(पं. गौरी शंकर द्विवेदी, चन्दवाड)
सव्या हृतिकाँ स प्रणवाँ गायत्री शिरसा सह।
ये जयन्ति सदा तेषाँ न भयं विद्यते क्वचित्॥
जो मनुष्य सर्वदा व्याहृति, प्रणव, शिर इनके साथ गायत्री का जप करता है। वह कभी भय नहीं पाता।
शत जप्ता तु सा देवी, दिन पाप प्रणाशिनी।
सहस्र जप्ता तु तथ, पात केभ्यः समुद्धरेत॥
सौ बार गायत्री का जप करने से दिन के सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं, और हजार बार जपने से सम्पूर्ण पापों से छूट जाता है।
हृता देवी विशेषेण सर्व काम प्रदायिनी।
सर्व पाप क्षय करी वरदा भक्त वत्सला॥
जो हवन गायत्री मन्त्र से किया जाता है, वही सम्पूर्ण मनोरथों को पूर्ण करने वाला है, भक्ति प्रिय, वरदानी गायत्री सब पापों को नाश करती है।
गायत्री वेद जननी, गायत्री पाप नाशिनी।
गायत्र्याः परमं नास्ति दिवि चेह च यावनम्॥
गायत्री वेदों की माता है, पापों का नाश करती है, उस लोक एवं परलोक में गायत्री से परे पवित्र करने वाला कोई नहीं।
हस्त त्राण प्रदा देवी, पतताँ नरकार्णवे।
तस्मात्ता नभ्य सेन्नित्यं, ब्राह्मणो नियतः शुचिः॥
जो मनुष्य नर्क रूपी समुद्र में पड़े हैं, उनका हाथ पकड़ कर रक्षा करने वाली गायत्री ही है। इसलिए नियम पूर्वक पवित्रता से ब्राह्मण नित्य गायत्री का अभ्यास करें।
गायत्री जाप निरत, कत्थेपु भोज येत।
तस्मिन्न तिष्ठते पाप दुखि पुष्केर!
जापे नेव तु सं सिद्धयेब्रं नात्र संशयः॥
गायत्री में तत्पर ब्राह्मण को हव्य काव्य से जिमावेडडडड। क्योंकि उस ब्राह्मण में पाप इस भाँति नहीं टिकते। जैसे कमल के पत्ते पर जल।
ब्राह्मण गायत्री जप करने से ही सिद्धि पाता है। इसमें कोई संदेह नहीं।
उपाँशु स्याच्छत गुणः, सहस्रो मानसः स्मृतः।
नोच्चै जाप्यं बुधः कुर्यात् सवित्र्यास्तु विशेषतः॥
उपाँशु जप सौ गुना फल देने वाला है, मानस जप हजार गुना। विशेषकर गायत्री जप ऊँचे स्वर से न करें।
सावित्रि जाप्य निरतः स्वर्ग माप्नोपित मानवः।
गायत्री जाप्य निरतो, मोक्षोपापं च च विदति॥
जो मनुष्य गायत्री के जप से तत्पर है। वह स्वर्ग पाता है और गायत्री जप करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
तस्मात् सर्व प्रयत्नेन, स्नातःप्रपत मानसः।
गायत्रीं तु जपेद्भक्ता सब पाप प्रणाशिनीम्॥
इस कारण प्रयत्न पूर्वक स्नान कर पवित्रतापूर्वक स्वस्थ चित्त हो, पाप नाशक एवं वर दात्री, वेद-माता गायत्री का निरंतर जप करें।
दस सहस्र जप्तातु, सर्व कलाष नाशिनी।
सुवर्ण स्तेय कृद्विप्नो, ब्रह्महा गुरु तल्पगः॥
जो दस हजार बार जप करता है, उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं, सुवर्ण की चोरी करने वाला ब्राह्मण, ब्रह्म हत्या करने वाला, गुरु की शैया पर शयन करने वाला।
सुरापश्च बिशुद्धयेत लक्ष जप्पान्न संशय।
मदिरा पीने वाला। यह सब पाप करने वाले एक लाख गायत्री जप करने से निःसंदेह शुद्ध हो जाते हैं।
वर्ष-13 संपादक - श्रीराम शर्मा, आचार्य अंक-7
(पं. शिव शंकर मिश्र, एम. ए.)
धर्म का अभ्युत्थान करो।
मानवता को पशुता के बन्धन से मुक्त करो, फिर से जगती को जग जीवन के उपयुक्त करो,
संस्कृति के खण्डहर का फिर से नव निर्माण करो, धर्म का अभ्युत्थान करो!!
सेवा, दया, त्याग, ममता, संयम, समता, संतोष, से मिल बनता धर्म मानव का सञ्चित कोष,
इसी कोष की वृद्धि हेतु तुम भी कुछ दान करो, धर्म का अभ्युत्थान करो!!
अब पुस्तक से खींच धर्म को जीवन में लाओ, प्रभु का रूप समझ मानव को पूजो अपनाओ,,
द्रवीभूत अपनी आस्था से तुम पाषाण करो, धर्म का अभ्युत्थान करो!!
(1) गायत्री के 24 अक्षर 24 अत्यन्त ही महत्वपूर्ण शिक्षाओं के प्रतीक हैं। वेद, शास्त्र, पुण्य, स्मृति, उपनिषद् आदि में जो शिक्षाएं मनुष्य जाति को दी गई हैं उन सबका सार इन 24 शिक्षाओं में मौजूद है। इन्हें अपनाकर मनुष्य प्राणी व्यक्तिगत तथा सामाजिक सुख शान्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है।
(2) गायत्री सबसे छोटा किन्तु सबसे सारगर्भित एक सार्वभौम धर्मशास्त्र है। इसके आधार पर मनुष्य जाति की शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, अंतर्राष्ट्रीय, समस्त समस्याएं सुलझाई जा सकती हैं।
(3) गायत्री के 24 अक्षरों के उच्चारण से शरीर के विभिन्न स्थानों में स्थिति सूक्ष्म चक्रों, मातृकाओं, ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं का जागरण होता है। जैसे टाइप राइटर के अक्षरों पर उंगली रखते ही कागज पर उसी अक्षर की चोट पड़ती है वैसे ही मुख और कण्ठ में अनेक गुप्त गुत्थियों की चाबी है। गायत्री के अक्षरों का गुन्थन ऐसा विज्ञान सम्मत है कि इसके अक्षरों के उच्चारण से शरीर में छुपे हुए गुप्त संस्थानों पर दबाव पड़ता है और वे जागृत होकर मनुष्य की अनेक सोई हुई शक्तियों को जागृत करते हैं।
(4) संसार में सबसे अधिक, सबसे सच्चा एवं सबसे निस्वार्थ प्रेम माता का होता है। ईश्वर से हम इच्छानुसार कोई भी रिश्ता कायम रख सकते हैं उसी के अनुसार ईश्वर की ओर से प्रत्युत्तर भी मिलता है। माता का रिश्ता सबसे महत्वपूर्ण होने से यदि यह सम्बन्ध स्थापित किया जाय तो प्रभु की ओर से भी अलौकिक मातृ प्रेम होता है। वे माता की तरह शीघ्र द्रवित होते हैं और भक्त के सब अपराधों को क्षमा कर देते हैं।
(5) नारी की पवित्रता एवं श्रेष्ठता संसार में सर्वोपरि है। आज उसे भोग सामग्री माना जाता है और उसे पराधीन, असहाय, निर्बल, अशिक्षित एवं दीन हीन बनाकर पशुवत् रखा जा रहा है। कन्या का दर्जा पुत्र से हेटा समझना उसे पराये घर का कूड़ा मानना, विवाह में दहेज माँगना बात बात में मार पीट एवं अपमान करना आदि कारणों से स्त्री जाति दिन दिन नीचे गिरती जाती है, फलस्वरूप हमारा पारिवारिक जीवन एवं सुसंतति का विकास अवरुद्ध हो रहा है। आधी आबादी को, नारी जाति को अविकसित रखकर कोई भी राष्ट्र एवं समाज उन्नति नहीं कर सकता। भगवान मनु पहले ही कह चुके हैं कि जहाँ नारी की पूजा होगी वहीं देवताओं का निवास होगा। भारत के घर घर में देवताओं का निवास हो इसके लिए नारी की श्रेष्ठता तथा सम्मान की भावना का विकास होना आवश्यक है। गायत्री उपासना से इस भावना को प्रोत्साहन मिलता है।
(6) सद्बुद्धि संसार का सबसे मूल्यवान धन है। ऋतम्भरा प्रज्ञा, सत् असत् का विवेक, निर्मलता, धैर्य साहस, सत्यनिष्ठा आदि गुणों वाली मनोभूमिका ही सद्बुद्धि है। इसको प्राप्त करने से मानव जीवन स्वर्गीय सुख शान्ति से परिपूर्ण हो जाता है। गायत्री में इस सद्बुद्धि के लिए ही प्रभु से प्रार्थना की गई है और यदि यह याचना सच्चे हृदय से की जाय तो वह प्राप्त होकर भी रहती है।
(7) गायत्री मन्त्रों में अनेक ज्ञान विज्ञान छिपे हुए हैं। अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र शस्त्र, सोना आदि बहुमूल्य धातुओं का बनाना, अमूल्य औषधियाँ रसायनों, वायुयान, अनेकों ऋषि सिद्धियाँ, शाप वरदान के प्रयोग, नाना प्रयोजनों के नाना प्रकार के उपचार, परीक्षा विद्या, अंतर्दृष्टि, प्राण विद्या, वेधक, प्रक्रिया, शूल शाल्य, वाम मार्गी तंत्र विद्या, कुण्डलिनी चक्र, दशा महाविद्या, महामातृ का जीव निर्मोक्ष, रूपांतरण, अज्ञातसेवन, अदृश्य दर्शन, शब्द परव्यूह, सूक्ष्म सम्भाषण आदि अनेक लुप्त प्रायः महान विद्याओं के रहस्य बीज और संकेत गायत्री में मौजूद हैं। इन विद्याओं के कारण एक समय हम जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं के स्वामी बने हुए थे, आज इन विद्याओं को भूलकर हम सब प्रकार दीन हीन बने हुए हैं। गायत्री में सन्निहित उन विद्याओं का यदि फिर प्रकटीकरण हो जाय तो हम अपना प्राचीन गौरव फिर प्राप्त कर सकते हैं।
(8) गायत्री सनातन एवं अनादि मन्त्र है। पुराणों में कहा है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्म को आकाशवाणी द्वारा गायत्री प्राप्त हुआ था, इसी की साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों में चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। वेद विद्या, गायत्री की व्याख्या मात्र है। गायत्री को जानने वाला वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।
(9) गायत्री एक आवश्यक नित्य कर्तव्य है। इस धर्म कर्तव्य की उपेक्षा करने वाले को शास्त्रकारों ने शूद्र कहा है। मनुष्य का हाड़ माँस का शरीर माता के गर्भ से प्रसव होता है किन्तु आध्यात्मिक जीवन गायत्री माता के द्वारा ही मिलता है। यह दूसरा जन्म होने पर कोई व्यक्ति द्विज कहलाता है। जहाँ गायत्री की नियमित साधना होती है वहाँ कल्याण की वर्षा होती रहती है।
(10) गायत्री सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मन्त्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मन्त्र से हो सकता है गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने में भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प श्रमसाध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है।
(11) गायत्री, गीता, गंगा और गौ यह भारतीय संस्कृति की चार आधारशिला है उन सबमें गायत्री का स्थान सर्व प्रथम है। जिसने गायत्री के छिपे हुए रहस्यों को जान लिया उसके लिए और कुछ जानना शेष नहीं रहता।
(12) स्वाध्याय, सत्संग, कथा, तीर्थ यात्रा, कीर्तन, दान पुण्य, पूजा अर्चा आदि के अपने अपने महत्व है। पर तप का महत्व सर्वोपरि है क्योंकि तप की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप ताप जलते रहते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल प्राप्त होता है जिसके द्वारा साँसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्याएं हल होती हैं। सभी तपों की जननी गायत्री है। 84 प्रकार के योगों की साधना गायत्री से ही होती है।
(13) गृह विरक्त स्त्री-स्त्री पुरुष, बाल, वृद्ध सभी अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार गायत्री माता का आश्रय लेकर अपने भीतर और बाहर फैले हुए अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकते हैं। अविश्वासी व्यक्ति परीक्षा की दृष्टि से भी कुछ समय गायत्री उपासना करके देखे, तो उनका अविश्वास विश्वास में परिणित होकर रहता है।
(14) समस्त धर्म ग्रन्थों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। समस्त ऋषि मुनि मुक्त कण्ठ से गायत्री का गुणगान करते हैं। शास्त्रों में गायत्री की महिमा बताने वाला इतना साहित्य भरा पड़ा है कि उसका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा ग्रन्थ ही बन सकता है। गीता में भगवान ने स्वयं श्री मुख से कहा है- ‘गायत्री छन्दसामहम्’ अर्थात् ‘गायत्री मन्त्र मैं स्वयं ही हूँ।’
(15) गायत्री को भूलोक की कामधेनु कहा गया है क्योंकि यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासा शान्त करती है। गायत्री को सुधा कहा गया है क्योंकि जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाकर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से वह परिपूर्ण है। गायत्री को पारसमणि कहा गया है क्योंकि उसके स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अन्तःकरण का शुद्ध स्वर्ण जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा गया है- क्योंकि इसकी छाया में बैठकर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिये उचित एवं आवश्यक हैं।
(16) श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का अंचल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणकारक ही होता है। गायत्री को ब्रह्मास्त्र कहा गया है कि क्योंकि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं जाता।
(17) गायत्री साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि-सिद्धियाँ परिलक्षित होने लगती है। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है और वह निर्मल एवं प्रकाशवान होकर ईश्वरीय शक्तियों, गुणों सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाता है।
(18) प्राचीन काल में ऋषियों ने बड़ी-बड़ी तपस्याएं और योग साधनाएं करके अणिमा, महिमा आदि चमत्कारी ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे तथा वे कितनी ही अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे इसका वर्णन इतिहास पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्याएं और योग साधनाएं गायत्री के आधार पर ही होती थीं। गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
(19) गायत्री उपासना से मनुष्य की अनेक कठिनाइयाँ हल होती हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि जो लोग आरम्भ में दरिद्रता का अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, अपने मामूली गुजारे की भी व्यवस्था जिनके पास न थी, कर्ज के बोझ से दबे हुए थे, व्यापार में घाटा जा रहा था, उन्होंने गायत्री की उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गये कि जिनको अनेकों के लिए ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊंचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद हैं। जिनकी बुद्धि बड़ी ही भौंड़ी और मंद थी वे चतुर, तीक्ष्णबुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए हैं। झगड़ालू, चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फंसे हुए, आलसी एवं मूढ मति लोगों के स्वभाव में ऐसे परिवर्तन हुए हैं कि लोग दाँतों तले उंगली दबाते रह गये।
(20) गायत्री साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते रहते हैं। जिनके दाम्पत्ति जीवन बड़े कर्कश थे, पति-पत्नी में कुत्ता बिल्ली का सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम के निर्झरणी बहती देखी गईं। भाई भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ। जो कुटुम्ब, परिवार, क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे वहाँ शान्ति की वर्षा हुई। फौजदारी, मुकदमाबाजी, कत्ल, चोरी, डकैती, की आशंका से हर घड़ी भय रहता था वहाँ निर्भयता का एकछत्र राज हुआ। शत्रुओं के आक्रमण में जो लोग घिरे हुए थे, वे इन आपत्तियों से बाल बाल बच गये।
