(1) इस अंक के साथ अधिकाँश अखण्ड-ज्योति के सदस्यों का चंदा समाप्त हो जाता इसलिए पाठकों से प्रार्थना है कि मनीआर्डर से 2) अपना चन्दा तुरन्त ही से भेज दो। अखण्ड-ज्योति उतनी ही छपनी है जितने उसके ग्राहक होते हैं। अतएव जो सज्जन देरी से चंदा भेजते हैं, उन्हें कई अंकों से वंचित रहना पड़ता है और फाइल अधूरी रह जाती है। इस उलझन से बचने के लिए यह अंक पहुँचते ही चंदा भेज देने की प्रार्थना है।
(2) वी0 पी0 भेजने में ग्राहकों को) बिल्कुल व्यर्थ अतिरिक्त वी0 पी0 खर्च देना पड़ता है। 2) की जगह 3) की वी0 पी0 पहुँचती है। और उसके लौट आने में यह भार हमारे ऊपर पड़ता है। इस व्यर्थ अपव्यय से बचने के लिए वी0 पी0 मंगाने के अपेक्षा अखण्ड-ज्योति का चंदा 2) मनीआर्डर से भेजना में ही दोनों का हित है।
(3) जिन्हें अगले वर्ष ग्राहक न रहना हो वे कृपा पूर्वक पिछले संबंध के नाते एक कार्ड भेजकर अपनी अस्वीकृति लिख देने का कष्ट अवश्य करें। जिन्हें वी0 पी0 मंगाने का ही आग्रह हो वे भी सूचना भेज दें। ताकि उनके लिए वैसी ही व्यवस्था की जाय।
(4) अखण्ड-ज्योति का नया वर्ष जनवरी से प्रारम्भ होता है। जो लोग बीच के महीनों से ग्राहक बनते है उनकी फाइलें भी अधूरी रहती हैं। और अधूरे वर्ष का हिसाब रखने में हमें भी बड़ी अड़चन होती है। जिन की पत्रिका सन् 54 के किसी बीच के महीने से चालू हुई है उनसे प्रार्थना है कि सन् 55 के शेष महीनों का चन्दा तीन आना चार-चार पाई प्रति अंक के हिसाब से भेज कर अपना अगले वर्ष का हिसाब पूरा अवश्य कर ले।
(5) जनवरी का अंक ज्ञान अंक होगा। इसकी लागत चार आने से अधिक है। पर गायत्री ज्ञान प्रचार की दृष्टि से तीन हजार का घाटा उठा कर इसका मूल्य दो आना रखा है। इसको बेचने, दान करने, मित्रों को उपहार देने के लिए अधिक संख्या में मंगाने की गायत्री प्रेमियों से प्रार्थना है। 6) से अधिक के अंक मंगाने पर रजिस्ट्री, डाक खर्च भी हम अपना लगा देंगे। कम अंक मंगाने पर डाक खर्च मंगाने वालों को देना होगा। जो करीब 1) होगा।
(6) चंदा भेजते समय मनीआर्डर कूपन में अपना पूरा पता स्पष्ट अक्षरों में लिखें, घसीट कर लिखे हुए पते ठीक प्रकार पढ़े नहीं जा सके तो कितने ही अंक गलत पते के कारण गुम होते रहते हैं। अपना ग्राहक नम्बर भी अवश्य लिखाना चाहिए। जिन्हें नम्बर याद न हो वे पुराने ग्राहक अवश्य लिख दें।
(7) अखण्ड-ज्योति के सदस्य बढ़ाना दूसरों को कल्याण मार्ग पर अग्रसर करने का एक परम पुनीत परमार्थ कार्य है। साथ ही इससे आपकी पत्रिका की सामर्थ्य और सेवा संभावना भी बढ़ती है। अपने प्रिय जनों को अखण्ड-ज्योति का सदस्य बनाने के लिए कुछ-कुछ सक्रिय प्रयत्न करना हर अखण्ड-ज्योति प्रेमी को अपना आवश्यक कर्त्तव्य मानना चाहिए।
(5) इस वर्ष जिज्ञासुओं के पत्रों का उत्तर देने में करीब 1400) डाक खर्च व्यय हुआ। यदि जिज्ञासु सज्जन उत्तर के लिए कृपा पूर्वक जवाबी कार्ड या लिफाफा भी भेजा करें तो किसी प्रकार आर्थिक उलझनों के बीच जीवित रह सकने वाली अपनी प्रिय पत्रिका को इस बोझ से आसानी के साथ बचा सकते है। यों उत्तर तो हम यथा सम्भव हर पत्र का ही देते हैं। हर पत्र में अपना पूरा पता स्पष्ट अक्षरों में अवश्य लिखना चाहिए। प्रति दिन 10-5 ऐसे पत्र रद्दी में डालने पड़ते हैं, जिनमें पूरा पता नहीं होता।
(6) यहाँ से हर महीने ठीक पहली तारीख को दो बार जाँचकर अंक भेजे जाते हैं। यदि कभी कोई अंक न मिले तो अपने डाकखाने में तलाश करके, उसी मास हमें सूचना देनी चाहिए। ताकि उस अंक को दुबारा भेजने का प्रयत्न किया जाय। कई मास बाद सूचना देने पर वह अंक समाप्त हो जाने की दशा में भेजना सम्भव नहीं रहता।
पत्र व्यवहार का पता-
‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-14 संपादक-श्री राम शर्मा, आचार्य अंक-12
(श्री गंगा प्रसाद श्रीवास्तव)
बुझे असंख्य दीप पर बुझी न ज्योति शृंखला!
अनेक कण उठे, मिले कि शृंग तुँग हो गया,
कि एक-एक बिन्दु में असीम सिंधु खो गया।
इसी तरह अनेक क्षण बँधे कि जिन्दगी बनी,
मगर बँधे न क्षण रहे, खुली न मृत्यु मेखला!
अनेक बार प्राण यह जला, न पर मिटी जलन!
न राह की कभी चुकी, न कभी मिटी थकन!
गरल पिया पियास में, पियास और भी बढ़ी,
मनुष्य यह इसी तरह तृषार्त तृप्ति में पला!
खिले, झरे, प्रसून पर मिटी न वह परम्परा,
अमर्त्य ही रही सदा मरण भरी वसुन्धरा!
न जन्म मृत्यु से बँधा, न मृत्यु जन्म से बँधी,
घिरे तिमिर जलद बहुत, मगर बँधी न चंचला!
न आदि का पता यहाँ, न अन्त का विभाग है,
अनन्त सृष्टि में भरा अनादि एक राग है!
यहाँ न फूल फूल है, यहाँ न धूल धूल है,
अजर यहाँ विनाश, तो अमर यहाँ सृजन-कला!
(श्री स्वामी शिवानन्द जी)
योग उस साधन को कहते हैं जिसके द्वारा व्यक्ति की आत्मा समष्टि की आत्मा से मिलती है। याज्ञवलक्य जी ने योग की परिभाषा करते हुए लिखा है “व्यक्ति की आत्मा और समष्टि की आत्मा के मिलने का नाम ही योग है।”
योग का उद्देश्य मनुष्य को प्रकृति के चंगुल से छुड़ा कर यह अनुभव कराना है कि वह पूर्णरूपेण स्वतन्त्र है। उसको योग परमानन्द के लिए तैयार करता है।
योग में उन क्रियाओं का विस्तृत विवेचन है जिनसे मन की लहरों को नियन्त्रण में रखा जाता है। और उस दिव्य चेतना को प्राप्त किया जाता है। जिसमें पुनर्जन्म के बीज पूर्णतया जल जाते हैं। योगी पूर्णता या स्वतंत्रता को प्राप्त होता है।
शक्ति की कामना, लोभ, काम स्वार्थ और पाशविक वासनाओं ने मनुष्य को सच्चे आध्यात्मिक जीवन से पृथक कर दिया है और उसको भौतिकता में घसीट कर डाल दिया है। अगर मनुष्य सच्चाई और उत्साह के साथ योग के सिद्धान्तों पर चले तो वह पुनः अपनी खोई हुई दिव्यता को उपलब्ध कर सकता है। योग से आसुरी वृत्तियाँ नष्ट होती हैं और दैवी स्वभाव की प्राप्ति होती है।
योग के अभ्यास से तुम्हें उद्वेग और वासनाओं पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। तुम प्रलोभनों को जीत सकोगे। मन को अस्थिर बनाने वाली चीजों को दूर कर सकोगे। योग तुमको मानसिक संतुलन बनाये रखने की सामर्थ्य प्रदान करेगा। उसमें तुम्हें शान्ति और चित्त की एकाग्रता प्राप्त होगी। तुम्हें भगवान का साक्षात्कार होगा और तुम जीवन का सबसे बड़ा सुख प्राप्त कर सकोगे।
योगाभ्यास द्वारा तथा मनोवृत्तियों पर नियन्त्रण करके तुम अनेक शारीरिक मानसिक और दिव्य शक्तियाँ प्राप्त कर सकते हो। यौगिक व्यायाम जैसे यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान द्वारा तुमको अपने शरीर और मन पर पूर्ण नियन्त्रण करना चाहिये। इनके अभ्यास से तुम शरीर और मन की चंचलता से मुक्त हो जाओगे। तुम अनन्त शक्ति और उत्साह प्राप्त करोगे। तुम्हारी आयु बढ़ेगी और तुम यौवन का आनन्द ले सकोगे। तुम्हारा मन शक्तिशाली बनेगा।
संयम से रहो। हृदय में सद्गुणों को स्थान दो। मन की चंचलता दूर करो। चित्त को एकाग्र करने का अभ्यास करो। तुम्हारे अन्दर जो शक्तियाँ गुप्त हैं वे प्रकट होंगी। चर्म चक्षुओं की सहायता के बिना भी तुम देख सकोगे। बिना कानों से सुन सकोगे तुम अपने मन से ही सीधे देखने और सुनने की क्षमता प्राप्त कर लोगे।
योग का मार्ग आन्तरिक है और उसमें प्रवेश करने का दरवाजा तुम्हारा हृदय है। तुम्हारे अन्दर साहस, अध्यवसाय, धैर्य तितिक्षा और आत्मोन्नति की तीव्र कामना होनी चाहिये। कमजोर मनुष्य योग के इस मार्ग पर नहीं चल सकता।
जो मनुष्य योग के इस मार्ग में चलना चाहता है उसे सरल, विनयशील, दयालु, संस्कृत और सहिष्णु होना चाहिए। उसे प्रत्येक स्थान पर सत्य की खोज करनी चाहिए। उसके हृदय में महात्माओं के लिए आदर का भाव होना चाहिए। उसे शास्त्रों में विश्वास होना चाहिये।
अगर तुम योग के मार्ग में सफलता चाहते हो तो तुम्हें कठोर तपस्या करनी होगी। इससे तुम्हारी मानसिक शक्ति बढ़ेगी। तुम्हारे अन्दर पवित्रता आयेगी फिर तुम दिव्य चेतना और चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर सकोगे।
अगर तुम अपने अन्दर छिपी हुई दिव्यता को प्राप्त करना चाहते हो-अगर तुम साँसारिकता के बन्धन से मुक्त होना चाहते हो तो तुम्हें अपने विचारों पर अधिकार पाने की कला को तुम राजयोग द्वारा सीख सकते हो। तुमको सही तरीके से सोचते रहने, बोलने और कार्य करने के तरीके जानना चाहिए। तुम्हें सदाचार से रहना चाहिये। तुम्हें जानना चाहिये कि मन को किस प्रकार बाह्य पदार्थों से हटा कर किसी एक स्थान पर केन्द्रित किया जाता है। तुम्हें धारणा और ध्यान का सही ढंग जानना चाहिये। तभी तुम सच्चे अर्थ में सुखी हो सकोगे। तभी तुम शक्ति और स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकोगे। तभी तुम अमरत्व और पूर्णता प्राप्त कर सकोगे।
मन के समस्त विकार मानसिक संयम, धारणा तथा ध्यान से नष्ट हो जाते हैं। अन्त में व्यक्ति की आत्मा परमात्मा से मिल जाती है। हठयोगी अपना अभ्यास शरीर और प्राण से प्रारम्भ करता है और ज्ञान योगी बुद्धि तथा संकल्प शक्ति से प्रारम्भ करता है।
तुम्हें अपने मन पर बड़ी होशियारी से अधिकार करना होगा। तुम्हें इसके लिये बुद्धिमता पूर्ण साधनों को अपनाना होगा। पाशविक शक्ति के प्रयोग की कोई आवश्यकता नहीं। अगर तुम बल प्रयोग करोगे तो वह और अधिक गड़बड़ मचायेगा। जो मनुष्य मन को पाशविक बल से अधिकार में लाना चाहते हैं वह उन लोगों के समान हैं जो एक पतली डोरी से हाथी को बाँधना चाहते हैं।
सही ढंग से सोचो। विचारों के नियमों को जानो। अपने को मन से पृथक करो। अपने को विचारों से पृथक करो। तुम अपने विचारों के मूक साक्षी बनो। तुम ऐसा न समझो कि तुममें और तुम्हारे विचारों में कोई अन्तर नहीं है। धीरे-धीरे सब प्रकार के विचार नष्ट हो जायेंगे। जिस प्रकार बिना ईंधन के आग बुझ जाती है और बिना घी के दीपक बुझ जाता है उसी प्रकार मन भी अपने मूल स्थान से मिल जाता है जब विचार समाप्त हो जाते हैं। अब तुम आत्मा में प्रवेश करोगे।
अगर तुम ने योग के अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचने का दृढ़ संकल्प कर लिया है, अगर तुम आध्यात्मिक जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने में दृढ़ व्रत हो तुम कई बार असफल होने पर भी अवश्य उठोगे और आगे बढ़ोगे। अपने अन्दर दिव्य शक्ति का अनुभव करो। साँसारिक पदार्थों के लिए घृणा और ईश्वर के साक्षात्कार के लिए तीव्र उत्कण्ठा पैदा करो। साँसारिक इच्छाएँ त्यागो, हमेशा उच्च आध्यात्मिक ज्ञान में विचरण करो। अपने पौरुष नैतिक साहस तथा आध्यात्मिक शक्ति को प्रदर्शित करो।
योग के अभ्यास के लिए गुरु की आवश्यकता होती है। लेकिन तुम्हें अपने गुरु के निर्वाचन में बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। योग या अध्यात्म के क्षेत्र में अनेक ऐसे गुरु हैं जो लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक पहुँचाते हैं। एक योगी जो इस मार्ग में चल चुका है वह तुम्हें बिना किसी खतरे के गन्तव्य स्थान तक पहुँचा देगा। मार्ग में आने वाले भय और कठिनाईयों की ओर से तुम्हें सावधान कर देगा। अगर तुम्हें ऐसा गुरु नहीं मिलता तो तुम अपने से अधिक योग्य साधक से ही सहायता ले सकते हो। अच्छा तो यह रहे कि अगर तुम उनसे शिक्षा ले सको और अभ्यास कर सको। बाद में तुम घर पर भी योगाभ्यास कर सकते हो और अपने गुरु के साथ पत्र व्यवहार रख सकते हो। जब तुमको अवकाश मिले तब तुम उनके पास कुछ समय व्यतीत कर सकते हो। अगर तुम्हें ऐसा गुरु नहीं मिलता तो तुम अनुभवी योगियों ओर महात्माओं द्वारा लिखे गये ग्रन्थों से प्रारम्भिक कार्य चला सकते हो। इन ग्रन्थों से तुम्हें प्रेरणा मिलेगी, तुम्हारे सारे संदेह मिट जायेंगे। अगर उन ग्रन्थों के लेखक जीवित हैं तो तुम उनसे पत्र व्यवहार कर सकते हो और अवकाश मिलने पर उनके साथ रह भी सकते हो।
अगर तुम शारीरिक शक्तियाँ या रहस्य पूर्ण अनुभव प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हें योग के मार्ग में सफलता नहीं मिलेगी। तुमको सत्य के लिये तीव्र कामना रखनी होगी। तभी तुम योग के सोपान पर चढ़ कर दिव्य चेतना प्राप्त कर सकोगे। तुम्हारे अन्दर तीव्र वैराग्य का होना भी अत्यावश्यक है। बिना तीव्र वैराग्य के आत्मानुभूति नहीं हो सकती और बिना आत्मानुभूति के स्वतंत्रता, पूर्णता और अनंत आनन्द भी नहीं उपलब्ध हो सकते।
(श्री दुर्गाशंकर केवलराम शास्त्री )
संस्कृति और संस्कार दोनों अनन्यार्थ शब्द हैं। प्राचीनों ने संस्कृति शब्द का पुष्कल और एक से अधिक अर्थ में उपयोग करके उसे महा अर्थवाहक बनाया है।
संस्कार शब्द का अर्थ स्पष्ट करने के लिए जड़ वस्तु के संस्कार का उदाहरण दिया है, किन्तु हम तो यहाँ मनुष्य के संस्कार का विचार कर रहे हैं। वैसे स्नानादि द्वारा शरीर की शुद्धि के लिए शरीर संस्कार शब्द का प्रयोग होता है, लेकिन यहाँ तो संस्कार शब्द से हमारा हेतु मनुष्य के मन, बुद्धि, भावना, अहंकार आदि को चमकाने, विकसित करने से है।
जन्मना जायते, शूद्रः संस्कारैद्विज उच्यते।
