी जिंध वालों और यू. पी. उत्तर प्रदेश में रहने वालों को आगे बढ़ाना चाहते हैं। प्रान्तीयता की भावना हमारी संकुचिता, की प्रतीक है। इससे यह ज्ञात होता है कि हमारे हृदय कितने छोटे हैं। हमारी आत्मीयता के ये छोटे-छोटे दायरे हिंद समाज के कलंक हैं। जब हम एक प्रान्त के व्यक्ति से पक्षपात करते हैं, और दूसरे का सच्चे हठ की अवहेलना करते हैं, तो हम एक पाप करते हैं। पक्षपात हमारा राजनीति का एक बड़ा शत्रु है। पक्षपात के कारण अयोग्य, अशिक्षित अनाधिकारी व्यक्ति मिनिस्ट्री, म्यूनिस्पैलटी, की मैम्बरी का आनन्द भोगता है-भ्रष्टाचार पूर्ण शासन करता है, जबकि योग्य विद्वान् अधिकारी सज्जन पड़े सड़ा करते हैं।

आज कल के भ्रष्टाचार का तीसरा कारण अवसर वादिता है। “अब अवसर है, हम अधिकारी हैं, अपने महकमे के सरताज हैं, हमारा अपना राज्य है। अतएव अपना उल्लू सीधा कर लेना चाहिए”- ऐसी विचार धारा हमारे पतन का कारण है। आज राजनैतिक जीवन में अधिकार नेता, अधिकारी अफसर लोग अपने-2 अवसर से पूरा-पूरा फायदा उठाने की फिक्र में लगे हुए हैं। इस अवसरवादिता का पतित रूप कन्ट्रोल तथा पुलिस-कचहरियों आदि के विभागों में अपने सबसे घिनौने रूप में देखा जा सकता है।

घूस, भ्रष्टाचार और पक्षपात -

पुलिस वाला इक्के वालों, ताँगे वालों, छोटे-2 फेरी वालों, खोमचा फल इत्यादि बेचने वालों, पटरियों पर बिसाती की छोटी-2 दुकान लगाने वालों से रिश्वत लेते हैं। सबका दैनिक रुपया बँधा है। शाम को प्रत्येक ताँगा, रिक्शा, या बिसाती अपनी अर्जित आय का एक भाग लाकर कानिस्ट बिल साहब की जेब में डाल जाता है। चुँगी कस्ट इत्यादि में मुसाफिर या व्यापारी को पकड़ लिया जाता है। राशन की दुकानों पर कम तोलने, कूड़ा करकट मिलाकर गेहूँ आदि निकाल लेने, दूध में पानी की मिलावट, घी में वनस्पति का मिश्रण, काली मिर्च में पपीते के बीज, जीरे में सींकों के जीरे का पुट इत्यादि बाजार की अनैतिकता का कारण निरीक्षकों को मिलने वाली घूस ही है।

गत कुछ वर्षों से देश में चोरी डाकू का दौर दौरा चल पड़ा है। स्कूल कालेज में छोटी छोटी वस्तुओं की चोरी, फाउंटेन पेन, पेंसिल, रुमाल इत्यादि उचाटने को तो बुरा ही नहीं माना जाता। उधार चीज लेकर, विशेषतः रुपया या पुस्तक वापस न करना तो हमारी आदत का अंग बन गया है। जो वस्त्र खुले बाजार में प्राप्त नहीं होता, वह चोर बाजार में अनायास ही प्राप्त हो जाता है। रेल के महकमे में रिश्वत पर्याप्त चलती है। व्यापारी अपने व्यापार के लोभ में अनाप शनाप घूस देकर माल की बिल्टी तैयार करा लेते हैं। बिना टिकट सफर करने की अनैतिक आदत भी बृहत् संख्या में दृष्टि गोचर हो रही है। सरकारी दफ्तरों में रिश्वत का यह जोर है कि एक क्लर्क अपने ही आफिस के दूसरे क्लर्क से चाय पानी के पैसे ले लेता है। दिनों दिन बढ़ती हुई यह चोरी, घूस खोरी, भ्रष्टाचार और छीना झपटी भोगवाद, धन लिप्सा का विराम कम होना, कहा नहीं जा सकता। भोग गर्भित स्वार्थ के कारण आज प्रायः सभी प्रकार के नैतिक बन्धन शिथिल पड़ गये हैं।

नेताओं का दुरंगापन-

सरकारी योजनाओं की विफलता में उनके कर्मचारियों, नेताओं, पथ प्रदर्शकों की स्वार्थ जन्य अनैतिकता का प्रमुख हाथ है। आज एक व्यक्ति कुछ प्रोपेगेन्डा करता है, कल वही मिनिस्टर या अधिकारी बन कर राष्ट्र की उपेक्षा कर निजी स्वार्थ को सर्वोपरि समझने लगता है। पिछले और दलित वर्गों की आवाज को दबाता है और अपने खूनी पंजों से बहुसंख्यक जनता की सामाजिक दासता की बेड़ियाँ सख्त कर देता है। अनेक नेता घर पर नौकरों मजदूरों को मारते पीटते, तनख्वाह नहीं देते हैं, बाहर जनता में प्लेटफार्म पर मजदूरों का पथ प्रदर्शन का ठेका लेते हैं। स्वयं मदिरा पान कर दूसरों को मदिरा की असंख्य बुराइयाँ दिखाते हैं, स्वयं रेशमी सिल्क इत्यादि घर में पहिन कर बाहर खद्दर पहिन कर निकला करते हैं। कहते कुछ हैं, करते कुछ उलटा ही हैं। वचन तथा आचरण में सर्वत्र दुरंगापन चल रहा है!


धर्म के नाम पर मानवता का पतन

धर्म अत्यन्त पवित्र मानवीय आत्माभिव्यक्ति है। धर्म की उत्पत्ति मानवता के कल्याण से जुड़ी हुई है। संसार के सब ज्ञान, अनुभव, नैतिक प्रगति का नवनीत धर्म ही है। सच्ची धर्म भावना से मानव मात्र का कल्याण होता है, किन्तु हम देखते हैं, आज के युग में धर्म की आड़ में धर्मान्धता का प्रचार हो रहा है, साम्प्रदायिकता का जाल बिछता जा रहा है, धार्मिक संस्थाओं में आडम्बर भोग विलास तथा बाह्य प्रदर्शन बढ़ते जा रहे हैं। झूठे सार हीन धर्म विश्वास, रूढ़ियां, कट्टरता, धर्मान्धता, अज्ञान पारस्परिक विद्वेष फैला रहे है। मठ मन्दिरों जिनकी जिन पवित्र सेवा, त्याग, निस्वार्थ, भावना के उच्च उद्देश्यों के लिए स्थापना की गई थी, वे समय की गति से विलुप्त हो गए हैं।

एक युग था जब मन्दिर का पुजारी ज्ञानी, सुशिक्षित, सच्चरित्र, उपदेश देने तथा तदनुकूल आचरण करने वाला संयमी व्यक्ति होता था। भजन पूजन, कीर्तन, सदग्रन्थावलोकन मन्दिर की देख रेख मूर्ति को स्नान कराना, मन्दिर में यज्ञ इत्यादि की देख भाल उसका कार्यक्रम था। समय बदला और भगवान की सेवा में भी धोखे-बाजी चल निकली है।

आज मन्दिरों का प्रसाद दुकानों पर आकर पैसों से बिकता है। उनमें से नफा कमाया जाता है। कहने को यह भगवान का प्रसाद है, पर उसे चखने के लिए गाँठ में रुपया चाहिए। जिस देश में भगवान का ट्रेड मार्क लगा कर रद्द, दुर्गंधमय, सड़ी बसी मिठाइयाँ बेची जाएं, पूजा बिना रुपये पैसे न हो सके, पुजारी और महन्त दिन भर गाँजा तम्बाकू, भाँग, अफीम तथा अन्य नशीली वस्तुओं का सेवन कर रात्रि के अन्धकार में परस्त्री भोग डकैती और खून तक करते रहें, और जनता दकियानूसी विचारों व अन्ध विश्वासों में पड़ी रहे, उसका भविष्य क्या होगा?

