गायत्री महामन्त्र से लाभ उठाने के लिए यह आवश्यक है कि गायत्री विद्या का पूरा परिचय एवं विधान भली प्रकार सीख लिया जाय। अधूरी जानकारी का परिणाम अधूरा ही होता है। साइन्स डाक्टरी, इंजीनियरिंग, कानून, रसायन, शिल्प आदि की भाँति गायत्री भी एक महत्वपूर्ण विद्या है। जिसकी पूरी जानकारी प्राप्त करके ही पूरा लाभ उठाया जाना सम्भव है।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों एवं सिद्ध पुरुषों के सहयोग तथा दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर, जो ज्ञान एकत्रित किया गया है उसको पुस्तक रूप में प्रकाशित कर दिया है। इनमें उन सभी प्रश्नों का उत्तर, शंकाओं का समाधान तथा विभिन्न प्रयोजनों के लिए गायत्री प्रयोगों का पूरा वर्णन है। इन्हें पढ़ने के बाद कोई बात पूछने लायक नहीं बचती। फिर भी कोई बात पूछनी हो तो जवाबी पत्र भेज कर प्रसन्नता पूर्वक पूछी जा सकती है। स्मरण रहे साधारण पत्र की 10-20 पंक्तियों में किन्हीं साधनाओं का पूरा विधान या विज्ञान बताया जाना सम्भव नहीं। संचित और अधूरे उत्तरों से जिज्ञासुओं का ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। इसलिए कोई पूछताछ करने से पहले गायत्री महाविद्या आदि ग्रन्थों को मंगा लेते हैं व गायत्री परिवार के सदस्य माने जाते हैं और उनकी उन्नति के लिए समय-समय पर अनेक आवश्यक बातें एवं सूचनायें इधर से ही भेजी जाती रहती हैं।
(1) गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग)
विषय- गायत्री विद्या का वैज्ञानिक परिचय, तथ्य तथा मूल आधार, साधना द्वारा गुप्त 24 शक्तियों का जागरण, अनेक शक्तियों का आविर्भाव वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान, अनेकों अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध निष्काम और सकाम साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अन्यत् आवश्यक नियम गायत्री द्वारा संध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं मन्त्र का अर्थ माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
(2) गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग)
विषय- गायत्री विद्या सम्बन्धी छोटे-छोटे किन्तु बड़े ही महत्वपूर्ण रत्नों का संस्कृत श्लोक और हिन्दी अर्थी समेत संग्रह है। गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पंजर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, 24 गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री सहस्रनाम, गायत्री स्त्रोत, गायत्री लहरी आदि के इस संग्रह को गागर में सागर कहा जा सकता है।
(3) गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग)
विषय- गायत्री द्वारा 84 प्रकार की महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी योग साधना का विस्तृत वर्णन है। गायत्री के पाँच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरों का परिचय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय आदि पंचकोषों की साधना, हठयोग, राजयोग, लययोग नादयोग, ऋजुयोग प्राणयोग, शब्दयोग, स्वरयोग की विधियाँ। बन्ध, मुद्रा, पंच तन्मात्रा, ग्रन्थि भेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन, सोऽहं का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग मनोनिग्रह मैस्मरेजम की बेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिए।
(4) गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार
विषय- अनेकों साधकों को, अपनी-अपनी साधना में अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन इस पुस्तक में है। किन व्यक्तियों को किस-किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए, निराशा एवं असफलता के अंधकारपूर्ण वातावरण पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
गायत्री यज्ञ विधान -
यज्ञ का रहस्य, विज्ञान, विधान विवेचन, कारण हेतु महत्व आदि को पूरे विस्तार एवं प्रमाणों के साथ समझाया गया है। गायत्री के छोटे होम बड़े यज्ञ, विवेक विधियों और विवेचनाओं एवं मंत्रों के साथ विस्तारपूर्ण समझाये गये हैं। इस पुस्तक के आधार पर पूर्ण शास्त्रोक्त विधि विज्ञान का यज्ञ कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से कर सकता है और देव शक्तियों द्वारा अनेक सहायताएं प्राप्त कर सकता है।
(5) सचित्र गायत्री शिक्षा -
विषय- गायत्री के 24 अक्षरों में 24 महान सिद्धाँत छिपे हुए हैं। उनको समझने के लिए 24 श्लोक, 24 लेख, 24 भावपूर्ण कविताएं तथा 26 आर्ट पेपर पर छपे हुए कलात्मक तिरंगे चित्र हैं। पुस्तक बड़ी ही शिक्षाप्रद तथा प्रभावोत्पादक है।
(6) गायत्री चित्रावली -
विषय- विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री के विविध ध्यानों के लिए आर्ट पेपर पर छपे हुए 24 तिरंगे चित्र तथा उनका पूरा परिचय।
(7) गायत्री मन्त्रार्थ -
विषय- गायत्री के एक-एक अक्षर की विस्तृत शास्त्रीय व्याख्या तथा अनेक ऋषियों के अनेक प्रकार से किये गये अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण की गायत्री व्याख्या भी इसमें है।
छोटा सैट
उपरोक्त पुस्तकों के कुछ स्थलों का संचित साराँश लेकर यह पुस्तकें भी छापी गई है।
(1) गायत्री ही कामधेनु है।
(2) गायत्री का वैज्ञानिक आधार
(3) वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री
(4) गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएं
(5) अनादि गुरु मन्त्र गायत्री
(6) सचित्र गायत्री
(7) गायत्री के 14 रत्न(प्रथम भाग)
(8) गायत्री के 14 रत्न (द्वितीय भाग)
(9) विपत्ति निवारण गायत्री
(10) स्त्रियों का गायत्री अधिकार
(11) गायत्री सहस्रनाम पाठ
(12) गायत्री हवन विधि
अत्यन्त सस्ती एवं सुन्दर वितरण योग्य पुस्तकें
(1) गायत्री की गुप्त शक्ति
(2) सुख शान्ति दायिनी गायत्री
(3) गायत्री से बुद्धि विकास
(4) गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ
(5) गायत्री का अर्थ सन्देश
(6) स्त्रियों की गायत्री साधना
(7) गायत्री उपासना कैसे करें
(8) गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध
(9) गायत्री चालीसा
(10) गायत्री का तिरंगा चित्र
मूल्य में कमी के लिए लिखना बिल्कुल व्यर्थ है। हाँ 6 से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च अपना लगा दिया जाता है।
‘अखण्ड-ज्योति’- यह गायत्री संस्था की मुख्य पत्रिका है। यह गत 14 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। इसमें हर महीने गायत्री सम्बन्धी लेख रंगीन चित्र तथा समय-समय पर गायत्री उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएं विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। जुलाई में हर साल एक गायत्री अंक निकलता है। गायत्री संस्था से सम्बन्ध रखने के लिए- अखण्ड-ज्योति का ग्राहक रहना आवश्यक है।
गायत्री तपोभूमि- जब कभी आप मथुरा पधारें तब मथुरा से एक मील की दूर (वृन्दावन रोड पर स्थित) गायत्री तपोभूमि अवश्य पधारें। यहाँ गायत्री माता का मन्दिर, 2400 तीर्थों की रज, जल, 60 करोड़ हस्त लिखित मंत्रों का संग्रह, अखण्ड अग्नि की स्थापना, नित्य यज्ञ, तुलसी का वन, गायत्री पुस्तकालय, सत्संग आदि से आपको बहुत शाँति मिलेगी। साधना के लिए वह उत्तम स्थान है।
वर्ष-14 संपादक-श्री राम शर्मा, आचार्य अंक-8
(श्री शिवशंकर मिश्र, एम.ए.)
जग के अंधकार में भरता जो अति दिव्य प्रकाश, स्वर्ण अक्षरों से लिखता है मानव का इतिहास,
जिसके द्वारा उन्नत करते ज्ञान और विज्ञान, जिसको अभिमन्त्रित करते हैं गीता, वेद, पुरान,
उसी यज्ञ में आहुति देकर करो स्वयं को धन्य। इससे पावन नहीं विश्व में हुआ दूसरा अन्य॥
इसके द्वारा मानव को मिलती है आत्मिक-शान्ति, दूर सदा को हो जाती है ग्लानि, क्षोभ, मद भ्राँति,
शेष न रह पाता मानस में है कोई विद्वेष, सहज-सह्य बन जाते दैहिक, दैविक भौतिक क्लेश,
स्वयं साँत्वना में परिवर्तित हो जाता संताप। वरदानों का रूप ग्रहण कर लेता है अभिशाप॥
आओ साधक दिव्य-यज्ञ में आज बंटाओ हाथ, जीवन के चारों फल इसके सदा चलेंगे साथ,
धर्म-नीति का संबल, संस्कृति का पुनीत पाथेय, सत्य और शिव, सुन्दर द्वारा सर्वोदय है ध्येय,
बुद्धि जगत की इसके द्वारा ही सम्भव श्रीवृद्धि। सरस्वती का यज्ञ स्वयं ही इस जगती पर सिद्धि॥
मनुष्य पर साधारणतया पाश्विक वृत्तियों का आधिपत्य छाया रहता है। इस पशुत्व को हटाकर उसके स्थान पर मनुष्यत्व एवं देवत्व की स्थापना के लिए जो प्रयत्न करते रहते हैं उन्हें संस्कार कहते हैं। जंगली पशु को उपयोगी बनाने के लिए, उसे बहुत कुछ सधाना एवं सिखाना पड़ता है, यदि वह प्रयत्न न हो तो जंगल में पकड़े हुए हाथी, घोड़ा, बैल, रीछ, बन्दर आदि से कुछ भी उपयोगिता की आशा नहीं की जा सकती। जंगल की उपेक्षित पड़ी हुई भूमि में कोई अच्छी फसल पैदा नहीं की जा सकती उसे काम की बनाना हो तो जुताई निराई, मेंड़ बन्दी, सिंचाई आदि के उपचार करने होते हैं। तभी उनमें उत्तम फसल की आशा की जा सकती हैं। मनुष्य का भी यही हाल है। वह भी जन्म से पाश्विक वृत्तियों की ही अधिकता लेकर आता है। इन वृत्तियों को परिमार्जन करने के लिए उसकी मनोभूमि पर जो छाप डालनी पड़ती है उसे संस्कार कहते हैं। संस्कार डालने की पद्धति को ही संस्कृति कहते हैं।
भारतीय संस्कृति सबसे प्राचीन होने के साथ उन विशेषताओं से परिपूर्ण है कि उसे किसी वर्ग समाज, जाति, सम्प्रदाय आदि की न कह कर सार्वभौमिक सम्पूर्ण मानव जाति की संस्कृति कहना उचित होगा। भारतीय संस्कृति-किसी राष्ट्र, वर्ग, समाज या सम्प्रदाय की संस्कृति न होकर मानवता की, आत्मा, धर्म की, सत्य की, परमार्थ की, सामाजिकता की, सेवा, प्रेम, त्याग, संयम और उदारता की संस्कृति है। इस संस्कृति-इस विचार पद्धति को, इस जीवनयापन की प्रणाली को अपनाने से मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बन सके, इस तथ्य को ध्यान में रख कर हमारे त्रिकालदर्शी पूर्वजों एवं ऋषियों ने इसका निर्माण किया है।
भारतीय विचारधारा एवं जीवनयापन पद्धति- आज बहुत विकृत, अव्यवस्थित उपेक्षित एवं अस्त-व्यस्त दशा में पड़ी हुई दिखाई देती है। विदेशी राजनैतिक, सैद्धान्तिक शैक्षणिक एवं साँस्कृतिक प्रभाव ने हमारे दुर्बल मनों पर भारी छाप डाली है जिसके कारण हमें अपने मन का अपनी महानता का भान नहीं रहा है, दूसरी ओर अज्ञान, अंधकार, स्वार्थपरता और सुयोग्य पथ प्रदर्शन के अभाव में उस संस्कृति को विकृत करके रूढ़िवाद, अंधविश्वास एवं मूढ़ता के बुरे रूप में उपस्थित कर दिया है। इस दुहरे आक्रमण से आहत हुई हमारी संस्कृति अपना उच्च स्थान कायम न रख सकी और उपेक्षा एवं तिरस्कार के गर्त में गिरकर दुर्दशा में जीवन यापन करने लगी है। पर वस्तुतः वह उतनी तुच्छ है नहीं जितनी कि आज समझी और मानी जाती है। पिछले दिनों दुर्भाग्यवश मुस्लिमलीगियों ने धर्म और संस्कृति का नाम लेकर देश में जो सत्यानाशी नाटक खेला उससे यह दोनों शब्द विज्ञ लोगों की दृष्टि में घृणास्पद बनने लगे हैं। जब कहीं इन शब्दों का प्रयोग होता है तो लोग भयभीत हो जाते हैं और यह आशंका करने लगते है इसमें भी कोई वैसा ही सत्यानाशी बीजाँकुर न छिपा हो। दूध का जला छाछ को फूँक कर पिए तो इसमें कोई बुराई नहीं है पर छाछ तो छाछ ही रहेगी। हजार परीक्षा कर लेने पर भी उसमें मुँह जलाने का दोष न मिलेगा। भारतीय धर्म और संस्कृति में एक भी विषैला परमाणु नहीं है यह तो व्यक्तिगत एवं सामूहिक सुख शान्ति को रखने एवं बढ़ाने वाली एक बुद्धि संगत, चिर परीक्षित विचारधारा एवं जीवनयापन पद्धति है।
भारतीय संस्कृति का जन समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है इसकी जानकारी प्राप्त करने के लिए हमारा लाखों वर्षों का इतिहास साक्षी है। इस सांस्कृतिक प्रेरणा ने घर-घर में महापुरुष पैदा किये हैं, और पारस्परिक स्नेह सद्भाव त्याग एवं उदारता के वे उदाहरण उपस्थित किये हैं जिनका स्मरण करने मात्र से आज हमारा नैतिक बल एवं सन्मार्ग पर चलने का उत्साह बढ़ता है। कठोर श्रम और सादगी का रहन-सहन अपनाने की नीति ने इस देश को धन-धान्य से पूरित कर रखा था। दूसरे के धन को ठीकरी के समान समझने, पराई स्त्री को माता या बेटी की दृष्टि से देखने, दूसरों के दुःख को अपना दुःख मानने के आदेश ने सभी प्रकार के संघर्षों एवं छिद्रों का द्वार रोक दिया था। बड़े-बड़े बलवान असुर विद्रोही इस संस्कृति को नष्ट करने आये पर वह अपनी विशेषताओं के कारण सजीव रही आज जहाँ अनेकों प्राचीन समस्याएं लुप्त प्रायः हो गईं अपनी महानता एवं उपयोगिता के कारण हमारी संस्कृति आज भी जीवित है और अपने पुनः विकास के लिए नये-नये कोपलों के साथ फिर हरी भरी होने का प्रयत्न कर रही है।
भारतीय संस्कृति हमारी लाखों वर्ष पुरानी वह जीवनयापन पद्धति है जो मनुष्य की पाश्विक प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण स्थापित करते हुए सादा जीवन उच्च विचार का आदर्श उपस्थित करती हुई देवत्व की ओर व्यक्ति और समाज को अग्रसर करती है। लोग इसकी विशेषताओं को भूल गये हैं। जिनमें सामर्थ्य है उनने इस बात का पूरे मन से प्रयत्न नहीं किया कि पदार्थ विज्ञान, मनोविज्ञान, समाज विज्ञान तर्क प्रमाण, उदाहरण आदि का आधार लेकर उन सांस्कृतिक विशेषताओं का बुद्धि ग्राह्य रूप में जनता के सामने उपस्थित करें। जो विकृतियाँ, बुराइयां, रूढ़ियां, कुरीतियाँ, धर्म के नाम पर समाज में घुस पड़ी हैं उनका परिष्कार करके सच्चे एवं निर्मल स्वरूप आगे लावे। इस प्रयत्न के अभाव में पाश्चात्य विचारधाराओं की चमक से प्रभावित पीढ़ी अपने प्राचीन आधारों को हेय एवं व्यर्थ मानने लगी है यदि सही आधार लेकर जनता को उन प्राचीन आदर्शों की महानता एवं उपयोगिता समझाई जा सके तो प्राचीन गौरवमयी प्रचण्ड प्रेरणा का ऐसा अजस्र स्रोत खुल पड़ेगा जो हमें व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से सब प्रकार सुखी समृद्धि बनाते हुए पारस्परिक राष्ट्रीय एकता के सुदृढ़ सूत्रों में बाँध देगा।
हमारे विचार पद्धति का प्राचीन आदर्श महान है। आस्तिकता, सत्य, अहिंसा, सत्य प्रेम, विवेक, स्वच्छता, सेवा, संयम, श्रम, त्याग, समता, एकता आदि को अपनाने से हम अपने चारों ओर आत्मीयता, समृद्धि स्वस्थता एवं सुख शान्ति का वातावरण पैदा कर सकते हैं। इन्हीं आदर्शों को जीवन में घुला-मिला लेने के लिए अनेक आयोजन विधान एवं कार्यक्रम बने हुए हैं जिस पर यदि ठीक ढंग से चला जाय उसे ठीक प्रकार समझा जाय तो उपरोक्त आदर्श केवल सिद्धाँत मात्र न रह कर जीवन के व्यवहारिक अंग बन सकते हैं। आदर्शों को व्यवहार में लाने के लिए जो धार्मिक प्रक्रियाएं विधि व्यवस्थाएं ऋषियों ने बनाई थीं उन्हें हम मोटे तौर पर संस्कृति कह सकते हैं।
हमारे खान-पान, रहन-सहन, त्यौहार-व्रत, उत्सव, विवाह, अंत्येष्टि आदि सोलह संस्कार चार वर्ण, चार आश्रम तीर्थ, पूजा, मन्दिर, हवन, कथा कीर्तन, शिखा, सूत्र वेषभूषा, रीतिरिवाज, देवी देवता, मन्दिर, मठ, साधु, पुरोहित, वेद शास्त्र, दिनचर्या, काम सेवन, अभिवादन, रिश्ते आदि में संस्कृत का समावेश है। इनको दैनिक जीवन में समुचित स्थान देने से हमारा जीवन साँस्कृतिक बनता है। समय-समय पर व्यक्तिगत या सामूहिक आयोजनों के संस्कार त्यौहार, उत्सव आदि के द्वारा भी प्रभावशाली ढंग से एक सामूहिक सुसज्जा के साथ उपयुक्त मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार किया जाता है। इन सब क्रियाओं एवं प्रथाओं का प्रयोजन केवल एक ही है वह है-आदर्श जीवन यापन करने वालों का एक सुसंगठित समाज बनाना। संस्कृति का मूल उद्देश्य यही समझना चाहिए।