अर्थात्- मनुष्य जन्म से द्विज नहीं होता, द्विज तो वह संस्कार द्वारा बनता है। इस वचन में स्मृत्युक्त उपनयनादि संस्कार-यानि उनके हेतु से होने वाले शास्त्रों कर्म ही विवक्षित हैं। ऐसा न मान कर हम यह मानें कि उपनयन के बाद प्राप्त ब्रह्मचर्य और विद्यार्जन भी विवक्षित हैं। साराँश यह कि मनुष्यादि के एतद्विषयक समग्र निरूपण को विशाल दृष्टि से ध्यान में लेकर सोचा जाय तो ऊपर के वचन का तात्पर्य यह निकलता है कि स्वभावतः मनुष्य पशु अथवा पामर है और संस्कार द्वारा वह सच्ची मानवता वाला अर्थात् संस्कारी मनुष्य बनता है। संस्कार शब्द की इतनी चर्चा से यह स्पष्ट हुआ ही होगा कि संस्कार शब्द का जो चमक या पालिश सूचक अर्थ है वह बाहरी सफाई और शुद्धि का नहीं, बल्कि मानव हृदय की उस चमक या शोभा का द्योतक है, जिससे मनुष्य की रहन-सहन भावना, बुद्धि सभी कुछ समाज में दीप्त हो उठें। दूसरे शब्दों में, इसे यों कह सकते हैं कि जिस शिक्षा से मनुष्य में समाज हितलक्षी और आध्यात्मिक गुणों का विकास और वृद्धि होती है, उसी को संस्कार कहते हैं। जैसा कि शंकराचार्य ने कहा है, मात्र दोषापनयन या मात्र गुणाधान से नहीं, बल्कि संस्कार के लिए दोषापनयन और गुणाद्यान दोनों की आवश्यकता है।
संस्कार शब्द का अर्थ अंग्रेजी के कल्चर शब्द के अर्थ से मिलता जुलता है। लेकिन हम शंकर द्वारा किये गए अर्थ को पकड़ कर ही आगे बढ़ें तो मानव चित्त के संस्कार द्वारा दूर करने योग्य दोषों का अर्थ होगा, मनुष्य जीवन के मूल से चिपटी हुई पशु सहज स्वाभाविक वासनाएँ, जिनमें राग, द्वेष, मोह और भय मुख्य हैं तथा अनेक पीढ़ियों की अविद्या, भय और राग द्वेष प्रेरित प्रवृत्तियों के कारण रक्त में भिदी हुई पामर जनों में साधारणतः पाई जाने वाली आदतें भी हैं। सरलता के लिए हम मान लें कि इन द्विविध दोषों का अपनयन ही दोषानयन है और गीता में दैवी सम्पद् के रूप में जिनकी गणना की गयी है उन और उनके सदृश गुणों का चित्त में आधान, गुणधान है। इस प्रकार के दोषानयन और गुणधान का नाम ही संस्कार है, आदर्श संस्कार की इस व्याख्या से सन्तोष मान कर हम आगे बढ़ें।
इस प्रकार के संस्कार शुभ संस्कार है। साधारणतः संस्कार शब्द का प्रयोग शुभ संस्कारों के लिए ही किया जाता है और वही ठीक भी है क्योंकि जिन्हें अशुभ संस्कार या कुसंस्कार कहा जा सकता है, उनमें चित्त को चमकाने या उज्ज्वल बनाने की क्षमता ही नहीं होती। जिसे योगशास्त्र में क्लेश कहा गया है, और अन्य शास्त्रों में जिसे दोस्त माना गया है, उस अविधा, भय, राग, द्वेष, से उत्पन्न वृत्ति और स्वभाव का ही योग शास्त्रीय नाम अशुभ संस्कार है।
अब मानव चित्त के विकास की भिन्न-भिन्न भूमिका के अनुसार व्यक्ति में शुभाशुभ संस्कारों का मिश्रण और शुभ संस्कारों में भी उच्च नीच भूमिका का होना स्वभाविक है। जहाँ एक समाज में उच्च भूमिका के शुभ संस्कारों वाले कुछ लोग भी पाए जाते हैं। किन्तु किसी भी राष्ट्र के श्रेष्ठ विचारकों और दृष्टाओं का प्रयत्न सदा यही रहता है, कि उच्चतम संस्कार ही आदर्श रूप में प्रतिष्ठित हों।
ऊपर संस्कार का जो विचार किया है, उससे व्यक्ति के संस्कारों का ही अर्थ निकलता है। प्राचीनों के गर्भाधानादि संस्कार विचार में यही अर्थ निहित है और यह तो मानी हुई बात है कि शास्त्रोक्त विधि से नहीं, किन्तु संस्कार युक्त शिक्षा द्वारा किसी भी व्यक्ति के जीवन में तेज और चमक पैदा होती है। लेकिन अधिकतर लोगों के जीवन में यह चमक बाहरी ही रहती है। साथ ही, यह भी पाया गया है कि तीव्र संवेग युक्त विशिष्ट व्यक्तियों के चित्त के समूचे प्रदेश में यह चमक या तेज गहराई तक उतर जाता है और उनके चित्त की समस्त भूमिकाओं को प्रदीप्त कर देता है। इस तरह ऊपर हमने जो अर्थ किया है, उस अर्थ के अनुरूप शुभ संस्कार वाले श्रेष्ठ मनुष्यों के प्रत्यक्ष सदाचार युक्त उदाहरण से, उनके द्वारा दी गई शिक्षा दीक्षा से और क्वचित् किसी उत्तराधिकार के बल से, उनकी सन्तान में ये संस्कार न्यूनाधिक अंश में प्रकट होते हैं, और चित्त की ऐसी संस्कारशील स्थिति जब किसी समाज में कई-कई पीढ़ियों तक बराबर बनी रहती है और निरन्तर विकसित होती रहती है तो आगे चल कर वह उस समाज का स्वभाव बन जाती है, और उस दशा में हम उसे उस समाज का संस्कार कहते हैं। इसमें संस्कार शब्द के दोनों अर्थ निहित हैं।
वैसे मनुष्य जीवन में दो प्रकार से परिवर्तन होते हैं। एक परिस्थिति के दबाव के कारण, और दूसरे, मनुष्यों के अपने पुरुषार्थ के कारण। जीवन को टिकाये रखने के लिए परिस्थिति के अनुरूप परिवर्तन प्राणी मात्र के जीवन में होते रहते हैं। मनुष्य भी एक प्राणी है, अतः उसके जीवन में भी परिस्थिति के अनुकूल परिवर्तनों का होना स्वाभाविक है। किन्तु परिस्थिति के ऐसे दबाव से होने वाले परिवर्तन संस्कार नहीं कहलाते। जब मनुष्य सोच-समझ कर प्रयत्न पूर्वक अपने मन, बुद्धि आदि का विकास करता है, तो उसका वह विकास ही संस्कार कहा जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति प्रयत्न करे, तो वह अपनी पामरता को टाल कर संस्कारिता प्राप्त कर सकता है और इसके विपरीत प्रमाद वश अपने उच्च संस्कारों को छोड़ कर वह पामरता के गर्त में गिर सकता है। महाभारत में यथार्थ ही कहा है-
प्रमादं वै मृत्युँमहं ब्रवीमि अप्रमादभृतत्वं ब्रवीमि।
अर्थात्- प्रमाद के कारण उत्पन्न पामरता ही मृत्यु है और अप्रमाद से प्राप्त होने वाली संस्कारिता ही अमरता है।
भिन्न-भिन्न राष्ट्रों में उनके इतिहास के विभिन्न कालों में जो संस्कृतियाँ प्रकट हुईं, वे उन उन राष्ट्र की भौतिक परिस्थितियों और ऐतिहासिक बलों द्वारा उत्पन्न की गयी स्वभाव जन्य विशेषता के परिणामस्वरूप, अपनी-अपनी खास विशेषताओं वाली रही हो तो वह स्वाभाविक ही है। ये साँस्कृतिक विशेषताएँ उन उन राष्ट्रों के व्यावर्तक लक्षणों जैसी मानी गई और उन्हें अभिमान की वस्तु समझा गया, किन्तु संसार के अलग अलग देशों और युगों में जो पैगम्बर और संत महात्मा हो गये, उन्होंने तो सत्य, अहिंसा, अनासक्ति सहिष्णुता, सब भूतों के प्रति भ्रातृभाव या आत्मभाव, आध्यात्मिकता, अभय, ज्ञान, विज्ञान आदि दैवी सम्पद् रूप संस्कारों पर ही अधिक जोर दिया है और विभिन्न संस्कृतियों के अन्तस्तल में विद्यमान इन उच्च संस्कारों को ही ग्रहण करके इस युग के महापुरुष भी अखिल मानव जाति की एक और अभिन्न संस्कृति की रचना के लिए सतत् यत्नशील रहें, इसी में संसार के भावी सुख और शान्ति की आशा निहित है।
(प्रो. श्री लालजीराम शुक्ल)
बालक की सेवा मनुष्य के जीवन को पवित्र बनाती है। काम, क्रोध और लोभ इन सभी मनोवृत्तियों का इससे शोध होता है। गृहस्थ जीवन का यदि कोई लाभ है तो बालकों की सेवा है। चाहे अपने बालकों की हो या दूसरों के, उनकी सेवा करना महापुण्य है। इसलिए जिस व्यक्ति की सन्तान नहीं होती, उसे यह पुण्य कमाने का सौभाग्य नहीं होता। यहाँ यह दर्शाना चाहते हैं कि जिस व्यक्ति का बालकों के प्रति स्वाभाविक प्रेम नहीं होता, उसे प्रकृति सन्तान देती ही नहीं। लोभ, प्रेम का विनाशक है। अतएव जिस व्यक्ति के मन में लोभ की मात्रा अत्यधिक होती है उसकी सन्तान नहीं होती। काम और क्रोध सन्तान के शरीर और मन के गठन कर अपना कुप्रभाव अवश्य डालते हैं, पर जितना प्रभाव लोभ का होता है उतना इन दूसरे मनोविकारों का नहीं होता। काम और क्रोध स्थायी मनोविकार नहीं हैं। वे एक क्षण में आते हैं और दूसरे क्षण में चले जाते हैं। दूसरे यह मनोभाव आते हैं पहचान लिए जाते हैं। जब कोई व्यक्ति काम अथवा क्रोध के वश में होकर अनुचित काम कर बैठता है तो पीछे पछताता है। वह उन मनोविकारों से मुक्त होने की चेष्टा करता है, पर लोभ न तो पहचाना ही जाता है और न उससे मुक्त होने की मनुष्य चेष्टा ही करता है। काम और क्रोध मनुष्य के बड़प्पन के कारण नहीं होते, पर लोभ से धन संग्रह होता है और इससे मनुष्य आज कल की दुनिया में आदर भी प्राप्त कर लेता है।
लोभ, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष आदि मनोविकारों के उत्पादक हैं। लोभी, मनुष्य बड़ा स्वार्थी होता है। जहाँ लोभ होता है वहाँ प्रेम की उपस्थिति सम्भव नहीं। प्रेम का वातावरण ही संतान के जीवन का प्राण है। अतएव लोभी और कृपण मनुष्य के घर सन्तान का पैदा होना अथवा जीना असम्भव हो जाता है। देखा गया है अपने आप पैसा कमा कर बड़े बने लोगों को या तो सन्तान होती नहीं और यदि संतान होती भी है तो वह मर जाती है। यह भी देखा जाता है कि जब धनी अथवा कृपण मनुष्य धन के प्रति अपना मोह छोड़ देता है और अपना धन उदारतापूर्वक दूसरी की सेवा में खर्च करने लगता है, तो सन्तान जीवित रहने लगती है। कितने ही सन्तानहीन व्यक्ति इस प्रकार सन्तान प्राप्त कर लेते हैं। मैंने अपने अनुभव में देखा है कि एक गृहस्थ के घर में सन्तान नहीं थी। पति पत्नी की अवस्था 35 वर्ष के लगभग हो चुकी थी। उन्होंने एक गरीब बालक को जो स्कूल में पढ़ता था अपने घर में रख लिया। वे उसे खूब प्यार करते थे। दो साल के पश्चात् वह बालक उस घर से दूसरी जगह चला गया, पर उनका प्रेम उस बालक से नहीं छूटा। वे उसे समय-समय पर बुलाते ही रहते थे। कुछ समय के बाद उनको भी सन्तान होने लगी और इस समय उन्हें पाँच सन्तानें हैं।
यहाँ यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि दत्तक पुत्र से वह मानसिक शुद्धि नहीं होती जो दूसरे लोगों के बालक को घर में रख कर उनकी सेवा से होती है। दत्तक पुत्र सेवा भाव से नहीं रखा जाता, अपना नाम रखने के लिए रखा जाता है। अपने मरने के बाद धन की रक्षा कौन करेगा, इस बुद्धि से दत्तक पुत्र रखा जाता है। यहाँ पुत्र का पालन धन की रक्षा के लिए और नाम रखने के लिए किया जाता है। अतएव दत्तक पुत्र से मनुष्य के लोभ में कमी नहीं होती। बहुत से दत्तक पुत्र व्यभिचारी, कुकर्मी और रोगी होते हैं इसका कारण उनके दत्तक माता-पिता का मानसिक वातावरण है।
कितने ही कन्जूस लोगों को अपनी सन्तान तो होती नहीं। यदि वे दूसरे की सन्तान अपने घर में रखलें तो वह भी मर जाती है। अभी मेरे एक मित्र ने अपने ऊपर बीती कथा सुनायी। उसका बड़ा लड़का हाल ही में मर गया। उन्होंने इस लड़के को अपने भाई के पास रख दिया था। मेरे मित्र गरीब हैं। उनकी चार सन्तानें हैं। उनके भाई लखपति हैं पर सन्तान एक भी नहीं है। वे अपनी कमाई से लखपति हुए हैं। वे दिन भर काम करते हैं तथा रोजगार में बड़े चतुर हैं। मेरे मित्र ने दूसरे लोगों की कहा-सुनी से अपने बड़े लड़के को बड़े भाई के पास रख दिया। एक साल के भीतर ही वह लड़का मर गया। इस लड़के की मृत्यु का कोई मानसिक कारण हो सकता है इस बात की सम्भावना मेरे मित्र को न थी। उन्होंने अपना दूसरा लड़का उसके पास रख दिया। पर थोड़े ही दिन रहने के पश्चात् देखा गया कि इस बालक के चरित्र में बहुत सी बुराइयां पैदा हो गयीं, जो पहले उसमें न थी। मैंने अपने मित्र को शीघ्र से शीघ्र दूसरे लड़के को वापिस लाने के लिए कहा। इस मित्र के द्वारा यह भी पता चला कि उनके भाई ने अपने एक दूसरे सम्बन्धी की एक लड़की भी रखी थी। वह लड़की भी साल भर के भीतर मर गयी।
पाठक एक मनोवैज्ञानिक की लेखनी से इस प्रकार की घटनाओं का वैज्ञानिक कारण प्रदर्शित होते देख कर आश्चर्य करेंगे। साधारण वैज्ञानिक ऊपर कहे गये विचारों को प्रायः अन्धविश्वास मात्र मानेंगे। जनसाधारण में यह किंवदन्ती प्रचलित ही है कि बाँझ व्यक्ति के पास अपनी संतान नहीं रखनी चाहिये। इस किंवदन्ती का आधार समाज के अनेक लोगों का अनुभव है। इसकी सत्यता आज हम मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों के द्वारा सिद्ध होते हुए पाते हैं। यहाँ एक दो उदाहरण देना उक्त सिद्धाँत की पुष्टि के लिए आवश्यक होगा।
लेखक एक ऐसे बड़े धनी सेठ को जानता है जिसके दो भाई और हैं। इस सेठ के बड़े भाई ने छोटे भाई के यहाँ नौकरी कर ली। सेठ के मैनेजर का मासिक वेतन एक हजार रुपया था और बड़े भाई का वेतन डेढ़ सौ रुपया मासिक था। सेठ ने अपने छोटे भाई को अपने यहाँ नौकर रखना चाहा। वह छोटा भाई अपने सिर पर घी का पीपा रखकर गाँव-गाँव बेचता और इससे अपनी रोजी चलाता था। सेठ के बारह सन्तानें हुई परन्तु दो वर्ष से अधिक कोई जीवित न रही। उसके बड़े भाई को एक भी सन्तान न हुई। छोटे भाई के तीन लड़कियाँ और दो लड़के हुए और सभी जीवित रहे। सेठ ने अपने छोटे भाई के छोटे लड़के को गोद ले लिया। बड़ा स्वस्थ रहा। पर छोटे लड़के को अब अनेक प्रकार की बीमारी घेरने लगी। इस बालक को मैंने कभी निरोग नहीं पाया। सेठ ने इस बालक की शिक्षा के लिए अनेक प्रकार का प्रयत्न किया परन्तु वह सुशिक्षित न हो सका। सेठ स्वयं बड़े शिक्षा प्रेमी हैं। किन्तु उनके शिक्षा प्रेम का उल्टा ही प्रभाव बालक पर पड़ा। वे बालक को कठोर अनुशासन में रखते जिससे उसके आचरण में किसी प्रकार की भ्रष्टता न आ जाय। उनके कठोर नियन्त्रण से भ्रष्टता तो नहीं आयी किन्तु बीमारी आ गयी। सम्भव है जब यह बालक बीमारी से मुक्त हो जाय तो वह आचरण भ्रष्ट बने। अनुदार चित्त व्यक्ति के दत्तक पुत्र का जीवन प्रायः इसी प्रकार का होता है।
उपयुक्त दृष्टान्त से यह स्पष्ट है कि बालकों के जीवन के लिए और उनके मानसिक विकास के लिए उन्हें पवित्र विचारों के वातावरण में रखने की आवश्यकता है। तो भी मनुष्य के विचार बड़े अनुदार रहते हैं। वह धन में बाधा डालने वाले व्यक्तियों के प्रति अपने मन में बहुत ही बुरी भावनाएँ लाता है। वह ऊपर से बड़ा ही सुशील हँस मुख होता है पर भीतर से बड़ा कठोर हृदय और क्रूर होता है। उसके मन में प्रत्येक क्षण दूसरों के विनाश के भाव उठा करते हैं। ये बुरे भाव उनके मन में अनजाने ही प्रवेश कर जाते हैं। जो व्यक्ति उनके पास रहते हैं। वे उस व्यक्ति के मन में बड़ा उथल-पुथल मचा देते हैं। यदि किसी व्यक्ति का मन दृढ़ न हुआ तो वे इस व्यक्ति का विनाश ही कर देते हैं। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारे प्रत्येक विचार चाहे वे उदार हों अथवा अनुदार अपने आस-पास के लोगों पर प्रभाव डालते ही हैं। इस संसार की सबसे मौलिक सेवा संसार के लोगों के प्रति सद्भावना प्रदर्शित करके करते हैं। इसी तरह उनकी सबसे भारी क्षति दुर्भावनाओं को अपने मन में लाकर करते हैं।
