यज्ञ आवश्यक है।

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई हैं उतनी और किसी को नहीं दी गई। हमारा कोई भी शुभ-अशुभ धर्म कृत्य यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। जब बालक का जन्म होता है तो उसकी रक्षार्थ सूतक निवृत्ति तक घरों में अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में भी हवन अवश्य होता है। अन्त में जब शरीर छूटता है तो उसे अग्नि को ही सौंपते हैं। अब लोग मृत्यु के समय चिता जलाकर यों ही लाश को भस्म कर देते हैं शास्त्रों में देखा जाय, तो वह भी एक यज्ञ हैं। इसमें वेद मन्त्रों से विधिपूर्वक आहुतियाँ चढ़ाई जाती हैं और शरीर को यज्ञ भगवान को अर्पण किया जाता है।

सभी साधनाओं में हवन अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं, वे चाहें वेदोक्त हों चाहे तान्त्रिक, हवन उनमें किसी न किसी रूप में अवश्य करना पड़ेगा। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण में जप से दसवाँ भाग हवन करने का विधान है। परिस्थितिवश दसवाँ भाग आहुतियाँ न दी जा सके तो शताँश (सौ वाँ भाग) आवश्यक है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता हैं जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता-पिता की सेवा-पूजन करना मनुष्य का नित्य कर्त्तव्य है उसी प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है।

यज्ञ किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं हैं। साधारण रीति से किये हुए हवन में जो धन व्यय होता है वह एक प्रकार से देवताओं की बैंक में जमा हो जाता है और वह सन्तोषजनक ब्याज समेत लौटकर अपने को बड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता के समय पर वापिस मिलता हैं। विधिपूर्वक, शास्त्रीय पद्धति एवं विशिष्ट उपचारों एवं विधानों के साथ किये हुए हवन तो ओर भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे यज्ञ एक प्रकार के दिव्य अस्त्र हैं। दैवी सहायताएं प्राप्त करने के अचूक उपचार हैं। यज्ञ समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का पिता है। यज्ञ को वेदों ने ‘कामधुक्’ कहा है वह मनुष्यों के अभावों का पूरा करने वाला और बाधाओं को दूर करने वाला है। यज्ञ एक महान विद्या है। पांचों तत्वों का यज्ञ में एक वैज्ञानिक संमिश्रण होता है जिससे एक प्रचण्ड दुर्वर्ष शक्ति का आविर्भाव होता है। यज्ञ की इस प्रचण्ड शक्ति को ‘द्वि नासिक , सप्त जिह्वा, उत्तर मुख, कोटि द्वादश मूर्त्या, द्विपञ्चशत्कला युतम’ आदि विशेषणों युक्त कहा गया है। इस रहस्यपूर्ण संकेतों में यह बताया गया है कि यज्ञाग्नि की मूर्धा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों हैं। इससे दोनों क्षेत्र सफल बनाये जा सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति यज्ञ की नासिका है उस पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, सातों प्रकार की संपदाएं यज्ञाग्नि के हाथ हैं, वाममार्ग और दक्षिण मार्ग ये दो मुख हैं। हवा सातों लोक जिह्वाएँ हैं, इन सब लोकों में जो कुछ भी विशेषताएं हैं वे यज्ञाग्नि के मुख में मौजूद हैं। उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व केन्द्र अग्नि मुख है। यज्ञ की 52 कलाएं ऐसी हैं जिनमें से कुछ को प्राप्त करके ही रावण इतना शक्तिशाली हो गया था। यदि यह सभी कलाएं उपलब्ध हो जायें तो मनुष्य साक्षात् अग्नि रूप हो सकता है और विश्व के सभी पदार्थ उसके करतलगत हो सकते हैं। यज्ञ की महिमा अनन्त है। उसका थोड़ा आयोजन भी फलदायक होता है। गायत्री उपासकों के लिए तो यह पिता तुल्य पूजनीय है।


यज्ञ की बेला

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)


यज्ञ की बेला

आज यज्ञ की बेला, साधक करो हृदय पावन।

किरणों के द्वारा सूरज का सन्देश आया। विहँगावलि का स्वर वेदों के मन्त्रों को लाया।

फूल-फूल पर, कली-कली, पर अलि दल का गायन। आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन।

उदय बना वेदी नीहार-कणों ने पट छोया। मलय मंच को स्वच्छ कर रहा है खोया-खोया॥

जन-रव करता जीवन, जब जागृति का आवाहन। आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन॥

नयी चेतना, नयी प्रेरणा और नया प्रण है। भक्ति, भाव, निष्ठा, इनका उत्साह चिरंतन है

सत्य-साधना में तुम कर दो अर्पित तन, मन, धन। आज यज्ञ की बेला, साधक! करो हृदय पावन॥

यज्ञ की अनिर्वचनीय महत्ता

यो यज्ञे यज्ञ परमैरिज्यते यज्ञसंज्ञितः।

तं यज्ञ पुरुषं विष्णुँ नमामि प्रभु मीश्वरम्॥

जो यज्ञ द्वारा पूजे जाते हैं, यज्ञ मय हैं, यज्ञ रूप हैं उन यज्ञ रूप परमेश्वर को नमस्कार है।

भारतीय धर्मशास्त्रों को यज्ञ को ईश्वर रूप माना गया है। सब वेदों में ज्येष्ठ ऋग्वेद के सर्वप्रथम मन्त्र “अग्नेमीलं पुरोहित” में अग्नि रूप परमात्मा की वन्दना एवं प्रार्थना की गई है। इससे प्रतीत होता है कि वेद के अवतरण से भी पूर्व अग्नि रूप यज्ञ भगवान की महिमा प्रकट थी।

ब्राह्मण, ग्रन्थों, संहिताओं तथा उपनिषदों में अनेक स्थलों पर यज्ञ का ईश्वर परक, देव परक एवं अत्यन्त प्रतिष्ठित एवं महत्वपूर्ण शब्दों में स्मरण किया गया है।

यज्ञों वै विष्णुः। -शत. ब्रा.1।1।1।2

यज्ञों वै विष्णुः। -तैत्तिरीय संहिता 1।7।4

पुरुषो वै यज्ञः। -शत. ब्राह्मण 1।2।4।3।2

इन वाक्यों में यज्ञ को परमात्मा का रूप माना गया है, क्योंकि परमात्मा के अधिकाँश गुण यज्ञ की अग्नि में मौजूद होते हैं।

यज्ञो व स्वरइर्देवाः।

-शत.ब्रा.1।1।1।2।2

यज्ञ एव सचिता।-गो.ब्रा.पू.1।33

स्रयः स्र यज्ञोऽसौ स आदित्यः।

-शत. ब्रा.14।1।1।6

इन्द्रो वै यज्ञः। -मै. शा. 4।6।7

एष वै प्रत्यक्ष यज्ञों यत्प्रजापतिः।

- शत. ब्रा. 4।3।4।3

प्रजापतिर्वै यज्ञः। -तैति. 1।1।10।10

प्रजापतिर्वै यज्ञः। - गौपथ. ब्रा. पू. 2।18

प्रजापतिर्ययज्ञः। - शत. ब्रा. 1।1।11

यज्ञउवै प्रजापतिः। -कौ 10।1

यज्ञः प्रजापतिः। - शत. ब्रा. 11।6।3।9

इन वाक्यों में यज्ञों में को सूर्य इन्द्र, एवं प्रजापति माना गया है । जिस प्रकार सूर्य से प्रकाश, उष्णता, आरोग्य प्राप्त होता है, इन्द्र से वर्षा एवं वनस्पति उपलब्ध है, प्रजापति प्रजा का पालन करते हैं, वैसे ही यज्ञ भी इन तीनों देवताओं के कार्य को पूरा करता है। इसलिए उसे प्रत्यक्ष सूर्य, इन्द्र एवं प्रजापति माना गया है।

प्रथम हि यज्ञः।-कपि.शा.40।20

यज्ञो वै कर्म।-शत.ब्रा. 1।1।1।1

यज्ञो वै श्रेष्ठतर कर्म। -कपि.शा. 46।6

यज्ञो वै श्रेष्ठतर कर्म। -1।7।15

इन वाक्यों में यज्ञ को सर्वश्रेष्ठ कर्म, सबसे आवश्यक प्राथमिकता देने योग्य कर्म कहा है। क्योंकि संसार में जितने भी श्रेष्ठ कर्म है उन सब में यज्ञ का स्थान निश्चय ही सर्वोपरि है। जितने कार्य संसार में आवश्यक हैं, सबसे पहले करने योग्य हैं उनमें यज्ञ का पहला नम्बर है। क्योंकि अन्य कार्य मनुष्य का जितना हित साधन करते हैं, यज्ञ उन सबसे अधिक लाभदायक हैं।

यज्ञो वै परशुः। -शत.ब्रा. 3।6।4।10

यज्ञो वै आपः। -शत.ब्रा. 1।1।1।1।

यज्ञो वा अनः।-शत.ब्रा. 1।1।1।2

यज्ञो वै प्रावित्रम् -शत.ब्रा. 1।4।3।52

इन वाक्यों में यज्ञ को परशुः, आपः, अनः, प्रावित्रम् सदृश्य महत्वपूर्ण शक्तियों का प्रतीक बताया गया है। इन सूक्ष्म शक्तियों का लाभ प्राप्त करके मनुष्य प्रकृति पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता है।