धर्मशालाओं में आज मुसाफिर को जो कष्ट होते हैं, जैसी गन्दगी भ्रष्टाचार स्वार्थ और चौकीदार का एक छत्र राज होता है, यह प्रत्येक यात्री जानता है। रिश्वत में कुछ न कुछ देते रहने से आप अच्छा कमरा प्राप्त कर सकते हैं अन्यथा आपका निकृष्ट तथा दुर्गंधमय अंधेरे कमरे से सन्तोष करना पड़ेगा। धर्मशालाओं में शौचादि का स्थान ऐसा गन्दा रहता है, कि मानव की गन्दगी और कुरूपता पर दया आती है।

दिखावे का धर्मः-

आज का धर्म दिखावे का धर्म है। दिन भर व्रत रखने वाले भगवान का नाम लेने, भजन पूजन करने दान देने, सद्ग्रन्थों का पठन पाठन करने या मौन धारण करने के स्थान पर गालियाँ देते रहते हैं, व्रत रखने वाले दुकानदार कम तोलने, काला बाजार करने, झूठ बोलने, ग्राहक को ठगने में लगे रहते हैं। कहने को व्रत उपवास से हैं, शाम को मन्दिर में पूजन दर्शन के लिए भी जाएंगे किन्तु कम तोलना, झूठी बातें करना, व्यर्थ की खुशामद, काला बाजारी नहीं छोड़ेंगे। यह है, आज का झूठा दिखावे का धर्म।

दिन-रात अपशब्दों का उच्चारण करने, लड़ने झगड़ने, मारने पीटने, गुस्सा रहने वाली कर्कशा स्त्रियाँ अपने आपको धर्म का ठेकेदार समझती हैं। जो स्त्रियाँ पढ़ना नहीं जानतीं, या अक्षर ज्ञान मात्र लेकर रामायण, गीता महाभारत में चिपकी रहती हैं, वे अपने को धर्म का दावेदार मान बैठी हैं। जो हफ्ते में एक बार गंगा या जमुना में स्नान कर लेती हैं, वे अपने को पवित्र मानती हैं। जिन्हें सारहीन धार्मिक विश्वासों ने अकर्मण्य और कूप मंडूक बना दिया है, जो दिन-रात बहुओं पर नृशंस अत्याचार करती हैं, उन्हें स्वयं पीटती या पति से पिटवाती हैं, वे अज्ञानी अपने पाप को धर्म के आवरण में छिपाने का प्रयत्न करती हैं। बड़े-2 पूँजीपति रात-दिन काला बाजार कर जनता को लूट मार धोखा देकर खूब रुपया ऐंठते हैं। फिर परमेश्वर को रिझाने और पाप धोने के लिए गंगा स्नान, यात्रा, दान का स्वाँग बनाते हैं।

‘धर्म’ मनुष्य जीवन की प्रधान आवश्यकता है। पूजा और उपासना से मनुष्य का अन्तःकरण निर्मल होता है और आत्म बल बढ़ने से आत्मा सच्चे सुख एवं शान्ति की ओर अग्रसर होता हे। आज धर्म एवं उपासना के नाम पर केवल कुछ रूढ़ियां प्रचलित रह गई हैं। इसमें सुधार होना मनुष्यता की रक्षा के लिए अत्यन्त आवश्यक है। धार्मिक विश्वास हमारे प्रत्येक कार्य और विचार ओत प्रोत होना चाहिए। जीवन की गतिविधि साधनामय होनी चाहिए। पूजा उपासना से लेकर दैनिक जीवन के सामान्य कार्य तक साधनामय हों तभी हम सच्चे साधक एवं ईश्वर विश्वासी बन सकते हैं।


मानवता की रक्षा के उपाय

मानवता मनुष्य की दैवी सम्पत्ति

तुम मानव हो! तुम आदि कर्त्ता महाप्रभु परम पिता परमेश्वर के पुत्र हो। तुम उन दिव्य गुणों विशेषताओं, उच्चतम दैवी सम्पदाओं शुभ उद्देश्यों के पुँज हो, जो तुम्हारे पिता में सन्निहित है। प्रत्येक मनुष्य उस दिव्य विभूति का अधिकारी है, जिसकी कल्पना हम जगत नियंता सच्चिदानन्द आनन्द घन अमृत तत्व मंगलमय भगवान में करते हैं। मानवता हमारा विशेष गुण है।

सद्गुणों, सद्भावनाओं, सद्आचरण तथा सद्व्यवहारों से दृढ़ पुरुषत्व का नाम “मानवता” है। मानवता में वे सब शुभ, सात्विक, सद् सामर्थ्य केन्द्रित हैं, तो हमें पशुत्व या असुरत्व से ऊँचा उठाते हैं, और हमारी प्रवृत्ति को सदाचार, संयम, परमार्थ सिद्धि, बुद्धि विवेक, सहिष्णुता की ओर रखते हैं।

देवत्व की प्राप्ति का प्रथम सोपानः-

मानवता की पूर्णता देवत्व की प्राप्ति का प्रथम सोपान है। मनुष्य का आंतरिक तथा वाह्य जितना अधिक से अधिक विकास होता है, उतना ही वह मानवता के समीप आता है। मनुष्य में जो ईश्वर का दिव्य अंश है, उसे धारण किए रहने का सतत् प्रयत्नशीलता मानवता है, उस दिव्य शक्ति का विकास करने के लिए समस्त कर्म मानवता के सत्कर्म हैं। जो इन शुभ प्रयत्नों में जितनी तल्लीनता और निष्ठा से संलग्न है वह उतना ही मानवता के पास है। अपनी देह द्वारा परमेश्वर को प्रकट करना, दिव्य शक्तियों का विकास करना, समीप की भूमि को दैवी प्रकाश, प्रेम सहानुभूति, दया, आनन्द, तृप्ति से भर देना, गिरे हुए प्राणियों को ऊँचा उठाना, परस्पर सेवा सद्भाव सहानुभूति रखना मानवता का विकास करना है।

मानवता क्या है?

एक विद्वान का कथन है- “दिव्य शक्ति का सम्पूर्ण विकास मानवता की पूर्णता है। विश्व में एक ही पवित्रतम मन्दिर है, जिसमें अत्यन्त शक्तिशाली पूर्णता की प्रतिमा स्थित है। वह मन्दिर मानवता का शरीर है। इस मानवता का सर्वोत्तम उपयोग, अपने अन्तः स्थित देव को सुरक्षित रखता है। मानवोचित कर्मों से ही वह अन्तः स्थित देव प्रसन्न होता है। परस्पर प्रेमपूर्वक सम्मिलन, दर्शन और स्पर्श से स्वर्ग-सुख का अनुभव मानवता के अभ्युदय पर निर्भर है। मानवता की शीतल सुखकर और समुन्नत वृष्टि से विश्व के समस्त संताप शान्त हो जाते हैं।”

हिन्दुओं के महापुरुषों-भगवान राम, तथा योगेश्वर कृष्ण-में हमें मानवता की पूर्णता के आदर्श उदाहरण मिलते हैं। उनके सर्वगुण सम्पन्नता, सर्वज्ञता, कर्मकुशलता, कर्तव्य शीलता ही उनके मानव जीवन की पूर्णता के परिचायक हैं। श्री रामचन्द्र ने जन्म से लेकर ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, राजस्व, पुत्र धर्म, संकट, युद्ध, सहायता इत्यादि की नाना मर्यादाओं का आदर्श हमारे सम्मुख प्रस्तुत किया। जगत के जंजालों और विलापों से घिरे रह कर धर्म की धुरन्धरता ज्ञान की गरिमा, नीति निपुणता, बुद्धि विशालता, मत तथा संयम की महानता, चित्त की चैतन्यता, अहंकार शून्यता, विचारों की दक्षता, बल सौंदर्य, सरलता की प्रचुरता, ऐश्वर्य, धर्म यशश्री, वैराग्य और मोक्ष की सम्पूर्णता प्राप्त कर लेने का आदर्श श्रीकृष्ण चरित्र में दृष्टिगोचर होता है। मनुष्य जीवन का ऐसा कोई अंग नहीं जिसकी पूर्णता, सर्वांगीण विकास इन दोनों महा-मानवों में न हो। सत्यं, शिवम् सुन्दरम् का एकीकरण करके आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक पूर्णता यहाँ हमें सहज ही उपलब्ध हो जाती है। श्रीकृष्ण के चरित्र से स्पष्ट है कि मानव संयमित और सादे जीवन के द्वारा-(1) कर्म (2) ज्ञान, (3) तथा भक्तियोग का समन्वय करता हुआ दिव्य शक्तियों से संपन्न जीवन व्यतीत कर सकता है।

