“स नः पर्षद अतिद्विषः”
अथर्ववेद 6। 34। 1
हे ईश्वर! हमें द्वेषों से पृथक कर दे।
“भद्रं कर्णेभिः श्रृणुयाम”
यजुर्वेद 25। 21
हम कानों से सदा भद्र मंगलकारी वचन ही सुनें।
“एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”
ऋग्वेद 1।164। 46
उस एक प्रभु को विद्वान लोग अनेक नामों से पुकारते हैं।
“तमेव विद्वान विभाय मृत्योः”
अथर्ववेद 10। 8। 44
आत्मा को जानने पर मनुष्य मृत्यु से नहीं डरता।
“अग्निर्मेघाँ दधातु मे”
अथर्ववेद 1। 943। 1
परमात्मा देव भुक्त में सर्वश्रेष्ठ बुद्धि को धारण करावें।
“अनुव्रतः पितुः पुत्रों”
अथर्ववेद 3। 30। 2
“स्वस्ति गोम्यो जगते पुरुषेभ्यः”
अथर्ववेद 1। 39। 4
सब पशु पक्षी और प्राणी मात्र का भला हो।
“संगच्छध्वम् संदध्वम्” ऋग्वेद 10। 19। 2
मिल कर चलो और मिल कर बोलो।
”शुद्धाः पूता भवत यज्ञियासः”
ऋग्वेद 5। 51। 1
शुद्ध और पवित्र बनो तथा परोपकारमय जीवन वाले हो।
”आप्नुहि श्रेयसिमतिसमं क्राम”
अथर्ववेद 2। 11। 1
अपने समान लोगों से आगे बढ़ और श्रेय को प्राप्त कर।
“रमन्तां पुण्या लक्ष्मीर्याः पापीस्ता अनीनशम”
पुण्य और कमाई तेरे घर की शोभा बढ़ावे, पाप की कमाई को मैं नष्ट कर देता हूं।
वर्ष १३ संपादक-श्रीराम शर्मा, आचार्य अंक 9
(हरिनंदन मिश्र आयुर्वेदाचार्य)
उठ रे मानव निज नींद भगा युग बीत गया तुझको सोते।
अति दूर पड़ी तेरी मंजिल चढ़ना-बढ़ना आसान नहीं।
सोना, रोना, सुधि को खोना सचमुच सुख का सामान नहीं।
झूठी सुमनों की सेज सजी, अच्छा है शूलों पर हंसना।
मिथ्या महलों की मीनारें, इनसे शुभ टीलों पर बसना।
निर्माण नया करना राही क्यों व्यर्थ यहां साहस खोते।
उठ रे मानव निज नींद भगा युग बीत गया तुझको सोते।
चलते आंधी तूफान निरे दीपक जलते रहते फिर भी।
उठते सागर में ज्वार अरे? जलपोत नहीं रुकते फिर भी।
अड़ते आखिर पथ में गिरि भी पर चीर उन्हें सरिता बहती।
कारा की काल कोठरी में देखी कवि की कविता बनती।
तुझको नौका अपनी खेती पतवार नये सिर से होते-
उठ रे मानव निज नींद भगा युग बीत गया तुझको सोते।।
बढ़ने वाले रुकते न कभी भीषण बाधा बरसातों में।
उड़ने वाले थकते न कभी पंछी नभ-झंझावातों में।।
जिनका अंगारों से परिचय उनको न कभी जलने से भय।
निर्भीक वही मिटते जाते, उनको मिलती मिटने से जय।
फलते जग में प्राणी जाहिर पर पीड़ा खुद हैं ढोते।
उठ रे मानव निज नींद भगा युग बीत गया तुझको सोते
(श्री ब्रजमोहन जी मिहिर)
पीड़ित व्यक्ति के लिए वास्तव में यह संसार दुःख-कानन है। दुःख से घिरे हुए व्यक्ति के अन्दर केवल एक ही विचार कार्य करता है कि वह निरीह और घृणास्पद है। अन्य व्यक्ति न उसके प्रति आकृष्ट होते हैं और न हार्दिक संवेदना ही प्रकट करते हैं और तो और, उसका स्वयं अपने ही ऊपर विश्वास हट जाता है। बात यही है कि दूसरों से न उसे सहायता मिलती है और न सान्त्वना ही, पर उसके मन से यह बात अलग नहीं होती कि शायद किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उसे दुःख से छुट्टी मिल जाय।
दुःख के अवसर पर मन से किसी प्रकार की सहायता नहीं मिलती, क्योंकि उसकी अनर्गल इच्छाएं ही दुःख उत्पन्न करती हैं। इच्छाओं से उत्पन्न सुख का तो वह आलिंगन करता है पर दुःख के उपस्थित होने पर उसकी कुछ सुने बिना ही वह उसे भगा देना चाहता है। परिस्थितियों के अनुकूल होने पर यदा-कदा उसे अपनी चाल में सफलता मिल जाती है और बुद्धि निस्सहाय होकर सुषुप्ति-अवस्था में चली जाती है और दुःख के विषय पर गंभीर विचार करने में असमर्थ हो जाती है। मन के चक्र में फंसा हुआ प्राणी इस प्रकार अधिक काल तक दुःख भोगता रहता है। एक के बाद दूसरा-इस प्रकार कितने ही जीवन ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं।
कुछ लोग ऐसे ही भी हैं जो दुःख की घड़ी उपस्थित होने पर उस पर विचार करते हैं और सत्संग का आश्रय लेते हैं। लेकिन अधूरे विचार और बाहरी सत्संग से उन्हें विशेष लाभ नहीं होता, क्योंकि उसमें भी दुःख से भागने के अतिरिक्त उनका कोई दूसरा अभिप्राय नहीं होता। दुःख पर विचार करते समय या सत्संग के अवसर पर उनका पूरा मन वहां नहीं रहता। उनका मन सदा इधर-उधर भटकता रहता है और दूसरों की बातें में दुःख से छुटकारा पाने के लिए समाधान ढूंढ़ता है, जो उसे कभी नहीं मिलता है। कारण वह अपने इन्द्रिय-सुखों को छोड़ना नहीं चाहता। दुःख के अवसर जीवन में बार-बार आते हैं और जब-जब आते हैं। तब-तब मनुष्य को गहरी चोट पहुंचाते हैं। मनुष्य उससे तिलमिला उठता है, रोता और चिल्लाता है, पश्चाताप करता है और उसके मन में भोगों से मुंह मोड़ने की भी इच्छा होती है लेकिन पुरानी आदत अवसर पाने पर उसे भोग-भोगने के प्रति पुनः प्रवृत्त कर देती है और उसका पूर्व का प्रत्यय मन्द पड़ जाता है। वास्तव में उसका यह दुःख भी प्रतारण ही है। किसी कार्य के प्रति सच्चे दुःख से सजगता उत्पन्न होती है। यदि ऐसा न हो, तो समझो कि दुःख का उसके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। दुख में यदि मनुष्य नहीं संभला तो संसार में ऐसी कोई शक्ति नहीं है, जो उसे सत-पथ पर ले आ सके।
जिस मनुष्य ने जिन्दगी की बातों को अर्थात् उसके सुख-दुःख को भली−भांति समझ लिया है और जिसके मन में दुःखों से छुटकारा पाने की तीव्र इच्छा उत्पन्न हो गयी है, उसे जीवन-पर्यन्त सत्संग करते रहने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। सत्संग से बहुत कम लाभ उठाने वाले वे ही व्यक्ति होते हैं जो सदा सत्संग करते रहते हैं, लेकिन अपने को समझने की कभी कोशिश नहीं करते। अन्य सभी इन्द्रियों की भांति सत्संग भी उनके लिए वार्तालाप करने का एक स्थान हो जाता है। कहीं दो घड़ी बैठ कर जहां भी वे अपना मन बहला लिया करते हैं, ऐसे लोगों के अज्ञान का जल्दी अन्त नहीं होता। जीवन की किसी बात को सम्मुख रखकर, जिसको कि समझने की उसे अतिशय आवश्यकता है, यदि वह किसी सन्त के पास जाता है तो सम्भव है कि उसे अल्पकाल के सत्संग से ही बहुत बड़ा लाभ हो जाय। लेकिन जो केवल बात सुनने और समय बिताने की गरज से सत्संग करता है, उसे बहुत कम और देरी से लाभ होता है। अष्टावक्र ऋषि ने तो राजा जनक को रकाब पर पैर रखने के जितने अल्प समय में ही ज्ञान करा दिया था। सत्संग का अभिप्राय है-मार्ग में किसी विघ्न के आ जाने पर उसका समाधान कर लेना। हर बात को समझते और साधते हुए आवश्यकता उपस्थित होने पर सत्संग से लाभ उठाते हुए जीवन को ले चलने पर मार्ग सुगम हो जाता है।
मनुष्य का जीवन एक वाटिका है। वाटिका को अच्छी दशा में रखने के लिए उस पर सब ओर से निगाह रखनी आवश्यक है। उद्यान के सौन्दर्य को नष्ट कर देने वाली कोई चीज यदि बीच में उग जाती है तो चतुर माली उसे तुरंत उखाड़ फेंकता है। बाग देखने में यदि अच्छा न हुआ तो माली का सारा परिश्रम व्यर्थ समझा जाता है। माली जमीन को खूब बहाता है और उसे मुलायम बना देता है। जमीन के सब प्रकार से अच्छी हो जाने पर यह भांति-भांति के पुष्प और फल के वृक्षों को यथास्थान उसमें बैठाता है। प्रवीण माली द्वारा इस प्रकार सजाया हुआ बाग देखने में सुन्दर मालूम होता है। बाग के मालिक की भी वहां बैठने की इच्छा होती है और आगंतुकों की भी। यह जीवन भी एक उद्यान के समान है। इसे सब प्रकार संभाल कर रखना चाहिए, ताकि इसकी स्वाभाविक प्रगति में किसी प्रकार का विघ्न न उपस्थित हो। बहुत प्रकार की इच्छाओं से घिर जाने पर मनुष्य का जीवन बिना संभाली हुई वाटिका के समान हो जाता है। इच्छाओं की पूर्ति करने में वह परिश्रम करता है और उसमें संलग्न रहता है। सफलता भी होती है पर प्रायः वह विफल ही रहता है। बहुत समय तक इस सुख-प्राप्ति की धुन में लगे रहने के कारण उसे अनेकों प्रकार के अनुभवों से होकर गुजरना पड़ता है। सुख के बीच उसकी प्रतिक्रिया से इसे प्रत्यक्ष अघात पहुंचता रहता है। फिर से वह इसकी को सही जीवन समझता है। दुःख के बहुत बढ़ जाने पर जीवन कभी-कभी उसे भार मालूम होने लगता है। इस घबराहट के बीच उसके मन में एक ही धुन रहती है विपरीत स्थिति और दुःख से कैसे छुटकारा मिले। इसके लिए वह न करने योग्य भी कार्य कर डालता है। दुःख के बहुत बढ़ जाने पर मन और बुद्धि पर उसका काबू नहीं कर जाता। मन की अतिशय खिन्न दशा में तो प्राणी शरीरान्तक चाहने लगता है अशान्त चित्त की यह बहुत ही मलिन दशा है। इसलिए दुःख की साधारण दशा में होश के रहते हुए जब चित्त में सजगता उत्पन्न हो, तो इस अवसर को हाथ से न जाने देना चाहिए। दुःख के समय उत्पन्न हुई सजगता को चिरस्थायी बनाये रखने के लिए उचित प्रतिविधान करना चाहिए।
चूंकि हमें अपने सुख का आवश्यकता से अधिक ध्यान रहता है, इसलिये जीवन में यह सारी गड़बड़ी और मुसीबतें हैं। इन्द्रिय सुख के सम्बन्ध में प्रत्येक का यही अनुभव है कि वह ऐसा सुख नहीं है, जो मनुष्य को निश्चिंत कर दे। प्रत्युत वह दिनोंदिन कष्ट उत्पन्न कर बंधन को बढ़ाता ही रहता है। इस सुख में तृप्ति नहीं है। किसी भोग को कुछ समय तक स्थायी रखने से मनुष्य को उसकी आदत पड़ जाती है। फिर तो अनायास ही अचेतन मन उस काम को कर बैठता है। इन्द्रिय सुखों में यदि कोई विघ्न और निर्बंध न होता तो कदाचित इसको भी स्वाभाविक कहा जा सकता और फिर उससे छुटकारा पाने की कोई बात न सोची जाती। संसार में दिखलायी यही देता है विघ्न-बाधाओं से विमुक्त होकर कोई भी व्यक्ति इन्द्रिय-सुखों को नहीं भोग सका है। किसी भी सुख के भोग में सबसे बड़ा विघ्न तो अपना शरीर ही है। इसके अतिरिक्त परिस्थिति की विभिन्नता अनुसार अनेकों प्रकार की दिक्कत है, जो मनुष्य के सामने रोज आया करती है और मनुष्य उनका नित्य प्रति अनुभव करता है। देखने और विचार करने पर यह भी मालूम पड़ता है कि सुख का कोई कार्य नहीं है, जिसके लिए हमें बाह्य किसी भी वस्तु पर निर्भर करना पड़ता हो या हम पर उसकी प्रतिक्रिया न होती हो। ऐसा दशा में कौन प्राणी यह कह सकता है उसका सुख विघ्न-बाधाओं से रहित है। जब यह दशा है तो मनुष्य के लिए आवश्यक हो जाता है कि वह अपने सुख-दुःख के प्रति सजग होकर जीवन की बातों को समझने की कोशिश करे और अपनी किसी इच्छा का जबर्दस्ती दमन न करके उसके रहस्य को समझे। इच्छा का रहस्य जब भली प्रकार अवगत हो जाता है, तब उसे त्याग करने में दुःख नहीं होता। उचित प्रयास द्वारा मनुष्य उसे छोड़ने में समर्थ होता है। यह काम भी आसन नहीं है। यदि मनुष्य यदा सजग रहे तो सम्भव अवश्य है। सजग होकर भी यदि मनुष्य अपने चिरकाल के अभ्यास को नहीं छोड़ पाता तो उसे कोई दूसरी संज्ञान युक्ति बतलायी भी नहीं जा सकती। ऐसे असमर्थ प्राणी सदा दुःख में ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं। मनुष्य को सच्चे मार्ग पर लाने के लिए दुःख से बढ़कर कोई वस्तु नहीं है। दुःख ही मनुष्य को सजग होने का अवसर प्रदान करता है। सजगता द्वारा जीवन का बोध हो जाने पर उसकी गति स्वाभाविक हो जाती है। आरम्भ में चित पहले से भी अधिक अशान्त हो जाता है, लेकिन यह अशान्ति सजगता के प्रकाश में धीरे-धीरे कम होने लगती है। आरम्भ की यह वह परेशानी है जो जीवन को समझ की राह पर ले जाती है। इस परेशानी के बीच ही जीवन का सच्चा रहस्य प्रकट होता है। शनैः शनैः मनुष्य उसके बीच में रह कर उसको देखता हुआ और उसके रहस्य को समझता हुआ उससे मुक्त हो जाता है। जीवन त्याज्य बातों को समझकर ज्यों-ज्यों मनुष्य उन्हें आसानी से छोड़ सकने में समर्थ होता जाता है, त्यों-त्यों उसका जीवन अधिकाधिक स्वाभाविक और गंभीर बनता जाता है। त्याग की हुई वस्तु में फिर उसका राग नहीं रह जाता। छोड़ने पर मन में उसके प्रति न कोई क्षोभ होता है और न उस पर विजय प्राप्त करने का रहस्य ही। वह प्राणी अपनी किसी दशा में प्रतिहत नहीं होता। जीवन उसको अधिक रुचिकर और अपना मालूम होता है, क्योंकि उसने उसे पास से देखा है और उसके अलग-अलग पहलुओं पर गौर करना सीखा है। जीवन के साथ समवर्ती होने पर कष्ट कम होने लगता है। उसके सामने जो बात आयेगी, उसे समझने के लिए वह अपना हृदय, मन और बुद्धि अर्पित कर देगा। उसके विचार और कार्य में कोई अन्तर न होगा। अपने को समझने के लिए मनुष्य को अन्य किसी व्यक्ति के उपदेश और आलोचना की आवश्यकता नहीं होती। राग-द्वेष से प्रेरित होकर वह न किसी के प्रति प्रेम प्रदर्शित करेगा और न किसी से घृणा करेगा, न किसी को अपना मित्र समझेगा और न शत्रु ही। वह मनुष्य अपने को समझने में इतना संलग्न हो जायेगा कि बाह्य वस्तुएँ उसके प्रति उपेक्षणीय हो जायेंगी। दूसरों की बातों पर ध्यान देने के लिए उसके पास समय न रहेगा और न वह दूसरों के प्रति कोई विरुद्ध बात ही सोचेगा। किसी को अपने से श्रेष्ठ समझ कर न वह उसका प्रभुत्व स्वीकार करेगा और न किसी को अपने से न्यून समझ कर उसकी उपेक्षा करेगा या उस पर प्रभुत्व दिखलायेगा। दोनों ही दशाओं में भीतर भय और भेद रहता है, इसलिये ऐसे जीवन में न समत्व होता है और न स्वाभाविकता ही। इसका परिणाम संकीर्णता और अवनति है।
जीवन में जब दूसरों का प्रभाव अधिक पड़ने लगता है तब वह मनुष्य अपना नहीं कर जाता। उसके अन्दर विचार और स्वतन्त्र कार्य करने की क्षमता का अभाव हो जाता है। जीवन की ऐसी परिस्थिति में सत्य का प्रदर्शन नहीं होता। सत्य का अनुभव करने के लिए प्रत्येक प्राणी को अपना बन जाने की आवश्यकता है। सत्य की खोज करने वाले को हर्ष, शोक, मोह, अनुराग और प्रभुत्व की भावना को अपने पास नहीं आने देना चाहिए। ये दशाएं मन को उत्तेजित करने वाली होती है। चित को ऐसी स्थिति में रखा जाय कि उस पर बाहरी कोई बात अपना प्रभाव न डाल सके। चित्त में जब आनन्द और निरालम्ब प्रेम स्थान पा लेता है, तब अपने-पराये का भेद मिट जाता है। ऐसा पुरुष न कभी उदास रहता है और न मन लगाने के लिए किसी अवलम्ब की आवश्यकता अनुभव करता है। जीव-जन्तु और लता-बल्लियों के साथ उनका सौहार्द हो जाता है। कष्टदायक अवसरों का भी जीवन में अभाव होना आरम्भ हो जाता है। मन सदा प्रसन्न और एकाग्र रहने लगता है। संसार के साथ उसका अम्लान प्रेम का सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। उसको सर्वत्र सत्य का दर्शन होता है और प्रत्येक अवस्था उसके आनन्द की अवस्था हो जाती है। वायु के रूप में वह संसार की सैर करेगा। फूल-पत्तियों और घास के साथ वह नृत्य करेगा, आकाश उसका रूप होगा, जल, पृथ्वी और अग्नि उसके बाह्य प्रतीक होंगे। संसार की प्रत्येक वस्तु के साथ जब एकता और मैत्री स्थापित हो जायेगी, तब वह खिन्न और भयातुर क्यों रहेगा। उस शुद्ध और पवित्र मन के अन्दर यह वांछित भावना उदय होती है। ऐसे उद्बोधित पुरुष संसार में आनन्द-प्रसार करने के केन्द्र बन जाते हैं। व्यक्त और अव्यक्त दोनों दशाओं में उनके द्वारा कार्य-सम्पादन होता रहता है। आनन्द-उपलब्धि की यह भावना स्वार्थ की भावना नहीं है। इसमें निवास करने से मन के संकल्प-विकल्पों का तिरोभाव हो जाता है। जीवन की शुद्ध और सात्विक सहज दशा है। ऐसे व्यक्ति को देखकर दूसरे प्राणी भी इस शुद्ध भावना को ग्रहण करने की इच्छा करने लगते हैं और इस ओर अपना प्रयास आरम्भ कर देते हैं। इस शुद्ध अवस्था की प्राप्ति एक ही क्षण में नहीं है पर इसमें हताश होने की कोई बात नहीं है। सत्य सबके लिए एक और अनिवार्य है। सभी एक-न-एक दिन इसे प्राप्त करेंगे-प्रश्न केवल समय का हो सकता है। इसके लिए सबसे आवश्यक बात है-तीव्र वेग का होना। तीव्र वेग वाले प्राणी इसे शीघ्र प्राप्त कर लेते है। उन्हें इधर-उधर भटकता नहीं पड़ता। देर तो उनको लगती है, जो मन्द वेग के कारण रास्ते में रुक कर इधर-उधर की सेर करने लगते हैं। आपने देखा होगा कि पर्वतारोहण के शौकीन कुछ ऐसे भी होते हैं जो मार्ग के संकटों की कुछ परवाह नहीं करते। हर एक विघ्न बाधाओं का अतिक्रमण करते हुए वे मनोवांछित शिखर पर पहुंच जाते हैं। चलते-चलते उनके पैरों में रक्त स्राव होने लगता है, पर वह भी उनका आगे बढ़ना रोक नहीं देता। श्री मानसजी के हनुमान जी तीव्र वेग की भावना के एक सुन्दर जगमगाते हुए अनुपम निदर्शन हैं। सत्य की खोज के लिए उनके मन में अपार उत्साह था। जिस गंभीर और विस्हत सागर को देखकर लोग भयभीत हो जाते हैं उसे उन्होंने एक ही छलांग में पार कर लिया। उनका जीवन अमर है। औरों में वह पराक्रम, शक्ति और सत्य की खोज का वेग नहीं था, इसीलिए भगवान श्री राम को उन्हें पार उतारने के लिए सेतु बांधने का आयोजन करना पड़ा। पर पार सब हो गये, क्योंकि सभी के अन्दर उद्देश्य की पूर्ति के लिए लगन थी, सबका हृदय और मन शुद्ध हो चुका था और सभी सत्य पथ के पथिक थे। मन और हृदय दोनों में जब किसी वस्तु के लिए अदम्य आकांक्षा उत्पन्न होती है तब प्राणी उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है इसके लिए किसी भी प्रयास को वह सहर्ष स्वीकार करता है।