यज्ञ की महिमा साधारण नहीं है। धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य यज्ञ हवन के साथ होता है। इतना ही नहीं आगे चलकर को यहाँ तक कि अपने आपको यज्ञ बना लेने का विधान है। मनुष्य का जीवन यज्ञ के साथ आरम्भ होता है और यज्ञ के साथ ही उसकी समाप्ति होती है। गर्भाधान का आरम्भिक संस्कार जिसमें रज-वीर्य के संयोग से देह का प्रथम कलल उत्पन्न होता है, यज्ञ के साथ होता है। जब देह में से प्राण निकल जाता है तब भी देह को यज्ञ भगवान को भेंट करने के लिये अन्त्येष्टि किया जाता है।

यज्ञ में वेद मन्त्रों के साथ आहुति देने के अनेक सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं, उन परिणामों में सबसे प्रथम यह है कि मनुष्य की आत्मा शुद्ध होती है, उसके चिर संचित कुसंस्कार नष्ट होते हैं, मनोविकार घटते हैं और शुभ संकल्प एवं ब्रह्मतेज की तीव्र गति से अभिवृद्धि होती है। शास्त्रों में ऐसे अनेक प्रमाण मौजूद हैं।

य एनं परिषी दन्ति समादधति चक्षसे। सप्रेद्धो अगिनर्जिह्वाभिरुदेतु हृदयादधि॥

अथर्व॰ 6।75।1

जो इस अग्नि के चारों ओर बैठकर हवन आदि करते है और दिव्य उद्देश्य से हवि चढ़ाते हैं उनके हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है।

प्रहोत्रे पर्वयं वचोग्नये भरता ब्रहत्। विषाँ ज्योतीं विभ्रते न विद्यते ॥

सा. म. 38

यज्ञ करने से सद्बुद्धि, तेज और भगवान की प्राप्ति होती है।

ॐवसोः पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यसि मात् रिश्वनो धर्मासि विश्वधा असि। परमेण धाम्ना ह हस्वमाह्वामीं ते यज्ञ पतिमाह्वायति।

यजु. 1।2

हे यज्ञ तू पवित्र है एवं पवित्रता का हेतु है। तू द्यौ लोक है, तू ही पृथ्वी लोक है। तू वायु को चलाता एवं शुद्ध करता है। तू विश्व को धारण करता है। तू परमधाम से सुख को बढ़ाता है। हे यज्ञ तू यजमान को मत त्याग, यह यजमान तुझे कभी न त्यागे।

दत्तमिष्टं हुतं चैव तप्तानि च तपाँसिच।

वेदाः सत्य प्रतिष्ठानास्तमात्स्त्य परोभवेत॥

(वाल्मीक अयो 109।14)

दान, यज्ञ, होम, तपस्या और वेद, इनका आश्रय लेना ही सत्य है। अतः सबको सत्यनिष्ठ होना चाहिए। अर्थात् यज्ञ ही उपरोक्त सत्य कर्त्तव्यों में संलग्न होना चाहिए।

यज्ञाः कल्याणं हेतवः।

विष्णु पुराण 6।9।8

यज्ञ ही कल्याण का हेतु है।

यज्ञ के द्वारा जो आध्यात्मिक आनन्द मिलता है वह अलौकिक है। उसे स्वर्ग सुख कहते है। यों यज्ञ द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति भी होती है पर उसका मुख्य लाभ आत्मकल्याण है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश का आविर्भाव करना है। यह ब्रह्म तेज किसी जीवन में जितना ही बढ़ना है उतना ही उसे देवताओं को उपलब्ध हो सकने वाला स्वर्गीय सुख प्राप्त होता है। कहा भी है-

नौह वा एषा स्वर्ग्या। यदगिन होत्रम्

शतपथ 2।3।3।15

यह अग्निहोत्र निश्चय ही स्वर्ग सुख प्राप्त करने वाली विशेष नौका है।

आगिनहोत्रं जुहुयात् स्वर्ग कामः।

स्वर्ग की कामना करने वाले को अग्निहोत्र करना चाहिए।

यज्ञ दान तपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।

यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

गीता 18।5

यज्ञ, दान, तप और कर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। इन्हें करना ही उचित है। यह यज्ञ दान और मनीषियों को भी पवित्र करते हैं।

यज्ञेन देवा विमला विभान्ति यज्ञेन देवा अमृत्व माप्नुयुः। यज्ञेन पापैर्बहुभिर्विमुक्तः आप्रोन्ति लोकान् परमस्य विष्णोः।

(हारीत)

यज्ञ से समस्त लोक निर्मल ओर सुन्दर बनते हैं यज्ञ से देवता अमर होते हैं। यज्ञ से अनेक पापों से छुटकारा तथा परमात्मा के लोक की प्राप्ति होती है। स्वर्ग का अर्थ चाहे इस लोक का आध्यात्मिक अलौकिक दिव्य सुख किया जाय, चाहे स्वर्ग लोक में देवताओं को प्राप्त होने वाला सुख किया जाय दोनों ही जीव के लिए शुभ हैं। यज्ञ से मनुष्य निश्चित रूप से शान्तिदायक शुभ सद्गति को प्राप्त होता है।

त्रैविद्या माँ सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गति प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्र लोक मश्नन्ति दिव्यान दिवि देव भोगान्॥

गीता 1।20

वेद विधान के अनुसार यज्ञों द्वारा मुझ भगवान को पूज कर जो निष्पाप मनुष्य स्वर्ग चाहते हैं वे अपने पुण्य के कारण देव लोक, स्वर्गीय सुख को भोगते हैं।

देह में जो असुरतामय, पाप रूप कुसंस्कार असुर प्राण भरे रहते हैं तथा वे कुविचारों के दूषित वातावरण के रूप में संसार में भ्रमण करते रहते हैं, यज्ञ द्वारा उनका विनाश होकर देव प्राण की वृद्धि होती है। अर्थात् असुरता घटकर देवत्व पनपता है। यथा :-

ये रूपाणि प्रति मुञ्चमाना असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यागिनष्टाँ ल्लोकात् प्रणुदात्य स्मात्॥

यजु. 2।30

जो असुर प्राण इस पृथ्वी पर असुर रूप से विचरण करते रहते हैं वे यज्ञ की अग्नि द्वारा शरीर में से निकाल बाहर किये जाते हैं।

यज्ञ होम आदि द्वारा इस शरीर को ब्राह्म बनाया जाता है, उसमें ब्राह्मी गुण स्थापित किये जाते हैं। इन आवश्यक धर्म कृत्यों की उपेक्षा करने से मनुष्य ब्राह्मणत्व से वञ्चित हो जाता है।

स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येन ज्ययासुतैः। महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥

मनु॰

स्वाध्याय, व्रत, होम, वेदाध्ययन, सुप्रजनन,यज्ञ तथा महायज्ञों द्वारा यह शरीर ब्राह्म किया जाता है ।

यज्ञ ऐसा आवश्यक कर्म है कि उसे करते ही रहना चाहिये क्योंकि इससे परमात्मा प्रसन्न होता है, प्रभु की प्राप्ति होती है, जिस पर परमात्मा प्रसन्न है उसे किसी वस्तु की कमी नहीं रहती। यज्ञ परित्याग करने से मनुष्य अनेक सत्परिणामों से वञ्चित होकर अधोगामी बनता है।

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान यज्ञ पुरुषः।

इज्यते स्वेन धर्मेण जनैर्वंर्णाश्रमान्वितैः।

तस्य राज्ञों महाभाग भगवान भूत भावनः।

परितुष्यति तिष्ठतो निज शासने।

तास्मिस्तुष्टे किमप्राप्यं जगतामीश्वर श्वरे॥

भागवत 4।14।18-20

जिस राष्ट्र या नगर में भगवान यज्ञ पुरुष का यजन होता है उस पर भगवान प्रसन्न होते हैं। जहाँ भगवान प्रसन्न होते हैं वहाँ कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती।

कस्त्वा विमुञ्चति सत्वा विमुञ्चति कस्मैत्व विमुञ्चति तस्मै त्वं विमुञ्चति । पोषाय रक्षसा भागोऽसि॥

यजु. 2।23

भला कौन सुख चाहने वाला, यज्ञ को छोड़ता है? जो यज्ञ को छोड़ता है उसे यज्ञ रूप परमात्मा भी छोड़ देता है। सबकी पुष्टि एवं उन्नति के लिए हविष्य यज्ञ में छोड़ा जाता है। जो नहीं छोड़ता वह राक्षस हो जाता है ।

यज्ञ शब्द का अर्थ-

यज धातु से यज्ञ शब्द बना है। जिसका अर्थ है देव पूजा, संगति करण और दान। ईश्वरीय दिव्य शक्तियों की आराधना, उपासना, उनकी समीपता संगति तथा अपनी समझी जाने वाली वस्तुओं को उनके अर्पण करना यह यज्ञ की आध्यात्मिक प्रक्रिया है। देव गुण सम्पन्न सत्पुरुषों की सेवा एवं संगति करना तथा उन्हें सहयोग देना भी यज्ञ है। व्यावहारिक अर्थों में इसे यों भी कह सकते हैं कि बड़ों का सम्मान बराबर वालों से संगति, मैत्री, अपने छोटों को, कम शक्ति वालों को दान सहायता करना यज्ञ है। इस प्रकार ईश्वर उपासना, सत् तत्व का अभिवर्धन एवं पारस्परिक सहयोग भी यज्ञ माने जाते हैं। यों हवन के अर्थ में यज्ञ शब्द का प्रयोग तो प्रसिद्ध ही है। हवन द्वारा भी उपरोक्त तीनों प्रयोजन पूर्ण होते हैं।

