वेदों के स्वर्ण सूत्र

तुम्हारी भुजाएं खूब बलशाली होवें।

असंतापं में हृदयं। अथ. 16।3।6

मेरा हृदय संताप से रहित हो।

अहमनृतात्सत्यमुपैमि। यजु. 1।5

मैं झूठ से बच कर सत्य को धारण करता हूँ।

यशः श्रीः श्रयताँ मयि। यजु. 29।4।

यश और ऐश्वर्य मुझ में हों।

भूयासं मधु संदृशः। 12।4।6

प्रत्येक देखने वाले को मेरा दर्शन मीठा हो।

अत्राजहीत ये असन्नशिवाः। अथ. 12।2।27

अमंगल दुखप्रद दोषों का परित्याग कर दो।

समुद्रो अस्मि विधर्मणा। अथ 16।3।6

मैं धारण शक्ति से समुद्रवत् गम्भीर बनूँ।

मा मा प्रापत् पाप्मा मोत मृत्युः। अ. 17।1।29

मुझे पाप और मौत न व्यापे।

वियं वनेम ऋतया सपन्तः। ऋग. 2।11।12

सदाचरण से परस्पर प्रेम करते हुए हम बुद्धि प्राप्त करें।

विद्वानों के जीवन से मिलकर जीओ।

ऋषिधविप्रः पुरएता जनानाम्। ऋग. 9।87।3

तत्वदर्शी विद्वान् पुरुष मनुष्यों का नेता हो।

वदन् ब्रह्मा वदतो वनीयान्। ऋग. 10।11।7

उपदेष्टा ब्राह्मण चुप रहने वाले ब्राह्मण से श्रेष्ठ है।

उत देवा अवहितं देवा उन्नयथा पुनः। ऋ.. 10।137।1

रे विद्वानों! गिरे हुए (पतित) को पुनः ऊंचा करो।

तुम्हारे हृदय एक समान हों।

नाहं विन्दामि कितवस्य भोगम्। ऋग. 10।34।3

मैं जुआरियों के लिये भोग (सुख) नहीं देखता।

अर्याज्ञयो हत वर्चा भवति। अथ. 12।2।37

यज्ञ हीन का तेज नष्ट हो जाता है।

तमेव विदित्वाँति मृत्युमेति। यजु. 31।18

उस ब्रह्म (प्रभुः) को जानने से ही मृत्यु से छुटकारा है।

अरिष्टाः स्याम तन्वा सुबीराः। अथ. 5।3।5

हम शरीर से निरोग हों और उत्तम वीर बनें।

भूत्यै जागरणम् अभूत्यै स्वपनम्। यजु. 30।17

जागना (ज्ञान) ऐश्वर्य प्रद है। सोना (आलस्य) दरिद्रता का मूल है।

अतप्ततनूने तदामो अश्नुते। ऋग. 9 9।83।1

जिसने शरीर को तपाया नहीं वह सुख को नहीं पाता।

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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

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वर्ष-14 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-2

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जीवन यज्ञ

(श्री महावर प्रसाद विद्यार्थी, टेढ़ा-उन्नाव)


जीवन यज्ञ (Kavita)

क्या हुआ अब बुझ गया तो,

रात भर दीपक जला है! ग्रीष्म का विकराल आतप,

विषम झञ्झावात सहना । हिम पड़े या उपल बरसे ,

क्या सरल तब अडिग रहना?

पल्लवित, कुसुमित फलित तरु,

गा रहा कुछ, कौन जाने।

भर रहा सौरभ जगत में, फल काँटों में पला है।

है कठिन गिरि बन गहन को,

काट अपना पथ बनाना। दीपकों-से, दृढ़-चरण के, चिह्न अपने छोड़ जाना ॥

सफल जीवन-यज्ञ, जब जग, मोद-मय आमोदमय हो।

है मरण तो सरल कितना, कठिन जीवन की कला है।

क्या हुआ अब बुझ गया तो, रात भर दीपक जला है।

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मानव जीवन का आदर्श-संयम

(श्री अगरचन्द जी नाहटा)

मनुष्य और पशु-पक्षी आदि अन्य प्राणियों में यही प्रधान अन्तर है कि उनमें विवेक का बड़ा अभाव व कमी है और मनुष्य में उसकी अधिकता है। वास्तव में पूछा जाय तो विवेक ही मनुष्य की मनुष्यता का माप दण्ड है। जब जो चाहा किया, कहा, खाया, हिताहित व कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य विचार नहीं किया तो मनुष्य शरीर धारण करने पर भी वह मनुष्य के रूप में पशु ही है। विवेकपूर्वक प्रवृत्ति का नाम ही संयम है। हम अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति की जाँच करें, यदि वह अनावश्यक है, अहितकर है, दूसरे को एवं अपने को कष्टदायक है, तो उससे विरत हो जाये, यही संयम है। हर प्रवृत्ति चाहे मन की हो, चयन की हो, या काया की, उसकी जाँच करें और स्वच्छन्दता पर नियंत्रण कर हित (स्वपर-गुणकारी), परिमित (अनावश्यक को छोड़कर आवश्यक हो, उसका आचरण भी विवेकपूर्वक) आचरण ही संयम है। इसके लिये 5 इन्द्रियाँ 4 कृपाय) कलुषित प्रवृत्तियाँ, क्रोध, मान, माया, लोभ), शरीर, मन व आत्मा पर नियंत्रण होना आवश्यक है। भारतीय अध्यात्म साधना में इस पर बड़ा जोर दिया गया है। क्योंकि असंयमित व विवेक रहित स्वच्छन्द जीवन ही मनुष्य के पतन का प्रधान व एकमात्र कारण है।

मनुष्य प्रतिदिन कुछ न कुछ प्रवृत्ति तो करता ही रहता है। नेत्रों से सुन्दर-असुन्दर पदार्थ देखता रहता है। कानों से भली बुरी-बातों को सुनता रहता है नाक से सुगंध-दुर्गंध ग्रहण करता रहता है, रसना से विविध खाद्यों का रस अनुसरण करता रहता है, त्वचा से कोमल कठोर, गर्म शीत आदि की विविध अनुभूति करता रहता है, इसी प्रकार मन से भी शुभाशुभ बातें सोचता ही रहता है। यों प्रवृत्तियाँ निरन्तर होती रहती हैं। इनमें बहुत सी अनावश्यक व अहितकर भी होती हैं। आत्मा की शक्ति इन सब प्रवृत्तियों में फैली हुई रहती है। बिखरी हुई रहती है। इन बिखरी हुई शक्तियों का एकीकरण ही संयमाभूयास व संयमाचरण का प्रधान उद्देश्य होता है। बिजली की शक्ति अनेक बल्बों में बिखरने पर साधारण प्रकाश रूप लगती है, वही संचित होने पर अद्भुत कार्य कर दिखाती है। इसी तरह बिखरी हुई शक्ति का संग्रह व एकीकरण किया जाय तो आत्मा में बड़ी-भारी शक्ति विकसित होती है, जिसके अद्भुत चमत्कारों का वर्णन महर्षि पातंजलि के योगसूत्र में हम पाते हैं। उसके विभूति पाद में लिखा गया है कि अमुक प्रवृत्ति के संयम से ऐसी विभूतियाँ व विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। योग का उद्देश्य ही चित्त वृत्तियों का निरोध है। इन्द्रिय, शरीर व मन पर आत्मा का नियंत्रण होता है। तो हम बहिर्मुखता से हटकर अन्तर्मुखता की और बढ़ते हैं। उनके नियंत्रण रूप संयम के द्वारा आध्यात्मिक शक्तियों की वृद्धि होती है।

योगियों की बात एक बार एक किनारे रख के भी सोचते हैं, तो असंयमित जीवन से व्यक्ति, समाज, देश, राष्ट्र सभी का अकल्याण है। मन की इच्छाओं का क्या? कभी कुछ करने का, कभी कुछ और करने का दिल होता रहता है। यदि स्वच्छंदता से उन इच्छाओं के अनुरूप ही प्रवृत्ति करते रहें तो मरण व दुख पद पर समझिये। थोड़े से दृष्टान्त आपके जीवन में से देकर आपका ध्यान जीवन में संयम को आवश्यकता की ओर आकर्षित कर देना चाहता हूँ। जरा ध्यान दीजिये, ये ही आदर्श-जीवन की अद्भुत बातें हैं जिनके विवेक से जीवन बनता है, और अविवेक व असंयम से जीवन बिगड़ता है, दुखी होता है।

1. खाने में देखिये-संयम की बड़ी आवश्यकता रहती है। जो आया वही भक्ष्य-अभक्ष्य व अपरिमित खाता रहे तो ठीक न पचने व स्वास्थ्य के विरोधी तत्वों के शरीर में प्रवेश कर लेने के कारण रोगों की उत्पत्ति हो जायेगी। बीमार व्यक्ति यदि खाने का संयम न रखे, जो इच्छा में आये वही खाते तो तुरन्त रोग बढ़कर मरण तक को प्राप्त हो सकता है। रोगी को अपनी इच्छा पर संयम रखना, रोक लगाना जरूरी होता है- यदि उसे रोग मुक्त होना है, स्वस्थ रहना है उसकी परिचर्या करने वाले को भी उसी पर अंकुश रखना पड़ता है। बालक व रोगी सुपथ्य के लिए बड़े झुँझलाते हैं, इठलाते हैं, यावत जिद भी करते हैं वे रोते तक हैं, पर उन पर उस समय करुणा नहीं की जा सकती बल्कि उससे हित के लिये ही संयम पालन करवाया जाता है संयम नहीं रखे, तो कष्ट रोग वृद्धि यावत मरण निश्चित है। इस भय से ही सही, पर संयम रखना तो जरूरी होता है ही।

3. बोलने में संयम न रखे तो कलई या मनोमालिन्य की सृष्टि होती है। चाहे जैसा जो वाक्य मन में आया, हर किसी को कह दिया जाए तो इसका परिणाम बड़ा दारुण होता है। वचन के घाव का इलाज नहीं, शब्द बाण के सदृश्य है। छूटा कि परवश हुए। इसलिए बोलते समय वाक् शक्ति पर बड़ा संयम रखना पड़ता है। जिसका अपनी शक्ति पर नियंत्रण है वह सफल वक्ता बन सकता है हित, परिमित व सत्यवचन बोलिये, आवश्यकता से अधिक एक शब्द का उच्चारण न करे। जो कुछ बोला जाय मधुर, सुचिन्तित व स्वपर हितकारी हो, यह विवेक रखना परमावश्यक है। वचन के असंयम से ही बात का बतंगड़ बन जाता है। अधिक झगड़े इसी कारण पैदा होते हैं। तूने मुझे ऐसा क्यों कहा? गाली दे दी, मजाक कर दी, मुझे ऐसा दिखा दिया, मेरी निंदा की है, अच्छा अब मौका मिलने पर मैं भी न चूकुँगा। इस तरह इस बात की बात में झगड़ा बढ़ जाता है।

वाद्ययंत्रों के वादन में, मोटर गाड़ी आदि के चलाने में यंत्रों पर हाथों का संयम रखना जरूरी होता है। थोड़ा सा हाथ का संयम खत्म हुआ कि मोटर कहीं से कहीं जा गिरेगी। ताल और वाद्य पर कंट्रोल न रहा तो सारा मजा किरकिरा हो जायेगा।

मनुष्य को हर व्यवहार में ‘अति’ से बचना पड़ता है। क्योंकि न्यूनता से काम परिपूर्ण नहीं होता, और अति से किया कराया बिगड़ जाता है। इसीलिए ‘अति सर्वत्र वर्जयते’ कहा गया है। कम और अधिक दोनों के बीच के सन्तुलित व्यवहार से ही कार्य सिद्धि होती है। यह यथा योग्य सन्तुलित व्यवहार संयम का ही एक प्रकार है इस प्रकार हम देखते हैं कि संयम के बिना जीवन ठीक से चल ही नहीं सकता, सिद्धि मिल नहीं सकती।

संयम रूपी ब्रेक की आवश्यकता काम में अनुभूत होती है। मोटर, रेल, साइकिल आदि में ब्रेक न हो तो महान अनर्थ हो जाय। जीवन में कभी चलने की आवश्यकता होती है तो कभी बीच-बीच में रुकना भी आवश्यक हो जाता है। रुकना ही संयम है इससे शक्ति बढ़ती है।

मकान के सब दरवाजे खुले रहते हैं तो इधर-उधर से धूल धक्कड़ इकट्ठा हो मकान को अशोभनीय बना देते हैं। अतः कचरा करकट प्रवेश न करने पायें इसके लिये खिड़कियाँ व दरवाजे बन्द रखने आवश्यक होते हैं। तदनुरूप विविध प्रवृत्तियों से जो कर्म रूप कचरा आत्मा में आ रहा है, उसको बन्द करने के लिए मन, वचन, काया को जो छूटा खुला रखा है, उसे काबू में लाना होगा, उसके हर कर्म बंधन के मार्गों को बन्द करना होगा।

जैनागमों में तो संयम को बड़ा ही महत्व दिया गया है, जैन-मुनियों का विशेषण जहाँ भी आता है, उन्हें तप और संयम से आत्मा को मावित करने वाला बतलाया गया है, भगवान महावीर का जीवन व साधना तो तप और संयम का अपूर्व और आदर्श उदाहरण है। जैन धर्म के अनुसार संसार में अनादि काल से परिभ्रमण करते रहने के कारण उसके कर्म ही हैं, आत्मा के हाथ कर्म का बन्धन मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, मन वचन काया हरत्रि योग और प्रमाण्द से होता है। कर्मों के आने के मार्ग को आश्रम कहा जाता है। कर्मबंधन को रोकने को संसार या संयम कहते हैं। पूर्व कर्म का आत्मा में अलग हो जाना निर्जरा कहलाता है और कर्मों से सर्वथा छुटकारा पाना ही मुक्ति मोक्ष कहलाता है। इन चारों तत्वों को ठीक समझने के लिये सरोवर की उपमा दी जाती है। आत्मा रूपी सरोवर है, कर्म रूपी जल है, सरोवर पानी के अनेकों मार्ग होते हैं, वे नाले, खोले आश्रव समझिये, आश्रव द्वारा कर्म रूप जल के आने के मार्ग को रोक देना, संवर कहलाता है हमें यदि सरोवर को खाली करना है तो सबसे पहले नये आने वाले जल को रोकना पड़ेगा, उसके बाद पहले के आये हुए जल को उलीच कर बाहर निकालना पड़ेगा और धूप अग्नि की गर्मी से सरोवर को सुखाना पड़ेगा, संयम के द्वारा आत्मा में आने वाले नये कर्म रुक जाते हैं, फिर तप और शुभ भावना रूप निर्जरा से पूर्व कर्मों को क्षय बनाने से आत्मा का मोक्ष हो जाता है।

संयम 17 प्रकार के होते हैं। 5 इन्द्रियाँ, मन, वचन, काया, इन त्रियोगी और चार कृषाय पर अंकुश रखना साधक के लिए अत्यावश्यक है, बहिर्मुखता छोड़ आत्मा में ही निवास करना, स्थिर रखना, रमते रहना ‘संयम’ है।

संयम के द्वारा शक्ति का संचय होता है, क्योंकि निरर्थक प्रवृत्तियों में शक्ति का जो अपव्यय होता है, वह रुकने से ही शक्ति बढ़ती है, उस संचित शक्ति से आला का उत्थान सहज हो जाता है। बिखरी हुई शक्तियाँ किसी भी काम को पूर्णतया सफल बनाने में असमर्थ होती हैं, तब संचित शक्ति से बड़े-बड़े कार्य भी सुगम हो जाते हैं असत् कार्यों में जो शक्ति लगती थी, वह अच्छे कार्यों में लगने से परिणाम शुभ ही होगा।

संयम मार्ग यथेच्छा प्रवृत्ति करने वालों के लिये काँटों का दुर्गम मार्ग है। पर वैराग्यवान् साधक व्यक्तियों के लिए आगे बढ़ने में वह परम आवश्यक है। जब मन, वचन, कायारूप बाहर की प्रवृत्तियों से हटकर आत्मा अन्तर्मुखी होती है। उसके सारे दुख-सुख रूप में प्रतीत होने लगते हैं। इसलिये कहा गया है कि संयमी पुरुष के आगे चक्रवर्ती का सुख भी तुच्छ है, क्योंकि संयम का आनन्द अपरिमित है। संयम सुख स्वाश्रयी है। तब बाहरी सुख परिमित, क्षणिक और परिणामतः दुःखोत्पादक है, बाहर का सुख वास्तव में सुख नहीं सच्चा सुख तो संयम में है।

साधक के लिये एकान्त का महत्व इसलिये है कि संसारी आत्मा निमित्त वासी है, भले बुरे जैसे-जैसे संयोग मिलते हैं, मन वचन, काया उनसे प्रभावित हो, अनुरूप प्रवृत्त हो जाते हैं, अतः निमित्त कारण ही कम मिले तो प्रवृत्ति का कम हो जाना स्वाभाविक है। गुफा, वन, जंगल आदि एकान्त स्थानों में चित्तवृत्ति अधिक एकाग्र होती है। क्योंकि वहाँ इन्द्रियों को आकर्षित करने वाले साधन कम होते हैं। मनोबल के बढ़ जाने पर तो जहाँ कहीं भी रहा जाय, वन ही घर है, घर ही वन है, मन अपने हाथ में और वश में है तो कहीं भी जाइये कैसे भी बुरे संयोगों में रहिये उनका आप पर प्रभाव नहीं पड़ेगा। पर जहाँ तक तथाविध मनोजय नहीं है, संयोगों का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। वहाँ तक साधक को बुरे संयोगों से बचे रहना आवश्यक बतलाया है, यही संयम साधना का उद्देश्य है, गुफा में बैठे ध्यान करने से मन की एकाग्रता इसलिए अधिक होती है कि वहाँ बाहरी शब्द सुनाई नहीं देता। बाहरी चीजों का अवलोकन वहाँ से किया नहीं जा सकता, न गुफा में कुछ दर्शनीय वस्तुएं ही होती है कि जिससे इन्द्रियाँ क्षुब्ध हों, विकार जाग्रत हों, न चंचल हो, वहाँ गंध भी कुछ नहीं रहती न अस्वाद योग्य खाद्य व स्पर्श योग्य स्निग्ध व कोमल वस्तुएं ही होती हैं, इसलिए वहाँ मन को संयमित रखना सहज होता है वहाँ वचन व्यवहार भी करे किससे? अतः सहज ही मौन रह जाता है क्रमशः मन उस अवस्था में अभ्यास और उस वातावरण से शाँत हो जाता है।

बाहरी आकर्षणों से बचने के लिए जिस प्रकार एकान्त की आवश्यकता है, उसी प्रकार वैराग्य की भी। जहाँ तक बाहरी पौदगलिक आकर्षणों के प्रति अरुचि नहीं होती, एकान्त स्थान में रहने पर भी मन स्थिर नहीं हो पाता, उनका मन बाहर जाकर विषय सुखों का अनुभव करने के लिए छटपटाता रहता है, अतः संयमित जीवन के लिए विषय और कषायों के प्रति विरक्ति अरुचि रूप वैराग्य का होना भी आवश्यक है।

संक्षेप में सार वही है कि सर्वप्रथम अनावश्यक प्रवृत्तियों से हटिए फिर मानी हुई आवश्यकताओं को कम करिये। वचन से मौन, काया से निश्चल और मन को एकाग्र करिए। इन्द्रिय और मन को एकाग्र करिये, इन्द्रियाँ और मन पर आत्मा का नियंत्रण हो। प्रत्येक प्रवृत्ति विवेक पूर्वक हो। स्थिर, शाँत, और पूर्ण संयमित बनकर आत्मा में ही रमते हुए संयम सुख का आनन्द लूटिए।


आत्म-चिन्तन की आवश्यकता

(श्री सन्तराम बी.ए.)