भिन्न-भिन्न उपायों द्वारा लोगों ने इसकी खोज की और उनका कहना है कि सत्य की प्राप्ति के लिए मार्ग अनेक हैं, किन्तु मैं तो समझता हूं कि सत्य की प्राप्ति का मार्ग केवल एक है और वह है ‘‘जीवन के रहस्य को समझना।’’ इसे लोग जब तक भली प्रकार नहीं समझ लेते, तब तक वे अनेकों मार्ग और अनेकों उपायों द्वारा अनुभव प्राप्त करने की चेष्टा करते रहते हैं। लोग कहते हैं कि ईश्वर घट-घट में व्याप रहा है, लेकिन वह भी केवल मुंह से ही कहते हैं। इस सत्य को समझ लेने पर प्राणी अपने प्रत्येक कार्य का जिम्मेदार हो जाता है। वह अपने अन्तरात्मा की ध्वनि को सुनता है और उसके अनुसार आचरण करता है। अर्थात् वह प्रत्येक कार्य में अपने हृदय और मन को एक करके कार्य करने की चेष्टा करता है। हृदय और मन में ऐक्य में ही बुद्धि का विकास है। अन्तः करण में ईश्वर, सत्य अथवा जीवन को अनुभूति हो जाने पर प्राणी अपने समस्त कार्यों के प्रति सावधान हो जाता है। उसका यह पथ जीवन की वास्तविकता को सामने रखता है। इससे जीवन स्वाभाविक और सरल बनता है। फिर उसके अन्दर ईश्वर प्राप्ति और सत्य को जानने की कोई इच्छा नहीं रह जाती, प्रत्युत उसका जीवन ही सत्य हो जाता है। उसका प्रत्येक आचरण, व्यवहार और कार्य इस प्रकार का होता है कि उससे कोई कर्मबंधन नहीं स्थापित होता। इस प्रकार का समत्वमय जीवन ही सत्य है और इसमें ईश्वर का दर्शन है।
सत्य की अनुभूति के बाद सब बातों और सब दशाओं में मनुष्य अपनी सत्ता का अनुभव करता है। संदेह उसके मन से हट जाता है। प्रत्येक स्थिति में वह सत्य के अन्दर निवास करता है। अकेलेपन की भयावह दशा का भी अन्त हो जाता है। प्रतिक्षण सत्य के सम्मुख होने से वह सदा आनन्द में निवास करता है।
सत्य विहीन मनुष्य की दशा जल से बिछुड़ी हुई मछी की-सी होती है। कुछ क्षण में जीवित तो रहते हैं, लेकिन उनके जीवन में आनन्द, उत्साह और सार नहीं रहता। उनकी दशा उस मीन की सी होती है, जो किसी मछुए के जाल में फंसकर अतिशय दुःख से प्राण त्याग करती है। अपने किसी क्षणिक सुख के कारण यदि किसी मनुष्य ने अपनी दशा को इससे कुछ अतिरिक्त समझा है तो मैं कहता हूं कि वह भ्रान्त है और अपने जीवन को भली प्रकार नहीं समझ रहा है। संसार एक बहुत ही बड़ा जाल है, उसके असंख्य छिद्रों में मनुष्य अपनी इच्छाओं की तृप्ति देखता है और लोभ-मोह के कारण उसमें फंसने की चेष्टा करता है। एक बार फंस जाने पर उससे निकलता कठिन है, अतः मनुष्य को श्वास-प्रश्वास में सचेत रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय नहीं है।
पूर्ण सचेत हो जाने पर कर्तव्य का भाव भी जाता रहता है और उसे कोई वस्तु अपने में फंसा नहीं पाती। आनन्द की सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण वस्तु जब दूसरी नहीं है तब संसार का क्षणिक सुख-दुःख पश्चिम में डूबते हुए सूर्य की भांति मन को दूर देश में कहीं अस्त हो जाता है। यह जीवन में तटस्थता की दशा है, जहां संसार के वैभव आकाश में स्थिति प्रातःकालीन नक्षत्रों की भांति फीके होकर आनन्द के परम प्रकाश में विलीन हो जाते हैं। आनन्द की प्राप्ति के पश्चात् संसार की बातों का चित्त पर असर ही नहीं होता। फिर कोई भी पदार्थ अपनी ओर आकृष्ट नहीं कर सकते। सारे प्रपंच मिट जाते हैं।
जब यही एक वस्तु जीवन में प्राप्त करने योग्य है, बल्कि यही जीवन है, तब मनुष्य यहां के सुख-दुःख के पचड़े में पड़कर व्यर्थ अपना समय क्यों नष्ट करता है। मार्ग में यदि कोई प्रतिरोध आ जाय तो उस पर विचार करना चाहिए और उसे समझने की कोशिश करनी चाहिए। आनन्द को सम्पूर्ण रूप में प्राप्त कर लेने की प्रत्येक मनुष्य के अन्दर अभिलाषा होनी चाहिए। इस पथ पर चलते हुए भी ऐसा नहीं है कि दुःख न आवे। दुःख के आने पर उसे टालने की कोशिश न की जाय। ऐसा करने से लगन के होते हुए भी लक्ष्य तक पहुंचने में विलम्ब होगा।
आनन्द की अनुभूति कोई किसी को करा दे, यह सम्भव नहीं है। अपने ही प्रयास से जीवन की यह स्थिति प्राप्त की जाती है। यह कोरी कल्पना नहीं है। बोधपूर्वक प्रयास करने पर इसमें सफलता मिलती है, वह ध्रुव सत्य है। प्रत्येक मनुष्य अपने पुरुषार्थ और प्रयास के द्वारा इसे प्राप्त कर सकता है। लोगों के जीवन में विभिन्नता अवश्य दृष्टिगोचर होती है, लेकिन यह कोई रुकावट नहीं है। सत्य वस्तु में कल्पना के लिए कोई स्थान नहीं है।
चूंकि बहुतों के मन में सत्य को जान लेने की इच्छा और लगन है और किसी सरल मार्ग की खोज है, इसलिए मैं उनको इस पथ पर चलने के लिए आमंत्रित करता हूं। एक बार सजग होकर पैर आगे बढ़ा देने पर फिर निराश नहीं होना पड़ता और मनुष्य पीछे कदम हटाना पसन्द नहीं करता। समझ-बूझकर जब हम इस पथ पर पैर रखेंगे तब हमारे अन्दर सुख-दुःख के रहस्य को समझने की क्षमता आ जायगी। सुख का प्रसंग आने पर हमें फूलना नहीं चाहिए बल्कि उनके बीच में रहते हुए उनके रहस्य को समझकर उनसे मुक्त हो जाना चाहिए। आनन्द ही एकमात्र सत्य है। यही एक स्वाभाविक मन्दिर है, जहां सबको आना है। यहां बैठकर आप सच्चे ध्यान में निमग्न हो सकते हैं। इसको एक बार दृढ़तापूर्वक अपना लेने से सारा संदेह दूर हो जाता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य संसार का हो जाता है और संसार उसका हो जाता है। मैं−पन की पृथक भावना मिटकर विराट में लीन हो जाती है। राग-द्वेष की अग्नि सदा के लिए बुझ जाती है।
इस आत्यान्तिक आनन्द के प्राप्त कर लेने पर मनुष्य स्वतंत्रतापूर्वक संसार में विचरण करता है जो मनुष्य पूर्ण स्वतंत्र है और आनन्द में स्थिति वे ही संसार के सामने कुछ सही बात रख सकते हैं। आनन्द में प्रतिष्ठित हो जाने पर पुरुष प्राणी मात्र का मित्र हो जाता है और प्रेम ही उसका मुख्य आचरण रहता है प्रेम के अतिरिक्त उसके पास और कोई वस्तु नहीं रहती। इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर एक ही अनेक में देखने की क्षमता स्वाभाविक ही रहती है। यही मोक्ष की स्थिति है।
(श्री जेम्स ऐलन)
जो लोग बाह्य धार्मिक आडम्बरों के स्थान पर जनसाधारण से विमुक्त होकर सब जीवन सम्बन्धी मौलिक अन्वेषण करते हैं, उनका घमण्ड रूपी अन्धकूप में, जो ऐसे लोगों की प्रतीक्षा करता रहता है गिरना अवश्यम्भावी है। जो यह समझने लगते हैं कि उनके बराबर आध्यात्मिक प्रकाश पाने वाला कोई नहीं, उनके लिए अन्य धर्मों पर आक्रमण करना (रूढ़ि-प्रेमियों की निन्दा करना, मानो रूढ़ि-प्रेमी दोष का पर्याय है) साधारण सी बात हो जाती है। रूढ़ि से विलग होने का अर्थ पाप से मुक्त होना कदापि नहीं है। निःसन्देह सनातन धर्म से विलग होने वाला प्रायः अधिक कटु और अपमान-कारक होता है। यह परिवर्तन और बात है तथा हृदय-परिवर्तन कुछ और। धर्म से अपनी श्रद्धा हटा लेना सरल है परन्तु अपने का पाप से मुक्त करना बहुत कठिन है।
वास्तव में रूढ़ि और अनुमति नहीं, किन्तु घृणा और अहंकार ही त्याज्य हैं। पर धर्म नहीं किन्तु विज पाप ही घृणास्पद है। बुद्धिमान पुरुष इसलिए घमण्ड न करेगा कि दूसरों की अपेक्षा वह अधिक अनुभवशील है, अधिक उच्च स्थान पर है। जो ऐसे नाम मात्र के धर्म के दास अभी तक बने हैं, जिसको कि उसने छोड़ दिया है। दूसरों के प्रति संकुचित, स्वमतान्ध और स्वार्थी आदि शब्द प्रयोग करने से बुद्धिमता नहीं सूचित होती। कोई भी इन शब्दों का प्रयोग अपने प्रति अच्छा न समझेगा। धार्मिक लोगों को दूसरों के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करना चाहिए, जिसके प्रयोग से वे स्वयं दुःखी रहते हैं।
जो दया तथा नम्रता-प्रदर्शन कर रहे हैं, वे ही सचमुच बुद्ध है। वे अपने को तुच्छ समझते हैं। दूसरों के प्रति दया दिखाते हैं। अपने दोषों की निन्दा कठोर तर्क द्वारा किया करते हैं। अपराधों को दया-दृष्टि से देखते हैं। इस प्रकार वे प्रकृति तथा वस्तुओं की व्यवस्था को देखने के लिए ज्ञानचक्षु प्राप्त करते हैं जिनके व अन्य लोगों की तथा अन्य धर्मों की वास्तविकता ज्ञात करने में समर्थ होते हैं। अपने अन्य धर्मावलम्बी तथा नियम मात्र पृथक अनेक पड़ौसी को घृणा दृष्टि से नहीं देखते अनेक धार्मिक सम्प्रदायों का होना आवश्यक है जो अनेक धर्म-विशेष के प्रति निष्ठा रखते हैं और अपने समीपवर्ती के धर्म-पालन में प्रतिरोध नहीं करते, जो अपने पड़ौसी के धर्म कर्तव्य की निन्दा नहीं करते, वे ही संसार को पूर्ण शान्ति की और अग्रसर कर सकते हैं।
सब विभिन्न धर्मों में प्रेम रूपी ऐक्य-शक्ति है। प्रेमी जन सब धर्मों की सानुकम्प एकता में प्रवेश कर चुके हैं।
जो लोग धर्म के मौलिक तत्व को जान गये हैं, जिनका ज्ञान चक्षु खुल गया है, जिनका हृदय अगर दया दाक्षिण्य-वृत्ति में प्रवृत्त है, वे कलह तथा परनिन्दा को पास न फटकने देंगे, अपने मत की प्रशंसा-रूपी भ्रान्ति में न फंसेंगे। इस बात को साबित करने का प्रयत्न न करेंगे कि उनका ही मत सर्वश्रेष्ठ है। और वे दूसरे मतों का अपमान करके अपने धर्म को ऊँचा बनाने का प्रयत्न न करेंगे। जिस प्रकार सत्यवादी पुरुष अपनी तथा अपने कार्य की बड़ाई नहीं करता, उसी प्रकार विनम्र तथा दयाशील पुरुष अपने मन को सर्वोपरि करने का प्रयत्न नहीं करता और न तो दूसरों के पवित्र धर्मों का छिद्रान्वेषण करके अपने धर्म-विशेष का उन्नत करने के फेर में रहता है।
अपने धर्म की बड़ाई और दूसरे के धर्म की निन्दा न करनी चाहिये, प्रत्युत अन्य धर्मों का सम्मान करना चाहिये। सम्मान का कारण चाहे जो कुछ भी हो परन्तु इस प्रकार बरतने से अपने धर्म का ह्रास होगा और दूसरे धर्म का लाभ। विपरीत आचरण होने पर तथा दूसरे का अहित करने पर अपने धर्म का लोप हो जाता है। जो कोई परधर्म की निन्दा करके अपने धर्म का विज्ञापन करता है, वह वास्तव में अपने धर्म के प्रेमवश और उसकी ख्याति दूर तक फैलाने के लिये करता है। यह अंधकारमय तथा प्रगाढ़ भ्रम है, जिससे आकृष्ट होकर लोग यह सोचते हैं कि वे पर-धर्मों के छिद्रान्वेषण से अपने धर्म की सेवा कर सकते हैं। सबसे दयनीय बात तो यह है कि सदैव सनातन धर्मों की निन्दा कर, उन्हें समूल नष्ट करके अन्य लोगों को अपना मतावलम्बी बनाने के आनंद में, अपने ही मत को बदनाम तथा नष्ट करने के चिंतनीय कार्य में लीन रहते हैं।
जिस प्रकार कोई व्यक्ति दूसरों पर मिथ्याक्षेप कर प्रत्येक ओर अपने चरित्र तथा उत्कर्ष पर स्थायी आघात करता है, उसी प्रकार दूसरे मतों की निन्दा करके वह प्रत्येक बार अपने धर्म को तुच्छ तथा कलुषित बनाता है। अन्य धर्मों पर आक्रमण और दोषारोपण करने वाला वही मनुष्य होता है, जो अपने धर्म को अपमानित तथा उस पर आक्रमण होते देख बहुत दुःखी होता है यदि कोई मनुष्य अपने धर्म पर किये गये आक्षेपों को सहन नहीं कर सकता तो उसे ध्यान रखना चाहिये कि वह अन्य धर्मों पर भी आक्षेप न करें। यदि उसे अपने धर्म की प्रशंसा और सहायता करती आती है तो यह उसका कर्त्तव्य है कि वह अन्य धर्म की जो बाह्य रूप से भिन्न होते हुए भी (उसी के धर्म की तरह) श्रेष्ठ आदर्श को अपने सामने रखता है-सहायता तथा प्रशंसा करे। इस प्रकार साम्प्रदायिक जीवन के दुःखों तथा दोषों से मुक्त होकर वह दैवी त्याग तथा दान में भी अपने को दक्ष बना लेगा।
वह हृदय की सौम्यता तथा त्याग को अपना चुका है उन अन्य विकारों से मुक्त हो जाता है जो पक्षपातमय कलह, प्रखण्डता, उत्पीड़ा और कटुता की अग्नि को प्रत्येक युग में प्रज्ज्वलित रखते हैं। यह (हृदय) दया तथा कोमलता के विचारों में निवास करता है। न किसी का अनादर करता है और न किसी से घृणा, किसी से बैर नहीं मोल लेता। सौम्य जन ईश्वरीय-नियम की उस तह को जान लेते हैं जो अन्य प्रकार से नहीं जानी जा सकती। वह सब धर्मों तथा सम्प्रदायों में अच्छाई ही पाता है और उन अच्छाइयों को अपना लेता है।
सत्यान्वेषियों को मतों तथा द्वेष युक्त भेदों का त्याग करना चाहिए। उन्हें त्याग के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। त्यागी तथा दयाशील लोग मिथ्याक्षेप, परोक्ष निन्दा और दूसरों पर दोषारोपण करने से बिल्कुल दूर रहते हैं। ये अन्य धर्म को कुचलकर अपने धर्म की उन्नति नहीं चाहते।
सत्य अपना प्रतिवाद नहीं कर सकता। निर्दोषता, वास्तविकता तथा अटल ध्रुवत्व ही सत्य का स्वाभाविक गुण है। तब धर्मों तथा मतों में अनन्त विरोध क्यों? क्या यह भूल के कारण नहीं हैं? प्रतिवाद तथा कलह तो दोष के साम्राज्यान्तर्गत हैं क्योंकि दोष भ्रमात्मक होने से निज विरोधी होता है।
यदि ईसाई धर्म वाले अपने धर्म को सत्य और बौद्धधर्म को झूठा करार देते हैं और बौद्धधर्म वाले अपने धर्म को सत्य और ईसाई धर्म का मिथ्या बताते हैं तो हमारे सामने एक असात्त्वनीय विरोध खड़ा हो जाता है -क्योंकि दोनों धर्म सच्चे और साथ ही साथ झूठे नहीं हो सकते, परन्तु यदि ये दोनों धार्मिक सम्प्रदाय यह कहें या विचारें कि वास्तव में विरोध का कारण दोष है परन्तु दोष उनमें या उनके धर्म में नहीं किन्तु दूसरे मनुष्य में तथा उसके धर्म में है, तो उससे विरोध और बढ़ जाता है। तब दोष की जड़ क्या है? और सत्य कहां है? क्या इन व्यक्तियों के दृष्टिकोण से दोष नहीं है? क्या वे अपने-अपने दृष्टिकोण को बदल दें- यदि बैर का स्थान उदारता को दे दें तो क्या उन्हें वह सत्य भासित न होगा जो पारस्परिक विरोध से शून्य है?