बालक का मन बड़ा ही निर्मल होता है। उसके मन में दृढ़ता नहीं होती। अतएव जब किसी व्यक्ति के प्रबल विचार उसके अचेतन मन में घुस जाते हैं। तो वे उसकी बड़ी क्षति कर डालते हैं। यदि कोई व्यक्ति अपने शत्रु के विनाश के विचार मन में ला रहा है और इसी बीच उसका बालक उसके समीप आये तो अज्ञात रूप से उसके वे अभद्र विचार बालक के हृदय में प्रवेश कर जाते हैं। इस कारण बालक का स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है अथवा उसकी मृत्यु ही हो जाती है।
हमारी साधारण धारणा है कि बालक को बिना सिखाये कुछ भी नहीं आता। बालक के जीवन पर उन्हीं बातों का प्रभाव पड़ता है, जिन्हें हम जान बूझकर उसके मन में डालते हैं। पर हमारी यह धारणा भ्रमात्मक है। हम बालक के जीवन पर जितना जान बूझकर प्रभाव डालते हैं उससे कहीं अधिक प्रभाव उसके जीवन पर अनजाने डालते हैं। हम जो भी विचार मन में लाते हैं। उससे बालक प्रभावित होता है। यदि हमारे सब समय के विचार भले हैं, यदि हम सब समय दूसरे के ही कल्याण का चिन्तन करते हैं तो बालकों का चरित्र स्वतः ही सुन्दर बन जाता है। प्रेम ही सब सद्गुणों का स्रोत मूल है और घृणा सब दुर्गुणों का। हमारी विश्व प्रेम की भावनाएँ बालकों के हृदय में स्थान कर लेती है और वे उसे अपने आप सदाचारी बना देती हैं।
जो व्यक्ति सन्तान को सुयोग्य बनाना चाहता है, उसे यह आवश्यक है कि वह कठोर परिश्रम से पैसा कमाकर उनका लालन पालन करे। दूसरे के धन की आशा न करे। अपने बालकों को दूसरों के सहारे कभी न छोड़े। यदि कोई गरीब व्यक्ति अपने बालक को प्रेम के साथ पालता है और यदि ऐसे बालक को वह किसी कारण वश धनी से धनी के घर थोड़े दिन के लिए रख दे वहाँ बालक को सब प्रकार के सुख की सामग्री मिलती है तो भी वह बालक वहाँ रहना पसन्द न करेगा। बालक प्रेम का भूखा होता है। प्रेम की भूख भोजन की भूख से भी प्रबल होती है। धनी घर में बालक की केवल भौतिक भूख तृप्त हो सकती है। यही कारण है कि वह ऐसे घर को जेलखाने के समान मानता है। ऐसे घर में रहने पर पहले तो वह वहाँ से भागने की चेष्टा करता है और जब वह इसमें समर्थ नहीं होता तो रोग का आश्रय लेता है। जो बालक इस प्रकार के वातावरण में रहकर भी जी जाते हैं वह किसी न किसी प्रकार के बड़े चरित्र दोष को पकड़ लेते हैं, देखा गया है कि दत्तक पुत्र आदि रोगी, क्रूरकर्मी, व्यभिचारी न हुआ तो वह निस्सन्तान अवश्य होता है। इस प्रकार की घटना का प्रधान कारण बालक का दूषित मानसिक वातावरण में पाला जाना है। किसी भी दीन व्यक्ति को, अपनी सन्तान को, यदि प्यार करता है, अपने धनी सम्बन्धी के घर न रखना चाहिए। यदि यह संबंधी निस्सन्तान है तो उसे और भी अधिक सावधान रहना चाहिए। इससे बालक के मर जाने का भय है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने-आप ही बड़ी लगन के साथ अपने बालकों का लालन-पालन करना चाहिए। इससे बालकों का कल्याण होता है ओर अपना भी आत्मोद्धार होता है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
“आत्मविश्वास का अर्थ है ईश्वर की अनन्त शक्ति में विश्वास। जो असंख्य विपत्तियों से घिर जाने पर भी कार्य करता और कर्त्तव्य से च्युत नहीं होता वही सच्चा आत्म-विश्वासी है” -गाँधी जी
संसार में समुन्नत एवं अवनत जो दो प्रकार के व्यक्ति दिखाई देते हैं, उनके मानसिक संस्थान में मुख्य अन्तर आत्मविश्वास का आधिक्य या न्यूनता है। समुन्नत व्यक्ति को अपनी शक्तियों के प्रति अमित विश्वास होता है, जबकि अवनत को अपने अन्दर विश्वास नहीं होता। आत्मविश्वासी जो कुछ करता है, पर्याप्त विचार और चिन्तन के पश्चात् करता है, जबकि इस गुण से विहीन व्यक्ति ढिलमिल, अस्थिर, अनिश्चित स्वभाव का होता है। वह जो कुछ करता है आधे मन से करता है और उसके पग शिथिल से रहते हैं। आत्म विश्वासी के पग दृढ़ता से पड़ते हैं। वह जो कुछ करता है, दृढ़ संकल्पों से करता है। उसे अपने कार्य के प्रति उत्साह होता है वह लगन और परिश्रम से प्रतिदिन अपनी उन्नति करता चलता है। मानव प्राणियों का कुछ ऐसा नियम है कि जो अपने अन्दर शक्ति और विश्वास रखता है उसके इर्द-गिर्द अनेक व्यक्ति एकत्रित होते और उसके पथ प्रदर्शन में चलते हैं, अपना नेता मानते हैं, किन्तु आत्म श्रद्धा विहीन व्यक्ति रबड़ की गेंद के समान अन्दर से खोखला, अस्थिर बना रहता है। श्रद्धाविहीन व्यक्ति का जीवन उत्साह हीन होता है। वह चलता फिरता है, दैनिक कार्य भी करता है पर उसके जीवन की अवस्था शून्य के समान निष्क्रिय और मुर्दा होती है।
आत्मविश्वास दृढ़ निश्चयी है, तो विश्वास विहीन, अस्थिर, चंचल और सन्देह से परिपूर्ण व्यक्ति है। एक में दृढ़ता है, तो दूसरा हर जगह से लचीला ढीला ढाला। एक का जीवन उद्देश्य से परिपूर्ण है, तो दूसरा निरुद्देश्य और उत्साह विहीन है। एक आकाश में उड़ते हुए मजबूत पंख फड़फड़ाते हुए निष्क्रिय पक्षी के समान निर्बल है।
आत्म-विश्वास जीवन की आधारशिला है। एक उमंग है, जिससे जीवन-पुष्प खिल उठता है। इस गुण से मुक्त व्यक्ति हँसमुख सरल स्वभाव रहता है। उसका हर एक पग दृढ़ता से रखा जाता है। आत्मविश्वास साहस और पौरुष का पिता है। साहसी व्यक्ति तीव्रता से जीवन पथ पर अग्रसर होता है।
आत्मविश्वास से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य कायम रहता है। जिसे अपनी शारीरिक और मानसिक शक्तियों के प्रति विश्वास है उसकी ताकतों का कभी क्षय नहीं होता। वह निरन्तर स्वस्थ और प्रसन्न होता जाता है। इसके विपरीत जब मनुष्य का आत्मविश्वास जाता रहता है तो वह रोगी, निराश, दुःखी, अपने को भार स्वरूप बन जाता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन बड़ा कारुणिक एवं दुःखपूर्ण होता है। विश्वास जाते रहने से लोग आत्म हत्या तक करते हुए देखे गये हैं। आत्म विश्वास पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति का एक सहज स्वाभाविक लक्षण है।
आत्मविश्वासी में एक दैवी तेज होता है जिससे उसका मुख अपूर्ण आशा से पूर्ण हो उठता है। सबको उसके प्रति विश्वास होता है। आत्म विश्वास लुप्त हो जाने से मनुष्य का सामाजिक, शारीरिक, मानसिक क्षय हो जाता है। पुनः इस दैवी गुण के विकास से शक्ति आने लगती है और मनुष्य पूर्ववत् खड़ा हो जाता है।
प्रो. लालजी राम शुक्ल का मत है, “मनुष्य की किसी बात में कार्य-क्षमता उसके आत्मविश्वास सच्चे आध्यात्मिक चिन्तन का परिणाम है। जो मनुष्य वर्तमान काल के कर्त्तव्य पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित करता है और बची हुई शक्ति को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाता है, उसका आत्मविश्वास नष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम में आगे पीछे की बात में अत्यधिक चिन्तित रहता है वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिन्ता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं।”
स्काटलैण्ड का राज ब्रूस एक बार शत्रुओं से पराजित हो कर अपना राजपाट खो बैठा। उसने कई बार प्रयत्न किए किन्तु सब में विफल रहा। बार-बार पराजित होने पर उसका आत्मविश्वास लुप्त हो गया। वह दुःखी निराश शत्रुओं से बचने के लिये एक गुफा में छिपा पड़ा था। उसका मन कष्टों और अभावों की कुकल्पना में व्यक्त था। वह संसार को दुःखमय समझ कर अपने जीवन को धिक्कार रहा था। मन तो बड़ा हठीला, चंचल, दृढ़ आर बलवान् है। जब यह नैराश्य और निर्बलता की ओर उन्मुख होता है, तो अपने प्रति संदेह, दुःखों, विफलता, अवगुण, कमजोरी से परिपूर्ण हो उठता है। ब्रूस ने देखा एक मकड़ी गुफा के द्वार पर जाला बुनने का विफल प्रयत्न कर रही है। वह बार-बार गिरती है पर पुनः नए उत्साह लगन अध्यवसाय से पुनः प्रयत्न करती है। मकड़ी के प्रयत्नों की निष्फलता ने उसे संकल्प विकल्प में डाले रखा। कुछ देर पश्चात् उसने देखा कि मकड़ी एक सूक्ष्म तन्तु को बुनने में सफल मनोरथ हो गई। जाला बढ़ता गया और अन्तः वह उसे पूर्ण कर सकी। ब्रूस सोचने लगा, “इस क्षुद्र निर्बल मकड़ी में भी कितना प्रयत्न, श्रम, लगन और परिश्रमशीलता है। इसने चंचल चित्त को इष्ट सिद्धि में एकाग्र किए रखा। विफलता की परवाह न की प्रत्युत दृढ़ता से लक्ष्य पर लगी रही। मैं भी पुनः प्रयत्न करूंगा और अवश्य सफल मनोरथ हूँगा। मैं चित्त विक्षेप नहीं होने दूँगा, पुनः पुनः प्रयत्न करूंगा, मन को निरन्तर एकाग्र करूंगा”। उसका आत्मविश्वास जाग्रत हो गया। ऐसा सोचकर वह मुस्तैदी से अपने काम में लग गया। उसने टूटी-फूटी सेना और रुपया संग्रह किया। एक दिन वह पूरी सफलता प्राप्त कर सका।
आत्म विश्वासी धैर्यवान होता है। वह विफलता से घबराता नहीं। अपना अभ्यास जारी रखता है। कभी निराश नहीं होता। चंचल ओर अस्थिर चित्त जहाँ जहाँ दौड़ दौड़ कर जाता है, वह पुनः पुनः उसे अपने लक्ष्य पर लगाता है। एकाग्रता से शक्ति आती है। धैर्य का प्रादुर्भाव होता है।
चाणक्य की सफलता का मूल कारण उसका आत्मविश्वास था। एक बार चाणक्य के पाँव में एक काँटा लग गया था। इस पर उसे इतना क्रोध आया कि उसने जब तक उस कंटीली झाड़ी की जड़ें न खोद डालीं तब तक विश्राम नहीं किया। उसने उस कुशा को अणु-अणु कर के ही छोड़ा। ऐसा था उस काले कलूटे ब्राह्मण का आत्म-विश्वास।
चाणक्य दरिद्र था, काला सा बदसूरत व्यक्ति था लेकिन उसमें आत्म विश्वास और शक्ति कूट-कूट कर भरी हुई थी। सभा में चाणक्य को अपमानित किया गया। दरिद्र चाणक्य का क्रोध जाग्रत हो उठा। उसने प्रतिज्ञा की कि वह महानन्द से प्रतिशोध लेगा जब तक नन्द वंश का नाश न कर देगा तब तक अपनी चोटी न बाँधेगा। चाणक्य का आत्मविश्वास इतना दृढ़ था कि प्रयत्न सफल हुए। परिस्थितियाँ उसकी चेरी बनीं और अन्ततः उसने नन्दवंश का नाश ही करके छोड़ा।
हिटलर, मुसोलिनी, को अपनी शक्तियों के प्रति अमित विश्वास था। यद्यपि वे कुटिलता की ओर बढ़े और नाजीवाद का प्रचार किया, पर एक दिन उनकी शक्तियों के सम्मुख सम्पूर्ण यूरोप थर्रा उठा था। राणा प्रताप सिंह मुगलों से अन्त समय तक लड़ते रहे। राज परिवार ने जंगलों में असंख्य कष्ट झेले। कुछ गिने राष्ट्रवादी देश भक्तों और भीलों के अतिरिक्त उनका कोई सहायक न था। केवल आत्म विश्वास ही उनका मित्र, उनकी शक्ति, उनकी मूल प्रेरणा थी। शिवाजी ने थोड़ी सी सेना की सहायता से मरहठा राज्य की स्थापना की थी। उन्होंने जीवन भर अपना ही सहारा देखा। सिद्धार्थ ने आत्म विश्वास के बल पर राजपाट त्याग कर दिया था और जीव ब्रह्म आत्मा का साक्षात्कार कर उपरामता को प्राप्त हो धैर्य युक्त बुद्धि से परमात्मा में लीन हो गए। उन्होंने आत्म विश्वास के बल पर जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, और रोग आदि पर विजय प्राप्त की।
इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हमें इतिहास, पुराण, महाभारत, रामायण इत्यादि ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं जिनसे प्रतीत होता है कि मनुष्य परिस्थितियों, भाग्य या घटनाओं का दास नहीं है। वह अपने अन्दर एक गुप्त आध्यात्मिक शक्ति रखता है, जिससे उसके शरीर में तेज, कार्य में दृढ़ता और संकल्पों में शक्ति आती है। कठिनता का अंधकार विलुप्त होकर सफलता का प्रकाश आता है, उद्देश्य की बाधाएँ दूर होती हैं, कठिन कार्य सफल बनते हैं। यह शक्ति उसका जीता जागता आत्म विश्वास है।
मनुष्य की आत्मा असंख्य शक्तियों की भंडार है। आत्मशक्ति प्राप्त करने वाला साधक चाहे जो क्षेत्र चुने ले सर्वत्र सफल होता जाता है। नौकरी, व्यापार, राजनीति, धर्म समाज सेवा, विद्या प्राप्ति, राज्यशासन, वकालत, वैद्यक-चाहे जो भी कार्य क्षेत्र चुना जाय सर्वत्र मनुष्य का आत्म विश्वास ही सिद्धि में सहायता होता है।
तुम्हारा परमात्मा है, परमात्मा का बल तुममें है। तुम्हारी आत्मा ही परमात्मा का लघु स्वरूप है। यदि तुम्हें ईश्वर को देखने की आकाँक्षा है, तो उसे निज हृदय में ढूँढ़ो। अपनी आत्म शक्ति से तुम ईश्वर को अपने अन्दर देख सकते हो। तुम्हारे रक्त की बूँद में ईश्वरीय शक्ति का दिव्य प्रवाह बह रहा है। वह ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप एवं अनन्त है। वह ज्ञान मय, चैतन्य और आनंदस्वरूप है। वह तुम्हारी आत्मा में बैठकर तुम्हें नित्य और अद्वितीय शक्ति, साहस, पौरुष प्रदान कर रहा है। परब्रह्म परमात्मा का स्वरूप होने के कारण आपको अपने शक्तियों की पूँजी सम्हालनी चाहिए। शक्ति पाकर निर्बल और पंगु नहीं रहना चाहिए। सच मानिये, आपको अपने अंतर्जगत से अतुल सामर्थ्य और शक्ति प्राप्त हो सकती है यदि आप हृदय में स्थित विराजमान परमदेव के दर्शन कर लें। हानि लाभ, जय पराजय, यश अपयश, मान अपमान सब में परमात्मा के बल से सामर्थ्य ग्रहण करते रहिए।
(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम.ए.)