सदा कार्य व्यस्त रहना, ताँगे घोड़े की तरह सदा काम में जुते रहना, शरीर और मन को सदा दौड़ाते रहना शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है। इस पर भी हममें से अधिकतर मनुष्य अपने अवकाश के समय का उपयोग केवल दो ही रीतियों से करने का विचार कर सकते हैं या तो हम केवल काम करते हैं या केवल खेल में ही समय बिता देते हैं। इसमें से बहुत कम लोग यह विचार करते हैं कि दैनन्दिन जीवन में आने वाले विरामों का एक दूसरा बहुमूल्य उपयोग भी है और वह है- आत्मचिन्तन।

यदि हम किसी मनुष्य को अपने चौबारे में या सोने के कमरे में या कुटिया में चुपचाप बैठा देखे- जो न पढ़ रहा है, न लिख रहा है, न काम कर रहा है और न खेल रहा है- केवल बैठा है, ऊपर से देखने पर कुछ भी नहीं कर रहा है, तो हममें से अधिकतर क्या समझेंगे? हमारी पहली धारणा यह होगी कि वह किसी की प्रतीक्षा कर रहा है। संभवतः हमें थोड़ा खेद भी होगा कि बेचारा उदास बैठा है। हमारे मन में कभी यह बात न आयेगी कि यद्यपि ऊपर से ऐसा दीखता है कि वह कुछ नहीं कर रहा है पर वस्तुतः वह कोई ऐसा काम कर रहा है जो महत्वपूर्ण और आनन्द दायक दोनों है- उसने अपने मन को इधर-उधर भटकने से रोक कर वर्तमान परिस्थितियों से पूरी तरह अलग होकर चिन्तन में अपने पंख खुले छोड़ दिये हैं।

चिन्तन से नवशक्ति एवं विश्राम मिलता है, आने वाली आवश्यकताओं के लिए शक्ति रक्षित होती है, और जीवन को संतुलित और लचीला बनाये रखने में सहायता मिलती है। इसके द्वारा हम बहुधा अपने अच्छे बुरे कर्मों पर पुनर्विचार कर सकते हैं। इस क्रिया से आन्तरिक विकास में बड़ी सहायता मिलती है।

इसके लिए किसी विशेष या निश्चित प्रणाली की आवश्यकता नहीं। इसमें मन को केवल स्वतंत्र करके शाँति के साथ उद्देश्यों और वर्तमान के कथित ‘क्रियात्मक’ पदार्थों के परे भटकने देने की बात है। चिन्तन में केवल अपने विचारों को जान बूझकर आदेश करना पड़ता है कि वे छुट्टी पर हैं दैनन्दिन जीवन की वास्तविकताओं को छोड़ दें और इस प्रकार इच्छापूर्वक मन की वह अवस्था उत्पन्न कर दें जिसमें मनुष्य कोई मधुर संगीत सुनकर या सूर्यास्त का दृश्य देखकर, या उक्त पर्वत मालाओं पर आश्चर्य से दृष्टिपात करके पहुँच जाता है। यह मन का वह भाव है जिसमें आश्चर्य है पर प्रत्याशा के बिना, ध्यान है पर किसी चेष्टा या अभिसंधि के बिना।

आत्म-चिन्तन के लिए किसी भौतिक सहायता की आवश्यकता नहीं। केवल बैठने के लिए कोई अच्छा सुखद स्थान होना चाहिए। इसके लिये परिस्थितियों का भी कोई महत्व नहीं क्योंकि एक बार स्वभाव बन जाने पर फिर मनुष्य को परिस्थितियों का भाव नहीं रह जाता। वह चाहे जहाँ भी बैठकर चिन्तन कर सकता है हाँ शाँत और सुन्दर परिस्थितियों से सहायता अवश्य मिलती है और कभी-कभी उनके प्रभाव से ही मन चिन्तन अवस्था में चला जाता है।

महान मनोविज्ञानी, विलियम जेम्ज अपने दर्शन शास्त्र के विद्यार्थियों को पुनः पुनः उपासना गृह में जाने की सिफारिश किया करता था। उसने बताया था कि किसी ऐसे शान्त में जाने का अभ्यास जहाँ चिन्ताशील विचार की सूचना प्राप्त होती हो मनुष्य का अपना दृष्टिकोण ठीक रखने में सहायता देती है। वह कहा करता था कि किसी सत्संग में जाने का अनुभव वैसा ही है। मानो कोई मनुष्य भीड़ में पड़ गया है, धक्कों से उसके पाँव-उखड़ गये हैं, तब वह निकटवर्ती द्वार की पैड़ी पर चढ़ जाता है और वहाँ से लोगों के सिर के ऊपर दृष्टि दौड़ाता है, और देखता है कि सामूहिक रूप से भीड़ क्या कर रही है, तब वह ऊंची पैड़ी पर से स्तर कर फिर उसी ठेल पेल में घुस जाता है और धक्का मारकर ठीक दिशा में चलने का यत्न करता है। चिन्तन के सम्बंध में भी वह इसी उपमा का प्रयोग कर सकता था। आत्म चिन्तन से हम क्षुद्र विचारों से ऊपर उठ जाते हैं, और पहचान सकते हैं कि कौन बात महत्वपूर्ण है और कौन महत्वहीन। इससे अनुभव का आध्यात्मिक भाव स्पष्ट हो जाता है।

चिन्तन की क्रिया आरंभ करने के लिए केवल इतनी ही बात की आवश्यकता है कि मन को ठीक मार्ग पर धकेल दिया जाय। यह प्रारंभिक निर्देशक मन को सार्वभौमिक और व्यक्तित्व शून्य की दिशा में ऊपर की ओर बाहर की ओर ले जाने वाला हो, न कि विशेष आत्म-केन्द्रस्थ की दिशा में नीचे की या भीतर की ओर।

क्रियात्मक योजनाओं से थका हुआ और विशेष प्रकार के विचारों से ऊबा हुआ मन इन सब संकीर्ण विचारों को आश्चर्यजनक आसानी के साथ छोड़ देता है। चिन्तन का अभ्यास करते समय पहले थोड़ी-थोड़ी देर के लिए सुन्दरता का स्वरूप, सत्य का अर्थ साहस का भाव, मानव जाति का अदृष्ट, अमरता का गुण प्रभृति किसी सामान्य और अमूर्त विचार पर मन को एकाग्र करना चाहिए। अथवा कोई अनुप्रमाणित करने वाला आप्त वचन लेकर उसे या उससे निकलने वाले विचार को मन में स्थित कीजिए। संभव है कि इससे आपको उसका कोई नवीन अर्थ सूझ जाय, क्योंकि कहा जाता है कि प्रत्येक महाषाक्य के सात का सत्तर अर्थ होते हैं। एक बार विचारधारा को रास्ता दिखा देने के बाद, प्रवाह के साथ-साथ चलिए और जहाँ यह ले जाय वहीं को जाने दीजिए। दर्शक मात्र बन जाइये।

दुख के समय में जब चिन्ता सताने या किसी दूसरे मनोविकार के वशीभूत हो जाने पर शाँति पाने का इससे बढ़कर और कोई साधन नहीं। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि के प्रबल आक्रमण से मनुष्य की बुद्धि ठिकाने नहीं रहती। उस समय आत्म-चिन्तन से बड़ी सहायता मिलती है। बच्चा, बूढ़ा, स्त्री, पुरुष जो भी चाहे अपने अवकाश के समय को बड़ी सरलता से चिन्तन में लगा सकता है। बुद्धिपूर्वक सोच समझकर जीवन बिताने के लिए चिन्तन का महत्व है।


संगीत और आध्यात्मिकता का सम्बंध

(राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद)

‘इतिहास से विरासत में आपको भारतीय संगीत जैसी अमूल्य निधि मिली है। अन्य देशों के संगीतों की अपेक्षा इसमें जो विशिष्टता है वह मान्यताओं के कारण है जो संगीत के सम्बंध में हमारे पूर्वजों की थी। भारत में संगीत क्षणिक आमोद-प्रमोद व अतृप्त तृष्णा की वस्तु न होकर समस्त ब्रह्माण्ड अथवा व्यक्त जगत से ऐक्य का आभास है चिरानन्द प्रदान करने वाली आध्यात्मिक साधना है और साँसारिक दुखों से मुक्ति प्रदान करने और ब्रह्म तक मानव को ले जाने वाला मार्ग है। संगीत के इस स्वभाव और ध्येय को हमारे लोगों ने हमारी सभ्यता के प्रभाव से पहचान लिया था और जानबूझ कर संगीत का विकास इन्हीं आदर्शों के अनुकूल किया था। उन्होंने संगीत और जीवन में किसी प्रकार की खाई न खोदी, किसी प्रकार की दीवार न खड़ी की। यह कहना अनुचित न होगा कि उन्होंने संगीत को हमारे जीवन में इस प्रकार बुन दिया कि सहस्र शताब्दियों के पश्चात भी वह उसका अविच्छिन्न अंग बना हुआ है। संसार में सम्भवतः ऐसा अन्य कोई देश नहीं है जहाँ संगीत इतने पुराने युग से जन जीवन में इतना व्याप्त हो जितना कि वह भारत में सहस्रों वर्षों से रहा है। संसार की सब जातियों की अपेक्षा भारतवासियों के कहीं अधिक संगीत प्रेमी होने की बात का जिक्र मैगस्थनीज भी कर गया है। ईसामसीह पूर्व 150 लगभग लिखे गये इण्डिका नामक अपने ग्रंथ में आर्यन ने मैगस्थनीज का यह कथन उद्धृत किया है कि, ‘सब जातियों की अपेक्षा भारतीय लोग संगीत के कहीं अधिक प्रेमी हैं।’ सहस्रों वर्षों से हमारे घरेलू और दुनियावी जीवन में लगभग सभी काम किसी न किसी प्रकार संगीत से आरंभ होते रहे हैं।

‘जन्म से लेकर मृत्यु तक यह संगीत हमारे साथ बना रहता है। जिस दिन बालक संसार में अपनी आँखें खोलता है उस दिन से ही संगीत से भी उसका परिचय हो जाता है। नामकरण, कन्छेद, विवाह आदि में तो संगीत होता ही है। ऐसा कोई तीज त्यौहार नहीं होता, ऐसा कोई पर्व और संस्कार नहीं होता, जिसमें संगीत न हो। घर में ही क्यों? हमारे यहाँ खेत में और चौपाल में, चक्की चलाने और धान कूटने में भी संगीत चलता ही रहता है।’ अतः यह कहना अनुपयुक्त न होगा कि हमारे जन-जीवन के उल्लास को प्रकट करने का तो यह प्रभावी साधन है ही साथ ही उसको गतिमान बनाने का भी अस्त्र है। संगीत उनको रचनात्मक कार्यों में अग्रसर होने की सामूहिक स्फूर्ति और प्रेरणा प्रदान करता है और उनको वह सामूहिक शक्ति देता है जो उन्हें उन कामों के करने के योग्य बना देती है जो वे अकेले या समूह में संगीत की प्रेरणा के बिना न कर पाते।

‘इतना ही क्यों? भारत में संगीत ने आध्यात्मिक और साँस्कृतिक क्षेत्र में वह काम किया है जो संभवतः और कोई शक्ति शताब्दियों के परिश्रम के पश्चात भी न कर पाती। यद्यपि भारत का साधारण जन वर्णमाला से सर्वथा अपरिचित ही है, किन्तु फिर भी वह आध्यात्मिक ज्ञान से शून्य नहीं है। देश के किसी भी दूर से दूर के ग्राम में आप चले जाइए आपको वहाँ का साधारण कृषक भी अनेक आध्यात्मिक तथ्यों से पूर्णतया परिचित मिलेगा। श्री कजिन्स ने अपने ऐसे ही एक अनुभव का जिक्र कुछ दिन पूर्व परिजन पत्रिका में किया था। उन्होंने लिखा था कि एक ग्राम में वह एक सज्जन से कई घण्टे गूढ़ दार्शनिक तत्वों की बातचीत करते रहे। उस सज्जन के ज्ञान से अत्यन्त प्रभावित होकर चलते समय उन्होंने उक्त सज्जन से कहा कि वह अपना पता लिख कर उनको दे दें। किन्तु उनके आश्चर्य की उस समय कोई सीमा नहीं रही जब उक्त सज्जन ने ऐसा करने में इस कारण अपनी असमर्थता प्रकट की क्योंकि वह वर्णमाला से सर्वथा अपरिचित था। मेरे विचार से कि वर्णमाला से अपरिचित होने पर यदि हमारा साधारण जन इस प्रकार का ज्ञान रखता है तो उसका एक प्रमुख कारण यही है कि संगीतमय गाथाओं और कथाओं ने उसके हृदय में उस ज्ञान को बैठा दिया है। मैं कभी-कभी सोचा करता हूँ कि क्या कारण है कि भारत ही एक ऐसा देश है जिसमें तुलसी या कबीर जैसे कवियों की कृतियों से अनपढ़ लोग भी करोड़ों की संख्या में परिचित हैं। पर मैं समझता हूँ कि इस रहस्य का हल यही है कि हमारे जीवन में इतना बुरा हुआ है कि सहज में ही इन कवियों के मधुर पद घर-घर और ग्राम-ग्राम की सम्पत्ति बन गये। आज भी ऐसे अनेक लोग मिल जायेंगे जो सर्वथा अनपढ़ होते हुए भी तुलसी के रामचरितमानस के अनेक पद सादर सुना सकते हैं, और कबीर के पदों का तो कहना ही क्या है? अतः भारत के साँस्कृतिक आध्यात्मिक विकास में संगीत का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान रहा है। हमारे देश के प्राचीन युग में संगीत शास्त्रियों और संगीतज्ञों का भी बड़ा ऊंचा दर्जा होता था जैसा कि संगीत शास्त्रियों की मुनि और ऋषि की उपाधियों से पूर्णतया स्पष्ट है। इन संगीत शास्त्रियों का देश के मानसिक निर्माण में इसलिए भी पर्याप्त भाग होता था क्योंकि प्राचीन युग में संगीत शास्त्र का अध्ययन शब्दशास्त्र के अध्ययन के साथ ही वैदिक शिक्षा व्यवस्था का अनिवार्य अंग था।

भारतीय संगीत कल्याण साधना का एक मार्ग है और सामूहिक शिक्षा का एक ढंग है। अतः यह आवश्यक है कि अपने संगीत को पुनः अनुप्रमाणित करने के लिए हम इन दोनों पक्षों से इसका संबंध फिर जोड़ दें। मुझे शंका है कि इस बारे में उतना विचार नहीं किया गया है जितना कि होना चाहिए।

‘माह का भारतीय संगीत जन जीवन की गंगा से कुछ दूर ही है। वह तो कुछ नगरों की सम्पत्ति बन गया है। मैं यह मानने के लिए प्रस्तुत नहीं हूँ कि उस संगीत की अच्छाई-बुराई को सागर ही परख सकते हैं। हमारे यहाँ तो संगीत की कसौटी यही है जड़ दीप उससे जल उठे। तब फिर भला यह कैसे कहा जा सकता है कि ग्रामवासी का हृदय उससे प्रफुल्लित न हो जायेगा? यदि तुलसी और कबीर ने अपने संगीत से उत्तर भारत के ग्राम्य जीवन को आध्यात्मिकता से प्लावित कर दिया और अनपढ़ों को पण्डित बना दिया तो कोई कारण नहीं है कि आज का संगीतज्ञ वैसा क्यों नहीं कर सकता है इस लोक तंत्र के युग में यह आवश्यक है कि हमारे संगीतज्ञ हमारी जनता से अपना संबंध पुनः वैसा ही स्थापित करें जैसा पहले युग में था और जो अंग्रेजी युग की नगर प्रधान प्रवृत्तियों के कारण टूट गया था। वह इसलिए आवश्यक है कि आज हमारे संगीतज्ञों को वैसा अवकाश-पूर्ण जीवन व्यतीत करने की सुविधा और आर्थिक साधन नहीं है जो इन्हें सामन्तों और राजाओं के युग में प्राप्त थी।

