वेदों का शंख नाद

इच्छन्ति देवाः सुन्वन्तं, न स्वप्नाय स्पृहयन्ति। येन्ति प्रमादमतन्द्राः। (ऋग्वेद 8.2.18)

जो व्यक्ति जाग कर शुभ कर्मों में लगता है उसी को देवता चाहते है, सोये पड़े रहने वाले से वे प्रीत नहीं करते। अच्छी तरह समझ लो, प्रमादी की कोई मदद नहीं करता।

यो जागार तमृचः कामयन्ते, यो जागार तमु सामानि यन्ति। यो जागार तमयं सोम श्राह, तवाहमस्मि सख्ये न्योकाः॥

ऋग्वेद 05.44.14

जो जागा हुआ है वही ऋचाओं से कुछ लाभ ले सकता है, जो जागा हुआ है उसी की साम वेद के मंत्र सहायता करते हैं। जो जागा हुआ है उसी के आगे चाँद मैत्री के लिए हाथ पसारता है! उसी की यह सारी प्रकृति दासी बनती है, जो जागा हुआ है, इसलिये-

उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवान यज्ञेन बोधय।

आयुः प्राणं प्रजाँ पशून् कीर्ति यजमानं च वर्धय॥

अथर्व वेद 19.31.1

उठ खड़ा हो, जाग जा, ऐ ज्ञानी! यज्ञ द्वारा अपने अन्दर देव-भावों को जगा ले। अपनी आयु को, प्राण को, प्रज्ञा को, कीर्ति को बढ़ा, पशुओं की बढ़ा, यज्ञ करने वाले को बढ़ा।

कृतं में दक्षिणे हस्ते, जयो में सव्य आहितः।

गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनंजयो हिरण्यजित॥

अथर्व वेद 7.50.8

मैं हाथ पर हाथ धरकर बैठने वाला नहीं हूं। मेरे दाहिने हाथ में कर्म है और बाँये हाथ में विजय धरी है। इस कर्म रूपी जादू की छड़ी हाथ में लेते ही गौ, घोड़े, धन-धान्य, सोना-चाँदी जो चाहूँगा सो मेरे आगे हाथ बाँधकर खड़ा हो जायेगा।

सूर्यो में चक्षुर्वातः प्राणोऽन्तरिक्षमात्मा पृथिवी शरीरम्।

अस्तृतो नामाहमयमास्म॥

(अथर्व वेद 59-7)

यह मेरी देखने में छोटी-सी लगने वाली आँख शक्ति में छोटी नहीं, किन्तु सूर्य के बराबर है। मेरी प्राण-शक्ति का अंदाजा लगाना हो तो इस अपार वायुमण्डल से लगा लो। मेरे शरीर के मध्य भाग की तुलना अंतरिक्ष से कर सकोगे। और मेरा यह छोटे से कद वाला शरीर देखने में छोटा होता हुआ भी शक्ति में छोटा नहीं, किन्तु समूची पृथ्वी के बराबर है। मैं अनीश्वर हूँ, किसी के मारे मर नहीं सकता।

उत्क्रामातः पुरुष माव पत्था,

मृत्योः षड्वीशमवमुँचमानः॥

अथर्व वेद 8-1-4

ए नर! उन्नति कर, अवनत मत हो, मौत की बेड़ी को काट डाल।

वर्ष-13 सम्पादक -आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-5


उपेक्षा

(श्री फूलचन्द जैन)


उपेक्षा (Kavita)

मुझ को भी है परवाह नहीं!

जग में परवाह किसे, मुझको जग की परवाह नहीं॥

जग से मैं तोड़ चुका नाता, उसका भी इसमें क्या जाता।

अपने ही सुख की सीमा तक, सीमित रहता मैं सुख पाता॥

मैं करूं याचना क्यों सुख की, जब उसकी मुझको चाह नहीं-

मुझको भी है परवाह नहीं॥

कुछ-कुछ मैंने भी स्वाद लिया, इन सुख की तरल तरंगों का।

कुछ-कुछ आभास मिला मुझको, नव प्रेम प्रसंग उमंगों का॥

जग की अस्थिरता में लय है, यह बहता सदा प्रवाह नहीं-

मुझको भी है परवाह नहीं॥

है काम नहीं आशा तेरा, आह्वान आज निराशा का।

जल ही जब यहाँ असम्भव है, फिर आश्रय कहाँ पिपासा का॥

जिस पथ में भूल-भुलैया हैं, मैं चलता उसकी राह नहीं-

मुझको भी है परवाह नहीं॥


सर्वत ks मुखी उन्नति

धीरस्तुष्टो भवेन्नैवह्ये कस्याँ हि समुन्नतौ। कृयतामुन्नति स्तेन सर्वास्वाशासु जीवने॥

अर्थ-विज्ञ मनुष्य को एक ही प्रकार की उन्नति से सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिए वरन् सभी दिशाओं में उन्नति करनी चाहिए।

जैसे शरीर के कई अंग हैं और इन सभी का पुष्ट होना आवश्यक होता है वैसे ही जीवन की सभी दिशाओं का विकास होना सर्वतोमुखी उन्नति का चिन्ह है।

यदि पेट बहुत बढ़ जाय और हाथ पैर बहुत पतले हो जायें तो इस विषमता से प्रसन्नता न होकर चिन्ता ही बढ़ेगी। इसी प्रकार कोई आदमी केवल धनी, केवल विद्वान, केवल पहलवान, बन जाय तो वह उन्नति सुखदायक न होगी। वह बलवान किस काम का जो दाने-दाने को मुहताज हो, वह विद्वान किस काम का जो रोगों से ग्रस्त हो, वह धनी किस काम का जिसके पास न विद्या है न बल?

जैसे किसान सब ओर से खेत की रखवाली करता है, सेनापति सब युद्ध भागों की रक्षा करता है, वैसे ही जीवन धन की रक्षा और उन्नति सर्वतोमुखी होनी चाहिए। जिस ओर लापरवाही की जायगी उसी ओर से ऐसे छिद्र हो सकते हैं जो भर-पूर धन सम्पत्ति की नाव को बीच में ही डुबो दें।

मानव जीवन के आठ पहलू हैं, आठ बल हैं। शक्ति की आठ भुजाएँ हैं—(1) स्वास्थ्य (2) विद्या (3) धन (4) व्यवस्था (5) संगठन (6) यश (7) शौर्य (8) सत्य। इन आठों के सम्मिलन से एक महत्वपूर्ण सर्वांगपूर्ण ‘बल’ बनता है। इन शक्तियों में से जिसके पास जितना भण्डार होगा वह उतना ही अधिक विकसित माना जायगा।

अब इन सभी बलों के सम्बन्ध में कुछ चर्चा करेंगे।

(1) स्वास्थ- की महत्ता हम सब जानते हैं कि वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल है। अस्वस्थ मनुष्य तो इस पृथ्वी का एक भार है जो दूसरों के कष्ट का कारण बनकर अपनी सांसें पूरी करता है। सच्चे जीवन का स्वाद लेने और मनुष्यता के उत्तरदायित्वों को पूरा करने से वह सर्वथा वंचित रह जाता है। किसी मार्ग में उन्नति करना तो दूर, उसे प्राण धारण किये रहना भी बड़ा कठिन हो जाता है। स्वास्थ्य सर्वप्रथम और सर्वोपरि बल है। इस बल के बिना अन्य सब बल निरर्थक हैं। इसलिए स्वस्थता की ओर सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

अस्वस्थ होने के थोड़े से कारण हैं यदि हम उनकी ओर सतर्क रहें तो बीमारी और कमजोरी से बच कर स्वाभाविक स्वस्थता प्राप्त कर सकते हैं। स्वास्थ्य की ओर पर्याप्त ध्यान न देना, निरोगता में पूरी दिलचस्पी न लेना, तन्दुरुस्ती के खराब होने का सबसे बड़ा कारण है। रुपया कमाने में, कारोबार व्यापार में, या अनेक अन्य कामों में जितनी पेनी दृष्टि से, होशियारी और दिलचस्पी से काम करते हैं यदि उसका दसवाँ भाग भी तन्दुरुस्ती की और ध्यान दिया जाय तो दुर्बल होने की नौबत न आवे। आमतौर से लोग शरीर को आराम देने और सजाने की तो फिक्र करते हैं, इन्द्रिय भोगों के साधन जुटाते हैं पर यह नहीं सोचते कि चिरस्थायी स्वास्थ्य और दीर्घजीवन किस प्रकार प्राप्त हो सकता है। यदि हम धनी बनने की इच्छा करें तो अवश्य ही सफल मनोरथ हो सकते हैं। धनी बनने से स्वस्थ बनना सुगम है।

स्वाद, फैशन या आराम की ओर ध्यान न देकर आरोग्य की दृष्टि से हमें अपना जीवन क्रम बनाना चाहिए। प्रातःकाल जल्दी उठना, रात को जल्दी सोना, नियमित व्यायाम, त्वचा को खूब रगड़ रगड़ कर पूरा स्नान, मालिश, मलों की भली प्रकार सफाई, चटोरेपन को बिल्कुल तिलाँजलि देकर सात्विक मन से, कम खूब चबाकर, प्रसन्नतापूर्वक भोजन करना सामर्थ्य के अनुसार श्रम, चिन्ता से बचाव, वीर्य रक्षा आदि बातों में सावधानी बरती जाय तो स्वस्थता परछांई की भाँति साथ रहेगी। तन्दुरुस्ती हकीम डाक्टरों की दुकानों या रंग बिरंगी शीशियों में नहीं है वरन् आहार-बिहार की सात्विकता-एवं सावधानी में है। आडम्बरी, कृत्रिम, चटोरे, प्रकृति विरुद्ध, आलसी रहन-सहन से हम रोगी बनते हैं, उसे परित्याग करके यदि सादा, सीधा, सरल और प्रकृति अनुकूल जीवन क्रम बनाया जाय तो स्वस्थता निश्चित रूप से हमारे साथ रहेगी।

(2) विद्या- के दो विभाग हैं, एक शिक्षा दूसरी विद्या। साँसारिक जानकारी को शिक्षा कहते हैं जैसे भाषा, भूगोल, गणित, इतिहास, चिकित्सा, व्यापार, शिल्प, साहित्य, संगीत, कला, विज्ञान, नीति, न्याय, व्यवस्था आदि। विद्या-मनुष्य के कर्तव्य और उत्तरदायित्व को हृदयंगम करने को कहते हैं। धर्म, आध्यात्म, शिष्टाचार, सेवा, पुण्य परमार्थ, दया त्याग, सरलता, सदाचार, संयम, प्रेम, न्याय, ईमानदारी, ईश्वर परायणता, कर्तव्य भावना प्रभृति वृत्तियों का जीवन में घुल मिल जाना विद्या है। शिक्षा और विद्या दोनों को ही प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। शिक्षा से साँसारिक जीवन की श्रीवृद्धि होती है और विद्या से आत्मिक जीवन में सुसम्पन्नता आती है।

बौद्धिक प्रकाश के लिए जिज्ञासा की सबसे अधिक आवश्यकता है। जिसके मन में जानने की इच्छा उत्पन्न होती है अनेकों तर्क वितर्क उठते हैं, चिन्तन मनन और विवाद करने में जिसे रस आता है, जो अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहता है, जिसे ज्ञान संग्रह का शौक है, जो ज्ञानवान बनने के महत्व और आनन्द से परिचित है वह नित्यप्रति अधिक ज्ञानवान होता जायेगा। ज्ञानवान बनने के अनेकों साधन उसे पग पग पर प्राप्त होते रहेंगे। मूढ़मति के मनुष्यों को जहाँ कोई “खास बात” नहीं दिखाई पड़ती, जिज्ञासु व्यक्ति की सूक्ष्म दृष्टि-वहाँ भी बहुत सी जानने योग्य बातें ढूँढ़ निकालती हैं। ज्ञानवान बनने की तीव्र आकाँक्षा हुए बिना मस्तिष्क की वे सूक्ष्म शक्तियाँ संचित नहीं हो सकती जिनके आधार पर शिक्षा और विद्या की प्राप्ति हुआ करती है। ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ के सूत्रकार ने ज्ञान साधना का प्रथम उपाय जिज्ञासा को बताया है जिज्ञासु होना विद्वान होने का पूर्व रूप है।

पर्यटन, यात्रा, समाचार पत्रों का पढ़ना, विचार पूर्ण पुस्तकों का अध्ययन, सत्संग, आम लोगों की मनोवृत्तियों का अध्ययन, घटनाओं पर विचार और उनका निरूपण एवं अनुभव सम्पादन में रुचि लेने वाले मनुष्य बुद्धिमान हो जाते हैं। जो अपनी भूलों को ढूँढ़ने और सही निष्कर्ष तक पहुँचने के हठधर्मी से बचाकर अपने मस्तिष्क को खुला रखते हैं वे आवश्यक एवं उपयोगी ज्ञान को पर्याप्त मात्रा में एकत्रित कर लेते हैं। समर्थक और विरोधी दोनों तथ्यों को समझने और उनकी विवेचना करने के लिए जो लोग प्रस्तुत रहते हैं वे भ्रम से, अज्ञान से बचकर वास्तविकता तक पहुँच जाते हैं। अपनी जानकारी की अल्पता को समझना और अधिक मात्रा में अधिक वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करने की निरन्तर चाह रखना, मनुष्य को क्रमशः ज्ञानवान बनाता है। ज्ञान वृद्धि को प्राप्त करने के अवसरों को जो लोग तलाशते रहते हैं और वैसे अवसर मिलने पर उनका समुचित लाभ उठाते हैं, उनकी विद्या दिन दिन बढ़ती जाती है।

(3) धन- समय के प्रभाव से आज पैसे का मनुष्य जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। मनुष्य की लघुता महानता अब पैसे के पैमाने से नापें जाने लगी है। पैसे के द्वारा सबकी सुख सामग्रियाँ, सब प्रकार की योग्यता और शक्तियाँ खरीद ली जाती हैं। आज जो अनुचित, अत्यधिक महत्व पैसे को प्राप्त है, उसकी ओर ध्यान न दिया जाय तो भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि पैसे की आवश्यकता हर एक को है। भोजन, वस्त्र एवं मकान की जरूरत पड़ती है। अतिथि सत्कार, परिवार का भरण पोषण, बच्चों की शिक्षा, विवाह, चिकित्सा, दुर्घटना, अकाल, आपत्ति आदि के लिए थोड़ा बहुत पैसा हर सद्गृहस्थ के पास रहना आवश्यक है।

धन उपार्जन की अनेकों प्रणाली संसार में प्रचलित हैं। उनमें से व्यापार, उत्पादन एवं निर्माण की प्रणाली सब से उत्तम है। शिल्प, वाणिज्य, कलाकौशल, कृषि, गौ पालन, दलाली आदि के द्वारा आसानी से पैसा पैदा किया जा सकता है। नौकरी बिना पूँजी वाले और ढीले स्वभाव वालों का सहारा है। ऐसे ही किसी उत्तम कार्य से जीविका उपार्जित करनी चाहिये। विश्वस्तता, मधुर व्यवहार, परिश्रम, ईमानदारी, अच्छी चीज, वायदे की पाबन्दी, सजावट, विज्ञापन एवं मितव्ययिता के आधार पर हर व्यक्ति अपने कारोबार में वृद्धि कर सकता है। नौकरी, उत्पादन, निर्माण, व्यापार सभी कार्यों में इनके आधार पर आमदनी और मजबूती बढ़ सकती है। न्यायोचित आधार पर समुचित जीविका प्राप्ति कर लेना कुछ बहुत कठिन नहीं है।

थोड़े प्रयत्न से अधिक धन कमाने के लिये लोग चोरी, डकैती, लूट, रिश्वत, ठगी, उठाई गिरी, बेईमानी, धोखा, मिलावट, विश्वासघात, जुआ, सट्टा, लाटरी, अन्याय, शोषण, अपहरण आदि नीच निन्दित मार्गों का आश्रय ग्रहण करते हैं। इस प्रकार का धन कमाने में लोक निन्दा, राजदण्ड, शत्रुता, घृणा, प्रति हंसा का भय तो प्रत्यक्ष ही है। इसके अतिरिक्त इस प्रकार झटके का पैसा बुरी तरह अपव्यय होता है। जो पैसा पसीना बहाकर, किफायतशारी से नहीं जमा किया गया है, उसके खर्च होने कुछ दर्द नहीं होता। चोर, जुआरी, ठग, इस हाथ विपुल धन कमाते हैं घोर उस हाथ होली में जलाकर स्वाहा कर देते हैं। इस प्रकार अपव्यय से अनेक पाप, दुर्गुण एवं बुरे उदाहरण उत्पन्न होते हैं। सबसे खास बात यह है कि ऐसा पैसा बीमारी, मुकदमा, चोरी, व्यसन आदि कुमार्गों में नष्ट हो जाता है। यदि बच भी रहे तो कुकर्मी पिता के उत्तराधिकारी ऐसे कुकर्मी निकलते हैं कि उस पैसे की होली तपे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता।