विपत्ति से घबराओ मत। विपत्ति कड़वी जरूर होती है, पर याद रखो, चिरायता और नीम जैसी कड़वी चीजों से ही ताप नाश होकर शरीर निर्मल होता है।
विपत्ति में कभी निराश मत होओ। याद रखो, अन्न उपजा कर संसार को सुखी कर देने वाली जल की बूंदें काली घटा से ही बरसती हैं।
विपत्ति असल में उन्हीं को विशेष दुःख देती है, जो उससे डरते हैं। जिसका मन दृढ़ हो, संसार की अनित्यता का अनुभव करता हो और हर एक में भगवान की दया देखकर निडर रहता हो, उसके लिए विपत्ति फूलों की सेज के समान है।
जैसे रास्ते में दूर से पहाड़ियों को देखकर मुसाफिर घबड़ा उठता है कि मैं इन्हें कैसे पार करूंगा, लेकिन पास पहुँचने पर वे उतनी कठिन नहीं मालूम होती, यही हाल विपत्तियों का है। मनुष्य दूर से उन्हें देखकर घबरा उठता है और दुःखी होता है, परन्तु जब वे ही सिर पर आ पड़ती हैं तो धीरज रखने से थोड़ी सी पीड़ा पहुँचाकर ही नष्ट हो जाती है।
जिस तरह खरादे बिना सुन्दर मूर्ति नहीं बनती उसी तरह विपत्ति से गढ़े बिना मनुष्य का हृदय सुन्दर नहीं बनता।
विपत्ति प्रेम की कसौटी है। विपत्ति में पड़े हुए बन्धु बान्धवों में तुम्हारा प्रेम बढ़े और वह तुम्हें निरभिमान बनाकर आदर के साथ उनकी सेवा करने को मजबूर कर दे, तभी समझो कि तुम्हारा प्रेम असली है। इसी प्रकार तुम्हारे ऊपर विपत्ति पड़ने पर तुम्हारे बन्धु बांधवों और मित्रों की प्रेम परीक्षा हो सकती है।
काले बादलों के अन्धेरे में ही बिजली की चमक छिपी रहती है, विपत्ति अर्थात् दुःख के बाद सुख, निराशा के बाद आशा, पतझड़ के बाद वसन्त ही सृष्टि का नियम है।
याद रहे कि जब तक सुख की एकरसता को वेदना की विषमता का गहरा आघात नहीं लगता तब तक जीवन के यथार्थ सत्य का परिचय नहीं मिल सकता।
विपत्ति पड़ने पर पाँच प्रकार से विचार करो-
1- तुम्हारे अपने ही कर्म का फल है, इसे भोग लोगे तो तुम कर्म के एक कठिन बन्धन से छूट जाओगे।
2- विपत्ति तुम्हारे विश्वास की कसौटी है, इसमें न घबड़ाओगे तो तुम्हें भगवान की कृपा प्राप्त होगी।
3- विपत्ति मंगलमय भगवान का विधान है और उनका विधान कल्याण कारी ही होता है। इस विपत्ति में भी तुम्हारा कल्याण ही भरा है।
4- विपत्ति के रूप में जो कुछ तुम्हें प्राप्त होता है, यह ऐसा ही होने को था, नयी चीज कुछ भी नहीं बन रही है, भगवान का पहले से रचकर रखा हुआ ही दृश्य सामने आता है।
5- जिस देह को, जिस नाम को और जिस नाम तथा देह के सम्बन्ध को सच्चा मानकर तुम विपत्ति से घबराते हो, वह देह, नाम और सम्बन्ध सब आरोप मात्र हैं, इस जन्म से पहले भी तुम्हारा नाम, रूप और सम्बन्ध था, परन्तु आज उससे तुम्हारा कोई सरोकार नहीं है, यही हाल इसका भी है, फिर विपत्ति में घबड़ाना तो मूर्खता ही है, क्योंकि विपत्ति का अनुभव देह, नाम और इनके सम्बन्ध को लेकर ही होता है।
(श्री. तारा बेन मोडक)
जिस संकुचित वातावरण में रह कर स्त्रियाँ स्वयं संकुचित विचारों वाली बन गई थीं और जिस वातावरण के कारण पुरुषों के अन्दर भी स्त्रियों के बारे में संकुचित विचार पैदा हो गये थे, उन सबको मिटाकर आज सुधरे हुए संसार में यह बात सिद्ध की जा चुकी है कि स्त्री पुरुष दोनों मानव समाज के दो अंग हैं जिन पर समाज की समान जिम्मेदारी है।
मनुष्य जीवन में स्त्री की जो जिम्मेदारियाँ हैं, उनको अंगीकार करके हमें स्त्रियों की ओर से अपना विशिष्ट भाग प्रदान करना है। अब तक गृह जीवन स्त्रियों के हाथ में था और बाहर का सारा व्यवहार पुरुषों के हाथ में था। इसके दो परिणाम स्पष्ट रूप से आज हमारे सामने हैं। एक तो यह कि आज समाज में पुरुषों के सभी व्यवहारों को एक प्रकार की श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा प्राप्त है और स्त्रियों के काम को जनाना समझकर उन्हें हीन दृष्टि से देखा जाता है। आज भी कहीं बाहर जाकर काम करने में स्त्रियाँ विशेष गौरव का अनुभव करती हैं, जबकि घर में रहने वाली और घर सम्हालने वाली बहनें अपने मन में यही समझती हैं कि हम कुछ नहीं करती, और हमारा जीवन व्यर्थ ही बीत रहा है।
दूसरा परिणाम यह हुआ है कि बाहर के सब व्यवहारों पर पुरुषों की छाप पड़ी हुई है। आज हम जिस जगत में रह रहे हैं, वह आदि से अन्त तक पुरुषों की सृष्टि है। व्यापार, व्यवहार, कानून कायदा, राजनीति धर्मनीति, उद्योग धन्धे, सभी कुछ पुरुषों के बनाये हुए हैं। स्त्रियाँ आज इन कामों में कितना ही भाग क्यों न लें तब भी वे पुरुष बनकर यानी पुरुषों द्वारा ठहराये हुए तरीके से, उनके द्वारा विकसित की गई पद्धति से ही आगे क्यों न बढ़ जाएं, कितने ही विभिन्न क्षेत्रों को क्यों न पदाक्रान्त कर लें और पुरुषों की बराबरी करने का कितना ही आत्मसंतोष स्त्री न अनुभव करे तथापि आखिरकार उनको रहना, उसी दुनिया में है, जिसका विधाता पुरुष है।
जो काम स्त्रियों को कुदरत की ओर से सौंपा गया है, और जिसे वे भली-भाँति कर सकती हैं उसी काल संगोपन और बालशिक्षा के काम को यदि वे पूरी तरह सम्हाल लें, तो वे एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी को सम्भाल लेंगी।
स्त्रियाँ कह सकती हैं कि इसमें आपने नयी बात क्या कही? आज न जाने कितने युगों से हम घर की और बच्चों की ही गुलामी करती आयी हैं और रात-दिन उन्हीं का पाखाना पेशाब उठाती हैं, फिर उसी को करने में विशेषता क्या है? पहली विशेषता तो भावना की है। बहनों को समझना चाहिए कि यह काम सिर पर आकर पड़ा हुआ कोई बोझा नहीं है और पुरुष जितने भी काम करते हैं उनमें से किसी से किसी प्रकार हल्का नहीं है। इस भावना से यदि हम इन कामों को करें तो इनमें हम रस की घूँटें पी सकती हैं। इसमें संदेह नहीं कि भावना के रंग से रंग कर हमारे सब काम अधिक सजीव और प्रकाशित हो उठेंगे।
दूसरी विशेषता है उन्हीं कामों को करने के तरीकों की। परंपरागत तरीकों से बच्चों की परवरिश करना एक बात है, और इस सम्बन्ध के शास्त्रों का अध्ययन करके स्वयं प्रयोगों द्वारा उन तरीकों में उन्नति करना दूसरी बात है। यदि स्त्रियाँ बाल संगोपन सम्बन्धी शास्त्रों का अध्ययन करें, गहराई के साथ इन विषयों का चिन्तन ओर मनन करें और इस प्रकार अपने अनुभवी विचारों की भेंट समाज के चरणों में चढ़ाती रहें तो यह काम आज जितना हीन और गौण माना जाता है, उतना न स्वयं स्त्रियों को ही हीन और गौण मालूम होगा, और न पुरुषों को ही गौण लगेगा।
यदि हमारी बहनें, बाल मनोविज्ञान, बाल शिक्षा शास्त्र, बाल शरीर और बाल मानस के विकास का और ऐसे अन्य विषयों का गम्भीर अध्ययन करके तदनुसार इस दिशा में भली भाँति काम करने लगे तो पुरुषों के दिल में कभी यह ख्याल उठेगा ही नहीं कि चूँकि स्त्रियाँ उनकी तरह बाहर जाकर नौकरी नहीं करती, इसलिए वे कोई कम महत्व का काम करती हैं। मराठी में एक कहावत है कि ‘जिव्या इत्यंत पालण्यानी दोरी तीजगास उद्धारी’ यानी जिनके हाथ में पालने की डोरी है वही संसार की उद्धारकर्त्ती भी हैं, यह कहावत आज या तो केवल लेखों और निबन्धों में प्रयुक्त होती है अथवा मातृ दिन के उत्सव पर दोहरा दी जाती है। पर यदि बहनें मन में धार लें तो कल यही चीज पूरे अर्थों में सत्य और सार्थक हो सकती हैं।
दूसरी बात मैं यह कहना चाहती हूँ कि संसार के मानवी व्यवहारों में स्त्री को स्त्री के नाते ऐसा परिवर्तन करना चाहिये जो उसके विचारों और वृत्ति के अनुरूप हों। आज कल जिस तरह व्यवहार देश और प्राणी जाति के बीच में हो रहा है उसमें कई प्रकार का जंगली पन भरा हुआ है, पशुता भी है, हृदय शून्यता और अमानुषता भी है, पुरुषों की इस दुनिया में यह एक सामान्य धारणा बनी हुई है कि जहाँ-जहाँ व्यवहार का सम्बन्ध आता है, वहाँ-वहाँ उसकी नींव असत्य पर ही बनी होनी चाहिए। मनुष्य को दुनिया में यही सोचकर चलना चाहिए कि जहाँ जो कुछ है सो बुरा ही बुरा है जितने हक या अधिकार पाने हैं, वे सब लड़ झगड़कर कर ही पाने हैं। ये और ऐसे अन्य अनेक अलिखित नियम आज मनुष्यों के आपसी व्यवहार में प्रचलित हैं।
मैं मानती हूँ कि यदि स्त्रियाँ पुरुषों का अनुकरण करना छोड़ दें और जो कुछ उनके मन को अच्छा जंचे वैसा ही करने लगे तो मनुष्यों के व्यवहार में कुछ परिवर्तन कर सकती हैं और उसको अभीष्ट रूप भी दे सकती हैं। इसमें शक नहीं कि जो संसार पीढ़ियों और सदियों से पुराने हैं, उनके दूर होने या बदलने में भी काफी समय लगेगा। फिर भी, दुनिया ऐसी कोई चीज नहीं, जो असम्भव हो, आजकल की स्त्री दो रोगों से ग्रस्त है। एक रोग तो यह होता है वह चाहें या न चाहें तो भी उनका मन यह मानना चाहता है कि पुरुष जो कहता है वही ठीक है, पुरुषों के ठहराये हुए नियम उनके बनाए हुए विधि विधान, उनके तैयार किए हुए कानून कायदे और उनके द्वारा प्रचारित रीति रिवाज जो कुछ भी हैं उसे सब उसको सोलहों आने ठीक मालूम होते हैं।
स्त्री का दूसरा रोग है तंगदिली अर्थात् हृदय की संकुचितता। आज स्त्री महान बातों का उतनी ही महानता के साथ विचार नहीं कर पाती। उसके लिए यह महत्व जरूरी है कि वह अपने हृदय को विशाल बनावें और दुनिया को विशाल दृष्टि से देखें।
आज स्त्रियों में पारस्परिक निन्दा का, असहिष्णुता का, असहानुभूति का और इसी तरह के अन्य ‘स्त्री सुलभ’ दूषणों का जो बाहुल्य पाया जाता है, उसकी जड़ में ये दो रोग रहे हुए हैं और ये सब दोष उसकी इसी रोग मन के परिणाम अथवा चिह्न हैं।
हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि स्त्री को यह रोग घर की चार दीवार के अन्दर बन्द रहने के कारण ही लगा है। गृहणी और माता के रूप में अपने कर्त्तव्यों का भली भाँति पालन करना मानव हित की दृष्टि से स्त्री का सब से बड़ा काम है। इस तथ्य को समझ कर जिस दिन स्त्रियाँ पुनः इस ओर झुकेंगी, उस दिन उन्हें खास तौर पर यह बात ध्यान में रखनी होगी कि वे भविष्य में कभी अपने को संकुचित वातावरण में रखकर तंग और संकुचित बनने में यत्न पूर्वक बचाएगी अर्थात् उनको यह बात सदा ध्यान में रखनी होगी कि वे स्वयं भी देश की नागरिक हैं, समाज का अंग हैं और मातृ भूमि की सन्तान हैं। अतएव इन सब नातों से भी उनके अपने कुछ कर्त्तव्य हैं ही, जिनको भुलाना कभी हितकारक नहीं हो सकता। इस दिशा में वे प्रत्यक्ष कुछ काम न कर सकें, तब भी ऐसे प्रश्नों पर सोचते रहना और उनके सम्बन्ध की आवश्यक जानकारी प्राप्त करते रहना बहुत जरूरी है।
इसी तरह जब-जब अवसर मिले, लोक हित का कुछ न कुछ काम घर में बाहर निकल कर करने की जिम्मेदारी अपने सिर लेते रहना भी उनके लिए अच्छा है।
डर को, आप चाहे जितनी कोशिश करें, कोशिश से नहीं निकाल सकते, इसलिए यह जोर आजमाई बंद कीजिए। अपने डर के विचार से कहिए “मैं तुम से नहीं डरता।” बस आपका हृदय साहस से भर जायगा और डर का कोई मूल्य न रहेगा।
(श्री दौलत राम कटरहा, जबलपुर,)
आदत या स्वभाव का व्यक्ति के जीवन में वैसा ही स्थान है जैसा स्थान सामाजिक जीवन में रीति−रिवाजों का है। उत्तम शिक्षण का एक उद्देश्य यह भी है कि व्यक्ति को जीवन में अच्छी आदतों से सज्जित व समलंकृत किया जावे। व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाना उत्तम शिक्षा कर प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। किंतु दुर्दैव से हमारी पाठशालाओं का शिक्षण क्रम कुछ ऐसा है तथा हमारे घरों का वातावरण भी इतना प्रतिकूल है कि छात्र जितना अधिक पढ़ते जाते हैं उतने ही अधिक वे अविनयी व उद्धत होते जाते हैं। ज्यों-ज्यों आज कल का तथा कथित ज्ञान विद्यार्थियों के मस्तिष्क में घुसता जाता है त्यों-त्यों विनय या शील बाहर निकलता जाता है। आज कल की विद्या का नशा ठीक शराब जैसा ही है। शराब के संबंध में इटालियन लोगों में यह कहावत प्रचलित है कि जब शराब अंदर जाती है तो सद्बुद्धि बाहर निकल जाती है। आज भी विद्या मदिरा के प्रभाव से सद्बुद्धि व उत्तम शील भाग खड़े हुए हैं। ऐसे समय में इस ज्ञान के प्रचार की, विद्या की शोभा विनय से है, आवश्यकता दिनों दिन बढ़ती जा रही है।
विद्यार्थियों को विनय शील बनाने के लिए भगीरथ जैसे प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है। बल्कि यदि हम चौकन्ने रहें असावधानी व प्रमाद को स्थान न दें तो हमें अनेक छोटे-छोटे ऐसे अवसर प्राप्त होंगे जिनका सदुपयोग कर हम बालकों को अपनी इच्छानुसार विनय शील सम्पन्न बना सकते हैं। बच्चे अविनयी इसलिए होते हैं कि न तो हम स्वयं संयत व्यवहार करते हैं और न स्वयं बच्चों को सुसंयत रखने की क्षमता रखते हैं। बच्चा हमारे सामने अपने बड़े भाई या बहिन का या स्वयं हमारा ही नाम लेता है, तो हम हँस देते हैं। हम सोचते हैं कि बच्चा शब्दों का उच्चारण करना सीख रहा है तो उसे सफल होते देख हम प्रसन्न हो उठते हैं। हमारा बच्चा जब अन्य बच्चे को गाली देता है या अपने से बड़े किसी व्यक्ति को छड़ी से मारता है तो उसके साहस को देखकर हमें प्रसन्नता होती है। बच्चा जब हमारी आज्ञा को टाल देता है तो हम भी आज्ञा पालन पर जोर नहीं देते और फिर जब वह बड़ा होकर पूर्णतया उच्छृंखल, निरंकुश और उद्धत हो जाता है तब हम अपने भाग्य को कोसते हैं। जो वातावरण हम उनके सामने उपस्थित करते हैं उस वातावरण में पलने वाला बालक उद्धत और अविनयी न हो तो क्या हो? दोष हमारा है और हम दैव को दोष देते हैं।
