(श्री मुरलीधर दिनोदिया, बी.ए., एल.एल.बी.)
-एक आदमी चींटियों को दलिया डालने नित्य जंगल में जाता है, उसके पड़ौसी का लड़का बीमार पड़ा है लेकिन उसका हाल चाल पूछने वह कभी नहीं जाता।
-एक आदमी नित्य स्नान करता और साफ-सुन्दर कपड़े पहनता है। लेकिन वह जहाँ तहाँ थूक देता है और पान की पीक से दीवारों को रंगता रहता है।
-एक आदमी सैकड़ों वर्ष पुरानी कब्र पर मत्था टिकाता है, फूलों का हार चढ़ाता है। लेकिन वह अपने बूढ़े माता-पिता को बात-बात पर झिड़क देता है।
-एक महिला नित्य घण्टों कथा कीर्तन में गाती है। परन्तु वह अपनी अंधी बूढ़ी सास का हाथ पकड़कर उसे पखाने तक नहीं छोड़ सकती।
-रेल गाड़ी चलते समय अंदर बैठे हुए यात्री आपके साथ जो व्यवहार करते हैं, ठीक वही व्यवहार आप अंदर बैठते ही पीछे आने वालों के साथ करते हैं। अंदर आने वाले यात्री आपको मानवता से गिरे हुए लगते थे, पर भीतर जाते ही क्षण मात्र में आप भी वैसे ही बन जाते हैं।
-श्रीमान् जी ने जंगल में प्याऊ लगाई है पर तपती दुपहरी में कोई राह चलता घर के दरवाजे पर आकर पानी माँगता है तो उसे दूसरा घर बताते हैं।
-सीताजी, रुक्मणी जी, पार्वतीजी आदि की मूर्तियों को नित्य सिर झुकाने वाला व्यक्ति बस से यात्रा करते हुए, स्त्रियाँ बैठी होने पर गंदे अश्लील शब्दों को जोर-जोर से बोलते हुए तनिक नहीं संकुचता।
-महाशय जी औरंगजेब की धार्मिक असहिष्णुता के लिये उसे भर पेट कोसते रहते हैं लेकिन मित्रों में कट्टर सुधारवादी कहलाने के प्रलोभन में अपने घर में ही छोटे-मोटे औरंगजेब स्वयं बने हुए हैं। अपनी माताजी एवं पत्नी को मूर्ति पूजा आदि नहीं करने देते हैं। वे बेचारी अशिक्षित पुराने विचारों की हैं और उनके ऊपर लादी गई इस विवशता के कारण उनका जीवन विषाद मय बना हुआ है। नतीजा सारे घर का वातावरण ही सदा अप्रिय बन रहता है।
-आप शायद सिनेमा देखते होंगे। पैसे खर्च कर सिनेमा भवन के दूषित वातावरण में घण्टों बैठ सकते हैं, पर यदि स्वाध्याय के लिए, चाहे आधा घण्टे के लिए ही, आपको कहा जाये तो सम्भवतः आपका उत्तर होगा “समय नहीं मिलता”।
-यह कैसी विडम्बना है। मैं सोचता हूँ- काश, मनुष्य कुछ अधिक विचारवान् हुआ होता!
वर्ष-13 संपादक-श्रीराम शर्मा, आचार्य अंक-6
(श्री विद्यावती मिश्र)
तुझ में छिपा हुआ वह जैसे कलि में छिपा हुआ पराग है। अथवा वीणा के तारों में जैसे पंचम राग है॥
किंतु अपरिचित तू इससे ही तुझे नहीं विश्वास है! जिसको खोज रहा अग-जग में वह तो तेरे पास है!
यह है कहता कौन कि मंदिर मस्जिद उसके धाम हैं। घट-घट वासी अगम अगोचर अन्तर्यामी राम हैं॥
जिसे प्राप्त करने का साधन आत्मा का संन्यास है! जिसको खोज रहा!
धर्म पन्थ है कठिन सुगम बस सत्कर्मों की राह है। भाग्य मौन पायेय निरंतर चलती मन की चाह है॥
अनहद स्वर तेरी वाणी को पावन हास विलास है! जिसको खोज रहा!
निज को पुनः टटोल बावले अरे भटकना व्यर्थ है। अपने को पहचान अरे तू ही तो सबल समर्थ है॥
संसृति से भी कहीं सनातन यह तेरी प्रति श्वास है! जिसको खोज रहा0!
मानव अब मानव बन, अपनी मानवता पहचान ले। तू प्रभु का सच्चा स्वरूप है इस रहस्य को जान ले॥
फैला हुआ अखिल भूतल में तेरा अमर प्रकाश है! जिसको खोज रहा0!
महेश्वरस्य विज्ञाय नियमान्न्याय संयुतान्। तरय सत्ताँच स्वीकुर्वन कर्मणातमुपासयेत।
अर्थ-परमात्मा की सत्ता और इसके न्यायपूर्ण नियमों को समझकर ईश्वर उपासना करनी चाहिए।
ईश्वर सर्वव्यापक, दयालु, सच्चिदानन्द, जगत पिता, न्यायकारी आदि अनेक महिमाओं से युक्त है। उसका ध्यान रखने से मनुष्य का बुराइयों से बचना और दूसरों के साथ आत्मीयतापूर्ण सद्व्यवहार करना अधिक सम्भव है। इसलिए आस्तिकता मनुष्य जाति की महान आवश्यकता है। अपनी आत्मा को लघुता से विकसित करके उसे पूर्ण-महान-परम-आत्मा (परमात्मा) बना देना मानव जीवन का लक्ष्य है।
ईश्वर उपासना के विविध कर्मकाण्ड एक प्रकार के आध्यात्मिक व्यायाम हैं, जिनके द्वारा आत्म बल बढ़ता है और उस आत्मबल द्वारा नाना प्रकार के भौतिक सुख एवं आत्मिक आनन्द प्राप्त होते हैं। उन आनन्दों को ही ईश्वरीय कृपा भी कहा जाता है उसने हमें जीवन तथा जीवन यापन के अनेक साधन दिए हैं, जिनके कारण वह दयामय, दानी और परम पिता कहलाता है। कृतज्ञता और उपकारी के प्रति श्रद्धा की महान् भावना को अन्तःकरण में स्थिर और प्रबल रखना प्रार्थना का मुख्य उद्देश्य है।
इन सब बातों को समझते हुए ईश्वर की उपासना करनी चाहिए पर साथ ही ध्यान रखना चाहिए कि वह न्यायकारी एवं नियम रूप है। जैसे अग्नि, बिजली आदि का नियमानुकूल व्यवहार करने से वे बहुत उपयोगी सिद्ध होती हैं किन्तु यदि उनके नियमों को थोड़ा भी तोड़ा जाय तो वे प्राणघातक बन जाती है इसी प्रकार ईश्वरीय नियमों का पालन करना ही उससे लाभ उठाने का सर्वोत्तम मार्ग है।
ईश्वर का सबसे निकटवर्ती स्थान अपनी आत्मा है। वहीं से परम प्रभु सदगुरु के रूप में सन्मार्ग पर चलने का आदेश देता रहता है। हमारी मलीनता ही उसके रूप का दर्शन करने और उसकी वाणी सुनने में बाधा डालती है। यदि अपनी अन्तरात्मा को पवित्र बना लिया जाय तो ईश्वर का साक्षात्कार और प्रेम संभाषण बड़ी आसानी से हो सकता है। अंतरात्मा की पुकार ही ईश्वरीय वाणी है। उसे सुनने से, उसके संकेतों पर चलने से बुरे से बुरा मनुष्य भी थोड़े ही समय में श्रेष्ठतम महात्मा बन सकता है।
परमात्मा और आत्मा के बीच में जो आदान प्रदान होता है वह एक न्याय तथा नियम की सन्तुलित तुला के आधार पर ही है। जीव जितना ही ईश्वरीय नियमों पर चलता है या उन्हें तोड़ता है, उसी के आधार पर उसे कर्मफल मिलता है। स्वेच्छापूर्वक भले या बुरे कर्म करने में सब जीव पूर्ण स्वतंत्र हैं पर वे उन कर्मों का फल प्राप्त करने में पराधीन हैं। अपने किये हुए प्रारब्ध कर्मों का फल अवश्य भोगना होता है। उससे छुटकारा मिलना कठिन है।
ईश्वर उपासना की अनेक प्रक्रिया प्रचलित हैं। सभी धर्मों में ईश्वर आराधना के विधान मौजूद हैं। इसका मूल उद्देश्य यही है कि मनुष्य के चित्त में ईश्वर के सर्वव्यापक और न्यायकारी होने के संस्कार जमे और वह बुराइयों से बचे। निश्चय ही पुलिस कप्तान को सामने खड़ा देखकर जेबकट की यह हिम्मत नहीं पड़ती कि वह उस अधिकारी की जानकारी में जेब काटे। क्योंकि वह जानता है कि ऐसा करने पर उसका अपराध छिप न सकेगा। वह तुरन्त पकड़ा जायेगा और जेल की यातना भोगेगा।
ठीक यही बात ईश्वर उपासना के सम्बन्ध में चरितार्थ होती है। जो उस परम शक्ति को सर्वत्र व्यापक देखेगा उसकी न्यायशीलता पर विश्वास करेगा, वह इस बात को नहीं भूलेगा कि कोई पाप चाहे कितने ही गुप्त रूप से किया जाय ईश्वर की जानकारी से छिपा नहीं रहता और न्यायशील परमात्मा किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। उसकी न्याय तुला सबके लिए एक समान है। ‘पुण्यात्मा का पुण्यफल और पापी को दारुण दुःख’ यह उस परमात्मा की न्यायशीलता अविच्छिन्न है, इसमें कभी कोई अन्तर नहीं आ सकता।
परमात्मा किसी की निन्दा स्तुति से प्रसन्न या अप्रसन्न नहीं होता। वह ‘कथनी’ की अपेक्षा ‘करनी’ को महत्व देता है। बकवाद की अपेक्षा उसे व्यवहार प्रिय है। बकवादी लोग नाना प्रकार के स्तोत्र पढ़कर भी उसे भुलावे में नहीं डाल सकते और न अपने लाभ के लिए पक्षपात करा सकते हैं। ईश्वर की अधिक कृपा प्राप्त करने का तो एकमात्र मार्ग यही है कि मनुष्य के गुण कर्म और स्वभाव में धर्म धारणा, कर्तव्य निष्ठा, सच्चाई और सात्विकता का परिपूर्ण समावेश हो। ईश्वर उपासना का सबसे बड़ा लाभ यह है कि उपासक किसी गफलत में नहीं रहता, वह प्रभु को भूलता नहीं, उसकी सर्व व्यापकता तथा न्यायशीलता का विस्मरण नहीं करता, फलस्वरूप वह कुमार्गगामी होने से बच जाता है और सन्मार्ग का अवलम्बन करके परम आनन्ददायक सत्परिणामों को प्राप्त करता है। इस प्रकार ईश्वर उपासना का प्रकारान्तर से परिणाम बड़ा कल्याण कारक होता है।
आज लोग ईश्वर उपासना के मूल हेतु को भूल गये हैं और उसे खुशामद पसंद चापलूस राजा नवाब की भाँति तथा रिश्वतखोर अफसर की तरह समझकर प्रशंसा के छंद सुनाकर या पैसा पाई की पूजा पत्री चढ़ाकर लुभा लेना चाहते हैं। इस बालक्रीड़ा का वस्तुतः ईश्वर पर कोई प्रभाव नहीं होता। सच्ची उपासना का तात्पर्य जो भली प्रकार समझता है वास्तव में वही सच्चा भक्त है। और उसी की भक्ति फलदायिनी होती है।
गायत्री का पंद्रहवाँ अक्षर ‘म’ इस महासत्य की ओर संकेत करता है कि -’अन्याय की और मत झुको। न्याय पर आरुढ़ होओ।’ इस सुव्यवस्थित संसार में हमें केवल उतना ही पदार्थ शान्तिदायक हो सकता है जो न्यायपूर्वक उपार्जित है। जो अन्याय-पूर्वक प्राप्त किया गया है वह चमकते हुए शृंगार की तरह आकर्षक तो अवश्य लगता है पर उसको उपभोग के लिए स्पर्श करते ही झुलसन आरम्भ हो जाती है। जैसे तेजाब पीकर कोई अपनी प्यास नहीं बुझा सकता उसी प्रकार अन्याय का मार्ग ग्रहण करके सुखोपभोग की आशा करने वाला व्यक्ति भी निताँत असफल रहता है। आज चारों ओर अन्याय का बोलबाला है। हर व्यक्ति यह सोचता है कि जैसे बने वैसे मुझे सुखोपभोग के साधन प्राप्त कर लेने चाहिएं। वह इस महान सत्य और कठोर तथ्य को भूला हुआ है कि अन्याय के बदले में विपत्ति के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं किया जा सकता। जो लोग अनीतिपूर्वक संपत्ति सत्ता और शक्ति को हथियाने में सफल हुए हैं वे बाहर से भले ही मौज करते हुए दिखाई दें, पर थोड़े ही समय में इन भूल भुलैयों का पर्दाफाश हो जाता है और यह स्पष्ट रूप से प्रकट होने लगता है कि अनीति अपने लिए, अपने परिजनों के लिए, तथा समस्त संसार के लिए, केवल विपत्ति ही बढ़ाने में समर्थ हो सकती है।
गायत्री- नीति और न्याय की स्थापना पर बल देती है और बताती है कि जो बोओगे वही काटोगे। प्रारब्ध और कुछ नहीं, भूत काल में किये हुये अपने भले बुरे कर्मों का परिणाम मात्र है। पर-आत्मा के न्याय युक्त शासन में मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता, और न किसी के अधिकार का हनन होता है। अपना प्रयत्न, पुरुषार्थ, विचार, भाव, संकल्प और कार्य ही अपने लिए दुख और सुख उत्पन्न करता है। इन्हीं के आधार पर ईश्वर प्रसन्न या अप्रसन्न होता है। दैवी कृपा या दैवी कोप प्राप्त होने का मूल कारण भी यही है।
पन्द्रह वे अक्षर ‘म’ के अनुसार हमें सच्चे रूप में आस्तिक बनना चाहिए। ईश्वर की सर्वव्यापकता और न्यायशीलता पर विश्वास करते हुए अपनी विचारधारा तथा कार्य पद्धति को ऐसा बनाना चाहिए जिससे चिरस्थायी सुख शान्ति की प्राप्ति हो सके।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
दुनिया में कई दुनिया हैं और आदमी में कई आदमी। वास्तव में मनुष्य की चेतना में पर्त पर पर्त है। एक पर्त शुभ है तो दूसरा अशुभ। अतः वह निश्चित नहीं कर पाता, वह एक रूप नहीं हो पाता। क्या है, सो कहा नहीं जा सकता। हम प्रायः यह नहीं जानते कि प्रत्येक व्यक्ति में एक दूसरा व्यक्ति छिपा बैठा है। आदमी के अन्दर भी एक दूसरा आदमी है। यह हमारा दूसरा गुप्त आँतरिक व्यक्तित्व है। इसी में एक वृत्ति उत्पन्न होती है, जिसे हम कहते हैं- द्विविधा वृत्ति।
‘द्विविधा वृत्ति’ क्या है? हम मुँह से कहते हैं कि उच्च साँस्कृतिक, नैतिक जीवन निर्वाह करना चाहिए, भजन, पूजा करनी चाहिए, व्रत एवं उपवास रखना, सत्संग और स्वाध्याय करना चाहिए। किन्तु आश्चर्य, महा आश्चर्य, हम ऐसे ऐसे गन्दे विषयों, कार्यों, वासनाओं के विषय में सोचने लगते हैं, ऐसे ऐसे आसुरी प्रवृत्ति वाले विकार हमारे मन में ताण्डव मचाने लगते हैं, जिस पर हम प्रायः विश्वास नहीं करते, सात्विक प्रवृत्ति के मन में ये दुर्भावनाएं कहाँ से उत्पन्न हो गई?
