कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः।
यजु. 40/2
मनुष्य इस संसार में कर्म करता हुआ ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे।
आरोहणमाक्रमणं जीवतो जीवतो ऽयनम्।,
अथ. 5/307
उन्नत होना और आगे बढ़ना प्रत्येक जीव का धर्म है।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृतयुमुपाध्नत।
अथ. 11/5/19
ब्रह्मचर्य रूपी तपोबल से ही विद्वान लोगों न मृत्यु को जीता है।
आयुर्यज्ञेन कल्पताम्, प्राणों यज्ञेन कल्पताम्।
यजु. 09/29
जीवन को यज्ञ से समर्थ बनाओ, तथा प्राणों को पुष्ट करो।
जिव्हाया अग्रे मधु में जिव्हा मूल मधूलकम्।
अथ. 34/12
मेरी जिव्हा के अग्र भाग में तथा मूल में मधुरता हो।
शिवा नः संख्या सन्तु भात्रा।
ऋग. 4/10/8
भाइयों से मित्रता कल्याणकारिणी होती है।
ऋतस्य पथा प्रेत।
यजु. 7/45
सत्य के मार्ग पर चलो।
कुण्वन्तो विश्वमार्थम्।
ऋग. 9/63/5
सारे संसार को श्रेष्ठ बनाओ।
मा वः स्तेन ईशत माघशंसः।
यजु. 1/1
चुप से धन लूटने वाला और पाप फैलाने वाला तुम पर हुकूमत न करे।
मधुमती वाचमुदेयम्।
अथ. 16/2/2
मैं मीठी वाणी बोलूँ।
तन्में मनः शिव संकल्पमस्तु।
यजु. 64/1
मेरा मन उत्तम संकल्पों वाला हो।
आकूतिः सत्या मनसो में अस्तु।
अथ. 5/3/4
मेरे मन का विचार सच्चा ही हो।
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वर्ष-14 संपादक- श्रीराम शर्मा, आचार्य अंक-4
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(श्री महावीर प्रसाद विद्यार्थी, टेढ़ा उन्नाव)
हो उठी झंकृत विपंची, देव! फिर मैं क्यों न गाऊँ! चल पड़े थे जब चरण ये, खिल उठे थे अयुत शतदल,
छिन्न था बन्धन क्षितिज का, चूमती थी मृत्यु पदतल, रागमय था व्योम, नीचे हरित अंचल मेदिनी का,
ली यही, जग में निरन्तर ज्योति जीवन की जगाऊँ।
कंटकों का जाल पथ में देखकर मैं मुस्कराया। देख दुर्गम गिरि वनों को मैं नहीं फूला समाया।
रात घिर आई, तिमिर के सिन्धु का तब ज्वार आया, गिर पड़ा मैं श्रान्त विह्वल, पैर क्या पीछे हटाऊँ?
भेद उर तम-तोम का फिर शीघ्र ही होगा सवेरा, रंग भर देगा जगत में तूलिका से रवि चितेरा,
भव्य बाल-मराल मानस में तिरेंगे मुदित होकर, ले यही विश्वास पथ पर
देव! बढ़ता नित्य जाऊँ हो उठी झंकृत विपंची, देव! फिर मैं क्यों न गाऊँ!
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
1- एक छोटा बालक, जो बड़ा होकर एक प्रसिद्ध आत्मवेत्ता बना, ने चार वर्ष की अल्पायु में प्रथम बार एक छोटा-सा कछुआ देखा, उसे यह छोटा सा जानवर रेंगते देखकर विस्मय हुआ। उसके मन में आया कि तनिक लकड़ी से मार कर देखूं तो सही, यह अपना नन्हा सा मुँह हाथ पाँव कहाँ छिपाता है?उसने मारने के लिए लकड़ी उठाई, लेकिन............... न जाने मन के अन्दर से किसी ने लकड़ी मारने से रोक ली। वह कछुये को न मार सका, तनिक सी चोट न पहुँचा सका। इस घटना का वर्णन स्वयं करते हुए बाद में उन्होंने लिखा-
“न जाने मन, आत्मा या हृदय की किस अज्ञात शक्ति ने मेरा हाथ जकड़ लिया। मैं उस अबोध पशु को कुछ भी हानि न पहुँचा सका। मैं मुश्किल से लकड़ी कछुए की पीठ तक लाया हूँगा कि किसी अज्ञात शक्ति ने मेरे हृदय में कहा- “यह क्या करते हो? अबाध कछुये को हानि पहुँचाना तो पाप है। कही ऐसा महापाप मत कर बैठना। देखो, सम्हलो, हाथ सम्हालो, अनजान गरीब कछुये को मार कर पाप के भागी न बनना। जो किसी को हानि न पहुँचाए ऐसे जीव को मारना महापाप है।” इन विचारों से मैं ऐसा भर गया कि इच्छा होते हुए भी उस कछुये को मार न सका। शरीर पर जैसे मेरा प्रभाव न था, वह किसी अज्ञात शक्ति के काबू में था। मैं भागा-भागा घर माँ के पास पहुँचा और उनसे पूछा कि “यह कर्म बुरा है, यह पाप है, पाप से दूर हटो” कहने वाला कौन था? माताजी ने अत्यन्त प्रेम से मेरे अश्रु पोंछते हुए मुझे समझाया-
“बेटा, कोई इस शक्ति को अन्तरात्मा कहता है, कोई इसे आत्मध्वनि के नाम से पुकारता है, किन्तु सत्य बात तो यह है कि यह मनुष्य के अन्तर में स्थिर परमेश्वर की आवाज है, जो भले बुरे का विवेक करती है। यदि तुम आत्मध्वनि के आदेश को ध्यान से सुनोगे और उसके आदेशानुसार कार्य करोगे, तो यह ध्वनि तुम्हें अधिक साफ, अधिक स्पष्ट और अधिक ऊंची सुनाई पड़ेगी। सदैव सीधा और कल्याणमय मार्ग प्रदर्शित करेगी। किन्तु यदि तुम इसकी उपेक्षा करोगे तो धीरे-धीरे यह लुप्त हो जायेगी और तुम्हें बिना पथ-प्रदर्शन के गहन अन्धकार में भटकने के लिए छोड़ देगी।”
2- आत्म-ध्वनि या अन्तरात्मा का आदेश मनुष्य का एक दैवी गुण है। मनुष्य की आत्मा ही उसे उचित-अनुचित, सत-असत, नीर-क्षीर का विवेक करने वाली शक्ति है अन्य पशुओं में औचित्य दिखाने वाली कोई शक्ति नहीं पाई जाती है।
संसृति जात प्रत्येक मनु तनुज देहधारी का शिशुत्व अत्यन्त पवित्र एवं निर्लेप होता है। बालक के हृदय में भगवान बोलता है। उसकी निर्दोष आँखों से दैवी तत्व झलकता है। स्वार्थ या ईर्ष्या का नृत्य उसके मन में नहीं होता। साँसारिक लोभ स्वार्थ या दुरभिसन्धि उस पर अपना प्रभुत्व नहीं जमा सकती, कुवासनाएं उसे अस्त-व्यस्त नहीं कर सकती। बालक का निर्लेप मन नैसर्गिक रूप से किसी भी क्रिया के अनुकरण में तत्पर रहता है। बचपन की प्रत्येक दलित इच्छा या गुप्त मन में बैठी हुई वासना अपनी प्रतिक्रिया डाले बिना नहीं रहती। इन क्रियाओं की अच्छाई-बुराई के बारे में प्रायः हम अपरिचित होते हैं। आत्मध्वनि ही वह दैवी संकेत है जो हमें पग-पग पर बुराई और पाप से रोकती है। ज्यों−ही हम कोई गन्दा काम या पापकर्म करने की ओर प्रवृत्त होते हैं, त्यों−ही आत्मा हमें धिक्कारती या कचोटती है कि हम अनिष्ट मार्ग पर न जायं, पाप से बचें, दुष्कर्म से अपनी रक्षा करें।
आत्मा की आवाज प्रत्येक मनुष्य में सुन पड़ती है। हो सकता है कि अधिक पापों के कारण इस पर मैल मिट्टी जम जाय और यह कुछ फीकी-सी पड़ जाये। किन्तु यह रहती है अवश्य। किसी में तीव्र तो किसी में मन्द। धर्म भीरु, ईश्वर निष्ठ, भक्तों के हृदय में अंतर्ध्वनि बढ़ी तेजी से बोलती है। उनकी रक्षा करती तथा पथ-प्रदर्शन करती है। दुष्ट, पापी व्यक्तियों में अनाचार के कारण यह मोह स्वार्थ और हिंसा में दब सी जाती है।
आत्म-आदेश मनुष्य को मिला हुआ एक दैवी वरदान है, जो आनन्दकनद परमेश्वर की ओर से मनुष्य को सत्पथ पर अग्रसर होने के लिए दी गई है। हमारी आत्मा निर्विकार और अलिप्त है। उसमें किसी प्रकार का मैल नहीं। यही आत्मा हमारे शुभ कार्यों, सात्विक विचारों, भव्य भावनाओं और उत्कृष्ट इच्छाओं की प्रेरक शक्ति है। सर्वोत्कृष्ट ज्योति स्वरूप परमात्मा सबमें विराजमान हैं यही आत्म ज्योति है।
मनुष्य के स्वभाव का परिष्कार, आत्मोन्नति, सद्प्रवृत्तियों का विकास, आध्यात्मिक आनन्द कुछ कुछ इस आत्मतत्व पर निर्भर है कि हम अपनी आत्मध्वनि का कितना विकास करते हैं। आत्मध्वनि हमारे विकास की बात है। निरन्तर इसे सुनने तथा इसके अनुसार ध्यानपूर्वक कार्य करने से हमारी आत्मध्वनि और भी स्पष्टतर और तीव्रतर सुनाई देने लगती है यदि हम आत्मा की अवहेलना किसी कार्य या काल में करते हैं, तो आत्म निर्देश धीरे-धीरे धीमा पड़ जाता है और हमारे पाप कर्म उस पर अपनी जड़ जमा लेते हैं। चोर, डकैत, खूनी कातिल प्रायः सबमें उच्चतर आत्मा का निवास होता है किन्तु पुनः पुनः आत्मा के विरुद्ध जघन्य कार्य करने, आत्मा की अवहेलना करने से वह धीमी पड़ जाती है। कालान्तर में कोई दुष्कर्म, चोरी, डकैती, खून करते हुए उन्हें आत्मा की प्रताड़ना प्रतीत नहीं होती। बार-बार आत्मा की अवहेलना से अन्त में यह मृतप्राय हो जाती है। वह व्यक्ति दया का पात्र है, जिसकी आत्मा दुष्कर्मों और पापों के कारण मर गई है।
3- आत्मध्वनि क्या है? यह हमारे हृदय में विराजमान परम प्रभु हैं परमेश्वर का अस्तित्व प्रत्येक व्यक्ति के हृदय मंदिर में है। विशुद्ध भाव से सुनने वाले को हमारे हृदय में बैठे-बैठे भगवान हमें उचित राह पर चलने का आदेश दिया करते हैं। जो व्यक्ति धार्मिक कृत्यों, साधनों, इन्द्रियों के संयम द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करते हैं और अनन्य शरणागति को प्राप्त होते हैं, उन्हें अंतर्ध्वनि स्पष्ट सुन पड़ती है। आत्मा की आवाज का उठना स्वयं एक शुभ लक्षण है। उस पर भगवत्कृपा समझनी चाहिए। यही आत्मध्वनि जीवात्मा को संसार बन्धन से मुक्ति कर सकती है जो आत्मध्वनि हमें सत्पथ पर अग्रसर करती है वही आत्मा का बन्धन है परमात्मतत्व की प्रतीति इसी तत्व से होती है।
आत्मध्वनि अन्दर रहने वाले ईश्वर का आदेश है। हमारा हृदय एक देवालय है, जिसमें परमेश्वर का निवास है।
“तुम नहीं जानते हो कि तुम देवता के मन्दिर हो और परम देवता तुम्हारे हृदय में हैं” (बाइबिल)
“उपद्रष्टा अनुमन्ता, भर्ता, भोक्ता, महेश्वर और परमात्मा नाम से अभिहित पुरुषोत्तम देह के भीतर स्थित रहते है।” (गीता 13।23)
“हे मरणधर्मशील मानव! तुम अपने को जानो, क्योंकि तुम्हारे भीतर तथा अन्य सभी के भीतर एक अद्वितीय देवता है, जो बाहर आकर संसार के रंग मंच पर नानाप्रकार से अभिनय करता है तथा प्रमाणित करता है कि ईश्वर है।” (रिसरेक्शन लार्ड सिशग्मा)
यदि तुम वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति चाहते हो, तो आत्मा की आवाज ध्यानपूर्वक सुनो और तदनुसार कार्य करो प्रत्येक शुभ सात्विक देवोचित शक्ति का उद्गम स्थान स्वयं तुम्हारे अन्तर में विद्यमान है। संसार की सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं केवल इसी तत्व में समाई हैं कि मनुष्य आत्मिक शक्तियों का कितना विकास करता है। यदि आत्मध्वनि के निर्देश पर चलता रहे तो उसकी उन्नति निश्चय है।
जो मनुष्य संसार में सफल जीवन के अभिलाषी थे, उन भक्त आध्यात्मिक पुरुषों ने प्रथम कार्य अपनी अन्तरात्मा को जाग्रत करने का किया था। अन्तःकरण द्वारा ध्यान से सुनने पर हम परमात्मा की आज्ञा को जान सकते हैं। यदि आप अन्तःकरण की आज्ञा का पालन सीख ले, तो मोटी-मोटी धार्मिक पुस्तकों में अटके रहने की कोई आवश्यकता न रहे, क्योंकि वे भारी भरकम ग्रन्थ भी अन्तरात्मा के सदुपयोग का परिणाम है। अन्तःकरण की आवाज का आदेश-पालन ही दुनिया के तमाम धर्मों का मूल है।
कहते हैं एक बार एक रोमन राजनीतिज्ञ बलबाइयों के साथ पकड़ा गया। बलबाइयों ने उससे व्यंगपूर्वक पूछा- “अब तेरा किला कहाँ है? अब तू किस के बल पर अकड़ेगा?” उसने हृदय पर हाथ रखकर कहा, “यहाँ मेरा परमात्मा मेरे अन्दर है। वह मेरा रक्षक है। उसके बल पर मैं सदा ऊँचा रहूँगा।” ज्ञान के जिज्ञासुओं के लिए यह उत्तर बड़ा मर्मस्पर्शी है जो दूसरों का सहारा चाहते हैं, जो सदा एक न एक अगुआ ढूँढ़ा करते हैं, उनसे मैं कहूँगा, “ओ थोथी विचारधारा वाले हलके मनुष्यों! तुम अपनी अन्तरात्मा के, हृदय में स्थित परमेश्वर के दृढ़ आश्रय को ढूंढ़ो, उसी पर डटे रहो, उसी पर विश्वास लाओ, उसका सम्मान करो।”
संसार में ऐसे अनेक दृढ़ चित्त महापुरुष हो गये है जिन्होंने मरते दम तक अन्तरात्मा की टेक नहीं छोड़ी। सत्यवादी हरिश्चन्द्र, महाराणा प्रताप वीर हकीकत राय, स्वा. विवेकानन्द, रामतीर्थ, महात्मा गाँधी अन्तरात्मा के पथ पर अग्रसर रहे। ये आत्मिक विकास के अनुकरणीय आदर्श है। इन जैसा दृढं आत्माज्ञाकारी पुरुष होना असम्भव है।
पाप यथार्थ में कहाँ है? कोई बात तुम्हारी अन्तरात्मा में चुभे और तुम उसकी परवाह न करो, तो तुम पाप कर रहे हो। क्या आत्मध्वनि की उपेक्षा परमात्म ध्वनि की अवहेलना नहीं है? क्या यह अपमान उस परमेश्वर की प्राकृतिक नियम सीमा का उल्लंघन नहीं है? याद रखिये आत्माज्ञा का उल्लंघन करना, आत्मा की पुकार की अवहेलना अवनति की ओर अग्रसर होना है। आत्म हनन से हम अपने ही लिये अच्छा नहीं करते, प्रत्युत स्थानीय वातावरण को कुचेष्टा के कुविचार से कलुषित कर देते हैं। अन्तःकरण की हत्या करना मानों स्वयं अपनी हत्या कर लेना है। जिनकी अन्तरात्मा नष्ट हो चुकी है, हाय, उन्होंने अपने सबसे बड़े हितैषी, मित्र और पथ-प्रदर्शक को खो दिया हैं वे वास्तव में उन अन्धों के समान है, जो बिना लाठी के गहरे और ऊँचे गार में छोड़ दिये गए है। उस व्यक्ति का पाप-पंक से उद्धार होना कठिन है, क्योंकि बिना अन्तरात्मा के विकास, धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं हो सकता, और न धर्म पर दृढ़ विश्वास ही।
4- आत्मा के आदेश की अवमानना का परिचित चिह्न क्या है? हम किस प्रकार जाने कि हम आत्माज्ञा का कहना नहीं मान रहे है? इसके चिह्न है भय, लज्जा और विषाद तथा प्रसन्नता। प्रथम तीनों मनोभावों की उत्पत्ति तब होती है जब हम किसी अनाचार या कुचेष्टा के करने में आत्माज्ञा का उल्लंघन करते हैं। जहाँ हमने दुष्कर्म में हाथ डाला कि तुरन्त मन में एक संकोच की उत्पत्ति होती है जो उस कुकर्म को करने में प्रतिषेधक सिद्ध होती है। तदनन्तर यह प्रतिसेध्य कार्य का परिणाम भी प्रकाशित करती है कि “यदि तू ऐसा पाप कर्म करेगा, तो तेरा भविष्य अन्धकारमय हो जायेगा, तेरी प्रतिष्ठा ओर कीर्ति में कलंकारोप होगा।
जो व्यक्ति अन्तरात्मा की हत्या करता है, उसके मन में एक गुप-चुप पीड़ा सदा चुभती रहती है। वह दैवी प्रकोप से भयभीत रहता है। तत्पश्चात् लज्जा उसकी काया में प्रवेश करती है और वह किसी प्रतिष्ठित से चार आँखें नहीं कर पाता। यदि उसके पुण्य एवं शुद्ध संस्कार जोर मारते है, तो एक दिन वह जागृत हो उठता है और उसे अपनी भयंकर भूल का ज्ञान होता है। आत्माज्ञा के पालन में वह पुनः अपनी भूल सुधार कर सुख तथा आत्मिक प्रसन्नता प्राप्त करता है। महर्षि बाल्मिकि पहले एक डाकू थे। यकायक एक दिन उनकी अन्तरात्मा जाग्रत हुई और वे परम विद्वान बन गये थे।
यह पश्चाताप, जो आत्मा के आदेश के पालन न करने के कारण मन में उत्पन्न होता है, अनुभवशीलों के जीवन के सुन्दर बनाने में सहायक होता है। गन्दगी, पाप, कुपथ की कुरूपता से परिचित जो व्यक्ति जीवन की विपत्ति की कसौटी पर कसा जा चुका है और खरा है, ऐसा व्यक्ति फिर पाप पंक में नहीं फंसता।
प्रिय पाठक! यदि तुम शान्ति, सामर्थ्य और शक्ति चाहते हो तो अपनी अन्तरात्मा का सहारा पकड़ो। तुम संसार को धोखा दे सकते हो किन्तु अपनी आत्मा को कौन धोखा दे सकता है? तुम दुनिया की आँखों में धूल झोंक सकते हो, पण्डित, विद्वान, धनी, महात्मा सब कुछ बन सकते हो, पर यदि तुम्हारी अन्तरात्मा शक्तिवान, प्राणवान जाग्रत नहीं है, यदि तुम उसकी अवहेलना करते हो, तो तुम्हारे हृदय में एक गुपचुप पीड़ा अवश्य होती रहेगी। यह है आपकी अन्तरात्मा की महान शक्ति। इसे साधने से सब-सब जायेगा।
अन्तःकरण को बलवान बनाने का उपाय यह है कि आप कभी उसकी अवहेलना न करें। वह जो कहे, उसे सुनें और कार्य रूप में परिणत करें, किसी कार्य को करने से पूर्व अपनी अन्तरात्मा की गवाही अवश्य लें। यदि प्रत्येक कार्य में आप अन्तरात्मा की सहमति प्राप्त कर लिया करेंगे तो विवेक कभी नष्ट न होगा। दुनिया भर का विरोध करने पर भी यदि आप अपनी अन्तरात्मा का पालन कर सकें, तो कोई आपको सफलता प्राप्त करने से नहीं रोक सकता।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा एम.ए. एल.एल.बी.)