इस दयनीय परिस्थिति से त्राण पाने के लिए हमें अपने बच्चों के लिए सुन्दर और स्वस्थ परिस्थिति का निर्माण करना होगा। सुन्दर वातावरण व मानसिक परिस्थितियों का निर्माण शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य होना चाहिए। कारण यह है कि किसी विशेष परिस्थिति में बालकों को रखने का अर्थ है उन्हें दूसरी परिस्थिति से साफ दूर रखना। यदि हम बालकों के लिए अच्छी परिस्थिति का निर्माण कर देंगे तो वे बिना प्रयास बुराइयों से बच जावेंगे। क्योंकि एक अच्छे वातावरण में रहने वाला बालक दूसरे वातावरण के कार्य कर ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ नित्य माता-पिता को प्रणाम करने वालों के वातावरण के लड़के न अपने माता-पिता को गाली दे सकते हैं। अतएव हमें अपने बच्चों को सुन्दर वातावरण में रखकर बुरे वातावरण से इतनी दूर रखना चाहिए कि बुरे वातावरण में पले व्यक्तियों जैसे आचरण करना उनके लिए कठिन हो जावे। सुन्दर वातावरण में रहने से बालक अपने आप बुरे वातावरण व उसके प्रभाव से दूर रहेंगे। अतएव जो लोग चाहते हों कि उनके बच्चे विनयशील निकलें उन्हें अभी से वैसा वातावरण तैयार करने का प्रयत्न करना चाहिए। बालक के जन्म से पहले ही यह प्रयत्न होना चाहिए।
यदि दुर्भाग्य वश प्रारम्भ से ही हमने वातावरण को सुधारने का प्रयत्न नहीं किया है तो भी हमें हताश नहीं होना चाहिए। जब से हम सुधार करना प्रारम्भ करेंगे तब से ही हमें अपने प्रयत्नों का फल मिलना शुरू हो जायेगा। सत् प्रयत्न कभी निरर्थक नहीं होते। कल्याण कारी कर्मों को करने वाला कभी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता, अतएव जब से हम चेत जावे तभी से सत प्रयत्न आरम्भ कर दें। कल्पना करिए कि आपके माँ-बाप या अन्य गुरुजन जीवित हैं और आपके बच्चे अभी छोटे-छोटे हैं, तो यदि आप आज से ही यह निश्चय कर लेते हैं कि हम अपने माँ-बाप और गुरुजनों के नित्य प्रातःकाल चरण स्पर्श करेंगे तो आपके बच्चे आपकी इस रीति से प्रभावित हुए बिना न रहेंगे। उनके कोमल चित्त पर अदृष्ट रूप से पवित्र संस्कार जमा होते जावेंगे। और बड़े होने पर वे भी आपके इस आचरण का अनुकरण करेंगे।
माता-पिता को प्रणाम करने का पवित्र प्रभाव आप पर भी पड़ेगा। यदि आपके गुरुजनों की धारणा आपके प्रति अभी तक अच्छी नहीं रही है, आपके प्रणाम करने का तात्कालिक असर यह होगा कि उनकी भावनाएँ आपके प्रति शुद्ध हो चलेंगी और आपको उनका आशीर्वाद मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। यदि आपके प्रति उन्होंने कुछ गलत धारणाएँ बना ली हैं तो वे गलत धारणाएं धीरे-धीरे काफूर हो जावेंगी और सच्चे मन से वे आपके लिए शुभ कामनाएँ करेंगे जो कि निष्फल नहीं होंगी।
यदि आप अपने गुरुजनों को नित्य प्रति प्रणाम करते हैं और आपकी पत्नी भी स्वेच्छा से अपने सास ससुर और अन्य गुरुजनों को नित्यशः प्रणाम करती है तो विचारिये तो सही कि इस छोटे से मूल्य की कुटुम्ब पर कैसा स्वस्थ प्रभाव पड़ेगा। पहला प्रभाव तो यह होगा कि सास बहू का आपसी मन मुटाव और मत भेद दूर होने लगेगा बहू को सास का अनुग्रह प्राप्त होगा और उनकी कृपा दृष्टि से घर के वातावरण में अधिकाधिक शाँति आती जावेगी। बहू जब सास को नित्यशः प्रणाम करने का संकल्प कर लेगी तो उसके हृदय में भी सास के प्रति पूज्य भाव उत्पन्न होंगे। जिसके परिणाम स्वरूप सभी अपनी-अपनी मर्यादाओं के भीतर रहेंगे, कोई मर्यादाओं का उल्लंघन कर अनुचित चेष्टाएँ न करेंगे और दोनों ओर से हृदय अधिकाधिक शुद्ध होता जायगा। मैं समझता हूँ कि कौटुम्बिक मर्यादाओं के पालन के लिए गुरुजनों को प्रणाम करने जैसी छोटी-छोटी बातें अनिवार्य हैं। इनके बिना एक सम्मिलित कुटुम्ब की एकता कायम नहीं रखी जा सकती। अतएव हमें चाहिए कि हम गुरुजनों को प्रणाम करने जैसी छोटी-छोटी बातों का महत्व समझें, स्वयं अभिवादन शील बनें और अपने बच्चों को भी अपने गुरुजनों को नित्यशः प्रणाम करने की शिक्षा दें।
शास्त्र कहते हैं कि नित्य वृद्धों की सेवा करने वाले अभिवादन-शील व्यक्तियों की आयु, विद्या, यश और बल नित्य बढ़ते जाते हैं। अभिवादन शील व्यक्ति का यश तो निश्चय ही बढ़ता है पर उसका बल और विद्या भी बढ़ती है यह भी ध्रुव सत्य है। जो अभिवादन शील है जिसने वृद्धों की सेवा का व्रत लिया है वह अपने लिए एक विशेष प्रकार के वातावरण का निर्माण कर लेता है। जिसमें कि प्रमाद, अविधा, असंयम आदि दुर्गुण पनप नहीं सकते, अतएव वह सेवा व्रती व्यक्ति आपसे आप नित्यशः दूषित वातावरण से दूर-दूर हटता चला जाता है और सुन्दर वातावरण के क्रमशः निकट पहुंचता हुआ समस्त सद्गुणों और पवित्र वस्तुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
किसी बुद्धिमान व्यक्ति ने सूत्र रूप कहा है...
बे अदब, बे नसीब
बा अदब, बा नसीब।
अर्थात् अविनयी अभागा होता है और विनयी भाग्यवान। इस छोटी सी उक्ति में कितनी सच्चाई भरी है, इसे यदि हम समझ लें तो सद्विद्या का रहस्य हमें समझ में आ जायगा, अन्यथा हमारा सारा ज्ञान एक बोझ मात्र और निरर्थक है।
(श्री. सत्यदेव जी)
बुढ़ापा हमारे जीवन का ग्राँड टोटल है। इस अवस्था में पहुँचते-पहुँचते हम अपनी क्रियाशील के उच्चतम शिखर पर चढ़ गये हैं। कर्त्तव्याकर्त्तव्य का एक पुँज हमारे पीछे लगा रहता है। यह अवस्था या तो शान्ति के साथ आनन्द मनाने की है या पश्चाताप की सांसें लेने के लिए। इस अवस्था तक हमारे जीवन का इतिहास बन चुका होता है। कुल, समाज, देश के प्रति हम अपना कर्त्तव्य कर चुके होते हैं। भले ही वह अच्छा हो या बुरा। यदि हमने अच्छा किया, अपने जीवन का सद्व्यय किया है तो हम एक गौरवपूर्ण बुढ़ापे में प्रवेश करते हैं, और यदि अपव्यय किया है तो पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ नहीं आता। पछताने से कुछ नहीं होता, चिड़िया खेत चुग चुकी होती है। अवश्य ही महात्मा-गाँधी, राजेन्द्र बाबू आदि अपने बुढ़ापे को आनन्द मय बना सकते हैं।
ऐसी अवस्था में सन्तोष प्राप्ति के लिए हमें युवावस्था से ही तैयारी करनी होगी। हमें पग-पग पर अपने कर्त्तव्य का ध्यान रखना होगा। समय का सदुपयोग ही जीवन का सदुपयोग है और जीवन का सदुपयोग ही अपनी कीर्ति प्रसार का साधन है। यही कीर्ति हमारे जीवन का गौरवपूर्ण इतिहास रखती है। हम अपने कुल, समाज और देश में इसी से लब्ध प्रतिष्ठ हो सकते हैं। हमारा नाम हमारे काम के ऊपर निर्भर करता है। सन्तोष तो सेवा करने से आता है।
हर मनुष्य बाल्यावस्था में या युवावस्था में यह स्वप्न देखा करता है कि उसे जीवन में ऐसा-ऐसा करना है। वह अपना आदर्श सामने रखता है। अपने जीवन में वह एक कार्यक्रम बनाता है। परन्तु समय के परिवर्तन के साथ-साथ उसमें भी परिवर्तन आता है। उसमें स्वार्थ आदि भावनाएँ आने लगती हैं। उनका आदर्श डग-मग करने लगता है। अन्त में उसे अपने भाग्य पर सन्तोष करना पड़ता है। वह सोचता है, मैं कुछ कर नहीं सकता। वह आधार हीन नौका बन जाता है। उसे मालूम नहीं पड़ता नाव कहाँ जा रही है। अन्त में उसकी नाव पुरानी होकर अघट घाट पर लग जाती है उसे पता नहीं रहता कि वह कहाँ आ गया। जीवन की नाव भी इसी भाँति डाँवाडोल रहती है। अन्त में बुढ़ापे का आगमन होने लगता है। मनुष्य जब अपने जीवन का हिंसावलोकन करता है, तो उसके पीछे सिर्फ हाय-हाय का ही अम्बार रहता है। वह कहने लगता है काश! मैंने यह कार्य न किया होता। इसी भाँति उसका कथन प्रारम्भ होता है। अपने जीवन से कोई रस नहीं रह जाता।
सफल जीवन ही सुखमय बुढ़ापा ला सकता है। बुढ़ापे तक पहुँचकर हमें परिवार वृहद् दिखलाई पड़ता है। अपने ही परिवार में भिन्न-भिन्न प्रवृत्तियों के लोगों से सामना करना पड़ता है। हर प्रकार के मनोवृत्ति वाले सदस्य को संतुष्ट करना पड़ता है। हमारी हार्दिक दशा भी युवावस्था की भाँति नहीं रहने पाती, हमारी आमदनी थक जाती है, हम क्रियाशील जीवन से पूर्णतः विश्राम लेना चाहते हैं। यह हमारे स्वभाव पर निर्भर करता है कि हम अपना बुढ़ापा कैसे बिताते हैं। बच्चे हमारा उपदेश ध्यान में नहीं देते। घर की पतोहू हमारी बोली को टर्राहट का विशेषण देती है। रुपये पैसे के लिए हमें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। हम परमुखापेक्षी बन जाते हैं। इसके सिवा, युवावस्था के किए हुए दुष्कर्म हमें अलग बेचैन करते हैं। क्या इस दशा में इससे परित्राण का कोई साधन नहीं है।
इन अभिशापों से बचने के लिए हमें युवावस्था से ही तैयारी करनी है। युवावस्था ही हमारा सन्धि स्थल है। इस सन्धिस्थल पर पहुँचकर हमें सिंहावलोकन करके भावी निर्माण योजना करनी है। इस स्थल पर पहुँचकर सुगमता से पता पा जाते हैं कि हम संसार में कौन सा काम सुगमता से कर सकते हैं। संसार हमसे क्या काम लेना चाहता है। हम संसार में जिस भाँति अपना विशिष्ट स्थान बना सकते हैं, इस भाँति सोचकर यदि हम अपना भावी कार्यक्रम बनावें और उस पर हृदय से अमल करने की चेष्टा करें, धैर्य से काम लें, अध्यवसायी बने रहें तो कोई कारण नहीं कि हमारे जीवन में सफलता का आगमन नहीं है, और हम सात्विक सुख और शान्ति लाभ न करें।
कार्य से प्रेम करने पर हमारे अन्दर सामाजिकता की भावना स्वतः आ जायगी। हम अब निश्चिंत हो जाएंगे। स्वतः आत्मविश्वासी बनकर हम दूसरों का भी विश्वास करेंगे। अपने से प्रेम करके हम दूसरों से भी प्रेम करने लगेंगे। जो हमारे साथ आवेंगे। वे प्रभावित हुए बिना न रहेंगे।
हमें हर प्रकार से अपने स्वभाव में मृदुलता लाने की चेष्टा करनी होगी। देखा यह जाता है कि युवावस्था के सफल मनुष्य बुढ़ापे में भी अपने आगे युवकों को कुछ नहीं समझते, उनकी कदर नहीं करते हैं। सोचते हैं हम ही सबसे काबिल हैं। औरंगजेब का बुढ़ापा इसका सुन्दर उदाहरण है। मरने के पहले उसने जो पत्र अपने पुत्रों को दिये, उनमें उसने अपने कर्त्तव्य की पश्चातापपूर्ण विवेचना की, कहा मैं अपने पापों को लादे अकेले जा रहा हूँ। मैंने देश की दुर्दशा कर डाली है।
इस प्रकार युवावस्था ही हमारी चेतावनी का स्थान है। हम इसी समय अपने को भला या बुरा बना सकते हैं। बुढ़ापे में आर्थिक दुर्दशा का कारण युवावस्था की फिजूल खर्ची है। आमदनी के समय हम आसानी के साथ किंचित संचित करते चलें तो बुढ़ापे में विशेष अर्थ कष्ट न होगा। जीवन बीमा, सेविंग बैंक में जमा करना आदि आजकल के सुन्दर साधन हैं। किसी भाँति हमारे पास कुछ पैसों का बुढ़ापे में होना परमावश्यक है।
बुढ़ापे में पहुँचने के पहले हमें अधिकारों और विशेषाधिकारों को नवयुवकों के जिम्मे सुपुर्द कर देना चाहिए। हमें सिर्फ सलाहकार होने की कोशिश करनी चाहिए। बहुतेरे घरों में झगड़ा अधिकार को लेकर होता है। बूढ़े लोग नवयुवकों के आधुनिक मस्तिष्क को पहचानने में भूल करते हैं और इस भाँति बराबर अधिकार ग्रहण करने की रस्साकशी चला करती है। बुढ़ापे में अधिकार लोभ क्यों? क्यों न वे अधिकार देकर अपने को इस योग्य बना लें कि नवयुवकों को सलाह के लिए उनके पास आना पड़े और वे लोग वृद्धों की सलाह शिरोधार्य कर अपने को धन्य समझें। यह तभी सम्भव है जब युवावस्था का समुचित उपयोग हो। हमारी युवावस्था का कार्य परोपकार पूर्ण हो और हम समाज के एक उपयोगी अंग बनें। बुढ़ापे की तैयारी में सतर्कता की आवश्यकता युवावस्था से ही है।
सत्य ही हम हैं। भूल हमारी आत्मा का स्वभाव नहीं। ऐक्य हमारी आत्मा का गुण है। प्रेम, न्याय, सत्य, सौंदर्य के हम तत्व हैं, इस बात से हृदयपूर्वक मान लेने से हमें अपूर्व शान्ति का अनुभव होने लगता है। निर्मलता के हमें दर्शन होने लगते हैं। धैर्य हमें प्राप्त हो जाता है, आत्मा आध्यात्मिक भवन पर बहुत ऊँची चढ़ जाती है।
(श्रीमती प्रीतम देवी महेन्द्र)
यदि आपको भेंट स्वरूप कोई हाथी दे दे, या देना चाहे, तो क्या आप वह भेंट स्वीकार करेंगे? पहले आप हाथी के साथ आने वाले यश प्रतिष्ठा की बात सोचकर प्रसन्न होंगे और अपने अहं की तृप्ति के लिए उस भेंट को लेने में प्रसन्न होंगे। किन्तु दूसरे ही क्षण आप सोचेंगे कि क्या आप उसे सम्हाल भी सकेंगे? हाथी के साथ आने वाले व्यय तथा जिम्मेदारियों को सम्हालने की शक्ति भी हममें है या नहीं? हम उसे कहाँ रखेंगे? हमें किन-किन वस्तुओं की आवश्यकताएँ होंगी? इत्यादि अनेक विचार आपके मन में आयेंगे और अन्ततः न सम्हाल सकने के कारण आप हाथी जैसी भेंट न लेना चाहेंगे।
जब गंगा पृथ्वी पर अवतीर्ण होने लगीं तो एक ऐसे दृढ़ शक्तिशाली व्यक्ति की आवश्यकता प्रतीत हुई जो उनका भार सम्हाल ले। बड़ी खोज की गई कि कौन इस बोझ को सम्हाले पर कोई न मिला। अन्ततः शिवजी ने उस बोझ को सम्हालने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लिया और श्री गंगाजी पृथ्वी पर उतरीं। यदि सम्हालने वाला न होता, तो कदाचित गंगा जी पृथ्वी पर न आती।