देवानाँ द्रव्य हविषाँ ऋक् साम यजुषाँ तथा।

ऋत्वजाँ दक्षिणानाँ च संयोगो यज्ञ उच्यते॥

-मत्स्य पुराण

देवों को हवि प्रदान, वेद मन्त्रों का उच्चारण, ऋत्विजों को दक्षिणा इन तीनों कार्यों का संयोग यज्ञ कहलाता है।

इज्यन्ते चत्वारों वेदाः सांगाः सरहस्याः सच्छिष्येभ्यः।

सम्प्रदीयन्ते (उपदिश्यन्ते) सदाचाय्यर्यै येन वा स यज्ञः॥

विद्वान आचार्यों द्वारा सत्पात्र शिष्यों को अंग-उपाँगों सहित वेदों का पढ़ाना यज्ञ है।

येन सदनुष्ठानेन इन्द्रादि देवाः सुप्रसन्नाः सुवृष्टिं कुर्युस्तत पदाभिधेयम।

जिस कार्य से इन्द्रादि देव प्रसन्न होकर उत्तम वर्षा करें उसे यज्ञ कहते हैं।

येन सदनुष्ठानेन स्वर्गादि प्राप्तिः सुलभाः स्यात तत् यज्ञ पदामिधेयम्।

जिस आयोजन द्वारा स्वर्ग आदि सद्गति को प्राप्त करना सुलभ हो वह यज्ञ है।

येन सदनुष्ठानेन सम्पूर्ण विश्वकल्याणं भवेत् तत् यज्ञपदाभिधेयम्।

जो आयोजन विश्व कल्याण करने वाला हो उसे यज्ञ कहते है।

येज सदनुष्ठानेन आध्यात्मिक आधिदैविक आधिभौतिक तापत्रयोनन्मूलनं सुकरं स्यात तत यज्ञ पदाभिधेयम्॥

जिस सदनुष्ठान द्वारा आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक तीनों प्रकार के कष्टों का निवारण हो वह यज्ञ कहा जाता है।

वेदमन्त्रर्देवतामुदिश्य द्रव्यस्य दानं यागः।

वेद मन्त्रों द्वारा देवोद्देश्य के लिये दान करना यज्ञ है।

देव पूजा

यजनं देवानाँ पूजनं सत्कार भावनं यज्ञः।

देवों का पूजा सत्कार भाव यज्ञ है ।

इज्यन्ते देवा अनेनेति यज्ञः।

जिस कार्य के द्वारा देवताओं का सम्मान किया जाय वह यज्ञ है।

इज्यन्ते देवा आस्मिन्निति यज्ञः।

जिससे देवों का पूजन किया जाय उसे यज्ञ कहते हैं।

इज्यन्ते सम्पूजिताः तृप्तिमासाद्यन्ते देवा अन्नेति यज्ञः। जिससे देवों को पूजित एवं तृप्त किया जाय वह यज्ञ है।

संगतिकरण

यजनं धर्म देश जाति मर्यादा रक्षायै महापुरुषाणमेकीकरणं यज्ञः।

श्रेष्ठ पुरुषों को धर्म, देश, जाति की मर्यादा की रक्षा के लिए संगठित एवं एकत्रित करना यज्ञ है।

इज्यनते संगतीक्रियन्ते विश्वा कल्याणाथ महात्तो विद्वाँसः वैदिक शिरोमणयः निमन्ञ्यन्ते आस्मिन्निति यज्ञः।

1. जहाँ विश्व कल्याण के लिए श्रेष्ठ, विद्वान, वेद पुरुषों को आमन्त्रित एकत्रित किया जाता है वह यज्ञ है।

इज्यन्ते स्वकीय बन्धुवान्धवादयः प्रेम सम्मान भाजः संगति करणाय आहूयन्ते प्रार्थ्यन्ते च येन कर्मणेति यज्ञः।

जिस आयोजन में बन्धु बान्धवों, स्नेह सम्बंधियों को पारस्परिक संगठन के लिए प्रेम एवं सम्मान के साथ एकत्रित किया जाता है वह यज्ञ है।

दान

यजनं यथा शक्ति देश काला पात्रादि विचार पुरस्सरं द्रव्यादि त्यागः।

देश काल पात्र का विचार करके सदुद्देश्य के लिए जो धन दिया जाता है उसे यज्ञ कहते हैं।

इज्यते देवतोद्देशन श्रद्धा पुरस्सरं द्रव्यादि त्यज्यते यस्मिन्निति यज्ञः।

देवों के निमित्त श्रद्धापूर्वक जिसमें दान किया जाता है उस कार्य को यज्ञ कहते हैं।

इज्यन्ते भगवति सर्वस्वं निधाप्यते येन वा से यज्ञः ।

भगवान को आत्म-समर्पण करने की क्रिया यज्ञ है।

इज्यन्ते सन्तोष्यन्ते याचका येन कर्मण स यज्ञः।

याचकों को सन्तुष्ट करना यज्ञ है।

यज शब्द के तीन अर्थ हैं (1) देव पूजा (2) संगतिकरण (3) दान । इन तीनों पर विविध दृष्टि-कोण से विचार करने से उनके जो अर्थ निकलते हैं, उनका निष्कर्ष यह हैं कि :-

संसार में जो दैवी और आसुरी दो शक्तियाँ काम कर रही हैं। उनमें देवत्व की, न्याय सतोगुण की, और धर्म पक्ष की पूजा, उपासना एवं सहायता की जाय, उसी में श्रद्धा रखी जाय और अपना प्रत्येक कदम उसी दिशा में अग्रसर किया जाय। असुरता को हटाने, उससे लड़ने और उसका विरोध करने के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। यदि मजबूरी के कारण बुराई की परिस्थिति में रहना भी पड़े तो भी उसको मानसिक रूप से कभी स्वीकार न करना चाहिये । वरन् कम से कम उससे मानसिक घृणा तो रखनी ही चाहिए और उस परिस्थिति से छुटकारा पाने के लिए प्रभु प्रार्थना तथा प्रयत्न भी करते रहना चाहिए। असुरता का पक्ष ग्रहण करना और उसी में तल्लीन हो जाना असुर पूजा है। यज्ञ में श्रद्धा रखने वालों को इससे बचना चाहिए।

(2) संसार में फूट, द्वेष, विलगाव, घृणा के भाव पहले से ही बहुत ज्यादा हैं, उनको बढ़ावा न देकर ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि एकता, मेल, प्रेम, संगठन, सहयोग तथा पारस्परिक आत्मीयता का वातावरण बढ़े। एक दूसरे के साथ उदारता तथा सेवा सहायता का व्यवहार करें। जाति-जाति में राष्ट्र-राष्ट्र में, प्राँत-प्राँत में, धर्म-धर्म में, वर्ग-वर्ग में जो विद्वेष, छीन झपट, आपा-धापी, फूट-फिसाद, चढ़ा-ऊपरी फैली हुई है उसे बढ़ाने का नहीं घटाने का प्रयत्न करना चाहिए और अनेकता को एकता में, मतभेद को समन्वय में परिवर्तित करना चाहिए। हिन्दू धर्म सहिष्णुता एवं अनेकता में एकता देखने का धर्म है, इसमें अनेकों संस्कृतियाँ, विचारधाराएँ, मान्यताएँ मौजूद हैं, कई तो परस्पर विरोधी भी हैं, इतने पर भी सब में एकता कायम है। अनेक दर्शन, अनेक वाद, अनेक सिद्धान्त और सहिष्णुता पूर्वक आपस में रह सकते हैं और लड़ने-झगड़ने की अपेक्षा प्रेमपूर्वक विचार विनिमय द्वारा, संगतीकरण द्वारा परम लक्ष्य तक पहुँच सकते हैं। इस संगतीकरण को दृष्टि में रखना यज्ञ का आवश्यक अंग है।

(3) परमात्मा ने जो कुछ हमें दिया है वह हमारे ही भोगने या सञ्चय करने के लिए नहीं है। कुएं, नदी, वृक्ष, गाय, घोड़ा आदि तक अपनी सम्पत्ति को दूसरों को देते हैं फिर हम मनुष्य होकर उनसे भी पीछे रहें, यह यज्ञ भावना के विपरीत है। हमारे पास जो कुछ बल, बुद्धि, विद्या, धन, वैभव, ऐश्वर्य, प्रभाव आदि हैं उसे अपने छोटों को ऊपर उठाने में और अपने से बड़ों को आगे बढ़ाने में लगाना चाहिए। अपनी निजी आवश्यकताएं कम से कम रखें, पूर्ण श्रम एवं लगन के साथ अपनी साँसारिक, मानसिक, शारीरिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों को बढ़ावें, पर उस बढ़ोतरी का उद्देश्य ‘सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर’ होना चाहिए। बेटे-पोतों को जायदादें खड़ी करके उन्हें हरामखोर बना जाने की अपेक्षा अपनी कमाई को संसार में सद्गुण, सद्विचार सद्भाव, सत्कर्म एवं सुख शान्ति बढ़ाने में लगाना चाहिए।

आज दान का दुरुपयोग खूब होता है अनधिकारी लोग दूसरों को उल्लू बना कर मुफ्त का माल उड़ाने में बहुत प्रवीण होते हैं, इनसे बचना उचित है, परन्तु अपनी शक्तियों को सत्कर्मों के लिए दिल खोल कर खर्च करने में भी कंजूसी न करना उचित है।

उपरोक्त तीनों भावनाओं- देव पूजा, संगतिकरण और दान को हृदयंगम करना- अपनाना- कार्य रूप में लाना ही यज्ञ का सन्देश, शिक्षण एवं वास्तविक अर्थ है।