हमारे संगीतज्ञ मीरा और तुलसी की परम्परा को पुनर्जीवित करें। आज भी मीरा और तुलसी के पदों के लिये जनता के हृदय में आदर है, श्रद्धा है और उनके लिए गरीब अमीर सभी खर्चा करने को भी तैयार होते हैं। अतः मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि हमारे संगीत का जनजीवन की गंगा से सम्बंध हो गया तो वह नवजीवन प्राप्त कर लेगा और अपने के सार्थक और सफल बना लेगा।

‘किन्तु जनजीवन के संपर्क का यह अर्थ कदापि नहीं है कि संगीत के स्वरूप को विकृत कर दिया जाए। यदि ऐसा हुआ तो वह अपना मिशन कदापि पूरा नहीं कर सकेगा। हमारे संगीत के स्वरूप अपने स्वभावगत उद्देश्य के अनुकूल ही बने हैं। उदाहरणार्थ हमारे संगीत में रागों का स्थान प्रधान है। यदि राग नहीं तो हमारा संगीत भी नहीं। किन्तु रागों का यह महत्व अन्य बातों के अतिरिक्त इसलिये भी तो है कि हमारे संगीत का ध्येय मन में एक और केवल एक रस का उद्रेक करना है। मानसिक शिक्षा और समय का यह बड़ा प्रभावी तरीका है। अतः स्पष्ट है कि हमारे संगीत का जो ऐतिहासिक स्वरूप है उसको विकृत करके हम उसे जीवन के लिए वैसा कल्याणकर नहीं रख सकते जैसा कि वह है और होना चाहिये। मुझे इस बात का दुख और खेद है कि हमारे देश की प्रचलित परिपाटियाँ संगीत की परम्परा को विकृत कर रही हैं और इस प्रकार हमारी भारी हानि कर रही है। मैं तो यही आशा करता हूँ कि इस प्रश्न पर संजीदगी से विचार किया जायेगा और देश और जाति के लिए संगीत को मानसिक और चारित्रिक उन्नति का एक साधन और जबरदस्त साधन बनाने का प्रयत्न किया जायेगा न कि केवल मन बहलाव और विलास का एक जरिया।

‘अब समय आ गया है कि संगीत का हमारी शिक्षा व्यवस्था से घनिष्ठ सम्बंध काय किया जाए। उसका यह अर्थ नहीं कि यह विश्व विद्यालयों को परीक्षाओं के लिए एक विषय मात्र हो जाए। इसका अर्थ यह है कि हमारे विद्यार्थियों की सामाजिक या सामूहिक चेतना के निर्माण में संगीत का भी अंश हो। हमारे यहाँ तो भगवान भी बिना मुरली या डमरू के पूरे नहीं समझे गए हैं। मानव का तो प्रश्न ही क्या है? यह अकारण ही नहीं है कि विद्या की आधिदेवी सरस्वती के हाथ में पुस्तक के साथ-साथ वीणा भी बताई जाती है। उसका यही अर्थ है कि किसी भी व्यक्ति की शिक्षा केवल पुस्तकीय ज्ञान से ही नहीं पूरी होती वरन् उसके लिए यह भी आवश्यक है कि उसकी मानसिक वृत्तियाँ का भी ऐसा परिमार्जन हो गया हो कि उसे वैराग की कोई भी बात अच्छी न लगे और उसके हृदयतंत्री के तार सर्वदा वही मधुर राग से गूँजते रहें। आज हमारी शिक्षा ऐसी नहीं है और इसीलिए आज हमारे यहाँ मस्तिष्क और हृदय का तालमेल ठीक नहीं दिखाई देता। प्लैटो ने भी इस बात पर जोर दिया था कि संगीत के बिना मानव की शिक्षा पूरी नहीं मानी जा सकती। अतः हमारे संगीत शास्त्रियों और शिक्षा शास्त्रियों दोनों को ही यह विचार करना है कि यह सम्बंध कैसा हो और किस प्रकार कायम किया जाए। अनेक युग बीते तब भारतीय संगीत का उद्भव भगवान शिव से हुआ था। तब से समय के प्राँगण में अनेक राजा महाराजा, सेनानी और विजेता आए और विलुप्त हो गए, अनेक साम्राज्य बने और बिगड़े अनेक दुर्दिन आये और दुःख के पहाड़ टूटे किन्तु भारत बना रहा और भारतीय संगीत बना रहा। इस मृत्युशील संसार में हमारे इतने दीर्घ जीवन का यही रहस्य है कि हमने आध्यात्मिकता का दामन नहीं छोड़ा है। ऐसी आध्यात्मिकता का जो दार्शनिक की शुष्कता से कहीं दूर भगवान की गीता में है और भक्तों के गान में हैं। मुझे विश्वास है कि भगवान शिव का यह वरदान, यह भारतीय संगीत, हमारे जातीय जीवन को सर्वदा गंगा-मृत के समान अमर बनाने वाला बना रहेगा।


उत्थान एवं पतन का गतिचक्र

(श्री रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

संसार की जातियों, राष्ट्रों के उत्थान पतन, व्यक्तियों कुटुम्बों, बड़े-बड़े परिवारों की उन्नति एवं अवनति का एक क्रम है, एक चक्र है। यदि हम ऐतिहासिक दृष्टिकोण से व्यक्तियों परिवारों, जातियों, राष्ट्रों के उत्थान एवं पतन का निरीक्षण करें, तो हमें प्रतीत होता है कि-

प्रत्येक राष्ट्र, परिवार तथा व्यक्ति के उत्थान का कारण उसमें रहने वाले व्यक्तियों के गुण हैं। प्रायः प्रत्येक समुन्नत राष्ट्र या परिवार में एक ऐसा अद्भुत परिश्रमी या प्रतिभाशाली व्यक्ति होता है, जिसके परिश्रम त्याग, बलिदान, सतत उद्योग एवं अथक परिणाम के फलस्वरूप वह राष्ट्र या परिवार समुन्नत होता है, उसका क्रमिक विश्वास होना प्रारंभ होता है और उसी के जीवन में वह उन्नति के शिखर पर पहुँच जाता है।

जब तक परिश्रम, प्रतिभा एवं सतत उद्योग की यह आधार शिला दृढ़ता से जारी रहती है, वह व्यक्ति जीवित रहता है, तब तक वह परिवार या राष्ट्र पुष्पित फलित और समृद्धिशील रहता है।

इस परिवार या राष्ट्र की नवीन परिवर्तित सुखद परिस्थितियों में पल कर नई पीढ़ी राष्ट्र के नए नागरिक परिवार के पुत्र, पुत्री, बन्धु बाँधव इत्यादि अपनी शक्तियों को उस अनुपात में नहीं विकसित कर पाते, जितना प्रारंभिक युगान्तरकारी प्रतिभावान व्यक्ति ने की थी। उनकी शक्तियाँ क्रमशः क्षीण होनी प्रारंभ होती हैं। वे परिश्रम या जागरुकता का महत्व नहीं समझते। वे विलासप्रियता में निमग्न होकर अर्जित धन सम्पत्ति, प्रतिष्ठा, संचित, साख का अनुचित लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं।

नई अविकसित पीढ़ी के युवक-युवतियों पर भी जब तक बुजुर्ग या आध्यात्मिक शक्ति सम्पन्न महापुरुष की छाया रहती है, परिवार या राष्ट्र ज्यों का त्यों रहते हैं। इसके नहीं होने पर न उसका आगे उत्थान चलता है, न पतन होता है।

महापुरुष या प्रतिभावान व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात उसकी संतान या राष्ट्र पिता के देहावसान के बाद उस देश के नागरिक परस्पर लड़ते-झगड़ते हैं, शक्ति या धन के लिए युद्ध तक होते हैं, भाई-भाई लड़ते हैं, और धीरे कुटुम्ब का पतन प्रारंभ होता है। अविकसित अपरिपक्व व्यक्ति की संतानें प्रायः अर्जित धन, गौरव, प्रतिष्ठा या साख के महत्व को नहीं समझती, धीरे-धीरे अगली पीढ़ियों में समृद्धि का चक्र नीचे आना प्रारंभ होता है। जैसे-जैसे संतान या नागरिकों की शिक्षा, अध्यवसाय, परिश्रम की कमी होती है जैसे-जैसे पतन का चक्र नीचे की ओर आता-जाता है।

अन्त में एक ऐसी स्थिति आती है, जब परिवार या राष्ट्र के नागरिक साधारण स्तर पर आ जाते हैं। उनमें कोई विशेषता, प्रतिभा, जागरुकता या परिश्रमशीलता शेष नहीं रह जाती। वे अन्य लोगों की तरह मामूली से बनकर अन्य लोगों में मिल जाते हैं पतन का चक्र अपनी निम्नतम स्थिति में आ जाता है।

बहुत दिनों तक यह प्रसिद्ध कुटुम्ब विस्मृत सा रहता है। लोग उसे भूल जाते हैं किन्तु फिर एक असाधारण शक्तियों वाले बच्चे का जन्म होता है। वह अपने परिवार की अवस्था, प्रतिष्ठा, आत्म गौरव का अध्ययन करता है। उसके गुण ऊंचा उठने के लिए उत्प्रेरित करते हैं। चक्र की प्रगति इस बच्चे के साथ पुनः उन्नति की ओर चलती है। वह अपना वातावरण स्वयं निर्मित करता है। शक्तियों के विकास, दूसरों का अनुभव, अपना उद्योग, परिश्रम की दैवी सम्पदाएं साथ लेकर पुनः उत्थान और समृद्धि के चक्र को ऊपर उठाता है। फिर वह राष्ट्र, परिवार या देश सम्मुख होना प्रारंभ होता है। इसी उत्थान-पतन के क्रम को देखकर इतिहासकारों ने कहा है ‘इतिहास निरन्तर अपनी पुनरावृत्ति किया करता है।’

विलास प्रियता, आराम से रहना, गंभीरता से जनरुचि, संसार की प्रगति अपनी सामर्थ्य या शक्ति का वृत्ति अनुमान न रहना, पतन का कारण बनती है। परिश्रम, संयम, उद्योग, मितव्ययिता, जागरुकता से नियति तक ऊंचा उठता है। जागृति एक प्राकृतिक घटना है। राष्ट्रों या परिवार की बीमारी और नींद मनुष्यों की कई-कई पीढ़ियाँ तक रहती है।

खल्डिया, इजिप्ट, रोम इत्यादि पुराने राष्ट्रों के नागरिकों के आचरण भ्रष्ट होते ही इनका अधः पतन होना प्रारंभ हो गया। किलोपेट्रा जैसी परम वैभव सम्पन्न इजिप्ट की महारानी ने कितने पाखण्ड चलाये, अन्त में क्या दुष्परिणाम हुए, यह इतिहास हमें स्पष्ट बताता है। ग्रीक राष्ट्रों में स्त्रियों का प्राधान्य बढ़ते ही वहाँ के नागरिक विलासी बन गये और राष्ट्र को रोमन लोगों ने जीत लिया। शक्ति, संयम, सदाचार के बल पर रोम प्रसिद्ध रहा किन्तु आचरण में शैथिल्य आते ही रोम का पतन आरंभ हुआ।

भारत के इतिहास को लीजिए। नए वंशों की नींव डालने वाले व्यक्ति जैसे कनिष्क, हर्ष, अशोक, चन्द्रगुप्त मौर्य, शिवाजी, शेरशाह, बाबर इत्यादि शासक अद्भुत शक्तियों, परिश्रम एवं उद्योग के भरे हुए प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। इन्हीं के साम्राज्य का पतन दुर्बल शासकों का विलासी कमजोर, आरामतलबी के कारण हुआ। नींव डालने वाला शासक प्रतिभा सम्पन्न, उद्योगी और परिश्रमी तथा नींव उखाड़ कर पतन करने वाले व्यक्ति दुर्गुणों से युक्त, असंयमी, डरपोक निकम्मे होते आये हैं।

प्रकृति का कुछ ऐसा विधान है कि बड़े व्यक्तियों के पुत्र-पुत्री उस कोटि के प्रतिभावान, संयमी परिश्रमी, दूरदर्शी नहीं होते, जितने उनके पिता थे। उन्हें समृद्धि का जो वातावरण प्राप्त होता है, उनमें उनकी गुप्त शक्तियों का विकास रुक जाता है। चूँकि बच्चों में पूर्व संचित समृद्धि, प्रतिष्ठा या धन सम्पत्ति को संभालने की शक्ति नहीं होती, इसलिए धीरे-धीरे वह स्वयं हीनता की ओर जाते हैं। उच्च शक्तियों के साथ साँसारिक समृद्धि, प्रतिष्ठा, धन इत्यादि का अन्योन्याश्रित वृत्ति संबंध है।

व्यक्तियों एवं परिवारों के उत्थान पतन में निरन्तर नियति चक्र चल रहा है। बड़े परिवारों के व्यक्ति अपने बच्चों की शिक्षा, परिश्रमशीलता, जागरुकता, संयम के प्रति ध्यान नहीं देते। फलतः इनके बच्चे साधारण अपरिपक्व असंयमी रह जाते हैं और उनकी पीढ़ियों की संचित सम्पत्ति धीरे-धीरे विनष्ट हो जाती है। कभी-कभी देखा जाता है कि कुछ व्यक्ति और परिवार यकायक सट्टे बेईमानी, काले बाजार या चालबाजियों के बल पर समुन्नत नजर आने लगते हैं, किन्तु कलई खुलते ही उतनी तेजी से उनका पतन भी देखा जाता है।

बड़े खानदान के लड़का-लड़की रुपये का मूल्य नहीं समझते, वे उस अनुपात में परिश्रम नहीं कर पाते, जिस अनुपात में उनके पूर्व पुरुषों ने किया था। धीरे-धीरे उनके हाथ में आकर व्यापार शिथिल होते हैं। मूल धन भी खाया पकाया जाता है। खर्चे वैसे के वैसे ही बने रहते हैं। व्यापार नष्ट होता है और फिर वे परिवार उसी स्थिति में आ जाते हैं, जहाँ से उनका उत्थान होना प्रारंभ हुआ था। इस नियति क्रम से युद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक शासक नवीन शासकों को गुणी परिश्रमी एवं प्रतिभाशाली बनाकर उनके हाथ में बागडोर सौंपे।

पिता-पुत्र को गरीबी का महत्व समझाये। रुपये की शक्तियाँ, सदुपयोग, परिश्रम शीलता और संयम, इत्यादि सिखाये। कंधे मजबूत होने पर ही सब धन, यश, प्रतिष्ठा जायदाद सौंपने में स्थाई ख्याति प्रतिष्ठा स्थिर हो सकती है। उत्थान एवं पतन के चक्र को चलाने में प्रकृति बड़ी निर्दयी है, यह स्मरण रखिए।


सिद्धियों का मूल एकाग्रता

(श्री रामदास विष्णु पटेल, सावदा)

कर्मयोग, भक्तियोग, लययोग, नादयोग, ध्यान, धारणा, जपयोग इत्यादि जितने साधन हैं, वह सब अन्तःकरण की शुद्धता, पवित्रता तथा एकाग्रता के लिये हैं। चंचल मन से किया हुआ कोई भी साधन सिद्ध नहीं हो सकता।

‘रसस्य मनसश्चैव पञचलत्वं स्वभावतः।

रसबद्धो मनोबद्धं कि न सिध्यति भूतले॥’

(बरहोपनिद्)

पारद और मन यह स्वभावतः चंचल हैं, यदि पारद को और मन को बद्ध कर दिया जाय तो फिर त्रैलोक्य में अप्राप्य कुछ भी न रहेगा।

जिस प्रकार अस्थिर जल में अपना प्रतिबिम्ब साफ नहीं दीखता, उसी प्रकार जब तक चित्त चंचल है, तब तक अपना आत्मस्वरूप प्रकट नहीं होता। इसलिये मन को साधन द्वारा एकाग्र करने का अवश्य प्रयत्न करना चाहिए, जिससे अन्तःकरण की शुद्धि होती रहेगी और शुद्धता के साथ-साथ एकाग्रता भी बढ़ती जायेगी। संकल्प और विकल्प करते रहना यह तो मन का धर्म है, इसलिए साधन द्वारा धैर्यपूर्वक मन को साधनारुढ़ करके मन को शनैःशनैः जीतना चाहिए। मन पर नियंत्रण किये बिना साधन सफल नहीं होता और साधक निरुत्साह हो जाता है।

‘मनोहि विजितं येन जितं तेन जगत्रयं’

मनोविज्ञान शास्त्र का कथन है कि मन का नियंत्रण करने से एक महान सूक्ष्म बलवती शक्ति उत्पन्न होती है, जिसका परिचय होना अल्पज्ञ मनुष्यों को दुस्तर है, मनोनियम से कायिक, मानसिक और सामाजिक उन्नति होती है। कर्मयोग, भक्तियोग, लययोग, हठयोग, राजयोग तथा तपयोग इसमें सरल और साध्य केवल जपयोग है, मंत्र का जप मनोयोग के साथ करने से एकाग्रता साध्य होता है।

‘तज्जपस्तदर्थ भावनम्’