जो व्यक्ति अपने धर्म को सत्य बतलाता है और दूसरे धर्म को मिथ्या, उसने वास्तव में अपने धर्म के मूल सार को नहीं जाना है -क्योंकि सार वस्तु के पाने पर सब धर्मों में सत्य का प्रकाश पाता है। जिस प्रकार विश्व के अखिल दृष्टव्य विषयों में केवल एक ही सत्य है, उसी प्रकार सब धर्मों की नैतिक शिक्षा पवित्र है-और तब महात्माओं ने केवल एक ही सार वस्तु का उद्देश्य दिया है। ईसा मसीह द्वारा दिये गये पर्वत पर धर्म के प्रवचन के उपदेश सब धर्मों में मिलते हैं और सब महात्मा तथा उनके अनुयायियों ने उन्हीं उपदेशों के अनुसार ही अपने जीवन को बिताया क्योंकि शुद्ध हृदय तथा दोषरहित जीवन ही सत्य है। सिद्धान्तों तथा मत समूहों में सत्य नहीं है। हृदय शुद्धि, जीवन की पवित्रता, करुणा प्रेम तथा परहितेच्छा के ऊपर ही सब धर्म दीक्षा देते हैं। वे सुकर्म करने का और पाप तथा स्वार्थपरता त्यागने का उपदेश देते हैं। ये बातें, सिद्धांत ईश्वर-शास्त्र तथा मतों से कुछ सम्बन्ध नहीं रखतीं। ये क्रियात्मक हैं, अभ्यास करने के लिए हैं और जीवन में व्यवहार के रूप में आचरणीय हैं। लोगों में इन बातों पर मतभेद नहीं होता क्योंकि वे तो प्रत्येक मत द्वारा प्रतिपादित द्वारा सच्चाइयां हैं। पर आखिर मतभेद किस बात के लिए होता है? केवल मीमांसा तथा ईश्वर-शास्त्रों के विषय में ही। लोग सच्ची बातों के विषय में नहीं वरन् झूठी बातों के विषय में मतभेद करते हैं। वे सत्य पर नहीं वरन् दोषों पर कटते-मरते हैं। सब धर्मों का तथ्य यह है कि सत्य के विषय में कुछ जानने के पहिले प्रत्येक व्यक्ति अपने भाइयों से कलह करना छोड़ दे और उसके साथ प्रेम और उदारतापूर्वक बर्ताव करें। किसी व्यक्ति के लिए यह करना उस समय तक कैसे सम्भव होगा जब तक वह अपने पड़ौसी के धर्म को झूठा समझकर उसे समूल नष्ट कर देना अपना परम कर्त्तव्य समझता है? वह दूसरों के प्रति उस व्यवहार का प्रदर्शन नहीं है जिसकी आशा हम अन्य तरीके से अपने प्रति करते हैं।
सत्य और वास्तविकता सब देश और सब काल में अपने ही रूप में रहती है। पवित्र ईसाई और पवित्र बौद्ध में कुछ भी अन्तर नहीं। दोनों में हृदय को शुद्धता, जीवन की पवित्रता, निर्दोष आकांक्षाएं और मृत्यु-प्रेम पाये जाते हैं। बौद्ध धर्मावलम्बी के सुकर्म एक ईसाई के सुकर्म से भिन्न नहीं। पाप के लिये प्रायश्चित दुर्विचार तथा दुष्कर्म के लिए चिंता केवल ईसाइयों के हृदय में ही नहीं वरन् सब धर्मावलंबियों के हृदय में उत्पन्न होती है। सहृदयता की बड़ी आवश्यकता है। प्रेम अनिवार्य है। एक ही प्रकार के मौलिक सिद्धान्तों के कारण सब धर्म एक है। किन्तु मनुष्य इन सत्यों में रत नहीं होता। वह उन वस्तुओं के मतों तथा मीमांसाओं में उलझता हैं जो अनुभव तथा ज्ञान की सीमा के परे हैं जो केवल अपने मन-विशेष की रक्षा तथा प्रचार में ही फूटते हैं और परस्पर मुठभेड़ करते हैं।
दोषारोपण प्राथमिक उत्पीड़न है। मैं अच्छा हूं तुम बुरे यह विचार घृणास्पद है। इसी बीच विश्वव्यापक सत्यता को पाकर मनुष्य अहंकार को छोड़ देता है, दोषारोपण रूपी घृणास्पद ज्वालाओं को शान्त कर देता है। अपने हृदय से ‘सब दोषी हैं’ इस दूषित विचार को निकाल कर ‘‘केवल मैं ही दोषी हूं’’ इस प्रकाशमय विचार को अपनाते हैं। ऐसा सोचने के पश्चात वह पाप मुक्त हो जाता है। सबके साथ उदारता तथा प्रेमपूर्वक व्यवहार करता है। भेदभाव नहीं उत्पन्न करता है और फिर्केबन्दी से दूर रहता है। शांति का इच्छुक होता है न कि पक्षपाती। इस प्रकार त्यागमय जीवन व्यतीत करता हुआ सबसे प्रसन्न रहता है। वह सर्वमय हो जाता है। उसे विश्व-व्यापक सत्य भासित हो जाता है क्योंकि जहां एक दोष दूसरे दोष का विरोध करता है और स्वार्थपरता फूट फैलाती है वहां सत्य सत्यता को भासित करता है और धर्म एकीकरण का कारण होता है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
मनुष्य के जीवन में नाना प्रकार के रस हैं। जिस प्रकार मधुमक्खी सुन्दर सुरक्षित सुमनों का मधु एकत्रित करती है, उसी प्रकार वह कडुए नीम के कसैले फलों से भी शहद लेती है। मीठा और कसैला शहद मिलकर एक नया स्वाद देता है। इसी प्रकार मानव जीवन में सुख दुःख, आशा-निराशा, मजबूरियाँ, उल्लास, हर्ष-विषाद आदि नाना प्रकार के मीठे-खट्टे व कसैले पुष्प हैं, जिससे हम जीवन रस एकत्रित करते हैं।
हमारा जीवन एक वैज्ञानिक की प्रयोगशाला की तरह है, जिसमें हम स्वयं अपने साथ तथा समान के अन्य नागरिकों के साथ रहकर नित नूतन प्रयोग किया करते हैं। एक तरह हम सब ही इस संसार रूपी प्रयोगशाला में अपने अनुभवों द्वारा प्रयोग कर रहे हैं। हमारी पाँच इन्द्रियाँ, हमारा मस्तिष्क, हमारा शरीर वे यंत्र हैं, जिनसे हम जीवन और संसार विषयक ज्ञान एकत्रित कर रहे हैं।
वे कौन से जीवन सत्य हैं, जो संसार का अनुभव करने के पश्चात हमें मिलते है तथा जिनसे दूसरों को लाभ हो सकता है? आइए, विद्वानों? महर्षियों तथा ज्ञानियों द्वारा प्रदत्त कुछ जीवन सत्यों पर विचार करें :-
जीवन में रस लें
हमारा आधारभूत सत्य यह होना चाहिए कि हम अपने जीवन को प्यार करना, उसमें अधिक से अधिक सफलता, प्रतिष्ठा एवं गौरव प्राप्त करने का उद्देश्य अपने समक्ष रखें। बुद्धिमता पूर्वक जीवन का कार्यक्रम ऐसा कार्य क्षेत्र का चुनाव करें जो कार्य हमें जीवन भर करना है, उस पर रचनात्मक दृष्टि से विचार करें। उसमें आनन्द लें। लोग कुछ वर्ष पश्चात् अपने कार्य में दिलचस्पी या रस लेना छोड़ देते हैं और काम को भार स्वरूप समझने लगते हैं। यह बड़े लोभ का विषय है।
अपने कार्य में रस लीजिए, उसे दिलचस्प बनाइये। दिलचस्पी से अपना कार्य करने से मनुष्य का स्थायी उत्साह बना रहता है और कार्य सहज सरल हो उठता है। गहराई से अपने पेशे के गुप्त रहस्य मालूम करें और अपने आपको कार्य के अनुकूल बना लें, ढाल लें। जैसे-जैसे आपकी शक्ति, स्वभाव और आदतें पेशे के अनुकूल ढलती जाएंगी, वैसे-वैसे एकरसता हटती जायगी। हम निरन्तर अपने पेशों में उन्नति करते जा रहे हैं यह भाव मन में रखने से स्थायी उत्साह बना रहता है।
प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ कार्य करना पड़ता है, हम भी अपना कार्य कर रहे हैं। अब बिना काम जिन्दा नहीं रहा जा सकता। जब बिना काम जिन्दा नहीं रहा जा सकता, तो क्यों न अपने कार्य में रस लें- यह मन में बैठा लेना चाहिए।
प्रधान कार्य के अतिरिक्त कुछ अवकाश का समय निकालें, जिसमें कुछ न कुछ मनोरंजन करते रहें। मनोरंजन जीवन का रस है। कुछ काल के लिए आप संसार की चिंताएँ भूल जाएं। उत्साह से खेलों में भाग लें। उत्साह बनाए रखने से शरीर की शक्तियां सक्रिय हो जाती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।
पेशे में रस बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि आपका कुछ दिनों के लिए मुख्य पेशा छोड़ते रहें और दूसरे कार्यों में संलग्न होते रहें। नया कार्य करने से सरलता बनी रहती है तथा कुछ काल पश्चात् पुराने पेशे के प्रति पुनः उत्साह जाग्रत हो उठता है।
बंधनों से मुक्त समझें
संभव है आपके मानसिक जीवन में गुप्त भावना ग्रन्थियां पड़ी हों। आप ऐसे सभी संस्कारों से मुक्त रहने का अभ्यास करें जो अनुचित रीति से आपके व्यक्तित्व पर भार डाल रहे हैं। अपने सामर्थ्य पर रह कर नए विचारों की दुनिया में रहा करें।। नए रूप में अपनी परिस्थितियों, कठिनाइयों और नाना समस्याओं पर विचार करें।
आपके बंधन बाहरी या मानसिक दोनों प्रकार के हो सकते हैं। उनका विचारपूर्वक विश्लेषण करें वर्गीकरण करें, फिर पृथक-पृथक विचार कर एक-एक को सुलझाएं। समस्याओं की गुत्थियां संभव हैं, जो आपको भयभीत कर दें, किंतु जैसे-जैसे आप उनका वर्गीकरण करेंगे वैसे-वैसे वे साफ होती जाएंगी। बिखरे और उलझे हुए बालों को देखकर मन कैसा घबराता है किन्तु उन्हीं केशों को जब स्वच्छ कर कंघे से सुलझा लिया जाता है तो वे ही सुन्दर प्रतीत होने लगते हैं। यही हाल जीवन समस्याओं का है। दूर से उलझा हुआ देखकर आपको जो घबराहट होती है, समीप आने पर वह विलुप्त हो जाती है।
आवश्यक-अनावश्यक का भेद करना सीखें
अनेक बार हमारी मानसिक शक्तियां धोखा दिया करती हैं। कठिन श्रमपूर्ण कार्यों के प्रति हमारा सम्मान नहीं होता। अरुचिकर कामों को हाथ में लेने की तबियत नहीं करती। सच्चे और ठोस कार्य से बचने के निमित्त प्रायः हम अनावश्यक कार्यों को हाथ में ले लेते हैं और उनमें ऐसे संलग्न हो जाते हैं, मानो अत्यन्त जरूरी काम कर रहे हों। कष्ट साध्य कार्यों से भागने की और खेलकूद में प्रवृत्त रहने की वृत्ति बच्चों में विशेष रूप से पाई जाती है। हम में से अनेक भी इसी प्रवृत्ति के शिकार हैं। हम उन जरूरी कार्यों को न करेंगे, जिनमें श्रम लगता है। कहानी, उपन्यास पढ़ने वाले ढेरों हैं पर गंभीर साहित्य में आनन्द लेने वाले नगण्य हैं।
कठिन, अरुचिकर, परिश्रम और मनोयोग चाहने वाले कार्यों को आप सबसे पहले करें। प्रात: काल का समय ऐसे कठोर कार्यों को बखूबी कर सकते हैं क्योंकि आपका मन और शरीर ताजा है।
कौन काम पहले, कौन बाद में करें इनका विवेक मनुष्य को अपनी दक्षतम शक्तियों को एक स्थान पर केन्द्रित करना सिखाता है। अनावश्यक कार्य सरल होते हैं पर उनसे कोई स्थायी लाभ नहीं होता। ऐसे मोहक प्रलोभन से सावधान!