(25) बीमारी से तो कितने ही गायत्री साधकों का पिण्ड छूटा है। कई तो तपैदिक की मृत्यु शैया पर पड़े पड़े यमराज से लड़े हैं और उनकी डाढ़ो में से वापिस लौटे हैं। भूतोन्माद, दुःस्वप्न, मूर्छा, हृदय की निर्बलता, गर्भाशय का विषैला होना आदि रोगों से कितनों ने ही मुक्ति पाई है। कोढ़ी शुद्ध हुये हैं। असंयत जीवन क्रम और कुविचारों से उत्पन्न होने वाले स्वप्नदोष, प्रमेह आदि रोगों में मनः शुद्धि के साथ साथ तुरन्त कम होना आरम्भ हो जाता है। दुर्बल, जीर्ण रोगों से ग्रस्त व्यक्तियों को वेद माता की गोद में पहुँचकर बड़ी शान्ति मिलती देखी गई है। सन्निपात, शीतला, हैजा, प्लेग, मोतीझरा, निमोनिया आदि कठिन रोगों में गायत्री ने चक्र सुदर्शन की तरह रक्षा की है।
(22) चिन्ताओं के दबाव से जो मस्तिष्क फटते रहते थे, उन्हें निश्चिन्तता और सन्तोष की साँस लेते हुए देखा गया है। मृत्यु शोक, सम्पत्ति नाश, ऋण ग्रस्तता, बात बिगड़ जाने का भय, कन्या विवाह का खर्च, प्रियजनों का विछोह, जीविका का आश्रय टूट जाना, अपमान, असाध्य रोग, दरिद्रता, शत्रुओं का प्रकोप, बुरे भविष्य की आशंका आदि कारणों से जिन्हें हर घड़ी चिंता घेरे रहती थी उन्हें माता की कृपा से निश्चिन्तता प्राप्त हुई है। या तो उन्हें कोई आकस्मिक सहायता मिली है या भीतरी प्रेरणा से उद्धार का कोई उपाय सूझ पड़ा है या अन्तःकरण में ऐसा विवेक और आत्मबल प्रकट हुआ है जिससे उस अवश्यम्भावी अटल प्रारब्ध को हंसते हंसते वीरतापूर्वक सहन कर लिया गया।
(23) पुरुषों की ही भाँति स्त्रियाँ भी प्रसन्नतापूर्वक गायत्री उपासना कर सकती हैं। विधवाएं आत्मसंयम इन्द्रिय निरोध, मनोनिग्रह एवं सात्विकता की वृद्धि करने में गायत्री की सहायता से सफल होती हैं। वे घर में रह कर इस तपस्या द्वारा आत्म-कल्याण एवं प्रभु प्राप्ति एवं जीवन मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। कुमारी कन्याओं की गायत्री साधना उनको अच्छे घर पर तथा अत्यन्त सौभाग्य प्रदान करने में सहायक होती है। सधवाएं गायत्री साधना द्वारा दाम्पत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों का कुशल क्षेम प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी, बुद्धिमान दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती हैं।
(24) सबसे उत्तम यह है कि निष्काम होकर अटूट श्रद्धा और भक्ति भाव से गायत्री की उपासना की जाय कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकता को स्वयं पूरा करता है। प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।
(श्री श्याम मनोहर दुबे, बसाई)
मेरे जीवन का अधिकाँश समय अध्ययन कार्य में ही बीता है। शिक्षा को मैं मनुष्य जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता समझता हूँ। इसलिए उसे श्रेष्ठतम लोक सेवा समझकर मैं पूर्ण तत्परता और उच्च श्रद्धा के साथ अध्यापन कार्य में प्रवृत्त रहता हूँ। मेरी आजीविका का एकमात्र साधन अध्यापकी ही रही है परन्तु कभी भी मैंने उसे व्यवसाय नहीं माना। यदि भूखा रह करके मुझे यह कार्य करना पड़े तो दूसरे व्यवसाय में करोड़पती होने का अवसर ठुकराते हुए भी अपने इस परम प्रिय कार्य में भूखा मरने की श्रद्धा मुझमें मौजूद है।
शिक्षा एक विज्ञान है। जिसका उद्देश्य मनुष्य के मस्तिष्क का ऐसा निर्माण करना है जिससे वह अपने मन में मनुष्यता के उपयुक्त सद्गुण, सद्भाव, सद्विचार और सत्कर्मों का आदि बन सके। शिक्षित उसे ही कहना चाहिए जो दूसरों के लिए आनन्दवर्धक एवं उपयोगी हो। जिस शिक्षा से मनुष्य के गुण, भाव, विचार और कार्य अनीति युक्त बनते हों, जिससे मनुष्य स्वार्थी, दुर्गुणी एवं दूसरों की परेशानी बढ़ाने वाला बनता हो वह शिक्षा, शिक्षा नहीं। ऐसी मेरी मान्यता आरम्भ से ही रही है।
अध्यापक क्षेत्र में मैंने जीवन भर प्रयोग किये हैं। एक समय मेरा विचार था कि प्राथमिक शिक्षा के समय ही बालकों पर अच्छे संस्कार डाले जा सकते हैं इसलिए ग्रेजुएट होते हुए भी मैंने प्राइमरी पाठशाला चलाई। कुछ दिन के अनुभव से देखा कि इस आयु के छोटे बालकों पर स्कूल में नहीं घर पर ही उसके सहचरों एवं अभिभावकों के चरित्र का अनुकरण करने का ही प्रभाव पड़ता है। स्कूल के मास्टर द्वारा वे अक्षर ज्ञान सीखते हैं पर उसके उपदेशों का कोई बहुत प्रभाव ग्रहण नहीं करते। यह देखकर मैंने वह नौकरी छोड़ दी।
हाई स्कूल में नौकरी की, वहाँ देखा कि अंग्रेजी स्कूलों का वातावरण, एवं शिक्षा पद्धति का क्रम ऐसा है कि वहाँ कोई अध्यापक मशीन के पुर्जे की तरह अपनी ड्यूटी भुगत देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता। यहाँ मन नहीं लगा तो अन्यत्र काम करने की सोची। एक कॉलेज में प्रोफेसरी मिल गई। वहाँ भी मनोरथ पूरा न हुआ। लड़के बराबरी का दावा करते थे, अहंकार और उच्छृंखलता की उस क्षेत्र में ऐसी बाढ़ थी कि वहाँ मुझे लू लू बनाया जाने लगा, वहाँ से भाग अपना बिस्तरा समेटा।
अब की बार संस्कृत पाठशाला ले बैठा। साथ साथ प्रौढ़ पाठशाला भी लगाई। दोनों के विद्यार्थी अपना एक विशिष्ट उद्देश्य लेकर आते थे। संस्कृत का कोर्स इतना कठिन था कि विद्यार्थी को अधिकाँश समय व्याकरण घोटते रहने तथा परीक्षा में उत्तीर्ण होने की रट में लगे रहते थे। प्रौढ़ लोगों को अपने कार्यों से बहुत थोड़े वक्त के लिए समय मिलता वह समय उन्हें साक्षर बनाने की शिक्षा में ही व्यतीत हो जाता। इस प्रकार मैंने अनेक बार इस्तीफे दिये और अनेक नई जगह तलाश की। अनेक बार अपने संकलकत्व में भी विद्यालय चलाये परन्तु किसी भी में मनोनुकूल सुविधा न मिली परीक्षा उत्तीर्ण करने में ही विद्यार्थी तथा उसके अभिभावकों की रुचि होती है। परीक्षा में उत्तीर्ण होने में जो बातें काम दें वही उनकी दृष्टि में पढ़ाई है बाकी बातों को वे अनावश्यक ही नहीं समय को बर्बाद करने वाली भी मानते हैं। ऐसी शिक्षा पद्धति के साथ मेरे आदर्शों की पटरी नहीं बैठ सकी। जिन बातों को मैं शिक्षा कहता हूँ उनका इस वातावरण के लिए न कोई स्थान है न आदर। ऐसी दशा में मेरा वर्षों का प्रयास आरण्य रोदन के समान व्यर्थ हो गया। अब तक के मेरे प्रयोग प्रायः निष्फल रहे।
इन कारणों से खिन्न होकर मैंने आचार्य जी से पूछा कि मैं शिक्षक बनना चाहता था, शिक्षा में मेरी असाधारण श्रद्धा है। परन्तु क्या करूं वर्तमान परिस्थितियों में वैसी शिक्षा के लिये न तो कहीं अवसर दिखाई देता है और न उत्साह। ऐसी दशा में मुझे क्या करना चाहिये? उन्होंने मुझे मथुरा बुलाया और एक ऐसी शिक्षा पद्धति समझाई जो सचमुच ही असाधारण थी। उन्होंने गायत्री गीता और गायत्री स्मृति के मन्त्रों को पाठ्यक्रम बनाकर गायत्री विद्यालय चलाने की योजना बताई। मेरे आनन्द का ठिकाना न रहा। नौकरी से मैंने इस्तीफा दे दिया और स्वतंत्र रूप से एक गायत्री विद्यालय चलाने लगा। इस बात को एक वर्ष से अधिक होने को आया। गायत्री के 24 अक्षर 1 प्रणव 1 व्याहृतियाँ इस प्रकार 26 दिन का कोर्स होता है। 4 दिन चार रविवारों को छुट्टी रहती है। इस प्रकार एक महीने में एक कक्षा पूरी हो जाती है। शिक्षा काल में विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य सात्विक आहार, तपस्वी दिनचर्या, नित्य जप, नित्य हवन, आदि का कार्यक्रम रहता है। हमारा यह विद्यालय भ्रमणशील रहता है। एक एक महीने में एक गाँव में रह कर अब तक बाहर स्थानों पर यह विद्यालय चल चुका है। बीस से लेकर चालीस तक स्त्री पुरुष इन शिक्षा सूत्रों में सम्मिलित हुए और उन्होंने जीवन के प्रत्येक पहलू पर आवश्यक ज्ञान प्राप्त किया। विचार विनिमय और शंका समाधान का पर्याप्त अवसर रहने, गायत्री के अक्षरों में सन्निहित शिक्षा को भली प्रकार हृदयंगम कराया जा सका।
जिन लोगों ने यह शिक्षा प्राप्त की है उनमें से अधिकाँश के जीवन में भारी परिवर्तन हुए हैं। उनकी गाली देने की, नशेबाजी की, समय का अपव्यय करने की, गन्दे रहने की आदतें छूटी हैं। दहेज, मृतकभोज, बालविवाह, आदि 3 रीतियों में कमी हुई है। कटु भाषण, द्वेष कलह, मनोमालिन्य, फूट, पार्टीबन्दी, मुकदमे बाजी, आदि की अग्नि बुझी है और लोगों ने व्यायाम करना, पुस्तकें पढ़ना आरम्भ कर दिया है, फालतू समय में छोटे गृह उद्योगों द्वारा पैसे कमाने लगे हैं। गायत्री जप, सन्ध्या वन्दन, रामायण पाठ, उपवास, हवन आदि धार्मिक कृत्यों का एक नया सिलसिला उन लोगों में चल पड़ा है। जो स्त्री पुरुष एक महीने की छोटी सी अवधि में इस शिक्षा में सम्मिलित हो रहे हैं, उनने अपने अपने घरों का वातावरण ही बदल दिया है। उनके बदले हुए विचार और स्वभाव ने उन घरों में एक नई ही चेतना पैदा कर दी है।
इस प्रकार मैं देखता हूँ कि शिक्षा के सम्बन्ध में जो स्वप्न जीवन भर मैं देखता रहा वह अब पूरे होने जा रहे हैं। साधारण व्याख्यानों से, छुटकारा वार्तालाप का वह प्रभाव नहीं पड़ता जो गायत्री के माध्यम से, एक नियमित और निश्चित पाठ्यक्रम द्वारा अध्ययन एवं मनन करने से होता है। कोई भी कार्य एक मुख्य उद्देश्य लेकर किया जाता है और उस उद्देश्य के अनुसार ही परिणाम होता है, जो लोग परीक्षा उत्तीर्ण होने का प्रणाम पत्र लेने के उद्देश्य से पढ़ते हैं उन्हें उसी लक्ष की पूर्ति में अपनी पढ़ाई की सफलता दिखती है। परन्तु जिनने जीवन निर्माण के लिए, आत्म शाँति के लिए, गायत्री माता का सन्देश सुना है, वे अपनी शिक्षा की सार्थकता इसी में देखते हैं कि वे प्रतिष्ठा, शाँति, सम्पन्नता और उन्नति का जीवन उपलब्ध करें। उनका यह संकल्प पूर्णरूप से सफल न भी हो तो भी पूर्ण स्थिति में भारी परिवर्तन हो जाना निश्चित है। इसके अनेकों प्रत्यक्ष उदाहरण इस एक वर्ष की अवधि में मैंने देखे हैं।
जब मैं मथुरा गया था तब आचार्य जी ने अपनी योजनाएं बताई थीं कि वे किस प्रकार देश में चलते फिरते गायत्री विद्यालय स्थापित करके धर्म और नीति को भारतीय जीवन में ओत प्रोत करेंगे। मेरा जो तुच्छ अनुभव है उसे देखकर यह अनुभव होता है कि ऐसे ही हजारों शिक्षक जब देश भर में फैल जायेंगे तो नवीन समाज की रचना, नवीन युग का निर्माण कठिन न रहेगा। मैं देववादी नहीं समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में ही मेरी रुचि है मुझे लगता है कि इन दोनों ही महान् आवश्यकता की पूर्ति में आचार्यजी का गायत्री आन्दोलन बहुत भारी योग देगा। इसी दृष्टि से मैं गायत्री संस्था में सम्मिलित हुआ हूँ। इस योजना के द्वारा मुझे अपने समाज में और राष्ट्र का भारी कल्याण होता दिखाई पड़ रहा है।
(श्री भारत राम वानप्रस्थी, चौरसिया)
गायत्री का सर्व विदित लाभ यह है कि उससे जन्म जन्मान्तरों के सुसंस्कार मिलते हैं और कुपात्रता दूर होती है। सुसंस्कारी और सत्पात्र होना जीवन का सबसे बड़ा लाभ है। जिसे यह लाभ प्राप्त है, उसे किसी बात का अभाव नहीं रहता।
जो लोग जीवन की छोटी मोटी असुविधाओं का निवारण करने के लिए सकाम उपासना करते हैं वे इस प्रचण्ड ब्राह्मी शक्ति की महिमा को नहीं जानते। चक्रवर्ती राजा से कोई यह माँगे कि मुझे एक रोटी दिला दीजिए तो उस याचक को मूर्ख ही कहेंगे। रोटी तो थोड़े परिश्रम से कमाई जा सकती है या अन्य तरीकों से भी उसे प्राप्त किया जा सकता है। राजा से माँगनी हो तो ऐसी मूल्यवान वस्तु माँगनी चाहिए जो अपने प्रयत्न से या साधारण साधनों से प्राप्त न हो सकती हो। साँसारिक वस्तुएं मनुष्य स्वयं उपार्जित कर सकता है, दूसरों से ले सकता है या उनके अभाव में भी काम चला सकता है, परन्तु एक ऐसी वस्तु है जो कठिनाई से प्राप्त होती है वह वस्तु है सुसंस्कार, सत्पात्रता और सात्विक दृष्टि, यही गायत्री माता से माँगने योग्य है। जिसने यह प्राप्त किया उसके लिए सर्वत्र आनन्द ही आनन्द है।
मैंने साधना मार्ग में विनम्र पदार्पण किया है। उत्तराखंड के तपस्वी महात्माओं की कृपा का किंचित प्रसाद प्राप्त करने में भी समर्थ हुआ हूँ। ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव करने का सौभाग्य मुझे दिया गया है-एक अत्यन्त महान प्रचण्ड ज्योति अपना हाथ पर मेरे शरीर को रखकर धीर धीरे उसमें प्रवेश करती हुई विलुप्त हो गईं। इसी प्रकार हृदय चक्र में सूर्य शक्ति का जो अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है उसका रस कोई भुक्त भोगी ही जानते हैं। माता जिस पर वस्तुतः प्रसन्न होती है उसे माया के झंझटों से छुड़ाकर त्याग और वैराग्य की ओर ले चलती है तथा सत्पात्रता एवं सुसंस्कार प्रदान करती है। परन्तु जिनसे वे पीछा छुड़ाना चाहती हैं उसे माया का खिलौना देकर बहला फुसला देती हैं। वह अज्ञानी उस खिलौने से लिपटा रहता है और माता की गोदी में चढ़कर उसका अमृत तुल्य पय पान करने से वंचित रह जाता है।
मैं माता के चरणों में आत्मार्पण करके जो शाँति पाता हूँ वह सारी पृथ्वी का धन ऐश्वर्य मिलने पर भी सम्भव नहीं है। माता से यही प्रार्थना रहती है कि कही तू साँसारिक खिलौनों में मुझे न बहका देना, मुझे कोई वस्तु नहीं चाहिये केवल तेरी कृपा विशुद्ध कृपा-चाहिये, जिससे आत्मा का सच्चा स्वार्थ साधन हो सके।
(श्री महात्मा अद्वैतानन्द जी महाराज)
गायत्री उपासना की महिमा जितनी कही जाय उतनी कम है। माता की कृपा से कोई भी सच्चा साधक वंचित नहीं रहता, उसे उसके परिश्रम की अपेक्षा कई गुना लाभ निश्चित रूप से मिल जाता है। परन्तु बुद्धिमानी इसमें नहीं है कि छोटे छोटे साँसारिक प्रयोजनों में साधना की महान आध्यात्मिक शक्ति को खर्च किया जाय। तप से बड़ा और कोई धन नहीं है। तप के बदले से ही सुख मिलता है। संसार में जितने सुखी, और सुसम्पन्न व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं वे भूतकाल में तपस्वी रहे हैं जब उनका तप समाप्त हो जाएगा तो उन्हें तुच्छ प्राणी की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। तब उनके पास कोई सम्पत्ति शेष न रह जायगी।
तप और पुण्य की सम्पत्ति जमा करते जाना ही वास्तविक बुद्धिमानी है। इस सम्पत्ति के भण्डार से साँसारिक और आत्मिक सभी महानताएं प्राप्त हो सकती हैं। यहाँ तक कि ईश्वर तक को खरीदा जा सकता है। तपस्वी या साधक के लिए एक बहुत बड़ा खतरा यह है कि जैसे ही उसे कुछ आत्मबल प्राप्त होता है वैसे ही वह उत्साह से भर जाता है और उसका प्रदर्शन करके यश, प्रतिष्ठा, पूजा या प्राप्ति में उसे खर्च करने लगता है, फलस्वरूप वह पूँजी अति शीघ्र समाप्त हो जाती है और वह रीता का रीता रह जाता है।