प्रतिकूल प्रसंग, बुरा स्वास्थ्य, विरोधी परिस्थितियाँ, गरीबी, और कष्टों के काँटों में प्रायः महापुरुषों की शक्तियाँ विकसित हुई है। अनेक व्यक्तियों की गुप्त शक्तियाँ चेतना की ऊपरी सतह में न होकर प्रायः निम्न स्तरों में छिपी पड़ी रहती है। इन छुपी हुई गुप्त शक्तियों को विकसित करने के लिए मामूली झकोरों या मनः हलचलों से काम नहीं चलता। उनके लिए गहरे झटके, गहरी खोज लगानी होती है।
कुछ व्यक्ति स्वर्ण की उन खदानों की तरह हैं, जिनमें बहुत गहरा खोदने से सोना उपलब्ध होता है। जब मजदूर खोदना प्रारम्भ करता है, तो ऊपरी मिट्टी सख्त प्रतीत होती है, कंकड़ पत्थर आते-जाते है। खोदना फिर भी जारी रहता है। अन्ततः वे सोने के उन गुप्त केन्द्रों में आ जाते हैं, जो इधर-उधर खान के अन्तराल में अलक्षित पड़े हुए थे। मामूली चंचल प्रकृति का व्यक्ति थोड़ा सा खोद कर निराश हो सकता था किन्तु सतत् उद्योगी मजदूर अन्ततः उन छुपी हुई स्वर्ण कणिकाओं तक पहुँच ही जाता है। आपके मन के गुप्त प्रदेशों में छुपी हुई बौद्धिक, मानसिक अथवा आत्मिक शक्तियाँ ऐसे ही निचले मनः-स्तरों में निवास करती हैं। प्रतिकूलता के गहरे झटके, मन, शरीर, बुद्धि इत्यादि सबको आमूल झकझोर देने वाले तूफान प्रायः इन शक्तियों को जाग्रत कर देते हैं।
स्वेट मार्डन साहब ने इन छुपी हुई गुप्त शक्तियों की तुलना उन फौलादी टुकड़ों, गोलियों या लोहे के छोटे-छोटे बेढंगे कणों से की है, जिन्हें हम लापरवाही से योंही बच्चों के खेलने के लिए फेंक दिया करते हैं। लेकिन इन्हीं लोहे के टुकड़ों को एकत्रित कर जब हम बम बनाते है, तो इनसे अद्भुत शक्ति का प्रादुर्भाव होता है, और इनसे बड़े मकान, चट्टान तथा पर्वत तक उखड़ जाते है। इसी प्रकार मानसिक एवं बौद्धिक शक्तियों के प्रादुर्भाव के लिए जीवन के विकट क्षण, विषम परिस्थितियाँ, कठिन विरोध आते हैं। और महान व्यक्तियों की गुप्त शक्तियों को प्रतिकूलता में भी जाग्रत कर देते हैं।
कुछ व्यक्ति जागते हुए भी सोते हुए व्यक्तियों के समान लापरवाह, भूले हुए, अर्द्धनिद्रित जैसे होते हैं। वे कभी अपने मन बुद्धि या आत्मा के गुप्त खजाने को ढूंढ़ने की चेष्टा नहीं करते यहाँ तक कि कोई कड़ा विरोध या प्रतिकूलता आकर उन्हें झकझोर जाती है। उनकी संचित शक्तियाँ इतनी गहरी पड़ी रहती हैं, कि मामूली प्रेरणा या प्रोत्साहन से कुछ भी नहीं होता। जब उनका विरोध होता है अथवा मजाक उड़ाया जाता है, मानहानि होती है, गालियाँ पड़ती है, तो उनकी दृढ़ता, इच्छा शक्ति या गुप्त साहस यकायक जाग्रत हो जाता है। चाणक्य इस प्रकार के व्यक्ति का एक उदाहरण है। खिल्ली उड़ाये जाने पर उन्होंने दृढ़तापूर्वक प्रतिशोध लेने की प्रतिज्ञा की और उसी के लिए सतत् उद्योग करते रहे। अन्त में उन्होंने एक राज्य की नींव उखाड़ डाली। दृढ़ संकल्प उत्पन्न होते ही ऐसे व्यक्तियों की उन्नति प्रारम्भ हो जाती है और कुछ काल की साधना के उपरान्त वे अपनी महानता खोज लेते है।
मैं एक ऐसे निर्धन विद्यार्थी को जानता हूँ जो धनवान विद्यार्थियों के उपहास का विषय थे। जब वे प्रथम बार कालेज में प्रविष्ट हुए तो उनकी गरीबी, गँवारुपन और अस्त-व्यस्त हालत को देखकर अन्य सब उन्हें चिढ़ाते थे किन्तु कुछ ही दिनों के उपरान्त उनके चरित्र की सचाई, परिश्रम शीलता और बुद्धि की कुषाग्रता का ऐसा प्रभाव फैला कि पूरी कक्षा उनका लोहा मानने लगी। फीस तक के लिए रुपया चन्दा किया गया। वर्ष भर उनके साथियों ने उन्हें भोजन कराया। ट्यूशन करते रहे, पाँव में कभी जूता न रहा, जाड़ों भर ठिठुरते रहे, किन्तु परीक्षा में नम्बर सदैव अच्छे आये। आज वे एक उच्च सरकारी पद पर हैं और अच्छा वेतन पा रहे हैं। उन्होंने विरोध में भी सदा अपनी उच्चतम शक्तियों को जामत रखा है।
इनसे कभी-कभी बातचीत होती है तो वे बताया करते हैं कि जितना भी अधिक उनका मजाक उड़ाया गया, उतना ही वे आगे बढ़े, उतनी ही दृढ़ता से उन्होंने परिश्रम किया, विद्यार्थी काल में भी वे महत्वाकाँक्षा को सदा आगे बढ़ाते रहे।
एक व्यापारी से बातचीत करने पर विदित हुआ कि अपने दीर्घ जीवन में उन्हें व्यापार में जो भारी सफलता प्राप्त हुई है उसका गुर कठोर परिश्रम और सतत् संघर्ष रहा है। वे अब आसानी से प्राप्त हो जाने वाली सफलताओं से डरते हैं। यदि बिना परिश्रम सतत् संघर्ष और कठोर विरोध के बिना कुछ प्राप्त हो जाता है तो वे उसमें कही न कहीं कोई न्यूनता या अस्थायीपन जरूर देखते हैं। वे साधारण सफलताओं से संतुष्ट नहीं होते क्योँकि उन्हें उनमें आनन्द प्राप्त नहीं होता। न उस आनन्द को अधिक महत्व देते हैं जो बिना एक कठोर संघर्ष के उपरान्त प्राप्त होता है।
इतिहास में हमें अनेक व्यक्तियों के उदाहरण उपलब्ध हैं, जिन्होंने अपने शारीरिक विकार अथवा किसी न्यूनता की क्षतिपूर्ति अपने बौद्धिक एवं आश्चर्य चकित करने वाले मानसिक गुणों की वृद्धि करके की है। लड़कियाँ जो कुरूप थी, या अतिसाधारण सौंदर्य की थी, अपने अद्भुत गुण विकसित कर सकी हैं। उनके मन में कमजोरी के ऊपर विजय प्राप्त करने की तीव्र उत्कण्ठा थी, जो उनसे निरन्तर यह कठोर परिश्रम कराती रही। एक प्रसिद्ध अंग्रेज जन्म से ही बिना हाथ पाँव के रहे, किन्तु उनका मस्तिष्क इतना अद्भुत, इतना शक्तिशाली था कि एक आगन्तुक ने उससे प्रभावित होकर उन्हें एक उच्च पद पर नियुक्त किया और वे एक बड़ी फर्म के मैनेजर का कार्य सम्हालते रहे। मस्तिष्क की कुशाग्रता के सम्मुख उनका हाथ पाँव विहीन होना बेमानी रहा।
अपने आपको शारीरिक दृष्टि से भरा पूरा पाने के कारण हममें से अनेक व्यक्ति अतिसाधारण शक्तियों या साधारण से परिश्रम मात्र से सन्तुष्ट हो जाते हैं, गहरे में सोती हुई गुप्त शक्तियाँ जाग्रत ही नहीं हो पाती। इन व्यक्तियों के मामूली बने रहने की यही दर्दनाक कहानी है।
एक प्रसिद्ध कहानी में एक साधारण सी स्त्री के गुम सामर्थ्य के विकास की कहानी इस प्रकार कही गई है। वह साधारण स्थिति के एक क्लर्क की पत्नी थी। एक दिन एक धनी से किसी उत्सव में सम्मिलित होने के लिए एक हार माँग लाई। संयोग से हार खो गया। उसका ऋण उतारने के लिए उसने कठोर परिश्रम किया। निरन्तर 15 वर्ष तक कार्य करती रही। अन्ततः जब ऋण चुकाने का समय आया तो ज्ञात हुआ कि हार नकली था। उस युवती के आश्चर्य, विस्मय परिश्रम का अनुमान कीजिए। लेकिन एक बात दिन की तरह स्पष्ट थी। वह था उसका कठोर अनवरत परिश्रम, जिसने उसे एक साधारण स्थिति से उठाकर असाधारण शक्तियों वाली स्त्री बना दिया। जब किसी भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष कारण से मनुष्य एक निश्चित दिशा में परिश्रम पर जुट जाता है, तो निश्चय ही उसकी अगाध शक्तियों का भण्डार खुल जाता है।
कुछ व्यक्ति कभी अपनी शक्तियाँ नहीं खोज पाते, कभी अपने गुप्त सामर्थ्यों को नहीं खोजते। जब तक कि उन्हें विरोध और असफलता प्राप्त होती है। उनकी संचित शक्तियाँ इतने गहरे में रहती हैं कि साधारण धक्के या झटके से जाग्रत नहीं होती। जब उन्हें कोई असाधारण चोट पहुँचती है, मानहानि अथवा धक्का-सा लगता है, गाली दी जाती है, तो न जाने किस गुप्त प्रदेश से अद्भुत शक्ति जाग्रत होकर चेतना के ऊपरी स्तर पर आ जाती है। चाणक्य इसका एक उदाहरण है। मानहानि की चोट लगने पर उसकी गुप्त शक्तियों का विकास हुआ और उसने राज्यों की उलट-पलट की।
यदि अब्राहम लिंकन एक साधारण परिवार में जन्म न लेकर किसी अमीर के विलास महल में जन्म लेते, और मन लगाकर एकाग्रता पूर्वक अध्ययन न करते, तब वे कैसे अमेरिका के राष्ट्रपति बन पाते? गरीबी को दूर करने के लिए उन्होंने भरसक चेष्टाएं की दृढ़ संकल्प से मन लगाकर एकाग्रता पूर्वक कार्य किया। अन्ततः परिश्रम के बल पर विजयी हुए। प्रतिकूलताओं से सतत् संघर्ष कर वे अन्त में उच्चतम पद पर प्रतिष्ठित हुए। यदि आराम तलबी में अमीर बच्चों के साथ रहते, तो कौन उनके कार्य, अध्यवसाय अथवा परिश्रम का महत्व सूचित करता।
मनुष्य स्वभावतः आलसी और आरामतलब जीव है। वह कठोर परिश्रम से दूर भागता है। जब तक उसके सामने कोई विशेष कारण, कोई लाभ अथवा निकट भविष्य में होने वाला फायदा नहीं होता, तब तक वह कार्य में पूरी तरह नहीं जुटता, उसकी शक्तियों का भी पूर्व विकास नहीं हो पाता। चेतना के ऊपरी स्तर की शक्तियाँ ही काम में आती रहती है।
अमीर व्यक्ति का बालक, जिसको घोर संघर्ष की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती, उतना कठोर संघर्ष नहीं कर पाता, जितना एक निर्धन व्यक्ति का बालक करता है। गरीब को सदा समाज में अपनी स्थिति उच्चतर श्रेष्ठतर, बनाने की इच्छा रहती है। यही उसे आगे धकेला करती है। एक अमीर ढीले-ढाले लड़के की तुलना आप एक मजबूत दृढ़ प्रतिज्ञ निर्धन व्यक्ति से कीजिए जो प्रतिकूलताओं के विरोध में निरन्तर अग्रसर होता चलता है। एक कमजोर है, दूसरा शक्ति का आत्म पिण्ड। संसार में आपको अनेक ऐसे व्यक्ति मिलेंगे जिनके विकास, उन्नति और अभिवृद्धि की मूल धारणा प्रतिकूलताएं ही रही हैं।
जेता शत्रु न विचषणिः।
अथ 10/47/10
प्रभु ही सब शत्रुओं को जीतने वाले और उनके द्रष्टा हैं।
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा।
यजु 40/2
मनुष्य इस संसार में कर्म करता हुआ ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करें।
(श्री पं. गंगादत्त शास्त्री)
भारत के कई प्रान्तों और विशेष कर पंजाब में साम्प्रदायिक दंगों और उनसे होने वाली जान-माल की अथाह क्षति का बाजार गर्म है। जिधर देखते हैं उधर ही मानवता के स्थान पर दानवता का ताण्डव नृत्य नजर आता है। हिन्दुओं के मन्दिर और मकान जलाये जा रहें हैं करोड़ों की सम्पत्ति लूटी जा रही है, बच्चों, बूढ़ों और स्त्रियों का निर्दयता से वध किया जा रहा है। ये भयंकर उपद्रव- जिनके सम्बन्ध में पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, आज प्रत्यक्ष दिखाई पड़ रहें है। हम अपने ही सन्मुख अपनी असंख्य माँ बहिनों तथा बहू-बेटियों को इस अकाल मृत्यु का ग्रास बनते हुए प्रतिदिन देख रहे हैं। किन्तु असमर्थता के कारण भागने के सिवाय हमारे पास दूसरा चारा ही नहीं।
जिस जाति के पूर्वजों ने पग पग पर संसार को वीरता की अलौकिक झनकार सुनाई थी और अन्याय व अत्याचार का अन्त करके विश्व में सुख-शान्ति का साम्राज्य समर्पित करने का दिव्य संदेश दिया था, आज उन्हीं के वंशज हम उनके उपदेश के विपरीत चलें तो यह जानकर किसे दुख न होगा?
शताब्दियों से परतन्त्रता की बेड़ियों में जकड़े हुए हिन्दु-समाज ने शारीरिक गुलामी के साथ-साथ बौद्धिक परतन्त्रता को भी इस कदर अपना लिया कि उसने अपने साहित्य का ज्ञान तो दूर रहा- उसका परिचय प्राप्त करना भी व्यर्थ समझा और वैदेशिक साहित्य का केवल मात्र अध्ययन और उसका अन्धानुकरण ही जीवन का उच्च ध्येय समझ लिया। इस अन्धानुकरण और उपेक्षा-भाव ने ही वास्तव में हिन्दू-जाति का यह पतन कर डाला है। क्या ही अच्छा होता यदि प्रत्येक हिन्दू केवल मात्र गीता का ही अध्ययन कर- उसके पद-चिन्हों पर चलता। रण से विमुख और कायरता की रट लगाने वाले अर्जुन जैसे क्षत्रिय को जिसने मधुर सन्देश द्वारा युद्ध के लिए उत्तेजित कर दिया और भयंकर संग्राम द्वारा असंख्य शत्रुओं का संहार करते हुए निर्बल पाण्डवों के गल में वैजयन्ती पहना दी। क्या आज भी उस गीता के प्रतिशब्द में वह धधकती हुई आग नहीं है?
