मा जीवेभ्य प्रमदः। अ. 8।1।7
प्राणियों की ओर से बेपरवाह मत हो।
मा प्रणाप्र पथो वयम्। अ. 13।1।59
सन्मार्ग से हम विचलित न हों।
जातवेदः पुनीहि मा। यजु. 19।39
पतित पावन प्रभु मुझे पवित्र करें।
सत्यमूचुर्नर एवा हि चक्रः।
सत्पुरुषों ने सत्य का ही प्रतिपादन किया है और वैसा ही आचरण किया है।
जानता संगमेमहि। ऋग. 5।51।15
हम ज्ञानियों की संगत में रहा करें।
मान्तः स्थुनौ अरातयः। ऋग. 10।57।1
हमारे अन्दर कंजूसी न हो।
उतो रियः पूर्णतो नोपदस्यति। ऋग. 10।117।1
दानी का धन घटता नहीं।
ईजानाः र्स्वग यन्ति लोकम्। अथर्व. 18।4।2
यज्ञ करने वाले उत्तम गति को प्राप्त करते हैं।
अयज्ञियो हतवर्चा भवति। अ. 12।2।37
यज्ञहीन का तेज नष्ट हो जाता है।
अक्षैर्मादीव्यः। ऋग. 10।24।13
जुआ मत खेलो।
जाया तप्यते कितवस्य हीना। ऋग. 10।34।10
जुएबाज की स्त्री दीन-हीन होकर दुःख पाती रहती है।
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये। अथर्व. 19।62।1
सबका कल्याण सोचो चाहे शूद्र हो चाहे आर्य।
विश्वे देवा अभि रक्षन्तु मेह। अथर्व. 5।3।4
सब विद्वान मेरी रक्षा करें।
पृणन्नापिरपृणन्तमभिष्य त। ऋग. 10।117।7
कंजूस पीछे रह जाता है, दानी आगे बढ़ जाता है।
न स सखा यो न ददाति सख्ये। ऋग. 10।117।4
वह मित्र ही क्या जो अपने मित्र को सहायता नहीं देता।
मा गृधः कस्य स्विद्धनम्। यजु. 40।1
किसी के धन को मत लो।
वयं सर्वेषु यशसः स्याम। अथ. 6।58।2
हम समस्त जीवों में यशस्वी होवें।
सुगा ऋतस्य पन्थाः। ऋग. 8।31।13
सत्य का मार्ग सुख से गमन करने योग्य सहज है।
अनागोहत्या वै भीमा। अथर्व. 10।1।29
निरपराध की हिंसा करना बड़ा भयंकर है।
मात्रतिष्टः पराँगमनाः। अथ. 8।1।9
यहाँ पर (संसार में) उदासीन मन से मत रहो।
वर्ष-13 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-10
(श्री. शिव प्रसाद द्विवेदी ‘शिव’)
प्राण का दीपक जलाये जल रहा हूँ।
जिन्दगी की वह अमित रेखा चिरन्तन। है न जिसको जान पाया रह चपल मन।
कौन वह संबल हृदय या प्राण है। स्नेह जिसका कर रहा आह्वान है॥
मैं उसे मन में बसाये चल रहा हूँ। प्राण का दीपक चलाये जल रहा हूँ॥
मैं बिकल हूँ, प्राण मेरे है डडडडडडजिःसबल। हैं भुजाओं में निहित तूफान सा बल॥
कंटकों से भर रही जीवन डगर है। मौत से भी जीतना मुझको मगर है॥
यह अटल निश्वास ले मैं चल रहा हूँ। प्राण का दीपक जलाये जल रहा हूँ॥
ज्वार सागर का न मुझको रोक पाया। कब लुभा पाई मुझे ममता अहन्ता और माया।
सत्य का दीपक सतत जलता रहा है। आत्मा मेरा सदा यह घोषणा करता रहा है॥
मैं अकेला हूँ। अकेला ही डगर पर चल रहा हूँ॥ प्राण का दीपक जलाये जल रहा हैं॥
(महात्मा गान्धी)
ईसवी सन् की कुछ शताब्दियों पहले एक यहूदी व्यापारी हो गया है। उसका नाम सोलोमन था। उसने धन और यश भरपूर कमाए थे। उसकी कहावतों का आज भी यूरोप में प्रचार है। वेनिस के लोग उसे इतना मानते थे कि उन्होंने उसकी मूर्ति स्थापित की। उसकी कहावतें आज कल याद तो रखी जातीं हैं, परन्तु ऐसे आदमी बहुत कम हैं जो उनके अनुसार आचरण करते हों। वह कहता है- “जो लोग झूँठ बोलकर पैसा कमाते हैं वे घमण्डी हैं और यही उनकी मौत की निशानी हैं।” दूसरी जगह उसने कहा है- “हराम (मुफ्त) की दौलत से कोई लाभ नहीं होता। सत्य मौत से बचाता है।” इन दोनों कहावतों में सोलोमन ने बतलाया है कि अन्याय से पैदा किये हुए धन का परिणाम मृत्यु है। इस जमाने में इतना झूठ बोला और इतना अन्याय किया जा रहा है कि साधारणतः हम उसे झूठ और अन्याय कह ही नहीं सकते। जैसे कि झूठे विज्ञापन देना, अपने माल पर लोगों को भुलावे में डालने वाले लेबल लगाना, इत्यादि।
इसके बाद वह बुद्धिमान कहता है- “जो धन बढ़ाने के लिये गरीबों को दुःख देता है वह अन्त में दर दर भीख माँगेगा।” इसके बाद कहता है- “गरीबों को न सताओ, क्योंकि वे गरीब हैं। व्यापार में दुःखियों पर जुल्म न करो। क्योंकि जो गरीब को सताएगा खुदा उसे सताएगा।” लेकिन आजकल तो व्यापार में मरे हुए आदमी को ही ठोकर मारी जाती है। यदि कोई संकट में पड़ जाता है तो हम उसके संकट से लाभ उठाने को तैयार हो जाते हैं। डकैत तो मालदार के यहाँ डाका डालते हैं, परन्तु व्यापार में तो गरीबों को ही लूटा जाता है।
फिर सोलोमन कहता है- “अमीर और गरीब दोनों समान हैं। खुदा उनको उत्पन्न करने वाला है, खुदा उन्हें ज्ञान देता है।” अमीर का गरीब के बिना और गरीब का अमीर के बिना काम नहीं चलता। एक से दूसरे का काम सदा ही पड़ता रहता है, इसलिए कोई किसी को ऊँचा या नीचा नहीं कह सकता। परन्तु जब उन्हें इस बात का होश नहीं रहता कि ईश्वर उन्हें ज्ञान देने वाला है तब विपरीत परिणाम होता है।
धन की गति का नियन्त्रण
धन नदी के समान है। नदी सदा समुद्र की ओर अर्थात् नीचे की ओर बहती है। इसी तरह धन को भी जहाँ आवश्यकता हो वहीं जाना चाहिए। परन्तु जैसे नदी की गति बदल सकती है। वैसे ही धन की गति में भी परिवर्तन हो सकता है। कितनी ही नदियाँ इधर-उधर बहने लगती हैं और उनके आस-पास बहुत-सा पानी जमा हो जाने से जहरीली हवा पैदा होती है। इन्हीं नदियों में बाँध बाँधकर जिधर आवश्यकता हो उधर उनका पानी ले जाने से वही पानी जमीन को उपजाऊ और आस-पास की वायु को उत्तम बनाता है। इसी तरह धन का मन-माना व्यवहार होने से बुराई बढ़ती है, गरीबी बढ़ती है। साराँश यह है कि यह धन विष-तुल्य हो जाता है, पर यदि उसी धन की गति निश्चित कर दी जाय, उसका नियम पूर्वक व्यवहार किया जाय, तो बाँधी हुई नदी की तरह वह सुखप्रद बन जाता है।
अर्थ शास्त्री धन की गति के नियन्त्रण के नियम को एकदम भूल जाते हैं। उनका शास्त्र केवल धन प्राप्त करने का शास्त्र है, परन्तु तो अनेक प्रकार से प्राप्त किया जा सकता है। एक जमाना ऐसा था जब यूरोप में धनिक को विष देकर लोग उसके धन से स्वयं धनी बन जाते थे। आजकल गरीब लोगों के लिए जो खाद्य पदार्थ तैयार किए जाते हैं उनमें व्यापारी लोग मिलावट कर देते हैं। जैसे दूध में सुहागा, आटे में आलू, कहवे में ‘चीकरी’, मक्खन में चरबी इत्यादि। यह भी विष देकर धनवान होने के समान ही है। क्या इसे हम धनवान होने की कला या विज्ञान कह सकते हैं?
न्याय का रास्ता ही सच्चा
परन्तु यह न समझ लेना चाहिये कि अर्थशास्त्री निरा लूट से ही धनी होने की बात कहते हैं। उनकी ओर से यह कहना ठीक होगा कि उनका शास्त्र कानून-संगत और न्याय-युक्त उपायों से धनवान होने का है। पर इस जमाने में यह भी होता है कि अनेक बातें जायज होते हुए भी न्यायबुद्धि से विपरीत होती हैं। इसलिए न्यायपूर्वक धन अर्जन करना ही सच्चा रास्ता कहा जा सकता हैं। और यदि न्याय से ही पैसा कमाने की ही बात ठीक हो तो न्याय-अन्याय का विवेक उत्पन्न करना मनुष्य का पहला काम होना चाहिये। केवल लेन-देन के व्यावसायिक नियम से काम लेना या व्यापार करना काफी नहीं है। यह तो मछलियाँ, भेड़िये, और चूहे भी करते हैं। बड़ी मछली छोटी को खा जाती है, चूहा छोटे जीव-जन्तुओं को खा जाता हैं और भेड़िया आदमी को खा डालता है। उनका यही नियम है, उन्हें दूसरा कोई ज्ञान नहीं है, परन्तु ईश्वर ने मनुष्य को समझ दी है, न्याय-बुद्धि दी है। उसके द्वारा दूसरों को भक्षण कर उन्हें ठगकर उन्हें भिखारी बनाकर इसे धनवान न होना चाहिये।
धन साधनमात्र है और उससे सुख तथा दुःख दोनों ही हो सकते हैं। यदि वह अच्छे मनुष्य के हाथ में पड़ता है तो उसकी बदौलत खेती होती हैं और अन्न पैदा होता है, किसान निर्दोष मजदूरी करके सन्तोष पाते हैं और राष्ट्र सुखी होता है। खराब मनुष्य के हाथ में धन पड़ने से उससे (मान लीजिये कि) गोले बारूद बनते हैं और लोगों का सर्वनाश होता है। गोला बारूद बनाने वाला राष्ट्र और जिस पर इनका प्रयोग होता है वे दोनों हानि उठाते और दुःख पाते हैं।
इस तरह हम देख सकते हैं कि सच्चा आदमी ही धन है। जिस राष्ट्र में नीति है वह धन सम्पन्न है। यह जमाना भोग-विलास का नहीं है। हर एक आदमी को जितनी मेहनत-मजदूरी हो सके उतनी करनी चाहिये।
सोना-चाँदी एकत्र हो जाने से कुछ राज्य मिल नहीं जाता। यह स्मरण रखना चाहिये कि पश्चिम में सुधार हुए अभी सौ ही वर्ष हुए हैं। बल्कि सच पूछिये तो पचास ही कहे जाने चाहिए। इतने ही दिनों में पश्चिम की जनता वर्णसंकर सी होती दिखाई देने लगी है।
यूरोप के राष्ट्र एक दूसरे पर घात लगाए बैठे हैं। केवल अपनी तैयारी में लगे होने के ही कारण सब शान्त हैं। किसी समय जब जोरों की आग लगेगी तब यूरोप में नरक ही दिखाई देगा। यूरोप का प्रत्येक राज्य काले आदमियों को अपना भक्ष्य मान बैठा है। जहाँ केवल धन का ही लोभ है वहाँ कुछ और हो ही कैसे सकता है? उन्हें यदि एक भी देश दिखाई देता है तो वह उसी तरह उस पर टूट पड़ते हैं जिस तरह चील और कौवे माँस पर टूटते हैं। इस प्रकार सब उनके कारखानों के ही कारण होता है, वह मानने के लिए हमारे पास कारण हैं।
व्यापारी का काम भी जनता कि लिए जरूरी है, पर हमने मान लिया है कि उसका उद्देश्य केवल अपना घर भरना है। कानून भी इसी दृष्टि से बनाये जाते हैं कि व्यापारी झपाटे के साथ धन बटोर सके। चाल भी ऐसी ही पड़ गई है कि ग्राहक कम से कम दाम दे ओर व्यापारी जहाँ तक हो सके अधिक माँगे और ले। लोगों ने खुद ही व्यापार में ऐसी आदत डाली और अब उसे उसकी बेईमानी के कारण नीची निगाह से देखते हैं। इस प्रथा को बदलने की जरूरत है। वह कोई नियम नहीं हो गया है कि व्यापारी को अपना स्वार्थ की साधना-धन ही बटोरना-चाहिए। इस तरह के व्यापार को व्यापार कहकर चोरी कहेंगे। जिस तरह सिपाही राज्य के सुख के लिए जान देता है उसी तरह व्यापारी को जनता के सुख के लिए धन गँवा देना चाहिए, प्राण भी दे देना चाहिए। सिपाही का काम जनता की रक्षा करना है, धर्मोपदेशक का उसको शिक्षा देना है। चिकित्सक का उसे स्वस्थ रखना है, और व्यापारी का उसके लिए आवश्यक माल जुटाना है। इन सबका कर्त्तव्य समय पर अपने प्राण भी दे देना है।
(श्री नादेव जी शास्त्री, वेदतीर्थ)
अंग्रेजी में एक कहावत है-इतिहासों की पुनरावृत्ति होती रहती है अर्थात् इतिहासों के दृष्टान्त पुनः पुनः समय-समय पर जगत के सम्मुख किसी न किसी रूप में आकर जनसमुदाय, जनपद, राष्ट्र, देश संसार को कुछ स्मरण दिला जाते हैं, कुछ सचेत कर जाते हैं, कुछ सिखा जाते हैं। इसी दृष्टि से संसार के इतिहासों का महत्व है, फिर चाहे ऐसे इतिहास वंश-परम्परा से, राष्ट्र-परम्परा से, कर्णोपकर्णिका से आये हों, अथवा इतिहास के पन्नों में श्वेत पत्रों पर कृष्णाक्षरों में लिखे गये हों। यद्यपि सब इतिहास भिन्न-भिन्न वर्णों वाले कागजों पर कृष्णमसी से ही लिखे गये हैं, मुद्रित हुए हैं, पर उन कृष्णाक्षरों में लिखे गये वाक्य स्वर्णाक्षरों का मूल्य रखते हैं। किसी-किसी इतिहास में लिखे गये वाक्यों का तो मूल्य लगाना ही कठिन है। समस्त पृथ्वी भी मूल्य में दी जाय तो भी उन वाक्यों का, उन वाक्यों में उपवर्णित गम्भीर सत्य तत्वों का संसार में क्या कोई मूल्य दे सकता है। इसी दृष्टि से इतिहासों का महत्व है।
आजकल के लोग कहते हैं कि पुराने लोग इतिहास के महत्व को जानते न थे, पर यह उनकी भूल है। छान्दोग्य उपनिषद् में इतिहास को एक विशेष विद्या में माना गया है और हमारे ऋषि−मुनि जब कभी दृष्टि का समय आता है तब ‘इति-ह-आस’ (ऐसा निश्चय से था) ‘इति-ह-ऊचुः-वृद्धाः’ (ऐसे बड़े बूढ़े कह गए) ऐसे वाक्यों से ही प्रारम्भ करते देखे गए। किसी घटना का स्थान, तारीख, सन्, उस घटना से सम्बद्ध महापुरुष अथवा विशिष्ट पुरुषों का नाम-धाम, उनके जीवन का विशेष बातें इत्यादि का उल्लेख इतिहास में आना ठीक है, पर असली तत्व देखना चाहिये, ये तो ऊपर-ऊपर के छिलके हैं। असली तत्व तो वह सत्य है, जो उन बातों से प्रकाशित होता है और संसार में मार्गदर्शक का काम देता है। आजकल स्कूलों-कालेजों में जो इतिहास रटाया जाता है, वह तो छात्रों के विनाश मात्र का कारण है, वह सुसंस्कृति के विनाश का कारण है। हमारे इतिहास-पुराण जैसे भी हैं, जिस रूप में भी मिले रहे हैं, चाहे उनमें कथा-गाथा की भले ही भरमार हो, पर सब में एक बात पर जोर है। वह यह कि ‘यतो धर्मः ततो जयः’-जिधर धर्म रहा है, रहेगा, उधर ही जय होगी, ‘सत्यमेव जयते नानृतम’-जिधर सत्य होगा, अधिक सत्य होगा, रहा है, उधर ही जय रही है और रहेगी। यदि इतिहास इस बात को नहीं दिखाता तो फिर उस इतिहास का लाभ ही क्या? फिर वह इतिहास ही क्या? हमारा इतना बड़ा महाभारत किन्तु चार श्लोकों में उसका सुन्दर तत्व आ जाता है। वे चार श्लोक ये हैं-
माता पितृ सहस्त्राणि पुत्रदार शतानि च। संसारेष्वभूतानि यान्ति यास्यन्ति चापरे॥
संसार में सैंकड़ों बार आये गये, सैकड़ों बार पुत्र-स्त्री, इष्ट-मित्र, बन्धु-बान्धवों का संपर्क हुआ, ऐसे ने जाने कितनी बार हुआ और कितनी बार होगा, कोई ठिकाना नहीं है।
शोकस्थानसहसत्राणि दुःखस्थानशतानि च। दिवसेदिवसे मूढ़म् आविशन्ति न पण्डितम्॥
संसार में शोक के अवसर सहस्रों बार आते और जाते हैं, दुःख के प्रसंग सैकड़ों बार आते और जाते हैं, पर तत्वदर्शी पण्डित संसार के तत्व पर दृष्टि रखकर घबराता नहीं, मूर्ख ही घबराते रहते हैं।
न जातु कामान्न ययान्न लोभाद् धर्म त्यजेज्जी वितस्यापि हेतोः। धर्मो नित्यो हेतुरष्य त्वनित्यः जीवो नित्यो सुखदुखे त्वनित्ये॥
किसी इच्छा, लोभ, भय से मनुष्य को कभी धर्म नहीं छोड़ बैठना चाहिये, कभी कर्त्तव्य से परामुख नहीं होना चाहिये। धर्म नित्य है, सदैव साथ देने वाला है, पर वह जिससे बनता है वह साधन-सामग्री अनित्य वस्तु है। जीव नित्य है, पर उसके साथ समय-समय पर चिपटते रहने वाले सुख-दुःख अनित्य हैं, इसलिये घबराते क्यों हो, कर्त्तव्य-पथ पर अड़े रहो-इतना कह कर अन्त में सौति ऋषि कहते हैं-
ऊर्ध्व बाहुर्विरौम्येष न च कश्चिच्छृणोति मे। धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते॥
कैसा उलटा जमाना आया, मैं ऊपर हाथ उठा उठाकर चिल्ला रहा हूँ, कोई सुनता ही नहीं! लोगों! धर्म से ही तुम्हें अर्थ मिलेगा, राज्य मिलेगा, साँसारिक ऐश्वर्य मिलेगा। तुम धर्म पर ही क्यों नहीं आरुढ़ रहते?
