वेदों के स्वर्ण सूत्र

डमं से वरुण श्रुधी हवम। यजु. 21। 1

हे भगवान मेरी इस प्रार्थना को सुन लो।

ऋतस्य पन्थाँ न तरन्ति दुष्कृतः। ऋग. 9। 73। 6

सत्य के मार्ग को दुष्कर्मी पार नहीं कर पाते।

अघमस्त्वघकृते अथर्व. 10। 1। 5

पापी को दुःख ही मिलता है।

स्वस्ति पन्थामनुचरेम। ऋग. 5। 51। 51

हम कल्याण मार्ग के पथिक हों।

आरोह तमसो ज्योतिः। अ. 8। 1। 8

अन्धकार (अविद्या) से निकल कर (ऊपर उठकर) प्रकाश (ज्ञान) की ओर आओ।

मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे। यजु. 36। 18

हम सब परस्पर मित्र की दृष्टि से देखें।

केवलाघो भवति केवलादी। ऋग. 10। 117। 6

अकेला भोग भोगने वाला व्यक्ति पाप को ही भोगता है।

यज्ञो विश्वस्य भुवनश्य नाभिः। अथ. 9। 10। 14

यज्ञ ही सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को बाँधने वाला नाभिः स्थान है।

उद्यानं ते पुरुष नावयानम्। अथ. 8। 1। 6

पुरुष तुझे आगे बढ़ना है न कि पीछे हटना।

मर्यादे पुत्रमाधेहि। अथर्व 6। 81। 2

सन्तान को मर्यादा में लगाओ।

चारु वदानि पितरः संगतेपु। अथ. 7। 12। 1

मैं सभाओं में अच्छा साफ, सुन्दर बोलूँ।

दक्षिणावन्तों अमृतं भजन्ते। ऋग. 1125।

दानी अमर पद प्राप्त करते हैं।

मा नो द्विक्षत कश्चन। अथ. 12। 12। 6

हम से कोई भी द्वेष करने वाला न हो।

अग्निनाग्निः समिध्यते। ऋग. 1। 12। 6

अग्नि से अग्नि जलती है या जीवन से जीवन मिलता है।

सम्यंचः सव्रता भूत्वा वाचं बदत भद्रया। अ. 3। 30।

हम सब समान गति, समान कर्म, समान ज्ञान और समान नियम वाले बनकर परस्पर कल्याणी वाणी से बोलें।

देवानाम् सुख्यमुपसेदिमा वयम्। ऋग. 1। 81। 2

हम देवों (विद्वान) की मैत्री करें।

स्वं महिमानमायजताम्। यजु. 21। 47

अपनी महिमा व प्रतिष्ठा को बढ़ाओ।

अस्माकं सन्त्वाशिषः सत्या। यजु. 2। 10

हमारी कामनाएं सच्ची हों।

न कामममव्रतो हिनोति न स्पृशद्रयिम्।

साम. पूर्व. अ: 4 प्र: 5 खं: 1 मं: 5

व्रतहीन (बेऊसूल) न अपनी कामना को पूर्ण कर सकता है और न ऐश्वर्य को ही पाता है।


अखण्ड ज्योति

(श्री लक्ष्मी प्रसाद द्विवेदी ‘चन्द्र’)


अखण्ड ज्योति (Kavita)

प्रदीप! यह जला करे। असीम स्नेह-धार पर, अकम्प लौ बयार पर, प्रदीप! यह जला करे।

जला करे नगर-नगर, भवन-भवन, डगर-डगर, लिये अमन्द वर्ति-कण, जला करे जगर-मगर।

दिगन्त जगमगा उठे। प्रकाश डगमगा उठे॥

परन्तु द्वार द्वार पर, प्रदीप! यह जला करे।

कहीं जले, कहीं ढले तमिस्र के विकास पर, ज्वलित शिखा महान ले, जले नया प्रकाश भर।

तिमिर भरी गली-गल। खिले कनक-कलित कली।

अनन्त सिन्धु ज्वार पर, प्रदीप! यह जला करे।


हमारा जीवनोद्देश्य-अक्षय सुख

(श्री हरगोविन्द जी पाराशर काव्यतीर्थ साहित्यरत्न)

मानव के नैसर्गिक इच्छात्रय में सुख प्राप्ति की आकाँक्षा सर्वप्रमुख है। वह अपने हृदय से उसको चाहता है तथा उसी की प्राप्ति में सदैव प्रयत्नशील रहता है। “दुःख से निवृत्ति हो चिरन्तन सुख मुझे मिले” यह मनुष्य चाहता तो अवश्य है, पर माया के पाश में कुण्ठित बुद्धि हो उस ‘अक्षय सुख’ के यथेष्ट महत्व और सन्मार्ग को न जानने के कारण लक्ष्य भ्रष्ट हो विफल मनोरथ संसार में बारम्बार भ्रमित होता रहता है। यहाँ हमारे प्रस्तुत विषय की स्पष्टि के लिए निम्नलिखित इन प्रश्नों के उत्तर अभीष्ट होंगे-

(1) सुख किसे कहते हैं? (2) उसके कितने विभेद हैं? (3) उनमें मानव की कैसी अवस्था रहती है? (4) मनुष्य को कौन सा सुख श्रेयस्कर है? (5) अक्षय सुख क्या है? (6) यह सुख कैसे प्राप्त किया जा सकता है? तथा इसे प्राप्त करने से क्या होता है? आइए इन प्रश्नों पर विचार करें।

(1) दैहिक (देह सम्बन्धी) दैविक (भाग्य सम्बन्धी) और भौतिक (संसारी) इन तीनों तापों के दुःख से निवृत्ति हो ऐसी शान्ति को ‘सुख’ कहते हैं।

(2) सम्पूर्ण सुखों को संक्षेपतः दो मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) निरालम्ब सुख और सालम्ब सुख। किसी वस्तु या आकार के अवलम्बन साहित्य सुख को ‘निरालम्ब’ तथा किसी वस्तु या साकार द्वारा प्राप्त सुख को ‘सालम्ब सुख’ कहा जाता है।

निरालम्ब सुख स्थायी तथा सालम्ब सुख अस्थायी होता है क्योंकि निराकार अविनाशी एवं स्थायी होता है, इसके विपरीत साकार वस्तु विनाशी होती है। जो सुख जिस आलम्ब के हेतु होगा, उसके नष्ट होने पर ‘तज्जनित सुख’ भी नष्ट हो जावेगा। यदि वह आलम्बन अविनाशी अक्षय है तो तज्जनित सुख भी अविनाशी होगा।

(3) निरालम्ब सुख ‘आत्मानन्द’ नाम से भी व्यवहृत होता है प्रत्येक प्राणि आत्मवान् है, तथा ‘आनन्द’ आत्मा का गुण है आत्मा और परमात्मा वस्तुतः अभिन्न हैं, जब आत्मा अनुभवजन्य हो जाती है, तब वह (प्राणि) आनन्दमय हो जाता है। सालम्ब सुख में मानव की सुख दुःखात्मक अवस्था रहती है, कारण-यह सुख किसी साकार वस्तु का अवलम्बन जन्य होता है। पहले हम कह चुके हैं कि साकार विनाशी होता है। अतः तज्जन्य सुख भी नष्ट हो जाता है, तब उसकी दशा भी पूर्ववत दुःखी हो जाती है। इस सुख में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध हैं, जैसे धन के कारण जो सुख होगा उसके नष्ट होने पर तज्जन्य उस सुख का भी विनाश निश्चित हो जायगा और उस उपयोग (सुख) के अभाव में धन का भी नाश हो जावेगा।

(4) इन दोनों सुखों को यदि अक्षयता रूपी मापदण्ड में तौला जाय तो निरालम्ब रुख ही गुरु निकलेगा। इसी ‘निरालम्ब सुख’ को ‘अक्षय सुख’ भी कहते हैं, अतः मनुष्य को इसी सुख की प्राप्ति में कृत प्रयत्न होना चाहिये।

(5) ‘अक्षय सुख’ उसे कहते हैं जो कभी भी किसी भी अवस्था में कम न हो किन्तु अक्षय ही बना रहे। सुख तभी अक्षय हो सकता है, जबकि उसका आलम्बन भी अक्षय हो। अक्षय आलम्बन परमात्मा अर्थात् ब्रह्म के सिवा और कुछ भी नहीं। वही ब्रह्म एक ऐसा तत्व है जिसका आज तक कोई वर्णन उपस्थित नहीं कर सका है। यद्यपि वेद चतुष्टय इस तरफ खूब प्रयत्न करते हैं पर ‘नेति नेति’ से अपनी असमर्थता भी व्यक्त कर देते हैं। वही तत्व आकार रहित और अक्षय है उसी के सहारे जो अखण्ड सुख प्राप्त होता है वही ‘अक्षय सुख’ कहा जाता है।

(6) इसी अक्षय सुख की प्राप्ति का मार्ग-निर्देशन प्रत्येक धर्म अपनी-अपनी रीति से स्पष्ट करते हैं। ‘जितने मत वे ही पथ’ के अनुसार सब धर्म उसी एक परम तत्व या ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति के मार्ग हैं। किसी भी धर्म से इस ‘अक्षय सुख’ को प्राप्त किया जा सकता है, अन्तर केवल इतना ही है कि कोई मार्ग सीधा है तो कोई घुमावदार।

इस सुख को जो प्राप्त कर लेता है वह कहीं तन्मय हो जाता है। इसी मत का दृष्टीकरण तुलसी दास जी ने अपने इन शब्दों में इस प्रकार किया है-

सोई जानेहू जेहि देहु जलाई। जानत तुम्हई तुम्हई होहि जाई॥

मानव की एक ‘ऐसा प्राणी है जो’ इस सुख की प्राप्ति भली भाँति करने में समर्थ हो सकता है। इस ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति का एक सीधा मार्ग जो हमारे ऋषि मुनियों से विहित है संक्षिप्त में निर्दिष्ट करना ‘अप्रासंगिक’ न होगा। पहले सत्शास्त्रों को अध्ययन एवं मनन कर सत्संग से भगवान में श्रद्धा और विश्वास को दूर कर, इन्द्रियों का नियमन करते हुए मन को वश में करे। मन को वश में करना बड़ा ही कठिन कार्य है, अतः उसे अभ्यास और वैराग्य (त्याग) से वश में करे। तथा-

यतो यतो निश्चरति, मनश्चञ्चल मस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैत, दात्मन्येव वशं न येत्। गीता।

“अस्थिर चंचल मन जिन-जिन विषयों की ओर दौड़े, वहाँ-वहाँ से उसका नियमन करते हुए आत्मा के वश में करे।”

तमोगुण के पाँच तथा रजोगुण के तीन (काम, क्रोध, लोभ) इन आठों गुणों से जब तक समूल निवृत्ति नहीं होती, तब तक मन वश में नहीं होता। अतः धीरे-धीरे दृढ़ाभ्यास से तमोगुण और रजोगुण का परित्याग करें, इससे तत्व गुण की प्राप्ति होती है तथा मन वश में हो जाता है। इसके बाद दैहिक, दैविक, भौतिक तापों को समूल जीतकर दत्तचित्त हो परमात्मा प्राप्ति के लिए निदिध्यासन करे, इससे अन्तःकरण में ज्ञान का आविर्भाव होगा। ज्ञान होने पर कर्म बन्धन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है, जैसा कि गीता में कहा भी है-

सर्व कर्माखिलं पार्थ। ज्ञाने परि समाप्यते॥ 4।

“हे पार्थ! सम्पूर्ण यावकर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।” ज्ञान ‘अक्षय सुख’ का प्रवेशद्वार है। यहाँ आने पर साधक शान्ति के पास पहुँचने लगता है। गीता में कहा भी है-

ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्ति मचिरेणाधि गच्छति।

“ज्ञान को प्राप्त कर परमशान्ति या अक्षय सुख शीघ्र ही प्राप्त होता है। पर अभी प्राप्ति नहीं हुई, इसके बाद ज्ञान रूपी तलवार से तीन विघ्न छेदन करने शेष रह जाते हैं। ये सब अक्षय सुख की प्राप्ति के बाधक हैं, ये वे ही तीन शरीर हैं जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहे जाते हैं। इन्हीं तीनों परदों का ज्ञानखण से छेदन कर साधक ‘अक्षय सुख’ प्राप्त करता है।

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को इसी ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति के लिए तलवार चलाने की आज्ञा दी है-

तस्मादज्ञान सम्पूतं, हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः। छित्वैनं संशयं योग मातिष्ठोत्तिष्ठ भारत 4। 42

हे अर्जुन! तू समत्व बुद्धि योग में स्थित हो, और अज्ञान से उत्पन्न हुए हृदय स्थित इस अपने संशय (शरीर त्रय) को ज्ञान रूप तलवार के द्वारा छेदन कर, खड़ा हो अर्थात् अक्षय सुख की प्राप्ति कर।

इन तीनों शरीरों के छेदन होने पर साधक अखण्डानन्द अर्थात् ‘अक्षय सुख’ प्राप्त करता है, तथा वह वहीं स्थिर हो जाता है लौटता नहीं। भगवान ने भी कहा है-

य प्राप्य न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं मम।

जहाँ पहुँच कर फिर आवागमन नहीं होता वही मेरा परम धाम है।

इसी ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति में मनुष्यत्व की सार्थकता है। इस कारण हे मेरे भाइयो! आप इसी की प्राप्ति में जुट जाओ। भगवान बड़े ही दयालु हैं वह तुमको शीघ्र ही अपना लेंगे इसमें कोई शक नहीं।


विचारों की प्रचण्ड शक्ति

(श्री ब्रजलाल त्रि. कामदार ‘धर्मरत्न’)

विचार शक्ति का केन्द्र स्थान मनुष्य का मस्तिष्क है किन्तु उस विचार शक्ति का आधार मन की स्थिरता पर अवलम्बित है। चंचल मन में अनेक प्रकार के संकल्पों-विकल्पों की तरंगें उठती रहती हैं और वे तरंगें चित्त में खलबली मचाकर मस्तिष्क को अशान्त बना देती हैं। विचार शक्ति का स्थान अन्तर जगत है। और इन्द्रियों सहित मन बुद्धि चित्त का व्यापार बाह्य जगत से है। अतः इन्द्रियों तथा मन बुद्धि और चित्त को बाह्य विषयों से हटा कर अन्तरमुख करना चाहिए। जब तक मन बुद्धि आदि अन्तरमुख होकर स्वस्थ, निश्चल एवं संयमित न हो जायं तब तक विचारों की एकाग्रता नहीं बन सकती। विचारों की एकाग्रता अथवा विच्छिन्न विचारधाराओं का समीकरण ही विचार शक्ति है।

मनुष्य जो कुछ करता है अथवा कर सकता है पर सब अपनी विचार शक्ति के बल पर ही करता है। विचारों का प्रवाह जब तक भिन्न-भिन्न दिशाओं में प्रवाहित होता रहता है तब तक उसमें महान कार्य सम्पादित हो सकता है। विचार धारा का निग्रह, विरोध एवं संयम करने से ही उसमें महान शक्ति का आविर्भाव होता है और शक्ति संसार के साम्राज्य तो क्या स्वर्ग पर भी अपना अधिकार जमा लेती है। नदियों के प्राकृतिक जल प्रवाहों को बाँधों के द्वारा रोक कर, उस निग्रही जल प्रवाह के प्रयत्न से महान विद्युत बल को उत्पन्न किया जा सकता है और लाखों एकड़ जमीन सींची जा सकती है, जबकि वर्षा का बूँद-2 करके गिरा हुआ जल थोड़े क्षणों में प्रवाहित होकर पृथ्वी पर जाता है या सूर्य की ताप में सूख जाता है।

इस विश्व के अनेक प्रकार के बलों में निरोधक विचारों का बल सबसे प्रचण्ड एवं महान बल है और वह निग्रहीत बल ही अब्य परिस्थित मन को अपने अधिकार में लाने, उसे सुधारने और बाह्य विषयों से हटाकर अन्तरमुख करने में समर्थ होता है। मन भी एक शक्तिशाली यन्त्र है और मन के द्वारा ही इस विश्व की रचना हुई है। विचारशक्ति प्रेरणा से ही मन रूपी यन्त्र कार्य तत्पर होता है। अतः उस मन के द्वारा अगर हमें महान कार्य को सम्पादन करना है तो हमें अपनी विचारशक्ति निग्रहीत एवं केन्द्रित करनी होगी। किसी भी विषय को लेकर उस एक विषय के सम्बन्ध में ही बार-बार विचार करना और अत्यन्तासक्त भाव से निरन्तर एकाग्रता पूर्वक बाधक एवं बिखरे हुए संकल्पों-विकल्पों का नाश कर, कार्य सिद्धि के लिए दृढ़ निश्चय करना- इसी का नाम निग्रहीत विचारशक्ति है। विचार जितने सूक्ष्म होंगे उसकी शक्ति उतनी ही विस्तृत, व्यापक एवं बलवती होगी।