भारत के पुनर्निर्माण के लिए जहाँ भौतिक उन्नति की अनेक पंचवर्षीय दश वर्षीय योजनाएं आवश्यक है वहाँ सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए भी योजनाबद्ध कार्यक्रम बनाया जाना भी कम आवश्यक नहीं है। क्योंकि संस्कृति ही किसी समाज और राष्ट्र की रीढ़ होती है। कानून की शक्ति इतनी प्रबल एवं हृदय के अन्तराल तक पहुँचने वाली नहीं है जिसके द्वारा कि मनुष्य प्रलोभनों को ठुकरा कर नैतिक सिद्धान्तों के पालन के लिए त्याग कर सके। यह शक्ति तो केवल उन धार्मिक भावनाओं एवं मान्यताओं में ही है जो अन्तरात्मा पर विश्वास के रूप में छाई हुई है और उनकी रक्षा के लिए मनुष्य बड़े से बड़ा बलिदान करने को तैयार हो जाता है। नैतिक नियमों का पालन करने वाला मोटे तौर से घाटे में रहता है, इस घाटे की क्षतिपूर्ति वे धार्मिक भावनाएं ही कर सकती हैं कि भले ही मैं बेईमानी को छोड़कर साँसारिक दृष्टि से घाटे में रहा पर अन्तरात्मा के सम्मुख, ईश्वर के सम्मुख, धर्म की रक्षा करने वाला सिद्ध होकर मैं आत्म सन्तोष एवं सद्गति का अधिकारी होता हूँ। यह विश्वास ही एक मात्र वह उपाय है जो हमारी पाश्विक वृत्तियों को नियन्त्रण रखने में समर्थ हो सकता है। इसी को हम संस्कृति कह सकते हैं। यदि इन साँस्कृतिक बाँधों की मरम्मत नहीं की जाती है इनकी नीवों को फिर से मजबूत नहीं बनाया जाता है तो भारी जल प्रलय से भारी खतरा खड़ा हो सकता है। हमारे राष्ट्रीय चरित्र का, नैतिकता का बाँध टूट गया तो भ्रष्टाचारी, बेईमान, उद्दण्ड, चालाक, धूर्त और निकम्मे लोगों का समाज सभी उन्नतिकारी भौतिक योजनाओं को बहा ले जायेगा और उन्हें उसी प्रकार नष्ट कर देगा जैसे जल प्रलय में टूटी फूटी नाव डूब जाती है।
साँस्कृतिक पुनरुत्थान का कार्य सरकार नहीं कर सकती। यह कार्य कूटनीतिज्ञों और राजनैतिक मदारियों का है भी नहीं यह कार्य तो सदा से उन आत्माओं का रहा है जो अपने सम्बन्ध में तप और त्याग का असाधारण उदाहरण जनता के सम्मुख उपस्थित करके उनका हृदय जीतते हैं और अपने धार्मिक ज्ञान एवं निर्मल हृदय, साधु स्वभाव एवं निरन्तर सेवावृत्ति द्वारा महान आदर्शों की छाप जनसाधारण के अन्तराल में जमा सकने में समर्थ होते हैं। सरकारी कामों में संदेह की पर्याप्त गुंजाइश रहती है इसलिए उनका प्रभाव प्रायः उथला ही होता है। आत्मा की पुकार का आत्मा तक पहुँचने का कार्य वे ही लोग कर सकते हैं जो अपने उज्ज्वल चरित्र एवं महान ज्ञान के कारण इसके अधिकारी बन सके हों।
हम लोगों के कंधों पर राष्ट्र के साँस्कृतिक पुनरुत्थान की महान जिम्मेदारी है। जिम्मेदारी की उपेक्षा करना हमारे लिए एक धार्मिक पातक, नैतिक विश्वासघात एवं सामाजिक अपराध से कम न होगा। इस कलह को दूर करने के लिए विशुद्ध कर्त्तव्य भावनाओं से प्रेरित होकर भारतीय संस्कृति की पुनः प्राण प्रतिष्ठा करने के लिए हम खड़े होते हैं, कदम बढ़ाते हैं, सुव्यवस्थित योजना के अनुसार कार्य प्रारम्भ करने का शंख बजाते हैं। इन महान कार्यों के लिए भावनावान् सच्चे मनुष्यों का वास्तविक सहयोग अपेक्षित है। देश -व्यापी सांस्कृतिक प्रतिष्ठापना के लिए बहुत भारी काम हमें करना है, सामने भारी कर्मक्षेत्र पड़ा हुआ है। इस पुनीत अभियान में हमें उन सच्ची आत्माओं के सहयोग की अति आवश्यकता है। जो कार्य की महानता उपयोगिता एवं आवश्यकता को अनुभव करती हो। ऐसे लोगों को कंधे से कंधा लगाकर काम करने के लिए हम सादर आमन्त्रित करते हैं।
भारतीय संस्कृति की अनेक विशेषताएं हैं और उन विशेषताओं को हृदयंगम करने के अनेक भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ है। लाखों वर्षों से भारतीय जिस प्रकार से सोचते आ रहे हैं और जिन सम्बन्धों एवं विश्वासों पर उनकी मनोभूमि बनती चली आ रही है वह विचारधारा वस्तुतः मनुष्य को असामाजिक-अनैतिक, अवाँछनीय गतिविधि अपनाने से रोकती है और स्वयं कुछ कठिनाई सहकर भी दूसरों को सुविधा देने के लिए प्रेरित करती है।
धर्म के दस लक्षण जो मनु भगवान ने बताए हैं उनको अपनाने से मनुष्य स्वयं नैतिकता एवं सामाजिकता पर दृढ़ हो सकता है। उसके लिए त्याग करने एवं कष्ट सहने को तत्पर हो सकता है। जिस मनुष्य की ऐसी मान्यता, धारणा एवं गतिविधि होगी वह निश्चय ही अपने आस-पास सहयोग, प्रेम, सद्भाव एवं सदाशयता का वातावरण तैयार करेगा। शाँतिप्रिय समाज में रहने से सुख सुविधाएं बढ़ती हैं। जो व्यक्ति ऐसा वातावरण बनाने में अधिक सहयोग देता है, अधिक सक्रिय भाग लेता है, अपना अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित करके एक आदर्श सामने लाता है यह निश्चय है दूसरों का अधिक प्रेम एवं सहयोग उपलब्ध करता है। इस प्रकार इन नैतिक नियमों का श्रद्धापूर्वक पालन करने वाला जहाँ सुसंगत कहलाने का श्रेय प्राप्त करता है वहाँ वह अपनी संस्कृति का गौरव बढ़ाते हुए व्यक्तिगत तथा सामूहिक सुख शान्ति में निरन्तर बढ़ोतरी करता है। ऐसे सुसंस्कृत लोगों की अधिकता वाला समाज निश्चय ही स्वास्थ्य, संगठन, धन, ज्ञान, बल, प्रतिष्ठा आदि सुख साधनों से भरा पूरा रहता है। प्राचीन काल में भारतवर्ष की यही स्थिति थी।
जीवनयापन के नियमोपनियम विधान, आचरण, उपचार, कर्मकाण्ड, संस्कार, त्यौहार, प्रथा परम्परा, भाव, भाषा, वेश भूषा, व्यवहार, रिश्ते, आहार-विहार, धार्मिक, मान्यता आदि के संमिश्रण को बाह्य संस्कृति कहते हैं। क्रिया रूप संस्कृति को प्राण कहा जा सकता है। दोनों के सम्मिश्रण से ही एक सजीव शरीर स्थिर रहता है। हम केवल भारतीय सिद्धान्तों को तो मानें पर आचरण सभी उसमें प्रतिकूल, विदेशी परम्पराओं से भरे हुए हों तो वह संस्कृति का शरीर रहित प्राण एक प्रकार का प्रेम मात्र माना जायगा। यदि हम बाह्य कर्मकाण्ड तो सभी भारतीय रखे पर मनोभूमि हमारी अनैतिक भारतीय परम्पराओं से भिन्न हो तो वह ऐसा ही होगा जैसा प्राण रहित मृतक शरीर। इन दोनों ही अपूर्णताओं को पूरा करती हुई जो सैद्धान्तिक और व्यवहारिक जीवन में घुली मिली हमारी चिर प्राचीन गतिविधि है उसे ही अपनाने को सच्ची संस्कृति कह सकते हैं। आज ऐसी ही संस्कृति की पुनः प्राण प्रतिष्ठा करने की आवश्यकता है। जिस राजमार्ग पर चलकर हमारे पूर्वज महान बने थे वह हमारे लिए भी खुला हुआ है। देश, काल, पात्र अवसर और आवश्यकतानुसार व्यवहार में थोड़ा हेर-फेर करते हुए भी हम आसानी से अपनी चिर प्राचीन संस्कृति को अपनाएं तो न केवल अपने निकटवर्ती क्षेत्र में वरन् समस्त संसार में एक ऐसी आदर्श जीवन पद्धति का नमूना उपस्थित कर सकते हैं जिसे अनैतिकता एवं कृत्रिमता के दुष्परिणामों से ऊबी हुई दुनिया प्यासे पक्षी की तरह खोजती फिरती है।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान का महान कार्य पूरा करने के लिए हमें विशाल पैमाने पर कार्यक्रम बनाना अपनाना और फैलाना होगा। तभी इतने बड़े देश की इतनी बड़ी जनसंख्या में उन सुसंस्कृत तथ्यों की स्थापना सम्भव हो सकेगी। यों अपने-अपने ढंग से अनेकों सत्पुरुष इस दशा में प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं, यह कोई नई बात नहीं है फिर भी अखण्ड-ज्योति एवं गायत्री परिवार से सम्बन्धित स्वजन सम्बन्धियों को साथ लेकर हम एक आयोजन का कार्यक्रम उपस्थित करते हैं। इसे आगे बढ़ाने में हम लोग तत्पर होंगे इसकी उपयोगिता को प्रतिपादन करने में सफल होंगे तो निश्चय है कि अगणित सहयोगी इसे पूरा करने में अपना समय, सद्भाव और सहयोग प्रदान करेंगे और उस गतिविधि का देशव्यापी एवं विश्वव्यापी होना कुछ कठिन न रहेगा। योजनाएं इस प्रकार हैं :-
(1) संस्कृति का कोई परिमार्जित रूप अभी जनता के सामने प्रस्तुत नहीं है। अनेक भ्रान्त विचार, आदर्श एवं रीति रिवाज मध्य काल की विभिन्न परिस्थितियों में उपज खड़े थे। वे भी आज संस्कृति में घुसे बैठे हैं। जो उन्हें ही परम्परागत धर्म मानने लगे हैं। ऐसी भ्रान्तियों और वास्तविकताओं को सच्चे धार्मिक दृष्टिकोण के अनुसार छाँट-छाँट कर नीर-क्षीर की तरह अलग करना होगा और संस्कृति और विकृति के भेद को स्पष्ट करके जनता के सामने पालन करने योग्य ग्राह्य तत्वों को अपनाने और अग्राह्यों का मोह त्यागने के लिए कहा जाय।
(2) देश, काल, पात्र के अनुसार प्राचीनकाल के और अब के समय में जो अन्तर आ गया है उसको ध्यान में रखते हुए यह बताया जाय कि प्राचीन काल के दृष्टिकोण को अक्षुण्य रखते हुए आज जीवन के रहन-सहन में कितनी सीमा तक हेर-फेर करना आवश्यक है।
(3) साँस्कृतिक जीवन के आदर्श और व्यवहार को अपनाने पर मनुष्य को जो सुविधाएं सुख शान्ति समृद्धि एवं सफलताएं मिल सकती हैं उनको तर्क, प्रमाण, उदाहरण, तथ्य आदि के आधार पर भली भाँति सिद्ध किया जाय और उन निष्कर्षों को बड़े परिमाण में प्रचारित किया जाय। साथ ही उन सांस्कृतिक आदर्शों की अवहेलना करने पर जो कठिनाइयाँ एवं परेशानियाँ उत्पन्न होंगी उनका भी बुद्धि संगत प्रतिपादन किया जाय। इस प्रकार जनता को भली प्रकार यह समझाया जाय कि उनकी व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन की स्थिरता, शान्ति एवं उन्नति के लिए हमारी संस्कृति कितनी उपयोगी एवं आवश्यक है।
(4) उपरोक्त पंक्तियों में कहे हुए (अ) संस्कृति एवं विकृति की छाँट (ब) वर्तमान काल के अत्रसय संस्कृति का व्यवहारिक रूप (स) संस्कृति की उपयोगिता को तर्क और प्रमाणों सहित सिद्ध करने के कार्य के लिए विद्वानों का शोध मण्डल कार्य करे और ऐसी ठोस जानकारी प्रस्तुत करे जो शास्त्रीय दृष्टि से ही नहीं भौतिक दृष्टिकोण से भी काफी मजबूत हो। कम्यूनिज्म सिद्धान्तों के पीछे जितना प्रबल आधार है। उससे अधिक प्रबल आधार साँस्कृतिक जीवन के पक्ष में सामान्य बुद्धि की जनता एवं कच्चे मस्तिष्क के लड़कों को भी समझा सकने योग्य प्रामाणिकता को यह शोध मण्डल प्रस्तुत करे।
(5) ऐसी शोधों के निष्कर्ष को अधिकाधिक जनता तक पहुँचाने के लिए अत्यन्त सस्ते ट्रैक्ट छापे जाएं तथा उन्हें लेखों द्वारा अनेक पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित करने के लिए लेखक तैयार किये जाएं और पत्रकारों से इस कार्य के लिए अपने पत्रों में स्थान देते रहने का अनुरोध किया जाय।
(6) कुछ ऐसे आश्रम हों जहाँ साँस्कृतिक जीवन यापन करने की क्रियात्मक व्यवस्था हो। जहाँ रह कर लोग उस पद्धति को व्यवहारिक रूप से अभ्यास में लाने का प्रयत्न करें और उसके अभ्यास हो जाने पर अपने-अपने स्थानों में जाकर अपने आदर्श के अनुसार जीवन यापन करने के लिए दूसरों को प्रभावित करके अपने अनुकरण करने वाले बनावें।
(7) साँस्कृतिक आदर्शों के अनुकूल वातावरण उत्पन्न करने के लिए चित्र पोस्टर आदि को बाजार में प्रस्तुत किया जायं।
(8) जिन लोगों पर कमाने की जिम्मेदारी नहीं है, ऐसे लोग अपना जीवन सांस्कृतिक विचारों में प्रचार के लिए अर्पण कर दें। व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं, कमजोरियां, स्वार्थपरताओं और आलस्य प्रमाद आदि दुर्गुणों से बचने की प्रतिज्ञा लेकर यदि कुछ ब्रह्मचारी या वानप्रस्थी लोग कमर कस कर सच्चे मन से इस दशा में जुट जाएं तो पहाड़ पलट देने जैसा कार्य कर सकते है। जिनको पारिवारिक गुजारे के लिए कमाने की चिन्ता नहीं है ऐसे जमीन जायदाद की आमदनी वाले लोग भी इस कार्य में पूरा समय दे सकते हैं। अथवा अपने बदले में कुछ गृहस्थ कार्यकर्ताओं को वेतन देकर भी राष्ट्र को अर्पित कर सकते है। पूरा समय देकर पूरी शक्ति के साथ साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए जितने व्यक्ति अधिक संख्या में जुटेंगे उतनी ही अधिक एवं शीघ्र प्रगति होगी।
(9) जो लोग पूरा समय नहीं दे सकते तो छुट्टी का दिन या प्रतिदिन कुछ समय सांस्कृतिक ज्ञान प्रसार के लिए अपने निकटवर्ती क्षेत्र में दिया करें। पहले अपने घर में फिर मित्रों और पड़ौसियों में इस प्रकार की योजनाओं को कार्यान्वित करने का प्रयास किया करें।
(10) पर्व एवं त्यौहार अब केवल खान पान या सजावट के उत्सव मात्र रह गये हैं। वस्तुतः इनमें बहुत भारी शिक्षात्मक संदेश भरे पड़े हैं। प्रत्येक पर्व एवं त्यौहार को सामूहिक या व्यक्तिगत रूप से इस प्रकार बनाया जाय कि उनमें छिपे हुए संदेशों की छाप मनाने वालों पर पड़े। सामूहिक गोष्ठियाँ सभाएं अथवा पूजा चर्चा कथा-कीर्तन के आयोजन करके ऐसे प्रवचन हों जिनमें उस त्यौहार की उपयोगिता तथा संदेश को सब लोग समझ सकें और अपना सकें।
(11) या तो वर्तमान पण्डित पुरोहितों को सुधारा जाय या ऐसे नये पण्डित पुरोहित तैयार किये जाएं जो दक्षिणा लूटने तक का ही यजमान से नाता न रखें। वे सोलह संस्कार कराने की शास्त्रोक्त शिक्षा प्राप्त करें और निर्लोभ भाव से, कम से कम खर्च में संस्कार करावें ताकि जिनका संस्कार हो उन पर उस धर्मकृत्य के आध्यात्मिक प्रभाव द्वारा और वहाँ उपस्थित लोगों पर संस्कार के समय पढ़े गये मन्त्रों की व्याख्या सुनने से अपने कर्त्तव्यों को समझने एवं पूरा करने का प्रभाव पड़े।
(12) मन्दिर, मठ, पौरोहित्य, भिज्ञा, ब्रह्मभोज तीर्थ, दान, दक्षिणा आदि के नाम पर जो पैसा धार्मिक जनता देती है वह ऐसे कार्यक्रमों को पूरा करने एवं व्यक्तियों के निर्वाह में लगे जो केवल सांस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए पूरी तरह संलग्न हो, यह धन किसी को मुफ्त की आमदनी के रूप में हरामखोरी में फिजूल खर्ची में बर्बाद न करने दिया जाय।
(13) भागवत् आराधना, गायत्री जप, यज्ञ आदि आत्मबल एवं सतोगुण बढ़ाने वाले आस्तिकता पूर्ण धर्मकृत्यों को जनसाधारण के नित्यकर्मों में समावृष्ट करने का प्रचण्ड प्रयत्न हो क्योंकि आत्मा में आस्तिकता सुदृढ़ संस्कारों की स्थापना बिना सांस्कृतिक पुनरुत्थान के हो सकेगी।
(14) इस प्रकार के सांस्कृतिक कार्यकर्त्ताओं का समय-समय पर सम्मेलन तथा शिक्षण की एक केन्द्रीय एवं नियमित व्यवस्था रहे।
(15) जिस प्रकार का सांस्कृतिक शिक्षण शिविर गत मास मथुरा में हुआ था जिसका विस्तृत विवरण इस अंक में है वैसे शिविर स्थान पर समय-समय पर होते रहें और एक स्थान के कार्यकर्त्ता दूसरे स्थान जाकर शिक्षण कार्य किया करें।
(16) रविवार को या अन्य छुट्टी के दिन पारिवारिक सत्संग हुआ करे। एक स्थान पर जितने संस्कृति प्रेमी हों वे क्रमशः एक-एक दिन अपने यहाँ पारिवारिक सत्संग कराया करें जिसमें मुहल्ला पड़ौस के सज्जनों को विशेष रूप से एकत्रित किया जाय और अन्य सदस्य भी उपस्थित होकर हवन, कीर्तन, प्रवचन आदि करें, इससे भावनाओं के निर्माण के साथ-साथ संगठनात्मक प्रवृत्ति भी बढ़ती रहे।
(17) कुछ सुशिक्षित नारियाँ भी इन कार्यक्रमों को स्त्री समाज में प्रचारित करें। वे स्त्रियों के पारिवारिक सत्संग एवं शिक्षण शिविर करने के लिए अपना समय दें। स्त्रियों में सांस्कृतिक शिक्षा पर गीत मंडलों एवं भजनों का प्रचार किया जाएं।
(18) किशोर बालकों के लिए अलग शिक्षण शिविर किये जाए। उनमें शिक्षार्थियों के बौद्धिक स्तर को ध्यान में रखते हुए वार्तालाप, प्रश्नोत्तर, कथा कहानी आदि द्वारा साँस्कृतिक शिक्षा संस्कार जमाये जाएं।
(19) लोकप्रिय कार्यक्रमों में संगीत, चित्रपटों की प्रदर्शनी, एकाकी नाटक, वार्त्ता प्रदर्शन, मेजिक लालटेन, कथा, प्रवचन, कीर्तन, प्रतियोगिता सभा सम्मेलन आदि के आयोजन करके सांस्कृतिक छाप जनसाधारण के मनों पर डालने का प्रयत्न किया जाय।
(20) इन योजनाओं को चलाने के लिए कुछ ऐसे व्यक्ति आगे आवें जिनका चरित्र अत्यन्त पवित्र, ज्ञान और विवेक असाधारण, भावना उत्कृष्ट और लगन सच्ची हो। निस्पृह, तपे हुए ऐसे सच्चे मनुष्य जिन पर सहज ही श्रद्धा हो सकती है, ऐसे लोग ही इन योजनाओं को सफल बना सकते हैं। उन्हें ढूँढ़ा जाय।
इन योजनाओं का आरम्भ अभी गायत्री तपोभूमि से आरम्भ किया जा रहा है। कुछ कार्य आरम्भ किये जा रहे हैं और उनका स्पष्ट आयोजन शीघ्र ही सामने आ जायगा।
(श्री श्यामलाल जी अग्रवाल, मथुरा)
अप्रैल के गायत्री यज्ञ की व्यवस्था सम्बन्धी बहुत सा कार्यभार अपने जिम्मे लेने का मुझे सौभाग्य मिला था। यों अनेक जिम्मेदारियाँ तथा कार्यभारों को मुझे कम ही अवकाश रहता है पर गायत्री महायज्ञ के दिनों में तो सब कार्य छोड़कर मैं पूरी तरह उस पुनीत आयोजन में आदि से अन्त तक लगा रहा।
वह यज्ञ समाप्त होकर ही चुका था कि एक दिन आचार्य जी ने कहा- श्यामलाल जी शीघ्र ही सरस्वती यज्ञ भी की व्यवस्था भी आपको करनी है। मैं हैरान हुआ कि अभी-अभी हम सब इतना श्रम कर चुके है, गायत्री तपोभूमि को पिछले यज्ञ की घटी का बहुत सा उधार पैसा लोगों को चुकाना है। फिर इतनी जल्दी दूसरे सरस्वती यज्ञ की क्या आवश्यकता पड़ गई।
मैं चिन्ता और परेशानी में पड़ा-और कहा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुकूल धीरे-धीरे सब काम करना उचित है। कुछ समय बाद जब तक पिछला ऋण चुक जाय और हम लोगों की थकान भी दूर हो जाय तब नया आयोजन करना उचित होगा।