बस महाभारत, इतिहास, पुराण में इसी सत्य पर बल देने के लिये इतना विस्तार किया गया है और यह सत्य त्रिकालावाधित सत्य है। प्राचीन समय के समस्त इतिहासों का यही सार है, जो अब भी संसार के राष्ट्रों की दशा पर चरितार्थ हो रहा है। अर्वाचीन राष्ट्रों के इतिहास भी हमको कई तत्व सिखलाते हैं। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’- इसी तत्व को छान्दोग्य उपनिषद् में लिखा है।
‘शत ज्ञानिनामेको वली कम्पयते’
इन शब्दों में कहा है अर्थात् एक डण्डे वाला सौ कोरे ज्ञानियों को कँपा देता है। यह सत्य है, पर तात्कालिक सत्य है, पारमार्थिक सत्य नहीं। केवल भौतिक बल पर भरोसा रखने वाले और देवों को समय-समय पर परास्त करने वाले असुर आखिर देवों से हारे ही। प्राचीन इतिहास पुराणों में उपवर्णित देवासुर-संग्रामों के अन्त में देवों की, सात्विक वृत्ति वालों की विजय हुई है। अब भी संसार में देवासुर-संग्राम बराबर चल रहे हैं। दीखने को दीख रहा है कि असुर देवों को नचा रहे हैं, दबोचे जा रहे हैं, खाये जा रहे हैं, पर पारमार्थिक सत्य की फिर भी जय होगी। फिर यह भी बात ध्यान रखने की है कि देवों में जब स्वार्थ आने लगता है, तभी वे हारने लगते हैं, नहीं तो वे त्रिकाल में भी हार नहीं सकते। असुर सदा देवों के छिद्र देखते रहते हैं और उसी स्थान में हरा देते हैं। आजकल संसार के राष्ट्रों व महा राष्ट्रों में वही आसुरी प्रकृति घुसी हुई है और केवल भौतिक बल पर समझ बैठे हैं कि वे सदा संसार को मनमाना नाच नचाते रहेंगे, पर अन्त में देवों की ही विजय होती है और होगी। पारमार्थिक सत्य ही फिर उभरेगा और आसुरी वृत्ति वालों को पाठ पढ़ाएगा। आज संसार में यत्र-तत्र-सर्वत्र देव नीचा देख रहे हैं, दब रहे हैं, मानो अन्धकार प्रकाश को खाये जा रहा है, पर यदि संसार के देव स्वार्थरहित होकर एक साथ जुट कर आसुरी वृत्ति वालों पर आक्रमण करेंगे तो पुनः संसार सुख-शान्ति, ऋद्धि-सिद्धि-समृद्धि समानता के नाते बरतने लगेगा और संसार एक रहने का स्वर्गमय स्थान बनेगा। अब तो संसार, सब कुछ होते हुये कोरा नरक है-इतिहास यही कह रहा है।
(जापानी डॉक्टर श्री शोजाबुरो ओवेट)
प्राणायाम के वैज्ञानिक सिद्धान्त की व्याख्या, उसके प्रयोग सिद्ध परिणामों और उसकी रीतियों का वर्णन करने के पहले मैं यह बतला देना चाहता हूँ कि मैंने क्यों प्राणायाम करना आरम्भ किया।
पाँच वर्ष की अवस्था तक मैं खूब स्वस्थ रहा, किन्तु पाँचवें वर्ष, 1892 के मार्च में, मेरी बाँई जाँघ पर अचानक अस्थि शोध हो गया। नगर के एक चिकित्सक से सलाह ली गई, परन्तु वह रोग को नहीं पहचान सका। सूजन बुरी तरह बढ़ती गई, इससे मेरे पिता को बड़ी चिन्ता हुई। वे मुझे टोकियो के सतो के अस्पताल में ले गये। परन्तु उचित उपचार के लिये बहुत देर हो गई थी और मेरा शरीर बहुत कृश हो चला था।
जब मुझे इस अस्पताल में एक महीना हो गया तब बैरन सतो ने मेरे माता-पिता को सम्मति दी कि मुझे वायु-परिवर्तन के लिये निक्कों भेज दे। जब मैं निक्कों में था तो रुग्ण भाग पकने लगा। इसलिये एक सर्जन ने चीर-फाड़ की। इस छोटे से ऑपरेशन के बाद पीड़ा प्रायः भाग गई और साधारणतः मेरा स्वास्थ्य कुछ अच्छा हो गया। किन्तु पूरी चिकित्सा के लिये मैं अभी बहुत निर्बल था।
जब मैं बारह वर्ष का हुआ तो एक प्रसिद्ध शल्य चिकित्सक डॉक्टर हतनों ने मेरी जाँच की। रोग का पूरी तरह निदान कर लेने पर उन्होंने शल्यचिकित्सा (चीर-फाड़) के लिये उस अवसर को ठीक उपयुक्त बतलाया। उसी वर्ष, मार्च में मैं मितो में उनके अस्पताल में भरती हो गया। वहाँ मेरी बाँई जाँघ पर कठिन ऑपरेशन किया गया और बेकाम हड्डी के तीन टुकड़े निकाले गये। यह चीर-फाड़ सफल सिद्ध हुई। उसी वर्ष नवम्बर में मैं सात वर्ष की लम्बी बीमारी से प्रायः आरोग्य हो गया। मेरे माता-पिता के हर्ष का ठिकाना न रहा।
इस प्रकार पाँचवे और सातवें वर्ष के बीच जिस समय बालकों की शारीरिक वृद्धि होती है, मैं रोग के कारण खाट ही पकड़े रहा और यदि डॉक्टर हतनों ने कुशल शल्य-प्रयोग न किया होता तो मैं लँगड़ा हो गया होता और सम्भव है कि मर भी गया होता। आजकल भी कई लोग इसी रोग के कारण या तो लूले हो जाते हैं या मर जाते हैं।
ऑपरेशन हुए अभी केवल पाँच महीने हुये थे, इसलिये मेरा चेहरा इतना पीला और शरीर इतना दुबला था कि हर कोई मुझे क्षयी-बालक समझता था। पाठशाला के वैद्य ने मेरी जाँच करके कहा, तुम्हारे फेफड़े बलवान नहीं है, तुम्हें उनकी परवाह करनी चाहिये। डाक्टरी जाँच से पता चला कि मेरी छाती अपने दर्जे में सबसे ज्यादा सिकुड़ी हुई थी और फेफड़े को फुलाने और संकुचित करने से छाती की चौड़ाई में केवल 18 इंच का अन्तर होता था।
डॉक्टर ने मेरे छोटे से हृदय को बड़ा उत्साहित किया। उस समय मेरे नगर में क्षय से बहुत लोग मर रहे थे और मुझे विश्वास हो गया था कि यक्ष्मा संसार में सबसे भयंकर रोग है। यक्ष्मा का प्रतिबन्ध क्यों नहीं किया जा सकता? फुफ्फुस को बलिष्ठ बनाने का सबसे अच्छा उपाय क्या है? ये प्रश्न मुझे हमेशा चिन्ता में डाले रखते थे।
इसके बाद शीघ्र ही मुझे प्रकृति-विज्ञान सम्बन्धी एक व्याख्यान सुनने का अवसर मिला। उससे मुझे पता लगा कि जैसे आग हवा की सहायता से जलती है उसी तरह शरीर का ताप भी ऑक्सीजन की खपत और शरीर की तथा उसके सब जन्तुओं की पुष्टि पर निर्भर है। तब मेरे मन में विचार आया कि अगर फेफड़े इतने मजबूत हों कि काफी ऑक्सीजन खींच सकें तो क्षय के कीड़े फेफड़ों में प्रवेश कर लेने पर भी ऑक्सीजन से जल जायं। जैसे उचित व्यायाम से शरीर बलवान बनता है उसी प्रकार उपयुक्त व्यायाम से फेफड़े भी बलवान बनाये जा सकते हैं। और फेफड़ों का व्यायाम प्राणायाम मात्र हैं। इस अन्वेषण ने मेरे मन को शान्त किया और यही मेरे प्राणायाम को आरम्भ करने का कारण है।
व्याख्यान समाप्त होते ही मैं अपने डेरे पर लौट आया और देहात की पवित्र वायु में प्राणायाम का अभ्यास करने लगा। यह 24 मई 1900 की बात है। तबसे मैं प्रतिदिन प्रातःकाल पाठशाला को जाते हुये खेलते हुये, चलते हुये और सोने से पहले दृढ़ता से प्राणायाम करने लगा। केवल जागते हुए ही नहीं, स्वप्नों तक में मैंने प्राणायाम किया। और अब तक मुझे कई अवसर याद हैं जब बिस्तरे पर से जगकर मैंने अपने आपको प्राणायाम करते हुए पाया।
इस समय से मेरे शरीर में खूब उन्नति होने लगी। एक ही वर्ष में फेफड़ों को फुलाने और सिकोड़ने से मेरी छाती की चौड़ाई में लगभग 4 इंच का अन्तर हो गया और ऊँचाई में मैं चार इंच बढ़ गया। अब मैंने डॉक्टर से पूछा कि, क्या मरे फेफड़े यक्ष्मा के शिकार तो न होंगे? उसने उत्तर दिया, तुम्हारी बड़ी तगड़ी छाती है, क्षय का तुम्हारे लिये सवाल ही नहीं उठ सकता। मैं प्रसन्नता से फूला न समाया। इस प्रकार मैंने अपनी ही इच्छा से प्राणायाम करना आरम्भ किया था, किसी वैद्यक ज्ञान के कारण नहीं। मुझे दृढ़ विश्वास हो गया था कि प्राणायाम से शरीर बलवान होता है और यक्ष्मा का प्रतिबन्ध होता है। इसी विश्वास से मैं अपने माता-पिता और बन्धु-बान्धओं को प्राणायाम करने की सम्मति देने लगा। अपने विश्वास के कारणों का जब कभी मैं स्मरण करता हूँ तो मुझे मालूम होता है कि यद्यपि वे बहुत साधारण थे तो भी आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों के अनुसार सर्वथा अशुद्ध नहीं थे।
अपने तेरहवें और पन्द्रहवें वर्ष के बीच मैं आजकल से भी अधिक समय तक प्राणायाम किया करता था, कभी-कभी तो मैं चार या पाँच घण्टे प्रतिदिन प्राणायाम करता था। बहुधा लोग मुझसे पूछते हैं कि युवकों के लिये और विशेषकर बालकों के लिये प्रतिदिन तीन-चार घण्टे प्राणायाम करना हानिकारक तो नहीं है? ये सन्देह कल्पित हैं, अनुभव इनका आधार नहीं है। स्वयं अपने अनुभव से मेरा विश्वास है कि कई घण्टों तक प्रतिदिन प्राणायाम करना बहुत लाभदायक है।
अध्यापक फुतकी ने उदरगत-श्वासक्रिया (प्राणायाम की एक विधि) का अभ्यास करना उसी समय आरम्भ कर दिया था जब वे हाई स्कूल में विद्यार्थी थे। इससे उनका निर्बल शरीर बलिष्ठ हो गया। जिन दिनों वे प्राणायाम को अधिक दृढ़ता और उत्साह के साथ किया करते थे उन दिनों उन्होंने 36 मील की एक दौड़ में भाग लिया और उसे जीत लिया, यद्यपि इस दौड़ में भाग लेने वाले कई प्रतियोगी ऐसे भी थे जो उनसे अधिक बलवान दिखाई देते थे, इस प्रकार उन्होंने सिद्ध कर दिया कि उनके फुफ्फुस और हृदय भी उतने ही बलवान हैं जितने उनके और अवयव। यदि केवल उनके अवयव ही बलिष्ठ होते और फेफड़े और हृदय निर्बल होते तो वे अवश्य ही दौड़ में जीत नहीं सकते थे।
एक रोचक घटना सुनिए। अप्रैल 1903 की बात है, अभी मैंने पहले-पहल लोगों को प्राणायाम करने की सम्मति देना आरम्भ किया था। मेरे पिता के कारखाने में कजूसो किमुरा नामक एक मजूर काम करता था। उसकी माता और उसके दो भाई यक्ष्मा से मौत के मुख में जा चुके थे और उसके पिता की मृत्यु स्वरयन्त्र के क्षय से हुई थी। इस प्रकार क्षय की ओर उसकी पैतृक प्रवृत्ति थी, और उसके शरीर की गठन भी निर्बल थी। वह इतना पीला और इतना दुबला पतला था कि हर किसी का यही विश्वास था कि वह क्षय का शिकार हो चुका है। निर्बल वह इतना था कि उससे 28 सेर वजन का लोहे का डण्डा भी न उठता था। काम से वह अक्सर गैरहाजिर रहता था। कुछ समय से वह औषधों का भी उपयोग कर रहा था पर उससे लाभ कुछ भी नहीं हो रहा था। उसने मुझसे पूछा कि मैं बलिष्ठ कैसे हों सकता हूँ। उस समय अवस्था तो मेरी सोलह वर्ष की ही थी पर प्राणायाम पर मेरा विश्वास दृढ़मूलक था। मैंने उससे कहा-जो मेरे कहने के अनुसार काम करोगे तो तुम्हें जुलाई से पहले ही अपना खोया हुआ बल प्राप्त हो जाय।
(1) प्रतिदिन प्रातःकाल 6 बजे उठो, सारे शरीर पर शीतवर्षण के बाद खुली खिड़की के सामने दस-पन्द्रह मिनट तक प्राणायाम करो, उसके बाद बीस मिनट तक खेतों (खुली हवा) में टहलो, तब जलपान करो।
(2) एक दिन में तीन बार भोजन करो, और बीच में कुछ न खाओ।
(3) दिन ढले दस से पन्द्रह मिनट तक प्राणायाम करो।
(4) सोने के पहले शीत-घर्षण के बाद फिर दस से पन्द्रह मिनट तक प्राणायाम करो।
दस दिन तक प्राणायाम करने के बाद उसे तन-मन दोनों से शान्ति का अनुभव होने लगा। उसके स्वास्थ्य में लगातार उन्नति होती गई और अब वह सदैव कहा करता है कि मेरा स्वास्थ्य प्राणायाम का ही शुभ परिणाम है। जब तक जीवन रहेगा तब तक मैं उसका अभ्यास करता रहूँगा।
उस समय से मैं अपने पिता के कारखाने के सब मजूरों को प्राणायाम करने की सम्मति देने लगा।
अब मैं हाल की कुछ थोड़ी सी घटनाओं का वर्णन करता हूँ।
एक कारखाने का एक साझीदार दस वर्ष से आमाशय और अन्तड़ियों के जीर्ण रोग से पीड़ित था। उस समय उसकी उम्र 27 वर्ष की थी। मैंने उसे मार्च 1912 में प्राणायाम करने की सम्मति दी और उसी वर्ष जुलाई में उसके रोग का निवारण हो गया।
एक सरकारी पदाधिकारी, जिसकी अवस्था 21 वर्ष की थी, तीन वर्ष से नाड़ी-दौर्बल्य और कोष्ठबद्धता से पीड़ित था। स्नायविक विकार और पेट की पीड़ा के कारण रात को उसे नींद नहीं आती थी, दिन में उसे सिर दर्द रहता था, उसकी भूख लोप हो गई थी और दिन-दिन वह दुर्बल होता जा रहा था। मार्च 1912 में मैंने उसकी पहली बार जाँच की और उसे प्राणायाम का अभ्यास करने की सलाह दी। छः महीने के बाद वह इन कष्टसाध्य रोगों से मुक्त हो गया, और अब तो उसके रोग के सब लक्षण तिरोहित हो गये हैं और अपने काम में उसे आनन्द मिलता है।
अब तक मैंने यक्ष्मा के बहुत से रोगियों को प्राणायाम करने की सम्मति दी है और प्रत्येक दशा में फल भी उत्तम रहे हैं।
मैंने यक्ष्मा के प्रतिशोध के लिए प्राणायाम करना आरम्भ किया था, अपने ऊपर उसके आरोग्यप्रद प्रभावों और अपने किये कई प्रयोगों से मुझे विश्वास है कि यदि स्वस्थ मनुष्य प्रतिदिन बीस मिनट प्राणायाम करे तो उसे कभी यक्ष्मा न होगा।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