गायत्री उपासकों में आत्मबल अति शीघ्र बढ़ता है, उन्हें छोटी छोटी अनेक सिद्धियों का अनुभव थोड़े ही दिनों में होने लगता है। उस समय उन्हें बहुत ही सावधान रहना चाहिए। किसी का भाग्य बदलने में, ईश्वर के विधान को पलट कर अपनी इच्छा प्रधान सिद्ध करने में अपनी शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिये। पूर्व जन्मों के किये हुए कर्मों से जो प्रारब्ध बनता है उसके भले बुरे सभी भोगने पड़ते हैं। कर्म भोग से हरिश्चंद्र, मोरध्वज, कर्ण, नल, अम्बरीष, भगवान के परम कृपा पात्र होते हुए भी इन लोगों को अपने भाग्य का भोग पूरा करना पड़ा। भक्त यदि अपनी तपस्या की बाजी लगादे तो भगवान को अपना कार्य करने से रोक सकता है। इसलिए भगवान से भक्त को बड़ा बताया गया है। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा दुस्साहस करने से भक्त की तपस्या बहुत शीघ्र समाप्त हो जाती है और वह अपनी संचित आध्यात्मिक पूँजी से हाथ धो बैठता है।
इसलिए अपने या किसी दूसरे के साँसारिक प्रयोजन पूरे करने के लिए कभी आत्मबल को, तपोधन को, नष्ट नहीं करना चाहिए। गायत्री साधक किसी को शाप वरदान न दे। जो व्यक्ति गायत्री माता की कृपा से लाभ उठाना चाहता है उसे स्वयं उपासना आराधना करके गायत्री महाशक्ति की सहायता प्राप्त करनी चाहिये। दूसरों के तप से स्वयं लाभ उठाना एक गलत तरीका है जिसे चालाक आदमी, भोले भाले साधकों को खुशामद या दीनता दिखाकर प्रयुक्त करते हैं। साधकों को किसी प्रपंच में फंसकर अपनी शक्ति बरबाद नहीं करनी चाहिए वरन् उसे आत्म कल्याण के लिए सुरक्षित करना चाहिए।
यदि गायत्री उपासक को लोक सेवा करनी है, दूसरे पर दया आती है, उनकी पीड़ा दूर करने की इच्छा है, तो अपनी सारी बुद्धिमानी खर्च करके उस मनुष्य को माता का उपासक बना देना चाहिए ताकि वह स्वयं आनन्द आध्यात्मिक और साँसारिक लाभों को प्राप्त कर सकें। इस उपचार से साधक का पुण्य परमार्थ बढ़ता है और उस मनुष्य का भी कल्याण होता है जो लोग स्वयं उपासना का कष्ट नहीं उठाना चाहते और किसी तपस्वी के तप का अवस्थित लाभ अपना प्रारब्ध बदलने में खर्च कराना चाहते हैं। खुदगर्ज लोगों से गायत्री साधकों को सावधान रहना चाहिए। अनेक साधक संसार में आये दिन घटित होती रहने वाली दुख सुख की घटनाओं में अपनी टाँग अड़ाकर किसी का प्रारब्ध बदलने के झंझट में लग जाते हैं, यह मूर्खता का मार्ग किसी भी दूरदर्शी गायत्री उपासक को नहीं अपनाना चाहिए।
(महात्मा श्री “गायत्री पुत्र जी” वरहज)
माता पिता की मृत्यु के बाद लम्बे समय तक सरकारी नौकरी करता रहा। पाठ पूजा में मेरा मन आरम्भ से ही बहुत था। अक्टूबर सन् 31 को तीर्थ यात्रा के लिए घर से निकला। अनेक तीर्थों की यात्रा करते हुए जगन्नाथ जी पहुँचा। सुना था कि जगन्नाथ जी के सामने जो प्रार्थना सच्चे हृदय से की जाय उसे वे पूरी करते हैं। मैंने जगदीश जी प्रार्थना की कि आप मुझे गायत्री वाला सच्चा ज्ञान दे दीजिए। मुझे तत्काल ऐसा भास हुआ मानों मेरी प्रार्थना सुन ली गई हो और एवमस्तु का वरदान दिया गया हो।
तीर्थ यात्रा से वापिस लौट रहा था तो रास्ते भर अन्तरात्मा में बैठी हुई कोई शक्ति यह कह रही थी कि दो काम एक साथ नहीं हो सकते या तो ईश्वर को ही प्राप्त किया जाय या संसार की ही गुलामी की जाय, मैंने निश्चय किया कि मुझे प्रभु को प्राप्त करना है। निश्चय के फलस्वरूप इस्तीफा दे दिया, नौकरी छोड़ दी।
मेरी साधना में राम नाम का जप और गीता का पाठ दो ही प्रधान थे। गीता में मैंने देखा कि गायत्री मन्त्र स्वयं भगवान का स्वरूप है। अन्य सन्त महात्माओं से भी यही सुना था और मेरी अन्तरात्मा ने भी यही कहा। तब से मैंने गायत्री माता की शरण पकड़ी और उन्हें ही अपना आत्म समर्पण कर दिया।
त्रिकाल सन्ध्या, जप और काले तिल तथा घी का हवन यह मेरा नित्य कर्म रहा, अधिकाँश समय उसी कार्यक्रम में लग जाता, एक ही लगन और एक ही रट दिन रात रहती। इस प्रकार दो वर्ष बीत गये। 21 फरवरी सन् 33 की रात को करीब दस बजे जबकि मैं सोया हुआ था- हवन कुण्ड के पास एक दिव्य तेज युक्त देवी का दर्शन हुआ। मैं चौक पड़ा और पूछा- आप कौन हैं? उनने मन्द मुस्कान के साथ उत्तर दिया- गायत्री। मेरा रोमाँच हो गया। प्रेम विह्वल होकर माता के चरणों पर गिर पड़ा। उस स्वर्गीय सुख का वर्णन करते नहीं बनता, मैं कृतकृत्य हो गया।
माता ने अन्तर्ध्यान होते हुए कहा तुम मेरे धर्म पुत्र हो। मेरा मन्त्र ब्रह्म रूप है। इसका उपयोग आत्म कल्याण के लिए ही होना चाहियें जो लोग इससे साँसारिक कामनाएं प्राप्त करते हैं वे अधोगामी होते हैं। तुम ब्रह्म शक्ति के लिए ही हमारा उपयोग करना। मैंने उनके चरणों में सिर झुका दिया। मेरी स्त्री को मेरा अनुगमन करने का आदेश देकर अदृश्य हो गईं।
दूसरे दिन से हम दोनों ने घर छोड़ दिया। माता ने मुझे धर्म पुत्र कहा था मैंने अपना पुराना नाम पाँडे सुख मंगल लाल छोड़कर गायत्री पुत्र रख लिया। मेरी धर्म पत्नी ने उसी दिन से सब साँसारिक कामनाएं त्याग दी और निशिदिन मेरा अनुगमन करने लगीं। कुछ समय कतिपय स्थानों पर परिभ्रमण करने के बाद हम दोनों बरहज आये। यह स्थान मनोनुकूल दिखाई पड़ा। सरयूतरी पर श्मशान भूमि में पहले कपड़ा तानकर हम लोग रहे फिर एक छप्पर डाल लिया। 27 अप्रैल सन् 35 से हम लोग यहीं हैं। रीति नीति यह है कि-मांगने का सवाल नहीं, लेने से इनकार नहीं। किसी के बुलाने का सवाल नहीं, किसी के आने की मुमानियत नहीं, किसी की खुशी नाखुशी की परवा नहीं। पाँच बीघे के घेरे से बाहर जाता नहीं, बरहज कस्बा बहुत बड़ा है, उसके बिलकुल निकट रहता हूँ, पर आज तक उसे आंखों से नहीं देखा। अपनी कोई निश्चित आमदनी नहीं है पर धर्मार्थ कार्यों के लिए यहाँ सदैव कुछ न कुछ होता ही रहता है। हर पूर्णिमा को इस कुटी पर चने बंटते है जिसे लेने के लिए भारी भीड़ जमा होते देखकर सभी को हर्ष और आश्चर्य होता है। नित्य का जप और नियमित रूप से दोनों समय हवन यह अपना निश्चय कार्यक्रम है। यहाँ आने वाले व्यक्ति गायत्री उपासना की सलाह प्राप्त करके जाते हैं जिससे बहुधा उनका कल्याण ही होता है। साँसारिक नौकरी छूट गई अब हम दोनों माता की नौकरी में लगे हुए हैं। रोटी कपड़ा लेकर परम सन्तोषपूर्वक जीवन यापन करते हैं।
(श्री गुरुचरण जी आर्य विहिया)
प्राचीन काल में प्रायः सभी ऋषि गायत्री की उपासना करते थे और इसी महामन्त्र का उपदेश अपने अनुयायियों को करते थे। यह परम्परा अनादि काल से लेकर अब तक चली आ रही है। आधुनिक काल के भी सन्त महात्मा इसी मार्ग पर चल रहे हैं।
लोगों की कल्पना है कि आर्यसमाज मूर्ति पूजा की भाँति जप तप पर भी विश्वास नहीं करता। यह मान्यता सर्वथा गलत है। श्री स्वामी दयानन्द सरस्वती गायत्री के परम श्रद्धालु उपासक थे। उनके गुरु प्रज्ञाचक्षु श्री॰ विरजानन्द सरस्वती ने तो गंगा के शीतल जल में खड़े होकर दीर्घकाल तक गायत्री उपासना की थी। श्री. स्वामी दयानन्द ने जीवन भर स्वयं गायत्री उपासना की तथा अनेकों अपने अनुयायियों को इसके लिए प्रेरणा देते रहे। तथा श्री वासीराम जी कृत महर्षि दयानन्द का जीवन चरित्र पुस्तकों से नीचे श्री महायानन्द प्रकाश नामक स्वामी जी के जीवन चरित्र ग्रन्थ से कुछ उदाहरण उपस्थिति कर रहे हैं जिससे पाठक श्री स्वामी दयानन्द की गायत्री निष्ठा का अनुमान लगा सकें।
पृष्ठ 445- “मेरठ में जपाराधन का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा- बद्रीनारायण में रहकर मैंने भगवती गायत्री का जपानुष्ठान किया था।”
पृष्ठ 112- ठाकुर गोपालसिंह की 90 वर्ष की एक वृद्धा ताई थी, जिसका नाम हंस ठकुरानी था, और वह 65 ग्रामों की स्वामिनी थी, परन्तु उसका जीवन बड़े संयम का था, वह आई और उपदेश ग्रहण की इच्छा प्रकट की। महाराजा ने उसे ओऽम् गायत्री का जाप बताया और मूर्ति पूजा छोड़ देने का आदेश किया।
पृष्ठ 130- इस बार स्वामी जी कायम गन्ज में लगभग 30 दिन रहे, लोगों के पूछने पर उन्होंने त्रिकाल संध्या का निषेध किया और दो काल संध्या का उपदेश किया। संध्या, गायत्री और वलिवैश्य देव का उपदेश करते थे।
पृष्ठ 105- पण्डित गंगा प्रसाद महाराज के एक और भक्त थे वे स्वामी जी के उपदेश से लोगों को यज्ञोपवीत धारण करने की प्रेरणा करते थे और गायत्री जपने को कहते थे।
पृष्ठ 110- वैलून जिला बुलन्दशहर भक्त जन ने तख्त पर एक सिरकी बिछा दी और गद्दा डाल दिया था, जिस पर महाराज जी बैठा करते थे लोगों को संदेश गायत्री का उपदेश करते थे जो कोई उसके पास आता उससे पूछते गायत्री जानते हो, वह कहते नहीं तो उसे गायत्री सिखाने और लिखकर देते थे। पंडित इन्द्र मुनि ने गायत्री की बहुत सी प्रतियाँ लिखकर उसके पास रखदी थी। वह किसी को कोई प्रति देते तो उसके नीचे एक हजार का अंक लिख देते कि एक हजार बार जाप करो। इस प्रकार उन्होंने लगभग पचास मनुष्यों को गायत्री की प्रतियाँ बाँटी।
पृष्ठ 131- कर्णवास में यज्ञोपवीत के लिए बड़ी आयु वालों को प्रायश्चित करना निश्चित हुआ। अनूप शहर, दानपुरा अहमदगढ़, राम घाट, जहांगीराबाद और कर्णवास के पण्डित गायत्री जप के लिए निमंत्रित होकर अनुष्ठान करने लगे। यह गायत्री पुरश्चरण आधे शुक्ल पक्ष में समाप्त हो गया और स्वामी जी की कुटिया पर एक वृहद् हवन हुआ।
पृष्ठ 164- भगवान दयानन्द जी ने गंगा समीप निवासी सहस्रों जनों को जनेऊ देकर द्विज बनाया। संध्या सिखाई, गायत्री का जप बताया और लाख जनों को सदुपदेश से सन्मार्ग दिखाया।
पृष्ठ 225- छलसर में सैकड़ों राजपूतों ने उनसे गायत्री गुरु मन्त्र ग्रहण किया और सहस्रों मनुष्य आपके अनुयायी हो गये।
पृष्ठ 226- यहाँ ठाकुरों के कई लड़के यज्ञोपवीत लेने को समुद्यत थे। इसलिए स्वामी जी की आज्ञा से बाहर पंडित जप करने बैठाये गये और सात दिन तक वृहद हवन होता रहा।
पृष्ठ 352-एक व्याख्यान में महाराज ने अन्य पर्व यथाई मन्त्रों का खण्ड करके गायत्री मन्त्र की प्रधानता बतलाई और कहा था कि इसका प्रतिदिन जाप करना चाहिए।
पृष्ठ 358- पण्डित पोलो राम जी का महाराज से बड़ा प्रेम था। महाराज ने अपार दया से उनको उपदेश किया कि-गायत्री का जप प्रतिदिन किया करो। यह कल्याणकारी मन्त्र है। मेरे पास यही एक वस्तु है जो मैंने आपको दे दी है।
पृष्ठ 373- स्वामी जी यज्ञों में और यज्ञोपवीत आदि संस्कारों में गायत्री पुरश्चरण कराया करते थे। बहुत से विद्वान मिलकर बारह चौदह दिन तक गायत्री जाप करते। यजमान से भी यह पवित्र जप कराया जाता। जमपुर के ठाकुर रणजीत सिंह ने एक बड़ा भारी यज्ञ करने का संकल्प किया था। इस पर महाराज ने उन्हें कह रखा था कि हमारे कथनानुसार गायत्री का अनुष्ठान कराइये। ठाकुर महाशय ने उस यज्ञ को करने के लिए स्वामी जी को ही आमंत्रित किया। इस प्रकार के अनेक प्रमाण उपरोक्त पुस्तकों में मौजूद हैं।
श्री स्वामी दयानन्द जी ने सत्यार्थ प्रकाश के तीसरे समुल्लास के पृष्ठ 22 पर लिखा है- पिता, माता व अध्यापक अपने लड़के लड़कियों को अर्थ सहित गायत्री का ज्ञान करावें। इस प्रकार गायत्री मन्त्र का उपदेश करके सन्ध्योपासना आदि सिखलावें।
बार बार जप करने में अन्तः करण की शुद्धि, बुद्धि तीव्र और सर्व प्रकार की शुभ कामनाओं की उसके अनुकूल आचरण करने से सिद्धि होती।
उपरोक्त प्रमाणों में यह स्पष्ट हो जाता है कि श्री स्वामी दयानन्द भी अन्य ऋषियों की भाँति गायत्री माता के प्रति अनन्य निष्ठावान थे। आर्य समाज को गायत्री जप का विरोधी मानना एक भ्रान्त कल्पना है।
(स्व. श्री पं. शिवदत्त शर्मा)
गायत्री जप के विषय में अनेक आख्यान प्रचलित हैं, उनमें से सोम शर्मा नाम के ब्राह्मण का एक रोचक आख्यान ‘श्री गायत्र्यर्थ प्रकाश’ से यहाँ उद्धृत करते हैं।
सोम शर्मा नाम का एक ब्राह्मण गायत्री का परम भक्त हो गया है। उसने अपने जीवन में गायत्री के (निष्काम) कई पुरश्चरण किये थे। उसकी स्त्री बड़ी साध्वी-सुशील-सुरुपा और पतिपरायण और चार पुत्र थे। उनमें तीन पुत्र तो बड़े विद्वान, बुद्धिमान, धर्मात्मा थे। परन्तु दैवयोग से सबसे छोटा चौथा पुत्र चोर निकला। पिता-माता और भाइयों ने बहुत कुछ समझाया, पर उसने किसी का कहना नहीं माना। अन्त में सोम शर्मा की मृत्यु के समय जब सारा कुटुम्ब एकत्र था, उसने अपने छोटे पुत्र से कहा कि इस समय केवल तुम्हारी चिन्ता से मैं दुःखी हूँ। यदि तुम मेरी एक बात मान लोगे, तो मेरी मृत्यु बहुत सुख से होगी।
समय का विचार करके छोटे पुत्र ने पिता के कान में जाकर कहा कि चोरी छोड़ने के सिवाय और कुछ थोड़ी देर का काम बताओगे मैं मान लूँगा।
पिता ने कहा कि मैं चोरी छोड़ने को नहीं कहूँगा। तुम्हारी इच्छा हो सो करते रहना, परन्तु ठीक सूर्योदय के समय स्नान करके एक माला गायत्री की जप लिया करना।
लड़के ने सोचा-एक माला जपने के लिए अधिक से अधिक दस मिनट लगेंगे। उसने स्वीकार कर लिया और उसके पिता की सुख से मृत्यु हो गई।
छोटा लड़का भी यथा समय अपने काम में (चोरी करने में) लग गया। परन्तु जहाँ कही जैसे ही सूर्योदय हो कि तत्काल स्नान करके माला जपने का नियम दृढ़ता से पालन करता रहा।
एक बार उसके मन में स्फुरण हुई नित्य छोटी छोटी चोरी करने से एक बड़ी चोरी करना अच्छा है। उससे पकड़े जाने पर तो प्राण दंड होगा, परन्तु दैवयोग से बच गये, तो सारे जीवन की चिन्ता दूर हो जायगी। यह सोचकर उसने अपनी कला से राजमहल में प्रवेश कर रानियों के जेवर का डिब्बा चोरी करके अपने घर का रास्ता लिया। जैसे ही वह शहर के बाहर हुआ कि सूर्योदय का समय हो गया। वहीं पर एक जलाशय था। उसने कपड़े उतार उनमें जेवर का डिब्बा लपेटकर तालाब के किनारे रख दिया और आप स्नान करके गायत्री का जप करने लगा।
उतने ही में चोर को पकड़ने के लिए फौज के सिपाही चारों तरफ दौड़ पड़े। कुछ लोग इस तरफ भी आ पहुँचे तो क्या देखते हैं कि एक दिव्य तेज युक्त सोलह वर्ष की लड़की उन कपड़ों के पास बैठी है और ब्राह्मण स्नान करके जप कर रहा है। यह देखकर उनके अफसर ने कहा-अरे यह ब्राह्मण तो निर्भय होकर जप कर रहा है और यह बाई उसके कपड़ों की रखवाली कर रही है। दूसरी तरफ चलो, चोर कहीं निकल न जाय। ऐसा कहकर वे लोग दूसरी तरफ चल दिये। उधर ब्राह्मण माला पूरी करके अपने कपड़ों के पास उस लड़की को बैठी देखकर कहने लगा-बाई! तुम कौन हो और मेरे कपड़ों के पास क्यों बैठी हो?