आचार्य जी ने बड़े ही गम्भीर एवं शान्त भाव से कहा- हम लोगों को अपने तन, मन धन सम्बन्धी कठिनाइयों की चिंता न करके राष्ट्र निर्माण के उस कार्य में पूरी तत्परतापूर्वक बिना समय गंवाये लग जाना चाहिए जो आज की विषम परिस्थिति में अतीव आवश्यक है। वह कार्य है साँस्कृतिक पुनरुत्थान का भारतीय संस्कृति जितनी प्राचीन है उतनी ही महान है। इसको भूल जाने का परिणाम ही है कि आज हम उन सब परिस्थितियों से वंचित हो गये हैं जिनके कारण किसी समय हम उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़े हुए थे, यदि सचमुच हमें अपना राष्ट्रीय पुनरुत्थान करना है तो वह साँस्कृतिक उत्कर्ष से ही होगा। इस कार्य में हमें अपनी कठिनाइयों का ध्यान करके ईमानदार लोक सेवी की भाँति बिना समय गंवाये तत्परतापूर्वक लग जाना ही उचित है।
आचार्य जी की बात मेरी समझ में आई कि सरस्वती यज्ञ से इनका मतलब यह है कि हम एक इस प्रकार का ट्रेनिंग कैम्प लगावें जिसमें लोगों को प्राचीन भारतीय संस्कृति को बताया जा सके और आज के युग में हम किस प्रकार अपने-अपने विचारों को आदतों को बनावें जिससे हम सफलता से जीवन व्यतीत कर सकें। सच्चे सुख की प्राप्ति कर सकें और अपने देश को बुराइयों से दूर करके उन्नति की ओर बिना राजनीति की दलदल में पड़े हुए, बिना चुनाव आदि के संघर्षों में पड़े हुए देश को सच्ची उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर सकें।
इतिहास का विद्यार्थी और बालकपन से भारतीयता का पुजारी होने के नाते मैं सोचने लगा कि यद्यपि देश को स्वतन्त्र हुए सात वर्ष हो गये। देश की बागडोर भी हमारे जन नायकों के हाथ में आ गई फिर भी देश में शान्ति क्यों नहीं है, लोगों में भाईचारा, आत्म विश्वास और प्रेम की भावना क्यों जागृत नहीं हुई है? बहुत सोचते मैंने सोचा कि एक हजार वर्ष की गुलामी के समय में हमारे समाज में इतनी सामाजिक बुराइयाँ घुस गई है कि हम अपनी सभ्यता धर्म और संस्कृति को बिल्कुल भूल गये हैं। इस समय हिन्दुओं में दो प्रकार की विचारधाराओं के लोग हैं एक तो वे जिन्हें हम रूढ़िवादी कह सकते हैं जो धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के अंधविश्वास, सामाजिक, संकीर्णता और पोंगापंथी में फंसे हुए हैं, इनसे भी गये बीते विचार के वे लोग हैं जिन्हें भारतीय धर्म, दर्शन, सभ्यता, संस्कृति, भाषा रीति रिवाज आदि सब हेय लगती है जिनकी जिह्वा पर हर समय ‘गॉड, वेरीगुड, थैंक्यू’ आदि शब्द रहते हैं। पाश्चात्य सभ्यता के पुजारी हमारे इन भाइयों को ऐसा लगता है मानो भारत में तो सब जंगली ही जंगलीपन है और पश्चिम में सभी अच्छाइयाँ है।
इस प्रकार हमें अपने देश में आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने देशवासियों को अपने प्राचीन ऋषि मुनियों का पवित्र संदेश दें, आज के अर्थवाद के युग में हम श्रम के महत्व को समझें और श्रम करने में अपना अपमान नहीं वरन् मान का अनुभव करें, अपनी सीमित आमदनी के अनुसार ही अपने जीवन को ऐसे ढांचे में ढालें कि हमारी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हमारी सीमित आय में ही हो सके, साथ ही हमें आवश्यकता इस बात की है हम प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रतिपादित धर्म के सच्चे अर्थों को समझें। न तो सारी बिगड़ी हुई धर्म के नाम पर चलने वाली आज की पोंगापंथी को चलने दें और न सबको ढकोसला और व्यर्थ बताकर उसे गंगा में बहाएं। भारतीय संस्कृति के चार स्तम्भ है ‘धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष’ की प्राप्ति करना।
यदि हम धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के वास्तविक अर्थों को समझ सकें और सच्चे रूप में इनके अनुसार अपने जीवन को चला सकें तो संदेह नहीं कि हमारा जीवन आदर्श बन सकता है और हम ही नहीं वरन् हमारा देश और समाज सभी उन्नति कर सकते हैं। परन्तु प्रश्न उठता है कि हम ये सारी बातें कहाँ पावें? पहले समय में हमारे बालक गुरु कुलों में शिक्षा पाते थे जहाँ अनुभवी वानप्रस्थी और संन्यासी अध्यापक शिष्यों को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति के लिए, जीवन को सफल बनाने के लिए किताबी शिक्षा ही नहीं देते थे वरन् व्यावहारिक शिक्षा भी अपने जीवन के अनुभवों के आधार पर देते थे। परन्तु आज हमारे विद्यालय केवल किताबी शिक्षा ही देते हैं। जिनमें व्यवहारिकता का कहीं लेशवेश भी समावेश नहीं होता। सच तो यह है हमारा आज का स्कूल और कालेजी शिक्षा प्राप्त किया हुआ युवक जीवन की वास्तविकताओं से कोसों दूर रहता है, शारीरिक श्रम की बात उसे काटने को दौड़ती है, ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की तरह वह इन विद्यालयों से लेकर आता है। साहिबियत, हुकूमत की बू, दम्भ और शान−शौकत। पर ये बातें भारत जैसे निर्धन देश में उन्हें प्राप्त कैसे हों? अतः आज हमारे लाखों नहीं करोड़ों युवक युवती अनेकों मुसीबतों में फंसे हुए हैं, बेरोजगारी का चारों ओर बोलबाला है, और जो चाहता है वह कुर्सी और गद्दे तकियों पर मौज करना चाहता है, जो चाहता वह बहुत तड़कीली भड़कीली जिन्दगी व्यतीत करना चाहता है चाहे इसके लिए कोई भी जघन्य से जघन्य पाप ही क्यों न करना पड़े। आज लोगों को अपनी प्राचीन सभ्यता, संस्कृति, धर्म का ज्ञान न होने के कारण अनेकों मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है। भाई-भाई में प्रेम नहीं है पिता पुत्र में प्रेम नहीं है पति पत्नी में प्रेम नहीं है। आज हम इतने गिर गये हैं कि मुँह से कहते कुछ है और कर्म करते है की उसके विपरीत। बातें लम्बी चौड़ी सेवा और आदर्श की करते है परन्तु मन में यही रहता है कि किसी प्रकार मौका लग जाय कि किसी की सम्पत्ति उड़ा ली जाय। जिसे हम भाई या बहिन कह कर सम्बोधित करते हैं। उसके प्रति हमारे मन में वे भाव होते नहीं हैं। यह सब क्यों केवल इसी कारण कि वह हमारा जीवन बनावटी बहुत अधिक हो गया है वास्तविकता का कहीं पुट भी नहीं रहा है।
अतः अब यह आवश्यक हो गया है कि स्थान स्थान पर इस प्रकार के साँस्कृतिक आयोजन हों जिसमें लोगों को सच्चे अर्थों भारतीय संस्कृति के आधार पर जीवन व्यतीत करने की व्यवहारिक शिक्षा दी जाय जिनमें लोगों को आत्मा का महत्व बताया जाय और बताया जाय कि हमारा आचरण भीतर बाहर समान होना आवश्यक है जिनमें लोगों को शारीरिक श्रम का महत्व बताया जाय और यह बताया जाय कि यदि मनुष्य जीवन में सुख प्राप्त करना चाहता है, यदि वह दीर्घजीवी होना चाहता है उसे श्रम से घृणा नहीं प्रेम करना होगा, उसे अपने हृदय में वह अलौकिक ज्योति जाग्रत करनी पड़ेगी। जिससे वह बाहरी आडम्बरों को छोड़ कर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति सुगमता पूर्वक कर सके।
सरस्वती यज्ञ और सांस्कृतिक शिक्षण शिविर की उपयोगिता मेरी समझ में भली प्रकार आ गई और पिछले गायत्री यज्ञ की भाँति इस आयोजन को भी सफल बनाने में अपनी सामर्थ्य के अनुसार तत्पर हो गया।
(श्री अशर्फीलाल मुख्तार, बिजनौर)
बुद्धि की शक्ति से दुनिया परिचित है। उसके चमत्कार भी सबने देखे हैं, बुद्धि बल से विज्ञान का आविष्कार हुआ राजनीति, कूट नीति, चिकित्सा रसायन कला कौशल, युद्ध चातुर्य, कल कारखाने यन्त्र, मशीनें आदि सभी दिशाओं में बुद्धिबल की विजय दुन्दुभी बज रही है। नेता, शासक, न्यायाधीश, लेखक, वकील, डॉक्टर, प्रभृति लोगों को तो बुद्धि जीवनी ही कहते हैं। बुद्धि के बल से ही अपनी जीविका कमाते हैं। जो जितना चतुर है वह उतना ही बड़प्पन तथा ऐश आराम उपलब्ध करता दीखता है।
बुद्धि बल ने लोगों को बहुत चमत्कार दिखाये है। पर उसके ऊपर भावना का आधिपत्य न होने से निरंकुश मदोन्मत हाथों की तरह वह अपने बल को मानव समाज के हित की अपेक्षा अहित में अधिक लगाने की लगी है। मशीनों की वृद्धि ने लाखों करोड़ों मनुष्यों के मुख का ग्रास छीन कर उन्हें भूखों मर जाने के लिए विवश कर दिया है। संगठित पार्टी बन्दी अपने वर्ग के स्वार्थ को ऊपर रखने के लिए कूटनीतिक चतुरता के द्वारा करोड़ों लोगों को प्रचार साधनों की सहायता से भ्रम में डाल देती हैं। लड़ाई के हथियारों तथा आधुनिक बमों ने मनुष्य जाति को पृथ्वी पर से नष्ट कर देने का ही बीड़ा खाया मालूम देता है। छल, ठगी, धूर्तता, चालाकी, भ्रष्टाचार, व्यभिचार आदि असंख्य अनैतिक कार्यों में बुद्धि की विशेषता ही काम करती दीखती हैं।
बुद्धि एक उत्तम वस्तु है पर वह तभी तक उत्तम है जब तक उस पर भावना का नियन्त्रण रहे। मनुष्य की आत्मा में एक ऐसा दैवी तत्व निवास करता है जो उसे आत्म नियन्त्रण एवं दूसरों के साथ उदार व्यवहार करने के लिए निरन्तर प्रेरित किया करता है। आस्तिकता, धार्मिकता, नैतिकता, संयम, सेवा उदारता पवित्रता कृतज्ञता आदि इसी के लक्षण हैं। यदि वह भावना तत्व मनुष्य में समुचित मात्रा में हो तो वह स्वल्प साधनों से, स्वल्प शिक्षा से, स्वल्प बौद्धिक विकास से भी स्वस्थ, सन्तुष्ट, प्रसन्न एवं सुख शान्तिमय जीवन-यापन कर सकता है। इसके विपरीत यदि बुद्धि का विकास तो ऊंची चोटी तक पहुँच जाय पर किसी मनुष्य में सद्भावनाएं न ही तो वह नैतिक नियमों के उल्लंघन में तनिक भी संकोच न करेगा और दूसरों के लिए ही नहीं अपने लिए भी नाना प्रकार की मुसीबतें उत्पन्न कर लेता है।
देखा जाता है कि बुद्धि विकास के लिए नाना प्रकार के प्रयत्न हो रहे हैं। सरकारी और गैर-सरकारी अनेक प्रकार के शिक्षालय बौद्धिक उन्नति के लिए खुले हुए हैं। लोगों को बुद्धिमान बनाने के लिए जितना चाहिए उससे अधिक प्रयत्न हो रहे हैं पर भावना की सर्वत्र उपेक्षा है। मनुष्य की अन्तरात्मा में छिपी हुई सद्भावना को जागृत, विकसित पुष्ट एवं सक्रिय करने के लिए न सरकारी प्रयत्न हो रहे हैं न गैर-सरकारी। प्राचीन काल में यह कार्य त्यागी तपस्वी, सन्त महात्मा, पुरोहित आचार्य किया करते थे पर खेद की बात यह है कि आज वे लोग भी लोकेषणा, साम्प्रदायिकता, अकर्मण्यता, एकान्तवाद में फंस कर लोक शिक्षा की जन समाज की भावनाएं विकसित करने की जिम्मेदारियों से विमुख हो रहे हैं।
बुद्धि को अत्याधिक महत्व मिलना और भावना की अत्यधिक उपेक्षा देखकर मेरे मन में बड़ी निराशा उपजती थी और सोचा करता था कि यदि संसार का हर कोना-आज के अमेरिका से भी अधिक धनी हो जाय तो भी मानव समाज की सुख शान्ति में रत्ती भर भी वृद्धि न होगी। बड़ी-बड़ी विकास योजनाएं बनना उचित है उनको सफल बनाने में हमें सहयोग भी देना चाहिए पर केवल आर्थिक उन्नति की योजनाएं-भावना विकास पर कार्य उपेक्षित रहे तो मानव जाति के लिए सुख शान्ति का कोई ठोस आधार उपस्थित न करेंगे। जातीय, राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय, क्लेश कलह की दावानल ऐसी चिर संचित उन्नतियों को कुछ ही दिनों में भूमिसात् कर सकती है। उन्नति और समृद्धि की स्थिरता की गारण्टी तो केवल सद्भावना की सुस्थिरता के साथ ही हो सकती है।
हमारे देश के साथ ही संसार का सच्चा उत्कर्ष कैसे होगा? इस प्रश्न का एक ही उत्तर हो सकता है वह है मानवीय भावना की अभिवृद्धि। हमारा देश, जिसकी कि सदा से इस दिशा में नेतृत्व करने की जिम्मेदारी रही है। जो आपको जगद्गुरु कहला रहा है इस दशा में कुछ विशेष प्रयत्न न करना सचमुच ही एक बड़े खेद की बात थी।
जिन लोगों ने आचार्य को बहुत निकट से देखा, समझा और खोजा है उन्हीं मैं में एक मैं भी हूँ। लम्बे अर्से से मेरा उनसे परिचय है, जितना अधिक समय बीतता गया है उतनी ही मेरी श्रद्धा बढ़ती गई है। मैं जानता हूँ कि आचार्य जी असाधारण विद्वान होते हुए भी बुद्धि प्रधान नहीं, भावना प्रधान है। उन्हें भावना की साक्षात् प्रतिमूर्ति ही कहना चाहिए। जब मैंने अखण्ड-ज्योति में शिक्षण शिविर की योजना पढ़ी तो हृदय हर्ष से भर गया। वकालत के व्यस्त कार्यक्रम को छोड़कर मथुरा पहुँचा। और इस महत्वपूर्ण शिविर में सम्मिलित होकर इस भावना प्रसार के शिक्षा परीक्षण में सहयोग देता रहा।
लगभग 50 सुशिक्षित छात्र इस शिविर में शिक्षा प्राप्त करते थे। प्राचीन काल में गुरु कुलों की शिक्षा पद्धति कैसी होती रहेगी इसका एक छोटा सा दृश्य प्रत्यक्ष रूप से आँखों के सामने आ जाता था। आश्रम की सफाई, पौधों की सिंचाई, जल भरना आदि सब काम शिक्षार्थी श्रमदान करके स्वयं अपने हाथों ही करते थे। किसी नौकर की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। सभी छात्रों का भारतीय वेश भूषा में कंधे पर पीले दुपट्टे डाल कर ब्रह्मचारी के रूप में रहना बहुत ही सुन्दर प्रतीत होता था।
सवेरे सब लोग सोकर 4 बजे उठ बैठते थे। शौच, स्नान, श्रमदान आदि से 6 बजे तक निवृत्त हो जाते थे। 6 से 8 बजे तक सरस्वती यज्ञ होता जिसमें छात्रों के बुद्धि विकास के लिए कमलपुष्प, ब्राह्मी, वच, शतावरी, शंखपुष्पी, गोरखमुण्डी आदि बुद्धिपूर्वक सामग्रियों का शास्त्रोक्त विधि से हवन किया जाता। यज्ञ के बाद शिक्षण कार्य आरम्भ होता। आचार्य जी तथा महेन्द्र जी के भाषण नियमित रूप से प्रातःकाल दस बजे तक होते। दस बजे भोजन करने के बाद छात्रगण विश्राम के अतिरिक्त निर्धारित स्वाध्याय करते, डायरी लिखते, बताये हुए विकारों पर नोट तैयार करते जिनको जाँच करके उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण के नम्बर दिये जाते थे। प्रतिदिन के दैनिक व्यवहारों तथा कार्यों पर भी नम्बर दिये जाते थे। इसमें छात्रों को अपने आचरण को अधिक उत्तम बनाने में उत्साहपूर्ण होड़ लगी रहती। उत्तीर्ण होने वाले छात्रों को शिविर के अन्त में जो प्रमाण पत्र दिया जाने वाला था वह इतना सुन्दर और आकर्षक था इसे छोड़ने के लिए कोई भी तैयार न था, इसलिए शिविर की शिक्षा परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए प्रयत्न करने में छात्रों में प्रतिस्पर्धा सी बनी रहती थी।
शाम को तीन से छः बजे तक फिर शिक्षा क्रम चलता जिसमें शिविर में पधारे हुए विद्वानों के अतिरिक्त मथुरा वृन्दावन के उच्च कोटि के गणमान्य व्यक्तियों के भी भाषण होते। इस प्रकार कुल 43 भाषण हुए जो एक से एक अनुभव पूर्ण एवं सारगर्भित थे। शाम को एक घण्टा लाठी चलाने की शिक्षा दी जाती। शौच स्नान से निवृत्त होकर भोजन होता और प्रार्थना करके रात को 6 बजे तक सब लोग सो जाते। एक दिन मथुरा के और एक दिन वृन्दावन के प्रमुख स्थान देखने के लिए यात्रा का भी आयोजन रखा गया था। भोजन व्यय किसी पर बाधित न था फिर भी अधिक निर्धन छात्रों को छोड़कर शेष सबने अपना भोजन जो लगभग एक रुपया प्रतिदिन के करीब पड़ता था पूरा या आँशिक जमा करा दिया था। जयपुर के दो छात्रों ने अपने खर्च से दूना जमा कराया। खरगोन के एक छात्र ने अपने सहपाठियों को अन्तिम दिन प्रीतिभोज दिया।
बाह्य दृष्टि से कार्यक्रम छोटा ही था। देखने में कोई बहुत बड़ी असाधारण बात वहाँ न थी, पर उसके मूल में जो वस्तु काम कर रही थी वह ऐसी है कि संसार का भाग्य निर्माण उसी के ऊपर टिका हुआ है। मनुष्य का सुख बुद्धि पर नहीं भावना पर निर्भर है। भावना को प्रधानता देना, भावना को आदर मिलना, भावना की रक्षा के लिए तप और त्याग करने को प्रस्तुत रहना यह वह बात है जो मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाती है। सच्ची सम्पत्ति भी भावना ही में है। माल की मस्ती से ख्याल की मस्ती कहीं अधिक वास्तविक है। सच तो यह है कि जो लोग माल पैदा करके मस्ती उठा रहे है। उनमें भी एक प्रकार के ख्याल की ही मस्ती है, अन्यथा वे अपने सोने चाँदी, जर जवाहरात को हर घड़ी सिर पर थोड़े ही लादे फिरते हैं। यदि मनुष्य उच्च विचारों एवं कार्यों के महत्व को समझने और उनके उपलब्ध करने पर माल मस्त की तरह प्रसन्न रहना सीख ले तो हर व्यक्ति कुबेर सा धनी और इन्द्र सा सम्पन्न बन सकता है।
इस शिक्षा आयोजन में सद्भावनाओं को जागृत करना ही प्रधान उद्देश्य था, उसी के आधार पर सारी योजना तथा कार्य पद्धति बनाई गई थी। शिविर में जाने के बाद तो मेरा और भी दृढ़ विश्वास हो गया कि भावना प्रधान शिक्षा से ही मान व अन्तः करण का उत्कर्ष हो सकेगा और उसके लिए आचार्य जी का आयोजन एक सही कदम है। सोचता हूँ कि वकालत के पेशे से छुटकारा पाकर अपना शेष जीवन इसी पुनीत कार्यक्रम को पूर्ण करने में क्यों न लगा दूँ?