वृत्ति को अन्तर्मुखी करना साधक का ध्येय है। इसलिए अपने नेत्र को मिलित रख कर मंत्र के अक्षरों पर मन को दृढ़ आरुढ़ करना और ध्यान सहित जप करना इस प्रकार बिना नागा दृढ़ विश्वास तथा श्रद्धा पूर्वक करने से वृत्तियाँ जगत की और बाहर बिखरी हुए विचार अन्तर्मुख होने लगते हैं।

जिस प्रकार सूर्य की किरण सूत्र को जला नहीं सकती पर जब सूर्यकान्त काँच द्वारा किरणों को एकत्र कर दिया जाए तो प्रत्यक्ष अग्नि प्रकट हो जाती है और सूत्र को जलाकर भस्म कर देती है, इसी प्रकार-

‘यदा पंचवतिष्टन्ते ज्ञानानि मनसा सह’

जिस समय पंच कर्म इन्द्रियाँ, पंच ज्ञानेन्द्रियाँ अपने विषयों की ओर नहीं जाती है तब मन निश्चल हो जाता है। बाह्य सृष्टि और अपने स्व शरीर की विस्मृति होती रहे तब जानना चाहिये कि मन की एकाग्रता होनी प्रारंभ हो रही है। इस प्रकार एकाग्रता का साधन संयमपूर्वक करते रहने से साधक सिद्धि के सन्निकट पहुँचेगा। अन्तःकरण में पूर्ण उत्साह, मन की प्रसन्नता भी प्रतिदिन वृद्धिगत होने लगेगी और इष्ट मनोरथ भी अपने सफल होते रहेंगे।

मन में अनेक विलक्षण शक्तियाँ भरी हुई हैं। पर ये यत्र-तत्र बिखरी पड़ी रहती हैं जिससे उनका समुचित विकास नहीं हो पाता और मनुष्य उनके अद्भुत लाभों से वंचित रह जाता है। बारूद जमीन पर बिछाई जाय और उसमें आग लगाई जाय तो वह साधारण रीति से जल जाने के अतिरिक्त और कोई विशेष कार्य न करेगी पर यदि उसी बारूद का बन्दूक की नली में विधिपूर्वक प्रयोग किया जाय तो वह दूरस्थ लक्ष्य का भी बेधन कर सकती है। इसी प्रकार हमारी मानसिक शक्तियाँ यदि बिखरी रहेंगी तो उनसे कोई विशेष लाभ उठाना संभव न होगा। पर यदि एकाग्रता द्वारा उनको जगाया जाय, बलवान किया जाय तो एक-एक मानसिक शक्ति एक चमत्कार बनकर प्रकट हो सकती है।

अनेक सन्त महात्माओं में अनेक प्रकार की सिद्धियाँ होने के वर्णन सुने जाते हैं। उनके कार्य अनेक बार ऐसे होते हैं जिन्हें साधारण मनुष्य नहीं कर सकता। उनकी यह सिद्धियाँ आत्मिक एकाग्रता के ऊपर निर्भर रहती हैं। मनुष्य शरीर में अनन्त शक्ति केन्द्र छिपे पड़े हैं वे साधना की एकाग्रता द्वारा सक्रिय एवं प्रकट होते हैं। बहिर्मुखी लोग व्यर्थ की बातों में लगाकर अपने मन के लाभ से अपरिचित तथा वंचित रह जाते हैं। किन्तु जो लोग अन्तर्मुखी होकर अपने चित्त को जप, ध्यान आदि में एकाग्रता को बढ़ाते हैं वे अपनी अनेक आत्मिक शक्तियों का दर्शन करते हुए आत्म साक्षात्कार का परमानन्द प्राप्त करते हैं। निरन्तर आत्मा में दत्त चित्त होकर सरकस में काम करने वाले नट जिस पर अपने शरीर द्वारा आत्मिक एवं मानसिक शक्तियों पर चित्त एकाग्र करके साधना द्वारा अनेक सिद्धियों के स्वामी बन जाते हैं। सबसे बड़ी अपने आपको भवबन्धनों से मुक्त कर लेना तथा आत्मा का साक्षात्कार करके जीवन मुक्त बनना है। इस महासिद्धि के लिए भी चित्त की चंचलता को दूर करके एकाग्रता का अभ्यास बढ़ाना ही है।


जीवन यज्ञ

(राजवैद्य पं. श्यामबिहारी लाल शुक्ल शास्त्री)

जीवात्मा की संसार में विचित्र दशा है नाना योनियों में घूमते-फिरते कभी भगवान दया करके उसे मनुष्य देह दे देते हैं। मनुष्य योनि में जन्म लेकर शिशु, कुमार, युवादि अवस्थाओं को पाकर फिर विषय भोगों में फंसता है। संतान पैदा कर उनके लिए धन धान्य तथा अच्छे-अच्छे भोगों की सामग्री एकत्र करता है उनके उपार्जन करने में तरह-तरह के न्याय, अन्याय और नाना प्रकार के कष्टों को भी सहन करता हुआ पाप तथा अधर्म की भी कुछ चिन्ता न करके और अन्त में पापों के बोझे को सिर पर लाद कर काल का कलेवा हो जाता है। कवियों ने मनुष्य की एक भ्रमर की उपमा देते हुए कहा है कि किस प्रकार मनुष्य विषय-भोग, स्त्री, पुत्रों में फंस कर आगे के प्रबंधन सोचकर और विषयों के भोगने की प्रबल इच्छा से तृप्त न होकर सोचते-सोचते ही अचानक मर जाता है।

मनुष्य के विचार लीनता के सदृश एक कमल में बन्द भ्रमर विचार करता है कि रात्रि चली जावेगी, सूर्य भगवान प्रातः होते ही उदय होंगे, उनका दर्शन कर खिल जावेगा और मैं उसके पराग के मधु का पान करूंगा, ऐसा सोच ही रहा था कि एक हाथी ने कमल को उखाड़ मुँह में रख लिया। भ्रमर के समान वासनायुक्त मनुष्य को कालचक्र नष्ट कर देता है इस प्रकार पशु और मनुष्य में क्या अन्तर है। पशु भी पेट भर और सन्तान उत्पन्न कर मर जाता है परन्तु कई बातों में आज के मनुष्यों से कहीं अच्छे हैं। उन्हें भविष्य की अधिक चिन्ता नहीं, उनके चर्म, अस्थि तक दूसरों के काम में आ जाते हैं। वह संग्रह करना तो जानते ही नहीं मनुष्य को ईश्वर ने बुद्धि दी है। शास्त्र आदि के विचार पर यह सोच सकता है कि मनुष्य जीवन हमें किस लिए मिला है। कमाने-खाने, भोगने और अन्त में असहाय अचानक पशु की भाँति सब कुछ यहाँ छोड़ कर मर जाने के लिए नहीं मिला है। शास्त्र कहता है कि ‘नर समान नहिं कवनिह देही’ इत्यादि। क्या उसकी चरितार्थता भोग-भोगने में ही है। जो सुख अमरावती में इन्द्र को इन्द्राणी के साथ भोग-भोगने में मिलता है वही सुख कुत्ते को कुतिया के सहवास से प्राप्त होता है। जो सुख हमें षट्रस भोगने में प्राप्त होता है। उससे भी कहीं अधिक सुकरी को विष्ठा खाने में प्राप्त होता है। हमें मखमल के गद्दों पर जो आनन्द मिलता है, उससे अधिक गर्म रेत में लोटने से वैषाख में वैषाख नन्दन गधे को प्राप्त होता है। यदि मनुष्य में यज्ञादिक शुभ कर्म अथवा ज्ञान की वृद्धि न हुई जिससे वह ईश्वर को प्राप्त कर सके, हमें आज इसी पर विचार करना है इस घोर कलियुग में भागवत प्राप्ति के प्रायः सभी प्राचीन वैदिक साधन लुप्त से हो गये हैं।

अब न तो कोई वेदों का अध्ययन ही करता है और न वेदों में कथित यज्ञ-यागों को ही अब करता है। यद्यपि यज्ञों की महत्ता का अन्य शास्त्रों में विशेष कर गीता में वर्णन आया है। संसार में समस्त सुख तथा अक्षय सुख भी यज्ञों के करने से मनुष्य को प्राप्त हो सकता है और लोग प्राप्त भी करते हैं।

नित्य कर्म की भाँति होने वाले होम, अमावस्या, पूर्णिमा को होने वाली इष्टियाँ, विशेष अवसरों पर होने वाले विशिष्ट यज्ञों का क्या महत्व है? इसका वर्णन पाठक ‘अखण्ड ज्योति’ के पिछले अंक में पढ़ चुके हैं। अपनी स्थिति एवं भावना के अनुसार उनको करने के लिए हमें व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से प्रयत्न करते रहना चाहिए ताकि विश्व का सूक्ष्म वातावरण शुद्ध हो। वायु शुद्धि तो यज्ञों द्वारा आहुतियों एवं सामग्रियों के अनुपालन से एक सीमित मात्रा में ही होती है पर वेदमंत्रों के उच्चारण एवं यज्ञ की अत्यन्त रहस्यमयी प्रक्रियाओं द्वारा संसार का वह सूक्ष्म वातावरण जिसमें विचारों एवं भावनाओं का निवास है- शुद्ध होता है और उस शुद्धि के अनुसार सर्वत्र फैले हुए वासना, लोभ, स्वार्थ, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, छल, अनीति आदि के कुविचारों का समाधान होकर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है जिनमें जन साधारण के मस्तिष्क शाँत, स्वस्थ एवं सतोगुणी रहें। जब ऐसा वातावरण संसार में फैला रहता है तो घर-घर में सुख शाँति विराजती है परस्पर स्नेह, सद्भाव सेवा एवं सहयोग के ही उदाहरण चारों ओर दीख पड़ते हैं। पूर्व युगों में ऐसा ही वातावरण फैला रहता था। यज्ञ भगवान को प्रसन्न करके लोग सब प्रकार सुख शाँति प्राप्त करते थे। आरोग्य वृद्धि, उत्तम वर्षा, वीर्यदान, वनस्पतियों तथा धान्यों की उत्पत्ति, वायु वृद्धि, सकाम कामनाओं की पूर्ति तो यज्ञ के गौण लाभ है। मुख्य लाभ तो यज्ञकर्ता के उसके समीपवर्ती लोगों के समस्त संसार के विचारों एवं भावनाओं से भरे हुए सूक्ष्म वातावरण की शुद्धि ही है।

अब लोग यज्ञों का महत्व भूल गये हैं। उनका नियमित विधान बहुत थोड़े ही विज्ञ पुरुष जानते हैं। आर्थिक स्थिति भी कई बार ऐसे पुण्य प्रयोजनों में बाधक होती है। इसलिए यज्ञ योग तो सदैव सबके लिए सुगम नहीं रहते। पर यज्ञ भावना को हर घड़ी जीवन में चरितार्थ करना हम सभी के लिए सुगम है। निर्धन एवं कार्य व्यस्त व्यक्ति भी जीवन को यज्ञमय बनाने का सतत प्रयत्न कर सकते हैं।

मन में सबके लिए सद्भावनाएं रखना, संयम पूर्ण सच्चरित्रता के साथ समय व्यतीत करना, दूसरों की जो भलाई बन सके उसके लिए प्रयत्नशील रहना, वाणी को केवल सत प्रयोजनों के लिए ही बोलना, न्याय पूर्ण कमाई पर ही गुजारा करना, भगवान का स्मरण करते रहना, अपने कर्त्तव्य धर्म पर आरुढ़ रहना, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में विचलित न होना, यही नियम है, जिनका पालन करने से जीवन यज्ञमय बन जाता है। इन व्रतों के धारण करने में साँसारिक दृष्टि से कुछ अभावग्रस्त जीवन रहता दीखता है। वह व्यक्ति विलासिता का उपभोग एवं तिजोरियाँ भरने में सफल नहीं हो पाता, पर इनका त्याग करने पर उसे जो आत्म शक्ति एवं सद्गति मिलती है, उसका मूल्य भौतिक सम्पदाओं की अपेक्षा असंख्य गुना अधिक है।

मनुष्य जन्म बार-बार नहीं मिलता। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद लाखों वर्षों के उपरान्त यह अवसर हाथ आता है। इसे भी कूकर, सूकर की भाँति भौतिक प्रयोजनों में नष्ट कर दिया जाय तो यह कोई बुद्धिमानी नहीं है। मनुष्य जीवन को सफल बना लेना ही सच्ची दूरदर्शिता और बुद्धिमता है। हमें इसके लिये प्रयत्नशील रहना चाहिये। जीवन को यज्ञ रूप बनाकर, यज्ञ भगवान की शरण में अपने को डालकर हम अवश्य ही अपने जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं।


मन की चंचलता दूर करने का रहस्य

(श्री गिरीश देव वर्मा, बहरायच)

एक दिन सत्संग में एक सज्जन ने प्रश्न उठाया कि मन बड़ा चंचल है कैसे वश में किया जाय। बिना न के एकाग्र हुए भजन वृथा है। मन की चाल हवा से भी तेज है। क्षण भर में चौदह लोकों में घूम आता है। जाग्रत में ही नहीं, स्वप्न में भी चुप होकर नहीं बैठता। जन्म भर में कभी देखे सुने न हो, ऐसे-ऐसे अनोखे पदार्थ रच लेता है। यह बड़ा दुष्ट, चंचल प्रबल व ढीठ है।

एक दूसरे सज्जन ने कहा- मन की बात मत छेड़ो। मैं जब भजन करने बैठता हूँ तो और भी भागता है। बहुतेरा रोकता हूँ रुकता नहीं। मंत्र में लगाता हूँ तो बिना सिर पैर के ख्याली पुलाव पकाने लगता है। भगवान का ध्यान करना चाहता हूँ तो भागा-भागा फिरता है। राम-राम जपता हूँ तो ग्राम-ग्राम घूमता है। घर बाहर के, कचहरी दरबार के सब झगड़े भजन में लाकर खड़े कर देता है।

एक तीसरे सज्जन ने अपनी कठिनाई बताई कि-मैं तो इस मन की हरकतों से तंग आ गया हूँ। एक न एक बखेड़ा यह बराबर खड़े किये रहता है। मैं संसार से मुक्त होना चाहता हूँ तो मुझे लौटा-लौटा कर उसी में डालता है। सत्संग में जाना चाहता हूँ तो गप्प, ताश, शतरंज में लगा देता है। मन्दिर में दर्शन करने जाता हूँ तो सिनेमा के सामने ला खड़ा कर देता है। स्वाध्याय करना चाहता हूँ तो उपन्यास सामने जाकर रख देता है। गीता पढ़ने बैठता हूँ तो कहता है घर में दाल नहीं है, घी नहीं, मिर्च मसाला नहीं है, लकड़ी नहीं है, चलो, ले आओ। गीता फिर पढ़ लेना। यह तो रोज का गीत है। पेट पूजा तो प्रधान है। गीता का समरत्व योग भूखे पेट की ज्वाला नहीं शाँत कर सकता। मन की फरमाइशों के मारे तो तबियत परेशान हो गई है।

सबकी सुन लेने पर अन्त में उस सत्संग में उपस्थित एक महात्मा जी ने कहा कि-आप लोग उलटी गंगा बहा रहे हैं। आप लोगों के कहने के अनुसार तो आप कोई और हैं और मन कोई और। मगर बात असल में यह है कि आप ही से मन की सत्ता हैं। मन से आपकी सत्ता नहीं है। आप ही से मन निकला है। जैसे आप हैं वैसा आपका मन है। मन तो सरल, अबल और बेपेंदी का लोटा है। बिना कौड़ी पैसे का गुलाम है। वचन में बंधा हुआ है। इशारे पर काम करता है। जो-जो भोग आप माँगते हैं कि भजन नहीं करने देता। भजन करना आप चाहते ही कब हैं। धन में, स्त्री में, पुत्र में, नाम में, जुए मैं, माँस-मदिरा में, बीड़ी-सिगरेट में, सिनेमा, क्लब में आपकी रुचि है। इनसे आपको फुरसत ही कहाँ है। चौबीस घंटा में 23 घंटा इन्हीं का ध्यान करते हैं फिर एक घंटा राम नाम लेने का आडम्बर करते हैं और उस समय भी साँसारिक कार्यों का ताना बाना बुनते रहते हैं।

भाई! जो खाओगे उसकी डकार आवेगी। ग्रामोफोन में जो राग भरा जायेगा वही बजेगा। जैसे आप बनोगे वैसा मन भी बन जायेगा। आप चाहते हैं कि स्वाद में कमी न आने पावे। खाना-पीना राजसी व तामसी होता रहे। नेत्रों से सिनेमा आदि देखते रहें। कानों से फिल्मी संगीत सुनते रहें। वीर्यपात में भी कोई बन्धन न हो। आहार-विहार अनियमित होता रहे, मगर मन वश में हो जावे यह कैसे मुमकिन है। सभी विषयों पर लगाम लगाइये, मन आपसे आप आपका गुलाम हो जायेगा।