श्रीराम तथा श्रीकृष्ण ने मानवता का पथ प्रशस्त किया, मानवता का उच्चतम आदर्श हमारे सम्मुख रखा, और विशुद्ध मानवता की रक्षा के लिये सतत संग्राम किया। इन दोनों महामानवों की मानवता कर्त्तव्य शीलता, लोकोपकार सात्विकता, कर्मशीलता, और धर्म संस्थापना में है। उन्होंने स्वार्थ के लिये व्यक्तिगत सुख का बलिदान किया, मानवीय धर्म की रक्षा के लिये निरन्तर संघर्ष किया, समग्र जीवन दूसरों की सेवा, परोपकार, कर्तव्य, सत्य की स्थापना में लगाया।

इन दोनों महानुभावों में शरीर की हृष्ट-पुष्टता, विद्याध्ययन के प्रति प्रेम, गुरुजनों के प्रति असीम आदर भाव, माता-पिता, जेष्ठों के प्रति पूजनीय भाव, कुल तथा देश की मान रक्षा के लिये बलिदान, कर्तव्य पालन में निर्भीक, जागरुकता, विनम्रता दैनिक जीवन में आत्मसम्मान, सात्विकता, शिष्टता, अथक परिश्रम, कार्य कुशलता और धर्म प्रेम मिलते हैं। साहित्य, कला और संगीत उनके व्यक्तित्व के अंग थे। श्रीकृष्ण ने उपनिषदों का दोहन कर उस दार्शनिक साहित्य का निर्माण किया, जो गीता के नाम से विख्यात है। धार्मिक जीवन में, ये महामानव, जीवन युक्त थे, उनमें वैराग्य के साथ मुक्ति की प्रयत्नशीलता थी। श्रीकृष्ण ने मोक्ष के लिये प्रयत्न किया और व्यक्तिगत मुक्ति से, देश की मुक्ति, देश की मुक्ति से विश्व की मुक्ति को महत्वपूर्ण समझा। ऐश्वर्य, धर्म, बल, यश, श्री और वैराग्य आदि मानवता के सभी तत्वों को पूर्णता इन महामानवों में उपलब्ध हो जाती है। इनमें मानवता और ईश्वरत्व का जो समन्वय मिलता है, वह हमारे लिये पथ प्रदर्शक आदर्श रूप में है। हम चाहें, तो उनमें से अनेक तत्वों का जीवन में विकास कर सकते हैं। उनका मानव रूप में प्रकट होना मानव मात्र के लिये ज्ञान, बल, ऐश्वर्य, वीर्य, शक्ति, तेज आदि के अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करता था। मानव जीवन की पूर्णता के लिये श्रीकृष्ण का आदेश देखिए-

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।

निराशीर्निर्ममो भूत्वा युज्यस्व विगतज्वर॥

(गीता अ॰ 3/30)

“हे अर्जुन! ध्याननिष्ठ चित्त से सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें समर्पण करके आशा रहित और ममता रहित होकर संताप रहित होकर जीवन युद्ध कर।”

मानवता के सद्गुण

मानवता के लक्षणों का वर्णन भगवान कृष्ण ने गीता के 16 वे अध्याय में दैवी सम्पदा के अंतर्गत किया है। सच्चे आदर्श रूप मानव में निम्न गुण होने आवश्यक हैं। इनके सर्वोच्च विकास से ही हम सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने के अधिकारी हैं -

अभयं सत्व संशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दान दमश्च यज्ञश्च् स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥

अहिंसा, सत्यम, अक्रोधः, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् दया, भूतेषु, अलोप्त्वम् मार्दनम् होः, अचापलम्॥

तेजः, क्षमा, धृतिः, शौचम अद्रोहः, नातिमानिता। मवम्ति सपंदम् दैवीम् अभिजातस्य, भारत॥

श्रीकृष्ण भगवान् के उपरोक्त मन्तव्यों के अनुसार जिन व्यक्तियों को दैवी सम्पदाएँ प्राप्त हैं, उनके लक्षण इस प्रकार हैंः-

1- अभयमः-मन में भय का सर्वथा अभाव।

2- सत्व संशुद्धिः-अन्तःकरण की अच्छी प्रकार स्वच्छता।

3- ज्ञानयोग व्यवस्थितिः-तत्व ज्ञान के लिये ध्यानयोग में निरन्तर दृढ़ स्थिति।

4- दमः-इन्द्रियों का दमन।

5- यज्ञः-भगवत् पूजा और अग्निहोत्रादि

6- स्वाध्यायः-वेद शास्त्रों के पठन पाठन पूर्वक भगवत् के नाम और गुण का कीर्तन।

7- तपः-स्वधर्म पालन के लिये कष्ट एवं प्रतिकूलताएँ सहन करना।

8- आर्जवम्ः-शरीर और इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता।

9- अहिंसा-मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना।

10- सत्यम् -यथार्थ और प्रिय भाषण।

11- अक्रोधः-अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध न होना।

12- त्याग-कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग।

13- शान्तिः-चित्त की चंचलता का अभाव।

14- अपैशुनम्ः-किसी की निन्दा न करना।

15- भूतेषुदयाः-सब शुद्ध पतियों में हेतु रहित दया होना।

16- अलोलुप्त्वम्ः-इन्द्रियों का विषय के साथ संयोग होने पर भी आसक्ति का न होना।

17- मार्दवम्ः-कोमलता-मन, वाणी, कर्म, स्वभाव की।

18- हीः-लोक और शास्त्र के विरुद्ध आचरण में लज्जा।

19- अचापलम्ः-’व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव।

20- तेजः-वह शक्ति जिसके प्रभाव से श्रेष्ठ पुरुषों के सामने विषयासक्त और बीच प्रवृत्ति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्याय चरण से रुक कर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त करना चाहिये।

21- क्षमा

22- धैर्य

23- बाह्य शरीर तथा मन की शुद्धि एवं किसी के प्रति भी शत्रु भाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव।

ये सच्चे मानव के लक्षण हैं। हमें चाहिए कि इन मानवता के सद्गुणों को आचरण में लाने का सतत् प्रयत्न करते रहें। यथाशक्ति अपने दैनिक जीवन में इनका व्यवहार करें। दीर्घ कालीन अभ्यास से इनका निश्चय ही आपमें विकास होगा। आप सच्चे मानव बन सकेंगे ।

मानव धर्म के दस लक्षण

गीता, स्मृति, पुराण, और रामायण इत्यादि धर्म की विशद व्याख्या की गई है। स्मृतियों में मनुस्मृति सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है। मनुजी ने मनुष्य के लिये दस लक्षण आवश्यक बताये हैं। जो व्यक्ति इन दस लक्षणों से युक्त हैं, वे ही सच्चे मानव धर्म का पालन कर रहे हैं। मनुजी कहते हैं-

धृतः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचामिन्द्रियनिग्रहः। धी र्विद्यासत्यमक्रोधः दशकं धर्मलक्षणम्॥ (6/92)

अर्थात् धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य तथा अक्रोध-ये मनुष्य के दस मुख्य लक्षण हैं। जिनमें ये मानव धर्म के दसों लक्षण मौजूद हों, वह सच्चा मानव कहलाने का अधिकारी हैं। जो इनका पालन नहीं करते, वे मनुष्य का रूप कलंकित करते हैं। इन गुणों का सम्बन्ध किसी देश जाति, और सभी सम्प्रदाओं के धर्मनिष्ठ मानवों में ये समान रूप से पाये जाते हैं।