(श्री ओंकार लाला जी महाजन, खरगोन)
भारतवर्ष में अनेक तीर्थ हैं इनमें असंख्यों यात्री प्रतिवर्ष बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ जाते हैं। इन स्थानों में जाने से पुण्य फल प्राप्त होता है। ऐसी प्रायः सभी आस्तिक जनों की आस्था होती है। इन्हीं भावनाओं से प्रेरित होकर असंख्य जनता तीर्थ यात्रा करती है।
प्राचीन काल में तीर्थ स्थानों की स्थापना की गई थी, तब वहाँ पुण्य फल प्रदान करने वाली अनेक बातें भी रखी गई थीं। उन ऐतिहासिक स्थानों में जो महापुरुष उत्पन्न हुए थे या उन्होंने जो आदर्श कार्यों से प्रेरणा ग्रहण करके तीर्थ यात्री लोग इसी ढांचे में अपने जीवन को ढालें यह उद्देश्य प्रधान था। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी, योगेश्वर श्री कृष्ण चन्द्र के वचन और कार्य ऐसे हैं जिनसे हम बहुत कुछ सीख सकते हैं और उनके बताये हुए मार्ग पर चल कर जीवन को सफल बना सकते हैं। इसके अतिरिक्त इन भूमियों में कुछ ऐसा विशेष आध्यात्मिक प्रभाव भी होता है। जिनके कारण वहाँ के सूक्ष्म परमाणु आगन्तुकों के अन्तःकरण पर सतोगुण प्रभाव डालते हैं। जिसके कारण अनायास ही पापों से दूर रहने और धर्म संयत मार्ग पर चलने की भावना जागृत होती है।
तीर्थ स्थानों की उस आध्यात्मिक विशेषता को स्थिर रखने तथा बढ़ाने के लिए वहाँ निरन्तर धार्मिक आयोजन होते रहते हैं। ऐसे आयोजनों में यज्ञ प्रधान थे। यज्ञ भारतीय विज्ञान का एक अतीव महत्वपूर्ण रहस्यमय आविष्कार हैं। यज्ञ द्वारा मनुष्य प्रकृति के सूक्ष्म तत्वों पर अधिकार प्राप्त करके सूक्ष्म जगत की परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना सकता है। यज्ञ द्वारा जहाँ अनेक प्रकार के दिव्य अस्त्र-शस्त्र बन सकते हैं, सृष्टि में पर्याप्त वर्षा, धान्य, दूध, पशु वनस्पति, औषधि, निरोगता आदि की वृद्धि हो सकती है, व्यक्तिगत तथा सामूहिक कठिनाइयों को हल कर सकते हैं। वहाँ किसी स्थान विशेष को अमुक प्रकार की शक्ति से सम्पन्न भी बनाया जा सकता है। प्राचीन काल से तीर्थ स्थानों में अनेक महत्वपूर्ण यज्ञ इस आयोजन से भी होते रहते थे कि वहाँ की पापनाशिनी तथा धर्म भावना प्रेरक शक्ति अक्षुण्य बनी रहे। काशी और प्रयाग के दशाश्वमेध घाट प्रसिद्ध है। इन घाटों पर एक-एक करके दस-दस बार अश्वमेध विभिन्न राजाओं ने कराये थे। उस समय अपने घर में यज्ञ कराने की अपेक्षा ऐसे महत्वपूर्ण पुण्य स्थानों पर बड़े-बड़े यज्ञ कराना अधिक उपयोगी समझा जाता था। आज एक तो बड़े यज्ञ होते ही नहीं हैं यदि होते तो प्रशंसा के लोभी उन्हें अपने घरों तक ही सीमित रखते हैं। तीर्थों की शक्ति बढ़ाने के लिए वहाँ बड़े यज्ञ आज तो बन्द से ही हो गये हैं।
यज्ञों के अतिरिक्त प्राचीन काल में तीर्थ स्थानों में अनेक त्यागी, तपस्वी, विद्वान, महात्मा और पुरोहित रहते थे, अनेक गुरुकुल थे जहाँ सत्संग करके मनुष्य अपनी बुद्धि को शुद्ध करते थे, जीवन की अनेक कठिनाइयों को पार करने की कला सीखते थे। पापों का प्रायश्चित करते थे और आत्मबल बढ़ाने के लिए विशेष साधनाएं की जाती थी। इन लाभों से भी तीर्थ यात्रा का बड़ा महत्व था। देवालयों की दर्शन झाँकी, पवित्र नदी सरोवरों का स्नान तो एक गौण लाभ था मूल लाभ तो उन स्थानों की आध्यात्मिक विशेषताएं ही थीं।
अन्य अनेक धार्मिक भावना वाले व्यक्तियों की भाँति मेरी भी बहुत दिनों से तीर्थ यात्रा की इच्छा थी। बार-बार उत्साह उठता योजनाएं बनतीं, पर जब आज कल तीर्थ स्नानों में जो बुरा वातावरण है उसका स्मरण करता तो हृदय क्षोभ और ग्लानि से भर जाता। पण्डे यात्रियों के साथ जो ठगी धोखाधड़ी तथा दुर्व्यवहार करते हैं, उससे एक बार तीर्थ हो जाने के बाद वहाँ दुबारा जाने की इच्छा नहीं होती। इसी प्रकार सदुपदेश तथा आध्यात्मिक शिक्षा के लिए भी कोई सच्चे आयोजन वहाँ नहीं रहते, यज्ञ आदि आयोजनों के अभाव में वहाँ की सूक्ष्म प्रेरक शक्ति भी शिथिल पड़ गई है, यह कारण उत्साह को ठण्डा कर देने के लिए भी कम वजनदार नहीं है। फिर आर्थिक संकट भी तो हर आदमी को परेशान किये रहता है। इसी उधेड़ बुन में तीर्थ यात्रा की अभिलाषा बहुत दिनों से अधूरी पड़ी हुई थी।
अखण्ड-ज्योति में सरस्वती यज्ञ और साँस्कृतिक शिक्षण शिविर की योजना पढ़ी तो वह पिछली अभिलाषाएं अचानक जागृत हो गई और नियम समय पर मथुरा के लिए चल पड़ा और गायत्री तपोभूमि में जा पहुँचा। स्थान की दृष्टि से यह इमारत कोई इतनी बड़ी या प्रभावशाली नहीं है जैसी अन्यत्र कहीं नाप हो। इससे हजारों नहीं तो सैकड़ों गुनी कीमत के मन्दिर मैंने अपनी आँखों देखे हैं पर इस स्थान में जो विशेषताएं मैंने देखी वे निश्चित रुप से आज तक मैंने कहीं नहीं देखी है।
जिस कारण आग के निकट जाने पर स्वयमेव गर्मी अनुभव होती है, बर्फखाने में घुसने पर स्वयं ठण्डक लगने लगती है। उसी प्रकार इस तपोभूमि में घुसते ही ऐसा लगता है कि सारी मथुरा नगरी तीन लोक से न्यारी न सही उसकी यह एक उप नगरी यह तपोभूमि तीन लोक से न्यारी अवश्य है। यहाँ शिविर में शिक्षा व्यवस्था कैसी थी? किस वक्ता ने क्या कहा? क्या कार्य किस प्रकार होता था? आदि बातों पर मेरा ध्यान उतना नहीं था, क्योंकि वह सब बातें ऐसी नहीं थी जो अन्यत्र कहीं न होती हों या न हो सकती हों। इससे अधिक बड़े महत्वपूर्ण और सुव्यवस्थित आयोजन भी अनेक बार होते हैं।
यहाँ की प्रधान विशेषता यहाँ का वह वातावरण था जिसकी तुलना प्राचीन काल के उन ऋषि आश्रमों से की जा सकती है जहाँ गाय और सिंह एक साथ पानी पीते और रहते सुने जाते हैं। यहाँ वैसा कुछ मैंने प्रत्यक्ष देखा। हम लोग 50-60 शिविरार्थी इस थोड़ी सी जगह में घूमते फिरते रहते थे इतने अधिक लोगों के बीच यहाँ के पक्षी निर्भय होकर इस प्रकार क्रीड़ा करते रहते थे मानो वे हमारे ही सहयोगी हों। प्रातःकाल जब वेद मंत्रों की ध्वनि के साथ यज्ञ आरम्भ होता तो आस-पास के वृक्षों पर से तोता, कबूतर, गोरैया, कोयल, मोर आदि पक्षी उतर आते और यज्ञ वेदी के चारों ओर कलरव करने लगते। मोरों के तो मनोहर नृत्य आरम्भ हो जाते और वह बहुत देर तक चलते रहते। वह दृश्य देखते ही बनता। यह मोर मनुष्यों पर तनिक भी अविश्वास नहीं करते। उनके साथ भोजन तक करने को तैयार रहते हैं। बालकों की थाली में से भी उनके हाथ से रोटी लेकर यह खाते हैं, भोजन की तलाश में आश्रम की कोठरियों तक में यह घुस जाते हैं।
इस तपोभूमि में भारतवर्ष के प्रायः समस्त तीर्थों का जल रज सुसज्जित रखा हुआ है। देश भर के गायत्री उपासकों द्वारा मन्त्र लेखन में किया हुआ जप बहुत ही आदरपूर्वक स्थापित है। प्रायः 80 करोड़ हस्त लिखित गायत्री मन्त्र अब तक संग्रह हो चुके हैं। इतने लोगों ने इतने समय तक जो मन्त्र लेख जप किया है वह कापियों के माध्यम से मूर्तिमान होकर यहाँ विराजता है उस तप का प्रचण्ड तेज इस स्थान में श्रद्धापूर्वक बैठते ही प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। गायत्री माता की मूर्ति का भार तथा अंक प्रत्यंकों का माप, शास्त्रोक्त प्रमाणों के आधार पर हुआ है। इसकी प्राण प्रतिष्ठा भी असाधारण रीति से हुई है। आचार्य जी 24 दिन तक केवल गंगाजल लेकर दुस्साहसीय उपवास के साथ मूर्ति की प्रतिष्ठापना कराई, शास्त्रीय विधानों का तो प्रतिष्ठा में पूर्ण ध्यान रखा गया। यही करण है कि यहाँ की प्रतिमा चैतन्य प्राण जैसी प्रभावशाली परिलक्षित होती है। शान्त चित्त से श्रद्धापूर्वक थोड़ी देर इस प्रतिमा के सम्मुख खड़े होने पर ऐसा प्रतीत नहीं होता कि हम किसी निर्जीव पाषाण के सामने खड़े हैं। दर्शन मन में एक विशेष भावना तुरन्त विद्युत तरंगों की भाँति दौड़ जाती है यह प्रभाव यहाँ विशेष प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न किया गया है।
यहाँ नित्य यज्ञ होता है। प्राचीन नैतिक अग्निहोत्रियों की यज्ञ शालाओं की भाँति यहाँ अखण्ड अग्नि रखी जाती है। यज्ञ वेदी के चारों ओर हरी भरी तुलसी लगी हुई हृदय में सात्विक संस्कारों को उत्पन्न कर देती है। यह भूमि तपोभूमि के लिए चुनने में दैवी पथ प्रदर्शन का ध्यान रखा गया है। यह स्थान ऐसा है जिसमें प्राचीन काल के अनेक तपस्वी आत्माएं बड़े-बड़े एवं प्रभावों से यह भूमि अभी तक प्रभावित है।
इन सब बातों के अतिरिक्त आचार्य जी की आत्मा तथा भावनाओं का इस स्थान पर प्रभाव है। वे आरम्भ से ही इस बात का प्रयत्न कर रहे हैं कि यह स्थान इतनी चैतन्य प्रेरणा से युक्त हो जाय कि बिना कुछ कहे सुने भी इस स्थान में निवास करने पर लोग बहुत कुछ पा सकें। सचमुच बहुत अंशों तक वह वैसा हो भी चुका है। यह मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से भली प्रकार जान लिया है।
शिक्षण शिविर की शिक्षा पूर्ण थी। वृन्दावन की यात्रा की, मथुरा की परिक्रमा की, विद्वत्तापूर्ण भाषण सुने, अनेक सत्पुरुषों से परिचय हुआ, इन सब लाभों से बढ़कर लाभ यह हुआ कि मेरी तीर्थ यात्रा की फिर अभिलाषा पूरी हो गई। मेरा जो यह विचार था कि अब तीर्थों में केवल ढकोसला मात्र रह गया है, वह धारणा अब मैंने बदल दी है क्योंकि एक तीर्थ को तो मैं स्वयं अपनी आँखों देख चुका हूँ। और उसका प्रभाव भी अपने ऊपर प्रत्यक्ष अनुभव कर चुका हूँ।
मुझे चाय और सिगरेट का न मालूम कितने समय से बहुत बढ़ा-चढ़ा व्यसन था। मैं स्वप्न में भी यह आशा न करता था कि यह व्यसन छूट जायेंगे। एकाधिक कार प्रयत्न किया तो शरीर में भारी विघ्न खड़े हो गये। पर जब तपोभूमि में रहा तो बिना किसी प्रयत्न के यह दोनों व्यसन अनायास ही छूट गये और मुझे तनिक भी कोई अड़चन न हुई। अब तो ऐसा लगता है मानो यह व्यसन मुझे कभी थे नहीं। दोनों चीजों से घृणा होती है। यह तो प्रत्यक्ष लाभ है, आध्यात्मिक दृष्टि से, मानसिक दृष्टि से, शारीरिक दृष्टि से, साँसारिक दृष्टि से, मुझ में जो कुछ परिवर्तन हुए हैं उन्हें देख कर तो यही कहा जा सकता है कि मैंने बहुत कुछ पाया है। मेरी तीर्थ यात्रा पूर्ण सफल हुई है। मैं सोचता हूँ कि प्राचीन काल में भी तीर्थ ऐसे ही लाभदायक होते होंगे तभी लोग इतना कष्ट सहकर वहाँ जाने का प्रयत्न किया करते होंगे।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र,एम.ए.)
भगवान ने ऐसा हृदय तथा मस्तिष्क दिया है जिसमें निरन्तर अनेक प्रश्न, अनेक समस्याएँ अनेक गुत्थियों का चक्कर चलता ही रहता है। उन्हें सुलझाने के लिए बहुत सोचता हूँ और इस मन्थन काल में जो महत्वपूर्ण बातें सूझ पड़ती हैं उन्हें दूसरों के सामने प्रकट करने की इच्छा होती है। विचारों की अभिव्यक्ति को जब प्रकट किये बिना नहीं रहा जाता, तो कलम उठाता हूँ और कुछ लिखा करता हूँ और उन्हें पत्र पत्रिकाओं में छपने भेज देता हूँ। संयोग की ही बात है कि वे उद्गार पत्रकारों को पसन्द आते हैं और वे उन्हें प्रसन्नतापूर्वक और कई बार तो आग्रहपूर्वक भी छापते है।
अपने इस प्रयास में पिछले 12-14 वर्षों में अनेक पत्र पत्रिकाओं तथा उनके सम्पादकों से संपर्क स्थापित करने का अवसर मिला हैं, कुछ से पत्र व्यवहार का परिचय है, कुछ से मिलने जुलने तथा व्यक्तिगत सम्बन्धों का सुयोग बन गया है। पत्रकारों लेखकों और साहित्यकारों का भी एक क्षेत्र है। इस क्षेत्र में एक से एक उच्चकोटि के विद्वान, प्रतिभाशाली, सूझ-बूझ के साथ तथा सफल प्रयत्न महानुभाव भरे पड़े हैं। यह वर्ग छोटा सा ही है, पर राष्ट्र निर्माण का बहुत भारी उत्तरदायित्व उस पर है। इसलिए इन ‘थोड़े से’ लोगों को हम बहुत कुछ मानने को विवश होते हैं।
जिन साहित्यकारों से मेरा परिचय है उनमें से एक अपने ढंग के अनोखे व्यक्ति आचार्य जी हैं। अखण्ड-ज्योति के जन्मकाल से ही मैं व्यक्तिगत रूप से उनके घनिष्ठ संपर्क में हूँ और प्रायः इस पत्रिका का आरम्भ से ही तत्परता पूर्वक उसका सम्पादन कार्य करने में प्रमुख रूप से हाथ बंटाता रहा हूँ। हर महीने अनेक पत्रों का आदान-प्रदान हम लोगों के बीच में होता हैं और जल्दी-जल्दी हम आपस में मिलते भी रहते हैं। साल के 365 दिनों में शायद ही कुछ दिन ऐसे होते है, जिनमें अखण्ड-ज्योति के सम्बन्ध में आचार्य जी के सम्बन्ध में कुछ सोचने या करने का अवसर न आता हो। कह सकते हैं कि वे मेरे मानसिक परिवार के एक अंग बन चुके है।
बुद्धि से बुद्धि और हृदय से हृदय की परख आती है। विगत 14 वर्ष से मेरा हृदय आचार्य जी के अन्तस्तल को परखने का कार्य करता चला आ रहा है। इस दिशा में जितनी अधिक जानकारी मुझे प्राप्त हुई है जितना अधिक निकट से उन्हें समझने का अवसर मिलता गया है उतनी ही मेरी श्रद्धा बढ़ती गई है। किन गुणों किन भावनाओं किन विचारों पर मेरी ऐसी मान्यता हुई इसकी चर्चा करना यहाँ अनावश्यक होगा। हम अध्यापक लोग दिनभर मनुष्यों को ही परखते हैं, हमारी आँखें इस सम्बन्ध में दूसरों से अधिक पैनी होती है, वस्तु स्थिति को समझने में बहुत कम ही हम लोग भूल करते हैं। आचार्य जी पर मेरी अंधश्रद्धा नहीं है। मैं किसी का भक्त या चेला भी नहीं हूँ। व्यक्ति की सच्चाई तथा विचारों की ऊँचाई के सामने ही मस्तक झुकाना मैंने सीखा है, इसलिये किसी भी व्यक्ति का मैं केवल उतना ही मान करता हूँ जितना कि वह वस्तुतः प्राप्त होती है।
आचार्य जी को मैंने सच्चा ब्राह्मण पाया है। इनके विचारों और कार्यों में ब्राह्मणत्व का सच्चा आदर्श सन्निहित रहता है। तदनुसार मेरी भावना उनके प्रति किसी बुद्धि जीवी व्यक्ति की होनी चाहिए। मेरी यह श्रद्धा ही है जो रात-रात भर जागकर अखण्ड-ज्योति को सींचने के लिए कुछ कार्य करने को बलपूर्वक विवश करती है। आचार्य जी ने अपनी योग्यता और प्रतिभा का उपयोग पत्रकार जगत में आकर भी यदि धन कमाने के लिए किया होता तो निःसंदेह आज वे भी दूसरों की तरह बहुत सम्पन्न होते। पर आरम्भ से ही उनका स्वभाव और आदर्श ऐसा रहा है जिनके कारण आर्थिक तंगी उन्हें घेरे रहती है। व्यक्तिगत रूप से उनकी आर्थिक स्थिति इतनी दुर्बल रहती है कि अखण्ड-ज्योति को चलाने तथा अपने पारिवारिक खर्च चलाने में चिंता ही करनी पड़ती रहती है। उनकी इस कठिनाई को देखकर मेरी भावनायें उमड़ती रही हैं, पर ईश्वर ने अमीर मुझे भी नहीं बनाया। मैं भी मजदूर ही हूँ। “अपना श्रम देकर उनकी सहायता करूं” यह मेरी अन्तरात्मा मुझ से निरन्तर कहती रही है। उसी प्रकार पर मैंने गत 14 वर्षों से अखण्ड-ज्योति का सम्पादन कार्य करने तथा 50 पुस्तकें लिख देने का कार्य किया है। निश्चित है कि इतना श्रम मैंने किसी दूसरे के लिए किया होता तो उससे हजारों रुपयों की मुझे प्राप्ति हुई होती। पर ईश्वर जानता है कि आज तक मैंने एक कानी कौड़ी भी पारिश्रमिक इसके लिए कभी नहीं लिया है। लेना तो दूर कभी ऐसा विचार तक नहीं किया है करता भी कैसे? जितना ही इस संस्थान के निकट आता हूँ अधिक परिचित होता जाता हूँ और भी अधिक करने के लिए बहुत कुछ करने के लिए अन्तरात्मा कहती है।
इस बार गर्मी की छुट्टियों में आचार्य जी कोटा आये। उसमें शिक्षण शिविर की योजना बनाई और उसका संयोजन करने के लिए मुझसे कहा। विचार अच्छे थे योजना उत्तम थी। पर साल भर में गर्मी के दिनों में यह थोड़े से दिन ही तो छुट्टी के मिलते हैं। कोल्हू के बैल की तरह पूरे वर्ष जुते रहने के बाद यह थोड़े ही दिन ऐसे होते हैं, जिनमें रिश्तेदारियों, मित्रों आवश्यक कार्यों विनोद या ज्ञानवृद्धि के लिए कहीं जाना सम्भव हो सकता है। बाहर आने जाने में बच्चे भी साथ रहते हैं, वे सालभर से एक एक-दिन इन छुट्टियों के लिए गिनते रहते हैं। मैं यह छुट्टियाँ मथुरा बिताने और अन्य प्रोग्राम रद्द कर दूँ। वह बात किसे पसन्द आती। सभी ने असहमति और विरोध प्रकट किया। आचार्य जी रात को कोटा रहे। मेरा मन रातभर दशरथ की तरह संकल्प करता रहा। अन्त में अन्तरात्मा की पुकार जागी। जिस मिशन के लिये अब तक इतना खून पसीना बहाता रहा हूँ क्या उसकी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता के लिए घरेलू आग्रह एवं आवश्यकताओं को निछावर नहीं किया जा सकता? अवश्य ही किया जा सकता है। करूंगा। किया भी। नियम समय पर मथुरा पहुँचा और शिविर को सफल बनाने में जो कुछ बन पड़ा किया भी। अनेक साथियों और सत्पुरुषों के सहयोग से वह सफल भी हुआ। इसकी सफलता तथा भविष्य की योजना को देखते हुए मेरा चित्त प्रसन्नता से भरा हुआ है।
मथुरा के कोटा आये हुए मुझे इतने दिन हो गये पर एक बात मुझे बुरी तरह चुभ रही है। उसका घर जितना ही विचार करता हूँ उतना ही अधिक खेद और निराशा होती है। यह बात है अखण्ड-ज्योति की ग्राहक संख्या। जबकि कहानियों के, सिनेमा के तथा अन्य प्रकार के अखबार इतनी भारी संख्या में छपते हैं तब अखण्ड-ज्योति की ग्राहक संख्या इतनी थोड़ी रहे यह चिन्ता की बात है। हम लोग दिन रात खून पसीना बहाकर इतनी उच्च कोटि की पाठ्य सामग्री जुटाते हैं। मूल्य इतना सस्ता रखा है जिससे कागज छपाई की लागत मात्र मुश्किल से पूरी होती है। फिर भी लोग उसके ग्राहक क्यों नहीं बनते?