इन सब बातों पर ध्यान रखते हुए परिश्रमपूर्वक ईमानदारी के साथ उचित मार्गों से धन कमाना चाहिये। सही मार्गों से धनी बनना प्रशंसनीय है। धन को जोड़ जोड़कर विशाल राशि जमा करने में नहीं वरन् उसका ठीक समय पर आवश्यक एवं उचित उपयोग कर लेने में बुद्धिमानी है। धन को विवेकपूर्वक कमाना चाहिए और विचारपूर्वक खर्च करना चाहिए। तभी धन की शक्ति का वास्तविक लाभ लिया जा सकता है।

(4) व्यवस्था- बहुत बड़ी शक्ति है। बड़ी बड़ी सफलताएँ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को अच्छा व्यवस्थापक होना चाहिए। जो व्यक्ति कार्य पूरा करने का समुचित प्रबन्ध कर सकता है वह बहुत बड़ा जानकार है, धनी विद्वान और स्वस्थ पुरुष अनेक स्थानों पर असफल रहते देखे गये हैं पर चतुर प्रबंधक स्वल्प साधनों से बड़े-बड़े कार्यों के लिए सरंजाम जुटा डालते हैं और अपनी हिम्मत, चतुरता, बुद्धिमत्ता एवं व्यवस्था के बल पर उन्हें पूरा कर लेते हैं।

(अ) दूसरों पर प्रभाव डालना (ब) उपयोगी मनुष्यों का सहयोग एकत्रित करना (स) काम की ठीक योजना बनाना (द) नियमित कार्य प्रणाली का संचालन करना (ह) रास्ते में आने वाली कठिनाइयों का निराकरण करना, यह पाँच गुण व्यवस्थापकों में देखे जाते हैं। वे मधुर भाषण, शिष्टाचार, सद्व्यवहार, लोभ, भय आदि से दूसरों को प्रभावित करना जानते हैं। अनुपयोगी, अयोग्य, लोगों की उपेक्षा करके काम के आदमियों को सहयोग में लेते हैं। लाभ और हानि के हर एक पहलू को, वर्तमान परिस्थितियों को, ध्यान में रखते हुए अनुभव और आँकड़ों के आधार पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने के पश्चात वे अपने काम की योजना बनाते हैं। समय की पाबंदी, नियमितता, ठीक समय पर कार्य करना, स्वच्छता, निरालस्यता, एवं जागरुकता उनके स्वभाव का एक अंग बन जाती है। दोषों को वे बारीकी से ढूँढ़ लेते हैं और उन्हें दूर हटाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं। बदलती हुई परिस्थितियों के कारण जो खतरे आते हैं उन्हें रोकने एवं शमन करने पर उनका पूरा ध्यान रहता है। सफल व्यवस्थापक में इस प्रकार के गुण होते हैं, उनकी सूझ-बूझ व्यावहारिक होती है।

निरालस्यता, जागरुकता, स्वच्छता, नियमितता, पाबंदी, मर्यादा का ध्यान रखने में मनुष्य के विचार और कार्य व्यवस्थित होने लगते हैं और वह धीरे-धीरे अपने क्षेत्र में एक कुशल व्यवस्थापक बन जाता है। ऐसे आदमी का दुनिया लोहा मानती है।

(5) संगठन- शास्त्रकारों ने ‘संघशक्ति कलौयुगे’ सूत्र में वर्तमान समय में संघशक्ति संगठन, एकता को प्रधान शक्ति माना है। जिस घर में, कुटुम्ब में, जाति में, देश में, एकता है वह शत्रुओं के आक्रमण से बचा रहता है, एवं दिन दिन समुन्नत होता है। फूट के कारण जो बर्बादी होती है वह जग जाहिर है। अच्छे मित्रों का, सच्चे मित्रों का, समूह एक दूसरे की सहायता करता हुआ आश्चर्यजनक उन्नति कर जाता है। तन बल, धन बल, भुज बल की भाँति जन बल भी महत्वपूर्ण है। जिनके साथ दस आदमी है वह शक्तिशाली है। जनशक्ति द्वारा बड़े दुखद कार्यों को आसान बना लिया जाता है।

घर में और बाहर हर जगह मित्रता बढ़ानी चाहिए। समानता के आधार पर परस्पर सहायता करने वाला गुट बनाना चाहिए, उसे बढ़ाना और मजबूत करना चाहिए। संघ शक्ति से, मन बल से, जीवन विकास में असाधारण सहायता मिलती है, संगठित गौऔ का झुण्ड सामूहिक हमला करके बलवान बाघ को मार भगाता है।

आप सामूहिक प्रयत्नों से अधिक दिलचस्पी लीजिए। अकेले माला जपने की अपेक्षा संध्या, भजन, कीर्तनों में सामूहिक रूप में सम्मिलित होना पसन्द कीजिये। अकेले करतब करने की अपेक्षा खेलों में भाग लेना और अखाड़ों में जाना ठीक समझिये। सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक, बौद्धिक एवं मनोरंजन संस्थाओं में भाग लीजिए यदि आपके यहाँ वे न हों तो स्थापित कीजिये, अपने जैसे समान विचार के लोगों की एक मित्र मण्डली बना लीजिये और आपस में खूब प्रेमभाव बढ़ाइये। घर में और बाहर सच्ची मैत्री का, एकता का बढ़ाना एक महत्वपूर्ण वास्तविक लाभ है।

(6) यश- नीतिकारों का कहना है कि जिसका यश है उसका जीवन-जीवन है। प्रतिष्ठा का, आदर का, विश्वास का, श्रद्धा का संपादन करना सचमुच एक बहुत बड़ी कमाई है। देह मर जाती है पर यश नहीं मरता। ऐतिहासिक सत्पुरुषों को स्वर्ग सिधारे, हजारों वर्ष हो गये परन्तु उनके पुनीत चरित्रों का गायन कर असंख्यों मनुष्य अब भी प्रकाश प्राप्त करते हैं।

जो व्यक्ति अपने अच्छे आचरण और अच्छे विचारों के कारण, सेवा-साहस, सच्चाई एवं त्याग के कारण लोगों की श्रद्धा प्राप्त कर लेता है उसे बिना माँगे अनेक प्रकार से प्रकट और अप्रकट सहायताएँ प्राप्त होती रहती हैं। यशस्वी व्यक्ति पर कोई संकट आता है तो उसका निवारण करने के लिए अनेकों व्यक्ति आश्चर्यजनक सहायता करते हैं, इस प्रकार उन्नति के लिये अयाचित सहयोग प्राप्त करते हैं। सुख्याति द्वारा जिनने दूसरों के हृदय को जीत लिया इै इस संसार में यथार्थ में वे ही विजयी हैं।

प्रतिष्ठा आत्मा को तृप्ति करने वाली दैवी सम्पत्ति है। बाजार में ईमानदारी एवं सच्चाई के लिये जिसकी ख्याति है वही व्यापारी स्थायी लाभ कमाता है। यशस्वी पर हमला करके, अपने आपको सबकी निगाह में गिरा लेने के लिये कोई विरले ही दुस्साहस करते हैं। यह यश सद्गुणों से, सत्कार्यों से, सद्विचारों से एवं भीतर बाहर से विश्वस्त रहने वालों को ही प्राप्त होता है। महात्मा गाँधी से बड़े बड़े साम्राज्य थरथराते थे, वे गाँधी व्यक्ति से नहीं डरते थे वरन् उनके पीछे जो विशाल जन समूह की अटूट श्रद्धा थी उससे घबराते थे। यश सचमुच शक्ति है। उस शक्ति से सम्पन्न मनुष्य तुच्छ से महान् बन जाता है।

(7) शौर्य- साहस, बाजी मारता है। हिम्मत वालों की खुदा मदद करता है। आपत्ति में विचलित न होना, संकट के समय धैर्य रखना, विपत्ति के समय विवेक को कायम रखना मनुष्य की बहुत बड़ी विशेषता है। बुराइयों के विरुद्ध लड़ना, संघर्ष करना और उन्हें परास्त करके दम लेना शौर्य है। शाँति अच्छी है-परन्तु अशाँति का अंत करने वाली अशान्ति भी शान्ति के समान ही अच्छी है। कायरता की जिन्दगी से मर्दानगी की मौत अच्छी है। स्वाभिमान, धर्म और मर्यादा की रक्षा के लिए मनुष्य को बहादुर होना चाहिए।

खतरे में पड़ने का चाव, निर्भीकता, बहादुरी, जोश यह सब आन्तरिक प्रेरक शक्ति के, गरम खून के चिन्ह हैं। जो फूँक फूँक कर पाँव धरते हैं वे सोचते और मौका ढूँढ़ते रह जाते हैं पर साहसी पुरुष कूद पड़ते हैं और तैरकर पार हो जाते हैं। दब्बू, डरपोक, कायर, कमजोर, शंकाशील मनुष्य सोचते और डरते रहते हैं उनसे कोई असाधारण काम नहीं हो पाता। यह पृथ्वी वीर भोग्या है। वीर पुरुषों के गले में ही यह जयमाला पहनाई जाती है। उद्योगी सिंह पुरुष ही लक्ष्मी को प्राप्त करते हैं।

मनुष्य को साहसी होना चाहिये। विपत्ति आने पर शोक, चिन्ता भय, घबराहट विवेकपूर्वक उस संकट का समाधान करने के लिये ठीक-ठीक सोच सकने का साहस होना मनुष्यता का लक्षण है। आतताइयों से मुठभेड़ करने की बहादुरी होनी चाहिए। आगे बढ़ने के मार्ग में जो खतरे हैं उनसे उलझने में जिसे रस आता है वह शूरवीर है। जो साहसी, पराक्रमी, कर्मठ और निर्भीक है वह शक्तिमान है क्योंकि साहस रूपी प्रचण्ड शक्ति उसके हृदय में विद्यमान है।

(8) सत्यता- में अकूत बल भरा हुआ है साँच को कहीं आँच नहीं। सत्य इतना मजबूत है कि उसे किसी भी हथियार से नष्ट नहीं किया जा सकता। जिसके विचार और कार्य सच्चे हैं वह इस संसार का सबसे बड़ा बलवान है। उसे कोई नहीं हरा सकता। सत्यता पूर्ण हर एक कार्य के पीछे दैवी शक्ति होती है। असत्य के पैर जरा सी बात में लड़खड़ा जाते हैं और उसका भेद खुल जाता है किन्तु सत्य-अडिग चट्टान की तरह सुस्थिर खड़ा रहता है। उस पर चोट करने वालों को स्वयं ही परास्त होना पड़ता है।

सदुद्देश्य, सद्भाव, सत्कर्म, सत्संकल्प, चाहे कितने ही छोटे रूप में सामने आवें यथार्थ में इनमें बड़ी भारी प्रभावशालिनी महानता छिपी रहती है। हजारों आडम्बरों से लिपटा हुआ असत्य जो कार्य नहीं करता वह कार्य सीधी और सरल सत्यता द्वारा पूरा हो जाता है। सत्यनिष्ठ पुरुष प्रभावशाली, तेजस्वी और शक्तिशाली होता है, जो सत्यनिष्ठ है, मन, कर्म और वचन से सत्य परायण रहते हैं, उनके बल की किसी भी भौतिक बल से तुलना नहीं की जा सकती।

गायत्री का 14 वाँ अक्षर ‘धी’ सर्वतो मुखी उन्नति की प्रेरणा करता है। हम एक ही बल से सन्तुष्ट न रहें वरण उपरोक्त आठों दिशाओं में जीवन का विकास करें तभी गायत्री माता के सच्चे आज्ञानुवर्ती कहला सकते हैं।


वेदान्त और व्यावहारिक जीवन

(श्री ठाकुर राजबहादुर सिंह जी)

वास्तव में ‘वेदान्त’ तत्वज्ञान का वह विशुद्ध स्वरूप है जिसने समय पर अपने प्रवर्तक और परितोषक महान् आचार्यों द्वारा तत्कालीन जिज्ञासु जनता के जीवन को सत्य का वास्तविक आभास दिया है। किन्तु एक दृष्टि से देखा जाय तो प्राचीनकाल में वेदान्त की उतनी आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि तब आध्यात्मिकता का प्रसार पर्याप्त रूप में था और लोग ऐसा असन्तुलित जीवन नहीं व्यतीत करते थे जैसा इस पदार्थवादी युग में कर रहे हैं। उन दिनों महान् सत्य का अनुभव करने और इस सतत् परिवर्तित मिथ्या चमत्कार युक्त संसार की वास्तविकता समझने के लिये विभिन्न मार्ग थे, और मानव में ऐहिक दुर्गुणों ने इतना घर नहीं बना लिया था जैसा कि आजकल हो रहा है। उन दिनों वेदांत के अध्ययन का ध्येय, मुख्यतः जगत की वाह्य विभिन्नता में छिपी ‘एकता’ को समझकर महत् सत्य की अनुभूति द्वारा मुक्ति प्राप्त करना मात्र होता था, पर आज स्थिति भिन्न है। जिस साँसारिकता ने पहले मनुष्य का स्पर्श मात्र किया था उसने अब उसे जकड़ लिया है और वह माया मोह के प्रबल पाश में बँधकर ऐसा अन्धा और अशक्त हो गया कि वह उस ऊँचे उद्देश्य के लिए वेदान्त का विद्यार्थी बनने को तैयार न होगा। ऐसी अवस्था में आवश्यकता इस बात की है कि हम लोगों को दैनिक जीवन में वेदान्त की व्यावहारिक उपयोगिता का परिचय करायें और यह बता दें कि वेदान्त की सच्ची शिक्षा ग्रहण करके वह किस प्रकार ऐसा संतुलित जीवन व्यतीत कर सकते हैं। जिससे लोक परलोक दोनों सुधरें। प्राचीनकाल में सत्य की अनुभूति के लिए गुरु का सान्निध्य प्राप्त कर श्रवण, मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस प्रकार के मुमुक्षु सद्ज्ञान लाभ करते थे, पर सुख की चिन्ता में व्यस्त मानव को इतना अवकाश नहीं है कि वह उसके मूल की खोज करे-वह तो कस्तूरी मृग की तरह आत्मज्ञान रूपी सुगंध की खोज में दूर-दूर दौड़ता और भटकता रहा है। ऐसी अवस्था में उसे वाह्य जगत में ही वेदान्त के सिद्धान्तों का दिग्दर्शन कराकर सत्य के निकट लाना है, क्योंकि परिस्थिति बदल जाने के कारण साधन और विधि दोनों ही बदल गये हैं और हम जिस स्थिति में है उसी में उसका समुचित उपयोग करना है।

साधन और विधि

प्राचीनकाल के मुमुक्षु और जिज्ञासु तो अब मिलेंगे नहीं, जो केवल ज्ञान प्राप्त करके अपनी जिज्ञासा शान्त करने और ज्ञान द्वारा मोक्ष प्राप्त करने की अभिलाषा से वेदान्त का अध्ययन करें इसलिए हमें इस युग के उच्च और मध्यवृत्ति श्रेणी के लोगों में ऐसे विद्यार्थी प्राप्त करने होंगे जो साँसारिक जीवन की वर्तमान स्थिति से सन्तुष्ट नहीं हैं और जिनमें आध्यात्मिक विकास की थोड़ी बहुत अभिलाषा बीज रूप में विद्यमान है। इस प्रकार के अर्ध जिज्ञासु जब वेदान्त का कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेंगे तो उसे क्रियात्मक रूप में परिणत करने का प्रयत्न करेंगे और उनका जीवन संतुलित और सुखी बन जायगा।

यह सच है कि वेदान्त की शिक्षा का सर्वोत्तम साधन त्याग है, किन्तु उसका यह अर्थ नहीं कि वेदान्ती बनने के लिये संन्यासी बन जाने की आवश्यकता है। स्वामी विवेकानंद ने यही समझाकर कहा था कि “वेदान्त की शिक्षा है-संसार का त्याग करना चाहिये, पर केवल संसार त्याग करने के लिए उसे नहीं छोड़ना चाहिये। संसार में रहकर भी उसी का न बन जाना त्याग की सच्ची कसौटी है।” इसका यह स्पष्ट अर्थ है कि संसार में रहकर-गृहस्थ भी वेदान्त का मार्ग ग्रहण कर सकता है। वेदान्त के अभ्यासी को केवल अपनी मनोदशा ऐसी बना लेनी चाहिये जिससे कि वह जल में कमल पत्रवत् रह सके।

जब वेदान्त का विद्यार्थी यह निश्चय कर ले कि वह दोनों को सम्भालने की प्रवृत्ति और क्षमता रखता है तब वह उसका सच्चा अधिकारी हो जाता है।

वेदान्त क्या है?

