गायत्री संस्था की ओर से एक लम्बे समय से अत्यन्त ही महत्वपूर्ण खोज की गई है। हजारों प्राचीन ग्रन्थों का मंथन करके गायत्री सम्बन्धी समस्त जानकारियों का संकलन, देशव्यापी गायत्री उपासकों के अनुभवों का संग्रह, महान तपस्वियों एवं विद्वानों का सहयोग, रहस्यमय सिद्ध पुरुषों की खोज, स्वयं की कठोर तपश्चर्याओं का अनुभव, उपलब्ध ज्ञान का अनुभव, उपलब्ध ज्ञान का प्रयोग एवं परीक्षण करके जो जानकारी एकत्रित की गई हैं उसे पुस्तकों के रूप में प्रकाशित कर दिया गया है। यह साहित्य अनेक दृष्टियों से अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं अपूर्व है। इस पथ के पथिकों के लिए वह अनुभवी गुरु का काम देता है। देश भर के विद्वानों, महात्माओं, योगियों एवं अध्यात्म प्रेमियों ने एक स्वर से इस साहित्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की हैं।
बड़ा सैट
1-गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) सर्वसाधारण के लिए गायत्री विद्या की जानकारी नियमोपनियम, साधन विधि, अनुष्ठान, हवन तथा अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोगों का विस्तृत वर्णन।
2-गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग) गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री तन्त्र, चौबीस गायत्री सहस्रनाम आदि का श्लोकों और अर्थों सहित संग्रह।
3-गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) गायत्री द्वारा 84 प्रकार की रहस्यपूर्ण, गुप्त एवं चमत्कारी योग साधनाओं का विस्तृत वर्णन।
4-गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार- अनेकों साधकों के अपनी-2 गायत्री साधना में प्राप्त हुए महान अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन।
5-सचित्र गायत्री शिक्षा- गायत्री के 24 अक्षरों में 24 महान सिद्धान्त छिपे हुए हैं। उनको समझने के लिए 24 श्लोक, 24 लेख, 24 कविता तथा आर्ट पेपर पर छपे हुए 26 तिरंगे चित्र।
6-गायत्री चित्रावली- गायत्री माता के ध्यान करने योग्य, आर्ट पेपर पर छपे हुए 24 तिरंगे चित्र तथा उनका पूरा परिचय।
7-गायत्री का मंत्रार्थ- गायत्री के एक-एक अक्षर की विस्तृत शास्त्रीय व्याख्या और अनेक ऋषियों के किए हुए अनेक प्रकार के अर्थों संग्रह।
छोटा सैट
जो व्यक्ति उपरोक्त पुस्तकों नहीं खरीद सकते उनके लिए उपरोक्त ज्ञान को संक्षिप्त रूप से निम्नलिखित छोटी पुस्तकों में भी छाप दिया गया है।
गायत्री ही कामधेनु है।
गायत्री का वैज्ञानिक आधार
गायत्री की सर्व सुलभ साधना
वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री
गायत्री के 14 रत्न- प्रथम भाग
गायत्री के 14 रत्न- द्वितीय भाग
अनादि गुरु मंत्र गायत्री
विपत्ति निवारिणी गायत्री
स्त्रियों का गायत्री अधिकार
सचित्र गायत्री
धर्मार्थ वितरण करने योग्य-
सर्व शक्तिमान गायत्री 2- गायत्री चालीस 3-पूजा के योग गायत्री का रंगीन चित्र।
उपरोक्त पुस्तकों का मूल्य कागज छपाई पृष्ठ संख्या आदि की दृष्टि से सस्ता ही रखा है। फिर भी इनकी बिक्री से जो थोड़ा सा लाभ होता है वह किसी व्यक्ति को प्राप्त न होकर गायत्री संस्था को ही मिलना है। मूल्य में कमी के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। हाँ, 6 रु. से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च अपना लगा दिया जाता है।
पता- अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
बहुत दिनों तू भूला भटका, क्षीण हुई गति पथ पर अटका,,
लक्ष्य रहा अनजान! अपने को पहचान!!
तू मिट्टी को सोना समझा, पर, पाने को खोना समझा,,
शापों को वरदान! अपने को पहचान!!
प्रभु का मन्दिर, तेरी काया, माया तेरे तन की छाया,,
निज सत्ता को जान! अपने को पहचान!!
तुझमें निहित सत्य, शिव, सुन्दर, पावनतम् से बन पावन तर,,
बन जा तू भगवान! अपने को पहचान!!
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बसताँ ना पवित्रः सन् वाह्यतोऽभ्यन्तरस्तथा। यतः पवित्रतायाँ हि राजतेऽति प्रसन्नता॥
अर्थ- मनुष्य को बाहर और भीतर से पवित्र रहना चाहिए क्योंकि पवित्रता में ही प्रसन्नता रहती है।
पवित्रता में चित्त की प्रसन्नता, शीलता, शान्ति निश्चिन्ता, प्रतिष्ठा और सफाई छिपी रहती है। कूड़ा करकट, मैल, विकार, पाप, गन्दगी, दुर्गन्ध, सड़न, अव्यवस्था एवं घिचपिच से मनुष्य की आन्तरिक निकृष्टता प्रतीत होती है। इस निकृष्टता से विरत करके महान पवित्रता में मनुष्य को संलग्न करना ही गायत्री के बारहवें अक्षर ‘दे’ का उद्देश्य है।
आलस्य और दरिद्र, पाप और पतन जहाँ रहते हैं वहीं मलीनता या गन्दगी का निवास रहता है, जो इस प्रकृति के हैं, उनके वस्त्र, घर, सामान, शरीर मन, व्यवहार, वचन, लेन देन, सब में गन्दगी और अव्यवस्था भरी रहती है। इसके विपरीत जहाँ चैतन्यता, जागरुकता, सुरुचि, सात्विकता होगी वहाँ सबसे पहले स्वच्छता की ओर ध्यान जायगा। सफाई, सादगी एवं सुव्यवस्था में ही सौंदर्य है। इसी को पवित्रता कहते हैं।
गन्दे खाद से गुलाब से सुन्दर पुष्प पैदा होते हैं, जिसे मलीनता को साफ करने में हिचक न होगी वही सौंदर्य का सच्चा उपासक कहा जायगा। मलीनता से घृणा होनी चाहिये पर उसे घटाने या हटाने में रुचि होनी आवश्यक है। जो पवित्रता से प्रेम करता है उसे गन्दगी को हटाने में तत्परता प्रकट करके ही अपने प्रेम की परीक्षा देनी पड़ती है। आलसी लोग अक्सर फुरसत न मिलने का बहाना करके अपनी कुरुचि पर पर्दा डालते हैं।
पवित्रता एक अध्यात्मिक गुण है। आत्मा स्वभावतः पवित्र एवं सुन्दर है। इसलिए आत्म परायण व्यक्ति के विचार व्यवहार और पदार्थ भी सदा स्वच्छ एवं सुँदर रहते हैं। गन्दगी उसे आँखों देखी नहीं सुहाती गन्दगी में उसकी साँस घुटती है। इसलिए वह सफाई के लिए दूसरों का सहारा नहीं टटोलता। अपनी सभी वस्तुओं को स्वच्छ बनाने के लिए वह सबसे पहले, सब कामों को छोड़कर अवकाश निकालता है। क्योंकि वह भली प्रकार समझता है कि पवित्रता मानव जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता एवं प्रतिष्ठा है।
पवित्रता जीवन के सभी क्षेत्रों में आवश्यक है शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, व्यावहारिक आध्यात्मिक, पवित्रताएँ हर गायत्री उपासक के जीवन व्यवहार में ओत प्रोत होनी चाहिए। शरीर और वस्त्रों की सफाई के बिना शरीर का निरोग रहना कठिन है। विचार और भावनाएँ जब तक शुद्ध न हों तब तक किसी व्यक्ति की मानसिक अशांति तथा उद्विग्नता दूर नहीं हो सकती। आर्थिक पवित्रता का अर्थ है व्यवस्थित आजीविका तथा साफ लेन देन। जिसकी आजीविका की ठीक व्यवस्था न होगी तथा जो उधार के लेन देन में गन्दगी रखेगा, ऋण के फेर में पड़ेगा। उसकी आर्थिक गंदगी अनेक उलझनें तथा पेचीदगियां सामने उपस्थित करती रहेंगी। सामाजिक पवित्रता का तात्पर्य है- सामाजिक संगठन के नैतिक नियमों का पालन तथा पारस्परिक सहयोग के लिये उदारता पूर्ण व्यवहार। इस मार्ग पर चलने से मनुष्य जाति पारस्परिक कलह से बचकर सुख, शान्ति पूर्वक जीवन यापन कर सकती है। व्यावहारिक पवित्रता में शिष्टाचार, नम्रता, मधुर भाषण, कृतज्ञता, प्रत्युपकार, परिश्रम शीलता, मितव्ययता, नियमितता, निरालस्य, कर्तव्य निष्ठा आती हैं। आध्यात्मिक पवित्रता में सचाई, संयम, आत्मनिष्ठा, त्याग, सेवा, सात्विकता तथा आस्तिकता का समावेश है। इन छहों पवित्रताओं की समुचित रक्षा, व्यवस्था एवं अभिवृद्धि के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना गायत्री उपासक का परम पुनीत कर्त्तव्य है।
देवता स्वच्छता प्रेमी होते हैं और असुर मलीनता प्रेमी। जिस व्यक्ति का शरीर अशुद्ध रक्त से अशुद्ध मलों से भरा हुआ है, जो शरीरगत अशुद्धियों की भरमार में रोज ही बीमार पड़ता है, जिसके नाक, दाँत, मुख से दुर्गन्धि आती है, जिसके कपड़े गन्दे रहते हैं। व्यवहार का सामान, मकान आदि में अव्यवस्था एवं गन्दगी का साम्राज्य छाया रहता है उसे देवत्व से दूर, एवं असुरता के समीप ही समझना चाहिए। ऐसे लोग देवशक्तियों को न तो अपनी ओर आकर्षित कर सकते हैं न उनकी कृपा का लाभ उठा सकते हैं।
इसी प्रकार जिनके विचारों में, भावनाओं में, छल कपट, अहंकार, अपहरण, पाप, द्वेष, विषय विकार, क्रोध, लोभ, मोह, स्वार्थपरता आदि का साम्राज्य छाया हुआ है तब तक उनके मन में देवत्व का आविर्भाव होना किस प्रकार सम्भव हो सकता है? जिनकी आजीविका गन्दी हैं-जो रिश्वत खोरी, चोर बाजारी, बेईमानी, चोरी, दगाबाजी एवं अनीति से पैसा कमाते हैं, ऋण के अभ्यस्त हैं, देने और लेने में सफाई नहीं रखते, अपने वचन का जिन्हें ध्यान नहीं ऐसे लोग साधारणतः अर्थ चिन्ता से ऐसे मलिन रहते हैं कि देवत्व की उपासना के लिए उनकी सच्ची अभिरुचि ही उत्पन्न नहीं हो पाती। किसी देवी देवता से मुफ्त में माल झटक लेने के लिए पूजा पत्री का चालाकी भरा फंदा वे फेंकते हैं तो वह भी प्रायः सफल नहीं होता। क्योंकि आर्थिक पवित्रता से रहित, अर्थ सिद्धान्तों का स्वच्छता पूर्वक पालन न करने वाला मनुष्य अपनी अर्थ मलीनता के कारण सच्ची उपासना की स्थिति में ही नहीं होता। फिर उसकी उपासना सफल हो तो हो कैसे?
सामाजिक गन्दगी भी एक ऐसी असुरता है जिससे दैवीशक्तियाँ सदा रुष्ट और प्रतिकूल रहती हैं धार्मिक कानून, सामाजिक कानून, राजकीय कानून इसलिए बने हुए हैं कि उनका पालन करते हुए एक मनुष्य का स्वार्थ किसी दूसरे के स्वार्थ से न टकराये। चोरी, जुआ, व्यभिचार, कर्कशता, निष्ठुरता, अनुदाता, स्वार्थपरता, धूर्तता आदि के द्वारा दूसरों को कष्ट पहुँचाना ही उन कानूनों को तोड़ना है। इससे मनुष्य समाज में परस्पर दुर्भाव एवं द्वेष की वृद्धि होती है। इसलिए सामाजिक स्वच्छता उन बातों में मानी जाती है जिसमें मनुष्य स्वयं तो किसी को अनुचित हानि न पहुँचावे वरन् अपने लाभ एवं अधिकार को भी उदारता पूर्वक अपने से दुर्बलों के लिए दान कर दे। ऐसे सेवा भावी, संयमशील व्यक्ति ही धर्मात्मा, लोक सेवी या देशभक्त कहे जा सकते हैं। व्यावहारिक पवित्रता भी सामाजिक पवित्रता का ही एक अंग है। परिश्रम शीलता, निरालस्यता, शिष्टाचार, सद्व्यवहार, मितव्ययता, समय का सदुपयोग, कृतज्ञता, प्रत्युपकार तथा कर्त्तव्यनिष्ठा के सद्गुणों को अपनाने वाला व्यक्ति अपने तथा अपने निकटवर्ती लोगों की उन्नति, शान्ति, सुविधा एवं प्रसन्नता में सहज ही अभिवृद्धि कर सकता है। ऐसी सामाजिक एवं व्यावहारिक पवित्रता को अपनाने वाले मनुष्य सहज ही दैवी शक्तियों के कृपा पात्र बन सकते हैं।
आध्यात्मिक पवित्रता-सत्यनिष्ठा, प्राणिमात्र के प्रति आत्मीयता, सद्भावना, सात्विकता और दिव्य विचार, गुण, स्वभाव, एवं कार्यों में अगाध निष्ठा को कहते हैं। जिसका आत्मा इनके विपरीत तत्वों से आच्छादित है उसे अनात्मवादी असुर ही कहा जायगा चाहे वह रावण की तरह पूजा-पाठ, यज्ञ, हवन करने वाला ही क्यों न हो। रावण अपनी असुरता के कारण जीवन भर दिव्यसत्ता का प्रिय पात्र न बन सका उसके विपरीत शबरी, निषाद, सुदामा, विदुर, नरसी, रैदास आदि साधारण योग्यता के व्यक्ति अपनी आत्मिक पवित्रता के कारण धन्य हो गये।
सर्वांगीण पवित्रता, जीवन को सुख शान्तिमय बनाने की सीधी पगडण्डी है। देवता की पूजा प्रतिष्ठा के लिए स्थान शुद्धि की आवश्यकता होती है गायत्री दैवीसत्ता को जो मनुष्य अपने अंदर प्रतिष्ठापित करना चाहते हैं उनके लिए यह आवश्यक है कि सब ओर से सफाई कर डालें। कूड़े कचरे को झाड़ बुहार कर बाहर फेंक दें। बुरे विचार, बुरे गुण, बुरे स्वभाव, बुरे कार्य इनकी जो आदतें पड़ गई हैं उनको हटाना चाहिये। इन गन्दगी के हटने पर ही वह स्वच्छता हो सकेगी जिस पर दैवी तत्वों की स्थापना होती है। गायत्री महान शक्ति शाली है, उसकी आराधना से सब कुछ मिल सकता है, लोक और परलोक में सब प्रकार आनन्ददायक परिस्थिति प्राप्त हो सकती है, पर वह सब सम्भव तभी है जब माता की आज्ञाओं और शिक्षाओं पर भी ध्यान दें। उनके आदेशों को पालन करके जो लोग अपने आपको सच्चा मातृभक्त सिद्ध करते हैं वे ही उसकी गोदी में चढ़ने का, पयपान करने का तथा अंचल की शीतल छाया का सुख लाभ करते हैं। माता के आदेशों का हर घड़ी तिरस्कार करने वाले लोग केवल चन्द मिनट पूजा पाठ करके अभीष्ट लाभ प्राप्त करना चाहें तो यह कठिन ही है।
गायत्री महामंत्र का बारहवां अक्षर ‘दे’ यही आदेश देता है कि हम भीतर और बाहर से सब प्रकार पवित्र बनें। शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, व्यावहारिक, आर्थिक और आध्यात्मिक पवित्रता की रक्षा करने और बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहें। इस आदेश को शिरोधार्य करने वाला साधक अपनी साधना का फल तत्काल प्राप्त करता है। इस नीति, एवं कार्य पद्धति को अपनाते ही उसकी अनेकों उलझनें सुलझ जाती हैं और तत्काल अभीष्ट शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
(श्री आचार्य बिनोवा भावे)