ये दुर्भावनाएँ हमारे गुप्त आन्तरिक व्यक्तित्व से उत्पन्न हुई हैं। इसका स्रोत हमारा अतृप्त, असंस्कृत, असभ्य, गुप्त आँतरिक व्यक्तित्व है। ऊपरी व्यक्तित्व कुछ कहता है, तो आँतरिक व्यक्तित्व दूसरी सर्वथा विपरीत आज्ञा दिया करता है। ऊपरी व्यक्तित्व संयम की आज्ञा दिया करता है, तो आँतरिक व्यक्तित्व मौज उड़ाने, मस्त रहने से प्रवृत्ति उत्पन्न करता है। इन दोनों व्यक्तित्वों का निरन्तर संघर्ष चलता रहता है। एक मनुष्य को शुभ कार्यों के प्रति खींचती है, तो दूसरा उसे अशुभ की और आकृष्ट किया करता है। ऊपरी पर्त में ज्ञान, वैराग्य, संयम, तेज, भरा रहता है, तो नीचे की पर्त में गन्दगी, असंयम, उत्तेजना भरी रहती है।
मनुष्य जो कहता है, वह वास्तव में अनुभव करता भी है, या नहीं- यह नहीं कहा जा सकता। वह दीखता तो एक है किन्तु है उससे सर्वथा भिन्न-अनेक विरोधी तत्वों का सम्मिश्रण, माया का पुतला।
हमारी यह भीतरी दुनिया की हमारी उलझनों, नाना कष्टों और आन्तरिक क्लेशों का कारण है। जो कुछ हमें अपने शरीर में परिवर्तन प्रतीत होता है, यह हमारे अन्दर बैठे हुए आदमी की करामात है।
डॉक्टर कोयू अपनी पुस्तक ‘सेल्फ मास्टरी थ्रू कानशस आटो सजेशन’ में लिखते हैं कि मनुष्य को चाहिए कि चेतना की आँतरिक पर्तों की सफाई करें, उनमें विश्वास पैदा करें, उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न करें। ऊपरी पर्त को संकेत देने से कोई विशेष लाभ नहीं होगा। वास्तव में मनुष्य की उन्नति की आधारशिला यह आँतरिक पर्त ही है। मनुष्य की बाहरी कठिनाइयाँ एक छाया मात्र हैं बाह्य कठिनाइयाँ आँतरिक कठिनाइयों का आरोपण मात्र हैं। जो व्यक्ति इस अंदरूनी पर्त में शक्ति उत्पन्न कर लेता है, वह अपार शक्ति का अनुभव करता है। उसे संकटों को पार करने के लिये यहीं से शक्ति प्राप्त होती है।
इस आन्तरिक पर्त में आप आत्मविश्वास उत्पन्न करें। ऊपरी विश्वास से कोई लाभ नहीं है। जो बात आप मन में अन्दर से महसूस करते हैं, वही आप वास्तव में हैं आपका शरीर, आपके वस्त्र, डील-डौल नहीं, ये आन्तरिक पर्त में जमे हुए आपके विश्वास, आपकी भावनाएँ, विचार, संकेत ही जीवन निर्माण करते हैं।
(आचार्य विनावा भावे)
“परशुराम”- यह एक अद्भुत प्रयोगी लगभग पच्चीस हजार वर्ष पहले हो गये हैं। यह को कणस्थों के मूल पुरुष हैं। माँ की ओर से क्षत्रिय और बाप की तरफ से ब्राह्मण। पिता की आज्ञा से इनने माँ का भी शिर काट डाला था। कोई पूछ सकते हैं, ‘यह कहाँ तक उपयुक्त था? लेकिन उनकी श्रद्धा को सशंकता छू तक नहीं गई थी। ‘निष्ठा से प्रयोग करना और अनुभव से ज्ञान प्राप्त करना, यही उनका सूत्र था।
परशुराम उस समय के सर्वोत्तम पुरुषार्थी व्यक्ति थे। उनके हृदय में दुखियों के प्रति दया थी और अन्यायों से तीव्रतम चिढ़। उस समय के क्षत्रिय बहुत ही उन्मत्त हो रहे थे। वे अपने को जनता का रक्षक कहते थे, लेकिन व्यवहार में तो उन्होंने कभी का ‘र’ को ‘भ’ में बदल दिया था। परशुराम ने उन अन्यायी क्षत्रियों का घोर प्रतीकार शुरू किया। जितने क्षत्रिय उनके हाथ आये, उन सबको उसने मार ही डाला। पृथ्वी को नक्षत्रीय बनाकर छोड़ूंगा,’ यह उनने अपना विरद बना लिया था।
इसके लिये यह अपने पास हमेशा एक कुल्हाड़ी रखने लगे। कुल्हाड़ी से रोज कम से कम एक क्षत्रिय का सिर तो उड़ाना ही चाहिये, ऐसी उपासना उनने अपने ब्राह्मण अनुयायियों में जारी की। पृथ्वी निःक्षत्रिय करने का यह प्रयोग उनने इक्कीस बार किया। लेकिन पुराने क्षत्रियों को जान-बूझकर खोज-खोज कर मारने और उनकी जगह अनजाने नये-नये क्षत्रियों का निर्माण करने की प्रक्रिया का फलित भला क्या हो सकता था? आखिर रामचन्द्र ने उनकी आंखों में अंजन डाला। तब से उनकी दृष्टि कुछ सुधरी।
तब उनसे उस समय के कोंकण के घने जंगल तोड़-तोड़कर बस्तियाँ बनाने के रचनात्मक कार्य का उपक्रम किया। लेकिन उनके अनुयायियों को कुल्हाड़ी के हिंसक प्रयोग का चस्का पड़ गया था, इसलिये उन्हें कुल्हाड़ी का यह अपेक्षाकृत अहिंसक प्रयोग फीका-सा लगने लगा। निर्धन को जिस प्रकार उसके सगे-सम्बन्धी त्याग देते हैं, उसी प्रकार उसके अनुयायियों ने भी उसे छोड़ दिया।
लेकिन यह निष्ठावान् महापुरुष अकेले ही वह काम करते रहे। ऐच्छिक दरिद्रता का वरण करने वाले, आरण्यक प्रजा के आदि सेवक भगवान शंकर के ध्यान से वह प्रतिदिन नई स्फूर्ति प्राप्त करने लगे और जंगल काटना, झोपड़ियाँ बनाना, वन्य पशुओं की तरह एकाकी जीवन व्यतीत करने वाले अपने मानव बन्धुओं को सामुदायिक साधना सिखाना-इन उद्योगों में उस स्फूर्ति से काम लेने लगे। निष्ठावंत और निष्काम सेवा ज्यादा दिन एकाकी नहीं रहने पाती। परशुराम की अदम्य सेवावृत्ति देख कोंकण के जंगलों के वे अन्य निवासी पिघल गये और आखिर उन्होंने उनका अच्छा साथ दिया। अपने-आपको ब्राह्मण कहलाने वाले उसके पुराने-पुराने अनुयायियों ने तो उनका साथ छोड़कर शहरों की पनाह ली थी, मगर उनके बदले ये नए अवर्ण अनुयायी उन्हें मिले। उनने उन्हें स्वच्छ आचार, स्वच्छ विचार और स्वच्छ उच्चार की शिक्षा दी। एक दिन परशुराम ने उनसे कहा-भाइयो! आज से तुम लोग ब्राह्मण हो गए।’
राम और परशुराम की पहली भेंट धनुर्भंग-प्रसंग के बाद एक बार हुई थी। उसी समय उन्हें श्री रामचन्द्र जी से जीवन दृष्टि-मिली थी। उसके बाद इतने दिनों में उन दोनों की भेट कभी नहीं हुई थी। लेकिन अपने वनवास के दिनों में रामचन्द्र पंचवटी में आकर रहे थे। उनके वहाँ के निवास के आखिरी वर्ष में बागलाण की तरफ से परशुराम उनसे मिलने आए थे। जब वह पंचवटी के आश्रम में पहुँचे, उस समय रामचन्द्र पौधों को पानी दे रहे थे। परशुराम से मिलकर रामचन्द्र को बड़ा ही आनन्द हुआ। उनने उस तपस्वी और वृद्ध पुरुष का साष्टाँग प्रणाम-पूर्वक स्वागत किया और कुशल प्रश्नादि के बाद उनके कार्यक्रम के बारे में पूछा। परशुराम ने कुल्हाड़ी के अपने नये प्रयोग का सारा हाल रामचन्द्र को सुनाया। वह सुन रामचन्द्र ने उनका बड़ा गौरव किया। दूसरे दिन परशुराम वहाँ से लौटे।
अपने मुकाम पर वापिस आते ही उनने उन नये ब्राह्मणों को राम का सारा हाल कह सुनाया और बोले-
‘रामचन्द्र मेरे गुरु हैं। अपनी पहली ही भेंट में उनने मुझे जो उपदेश दिया, उससे मेरी वृत्ति पलट गई और मैं तुम्हारी सेवा करने लगा। उनकी भेंट में उनने मुझे शब्दों द्वारा कोई उपदेश नहीं दिया लेकिन उनकी कृति में से मुझे उपदेश मिला है वही मैं आज तुम लोगों को सुनाता हूँ।’
‘हम लोग जंगल काट-काटकर बस्ती बसाने का यह जो कार्य कर रहे हैं, वह बेशक उपयोगी कार्य है। लेकिन इसकी भी मर्यादा है। उस मर्यादा को न जानकर हम अगर पेड़ काटते ही रहेंगे, तो वह एक नहीं भारी हिंसा होगी और कोई भी हिंसा अपने कर्ता पर उलटे बिना नहीं रहती यह तो मेरा अनुभव है। इसलिए अब हम पेड़ काटने का काम खत्म करें। आज तक जितना कुछ किया, सो ठीक ही किया क्योंकि उसी की बदौलत पहले जो ‘असह्यादि’ था, वह अब ‘सह्यादि’ बन गया है। लेकिन अब हमें जीवनोपयोगी वृक्षों के रक्षण का काम भी अपने हाथ में लेना चाहिए।’
यह कहकर उनने उन्हें आम, केले, नारियल, काजू, कटहल, अन्नानास आदि छोटे-बड़े फल के वृक्षों के संगोपन की विधि सिखाई। उसे इसके लिए स्वयं वनस्पति-संवर्धन-शास्त्र का अध्ययन करना पड़ा और उनने अपने हमेशा के उत्साह से उस शास्त्र का अध्ययन किया भी। उनने उस शास्त्र में कई महत्वपूर्ण शोध भी किये। पेड़ों को मनोज्ञ आकार देने के लिए उन्हें व्यवस्थित काटने-छाँटने की जरूरत महसूस कर उसने उनके लिए एक छोटे से औजार का आविष्कार किया। इस औजार को ‘नव-परशु’ का नाम देकर उसने अपनी परशु-उपासना अखण्ड जारी रखी।
एक बार उनने समुद्र तट पर नारियल के पेड़ लगाने का एक सामुदायिक समारोह सम्पन्न किया। उस अवसर से लाभ उठाकर उनने वहाँ आए हुए लोगों के सामने अपने जीवन के सारे प्रयोगों और अनुभवों का सार उपस्थित किया। सामने पूरे ज्वार में समुद्र गरज रहा था। उसकी तरफ इशारा करके समुद्रवत् गम्भीर ध्वनि में उसने बोलना आरंभ किया-
‘भाइयों! यह समुद्र हमें क्या सिखा रहा है, इस पर ध्यान दीजिए। इतना प्रचण्ड शक्तिशाली है यह, परंतु अपने परम उत्कर्ष के समय भी वह अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता। इसीलिए उसकी शक्ति हमेशा ज्यों की त्यों रही है। मैंने अपने सारे उद्योगों और प्रयोगों में से यही निष्कर्ष निकाला है। छुटपन में मैंने पिता की आज्ञा से अपनी माता की हत्या की, लोग कहने लगे, कैसा मातृ हत्यारा है।’ मैं उस आक्षेप को स्वीकार करने को तैयार नहीं था। मैं कहा करता, ‘आत्मा अमर है और शरीर मिथ्या है। कौन किसे मारता है! मैं मातृ-हत्यारा नहीं हूँ, प्रत्युत पितृ-भक्त हूँ।’
‘लेकिन आज में अपनी गलती स्वीकार करता हूँ। मातृवध का आरोप मुझे उस समय स्वीकार नहीं था, और आज भी नहीं है। लेकिन मेरे ध्यान में यह बात नहीं आई थी कि पितृ भक्ति की भी मर्यादा होती है। यही मेरा वास्तविक दोष था। लोग अगर अचूक उतना ही दोष बताते तो उसमें मेरी विचार-शुद्धि हुई होती। लेकिन उन्होंने भी मर्यादा का अतिक्रमण करके मुझ पर बेजा आक्षेप किया और उससे मेरी विचार शुद्धि में कोई सहायता नहीं पहुँची।’
‘बाद में बड़ा होने पर अन्याय के प्रतीकार का व्रत लेकर मैं जुल्मी सत्ता से इक्कीस बार लड़ा हर बार ऐसा प्रतीत होता था कि मैं सफल हो गया हुँ लेकिन प्रत्येक मर्तबा मुझे निश्चित असफलता ही नसीब हुई। रामचन्द्र ने मेरी गलती मुझे समझा दी।’
अन्याय- प्रतीकार मनुष्य का धर्म तो है, लेकिन उसकी भी एक शास्त्रीय मर्यादा है, यह ज्ञान मुझे गुरु-कृपा की बदौलत प्राप्त हुआ।
‘इसके उपरान्त मैं जंगल काटकर मानव उपनिवेश बनाने के मानव सेवा के कार्य में जुट गया, लेकिन आप जानते ही हैं कि जंगल काटने की भी एक हद होती है, इस बात का ज्ञान मुझे ठीक समय पर कैसे हुआ।’
‘अब तक मैं निरन्तर प्रवृत्ति का ही आचरण करता रहा। पर आखिर प्रवृत्ति की मर्यादा तो है ही न? इसलिये अब मैं निवृत्त होने की सोच रहा हूँ। इसके माने यह नहीं है कि मैं कर्म ही त्याग दूँगा। स्वतंत्र नई प्रवृत्ति का आरम्भ अब नहीं करूंगा। प्रवाह-पतित करता रहूँगा। प्रसंगवश, आप पूछेंगे तब, सलाह भी देता रहूँगा।’
‘इसलिये मैंने आज जान बूझकर इस समारोह का आयोजन किया और अपना यह समुद्रोपनिषत या जीवनोपनिषत चाहे जो कह लीजिये आपसे निवेदन किया है। फिर से थोड़े में कहता हूँ, पितृ भक्ति मर्यादा, प्रतीकार की मर्यादा, मानव सेवा की मर्यादा-साराँश सभी प्रवृत्तियों की मर्यादा- यही मेरा जीवन सार है। आओ, एक बार सब मिल कर कहें, ॐ नमो भगवत्ये मर्यादायै।’
इतना कह कर परशुराम शाँत हो गये। उनके उस उपदेश की गम्भीर प्रति ध्वनि सह्याद्रि की खोह-कंदराओं में आज भी गूँजती हुई सुनाई देती है।
(श्री भगवानदास केला)
युग की पुकार है कि हम अपने को बदलें और कुछ दिन घाटे की बिजनिस करना सीखें। हमारे पत्रकार यह न सोचें कि आगामी तीन वर्षों में हमें अपनी कोठी बना लेनी है। वे सोचें कि इन वर्षों में इसे इस क्षेत्र में अपने विचार भर देने हैं। प्रकाशक यह न सोचें कि हमें तीन वर्ष में अपना प्रेस लगा लेना है। वे सोचें कि हमें अपनी भाषा के इतने अभाव पूरे कर देने हैं। मिल का मालिक यह न सोचे कि हमें एक नयी मिल लगानी है, वे सोचें कि हमें मिल एरिया को नया जीवन देना है।
-कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’
हर एक र्स्वथडडडडड और समर्थ आदमी को यथा सम्भव कोई व्यवसाय करना और स्वावलम्बी होना चाहिये। बिना परिश्रम किये मुफ्त की रोटी खाना, अपने निर्वाह के लिए दूसरों पर भार-स्वरूप बने रहना उचित नहीं है। अच्छा, हमारे व्यवसाय का लक्ष्य या आदर्श क्या हो? अपने व्यवसाय में हम किन-किन बातों का ध्यान रखें।