यज्ञ द्वारा देवों का आवाह्न

देवों और मनुष्यों को परस्पर सम्बन्ध स्थापित कराके सुख शान्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाला अमोध साधन यज्ञ है। केवल मनुष्य का स्थूल प्रयत्न भी पर्याप्त नहीं और केवल देवताओं की सूक्ष्म शक्तियाँ भी सब कुछ कर सकने में समर्थ नहीं होती। कल्याण का आयोजन दोनों के सहयोग से ही होता है। गीता में इस रहस्य को स्पष्ट कर दिया गया है।

सहयज्ञा प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यष्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥ देवान भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।

परस्पर भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ। इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्वन्ते यज्ञ भाविताः॥

गीता 3।10-11

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में या सहित प्रजा को उत्पन्न करके उससे कहा इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को देने वाला हो।

तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं को बढ़ाओं, वे देवता लोग तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार आपस में कर्तव्य समझ कर कर उन्नति करते हुए परम कल्याण को प्राप्त होगे।

यज्ञ द्वारा बढ़ायें हुए देवता तुम्हारे लिए बिना माँगे ही अभीष्ट भोगों को प्रदान करेंगे।

यजुर्वेद अध्याय 22।23 में भगवान का आदेश है कि-

आयर्यज्ञेन कल्पताम् प्राणोयज्ञेन कल्पताम् चयोर्यज्ञेन कल्पताम् वाग्यज्ञेन कल्पताम् मनोयज्ञेन कल्पताम

आत्मा यज्ञेन कल्पताम् स्वाहा।

अपनी आयु, प्राण, इन्द्रियाँ, मन,आत्मा आदि सर्वस्व को यज्ञ के समर्पण करो।

इस मन्त्र में मनुष्यों को यह आदेश किया गया है कि वे अपना सर्वस्य यज्ञ के लिए लगा दें। यज्ञ के द्वारा देवों से सम्बन्ध स्थापित करने का पूरी तत्परता से प्रयत्न करने के लिए मनुष्यों की जैसी प्रेरणा देवों को भी दी गई है।

देवा यजमानश्च सीदत।

हे देवताओं। यजमान और तुम पास-पास बैठो और इकट्ठे यज्ञ करो।

मनुष्य का लाभ देवताओं से सम्बन्ध स्थापित करने, उन्हें सहयोग देने और बढ़ाने में ही है। क्योंकि इस प्रकार सन्तुष्ट और परिपुष्ट हुए देवता करते हैं। महर्षि अंगिरा का वचन हैं :-

यज्ञादिभिर्देवा शक्ति सुखादीनाम्।

-अंगिरा

यज्ञादि शुभ कर्मों से देवताओं को प्रसन्न करके मनुष्य शक्ति, सुख आदि सम्पदाएँ प्राप्त करता है।

अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वह देव कौन हैं? कहाँ रहते हैं ? इनसे हमारा क्या सम्बन्ध है? और यज्ञ द्वारा यह क्यों सन्तुष्ट होते हैं? यज्ञ द्वारा उनका पोषण किस प्रकार होता है? और उनमें कौन सी सामर्थ्य है जिसके द्वारा संसार को वे लाभ पहुँचा सकें? बिना यज्ञ के संसार को लाभ पहुँचाने में उन्हें क्या अड़चन होती है? इन सब प्रश्नों पर विचार करना आवश्यक है ताकि उपरोक्त अभिवचनों का तात्पर्य ठीक प्रकार समझ में आ जावे।

देव शब्द का स्थूल अर्थ

देने वाला- सत्पुरुष ज्ञानी, विद्वान आदि श्रेष्ठ व्यक्ति है। ऐसे पुरुषों को सहयोग देना, उनकी शक्तियों एवं कर्म पद्धतियों को आगे बढ़ाने के लिए निस्वार्थ भाव से सहायता करना यज्ञ है। ऐसे लोगों का भाव बढ़ाकर, उनके पक्ष में वातावरण तैयार करके तथा अन्य मार्गों से उनके उद्देश्यों को सफल बनाने में सहयोग देकर उनकी पूजा की जाती है। उपासना का अर्थ समीपता भी है। सत्संग द्वारा उनके विचारों एवं कार्यों से समीपता स्थापित करके, लाभ उठाना भी देव पूजा है यदि हमारे मन में सत्पुरुषों के प्रति या उनके कर्मों के प्रति श्रद्धा न हो, उनका सहयोग या अनुकरण न करें, अनुशासन न मानें तो वे इच्छा करते हुए भी हमारी कोई सेवा नहीं कर सकते, हमें कोई लाभ नहीं पहुँचा सकते। इसलिए दोनों पक्षों में पारस्परिक स्नेह सम्बन्ध सहयोग एवं सद्भावना होना आवश्यक है। इस एकता का स्थापित करना ही यज्ञ है जहाँ सदुद्देश्य के लिए सच्चे मन से दो व्यक्ति मिलते हैं वहाँ एक और एक मिलकर दो होने का नहीं वरन् एक + एक = ग्यारह (11) होने का सिद्धान्त लागू होता है। उनकी सम्मिलित शक्ति दूनी नहीं, ग्यारह गुनी हो जाती है। इस बढ़ी हुई शक्ति से दोनों ही पक्षों को अपरिमित लाभ होता है। यहाँ स्थूल यज्ञ की साँसारिक देव पूजा हुई ।

दूसरे देवता वे हैं जो अदृश्य हैं, देवलोक या स्वर्ग आदि लोकों में रहते हैं। यह देवता ईश्वर की विविध प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ हैं। वैसे तो ईश्वर एक ही है, उसके शासन में और कोई साझीदार नहीं हैं। देवताओं को अनेक ईश्वर मानना मूर्खता है। ईश्वर, की विभिन्न शक्तियाँ अलग-अलग हैं, उनके गुण और कार्य भिन्न-भिन्न हैं इन्हें देव कहते हैं। इसी प्रकार प्रकृति के अन्तराल में काम करने वाली सृष्टि में रचना, विकास, पोषण और संहार करने वाली अनेक शक्तियाँ हैं यह भी देव कहलाती हैं। अनेकों ग्रहों और सौर मण्डलों से जो प्रभाव किरणें हम तक आती हैं उन्हें भी देव कहते हैं। सूर्य की किरणें में जो सप्त रंग की एवं विविध गुणों वाली अल्ट्रावायलेट, अल्फावायलेट, एक्सरेज आदि धाराएँ काम करती हैं यह भी देव हैं।

ग्रन्थों में 33 कोटि देवताओं का वर्णन हैं। 33 प्रकार के देवताओं का परिचय इस प्रकार है- बसु 8, रुद्र 11, आदित्य 12, अश्विनी कुमार 1, पूषा 1, यह देव शक्तियों इस विश्व के वातावरण में नाना प्रकार के परिवर्तन, उपद्रव, उत्कर्ष उत्पन्न करती रहती हैं।

देवता 33 प्रकार के, पितर 8 प्रकार के, असुर 99 प्रकार के, गंधर्व 27 प्रकार के पवन 46 प्रकार के, बताये गये हैं। यह आश्चर्य कौतूहल एवं अविश्वास की बात नहीं हैं। यह भारतीय सूक्ष्म विज्ञान की चिरकालीन प्रयत्न एवं अन्वेषण के साथ की हुई खोज है। किसी समय इन शक्तियाँ की भारतीयों को भली प्रकार जानकारी थी और वे उनसे लाभ उठाकर समस्त प्रकृति के स्वामी बने हुए थे। कहा जाता है कि रावण के यहाँ देवता कैद रहते थे, उसने देवों को जीत लिया था या अपने वश में कर लिया था, वस्तुतः उसने इन अदृश्य शक्तियों की खोज करके उनका उपयोग, नियन्त्रण, संचालन, आवाहन और विसर्जन भली प्रकार जान लिया था। इसे ही अलंकारी रूप से देवताओं को कैद करना कहते हैं।

पाश्चात्य विज्ञान वेत्ता धीरे-धीरे प्रकृति की रुद्र शक्तियों का पता लगाते जा रहे हैं। संकाशी (ईथर) तड़ित (बिजली) गृध्रा (टेली विजन) शरभा (वाध्य) व्याता (अणु शक्ति) कोटय (गैस) बलाका (विस्फोटक) आदि थोड़ी सी शक्तियों के कुछ अंशों को जान पाया है। और इन्हीं के आधार पर अनेक यन्त्र बनाये हैं। यह रुद्र सेना है। शिवजी की बारात में जिन भूत-पिशाच आदि का व्यंगात्मक वर्णन पुराणों में आया है वह यही तीन शक्तियाँ हैं। इनकी गणना भी एक प्रकार से ही कोटि के देवों में ही होता हैं यह श्रेणी बाल क्रीड़ा जैसे कौतूहल की है। इनसे संसार का लाभ कम और हानि अधिक होती है इसलिये शिवजी की बारात जहाँ चित्रित की जाती है वहाँ उनकी सेना को “तनु छीन कोउ अति पीन, पावन कोई अपावन तनु धरे” दिखाया जाता है। यह उस सेना की तुच्छता का उपहास है। विष्णु, इन्द्र आदि प्रधान शक्ति पुण्य से जो शक्तियाँ संबंधित हैं उनकी सूक्ष्मता, सुन्दरता, महत्ता और उपयोगिता इस रुद्र सेना की अपेक्षा कहीं उच्च कोटि की है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने रुद्र सेना की शक्तियों का उपयोग खर्चीली मशीनों तथा खर्चीले ईंधनों से ही करना माना है और देव विद्या के भारतीय वेत्ता इन सब कार्यों को बिना मशीनों के बिना पैट्रोल आदि खर्च किये करना जानते थे। महाभारत युद्ध में तथा लंका युद्ध में ऐसे अनेक दिव्य अस्त्र शस्त्रों की चर्चा है। उनका उपयोग मन्त्र बल से ही होता था।