आज भी वह संसार में दानवता का दमन करते हुए मातृभूमि को- जो अपने ही कुपुत्रों की काली करतूतों से बुरी तरह खण्डित हो रही है- अखण्ड तथा सुखमय नहीं बना सकती है ? किन्तु हिन्दू जाति का दुर्भाग्य है कि उसने स्वदेशाभिमान और वीरता में विश्वास के स्थान पर केवल मात्र अपने ही भाइयों का खून चूस कर पूँजी इकट्ठी करना सीख लिया है। ये भावनाएं ही उनमें कायरता भर ही है। गीता में ऐसे मनुष्यों को खूब फटकार दी है और उन्हें अनार्थ तथा दुर्बल हृदय कहा गया है। इसी विषय पर अर्जुन को सम्बोधित करते हुए श्री कृष्ण ने कहा था-
कुत्पस्त्ना कश्मलमिदं विषमें समुपस्थितम्, अनार्य जुष्टमस्वर्ग्यकीर्तिकरमर्जुन !
क्लैव्यं माम गमः पार्थ नैतत्वय्युपपद्यते क्षुद्रं हृदयदौबल्यं त्यक्तवोत्तिष्ट परन्तप !
हे अर्जुन ! इस संकट के अवसर पर तुम्हारे में इस प्रकार का अज्ञानयुक्त मोह कैसे पैदा हो गया है कि- “मैं अपने सम्बन्धियों को रण में नहीं मारूंगा, यह मानवता तो कायरों के हृदय में पैदा होती है, इससे अपयश और नरक ही प्राप्त होता है। इसलिए घबराओ मत! तुम्हारे जैसे वीर पुरुष के लिए यह बात शोभा नहीं देती। हृदय की दुर्बलता तथा क्षुद्रता को छोड़कर धनुष उठाओ और शत्रुओं से जाकर लड़ो, यदि तुम इस क्षात्र धर्म का पालन न करोगे तो- ततः स्वधर्म कीर्तिन्च हत्वा पापमवा प्स्थसि अर्थात् अपने धर्म और यश को त्याग कर पातकी कहलाओगे। उस दशा में संसार में तुम्हारा जीवित रहना उचित नहीं होगा, क्योंकि सम्भावितस्य चाकितिर्मरणादतिरिच्यते, संसार में प्रतिष्ठित व्यक्ति की निन्दा मृत्यु से भी भयंकर है।
गीता के इन जीवन भरे उपदेशों ने ही एक बार अज्ञानान्धकार में पड़ी हुई हिन्दू जाति को जगाकर कर्त्तव्य मार्ग की ओर अग्रसर किया था और भारत में पुनः हिन्दुत्व की जड़ पक्की की थी।
शत्रु से प्रतिक्रिया लेना हमारा शास्त्रोक्त धर्म है और शास्त्र ने यहाँ तक कह दिया है कि शत्रु को अपनी कन्या देकर भी मार देने में कोई दोष नहीं है। जो आदमी अपनी मातृभूमि को विधर्मियों द्वारा पद-दलित देखकर भी कान में तेल डालकर सोया रहता है वह परम कृतघ्न है, पितर भी उसके हाथ की अंजलि ग्रहण नहीं करते- “पितरोअपि ने गृहृन्ति तद्दत्ताँ सलिलाज्जलिम” हिन्दुओं के वेदों और शास्त्रों ने केवल वीरता के गीत नहीं गाये अपितु इनके पूज्य देवताओं ने स्वयं शस्त्र ग्रहण करते हुए इन शिक्षाओं को कार्य रूप में परिणत करके दिखला दिया है शिवाजी ने त्रिशूल, दुर्गा ने धनुष तलवार, भाला आदि गणेश ने शंकु और हनुमान ने गदा ग्रहण की है भीष्म ने तो यहाँ तक कह दिया था :-
अग्रत श्चतुरो वेदाः षृष्टतो धनुरुद्यतः। इदं ब्राह्म इदं क्षात्रं शापेन च शरेण च ॥
अर्थात्- ब्राह्मण होने के नाते मेरे आगे चार वेद रखे हैं और मेरे पीछे युद्ध के लिए तैयार धनुष पड़ा है। मेरे पास ब्रह्मा और शास्त्र दोनों तेज हैं, जिससे काम पड़ेगा उसी का उपयोग करूंगा। खेद। अपने पूर्वजों के इन आदर्शों को भूल कर आज हिन्दू जाति दूसरी ही ओर जा रही है। जिस जाति के नौनिहालों ने केवल एक स्त्री का अपमान न सहकर महाभारत जैसा भयंकर संग्राम करा डाला और उस अपमान का पूरा बदला लिया, उन्हीं की सन्तान आज की हिन्दू जाति है, जिसके सामने प्रतिदिन हजारों अबलाओं की अस्मतें लूटी जा रही हैं, उनकी हत्याएं की जा रही हैं, उनके नन्हें शिशुओं को अग्नि की लपटों में धकेला जा रहा है। और उनके परिवार वालों को कमरों में बन्द करके आग लगाकर भस्म किया जा रहा है, परन्तु फिर भी इनके खून में हरकत पैदा नहीं होती।
हिन्दुओं के सर्वश्रेष्ठ नेता श्रीकृष्ण को कौन नहीं जानता, जिनके श्रीमुख से गीता के अमर उपदेश निकले हैं, उन जैसा वीर और दृढ़ प्रतिज्ञ मनुष्य आज तक कोई नहीं हुआ। जिस समय द्रौपदी ने उन्हें दूत के रूप में जाते हुए देखा तो उसने कहा- भया! तुम उनसे सन्धि करने तो जा रहे हो किन्तु मेरे बालों को न भूल जाना, इन्हीं बालों को खींच कर उन्होंने एक अबला का अपमान किया था। तब श्री कृष्ण ने उत्तर दिया- है द्रौपदी ! चाहे हिमालय पर्वत चलने लग पड़े पृथ्वी के सौ टुकड़े हो जाय और आकाश नक्षत्रों के सहित गिर पड़े, किन्तु मेरा वचन असत्य नहीं हो सकता, मैं उन आततायियों से बदला लेकर रहूँगा।
श्रीकृष्ण ने जैसा कहा करके दिखला दिया और दुनिया के सामने एक ज्वलन्त आदर्श रख दिया- ‘आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारता” अर्थात् सामने आते हुए शत्रु को बिना सोचे समझे मार गिराना चाहिए। नीति शास्त्र भी कहता है कि “सदसि वाक् पटुता युधि विक्रमाः” अर्थात् असली मनुष्य वही है जो सभा में वाक् चातुरी और रण में कौशल दिखलाये, सदियों से अपने इन उज्ज्वल आदर्शों को भूलकर हिन्दू जनता कमजोर तथा आत्म विस्मृत हो चुकी है और आत्म गौरव तो इसमें लेश मात्र भी नहीं दिखाई पड़ता, केवल ‘ब्लैक मार्केट’ के जरिये पैसा कमाना और उसे ऐशोआराम में खर्च करना ही इसने अपना मुख्य ध्येय समझ लिया है। अपना देश अपनी सभ्यता और अपना साहित्य इसने बिल्कुल तुच्छ समझ लिया है।
मुसीबतों में पड़े हुए अपने लाखों भाइयों की दुख गाथाएं- सुनने की इसे आवश्यकता नहीं। जिस देश के अन्न, जल और मिट्टी से जीवन प्राप्त कर यह हिन्दू जाति फली और फूली है, उसी को विधर्मियों द्वारा पद-दलित कराने में इसने कोई कसर शेष न रखी। निरन्तर सुख-निद्रा में सोये रहने के कारण इसमें से देश-भक्त और वीरता के भाव ही जाते रहे और देश की चिन्ता लग पड़ी। विपत्ति काल में अपनी अन्याय से कमाई हुई पूँजी के साथ कायरों की तरह लुक-छिप जाना ही इसने अपना आदर्श समझ लिया है। इस बुज़दिली को सर्वप्रथम जन्म देने वाले हैं हमारे ये बड़े-बड़े तोंद-धारी पूँजीपति- जिन्होंने हर मुसीबत के समय देश के साथ गद्दारी की, धोखेबाजी की और गीता के पवित्र सिद्धाँत को ठुकरा कर समय से अनुचित लाभ उठाया और देश को हर सम्भव उपाय से चूस-चूस कर अस्थि शेष कर डाला है।
एक ओर तो हजारों निरपराध स्त्रियों, बूढ़ों, और बच्चों की हत्याएं की जा रही है, हिन्दुओं के मन्दिर बाजार धर्मशालाएं तथा मकान जलाए जा रहे हैं। और अबलाओं के सतीत्व पर आक्रमण हो रहें है, तो दूसरी ओर हमारे ही हिन्दू भाई इन सब घटनाओं से अनजान बन कर ब्लैक ‘मार्केट’ के चक्कर पर चल रहे हैं और “पैसा गुरुणा गुरु” वाली कहावत चरितार्थ कर रहें है। मैं नहीं जानता कि ऐसे पापियों का बोझ उठाने के लिए हमारी मातृभूमि को कितने कष्ट का सामना करना पड़ रहा होगा। जब देश पर विधर्मियों के आक्रमण हो रहें हैं तब स्वयं बोरियाँ- बिस्तर बाँध कर दुबक जाना मनुष्यता नहीं पशुता है और कायरता है। पिछले जमाने में जब कुछ डरपोक क्षत्रिय युद्ध से भाग कर अपने घरों में आते तो वीर क्षत्राणियाँ उन्हें सौ-सौ लानतें देती- “तुम क्षत्रिय कुल के कलंक हो, तुमने अपने कुल को धब्बा लगाया है”। उन वीर क्षत्राणियों को अपने पतियों और पुत्रों का इतना मोह नहीं था। जितना कि युद्ध में क्षत्रियत्व की शान रखने का।
आज कल देश में जितने दंगे और फसाद हो रहें है उनमें हिन्दुओं की स्वार्थान्धता, दुर्बलता और पलायन वृत्ति ही मुख्य कारण है। हमारे विरोधियों में यह विश्वास फैल गया है कि हिन्दू कायर और बुज़दिल हैं, इसीलिए वे उन पर आक्रमण करने का साहस कर देते हैं। हिन्दू बजाय भागने के यदि संगठित होकर एक बार भी उनके दाँत खट्टे कर दें तो फिर उनमें फसाद करने की हिम्मत नहीं हो सकती अतः हिन्दुओं की भलाई इसी में है कि वे एक बार गीता का अमर उपदेश सुनकर वीरता से गुण्डों का सामना करें।
हिन्दू समाज को जागृत करने के लिए गीता एक अमूल्य साधन है। इसके एक एक शब्द में वह उत्तेजना, वह नवस्फूर्ति और वह अन्तर्ज्वाला भरी हुई है जो मुर्दे में भी जागृति पैदा करती है। श्रीकृष्ण जैसे महान क्रांतिकारी नेता के मुख से निकले हुए ये शब्द सुनने मात्र से ही शरीर के अंग-अंग में आग की लपटें पैदा कर देते हैं। आज की विषम परिस्थिति में यदि हमारी रक्षा हो सकती है तो इसी अनुपम ग्रन्थ के तूफानी उपदेशों का कार्य रूप में परिणत करने से।
(श्री सावित्री देवी जी फिल्जोर)
रोग में ग्रस्त बालक शय्या पर पड़ा है। वह कहता है “नहीं अम्मा आज तो वैद्यजी मुझे भोजन के लिये खासतौर से मना कर गये हैं, यह कह गये हैं कि आज तुम कुछ नहीं खाना क्योंकि वह तुम्हारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचायेगा।” किन्तु पास खड़ी अम्मा भोजन भरी थाली हाथ में लिये कह रही है, नहीं बेटा “थोड़ा-सा तो खा लो, और कुछ नहीं खाता तो थोड़ी सी खीर ही खा ले। हाय! क्या बच्चा दिन भर भूखा ही रहेगा ?
एक विचित्र अवस्था आ पड़ने पर सत्यव्रती कह रहा है, नहीं भाइयों, सत्य का महाव्रत पालन करने की वह महिमा तुम कुछ नहीं जानते हो, मैं और क्या कहूँ।’ किन्तु अन्य सब लोग कहते हैं कि “थोड़ा सा” एक बार झूठ बोलने में भला क्या नुकसान है, एक बार तो धर्मराज युधिष्ठिर ने भी झूठ बोला था, “थोड़ा सा” झूठ न बोलने से बना बनाया काम सारे का सारा बिगड़ जायेगा।
-बड़े प्रलोभन का समय है, जबकि यती कह रहा है “भाग जाओ” तुम्हारा मेरे सामने कुछ काम नहीं है। क्या तुम्हें मालूम नहीं कि मैं कौन हूँ ? किन्तु चारों तरफ डोलती फिरती हुई मोहिनी मुरतें अपनी चेष्टाओं द्वारा कह रही हैं कि अरे थोड़ा सा आनन्द एक बार लेकर देख, फिर चाहे छोड़ देना ‘थोड़ा सा केवल थोड़ा सा’।
-प्रकृति देवी की गोद में पला हुआ एक युवक इस बाजारी दुनिया में नया-नया आया है। स्थान-स्थान पर उसे मित्र-सलाहकार मिलते हैं- अरे थोड़ा सा माँस अवश्य खाना चाहिये, इससे शरीर में ताकत आती है हानि तो बहुत खाने से होती है। मित्र ! मद्य का “थोड़ा सा” सेवन तो अवश्य करना चाहिये, इससे दिल प्रसन्न रहता है। “थोड़ा सा” मसाला, चटनी, चूर्ण खाना तो आवश्यक है। डॉक्टर लोग भी ऐसा कहते हैं। इनके बिना भोजन पच ही नहीं सकता। भोजन के बाद धूम्रपान (सिगरेट) (तंबाकू) बड़ा ही उपयोगी है। सारा दिन पीने को कौन कहता है। थोड़ा सा भोजन के बाद।
बिच्छू कहता है कि मुझे केवल ‘थोड़ा सा’ केवल अपने पतले डंक की नोक भर धरने को स्थान अपने शरीर में दे दो, बस शेष सारे शरीर को मैं कुछ नहीं कहता।
-आग लगाने वाला कहता है कि ‘थोड़ी सी’ एक चिनगारी अपने छप्पर के एक कौने में लगाने दो मैं और कुछ नहीं माँगता।
-पाप भाव कहता है कि मुझे अपने हृदय में थोड़ा सा स्थान दे दो मैं वहाँ कौन में एक ओर चुपचाप बैठा रहूँगा, करूंगा कुछ नहीं।
-चतुर शासक कहता है कि तुम केवल थोड़ा सा एक पैसा भर अपनी अमुक वस्तु पर कर लगा लेने दो अधिक कुछ नहीं।
-विदेशी व्यापारी आकर कहते हैं कि तुम अपने विशाल देश के एक किनारे से परे थोड़ी सी भूमि हमें दे दो केवल एक कोठी बनाने की जगह।
-मैंने आज ऐसी वस्तुएं न खाने का व्रत किया था, किन्तु अमुक आदमी यह खोये का लड्डू रख गया है, इसे न खाऊँगा। किन्तु जब वह दे ही गया है तो इसे बिलकुल न खाना ठीक नहीं इसलिए थोड़ा सा खा लूँ थोड़ा-थोड़ा करके वह सारे के सारे लड्डू खा लिये।
-मैंने तो मद्य तो बहुत दिनों से छोड़ दी है किंतु आज यह दुकान सामने आ गयी है लाऊं तो थोड़ी सी एक प्याला पी लिया थोड़ी-थोड़ी करते-करते इसके पास जो पैसे थे उसने अपनी जेब खाली कर दी और घर को चल दिया।
-मुझे पेचिश हो रही है इसलिए इमली की चाट मुझे खानी तो नहीं चाहिए किन्तु थोड़ा सा इमली का पानी चावलों में डाल लेता हूँ। थोड़ी देर में चार- पाँच चम्मच और डाल लिये, फिर यह कहते हुए कि चाहे मैं मरु या जीऊं सारी कुण्डी ही उठा कर पी डाली।
-रात के दो बजे घड़ी का अलार्म बज रहा है कि एक मनुष्य को कहीं बाहर जाना है, जब वह उठा तो कहने लगा कि अभी तो दो ही बजे हैं मुझे तो चार बजे जाना है। थोड़ा सा और सो लूँ केवल दस-पन्द्रह मिनट। वह सो जाता है और साढ़े चार बजे आँख खुलती है।
-उस धोखा देने वाले ने जो कि आज संसार में किसी पर विश्वास नहीं कर सकता, और जिसके लिए झूठ बोलना सच की तरह बिलकुल साधारण हो गया है प्रारम्भ में केवल एक बार ही थोड़ा सा झूठ बोलकर लोगों को धोखा दिया था।
-वह विशूचिका रोग कि जिसमें बड़ा हृष्ट-पुष्ट शरीर दो घण्टों में छटपटा कर ठण्डा हो गया। प्रारम्भ में थोड़ा सा दिखाई भी न देने वाली क्षुद्र से क्षुद्र कीटाणु के रूप में था।
-यह जो पाप वृक्ष जो कि आज ऊंचे और दूर दूर तक फैली हुई विशाल शाखाओं में दृढ़ खड़ा है प्रारम्भ में ‘थोड़ा सा’ केवल एक नन्हें से बीज के रूप में था।
-थोड़े से की उपेक्षा करने वाले को क्या पता था कि इस थोड़े में से सारे जहाज में पानी भर जायगा और इतना सामान तथा हजारों यात्री देखते-देखते समुद्र में लीन हो जायेंगे।
-‘थोड़ी सी’ (केवल पाँच मिनट की) देर करने वाले सेनापति को क्या मालूम था कि इससे उसके महाराज की सदा के लिए पराजय हो जायेगी और सारे संसार का इतिहास बदल जायगा।
-माता को क्या मालूम था आज ‘थोड़ी सी’ केवल एक पुस्तक की चोरी पाठशाला से कर लाने वाला उसका पुत्र एक दिन चोरी में फाँसी चढ़ेगा।