मेरे मित्र बोले, “बम्बई में खाने का खर्च तो अधिक नहीं पर प्रो. साहब चाय दिन में चार बार और एक पैकिट सिगरेट अवश्य चाहिए। अपने से तो इन जरूरी चीजों के बिना तो नहीं रहा जाता। हमें पान न दीजिए, सोडा लैमन या आइसक्रीम के बिना काम चला लेंगे किन्तु सिगरेट और चाय तो नितान्त आवश्यक समझिए।’
एक दूसरे महोदय प्रायः कहा करते हैं, “घर में चाहे बिना साग तरकारी के काम चला लें, पर कपड़ा सलीके का ही चाहिए। धुला हुआ, इस्तरी से सही क्रीज के। इसके बिना हमें बड़ी कमजोरी मालूम होती है। भाई साहब, आपके पेट के अन्दर क्या जा रहा है? आप क्या खाते पीते हैं? घर में कैसे रहते हैं? ये बातें कौन देखता हैं। आदमी अपने कपड़ों से ही जाना जाता है।”
ऊपर मैंने दो दृष्टिकोण उद्धृत किये हैं। ये ऐसे उदाहरण हैं जो अपनी आवश्यकताओं की वजह से परेशान हैं। हमारे समाज में आपको इस प्रकार के अनेक व्यक्ति मिलेंगे जो किसी न किसी अपव्यय में फँसे हैं। कोई सिनेमा के जंजाल में है तो कोई, अच्छे वस्त्र आभूषण इत्यादि पहिन कर मिथ्या अभिनय में फँसे हुए अपनी आय को कोस रहे हैं। कहीं औरतें आभूषणों या नये फैशन के कपड़ों के लिए फरमाइश कर रहीं हैं, तो कही पतिदेव क्लब में होने वाले मनोरंजनों के माया जाल में व्यस्त हैं। झूठा कृत्रिम आवश्यकताओं के माया जाल में ये लोग परेशान हैं।
आवश्यकताएँ हमारे स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार घटती बढ़ती रहती हैं। रबर की तरह उन्हें जब चाहे बढ़ा लीजिए, जब चाहे स्वभाव पर कठोर नियंत्रण कर उन्हें कम कर लीजिए। जितनी अधिक आवश्यकताएं, उनकी पूर्ति के लिए उतना की कठिन श्रम, भाग दौड़ जीवन संघर्ष। अपूर्ण रहने पर उसी अनुपात में मानसिक कष्ट और वेदना।
प्रत्येक आवश्यकता के साथ आपका आन्तरिक आनन्द संयुक्त है। सावधान रहिए कि जिन आवश्यकताओं के लिए आप सर खप कर एड़ी चोटी एक कर रहे हैं, वे वास्तविक हैं या विलास विषयक।
मेरे रूप से आपकी आवश्यकताएं तीन प्रकार की हैं- 1. जीवन यापन के लिए जरूरी 2. सुख विषयक 3. विलास विषयक। प्रथम वर्ग की आवश्यकताएं पूर्ण कर अधिक से अधिक सन्तोष हो सकता है। वर्ग 2. और वर्ग 3 की अन्तिम सीमा का कोई ठिकाना नहीं।
प्राचीन भारतीय ऋषि मुनियों ने आवश्यकताओं में भेद नैतिक आधार पर किया था। उन्होंने मानव के लिए उन्हीं आवश्यकताओं की योजनाओं रची थी, जो सरल सादा जीवन और उच्च विचारों की पोषक थीं। सुख और विलास को उन्होंने मानव की शक्तियों को कुण्ठित करने वाला माना था।
भौतिक सभ्यताओं के युगों में मनुष्य ने सुख और विलास की आवश्यकताओं को बढ़ाया, अपूर्ण होने पर मन में विक्षोभ एवं मानसिक कष्टों, अभावों की भट्टी में जलते रहें।
जीवन विषयक आवश्यकताएँ क्या हैं? हम आवश्यक, सुख, विषयक, एवं विलास की आवश्यकताओं में विवेक किस प्रकार करें? आइये, इस प्रश्न पर विचार करें।
जीवन-रक्षक आवश्यकताएँ वे हैं, जिनके बिना मनुष्य जीवित नहीं हर सकता। पौष्टिक भोजन, वायुमय मकान, साधारण वस्त्र, रोगोपचार की सुविधाएँ तथा शिक्षा- ये ऐसी मौलिक आवश्यकताएँ हैं, जो जीवधारण के अतिरिक्त मनुष्य की शारीरिक, मानसिक तथा शैल्पिक शक्तियों का विकास करती हैं। प्रत्येक व्यक्ति को इनकी पूर्ति का प्रथम प्रयत्न करना चाहिए।
इनके पश्चात् उन आवश्यकताओं को पूर्ण कीजिए जो आपके सामाजिक यश प्रतिष्ठा के लिए जरूरी हैं और जिसके लिए आपको कभी-2 अपनी जीवन विषयक आवश्यकताओं से विमुख होना पड़ता है।
यहाँ तक आप अपने आपसे उदारता का व्यवहार कर सकते हैं किन्तु आगे का मार्ग बड़ी जागरुकता एवं सावधानी का है। आनन्द एवं विलास के क्षेत्र अनन्त हैं। आज के मानव की चिन्ता का कारण ये ही वर्ग है।
विलास एवं आनन्द का वर्ग बड़ा लम्बा हैं। इसमें बढ़िया-बढ़िया वस्त्र, आलीशान मकान, गहने मनोरंजन के कीमती साधन, मिष्ठान्न और ऊँचे प्रकार के भोजन, मोटर, सिनेमा, क्लब का जीवन, मादक पदार्थों का सेवन, दान दहेज की अधिकता, बहुमूल्य वाहन, कलात्मक वस्तुओं का खरीदना सम्मिलित है।
अपने पेशे, स्तर और वातावरण को देखिए और फिर उपरोक्त आवश्यकताओं को कम करते जाइये। अपने सामाजिक जीवन, आर्थिक शक्ति, परिवार के सदस्यों की संख्या, स्थान एवं समय को देखिये।
जिस वस्तु को रखने की आप में क्षमता नहीं हैं और जो आपकी किसी स्थायी माँग की पूर्ति न कर केवल मिथ्या प्रदर्शन मात्र के लिए है, उसे त्याग दीजिए। जिन भोजनों से आपकी कार्य क्षमता नहीं बढ़ती, केवल व्यसन के रूप में साथ बँधे हुए हैं, उनसे तुरन्त दूर रहने लगिए। पान, सिगरेट, शराब, भाँग, चरस, बीड़ी, और इसी प्रकार के दूसरे व्यसन आपकी अज्ञानता के सूचक हैं। इनके पंजे में बँधे रहना महा मूर्खता है।
मानव को शान्ति तब प्राप्त होती है, जब वह कम से कम आवश्यकताओं का बोझ सर पर रखता है जिसे तनिक-तनिक सी वस्तुओं का मोह होता है, वह उनकी आपूर्ति पर निरन्तर विक्षुब्ध रहता है।
कम आवश्यकता वाला व्यक्ति अपनी शक्ति क्षुद्र कार्यों से बचाकर उच्चतर कार्यों में व्यय कर अपनी आत्मिक उन्नति कर सकता है। देह में वासना है, वासना से असंख्य इच्छायें और इच्छाओं से कष्ट उत्पन्न होता है। जैसे हाथी के बाहर निकले हुए दाँत फिर अन्दर नहीं जाते, वैसे ही एक बार बढ़ी हुई आवश्यकताएँ कम नहीं हो पाती। प्रत्येक आवश्यकता एक ऐसा महसूल है, जो चुकाना ही पड़ता है।
आज के जीवन में जो समस्याएं अत्यन्त पेचीदा हो रही हैं, जिनसे अन्तः करण में क्षोभ उत्पन्न होता है, वे बढ़ी हुई झूठी कृत्रिम आवश्यकताओं से ही उत्पन्न हुई हैं। हम स्वयं ही इनके जनक हैं।
देखिए, आपकी प्रवृत्ति किस ओर चल रही है-क्या आप निरन्तर एक के पश्चात दूसरी अन्धाधुन्ध आवश्यकताएं बढ़ाते चले जा रहे हैं? अनाप-सनाप व्यय कर, दूसरों से ऋण ले लेकर क्यों व्यर्थ ही बन्धनों में डाल रहे हैं? कहीं आप को मिथ्या प्रदर्शन, झूठी शान, जगत को अपना अतिरंजित स्वरूप दिखाने की तो आदत नहीं पड़ गई है? विलास, भोग, व्यभिचार अभक्ष्य वस्तुओं का पान करने की कुत्सित आदत में पड़ कर आपका चित्त चंचल तो नहीं रहता है? यदि आप इन शत्रुओं से मुक्त रहना चाहते हैं, तो अपनी आवश्यकताओं को एक-एक करके कम करते जाइये, आप सुखी रहेंगे।
हमारा सुख हमारी आवश्यकताओं के अनुपात में रहता है। अधिक आवश्यकताओं वाला व्यक्ति बड़ी कठिनता से सुख-समृद्धि प्राप्त करता है। कारण उसकी अंतिम आवश्यकता की पूर्ति होते-होते, सुख भोगने की शक्ति क्षीण हो जाती है प्रत्येक आवश्यकता एक मानसिक बन्धन है। जो इन बन्धनों में अधिक से अधिक बँधा है, उसके सुख में उतनी ही बाधाएं हैं।
अधिक आवश्यकता वाला व्यक्ति जिस मानसिक रोग से पीड़ित रहता है, वह है मन का वश में न रहना, अति चंचलता, अति स्वच्छन्दता और चित्त को वश में न कर सकना। यदि ये व्यक्ति कुछ चित्त-वृत्ति निरोध करें, तो बढ़ी हुई आवश्यकताओं से मुक्ति पा सकते हैं। मनुष्य मन की वृत्तियों को ढीली छोड़ कर चंचल, उन्मत्त और प्रचण्ड बना लेता है। कालान्तर में आदत बन जाने पर इनसे मुक्ति असंभव हो जाती है। व्यसन, फैशन, व्यभिचार आदि कुत्सित आदतों का प्रारम्भ बड़ा साधारण होता है, धीरे-धीरे व्यसन बढ़ते हैं अन्त में मनुष्य इन्हीं इन्द्रियों का दास हो जाता है।
इसी प्रकार यदि मनुष्य मन में दृढ़ता से यह प्रण कर ले कि मुझे मन की चंचलता, व्यर्थ के प्रलोभन इत्यादि से मुक्त रहना है तो वह मन की प्रलोभन वृत्ति निमन्त्रित कर सकता है।
जैसे अपने व्यसन का मायाजाल क्षीण आरंभ से किया था, वैसे ही शुभ भावना का प्रारम्भ कीजिए। शुभ का चिन्तन कीजिए, सद्विचार में लगे रहिए, व्यर्थ की कृत्रिम आवश्यकताओं को काटते जाइये, आप देखेंगे, आपका अंतर्द्वंद्व कम हो गया है, मन में अब दुःख की लहरे कम उठती हैं। अपनी पूर्णता की भावना, आत्म शक्ति की भावना अन्तर्मुखी निश्चयात्मा की भावना में दृढ़ता पूर्वक रमण करने से चित्तवृत्ति का निरोध होता है। मन में यह भावना जमाइये :-
आवश्यकताओं की पूर्ति सम्भव नहीं है। एक आवश्यकता पूर्ण होती है, तो चार और आकर खड़ी हो जाती हैं। इसकी पूर्ति पर बीस-पच्चीस नई जरूरतें मुँह फैला देती हैं। इस माया जाल में फँसने पर आवश्यकताओं का अन्त नहीं। अतः मैं व्यर्थ इन्हें कदापि न बढ़ने दूँगा।
मनुष्य को अपना महत्व समझ लेने दो फिर वह सब वस्तुओं को अपने पैरों के नीचे कर लेगा, अपने वश में कर लेगा।
-इमरसन
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राग के समान आग नहीं, द्वेष के समान भूत पिशाच नहीं, मोह के समान जाल नहीं, तृष्णा के समान नदी नहीं।
-महात्मा बुद्ध
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जो मनुष्य सुनकर, खाकर, देखकर छूकर न तो प्रसन्न होता है और न उदास होता है उसे जितेन्द्रिय मानना चाहिए।
-मनु स्मृति
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जहाँ पुरुष से स्त्री, और स्त्री से पुरुष सन्तुष्ट हो, उसी घर में निश्चित ही कल्याण का निवास होता है।
-मनु
(प्रो. लाल जी राम शुक्ल)
कोई राष्ट्र तभी तक सुदृढ़ रहता है जब तक उसके सम्बन्धी करण करने वाले व्यक्ति अपना कार्य भली प्रकार से करते हैं। जब राष्ट्र में उन लोगों की कमी हो जाती है जो समाज के एक व्यक्ति का सम्बन्ध दूसरे व्यक्ति से जोड़ते हैं तो समाज निर्बल और छिन्न-भिन्न हो जाता है। अपने व्यवसाय के विषय में चिन्ता करने वाले व्यक्ति चाहे वे किसी कार्य के करने में कितने ही कुशल क्यों न हों समाज और राष्ट्र को दृढ़ नहीं बनाते। ऐसे लोग समाज के उपयोगी व्यक्ति अवश्य हैं, वे समाज का धन बढ़ाते और समाज का भौतिक बल बढ़ाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर ऐसे लोगों की शक्ति को समाजोपयोगी कार्यों में लगाया जा सकता है। उनके कमाये हुए धन को समाज के काम में लाया जा सकता है, परन्तु ऐसे लोगों में स्वयं यह क्षमता नहीं होती कि वे अपनी आत्मा-स्फूर्ति से कोई सामाजिक कार्य कर सकें। जो लोग अपने ही लिए जीते हैं वे बाध्य होकर समाज की भलाई का काम करते हैं। ऐसा करने में उन्हें उस सन्तोष को अनुभूति नहीं होती जो सामाजिक भावों से भरे हुए व्यक्ति को समाज के कार्य करने से प्राप्त होता हैं। इसके कारण जब कभी ऐसे लोग अपने आप छोड़ दिये जाते हैं तो वे अपने सामाजिक कार्य को भी अपनी व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध का साधन बना लेते हैं। राष्ट्र में अनेक प्रकार के भ्रष्टाचार का यही कारण होता है। वर्तमान काल में जो हम भारतवर्ष में देशव्यापी भ्रष्टाचार देखते हैं उसका प्रधान कारण यहाँ है कि हमारे राष्ट्र में उन लोगों की कमी है जो राष्ट्रीयता के हेतुओं को लेकर किसी कार्य में हाथ डालते हैं। सामाजिकता के भावों की कमी के कारण ही हमारा देश सदियों गुलाम रहा और इन्हीं भावों की कमी के कारण अर्थात् राष्ट्र के लिए जीने वाले लोगों की कमी के कारण आज हमारे समाज में अनेक प्रकार के भ्रष्टाचार फैले हुए हैं। किसी भी राष्ट्र की स्वतन्त्रता की रक्षा के लिए वह आवश्यक है कि समाज में ऐसे लोगों की वृद्धि हो जो व्यक्तिगत स्वार्थ से प्रेरित होकर नहीं वरन् दूसरों की सुख-वृद्धि के हेतु अनेक प्रकार के कामों में हाथ डालते हैं।
राष्ट्र में इस प्रकार की सामाजिकता का विकास शिक्षा के द्वारा किया जा सकता है। शिक्षा एक ओर व्यक्ति के आर्थिक ओर पारिवारिक जीवन को सम्पूर्ण बनाती है और दूसरी और वह मनुष्य में सामाजिकता के भावों की वृद्धि करती है। यदि कोई शिक्षा प्रणाली केवल व्यक्ति की आर्थिक समस्याओं को हल करती है अथवा केवल व्यक्ति में चिन्ता की क्षमता बढ़ाती है तो हम ऐसी शिक्षा प्रणाली को सन्तोष जनक शिक्षा-प्रणाली नहीं कहेंगे। यदि व्यक्तिगत जीवन के सुखी बनाने के साधनों को उपस्थित करने वाली शिक्षा ही देश के बालकों और नवयुवकों को दी जावे तो ऐसे बालक कुछ समय के लिए धनी और समृद्धिशाली नागरिक बन जायेंगे, परन्तु सामाजिकता के भावों की कमी के कारण वे अपने वैभव को अधिक दिन तक स्थिर न रख सकेंगे। धनी लोगों में जब सामाजिकता के भावों का अभाव रहता है तो वे आपस में मिलकर निर्धन लोगों को लूटने की मनोवृत्ति से अपने आपकी रक्षा नहीं कर सकते। जिस प्रकार मोटी भेड़ें और बकरियाँ भूखे भेड़िया को ही अपनी उपस्थिति से ही निमन्त्रण देती हैं उसी प्रकार सामाजिकता के भावों से वंचित धनी लोग बाहर के लोगों को उन्हें लूट ले जाने का निमन्त्रण देते हैं।