सच्ची इच्छा और नकली इच्छा से विवेक करें।
आप जीवन में छोटी-बड़ी अनेकों इच्छाओं को पूर्ण करने बड़े बनने के अनेकों स्वप्न देखा करते हैं। ‘‘मैं वह भी कर लूं, वह भी कर लूं’’ ‘‘लक्ष्मी की मेरे पास कृपा हो’’ सरस्वती सहायक हो, ऐसी-ऐसी सैकड़ों इच्छाएं सागर में तरंगों की भांति मन में उत्पन्न होती रहती हैं। ये थोथी बातें है। जो निरी कपोल कल्पना में निमग्न रहता है कार्य कुछ नहीं करता, वह निरा शेखचिल्ली ही कहा जायेगा। ये सब नकली इच्छाएँ हैं, जिनका कुछ महत्व नहीं।
सच्ची इच्छा मन में रखने वाला अपने लक्ष्य के प्रति उत्साह जागरूकता और परिश्रम है। नकली इच्छा मेहनत का अवसर आते ही विलुप्त हो जाती है। असली इच्छा कठोर परिश्रम, कठिनाई, असफलता कष्टों के बावजूद स्थायी बनी रहती है। सच्ची इच्छा में स्थायी प्रयत्न की भावना है। जिसके प्रति जितनी दृढ़ सच्ची इच्छा होती है, वह उतनी ही सफल होती है। नकली इच्छा आकस्मिक सक्रियता है। नकली इच्छा को शक्ति का अपव्यय, आलस्य और व्यसन नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं, सच्ची इच्छा के सामने ये दुम दबाकर भाग जाते हैं।
शक्ति के अपव्यय (बिखरना) से बच। कार्य को हाथ में ले उसी में गढ़ जाएं, तब ही आप सच्ची इच्छा की साधना कर सकते हैं। सावधान, आलस्य एवं व्यसन को पास न फटकने देना। मानव संस्कृति ने जितने महान कार्य किए हैं, वे तीव्र स्थायी इच्छा शक्ति के संतुलन द्वारा ही संपन्न हुए हैं। इच्छा शक्ति ही आपको आगे प्रेरित करने वाली अमोघ शक्ति है। निश्चय में ढले न रहें।
समीप से देखें
दूर की दुनिया, व्यक्ति, मनुष्य, समस्याएँ, एक अभिनव आकर्षण से युक्त प्रतीत होते हैं। वस्तु की दूरी एक भीना धुँधलापन नेत्रों पर बिछा देती हैं। इस अस्पष्टता के आवरण में असुन्दर अकल्याणकारी भी सुन्दर और कल्याणकारी प्रतीत होने लगता है। दूर से चित्रों में नया सौन्दर्य भर जाता है। समीप से देखने पर आप ऐसे अनेक रंगे लियरों से परिचित हो जाएंगे उनके अनेक रहस्य आप के सामने प्रकट होंगे, समस्याओं की कलह खुल जायगी, गड़े व्यक्तियों की पोलें खुल जायेगी। आप देखेंगे कि जो दूर से चमकता है, वह सब सोना नहीं होता, चाँद में भी कालिमा लगी हुई है। आपको बड़े व्यक्तियों में तुच्छता और तुच्छ समझे जाने वालों में त्याग और बलिदान की महानता दृष्टिगोचर होगी।
अपनी गुप्त बातें हर किसी से न कहें
प्रत्येक व्यक्ति के पास कुछ ऐसी गुप्त बातें रहस्यों के रूप में होती हैं, जिनकी गोपनीयता पर उसकी प्रतिष्ठा, साख या सामाजिक स्थिति निर्भर रहती है। अनेक बार ऐसी गुप्त व्यथाएँ होती हैं, जिन्हें दूसरे व्यक्ति बांट नहीं सकते, केवल हँसी और व्यंग्य अवश्य कर सकते हैं। आपके कष्ट सुनकर उनकी दर्प पूर्ति और ईर्ष्या की वासनाएँ शान्त होती हैं। आपकी तकलीफों को सुनकर वे अपने आपको उनसे ऊँचा समझते हैं। आपको हेय दृष्टि से देखते हैं। मन ही मन आपकी मजबूरियों और असफलताओं पर हँसते हैं। जो बाहर से सान्त्वना भी देते दिखाई देते हैं, उनके मन में भी अपने दर्प पूर्ति का भाव है। जिनकी आप सहानुभूति चाहते हैं, उससे आपको कोई लाभ होने वाला नहीं है। जो सहानुभूति केवल मिथ्या प्रदर्शन के लिए है, उससे क्या लाभ? यही सहानुभूति प्रदर्शन करने वाले दूसरों के सम्मुख आकर आपकी गुप्त बातें फैलाएंगे और आपकी अप्रतिष्ठा का कारण बनेंगे। आपके मित्र ही आपके गुप्त भेद चारों और फैलाकर किनारा कर लेते हैं।
कविवर रहिम ने इसी तत्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है-
‘‘रहिमन निज मन की व्यथा मन ही राखै गोय। सुनि अठिलैहै लोग सब, बांट न लहै कोय।।’’
व्यापारियों, उच्चाधिकारियों तथा नेताओं के लिए अपने कार्यालय, व्यापार, दुकान, घर या पार्टी के भेदों को गुप्त रखना आवश्यक है। गोपनीयता से आप में दूसरों को आकर्षण प्रतीत हो जायगा।
संभव है, आप में कुछ ऐसी गुप्त कमजोरियां हैं, जिनका दूसरों को बताना आपके, आपके परिवार या अन्य व्यक्तियों के लिए अहितकर हो ऐसी दुर्बलताओं को दफना देने में ही लाभ है।
व्यापार में अपने लाभ-हानि, वास्तविक आर्थिक स्थिति किसी से कहना अत्यन्त हानिप्रद है। जब तक बाहर वाले यह समझते हैं कि आपकी आन्तरिक स्थिति अच्छी है, आप खूब लाभ कमा रहें हैं, आपके पास पूँजी एकत्रित है, तब तक आपकी साख बची रहती है। उधार से भी आपके व्यापार में सहायता मिलती है किन्तु आपके घाटे की बात सुनकर आपके निकट सम्बन्धी भी किनारा कर लेंगे, कोई तनिक भी सहायता प्रदान न करेगा। बनी-बनी का सब कोई साथी है, पर बिगड़ी को कोई नहीं है। सम्भव है, धीरे-धीरे आपकी हानि दूर होकर फिर अच्छे दिन फिरें, समय की गति के साथ आप पुनः समृद्धिशाली बन जायँ। अतः जिन मानसिक उलझनों, हानि, कष्टों में आप हों, उन्हें पृथक-पृथक सुलझाकर स्वयं हल करें अपने आत्मबल, गुप्त सामर्थ्य को उत्तेजित करें और स्वयं अपनी सहायता करें। दूसरों से अपने कष्टों एवं मजबूरियों की कहानियां न कहते फिरें।
(प्रो. लालजीराम शुक्ल)
हमारी शक्ति का केन्द्र हमारे मन में ही है। मन जिस पदार्थ का चिन्तन करता है वह उसकी रचना करने लगता है। रचना के इस कार्य में मानसिक शक्ति खर्च हो जाती है। इस प्रकार मनुष्य तब अपनी शक्ति को खो देता है तो दुःखी हो जाता है। संसार के पदार्थों के विषय में अधिक चिंतन करने से हम अपने आपको ही भूल जाते हैं। इसके परिणामस्वरूप तब किसी प्रकार का कुचिंतन मन में आ जाता है तो हम उसे रोक नहीं सकते। फिर जैसा हमारा चिंतन होता है घटनाएँ भी उसी प्रकार होती हैं। शक्ति की उपस्थिति की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं।
धन, परिवार और यश की वृद्धि में मनुष्य का मन फँसा रहता है। जब तक मनुष्य अपनी सब प्रकार की बाहरी वृद्धि देखता है तब तक आध्यात्मिक चिंतन की उसको इच्छा ही नहीं होती। आध्यात्मिक चिंतन ऐसी अवस्था में नीरस प्रतीत होता है। बहुत से लोगों को तो सांसारिक कामों से फुरसत ही नहीं मिलती कि वे अपने आपके विषय में सोचें। कितने ही मनुष्य अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें किसी काल के लिए अकेले छोड़ दिया जाय तो वे काल कवलित बन जायें। इसका प्रधान कारण उनका कुरूप आला ही है। अधिक देर तक सांसारिक बातों में मन को विचरण करने देने से अनेक प्रकार के राग द्वेष के विचार मन में घर कर लेते हैं। इन विचारों को नैतिक बुद्धि स्वीकार नहीं करती अतएव इनका वसन होता है। पर दमन से किसी भी प्रकार को भावना का बल चढ़ता है, वह भावना नष्ट नहीं होती। जिन व्यक्तियों का आचरण जितना अधिक नैतिक होता है वे अपनी अप्रिय वीभत्स भावनाओं का दमन उतना ही अधिक करते हैं। और इसलिए उनके मन में उतनी ही अधिक अशान्ति रहती है। इस अशांति के कारण उन्हें बिना काम के रहना असंभव हो जाता है। पर तब हम अपनी दलित मानसिक भावनाओं को स्वीकार नहीं करते तो वे दूसरे लोगों पर आरोपित हो जाती हैं। ऐसी अवस्था से मनुष्य अपने ही दुर्गुणों को दूसरों में देखता है। तब उनमें सुधार होते हुए नहीं देखता है तो दुःखी होता है। इस दुःख का कारण आत्म विस्तृति ही है। तब हम में मानसिक शक्ति नहीं रहती तो हमारी बातें कोई नहीं मानता। जिस व्यक्ति में जितनी कम दूसरे का सुधार करने की शक्ति रहती है उसमें दूसरे का सुधार करने का उतना ही उतावलापन रहता है।
सभी काम आत्मोन्मुख होकर करने से सफलता को अंजाम देते हैं। जब किसी कार्य को चिंता से और उद्विग्न मन होकर किया जाता है तो उसमें विफलता मिलती है। साम्यावस्था में सहज भाव शक्ति वर्धक है। जब हम अपने कार्य में कोई त्रुटि देखें अथवा किसी प्रकार की सहायता की आवश्यकता देखें तो हमें अपने भीतर ही सिमट जाना चाहिये। जब मन की उद्विग्नता मिट जाती है तो नया साहस और उत्साह प्राप्त होता है। शान्त भाव में ही शक्ति है। अशांत भाव में शक्ति का विनाश है। किसी भी पदार्थ के विषय में बार-बार सोचने से हमारी शक्ति का विनाश होता है। अतएव जब कभी कोई ऐसा विचार मन में आ जायं जो अप्रिय हो तो मन में गहरा संस्कार पैदा करने से पूर्व ही मन से निकाल कर बाहर कर देना आवश्यक है। अप्रिय घटनाओं को या तो प्रिय रूप जाना जाय अथवा उनके विषय में अधिक सोचा ही न जाय। सभी अप्रिय घटनाओं का सुन्दर अंग भी होता है। इस सुन्दर अंग के ऊपर बार-बार विचार करना चाहिये।
धार्मिक लोग शक्ति का केन्द्र ईश्वर अथवा किसी अदृश्य सत्ता को मानते हैं। यह बात सत्य है कि मनुष्य के अहंकार रूपी मन में कोई अद्भुत शक्ति नहीं। इतना ही नहीं जिस मनुष्य में जितना अधिक अहंकार होता है उसकी मानसिक शक्ति उतनी ही कम होती है। अहंकार एक प्रकार की मानसिक बीमारी है। यह बीमारी मनुष्य को अनेक प्रकार के दुःखों में डाल देती है। जब किसी प्रकार मनुष्य में अहंकार की कमी होती है तो मनुष्य में स्वास्थ्य सुधरता है। ऐसी अवस्था में ही मनुष्य को मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। ईश्वर के ध्यान से जहाँ तक अहंकार की कमी होती है वहां तक इस प्रकार का ध्यान अच्छा है।
परमशक्ति का वास्तविक केन्द्र तो मनुष्य का स्वत्व ही है। इसका आरोपण किसी बाहरी पदार्थ पर करना एक प्रकार का अज्ञान है। अपने भीतर ही अपनी शक्ति और आनन्द का केन्द्र है। बाहरी ओर भटकने से क्या लाभ?
नाभी विच कस्तुरी बसे, मूरख मृग नहिं सूझ। तेरा साहब तुझ में, बूझ सके तो बूझ।।
अपने आपको भूलने से मनुष्य से मनुष्य को शक्ति कैसे मिल सकती है? प्रत्येक मनुष्य एक आध्यात्मिक अणु (चैतन्य अणु) है। हम हाल में ही ऐटमबम से जड़ अणु शक्ति से परिचित हुए हैं। फिर चेतन अणु में कितनी शक्ति हो सकती है इसका पता कौन लगा सकता है? यह चैतन्य अणु हमारा विचार ही है। विचार देश और काल की सीमा से बद्ध नहीं है। कई हजार वर्ष पूर्व का विचार भी आज हमें शक्ति दे रहा है। उसमें हमारे विचारों को बदलने की शक्ति है। जब हम उत्साहहीन हो जाते हैं तो किसी महर्षि के भले विचार पर चिंतन करने से फिर नव जीवन को प्राप्त कर लेते हैं। काल विचार की शक्ति को नष्ट करने में समर्थ नहीं। इसी प्रकार देश की सीमाएँ भी विचार को नहीं बांधती। एक ही विचार सारे जगत में फैल जाता है। विचार द्वारा मनुष्य संसार के समस्त प्राणियों के हृदयों पर अधिकार कर लेता है। विचार द्वारा समाज में महान विस्फोट होते हैं और विचार द्वारा ही शान्ति की स्थापना होती है। जो विचार जितना पक्का होता है उसकी शक्ति उतनी ही अधिक होती है।
विचार की शक्ति जगत के कल्याण करने की भावना पर निर्भर रहती है। संसार की ध्वंसात्मक शक्ति इतनी प्रबल नहीं होती जितनी रचनात्मक प्रबल होती है। कहा जाता है शैतान ही ईश्वर के नाम से मनुष्य के समक्ष आता है और पूजता है। यदि किसी मनुष्य का विचार सबको कल्याण करने की भावना से पैदा हुआ है तो कुछ काल तक वह भले ही अवहेलना की स्थिति में रहे पर धीरे-धीरे प्रबल हो जाता है। जब हमें अपने ही सिद्धांतों में विश्वास नहीं होता तभी हमें असफलता मिलती है। हमारा विचार चाहे जितनी ही उच्च कोटि का क्यों न हो यदि हमें उसमें विश्वास नहीं तो वह अधिक काल तक जीवित नहीं रहता।।
जब हमारी बाहरी और भीतरी भावनाओं में ऐक्य रहता है तो जैसा हम संकल्प करते हैं उसी प्रकार की सिद्धि हमें मिलती है। इस ऐक्य की अनुपस्थिति में सिद्धि नहीं मिलती। विचारों की स्थिरता मनुष्य को सफलता प्रदान करती है। विचारों की अस्थिरता अविश्वास के कारण होती है और इसका परिणाम भला नहीं होता। अस्थिर विचारों से आत्म-विश्वास की और भी कमी हो जाती है।
बीमारी की अवस्था में मनुष्य के विचार उसके काबू के बाहर हो जाते हैं। वे बीमारी की ही कल्पना में लग जाते हैं। इसी प्रकार किसी प्रकार की असफलता की अवस्था में भी मनुष्य के विचार नकारात्मक विचार हो जाते हैं। वह सफलता के होने में विश्वास ही नहीं करता। जब तक मनुष्य के विचार नहीं सुधरते न उसका स्वास्थ्य सुधरता है और न उसकी परिस्थिति सुधरती है। जब नकारात्मक विचारों की वृद्धि होने लगे तो किसी प्रकार चिंतन को शान्त कर देने से भारी लाभ होता है। कितने रोगियों का जटिल रोग अपने विचारों को श्वांस-प्रश्वांस पर केन्द्रित करने से नष्ट हो जाता है। रोगों के विनाश में आत्मनिर्देश का भारी कार्य होता है। पर चित्त की बिगड़ी हुई अवस्था में मनुष्य का आत्म-निर्देश उसका कल्याण नहीं करता। प्रत्येक शुभ-निर्देश प्रति-निर्देश में परिणत हो जाता है। यदि हम अपने आत्म-निर्देश से कोई लाभ उठाना चाहते हैं तो पहले हमें अपने तन और अचेतन मन में एकता स्थापित करनी होगी। जब तक हमारा संपूर्ण मन किसी बात में नहीं लग जाता हमें किसी प्रकार का लाभ नहीं होता। बीमार मनुष्य को पुराना अभ्यास बीमारी के विषय में चिंतन करने का होता है। किसी प्रकार का शुभ निर्देश सफल होने के पूर्व यह आवश्यक है कि बीमार मनुष्य अपनी बीमारी के विषय में सोचना बन्द करे इसलिए किसी प्रकार मन को स्थिर करना आवश्यक होता है। जब मनुष्य अपनी बीमारी के विषय में भूल जाता है तो फिर उसे जैसा निर्देश दिया जाता है उसका वैसा ही फल होता है। इमील कूदे महाशय रोगी को शुभ निर्देश देने के पूर्व अचेतन अवस्था में ले जाते थे अथवा किसी न किसी प्रकार चेतना के कार्य को स्थगित करने की चेष्टा करते थे।
पर जिस मनुष्य को विचार की शक्ति में पूर्ण विश्वास है उसे अचेतन अवस्था की शरण लेने की आवश्यकता नहीं। अपनी चेतन अवस्था में ही हम अपनी मानसिक शक्तियों का ध्यान कर सकते हैं। प्रतिदिन के ध्यान से वे शक्तियां दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं। जैसे-जैसे नयी शक्तियों का उदय होता है हमारा आत्म-विश्वास भी बढ़ता जाता है। मानसिक शक्ति की विकसित अवस्था में मनुष्य शुभ मात्र से दूसरे लोगों का कल्याण कर देता है। कितने ही रोगी शुद्ध मन के व्यक्ति की सद्भावना मात्र से अच्छे हो जाते हैं। जब चिकित्सक को अपनी मानसिक शक्ति और उसके उपयोग के सिद्धान्त में विश्वास होता है तो इसका भला प्रभाव रोगी के मन पर भी पड़ता है। जिस चिकित्सक को आत्मविश्वास नहीं रहता वह रोगी का भी कल्याण करने में असमर्थ रहता है।
मानसिक शक्ति का केन्द्र देहाभिमान करने वाला मन नहीं, उसका केन्द्र वह मन है जो हम में और दूसरे प्राणियों में एक है। वह एक ओर अपना आप ही है और वह सर्वात्मा है। वह बाहर दौड़ने से नहीं मिलता भीतरी ओर दृष्टि करने से मिलता है। इसे पहचानना कठिन है और यह अपना आप ही है। जो मनुष्य जितना ही उदार अपने विचारों को बनाता है वह उतना ही चैतन्य अणु की शक्ति का अधिकारी होता है। चैतन्य अणु की शक्ति स्वार्थमय काम के लिए नहीं मिलती, वह परमार्थ के काम में ही उदय होती है। मक्खी को मारने के लिए तोप की आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह तुच्छ स्वार्थ साधन के लिये चैतन्य अणु की शक्ति का विस्फोट नहीं होता। जो मनुष्य जितना ही अपने स्वार्थ की आहुति करता है उसकी शक्ति उतनी ही बढ़ती है।
(एक चीनी दार्शनिक के विचार)
जिस प्रकार प्रभात काल लवा पक्षी को, सायंकाल की धूसरता उल्लू को, शहद मधुमक्खी को, मृत शरीर गिद्ध को प्रफुलित करते हैं उसी प्रकार जीवन मनुष्य को प्यारा है। मानवी जीवन चाहे उज्ज्वल भले ही हो, किन्तु वह आँखों को चकाचौंध में ही डालता है, चाहे वह निस्तेज भले ही हो, फिर भी निराशा उत्पन्न नहीं करता, वह चाहे जितना मधुर हो, फिर भी उससे जी नहीं ऊबता। चाहे सड़ कर वह बिगड़ गया हो फिर भी छोड़ा नहीं जाता। इतना होने पर भी उसका सच्चा मूल्य कौन जान सकता है।
बुद्धिमत्ता इसी में है, जब जीवन की कदर उतनी ही की जाय जितनी योग्यता है। मूर्खों की तरह न तो यह समझो कि जीवन की अपेक्षा दूसरी कोई वस्तु अधिक मूल्यवान नहीं है, और न ढोंगी बुद्धिमानों की तरह यह ही खयाल करो कि जीवन नि:सार है। केवल अपने स्वार्थ ही के लिये उस पर आसक्त न होओ, बल्कि उससे होने वाले दूसरों के हित का ध्यान रखो।
सोना देने पर भी जीवन नहीं खरीदा जा सकता और न ढेर के ढेर हीरे खर्च करने पर गया हुआ समय फिर वापिस मिल सकता है। इसलिये प्रत्येक क्षण को सद्गुण संपादन करने में ही लगाना बुद्धिमानी का काम है।
हमारा जन्म न हुआ होता अथवा जन्म से भर गये होते तो अच्छा होता-ऐसा न वहाँ और न अपने उत्पन्नकर्ता से यह पूछो कि ‘‘यदि हम पैदा न होते तो तू बुराई किसके लिये बनाता’’? ऐसे-ऐसे प्रश्न करना भूल का काम है क्योंकि भलाई-बुराई तुम्हारे हाथ में है और भलाई न करने का नाम बुराई है।
यदि मछली को मालूम हो जाये कि चारे के नीचे कँटिया है तो क्या वह उसे निगल जायगी? यदि सिंह जान ले कि जाल मेरे फँसाने के लिये बिछाया गया है तो क्या वह उसमें घुस जायेगा? उसी प्रकार यदि यह बात मनुष्य को विदित हो जाये कि जीवात्मा शरीर के साथ नष्ट हो जायेगी तो क्या वह कभी जीने की इच्छा करेगा?