वास्तव में किसी वस्तु की सम्हाल ही मुख्य है। जो मनुष्य स्वयं सम्हलना, दूसरों को सम्हालना जानता है वह प्रसन्न और संतुष्ट रहता है, जो सम्हाल से अनभिज्ञ रहता है वह अतृप्त एवं दुःखी रहता है। यह देख कर बड़ा दुःख होता है कि कुछ व्यक्ति अपनी वस्तुओं के सम्हालने में बड़े लापरवाह होते हैं और अपने रुपये का पूरा-पूरा लाभ नहीं उठा पाते। घाटे में रहते हैं। यदि वस्तु के नष्ट होने से पूर्व उसकी उचित देख भाल, सम्हाल, और दुरुस्ती करा ली जाय तो उसमें नए ढंग का जीवन संचार हो सकता है।
वह कौन सी वस्तु है जिसकी हमारे लिए सर्वाधिक आवश्यकता और मूल्य है। यह बहुमूल्य वस्तु है हमारा शरीर। मानव शरीर वह यंत्र है जिसका मूल्य आँका नहीं जा सकता। एक बार एक निर्धन व्यक्ति एक विद्वान के पास जाकर कहने लगा कि मैं बड़ा निर्धन हूँ, मेरे पास कुछ नहीं है। विद्वान बोले- “भाई! मैं तुम्हें 10 हजार रुपये दे सकता हूँ यदि तुम मुझे अपनी एक आँख दे दो। कहो क्या दस हजार रुपये लेने को तैयार हो?” वह व्यक्ति शर्मा गया और बोला- यह तो मैं दे नहीं सकता। इस पर विद्वान बोला- “भाई! जब तुम एक छोटी सी आँख का मूल्य दस हजार से अधिक मानते हो तो जरा अनुमान करो कि इस हिसाब से सम्पूर्ण शरीर का कितना अधिक मूल्य होगा।”
इस शरीर का मूल्य कितना अधिक है, पर शोक (महाशोक) हम इसी शरीर की पूरी-पूरी सम्हाल नहीं करते। शरीर में कोई पुर्जा घिसता है, हम उसकी दुरुस्त नहीं करते। साँसारिक लोभ में हम शरीर रूपी मशीन को दिन-रात घिसते तोड़ते-फोड़ते ही रहते हैं। पर्याप्त विश्राम नहीं देते, तेल डालकर उसे स्वस्थ नहीं बनाते। इस मशीन के पुर्जों का सामयिक ज्ञान प्राप्त नहीं करते। तनिक सोचिए, जो मशीन आपको बाजार में दुबारा प्राप्त नहीं हो सकती, जिसका कोई पुर्जा बदला नहीं जा सकता, जो सदा के लिए एक ही बार के लिए आपको प्राप्त हुई है, जिसके क्षय से आपका क्षय है, उस बहुमूल्य मशीन के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हमारी विपरीत बुद्धि का ही एक दुष्परिणाम है।
दाँत हमारे शरीर का कितना छोटा सा अंग है। लेकिन इसकी सम्हाल न कीजिए, मंजन, दातुन करना छोड़ दीजिए फिर देखिए कितनी जल्दी दाँत खराब होते हैं और आपकी चिन्ता के कारण बनते हैं। आपके असंख्य रुपये व्यय हो जायेंगे किन्तु प्राकृतिक दाँत कभी प्राप्त न होंगे। इसी प्रकार नेत्र हैं, हम रात-रात भर जागृत रह, सिनेमा देख कर उन्हें बेकार कर डालते हैं। फिर उम्र भर चश्मा चढ़ाये रहते हैं। इसी प्रकार अन्य अंगों का और भी अधिक महत्व है। मूत्र अवयव सबसे कोमल है। अतः इनका महत्व अत्यधिक है। हमें चाहिए कि शरीर में कोई भी टूट-फूट, कमजोरी, थकावट आते ही सावधान हो जाएं और जब तक उन्हें दुरुस्त न कर लें, चैन न लें। शरीर की उचित सम्हाल दीर्घ जीवन का रहस्य है।
सम्हाल की परिधि अति विस्तृत है। शरीर के पश्चात् मन की उचित सम्हाल आवश्यक है। मन अस्वस्थ है, तो शरीर अस्वस्थ है। मन रोग शोक-चिंता, पश्चाताप, ग्लानि, भय से परिपूर्ण है तो शरीर भी न सम्हलेगा। आप अपने मन को खूब सम्हाल कर रखें और उनमें महत्वाकाँक्षा, आशा, उत्साह, प्रेम, सहानुभूति, दया आदि के सुमधुर सुगंधित पुष्पों के वृक्ष लगावें। निरन्तर उन्हें प्रेरणा देते रहें और पनपाते रहें।
सावधान! किसी ऐसी स्थिति में न फँस जायें कि हृदय का प्रेम और स्निग्धता टूट जाय। शुष्कता और निराशा से बचते रहें। आपका हृदय जितना ही भविष्य की मधुर आशाप्रद कल्पनाओं से परिपूर्ण रहेगा, उतने ही आप प्रसन्न एवं आनन्दित रहेंगे। मन को उचित दिशा में बहता रखिए।
वस्तुओं के सम्हाल कर विचार करें, तो हमें प्रतीत होता है कि उनके प्रति हमारा बड़ा दुर्व्यवहार रहता है। हम बाजार में जब वस्तुएँ खरीदने जाते हैं, तो उनके रूप से आकर्षित होकर खूब व्यय करते हैं। स्त्रियाँ बढ़िया-2 रेशमी वस्त्र, जूते, आभूषण इत्यादि खरीदती हैं। लेकिन कैसा दुर्भाग्य है कि इन वस्तुओं की सम्हाल की ओर पर्याप्त ध्यान नहीं देतीं। उनके वस्त्र बेतरतीब इधर-उधर पड़े रहते हैं, जूतों पर पालिश नहीं होती, आभूषणों को स्वच्छ नहीं करतीं और प्रायः अन्य वस्तुओं के प्रति भी ऐसा ही बुरा व्यवहार करती हैं। हम मकान बनाते हैं, बनाने में खूब व्यय करते हैं, लेकिन कुछ काल पश्चात् मकान के प्रति हमारी सम्हाल कम होने लगती है। दीवारों में छेद हो जाते हैं, सफेदी उड़ जाती हैं, किवाड़ों की पालिश उड़ जाती है, खिड़कियाँ टूट-फूट जाती हैं। मामूली टूट-फूट की भी मरम्मत नहीं कराई जाती, ठीक समय पर न सम्हालने के कारण ये अपनी पूरी आयु भर काम नहीं देतीं। धार्मिक वृत्ति के अनेक पूँजीपति मठ मन्दिर धर्म शालाएँ बनाते हैं लेकिन वे यह नहीं सोचते कि बनवाना और सम्हालना-ये दो समान रूप से महत्वपूर्ण कार्य हैं। यदि वे आधा रुपया बाद की सम्हाल के लिए रख लें और बनाने में कम व्यय करें तो अधिक लाभ उठा सकते हैं।
यदि आपके पास किसी प्रकार की मशीन है- साइकिल, सीने की मशीन, टाइपराइटर, घड़ी है तो उसे सम्हालने का उत्तरदायित्व और अधिक बढ़ जाता है। मशीन सबसे अधिक सम्हाल चाहती है। घड़ी एक छोटी सी मशीन है, लेकिन यदि आप उसे प्रतिदिन ठीक चाबी इत्यादि देकर सम्हालते रहे तो बहुत दिन आपका काम दे सकती है। अपना फाउन्टेन पेन ही लीजिए। यदि आप उसकी सफाई, टूट−फूट और सम्हाल का यथेष्ट ध्यान रखें, तो निश्चय जानिये वह बहुत दिन तक आपकी सेवा कर सकता है। जूते पर प्रति दूसरे दिन पालिश करते रहें, फटा हुआ हिस्सा सिलाते रहें, गर्मी और जल से बचावें, तो बहुत दिन तक आपके काम आ सकता है। धोबी के धुले हुए कपड़े यदि काफी सम्हाल कर रखे जाएं, तो अधिक दिन साफ और स्वच्छ रह सकते हैं। पुस्तकों की जिल्द बँधवा लेने से उनके पन्ने बचे रहते हैं। बच्चों की पाठ्य पुस्तकों की जिल्द बँधवाना तो अति आवश्यक है।
न सम्हालने से आपका चश्मा गिर कर नष्ट होता है, तो चीनी काँच के बर्तन चकनाचूर होते हैं। यदि कोई सम्हाल कर रखें, तो काँच का बर्तन धातु के बर्तन जितना ही चल सकता है पर काफी सम्हाल न होने के कारण वह टूटते-फूटते रहते हैं। अनेक काँच की शीशियाँ, चिमनियाँ लापरवाही की वजह से बेकार होती हैं। काँच की चूड़ियों का भी यही हाल है। कीमती फूलदान, गमले, पेपरवेट, काँच के कलम दान, घड़ियों के शीशे हमारी लापरवाही के दुष्परिणाम हैं। बिजली के पंखे, इस्तरी, बल्ब, रेडियो इत्यादि उचित सम्हाल न होने के कारण असमय ही नष्ट हो जाते हैं। बिस्तर बाँधने के होल्ड आल सफर में काम आते हैं और पर्याप्त सम्हाल रखने से जीवन पर्यंत काम में आ सकते हैं। हाथ में रखने के थैले, रुपया रखने के पर्स, थर्मामीटर उचित न सम्हाल न रखने से नष्ट होते हैं। इसी प्रकार अन्य उदाहरण दिये जा सकते हैं।
(श्री. हीरालाल जी)
तमाम रोगों को दो भागों में बाँटा जा सकता है-तीव्र रोग और जीर्ण रोग। तीव्र रोग का आक्रमण यकायक और जोरों का होता है लेकिन जीर्ण रोग की अपेक्षा इस रोग से शीघ्र छुटकारा ही नहीं बल्कि इसके सहारे बहुत सशक्त एवं सुन्दर स्वास्थ्य बनाया जा सकता है क्योंकि तीव्र रोग में शरीर में संचित विजातीय द्रव्य जलकर शरीर को शुद्ध बना देता है। इन रोगों में ज्वर, सर्दी, चेचक, हैजा, संग्रहणी और फोड़े आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। जब तीव्र रोग में प्राकृतिक विजातीय द्रव्य निकालने का ठीक-ठीक अवसर और सहायता नहीं दी जाती और रोग दवाओं द्वारा दबा दिया जाता है। तब वही दबकर जीर्ण रोग का रूप धारण कर लेता है। इस रोग में दमा, गठिया, कब्ज, पेचिश आदि शामिल हैं।
साधारणतः यह कहा जा सकता है कि विजातीय द्रव्य का शरीर में धीरे-धीरे इकट्ठा होना ही जीर्ण रोग है।
तीव्र रोग की चिकित्सा के समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ये तीव्र लक्षण ही इस रोग के कारण हैं। तीव्र रोग के लक्षण से पता चलता है कि रक्त में विजातीय द्रव्य इकट्ठा हो गया है और बाहर निकलने का रास्ता बना रहा है। इसलिए निमोनिया, टाइफ़ाइड या अन्य प्रकार का ज्वर आने पर समझ लेना चाहिए कि विजातीय द्रव्य अब बाहर निकलना चाहता है। उस समय विजातीय द्रव्य को निकलने के लिए वैज्ञानिक तरीकों पर मदद देनी चाहिए ताकि शरीर शुद्ध एवं मन निर्विकार हो जाय। रोग की छेड़छाड़ करने से विजातीय द्रव्य शरीर से बाहर नहीं निकल पाता और गाँठों में जमा होकर गठिया, फेफड़े में जमा होकर दमा और मूत्राशय में जमा होकर पथरी आदि रोगों का रूप धारण कर लेता है। तीव्र रोग की चिकित्सा सावधानी से करने पर मृत्यु की कम संभावना बनी रहती है।
बिना भूख के ही भोजन करना रोग की नींव को मजबूत करना है इसलिए पेट और आँतों को साफ रखने के लिए काफी पानी पीना चाहिए। यही नहीं पानी में विष को घुलाकर उसे शरीर के बाहर निकलने की अपार शक्ति है। विष को शरीर से बाहर निकालने के लिए यह गुर्दे और त्वचा के काम में सहायक होता है। रोगी की अवस्था देखकर ठंडे-गरम पानी का प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। हो सके तो यह प्रयोग किसी विशेषज्ञ से ही करना चाहिए अन्यथा लाभ के बदले हानि की अधिक संभावना रहती है। यदि रोगी कै करना चाहता हो तो भर पेट पानी पीकर उसमें नमक भी मिला कर कै करना चाहिए। कै करने की इच्छा होने के माने यह है कि पेट में कोई चीज है जो बाहर निकलने का प्रयत्न कर रही है।
रोगी यदि कमजोर नहीं है तो रोजाना गुनगुने पानी का एनिमा अवश्य लेना चाहिए। कब्ज तो इससे जाता ही है लेकिन संग्रहणी तक चली जाती है। तीव्र रोग होने पर आँतों एवं त्वचा और गुर्दे को साफ रखने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। खट्टे लेकिन क्षारमय फलों-संतरा, मकोय, आदि-का रस पीना चाहिए। इससे शरीर से मल के निकास में काफी मदद मिलती है। यदि फलों का रस प्राप्य न हो तो तरकारी का रस लेना चाहिए नहीं तो पानी में नींबू ही मिलाकर पीते रहना चाहिए।
अगर आँतें अपना काम न कर रही हों तो उन्हें उत्तेजित करने के लिए खूब गरम पानी का एनिमा देना चाहिए। गरम-ठंडे पानी के अनेक प्रकार के प्रयोग तथा पट्टियाँ भी रोगी को आराम पहुँचाने के लिए दी जा सकती हैं। इसके लिए विशेषज्ञ की आवश्यकता होती है। त्वचा को साफ रखने के लिए रोगी के कमजोर रहने पर स्पाँज देना चाहिए। तौलिए को गरम पानी में भिगोकर निचोड़ लें फिर आहिस्ता-आहिस्ता पैर से मुँह तक रगड़ें, अंत में ठंडे तौलिए से रगड़ कर छोड़ देना चाहिए।
जब रोग की घंटी को ठीक-ठीक नहीं समझी जाती और उसके कारण दूर करने के बजाय उसे दबाया जाता है जो सूचना देने की घंटी एवं शक्ति धीरे-धीरे मंद पड़ जाती है। बस यहीं से जीर्ण रोग की शुरुआत होती है।
जीर्ण रोग को दूर करना शरीर के अंदर की जीवनी शक्ति को उभारकर रोग को उग्र रूप में लाने की कला है। जो जितना ही उखाड़ लाने और उसे समझने की कला में निपुण होगा उसके हाथ से उतने ही जल्दी रोगी स्वास्थ्य प्राप्त करेंगे।
प्राकृतिक चिकित्सा में उपचार के साधन हैं- भोजन, जल, वायु, धूप, कसरत और मानसिक विचार। इन सब का सहारा बड़ी सावधानी और समझदारी के साथ लेना चाहिए। यह समझ कर चिकित्सा करना कि जितना ही अधिक प्रयोग किया जायगा उतना ही अधिक लाभ होगा सरासर बुद्धिमानी से परे है। बुद्धिमानी तो इसमें है कि चिकित्सक रोग, रोगी की अवस्था, वहाँ के साधन और रहन-सहन तथा जलवायु के अनुसार ही चिकित्सा-क्रम निर्धारित करें। यह नहीं कि जिस गाँव में सालों में भी संतरे का दर्शन न हुआ हो वहाँ के लिए संतरे का और जो रोगी इतना कमजोर हो कि गुन-गुने पानी से भी भागता हो उसे 50-60 डिग्री का एक दम ठंडा पानी दे दे तो वह डर के मारे ही बिना मौत मर जायगा।
चिकित्सा शुरू करने के पहले की दवाओं-का इतिहास और रोगी के खान-पान का भी विवरण जान लेना आवश्यक है। माँसाहारी और एलोपैथी बोतलों को साफ करने वाले रोगियों की दवा बड़ी सावधानी से करनी चाहिए। इनके रोगों में उभाड़ बड़े जोरों का होता है क्योंकि सारा शरीर विष से भरा रहता है। चिकित्सा हमेशा नरम और सुलझी हुई होनी चाहिए।
भोजन जीवन देने के साथ-साथ जीवन लेने वाला भी है। तीव्र रोग में भोजन विष से कम काम नहीं करता। जीर्ण रोग के रोगी को भोजन के गुणावगुण पर सदा ध्यान रखना चाहिए। जो भोजन अनुकूल हो उसे भी उचित मात्रा से अधिक नहीं देना चाहिए, क्योंकि भोजन का जो भाग शरीर के उपयोग में नहीं आयेगा वह विष बनकर शरीर में इकट्ठा होगा। कहावत है “अधिक अमृत भी विष का काम करता है।”
चिकित्सा का काम है शरीर का शोधन करना। इनमें हमेशा क्षारमय और कफ निवारक भोजन करना चाहिए। यों तो साधारण मनुष्य के भोजन में 80 प्रतिशत क्षार और 20 प्रतिशत अम्ल रहना ही चाहिए लेकिन रोगी के भोजन में तो इस नियम का अवश्य ही पालन करना चाहिए। अक्ल को संतुलित करने के लिए अधिक क्षार की आवश्यकता होती है। यकायक भोजन से अम्लकारक खाद्य नहीं निकाल देना चाहिए नहीं तो शरीर शोधन बहुत तेजी से शुरू हो जाता है और बीच में उपद्रव भी होता रहता है।