हमारी आधुनिक शिक्षा-प्रणाली में बालकों को व्यक्तिगत सुखी जीवन व्यतीत करने के योग्य बनाने की ओर ही विशेष ध्यान दिया गया है। उनसे सामाजिक भावों की वृद्धि की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया। जो शिक्षा हमारे बालक बड़े से बड़े विद्यालयों में पाते हैं उससे वे यह सीख जाते हैं कि वे कैसे बड़े इंजीनियर, डॉक्टर कारीगर अथवा प्रोफेसर बन जायें परन्तु वह यह नहीं सीखते कि वे अपनी सभी योग्यताओं को किस प्रकार समाज को अर्पित करें। अपने काम का समाज के ऊपर क्या प्रभाव पड़ेगा इस विचार के अभाव में हमारे शिक्षित युवक समाज के सच्चे सेवक अथवा उसके पोषक बन कर समाज के शोषक डाकू अशिक्षित डाकू से अधिक घातक होता है उसी प्रकार हमारे सामान्य विद्यालयों की उच्च शिक्षा-प्राप्त किये हुए नवयुवक समाज की अशिक्षित लोगों की अपेक्षा हमारे समाज के लिए अधिक घातक बन जाते हैं। यदि हम उपस्थिति को बदलना चाहते हैं तो हमें अपनी शिक्षा-प्रणाली में सदा यह ध्यान में रखना होगा कि हम विद्यार्थी को न केवल व्यक्तिगत जीवन के लिए सुयोग्य बनावें वरन् उनमें उन सामाजिक भावों का भी विकास करें जिससे समाज दृढ़ और सुचारु रूप से संचालित हो।
मनुष्य स्वनिर्मित प्राणी
मनुष्य के कोई गुण जन्मजात नहीं होते ये अभ्यास द्वारा मनुष्य में आते हैं। यूरोप के प्रसिद्ध दार्शनिक काँट महाशय के इस कथन में मौलिक सत्य है कि मनुष्य स्वनिर्मित प्राणी है। इस कथन का अभिप्राय यही है कि मनुष्य चाहे तो अपने आपको स्वार्थी और निकम्मा व्यक्ति बना सकता है अथवा वह योग्य अभ्यास के द्वारा अपने आपको दैवी पुरुष बना सकता है। सामाजिकता के भावों वाला व्यक्ति दैवी पुरुष है और यह दैविकता मनुष्य में अभ्यास से आती है। संसार के सुयोग्य शिक्षालय उनके विद्यार्थियों द्वारा ऐसे अभ्यास को कराते हैं जिससे उनमें दैवी गुणों अर्थात् सामाजिक भावों का विकास हो। इन सामाजिकता के भावों के विकास के लिए राष्ट्र के शिक्षा महारथियों को सुयोग्य योजनाएँ बनानी पड़ती हैं। जो बालक जितनी ही अधिक आनन्द के साथ अपना समय बाल समाज में व्यतीत करता है उसके कामों में भाग लेता है, अपने साथियों के सुख-दुख के लिए अपने छोटे-छोटे स्वार्थों का त्याग करता है, अपने से बड़े बालकों के अनुशासनों को मानता है, अपने से छोटे साथियों की रक्षा के लिए सदा सचेष्ट रहता है उन्हें सुखी बनाने के लिये अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाता रहता है और समय पड़ने पर बाल। समाज के साहस के कार्यों में नेतृत्व भी करता है, वह बड़ा होने पर अपना जीवन स्वार्थ परायणता के व्यवसायों में व्यतीत नहीं करता। जब तक यह दूसरों के जीवन को सुखी न बनावे वह अपने जीवन को सारहीन मानता है ऐसा ही बालक गाँव का, परगने का, जिले, प्रान्त अथवा देश का अगुवा बनता है, वह समाज के साधारण लोगों को अपने आचरण से प्रभावित करता है और उन्हें सद्पथ पर चलने का निर्देश देता है।
विचारों का महत्व
मनुष्य के जीवन के विकास में उसके प्रतिदिन के विचार, भाव और क्रियाएँ बड़े महत्व का स्थान रखते हैं। बालक जो कुछ प्रतिदिन सुनता, समझता, बोलता और करता है। उससे उसका मन बनता है। बालक के आस-पास के वातावरण का प्रभाव उसके जीवन को विशेष ओर मोड़ने में भारी महत्व रखता है। बालक जैसे वातावरण में रहता है उसी प्रकार का उसका स्वभाव बन जाता है। पूँजीवादी विचारों के वातावरण में रहने वाला बालक स्वयं एक धनी व्यक्ति बनने में अपने जीवन की पूर्णता देखता है। इसी प्रकार जो बालक नित्यप्रति देश के परोपकारी समाज सेवकों के त्याग की कहानियाँ सुनता है। उनके दर्शन करता है, उनके उपदेशों को सुनता है वह अपने जीवन का आदर्श समाज सेवा और समाज के लिए अपना सर्वस्व करना बना लेता है। जब तक वह ऐसे कामों में नहीं लग जाता जिससे समाज का वास्तविक लाभ हो वह अपने आपमें आत्म सन्तोष की अनुभूति नहीं करता।
छोटे बालकों में सामाजिकता की वृद्धि उनके खेलों के द्वारा की जा सकती है। बालक खेल में ही बड़े महत्व के सामाजिक गुणों को प्राप्त करते हैं। बालक के खेल जितने ही अधिक सामाजिक हों उतना ही अच्छा है। खेल के कार्य में जो आनन्द की अनुभूति बालक को होती हैं वह खेल के समय के संस्कारों को स्थायी बना देती है और जब ये संस्कार सामाजिक क्रियाओं के होते हैं तो वे बालक के स्वभाव को सहज में ही समाज प्रेमी बना देते हैं। क्योंकि बिना समाज के खेल की क्रियाएँ सम्भव नहीं। जब इस प्रकार के खेल से संस्कार बालक के अचेतन मन में बैठ जाते हैं तो बालक स्वभावतः ही सामाजिक कार्यों में अपनी पूर्णता की खोज करने लगता है ऐसा व्यक्ति आगे चल कर सामाजिक नागरिक बनता है।
बालकों के द्वारा अभिनय करना, वाक् प्रतियोगिता में भाग लिवाना और समाज-सेवी लोगों की जयन्ती मनाना, उनमें सामाजिक भावों को दृढ़ करने के उपाय हैं। इनके अतिरिक्त बालकों के प्रतिदिन के आचरणों को देखना होगा कि वे कहाँ तक दूसरों के लाभ के लिए स्वार्थ का त्याग करते हैं और अपने आपको कठिन परिस्थिति में डालते हैं।
शिक्षक की योग्यता
बालकों को सामाजिक कार्य में प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक है कि स्वयं शिक्षक प्रबल सामाजिक भावों का व्यक्ति हो। पुराने समय में समाज की शिक्षा ऐसे ही लोगों के हाथ में होती थी जिसका व्यक्तिगत जीवन बिलकुल ही चिन्तारहित रहता था। जो अपनी लाभ-हानि की बातों को बहुत कम सोचा करते थे। और जो सदा परोपकार में ही अपना सच्चा कल्याण देखते थे। भारतवर्ष में समाज के शिक्षक भिक्षु, संन्यासी और ऐसे ब्राह्मण होते थे जिन्हें धन संचय की चिन्ता नहीं रहती थी। यूरोप में भी जनता के शिक्षक ईसाई, पादरी और भिक्षु होते थे। आधुनिक काल में संसार के सभी शिक्षालयों में ऐसे शिक्षकों का अभाव है। जब से विद्या प्राप्ति का प्रधान हेतु धनोपार्जन हो गया है तब से शिक्षकों की मनोवृत्ति शिक्षा के द्वारा धन कमाने की बन गई है। यही कारण है कि न केवल भारत में वरन् संसार के सभी देशों में सच्चे सामाजिक भावों की कमी पायी जाती है।
हम विश्वास करते हैं कि शिक्षा ही स्वयं उन साधनों को प्रस्तुत करेगी जिनसे विकृत शिक्षा के दोष हटेंगे और मनुष्य में उन सद्गुणों का आविर्भाव होगा जिससे मानव समाज सुखी और संपन्न बनेगा।
(श्री मोहनलाल वर्मा बी. ए. एल. एल. बी.)
लोकप्रिय मनुष्य के व्यक्तित्व में एक ऐसी गुप्त वस्तु है, जिसका फोटोग्राफर चित्र नहीं खींच सकता, चित्रकार अपनी तूलिका के द्वारा उसे चित्रपट पर अंकित नहीं कर सकता, मूर्तिकार अपनी छेनी से गढ़कर उसका निर्माण नहीं कर सकता। इस गुप्त भाव का हम अपने हृदय में अनुभव करते हैं, किन्तु कोई इसका वर्णन नहीं कर सकता, कोई जीव चरित्र लेखक शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकता। इसी गुप्त शक्ति से मनुष्य को जीवन तथा समाज में यह प्रतिष्ठा एवं नेतृत्व प्राप्त होता है।
जब हम श्री राधाकृष्णन, पं. जवाहरलाल नेहरू, श्रीमती सरोजनी नायडू इत्यादि भारतीय नर रत्नों तथा ब्लेन, लिंकन, रुजवेल्ट, चर्चिल इत्यादि यूरोपीय पुरुषों के विषय में सोचते हैं, तो हमें ज्ञात होता है कि उनमें कुछ ऐसी गुप्त मानसिक एवं चुम्बकीय शक्तियाँ थी और हैं, जिनका अलक्षित प्रभाव हम पर पड़े बिना नहीं रहता। कुछ ऐसे व्यक्ति हुए हैं, जिनकी महत्ता असंदिग्ध है, किन्तु वे जनता में उत्साह और अपने प्रति आदर उत्पन्न न कर सके, इनमें वह माननीय विद्युत न थी। मानवीय चुम्बक अनेक तत्वों का सम्मिश्रित योग है। इनमें व्यक्तिगत संपर्क, मिलनसारी, मस्तिष्क की शक्ति एवं शिक्षा के साथ-साथ अन्य भी अनेक तत्व सम्मिलित हैं। हम देखते हैं कि अनेक व्यक्ति साधारण योग्यता के होकर भी व्यक्तिगत दृष्टि से अनेक आकर्षण लेकर आते हैं। वे समाज में एक दूसरे से बातें करना जानते हैं, मिलनसार रहते हैं, और अपनी मानवीय विद्युत से अनायास ही दूसरों पर विजय प्राप्त कर लेते हैं।
इस मानवीय विद्युत का एक अच्छा उदाहरण एक कुशल वक्ता है, जो अपनी वकृत्व कला से अनायास ही श्रोताओं को वश में कर लेता है। अच्छे व्यक्तित्व में एक ऐसा जादू, एक मादक आकर्षण होता है, जो क्षण भर में हमें विमुख कर लेता है और हम उनकी बातें मान लेते हैं।
अच्छे व्यक्तित्व वाले व्यक्ति अपनी कुशाग्र बुद्धि विवेक के बल पर यह मालूम कर लेते हैं कि एक विशेष अवसर पर क्या, कैसे, क्योंकर कहना चाहिये? तात्कालिक बुद्धि और सामान्य ज्ञान वे गुण हैं, जिनकी अत्यधिक आवश्यकता है। सुसंस्कृत स्वभाव, परिष्कृत एवं परिपक्व रुचि का निरन्तर विकास होना अनिवार्य है। लोकप्रिय बनने के इच्छुक होकर आप दूसरों के दृष्टिकोण पर तुषारापात नहीं कर सकते। आपको समाज में रह कर लोकप्रियता प्राप्त करनी है। यह लोकप्रियता वह प्रसिद्धि है, जो आपको आपके बन्धु, मित्र, जान-पहिचान के व्यक्ति, समाज के अन्य सदस्य प्रदान करते हैं। आपको अपने अधिक से अधिक सम्बन्ध बढ़ाने और उन्हें निरन्तर बनाये रखना है। आपको समय-समय पर लेन-देन बनाये रखना चाहिये। ऐसे अधिक से अधिक अवसर निकालने चाहिये, जिनमें आप दूसरों को प्रसन्न कर सकें।
लोकप्रियता आपके ज्ञानवर्द्धन पर बहुत कुछ निर्भर है। आपका सामान्य ज्ञान, विशेषतः राजनीति और समाज शास्त्र-ये दोनों ऐसे विषय हैं, जिनका अच्छा ज्ञान होने पर ही आप समाज में आकर्षण होने का केन्द्र बन सकते हैं। अधिक से अधिक सामान्य ज्ञान संग्रह करें, समाचार पत्र पढ़ अपने ज्ञान को चिरनवीन रखें। ये ऐसे विषय हैं जिनसे आपकी यश प्रतिष्ठा का सम्बन्ध हैं। जो इन विषयों पर तथा सामयिक समस्याओं पर बातें कर सकता है, वह अवश्य लोकप्रियता प्राप्त करेगा।
डेल कार्नेगी ने लोकप्रियता प्राप्त करने के जो 6 नियम बनाये हैं, उन्हें स्मरण रखिये और दैनिक जीवन में प्रयुक्त कीजिए। उनके अनुसार आप 1.दूसरों के प्रति रुचि उत्पन्न करें, सहानुभूति को फैलाये, उनकी समस्याओं में दिलचस्पी उत्पन्न करें, 2. स्वाभाविक मुस्कान से सदैव दूसरों का स्वागत करें, 3. उनके नाम स्मरण करें दूसरों को उनके नाम से पुकारने से निकटता और आत्मीयता की अभिवृद्धि होती है। बातचीत के मध्य में कई बार उनके नाम का संकेत कीजिए, 4. अच्छे श्रोता बनिए और वक्ता के विचारों के प्रति हार्दिक सहानुभूति और प्रशंसा के भाव भी यदि श्रोता प्रकट करता चले और दूसरों को उनका दृष्टिकोण समझाने, कहने, बोलने की पूरी आजादी देता चले, तो वह सहज ही वक्ता के हृदय में वास कर लेता है। चार्ल्स डब्ल्यू. इलियट ने सत्य ही लिखा है- “सफल व्यवसायिक बातचीत का कोई रहस्य नहीं है जो व्यक्ति आपसे बात कर रहा है, उसकी बातों पर पूर्ण ध्यान देना ही महत्व की वस्तु है। बातचीत करने वाले व्यक्ति की भावनाओं और विचारों को गुदगुदाने का इससे अधिक सफल कोई दूसरा उपाय नहीं है।” जहाँ संभव हो दूसरों की प्रशंसा करें, अन्यथा सहानुभूति को प्रकट करते ही चलें।
कार्नेगी का एक नियम है कि आप स्वयं आकर्षित बनना चाहते हैं, तो स्वयं भी दूसरों के प्रति आकर्षित हूजिए। दूसरों से ऐसे प्रश्न कीजिए जिनके उत्तर देने में वे आनन्द का अनुभव करें। उन्हें अपने विषय में कहने को प्रोत्साहित कीजिए, उनकी हृदयस्थ भावनाओं को गुदगुदाइये। आपको लोग पसन्द करेंगे।
कार्नेगी ने पुनः पुनः इस बात पर ध्यान आकृष्ट किया है कि हम दूसरों के दृष्टिकोण से देखना सीखें, उन्हीं की रुचियों, दिलचस्पी की बातों के विषय में उनसे बातें करें। कार्नेगी कहते हैं- “दूसरों के हित की भाषा में बात करने से आप सहज ही दूसरों के हृदयों में स्थान बना सकते हैं। किसी मनुष्य के हृदय में प्रवेश करने का राजमार्ग उन बातों की चर्चा करता है, जिन्हें वह बहुत अधिक पसन्द करता है। अतः किसी व्यक्ति के विश्वास और प्रेम का पात्र बनाने के लिये आप यह जानने का प्रयत्न कीजिए कि किस विषय में उसकी विशेष अभिरुचि है और फिर उसी विषय में उससे बातें कीजिए। उसके विचारों को गुदगुदा कर आप सहज ही उसके साथ अपनी आत्मीयता स्थापित कर सकते हैं। लोगों की प्रवृत्तियों और अभिरुचियों को पहिचानने में आप को वर्षों लग सकते हैं।”