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चार पुरुषार्थ बतलाये गये हैं। इनमें से मोक्ष और काम परस्पर विरोधी सिरों पर स्थित हैं। प्रकृति और पुरुष या शरीर और आत्माओं में अनादि काल से संघर्ष चला आ रहा है। वेदों में जो वृत्र और इन्द्र के युद्ध का वर्णन है वह इसी सनातन युद्ध का वर्णन है। ‘वृत्र’ का अर्थ है ज्ञान को ढ़क देने वाली शक्ति। ‘इन्द्र’ संज्ञा परोक्ष संकेत की द्योतक है और उस अर्थ को सूचित करने के ही लिए खासकर गढ़ी गई है। ‘इदम्’- ‘द्र’ या ‘विश्वद्रष्टा’ ‘इन्द्र’ शब्द का प्रत्यक्ष अर्थ है। यह है उसका स्पष्टीकरण। ज्ञान को ढांकने की कोशिश करने वाली और ज्ञान का दर्शन करने की चेष्टा करने वाली, इन दो शक्तियों का अर्थ क्रमशः जड़, शरीरात्मक, भौतिक शक्ति और चेतन, ज्ञानमय, आत्मिक शक्ति है। इन दोनों में सदा संघर्ष होता रहता है और मनुष्य का जीवन इस संघर्ष में फंसा हुआ है। ये दोनों परस्पर-विरोधी तत्व एक ही व्यक्ति में काम करते हैं, इसलिये मनुष्य का हृदय इनके युद्ध का धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र हो गया है आत्मा को मोक्ष-पुरुषार्थ की अभिलाषा होती है, शरीर को काम-पुरुषार्थ प्रिय हैं। दोनों एक-दूसरे को नाश करने की ताक में हैं।
मोक्ष कहता है-काम आत्मा की जान लेने पर तुला हुआ उसका कट्टर बैरी है। उसे मार डालों निष्काम बनो। यह बड़ा मायावी और स्नेही मालूम होता है। लेकिन इसके प्रेम के स्वाँग पर मोहित होकर धोखा न खाना। यह जितना कोमल दीखता है उतना ही क्रूर है। इसके दिखाने के दाँत प्रेममय हैं पर खाने के दाँत क्रोध से भरे हुए। ऊपर-ऊपर से यह चैतन्य रस से परिपूर्ण बालकों को जन्म देता हुआ दिखाई देता है। लेकिन यह वास्तविक नहीं है। यह बूढ़ी महतारी अब तक मरती क्यों नहीं, इसी की इसे हमेशा फिक्र रहती है। याद रहे कि लड़के को जन्म देने का अर्थ हैं पिता की मृत्यु की तैयारी करना। अगर आपकी यह इच्छा होती कि आपके बाप-दादा, आपके पुरखे जीवित रहें, तो क्या आप लड़के और नाती-पोते पैदा करते ? क्या आपको पता नहीं कि इतने आदमियों का प्रचण्ड लोक संग्रह या मनुष्यों का ढेर पृथ्वी सम्भाल नहीं सकती? आप इतना भी नहीं जानते? माँ तो मरने ही वाली है, वह हमारे वश की बात नहीं यह कह देने से काम नहीं चलेगा। हम यह नहीं भुला सकते कि माता की मृत्यु की अवश्यम्भाविता स्वीकार करके ही पुत्र का उत्पादन किया जाता है। इसीलिए तो जन्म का भी ‘सूतक’ (जनना शौच) रखना पड़ता है। चैतन्य रस से भरे बालक को उत्पन्न करने का श्रेय अगर आपको देना हो, तो उसी रस से ओत-प्रोत माता को मार डालने का पातक भी उसी के मत्थे होगा। उत्पत्ति और संहार, काम और क्रोध, एक ही छड़ी के दो सिरे हैं। ‘काम’ कहते ही उसमें ‘क्रोध’ का अन्तर्भाव हो जाता है इसीलिए अहिंसक वृत्ति वाले सत्पुरुष संहार-क्रिया की तरह उत्पत्ति की क्रिया में भी हाथ नहीं बटाते। सच तो यह है कि बालक का चैतन्य रस काम का पैदा किया हुआ होता ही नहीं। जिस गन्दे अंग रस से मलिन होने में माँ-बाप अपने-आपको धन्य मानते हैं वह रजो रस इसका पैदा किया हुआ होता है। कारण, इसका अपना जन्म ही रजोगुण की धूल (रज) से हुआ है। आप अगर इसके मनोरथ पूरे करने के फेर में पड़ेंगे तो यह कभी अघाएगा ही नहीं, इतना बड़ा पेटू है। जिस-जिसने इसे तृप्त करने का प्रयोग किया वे सभी असफल हुए। उन सबको यही अनुभव हुआ कि काम की तृप्ति कामोपभोग द्वारा करने का यत्न स्वयं क्षत्रिय बनकर पृथ्वी को निःक्षत्र करने के प्रयास की तरह व्याघातात्मक या असंगत है। इसे चाहे जितना भोग लगाइए, आग में घी डालने-जैसा ही होता है। इसकी भूख बढ़ती ही जाती है। अन्नदाता ही इसका सबसे बड़ा खाद्य है और उसे खाने में इसे निःसंदेह भस्मासुर से भी बढ़कर सफलता मिलती है। इसलिए इस कामासुर को वरदान देने की गलती न कीजिए।
इसकी ठीक उल्टी बात काम कहता है। वह भी उतनी ही गम्भीरता से कहता है- “मोक्ष के चक्र में में आओगे तो नाहक अपना कृपालु-मोक्ष (कपाल-क्रिया) करा लोगे। याद रखो, वेदान्त की ही बदौलत हिन्दुस्तान चौपट हुआ है। यह तुम्हें स्वर्ग−सुख और आत्म-साक्षात्कार की मीठी-मीठी बातें सुनाकर भुलावे में डालेगा। लेकिन यह इसकी खालिस दगाबाजी है। ऐसे काल्पनिक कल्याण के पीछे पड़कर ऐहिक सुख को तिलाँजलि देना बुद्धिमानी की बात नहीं है। ‘तत्वमसि’ आदि महावाक्यों की चर्चा यदि कोई घड़ी भर मनोविनोद के लिए भोजन के अनन्तर नींद आने से पहले या नींद आने के लिए करे तो उसकी वह क्रीड़ा क्षम्य मानी जा सकती है। परन्तु, यदि कोई खाली पेट यह चर्चा करने का हौसला करेगा, तो वह याद रक्खे कि उसे व्यावहारिक ‘तत्वमसि’ (पैसे) की ही शरण लेनी होगी। चाँदनी बिलकुल आटे-जैसी सफेद भले ही हो, परन्तु उसकी रोटियाँ नहीं बनती और तो कुछ नहीं, मोक्ष की चिन्ता की बदौलत जीवन का आनन्द खो बैठोगे। इस विश्व के विविध विषयों का आस्वाद लेने के लिए तुम्हें इन्द्रियाँ दी गई हैं। लेकिन यदि तुम ‘जगन्मिथ्या’ मानकर इन्द्रियों को मारने का उद्योग करते रहोगे तो आत्मवंचना करोगे और आखिर तुम्हें पछताना पड़ेगा। पहले तो जो आँखों को साफ-साफ नजर आता है उस संसार को मिथ्या मानों और फिर जिसके आस्तित्व के विषय में बड़े बड़े दार्शनिक भी सशंक हैं, वैसी ‘आत्मा’ नामक किसी वस्तु की कल्पना करो, इसका क्या अर्थ हैं? वेदों ने भी कहा है, ‘कामस्तदग्रे समवर्तत’ -सृष्टि की उत्पत्ति काम से हुई और इसका अनुभव तो सभी को है। यदि दरअसल ईश्वर जैसी वस्तु हो तो भी कल यदि सभी लोग निष्काम होकर ब्रह्मचर्य का पालन करने लगें, तो जिस सृष्टि को उत्पन्न होने से बचाने के लिए यही परमेश्वर समय-समय पर अवतार धारण करता है उसका पूरा-पूरा विध्वंस हुए न रहेगा। ‘मोक्ष’ के माने अगर आत्यान्तिक सुख हो तो सरल भाषा में उसका अर्थ चिरन्तन कामोपभोग ही हो सकता है।
यह है काम की अपील।
सम्पूर्ण त्याग और सम्पूर्ण भोग, ये परस्पर विरोधी दो ध्रुव है। एक कहता है शरीर मिथ्या है दूसरा कहता है आत्मा झूठी है। दोनों को एक दूसरे की परवाह नहीं, दोनों पूरे स्वार्थी हैं। लेकिन आत्मा और शरीर दोनों का मिलन मनुष्य में हुआ है। इसलिए इस तरह दोनों पक्ष में अपने ही सगे-सम्बन्धी देखकर अर्जुन के लिए आत्म निर्णय कराना असम्भव हो गया उसी तरह कर्मयोग के धर्मक्षेत्र में अपने स्नेही-सम्बन्धियों को दोनों विषयों से संलग्न देखकर मनुष्य के किसी भी एक पक्ष के अनुकूल स्थायी और निश्चित निर्णय देना कठिन हो जाता है। मन की द्विधा स्थिति हो जाती है और एक मन शरीर का पक्ष लेता है, दूसरा आत्मा की हिमायत करता है। मनुष्य का जीवन अ-शरीर आत्मा और आत्महीन शरीर की संधि पर आश्रित है, इसलिए उसे शुद्ध आत्मवाद या मोक्ष-पूजा पचती नहीं, और शुद्ध जड़वाद या कामोपासना भी रुचती नहीं। इन दोनों मार्गों में अद्वैत कायम करना, या उनका सामंजस्य करना बड़े कौशल का काम है। यह कर्म करने की चतुराई या ‘कौशल’ ही जीवन का रहस्य है।
पहले, जब आजकल की भाँति दूषित वातावरण नहीं था, ब्रह्मचर्य की रक्षा सुलभ थी और स्वतः ही हो जाया करती थी। उस समय का रहन-सहन, वेश-भूषा, आचार-विचार, शिक्षा-प्रणाली और सभ्यता आदि लोगों को ब्रह्मचर्य-व्रत के धारण करने में सहायता पहुँचाते थे। आजकल की परिस्थिति ठीक इसके विपरीत है। पहले बाल जीवन पवित्र और सरल था। लोगों का आहार-विहार नियमित था। वे सत्य के उपासक होते थे अतः ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थिति रहने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। ब्रह्मचर्य व्रत को स्थायी बनाने के लिए आश्रम-धर्म भी उसका एक प्रधान अंग था। प्राचीन काल के पुरुष गृहस्थाश्रम में केवल इन्द्रिय-सुख के लिए नहीं प्रवेश करते थे। विद्यार्थी-जीवन समाप्त करके विद्यालय से निकलने के पश्चात जिनका उद्देश्य प्रवृत्ति-मार्ग में आकर सृष्टि उत्पन्न करना चाहता था, केवल वे ही गृहस्थ-धर्म स्वीकार करते थे। गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर भी उनका जीवन विलासी नहीं होता था, प्रत्युत किसी मुख्य उद्देश्य की पूर्ति के हेतु इस आश्रम में भी वे अपना रहन-सहन शुद्ध एवं संयमित रखते थे। अपने ही सदृश एक नूतन आकृति को उत्पन्न करने के निमित्त से वे रति-रहस्य में सम्मिलित होते थे, अन्यथा नहीं। जीवन में केवल कुछ ही ऐसे अवसर होते थे, जब उन्हें अपनी शक्ति को बहिर्मुख करने की आवश्यकता पड़ती थी। संतान हो जाने के बाद उसे युवावस्था प्राप्त कर लेने के पूर्व ही, वे गृहस्थाश्रम छोड़कर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे। आजकल की तरह उस समय ऐसी भद्दी प्रथा कहीं देखने को भी नहीं थी कि एक ही परिवार के पिता और पुत्र दोनों चिरकाल तक संतानोत्पत्ति के कार्य में प्रवृत्त रहें।
आजकल जीविका का प्रश्न संसारव्यापी विकट समस्या हो रही है। स्वतंत्र कृत्रिम उपायों द्वारा इसके हल करने का कुछ आयोजन किया है। जिस समय भारतवर्ष की जन-संख्या कम थी और भूमि उर्वरा एवं रत्न गर्भा होने के कारण भोजन, वस्त्र तथा जीवन की अन्य आवश्यक सामग्री का अभाव नहीं था, उस समय विवाह के शुभ अवसर पर वर-वधू को यह आशीर्वाद दिया जाता था कि वह दम्पत्ति अनेक संतानों से सम्पन्न हो। देश तथा समाज की उस समय की स्थिति एवं आवश्यकता के अनुसार ऋषियों और शुभचिन्तकों का यह आशीर्वाद उनके लिए शुभ वचन था। लेकिन वर्तमान परिवर्तित स्थिति में वैसी शुभकामना दुःख का मुख्य कारण बन सकती है।
संसार के इस अशान्त वातावरण में, देश में भीषण गरीबी एवं आवश्यकता से अधिक जन संख्या हो जाने से यहाँ के युवक-युवतियों का युग के अनुसार यह मुख्य धर्म हो गया है कि वे जहाँ तक हो सके पूर्णरूप से पवित्र रहकर अपने को विवाह-बन्धन से मुक्त रखने का प्रयत्न करें। विवाह-बन्धन से अपने को अलग रखना तथा आचरण को पूर्ण संयमशील बनाना चरित्र की पवित्रता की पराकाष्ठा है। मन और शरीर दोनों से ब्रह्मचर्य का व्रत पालन करना निःसंदेह बहुत ही कठिन है, लेकिन मन और शरीर के होम किए बिना उसकी पूर्णता कदापि सम्भव नहीं है। इस सम्बन्ध में हमें इस बात को हृदयंगम करना चाहिए है कि मनुष्य और ऊपर उठना चाहता है तो यह आवश्यक है कि उसके मन के अन्दर स्त्री और पुरुष भाव की कोई पृथक सत्ता न रह जाय। स्त्री और पुरुष की पृथक सत्ता सृष्टि का कारण होती है, किन्तु जिस समय प्रकृति पुरुष में विलीन हो जाती है उस समय उसकी सृजन-क्रिया का कार्य समाप्त हो जाता है। स्त्रियाँ प्रकृति रूपिणी हैं। अतः मनुष्यों के लिए यह कहा जाता है कि वे प्रकृति को देखते हुए उससे शनैः शनैः अलग हो जाने की कोशिश करें। इस सिद्धान्त को ही सामने रखकर प्राचीन काल में स्त्री-पुरुषों के लिए आश्रम-धर्म का आयोजन किया गया था। लेकिन आज भी यह जन कल्याण के लिए लाभदायक एवं उपयोगी है। अतः आधुनिक काल स्त्री-पुरुषों को इस सिद्धान्त का मनन करके उससे लाभ उठाना चाहिए। इससे एक दूसरा लाभ यह होगा कि ऐसे स्त्री-पुरुष संसार की आर्थिक समस्या के प्रश्न को हल करने में सहायक होंगे।
इस कठिन विधान को समझने तथा उस पर अमल करने के लिए यह आवश्यक है कि उसमें हृदय और मन दोनों का पूर्ण सहयोग हो। दोनों के मेल से कार्य आसान हो सकेगा। अन्यथा मनुष्य अपनी वास्तविक आवश्यकता को न समझकर या तो उसे बलात्कार से दमन करने की कोशिश करेगा या अनर्गल भोगवासनाओं में डूब जायगा। दोनों ही दशाएँ असंगत हैं। चरित्र कोई ऐसी वस्तु नहीं हैं जिसे बलात् किसी नियम अथवा नियन्त्रण में बाँधकर सुधारा जा सके। किसी भावना का दमन करके जब कोई बात चरित्र में लाने की चेष्टा की जाती है तो उसका परिणाम प्रायः दुःख और क्लेश ही होता है।
ब्रह्मचर्य-व्रत के पालक के लिए भोजन की ओर भी ध्यान देने की जरूरत है। यह सर्वमान्य सिद्धान्त है कि जैसा भोजन किया जाता है, वैसा ही शरीर और मन बनता है। अतः ऐसा भोजन नहीं करना चाहिए, जो अन्दर के तन्तुओं को उत्तेजित करे। अधिक सब्जी, मोटे आटे की रोटी, कुछ चावल, ताजे फल, आधी छटाँक तक घी और आध सेर तक दूध ब्रह्मचर्य-पालकों के लिए उत्तम भोजन है। कुछ भूखा रखते हुए भोजन समाप्त करना चाहिए, रात्रि में रोटी सब्जी का सादा भोजन ही सूर्यास्त तक कर लेना लाभदायक है। ब्रह्मचारियों के लिए रात्रि में दूध-सेवन भी अहितकर है। बासी भोजन और माँस का सेवन कभी न किया जाय। गरम मसाला, मिर्च, गुड़, चीनी, नमक और तेल ब्रह्मचर्य-पालन के लिये हानिकर हैं। अतः इन्हें त्याग समझना चाहिए। नमक का उपयोग छोड़ देना मुश्किल जरूर हैं, किन्तु छोड़ दिया जाय तो विशेष हितकर है।
जैसा कि इस लेख में ऊपर लिखा जा चुका है, स्त्री सत्ता का पुरुष के अन्दर विलीन हो जाना ही ब्रह्मचर्य-व्रत की चरम सीमा है। लेकिन यह उच्च आदर्श इतना कठिन है कि इसके साधने में कोई विरला ही सफल हो सकता है। इससे नीचे उतरकर साधक को यदि इतनी सफलता भी मिल जाय कि स्त्री की आकृति उसके मन में बस कर उसे उद्विग्न न कर सके, तो यह भी थोड़ी सफलता नहीं है, स्त्रियों के प्रति राग छोड़ देने से ही यह सम्भव है, अन्यथा नहीं। स्त्री का ख्याल रखते हुए उसके प्रति आकृष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है।
यह प्रश्न हो सकता है कि जब यह व्रत इतना कठिन है तो मनुष्य इसका पालन कैसे कर सकता है जितना कठिन यह प्रश्न है, उतना ही कठिन, यदि कुछ दिया जा सके, तो उसका उत्तर भी होगा।