व्यावहारिक जीवन में वेदान्त के सिद्धान्तों को लागू करने वाले को सबसे पहले वेदान्त के सच्चे स्वरूप का अध्ययन करना पड़ेगा। इस तत्वज्ञान का विवेचन उपनिषदों, ब्रह्मसूत्रों और गीता में दिया गया है--इसलिये इन तीनों ग्रन्थों को प्रस्थान त्रयी कहा जाता है जिसका अर्थ यह है कि इन तीनों चरणों के आधार पर यह तत्वज्ञान टिका हुआ है। इसका नाम ‘वेदान्त’ इसलिए पड़ा कि यह वेदों का अन्त (वेद--अन्त) होने का दावा करता है। यहाँ वेद का अर्थ ऋग्, युज्, साम और अथर्व नहीं प्रत्युत ‘ज्ञान’ है, और ज्ञान नित्य और अनंत है और इस अनन्त रहस्यपूर्ण जगत में इसकी कोई सीमा निर्धारित नहीं की जा सकती। संसार में अब तक जो कुछ ज्ञात हो चुका है और आगे होने वाला है, उन सभी का सूत्र वेदों में विद्यमान है। सीमित अर्थ में वेदान्त का अर्थ-वह आध्यात्मिक ज्ञान जिसमें अन्य सभी ज्ञानों का समावेश है। इसका यह स्पष्ट अर्थ है कि आध्यात्मिक ज्ञान के अतिरिक्त संसार का ज्ञान भी उसी में सन्निहित है, अतः संसार का त्याग करके ही उसका ज्ञान प्राप्त किया जाय, यह वाँछनीय नहीं है। यही नहीं वेदान्त के अंदर तो विस्तृत अर्थ में सारे संसार के धर्मग्रन्थ-बाइबिल, कुरान, धर्मं पद, जिंदावेस्ता आदि तथा कला वान भी आ जाते हैं। भविष्य में जो गौतमबुद्ध, ईसामसीह और भगवान शंकर का समकक्ष पैदा होगा वह भी वेदों के परे कुछ भी कह या कर नहीं सकता। स्वामी विवेकानन्द जी ने वेदों के बारे में कहा है—”वेद अनादि और अनंत हैं। कुछ लोगों को यह बात असंगत सी लग सकती है कि कोई भी पुस्तक अनादि और अनंत कैसे हो सकती है। किन्तु वेद का अर्थ पुस्तक विशेष नहीं वेद का अर्थ तो है आध्यात्मिक विधानों का संग्रहीत कोष, जिसकी खोज विभिन्न व्यक्तियों ने अलग अलग समयों में की है।” दूसरे शब्दों में इसका अर्थ यह हुआ कि यह युगों का संग्रहीत अनुभव है जो सभी देशों की युगों की संतानों को प्राप्त हो रहा है। प्रश्न हो सकता है कि यदि वेद, ज्ञान का असीम भण्डार है तो फिर कोई एक तत्वज्ञान उसका अन्त (वेद-अन्त) कैसे बन सकता है, क्योंकि फिर तो वेद अन्तहीन ठहरे? पर यह विरोधाभास केवल वाह्य और प्रकट रूप में ही दिखाई देता है। ज्ञान दो प्रकार का होता है- एक तो इन्द्रियम ग्राह्य जो केवल बाह्यजगत से सम्बंध रखता है और दूसरा है आभ्यंतरिक जो अंतर्निहित सत्य को प्रत्यक्ष करता है। पहला-साँसारिक ज्ञान तो सदा पूर्ण बना रहेगा, क्योंकि उसके बारे में विज्ञान जितनी खोज करता जा रहा है उतना ही यह बढ़ता जाता है और जगत का बाह्य चमत्कार होने में ही नहीं आता। उदाहरण के रूप में हम कह सकते हैं कि विज्ञान ने इस बाह्य जगत् का रहस्य जानने के लिये छानबीन की और उसने विश्लेषण करके यह बता दिया कि जल, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के योग से बनता है। पर ऑक्सीजन और हाइड्रोजन क्या है? यह कौन बता सकता है। वैज्ञानिक आविष्कारों और खोजों के पहले जहाँ संसार में एक बात अज्ञात थी, वह अब उतनी बड़ी खोजबीन के पश्चात अनेक बातें अज्ञात हो रही हैं। प्रकृति का रहस्य सुलझने के बदले गहनतर होता जा रहा है-उलझता जा रहा है। विज्ञानवेत्ता मनुष्य भी वही है। जहाँ शताब्दी पहले उसका पूर्वज था। वह बाह्य रेज, तार, हवाई जहाज, रेडियो, टेलीविजन और अणुबम से अपने को आगे बढ़ा हुआ समझता है, पर जो ज्ञान आज वह विज्ञान के याँत्रिक साधनों से प्राप्त कर सका है वह और उससे भी अधिक हमारे अंतर्दृष्टि ऋषियों ने सहस्रों लाखों वर्ष पूर्व प्राप्त कर लिया था। परकाया-प्रवेश और नक्षत्रों का विवरण उन्होंने अपने सहज ज्ञान से पा लिया था जो अभी तक वैज्ञानिकों के लिए समस्या ही बना हुआ है। अब रही आन्तरिक-आध्यात्मिक सत्य को प्रत्यक्ष करने की बात, सो वेदान्त का कार्य क्षेत्र वास्तव में यही है और वेदान्त को वेदान्त नाम ही इसलिए दिया गया है कि वह वास्तव में ज्ञान का अंत है उसके परे कोई जा नहीं जा सकता। वेदान्त और विज्ञान दोनों इस दृष्टि से इस संसार और इसके ध्येय के पूरक है।

व्यापारिक वेदान्त की साधना

ऊपर बताई हुई बातों से यह जाना जा सकता है कि जब साँसारिक-वैज्ञानिक और आध्यात्मिक ज्ञान इस जगत में एक दूसरे के पूरक हैं तो उनका सामंजस्य और समन्वय अनिवार्य है। इसी के अभाव में असमय में त्यागी या संन्यासी बनने वाले का ज्ञान एकाँगी रहता है। इस प्रकार जो लोग सदा व्यापार, कृषि, नौकरियों या अन्य कामकाजों में सम्यक् मनोयोग और एकाग्रतापूर्वक लगे रहते हैं उन्हें कभी इस बात का भान नहीं होता कि उनके प्रत्यक्ष संसार से परे भी कोई शक्ति है और स्वयं उन्हीं के अन्दर ऐसी शक्ति छिपी है जिसका विकास करके उनका एकाँगी-साँसारिक मात्र ज्ञान पूर्ण हो सकता है और उन्हें पूर्णतः सन्तुलित जीवन के परिणाम स्वरूप सुख और शान्ति मिल सकती है इसके लिए उन्हें अपनी आध्यात्मिक चेतना जागृत करनी होगी। उन्हें इस को समझकर दैनिक जीवन में उसका आभास प्राप्त करना होगा-

(1) संसार में जो भिन्नताएँ और भेद देखे जाते हैं वे वास्तव में (क) काल (ख) व्यवधान और कारण एवं परिणाम के परस्पर सम्बंध के अन्तर हैं।

इस बात को संक्षिप्त और अधिक बोधगम्य रूप में इस प्रकार कह सकते हैं कि ये भिन्नताएँ नाम और रूप के भेद हैं यदि हम किसी वस्तु से उसका नाम या रूप दूर कर दें जो कुछ शेष रहता है वह सार या सत्य है। उदाहरणार्थ यदि हम किसी सोने की अँगूठी को गला दें, तो उसका नाम ‘अँगूठी’ और उसका रूप रचनात्मक या बनावट दूर हो जाती है, पर उसका नाम एवं रूप मिटकर भी सोना-अर्थात् सार रह जाता है। कोई व्यक्ति विशेष मर जाता है तो उसका नाम और रूप तो चला जाता है, पर उसका सार-सत्य आत्मा रह जाता है इस सत्य या शुद्ध स्वरूप आत्मा को ही लक्ष्य करके स्वामी विवेकानन्द ने कहा है-’आत्मा सबसे परे अनन्त’ ज्ञात और ज्ञातव्य की सीमा के बाहर है, उसके द्वारा ही हम इस जगत को देखते हैं। केवल वही सत्य है। यह मेज, यह श्रोतागण, यह दीवार सभी नाम और रूप को हटा देने पर आत्मा मात्र रह जायेंगे। नाम और रूप ही इस भेद के कारण हैं। नाम रूप से पहचाने जाने वाला यह शरीर तो नश्वर है। इसका स्वामी-आत्मा अनश्वर, अजर, अमर और अनन्त है।’

इस प्रकार जगत के प्रत्येक दृश्य रूप में नाम और रूप के कारण जो अन्तर, जो व्यवधान दृष्टिगोचर होता है उसे मिटाने पर सारा संसार एक केवल एक रह जाता है। सर्वत्र ही वह ‘एक’ रह जाता है। इसका स्पष्ट अर्थ यह हुआ कि संसार में हम जो कुछ भी देखते हैं वह एक ही तत्व के विविध प्रदर्शित स्वरूप हैं और वास्तव में एक ही है। दार्शनिकों ने इसको ब्रह्म कहा है। इस प्रकार की भावना से व्यक्तिवाद और अहं का विनाश होता है। दैनिक जीवन के प्रत्येक व्यवहार से यदि हम लक्ष्य करें, तो साँसारिक रूप में उससे क्रियात्मक सम्बंध रख असम्बन्ध रह सकते हैं। दृष्टाँत के रूप में कि हम कोई ऐसा काम करें जिसके कारण हमें साँसारिक दृष्टि से आर्थिक या पारस्परिक हानि हो जाय तो उस कार्य से, कार्य-कारण सम्बन्ध होते हुए भी, अपने को निमित्त मात्र समझकर दुःख, मोक्ष, परिताप और तद्जन्य शारीरिक कष्टों से बहुत कुछ बच सकते हैं। इसी प्रकार वेदान्ती दृष्टिकोण से हम साँसारिक लाभ उठा सकते हैं।


द्वेष, भय और वासनाओं से मुक्ति का मार्ग

(बर्मा के प्रधान मंत्री श्री ऊनू)

प्रत्येक प्राणी का वह चाहे न चाहे, मृत्यु के बाद तुरन्त पुनर्जन्म होता है। संसार के महासागर में जीवन और मृत्यु का यह अनवरत चक्र चलता ही रहता है। यह पुनर्जन्म चार योनियों में हो सकता है। (1) ब्रह्म (2) देव (3) मनुष्य (4) अन्य प्राणी।

जन्म और मरण के इस अनन्त चक्र का मुख्य कारण है लोभ, दोष, और मोह का प्राणियों में बद्ध-मूल होना। साधारण तौर पर कहा जाय तो कहा जा सकता है कि मनुष्य पशु से ऊपर है। देव मनुष्य से और ब्रह्म, देव से। किन्तु वस्तुतः इनमें से किसी भी रूप में जन्म लेना श्रेय और अभीष्ट नहीं है। क्योंकि एक बार जन्म ग्रहण करने पर फिर चाहे वह इनमें से किसी भी रूप में हो, उसे उसके परिणामों-जरा, रोग, मृत्यु प्रिय वियोग और अप्रिय संयोग आदि अपरिहार्य दुःखों को भोगना ही पड़ता है।

इस दुःख-ताप से बचने का उपाय क्या है? इसका एक ही उपाय है- जन्म मरण के चक्र से मुक्ति लोभ, दोष और मोह आदि भव-बन्धन के कारणों का समूल नाश करके ही प्राप्त की जा सकती है और इनका एक मात्र उपाय मन को वश में करना और उन एकाग्र ध्यान की एक उच्च स्थिति तक पहुँचाना।

जब मनुष्य का मन उस सीमा तक विकसित हो जाता है तो वह पथ की उन चार मंजिलों तक क्रमशः पहुँच सकता है जिन्हें पाली में (1) सोतापित्त, (स्त्रोतापति) (2) सकवागामी (सकृदागामी) (3) अनागामी और (4) अर्हत कहा जाता है।

जो व्यक्ति प्रथम मंजिल में पहुँचता है उसके अपने अंतिम लक्ष्य के सम्बन्ध में सब संशय छिन्न हो जाते हैं। दूसरी मंजिल में पहुँचने वाले की वासनाएँ पर्याप्त सीमा तक समाप्त हो जाती है। तीसरी मंजिल में पहुँचने पर मनुष्य का दोष, भय और दैनिक वासनाएँ उच्छिन्न हो जाती हैं, किन्तु उसमें उच्च योनि में जाने की आकाँक्षा बनी रहती है। किन्तु अर्हत, जो अन्तिम मंजिल में पहुँच गया है, न केवल दोष, भय और भौतिक वासनाओं को जीत लेता है, वरन् सभी आकांक्षाओं और राग-द्वेष पर भी विजय पा लेता है। व्यक्ति इस अन्तिम व्यवस्था में पहुँच जाता है, मृत्यु के बाद उसका पुनः संसार में आगमन नहीं होता।

संक्षेप में युद्ध द्वारा अविकृत स्थूल सिद्धान्तों का रूप यह है। इस सिद्धान्त के दो भाग हैं। पहला भाग मृत्यु के बाद की स्थिति के सम्बन्ध है, और साधारण मरणधर्मा मानव के लिए उसे सिद्ध कर सकना प्रायः असम्भव है। किन्तु इसके भाग का संबन्ध इह लोक के साथ है और उसे सिद्ध किया जा सकता है। मैं इस दूसरे भाग को ही कुछ स्पष्ट करने का प्रयत्न करूंगा।

मानव मन का एक प्रधान धर्म है सन्देह करना। मनुष्य जिस धर्म का पालन करता है, वह भी उसके सन्देह से नहीं बनता। हम एक बौद्ध का उदाहरण लें। चाहे वह सामान्य बौद्ध हो और चाहे भिन्न, यदि हम उससे पूछें कि क्या तुम्हारी बौद्ध धर्म में पूर्ण आस्था है? यदि वह ईमानदार है तो उत्तर देगा ‘नहीं, कभी मुझ में संदेह की कणिका पैदा हो जाती है।’ किसी भी सच्चे आदमी के लिए यह उत्तर देना स्वाभाविक है और आप इससे भिन्न उत्तर की आशा भी नहीं कर सकते। क्यों? क्योंकि सन्देह मानव का स्वभाव है। किन्तु उसने इस पथ की पहली मंजिल तय कर ली है उसके मन से बुद्ध के सिद्धान्त के सम्बन्ध में समस्त संदेहों की निवृत्ति हो जायगी, क्योंकि उसने अपने अंतर्मन में समस्त दुखों के परिणाम को जान लिया है।

तीसरी मंजिल अर्थात् अनागामी की स्थिति इससे कहीं ऊँची है। मैं इसे थोड़ा स्पष्ट करूंगा। मनुष्य, चाहे वह कितना भी साधु हो, द्वेष से मुक्त नहीं हो सकता, इसी प्रकार चाहे वह कितना ही वीर हो, भय से मुक्त नहीं हो सकता। एक साधु प्रकृति मनुष्य अधिक से अधिक अपने द्वेष और क्रोध का दमन ही कर सकता है किन्तु वह जानता है कि उसमें द्वेष और भय की अनुभूति विद्यमान है। एक वीर पुरुष अधिक से अधिक अपने भय का दमन करने का प्रयत्न कर सकता है, किन्तु उसे यह संवेदन रहता है कि उसमें भय की भावना है किन्तु जो व्यक्ति पथ की तीसरी मंजिल में पहुँच जाता है उसमें केवल एक ही आकाँक्षा रह जाती है कि वह अपने से ऊँची योनि अर्थात् ब्रह्म योनि में जन्म ले। उसमें द्वेष, भय या किसी प्रकार की दैहिक वासना नहीं रहती। विश्व भर में कोई भी उसे भय, द्वेष या दैहिक भावनाओं से प्रलोभित नहीं कर सकता।

किन्तु सबसे अधिक आश्चर्यमय चौथी और अन्तिम दशा है। तीसरी दशा में फिर भी ब्रह्म बनने की आकाँक्षा बनी रहती है, किन्तु जब मनुष्य चौथी दशा में पहुँचता अर्थात् अर्हत बन जाता है तो उसमें न केवल द्वेष, भय या भौतिक भावनाओं का बल्कि किसी भी प्रकार की अतीन्द्रिय वासना का लेशमात्र भी नहीं रहता। उसकी सब वासनाएँ निःशेष हो जाती हैं। संसार में कोई भी अर्हत को द्वेष, भय अथवा किसी भी वासना की और आकृष्ट नहीं कर सकता।