मानवता की रक्षा, विकास एवं सेवा के उपाय

संगठित प्रयत्न की आवश्यकता-

मानवता की रक्षा, विकास, एवं सेवा के लिये हममें से प्रत्येक मनुष्य को सतत जागरुक होना चाहिये। स्वयं कोई भी विनाशात्मक कार्य न कर रक्षात्मक एवं रचनात्मक कार्य करने के लिये पूरी शक्ति जुटा रखिये। यदि हममें से प्रत्येक व्यक्ति मानवता की रक्षा के लिये कटिबद्ध हो जाय, तो निश्चय ही हमारे परिवार, मुहल्ले, प्रान्त, देश से पशुता, बर्बरता और भ्रष्टाचार का अन्त हो सकता है। प्रत्येक मुहल्ले में सेवा सभायें, मानव-गोष्ठियाँ, समितियाँ, छोटे-छोटे क्लब बने, जो ऊँच नीच, गरीब अमीर का झूठा कृत्रिम भेदभाव भूल कर मानव मात्र के कल्याण के लिये भ्रातृ भाव, प्रेम, सौहार्द, समता, सहकारिता, सहानुभूति, सहायता, संगठन का वातावरण पैदा करें। एक दूसरे की सहायता करें, मन्दिर तथा धर्म स्थानों पर मानव सेवा दलों के संगठन और शिक्षा के केन्द्र बनें। प्रत्येक मानव को शान्ति, सहनशीलता, क्षमा के साथ अनीति और अत्याचार को दूर करने के लिए निर्भयता, वीरता और साहस का संचय करना चाहिए।

अन्धविश्वास, अति विश्वास एवं गलत फहमिया

समाज तथा अपने परिवारों में जो अंध विश्वास अतिविश्वास, गलत फहमिया हैं, उनको निकाल देना चाहिए। स्मरण रखिए विकार एक क्षुद्र से भ्रम के रूप में आपके मानस पटल पर उदित होता है। यह मन का मैल है। यदि प्रारम्भ में ही इसे साफ कर लिया जाए, जिसके विरुद्ध शिकायत है, उससे मामला साफ कर लिया जाय तो अत्युत्तम है अन्यथा चुपचाप एक दूसरे के विरुद्ध विष एकत्रित होता रहता है और समाज में विद्वेष, घृणा और अराजकता फैलती है।

हमारे बिछड़े हुए जितने भाई हैं- उनसे प्रेम और समता का व्यवहार किया जाय। हिन्दुओं में शूद्रों की स्थिति कुत्तों से भी बदतर है आर्थिक सामाजिक दृष्टि से वे उच्च जातियों के दास हैं। जाति की संकुचिता ने हमें गुलाम बना दिया था। हमें जाति हीन शिक्षित शक्ति प्रतिभा उच्च गुण सम्पन्न मानव समाज बनाने में प्रयत्नशील होना चाहिए। यही हमें हिन्दू जाति को जीवित रखना है तो ऊंच नीच के भेद को सर्वथा नष्ट कर देना होगा। हिन्दू समाज के अंतर्गत दलित शोषित जातियों के पुनरुत्थान की योजनाएं बननी चाहिए।

रूढ़ियां दूर कीजिए -

मानवता की रक्षा का एक मात्र उपाय यह है कि मानव के सर्वांगीण विकास में जो सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक या अन्य बाधाएं हैं उन रोड़ों को तोड़ दिया जाय। प्रत्येक मानव यह कार्य करे, अत्याचार, अविचार और अनाचार का निर्भीकता से डट कर सामना किया जाय। यदि हमें अन्य राष्ट्रों की प्रतियोगिता में जीवित रहना है, तो समाज के प्रत्येक व्यक्तियों को जाग्रत करना होगा, उसे शिक्षित कर आचार विचार, कर्तव्य अकर्तव्य पाप पुण्य का विवेक सिखाना होगा, सब की जिम्मेदारी स्वयं अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। इस प्रकार सबको समुन्नत संगठित कर आगे बढ़ाना होगा। हम भावी मानव के लिए निष्कंटक, आलस्य हीन, प्रमाद-रहित, आडम्बर विहीन, सरल सादा, उच्च विचारों वाला जीवन चाहते हैं। पाश्चात्य सभ्यता एवं विदेशी संस्कृति से हमें आँख मूँद कर प्रभावित नहीं होना है। हमें भारतीय संस्कृति की पृष्ठ भूमि पर मनुष्यत्व का विकास करना है। हमारा अन्तिम ध्येय तो वह साँस्कृतिक स्वराज्य है। जिसमें सब सुखी हों, सब सम्पन्न शिक्षित प्रकाश मान हों, हमारी जरूरी माँगें पूर्ण हों, साहित्य कला ज्ञान विज्ञान की वृद्धि हो, और स्वास्थ्य सुख एवं शान्ति के सब साधन मानव मात्र के लिए सुलभ हों।

सम्वेदना शील हृदय की आवश्यकता-

मानवता की वृद्धि एवं विकास की एक बड़ी आवश्यकता है- संवेदन शील हृदय (दर्दे दिल) दृढ़ प्रतिक्षता और सद्भावना। संवेदन शील वह है, जो मानव मात्र की कसक पीड़ा, उल्लास, हर्ष, सिसक, रोदन को अपने दिल में महसूस करता है। जब दीन गरीब किसान मजदूर पर अत्याचार होता है, तो सम्वेदन शील मानव के हृदय में टीस उठती है, जब विधवा के ऊपर लात घूसों का प्रहार होता है तो उसकी चोट उसके मन में उत्पन्न होती है, जब लूटमार डाकेजनी काला बाजार रिश्वत से मानवता कलंकित होती है, वह मन ही मन रोया करता है। वह शोषित पीड़ित मानवता के प्रति सदा सद्भावना रखता है। जब तक दूसरों पर होते हुए अत्याचार हमें तिलमिला नहीं देते, जब तक हम अपने संकुचित स्वार्थों के दायरे में बन्द हैं, तब तक हम मानवता से दूर हैं। अतः हमें यह स्मरण रखना चाहिए-

दर्दे दिल, पासे वफा जजबए ईमाँ होना, आदमयित है, यही और यही इन्सा होना।

यम नियमः-

हमारे शास्त्रों में मानवता की वृद्धि के लिए हमारे यहाँ यम नियमों का विधान रखा गया है (1) अहिंसा (2) सत्य (3) अस्तेय (4) ब्रह्मचर्य और (5) अपरिग्रह दूसरों से व्यवहार करने के लिए रखे गये हैं। आत्म सुधार के लिए इसी प्रकार (1) शौच (2) सन्तोष (3) तप (4) स्वाध्याय (5) और ईश्वर भक्ति आदि साधन माने गऐ हैं। कहने को ये छोटे-छोटे शब्द हैं, किन्तु इनका पालन कठिन है। ‘कठिन’ कहने भर से दूर हट जाना कायरता है। अतः हमें यथाशक्ति इनकी साधना करनी चाहिए। आत्म चिंतन द्वारा हममें से प्रत्येक अपनी त्रुटियाँ मालूम करे और दृढ़ता से उन्हें दूर करने का प्रयत्न करे।

आवश्यकताओं पर नियंत्रण-

प्रत्येक व्यक्ति को निजी आवश्यकताओं को कम करना चाहिए तथा दूसरे की सेवा सहायता का ध्यान रखना चाहिए। स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ, अपने के स्थान पर दूसरे की आवश्यकताओं का ध्यान करना चाहिए।

हम लोग तुच्छ स्वार्थों को अपना ध्येय मानकर अनर्थ करते रहते हैं। “अमुक वस्तु मुझे चाहिए मुझे सबसे अधिक हिस्सा प्राप्त हो, मैं लूँगा दूसरे को कुछ न दूँगा, मेरी आवश्यकताएं पहले पूर्ण होनी चाहिएं- यह दूषित विचार धारा हम में से प्रत्येक मानव को त्याग देनी चाहिए। हमें स्वार्थ के स्थान पर दूसरों के प्रति आत्मीयता की भावनाएं विकसित करनी चाहिए।