जिस प्रकार पक्षी एकाएक पिंजड़े में फँस जाने पर पटक-पटक कर अपने शरीर की दुर्गति नहीं कर डालता, उसी में पड़ा हुआ दिन व्यतीत करता है, उसी प्रकार जिस स्थिति में हो उससे भागने का प्रयत्न करो उसी में सन्तोष रखो, समझ लो कि हमारे, भाग्य में यही बदा था।
यद्यपि तुम्हारी स्थिति में मार्ग कांटेदार है, किन्तु वे दुःखदायी नहीं हैं। उन सभी को अपनी प्रकृति के अनुकूल बना लो, जहां किन्तु बुराई देख पड़े, समझ लो कि वहाँ सावधानी की आवश्यकता है।
जब तक तुम पुआल के बिछौने पर लेटे हो तब तक तुम्हें बड़ी गहरी नींद आवेगी, किन्तु जब गुलाब के फूलों का बिछौना सोने को मिल गया वहां कांटों से बचने की चौकसी करनी पड़ेगी।
गर्हित जीवन से यशस्वी मृत्यु अच्छी है। इसलिए जितने दिन तुम यश के साथ जीवित रह सकते हो, उतने ही दिन जीवित रहने का प्रयत्न करो। हां, यदि तुम्हारा जीवन लोगों को तुम्हारी मृत्यु से अधिक उपयोगी जान पड़े तो उसकी अधिक रक्षा करना भी तुम्हारा कर्त्तव्य है।
मूर्ख मनुष्य कहते हैं कि जीवन अल्प है, किन्तु तुम ऐसा न कहो, क्योंकि अल्प जीवन के साथ चिंतायें भी तो अल्प ही रहती है।
जीवन का निरुपयोगी भाग निकाल डाला जाय, तो क्या बचेगा? बाल्यावस्था, बुढ़ापा, सोने का समय, बेकार बैठने का समय और बीमारी के दिन शेष यदि जीवन के संपूर्ण दिनों में से निकाल दिये जाये तो कितने दिन शेष रह जाते हैं।
मनुष्य जीवन ईश्वरीय देन है। यदि वह अल्प है तो उससे सुख भी अधिक रहेगा। दीर्घ गर्हित जीवन से हमको क्या लाभ? क्या अधिक दुष्कर्म करने के लिये अपना जीवन बढ़वाना चाहते हो? अब रही बात भलाई करने की। तो क्या वह जिसने तुम्हारा जीवन परिमित कर दिया है उतने दिन के कर्मों को देखकर संतुष्ट न होगा।
ऐ शोक के पुतले मनुष्य! तू अधिक दिनों तक क्यों जीवित रहना चाहता है? केवल श्वांस लेने के लिए, खाने-पीने का लिए और संसार का सुख भोगने के लिये? यह तो पहले ही जाने कितने बार तू कर चुका है। बार-बार वही वही करना अरुचिकर और व्यर्थ नहीं है?
क्या तू अपने गुण और बुद्धि की वृद्धि करेगा? परन्तु शोक! न तो तुझे कुछ सीखना है और न तुझे कोई शिक्षक मिलता है? तुझे तो अल्प जीवन दिया गया है तब तू उसी का सदुपयोग नहीं करता तो दीर्घ जीवन के लिये फिर क्यों अभिलाषा करता है?
हम में विद्या का अभाव है, इसके लिए तू पश्चाताप करता है? उसका अन्त तो तेरे ही साथ श्मशान में हो जायगा। इसीलिये इस संसार में ईमानदार बन कर रह, तभी तू चतुर कहलायेगा।
‘‘कौवे और हिरनों की आयु १०० वर्ष की होती है, और हमारी आयु इतनी दीर्घ क्यों नहीं होती?’’ ऐसा ध्यान में भी न लाए। छिः छिः तुम अपनी समता कौवों और हिरनों से करते हो। यदि इन से तुलना करने बैठो तब भी उनमें विशेष गुण मिलेंगे वे तुम्हारी तरह न तो झगड़ालू हैं और न कृतघ्न हैं, उलटे वे तुम्हें उपदेश देते हैं कि निष्कपट और सादगी के साथ जीवन व्यतीत करने से बुढ़ापे में सुख होता है।
क्या तुम अपने जीवन को इन पशु-पक्षियों से अधिक उपयोगी बना सकते हो? यदि नहीं तो अल्प जीवन तो तुम्हें मिलना ही चाहिये। मनुष्य जानता है कि मैं थोड़े दिन तक इस संसार में रहूंगा तब भी अत्याचार करने के लिये संसार को अपना गुलाम बनाकर छोड़ता है। यदि कहीं वह अगर होता तो न मालूम कितना भीषण अत्याचार करता।
ऐ मनुष्य! तुझे जीवन बहुत काफी मिला है। परन्तु तू इसे न जानता हुआ सदैव दीर्घ जीवन के लिये झींकता है। सच तो यह है कि तुझे दीर्घ जीवन की कुछ भी आवश्यकता नहीं क्योंकि तू उसका दुरुपयोग कर रहा है। तू उसे इस तरह व्यर्थ गँवाता है जैसे तुझे आवश्यकता से अधिक जीवन दिया गया हो। और फिर भी शिकायत करता है मेरा जीवन दीर्घ नहीं बनाया गया!
मनुष्य संपत्ति का ठीक-ठीक उपयोग करने से धनवान होता है। केवल धन की प्रचुरता से ही वह धनी नहीं कहा जा सकता। विज्ञजन पहले ही से वह संयमपूर्वक रहते हैं और आगे भी संयम का ध्यान रखते हैं। परन्तु मूर्खों का हमेशा ही ‘‘श्रीगणेशाय नमः’’ हुआ करता है।
‘‘चलो प्रथम धनोपार्जन कर लें और फिर इसका उपयोग कर लेंगे’’ ऐसा विचार छोड़ दो। वह, तो वर्तमान समय का दुरुपयोग करता है। एक प्रकार से अपना सर्वस्व गँवा रहा है। सैनिक के हृदय को बाण सहसा बेध देता है। उसे कुछ खबर नहीं कि यह बाण कहां से आया। उसी प्रकार मृत्यु मनुष्य को एकाएक आ धर दबोचती है तब उसे स्वप्न में भी यह ख्याल नहीं होता कि मैं इस प्रकार काल ग्रास बन जाऊँगा।
अब आइये जीवन क्या है जिसकी लोगों का इतनी उत्कट इच्छा रहती है? अथवा श्वासोच्छवास क्या वस्तु है जिसका चाव जनसाधारण इतना करते हैं? उत्तर यही देना पड़ेगा कि यह जीवन भ्रमोत्पादक और आपत्तिपूर्ण है। इसके आदि में अज्ञान, मध्यम में दुःख और अन्त में शोक होता है।
जिस प्रकार एक लहर दूसरी लहर को धक्का देती है और फिर दोनों पीछे से आई हुई तीसरी लहर में अन्तर्गत हो जाती है, उसी प्रकार जीवन में एक संकट के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा और तीसरे के बाद चौथा ऐसे ही नये-नये संकटों का आना-जाना लगा रहता है, प्रस्तुत बड़े संकट में पूर्व के संकट छोटे-छोटे संकट विलीन हो जाते हैं। यदि सच पूछिये तो हमारे भय भी हमारे वास्तविक संकट हैं और असम्भव बातों के पीछे पड़कर निराशाओं को झेल लेते हैं।
मूर्ख मृत्यु से डरते हैं, और अमर होने की भी इच्छा करते हैं। जीवन का कौन सा भाग हम हमेशा अपने साथ रखना चाहते हैं? यदि कहिये जवानी, तो क्या जवानी व्यभिचार और धृष्टता में व्यतीत करने के लिये मांग रहे हो? और कहो बुढ़ापा, तो क्या निर्वीर्य अवस्था ही तुम्हें अधिक पसन्द है?
ऐसा कहा जाता है कि, सफेद बालों का बड़ा सत्कार होता है। यह बात सच है, परन्तु सद्गुण यौवन का भी मान बढ़ा सकता है, बिना सद्गुणों के बुढ़ापे का प्रभाव आत्मा की अपेक्षा शरीर पर ही अधिक पड़ता है। कहते हैं कि, वृद्ध पुरुषों का आदर इसलिये होता है कि ये विश्रृंखलता का तिरस्कार करता है। परन्तु जब हम देखते हैं कि वे व्यसन और विषय का तिरस्कार स्वयं नहीं करते, किन्तु व्यसन और विषय उनका ही तिरस्कार करते हैं, तब हमें यही कहना पड़ता है कि लोगों का स्वयं का उपर्युक्त कथन कुछ बहुत सत्य नहीं है।
अतएव यौवन काल में सद्गुणों को उपलब्ध करो तभी बुढ़ापे में भी सत्कार होगा।
(श्री गोपाल दामोदर तामसकर)
आज कल के सभ्य कहलाये जाने वाले लोग आंखें बन्द करके भौतिक उन्नति में लगे हुए हैं, यहां तक कि उन लोगों को ख्याल नहीं कि उन्हें मरना भी होगा। इन्द्रिय-सुखों में वे इतने लिप्त हैं कि इन्हीं को जीवन-सर्वस्व समझ बैठे हैं। उनके लिए न आत्मा है न परमात्मा है। उनका अखिल देव द्रवयदेव है। इसके विपरीत हिन्दुस्तान की स्थिति को देखिये। ‘शरीर और इस जगत के इतर सब वस्तुएँ नश्वर हैं, केवल धर्म शाश्वत है।’ यहां तक तो ठीक रहा, पर आगे भारतवासी कहते हैं- इसलिए धन, दारा, पुत्र इत्यादि के झगड़े में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं।’ हमारे कहने का यह मतलब नहीं कि हमारे हिन्दूधर्म के मुख्य तत्व ये ही हैं, और इन्हीं के अनुसार हमें आचरण करने को हमारे सच्चे हिन्दूधर्म ने बतलाया है। किसी कारण से हमारे धर्म के कुछ तत्वों का इतिहास में दुरुपयोग हुआ सा दीख पड़ता है। भौतिक वस्तुएँ नश्वर अवश्य हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि हम उनको बिल्कुल छोड़ दें और रात-दिन केवल ईश्वर भजन में लगे रहें। हमारे धर्म के तत्व इतने एकदेशीय नहीं हैं।
धार्मिक उन्नति प्रधान तो अवश्य है, पर यह भौतिक उन्नति के बिना सिद्ध नहीं हो सकती। हमारे यहां के जीविकारों ने इस बात को पहचाना था कि धार्मिक उन्नति के लिए भौतिक उन्नति की भी आवश्यकता है। यह बात हमारे यहां के लोग जानते थे और तद्नुसार आचरण भी करते थे। पर किसी कारण से नश्वरता के सिद्धान्त को ही प्रधानता मिल गई। यह बात लोगों की दृष्टि से उठ गई कि भौतिक उन्नति का धार्मिक उन्नति से क्या सम्बन्ध है। और फिर भौतिक उन्नति की ओर लक्ष्य बहुत कम रहा। उसके परिणाम अब तक दिखाई देते हैं। और फिर पाश्चात्य सभ्यता की ओर जब भारतवासी ध्यान देते हैं, जब ये देखते हैं कि रात-दिन इन्द्रिय सुख को सामग्री मिलने के प्रयत्न करने पर भी उन्हें सन्तोष और आराम नहीं है, तब तो इनकी कल्पना और भी दृढ़ हो जाती है और दुनिया में इन लोगों का बर्ताव ऊटपटांग होने लगता है। शरीरधारी होने के कारण भौतिक वस्तुओं से बिल्कुल दूर कभी हो ही नहीं सकते, इसके उलटा इन्द्रिय-सुख लेने की लालसा तो उन्हें बनी ही रहती है, परन्तु वास्तव में क्या करना चाहिये, यह उन्हें मालूम नहीं रहता। वे उचित मार्ग से भटके रहते हैं। इसके दुष्परिणाम न होने पावें, इसलिए धार्मिक और भौतिक उन्नति के पारस्परिक सम्बन्ध को अच्छी तरह पहचान लेना अत्यन्त आवश्यक है।
मनुष्य मांस-पिण्ड का बना है। उसे भूख लगना स्वाभाविक है। भोजन पर ही उसका जीवन निर्भर है। बिना भोजन के वह जिन्दा नहीं रह सकता। उसे वस्त्र भी चाहिये। फिर अन्य प्राणियों के बिल्कुल विपरीत उसे बहुत काल तक पत्नी को ही नहीं, किन्तु बाल-बच्चों को भी झेलना पड़ता है। उन्हें भोजन-वस्त्र के सिवा शिक्षा भी देनी पड़ती है और स्वाभाविक प्रेम के कारण उनके लिए कुछ छोड़ जाने की प्रवृत्ति भी होती है।
यूनान देश में अरस्तू नामक बड़ा विद्वान तत्ववेत्ता हो गया है। उसने राज्य-विज्ञान पर एक बड़ा उत्तम ग्रन्थ लिखा है। उसमें उसने उपर्युक्त विषय पर भी विचार किया है। वह कहता है कि उत्तमोत्तम जीवन के लिए तीन प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता है। वे हैं (१) भौतिक सम्पत्ति, (२) शारीरिक सम्पत्ति और (३) आध्यात्मिक सम्पत्ति। सुखी होने के लिए इन तीनों प्रकार की सम्पत्ति की आवश्यकता हो जाती है। जिस मनुष्य में वीरता, सौम्यत्व, न्याय अथवा चतुरता का अणु भी न हो, जोकि सूक्ष्म कीट-पतंगों को भी देखकर डर जावे, इच्छा होने पर जो महान से महान दुष्ट कृत्य करने को आनाकानी न करे, जो एक छदाम के लिए भी मित्रों का नाश करने को तत्पर हो, जो बालक अथवा पागल के समान बिल्कुल बुद्धिहीन हो, वह कदापि सुखी नहीं हो सकता।
यदि कोई कहे कि अत्यन्त थोड़े से भौतिक पदार्थों के द्वारा जिस प्रकार जीवन बिता सकें, वह जीवन बिताकर केवल धार्मिक कार्य में लगे रहें, केवल धार्मिक उन्नति करते रहें, तो वह मनुष्य अत्यन्त भूला हुआ है, वह वैयक्तिक दृष्टि से विचार कर रहा है, राष्ट्रीय दृष्टि से नहीं। स्मरण रहे कि व्यक्ति की भलाई-बुराई राष्ट्र की भलाई-बुराई पर अवलंबित है। तप, योग इत्यादि कार्य निर्भय करते रहे, इसके लिये पुराने काल में भी सेना रखनी पड़ती थी और चौकी पहरे का प्रबन्ध करना पड़ता था। जब भौतिक श्रेष्ठता की शंका का उदय भी नहीं हुआ था, जबकि लोग बहुत सच्चे और न्यायी थे, तब लोग साधारणतया धार्मिक कार्यों में स्वभावतः ही लगे रहते थे, तब इन बातों की आवश्यकता थी, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि इसकी आवश्यकता आज विशेष बढ़ गई है। आज हम जीवन-संग्राम में पड़े हुये हैं। इस बात को ख्याल में रखना चाहिये कि जब तक हम थोड़े श्रम से अधिक सम्पत्ति न उत्पन्न करेंगे तब तक हम जीवन संग्राम में न टिकेंगे। इसके साथ ही साथ हमें धार्मिक उन्नति करना है। इसके लिये हमें समय चाहिये। यदि हम रात-दिन केवल भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति में लगे रहें तो हम धार्मिक उन्नति न कर पावेंगे। बहुत समय से हमारी जो धार्मिक और सामाजिक उन्नति हो रही है, उसका मुख्य कारण हमारी समझ में यही है कि थोड़े से पदार्थों के लिये हमें दिनोंदिन अधिक परिश्रम करना पड़ता है सारा समय उसी में जाता है, उससे हमें छुटकारा मिलना ही कठिन हो गया है। विद्या के नये प्रकाश का उतना दोष नहीं कि जितना इस बुरी परिस्थिति का है। इसी नयी स्थिति के कारण हमारी साम्पत्तिक स्थिति बिगड़ गई है, और इस कारण हमारी सामाजिक और धार्मिक अधोगति होती चली जा रही है। आजकल बड़ी कठिनता से जन-समाज अपनी काया को सजीव रख सकता है। रात-दिन किसी प्रकार सम्पत्ति की प्राप्ति करने की चिन्ता में हमें पड़े रहना पड़ता है।