लोगों की पैसे की तंगी इसका कारण बिल्कुल नहीं है, गरीब लोग भी इतने पैसे आये दिन व्यर्थ की बातों में खर्च करते रहते है। समय का फेर, सद्विचारों के महत्व के प्रति लोगों की उपेक्षावृत्ति ही इसका प्रधान कारण है। इन बातों का तो दोष है ही जो ऐसे उपयोगी कार्य आगे पढ़ नहीं पाते पर अधिक दोष हम लोगों का है जो इसकी उपयोगिता और महत्ता को समझते हुए भी इस मिशन को आगे बढ़ाने के लिए क्रियात्मक रूप से कुछ नहीं करते। अखण्ड-ज्योति आचार्य जी की वाणी है, उनकी अन्तरात्मा की पुकार है इसे अधिक लोग सुनें समझें तभी उनका श्रम सार्थक हो सकता है। इस सार्थकता की जिम्मेदारी उनकी है जो अपने आचार्य जी का प्रेमी, हितैषी मित्र या शिष्य कहते हैं। सच्ची सद्भावना हमेशा क्रिया रूप में प्रकट होती है। इसके लिए अपना विनम्र उदाहरण मैं पेश कर सकता हूँ। आचार्य जी को उनके मिशन को मैं अच्छा मानता हूँ, आदर रखता हूँ तो उसके फलस्वरूप कुछ त्याग भी करता हूँ और कष्ट भी सहता हूँ और समय भी देता हूँ। पर जो लोग पैर छूने में सबसे आगे रहते हैं, तरह-तरह की सेवाएं और सहायताएं प्राप्त करने की आशा करते हैं पर जब स्वयं कुछ करने का अवसर आता है तो हाथ झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार में ऐसे लोगों की आशा मुझे कभी न थी। पर जब इस बार पत्रिका दफ्तर का भली प्रकार अध्ययन किया तो व्यवस्थापक श्री सत्यदेव जी ने बताया कि ऐसे लोग उंगलियों पर गिनने मात्र हैं। जो दूसरों को अखण्ड-ज्योति का ग्राहक बनाने के लिए कुछ प्रयत्न करते है। अधिकाँश तो ऐसे हैं जो अपना चन्दा ही मुश्किल से भेजते हैं। इस स्थिति को देखकर सुनकर मेरा सिर लज्जा से नीचे गढ़ने लगा है।
ये कैसे मित्र है, हितैषी हैं, प्रेमी हैं, श्रद्धालु हैं, जो अपनी आदर भावना की श्रद्धा को चरितार्थ करने के लिए कुछ नहीं करते। यदि आचार्य जी की वाणी अन्तरात्मा की पुकार अखण्ड-ज्योति खराब है, हानिकारक है तो उसका विरोध करना चाहिए और उसे बन्द कराने का प्रयत्न करना चाहिए यदि वह उत्तम है तो उसके प्रसार के लिए कुछ तो प्रयत्न करना चाहिए कुछ तो समय देना ही चाहिए। न विरोध न सहयोग यह उपेक्षा तो मृतप्रायः सड़ी गली मनोवृत्ति की द्योतक है। यदि हमारा परिवार सचमुच ऐसा ही है तो निराशा और अंधकार की ही कल्पना की जा सकती है।
यह तनिक भी कठिन नहीं कि अखण्ड-ज्योति का एक सदस्य चाहे तो एक दो और अपने नये साथी न बना ले। हर सदस्य का थोड़ा-थोड़ा सहयोग आचार्य जी की वाणी के बल और क्षेत्र में असाधारण वृद्धि कर सकता है। मैं सोचता रहता हूँ कि किन शब्दों में अपने साथियों के आगे अपना हृदय उड़ेल कर रखूँ कि वे अपने-अपने परम आवश्यक कर्त्तव्य को समझें और इसके लिए प्रयत्न करें। शब्द नहीं मिलने पर भावना मेरी असाधारण है, यदि थोड़े से साथियों को भी मैं अपनी आन्तरिक बेचैनी समझा सकने में सफल हो सकूँ तो हो नहीं सकता कि मेरी ही भाँति वे भी कुछ न कुछ करने को तत्पर न हों। काश, मुझे अपनी ही भावनाएं अपने साथियों के सम्मुख रखने और साथियों को उनकी वेदना अनुभव कराने की शक्ति भगवान ने दी होती तो कितना उत्तम होता।
(डॉ. परशुराम शर्मा, फीरोजपुर)
मेरी आयु 82 वर्ष के लगभग है। जब से होश सम्भाला है, मनुष्य समाज की गतिविधियों को देखने और समझने में विशेष दिलचस्पी लेता रहा हूँ। मेरे देखते-देखते पैसा और चतुरता की दृष्टि से मनुष्य समाज ने आश्चर्यजनक उन्नति की है। सुख सामग्रियाँ बहुत बढ़ी है, विज्ञान की उन्नति ने तो जीवन क्रम को ही बदल दिया है, वाचालता और तर्क शक्ति खूब बढ़ी है, प्रचार साधनों के बढ़ जाने से अपने विचार असंख्य लोगों तक पहुँचा देना सुगम हो गया है। इस उन्नति के साथ-साथ मनुष्य का नैतिक स्तर बेहिसाब गिरा है, उनकी भावनाएं निकृष्ट कोटि की हो गई है, लक्ष्य और उद्देश्य तो इतने नीचे हो गये है। जिनके लिए पशु को भी लज्जित होना चाहिए। इसका परिणाम वही हो रहा है कि अनेक बीमारियों, परेशानियों, चिन्ताओं तथा क्लेशों से वह दिन दिन अधिक ग्रस्त होता चला जा रहा है।
जब इस अधः पतन के असंख्य उदाहरण अपने चारों ओर देखता हूँ तो मेरी आँतरिक वेदना उमड़ पड़ती है, हृदय दुख से भर जाता है। दूसरे पूर्वजों के पास आज जितने साधन न थे पर वे अपनी उत्तम बौद्धिक स्तर के कारण स्वयं ही आनन्द का अनुभव नहीं करते थे वरन् अपने निकटवर्ती दूसरे लोगों को भी चिन्ताओं और क्लेशों से छुड़ा कर आनन्दित बनाने का महान उपकार करते थे, उन्हीं शिक्षाओं आदर्शों एवं विचार धाराओं के कारण उन्हें जगद्गुरु माना जाता था। आज ज्ञान और विज्ञान के नाम पर बहुत कुछ पढ़ा और पढ़ाया जाता है, सुना और सुनाया जाता है पर उससे सुख सामग्रियाँ तो बढ़ती है पर सुख की अनुभूति में रत्ती भर भी वृद्धि नहीं होती। आज तो जो जितना ज्यादा बुद्धिमान माना जाता है वह दूसरों को भ्रमग्रस्त पीड़ित और परेशान करने में उतना ही अधिक लगा होता है।
मानव अंतःकरण की इस अवनति से दुखी होकर उसे और अधिक गिरने से रोकने तथा यथासम्भव ऊपर उठने की कामना से मैं अपनी तुच्छ सामर्थ्य के अनुसार पूरा प्रयत्न करता रहा हूँ। महात्मा गाँधी के पवित्र चरणों में कई महीने रहने का सौभाग्य प्राप्त करके तथा महामना मालवीय जी के सान्निध्य में लम्बे अर्से तक कार्य करने से मेरे यह भाव दिन दिन दृढ़ होते गए हैं कि मनुष्य का नैतिक उत्कर्ष जब तक नहीं होगा, उसके रहन सहन खान-पान भाव विचार लक्ष्य उद्देश्य तथा करने और कमाने के तरीके जब तक ठीक न होंगे तब तक सुख सामग्रियों का पहाड़ भी उसके लिए उपयोगी सिद्ध न होगा। जीवनयापन की आन्तरिक मान्यताएं और बाह्य पद्धतियाँ ही वह मर्मस्थल है। जिनका सुधार या बिगाड़ होना संसार के भविष्य को बनाता और बिगाड़ता है। इन्हीं तथ्यों को जनता को जताने के लिए मैंने भारतवर्ष के विभिन्न भागों में तथा विदेशों में यथा संभव कार्य किया है, और इसी प्रयत्न में अनेक सत्पुरुषों का परिचय प्रेम तथा सहयोग प्राप्त करने का अवसर मिला है।
इसी दौरान में जब मैं बम्बई था तब एक सज्जन के यहाँ अखण्ड-ज्योति कार्यालय की कुछ पुस्तकें देखीं। उन्हें पढ़ा। पढ़ने पर ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरी ही जैसी भावना और वेदना इन पुस्तकों के लेखक की भी है। मुझे अपने हृदय की ही बातें इन पुस्तकों में अभिव्यक्त मिलीं। पर आज के इस बनावटी युग में वास्तविकता का पता लगाना बहुत कठिन होता है। इसलिए मैं उन पुस्तकों के लेखक श्री आचार्य जी से मिलने मथुरा पहुँचा। जो कुछ प्रयत्न मैंने वहाँ देखा उनसे मैं असाधारण रूप से प्रभावित हुआ और तब से मेरा लगाव उनसे निरन्तर बढ़ता ही गया है। जो भी लोग मेरे संपर्क में आते हैं उनको अखण्ड-ज्योति तथा वहाँ की विविध पुस्तकें पढ़ने के लिए बलपूर्वक प्रेरणा करता रहा और मैं देखता हूँ कि उनसे, उन लोगों को वस्तुतः बहुत लाभ पहुँचता है, इससे मेरे मन को बड़ा सन्तोष होता है और अधिक लोगों को अधिक बलपूर्वक प्रेरणा करने का उत्साह बढ़ता रहता है।
पिछले मई मास के अंक में जब आचार्य जी ने साँस्कृतिक शिक्षण शिविर की योजना प्रकाशित की तो मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मानो मेरी अपनी आन्तरिक भावना तथा योजना को ही कोई चरितार्थ कर रहा हो। ऐसे कार्य में मुझे योग देना ही था। अनेक अड़चनों के रहते हुए भी मैं मथुरा में एक दो दिन पहले ही पहुँच गया था और शिविर पूर्ण होने तक लगभग दो सप्ताह वहाँ रहा। इस प्रारम्भिक प्रयोग को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह परिचय पूर्ण सफल रहा। अनुभव और साधनों का अभाव होते हुए भी कार्य हुआ। वह वस्तु बहुत ठोस और प्रभावशाली था। प्राचीन गुरुकुल पद्धति से लम्बे समय तक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र मिलना तो अब कठिन है पर ऐसे छोटे-छोटे शिविरों की शृंखला देशभर में फैल जाय तो निस्सन्देह बहुत अधिक लोग जीवन निर्माण का वास्तविक ज्ञान सुविधापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं, यह योजना नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए अपने ढंग की अनोखी योजना है।
(पं. हरि प्रसाद जी ओझा, मथुरा)
श्रद्धेय पं. श्रीराम शर्मा जी ने गत मास एक भारतीय शिक्षण शिविर का आयोजन किया था, जिसमें विभिन्न स्थानों के अनेक श्रद्धालु शिक्षार्थी सम्मिलित हुए थे। दुर्भाग्य से इच्छा होते हुए भी मैं शिक्षण शिविर में भाग न ले सका। पण्डित जी की अनुपम उदारता, निरभिमानता, सौजन्यशीलता बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय की सक्रिय भावना का किन शब्दों द्वारा यश गान किया जाय, यह मुझ शुद्र बुद्धि की समझ में नहीं आ रहा है।
मनीषी आचार्य जी से मेरा कतिपय सिद्धान्तों पर गहरा मतभेद है। मैं आर्य समाजी विचारों का हूँ पण्डित जी सनातनी है फिर भी उनकी ऋषिकल्प सर्वसाधारण के प्रति शुभ भावनाओं पर मैं हृदय से मुग्ध हूँ, पाठक इन पंक्तियों को, मनस्येकं, वचस्येकं कर्मण्येजम् के सिद्धान्तानुसार ही सत्य स्वीकार करेंगे-मुझे दृढ़ आशा है।
अब मैं अपने मन की बात का निवेदन करता हूँ, वह यह कि मैं शिक्षण शिविर के अन्तिम दिन भी नितान्त अन्तिम क्षरण-जब शिक्षणार्थियों समावर्तन संस्कार होकर विदाई चित्र लिया जाने वाला था उपस्थित हुआ। तब मान्यवर शर्मा जी का दीक्षान्त भाषण समाप्त हो रहा था। शर्मा जी ने अपने भाषण के अन्त में उपसंहार के रूप में जो एक बात शिक्षणार्थियों को बताई उसको श्रवण कर मुझे जो अप्रतिम और हार्दिक आनन्द अनुभव हुआ वह वाणी द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। कारण “जो गूँगो गुड़ खाय स्वाद कहि सके न ताको” वाली लोकोक्ति चरितार्थ हो रही थी मैं न लेखक हूँ न वक्ता हाँ विद्वानों के लेख और वयोवृद्धों की शिक्षाप्रद बातों के श्रवण से मनन का शौक अवश्य है। क्योंकि मेरी शिकायत किंचित भी नहीं है इसी कारण मैं किन्हीं पवित्र भावों को लेखक कर व्यक्त करने का अभ्यास नहीं है।
आचार्य जी ने गम्भीरतापूर्वक सरल भाव से शिष्य वर्ग के समक्ष यह कहा कि भाई हम सौ बातों की एक बात आप लोगों के ठोस अभ्युदयार्थ बताते हैं और वह यह कि आप अपने निवास स्थल को वापस जा रहे हैं वहाँ पहुँच कर नित्य नियम से प्रतिदिन अपने पूज्य माता, पिता, गुरु, जेष्ठ सहोदर आदि मान्य व्यक्तियों का चरण स्पर्श युक्त अभिवादन करने का अटूट व्रत धारण करने की मन, वचन, कर्म से प्रतिज्ञा करें और तद्वत् आचरण भी?