व्यवसाय का आदर्श स्थिर करना हमारे लिए ऐसा ही है, जैसे किसी यात्री के लिए अपनी दिशा निश्चित कर लेना। अगर हम यात्रा आरम्भ करने से पहले अपना लक्ष्य या दिशा निश्चय नहीं करते तो हम कभी एक ओर चलेंगे, कभी दूसरी ओर, कभी दाँयी ओर, कभी बाँयी ओर, कभी आगे और कभी पीछे। इसका परिणाम यह होगा कि हम बहुत समय तक घूमते रह कर अपनी यात्रा में विशेष प्रगति न कर पायेंगे। हमने जिस स्थान से चलना आरम्भ किया है, उसके आस-पास ही चक्कर लगाते रहेंगे अथवा यह भी सम्भव है कि अपने रवाना होने की जगह से कुछ पीछे हट जाएं। यात्री के लिए यह जरूरी है कि वह पहले से यह स्थिर करले कि उसे किस दिशा में जाना है और कहाँ पहुँचना है जिससे उसे व्यर्थ इधर-उधर न भटकना पड़े। इस तरह जो आदमी व्यवसाय आरम्भ करें उसे यह भली भाँति सोच समझ लेना चाहिए कि इस व्यवसाय का आदर्श क्या है और मुझे इसमें किन सिद्धान्तों का ध्यान रखना आवश्यक है।
सम्भव है कि कुछ आदमी इस तरह की चर्चा को अनुपयोगी समझें। वे कह सकते हैं कि व्यवसाय का उद्देश्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अधिक से अधिक धन कमाना है। जबकि हमारे व्यवसाय से हमारा गुजर अच्छी तरह हो सकता है तो वह व्यवसाय अवश्य ही अच्छा है, फिर हमें यह सोचने की कोई जरूरत नहीं रहती कि उसका आदर्श क्या है। इस तरह की विचारधारा बहुत एकाँगी है। ये लोग सिर्फ अपने हित या स्वार्थ की बात सोचते हैं। वे भूल जाते हैं कि आदमी समाज में रहता है, उसके कार्यों और विचारों का प्रभाव दूसरों पर पड़े बिना नहीं रहता। यदि हम दूसरों से छल कपट करके उनका पैसा हड़पने का विचार करें और दूसरे अपनी चालाकी से हमें धोखा देते रहें तो समाज का जीवन कितना संकटमय हो जायगा। समाज का कार्य अच्छी तरह होता रहने के लिए यह बात आवश्यक है कि उसका प्रत्येक अंग अपना अपना कार्य करते हुए दूसरों के सुख और सुविधा का ध्यान रखें। हमारे काम का दूसरों के उचित स्वार्थों से संघर्ष न हो, हम किसी को हानि न पहुँचावें।
यह ठीक है कि आदमी कोई व्यवसाय इसलिये करते हैं कि उससे उनका भोजन, वस्त्र आदि शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। परन्तु मनुष्य की केवल शारीरिक आवश्यकताएं ही नहीं होतीं, उसे मन या आत्मा की जरूरतें रहती हैं। आदमी की इच्छा होती है कि वह दूसरे से प्यार करें,वह दूसरों की सेवा और सहायता करें और दूसरे आदमी उसकी सेवा और सहायता करें। आदमी की स्वाभाविक इच्छा है कि वह दूसरों से मिलजुल कर सहानुभूति और सहयोग का भाव रखते हुए सामाजिक जीवन व्यतीत करें। आदमी की इन इच्छाओं की पूर्ति उसके व्यवसाय से कहाँ तक होती है यह भी उसके लिए विचारणीय प्रश्न है।
आदमी का अपने व्यवसाय में काफी समय लग जाता है। कुछ विशेष अवस्थाओं को छोड़कर उसे हर रोज कई कई घण्टे अपने व्यवसाय में लगाने पड़ते हैं इस समय उसके मन में जो विचार रहते हैं उनका उसके जीवन पर बहुत असर पड़ता है। इसलिए यह आवश्यक है कि अपना व्यवसाय करते समय हमारे विचार ऊँचे हों। ऐसा न हो कि उस समय हमारे जीवन में संकीर्ण स्वार्थ भरा हो, हम दूसरों को कष्ट या हानि पहुँचाकर भी अपने लिए सुख के साधन की फिक्र में हों। अपना काम धन्धा करने के साथ साथ हम अपने मन में प्रेम, दया सहानुभूति, सहयोग और सेवा-सुश्रूषा आदि गुणों का विकास करते रहें। हमारा व्यवसाय हमारी शारीरिक आवश्यकताओं की ही पूर्ति में सहायक न होकर हमारी मानसिक और आत्मिक उन्नति में भी सहायक होना चाहिये।
जब तक ऐसा नहीं होता, हमें अपने व्यवसाय से यथेष्ट सुख शान्ति नहीं मिल सकती। हमें समय समय पर कुछ ऐसे आदमियों से मिलने का अवसर आता है, जिन्हें उनके व्यवसाय से काफी आमदनी है, वे दूसरे आदमियों की दृष्टि में खुद सुखी जीवन बिताने वाले है। समाज में वे अच्छी मान प्रतिष्ठा पाते हैं। पर ये सब होते हुए भी वे वास्तव में सुखी नहीं हैं, उनके मन में बड़ा संघर्ष और असंतोष रहता है। हाँ इस तरह की बातें वे सर्वसाधारण में प्रकट नहीं करना चाहते, जो कोई उनका बहुत घनिष्ठ मित्र होता है, उसे ही यह भीतरी रहस्य मालूम हो सकता है।
हमारा व्यवसाय हमारे पूरे जीवन का निर्माण करने वाला हो केवल अधूरे जीवन का नहीं। आदमी केवल शरीर नहीं है, उसके साथ मन और आत्मा है। जो व्यवसाय निरे स्वार्थ की दृष्टि से किया जायगा उससे हमारे मन और आत्मा की आवश्यकताएं पूरी नहीं हो सकतीं। इसके लिये तो हमें अपना व्यवसाय इस तरह का रखना होगा जिससे दूसरों का भी हित हो। तभी हमारे मन और आत्मा की उन्नति करने वाले गुणों की वृद्धि होगी और हमारे जीवन का विकास होगा। जो आदमी अपने व्यवसाय से पहले तो जैसे-जैसे धन कमाता है और उससे अपनी शारीरिक सुविधाएं या सुख प्राप्त करता है और फिर थोड़ा बहुत रुपया गरीबों को दान देता है, या सार्वजनिक उपयोगों के लिए औषधालय, विद्यालय, धर्मशाला या मंदिर आदि की स्थापना करके अपने मन या आत्मा को सुख पहुँचाने की चेष्टा करता है, वह अपने जीवन को अलग-अलग भागों में देखता है और उनकी आवश्यकताओं की जुदा-जुदा समय में और जुदा-जुदा उपायों से पूर्ति करता है। परन्तु मनुष्य जीवन को इस प्रकार अलग-अलग टुकड़ों में विभाजित करना ठीक नहीं है। उसके विकास का कार्य यथासम्भव इकट्ठा ही होना चाहिए।
(श्री स्वामी सत्यदेव जी परिव्राजक)
शिक्षित मनुष्य में अपना टुकड़ा कमा खाने की योग्यता का होना भी परमावश्यक है। जो मनुष्य अपने आपको पढ़ा लिखा कहकर स्वतंत्र टुकड़ा कमाने की जो शक्ति नहीं रखता उसका पढ़ना लिखना व्यर्थ है।
आज हमारे स्कूल और कालेजों में पढ़ने वाले छात्र किस प्रकार इधर उधर मारे मारे फिरते हैं। छः वर्ष के हुए, माँ बाप ने पढ़ने को भेजा, दस वर्ष मेहनत करके परीक्षा पास की, चार वर्ष दिमाग खाली कर बी.ए. की डिग्री ले ली, डिग्री लेने पर भी प्रश्न वही सामने है- हमें रोटी कैसे मिलेगी? माता-पिता ने अपनी जायदाद नीलाम कर-कर लड़के को पढ़ाया, हजारों रुपये खर्च हो गये कर्ज पर कर्ज हो गया, जब पढ़ लिख कर बाहर निकला, और माता-पिता की आशा हुई कि अब सारा दरिद्र दूर हो जायगा उस समय नया दृश्य क्या? अब नौकरी की सिफारिश करने वाला चाहिये। कहीं सिफारिश लगे, किसी साहब के आगे जाकर गिड़गिड़ाया जाये, उसको गालियाँ दी जायं, किसी गरीब की नौकरी हटवाकर अपना उल्लू सीधा किया जाय, तब कहीं जाकर नौकरी लगे और उस बी.ए. पढ़ने वाले का ‘सब्ज बाग’ देखने में आवे। उस सब्ज बाग में भी क्या आनन्द है? वहाँ उस बी.एस., एम.ए. की डिग्री का बड़ा भारी पुरस्कार मिलता है। आप जानना चाहते हैं?
अच्छा सुनिए, पहला पुरस्कार तो मिला- (योर मोस्ट ओबिडेण्ट सर्वेन्ट) आपका निहायत ताबेदार गुलाम? यह लो पहला पुरस्कार। अब इसके आगे जिसने सिफारिश लड़ाकर नौकरी दिलवाई है, उसके घर की हाजिरी भरना- यह नम्बर दो पुरस्कार है। तीसरा पुरस्कार है अफसरों की दिन-रात गालियाँ सहना, चौथा पुरस्कार है अपनी आत्मा के विरुद्ध काम करना। आज हजारों लाखों भारतीय इन पुरस्कारों से लदे हुए हैं। उनसे आकर पूछ देखिये। कैसे कैसे झूठ कैसी कैसी मक्कारियाँ उनको नौकरी की खातिर करनी पड़ती हैं। अपने अफसरों को प्रसन्न रखने के लिए उनको कैसे कैसे स्वाँग रचने की जरूरत पड़ती है। लड़का घर में बीमार है, छुट्टी चाहिये अब छुट्टी कैसे मिले? अपने अफसर से जाकर छुट्टी माँगते हैं। वह काम अधिक है का डर दिखाता है छुट्टी नहीं मिलती। अब क्या करें? डॉक्टर के पास जाकर, दस पाँच रुपये दक्षिणा दें, उससे अपनी बीमारी का सर्टिफिकेट लेते हैं और अपनी बीमारी की झूठी अर्जी भेजकर आत्मा का हनन करते हैं। जानते हैं कि पाप कर रहें है पर क्या करें-मरता क्या नहीं करता- लड़के के इलाज के लिए छुट्टी चाहिए। जब हाकिम छुट्टी न दे तो उसकी आँखों में धूल झोंकने के लिए कुछ बहाना बनाना ही पड़ता है।
कौन समझदार इस स्कूली, स्वतंत्रता का हरण करने वाली शिक्षा को शिक्षा कह सकता है। यह शिक्षा नहीं है यह मकड़ी का ताना बाना है। जो इसमें फंसा सो गया। एक बनिया का लड़का चार आने के चने खरीदता है। वह उनको उबालकर नमक मिर्च लगाकर बाजार में बेच आठ आने के पैसे पैदा करता है। वह उस कलमघिस्सू, कुर्सी तोड़ने वाले तथा अफसर की हाँ में हाँ मिलाने वाले जी हुजूर के सम्पादक से लाख दरजे अच्छा है। उसको अपनी आत्मा का हनन तो नहीं करना पड़ता? वह जब चाहे स्वेच्छानुसार घूम सकता है। वह अपनी मरजी का मालिक है। उसको किसी के सामने गिड़गिड़ाना नहीं है। उसको छुट्टी माँगने की जरूरत नहीं। वह देश-सेवा कर सकता है, देश भक्तों से मिल सकता है उनके व्याख्यानों का आनन्द ले सकता है पर हमारा कालेज का ग्रेजुएट बेचारा मिल और स्पेन्सर पढ़कर भी अपने गले में जंजीर बाँधे हुए है और अपनी शक्तियों को वेश्याओं की भाँति बेच रहा है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली के ऐसे जहरीले फल क्यों हैं? उत्तर स्पष्ट है। स्कूल और कालेजों की शिक्षा असल में शिक्षा नहीं है, यह केवल परीक्षा पास कराने की मशीन है। खूब रट रट कर, घोटा लगाकर परीक्षा पास कर लेना ही इसका मुख्य उद्देश्य है। प्रत्येक कालेज का अधिवक्ता परीक्षोत्तीर्ण विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना-फीसदी अधिक लड़के पास कराना- ही अपना उद्देश्य समझता है। स्कूलों के अध्यापक निरीक्षकों को बड़े गौरव से कहते हैं।-देखिये महाशय हमारे स्कूल में से इतने लड़के पास हुए। बस मतलब पूरा हो गया शिक्षा की इतिश्री हो गई! लड़कों की तन्दुरुस्ती, उनका चरित्र बिगड़ जाय तो बिगड़ जाय, पर पास होना चाहिए। लड़के परीक्षा पास करना अपना मुख्य कर्त्तव्य समझ सब कुछ उसके लिए बलिदान कर देते हैं और परीक्षा पास कर लेने पर समझ बैठते हैं- बस अब मैदान मार लिया। अब संसार के दुखों से छूट गये।
बेचारे यह नहीं जानते कि जीवन का सबसे अच्छा समय गुजर गया और अब मुसीबतों का आरम्भ होने लगा है। फोनोग्राफ की भाँति उनको पढ़ाई की सब बाते याद हैं और जब चाहें तभी उगल कर दूसरों का मनोरंजन कर सकते हैं। मिल और स्पेन्सर के उपदेश तो उन्हें कण्ठ हैं पर उनसे रोटी कमाने में कुछ भी सहायता नहीं मिल सकती।
सहायता हो कैसे? पहले तो इस शिक्षा द्वारा शरीर खो दिया- तन्दुरुस्ती नष्ट हुई- जो कुछ बचा उससे आर्थिक-स्वतंत्रता लाभ करने को सर्वथा असमर्थ हैं। चौदह वर्षों की शिक्षा नवयुवकों को इस योग्य नहीं बना सकती कि वे स्वतंत्रता पूर्वक जीवन निर्वाह कर सकें। घर की पूँजी स्वाहा हो गई और परिणाम निकला-नौकरी यदि उसी पूँजी से कालेजों में समय नष्ट न किया जाता तो अच्छे रहते। दुकान खोलकर मजे में गुजारा कर सकते थे। धन भी गया, शक्ति भी गई, स्वतंत्रता भी बेच डाली, अब जीवन का साधन केवल दूसरों पर निर्भर रहने पर ही गया है। दस रुपये की नौकरी के लिए जूतियाँ चटकाते फिरते हैं। मगर हाथ से कोई उद्योग धंधा नहीं करेंगे। अंग्रेजी पढ़कर धंधा! स्वतंत्रता की खानि ‘उद्योग’ से इन्हें घृणा है। पढ़ने लिखने के अर्थ यह है कि केवल क्लर्की की जाय और अपने देश के अनपढ़ भाइयों का गला काटकर रुपया पैदा हो। अब बढ़िया सूट बूट चाहिये। घर में खाने को न रहे मगर फैशन पूरा हो। जहाँ अंग्रेजी की गिटपिट आई वहीं भेष बदला और जेंटलमेनी का भूत सिर पर सवार हुआ। यदि बाप अपने मिडल पास बेटे को बाजार से आटा खरीद लाने को कहता है तो बेटा बाजार जाकर सौदा खरीदने से हिचकिचाता है। यदि किसी प्रकार मान भी लिया तो दो चार, दस सेर आटा उठाने के लिए उसे एक नौकर चाहिए। अंग्रेजी पढ़ने से हाथों में मेहन्दी लग जाती है, और वे सुन्दर बनकर जेबों में रखने लायक रह जाते हैं।
भारतीय बच्चों के सामने हमें शिक्षा का नया आदर्श रखना है। उनको कर्मवीर बनाने की शिक्षा देनी है। उनके अंदर की स्वावलम्बन संजीवनी शक्ति भरनी है। यह सच तभी होगा जब मजदूरी की महत्ता को शिक्षा में प्रथम स्थान दिया जायगा, जब देश के लोग चरित्र की कसौटी से ऊँच-नीच की परख करेंगे। अकर्मण्यता का जहर जो आज हमारी समाज में फैल रहा है, उसको निकालना है। वह केवल एक प्रकार का बपतिस्मा है। उससे मनुष्य केवल किसी भलेमानस की बात समझने लायक बनता है उसको मैं शिक्षा नहीं कहता, शिक्षा दूसरी वस्तु है। वर्तमान शिक्षा से उलटा भीरुता, कायरता और अकर्मण्यता फैल गई है और हमारा बल वीर्य नष्ट हो गया है। इसलिए हमें सच्ची शिक्षा की ओर आना चाहिए और अपनी पिछली भूलों को सुधारने का यत्न करना चाहिए।
(श्री स्वामी सत्य भक्त जी वर्धा)