-अनजान को क्या मालूम था कि केवल थोड़ी सी रत्ती भर विष पड़ जाने से सारा भोजन विषैला हो जायगा और जो इसको ‘थोड़ा सा’ ग्रहण करने मात्र से वह मर जायगा।
-यह बड़ा दुर्जन है, इससे मिलने के लिए गुरुजी ने रोका था। किन्तु कभी-कभी ‘थोड़ी सी’ बातचीत कर लेने में क्या हानि है। कुछ दिनों के बाद दिल कहता है कि जब मित्रता ही की है तो इनकी सभी बातों में ‘थोड़ा-थोड़ा’ सम्मिलित होना चाहिए नहीं तो मित्रता कैसी? थोड़ा-थोड़ा करके ही वह स्वयं भी कुछ दिनों में पक्का दुर्जन बन जाता है।
-हर एक कार्य में ‘थोड़ा सा’ से ही प्रारम्भ होता है। प्रारम्भ में थोड़ी सी अंगुली पकड़ते-पकड़ते पहुँचा पकड़ा जाता है और मनुष्य सर्वथा ‘थोड़ा’ के अधीन हो जाता है।
-वह आग कि जिसमें सारा नगर जल गया प्रारम्भ में ‘थोड़ी सी’ केवल एक चिनगारी के रूप में थी। वह व्रण जिसका कि विष सारे शरीर में फैलकर प्राण चले गये, प्रारम्भ में ‘थोड़ी सी’ एक फुन्सी के रूप में था।
-वह आपस की लड़ाई जिसके महायुद्ध में असंख्यों प्राणी नष्ट हुए, और सम्पूर्ण संसार को धक्का पहुँचा प्रारम्भ में ‘थोड़ी सी’ केवल एक कटु वचन के रूप में पैदा हुई थी।
-उस वीर्य नाश करने वाले ने, जोकि आज गले सड़े शरीर में पड़ा हुए आंखें दिखा रहा है, और जिसे कि कुछ दिनों की दुनिया में नैराश्यता के सिवाय और कुछ नहीं दिखाई देता प्रारम्भ में केवल एक बार ‘थोड़े से’ काम विचार ने उधर मुँह उठाया था।
-ऊंची पहाड़ी पर सुख से खड़े हुए प्राणी को क्या पता था कि पास की बेरों से लदी झाड़ी पर मुँह मारने के लिए केवल एक पग थोड़ा सा नीचे की ओर उठाने में वह खाई में जा गिरेगा और सब हड्डियाँ चकनाचूर हो जायेंगी।
-यह थोड़ा सा बहुत भयंकर वस्तु है, कभी इसको थोड़ा सा समझ कर उपेक्षा मत करना। केन्द्र से च्युत होते ही थोड़ा या बहुत सारे भूमण्डल से सम्बन्ध बिगड़ जाता है। गुरुता केन्द्र से अतिरिक्त किसी भी अन्य स्थान पर वस्तु को सम्हाला नहीं जा सकता। वह स्थान फिर वहाँ से थोड़ी दूर हो या बहुत। इसी प्रकार संसार व्यापी नियमों की सत्य रेखाओं से ‘थोड़ा सा’ भी हटने से हमारा सम्बन्ध बिगड़ जाता है और हम उसकी महान रक्षा से तत्क्षण वंचित हो जाते है।
-अतः प्रश्न तो किसी काम के बिलकुल ही कर डालने में या न करने में है, थोड़ा करने या बहुत करने में नहीं, और फिर यदि सुई की नोंक से एक बार भी थोड़ा सा छिद्र बना दिया गया तो उससे निकलने वाली धारा कुछ ही क्षणों में बढ़कर एवं भयंकर प्रवाह बहाने वाले मार्ग के रूप में आ जाती है। थोड़ा कभी थोड़ा रह नहीं सकता।
-एक बार भी चस्का लग जाने पर उसे कौन छोड़ सकता है? एक बार धारा में पड़ जाने पर फिर कौन वापिस लौट सकता है इसलिये विचारने और सम्हालने का समय तभी है जबकि प्रलोभन ‘थोड़ा- थोड़ा सा’ कहता हुआ हमें गड्ढे में डालने के लिए पास आता है। उस समय कम से कम यह तो सोच लेना चाहिये कि जब मैं इस थोड़े से को नहीं रोक सकता तो क्या बढ़ जाने पर रोक सकूँगा।
-अब की बार यदि फिर कभी वह ‘थोड़ा सा’ आवे तो कड़क कर कह देना गम्भीर स्वर में नहीं, कभी नहीं, बिलकुल नहीं। क्या मैं इतना तुच्छ हूँ कि ‘थोड़ा-सा’ की बहकावट में आऊँगा। यह मेरे दृष्टिपात के भी योग्य नहीं है। मुझ में जगत जननी जगत गुरु सर्वशक्तिमान गायत्री माता की महाशक्ति प्रभावित हो रही है, मैं अगाध अटल हूँ। क्या मैं इस ‘थोड़े से’ से हिल जाऊँगा। यह थोड़ा सा है ऐसा कह कर इसे अस्वीकार कर दो, लात मार दो दूर फेंक दो।
-किन्तु यह आश्चर्य है कि हमें प्रलोभन के समय ही यह ‘थोड़ा सा’ याद आता है।
-अच्छे कामों में हम ‘थोड़ा सा’ ‘थोड़ा सा’ नहीं करते हम ‘थोड़ा सा’ प्रतिदिन सत्संग क्यों न करें, थोड़ा-थोड़ा पढ़ने में प्रवृत्त हों यहाँ भी थोड़े से को कभी तुच्छ न समझना चाहिये। एक-एक धूलिकण से हिमालय जैसे पहाड़ खड़े हुए हैं।
एक-एक बूँद से महासागर भरे हैं। एक-एक पल से मिलकर यह अनन्त काल बना है। एक-एक परमाणु से जुड़ कर यह विश्व ब्रह्माण्ड खड़ा है। एक-एक सत् कर्मों के पुण्यों से महात्माओं की चरित्र मालाएँ गूँथी गई है। एक पग ऊपर रखने से उससे उच्च इन्द्रासन तक पहुँच गये है। यही दशा है जहाँ ‘थोड़ा सा’ थोड़ा करके जितना बढ़ाया जाये उतना ही ‘थोड़ा है’। यही इसी ‘थोड़ा सा’ के सिद्धान्त का उचित प्रयोग है। जिसके करते सहज में परम अभीष्ट प्राप्त किया जा सकता है।
(सन्त बिनोवा)
हमारे शास्त्र में अस्तेय और अपरिग्रह ऐसा दुहरा धर्म माना गया है। अस्तेय याने चोरी नहीं करना और अपरिग्रह याने संग्रह नहीं करना। आज हम एक स्कूल में ठहरे हैं। वहाँ दीवारों पर अच्छे-अच्छे वचन लिखे हैं। उसमें एक वचन चोरी करना पाप है यह भी लिखा है। यह भी लिखा जाना चाहिये था कि संग्रह करना पाप है। चोरी करना पाप है यह माना गया पर केवल इतना ही धर्म नहीं है। संग्रह करना भी पाप है यह माना जाना चाहिए। हमें खुशी है कि इन्होंने रुपये में आठ आना काम कर लिया है। अस्तेय के साथ-2 अपरिग्रह को भी रहना चाहिये। एक जमाना था जब संग्रह को कोई खास महत्व नहीं देते थे। पैसों को कोई पूछता ही नहीं था। घरों में गल्ला भरा रहता था पर आज हमारा सारा दारोमदार पैसे पर है- तो उसका नतीजा यह है कि एक छोटी सी पेटी में भी बहुत सारा संग्रह कर सकते हैं। जेब में लाख रुपये भी रख सकते हैं। पर अगर लाख रुपये की जगह लाख सेर अनाज रखना हो तो बहुत मुश्किल होगा। रुपया तो ऐसी चीज है जो गाँव से कोई ले आये तो कुछ पता नहीं चलेगा गाँव वाले को।
मनु ने लिखा है कि चार आश्रम और चार वर्ण मिल कर जो सोलह अवस्थाएं हैं उनमें केवल वैश्य संग्रह कर सकता है और वह कितना संग्रह करें उसका भी हिस्सा बताया। गृहस्थ तीन दिन का संग्रह रखे और अगर उतने से न निभे तो 12 दिन का संग्रह रखे । उतने से भी न निभे तो एक साल का संग्रह रखें और अगर उतने से भी नहीं निभे तो तीन साल का संग्रह रखें। तीन साल से अधिक संग्रह नहीं कर सकते। तीन साल का संग्रह रखने का मनु ने मान लिया याने यह नहीं कि उससे कम जिसके पास है उसका निर्वाह स्टेट करेगी। तीन साल से ज्यादा जिसके पास है उससे तो ले लेने का हक है ही। और अब तो कानून भी आ रहा है। कहते हैं कि सरकार को खानगी मालकियत लेने का हक है। सरकार को हक है उससे ज्यादा हक आपको है। अगर सरकार को सम्पत्ति छीनने का हक है तो आपको अधिक से अधिक त्याग करने का हक है। हम आपसे कोई जबरदस्ती लेना नहीं चाहते। हम तो आपको नीति सिखाना चाहते हैं कि अधिक संग्रह मत करो। आज की सम्पत्ति आज पैदा हुई और वह सबको मिल जाती है और तब कोई संग्रह करे तो वह हमें मान्य है पर लोगों को आज ही न मिलें तो वह संग्रह करने का अधिकारी नहीं हैं जो मनुष्य दूसरे को खाना न मिलने पर भी अपने पास संग्रह रखता है तो वह परमेश्वर को क्या मानेगा? जिसने तो पैसे को ही देवता मान लिया। जिसने पैसे को माना उसमें फिर ईश्वर निष्ठा नहीं रही। इसलिए तो गीता ने कहा ‘यदृष्टा लोभ-सन्तुष्टा’ समाज की सेवा करते जाये और जो मिले उसी में समाधान मानें। आज ये लोग कहते हैं कि हमने कमाई की और हमारे पास पैसा आया। हम कहते हैं कि हमने व्यापार किया। व्यापार के माने क्या हैं? जिसने पैदा किया था उसके पास उसे पहुँचा दिया। तो इसमें जो महनताना है वह लेने का आपको हक है। आपने केवल पहुँचाने का काम किया। उत्पादन का काम तो नहीं किया। उत्पादन करने वाले को दो चार रुपया मिलता है और पहुँचाने वाले को हजार हजार रुपया मिलें यह क्या न्याय है? ये लोग अपने भण्डार भर सकते हैं। जरूरत पड़ने पर भण्डार खोलते भी नहीं। आपको तो करना यह चाहिये कि जब लोगों को जरूरत हो भण्डार खोल दें। पर इसके बीच जो मुनाफाखोरी होती है उसे आप समझते हैं कि यही धर्म है। आप तो सेवक हैं। उसके माने आपके जो स्वामी है आम जनता वह जितना पा सकती है उससे बढ़ कर आपको पाने का क्या हक है? राम से हनुमान क्या अधिक वेतन का हकदार माना जायेगा? इस लिए यह समझने की बात है कि हम कोई न कोई अन्याय करते हैं और कमाते हैं। अगर न्याय से कमाते हैं तो हम उसके ट्रस्टी बन जाते हैं। पोस्टमैन के पास बहुत सारी डाक आई तो क्या वह उसके लिए आयी? उसके पास तो वह दूसरों के पास पहुँचाने के लिए आयी है। यह जरा समझने की बात है। आज हम यह समझते नहीं है और इस लिए आज समाज में दुःख है।
हमने ‘चोरी करना पाप है’ यह अच्छा वाक्य माना, पर यह तो नहीं माना कि संग्रह करना पाप नहीं है तो चोरी करना भी पाप नहीं है। पर कम्युनिस्ट के पुत्र हैं पुत्र को चोर समझो और पिता को चोर न समझो। यह कैसी बात? पुराणों में एक कहानी है। एक राजा अपने राज्य का वर्णन करते हुए कहता है नमस्तेना जनपदे, मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है। इतना कहने भर से वह चुप नहीं रहा। उसने फौरन कहा ‘न कदर्यः, याने मेरे राज्य में कोई कन्जूस नहीं है। यह उसको क्यों कहना पड़ा? क्योंकि वह जानता है कि कन्जूस ही चोर को पैदा करने वाले है। जब तक इन्हें खतम नहीं करते तब तक वे मिटेंगे नहीं।
आज हम क्या करते हैं? आफिस में ग्यारह बजे गये, देखा ऊपर के अधिकारी नहीं आये हैं, दो बजे आयेंगे तो काम करने के बजाय सो गये और फिर पौने दो बजे उठ गये। यह एक नई चोरी नहीं है। चोरी के कई प्रकार हैं हम तो रात में भी चोरी करते हैं उसी को अच्छा मानते हैं क्योंकि उसे रात में जागना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी खतरे का सामना करना पड़ेगा और तब जो कमायेगा हम कहेंगे उस पर उसका कुछ हक है। पर ये तो एक का दस करना हो तो एक पर केवल एक शून्य देकर कर लेते हैं। ऐसा सारा इनका कारोबार चलता है और खतियौनी में लिखते हैं- ‘श्रीहरि’। श्रीहरि याने ‘श्री’ का हरण करने वाले।
हमारा विचार सबको सुखी करने का है। जरा श्वासोच्छवास का भला देखिये। हवा लेते हैं और छोड़ते हैं पर ये कमबख्त लेते ही हैं, देना नहीं जानते। अगर लेते ही जायेंगे तो पेट फूट जायेगा। जलोदर होता है। पानी तो पीते जाते है पर पानी बाहर नहीं निकलता है। नतीजा पेट फूलता जाता है और आखिर वह मर जाता है। तो देने से कुछ नुकसान नहीं फायदा ही होता है। यह किसान आसानी से समझता है। वह बीज के वास्ते अच्छे से अच्छा अनाज चुनकर रख लेता है। अगर खाने के लिये अनाज नहीं बचा तो भी बीज को नहीं खाते। तरकारी आदि खाकर रह जाते हैं और अच्छे बीज को खेत में ही बोते हैं। इसलिए किसान का जीवन पवित्र है। वेदों ने कहा है कि ‘खेती करो और उससे थोड़ा भी पैसा मिलेगा वह बहुत है ऐसा समझो।’ बिना उत्पादन किये पैसा हासिल करते हैं इसके माने क्या? इस जेब का उस जेब में डाल दिया। व्यापारी, वकील, शिक्षक इन सब लोगों ने क्या कमाया? रवि बाबू ने कहा- ये लोग गुणा नहीं करते, विभाजन करते है। उत्पादन के काम ये लोग करते ही नहीं, कहते हैं वकीलों को 25) रुपया रोज मिल जाता है तो वह किस लिए कातेगा? हम चाहते हैं 25 रु. मिलता है तो क्या पैदा होता है? और सूत अगर थोड़ा भी कातोगे तो भी वह उत्पादन का काम होगा। पर यह कोई समझता ही नहीं है। और पैसा ही बटोरने में लगा रहता है। मजदूर को जो मेहनताना मिलता है उससे अधिक इसे कैसे मिलता है यह हमें अभी तक समझ में नहीं आया है।
हम आपकी इतनी सेवा करते है। दही फल खाते हैं कल अगर आप कहें कि आप हमारी वह सेवा करते हैं इसलिये हम आपको 25 केला जबरदस्ती खिलायेंगे तो हम कहेंगे हम पर इतनी मेहरबानी मत करो। सेवा करने से मगर पाचन शक्ति बढ़ी हो तो अधिक देना चाहिये और अगर नहीं बढ़ी हो तो अधिक देने से क्या फायदा! एक भाई ने हमें कहा-राष्ट्रपति को इतनी पेन्शन मिलनी चाहिये कि उसे काम न करना पड़े। हमने कहा कि अगर राष्ट्रपति बनने पर भी जिन्दा रहे तो उसे जरूर काम करना चाहिये। जब वह खाने का अधिकारी है तो उसे काम भी जरूर करना चाहिये। राष्ट्रपति एक बड़ा पद है इसलिए उसे काम नहीं करना चाहिए ऐसा क्यों? जो काम करता है वह आज हीन माना जाता है। महान पुरुष तो वह तब गिना जायेगा जब वह 24 घण्टे काम करेगा। रात-दिन सेवा ही करनी चाहिए। पर आज ऐसा नहीं मानते। तो हम कहते हैं जो खाता-पीता है उसे काम करना लाजमी है। मनुष्य अपने कर्त्तव्य कर्म से भगवान की पूजा करता है और उसे सिद्धि मिलती है। कब तक काम करना चाहिए तो कहा-‘कुर्वन् नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समा’ अगर हम सौ साल जिये तो सौ साल काम चाहिए। आज तो ऐसा है कि संन्यासी कहेगा कि मैं काम नहीं करूंगा, मैं तो भिक्षा ही मांगूंगा। कवि कहेगा मैं काम नहीं करूंगा, मैं तो कविता ही लिखूँगा। इसी तरह व्यापारी, शिक्षक सभी कहेंगे कि हम काम नहीं करेंगे। अगर इस तरह हर कोई काम टालने का सोचे तो काम किसे करना चाहिए? यह जरा समझा दीजिए।