दूर की न सोचने वाला लालची नष्ट हो जाता है और जो यह कहता है कि “मुझे नहीं चाहिए आप लीजिए”- उसे प्रकृति के कोष तथा भगवान के भण्डार से बहुत मिलता है। जिसे न्याय और अन्याय का ज्ञान है, जो लेने योग्य और न लेने योग्य का भेद समझता है, ऐसे श्रेष्ठ पुरुष का घर ढूँढ़ती-2 लक्ष्मी स्वयं उसके पास पहुँच जाती है। उदार दृष्टि कोण वाला प्रेमी व्यक्ति दूसरों को भी अपना समझता है, उनसे प्रेम पूर्ण उदार व्यवहार करता है-ये भावनाएँ होने के कारण वह थोड़े ही में गुजारा कर लेता है और कहता है- “बस, मेरे लिए इतना ही पर्याप्त है, मुझे और कुछ नहीं चाहिए”

“मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए”- यह नीति ऐसी है, जिसके आधार पर मानवता की रक्षा और विकास हो सकता है। इस नीति का पुराना शानदार इतिहास है। एक दृष्टिपात कीजिए-

“मैं लूँगा, आपको न दूँगा”- इस नीति का पालन रामायण युग में कैकेयी के द्वारा हुआ था। इस स्वार्थ मयि नीति के कारण सम्पूर्ण अयोध्या नरक धाम बन गई थी। दशरथ ने प्राण त्याग दिये थे, राम को चौदह वर्ष का वनवास मिला था। किन्तु जब भरत ने ‘मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए” की नीति अपनाई, तो दूसरे ही दृश्य उपस्थित हो गए थे। राम ने राज्याधिकारी को त्यागते हुए भरत से कहा- “बन्धु! तुम्हें राज्य का सुख प्राप्त हो, मुझे यह नहीं चाहिए।” सीता देवी न कहा-”नाथ! यह राज्य भवन मुझे नहीं चाहिए, मैं तो आपके साथ रहूँगी।” सुमित्रा ने लक्ष्मण से निर्देश किया- “यदि सीताजी रामचन्द्रजी के साथ वन में जा रही हैं, तो हे पुत्र! उनकी सेवा के लिए तुम भी बन में जाओ।” भरत ने इस नीति को और भी सुन्दर रीति से चरितार्थ किया। उन्होंने राज-पाट को लात मारी और भाई के चरणों में लिपट कर बालकों की तरह रोने लगे। वे बोले-”भाई! मुझे राज्य नहीं चाहिए। राज-पाट मेरे लिये नहीं है, इसे तो आप ही ले लीजिए।” मानव रत्न श्री राम ने कहा- ‘भरत, मेरे लिए तो वनवास ही श्रेष्ठ है। राज्य का सुख तुम भोगो।”

ऊपर के प्रसंग में हमें दूसरों के लिए आत्म बलिदान करने के अनेक, भव्य उदाहरण मिल जाते हैं। यह त्याग का दूसरों की सुख सुविधा उन्नति का अधिक ध्यान रखने का सुनहरा नियम आज जगत में व्याप्त बेचैनी, पीड़ा, छीना झपटी और युद्ध को दूर कर सकता है। ‘मैं लूँगा’ के स्थान पर ‘आप लीजिए’ वह मंत्र है, जो विश्व में शाँति स्थापित कर सकता है।

पारस्परिक सद्भावः-

मित्रो! प्रभु ने मनुष्य को इसलिए इस आनन्दमयी सृष्टि में नहीं भेजा कि हम आपस में लड़े, झगड़े छीना झपटी करें, शोषण, कुकर्म, दण्ड, अत्याचार, दुःख, बेचैनी और पीड़ा में फँसे, रक्त की होली खेलें। हम बालकों का यह दुष्कर्म देख कर परम पिता परमेश्वर को बहुत मनः क्लेश होता है। अतः यह उलटी चाल छोड़ कर दूसरों की सुख सुविधा का खूब ध्यान रखना चाहिए। परमात्मा को प्रसन्न करने की सबसे सीधी चाल यह है कि हर एक व्यक्ति ‘मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिए’ की निस्वार्थ रीति को ग्रहण करे। इस नीति की शिक्षा स्वयं अपने जीवन में उतारे और पड़ौसियों को दे। जहाँ तक सम्भव हो प्रेम, न्याय, भ्रातृ भाव का यह दिव्य संदेश पहुँचाना चाहिए। सबको सुखी बनाकर सुखी भविष्य की आशा और आश्वासन दिलाना चाहिए।

दूसरों के प्रति शुभ भावनाएं-

हमें चाहिए कि दूसरों के विषय में खराब या दुर्बल विचार करना त्याग कर सद्भाव की आशा करे। हमें उनके प्रति वही व्यवहार करना चाहिए जो हम अपने प्रति कराना चाहते हैं। हमारी आध्यात्मिक, मानसिक, शारीरिक उन्नति में दूसरों के प्रति किए गये अत्याचार, दुष्टता, धोखेबाजी, लूट, कालाबाजार, चोरी इत्यादि बाधक हैं। हमारा दुष्कर्म कभी छिप नहीं सकता। यदि हम दुनिया की आँखों में धूल झोंककर झूठ बोलकर अथवा धोखा देकर, रिश्वत, पक्षपात या भ्रष्टाचार में ऊँचे उठ भी जाते हैं, तो कल हमारी कलई अवश्य खुल जाएगी। वास्तविकता प्रकट होने पर जो आत्मग्लानि की जो पीड़ा सहन करनी पड़ती है, उसकी कसक सैंकड़ों बिच्छुओं की काटी हुई पीड़ा से भी अधिक है। अतः अपाहिज, दीन, शोषित, दुःखी, कोढ़ी, पीड़ित, पददलित, पशु-पक्षी जगत, वनस्पति- किसी के प्रति भी निर्दयता नहीं करनी चाहिए।

सहानुभूति और दया-

जुल्म और निर्दयता पशुत्व है। बेरहमी का बर्ताव करना मनुष्य को किसी प्रकार भी शोभा नहीं देता। जुल्म करना तो दानवों का दुष्कर्म है, जिन्हें उचित अनुचित भलाई बुराई का विवेक नहीं होता। आप मानव हैं। बुद्धि, विवेक, विद्या सदाचार के ज्योतिर्मय पिंड हैं। क्या आप दूसरों पर जुल्म कर पशुत्व को कोटी में जाना पसन्द करेंगे? कदापि नहीं, यह दुष्कर्म, यह अन्याय, अनाचार, बेईमानी, धोखेबाजी, चोरी आप कदापि नहीं करेंगे। यह आपके योग्य कर्म नहीं है। आप मनुष्य होकर शोषण नहीं कर सकते। भारत की निरक्षर, पिछड़ी, पीड़ित, और अन्ध विश्वास जनता की सेवा में ही आपकी शक्तियों का उपयोग होना चाहिए।

सद्व्यवहार करना ही शोभनीय है-

मनुष्य अपने सद्व्यवहारों से देवता बन जाय, या मानव से दानव। हमारे पूर्व पुरुषों ऋषियों मुनियों ने सद्व्यवहार उदारता, प्रेम, मित्रता, परस्पर उचित सहकार और सहानुभूति को मानवता के महत्व पूर्ण अंग माने हैं। मनुष्य यदि सच्चे मानव का जीवन जीना चाहे, तो उसे मानव धर्म का आश्रय लेना चाहिए।

सत्संगति मानव धर्म का एक आवश्यक गुण है। जो सत्य है उसकी ओर आकृष्ट होना, उत्तमोत्तम विचारों, मन्तव्यों, धारणाओं वाले ज्ञानी, महात्माओं विद्वानों, सद्ग्रन्थों का संग करने से हमारे बुरे विचारों एवं वासनाओं का नाश होता है और शुभ संस्कार पड़ते हैं। चाहे कुछ काल तक सत्संग का प्रभाव प्रकट न हो, किंतु थोड़े सप्ताह पश्चात् मानवोचित शुभ संस्कार प्रकट होते रहते हैं। सत्संग से अज्ञान और अविवेक का क्षय होता है।