1- हम सर्व धर्म समभावी बनें। अगर हमारा किसी धर्म संस्था से ज्यादा संपर्क है, तो हम भले ही उस संस्था का अधिक उपयोग करें और आत्मीयता प्रकट करें, परन्तु दूसरी धर्म-संस्थाओं को अपनी धर्म-संस्था के समान पवित्र मानें। उनसे लाभ उठाने का मौका मिलने पर उनसे लाभ उठावें। ये सभी धर्म-संस्थाएं मनुष्य समाज को उन्नत बनाने के लिये थीं। उनकी रीति नीति में अगर अन्तर मालूम होता है, तो उस अन्तर से उन्हें भला बुरा न समझें किन्तु उसको देश काल का असर समझें। करीब सवा हजार वर्ष पहले अरब के लोगों की उन्नति के लिये इस्लाम ने जो नियम बनाये यदि वे आज किसी देश के लिए निरुपयोगी हैं। तो इसी से इस्लाम को बुरा न समझें। हम इतना ही कहें कि यह नियम आज के लिये उपयोगी नहीं हैं, इसलिए दूर कर देना चाहिये परन्तु अपने समय के लिए अच्छा था। इसी उदारता से हमें वैदिक, जैन, बौद्ध, ईसाई, पारसी, आदि धर्मों पर विचार करना चाहिये। हम उनकी आलोचना करें। परन्तु पूर्ण निष्पक्षता से आलोचना करें। उनमें से वैज्ञानिक सत्य को खोज लें। बाकी को वर्तमान काल की दृष्टि से निरुपयोगी कहकर छोड़ दें। परन्तु इससे उस धर्म का निरादर न करें। जिस सम्प्रदाय को इसने अपना सम्प्रदाय बना रखा है, उसकी आलोचना करते समय हमारे हृदय में जितनी भक्ति रहती है वही भक्ति हम दूसरे सम्प्रदायों की आलोचना करते समय रखें। अपने सम्प्रदाय के दोषों पर तो हम नजर ही न डालें, और दूसरे सम्प्रदाय के दोष ही दोष देखें यह बड़ी से बड़ी भूल है। इससे हम किसी भी धर्म के अनुयायी नहीं कहला सकते- धर्म का लाभ हमें नहीं मिल सकता।
2- जो कार्य सार्वजनिक और सार्वकालिक दृष्टि से अधिकतम प्राणियों के अधिकतम सुख का कारण है, उसे ही धर्म समझें। इसके विरुद्ध कोई भी कार्य क्यों न हो,- भले ही बड़े से बड़ा महान पुरुष या बड़े से बड़ा आगम ग्रंथ उनका समर्थन करता हो, परन्तु उसे हम धार्मिक न समझे। हमारे प्रत्येक कार्य में यह उद्देश्य जरूर रहे। इस सिद्धान्त को हम अपने जीवन में उतारने की कोशिश करें।
3- उपर्युक्त सिद्धाँत के अनुसार सभी सम्प्रदायों में कुछ न कुछ हितकर तत्व रहते हैं। हम उन्हीं को मुख्यता देने की कोशिश करें, जिससे सब सम्प्रदायों में तथा उनके अनुयायी वर्गों में आदर और प्रेम बढ़े और सबके जुड़े-जुड़ें संगठन बनें। हिन्दू धर्म का कर्मयोग, जैन धर्म की अहिंसा और तप, बौद्ध धर्म की दया, ईसाई धर्म की सेवा, इस्लाम का भ्रातृत्व ये सब चीजें सभी के लिए उपयोगी हैं। अन्य सम्प्रदायों में भी अनेक भलाई मिलेंगी। इन्हीं को मुख्यता देकर अगर हम विचार करें, तो सब धर्मों से हमें प्रेम भी होगा आपका द्वेष भी नष्ट होगा, तथा सबका एक संगठन भी बन सकेगा। इसके लिये हमें जहाँ तक बन सके सभी सम्प्रदायों के धर्मस्थानों का उपयोग करना चाहिये। अपने सम्प्रदायों के मंदिरों में भी अन्य सम्प्रदायों के महात्माओं के स्मारक रखना चाहिये, सभी सम्प्रदायों महात्माओं के स्मारक जहाँ बराबरी से रह सकें, ऐसे स्थान बनाना चाहिए। इस प्रकार सर्व-धर्म समभाव को व्यावहारिक रूप देने और उसे जीवन में उतारने की पूरी कोशिश करनी चाहिये।
4- बहुत सी ऐसी बातें हैं जो एक समय अच्छी थीं, उपयोगी थीं, क्षन्तव्य थीं, इसलिये शास्त्रों में या रूढ़ि में स्थान पा गई हैं। परन्तु आज वे उपयोगी नहीं हैं। इसलिये उन्हें हटा देना चाहिये। सिर्फ इसी बात को लेकर कि वे हमारे शास्त्रों में लिखी हैं, या पुरानी हैं, उन्हें चालू रखना अन्याय है। जो सर्व-धर्म समभावी है, वह किसी एक धर्मशास्त्र की दुहाई देकर किसी अनुचित बात का समर्थन क्यों करेगा? एक सम्प्रदाय के शास्त्र में किसी बात का विधान हो सकता है और दूसरे सम्प्रदाय के शास्त्र में उसका निषेध हो सकता है, तब सर्व-धर्म समभावी के सामने एक जटिल प्रश्न खड़ा हो जाता है कि वह किसकी बात मानें? ऐसी हालत में उसे यह देखना चाहिये कि कल्याण किस में है? अगर कोई बात सभी शास्त्रों में एक सी मिलती है अथवा उसमें जितने मत हों वे सभी वर्तमान में हितकारी न हों, तो उन सबको छोड़कर उसे कल्याणकारी बात पकड़ना चाहिये। जैसे वर्तमान में संकुचित जातीयता, स्त्रियों के पुनर्विवाह का निषेध, पर्दा की अधिकता, छुआछूत का अनुचित विचार, भूत, पिशाच आदि की मान्यता, अविश्वसनीय अतिशय आदि बहुत से अहितकर तत्व आ गये हैं जोकि प्रगति के नाशक तथा ईर्ष्या और दुरभिमान को बढ़ाने वाले हैं, इन सब कुतत्वों को हटाकर विवेकी बनाना चाहिये। एक जैन कहे कि महावीर के जन्म समय इन्द्रादि देवता पूजा करने आये थे, बौद्ध कहें कि बुद्ध के जन्म समय ब्रह्मा, विष्णु महेश मौजूद थे, वैष्णव कहे कि राम के जन्म समय शिव इन्द्र आदि अयोध्या की गलियों के चक्कर काटते थे, तो ये सब बातें अंध विश्वास और मूढ़ता के चिह्न हैं इनसे विज्ञान की हत्या होती है, समभाव नष्ट होता है, ईर्ष्या और दुरभिमान बढ़ता है। हमें धर्म को अधिक से अधिक विज्ञान संगत बनाना चाहिये और इसी बुनियाद पर धर्म तथा समाज का नव-निर्माण या जीर्णोद्धार करना चाहिये।
5- आज मानव - समाज कई तरह के भेदों में बंटा हुआ है। साम्प्रदायिक भेद तो हैं ही साथ ही और भी अनेक तरह के वर्ग बना लिये गये हैं और इस प्रकार वर्गयुद्ध चालू हो गया है। मनुष्य अपना पेट भर के सन्तुष्ट हो जाता तो गनीमत थी, परन्तु वह इतने में सन्तुष्ट नहीं होता, वह यह कोशिश करता है कि हमारी जाति के सब मनुष्यों का पेट भरे और हम सब संगठित होकर दूसरों को लूटें। इसीलिए एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को पीस डालना चाहता है। लाखों करोड़ों मनुष्य दूसरे देश पर शासक बनकर मौज करना चाहते हैं। दूसरे जाति के अच्छे से अच्छे सदाचारी, त्यागी, गुणी, विश्वसनीय व्यक्ति से उतनी आत्मीयता प्रकट नहीं करना चाहते जितनी कि अपने वर्ग के पतित से पतित व्यक्ति के साथ करना चाहते हैं। इस राष्ट्रीय जाति -भेद से आज दुनिया की राजनीति- अर्थनीति भयंकर ताँडव कर रही है और उससे मनुष्य जाति त्राहि त्राहि पुकार रही है। जरूरत इस बात की है कि मनुष्य जाति एक ही मान ली जाय जैसी कि वह है। शासन की सुविधा के लिए राष्ट्रीय भेद रहें, परन्तु एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र पर पशुबल से तथा किसी और ढंग से आक्रमण न करें। अगर किसी देश में मनुष्य संख्या ज्यादा है, तो कम संख्या वाले देश में जाकर वे इस शर्त पर बस जायें कि अपने को हर तरह उसी देश का बना लेंगे, वहाँ की भाषा आदि को अपना लेंगे। उन देशों पर आक्रमण करके, उन्हें दलित करके अपने वर्ग का पोषण करना मनुष्यता का नाश करना है। इससे संसार में शान्ति नहीं हो सकती। इस नीति से कोई चैन से नहीं बैठ सकेगा और बारी बारी से सबको पिसना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त एक राष्ट्र के भीतर भी अनेक तरह के राष्ट्र बने हुए हैं। जैसे भारतवर्ष में हिन्दू मुसलमानों के जाति-भेद और सम्प्रदाय-भेद से घोर संग्राम छिड़ा रहता है। इसके अतिरिक्त हिन्दू समाज में ही करीब चार हजार जातियाँ है, इनमें परस्पर रोटी-बेटी व्यवहार नहीं, इससे पारस्परिक सहयोग का लाभ नहीं मिल पाता है। पड़ौस में रहते हुए भी न रहने के बराबर कष्ट उठाना पड़ता है। ये वर्ग-भेद भी ईर्ष्या और दुरभियान के बढ़ाने वाले है। इन सब भेदों को तोड़ देने की जरूरत है। हाँ, जीवन में मित्र-वर्ग या सम्बन्धी वर्ग बनाने की जरूरत होती है, सो वहाँ चाहे सो बनाना चाहिए। अमुक वर्ग में से ही चुनाव कर सकें यह भेद न होना चाहिए। इस प्रकार जब हममें सर्व जाति समभाव आ जायगा, तो हममें से वर्ग युद्ध के तथा ईर्ष्या और दुरभिमान के बहुत से कारण नष्ट हो जाएंगे, तथा हमें प्रगति के लिए तथा सुविधापूर्वक जीवन बिताने के लिए बहुत से साधन मिल जाएंगे, इसलिए हमें अपने दिल से जाति, उपजाति का मोह निकाल देना चाहिए, जातीय और साम्प्रदायिक विशेषाधिकारों की माँग छोड़ देना चाहिए, जाति के नाम पर रोटी-बेटी-व्यवहार का विरोध न करना चाहिए इस प्रकार सर्व-धर्म-समभावी के समान सर्व जाति समभावी भी बनना चाहिए।
6- सर्व-जाति समभाव की तरह नर नारी समभाव भी अत्यावश्यक है। यह सर्व जाति समभाव का एक अंग है। नर नारी की शारीरिक विषमता है, परन्तु वह विषमता ऐसी नहीं है जैसी कि एक शरीर दो अंगों में होती है। नर नारी एक दूसरे के लिए पूरक हैं। इसलिए एक दूसरे का उन्नति में एक दूसरे की बाधक नहीं होना चाहिए और जहाँ तक बन सके अधिकारों में समानता होनी चाहिए। अनेक स्थानों पर स्त्री की अवस्था गुलाम सरीखी है। उसके आर्थिक अधिकार पूरी तरह छिने हुए हैं। फूटी कौड़ी पर भी उसका स्वामित्व नहीं है। यह दुःपरिस्थिति मिटनी चाहिये। जहाँ तक बन सके, स्त्री पुरुषों में अधिक समता का प्रचार होना चाहिए, अगर विषमता रहे भी, तो वह कम से कम हो। सामाजिक अधिकारों में भी विषमता न होनी चाहिए। स्त्री सिर्फ इसलिए किसी कार्य से वंचित न हो सके कि वह स्त्री है। धार्मिक अधिकारों में तो विषमता का कोई मतलब नहीं है। फिर भी पुरुष ने धार्मिक क्रियाकाण्डों में नारी के अधिकार छीने हैं। उससे पुरुष को कोई लाभ भी नहीं हुआ। इसलिए यह विषमता भी दूर करनी चाहिए। इस प्रकार सर्वजाति समभाव के समान नर नारी समभाव की भी जरूरत है।
इस प्रकार यदि हम सर्व धर्म समभाव, सर्व जाति समभाव, विवेक या समाज सुधारकता, निःस्वार्थता आदि गुणों को लेकर धर्म की मीमाँसा करेंगे तो सच्चे धर्म को प्राप्त कर सकेंगे। उस धर्म को जीवन में उतारने से हमारा भी कल्याण होगा और जगत का भी कल्याण होगा।
(डॉ. शिवराज लाल त्रिपाठी गोला गोकरनाथ)
युजिर ‘योगे’ धातु से योग शब्द सिद्ध होता है जिसका तात्पर्य जोड़ या मेल है। मनुष्य का मेल मनुष्य, पशु पक्षी तथा जड़ पदार्थों से भी होता है, परन्तु उसका नाम योग नहीं, बल्कि संयोग है। अध्यात्म विद्या में जीव-ईश्वर संयोग को योग कहते हैं। परमात्मा इस जीवात्मा से सदैव सर्व स्थल में मिला हुआ है कभी पृथक नहीं रहता, यहाँ तक कि जब मनुष्य भौतिक शरीर त्यागकर बाहर निकल जाता है तथा गर्भ में निवास करता है या मोक्ष को प्राप्त होता है तब भी जीव-ईश्वर की आवश्यकता नहीं होती। अब प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जब जीव और ईश्वर का वियोग किसी देश, काल तथा अवस्था में होता नहीं तो फिर योग कैसा? इसका सरल उत्तर यह है कि यों तो आत्मा को ईश्वर का योग प्रत्येक दशा, काल तथा अवस्था में उसी परम देव की परम दया से होता है, यही जीवन है। परन्तु यह स्वाभाविक योग जीव की ओर से नहीं होता और न उसको उस योग का ज्ञान होता है और न उसका अनुभव व आनन्द जीव को प्राप्त होता है। अस्तु।
जीव को ईश्वर के मेल का ज्ञान होना ही योग है और इस अनुभव द्वारा प्रयत्नशील योगीजनों का साक्षात्कार हो जाना ही परमानन्द है। परमानन्द प्राप्त हो जाने के पश्चात शेष प्राप्त करने के लिये कुछ नहीं रहता यही परमपद और मोक्ष दशा है। जब तक इस अवस्था को मनुष्य प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक अनेकों शरीरों में घूमता हुआ नानाप्रकार के कष्टों को भोगता हुआ बहुत जन्मों के पश्चात शुभ कर्मों और शुभ संस्कारों एवं ईश्वर की परम कृपा से योग साधन करने के लिए मनुष्य शरीर की प्राप्ति होती है। परमानन्द अर्थात् जिसे प्राप्त कर लेने के बाद कभी भी जीव-दुःख को प्राप्त नहीं होता और न दुःख स्वरूप शरीरों को प्राप्त होता है अर्थात् सर्वदा परमानन्द में निवास करता है। यही परम आवश्यकता है।
जीवात्मा को इस बात का यथार्थ ज्ञान और अनुभव व साक्षात्कार हो जाना कि वह घट-घटवासी सर्व व्यापक मेरे पास है और मैं उसकी गोद या शरण में हूँ ऐसी अवस्था का नाम जीवन का ईश्वर से योग है। और इसके उपाय व क्रिया का नाम योगानुष्ठान या योगाभ्यास है। और इस योग से जो दुःख निवृत्ति तथा सुख प्राप्ति रूप फल मिलता है उसको योग विभूति आदि समझना चाहिए।
इस जीवात्मा का दो पदार्थों से सम्बन्ध रहता है अर्थात् प्राकृतिक जगत व माया से या यों समझिये कि प्राकृतिक जगत व अप्राकृतिक जगदीश्वर से, क्योंकि मनुष्य का मन एक है और वह एक समय में, एक ही विषय को ग्रहण तथा अनुभव करता है। और मन प्रकृति का पुत्र है, इसलिये वह अधिकार अपनी माता माया देवी से ही नियुक्त रहता है। यही कारण है कि वह जगत पिता परम देव मायापड़त की आज्ञा तथा अनुभव से विमुख तथा वियुक्त रहता है।
जब इसको परमपिता की सत्ता का ही ज्ञान नहीं है तो उससे प्यार व योग का ज्ञान कैसे हो सकता है परन्तु माया की गोद में क्षणिक अस्थिर सुखाभास प्राप्त होता है। परमपिता के योग से स्थिर तथा चिरकाल तक रहने वाला चिरानन्द प्राप्त होता है।