शरीर स्थूल होने के कारण ही अमुक स्थल एवं काल विशेष में मर्यादित रहता है, किन्तु आत्मा सूक्ष्म होने के कारण सर्वत्र व्यापक अजर, अमर, नित्य, शाश्वत, सनातन एवं महान है। शरीर बल से आत्मबल महान शक्ति सम्पन्न है और समस्त विश्व ब्रह्माण्डों का संचालन करता है। जल से भाप अधिक बलवान है और भाप का बल बड़ी-बड़ी मिलों, स्टीमरों एवं रेलवे के इंजनों द्वारा लाखों मन माल ढोने में समर्थ होता है। भाप से विद्युत शक्ति में अधिक बल है और केंद्रीभूत-पावर हाउस-स्थित विद्युत का एक जरा सा आघात एक ही समय में सैकड़ों विशाल कार्य यन्त्रों को गतिमान कर देता है, हजारों दीपक एक साथ प्रज्वलित कर देता है और तार टेलीफोन के द्वारा हजारों मील को दूरी पर संदेश पहुँचा देता है, तब मनुष्यों के अन्तःकरण में केंद्रित विचार शक्ति का कितना प्राबल्य एवं प्रभाव होगा उसका सहज ही अनुमान किया जा सकता है।

विचार शक्ति आँतर जगत की विद्युत शक्ति है मनुष्य ईश्वर का अंश है और मनुष्य की उस आत्मा का जब परमात्मा में योग हो जाता है, तब उसकी विचार शक्ति की सामर्थ्य नूतन जगत की रचना करने में भी समर्थ हो जाती है। ऐसी विचार शक्ति अपनी ओर आकर्षित करके कार्य को सम्पादित करती है। विचारों के स्फुरण से ही इच्छा शक्ति जागृत होती है और उस इच्छा शक्ति द्वारा महान पुरुषों ने इस संसार में क्या-क्या चमत्कार नहीं दिखलाया है! निग्रहीत विचारों में जितना बल होगा उतनी ही उसमें आकर्षणशक्ति अधिक होगी। केन्द्रित विचारों की शक्ति का तेजोवलय घेरा मनुष्य के मुखमण्डल के आस-पास बना रहता है। और उसमें लोह चुम्बक की भाँति सजातीय विचारों को अपनी ओर आकर्षित करने की शक्ति होती है। उस शक्ति के कारण हम चाहे जाने या न जाने परन्तु समान विचार अपने आप ही एक दूसरे के विचारों में सम्मिलित हो जाते हैं और वे भले या बुरे अथवा सबल या निर्बल बन कर, मनुष्य को कार्य तत्पर अथवा अकर्मण्य बना देते हैं। हमारे अच्छे अथवा बुरे विचारों के साथ बाहर के समान विचारों का जब सम्मिलित होकर बल मिल जाता है तब हम उस बुरे अथवा भले कार्य को करने में तत्पर हो जाते हैं और उसकी अच्छाई-बुराई का अनुभव करते हैं। अतएव हमें अपने विचारों के प्रति बहुत ही सावधान रहना चाहिए।

हम सब एक ही परम चैतन्य तत्व के अविनाशी अंश हैं और हम सबके अन्तःकरण में वही एक चैतन्य तत्व विराजमान है। अतः हमारा विचार समूह सजातीय-विजातीय विचार समूहों में मिलकर जगत की भलाई अथवा बुराई का कारण बन सकता है। ऐसी परिस्थिति में हमारा कर्त्तव्य है कि हम सदैव देवी विचारों का सेवन करें, दैवी विचारों का संग्रह करें और दैवी विचारों का बल बढ़ावें, ताकि हम जगत में शान्ति, दया, दान, क्षमा, सत्य, अहिंसा, धृति, अस्तेय, प्रेम, उदारता आदि दैवी गुणों की स्थापना करके संसार को विनाश के मार्ग से बचा सकें, और उस समान विचार शक्ति के सामूहिक बल से आसुर भावापन्न काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, रोग, शोक, दुःख, द्वेष, क्लेश आदि जगत का अहित एवं क्षय करने वाले दुर्गुणों का नाश कर जगत की रक्षा करने में समर्थ हो सकें।

मनुष्यों को राक्षस न होकर देवता बनने के लिये अपने जीवन में सत्वगुण की वृद्धि करनी चाहिए। बिना सत्वगुण की वृद्धि के दैवी विचारों का सेवन हो नहीं सकता और बिना धर्म के आचरण किये सत्वगुण की वृद्धि हो नहीं सकती। धर्म के पालन से सत्वगुण के द्वारा दैवी भावना एवं अधर्माचरण से रजोगुण, तमोगुण के द्वारा राक्षसी अथवा आसुरी भावनाओं का उदय होता है। ये भावनायें हमारी मनोवृत्ति एवं विचार शक्ति के ऊपर अधिकार रखती हैं। अतः हमारे जीवन में अगर सत्वगुण की वृद्धि होगी तो वह दैवी प्रवृत्ति का विस्तार करेगी। अथवा रजोगुण, तमोगुण की वृद्धि होगी तो वह आसुरी भावों का उत्कर्ष करके राक्षसी प्रवृत्ति को बढ़ावेगी। इन दैवी एवं आसुरी वृत्तियों को जानने के लिए हमें अपनी स्वसत्ता का अनुभव एवं अध्ययन करना चाहिए। हम से आत्मा का, हमारे जीवन का, हमारे कार्यों का तथा हमारी भावना एवं विचारों का हमें ज्ञान प्राप्त करना चाहियें। दूसरे शब्दों के द्वारा हमें आत्म निरीक्षण करना चाहिए। अपने अन्दर के दोषों को दूर करना चाहिए तथा दुर्भावनाओं और दुवृत्तियों को हटाकर सदाचार एवं सद्गुणों को बढ़ाना चाहिए। तब ही हमारा अन्तःकरण निर्मल एवं पवित्र होगा, हमारा मन, बुद्धि, चित्त शान्त एवं स्वस्थ होंगे तथा हमारा गर्व और अहंकार गल कर वासनाओं का विनाश होगा। ऐसा होने पर ही सत्वगुण की धवल धारा का उर्ध्वगामी प्रवाह हमारे विचारों के केन्द्र स्थान मस्तिष्क के सब दोषों को धोकर मनः क्षेत्र को स्वच्छ, निर्मल एवं प्रफुल्लित करेगा और फिर उसमें से विचारों का जो स्फुरण होगा वह आपके जीवन को ही नहीं समस्त जगत के लिए भी स्वास्थ्यकर, रुचिकर एवं कल्याणप्रद होगा।


ब्रह्मचर्य का वास्तविक रूप

(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम. ए. एल. टी.)

ब्रह्मचर्य क्या है? ब्रह्मचर्य का साधारण अर्थ है कि पुरुष और स्त्री एक दूसरे को विषय की दृष्टि से न देखें, एक दूसरे को विषय के विचार से न छुएँ उनके मन में स्वप्न में भी विषय के विचार न उठें। जब वे एक दूसरे की ओर देखें या एक दूसरे के बारे में सोचें तो उनकी दृष्टि और विचार में कामुकता लेश मात्र भी न हो।

शरीर में वीर्य ही प्रधान वस्तु है और वीर्य की रक्षा करना ही ब्रह्मचर्य है। परन्तु हम देखते हैं कि पुरुष और स्त्री, बूढ़े ओर जवान सभी काम लिप्सा के जाल में फँसे पड़े हैं। विषय और वासना से अन्धे होकर लोग थोड़ी सी देर के मजे के लिये बड़े परिश्रम से कमाई हुई जीवन शक्ति की निधि को पलभर में खा बैठते हैं जब मद उतरता है, तब हम अपने को दयनीय दशा में पाते हैं। दूसरे दिन सवेरे हमारा शरीर भारी और सुस्त मालूम होता है और दिमाग काम करने से जवाब दे देता है। हम भस्म और याकूतियाँ खाते हैं, वैद्यों के पास जाकर ताकत की दवा माँगते हैं और सदा इस खोज में रहते हैं कि खोई हुई भोग की शक्ति कैसे यथावत हो जावे। इसी प्रकार दिन और वर्ष बीतते जाते हैं और जब असमय में ही बुढ़ापा आ जाता है हम अपने शरीर और दिमाग दोनों को ही क्षीण पाते हैं।

अतः ब्रह्मचर्य से होने वाले शारीरिक तथा मानसिक लाभ को ध्यान में रखकर ब्रह्मचर्य का पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। संकुचित अर्थ में जननेन्द्रिय-विकार के विरोध और अमैथुन को ही लोग ब्रह्मचर्य का पालन समझते हैं। परन्तु वास्तव में यह अधूरी और खोटी व्याख्या है। ब्रह्मचर्य का पूर्ण अर्थ है विषय मात्र का निरोध। जो और इन्द्रियों को जहाँ तहाँ भटकने देकर केवल एक ही इन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करता है, वह निष्फल प्रयत्न करता है, इसमें सन्देह नहीं। कान से विकार की बातें सुनना, आँख से विकार उत्पन्न करने वाली वस्तु देखना, जीभ से विकारोत्तेजक वस्तु चखना, हाथ से विकारों को भड़काने वाली चीज को छूना और साथ ही जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करना, यह तो आग में हाथ डालकर जलने को रोकने के समान हुआ। इसीलिए जो जननेन्द्रिय को रोकने का निश्चय करे उसे पहले ही से प्रत्येक इन्द्रिय को उस इन्द्रिय के विकारों से रोकने का निश्चय कर लेना चाहिये।

यदि हम सब इन्द्रियों को एक साथ वश में करने का अभ्यास करें- रफ्त डालें तो जननेन्द्रिय को वश में करने का प्रयत्न शीघ्र ही सफल हो सकता है, तभी उसमें पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त की जा सकती है अतः ब्रह्मचर्य की संकुचित व्याख्या से भ्रमित न होकर हमें ब्रह्मचर्य के मूल अर्थ को याद रखना चाहिए। “ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्म की--सत्य की शोध में चर्या, अर्थात् तत्सम्बन्धी आचार। इस मूल अर्थ से सर्वेन्द्रिय संयम का विशेष अर्थ निकलता है” अतः केवल जननेन्द्रिय संयम के अधूरे अर्थ को तो हमें भुला ही देना चाहिए और समस्त इन्द्रियों का संयम मन, वचन और काया से होना चाहिए।

अतः याद रखिये कि आत्मा संयम, जो सर्वेंद्रिय संयम द्वारा ही सम्भव हैं, जीवन का नियम होना चाहिये। इसलिए मैथुन भी तभी किया जाय जबकि पति-पत्नी दोनों चाहें और वह भी नियमों से शासित होकर जिन्हें दोनों ने शान्त ‘चित्त से तय कर लिया हो। यदि आप विवाहित हैं तो याद रखिये कि आपकी स्त्री, मित्र, सहचरी और सहयोगिनी है, भोग विलास का साधन नहीं। यदि आप अविवाहित हैं तो अपने को पवित्र रखना आपका अपने प्रति, समाज के प्रति और अपने भावी साथी के प्रति, कर्त्तव्य है। यदि आप पति या पत्नी भक्ति की इस भावना को दृढ़ करेंगे, तो इसे आप सारे प्रलोभनों से बचने का अमोघ साधन पावेंगे।

परमात्मा ने शुक्र- (वीर्य) रूपी जो गुप्त शक्ति हमें दी है उसे दृढ़ आत्म-संचय द्वारा संचित करना चाहिए, फिर हम देखेंगे कि इससे केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आत्मिक ओज और पौरुष में कितनी वृद्धि होती है।


अध्यात्मवादी की पृष्ठ भूमि

(श्री बैजनाथ पण्ड्या)

आध्यात्मिक मार्ग की कोई भी साधना क्यों न हो, उसकी बुनियाद ऊँचे से ऊंचा आचार, ऊंचे से ऊंची सच्चरित्रता, पूर्ण निर्मलता, पूर्ण परोपकार भाव है। योग के यम-नियमों में इनका समावेश है। वेदान्त के साधन-चतुष्टय में भी ये ही हैं, भक्तिशास्त्र में, निष्काम कर्मयोग में, इन सबकी आवश्यकता है, पर साधक बहुधा इन सद्गुणों की आवश्यकता और महत्व को न समझ, उनको एक ओर छोड़कर, प्राणायामादि साधनों में लग जाते हैं। इसी कारण उनकी उन्नति नहीं होती। साधक चतुष्टय यम-नियमों के पूर्ण रूप से अपने में आ जाने से अपना विकास आप से आप पूर्ण होकर, हमारी सोती हुई आध्यात्मिक शक्याँ आप से आप जाग उठती हैं और बिना योग साधना के भी हम उच्चशिखर को पहुँच जाते हैं। इन प्रारम्भिक सद्गुणों के बिना योगसिद्धि प्राप्त होने पर भी अधःपतन की सम्भावना रहती है।

सच्ची आध्यात्मिकता तो उस दशा की पूर्ण प्राप्ति या पूर्ण अनुभव है, जिसमें साधक अपने को सब प्राणियों में और सब प्राणियों को अपने में देखते हैं, अर्थात् अपने और दूसरों में एक ही आत्मा का दर्शन करता है और उसमें द्वित भाव थोड़ा भी बाकी नहीं रहता, जैसाकि श्रीमद्भागवत गीता (अ. 6 श्लोक 29) में कहा है। इस दशा में साधक दूसरे भूखे की भूख का, पतित के पाप का, दुःखी के दुःख का, स्वयं अनुभव करता है। योग सिद्धियों का कोई महात्म्य नहीं है वे प्रकृति के नियमों के ज्ञान से प्राप्त हो सकती हैं, पर आध्यात्मिकता प्रेम से आती है। एक तत्व को जानना, उसकी चेतना का बने रहना, उसका सदैव अनुभव होते रहना, यह आध्यात्मिकता है। कबीर ने कहा है ‘न पल बिछुड़े पिया हमसे, न हम बिछुड़े पियारे से’ यह अनुभव अध्यात्म के जिज्ञासु को होते रहना चाहिये। इसका अर्थ ‘यही है कि उसको अपने में और दूसरें में कोई भेद नहीं दीखता। श्री शंकराचार्य से एक कापालिक ने उनका सिर माँगा, उन्होंने यही कहा कि ‘इस समय तो मेरे शिष्य सिर देने में बाधा डालेंगे, पर यदि तुम आधी रात को आओ तो सिर ले जा सकोगे।’

अध्यात्म ज्ञानी के लिये कोई भेदभाव नहीं रह जाता। उसकी शुद्धि के प्रभाव से उसके आस-पास के लोगों में भी शुद्धि फैल जाती हैं। उसकी मुक्ति का अर्थ यह है कि उसके साथ और लोग भी मुक्त होते हैं।

इस प्रकार आध्यात्मिकता और सिद्धियों में बड़ा भेद है। दोनों का उपयोग है और पूर्ण मनुष्य में दोनों पाई जायेंगी। आज कल दूसरों के ऊपर अपना प्रभाव डालने की विधि बतलाने वाली बहुत सी पुस्तकें छपती हैं। ये पीछे हटाने वाली, मार्ग से च्युत करने वाली हैं, क्योंकि दक्षिण मार्ग में कभी किसी की स्वतन्त्र इच्छा शक्ति पर दबाव नहीं डाला जाता। मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण इत्यादि वाममार्ग की पाप भरी विधियाँ हैं, जिनका भारी कर्म विपाक उनके उपयोग करने वाले को अवश्य गिरा देता है।

इसलिए आरम्भ में स्थूल शरीर की और मन के भावों की शुद्धि अच्छी तरह हो चुकनी चाहिए। माँस, मदिरा, भाँग, गाँजा, तम्बाकू आदि मादक द्रव्य- ये योगी के लिए विष हैं। साधना आरम्भ करने के कम से कम एक वर्ष पूर्व से इनका त्याग हो जाना चाहिए। स्थूल शरीर के हाथ पर, नाखून सब साफ रहें और सारा शरीर भी साफ हो। उसके पहनने, बिछाने और ओढ़ने के कपड़े भी शुद्ध साफ रहें। स्थूल शरीर और मन के भाव शान्तिमय हों। पूर्ण आरोग्यता हो। दवाइयों का उपयोग जितना कम हो सके उतना ही उत्तम है। उत्तेजक और मादक द्रव्य योगाभ्यास में परम बाधक हैं। पशुओं की माँस ग्रन्थि आदि से बनी हुई दवाइयों का उपयोग कभी न किया जाय, एक तो इस में हिंसा होती है और दूसरे उनका प्रभाव साधक पर बहुत बुरा पड़ता है। शरीर को छिन्न-भिन्न या विकृत न होने देना चाहिए। जैसे तंग जूते पहनना, जो अपने पैरों की उंगलियों को विकृत कर देते हैं, योग साधना में बाधक होता है। भगवद्गीता में कहा है कि युक्त आहार-विहार वाले और कर्मों में युक्त दर्जे तक ही लगने वाले को योग दुःख हरण करने वाला होता है। उसका सोना, जागना भी ठीक-ठीक होना चाहिए।

(गी. 6। 17)

योगाभ्यास में अपनी साधारण बुद्धि का उपयोग न छोड़ देना चाहिए शरीर की विचार, श्वास या किसी अंग पर अधिक ध्यान लगाने में जोखिम है। यदि जरा भी भारीपन, दर्द या सिर घूमना या दबाव मालूम पड़े तो अभ्यास को रोक देना चाहिए, क्योंकि दर्द इस बात की एक चेतावनी है कि स्थूल और सूक्ष्म शरीर पर बहुत अधिक दबाव डाला जाता है। योगाभ्यासी के मन के क्रोध, चिड़चिड़ापन और द्वेष तो बिलकुल ही निकल जाना चाहिए। उसे उत्सुकता न सतावे। सब योगों में एकत्व की प्राप्ति की इच्छा रहने से सेवाभाव, परोपकार भाव, जगत के कल्याण की भावना स्वाभाविक ही रहती है। यदि योगाभ्यासी में कोई सोते दुर्गुण छिपे हैं तो वह योगाभ्यास से उत्तेजित होकर बाहर प्रकट हो जाते हैं, इसलिए यम और नियम योगी में अवश्य आरम्भ से ही होने चाहिए। अहिंसा (किसी को दुःख न पहुँचाना), सत्य, अस्तेय (दूसरों की वस्तु बिना दिये न लेना), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह अर्थात् वस्तुओं का संग्रह न करना ये ‘यम’ हैं। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय (जप और सद्ग्रन्थों का अध्ययन) और ईश्वर की भक्ति- ये नियम हैं।

साधना में- जिन साधारण सद्गुणों की आवश्यकता है, वे ये हैं- पवित्र जीवन खुला मन, शुद्ध हृदय, सबके प्रति भ्रातृभाव, सलाह और ज्ञान देने और लेने के लिए सदैव तैयार रहना, गुरु के प्रति श्रद्धा, सत्य पालन में तत्परता, अपने ऊपर अन्याय हो, उसे निर्भयता से सहना, जो नियम हैं, उनके कहने में निर्भय तत्परता, जिनकी अयोग्य निन्दा होती हो, उनका हिम्मत से बचाव करना और मनुष्य जाति की उन्नति और पूर्णता के ध्येय को सदैव ध्यान में रखना- ये वे सुवर्ण-सीढ़ियाँ हैं, जिन पर चढ़ कर जिज्ञासु ब्रह्मज्ञान के मन्दिर में सहज प्रवेश कर सकता है।


प्रभु प्रार्थना के कुछ सुन्दर रूप

(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम. ए. एल. टी.)