स्त्री की बात तो जाने दीजिए, लोग छोटी-छोटी चीजों के प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, फिर विवाह तो वयस्क स्त्री-पुरुषों के लिए जीवन का बहुत बड़ा प्रलोभन जान पड़ता है। किसी अच्छे मकान, सुन्दर वस्त्र, उत्तम भोजन सामग्री आदि को देखकर लोग इस कदर उनके प्रति आकृष्ट हो जाते हैं, मानो उनका व्यक्ति तत्व कोई चीज ही नहीं है संसार की छोटी-से छोटी चीज उनके मन को अपने साथ उड़ा ले जाती है। पाने की कोई आशा न होते हुए भी लोग इस कदर उसके पीछे पड़ते हैं कि उनके पास अपनी कोई चीज ही नहीं हैं। किसी चीज के चाहने पर उसके न मिलने पर मन की यही दशा होती है। इन सब बातों के मूल में हमें एक ही कारण प्रतीत होता है कि हम लोग अन्दर से बहुत दीन हैं। इसलिए मन चारों ओर दौड़ता है। लोगों की यह दयनीय दशा ही उनकी विपत्ति का मुख्य कारण हैं। संसार की किसी वस्तु के चाहने पर हमें मन को उसके प्रति अर्पित कर देना पड़ता है, फिर भी उसकी प्राप्ति सदा साध्य नहीं है। यदि इच्छित वस्तु प्राप्त भी करली गयी तो उसके उपभोग के लिये दूसरों पर निर्भर करना ही सबसे बड़ी गरीबी है। बाह्य सभी सुखों के लिए हमें उनके साथ रहना और चलना पड़ता है, जिसका अन्तिम परिणाम सदा दुःख है।
ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करना उन्हीं के लिए शक्य है जिनका मन बाहर के प्रलोभनों में न पड़कर अन्तर्मुख हो जाय। आत्मा में प्रतिष्ठित हो जाने पर फिर संसार उस व्यक्ति को अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर पाता। इसमें जो भी मनुष्य सफलता प्राप्त कर सके, उसी का जीवन धन्य है। ब्रह्मचर्य का जीवन सर्वोत्तम है। आधुनिक काल में संसार की दुर्दशा को देखते हुए जो व्यक्ति इस व्रत का पालन करने में समर्थ होता है, वह केवल अपना ही कल्याण नहीं करता, बल्कि उससे सारे संसार का हित होता है। वह अपने आचरण और शुद्ध व्यवहार तथा आदर्श जीवन द्वारा समाज में नवीन शक्ति का संचार करेगा। उसका पवित्र जीवन दूसरों के लिए आदर्शमय जीवन का एक ज्वलन्त उदाहरण होगा। ब्रह्मचर्य का जीवन दीर्घसूत्री न होगा। शुद्ध मन और स्वस्थ शरीर वाला छोटा बालक जैसे प्रसन्न रहता है वैसे ही ब्रह्मचारी भी आत्मानन्द में निरत रहेगा। बालक के मान में जैसे किसी के प्रति राग-द्वेष नहीं रहता, वैसे ही ब्रह्मचारी का मन भी वृति शून्य होगा। समत्व की भावना होने से ब्रह्मचारी सदा जगत के कल्याण सम्पादन में लगा रहेगा। लेकिन न वह किसी के प्रति अनुराग दिखलायेगा और न किसी की ओर आकृष्ट होगा। इस प्रकार ब्रह्मचारी का जीवन परम पवित्र और शुद्ध जीवन है।
इससे सम्बन्ध रखने वाला दूसरा प्रश्न यह हो सकता हैं कि जो लोग इतनी कठिन तपश्चर्या नहीं कर सकते, उन्हें क्या करना चाहिये। इसका स्वाभाविक उत्तर यही हो सकता है कि वे गृहस्थाश्रम-धर्म स्वीकार करके मर्यादोचित जीवन व्यतीत करें। यह भी कोई आसान काम नहीं है। गृहस्थाश्रम-जीवन स्वीकार करने का अर्थ है अपने ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी को लेना। केवल उसी को विवाह-बन्धन में फंसने का हक है जो सब प्रकार से इसका पात्र हो अर्थात् जिसका मन बलवान् और शुद्ध है, शरीर द्वारा जो स्वस्थ है, जिसे कोई संक्रामक रोग नहीं है। जिसका परिवार भी ऐसे रोगों से मुक्त रहा हो, जिसके सम्मुख कठिन आर्थिक प्रश्न न हो, जिसका हृदय कोमल और दयालु हो और जो देखने में कुरूप न हो। इन बातों के अतिरिक्त उसके अन्दर समत्व की भावना भी हो, ताकि वह जीवन के सुख दुःख को सहन कर सके। जिनके अन्दर ये सब गुण विद्यमान हैं, केवल वे ही विवाह के लिए उचित पात्र हैं, ऐसे दम्पत्ति जो सृष्टि का रचनात्मक कार्य करेंगे, उससे संसार में शान्ति स्थापित होगी और लोगों का जीवन सरल बनेगा। इस लेख में मुझे एक और बात की ओर ध्यान दिलाना उचित मालूम पड़ता है कि ऐसे दम्पति भी उतनी ही संतान उत्पन्न करें, जिनका वे भली प्रकार पालन-पोषण कर सकें। भारत वर्ष में परिवारों की दशा आजकल बहुत ही शोचनीय है। अधिकतर तो ऐसे ही दम्पति हैं, जिन्होंने विवाह की जिम्मेदारी को न समझकर इस भार को अपने ऊपर उठा लिया है। जिस काम के वे सब प्रकार से नाकाबिल थे, उसे अपने ऊपर लेकर उन्होंने अपना जीवन तथा समाज का जीवन बहुत ही कष्टमय बना दिया है। उनका सारा जीवन चिन्ता में और रोते-झींकते बीतता है। यह भी देखा जाता है कि जो लोग गरीब हैं, उनके यहाँ संतान अधिक होती है। गरीब के यहाँ अधिक संतान का होना दुःख-पर-दुःख का आना है। गरीबों के यहाँ बच्चों की दुर्दशा देखकर जी भर आता है। कीड़े-मकोड़ों की भाँति वे घर में इधर-उधर घूमते या पड़े रहते हैं। उनके तन पर न ठीक वस्त्र दिखायी पड़ता है और ने उनके शरीर में भोजन ही पहुँचता है, जिससे उनके शरीर की उचित उन्नति होकर उनके मन और बुद्धि विकसित हों।
प्राचीन काल में विवाह का उद्देश्य परम पावन था, शुद्ध जीवन व्यतीत करने का वह एक उचित माध्यम था। किन्तु इस समय के ठीक विपरीत विवाह करने का अभिप्राय लोगों की दृष्टि में काम लिप्सा को तृप्त करने का एक साधन मात्र है। इस बात पर विचार करने के लिए तो एक बिल्कुल ही स्वतंत्र लेख की आवश्यकता है। इस लेख में तो सिर्फ ब्रह्मचर्य व्रत के कुछ पहलुओं पर ही विचार किया गया है।
विवाहित स्त्री-पुरुषों के लिये या जो लोग इस बन्धन में अपने को फंसाने जा रहे हैं, उन्हें अपने कष्टों पर ध्यान देते हुए सजग होकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। जिन्होंने बिना समझे अपने सिर पर इस जिम्मेदारी को ले लिया है उन्हें अपना ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहिए कि वे कम से कम संतान पैदा करें जिसकी वे उचित देखभाल कर सकें। ऐसा करने से उनके कष्ट में कमी हो सकती है नहीं तो जीवन कहीं का न रह जायगा, और कष्ट दिनों दिन बढ़ता ही जायगा। वैवाहिक जीवन विषय भोग का जीवन नहीं है। प्राचीन काल में संतान उत्पन्न करने के एक निश्चित अभिप्राय से ही वीर्य का क्षण किया जाता था, अन्यथा नहीं। उस समय के दम्पति में भोग-वासना की लिप्सा नहीं के बराबर होती थी। संतानोत्पत्ति के अवसर के अतिरिक्त स्त्री-पुरुषों का आचरण शुद्ध होता था। एक-दूसरे को कामाभाव की दृष्टि से नहीं देखते थे, बल्कि एक मित्र या आत्मीय की दृष्टि से। इन सब उच्च आदर्शों के प्रति कहाँ तक किसको सफलता मिल सकती है, बिलकुल ही व्यक्तिगत प्रश्न है, इस सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन जो लोग संसार के दुःख अथवा अपने को देखकर सजग हो जायेंगे उन्हें लाभ ही होगा। दुःख में बिना सजग हुए उससे छुटकारा नहीं मिलता। जो लोग दुःख से सजग नहीं होते, उनका कहीं ठिकाना नहीं लगता।
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
भारत के सार्वजनिक जीवन में प्राणायाम का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। मध्यान्ह और सायंकाल किसी भी ब्रह्मचारी और गृहस्थ को नित्य पूजन के समय संध्योपरान्त प्राणायाम करना पड़ता है। अतः यह कहा जा सकता है कि हिन्दुओं के सभी कार्यों का आरम्भ प्राणायाम के उपरान्त ही किया जाता है। आपने देखा होगा कि खाते पीते अथवा कुछ और कार्य करते समय भारतीय लोग तीन बार आचमन कर, पुनः संकल्प करते हुए, प्राणायाम का अभ्यास करते हैं। प्राणायाम को सब कार्यों से पहले करने से यह तात्पर्य है कि प्राणायाम करने से मन एकाग्र और विचारशील होकर कार्य परायण होगा, जिसके फलस्वरूप निर्धारित कार्य में सफलता मिलेगी।
प्राणायाम करने से सफलता क्यों मिलती है? किसी भी कार्य में एकाग्रता, तन्मयता, विचार परायणता निर्णय बुद्धि उस कार्य के साफल्य की जननी है और प्राणायाम इस सफलता के कारणों को प्रौढ़ तथा विकसित करने का साधन है। मन की एकाग्रता का सम्बंध केवल मस्तिष्क से ही नहीं होता, किंतु पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के संस्पर्श से भी एकाग्रता का परिचय मिलता है। एकाग्रता स्पर्श ज्ञान पर, अनुभूत ज्ञान पर, दृक्श्रुत तथा रसात्मक- ज्ञान पर, अपने ज्ञानतन्तुओं की विभिन्न रुपात्मकता का परिचय पाती है, जो सचमुच एक ही केन्द्र से परिवृत हैं। परन्तु ज्ञानेन्द्रियों के रूप गुणों के भेद-विपर्यय से तत्कथित अनुभवों के रूप गुणों में विकल्पाभास लाते दीखते हैं। वास्तव में, जो कुछ आप देखते हो वह उसी शक्ति का कार्य है, जो शक्ति आपके ही द्वारा सुनती या स्पर्श करती या रस का अनुभव करती है चूँकि इस एक ही शक्ति के बाहरी द्वार कई ओर से खुले हैं, अर्थात् बहिर्मुख हुए हैं। हमें ऐसा परिचय होता है कि हम देख रहे हैं या सुन रहे हैं अथवा स्पर्श कर रहे हैं और सोच रहे हैं।
परन्तु जैसा इनका बाहरी रूप है, वैसा ही अपूर्व इनका आन्तरिक स्वरूप भी है। ये ज्ञानेन्द्रियाँ जब अन्तर्मुख होती हैं तो इनमें बाहरी शक्ति परायणता का केन्द्रियकरण होता है। जिस प्रकार चार भाई अलग-अलग 1-1 लाख की सम्पत्ति का संचय कर केवल मात्र 1-1 लाख के ही अधिपति माने जाते हैं, उसी प्रकार हमारी इन्द्रियों और उनके कार्य भी अपने-अपने रूप गुणों के अनुकूल ही परिचित हुआ करते हैं। और जिस प्रकार वे चार भाई 1-1 लाख की सम्पत्ति को विदेश से लौटकर अपने सम्मिलित परिवार के अर्पण करते हैं, तो उनकी शक्ति 1-1 लाख में नहीं, अपितु 4 लाख में मानी जाती है और लोग कहते हैं कि उनके पास 4 लाख रुपया है, उस परिवार में 4 लाख रुपये हैं..., ठीक इसी प्रकार जब इन्द्रियों का अन्तर्मुख करण होता है, जब उनकी वृत्तियाँ बाहर की ओर जाने के स्थान पर अन्दर की ओर पलटी जाती हैं, तो उन इन्द्रियों के अधिष्ठानभूत मन की शक्ति प्रबल और सर्वगुण अनुभवात्मक हो जाती है। वह बिना कान के भी सुनता और बिना आँख के देखने की क्षमता रखता है, क्योंकि उसके तत्तद्गुणात्मक-उपकरण ने अपनी शक्ति उसी से केन्द्रित कर दी है। यही कारण है कि अन्धों की दृष्टि-शक्ति का केंद्रियकरण मन से होने के साथ, बौद्धिकता में विकास लाता है और वह अन्धा आँखों के न होने पर भी उसका ज्ञान अपनी मानसिक-परिचय शक्ति द्वारा उसी रूप में कर लेता है, और उसे वस्तु ज्ञान के लिए कभी-कभी स्पर्श की आवश्यकता भी नहीं रहती।
स्थूल जगत में जो जीवनी-शक्ति प्रत्येक वस्तु का परिचालन करती दीखती है और जो मानसिक जगत में विचरण करती है, उसी का नाम प्राण है। प्राणायाम के अर्थ होते हैं कि जो जीवनी शक्ति को नियमित, संचालित, यमित रखे। जो जीवनी-शक्ति निरंतरतः मनुष्य की स्नायुओं से निकला करती है, बहुमुखी होती है, केन्द्र से विकेन्द्रित होती है उसको अधिकार में लाने की जो क्रिया है, उसी का नाम प्राणायाम है। यही प्राणशक्ति भौतिक शरीर का भी परिचालन करती है और दृश्य रूप का अनुभव भी करती है। जिस अनुभव के बल पर प्रत्येक शरीर उन अनुभवों को स्वयं करता है और इसी पर आभ्यन्तरिक विचार भी अधिष्ठित हैं। यह शक्ति इस तरह की है कि हम इसे पाशविक शरीर का शक्ति सार कह सकते हैं। प्राणायाम द्वारा इसी शक्ति पर अधिकार करना योगियों का लक्ष्य होता है, जिसकी प्राप्ति किसी निश्चित अनुपात तक प्रत्येक व्यक्ति के लिए हितकर होती है। जो इन शक्तियों को अपने अधिकार में कर लेता है, वह स्थूल और सूक्ष्म जगत् में अपनी स्थिति पर ही नहीं बल्कि अधिवैश्रुतिक स्थिति पर आधारित हुए जीवात्मक तत्व का अधिकार भी प्राप्त कर लेता है।
इस शक्ति द्वारा विश्व परिचालित होता है और किसी अवस्था में विश्व की नसों में प्रवाहित होने वाली नसों की परिचालिका शक्ति कोई और भिन्न नहीं है। इसलिए इसके द्वारा शरीर-विजय पाने का अर्थ होता है कि प्रकृति की शक्ति के ऊपर अधिकार करना अथवा भौतिक स्तर से ऊपर उठना।
हिन्दू दर्शनशास्त्र के विशेष अंगानुसार सारी प्रकृति दो मुख्य पदार्थों से बनी है, एक है आकाश और दूसरा है प्राण -अर्थात् परिचालक स्फुरण। यही आजकल के वैज्ञानिकों के मैटर और फोर्स होने चाहिए, क्योंकि इस विश्व में जिस किसी का आकार है, भौतिक-स्थिति है, वह सर्वव्यापक और अनन्त आकाश से ही उत्पन्न हुआ है। गैस, तरल तथा ठोस रूप में सारा विश्व, जिसमें सारा सौर जगत् तथा अन्य ऐसे ही असंख्य सौर जगत ही नहीं, अपितु सृष्टि-शब्द के अंतर्गत सब कुछ इसी सूक्ष्म और अव्यक्त आकाश से उत्पन्न हैं और अन्त में इसी आकाश में लीन हो जायगा।
इसी प्रकार प्रकृति की शक्ति जितने नामों से मनुष्य को ज्ञात है, जैसे गुरुत्वाकर्षण, प्रकाश, तेज विद्युत, आकर्षण आदि जो कुछ भी उत्पादक शक्ति स्थूल सृष्टि, स्नायु-तरंगें, पाशविक बल, विचार तथा अन्य मानसिक शक्तियाँ, जो अधिक से अधिक मनुष्य द्वारा जानी गयी हैं, इसी विश्वप्राण के भिन्न भिन्न रूप हैं। किसी भी पदार्थ का पूर्ण ज्ञान होने से आपको विश्वस्तः यही पता चलेगा कि उस पदार्थ की सत्ता में से इस प्राण को घटा दिया जाय तो जो कुछ शेष रहेगा, वह उस पदार्थ का जीव हीन रूप ही रहेगा, जिसमें न रूप होगा, न गुण और न अन्य कुछ। अतः पदार्थ और उक्ति का संचय प्रकृति के दो मूल नियम हैं।
सृष्टि के अन्त में शक्ति के भिन्न-भिन्न रूप अव्यक्त हो जाते हैं। किन्तु नवीन सृष्टि उत्पन्न होते ही शक्ति का पुनः प्रस्फुरण होता है और आकाश में चालित होते ही पिघलाकर आकृतियों की सृष्टि होने लगती है जिस तरह आकाश के परिवर्तन होते ही, प्राण भी घटता और बढ़ता है। योगशास्त्र के अनुसार यह शरीर सूक्ष्म-जगत् है, जिसमें ज्ञानेन्द्रियाँ ही सूक्ष्म-आकाश और स्नायुमण्डल ही विचार-तरंग और स्फुरण ही प्राण है। अतः उनके परिचालन के रहस्य का ज्ञान और उनका नियन्त्रण ही विश्वविजय की प्राप्ति करना है।