जैसे माता के क्षीर पान करने से थोड़ी देर के लिये क्षुधा तृषा से तृप्ति हो जाती है। यथार्थ तृप्ति रूप शान्ति नहीं। थोड़ी देर पश्चात फिर भूख प्यास आकर सताती है, परन्तु योगाभ्यास करते करते इस भौतिक शरीर के रहते हुए भी जब योगाभ्यासी कण्ठ कूप में जो तालू के कान के समीप एक कूप जैसा गढ़ा है, जब योगी उसमें संयम करता है, तो बहुत काल तक उसकी भूख प्यास जाती रहती है अर्थात् जब तक योगी इसका संयम करता रहेगा तब तक भूख प्यास न लगेगी। तथा :-
“कण्ठे कूपे क्षुति पिपासा निवृतिः”
योग दर्शन वि. पा. सू. 29
अब समझो कि जब भौतिक माया माता का शरीर विद्यामान होते हुये भी मानस यज्ञ का दीक्षित यजमान (योगी) उस परम ज्योतिर्मय भगवान का ध्यान करता है तो उसकी भूख प्यास पयान कर जाती है। यदि स्थूल भौतिक शरीर को त्याग कर सूक्ष्म दिव्य शरीर से केवल परमपिता का ही सेवन मुक्त पुरुष करता है तो फिर उसको भूख प्यास से तनिक सम्बन्ध नहीं रहता।
जैसे एक बालक अपनी माँ की गोद से पृथक होकर रोता और बिलबिलाता है उसको भूख ने सता रखा है, बिल्ली, कुत्ते व अन्धकार आदि ने डरा रखा है और वह अपनी प्यारी माता को नहीं देखता इसलिए दुःखी होकर रोता है और चिल्लाता है। परन्तु जब जननी अपने लाडले और सलौने पुत्र को अपनी प्रेममई गोद में उठा लेती है तो वह कैसा प्रेम पुलकित हो जाता है और छाती से लिपट कर दूध पीता है, उस समय पहले सारी पीड़ा को भूल जाता है। यही दशा हम सब जीवों की परम जननी और जनक परम पिता परमेश्वर के सामने है। जब हम जगत के झगड़ों में फंसे हुए बहुत थककर व्याकुल हो जाते हैं तब पिता जी गहरी नींद देकर अपने गोद अंगों में भर लेते हैं। उस समय लेशमात्र भी क्लेश नहीं रहता-यह “वैत्तिक योग” है जो सुषुप्ति अवस्था में हमको प्राप्त होता है। परन्तु शोक कि इसके महत्व को नहीं समझते है इसीलिए इसका भान नहीं करते। इसका भी मुख्य कारण है कि जैसे किसी सोते हुए बालक को उसकी माता प्यार करती है परन्तु सुप्त सपूत को उसकी कुछ भी सुति नहीं है इसलिए वह उसके प्यार की न प्रतिष्ठा करता है और न उसका धन्यवाद देता है यही दशा सुषुप्ति अवस्था में हमारे साथ परम प्रेमी के प्यार व योग की है। इसका प्रयोजन यह है कि परमेश्वर अपने योग द्वारा अपनी दशा दर्शाते और प्यार दिखाते हैं। परन्तु हम कपूत कृतघ्न बालक उनके प्यार की कुछ परवाह नहीं करते, न उसको धन्यवाद देते हैं।
जब हम दुःखमय दुनिया में बहुत दुःखी हो जाते हैं और प्रभु से मिलने की सत्य उत्कण्ठा हमारे मन में उत्पन्न होती है और हम प्रयत्न करके अपने मन मंदिर हृदयाकाश में उस प्यार को विराजमान देखते हैं और समस्त संसार की सामग्री की सुध−बुध अपने मन से भुला देते हैं, तब हमको अपने अन्तःकरण में उस विभु के विराजमान होने का ज्ञान होता है और चक्षु से अपने आत्माराम के समक्ष जाज्वल्यमान देखते हैं उसका नाम योग है।
(श्री दानेश्वर शर्मा बी. ए. रामपुर)
यह नितान्त सत्य है कि मानव स्वतः पूर्ण नहीं। अध्यात्मवादियों के अनुसार मानव उस अखण्ड एवं पूर्ण ब्रह्म का एक अंश मात्र ही है। आधुनिक कवियों ने ‘तुम उच्च हिमालय शृंग और मैं चंचल गति सुर सरिता’ कह कर मानवता की अपूर्णता का विश्लेषण किया है। ईश्वर अखण्ड बुद्धि है और मनुष्य खण्ड बुद्धि का अपूर्ण प्राणी। यही है वह वस्तु जो प्रार्थना की आवश्यकता इंगित करती है।
प्रार्थना की आवश्यकता पूर्वीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने समान रूपेण प्रदर्शित की है। भारतीय साधकों ने कहा है कि प्रार्थना के द्वारा हम अपनी पात्रता का पड़रचय उस अखण्ड बुद्धि का देते है। ईश्वर जो देगा वह तो निर्धारित ही है। प्रार्थना के द्वारा हम अनिर्धारित वस्तु छीन नहीं सकते लेकिन पात्रता का परिचय देकर कृपा दृष्टि अवश्य प्राप्त कर सकते हैं। ईश्वर की दृष्टि में सब प्राणी समान हैं। अतः वे समदर्शी कहलाते हैं। किन्तु उस समदर्शी को भी विवश होकर एक बार कहना पड़ा-
“समदर्शी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्य गति सोऊ॥”
प्रार्थना की महत्ता विज्ञ पाठक इस चौपाई में ढूँढ़ सकते हैं। दूसरा उदाहरण लीजिये। माता का स्नेह सभी बच्चों पर समान रहता है चाहे बच्चे कपूत हों या सपूत। ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति”। किन्तु आज्ञाकारी एवं स्वेच्छाचारी पुत्रों की पात्रता में अन्तर है। माता दोनों को मिठाई देती है लेकिन एक पुत्र प्रेम रस युक्त अमृत मिष्ठान प्राप्त करता है तो दूसरा केवल शक्कर और खोये का सम्मिश्रण।
प्रार्थना जब मानसिक एवं आध्यात्मिक अनुरोध पर आश्रित रहती है तभी अभीष्ट सिद्धि होती है। जहाँ तक व्यक्तिगत अनुभव का प्रश्न है, इन पंक्तियों के लेखक को कुछ अनुभव है। गायत्री के प्रातः कालीन आद्य स्वरूप की प्रार्थना करना मेरा कुछ नियम सा है। बी ए. और एल. एल. बी. परीक्षा की आशातीत सफलता को मैं दैवी अनुग्रह मानता हूँ। हमारे आस्तिक बन्धु इस पर मेरा समर्थन करेंगे और नास्तिक बन्धु कोरा प्रलाप समझ उपहास करने से कदापि नहीं चूकेंगे। कुछ भी हो मुझे उनसे कोई शिकायत नहीं। किन्तु मुझे कुछ विश्वास सा हो गया है कि यदि आप सच्चे एवं शुद्ध मन से प्रार्थना करेंगे तो आपकी पुकार उस सर्वव्यापी एवं अन्तर्यामी तक अवश्य पहुँचेगी और आपकी मनोकामना पूर्ण होगी।
कवींद्र रवीन्द्र ने शान्ति निकेतन की स्थापना की है। उन्होंने एक स्थान पर लिखा है- “शाँति निकेतन में प्रार्थना का समय नियत है। प्रातः कालीन प्रार्थना में छात्रों की उपस्थिति अनिवार्य है, मुझे आवश्यकता उनकी शारीरिक उपस्थिति से है, मानसिक उपस्थिति से नहीं। यदि वे प्रार्थना के समय वृक्षों पर गिलहरी की उछल कूद भी देख रहे हों तो मुझे कोई ऐतराज नहीं। नियमित प्रार्थना क्रम से एक ऐसा समय अवश्य आएगा जबकि उनकी मानसिक एकाग्रता अवश्य होगी और वह एकाग्रता प्रार्थना का रूप होगी।” नव-अभ्यासियों के लिए रवीन्द्र नाथ जी का यह सिद्धाँत अनुकरणीय है।
राग द्वेष, क्रोध, लोभ मोहादि मानव जाति के जन्म जात शत्रु हैं। इनसे मुक्त रहने के लिये प्राचीन ऋषि महर्षियों ने प्रार्थना का तरीका अपनाया था। कितनी श्रद्धा, कितना विश्वास एवं कितनी नम्रता थी उसमें। उनकी प्रार्थना थी -
“अविनयमपनय विष्णो दमय मनः शमय मृग- तृष्णम्। भूतमयाँ विस्तास्य तास्य संसार सागरतः।
अर्थात्- हे विष्णु! हमारी अविनयता को हर करो, चंचल मन का दमन करो। विषयक्रमी मृग तृष्णा को शान्त करो। मेरे ही हृदय से सब प्राणियों पर दया का विस्तार करो ओर संसार सागर से हमें पार करो।”
बताइए ऐसा कौन मनुष्य होगा जो इस नम्रता पर न पिघल उठे और फिर यह तो उस महान विभूति के लिये प्रयुक्त है जो अपनी दयालुता के लिये ‘दया सागर’ के नाम से विख्यात है। मैं नहीं समझता कि इस प्रार्थना के बाद भी चिन्ता, दुःख द्वेषादि टिक सकते हैं। गीता के इस श्लोक पर प्रार्थना करने वालों को विश्वास रखना चाहिए-
अनन्याश्चिन्तयन्तोमाँ ये जनः पर्यु पासते। तेषाँ नित्याभियुक्तानाँ योगक्षेमं वहाम्यहम्॥
अर्थात्- जो मनुष्य अनन्य भाव से मुझे पर-आत्मा की उपासना करता है उसके योगक्षेम का बोझ मैं अपने ऊपर ले लेता हूँ।
आपके विषम-युग में भी प्रार्थना की महत्ता छिपी नहीं। युग-पुरुष गाँधी इस व्रत के महान व्रती थे। वे नियमित रूप से प्रातः एवं सायंकाल में प्रार्थना किया करते थे। अपने अन्तिम समय में भी वे प्रार्थना मंत्र की सीढ़ी पर प्रार्थनोद्यत थे। गाँधी जी के प्रधान शिष्य श्री बिनोवा भावे भी इस देश के महापुरुष सदा से ही प्रार्थना के महत्व को समझते और अनुभव करते आ रहे हैं। भारतीय तत्व वेत्ताओं ने प्रार्थना को मनुष्य का एक आवश्यक नित्यकर्म माना है। इसलिये प्रार्थना से विमुख रहने वालों की स्थान-स्थान पर उन्होंने भर्त्सना भी की है।
प्रार्थना के समय साधारणतया चित्त को एकाग्र कर आत्म विश्वास के साथ ईश्वर के सम्मुख कुछ संकल्प करना चाहिए। इस संकल्प का अर्थ साधारणतया यह हो-
“ हे जगत्पिता! मेरे पूर्वकृत पापों को क्षमा करो। मेरा हृदय शुद्ध करो। लालसा एवं वासना अब मुझे जीत न सकें। मेरी जितेन्द्रिय आत्मा तेजोमय हो। कामादि शत्रु उसकी तेजाग्नि से ही जल जाएं। मुझे अब कोई विकार न हो। मैं शुद्ध बनूं। मैं पवित्र हूँ। मैं मुक्त होऊँ। मैं तुम्हारी शरण में पड़ा हूँ। भवव्याधियों से मेरी रक्षा करो।” सच्चे हृदय से की हुई, आत्म कल्याण की प्रार्थना को प्रभु तत्काल सुनते हैं और उसका प्रत्युत्तर प्राप्त होने में देर नहीं रहती।
(श्री रामसिंह जी, कानपुर)
किसी व्यक्ति की उसके सम्मुख उसकी बुराई करना उतना पाप नहीं जितना अपने मन में उसके प्रति बुरा सोचना! क्योंकि बुराई तो उस व्यक्ति के अवगुणों को देख कर की जाती है जिसकी आलोचना करना कोई अपराध अथवा पाप नहीं है। परन्तु उसके प्रति अपने मन में बुरे विचार रखना अथवा उसका अनिष्ट चाहना, किसी पर कुदृष्टि रखने का अर्थ यह होगा कि आपके मन में पाप है, आप उस व्यक्ति से अनुचित लाभ उठाना चाहते हैं, आप अपनी आत्मा की पुकार के विरुद्ध कार्य करना चाहते हैं जो उस परमपिता परमात्मा की दृष्टि में एक महान अपराध है।
दूसरों का बुरा सोचने में, उनका अनिष्ट चाहने में कुछ लाभ भी नहीं होता अपितु अपनी ही हानि होती है। देखने में हमें चाहे कुछ लाभ प्रतीत होता हो परन्तु वास्तव में हमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में एक महान क्षति पहुँचती है। उदाहरण के लिये आप मान लीजिये कि दो भाई हैं उनमें से एक के पास बड़ी धन राशि है और दूसरा भी धनी परन्तु कुकर्मी है। वह अपने भाई की धन राशि को देखकर मन ही मन कुढ़ता है उसका अनिष्ट सोचता है। इसके लिये वह उसके घर चोरी करता है और उसकी हत्या करके उसके धन पर अपना अधिकार जमा लेता है तथा अपार धन राशि की प्राप्ति पर मन ही मन बहुत प्रसन्न होता है। परन्तु वास्तव में यदि देखा जाय तो वह अपने को घोर संकट में डाल देता है। सदैव उसको डर लगा रहता है, आत्मा धिक्कारती रहती है, पकड़े जाने का डर हमेशा बना रहता है। वह प्रत्येक व्यक्ति को संदेहात्मक दृष्टि से देखने लगता है। अपनी सबसे बड़ी हानि तो वह यह करता है। कि अपने भाई को जो उसका एक हाथ था, खो बैठता है। अब आप ही सोच सकते हैं कि उसे लाभ हुआ या हानि? इसी प्रकार अनेक ऐसे ज्वलन्त उदाहरण दिये जा सकते हैं जो इससे हानि होने की ही राम कहानी सुनाते हैं।
ऐसा तो आप सबको अनुभव होगा कि जब कोई व्यक्ति किसी स्त्री को कुदृष्टि से देखता है तो उसे स्वप्नदोष हो जाता है। यह घटना भी उसी ध्रुव सत्य की पुष्टि करती है। इस घटना में वह व्यक्ति उस स्त्री के प्रति अपने मन में कुविचार रखता है जिससे उसका वीर्यपात हो जाता है। उस स्त्री को कोई भी क्षति नहीं पहुँचती बल्कि उस व्यक्ति के शरीर को ही हानि होती है। इसी प्रकार आप अनेक ऐसे उदाहरण प्राप्त कर सकते हैं जिनसे यह सिद्ध होता है कि दूसरों का अनिष्ट चाहने वाला पहले अपनी ही हानि करता है। कहावत भी है कि जो दूसरों के लिये गड्ढा खोदता है पहले स्वयं ही उसमें गिर जाता है।
हमारी धार्मिक पुस्तकों में भी अनेक ऐसी कथायें हैं जो हमें शिक्षा देती हैं कि दूसरों का बुरा मत सोचो। महा अभिमानी रावण सीता का अनिष्ट करने के पहले स्वयं ही नष्ट हो गया। पाण्डवों से द्वेष करने वाला दुर्योधन पाँच गाँव क्या अपना सर्वस्व एवं स्वयं को भी खो बैठा। भगवान कृष्ण के प्रति कुविचार करने वाला कंस अधिक दिनों तक इस पृथ्वी पर न रह सका। क्योंकि उसका मन दूषित हो चुका था जिसके कारण उसे कहीं भी शान्ति न मिलती थी जो अन्त में उसकी मृत्यु का कारण बनी।
जब हम जानते हैं कि दूसरों से द्वेष करने पर, उनका बुरा सोचने पर एवं उनका अनिष्ट चाहने पर हम को महान क्षति पहुँचेगी, हमारी आत्मा दूषित हो जायगी, हम ईश्वर की दृष्टि में अपराधी बन जायेंगे, हमें कहीं भी शान्ति न मिलेगी तो फिर हम दूसरों के प्रति कुविचार क्यों रखें? किसी से द्वेष क्यों करें? और यदि हम यह सब जानते हुए भी दूसरों से द्वेष करते हैं, उनका अनिष्ट चाहते हैं, तो वह कितनी मूर्खता की बात होगी?