“हे प्रभो! तेरे सामने हाथ जोड़कर सच्चे हृदय से इतनी ही प्रार्थना करता हूँ कि मैं माँगू या न माँगू, मुझे कोई ऐसी चीज कभी न देना जो मुझे अच्छी लगने पर भी मेरा बुरा करने वाली ही और मेरी बुद्धि को कुमार्ग पर ले जाने वाली हो। ।”

“हे प्रभो! चुम्बक उसी लोहे को अपनी ओर खींचता है, जो शुद्ध होकर उसके सामने आता है। मुझे भी, हे कृपासागर! समस्त अभिमानों तथा विकारों के मिश्रण से रहित कर दीन-हीन शुद्ध लोहा बना दो, जो तुम्हारे आकर्षक कृष्ण नाम चुम्बक को पाते ही दौड़कर उसमें सदी के लिये चिपट जाय।”

“हे नाथ! तुम कृपा करके ऐसी शक्ति दो जिससे मैं विषय शक्ति से पिण्ड छुड़ाकर तुम्हारी और अपने मन को निरन्तर लगाये रख सकूँ, तुम्हारा चिन्तन ही मेरे जीवन का आधार बन जाय।”

“हे मेरी आत्मा के प्रियतम स्वामी! मैं तुमको ही चाहता हूँ, मुझे और कोई भी वस्तु प्यारी न लगने दो, जो वस्तुएँ मुझे तुमसे दूर हटाती हों, वे मुझे जहर सी लगने लगें। एकमात्र तुम्हारी इच्छा ही मेरे लिए मधुर हो-तुम्हारी इच्छा ही हमारी इच्छा बन जाय।’

“दयामय! तुम दयालु हो, मेरी ओर न देख कर अपनी कृपा से ही मेरे इस, दुष्ट मन को अपनी ओर खींच लो। इसे ऐसा जकड़कर बाँद लो कि यह कभी दूसरी ओर जा ही न सके। मेरे स्वामी! ऐसा कब होगा? कब मेरा यह मन तुम्हारे चरणों के दर्शनों में ही तल्लीन हो रहेगा। कब यह तुम्हारी मनोहर मूरति की झाँकी कर-करके कृतार्थ होता रहेगा।

अब देर न करो दीन बन्धु! जीवन सन्ध्या समीप है। इससे पहले-पहले ही तुम अपनी दिव्य ज्योति से जीवन में नित्य प्रकाश फैला दो। इसे समुज्ज्वल बनाकर अपने मन्दिर में ले चलो और सदा के लिए वहीं रहने का स्थान देकर निहाल कर दे।

‘हे परमेश्वर! आप तेज पुँज हो, आप बुद्धि के सागर हो, शक्ति के अथाह उदधि हो। मुझे भी तेज से परिपूरित कीजिए। उड़ेल दो। मुझे भी तेज से परिपूरित कीजिए। उड़ेल दीजिए, बुद्धि शक्ति से अंग अंग भर दीजिए। हृदय में सद्गुणों का विकास कीजिए।”

“नाथ! मैं जैसा हूँ, जो कुछ हूँ, तुम्हारे सामने हूँ। मेरी त्रुटियाँ, जिनका मुझे बोध नहीं है, तुम्हारे सामने एक-एक प्रत्यक्ष हैं। उन त्रुटियों को पूरा भी तुम्हीं करोगे। मुझे तो उनमें से बहुतों का पता तक नहीं है। त्रुटियाँ हैं, इसका विश्वास इसी से होता है कि मेरा मनोरथ-तुम्हारी माधुरी के नित्य आस्वादन का मनोभिलाष पूर्ण जो नहीं हो रहा है।

मेरे प्राणों के प्राण, नित्य मधुर, प्रियतम जो कुछ भी कमी हो, उसे अपनी कृपादृष्टि से पूरी कर दो और अपने रस समुद्र में सदा के लिये डुबोकर निकाल दो।”


चलते रहो! चलते रहो!

(प्रो. मोहनलाल वर्मा बी. ए. एल. एल. बी.)

निरन्तर तीव्र गति से प्रवाहित सरिताओं का जल जीवन युक्त होता है, इसके विपरीत जिस जल में प्रवाह नहीं है, जो एक स्थान पर रुक गया है, वह सड़कर दुर्गंधमय हो उठता है। इस सड़े हुए स्थिर जल में भी ज्यों−ही प्रवाह की गति आती है, त्यों−ही इसमें नव जीवन का प्रादुर्भाव हो उठता है। गति ही जीवन हैं, स्थिरता मृत्यु का पर्याय है।

प्रकृति में देखिये, अनन्त आकाश का भ्रमण करता हुआ सूर्य प्रातः से अपना गतिवान जीवन प्रारम्भ करता है और अपरिमित लोकों को द्युतिमान करता हुआ सम्पूर्ण दिन गतिशील रहकर रात्रि में विश्राम ग्रहण करता है। उसकी इस यात्रा का प्रतिपल प्रतिक्षण गति से परिपूर्ण रहता है। निरन्तर गतिशील रहने के कारण ही कदाचित उसके द्वारा विश्व के जीव जगत का इतना भला होता है। सूर्य भगवान का एक दिन का विश्राम जीव-जन्तु जगत के लिए मृत्यु का सन्देश बन सकता है।

प्रकृति के जीव-जन्तु-पक्षी जगत को देखें, तो आपको स्पष्ट ज्ञात हो जायगा कि जो जीव गतिवान रहते हैं वे स्वास्थ्य, सौंदर्य और दीर्घजीवन का आनन्द प्राप्त करते हैं। निरन्तर यत्र तत्र उड़ने वाले विभिन्न पक्षी, जंगलों में इधर-उधर दौड़ने वाले हिरण, गतिवान जीवन व्यतीत करने वाली गाएँ, बकरियाँ, भेड़े, घोड़े, वृक्षों पर उछल-कूद का जीवन व्यतीत करने वाले बन्दर जल में निरन्तर गतिशील मछलियाँ, कछुए, मगर इत्यादि बड़ा स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। इसके विपरीत आलस्य में जड़ जीवों की तरह स्थिर पड़े रहने वाले जीव, पंगु, अल्पायु, और अस्वस्थ रहते हैं। निष्क्रिय जीवन व्यतीत करने वाले जीव जल्दी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनके अवयव शैथिल्य में पड़े रहने के कारण निज कार्य यथोचित रीति से पूर्ण नहीं कर पाते।

प्राणिशास्त्र हमें सिखाता है कि जो अपनी शक्तियों- शारीरिक मानसिक या आध्यात्मिक-का निरन्तर उपयोग करता है, उस गति के कारण उनकी ये शक्तियाँ तथा निरन्तर सक्रिय रहने वाले अवयव पुष्ट होकर सुन्दर बन जाते हैं। काम न करने वाले अवयव सूख कर विनष्ट हो जाते हैं। निरन्तर कार्य से हमारा शरीर पुष्ट होकर आत्मा की ऊँचाई प्राप्त करता है।

लेखक की अपनी माताजी का उदाहरण गतिवान जीवन का जाग्रत उदाहरण है। वे बड़े तड़के पाँच बजे गृहस्थ के नाना कार्यों में दत्तचित्त हो संलग्न हो जाती हैं। ठण्ड या गर्मी शौचादि से निवृत्त होकर स्नान, ध्यान, पूजन, गीतापाठ के अतिरिक्त गृहस्थ के सभी कार्य ऐसे करती हैं जैसे किसी मशीन के द्वारा किये जा रहे हों। भैंस दुहने का कार्य हो या वस्त्र धोने का, पाकशाला के कार्य हों या सीने-पिरोने के, वे निरन्तर चलते रहते हैं। समस्त दिन कार्य से थक कर वे रात्रि में मीठी नींद सोती हैं। उन्हें पता नहीं रहता कि कहाँ सो रहीं हैं। भोजन कम से कम, वस्त्र सबसे थोड़े किन्तु कार्य सबसे अधिक। उनसे कोई उनके उत्तम स्वास्थ्य का रहस्य पूछे, तो वे उसे एक ही वाक्य में कहेगी, “जो फिरेगी, सो चरैगी, बँधो भूखौ, मरैगो।” अर्थात् जो चल-फिर कर गतिशील जीवन व्यतीत करेगा, उसे खुल-कर भूख लगेगी, जो एक स्थान पर बंधा रह कर गति विहीन जीवन व्यतीत करेगा, उसकी निष्क्रियता उसे मार डालेगी। इस उक्ति से उनके स्वस्थ जीवन का पूर्ण मर्म खिंच कर आ जाता है। वे गति को ही जीवन का प्रधान लक्षण मानती हैं। आधुनिक मानव के गिरे हुए स्वास्थ्य, कुरूपता, अल्पायु का प्रधान कारण स्थिर, गतिविहीन जीवन है। उसे थोड़ी दूर के लिये सवारी चाहिए। बस ट्राम ने उससे यात्रा का आनन्द छीन लिया है, साइकिल आधुनिक मानव का शत्रु है क्योंकि इसने आधुनिक युवक के पाँव जर्जरित, पंगु, शक्तिविहीन कर दिये हैं। उसे साइकिल का ऐसा क्रीतदास कर दिया है कि उसे थोड़ा भी चलना नहीं पड़ता। पाँवों का समुचित उपयोग न करने के कारण उसकी जीवन शक्ति का ह्रास हो गया हैं।

हम यह जानते हैं कि कुछ शौकीन लोग टहलने जाते हैं। बड़ी आबादियों में ऐसे व्यक्ति दस प्रतिशत से अधिक नहीं हैं जो टहलने के अभ्यस्त हैं। चाहे आप कोई व्यायाम करें, अथवा नहीं किन्तु टहलने का लोकप्रिय व्यायाम अवश्य करें। यदि नहीं तो आज से ही साइकिल का प्रयोग छोड़ कर इधर-उधर जाने के लिए पाँवों का ही प्रयोग किया करें।

“चलते रहो” का तात्पर्य विस्तृत है इसका एक अर्थ यह भी है कि कुछ न कुछ कार्य करते रहो, आलस्य में निष्क्रिय जीवन व्यतीत न करो। एक कार्य के पश्चात दूसरा कोई नवीन कार्य प्रारम्भ करो। मानसिक कार्य के पश्चात शारीरिक, शारीरिक श्रम के पश्चात मानसिक कार्य- यह क्रम रखने से मनुष्य निरन्तर कार्यशीलता का जीवन व्यतीत कर सकता है।

आलस्य शत्रु है, सक्रियता जीवन जागृति का लक्षण है। श्रम ही मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट पूँजी है। आलसी व्यक्ति परिवार तथा समाज का शत्रु है। वह दूसरों के संचित श्रम पर निर्वाह करता है। ऐसे व्यक्ति से प्रत्येक परिवार को बचना चाहिये।

परिवारों में जितने व्यक्ति हों, सभी सक्रिय रहें, अपना-अपना कार्य जागरुकता से सम्पन्न करें। मुखिया का कर्त्तव्य है कि वह बच्चों में प्रारम्भ से ही कार्य करने की आदतों का विकास करे। बच्चों में आलस्य उनके भावी जीवन के लिए हानिकारक है।

निरन्तर कार्य करने से वासनाएँ नियन्त्रित रहती हैं। थक जाने से मनुष्य का मन घृणास्पद कृत्यों से बच जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ शुभ कार्यों की ओर अधिक लगती हैं। कार्यशीलता चरित्र को चमका कर द्युतिमान कर देती हैं और स्वास्थ्य सौंदर्य से परिपूर्ण कर देती हैं।

गतिशील जीवन का समग्र ज्ञान-विज्ञान एवं मर्म ऐतरेय ब्राह्मण के एक गीत में बड़ी सुन्दरता से व्यक्त किया गया है। इस गीत में भगवान इन्द्र ने हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को सक्रिय जीवन व्यतीत करने का उपदेश इस प्रकार किया हैं :-

“हे रोहित! श्रम से जो नहीं थका, ऐसे पुरुष को भी नहीं मिलती। बैठे हुए आदमी को पाप घर बनाता है। इन्द्र उसी का मित्र है, जो बराबर चलता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।

जो पुरुष चलता है, उसकी जाँघों में फूल फूलते हैं। उसकी आत्मा भूषित होकर फल प्राप्त करती है। चलने वाले से पाप थक कर सोये रहते हैं। इसलिए चलते रहो, चलते रहो!

बैठे हुए का सौभाग्य बैठा रहता है, खड़े होने वाले का सौभाग्य सोता रहता हैं और उठ कर चलने वाले का सौभाग्य चल पड़ता हैं। इसलिए, चलते रहो, चलते रहो!

सोने वाले का नाम कलि है, अंगड़ाई लेने वाला द्वापर है। उठ कर खड़ा होने वाला त्रेता है और चलने वाला कृतयुगी होता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो!

चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है। चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है। सूर्य का परिश्रम देखो, जो नित्य चलता हुआ कभी आलस्य नहीं करता। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।


सदा शुभ कर्म करते रहिए

(श्रीमती कौशिल्या देवी वर्मा ‘शान्ति’)

संसार में कर्म का सबसे बढ़कर महत्व है। कर्म से बड़ा कुछ भी नहीं हैं। बात-बात में लोग कर्म की दुहाई देते हैं। मनुष्य को दुःख-सुख, मान-मर्यादा जो कुछ भी प्राप्त होती है, सब कर्मानुसार ही होती हैं।

मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही उसे फल मिलता है। सुकर्म करने वाला इहलोक और परलोक दोनों में सुख भोगता है और कुकर्म करने वाला उसके विपरीत फल पाता है। अतः मनुष्य को बहुत सोच समझकर कर्त्तव्य करना चाहिये, क्योंकि उसके कर्म की जाँच करने वाला भी इहलोक और परलोक दोनों में वर्त्तमान है। इस अवसर पर गोसांई तुलसीदास जी ने क्या ही अच्छा कहा है-

“कोउ न काहु दुख-सुख कर दाता। निज कृत कर्म भोग सब भ्राता॥

करै जो कर्म पाव फल सोई। निगम नेति अस कह सब कोई॥

शुभ अरु अशुभ कर्म अनुहारी। ईश देहि फल हृदय विचारी॥”

अर्थात्- मनुष्य अपने आप ही दुःख-दुख का बनाने वाला है, परमात्मा तो केवल फल देने वाला है, किन्तु अज्ञानवश मनुष्य उसको ही दोषी ठहराता है और अपने कर्म की और किञ्चित्मात्र भी ध्यान नहीं देता।

मनुष्य कर्मों का दास है।

“कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः॥”

कर्म से ही जनकादिक को उत्तम सिद्धि मिली थी।

यद्यदाचरित श्रेष्ठस्तत्तबेवेतरोजनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्त्तते॥

हे अर्जुन! श्रेष्ठ पुरुष जो-जो करता है, वही और लोग भी करते हैं। श्रेष्ठ जिसे उत्तम समझता है और लोग भी उसे ही उत्तम समझते हैं।

अतः बड़े लोगों को खूब सोच-समझकर काम करना चाहिये, और अपना आचरण शुद्ध रखना चाहिये, क्योंकि समाज उन्हीं का अनुसरण करता है। बड़ों को अपना यह दायित्व कभी भी भूलना नहीं चाहिए।

न में पाथास्ति कर्त्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंजन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त्त एव च कर्मणि॥

हे अर्जुन! मुझे कोई कर्त्तव्य नहीं है, क्योंकि तीनों लोकों में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो मुझे न मिली हो, या आगे न मिलने वाली हो, फिर भी मैं कर्म करता ही रहता हूँ।

यदि ह्यहं न वर्त्तयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्त्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥

आलस्य त्याग कर यदि मैं ही कर्म न करूं, तो अन्य सब मनुष्य भी सब प्रकार से मेरा ही अनुसरण करेंगे।