राष्ट्र की अच्छी स्थिति के बिना व्यक्ति की स्थिति अच्छी रह नहीं सकती। हमारे यहाँ के इतिहास में यही भारी दोष दिखाई पड़ता है। हमारे यहाँ के इतिहास में धर्म ने अथवा (और यही सच बात है) धर्म की भूली कल्पना की फैलाई हुई ग्लानि ने इस ओर अत्यन्त उदासीनता उत्पन्न कर दी। परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति किसी भी प्रकार अपना जीवन बिताने लगे और राष्ट्रीय विचार नष्ट होने लगे। इस कारण राष्ट्र की अधोगति होने लगी। राष्ट्र की अधोगति का परिणाम शीघ्र ही व्यक्तियों पर होने लगा, फलतः जीवन-संग्राम तीव्रतर होने लगा। इससे वैयक्तिक अधोगति पूर्ण सीमा को पहुँच गई। लोग स्वार्थी हो गये, झूठ बोलने लगे और असत्याचरण तथा दुराचार करने लगें। इसी के परिणाम आज भी दिख रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि विदेशियों के सामने ये न टिक सके और पराधीन होना पड़ा । अब तो दिनोंदिन ये दुर्गुण और भी बढ़ते चले जा रहे हैं। साराँश, धार्मिक उन्नति प्रधान अवश्य है, परन्तु भौतिक उन्नति के बिना उसका उदय होना असम्भव है। हम फिर भी कहते हैं कि हिन्दू राष्ट्र के लिए भौतिक सम्पत्ति से डरने का उतना कारण नहीं जितना कि पाश्चात्य देशों में है। हमारे यहाँ के धर्म के तत्व जब तक बने हैं, तब तक हम भौतिक पदार्थों के सुख को ही परमसुख कभी न समझेंगे परन्तु जब तक हम भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के पारस्परिक सम्बन्ध को नहीं समझ लेते, तब तक हमारी धार्मिक उन्नति होना सम्भव नहीं। वर्तमान स्थिति का विचार रख कर हमें कार्य करना चाहिये, उसको हम भूल नहीं सकते। उसको यदि भूल जावें और अपने मन में अपने को बड़ा समझते रहे है तो उसे भी खो बैठेंगे। यह बात अच्छी तरह विचार में रखनी चाहिये। माना कि शरीर और संसार के समस्त भौतिक पदार्थ केवल साधन मात्र हैं, परन्तु यह भी स्मरण रखना चाहिये कि उनके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। इस समय उनकी अत्यन्त आवश्यकता है। अपनी उदासीनता के कारण ही हम इस स्थिति को प्राप्त हुए हैं। भौतिक ऐश्वर्य तो खो बैठे ही हैं, परन्तु उदर और शरीर के प्रश्न बहुत कठिन होने के कारण धीरे-धीरे धार्मिक ऐश्वर्य भी खोते चले जा रहे हैं। धार्मिक सम्पत्ति के लिए भौतिक और शारीरिक सम्पत्ति अत्यन्त आवश्यक साधन हैं।जब तक हम जानते रहेंगे कि भौतिक पदार्थ केवल साधन मात्र हैं तब तक धार्मिक उन्नति को भय नहीं, इसका उलटा उसके लिए अवकाश भौतिक उन्नति करने पर ही मिलेगा। नहीं तो लोग अपना जीवन रखने का प्रयत्न उचित-अनुचित सभी उपायों से करेंगे। फिर क्या-क्या अनर्थ होंगे, इसका ठिकाना नहीं। “वुभुक्षितः कि न करोति पाप।”
(श्री स्वामी सत्यदेव जी परिव्राजक)
जीवन एक संगम है-वह संग्राम जिसमें परास्त होने वाले अधिक हैं, और जीतने वाले थोड़े। वे ही विजयी होते हैं, जो अपने इर्द-गिर्द की दशाओं को वश में कर प्राकृतिक नियमों के अनुसार अपने जीवन को बनाते हैं। वे ही सर्वश्रेष्ठ और समर्थ प्राणी हैं।
प्रत्येक वर्ष के आरम्भ में हजारों कलियाँ निकलती हैं, उनमें से बहुत थोड़ी सुन्दर विकसित फूलों की दशा में आती हैं, पश्चात् उनमें से थोड़ी ही निर्दोष पुष्प बनती है, और उन पुष्पों में से थोड़े परिपक्व फूलों की अवस्था तक पहुँचते हैं, इसी प्रकार पक्षी हजारों अण्डे देते हैं, परन्तु उनमें से थोड़े ही बच्चे अण्डों से बाहर निकल कर, प्रौढ़ावस्था ग्रहण कर सकते हैं। इस पृथ्वी पर करोड़ों स्त्री-पुरुष निवास करते हैं, उनमें से थोड़ी संख्या ही ऐसी सन्तान उत्पन्न करती है जो बीज रूप होकर निरन्तर संतति की वृद्धि कर सके। करोड़ों बालक संसार में उत्पन्न होते हैं, उनमें से अधिकाँश कमजोर, निर्बल, दुर्व्यसनी और पतितावस्था में जीवन व्यतीत कर मिट्टी में मिल जाते हैं और दुनिया उनका नाम भी नहीं जानती।
यहाँ पर प्रश्न यह होता है कि समक्षता और योग्यता की कसौटी क्या है? हम कैसे जान सकें कि अमुक स्त्री या अमुक पुरुष के रज-वीर्य में विजेताओं की नस्ल उत्पन्न की योग्यता है या वे केवल अयोग्यों की ही संख्या-वृद्धि करने में समर्थ है? जीवन संग्राम के इस भयंकर युद्ध में कौन सा विजयी हो सकता है? यही एक प्रश्न है।
इन प्रश्नों का यदि हम थोड़े शब्दों में उत्तर दें तो हम कह सकते हैं कि विजयी वह है जिसने अपने ऊपर विजय लाभ की है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार भयंकर गर्जना करते हुए हम सबको निगल जाने की चेष्टा में रहते हैं। मनुष्य जीवन के नाशक ये शत्रु अन्दर से ही अपना नाशकारी कार्य करते हैं, बाहर से नहीं। इसलिए हमें इन अन्दर के शत्रुओं पर विजय-लाभ करना है।
अब यह स्पष्ट है कि हमारा असली शत्रु वह मनुष्य नहीं जो तलवार, बन्दूक, लकड़ी या गोलियों से हम पर हमला करता है, असली शत्रु वह नहीं जो ईर्ष्या द्वेषवश अपने विषैले शब्दों से हम पर चोट करता है। इस बाहर के शत्रु के घाव अधिक हानि पहुँचाने की शक्ति नहीं रखते। ऐसे शत्रु को हम आसानी से वश में कर सकते हैं। मधुर-भाषण दया से सना हुआ कार्य, उदार, वचन-बस इतने से ही वही शत्रु हमारा मित्र और हितैषी बन जाता है। इस प्रकार हम उसको जीत लेते हैं। केवल प्रेम की डोरी, सहृदय और अहिंसा का उच्च भाव शीघ्र ही उसको अपनी ओर आकर्षित कर लेता है, क्योंकि ‘प्रेम’ ही परमेश्वर है।
अतएव हमारी निन्दा करने वाला, दिन-रात लोगों में हमारे प्रति बुरा भाव फैलाने वाला मनुष्य, हमारा शत्रु नहीं है बल्कि सच्चा मित्र है। वह हमें अपनी आन्तरिक दैवी-शक्तियों, उदारता, सहानुभूति युवा-कौशल, दया और आत्म-संयम के विकास का अवसर देता है। वह जो हमारे साथ कुश्ती करता है, हमें अधिक मजबूत और शक्तिशाली बनाता है। वह जो हमारी परीक्षा लेता है, हमें शिक्षा देता है। वह जो हमारी शक्तियों को आह्वान करता है, हमें अधिक वीर्यवान बनाता है। हमारा घातक यह बाहरी शत्रु नहीं, यह तो हमारा मित्र है। इसके साथ युद्ध करने में हम संसार में विजय करना सीखते हैं और जब हम सैकड़ों बार इसको पराजित कर सकते हैं तब संसार को पराजित करना तुच्छ बात हो जाती है।
हमारा असली चोर हमारे अन्दर रहता है। यह बड़ा कठोर, बड़ा दुष्ट, बड़ा मायावी, शक्तिवान, चैतन्य और आजीवन-द्वेषी है। बाहर के शत्रुओं को विजय करने की अपेक्षा इस आन्तरिक शत्रु को विजय करना अति दुःसाध्य है। इसके विजय करने में उन शक्तियों की आवश्यकता है जिनके प्राप्त होने पर अन्य सब प्रकार की विजय-श्री-लाभ आसान हो जाता है। जिस मनुष्य ने अपने आपको वश में कर लिया वह नगर के विजय करने वाले से श्रेष्ठतर है। यूनान के बादशाह सिकन्दर ने बहुत से नगर और देश विजय किये किन्तु वह अपने आपको विजय न कर सका। सड़क के किनारे चिथड़े पहने बैठा हुआ डायोग्रीज, धूल वाली सड़कों पर घूमने वाला महात्मा बुद्ध, छोटी सी पाठशाला में बैठकर पढ़ाने वाला सुकरात और बढ़ई का लड़का ईसामसीह--इन मनुष्यों ने नगर विजय नहीं किये, लाखों मनुष्यों पर आधिपत्य नहीं किया, परन्तु उनकी महत्ता एक दूसरे प्रकार की विजय से थी- जिस विजय के सामने सारा संसार सर झुकाता है और जिसकी प्राप्ति इन्द्रिय-निग्रह से होती है।
सचमुच अपनी इन्द्रियों को वश में करने वाला जिसने अपनी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों को इसी एक कार्य में लगा दिया है, उस मनुष्य से लाख दर्जे अच्छा है जिसने अपनी सेना के द्वारा बड़े-बड़े नगरों को वशीभूत किया हो, क्योंकि, यद्यपि मनुष्य पर प्रभुता पाना बड़े गौरव की बात है परन्तु जिसने अपने आपको जीत लिया वह राजाओं का भी राजा है।
(श्री गणेशदत्त शर्मा गौड़)
तम्बाकू एक बहुत ही बुरी वस्तु है, किन्तु इसका साम्राज्य इतना बढ़ गया है, कि उसे हटाने में बड़े ही परिश्रम और समय की आवश्यकता है। राजा रंक, छोटे, बड़े, मूर्ख विद्वान, सभी इसके चक्कर में आ गये हैं। आजकल इसने इतना आदर पाया है कि आगन्तुक मेहमानों के आतिथ्य सत्कार में भी यह काम आने लगा है। इसके प्रचार में कमी नहीं होकर नित्यप्रति वृद्धि ही हो रही है। मामूली बुद्धि के लोग या यों कहिये कि अधिकाँश लोग जानते भी नहीं हैं कि बीड़ी, सिगरेट बनाने वाले व्यापारी उसकी बनावट में सैकड़ों युक्तियाँ करते हैं, जिससे कि लोग तम्बाकू के व्यसन में फँसते ही रहें और उनका माल धड़ाधड़ खपता रहे। बीड़ी सिगरेट वाले जर्दे में अनेक प्रकार के सुगन्धित तेजाब छिड़कते हैं, संखिया और अफीम का पानी डालते हैं। इस प्रकार से तैयार किये हुए जर्दे की बनी चुरुट, बीड़ी, सिगरेट हम पर अपना अधिक प्रभाव जमाते हैं। कई कम्पनियों के सिगरेटों में पारा मिलाया हुआ पाया गया है और कितनों ही में और भी कई दूसरे पदार्थ! तात्पर्य यह, कि तम्बाकू सेवन करने योग्य वस्तु नहीं है।
हिन्दुओं के पुराणों में तो इसकी उत्पत्ति गोरक्त से मानी है! इतने पर भी अफसोस और शर्म की बात है कि सनातनधर्म, नामधारी, और शिखाधारी हिंदू इसको ग्रहण करके अपने को पवित्र ही समझते हैं!! विदेशों में इसकी रोक का प्रबन्ध हो रहा है परन्तु भारत में अभी तक लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित ही नहीं हुआ है। यदि कोई तम्बाकू का विरोध करने के लिये उठता है तो बदमाशों का एक बड़ा दल उसका सामना करने के लिये तैयार हो जाता है। ऐसा मौका इस पुस्तक के लेखक के साथ कई बार आया है। धर्म के लिहाज से ही नहीं, बल्कि धन के लिहाज से भी, इस व्यसन ने देश का इतना धन फूँक दिया कि जिसका आँकड़ा बाँधा जाना भी असम्भव है। तम्बाकू के सेवक दुराचारी भी हो जाते हैं-बच्चे अपने घर से या किसी दूसरे के पैसे चुरा कर तम्बाकू पीते हैं। कैदी लोग जेल में बड़ी जोखिम उठाकर भी चुराई हुई बीड़ी को छुपाकर रखते हैं। किसी व्यक्ति से पीने के लिए बीड़ी माँगने में किसी प्रकार की लज्जा नहीं होती-इसके लिए भीख माँगनी पड़ती है। तम्बाकू पीने वाले इतने ज्ञान शून्य होते हैं कि हर कहीं, दूसरे के घरों में, देवालयों में, पवित्र स्थानों में भी बिना इज्जत के ही चुरुट जलाने लगते हैं और दिल में जरा भी नहीं शर्माते। नाटक घरों में, सभा भवनों में, बड़े-बड़े कारखानों में बीड़ी सिगरेट पीने की मनाही होती है लेकिन लोग नियमों की कुछ भी परवाह नहीं करते। हम उदाहरणार्थ यहाँ यह दिखलाते हैं कि रेल में तम्बाकू पीना जुर्म है। देखिये-
यद्यपि रेल के डिब्बे में बिना साथियों की आज्ञा के तम्बाकू पीने वाले पर 20 रु. जुर्माने का विधान रेलवे ऐक्ट में है, तथापि हम देखते हैं कि यह ऐक्ट पुस्तक में ही है, कोई भी इसकी परवाह नहीं करता। तात्पर्य यह है कि इसके पीने वाले ज्ञान शून्य हो जाते हैं, उन्हें इसकी धुन में भला-बुरा कुछ भी नहीं सूझता!! बीड़ी चुरुट पीने वाले को यदि कुछ समय के लिये बीड़ी तम्बाकू न मिले तो वे किसी काम के नहीं रहते। स्वर्गीय टॉलस्टाय ने लिखा है-
“एक मनुष्य ने अपनी स्त्री का खून करने का इरादा किया। उसने छुरी निकाल ली, मारने को तैयार हुआ, अन्त में पछताकर पीछे हट गया। फिर चुरुट पीने बैठ गया, उसके विष से उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो गई उसने उठकर अपनी स्त्री को छुरा मारकर मार डाला।”
उक्त महाशय तो यहाँ तक लिखते हैं- “तम्बाकू एक ऐसा सूक्ष्म नशा है कि वह कितने ही अंश में शराब से भी बुरा माना जाना चाहिये।” डॉक्टर आर. टी. ट्राल एम. टी. लिखते हैं- “मेरी सम्मति में वह मनुष्य जो तम्बाकू सेवन करता है कदापि पति या पिता बनने योग्य नहीं है। अपनी स्त्री के सामने इस प्रकार बेहया और निर्लज्ज होने का उसे कुछ भी अधिकार नहीं है, और अपने बच्चों को निर्बल, तथा चिररोगी बनाने का भी उसे कोई हक नहीं है। शराब से भी अधिक भयानक और नवयुवकों में अधिक प्रचलित तम्बाकू सेवन की आदत है। तम्बाकू सेवन से जो चुस्ती मालूम होती है, अन्त में वह सेवन करने वाले को मिट्टी में मिला देती है।”
डॉक्टर अलनस साहब का कहना है- “तम्बाकू सेवन करने वालों को पांडु रोग हो जाय और उनका रुधिर सूख जावे तो कोई आश्चर्य नहीं। तम्बाकू से अजीर्ण होता है, रक्त सूख जाता है और शरीर काँटा सा होता है। रुधिर ही जीवन का कारण है, जिसके कम होने से निर्बल होकर यदि क्षय बन बैठे तो आश्चर्य ही क्या?