ज्योतिषशास्त्र कहता है, प्रत्येक विशालतम ग्रह का मनुष्य के इस शरीर में तदात्मक स्थान है सूर्य, चन्द्रादि ग्रहों का प्रभावोत्पादक-दर्पण भी अपने सूक्ष्म अथवा शरीरात्मक रूप में विद्यमान रहता है और क्रमशः अथवा विधितया उन विशाल ग्रहों की क्रिया अथवा उनके पद-चिह्न भी मनुष्य के इस शरीर में प्रतिक्रियात्मक होते रहते हैं और उनकी प्रत्येक प्रगति हमारे जीवन के सुख और दुःख का निर्णय करती है। जिस प्रकार आधुनिक टेलीविजन यन्त्र द्वारा निश्चित अथवा निर्धारित अथवा इच्छित सम्भव दृश्य का आप दर्शन कर लेते हैं, अर्थात् जिस प्रकार टेलीविजन यन्त्र पर किसी दूर में होने वाले रूप की प्रतिक्रिया होती है, क्योंकि उस टेलीविजन यन्त्र में तत्तद्रुप रूपात्मक प्रभाव ग्राही तन्तुओं का समावेश किया है...ठीक उसी प्रकार आपके इस यन्त्र में भी दूर होने वाले कार्य की प्रगति का स्फुरण भी होता रहता है।
इससे यही अर्थ स्पष्ट हुआ कि हमारे शरीर में विश्व के विशाल कलेवर का व्यष्टि रूप है। यह अखिल-विश्व का एक नमूना है, जिसमें प्रत्येक कार्य विश्व विधान के अनुकूल ही होते आ रहे हैं और जिनका विशालतम रूप सृष्टि-क्रम है। जिस प्रकार मनुष्य जीवित होता, विकास को प्राप्त करता और पुनः अदृश्य हो जाता है उसी प्रकार उसके विशाल रूप अखिल-विश्व को जानो। जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में यह सिद्ध है कि शक्ति ही सर्वव्यापक और नियन्ता है, उसी प्रकार हमारे शरीर में भी उसी शक्ति का तादात्म्यक रूप अथवा गुण अथवा प्रगति है। अतः तदनुसार ही उस शक्ति का नियंत्रण अथवा संचालन किया जाय, जो हमारे दैनिक जीवन को स्थिर रख सके, जो हमारे वैज्ञानिक जीवन, मनोवैज्ञानिक जीवन, आध्यात्मिक जीवन अतिचेतनात्मक जीवन तथा जीवन सम्बन्धी और सभी प्रगतियों में विषमता का परिहार कर, संतुलन का अवतरण करे।
इस तरह प्राणायाम, जिसके अर्थ हैं प्राण पर अधिकार करना (अतः उसका संचालन करना भी) वह साधन है (1) जिसके द्वारा साधारण मनुष्य इसी छोटे से शरीर में विश्व जीवन का अनुभव करता है और विश्व की सभी शक्तियों का परिचय पाता हुआ उन पर पूर्ण विजय का प्रयत्न करता है तथा, (2) योगी इस छोटे से मन में ही विश्वचेतना का अनुभव करता हुआ, विश्व की सभी चेतन शक्तियों को अधिकृत करता हुआ उन पर पूर्ण विजय का प्रयत्न करता है, (3) आज का वैज्ञानिक इसी छोटे से भौतिक-वर्ग में ही सभी शक्तियों को केन्द्रीभूत देख उन पर पूर्ण विजय कर, उनका उपयोग करता है तथा, (4) एक आध्यात्मिक साधक, इसी सत्संकल्पात्मक आत्म जगत में, विश्वजीवन की अनन्तसूत्रत्मिक-शृंखला के दर्शन करता हुआ, उनको अधिकृत कर, उनका सत्याधिकार धारण कर लेता है। इसी छोटे से शरीरात्मक स्थान पर ही यह विशाल प्रयत्न हो रहा है- (अ) भौतिक, (ब) मानसिक, (स) मनोवैज्ञानिक और (द) आध्यात्मिक
अतः विलम्ब की आवश्यकता नहीं विश्वास के लिए तर्क और विवाद उचित नहीं। प्रकृति के विशाल युगों का समय हमें अपने जीवन में संप्रवर्तित करना है तथा विचारशक्ति और क्रिया के बल शारीरिक साधना द्वारा शीघ्र ही अपने लक्ष्य की प्राप्ति करनी चाहिए। इस लक्ष्य की प्राप्ति मनुष्य के जीवन में सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि मनुष्य प्राणायाम के द्वारा ही तो जीवित रहता हैं और इसी प्राणायाम के साधारण स्तर को विकास की और ले जाने से हम अवश्यमेव मनुष्य जीवन की अवधि को भी विकास के पद चिह्नों को अनुगामी बना सकते हैं। जिस प्रकार साधारण प्राणायाम करने से आप जीवन धारण करते हैं उसी प्रकार तदधिक प्राणायाम करने से आप चिरायु भी रह सकेंगे।
(प्रो. रामचरणमहेन्द्र एम. ए.)
स्मृति और आशा दोनों मानव जीवन के लिए बड़े प्रेरक शब्द हैं। वर्तमान जीवन से असंतुष्ट होकर, जीवन के संघर्ष से ऊबकर हम कभी विगत मधुर स्मृतियों में डूबने उतरने लगते हैं, तो कभी भविष्य को आशा का चश्मा लगाकर देखते हैं। इन दोनों के वश में होने का तात्पर्य यह है कि हम अपने वर्तमान से असंतुष्ट हैं। वर्तमान जीवन के सुख, संतोष, प्रगति से हमें-विशेष लाभ नहीं हो रहा है। हम वर्तमान से भागकर या तो अपने अतीत में छिपना चाहते हैं, अथवा भविष्य में कूद कर सुख-स्वप्नों में लीन हो जाना चाहते हैं।
मनुष्य के मानसिक पलायन के यही दो छोर हैं। जिस प्रकार जुलाहे की तागे की रील दिन भर इधर से उधर चक्कर काटती रहती है, क्षण भर शान्त नहीं होती, उसी प्रकार हमारा मन-मयूर निरन्तर अतीत की स्मृतियों तथा भविष्य की समुज्ज्वल आशाओं के मध्य में उछल-कूद किया करता है। मन चंचल है, एक क्षण स्थायी नहीं रहता उसे कुछ सोचने-विचारने, मनन, चिन्तन के लिए चाहिए। चिन्तन करना उसकी मूल प्रकृति है। यदि आप न भी चाहेंगे, तब भी वह अपने चिन्तन के निमित्त कोई न कोई विषय स्वयं ढूँढ़ लेगा। जब बिना चिन्तन किये छुटकारा नहीं है, तो क्यों न मन को चिन्तन करने के हेतु कुछ शुभ भाव, उत्कृष्ट कल्पनाएँ सात्विक प्रेरक विचारधारा प्रदान की जाय।
हमारी स्मृतियों के अटल भण्डार में नानाप्रकार की सुख दुःख भरी अनुभूतियाँ संग्रहीत रहती हैं। बहुत सी मानसिक, अनैतिक भावनाओं सम्बन्धी प्रारम्भिक जीवन की मूर्खताएँ, अनजान में किए हुए पाप दोष, दुर्व्यवहार, दूसरों का अहित, मनमुटाव, अव्यक्त मन में स्मृतियों के रूप में दबी पड़ी रहती हैं। अनेक वासनाओं को हमें दबाना पड़ता है। मन को मारकर समाज के बन्धनों का ध्यान रखना पड़ता है। ये दबे हुए कष्ट, दुःखद प्रसंग अभद्र व्यवहार, दुष्टता के कार्य यदि भुलाये जाएं तभी श्रेष्ठ हैं। उनकी ओर ध्यान न देना, कभी न सोचना ही उत्तम है। यदि हम स्मृतियों के रूप में उन्हीं में उलझे रहेंगे, तो ये वासनाएँ परिवर्तित, संक्षिप्तता और प्रतिभासित, रूपांतरित होकर हमारे मौजूदा जीवन को कड़ुवा बना देंगी। हमारा मौजूदा जीवन भी मिट्टी में मिल कर धूल हो जायगा। ऐसे व्यक्ति के काम, क्रोध, ईर्ष्या, लोभ सम्बन्धी अटल मानसिक भावना-ग्रन्थियाँ अन्यक्त मन में निवास करती है। अनेक व्यक्तियों के दुःखी होने का प्रधान कारण यही है कि वे स्मृति की निकृष्ट भूमिका में निवास करते हैं। वे उन्हीं स्मृतियों को खोदते हैं, जहाँ अन्धकार है, दुःख है, वेदना है, जहाँ परिताप का प्रज्वलन हो रहा है, यह भारी अज्ञान है।
इसकी उपेक्षा भविष्य की आशाओं पर मन को केन्द्रित करने से मनुष्य में नव-प्रकाश, नवस्फूर्ति, नई नई कल्पनाएँ जागृत होती हैं। उसकी कार्य शक्ति में अद्भुत प्रभाव पड़ता है। उसकी कार्य सम्पादिका शक्तियाँ आशा द्वारा संकलित होकर मनुष्य को आगे बढ़ाते हैं।
आगे हमारे लिए सुख और स्मृति का समय आ रहा है। हमारे आनन्द के दिन अब आ गये हैं। हमारे दुख क्लेश परस्पर विरोधी इच्छाएँ, अहितकर कृतियाँ समाप्त हो चुकी हैं। अब तो चहुँ ओर आनन्द ही आनन्द है, प्रसन्नता ही प्रसन्नता का अखण्ड प्रवाह बह रहा है। हमारे आगे आनन्द का स्त्रोत खुल गया है। सम्पूर्ण आनन्द का स्त्रोत हमारे भीतर है। आनन्द ही भरा सच्चा स्वरूप है। मैं परब्रह्म के आनन्द में मग्न हो गया हूँ। मेरा भविष्य मेरी चतुर्दिक् उन्नति के लिए शान से चला आ रहा हैं- इस प्रकार की भावी आशाएँ रखकर चलने वाला व्यक्ति अपने अन्दर एक प्रकार की शक्ति का अनुभव करता है। वह जितना अपनी शक्तियों से माँगता है, उससे बहुत अधिक मिलता है। आशा जितनी ऊँची होती है, उसी के अनुसार धीरे-2 मनुष्य की शक्तियाँ भी बन जाती हैं।
भविष्य की आशा एक ऐसा जादू भरा संदेश हमें सुनाती है, जो हमारे मन में, शरीर के अंगों में, अणु में, रक्त में स्फूर्ति और नवशक्ति भर देती है। हमारा चेहरा मानवीय विद्युत के प्रकाश से चकाचौंध कर उठता है, ईश्वरीय क्षेत्र चमक उठता है।
आशा से प्रदीप्त व्यक्ति जहाँ जाता है आनन्द शक्ति, प्रोत्साहन, प्रेरणा का ही प्रवाह बहाता है, उसके दर्शन कर हम में उत्साह का, और नवजीवन का संचार हो उठता है। आनन्द, शान्ति, प्रसन्नता और स्वास्थ्य की किरणों को वह अपने चहुँ ओर बरसाता है। उसका व्यक्तित्व जादू जैसा प्रभाव करता है।
उस व्यक्ति को धन्य है, जो पुराने अनुभवों के बल पर विवेक बुद्धि निज शक्ति को देखकर आशाओं का निर्माण करता है, भविष्य की आशा जरूर कीजिए किन्तु ऐसी ऊँची-ऊँची कल्पनाओं में मत डूबें जाइए जो कभी पूर्ण न हों। जिस तक आपकी शक्तियाँ न उठ सकें। यदि कोई फकीर राजा होने की आशा बाँधे तो कहाँ तक उचित होगा? अपने वर्ग, स्तर, योग्यता प्रयत्नों के अनुसार आप भविष्य की उज्ज्वल तर बनाने के स्वप्न जरूर देखें। अपनी शक्ति के अनुसार ही आशा का महल निर्मित करें।
हमारी आशा की, सुख की, आनन्द की भावना को कोई नहीं छीन सकता। असली बात भावना की है। भविष्य में उन्नति करने की भावनाएं जीती जागती शक्तियाँ हैं जो विकारमय अतीत को शान्त कर भविष्य के अलौकिक विलक्षण आनन्द को प्रदान करती है-
प्रसादे सर्वदुःखानाँ हानि रस्योपजायते। प्रसन्न चेतसाँ ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥ गीता॥
चित्त के परम प्रसन्न होने पर सब दुःखों का नाश हो जाता है और अखण्ड प्रसन्नता युक्त चित्त की स्थिति बनी रहने से बुद्धि सुस्थिर हो जाती है।
(श्री हरिनारायण मलतारें बी. ए., साहित्य-रत्न)
भ्रमवश हम रुपये पैसे को धन समझ बैठे, स्थावर सम्पत्ति का नाम करण, हमने धन के रूप में कर डाला, और हमारे जीवन का केन्द्र, बिन्दु आनन्द का स्त्रोत इस जड़ स्थावर जंगम के रूप में सामने आया। हमारा प्रवाह गलत मार्ग पर चल पड़ा।
क्या हमारे अमूल्य श्वांस प्रवास की कुछ क्रियाओं की तुलना या मूल्याँकन क्या त्रैलोक्य की सम्पूर्ण सम्पत्ति से की जा सकती है? करूं का सारा खजाना जीवन रूपी धन की चरण रज से भी अल्प क्यों न माना जाय? सच्चा धन हमारा स्वास्थ्य है विश्व की सम्पूर्ण उपलब्ध सामग्री का अस्तित्व जीवन धन की योग्य शक्ति पर अवलम्बित है। मानव अप्राप्त के लिए चिंतित तथा प्राप्त के प्रति उदासीन है, हमारे पास क्या है? इसके लिए वह सुख का श्वांस नहीं लेता, संतोष नहीं करता, वरन् क्या नहीं हैं इसके लिए वह चिंतित दुःखी व परेशान है। मानव स्वभाव की अनेक दुर्बलताओं में प्राप्त के प्रति असंतोषी रहना सहज ही स्वभाव जन्य पद्धति मानी गई -स्वयं का मूल्याँकन करने में।
मानव आदि काल से ही मस्तिष्क का दिवा लिया रहा। देखिये न, एक दिन हृष्ट-पुष्ट भिक्षुक, जिसका स्वस्थ शरीर सबल अभिव्यक्ति का प्रतीक था, एक गृहस्थ ज्ञानी के द्वार पर आकर अपनी दरिद्रता का, अपनी अपूर्णता का बड़े जोरदार शब्दों में वर्णन सुना रहा था, जिससे पता चलता था कि वह व्यक्ति महान निर्धन है, और इसके लिए वह विश्व निर्माता ईश्वर को अपराधी करार दे रहा था, अचानक ज्ञानी गृहस्थी ने कहा भाई हमें अपने छोटे भाई के हेतु आँख की पुतली की दरकार हैं। 100 रु. लेकर आप हमें देवें। भिक्षुक ने लपक से नकारात्मक उत्तर दिया कि वह दस हजार रुपये तक भी अपने इस बहुमूल्य शरीर के अवयवों को देने को तैयार नहीं। कुछ क्षण बाद पुनः ज्ञानी गृहस्थ ने कहा-मेरे पुत्र का मोटर दुर्घटना में बाँया पाँव टूट चुका है, अतः 21 हजार रु. आप नकद लेकर आज ही अस्पताल चलकर अपना पैर देवेंगे तो बड़ी कृपा होगी। इस प्रश्न पर वह भिक्षुक अत्यन्त ही क्रोधित मुद्रा में होकर बोला 20 हजार तो दर किनारे रहे, एक लाख क्या दस लाख तक मैं अपने बहुमूल्य अवयवों को नहीं देऊंगा और रुष्ट होकर जाने लगा। गम्भीरता के साथ ज्ञानी ने रोककर कहा-भाई तुम तो बड़े ही धनी हो जब तुम्हारे दो अवयवों का मूल्य लगभग 50 हजार रुपये का होता है, भला सम्पूर्ण देह का मूल्य तो अरबों रुपये तक होगा। तुम तो अपनी दरिद्रता का ढिंढोरा पीटते हो, अरे लाखों को ठोकर मार रहे हो, अतः जीवन धन अमूल्य है।
हम अपना दृष्टिकोण ठीक बनावें। मिट्टी के ढेलों को जड़ वस्तु को धन की उपमा देकर उसकी रक्षा के लिए संतरी तैनात किए, विशाल तिजोरियों के अन्दर सुरक्षित किया। चोरों से, डाकुओं से किसी भी मूल्य पर हमने उसे बचाया, परन्तु प्रतिदिन नष्ट होने वाले प्रत्येक हमारी दैनिक, अशोच्य क्रियाओं द्वारा घुल घुलकर मिटने वाला यह जीवन दीप, बिना तेल के बुझ जायेगा। ‘निर्वाण दीपे किम् तैल्य दानम्’ फिर क्या होने वाला है। जबकि दीपक बुझ जाय, हमें आलस्य, अकर्मण्यता आदि स्वास्थ्य को हानि पहुँचाने वाली दैनिक क्रियाओं द्वारा इस जीवन धन की रक्षा करनी होगी। व्यसन, व्यभिचार, संयम हीनता, के डाकू कहीं लूट न लें। सतर्कता के साथ जागरुक रहना होगा। रुग्ण शैया पर पड़े रोम के अन्तिम सम्राट को राजवैद्य द्वारा अन्तिम निराशाजनक सूचना पाने पर कि वह केवल कुछ क्षणों के ही मेहमान हैं आस पास के मंत्रियों से साम्राज्ञी ने कई मिन्नतें कीं कि वे साम्राज्य के कोष का आधा भाग वैद्य के चरणों में भेंट करने को तैयार है अगर उन्हें वे दो घण्टे जीवित और रखें। उत्तर था- “त्रैलोक्य की सम्पूर्ण राज्य लक्ष्मी भी सम्राट को निश्चित क्षण से एक श्वांस प्रवास भी देने में असमर्थ है।” क्या हमारी आँखों के पर्दे ज्ञान की ज्योति जो बुझ चुकी है क्या उपरोक्त कथन से स्पष्ट नहीं होता है कि जीवन धन अमूल्य है बहुमूल्य है, तथा अखिल ब्रह्माण्ड की किसी भी वस्तु की तुलना में वह महान है?