दूसरी तरफ मुँह फेरे हुए ही उस देवी ने उत्तर दिया कि तेरे पिता सोम शर्मा मेरा परम भक्त था। तू उसका पुत्र है, आज तेरे प्राणों पर संकट देख मुझे आना पड़ा।
ब्राह्मण समझ गया कि भगवत् गायत्री देवी है। उसने साष्टाँग दण्डवत प्रणाम करके कहा-माँ इतनी दया मुझ पर है फिर मुझे दर्शन क्यों नहीं होते।
भगवती ने कहा-यह उस तेरे पिता के पुण्य का प्रताप था कि मुझे आज तेरे प्राणों की रक्षा के लिए यह सब करना पड़ा है और तू ब्राह्मण होकर नीच कर्म करता है। ऐसे लोगों को मेरा दर्शन होने लगे, तो वेद-शास्त्रों की मर्यादा और मेरा महत्व ही क्या रहेगा।
ब्राह्मण ने पुनः-पुनः साष्टाँग प्रणाम किया और क्षमा याचना की तो भगवती ने कहा-मैं तुझसे प्रसन्न हूँ कि तूने एक माला जप करने को पिता की आज्ञा का पालन किया है। अब इस कर्म को छोड़कर तू जप ही को अपने जीवन का लक्ष्य बना ले, तो सर्वथा सुखी होगा और उचित समय पर दर्शन होंगे। इतना कहकर भगवती अन्तर्ध्यान हो गई।
इस आख्यायिका से हमें यह उपदेश मिलता है कि (1) नित्य बिना नागा (2) समय पर (3) श्रद्धा और सत्कार पूर्वक (4) दीर्घकाल तक (संसारी धन्धों में लगे रहकर भी ) जप करते रहने से महान भय से रक्षा होती है और जीवन सफल हो जाता है।
(पं. वैजनाथ जी तिवारी जबलपुर)
मेरी उम्र इस वक्त 46 वर्ष की है, मैं केवल छठवीं तक अंग्रेजी पढ़ सका हूँ, मेरी पिताजी जमींदार थे जब में कुछ समझने योग्य हुआ तब जमींदारी जाती रही। बड़े भाई का देवलोक हो गया और थोड़ा सा कर्ज अदा करने के लिए मकान का एक हिस्सा बेचना पड़ा। भविष्य बहुत भयानक दिखने लगा यहाँ तक कि परिवार का खर्च सम्हालना कठिन हो गया। सन् 1940 में मुझे अपनी ससुराल मौजा उत्तरी फरुक्खाबाद लाइन, जिला, कानपुर जाने का मौका पड़ा। वहाँ मुझे मेरे एक रिश्तेदार मौजा, बरुआ, पास चौबेपुर जिला कानपुर लिवा ले गये। मौजा बरुआ में, श्री गंगा जी तट, श्रीमान् परिव्राजकाचार्य श्री 108 स्वामी ज्ञानाश्रम जी महाराज के मैंने दर्शन किये और उनसे मैंने गुरु दीक्षा देने की प्रार्थना की। श्री स्वामी जी ने मुझे गुरु दीक्षा इस इकरार पर देना मंजूरी की कि मैं स्वयं पहले सवा लाख गायत्री जप करूं और संख्या पूर्ण होने पर अपनी रिपोर्ट उनके पास भेजूँ! मेरे सामने हर तरह की कठिनाइयाँ थी इन सब मुसीबतों से बचने के ख्याल से मैंने श्री स्वामी जी की आज्ञा का पालन किया और उनसे गुरु दीक्षा मन्त्र उपदेश ग्रहण किया। श्री गुरुजी ने मुझे यह उपदेश दिया कि प्रतिदिन प्रातः व सायंकाल श्री गायत्री तथा गुरु मन्त्रजप निश्चित संख्या में करता रहूँ। उसकी आज्ञानुसार आज 12 वर्ष से मैं नित्य जप करता आ रहा हूँ।
सन् 1944 में मुझे अपनी भतीजी की शादी करनी पड़ी उस समय मेरी आर्थिक दशा बहुत कमजोर थी और मुझे किसी भी नजदीकी और अन्य रिश्तेदारों से भरोसा नहीं था कि वे मेरे खर्च में मदद देंगे। मेरी भी हार्दिक इच्छा थी कि मुझे ऐसा मौका न आवे कि इस कार्य के लिए कर्ज लेना पड़े या किसी रिश्तेदार से रकम की मदद लेना पड़े। श्री गायत्री माता तथा इष्ट देव का स्मरण कर और उन्हीं की आज्ञा समझ मैंने कार्य शुरू किया और कार्य निर्विघ्न बड़े सुन्दर रूप से समाप्त हुआ जिसका मुझे खुद आश्चर्य है। इस कार्य को सुन्दर रूप से समाप्त होता देख मेरे शुभचिन्तक पड़ौसी तथा रिश्तेदार मुझे बहुत लायक (हैसियतदार) व सपूत समझते लगे और तब से मुझसे कर्ज माँगने की आशा रखने लगे समय फिर बदला और सब वास्तव में श्री गायत्री माता तथा इष्टदेव की दया और आशीर्वाद का फल है। शुरू में जो मेरी योग्यता के अनुसार मुझे मजदूरी मिलती थी आज उसी काम में मुझे मेरी जरूरत के मुताबिक अच्छी मजदूरी मिल जाती है और अब वस्त्र, अन्न संकट से पूर्ण युक्त हूँ।
गत वर्ष कुँवार में सन् 1951 मेरे दाहिने पैर में घुटना के ऊपर और कमर के नीचे मरण संकट दर्द हो गया। अनेक उपचार किये पर आराम नहीं मिला। एक रात्रि को जब दर्द से इतना व्याकुल हो गया कि लेटने बैठने से असमर्थ हो गया माता को इस रूप में स्मरण कर ध्यान किया कि माता ये दण्ड मुझे किस खोटे कर्म के लिए मिल रहे हैं, आपका स्मरण तो में कुछ काल से नित्य कर रहा हूँ कैसे समझूँ कि आप दयालु हैं दर्द से तो प्राण निकल रहे हैं। मेरी कराहना सुन मेरी स्वयं माता मेरे पास आई और वे मेरी बुआ की लड़की मेरी बहिन को बुलाकर ले आई जो अपने साथ एक शीशी में कुछ 10-20 बूँद दवा लेकर आईं। उन्होंने वह दवा लगाकर थोड़ी देर अपना हाथ फेरा बस पाँच मिनट में मेरा दर्द जाता रहा पर क्षणिक दर्द रह गया। मैंने बहिन जी से दवा का नाम पूछा तो उन्होंने बताया कि वह दवा ‘दिल आराम तेल’ है जो दिल आराम फार्मेसी मौलवीगंज लखनऊ से प्राप्त हो सकता है। दर्द में जब ऐसा तत्काल आराम मिला तो मैंने पाव भर तेल वी. पी. से 13 रु. 8 आना का मंगाया और उसे इस्तेमाल किया पर पहले दिन जो क्षणिक दर्द रह गया था वह दर्द उस दवा से नहीं गया। तब मेरा और भी पक्का विश्वास हुआ कि मरण संकट दर्द में तत्काल आराम मिलना, श्री गायत्री माता से प्रार्थना करने का ही फल था। यह सब चमत्कार देख मेरी अटूट श्रद्धा बढ़ गई है।
अब मैंने जीवन में यह निश्चय कर लिया है कि अपने स्वल्प साधन के साथ ही साथ अधिक से अधिक में श्री गायत्री जप का प्रचार करूं। इसी उद्देश्य को लेकर मैंने अपने मित्रों के सहयोग से श्री गायत्री प्रचार मण्डल की शहर में स्थापना सन् 1951 में की और हर पंद्रहवें दिन रविवार को श्री गायत्री प्रचार हेतु बैठक करता आ रहा हूँ। इसी तरह श्री गायत्री प्रचार का कार्य ग्वारीघाट में श्री नर्मदा नदी तट पर भी इसी साल से चालू कराया है। मेरा विश्वास है कि श्री गायत्री जप नित्य बिना नागा, समय पर, श्रद्धा और सत्कारपूर्वक, दीर्घकाल तक संसारी धन्धों से लगे रहने पर भी जप करते रहने से महान भय से रक्षा होती है और जीवन सफल हो जाता है और साधक अन्न वस्त्र संकट से पूर्ण मुक्त रहता है।
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गायत्री चैव वेदाश्च् ब्रह्मण्य तोलिता पुरा। वेदेभ्यश्च चतुर्भ्योऽपि गायत्र्यति गरीयसी॥
प्राचीन काल में ब्रह्मा जी ने गायत्री को वेदों से तोला, तो चारों वेदों से भी गायत्री का पल्ला भारी रहा।
नास्ति गंगा समं तीर्थं न देवः केशवात्परः। गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति॥
गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं और गायत्री से श्रेष्ठ जप न, कोई आज तक हुआ न आगे होगा।
गायत्र्या न परं जप्यं, गायत्र्या न परं तपः। गायत्र्या न परं ध्यानं, गायत्रया न परं हुतम॥
गायत्री से बढ़कर कोई जप नहीं, गायत्री से बढ़कर कोई तप नहीं, गायत्री से बढ़कर कोई ध्यान नहीं, और गायत्री से बढ़कर कोई यज्ञ नहीं है।
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(श्री कृपाराम जी पाण्डेय, सीरबड़)
(1) मेरे अध्ययन काल में पं. वामदेव जी मिश्र ने यह कथा उपदेश रूप में हमको सुनाई थी। मथुरा दत्त नाम के एक ब्रह्मचारी काशी में विद्याध्ययन करते थे, उनका भोग एक समय का दो सेर का होता था, कोई उन्हें खिलाने को तैयार नहीं होता था, एक तेली उन्हें खाना देने के लिए तैयार हुआ उस समय आटे की मशीन नहीं चलती थी उसकी स्त्री स्वयं पीसकर देती थी, कुछ दिनों बाद वह ऊब गई और अनुचित शब्दों द्वारा एक दिन फटकारने लगी और कहने लगी कि इस निगोड़े को खिलाते खिलाते मेरे चूतड़ों में चट्टे पड़ गये अब मैं आटा पीसकर इसे नहीं दूँगी, इससे अपमानित हो ब्रह्मचारी जी चल दिये, परन्तु तेली ने अपनी स्त्री को बहुत कटुवचन कहते हुये, ब्रह्मचारी जी से प्रार्थना करने लगा-महाराज! आप प्रतिदिन की तरह मेरे यहाँ से भोजन सामग्री ले जाया करें। किन्तु वे नहीं लौटे किसी महात्मा के पास जाकर आपने इस व्यथा को व्यक्त किया। महात्मा ने उन्हें गायत्री मन्त्र जप का विधानतः निर्देश दिया और वे उसी से दक्षिण, रामनगर के सामने निरन्तर रहकर जप प्रारम्भ कर दिया। जैसे दिन बीतने लगे लोग उनके पास भोजन के लिये नाना प्रकार की वस्तुएँ ले जाने लगे लेकिन वे सबको मना कर देते, अन्त में जप पूर्ण होने पर, श्री काशी नरेश जी स्वयं उनके पास आये और कहने लगे कि महाराज! हवनादि में जो खर्च लगे मैं दूँगा आप विधिवत इसको पूर्ण करें। किन्तु उन्हें कहा हमारा सम्पूर्ण कार्य जप से ही पूर्ण होगा, मुझे किसी की सहायता की आवश्यकता नहीं है, इस तरह जप पूर्ण कर यहाँ से वे प्रयाग चले गये और वहाँ प्रयाग के दूसरे किनारे पर झूँसी के पास कुटिया बनाकर रहने लगे।
कुछ काल के बाद यह बहुत प्रसिद्ध हो गये, और अनेक प्रकार के चमत्कारों द्वारा लोगों का कार्य भी समय समय पर कर दिया करते थे। जब गोरखपुर के पय आहारी (पवहारी ) बाबा ने इनकी इस प्रशंसा को सुना तो एक दिन अपने दलबल के साथ लगभग 10 बजे रात्रि को आ पहुँचे और परीक्षा लेने की दृष्टि से इनके यहाँ कहलवा दिया कि मैं आपका आज अतिथि हूँ और हमारे यहाँ आज एकादशी होने के कारण हाथी, घोड़े, ऊँट तक फलाहार ही करते हैं, आप इसका उचित प्रबन्ध करदें। ब्रह्मचारी जी के पास उस समय एक व्यक्ति बैठा था जो एक पाव सिंघाड़े का हलुआ और आधा सेर दूध लेकर आया था। ब्रह्मचारी जी ने कहा कि भाई इतना कष्ट करो कि दो नाँद कोरी लादो वहाँ से गाँव एक मील था वह आदमी जाकर दो नाँद ले आया। ब्रह्मचारी जी ने उससे कहा कि एक नाँद में दूध और एक में हलुआ रखकर कपड़े से ढ़क दो और जाकर बाबा जी से कह दो कि अपने आदमियों को भेजकर सामान यहाँ से मँगवा लें और तुम घर चले जाओ, वह बाबाजी को सन्देशा देकर घर चला गया और बाबाजी के सभी आदमी, घोड़े ऊँट आदि उस नाँद के सामान से ऊब गये और वह समाप्त नहीं हुआ। प्रातःकाल बाबा जी आकर चरणों पर गिर पड़े और कहने लगे कि मैंने बड़ा अपराध किया जो इस तरह आपकी परीक्षा ली आपका बहुत चमत्कार है। ब्रह्मचारी ने कहा हमारे में कोई चमत्कार नहीं है, यह सब गायत्री माता का चमत्कार है। कुछ दिनों के बाद वे अपने यहाँ आने वालों से उन्होंने कहा कि अब मैं अमुक दिन यहाँ से जाने वाला हूँ। और उस दिन यमुनाजी में एक प्रकाश दिखलाई दिया और ब्रह्मचारी जी उठकर उस प्रकाश के पास गये और उसी के साथ लुप्त हो गये।
(2) हमारे प्रपितामह प्रयाग दत्त पांडेय गायत्री के उपासक थे और माता के बल से ही वे कई बार चिकित्सा में आश्चर्यजनक कार्य करते थे, एक बार एक जगह जा रहे थे रास्ते में कुछ लोगों ने कहा कि वैद्यराज जी हमारे यहाँ एक रोगी है उसे देखते जाइये। उस रोगी को देखा तो उसकी सन्निपात से अन्तिमावस्था जान पड़ती थी और 8 वैद्य उपस्थित थे उन लोगों ने जवाब दे दिया था और दो घण्टे का ही मेहमान बता रहे थे, उस रोगी को सबके सामने ही कण्डे की राख उठाकर तीन पुड़िया बनाकर दे दीं और कहा कि अदरक के स्वरस मधु से आज दे दो और कल पथ्य दे देना कहकर वहाँ से चले गये, शेष वैद्यों ने पागल कहकर मजाक किये, किन्तु दूसरे दिन वह स्वस्थ हो गया और उसे पथ्य दिया गया। इस तरह अनेक घटनाएँ उनके जीवन की हैं, एक कुआँ जो हमारे यहाँ के जमींदार द्वारा बनवाया जाता था कुछ बनने पर गिर जाता था। इस पर बाबू नवलकिशोर सिंह ने कहा कि यदि मेरे बनवाये एक कुआँ भी नहीं बन रहा है तो मैं अनशन कर प्राण दे दूँगा, लोगों ने इनसे कहा ये उनके पास गये और बाबू साहब से कहने लगे आप अन्न ग्रहण करें मैं कल कुआँ बनवा दूंगा और प्रातःकाल वे कुएँ में स्वयं बैठकर गायत्री का जप करने लगे, कुआँ बनने लगा 10 हाथ बँधने पर दीवार गिरने लगी राजगीर निकल गये और उनसे भी कहने लगे कि आप भी शीघ्र निकल आवें। नहीं तो कुआँ बैठ रहा है, उन्होंने इशारे से मना कर दिया और माला समाप्त कर टेढ़ी दीवार का स्पर्श हाथों से कर राजगीरों से कहने लगे कि आकर जुड़ाई प्रारम्भ करो कोई गड़बड़ी अब नहीं होगी। वे सब भीतर जाकर चिनाई करने लगे सायंकाल तक कुआँ जुड़ गया किन्तु कुछ देर के लिए पत्थर घट गया तो उन्होंने कहा आज जैसे हो पूरा करलें नहीं फिर मेरे निकलने के बाद इसकी जुड़ाई फिर नहीं हो सकेगी, तो ईंटों द्वारा शेष को पूर्ण किया गया। वह कुआँ आज भी वैसे ही तैयार है। लगभग 100 वर्ष की बात है।
(3) हमारे पितामह बाल्यावस्था से ही गायत्री जप में लग रहे थे जिनका प्रभाव यह था कि रोगी को या उसके दुख को देखकर ही रोगी के अच्छा होने और मरने का बिलकुल ठीक ठीक समय (तिथि, वार और घण्टा तक) बता देते थे, असाध्य रोगियों की न चिकित्सा ही करते थे न देखने ही जाते थे। जीवन के अन्तिम 15 वर्ष तो अहर्निशि गायत्री जप हवन व वेद पाठ में ही लगा दिये थे। मृत्यु से पहले कुछ लोगों से कहते थे कि मैं जितना जप करना चाहता था उसमें कमी रह गई अतः मुझे पुनः जन्म ग्रहण करना पड़ेगा, अब अमुक समय मेरी मृत्यु हो जायगी और उसी समय वे दिवंगत हुए।
( श्री पं. हरिशंकर पाण्डेय शास्त्री, इटारसी )
गायत्री उपासना की शिक्षा मुझे 11 वर्ष की आयु में उस समय मिली जब मेरा यज्ञोपवीत हुआ था। जिस दिन से यह महामन्त्र मुझे मिला उस दिन से लेकर आज पर्यंत मैं पूर्ण श्रद्धा और लग्न के साथ नियमित रूप से इस साधन को करता हुआ चला आ रहा हूँ।
गायत्री के अनेक लाभ बताये जाते हैं उनमें से कुछ को मैंने अपने जीवन में प्रत्यक्ष देख लिया है। पहला लाभ जिसका मैंने भली भाँति अनुभव किया है यह कि जिससे साधक की बुद्धि निर्मल एवं कुशाग्र बनती हैं। मैं पढ़ने में सदैव तेज रहा, स्मरण शक्ति और धारणाशक्ति सदैव तेज रही, 25 वर्ष की आयु में मेरी शादी हुई इससे पूर्ण ही आयुर्वेद की परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर चुका था।
घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी, मैं एक अच्छा दवाखाना खोलना चाहता था। घर के लोगों से चर्चा की तो उन्होंने दवाखाना खोलने लायक पैसा जुटाने में असमर्थता प्रकट की। दूसरी कठिनाई यह थी कि इटारसी जैसे नगर में जहाँ बीसों डॉक्टर, वैद्य और अस्पताल मौजूद वहाँ नये एवं छोटे दवा-खाने का चलाना कठिन दिखाई पड़ता था। सब लोग मुझे नौकरी देने की सलाह दे रहे थे। इच्छित व्यवसाय करने का मार्ग रुका हुआ दिखाई पड़ता था। निराशा और चिन्ता से मेरा मन भारी हो रहा था।
एक दिन अस्थिर चित्त से जब मैं पूजा में बैठा हुआ माता से अपनी मनो व्यथा कह रहा था तो अचानक ऐसी अन्तः प्रेरणा हुई कि “मैं अपना कार्य आरम्भ करूं मुझे दैवी सहायता मिलेगी।” मुझे उत्साह प्राप्त हुआ और एक छोटा सा किराये का मकान लेकर औषधालय आरम्भ कर दिया।
कार्य में आशाजनक सफलता मिली, जिस रोगी पर हाथ डाला वह अच्छा ही हुआ। अनेकों असाध्य और कष्ट साध्य रोगी अच्छे करने का श्रेय अपने को प्राप्त हुआ। साथ ही धन और यश की भी वृद्धि हुई। इन थोड़े से ही दिनों में दस हजार से अधिक रुपया लगा कर अपना निजी मकान बनाया है। बगीचा, औषधालय मरीजों के वार्ड आदि बनाने के लिये 30 एकड़ जमीन खरीदी है जिस पर शीघ्र ही एक विशाल भवन बनने की तैयारी हो रही है। हजारों रोगियों की सेवा इस छोटे दवाखाने से आज भी हो रही है फिर नयी व्यवस्था के अनुसार तो और भी विशाल पैमाने पर सेवा कार्य होना संभव है।
यह सब गायत्री उपासना का ही चमत्कार है। अन्यथा कुछ ही समय पहले जब औषधालय खोलने लायक पूँजी, सहायता एवं सुविधा की कोई व्यवस्था न थी कौन यह आशा करता था कि साधनों के अभाव में भी इस प्रकार की उन्नति सम्भव है।
आत्मिक दृष्टि से गायत्री उपासना द्वारा जो लाभ हुए हैं उनका उल्लेख न करना ही शिष्टाचार की दृष्टि से उचित है, माता मेरी अन्तःभूमि को जिस प्रकार निर्मल करती जा रही है उस प्रगति को देखते हुए यह आशा करना भी अनुचित नहीं कि अपना मनुष्य जन्म निष्फल जायगा।
( श्री मगन लाल गाँधी, नवसारी )
कठिन प्रारब्ध भोगों का कुचक्र ऐसा है जिसे भोगे बिना मनुष्य को छुटकारा नहीं मिलता। दशरथ जी भगवान राम के पिता थे, उनकी मृत्यु पुत्र शोक में अर्त बिलख बिलख कर हुई। इस प्रकार की मृत्यु संसार में सबसे अधिक कष्टदायक होती है। रामचन्द्र जी भगवान होते हुए भी अपने पिता जी को ऐसी करुणा जनक मृत्यु से न बचा सके। इसी प्रकार पाण्डवों का वृत्ताँत है। द्रौपदी का अपमान, अभिमन्यु का वध, अज्ञात वनवास, दास्यवृत्ति, नाना प्रकार के त्रास और अन्त में बर्फ में गलकर मरने की पीड़ा इतने दुख पाण्डवों को निरन्तर सहने पड़े, बेचारे जीवन भर परेशान रहे। भगवान कृष्ण उनके परम सखा, सहायक एवं सम्बन्धी थे फिर भी वे उनके प्रारब्ध भोगों को मिटाने में सफल न हो सके।
कई बार सत्पुरुषों को भी पूर्व संचित प्रारब्ध भोगों के कारण दुख उठाने पड़ते हैं। राजा विक्रमादित्य, हरिश्चन्द्र, अम्बरीष, नल आदि को जो कष्ट उठाने पड़े वे किसी से छिपे नहीं हैं। अहिल्या, द्रौपदी, शैव्या, आदि देवियों को जो कष्ट सहने पड़े उसमें उनके तात्कालिक कर्म कारण नहीं थे। उनके तत्कालीन जीवन तो परम पवित्र थे उसमें कोई कारण त्रास मिलने का न था फिर भी उन्हें किन्हीं भोगों को भोगने के लिए विवश होना पड़ा। ऐसी घटनाएं इस संसार में अनेकों घटित होती रहती हैं।
मुझे भी एक ऐसी ही घटना का सामना गत वर्ष-2 अप्रैल सन् 52 को करना पड़ा। मेरी दुकान में अचानक आग लग गई और देखते देखते हजारों रुपयों का सामान जलकर भस्म हो गया। अग्निकाण्ड की भयंकरता को देखते हुए पड़ौसी दुकानदारों का प्राण सूख रहा था, उनकी दुकान में भी आग फैल जाती तो अनेकों का भयंकर अनिष्ट होता। आग बुझाने के प्रयत्नों के साथ साथ हम लोग मन ही मन भगवान को पुकार रहे थे कि अब इस अनिष्ट को आगे बढ़ने से रोकिये। मेरी श्रद्धा गायत्री माता पर है माता का ध्यान रखने और उनसे अपनी आर्त पुकार करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न सूझ पड़ता था। दुकान जल जाने के बाद फिर क्या होगा मेरा कैसे गुजारा होगा यह चिंता सभी दर्शकों एवं हितैषियों के चित्त को दुखी बना रही थी। किसी प्रकार आग काबू में आई और उद्विग्नता कम हुई।
दुकान की आग बुझ गई पर चिन्ता और निराशा की आग जल उठी। हरि का हरनाम सहायक होता है। गायत्री माता से बेड़ा पार करने की पुकार करने लगा। और करता भी क्या ?