लोकप्रियता प्राप्त करने के लिए अधिक से अधिक व्यक्तियों से संपर्क स्थापित कीजिए अपने स्वार्थ का संकुचित दायरा छोड़कर उदारता, प्रेम तथा सहानुभूति का विस्तृत दायरा बनाइये। विनम्रता एक ऐसा गुण है, जिससे जनता आपके पास खिंचकर आती है। प्रत्येक से मित्रतापूर्ण व्यवहार करने से आप एक ऐसे दर्पण बन जाते है, जिनमें प्रत्येक व्यक्ति अपना प्रतिबिम्ब देखता है जितने अधिक व्यक्ति आपमें आत्मभाव पायेंगे, उतने आपके मधुर सम्बन्ध बढ़ते जायेंगे, उतने ही आप लोकप्रियता प्राप्त कर सकेंगे।
प्रत्येक व्यक्ति एक बन्द पुस्तक के अनुरूप है। आप इस मनुष्य रूपी पुस्तक का एक पृष्ठ उलटिए, आपको नवीन जानकारी प्राप्त होगी, कुछ नए-नए अनुभव तथा ज्ञानत्व तत्व प्राप्त हो जायेंगे। प्रत्येक व्यक्ति के अनुभवों से लाभ उठाने, कुछ सीखने-समझने, सहानुभूति, प्रश्न करने के लिए प्रस्तुत रहिए। प्रत्येक व्यक्ति मनोरंजन ज्ञान से परिपूर्ण है, हर एक के पास आपसे कुछ कहने, आपको कुछ प्रदान करने के लिए मौजूद है। यदि चतुर हैं, तो अपने काम की चीजों को आसानी से उनके मस्तिष्कों में से निकाल सकते हैं। यह रहस्य होंगे, जो आपके लिए सर्वथा नवीन और उपयोगी हैं, जीवन में कभी न कभी काम में आने वाले हैं। अतः अपने संपर्क में आने वाले किसी भी व्यक्ति का तिरस्कार मत कीजिए। उनसे ज्ञान आप किस प्रकार प्राप्त कर सकते हैं? इसका उत्तर है, स्वयं उन्हें अपनी समय और सहानुभूति देकर, उनकी व्यक्तिगत समस्याओं में दिलचस्पी लेकर, उनके हितैषी और मित्र बन कर। संसार के अनेक व्यक्ति आपको सहानुभूति का दान चाहते हैं, आपको अपने दुःख दर्द की कहानियाँ सुनाने के इच्छुक हैं। अपनी हिचक और मिथ्या बनावट, कृत्रिमता त्यागकर उनसे तादात्म्य का अनुभव कीजिए। व्यर्थ की लज्जा का परित्याग कर दीजिए। अधिक से अधिक व्यक्तियों से मिलिये, यथा संभव बोलिये, और उनके गर्व को संतुष्ट रखने में प्रयत्नशील रहिए।
सबसे मिलने, उनका दुःख दर्द सुनने वाला व्यक्ति प्रत्येक अनुभव को शिक्षादान देने वाला सन्देश समझ कर ग्रहण करता है। प्रत्येक आदमी प्रसन्न, मिलनसार व्यक्ति से संपर्क स्थापित रखने का इच्छुक होता है। जो व्यक्ति चुपचाप दबा दबा रहस्यपूर्ण सा रहता है, उस पर जनता का विश्वास नहीं होता। जिस व्यक्ति का हृदय आप पढ़ नहीं सके हैं, उसकी सत्यता और ईमानदारी पर आप कैसे विश्वास कर सकते हैं? जनता का ध्यान आकृष्ट करने वाले व्यक्ति प्रायः उदार और विशाल हृदय होते हैं। उन्हें स्वतः प्रेम करने को जी चाहता है, अनायास ही वे हमारा विश्वास प्राप्त कर सकते हैं। गोपनीयता घृणा उत्पन्न करती है, प्रेम आकृष्ट करता है। जो व्यक्ति बातों को बहुत छिपाने, चुगली करने का आदी होता है। उसे देखकर दूसरे व्यक्ति के हृदय में शक-शुबहा उत्पन्न होता है। गोपनीयता त्याग करने वाले, चुपचाप रहने वाले, दूसरों से न मिलने-बरतने वाले व्यक्ति कभी लोकप्रिय नहीं हो सकते। जो सदा आपको अपना हृदय खोलकर दिखा देता है, जिसके रगरेशे, उदारता और प्रेम से आप भलीभाँति परिचित हैं, वह अनायास हमारा प्रेम प्राप्त कर लेता है। अपनी त्रुटि पर वह क्षमा याचना को प्रस्तुत रहता है, हम उसे प्रसन्नतापूर्वक क्षमा कर देते हैं क्योंकि उसकी ईमानदारी और भलमनसाहत पर हमें पूर्ण विश्वास है। आप ईमानदार, प्रेममय, उदार बनें, लोकप्रियता प्राप्त होती जायेगी।
(श्रीमती प्रीतम देवी जी)
यह संसार हमारी भावनाओं का ही तो रूप है। हम जैसा स्वयं विचार करते हैं, जिन कल्पनाओं में व्यस्त रहते हैं, वैसा ही दूसरों को भी समझते हैं। अपने व्यक्तित्व के अनुसार ही हम दूसरों के चरित्र परखते हैं, उनके अच्छे-बुरे होने ही पहिचान करते हैं। संसार के व्यक्ति आइने या शीशों की तरह हैं, जिनमें हमारा प्रतिबिम्ब दिखा करता हैं, हमारे विचार मन्तव्य, भावनाएँ, योजनाएँ, कल्पनाएं साकार हो उठती हैं।
जिन व्यक्तियों में आपको त्रुटियां दृष्टिगोचर होती हैं, धीरे-धीरे उनके खिलाफ आप एक अन्य विश्वास मन में रख लेते हैं। फिर आपको उनमें दोष ही दोष नजर आने लगते हैं। इन दोषों का कारण केवल उस व्यक्ति में ही नहीं स्वयं आपमें भी है। खुद आपके दोष उस व्यक्ति में प्रतिबिम्बित होते हैं।
परदोष-दर्शन एक मानसिक रोग है। जिसके मन में यह रोग उत्पन्न हो गया है वह दूसरों में अविश्वास भद्दापन, मानसिक, नैतिक, कमजोरी देखा करता है। अच्छे व्यक्तियों में भी उसे त्रुटि और दोष का प्रतिबिम्ब मिलता है। अपनी असफलताओं के लिए भी वह दूसरों को दोषी ठहराता है।
संसार एक प्रकार का खेत है। किसान खेत में जैसा बीज फेंकता है, उसके पौधे और फल भी वैसे ही होते हैं। प्रकृति अपना गुण नहीं त्यागती। आपने जैसा बीज बो दिया, वैसा ही फल आपको प्राप्त हो गया। बीज के गुण वृक्ष की पत्ती और अणु 2 में मौजूद रहते हैं। आपकी भावनाएं ऐसे ही बीज हैं, जिन्हें आप अपने समाज में बोते हैं और उन्हें काटते हैं। आप इन भावनाओं के अनुसार ही दूसरे व्यक्तियों को अच्छा बुरा समझते हैं। स्वयं अपने अन्दर जैसी भावनाएँ लिए फिरते हैं, वैसा ही अपना संसार बना लेते हैं। आइने में अपनी ओर से कुछ नहीं होता। इसी प्रकार समाज रूपी आइने में आप स्वयं अपनी आन्तरिक स्थिति का प्रतिबिम्ब प्रतिदिन प्रतिपल बड़ा करते हैं।
एक बदशक्ल काला कलूटा व्यक्ति अपने आपको बड़ा सुन्दर समझता था। संयोग से उसे अपना प्रतिबिम्ब जल में दिखाई पड़ा। इस महाकुरूप आकृति को देखकर वह भयभीत हो गया। उसे प्रतिबिम्ब पर विश्वास न हुआ तो स्वयं काँच में देखा तब उसे वास्तविकता का ज्ञान हुआ। इसी प्रकार यदि हमें कोई ऐसा शीशा प्राप्त हो जाय, जो हमें आन्तरिक विकारों, दुर्भावनाओं, कुकल्पनाओं का मूर्त रूप साकार कर दे, तो हमें यह देखकर आश्चर्य होगा कि हमारे अंतर्प्रदेश में कितनी गन्दगी और विकार एकत्रित हो गये हैं। आन्तरिक गन्दगी के फलस्वरूप ही प्रायः हमें संसार में कुरूपता, और दोष का वातावरण दृष्टिगोचर होता है। हम जैसा देंगे, वैसा ही लेंगे। जब हम अनिष्टकर दोष दर्शन वाली दुष्प्रवृत्ति लेकर संसार में निकलते हैं, तो बदले में हमें दोष, असफलताएँ, प्रमाद, झूठ-कपट मिथ्याचार ही प्राप्त होगा।
हमारे सुख का कारण हमारी सद्भावनाएँ ही हो सकती हैं। अच्छा विचार, दूसरे की प्रति उदार भावना, सत् चिन्तन, गुण-दर्शन वे दिव्य मानसिक बीज हैं, जिन्हें संसार में बोकर हम आनन्द और सफलता की मधुरता लूट सकते हैं। शुभ भावना का प्रतिबिम्ब शुभ ही हो सकता है। गुण दर्शन एक ऐसा सद्गुण है, जो हृदय में शान्ति और मन में पवित्र प्रकाश उत्पन्न करता है। दूसरे के सद्गुण देखकर हमारे गुणों का स्वतः विकास होने लगता है। हमें सद्गुणों की ऐसी सुसंगति प्राप्त हो जाती है, जिसमें हमारा देवत्व विकसित होता रहता है।
सद्भाव पवित्रता के लिए परमावश्यक है। इनसे हमारी कार्य शक्तियाँ अपने उचित स्थान पर लगकर फलित पुष्पित होती हैं। हमें अन्दर से निरन्तर एक ऐसी सामर्थ्य प्राप्त होती रहती है, जिससे निरन्तर हमारी उन्नति होती चलती है।
एक विद्वान् ने सत्य ही लिखा हैं, “शुभ विचार, शुभ भावना और कार्य मनुष्य को सुन्दर बना देते हैं। यदि सुन्दर होना चाहते हो, तो मन से ईर्ष्या द्वेष और वैर भाव निकाल कर केवल यौवन पर ध्यान न दो। सुन्दर मूर्ति, पवित्र मूर्ति की कल्पना करो। प्रातःकाल ऐसे स्थानों पर घूमने के लिए निकल जाओ जहाँ का दृश्य मनोहर हो- सुन्दर-2 फूल खिल रहे हों पक्षी बोल रहे हों, उड़ रहे हों, चहक रहे हों। सुन्दर पहाड़ियों पर, हरे भरे जंगलों में और नदियों के सुन्दर तटों पर घूमो, टहलो, दौड़ो और खेलो। वृद्धावस्था के भावों को मन से निकाल दो और बन जाओ हँसते हुए बालक के समान सद्भावपूर्ण। फिर देखो कैसा आनन्द आता है।
मनुष्य के उच्चतर जीवन को सुसज्जित करने वाला बहुमूल्य आभूषण सद्भावना ही है। सद्भावना रखने वाला व्यक्ति सब से भाग्यवान है। वह संसार में अपने सद्भावों के कारण सुखी रहेगा, पवित्रता और सत्यता की रक्षा करेगा। उसके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति प्रसन्न रहेगा और उसके आह्लादकारी स्वभाव से प्रेरणा प्राप्त करेगा। सद्भावना सर्वत्र सुख, प्रेम, समृद्धि उत्पत्ति करने वाले कल्पवृक्ष की तरह है। इससे दोनों को ही लाभ होता है। जो व्यक्ति स्वयं सद्भावना मन में रखता है, वह प्रसन्न और शान्त रहता है। संपर्क में आने वाले व्यक्ति भी प्रसन्न एवं संतुष्ट रहते हैं। मन में सदैव सद्भावनाएँ ही रखें।
यज्ञ में आरोग्य वर्धक एवं रोग निवारक अद्भुत गुण हैं। जहाँ यज्ञ होते हैं। वहाँ सामूहिक रोगों की निश्चित रूप से कमी होती हैं। जलवायु का परिमार्जन एवं संशोधन होने से उनके रोग कारण दोष हट जाते हैं और आरोग्य वर्धक गुण बढ़ते हैं। फलस्वरूप अनेक रोगों से जनता अपने आप मुक्त हो जाती है। यज्ञ करना एक बड़ा अस्पताल खोलने के समान है जिससे अगणित रोग ग्रस्तों तथा भविष्य में बीमार पड़ने वाले लोगों का इलाज उनके घर बैठे ही हो जाता है। चिकित्सा पर जो धन, समय, श्रम, चिन्ता, काम में हानि आदि की कठिनाई होती है उससे अनेक रोग बन जाते हैं। सब प्रकार यज्ञ करना अस्पताल खोलने से भी अधिक उपयोगी सिद्ध होता हैं।
यज्ञ के आरोग्य वर्धक रोग निवारक गुणों का वर्णन करने वाले अनेकों मंत्र वेदों में भरें पड़े हैं उनमें से कुछ यहाँ दिये जाते हैं-
ममाग्ने वर्चोविहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धाना स्तन्वं पुषेम।
अथर्व 4। 3। 1
हे अग्नि, हम आपको यज्ञ में प्रदीप्त करते हैं, आप हमारे शरीर को पुष्ट और तेज को प्रदीप्त करो।
यदि क्षितायुर्यदि का परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीति एवं। तमाहरामि निऋर्तरुपस्था दत्वार्षमेन शत शारदाय
अथर्व 3। 11। 2
यदि रोगी अपनी जीवन शक्ति को खो भी चुका हो निराशाजनक स्थिति को पहुँच गया हो, यदि मरण काल भी समीप आ पहुँचा हो तो भी उसको मैं मृत्यु के चंगुल से बचा लेता हूँ और सौ वर्ष जीने के लिए पुनः बलवान कर देता हूँ।
सहस्त्राक्षेण शतवीर्येण शर्तायुषा हविषाहार्षमेनम्।
इन्द्रौ यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम।
-अथर्व 3। । 113
हजारों शक्तियों से युक्त, सौ वर्ष की आयु देने वाले इस हवन द्वारा रोगों को मौत के पंजे से बचाता हूँ। प्रभु इसे समस्त पापों तथा रोगों से मुक्त करें।
कोई पदार्थ अपने स्थूल रूप में जितना शक्तिशाली होता है उसकी अपेक्षा वह सूक्ष्म रूप में अधिक प्रभावशाली एवं विस्तृत हो जाता है। आयुर्वेद ग्रन्थों में लिखा है-बादाम को साबुत खाने की अपेक्षा पीसकर खाने में अधिक गुण हैं। पीसने की अपेक्षा घिसकर खाना अधिक लाभदायक है।” कारण स्पष्ट है जो वस्तु जितनी बारीक होती जाती है। सूक्ष्म बनती जाती है उतने ही उसके गुण बढ़ते जाते हैं। रोटी के ग्रास यों ही अधकुचले निगल लिए जायं तो वह भोजन उतना लाभ दायक न होगा जितना कि खूब चबा-चबाकर बारीक करके खाया हुआ भोजन। सोने या चाँदी का टुकड़ा किसी को खिलाया जाय तो उसके किसी लाभ की आशा नहीं किन्तु यदि उसी सोने या चाँदी को सूक्ष्म करके भस्म या वर्क बनाकर खिलाये जाते हैं तो उसका रोग निवारक एवं बलवर्धक पड़ता है। औषधि विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि किसी औषधि को जितना ही बारीक किया जाता है अधिक घोटा जाता है उतनी ही वह अधिक गुणकारी बनती जाती है कारण यही है कि स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म का गुण विशेष होता है। यज्ञ में हवन सामग्री को अग्नि द्वारा स्थूल से सूक्ष्म बनाया जाता है, फलस्वरूप उसकी शक्ति एवं उपयोगिता भी बहुत बढ़ जाती है।