आग जहाँ रखी जाती है पहले उस स्थान को गरम करती और जलाती है। तेजाब यदि साधारण धातु के बर्तन में रखा गया है तो पहल उसे ही नष्ट करेगा। इसी प्रकार द्वेष और दुर्भाव, पाप और कुविचार जिसके मन में रहते हैं पहले उसी का अनिष्ट करते हैं। जब तक वे जमे रहते हैं तब तक निरन्तर वहाँ हानि करते हैं। जिसके लिए दुर्भाव रखें जाते हैं उसको तो उसकी शताँश हानि भी नहीं पहुँच पाती जितनी कि अपनी होती है। इसीलिए जिससे जहाँ मतभेद हों, विरोध हों उसे प्रकट में तो कहना चाहिये और उसके निवारण के लिए उचित उपाय भी तत्परता पूर्वक करना चाहिये। परंतु मन में उसकी गाँठ बाँधने और ईर्ष्या, द्वेष रखने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। महात्मा गाँधी इस सिद्धाँत का सफल प्रयोग करके दिखा चुके हैं- “विरोधी के प्रति बिना दुर्भाव रखे हुए भी बुराई का प्रतिरोध करना सम्भव है।” हम भी आवश्यकतानुसार उसी मार्ग का अवलम्बन करें।
हमें चाहिये कि दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझें, उनके अनिष्ट को अपना अनिष्ट मानें तभी यहाँ पर शान्ति का साम्राज्य हो सकेगा। हमें द्वेष भाव त्याग कर सभी के प्रति प्रेमभाव रखना होगा, स्वार्थ भाव त्याग कर परमार्थ भाव का सहारा लेना होगा तभी सबका कल्याण हो सकेगा। श्री. तुलसीदास जी कहते हैं-
परहित बस जिनके मन माही। तिन कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
(श्री अगरचन्द जी, नाहटा बीकानेर)
प्रायः लोग यह कहा करते हैं- हमसे यह नहीं बन पाता। वह काम बड़ा कठिन है। क्या करें। इच्छा होते हुए भी सत्कार्य कर नहीं पाते, बुरी आदतें छूटती नहीं। कठिन प्रतिक्षाएं करने के लिए मन तैयार नहीं होता, तैयार करते हैं तो मन निभा नहीं पाता, कठिन तप करने के लिए समय नहीं मिलता। आदि बातें कहकर बाहरी कारणों को आगे करके हम अपना बचाव करते रहते हैं। वस्तुतः यह हमारे मन की कमजोरी है, दृढ़ संकल्प शक्ति की कमी है। वास्तविक कमी तो अपने भीतर है पर दोष दूसरों को-निमित्त कारणों को देते हैं। यदि मन में किसी कार्य के करने के लिए कृत संकल्प हो जायं और तदनुसार कार्य में प्रवृत्त हो जायं तो बाधाएं स्वयं दूर हो जाएंगी। अभ्यास से शक्ति प्रस्फुटित होगी। असम्भव कार्य सम्भव और कठिन कार्य सहज हो जाएंगे।
एक कार्य को अनेक बार कर लेने से उसका अभ्यास पड़ जाता है। जिस प्रकार बुरी आदतें बुरे कार्यों के अनेक बार करने के कारण पड़ गई हैं उसी प्रकार अच्छे कार्यों को निरन्तर करते रहें तो उसकी भी आदत पड़ जाएंगी। अभ्यास के द्वारा ही मनचाहा कार्य व परिवर्तन सम्भव होता है अतः सर्वप्रथम अपने में कहाँ-कहाँ खराबियाँ हैं, कमजोरियाँ हैं उनको ढूँढ़कर सुधार करना व किसी भी शुभ कार्य के अभ्यास, दृढ़ निश्चय व पूरी लग्न से करने में प्रवृत्त होना चाहिए। वास्तव में हम जो कार्य करना चाहते हैं वह हो ही जाता है। नहीं होता तो दृढ़ संकल्प की कमी है या जितना समय व श्रम उसके लिए आवश्यक है, दे नहीं रहे हैं, यही कमी है। करने की प्रबल इच्छा है तो उसके लिए समय व साधन मिल ही जायगा साधन जुटा ही लेंगे। बाधाएं आयेंगी तो दूर नहीं भाग कर डटे रहेंगे। इससे वे भी थोड़ी ही देर में समाप्त हो जाएंगी। बाधाएं सदा बनी नहीं रहतीं। दृढ़ मनस्वी उन्हें परीक्षा का समय समझकर अधिक दृढ़ता अपनाता है वह घबराता नहीं, इससे उन पर विजय पा लेना है। अतः आज से ही अपनी कमजोरियों पर दृढ़ मन से विजय पाने का निश्चय करिए। सफलता सुनिश्चित है। उतावली न कर धैर्य रख आगे बढ़ते जाइये। लक्ष्य ठीक है, उसके लिये प्रगति हो रही है, तो साध्य प्राप्ति की सिद्धि देर सवेर में मिलेगी ही।
यदि आप महान कार्य करने योग्य शक्ति का अपने में अनुभव नहीं कर रहे हैं, तो निराश नहीं होइये। जितना कर सकते हैं उतना तो करने के लिए तैयार हो जाइये। बहुत से सहज कार्य भी हम नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें तो आज से व अभी से ही करने का निश्चय कीजिये व प्रवृत्ति प्रारम्भ कर दीजिये। छोटे-छोटे कार्यों में सफलता मिलने पर बड़े-बड़े कार्य करने का भी साहस होगा। बहुत सी बातें तो वास्तव में सरल ही होती हैं।
जितना चाहिए उतना नहीं कर पा रहे हैं तो उसके लिए योग्यता बढ़ाने के लिये जितना भी कर सकते हैं, उतना तो करिये। पूरा नहीं तो आधा ही सही, आधा न हो तो पाव ही या थोड़ा बहुत भी जितना भी सहज कर सकते हैं, उतना तो करिये। कोई भी व्यक्ति कुछ भी न कर सके, यह असम्भव है। कर्त्तव्य शक्ति ही तो जीवन का लक्षण है।
प्रस्तुत लेख में ऐसी ही कुछ बातें आपके सम्मुख रख रहा हूँ जो तनिक भी दुःसाध्य व कष्ट साध्य नहीं अपितु सहन साध्य हैं, अतः अधिक कुछ नहीं कर सकते उनके लिए ‘इतना तो करिये’, के रूप में उनकी ओर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है। शुभ कार्य थोड़ा भी महान फलदाता है वह बीज की भाँति उसकी जड़ दृढ़ व विस्तृत होती जाती है। छोटे से बीज से वृक्ष फल फूल कितने बड़े व कितने सुन्दर लगते हैं। “थोड़ा करने से तो न करना ही अच्छा” यह गलत धारणा दूर कर, “नहीं करने की अपेक्षा तो थोड़ा सा भी करना अच्छा” इस आदर्श वाक्य को अपनाइये। नीतिकार ने तो यहाँ तक कह दिया है कि ‘बैठे से बेगार भली’ कुछ कार्य होगा तो सही।
मान लीजिये कि आप किसी का भला व परोपकार कर सकने योग्य बुद्धि धन व शक्ति अपने में अनुभव नहीं कर रहे हैं तो बुराई से बचने का प्रयत्न तो करिये ही। यदि आप किसी के भी बुरा करने से बच सकें तो बड़ा भारी काम हो गया। बुराई करना तो हमारे हाथ में होती है उसके लिए तो किसी साधन की आवश्यकता नहीं। हमारे मन, वचन, काया की प्रवृत्ति से ही तो हम उसे करते हैं।
किसी को बचाने के समर्थ नहीं भी हों तो उसे न मारना तो आपके हाथ है। थोड़ा सा ध्यान रखा जाय तो अनुपयोग, अज्ञानता से जो छोटे बड़े हजारों लाखों प्राणियों को आपके द्वारा त्रास व कष्ट मिलता है, यावत प्राण हरण होता है वह तो रुक जायगा। उसकी हिंसा के पाप से तो बच जायेंगे। किसी की सेवा न भी कर सकते हो तो कुसुवा तो न कीजिये।
दान देने के लिए धन व वस्तुएं आपके पास नहीं हैं तो हर्ज नहीं आप सहानुभूति प्रकट कर उसे साँत्वना एवं प्रेरणा तो दे सकते हैं। और कम से कम किसी की कोई चीज छीनिये नहीं। किसी को सत शिक्षा दे सकते हो तो वह भी कोई कम महत्व की बात नहीं। धन और वस्तुओं से भी वह अधिक बढ़कर है। इसमें आपका लगता ही क्या है। लोगों को औषधि दान दे निरोग बनाना आपके लिए सम्भव नहीं हो तो रोगी के पास थोड़ा बैठें, उसके प्रति सहानुभूति प्रगट कर, आश्वासन देकर उसे शाँति पहुँचाइये उसके दुःख को हल्का करिये।
अन्य साधन भजन करने के लिए समय व साधन न हों यो सत्संगति तो सहज है। गुणी व्यक्ति के पास जो थोड़ा भी समय मिले बिताइये। कुछ काम की बातें तो जानने को मिलेंगी ही।
कहीं बाहर जा नहीं सकते तो घर बैठे ही कोई अच्छा ग्रन्थ अवकाश के समय पढ़ के प्रेरणा प्राप्त करिये। तप व योग की कठिन साधना न हो सके तो भक्ति तो अपने हृदय से होती है उसके लिये तो कहीं जाने की जरूरत नहीं, कुछ कष्टदायक नहीं होता। सच्चे हृदय से अपने इष्ट महापुरुष का स्मरण व भजन भक्ति करिये।
अपने में गुण प्रगट करने की योग्यता न हो तो गुणी व्यक्तियों का आदर करना तो कठिन नहीं है। गुणियों को देखकर हर्ष मनाइये। स्वयं न कर सकें तो जो कर सकते हैं उनका अनुमोदन करिये उसकी प्रशंसा करिये। शुभ काम नहीं कर सकते हो तो करने की इच्छा तो रखिये, प्रयत्न भी करते रहिये, मिले हुए सम्बंधियों से लाभ उठाया करिये। कार्यों में कठिनता ही क्या है? अधिक न सही इतना तो करिए ही।
(श्री कृष्ण मुरारी महारिया, बाँदा)
भाग्य हमारे कर्मों का फल है, कोई ईश्वर इच्छित वस्तु नहीं। हम नित्यप्रति कुछ न कुछ किया करते हैं और उसका परिणाम भी हमें मिला करता है। बस, यही परिणाम हमारा भाग्य होता है। जैसे यदि कोई नटखट बच्चा चारपाई आदि पर चढ़ कुछ शैतानी करने लगे और गिर पड़े तो उसे कुछ न कुछ चोट अवश्य ही आवेगी। इस घटना पर यह कहा जा सकता है कि चोट उसके भाग्य में बदी थी। परन्तु यदि इस चोट के अनुकूल कार्य न किया गया होता तो बच्चे को चोट भी न आती। अतः चोट लगनी ही थी यह बात अनुचित है अर्थात् भाग्य को मनुष्य स्वयं ही बनाता है, ईश्वर नहीं।
ठीक इसी प्रकार यदि एक विद्यार्थी परीक्षा के लिए कठिन परिश्रम करता है तो अवश्य उत्तीर्ण होगा, परन्तु यदि वही विद्यार्थी परिश्रम बिल्कुल नहीं करता तो उसका उत्तीर्ण होना असम्भव है। यहाँ पर हम देखते हैं कि एक ही विद्यार्थी उत्तीर्ण भी हो सकता है और अनुत्तीर्ण भी। इस विषय पर कोई भी निश्चित रूप से यह नहीं बता सकता कि वह उत्तीर्ण होगा अथवा अनुत्तीर्ण। इसका केवल यही कारण है कि विद्यार्थी जैसा चाहे वैसा ही होगा।
आगे हम यह भी देखते हैं कि ईश्वर ने मनुष्य को कोई भी व्यर्थ की वस्तु नहीं दी है। किसी न किसी रूप में प्रत्येक वस्तु का उपयोग मनुष्य द्वारा होता ही रहता है। ईश्वर ने मनुष्य को मस्तिष्क इसलिए दिया है कि वह अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करे, यदि सब कुछ पूर्व निर्धारित ही होता तो मस्तिष्क बुद्धि और चेतना की क्या आवश्यकता थी। फिर उसकी विचार शक्ति, क्रियाशीलता और पुरुषार्थ की आवश्यकता और उपयोगिता ही क्या रह जाती?
इसके बाद हमें यह भी दिखाई देता है कि कोई दुखी है कोई सुखी, कोई धनवान है, कोई दरिद्र और कोई बुद्धिमान है कोई मूर्ख। यदि यह कहा जाय कि यह भी ईश्वर की देन है या ईश्वर ने किसी के भाग्य में ऐसा ही लिख दिया था तो यह सरासर मूर्खता होगी। ईश्वर तो सच्चा न्यायी है, वह ऐसा अन्याय कर ही नहीं सकता। ईश्वर तो न्यायपूर्वक सभी को एक दृष्टि से देखता है। वह न किसी को नीचा समझता है और न ऊँचा। वह सभी को एक सा चाहता है और सभी को बराबर देता है।
यह प्रश्न उठ सकता है कि जब ईश्वर सभी को बराबर शक्तियाँ और सम्पत्तियाँ देता है तो कोई साधन-सम्पन्न और कोई साधन-हीन क्यों दिखाई देता है? हमें जानना चाहिए कि ईश्वर तो सबको बराबर शक्तियाँ और संपत्तियां देकर भेजता है परन्तु कोई उनका सदुपयोग करता है। कोई उपयोग करता ही नहीं और कोई उनका दुरुपयोग करता है। इस समय एक सीधे सिद्धाँत द्वारा सदुपयोग करने वाला उन्नति करता है, दुरुपयोग करने वाला अवनति करता है और जो उपयोग करता ही नहीं उसकी शक्तियाँ तथा संपत्तियां बेकार हो जाती हैं। यहाँ भी मनुष्य ही अपने भाग्य का विधाता दीखता है।
तुलसीदास जी ने अपनी रामचरित मानस में लिखा है ‘होइ है सोइ जो राम रचि राखा”। इसी प्रकार अन्य विद्वान भी भाग्य को ईश्वर के आधीन बतलाते हैं तो क्यों? ऐसा सन्देह करने से भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। तुलसीदास जी या अन्य विद्वानों का भाग्य को ईश्वराधीन बताने के दो कारण हो सकते हैं-पहला यह कि मनुष्य कर्म के फल को ईश्वराधीन समझे और कर्त्तव्य को अपने आधीन। इस प्रकार मानकर चलने से मनुष्य का मन फल की ओर आकर्षित होता है और वह अपने कार्य को अधिक सरलता एवं पूर्णता से कर सकता है। दूसरा कारण यह हो सकता है कि यदि किसी मनुष्य को कर्तव्य करते हुए भी कुछ कारणों से असफलता प्राप्त हो तो वह यह जानकर अपना धैर्य न छोड़े कि ऐसा होना ही था, और पुनः उसी कार्य को करे। इस प्रकार अनेकों प्रयत्नों के पश्चात उसे सफलता मिल ही जावेगी, क्योंकि प्रत्येक असफलता उसे उसकी त्रुटियाँ बता देगी, जिनसे कि वह मनुष्य भविष्य के लिए सावधान हो जावेगा।
जैसे पहले दिन जमाया हुआ दूध दूसरे दिन दही बन जाता है वैसे ही कल का किया हुआ कर्म आज हमारे लिये प्रारब्ध या भाग्य के रूप में उपस्थित होता है। इसलिए भाग्य को कर्म लेख या कर्म रेख भी कहते हैं, यह कर्म लेख, ईश्वर ने अपनी इच्छा से हमारे ऊपर नहीं थोपा है वरन् हमारे किये हुए भूतकाल के कर्मों का फल है शराब पीने का परिणाम नशा, सनाय खाने का परिणाम दस्त और विष खाने का परिणाम प्रशांत होता है उसी प्रकार भले बुरे हमारे ही कर्म कुछ समय उपरान्त भाग्य रूप में उपस्थित हो जाते हैं। वस्तुतः अपने भाग्य के निर्माता हम स्वयं ही हैं, ईश्वर यदि किसी का भाग्य भला, किसी का बुरा बनाता तो उस पर अन्यायी होने का, पक्षपाती होने का दोषारोपण किया जा सकता है जिससे कि वह सर्वथा रहित है।
प्रभु ने मनुष्य को कर्म करने की पूर्ण स्वाधीनता दी है। वह हमारी गतिविधि एवं कार्य पद्धति में कोई हस्तक्षेप नहीं करता। यह अन्तर आत्मा में बैठकर सदा शुभ कार्य पर चलने की ही प्रेरणा करता है। बुरा काम करते ही भीतर से एक आवाज उसे बन्द करने की आती है। लोग उस ईश्वरीय आवाज को अनसुनी करके पाप एवं कुकर्म करते हैं और पीछे बुराई प्रकट होने पर इसका दोष ईश्वर पर मढ़ते हैं। कहते हैं ईश्वर की ऐसी ही मर्जी थी। यह केवल आत्म वंचना है। ईश्वर की मर्जी यह कभी नहीं हो सकती कि हम दुष्कर्म करें और उसके फल स्वरूप दुःख, शोक के समुद्र में गोते लगावें। वह तो हमें सन्मार्ग गामी और सुख शान्तिमय जीवन व्यतीत करता हुआ देखना चाहता है। इसी दशा में यह अन्तर आत्मा के भीतर से सदैव संकेत भी करता है। आप बुराई करना और दुष्परिणाम के लिए ईश्वर को दोषी ठहराना एक उपहासास्पद बात ही कही जा सकती है।
भाग्य का रोना अक्सर आलसी, अकर्मण्य और कायर प्रकृति के मनुष्य अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए रोया करते हैं। पुरुषार्थी लोग अपना रास्ता पहाड़ और समुद्र को चीर कर बनाते हैं। जो कठिनाइयाँ प्रारब्ध वश सामने आती हैं उनका वे वीरतापूर्वक मुकाबला करते हैं और आगे के लिए अपना भविष्य बनाने में सदैव संलग्न रहते हैं। यदि कोई अमिट घटना घटित होने वाली भी हो तो उससे निराशा होने को कोई कारण नहीं। पुरुषार्थ हमारा कर्तव्य है। इस कर्तव्य पथ पर आरुढ़ रहने से वह समय अवश्य आवेगा जब अभीष्ट परिणाम की प्राप्ति होगी। प्रारब्ध की कोई त्रासदायक बदली पुरुषार्थ रूपी सूर्य को कुछ समय के लिए ढकेले तो भी उसका अंधेरा देर तक नहीं रह सकता।
(सुश्री शुभा खन्ना, एम.ए.)