कर्म को संसार में सभी लोगों ने प्रधान माना है। गोसांई तुलसीदासजी ने भी कहा है-

“कर्म प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करै सो तस फल चाखा॥

संसारी सभी मनुष्य काम के वशीभूत हैं। इच्छापूर्वक कर्म करने से मनुष्य बन्धन में फँसता है और निःस्वार्थ भाव काम करने से उसकी आध्यात्मिक उन्नति होती है। इस सिद्धान्त के अनुसार हमको बिना फल की इच्छा किये हुए अपना धर्म समझकर कर्म करना चाहिये। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि कर्त्तव्य धर्म सबके लिये आवश्यक है।

कर्म साधारणतः किसी उद्देश्य के निमित्त ही किये जाते हैं। उद्देश्य मनुष्य के संस्कारवश अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के होते हैं, परन्तु कर्म के रूप भिन्न-भिन्न होते हैं। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म करने का ही उपदेश दिया है।

चित्त की शुद्धि के लिए निष्काम कर्मयोग की बड़ी आवश्यकता है। मन के पवित्र होने से काम, क्रोध आदि नष्ट हो जाते हैं। दृष्टि में अद्वैत भावना आ बसती है। इसके बाद जीवनमुक्ति का मार्ग मिल जाता है। जिस प्रकार गीता में योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र ने निष्काम कर्म के ऊपर जोर दिया है, वैसे ही उन्होंने चित्त-शुद्धि को भी अत्यावश्यक बतलाया है, क्योंकि इसके बिना तो ईश्वर-सान्निध्य प्राप्त होना असम्भव है।

कोई जीव क्षण भर भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता। अतः कर्म करने से पूर्व मनुष्य को यह निश्चय कर लेना चाहिए, कि क्या कर्त्तव्य है, और क्या अकर्त्तव्य है। उस निश्चय के लिये धार्मिक ग्रन्थों की सहायता लेनी पड़ती है, परन्तु अपनी आत्मा यदि पवित्र हो तो वह इसकी सबसे अच्छी और सच्ची निर्णायक हो सकती है। यह छिपा हुआ शब्द प्रत्येक काम करने के पहले हमें सावधान करता रहता है। चाहे हम उसे ध्यान से सुनें या न सुनें, उसकी आज्ञा मानें या न मानें। इससे भी बड़ी बात यह है, कि निःस्वार्थ स्वधर्मोवित्त कर्त्तव्य सारी बाधाओं और बन्धनों से परे हैं।

कर्म की सहायता से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है। लोक और परलोक दोनों सुधारे जा सकते हैं। कर्म के आगे असम्भव को कहीं स्थान ही नहीं है। संसार के इतिहास पर दृष्टि दौड़ाइये, हजारों उदाहरण मिलेंगे। अतः मनुष्य को सदा सावधान होकर कर्म करना चाहिये।

मृत्यु के बाद कोई भी अपने साथ नहीं जाता, केवल अपना किया हुआ शुभाशुभ कर्म ही साथ जाता है। स्वार्थमय जगत में जब तक धन है, तभी तक आत्मीय स्वजन अपने बनें हुये हैं, निर्धन व्यक्ति के तो स्वजन पराये हो जाते हैं। मित्रगण तथा कुटुम्बीजन तो केवल श्मशान तक साथ जाकर मृत-शरीर को आग पर फेंककर चले जाते हैं और यहाँ तक उनकी अन्तिम कर्त्तव्य की समाप्ति हो जाती है। साथ एकमात्र केवल कर्म ही जाता है। अतः बड़ी सावधानी से साथ जाने वाले शुभ कर्मों की मनुष्य को आराधना करनी चाहिये।

शुभ कर्म ही मनुष्य का सच्चा मित्र है। इस मित्र की सहायता से वह साँसारिक तथा पारलौकिक सुख सम्पत्तियों को प्राप्त करता है। इसके विपरीत अशुभ कर्म से बढ़कर मनुष्य का कोई शत्रु नहीं जो कुविचारों और कुकर्मों में लिप्त रहेगा उसे सदा सर्वत्र अशाँति पीड़ा एवं दुर्गति ही मिलेगी।


हमारे कुछ आवश्यक कर्त्तव्य

(श्री भगवानदास जी केला)

1.हम कोई काम उसी हालत में अच्छी तरह कर सकते हैं जब हममें उसको करने की योग्यता हो। इस योग्यता में शारीरिक योग्यता का बड़ा महत्व है, या यों कह सकते हैं कि और योग्यता होते हुए भी, यदि हमारा शरीर ठीक नहीं है, हमारा स्वास्थ्य खराब है, हम बीमार पड़े हैं, तो हम उस काम को अच्छा न करे सकेंगे, उसमें हमारा मन ही न लगेगा। इसलिए हर एक आदमी का पहला कर्त्तव्य है कि वह अपना स्वास्थ्य बनाये रखे। बीमार पड़ने पर जो अपने विविध कर्त्तव्यों का पालन नहीं कर सकता, वह दुखी रहता है। यही नहीं उसके भाई-बन्धु आदि भी बड़ी चिन्ता में रहते हैं, उनका बहुत सा समय उसकी सेवा-सुश्रूषा करने में लग जाता है, इसलिये वे भी अपना अपना काम अच्छी तरह पूरा नहीं कर पाते। जिस परिवार में कोई आदमी रोगी होता है, उसकी आमदनी कम हो हो जाती है, और दवा-दारु आदि का खर्च बढ़ जाता है। इससे सभी को असुविधा होती है। इससे वह स्पष्ट है कि स्वस्थ रहने का प्रयत्न करना कितना आवश्यक है।

2. स्वास्थ्य रेखा के नियम बहुत जटिल या पेचीदा नहीं हैं। आदमी को शुद्ध, ताजा और सादा भोजन करना चाहिये, साफ हवादार स्थान में रहना चाहिये, कुछ व्यायाम और जितना जरूरी हो विश्राम करते रहना चाहिये और मन में अच्छे सात्विक विचार रखने चाहियें।

कुछ आदमी निर्धनता के कारण और कुछ आलस्य या शौकीनी आदि के कारण इन बातों की ओर यथेष्ट ध्यान नहीं देते। इसका परिणाम यह होता है कि वे बीमार पड़ जाते हैं, उनका सुख नष्ट हो जाता हैं, तब उन्हें स्वास्थ्य का मूल्य ज्ञात होता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम कोई बात ऐसी न करें जिससे हमारा स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका हो।

2. स्वास्थ्य रक्षा के साथ ही, शिक्षा पाने की कोशिश करनी चाहिए। लिखना-पढ़ना सीख लेने पर हम अपने विचार लिख कर रख सकते हैं। हमारे लेखों को पढ़ कर दूर-दूर रहने वाले आदमी हमारे विचार जान सकते हैं, और हम उनके विचारों से परिचित हो सकते हैं। इस तरह दूर-दूर के आदमियों से हमारा सम्बन्ध हो जाता है। यही नहीं, हम उन महापुरुषों के विचार और अनुभव भी जान सकते हैं, जो पुराने जमाने में हुए थे। उनके लेखों या पुस्तकों से हम लाभ उठा सकते हैं। और अपनी उन्नति कर सकते हैं। शिक्षित आदमी अपने कर्त्तव्यों का अच्छी तरह पालन कर सकते हैं, और अपनी जीवन-यात्रा शान्ति और सुख पूर्वक तय कर सकते हैं। नागरिकों को चाहिए कि अपनी सन्तान तथा भतीजे, भानजे आदि को भी शिक्षा दिलावें। हाँ, यह याद रखना आवश्यक है कि शिक्षा का अर्थ केवल लिखना-पढ़ना सीख लेना ही नहीं है, शिक्षा का अर्थ है हमारी शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक शक्तियों का विकास। अतः हमें शिक्षा का व्यापक स्वरूप ग्रहण करना चाहिये। सब विषय की विशेष बातें लिखने का यहाँ प्रसंग नहीं है, तुम स्वयं जान लोगे।

3. अन्य कर्त्तव्यों में पहले स्वावलम्बन की ओर तुम्हें ध्यान देना आवश्यक है। तुम्हें समाज द्वारा पैदा या तैयार किये हुये भोजन- वस्त्र आदि की आवश्यकता होती है इन वस्तुओं को बिना मेहनत किये, मुफ्त में प्राप्त करना किसी को शोभा नहीं देता। यह तो एक प्रकार की चोरी है। भिक्षा, छल, कपट या चोरी करने का तो विचार भी मन में न लाना चाहिये। दान-दक्षिणा या सहायता के रूप में दूसरों से धन या अन्य पदार्थ लेना केवल उन्हीं लोगों के लिए ठीक है, जो अपाहिज या लूले, लँगड़े आदि हों, अथवा जो सब समय समाज हित की बातें सोचने या करने में लगाते हैं। समाज सेवा के बिना, दूसरों के द्वारा प्राप्त पदार्थों का उपयोग करना सर्वथा अनुचित है। हमें स्वावलम्बी बनना चाहिये। किसी आदमी का, अपने बाप-दादा आदि की कमाई खर्च करते हुए भी निखट्टू पड़े रहने ठीक नहीं। अपने निर्वाह के लिए हमें स्वयं उद्योग और पुरुषार्थ करना चाहिये!

4. जिस प्रकार हमें अपने जीवन निर्वाह के लिए स्वावलम्बी बनना चाहिए, उसी प्रकार अपने परिवार तथा आश्रितों के लिए भी हमें समुचित परिश्रम और उद्योग करना चाहिए। यही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति को इतनी योग्यता प्राप्त करनी चाहिए कि उसके कमाए हुए धन से उसका और उसके परिवार आदि का निर्वाह होने के बाद भी कुछ बचत अवश्य रहे, जो संकट या बीमारी अथवा बेकारी आदि के समय काम आवे, और साथ ही साथ बड़े परिवार यानी देश की सामूहिक आवश्यकताओं की पूर्ति में भी वह सहायक हों। यह तभी हो सकता है जब हम सोच समझकर खर्च करने वाले हों, मितव्ययी हों, अंधा-धुन्ध पैसा उड़ाने वाले न हों। कारण यदि खर्च पर नियन्त्रण न रहे तो चाहे जितनी आमदनी हो, सभी खर्च हो सकती है। प्रायः देखने में आता है कि जिन लोगों की अच्छी खासी और निश्चित आमदनी है, वे क्षणिक आनन्द की वस्तुओं में पैसा खर्च कर देते हैं, पीछे अत्यन्त आवश्यक है और उपयोगी पदार्थों के लिये भी उनके पास धन की कमी हो जाती है और वे कर्जदार बन जाते हैं। बड़ी-बड़ी तनख्वाह पाने वाले कितने बाबू लोगों का यह हाल होता है कि तनख्वाह मिलते ही उसका अधिकाँश भाग पिछले महीने के बिल चुकाने में झटपट खर्च हो जाता है। पन्द्रह-सोलह तारीख से उनकी जेब खाली दिखाई देती है। किसी प्रकार जैसे-जैसे चौबीस-पच्चीस तारीख तक काम चलता है, फिर तो एक-एक दिन अगले महीने की तनख्वाह की इन्तजारी में बीतता है। यह सब इनकी अनसमझ का और उधार सौदा लेने की आदत का फल है। ये लोग चाहें तो आसानी से, अपना खर्च चला सकते हैं, और अपनी बीमारी या बेकारी आदि के संकट के अवसर के लिये कुछ पैसा जमा भी कर सकते हैं। हर आदमी को ऐसा नियम बनाना चाहिए कि कोई चीज खरीदने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति और उस बीज की जरूरत का शान्ति और गम्भीरता से विचार करें। जहाँ तक हो सके कोई चीज उधार न खरीदी जाय, चाहे वह कुछ सस्ती ही क्यों न मिलती हो।

5. हमारा धन सिर्फ हमारे ही उपयोग के लिए नहीं है। उस पर समाज का भी खासा अधिकार है। हमारे धन से हमारे परिवार का भरण-पोषण होना चाहिए, यह बात तो आदमी फिर भी आसानी से समझ सकते हैं, परन्तु हमारे धन पर समाज का भी अधिकार है, यह कैसे? मैंने परिश्रम किया, और उस परिश्रम के बदले किसी आदमी या संस्था या सरकार से मुझे कुछ धन मिल गया। अब इस धन से किसी दूसरे का क्या सम्बन्ध? मैं इसे जिस तरह चाहूँ खर्च करूं। इसमें कोई रोक-टोक क्यों?

किसी भी कार्य के उदाहरण से यह स्पष्ट हो जायगा कि मुझ में धन पैदा करने की जो शक्ति या योग्यता आदि है, वह उसी दशा में है, जबकि मुझे समाज के अनेक आदमियों का सहयोग प्राप्त हुआ है। यदि दूसरे लोगों की सहायता न मिले तो कोई भी आदमी अकेला कुछ धन पैदा नहीं कर सकता। धन पैदा करने के बाद उसकी रक्षा या वृद्धि भी समाज के सहयोग बिना नहीं हो सकती। इसलिए धन को खर्च करने में इस बात का अवश्य विचार रहना चाहिये कि उससे समाज का हित भी हो। जिस समाज ने हमें धन पैदा करने योग्य बनाया है, उसकी उपेक्षा करना निंद्य ही नहीं, हानिकारक भी है। इसलिये हर आदमी को चाहिए कि अपने धन का अधिकारी सिर्फ अपने आपको न माने, उसमें समाज का भी हिस्सा समझे और इसी दृष्टि से उसे खर्च करे।

ऊपर कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को शक्ति और योग्यता उसे बहुत कुछ समाज से प्राप्त हुई हैं इससे हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि हमें अपनी शक्ति आदि का उपयोग समाज की उन्नति के लिए करना चाहिए। हम समाज के मौजूदा आदमियों के तो बहुत ऋणी हैं ही, यदि विचार किया जाय तो हम अपने पुरखों या पूर्वजों के भी ऋणी हैं। हमें इस समय किसी विषय का जितना ज्ञान प्राप्त है वह इस बात पर निर्भर है कि हमारे पूर्वजों ने अपनी सामर्थ्य में उस दिशा में कितना कार्य किया। प्रत्येक समय में आदमी पिछली पीढ़ी के अनुभवों से लाभ उठा कर काम करते हैं, और आने वाली पीढ़ी के लिए अपने अनुभव विरासत में छोड़ जाते हैं। इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी कोशिश होती रहने से भौतिक या वैज्ञानिक उन्नति होती है। यही बात मानसिक जगत के सम्बन्ध में कही जा सकती है। एक पीढ़ी अपने विचार साहित्य के रूप में छोड़ती है, उसे मनन करके अगली पीढ़ी मनुष्य जाति के भावी विकास में मदद देती है। इससे स्पष्ट है कि हमारी यह सीढ़ी, अब तक की पिछली सीढ़ियों के प्रति बहुत ऋणी हैं। इस परम्परा को बनाए रखने के लिए हमें भी समाज की उन्नति में भरसक सहयोग करना चाहिए। बस, हमारा धन ही नहीं, हमारी शक्ति और योग्यता, यहाँ तक कि हमारा जीवन भी मानव समाज के हित के लिए है। हमें तुच्छ खुदगर्जी की जिन्दगी न बितानी चाहिए, अथवा, यह कहना ठीक होगा कि हमारा सच्चा स्वार्थ इस बात में है कि हम समाज के लिए जीवन व्यतीत करें। हम अपने शरीर को स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट बनावे अपनी मानसिक तथा अन्ध शक्तियों को बढ़ावें, लेकिन यह याद रखें कि इनका उपयोग समाज की सेवा और हित के लिए ही हो, और हमारे द्वारा किसी को कुछ कष्ट या असुविधा न हो।

6. हम दूसरों से भाई-बन्धु या पड़ौसी का सा व्यवहार करें, किसी को कुछ कष्ट न दें, उनके सुख को अपना सुख और उनके दुख को अपना दुख समझें। यदि यह बात भली-भाँति ध्यान में रख ली जाय और इसके अनुसार सब आदमी व्यवहार करें तो सामाजिक जीवन को बहुत सी असुविधाएँ दूर हो जायं। पर हम अपनी सुविधा, अपने सुख, और अपने लाभ की ओर दृष्टि रखते हैं। दूसरों की हम चिन्ता नहीं करते। हम ऐसी चिन्ता की आवश्यकता ही नहीं समझते, मिसाल के तौर पर कितने ही विद्यार्थी जोर से पढ़ा करते हैं कि दूसरों का ध्यान बँट जाता है, उनके अध्ययन में बाधा होती है। पर वे इसका विचार नहीं करते। रेल का टिकट खरीदते समय यदि खिड़की के पास पुलिस का सिपाही खड़ा न हो तो कितनी धक्का-मुक्की होती है। हर एक आदमी चाहता है कि दूसरों को हटा कर मैं आगे बढ़ जाऊँ। यहाँ तक कि हम बड़े, बालक या कमजोर आदमी का भी कुछ लिहाज नहीं करते। फिर जब आदमी रेल में सफर करता है, तो बहुधा शिक्षित और सभ्य कहलाने वाला व्यक्ति पाँव फैला कर लेट जाता है, और अपने सामान आदि से इतना स्थान घेर लेता है कि दूसरे मुसाफिरों को बैठने को भी जगह नहीं मिलती। वह देखता है कि उसके कितने ही भाई खड़े हैं, और कष्ट पा रहे हैं, पर वह स्वयं अपनी इच्छा से उनके लिए जगह की व्यवस्था नहीं करता। हमारे यहाँ कोई त्यौहार या विवाह-शादी है तो हम यह कब सोचते हैं कि हमारी धूम-धाम और गाजे-बाजे से हमारे पड़ौसियों को कोई कष्ट तो नहीं होता! प्रायः रात को बारह और एक-दो बजे तक शोरगुल होता रहता है, और बेचारे पड़ौसियों की नींद हराम हो जाती है। कभी-कभी हमारे पड़ौस में कोई आदमी बीमार होता है, उसे वैसे ही नींद नहीं आती, फिर हमारे गाजे-बाजे से उसको कितना कष्ट होगा, इसका सहज ही विचार किया जा सकता है। कुछ घरों में खास-खास अवसरों पर ‘रतजगा’ होता है, औरतें रात भर जागती और गीत गाती रहती हैं। चाहें ऐसी बात किसी रीत-राम के नाम पर की जाय या धार्मिक कृत्य की आड़ में, नागरिकता की दृष्टि से और मानवता के विचार से सर्वथा निंदनीय और त्याज्य है।


जीवन के निष्कर्ष

जीवन यापन करते हुए अपने व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर मनुष्य जिन निष्कर्षों पर पहुँचता है उनका महत्व निस्सन्देह बहुत अधिक है। संसार के कुछ विचारशील व्यक्तियों ने अपने जीवन-निष्कर्षों को किस प्रकार व्यक्त किया है। उसका कुछ आस्वादन नीचे की पंक्तियों में कीजिए :-

डब्लू. आर. इंजे लिखते हैं- मैं इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि मनुष्य को अपने विषय में अच्छी राय न रखनी चाहिए। हमारा अधिकार केवल प्रार्थना पर है। हम दया के लिए प्रार्थना करें। मानव जीवन में सुखद विवाह सर्वोत्तम पदार्थ ही नहीं, ईश्वर की सभी देनों में श्रेष्ठ है। जो प्रेम नहीं करता वह ईश्वर को नहीं जानता। प्रेम ही ईश्वर है। जो अपनी आँखों देखते भाई को प्रेम नहीं कर सकता वह अदृष्ट ईश्वर से कैसे प्रेम कर सकता है?