एक भेद की बात जान लीजिये कि वीर्य, प्राण व मन एक ही स्तर की वस्तुएं है। एक को रोक लेने पर दूसरी दोनों स्वयमेव रुक जाती है। मन को रोकिये प्राण व वीर्य वश में हो जाते हैं। वीर्य की गति ऊर्ध्वरत कीजिये तो मन व वीर्य पर आधिपत्य मिल जाता है। इन तीनों को वश में करने का एक भी साधन है और अलग-अलग भी। वीर्य पर विजय पाने के लिए मनसा वाचा कर्मण ब्रह्मचारी बनना पड़ेगा। सात्विक आहार व सात्विक विहार रखना पड़ेगा। आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्राओं द्वारा कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करना पड़ेगा। इसी तरह प्राण को रोकने के लिए हठयोग, अष्टाँग योग, विशेष प्राणायामों आदि का साधन करना पड़ेगा। मगर यह सब क्रियाएं बड़ी कठिन व कष्ट साध्य हैं। सबसे सरल उपाय यह है कि आप लोग ध्यान सहित गायत्री का जप कीजिये और देखिये कि कितनी जल्दी आप मन को अपना चाकर बना लेते हैं। श्रद्धापूर्वक स्वर, ताल व लय से गायत्री मंत्र का जप करने से अभीष्ट की पूर्ति हो जाती है। भगवान ने कहा कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ। इसका मुख्य कारण है कि अन्य यज्ञों में जो बाहरी तैयारी, सहायता आदि की आवश्यकता पड़ती है। वे सब झंझटें जप यज्ञ में नहीं होती। जप यज्ञ में केवल सात्विक भाव, प्रेम साधना, तन्मयता, एकाग्रता की ही आवश्यकता पड़ती है। प्रेम भाव से किसी स्थान, अवस्था, समय व परिस्थिति में जप किया जा सकता है। गायत्री जप से जो मन की एकाग्रता होती है उसका वैज्ञानिक आधार भी है।

गायत्री मंत्र के अक्षरों व शब्दों का गुन्थन कुछ इस प्रकार का है कि उसके जप से स्वर यंत्रों में जो कंपन उत्पन्न होता है उसका प्रभाव पृष्ठ वंश में स्थित नस नाड़ियों में पड़ता रहता है। उन्हीं शब्दों के बार-बार दुहराने से कंपन के झटके चक्रों में लगा करते हैं और कुछ दिनों के अभ्यास के बाद वे चक्र खुलने लगते हैं। कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है। यह क्रियाएं अनजाने हुआ करती हैं।

गायत्री मंत्र में 24 अक्षर हैं और तीन पद। ओउम् व व्याहृतियों का एक पद है। इस तरह चार पद हो जाते हैं। इन पदों व शब्दों का उच्चारण कुछ इस प्रकार किया जाता है कि ध्वनि में ताल, स्वर व लय का समावेश हो जाता है। एक स्वर में तालयुक्त लय के साथ जब जप किया जाता है तब ध्वनि का माधुर्य इतना बढ़ जाता है कि मन सब तरफ से खिंच कर इन्द्रियों सहित एक ओर लग जाता है। जप का यह तरीका गुरु मुख से ही जानने योग्य है। जैसे किसी एक योग को सीखने के लिए बार-बार अभ्यास करना पड़ता है उसी तरह गायत्री मंत्र के तालयुक्त जप का ढंग गुरु के पास रह कर अभ्यास द्वारा सीखा जाता है। जब जप ठीक ढंग से होने लगता है तब मन नहीं भागता है बल्कि उसी में आनन्द प्राप्त करने लगता है।

संगीत के जानकार जानते हैं कि विभिन्न राग-रागनियों के विभिन्न रूप होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने इसका पता लगा लिया था। पश्चिमी विद्वानों ने भी विज्ञान द्वारा यह प्रमाणित कर दिया है कि खास तरह के राग छेड़ने पर एक खास तरह की आकृति बन जाती है। फ्राँस में दो बार इस विषय को लेकर प्रदर्शन व परीक्षण किये गये हैं। एक में मेडम लैंग ने एक राग छेड़ा तो फलस्वरूप देवी मेरी की आकृति शिशु जिजस क्राइष्ट को गोद में लिये हुई प्रकट होती दीख पड़ी। दूसरी बार एक भारतीय गायक ने भैरव राग छेड़ा था जिसके फलस्वरूप भैरव की भीषण आकृति प्रकट हुई थी।

इसी प्रकार इटली में एक युवती ने एक भारतीय से सामवेद की एक ऋचा को सितार पर बजाना सीखा। खूब अभ्यास कर लेने के अनन्तर उसने एक बार नदी के किनारे रेत में सितार रख कर उसी राग को छेड़ा। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ रेत पर एक चित्र सा बन गया। उसने अन्य कोई विद्वानों को यह बात बतलाई। उन्होंने उस चित्र का फोटो लिया। चित्र वाणी पुस्तक धारिणी सरस्वती का निकला। जब वह युवती तन्मय होकर उस राग को छेड़ती तब वही चित्र बन जाता।

इस प्रकार जब गायत्री मंत्र का जप ताल स्वर व लय के साथ किया जाता है तो राग से पुस्तक, पुष्प, कमण्डल, माला लिये हुए हंस पर आरुढ़ एक देवी का चित्र बन जाता है। उसको हमारे ऋषियों ने वेदमाता गायत्री की संज्ञा दी है। लय की विभिन्नता होने पर किसी को एक मुख वाली, किसी को पाँच मुख वाली गायत्री माता के दर्शन होते हैं। इसी प्रकार प्रातः ध्यान में दूसरा रूप रहता है, मध्याह्न ध्यान में दूसरा और सायंकालीन ध्यान में दूसरा रूप रहता है। मूल तत्व में माता का ही चित्र विभिन्न रूपों व कलाओं में भासित होता है। हर मनुष्य की प्रकृति पृथक-पृथक होती है। उसी के अनुसार और समय के भेद से जप के समय गायत्री माता का ध्यान विभिन्न रूपों में किया जाता है जब अभ्यास आगे बढ़ता है तब साधक माता के ध्यान में इतना तन्मय हो जाता है कि उसकी आत्मा उसी रूप में अवस्थित हो जाती है। उस समय जप ध्यान में लीन हो जाता है।

वैज्ञानिक बता रहे हैं कि जिन विचारों का उदय मस्तिष्क में बार-बार होता है वे वहाँ चित्रित हो जाते हैं। उसी प्रकार के भाव मस्तिष्क में घर बना लेते हैं। उनसे मन का इतना लगाव हो जाता है कि उन्हीं में वह आनन्द प्राप्त करने लगता है। उन्हीं में मग्न रहता है। इसी प्रकार जब गायत्री का जप ध्यान सहित किया जाता है तब वही संस्कार घर बनाने लगते हैं। दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होने लगता है और पूर्व संस्कार और आसुरी वृत्तियाँ मिटने लगती हैं।

एक पात्र में जल भरा है। उसमें पिघला हुआ शीशा उड़ेला जाता है। जैसे-जैसे शीशे की धार पात्र की तरह धंसती जाती है वैसे ही वैसे पानी का अंश पात्र के ऊपर से बाहर बहकर निकलता जाता है। अन्त में शीशे की तह पात्र के मुँह तक आ जाती है तब पानी का कुल भाग पात्र से बाहर निकल जाता है। पात्र में शीशा ही शीशा दिखाई पड़ता है ।

इसी तरह जब साधक ध्यान सहित गायत्री का जप करता है तब मस्तिष्क रूपी पात्र मैं दैवी गुणों की धारा उड़ेलने लगता है और जल रूपी गंदे विचार बाहर गिरने लगते हैं। शुद्ध सात्विक भाव आने लगते हैं। काम, क्रोध, लोभ, सात्विक भाव आने लगते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मद, मत्सर दूर होने लगते हैं। मन शुद्ध-निर्मल होने से एकाग्र होने लगता है। वह भागा-भागा नहीं फिरता। आपका खरीदा गुलाम बन जाता है। जो चाहिए काम लीजिये।

मन की चंचलता दूर करने के लिए गायत्री जप यज्ञ से बढ़कर और कोई तरीका इतना सरल सुसाध्य व शीघ्र फल देने वाला नहीं है।


दैवी सम्पदा में सुख प्राप्ति

(पं. गौरी शंकर जी द्विवेदी, चंदवाड़)

वास्तविक भक्त में जो लक्षण होने चाहिए, अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण ने गीता अ. 16 में बताये हैं।

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नाति मानिता भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत

अ. 16।1।3

हे भारत, निर्भयता, अन्त करण की शुद्धि, भगवान के स्वरूप में निरन्तर दृढ़ स्थित (आस्तिकता), दान, इन्द्रिय संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध हीनता, त्याग, शाँति, निन्दा या चुगली न करना, सब प्राणियों पर दया, लोभ रहित होना, कोमलता, ईश्वर और शास्त्र विरुद्ध कर्मों में लज्जा, अचंचलता, तेज, क्षमा, धैर्य, शौच, अभिमान शून्यता, यह सब गुण दैवी सम्पदा को प्राप्त हुए पुरुष में रहते हैं, और यह दैवी सम्पत्ति भक्त में ही रहती है। इसलिए भक्त को देव कहते हैं।

विष्णुभक्तः स्मृतो देव आसुर स्तद्विपर्ययः॥

पद्य. पु.

इस जगत में दो प्रकार के जीव हैं। एक देव, दूसरा असुर, जो भक्त हैं वे देव हैं, जो भक्त नहीं हैं, वही असुर है।

दैवी सम्पत्ति के गुण वाला भक्त है, जहाँ भक्ति है, वहाँ दैवी सम्पदा का होना अनिवार्य है। कुछ लोग भूल से ऐसा कह दिया करते हैं, कि ‘भक्ति करो’ भक्त में सद्गुण न हो, तो न सही, मनुष्य चाहे जितने भी पाप करे, बस भक्त हो जाय। फिर कोई पराया नहीं, परन्तु उनका यह कहना वैसे ही युक्ति विरुद्ध है, जैसे कि यह कहा जाय, कि सूर्य उदय हो जावे, फिर वहाँ अंधकार भले ही बना रहे। जहाँ सूर्य उदय हो गया, वहाँ अंधकार रह भी कैसे सकता है। जहाँ भक्ति रूपी सूर्य का प्रकाश हुआ है, वहाँ दैवी सम्पत्ति अवश्य ही फैल जायेगी। यह बात किसी भी अंश में सत्य है, कि भगवत् प्राप्त महात्मा भक्त में पुरुषों के बाहरी आचरणों से उनकी परीक्षा नहीं होती, कुछ गुण ऐसे है जिनका उनमें रहना अत्यन्त ही आवश्यक है।

‘अहिंसा सत्य शौच दयास्तिक्यादि चारित्र्याणि परिपालनीया।’

भक्ति के साधक को अहिंसा, सत्य, शौच, दया, आस्तिकता आदि आचरणीय सदाचारों का भलीभाँति पालन करना चाहिए। जिस पुरुष में यह गुण न हो वह यदि कदाचित भक्त भी हो तो भी उससे करना ही चाहिए। अधिकाँश में इन गुणों से रहित भक्त तो होते ही नहीं। यह निश्चय रखना चाहिये, कि यदि भगवत् चिन्तन और दैवी सम्पत्ति बढ़ रही है, तो हमारी भक्ति मार्ग में उन्नति हो रही है। यदि जगत का चिन्तन है, और दैवी सम्पत्ति का अभाव है तो हमारी निश्चय ही अवनति हो रही है। दोनों का परस्पर में विरोध है, माना जाय कि हमारा मुख जगत की ओर, तो भगवान की ओर पीठ ही होगी, अगर भगवान की ओर मुख करें, तो पीठ जगत की ओर ही रहेगी। यह विलक्षण बात है।

भगवान का प्रेम पूर्वक चिन्तन भक्त का धर्म है और दैवी सम्पदा के गुण उसकी जीवन पद्धति है। वह सब कुछ छोड़ देता है, पर इन गुणों को कदापि नहीं छोड़ता, यह निश्चय है कि वह किसी प्रकार की भी, आसक्ति, ममता, कामना, अहंकार, मोहवश जीवन पद्धति को नहीं बदलता।

किसी कारण वश उसकी जीवन पद्धति में भगवत्प्रेम में विरोध दीखता है, वहीं अपने प्रभु की आज्ञा लेकर स्वधर्म की रक्षा हेतु नीति को छोड़ देता है। जैसे प्रह्लाद, विभीषण, भरत, बलि, वृज वनिता आदि उदाहरण मिलते हैं।

पिता तजे प्रह्लाद विभीषण बन्धु भरत महतारी,

बलि गुरु तजे गोप ब्रज वनितन भए सब मंगल कारी।

माता-पिता, भाई आदि की आज्ञा न मानते हुए भी सदाचार नीति का त्याग नहीं हुआ है। प्रेम धर्म निबाहने में भक्तों ने स्वयमेव कष्ट सहे हैं। भक्ति के साधक को बड़ी सावधानी के साथ शास्त्र विहित सद्गुणों, सदाचारों का यथावत पालन करना चाहिए। उन पाँच गुणों की व्याख्या निम्नांकित है।

अहिंसा 2. सत्यम् 3. शौच 4. दया 5. आस्तिकता।

अब इन पाँचों की विवेचना करते हैं-

अहिंसा अपने शरीर मन, वाणी द्वारा किसी भी जीव को कभी भी कष्ट नहीं पहुँचाना।

सत्य जो देखा सुना हो, उसे यथावत कह देना, वाणी द्वारा सत्य बात का उच्चारण अन्यथा मौन रहना, साथ ही शब्दों में कठोरता न हो एवं वचन हितकर हों, अथवा हृदयस्थ भावों को जिह्वा द्वारा कह देना सत्य है।

शौच- भीतरी, बाहरी। भीतरी पवित्रता-आँगर्गात्राणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुश्चयति। मन की शुद्धि सत्य वाणी से होती है।

बाहरी-जलादि से, पवित्र भोजनादि अपने भीतर दभाँदिक दोषों को मन में न आने देना, सरलता, प्रेम, अद्वेष प्रसन्नता द्वारा मन को पवित्र बनाना।

दया कोई भी क्यों न हो, बिना किसी भेद भाव के दुखी दशा में दुखी होना और यथा साध्य दुख दूर होने में सहायता करना।

आस्तिकता, शास्त्र एवं भगवान पर विश्वास। जब भगवान में पूर्ण विश्वास हो गया, तो मन अपने आप भगवान की ओर लग जायेगा, भगवान की सत्ता सर्वत्र है, वे सभी के भंडार हैं, संसार में हो कुछ भी हम देखते हैं, या जहाँ तक हमारी कल्पना पहुँचती है, वे सब भगवान के एक क्षुद्र अंश में मौजूद हैं। अतः साधक को इन बातों को अपनाते हुए, अपने मार्ग में अग्रसर होना चाहिए। फिर आने वाली महान आपत्ति भी शाँति प्रदर्शक होगी।

सर्वदा सर्व भावेन निश्चिन्तितैर्भगवानेन भजनीयः।

सब समय सर्वभाव से भगवान का ही भजन करना चाहिए। यही है, सुख, शाँति का मूल मंत्र। यह भी निर्विवाद सत्य है कि बिना दैवी सम्पदा के कोई भी शाँति नहीं पा सका। शाँतिः


शक्तियों का दुरुपयोग मत कीजिए।

(मोहनलाल वर्मा, बी. ए. एल. एल. बी.)

सौंदर्य, शक्ति, यौवन और धन संसार की चार दिव्य विभूतियाँ हैं। ईश्वर ने इन शक्तियों की सृष्टि इस मन्तव्य से की है कि इनकी सहायता एवं विवेकशील प्रयोग के द्वारा मानव धीरे-धीरे उत्थान एवं समृद्धि के शिखर पर पहुँच जाय। वास्तव में इन दैवी विभूतियों के सदुपयोग द्वारा मनुष्य शारीरिक, बौद्धिक एवं मानसिक शक्तियों का चरम विकास कर सकता है। मानव व्यक्तित्व के विकास में वे पृथक-पृथक अपना महत्व रखती हैं।

भगवान के गुण स्वरूप की कल्पना में हम सौंदर्य शक्ति एवं चिर यौवन को महत्ता प्रदान करते हैं। हमारी कल्पना में परमेश्वर सौंदर्य के पुँज हैं, शक्ति के अगाध सागर हैं, चिर युवा हैं, अक्षय हैं। लक्ष्मी उनकी चेरी है। ये ही गुण मानव जगत में हमारी सर्वतोमुखी उन्नति में सहायक हैं। जिन-जिन महापुरुषों को इन शक्ति केन्द्रों का ज्ञान हुआ और जैसे-जैसे उन्होंने इनका विवेकपूर्ण उपयोग किया, वैसे-वैसे उनकी उन्नति होती गई। किन्तु जहाँ इनका दुरुपयोग हुआ, वहीं पतन प्रारंभ हुआ। वह पतन भी इतना भयंकर हुआ कि अंतिम सीमा तक पहुँच गया और उनका सर्वनाश इतना पूरा हुआ कि बचाव संभव न हो सका।

इतिहास इस चिर सत्य का साक्षी है कि सौंदर्य का दुरुपयोग मानव के रक्तपात, युद्ध, लूटपाट और संघर्षों का एक कारण बना है। सुन्दर स्त्रियों को प्राप्त करने के हेतु विश्व के इतिहास में युद्धों के उदाहरणों की कमी नहीं है। सुन्दरी सीता रामायण के युद्ध एवं द्रौपदी महाभारत के युद्धों का कारण बनी! ट्राम का युद्ध एक सुन्दरी के कारण वर्षों चलता रहा। आज के युग में भी सुन्दरी माया उत्पातों का एक कारण मानी गई है। समाज में सौंदर्य के गलत दृष्टिकोण को लेकर आये दिन अनेक प्रकार के झगड़े चला करते हैं।

आज के व्यक्तियों की सौंदर्य भावना केवल ऊपरी चमक-दमक तक ही सीमित रहती है। वे शारीरिक आकर्षण मात्र को ही सौंदर्य का मापदण्ड मानकर उत्पात करते रहते हैं। बाहर आकर्षण बनाये रखने के हेतु अपार धन व्यय किया जाता है। इस अत्यधिक शृंगार प्रियता ने समाज में वासना लोलुपता की अभिवृद्धि की है। आज भी निरंतर यह कार्य हो रहा है। उस सौंदर्य को जो पानी से घुल कर नष्ट हो जाता है, लोग सर्वोपरि मान बैठे हैं।