पथ की इन प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ अवस्थाओं में होने वाले मानसिक और आध्यात्मिक परिवर्तन परलोक में नहीं, इह लोक में ही होते हैं और मनुष्य उन्हें इसी में प्राप्त कर सकता है।

आजकल जब कोई व्यक्ति पैनिसिलिन, एम. बी. की गोलियों, जेट विमान या अणुबम का आविष्कार करता है और संसार के सम्मुख उनकी घोषणा करता है तो वैज्ञानिक उनके परीक्षण कर सकते हैं। लोगों को बुद्ध के उपर्युक्त आविष्कार का भी अवश्य परीक्षण करना चाहिए। यह आविष्कार व्यक्तिगत आत्म निरीक्षण से हो सकता है। हमें बुद्ध के इस सिद्धाँत को धर्म मानकर नहीं चलाना चाहिए उसे संदेह, राग-द्वेष तथा इन्द्रियगम्य व अतीन्द्रिय वासनाओं से मुक्ति दिलाने वाली जीवन पद्धति का एक उपाय मानकर चलना चाहिए।

मेरा आपसे हार्दिक आग्रह है कि आप उपाय और उससे साधित जीवन-पद्धति की परीक्षा करने के लिए उसी भाँति गंभीरता से प्रयत्न करें जिस भाँति किसी नये वैज्ञानिक आविष्कार की परीक्षा की जाती है।


मेरा कुछ नहीं

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)

मेरे पास एक मकान है, जिसे मैंने खरीदा है और इधर-उधर से सुधारकर खूबसूरत शिष्ट व्यक्तियों के रहने योग्य बना लिया है। मैं इस पर खूब व्यय करता हूँ। प्रति वर्ष पुताई और रोगन सफाई चित्रों में व्यय करता हूँ।

पर क्या यह वास्तव में मेरा है? नहीं, कदापि नहीं। मेरे इसमें आने से पूर्व न जाने वह जमीन जिस पर यह खड़ा है, कितने व्यक्तियों के अधिकार में आकर निकली होगी? इस घर में कितने ही व्यक्ति आते जाते रहे होंगे? कोई मर कर, कोई गरीबी के कारण, कोई प्रकृति के किसी आक्रमण द्वारा बिखर गये होंगे, और तब मेरे पास आया होगा, यह मकान। मेरे जन्म से पूर्व यह मकान किसी और का था, मेरी मृत्यु के पश्चात न जाने इसका वासी कौन कहे, कौन होगा? पर यह निश्चय है, यह मेरा नहीं है। मैं जब तक जिन्दा हूँ इसमें आश्रय भर लेता हूँ, बस। केवल मेरा इससे इतना ही सरोकार है।

कृषक का खेत उसका सर्वत्व है। वह उसे रखने के लिए असंख्य आफतें मोल लेता है। सम्पूर्ण आयु पर्यन्त उसे अच्छा बनाने, उपज की वृद्धि में प्रयत्नशील रहता है, पर मूर्ख यह नहीं सोचता कि उसका वास्तव में कुछ नहीं! न जाने वह खेत कितने व्यक्तियों के पास से गुजर चुका है। भविष्य में न जाने कितने उसके मालिक बनेंगे।

मेरे हाथ में एक रुपया आ जाता है। मैं इसे अपना कहता हूँ। प्यार करता हूँ। प्यार से बटुए में छिपा कर रखता हूँ। थोड़ी देर के लिए मैं भूल जाता हूँ कि यह रुपया आवारा है। एक जगह नहीं टिकता इसकी गति बड़ी तीव्र है। एक से दूसरे, दूसरे से तीसरे, तीसरे से चौथे, पाँचवें, पचासों, हजारों हाथों में यह चलता फिरता रहता है। किसी एक का नहीं बनता। किसी एक का होकर नहीं रहता। फिर, मैं भी कैसा मूर्ख हूँ जो इसे अपना अपना कहकर घमण्ड में फूल उठता हूँ। मैं क्यों यह ध्रुव सत्य विस्मृत कर बैठता हूँ कि इससे मेरा क्षणिक सम्बन्ध है। न जाने कल यह किसके पास होगा। इसका भावी कार्यक्रम गतिविधि क्या है?

मेरे पास असंख्य पुस्तकें हैं, घर की सैकड़ों छोटी बड़ी वस्तुएं हैं, आराम की वस्तुएँ हैं, गाय और भैंसें हैं, साइकिल मोटर है, अच्छे वस्त्र हैं, क्या इनसे मेरा सच्चा रिश्ता है, क्या ये सदा मेरी होकर रहने वाली हैं।

मैं फिर भूलता हूँ। क्षुद्र साँसारिक वस्तुओं के लोभ में इन्हें ‘अपना’ कहने की मूर्खता करता हूँ। मैं प्रमाद एवं अज्ञानवश यह समझने लगता हूँ कि ये मेरे व्यक्तित्व, मेरी आत्मा के अंग हैं। यही मेरी बड़ी गलती है। ये नाना वस्तुएँ भला क्योंकर मेरी हो सकती हैं। न जाने किस किस का इन पर कब कब अधिकार रहा होगा। थोड़ी देर के लिये ये मेरे पास एकत्रित हो गई हैं। फिर न जाने कौन कहाँ बिखर जायेगी।

मैं बाल बच्चों का पिता हूँ। मेरी पत्नी बच्चों से अपने को पृथक नहीं कर पाती। ‘हमारे बच्चे बड़े होंगे, हमें न जाने किस किस प्रकार से सहायता प्रदान करेंगे, हमारे दुःख दूर करेंगे।’ मैं भी कभी कभी यही समझने की मूर्खता कर बैठता हूँ। पर क्या वास्तव में ये बच्चे हमारे हैं? क्या हम ही इनके सब कुछ हैं? क्या इनका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व, आशा अभिलाषा, इच्छाएँ नहीं हैं? नहीं, ये हमारे नहीं हैं? हमारा इनसे क्षणिक सम्बन्ध है जिस प्रकार पक्षियों के बच्चे समर्थ हो जाने पर उड़ जाते हैं, लौटकर फिर माँ-बाप के पास आकर नहीं रहते, उसी प्रकार ये मानव परिन्दे न जाने कब, कहाँ, किस ओर, किस अभिलाषा से उड़ जाने वाले हैं। फिर मैं इन्हें क्योंकर अपना कह सकता हूँ?

मैं अपने शरीर को ‘अपना’ ‘अपना’ कहता हूँ। साज शृंगार में यथेष्ट समय व्यय करता हूँ। शीशे में शक्ल देख कर फूला नहीं समाता। अपने नेत्र, कपोल नासिका, मुखमुद्रा को सर्वश्रेष्ठ समझता हूँ। अपने शरीर के प्रत्येक अवयव पर मुझे गर्व है। पर क्या वास्तव में यह शरीर मेरा है?

शरीर मेरा नहीं। वह तो हाड़, माँस, रक्त, मज्जा, तन्तु, वीर्य इत्यादि का पुतला मात्र है। क्या मैं उदर, मुख, पाँव, सिर इत्यादि हूँ? क्या मैं रक्त हूँ, माँस हूँ? अस्थियों का पिंजर हूँ? क्या मैं श्वांस हूँ, वाणी हूँ? क्या हूँ?

वास्तव में उपरोक्त वस्तुओं में से मेरा कुछ भी नहीं है। इन सब साँसारिक पदार्थों से मेरा सम्बन्ध क्षणिक, अस्थायी और झूठा है। अज्ञान तिमिर में मुझे इन वस्तुओं से अपना साहचर्य प्रतीत होता है। मैं तो आत्मा हूँ। इस शरीर रूपी पिंजरे में अल्पकाल के लिये आ बँधा हूँ। मैं ईश्वर का दिव्य अंश हूँ। संसार से निर्लिप्त हूँ। साँसारिक वस्तुओं से मेरा संबंध क्षणिक है। यदि मैं अल्प लोभ के वश स्वार्थ और तृष्णा में लिप्त होता हूँ, तो यह मेरा अज्ञान है, मूढ़ता है।


चतुर्भुज-धर्म पुरुष

(श्री महात्मा जवाहराचार्य महाराज)

दान धर्म-

किसी वस्तु से अपनी सत्ता हटा लेने को ही दान कहते हैं। मान, प्रतिष्ठा या यश के लिये जो त्याग किया जाता है, वह दान नहीं है। वह तो एक प्रकार का व्यापार है, जिसमें कुछ धन आदि दिया जाता है और उससे मान, सम्मान आदि खरीदा जाता है। ऐसे दान से दान का प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। ‘अहंभाव’ या महत्ता का त्याग करना दान का उद्देश्य है। अगर कोई दान अहंकार की वृद्धि के लिये होता है, तो उससे दान का प्रयोजन किस प्रकार सिद्ध हो सकता है? दान से कीर्ति भले ही मिले, पर कीर्ति की कामना करके दान नहीं देना चाहिये। किसान धान्य की प्राप्ति के लिये खेती करता है पर उसे भूसा तो मिल ही जाता है। अगर कोई किसान भूसे के लिये ही खेती करे तो उसे बुद्धिमान कौन समझेगा? इसी प्रकार निष्काम भाव से दान देने से कीर्ति आदि भूसे के समान आनुषंगिक फल मिल ही जाते हैं, पर इन्हीं फलों की प्राप्ति के लिये दान देना विवेक शीलता नहीं है। इसी प्रकार दानीय व्यक्ति को लघु और अपने आपको गौरव शील समझकर भी दान नहीं देना चाहिये।

यह कभी न भूलो कि दान देकर तुप दानीय व्यक्ति का जितना उपकार करते हो, उससे कही अधिक दानीय-व्यक्ति तुम्हारा दाता का उपकार करता है। वह तुम्हें दान-धर्म के पालन का सुअवसर देता है, तुम्हारे ममत्व को घटाने में या हटाने में निमित्त बनाता है। अतएव वह तुमसे उपकृत है तो तुम भी उससे कम उग्कृत नहीं हो। अगर दान देते समय अहंकार का भार आ गया तो तुम्हारा दान अपवित्र हो जायगा।

शील धर्म-

बुरे कर्मों से निवृत्त होना और अच्छे कामों में प्रवृत्त होना ‘शील’ कहा जाता है। यह शील का सामान्य स्वरूप है। इससे यह प्रश्न स्वतः उत्पन्न हो जाता है कि बुरा क्या है और अच्छा क्या है। संसार के समस्त शास्त्रों का सार अच्छे और बुरे की व्याख्या में ही आ जाता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि पाँच बातें बुरी हैं- (1) हिंसा (2) झूठ (3) चोरी (4) व्यभिचार (5) शराब पीना। इन पाँचों बातों से निवृत्त होना चाहिये। पाँच अच्छी बातें हैं-(1) दया (2) सत्य (3) प्रामाणिकता अर्थात् अन्याय से किसी वस्तु को प्राप्त करने की अपेक्षा न रखना (4) परस्त्री को माता-बहिन के समान समझना और (5) नशे की किसी वस्तु का उपयोग न करना।

‘शील’ संसार की उत्तम सम्पत्ति है शील-धर्म का अर्थ है- सदाचार का पालन। सदाचार का पालन आत्मबल वाला ही कर सकता है। और आत्मबल वाले में ही सदाचार हो सकता है। शील की महिमा अपरिमित है। उसकी महिमा प्रकट करने वाली अनेक कथाएँ मौजूद हैं। सुदर्शन सेठ के लिए शील के प्रताप से ही फाँसी का तख्ता सिंहासन बन गया था। सीता के शील के प्रभाव से अग्नि शीतल हो गई थी। प्रभात होते ही सोलह सतियों का स्मरण क्यों किया जाता है? क्यों उनका यश गाया जाता है? शील के कारण ही।

ऐसी-ऐसी अनेक कथाएँ हैं जिनमें शील धर्म की महिमा का बखान है। कई लोग इन कथाओं को कल्पित कहकर उनकी उपेक्षा करते हैं। पर वास्तव में उन्होंने उनका मर्म नहीं समझा है। आत्मबल के प्रति अवस्था ही इसका प्रधान कारण है।

तप धर्म-

शील-धर्म के पश्चात् तप-धर्म है। तप में क्या शक्ति है, सो उनसे पूछो जिन्होंने छः-छः महीने तक निराहार रहकर घोर तपश्चरण किया है और जिनका नाम लेने मात्र से हमारा हृदय निष्पाप एवं निस्ताप बन जाता है। तप में क्या बल है, वह उस इन्द्र से पूछो जो महाभारत के कथनानुसार अर्जुन की तपस्या को देख कर काँप उठा था और उसको एक दिव्य रथ प्रदान किया था।

कहते हैं, अर्जुन की तपस्या से इन्द्र काँप उठा। उसने मातलि को रथ लेकर अर्जुन के पास भेजा, मातलि अर्जुन के पास रथ लेकर पहुँचा और बोला-धनंजय। इन्द्र आपके तप से प्रसन्न हैं। आप इस रथ के योग्य है, अतएव इसमें आप बैठिए। बहुत लोगों ने संसार के बहुत से काम किए हैं, पर यह रथ किसी को नहीं मिला। मगर तप के प्रताप से आज यह रथ आपको भेंट किया जाता है।

इस कथन में अलंकार-भाषा का प्रयोग है। वस्तुतः यह शरीर ही रथ है। इस रथ में जुतने वाले अश्व इन्द्रियाँ हैं। तप के प्रभाव से अर्जुन को एक विशिष्ट प्रकार के रथ की प्राप्ति हुई, जिसमें तपो धनी ही बैठ सकते हैं।

चक्रवर्ती भरत महाराज के पास सेना, अस्त्र-शस्त्र और शरीर के बल की कमी नहीं थी। लेकिन जब युद्ध का समय आया था, तब वे तेला करके युद्ध किया करते थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि तेला का बल चक्रवर्ती के समग्र बल से भी अधिक होता है।

तप से शरीर भले दुर्बल प्रतीत हो, मगर आत्मा असाधारण बलशाली बन जाती है।

भाव धर्म-

प्रत्येक कार्य होने के तीन प्रकार हैं-पहले विचार होता है, फिर उच्चार होता है, तब अन्त में आचार होता है। इस प्रकार प्रत्येक कार्य के लिए पहले पहले आत्मा में विचार या संकल्प होता है। संकल्प में यदि बल हुआ तो कार्य सिद्धि में सुगमता और एक प्रकार की तत्परता होती है। वास्तविक बात तो यह है कि कार्य की सिद्धि प्रधानतः संकल्प शक्ति पर अवलम्बित है।

संकल्प करना अर्थात् आत्मा को जागृत करना। जो जागृत होता है उसका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। जो मनुष्य गाढ़ी नींद से सोया पड़ा हो या डरपोक हो, उसके घर में घुसकर चोर चोरी कर सकते हैं पर जो मनुष्य जागृत है और साहसी है, उसके घर में घुसने का साहस चोर को नहीं होता। अगर हम जागृत होंगे तो चोर क्या कर सकेंगे? ऐसा विश्वास तुम्हें है, पर आध्यात्मिक विषय में यह विश्वास टिकता नहीं है। अगर तुम्हारी आत्मा जागृत है तो कर्म-चोर की क्या विसात कि वह तुम्हारी शक्ति का अपहरण कर सके? तुम्हारी गफलत के कारण चोर तुम्हारे आत्म गृह में प्रवेश कर सका है। जिस क्षण तुम्हारी संकल्प-शक्ति जागृत होगी, उसी क्षण चोर बाहर निकल भागेगा।

ज्ञान-दीप तप-तेल भर, घर सोधो भ्रम छोर।

या विधि विन निकसे नहीं पैठे पूरव चोर॥

अपनी संकल्प शक्ति का विकास करना ही आध्यात्मिक विकास है।


पतिव्रत योग

(श्री ऋषिराम जी शुक्ल ताल्लुकेदार)

मनन करने पर पता चलता है कि ‘योग‘ और ‘पतिव्रत योग‘ की साधना-प्रणाली में भी अन्तर नहीं है, क्योंकि ‘योगश्चित्तवृत्ति निरोधः’।

चित्त की वृत्तियों को विषयों की ओर से हटा कर भगवान की किसी सगुण या निर्गुण मूर्ति में स्थिर कर देना ही योग है। तो फिर चित्तवृत्ति समेत बहिर्मुख इन्द्रियों को बुरे रास्ते से हटाकर अपने पति में ही स्थिर करना स्त्रियों का पतिव्रत क्या योग नहीं है?