सच्ची प्रार्थना निष्फल नहीं जाती। मेरी भी निष्फल नहीं गई। कुछ समय पूर्व अनायास और अनिष्ठा पूर्वक दुकान का बीमा करा लिया था वह इस आड़े समय में काम आया जितनी हानि हुई थी उसके अधिकाँश की पूर्ति हो गई। एक और से मेरा भोग भुगत गया दूसरी और विगत कई वर्षों की लगातार गायत्री उपासना के फलस्वरूप उस हानि की पूर्ति भी हो गई।
काल पुरुष अपना काम करता है, प्रारब्ध भोग छूटते नहीं, पर माता की कृपा भी अपना काम करती है। डॉक्टर का तेज चाकू आपरेशन करता है पर दयामयी नर्स शीतल मरहम लगाने को तैयार रहती हैं। माता का अंचल पकड़कर हम अपने कठिन कर्मों के भवसागर को आसानी और सुविधापूर्वक पार कर सकते हैं।
(पं. बालाराम शर्मा, भोपाल )
गायत्री उपासना से धीरे-धीरे मनुष्य के सब संकट दूर होते हैं पर कई बार ऐसा भी होता है कि तत्काल भारी संकट से निवृत्ति हो जाती है। यों तो भगवान भक्तों का कल्याण सदैव ही करते हैं पर आपत्ति पड़ने पर वे ग्राह के मुख से गज को छुड़ाने के लिये जिस प्रकार दौड़े आये थे उसी प्रकार गायत्री माता भी आपत्ति के समय रक्षा करती है, इसके अनेक उदाहरण हमने देखे हैं उनमें से एक उदाहरण नीचे लिखा है।
इसी वर्ष कार्तिक कृष्णा की बात है। प्रातः काल मैं उपासना पर बैठा हुआ था, जप पूरा पुरा भी न हो पाया था कि दरवाजे पर बड़ी घबराहट भरी आर्त पुकार सुनाई पड़ी। पुकारने वाला व्यक्ति मेरे पास दौड़ता हुआ सीधा आया और बोला-भैया अनर्थ हो गया, मेरी इकलौती लड़की को काले विष धर साँप ने काट लिया, उसको किसी प्रकार बचाओ, तुम्हारा पूजा पाठ मेरे फिर किस काम आयेगा। चलो, तुरन्त उठो और उसके प्राण बचाओ।
मैंने हाथ के इशारे से कुछ ठहरने को कहा और आधी माला को पूरा करके उठ बैठा। बात चिन्ताजनक थी, इधर के विषधर साँप बड़े भयंकर होते हैं उनके काटने पर कोई विरला ही बच पाता है। बालिका बड़ी मृदुल थी। उसकी इस प्रकार मृत्यु होने की कल्पना से मेरा भी जी टूटने लगा। जल्दी पैर बढ़ाता हुआ मैं उसके साथ चल दिया।
जाकर देखा तो लड़की बिलकुल बेहोश थी, नेत्र लाल हो रहे थे, मुख से विषैला फेन निकल रहा था। ऐसे मृत्यु के मुख में जाते हुए प्राणी को निकालने के लिये क्या उपचार हो सकता था, इस छोटी बस्ती में किसी अच्छे उपचार की तत्काल व्यवस्था होने की भी सुविधा नहीं। फिर अपने बूते की जो बात हो उसे तो करनी ही चाहिये। मेरे ऊपर उपचार का भार डाला गया था। ‘निर्बल के बल राम होते हैं, मेरे पास गायत्री के अतिरिक्त और, कोई दवा दारु नहीं। उसी का प्रयोग बालिका पर आरम्भ कर दिया।
गायत्री मन्त्र से बालिका को मैंने झाड़ना आरम्भ किया। श्री. पुरुषोत्तम राय सारकेट मेरी सहायता कर रहे थे। प्रयोग आरम्भ हुआ साथ ही उसका चमत्कारी लाभ भी दृष्टिगोचर होने लगा। बालिका की बेहोशी दूर होने लगी, मुँह से निकलने वाला झाग बन्द हुआ और आंखें खुलने लगी। हमारा उत्साह बढ़ा। गायत्री से मन्त्रित करके कालीमिर्च उसे खिलाई और अभिमन्त्रित गंगाजल पिलाया। बच्ची के प्राण बच गये। एक दो दिन में ही वह चलने फिरने लगी।
माता की कृपा से क्या नहीं हो सकता? मौत के मुँह में प्रवेश हुए प्राणी पुनः लौट सकते हैं। विषधर सर्प के दांतों का हलाहल भी पानी जैसा हानिरहित बन सकता है।
(श्री प्रहलाद सिंह धर्मप्रेमी, गुड़गाँव)
मैं कई वर्ष से तत्परतापूर्वक गायत्री की उपासना कर रहा हूँ। हमारे घर में गायत्री माता के प्रति सभी की श्रद्धा है। गायत्री सम्बन्धी पुस्तकें पढ़ने के बाद यह विश्वास बहुत गहरा हो गया है कि मनुष्य के लौकिक और पारलौकिक कल्याण के लिए उस महामन्त्र का साधन करना बहुत आवश्यक है।
सुनते है कि ऐसे अनेकों महात्मा हुए हैं जिन्होंने गायत्री का तप करके बड़ी ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त की हैं। उनमें से अनेकों में भूत भविष्य का ज्ञान तथा दूसरों को लाभ पहुँचाने की यहाँ तक कि प्राण बचाने की भी शक्ति थी। बहुत से लोग इन बातों पर सहसा विश्वास नहीं करते क्योंकि उन्हें इसके लिए प्रत्यक्ष उदाहरण दिखाई नहीं पड़ते। पर मैंने अपने घर में ही ऐसा उदाहरण देखा है जिसके कारण यह विश्वास दृढ़ होता जा रहा है कि माता को आत्म समर्पण करने वाले साधक निस्सन्देह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं और सर्व समर्थ बन सकते हैं।
कुछ महीने पहले की ही बात है। मेरी धर्मपत्नी कुंए से पानी भर कर लाई, घर में ही कुँआ है। रोज ही पानी भरती थी पर कभी कोई खराब बात न होती थी। उस दिन वह आई और पानी भरती मुझ से बोली- कोई इस कुँए में गिरेगा, उसका बचना मुश्किल है।
उसके यह शब्द बड़े अटपटे थे। कुँए में गिरने और मुश्किल से बचने का कोई प्रसंग उस समय न था। मैंने उसकी बात को बेतुकी और मूर्खतापूर्ण समझकर अनसुना कर दिया। कुँआ बने मुद्दतें हो गईं उसमें कभी कोई नहीं गिरा तो अभी कोई उसमें कैसे गिरेगा? और गिर भी पड़ेगा तो मुश्किल से बचेगा, इस बात की कोई संगति न थी। स्त्रियाँ अकसर ऊटपटाँग बातें सोचा करती हैं अपनी इस सहज मान्यता के कारण मैंने उसकी बात पर कुछ भी ध्यान न दिया और अनसुनी करके अपने काम से चल दिया।
इस बात को कोई पाँच मिनट ही हुए होंगे कि पीछे की ऊपर वाली छत में से मेरे छोटे भाई का ढाई वर्ष का लड़का कुंए में आ पड़ा। बच्चे के गिरने की आवाज सुनते ही सब लोग हड़बड़ा गये छत पर से कुंए में गिरना, ढाई वर्ष का बालक गहरा पानी, कुंए का पक्का भीतरी भाग इन सब बातों को एक साथ सोचने पर आँखों के सामने भयंकर अनिष्ट का घोर अन्धकार सामने आ खड़ा हुआ।
क्षण भर में निकालने का प्रबन्ध किया गया, रस्सी के सहारे एक व्यक्ति कुंए में उतरा। घर भर में कुहराम मचा हुआ था। सब की आंखें उस कुंए में उतरने वाले व्यक्ति पर लगी हुई थी। मैं गायत्री माता से करुणामयी प्रार्थना कर रहा था कि माता आज सहायता करो, किसी प्रकार बालक के प्राण बचाओ। रोने धोने वाले धर के सब लोग भी गायत्री माता का ध्यान कर रहे थे। कुंए में घुसने वाला व्यक्ति नीचे पहुँचा उसने आवाज दी कि बालक बिलकुल अच्छा है। अभी ऊपर आता है। बच्चे को ऊपर निकाल लिया गया। देखा तो सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, उसको कहीं खरोंच भी न आई थी। प्रसन्नता और सन्तोष से सबके चेहरे खिल गये।
इस घटना को कोई दूसरी दृष्टि से देखना चाहे तो देख सकता है पर मेरी दृष्टि में इसमें माता की कृपा का चमत्कार छिपा हुआ है। स्त्री को किसी के कुंए में गिरने की पूर्व सूचना अकारण नहीं है। वह कहती थी कि मुझे बिलकुल ऐसा लग रहा था मानो कोई अब तब इस कुंए में गिरने ही वाला है। संभवतः उसकी आत्मिक पवित्रता के कारण उसे भविष्य की घटना का पूर्णाभास हो गया था। इतने ऊंचे से गहरे जल में ढाई वर्ष के बच्चे का गिरना और उसका अछूता हंसना खेलना निकलना, हम लोगों के ऊपर दैवी अनुग्रह का विशेष चिन्ह ही है। हम लोगों की साधना बहुत स्वल्प है, उसका फल यदि हो सकता है तो नैष्ठिक उपासक और पूर्णरूपेण माता को आत्म समर्पण करने वाला साधक यदि बहुत कुछ पाते हैं, ऋद्धि सिद्धियों के स्वामी बनते हैं तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए।
(श्री रघुनाथ राव, दिल्ली)
मालिक चाहते हैं कि नौकर उनके काम का ठीक प्रकार अंजाम दे। तनख्वाह देने के साथ साथ उनकी चाहना उचित है। नौकर भी कुछ ईमानदार होते हैं कुछ बेईमान, बेईमान नौकर अच्छी परिस्थितियों में भी काम से जी चुराते हैं, या उनमें बिगाड़ पैदा करते है, इसके विपरीत ईमानदार कर्मचारी को बुरी परिस्थिति में रहना पड़े तो भी वह जहाँ तक हो सकता है मालिक के बताये हुए काम तथा उत्तरदायित्व को पूरा करता है। मैं अपनी अन्तरात्मा के सामने ईमानदार व्यक्ति हूँ और सदैव यही सोचता रहता हूँ कि मालिक के काम को सच्चे मन से पूरा करूं।
अपनी इस कर्तव्यनिष्ठा के कारण मुझे अपने साथियों की अपेक्षा कहीं अधिक श्रम तथा समय लगाना पड़ता है, इसके अतिरिक्त उस अपनी आमदनी से भी वंचित रहता हूँ जिसके ऊपर सभी लोग गुलछर्रे उड़ाया करते है। कर्तव्य निष्ठ एक कसौटी है जिस पर रोज ही अपने को घिसना पड़ता है, ईमानदारी एक अग्नि परीक्षा है जिसमें ईमानदार को रोज ही तपना पड़ता है। यह दोनों ही परिणाम भुगतने का मैं बहुत समय से आदि हो गया हूँ। मेरी बेबसी और परेशानी पर कुछ सहृदय लोग तो सहानुभूति दिखाते हैं पर साधारणतः मुझ जैसे लोग मूर्ख कहलाते हैं और उपेक्षा की दृष्टि से देखे जाते हैं।
अनुकूल वातावरण न होने और अनेक असुविधाएं रहने पर अच्छा नौकर भी अपनी योग्यता का ठीक प्रकार परिचय नहीं दे पाता, पूरी शक्ति भर काम करते देखकर अफसर लोग प्रसन्न भले ही होते हों पर मेरा अन्तःकरण प्रसन्न न था, मैं चाहता था कि अमुक असुविधायें दूर हो जावें तो मैं और भी अधिक सेवा करने में समर्थ हो सकूँ। गायत्री माता का जप करते हुए मेरे अन्तःकरण में रहने वाली यह कामना भी माता को प्रकट हो ही जाती है।
जिस विभाग में, मैं पड़ा हुआ था, उसमें से बाहर जाने की बदली होने की सम्भावना न थी, मैं उससे बदली चाहता था, पर चाहने से ही क्या हो सकता है, कई बार के छोटे-मोटे प्रयत्न निष्फल भी हो चुके थे। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक होती है, गायत्री माता को अपने मन की व्यथा सुनाकर सन्तोष कर लेता।
अचानक ऐसा लगा मानों मेरी व्यथा का निवारण होने वाला हो। ता. 17.2.52 को गायत्री कवच मैंने धारण किया। दूसरे ही दिन दोपहर को 12 बजे चिट्ठी आई कि एक अच्छे स्थान पर बदली के लिए हम लोगों के “शॉर्टहैंड की” परीक्षा एक घण्टे बाद 5 बजे होगी। 1 घंटे में तो कोई तैयारी भी न हो सकती थी, पर इच्छा अवश्य थी कि यह स्थान मुझे मिल जावे तो उत्तम है। माता का ध्यान और स्मरण इस क्षण मन ही मन बड़े जोरों से होने लगा।
परीक्षा हुई। परिणाम निकला तो मालूम हुआ कि मैं पहले ग्रुप में सर्वप्रथम रहा और रेलवे मिनिस्ट्री के दफ्तर में पहुँच गया। कुछ समझ में नहीं आया कि यह सत्परिणाम मुझे किस सुकर्म का मिल रहा है। सब साथी भी हैरान हैं कि इसके पास क्या जादू है जिसे चार महीने के अन्दर दो परिवर्तन प्राप्त कर चुका। जिस पद पर अभी नियुक्ति हुई है उसका ग्रेड 330 तक है।
आगे जो होना होगा, होगा। माता की शरण लेकर में बड़ा सन्तुष्ट हूँ। आत्मिक उन्नति के लिए मैं जैसा वातावरण और अवसर चाहता था उसी दिशा में प्रगति हो रही है। अपनी एक ही इच्छा है- “पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता का आदर्श उपस्थित करना” माता मेरी कठिनाइयाँ सुलभ कर उसी स्थान पर ले पहुँचेगी जहाँ इसके लिए उपयुक्त अवसर होगा ऐसा मुझे विश्वास है। इस मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक व्यक्ति ऐसी ही आशा रख सकता है।
(श्री सच्चिदानन्द जी मिश्र, आरा)
मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की बाधाएं और असुविधाएं आती हैं, थोड़े से लोग तो ऐसे होते हैं जो उनकी परवाह नहीं करते और स्थिर चित्त से अपने रास्ते चलते रहते हैं। पर अधिकाँश व्यक्ति ऐसे होते हैं जो छोटी मोटी और कभी कभी की बाधाएं ही बर्दाश्त कर पाते हैं, आये दिन कि कष्टों से उनका चित्त व्याकुल हो जाता है।
अपनी स्थिति उन अधिकाँश व्यक्तियों जैसी ही है अन्य कठिनाइयों की उपेक्षा आए दिन का पारिवारिक कलह मुझे बहुत त्रासदायक लगता है। गरीबी में रहना और सुखी रोटी खाना-सम्पन्न किन्तु पारिवारिक कलह युक्त जीवन की अपेक्षा बुरा नहीं है। ऐसी मेरी मान्यता है।
मेरा एक छोटा भाई है महेशानन्द। उससे मेरी धर्मपत्नी की पटती न थी, आये दिन दाँता किट किट होती रहती, दफ्तर से काम करके जब घर आता और कलह मचा देखता तो चित्त घबराता और इच्छा होती कि ऐसे गृहस्थ से विरक्त होना अच्छा। घर के झगड़ों को सुलझाने की कोशिश भी बहुत की, पर जब कुछ सफलता न मिली तो निराश हो भगवान में चित्त लगाने लगा। ईश्वर भक्ति के लिए गायत्री का जप मुझे उत्तम मार्ग लगा उसे और अधिक तत्परता पूर्वक बढ़ाने लगा।
छोटा भाई महेशानन्द, पिताजी की मृत्यु के बाद बहुत रोगी हो गया था, रोग से निवृत्त होने पर उसकी भी प्रवृत्ति गायत्री उपासना में बढ़ी। मैंने उसे गायत्री उपासना की सलाह दी और उसने मनोयोग पूर्वक नित्य नियमित जप आरम्भ कर दिया। उसका स्वास्थ्य बहुधा खराब रहता था, पर जब से उसने गायत्री की पूजा आरम्भ की है तब से उसका स्वास्थ बहुत सुधरा है। बहुत दामों की दवाएं जितना लाभ नहीं पहुँचा सकती थीं, उससे अधिक निरोगता उसे पूजा द्वारा प्राप्त हुई है।
दूसरी ओर मेरी स्त्री के स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो रहा है। वह दिन दिन मधुरभाषिणी, सहनशील और विवेकवान होती जा रही है, फलस्वरूप अब वह गृह कलह नहीं होता जिसके कारण मेरा चित्त दुखी रहता था और गृहस्थ त्यागकर विरक्त बनने की बात सोचा करता था।
भाई की अस्वस्थता का निवारण पत्नी का स्वभाव परिवर्तन यह छोटी घटनाएं हो सकती हैं। पर मेरी दृष्टि में यह दोनों ही अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, इनके अभाव में मेरा चित्त सदैव दुखी रहता था, पर अब बहुत कुछ शान्ति का अनुभव करता है।
(श्री पृथ्वीराज तिवारी, गोहाटी)
यों तो मैंने विक्रमी संवत् 2006 की गोपाष्टमी से गायत्री माता की पूजा स्वरूप सन्ध्या वन्दन आदि आरम्भ कर दी थी। सन्ध्या काल मालाएं अपनी श्रद्धा भक्ति के साथ दिन में 2 बार प्रातः सायं करता था। पीछे त्रिकाल सन्ध्या भी करने लग गया। परन्तु इन साधनाओं के करते हुए भी मुझको अपनी साधना तथा उपासना पर इतना भरोसा नहीं था। मेरे अन्तःकरण में शंकाएं बनी ही रहती थीं कि मैं जो कुछ कर रहा हूँ वह सही है या त्रुटिपूर्ण। साधना काल के अनुभवों का अर्थ भी नहीं समझ पाता था। बड़ी दुविधा में पड़ा हुआ था। में बहुत दिनों से योग्य महात्मा, पथप्रदर्शक की तलाश में था।
शंकराचार्य आदि महात्माओं के उपदेश पत्रों में गुरु के लिये बहुत ही जोर दिया गया है। उनके पत्रों से मुझको ऐसा अनुभव हुआ कि बिना पोश गुरु के पथ प्रदर्शन के मेरी साधना का श्रम व्यर्थ ही जायेगा। ऐसी बातों से मेरा चित्त बड़ा ही उदास तथा चिन्ताशील रहा करता था। अनुभवी महात्मा और ऋषि केवल वेदमाता को ही अपना आधार मानने वाला गुरु कैसे प्राप्त हो? बड़ी चिन्ता का विषय बन गया।
विक्रमी सम्वत् 2008 की रामनवमी की रात्रि को 2.211 बजे स्वप्नावस्था में एक ऐसी प्रेरणा हुई। उस प्रेरणा के आधार पर गायत्री सम्बन्धी अमूल्य साहित्य तथा सद्गुरु की प्राप्ति सहज हो गई।
जब से गुरुदेव की शरण प्राप्त हुई है, मुझको गायत्री उपासना में बहुत ही सन्तोषजनक प्रगति करने का आनन्द प्राप्त हो रहा है। दिन पर दिन स्वभाव और प्रकृति में भी सन्तोषजनक परिवर्तन हो रहा है। आत्मबल की आशाजनक वृद्धि हुई है। हृदय में बड़ा ही सन्तोष हो रहा है। कुछ यौगिक षट्चक्रों का भी अप्रत्यक्ष रूप में अनुभव होने लगा है, कुछ ही दिनों में वेदमाता के प्रति इतनी श्रद्धा और सन्तोषजनक प्रगति का होना भगवती की कृपा का प्रत्यक्ष प्रमाण मालूम देता है।
पिछले दिनों में मुझको बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इन कठिनाइयों से बचने के लिये मेरे सामने किसी भी प्रकार के साधन नहीं थे। चारों तरफ निराशा के बादल छाए हुए थे। मैं एकान्त में बैठकर बहुत ही हीन शब्दों में माता से अपने संकट को दूर करने की प्रार्थना किया करता था। मुझको ऐसा स्वप्न में भी विश्वास नहीं था कि माता हमारे कष्ट को दूर करने के लिए शीघ्र ही कोई मार्ग निकाल देगी। अन्त में माता ने हमारे हृदय की बात को जानकर सच्ची पुकार को समझ-कर एक बड़ी भारी उलझन भरी समस्या को हल कर दिया। अब हम अपनी साँसारिक उन्नति भी करने में सफल होंगे ऐसी आशा हो गई है।
उपासना काल में बहुत से अनुभव हुए हैं। इन अनुभवों का जिक्र गुरु आज्ञा के बिना करना निषेध है। अतः इस विषय में विशेष बातें नहीं लिखी जा सकतीं।
बहुत से साँसारिक लाभों के अतिरिक्त एक पुत्र रत्न भी हुआ है जिसके लिए पण्डितों के कथनानुसार ऐसे बालक का होना भगवती की कृपा का विशेष रूप से होना ही है।
(डॉ. जगदीश निगम, कानपुर)
मैं डॉक्टर हूँ। डाक्टरी मेरी व्यवसाय है। दो वर्ष से मैं गायत्री की उपासना करता हूँ। रोग निवारण के लिए जितनी उपयोगी दवाएं सिद्ध नहीं होती उससे अधिक गायत्री के उपचार सिद्ध होते हैं। कितने ही कष्ट साध्य रोगियों पर मैं गायत्री मन्त्र का उपयोग करके आश्चर्यजनक लाभ देख चुका हूँ। उनमें से कुछ का संक्षिप्त विवरण नीचे प्रस्तुत कर रहा हूँ।
1- एक 16 वर्ष की लड़की जिसको फिट (दौरे) आने लगे थे और एक दिन वह फिट में पड़ी थी हर तरह से लोग होश में लाने की कोशिश कर रहे थे मगर होश में न आ सकी मैं जब पहुँचा और मंत्र पढ़कर उसके मुँह पर छींटा मारते ही उसने आँख खोल दी और ठीक हो गई लोग देखते रह गये।