संभाषण कुशलता एवं वाक्पटुता के इस वर्तमान सभ्य युग में ‘आप कम बोलने की आदत डालिए, अधिक बातचीत न करिए’ शायद आपको अनुचित एवं असंगत प्रतीत होगा। किन्तु यदि आपको समाज में एक सम्मान पूर्ण एवं प्रतिष्ठित स्थान बना लेना है तो आप कम बोलिए और व्यर्थ बाते बनाना छोड़ दीजिए। पारस्परिक विचार विनिमय में शब्दों की कंजूसी करिए, अपनी जिव्हा पर अंकुश लगाइए और अपने विचारों को कम से कम शब्दों में व्यक्त कीजिए। आप देखेंगे कि आपका अधिक बकवास और निरर्थक प्रलाप करने वालों की अपेक्षा अधिक प्रभाव है। अर्थपूर्ण और संयम वाणी का प्रयोग प्रतिष्ठा प्राप्त करने का एक सुगम साधन समझिए।
यों भी चीख-चिल्लाहट और शोरगुल से भरे आज के विचित्र युग में चुप रहना अधिक संगतपूर्ण लगता है। जरा सोचिए नीरवता में कितना आनन्द है, कितना माधुर्य है, कितनी शान्ति है। अनेक महापुरुष नीरवता के अपरिमित आनन्द और मौन की महत्ता को स्वीकार करते आए हैं। हमारे युग के महापुरुष महात्मा गाँधी का जीता जागता दृष्टान्त हमारे सम्मुख है। शहरों के कोलाहल से ऊब कर सदा मौन, शान्त ग्रामीण वातावरण में उनका निवास रहा। कभी वर्धा की कुटिया में तो कभी सेवाग्राम के आश्रम में। प्रति सप्ताह का सोमवार उनका मौन दिवस होता था। उनका यह स्वनिर्मित अनुशासन उन्हें अपनी शक्ति संचित करने का सुअवसर देने के साथ-2 मानसिक संतुलन बनाये रहने में भी सहायक होता था। गाँधी जी का व्यक्तिगत विचार था कि मौन साधन सत्य की खोज में भी महान सहायक सिद्ध हुआ है। मौन रहकर ही ऋषियों को साँसारिक वास्तविकता का बोध हो पाया। लगभग 30 वर्ष से प्रसिद्ध महर बाबा मौन धारण किये हुए हैं, विश्व भ्रमण के लिए यंत्र तंत्र घूमने पर भी उनका विश्वास है कि वाणी की अपेक्षा हृदय की भाषा अधिक बलिष्ठ एवं प्रभावोत्पादक है। उत्तर प्रदेश के बाँदा स्थान पर स्थित बम्बेश्वर पर्वत पर निवास करने वाले महात्मन् साँसारिक माया, मोह और झूठ प्रपंच से ऊबकर संन्यासी बन गए और 20 वर्ष तक मौन साधन कर अपने योग साधन में निरत रहे। यही महात्मन् आज मौनी बाबा के नाम से विख्यात हैं और श्रद्धा और आदर के पात्र हैं।
किन्तु यह न समझिये कि मौन धारण करना निर्जीवता एवं विरक्त जीवन का द्योतक है। इस अवस्था में भी जीवन है, सजीवता है। प्रायः देखा गया है कि जो विचार, जो भावनाएँ भाषा द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती, मौन द्वारा भली भाँति अभिव्यक्त हो जाती हैं। मूक एवं शान्त वातावरण में हृदय का हृदय से संयोग होता है। हृदय अज्ञात भाषा द्वारा दूसरे हृदय की स्थिति, उसके भाव, उसके स्पन्दन के विषय में सब कुछ ज्ञात कर लेता है। प्रसिद्ध थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापिका मैडम एच. पी. ब्लावट्स्की ने ‘मौन ध्वनि’ के विषय में बहुत कुछ कहा है।
मौन का प्रभाव अपरिमित है। प्रत्येक कला को उसने प्रभावित किया है। ललित कला की सिरमौर नृत्य कला को ही लीजिए। मूकाभिनय से विविध हाव-भाव के प्रदर्शन से नृत्यकार अपनी कला को सजीव बना लेता है। अपनी भाव भंगिमा से ही वह अपनी प्रत्येक बात को भली भाँति दर्शकों के सम्मुख रख पाने में सफल होता है। सम्भवतः वाणी के संयोग से उसे अपनी कला को इतना सजग एवं सजीव बनाने में इतनी सफलता न मिलती। प्रसिद्ध कत्थाकली नृत्य अपने मूकाभिनय की सजीवता के कारण ही आज सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुका है।
दैनिक जीवन में भी मौन का कुछ कम महत्व नहीं है, प्रायः देखा गया है कि शाँत रहकर एकान्त में किया गया कार्य सुन्दरता एवं सफलता से संपन्न होता है। अध्ययन को ही लीजिए। विद्यार्थी शान्त एवं एकाँत स्थान की खोज में रहते हैं क्योंकि उसी वातावरण में एकाग्रता सम्भव है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विलियम जेम्स अपने दर्शन शास्त्र के शिष्यों को एकाँत निवास का उपदेश देते रहे। उनका कथन था कि एकाँत में और भाषा से विलग होकर ही मनुष्य अपना दृष्टिकोण भली भाँति समझने में सफल होता है। हमारे देश में ही काँग्रेस के पिछले प्रधान राजर्षि टण्डन जी प्रधान पद से दिया जाने वाला अपना भाषण तैयार करने के लिए किसी अज्ञात एकान्त स्थान को चले गये थे। अधिकतर कवि अपना काव्य सृजन एकान्त कौने में बैठकर करते हैं। मौलिक एवं नवीन विचार मस्तिष्क में एकान्त चिन्तन एवं मनन के फलस्वरूप ही उपजते हैं। उस समय कोलाहल पूर्ण इस धरती से जैसे सम्बन्ध टूट सा जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि मौन की बड़ी महत्ता है, उसमें महान बल है यद्यपि आज के युग में वह कम उपेक्षित नहीं है। आज प्रत्येक व्यक्ति जिव्हा द्वारा ही विश्व को जीतने की, अपना कार्य साधने की सुध लगाए है। एक बात के स्थान पर चार बात बनाने के हम अभ्यस्त हैं। प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक सुकरात के तथ्यपूर्ण कथन “जो गरजता है बरसता नहीं” को जैसे हम भूल बैठे हैं। गरजने के स्थान पर बरसने की ही आदत डालिए। साथ ही यह न भूलिए कि वाणी संयम में अपार सुख है। चुप रहकर विचित्र सजीवता, ताजगी, प्रफुल्लता विश्वास का सुख उठाइए। अपनी शक्ति को व्यर्थ नष्ट होने से बचाने का एक सफल साधन होने के कारण भी मौन की महत्ता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता।
(श्री वीरनरायण दलेला, एम. ए.)
आज के युग ने मनुष्य को निराशावादी बना दिया है। गम्भीरता, एकाग्रता तथा हृदयता आदि गुण कोसों दूर जा पड़े हैं और उनका स्थान भावुकता, छोटी छोटी बात पर उत्तेजना और उदर-पूर्ति की चिन्ता ने ग्रहण कर लिया है। आज का मानव जीवन ईश्वर का वरदान नहीं प्रत्युत अभिशाप प्रतीत होता है। इसका कारण मुख्यतः मानसिक स्वास्थ्य का अभाव है।
हमारे पंच तत्वों द्वारा निर्मित शरीर में मन का स्थान प्रधान है, शरीर का गौण, क्योंकि मन चेतन है, शरीर जड़। गीता में भी चैतन्य को ही प्रधान माना है। मानसिक स्वास्थ्य पर ही अधिक सीमा तक शारीरिक स्वास्थ्य निर्भर है। स्वर्गीय महात्मा गाँधी जी ने अपनी पुस्तक “निरोग साधन” में लिखा है- “पाश्चात्य देशों में इस मत का एक पंथ ही है कि जिसका मन शुद्ध होता है उसके शरीर में रोग होते ही नहीं, और हुए भी, तो वह शुद्ध मन के जोर से अपना शरीर निरोग कर सकता है। सार यह है कि आरोग्य का दृढ़ साधन हमारा मन ही है, मन की शुद्धि से ही आरोग्य प्राप्त होता है।”
वर्तमान मनोवैज्ञानिक भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। इसी सिद्धाँत पर उन्होंने चिकित्सा की एक नवीन प्रणाली भी निकाली है जिसे हम “मनोवैज्ञानिक चिकित्सा” के नाम से पुकारते हैं। इस चिकित्सा द्वारा, देश और विदेशों के अनेक भागों में आधुनिक युग में, अनेक प्रसिद्ध चिकित्सक जनता को आरोग्य लाभ करा रहे है। सिद्धाँत है भी उचित। क्योंकि मन विचारों की उत्पत्ति का स्थान है, प्रत्येक भले बुरे विचार का प्रभाव हमारे शरीर के प्रत्येक अवयव पर पड़ता है। जब तक हमारा मन संतुलित है और पड़वत्रडडडडडड एवं सुचारु रूप से कार्य करता है, तब तक शरीर की किसी भी क्रिया में दोष नहीं आता, शरीर पूर्ण स्वस्थ रहता है, फिर हम किसी भी असफलता से व्यथित होकर किंकर्तव्य विमूढ़ नहीं हो सकते, प्रत्युत हम खड़े रहते हैं इनके बीच अचल हिमालय की तरह मुस्कराते हुए।
मन की प्रधानता बताते हुए बुद्ध भगवान ने कहा है “इस समय हम जो कुछ भी हैं, उसके निर्माण कर्ता हमारे विचार हैं। यदि मनुष्य के मन में पवित्र विचार हैं तो सुख परछांई की तरह उसके पीछे चलता है”। एक दूसरे विद्वान का कथन है-”कार्य विचार का फूल है, और सुख दुख उसके फल हैं। मनुष्य जिस प्रकार की खेती करता है उसी प्रकार के मीठे और कडुए फल पीता है।
मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने का एकमात्र साधन है मन पर अधिकार प्राप्त करना एवं उसे शक्तिशाली बनाना। पौष्टिक भोजन एवं औषधियों से नहीं किंतु पड़वत्रडडडडडड एवं उच्च विचारों से मन पर विजय प्राप्त की जा सकती है।
जिस प्रकार वैद्य औषधि देने के पूर्व, रोग का पता लगाने के लिए रोगी की नाड़ी की परीक्षा करता है, उसी प्रकार हमें मानसिक रोगों का पता लगाने के लिए आत्म परीक्षण करना चाहिए। तदुपरान्त उचित संकेत रूपी औषधि लेनी पड़ेगी। जैसे यदि कोई मनुष्य रोगी है तो उसे यह आत्म संकेत लेना उचित होगा- “मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ, मैं पूर्ण निरोगी हूँ, मेरे मन एवं शरीर का प्रत्येक अवयव पूर्ण स्वस्थ एवं शाँतिशील है और सुचारु रूप से कार्य कर रहा है।” मन की चंचलता पर अधिकार प्राप्त करने के लिये यह आत्म संकेत उचित हो सकता है- “मैं मन का गुलाम नहीं, मन मेरा गुलाम है अतः इसे मेरी आज्ञा को मानना पड़ेगा।” कहने का अभिप्राय यह है कि मन एवं शरीर के जिस विकार को ठीक करना है, उसके विरोधात्मक आत्म-संकेतों का लगातार इतना मनन करना चाहिए कि उसे यह आभास होने लगे कि जैसा वह आत्म संकेतों द्वारा कर रहा है, वैसा ही वास्तव में वह है। कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक सफलता प्रतीत होगी। यह बात केवल कल्पित ही नहीं है प्रत्युत हमें इसके अनेकों उदाहरण देखने को मिलेंगे। संसार के प्रायः सभी महापुरुषों ने मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करके ही अपने जीवन का निर्माण किया था।
मनोविकारों पर विजय प्राप्त करना एक अतिदुष्कर कार्य है, परन्तु सफलता पर विजेता को सर्वत्र ही सुख का सागर लहराता हुआ दृष्टिगोचर होगा। मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त करने का सबसे सुगम उपाय है कि दैनिक जीवन के छोटे से छोटे कार्य जैसे कपड़े पहनना, पुस्तकें यथास्थान रखना, वार्तालाप करना इत्यादि में भी सावधानी प्रदर्शित करें। आज हमारे सम्मुख सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सभी प्रकार की गहन समस्याएं उपस्थित हैं जिन्हें उत्तम और स्वस्थ विचार ही सुलझा सकते हैं।
गायत्री प्रेमियों को यह जानकर बड़ी प्रसन्नता होगी कि तपोभूमि का निर्माण कार्य प्रायः पूरा हो गया है। पलस्तर, सफेदी, रंग, वार्निश आदि के कुछ कार्य सम्भवतः यज्ञ के बाद हो सकेंगे। यह तीर्थ बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान पर बना है। मथुरा से एक मील आगे चलकर वृन्दावन वाली सड़क पर यह पुनीत स्थान है। पक्की सड़क बिल्कुल मंदिर से सटी हुई जा रही है। पीछे दो खेत के फासले पर पुण्य सलिला यमुना प्रवाहित हो रही है। चारों ओर अनेक ऐसे प्राचीन स्थान हैं जिनमें ऋषियों ने तपस्याएं की हैं।
तपोभूमि में थोड़े से वृक्ष पहले से लगे हुये हैं, आगामी वर्षा ऋतु में इसमें वृक्ष, पुष्प और लता पल्लवों की और भी हरियाली हो जायगी। यह स्थान ब्रजभूमि में अपने ढंग की अनोखी शोभा वाला होगा। दर्शनीय दृष्टि से भी यह स्थान बहुत ही सुरम्य, मनमोहक, शान्तिदायक एवं ज्ञानवर्धक होगा। इसमें सब और ऐसी सुन्दर शिक्षाएं अंकित रहेंगी, जिनके पढ़ने से कठोर हृदयों में भी सरस धार्मिक भावनाएं परिप्लुत होने लगें।
मंदिर के एक कक्ष में भारतवर्ष के प्रायः सभी तीर्थों का रज जल स्थापित रहेगा। अब तक करीब एक हजार तीर्थों का जल रज आ चुका है। अगले दो सप्ताह में इतने ही तीर्थों का प्रतिनिधित्व और भी आ जायगा। कुछ तीर्थ ऐसे रह जाएंगे जिनका जल रज एक दो मास से पहले आने की सम्भावना नहीं है। प्रयत्न जारी रहने से इस वर्ष के अन्त तक 2400 तीर्थों का प्रतिनिधित्व इसमें एकत्रित हो सकेगा।