पूर्वकाल में अन्य लोकों तथा ग्रह नक्षत्रों तक मनुष्यों का आना-जाना होता था। शरीर को अणु के समान छोटा या अदृश्य बना लेना, आकाश में अत्यन्त विशाल रूप में फल जाना, जल पर चलना, आकाश में उड़ना आदि अष्ट सिद्ध, नवनिद्ध अनेक सिद्ध पुरुषों को करतलगत होती थीं। यह सब कार्य सूक्ष्म प्रकृति की उन शक्तियों द्वारा उत्पन्न होते थे जिन्हें देव नाम से पुकारते हैं। प्रत्येक सूक्ष्म शक्ति को अध्यात्म विज्ञान के अनुसार एक देव माना गया है। पञ्च तत्व देव-जल को वरुण देव, गर्मी को अग्नि, पवन को वायु देव, धरती को गौरी, आकाश को इन्द्र देव माना गया है। इसी प्रकार सृष्टि के अन्तराल में जो अनेकों शक्तियाँ काम कर रही हैं उनको भी देव संज्ञा दी गई है।

अदृश्य शक्तियों के दो भाग है- एक चेतना दूसरा क्रिया। क्रिया प्रकृति से सम्बन्धित है, चेतना ब्रह्म का अंश हैं। जैसे सूर्य का स्थूल रूप अग्नि पिण्ड मात्र है, भौतिक विज्ञानी सूर्य को केवल अग्नि का गोला या भ्रमण शील एक ग्रह मात्र समझते हैं पर अध्यात्म विज्ञान के अनुसार इस स्थूल रूप के अतिरिक्त सूर्य में एक चैतन्य प्राण भी है जो ब्रह्म भी है ब्रह्म से प्रेरणा प्राप्त करता है, ब्रह्म रूप है। इसी प्रकार, जल, वायु, अग्नि आदि देवों के जो स्थूल रूप हैं उनके अतिरिक्त उनमें एक चैतन्य आत्मा भी है जो ब्रह्म से सम्बन्धित है। जैसे मनुष्य का शरीर भीतर की प्राण चेतना के अनुसार कार्य करता है वैसे ही इन देवों की अन्तः चेतना ही उनकी दृश्य क्रिया का संचालन करती हैं। उस देव आत्मा से जब सम्बन्ध स्थापित हो जाता है तो उसके अनुसार इन जलवायु आदि के चलाने और रोकने का कार्य होने लगता है। इन्द्र की चैतन्य सत्ता को उपासना द्वारा प्रसन्न कर लिया जाय तो मनुष्य मनचाही वर्षा कराने में सफल हो सकता है। गंगा की देव आत्मा को प्रसन्न करके भागीरथ पृथ्वी पर गंगा नदी को लाये और उसी जल धारा को इच्छित मार्ग से समुद्र जल ले गये। पूर्व काल में इसी प्रकार अन्य देवों को लोगों ने प्रसन्न किया है और अभीष्ट लाभ प्राप्त किये है।

गणेश, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, ब्रह्मा, भैरव योगिनी, आदि देवता भी इसी प्रकार के हैं। यह शक्तियाँ मनुष्य पर अनेकों प्रभाव डालती हैं। जब इन देवों की स्थिति और मनुष्य की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति एक ही केन्द्र पर केन्द्रित होती है तो दोनों में पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है। इसे ही देवता को प्रसन्न करना या सिद्ध करना कहते है दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि किन्हीं साधना विशेष द्वारा अपने शरीर की धातुओं, चक्रों-उपकरणों, ग्रंथियों को तथा ब्रह्मरंध्र के मस्तिष्कीय चुम्बक केन्द्र को ऐसा ढाल दें कि वे आकाश में फली हुई अभीष्ट देव शक्ति को अपनी ओर खींच सके तो उस साधन को देवोपासना कहेंगे। ऐसी देवोपासना जब सफल हो जाती है तो अभीष्ट सत्परिणामों से उपासक को तृप्त कर देती है। पश्चिमीय देशों के भौतिक विज्ञानी मशीन बनाने में संलग्न होकर रुद्र की बारात को को प्रसन्न कर रहे हैं, हमारे पूर्वज आत्म साधना, तपश्चर्या, मन्त्र, भोगाभ्यास, यज्ञ आदि क्रियाओं से देव तत्वों की सूक्ष्म आत्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित करके उनकी महान् शक्तियों का भरपूर लाभ उठाते रहे थे।

देव शक्तियों का परिचय, उनके सान्निध्य से प्राप्त होने वाले लाभ, उनकी आकृति एवं वाहनों का रहस्य उनकी उपासनाओं की विधियों का अन्तर, साधना मार्ग की कठिनाई, सफलता के रहस्य आदि का बहुत विस्तृत विज्ञान है। इस यज्ञ सम्बन्धी पुस्तक मे


यज्ञ द्वारा अमृतमयी वर्षा

यज्ञ से वर्षा का घनिष्ठ सम्बंध है। कहते हैं कि यज्ञ से इन्द्रदेव प्रसन्न होते हैं और वर्षा की कमी नहीं रहने देते। पूर्व काल में जब इस पुण्य भूमि में पर्याप्त यज्ञ होते थे तो खूब वर्षा होती थी और अन्न, वनस्पति, पशु, दूध आदि से यह देश सदा भरा पूरा रहता था। वर्षा का जल कृषि के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं क्योंकि उसमें आकाशस्थ अनेक खाद्य सम्मिश्रित हो जाते हैं जिससे अन्न वनस्पति बढ़ते भी खूब हैं और उनमें पौष्टिक तत्व भी अधिक होते हैं। नहर आदि के पानी से सींचने पर पौधों की उतनी वृद्धि नहीं होती, जितनी कि वर्षा के जल से होती है। इस प्रकार जो विटामिन, क्षार एवं पौष्टिक तत्व वर्षा से सींचे हुए पेड़ के फल बीजों में होता है वह अन्य प्रकार की सिंचाई से नहीं होता। वर्षा का जल स्वच्छता की दृष्टि से बहुत उच्चकोटि का होने के कारण स्वास्थ्य के लिए भी लाभप्रद होता है। वर्षा की नमी हवा में रहने से पशु-पक्षी आदि भी प्रसन्न एवं परिपुष्ट होते हैं। इसी नम हवा से रज वीर्यों में प्रजनन शक्ति बढ़ती है कुत्ते आदि अनेक पशु वर्षा के उपरान्त ही गर्भ धारण करते हैं। वर्षा की उपयोगिता अनेक दृष्टियों से है।

वर्षा को देवाधीन समझा जाता है। क्योंकि मनुष्य की इच्छा एवं क्रिया द्वारा उसको चाहे जब नहीं बरसाया जा सकता। वर्षा की इस अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए ऋषियों ने प्रयत्न और अन्ततः यज्ञ द्वारा अभीष्ट वर्ग करने में सफलता प्राप्त की। यज्ञ द्वारा वर्षा करना और रोकना उनके लिए सरल था। अपनी इसी सफलता का उद्घोष करते हुए उन्होंने यज्ञ कि महत्ता गाई और कहा :-

अन्नेनभूता जीवन्ति, यज्ञं सर्वं प्रतिष्ठितम्।

पर्जन्यो जायते यज्ञात सर्व यज्ञमयं ततः॥

कालिका पुराण 32। 8

अन्न से ही प्राणी जीते हैं। वह अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है और वर्षा यज्ञ द्वारा होती है। यह सम्पूर्ण विश्व यज्ञमय ही है।

यज्ञेनाऽऽप्याग्यिता देवा बुष्टयु त्सर्गेण मानवाः । आप्यायनं वै कुर्वन्ति यज्ञाः कल्याणं हेतवः।

-पद्मपुराण सृष्टि खण्ड।124

यज्ञ से देवता परिपुष्ट होते हैं। यज्ञ से वर्षा होती है और मनुष्यों का पालन होता है। यज्ञ ही कल्याण का हेतु है।

यज्ञैराप्यायिता देवा वृष्टयुत्सर्गेण वै प्रजाः।

आप्यायन्ते तु धर्मज्ञ यज्ञाः कल्याण हेतवः॥

विष्णु पुराण 6 । 1। 8

यज्ञ से देवताओं का अभिवर्धन होता है। यज्ञ वर्षा होने से प्रजा का पालन होता है। हे धर्मज्ञ यज्ञ ही कल्याण के हेतु हैं।

अन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ कर्म समुद्भवः॥

गीता 3।14

समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वर्षा से होती है, वर्षा यज्ञ से होती है और वह यज्ञ कर्म से होता है।

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्य भुपतिष्ठते।

आदित्या ज्जायते वृष्टिवृष्टेरन्नं ततः प्रजाः।

मनु 3 । 76

अग्नि में विधि विधान पूर्वक दी हुई आहुति सूर्य को प्राप्त होती है, उससे वर्षा होती है। वर्षा से अन्न होता है और अन्न से प्राणी की उत्पत्ति होती है।