2- बच्चे को नजर लग गई थी वह किसी तरह से चुप नहीं होता था, खूब जोर-जोर से रो रहा था और उछलता था मैंने उसके ऊपर 3 बार फूँक कर डाल दिया जिससे बच्चा फौरन ठीक हो गया।
3- एक स्त्री जिसको कि उसकी सौत लगी थी जिससे उसके खून माहवारी बहुत दिनों तक जारी रहता था, खाना नहीं खाती थी, हमेशा लेटी रहती थी इलाज काफी हुआ और बहुत से झाड़ने वाले भी आये मगर कुछ न हुआ जब मेरे पास इलाज के लिये आई तो मैं भी दवा देता रहा जिससे कुछ ठीक नतीजा न मिला। एक दिन मेरी तबियत में माता का ध्यान और इच्छा प्रकट हुई तो मैंने एक गिलास पानी मंगवाया और उसमें 6 बार मन्त्र पढ़-कर फूँक दिया और दिन भर उसको पीने को दिया जिससे वह बिलकुल ठीक हो गई और किसी प्रकार का रोग उसका अब तक नहीं हुआ है।
4- एक 18 साल का लड़का बेहोश पड़ा था बोल बन्द था, उसका इलाज हुआ और झाड़फूंक भी हुई मगर कुछ लाभ न हुआ। तब मेरे पास इलाज को आया मैंने भी दवाइयां दीं, मगर कोई लाभ न हुआ। तब मैंने उसको 7 बार गायत्री मंत्र की फूँक दी 2 दिन के बाद वह ठीक हो गया और फिर दवा होती रही और वह ठीक हो गया।
मेरा ध्यान हर समय अनुष्ठान करने में ही रहता है प्रायः तो मैं 11 माला सुबह और 3 माला शाम को जपता हूँ और पूजा मैं नहीं जानता हूँ। आगे आप मुझको समझाइयेगा। मैं चाहता हूँ कि आप मुझको गायत्री माता की चन्द फोटो यानी 6 फोटो अलग अलग बड़ी साइज की भेजने की कृपा करें। किताब नहीं रखी जा सकती है, कुछ कार्य के अनुष्ठान हवन बतायें ताकि लोगों के यहाँ पर जाकर कर सकूँ और उनको तत्काल लाभ हो जैसा कि यहाँ पर एक सज्जन हवन करते हैं और वह हवन में जरा सी आग रखकर जाप कर रहे हैं जिससे हवन थोड़ी देर में जलने लगता है और लोगों को विश्वास हो जाता है वह श्री हनुमान जी के उपासक मालूम होते हैं उनकी बीवी बुखार में बहुत दिनों से बीमार है मैंने उनसे हवन के लिए कहा था मगर उन्हें विश्वास नहीं है मुझको अकर्सन और फलौन का तरीका बताइयेगा- ताकि मैं अभ्यास करता रहूँ। मेरे पास अनुभव बहुत है मगर मैं आपको क्या क्या लिखूँ खैर चन्द अनुभव मैं आपको लिख रहा हूँ।
1- एक 16 वर्ष की लड़की कुमारी को रोजाना 6-7 बजे शाम को फिट आ जाते थे उसका इलाज किया गया मगर कुछ लाभ नजर न आया उसकी दाँती बैठ जाती थी, हाथ पाँव में ऐंठन होती थी, एक सज्जन ने कहा कि इसके ऊपर वदम देव है नहीं जा सकते हैं। मैं हवन ही करके हटा सकता हूँ और कोई नहीं हटा सकता है। मैंने कहा आज फिट नहीं आवेंगे जाकर उसका हाथ पकड़ कर 7 बार गायत्री मन्त्र पढ़कर फूँक दिया और कहा कि आज तुम सपना देखोगी सुबह बताना फिट नहीं आया और रात में उसने सपने में देखा कि 2 बाबा आये और कहा कि मैं नहीं आ सकती हूँ तो फिर उन्होंने लड़की के पीछे साँप छोड़ दिया लड़की भागी भागी फिरती रही फिर नींद खुल गई। उसकी माँ ने देखा कि एक कन्या लाल चुनरी पहने ऊपर से आ रही है और लड़की के पास आकर गायब हो गई उसी दिन से ठीक है और कोई रोग भी नहीं है।
2- मेरे बच्चे को कई दिन से तेज बुखार था। और खसरा भी निकल आया। मेरी इच्छा किसी दिन भी उससे बोलने को न हुई दवा दे जाती थी। यकायक एक दिन सुबह को जब मैं जाप करके उठा और पानी बच्चे के ऊपर छोड़ा और प्रेम से एक बार मन्त्र से फूँक डाला जिससे फौरन माता ने रक्षा की और बच्चा उसी समय से खेलने लगा।
3- एक अखबार देने वाले का लड़का जिसकी उमर 4 साल की थी खसरा में सख्त बीमार हो गया था यहाँ तक कि बचने की कोई उम्मीद न थी। उस बच्चे का पिता उसके जीवन से निराश हो गया था। मुझको इलाज के लिये बुलाने आया और अभी तक उसने देवी जी के पूजा ही करता रहा था। मैंने देखा और भगवती से प्रार्थना की बच्चा उसी से ठीक होता गया और आजकल आनन्द से खेल रहा है।
4- एक 4 साल का बच्चा तेज बुखार में पड़ा था, चौंकता था, आँख बन्द किये था, दवा डॉक्टर के यहाँ से आई थी और आजकल छोटी माता का प्रकोप भी है। मैंने 7 बार गायत्री मंत्र पढ़कर फूंक दिया और चला आया मगर शाम को उसके पिता भी बच्चे को लाये और बताया कि बच्चा अब बिलकुल ठीक है, गुरुजी दवा तो बिलकुल देने की जरूरत भी नहीं पड़ी, भगवती की कृपा से बिलकुल ठीक है।
(श्री रामचन्द्र प्रसाद जी, दानापुर केन्ट)
सावरि तन्त्र संग्रह ग्रन्थ के लेखक श्री गोविन्द दास विनीत के गायत्री द्वारा प्रेतबाधा निवारण का एक व्यक्तिगत अनुभव छपाया है। उसे अविकल रूप से उद्धृत करके पाठकों के लाभार्थ उपस्थित करते हैं। श्री. गोविन्द दास जी लिखते हैं-
“मेरी मौसेरी बहिन नत्थीखेडा से तालवेहट (झाँसी) आयी। मेरे बहनोई श्री जुगलकिशोर जी वहाँ के पोस्टमैन थे। घर आते आते न जाने क्या हो गया? वह अंट संट बकने लगे और कभी कभी अपना सिर भी पीटने लगी। लगातार 6 महीने तक सारा कुटुम्ब परेशान रहा पर दर्द बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की। श्री देशपति जी एक नामी झाड़ा देने वाले थे। वह भी बुलाये गये। यहाँ मेरी बहन उसी दशा में बोली- “तुम लोग ठीक नहीं कर रहे हो, अभी मैं सिर्फ इसी के प्राण लेने की कोशिश कर रहा हूँ, मगर अब सारे कुटुम्ब का नाश कर दूँगा।” मेरे पिता जी ने पूछा- “कुटुम्ब ने क्या बिगाड़ा है।” बहिन के मुँह से निकला- “तुमने ‘पूरा’ से ठाकुर देशपति को बुलाया है। वह मुझे कष्ट देगा और मैं तुम सब को।” यद्यपि न तब तक देशपति आये थे, और न उनकी कोई चर्चा ही वहाँ चल रही थी। फिर भी माना जा सकता है कि मेरी बहन को किसी तरह खबर पड़ गई हो। जो हो, ठाकुर साहब आये, एक एक को देखकर हंसा, बहन के मुँह से निकला, “तुम चले जाओ तो अच्छा हो।” ठाकुर साहब- “हम तुम्हें अपने साथ लेकर जायेंगे।” बहन- मुझे मालूम है कि तुम मुझे वश में कर सकती हो, परन्तु भाई बन्दी में यह व्यवहार अच्छा नहीं।” “ठाकुर साहब- जब तुम्हें भाई बन्दी का इतना ख्याल है तो तुम्हीं मेरा कहना मानकर चले जाओ। बेचारे ब्राह्मणों को क्यों 6 महीने से दुःख दे रहे हो।”
“बहन-तुम बेजा दबाव न डालो। हम इसे छोड़ नहीं सकते। इसने हमारा हद से ज्यादा नुकसान किया है।”
यह ठीक चीज थी कि बहिन जिस मकान में रहती थी, उसमें एक छोटी सी चबूतरी थी और उसे उसने खोद डाला था। “ठाकुर साहब- जो हुआ सो हुआ अब तुम्हें मेरा कहना मानकर इसे छोड़ देना चाहिए। “बहन- मैं यह मान नहीं सकता।”
“ठाकुर साहब- तो तुझे यत्न करना पड़ेगा।” ठाकुर साहब ठीक हो गयी। उसने अपने पति और ससुर आदि को देखकर घूँघट डाल लिया। सब समझे भूत डर कर भाग गया।
परन्तु दस मिनट के भीतर की वही हालत हो गयी। वह हंसने लगी और बोली- “रोगी का इलाज पीछे करना, पहले घर जाकर लड़के की हालत देख आओ।”
बात कुछ समझ में न आयी और ठाकुर साहब उसे टालकर अपने यन्त्र मन्त्र का सामान बतलाने में लग गये।
कुछ देर बाद भोजन करने बैठे, कि उसी वक्त ‘पूरा’ से आकर एक आदमी ने खबर दी कि उनका लड़का कुँए में गिरकर मर गया है। शोकातुर होते हुए ठाकुर साहब अपने गाँव को चल दिये। उसके दो महीने पीछे तक मेरी बहिन को इतना कष्ट रहा कि उसका अस्थि पंजर मात्र रह गया। ठाकुर साहब फिर आ पहुँचे और बोले- “तूने मेरा जवान लड़का तो खा ही लिया है, पर अब मैं तुझे भी न छोड़ूंगा।
कहना न होगा कि उन्होंने उसी दिन बहिन को ठीक कर दिया, और वह एक ढक्कनदार घड़े में कुछ सामान रखकर विदा हो गये। अपने गाँव के पास पहुँच कर उन्होंने घड़े को एक चबूतरे पर रखा और पेशाब करने बैठ गये। इसी बीच में न जाने क्या हुआ? घड़ा फूट गया और ठाकुर साहब का दूसरा लड़का अपने दरवाजे पर खेलते खेलते ही चक्कर खाकर मर गया। बहिन की हालत फिर वैसे ही हो गयी।
अब तो सभी ताँत्रिकों का साहस टूट गया और एक विनय करने के सिवा दूसरा चारा शेष न रहा। एक दिन बहिन ने आप ही कहा-सवा लाख गायत्री पाठ कराओ, और मुझे गयाजी भेज दो, तो मैं इसे छोड़ सकता हूँ। वही योजना की गयी। कुछ दिन पीछे बहिन बिल्कुल अच्छी हो गयी।
गायत्रयुपासनाकरणादात्मशक्तिर्विवर्धते। प्राष्यते क्रमशोऽजस्य सामीपयं परमात्मनः।11।
-गायत्री की उपासना करने से आत्म-बल बढ़ता है। धीरे-धीरे जन्म बन्धन रहित परमात्मा की समीपता प्राप्त होती है।
(श्री अम्वादास पंडरो शा. सौरब बुरहानपुर)
इस वर्ष चालीस दिन के सवालक्ष के अनुष्ठान के पश्चात् मेरे पिता जी बवासीर (मूल व्याधि) से पीड़ित थे।
नाँदुरे से भाई का पत्र आया, “पिता जी के बवासीर (मूल व्याधि) ने उग्र स्वरूप धारण किया है। वे बेचैन हैं। खाने पीने में अरुचि तो है ही, साथ ही साथ खाने पीने की भी शक्ति नहीं, चल फिर नहीं सकते, निश्चल पड़े हैं। अतीव दुःख अनुभव कर रहे हैं। शहर के प्रसिद्ध डॉ. कुलकर्णी को बुलाया गया-किन्तु उन्होंने कहा कि “यह केस मेरे शक्ति के बाहर है, अतः इन्हें अकोला के प्रसिद्ध सिविल सर्जन के पास जाकर बवासीर का आपरेशन कराओ, अन्यथा रोग दुरुस्त नहीं हो सकेगा।” अतः आप यह पत्र तार के समान समझ कर निकल जाओ।
यह दुःखद पत्र पढ़ कर बड़े भाई, भाभी, तथा मेरे प्राण में प्राण नहीं रहे सबके होश उड़ गये। बड़े भाई तत्काल 5 दिन की छुट्टी लेकर रविवार को नाँदुरा रवाना हो गये। मेरा पूर्ण चित्त पिता जी के जीवन की ओर लगा हुआ था।
रविवार को तथा सोमवार को माता गायत्री से इस विषय में वार्तालाप किया व सोमवार शाम को शैली पर जल एवं तुलसी पत्र लेकर संकल्प रूप से अनुष्ठान का पुण्य फल पिता जी को गायत्री मन्त्र युक्त अर्पण किया व साथ ही साथ यह भावना की कि- “यह मेरी अनुष्ठान की पुण्य शक्ति गायत्री मन्त्र के आधार पर वायु मण्डल को पारकर शीघ्रातिशीघ्र पिता जी की ओर जा रही है और पिता जी को उस महान व्याधि से मुक्त कर रही है। अतः पिता जी स्वस्थ हो गये हैं, खाने पीने लगे, चलने फिरने भी लगे हैं एवं घर में सब की मुद्रा प्रसन्न है।
साथ ही साथ मेरा अन्तःकरण भी सचमुच प्रसन्न हो रहा था। लगातार गायत्री माता से पिता जी के स्वस्थ होने तथा जीवन प्राप्त करने की प्रार्थना करता था।
गुरुवार को जब भाई बुरहानपुर लौट आये तो उन्होंने शुभ सन्देश सुनाते हुए कहा कि “रविवार की रात्रि से सोमवार की शाम तक पिता जी की हालत बहुत सोचनीय थी, जल के अभाव से उनका गला घर्र घर्र बज रहा था। हाथ पैर निश्चित थे। अस्थि पंजर थे उनके बचने का कोई भरोसा नहीं था, उन्हें चारपाई (खाट) से नीचे उतारा गया। घर में सब शोक कर शोर मचाने लगे।
लेकिन शाम को क्या हुआ कि उनकी हालत में विद्युन्मय फरक मालूम हुआ, हाथ पैर हिलने लगे, जल एवं दूध पिया, गले का घर्र घर्र बजना बन्द हुआ, दूसरे दिन खाने पीने लगे। बवासीर से मुक्त हो गये और आज गुरुवार को खेती में भी काम करने चले गये।
यह सब माता की कृपा एवं मेरे गुरुदेव के चरणों में स्थित अपनी अटल श्रद्धा और विश्वास का ही फल है।
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पुष्कलं धन समृद्धिः सहयोगश्च सर्वतः। स्वास्थ्यं वा त्रय एते स्युस्तस्माल्लामश्च लौकिकाः।
सन्तोषजनक धन की वृद्धि, सब ओर से सहयोग और स्वस्थता ये तीन साँसारिक लाभ उससे होते हैं।
काठिन्यं विविधं चोरं ह्यापदा संहतिस्तथा। शीघ्रं विनाशताँ यान्ति विविधा विघ्नराजयः।
नाना प्रकार की घोर कठिनाई और विपत्तियों का समूह नाना प्रकार के विघ्नों का समूह इससे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।
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(श्री सीताराम गुप्ता, हजारीबाग)
मैट्रिक में मैं दो वर्षों से फेल हो रहा था। बार बार फेल होने से मन भी अच्छी तरह न लगता था। दिल उदास रहता था। किसी काम में मन नहीं लगता था। घर से और बाहर से मुझ पर निन्दा की बौछार होती थी। पिता जी की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी कि मैं बार बार फैल होऊँ, और वह मुझे पढ़ाते जायं। दूसरी बात यह थी कि समय की बर्बादी होती थी। एक ही कोर्स को बार बार पढ़ने में मन नहीं लगता था। घर के लोग मुझको ताने देते थे। मुझे ऐसा लगता था मानो इस अपमान के जीवन से मृत्यु कहीं अच्छी है। कभी-2 मुझे ऐसा मालूम होता था कि मैं आत्म हत्या करलूँ, लेकिन मैंने अपने को सम्भाला और सोचा कि शास्त्र में कहा गया है कि ‘आत्म हत्या करना महापाप है।’ मैं शहर से दूर एकान्त में जाकर एक घंटा प्रतिदिन रोता था। मैं प्रतिदिन सोचता था कि कौन मेरे दुःख का अन्त कर सकता है? क्या कोई भी ऐसा उपाय नहीं है कि मेरा दुख दूर हो? क्या कोई भी ऐसी देवी या देवता नहीं है जो मेरे दुःख को दूर कर सकता है? इसी उधेड़ बुन में मैं दिन रात लगा रहता था। चारों तरफ मुझे अन्धकार ही अन्धकार मालूम होता था। प्रकाश की मुझे कहीं झलक ही नहीं दिखाई पड़ती थी। अन्त में मैं एक दिन ब्रजमोहन प्रसाद गुप्ता की दुकान पर गया। उन्होंने मुझे “गायत्री के अनुभव” और अखण्ड ज्योति की पुस्तक दिखलाई। उन्होंने मुझे विश्वास दिलाया कि ‘गायत्री साधना से तुम अवश्य परीक्षोत्तीर्ण होंगे। प्रथम तो मुझे विश्वास नहीं हुआ परन्तु उनके बहुत आग्रह करने पर मैंने दूसरे दिन से गायत्री साधना आरम्भ कर दी। हाँलाकि हमारी साधना में बहुत कुछ त्रुटियाँ रह गई थीं और मैंने अच्छी तरह गायत्री साधना को विधि विधान से नहीं अपनाया था। सिर्फ मैं एक माला प्रातःकाल जप लिया करता था।
धीरे-धीरे परीक्षा के दिन समीप आये। तीसरी वर्ष मैंने भाग्य आजमाने के लिए परीक्षा का फार्म भर दिया। सिर्फ कुछ आशा थी तो माता पर। दो वर्ष फेल होने की बदनामी, समय और धन का बर्बाद जाना साथियों से पीछे रहने की लज्जा यह बातें मेरे मन में रह रह कर निराशा और दुःख उत्पन्न करती थीं। जैसे-2 परीक्षा के दिन निकट आते जाते थे, दिल घबराता था। ईश्वर से प्रार्थना करता था कि उन दिनों बीमार पड़ जाऊँ। कभी कभी ऐसा लगता कि जूते को पानी में भिगोकर और उसी भीगे जूते को पहनकर घूमा करूं जिससे सर्दी और ज्वर आ जाय, जिससे कि मैं बदनाम होने से बच जाऊँ। परीक्षा समाप्त हुई। आशा और निराशा के बीच मेरा मन डोल रहा था। मुझे विश्वास नहीं था कि मैं पास करूंगा क्योंकि इंग्लिश का पर्चा खराब हुआ था।
कोई पूछता कि कैसा कि यों ही? तो मैं उत्तर देता सप्लीमेन्ट्री में फिर अपने भाग्य को अजमाऊँगा।
परीक्षा फल निकला। मेरा नाम उत्तीर्ण छात्रों में आया। उमँग और उत्साह का ठिकाना न रहा। खुशी से मैं नाच उठा। तभी से मैं गायत्री माता की आँचल को पकड़ा हूँ। उसी दिन से गायत्री माता के प्रति मेरी असीम श्रद्धा और भक्ति उत्पन्न हुई और मैं आशा करता हूँ कि माता की कृपा से भविष्य में इस भवसागर रूपी समुद्र से हमारी जीवन नैया पार लगेगी।
इसके पश्चात् कुछ दिनों के लिए मुझे नौकरी करने कि इच्छा हुई क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति खराब थी। ऐंपलायमेंट एक्सचेंज ऑफिस की सूचना मेरे घर पर नहीं आई अन्त में मैं ऑफिस गया। अन्त में मैं लाचार और निराश होकर लौट रहा था। मन ही मन गायत्री माता का ध्यान लगा रहा था और गायत्री मन्त्र भी जप रहा था कि इतने में एक मनुष्य आया और मुझे नौकरी मिलने का सूचना पत्र दे दिया। यह गायत्री माता का प्रताप था कि मुझे नौकरी मिल गई।
मैट्रिक पास करने के बाद मुझे कालेज में भर्ती होने की इच्छा प्रकट हुई मगर पिताजी आगे पढ़ाने को तैयार न थे। गायत्री माता की कृपा से मुझे 42 रु. 8 आना किसी के द्वारा प्राप्त हुआ और मैं कालेज में नाम लिखा आया। आश्चर्य की बात यह है कि पहले पिताजी कालेज की फीस देने में भी अस्वीकार किए थे पर अब वे न जाने क्यों कालेज की फीस देने को तैयार हैं।
यह सब गायत्री माता की ही कृपा है। इसलिए पाठकों से मेरा नम्र निवेदन है कि वे गायत्री साधना अपनावें जिससे वे दैविक, भौतिक और शारीरिक दुःखों से बचें और पारलौकिक जीवन को उन्नत बना सकें।
(श्री गोविन्द रामहिंगवासिया हटा)
मैं सरकारी अंग्रेजी मिडिल स्कूल हटा (जिला सागर मध्य प्रदेश) में एक साधारण कर्मचारी हूँ। मुझे मेरे प्रिय मित्र गंगा प्रसाद जी स्वर्णकार वैद्य के चिरंजीव भगवान दास जी वैद्य गायत्री मन्त्र लेखन के लिये प्रेरणा दिया करते थे, उनके उत्साहित करने से मैंने निश्चय किया कि क्वार की नवदुर्गा में उपवास के साथ यह गायत्री मन्त्र लेखन कार्य प्रारम्भ करूंगा। इसी निश्चय के अनुसार सम्वत् 2008 में मैंने फलाहार पर उपवास व गायत्री जप के साथ गायत्री लेखन का भी एक नियम बना लिया। मैं 108 गायत्री मन्त्र प्रति दिन लिखने लगा।
उन दिनों मेरी पाठशाला में एक शिक्षक थे श्री घनश्याम प्रसाद जी मिश्र, बी.ए.। वे मन्डला से स्थानाँतरित होकर हटा आये हुए थे तथा वे पुनः मन्डला जाना चाहते थे। उन्होंने एक प्रार्थना पत्र इस आशय का उच्च अधिकारी के पास भेजा था। उसे भेजे एक मास हो गया था।
मेरे उपवास के चौथे दिन, जब मैं शाला में अपने स्थान पर बैठकर गायत्री लेखन का कार्य कर रहा था, वे मेरे पास आये और उन्होंने मुझसे प्रश्न किया कि “पण्डित जी क्या मेरा स्थानाँतर होगा? यदि होगा तो कब तक?”