इन शब्दों को सुनकर मेरे अंतःकरण में एक प्रकार की बिजली सी (हर्षातिरेक से) दौड़ गयी। हृदय श्रद्धा से गदगद हो आया, और न मालूम कल्प, काल से अब तक की कितनी घटनाएं दृष्टि के सामने दौड़ गयी खिचड़ी के एक चावल वाली नीति के आधार पर शिक्षण शिविर की सफलता समझ अपनी अनुपस्थिति का पश्चाताप करता रहा। पाठकों को ध्यान रखना चाहिए कि आचार्य जी के उपर्युक्त शब्द भारतीय नहीं अपितु वैदिक संस्कृति की आधारशिला है। भगवान मनु अपने मानव धर्मशास्त्र में स्पष्ट घोषणा करते है कि जो व्यक्ति मान्य व्यक्तियों (स्त्री पुरुष) को नित्य नियम के श्रद्धा भक्ति से अभिवादन करते हैं उनकी आयु, विद्या, बल, बुद्धि, आरोग्यता, यश की उत्तरोत्तर निश्चय वृद्धि होती है। बहुत सम्भव है इन्हीं कारणों से मेरी मातामहि जब मैं 4-5 वर्ष का अबोध बालक था, नित्य संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों को मुझसे अभिवादन कराया करती थी अरे लाला बीधोभूआको (भंगन) राम राम कर ले, अरे हरिया तेने आज जोखी ताऊ को (कहार) राम-राम न करी अब कर ले, इसी प्रकार बाबा जब बाजार को जाते और साथ होता तो जैसा मिलता उससे उसी प्रकार चाचा, ताऊ, बाबा आदि कहकर राम-राम करने का आदेश कर राम राम कराते। मैं 4-5 वर्ष का बालक तो था ही कहता बाबा राम राम? वे लोग मुँह भर आशीर्वाद देते जीते रहो। हम जैसे बूढ़े हो जाओ। इधर मेरे बाबा कहते राम राम करता है कि लट्ठ सा मारता है? यों कहा कर हाथ जोड़कर बाबा जी राम-राम धीरे से, स्वर्गीय बाबूराम जैन का ये व्रत था कि छोटे बड़े, गरीब अमीर, ब्राह्मण शूद्र, स्त्री पुरुष शत्रु मित्र जो कोई भी उनके सम्मुख आता या वे किसी के भी सम्मुख जाते लाला बाबूराम सबसे पूर्व राम-राम करते, उनकी लाघवता अनुकरणीय थी कि वे कभी भी किसी को पहले राम राम करने का मौका ही नहीं देते थे। बड़ी उम्र वाले दोनों प्रकार के लोग बड़े लज्जित होते थे, वे कहा करते थे कि हमारे गाँव के किसी व्यक्ति को गलित कुष्ठ को गया था, उनसे व्रत लिया हुआ था कि गाँव भर के प्रत्येक घर में नित्य सायं प्रातः जाकर घर के प्रत्येक सदस्य का नाम ले लेकर राम राम करना, तब दोनों समय अन्न ग्रहण करना, उसने अपने जीवन के दसियों वर्ष इसी अटल व्रत से बिताये। जीवन के अन्तिम काल में उसका शरीर निरोग हो गया।
गुरुकुल विश्वविद्यालय वृन्दावन के 20-25 वर्ष पुराने किसी उत्सव पर जिसका सम्वत् याद नहीं, सुप्रसिद्ध आर्य मिश्नरी पं. अयोध्या प्रसाद जी पाठक ने अपने व्याख्यान में बताया था कि वे योरोप के किसी सर्वधर्म सम्मेलन में वैदिक धर्म के प्रतिनिधि बनकर गये, सम्मेलन में अभिवादन प्रणाली का प्रश्न उपस्थित हुआ अन्य मतों और देशों की अभिवादन प्रणाली के समक्ष भारतीय अभिवादन प्रणाली का प्रदर्शन इस सुयोग्यता और वैज्ञानिक ढंग से किया कि उपस्थित मण्डली मन्त्र मुग्ध की भाँति, चकित रह गई। जहाँ अन्य देशों में कहीं टोपी उतारकर, कहीं छड़ी उठाकर, कहीं हाथ सीधा तानकर, कहीं जीभ निकालकर तथा अनेक प्रकार के निःसार प्रदर्शन करते हैं। वहाँ एक आर्यवर्तीय प्रथा है, जो समृद्ध मानव शरीर के प्रमुख अंगों को एकत्रित कर कर्म के प्रतीक युगल करो से (पाली) श्रद्धा पुष्पाँजलि बना, शरीर संचालक मस्तिष्क को नत कर, ब्रह्म स्थान हृदय पर सबको एकत्रित कर कृतज्ञतापूर्वक नमस्ते निवेदन करता है तब संपर्क में आये व्यक्ति का हृदय पुलकित हृदय से गदगद हो जाता है।
लगभग 35-40 वर्ष की बात होगी मुरसान स्टेशन पर एक वयोवृद्ध सज्जन पारस्परिक वार्तालाप के सिलसिले में किसी विद्यार्थी से कह रहे थे कि प्राचीन काल में यहाँ राजपुरुषों, सम्मान्य राज्याधिकारियों प्राप्त संन्यासियों के सम्मुख उपस्थित होने पर जूता छोड़कर प्रथम अपने पूज्य पिता जी का नामोच्चारण करते हुए अपना नाम लेकर हाथ जोड़कर अभिवादन करने की प्रथा प्रचलित थी।
माता-पिता, गुरु, अतिथि, संन्यासी आदि गुरु जनों को किस प्रकार अभिवादन किया जाता है इसका तरीका अशिक्षित लोग भी जानते है। जब मैं अपने पूज्य पिता जी को, जो अन्तिम दिनों संन्यासी हो गये थे उसके चरण स्पर्श कर रहा था, जो एक अशिक्षित व्यक्ति ने जूता छोड़कर, हाथ जोड़कर मस्तक नवाकर, दोनों हाथों को उलट-पलट कर चरण स्पर्श करने का अभिवादन मुझे सिखाया। आज तो वह सब प्रथाएं लुप्त होती चली जा रही है।
अभिवादन की भारतीय संस्कृति को पुनः प्रचलित करने के लिए आचार्य जी इतना प्रयत्न कर रहे हैं यह देखकर मेरा हृदय गदगद हो जाता है।
(श्री केशवदेव शर्मा बी.ए. साहित्य रत्न)
आज हमारा समाज पतनोन्मुख हो रहा है, जिसमें आन्तरिक क्लेश होता है पर साथ ही यह विश्वास भी है कि समय-समय पर महान पुरुषों ने अपने व्यक्तित्व से मनुष्य और समाज को पतन के मुख से बचाया है और बचाते रहेंगे। संसार का इतिहास ऐसे महापुरुषों के आदर्शों में भरा पड़ा है। जब-जब मानव जाति अपने पतन की ओर द्रुत गति से बढ़ी है तभी-तभी महापुरुषों का आविर्भाव हुआ और अपने चरित्र की विशेषताओं से उनको शान्ति का मार्ग दिखाया सत पथ पर चलने वाले की प्रेरणा देकर मानव धर्म की समय-समय पर रक्षा की।
इस बात का उल्लेख श्री कृष्ण भगवान ने स्वयं गीता में किया है। कि जब-जब मानव धर्म की हानि होती है तभी मैं पृथ्वी पर आता हूँ। धर्म का सम्बन्ध संस्कृति से विशेष है। धर्म के पतन से देश की संस्कृति भी पतन को प्राप्त हो जाती है। भगवान कृष्ण ने अपने वाक्यों को स्थिर रखने के लिए मथुरा में जन्म लेकर दुष्टों का दमन किया।
ऐसे प्रयत्न समय-समय पर विभिन्न प्रकार से होते रहते हैं। सृष्टि के नैतिक सन्तुलन को ठीक करने के लिए भगवान उस समय की आवश्यकतानुसार अपने वैभव को अवतरित करता है। आज के समय की आवश्यकता इस बात की है कि भारत के नैतिक उत्कर्ष के लिए कुछ ऐसी हस्ती उत्पन्न हो, जो अपने उज्ज्वल चरित्र, विचार और कार्यों से लोगों को अपने अनुकरण के लिए प्रेरणा दे सके। केवल व्याख्यान लेख या प्रचार कार्य से यह कार्य पूरा नहीं हो सकता। अनेक संस्थाओं की ओर से बड़े-बड़े प्रचार समारोह एवं जलसे होते हैं, उनमें धूमधाम, भीड़ भाड़, प्रदर्शन तथा मनोरंजन तो खूब होता है पर उनका जनता पर वैसा प्रभाव नहीं पड़ता जैसा पड़ना चाहिए। कारण यही है कि नैतिक शक्ति से परिपूर्ण उज्ज्वल व्यक्तित्व जब तक सामने न आवेंगे अनुकरण करने योग्य आदर्श सामने न होंगे तब तक कोई विशेष प्रभाव जनता पर न पड़ सकेगा।
सौभाग्य से इस बार मुझे ऐसा अवसर देखने को प्राप्त हुआ है जिसका अनुभव करके ऐसा विश्वास होता है कि भगवान भारतवर्ष के चरित्र को ऊंचा उठाने वाले आदर्श व्यक्तित्व उत्पन्न कर रहे हैं। इस बार मैं साँस्कृतिक शिक्षण शिविर में शिक्षा प्राप्त करने के लिए सम्मिलित हुआ। यों मैंने अनेक विषयों पर भाषण सुने हैं पर शिक्षण शिविर में जो प्राप्त था वह अब तक अन्यत्र देखने को नहीं मिला। भाषणों की अपेक्षा व्यक्तित्व और चरित्र की इस शिक्षण की विशेषता थी जिसका हम सब पर विशेष रूप से मुझ पर प्रभाव पड़ा।
आचार्य जी त्याग और तप की एक जीवित मूर्ति है। इनका बालकों जैसा स्वभाव, हृदय को मोहित कर लेता है। विद्या, ज्ञान, अनुभव की दृष्टि से ये जितने ऊंचे हैं उससे बहुत ऊंचा इनका चरित्र है। किसी व्यक्ति के बारे में उसके समीपवर्ती लोग अधिक अच्छी तरह जानते हैं। मैं मथुरा में लम्बे अर्से से रहता हूँ। इस नगर के बच्चे-बच्चे में आचार्य जी के प्रति उच्च भावना तथा अपार श्रद्धा है। उसे देखते हुए यह अनुभव सहज ही लगाया जा सकता है कि उनका व्यक्तित्व कितना निर्मल एवं छिद्ररहित है। जो जितना ही निकट से उन्हें देखता है, परखता है वह उतना ही प्रभावित होता है। मैं शिक्षण शिविर के थोड़े से दिनों ही उनके समीप रहा हूँ। पर इसकी छाप तो कलुषित हृदय पर रजत चाँदनी की भाँति पड़ी है। अनेक व्यक्तियों को देखने और परखने को मुझे अवसर मिलते रहे हैं, पर ऐसे निस्वार्थ एवं परोपकारी व्यक्ति मेरी दृष्टि से नहीं गुजरे। उनका व्यक्तित्व ही है जो इस प्रकार की योजनाओं के इस अन्धकार युग में सफल होने की आशा प्रदान करता है।
इस शिविर में मैंने जितना पढ़ा या सुना उसकी अपेक्षा संचालकों एवं अध्यापकों के व्यक्तित्वों को परखने में अधिक समय लगाया, अधिक प्रयत्न किया। सभी एक अच्छे व्यक्तित्व यहाँ मौजूद थे। श्री रामचरण महेन्द्र, श्री अशर्फीलाल जी मुख्तार, श्री परशुराम जी शर्मा, श्री गौर शंकर जी द्विवेदी सभी की अपनी-अपनी विशेषतायें थीं।
प्रो. रामचरण महेन्द्र जी जितनी उच्च शिक्षा प्राप्त है, उतने ही नम्र हैं। अभिमान आपको छू भी नहीं पाया। पहनावा उढ़ाव की सादगी देखते ही बनती है। मनोविज्ञान शास्त्र के अनुसार जो भाषण उन्होंने दिये उन्हें वे अपने व्यक्तिगत जीवन में भी कड़ाई के साथ पालन करते हैं। यह देखकर हम लोगों को वस्तुतः बड़ी प्रेरणा प्राप्त हुई। अपनी कन्याओं को वे जो पैसे देते हैं, उन्हें फिजूलखर्च न करके जोड़ने की आदत डालने की जो विधि उन्होंने बनाई उससे मैं बहुत ही प्रभावित हुआ हूँ और उसे अपने घर में भी प्रयोग करने का प्रबंध आरम्भ कर दिया है।
डॉ. परशुराम जी की आयु 82 वर्ष की थी पर वे हम में से अनेकों की अपेक्षा अधिक स्वस्थ थे। उनका भाषण नहीं शरीर यह बताता था कि यदि संयम तथा प्राकृतिक आधार पर जीवन यापन किया जाय तो मनुष्य अपने स्वास्थ्य की कितनी रक्षा कर सकता है। उनकी और भी कितनी ही विशेषतायें थी।
श्री अशर्फीलाल जी वकील होते हुए भी गम्भीरता की साक्षात मूर्ति हैं। वकालत जैसा व्यवसाय उन्हें दुर्भाग्य से ही मिला है, अन्यथा उनके सभी लक्षण सन्त के हैं। जब मुझे यह बताया गया कि आप शीघ्र ही वकालत छोड़कर गायत्री तपोभूमि की साँस्कृतिक योजनाओं को पूर्ण करने में अपना शेष जीवन लगाने की तैयारी कर रहे हैं तब यह जाना कि उनके हृदय में कितनी गहराई तक त्याग भावनायें प्रवेश कर चुकी है।
द्विवेदी जी की प्रसन्न मुद्रा देखते हुए बनती थी वे स्वयं प्रसन्न रहते और अपने प्रसन्न स्वभाव के कारण शिविर के सभी शिक्षणार्थियों में प्रसन्नता भरे रहते नरमेध के लिए अपने को बलि देने की तैयारी में लगाये हुए। पं. तारकेश्वर जी भी बहुत ही कम बोलते देखे गये पर संस्था की जिम्मेदारियों को उन्होंने अपने ऊपर ओढ़ सा रखा था। उनके समृद्ध विशाल हृदय में कितनी भावनायें लहरें ले रही हैं उसे कोई कवि या अंतर्राष्ट्रीय व्यक्ति ही माप सकता है। गंगा तुल्य परम साध्वी वयोवृद्ध माता द्रौपदी देवी जी अन्नपूर्णा की साक्षात अवतार थीं, छात्रों को उनका भोजन ऐसा ही लगता था मानो सभी को माता के हाथ की रसोई प्राप्त हो रही है।
एक क्या सभी प्रबन्धक ही नहीं छात्र भी-प्रशंसनीय व्यक्तित्व के थे। उत्तम प्रकार के इतने व्यक्तित्व गायत्री तपोभूमि में रहे तो ऐसा लगता था कि स्वर्ग यही है। सुनते है कि मानव शरीर को ‘सुर दुर्लभ’ कहा गया है। ऐसी परिस्थितियों में रहने के सुख को प्राप्त करने के लिए ही देवता तरसते होंगे। शिविर की समाप्ति पर विदाई के समय सभी का हृदय भर आया था। ऐसी पुण्य परिस्थितियों को छोड़ने के लिए किसका जी चाहता होगा, पर संसार की कठोर नियति से विवश होकर मनुष्य को प्रिय छोड़ने और अप्रिय ग्रहण करने के लिए विवश होना पड़ता है। उन दिनों की घटनायें और स्मृतियाँ मेरे हृदय को आज भी कोमल भावनाओं से द्रवित कर देती है।
(श्री सत्यदेव शर्मा)
सरस्वती यज्ञ और साँस्कृतिक शिक्षण शिविर की योजना यद्यपि छोटी सी ही थी पर उसके परिणाम अतीव महत्वपूर्ण और आशाजनक हुए हैं। जो छात्र यहाँ इन थोड़े समय के कार्यक्रम में शिक्षा प्राप्त करके गये हैं। उन्होंने अपने ऊपर पड़े हुए प्रभाव की जो अभिव्यक्तियाँ लिखी हैं उनसे प्रतीत होता है कि कोई भी छात्र ऐसा नहीं गया है कि जिस पर व्यक्तिगत रूप से इस वातावरण की गहरी छाप न पड़ी हो और जिसकी विचारधारा एवं कार्यक्रम में असाधारण परिवर्तन न हुआ हो।
जलालपुर न्योरी निवासी श्री लक्ष्मीनारायण निगम ने लिखा है “मैंने अपने जीवन में से क्रोध को हटाने और मिटाने का निश्चय कर लिया अब कभी किसी घटना या व्यक्ति पर क्रोध आता है तब कुछ समय सद्बुद्धि रूप गायत्री माता का ध्यान करता हूँ। ऐसा करने से क्रोध का उबाल हट जाता है फिर शान्त चित से उस क्रोध देने वाली घटना की तह तक जाकर उसके रुधार का प्रयत्न करता हूँ। इस प्रकार व्यक्तियों पर क्रोध करके उन्हें शत्रु बनाने की अपेक्षा, समुचित प्रयत्न से उन्हें सुधारने तथा अनुकूल बनाने में सफल हो जाता हूँ। तीन चार योगासन भी नित्य-करने लगा हूँ। इससे स्वास्थ्य में सुधार दिख पड़ता है। स्वादेन्द्रिय पर काबू करना शुरू कर दिया है अब मैं स्वाद की दृष्टि से नहीं उपयोगिता की दृष्टि से ही भोजन करता हूँ। माता पिता तथा गुरुजनों का नित्य प्रातःकाल चरण स्पर्श करना अब मेरा नित्यकर्म बन गया है।
पाली इटावा के श्री प्रेम चन्द्र जी लिखते हैं-आपके शिविर से शिक्षण प्राप्त करके घर आने के बाद मुझ में बहुत परिवर्तन हो गया है। पहले मैं बड़ा क्रोधी तथा अनेक त्रुटियों का भण्डार था पर आपके पास थोड़े ही दिन रहकर खराद पर चढ़ी हुई वस्तु की तरह स्वच्छ हो गया हूँ। अब मैं प्रातः 4 बजे उठकर स्नानादि से निवृत्त होता हूँ और संध्या गायत्री जप करके तब कुछ कार्य करता हूँ। माता पिता के नित्य चरण स्पर्श करना भी अब मेरा नित्य नियम बन गया है। मीठा बोलना और अपनी कार्य शक्ति को बढ़ाना अब ये दो मेरे प्रधान कार्यक्रम हैं।
खेराबाद (सीतापुर) से श्री शुभकार नाथ कपूर लिखते हैं-”जितनी व्यवहारिक शिक्षा मैंने शिक्षण शिविर में प्राप्त की इतनी अब तक विश्व विद्यालय की बी.ए. की पढ़ाई में प्राप्त नहीं कर सका था। मेरे तीन अवगुण तो स्पष्टतः दूर हो गये हैं- (1) मैं बहुत बोलता था पर अब केवल उतना ही बोलता हूँ जितना उपयोगी तथा आवश्यक होता है। (2) हर काम में मुझे बड़ी उतावली होती हैं, जो इच्छा जिस समय उठती उसे जल्द से जल्द पूरा करने का प्रयत्न करता पर अब मैं हर बात पर विचार करना- ठहरना, सोचना, उसके हानि लाभ तथा दूरवर्ती परिणामों पर विचार करके तब उस इच्छा को चरितार्थ करने न करने का अभ्यास डाला है। (3) मेरा स्वास्थ्य बिगड़ रहा था, उसकी ओर समुचित ध्यान भी न देता था अब अपने स्वास्थ्य को ध्यान में रख कर ही आहार विहार की व्यवस्था करता हूँ और भी छोटे-मोटे परिवर्तन मैंने अपने में किये हैं, जिनके आधार पर विश्वास होता है कि मेरे व्यक्तित्व का भविष्य में अच्छा विकास हो सकता है।
पारादान, फतेहपुर के श्री शान्ति स्वरूप वर्मा लिखते हैं- सरस्वती यज्ञ के शिक्षण शिविर में जो सज्जन आये हुए थे उनमें कठोर अनुशासन, आपसी प्रेम भावना सब काम अपने हाथ से करने का स्वावलम्बन शारीरिक परिश्रम करने में आनन्द एवं उत्साह छोटी-छोटी बातों की भी अपेक्षा न करना बड़ों का आदर सादगी आदि का जो प्रत्यक्ष वातावरण देखा उसका मेरे ऊपर प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है। इन सद्गुणों ने मेरे हृदय में अपना स्थान जमा लिया। इन्हें कार्य रूप में परिणित करने और व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए मैं नित्य ही प्रयत्न करता हूँ। धीरे-धीरे ये गुण मेरे आचरण और व्यवहार में प्रकट होते जाते हैं। आशा यह है कि जो कुछ सीखा है उसे मन वचन और कर्म में उतार सकूँगा।
पीपलमण्डी आगरा के श्री महेशचन्द्र माथुर लिखते हैं-”इस शिविर में मैंने वे अमूल्य वस्तुएं प्राप्त की हैं उन बातों का अनुभव किया है जो मेरे लिए स्वप्न में दुर्लभ थीं। यदि ऐसी शिक्षा का अवसर सभी को मिले तो मैं विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि संसार की स्थिति ही बदल सकती है। वहाँ की शिक्षा का ही नहीं वातावरण का भी मेरे ऊपर भारी प्रभाव पड़ा है। यहाँ से आने के बाद मैंने नित्य संध्या करने और गायत्री जप का नियम बना लिया है। अपने आपको हीनता की भावना से मुक्त कर रहा हूँ और आत्मिक महानता को पहचानने तथा आत्मबल बढ़ाने में संलग्न हूँ। भोजन की पवित्रता तथा उपयोगिता पर बारीकी से विचार करके तब उसे ग्रहण करने की आदत पड़ रही है। चार बजे जल्दी सोकर उठने लगा हूँ। अब मैं घर के बड़ों के चरणस्पर्श करके प्रणाम करता हूँ, जिसका करना मेरे लिए पहले एक लज्जा एवं संकोच की बात प्रतीत होने के कारण दुर्लभ ही था। इस शिविर से हमें जो शिक्षायें एवं प्रेरणायें मिली हैं वे इतनी अमूल्य हैं कि कीमती रत्नों से भी उनकी तुलना नहीं हो सकती है।