अग्नि में जलाने से कोई वस्तु नष्ट हो जाती है ऐसा सोचना ठीक नहीं। विज्ञान बताता है कि कोई भी पदार्थ कभी नष्ट नहीं हो सकता केवल उसका रूपांतर होता रहता है। जो वस्तु अभी मूर्त रूप में दिखाई दे रही हैं वह यदि अग्नि से, जल से, तोड़ फोड़ देने से या किसी अन्य प्रकार से नष्ट कर दी जाय तो वह नाश केवल उससे मूर्त रूप का ही होता है। उसके समस्त परमाणु ज्यों के त्यों अक्षुण्य रहते हैं उनका रूप भले ही बदल जाय पर उनका अस्तित्व बराबर बना रहता है। हवन में जलाई हुई सामग्री बर्बाद नहीं हो जाती केवल उसका रूप बदलता है। पहले वह मूर्त रूप में केवल एक स्थानीय थी, फिर वह सूक्ष्म होकर वायु रूप बनती हैं और विस्तृत क्षेत्र में फैलकर अपना व्यापक असर दिखाती है।
मिर्च को यदि साधारण रीति से सूँघा जाय तो उसमें कोई विशेष बात न मालूम पड़ेगी। यदि उसे कूटा जाय तो कूटते समय जो उसके सूक्ष्म परमाणु इधर-उधर उड़ेंगे उनके पास बैठे हुए लोगों को खाँसी आवेगी। यदि उसी मिर्च को जलाया जाय जो जितनी दूर तक वायु में उसके परमाणु फैलेंगे उतनी दूर तक के लोग छींकने लगेंगे। मिर्च अपने मूर्त रूप में जितनी शक्तिशाली थी उसकी अपेक्षा कूटने पर और उसकी अपेक्षा जलाने पर अधिक परिणाम में और अधिक क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखा सकी। ‘सूक्ष्मता में अधिक शक्ति’ के इस सिद्धान्त के आधार पर यज्ञ की उपयोगिता बहुत कुछ समझी जा सकती है।
रोगों के कीटाणु बहुत ही बारीक होते हैं। उन्हें खुली आँखों से तो देखना भी असम्भव है। बढ़िया सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों की सहायता से ही वे देखे जाते हैं। साधारणतया एक इंच स्थान में तीस हजार कीटाणु रहते हैं। कभी कुछ कम होते हैं। तो कभी-कभी वे और भी अधिक छोटे होने के कारण एक इंच में और भी अधिक संख्या में रह सकते हैं। औषधियों के कण स्वभावतः इतने बारीक नहीं हो सकते इसलिए वे सभी कीटाणुओं तक नहीं पहुँच सकते किन्तु वहीं औषधि यदि अग्नि में जलाई जाती है। तो वह वायु रूप होकर अधिक सूक्ष्म बन जाती है और उन बारीक से बारीक रोग कीटाणुओं के पास आसानी से पहुँच कर उन्हें नष्ट करने में समर्थ हो सकती है। मोटे रूप में खिलाने पर औषधि द्रव्य जितना गुण करते हैं उसकी अपेक्षा वायु रूप होने पर उनका गुण निश्चय ही अधिक होगा क्योंकि वे श्वास के साथ, रोम कूपों के द्वारा शरीर के प्रत्येक स्थान तक स्वल्प काल में प्रचुर परमाणु में पहुँच सकती है। औषधि को खाने पर वह पेट में पचती है तब रक्त में मिलने पर अपना प्रभाव रोगी के अंग तक पहुँचाती है पर हवन द्वारा उस औषधि को रोगी अंग के किसी भी भाग तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है। हवन द्वारा औषधियों के प्रभाव को शरीर के गहरे से गहरे स्थान में सुगमता पूर्वक पहुँचाया जा सकता है।
कभी-कभी हैजा, चेचक, प्लेग आदि का प्रकोप होने की सम्भावना होती है, तो डॉक्टर लोग उसकी पूर्ण सुरक्षा के रूप में उस रोग के टीके (इंजेक्शन) लगाते हैं ताकि भविष्य में उस व्यक्ति पर उस रोग के आक्रमण की सम्भावना न रहे। उनका कहना है कि इस टीके की औषधि से रक्त में ऐसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है कि उस पर रोग का आक्रमण सफल नहीं हो सकता। डाक्टरों की यह खर्चीली एवं आडम्बर पूर्ण प्रक्रिया यज्ञ द्वारा अधिक अच्छी तरह हो सकती है। हवन करने से उसमें जलाई औषधियाँ सूक्ष्म होकर निकटवर्ती लोगों के शरीर में प्रवेश करती हैं और रक्त में ऐसा प्रभाव छोड़ देती हैं कि फिर वहाँ रोगों का आक्रमण नहीं हो सकता और ‘पूर्ण सुरक्षा’ की उचित व्यवस्था अपने आप हो जाती है।
आजकल बड़े-बड़े मेलों में हैजा आदि रोगों में टीका लगाने में बहुत खर्च होता है और टीका लगाने वालों को सुई चुभने का तथा उसकी प्रतिक्रिया में ज्वर आदि का कष्ट सहना पड़ता है फिर भी हैजा आदि की समुचित रोक नहीं होती। प्राचीन काल में ऐसे पर्वों पर बड़े-बड़े यज्ञ होते थे, जिनके कारण अधिक जन समूह इकट्ठा होने पर रोग आदि बढ़ने का भय तो दूर उलटे इन आगन्तुकों को आरोग्य लाभ होता था। आज तो समय की गति ही दूसरी है। लोग अपने महत्वपूर्ण विज्ञान भूलते जाते हैं उसे घृणा और अपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और दूसरों के अन्धानुकरण को अपनी बुद्धिमत्ता और प्रगतिशीलता मानते हैं।
रोग नाश में हवन कितना सहायक एवं उपयोगी होता है इस सम्बन्ध में प्रो. टिलवर्ट डॉ. टाटलिट डॉ. हेफकिन की खोजें बहुत उत्साहवर्धक हैं। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टि से अनेक वस्तुओं के धुएं बहुत ही उपयोगी सिद्ध किए हैं ।
रसायन शास्त्र के फ्राँसीसी विज्ञान वेत्ता डॉक्टर बिले ने अग्नि और धुँए का वायु पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सम्बन्ध में गहरी शोध की है। उन्होंने विभिन्न पदार्थों के जलने से उत्पन्न धुओं के गुण-दोषों की जाँच करके पता लगाया है कि कतिपय वस्तुएँ ऐसी हैं जो अपने साधारण रूप की अपेक्षा जलने पर कहीं अधिक लाभदायक बन जाती हैं। उनका कहना है कि शक्कर जलाने में फार्मिक आलडीहाइड नामक गैस बनती है जो वायु में छाये हुए हैजा, महामारी, क्षय, चेचक आदि के रोग कीटाणुओं को दूर करती है। गन्ने की साधारण खाँड की अपेक्षा मुनक्का, छुहारा, किशमिश मधुर पदार्थों से जो गैस उत्पन्न होती है उसमें कृमि नाश के अतिरिक्त पोषण का भी विशेष गुण है। फार्मेलिन नामक एक पदार्थ डाक्टरों की दुकान पर बिकता है यह मकानों की शुद्धि एवं कीटाणु नाश के लिए काम में लाया जाता है। यह फार्मेलिन लकड़ियों को जलाकर बनाई हुई गैस का द्रव रूप ही है। साधारण लकड़ियों की गैस बनी फार्मेलिन जब इतनी उपयोगी है तो हवन में प्रयुक्त होने वाली विशेष गुण वाले वृक्षों की विशेष समिधाओं का यज्ञ धूम्र कितना उपयोगी होगा इसका अनुमान लगाना कुछ कठिन नहीं है।
यज्ञ से राजयक्ष्मा जैसे असाध्य एवं कष्ट साध्य समझे जाने वाले रोग भी दूर हो जाते हैं। जिन रोगों में साधारण औषधियाँ काम नहीं करतीं उनमें विधिपूर्वक यज्ञ विशेष उपयोगी सिद्ध होता है। चरक ऋषि का भी ऐसा ही मत है-
प्रयुक्तया यथा चेष्टया राजयक्ष्मा पुरोजितः।
ताँ वेद विहितामिष्टि मारोग्यार्थी प्रयोजयेत्॥
वरक चिकित्सा खण्ड 8। 122
प्राचीन काल में जिस यज्ञ के प्रयोग से राज यक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था। रोग मुक्ति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को चाहिये कि उसी वेद विहित यज्ञ का आश्रय ले।
अथर्व वेद में कहा गया है कि संजीवनी शक्ति रोगी को प्राप्त होती है और वह रोग मुक्त होता है।
यथा :-
युँचामित्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्यादुत राजयक्ष्मात। ग्रहिर्जग्रह यद्येत देन तस्या इन्द्राग्नि प्रमुमुक्तमेनम् ॥
अथर्व. 11। 1
हे व्याधि ग्रस्त रोगी, तुझको सुख के साथ चिरकाल तक जीने के लिए गुप्त यक्ष्मा और प्रकट तपैदिक रोग से हवन द्वारा मुक्त करता हूँ। इस रोगी को रोग से इन्द्र सूर्य एवं यज्ञ छुड़ा देंगे।
प्राचीन काल में आरोग्य वृद्धि और रोग निवारण के लिए यज्ञ होते थे, उनका ब्रह्मा कोई आरोग्य शास्त्र का मर्मज्ञ विद्वान होता था जो सूक्ष्म वैज्ञानिक परीक्षा द्वारा यह जान लेता था कि इस समय वायु मण्डल में दया विकार बढ़ जाने से कौन रोग फैला हुआ है और उसके निवारण के लिए किन औषधियों का हवन करना चाहिए। व्यक्तिगत रोगों के लिए भी ऐसे हवनों का आयोजन किया जाना था। रोगी के शरीर में कौन सी व्याधि बढ़ी हुई है, कौन से तत्व घट-बढ़ गये हैं उनकी पूर्ति करने एवं शरीरगत धातुओं का संतुलन ठीक करने के लिए किन औषधियों की आवश्यकता है वह ऐसा निर्माण करता था और उन औषधियों की सम्मिति बना कर, उसी प्रकृति के वेद मन्त्रों से आहुतियाँ दिला कर हवन कराया जाता था। वैसा ही पुरोडस एवं यज्ञावशिष्ठ रोगी के लिए तैयार किया जाता था, रोगी यज्ञ धूप के वातावरण में रहता था और उसी वायु से सुवासित जल वायु एवं आहार ग्रहण करता था। ऐसे भेषज यज्ञों के अनेक वर्णन ग्रन्थों में आते हैं :-
भैषज्य यज्ञा वा एते। ऋतु सन्धिषु व्याधिर्जायते तस्यादृतु सन्धिषु प्रयुज्यन्ते।
शतपथ
अर्थात्- यह भैषज्य यज्ञ है। ऋतु परिवर्तन के समय जो व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं उनके निवारण के लिए इनका प्रयोग होता है।
भैषज वृतोह वा एष यज्ञो यत्रैवं विद् ब्रह्मा भवति।
छान्दोग्य 4। 17।18
अर्थात्- भैषज्य यज्ञों में आयुर्वेद शास्त्र का ज्ञाता ब्रह्मा होता है।
आज वह यज्ञ चिकित्सा की महत्व पूर्ण विद्या लुप्त प्रायः हो गई है परन्तु यदि इस दिशा में अभिरुचि रखने वाले मनीषी लोग प्रयत्न करें तो इस महत्व पूर्ण विज्ञान को पुनर्जीवित करके असंख्य रोगियों की पर्याप्त रक्षा की जा सकती है।
(महात्मा जेम्स सेलन)
कुकर्मों के लिये दण्ड पाना उतना ही कल्याणमय है, जितना सुकर्मों के लिये सुख पाना। यदि हम अपनी मूर्खता और अपने पाप के लिए दण्ड न पावें तो हम सुरक्षित नहीं रह सकते। हम उच्छृंखल हो जायं। और उस समय हम अपने शुभ तथा ज्ञानमय कर्म के फलों से भी हाथ धो बैठेंगे। तब नृशंसता का साम्राज्य फैल जायगा। वास्तव में ईश्वरीय ‘नियम’ न्याय और दया की पद्धति है।
निस्संदेह, श्रेष्ठ नियम तो अनन्त दया की निधि है। इसका कार्य अविचल और उपभोग अपरिमित है। यह वही अनन्य प्रेम है जो सदैव पूर्ण रहता है और सर्वकाल में प्रवाहित होता रहता है।” क्रिश्चियन इसी का गान किया करते हैं। बुद्ध धर्म के सिद्धान्तों में इसी को “अपरिमित दया” की संज्ञा दी गयी है। जो नियम हमें दण्ड देता है, वही हमारी रक्षा भी करता है।
जब मनुष्य अज्ञानता से अपना पतन करना चाहता है, तब वह अपना प्रेम-प्रेरित कर- जो हमें दुःखद प्रतीत होता है-रक्षार्थ बढ़ा देता है। हमारे प्रत्येक दुःख हमें दैवी-प्रकाश की ओर अग्रसर करते हैं। हमारे प्रत्येक सुख ईश्वरीय नियम की महत्ता का गुण गान करते हैं और हमें बताते हैं कि पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लेने पर हम कितने उच्चतम आनन्द के उत्तराधिकारी होंगे। अनुभव ही उन्नति की सीढ़ी है। कुछ अंश तक दुःख ही हमारे अनुभव का कारण होता है। जिस समय हमारा हृदय प्रेम से द्रवीभूत हो जाता है- उस समय इसके प्रत्येक आश्चर्यजनक मंगल-कार्य में प्रेम ही का व्यवहार दिखाई पड़ता है। ज्ञान-प्राप्त करते ही शान्ति की प्राप्ति निश्चित हो जाती है।
वस्तुओं के सर्वश्रेष्ठ नियम-क्रम में हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते। परन्तु उस श्रेष्ठ को भली-भाँति बुद्धिगम्य करने के लिए और उसकी आभा से प्रभावित होने के लिए हम अपने की मोड़ सकते हैं। उच्चकोटि की वस्तु का ह्रास करना महामूर्खता है। किन्तु तुच्छ वस्तु को उच्च आदर्श तक पहुँचा देना ज्ञान की चरम सीमा है। विश्व-ब्रह्माण्ड के दिखलाई देने वाली वस्तुओं के रचनाक्रम पर शंकित नहीं होते, वे संसार को सब तरह से पूर्ण पाते हैं। उनके लिए यह, असम्बद्ध वस्तु-खण्डों का एक ढेर नहीं है। वे सर्वत्र स्थायी आनन्द और दैवी शान्ति ही का दर्शन करते हैं।
अपवित्र वासनाओं में फँसा हुआ मूर्ख बन्दी, भले ही चिल्लाया करे “ऐ प्रेमी, कितना सुन्दर होता यदि हम और तुम विश्वकर्त्ता से मिलकर कूट-नीति का प्रयोग कर सकते और वस्तुओं के दुःखद रचनाक्रम को खण्डित करके अपनी इच्छानुसार उनकी रचना फिर से करते।’ इस प्रकार इच्छा रहती है भोग-लम्पटों की जो निन्दित भोग-विलासों से अपनी तृप्ति करके उसके स्वाभाविक दुःखद परिणामों से बचना चाहते हैं। ऐसे ही लोग संसार की ‘वस्तुओं को दुःखदायी रचना के रूप में देखा करते हैं। वे संसार को अपनी वासना-तृप्ति के लिये एक साधन-मात्र बनाना चाहते हैं। उन्हें उच्छृंखलता प्रिय है, नियम नहीं। किन्तु ज्ञानी अपनी इच्छा और वाँछना को ईश्वरीय नियम की ओर झुकाता है। वह भूखण्ड के अपार विस्तार को प्रकाशमय-पूर्णता के रूप में देखता है।