मैं बड़े असमंजस में पड़ गया। मैंने उनसे पाँच मिनट के बाद उत्तर देने के लिए कहा। इस समय के भीतर मैंने हृदय में महारानी गायत्री का स्मरण कर पण्डितजी के सम्बन्ध में क्या होने वाला है इसका उत्तर जानना चाहता हूँ। आत्मा पवित्र होने पर ऐसे उत्तरों का मिलना कुछ कठिन भी नहीं होता। भीतर से आत्मा ने उत्तर दिया- “हाँ, स्थानाँतर शीघ्र होगा, तरक्की होगी व इच्छित स्थान प्राप्त होगा और इसका आज्ञा पत्र गुरुवार तक आ जायगा।”
मैंने उपरोक्त बात उनको कह दी। यह सुनकर वे बड़े प्रसन्न हुए। परन्तु मेरे मन में विचार आया कि तुम यह क्या कर गए? न तुम सिद्ध हो, न ज्योतिषी। पर आत्मा ने पुनः आदेश दिया कि तुम चिन्ता मत करो तुमने जो कहा वैसा ही होगा।
सात दिन निकल गये गुरुवार का दिन भी आ गया किन्तु उनका आर्डर नहीं आया। वे बोले पण्डितजी गुरुवार तो निकल गया। यह सुनकर मैं कुछ लज्जित सा हुआ। सोचा अपनी आत्मिक पवित्रता में कमी रही है इससे आत्मा की आवाज उतनी स्पष्ट नहीं हो सकी। अन्यथा गायत्री उपासकों की आत्मा जब पवित्र हो जाती है तो उनके आन्तरिक सन्देश गलत नहीं होते।
परन्तु मुझे हृदय में इस बात की अशान्ति थी कि मैंने इस गुरुवार के पहले-गुरुवार के लिये कहा था। जब श्रीमान् हैडमास्टर साहब ने आर्डर पढ़कर सुनाया तब मेरा ध्यान ‘दिनाँक’ की ओर गया। मैंने उनसे कहा कि आर्डर के आने में 10 दिन कैसे लगे। इस पर लिफाफा उठाकर देखा उसमें हटा जिला बालाघाट की मुहर लगी थी। वह लिफाफा गलती से हटा जिला बालाघाट पहुँच गया था व घूमकर 10 दिन में हटा (जिला सागर) आया। यदि वह जबलपुर से सीधा आता तो पहले गुरुवार को ही मिल जाता।
गतवर्ष क्वार के महीने में हटा में हैजा फैला था। गुरुवार के सवेरे आठ बजे में श्रीमान् हैड मा. साहब के घर गया था। वहाँ मुझे पाठशाला के चौकीदार गोरेलाल से विदित हुआ कि आज रात से बसन्ती की माँ बीमार है। बसन्ती शाला के एक नौकर का नाम था। वह भी दो दिन पहले से बीमार था।
गोरेलाल की बात सुनते ही अचानक मेरे मुख से निकल पड़ा कि बसन्ती तो अच्छी हो जायगी किन्तु उसकी माँ मर जायगी। कहने को तो में कह गया पर बाद में मुझे बड़ा पश्चाताप हुआ। संध्या के पाँच बजे मुझे सूचना मिली कि बसन्ती की माँ मर गई है पर उसकी तबियत अच्छी है।
यह दो घटनाएं संक्षिप्त में ही लिखी हैं। इनके अतिरिक्त अनेक बार और भी ऐसे ही अनुभव हो चुके हैं और यह विश्वास बढ़ रहा है कि यदि आत्मिक पवित्रता अधिक हो जाय तो संसार की अज्ञात बातों को जानना और वाक्य सिद्धि प्राप्त करना कुछ कठिन नहीं है।
(श्री राम दयाल शर्मा पारासर, तिलहर)
हिमालय की पर्वतीय तपोभूमि में प्रवेश करते ही मन को स्वाभाविक शान्ति प्राप्त होती है। इस वर्ष मैं कुछ समय के लिये हरिद्वार ऋषिकेश गया। चित्त में बड़ी शान्ति प्राप्त हुई। मेरी इस यात्रा में आचार्य श्री का एक आदेश भी जुड़ा हुआ था। वह यह कि “मैं पूर्णाहुति यज्ञ की सफलता के लिए उत्तराखंड के सन्त महात्माओं से आशीर्वाद माँगू।”
उपरोक्त उद्देश्य के लिए तथा तपस्वी महात्माओं के दर्शनों का सौभाग्य प्राप्त करने की अपनी आन्तरिक उत्कण्ठा को तृप्त करने के लिए मैं अनेक सत्पुरुषों से मिला। अनेकों का दर्शन और सत्संग प्राप्त करके बड़ी प्रसन्नता तथा शान्ति प्राप्त हुई। इन्हीं महात्माओं में एक असाधारण निष्ठावान् महात्मा भी ऋषिकेश में मिले मैं उनसे बहुत प्रभावित हुआ। पाठकों में से भी कभी कोई हरिद्वार पधारे तो मेरी ही भाँति उनके दर्शन का सौभाग्य प्राप्त वे भी कर सकें इसके लिए उनका कुछ परिचय नीचे लिख रहा हूँ।
यह महात्मा आज कल-परमार्थ निकेतन ऋषिकेश में रहते हैं। नाम है उनका “गायत्री स्वरूप”। जैसा इनका नाम है वस्तुतः वे हैं भी वैसे ही। यह विगत छः वर्षों से मौन धारण किये हुए गायत्री साधना में संलग्न हैं। इनकी आत्मा का तेज इतना प्रखर है कि न बोलते हुए भी उनकी शिक्षा तथा प्रेरणा सामने उपस्थित व्यक्ति को भली प्रकार प्राप्त होती है।
निकट रहकर इनके व्यक्तित्व की महानता देखते ही बनती है। सादगी, प्रेम, उदारता, सेवा इनके जन्मजात गुण हैं। त्याग, तप और संयम इनके रोम रोम में समाये हुए हैं। छः साल का मौन साधारण काम नहीं है। इनका आहार विहार तथा दिनचर्या ऐसी है जिसे देख कर प्राचीन काल के ऋषियों की याद सहज ही आ जाती है।
यह महात्मा जोधपुर प्राँत के गायत्री नामक कस्बे के मूल निवासी हैं। कुछ समय पूर्व बीकानेर में जसूसर गेट के सामने रहते थे। उच्च ब्राह्मण कुल में आपका जन्म है जन्म से ही इनकी गायत्री निष्ठा थी। माता की कृपा के अनेकों चमत्कार इनने देखे, जिससे प्रभावित होकर उनने जीवन का अंतिम भाग गायत्री माता के चरणों में अर्पित करने का निश्चय किया। उनकी इच्छा पूर्ण होकर रही। घर का कारबार अपने पुत्रों को सौंपकर अब वे तपस्या के लिये चले गये हैं।
उनके जीवन में गायत्री उपासना के फलस्वरूप कितनी ही आश्चर्यजनक घटनाएं घटित हुई हैं। एक बार सम्वत् 70 में वे अपनी माता के साथ पुष्कर से जयपुर जा रहे थे। रास्ते में अचानक भारी वर्षा हुई और पहाड़ों का पानी एकत्रित होकर तालाब में जाने लगा। जिस रास्ते वे चल रहे थे उसमें इतना पानी आ गया कि माताजी समेत वे डूबने लगे। ऐसे समय में गायत्री स्मरण के अतिरिक्त और कोई उपाय उनसे न बन पड़ा वे कहते हैं कि हमें ऐसा अनुभव हुआ मानों किसी ने पकड़कर उठा लिया हो और पार लेगा दिया हो। डूबने और मरने से बचने को वे माता की महान कृपा मानते हैं।
दूसरी घटना यह हुई कि वे एक बारात में गए हुए थे तो एक दो फुट मोटा भारी पत्थर ऊपर से गिरा। पहले से किसी को इसकी सम्भावना न थी। पत्थर उस स्थान पर गिरा जहाँ वे बैठे थे। आधा सैकिंड पूर्व ही किसी अज्ञात शक्ति ने उनका हाथ पकड़कर बलपूर्वक खींचा और वे जैसे ही वहाँ से हटे वैसे ही क्षण भर में वह वज्र शिला गिरी और स्थान पर रखी हुई अन्य वस्तुएं चकनाचूर हो गईं।
महात्मा गायत्री स्वरूप ने देखा कि माता उनके जीवन की बार बार ऐसी कृपा करती है तो उनका भी यह कर्तव्य है कि अपने जीवन को उनकी गोदी में समर्पण करके मानव जन्म को सफल बनावें। अपनी इसी मान्यता को कार्यरूप में परिणत करते हुए यह महाभाग आज ऋषियों जैसी तपस्या में संलग्न हैं।
(श्री बद्रीप्रसाद बहूलाल मालवीय, इटारसी)
मेरे दो बच्चे थे। एक बच्चा व एक बच्ची। दोनों 3-4 साल के हो गये। नौकरी रेलवे में करता हूँ। समय प्रसन्नता से कट रहा था। परन्तु माताजी की इच्छा बलवान थी। पूर्व जन्म का कोई कारण आने के कारण दोनों बच्चे न रहे। इस कारण मैं बहुत दुःखी रहता था। इसी बीच में मेरे एक काकाजी हैं, उनका उस समय एक मुकदमा चल रहा था। उसका विचार भी मेरे दिमाग में चक्कर चल रहा था। इन दोनों कारणों से मैंने सोच लिया था कि एक दिन जीवन का अन्त ही कर दूँ तो ठीक है। इसी विचार के कारण मैं दिनोंदिन दुबला होता जा रहा था। खाना भी नहीं खाया जाता था। सोचता था क्या करूं। रेल में कट जाऊँ या कहीं जाकर मर जाऊँ।
इसी बीच में वेदमाता जी की असीम कृपा से मुझे मान्यवर भगवती दीन जी से मुकाबला हो गया। उन्होंने मुझ से हाल पूछा कि तुम कमजोर क्यों दीखते हो। मैंने उन्हें अपनी सब रामकहानी सुना दी। मुझे पण्डित जी पहले से भी पहचानते थे। परन्तु जब प्रभु को कष्ट मिटाना होता है तभी उपाय मिलाता है। पं. जी ने मुझे काफी हिम्मत दी तथा माताजी का पूजन, जाप करने की विधि बतलाई कि यदि तुम माताजी की शरण में पड़ जाओगे तो बहुत जल्दी शान्ति मिलेगी। पं. जी की बातों पर मुझे पूर्ण विश्वास हो गया तथा उनके कहे अनुसार माताजी का पूजन, जाप व चालीसा का पाठ करने लगा तथा मेरे काकाजी को भी जिन पर मुकदमा चल रहा था माता की सेवा में लगा दिया। इतवार को माताजी का उपवास करना भी शुरू किया।
जब मैं काकाजी के साथ पेशी पर अदालत में जाता था तब माताजी के मन्त्रों का जाप अदालत के अन्दर किया करता था तथा काकाजी भी माताजी के जाप में अदालत में मग्न रहा करते थे। माता जी कृपा से कुछ माह के बाद माताजी की सेवा के कारण मेरे काकाजी पर जो मुकदमा चल रहा था उसमें पूर्ण रीति से हमारी जीत हो गई। इस कारण एक चिन्ता मेरे मन की माताजी की कृपा से दूर हुई।
दूसरी बात-अब मेरे यहाँ जो दूसरी एक कन्या हुई थी वह भी बीमार ही रहा करती थी। बहुत इलाज किया ठीक नहीं रहती थी। परन्तु जब से माताजी की सेवा में लगे हैं लड़की पूर्णरूप से ठीक रहती है। कोई तरह की बीमारी उसे नहीं है तथा मेरा अन्तरात्मा पूर्ण रूप से शान्त रहता है।
(श्री रामचन्द्र तिवारी, गरोठ)
सम्मानपूर्ण आजीविका और अभीष्ट स्थान पर निवास यह दोनों ही बातें मनुष्य के जीवन में बड़ा महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। फिर जिनका कार्यक्रम नौकरी हो उनके लिये तो इनका और भी अधिक महत्व है।
मैं कुछ समय से गायत्री उपासना तथा मन्त्र लेखन की साधना में संलग्न हूँ। यों मेरी साधना निष्काम रही है, पर देखता हूँ कि उसके साँसारिक परिणाम भी बहुत कल्याण कारक हो रहे हैं।
दूसरे कई साथी अच्छी और स्थायी नौकरी पाने के लिए काफी दौड़ धूप करते रहे हैं। उन्होंने कृपा पूर्वक मुझे भी कई बार प्रेरणा दी कि मैं भी अधिक प्रयत्न करूं। यथासम्भव मैंने वह सब किया भी है, अपना प्रथम आधार गायत्री माता की शरणागति ही रही है। सच्चे मन से मैंने माता का आश्रय लिया है और माता की सच्ची कृपा का परिचय भी पाया है। जबकि अन्य उद्योगी साथी अपने लिये उपयुक्त स्थान न पा सके तब मैं नायब तहसीलदार की स्थायी जगह पर नियुक्त हूँ और स्थान भी मनोवांछित मिल गया था। अपनी इस नियुक्ति में मुझे माता की स्पष्ट कृपा परिलक्षित होती है। जैसे माता अपने बालक को गोद में लेकर उसी सब प्रकार रक्षा करती है वैसे ही गायत्री माता के अंचल में आश्रय पाने वाला व्यक्ति भी अपनी उन्नति एवं सुरक्षा के लिए निश्चित हो जाता है।
कोई कोई व्यक्ति अच्छे कवच अपने पास रखते हैं और उनके बिगड़े काम बनते हैं। मैंने गायत्री मन्त्र लेखन की कापियों में कवच की शक्ति पाई उन्हें सर्वथा साथ रखने का परिणाम बहुत ही लाभदायक रहा। मेरे मित्रों ने भी मन्त्र लेखन यज्ञ में भाग लिया है और अपनी भावनाओं के अनुसार समुचित लाभ प्राप्त किया है। एक पटवारी सज्जन ने अपना दीवानी मुकदमा इसी महामन्त्र की शक्ति से इच्छानुसार जीता।
अपनी तथा दूसरे की गायत्री उपासना के परिणामों को देखते हुए यह कहना पड़ता है कि गायत्री माता समुचित कल्पवृक्ष का काम करती है। अपने पुत्रों की रक्षा एवं उन्नति के लिए वह बड़ी सहायता देती है। शत्रु चाहे आन्तरिक हो चाहे बाहरी उनसे रक्षा सहज ही हो जाती है। भयभीतों को माता की शरण में अभयदान मिलता है। सकाम साधना की अपेक्षा निष्काम भावना अधिक श्रेष्ठ है।
(पं.रामदयाल परिहार, तिलहार)
गायत्री तीर्थ का निर्माण, माता के मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा, तथा पूर्णाहुति महायज्ञ का आयोजन तारीख 20, 21, 22 जून को सानन्द सम्पन्न हो गया। उस अवसर पर केवल 240 सज्जनों को ही आमन्त्रित किया गया था इसलिए उस मनोहर दृश्य का लाभ कुछ थोड़े से बड़भागी ही ले सके। पर वे हजारों गायत्री प्रेमी जो उस अवसर पर उपस्थित नहीं हो सके, अवश्य ही इस यज्ञ में सूक्ष्म रूप से सम्मिलित रहे होंगे। उनके लिये इस उत्सव का आँखों देखा संक्षिप्त विवरण नीचे की पंक्तियों में उपस्थित करते हैं। इस सम्बन्ध में विशेष प्रकाश तो आचार्य जी अगले अंक में स्वयं डालेंगे। इस समय नहीं लिख सके हैं इसलिए पढ़कर संतोष कर लेना होगा।
समारोह को सफल बनाने के लिये कितने ही महानुभाव लगभग 10 दिन पूर्व मथुरा आ गये थे। ता. 18 और 19 को तपोभूमि में काफी चहल पहल आरम्भ हो गई थी। रात को प्रवचन होने आरम्भ हो गये थे। श्री. स्वामी देवदर्शनानन्द जी सरस्वती का प्रवचन दोनों दिन हुआ। आचार्य जी का लिखित भाषण ता. 21 को पढ़ कर सुनाया गया। जिसे सुनकर श्रोता लोग गदगद हो गये। पण्डित मुकुट बिहारीलाल जी शुक्ल वकील, सम्पादक ‘मानव’ के तीनों दिन महत्वपूर्ण प्रवचन हुए।
ता. 20 को प्रातःकाल से कार्य आरम्भ हुआ। आचार्य श्री. लालजी कृष्ण पण्डमा की अध्यक्षता में पंचमुखी यज्ञ का कार्य आरम्भ हुआ। वेदपाठी विद्वान ब्राह्मणों ने पूर्ण शास्त्रोक्त रीति से कुण्ड तथा वेदियों की रचना की थी। वैदिक विधि विधान के साथ देव पूजन तथा यज्ञ हुआ।
लगभग 250 व्यक्ति देश के कौने कौने से आये हुए थे। मद्रास को छोड़कर भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त का प्रतिनिधित्व मौजूद था। आगन्तुकों में 16 वकील, 41 ग्रेजुएट, 1 इंजीनियर, 3 डॉक्टर तथा अनेकों संस्कृत एवं धर्मशास्त्र के सुयोग्य ज्ञाता महानुभाव उपस्थित थे। सभी विचारधाराओं के व्यक्ति अपने तुच्छ मतभेदों को भूल कर अनेकता में एकता अनुभव करने के लिए एकत्रित थे। अधिकाँश महानुभाव सनातन धर्मी थे पर आर्य समाजों के उच्च पदाधिकारी तथा कई बातों में मतभेद रखने वाले अन्य अनेकों महानुभाव उतनी ही श्रद्धा और तत्परता के साथ भाग ले रहे थे। 40 से अधिक महिलाएं बाहर से आई थीं, यह सभी गायत्री उपासना में बहुत समय से निष्ठावान रही थीं।