जिस प्रकार यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहारादि द्वारा चित्त को ईश्वर के अधीन रखना ही पुरुषों के योग का साधन कहा गया है, उसी प्रकार अपनी सब शारीरिक, मानसिक और वाचिक चेष्टाएँ पति के निमित्त करते हुये सब तरह से पति नारायण होना ही स्त्रियों के पतिव्रत-योग का साधन है। पुरुषों के लिये ईश्वरोपासना दो प्रकार की, साकार तथा निराकार, कही गई है, किन्तु स्त्रियों के लिये एक पतिव्रत-रूप सगुण उपासना ही वेदों का शास्त्रों में वर्णित है।

अवश्य ही गार्गी मैत्रेयी आदि विदुषी नारियों ने भी ज्ञान मार्ग द्वारा निर्गुण ब्रह्म को और गोपियों तथा मीराबाई-प्रभृति स्त्रियों ने भक्तिमार्ग का अवलम्बन कर सगुण ब्रह्म की उपासना करके, पुरुषों के समान स्वतन्त्र रीति से, आत्म-साक्षात्कार किया था, किन्तु इन सबका ज्ञान और भक्ति पर असाधारण अधिकार था। ये स्त्रियाँ साधारण कोटि की नहीं थी। इनमें कोई तो श्रुति, कोई देवियाँ और कोई ऋषि के समान थीं और किसी विशेष कारणवश इन्होंने संसार में अवतीर्ण होकर लोकोपकार किया था।

स्त्रियों की आदर्श अनसूया जी, जगज्जननी सीता जी, सावित्री जी एवं माता गाँधारी हैं। इन्होंने अपने पतिदेव को ही आत्मसमर्पण कर उनकी उपासना की थी और आजन्म उन्हीं की सेवा में रहकर अप्रतिहत शक्ति के साथ परमपद प्राप्त किया था। आष्टाँग-योग के सिद्ध होने से जो शक्ति और सिद्धि बहुत समय में पुरुषों को प्राप्त होती है, उसी शक्ति को स्त्री पतिव्रत-योग के बल से थोड़े समय में ही प्राप्त कर सकती है, यह सर्वथा निर्विवाद है।

इस पतिव्रत-योग शक्ति का दिग्दर्शन संक्षेप रूप में कराया जा सकता है। महाभारत के युद्ध में धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों में से केवल दुर्योधन बच रहा था। वीर श्रेष्ठ भीमसेन ने जब दुर्योधन को भी मार डालने की प्रतिज्ञा करली तब दुर्योधन अपने जीवन की आशा छोड़कर अपनी माता के अन्तिम दर्शन करने के लिये उनके पास गया और रोने लगा। तब पति-भक्त माता गाँधारी ने उसको ढाढ़स बँधाकर धर्मराज युधिष्ठिर के पास भेजा कि उनसे वह अमर होने का उपाय पूछे। धर्मराज ने उसे यह उपदेश दिया-दुर्योधन तू नग्न होकर अपनी माता के सामने जा। यदि वे एक बार तुझे अपनी दृष्टि से देख लें तो फिर तुझे कोई मार न सकेगा। धर्मराज के कथनानुसार दुर्योधन नग्न होकर अपनी माता के पास जाने गया, तब पाण्डवों के हितैषी भगवान् कृष्ण ने अपनी योगमाया द्वारा दुर्योधन के मन को प्रेरित किया कि नग्न-अवस्था में माता के पास जाना अनुचित है, अतः लँगोटी पहनकर तुम उनके पास जाओ।

भगवान कृष्ण के आदेश का पालन दुर्योधन ने किया। जब वह लँगोटी पहनकर माता के पास पहुँचा तब माता गान्धारी ने पूछा- ‘बेटा दुर्योधन, क्या तुम मेरे पास ठीक उसी रूप में आये हो, जैसा कि धर्मराज ने तुम्हें कहा था?’

दुर्योधन के मुख से निकल पड़ा-’हाँ माता, ठीक ही आया हूँ।’

जब माता गाँधारी ने अपनी आँखों की पट्टी खोलकर उसे देखा तो अपनी पतिव्रत-शक्ति से सब वृत्तांत जानकर कहा-’मार्गेत्वया सम्मिलितोअघुना किं कृष्णः कि मूचेवचनं वदस्वं।’

हे पुत्र! मार्ग में क्या तुम्हें कृष्ण मिले थे? उन्होंने तुम से क्या कहा? ‘आँखों पर पट्टी बाँध रखने वाली माता की विलक्षण शक्ति देखकर दुर्योधन दंग रह गया। माता से उसने इस ज्ञानशक्ति का कारण पूछा तो पति परायणा गाँधारी ने कहा- योगेन शक्तिः प्रभेवन्नराणाँ पतिव्रतेनापि कुलाँगनानाम। अर्थात् पुरुषों को जो शक्ति ‘योग‘ से प्राप्त होती है, वही शक्ति कुलाँगनाओं को अपने पतिव्रत धर्म से।

ओह! कैसा पतिव्रत योग है कि गाँधारी ने तत्काल ही क्रुद्ध होकर भगवान कृष्ण को भी शाप दे डाला-’कृष्ण त्वया में निहताश्च पुत्रा नश्यन्तु ते यादव यूथ संघा।’

हे कृष्ण! तुमने मेरे पुत्रों का नाश किया और एक बचे हुये पुत्र को मारना चाहा, जाओ तुमने मेरे पुत्रों का नाश किया इसी तरह तुम्हारे सब यादव गण भी नष्ट हो जायेंगे। स्त्री के पतिव्रत की यह शक्ति पुरुषों के उस अष्टाँग-योग-शक्ति से तनिक भी कम नहीं। करोड़ों ब्रह्माण्डों की सृष्टि और संहार करने वाले सर्वशक्तिमान भगवान् श्री कृष्ण पतिव्रता के इस शाप को मिटाने में समर्थ न हो सके। माता गाँधारी के शाप से अन्त में यादवों का वंश नष्ट हो ही गया। दूसरा उदाहरण महाराज भोज का लीजिये।

एक दिन महाराज भोज प्रजा की दशा देखने के उद्देश्य से अपनी राजधानी में घूम रहे थे। तब उन्होंने किसी मकान की खिड़की से देखा कि एक स्त्री अपनी पति की चरण-सेवा कर रही है। निद्रा-वश होने से पति उसकी जंघा पर ही सिर रख कर सो गया था। उसी कमरे के एक दूसरे कौने में उसका छोटा सा बच्चा सोया हुआ था। बीच में एक अग्निकुण्ड था, जिसमें अग्नि की प्रचण्ड ज्वालायें उठ रही थी। उसी समय सोया हुआ बच्चा उठकर चिल्लाता हुआ उस अग्निकुण्ड की ओर आने लगा। माता यह सब देख रही थी, किन्तु उसने जंघा पर सोये हुए पतिदेव को जगाने से अपने पतिव्रत नियम में बाधा से पुत्र की प्राण रक्षा न कर उसकी उपेक्षा ही कर दी। बहुत छोटा और अबोध होने के कारण वह बालक उस अग्निकुण्ड में गिर गया। इधर महाराज भोज को तो विश्वास हो गया था कि बच्चा अग्नि में भस्म हो गया होगा, किन्तु उस पतिव्रता के शाप के डर से अग्नि चन्दन के लेप के सदृश्य शीतल होकर शान्त हो गई। बच्चे का बाल तक बाँका न हो पाया। उस पतिव्रता के पतिव्रत-योग की शक्ति से चकित हो भोज ने-’हुताशंचन्दन पंकाशीतलः।’ यह श्लोक का चतुर्थ चरण बनाकर कालिदास से कहा- ‘शेष तीन चरण की पूर्ति कर दीजिये।’ कविवर कालिदास ने प्रखर प्रतिभा के सहारे उसी घटना के अनुरूप समस्या-पूर्ति करदी-

‘सुतं पतन्त प्रसमीक्ष्यपावके,

न बोधया भास पति पतिव्रता।

पतिव्रता शाप भयेन पीड़ितो,

हुताशनश्चन्दन पंक शीतलः॥’

अहा! क्या स्त्रियों का पतिव्रत-योग पुरुषों के उस अष्टाँग योग से कम है? इसीलिये तो समार्त्त धर्म के प्रवर्तक, धर्मशास्त्र के अधिकारी और आदिम उपदेशक मनु भगवान इस पतिव्रत की मुक्त कण्ठ की प्रशंसा करते हुए कहते हैं-’नास्ति स्त्रिणाँ प्रथग् यज्ञो न व्रतं नाप्यु पोषणम्। पतिं शुश्र षते यनं तेन स्वर्गे महीयते॥ मनुस्मृति 5।1।15॥

स्त्रियों के लिये अलग से यज्ञ, व्रत और उपवास नहीं हैं केवल पति की सेवा करने से वे परमपद प्राप्त कर सकतीं है और देवताओं द्वारा सम्मानित होती हैं।

इसी एक सहज उपाय से जिस स्त्री ने इस पतिव्रत-योग को प्राप्त कर लिया, फिर उसके लिये कौन सा कर्तव्य शेष रह जाता है? वह तो फिर अपने मनुष्यत्व को त्याग कर देवत्व को प्राप्त होकर जगत्पूज्या लक्ष्मी बन जाती है।

सब वेद और शास्त्र उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं।

यश्य भार्या शुचिर्दक्षा भर्त्तार मनुगामिनी। नित्यं मधुर वक्त्रीच सा रमा न रमा रमा॥

इस पतिव्रत-योग की महिमा का वर्णन कौन कर सकता है? उसके प्रताप से इस भारतवर्ष में ऐसे वीर पैदा हुए हैं जिनके मन इन लौकिक विषयों में मुग्ध न होकर अपने लक्ष्य से किंचित मात्र भी विचलित नहीं हो सकते थे।

महाराज रामचन्द्रजी ने एक बार लक्ष्मण जी के ब्रह्मचर्य की परीक्षा के लिये प्रश्न किया-

‘पुष्पं दृष्ट्वा फलं दृष्ट्वा दृष्ट्वा यौषित यौवनम्। त्रीणी रत्नानि दृष्ट्वैव कस्यनोंचलते मनः॥’

सुन्दर पुष्प, फल और स्त्री का यौवन, इन तीनों रत्नों को देखकर किसका मन चंचल नहीं होता? क्या नीति का यह वचन मिथ्या हो सकता है जो तुम अपने को अखण्ड ब्रह्मचारी समझते हो?’

वीर लक्ष्मण ने तुरन्त इसका उत्तर देते हुए कहा-

पिता यस्य शुचिर्भूतो माता यस्य पतिव्रतः।

साभ्याँ यः सुनुरुत्पन्नस्तस्यनोच्चलते मनः।

‘जिसके पिता पवित्र आचरण वाले और माता पतिव्रता हो, उनके रज-वीर्य से उत्पन्न पुत्र का मन चलायमान नहीं हो सकता।

यही योग और पतिव्रत भारतवर्ष अलौकिक सम्पत्ति है। इसके प्रताप से यहाँ के स्त्री-पुरुषों ने भौतिक विषयों के उपभोगों को लात मारकर अध्यात्म-चिन्तन में ही अपनी सारी शक्ति लगाई। फलतः अखण्ड पद को प्राप्ति कर- (‘दिवौकसाँ मर्धनी तैः कृतं पदम्।,)- उस देव पद को भी ठुकरा दिया।

भारतभूमि धन्य है, जिसमें जन्म लेने वाले स्त्री-पुरुष पतिव्रत और योग को ही अपनी सर्वश्रेष्ठ सम्पत्ति समझते थे। उनकी सफलता पर इस कारण स्वर्ग के देवताओं को भी ईर्ष्या होती थी और वे भारतवासियों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा किया करते थे।

अहो अमीषाँ किमकारि शोभनम्

प्रसन्न एषाँ स्विदुत स्वयं हरिः।

ऐर्जन्म लब्धं नृषु भारताजिरे।

मुकुन्दष्ये से वौपयिकं स्पृहा हिनः॥

श्रीमद्भा 05/19/21

धन्य है, जिसके प्रताप से यहाँ की स्त्रियों के उदर से ऐसे योगराज उत्पन्न हुये कि जिन्होंने यहाँ स्त्रियों का नाम वीर जननी रखा गया और भूमण्डल में यह घोषित कर दिया गया-

नारी नारी मत कहो, नारी नर की खान। नारी से सुत उपजें, ध्रुव प्रहलाद समान॥

किन्तु खेद है कि सुधार, स्वातंत्र्य तथा उन्नति के नाम पर इसी पतिव्रत-योग को आज का स्त्री समाज नष्ट करने लगा है। इन ‘सुधार’-वादिनी स्त्रियों में बहुतों का गार्हस्थ्य-जीवन धार्मिक दृष्टि-कोण से भारतीय नारीत्व के अनुरूप नहीं है।

अतः बहिनों! प्राचीन मर्यादा का पालन करने वाली देवियों के इतिहास का मनन करो। उनकी गाथाओं को अपने अन्तःकरण में अंकित करो। उन्हीं के समान अद्वितीय कार्य-सम्पादन करने की क्षमता प्रकट कर अपना नाम चिरस्मरणीय बनाओ।

ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसी सदाचारिणी और गुणवती माताएं पुनः इस देश में उत्पन्न करें, जिनसे इसका मुख उज्ज्वल हो।


स्वार्थी होना भी कोई बुरी बात नहीं है।

(श्री गोपाल दामोदर तामस्कर)

कुछ लोग स्वार्थ और स्वार्थी लोगों पर बेतरह चिढ़ा करते हैं। परन्तु विचार करने की बात यह है कि क्या स्वार्थ सचमुच इतनी बुरी चीज है जितनी वह बताई और समझी जाती है। हम प्रारंभ में ही यह बतला देना चाहते हैं कि हम स्वार्थ की महिमा गाने के लिये प्रस्तुत नहीं हुये, हम तो केवल यही दिखलायेंगे कि स्वार्थ स्वयं इतना बहुत बुरा नहीं जितना कि वह समझा जाता है।

यों तो मनुष्य में जन्म से ही अनेक प्रवृत्तियाँ होती हैं, पर कुछ प्रवृत्तियाँ बड़े होने पर ही विकसित होती हैं। हमारा मत है कि स्वार्थपरता भी एक स्वाभाविक और जन्मजात प्रवृत्ति है। किसी प्रकार का कष्ट होने पर या भूख लगने पर रोना, और अपनी वह इच्छा अन्य किसी प्रकार प्रदर्शित करना, कष्ट दूर होने पर आनन्द प्रकट करना इत्यादि-इत्यादि कार्यों के बहुत भीतर स्वार्थ का बीज गुप्त रहता है। यह सच है कि यदि बालक में ये कार्य और प्रवृत्तियाँ न हों तो बालक की रक्षा और उसका पालन पोषण कठिन हो जायेगा। इन प्रवृत्तियों के न होने से मनुष्य-जाति का अस्तित्व ही कदाचित मिट जायगा। चाहे विकासवाद का आश्रय लेकर यह कहिये कि वे ही प्राणी दुनिया में जीने पाते हैं जिनमें अपनी रक्षा और विकास की यथेष्ट योग्यता होती है, या हिन्दुओं की भाषा में यों कहिये कि परमेश्वर ने प्राणियों की रक्षा के लिये ये प्रवृत्तियाँ उसे दी हैं। परन्तु बात एक ही है। इनके बिना मनुष्य संसार में जीवित नहीं रह सकेगा। इन्हीं प्रवृत्तियों से ही स्वार्थपरता उत्पन्न होती है। साराँश यह है कि स्वार्थपरता भी एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है।

परन्तु अब प्रश्न उठता है कि क्या स्वार्थ की प्रवृत्ति भी उल्लिखित प्रवृत्तियों की तरह अनिवार्य रीति से आवश्यक है? ‘इसका स्पष्ट उत्तर यही है हाँ’। कारण भी स्पष्ट है। जिन प्रवृत्तियों से स्वार्थ-परता उत्पन्न होती है, उनका मुख्य गुण उसमें रहता है। इससे व्यक्ति और समाज दोनों दृष्टि से मनुष्य की रक्षा होती है। यदि मनुष्य अपने शरीर की रक्षा स्वयं न करें और न दूसरों से करावे, तो उसकी रक्षा और कौन करेगा? प्रत्येक मनुष्य जाति का अस्तित्त्व बना हुआ है। वास्तव में प्रत्येक प्राणी में आत्म-संरक्षक एक स्वाभाविक प्रवृत्ति है और इस दृष्टि से स्वार्थपरता उसका एक प्रधान और स्वाभाविक साधन है। यह समझना और बतलाना कठिन है कि इस प्रवृत्ति के बिना मनुष्य की रक्षा कैसे होगी। प्रत्येक मनुष्य को अपनी-अपनी चिन्ता रहती है और यह नितान्त आवश्यक है। परन्तु यदि शरीर-रक्षण के लिये स्वार्थपरता की आवश्यकता है, तो कुटुम्ब के बालक, पति-पत्नी, माता पिता, भाई बन्धु इत्यादि आश्रितों की रक्षा के लिये भी उसकी कम आवश्यकता नहीं है।