युवकों में सौंदर्य भावना का निंद्य स्वरूप बुरी तरह फैला हुआ है। कृत्रिम सुन्दरता बनाकर दूसरों को ठगा जाता है। बनाव-शृंगार कर अपनी त्रुटियों या चरित्रगत दुर्बलताओं पर आवरण डाल दिया जाता है। सौंदर्य का स्वाँग भरने वाले, सुन्दर आकर्षण वस्त्र तथा चटकीले-भड़कीले वस्त्र पहनने वाले व्यक्ति प्रायः चरित्र के दुर्बल, स्वभाव के रसिक, वासना लोलुप, चंचल प्रकृति के होते हैं। इनसे न स्वयं अपना भला हो पाता है, न समाज का ही कुछ लाभ होता है। सुन्दर व्यक्ति कोमलता का स्वाँग करते देखे जाते हैं। किसी भी कष्ट साध्य कार्य से उनका मन नहीं रमता।

यौवन मनुष्य की परिपक्वता का समय है। मनुष्य की सब शक्तियाँ पूरी रहती है, मन में आशा, शक्ति और उत्साह रहता है। मुँह पर मुस्कराहट खेलती रहती है। यौवन में मन उचित-अनुचित जिस ओर मन झुक जाता है, जीवन भर उसी ओर झुका रहता है। जब ये आदतें एक जैसी हैं तो मनुष्य उन्हें बदल नहीं पाता।

यौवन में काम भावना (सेक्स) का उभार आता है, मन वासनाओं से भर जाता है। यदि युवक इन वासनाओं का नियंत्रण न करे, या कार्य, कला, अध्ययन, संगीत या अन्य किसी मार्ग द्वारा इन्हें निकलने का मार्ग प्रदान न करे, तो वे गंदे घृणित मार्गों से निकलने लगती है। वासना एक शक्ति है, जिसका दुरुपयोग मनुष्य को पशु कोटि में ला पटकता है। पतन की चरम सीमा में पहुँचकर उसे ज्ञान होता है कि उसने अपने मनुष्यत्व, पौरुष, वीर्य का कितना नाश किया।

पथ-भ्रष्ट युवक सब से दयनीय जीव है। वह उस अमीर की तरह है, जो जीवन-सम्पदा को मिट्टी में मिला रहा है। उसे उन सत सामर्थ्यों का ज्ञान नहीं जो उसके चरित्र में छिपे हैं।

शक्ति का दुरुपयोग मनुष्य को राक्षस बना सकता है। रावण जाति का ब्राह्मण, बुद्धिमान, तपस्वी राजा था, किन्तु शक्ति का मिथ्या दम्भ उस पर सवार हो गया। पण्डित रावण राक्षस रावण बन गया। उसकी विवेक बुद्धि क्षय हो गई। वासना उत्तेजित हो गई। वासना तो एक प्रकार की कभी न बुझने वाली अग्नि है। जितना उसने वासनाओं की पूर्ति का प्रयत्न किया, उससे दुगने वेग से वह उद्दीप्त हुई। शक्ति उसके पास थी। वासना की पूर्ति के लिए रावण ने शक्ति का दुरुपयोग किया। अन्त में अपनी समस्त शक्ति के बावजूद रावण का क्षय हुआ। दुर्योधन ने शक्ति के दम्भ में अपने सब भाई-बन्धुओं का नाश किया।

मुसलमान शासकों के असंख्य उदाहरण हमारे सामने हैं। संयमी, कष्ट-सहिष्णु, सतत जागृत रहने वाले शक्ति सम्पन्न सम्राटों ने बड़े-बड़े राज्यों की नींव रखी। बाबर ने अपनी वीरता से मुगल साम्राज्य की नींव पक्की की किन्तु उसके पुत्र धीरे-धीरे असंयमी, विलासी, लोलुप बने। फलतः मुगल साम्राज्य का क्षय हो गया।

शक्ति का सदुपयोग किया जाय, तो वह मानव मात्र के लिए कल्याणकारी संस्थाओं, आश्रमों, नये-नये नियमों का निर्माण करने, समाज सेवा, नारी जागृति के पुनीत कार्यों में प्रयुक्त हो सकता है दुष्टों का दमन किया जा सकता है।

शक्ति के दुरुपयोग से न्याय का गला घुट जाता है, विवेक दब जाता है, मनुष्य को निज कर्त्तव्य का ज्ञान नहीं रहता, यह मदहोश हो जाता है और उसे सत-असत् का अन्तर प्रतीत नहीं होता।

अंग्रेजी में एक कहावत है, ‘सिंह की तरह बलवान बनो, किन्तु उस शक्ति से निर्धनों को आर्थिक सहायता, निर्बलों को ताकत, असहायों को सहारा मिलना चाहिये। इसी में शक्ति की उपयोगिता है।

लक्ष्मी जहाँ सुख की प्राप्ति का साधन है, वहीं पथ भ्रष्ट भी करने वाली हैं-

श्री सुखस्येह संवासा, सा चापि परिपन्थिनी

-म. भा. उद्यो. पर्व 42-31

अमीर लोगों के पुत्र उच्छृंखल अपव्ययी, विलासी और व्यसनी होते हैं। उनके मन में धन का प्रमाद इतना अधिक छाया रहता है। कि उसके कारण उनकी गुप्त शक्तियाँ विकसित नहीं हो पाती। वे मन के भीतरी स्तर में गुप्त पड़ी रहती हैं।

धन आलस्य उत्पन्न कर मनुष्य को निकम्मा, निरुत्साह और निश्चेष्ट बना देता है। उच्च वृत्तियाँ वासना की आँधी में दब जाती हैं। जिस धन से हम समाज सेवा, लोकोपकार तीनों को प्रोत्साहन प्रदान कर सकते हैं, वही हमारी वासना-पूर्ति में स्वाहा होने लगता है। धन की शक्ति से मनुष्य उचित-अनुचित की परवाह न कर अपनी इच्छाओं को पूर्ण करना चाहते हैं। दूसरे व्यक्ति धन का लोभ पाकर पतन के समस्त साधन जुटा देते हैं, और भोग विलास की घातक निद्रा में मनुष्य सो जाता है। धन वह निद्रा है, जिसके धुंधले में ज्ञान की ज्योति भी क्षीण हो जाती है।

अतः उपरोक्त चारों पदार्थों का उपभोग बहुत सोच-विचार करना चाहिए। उचित उपयोग से विष भी अमृत का कार्य करता है, जब कि मूर्ख के हाथ में अमृत भी विष न सकता है।

अपने से पूछिए आप इस विष को अमृत बना रहे हैं, अथवा इस अमृत को विष बना कर मरने की तैयारी कर रहे हैं?


थकावट कैसे दूर हो?

(श्री श्याम जी शर्मा, बी.ए.)

प्रत्येक स्वस्थ व्यक्ति काम करना और स्फूर्त, चुस्त रहना चाहता है। फिर आप सुस्त क्यों रहते हैं? आपको वीर्य सम्बंधी कोई व्याधि नहीं, मूत्र सम्बंधी कोई बीमारी नहीं, आमाशय संबंधी कोई बीमारी नहीं, फिर आप थके से, निष्प्राण से क्यों रहते हैं?

क्या थकावट भी कोई व्याधि है? फिर आप पर इसका आतंक क्यों छाया रहता है? दिन भर के साधारण परिश्रम की थकावट रात की लंबी गहरी नींद द्वारा गायब हो जानी चाहिये। प्रातःकाल आपको मुस्कराती हुई कली की भाँति, शरीर को हल्का लेकर चारपाई से विदा ग्रहण करना चाहिए, किन्तु आप प्रायः रोज ही इस अवस्था का अनुभव करते हैं।

मनुष्य थकावट का अनुभव जिन कारणों से करता है, आपके भी सुस्त, भारी-भारी से बने रहने के वही कारण हैं। जब शरीर और मस्तिष्क अत्यधिक कार्य भार से एक समय तक दबता रहता है, जब मनुष्य पेट को भूल कर, सुस्वादु व्यंजनों से मूषक की भाँति ठूँस-ठूंस कर भर लेता है, शेखी में आकर शक्ति से अधिक काम और कम आराम करता है, व्यायाम अथवा खेलों की प्रतियोगिता में उर्वप्रियता प्राप्त करने के लिये जान पर खेलता है, अथवा जब किसी के शरीर के अवयव पर्याप्त परिश्रम से काफी घिसते हैं और उनके पुनर्निर्माण के लिए पर्याप्त पौष्टिक आहार नहीं मिलता उस समय शरीर में एक प्रकार की विक्षुब्धता सी उत्पन्न हो जाती है और हम थकावट का अनुभव करते हैं। यह थकान निरन्तर जारी रहने से किसी न किसी व्याधि का रूप धारण कर लेती है।

शरीर में हर समय टूटने ओर बनने की क्रिया होती रहती है। पुराने कोष्ठ टूटते और नवीन बनते रहते हैं। जब कार्याधिक्य अथवा अथक परिश्रम के कारण टूटने का काम अधिक और बनने का कम होता है, उस समय हमारे रक्त में एक प्रकार की रासायनिक गंदगी मिलकर उसके साथ परिभ्रमण करने लग जाती है। उस रासायनिक गंदे द्रव्य के न्यूनाधिक्य पर ही हमारी थकावट, सुस्ती और परेशानी निर्भर करती है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि एक थका हुआ परिश्रान्त व्यक्ति वह है जिसके रक्त में विष संचालित हो रहा है। डाक्टरों और कतिपय वैज्ञानिकों ने इस विष को लेकर स्वस्थ पशुओं के रक्त में दाखिल किया है। परिणामस्वरूप उन पशुओं में भी थकावट के वे समस्त लक्षण पैदा हो गये हैं जो उस थके हुये व्यक्ति में मौजूद थे, जिसके रक्त का विष लिया गया था।

यदि शरीर में थकावट बढ़ती रहे, रासायनिक विष की वृद्धि होती रहे, तो यह माँसपेशियों, हृदय, मस्तिष्क और रक्त को ही नहीं, समस्त शरीर को विषाक्त कर देगा। अस्तु थकावट शरीर की ओर से आने वाले खतरे की एक घण्टी है। महर्षि चरकाचार्य ने व्यायाम करने वालों को चेतावनी भी दी है कि वे सामर्थ्य से अधिक श्रम न करें, थकावट से बचें।

थकावट के लक्षण शारीरिक भी हो सकते हैं और मानसिक भी, अथवा दोनों ही। हम आये दिन इनका अनुभव करते रहते हैं। खूब व्यायाम करने अथवा तैरने के पश्चात हमारी माँसपेशियाँ स्वतः थकान का अनुभव करने लग जाती हैं। शारीरिक थकावट, मानसिक थकावट का भी कारण बन जाती है। मानसिक थकावट मानसिक कारणों से भी उत्पन्न होती है। अधिक काल तक निरन्तर पढ़ते रहने, मस्तिष्क को अधिक उलझनों और चिन्ताओं के चंगुल में फंसा देने से मस्तिष्क की समतोलन शक्ति शिथिल हो जाती है। इस अवस्था में मस्तिष्क थक कर कुछ काम नहीं कर पाता।

तुमुल कोलाहल और शोर भी मानसिक थकावट का एक प्रधान कारण है। आपने देखा होगा कि शहरों के निवासियों को थकावट बहुत जल्दी घेर लेती है। वे कुछ दूर चलते ही टाँगा और बस की बाट जोहने लगते हैं। इसका कारण है शहरों का शोर, सड़कों पर आने जाने वाली मोटरों की भों-भों, टाँगों की खड़खड़ाहट, इंजनों की चीख और दुकानदारों ग्राहकों की कश्मकश। यह कोलाहल सीधा हमारे स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव नहीं डालता, किन्तु शनैः-शनैः स्नायविक क्षुब्धता उत्पन्न कर हमारी मानसिक थकावट का कारण अवश्य बनता है शब्द लहरों द्वारा हमारे मस्तिष्क तक पहुँचता है। शरीर के सभी केन्द्र शब्द लहरों से प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि किसी निर्जन पथ पर जाते हुए जब आप भयानक शब्द सुनते हैं तो शरीर के केन्द्र प्रभावित होते हैं, हम चौंक पड़ते हैं और शरीर थर-थर काँपने लगता है। नगर निवासियों के अशाँत, नाजुक, निर्बल रहने का एक कारण यह भी है। जर्मन महासमर के समय विस्फोट पदार्थों की धमक और शोर से कितने ही व्यक्ति मौत का शिकार बन गये थे।

अस्तु, शारीरिक और मानसिक थकावट का यत्किंचित् अनुभव करते ही कार्य बन्द कर आराम करना चाहिए। कभी-कभी स्वप्न दोष, हृदयस्पन्दन, ब्लडप्रेशर, उन्माद आदि के भयंकर रोग इसी थकावट के वरदान स्वरूप लोगों को मिल जाते हैं। मानसिक और शारीरिक थकावट ही है जो लोगों को प्रायः गंगातट पर निवास करने, एकान्त वास करने, कश्मीर, और शैल-शिखरों पर जाने, नगर निवासियों को गाँवों की ओर आकर्षित करने और लोगों को संसार विरक्त तक बनने के लिए प्रेरित करती है।

व्यायाम करने वालों को चाहिए कि शरीर में शैथिल्य का अनुभव करते ही वे इसे बन्द कर दें। 15 मिनट तक खुली हवा में टहलें। फिर दूध लस्सी या शरबत, बादाम अथवा अन्य किसी तरल पौष्टिक का सेवन करें।

मजदूरों और अन्य परिश्रम करने वालों को भी थकने पर सुस्ताना और परस्पर हंसना बोलना बहुत आवश्यक है।

विद्यार्थियों को मानसिक थकावट का अनुभव करते ही पुस्तक छोड़कर पार्क में टहलना और कुछ गाना थकावट को दूर करने के लिए आवश्यक है।

बहुत से नागरिक मानसिक थकावट को दूर करने के लिए थियेटर, परिस्तान पार्क अथवा सिनेमा घरों में पहुँचते हैं किन्तु यह तरीका उसे घटाने के बजाय बढ़ाता है। उन्हें काम से अवकाश पाने के पश्चात टहलते हुए शहर के बाहर किसी निर्जन स्थान या नदी के तट पर जाकर घूमना, बैठना अधिक स्वास्थ्यकर और उपयोगी है।


हवन सम्बंधी कुछ आवश्यक बातें।

वैसे तो प्रत्येक कार्य ही विधिपूर्वक करना उचित है, परन्तु यज्ञ जैसे महान धार्मिक कृत्य को तो और भी अधिक सावधानी, श्रद्धा, तत्परतापूर्वक करना चाहिए। जिन विधि विधानों का नियमों का शास्त्रों में उल्लेख है उनका पालन करने में लापरवाही न करनी चाहिए। गीता में ऐसे अधूरे और लापरवाही से किये हुए यज्ञ की निन्दा की है और उसे तामस ठहराया है।

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्यहीनसदक्षिणम्।

श्रद्धा विरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।

गीता 17।13

शास्त्र विधि से हीन, अन्न दान से रहित एवं बिना मंत्रों के बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को ‘तामस यज्ञ’ कहते हैं।

सुशुद्धैयजमानस्थ ऋत्विग्भिश्च यथा विधि

शुद्ध द्रव्योपकरणैर्यष्टव्यमिति निश्चयः।

तथा कृतेषु यज्ञेषु देवानाँ तोषणं भवेत।

श्रेष्ठ स्याद्देव संद्येषु यज्वा यज्ञ फलं लभेत।

(महाभारत)

शुद्ध, सुयोग्य ऋत्विजों से, विधिपूर्वक शुद्ध सामग्री से यजमान यज्ञ करावे। विधिपूर्वक यज्ञ सम्पन्न होने से देवता सन्तुष्ट होते हैं जिससे अच्छे सम्मान तथा यथोचित यज्ञ फल की प्राप्ति होती है।

होम देवार्चनाद्यास्तु क्रियास्वाचमने तथा।

नेक वस्त्रः प्रवर्तेत द्विजवाचनिकेतथा।

वामेपृष्ठे तथा नाभौ कच्छत्रय मुद्राहृतम्।

त्रिभिः कच्छैः परिज्ञेयो विओ यः स शुचिर्भवेत्॥

यज्ञोपवीते द्वेधार्ये श्रौते स्मार्ते च कर्मणि। तृतौयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावेतदिष्यते।

खल्वाटत्वादि दोषेण विशिखश्चेन्नरोभवेत्। कौशीं तदाधारयीत ब्राह्मग्रन्थि युताँशिखाम्।

कुश पाणि सदातिष्ठैद् ब्रह्मणोदम्भ वर्जितः।

सनित्यं दन्ति शपानि तूल राशिमिवानिलः। सनित्यं हम्ति पापानि तूल राशिमिवानिलः।

होम, आचमन, सन्ध्या, स्वस्ति वाचन और देव पूजादि कर्मों को एक वस्त्र से न करें। नाभि पर तथा नाभि से काम भाग में और एक पृष्ठ भाग में इस प्रकार धोती की तीन काछें लगाने से ब्राह्मण कर्म के योग शुद्ध होता है। श्रोत और स्मार्त कर्मों में दो यज्ञोपवीत धारण करने चाहिए। कंधे पर अंगोछा न हो तो तीसरा यज्ञोपवीत उसके स्थान में ग्रहण करे। यदि गञ्जेपन के कारण शिर स्थान पर बाल न हो तो ब्रह्म ग्रन्थि लगाकर कुश की शिखा धारण करें। जो ब्राह्मण हाथ में कुश लेकर कार्य करता है वह पापों को नष्ट करता है।