उपरोक्त मंत्र में बताया गया है कि अग्नि में डाली हुई आहुति प्राणियों को प्राप्त होती है और वह वर्षा तथा अन्नोत्पत्ति का कारण बनती है। विज्ञान से सिद्ध है कि अग्नि जलने से कार्बन डाइऑक्साइड गैस बनती है। इस गैस का पृथ्वी पर एक पर्त फैला रहता है। जिसका काम यह है कि सूर्य की किरणों की गर्मी को पृथ्वी पर रोके रखे। यदि यह पर्त पतला होगा तो गर्मी ठहरेगी नहीं और भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जायगी। रेगिस्तान में यह पर्त पतला होता है फलस्वरूप दिन में कितनी ही धूप पड़े रात को वहाँ की जमीन तथा वायु ठण्डी होती है। ऐसी स्थिति में वहाँ कृषि एवं वृक्ष, वनस्पति नहीं उगते, वर्षा करने वाले बादलों को पकड़ने में भी उस प्रदेश का वायुमण्डल असमर्थ रहता है इसलिए वहाँ वर्षा की सदा कमी रहती है। जिन प्रदेशों में कार्बन डाइऑक्साइड गैस की पर्त पृथ्वी की सतह पर मोटी होती है वहाँ सूर्य की किरणों द्वारा पृथ्वी पर आने वाली उर्वरा शक्ति एवं गर्मी सुरक्षित एवं सुग्रहीत रहती है और उस भूमि में वृक्ष, वनस्पति खूब होते हैं।

काँच में यह गुण है कि सूर्य की किरणों की गर्मी को अपने में से भीतर आने देता है। पर उल्टी वापिस नहीं निकलने देता। जिन कमरों में काँच के रोशनदान लगे होते हैं वहाँ थोड़ी सी धूप जाकर भी कमरे में अपना पूरा प्रभाव कर सकती है। किन्हीं-किन्हीं नर्सरियों में ऐसे पौधे होते हैं, जिनको अधिक गर्मी चाहिए, उनके लिए काँच के ढक्कन घर बना दिये जाते हैं। जिनमें होकर धूप भीतर तो घुस जाय पर बाहर न निकले। फलस्वरूप उन पौधों को पर्याप्त गर्मी प्राप्त होती रहती है और वे उष्ण प्रदेश में ही जीवित रहने वाले पौधे शीत प्रदेशों में भी जीवित रहते हैं। सूर्य की किरण की गर्मी को भीतर घुस जाने देना पर बाहर न निकले देने तक जो कार्य काँच करता है वही कार्य पृथ्वी पर फैला हुआ कार्बन डाइऑक्साइड गैस की पर्त भी करती है। यह पर्त जितनी ही मोटी और मजबूत होगी, पृथ्वी को सूर्य की बहुमूल्य उर्वरा शक्ति को अपने में धारण करने और सुरक्षित रखने में सुविधा होगी।

ज्वालामुखी पहाड़ों से यह कार्बन गैस निकलती है। उस प्रदेश में उसका एक मोटा पर्त जमीन पर फैल जाता है। फलस्वरूप ज्वालामुखी पर्वतों के आस-पास वृक्ष वनस्पतियों का बाहुल्य रहता है और वहाँ वर्षा भी अधिक होती है। फ्राँस में यूबरीन नामक एक चश्मा है जिसमें से प्रायः कार्बन निकलती रहती है। इस चश्मे के आस-पास का क्षेत्र सदा हरियाली से हरा भरा रहता है। इसलिए यह यज्ञ से उत्पन्न कार्बन पृथ्वी को उर्वरा बनाती है और अन्न, फल तथा वनस्पतियों से हमें भरा पूरा रखती है।

यह सोचना ठीक नहीं कि अग्नि जलाने से ऑक्सीजन वायु खर्च होती है और कार्बन उत्पन्न होती है इसलिए हवन स्वास्थ्य के लिए अहितकर होगा। हवन में ऑक्सीजन खर्च ही कितनी होती है। उससे कहीं ज्यादा जो कल कारखानों, रेल, मोटर आदि में हो जाती है। फिर यदि थोड़ी ऑक्सीजन जले और कार्बन बने भी तो उसकी पूर्ति उन वृक्षों, वनस्पतियों से हो जाती है, जो हवन द्वारा उत्पन्न होती है। वृक्ष पौधों से दिन भर स्वच्छ प्राण प्रद वायु निकलती रहती है। हवन की कार्बन का हानिकारक तत्व नष्ट करने के लिए तो पहले से ही कलश आदि की स्थापना कर ली जाती है।

‘वैज्ञानिक लोग बादलों से बर्फ का चूरा हवाई जहाजों से छिड़क कर उड़ते हुए बादलों को भारी करते हैं और उससे वर्षा कराने का प्रयत्न करते हैं। कृत्रिम वर्षा का यह प्रयोग अभी सफल नहीं हो सका है। पर यज्ञ द्वारा वर्षा कराने के प्रयोग बहुधा सफल होते हैं।

बादल जब पोले होते हैं। तो हवा उनमें भीतर भर जाती है और उन्हें इधर से उधर उड़ा ले जाती हैं। यदि यह बादल अपेक्षाकृत सघन हो जाते हैं या कोई ऐसा कारण बन जाता है कि वायु उनके भीतर न घुस पावे तो यही बादल भारी होकर बरसने लगते हैं। हवन द्वारा यह आवश्यकता इस प्रकार पूरी होती है कि होमा हुआ घी सूक्ष्म बनकर वायु द्वारा बादलों तक पहुँचता है और उसकी चिकनाई की एक पर्त बादलों के ऊपर चढ़ जाता है। जो वायु को उनके भीतर जाने से रोकता है फलस्वरूप बादल भारी होकर बरसने लगते हैं।

पानी में चिकनाई डाली जाय तो वह उसके भीतर नहीं ठहरती वरन् ऊपर आकर पर्त की तरह फैल जाती है। यह हवन का धुँआ बादलों के ऊपर एक चिकनाई की पर्त चढ़ा देता है हवा चिकनाई को पार नहीं कर पाती। देखा जाता है, कि जाड़े के दिनों में बहुत से लोग चेहरे पर वैसलीन, मक्खन आदि मल लेते हैं जिससे ठण्डी वायु त्वचा तक नहीं पहुँचती और चेहरे की चमड़ी फटने की दिक्कत नहीं होती। जिस प्रकार वैसलीन चेहरे की त्वचा तक हवा पहुँचाने से रोकती है वैसे ही बादलों के ऊपर फैली हुआ हवन के धुँए की पर्त ऐसे ढाल का काम करती है जो हवा के बादलों के भीतर घुस कर उन्हें उड़ा देने से रोकती है। यह रोक ही वर्षा का कारण बन जाती है।

एक कटोरी में पानी, एक में घी भर कर आग पर गम किया जाय तो पानी में बुलबुले उठने लगेंगे घी यद्यपि जलेगा तो अवश्य, पर उसमें बुलबुले न उठेंगे। बुलबुले उठने का कारण यह हैं कि पानी के गर्म होने पर हवा उसके भीतर प्रवेश करती है, इसके विपरीत घी को भेद कर हवा कटोरी के पेंदे में नहीं पहुँच पाती और बुलबुले नहीं उठते। यह इस बात का प्रमाण है कि चिकनाई को पार करके हवा भीतर नहीं जाती। हवन द्वारा बादलों के ऊपर चिकनाई का आवरण चढ़ा कर उन्हें हवा द्वारा इधर-उधर उड़ा दिये जाने से रोकता है और वर्षा होने लगती है। चिकनाई ठण्ड पाकर जमती है और अपने साथ पानी का भी जमा देती है। जाड़े के दिनों में जब घी जमता है तो उसका जलाँश भी जम जाता है। हवन का घी बादलों को घना करता है, जमाता है और उन्हें बरसने के लिए विवश करता है।

वर्षा कराने और रोकने में अतिवृष्टि और अनावृष्टि रोकने में यज्ञों की सामर्थ्य अद्भुत है।

“निकामे निकामें पर्जन्यो वर्षतु॥”

इच्छानुसार वर्षा कराना, वर्षा पर मानुषी आधिपत्य कराना यज्ञ भगवान के हाथ में है। केवल जल वर्षा ही नहीं, यज्ञ से उस प्राण की वर्षा भी होती है, जो समस्त प्राणियों को स्वस्थ, सजीव और चिरस्थाई बनाता है। उस प्राण से ही यह पृथ्वी स्थिर है अमृत प्राण जो यज्ञ का प्रधान उपहार है इस धरती माता को हरी भरी बनाये हुए है। इसी से कहा गया है-

“यज्ञाः पृथिवीं धारयन्ति”

-अथर्व

“यज्ञ ही इस पृथ्वी को धारण किये हुए है।”


आध्यात्मिक यज्ञ

अथर्व वेद 7 ।103 । 1 में कहा गया है-

को यज्ञ कामः? क उ पर्ति कामः?

अर्थात्- यज्ञ की चिंता करने वाला कौन है? उस यज्ञ को पूरा करने की फिक्र किसे है?