इस विवेचन के बाद कोई हमसे प्रश्न कर सकता है कि यदि आत्म-रक्षा के लिए स्वार्थ आवश्यक है, तो लोग उसे बुरा क्यों कहते हैं, लोग उसकी निन्दा क्यों करते हैं? और ‘स्वार्थ’ त्यागी की प्रशंसा क्यों करते हैं? पहले हम प्रथम प्रश्न का उत्तर देंगे।

इसका उत्तर यह है कि वास्तव में निन्दा स्वार्थ की नहीं होती। जो कोई नीति के नियमों का उल्लंघन करके अपने स्वार्थ की पूर्ति करता है उसकी निन्दा होती है। नीति के नियम कुटुम्ब और समाज की रक्षा के लिए होते हैं, उन्हीं पर कुटुम्ब और समाज का अस्तित्व अवलम्बित है। यदि सब मनुष्य झूठ बोलने लगें, सब मनुष्य असत्याचरण करने लगें कोई किसी का विश्वास न करें, समय पाते ही प्रत्येक चोरी करने लगे, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों की कोई भी हानि करने को तैयार हो जाय तो समाज और कुटुम्ब का टिकना असम्भव हो जायगा। इसलिए ऐसे दुष्कर्म शील पुरुषों की जितनी निन्दा की जाय थोड़ी है। जो स्वार्थ अपने कर्तव्यों या नीति के नियमों को भुलाते वह हीन प्रकार का स्वार्थ है। नीति के नियमों में कर्तव्यों का पालन भी शामिल है और उनका एक प्रधान उद्देश्य कुटुम्ब या समाज की रक्षा करना है। यदि कोई पुरुष अपने शरीर की रक्षा के सिवाय दूसरे के शरीर की रक्षा न करे तो उसके बालक की या पत्नी की रक्षा कौन करेगा? कोई कोई लोग तो इतने स्वार्थी होते हैं कि उन्हें अपने आश्रितों के प्रति अपने कर्तव्यों का स्मरण तक नहीं रहता। ऐसी अवस्था में उनकी निन्दा होना अनुचित नहीं। घोर स्वार्थी पुरुष की निन्दा होने का एक कारण और है और वह है पर-हित का कर्तव्य। अपने नैतिक विकास के लिए न सही, आत्म-हित के लिए भी पर-हित करना पड़ता है। जिस कुटुम्ब में, जिस ग्राम में, जिस जिले में, जिस प्रान्त में, जिस देश में, जिस जन-समाज में तुम रहते हो, उस कुटुम्ब, उस ग्राम, उस जिले, उस प्रान्त, उस देश और जन-समाज के हित पर तुम्हारा निजी हित अवलम्बित है।

जो लोग नीति के नियमों का, अपने कर्तव्य का और उदार बुद्धी मूलक स्वार्थ का विचार रखेंगे, वे बहुधा स्वार्थी न कहलावेंगे। वे लोग तत्व-दृष्टि से स्वार्थी अवश्य है। उनके स्वार्थ के कारण दूसरों के स्वार्थ का, दूसरों के प्रति उनके कर्तव्यों का और समाज-व्यवस्था के नियमों का उल्लंघन नहीं होता, इसलिए लोगों के ख्याल में यह बात नहीं आती कि वे वास्तव में अपने स्वार्थ की सिद्धि में ही लगे हैं।

कोई चाहता है कि मेरे लिए तो सब लोग कष्ट उठावें, पर मैं किसी के लिए कष्ट न उठाऊँ। कोई चाहता है कि मेरा काम मुफ्त ही सिद्ध हो जाय और एक कौड़ी खर्च न करनी पड़े। कोई चाहता है कि मुझे मुफ्त ही दूसरे के बल पर शान करने को मिले। दूसरों के भरोसे अपनी जिह्वा और उदर की, अच्छे-अच्छे कपड़े पहनने की, इच्छा तृप्त करने वाले लोग समाज में कम नहीं रहते। यदि कोई पुरुष ऐसे लोगों की ये इच्छा तृप्त न करें तो उसे ये लोग स्वार्थी कहने लगेंगे। वास्तव में ऐसा कहने वाले ही अतीव स्वार्थी हैं। जिनकी वे निन्दा करते हैं वे नहीं। अपने स्वार्थ के वश ये लोग दूसरों को व्यर्थ ही स्वार्थी कहा करते हैं। इस तरह समाज में कभी उचित कारणों से और कभी व्यर्थ ही स्वार्थी समझा जाने का अवसर आ जाता है।

मनुष्य प्रधानतः स्वार्थी ही है और ऐसा होना आवश्यक भी है। यदि वह स्वार्थी न हो तो उसका अस्तित्व भी रहना कठिन हो जाय। परन्तु हम यह भी जानते हैं कि मनुष्य में परहित की भी थोड़ी बहुत प्रवृत्ति है। पुत्र प्रेम, पति-प्रेम, पितृ-प्रेम, बन्धु-प्रेम, देश-प्रेम केवल बनावटी भाषा नहीं है। उसमें कुछ सत्यता भी है। मनुष्य में दया, अनुकम्पा, प्रेम आदि भावनाएँ भी स्वाभाविक हैं। किसी के कष्ट को देखकर दया उत्पन्न होना क्या स्वाभाविक नहीं है? किसी कष्टमय दशा को देखकर हमें कष्ट क्यों होता है? क्या इसमें भी हमारा कोई स्वार्थ सिद्ध होता है? क्या लोग अपने पुत्रादि के लिये अपने प्राण तक नहीं होम देते? क्या सब माता-पिता केवल किसी आशा पर पुत्र का लालन-पालन करते हैं? क्या पुत्र की रक्षा करते समय सदैव स्वार्थ मूलक विचार बने रहते हैं? क्या माता-पिता की, भाई-बहिन की, पति या पत्नि की सेवा हम सदैव अपने स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही किया करते हैं? क्या सेवा के लिये सेवा, प्रेम के लिये प्रेम हम कभी नहीं करते, क्या रण में जाने वाला सिपाही सदैव स्वार्थ पर ध्यान रखकर ही युद्ध करता है? क्या उसे यह निश्चित आशा रहती है कि मैं रण में अवश्य विजयी होऊँगा और समर से जिन्दा लौट आऊँगा?

ऐसे-ऐसे कितने ही प्रसंगों का स्मरण कराया जा सकता है कि जब मनुष्य केवल दया, प्रेम, परहित की कामना से प्रेरित होकर कार्य किया करता है। प्रत्येक व्यक्ति को यह मालूम है कि पुत्र होने से माता पिता के शारीरिक सुख में अनेक प्रकार की विघ्न हुआ करते हैं इतना ही नहीं, किन्तु उन्हें अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष कष्ट उठाने पड़ते हैं। पर क्या पुत्रेच्छा स्वाभाविक बात नहीं है? पुत्र प्राप्ति के लिए लोगों ने क्या-क्या प्रयत्न नहीं किए। क्या ये कष्ट केवल स्वार्थ मूलक ही रहते हैं? हमारी समझ में इन प्रयत्नों में स्वार्थ का त्याग अवश्य है। जिस दिन तरुण पुरुष का विवाह होता है, उसी दिन उसे अपने स्वार्थ की सीमा बढ़ानी पड़ती है, और जिस दिन पुत्र-प्राप्ति होती है, उस दिन उसे सीमा को बहुत ही अधिक बढ़ाना पड़ता है। एक दृष्टि से यह स्वार्थ विस्तार ही स्वार्थ-त्याग है। अपने शरीर का स्वार्थ छोड़कर मनुष्य पुत्र और पत्नी के लिये कष्ट सहने को तैयार रहता है। जगत में यही स्वार्थ-त्याग का पहला पाठ है। व्यक्तिगत स्वार्थ को भूलना और अधिकाधिक लोगों के लिये कष्ट सहना ही स्वार्थ-की पहली सीढ़ी पर चढ़ना है। अबोध बालक में स्वार्थ-त्याग की थोड़ी बहुत प्रवृत्ति रहती है। स्वार्थी होते हुए भी वह दूसरे बालकों के प्रति उदारता भी दिखलाता है और उसकी यह प्रवृत्ति नैतिक विकास की बड़ी भारी नींव है। यदि मनुष्य केवल स्वार्थी होता, तो नैतिक विकास की आशा मृग जल सदृश्य होती। यह हमें जानना ही होगा कि परहित चिंतन, स्वार्थ-त्याग, प्रेम, दया आदि भी हम में स्वाभाविक ही हैं, चाहे उनका परिणाम स्वार्थपरता से कम क्यों न हो।


साधुता का लक्षण-सत्य प्रियता है।

(श्री पं. जनार्दन झा)

जितना ही सत्यप्रियता का अभाव है उतना ही सुजनता का ह्रास है। सत्यप्रियता समाज के लिये एक ऐसा सुलभ बन्धन है कि जिससे समाज की बहुत बुराइयां दूर हो जाती हैं। सिर्फ झूठ न बोलने के भय से ही समाज का बहुत कुछ सुधार हो सकता है। किंतु बहुत लोगों के मुँह से यह सुनने में आता है कि बिना झूँठ बोले काम नहीं चलता। पाठशालाओं में शिक्षकों के निकट सजा पाने के डर से विद्यार्थीगण, घर में माँ-बाप और अन्यान्य गुरुजनों से धिक्कारे जाने के भय से लड़के-लड़कियाँ, मालिक के डर से नौकर और समाज की निन्दा और लोक लज्जा के भय से गाँव के रहने वाले झूँठ बोलना अंगीकार करते हैं। अब यह सोचना चाहिये कि घर-घर में व्याप्त होने वाले इस मिथ्या भाषण का मूल क्या है? इसका मूल डर है। डर जाने पर ही लोग झूठ का सहारा लेते हैं। भीरुता और कायरता के सिवा इस मिथ्या भाषण का और कारण क्या कहा जा सकता है। कई एक सामान्य गुणों के अभाव से यह भारी दोष उत्पन्न होता है। बिना विचारे जब कोई अनुचित कर्म कर बैठता है तब उसे भय होता है। वह सोचता है-दोष स्वीकार करने पर मैं दण्ड पाऊँगा, घर के लोग मुझ पर क्रोध करेंगे। अड़ोस-पड़ोस के लोग मुझे घृणा की दृष्टि से देखेंगे, और भी मुझे कितने ही दुःख झेलने पड़ेंगे। ऐसी हालत में क्या करना चाहिए? अपना दोष स्वीकार करके दण्ड पाना उचित है अथवा झूँठ के सहारे अपना दोष छिपाकर उद्धार पाना उचित है? कोई तो उस अपराधी व्यक्ति को यह सलाह देगा कि अगर दो-एक झूठ बात बोलने से सारा संकट मिट जाय, झूठ बोलने में हर्ज ही क्या? शुद्ध चरित्र वाले कहेंगे कि अपराधी अपने दोष को छिपाकर एक बार किसी तरह बच सकता है किन्तु उसी घड़ी से उसके भविष्य की आशा, शुभ संकल्प सर्वदा के लिए लुप्त हो जाता है। अपने अपराध-जनित संकट से रक्षा पाने के लिए बार-बार उसे झूठ बोलना पड़ता है, हृदय के उच्च भाव सभी एक एक निकल जाते हैं। अपना दोष स्वीकार कर लेने पर सत्यवादी को दण्ड जरूर होता है किन्तु सत्य से उसका हृदय उस दण्ड की अपेक्षा अधिक उन्नत होता है। उसके मन से सारा भय भाग जाता है, उसे झूठ बोलने के लिए फिर कभी बाध्य होना नहीं पड़ता किन्तु जो लोग मिथ्यावादी हैं वे हमेशा ही भयभीत रहते हैं, उनका हृदय उद्विग्न रहा करता है। उनके जी में आप ही आप ग्लानि होती रहती है। वे कौटिल्य धारण करके नीच से भी नीच कर्म करने लग जाते हैं। बाहर से वे भले ही ऐश्वर्यशाली देख पड़े पर भीतर से वे बराबर बेचैन रहा करते हैं। जो लोग सत्य भाषी हैं, उनके मन में शान्ति, हृदय में साहस, बोली में स्पष्टता और दृष्टि में तेज भरा रहता है। सभ्य समाज में उनका आदर होता है। अच्छे गुणों की प्रतिष्ठा सभी समय सब देशों में होती है। सत्य भाषण एक वह प्रधान गुण है जिसके धारण से मनुष्य मात्र गौरवान्वित हो सकता है। जो असत्य सेवी हैं वे किसी काल में बड़ाई नहीं पा सकते।

जिन-जिन गुणों की ज्योति से संसार जगमगा रहा है उन गुणों को प्राप्त करने की अभिलाषा किसे न होगी? उन सब गुणों को कोई एक ही साथ प्राप्त कर लेना चाहे यह कभी हो नहीं सकता। हाँ, एक-एक गुण का अभ्यास करके लोग गुणों से अपने को अलंकृत कर सकते हैं। अवगुण अनायास ही प्राप्त होता है किन्तु गुण विशेष साधन का फल है। यदि तुम गुणों का संग्रह करना चाहो तो उसका सुगम उपाय यही है कि सबसे पहले तुम सत्य का सहारा लो। दृढ़तापूर्वक प्रतिज्ञा करो- ‘मैं झूठ नहीं बोलूँगा।’ बस एक सत्य का आश्रय ग्रहण करने ही से और जितने गुण हैं वे आपसे आप आकर तुम्हारा हाथ पकड़ेंगे।

एक बड़े विज्ञ महात्मा का कथन है-’ज्ञान ही शक्ति है।’ ज्ञान का स्वरूप सत्य है, और अज्ञान का असत्य। इस सिद्धान्त से सत्य और शक्ति में कुछ भेद न रहा। जिसमें जितना सत्य का भाग है वह उतना ही शक्तिमान है। संसार में जितने अनिष्ट संघटित हुए हैं, हो रहे हैं और होंगे-इनका एक-मात्र कारण सत्य की ह्रासता है। एक बार भारतवर्ष की ही बात सोचकर देखो। उस भारत में जब सत्य का सम्मान था, सबके आचार विचार विशुद्ध थे, छल-कपट को लोग महापाप समझते थे, तब भारत में शक्ति, समृद्धि और सुखी था। ज्यों-ज्यों सत्य का ह्रास होने लगा त्यों-त्यों भारतवासी आर्यगण शक्तिहीन होने लगे। हाय! प्राचीन भारत की सत्यप्रियता, स्वधर्म निष्ठा, साधुता, धीरता और वीरता के साथ वर्तमान भारत की असत्यपरता, दुराचार, अशिष्टता, अधीरता और भीरुता की तुलना करते हैं तो हृदय विदीर्ण हो जाता है और लज्जा से सिर नीचे झुक जाता है। किन्तु हम लोग यदि अब भी सत्यव्रत धारण करके अपने चरित्र को सुधारेंगे तो थोड़े ही दिनों में वर्तमान भारत के समस्त कलंकों को मिटा डालेंगे। कितने ही विदेशियों ने जो हम लोगों को बहुत-बहुत गालियाँ दी हैं और कितने ही विदेशी जो हम लोगों की मूर्खता पर अब भी हँसते हैं और हम लोगों की घृणा की दृष्टि से देखते हैं वे लोग भी सद्भाव धारण करेंगे और हम लोगों के महत्व का परिचय पाकर बार-बार हमारी प्रशंसा करेंगे।


अधिक नमक मत खाया कीजिए।

(कुमारी मनोरमा जी जनसार)

हमारे प्राचीन ऋषियों ने आज के अनेकों वर्ष पूर्व पदार्थ जानकारी की विद्या में बहुत उन्नति की थी, उन्होंने प्रत्येक वस्तु का विश्लेषण करके उसके गुण और दोषों का भली भाँति वर्णन कर दिया था। नमक के विषय में उनका कथन है...’त्रीणि पदार्थ नात्युपयुँजीत्। पिप्पली क्षारों लक्षण मिति।’ -चरक