अरे मानव! तू क्यों अपने को नहीं पहचान पाया। आदि काल से ‘जीवन धन’ तेरे को सरलता से मिला, भला बिया प्रयत्न किये, कठिनाई बिना मिलने वाली वस्तु का तू मूल्य आँक भी कैसे सकता है, और इसी कारण तू इसकी उपेक्षा करता रहा, लेकिन याद रख जब इस देह को आत्मा छोड़ेगी, तू अजीब प्राणी प्रेत नाम को ही सार्थक कर सकेगा। प्रेत के बनने के पूर्व इस देह से इस जीवन धन के मुकाबले में तू अमूल्य निधि क्यों नहीं प्राप्त करता? साधारण नमक तेल बेचने वाले व्यापारी भी अपनी वस्तु के क्रय-विक्रय के समय मूल्याँकन में, आदान-प्रदान में हानि नहीं उठाते। मूढ़ तू इससे भी गया बीता है। जीवन धन को देकर भी तू इसके बदले में दुनिया को प्रेत दे गया, सदेह स्वर्ग जाने के सिद्धाँत को तूने गलत सिद्ध कर दिया। पूर्वजों की अर्जित कीर्ति को तूने अपने कारनामों से कलंकित कर डाला।
गई सो गई इस क्षण से जीवन धन की रक्षा में तत्पर हो जा। तत्परता के लगने पर तू अपना जीवन सफल अवश्य बना सकेगा और सच्चे धन को प्राप्त कर सच्चे अर्थों में धनवान बन सकेगा।
(श्री रामस्वरुप वर्मा, बी. ए. टेढ़ा)
दुर्बलता महान पातक है। कहावत है कि ‘दैवोऽपि दुर्बल घातकः’ अर्थात् दैव भी दुर्बल का काल होता है) भौतिक शास्त्र के अनुसार इस विश्व में निर्बल का जीवित रहना ही संभव नहीं है, विश्व का प्रत्येक प्राणी, अणु-परमाणु तक एक पारस्परिक विकास-साध्य संघर्ष में लीन दिखाई पड़ता है। जीवन की पुकार अनन्त भूमि तक गूँज रही है, जहाँ प्रतिद्वन्द्विता का अखाड़ा लगा हुआ है, जहाँ प्रत्येक प्राणी अपने विकास मार्ग को प्रशस्त करने के लिए, दूसरों के विनाश की किंचित मात्र भी चिन्ता न करता हुआ अपने साधन में तत्पर है, वहाँ यदि उपरोक्त सिद्धान्त (दैवोऽपि दुर्बल घातकः) चरितार्थ न हो तो और कहाँ होगा।
स्वास्थ्य सुखों का मूल है, अतएव सर्वोपरि है। जो व्यक्ति प्रकृति के क्रीड़ा से स्वस्थता का अभय वरदान लेकर उत्पन्न हुआ है वही वास्तव में सुखी है वही सर्व-श्री का अधिकारी है। रोगी जीवन मृत्यु से भी अधिक कष्टदायी है। वस्तुतः रुग्ण शरीर लेकर जीवित रहना नर्क की यातनाओं से भी अधिक है। वे व्यक्ति सचमुच भाग्यशाली हैं, जो स्वास्थ्य धन के स्वामी हैं। वही सचमुच जीवन का आनन्द उठा पाते हैं। एक अनुभूत कहावत है कि ‘स्वस्थ शरीर ही में स्वस्थ मन होता है।’ फिर भला अस्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन कैसे रह सकता है जब मन भी अस्वस्थ हो गया तो हम अपनी मानसिक एवं आध्यात्मिक उन्नति करते हुए जीवन सफल की कल्पना कैसे कर सकते हैं? अतएव हमें संसारी व्यक्ति होने के नाते सर्व-प्रथम स्वास्थ्य सम्पन्न बनना परमावश्यक है। शास्त्रों में भी शारीरिक -स्वास्थ्य द्वारा ही धर्मार्थ कार्य एवं मोक्ष का सिद्ध होना माना गया है।
“धर्मार्थ काम मोक्षाणाम् शरीरमेव साधनं”
अच्छे स्वास्थ्य का साधारण चिह्न यह है कि व्यक्ति अधिक आयु पा जाने पर भी कम आयु का प्रतीत हो। मुख पर बालकों का जैसा सलोनापन भोलापन एवं आकर्षण हो। आंखें स्वच्छ एवं आकर्षक हों तथा शारीरिक कान्ति एवं स्फूर्ति सर्वत्र व्याप्त हो।
अब हम विषय विस्तार को उचित न समझकर स्वस्थ रहने एवं स्वास्थ्य-प्राप्ति के साधारण अत्यन्त ही उपयोगी नियमों पर साधारण प्रकाश डालेंगे।
प्रकृति के अनुसार जीवन व्यतीत करना।
सूर्योदय के चार घड़ी पूर्व उठकर बैठ जाना और आधे घण्टे तक ईश्वर स्मरण करना।
ऊषा-पान।
नित्य कर्म से निवृत्त होना।
भ्रमण अथवा साधारण व्यायाम।
प्रभात रश्मि-स्नान।
अपने वैयक्तिक कार्य विवरण का निवारण करना तथा तद्नुसार कार्य-व्यस्त होना।
घर्षण-स्नान।
संतुलित भोजन।
सदाचार।
वीर्य-धारण।
मनुष्य अपने जीवन को जितना ही कृत्रिमता से दूर एवं प्रकृत्यानुकूल रखेगा उतना ही अधिक स्वस्थ रहेगा। प्राकृतिक आहार विहार ही दीर्घ जीवन की कुँजी है। स्वाद और सजावट में फंसकर मनुष्य ज्यों-ज्यों प्रकृति से दूर होता जाता है, त्यों-त्यों वह प्रकृति के सामुख्य में अपने शरीर को अशक्त बनाता जाता है। वर्तमान युग मनुष्य को जीवन की प्रतिकूल दिशा की ओर मोड़ रहा है। अतः स्वास्थ्य प्रेमियों को प्रकृति के अनुकूल ही अपने जीवन को बनाना चाहिए। इसके लिए आहार विहार तथा रहन-सहन पर विशेष ध्यान देना चाहिए।
स्मरण रखिए प्रकृति की दया पर हमारा जीवन निर्भर है। उससे शत्रुता करके हमारा कल्याण भय से रिक्त नहीं है। प्रकृति अपने नियम की कठोर शासिका है। यह दूसरों से भी ऐसी ही आशा रखती है। अनियमित जीवन-यापन के परिणाम स्वरूप ही हम प्रायः रुग्ण हो जाते हैं। यदि हम अपना आहार-विहार ठीक रखें, प्रकृति के नियमों के अनुसार आचरण करें तो निस्संदेह निरोग दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकते हैं।
(डा. वरनर मेककटन)
व्यायाम में मेरी अधिक रुचि देखकर एक 70 बरस के वृद्ध महोदय ने मुझे फ्रिक्शन बाथ के संबंध में अपने अनुभव बतलाये। वृद्ध महाशय कहने लगे-
जब मैं बीस बरस का था तब क्षय रोग से पीड़ित था, और इससे मैं मर जाऊँगा, मुझे ऐसा ज्ञात होने लगा। प्रायः सभी कुटुम्बियों ने और मित्रों ने मेरे जीवन की आशा छोड़ दी। किन्तु मेरे जीवन की इच्छा बड़ी प्रबल थी। जब सब मुझे मरने की बात कहते थे तो मैं उनसे कहता था, नहीं मैं मर ही नहीं सकता। मैं इस रोग से मुक्त होने के उपाय ढूँढ़ने लगा। सोचते-सोचते यह विचार आया कि त्वचा शारीरिक विष निकालने का मुख्य अवयव है। ज्यों-ज्यों इसकी गहनता पर विचार करता गया, त्यों-त्यों मेरा विश्वास इस पर बढ़ता ही गया।
अतएव मैं यह निश्चय न कर सका कि इस सम्बन्ध में मैं क्या करूं। फिर भी मैं बाजार गया और घोड़े के बालों का ब्रुश खरीद लाया। घर जाने पर मैं अपना त्वचा को साफ करने लगा। इस तरह उक्त ब्रुश से प्रतिदिन कई मिनट तक अपने शरीर को घिसता। इसका अभ्यास हो जाने पर मैं रोज अपने शरीर को घिसने लगा। पहले तो कुछ कष्ट अवश्य हुआ लेकिन पीछे सुखद प्रतीत होने लगा।
उस वृद्ध ने अपने सारे शरीर की चमड़ी मुझे दिखाई। मैं देखकर आश्चर्यान्वित हो गया कि वह मखमल के समान सम्पूर्ण स्वच्छ थी और वृद्ध भी बिलकुल हृष्ट-पुष्ट और स्वस्थ था जिसे डॉक्टर लोग जवाब दे चुके थे। उसने केवल इसी उपाय द्वारा रोग से मुक्ति पाई।
उक्त महोदय का मत है कि यदि आप “शक्ति-सम्पन्न होना चाहते हैं तो त्वचा और शरीर को निर्मल बनाइये।”
जिस तरह फेफड़ों से शरीर का विष बाहर निकलता हैं उसी प्रकार त्वचा से भी साँस लिया जाता है। यह ऑक्सीजन को खींचकर अन्दर की गर्मी को बाहर निकालती है। अतएव चर्म-छिद्रों को हमेशा स्वच्छ रखने पर कोई भी बीमारी नहीं होने पाती।
इस स्नान का समय प्रातःकाल सबसे उत्तम है यदि व्यायाम करने के पीछे यह स्नान किया जावे तो और भी अच्छा है। इस क्रिया को बहुत से मनुष्य टावेल (तौलिया) से करते हैं। स्नान करने पर अपने शरीर को तौलिये से खूब रगड़ते हैं। यह पद्धति भी ठीक हैं। किन्तु यह क्रिया नियमपूर्वक नहीं होती। इसे इस तरह करना चाहिए।
(अ) सीना निकाल कर सीधे खड़े हो जाओ मुँह सामने रखो। अब एक मोटा खुरदरा टावेल लेकर शरीर को रगड़ो।
(ब) इसके पीछे टावेल का एक भाग कन्धे पर से और दूसरा दूसरी ओर के बगल से आगे निकाल कर पीठ को घिसो। इस प्रकार दोनों कन्धे को और बगल को साफ कर डालो।
(स) उपरोक्त-क्रिया से सामने वाला और पीछे वाला भाग भी साफ कर लो।
इस तरह शरीर के हर एक भाग को अलग अलग घिसो। घिस चुकने पर थोड़ा विश्राम करो, शरीर में कुछ झनझनाहट बाहर निकलती मालूम पड़ेगी। ब्रुश टावेल, अत्यन्त उपयोगी है, टार्किश टाविल सबसे उत्तम है। शुष्क स्नान के पीछे शीतल तल से स्नान करना। टावेल को पानी में भिगोकर शरीर पर रगड़ने से भी फायदा होता है।
जल-स्नान
जल-चिकित्सा में जल-स्नान की बहुत सी क्रियाएँ हैं। जिनमें टब बाथ टब में से स्नान करना अत्यन्त लाभदायक माना गया है। किन्तु टब-बाथ रोग की अवस्था में ही लाभप्रद है प्रतिदिन नहाने के लिये नहीं। प्रतिदिन शुद्ध शीतल जल से स्नान किया जावे, स्नान करने का समय 6 से 7 के बीच में प्रातःकाल ही उत्तम है। इसके पहले थोड़ा सा व्यायाम कर लेना अति उत्तम और लाभप्रद है। स्नान, घर में या सरोवर, तालाब या कहीं भी किया जा सकता है। आज कल लोग स्नान को एक धार्मिक नियम समझकर लोटे दो लोटे जल से ही नहा लेते हैं। इससे उनको वास्तविक लाभ नहीं होता। स्नान में कम से कम 40 मिनट लगना आवश्यक है।
20 मिनट शुष्क स्नान, (सूखी तौलिये से शरीर को रगड़ना)।
20 मिनट जल-स्नान, धीरे-धीरे नहाना और भीगी हुई तौलिये से शरीर को रगड़ना।
20 मिनट में सुखी तौलिये से शरीर को पोंछकर धोती पहनना, सिर से रगड़ कर पोंछना, तेल डालना और कंघी करना।
यही पद्धति दैनिक स्नान की सर्वोत्तम और सर्व सिद्ध है। इससे हमेशा स्वास्थ्य में उन्नति होती रहेगी।
वायु स्नान
वैज्ञानिक आधार पर स्नान तीन तरह के होते हैं। जल, वायु और धूप। अमेरिकन डाक्टरों ने इन स्थानों को बहुत ही महत्वपूर्ण सिद्ध किया है। वायु पर प्रत्येक प्राणी का जीवन निर्भर है। बिना पानी के मनुष्य कुछ दिनों तक जीवित रह सकता है। किन्तु बिना हवा के एक क्षण भी रहना कठिन है। डाक्टरों और वैद्य का सिद्धान्त भी वही है कि अशुद्ध वायु ही अनेक रोगों का कारण है प्राचीन समय में वह एक नियम था कि वायु की शुद्धि के लिये हर एक गृहस्थ अपना घर बनवाते समय एक-एक नीम का पेड़ जरूर लगाते थे। अब भी प्रायः ऐसा ही नियम कहीं-कहीं देखने में आता है।
वायु स्नान, जल और धूप स्नान से भी अधिक लाभदायक है। अनेक मनुष्यों ने इससे आरोग्य लाभ किया है। जिस व्यक्ति ने इसका अनुभव नहीं किया वह इसके वास्तविक गुणों को नहीं जान सकता। शरीर के भीतरी अवयवों को अत्यन्त शुद्ध वायु की आवश्यकता हमेशा रहती है। इसी तरह बाहरी शरीर को भी शुद्ध वायु की (आक्सीजन) की हमेशा आवश्यकता रहती है।
सबसे पहले शान्त और एकान्त स्थान ढूंढ़ना चाहिए जहाँ शुद्ध वायु अधिकता से प्राप्त हो सके। यदि घर में ही शुद्ध वायु मिल सके तो घर ही में इस प्रयोग को कर लेना चाहिए। स्नान के समय बिल्कुल नग्न हो जाओ, यदि सब वस्त्र न उतार सको तो लंगोट आदि का उपयोग कर सकते हो। वायु स्नान करते समय उष्ण और ठण्डी हवा का ख्याल रखो। जहाँ तक हो सके ठण्डी हवा का ही प्रयोग करो, पहले व्यायाम कर लेना चाहिये, फिर पीछे वायु सेवन करना चाहिये। प्रातःकाल इस क्रिया को कर लेने से अद्भुत लाभ होता है। इससे शरीर में फुर्ती और चंचलता बढ़ेगी।
गाँव के बाहर अथवा मैदान की वायु अधिक शुद्ध और लाभदायक होती है। कसरत करने के बाद जब (विषैला पसीना बाहर निकल आवे) तब शुद्ध वायु ग्रहण करना चाहिए। इससे एक विशेष लाभ यह है कि सर्दी और जुकाम का कभी भय नहीं रहता। यह स्नान शरीर की निर्बलता को रामबाण है, वायु से शरीर की सम्पूर्ण नसें नवीन और उत्तेजित हो जाती है। प्रातःकाल अवश्य ही बाहर घूमने की आदत डालो।