बुद्ध भगवान विश्व के ‘नैतिक-नियम’ को सदैव ‘कल्याण-मय’ कहा करते थे। और वास्तव में यदि कोई इसे किसी दूसरे दृष्टिकोण से देखता है तो ठीक नहीं करता। क्योंकि उससे पाप का तथा निर्दयता का लेश-मात्र भी होना असम्भव है। निर्बलों को कुचलने वाला और मूर्खों का नाश करने वाला यह वज्रवत-हृदय का कोई दानव नहीं, पर यह तो लालन-पालन करने वाला प्रेम है- दया का स्रोत है। वह निर्बल से निर्बल लोगों को भी चोट नहीं लगने देता। बलवान से बलवान लोगों की रक्षा, उनके बल के विनाशकारी प्रयोग से किया करता है। यह तो सब बुराइयों का नाशक और सब अच्छाइयों का रक्षक है। नन्हें बीज को बड़े बचाव के साथ प्रस्फुटित रहता हैं और श्वाँस मात्र से ही घोर से घोर अपराध को मिट्टी में मिला देता है। इसे देखना स्वर्ग-दर्शन है। इसे जान लेना समाधि-सुख है। इसको देखने वाले और इसे जानने वाले परम शाँति को प्राप्त कर सदैव आनन्द ही लूटा करते हैं।
यह न्याय-धर्म है, जिसे कोई विचलित नहीं कर सकता। प्रेम उसका हृदय है। शान्ति और सुन्दर आदर्श इसका ध्येय है। इसका अनुसरण करो।
आध्यात्मिक सुख कौन-कौन हैं? वे हैं-दया भ्रातृत्व प्रेम, उदारता, सुहृदयता, क्षमता, सन्तोष, शान्ति, अनन्त प्रेम तथा असीमित अनुकम्पा। ये सुख, भूखी आत्मा की ये आवश्यकताएँ प्राप्त हो सकती हैं-किन्तु उनका उचित मूल्य चुकाना होगा। इनका मूल्य है-निर्दयता, रुष्टता, निष्ठुरता, कोप, अधैर्यता, अविश्वास, कलह, घृणा और क्रूरता और इनसे उत्पन्न सुख तथा सन्तोष सबकी तिलाँजलि कर देनी पड़ेगी। धार्मिक मुद्राएँ जो स्वयं मृतक प्रतीत होती हैं- त्यागनी पड़ेंगी। इनका त्याग करते ही आपको तुरन्त इनकी धार्मिक प्रति-मूर्तियाँ प्राप्त होंगी। और तब आप अपने को आनन्द स्रोत में बदले हुये आयेंगे।
आध्यात्मिक सुख को भौतिक मूल्य पर और भौतिक सुखों को आध्यात्मिक मूल्य पर लेने की आशा करना स्वार्थपरता और मूर्खता की जड़ है। यह तो केवल विनियम और धर्म का मिश्रण करना और विनियम ही को धर्म मान लेना है। सहायता, दया तथा प्रेम क्रय नहीं किये जा सकते इनका केवल आदान-प्रदान हो सकता है। दान का मूल्य ग्रहण करने पर दान नहीं रह जाता।
(श्री विल्फ्रेड वेलाफ)
औद्योगिक क्रान्ति ने मनुष्य और समाज के स्वभाव में जो परिवर्तन कर दिये, उनके फलस्वरूप अच्छी तरह संगठित गाँवों के कुशल कलाकारों को भूख से मजबूर होकर, नीरस और आत्महीन शहरों में जाना पड़ा, जहाँ उनके जिम्मे भयंकर कारखानों में बिजली से चलने वाली जड़ मशीनों के सम्भाल के सिवा और कोई काम नहीं रहा। इसका मतलब उनके लिये एक अर्थपूर्ण और अनेक सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्यों वाले जीवन से निकल कर ऐसे जीवन में प्रवेश करना था, जिसमें न कोई अर्थ था और न किसी तरह के सामाजिक या आध्यात्मिक महत्व का कोई चिन्ह मौजूद था। यह एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी, सर्जक अवसर, व्यावसायिक और सामाजिक महत्व, स्वतन्त्रता और स्थानीय प्रतिष्ठा के जीवन को छोड़कर ऐसा जीवन अख़्तियार करना था, जिसमें धनी और शक्तिशाली मालिक का पूरा गुलाम बन जाता पड़ता है। और इस मालिक का मुख्य ध्येय पैसा कमाना ही था।
समय पाकर अब दुनिया के बाजारों की होड़ बढ़ी, तो कारखानों में विशिष्टीकरण (स्पेशियलाइजेशन) को बढ़ाकर उत्पादन को सस्ता बनाने का आम रिवाज हो गया। इसने आविष्कार काम को टुकड़ों में बाँट कर और फिर उन्हें जोड़कर तैयार करने की टेकनिक की प्रक्रियाएँ दोहराने वाली मशीनों की शृंखला को जन्म दिया, जिससे कुछ उद्योगों में दोहराये जाने वाले श्रम का प्रतिशत 65 प्रतिशत तक पहुँचा गया।
यह स्थिति ऐसी हर एक चीज को खतरा कर देती है, जिसका सम्बन्ध मानव प्रतिष्ठा और आध्यात्मिक संस्कृति के साथ है, सच पूछा जाय तो वह आध्यात्मिक मानव-ईश्वर के प्रतिबिम्ब रूप सर्जक मानव का इनकार है। इस यान्त्रिक तन्त्र में बुद्धि योग्यता, और अक्षमता रूप है, वह उत्पादन में रुकावट डालती है, क्योंकि वह निरर्थकता की भावना को बढ़ाती है, अपने काम में किसी तरह का रस नहीं रहने देती और इस तरह उत्पादन को घटाती है। इसलिए हर एक के मन बहलाव के साधन दाखिल करने पड़ते हैं, ताकि लोग मानव के स्तर से नीचे उतर कर पशु की तरह काम करते रहें। इसी मतलब के लिए अधिकाधिक वैज्ञानिक इस क्षेत्र में दाखिल किये जाते हैं-आज का विज्ञान इस हद तक नीचे गिर गया है।
न तो धर्म ने और न संस्कृति ने कभी इस आध्यात्मिक क्रूरता का विरोध किया। चतुराई से नए भौतिक वाद को धार्मिक पवित्रता का जो जाना पहनाया गया, उसके कारण भौतिकवाद के बारे में ऐसा घातक भ्रम बढ़ा कि आज भी दुनिया उसके कुछ बुरे से बुरे परिणामों को नहीं देख पाती। धन, दौलत, ऐश्वर्य, सामाजिक प्रतिष्ठा और राष्ट्रीय शक्ति के गौरव-गान का परिणाम सामाजिक और आध्यात्मिक कंगाली, गैर जिम्मेदारी और नैतिक व सामाजिक भावना की शिथिलता में आया, जो प्रत्यक्ष रूप में हमारी सभ्यता की नींव को खोखली बना रही है। एक समय के जिम्मेदार और संपूर्ण व्यक्तियों के सामाजिक कर्त्तव्यों और आदान-प्रदान की भावना वाले कुशल कारीगरों के यन्त्रवत काज करने वाले मजदूरों में बदल जाने से अधिकतर लोगों की दृष्टि में काम का महत्व पैसा कमाने के साधन के सिवाय और कुछ नहीं रह गया है। इस तरह हमारी आज की सभ्यता ने नकद पैसे पर आधार रखने वाला भौतिकवादी सभ्यता का रूप ले लिया है-ऐसे अपूर्ण व्यक्तियों ने समाज का रूप ले लिया है, जो अधिकतर सामूहिक उत्तेजनाओं और प्रदर्शनों के बल पर जीते हैं और अपनी सारी जरूरतें पैसे से पूरी करने की अपेक्षा रखते हैं। इस आध्यात्मिक दृष्टि से बाँझ दुनिया में धर्म का कोई अर्थ नहीं है और चर्च भी एक बेगार सा है।
तब अगर मजदूरों में चोरी की और समाज के ऊँचे वर्गों में ऊँची कीमतें लेने की अनैतिक वृत्ति का बोलबाला हो और वह दिन-प्रति-दिन बढ़े, तो इसमें आश्चर्य क्या? इस बुराई का नतीजा यह है कि मनुष्य के काम और उसकी आत्मा के बीच कोई सम्बन्ध नहीं रहा। जब मनुष्य काम में किसी तरह की जिम्मेदारी महसूस नहीं करता, तो वह नैतिक दृष्टि से भी अपनी कोई जिम्मेदारी नहीं निभाता। इसमें कोई शक नहीं कि हम इस नतीजे से एक सर्वथा नीतिहीन सभ्यता को जन्म दे रहे हैं। अगर हम उसकी कोई प्रतिक्रियाओं को उलटा न दें, तो उसका अन्त निकट ही समझिये।
साराँश यह है कि हमारे युग की मूल समस्या आध्यात्मिक है। वह समस्या औद्योगिक क्राँति की प्रगति के दरमियान भौतिक मूल्यों पर दिनों दिन अधिक जोर देने से पैदा हुई, जिसका यह नतीजा हुआ है कि मानव-कल्याण या अच्छे जीवन की चीजों और सुख-सुविधाओं के अधिक से अधिक उपयोगों के साथ एक रूप कर दिया गया है, दोनों में कोई भेद ही नहीं किया जाता।
पश्चिम में धन-दौलत और भौतिक वस्तुओं के बाहुल्य पहले से ही पूँजीवाद के प्रधान लक्ष्य रहे हैं । इन दोनों का लोभ और प्रेम आखिरकार समाज के हर वर्ग में पैठ गये हैं। इन्होंने शुरू के समाजवादियों के-जो गुणप्रधान सभ्यता की हिमायत करते थे- आदर्शवाद को व्यर्थ बना दिया है और मार्क्स के जरिये भौतिकवाद के शुभ भयानक स्वप्न को साम्यवादियों के हाथ में सौंप दिया है। आज तक सर्वभक्षी भौतिकवाद पृथ्वी के साधनों पर इतनी तेजी से नाश कर रहा है कि पृथ्वी का उपजाऊपन कायम रखकर या खोज और आविष्कार के जरिये उनकी पूर्ति नहीं की जा सकती।
18 अगस्त 1949 को ‘लन्दन टाइम्स’ में छपे ‘कच्चे माल की बरबादी’ लेख ने कच्चे माल की सुरक्षा की बहुत बड़ी आवश्यकता की तरफ लोगों का ध्यान खींचा था और ब्रिटिश एसोसिएशन की एक बैठक में दिये गये डॉ. आर. पी. लिनस्डेड एफ. आर. एस. के भाषण का नीचे लिखा हिस्सा उद्धृत किया किया था।
“मनुष्य अब कच्चे माल पर भयंकर आक्रमण कर रहा है। यह बनाया गया है कि पिछले सम्पूर्ण इतिहास में सारी दुनिया में कितने खनिज पदार्थ निकाले गये थे, उनसे ज्यादा 1900 से आज तक अमरीका में भूगर्भ से निकाले गये हैं। 1947 के अन्त तक सम्पूर्ण मानव इतिहास में कोयले का एकत्र उत्पादन लगभग 81 अरब मेट्रिक टन हुआ था। इसमें से 61 अरब मेट्रिक टन कोयला 1900 से अब तक खदानों से निकाला गया और काम में लिया गया।” अमरीका सारी दुनिया से ज्यादा लोहा और फौलाद, पैट्रोल, अखबारी कागज और रबर का उपयोग करता है। अब वह यह सारा कच्चा माल और दूसरे 80 जात के कच्चे माल बाहर से मँगाता है, क्योंकि वह अपने कच्चे माल का अधिकतर भाग खतम कर चुका है। “अमरीका, जो एक समय ऊपर से अटूट कुदरती भण्डार का स्वामी माना जाता था, कई तरह से अभाव ग्रस्त राष्ट्र बन जाने के खतरे में है।”
पश्चिमी सभ्यता का ध्येय क्या है? अमरीका के जीवन मान को प्राप्त करना!
भौतिकवाद मानव की बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करने की कोई शक्ति अपने में नहीं रखता, उलटे वही मनुष्यों को अशान्त व्याकुल और बेचैन ही बनाता है। अमेरिका में वह अशान्ति और व्याकुलता सबसे ज्यादा बढ़ रही है। भूख और भोग विलास के क्षेत्र में इच्छाओं का कोई अन्त नहीं है, जिस आदमी के पास जितना ज्यादा होता है, उतना ही ज्यादा व्याकुल और बेचैन वह पाया जाता है।
हमारी सभ्यता नष्ट हो रही है। वह इतनी कृत्रिम और अस्थायी हो गई है कि बढ़ता हुआ डर उसकी नींव को ही हिला रहा है। अगर इस नाश को रोकना हो तो हमें कई आध्यात्मिक अधिकारों और मूल्यों की पुनः स्थापना करनी होगी, जिन्हें हमने औद्योगिक क्रान्ति के समय में खो दिया है।
(उत्तराध्ययन सूत्र से)
सेंध लगाते हुये पकड़ा गया चोर किस तरह अपने कर्म से काटा जाता (पीड़ित होना) है उसी तरह से यह जीवन इस लोक और परलोक में अपने-अपने कर्मों द्वारा पीड़ित होते हैं क्योंकि संचित कर्मों को भोगे बिना छुटकारा नहीं होता।
संसार को प्राप्त जीव दूसरों के लिए (या अपने जीवन व्यवहार में) जो कर्म करता है वे सब कर्म उदय (परिणाम) काल में खुद उसको ही भोगने पड़ते हैं। उसके (धन में भागीदार होने वाले) बन्धु बान्धव कर्मों में भागीदार नहीं होते।
(ललचाने वाला) मन्द-मन्द स्पर्श यद्यपि बहुत ही आकर्षण होता है किन्तु संयमी उसके प्रति अपने मन को आकृष्ट न होने देने, क्रोध को दबावे, अभिमान को दूर करे, कपट (मायाचार) का सेवन न करे और लोभ को छोड़ देवे।
जो अपनी वाणी (विद्वत्ता) से ही संस्कारी गिने जाने पर भी तुच्छ और परनिंदक होते हैं तथा राग द्वेष से जकड़े रहते हैं वे परतन्त्र और अधर्मी हैं ऐसा जान कर साधु उनसे अलग रह कर शरीर के अन्त तक (मृत्युपर्यंत) सद्गुणों की ही आकाँक्षा करे।
काया और वचनों से मदान्ध बना हुआ तथा धन और स्त्रियों में आशक्त बना हुआ वह, जैसे केंचुआ मिट्टी को दो प्रकार से इकट्ठी करता है उसी तरह, दो तरह से कर्मरूपी बल को इकट्ठा करता हैं।
भिक्षाचरी करने वाला भिक्षु भी यदि दुराचारी होगा तो वह नरक से नहीं छूट सकता।
आत्मवत् सर्वत्र सब जीवों को मानकर (अर्थात् जिस तरह हमें अपने प्राण प्यारे हैं उसी तरह दूसरों को भी अपने अपने प्राण प्यारे हैं ऐसा जान कर) भय और बैर से विरक्त आत्मा किसी भी प्राणी के प्राणों को न हरे (न मारे या न सतावे)।
बन्ध और मोक्ष की बातें करने वाले, आचार का व्याख्यान देने पर भी स्वयं कुछ आचरण नहीं करते। वे मात्र वाग्शूरता (वाणी की बहादुरी) से ही अपनी आत्मा को (झूठा) आश्वासन देते हैं।
भिन्न-भिन्न तरह की (विभिन्न) भाषाएँ (इस जीव को) शरणभूत नहीं होती हैं तो फिर कोरी विद्या का अधीश्वरपन (पण्डितवन) क्या शरणभूत होगा? पाप कर्मों द्वारा पकड़े हुये मूर्ख कुछ न जानते हुये भी अपने को पण्डित मानते हैं।
जैसे एक मनुष्य ने एक कानी कौड़ी के लिये लाखों स्वर्ण मुद्राएँ (मोहरें) खर्च कर दीं अथवा एक रोगमुक्त राजा ने अपथ्य रूप केवल एक आम खाकर अपना सारा राज्य गँवा दिया (वैसे ही जीवात्मा क्षणिक सुख के लिये अपना तमाम कर्म बिगाड़ लेता है)।
विषयों ने उसे एक बार जीता (वह विषयासक्त हुआ) कि इससे उसकी दो तरह से दुर्गति होती है जहाँ से बहुत लम्बे समय के बाद भी निकलना उसके लिये दुर्लभ हो जाता है।
यदि मनुष्य भव के भोग, दाब की नोक पर स्थित जलबिंदु के समान है तो दिन−प्रतिदिन क्षीण होने वाली इस छोटी सी आयु में कल्याण मार्ग को क्यों न ताना (साधा) जाय?