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मारग्रेट जी. वान्डफील्ड के विचार हैं- प्रार्थना ईश्वर को अपने पक्ष में आकृष्ट करने को नहीं होती, वरन् ईश्वर की सर्व व्यापकता का ध्यान रखने के लिए होती है। पाप क्या है? जीवन का जो विकास हमें प्राप्त है उसके अनुकूल रहने से इनकार करना ही पाप है। दूसरों की अवज्ञा करना महान भूल है। घृणा और कटु आलोचना दोनों ऐसी बुराइयाँ हैं जो उनके कर्त्ताओं पर ही पड़ती है और मनुष्य-मनुष्य का जो परस्पर सम्बन्ध है उसे विषाक्त कर देती है।

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बरट्रेण्ड रसेल महोदय कहते हैं- मैं तो इस परिणाम पर पहुँचा हूँ कि बहुत बड़ी हानि पहुँचाने की अपेक्षा छोटी सी भलाई करना ही अच्छा है। जब मनुष्य सीमा से अधिक तिरस्कृत किया जाता है तब उसमें कोई ऐसी बहुमूल्य चीज नष्ट कर दी जाती है जो फिर नहीं बनायी जा सकती। जो मनुष्य अपने को समाज की इकाई नहीं समझता, वह यदि महान कलाकार नहीं तो नपुँसक है।

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रिवार्ड ग्रिगरी लिखते हैं- एक समय तीन मजदूर काम कर रहे थे! एक पथिक ने उनसे पूछा तुम क्या कर रहे हो?

पहले ने कहा- मैं पत्थर काट रहा हूँ!

दूसरे ने कहा- मैं अपनी जीविका कमा रहा हूँ।

तीसरे ने कहा- मैं गिरजा बना रहा हूँ।

जीवन में काम आवश्यक है। काम तीन प्रकार से किया जा सकता है- मशीन की तरह, रोजी कमाने के लिए तथा किसी महान आदर्श के लिए। इन तीनों को जीवन तथा समाज का ढाँचा तैयार करने को एकत्र किया जा सकता है। केवल आनन्द के लिए रहने की अपेक्षा इस तरह रहने से अधिक सन्तोष प्राप्त होता है।

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सर माइल्स टोमस महोदय का अनुभव है कि सीमा से अधिक आत्मरक्षा का भाव मनुष्य को उन्नति की ओर नहीं ले जाता। गलत दिशा में चिकनी सड़क पर चलने की अपेक्षा सही दिशा में पथरीले मार्ग पर चलना कहीं अच्छा है। केवल भाग्य जैसी कोई चीज नहीं है। हाँ, भाग्य जीवन में गौण महत्व अवश्य रखता है।

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एल. पी. जैक्स महोदय लिखते हैं- मैंने जीवन में जो कुछ सीखा है, संक्षेप में सब वही है जो मैं जानता हूँ, जिसमें विश्वास रखता हूँ, जिसकी आशा रखता हूँ, और अधिक संक्षेप में वह सब जो मैं हूँ। नास्तिक कहते हैं कि ईश्वर नहीं है और आस्तिक कहते हैं कि ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मैंने जीवन से सीखा है कि मेरा अस्तित्व ईश्वर के अस्तित्व से मिला हुआ है। लेकिन इस तरह से मिला है कि उसे पृथक करने का प्रयत्न किसी परिणाम पर नहीं पहुँचता।

लार्ड लिटन महोदय का भी अनुभव सुनिये- आनन्द के लिए अथवा आदर के लिए रुपया कोई आवश्यक वस्तु नहीं है। सत्य ही मैत्री की जननी है। सत्य निर्वासित व्यक्ति के समान है जो अपने लिए घर ढूँढ़ता फिरता है, परन्तु मिलता कोई नहीं। स्वर्ग हमारे चारों तरफ बिखरा पड़ा है, लेकिन उसे वही देख सकता है जिसके पास उसे देखने को आँखें हैं। सत्य तो यह है कि हम वह नहीं हैं जो जीवन ने इसे बनाया है, वरन् हमारा जीवन वही है जो हमने उसे बनाया हैं।

लार्ड आशफील्ड का कहना है कि मनुष्य के व्यक्तिगत गुण ही अन्त में सफल होते हैं। निर्णय की शक्ति, साधारण बुद्धि तथा विवेक बुद्धि, विचार बुद्धि तथा सद्व्यवहार ऐसे ही गुण हैं। मैं इनमें निर्भिमानता को और जोड़ुँगा। बिना अभिमान के भी अपना मान रखा जा सकता है। इन गुणों के अतिरिक्त एक गुण और है जो सभी गुणों में होना चाहिये। वह है विनोद प्रियता (सेंस आफ ह्यूमर) इसके अतिरिक्त मानव प्रकृति की दुर्बलताओं के प्रति सहिष्णुता रखना तथा आदान-प्रदान के लिए भी तैयार रहना कम आवश्यक गुण नहीं।

फ्रैंक सेलिसवरी महोदय लिखते हैं- हम जीवन में जो बोते हैं वही काटते हैं। जिस चीज के हम अधिकारी नहीं, उसे स्वीकार करना अपने चरित्र को गिराना है। शीघ्र ही या कुछ विलम्ब से नैतिक पतन प्रारम्भ हो जाता है। कर्म ही मनुष्य के लिए सर्वोत्तम आशीर्वाद है। बुरे से बुरे परिणाम के लिए तैयार रहना चाहिए और अच्छे से अच्छे की आशा रखनी चाहिए। मनुष्य अपनी सर्वोत्तम अवस्था में तभी होता है जबकि जीवन उसे प्रायः दुःसह परीक्षा में डाल देता है।

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मैं काम को इस प्रकार करता हूँ जैसे सब चीज मेरे ही ऊपर निर्भर हो और प्रार्थना इस प्रकार करता हूँ जैसे हर एक चीज ईश्वराधीन हो।

हर एक समस्या को शीघ्र सुलझाओ ताकि मस्तिष्क दिल से सबसे महत्वपूर्ण काम में लगने को मुक्त रहे।

यदि तुम कला की किसी चीज में उसके अवगुण ढूँढ़ने को देखोगे तो उसके गुण तुम्हारी दृष्टि में न आवेंगे।

बुरी चीज पर दुबारा दृष्टि न डालो। यदि कोई चीज तुम्हें सच्चा आनन्द देती है तो उसकी प्रशंसा करने में कृपणता मत करो। बड़े काम प्रोत्साहन के वातावरण में ही होते हैं। हम यह बात नहीं समझ पाते कि दूसरे की प्रशंसा करने से हमारी गुण ग्राहकता भी बढ़ती है।

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लार्डवैट फील्ट महोदय लिखते हैं-’क्रोध के वशीभूत न होना चाहिये। क्रोध समाज के लिये लाभदायक नहीं होता अपितु विनाश की ओर ले जाता है। सफलतापूर्वक खतरा लेने के लिये भाग्य की आवश्यकता होती है। जीवन में जन्म से मरण पर्यन्त भाग्य भी कुछ महत्व रखता है। लेकिन भाग्य उनकी कदापि सहायता नहीं करता जो उसके योग्य नहीं। लेकिन यदि तुम भाग्य पर बहुत अधिक विश्वास करोगे तो सम्भव है वह तुम्हें ठीक समय पर धोखा न दे जाय। हमें भाग्य को छोड़ अपने भविष्य पर सोचना चाहिए। और उसे अपने अधीन करने को दृढ़ संकल्प होना चाहिये।

मैंने जीवन जहाज पर बिताया है जहाज पर काम जहाज के लिये करना होता है न कि अपने लिए। जहाँ कहीं भी तुम हो, वहीं जहाज है। हर एक मनुष्य को अपनी उन्नति के लिए काम करना चाहिए। लेकिन जीवन ने मुझे यह सिखाया है कि यदि तुम अपनी ही उन्नति को एकमात्र दृष्टि में रखोगे तो तुम्हें निराश होना पड़ेगा।

अच्छा जहाज वह है जिसमें मल्लाह महान लक्ष्य से एकता के सूत्र में बँधे हैं।

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सी. सी. मारटिण्डेल का संकेत है- जीवन ने मुझे इससे अच्छा कुछ नहीं सिखाया कि मैं ईश्वर और अपने पड़ौसियों से प्रेम करुं। ऐसा नहीं हैं कि जीवन ने मुझे कुछ सिखाया ही न हो, परन्तु ईश्वर ने कुछ तो आन्तरिक अनुभव से और कुछ बाह्य अनुभव से मुझे समाज में रहने योग्य बनाया है और सद्भावना प्रदान की है कि उसकी सेवा करूं और उसके लिए अपने पड़ोसी की।

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सर विलियम वी. डार्लिंग (पार्लियामेण्ट के सदस्य) लिखते हैं- हेडोनिष्ट के अनुसार आनन्द ही जीवन का ध्येय है एक अन्य लेखक के कथनानुसार जीवन का लक्ष्य प्रसन्न होना है। प्रसन्न होने के लिए समय अभी है, और स्थान यही है, तरीका दूसरों को प्रसन्न करना है।

जीवन ही सब कुछ नहीं। एक चीज और है जो उसे गति प्रदान करती है-वह है साहस। यदि कोई जीवन को सार्थक बनाना चाहता है तो उसे भय को अवश्य तिलाँजलि देनी चाहिए। साहसी के लिए दुर्भाग्य भी अकस्मात सौभाग्य में परिणत हो जाता है।

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विस्काउण्ट टेम्पुल उड़ (रीडिंग विश्वविद्यालय के चाँसलर) लिखते हैं-मनुष्य की तीन अवस्थाएँ होती हैं- युवावस्था में वह अपनी पुस्तकों से बात करता है, मध्यावस्था में अपने मित्रों से और वृद्धावस्था में अपने से। मैं स्वीकार करता हूँ कि मेरे जीवन के अन्तिम परिच्छेद आत्मचिन्तन के परिच्छेद हैं। मेरे जीवन ने मेरे लिए जो विरासत छोड़ी है वह धैर्य और सहिष्णुता है।

विस्काउण्ट जोविट लिखते हैं- मैंने जीवन से जो कुछ सीखा है उससे कहीं बहुत अधिक सीखना चाहिए था। यदि मैं अपने अब तक के अनुभव के साथ फिर से जीवन प्रारम्भ करता, तो शायद वही गल्तियाँ फिर करता जो मैंने की हैं। मैंने लोगों को कहते सुना है कि मनुष्य का लड़कपन तब शुरू होता है, जब वह उन शैतानियों को सोचता है जो वह आगे करेगा। जवानी तब शुरू होती है जब वह उन्हें करता है। बुढ़ापा तब शुरू होता हैं जब वह उन पर पश्चाताप करता है। जीवन ने मुझे सिखाया है कि अपने साथियों में अच्छाई ढूँढ़ना ही सही मार्ग है। मनुष्य के लिए अध्ययन का उचित विषय मनुष्य ही है। जीवन को सुखी बनाने का एक ही रहस्य है। वह यह है- दूसरे लोगों का तथा उनकी समस्याओं का उतना ही ध्यान रखना जितना अपना तथा अपनी समस्याओं का। यदि तुम दूसरे को सुख दोगे तो तुमको भी फलस्वरूप सुख प्राप्त होगा।


प्राणायाम-विज्ञान

(श्री स्वामी शिवानन्द जी सरस्वती)

प्राण और अपान के संयोग को प्राणायाम कहते हैं। प्राण के प्रच्छर्द्दन या निर्धारण से मनोनाश होवेगा। उपनिषदों में प्राणायाम की महत्ता कही है- क्षुतृष्णालस्य निद्रा न जायते। गुल्मप्लीहज्वरपितक्षुधादीनि नश्यति- से प्राणायाम को सर्वरोग निवारक जानना चाहिये। प्राणायाम के दीर्घ अभ्यास से अल्पाशी स्वल्पनिद्रश्च तेजस्वी बलवान भवेत की उक्ति सिद्ध होती है। प्राण-निरोध से वासना का स्वतः क्षय हो जायगा।

प्राणायाम तीन प्रकार का होता है- पूरक, कुम्भक तथा रेचक। वायु के उत्क्षेपण की क्रिया को पूरक जानना और वायु निरोध की क्रिया को कुम्भक कहते हैं। इसी तरह वायु-रेचन की संज्ञा ही रेचक है।

आहार- शुद्धि रखते हुए, जो प्राणायाम का निरन्तर अभ्यास करता है, वह प्रथम अवस्था में पसीने का अनुभव करता है, पुनः वह शरीर के हल्केपन का अनुभव करता है। कालान्तर में यदि प्राणायाम उचित और निर्बाध हो तो भूमि त्याग की अवस्था आती है। परन्तु याद रहे कि आहार तथा प्रकृति में अपना पूर्ण निरोध रहे। यदि साधक नियमानुसार प्राणायाम का अभ्यास करे तो उसका स्वस्थ होना अनिवार्य है। प्राणायाम से नाड़ी-शुद्धि होगी, जठराग्नि तीव्र होगी और अनहद शब्द स्पष्ट सुनाई देगा।

कुम्भक दो प्रकार का होता है सहित कुम्भक तथा केवल कुम्भक। रेचक युक्त कुम्भक को सहित कुम्भक कहते हैं। इन दोनों से जो रहित होता है, उसे केवल कुम्भक जानना। अभ्यासी के लिए सहित कुम्भक का ही अभ्यास करना चाहिए। केवल कुम्भक के द्वारा शरीर कृश हो जाता है और कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है। केवल कुम्भक के दृढ़ अभ्यास से साधक बिन्दु विजयी होता है। उसमें तेजस्विता का प्रसार होता हैं।

योगी सदा इस बात पर विचार करता आया है। सूक्ष्म बुद्धि तथा महत-ज्ञान के द्वारा वह इस बात पर ज्ञान कर पाया कि वह अपने बिन्दु-निरोध में क्यों नहीं सफल हुआ। काम वासना के दमन करने का उसने भरसक प्रयत्न भी किया। आसन मुद्रा बन्ध के सतत अभ्यास से वह अपने कार्य में अग्रसर भी हुआ। तत्फलतः आन्तरिक-वृत्ति स्रोत विमुख भी हो गया तथा विपरीत अंश स्रोत में परिवर्तन भी हुआ। अब उसे अपनी शक्ति का परिवर्तन ज्ञात हो पाया जब कि शक्ति अभ्यासी में चमकने लगी। ऐसी अवस्था में, जब सफलता निकटवर्ती अनुभूत होवे, साधक को योग्य है कि वह अपने शरीर को आध्यात्मिक-शक्ति की प्राप्ति के योग्य बना लेवे। शरीर की समस्त वासनाओं तथा आधि−व्याधियों का परिष्कार पूर्णतः आवश्यक है।

इस प्रकार शरीर तथा मन का निकटस्थ सम्बन्ध योगी के ज्ञान प्रदेश में सूत्रित होता है, जिसके योग में शरीर तथा मन के निरोध की आवश्यकता पुष्ट होती है। अतः योगी ने स्वतः ही स्वतन्त्र विज्ञान को जन्म दिया। शरीर की शुद्धि मन की शुद्धि की प्रस्तावना है क्योंकि मन सहसा ही शरीर द्वारा प्रभावित होता है। अतः शारीरिक क्षुधा का निरोध करना चाहिए। अधिक भोजन, अधिक कार्य, अधिक बातें इत्यादि का योग मार्ग से निराकरण करना चाहिये। शारीरिक पूर्णता ही प्राणशक्ति में अन्तर्मुख वृत्ति लाती है। प्राण शक्ति बाह्यतः श्वास प्रतिरूप है श्वास-निरोध द्वारा प्राण वायु भी निरुद्ध हो जाती है। अतः श्वास प्रतिरोध को प्राणायाम कोष के ऊपर विजय पाने का अस्त्र माना गया है।