वेद भगवान की यह चिंता स्वाभाविक है। मनुष्यों से वेद पूछता है- मनुष्यों, क्या तुममें कोई ऐसा है जो यज्ञ की कामना करे? यज्ञ की फिक्र रखे? यह चिंता अकारण नहीं है। कहीं कोई विरले ही मनुष्य ऐसे होते हैं जो सच्चे यज्ञ की चिंता करते हैं ।

साधारण अग्नि होत्र तो प्रायः होते ही रहते हैं, बड़े यज्ञों का भी लोप नहीं हुआ है, वे भी यदा-कदा कराये ही जाते हैं। फिर यह पूछना कि- हे मनुष्यों! क्या तुममें कोई ऐसा है जो यज्ञ की चिंता करता हो? उसे पूरा करने की चिंता करता हो? अवश्य ही रहस्यमय होना चाहिए। यहाँ साधारण अग्निहोत्र से वेद भगवान का अभिप्राय नहीं है। वे उस वास्तविक यज्ञ की ओर संकेत करते हैं जिसका यह अग्निहोत्र स्थूल रूप है।

हवन में विश्व कल्याण के लिए, देवों को प्रसन्न करने के लिए बहुमूल्य सामग्री होमी जाती है और कहा जाता है ‘इदं न मम्’ यह मेरा नहीं है। अपनी उत्तम से उत्तम वस्तुओं को, शक्तियों को, समय को, विश्व कल्याण के लिए लोक सेवा में लगा देना, भगवान की दी हुई वस्तुओं को विराट्-पुरुष, विश्व मानव के चरणों में अर्पित करते समय किसी प्रकार के अहसान का अहंकार का भाव न लाना ही यज्ञ है। ‘इदं न मम्’ यह मेरा नहीं है, मेरा तो इस संसार में कुछ भी नहीं है, जो कुछ है सब प्रभु का है। फिर प्रभु की वस्तु प्रभु के चरणों में अर्पण करते हुए लोभ एवं संकोच करने की भी क्या जरूरत? अभिमान और अहसान भी किस बात का? प्रभु ने जो शक्तियाँ हमें दी हैं वे इन्द्रिय भोगों के लिए नहीं है। जोड़-जोड़ कर जमा करना यह तो अमानत में खयानत है। परमात्मा ने बिना मूल्य बिना कोई बदला लिए हमें अनेक वस्तुएँ, शक्तियाँ, सुविधाएं, और साधन सामग्रियाँ इसलिए दी हैं कि हम भी उनका उपयोग उसके लिए उसी प्रकार करें। परमात्मा हमें देता है और हम परमात्मा को उसके विराट् रूप विश्व मानव को, समाज को सौंप दें यह आदान-प्रदान, परस्पर विनियम आनन्दप्रद एवं सद्भावों की वृद्धि करने वाला है। इसी प्रक्रिया का नाम यज्ञ है। यदि प्रभु की दी हुई वस्तुओं को अपनी संकुचित स्वार्थ पूर्ति के लिए ही सीमित रखें तो यह ईश्वर की इच्छा और व्यवस्था के प्रतिकूल आचरण है, परमात्मा चाहता है कि ऐसा न हो। मैं प्रजा के लिए योग करता हूँ प्रजा मेरे लिए त्याग करें। जिस प्रकार निस्वार्थ दान का आचरण मैं निरन्तर करता हूँ वैसा ही आचरण लोग भी करें और मेरे सच्चे अनुयायी बनें। शतपथ ब्राह्मण में यज्ञ के इस मूलभूत उद्देश्य को स्पष्ट कर दिया है-

प्रजापतिर्वाऽएत दगो कर्मा करोत्तत्तत देवा अकुर्वन्।

शत. 6।2।3।11

प्रजापति परमात्मा ने आरम्भ में जिस प्रकार महान यज्ञ किया, उसी प्रकार का यज्ञ हम भी करते हैं।

सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा ने अनेक प्रकार की वस्तुएँ रचीं। वह अपने-अपने लाभ के लिए नहीं वरन् सुख सुविधा के लिए बनाई। उसका निर्माण कार्य केवल परमार्थ मय था। मनुष्य के जीवन आरम्भ को भी सृष्टि माना जाय तो भी परमात्मा गर्भस्थ बालक के लिए, नवजात शिशु के लिए जो-जो सुविधाएँ तथा सुख सामग्रियाँ बनाकर तैयार कर देता है उसे देखकर उसकी परमार्थ प्रियता का, यज्ञ भावना का सहज ही पता चल जाता है। इसी का अनुकरण हमें करना है। अपनी साँसारिक और आन्तरिक सामर्थ्यों को परमात्मा के निमित्त ही अर्पित करना है। हमारी भावना यही होनी चाहिए-

मेरा मुझको कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर। तेरा तुझको सोंपते क्या लागत है मोर॥

इस यज्ञ भावना का संसार से लोप सा होता देखकर वेद भगवान को चिंता हुई। परमात्मा ने यज्ञ किया- मनुष्य को सब कुछ दिया उसकी इच्छा थी कि यह लोग भी इस यज्ञ प्रक्रिया को जारी रखें। यह मुझे दें- मैं फिर इन्हें दूँ। इस प्रकार दान का अलौकिक सुख इन जीवों को मिलता रहे।

‘देहि में ददामिते।’

-यजु. 3 । 50

तुम मुझे दो- मैं तुमको दूँगा।

आज सर्वत्र यह क्रम टूटता दिखाई पड़ता है। लोग परमात्मा की दी हुई वस्तुओं को ले तो खुशी से लेते हैं, जो प्राप्त नहीं है, उसके लिए झगड़ते हैं, प्रार्थना करते हैं और यदि उनकी मनोवांछित अभिलाषा से कम मिलता है तो परमात्मा पर क्रोध भी करते हैं और उसे गालियाँ देने में भी नहीं चूकते। अपने स्वार्थ की तो उन्हें खूब फिक्र रहती है। पर इस बात की चिंता नहीं रहती कि परमात्मा ने जो कुछ हमें दिया था, यज्ञ भावना से, त्याग और परमार्थ की भावना से दिया था, और इसलिए दिया था कि इन वस्तुओं एवं शक्तियों का उपयोग हम भी वैसा ही करें और आरम्भ किये हुए यज्ञ को जारी रखें। इसके विपरीत सब लोग अपनी-अपनी ही आपापूती में लगे हैं। परमात्मा भी हमें खूब दें, संसार के अन्य समस्त जीव भी हमें सब कुछ दें, पर हम किसी को कुछ न दें। सबके दिये हुए को अपने पास समेट कर रखें, खुद ही उसका उपभोग करें। यह व्यापक रूप से छाई हुई स्वार्थपरता परमात्मा के यज्ञ उद्देश्य के प्रतिकूल है। हवन आदि भी लोग करते हैं पर उनमें भी स्वार्थ ही प्रधान होता है। अपने जीवन को, अपनी विचारधारा को, अपने लक्ष्य एवं कार्यक्रम को यज्ञमय बना लेने की सच्ची इच्छा आज किस में है? इसी अभाव से दुखी होकर वेद भगवान ने पूछा है ‘को यज्ञ कामः? क उ पूर्ति काम?’ यज्ञ की चिंता करने वाला कौन है? उसे पूरा करने की फिक्र रखने वाला कौन है? परमात्मा से जो अनन्त ऋण प्राप्त हो रहा है उसका प्रत्युपकार करने या उस भावना का प्रवाह संसार में जारी रखने वाली कार्य प्रणाली अपनाने की इच्छा की कमी देखकर ही परमात्मा पूछता है कि- कृतघ्नियों! मेरी सृष्टि रचना के महान उद्देश्य को नष्ट क्यों कर रहे हो? स्वार्थपरता से ऊँचे उठकर परमार्थमयी यज्ञ भावना को क्यों नहीं अपनाते? विश्व हित लोक सेवा और प्रभु पूजा की चिन्ता क्यों नहीं करते?

अग्निहोत्र के स्थूल लाभ पिछले पृष्ठों पर बताये जा चुके हैं, पर उनका वास्तविक स्वरूप है- स्वार्थपरता का त्याग और त्याग संयम, सेवा, सदाचार, परोपकार, उदारता, सहृदयता, आत्म निर्माण आदि सद्भावनाओं को चरितार्थ करना। इसी वास्तविक यज्ञ का बाहरी प्रदर्शन एवं स्थूल रूप हवन है। हवन को आध्यात्मिक यज्ञ का नाटक भी कह सकते हैं। जैसे नाटक देखकर उस नाटक में दिखाई हुई भावना जागृत होती है। उसी प्रकार अग्निहोत्र को देखकर हम आत्माहुति देने, आत्मत्याग एवं अपनेपन-स्वार्थपरता को छोड़ना सीखते हैं। हवन से यही प्रवृत्ति सर्वत्र नाचती दीखती है।

हवन कराने वाले पण्डितों और विद्वानों की कमी नहीं। दक्षिणा हो तो वे आसानी से कहीं भी उपलब्ध हो सकते हैं, पर ऐसे आचार्यों की आज भारी कमी है जो स्वयं मन से अपने आचरण से ऐसा ही यज्ञ करें और यजमान को भी ऐसा ही आत्म त्याग का हवन करना सिखावें। यह भी इस संसार में एक बड़ा भारी अभाव है। इस अभाव को पूरा करने के लिए प्रार्थना की गई है-

य इमं यज्ञं मनसा चिकेत प्रणोवोच स्तमि हेहे व्रवः।

-अथर्व

हे प्रभो, ऐसा गुरु भेजो, जो हमें मन से यज्ञ करना सिखावे।

जब तक मन से यज्ञ करना न आवे तब तक हवन मात्र से यज्ञ का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। यज्ञ का वास्तविक उद्देश्य अपने आपको परमात्मा के चरणों में सौंप देना है। मन बुद्धि, चित्त, अहंकार का अन्तःकरण चतुष्टय, दसों इन्द्रियाँ, दसों प्राण आदि आन्तरिक सम्पदाओं को भी जब जीव-परमात्मा को सौंपता है, इनका आहुति, भगवान में लगा देने का होम करता है तभी सच्चा यज्ञोद्देश्य प्राप्त होता है। इस यज्ञ की चर्चा उपनिषदों में इस प्रकार है।