अधीर (आसक्त) पुरुष तो सचमुच बड़ी ही कठिनता से इन भोगों को छोड़े पाते हैं, उनके भोग सुखपूर्वक सरलता से नहीं छूटते। (किन्तु) जो सदाचारी साधु होते हैं वे इस अपार दुस्तर संसार सागर को तैर कर पार कर जाते हैं।
यदि कोई इस लोक को उसकी तमाम विभूतियों के साथ एक ही व्यक्ति को उसके उपभोग के लिये देदे तो भी उसकी तृप्ति नहीं होगी क्योंकि यह आत्मा (बहिरात्मा-कर्मनाश में जकड़ा हुआ जीव) दुष्प्राप्य (बड़ी कठिनता से सन्तुष्ट होने वाला) है। (सदा असन्तुष्ट ही रहती है)।
गायत्री प्रेमियों से यह छिपा नहीं है कि नवरात्रि का पुण्य काल गायत्री उपासना के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। पिछले दिनों समय-समय पर नवरात्रि की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए यह बताया जाता रहा है कि जैसे रात्रि और दिन के मिलन का समय ‘सन्ध्या’ काल कहलाता है और सन्ध्या काल की उपासना, साधारण समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल भी आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष फलप्रद है। यह ऋतु सन्ध्या नवरात्रि ही है।
जैसे खेत में बीज बोने का एक विशेष समय आता है यदि उन्हीं दिनों बीज बोया जाय तो वह भली प्रकार उगता और फलता-फूलता है यदि इस निर्धारित समय से आगे पीछे बीज बोया जाय तो वैसा उपयुक्त फल नहीं होता इसी प्रकार नवरात्रि का समय भी साधना के लिये बहुत ही उपयुक्त है, इस समय जो जप, तप किया जाता है उसका फल अन्य साधारण समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है। जैसे स्त्री के ऋतुवती होने पर गर्भाधान सफल होने की सम्भावना अधिक रहती है वैसे ही नवरात्रि की गायत्री उपासना भी अधिक फलवती होती है। मिठाई बनाने के लिए चासनी पकाकर तार उठने के समय का जो महत्व है, वही महत्व नवरात्रि काल का है।
दो ऋतुओं की सन्ध्या मिलने पर शरीर गत मल फूल आता है और उस समय देह गत दोषों की सफाई बहुत अच्छे ढंग से एवं आसानी से हो सकती है। अनुभवी वैद्य जीर्ण रोगों के रोगियों की कोष्ट शुद्धि करने के लिए आश्विन या चैत्र में जुलाब देते हैं। और उदर रोग रक्त विकार आदि से रोगी को अच्छा करते हैं। आत्मिक रोगों के रोगी भी व्रत उपवास की तपश्चर्या रूपी जुलाब लेने और अनुष्ठान आदि की साधना रूप औषधि सेवन करें तो वे अन्य समय के उपचार की अपेक्षा अधिक लाभ उठा सकते हैं।
मुहूर्तों का विज्ञान ही महत्वपूर्ण है। पृथ्वी की चाल और ग्रह नक्षत्रों की चाल के अनुसार उनकी आकर्षण शक्ति एवं किरणों का प्रत्यावर्तन होता है, कई बार नक्षत्रों एवं ग्रहों की ऐसी किरणें पृथ्वी पर आती है कि उस समय रोग, भय, मानसिक उत्तेजना, कलह, अग्नि काण्ड आदि के उपद्रव फैलते हैं किसी समय कोई विशेष रोग दूर-दूर तक फैलता है और समय बदलने पर वह रोग अपने आप चला जाता है। इसमें जलवायु के जहाँ अनेक कारण हैं वहाँ अदृश्य शक्तियों एवं किरणों का पृथ्वी पर आवागमन का कर्म भी हैं। ‘मुहूर्त’ देखने या दिखाने का विज्ञान इसी आधार पर निर्धारित है। नवरात्रि का मुहूर्त ऐसा है जिस पर सात्विक दिव्य गुणों वाली शक्तियाँ, किरणें एवं सत्ताएं पृथ्वी पर छाई रहती हैं। साधना के अनुकूल वातावरण उन दिनों पृथ्वी पर छाया रहने से थोड़े ही समय में बहुत महत्वपूर्ण कार्य हो जाता है। इन्हीं सब बातों का ध्यान रखते हुए नवरात्रि में गायत्री की विशेष उपासना करने का जोर दिया जाता रहा है।
जो लोग गायत्री उपासना में पहले से ही रुचि रखते हैं उन्हें उचित है कि इन दिनों 24 हजार लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करें। जो केवल श्रद्धालु हैं जिन्होंने अभी तक कोई उपासना नहीं की हैं और आगे भी कोई निश्चय साधना क्रम बनने में कठिनाई दिखाई पड़ती है उन्हें भी ऐसा करना चाहिए कि कम से कम इन 9 दिनों में तो थोड़ी बहुत साधना करने के लिये समय निकालें। परीक्षा रूप में इस समय थोड़ी बहुत साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।
इस वर्ष नवरात्रि आश्विन सुदी 1 तारीख 8 अक्टूबर गुरुवार से आरम्भ होकर 8 दिन तक आश्विन सुदी 8 ता. 17 अक्टूबर शनिवार तक रहेगी। (इस बार एक तिथि बढ़ गई है) इन नौ दिनों में 24 हजार जप का लघु अनुष्ठान आसानी से किया जा सकता है। 9 दिन में 24 हजार जप करने के लिए प्रतिदिन 2667 मन्त्र जपने होते हैं। एक माला में 108 दाने होते हैं। प्रतिदिन 25 माला जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। एक घण्टे में साधारणतः 8 से 10 मालाएँ आसानी से जपी जा सकती हैं। इस प्रकार 2.30-3 घंटे में यह जप पूरा हो सकता है इतना समय निकालना कुछ अधिक नहीं है।
इन दिनों सूर्य प्रातः साढ़े 6 बजे निकलता है। दो घण्टे रात्रि रहे उठ कर शौच से निवृत्ति होकर सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पूर्व यदि साधना पर बैठा जाय तो दो घण्टे दिन चढ़े 8॥ बजे तक यह साधन पूरा हो सकता है। जिन्हें प्रातःकाल इतना समय मिलने में असुविधा हो वे कुछ समय प्रातः कुछ समय सायं काल निकाल कर जप की पूर्ति कर सकते हैं।
साधन के नियम बहुत सरल हैं। स्नानादि से निवृत्त होकर आसन बिछाकर पूर्व को मुख करके बैठें। जिन्होंने कोई प्रतिमा या चित्र किसी स्थिर स्थान पर प्रतिष्ठित कर रखा हो वे दिशा का भेद छोड़कर उस प्रतिमा के सम्मुख ही बैठे। वरुण देव तथा अग्नि देव को साक्षी करने के लिए पास में जल पात्र रख लें और घृत का दीपक या अगरबत्ती जला लें संध्यावंदन करके गायत्री माता का आवाहन करें। आवाहन मन्त्र जिन्हें याद न हो वे गायत्री शक्ति की मानसिक भावना करें। धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, फल, चन्दन, दूर्वा, सुपारी, आदि पूजा की जो माँगलिक वस्तुएँ उपलब्ध हों उनसे चित्र या प्रतिमा का पूजन कर लें। जो लोग निराकार मानने वाले हों वे धूपबत्ती या दीपक की अग्नि को ही माता का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम कर लें।
अपने गायत्री गुरु का भी इस समय पूजन वन्दन कर लेना चाहिये यही शाप मोचन है। कहा जाता है कि गायत्री मन्त्र कीलित है या शाप लगा हुआ है। उसका उत्कीलन करके जप करना चाहिए। इसका वास्तविक तात्पर्य इतना ही है कि स्वेच्छापूर्ण सर्व तन्त्र स्वतन्त्र साधना नहीं होनी चाहिये वरन् किसी के संरक्षण सहयोग एवं पथ-प्रदर्शन में साधना करनी चाहिए। नवरात्रि साधना में गुरु पूजन की विशेष आवश्यकता है क्योंकि अनुष्ठान का कोई ब्रह्मा सा संरक्षक अवश्य होता है।
इन दिनों जिससे जितनी तपश्चर्या बन पड़े उतनी उत्तम है। (1) ब्रह्मचर्य, (2) उपवास। यह दो तप प्रधान हैं। जो लोग केवल एक समय फलाहार पर नहीं रह सकते वे दो बार फल दूध ले सकते हैं। जिनके लिए यह भी कठिन हो वे दोपहर को बिना नमक का एक अन्न से बना हुआ भोजन और शाम को दूध लेकर अपना उपवास चला सकते हैं।
उपरोक्त दो प्रधान व्रतों के अतिरिक्त नवरात्रि में अन्य तितीक्षाएं भी उत्तम हैं। (1) भूमिशयन (2) चमड़े के जूतों का त्याग (3) पशुओं की सवारी का त्याग (4) शृंगार सामग्रियों का त्याग (5) अपना भोजन, जल, वस्त्र धोना, हजामत आदि शारीरिक कार्य स्वयं करना (6) प्रतिदिन कुछ समय मौन आदि संयम नियमों का पालन करने का यथा सम्भव प्रयत्न करना चाहिये।
जप के साथ-साथ हवन की भी आवश्यकता हैं। 24 हजार के अनुष्ठान में कम से कम 240 आहुतियों का हवन अवश्य होना चाहिये। इससे अधिक हो जाय तो और भी इच्छा है। प्रतिदिन 24 आहुतियों का हवन स्वयं करते रहने से दस दिन में वह पूरा हो जाता है। नित्य न हो सके तो वह अन्तिम दिन भी किया जा सकता है। हवन की विधि बहुत सरल है वह पिछले अंक में दी जा चुकी है।
जो साधक अपनी नवरात्रि तपश्चर्या की पूर्व सूचना हमें दे देंगे उनके साधन का संरक्षण, उनकी भूलों का परिमार्जन आवश्यक पथ-प्रदर्शन तथा उस साधन का आवश्यक परिपोषण यहाँ होता रहेगा। जो सज्जन अपना हवन न कर सकें वह भी हमें सूचित कर दें उनके निमित्त शास्त्रोक्त विधि से हवन यहाँ पर कर दिया जायगा।
जो नये उपासक हैं, जिनका पिछला कोई अनुभव नहीं हैं, वे नवरात्रि में 11 माला प्रतिदिन का नियम बना लें। इस प्रकार उनका दस हजार का जप हो जायगा। व्रत नियम पालन करना उनकी इच्छा पर निर्भर है, पर इन दिनों ब्रह्मचर्य से अवश्य रहें, जो व्यक्ति स्वयं साधना नहीं कर सकते वे दूसरों से अपने बदले का अनुष्ठान करा सकते हैं। इस प्रकार की समुचित व्यवस्था कराने में गायत्री संस्था की सहायता ली जा सकती है।
नवरात्रि में गायत्री चालीसा का 108 पाठों का अनुष्ठान भी होता है। 9 दिन में नित्य 12 पाठ करने से 108 पाठ पूरे हो जाते हैं। प्रायः दो घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं इसके लिए किसी विशेष प्रतिबन्ध की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके देखना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए अन्तिम दिन 108 या कम से कम 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देनी चाहिये। स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा अनुष्ठान को आसानी से कर सकते हैं।
नौ दिन अनुष्ठान करके दसवें दिन उसकी समाप्ति करनी चाहिए। जिन्हें जल्दी ही वे नौंवे दिन अपना जप पूर्ण करके भी पूर्णाहुति कर सकते हैं। अन्तिम दिन पूर्णता का हवन होना आवश्यक है। अपनी सामर्थ्यानुसार आहुतियों की संख्या रखी जा सकती है। कई व्यक्ति हवन में साथ बैठ कर आहुतियों का बाँट भी कर सकते हैं।
हवन के उपरान्त सत्पात्रों को ब्राह्मण भोजन या यज्ञ दक्षिणा देने का नियम है। यह भी यथा सम्भव करना चाहिये। जिन्हें आर्थिक कारणों से हवन की सुविधा न हो वे केवल घृत की 24 आहुतियाँ दे दें। जो ब्रह्मभोज नहीं कर सकते वे गौओं को 24 छटाँक आटा और 24 तोले गुड़ के गोले बनाकर खिलादें। कुँवारी कन्याओं को भोजन कराना भी ब्राह्मण भोजन ही है। दान का एक अच्छा तरीका यह भी है कि सामर्थ्यानुसार पैसे की गायत्री सम्बन्धी छोटी पुस्तकें मंगाकर सत्पात्रों को वितरण कर दें। अन्न दान से ज्ञान दान का पुण्य फल अधिक है।
सदा की भाँति इस वर्ष भी हमारा नौ दिन का पूर्ण निराहार व्रत रहेगा। इसलिये व्यक्तिगत रूप से इन दिनों पत्र व्यवहार तो हम किसी से न करेंगे पर ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि सबके पत्रों का उत्तर यथोचित रूप से दिया जाता रहे। बहुधा कई व्यक्ति नवरात्रि में हमारे समीप रह कर साधना सम्बन्धी मार्ग दर्शन चाहते थे पर यहाँ पहले व्यवस्था ठीक न थी इसलिए प्रायः सभी को यहाँ न आने के लिए कहा जाता था पर अब ये कठिनाई दूर हो गई है। मथुरा में गायत्री तपोभूमि बनवाने के कारण यहाँ साधकों की ठहरने की व्यवस्था हो गई है। पर जो सज्जन आना चाहें वे पूर्व स्वीकृति अवश्य ले लें क्योंकि सीमित संख्या में ही ठहरने की व्यवस्था है।
भूल सुधार
गत जुलाई के गायत्री अंक में ब्रह्मनिष्ठ तपोमूर्ति श्री गायत्री स्वरूप जी वानप्रस्थी का परिचय पृष्ठ 21 पर छपा है उसमें दो भूलें रह गई हैं पाठक उन्हें सुधार लें। वानप्रस्थी जी की जन्मभूमि जोधपुर प्राँत में गंगाणी नामक कस्बे में है। (2) उनका मौन व्रत आरम्भ हुए अभी 1 वर्ष के लगभग हुआ है।
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूँ पाँय। बलिहारी गुरु आपने गोविन्द दिया बताय॥
यह तम विष की बेलरी गुरु अमृत की खान। सीस दिये जो गुरु मिलैं तौ भी सस्ता जान॥
ऐसा कोई ना मिला सत्त नाम का मोत। तन मन सौंपे मिरग ज्यौं सुने वधिक का गीत॥
सतगुरु साँचा सूरमा नख सिख मारा पूर। बाहर घाव न दीखई भीतर चकनाचूर॥
सुख के माँथे सिले परै नाम हृदय से जाय। बलिहारी वा दुःख की पल पल नाम रटाय॥
लेने को सतनाम है देने को अनदान। तरने को आधीनता बूड़ने को अभिमान॥
दुख में सुमिरन सब करें सुख में करने न कोय। जो सुख में सुमिरन करै तो दुःख काहे को होय॥
केसन कहा बिगारिया जो मूँडौ सौ बार। मन को क्यों नहिं मूडिये जामें विषै विकार॥
कबिरा रसरी पाँव में कह सोवै सुख चैन। स्वाँस नगारा कूँच का बाजत है दिन रैन॥
कबिरा गर्व न कीजिए काल गहे कर केस। न जानौ कित मारि है क्या घर क्या परदेस॥
हाड़ जरै ज्यों लाकड़ी केस जरै ज्यों घास। सब जग जरता देखि कर भये कबीर उदास॥
झूठे सुख को सुख कहैं मानत है मन मोद। जगत चबेना काल का कुछ मुख में कुछ गोद॥
पानी केरा बुदबुरा अस मानुष की जात। देखते ही छिपि जायगा ज्यों तारा परभात।
रात गवाँई सोय करि दिवस गँवायो खाय। हीरा जन्म अमोल था कौड़ी बदले जाय।
आज कहैं कल्ह भजूँगा काल कहैं फिर काल। आज काल के करत ही औसर जासी जाल॥
आछे दिन पाछे गये गुरु से किया न हेत। अब पछतावा क्या करै चिड़िया चुग गई खेत॥
काल करै सो आज कर आज करै सो अब। पल में परलै होयगी बहुरि करैगा कब॥
कबिरा नौबत आपनी दिन दस लेहु बजाय। यह पुर पट्टन यह गली बहुरि न देखो आय॥
पाँचों नौबत बाजती होत छतीसों राग। सो मन्दिर खाली एड़ा बैठन लागे काग॥
यह तन काँचा कुम्भ है लिये फिरै था साथ। टपका लागा फूटिया कछु नहिं आया हाथ।
आये हैं सो जायँगे राजा रंक फकीर। एक सिंहासन चढ़ चले एक बँधे जंजीर॥
कबिरा आप ठगाइयें और न ठगिये कोय। आप ठगे सुख ऊपजें और ठगे दुख होय॥
तू मत जानै बाबरे मेरा है सब कोय। पिंड प्राण से बँध रहा सो अपना नहिं कोय॥
इक दिन ऐसा हो गया कोउ काहू को नाहिं। घर की नारी को कहे तन की नारी जाँहि॥
माली भावत देखिकै कलियाँ करी पुकार। फूली फूली चुनि लिये कालि हमारी बार॥
भक्ति भाव भादों नदी सबै चली बहरा। सरिता सोइ सराहिये जेठ मास ठहराय॥
जब लगि भक्ति सकाम है तब लाग निष्फल सेव। कह कबीर वह क्यों मिले निष्कामी निज देव॥
कबिरा हँसना दूर करु रोने से करु चीत। बिन रोये क्यों पाइये प्रेम पियारा मीत॥
हँसी तो दुख न बीसरै रोवों बल घटि जाय। मनहीं माहिं विसूरना ज्यौं घुन काठहिं खाय॥
माँस गया पिंजर रहा ताकन लागे काग। साहिब अजहुँ न आइया मन्द हमारे भाग॥
पावक रूपी नाम है सच घट रहा समाय। चित चकमक चहूटै नहीं घूवाँ ह्वै ह्वै जाय॥
जो जन विरही नाम के तिनकी गति है येह। देही से उद्यम करैं सुमिरन करैं विदेह॥
आगि लगी आकाश में झरि झरि परै अंगार। कबिरा जरि कंचन भया काँच भया संसार॥
कबिरा वैद बुलाइया पकरि के देखि वाहिं। वैदन बेदन जानई करक करेजे माहि॥
जाहु वैद घर आपने तेरा किया न होय। जिन या देदन निर्मई भला चरेगा सोय॥
आब गई आदर गया नैनन गया सनेह। ये तीनों तबही गये जबहिं कहा कछु देह॥
प्रेम न बाड़ी ऊपजै प्रेम न हाट बिकाय। राजा परजा जेहि रुचै सीस देह लै जाय॥
छिनहि चढै छिन ऊतरै मो तो प्रेम न होय। अघट प्रेम पिंजर बसै प्रेम कहावै सोय॥
प्रेम प्रेम सबकाई कई प्रेम न वीन्हें को। आठ पहर मीना रहै प्रेम कहावै सोय॥
जब मैं था तब गुरु नहीं अब गुरु मैं हम नाहिं प्रेम गली अति साँकरी ता में दो न समाहि॥
जा घट प्रेम न संचरै सो घट जान मसान। जैसे खाल लुहार की साँस लेत बिन प्रान॥
जल में बसै कमोदिनी चन्दा बसै अकास। जो हैं जाकों भावता सो ताही के पास॥
तत्व तिलक माथे दिया सुरति सरवनी कान। करनी कण्ठी कण्ठ में परसा पद निर्वान॥
कबिरा माला मनहिं की और सँसारी भेख। माला फेरे हरि मिलैं गले रहँट के देख॥
बिनवत हौं कर जोरिकै सुनिये कृपा निधान। साधु संगत सुख दीजिये दया गरीबी दान॥
अवगुन मेरे बाप जी बकसु गरीबनिवाज। जो मैं पूत कपूत हौं तऊ गिता को लाज॥
साहिब तुमहिं दयाल हौ तुम लगि मेरी दौर। जैसे काग जहाज को सूझैं और न ठौर॥
सिष तो ऐसा चाहिये गुरु को सबकछु देय। गुरुतो ऐसा चाहिये मिष से कछु नहिं लेय॥
तरयर तासु बिलम्बिये बारह मास फलन्त। सीतल छाया सघन फल पंछी केल करन्त॥
साधु कहावत कठिन हैं ज्यों खाँड़े की धार। डगमगाय तो गिर परे निःचल उतरै पार॥
गाँठी दाम न बाँधई नहिं नारी से नेह। कह कबीर तार साधु के हम चरनन की खेह॥
जाति न पूछो साधु की पूछि लीजिये ज्ञान। मोल करो तलवार का पड़ा रहने दो म्यान॥
कबिरा संगत साधु की हरै और ही व्याधि। संगत बुरी असाधु की आठों पहर उपाधि॥
कबिरा संगत साधु की ज्यों गन्धी की बास। जो कछु गन्धी दे नहीं तौ भी बास सुबास॥
पौथी पढ़ पढ़ जग मुआ पण्डित हुआ न कोय ढाई अक्षर प्रेम का पढ़े सो पण्डित होय॥
[श्री महावीरप्रसाद विद्यार्थी, एम. ए., साहित्य-रत्न]
माँ प्राची के आँगन में बिखरा अनुराग तुम्हारा!
आलोक राशि रवि-शशि-युत नीलत-सा अम्बर श्यामल छाया रहता जग-शिशु पर ममतामय उज्ज्वल अंचल!
खगकुल के कल कल स्वर में मुखरित है राग तुम्हारा!
मदु-रञ्जित-पल्लव-विरचित- बल्लरी-अंक में सोती- कलिका-कपोल पर बिखरे जो उजले-उजले मोती
करुणों! उनके अणु-अणु में अंकित है त्याग तुम्हारा!
प्यासी धरती पर घिरती जलधर-माला नव श्यामल, माँ, बरस-बरस पड़ता है तब प्यार तुम्हारा उज्ज्वल!
सुरभित पुलकित फूलों में मधु, रूप, पराग, तुम्हारा।
सरिता के वक्षःस्थल में उमड़ाती दया तुम्हारी, माँ, प्राण फूँक कर अपने तुमने जड़ सृष्टि संवारी!
कृमि-कीट मात्र रह जाते हम खोकर भाग तुम्हारा! माँ, प्राची के आँगन में बिखरा अनुराग तुम्हारा!
*समाप्त*