स्वभावतः देखने से ज्ञान होगा कि जन साधारण के प्राण संचार में किसी प्रकार की प्रणाली नहीं। परन्तु योगी श्वास-विधान द्वारा एक प्रकार की प्रणाली को जन्म देता है। जब श्वास में समानता अथवा एकमुखवृत्ति आती है तो श्वास का फल कुम्भक हो जाता है। श्वास का स्वतः निरोध हो जाता है। अब कुम्भक का श्रीगणेश होता है। मन में शान्ति का आभास होता है। समाधि का आविर्भाव होता है।

प्राणायाम के अभ्यास का शरीर मन और बुद्धि पर अति सफल प्रभाव होता है, क्योंकि यह सब प्रकार के शारीरिक तथा मानसिक रोगों का हन्ता माना जाता है। सिद्ध भी है कि यह शरीर में बहु शक्ति का संचार करता है, मन की अशुद्धियों को आक्रान्त कर, बुद्धि विकास में सहायक होता है। यह स्मृति प्रकाश में अत्यन्त महत्वपूर्ण योग है।

यह कहना ठीक नहीं कि प्राणायाम का अभ्यास केवल मात्र हठयोगी के ही लिए आवश्यक है। राजयोगी एवं वेदान्ती के लिए भी इसका उतनी ही आवश्यकता है। क्योंकि यह मन-निरोध का प्राथमिक यन्त्र है। वेदान्ती भी अवश्यमेव प्रणव के ध्यान में प्राकृतिक प्राणायाम करेगा। तद्वत् राजयोगी और हठयोगी भी पुरुष तथा शक्ति का ध्यान करते-2 स्वाभाविक प्राणायाम करने लगेंगे।

जैसा बताया जा चुका है कि प्राण एवं वासना का परस्पर अतीव घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक के निरोध से दोनों का निरोध होना सम्भव है। प्राणवायु क्रियाशील होने से चित्त भी स्पन्दित होता है। यदि प्राणवायु को वशीभूत किया जाय तो चित्तस्पन्दन स्वतः शान्त हो जायगा क्योंकि प्राण मात्र ही अस्तित्व पदार्थ की कुँजी है। अतः सिद्ध हुआ कि प्राणवायु के संचालन में वशीकरण होना, प्राकृतिक शक्ति संचार को वश में करना है।

उदाहरणार्थ एक बड़े कार्यालय में कई कार्य बिजली के बल से होते हैं। आप उन पर रोकथाम की इच्छा करें तो आपको सत्यतः उस कमरे में जाना होगा जहाँ से आप बिजली के समस्त सम्बन्धों को स्थगित कर दें। फलतः तमाम कार्य सहसा ही समाप्त हो जायेंगे तथा एक से व्यक्तिगत कार्य मात्र से तमाम कार्यालय रुक जायगा। इसी प्रकार एक योग का अभ्यासी भी व्यक्ति-केन्द्रों में निरोध की स्थापना करता है। जिससे वह अपने-अपने चक्रों का कार्य स्वतः स्थगित कर देता है। इस प्रकार प्राण शक्ति के द्वारा योगाभ्यासी मन तथा शरीर को निरुद्ध करता हुआ, ऊर्जत्व के मार्ग पर अग्रसर होता है।

अब हमें ऐसे परिपक्व विज्ञान का ज्ञान होता है, जिसकी प्राप्ति में आज के वैज्ञानिक चूक रहे हैं। परन्तु उसी की प्राप्ति हमारे योगाभ्यासी करते हैं। इसी से भय दृष्टिगत होता है कि एक तो मन सागर की तरंगावलियों को हस्त स्पर्श से शान्त कर देता है, परन्तु अन्य पुरुष मदान्वित हो, अनन्त आनन्द के बदले भूमि पर पतित होता है। अब देखना है कि हम किसको श्रेय मानेंगे?


आपकी संचित शक्तियाँ

(श्रीमती प्रीतमदेवी जी कोटा)

जिन तोप बंदूकों को जलयान के लिए रखा जाता है, चुनाव से पूर्व उसकी परीक्षा होती है। उनमें उनकी शक्ति से कुछ अधिक बारूद भरकर चलाया जाता है। यदि उस बढ़ी हुई शक्ति के भार को वे वहन कर लेती हैं, तो उन्हें युद्ध के लिए उपयुक्त समझ कर चुन लिया जाता है। अनेक तोप-बन्दूकें इस परीक्षा में ही विनष्ट होकर खण्ड खण्ड हो जाती हैं। इनमें से अनेक ऐसी होती हैं, जो साधारण स्थितियों, दैनिक कार्यों, मामूली तौर पर काम चला सकती हैं। पर अधिक काम या बोझ पड़ने पर टूट सकती हैं।

पुलों का भी यही हाल है। काम में लाने से पहले उन पर भारी ऐंजन को चलाकर देखा जाता है कि कहीं अधिक भार से टूट तो न जायेंगे? प्रत्येक ऐजिंन या लोकोमाटिव में कुछ हार्स पावर की शक्ति सुरक्षित रखी जाती है। यदि आप 20 हार्स पावर का ऐंजिन चाहते हैं, तो कम्पनी आपको 30 हार्स पावर का ऐंजिन भेजेगी। यह 10 हार्स पावर की अधिक शक्ति काम में नहीं आवेगी, पर कभी अड़चन या जरूरी मौके के लिए उसे सोचते रखना अति आवश्यक है। मौके बे मौके कभी भी उसकी जरूरत पड़ सकती है। सम्भावित आवश्यकताओं के लिए इसे संचित रखना जरूरी है।

ऐसा ही हाल मनुष्य की शक्तियों का होना चाहिए। अनन्त मानसिक शक्ति से परिपूर्ण, सुसंचालित विवेक, संतुलित चरित्र वाला व्यक्ति आपत्तिकाल या जरूरत के समय किंकर्त्तव्यविमूढ़ नहीं होता। अधिक काम में भी वह अपनी शक्तियों का पूर्ण परिचय देता है, जबकि ऊपरी दृष्टि से मोटे-ताजे व्यक्ति पीछे रह जाते हैं। जरा कार्योधिक हुआ कि उनके प्राणों पर आ बनती है।

बड़े व्यापारी उन व्यक्तियों को पसन्द करते हैं जो आपत्तिकाल में, जब मजदूरी भी कम हो उसी उत्साह से कार्य में संलग्न रहते हैं, जितने वे आराम के समृद्धिशाली दिनों में थे। प्रारम्भिक काल में जब व्यापार प्रारम्भ ही किया जाता है, उसे आगे विकसित करने के बड़े परिश्रमी, संयमी और शक्तिशाली व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है। व्यापार में मनुष्य का पुस्तकीय ज्ञान, शक्ति या अनुभव कार्य नहीं करता है, प्रत्युत उसे समुन्नत बनाने वाला वह भाव है जो उसके मन में पुनः-2 यह भावना उत्पन्न करता है कि खतरे के समय भी वह अपने कार्य को संभाल सकेगा। बची हुई शक्ति, संचित सम्पत्ति, एकत्रित ताकतें वे चीजें हैं जो मनुष्य को सफल व्यापारी बनाती हैं।

आपमें संचित शक्तियाँ कितनी हैं? जरूरत के समय के लिए आपने कितनी शक्तियाँ इकट्ठी कर रखी हैं? जो व्यक्ति जरूरत के समय के लिए अपनी शक्तियाँ एकत्रित नहीं रखता, वह मूर्ख है।

वे कौन सी शक्तियाँ हैं, जिनके संचय की आवश्यकता है। इसके उत्तर में कहा जायगा कि सर्वप्रथम हमें अपनी प्राण शक्ति का अधिकाधिक संचय करना चाहिए। प्राण शक्ति के द्वारा ही हमारा इस जगत से नाता है। जब तक प्राण तब तक संसार। प्राणों का जो कोष आपको मिलता है, उसकी रक्षा के लिए सदा सर्वदा जागरुक रहने की आवश्यकता है।

प्राण का अर्थ मनुष्य की शारीरिक शक्ति, सामर्थ्य, और क्रिया शक्ति का विकास है। मनुष्य के शरीर में दो प्रधान शक्तियाँ हैं- (1) शरीर का विकास पोषण एवं क्रियान्वित करने की शक्तियाँ (2) रोगों से युद्ध कर शरीर को स्वस्थ रखने की शक्ति। प्रथम शक्ति के द्वारा हमारे हाथ-पाँव शरीर के सब अवयव अपनी पुष्टि प्राप्त करते हैं, रक्त के द्वारा उनमें बल, भोजन, वीर्य का संचार होता है। दूसरी शक्ति से गन्दगी तथा सब प्रकार के विजातीय विषों का निष्कासन। यह शक्ति हमें जीवन को स्थिर रखने के हेतु संघर्ष करना सिखाती है। शरीर की रक्षा के लिए हमें इन दोनों ही शक्तियों का एक वृहत् संचित कोष अपने पास रखना चाहिए।

स्वस्थ जीवनी शक्ति वाले व्यक्ति के लक्षण इस प्रकार हैं- उसकी त्वचा वीर्य युक्त लाल स्निग्ध होती है, पाचन शक्ति सुव्यवस्थित होती है, मल द्वारा मल निष्कासन की क्रिया बड़े उत्तम तरीके से करता है, नेत्र निर्मल और तेजस्वी रहते हैं, घाव लगने पर आसानी से ठीक हो जाता है, निद्रा स्वस्थ और गहरी आती हैं। हमें चाहिए कि ऋषियों द्वारा प्रतिपादित सूर्यस्नान, प्राणायाम, उपयुक्त पौष्टिक भोजन द्वारा प्राणशक्ति का संचय करते रहें, वीर्य नाश न करें। व्यर्थ की छोटी-बड़ी चिन्ताओं में लगे रहने से असन्तोषी, अतृप्त विषादमय मनःस्थिति रखने से प्राण शक्ति का अपव्यय होता है। मन में आह्लाद तथा आशा का सुखद वातावरण बनाये रखें जैसे शरीर को पुष्ट करने से प्राणशक्ति संचित होती है, वैसे ही निर्भयता, ईमानदारी, प्रसन्नता, और आत्म निर्भरता जैसे सद्गुणों को चरित्र में उतारने से प्राणशक्ति को स्थिर रखा जा सकता है। प्राणशक्ति का निरन्तर संग्रह करना चाहिये। यह वह सम्पदा है, जिसकी रक्षा से संसार का सुख हमारे लिए सम्भव है।

अर्थ शक्ति अर्थात् संचित पूँजी की शक्ति महान् है। हम ऐसे सामाजिक युग में निवास कर रहे हैं, जिसमें हमारे सामाजिक सम्बन्ध अर्थ से संचालित होते है। जिसके पास जितनी संचित पूँजी है, समाज में उसको उतनी ही मान प्रतिष्ठा का अधिकार है। संचित पूँजी का तात्पर्य है, संचित श्रम। जो व्यक्ति श्रम को संचित कर पूँजी की शेल्फ में रखता है, उसके मन में एक आन्तरिक शान्ति विद्यमान रहती है, जो समय-समय पर उसके काम आती रहती हैं। हमारे समाज का विधान कुछ ऐसा है कि जब तक जीवन है, तब तक रुपये-पैसे की आवश्यकता रहती है। यौवन काल की संचित पूजी वृद्धावस्था की एक शक्ति बन जाती है।

जो व्यक्ति अर्थ-शक्ति को संचित रखता है वह अपने साथ एक ऐसा सेवक रखता है, जो हर समय हर अवस्था, हर स्थिति में सेवा-सहायता को प्रस्तुत रहता है। अर्थ एक जीती जागती शक्ति है। इस सम्बन्ध में बड़ा जागरुक रहने की आवश्यकता है। लक्ष्मी को चंचला कहा गया है। यह एक व्यक्ति के पास स्थिर नहीं रहती। तनिक सी असावधानी से वर्षों की संचित पूँजी अनायास ही हाथ से निकल जाती है। इस शक्ति को संचित करने के लिए अधिक जागरुक रहिये।

ईश्वर की अनुकम्पा, सहायता, प्रेरणा, में विश्वास ऐसी शक्ति है, जो मनुष्य को यौवन से लेकर मृत्यु पर्यन्त सहायता देती है। आस्तिकवाद हमारी सम्पदा है। ईश्वरीय सत्ता में निष्ठा हमें सदा सर्वदा समुन्नत करती है और संकट के समय आन्तरिक शान्ति प्रदान करती है। ईश्वर हमारे जीवन तथा कर्म का आदि स्रोत है, हमारे हृदय मन्दिर में प्रकाश करने वाला तेज पुँज है, हमारे जीवन में प्राण और श्वास है। ईश्वरीय आशा विहीन व्यक्ति उस सूखी पत्ती की तरह है जो विपरीत हवा में यत्र-तत्र मारी-मारी फिरती है। निराशा और वेदनाएँ उसे एक ओर खींचती हैं जो व्यर्थ के प्रलोभन, लोभ, अतृप्ति दूसरी विपरीत दिशा में आकर्षित करती हैं।

मैं ईश्वर के तेज की एक रश्मि हूँ। ईश्वरीय सत्ता में मुझे अन्ततः विलीन हो जाना है। मैं जहाँ से जन्मा हूँ, वहीं पहुँच जाऊंगा। मेरी आत्मा सत्त, चित्त, आनन्द स्वरूप परमेश्वर का अंश है। मुझ में तेरे प्रभु के गुण ही प्रकाशित हो सकते हैं। अनीति, अन्याय, अनर्थ से मेरा कोई सम्बन्ध नहीं-ऐसी आस्तिक भावना मनः प्राण में संचित रखने वाला व्यक्ति सदा सर्वदा कमल के समान उत्फुल्ल रहता है।

संकट में, विपदा में, निराशा के अवसरों पर दैवी सत्ता से तादात्म्य आपको वह अंतर्बल देगा, जिसके द्वारा आप आन्तरिक शक्ति पाते रहेंगे। ईश्वर शक्ति का आदि स्रोत है। उनसे हमारी आत्मा को सहन शक्ति प्राप्त होती है। इस अंतर्बल से व्यक्ति सब परिस्थितियों में बाह्य जगत के संकटों से सुरक्षित रहता है। ईश्वर की सद् योजनाओं में अपने विश्वास को निरन्तर बढ़ाते चलिए। पूजन, गायत्री जप, भजन, सन्ध्या तथा नाना साधनाएँ आपको सदा दैवी तत्व से संयुक्त रखती हैं।


अपना परिवार मत बढ़ाइए।

(प्रो.रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

जनसंख्या की वृद्धि-

भारत में अधिक सन्तान उत्पन्न होने से देश की खाद्य समस्या इतने प्रयत्न करने पर भी ज्यों की त्यों जटिल हो रही है। जितना खाद्य पदार्थों की उत्पत्ति में प्रयत्न किया जाता है, उतने ही अधिक मुँह खाने के लिये उत्पन्न हो जाते हैं। डॉ. सी. चन्द्रशेखर के अनुसार सन् 1920 में दुनिया की आबादी 1 अरब 83 करोड़ 40 लाख थी, जो सन् 1943 में 2 अरब 37 करोड़ 80 लाख हो गई। यदि आबादी का यही क्रम जारी रहा, तो अगले सौ वर्ष में दुनिया की आबादी दुगुनी हो जायगी। भारत में सन् 1872 से 1942 तक भारत की आबादी में 54 प्रतिशत वृद्धि हुई। अब तक करोड़ हैं जो अगले दस वर्षों में 40 करोड़ हो जायेंगे। उस संकटमय परिस्थिति की कल्पना कीजिए, जो इन अल्प शिक्षित, निर्धन, नंगे-भूखे, दीन-हीन नागरिकों के बढ़ जाने से भारत में उपस्थित हो जायगी।

डॉ. चन्द्रशेखरन ने लिखा है- “उस समय तक परिवार नियोजन से कुछ नहीं होगा, जब तक शीघ्र ही प्रभावपूर्ण ढंग से देश की बढ़ती हुई आबादी को रोकने का आन्दोलन न किया जायगा। रोगी-अपाहिज और असाध्य रोगों से पीड़ित लोगों को अनिवार्य रूप से आपरेशन कर राष्ट्रीय जीवन में रोगियों, अपाहिजों और अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ाने से रोका जाय। सरकार को यदि वास्तव में जनकल्याण राज्य स्थापित करना है तो आबादी का कठोर नियन्त्रण एक आवश्यक कर्त्तव्य है। देश में एक ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाय, जिसमें देश की नस्ल को स्वस्थ बनाने के उपचार का दुर्बल और अस्वस्थ व्यक्ति भी स्वागत कर सके।”