हम आपकी इतनी सेवा करते है। दही फल खाते हैं कल अगर आप कहें कि आप हमारी वह सेवा करते हैं इसलिये हम आपको 25 केला जबरदस्ती खिलायेंगे तो हम कहेंगे हम पर इतनी मेहरबानी मत करो। सेवा करने से मगर पाचन शक्ति बढ़ी हो तो अधिक देना चाहिये और अगर नहीं बढ़ी हो तो अधिक देने से क्या फायदा! एक भाई ने हमें कहा-राष्ट्रपति को इतनी पेन्शन मिलनी चाहिये कि उसे काम न करना पड़े। हमने कहा कि अगर राष्ट्रपति बनने पर भी जिन्दा रहे तो उसे जरूर काम करना चाहिये। जब वह खाने का अधिकारी है तो उसे काम भी जरूर करना चाहिये। राष्ट्रपति एक बड़ा पद है इसलिए उसे काम नहीं करना चाहिए ऐसा क्यों? जो काम करता है वह आज हीन माना जाता है। महान पुरुष तो वह तब गिना जायेगा जब वह 24 घण्टे काम करेगा। रात-दिन सेवा ही करनी चाहिए। पर आज ऐसा नहीं मानते। तो हम कहते हैं जो खाता-पीता है उसे काम करना लाजमी है। मनुष्य अपने कर्त्तव्य कर्म से भगवान की पूजा करता है और उसे सिद्धि मिलती है। कब तक काम करना चाहिए तो कहा-‘कुर्वन् नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शतं समा’ अगर हम सौ साल जिये तो सौ साल काम चाहिए। आज तो ऐसा है कि संन्यासी कहेगा कि मैं काम नहीं करूंगा, मैं तो भिक्षा ही मांगूंगा। कवि कहेगा मैं काम नहीं करूंगा, मैं तो कविता ही लिखूँगा। इसी तरह व्यापारी, शिक्षक सभी कहेंगे कि हम काम नहीं करेंगे। अगर इस तरह हर कोई काम टालने का सोचे तो काम किसे करना चाहिए? यह जरा समझा दीजिए।
भलैं सुधा सीचौ तहाँ, फलु न लागि है कोय। जहाँ बाल विधवान को, अश्रुपात नित होय॥
शूद्र बहुत जिस देश में, धरे क्षुद्रता भाव। वह विनसाता सहज ही, निज अज्ञान प्रभाव॥
जब आता अभिमान अति, तुरत नसाता मान। रावण औ शिशुपाल सम, होवे यदपि महान॥
पर भाषा, पर भाव, पर भूषण, पर परिधान। पराधीन जन की अहै, यही पूर्ण पहिचान॥
निर्बल मिलकर परस्पर, वस्त्र बनाता सूत। मिलो परस्पर दौड़ कर हर्षित भारत पूत॥
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(श्री हरिश्चन्द्र जोशी, प्रयाग)
महान पुरुष बनने के लिए मनुष्य को अपने विचार, स्वभाव व व्यवहार में महानता लाना आवश्यक हैं। केवल शक्ति के बल पर कोई भी मनुष्य महान नहीं बन सकता। महान बनने के लिए मनुष्यों के हृदय का प्रेम जीतना पड़ता है, अपने अन्दर आकर्षण शक्ति का विकास करना होता है, उनके हृदय में अपनत्व की भावना को स्थापित करना होता है। मनुष्य जो भी कुछ काम करता है उसका अधिकाँश भाग उस मनुष्य के विचारों पर आधारित होता है। क्योंकि मनुष्य के जिस प्रकार के विचार होंगे उसी प्रकार उसका स्वभाव निर्माण होगा, और स्वभाव के अनुकूल ही उसे मित्र व कार्यक्षेत्र प्राप्त होंगे, और उसी प्रकार का उसका व्यवहार होगा। संसार में मनुष्य को सफलता, असफलता, सुख, दुःख सभी कुछ उसके व्यवहारों का फल होता है।
उदाहरणार्थ आप किसी व्यक्ति को अपनी और आकर्षित करना चाहते हैं, अपने व्यक्तित्व की ओर झुकाना चाहते हैं। तब सर्वप्रथम आपको यह करना होगा कि जब भी वह व्यक्ति विशेष आप से भेंट करे आप अपना अस्तित्व भूल जाइए और उस व्यक्ति की समस्याओं एवं उलझनों को सुलझाने एवं उन्नति की ओर अग्रसर करने के सम्बन्ध में वार्तालाप कीजिए। उसकी कठिनाइयों में अपना हाथ अग्रिम कीजिए। उन्हें मान दीजिए। व्यवहार में उचित आदर सत्कार प्रदान कीजिए। आपकी प्रत्येक क्रिया उनकी इच्छा के अनुसार हो। बस आप कुछ ही समय उपरान्त यह देखेंगे कि उन्हें आपसे विलग रहने में किंचित कष्ट का अनुभव होगा। सद्भावनाओं से प्रेरित किया हुआ आकर्षण शीघ्र ही फलदायक व स्थाई रहता है। जब एक व्यक्ति को आप अपनी ओर पूर्ण रूप से आकर्षित कर लें, तब आप अपनी इच्छानुसार शनैःशनैः उन महाशय जी के विचार व स्वभाव परिवर्तन में भी सफल हो सकते हैं। और जब आप कई व्यक्तियों को एक साथ आकर्षित करना चाहते हैं तो आपके व्यवहार में जितने भी मनुष्यों से आपकी भेंट हो उनके साथ इसी प्रकार का व्यवहार करें। अक्सर इस प्रकार के गुण विख्यात नेताओं में पाए जाते हैं वे सर्वप्रथम अपने व्यवहारों द्वारा मनुष्य के हृदय का प्रेम जीतने का प्रयत्न करते हैं और जब वे पूर्ण रूप से मानव-समाज को आकर्षित कर लेते हैं। तब वे अपनी इच्छानुसार कार्य करवा लेते हैं । और किसी भी व्यक्ति को महान पुरुष बनने के लिए सर्वप्रथम यह आवश्यक है कि वह अपने अन्दर स्नेह एवं सद्भावनाओं से उत्पन्न आकर्षण का प्रयत्न करें।
महान पुरुष बनने के लिए दूसरी आवश्यकता है विचारों की महानता। अगर मनुष्य के विचारों में महानता नहीं हुई तो उसकी परिणाम यह होता है कि उन्नति करके भी पुनः पतन को प्राप्त हो जाता है। महान विचारों का तात्पर्य सात्विक भावना से है। किसी की भलाई, उपकार व सहायता करने में आपका व्यक्तिगत लाभ न छिपा हो। नहीं तो जब किसी दिन आपकी कामना पूर्ति में अभाव आवेगा उस दिन आपका सत्य स्वरूप प्रकट हो जावेगा और उस दिन से आपके प्रति लोगों के हृदय में प्रेमभाव का अभाव हो जायेगा। और जब भी आप अन्य व्यक्तियों से वार्तालाप करें उस समय आपके विचारों व वाणी के अन्दर महानता की झलक स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होनी चाहिए। नहीं तो वैज्ञानिक रूप से अच्छा प्रभाव नहीं पड़ता है। अतः इसके लिए आपको सदैव प्रथम अपने अन्तःकरण में यह भावना तीव्र रूप से जाग्रत करनी होगी कि मुझे उत्तम प्रकार के विचार ग्रहण करना है। विचार ही मनुष्य के जीवन के निर्माता हैं। अगर विचार उच्च व शुद्ध होंगे तो यह भी सत्य है कि आपका जीवन भी महान व निर्मल होगा। जब आप वस्तुतः महान होंगे तो दूसरे भी आपको वैसा ही समझेंगे और वैसा ही अपने अन्तःकरण में स्थान एवं मान देंगे।
तीसरी बात महान पुरुष बनने के लिए जो आवश्यक है वह है- मनुष्य का व्यवहार। मनुष्य का व्यवहार ही सत्य होता है बाकी सब असत्य भी हो सकता है। और इसी से ही वास्तविक सत्य रूप से जीवन पर प्रभाव पड़ता है। किसी व्यक्ति को आप हृदय से कितना चाहते हैं यह तो आपके व्यवहार से ही ज्ञान हो सकता है। उदाहरण के लिए मान लीजिए आपके घर पर प्रधानमंत्री जवाहर लाल जी आये हैं उस समय आप उनके लिए अपने घर को सुसज्जित करेंगे। उनके लिए श्रेष्ठ प्रकार का भोजन तैयार करेंगे। और कई तरह की ऐसी व्यवस्था करेंगे जिससे कि उनके हृदय में प्रसन्नता हो व उन्हें किसी तरह का कष्ट न हो। यह सब आप इसलिए करते हैं कि आपके हृदय में उनके प्रति कुछ श्रद्धा है। आन्तरिक प्रेम है यह सब आप किसी अनभिज्ञ या परिचित मित्र के लिए नहीं कर सकते हैं क्योंकि उनके प्रति आपके हृदय में इतनी श्रद्धा प्रेम नहीं है जितनी कि पं. जवाहर लाल जी के लिए है। अतः एक व्यक्ति का प्रेम उसके व्यवहारों द्वारा ज्ञात होता है। लोगों के प्रति इस तरह का हमारा व्यवहार होना चाहिए जिससे उनके हृदय में आपके प्रति वास्तविक रूप से श्रद्धा व प्रेम जागृत हो जावे। इसके अन्दर विशेष रूप से आपके बात करने की शैली। उनको ठोस रूप से लाभ देने की क्रिया। और अन्य व्यक्तियों को सम्मान देना। इन सब बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। यदि आप मान प्राप्त करना चाहते हैं तो दूसरों का सम्मान व इज्जत करना सीखिए। महान पुरुष बनने के लिए तीसरी आवश्यकता है-अपने व्यवहार में सात्विक व शुद्ध स्वरूप लाना।
महान पुरुष बनने के लिए चौथी आवश्यकता है दूसरों के अन्दर अपनत्व की भावना जागृत कराना। दूसरे व्यक्ति आपको अपना व्यक्ति जब ही समझेंगे जबकि आप दूसरों के दुःख दर्दों को ध्यान पूर्वक सुनें और उन्हें दूर करने का प्रयत्न करें। तब ही आप दूसरों के हृदय में अपनत्व की भावना को जागृत करने में सफल हो सकेंगे अन्यथा नहीं। मनुष्य सभी कुछ भूल सकता है परन्तु आपत्तिकाल में जो उसे सहायता प्राप्त होती है वह उसे कदापि नहीं भूल सकता है। और सहायता करने वाले के प्रति उसके हृदय में अपनत्व की भावना जागृत हो जाती है। उसके हृदय में उस व्यक्ति के प्रति स्वाभाविक रूप से प्रेम व श्रद्धा जागृत हो जाती है। अतः महान पुरुष बनने के लिए दूसरों के आपत्ति के दिनों में सहायता देकर उनके मनों को जीतना भी आवश्यक है।
महान पुरुष बनने के लिए पाँचवाँ गुण जोकि आवश्यक गुण है वह गुण है हिलमिल-सरिता। सब लोगों से हिलमिल कर रहना। विरोधी व्यक्तियों के विचार भी ध्यानपूर्वक सुनना। जिस प्रकार की महात्मा गाँधी जी ने किसी भी मत का खण्डन नहीं किया बल्कि सभी मतों के अच्छे तत्वों को सहायता देकर उनकी विशेष उत्तमताओं को प्रोत्साहित किया यही कारण था कि बापू जी राष्ट्रपिता ही नहीं बल्कि विश्वपिता के स्वरूप में सम्मानित हुए। उनसे चाहे कोई विरोध रखता हो पर वे किसी से विरोध नहीं रखते थे। यही कारण है कि आज वे सभी जाति सभी राष्ट्रों द्वारा सम्मानित हैं। वे कहते थे- ‘पाप से घृणा करो पानी से नहीं’। अतः महानता की महानतम सीढ़ी पर चढ़ने के लिए, सहिष्णुता, समन्वय भावना एवं मिलन सरिता का गुण भी नितान्त आवश्यक है।
इन सब बातों का ध्यान रखने पर जो महान बनने के लिए अवशेष गुण रह जाते हैं वे सब अपने आप ही आपके अन्दर आ जायेंगे। अतः जो व्यक्ति महान बनने का स्वप्न देखा करते हैं उनके दैनिक जीवन में इन सब बातों का विशेष महत्व होना चाहिए। इन सबके अतिरिक्त भी एक बात जोकि बहुत महत्व रखती है वह है जीवन के लक्ष, उद्देश्य एवं कार्यक्रम की सुनिश्चितता। इस सुनिश्चितता से ही वे सब गुण ठीक रूप से उत्पन्न हो सकते हैं और जीवन में पूरी-पूरी सफलता प्राप्त हो सकती है।
(श्रीमती प्रीतम देवी महेन्द्र)
“इस चीज की कभी आवश्यकता पड़ेगी” ऐसी आवश्यकता को लेकर हमारे परिवारों में जो अति संग्रह और अनावश्यक वस्तुओं, बच्चों, टूटी-फूटी कुर्सियों, ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों, चारपाई, फर्नीचर, टूटे या घिसे बर्तन, रद्दी कागज अथवा पुरानी पुस्तकें, टूटी मशीनों अथवा गाड़ियों के पुर्जे, इस्तेमाल की हुई स्टेशनरी का सामान, पुरानी बोतलें, शीशियाँ, शीशा, कंघे, चाकू, ब्लेड, ताश, शतरंज, खिलौने आदि खेलने की वस्तुएँ, चप्पलें, झाड़ू, झाड़न, चश्मे, तस्वीरें और उनके फ्रेम आदि को जमा कर रखने का रोग-सा लगा हुआ है। फालतू चीजें जिनका जीवन में शायद उपयोग न हो मानव सदय में संचित मोह और मानसिक दरिद्रता और गन्दगी का सबसे बड़ा कारण है। जो वस्तु हमारे काम नहीं आ रही है। सम्भवतः वह दूसरों के काम आ सके। अतः मोहवश अनावश्यक वस्तुओं को एकत्रित रखने से हम दूसरों को उनकी आवश्यकता की वस्तुओं से वंचित रखते हैं और समाज में वैषम्य, वैमनस्य और अभाव का बीज बो देते हैं।
समाज में भिन्न-भिन्न स्तरों के व्यक्ति हैं जिनसे आपका निकट या दूरी का सम्बन्ध है। जिसको आपकी वस्तुओं की आवश्यकता है, यदि वे मुफ्त में या कम दामों में दूसरे के पास चली जायें, तो आपकी समाज के प्रति उदारता की परिचायक है। आपके घर के कबाड़खाने से मजदूरों, मेहतरों, गरीबों, जमादारों की छोटी-मोटी आवश्यकताएँ पूर्ण हो सकती हैं। किसी को तन ढ़कने के लिए वस्त्र मिल सकते हैं, जो आपके वहाँ गल सड़ कर अथवा कीटाणुओं द्वारा नष्ट हो जाते। जो कागजों के ढेर आप मोहवश नहीं फेंकते, उनसे दुकानदार काम निकाल सकते हैं और आपको अपनी सभी आवश्यकता के लिए कुछ धन भी प्राप्त हो सकता है। घर की भरी हुई अलमारियाँ व्यर्थ मच्छर उत्पन्न करती हैं, स्वच्छ वायु का प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है।
आज प्रत्येक परिवार में एक कबाड़खाने को रखने की आदत-सी बन गयी है। चाहे घर में बैठने के लिए पर्याप्त स्थान न हो पर कबाड़खाना जरूर रहेगा। प्राचीन संस्कारों में पली हुई स्त्रियाँ कबाड़खाने से इतना प्रेम रखती हैं कि काम में आये हुए मिट्टी के टूटे बर्तन भी नहीं दूर करना चाहतीं। इनकी यह मोह-भावना उनके अन्तःकरण में जमी हुई आर्थिक मानसिक दरिद्रता और गन्दगी की सूचक है। इनसे अनेक गरीब गरजमन्दों की गृहस्थी की गाड़ी आगे सरक सकती है।
घर के इन कबाड़खानों का अनुभव हमें तब होता है जब स्थानान्तर करना पड़ता है अथवा तबादला हो जाता है। पिछले दिनों पाकिस्तान जाने वाले और भारत आने वाले शरणार्थियों के ये कबाड़खाने बाजारों की सड़कों पर आ गये थे और इन्हें धूप और वायु का स्पर्श हुआ था कुछ वस्तुओं की बिक्री के अनन्तर शेष का मोह त्याग कर उन्हें फेंक देना पड़ा था। गनीमत समझिये जो हजारों परिवारों को इन कबाड़खानों से मुक्ति मिली।
‘मनुष्य की आर्थिक सुव्यवस्थिता, आर्थिक स्वतन्त्रता और निश्चिन्तता तथा आर्थिक संक्षिप्तता सादगी का सम्बन्ध उनके ऊंचे से आचारिक और आध्यात्मिक जीवन से है और एक तरह से यही उसकी आधार शिला है।’
वास्तव में उपरोक्त विचारों में गहरी सत्यता है। आर्थिक संक्षिप्तता का तात्पर्य यह है कि मनुष्य की निजी आवश्यकताएँ कम से कम रहें उसका कम वस्तुओं के प्रति मोह भाव हो, उसका अहं कम चीजों से व्याप्त रहे तब मानसिक शान्ति का अधिक अनुभव किया जा सकता है। तब हमारा मन घर की अनेक टूटी-फूटी बेकार वस्तुओं में लिप्त रहता है, तनिक-सी वस्तु के पार्थक्य से मानसिक वेदना होती है, तो मनः शान्ति किस प्रकार प्राप्त हो सकती है ?