संकल्पेन बिना कर्म यत्किंचित् कुरुते नरः। फलं चाप्यल्पकं तस्य धर्मस्यार्द्धक्षयो भवेत्।

संकल्प के बिना जो कर्म किया जाता है उसका आधा फल नष्ट हो जाता है। इसलिए संकल्प पढ़ कर हवन कृत्य करावें।

अव होमोपवासेषु धौतवस्त्र धरो भवेत्। अलंकृतः शुचिमौनो श्रद्धावान विजितेन्द्रियः॥

जप, होम और उपवास में धुले हुए वस्त्र धारण करने चाहिए। स्वच्छ, मौन, श्रद्धावान और इन्द्रियों को जीतकर रहना चाहिए।

अधोवायु समुत्सर्गेप्रहासेऽनृत भाषणे। मार्जार मूषिक स्पर्शे आक्रुष्टे क्रोध सम्भवे। निमित्तेष्वेषु सर्वेषु कर्म कुर्वन्नयः स्पृशेत्।

होम जप आदि करते हुए, अपान वायु निकल पड़ने, हंस पड़ने, मिथ्या भाषण करने, बिल्ली मूषक आदि के छू जाने, गाली देने और क्रोध आ जाने पर हृदय तथा जल का स्पर्श करना ही प्रायश्चित है।

ग्रन्थों में अनेक विधि विधानों का अधिक खुलासा-वर्णन नहीं है। संक्षिप्त रूप से ही संकेत कर दिये गये हैं। ऐसे प्रसंगों पर कुछ का स्पष्टीकरण इस प्रकार है।

कर्त्रगानामनुक्तौतु दक्षिणाँगं भवेत्सदा। यत्रदिं नियमोनास्ति जपादिषु कथंचन। तिस्रस्तत्रदिशः प्रोक्ता ऐन्द्री सौम्याँऽपराजिता। आसीनः प्रह्वऊर्ष्वोवा नियमोयत्रनेदृशः। तदासीने न कर्त्तव्यं न प्रह्वेण न तिष्ठता।

जहाँ कर्त्ता का हस्त आदि नहीं कहा गया हो कि अमुक अंग से यह करे वहाँ सर्वत्र दाहिना हाथ जाना। जप होम आदि में जहाँ दिशा का नियम न लिखा हो वहाँ सर्वत्र पूर्व उत्तर और ईशान, इनमें से किसी दिशा में मुख करके कर्म करे। जहाँ यह नहीं कहा गया हो कि खड़ा होकर, बैठकर या झुककर कर्म करे, वहाँ सर्वत्र बैठकर करना चाहिए।

सदोपवीतिनाभाव्यं सदा बद्ध शिखेन च। विशिखाव्युपवीतश्च यत्करोति न तत्कृतम्। तिलकं कुँकुमे नैव सदा मंगल कर्मणि। कारयित्वा सुमतिमान न श्वेत चन्दनं मृदा।

हवन आदि करते समय यज्ञोपवीत पहनें, शिखा में गाँठ लगाए रहें। खुली शिखा न रखें। सब माँगलिक कार्यों में केशर मिश्रित तिलक लगावे। सफेद चन्दन या मिट्टी का नहीं।

हविष्यान्नं तिला माषा नीवारा ब्रीहयो यवाः इक्षवः शालयो मुद्गा पयोदधि ब्रीहय स्मृता।

इविष्वेषु यवा मुख्यास्तदनु ब्रीहय स्मृता।

व्र्रीर्हाणामप्यलाभेतुदघ्ना वा पयसाऽपिवा। योथोक्वस्त्वसम्पत्तौग्राह्यं तदनुल्पतः। यवानामिव गोधूमा व्रीहीणामिव शालवः

तिल, उड़द तिन्नी, भदौह, धान, जौ, ईख, बासमती चावल, मूँग, दूध, दही, घी और शहद ये हविष्यान्न हैं। इनमें जौ मुख्य है उसके बाद धान। यदि धान न मिले तो दूध अथवा दही में काम चलावें। कही हुई वस्तु न मिले तो उसके स्थान पर अनुकल्प, समान गुण वाली वस्तु ले लेनी चाहिए।

स्नास्यतो वरुणस्तेजो जुह्यतोऽग्नि श्रियं हरेत्। भुञ्जानस्य यमस्त्वायुः तस्यान्न व्याहरेत् त्रिषु॥

स्नान करते समय बोलने वाले का तेज वरुण हरण कर लेता है। यज्ञ करते समय बोलने वाले की श्री अग्नि हरण करता है। भोजन करने में बोलने वाले की आयु यम हरण कर लेते हैं।

क्षुतृट्क्रोध सामयुक्तो हीन मंत्रो जुहोति यः अप्रवृद्धे सधूमे या सोऽन्धः स्यादन्य जन्मनि।

भूख, प्यास, क्रोध आदि से व्याकुल व्यक्ति, मंत्र हीन, अप्रज्ज्वलित अग्नि में हवन करता है तो वह अगले जन्म में अन्धा होता है।

न युक्ता केशोजुहुयान्नानिपातित जानुकः अनिपातितजानुस्तु राक्षसैह्रियते हविः।

खुले बाल रखकर एवं जानु खुली रखकर हवन न करें। क्योंकि ऐसा करने से राक्षस हवि का हरण कर लेते हैं।

तिलार्ध तण्डुला देयास्टण्डुलार्ध यवस्तिथा

यवार्ध शर्कराः प्रोक्ताः सवार्द्धच घृतत्मृतम्।

-आनन्द रामायण

तिल से आधे चावल, चावल से आधे जौ, जौ से आधी शक्कर और आधा घी लेना चाहिये।

सर्व काम समृद्ध्यर्थं तिलाधिकयं सदैव हि।

-त्रिकारिका

सब कामों में सफलता के लिए तिल अधिक लेने चाहिए।

शमोपलाश न्यग्रोध प्लक्षवैकंकतोद्भवाः अश्वत्थोदुम्वरोविल्वश्चन्दनः सरलस्तया। शालश्च देवदारुश्च खदिरश्चेति याज्ञिकाः।

शमी (छोंकर) पलाश (ढाक) बट प्लक्ष (पाकर) विकंकृत, पीपल, उदम्बर (गूलर) बेल, चन्दन, सरल, शाल, देवदारु और खैर यह याहिक वृक्ष हैं, इनकी समिधा होम में लगावें।

पलाशाऽश्वत्थन्यग्रोध प्लक्षकवैकंतोभद्वाः।

वैतसौदुम्वरो विल्वश्चन्दनः सरलस्तथा॥

शालश्च देवदारुश्च खदिरश्चेति याज्ञिकाः॥

-ब्रह्म पुराण

ढाक, पीपल, बरगद, वैंककत, बेंत, गूलर, वेल, चन्दन, साल, देवदारु, कत्था इनकी लकड़ी याज्ञिक कही गई है।

निवासा ये च कीटानाँ लताभिर्वेष्टिताश्च ये।

अयज्ञिका गर्हिताश्च वल्मीकैश्च समावृताः

शकुनीनाँ निवासाश्च वर्जयेत्तान् महीरुहान्।

अन्याँश्चैवं विधान् सर्वान् यज्ञियाँश्च विवर्जयेत्।

-वायु पुराण

कीड़े-मकोड़ों से भरे हुए लताओं से लिपटे हुए, इमली, कटहल आदि वृक्ष यज्ञ के लिए उपयुक्त नहीं। काँटेदार, दीमकों की बाम्बी वाले जिनमें पक्षी रहते हों, ऐसे वृक्ष यज्ञ के लिए ग्राह्य हों तो भी काम में नहीं लेने चाहिए।

मन्त्रेणोंकार पूतेन स्वाहान्तेन विलक्षणः। स्वाहावसाने जुहुयाद् ध्यायन्वै मंत्र देवताम्।

आरंभ में ऊंकार और अन्त में स्वाहा लगाते हुए मंत्र देवता का ध्यान करते हुए स्वाहा के अन्त में आहुति छोड़ें।

यदालेलायते ह्यर्चिं समिद्धे हव्यवाहने।

तदाज्यभागावन्तेरेणाहुतीः प्रतिपादयेत्।

तदाज्यभागावन्तरेणहुतीः प्रतिपादयेत्।

-मुण्डकोपनिषद्

जब अग्नि भली भाँति जल चुके और उसकी लपटें उठने लगें तब उसमें आहुतियाँ देनी चाहिए।

योऽनर्चिषि जुहोत्यग्नौ व्यंग्कारिणी च मानवः।

मन्दाग्नि रामयावी च दरिद्रश्चापि जायते।

तस्मात्समिद्धे होतव्यं नासभिद्धे कथञचन॥

-छांदोग्य परिशिष्ट

जो मनुष्य बिना प्रज्ज्वलित, बिना अंगकार की अग्नि में आहुति देता है वह मन्दाग्नि आदि उदर रोगों का दुख पाता है। इसलिए प्रज्ज्वलित अग्नि में ही हवन करना चाहिए।

ऋत्वजा जुह्यता वह्नौ वहिः पतति यद्धविः।

प ज्ञेयो वारुणो भागः अक्षेप्या विमले जले।

-शौनक

अग्नि में हवन करते समय जो हवि बाहर गिर पड़े उसे वरुण का भाग मान कर पवित्र जलाशय में विसर्जित करना चाहिए।

उत्तानेन तु हस्तेन अंगुष्ठग्रेण पंडितम्। संहताँगुलि पाणिस्तु वाग्यतो जुहुयार्द्धावः॥

सीधे हाथ से एवं अंगूठे के अग्रभाग से दबाये हुए, परस्पर मिली हुई अंगुली युक्त हाथ से हवन करें।

कुशेन रहिता पूजा विफला कविता मया

उदकेन बिना पूजा बिना दर्भेण या क्रिया।

जल और कुश के उपयोग बिना पूजा सफल नहीं होती।

कुशस्थाने च दूर्वाः स्युर्मगंलस्याभिवर्द्धय।

-हेमाद्रौ

कुश के स्थान पर दूब का उपयोग कर लेने से मंगल की वृद्धि होती है।

हवन के समय वेद मंत्रों को सस्वर उच्चारण करने या छन्द, ऋषि, देवता आदि का विनियोग पढ़ने की आवश्यकता नहीं है, यथा-

उपस्थाने जपे होमे दोहे च यज्ञ कर्मणि।

हस्त स्वरं कुर्वीत शेवस्तु स्वर संयुता।

-ओतोल्लास

उपत्थान, जप, गोदोहन (जौद याग) और यज्ञ फर्मों में हस्त स्वर लगाने की आवश्यकता नहीं है। अन्य कर्मों में लगाव।

जपेहोमे मखे श्राद्धेऽभिषेके पितृकर्मणि।

हस्तस्वरं न कुर्वीत सन्ध्यादौ देव पूजने।

-स्मार्त प्रभुः

जप, होम, यज्ञ, श्राद्ध, अभिषेक, पितृकर्म, संध्या उथा देव पूजन इनमें हस्त स्वर का प्रयोग नहीं करना चाहिए।

उपस्थाने जपे होमे मार्जने यज्ञ कर्मणि।

कण्ठ स्वरं प्रकुर्वीत.................

-स्मार्त प्रभुः

उपस्थान, जप, होम, मार्जन तथा यज्ञ में कण्ठ स्वर पर्याप्त है।

न च स्मरेत् ऋषि छन्दः श्राद्धे वैतानिकेमखे। ब्रह्म यज्ञे च वै तद्धत्तथोंकार विवर्जयते।

श्राद्ध, अग्निहोत्र, एवं ब्रह्म यज्ञ में ऋषि, छन्द, एवं ओंकार का स्मरण वर्जित है।

हवन करते समय किन-किन उंगलियों का प्रयोग किया जाय इसके संबंध में भृंगी और हंसी मुद्रा को शुभ माना गया है। ‘मृगी’ मुद्रा वह है जिसमें अंगूठा, मध्यमा और अनामिका उंगलियों से सामग्री होमी जाती है। हंसी मुद्रा वह है जिसमें सबसे छोटी उंगली कनिष्ठिका का उपयोग न करके शेष तीन उंगलियों तथा अंगूठे की सहायता से आहुति छोड़ी जाती है।

होमे मुद्रा स्मृतास्तिस्रो मृगी हंसी च सूकरी।

मुद्राँ बिना कृतो होमः सर्वो भवति निष्फलः।

शान्तके तु मृगी ज्ञेया हंसी पौष्टिक कर्मणि।

सूकरी त्वभिचारे तु कार्ण तंत्र विदुत्तमेः।

-परशुराम कारिका

होम में मृगी, हंसी तथा सूकरी यह तीन मुद्रा प्रयुक्त होती हैं। मुद्रा रहित हवन निष्फल होता है। शान्ति कर्मों में मृगी मुद्रा, पौष्टिक कर्मों में हंसी और अभिचार कर्मों में सूकरी मुद्रा प्रयुक्त होती है।

कनिष्ठा तर्जनी हीना मृगी मुद्रा निरुच्यते।

हंसी मुक्त कनिष्ठा स्यात् कर संकोच सूकरी।

-परशुराम कारिका

कनिष्ठा और तर्जनी उंगलियाँ जिसमें प्रयुक्त न हों वह मृगी मुद्रा है कनिष्ठा रहित हंसी मुद्रा होती हैं और हाथ को सकोड़ने से सुकरी मुद्रा बन जाती है।

(पद्य पुराण-भूमिखण्ड)

जो होम जिस देवता के उद्देश्य से किया जावे उसी के मंत्र से हवन होना चाहिए।

देययात्रा विवाहेषु यज्ञ प्रकरणोषु च।

उत्सवेषु च सर्वेषु स्पृष्टास्पृष्टं न विद्यते।

-अत्रि स्मृति 246

देव यात्रा, विवाह, यज्ञ एवं उत्सवों में छूतछात का विचार नहीं किया जाता।

शुभ मुहूर्त देखकर उत्तम बेला में शुभ कर्म करना सदा ही उचित है पर अनावश्यक रूप से अधिक लंबे समय तक मुहूर्त आदि की अड़चन के कारण उसे टालना ठीक नहीं। क्योंकि टालने से आज का उत्साह एवं सत्संकल्प ठण्डा पड़ सकता है या कोई अन्य विघ्न उसमें रोड़ा अटका सकता है इसलिए शुभ कार्य को शीघ्र करना उचित है।

यदैव जायते वित्तं चितं श्रद्धा समन्वितम्।

तदैव पुण्यकालोऽयं यतोऽनियत् जीवितम्

अतः सर्वेष कालेषु रुद्रयज्ञ शुभप्रदः॥

-परशुरामः

जब पैसे की सुविधा हो, जब चित्त में श्रद्धा हो तभी पुण्य काल (शुभ मुहूर्त) है। क्योंकि इस नाशवान जीवन का कोई समय नहीं। रुद्र यज्ञ के लिए सभी समय शुभ है।

जन्म मरण आदि के कारण जो मृतक हो जाते हैं उनमें शुभ कर्म निषिद्ध है। जब तक शुद्धि न हो जाय तब तक यज्ञ, ब्रह्म भोजन आदि नहीं किये जाते। परन्तु यदि वह शुभ कार्य प्रारंभ हो जाय तो फिर सूतक उपस्थिति होने पर उस कार्य का रोकना आवश्यक नहीं। ऐसे समयों पर शास्त्रकारों की आज्ञा है कि उस यज्ञादि कर्म को बीच में न रोककर उसे यथावत चालू रखा जाय। इस सम्बंध में कुछ शास्त्रीय अभिमत नीचे दिये जाते हैं-

यज्ञे प्रवर्तमाने तु जायेतार्थ म्रियेत वा।

पूर्व संकल्पिते कार्ये न दोष स्तत्र विद्यते।

यज्ञ काले विवाहे च देवयागे तथैव च।

हूय माने तथा चाग्नौ नाशौचं नापि सतकम्।

दक्षस्मृति 6।19-20

यज्ञ हो रहा हो ऐसे समय यदि जन्म या मृत्यु का सूतक हो जाए तो इससे पूर्व संकल्पित यज्ञादि धर्म में कोई दोष नहीं होता। यज्ञ, विवाह, देवयोग आदि के अवसर पर जो सूतक होता है उसके कारण कार्य नहीं रुकता।

न देव प्रतिष्ठोर्त्सगविवाहेषु देशविभ्रमे।

नापद्यपि च कष्टायामा शौचम्॥

-विष्णु स्मृति

देव प्रतिष्ठा, उत्सर्ग, विवाह आदि में उपस्थित सूतक में बाधा नहीं।

विवाह दुर्ग यज्ञेषु यात्रायाँ तीर्थ कर्मणि।

न तत्र सूतकं तद्वत कर्म याज्ञादि कारयेत॥

-पैठानसि

विवाह, किला बनाना, यज्ञ, यात्रा, तीर्थ कर्म के समय यदि सूतक हो जाय तो उसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए।

यज्ञ करने वाले यजमान पर ही नहीं यह बात ऋत्विज् ब्रह्मा आचार्य आदि पर भी लागू होती है। उनके यहाँ कोई सूतक हो जाय तो वह यज्ञ करने-कराने या उसमें भाग लेने के अनधिकारी नहीं होते तथा-

ऋत्विजाँ यजमानस्य तत्पत्न्या देशकस्य च।

कर्ममध्ये तु नाशौच मन्त एव तु तद्भवेत-॥

ऋत्विजों को यजमान को, यजमान की पत्नी को और आचार्य को जन्म या मरण का सूतक नहीं लगता। यज्ञ कर्म की पूर्ति हो जाने पर ही उन्हें सूतक लगता है।