स्वास्थ्य का नाश-

अनियंत्रित सन्तान के जन्म से माता के स्वास्थ्य सौंदर्य और जीवन शक्ति का नाश होता है। प्रत्येक बच्चे के जन्म से माता के स्वास्थ्य को ऐसी क्षति पहुँचती हैं, जिसकी पूर्ति विशेष देख-रेख पौष्टिक अन्न तथा डाक्टरी निर्देश से ही हो सकती है। यह साधारण परिवारों में सम्भव नहीं होता। उधर एक के पश्चात दूसरी, तीसरी, चौथी सन्तान निरन्तर आती रहती है। प्रत्येक बार माता का गर्भाशय निर्बल पड़ता जाता है, गुप्तेन्द्रियाँ शिथिल पड़ती जाती हैं, मानसिक शक्तियाँ कमजोर होने लगती हैं, और श्वेत प्रदर, कमर पीड़ा, सर दर्द, बदहजमी, अनिद्रा, निर्बलता, यक्ष्मा, हृदयरोग उत्पन्न होने लगते हैं। प्रत्येक सन्तान माता की जीवनी शक्ति को कम करती है। उसकी आन्तरिक इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, पेट की त्वचा सिकुड़ जाती है और दूध पिलाते-पिलाते स्तन सुख कर लटक जाते हैं। जल्दी-जल्दी प्रसव होने से वे एक का पोषण ठीक तरह कर नहीं पातीं कि दूसरे का भार उन पर आ जाता है।

प्रकृति ने मनुष्य, चाहे स्त्री हो या पुरुष, के गुप्त सौंदर्य का मूल स्रोत उसकी गुप्त इंद्रियां को रखा है। जिस व्यक्ति के गुप्त अवयव अशक्त नहीं हैं, जिनमें वीर्य रज का भण्डार परिपूर्ण है, वे ही सबसे सुन्दर हैं। वीर्यवान पुरुष का सौंदर्य नहीं छिपता। वीर्यपात करने वाला लम्पट, कामी, आवारा पुरुष धीरे-धीरे कुरूप, काले रंग पुनः सन्तान को जन्म देने से निस्तेज, अनाकर्षक, काला रंग, झुर्रियों वाली त्वचा तथा स्फूर्ति विहीन वृद्धा जैसी बन जाती है। उसकी आयु क्षीण हो जाती है। अनावश्यक अधिक सन्तान का बोझ उस पर डालना उसे बदसूरत और वृद्ध बनाना है।

प्रत्येक शिशु रहन-सहन का स्तर नीचे लाता है

श्री सन्तराम जी ने लिखा है- ऐसे बहुत से उदाहरण मिलते हैं, जिनमें पिता की औसत आयु 27-28 वर्ष की और मासिक आय 40) है, पर 25 वर्ष की अवस्था पहुँचते-पहुँचते स्त्री पाँच बच्चों की माँ बन गई है। चालीस रुपये मासिक में 7 प्राणियों का निर्वाह होना कठिन हो जाता है बच्चों के बीमार हो जाने पर दवा-दारु के लिए पैसा नहीं होता, शीत से बचने के लिए गर्म कपड़ा नहीं खरीदा जा सकता और सन्तान को लिखा-पढ़ा कर उपयोगी नागरिक बनाना असम्भव हो जाता है। जो गृहस्थाश्रम सुखी होना चाहिए था, वह दुःख का धाम बन जाता है।”

प्रत्येक शिशु के पालन पोषण, वस्त्र, शिक्षा इत्यादि का अर्थ है सम्पूर्ण कुटुम्ब का रहन-सहन का स्तर नीचे आना। यदि स्तर उतना ही रखा जाय, तो बड़े कुटुम्ब के भरण पोषण में अपेक्षाकृत अधिक श्रम करना पड़ेगा। यदि श्रम न हुआ (जैसा प्रायः होता है) तो स्तर धीरे-धीरे नीचे आता रहता है। अन्तिम बच्चे की देख-रेख वस्त्र, शिक्षा इत्यादि के लिए बहुत कम शेष बचता है। सबसे छोटे बच्चे विशेषतः लड़कियाँ तिरस्कृत रहती हैं। ज्यों-ज्यों ये बच्चे बड़े होते हैं, त्यों-त्यों उनकी शिक्षा विवाह इत्यादि का भार निरन्तर एक मानसिक बोझ के रूप में गृहपति को परेशान करता है। उचित रुपया न व्यय होने के कारण अधिकतर बच्चे अल्पज्ञ और अविकसित पड़े रहते हैं। बड़े कुटुम्ब के बहुत से बच्चे बिना शिक्षा के यों ही पलते रहते हैं। सारे दिन वे कहाँ रहते हैं, क्या करते हैं, क्या खाते पीते हैं कोई इसकी परवाह नहीं करता।

अधिक सन्तान से उत्पन्न मानसिक चिन्ता

बड़े परिवार के मुखिया को एक प्रकार कष्ट रहता है। कैसे इन्हें भोजन दिया जाय? कैसे शहरों में रह कर इनके लिए मकान की व्यवस्था हो? कैसे कपड़े जुटाए जायं? इनका स्वास्थ्य कैसे स्थिर रहे? इनकी शिक्षा पर कैसे व्यय किया जाय? लड़कियों की शादियाँ कैसे होंगी? लड़कों का रोजगार कैसे लगे? ऐसी असंख्य छोटी-बड़ी चिन्ताएँ माता-पिता के मन को निरन्तर विक्षुब्ध रखती हैं। कोई न कोई बीमार पड़ा ही रहता है। किसी के विवाह की चिन्ता है, तो किसी की परीक्षा की फीस, पुस्तकों और पढ़ाई की चिन्ता परेशान किए रहती है। अधिक सन्तान वाले व्यक्ति का ज्यादातर समय क्षुद्र भय, संकीर्ण विचार, निराशा, शोक, क्रोध, अनिष्ट चिन्तन, आमदनी जुटाने में व्यय होता है। उसका मोह बढ़ जाता है। रुपये एकत्रित करने के लोभ में वह बेईमानी का मार्ग भी पकड़ लेता है। कभी-कभी मानसिक भार से उत्तेजित हो वह बच्चों की हत्या तक करने का पाप कर बैठता है।

अधिक सन्तान की चिन्ता मनुष्य को समय से पूर्व ही जर्जरित कर डालती है। पहले तो अपनी आय बढ़ाने में ही उसकी शक्ति-सुख व्यय होते चलते हैं। अवकाश, मनोरंजन, ब्रह्म चिन्तन, भजन, पूजन, सुख के लिए समय नहीं बचता। वह जो रुपया-पैसा संग्रह भी करता है, वह भी दो-चार शादियों या शिक्षा में ही व्यय हो जाता है। वृद्धावस्था में, जब उसके शरीर में शक्ति और हृदय में उत्साह नहीं रहता, ये ही आर्थिक संकट मनुष्य को बड़ा परेशान करते हैं। वृद्ध को एक ओर सन्तान को काम से लगाने की चिन्ता होती है, दूसरी ओर अपनी आर्थिक अवस्था को बनाने की फिक्र चलती रहती है। माता पुत्री की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई आयु को देख कर खीजती जाती है। पिता को संसार वासना लोलुप दृष्टि से उसे बचाने की चिन्ता रहती है। कहीं पुत्री पथ भ्रष्ट न हो जाय? कोई उसे बहका कर न ले जाय? गन्दी परिस्थिति में न बहक जाय? उसे कोई शारीरिक या मानसिक रोग न लग जाय? इस प्रकार की सैंकड़ों दुश्चिन्ताएँ माता-पिता को मानसिक नर्क में डाले रहती हैं। सुखी वही है जो परिवार नियोजन द्वारा इस नर्क से बचा रहे।

परिवार नियोजन के उपाय

भारतीय संस्कृति के अनुसार ब्रह्मचर्य इन्द्रिय निग्रह का सुलभ एवं सर्वोत्तम उपाय है। इससे मनुष्य की जीवन-शक्ति बनी रहती है। वीर्य मनुष्य का प्राण है। जो जितना इस जीवन तत्व का अपव्यय करता है, वह उतना ही अपनी शक्ति का ह्रास करता है। एक बार में नष्ट किया हुआ वीर्य महीनों में जाकर फिर प्राप्त होता है। अतः क्षणभर के पाशविक आनन्द के लिए वीर्य का नाश करना मूर्खता है।

केवल आनन्द मात्र के लिए विषय भोग करना अनुचित है। महात्मा गाँधी जी ने अपनी पुस्तक “ब्रह्मचर्य” में इस विषय पर लिखा है- “सन्तानोत्पत्ति की इच्छा पर ही सहवास करना चाहिए, अन्यथा नहीं। क्योंकि मातृत्व एवं पितृत्व की इच्छाओं से रहित केवल शारीरिक इच्छाओं की पूर्ति करना नैतिक पतन है केवल आत्म संयम की आवश्यकता है और मेरी समझ में पुरुष की अपेक्षा स्त्री के लिए आत्मसंयम करना ज्यादा आसान है संयम का अभाव स्त्री की अपेक्षा पुरुष में ही अधिक होता है हमारे देश में जरूरत बस इसी बात की है कि स्त्री अपने पति तक से “ना” कर सके। ऐसी सुशिक्षा स्त्रियों को मिलनी चाहिये।

विवाहित होकर भी आप ब्रह्मचर्य धारण करें। विश्वास करें, आपके लिए यह सर्वथा सम्भव है। आप दृढ़ता से प्रण करें तो बखूबी इस व्रत को धारण कर सकते हैं। आप वासना की क्षण भंगुरता को समझ गए हैं। अतः अब आप मानसिक दृष्टि से भी यह व्रत धारण कर सकते हैं।

महात्मा भगवान दीन लिखते हैं- “खाने का आनन्द जोर की भूख पर निर्भर है, जोर की भूख लम्बे समय का नतीजा है। इसी तरह दुनियादारी का आनन्द ब्रह्मचर्य पर निर्भर है। ब्रह्मचर्य माने आनन्द भण्डार को बढ़ाते रहना। ईंट का मकान जिस तरह पलस्तर से मजबूत बनता है और वर्षों टिक सकता है, वैसे ही इस हाड़मांस के मकान का पलस्तर ब्रह्मचर्य है, जो बरसों टिक सकता है।”

ब्रह्मचर्य मनुष्य की सबसे बड़ी उत्पादक शक्ति है, वह सन्तान उत्पन्न नहीं करेगी, तो बल, बुद्धि, दीर्घ जीवन, उत्तम स्वास्थ्य दूरदर्शिता और ओज उत्पन्न करेगी। वीर्य संग्रह देह को नया का नया बनाए रखेगा। मन की चंचलता पर यदि कोई काबू पा सकता है, तो वह ब्रह्मचारी ही कहलाता है।

आपके जितनी संतानें हैं, उनकी जिम्मेदारियों तो किसी प्रकार पूर्ण हो ही जायेंगी, नई सन्तान को जन्म न दीजिए। यदि सन्तान नहीं है, तो अपने को और भाग्यशाली समझिये। परमेश्वर ने आपको एक स्तर और ऊँचा उठा दिया है। विकास तथा ज्ञान प्राप्ति के लिए व्यर्थ के झंझटों को स्वयं दूर कर दिया है। आपकी असंख्य जिम्मेदारियाँ कम हो गई हैं। वस्तुतः आपको हर्षित होना चाहिए। उच्च कार्यों में अपनी शक्ति व्यय करनी चाहिए। संभव हो तो अपनी जीवन सहचरी को भी अपने मानसिक स्थल तक ऊँचा उठाना और उसका सर्वांगीण विकास करना चाहिए। आपके परिवार में ऐसे अनेक सदस्य हैं, जो आपका प्रेम, सेवा, सहायता, सौहार्द, पथ-प्रदर्शन चाहते हैं। उन्मुक्त हृदय से आपको ये सब प्रदान करने चाहिये। “हमारी ही संतान हो तो हम उस की देख रेख करें” यह अज्ञान है। इस अज्ञान से निकलें और परिवार के अन्य सदस्य पर अपने प्रेम की वर्षा करें।


यज्ञ द्वारा अमृतमयी वर्षा

यज्ञ से वर्षा का घनिष्ठ सम्बन्ध है। कहते हैं कि यज्ञ से इन्द्र देव प्रसन्न होते हैं और वर्षा की कमी नहीं रहने देते। पूर्व काल में जब इस पुण्य भूमि में पर्याप्त यज्ञ होते थे तो खूब वर्षा होती थी और अन्न, वनस्पति, पशु, दूध आदि से यह देश सदा भरा-पूरा रहता था। वर्षा का जल कृषि के लिए सर्वश्रेष्ठ है क्योंकि उसमें आकाशस्थ अनेक खाद्य संमिश्रित हो जाते हैं जिससे अन्न वनस्पति बढ़ते भी खूब हैं और उनमें पौष्टिक तत्व भी अधिक होते हैं। नहर आदि के पानी से सींचने पर पौधों की उतनी वृद्धि नहीं होती जितनी कि वर्षा के जल से होती है। इस प्रकार जो विटामिन, क्षार एवं पोषक तत्व वर्षा से सींचे हुए पेड़ के फल बीजों में होता है वह अन्य प्रकार की सिंचाई से नहीं होता। वर्षा का जल स्वच्छता की दृष्टि से बहुत उच्च कोटि का होने के कारण स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद होता है। वर्षा की नमी हवा में रहने से पशु-पक्षी आदि भी प्रसन्न एवं परिपुष्ट होते हैं। इसी नम हवा से रज वीर्यों में प्रजनन शक्ति बढ़ती है कुत्ते आदि अनेक पशु वर्षा के उपरान्त ही गर्भ धारण करते हैं। वर्षा की उपयोगिता अनेक दृष्टियों से है।

वर्षा को देवाधीन समझा जाता है। क्योंकि मनुष्य की इच्छा एवं क्रिया द्वारा उसको चाहे जब नहीं बरसाया जा सकता। वर्षा की इस अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ऋषियों ने प्रयत्न और अन्ततः यज्ञ द्वारा अभीष्ट वर्षा करने में सफलता प्राप्त की। यज्ञ द्वारा वर्षा करना और रोकना उनके लिए सरल था। अपनी इसी सफलता का उद्घोष करते हुए उन्होंने यज्ञ को महत्ता गाई और कहा :-

अन्नेनभूता जीवन्ति, यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम्।

पर्जन्यो जायते यज्ञात् सर्वं यज्ञमयं ततः॥

कालिका पुराण 32। 8

अन्न से ही प्राणी जीते हैं। वह अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा यज्ञ द्वारा होती है। यह सम्पूर्ण विश्व यज्ञमय ही है।

यज्ञेनाऽऽप्यग्यिता देवा वृष्ट्युत्सर्गेंण मानवाः।

आप्यायनं वैकुर्वन्ति यज्ञाः कल्याण हेतवः॥

पद्म पुराण सृष्टि खंड 3। 124

यज्ञ से देवता परिपुष्ट होते हैं। यज्ञ से वर्षा होती है और मनुष्यों का पालन होता है। यज्ञ ही कल्याण का हेतु है।

यज्ञैराप्यायिता देवा षृष्ट्युत्सर्गेण वै प्रजाः॥

आप्यायन्ते तुधर्मज्ञ यज्ञाः कल्याण हेतवः॥

विष्णु पुराण 3। 1। 8

यज्ञ से देवताओं का अभिवर्धन होता हैं। यज्ञ द्वारा वर्षा होने से प्रजा का पालन होता हैं। हे धर्मज्ञ, यज्ञ ही कल्याण के हेतु हैं।

अन्नाद्भवंति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञकर्म समुद्भवः॥

गीता 2। 14

समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है। वर्षा यज्ञ से होती है और वह यज्ञ कर्म से होता है।

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्य मुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥

मनु 3। 76

अग्नि में विधि-विधान पूर्वक दी हुई आहुति सूर्य को प्राप्त होती है उससे वर्षा होती हैं। वर्षा से अन्न होता है और अन्न से प्राणियों की उत्पत्ति होती है।

उपरोक्त मन्त्र में बताया गया है कि अग्नि में डाली हुई आहुति प्राणियों को प्राप्त होती है और वह वर्षा तथा अन्नोत्पत्ति का कारण बनती है। विज्ञान से सिद्ध है कि अग्नि जलने से कार्बन डायऑक्साइड गैस बनती है। इस गैस का पृथ्वी पर एक पर्त फैला रहता है जिसका काम यह है कि सूर्य की किरणों की गर्मी को पृथ्वी पर रोग कर रखे। यदि यह पर्त पतला होगा तो गर्मी ठहरेगी नहीं और भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जायगी। रेगिस्तानों में यह पर्त पतला होता है फलस्वरूप दिन में कितनी ही धूप पड़े रात को वहाँ की जमीन तथा वायु ठण्डी होती है। ऐसी स्थिति में वहाँ कृषि एवं वृक्ष वनस्पति नहीं उगते, वर्षा करने वाले बादलों को पकड़ने में भी उस प्रदेश का वायुमण्डल असमर्थ रहता है इसलिए वहाँ वर्षा की सदा कमी रहती है। जिन प्रदेशों में कार्बन डायऑक्साइड गैस की पर्त पृथ्वी की सतह पर मोटा होता है वहाँ सूर्य की किरणों द्वारा पृथ्वी पर आने वाली उर्वरा शक्ति एवं गर्मी सुरक्षित एवं संग्रहीत रहती है और उस भूमि में वृक्ष वनस्पति खूब होते हैं।