कम तथा केवल आवश्यक वस्तुओं से ही सादगी का आडम्बर विहीन सरल जीवन व्यतीत करना आध्यात्मिक जीवन का प्रवेश-द्वार है। महात्मा गाँधी जैसी विभूति आवश्यकताओं की कमी, आर्थिक संक्षिप्तता सादगी तथा आचारिक सरलता का महत्व प्रकट करती है। उन्होंने कम से कम वस्तुओं, केवल आवश्यक वस्तुओं से ही काम चलाया, अपने लिए एक धोती, चप्पल, घड़ी, लकड़ी, चश्मा इत्यादि से अधिक व्यय न किया। आज के युग में केवल आवश्यक वस्तुएँ रखकर अनावश्यक से दूर रहने का सन्देश श्री बिनोवा भावे दे रहे हैं।
क्या यह अच्छा हो कि भविष्य में हम असामाजिक और अनैतिक व्याधि से बचने का यत्न करें।
(श्री. प्रो. लालजी राम शुक्ल)
मनुष्य अनेक प्रकार के शारीरिक मानसिक रोगों से पीड़ित रहता है। मनुष्य का मुख्य रोग मानसिक है। शारीरिक रोग से इस रोग का प्रकाशन मात्र रहता है वह किसी न किसी प्रकार के रोग का आवाहन करता रहता है। शारीरिक पीड़ा मानसिक पीड़ा से कहीं हल्की होती है। अतएव मानसिक रोगों से बचने के लिए मनुष्य शारीरिक रोग को स्वीकार करता है। बहुत से शारीरिक रोग तब तक अच्छे नहीं होते जब तक मनुष्य का मन स्वस्थ नहीं होता।
मनुष्य के मानसिक संताप का प्रधान कारण अपने आपको किसी कल्पित कमी के लिये कोसते रहना है। रोगी को कल्पित कमी वास्तविक दिखाई देती है। रोगी अपने आपसे असन्तुष्ट रहता है। उसके भीतरी और बाहरी मन की एकता के स्थापन में ही स्वास्थ्य है और मन के इन दो भागों के विरोध होने पर ही रोग की व्यवस्था आ जाती है। मनुष्य जितनी ताड़ना अपने आप से पाता है उतना वह किसी दूसरे से नहीं पाता। जो मनुष्य किसी प्रकार के अपने जीवन के बहुत ऊँचे आदर्श बना लेते हैं वे सदा उन आदर्शों की प्राप्ति न कर सकने के कारण अपने को कोसा करते हैं। कोई मनुष्य धन की कमी के कारण और कोई चरित्र की कमी के कारण अपने को कोसते रहते हैं। ऐसे लोग अपने आपकी दूसरों से तुलना करते हैं और अपने आप को उससे अच्छा न होने के कारण दुःखी होते रहते हैं। कितने ही लोग अपनी एक प्रकार की कमी को भूलते हैं पर वह कमी सदा के लिये नहीं भूलती। यदि मनुष्य अपनी एक प्रकार की कमी को भूल जाय तो उसे अपने आप से दूसरे प्रकार की कमी दिखलाई पड़ने लगती है। यदि मनुष्य अपनी नैतिक कमी को भुलाने में सफल हो जाय तो वह धन की कमी, रूप की कमी अथवा सम्मान की कमी के विचार में परिणत होकर मनुष्य को त्रास देने लगती है। इस प्रकार अपने आपको भुलाने की चेष्टा करने से मनुष्य का दुःख कम न होकर और भी बढ़ जाता है।
मनुष्य का दुःख तभी घटता है जब अपने आप को पूरी तरह जानकर जैसा वह है वैसा ही अपने आपको स्वीकार करता है। अर्थात् जब वह अपने आप से आत्म समन्वय स्थापित करता है। मनुष्य चाहे जैसा भी हो वह उतना बुरा नहीं होता कि अपने आपको स्वीकार न कर सके। मानसिक आरोग्य प्राप्ति की कुँजी अपने आपको प्रेम करने में, अपने आप से एकत्व स्थापित करने में है।
लेखक ऐसे अनेक रोगियों के पत्र पाता है जो अकारण चिन्ता और भय के कारण आत्म सन्ताप में रहते हैं। एक रोगी लिखता है- “आज मेरी मानसिक तथा शारीरिक स्थिति बहुत ही दयनीय है। सबसे पहली बात यह है कि मैं सदा चिन्तित रहा करता हूँ। जब देखो तब मेरी सूरत सदा मनहूस रहा करती है। मुझे हँसी बहुत कम आती है। न मालुम कहाँ से फालतू विचार मन में आते रहते हैं। मैं चाहता हूँ फालतू विचार तथा चिन्ताएँ मन में न आवें पर वे पीछा नहीं छोड़तीं। मेरे अधिकाँश विचार अच्छे न होकर खराब भावना पूर्ण रहते हैं। जिनसे क्रोध, घमण्ड, मान आदि का अंश अधिक रहता है। जिससे शरीर को अधिक हानि होती है। मुझे मन ही मन क्रोध बहुत आता है जिससे मन चिन्तित हो जाता है।”
एक दूसरा रोगी अपने विचारों से इतना परेशान है कि मृत्यु के सिवाय और कोई रास्ता उसे विचारों के क्लेश से मुक्त करने का नहीं दिखाई देता सदा अपनी भर्त्सना किया करता है जहाँ तक बन पड़ता है वह सोता है। किन्तु जब जागता है तब अगाध विकार और चिन्ताएँ घेर लेती हैं। उक्त प्रकार की मानसिक स्थिति आत्म स्वीकृत न करने के कारण अपने वर्तमान और आदर्श स्वत्व में एकता स्थापित न होने के कारण उत्पन्न होती है। जो मनुष्य अपने आपको किसी विशेष प्रकार का विलक्षण बनाने की चेष्टा करता है वह अनेक प्रकार की आत्म-भर्त्सना का भागी होता है। विलक्षण बनाने की मनोवृत्ति एक दूसरे की सहगामी है।
बहुत से मनुष्य अपने आपके विषय में दो चित्र रखते हैं। एक में वे अपने आपको कुरूप और पतित के रूप में पाते है। मनुष्य प्रायः अपने सुन्दर सत्य को तो स्वीकार करता है परन्तु वह अपने कुरूप सत्व को अपने आपसे छिपाने की चेष्टा करता है। इस प्रकार मनुष्य का अपने आपके विषय में अभिमान बढ़ जाता है। फिर मनुष्य जितना ही अपने कुरूप स्वत्व को भुलाता है वह उतना ही किसी न किसी रूप में उसके सामने आ जाता है। जब मनुष्य का कुरूप सत्व इच्छा के विरुद्ध उसके सामने आ जाता है तब बड़ा भयावह रहता है। इस प्रकार मनुष्य के मन का अपना ही एक अंग, दूसरे अंग, के लिए पिशाच बन जाता है। यदि कोई मनुष्य स्थाई शाँति चाहता है तो उसके लिये यह आवश्यक है कि वह अपने व्यक्तित्व के दो प्रकार के चित्रों को मिलाकर एक नया ही चित्र तैयार करे। यह चित्र न तो इतना सुहावना होगा जितना कि पहले का कुरूप चित्र था। फिर मनुष्य न तो अपने सद्गुणों के लिए अधिक अभिमान करेगा न दुर्गुणों के लिए आत्म भर्त्सना करेगा।
आधुनिक काल में मनोवैज्ञानिक विधि से मनुष्य को सुखी बनाने के अनेक उपाय सोचे जाते हैं। मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य का सुख और दुःख उसी के हाथ में है। हमारे विवेक युक्त सन्तुलित विचार ही हमारे सुख का कारण होते हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको अपूर्ण मानकर उन्नति करने की चेष्टा करे तो वह अपने को सुखी बनाने में समर्थ होगा। प्रायः हम अपने आपको पूर्ण मान बैठते हैं और यही हमारे दुःख का कारण होता है। जो मनुष्य जितना ही पूर्ण अपने को समझता है वह अपनी भर्त्सना भी उतनी ही करता है। ऐसा व्यक्ति अपना ही शत्रु होता है।
मानसिक रोगों का अन्त करने का प्राचीन उपाय जिसे भगवान बुद्ध ने बताया है मैत्री भावना का अभ्यास है। मनुष्य दो प्रकार की अमैत्री भावना से अपने आपको दुःखी बनाता है। एक दूसरे के प्रति अमैत्री भावना और दूसरी अपने प्रति ही अमैत्री भावना। अपने प्रति अमैत्री भावना के समय मनुष्य अपने आपको कोसता रहता है। इस प्रकार के भाव को कुकृत्य कहा जाता है। ऐसे विचार का अन्त अपने प्रति मैत्री भावना का अभ्यास अपने आपको अभागा व्यक्ति न मान कर ‘उपयुक्त’ व्यक्ति ही मानने से होता है।
परन्तु कोई भी व्यक्ति तब तक मैत्री भावना अपने प्रति नहीं कर सकता जब तक वह दूसरों के प्रति मैत्री भावना नहीं लाता, जो दूसरों के प्रति उदारता के विचार मन में लाता है वह अपने प्रति भी उदारता के विचार करता है। दूसरों के प्रति प्रेम प्रदर्शित करना अपने प्रति प्रेम प्रदर्शित करने की सीढ़ी है। दूसरों की त्रुटियों को जो जितना ही माफ कर देता है उसकी अन्तरात्मा भी अपनी त्रुटियों को माफ कर देती है। मनुष्य के अनुदार विचार उस जहरीले साँप के समान है जो दूसरों को काटने के लिए पाला जाता है। परन्तु जो अपनी ही हानि करता है। उदार विचार इससे उल्टा कार्य करता है। वह दोनों का कल्याण करता है।
जो मनुष्य आत्म कल्याण चाहता है उसे निःस्वार्थ भाव से ही दूसरों के प्रति उदारता दिखाना और उनकी सेवा करना आवश्यक होता है। इस प्रकार के कार्य से उसे कोई लौकिक लाभ हो या नहीं उसे आध्यात्मिक लाभ तो अवश्य होता है। उसके उदार विचारों की संख्या बढ़ जाती है और ये उदार विचार उसे आपत्ति काल में काम देते हैं। उदार विचार रोग से बचाते हैं। और सहज में ही आरोग्य बना देते हैं। बाहरी फल की इच्छा से जो भला काम करते हैं उनका परिणाम दुखद ही होता है। कितनी बार हमें अपने भले कार्यों के लिए मान और यश न मिलकर अपमान और अपकीर्ति मिलती है। कितने ही लोग हमें उनके प्रति भलाई करने के लिए कुछ कृतज्ञता न दिखा कर नुकसान ही पहुँचाते हैं। इस प्रकार के जो व्यक्ति बाहरी काम की आशा से भला काम करता है वह दुख ही दुख में रहता है। जो व्यक्ति जितना स्वार्थी होता है वह दूसरों को उतना ही स्वार्थी पाता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों के प्रति भलाई करके आत्म सन्तोष का अनुभव करके आत्म भर्त्सना करता है। ऐसे ही लोगों को अकारण मानसिक रोग हो जाते हैं।
(पं. रामदयाल जी पाराशर, तिलहर)
मनुष्य के व्यक्तित्व का मूल्याँकन करते समय उसकी आदतों को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है। जिस मनुष्य की जैसी आदतें हैं, जैसा स्वभाव है, वैसा ही उसका मूल्याँकन किया जाता है। विद्या, बुद्धि, चतुरता, रौब, दाब आदि का भी मनुष्य जीवन में अपना स्थान है परन्तु उन सबसे ऊपर मनुष्य का रहन-सहन का तरीका, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं कार्य करने की गतिविधि ही है।
निरर्थक आडम्बर, शान शौकत, अकड़, बनावट शेखीखोरी, टीपटाप में अनेक व्यक्ति अपना मन बहुत लगाते हैं। वे दूसरों के सामने अपने को अमीर या बड़ा आदमी साबित करने के लिए उन बेहूदे तौर-तरीकों को अपनाते हैं जो अमीर होते हुए भी वास्तविक अमीरों तक को विज्ञ लोगों की दृष्टि में गिरा देते हैं। फिर ये नकली अमीर और नकली जेन्टलमैन अपने मन के बादशाह भले ही बने फिरें दूसरों की दृष्टि में वे छिछोरे, ओछे एवं निकम्मे ही जंचते हैं। ऐसे लोग दूसरों का आदर, सद्भाव एवं सहयोग प्राप्त नहीं कर सकते फलस्वरूप वे कोई बड़ी उन्नति भी नहीं कर पाते।
बनावट के नहीं, अच्छे गुणों से, रचनात्मक आदतों से, व्यवहार वादी स्वभाव से कोई मनुष्य दूसरों के मन में अपना स्थान बना सकता है। और उसी आधार पर साँसारिक सुविधाएँ एवं उन्नतियाँ प्राप्त कर सकते हैं। जो लोग छोटे से बड़े बने हैं उनमें अन्य विशेषताओं के साथ साथ उपरोक्त तीन बातें अवश्य रही हैं, गुणों, आदतों और स्वभाव की विशेषताएँ जिनके अन्दर न होगी उनकी अन्य योग्यताएँ कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध न कर सकेंगी।
एक बार अमेरिका के एक बड़े व्यापारी को कुछ ऐसे कर्मचारियों की आवश्यकता हुई जो उसके कारोबार को चलाने में सहायता करें। वेतन भी उन्हें पर्याप्त मिलने वाला था। उम्मीदवारों की अर्जियाँ माँगी गई। हजारों अर्जियाँ आई। चुनाव के लिये प्रार्थी लोग बुलाये गये। व्यापारी ने सभी से भेंट की। किसी की सूरत देखते ही ना का जवाब मिल गया। किसी से थोड़ी देर पूछताछ की गई, किसी को एक दो दिन काम दिखाने के लिए बुलाया गया। किसी को तुरन्त ही नियुक्त पत्र दे दिया गया।
उस व्यापारी का एक मित्र भी उस समय मौजूद था, उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि चुनाव में सबकी एक सी परीक्षा न लेकर किसी को तुरन्त नियुक्त किसी को तुरन्त इनकारी, किसी को काम सिखाने की नीति क्यों अपनाई गई। उसने अपने मित्र से इसका कारण एकान्त में पूछा। व्यापारी ने उत्तर दिया कि- “मैं किसी की विद्या चतुरता और दिखावट को नहीं उसके गुणों और आदतों को महत्व देता हूँ। जो लोग अपने सजाव, शृंगार, शान-शौकत, ऐंठ, अकड़, रौब-दाब पर अधिक ध्यान देते हैं, बातें बहुत करते हैं। अधिक मीठी या शेखी भरी बातें करते हैं वे हाथ पैर कम चलाते हैं, परिश्रम उनसे होता नहीं, काम करने में हेठी समझते हैं, जिन्हें अपनी बनावट का ही अधिक ध्यान रहता है उनके मस्तिष्क को दूसरे कामों की व्यवस्था बनाने के लिए अवकाश ही नहीं मिलता। इसलिये मैं ऐसे कर्मचारी नियुक्त करता हूं जो सादगी से रहने वाले, परिश्रमी, जिम्मेदारी के प्रति जागरुक और अव्यवस्था को हटा कर व्यवस्था बनाने में रुचि रखते हैं।”
व्यापारी ने अपने मित्र को बताया कि जो उम्मीदवार बहुत ठाठ-बाट की पोशाक पहिन कर, बढ़िया बाल काट कर, सजधज कर आये थे उन्हें देखते ही इनकार कर दिया गया। क्योंकि ऐसे लोग निकम्मे, कामचोर, बातूनी एवं फिजूल खर्चीले होते हैं, ऐसे लोगों को नौकर रखा जाय तो उनकी देखा-देखी और लोग भी ऐसी ही आदतें सीख सकते हैं और काम में अव्यवस्था उत्पन्न हो सकती है। इसलिए बढ़े ठाठ-बाट के व्यक्ति को मैं भूल कर भी नौकर नहीं रखता। जो लोग सादा पोशाक में थे, जिम्मेदारी एवं दृढ़ता की भावना जिनके चेहरों से टपकती है वास्तव में रखने योग्य होते हैं। ये उम्मीदवार बहुत देर प्रतीक्षा गृह में बैठे रहे थे, मैं छिप कर यह देखता रहा कि इनमें से बैठे-बैठे कौन क्या कर रहा है। जो लोग प्रतीक्षालय की वस्तुओं को इधर-उधर अस्त-व्यस्त कर रहे हैं, जहाँ-तहाँ सिगरेट की राख और दियासलाइयों की तीलियाँ पटक रहे थे, कुर्सियों पर बेढंगे तरीके से बैठे थे, उन्हें बेढंगा आदमी समझकर मैंने पहले ही अस्वीकृत कर दिया था क्योंकि इनकी यह आदतें हर काम में अव्यवस्था फैलावेंगी एक उम्मीदवार जो प्रतीक्षा गृह की वस्तुओं की अव्यवस्था दूर करने और वस्तुओं को यथा स्थान लगाने, गन्दगी को हटाने और शोभा बढ़ाने के प्रयत्नों में लगा रहा वह मुझे सबसे अधिक पसन्द आया। उसे मन में प्रत्यक्ष भेंट होने से पूर्व ही मैंने नौकरी की स्वीकृत दे दी थी। यद्यपि वह शिक्षा की दृष्टि से उतना अच्छा नहीं है, फिर भी उसकी आदतें मेरे कारोबार के लिए उच्च शिक्षा की अपेक्षा लाभदायक होगी”