ऋत्विजाँ दीक्षितानाँ च याज्ञिकं कर्म कुर्वताम्।

सत्रिव्रति ब्रह्मचरिदातृ ब्रह्म विदाँ तथा॥

दाने विवाहे यज्ञे च संग्रामे देश विप्लवे।

आपद्यपि हि कष्टायाँ सद्यः शौचं विधीयते॥

-याज्ञवलक्य

ऋत्विज्, दीक्षित अन्नसत्रि, चान्द्रायण आदि व्रतों में तत्पर, ब्रह्मचारी, दानी, ब्रह्मज्ञानी और याज्ञिकों की दान में, विवाह में, यज्ञ में, संग्राम में, देश विप्लव में और आपत्ति में सद्यः (तुरन्त) शुद्धि हो जाती है।

यज्ञ के मध्य सूतक हो जाने पर तात्कालिक स्नान कर लेने मात्र से उसकी शुद्धि हो जाती है। ऐसे अवसरों पर सूतक निवृत्ति के लम्बे समय तक पतीज्ञा करने की आवश्यकता नहीं होती। यथा-

यज्ञे विवाह काले च सद्यः शौचं विधीयते।

विवाहोत्सव यज्ञेषु अन्तरामृत सूतके।

पूर्वसंकल्पितार्थास्य न दोषश्चात्रिरव्रवीत्॥

अत्रि सं. 9 98

यज्ञ और विवाह में जन्म या मृत्यु का सूतक (अशौच) आ जाय तो उसको सद्यः शुद्धि हो जाती है। उस पूर्व संकल्पित कार्य या विवाहादि में कोई बाधा नहीं पड़ती।

गायत्री चर्चा-


यह अलभ्य अवसर चूका नहीं जाना चाहिए।

इस वर्ष का कुम्भ पर्व असाधारण महत्व का है। यों तो पूर्ण कुम्भ बारह वर्ष पीछे आता रहता है, पर इस वर्ष जैसे पुण्य योग इस अवसर पर एक साथ एकत्रित हुए हैं जैसे सुयोग सौ वर्ष बाद आते हैं। भारतीय धर्म में प्रत्येक पुण्य पर्व पर कुछ उत्तम कर्म करने का विधान है। इन विधानों को प्रायः सभी धार्मिक श्रद्धा वाले व्यक्ति प्रसन्नता पूर्वक अपनाते हैं। हमें पता है कि इस कुम्भ पर्व पर अनेकों आध्यात्मिक आत्माएं अनेक प्रकार के साधन, तप, दान आदि के आयोजन कर रहे हैं। उचित अवसर पर किया हुआ थोड़ा कार्य भी साधारण अवसर की अपेक्षा कहीं अधिक फलप्रद होता है। जो बात नवरात्रि साधना के विशेष अवसर के संबंध में लागू होती है वही बात और भी जोरदार कारणों के साथ कुम्भ वर्ष के संबंध में है।

अनेक पर्वों पर अनेक प्रकार के शुभ कार्य भिन्न-भिन्न रीति से किये जाते हैं। कुम्भ पर्व का प्रधान पुण्य ज्ञान दान है। त्रिवेणी तट पर दूर-दूर से लोग केवल इसी उद्देश्य से आते हैं। अनेकों सन्त महात्मा जो सदा गंगा के उद्गम केन्द्र में हिमालय को अपना घर बनाये हुए हैं, जनता के कल्याण के लिये किसी गुप्त प्रकट देश में प्रयोग करते हैं और किसी न किसी प्रकार ज्ञान दान का पुण्य कार्य करके अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करते हैं। देश के कौने-कौने से प्रायः सभी प्रमुख अध्यात्म परायण व्यक्ति यहाँ आते हैं और उनका उद्देश्य सद्ज्ञान का आदान-प्रदान नहीं होता। यों त्रिवेणी स्नान भी होता ही है। पर कुम्भ का मूल हेतु स्नान नहीं, ‘ज्ञान दान’ है।

जिस प्रकार सोमवती अमावस्या को ग्रहण के दिन प्रायः सभी धार्मिक मनुष्य स्नान करते हैं- रोग आदि विशेष स्थितियों को छोड़कर ऐसे अवसरों का स्नान आवश्यक मानते हैं, उसी प्रकार कुम्भ पर्व पर आत्मा को कल्याण मार्ग पर अग्रसर करने वाले ज्ञान का आदान-प्रदान करना भी आवश्यक माना जाता है। इस अवसर पर स्वाध्याय, सत्संग, प्रवचन, कथा श्रवण आदि के आयोजन सर्वत्र ही होते हैं। लोग अपनी-अपनी आर्थिक स्थिति के अनुकूल कुछ न कुछ दान पुण्य भी करते हैं। मानसिक दृष्टि से घोर कृपणों को छोड़ कर निर्धन से निर्धन व्यक्ति भी कुछ न कुछ अवश्य ही देते हैं। कुछ देने से त्याग करने से ही आत्मा का उत्कर्ष होता है। यज्ञ का अर्थ परमार्थ ही है। हम कुछ छोड़ने के उपरान्त ही अधिक उत्तम वस्तु पाने की आशा कर सकते हैं।

गायत्री संस्था की ओर से देशव्यापी कुम्भ पर्व की योजना इसी दृष्टि से की गई है। प्राचीन काल में एक स्थान पर सीमित भीड़ ही हो सकती थी। शहर बड़े न थे इसलिए तीर्थों में जगह भी काफी थी। पर अब तो परिस्थितियाँ बदल गई है। रेल-मोटर आदि साधनों से धार्मिक, आध्यात्मिक सभी प्रकार के व्यक्ति विभिन्न उद्देश्यों से अवाँछनीय संख्या में प्रयाग पहुँचते हैं और मेले-ठेले के अशान्त वातावरण में वह सब नहीं हो पाता जो होना चाहिए। आर्थिक कारण भी ऐसी यात्रा में बाधक होते हैं। इसलिये गायत्री संस्था ने ‘महा अभिज्ञान’ का आयोजन स्थान-स्थान में घर-घर में किये जाने की प्रेरणा की है। हर्ष की बात है कि प्रायः सभी निष्ठावान सदस्यों ने अपने-अपने स्थानों पर अपनी स्थिति के अनुसार ज्ञान प्रसार के आयोजन किये हैं। कुछ ने तो आश्चर्यजनक उदाहरण उपस्थित किये हैं, उनके सचित्र वर्णन अगले अंक में छपेंगे।

यह अंक पहुँचने तक माघी अमावस्या तारीख 3 फरवरी का पूर्ण कुँभ समाप्त हो चुका होगा। पर उसका पुण्य पर्व सम्पूर्ण कुम्भ संक्रांति तक रहेगा। कुम्भ का सूर्य ता. 12 फरवरी को होगा और वह एक महीने ता. 14 मार्च तक चलेगा। कुम्भ योजना में भाग लेने एवं इस सम्बंध में कुछ करने का यह भी अवसर है। जैसे ठीक सूर्योदय के समय का प्रातःकाल कहते हैं पर सूर्य निकल आने के कुछ देर पीछे भी प्रभात काल ही रहता है। उसी प्रकार ता. 3 फरवरी को कुम्भ पर्व होने पर भी उसका पुण्य काल सम्पूर्ण कुम्भ संक्रान्ति तक रहेगा। इस अवधि में हमारे परिवार के सभी सदस्यों को किसी न किसी रूप में ज्ञान दान का शुभ कृत्य करके अक्षय पुण्य का संचय करना चाहिये।

दानों में ज्ञान दान सर्वश्रेष्ठ है। ज्ञान दान में भी ब्रह्म दान उत्तम कहा गया है। गायत्री ज्ञान का दान करना एक बहुत बड़ा शुभ कर्म है। जिसकी तुलना साधारण शुभकर्म, व्रत, जप, स्नान आदि से नहीं हो सकती। पिछले अंकों में हमने इसके लिए अपने सभी परिजनों से आग्रह पूर्वक जोर दिया है। कार्य की सुविधा की दृष्टि से पाँच-पाँच पैसे वाली अत्यन्त सस्ती और चित्ताकर्षक सुन्दर आठ पुस्तकें भी छपाई हैं। इस प्रकाशन का उद्देश्य अधिक से अधिक लोगों तक कम से कम खर्च में गायत्री ज्ञान का विस्तार करना ही है। संस्था की ओर से सवालक्ष मनुष्यों को गायत्री ज्ञान का ब्रह्मदान करने का जो संकल्प किया गया है, उसकी पूर्ति के लिये यह छोटा साहित्य उपयुक्त माना गया है।

पिछले अंकों के अनुरोध के अनुसार अनेक व्यक्ति इन छोटे सैटों को 10-10 या 30-30 मंगाकर अपने क्षेत्र में प्रचारित कर रहे हैं। कुछ महानुभावों ने तो एक-एक हजार सैट मंगाये हैं। 240 सैटों का प्रचार करने का संकल्प कई एक निष्ठावान मनस्वी व्यक्ति कर चुके हैं। अच्छा हो कि इस दिशा में हम सभी और अधिक उत्साहपूर्वक कार्य करें ताकि सवालक्ष व्यक्तियों को ज्ञान दान करने का संकल्प पूरा हो सके। अभी इस दिशा में बहुत अधिक काम करने को शेष पड़ा हुआ है। कुम्भ पर्व समाप्त हो जाने पर भी यदि यह संकल्प पूरा न हुआ तो यह बात हम सबके लिए बड़ी खेदजनक होगी।

जिनकी निज की आर्थिक स्थिति में जितनी गुँजाइश हो, उसके अनुकूल वाले सैटों का दान करें। अपने मित्रों पर जोर देकर उन्हें ऐसे पुनीत दान के लिए तैयार करें। जिनके पास समय हो तो इन सैटों को बेचने का प्रयत्न करें। बेचने में जो समय एवं समझाने का श्रम लगाना पड़ेगा, वह भी दान से किसी भी प्रकार कम नहीं है। वैसे मुफ्त लेने देने की अपेक्षा खरीदना-बेचना अधिक उत्तम है क्योंकि इसमें लेने वाले को वस्तु का मूल्य मालूम होता है और बेचने वाले को समय एवं योग्यता खर्च करनी पड़ती है। साधारण लोग भी अपनी दुकानों पर रोज बहुत पैसे की बिक्री करते हैं। यदि कोई मनुष्य सच्चे मन से चाहे तो 10-20 रुपये की इतनी सस्ती और सुन्दर पुस्तकें अवश्य बेच सकता है। जो बच जायं उन्हें दान भी कर सकता है। गुरुओं के लिये प्राचीन काल में शिष्य लोग भिक्षा माँगकर लाते थे। अब भी यज्ञोपवीत संस्कार कराते समय ‘गुरु के लिए भिक्षा माँगने’ की लकीर-पीटनी पड़ती है। हम चाहते हैं कि गायत्री माता को गुरु मानकर उनके ज्ञान का प्रचार करने के लिए हम सभी अधिक उत्साह से कुछ कार्य करें। दूसरों को गायत्री ज्ञान से परिचित कराने के लिए अपने प्रभाव का पूरा-पूरा उपयोग करें। इस दिशा में लगाया हुआ थोड़ा सा श्रम, समय तथा धन भी बहुत महत्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न करने वाला सिद्ध होगा।

ऐसा भी हो सकता है कि इस छोटे साहित्य के जितने प्रचार की संभावना हो उतना उधार मंगा लिया जाय। उसे बेच कर पीछे पैसे भेज सकते हैं। जो लोग दान करना चाहें वे इस समय मंगाकर उतना साहित्य अपने निकटवर्ती सत्पात्रों को दान कर दें और पीछे थोड़ा-थोड़ा करके उस पैसे को चुकाते रहें। दस से कम सैट नहीं मंगाने चाहिये। जो सज्जन कुछ अधिक साहित्य मंगावें उन्हें रेलवे पार्सल से मंगाने चाहिये, अपने पास के स्टेशन और रेलवे लाइन का नाम लिख देने से रेलवे पार्सल कम किराये में पहुँच जाता है।

यह कुम्भ पर्व अतीव महान है, ऐसा अवसर पर्व सौ वर्ष बाद आया है। आगे भी सौ वर्ष तक ऐसे कुम्भ योगों का पर्व आने वाला नहीं है। इसलिए अधिक आग्रह के साथ अपने प्रत्येक परिजन से अनुरोध है कि वह इस अवसर पर गायत्री ज्ञान का प्रसार करने का पुण्य प्रयत्न अवश्य करे। इस अवसर पर इस दिशा में अपना समय, श्रम एवं धन लगाने की कंजूसी करना निश्चय ही एक भारी भूल मानी जायेगी।


विवेक वचनावली


विवेक वचनावली (Kavita)

कहत सकल घट राम मय, तौ खोजत केहि काज। तुलसी कहँ यह कुमति सुनि, उर आवत अति लाज॥

अलख कहहिं देखन चहहिं, सो कस कहिय प्रवीन। ब्रह्म स्फटिक मनि सम लसै, घट-घट माँझ सुजान।

निकट आय बरतै जो रंग, सो रंग लगै दिखान॥

कोटि घटन में विदित ज्यों, रवि प्रतिबिम्ब दिखाइ। घट घट में त्यों ही छिप्यो, स्वयं प्रकाशी आइ॥

यों सब जीवन को लखौ, ब्रह्म सनातन आदि। ज्यों माटी के घटन की, माटी ही बुनियादी॥

पंचन पंच मिलाइ कै, जीव ब्रह्म में लीन। जीवन मुक्त कहा वही, रस-निधि वह परवीन॥

अलख सबैई लखत वह, लख्यौ न काहू जाय। दृग तारिन को तिल यथा, देखौ नहीं दिखाय॥

हिन्दू में क्या और है? मुसलमान में और? साहिब सबका एक है, व्यापि रहासब ठौर॥

अलख ज्ञान इन दृगन सों, विदित न देखौ जाइ। प्रेम काँति वाकी प्रकट, सबही ठौर दिखाइ॥

सब घट मेरा साइयाँ, सूनी सेज न कोई। भाग्य उन्हीं के हे सखी, जिहि घट परगट होइ॥

कस्तूरी तन में बसै, मृग ढूँढे बन महिं। ऐसे घट घट राम हैं दुनिया देखे नाहिं॥

घट बढ़ कहीं न जानिय, ब्रह्म रहा भरपूर। जिन जाना तिन निकट है, दूर कहै ते दूर।

बहुत दिवस भटकत रह्या, मन में विषै विराम। ढूँढत ढूँढत जग फिरा, तृण के औटै राम॥

ज्यों नैनन में पूतली, त्यों खालिक घट माहिं। मूरख लोग न जानहीं, बाहर ढूंढ़न जाहिं॥

आप मिटाये हरि मिलैं, हरि मैटें सब जाय। अकथ कहानी प्रेम की, कहूँ न कोई पतिआव॥

पढ़-पढ़ के ज्ञानी भये, मिटयौ नहीं तन ताप। राम नाम तोता रटै, कटै न बन्धन पाप॥

गंगा यमुना सरस्वती, सात सिन्धु भरिपूरि। तुलसी चातक के मते, बिना स्वाति सब धूरि॥

कबीर माला ना जपों, जिह्वा कहों न राम। सुमिरन मेरा हरि करें, मैं पावों विश्राम॥

जदपि रहौ है भावतौ, सकल जगत भरपूर। बलि जैये वा ठौर की, जहं ह्वै करै जहूर॥


जीवन परिचय


जीवन परिचय (Kavita)

मैं उस जीवन का प्याला हूँ, जिसमें उल्लास छलकता है। मैं उस जीवन की ज्वाला हूँ, जिसमें संसार उबलता है॥

मैं उस जीवन की ज्योति प्रबल, जिसमें जन-जीवन पनपता है। मैं उस जीवन की राग अमल, जिसमें ह्रत्तार झनकता है॥

मैं उस जीवन का दर्पण हूँ, जिसमें आदर्श झलकता है। मैं उस जीवन का कर्षण हूँ, जिसमें बस प्रेम मुकलता है॥

मैं उस जीवन का धावन हूँ, जिसमें पशु का निर्वाह नहीं। मैं उस जीवन का दामन हूँ, जिसमें दनुता की छाँह नहीं।

मैं उस जीवन की माया हूँ, जिसमें ममता का लेश नहीं। मैं उस जीवन की काया हूँ, जिसमें शठता का वेश नहीं॥

मैं उस जीवन का हूँ, बसन्त, जिसमें प्रियतम की कूक बसी। मैं उस जीवन का हूँ अनन्त, जिसमें दुखिया की हूक धंसी॥

मैं उस जीवन का पावस हूँ, जिसमें रस की फौहार फटे। मैं उस जीवन का साहस हूँ, जिसमें यश की पौहार बंटे॥

मैं उस जीवन का माली हूँ, जिसमें शिशुता की हरियाली। मैं उस जीवन की थाली हूँ, जिसमें मधुता-प्रियता-ढाली॥

5

मैं उस जीवन की लहरी हूँ, जिसमें थल अथल उथल जाये। मैं उस जीवन की शफरी हूँ, जिसमें चल अचल छहल जाये॥

मैं उस जीवन का नाला हूँ, जिसमें कल-कल अनुराग बहे। मैं उस जीवन की बाला हूँ, जिसमें पल पल पर फाग दहे॥

मैं उस जीवन की मदिरा हूँ, जिसमें उन्माद मनस्वी का। मैं उस जीवन की सुशिरा हूँ, जिसमें सम्वाद तपस्वी का॥

मैं उस जीवन का कं्रदन हूँ, जिसमें भव विभव महालय है। मैं उस जीवन का मर्दन हूँ, जिसमें शवमय शुभ मानव है॥

*समाप्त*