(श्री सत्यदेव ओझा, एम. ए. यिदनापुर)
हमें पग-पग पर सुख और दुःख की अनुभूति होती रहती है और हम ऐसा समझते हैं कि यदि अमुक्त -अमुक्त वस्तुएँ हमें मिल जायं तो हम बहुत ही संतुष्ट हो जायेंगे, परन्तु जैसे ही वह वस्तु हमें मिल जाती है, हम उसके सुख का अनुभव न कर उसकी रक्षा की चिन्ता में दुखी होने लगते हैं। यह डर बना रहता है कि कहीं वह चीच खो न जाय। इस प्रकार एक-न-एक भय आजीवन बना रहता है और साथ ही साथ एक-न-एक लोभ भी लगा ही रहता है। हम स्वार्थों की पूर्ति के लिए किसी-न-किसी के पास हाथ पसारा करते हैं। अपनी लोलूपता का प्रदर्शन करते हैं और जब कोई हमारी ओर पूरा-पूरा ध्यान नहीं देता, तो हमें ऐसा लगता है कि हमारी अवहेलना हो रही है, हमारी मानहानि हो रही है। हमें प्रशंसा की भूख रहती है। हमारे अन्दर लोभ और मोह व्याप्त रहते हैं। फल यह होता है कि जो शक्ति हमारे उद्धार के लिए मिली है, जो शक्ति हमें परमेश्वर-प्रदर्शन के लिए मिली है उसका दुरुपयोग होता है और हम दिन-रात इस शक्ति का अपव्यय कर अन्त में देखते हैं, तो हाथ कुछ नहीं आता। जैसे -जैसे हम वृद्धावस्था के निकट पहुँचते हैं, तो हमारे दोषों का बोझ बढ़ता जाता है और फल यहीं होता है कि हम अत्यन्त मानसिक उद्वेग का अनुभव करने लगते हैं।
शक्ति के अपव्यय से बचने का उपाय होना आवश्यक है। पहले तो हम यह समझें कि संसार की क्षुद्र बातों से ऊपर उठे बिना हमारा कल्याण नहीं। मानसिक कल्याण और बोध तभी प्राप्त हो सकता है जब हमारे अन्दर से विरक्ति की भावनाएँ उठें। हम ऊपरी रुप से साधु फकीर का वेश बनाये रह सकते हैं, परन्तु यदि भीतर से मन का सहयोग विरक्ति की ओर न हो, तो हमें बार-बार लोभ और मोह के झकोरों से अस्त-व्यस्त होना पड़ेगा और तब हम देखेंगे कि हमारे लिए सुख शान्ति नाम की कोई चीज नहीं। अतः भोगों से उपरामता प्राप्त करने के लिए अन्दर का मैल साफ कर लेना परमावश्यक है। ऐसा कर लेने से बाकी का काम आसान हो जायगा।
जब हमें अपनी मृत्यु का ध्यान बराबर बना रहेगा और हममें क्षणभंगुरता की याद ताजी बनी रहेगी तो हमसे धीरे-धीरे मोह-निशा दूर हटती जायगी, ज्ञान की प्राप्ति होगी। इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए अलग से प्रयत्न नहीं करना पड़ेगा। हम जिस जगह पर हैं उसी जगह पर रहते हुए ऐसा कर सकते हैं। तब हम शारीरिक मृत्यु और आत्मा की अमरता का ध्यान बराबर बनाये रहेंगे, तो हमें घबराहट की ज्वाला में नहीं जलना पड़ेगा और हम भोगों की ज्वाला से भी अपने को बचा सकेंगे। जो हो, हमें निरन्तर आत्मा और शरीर को अलग-अलग देखते रहने का अभ्यास करना चाहिए। इस प्रकार से सोचते रहने पर हममें ऐसी बाते अवश्य ही आ जायगी।
हमें संसार के कामों में लगे रहना चाहिए। हमारे जिम्मे जो भी काम आ जाएं, उन्हें सहर्ष करना चाहिये। यदि सभी लोग काम छोड़ना प्रारम्भ कर दें, तो फिर कैसे होगा। अतः हमें प्रवाह प्राप्त जो काम हैं, उन्हें तो करना ही है और जब वे काम करें तो ठीक से करें, परन्तु मन की चिन्तनधारा को सबल अन्तर्मुखी करते जाएं, ऐसा करते हुए हम बहुत कुछ आत्म कल्याण कर सकेंगे। काम करते हमारे अन्दर दोष भी प्रकट होंगे, तो हमें उनको सामने आने देना चाहिए तभी दूर हो सकेंगे।
अपनी शक्ति का सदुपयोग हो इसके लिए तटस्थ भाव से साँसारिक कर्मों के करने की चेष्टा करें। ऐसा यदि हम करें तो कर्म का बोझ हम पर नहीं पड़ेगा और हम संसार के होकर उसमें फंसने से बच जायेंगे। बिनोवा जी कहते हैं कि समुद्र के किनारे खड़े रह कर ही हम समुद्र की लहरों का दृश्य देख सकते हैं। जो व्यक्ति उन लहरों में डूब रहा है, वह उस दृश्य को किस भाँति देख सकेगा। उसी भाँति हमें भी अभ्यास और विरक्ति के द्वारा धीरे धीरे मन को शान्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। फलस्वरूप हम अपनी शक्ति का क्षय रोक सकेंगे। इसलिए अनुभवी संतों ने इस बात पर बार-बार जोर दिया है कि इस संसार को नश्वर समझो अपने शरीर को नश्वर समझो, अपनी मृत्यु को सदा सामने रखो, तब तुम निश्चिन्त भाव से काम कर सकोगे और संसार में फंसने से बच जाओगे।
हम जो प्रवाह-प्राप्त कर्म पायें उसमें अपना संतोष मानें और उसको ठीक-ठीक करने का अभ्यास करें, उसे करते हुए अपने अन्दर चिन्तन करते रहें और इस बात का ध्यान रखें कि हमारे चिन्तन में आध्यात्मिकता की बातें ही बार-बार आयें। यों तो मन बहुत ही चंचल है, यह हमें वहाँ से यहाँ उठाता-बैठता और फेंकता रहता है, अतः धीरे धीरे ही इसको वश में किया जा सकता है। अस्तु, हमें सतत इस ओर प्रवृत्त रहने की चेष्टा करनी चाहिए। यदि कोई चीज हमारे मन के अनुकूल न हो, तो हमें उस समय क्रोध अथवा क्षोभ दिखलाने की आवश्यकता नहीं। हम उन्हें रोकें और समझें कि दैनिक जीवन में सभी को इस प्रकार की आशा निराशा और सुख-दुःख का अनुभव करना पड़ना है। कोई भी इससे बचा नहीं रह सकता। इसलिए सुख-दुख में जीवन से ऊपर उठने की कला सीख लेनी आवश्यक हैं।
हमें जो भी प्राप्त है, उसमें सुख मानें और समझें कि भगवान की बहुत भारी दया है कि उसने मुझे इन वस्तुओं का अधिकारी बनाया। हम अपने से ऊपर वालों की ओर नहीं, नीचे वालों की ओर देखें, तब हमें आसानी से पता चलेगा कि हमसे भी कम सुविधा प्राप्त करके वे अपना जीवन यापन कर रहे हैं। हम तो उनसे अधिक भाग्यशाली हैं। परमेश्वर से यदि माँगना ही है तो यह माँगे कि हे भगवान्! हमें यह शक्ति दो कि हम सुख दुःख दोनों को धैर्यपूर्वक झेल सकें और जो कुछ हमें प्राप्त है, उसमें संतोष मानकर बढ़ते चलें। इस प्रकार शक्ति की याचना से हम आन्तरिक शान्ति प्राप्त करेंगे और उद्विग्नता से अपनी रक्षा कर सकेंगे।
यदि सभी प्रकार की योग्यता प्राप्त कर चुके और अपने को बहुत शक्तिशाली, पटु और योग्यता सम्पन्न समझने का अहंकार आ गया तो पुनः एक एक करके हमारे अन्दर दुर्गुण का प्रवेश होगा, हमारी शक्ति का क्षय होगा और हम सब अशान्त होने लगेंगे। इस प्रकार की परिस्थिति से अलग रहना और अपने भीतर नम्रता का विकास करना परमावश्यक है। ऐसा करने से हम अपने को अधिक शान्त रख सकेंगे, और सज्जनों के निकट बैठकर उनकी शिक्षा को आसानी से हृदयंगम कर सकेंगे। अतः नम्रता की प्राप्ति के बाद हम सुरक्षित रहने की कला अपने आप सीख लेंगे और अपनी शक्ति का संरक्षण करते हुए इस संसार-यात्रा को सानन्द तय कर सकेंगे। तब हमें दिन पर दिन अत्यधिक शान्ति और आनन्द का अनुभव होगा और यदि हमें घबराहट कभी उद्वेलित भी करेगी तो उस पर शीघ्र काबू पा सकेंगे।
(श्री निरन्जनलाल गौतम)
सुखी दाम्पत्य जीवन के लिए स्त्री-पुरुष दोनों का स्वभाव कोमल, सुमधुर एवं शान्त वृत्ति वाला होना चाहिए। परन्तु यदि यह सम्भव न हो और भिन्न-भिन्न स्वभाव के स्त्री-पुरुषों को ही अपनी संसार नैया खेनी पड़े तो परस्पर मिलकर रहने के अचूक मंत्र का पाठ उन्हें कंठस्थ करना होगा। यदि अपने उग्र स्वभाव के कारण कलह जीवन का अनिवार्य अंग बन जाय तो फिर उसे मिटाने के लिए भी कभी-कभी विचार करना ही चाहिए।
स्वभाव की उग्रता के कारण वाक् दोष हो जाता है और वही वाक् दोष व्यंग वचनों की जननी है। जो घाव तलवार का होता है उससे कहीं अधिक गहरा और दुःखदायी घाव व्यंग्य का होता है, जो चिरकाल तक हृदय में अपने विषैले जख्म को बनाये रखता है। स्वभाव की उग्रता से ही मस्तिष्क में चिड़चिड़ापन पैदा होता है। दूषित स्वभाव के फलस्वरूप व्यंग, कटुवचन और चिड़चिड़ापन गृहकलह के हेतु हैं। इन दोषों के कारण थोड़ी सी असावधानी से कैसा अनर्थ होता है इसका सूक्ष्म परिचय निम्न पंक्तियों से मिलेगा।
उग्र स्वभाव के पुरुष की उग्रता के उदाहरण
स्त्री- आज तेल समाप्त हो गया हैं और मसाला भी आयेगा।
झगड़े के कारण वचन
पुरुष- क्या मैं तेरा नौकर हूँ जो हर समय ला-ला लगी रहती है? कभी अपनी आवश्यकता का रजिस्टर बन्द नहीं रखती। क्या बाप के यहाँ से कमाई आ रही है? एक बार सब सामान मँगवाने में क्या मुख दुखता है?
प्रेम पूर्ण उत्तर
-यदि सब सामान एक साथ मँगवा लिया करें तो ठीक है। इस प्रकार अधिक व्यय का भी भय है और समय भी अधिक लगता हैं।
(2) स्त्री ने बच्चे को पीट दिया। पतिदेव बिगड़ पड़े।
पुरुष- क्या इसे मार डालोगी। ईश्वर कैसा अन्यायी है, ऐसी बेरहम को क्यों बच्चा दिया? उसे मार डालों! यह तुम्हारा दुश्मन है न!!
प्रेम पूर्ण उत्तर
अरे दया करो। बच्चा है लग गई। बच्चा ही तो हैं प्यार से इसे समझा दो। मारने से तो वह बिगड़ता है।
(3) स्त्री- बाबू जी आप को आजकल देर बहुत जो जाती है। क्या काम अधिक रहता है, भोजन के लिये इतनी देर हो गई।
पुरुष- जैसे तुम ठलवा हो न, उसी प्रकार सबको समझती हो। मैं कही खेल तमाशे में नहीं गया हूँ। सब बातों का लेखा लिया जाता है। खबरदार मेरे बीच में न पड़ा करो। नहीं तो अच्छा न होगा।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-हाँ काम अधिक आ गया है। देर हो जाती है। जल्दी आने की इच्छा रहते हुए भी न आ सका। तुम्हें भी इतनी देर प्रतीक्षा में बैठना पड़ा। भोजन उठाकर रख देतीं। क्यों लिए बैठी रहीं?
(4) स्त्री- देखा कोट की जेब फट गई है क्या हुआ इसे?
पुरुष- मेरी देही में काँटे हैं न! पूछती है कैसे फट गई है। क्या कमा कर लाई थी जो लेखा लेती हैं?
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अब कपड़ा पुराना हो गया हैं। हाथ ढालते ही फट गई। जरा इसे ठीक कर देना।
(5) स्त्री- कमीज का बटन लगा लीजिये। गला खुल रहा है।
पुरुष- चुप रह। चली है तमीज सिखाने।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अरे मैंने ध्यान नहीं दिया था। धन्यवाद!
(6) स्त्री- देखो घर में मेहमान आये हैं इनके भोजनादि का प्रबन्ध होगा न?
पुरुष- मेरे से क्या कहती हैं क्या सब काम मेरे से पूछ कर होता है?
हाँ-हाँ जो कुछ मँगाना हो कहो। देखो आदर सत्कार में कमी न रहे।
(7) स्त्री- आज हमें अपनी सहेली के यहाँ जाना है। घर की चाबी लेते जाइए।
पुरुष- हाँ जी, क्यों नहीं। अब तो आपका पैर निकल गया है न? जब देखो सहेली के। यों क्यों न कहो कि मैं घर की रखवाली करता रहूँ।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अच्छा अधिक देर न करना। घर अकेला रहेगा। यदि चाहो तो चली जाओ, अधिक आना जाना भी ठीक नहीं होता।
(8) स्त्री- घी समाप्त हो गया है। कल से सूखी खानी पड़ेगी।
पुरुष- अच्छा! घी आये देर न हुई समाप्त हो गया? पहले फिजूल खर्ची से उठाया जाता है। कमाकर लाओ तो मालूम हो।
-हाथ साध कर उठाया करो। ऐसा प्रबन्ध कर लो जो एक समान रूप से काम चलता रहे।
(9) स्त्री- हमारी धोती फट चली, जम्फर भी फट गया, आप कपड़ा कब लायेंगे?