अपने व्यापारी मित्र की तथ्य पूर्ण बात सुनकर वह व्यक्ति बहुत प्रभावित हुआ। सचमुच उसके सभी सहयोगी और कर्मचारी अच्छी आदतें वाले थे, चुनाव की इस सावधानी से ही धनी व्यापारी गरीबी से उन्नति करता हुआ करोड़पति बना था। वह सदैव इस बात का प्रतिवादन करता था कि जीवन को उन्नतिशील बनाने के लिए और कोई वस्तु उतनी आवश्यक नहीं है जितनी (1) आदतों, (2) स्वभावों और (3) गुणों की उत्तमता की। अमेरिका का वह करोड़पति व्यापारी जिस निष्कर्ष पर पहुँचा था वह निष्कर्ष हम सभी के लिए समान रूप से तथ्य पूर्ण है। चाहे किसी को नौकरी करनी हो, चाहे खेती, चाहे कोई अमीर हो या चरवाहा, पण्डित हो या निरक्षर सभी के लिए यह बात सत्य है कि वह बेकार की बातों और आदतों में पड़ता है तो अच्छी आदतें पैदा करने के लिए अवकाश ही नहीं मिलेगा और वह उस महान योग्यता से वंचित रह जायगा जो किसी को बड़ा आदमी, अमीर, नेता, विद्वान सफल मनोरथ, प्रतिष्ठित, सत्ताधारी, कलाकार आदि के प्रतिष्ठित स्थानों तक पहुँचाती है। परिश्रमी, समय की एक घड़ी भी बर्बाद न करने वाले, अपने मस्तिष्क को रचनात्मक दिशा में लगाये रखने वाले, अव्यवस्था को क्षण भर के लिए भी सहन न करने वाले व्यक्ति की आदतें ही वह सम्पत्ति है कि सफलता उनके पीछे-पीछे चलेगी।
जो लोग आधे मन से काम करते हैं, अपनी वस्तुओं को यथा स्थान रखना नहीं जानते, जिन्हें हर काम में सफाई और सौंदर्य उत्पन्न करना नहीं आता वे फूहड़ लोग- जिस स्थान पर भी बैठेंगे वहाँ गन्दगी और दरिद्रता को आमन्त्रित करते रहेंगे। ऐसे लोगों के आस-पास का वातावरण सदा हानि, घाटा, दरिद्रता, क्लेश, आलस्य अवसाद, चिन्ता और परेशानी से भरा रहेगा। जिस प्रकार राहु, केतु या शनि की ग्रह दशा में मनुष्य दुख दरिद्र से ग्रसित हो जाता है वैसे ही अव्यवस्था, फूहड़पन, एवं बेकार कामों में शक्ति खर्च करना यह तीन आदतें भी दुर्भाग्य की जननी है। जहाँ यह तीनों रहेंगी वहाँ प्रतिकूल ग्रह दशा की भाँति असफलता एवं दुख दरिद्रता का वातावरण छाया रहेगा।
स्मरण रखिए- अच्छी आदतें, अच्छे स्वभाव अच्छे गुण ही साँसारिक जीवन में उन्नति एवं सफलता प्रदान करने वाली महत्व पूर्ण वस्तुएँ हैं। इनसे वंचित रहना दुख दारिद्र को प्रत्यक्ष आमन्त्रण देने के समान है।
प्राचीन काल में ऋषियों और देवताओं ने जो कुछ पाया था उसमें यज्ञ विद्या का उपयोग सर्वाधिक किया गया था। कहा भी गया है -
यज्ञेन हि देवा दिवाँगता यज्ञेना सुरा नपानुदन्तः यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति,
यज्ञे सर्व प्रतिष्ठितम् तस्माद्यज्ञं परमं वदन्ति।
अर्थात्- यज्ञ से ही देवताओं ने स्वर्ग का अधिकार प्राप्त किया। यज्ञ से ही असुर हराये गये। यज्ञ से ही शत्रु मित्र बन जाते हैं। यज्ञ में अनन्त लाभ भरे हुए हैं। यज्ञ की महिमा महान है।
सकाम यज्ञों के विस्तृत विधान एवं रहस्यमय विज्ञान हैं। आज उनकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। कुछ ग्रन्थ तो मुसलमानी शासन काल में ही नष्ट हो गये। जो बचे है उनके मर्मज्ञ विद्वान याज्ञिक रहे वे इतने लोभी रहे कि बिना पुष्कल दक्षिणा के कुछ करते नहीं, साधारण स्थिति के लोग उनकी योग्यता से लाभ न उठा सके। अनेक मतमतान्तरों के फैल जाने और विद्या का अभाव हो जाने से लोग वेद ज्ञान से वंचित हो गये। उनके महत्त्वों एवं रहस्यों तक को भूल गये। न तो यज्ञ प्रेमी यजमान रहे न कर्मनिष्ठ याज्ञिक ऐसे विद्वान रहे जिनको यज्ञ विद्या की समुचित जानकारी एवं अभ्यस्तता हो। ऐसी दशा में आज यज्ञ का वह महत्वपूर्ण विज्ञान जो हमारे पूर्वजों को ज्ञात है। हमें प्राप्त नहीं।
राजा नहुष यज्ञों द्वारा ही इन्द्रासन का अधिकारी बना था। ऋंगी ऋषि ने राजा दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ कराया था और उसी के प्रभाव से राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न उत्पन्न हुए थे। राक्षसों के उत्पातों से दुखी होकर उन्हें समूल नष्ट करने के लिए विश्वामित्र ऋषि ने एक विशाल यज्ञ आयोजन किया था। राक्षस लोग अपनी प्राण रक्षार्थ उस यज्ञ को नष्ट करने के लिए जी−जान से प्रयत्न कर रहे थे। इसी यज्ञ की रक्षा के लिए विश्वामित्र जी राम और लक्ष्मण को ले गये थे। जब लंका पर राम ने चढ़ाई की और राक्षसों को लगा हमारी पराजय होने जा रही है तो उन्होंने भी एक प्रचण्ड तान्त्रिक यज्ञ रचा था, यदि वह सफल हो जाता तो रावण आदि का उस लड़ाई में पराजित होना सम्भव न होता। वानरों ने उस यज्ञ को जान हथेली पर रखकर विध्वंस किया था। राजा बलि ने इतने यज्ञ किये थे कि वह वह अपने समय का सर्वोपरि शक्तिवान व्यक्ति बन गया था यदि उसके एक दो यज्ञ ही और हो जाते तो फिर राक्षस वर्ग की प्रभुता संसार पर अनिश्चित काल के लिए स्थिर हो जाती और विश्व में हाहाकार मच जाता। इस संकट से संसार की रक्षा करने के लिए भगवान को छल तक का आश्रय लेना पड़ा। वामन रूप बनाकर उन्होंने बलि को छला और उसको असफल बनाकर असुरों का प्रभुत्व स्थापित होने से बचाया। राजा जन्मेजय ने अपने पिता परीक्षित का बदला नागों से चुकाने के लिए नाग यज्ञ किया था। जिसमें मंत्रों की आकर्षण शक्ति से असंख्यों नाग आकाश मार्ग से खिंचे चले आये थे और यज्ञ कुण्ड में अपने आप आहुति रूप में गिरते थे। इस यज्ञ से अपनी प्राण रक्षा के लिए वासुकी इन्द्रासन से जा लिपटा था, जब इन्द्र भी वासुकी के साथ-साथ कुण्ड में गिरने के लिए मन्त्र व्रत से खिंचने लगा तब कहीं वह नागयज्ञ समाप्त कराया गया।
राजा द्रुपद ने द्रोणाचार्य को मारने के लिए एक ऐसे बलिष्ठ पुत्र की कामना की थी जो उनसे अधिक बलवान तथा शास्त्र विद्या का ज्ञाता हो। ऐसा पुत्र प्राप्त करने के लिए उन्होंने यज्ञ कराया। यज्ञ के अन्त में जब पुत्रोत्पादक पुरोडास (खीर) बन कर तैयार हुई और जो अत्यन्त स्वल्प काल उसे खाने के लिए नियत था, उस समय दुर्भाग्य वश रानी झूठे मुँह थी। मुहूर्त व्यतीत होता देख यज्ञ कर्ता ने उस खीर को यज्ञ कुण्ड में ही पटक दिया। उसी समय धृष्टद्युम्न और द्रौपदी यज्ञ कुण्ड में से निकले। और अन्त में उन्हीं से द्रोणाचार्य की मृत्यु हुई।
इस प्रकार की असंख्यों घटनाएँ प्रत्येक इतिहास पुराण में भरी पड़ी है। स्वयं भगवान ने अपने चौबीस अवतारों में एक अवतार ‘यज्ञ पुरुष’ का धारण किया है। यज्ञों की महिमा का कोई अन्त नहीं। इस युग में जिस प्रकार विभिन्न प्रकार की शक्तियों, भाप, कोयला, अग्नि, पेट्रोल, बिजली, जल, पवन, एटम आदि के द्वारा उत्पन्न की जाती है उसी प्रकार प्राचीन काल में यज्ञ कुण्डों और वेदियों में अनेकों रहस्यमय मन्त्रों, एवं विधानों द्वारा उत्पन्न की जाती थी। इस समय अनेक प्रकार की मशीनें अनेक कार्य करती हैं उस समय मन्त्रों और यज्ञों के संयोग से ऐसी शक्तियों का आविर्भाव होता था जिनमें बिना किसी मशीन के मनुष्य सबकुछ कर सकता था इसको ऋद्धि-सिद्धियाँ कहते थे। देवता और असुर दोनों ही दल इन शक्तियों को अधिकाधिक मात्रा में प्राप्त करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहते थे।
जिस प्रकार प्राचीन काल के विशाल भवनों के खंडहर अब भी जहाँ-जहाँ मिलते है और उसी से उस भूतकाल की महत्ता का अनुमान लगता है। उसी प्रकार यज्ञ विद्या की अस्त-व्यस्त जानकारियाँ जहाँ-तहाँ क्षत-विक्षत रूप से प्राप्त होती है। अनेक प्रकार के अलग-अलग विधान मिलकर एक स्थान में एकत्रित हो गये हैं और गाय-घोड़ा के जुड़े हुये अंगों की तरह एक विलक्षण स्थिति में खड़े हुये हैं। आज ऐसी ही अस्त-व्यस्त यज्ञ पद्धतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं। इनका संशोधन करना और यथावत उन विशिष्ट पद्धतियों को अलग-अलग करके उसका सर्वांग पूर्ण स्थापना भूत काल की भाँति करना एक ऐसा कार्य है। जो प्राचीन भारतीय विद्याओं की गुप्त शक्तियों के अन्वेषण में रुचि रखने वाले व्यक्तियों को पूरी तत्परता के साथ करनी है। इस शोध की जिम्मेदारी ऐसी है जिसे पूरा करके ही हम ऋषि ऋण से उऋण हो सकते हैं।
जिस प्रकार गायत्री विद्या की सर्वांग पूर्ण शोध के लिए पिछले तीस वर्षों से निरन्तर कार्य किया गया है, उसी प्रकार अब यज्ञ विद्या की शोध एवं सुव्यवस्था का कार्य हाथ में लेना है। इस विद्या की समुचित खोज होने पर भारतीय सूक्ष्म, चैतन्य विज्ञान, पाश्चात्य स्थूल जड़ विज्ञान की तुलना में अपना महान गौरव पुनः प्रतिष्ठापित कर सकता है। यज्ञ विद्या की सहायता से मानव जीवन के अनेकों कष्ट एवं अभाव दूर हो सकते हैं।
वेद मन्त्रों में तीन रहस्य हैं (1) उनकी भाषा का शिक्षात्मक स्थूल अर्थ (2) उनके उच्चारण से उत्पन्न होने वाली शब्द शक्ति का सूक्ष्म प्रभाव (3) उनमें सन्निहित शक्ति का यज्ञ आदि विशेष विधि विधानों के साथ उपयोग होने से उत्पन्न होने वाली प्रचण्ड शक्ति। आज कल लोग केवल मन्त्रों की शब्दावली का शिक्षात्मक अर्थ ही समझते हैं किन्तु वस्तुतः प्रत्येक वेद मन्त्र अपने गर्भ में महान विज्ञानमयी प्रचण्ड शक्तियों का भण्डार छिपाये बैठा है। जो तत्वदर्शी ऋषि इन मन्त्रों की शक्ति से परिचित है वे आगम और निगम सब के पारदर्शी हो जाते हैं।
विविध प्रकार के यज्ञ विभिन्न वेद मन्त्रों से होते हैं। उनका विधान ब्राह्मण ग्रन्थों तथा सूत्र ग्रन्थों में दिया हुआ है। अनुभवी याज्ञिक लोग परम्परागत ज्ञान के आधार पर भी उन विधानों को जानते हैं। ऐसे विधानों का वर्णन इन पंक्तियों में नहीं हो रहा है। उनकी पद्धतियाँ एवं जानकारियाँ तो धीरे-धीरे उपस्थित की जाती रहेंगी। इस समय तो गायत्री महामन्त्र तथा उससे संबंधित देव गायत्रियों के द्वारा होने वाले कुछ हवनों का उल्लेख किया जा रहा है। गायत्री महामंत्र के अंतर्गत 24 देव शक्तियों की अन्तःगायत्री हैं। इन अन्तः गायत्रियों का भी उपयोग होता है।
देव गायत्रियों द्वारा सकाम यज्ञों का सर्वांग पूर्ण सुनिश्चित विधान, जब तक उपलब्ध न हो तब तक अपूर्ण प्रयोगों से भी बहुत हद तक लाभ उठाया जा सकता है। नीचे कुछ ऐसे ही प्रयोग दिये जा रहे हैं जो यद्यपि अपूर्ण हैं फिर भी इनके द्वारा अनेक बार आशाजनक परिणाम उपस्थित होते देखे गये हैं।
देव गायत्रियों को स्वाहाकार के साथ कुछ विशेष प्रयोजनों में अमुक हवन सामग्रियों तथा अमुक समीक्षाओं का वर्णन है। यह प्रयोग बहुत सरल दीखते हैं पर वस्तुतः यह उतने सुगम नहीं है। किस व्यक्ति को, किस प्रयोजन के लिए, किस स्थिति में होम करना है उसे उसी के अनुसार अमुक मुहूर्त में, अमुक नियम पालन करते हुए, अमुक मन्त्रों के द्वारा अमुक वृक्ष के अमुक भाग की, अमुक प्रकार की समिधाएँ लानी होती हैं, और उनको विशेष मार्जनों, सिंचनों, अभिषेकों के साथ परिशोधन, शक्तिवर्धन, प्रमाणीकरण किया जाता है। तब वे समिधाएँ अपना प्रयोजन भली प्रकार पूर्ण करती हैं। इसी प्रकार जो हवन सामग्री इसमें लिखी हुई है वे देखने में बहुत सुलभ हैं पर उनके पौधों को बोने, सींचने, तोड़ने, परिमार्जित करने, सुखाने आदि के विशेष विधान है। दूध, दही, घृत आदि का जहाँ वर्णन है। वहाँ गौ, भैंस, बकरी आदि अमुक गति के पशु को अमुक प्रकार का ही आहार कराना, अमुक स्थानों का जल पिलाना अमुक मन्त्रों से दूध दुहना, उसे अमुक प्रकार की अग्नि से गरम करना, अमुक वस्तु के बने हुए पात्र में दही जमाना, अमुक काष्ट की रई से अमुक मन्त्र बोलते हुए दहि मंथन करके घी निकालना आदि का विस्तृत विधान छिपा हुआ है। हवन करने के दिनों में जो तपश्चर्यायें करनी पड़ती हैं उनके नियम भी अलग-2 हैं। इन सब विधानों के द्वारा ये साधारण समिधाएँ हवन सामग्रियाँ एवं विधियाँ भी विशिष्ठ महत्वपूर्ण बन जाती है। उन विधियों एवं नियमों में देश, काल, पात्र के अनुसार कुछ हेर-फेर भी करने पड़ते हैं। इस प्रकार की जानकारियाँ धीरे-2 संग्रह हो रही हैं और समयानुसार उनको छापा भी जायगा।
जब तक वैसी सर्वांगपूर्ण जानकारी उपलब्ध न हो तब तक साधारण रीति से भी नीचे लिखी हुई वस्तुएं निर्धारित देवगायत्रियों के साथ हवन किया जाए तो भी उसका परिणाम निश्चित रूप से अच्छा ही होगा। हानि की तो इसमें कोई संभावना है ही नहीं।
आत्म बल बढ़ाने के लिए :-
ब्रह्मतेज, आत्मबल, प्रतिभा, प्रभाव शालीनता आदि की अभिवृद्धि एवं पाप वृत्तियों को नष्ट करने के लिए ‘अग्नि गायत्री’ का प्रयोग किया जाता है। वेदमाता गायत्री की भाँति ही विभिन्न देवताओं की 24 गायत्री और भी है। इनके गुण और प्रभाव अलग-अलग है। अग्नि में पड़ कर जैसे साधारण वस्तुएँ भी अग्नि रूप हो जाती हैं। उसी प्रकार अग्नि गायत्री का प्रयोग करने से मनुष्य की अन्तः भूमिका अग्नि वर्ण हो जाती है, उसमें ब्रह्मतेज भर जाता है। इस अग्नि में भीतर के अनेक दुरित तथा पूर्व संचित कुसंस्कार भी जलकर नष्ट हो जाते हैं। अग्नि गायत्री का मन्त्र यह है-
ॐ भूर्भुवः स्वः महज्वालाय विद्महे।
अग्नि देवाय धीमहि। तन्नः अग्नि प्रचोदयात्।
इस अग्नि गायत्री के साथ विभिन्न हव्य पदार्थों के साथ होम करने से उनके जो परिणाम होते हैं उनके विवरण यह हैं :-
पलाशीभिखाप्नोति समिद्भिर्ब्रह्म वर्चसम्। प्लाश कुसुमैहुत्वा सर्वमिनष्ट मवाप्नुयात्॥
पलास की समिधाओं में हवन करने पर ब्रह्म तेल की अभिवृद्धि होती है। और पलाश के कुसुमों के हवन करने पर सभी इष्टों की सिद्धि होती है।
यवानाँ लक्ष होमेन घृताक्तानाँ हुताशने। सर्व काम समृतत्मा पराँ सिति मवाप्नुयात॥
यज्ञों में घी मिलाकर एक लाख बार अग्नि में आहुति देने से सब कामों की सिद्धि होती है तथा परा सिद्धि प्राप्त होती है।
ब्रह्म वर्चस कामास्तु पयसा जुहुयात्तथा। घृत प्लुतैस्तिलैर्वह्नि जुहुयात्सु समाहितः॥
ब्रह्म तेज की कामना करने वाला व्यक्ति सावधानी के साथ घृत युक्त तिलों से और घी से हवन करें।
गायत्र्ययुत होमाँच सर्व पापैः प्रमुच्यते। पापात्मा लक्ष होमेन पातकेभ्य। प्रमुच्यते॥
एक लाख आहुतियों से गायत्री द्वारा हवन करने से पापी मनुष्य भी बड़े पापों से छूट जाता है।
चन्दन द्वय संयुक्तं कर्पूरं तण्डलं यवम्। लवंग सुफलं चाज्यं सिता चाभ्रस्य दारुकैः। अयं न्यून विधिः प्रोक्तो गायत्र्याः प्रीतिकारकः।
दोनों चन्दन, कपूर, तणड्डल, यव, लवग, नारिकेल, भाज्य, मिश्री आम की लकड़ी यह वस्तुएँ गायत्री से प्रीति बढ़ाने वाली हैं।
क्षीरोदन तिलान्दूर्ण क्षीरद्रुम समिद्वरान्। प्रथक सहस्त्र त्रितयं जुहुयान्मन्त्र सिये॥