गुणग्राहिता चाहिएः-

आज स्वार्थ के स्थान पर दूसरों के गुणों के प्रति प्रीति, गुण ग्रहीता, को विकसित करने की अतीव आवश्यकता है। यदि हम दूसरे के उन्नत गुणों की प्रतिष्ठा करेंगे, उनके सद्गुणों की प्रशंसा करेंगे, तो मित्र भाव, सौहार्द, बन्धुत्व की शुभ भावनाओं की वृद्धि होगी, संसार प्रेम बन्धनों से परिपूर्ण होकर शत्रुभाव से मुक्त हो जायगा।

श्रद्धा मानवीय हृदय का मेरुदण्ड है। हमें श्रद्धा भाव की बुद्धि में बड़े हैं, उनके प्रति हमें भाव रखना चाहिए। विद्यार्थी समुदाय का गुरुजनों की प्रतिष्ठा, मान, एवं गुरुत्व का सदैव ध्यान रखना चाहिए। शास्त्रों की उक्ति है, ‘गुरु देवों भवः’ अर्थात् गुरु देवता के समान श्रद्धा का पात्र है। वृद्ध जनों के प्रति भी श्रद्धालु होने की परम आवश्यकता है।

जिन्हें पाकर मानवता धन्य हुई।

जहाँ मानवता को कलंकित कर शरीर धारण किये हुए पशुओं तथा दानवों की कमी नहीं है, वहाँ इसी संसार में आज भी ऐसे अनेक मानव रत्नों के दर्शन हो जाते हैं, जो मानव-मात्र के कल्याण, बन्धुत्व, प्रेम, सौहार्द, नैतिकता, सहानुभूति के कारण मनुष्यता को ही प्रतिष्ठित नहीं करते, प्रत्युत अपनी उदारता, परहित कातरता, तथा सद्भावना के कारण देवत्व की कोटि तक पहुँच जाते हैं। इनके कार्यों में प्रकट हुई उदारता, सहिष्णुता, त्याग, तथा जनहित की शुभ्र भावनाएँ मानवता की शोभा हैं। ये नर रत्न ‘स्व’ की संकुचित परिधि से ऊँचे उठे तथा मानव मात्र के कल्याण की पवित्र भावना के वशीभूत होकर परहितार्थ अग्रसर हुए।

श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार ने कलकत्ते के भीषण नर संहार के समय दानवता का नंगा नृत्य होते समय मानवता की रक्षा करने वाले कुछ नर रत्नों के इस प्रकार उदाहरण दिये हैं -

एक धनी व्यक्ति हिन्दु मुहल्ले के एक भाग में कुछ गरीब मुसलमानों की छोटी सी बस्ती थी। उसी में एक गरीब ब्राह्मण भी रहता था। वह साधारण जीवन में शायद मुसलमानों का स्पर्श भी न करता हो, परन्तु उस भीषण नर हत्या काण्ड में उसने अपने प्राणों की बाजी लगाकर मुसलमान पड़ौसियों की रक्षा की। प्रतिशोध के लिए एक हिन्दू भीड़ इस मुहल्ले में आ गई। बूढ़ा ब्राह्मण गली के सड़क किनारे पर खड़ा था। भीड़ उसे देखकर रुक गई। ब्राह्मण ने उसे शाँत करने की भरपूर चेष्टा की किन्तु जब वह न रुकी तो उसने आह भरते हुए कहा “अच्छा, यदि आप नहीं मानते तो आगे बढ़िए, परन्तु मैं यहीं खड़ा होकर आपको रोकूँगा। पहले आपको इस ब्राह्मण के रक्त से होली खेलनी चाहिए।” भीड़ स्तम्भित होकर रह गई।

एक मुसलमान व्यापारी सज्जन ने आस पास के बहुत से हिन्दू भाइयों को शरण दी और नेत्रों में आँसू भर कर कहा- ‘दो सौ वर्ष से हम साथ साथ रहते आये हैं और हमारा परस्पर बड़ा गहरा सरोकार है परन्तु आज बाहर वाले मुझे उन्हीं के खून में नहलाना चाहते हैं- मैं यह सोचकर शर्म से गढ़ा जा रहा हूँ कि इस्लाम के नाम पर ऐसी खौफनाक बातें हो रही हैं।’

‘हरिजन सेवक’ में छपा एक उदाहरण इस प्रकार है, ‘एक शहरी किसी ग्राम में गया और एक मोर पर निशाना साधने लगा। एक देहाती ने उसे मना किया, किन्तु वह नहीं माना, तो देहाती मोर और शिकारी के बीच में खड़ा हो गया। शिकारी जोश में था उसने सामने खड़े ग्रामीण की परवाह न कर गोली चला दी। देहाती के गोली लगी तथा वह घायल होकर गिर पड़ा। गाँव के व्यक्ति एकत्रित हो गये और यह स्पष्ट था कि वे शिकारी को लातों, घूसों और डण्डों से अधमरा कर देंगे, पर तभी वह घायल देहाती सरक कर शिकारी और उन लोगों के बीच में आ गया। उसने कहा- ‘मैंने जब मोर को नहीं मारने दिया, तो इसे क्यों कर मारने दूँगा। यह तो मनुष्य है।’ भारत के जीवन की समस्त दया, करुणा, अहिंसा और ममता के शाश्वत संस्कार उस मानवता की वाणी में मुखरित हो गये।

श्री प्रफुल्ल रंजन ने अपने भाई चित्तरंजन से कहा- ‘क्या तू पागल हो गया है? तुझे ध्यान है दान की झोली में क्या डाल रहा है?’

“हाँ ठीक मालूम है 1600) का है।”

“भोले भाई, बैंक में जमा रकम भी इतनी ही है और तू एक कलम के झटके में उसे साफ कर रहा है।?”

‘परन्तु दिया तो आखिर गाँधी जी को ही न? दक्षिणी अफ्रीका के लिए उनकी झोली में मैं और क्या दे सकता हूँ?”

“चित्त रंजन, धन्य है तेरी दान शीलता को।”

“नहीं, उन्होंने उत्तर दिया, ‘यह दान शीलता नहीं है। जब मैं कुछ देता हूँ तब मुझे यही प्रतीत होता है कि मैं स्वयं अपने को ही दे रहा हूँ, मानो मैं स्वयं ही अपने आगे माँगने को खड़ा हूँ, अथवा स्वयं परमेश्वर ही मेरे द्वारा अपनी भिक्षा की झोली भर लेता है। मैं ईश्वर की वस्तु ईश्वरीय कार्य के ही अर्पण कर रहा हूँ।”

योरोपीय महायुद्ध में एक जहाज डूब रहा था। कौन बचे कौन डूबे, इसका निश्चय करना था। लाटरी डालकर भाग्य की परीक्षा की गई। अचानक एक नाव पर बैठे व्यक्ति ने जहाज पर खड़े एक व्यक्ति को अपने पास बुलाया और कहा, “मेरे स्थान पर तुम बैठ जाओ। तुम्हारे वृद्ध माता पिता हैं, मेरा कोई नहीं। इतना कहते ही वह कूद कर जहाज पर आ गया। जहाज डूब गया, नाव वाले बच गये उस मानव ने प्रमाणित कर दिया कि कई ऐसे पवित्र कार्य भी हैं जिनके लिए प्राणों की आहुति दे देना भी सस्ता सौदा समझा जा सकता है।

फिलिस्तीन में दो भाई कृषि का कार्य कर निर्वाह करते थे। छोटा भाई क्वारा था तथा पृथक अकेला रहता था, बड़ा भाई बाल बच्चेदार था। एक दिन बड़े ने सोचा ‘मेरा छोटा भाई अकेला है, उसके कोई सन्तान भी नहीं जो कटाई में उसका हाथ बंटाये। आज रात मैं कटी हुई फसल का एक बड़ा सा गट्ठा उठा कर चुपके से उसके ढेर में डाल आऊँगा, बेचारे का बोझ कुछ हलका हो जायगा।’