पुरुष- मैं क्या करूं? देह में काँटे हैं। एक जोड़ा तीन महीने भी नहीं चलता। कपड़े की मरम्मत तुम क्यों करो। जब खूब फट जाये तो खोता दिखाई देता है।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-आपसे कपड़ा कुछ अधिक ही फटता है कपड़े में अगर खोता लग जाय तो बड़ा सूराख बनने से पूर्व ही उसे ठीक कर लेना चाहिये नहीं तो बढ़कर कपड़े को व्यर्थ कर देता है।
उग्र स्वभाव स्त्री की उग्रता के उदाहरण-
(1)पुरुष- जल्दी से एक गिलास पानी तो देना। तनिक जल्दी करो। मुझे बाहर जाना है।
स्त्री- तुम तो हथेली पर सरसों जमाते हो। मैं कोई लौंड़ी बाँदी हूँ! देते-देते आसमान सिर पर उठा लेते हो, क्या मैं ठलवा बैठी हूँ।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अभी लाई, तनिक बैठ लीजिए। मेरे हाथ मैले हैं।
(2) पुरुष- देखो तो तल्लू के बाल कितने मैले हो गए हैं। बाल भी बिखरे हैं। नाखूनों में मैल लगा है। फुरसत के समय इसकी भी देख भाल कर लिया करो
स्त्री- जब देखो कोई न कोई नुक्स निकालते रहते हैं। क्या हर वक्त भौंकने की आदत पड़ गई हैं? इसकी देख भाल मैं नहीं करती तो क्या आप करते हैं?
प्रेम पूर्ण उत्तर
अजी बच्चा है। खेल-कूद में कपड़े गन्दे कर लेता है। अब फिर साफ कपड़े बदल दूँगी।
(3) पुरुष- देखो यहाँ मेरा चाकू रखा था। क्या तुमने ले लिया है?
स्त्री- मैंने क्या बटुए में रख लिया? यहीं रखा होगा।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अभी तो यही रखा था मैं अभी ढूँढ़ कर देती हूँ।
(4) पुरुष- देखना मुझे दो रुपए ही जरूरत है दोगी क्या?
स्त्री- क्या मुझे हुण्डी सौंप गये थे? क्या माँगते शर्म नहीं आती, कभी देकर भूल गये थे?
प्रेम पूर्ण उत्तर
आपको तो पता ही है मेरे पास नहीं है अगर होते तो अवश्य दे देती। क्या मेरा और आपका अलग-अलग है।
(5) पुरुष- क्या धोबी मेरे कपड़े दे गया है? सब कपड़े मैले हो गये हैं।
स्त्री- क्या मैं धोबी के यहाँ से जाकर ले आऊँ? रास्ते में आते हुये लेते क्यों नहीं आये?
प्रेम पूर्ण उत्तर
-धोबी अभी तक लाया नहीं। आप लौटते उससे अवश्य कहते जाइये कि वह आज कपड़े पहुँचा दे।
(6) पुरुष- देखो तो घर में कितने जाले लगे हैं। अचार के बर्तनों पर कितनी गर्द जम गई है, तेल से तमाम अलमारी का तख्ता खराब हो गया है।
स्त्री- रोज तो सफाई करती हूँ। इस पर भी हरेक काम में नाक मारते रहते हो। कोई काम पसंद ही नहीं आता। किसी सुते मन से शादी की होती, काहे को मुझ फूहड़ को लाये थे।
प्रेम पूर्ण उत्तर
कार्य से कई दिन से छुट्टी ही न मिल सकी, फिर कुछ ध्यान भी नहीं गया। आज सब वस्तुओं को साफ करके रख दूँगी।
(7) पुरुष- देखना यह पुस्तक ठीक तरह मेज पर रख देना। कोई बच्चा फाड़ देगा।
स्त्री- लो रख लो अपनी पुस्तक! जरा देखने को ली थी। क्या इसका कुछ घिस जायगा?
प्रेम पूर्ण उत्तर
-ठीक है, पढ़कर रख दूँगी।
(8) पुरुष- आपका सामान तितर बितर हो रहा है इसे करीने से करो। घर की सुन्दरता करीने में ही है।
स्त्री- अहो! जब देखो लक्षण ही सिखाते रहते हैं। क्या इन चीजों को पेट में रख लूँ? घर ही बहुत बड़ा है न।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अभी ठीक हो जायगा। कुछ स्थान की भी हमारे यहाँ कमी हैं और सामान बढ़ता जा रहा है।
(9) पुरुष- आपने सुना नहीं? कोई आवाज दे रहा है।
स्त्री- क्या में बहरी हूँ? जिसे आना होगा आप आ जाएगा।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-सुन तो लिया है। द्वार खुला हुआ है, मैं अभी जाकर देखती हूँ।
(10) पुरुष- आपकी साड़ी बहुत मैली हो गई है। बदल क्यों न लो।
स्त्री- सुनते नहीं हो, कितनी बार कहा कि साबुन नहीं है।
प्रेम पूर्ण उत्तर
- हाँ बहुत मैली हो गई है। आज साबुन अवश्य लाना।
उग्र प्रश्नों के उग्र उत्तर
(1) पुरुष- क्या दीखता नहीं? पुस्तक में ठोकर मार दी?
स्त्री- क्या तुम्हें नहीं सूझता कि यह रास्ता है।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-अरे, देखा नहीं रास्ते से उठाकर एक ओर रख दीजिए।
(2) पुरुष- कौन कहता है कि मैं नहीं गया?
स्त्री- बस ज्यादा सफाई की जरूरत नहीं! यह बात किसी से छिपी नहीं।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-हो सकता है आप गए हों। परन्तु सब ही लोगों का विचार इसके विरुद्ध है।
(3) पुरुष- एक तरफ क्यों न बैठो। छाती पर क्यों चढ़ती हो।
स्त्री- लो बैठे रहो, एकदम खोटे हो। किसी के पास बैठना भाता ही नहीं।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-मेरे यहाँ बैठने से कोई बाधा पड़ती है तो चली जाती हूँ।
(4) पुरुष- कहाँ है वह रामू? वह आज भी स्कूल नहीं गया। क्यों नहीं रोज स्कूल भेजती?
स्त्री- मैंने क्या गोद में बैठा रखा है? पहले तो सिर पर चढ़ा लिया अब रौब गाँठते हैं।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-कहीं चला गया है। वह सिर पर चढ़ता जाता है। कल से उसका ध्यान रखा जायगा।
(5) पुरुष- देखना या तो मान जा, नहीं तो सिर तोड़ दूँगा।
स्त्री- क्यों, क्या खिला दिया है? आये सिर तोड़ने वाले।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-मेरा क्या दोष है। सिर तोड़कर भी तो आपको ही दवा करनी पड़ेगी।
(6) पुरुष- निकल जा यहाँ से। मैं तेरी सूरत नहीं देखना चाहता।
स्त्री- नहीं जाती। अगर मेरी सूरत नहीं भाती तो मुँह फेर लो।
प्रेम पूर्ण उत्तर
-कहाँ जाऊँ? यहाँ से मेरा और कहाँ ठिकाना है। क्षमा करो अब तो।
(7) पुरुष- दीपक क्यों नहीं जलाया? क्या समय नहीं हुआ?
स्त्री- क्या अपने सिर से जलाती? तेल भी हो? तुम सुनते भी हो?
प्रेम पूर्ण उत्तर
-आज तेल नहीं रहा। क्या आप ले आये? अभी जलाती हूँ।
(स्वामी मनोहरदास जी, ज्ञानतीर्थ)
अपठित मूर्ख तो प्रायः बहुतायत से होते ही हैं किन्तु पठित एवं अक्षर बोध वाले मूर्खों की भी कमी नहीं है। आज मैं आपके सामने धर्मशास्त्र के आधार पर पठित मूर्खों ही के कुछ लक्षण वर्णन करूंगा, यदि आप में भी यह लक्षण हों तो अपना परिमार्जन कर निर्मल हो जाइए।
-जो बढ़ चढ़कर ब्रह्मज्ञान की बातें करें परन्तु झूँठे मिथ्या अभियान का त्याग न करे ऐसे को पठित मूर्ख जानना चाहिए।
-औरों को शास्त्रीय एवं महापुरुषों के चरित्रों की कथाएँ कहकर शिक्षा देता हो स्वयं शिक्षा के अनुसार चलता हो, पर दोष दर्शन में महान चतुर और अपने दोषों को छिपाता हो, परम्परागत धर्म को तुच्छ दृष्टि से देखता हो तथा औरों को उनके आचरण से च्युत करता हो उसे पढ़ा हुआ मूर्ख मानो।
-अपने ज्ञाता पन के अभियान से सर्व प्राणी मात्र में छिद्रान्वेषण किया करता हो, अपने बाहरी एवं घर वालों से प्रेमपूर्वक बर्ताव न करता हो, जिसके बोलने से दूसरों का दिल दुखता हो अर्थात् कटु भाषी हो, ऐसे शिक्षित को पठित मूर्ख मानो।
-मैं ज्ञानी हूँ, मैं सर्वज्ञ हूँ ऐसा मानकर ऐसे कार्य में हाथ डाल देता है, जो उसकी समझ और बूते से बाहर है, परन्तु कार्य सिद्ध न होने पर क्रोध कर उस पर अविश्वास प्रकट करता है, लोगों के अधिकार का विचार किए बिना उनसे बोलने का साहस करता है वह पठित मूर्ख है।
-मुख पर भिष्ट और पीछे दुष्ट ऐसी जिसकी आदत हो, कहने की बात अलग और करने की अलग संसार सक्त होकर परमार्थ को धिक्कार करे।
-जो स्वधर्म नित्य नैमित्तिक कर्मों से विमुख रहे। ऊँचे कुल में जन्म धारण करने पर भी नीच कर्मों में प्रवृत्त होने वाला विद्वान भी मूर्ख हैं।
-गृह त्याग, वैराग्य धारण करके ईश्वर भजन नहीं करता, संत-महन्ताई के अभियान में चूर होकर नाम स्मरण को छोड़ देता है और साँसारियों की तरह उदर पूर्ति के साधन व्यापार करने में अपने जीवन को खपा देता है वह पठित होने पर भी मूर्ख ही है।
-रात दिन उत्तम-2 ग्रन्थों का पठन और श्रवण करते हुए भी अपने अवगुणों को त्यागे नहीं, अच्छे तत्वज्ञ पुरुषों की मसखरी करता हो, अपने पारलौकिक हित को भूलकर मनमाना पापा चरण करता हो वह पठित मूख है।
-अपना पुत्र, शिष्य और सेवक अनाधिकारी होकर अपमान करने लगे तब भी उसकी आशा न छोड़े। अपनी स्त्री एवं पुत्र के मुख पर उनकी प्रशंसा करे, उनके दुराचार को लोभ के वशीभूत होकर सहन करें, वह पठित होकर के मूर्ख है।
-बात-बात में संशय और तर्क करे, अपनी गलती को मजूर न करे। भौतिक वस्तुओं को ही सब कुछ जाने प्रत्यक्ष के सिवाय किसी की बात पर विश्वास न करे, ऐसे विद्वान अक्षर बोधी को पठित मूर्ख मानो।
-फैशन परस्ती की कुटेब में फंसकर अपने आपको रोगी बनाले, माँ-बाप का बात-बात पर अपमान करे, सिर्फ स्त्री एवं पुत्र मात्र का ही अपना कुटुम्ब मानकर लालन पालन करें, अन्य आत्माओं स्वजनों से घृणा करे, अभक्ष्य-माँसादि को भक्षण करे, गरीब का अहित और अनादर करे, वह विद्वान होते हुए भी मूर्ख है।
-विद्वान होते हुए अपनी विचारधारा संकुचित रखे, अपना प्रेम अपने कुटुम्ब तक ही सीमित रखे और अपनी पढ़ी और समझी हुई विद्या अपने लिए ही दबा कर रखे वह पठित मूर्ख है।
-काम, क्रोध, मद, लोभ की जब लग घट में खान।
क्या मूरख क्या पण्डिता दोनों एक समान॥
गायत्री चर्चा-
नवरात्रि का महत्व अखण्ड-ज्योति के पाठकों से छिपा नहीं है। पिछली नवरात्रियों से इस महापर्व के सम्बन्ध में प्रकाश डाला जाता रहा है। गर्भाधान के लिए ऋतु काल का जो महत्व है, बीज बोने के लिए खेत की उचित स्थिति (ओठ आना) का जो महत्व है, मिठाई बनाने के लिये चासनी पककर तार उठने के समय का जो महत्व है, साधना के लिए संध्या काल का जो महत्व है, वैसा ही महत्वपूर्ण अवसर अध्यात्मिक कार्यों के लिए नवरात्रि का होता है। सर्दी और गर्मी की ऋतुओं के सम्मिलन की संध्या नवरात्रि है। इसी समय वैद्य लोग पुराने रोगियों को जुलाब देकर उनकी स्थायी कोष्ठ शुद्धि एवं निरोगता का उपचार करते हैं, यही समय आत्मिक दुर्बलताओं को हटाकर अन्तःकरण श्द्धि एवं आत्मबल बढ़ाने के लिए सर्वोत्तम सिद्ध होता है। साधना कार्य के लिए नवरात्रि से बढ़कर और कोई शुभ मुहूर्त नहीं हो सकता।
अश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में गायत्री की विशेष उपासना करते रहने के लिए हम अपने पाठकों को सदा ही प्रेरणा देते रहते हैं। कारण यह है कि हम अपने तथा साधकों के प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जितना लाभ अन्य समयों में लम्बी अवधि तक साधना करने का भी नहीं हो पाता वह इन 6 दिनों की साधना से होता देखा जाता है। ऐसे अगणित अनुभवों का हमें भली प्रकार ज्ञान है और उसी आधार पर हम विशेष उत्साह एवं साहस के साथ नवरात्रि में गायत्री उपासना करने के लिए अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वाले सज्जनों से आग्रह एवं अनुग्रह करते हैं।
लघु अनुष्ठान-
आगामी मास चैत्र की नवरात्रि ता. 16 मार्च सोमवार से आरम्भ होकर ता. 24 मंगलवार तक रहेगी। इन नौ दिनों में जिनसे बन पड़े उन्हें 24 हजार जप का लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रतिदिन 25 मालाओं का नित्य जप करने से प्रतिदिन लगभग 24 घंटे लगते हैं इतना निकाल लेना कुछ बहुत मुश्किल बात नहीं है। प्रातःकाल दो घण्टे रात्रि रहे, शौच स्नान से निवृत्त होकर साधना पर बैठा जाय तो प्रातःकाल के समय में ही नियत जप पूरा हो सकता है। जो लोग देर में उठते हैं या जिन्हें जल्दी ही किसी काम पर लगना होता है, वे आधे से कुछ अधिक जप प्रातःकाल और शेष सायंकाल में पूरा कर सकते हैं।
नियमित अनुष्ठान के लिए जप के समय तक घी का दीपक या धूपबत्ती जलाए रहना चाहिए। पास में जल पात्र भी रहे। क्योंकि अनुष्ठान काल में अग्नि देवता और वरुण देवता (जल) को साक्षी रखना आवश्यक माना गया है। ब्रह्म संध्या के पाँचों अंग (आचमन, शिखाबंध, प्राणायाम, अघमर्षण और न्यास) गायत्री महाविज्ञान तथा सर्व सुलभ साधना पुस्तक में बताये जा चुके हैं। स्नान करके, आसन पर बैठ कर जल और अग्नि को समीप रखें। फिर ब्रह्म संध्या करें। तत्पश्चात् गायत्री और गुरु का पूजन करके जप आरम्भ कर दें। जो लोग निराकार उपासना करने वाले हैं वे अग्नि को गायत्री के तेज का प्रतीक मानकर उस पर घृत एवं सुवासित सामग्री चढ़ाकर पूजन कर लें। जो लोग साकार उपासना में विश्वास रखते हैं वे गायत्री का चित्र सामने रख उसका धूप, दीप, गंध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजन कर सकते हैं। इसी प्रकार अपनी अपनी भावना और मान्यता के अनुसार गुरु पूजन के लिए परमात्मा या किसी महापुरुष को मानसिक प्रणाम किया जा सकता है अथवा नारियल या चित्र का प्रतीक मानकर गुरु पूजन किया जा सकता है। जप पूरा होने पर विसर्जन कर देना चाहिए। जिस प्रकार जप के आरम्भ में पूजन करते समय मंत्र द्वारा या भावना द्वारा गायत्री महाशक्ति का आह्वान किया जाता है वैसे ही जप समाप्त होने पर मंत्र द्वारा-यदि मंत्र याद न हो तो भावना द्वारा-विसर्जन कर देना चाहिए। दीपक का घी समाप्त होने पर अपने आप बुझ जाने के लिए छोड़ देना चाहिए और जल को सूर्य के सम्मुख अर्घ्य चढ़ा देना चाहिए।