पिप्पली, क्षार तथा लवण का अधिक उपयोग नहीं करना चाहिए। आज चर्म रोगों की अधिकाधिक वृद्धि हो रही है। इसका मुख्य कारण अधिक नमक का उपयोग करना ही है। शहरों में तो लोग चाट और नमकीन पदार्थों के खाने में इतने आदी हो जाते हैं कि बाजार में जब तक चटपटी और नमकीन वस्तुओं का सेवन नहीं कर लेते तब तक उन्हें शान्ति ही नहीं मिलती। इन बाजारू पदार्थों में नमक का इतना मिश्रण रहता है कि दिन भर के किए हुए आहार में आवश्यकता से ज्यादा लवण हमारे उदर में पहुँच जाता है। बहुत से लोग तो अधिक नमक खाने के आदी होते हैं और ऐसा अभ्यास कर लेते हैं कि जब तक उनके खाद्य पदार्थों में भली भाँति नमक का मिश्रण न किया जाय तब तक उन्हें कोई स्वाद ही नहीं मालूम होता। इसी स्वाद उद्देश्य को लेकर लोग आवश्यकता से अधिक उदर में नमक पहुँचा देते हैं, इससे रक्त दूषित हो जाता है, और फलस्वरूप विविध प्रकार के चर्म रोग उत्पन्न हो जाते हैं। चरक संहिता में तो यहाँ तक बताया है कि नमक के अधिक प्रयोग से शरीर में ग्लानि, शिथिलता तथा दुर्बलता उत्पन्न होती है।

मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुँचती हूँ कि नमक का अधिक प्रयोग चर्म रोग तथा रक्त सम्बन्धी व्याधियों के उत्पादन में अवश्य सहायक होता है। इस सम्बन्ध में मैंने ग्राम सेवा संघ द्वारा संचालित धर्मार्थ-चिकित्सालय में उकौता (एग्जिमा) के रोगियों पर प्रत्यक्ष अनुभव करके भली भाँति देख लिया है। उकौता के रोगियों की चिकित्सा में मैंने सर्वप्रथम रोगी को नमक का सेवन करना बन्द करा दिया, जिस स्थान पर उकौता था वहाँ पर शुद्ध मिट्टी का लेप करना आरम्भ कराया, कुछ समय के बाद ही इस क्रिया से आशाजनक लाभ प्रतीत होने लगा, एक मास विधिवत नियम से प्रयोग करने पर पूर्व आरोग्यता प्राप्त हुई। यह स्थिति में उन रोगियों की बता रही हूँ जो अनेकों प्रकार की चिकित्सा कर चुके हैं, परन्तु कोई लाभ नहीं हुआ है। इस प्रकार उपरोक्त चिकित्सा विधि से सैकड़ों की संख्या में एग्जिमा के रोगियों को मैंने आरोग्य लाभ पहुँचाया। खाज, खुजली के रोगियों पर भी मैंने इसी प्रकार सफलता प्राप्त की है।

यहाँ पर मेरा यह अभिप्राय नहीं कि नमक का उपयोग बिल्कुल ही बन्द कर दिया जाय, उपयोग किया जाय, किन्तु अति स्वल्प मात्रा में ही। आवश्यकता से अधिक होने पर रोगोत्पादक है। नमक हमारे शरीर में इतनी ही मात्रा में पहुँचना चाहिये कि वह शीघ्र रक्त में घुलकर रक्त परिभ्रमण विधि से शरीर के सर्व प्रदेशों में परिभ्रमण कर उनको सड़ने आदि की क्रिया से बचाता हुआ सम्पूर्ण आभ्यंतरिक अवयवों की अशुद्धियों को अपने साथ लेकर वृक्कों द्वारा मूलाशय में एकाग्र होकर मूत्र प्रणाली द्वारा बाहर निकल जाय।

जितने भी खाद्य पदार्थ वनस्पत्यादि हैं उन सबका यदि पृथक-पृथक विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि विश्व विधाता परमात्मा ने उनमें भी नमक को किसी में कुछ कम तथा किसी में अधिक मात्रा में स्थान में रखा है। इस बात को परीक्षणों द्वारा अनेक प्रकार से सिद्ध कर वैज्ञानिक दृढ़ निश्चय पर पहुँच चुके हैं, फिर भी लोग अपने खाद्य पदार्थों में स्वाद के निमित्त और अधिक नमक का मिश्रण करते हैं, वही हमारे लिए हानिप्रद होता है। यथा शक्ति स्वल्प मात्रा में ही नमक का प्रयोग करना चाहिये। जो लोग चर्म रोग तथा रक्त सम्बन्धी व्याधियों से पीड़ित हैं, उन्हें नमक का उपयोग बिल्कुल बन्द कर देना चाहिये। इससे अति शीघ्र आशातीत लाभ होगा।

उपवासों में नमक का त्याग इसलिए किया जाता है कि रक्त में उत्तेजना और चित्त में चंचलता पैदा करने वाले इस अनावश्यक पदार्थ को शरीर में प्रवेश होना रोककर शरीर तथा मन को सात्विक बनाया जाय। मिर्च मसालों की अधिकता की भाँति नमक के स्वाद की आदत भी हानिकारक ही है। जितना नमक शरीर को आवश्यक है उतना तो हमारे खाद्य पदार्थों में पहले से स्वयमेव ही मौजूद रहता है। ऊपर से जितना नमक खाया जाता है वह शारीरिक आवश्यकता के लिए नहीं स्वाद के लिए ही होता है।

कहते हैं कि छः मास नमक छोड़ दिया जाय तो रक्त इतना शुद्ध हो जाता है कि साँप के काटने पर भी उस व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती। इस जनश्रुति में कहाँ तक सत्य है यह ही कहा नहीं जा सकता पर इतना निर्विवाद है कि आज जितना नमक खाने की लोगों को आदत पड़ गई है वह अनावश्यक ही नहीं हानिकारक भी है। हमें चाहिये कि इससे बचने का यथासम्भव प्रयत्न करते रहें।


मनोभावों का प्रभाव

(श्री हरिश्चन्द्र जी जोशी, इलाहाबाद)

किसी भी मनुष्य के जीवन की उन्नति व अवनति मनुष्य के मनोभावों पर अवलंबित है। अगर कोई मनुष्य अपने विचारों के प्रति हमेशा द्वंद्वात्मक रूप में रहता है तो वह जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफल नहीं हो सकता। जो मनुष्य जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति करना चाहते हैं उन्हें अपने विचार स्थिर और उच्च कोटि के रखने चाहिए।

जो मनुष्य जीवन को समुचित बनाना चाहता है उसके लिए उच्च एवं परिमार्जित विचार रखना बहुत ही आवश्यक है। क्योंकि संसार में मनुष्य के जिस प्रकार विचार होते हैं उसी प्रकार का उसे वातावरण भी प्राप्त होता है और मनुष्य का जैसी वातावरण होता है वैसी ही वह उन्नति करता है। अतएव उत्तम वातावरण प्राप्त करने के लिए मनोभावों का उच्च होना अत्यन्त आवश्यक है।

प्रत्येक मनुष्य के आन्तरिक व बाह्य दोनों प्रकार के विचार इयर द्वारा वायु में प्रवाहित रहते हैं अतएव एक पुरुष के जिस प्रकार के मनोभाव होते हैं उसी प्रकार के कई विचार, मस्तिष्क एवं वायु में से अपने अन्दर ग्रहण कर लेता है। एक वासना प्रेमी व्यक्ति के पास रात दिन वासनामय विचार घूमा करते हैं इसलिए वह हमेशा वासना के कठोर पथ में ही अपना जीवन व्यतीत कर देता है। और एक धार्मिक व्यक्ति के पास धार्मिक विचार घूमा करते हैं जिससे वह जीवन के परम लक्ष्य तक पहुँच जाता है। चाहे वह सिनेमा हाल हो या मन्दिर। अगर एक वासना प्रेमी का मन्दिर में भी स्त्री सौंदर्य की ओर लक्ष्य रहेगा और धार्मिक व्यक्ति सिनेमा में जाकर भी स्त्री को देवी स्वरूप मानकर सम्मान प्रदान करेगा। अतएव मनुष्य के विचार ही उसके जीवन निर्माण में सहायक होते हैं।

मनुष्य के जिस प्रकार विचार होंगे उसी प्रकार उसकी खाने, पीने की व अन्य रुचि भी रहती हैं। जैसे कोई व्यक्ति जरा-जरा सी बात पर क्रोध करने वाला, हिंसक प्रयोग करने वाला, घमण्डी, दूसरों को धोखा देने वाला, मनुष्य तामसिक विचार का होता है। इससे उसका स्वभाव भी तामसिक बन जाता है वह बात-बात पर क्रोध करता है, इससे उसके कई शत्रु हो जाएंगे, और कोई भी मनुष्य उससे बात करना पसंद न करेगा, उसके मित्र भी तामसिक विचार वाले होंगे, इससे उसके मित्र भी उससे ईर्ष्या करेंगे, उसे जीवन में कभी भी ऊपर नहीं उठने देंगे, अप्रसन्नता से उसकी सारी सुन्दरता भी नष्ट हो जायगी। क्रोध करने से खून जलता है। अतएव उनका जीवन-समय भी कम हो जाता है। यह कहा जाता है कि जब मनुष्य क्रोध करता है तो उसके शरीर में कार्बनडाइ ऑक्साइड का अधिक समावेश होता है इससे उसकी उत्साह शक्ति व प्राण शक्ति दोनों नष्ट हो जाती हैं। और जब मनुष्य प्रसन्न रहता है उस समय उसके शरीर में ऑक्सीजन अधिक आती है इससे रक्त साफ होता है, उत्साह बढ़ता है, प्राण शक्ति भी बढ़ती है, इससे मनुष्य की उम्र बढ़ती है व मुखाकृति दिन प्रति दिन सुन्दर होती है। इसलिए मनुष्य को तामसिक विचार त्यागकर सात्विक विचार अपनाना चाहिए।

अब एक सात्विक विचार वाले व्यक्ति को ली जिएगा। यह मनुष्य सात्विक आहार विहार पसन्द करेगा जैसे दूध, घी, मक्खन, फल इत्यादि। इससे उसका स्वभाव भी सात्विक होगा अर्थात् दूसरों का भला चाहने वाला, क्षमाशील, हर समय मुस्कुराने वाला होगा, इससे लोग उसे बहुत चाहेंगे, उसके शत्रु नहीं रहेंगे, उसके मित्र सात्विक विचार के होने के कारण वे भी उसे ऊपर उठाने का ही प्रयत्न करेंगे। इस प्रकार की विचार-धारा के कारण मनुष्य के अन्दर ऑक्सीजन का अधिकार समावेश होता है इससे मनुष्य में उत्साह शक्ति बढ़ती है, और मुखाकृति सुन्दर प्रतीत होती है। सात्विक विचार ही मनुष्य जीवन की सफलता का धरातल है और तामसिक विचार मनुष्य जीवन के पतन का पथ है।

अगर एक व्यक्ति हमेशा करुण-रस के संगीत गाता या सुनता है तो उसका जीवन करुणा-पूर्ण हो जाता है। क्योंकि संगीत की स्वर लहरी में अपनी क्षमता के विचारों को मस्तिष्क में खींचने की बहुत शक्ति रहती है। हर्ष-रस का संगीत सुनने व गाने से जीवन आनन्दमय हो जाता है क्योंकि हर्ष-रस के संगीत में ऑक्सीजन मिली रहती है अतः इसके श्रवण व गान दोनों से मनुष्य के शरीर में ऑक्सीजन की प्रधानता हो जाती है इसके फलस्वरूप मनुष्य के जीवन में अथाह उत्साह बढ़ जाता है, प्राणशक्ति भी बढ़ जाती है, इससे मनुष्य सुन्दर व लम्बी उम्र वाला (दीर्घजीवी) होता है। एक प्रगतिशील व्यक्ति के लिये हर्ष रस के विचार व संगीत का उतना ही महत्व है जितना कि मनुष्य के लिए भोजन। विचारों की महानता महान जीवन का प्रत्यक्ष लक्षण है। हमें चाहिये कि अपने भीतर काम करने वाले विचारों का निरीक्षण करते रहें तथा बुरे विचारों को, दोष दुर्गुणों को त्यागने एवं सद्विचार, सद्गुण, सद्भावों को अधिकाधिक मात्रा में अपनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहें।


गायत्री-संहिता

(गताँक से आगे)

चतुर्विशंतिलक्षाणाँ सततं तदुपासकः। गायत्रीणा मनुष्ठानाद्गायत्र्याः सिद्धिमाप्नुते ॥ 53॥

गायत्री का उपासक निरन्तर चौबीस लाख गायत्री के मंत्र जप का अनुष्ठान करने से गायत्री की सिद्धि को प्राप्त करता है।

साधनायै तु गायत्र्याः निश्छेलन हि चेतसा। वरणीयः सदाचार्यः साधकेन सुभाजनः॥

गायत्री साधना के लिये साधक को चाहिये कि वह श्रद्धा भक्ति के साथ योग्य श्रेष्ठ आचार्य को गुरु वरण करें। गायत्री दीक्षा लेकर साधना आरम्भ करें।

लघ्वानुष्ठानतो वापि महानुष्ठानतोऽथवा। सिद्धिं, विन्दति वै नूनं साधकः सानुपतिकाम् ॥ 55॥

लघु अनुष्ठान करने से अथवा वृहत अनुष्ठान करने से साधक साधना में किये गये श्रम के अनुपात से सिद्ध को प्राप्त करता है।

एक एव तु संसिद्धः गायत्री मंत्र आदिशत्। समस्तलोक मंत्राणाँ कार्यसिद्धेस्तु पूरकः॥ 56॥

सिद्ध हुआ अकेला ही गायत्री मंत्र संसार के समस्त मंत्रों द्वारा हो सकने वाले कार्यों को सिद्ध करने वाला माना गया है

अनुष्ठानावसाने तु अग्निहोत्रो विधीयताम्। यथा शक्ति ततो दानं ब्रह्मभोजस्त्वनन्तरम्॥ 56॥

अनुष्ठान के अनन्तर हवन करना चाहिये तदनंतर शक्ति के अनुसार दान और ब्रह्म-भोज करना चाहिये।

महामंत्रस्य चाप्यस्य स्थाने स्थान पदे पदे। गूढो रहस्यगर्भोऽनन्तोपदेशसमच्चयः॥ 58॥

इस महामंत्र के अक्षर अक्षर और पद पद में रहस्य भरा हुआ है और अनन्त उपदेशों का समूह इस महामंत्र में छिपा हुआ अन्तर्हित है।

यो दधाति नरश्चैतानपदेशाँस्तु मानसे। जायने ह्य भयं तस्य लोकमानन्दसंकुलम॥ 59॥

जो मनुष्य इन उपदेशों को मन में धारण करता है उसके दोनों लोक आनन्द से व्याप्त हो जाते हैं।

समग्रामपि सामग्रीमनष्ठानस्य पूजिताम्। स्थाने पवित्र एवैताँ कुत्रचिद्धि विसर्जयेत ॥ 60॥

अनुष्ठान की समस्त पूजित सामग्री को कहीं पवित्र स्थान पर ही विसर्जित करें।

सत्पात्रो यदि वाचार्यो न स्यात्संस्थापयेत्तदा। नारिकेलं शुचिं वृत्वाचार्यभावेन चासने ॥ 61॥

अगर श्रेष्ठ एवं योग्य आचार्य न प्राप्त हो तो पवित्र नारियल को आचार्य भाव से वरण करके आसन पर स्थापित करें।

प्रायश्चित्तं मतं, श्रेष्ठं त्रूटीनाँ पापकर्मणाम्। तपश्चर्यैव गायत्र्याः नातोऽयदृश्यते क्वचित् ॥ 62॥

गलतियों एवं पाप कर्मों के प्रायश्चित के लिये गायत्री की तपश्चर्या सबसे श्रेष्ठ मानी गई है।

सेव्या आत्मोन्नतेरर्थ पदार्थास्तु सतो गुणाः। राजसाश्च प्रयोक्तव्याः मनोवाँछामि पूर्त ये ॥ 63॥

आत्मा की उन्नति के लिये सतोगुणी पदार्थों का उपयोग करना चाहिये और मनोभिलाषाओं की पूर्ति के लिये रजोगुणी पदार्थों का उपयोग करना चाहिये।

प्रादुर्भावस्तु भावानाँ तामसानाँ विजायते। तमोगुणानामर्थानाँ सेवनादिति निश्चयः ॥ 64॥

तमोगुणी पदार्थों के उपयोग करने से तमोगुणी भावों की उत्पत्ति होती है।

मालासनं समिध्यज्ञ सामिग्रयर्चन संग्रह। गुणात्रयानुसारं हि सर्वे वैददते फलम् ॥ 65॥