इसलिए भोजन को इस प्रकार रखना चाहिए-
40 प्रतिशत फल- फलों में कोई भी मौसमी फल- संतरा, टमाटर, मकोय, खीरा, खरबूजा, तरबूज, ककड़ी आदि।
34 प्रतिशत शाक- तरकारी- सभी पत्तीदार तरकारियाँ और कंद को छोड़कर सभी हरी सब्जियाँ-पातगोभी, नेनुआ, तरोई, सरपुतिया, चिंचड़ा, पालक, परवल आदि-खायी जा सकती हैं।
इन तरकारियों का रोजाना दो छटाँक सलाद अवश्य ही खाना चाहिए।
कच्ची तरकारियों को बारीक कतर डालिए और उसे स्वादिष्ट बनाने के लिए उसमें ऊपर से गिरी लच्छे, भिगोये हुई किशमिश, मट्ठा या एक चम्मच शहद छोड़ सकते हैं।
5 प्रतिशत सूखे मेवे- किशमिश, अंजीर, मुनक्का आदि। सूखे फलों को खाने के 12 घंटे पहले पानी में भिगो देना चाहिए। खाते समय पानी पीकर मेवा खा लेना चाहिए।
10 प्रतिशत कण- चावल, गेहूँ, बाजरा, ज्वार आदि में से कोई भी एक अनाज। लेकिन यह स्मरण रहे कि किसी का भी कण और चोकर अलग नहीं करना चाहिए।
शरीर की सफाई हो जाने के बाद भोजन को इस प्रकार रखना चाहिए-फल तरकारी में 10 और 5 प्रतिशत क्रमशः घटाकर दूध तथा अन्य पदार्थ उसी मात्रा में बढ़ा देना चाहिए। इससे शोधन-काल में खोया हुआ वजन वापस आ जायगा और बढ़िया स्वास्थ्य प्राप्त होगा।
यदि संभव हो तो नाश्ता छोड़ देना चाहिए नहीं तो नाश्ते में कोई रसदार फल, दोपहर को कच्ची और पकी तरकारी और चोकर समेत आटे की रोटी और शाम को यही भोजन रखना चाहिए।
सप्ताह में एक दिन केवल पानी पीकर रहना चाहिए और दूसरे दिन गुनगुने पानी-डेढ़ दो सेर-का एनिमा लेकर पेट साफ कर लेना चाहिए।
यों तो प्राकृतिक चिकित्सा में जल के अनेक प्रयोग हैं लेकिन यहाँ तो हम ऐसी ही चिकित्सा-का वर्णन करना चाहते हैं, जो सर्वत्र आसानी से चलायी जा सके। दिन भर में कम से कम दो-तीन सेर पानी अवश्य ही पीना चाहिए। नित्य सारे शरीर को रगड़ कर ठंडे जल से स्नान करना चाहिए। हो सके तो नदी या झरने का पानी इस्तेमाल किया जाय। जहाँ तक हो ऐसा ही पानी होना चाहिए जहाँ सूर्य की रोशनी, हवा के झोंके आसानी से पहुँचते हों। इसके अलावा यदि प्रबंध हो सके तो रोगी की अवस्था का ख्याल करके कूने का पेडू नहान और मेहन नहान देना चाहिए। पहले तो केवल दोनों समय पेडू नहान लिया जाय लेकिन दो सप्ताह के बाद एक समय पेडू नहान के बदले मेहन नहान लिया जा सकता है। अकसर लोग यह भूल करते हैं कि अधिक से अधिक समय तक नहान लेने का मतलब यह समझते हैं कि जल्दी लाभ होगा, लेकिन ऐसी दशा में लाभ के बदले हानि की अधिक संभावना रहती है। अतः 4-5 मिनट से शुरू करके 10-15 मिनट तक ले लेना चाहिए।
रोगी के लिए हमेशा शुद्ध वायु में रहना आवश्यक है। नदी के किनारे बाग-बगीचों में ही अच्छा रहता है वहाँ धीरे-धीरे साँस को अंदर ले जाना चाहिए और फिर धीरे-धीरे ही उसे बाहर निकालना चाहिए। यह क्रिया दिन में कई बार की जा सकती है। वायु का फेफड़ों से और फेफड़े का सारे शरीर के रक्त संचालन से संबंध है अतः सारे शरीर को शुद्ध और स्वस्थ रखने के लिए शुद्ध वायु और स्वस्थ फेफड़े की आवश्यकता है।
हमेशा सुबह सूर्य निकलते सिरपर गीला तौलिया रखकर धूप में बैठ जाना चाहिए लेकिन यदि रोगी कमजोर नहीं है तो सूर्य निकलने के 1-2 घंटे बाद जबकि धूप तेज हो गयी हो 10 मिनट से शुरू करके 30 मिनट तक बैठना चाहिए। धूप लेने के बाद तुरन्त खूब रगड़-रगड़ कर ठंडे पानी से नहाना चाहिए। सप्ताह में एक रोज तेज धूप में इसी प्रकार शरीर से पसीना निकालने के लिए गरम पानी पीकर केले अथवा किसी भी हरे पत्ते से शरीर को ढ़ककर लेट जाना चाहिए। पसीना हो जाने के बाद ठंडे पानी से नहाना चाहिए।
रक्त संचालन को ठीक रखने के लिए कसरत जीवन के लिए बहुत ही उपयोगी है। बुढ़ापे का मतलब ही है रक्त-संचालन में कमी। अतः रोगी को रोग भगाने और नया जीवन लाने के लिए कसरत अवश्य करना चाहिए। शक्ति के अनुसार कसरत चुननी चाहिए। टहलना एक ऐसी कसरत है जिसे छोटे-बड़े, अमीर गरीब, निर्बल-सबल सभी कर सकते हैं। इस कसरत द्वारा सारे शरीर पर जोर पड़ता है आसन जानने वालों को तो आसन भी करना चाहिए। आसन से रोग भगाने में काफी मदद मिलती है। यह मन को वश में करने की कुँजी है। टहलने का समय सूर्य निकलने के पहले मंद-मंद वायु में ही अच्छा होता है। टहलते समय सीधा बदन, सीना निकला हुआ होना चाहिए और गहरी साँस लेते रहना चाहिए।
चिकित्सा शुरू करते ही रोग बड़ी तेजी से घटने लगता है लेकिन थोड़े दिन बाद गति मंद पड़ जाती है। उस समय लोग हिसाब लगाने लगते हैं कि इतने दिन में चार आना रोग गया तो बारह आना इतने दिन में जाना चाहिए और निराश हो जाते हैं, लेकिन निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है, उन्हें अपने को प्रकृति के चरणों में समर्पित कर देना चाहिए, प्रकृति उन्हें अपने आप ठीक समय पर स्वास्थ्य प्रदान करेगी।
रोग से छुटकारा पाने के बाद यह न समझ लेना चाहिए कि अब चाहे जैसे रहें बीमार नहीं पड़ेंगे। यदि हम फिर अपनी पुरानी गलतियों को दुहराते रहेंगे तो बीमार अवश्य ही पड़ेंगे।
विचारों का स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। विचार हमेशा शुद्ध रखना चाहिए। रोज अपने रोग में कमी का ही अनुभव करना चाहिए और निराशा को पास नहीं फटकने देना चाहिए।
गायत्री उपासना से जिस दिव्य शक्ति का आविर्भाव होता है, उसका पोषण और विकास यज्ञ की महिमा भी ऊष्मा करती है। बीज में से प्रस्फुटित हुए अंकुर के लिए जिस प्रकार खाद और पानी की आवश्यकता है उसी प्रकार गायत्री द्वारा प्रादुर्भूत आध्यात्मिक शक्तियों को परिपुष्ट करने में यज्ञ सहायक होता है। साधारण जप में न सही पर अनुष्ठान में गायत्री जप का दशाँश नहीं तो शताँश हवन करना आवश्यक होता है। गायत्री और यज्ञ का आपस में अनन्य सम्बन्ध है।
यज्ञ की महिमा अपार है। प्राचीनकाल में भारत के भौतिक आध्यात्मिक विज्ञान का मध्य बिन्दु यज्ञ ही रहा है। यज्ञ द्वारा मानसिक और आध्यात्मिक त्रुटियों का निवारण अनन्त ऋद्धि सिद्धियाँ तथा जीवन मुक्ति सरीखी पूर्णताएं जैसे लाभ प्राप्त होते हैं। साथ ही अगणित भौतिक प्रयोजनों की पूर्ति भी उससे होती है। मनुष्य के स्वभावों और चरित्रों का निर्माण, शरीरों को रोग मुक्त और पुष्ट करने की प्रक्रिया, अनेक अभावों की पूर्ति, वातावरण में सद्भावना के तत्वों के वृद्धि, वृक्ष-वनस्पति, पशु, अन्न आदि में प्राण तत्व की अधिकता, अमृतमयी वर्षा आदि अगणित लाभ यज्ञ के सर्व विदित है। इसके अतिरिक्त प्राचीन काल में यज्ञ द्वारा युद्ध में काम देने वाले दिव्य अस्त्र, अनुकूलता को बढ़ाने वाले और प्रतिकूलता को घटाने वाले तत्व यज्ञ की अत्यन्त महत्व पूर्ण एवं आध्यात्म विज्ञान की प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न किये जाते थे। खेद है कि आज वह जीवन संचारणी यज्ञ विद्या लुप्त प्रायः हो गई और हम उन अनन्त शक्ति स्रोतों का लाभ उठाने से वंचित हो गये।
यज्ञ विद्या की सर्वांगपूर्ण खोज करने के लिए अभी बहुत कष्ट साध्य श्रम करने की आवश्यकता होगी। फिर भी जो कुछ उपलब्ध है उसका ठीक प्रकार उपयोग किया जा सके तो वह भी इतना महान है कि उससे आशा जनक सत्परिणाम उपलब्ध हो सकते हैं।
आज मनुष्य जाति नाना प्रकार के अभावों कष्टों, चिन्ताओं, पीड़ाओं, भयों, उलझनों एवं आवेशों से ग्रसित हो रही हैं। व्यक्तिगत रूप से तथा सामूहिक जीवन में सभी कोई परेशान हैं। घर-घर में नरक विद्यमान है। समाज का संगठन-अनैतिक तत्वों की भरमार से छिन्न-भिन्न हो रहा है। राजनैतिक क्षेत्र ऐसा विषैला हो रहा है अणु बमों से कभी भी प्रलय उपस्थित करके चिरसंचित मानव सभ्यता भस्म हो सकती है। इस प्रकार की विपन्न स्थिति को दूर करने के लिए अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष प्रयत्न करने पड़ेंगे। साथ ही आध्यात्मिक उपचारों की भी उपेक्षा न की जा सकेगी। हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि केवल बाह्य प्रयत्नों से ही सब कुछ नहीं हो जाता, वातावरण बदलने और युग पलटने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सूक्ष्म प्रक्रियाओं की भी आवश्यकता होती है। इसके बिना सारी भाग दौड़ अधूरी एवं असफल ही रहती है। परिस्थितियों का निर्माण करने वाली अनेक सूक्ष्म प्रक्रियाएं हैं। उनमें यज्ञ का महत्व सर्वोपरि है।
यों हम गायत्री उपासना के साथ-साथ यज्ञ की महत्ता पर सदा ही जोर देते हैं। ओर छोटे-बड़े यज्ञों का समय-समय पर प्रेरणा पूर्वक आयोजन भी कराते रहे हैं। पर अब की बार कुछ विशेष अन्तः प्रेरणा एक विशद गायत्री महायज्ञ कराने की हुई है। इसका प्रधान उद्देश्य व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में फैली हुई अनैतिकता एवं अव्यवस्था को दूर करके वातावरण में सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि करना है। साथ ही अनेकों गायत्री उपासकों के आत्मबल को सरल रीति से बहुत अधिक बढ़ा कर उन्हें उस उच्च भूमिका तक पहुँचना भी अभीष्ट है जहाँ पहुँचना आशा जनक शान्ति प्राप्त न कर सकना संभव होता है। एक-एक मिट्टी के बर्तन को अलग-अलग पकाने में बहुत सामान, बहुत समय, बहुत श्रम, बहुत स्थान की आवश्यकता होती है पर जब कुम्हार एक ही स्थान पर बहुत बड़ा अलाव लगाकर उसमें हजारों बर्तन लगा देता है तो वह बर्तन थोड़े ही समय में एक साथ पक जाते हैं। अनेक गायत्री उपासकों की साधना का परिपाक इस एक ही गायत्री महायज्ञ में हो सकता है। जिस स्थान पर अलाव लगाया जा सकता है वहाँ की मिट्टी बिना प्रयत्न के पक कर लाल हो जाती है उसी प्रकार गायत्री तपोभूमि में जहाँ यह महान आयोजन होगा उस स्थान को सहज ही एक प्रचंड शक्ति स्रोत बन जाने का सौभाग्य मिलेगा। इस शक्ति स्रोत से चिर काल तक लाभ उठाते रहने का गायत्री परिवार को सुअवसर मिलता रहेगा। प्राचीन काल में ऐसे ही शक्ति केन्द्रों का नाम तीर्थ होता था, वहाँ समय-समय पर ऐसे ही महान आयोजन होते रहते थे। जिसके प्रभाव से वह भूमि वहाँ आने वालों को बहुत कुछ ऊँचे की सामर्थ्य धारण किये रहती थी। अब तीर्थ निष्प्राण होते चले जा रहे हैं, इसके कारण वहाँ की सूक्ष्म शक्ति का धीरे-2 समाप्त हो जाना ही है गायत्री तपोभूमि से प्राचीन काल के शक्ति शाली तीर्थों जैसा लाभ उठाना संभव हो सके इस दृष्टि से भी यह विशद यज्ञ आयोजन बड़ा ही उपयोगी सिद्ध होगा।
संकल्प हुआ है कि 125 करोड़ गायत्री महामंत्र का जप और 125 लाख आहुतियों का गायत्री महायज्ञ किया जाय। यह इतना बड़ा संकल्प है जितना महाभारत के बाद अब तक इस बीच में भी नहीं किया गया है। इसकी विशालता का हिसाब फैलाने से मस्तिष्क चकरा जाता है। पर निराशा की कोई बात नहीं जो शक्ति राई को पर्वत और पर्वत को राई कर सकती है उसके लिए ऐसे आयोजनों की पूर्णता कुछ कठिन नहीं है। हम तुच्छ हैं, हमारे साधन अत्यंत स्वल्प हैं पर जिस शक्ति की प्रेरणा से यह आयोजन हो रहा है वह न तो तुच्छ है और न उसके साधन स्वल्प हैं। उसकी प्रेरणाएं असफल रहने का कोई कारण नहीं दीखता।
चौबीस 24 करोड़ जप और 24-24 लक्ष यज्ञ के पाँच भागों में इसे बाँटा गया है। पूर्णाहुति का छटा आयोजन 5 करोड़ जप तथा 5 लक्ष यज्ञ का अन्त में होगा। इस प्रकार विराम लेते हुए एक एक मंजिल पूर्ण करते हुए इस विशाल काय महायज्ञ की पूर्णता की जायगी। इसके अंतर्गत बीच-बीच में (1) चारों वेदों के सम्पूर्ण मंत्रों का पारायण यज्ञ (2) रुद्रयज्ञ (3) विष्णु यज्ञ (4) शतचण्डी यज्ञ (5) महामृत्युँजय यज्ञ (6) गणपति यज्ञ (7) सरस्वती यज्ञ (8) अग्निष्टोम (9) ज्योतिष्टोम आदि अनेकों यज्ञ होते रहेंगे।
इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्ण फल प्राप्त कर्त्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है। यह संकल्प समस्त गायत्री उपासकों की ओर से किया गया है। इसलिए इसका श्रेय उन सभी को प्राप्त होगा जो इसमें जितने अंश के भागीदार बनेंगे जिस प्रकार किसी लिमिटेड कम्पनी के अनेक शेयर होते हैं उसी प्रकार इस यज्ञ के भी दस हजार भागीदार होंगे।
24 हजार जप तथा 240 आहुतियों के हवन का लघु अनुष्ठान ही इस यज्ञ का एक शेयर है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अनेकों शेयर खरीद सकता है उसी प्रकार कोई साधक इस यज्ञ के चाहे जितने भाग प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार भी उन्हीं नियमों में यह भी होंगे दो नियम ढीले कर दिये गए हैं। (1) उपवास अनिवार्य नहीं है जो कर सकें करें, न कर सकें न करें (2) जिन्हें अवकाश कम हो वे नौ दिन की अपेक्षा 15 दिन में 16 माला प्रतिदिन के हिसाब से भी कर सकेंगे। अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य आदि अन्य नियम आवश्यक होंगे। जप को अपने-2 घरों पर किया जा सकेगा पर उसका हवन गायत्री तपोभूमि की निर्धारित वेदी पर स्वयं उपस्थित होकर ही करना होगा। मथुरा के निकटवर्ती लोग अनुष्ठान के दिनों में ही एक दिन या दो दिन में 240 आहुतियों का हवन कर लिया करेंगे। बाहर के सज्जन अपने अनुष्ठान अपने स्थान पर करते रहें और एक वर्ष के भीतर जब भी अवसर मिले मथुरा आकर अपने कई अनुष्ठानों का हवन एक साथ भी कर सकते हैं। 240 आहुतियों में 3 मासे प्रति आहुति के हिसाब से 12 छटाँक सामग्री 1 मासे प्रति आहुति के हिसाब से 6 छटाँक घी, 1 तोले फी आहुति के हिसाब से 3 सेर समिधाएँ (लकड़ी) लगती हैं। जिन अनुष्ठान कर्त्ताओं के इच्छा तथा सामर्थ्य हो वे अपना यह सामान दे दें, जिनको कुछ कठिनाई हो, उनके लिए यह सब सामान की भी पूर्ति कर दी जायगी। इस महान आयोजन के आरम्भ का शुभमुहूर्त माघ सुदी 5(बसंत पंचमी) सन् 2011 तदनुसार 28 जनवरी है।