उधर छोटे भाई ने सोचा, ‘बड़े भाई के कन्धे पर गृहस्थी का बोझ है, अपनी सन्तान सहित भी वह इस भार को नहीं सम्हाल रहा है। अतः आज रात दबे पाँव मैं अपनी फसल से एक गट्ठा उठा कर उसके यहाँ डाल आऊँगा।’

रात्रि में दोनों अपना-अपना काम करने निकले और गट्ठे डाल आये सवेरा हुआ तो उन्होंने चकित होकर देखा दोनों के खलिहान पूर्ववत् पूरे के पूरे थे। दूसरी रात उन्हीं उदार भावों से प्रेरित होकर पुनः एक दूसरे के यहाँ गट्ठर डाले। फिर वही आश्चर्य। तीसरी रात अंधकार में वे एक दूसरे के खेतों में चले जा रहे थे कि एक दूसरे से यकायक टकरा गए। केवल स्पर्श मात्र से उन्होंने पहिचान लिया कि वे एक ही यहूदी माँ के पुत्र हैं। गट्ठे फेंक कर वहीं उसी क्षण वे एक दूसरे के गले से लिपट गये और प्रेमाश्रुओं की झड़ी लगा दी। यह है भाई भाई का स्वर्गीय स्नेह! ये हैं इंसानियत के मुकुट मणि।

इस प्रकार के सच्चे हीरों के अनेक उदाहरण पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते है, जिन्हें देख कर मानवता की उज्ज्वलता के भविष्य की आशा बँधती है। मनुष्य में ईश्वरत्व के जो दैवी तत्व हैं, वे किसी न किसी रूप में अक्सर प्रकट हो जाते हैं। राक्षसी वृत्तियों का काला अन्धकार दूर होगा और मानवता की ही विजय होकर रहेगी।

मानवता का ही दूसरा नाम भारतीय धर्म, भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति है। हमारे पूर्वज मनुष्यता के उपासक रहे हैं, उन्होंने साध्य की प्राप्ति के लिए साधन की पवित्रता की कमी भी उपेक्षा नहीं की है। वरन् इस बात पर जोर दिया है कि हमारी आवश्यकताएं तथा इच्छाएँ भले ही अपूर्ण रह जावें परन्तु उनकी प्राप्ति का मार्ग न्यायोचित एवं धर्मानुकूल ही होना चाहिए। अधैर्य एवं अन्याय से प्राप्त होने वाले सुख एवं वैभव की यहाँ सदा निन्दा ही की जाती रही है।

हमारी संस्कृति का एक ही संदेश है कि सच्चे अर्थों में मनुष्य बनें और जीवन में सभी क्षेत्रों को मानवता से ओत प्रोत करें और संसार में से पशुता के अंधकार को हटाकर उस दिव्य आचार विचार की ज्योति प्रकाशित करें जिसके प्रकाश में मानव प्राणी अपने आपको सच्चा इंसान अनुभव कर सके, स्वयं शाँति से रह सके और दूसरों को शाँति पूर्वक रहने दे सके। आइये, इस महान अनुष्ठान में हम सब लोग संलग्न हों। स्वयं मनुष्य बनें, अपने आचरण और विचारों को मानवता से परिपूर्ण करते हुए ऐसा आदर्श उपस्थित करें कि दूसरे भी हमारा अनुकरण करते हुए मानवता का गौरव बढ़ावें।

स्वर्गीय-सेठ श्री रण छोड़ दास मोघ जी, बम्बई

स्वर्गीय सेठ जो जितने सफल व्यापारी थे उतने ही उज्ज्वल चरित्र, धर्मनिष्ठ एवं भगवत् भक्त भी थे। सुदूर प्रदेशों में उनका व्यापार अब भी सफलता पूर्वक चल रहा है और उनका प्रायः सभी परिवार गायत्री उपासना में संलग्न है। स्वर्गीय सेठ जी के सुपुत्र श्री हरिदास जी तथा श्री करन दास जी ने अपने पिता जी के स्मरणार्थ गायत्री मन्दिर में ठहरने के कमरे बनवाने के लिए 2000) रुपये दान दिए हैं। साधन सम्पन्न लोगों के लिए यह दान अनुकरणीय है।


पूर्णाहुति यज्ञ की तैयारियाँ

(आगामी जेष्ठ सुदी 10ता. 22 जून सन् 53) को होने वाले पूर्णाहुति यज्ञ की तैयारियाँ आरम्भ हो गई हैं। यों इसका बाह्य रूप बहुत छोटा है। सम्मिलित होने वाले व्यक्तियों की संख्या बहुत बड़ी नहीं होगी, इसलिए उनके ठहरने, भोजन आदि के सम्बन्ध में भी कोई बहुत भारी आयोजन नहीं करना है। परन्तु ऐसे सूक्ष्म कार्यक्रम जिसके द्वारा गायत्री तीर्थ की शक्ति वस्तुतः असाधारण बनेगी बहुत ही महत्वपूर्ण है और उनकी तैयारी के लिए अगले पाँच महीनों में बहुत भारी कार्य करना पड़ेगा।

भारत भूमि में यों तो अगणित तीर्थ है, पवित्र नदियों, पुरियों, लिंगों, तीर्थों, पीठों से यह देश भरा हुआ है। पर ऐसे तीर्थ जिनकी सूक्ष्म शक्ति अब भी जागृत है अधिक नहीं हैं। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि जागृत एवं दिव्य शक्ति सम्पन्न 2400 तीर्थों का प्रतिनिधित्व पूर्णाहुति यज्ञ में हो सके। यों प्रायः दस हजार पुण्य भूमियों की रज और प्रायः एक हजार नदी सरोवरों का जल एकत्रित किया जायगा। गायत्री माता की प्रतिमा स्थापित करने की वेदी 2400 जागृत तीर्थों की रज से तथा 240 नदी सरोवरों के जल से निर्मित की जायगी। इस वेदी की पवित्रता इस योग्य होगी कि उस पर अवस्थित होने वाली माता की प्रतिमा सच्चे अर्थों में ‘प्राण प्रतिष्ठा’ से युक्त कही जा सके। इतने तीर्थों एवं जलाशयों की देश व्यापी शृंखला को एक सूत्र में पिरोने का कार्य महान तो अवश्य है पर वह कष्ट साध्य भी कम नहीं है। हिमि आच्छादित, दुर्गम, सुदूरवर्ती एवं अविज्ञात कितने ही तीर्थ ऐसे हैं जहाँ पहुँचने के लिए असाधारण प्रयत्न करने होंगे। इसके लिए अभी से कार्य आरम्भ कर दिया गया है।

ऐसे तीर्थ की प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए जितनी आत्मिक पवित्रता की आवश्यकता है। उसके लिए कम से कम 24 दिन का पूर्ण निराहार उपवास आवश्यक है। इसीलिए ऋषिकेश से विशेष रूप से मंगाये हुए गंगा जल पर निर्वाह करके 24 दिन तक निराहार उपवास करने का निश्चय किया गया है। हमारे कई मित्रों ने यह आशंका प्रकट की है कि इतने कठोर उपवास का परिणाम चिन्ता जनक हो सकता है। इन हितैषी सज्जनों की आत्मीयता एवं शुभाकाँक्षा के लिए हम कृतज्ञ हैं, उन्हें यह जानकर संतोष कर लेना चाहिए कि कुछ रक्त माँस एवं वजन घट जाने के अतिरिक्त और कोई दुर्घटना घटित होने वाली नहीं है। माता की कृपा एवं गुरुजनों के आशीर्वाद से यह तपश्चर्या भी सानन्द पूर्ण हो जायगी।