प्रणव युक्त 24 लाख गायत्री जप करके जप सिद्धि के लिए दूध, भात, तिल, दूर्वा तथा बरगद, गूलर, पीपल आदि दूध वाले वाले वृक्षों की समिधाओं से तीन हजार हवन करें।
तत्व संख्या सहस्राणि मन्त्र विज्जुत्यात्तिलैः। सर्व पापं विनिर्मुक्तो दीर्घ आयुः स विन्दति॥
तिलों से 24 हजार आहुति देने से होता समस्त पापों से छूट जाता है और दीर्घ जीवन पाता है।
उपरोक्त हव्य सामग्रियों तथा समिधाओं में अग्नि तत्व विशेष है। इनकी आहुतियाँ छोड़ने से निकटवर्ती वातावरण में तेज, उत्साह, स्फूर्ति एवं प्रेरणा का संचार होता है। आत्मिक तत्व, गुण एवं जल जागृत होकर हवन करने वाले में ब्रह्मतेज बढ़ाते हैं।
आत्मा और शरीर में ऊष्मा अग्नि तत्व बढ़ाने के लिये अग्नि गायत्री की उपासना उन विधि-विधानों के साथ की जाती है जो अग्निमय वातावरण उत्पन्न करते हैं। इसके द्वारा भीतर और बाहर प्रत्यक्ष प्रकाशवान तेज झलकने लगता है।
(क्रमशः)
“अखंड ज्योति” के पाठकों से गायत्री की महिमा छिपी नहीं है। इस महामन्त्र का आश्रय लेने वाला अपने आन्तरिक और साँसारिक क्षेत्रों को मंगलमय बना सकता है। भारतीय धर्म में इससे अधिक शिक्षा पद एवं शक्तिशाली मंत्र और कोई नहीं है। इसी प्रकार यज्ञ की महिमा भी सर्वविदित है।
गत जनवरी के अंक में यज्ञ सम्बन्धी बहुत कुछ चर्चा की जा चुकी है। हिन्दू का कोई भी धर्मकृत्य व्रत, उत्सव, पर्व, त्यौहार, संस्कार यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। हम अपने शरीर को अन्त में ‘अंत्येष्टि यज्ञ’ की चिता में ही भस्म करते हैं। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता है, जिसे “द्विजत्व” कहते हैं। जैसे स्थूल शरीर को जन्म देने वाले माता-पिता की सेवा पूजा करना मनुष्य का कर्त्तव्य है उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा करना भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है। यज्ञ को ‘ईश्वर का मुख’ कहा गया है। उसमें जो कुछ खिलाया जाता है वह सच्चे अर्थों में ब्रह्म भोज है।
यज्ञ एक परम रहस्यमय प्रचण्ड शक्तियों से परिपूर्ण विज्ञान है। प्राचीन काल में यज्ञ विद्या के ज्ञाता लोग शक्ति वेद मन्त्रों का उच्चारण, विविध समिधाएं तथा हव्य पदार्थों के वैज्ञानिक संमिश्रण, हवन वेदिकाओं पर देव तत्वों के आवाहन, कुण्डों में विशिष्ट अग्नियों के स्थापन एवं विभिन्न कर्मकाण्डी उपचारों द्वारा आकाश में ऐसी शक्तिमयी विद्युत तरंगें उत्पन्न करते थे जो बड़े-बड़े प्रयोजनों को पूर्ण करने के आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न करती थी। उस युग में असंख्य भौतिक और आध्यात्मिक शक्तियों, शब्दों एवं विद्युत तरंगों का उद्भव यज्ञ शालाओं में ही होता था। वेदान्त यज्ञ विद्या के श्रोता विश्वामित्र, वशिष्ठ आदि ऋषि लोग थे और तंत्रोक्त होम के निष्णात रावण आदि असुर थे। आसुरी शक्तियों को भी रावण ने वेदमन्त्रों एवं यज्ञों से ही प्राप्त किया था। अनेक राजा और ऋषियों ने समय-समय पर विभिन्न आध्यात्मिक एवं साँसारिक प्रयोजनों के लिए यज्ञ किये हैं उनके इतिहास से भारतीय प्राचीन ग्रन्थों का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। आज यद्यपि प्राचीन काल जैसी साँगोपाँग यज्ञ विद्या की जानकारी लुप्तप्राय हो गई है। फिर भी वर्तमान काल में विज्ञान शास्त्रोक्त विधि से ठीक प्रकार हवन यज्ञ किये जावें तो उनका परिणाम अब भी आशाजनक होता है। कई बार परिणाम आश्चर्यजनक होते हैं।
समयानुसार वर्षा, अन्न, वृक्ष तथा वनस्पतियों की वृद्धि, पशुओं की पुष्टि सुसन्तति, रोग निवारण कुबुद्धि एवं पाप वृत्तियों का नाश, वातावरण की शुद्धि, सतोगुण एवं सद्भावनाओं का विकास मंगलमय दैवी तत्वों से मनुष्य की घनिष्ठता बढ़ाना अनिष्टों का निवारण, आदि अनेक लाभ ऐसे हैं। जो यज्ञों द्वारा किसी न किसी रूप में अब भी निश्चित रूप से प्राप्त होते हैं।
महा महिमामयी गायत्री माता और प्रचण्ड शक्तियों के तेज पुँज यज्ञ पिता का एकीकरण “गायत्री महायज्ञ” है। जिस प्रकार गंगा और यमुना के मिलने से तीर्थराज संगम बनता है वैसे ही गायत्री और यज्ञ इन दोनों के सम्मिलित आयोजन का प्रभाव भी असाधारण ही होता है। गायत्री महायज्ञ का महात्म्य अन्य मन्त्र साधनों एवं यज्ञों से विशेष है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर गायत्री तपोभूमि मथुरा में प्रति वर्ष एक गायत्री महायज्ञ करते रहने का निश्चय किया गया है। इस बार यह यज्ञ चैत्र शुक्ल 13,14,15 संवत् 2011 वि0 तदनुसार 16,17,18 अप्रैल सन 54 शुक्रवार, शनिवार और रविवार को होने जा रहा है।
यह ऋषि कल्प आयोजन बाह्याडंबर, प्रदर्शन एवं दिखावटी तड़क-भड़क से बिलकुल शून्य रहेगा। यह यज्ञ पूर्ण शान्तिदायक वातावरण में शास्त्रोक्त रीत से लोक कल्याण एवं प्रभु प्रीत्यर्थ ही किया जायगा। इसमें एक सीमित संख्या में उतने आयोजन सम्पन्न होगा। जिन्हें इस यज्ञ में भागीदार बनना हो उन्हें पूर्व सूचना अवश्य भेजनी चाहिए ताकि सम्मिलित होने वालों की सीमित संख्या में उनका नाम भी सम्मिलित किया जा सके।
आत्मोन्नति का जो कार्य बहुत भाषण प्रवचन सुनने, बहुत पढ़ने, तथा छोटे-मोटे अन्य उपायों से पूरा नहीं होता वह ऐसे अवसरों पर सम्मिलित होने से सहज ही पूरा हो जाता है। कुम्हार के अवा में लगे हुए अनेक बर्तन एक ही अग्नि से कुछ ही समय में एक साथ पक जाते हैं। आग की तीव्र भट्टी के निकट बैठने वाले अनेक लोग उष्णता अनुभव करते है उन का शीत दूर हो जाता है, उसी प्रकार गायत्री महायज्ञ में प्रवेश करने मात्र से अन्तरात्मा के शुभ तत्वों का परिपाक, अभिवर्द्धन होता है और अनेकों रोग शोक उस गर्मी में बर्फ की तरह पिघल कर बह जाते है। बूँद-बूँद टपकने वाले सोते से जितना पानी बहुत समय में इकट्ठा किया जा सकता है उतना एक बड़े सरोवर में क्षण भर में प्राप्त हो सकता है। इसी प्रकार महीनों तक छुट-पुट चलने वाली साधना की अपेक्षा इस वृहद् अभियान में तीन दिन सम्मिलित होना प्रत्येक दृष्टि से उत्तम ही होगा। जो अधिक कार्य व्यस्त एवं अन्य कारणों से आने में असमर्थ न हों उन्हें इस अवसर पर सम्मिलित होने के लाभ से वंचित न रहना चाहिये। परन्तु स्मरण रहे हर किसी को यज्ञ में सम्मिलित होने की स्वीकृति न मिलेगी। जिन्हें सम्मिलित होना हो वे अपना स्थान पहले से ही निश्चित अवश्य करा लें। यह विज्ञप्ति ही सबके लिए आमंत्रण पत्र है। कोई सज्जन अलग से आमंत्रण आने की प्रतीक्षा न करें।
यज्ञ में भाग लेने वाले सब की पोशाक एक सी रहेगी। सफेद धोती कुर्ता, तथा कन्धे पर पीला रंगा हुआ दुपट्टा रहेगा। अशौच की स्थिति एवं बहुत छोटे-बच्चे वाली स्त्रियों को छोड़ कर अन्य महिलाएं भी भाग ले सकेंगी। स्त्रियों की धोती या चादर पीली रंगी होनी चाहिए। बाहर से आने वाले सज्जनों को ता0 15 की शाम को ही आ जाना चाहिए ताकि ता0 16 को प्रातः काल यज्ञ में सम्मिलित हो सकें। अखण्ड ज्योति प्रेस, घीयामंडी रोड़ पर है। गायत्री तपोभूमि मथुरा से वृन्दावन जाने वाली सड़क पर मथुरा से 1 मील दूर है रेलवे स्टेशन से सीधा तपोभूमि ही पहुंचना चाहिये। ठहरने की व्यवस्था प्रायः सभी की वहीं है। स्टेशन से प्रायः) सवारी ताँगे रिक्शे तपोभूमि का किराया लेते हैं। अनावश्यक लोगों को तीर्थ यात्रा कराने के लिए साथ न लायें। क्योंकि उनके ठहरने आदि की व्यवस्था न रहने, और साथियों की प्रेरणा दूसरे कार्य के लिए रहने से कार्यक्रम में गड़बड़ी फैलती है। जिन लोगों का यज्ञोपवीत अभी तक नहीं हुआ है उनको विधिपूर्वक यज्ञोपवीत लेने का भी यह परम शुभ अवसर है।
आप भी इसमें भाग लीजिए
यह यज्ञ केवल एक देशीय या कुछ सीमित संख्या या याज्ञिकों द्वारा सम्पन्न होने वाला साधारण हवन नहीं है। यह सभी गायत्री प्रेमियों का एक सम्मिलित सामूहिक एवं व्यापक क्षेत्र में सुविस्तृत महायज्ञ है। इसमें किसी न किसी रूप में भाग लेना प्रत्येक गायत्री उपासक का आवश्यक कर्तव्य है। जो लोग परिस्थितिवश मथुरा न आ सकें वे अपने-अपने स्थानों पर तीनों दिन कम से कम 24-24 आहुतियों का हवन और 10-10 मालाओं का जप अवश्य करें। जहाँ कई गायत्री उपासक हों वहाँ जप और हवन की योजना स्थानीय सुविधा की दृष्टि से की जा सकती है। इस प्रकार जो लोग इस व्यापक महायज्ञ में अपने-अपने स्थान पर सम्मिलित हों वे अपने कार्य की सूचना हमें अवश्य देदें -
आप अपने इस पारिवारिक महायज्ञ में-सम्मिलित हूजिये। मथुरा आना न हो सके तो अपने घर से ही यज्ञ आयोजन की व्यवस्था कीजिए-
(1) गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) मू-3॥)
गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, साधना द्वारा गुप्त 24 शक्तियों का जागरण, वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान, अनेकों अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन, यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा संध्या बंधन प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विधियाँ, अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रयोग।
(2) गायत्री महाविज्ञान (द्वि0 भाग) मू-3॥)
गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, 24 गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री सहस्रनाम, गायत्री स्तोत्र, गायत्री लहरी आदि का संग्रह।
(3)गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) मू-3॥)
गायत्री द्वारा 84 प्रकार की महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी योग साधना का विस्तृत वर्णन है गायत्री के पाँच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य, हठयोग, राजयोग, लययोग, नादयोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, शब्दयोग, स्वरयोग की विधियाँ, बन्ध, मुद्रा, पंच, तन्मात्रा, ग्रन्थिभेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि, समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन, सोऽहं का साधन, तन्त्र तथा वाममार्ग, मैस्मरेजम गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
(4) गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार मू0 3॥)
अनेकों साधकों को, अपनी-अपनी साधना में हुए महान अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन किन व्यक्तियों को किस-किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हुए, निराशा एवं असफलता के अन्धकार पूर्ण वातावरण पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण।
(5) गायत्री यज्ञ विधान-मू0 3॥)
यज्ञ का रहस्य, विज्ञान, विधान, विवेचन, कारण हेतु, महत्व आदि को पूरे विस्तार एवं प्रमाणों के साथ समझाया गया है। इस पुस्तक के आधार पर पूर्ण शास्त्रोक्त विधि-विधान का छोटा या बड़ा यज्ञ कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से कर सकता है।
(6) सचित्र गायत्री शिक्षा - मू0 2)
गायत्री के 24 अक्षरों में 24 महान सिद्धान्त छिपे हुए हैं। उनको समझने के लिए 24 श्लोक, 24 लेख, 24 भाव पूर्ण कविताएँ तथा 26 आर्ट पेपर पर छपे हुए कलात्मक तिरंगे चित्र हैं।
(7) गायत्री चित्रावली-मू0 1)
विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री के विविध ध्यानों के लिए आर्ट पेपर पर छपे हुए 24 तिरंगे चित्र तथा परिचय।
(8) गायत्री का मन्त्रार्थ-मू0 1)
गायत्री के एक-एक अक्षर की विस्तृत शास्त्रीय व्याख्या तथा अनेक ऋषियों के अर्थों का संग्रह।
छोटा सैट- उपरोक्त पुस्तकों के कुछ स्थलों का संक्षिप्त साराँश लेकर यह पुस्तकें भी छापी गई हैं।
1-गायत्री ही कामधेनु है), 2-गायत्री का वैज्ञानिक आधार), 3-वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री), 4-गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएँ), 5-अनादि गुरुमन्त्र गायत्री), 6-सचित्र गायत्री), 7-गायत्री के 14 रत्न (प्र0 भाग), 8-गायत्री के 14 रत्न (द्वि0 भाग), 9-विपत्ति निवारण गायत्री), 10-स्त्रियों का गायत्री अधिकार), 11- गायत्री सहस्रनाम पाठ)
अत्यन्त सस्ती एवं सुन्दर वितरण योग्य पुस्तकें
1-गायत्री की गुप्त शक्ति), 2-सुख शान्ति दायिनी गायत्री), 3-गायत्री से बुद्धि विकास), 4-गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ) 5-गायत्री का अथ सन्देश), 6-स्त्रियों की गायत्री साधना), 7-गायत्री उपासना कैसे करें), 8-गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध), 9-गायत्री चालीसा), 10-गायत्री का तिरंगा चित्र)
मूल्य में कमी के लिए लिखना बिलकुल व्यर्थ है। हाँ 6 रु0 से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च अपना लगा दिया है।
पता- ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस मथुरा।
कभी हारता और अगर मैं कभी जीतता यह अवसर है कह कर मुझको मत बहकाना,
पूर्ण शक्ति संकलन, संतुलन जय देता है हार भली विधि शक्ति न अपनी अजमा पाना,
मुझसे ही तुम मेरी भूलें नहीं छिपाओ!
इसको कह कर भाग्य न तुम मुझको भरमाओ!
बार बार लहरों का पत्थर से टकराना उसका दृढ़ निश्चय है कोई भाग्य नहीं है,
चट्टानों का टूट-टूट पानी हो जाना संघर्षों पर जय है कोई भाग्य नहीं है,
सतत साधना के प्रतिफल को यों न भुलाओ! इसको कहकर भाग्य न तुम मुझको भरमाओ!
अगर भाग्य में शक्ति बिना खेतों के हल के और कृषक के बिना सयल हाथों को पाये,
वीतराग शैया पर पड़े हुए मानव के- फैले मुख में गेहूँ के दाने भर जाये
दिला शरण, तुम राह मरण की मत दिखलाओ! इसको कहकर भाग्य न तुम मुझको भरमाओ!
पार्थ न मेरा गीता की भी बाट निहारे पाँचजन्य की करने बैठे नहीं प्रतीक्षा
धैर्य अनेकों बार अभी तक जग ने परखा भी पर होगी मेरी पद-गति की आज परीक्षा,
पथ प्रशस्त मत करो, कोटिशः शूल बिछाओ! इसको कह कर भाग्य न तुम मुझको भरमाओ!
*समाप्त*
(ले.-श्री शिवशंकर मिश्र एम. ए.)