धौलपुर से श्री प्रकाश मोहन कौशिक लिखते हैं- शिक्षण शिविर का कार्यक्रम बहुत ही सुन्दर था, जिसको विद्वानों ने निर्मित किया था। वहाँ के वातावरण में रहकर मेरे मन एवं शरीर में बहुत परिवर्तन हुए हैं। कुछ दिनों में मेरी बुद्धि मार्क्सवाद के प्रभाव से नास्तिकता की महत्ता को स्वीकार करने लगी थी और ईश्वर के अस्तित्व पर से मेरा विश्वास हटता जा रहा था। प्राचीन भारतीय संस्कृति की प्रत्येक वस्तु मेरी विचारधारा में केवल अन्धविश्वास और पाखण्ड मात्र रह गई थी। किन्तु पूर्व सुसंस्कारों ने सत्य की खोज के लिए प्रेरित किया और तपोभूमि में आने का अवसर प्राप्त करके मुझे आस्तिकता के पक्ष में ठोस तर्क, प्रभाव, कारण तथा तथ्य प्राप्त हुए, जिनके होने की मुझे स्वप्न में भी आशा न थी। यदि आस्तिकता की उपयोगिता को ऐसे ही तर्क और तथ्यों समेत उपस्थित किया जाय जैसा कि इस शिविर में किया गया तो संसार में से नास्तिकता का खतरा दूर हो सकता है। अब मैं अपने जीवन को भारतीय संस्कृति के आधार पर ढालने का प्रयत्न कर रहा हूँ।
चंदवाड़ होशंगाबाद के श्री गौरी शंकर द्विवेदी लिखते हैं- शिक्षण शिविर में मैं भी गया था। तपोभूमि के वातावरण का ऐसा प्रभाव पड़ा कि मैं उसे जीवन भर छोड़ना न चाहता था, परिस्थितियों वश घर लौटना पड़ा पर मेरा मन अब भी वहीं है और सोचता हूँ कि प्रतिवर्ष इस वातावरण में कुछ दिन रहने का सुयोग मिल जाया करे तो कितना उत्तम हो। आगे के लिए मैं ऐसा ही कार्यक्रम बनाने भी वाला हूँ। इन थोड़े से दिनों में जो पढ़ा गया वह इतना अधिक था यदि कोई निरन्तर केवल पढ़े ही तो छः महीने में भी इतना पढ़ नहीं सकता, कम से कम समय में अधिक से अधिक जानकारी देना यहाँ की शिक्षा की एक मौलिक विशेषता थी।
तपोभूमि के पवित्र वातावरण में रहने से वहाँ के अमृतोपम जलवायु सेवन से मेरा स्वास्थ्य निखर आया। पाचन शक्ति इतनी तीव्र हो उठी कि भोजन के समय से बहुत पहले ही कड़ाके की भूख लगती है ऐसा उससे पहले कभी सम्भव न हुआ था। वहाँ से आने के साथ मैं सुविस्तृत विचारों का कार्यक्रम साथ लेकर लौटा हूँ और उसे इस क्षेत्र में विचरण करने जा रहा हूँ। घर रहता हूँ। पर बहुधा रात को गायत्री तपोभूमि स्वप्नों में दिखा करती है।
पानीपत से श्री रामलाला जी लिखते हैं- शिक्षण शिविर में आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से मैं गया था, जो मुझे भली प्रकार प्राप्त हुई। दुर्वासनाओं को हटाने का प्रत्यक्ष लाभ अध्यात्म ज्ञान में है वह जिसे प्राप्त हो जाता है वह कठिनाइयों में भी हंसते रहने की आन्तरिक दृढ़ता प्राप्त कर लेता है। यहाँ की शिक्षा में ऐसे ही उपदेशों की प्रधानता थी। जैसे बर्तन पर कलई करने वाला बर्तन को रगड़ कर उसका मैल छुड़ाता और उसे कलई करके चमकाता है। वैसे ही मेरे मन और अन्तःकरण के मैल और विकार दूर होकर दैवी गुणों और ज्ञान रूपी कलई से मेरा हृदय ऐसा चमका दिया है। मानो मेरी दुनिया ही बदल गई हो। मुझे मनोवाँछित शान्ति प्राप्त हुई है। मैं तो अपने को ऐसा कृत्य-कृत्य मानता हूँ कि यदि अपने प्राणों की भेंट भी दे दूँ तो भी उस उपकार से कभी उऋण न हो सकूँगा।
मेरे घर में बहुधा पारिवारिक कलह बना रहता था, जिसके कारण धर्मपत्नी बहुधा बड़ी क्रुद्ध असन्तुष्ट और चिन्ताग्रस्त रहती थी। अब मथुरा से शिक्षा ग्रहण करके वापिस आने के बाद मैंने ऐसी योजना तथा व्यवस्था बनाई है जिस पर सबको चलना पड़ता है। तदनुसार सभी प्रसन्न और सन्तुष्ट हैं। धर्मपत्नी अक्सर कहती रहती हैं कि “अच्छा हुआ जो आप मथुरा चले गये जिससे हमारा जीवन आनन्दमय बन गया। मथुरा से आने के बाद मैंने अपने जीवन क्रम में कुछ सुधार और संकल्प किये हैं। आशा है कि प्रभु उन्हें सफल बनाने में सहायता करेगा।
धौलपुर से श्री जगदीश चन्द मिश्र लिखते हैं- तपोभूमि में जितनी तथा जैसी शिक्षा की आशा करता था वास्तव में उससे कहीं अधिक उच्चकोटि की शिक्षा मुझे मिली। मनुष्य के चरित्र का निर्माण करने के लिए जिन बातों की आवश्यकता है उन सबका आयोजन किया गया था। समय के एक-एक क्षण का सदुपयोग किया जाता था और बताया जाता है कि समय ही जीवन है। समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना ही जीवन को सफल बनाने की कला है। उन थोड़े दिनों में समय के महत्व को मैंने समझा और जरा सा भी समय व्यर्थ बर्बाद न हो उसका ध्यान रखता हूँ। अनेक बातों में मेरा चरित्र बन रहा है। मानसिक लाभ के साथ-साथ शारीरिक लाभ भी हो रहा है। पहले मैं सुस्त रहता था, श्रम से बचता था आलस्य भी करता था पर अब यह बात नहीं रही। व्यायाम रोज करने लगा हूँ। मधुर व्यवहार करना, मीठा बोलना, हिलमिल कर चलना, मिल बाँट कर खाना ऐसे ऐसे गुण मुझ में नये सिरे से पैदा हो रहे हैं। जो भावनाएं मथुरा से लेकर लौटा हूँ वे यदि कार्य रूप में आ गईं तो निश्चय ही हमारे भाग्य का एक नवीन पथ प्रशस्त हो सकता है।
डबरा (ग्वालियर) से श्री जमुना प्रसाद बड़ौरिया लिखते हैं- शिक्षण शिविर में केवल 11 दिन मैं रहा पर इतनी छोटी अवधि में ही बहुत कुछ प्राप्त किया। ऐसी कोई शिक्षा बाकी नहीं रही जो जीवन का उत्तम निर्माण करने में सहायक होती है। जो कुछ 11 दिन में भी उतना नहीं सीख सकते। भाषण अनेक जगह सुने हैं पर यहाँ के प्रवचनों में यह विशेषता थी कि वे तीर की तरह हृदय के भीतर कौने तक घुस जाते थे और अपना प्रभाव स्थायी रूप से छोड़ते थे। ऐसे उत्तम आयोजन में सम्मिलित होकर मैं अपने को धन्य मानता हूँ। मेरे ऊपर भी अन्य छात्रों की भाँति बड़ा उपयोगी प्रभाव इस शिक्षा का पड़ा है।
फतेहपुर जिला के पारादान निवासी श्री रामशंकर वर्मा लिखते हैं- तपोभूमि में शिक्षा पाकर आने के बाद मेरा जीवन क्रम ही बदल गया है। वहाँ के सत्संग में मुझे जो लाभ प्राप्त हुआ है उसे मैं कभी भी भूल नहीं सकता वास्तव में जीवन को उत्तम प्रकार से जीने के लिए ऐसी ही शिक्षा की आवश्यकता है, मुझ में जो भी बुरी आदतें थीं वे इसी शिक्षा के प्रभाव से जाती रहीं। पहले मेरा जीवनक्रम बहुत ही अव्यवस्थित था। दिन के 8 बजे सोकर उठना 10 बजे तक टट्टी जाना, नाश्ता करना फिर बिस्तर बिछाकर सो जाना। दोपहर को दो बजे उठना फिर स्नान करके भोजन करना, तमाखू खाना, एक दो घण्टे आराम करना, शाम को थोड़ा घूमने जाना, खाना खा पीकर सो जाना। घर का कोई आदमी काम धन्धा करने के लिए कहे तो उससे लड़ने को तैयार रहना यही मेरा दैनिक कार्यक्रम था। प्रायः बिल्कुल ही निट्ठला रह कर जीवन नष्ट कर रहा था। पूर्वजों की जायदाद और घर वालों के प्रयत्न से रोटी चैन से मिल जाती थी। फिर मैं कोई काम करता भी क्यों? पर अब यह क्रम बदल गया है। समय पर पूरा उपयोग करने का कार्यक्रम बना लिया है, जिसके कारण घर भर मुझ से प्रसन्न रहते हैं, पहले जो लोग निन्दा किया करते थे अब प्रशंसक बनते जा रहे हैं।
खण्डवा सी.पी. से श्री माँगीलाला जुगनाला केसनिया लिखते हैं- सरस्वती यज्ञ में मैंने आदि से अन्त तक भाग लिया वहाँ की कार्य पद्धति एवं कार्यक्रम देख कर अतीत काल का गुरुकुल प्रतीत होता था। इस शिक्षा सत्र के दिनों मथुरा रह कर जो अनुभव मैंने प्राप्त किये हैं भुलाए नहीं भूलते। बार-बार वे स्वर्गीय दृश्य हमारे आँखों के आगे घूमते रहते हैं। मेरे ऊपर इस शिक्षा का बहुत भारी प्रभाव पड़ा है। मेरा भोजन अब सात्विक होता है। चाय, पान, बीड़ी, तमाखू आदि व्यसन जो बहुत समय से लगे हुए थे अब बिल्कुल छूट गये हैं। प्रतिदिन के कार्यक्रम में उद्देश्यों तथा आदर्शों के पालन का बड़ी सावधानी से ध्यान रखता हूँ।
राँक गतौरा से श्री रमाशंकर गुर्दवान लिखते हैं- मैं अपने को अत्यधिक भाग्यवान समझता हूँ कि मैं साँस्कृतिक शिक्षा सत्र में शामिल हुआ। मैं जन्मजात चाय का आदी था सुबह बिना चाय के मुझे पाखाना नहीं होता था। मथुरा में मुझे न चाय की जरूरत पड़ी न किसी और चीज की। पान का तो मैं पूर्ण आदी था पर मैंने वहीं से पान न खाने का संकल्प किया। मैं अक्सर भाँग पिया करता था पर अब मैंने वह भी बिल्कुल त्याग दी है। मथुरा से घर लौटा तो शरीर का वजन कई पौण्ड बढ़ा और स्वास्थ्य सुधरा। मानसिक और आत्मिक दृष्टि से जो परिवर्तन मेरे में हुए हैं वे ऐसे हैं जिनकी कल्पना तक करना मेरे लिए कठिन था। घर आने पर मुझ में अनेक परिवर्तन हो चुके है तथा धीरे-धीरे और भी होते जा रहे हैं।
मथुरा डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का वायस चेयरमैन, अनेक शिक्षा संस्थानों का जन्मदाता तथा जीवन भर सार्वजनिक सेवाओं में लगाने वाली तपस्विनी द्रोपदी देवी शर्मा के हाथों में शिक्षण शिविर में भोजन का प्रबन्ध था। जो उन्होंने बड़े ही सुचारु रूप से पूर्ण किया। वे शिक्षण शिविर में भी सम्मिलित रहीं। लिखती हैं कि श्री गायत्री तपोभूमि द्वारा आयोजित जीवन निर्माण की व्यवहारिक शिक्षा देने वाले शिविर में आदि से अन्त तक मैं सम्मिलित रही। इससे मेरे हृदय की चिर पिपासा तृप्त हुई। आज जबकि संसार का नैतिक स्तर गिर कर रसातल की ओर जा रहा है तब ऐसे ही ऋषियों के आश्रमों द्वारा भटकते समाज, डूबते राष्ट्र, डगमगाते विश्व के उद्धार की आशा की जा सकती है। भौतिक उन्नतियों के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति की भी अतीव आवश्यकता है। इस आवश्यकता को पूरी करने से ही सच्ची उन्नति सम्भव है। जैसा आयोजन यह हुआ था वैसे ही शिविरों की आज प्रत्येक स्थान पर करने की नितान्त आवश्यकता है। पूज्य आचार्य जी की सद्भावनाओं और सत्प्रयत्नों को धन्यवाद करते हुए मैं यही आशा करती हूँ कि वे ऐसे शिविरों द्वारा राष्ट्र निर्माण की एक महती आवश्यकता को पूर्ण करने में अपने प्रभाव का उपयोग करेंगे।
श्री जगदीश प्रसाद भारती बी. ए. लिखते हैं- इस शिविर में रहकर मुझे अनिर्वचनीय मानसिक आनन्द की उपलब्धि हुई। मस्तिष्क में नये विचार आये और पुराने विचारों का परिष्कार हुआ। घोर तमाच्छादित जीवन पथ पर आलोक छा गया। संकीर्णता को त्यागने और सद्गुणों को अभ्यास में लाने के लिए यह हृदय उन्मुख हुआ है। जो शिक्षाएं यहाँ प्राप्त हुई उनकी मेरे मन पर स्थायी छाप लगी है। अब मैं अपने उपकारों एवं सद्व्यवहारों के लिए किसी से कृतज्ञता एवं प्रत्युपकार की आशा न रखकर कर्त्तव्य पालन की दृष्टि ही प्रत्येक कार्य में रखता हूँ फलस्वरूप पहले मुझे जो अपने मित्रों या स्वजनों से खिन्नता रहती थी। वह अब नहीं रहती। सरलता और सादगी के महत्व का समझकर अपने भोजन और वस्त्रों में मैंने बहुत हेरफेर किये हैं। निराशा और चिन्ता छोड़कर अब मैं उत्तम भविष्य बनाने की योजनाएं प्रस्तुत करने में संलग्न रहता हूँ। ऐसा लगता है मानो विचारों की दिशा ही पलट गई हो। प्रातःकाल उठकर माता-पिता के चरण स्पर्श करने चाहिए। इन उपदेशों को मैंने कार्य रूप में परिणित कर दिया है। इससे मुझे अपने ऊपर उनके आशीर्वाद की पुण्य वर्षा होती दिखती है।
श्री सुभाष चन्द्र माथुर लिखते हैं- मैं विद्यार्थी हूँ। स्कूली शिक्षा प्राप्त कर रहा हूँ। जून की छुट्टियों में शिक्षण शिविर का लाभ लिया। अनेक उपदेश वहाँ सुने। उनमें से एक उपदेश मैंने गिरह बाँध लिया है और वह है ब्रह्मचर्य। विद्यार्थी के लिए तो इसे जीवन प्राण ही बताया गया है। स्वास्थ्य, शिक्षा, चरित्र, दीर्घजीवन तथा आत्म कल्याण के लिए ब्रह्मचर्य प्रथम सोपान है। पर खेद है कि आज के दूषित वातावरण का प्रभाव विद्यार्थियों को इस मार्ग से विचलित कर देता है और को विचार जीवन भर दुख भोगते है। शिक्षण शिविर में मैंने ब्रह्मचर्य के लाभ को भली प्रकार समझ लिया है और इस कर्त्तव्य को निष्ठापूर्वक पालन करते रहने का व्रत लिया है।
इसी प्रकार के पत्र प्रायः उन सभी महानुभावों के आये हैं जो इस शिविर में सम्मिलित हुए थे। आमतौर से लोग अपनी वाचालता की छाप दूसरों पर जमाने के लिए भाषण देते हैं और मनोरंजन तथा कौतुहल के लिए लोग उन्हें सुनते हैं। यदि वही बात यहाँ भी रही होती तो निश्चय ही अन्य मनोरंजक आयोजनों की भाँति वह भी एक समय काटने का उपकरण बन जाता। पर वस्तुतः ऐसा हुआ नहीं। इस सत्र में सम्मिलित होने वाला हर व्यक्ति अपने मन में उथल-पुथल लेकर गया है और जो कुछ उसने सुना समझा है, देख पाया है उसे कार्य रूप में लाने के लिए ईमानदारी के साथ संलग्न है। उस व्यक्ति का मनोबल वातावरण संस्कार, अवसर आदि किस दिशा में उपलब्ध होते हैं। इन बातों के ऊपर यह निर्भर है कि वह इन शिक्षाओं से कितना लाभ उठा सकेगा।
ब्रह्मचर्य, सदाचार तथा नर−नारी के बीच पवित्रतम रखने के सम्बन्ध में यह शिक्षा बहुत ही उपयुक्त पथ प्रदर्शन करती हैं।
सिरसा से श्रीमती प्रेमवती देवी लिखती हैं- स्त्रियों के लिए साँस्कृतिक शिक्षण शिविर में व्यवस्था नहीं रखी गई थी फिर भी मुझे सौभाग्यवश उसमें सम्मिलित होने का अवसर मिल गया। जो शिक्षाएं यहाँ सुनीं उनमें नर और नारी के बीच पवित्र सम्बन्ध रहने पर बहुत अधिक जोर दिया जाता रहा। अवैध वासना की हानियों का जो दिग्दर्शन यहाँ कराया जाता रहा यदि उस पर लोग ध्यान देने लगें तो निःसंदेह प्राचीन काल की तरह फिर भी सुदृढ़ ब्रह्मचर्य जीवन का आधार बन सकता है। नारी में माता की भावना की स्थापना गायत्री आन्दोलन का प्रमुख सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के कार्य रूप में परिणित होने पर निःसंदेह पृथ्वी पर आज ही सतयुग का अवतरण हो सकता है। जो कुछ मैंने इस शिविर में सीखा उससे आत्मा के भीतर एक बड़ी तृप्ति अनुभव होती है। क्या-क्या सीखा यह शब्दों में कहने की सामर्थ्य मुझ में नहीं है।
मिश्रित रूप से गुरुकुल प्रणाली की साँस्कृतिक शिक्षा पद्धति अतीव उपयोगी हो सकती है। प्रथम परीक्षण जिस सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ उससे भविष्य की बहुत आशा बंधती है। इस शिविर की सफलता के कुछ कारण यह हैं (1) विद्यार्थियों को केवल पढ़ने लिखने तक ही शिक्षकों का सम्बन्ध न रह कर उनके पूरे दैनिक कार्यक्रम पर अध्यापकों का नियन्त्रण रहना (2) शिक्षा योजना में धार्मिक वातावरण परिपूर्ण रखना, प्राचीन गुरुकुल प्रणाली को वर्तमान समय के अनुकूल सुधारे हुए रूप में प्रयुक्त करना (3) शिक्षकों का अत्यन्त चरित्रवान निस्पृह, त्यागी तथा ऐसे आदर्शवान् होना जिसके व्यक्तित्व की छाप शिक्षार्थियों के अन्तःकरण पर स्वतः ही पड़े और वे उनके प्रति गहरी श्रद्धा रखने को स्वयं ही विवश हों (4) जो कुछ शिक्षा दी जाय वह धार्मिक आधार पर तो दी जाय पर तर्क, प्रमाण, उदाहरण, कारण, परिणाम आदि का बुद्धि मंगल विवेचन करते हुए इस प्रकार समझाया जाय जिससे शिक्षार्थी उचित निष्कर्ष पर स्वयं ही पहुँचें और स्वयं ही यह निर्णय करें कि मेरे लिए किस मार्ग पर चलना कितना लाभदायक तथा हानिकारक है। (5) शिक्षा या परीक्षा आदि की कोई फीस तो ली नहीं जाय। केवल भोजन का भार ही शिक्षार्थियों पर रहे। (6) कुछ आध्यात्मिक विशेष उपचार भी ऐसे अवसरों पर किये जाएं जो शिक्षालय के वातावरण को सूक्ष्म रूप से प्रभावशाली बनावे तथा शिक्षा ऐसे स्थानों पर हो जो स्वयं ऐसे प्रभाव से परिपूर्ण हो। जैसा कि साँस्कृतिक शिक्षण शिविर के अवसर पर “सरस्वती यज्ञ” का आयोजन साथ-साथ चलता रहा। यज्ञ और वेद मंत्रों में, आध्यात्मिक विशिष्ट उपचारों में वह शक्ति सन्निहित होती है। जिसके प्रभाव से वहाँ रहने वालों की मानसिक स्थिति में स्वयमेव अनुकूल परिवर्तन होने लगे। गायत्री तपोभूमि के स्थान को भी विशेष संस्कारों के साथ ऐसा ही प्रभावशाली बनाने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। जहाँ भी ऐसी शिक्षा हो वहाँ इस प्रकार के वातावरण बनाने का ध्यान रखा जाय।
उपरोक्त आधार पर शिक्षा देने का यह प्रथम प्रयास सफल समझा जा सकता है और आशा की जा सकती है कि इस प्रकार दी गई शिक्षा छात्रों की मनोभूमि में महत्वपूर्ण परिवर्तन करके व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक सुख शान्ति का ठोस आधार बन सकती है। विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ देने वाली शिक्षा का प्रसार सर्वत्र बहुत बढ़ रहा है। मनुष्य को अच्छा मनुष्य बनाने की उपेक्षित शिक्षा का यह आरम्भ एक नया प्रकाश पैदा करे, ऐसी माता से प्रार्थना है।
(पं. तारकेश्वर झा ममई, मुँगेर)