125 लाख गायत्री मंत्रों की हस्तलिखित पुस्तकें अब तक यहाँ आ गई हैं। पूर्णाहुति यज्ञ तक अभी बहुत आने को हैं। यह प्रयत्न यज्ञ के बाद भी जारी रहेगा और 24 करोड़ मंत्र एकत्रित होने तक मंत्र लेखन यज्ञ देश भर में जारी रखा जायगा।
जयपुर के प्रसिद्ध कारीगरों ने गायत्री माता की प्रतिमा बहुत ही सुन्दर बनाई है। यह दिव्य प्रतिमा देखते ही बनती है। प्रतिभा की प्राण प्रतिष्ठा जेष्ठ सुदी 10 को होगी। मूर्ति जयपुर से मंदिर में आ गई है।
मंदिर के बीच के कक्ष में माता की प्रतिमा रहेगी तथा मंत्र लिखा रहेगा। बगल के एक कक्ष में मंत्रों की पुस्तकों की तथा तीर्थों के जल रज की सुसज्जित प्रतिष्ठापना रहेगी। इनका भी नित्य पूजन होता रहेगा। मंदिर के बाहरी भाग में तथा बरामदे में गायत्री महिमा सम्बन्धी श्लोक अर्थ सहित लिखाये गये हैं। इस पूजा वेदी के अतिरिक्त एक सत्संग हाल, 10 व्यक्तियों के रहने लायक अलग अलग कोठरियाँ, पक्का कुँआ, चार कमरे प्रधान कार्यक्रम के लिए बने हैं। भवन निर्माण में लगभग 26 हजार और जमीन खरीदने में लगभग 6 हजार अब तक व्यय हुआ है। अभी कुछ कार्य शेष हैं जिसमें दो तीन हजार और लग जाने की सम्भावना है।
जैसी कि आशा की गई थी वैसा ही दिव्य स्थान यह विनिर्मित हो रहा है। इतनी आसानी से ऐसा महत्वपूर्ण स्थान प्रस्तुत हो सकना एक असाधारण बात ही है। जिन लोगों का धन, श्रम, सहयोग तथा सद्भाव इस तीर्थ के निर्माण में लगा है निश्चित रूप से वह पूर्ण सार्थक माना जायगा। क्योंकि उनकी इस प्रतिकृति द्वारा अनेक आत्माओं को शक्ति, शाँति एवं सद्गति प्राप्त होगी। जिसका श्रेय इन निर्माताओं को अनन्त काल तक प्राप्त होता रहेगा। ऐसे कार्यों में सहयोग एवं सहायता देने की इच्छा एवं प्रेरणा का अनुभव किन्हीं पुण्यात्माओं को ही होता है। ऐसे कार्यों में केवल सात्विक कमाई ही लग पाती है।
इस तपोभूमि द्वारा देशव्यापी गायत्री प्रचार का कार्य होगा। साधकों के लिए यहाँ साधना करने की तथा आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने की सुविधा रहेगी। समय समय पर यहाँ विशेष साधनाएं, तपश्चर्याएं, प्रयोग, अन्वेषण तथा इस विद्या की शोध अधिक गम्भीर आयोजन होते रहेंगे। देश भर के गायत्री उपासकों को परस्पर सम्बन्धित एवं संगठित रहने का तो यह तीर्थ बहुत ही महत्वपूर्ण माध्यम रहेगा।
यों मंदिर, मस्जिदों की इस देश में कमी नहीं है, एक से एक बड़े विशाल आकार के एवं लागत के मंदिर मौजूद हैं। इनमें से कितने ही तो अपनी उपयोगिता भी खो चुके हैं। कितनों में कुप्रबंध, स्वार्थपरता तथा अवाँछनीय व्यक्तियों का प्रभुत्व होने के कारण वे जनता के लिए घृणास्पद एवं राष्ट्र के लिए हानिकारक बन गये हैं। इन्हीं कारणों से ऐसे धर्म स्थानों की उपयोगिता के बारे में बहुत संदेह एवं विरोध भी समय समय पर प्रकट होता रहता है। इसी प्रकार के मंदिरों की एक संख्या और बढ़ा देने की हमारी कोई इच्छा नहीं है। हम स्वयं विवेक, तर्क, वास्तविकता एवं उपयोगिता के उपासक हैं। इस तीर्थ के निर्माण में जहाँ अनेक आध्यात्मिक रहस्य छिपे हुए हैं वहाँ यह भी कारण है कि इस तपोभूमि को एक आदर्श बनाकर यह दिखाया जाय कि मंदिरों का प्राचीन आधार क्या था और वे जन समाज के लिये कितने उपयोगी हो सकते हैं। हमें आशा करनी चाहिये कि यह मंदिर एक नवीन आदर्श उपस्थित करेगा और भारतीय संस्कृति के आज मलिन हो रहे प्रकाश को कुछ अधिक उज्ज्वल एवं प्रकाशवान बनायेगा। इससे जिस अखण्ड ज्योति की स्थापना हो रही है वह अनेक आत्माओं में शक्ति, शान्ति एवं समृद्धि का विकास करेगी।
पूर्णाहुति यज्ञ
यज्ञ की तैयारियाँ प्रायः पूर्ण हो चुकी हैं। हवन सामग्री पूर्ण शास्त्रोक्त विधि एवं अनुपात से शास्त्रीय तैयार की गई है, घृत आदि की शुद्धता के लिए विश्वस्त प्रबन्ध हुआ है। वेद पाठी पण्डितों द्वारा गायत्री यज्ञ का सांगोपांग विधान तथा मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा करने का कार्य सुनिश्चित हो चुका है। इस यज्ञ में परखे हुए गायत्री उपासक ही सम्मिलित हों इसका विशेष ध्यान रखा गया है। इनकी संख्या पहले 125 ही रखने का विचार था पर बहुत छाँट करने पर भी यह संख्या करीब ड्यौढ़ी होती दीखती है। यज्ञ में पूर्ण सात्विकता का ऋषिकल्प वातावरण रहेगा। कोई आडम्बर, प्रदर्शन, ठाठ-बाठ या आकर्षण इसमें नहीं रहेगा।
जो व्यक्ति इस यज्ञ में सम्मिलित रहेंगे उनके लिए आवश्यक आदेश पहले ही भेजे जा चुके हैं। ता. 20, 21, 22 जून को उन्हें भूमि शयन आदि तपश्चर्याएं करनी होंगी। यज्ञ के प्रसाद स्वरूप प्रातः काल पंचामृत, मध्याह्न को श्रम रहित खीर आदि का प्रसाद तथा शाम को फलाहार इस प्रकार जो यज्ञावशिष्ट आहार मिलेगा उसी में संतुष्ट रहना होगा। क्योंकि अन्न से मन का बड़ा सम्बन्ध है। उन दिनों पवित्र यज्ञ अन्न खाने से ही ऋत्विजों में समुचित आध्यात्मिक पवित्रता रह सकती है। सभी ऋत्विजों की निर्धारित वेशभूषा होनी चाहिए। धोती, कुरता, कन्धे पर पीला दुपट्टा, पैरों में चर्म रहित जूते या चट्टी। स्त्रियाँ सफेद धोती, पीली कुर्ती तथा पीली चादर रखेंगी, आने वालो को ता. 19 को किसी समय तक मथुरा पहुँच जाना चाहिए ताकि ता. 20 को प्रातःकाल यज्ञ में भाग ले सकें। तीनों दिन यज्ञ, जप, अभिषेक आदि कार्यक्रम प्रातः 5 बजे से 10 बजे तक और शाम को 4 बजे से 7 बजे तक रहेगा। राज को 8 बजे से 10 बजे तक विद्वानों के प्रवचन हुआ करेंगे। ता0 22 को 11 बजे कार्यक्रम समाप्त हो जायगा। इसके बाद सब लोग अपने अपने घर जा सकेंगे।
मथुरा जंक्शन और मथुरा केन्ट (छावनी) पर प्रायः सभी ट्रेनों पर स्वयंसेवक उपस्थित रहेंगे जो आगंतुकों को यथास्थान पहुँचाने में सहायता करेंगे। वैसे स्टेशन पर जो ताँगे, रिक्शे मिलते हैं उनसे कहा जाय कि वृन्दावन वाली सड़क पर मथुरा से ठीक पहले मील जहाँ गढ़ा है वहीं हमें पहुँचना है तो गायत्री मंदिर से अपरिचित ताँगे वाले भी आसानी से वहाँ पहुँचा देंगे। कोई व्यवस्था न बने तो स्टेशन से घीयामंडी, अखण्ड ज्योति कार्यालय में पहुँचना सम्भव है। वहाँ से मंदिर तक पहुँचना आसान होगा। ठहरने में अधिकाँश लोगों को मंदिर में ही ठहराया जायगा। जो लोग सपरिवार आयेंगे उन्हें शहर की धर्मशालाओं में ठहराया जायगा।
इन दिनों आँधी तथा वर्षा का योग है। गर्मी भी उन दिनों खूब पड़ेगी। इसलिए दुर्बल, बच्चे, बुड्ढ़े एवं अस्वस्थ लोग न आवें तो ही अच्छा है। जो लोग न आ सकें वे अप्रैल की अखण्ड-ज्योति में बताये हुए नियमों का पालन करते हुए घर रहते हुए भी यज्ञ में भागीदार रह सकते हैं यज्ञ के तीन दिनों में यथासम्भव उपवास, जप, हवन, मंत्रलेखन गायत्री चालीसा पाठ, गायत्री साहित्य का प्रचार, दान आदि शुभ कार्यों के आयोजन कर सकते हैं। जो सज्जन मथुरा पूर्णाहुति यज्ञ में अपनी ओर से कुछ सामग्री, घृत आदि सम्मिलित करना चाहें तो वैसा प्रसन्नतापूर्वक कर सकते हैं।
बैसाख सुदी 15 से लेकर जेष्ठ सुदी 10 तक हमारा निराहार व्रत चलेगा। पर मौन एकान्त सेवन अनुष्ठान आदि का कार्य नहीं रखा गया है। क्योंकि इन दिनों कितने आवश्यक कार्य हमें स्वयं निपटाने हैं। उपवास के दिनों में हमसे अनावश्यक पत्र व्यवहार न करना चाहिये। मथुरा पधारने वाले भी कम से कम समय लेकर आवश्यक वार्तालाप संक्षिप्त में कर लेने का ध्यान रखे ताकि शक्ति और समय का अनावश्यक खर्च न हो।
पूर्णाहुति यज्ञ- केवल मात्र घी और सामग्री का हवन मात्र नहीं है। उसका बाह्य रूप बहुत साधारण होगा पर इसकी सूक्ष्म महत्ता अनेक दृष्टियों से असाधारण होगी। सामूहिक सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ अब से करीब डेढ़ वर्ष पूर्व आरम्भ किया गया था, जिसके अनुसार देश भर में हजारों ऋत्विजों द्वारा 125 करोड़ गायत्री जप, 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास का संकल्प था। उसके इतनी जल्दी पूर्ण होने की आशा न थी पर माता की कृपा से वह आसानी से पूरा हो गया। 125 लाख हस्तलिखित गायत्री मंत्र संग्रहीत हो चुके और 2400 तीर्थों का जल रज भी एकत्रित होने में भी देर नहीं है। हमारे 24-24 लक्ष के पुरश्चरण पूर्ण होने में भी माता की असाधारण कृपा ही प्रधान है। पूर्णाहुति यज्ञ मथुरा में तो छोटा सा ही होगा पर उसके साथ हजारों उच्च कोटि की आत्माओं का हजारों स्थानों पर सम्बन्ध एवं सहयोग होगा। इन सबका सम्मिलित समन्वय ही पूर्णाहुति यज्ञ है। इसके द्वारा हम सब पूर्णता की और अग्रसर हों ऐसी माता से प्रार्थना है।
भावी कार्यक्रम
गायत्री तपोभूमि बन जाने और गायत्री मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद यह कार्य समाप्त नहीं हो जाता। वरन् लुप्तप्राय गायत्री विद्या की देशव्यापी पुनर्प्रतिष्ठा की स्थापना होने का सुनिश्चित कार्यक्रम आगे के व्यवस्थापूर्वक आरम्भ होना है। यह स्थान तो इस कार्यक्रम को आरम्भ करने का व्यवस्थित स्थान मात्र है। उपयुक्त स्थान से उपयुक्त कार्य करने में ही सदा सुविधा होती है।
संत्रस्त मनुष्यता का परित्राण, आध्यात्मिक निष्ठा का प्रकाश, भारतीय संस्कृति का पुनरुद्धार हमारा लक्ष है। सदाचार, प्रेम, कर्त्तव्य परायणता, सद्भाव, पवित्रता, संयम, सद्बुद्धि, आस्तिकता एवं मानवोचित जीवन की विधि व्यवस्था हमारा कार्यक्रम है। गायत्री उपासना उन्हीं दैवी सम्पत्तियों का एक केन्द्र बिन्दू है। इस संस्था की भावी गतिविधि इसी कार्यक्रम को पूर्ण करने की होगी।
कबिरा गर्व न कीजिये काले गहे कर केस। ना जानौं कित मारि है क्या घर क्या परदेस॥
हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केस जरै ज्यों घास। सब जग जरता देखि कर भये कबीर उदास॥
झूठे सुख को सुख कहैं मानत हैं मन मोद। जगत चबेना काल का कुछ मुख में कुछ गोद ॥
पानी केरा बुदबुदा अस मानुष की जात। देखते ही छिपि जायगा ज्यों तारा परभात॥
रात गँवाई सोय करि दिवस गँवायौ खाय। हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय॥
आज कहे कल भजूँगा काल कहे फिर काल। आज काल के करत ही औसर जासी चाल॥
आछे दिन पाछे गये गुरु से किया न हेत। अब पछतावा क्या करै चिड़ियाँ चुग गई खेत॥
काल करै सो आज कर आज करै सो अब। पल मैं परलै होयगी बहुरि करैगा कब।
कबिरा नौबत आपनी दिन दस लेहु बजाय। यह पुर पट्टन यह गली बहुरि न देखौ जाय॥
पाँचों नौबत बाजती होत छतीसौ राग। सो मंदिर खाली पड़ा बैठन लागे दाग॥
यह तन काँचा कुम्भ है लिए फिरै हैं साथ। टपका लागा फूटिया कछु नहिं आया हाथ॥
युग बीत गये चलते चलते।
मैं वह पागल पंथी जिसको, पंगल पग की परवाह नहीं।
मैं मंजिल खूब जानता हूँ लेकिन पहचानी राह नहीं।
हिम-पथ में सतत् साधना के, मैंने ये प्राण गला डाले।
आराध्य दीप की ज्वाला में, जी के अरमान जला डाले।
कितने संकल्प उठे, बैठे, अन्तर में कल मलते मलते।
युग बीत गये चलते चलते।
करने को सफल हेतु अपना, तरने को जलधि, सेतु अपना,
मैं बाँध रहा हूँ हिम गिरि की, चोटी से विजय-केतु अपना।
तै तपी निराला हूँ ऐसा, तप भी जिसको फलवान नहीं।
अभिशाप अयाचित अनगिनती पाये मैंने, वरदान नहीं।
मैं वह पाषाण कि जो पानी, बन गया युगों जलते जलते।
युग बीत गये चलते चलते।
जब शुष्क मरुस्थल तपते हैं, बहती है मेरी निर्झरनी।
आँधी-तूफान मचलते हैं, तब चलती है मेरी तरनी।
मुझको हर मौसम सावन है, हर परिवर्तन भाया रहता।
आँखों में हरियाली बनकर, मेरा साजन छाया रहता।
झंझायें लौरी गाती, मुझ पर प्यार-व्यंजन झलते झलते।
युग बीत गये चलते चलते।
(श्री मुरलीधर दीक्षित, भ्रान्त)
*समाप्त*