डॉक्टर एडवर्ड साहब लिखते हैं- तम्बाकू से मृगी, स्वरभंग, जीर्णज्वर, छाती और सिर में दर्द, कम्पवात, शिरोविभ्रम, अजीर्ण, नाड़ीब्रण, उन्माद आदि कई रोग हो जाते हैं।”
डॉक्टर ब्राउन साहब कहते हैं- “तम्बाकू पीने या सूँघने से मन्द-दृष्टि, शिरःशूल, मूर्छा, अफरा, निर्बलता, गला पड़ना, कम्पवायु, भूतोन्माद तथा कई ऐसे ही रोग होने का भय है।”
डॉक्टर कार्न एम. डी. लिखते हैं--”तम्बाकू के साथ शराब का ऐसा सम्बन्ध है, जैसा कि दिन के साथ रात का।”
डॉक्टर काविन साहब लिखते हैं- “रोगों को पैदा करने वाली बहुत सी आदतों में से शराब और तम्बाकू की ऐब मुख्य हैं। तो शराब और तम्बाकू पीते हैं, उनसे कदापि विवाह मत करो यह मेरा, मेरी बहिनों को उपदेश है। सुस्ती, रोगों का होना, बुरी हालत रहना, शोक, अचानक मृत्यु, जिगर और फेफड़ों के रोग, तम्बाकू और शराब पीने वालों के साथ छाया की तरह रहते हैं। बहिनों! यदि आमरण अविवाहित रहने का मौका आवे तो सहर्ष रहो, लेकिन तम्बाकू और शराब पीने वाले के साथ कदापि अपना विवाह सम्बन्ध मत होने दो।
”न्यूयार्क (अमेरिका) की तम्बाकू विरोधिनी सभा ने प्रकाशित किया है- “तम्बाकू खाने-पीने से थूक की वे थैलियाँ सूख जाती हैं जिनमें कि थूक बन कर तैयार होता है। इस कारण तम्बाकू सेवन के बाद अन्य किसी मादक द्रव्य के पान करने की इच्छा होती है।”
डॉक्टर अलसन ने लिखा है- “तम्बाकू मुख के थूक को सूखा देती है ओर जब प्यास लगती है तब किसी नशेदार पेय को पीकर तृष्णा शान्त करने की इच्छा होती है।”
आयुर्वेद महामहोपाध्याय श्री शंकरदास जी शास्त्री ने अपनी “आर्याभिषक” पुस्तक में लिखा है कि- “तम्बाकू सेवन से मनुष्य को बहुत हानि होती है लेकिन वह समझ में नहीं आती। तम्बाकू खाने से मुख में बदबू उत्पन्न हो जाती है और दाँतों को हानि पहुँचाती है। बलगम उत्पन्न होता है, आँखों को हानि होती है और पित्त भड़कता है। छाती में कफ पैदा होता है और कलेजा जल जाता है।”
धार्मिक दृष्टि से मादक पदार्थों का सेवन प्रत्येक धर्म में मना है। पुराणों में इसे गोरक्त से उत्पन्न बताकर पौराणिकों के लिये निषेध बताया है। जैनियों के धर्मग्रन्थों में तम्बाकू सेवन पाप है। आठवें पोप सावर्त और नवें पोप अनफेण्ट ने तम्बाकू के विरुद्ध कठोर नियम बनाये हैं अतएव ईसाई धर्म में तम्बाकू सेवन धर्म नहीं है। तुर्किस्तान और बर्लिन में तम्बाकू सेवन एक बड़ा भारी पाप है। पारसी धर्म में इसका सेवन पाप माना गया है। सिक्खों में तो तम्बाकू छूना भी बड़ा भारी पाप माना है। लिखने का तात्पर्य यह है, कि तम्बाकू जिसका कि पृथ्वी पर इतना प्रचार है, अत्यन्त बुरा तथा आर्थिक, धार्मिक और आयुर्वेदिक दृष्टि से अस्पृश्य एवं त्याज्य वस्तु है।
(उत्तराध्ययन सूत्र से)
-आज्ञा का उल्लंघन करने वाले, गुरुजनों के हृदय से दूर रहने वाले शत्रु समान (विरोधी) तथा विवेकहीन साधक को ‘अविनीत’ कहते हैं।
-जिस तरह सड़ी कुतिया सब जगह दुत्कारी जाती है उसी तरह शत्रु समान, वाचाल (बहुत बोलने वाला) तथा दुराचारी (स्वच्छन्दी) शिष्य सर्वत्र अपमानित होता है।
-महापुरुषों की शिक्षा से क्रुद्ध होना मूर्ख मनुष्य का काम है। चतुर होकर सहनशीलता रखो। नीच वृत्ति के मनुष्यों की संगति न करो। हँसी-मजाक और खेलकूद भी छोड़ देने चाहिये।
-कोप करना यह चाण्डाल कर्म है, यह न करना चाहिये। व्यर्थ बकवाद मत करो। समय की अनुकूलता के अनुसार उपदेश श्रवण कर फिर उसका एकान्त में चिन्तन मनन करना चाहिये।
-भूल में यदि कदाचित चाण्डाल (बुरा) कर्म हो जाय तो उसे कभी मत छिपाओ। जो दोष हो जाय उसे गुरुजनों के समक्ष स्वीकार करो। यदि अपना दोष न हो तो विनय पूर्वक उसका खुलासा कर देना चाहिये।
-जैसे अड़ियल टट्टू (अथवा गरियार बैलों को हमेशा चाबुक लगाने की जरूरत होती है उसी तरह मुमुक्षु पुरुष को महापुरुषों द्वारा ताड़ना की अपेक्षा न करनी चाहिये। चालाक घोड़ा जिस तरह चाबुक देखते ही ठीक मार्ग पर आ जाता है, वैसे ही मुमुक्षु साधक को अपने पाप कर्म का भान होते ही उसे छोड़ देना चाहिये।
-पूछे बिना उत्तर न दे। पूछने पर असत्य उत्तर न दे, क्रोध को शान्त करे, अप्रिय बात को भी प्रिय बना कर बोलो।
-तप और संयम द्वारा अपनी आत्मा का दमन करना यही उत्तम है! अन्यथा (कर्म जन्य) मार अथवा दूसरे बन्धन मुझे दमन करेंगे ही?
-वाणी अथवा कर्म से, गुप्त अथवा प्रकट रूप में गुरुजनों से कभी बैर नहीं करना चाहिये।
-भिक्षु कभी असत्य भाषण न करे। कभी भी निश्चयात्मक (अमुक बात ऐसी ही है अथवा अन्य रूप में हो ही नहीं सकती इत्यादि प्रकार के ) वचन नहीं कहने चाहिये। भाषा के दोष (द्विअर्थी शब्द प्रयोग, जिससे दूसरे को भ्रम या धोखा हो) से बचें और न मन में कपट भाव ही रखें।
-पूछने पर सावद्य (दूषित) कहे। अपने स्वार्थ के लिये अथवा अन्य किसी भी कारण से ऐसे वचन न बोलो जो निरर्थक (अर्थशून्य) हों अथवा जो सुनने वाले के हृदय में चुभें।
-(यह मेरा परम सौभाग्य है कि) महापुरुष मुझे मीठा उपोलम्भ अथवा कठोर शब्दों में भर्त्सना करते हैं। इससे मेरा परम कल्याण होगा। ऐसा मान कर उसका विवेकपूर्ण पालन करें।
-गुरुजन की शिक्षा (दण्ड) कठोर तथा कठिन होने पर भी दुष्कृत की नाशक होती है इसलिए चतुर साधक उसको अपना हितकारी मानता है किन्तु असाधु जन उसको द्वेषजनक तथा क्रोधकारी मानता है।
-कर्म के हेतु (कारण) को ढूंढ़ो। क्षमा से कीर्ति प्राप्त करो ऐसा करने से पार्थिव (स्थूल) शरीर को छोड़कर तू ऊंची दिशा में जायगा।
-कुबुद्धि बशात् (अज्ञान वशात्) पाप कृत्य करके जो मनुष्य धन प्राप्त करते हैं वे कर्म बन्ध में बँधे हुये और वैर (की साँकलों) में फँसे हुए (मृत्यु समय) धन को यहीं छोड़ कर (परलोक में) नरक गति में जाते हैं।
यज्ञ की महत्ता असाधारण है। उसके अनेक लाभ हैं। (1) वायु की शुद्धता से आनन्दमय वातावरण विनिर्मित होना, (2) वर्षा, अन्त और वनस्पतियों की प्रचुरता, (3) अनेक रोग कीटाणुओं का नाश, (4) अनेक कामनाओं की मनोवांछित पूर्ति, (5) देव और पितरों का पोषण तथा पूजन, (6) पापों का परिमार्जन (7) आध्यात्मिक प्राण चेतना का स्पन्दन, (8) स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति, (9) परम कल्याण और ब्रह्म निर्माण आदि अनेकों लाभ यज्ञ के हैं। इन विषयों पर विस्तृत प्रकाश डालने के लिए आगामी महीने से प्रति मास एक लेख अखण्ड-ज्योति में छपता रहेगा। जिससे पाठक यह सही प्रकार जान सकेंगे कि हमारे धर्म में यज्ञ को इतना महत्व क्यों दिया गया है।भारतीय धर्म में प्रत्येक शुभ वर्ष यज्ञ के साथ आरम्भ होता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अंत्येष्टि आदि सोलह संस्कारों का विधान है, इनमें एक भी संस्कार ऐसा नहीं है जो, बिना यज्ञ किये होता हो। आप सभी शुभ कर्म, व्रत-उपासना, कला, उत्सव आदि में किसी न किसी रूप में यज्ञ का समावेश अवश्य रहता है। विशेष अवसरों के लिये ही नहीं ऋषियों ने नित्य के लिए यज्ञ को आवश्यक बताया है। पंच महायज्ञों को नित्यकर्म बताया गया है। आज यज्ञ की शास्त्रोक्त प्रणाली घूमिल हो गई है फिर भी देखा जाता है कि किसी न किसी रूप में प्रत्येक आस्तिक परिवार में उसकी चिन्ह पूजा होती रहती है। ‘अग्यारी’ या ऐसे ही किसी नाम से अग्नि को घी में प्रज्वलित करके उस पर पूड़ी-पकवान के लघु ग्रास लौंग, धूप आदि चढ़ाये जाते हैं। ऐसी ‘अग्यारी’ होली, दीवाली पर तथा पर्व दुर्गाओं में प्रायः सभी जगह होती देखी जाती है। कितनी ही धर्मात्मा स्त्रियाँ भोजन का प्रथम ग्रास पहले चूल्हे की अग्नि में चढ़ाती हैं तब किसी को भोजन देती हैं। उनकी दृष्टि में अग्नि देव का भोग लगाकर उसका प्रसाद रूप भोजन करना एक उचित धार्मिक कृत्य होता है। इस प्रकार अग्निहोत्र की टूटी-फूटी पद्धतियाँ यत्र-तत्र अब भी दिखाई देती हैं जिनसे यह अनुमान सहज ही हो जाता है कि यहाँ किसी समय यज्ञ में स्त्रियों को महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था।
आज बिजली की शक्ति का उपयोग करके वैज्ञानिक लोग अनेक-अनेक यन्त्रों तथा प्रक्रियाओं का संचालन करते हैं। बिजली ‘महान अग्नि तत्व’ की एक छोटी सी शाखा है। इस शाखा की मर्यादा भी छोटी सी है। आधुनिक विज्ञान वेत्ता इस छोटी सी सीमा का कुछ भाग जान लेने पर बहुत गर्व अनुभव करते हैं। प्राचीन काल में ऋषियों ने महान अग्नि तत्व को असंख्य शाखा-प्रशाखाओं का पता लगाया था और आज के वैज्ञानिकों की तरह स्थूल लाभों तक ही सीमित न रह कर ‘अग्नि विद्या’ द्वारा प्रकृति की सभी शक्तियों पर आधिक्य प्राप्त किया था, इतना ही नहीं अग्नि के अत्यन्त सूक्ष्म ‘कारण’ भाग तक पहुँचाकर सूक्ष्म शरीर के पाँचों आचरणों को नष्ट करते हुए ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करने तक की विद्या जानती थी, सभी महत्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए वहाँ ‘यज्ञ’ होते थे। सत् और असत् कार्यों के लिए विभिन्न प्रकार के यज्ञों का प्रचलन था। वाल्मीकीय रामायण, महाभारत एवं अन्यान्य पुराण इतिहासों से इस प्रकार के अनेक यज्ञों का वर्णन है। रावण आदि असुरों ने भी बड़े-बड़े यज्ञ करके अद्भुत शक्तियाँ एवं सिद्धियाँ पाई थीं। यज्ञ विध्वंस करने में भी असुरों का प्रयोजन यही रहता था कि ऋषियों की शक्ति न बढ़ने पावे।
यज्ञ की महत्ता असाधारण है। उस पर क्रमशः अगले अंकों में प्रकाश डालेंगे। इस समय तो हमें उस कार्यक्रम का उल्लेख करना है तो पिछले अंक में ‘सामूहिक गायत्री यज्ञ आयोजन’ के सम्बन्ध में बताया गया था। गायत्री उपासना का एक आवश्यक भाग हवन है। प्राचीनकाल में तो जप के दशांश हवन होते थे। अर्थात् जो दस वाला यज्ञ करता था वह एक माला (108 मन्त्रों) का हवन भी करता था। साधन सामग्री की असुविधा तथा समय को देखते हुए यह विधान शसाँश का रहा। अर्थात् जो 10000 मंत्र जपे वह 100 आहुतियों का हवन भी करें। पीछे इतना भी कठिन रहने पर सहस्रांशु हवन का निर्धारण हुआ। 24 हजार का अनुष्ठान करने पर प्रायः 240 आहुतियों का हवन किया जाता है। सवालक्ष अनुष्ठान वाले यदि सवालक्ष आहुतियों का हवन नहीं कर पाते तो वे भी 240 आहुतियों से ही काम चलाते हैं। सुविधा असुविधा की दृष्टि से उसे न्यूनाधिक भले ही करनी पड़े पर इतना निश्चित है कि अग्निहोत्र गायत्री उपासना का एक आवश्यक अंग है।
गायत्री परिवार ने पिछले यज्ञों में एक महत्वपूर्ण साधना की है। आप सब लोगों ने मिल कर गत सहस्रांशु ब्रह्म यज्ञ को पूर्ण करने में 125 करोड़ जप 125 लाख आहुतियों का हवन, 125 हजार उपवास तथा लगभग 40 करोड़ का लेखन किया है। गायत्री तपोभूमि जैसे महान तीर्थ का निर्माण, 2400 तीर्थों का जल-रज संग्रह व्यापक गायत्री प्रचार तथा पूर्णाहुति यज्ञ का आयोजन किया है। 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरण 24 दिन का केवल गंगाजल उपवास यह सब भी आपके ही परिवार के एक व्यक्ति ने किया है। यह आगे के भी कार्यक्रम पूर्ण तत्परता पूर्वक चलने वाले हैं और आगे उनका विशेष विकास होने वाला है। इस पिछले कार्य की उचित सफलता और उनके आयोजनों की तैयारी के लिए आवश्यक बल प्राप्त करना हम सभी को अभीष्ट है। इसके लिये 125 करोड़ गायत्री मन्त्रों की आहुतियों का हवन करने का निश्चय किया गया है। जैसे पिछले दिनों अपने परिवार के सभी सामूहिक संकल्प पूरे होते रहे हैं। इसी प्रकार आशा है। कि दो वर्ष से पूर्व ही यह यज्ञ आयोजन भी पूर्ण होकर रहेगा। पिछले दिनों जो तैयारियाँ गायत्री परिवार द्वारा की गई हैं उनसे आशाजनक परिणाम अनेक क्षेत्रों में उत्पन्न हुए हैं। इस वर्तमान आयोजन का भी वैसा ही परिणाम होगा।
यों यज्ञ के विधि विधान बहुत विस्तृत हैं। उनकी बहुत बारीकियाँ, विधि व्यवस्थाएं, प्रक्रियाएं, सामग्रियां एवं कण्डिकाएं उपलब्ध हैं। अनेक प्रक्रियाओं के लिए सूत्र ग्रन्थों ने अनेक प्रकार के विधान हैं तथा आहुतियों के लिए अनेक मंत्र भी हैं। इस विधि व्यवस्था को पूरा करना हर किसी के लिए आसान नहीं है। अनुभवी, कर्मकाण्डी, एवं सदाचारी, विद्वान, वेदपाठी पण्डितों की सहायता से ही वह सब हो सकना सम्भव है। इस प्रकार के यज्ञों का स्वापक आयोजन हो सकना न तो सम्भव है और न आवश्यक। हम सब साधारण रीति से ऐसे अग्निहोत्र करेंगे जिनके लिये जैसे पण्डितों का सहयोग आवश्यक नहीं है। जो रीति इन हवनों के लिए निर्धारित की गई है वह बहुत सरल है उसे गायत्री उपासक आसानी से बिना किसी कठिनाई के पूरा कर सकते हैं। जिस प्रकार “गायत्री सन्ध्या” अकेले एक गायत्री मन्त्र से हो सकती है उसी प्रकार “गायत्री यज्ञ” भी केवल अकेले एक गायत्री मन्त्र से हो सकता है। सभी मन्त्र गायत्री मन्त्र से उत्पन्न हैं। जिस प्रकार किसी बात पर राजा की आज्ञा होने पर उसके सब अफसरों की आज्ञा आवश्यक नहीं होती उस प्रकार गायत्री मन्त्र, अन्य सभी मन्त्रों की आवश्यकता पूरी कर सकता है।