काँच में यह गुण है कि सूर्य की किरणों की गर्मी को अपने में से भीतर आने देता है पर उलटी वापिस नहीं निकलने देता। जिन कमरों में काँच के रोशनदान लगे होते हैं वहाँ थोड़ी सी धूप जाकर भी कमरे में अपना पूरा प्रभाव कर सकती है। किन्हीं-किन्हीं नर्सरियों में ऐसे पौधे होते हैं जिनको अधिक गर्मी चाहिए उनके लिए काँच के ढक्कनदार घर बना दिये जाते हैं जिनमें होकर धूप भीतर तो घुस जाय पर बाहर न निकले। फलस्वरूप उन पौधों को पर्याप्त गर्मी प्राप्त होती रहती है और वे उष्ण प्रदेश में ही जीवित रहने वाले पौधे शीत प्रदेशों में भी जीवित रहते हैं। सूर्य की किरणों की गर्मी को भीतर घुस जाने देना पर बाहर न निकलने देने का जो कार्य काँच करता है वही कार्य पृथ्वी पर फैला हुआ कार्बन डायऑक्साइड गैस का पर्त भी करता है। यह पर्त जितना ही मोटा और मजबूत होगा, पृथ्वी को सूर्य की बहुमूल्य उर्वरा शक्ति को अपने में धारण करने और सुरक्षित रखने में सुविधा होगी।

ज्वालामुखी पहाड़ों से यह कार्बन गैस निकलती है। उस प्रदेश में उसका एक मोटा पर्त जमीन पर फैल जाता है फलस्वरूप ज्वालामुखी पर्वतों के आस-पास वृक्ष वनस्पतियों का बाहुल्य रहता और वहाँ वर्षा भी अधिक होती है। फ्राँस में यूवरीन नामक एक चश्मा है जिसमें से प्रायः कार्बन निकलती रहती है इस चश्मे के आस-पास का क्षेत्र सदा हरियाली से हरा भरा रहता है। इसलिए यह यज्ञ से उत्पन्न कार्बन पृथ्वी को उर्वर बनाती है और अन्न, फल तथा वनस्पतियों से हमें भरापूरा रखती है।

यह सोचना ठीक नहीं कि अग्नि जलाने से ऑक्सीजन वायु खर्च होती है और कार्बन उत्पन्न होती है इसलिए हवन स्वास्थ्य के लिए अहितकर होगा। हवन में एक तो ऑक्सीजन खर्च ही कितनी होती है। उससे कहीं ज्यादा जो कल कारखानों, रेल, मोटर आदि में हो जाती है। फिर यदि थोड़ी ऑक्सीजन जले और कार्बन बने भी तो उसकी पूर्ति उन वृक्षों वनस्पतियों से हो जाती है जो हवन द्वारा उत्पन्न होती है। वृक्ष, पौधों से दिन भर स्वच्छ प्राणप्रद वायु निकलती रहती है। हवन की कार्बन का हानिकारक तत्व नष्ट करने के लिए तो पहले से ही कलश आदि की स्थापना कर ली जाती हैं।

वैज्ञानिक लोग बादलों में बर्फ का चूरा हवाई जहाजों से छिड़क कर उड़ते हुए बादलों को भारी करते हैं और उनसे वर्षा कराने का प्रयत्न करते हैं। कृत्रिम वर्षा का यह प्रयोग अभी सफल नहीं हो सकता है। पर यज्ञ द्वारा वर्षा कराने के प्रयोग बहुधा सफल होते हैं।

बादल पोले होते हैं तो हवा उनमें भीतर आ जाती है और उन्हें इधर से उधर उड़ा ले जाती है। यदि यह बादल अपेक्षाकृत सघन हो जाते हैं या कोई ऐसा कारण बन जाता है कि वायु उनके भीतर न घुस पावे तो वही बादल भारी होकर बरसने लगते हैं। हवन द्वारा यह आवश्यकता इस प्रकार पूरी होती है कि होमा हुआ घी सूक्ष्म बनकर वायु द्वारा बादलों तक पहुँचता है और उसकी चिकनाई की एक पर्त बादलों के ऊपर चढ़ जाता है। जो वायु को उनके भीतर जाने से रोकता है फलस्वरूप बादल भारी होकर बरसने लगते हैं।

पानी में चिकनाई डाली जाय तो वह उसके भीतर नहीं ठहरती वरन् ऊपर आकर पर्त की तरह फैल जाती है। हवन का धुंआ बादलों के ऊपर एक चिकनाई का पर्त चढ़ा देता है। हवा चिकनाई को पार नहीं कर पाती। देखा जाता है कि जाड़े के दिनों में बहुत से लोग चेहरे पर वैसलीन, मक्खन, आदि मल लेते हैं। जिससे ठण्डी वायु त्वचा तक नहीं पहुँचती और चेहरे की चमड़े फटने की दिक्कत नहीं होती। जिस प्रकार वैसलीन चेहरे की त्वचा तक हवा पहुँचने को रोकती है वैसे ही बादलों के ऊपर फैला हुआ हवन के धुँए का पर्त ऐसी ढाल का काम करता है जो हवा को बादलों के भीतर घुसकर उन्हें उड़ा देने से रोकती है। यह रोक ही वर्षा का कारण बन जाती है।

एक कटोरी में पानी, एक में घी भर कर आग पर गर्म किया जाय तो पानी में बुलबुले उठने लगेंगे, घी यद्यपि जलेगा तो अवश्य पर उसमें बुलबुल न उठेंगे। बुलबुले उठने का कारण यह है कि पानी के गर्म होने पर हवा उसके भीतर प्रवेश करती है, इसके विपरीत घी को भेद कर हवा कटोरी के पेंदे में नहीं पहुँच पाती और बुलबुले नहीं उठते। यह इस बात का प्रमाण है कि चिकनाई को पार करके हवा भीतर नहीं जाती। हवन द्वारा बादलों के ऊपर चिकनाई का आवरण चढ़ा कर उन्हें हवा द्वारा इधर-उधर उड़ा दिये जाने से रोकता है और वर्षा होने लगती है। चिकनाई ठण्ड पाकर जमती है और अपने साथ पानी को भी जमा देती है। जाड़े के दिनों में जब घी जमता है तो उसका जलाँश भी जम जाता है। हवन का घी बादलों को घना करता है, जमाता है और उन्हें बरसने के लिए विवश करता है।

वर्षा कराने और रोकने में अतिवृष्टि और अनावृष्टि रोकने में यज्ञों की सामर्थ्य अद्भुत है।

“निकामे निकामे पर्जन्यो वर्षतु”

इच्छानुसार वर्षा कराना वर्षा पर मानुषी आधिपत्य कराना यज्ञ भगवान के हाथ में है। केवल जल वर्षा ही नहीं यज्ञ से उस प्राण की वर्षा भी होती है जो समस्त प्राणियों को स्वस्थ, सजीव और चिरस्थायी बनाता है। उस प्राण से ही यह पृथ्वी स्थिर है। अमृत प्राण जो यज्ञ का प्राचीन उपहार है इस धरती माता को हरी बनाये हुए है। इसी से कहा गया है-

“यज्ञाः पृथिवीं धारयन्ति”

-अथर्व.

अर्थात्- यज्ञ ही इस पृथ्वी को धारण किये हुए हैं।


गो रक्षा हमारी आत्मरक्षा का प्रश्न है।

(श्री मुरलीधर दिनोदिया बी. ए. एल. एल. बी.)

महात्मा गान्धी ने गाय को ‘सरल निर्दोषता की कविता कहा है। घास-फूस खाकर अमृतोपम दूध प्रदान करने वाली गाय वास्तव में प्रभु की सृष्टि में अपनी उपमा आप हैं। गोदुग्ध सचमुच इस लोक का अमृत है। एक दूध से ही कितने पदार्थ तैयार किये जाते हैं। बैलों से खेती करने तथा बोझा ढोने का काम लिया जाता है। गोबर तथा गोमूत्र वैज्ञानिकों द्वारा सर्वोत्तम खाद घोषित किए जाते हैं। मरने पर गाय का चमड़ा तथा हड्डियाँ आदि भी मनुष्य जाति के लिए परमोपयोगी सिद्ध होते हैं। मनुष्य की मृत्यु के अनन्तर गाय उसको वैतरणी से पार कराती है या नहीं करती इस विषय में हम अपनी अज्ञता स्वीकार करते हुए इतना कह सकते हैं कि मनुष्य को उसके जीवन में ही संसार-सागर को पार करने में जितना सहारा गाय से मिलता है उतना और किसी भी प्राणी से नहीं मिलता।

जीते जी और मरने पर भी मनुष्य जाति पर इतने उपकार बरसाने वाली गाय को आर्यों ने, हिन्दुओं ने, यदि माता कहा तो क्या अनुचित किया। कृतज्ञता आर्य जाति का एक गुण है। वेदों में गाय का नाम ही ‘अवध्न्या’ अर्थात् ‘जो मारी न जाए’ आया है। वेदों से लगाकर आज तक हमारी संस्कृति में गाय की यही प्रतिष्ठा चली आ रही है।

भारत वर्ष से विदेशियों की सत्ता को समाप्त करने के लिए जितने हिंसक-अहिंसक आन्दोलन आज तक चले, जितनी आजादी की लड़ाइयाँ लड़ी गई उन सब में गौ-रक्षा को पूरा-पूरा महत्व दिया गया। राजपूतों, मराठों, और सिखों ने गौरक्षा के लिए क्या नहीं किया।

इस युग में भारतीय राष्ट्रीयता के जनक ऋषि दयानन्द ने गो-रक्षा के महत्व को सबसे पहले समझा था और अंग्रेज अधिकारियों एवं मुसलमान नेताओं से मिलकर गो रक्षार्थ प्रयत्न किया था। उन्होंने ‘गो करुण निधि’ पुस्तक की हिन्दी में रचना की थी जो इस विषय पर भारत की समस्त लोग भाषाओं में सब से पहली पुस्तक है।

पीछे महात्मा गाँधी का आविर्भाव हुआ। उन्होंने तो गोवध को मनुष्य-वध के समान माना है और गोरक्षा के प्रश्न को स्वराज्य से भी ज्यादा महत्व दिया हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है- “मेरे लिए गोवध और मनुष्य-वध एक समान है। भारत वर्ष में गोरक्षा का प्रश्न स्वराज्य से किसी भी प्रकार कम नहीं। कई बातों में तो मैं इसे स्वराज्य से भी बड़ा मानता हूँ।”

महात्मा गाँधी, भगवान तिलक, महामना मदन-मोहन मालवीय आदि महापुरुषों ने गो-रक्षा को स्वतन्त्रता-आन्दोलन का एक अंग बनाए रखा। गाँधी जी ने अपने विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग ‘संघ’ बनाए तो गो-रक्षा के लिए गो-सेवा संघ भी स्थापित किया।

गो-रक्षा आर्य संस्कृति का प्रतीक है। गाँधी जी ने 1921 में अपने ‘नवजीवन’ पत्र में लिखा था कि “गो रक्षा हिन्दू धर्म की दी हुई दुनिया के लिए बख्शीश हैं। यह कोरी कपोल कल्पना नहीं है। तपोपूत ज्ञान धन आर्य ऋषियों ने चिन्तन के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले थे उनकी सत्यता को आज के इस विज्ञान प्रधान युग में गो-भक्षक पाश्चात्य देशों के मनीषियों ने मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है और वे पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि “गाय सुख-समृद्धि की जननी है। मनुष्य जाति के इतिहास में आज तक जिन जातियों ने गो-रक्षण किया वे उन्नति के शिखर पर पहुँची और जिन्होंने गो-भक्षण किया वे अवनति के गहरे गढ़े में आज तक पड़ी हुई हैं।”

मुसलमानों के आगमन के साथ हमारे देश में गो-हत्या शुरू हुई थी। अंग्रेजी शासन-काल में तो व्यापार के आधार पर गो हत्या होने लगी और यह जघन्य कृत्य महात्मा गाँधी के उत्तराधिकारियों के शासन काल में अबाध गति से जारी है। गो-माँस, चमड़ा, हड्डी, आदि दूसरे देशों को बेच कर भारत वर्ष कई करोड़ रुपया प्रति वर्ष कमाता है। कैसी पुण्य कमाई है। क्या बढ़िया निर्यात व्यापार है! और आयात? दूसरे देशों से हम प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की लागत के दुग्ध-चूर्ण आदि दुग्ध जन्य पदार्थ मंगवाते हैं। उधर यूरोप के स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, आदि पिद्दी से छोटे-छोटे गो भक्षक देश भी शब्दशः दूधों नहाते हैं। वहाँ के निवासी स्वयं तो दूध का प्रयोग जी भर कर सकते ही है, दुग्ध जन्य पदार्थ प्रति वर्ष विदेशों को निर्यात कर सैकड़ों रुपये कमाते हैं सो अलग।

हमारे कितने ही नेताओं तक को यह भ्रम है कि मुसलमान मत में गोवध अनिवार्य ठहराया गया है। वास्तविकता यह है कि मुसलमानी मत में कहीं भी गो-वध का विधान नहीं है, और एक धर्म पुस्तक में तो गो-घातक को नरक का अधिकारी बताया गया है। मुसलमानी देशों में लोग गो-वध जानते ही नहीं। भारत में ही अनेक मुसलमान बादशाहों ने राजाज्ञा द्वारा गो-वध बन्द करा दिया था। यदि मुसलमानों के लिए गोवध धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य होता तो वे ऐसा कदापि नहीं करते। इसी जमाने में स्वर्गीय हकीम अजमलखाँ, सरसैयद अहमद, डॉ. सैयद महमूद, मौ. अब्दुल बारी आदि कितने ही गण्यमान्य मुसलिम नेताओं ने गो-रक्षा का समर्थन किया है। अभी हाल में नेहरू जी के मित्र केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल के सदस्य माननीय रफी अहमद किदवई ने भी गो-रक्षा का समर्थन किया है।

संसार में भारत ही एक ऐसा देश हैं जहाँ उपयोगी पशुओं का अँधा-धुन्ध वध होता है। इस अभागे देश में तो जच्चा के गर्भस्थ बच्चों तक को मार कर उनकी खालें विदेशों को निर्यात की जाती हैं क्योंकि मुलायम खाल की कीमत ज्यादा मिलती है। इस जघन्य कृत्य की कोई भी मजहब आज्ञा नहीं देता।

पश्चिम के देश माँसाहारी हैं तथापि घी दूध को वे लोग भी अत्यावश्यक समझते हैं। हमारे शाकाहारी देश में तो इन पदार्थों का और भी अधिक महत्व है। लेकिन आँकड़ों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश में इन पदार्थों को कोई महत्व नहीं दिया जाता। जहाँ भारत में पशुओं की उन्नति के लिए आध आना प्रति पशु खर्च किया जाता है वहाँ अमरीका आदि देशों में एक रुपया प्रति पशु। न्यूजीलैण्ड में दूध की खपत का अनुपात प्रति व्यक्ति 56 औंस है जबकि भारत में 6 औंस ही है। एक पाश्चात्य विद्वान का कथन है कि अब तब ज्ञात खाद्य पदार्थों में सब से अधिक पूर्ण खाद्य दूध ही है। हमारी इस मूर्खता का नतीजा एक तो यही है कि जहाँ और देशों में मनुष्य की आयु का अनुपात (औसत) 50, 60 वर्ष तक बैठता है वहाँ भारत में 22 वर्ष ही है।

गाय हमारे राष्ट्र की रीढ़ है। भारत का आर्थिक ढाँचा गाय पर टिका हुआ है। गाय हमारे किसानों का सर्वस्व है। भारत के नेताओं, अर्थशास्त्रियों तथा पश्चिमीय विद्वानों ने भी आर्थिक दृष्टि से गाय को अत्यन्त महत्व दिया है। गाँधी जी ने लिखा है- “जब तक हम गाय को बचाने का उपाय ढूँढ़ नहीं निकालते तब तक स्वराज्य का अर्थ ही न कहा जावेगा। देश की सुख-समृद्धि गौरक्षा और उसकी सन्तान की समृद्धि के साथ जुड़ी हुई है।


मस्त फकीरी


मस्त फकीरी (Kavita)

हैं आशिक और माशूक जहाँ, वहाँ शाह वजीरी है बाबा। ना रोना है, ना धोना है, ना दर्दे असीरी है बाबा॥

दिन रात बहारे चाहले हैं, और ऐसी सफीरी है बाबा। जो आशिक हुए सो जाने हैं, यह भेद फकीरी है बाबा॥

हर आन हँसी, हर आन खुशी, हर वक्त अमीरी है बाबा। जब आशिक मस्त फकीर हुए, फिर क्या दिलगीरी है बाबा॥2

कुछ जुल्म नहीं, कुछ जोर नहीं, कुछ दाद नहीं फरयाद नहीं। कुछ कैद नहीं, कुछ बन्द नहीं, कुछ जब्र नहीं, आजाद नहीं॥

शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं। है जितनी बातें दुनिया की, सब भूल गये कुछ याद नहीं॥

हर आन हँसी, हर आन खुशी, हर वक्त अमीरी है बाबा। जब आशिक मस्त फकीर हुये, फिर क्या दिलगीरी है बाबा॥2

जिस तरफ नजर कर देखें हैं, उस दिलवर की फुलवारी है। कहीं सब्जी की हरियाली है, कहीं फूलों की गुलक्यारी है॥

दिन रात मगन खुश बैठे हैं, और आस उसी की भारी है। बस आप ही वह दातारी हैं, और आप ही वह भंडारी हैं॥

हर आन हँसी, हर आन खुशी, हर वक्त अमीरी है बाबा। जब आशिक मस्त फकीर हुए, फिर क्या दिलगीरी है बाबा॥3

हम चाकर जिसके हुश्न के हैं, वह दिलवर सबसे आला है। उसने ही हमको जी बख्शा है, उसने ही हमको पाला है॥

दिल अपना भोला-भाला है, और इश्क बड़ा मतवाला है। क्या कहिए किससे क्यों कहिए, यहाँ कौन समझने वाला है॥

*समाप्त*

[सन्त “नजीर”]