यह आयोजन अत्यन्त ही विशद् है। दस हजार अनुष्ठान कर्त्ता ढूँढ़ने के लिए लाखों व्यक्तियों तक इसका संदेश पहुँचाना होगा। इस कार्य को हम अकेले नहीं कर सकते। इसके लिए बड़ी संख्या में सहयोगियों, स्वयं सेवकों एवं प्रचारकों की आवश्यकता होगी। जो घर-घर जाकर इस यज्ञ का संदेश पहुँचावें, महत्व बतलावे और भागीदार अनुष्ठान कर्त्ता तैयार करें। हमारी सभी गायत्री उपासकों से प्रार्थना है कि अपने-अपने क्षेत्र में इस प्रकार का नियमित प्रयन्त करें। दो-दो चार-चार की टोली बनाकर नित्य कुछ समय या छुट्टी का अधिक समय घर-घर प्रचार करने में जाने के लिए लगावें। यह अनेकों धर्म कामों से अधिक पुण्य है। दूसरों की आत्मा को कल्याण मार्ग पर लगाने से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में नहीं है। शुभ कार्यों में प्रेरणा देने वाले को उस कार्य का दशाँश पुण्य मिलना शास्त्रों में लिखा है। कम्पनियों के शेयर बेचने वालों तथा बीमा कम्पनी के एजेन्टों को भी कमीशन मिलता है। गायत्री प्रचार की पुनीत सेवा एवं यज्ञ को पूर्ण करने के लिए की हुई प्रयत्न शीलता भी ऐसी साधना है जो जप, हवन, प्राणायाम आदि में समय लगाने से कहीं अधिक श्रेयष्कर सिद्ध होगी।
मथुरा गायत्री तपोभूमि में ऐसे स्वयं सेवकों की भी बड़ी आवश्यकता है जो स्थानीय व्यवस्था यज्ञ का सहयोग करने के अतिरिक्त प्रचार करने के भी क्षमता रखते हों। किसी को वेतन दे सकना कठिन है पर भोजन, ठहरने आदि की समुचित व्यवस्था यहाँ रहेगी। तीन-तीन महीने समय देने के लिए भी ऐसे सेवाभावी सज्जन आते रहें तो यहाँ का सब प्रबंध ठीक प्रकार चलता रह सकता है। प्रारम्भिक व्यवस्था में हमें भी विशेष अड़चन तथा आवश्यकता रहेगी इसलिए पौष, माघ, फाल्गुन की प्रारम्भिक तिमाही में मथुरा आने के लिए ऐसे सत्पुरुषों को हम अनुरोध पूर्वक आमंत्रित करते हैं।
यह यज्ञ असाधारण है। इससे असाधारण ही शक्ति उत्पन्न होती है इसके भागीदार भी कुछ ऐसे आधार अनुभव प्राप्त करेंगे जो साधारण साधनाओं से सम्भव नहीं है। यह संकल्प अत्याधिक महान सम्भावनाओं से ओत-प्रोत है। इसे पूर्ण करने में सच्चा सहयोग करने की सभी गायत्री प्रेमियों, सभी धार्मिक प्रकृति के सत्य पुरुषों से हमारी हार्दिक प्रार्थना है।
(श्री कृष्णानन्द जी )
पति-पत्नी का सम्बन्ध शासक शासित के रूप में समझने वाला अगर एक आँख का अन्धा होता है, तो उसको कांट्रेक्ट समझ, महज छोटी बातों पर, पारस्परिक उदारता के अभाव में, सम्बन्ध विच्छेद का समर्थन करने वाला दोनों आँखों का। पहले में पत्नी केवल संभोग की वस्तु समझी जाकर यंत्रवत् संचालित होती है, उसका कोई पृथक व्यक्तित्व नहीं रह जाता, तो दूसरे में पति-पत्नी दोनों केवल अपनी पाशविक वृत्ति की पूर्ति की मृग मरीचिका में फँस जीवन की शाँति को खो ही बैठते हैं, उस उद्देश्य को भी भूल जाते हैं जिसके लिए वह शरीर मिला है। छोटी-छोटी बातों के लिए हमें जिन लोगों पर निर्भर रहना पड़ता है, उसके साथ भी हमें उदारता पूर्वक व्यवहार करना पड़ता है। फिर जिसके साथ हम जीवन बिताते हैं, सुख-दुःख की परस्पर की अनुभूति से हम अपने कार्य में स्फूर्ति और उत्साह प्राप्त करते हैं, उसके साथ तो हमें कहीं अधिक उदारता का व्यवहार करना ही पड़ेगा।
कई व्यक्ति दाम्पत्य जीवन सफल हो, उसके लिए प्रेम विवाह को प्रोत्साहन देना चाहते हैं, किन्तु वे भूल जाते हैं कि जहाँ आजकल प्रेम-विवाह का बाजार गर्म है, वहाँ की अवस्था और भी दर्दनाक है। थोड़ी सी मनमुटाव की कोई बात हुई नहीं कि झट से तलाक की दरख्वास्त पेश कर दी जाती है और बराबर के लिए छुटकारा मिल जाता है। टॉलस्टाय, अब्राहम लिंकन आदि ने भी तो प्रेम विवाह किया था, किंतु उनका दाम्पत्य जीवन कितना कटु बीता, कहा जाता है, टॉलस्टाय अपनी पत्नी के व्यवहार से बड़े खिन्न रहते थे। पत्नी कभी-कभी उनके घुटनों पर सिर टेक कर उनको उन सुनहले दिनों की याद दिलाती थी जब वे यौवन के उफान काल में एक दूसरे से संयुक्त रहते थे। किंतु इन बातों का उनके ऊपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। यहाँ तक कि पत्नी की मृत्यु के समय भी वह उसके निकट नहीं थे और उनकी पत्नी ने प्रेमियों से अपनी की हुई गलतियाँ चिल्ला-चिल्ला कर स्वीकार की थीं। कारण क्या था? जब उन्होंने प्रेम होने पर ही विवाह किया, तो उनका जीवन तो और भी प्रेम पूर्ण और शाँतिमय होना चाहिए था? स्पष्ट है कि युवावस्था में बहुत कम लोगों की दृष्टि आँतरिक सौंदर्य की ओर आकर्षित होती है। वह तो बाह्य सौंदर्य तक ही सीमित रह जाता है। यह उस अवस्था का स्वाभाविक गुण है। अवस्था के साथ-साथ विचार और दृष्टि भी बदलती रहती है। जिन गुणों के कारण एक युवती किसी युवक की दृष्टि में आकर्षण का केन्द्र प्रतीत होती है, पीछे चलकर जब युवक को संसार की यथार्थता का पता चलता है, तो वे ही गुण उसकी दृष्टि में अवगुण होने लगते हैं। मेरा एक मित्र एक लड़की की चपलता पर मुग्ध था। संयोगवश उसी से उसका गठबंधन भी हुआ पश्चात् जब वह लड़की अपने पूर्व परिचितों के साथ ससुराल में उस चपलता से व्यवहार करती, तो पति महोदय को यह बात अखरती।
विवाह एक ऐसा कृत्य है जो पति पत्नी के जीवन में अगर उनके हितेच्छुओं का सुन्दर व्यवहार रहा, तो एक महान परिवर्तन उपस्थित कर देता है। ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे, जहाँ विवाह के पहले जो लड़की अपने माँ बाप के घर में नटखट और उच्छृंखल समझी जाती थी- विवाहोपराँत गंभीर विचार वाली, शाँतिप्रिय कुलवधू बन गई है। आवश्यकता है कि उसके अभिभावक जरा उदारता से काम लें। उन्हें देखना चाहिए कि जो लड़की कल ही नैहर में इतनी स्वतंत्र थी, केवल कुछ घंटों की रस्म पूरी कर देने से ही तो शाँत और गंभीर नहीं बन जाएगी। पति महोदय अपनी जन्मजात श्रेष्ठता के कारण उस पर अनुचित दबाव डालते हैं। इसका परिणाम यहाँ होता है कि या तो वह अपनी कमजोरी के कारण ऐसी दब जाती है कि अपना व्यक्तित्व खो बैठती है अथवा उग्र रूप धारण किया तो सारे परिवार की दृष्टि में गड़ जाती है और फिर कलह का दौर-दौरा आरम्भ हो जाता है। अतएव मेरा यह अनुभव सिद्ध विचार है कि नवागत पत्नी के प्रति पति अथवा अन्य लोगों का व्यवहार पूरी उदारता का हो। अगर वह स्वतंत्रता चाहती है तो उसे स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। ऐसे व्यवहार से वह समझ जाएगी कि इस परिवार के लोग मेरे अनुकूल मिले हैं, मेरा हित चाहते हैं। फिर तो रमणी का हृदय त्याग की प्रति मूर्ति होता है- उसका हृदय तो सच्चे हृदय की खोज में रहता है। तब पति या परिवार वालों को उसे अपने अनुकूल चलाना आसान हो जाएगा।
बहुधा ऐसा होता है कि पति महोदय अपनी बहन अथवा भाभी के निकट अपनी पत्नी के फूहड़पन की आलोचना करते रहते हैं। मैं नहीं समझता कि इससे उनका कौन सा हित साधन होता है। परिणाम उल्टा ही होता है। यह मानव स्वभाव है कि किसी में कुछ अवगुण हैं और अगर आप उसे दूर करना चाहते हैं, तो उससे ही मिलकर कहिए। दूसरे के निकट कहने से चिढ़ हो जाती है और विशेषकर ऐसे व्यक्ति के मुख से आलोचना सुनकर जिससे अपनी प्रशंसा सुननी चाहिए, पत्नी पर उल्टा असर होगा ही।
अर्द्ध-अंग होने के नाते पति को अपनी पत्नी में दुःख-सुख में, उसकी बीमारी, घबराहट आदि में सहायता करनी चाहिए। कैसी कृतघ्नता की बात है कि जो पत्नी पति की बीमार के समय उसका बिछावन नहीं छोड़ती, हरदम सेवा शुश्रूषा में संलग्न रहती है, उसी के बीमार पड़ने पर बहुधा पति दाई-नौकर से उसकी सेवा करवाएंगे-स्वयं इन बातों से पृथक ही रहेंगे। यह मानव स्वभाव है कि बीमारी की हालत में जो सहानुभूति के दो शब्द कहता है, छोटा-मोटा एक दो काम कर देता है, उसकी ओर हृदय बरबस खिंच जाता है। पति का यह कर्त्तव्य होना चाहिए कि वह अपनी पत्नी की असहायावस्था में सहायता करें।
पत्नी निष्कपट प्रेम के भूखी होती है। इसलिए पति महोदय यदि समय-समय पर उनके कार्यों पर अपना यह विचार प्रदर्शित करते चलें कि उसका ही उनके जीवन से संबद्ध होना स्वर्गीय सुख का कारण है, तो इसका बहुत उत्तम प्रभाव पड़ेगा। इसी विचार की अभिव्यक्ति के लिए उन्हें अपनी पत्नी के जन्म दिवस को उत्सव का दिन समझ कर उसे खुशी पूर्वक व्यतीत करना चाहिए।
पत्नी का पति ही हर प्रकार से निकटतम साथी है। इसी बात को तो दूसरे शब्दों में कहा जाता है कि दोनों एक ही इकाई के दो भाग हैं। अतएव अगर दोनों का यह विचार स्थिर हो जाय कि एक का गुण-अवगुण, दूसरे का गुण-अवगुण है, एक की प्रशंसा-शिकायत दूसरे की प्रशंसा शिकायत है, तो तब बहुत अंश में दांपत्य जीवन की बुराइयाँ मिट जाएँ। पति अगर पत्नी के साथ पूरी उदारता से बात तथा सहिष्णुता और समझदारी से काम ले और यह समझे कि उसका पद उसकी पत्नी के पद से ऊँचा अथवा नीचा नहीं है, तो दाम्पत्य जीवन की बहुत सी विषमताएँ दूर हो जाएँ।
-कच्चे सूत के पलँग पर बैठने वाला मनुष्य जैसे नीचे गिर जाता है, उसी प्रकार विषय सेवन के आश्रय में जाने वाला नीचे ही गिरता है अर्थात् उसकी अधोगति होती है।
-किसी के शरीर का नाश करना ही हिंसा नहीं है, किन्तु द्वेष-बुद्धि से किसी को मानसिक दुःख देना भी हिंसा है।
-मर्यादा का उल्लंघन करने वाले भय, शोक और चिन्ता में रात-दिन अपने जीवन को गलाते हैं।
-आज का दिन घूमने में खो दो, कल भी यही बात होगी, और फिर अधिक सुस्ती आएगी।
-चार्ल्स किंगस्ले कहा करता था कि जब मैं किसी काम में लगता हूँ, उस समय संसार की और कोई बात मेरे सामने नहीं रहती, यही उद्योगी पुरुष बनने की कुँजी है।
-कोई व्यक्ति जब तक किसी चीज के लिए मेहनत नहीं करता, तब तक वह उसे प्राप्त नहीं होती।
-उद्योगी पुरुष अपना मार्ग ढूँढ़ता या उसे स्वयं बना लेता है।
-जिस बात को तुम कर सकते हो अथवा जिस बात का तुम स्वप्न देख सकते हो उसे शुरू कर दो।
-जीवन की प्रारम्भिक आपत्तियां बहुधा आशीर्वाद होती हैं। जीती हुई कठिनाइयाँ शिक्षा ही नहीं देतीं, बल्कि वे भविष्य के प्रयत्नों में हमें साहसी भी बनाती हैं।
-क्या तुम्हें जीवन से प्रेम है? तब, समय को व्यर्थ नष्ट मत करो, क्योंकि जीवन समय से ही बना है।
-शेक्सपीयर का कहना है कि मैंने समय को नष्ट किया और अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।
-ईश्वर ने जो काम तुम्हारे लिए बनाया है, उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर पूरा करने के लिए तुम बँधे हुए हो।
-यदि जीवन में बुद्धिमानी की कोई बात है तो एकाग्रता है, और यदि कोई खराब बात है तो वह है अपनी शक्ति को बखेर देना।
-शिष्टाचार द्वारा कोई भी मनुष्य संसार में अपनी उन्नति कर सकता है। जीवन का तीन चौथाई आधार अच्छा चाल-चलन है।
-तुम्हें जो कुछ चाहिए उसे अपनी मुस्कराहट से प्राप्त करो न कि तलवार के जोर से।
पथ पर न गिरेगा मेरा, शव, मंजिल पर ही होगा मजार॥
आँधी आती, तूफाँ चलते क्षण भर डगमग हो जाते पग। रातों की काली स्याही में खो जाता मेरा उजला मग॥
लेकिन विश्वास नहीं खोता इस तम में भी रवि किरणों का। ठोकर खा हो उठता है संकल्पों का प्रहरी और सजग॥
बाधायें मेरे अधरों पर लिख जाती हैं मुस्कान नई। झंझाके झोंके भर जाते मेरी बाँहों में एक ज्वार॥
मैं बढ़ता भारी कदमों से कंपित धरती यह और गगन। चट्टानों की छाती पर लिखता द्वन्द्व युद्ध का आमन्त्रण॥
में प्रलय काल के मेघों सा घिर बढ़ता जाता एक ओर। अपनी वाणी में भरे चुनौती के स्वर का भीषण गर्जन॥
मेरी बाँहों में बेचैनी अँगड़ाई लेती रह रह कर। कितना अधीर कितना आतुर मैं आज जूझते एक बार॥
नदियों की लहरों पर मेरी उद्दाम जवानी का पानी। झंझावातों के पंखों में मेरी ही तो गति दिवानी॥
मेरी आँखों की भाषा ही पढ़ ली है ज्वालामुखियों ने। मेरे मन्त्रों को दुहराती इन भूचालों की नादानी॥
मेरा ही दिया पाठ दुहराते, बार-बार बादल के स्वर। बिजली में, नभ की पाटी पर मेरे सन्देशों का उभार॥
रो रही जिन्दगी फूट-फूट, खिल-खिल करता हँस रहा मरण। सूनी ही माँग, किया किस युग ने धरती का सिंदूर हरण॥
लेकिन फिर से वह सत्यवान छूटेगा यम की काण से। धरती की सावित्री निष्ठा दुहरा देगी इतिहास चरण से॥
मैं चौराहे पर खड़ा मशालों की लिपि में देता पुकार । आओ, मेरे संग आओ, दूर करे हम युग का अंधकार॥
पथ पर न गिरेगा मेरा शव, मंजिल पर ही होगा मजार॥
*समाप्त*
(लेखक- श्री मनोहर वर्मा)