आचार्य जी की लिखित पुस्तकें मैंने इलाहाबाद में देखी थीं, उन्हें पढ़कर मेरे ऊपर असाधारण प्रभाव पड़ा और सब काम छोड़कर उन पुस्तकों के प्रचार के लिए घर-घर घूमने लगा, उस ज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के लिए दिन-दिन भर भ्रमण करने लगा।
मैंने जीवन के आरम्भ से ही एक बात सीखी है कि किसी बात के गुण दोष पर पूरे विवेक के साथ विचार करना चाहिए। यदि वह वस्तु त्याज्य है तो उससे सर्वथा अलग हो जाना चाहिए और यदि उपयोगी है तो आगे बढ़ाने के लिए शक्ति भर सहयोग देना चाहिए। राष्ट्रीय काँग्रेस के स्वाधीनता आन्दोलन में भी मैंने अपने जीवन के सर्वोत्तम 10 वर्ष लगाये। अन्तरात्मा ने कहा स्वराज्य आवश्यक है इसके लिए प्रयत्न करना हर भारतीय का कर्त्तव्य है। इसी आन्तरिक पुकार कर मैंने कदम आगे बढ़ाये और अनेक कष्टों को उस उद्देश्य के लिए निरन्तर लम्बे अर्से तक सहन करता रहा।
यों घर की अच्छी स्थिति है, कई बड़े प्रतिष्ठित स्थानों, पदों पर काम कर चुका हूँ पर भौतिक उन्नति तथा स्थिरता इसीलिए नहीं हो सकती कि जब अन्तरात्मा ने किसी कर्त्तव्य पालन के लिए पुकारा तो अपने भावना-मय हृदय को रोक न सका। सत्य और कर्त्तव्य यही दो रस्सियाँ ऐसी हैं जिनके द्वारा अपने को बंधा हुआ मैं मानता हूँ और ये रस्सियाँ जिधर खींचती है उधर ही पाशबद्ध पशु की तरह खिंचता चला जाता हूँ। यही गतिविधि अब तक मेरे जीवन की रही है।
अखण्ड-ज्योति का गायत्री साहित्य पढ़ कर मेरी अन्तरात्मा ने कहा- आत्मा की पवित्रता में व्यक्ति के सच्चे विकास की सारी योजनाएं सन्निहित है, वह वह पवित्र गायत्री महामंत्र की शिक्षा एवं साधना को अपनाकर प्राप्त की जा सकती है। ऋषियों ने इसी आधार को अपना प्रथम लक्ष्य माना था और वे अपना तथा संसार का बहुत कुछ कल्याण करने में समर्थ हो सके थे। मुझे लगा कि उस प्राचीन गौरव को प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक आधार है इस मान्यता के आधार पर मैं गायत्री उपासक बन गया। गायत्री ज्ञान की अधिक पिपासा मुझे मथुरा खींच लाई। यहाँ केवल दर्शनों को आया था पर दर्शनों के बाद वापिस लौटना सम्भव नहीं हो सका।
आचार्य जी ने नरमेध की योजना समझाई। उन्होंने बताया कि संसार में धार्मिक वातावरण उत्पन्न करने के लिए सच्चे आत्मत्यागी मनुष्य चाहिए। यों त्यागी कहलाने वाले, 56 लाख की सेना घर-घर भीख माँगती फिरती है। अनेक लोक सेवक कहलाने वाले व्यक्ति लोकेषणा-कीर्ति, प्रतिष्ठा, नेतागिरी, पदवी के भूखे हैं। अनेक ऐसे सनकी हैं जो त्यागी तो हैं पर अपनी डेढ़ चावल की खिचड़ी अलग ही पकाते फिरते हैं, योजना बद्ध संगठित एवं ऋषि प्रणीत मार्ग पर चलाने में उनकी अपनी सनक प्रधान रूप से बाधक रहती है। कितनों ने तो कठिन परिश्रम करने पर भी भर पेट भोजन न पाने के कारण जन्मजात त्यागी है। ऐसे तो लाखों करोड़ों त्यागी इस देश में सर्वत्र मिल जायेंगे, पर उच्च भावनाओं से प्रेरित, आन्तरिक दुर्बलताओं से मुक्त, स्थिर मन से एक लक्ष्य में जुट जाने वाले निष्ठावान व्यक्तियों की बड़ी भारी कमी है। महात्मा गाँधी ऐसे केवल 100 मनुष्य ढूँढ़ते रहे पर उन्हें हजारों लाखों नेताओं और स्वयं सेवकों में से केवल 100 व्यक्ति ऐसे न मिल सके जो उपरोक्त कसौटी पर खरे उतरते। ऐसे व्यक्ति जो उपरोक्त कसौटी पर खरे उतरे कोई वातावरण बनाने में समर्थ हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को ढूँढ़ने के लिए आचार्य जी का मन बहुत ही तड़प रहा है। वे अपनी जैसी लगन और तड़पन के कुछ और साथी चाहते हैं जिनको साथ लेकर व महान कार्यक्रम को पूर्ण कर सकें। ऐसी आत्माओं का आह्वान करने के लिए उन्होंने नरमेध का आयोजन सोचा है। आध्यात्मिक पुनरुत्थान के लिए सच्चे कार्यकर्ताओं को मिलजुल कर उन्होंने यह एक सार्वजनिक चुनौती उपस्थित की है।
निश्चित रूप से व्रतधारी, आत्मदान करने वाले, जीवन को एक लक्ष्य विशेष के लिए संकल्प कर देने वाले व्यक्ति ही किसी कार्यक्रम को निष्ठापूर्वक अब तक निबाहने में समर्थ हो सकते हैं। अन्यथा मानसिक उचाटें उन्हें इधर से उधर डुलाती रहती है। आज यह तो कल वह वे सोचते और करते रहते हैं संकल्पपूर्वक आत्मदान करने वाले व्रतधारी इस प्रकार की उचाटों से बच जाते हैं, और एक ही दिशा में उनका मन वचन और कर्म लगा रहता है। तदनुसार कार्य भी बहुत होता है और परिणाम भी महान ही होते हैं। यह सब बातें आचार्य जी ने मुझे विस्तारपूर्वक बताई और ऐसे व्यक्ति ढूँढ़ने पर भी न मिलने की अपने वेदना को रुंधे गले से अभिव्यक्त किया। उन्होंने भरे हुए कण्ठ से कहा एक समय में लोग परमार्थ के लिए अपनी हड्डियाँ देते थे शरीर का माँस देकर पक्षी के प्राण बचाते थे लोक कल्याण के लिए रचे हुए नरमेधों में अपनी आहुति देते हुए प्रसन्नता अनुभव करते थे, पर आज तो वैसे लोग रह नहीं गये हैं। ग्राही विरागी सभी एक से एक बढ़कर स्वार्थी हैं। कोई धन के लिए, कोई वंश के लिए, स्वर्ग के लिए, स्वार्थ साधन में लगे हुए हैं पर धर्म, आध्यात्म, संस्कृति एवं सार्वजनिक उत्कर्ष की परमार्थ भावनायें जिनमें हों ऐसे व्यक्ति ढूँढ़े नहीं मिल रहे हैं।
जिस प्रकार आचार्य जी अपने साथी ढूँढ़ने में निराश आँखों से चारों ओर ताकते हैं उस प्रकार प्राचीन काल में ऋषियों को नहीं ताकना पड़ता था। याचना पर अनेक प्राणवानों के प्राण उन्हें मिल जाते थे पर आज कौन इतना त्याग करेगा? इस निराशा पर मुझे अतीव खेद हुआ और आन्तरिक चोट लगी। भीतर से पुकार उठी ऐसे उपयोग कार्य के लिए क्या तू अपना जीवन नहीं दे सकता? कुछ देर सोचने पर यही उत्तर अन्तरात्मा ने दिया-अवश्य ही ऐसे पुनीत कार्य के लिए एक क्षण भंगुर शरीर को दिया जा सकता है। काल के गाल में क्रीड़ा करने वाले हम गूलर फल के कीड़े यदि ऐसे पुनीत कार्य में अपना जीवन लगा दें तो यह त्याग नहीं सौभाग्य ही है। यह हमारा दान नहीं वरन् जीवन को धन्य बनाने वाला दैवी वरदान ही है। कई दिन अनेक दृष्टियों से विचार करने के पश्चात् मैंने निश्चय कर लिया कि मैं अपने का इस नरमेध के लिए पेश कर दूँ। अपने संकल्प की सूचना आचार्य जी को दे दी और अपनी मानसिक स्थिति की परीक्षा देने के लिए अब मैं गायत्री तपोभूमि में ही एकनिष्ठ भाव से निवास कर रहा हूँ।
प्राचीन परम्पराओं का लोप न होने देने के लिए मुझे अपना जीवन देना ही चाहिए लोग अपना सर्वस्व परमार्थ के लिए दान करते रहे हैं। ऐसे असंख्य उदाहरण प्राचीन काल से उपलब्ध हैं। इस परम्परा को समाप्त न होने देना हमारा कर्त्तव्य है। मैं सत्य और कर्त्तव्य की रस्सियों से बंधा हुआ -इन्हीं के खिंचाव से खिंचता हुआ पशु अपने को मानता रहा हूँ। यज्ञ पशु बनने में मुझे और सोच विचार नहीं करना है। माता गायत्री और पिता यज्ञ से निर्मित इस शरीर और मन को दे डालने का संकल्प लेकर वस्तुतः आज मैं अपने भीतर एक प्रसन्नता भरा आत्मसंतोष अनुभव करता हूँ। और प्रतीक्षा कर रहा हूँ कि कब यज्ञ भगवान के सम्मुख इस नश्वर शरीर को शास्त्रोक्त रीति से समर्पण करके कब अपने को धन्य मानूँगा। पर अपने दाएं, बाँये ओर देखता हूँ कि और कोई मेरे साथी न बनेंगे? क्या अकेला मैं ही? नहीं भीतर से कोई कहता है मेरी जैसी अन्तरात्मा औरों में भी होगी और ऐसा नहीं हो सकता कि किसी और का कदम इस मार्ग पर न बढ़े। और भी लोग आगे आवेंगे और गायत्री माता तथा यज्ञ पिता की विजय ध्वजा फहराने के लिए एक प्रभावशाली टुकड़ी प्रस्तुत होगी कार्य की महत्ता और लक्ष्य की उपयोगिता को देखते हुए औरों की अन्तरात्माएं भी ऐसी भी प्रेरणा तथा पुकार करेंगी और निकट भविष्य ही बता देगा कि वीर विहीन मही अभी नहीं हुई है।
साँस्कृतिक शिक्षा का विद्यालय जब तक स्थायी एवं नियमित रूप से न चलने लगे तब एक ऐसा निश्चय किया गया है कि थोड़े-थोड़े दिन बाद ऐसे शिविर किये जाते रहें। आगामी शिविर आश्विन की नवरात्रियों में रखने का निश्चय किया है। यह आश्विन सुदी 1 से लेकर आश्विन सुदी 9 तदनुसार तारीख 27 सितम्बर सोमवार से लेकर तारीख 6 अक्टूबर बुधवार तक 10 दिन रहेगा।
नवरात्रि की पुण्य बेला आत्म निर्माण के लिए बहुत ही उत्तम अवसर है। इन दिनों पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन-ग्रह नक्षत्रों की विशिष्ट किरणों के आगमन पृथ्वी के विशेष राशि स्थल पर भ्रमण करते हुए पहुँचने आदि अनेक सूक्ष्म विज्ञान सम्मत कारणों से कुछ ऐसा अदृश्य वातावरण बन जाता है कि उन दिनों कुछ कार्य बहुत ही सफल होते हैं। शरीर की शुद्धि के लिए जुलाव देने आदि का उपचार वैद्य लोग उन्हीं दिनों करते हैं। आध्यात्मिक साधन की सफलता भी उन्हीं दिनों अधिक होती है। मन्त्र सिद्धि, पुरश्चरण, अनुष्ठान, दीक्षा आदि कार्यों के लिए तो यह समय सर्वोत्तम है ही, ऐसे समय में यदि सच्चे मन से सच्ची आत्माओं में से सच्ची शिक्षा निकले तो उसका प्रभाव दूसरों पर अवश्य ही होता है। समय की, महत्ता की दृष्टि से तथा उन दिनों दशहरा की लम्बी सरकारी छुट्टी भी रहेगी इन दोनों कारणों से अगली शिक्षा सब उपयुक्त समय पर रखी गई है। साधना की दृष्टि से 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान भी घर रह कर गायत्री तपोभूमि में करना अधिक उत्तम है। अनुष्ठान के साथ हवन भी आवश्यक होता है उसकी ठीक व्यवस्था हर कोई नहीं करता। यहाँ बड़े सामूहिक यज्ञ में सबको शास्त्रोक्त हवन में सम्मिलित होने का लाभ मिलेगा।
यों जनेऊ तो अनेक लोग कंधे डाले रहते हैं पर यज्ञोपवीत के रहस्य, मर्म, कार्य, कारण, विधान एवं उत्तरदायित्व को कोई विरले ही जानते हैं। यज्ञोपवीत के नौ धागे नवरात्रि के नौ दिनाँक में सम्बंधित है। एक दिन में एक धागे का रहस्य एवं महत्व समझकर यज्ञोपवीत धारण करके यज्ञोपवीत संस्कार कराने का सच्चा लाभ मिल सकता है। जिन लोगों ने विधिपूर्वक यज्ञोपवीत न लिया हो वे इस अवसर पर अभाव की पूर्ति भी कर सकते हैं। प्राचीन काल में घरों पर उपवीत नहीं होते थे वरन् गुरुकुलों को जाकर ही छात्र वेदारम्भ करते हुए उसे आचार्य के हाथों धारण करते थे।
इन 10 दिनों में सभी आगन्तुकों को 24 हजार गायत्री जप का लघु अनुष्ठान करना होगा। हवन में सबको भाग लेना होगा तथा गुरुकुलों में रहने की उपयुक्त तपश्चर्या का पालन करना होगा। समय की पाबन्दी अनुशासन का पालन पारस्परिक सद्भाव तथा सेवाभाव सभी के लिए अनिवार्य है। सबको अपना दस दिन का भोजन व्यय आरम्भ में ही जमा करा देना होगा। सभी की पोशाक एक सी रहेगी सफेद कुर्ता और धोती कंधे पर पीले दुपट्टे पाजामा पेन्ट या नेकर साधना या शिक्षा के समय काम में न लाया जा सकेगा। तपोभूमि में सीमित व्यक्तियों के लायक स्थान है इसलिए जिन्हें आना हो उन्हें अपना पूरा परिचय, नाम, पता, आयु, जाति शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यवसाय आदि सब बातों के सहित लिखना चाहिए। एक छोटी सीमित संख्या में ही व्यक्तियों के लिए वहाँ व्यवस्था हो सकती है। इसलिए जिन्हें आना हो उन्हें पहले ही स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति पत्र प्राप्त किए कोई सज्जन न आवें।
इस दस दिवसीय ज्ञान सत्र में लघु गायत्री अनुष्ठान, यज्ञ, यज्ञोपवीत शिक्षा आदि धार्मिक कृत्यों के साथ-साथ मथुरा वृन्दावन के प्रमुख स्थानों के दर्शन तथा परिचय भी होगा। आध्यात्मिक, धार्मिक, साधनात्मक प्रवचनों के अतिरिक्त जीवन को उत्तम बनाने के लिए व्यवहारिक एवं मनोवैज्ञानिक शिक्षा की भी व्यवस्था रहेगी। पिछले शिक्षण शिविर में जिन विषयों पर शिक्षा दी गई थी उन सबका भी समावेश रहेगा। अधिकारी, अनुभवी और सुलझे हुए विद्वानों के प्रवचन सुनने एवं अपनी व्यक्तिगत समस्याओं पर परामर्श करने का यह सर्वोत्तम अवसर है। पिछले शिविर में सीमित संख्या में ही छात्र लिये गये थे, इसलिये अनेक प्रार्थना पत्र अस्वीकृत किये गये थे। इस बार भी वैसी ही स्थिति रहेगी, इसलिए जिन्हें आना हो पहले से ही स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
अखण्ड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के सदस्यों को समय-समय पर हम यथा अवसर प्रेरणा देते रहते हैं, कार्यक्रम सुझाते रहते हैं तथा योजनाएं करते हैं। परिजनों की हमारे प्रति जो श्रद्धा सद्भावना ममता तथा आत्मीयता है उसके आधार पर इन कार्यक्रमों पर चलने एवं सहयोग देने पर प्रयत्न भी करते रहते हैं, इस प्रकार परस्पर सहयोग से दिन-दिन सदुद्देश्य की ओर प्रगति होती रहती है। यह क्रम आगे और भी उत्साहपूर्वक चलना चाहिए क्योंकि बहुत बड़ा लक्ष्य सामने खड़ा हुआ है उसे छुटमुट कार्यों से ही पूर्ण नहीं किया जा सकता। कंधे से कंधे भिड़ा कर हम लोग अग्रसर होंगे तभी अपने व्यक्तिगत आत्मोन्नति की तथा विश्वव्यापी सुख शान्ति की समस्याओं को हल कर सकना सम्भव होगा। हमारा परिवार इस क्षेत्र में एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिए हुए है इसलिए कार्य भी उसे ही अधिक करना होगा।
गायत्री उपासना, सद्ज्ञान प्रसार, तपोभूमि निर्माण आदि कार्यों के लिए अब तक परिजनों का उत्साहपूर्वक सहयोग प्राप्त होता है। अब एक कदम और आगे बढ़ाया जाता है। अब हमारी इच्छा है कि अपने परिवार के सदस्यों के हर घर से कम से कम एक व्यक्ति मथुरा में साँस्कृतिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए आवे। बाहर के लोगों को तभी यह शिक्षा क्रम व्यापक रूप से अपनाने के लिए कहा जा सकेगा। जब हम अपने परिवार के व्यक्तियों में कुछ आदर्श एवं विशेषता की स्थापना कर सकें। सुधार अपने से आरम्भ होना चाहिए। इसलिए प्राचीन काल की गुरुकुल पद्धति के अनुसार चरित्र निर्माण, आत्मोन्नति, स्वभाव एवं भावनाओं का परिष्कार हमें अपने घर से ही करना उचित है। इसलिए यह चाहना की जा रही है कि अपने परिवार के सभी सदस्य अपने घर का एक व्यक्ति किसी न किसी शिक्षण शिविर में भेजकर साँस्कृतिक शिक्षा प्राप्त करें।
विश्वामित्र-दशरथ से उनके दो पुत्र माँगने गये थे। राजा दशरथ को यह याचना बड़ी कठोर मालूम पड़ी। विश्वामित्र राजा दशरथ को दुख देना नहीं चाहते थे। पर अनेक महत्वपूर्ण कार्यों के लिए उन्हें याचना करनी पड़ी। विश्वामित्र को यह भिक्षा देकर राजा दशरथ का परिवार कुछ घाटे में नहीं रहा था। राजकुमार घर लौटे थे तो अपने साथ प्रसन्नतादायक परिस्थितियाँ ही लेकर लौटे थे। हमारी यह याचना भी वैसी है। यहाँ से शिक्षा प्राप्त करके लौटने वाले छात्र अपने परिवार के लिए प्रसन्नता ही लेकर लौटेंगे।
(पं. जुगल किशोर जी)
जिसने राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया। सब जीवों को मोक्ष मार्ग का निस्पृह हो उपदेश दिया॥1
बुद्ध, वीर, जिन, हार, हर, ब्रह्म या उसको स्वाधीन कहो। भक्ति भाव से प्रेरित हो, यह चित्त उसी में लीन रहो॥2
विषयों की इच्छा नहीं जिनके, आम्य भाव धन रखते हैं। निज पर के हित साधन में जो, निश-दिन तत्पर रहते हैं॥3
स्वार्थ त्याग की कठिन तपस्या, बिना खेद जो करते हैं। ऐसे ज्ञानी साधु जगत के, दुःख समूह को हरते हैं॥4
रहे सदा सत्संग उन्हीं का, ध्यान उन्हीं, का नित्य रहे। उन्हीं जैसी चर्या में, यह चित्त सदा अनुरक्त रहे॥5
नहीं सताऊं किसी जीव को, झूठ कभी नहीं कहा करूं। पर धन वनिता पर न लुभाऊं, सन्तोषामृत पिया करूं॥6
अहंकार का भाव न रक्खूँ, नहीं किसी पर क्रोध करूं। देख दूसरों की बढ़ती को, कभी न ईर्ष्या भाव धरूं॥7
रहे भावना ऐसी मेरी, सरल सत्य व्यवहार करूं। बने जहाँ तक इस जीवन में, औरों का उपकार करूं॥8
मैत्री भाव जगत में मेरा, सब जीवों से नित्य रहे। दीन दुखी जीवों पर मेरे, उर से करुणा स्रोत बहे॥9
दुर्जन क्रूर कुमार्ग रतों पर, क्षोभ नहीं मुझको आवे। साम्य भाव रक्खूँ मैं उन पर, ऐसी परिणित हो जावे॥10
गुणी जनों को देख हृदय में, मेरे प्रेम उमड़ आवे। बने जहाँ तक उनकी सेवा करके, यह मन सुख पावे॥11
होऊं नहीं कृतघ्न कभी मैं, द्रोह न मेरे उर आवे। गुण ग्रहण का भाव रहे नित, दृष्टि न दोषों पर जावे॥12
कोई बुरा कहो या अच्छा, लक्ष्मी आवे या जावे। लाखों वर्षों तक जीऊं या मृत्यु आज ही आ जावे॥13
अथवा कोई कैसा ही भय, या लालच देने आवे। तो भी न्याय मार्ग से मेरा, कभी न पग डिगने पावे॥14
होकर सुख में मग्न न फूले, दुःख में कभी न घबरावे। पर्वत, नदी, श्मशान भयानक, अटवी से नहीं भय खावे॥15
रहे अडोल अकम्प निरन्तर, यह मन दृढ़तर बन जावे। इष्ट वियोग अनिष्ट योग में सहनशीलता दिखलावे॥16
*समाप्त*