प्रायः सभी आगन्तुकों ने तीन दिन के विस्तृत कार्यक्रम में भाग लिया। तीन दिन में गायत्री का 24 लक्ष जप पुरश्चरण, 60 हजार आहुतियों का हवन, 1 हजार गायत्री चालीसा का पाठ, यजुर्वेद तथा गीता के पारायण, भागवत दशम स्कन्द तथा रामायण सुन्दर काण्ड के पाठ, श्री सूक्त, पुरुष सूक्त, गायत्री सहस्र नाम, गायत्री कवच, रुद्राष्टाध्यायी, दुर्गासप्तशती पाठ, महामृत्युँजय का जप आदि का सुव्यवस्थित कार्यक्रम तीनों दिन चलता रहा। सुव्यवस्थित कार्य क्रम तीनों दिन चलता रहा। सभी आयोजन बड़ी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए।
प्रातः साढ़े 3 बजे जागने की घण्टी बज जाती थी। सभी लोग उठकर शौच, स्नान, से निवृत्त होकर 5 बजे से पूर्व ही उपासना में लग जाते थे। 8 बजे सबको पंच गव्य दिया जाता था। साढ़े 11 बजे तक विविध कार्यक्रम चलते रहते। मध्याह्न को फलाहार दिया जाता। दो घण्टे का विश्राम देकर 2 बजे से फिर सब कार्यक्रम आरम्भ हो जाते और सायंकाल 5 बजे तक चलते रहते। इसके बाद लोग शौच स्नान से निवरते। सायं काल को फिर थोड़ा स्वल्प फलाहारी जल पान मिलता। रात्रि को 8 बजे से कीर्तन तथा प्रवचन होते और प्रायः 11 बजे तक समाप्त होते। ता. 21 की रात्रि को परिचय सम्मेलन हुआ। सब लोगों ने अपने अपने परिचय खड़े होकर स्वयं दिये, गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य इस अवसर पर बहुत ही प्रसन्न दृष्टिगोचर हो रहा था। अपने इतने भाई बहिनों को सामने देखकर उत्साह और हर्ष से सबके मन भरे हुए थे।
महिलाओं का पंडित अलग था, उनने बड़ी ही श्रद्धा तथा तत्परता के साथ भाग लिया। पहले दिन उनने सवा हजार से अधिक गायत्री चालीसा के पाठ किये। दूसरे दिन उनके लिए सवा लक्ष गायत्री जप का आयोजन था उन्होंने उससे भी अधिक जप किये। तीसरे दिन उनके द्वारा हवन का आयोजन था। सेवा कार्यों में उनका सहयोग सराहनीय रहा।
मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम तीनों दिन चलता रहा। ता. 22 गंगा दशहरा एवं गायत्री जयन्ती के पुण्य पर्व पर मध्याह्न काल को शुभ मुहूर्त में माता जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा वेद मन्त्रों के साथ सम्पन्न हुई। प्रतिमा की भव्यता देखते ही बनती थी। दर्शन को ऐसा लगता था मानों प्रसन्न मुद्रा में उसे आशीर्वाद दे रही हों।
उत्सव के विभिन्न अवसरों की चलती फिरती सिनेमा फिल्म खींची गई जो छोटे और बड़े सिनेमाओं में आसानी से दिखाई जा सकेगी। कितने ही फोटो भी लिये गये जो सम्भवतः अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में छपेंगे।
आचार्य जी 24 दिन के उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। उनका 117 पौण्ड का शरीर भार घट कर 95 पौण्ड रह गया था, शरीर काम नहीं करता था फिर भी वे तख्त पर पड़े हुए आगन्तुकों से निरन्तर कुशल क्षेम पूछना, पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर देना तथा व्यवस्था का संचालन करना जारी था। दुर्बलता इतनी अधिक थी कि खड़े होते ही शरीर काँपता था पर उनके चेहरे का तेज और वाणी का रस तनिक भी कम नहीं हुआ था। गंगा जल पीकर 24 दिन पूरे करने से उनका आत्म तेज कितना निखर गया है इसकी झाँकी हर आँख वाले को होती थी। वे बहुत कम बोल पाते थे, पर उपस्थित लोगों में से हर व्यक्ति यह अनुभव करता था मानों उसे परा और पश्यति वाणियों द्वारा बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी जा रही है।
जिन लोगों को इस पुनीत अवसर पर उपस्थित रहने का सौभाग्य मिला वे इन दिनों को धन्य मान रहे थे। सभी व्यक्ति एक प्रकृति के होने के कारण प्रेम आत्मीयता, स्नेह, सौहार्द, एवं स्नेह भावना का झरना झर रहा था, ऐसा अनुभव होता था मानों स्वर्गीय सुख यहाँ से फूट पड़ता हो। अधिकाँश व्यक्ति एक दो दिन पहले आ गए थे और यज्ञ से एक दो दिन पीछे गये। पर यह समय कुछ घण्टों की तरह बीत गया। किसी की इच्छा इस स्वर्गीय आनन्द को छोड़ने की न थी। कई व्यक्ति तो जाते समय बालकों की तरह फूट फूट कर रोये, यों वियोग से दुख तो सभी को हुआ परिस्थितियों के कारण, मजबूरियों के कारण, जाना पड़ रहा था पर हृदय से कोई भी जाना न चाहता था।
यज्ञ के लिए अरुणि मंथन द्वारा वेद मन्त्रों से अग्नि उत्पन्न की गई जिसका दृश्य बड़ा ही प्रभावोत्पादक था। प्राचीन काल में ऋषि लोग दो लकड़ियाँ घिसकर किस प्रकार वेद मंत्रों द्वारा यज्ञ के लिये अग्नि उत्पन्न करते थे, इसका प्रत्यक्षीकरण देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। इस पवित्र तथा लम्बे व्यतीत काल से जलती आ रही उस अग्नि को विशेष रूप से एक अप्रकट महात्मा के यहाँ से मंगाई गई थी। उन दोनों को यज्ञ में स्थापित किया गया। पंचमुखी घृत दीप की अखण्ड-ज्योति आयोजन के आरम्भ से अन्त तक जलती रही।
गायत्री मन्त्र लेखन लगभग 18 करोड़ एकत्रित हो गये थे उनकी विधिवत पूजा प्रतिष्ठा की गई। दो हजार से अधिक तीर्थों की रज तथा जल एक कक्ष में और मन्त्र लेखन की कापियाँ सुसज्जित रूप से दूसरे कक्ष में स्थापित की गईं थीं। (see copy lines missing)
तीन दिन का उपवास, भूमि शयन तथा सभी प्रकार का संयम नियम पालन करने से यज्ञ आयोजन में सम्मिलित रहने से प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव करता था, कि उसे एक विशेष आत्मबल प्राप्त हो रहा है। उस वातावरण की पवित्रता एवं सात्विकता हर हृदय में प्रवेश कर रही थी और ऐसा लगता था कि आन्तरिक कषाय कल्मषों को धोकर आत्मा को स्वच्छ कर देने वाली कोई दिव्य मन्दाकिनी सूक्ष्म रूप से यहाँ प्रवाहित हो रही है।
जितने व्यक्ति आये थे, सभी ने उत्सव को सफल बनाने के लिए जी-जान से प्रयत्न किया। जिनको जिस विभाग की सेवाएं दी गई थी, उसने अपने कर्तव्य को पूर्ण तत्परतापूर्वक पालन किया। धन्यवाद कौन किस किसको दे, सभी ने अपने आप ढंग से अपना कर्तव्य निभाया इसमें माता की प्रेरणा ही प्रधान कारण थी।
श्री. स्वामी देवदर्शनानन्द जी सरस्वती की अध्यक्षता में 24 लक्ष का जप पुरश्चरण पूरा हुआ। श्री मौनी महात्मा दुर्गा प्रसाद जी पंडित का शिवताण्डव नृत्य बड़ा ही प्रभाव पूर्ण रहा। छोटे से लेकर बड़े तक अपनी अपनी योग्यता के अनुभव बयाँ करते रहे। यज्ञ पूर्णतया सफल रहा। आँधी पानी की जो सम्भावना थी वह समारोह समय तक टलती रहीं पर यज्ञ समाप्त होते ही इन्द्र देव ने प्रसन्न होकर घनघोर जल वृष्टि की जिसको यज्ञ की सफलता समझकर सर्वत्र प्रसन्नता प्रकट की गई।
भविष्य के लिए ऐसी सुन्दर योजनाएं बनाई जा रही हैं जिनके द्वारा विस्तृत रूप से गायत्री विद्या लुप्त प्रायः महाज्ञान की पुनः स्थापना हो। प्रतिवर्ष चैत्र सुदी 15 को गायत्री उपासकों का एक वार्षिक सम्मेलन बुलाने का आयोजन रहा करेगा। जिस प्रकार का यज्ञ और पुरश्चरण मथुरा में हुआ था वैसे ही आयोजन देश भर में होते रहें इसके लिए प्रोत्साहन दिये जायेंगे। ऐसे आयोजनों में आचार्य स्वयं पहुँचने का प्रयत्न करेंगे। तपोभूमि में ऐसी व्यवस्था सोची जा रही है कि यहाँ नित्य नियमित पुरश्चरण और यज्ञ होते रहें। अधिक सस्ता गायत्री साहित्य छापने की भी योजना है। गायत्री सम्बन्धी खोज और अन्वेषण का कार्य इस तपोभूमि में निरन्तर होते रहेंगे।
आत्म कल्याण की साधना करने वालों के लिए यह तपोभूमि अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं शाँतिदायक है। यहाँ ऐसे सज्जन स्थायी रूप से निवास कर सकेंगे जिन पर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जो लोग घरेलू जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं और शान्तिमय जीवन बिताना चाहते हैं उसके लिए आचार्य जी का सान्निध्य, एवं तपोभूमि का अत्यन्त ही पवित्र एवं प्रभावशाली वातावरण बहुत ही अनुकूल एवं शान्तिदायक सिद्ध हो सकता है। जिन्हें भगवान ऐसा सौभाग्य प्रदान करें उन्हें बड़भागी ही समझना चाहिए।
यह पुण्य तीर्थ निश्चित रूप से असाधारण महत्व पूर्ण हैं, जिस स्थान पर यह स्थापित है वह प्राचीन काल में महात्माओं की सिद्धि भूमि है, इसके चारों ओर अनेक शक्तिपीठ तथा तपोवन फैले हुए हैं। ब्रज का यह प्रमुख केन्द्र है ऐसे स्थान पर इस तीर्थ को बनाने या बनवाने में जिनका समय, श्रम, सहयोग तथा धन लाभ है उनके प्रयत्न की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है। इस संस्था के द्वारा भारतीय संस्कृति तथा भारतीय आध्यात्म धर्म के पुनरुत्थान में इस विशेष सहायता के आशातीत हैं।
(डॉ. लक्ष्मी नारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम.ए. लखनऊ)
मेरे पूज्य पिताजी स्वर्गीय लाल सूरज प्रसाद श्री टण्डन अत्यन्त भक्त तथा संयमी प्राणी थे। वह गायत्री तथा हनुमान जी के परम भक्त थे। चौबीस घंटे वह चलते-फिरते, बैठते यहाँ तक कि बातचीत करते और काम करते भी गायत्री तथा सुन्दर काण्ड का मानसिक जप किया ही करते थे। घर की स्त्रियों का कहना था कि उन्हें हनुमान जी सिद्ध थे।
सन् 1921 की बात है। उस समय मैं लगभग 11 वर्ष का था तथा पांचवीं कक्षा का छात्र था। मुझे टाइफ़ाइड हो गया। एक महीने बाद दिमागी बुखार ने छोड़ा तो कोई असावधानी हो गई होगी। मेरी तबियत फिर पलट गई। लगभग तीन महीने ज्वर से पीड़ित रहना पड़ा। एक बार तो खाट से नीचे भी उतार लिया गया था। एक दिन एक विचित्र घटना घटी। वह मेरी आप बीती घटना आज भी मुझे ज्यों कि त्यों याद है। दूसरे खण्ड में बैठके में मेरी खाट पड़ी थी। एक बार सम्भवतः पूज्य पिताजी के अभाव से मुझे सामने की दीवार पर, दोपहर के समय कद्दे आदम हनुमान जी की मूर्ति के साक्षात् दर्शन हुए। पिता जी तथा बहिन पास ही बैठे थे। एकाएक मैंने पिता जी से कहा ‘चाचा मुझे हनुमान जी के दर्शन हो रहे हैं। ‘सब ने पूछा कहाँ? मैंने उन्हें उसी दिशा में संकेत कर दिया। किन्तु किसी को सिवा दीवार के और कुछ भी दिखाई न दे- वहाँ कुछ हो भी। मैं कहूँ’ सामने तो है बिल्कुल, यह देखो। यह देखो वह हाथ उठाकर आशीर्वाद देते हुए मुझसे कह रहे हैं अब तुम ठीक हो जाओगे इस दिन से। आश्चर्य है क्या आपको नहीं सुनाई दे रहा है। ‘पिताजी ने मुझसे उनसे कुछ पूछने को कहा। महावीर जी ने उत्तर दिया ‘तुम फलाँ दिन फलाँ चीज खाना आरम्भ करना।’ उसी समय घर की कई अन्य स्त्रियाँ वहाँ आ गई और मुझसे प्रश्न पूछवाने लगीं। मैंने प्रश्न पूछे और कहा ‘हनुमान जी कोई उत्तर नहीं दे रहे हैं। यह लो अब मूर्ति गायब हो गई। अब दीवार पर वह नहीं है। पिता जी ने देवता के कहे मुताबिक ही किया और मैं स्वस्थ हो गया।
आज का जगत इस घटना को क्या समझेगा। और वास्तव में यह घटना कैसे हुई और क्या थी यह अब तक मैं भी नहीं समझ पाया। पर अपने कानों, नेत्रों और चेतना पर तो मैं अविश्वास नहीं कर सकता। हो सकता है पिता जी ने जो आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करली हो, उस शक्ति का स्वरूप ही मेरे नेत्रों के सामने खड़ा हो गया हो। हो सकता है यह हैलाकुलेशन हो! यह मैस्मरेजम का खेल नहीं था, एक हनुमान तथा गायत्री भक्त तथा साधना का ज्वलंत जीवित उदाहरण था यह भी हो सकता है।
मन्त्र की अलौकिक शक्ति का एक और उदाहरण देकर मैं लेख को समाप्त करता हूँ। सम्भवतः सन् 1924 की बात है मैं तब आठवीं कक्षा का छात्र था। एक दिन छुट्टी की घण्टी में मेरे हाथ की उँगली में किसी जहरीले जीव ने काट लिया। किसने काटा यह तो मैंने नहीं देखा। पर मेरी उँगली धीरे-धीरे काली पड़ने लगी। स्कूल से छुट्टी लेकर मैं घर भागा। तब मेरे घर में काशी के एक संस्कृत के परम विद्वान पं. पुरुषोत्तम जी व्यास नागर जो एक प्रसिद्ध कर्म काण्ड ब्राह्मण थे, रहते थे। जब में घर पर आया तब वह पैखाने में थे जिस समय तक वह बाहर नहीं निकले मैं दर्द के मारे तड़पता रहा और मेरा हाथ का पंजा काला पड़ गया। हाथ पैर धोकर एक सफेद साफ कपड़ा लेकर सम्भवतः गायत्री मंत्र पढ़कर उन्होंने कपड़े से हाथ को झाड़ा और एक क्षण में दर्द बिल्कुल गायब हो गया और सफेद कपड़ा काला पड़ गया। यह मेरे ऊपर बीती हुई घटना है जो मन्त्र की अलौकिक शक्ति को प्रकट करती है।
जब जब मानव को देनी पड़ी परीक्षा! उसके बाल पौरुष की जब हुई समीक्षा॥
जब किसी सबल ने आकर पथ को रोका॥ जब क्रूर भाग्य ने क्रोध सहित अबलोका॥
तब तब मानव ने यज्ञ किया जय पाई! अज्ञान तिमिर ने प्राप्त करी अरुणाई॥
जल , वायु , अग्नि, भू, अम्बर शुद्ध बनाने। मानव के मन से संचित कलुष मिटाने॥
अन्याय, असत पर विजय सत्य को देने। संघर्षों में कर्मों की नौका खेने ॥
जन-शक्ति संकलन हेतु यज्ञ होता है। जो बीज सत्य, शिव, सुन्दर के बोता है॥
जब प्रकृति रूठती भू को त्रास दिखाती। जब नहीं नीर है धन माला बरसाती ॥
जब हरे खेत पर ओले गिर जाते हैं। जग को ग्रसने तूफान बड़े आते है॥
तब क्रोध शान्ति हित यज्ञ किया जाता है। तग करुणा का उपहार पुनः पाता है!!
इतिहास बदलता करवट, नियति बिलखती। है युद्ध पटल पर दानवता कुछ लिखती।
है अस्त व्यस्त होता जग जीवन का क्रम। हिल जाता जब है स्वयं ब्रह्म का संयम॥
तब यज्ञ पुनः स्वाभाविक गति लाते हैं। इसलिये सदा ही यज्ञ किये जाते हैं।
है महायज्ञ की आज हुई तैयारी! शीतलता देगी गायत्री सुखकारी ॥
फिर से अवनी का भाग्य बदल जायेगा।
मानव अपना उत्थान पुनः पायेगा। इस महायज्ञ में आओ हाथ बंटाओ!
इस मस्त भूमि को फिर से स्वर्ग बनाओ!!
(श्री शिवशंकर जी मिश्र, एम. ए.)
*समाप्त*