माला, आसन, हवन सामग्री, पूजा के पदार्थ जिस तत्व की प्रधानता के लिये लिए जायेंगे वे वैसे ही अपने गुणों के अनुसार फल को देते हैं।

प्रादुर्भवन्ति वै सूक्ष्माश्चतुर्विशनि शक्तयः। अक्षरेभ्स्तु गायत्र्याः मानवानाँ हि मानसे ॥ 66॥

मनुष्यों के अन्तःकरण में गायत्री के चौबीस अक्षरों से चौबीस सूक्ष्म शक्तियाँ प्रकट होती हैं।

मुहूर्ता योग दोषा वा येऽप्यमंगलकारिणाः। भस्मताँ यान्ति ते सर्वे गायत्र्यास्तीव्रतेजसा ॥ 67॥

अमंगल को करने वाले जो भी मुहूर्त अथवा योग दोष हैं वे सब गायत्री के प्रचण्ड तेज से नष्ट हो जाते हैं।

एतस्मात्तु जपान्मूनं ध्यानमग्नेन चेतसा। जायते क्रमशश्चैव षट्चक्राणाँ तु जाग्रतिः ॥ 68॥

निश्चय ही ध्यान में रत चित्त के द्वारा इस जप को करने से धीरे-धीरे षट् चक्र जागृत हो जाते हैं।

षट् चक्राणि यदै तानि जागृतानि भवन्ति हि। षट् सिद्धयोऽभिजायन्ते चक्रैरेतैस्तदानरम् ॥ 69॥

जब ये षट् चक्र जागृत हो जाते हैं तब मनुष्य को इन चक्रों के द्वारा छः सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

अग्निहोत्रं तु गायत्री मंत्रेण विधिवत् कृतम्। सर्वेष्ववसरेष्वेव शुभमेव मतं बुधैः॥ 70॥

गायत्री मंत्र से विधिपूर्वक किया गया अग्निहोत्र सभी अवसरों पर विद्वानों ने शुभ माना है।

यदावस्थासु सयाल्लोके विपन्ना सु तदातु सः मौनं मानसिकं चैव गायत्री जपमाचरेत् ॥ 71॥

जब कोई मनुष्य विपन्न (सूतक, रोग, अशौच आदि) अवस्थाओं में हो तब वह मौन मानसिक गायत्री जप करें।

तदनुष्ठान काले तु स्वशक्तीर्नियमेज्जनः। निम्नकिर्मसु ताः धीमान् न व्ययेद्धि कदाचनः ॥ 72॥

मनुष्य को चाहिये कि वह गायत्री साधना से प्राप्त हुई अपनी शक्ति को संचित रखे। बुद्धिमान मनुष्य कभी भी उन शक्तियों को छोटे कामों में खर्च नहीं करते।

नैवानावश्यकं कार्यं क्वचिदात्मार्थिनानरा। स्वात्मशक्तेस्तु प्राप्तायाः यत्र तत्र प्रदर्शनम् ॥ 73॥

आत्मार्थी मनुष्य को प्राप्त की हुई अपनी शक्ति का जहाँ का तहाँ आवश्यक हो प्रदर्शन नहीं करना चाहिये।

आहारे व्यवहारे च मस्तिष्केऽपि तथैव हि। सात्विकेन सदा भाव्यं साधकेन मनीषिणा ॥ 74॥

आहार में व्यवहार में और उसी प्रकार मस्तिष्क में भी बुद्धिमान साधक को सात्विक होना चाहिये।

कर्तव्य धर्मतः कर्म विपरीतं तु यद्भवेत्। तत्साधकरतु मतिमानाचरेन्न कदाचनं॥ 75॥

जो काम कर्तव्य धर्म से विपरीत हो वह कर्म बुद्धिमान साधक कभी नहीं करें।

पृष्ठेस्याः साधनायास्तु राजतेऽतितराँ सदा। मनरवीसाधकानाँ हि बहूनाँ साधनावलम् ॥ 76॥

इस साधना के पीछे आदि काल से लेकर अब तक के असंख्य मनस्वी साधकों का साधन बल शोभित है।

अल्पीयस्या जगत्येव साधनायास्तु साधकः। भगवत्यास्तु गायत्र्याः कृपाँ प्राप्नोत्य संशयम् ॥ 77॥

थोड़ी ही श्रम साधना से साधक भगवती गायत्री की कृपा को प्राप्त कर लेता है।

प्राणयामे जपन् लोकः गायत्रीं ध्रुवमाप्नुते। निग्रहं मनसश्चैव चेन्द्रियाणाँ हि सम्पदम् ॥ 78॥

मनुष्य निश्चय से प्राणायाम में गायत्री को जपता हुआ मन का निग्रह और इन्द्रियों की सम्पत्ति को प्राप्त करता है।

मंत्रं विभज्य भागेषु चतुर्षून्नतमस्तदा। रेचकं कुम्भकं वाह्यं पूरकं कुम्भकं चरेत् ॥ 79॥

बुद्धिमान मनुष्य मंत्र को चार भागों में विभक्त करके तब रेचक, कुम्भक, पूरक और वाह्य कुम्भक को करे।

यथा या पूर्वस्थितेनैव न द्रव्यं कार्य साधकम्। महासाधनतोऽप्यस्यान्नाज्ञो लाभं तथाप्नुते ॥ 80॥

जिस प्रकार धन पास में रखे रहने से ही कार्य सिद्धि नहीं हो जाती उसी प्रकार से मूर्ख मनुष्य इस महा साधन से भी लाभ प्राप्त नहीं कर सकता।

साधकः कुरुते यस्तु मंत्र शक्तेरपव्ययः। तं विनश्यति सा शक्ति समूलं नाश संशयः ॥ 81॥

जो साधक मंत्र शक्ति का दुरुपयोग करता है उसको वह शक्ति समूल नष्ट कर देती है।

सततं साधनाभिर्यो याति साधकताँ नरः। स्वप्नावस्थासु जायन्ते तं दिव्या अनभूतयः ॥ 82॥

जो मनुष्य निरन्तर साधना करने से साधकत्व को प्राप्त हो जाता है उस व्यक्ति को स्वप्नावस्था में दिव्य अनुभव होते हैं।

सफलः साधको लोके प्राप्नुतेऽनभान् नवान्। चित्रान् दशविधाश्चैव साधनासिद्धयन्तरम् ॥ 83॥

संसार में सफल साधक नवीन और विचित्र प्रकार के अनुभवों को साधना की सिद्धी के पश्चात् प्राप्त करता है।

भिन्नाभिर्विधिभिर्बुद्धया भिन्नासु कार्यपंक्तिषु। गायत्र्या सिद्ध मंत्रस्य प्रयोगः कृयते बुथा ॥ 84॥

बुद्धिमान पुरुष भिन्न-भिन्न कार्यों में गायत्री के सिद्ध हुये मंत्र का प्रयोग भिन्न-भिन्न तरीकों से विवेक पूर्वक करता है।

चतुर्विंशति वर्णैर्या गायत्री गुस्फिता श्रुतौ। रहस्य युक्तं तत्रापि विज्ञैः रहस्यवादिभिः ॥ 85॥

वेद में जो गायत्री चौबीस अक्षरों से गुंथी गई है विद्वान लोग इन चौबीस अक्षरों से गूँथने में भी बड़े बड़े रहस्यों को छिपा बतलाते हैं।

रहस्यमुपवीतस्य गुह्याद्गुह्यतरं हि यत्। अन्तर्हितंतु तर्त्सव गायत्र्याँ विश्वमातरम् ॥ 86॥

यज्ञोपवीत का जो गुह्य से गुह्य रहस्य है वह सब विश्व माता गायत्री में अन्तर्हित है।

अयमेव गुरोर्मन्त्रः यः सर्वोपरि राजते। विन्दौसिन्धुरिवास्मिस्तु ज्ञानविज्ञानमाश्रितम् ॥ 87॥

यह गायत्री ही गुरु मंत्र है जो सर्वोपरि विराजमान है। एक बिन्दु में सागर के समान इस मंत्र में समस्त ज्ञान और विज्ञान आश्रित हैं।

आभ्यन्तरे तु गायत्र्या अनेके योग संचयाः। अन्तर्हिता विराजन्ते कश्चिदत्त न संशयः ॥ 88॥

गायत्री के अंतर्गत अनेक योग छिपे हुए हैं। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है।

धारयन् हृदि गायत्रीं साधको धौत किल्विषः। शक्तीरनुभवत्युग्राः स्वस्मिनात्मन्यलौकिकाः ॥ 89॥

पाप रहित साधक हृदय में गायत्री को धारण करता हुआ अपनी आत्मा में अलौकिक तीव्र शक्तियों का अनुभव करता है।

वार्तारत्वेतादृशास्तस्मै भासन्तेऽल्पप्रयासतः। यास्तु साधारणों लोको ज्ञातुमर्हति नैव हि ॥ 90॥

उसको थोड़े ही प्रयास से ऐसी-ऐसी बातें विदित हो जाती हैं जिन बातों को सामान्य लोग जानने में समर्थ नहीं होते।

एतादृशास्तु जायन्ते तन्मनस्यनुभूतयः। यादृशान हि दृश्यन्ते मानवेषु कदाचन ॥ 91॥

उसके मन मैं इस प्रकार के अनुभव होते हैं जैसे अनुभव साधारण मनुष्यों में कभी भी नहीं देखे जाते।

प्रसादं ब्रह्मज्ञानस्य येऽन्येभ्यो विरन्त्यपि। आसादयन्ति ते नूनं मानवाः पुण्यमक्षयम् ॥ 92॥

ब्रह्म ज्ञान के प्रसाद को जो लोग दूसरों को भी बाँटते हैं, वे मनुष्य निश्चय ही अक्षय पुण्य को प्राप्त करते हैं।

गायत्री संहिता ह्येषा परमानन्ददायिनी। सर्वेषामेव कष्टानाँ धारणायास्त्यलं भुवि। ॥ 93॥

यह ‘गायत्री-संहिता’ परम आनन्द को देने वाली है। समस्त कष्टों के निवारण के लिये पृथ्वी पर यह अकेली ही पर्याप्त है।

श्रद्धया ये पठन्त्येनाँ चिन्तयन्ति च चेतसा। कृपायाँ वावगृहृन्ति भवबाघास्तरन्तिते ॥ 94॥

जो लोग इसको श्रद्धा से पढ़ते हैं और ध्यान पूर्वक इसका चिंतन मनन करते हैं वे लोग भव बाधाओं को तर जाते हैं।


श्री रामकृष्ण जी परमहंस के उपदेश

-जिसको ब्रह्मज्ञान हुआ हो, वह जीवन मुक्त है, वह ठीक समझता है-आत्मा अलहदा है और देह अलहदा। भगवान का दर्शन (आत्म-ज्ञान) होने पर देहात्म बुद्धी-देह में अहंभाव नहीं रहता, जैसे नारियल का जल सूख जाने से भीतर गिरी और गुठली अलहदा पृथक हो जाती है, वैसे ही विषय आदि में अहंभाव चले जाने पर आत्मज्ञान होता है। तब आत्मा अलहदा और देह अलहदा का बोध होता है।

-जो माँ इस भाँति कहती हो (आत्मोन्नति के लिए प्रयत्न मत करो) वह माँ, नहीं है। वह अविद्या रूपिणी है। जो ईश्वर लाभ के मार्ग में विघ्न डालती हो, ऐसी माँ की बात न सुनने से कोई भी दोष नहीं है। ईश्वर के लिए गुरुजनों के वाक्य का लंघन करने में कोई दोष नहीं होता। भरत ने रामचन्द्र के लिए कैकेयी की बात नहीं सुनी। गोपियों ने कृष्ण के दर्शन करने के लिए अपने पतियों का अटकाव नहीं माना। प्रह्लाद ने ईश्वर के लिए अपने बाप की बात नहीं सुनी। बली राजा ने भगवान की प्रीति के लिए गुरु शुक्राचार्य की बातें नहीं मानी। विभीषण ने राम को पाने के लिए बड़े भाई रावण की बात नहीं मानी थी। किन्तु इस बात को छोड़कर कि-’भगवान की ओर मत जाओ’ और उनकी सब बातें अवश्य सुननी चाहिये।

-गम्भीर ध्यान में वाह्य ज्ञान शून्य होता है। एक व्याध ने चिड़िया मारने के लिए ऐसी टकटकी बाँध रखी थी कि-कोई बारात कहीं से जा रही थी, साथ ही कितने लोग, कितने बाजे गाजे, कितनी सवारियाँ और कितने ही घोड़े भी थे, कितने देर तक अपने ही पास होकर वे चले गये। किन्तु व्याध को कोई होश नहीं, वह नहीं जान सका कि-उसके पास होकर एक बारात चली गई।

-एक व्यक्ति अकेला एक पोखरे में मछली पकड़ रहा था। (उसके हाथ में बंशी थी।) बहुत देर बाद (उसकी बंशी की, पानी के ऊपर रहने वाली, छोटी) लकड़ी हिलने लगी और जरा-जरा डूबने लगी। वह तब बंशी को हाथ से भली-भाँति पकड़ (मछली को) मारने के लिये तैयार हुआ। इतने में एक पथिक (राहगीर) ने पास जाकर पूछा-’महाशय, अमुक बनर्जी का मुकाम कहाँ पर है, आप कह सकते हैं?’ (प्रश्न का) कोई जवाब नहीं मिला। वह व्यक्ति उस समय बंशी को हाथ में लेकर उसे खींचने को तैयार हो रहा था। पथिक बार-बार जोर से कहने लगा-’महाशय, आप कह सकते हैं, अमुक बनर्जी साहब का घर कहाँ पर है?’ उस (मछली पकड़ने वाले) व्यक्ति को होश नहीं था। उसका हाथ काँप रहा था। नजर केवल ‘फतना’ (बंशी की लकड़ी) पर थी तब पथिक विमुख होकर चला गया। पथिक चला गया कि-इतने में (बंशी की) लकड़ी भी डूब गई। उस व्यक्ति ने खिंचकर मछली को जमीन पर उठाया। बाद को अँगोछे से मुँह पोंछकर वह पुकार कर पथिक को बुलाने लगा-अरे। सुनो, सुनो। पथिक लौटने को राजी नहीं था, किन्तु बहुत (बढ़ बढ़ कर) पुकारने से वे लौट आये। आकर उन्होंने पूछा-’क्या महाशय फिर क्यों बुलाते हो?’ पथिक ने का- ‘उस समय कितने बार पूछा, और अब कह रहे हो कि-क्या पूछा था।’ उस व्यक्ति ने कहा- ‘उस समय तो लकड़ी डूब रही थी। और मछली बंशी में पकड़ाई जा रही थी। इसी कारण मुझे उस समय कुछ भी सुनने में नहीं आया।

-ध्यान में इस बात की एकाग्रता हुआ करती है। और कुछ देखा भी नहीं जाता है और सुना भी नहीं जाता। स्पर्श का बोध तक भी नहीं होता। सर्प शरीर के ऊपर होकर चला जाता है, उसे भी मालूम नहीं होता। जो ध्यान करता हो वह भी नहीं होता और सर्प भी जान नहीं जान सकता है।


मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ।


मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ (Kavita)

मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ। मैं शापों को वरदान बना सकता हूँ॥

मैं शूलों को भी फूल समझता आया। मझधार विकट को कूल समझता आया॥

इस जग को विधि की भूल समझता आया। कंचन की काया धूल समझता आया॥

मैं आहों को मधु गान बना सकता हूँ। मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ॥1॥

मैंने मधु की बरसातें कभी न देखीं। वैभव की घड़ियाँ आते कभी न देखीं॥

सोने के दिन की बातें कभी न देखीं। वे चाँदी वाली रातें कभी न देखीं॥

मैं निशि को स्वर्ग-विहान बना सकता हूँ। मैं मानव को भगवान् बना सकता हूँ॥2॥

विष भरी जुबानें हिलते देख चुका हूँ। उर को छालों से छीलते देख चुका हूँ॥

नव कुसुम शूल में खिलते देख चुका हूँ। अरमान खाक में मिलते देख चुका हूँ॥

मैं जली कटी गुणगान बना सकता हूँ। मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ॥3॥

तुम जीवन में पाषाण न बनकर आओ। मुसकाओ प्रिय, सुनसान न बनकर आओ॥

मधु बरसाओ अंगार न बनकर आओ। तुम परिचित हो अनजान न बनकर आओ॥

मैं लज्जा को पहचान बना सकता हूँ। मैं मानव को भगवान बना सकता हूँ।

*समाप्त*

(श्री यमुनाप्रसाद शर्मा, पालीवाल)