अनुष्ठान के दिनों में शरीर से भी कुछ तपश्चर्याएँ करना तथा व्रत नियमों का पालन करना उचित है। इन दिनों के लिए ब्रह्मचर्य आवश्यक नियम है। जानबूझ कर कदापि कामसेवन नहीं करना चाहिए। स्वप्नदोष हो जाए तो दस मालाएँ प्रायश्चित्त स्वरूप अधिक जपनी चाहिए और एक आहार का अन्नदान करना चाहिए।
कामेन्द्रिय के भाँति जिह्वा इन्द्रिय का भी तप करना चाहिए। नौ दिन तक पूर्ण निराहार केवल जल के आहार पर रहना तो हर एक का काम नहीं है। जिन्हें जल पर रहना हो वे इस के लिए हमारी स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लें। जिनका शरीर इस योग्य नहीं है वे पूर्ण निराहार उपवास करने पर खतरे में पड़ सकते हैं। इसलिए सर्व साधारण को फल, दूध, छाछ आदि ‘फलाहारी’ कहे जाने वाले पदार्थों की सहायता से उपवास करना चाहिए। जो ऐसा उपवास न कर सकें वे नमक और शक्कर दोनों या दोनों में से एक स्वाद छोड़कर एक बार अन्नाहार लेते हुए अपना उपवास कर सकते हैं। दुर्बल लोग एक समय स्वाद रहित अन्नाहार दूसरे समय दूध या फलाहार लेकर उपवास का कोई न कोई आधार रख सकते हैं।
ब्रह्मचर्य तथा उपवास के अतिरिक्त तपश्चर्या के कुछ अन्य नियम भी हैं। यह नियम ब्रह्मचर्य तथा उपवास की तरह अनिवार्य तो नहीं हैं पर जिससे जितना बन पड़े यथा सम्भव इन नियमों का पालन करने का भी प्रयत्न करना चाहिए। (1) अपनी शारीरिक सेवाएँ स्वयं करना अर्थात् अपने भोजन, जल, हजामत, वस्त्र धोना आदि के लिए किसी दूसरे की सेवा स्वीकार न करके अपने हाथ ही यह सब काम करना। पशुओं पर सवारी न करना। (2) चारपाई या पलँग की अपेक्षा भूमि या तख्त पर सोना। (3) चमड़े का उपयोग न करके, रबड़ कपड़ा आदि से बने हुए जूते प्रभृति उपकरणों को प्रयोग करना। (4) मन, वचन और काया के दुष्कृतों का त्याग। (5) मौन धारण के लिए थोड़ा बहुत समय निकालना।
अनुष्ठान के अन्तिम दिन पूर्णाहुति के लिए थोड़ा बहुत यज्ञ तथा दान करना आवश्यक है। 24 हजार का दशाँश न सही शताँश हवन किया जाय तो 240 आहुतियों का हवन होता है। कई व्यक्ति हवन में साथ बैठकर आहुतियों को बाँट भी सकते हैं। हवन के उपरान्त सत्पात्रों को ब्राह्मण भोजन या यज्ञ दक्षिणा देने का नियम है। यह भी यथासंभव करना चाहिए। जिन्हें आर्थिक कारणों से हवन की सुविधा न हो वे केवल घृत से 24 आहुतियाँ दे लें। जो ब्रह्म-भोज नहीं करा सकते वे गौ को 24 छटाँक आटा और 24 तोले गुड़ के गोले बनाकर खिला दें। ब्राह्मण भोजन एवं दान का एक अच्छा तरीका यह भी है कि सामर्थ्यानुसार पैसे की गायत्री सम्बन्धी छोटी छोटी पुस्तकें मँगाकर सत्पात्रों को वितरण कर दी जायं। अन्नदान से ज्ञानदान का पुण्य अधिक है। 24 हजार जप पूरा होने पर हवन आदि की पूर्णाहुति तारीख 24 मार्च को नव में दिन करनी चाहिए जब तक पूर्णाहुति न हो जाय तब तक ब्रह्मचर्य, उपवास तथा तपश्चर्या के अन्य नियम पालन करते रहना चाहिए।
अनुष्ठान करने वाले व्यक्ति यदि अपने निश्चय की पूर्व सूचना अखण्ड-ज्योति के पते पर हमें भेज देंगे तो उनकी साधना को संरक्षण तथा अनुष्ठान में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन यहाँ पर किया जाता रहेगा। तप में बहुधा आसुरी शक्तियाँ बहुत विघ्न फैलाती हैं, इसीलिए उसके संरक्षण के लिए ब्रह्मा तथा दृढ़ पुरुष आदि की नियुक्ति की जाती है।
जो व्यक्ति स्वयं साधना नहीं कर सकते वे दूसरों से अपने बदले का अनुष्ठान करा सकते हैं। इसी प्रकार जो लोग स्वयं हवन आदि नहीं कर सकते, उनके बदले का हवन दूसरे कर सकते हैं। जिन्हें इस प्रकार की असुविधा हो वे गायत्री संस्था द्वारा सहायता ले सकते हैं।
सदा की भाँति इन चैत्र की नवरात्रियों में भी हमारा केवल जल लेकर पूर्ण निराहार व्रत रहेगा। इसलिए साधकों से प्रार्थना है कि उन दिनों हम से न तो अनावश्यक पत्र व्यवहार करें और न मथुरा पधार कर हमारी शाँति भंग करें।
गायत्री चालीसा का अनुष्ठान
जो लोग अधिक कार्य व्यस्त हैं, जो अस्वस्थता या अन्य कारणों से नियमित साधन नहीं कर सकते वे गायत्री चालीसा के 108 पाठों का अनुष्ठान कर सकते हैं। 9 दिन नित्य 12 पाठ करने से करने से नवरात्रि में 108 पाठ पूरे हो सकते हैं प्रायः डेढ़ घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं। इसके लिए किसी प्रकार के नियम, प्रतिबन्ध, संयम, तप आदि की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके बैठना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए। अन्तिम दिन 108 या 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देना चाहिए। स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा के अनुष्ठान को बड़ी आसानी से कर सकते हैं। यों तो गायत्री उपासना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में उसका फल विशेष होता है। गायत्री को भू-लोक की कामधेनु कहा गया है। यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाओं को शान्त करती है। जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य से परिपूर्ण होने के कारण उसे अमृत भी कहते हैं। गायत्री का स्पर्श करने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ हो जाता है इसलिए उसे पारसमणि भी कहते हैं। अभाव, कष्ट, विपत्ति, चिंता, शोक एवं निराशा की घड़ियों गायत्री का आश्रय लेने से तुरन्त शाँति मिलती है, माता की कृपा प्राप्त होने से पर्वत के समान दीखने वाले संकट राई के समान हलके हो जाते हैं और अन्धकार में भी आशा की किरणें प्रकाशमान होती हैं। गायत्री को शक्तिमान, सर्वसिद्धि दायिनी सर्व कष्ट निवारिणी कहा गया है। इससे सरल, सुगम, हानि रहित, स्वल्परमसाध्य एवं शीघ्र फलदायिनी साधना और कोई नहीं है। इतना निश्चित है कि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। अभीष्ट अभिलाषा की पूर्ति में कोई कर्म फल विशेष बाधक हो तो भी किसी न किसी रूप में गायत्री साधना का सत् परिणाम साधक को मिलकर रहता है। उलटा या हानिकारक परिणाम होने की तो गायत्री साधना में कभी कोई सम्भावना ही नहीं है। यों तो गायत्री साधना सदा ही कल्याणकारक होती है पर नवरात्रि में तो यह उपासना विशेष रूप से श्रेयष्कर होती है। इसलिए श्रद्धापूर्वक अथवा परीक्षा एवं प्रयोग रूप में ही सही-उसे अपनाने के लिए हम प्रेमी पाठकों से अनुरोध करते रहते हैं। गायत्री साधना के सत्य परिणामों पर हमारा अटूट विश्वास है। जिन व्यक्तियों ने भी यदि श्रद्धापूर्वक माता का अंचल पकड़ा है उन्हें हमारी ही भाँति अटूट विश्वास प्राप्त होता है।
गायत्री तपोभूमि का निर्माण
प्रसन्नता की बात है कि गायत्री मन्दिर का निर्माण बड़ी तेजी से हो रहा है। मथुरा शहर से वृन्दावन-जाने वाली सड़क पर ठीक एक मील दूर यह तपोभूमि बन रही है। बीच में गायत्री मन्दिर तथा दोनों बंगलों में दो छोटे कमरे (1) हस्तलिखित मंत्रों की स्थापना के लिए (2) 24 हजार तीर्थों की रज तथा जल की स्थापना के लिए रखे गये हैं। सत्संग भवन, दस साधकों के रहने लायक कुटियाँ, पक्का कुँआ, सुन्दर गेट तथा बगीचे में फुलवारी लगाने का आयोजन हो रहा है, आशा है कि हमारा 24 दिन का केवल गंगाजल पर उपवास आरम्भ होने की तिथि वैशाख सुदी 15 तक मन्दिर का सभी आवश्यक भाग बनकर तैयार हो जायगा। माता की प्रतिमा, जयपुर के सर्वश्रेष्ठ कारीगर द्वारा बन रही है। यह तपोभूमि भारतवर्ष में अपने ढंग की अनोखी होगी। इमारत की दृष्टि से नहीं, सूक्ष्म विशेषताओं की दृष्टि से इसका महत्व असाधारण होगा।
पूर्णाहुति की तैयारियाँ
पूर्णाहुति यज्ञ में केवल 124 ऋत्विजों को सम्मिलित करने का विचार था पर अत्यधिक संख्या में प्रार्थना पत्र आ जाने के कारण अब तक 175 व्यक्तियों को स्वीकृति दी जा चुकी है। सम्भवतः यह संख्या 240 तक पहुँच जायगी। आने वाले दर्शकों पर विशेष प्रति बन्ध तो नहीं है फिर भी उन्हें आने की सूचना अवश्य दे देनी चाहिए। देश के प्रत्येक भाग में से तीर्थों, पवित्र नदियों, सरोवरों तथा सिद्ध पीठों का जल तथा रज संग्रहीत किया जा रहा है।
सहस्रांशु ब्रह्म-यज्ञ, गायत्री मंत्र लेखन यज्ञ तथा 24 महापुरश्चरण की पूर्णाहुति के साथ-साथ गायत्री मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा यह आयोजन इस युग का एक महान पुण्य पर्व है। इसे तामसिक अपव्ययों, राजसिक प्रदर्शनों से बचाकर ब्रह्म वर्चस्व और ऋषिकल्प सात्विकता प्रधान ही रखा जा रहा है। इस यज्ञ में केवल कुछ तपे हुए और परखे हुए लोगों को ही सम्मिलित किया जा रहा है ताकि यज्ञ की सूक्ष्म शक्ति में अभिवृद्धि हो। ता. 20, 21, 22, जून सन् 53 को यह यज्ञ आयोजन होगा। जिन्हें स्वीकृति मिल चुकी है उन्हें ता. 19 की शाम को ही मथुरा पहुँच जाना चाहिए।
मंत्र लेखन यज्ञ
मंत्र लेखन यज्ञ उत्साह पूर्वक चालू है। कई व्यक्तियों ने आश्चर्यजनक संख्या में मंत्र लिखे हैं। आशा की जाती है कि कुछ ही दिनों में वह संख्या 24 करोड़ तक पहुँच जायगी। अच्छा यह हो कि अधिकाधिक लोगों को इस यज्ञ में सम्मिलित किया जाय। मंत्रों की संख्या बढ़ने की अपेक्षा लिखने वाले व्यक्तियों की संख्या में वृद्धि होना अधिक महत्वपूर्ण है। जिन सज्जनों को इस मार्ग में रुचि है उन्हें चाहिए कि अपने निकटवर्ती लोगों में गायत्री मंत्र लेखन का अधिकाधिक प्रचार करें, भले ही कोई थोड़ी-थोड़ी संख्या में ही लिख सकें पर धार्मिक प्रकृति के अपने निकटवर्ती लोगों को अधिक संख्या में इस यज्ञ में सम्मिलित करने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। कम से कम 240 तक की संख्या में भी मंत्र लिखाये जा सकते हैं। मंत्र लेखन यज्ञ में भागीदार बनने वाले सज्जनों की संख्या बढ़ाने का प्रयत्न करना गायत्री प्रेमियों का आवश्यक कर्त्तव्य हैं।
गायत्री उपासना के अनुभव भेजिए
सदा की भाँति अखण्ड-ज्योति का जुलाई 53 का अंक गायत्री अंक होगा। उसमें गायत्री उपासकों के अनुभव तथा चित्र रहेंगे। यदि गायत्री उपासना से आपको कोई आध्यात्मिक या साँसारिक ऐसा विशेष लाभ हुआ हो जिससे दूसरे लोग भी उसे पुण्य मार्ग पर आकर्षित हों तो उन अनुभवों को विस्तारपूर्वक लिखते हुए अपने आधे शरीर के फोटो समेत छपने को भेज दें। इसी प्रकार किन्हीं अन्य जीवित या स्वर्गीय गायत्री उपासकों के उत्साहवर्धक अनुभव आपको मालूम हों तो उनके वर्णन तथा फोटो भी प्रकाशनार्थ भेजने की कृपा करें।
तीर्थों का जल तथा रज भेजिए
गायत्री तपोभूमि में भारतवर्ष के सभी तीर्थों का जल तथा रज रखने की व्यवस्था की गई है। समस्त गायत्री प्रेमियों से प्रार्थना है कि अपने निकटवर्ती तीर्थों की दो-दो छटाँक रज (मिट्टी) किसी उत्तम स्थान की भेजने की कृपा करें। जल ठीक से भेजना असुविधाजनक हो तो उस रज को जल में भिगोकर सुखा लेना चाहिए। इस प्रकार दोनों का संमिश्रण होने से भी काम चल जायगा। जिन तीर्थों का जल तथा रज भेजी जाय उनका पूरा विवरण अवश्य लिखना चाहिए।
माँ! जीवन-संगीत सुना दे। आज हमें वह गीत सुना दे॥
जो कण-कण, अणु-अणु में गूँजे, जो जल-थल-नभ में छा जाये।
जो उपवन-उपवन में डोले, जो कानन-कानन लहराये॥
जो आँगन-आँगन में नाचे, जो गृह-गृह में दीप जलाये।
जो पग-पग पर प्रेम बखेरें, जो जन-जन में जीवन लाये॥
वाणी से अमृत बरसा माँ! प्यासे जग की प्यास बुझा दे।
माँ! जीवन-संगीत सुना दे, आज हमें वह गीत सुना दे॥
जिसको सुनकर मानव के मन प्राणों में चेतनता आये।
जिसको सुनकर हृदयों में शुचि-प्रेम, शान्ति सज्जनता आये॥
जिसको सुनकर वाणी में माधुर्य और कोमलता आये।
जिसको सुनकर जीवन में सुन्दरता और सरलता आये॥
आज जगज्जननी! वसुधा पर एक सुधा की धार बहा दे।
माँ! जीवन-संगीत सुना दे, आज हमें वह गीत सुना दे॥
जिसकी लय में जगती का नीरस-कोलाहल लय हो जाये।
जिसके स्वर में मानवता का तार-तार झंकृत हो जाये॥
जिसके भावों का आकर्षण मन में भ्रातृ-भाव उपजाये।
जिसके शब्दों का आयोजन विश्व-प्रेम का पाठ पढ़ाये॥
मानव के मानस मन्दिर में माता! मोहन मंत्र जगा दे।
माँ! जीवन-संगीत सुना दे, आज हमें वह गीत सुना दे॥
जो इस जीवन के यात्री को, जन-सेवा का मार्ग दिखाये।
जो भूले राही के पथ में, न्याय-नीति के दीप जलाये॥
जिसके महाराग को सुनकर मन का राग-द्वेष मिट जाये।
जिसके महा-मंत्र को पाकर मानव-जन्म सफल हो जाये॥
जननी! आज जन-जन के जीवन में नव जीवन-ज्योति जगा दे।
माँ! जीवन-संगीत सुना दे, आज हमें वह गीत सुना दे॥
*समाप्त*
[श्री मुकुन्दलाल मुकुल संतना]