मंत्र लेखन यज्ञ में जिस उत्साह से साधकों ने भाग लिया है उसे देखकर बड़ा सन्तोष एवं हर्ष होता है। आरम्भ में 24 लक्ष मंत्र लिखाकर गायत्री मन्दिर में प्रतिष्ठित करने का संकल्प था। ताकि इतने सत् साधकों की मंत्र लेखन तपश्चर्या का इस तीर्थ में एकीकरण होने से यह तीर्थ अधिक शक्ति सम्पन्न हो साथ ही इस बहाने साधकों को एक विशिष्ट प्रकार की लेखन साधना करने का अवसर मिले। लेखन में जप की अपेक्षा मेहनत एवं एकाग्रता अधिक होती है इसलिए उसका फल भी अधिक माना गया है। हर्ष की बात है कि 24 लाख हस्तलिखित मंत्र पिछली गायत्री जयन्ती तक ही हमारे पास जमा हो गये थे। इस समय उनकी संख्या करीब 85 लाख है। साधकों के उत्साह को देखते हुए यह निश्चय जान पड़ता है कि 125 लाख (सवा करोड़) मंत्र आगामी गायत्री जयन्ती के पूर्णाहुति यज्ञ तक आसानी से पूरे हो जावेंगे। इतने साधकों का, इतने समय तक, इतना महत्व पूर्ण तप जिस स्थान पर एकत्रित होगा उस स्थान की पवित्रता में निश्चित रूप से अभिवृद्धि होगी।

सहस्राँशु गायत्री ब्रह्म यज्ञ अपने ढंग का अनोखा यज्ञ है। एक स्थान पर कुछ व्यक्तियों द्वारा कुछ समय के लिए तो अनेक यज्ञ होते है पर इस यज्ञ की विशेषता यह है कि देश के कोने कोने में सहस्र ऋत्विजों द्वारा एक सम्मिलित संकल्प के अंतर्गत एवं सम्मिलित यज्ञ पूरा किया गया है। 125 करोड़ों गायत्री जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास, पूरे करने का काम बहुत भारी था। गतवर्ष देवोत्थानी एकादशी से यह यज्ञ प्रारम्भ किया गया था तब अनुमान था कि इतने विशाल आयोजन को पूरा करने में संभवतः तीन वर्ष लगेंगे पर कितने सन्तोष की बात है कि अब यह डेढ़ वर्ष में ही पूरा होने जा रहा है। इस संकल्प का तीन चौथाई शेष है उसका भी पूर्णाहुति के अवसर तक पूरा हो जाना निश्चित है।

अखण्ड साधनाओं का महत्व साधारण साधना की अपेक्षा अनेक अधिक गुना अधिक होता है। दो दो घण्टे रोज 12 दिन तक कीर्तन करने की अपेक्षा 24 घण्टे का एक अखण्ड कीर्तन अधिक फल प्रद है। इसी प्रकार अखण्ड दीपक, अखण्ड जप, अखण्ड पाठ आदि का महत्व बहुत अधिक है। प्राचीन काल में अग्नि को घर में अखण्ड प्रज्वलित रखने की प्रथा थी पारसियों ने अब भी बड़ी श्रद्धा सावधानी एवं पवित्रता के साथ अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है ऐसी अग्नि में एक विशेष प्रभाव उत्पन्न हो जाता है जो मनुष्य के लिए अनेक दृष्टियों से लाभ दायक सिद्ध होता है। उसकी समीपता से शरीर तथा मन को तेज, बल, उत्साह एवं पोषण प्राप्त होता है, अनेक प्रकार के विकारों को जलाने की भी ऐसी अखण्ड अग्नि में विशेष क्षमता होती है।

प्रसन्नता की बात है कि गायत्री मन्दिर में स्थापना के लिए एक ऐसी धूनी की अग्नि प्राप्त हो रही है जो विगत 700 वर्षों से अखण्ड रूप से जलती आ रही है। इस पर अनेकों महात्मा एवं सिद्ध पुरुष तप करके अपना लक्ष पूरा कर चुके है। अब यह अग्नि अपनी दिव्य शक्ति से इस गायत्री तीर्थ को प्रकाशवान् करेगी।

इमारत की दृष्टि से गायत्री मन्दिर बहुत मामूली होगा, लाखों करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले विशाल मन्दिरों की तुलना में कुछ ही हजार रुपयों से बनने वाला यह स्थान नगण्य सा दृष्टि गोचर होगा परन्तु इसकी सूक्ष्म शक्ति असाधारण होगी। ईंट पत्थरों का बड़ा सा पहाड़ खड़ा कर देने से कोई लाभ भी नहीं। ऐसे स्थानों के निर्माण का जो उद्देश्य होता है उसे पूर्ण करने के निमित्त ही यह तपोभूमि बनाई जा रही है और विश्वास है कि इसके निर्माण का लक्ष असफल न रहेगा।

हमारे 24-24 लक्ष के 24 गायत्री पुरश्चरणों की पूर्णाहुति का आयोजन भी इसी अवसर हो रहा है। इस अवसर पर परम आदरणीय गुरुजनों के आशीर्वाद एवं स्वजनों की सद्भावना प्राप्त होना भी हमारे लिए कम सौभाग्य की बात नहीं है। अपने पुरश्चरणों की साधारण पूर्णाहुति करने की अपेक्षा इतने आयोजनों के साथ उसकी समाप्ति होना और भी अधिक प्रसन्नता की बात है। इतने अच्छे रूप में उसकी समाप्ति होने में माता की कृपा ही प्रधान कारण है।

स्थूल दृष्टि से यह सारा आयोजन एक सामान्य सी बात है। परन्तु इसकी पृष्ठ भूमि में एक असाधारण योजना काम कर रही है। भविष्य ही बतावेगा कि इस छोटी दीखने वाली योजना में कितने महान परिणाम सन्निहित हैं।


मानवता के पथ पर

(श्री नीलकंठ तिवारी, एम. ए.)


मानवता के पथ पर (Kavita)

किसको प्रेम नहीं है भाता, लेकिन प्रेम नहीं हो पाता।

कवि के सपनों की पटरानी! समय कहाँ जो प्यार करूं मैं!

जब अंगार बरसते, कैसे फूलों का अवतार धरुँ मैं!

प्यार हृदय में पलता है, पर कोमल हृदय पेट से पलता।

और पेट की भूख बुझाने, मानव अपना हृदय कुचलता।

आज सभ्य शोषण का खूनी जबड़ा हमें चबाया जाता।

मानव हूँ, पापाण नहीं मैं, मन मेरा भी लहराता है।

घन अंधियारे से घबराकर, तेरे पास चला जाता है।

तेरी याद मधुर तब आकर, रस का दीपक एक जगाती।

पर दीपक की बाती से भी, आँधी हाय! निकल है आती।

जिसका आँगन आँधी में हो, उसका दीप कहाँ जल पाता।

हाहाकारों की दुनिया में, आज मुझे भी जाना होगा,

मौन रहूँ तो आँसू बनकर, मुझको भी बह जाना होगा।

मेरे कवि को, दुखी धरा के दुःखों में घुल जाना होगा।

घुलकर, अन्यायों से लोहा खुलकर आज बजाना होगा।

स्वयं वहाँ ही जाना होगा जहाँ बधिक तलवार उठाता।

यही मुझे विश्वास बड़ा है, जब अधर्म, भू भार हुआ है,

स्वयं धर्म की अमर शक्ति से पापों का संहार हुआ है।

यही अटल विश्वास लिये जग-जीवन में खो जाऊँगा मैं।

अपने घर को फूँक, जगत के घर-घर का हो जाऊँगा मैं।

जीवन के इस महा धनुष पर, लो, मैं अपना तीर चढ़ाता।

अभी विदा! सपनों की रानी! तेरे कवि को जगत बुलाता।

तुझसे कहीं अधिक है प्यारा, मुझको मेरे जग का नाता।

मेरे दुख की कथा! मौन हो, जग की कथा मुझे सुनने दे।

मेरे मन की व्यथा! मौन हो, जग की व्यथा मुझे चुनने दे।

लपटों के आसन पर बैठा, तेरा कवि अब शंख बजाता।

मेरे तन-मन-प्राण-कर्म तुम मानवता के पथ पर आओ।

पशु-बल, धन-बल एक ओर है, तुम निर्बल के बल बन जाओ।

मेरी वीणे! आज गरज तू, मेरी राख को पुनः जिला दे।

काँटे कुचलू , इसके पहले, फूलों में भी आग लगा दे।

मेरी छोटी नाव वहीं चल, जहाँ महा सागर लहराता।

-धर्म युग से

*समाप्त*