हवन के लिए कहाँ, किस प्रकार, कौन व्यक्ति, तथा आयोजन पूरे यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर है। परिस्थितियों के अनुसार हवन करने वालों के कई विभाग किये जा सकते हैं।
(1) जो एकाकी साधना पसन्द करते हैं वे अकेले बैठकर हवन कर सकते हैं। हवन सामग्री तथा घी मिला कर रखलें । ताँबे के छोटे हवन कुण्ड में या निर्धारित वेदी पर स्वयं हवन कर लिया करें।
(2) अपने परिवार के लोगों को इकट्ठे करके सबको हवन के आस-पास बिठा लें। एक घी चढ़ावें। कुछ व्यक्ति सामग्री की आहुतियाँ चढ़ावें। एक व्यक्ति माला लेकर गिनती करता रहे। आरम्भ में तीन-तीन समिधाएँ घी में डुबोकर सब लोग चढ़ावें और अन्त में तीन आहुतियाँ हवन सामग्री की चढ़ावें।
(3) अपने परिवार वालों, पड़ौसियों तथा मित्रों को आमन्त्रित करके यज्ञ भगवान के पूजन में सबको सम्मिलित करें। प्रार्थना, भजन, कीर्तन, उपदेश आदि का भी इस अवसर पर प्रबन्ध करें।
(4) सामूहिक हवन-किसी ऐसे स्थान पर होने चाहिए जहाँ अधिक से अधिक लोग भाग ले सकें। इनमें खर्च कुछ अधिक हो जाता है इसलिए उसे एक व्यक्ति के लिए करना कठिन होने पर कई व्यक्ति मिलकर करें तो भी ठीक है। एक-एक बार एक-एक व्यक्ति की ओर से भी हो सकता है। बारी-बारी अपने-अपने घर पर यज्ञ कराने की प्रेमी लोग व्यवस्था करें तो भी उत्तम है।
(5) किसी विशेष पर्व या हर्ष उत्सव के समय पर बड़े यज्ञों की भी व्यवस्था करनी चाहिए जिसमें सुयोग्य विद्वानों को भी बुलाया जा सके और ब्रह्मयोग आदि का भी प्रबन्ध हो सके।
साधारण व्यय वाले छोटे हवन भी नित्य हो सकते हैं। क्योंकि इनमें अधिक खर्च, समय और प्रबन्ध की आवश्यकता नहीं पड़ती। एकाकी हवन सन्ध्या पूजा के साथ ही हो जाता है। पारिवारिक हवन में समय और खर्च कुछ बढ़ जाता है। पारिवारिक हवन नित्य करना सरल नहीं हो तो रविवार को, पन्द्रह दिन में करना हो तो अमावस्या को और पूर्णमासी को, महीने में एक बार करना हो दो पूर्णमासी को करना ठीक होता है। किन्तु अमावस्या पूर्णमासी को उचित न हो वे छुट्टी का कोई और दिन निर्धारित कर सकते हैं। सामूहिक हवनों की व्यवस्था साधारणतया एक मास से पूर्व होना कठिन है। क्योंकि समय और धन की जल्दी जल्दी पर्याप्त व्यवस्था लोगों से बन नहीं पड़ती, इसलिए कुछ समय पश्चात करते रहते रहने में सुविधा रहती है। दक्षिणा का बहुत भार न पड़ता हो और कृपा पूर्वक किन्हीं विज्ञ विद्वान पण्डित का सहयोग मिल जाय तो उसे प्राप्त करने का भी प्रयत्न करना चाहिये। जहाँ वैसी व्यवस्था न हो वहाँ गायत्री उपासक पारिवारिक सहयोग से भी इन हवनों की व्यवस्था आसानी से कर सकते हैं।
हवन संबंधी साधारण जानकारी इस प्रकार है।
(1) हवन में शुद्धता का विशेष ध्यान रखना चाहिये। जो लोग सम्मिलित हों, स्नान अवश्य कर लें। वस्त्र भी धुले हुए पहनें। हवन में प्रयोग होने वाली सभी वस्तुओं की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिये।
(2)यों हवन सामग्री की विस्तृत जानकारी हमारी पुस्तकों में दी हुई है। पर साधारणतः 1-गूगल 2-चन्दन चूरा, 3-जायफल, 4-लौंग, 5-नागरमोथा 6-जावित्री 7-बच, 8-इन्द्र जौ, 9-मुलहैठी, 10-बड़ी इलायची, 11-खस, 12-दाल, 13-गोक्षा, 14-छुहारे, 15-बादाम यह 15 चीजें लेने से काम चल सकता है। इनमें लौंग, जवित्री इलायची आदि वस्तुएँ जो अधिक महंगी हों कुछ कम मात्रा में और शेष समान मात्रा में लेना चाहिए। वह वस्तुएँ तो कूट कर लेनी चाहिए।
(3) उपरोक्त हवन सामग्री के बराबर यव चावल, तिल मिलाने चाहिये। इनका अनुपात इस प्रकार होना चाहिए जो एक भाग, चावल दो भाग, तिल तीन भाग, शक्कर चार भाग, काले तिल मिल सकें तो अधिक उत्तम है।
(4) जौकुट औषधियाँ, जौ तिल, चावल, शक्कर इन सबको एकत्रित करके उनमें थोड़ा घी मिला लेना चाहिये।
(5) जहाँ औषधियों वाली हवन सामग्री न मिल सके वहाँ तिल, जौ, चावल, घी, शकर तथा जो सेवाएँ मिल सकें उन्हें मिलाकर काम चलाया जा सकता है।
(6) समिधाएं सड़ी घुनी न हों, पीपल, गुजरि शमी, बरगद, धाम, बेल, ढाक आदि उत्तम वृक्षों की लेनी चाहिये।
(7) यज्ञ के अन्त में मिष्ठान, फल या पंचामृत आदि का प्रसाद उपस्थित लोगों में वितरण करना चाहिए।
(8) 24 आहुतियों के लिए छोटा तांबे का हवन कुण्ड अथवा 12 अंगुला चौड़ी, 12 अंगुल लम्बी, 2 अंगुल ऊँची मिट्टी की वेदी बना लेनी चाहिये। 108 से लेकर 500 आहुतियों तक के लिए 24 अंगुल लम्बी 24 अंगुल चौड़ी 4 अंगुल ऊँची वेदी पर्याप्त है। यहाँ कुण्ड बनाने की व्यवस्था हो सके वहाँ और भी उत्तम है। साधारण हवन के लिए 24 अंगुल चौड़ा, 24 अंगुल लम्बा तथा 24 अंगुल गहरा होना चाहिए। कुण्ड को इस प्रकार तिरछा देखें कि नीचे का भाग चौथाई (6 अंगुल लम्बा 6 अंगुल चौड़ा) रह जाये। ऐसे ठीक लम्बाई-चौड़ाई के बने कुण्ड मिल जावें तो भी ठीक है।
(9) कुण्ड या वेदी को आकर्षक रंगों में चौक पूर कर अथवा पुष्पों आदि से सजाकर शोभादान करने का प्रयत्न करना चाहिये।
(10) कुण्ड या वेदी के ईशानकोण में कलश स्थापना करना चाहिये। मिट्टी या ताँबे का कलश ही उत्तम है, कलश नीचे थोड़ा अन्न बिछाना चाहिये। कलश के मुख पर पीपल, गूलर, पलाश, आम, बरगद इनमें से एक के या मिल सकें तो सबके पत्ते एकत्रित करके पंचवल्लव बनाकर रखना चाहिये। ऊपर से चावल भरा सकोरा रख देना चाहिये। कलश के निकट भाऊ पर घृत का दीपक जलता रहे।
(11) हवन होने के बाद, भस्म तथा पुनः उपचार की अन्य सामग्री को किसी पवित्र जलाशय या वेदालय के समीप विसर्जन कर देना चाहिये।
(12) आर्य समाजी ‘हवन पद्धति’ जिन्हें पसन्द हो वे उसके अनुसार प्रारम्भिक कृत्य एवं आहुतियाँ करते हुए शेष हवन गायत्री मंत्र से कर सकते हैं। दूसरी पद्धति जो गायत्री परिवार के लिये विशेष उपयुक्त होगी नीचे दी जाती है।
हवन की विधि इस प्रकार है :-
(1) यज्ञ में सम्मिलित होने वाले सब लोग शुद्ध होकर, आसन बिछाकर बैठें।
(2) यज्ञ की विधि व्यवस्था संचालन करने वाले प्रधान व्यक्ति सबके मस्तक पर चन्दन लगावें और परस्पर अभिवादन करें।
(3) सब लोग दाहिने हाथ की हथेली पर जल रखकर गायत्री मंत्र पड़ें और उस जल को सिर पर छिड़कते हुए ऐसी भावना करें कि हम इस मंत्र पूजा पाठ के मार्जन से पवित्र बने रहे हैं।
(4) इसके उपरान्त सब लोग ब्रह्म सन्ध्या करें। आचमन, शिखाबन्धन, प्राणायाम, अर्घ्यपण, न्यास यह ब्रह्म संध्या के पाँच अंग हैं। केवल गायत्री मंत्र से ही यह पाँचों कृत्य हो सकते हैं। इनका विस्तृत विधान अन्य पुस्तकों में लिखा जा चुका है।
(5) ईशान दिशा में कलश तथा घृतदीप की स्थापना करें। कलश में सब देव शक्तियों की स्थापना मानकर उसको धूप, दीप, नैवेध, अक्षत, सुपारी, दूर्वा पुष्प, फल चन्दन, कलश आदि माँगलिक द्रव्यों से पूजन करें। तथा संकल्प स्वस्तिवाचन आदि यथास्थिति पढ़ें।
(6) वेदी या कुण्ड की शुद्धि के लिये निम्न क्रियाएं करें। 1-कुशाओं से वेदी या कुण्ड को झाड़ना 2-कहीं कोई अनावश्यक वस्तु ढंकी दिखाई दे वहाँ कुश मूल से कुरेदना, 3-जो कूड़ा कचरा हो उसे उठाकर फेंकना, 4-घी होमने के स्रुवा की जड़ से पश्चिम से पूर्व की ओर-तीन बार उत्तर को हटते हुए तीन लकीर खींचे, 5-कुशा की जड़ से जल सिंचन करें। इसे पंच भू-संस्कार कहते हैं।
(7) सब लोग मिलकर कोई संस्कृत की या हिन्दी की स्तुति गावें।
(8) उपले के अँगार की अग्नि दो मिट्टी के पात्रों (सकोरा) के बीच में ढक कर लावें। उस अग्नि का माँगलिक द्रव्यों से पूजन करें।
(9) संपूजित अग्नि को व्यवस्थापूर्वक समिधाएँ लगे हुए कुण्ड या वेदी के मध्य में अग्नि स्थापित करे। और पंखे से हवा करके अग्नि प्रज्ज्वलित करे। कपूर जलाकर भी अग्नि प्रज्ज्वलित करने की क्रिया कराई जाती है।
(10) जब अग्नि प्रज्ज्वलित होने लगे तब आठ आठ अंगुल की तीन समिधाएं घी में डुबोकर क्रमशः एक-एक समिधा आहुति दें।
(11) अंजलि में जल भरकर क्रमशः पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं वेदी के चारों ओर जल छिड़के तथा थोड़ी-थोड़ी कुशा वेदी या कुण्ड के चारों ओर रखें।
(12) गायत्री मंत्र के अन्त में ‘स्वाहा’ शब्द बोलते हुए आहुति दें।
(13) थोड़े व्यक्ति जो अग्नि से वेदी के आस पास बैठ सकते हों वे ही हवन करें। शेष उनके पीछे बैठकर गायत्री मंत्र तथा स्वाहा का उच्चारण करते रहें। एक व्यक्ति घी चढ़ाये शेष हवन सामग्री चढ़ाएं। यज्ञ संचालन (ब्रह्मा) माला पर संख्या गिनते रहें और आहुति डालने का आदेश देते रहें।
(14) पास में जल भर कर रख लें। आहुति के बाद घी के स्रुवा में बची हुई एक बूँद उस पात्र में डलवा दिया करें। “इदं गायत्र्यै इयं नमम्” ऐसा उच्चारण करें।
(15) नियत संख्या में जप पूर्ण हो जाने पर कोई पूड़ी, पकवान, हलुवा, खाद आदि पदार्थ बना हो तो उसकी पाँच आहुति दें।
(16) आहुतियों से बचे हुए शेष हवन सामग्री तथा घृत को हाथ में लेकर खड़े होकर उसका पूर्णाहुति चढ़ावें, पूर्णाहुति में घी भरा हुआ नारियल पानी चढ़ाते हैं।
(17) सब सज्जन यज्ञ की एक या चार परिक्रमा करें।
(18) घी चढ़ाने के चम्मच की पीठ से यज्ञ भस्म लगाकर उसे क्रमशः मस्तक, ग्रीवा, दाहिनी भुजा की जड़ तथा हृदय पर सब लोग लगावें।
(19) जल के कटोरे में जो घृत की बूंदें टपकाई गई थी उन्हें हथेलियों पर मलकर हाथों को अग्नि के सम्मुख तपायें फिर उस घृत सिक्त हाथ को मुख, आँख, कान, नाक, मस्तिष्क तथा कण्ठ में लगावें।
(20) कलश में भरें हुए जल में कुश दूब या आम के पत्ते डुबाकर वहाँ सब उपस्थित व्यक्तियों पर जल छिड़कें और सबके कल्याण की कामना करें।
(21) कपूर जलाकर या घी के दीपक से यज्ञ की आरती करें ।
(22) यज्ञ में भूलों के लिए प्रभु से क्षमा प्रार्थना, शान्ति पाठ तथा देवताओं का विसर्जन करें। हो सके तो भजन, संगीत, कीर्तन, प्रवचन, आदि का आयोजन करें।
(23) पंचामृत आदि जो प्रसाद हो उसे सब लोगों को वितरण करके कार्य समाप्त करें ।
यों यज्ञों के विधि विधान बहुत विस्तृत है और उनकी अनेकों शक्तियाँ है उन सबके लम्बे फेर में न पड़कर उपरोक्त विधान ऐसा निर्धारित किया गया है जो बहुत सरल होते हुए भी, प्रायः सभी प्रमुख बातों से संयुक्त है। इनमें से सभी विधानों के लिये अनेकों श्रोत एवं स्मार्त मंत्र ग्रन्थों में लिखे हुए हैं। उन मन्त्रों को तथा यज्ञ सम्बन्धी अनेक बारीकियों को बताने के लिए शीघ्र ही इस विषय की पुस्तक प्रकाशित करेंगे। पर वह सब ठीक प्रकार जानना और याद करना सभी गायत्री प्रेमियों के लिए सरल नहीं है। इसलिए उपरोक्त विधान से या देश, काल, पात्र के अनुसार उचित हेर फेर करते हुए अपने यहाँ हवन करना चाहिये। कभी विद्वानों में गायत्री मन्त्र के उच्चारण से काम चल सकता है। हाँ, कार्य के अनुसार भावनाओं का उद्भव अपने मन में करते जाना चाहिये।
विधि विधान बड़ा देखकर किसी को परेशान नहीं होना चाहिये, एक बार जो कार्य को करने लगें वे दूसरों को सिखाने का प्रयत्न करें, यज्ञ रूप भगवान को प्रसन्न करके हम सब सुख शान्ति के भागी बनें।
[महावीर प्रसाद विद्यार्थी, एम.ए., साहित्यरत्न (टेढ़ा-उन्नाव)]
प्यार तुम्हारा ही तो माँ ,इन गीतों में साकार हो गया! बरसाया पीयूष, मरुस्थल, सोने का संसार हो गया!
गला दिया तुमने निज जीवन विश्व-वाटिका यह लहराई! आँधी-पानी में आँचल ढक बुझती दीपक-शिखा बचाई!
क्रोध तुम्हारा उबल पड़ा तो, चंडी का अवतार हो गया!
रोती ठोकर खाकर दुनिया थपकी खाकर फिर सो जाती, उमड़ तुम्हारी करुणा-धारा फूलों पर मोती बिखराती ,
प्यार तुम्हारा तूफानों में, नैया का पतवार हो गया!
किसे भला अवकाश कि सुन ले क्षणभर मेरी करुण कहानी, तुम्हीं न हो तो किन प्राणों में ढालूँ इन आँखों का पानी!
हाथ लगा दो करुणामयि, बस मेरा बेड़ा पार हो गया! प्यार तुम्हारा ही तो माँ, इन गीतों में साकार हो गया!
*समाप्त*