च्च्तस्यैवं विदुषो यज्ञस्यात्माः यजमानः श्रद्धा पत्नीः उरो वेदी वेद शिखा वाग्होता, प्राण उदगाता, चक्षुरर्ध्वयः मनो ब्रह्मा, श्रोते मग्नीत यन्यु रवं तदाहिवनीयः उदगाता।”

इस आध्यात्मिक यज्ञ में आत्मा यजमान श्रद्धा यजमान की पत्नी, हृदय वेदी, वेद शिखा, वाणी होता, प्राण उद्गाता, चक्षु अध्वर्यु, मन ब्रह्मा, कान आग्नीध्र मुख आह्वानीय अग्नि है।

इसी प्रकार का वर्णन और भी है-

वाग्वै यज्ञस्य होता।

चक्षुर्वै यज्ञस्यार्ध्वयुः।

प्राणों वै यज्ञस्योद्गाता।

मनो वे यज्ञस्य ब्रह्मा।

वृहदारण्यक 3 । 1। 3।-9

वाणी यज्ञ की होता, चक्षु यज्ञ का अध्वर्यु, प्राण यज्ञ का उद्गाता और मन यज्ञ का ब्रह्मा है।

यज्ञ पुरुष परमात्मा ही है। उसके चरणों में अपने को समिधा की भाँति समर्पित कर देने से अपना स्वरूप भी वैसे ही यज्ञमय हो जाता है जैसे हवन की अग्नि में पड़ी हुई समिधा तथा सामग्री अग्नि रूप हो जाती है। परमात्मा की आज्ञाएं, प्रेरणाएं तथा सतोगुणी प्रवृत्तियाँ अपने अन्तःकरण में धारण करना, अभ्यास, वैराग्य, स्वाध्याय, भक्ति आदि साधनों में ईश्वरीय प्रकाश को अपनी अन्तः भूमिका में अधिकाधिक धारणा करना भी यज्ञ है। सर्वव्यापक परमात्मा को सब में समाया हुआ देख कर गुप्त से गुप्त दुष्कर्मों से बचना चाहिए। कोतवाल को सामने खड़ा देखकर चोर जिस प्रकार ठीक उसके सामने ही चोरी करने का साहस नहीं करता, उसी प्रकार परमात्मा को सर्वव्यापक समझने वाला व्यक्ति भी कोई कुविचार एवं कुकर्म नहीं कर सकता क्योंकि जब से अपने अन्तःकरण में परमात्मा दिखाई पड़ता है, तब उसके सामने कुविचार कैसे रहें? इसी प्रकार विश्व के कण-कण में जब प्रभु दिखाई पड़ता है तो कौन सा गुप्त स्थान ऐसा हो सकता है जहाँ वह अपनी चोरी को छिपा ले? इसी प्रकार जो सर्वत्र प्रभु की विद्यमानता अनुभव करेगा। वह सभी जड़ चेतनों के साथ सद्व्यवहार के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकता। इसलिए यज्ञ पुरुष भगवान को सर्वव्यापी मान अन्तरात्मा में धारण करना ही आध्यात्मिक यज्ञ समझता है। इस यज्ञ निष्ठा को सर्वत्र यज्ञ पुरुष का ही रूप देखने की ब्रह्म दृष्टि को योगीजन सदैव अपनाते रहते हैं, शास्त्रों में भी इसका समर्थन है-

तस्मार्त्सवगतं ब्रह्म, नित्यं यज्ञो प्रतिष्ठितम्।

गीता 3।15

सर्वःव्यापक ब्रह्म, सदैव यज्ञ में रहता है।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणाहुतम्॥

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना॥

9 गीता 4 । 24

अर्पण (हवन क्रिया) ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में हवन किया जाता है और ब्रह्म ही हवन करता है। इस प्रकार जिसकी बुद्धि में सभी कर्म ब्रह्म रूप हो जाते हैं वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्।

मन्त्रोऽहममेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥

गीता 9 । 26

मैं क्रतु हूँ, मैं यज्ञ हूँ, मैं स्वधा हूँ, मैं औषधि हूँ और मैं ही मंत्र, घृत, अग्नि और हवन हूँ। गीता ने आध्यात्मिक यज्ञ को भली प्रकार समझाने के लिए उसके छोटे विभाग भी किए हैं। दैव या ब्रह्म यज्ञ, आत्म यज्ञ, तप यज्ञ, योग यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, ज्ञान यज्ञ, प्राण यज्ञ, संयम यज्ञ आदि की चर्चा करते हुए यह बताया है कि आत्म कल्याण के, प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलते हुए जो भी सत्साधन कार्य में लाये जाते हैं वे सब यज्ञ रूप ही हैं-

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।

ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्रति। श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमास्निषु जुह्रति। शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्रति। सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौं जुव्हति ज्ञानदीपिते॥ द्रव्ययज्ञानस्तपोयज्ञ योगयज्ञास्तथापरे॥ स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥

अपाने जुव्हति प्राणं प्राणेऽफनं तथापरे।

प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुव्हति।

सर्वेऽप्येते यज्ञविदोयज्ञक्षपितकल्मषाः।

गीता 4। 25-30 ॥

उपरोक्त श्लोकों में जिन यज्ञों की चर्चा है उनका वर्गीकरण इस प्रकार किया जा सकता है।

(1) योगियों का दैव यज्ञ- सूर्य अग्नि आदि देवताओं से अपनी इन्द्रियों का सम्बन्ध अनुभव करते हुए, उस सम्बन्ध की शक्ति को बढ़ाना।

(2) ब्रह्म यज्ञ- ज्ञान रूपी ब्रह्म अग्नि में अपने कर्म बन्धनों को होमना।

(3) संयम यज्ञ- संयम के तप रूपी अग्नि में

इन्द्रियों की वासना को जलाना।

(4) इन्द्रिय यज्ञ- इन्द्रिय शक्ति का मर्यादित सीमा में प्रयुक्त करके उनकी शक्ति का सदुपयोग करना।

(5) आत्म यज्ञ- आत्मा रूपी अग्नि में प्राणों की गति-विधि का उत्सर्ग करना।

(6) द्रव्य यज्ञ- अपनी भौतिक सम्पदा को सत्कर्मों में लगाना।

(7) तप यज्ञ- शारीरिक कष्ट सहिष्णुता तितीक्षा एवं द्वन्द्वों को सहन करने का उपार्जन।

(8) योग यज्ञ- योगाभ्यास द्वारा आत्मा विकास।

(9) स्वाध्याय यज्ञ- सद्ग्रन्थों द्वारा, सत्संग द्वारा एवं चिंतन-मनन द्वारा आत्म ज्ञान का सम्पादन।

(10) ज्ञान यज्ञ- सद्ज्ञान की अभिवृद्धि।

(11) प्राण यज्ञ- अपान में प्राण का लय, प्राण में अपान का समर्पण, इनकी गतियों का सन्तुलन करने के लिए कुम्भक का अभ्यास।

(12) आहार यज्ञ- भोजन की पवित्रता एवं उत्कृष्टता का साधन।

इस सब यज्ञ साधनों से मनुष्यों के सब पाप नष्ट होते हैं और ब्रह्म की प्राप्ति की दिशा में उसके कदम तेजी से बढ़ते जाते हैं।

यह आध्यात्मिक यज्ञ अन्तिम लक्ष है, स्थूल यज्ञ इसकी प्रथम सीढ़ी है। जैसे साकार मूर्ति पूजा से अभ्यास बढ़ाकर निराकार ब्रह्म की उपासना की जाती है। वैसे ही अग्नि होत्र के द्वारा यज्ञ भावनाओं का विकास कर अपने आपको ब्रर्ह्मपण करते हुए स्वयं या यज्ञ रूप बनना होता है। यही यज्ञ का परम रहस्य है। यह परमार्थ प्रियता, परस्पर सहयोग, सद्भावना की वृत्ति, संयम, त्याग उदारता, धर्म प्रियता, आस्तिकता एवं ईश्वर उपासना की भावना ही यज्ञ का वास्तविक रहस्य है।

एक बार ब्रह्म ज्ञानी राजा जनक ने सब ऋषियों से यज्ञ का वास्तविक रहस्य पूछा था और कहा था जो कोई उस रहस्य को बतावेगा उसे सौ गौएँ दान दी जाएंगी। अन्य ऋषियों ने स्थूल यज्ञों का वर्णन तो बहुत किया पर उसका अन्तिम लक्ष्य, प्रधान उद्देश्य कोई न बता सका। तब महर्षि याज्ञवलक्य ने यज्ञ का मर्म बताते हुए आत्म संयम और प्रभु परायणता का प्रतिपादन किया। इससे सन्तुष्ट होकर जनक ने याज्ञवलक्य को निर्धारित दान, देते हुए कहा-

वेत्थागिनहोत्रं याज्ञवल्क्य धेनु शतं ददामीति,

हे याज्ञवलक्य-आप अग्नि होत्र के रहस्य को जानते हैं, इसलिए आपको सौ गौएं भेंट करता हूँ।

गीता ने इस तथ्य का भली प्रकार स्पष्टीकरण किया है-

श्रेयान्द्रव्य मयाद्यज्ञाज्ज्ञान यज्ञः परंतप।

गीता 4 । 33

हे अर्जुन- द्रव्यमय-वस्तुओं से होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है।

यज्ञार्थातकर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।

गीता 3 । 9

यज्ञ के निमित्त किये हुए कर्मों के अतिरिक्त और सब कर्म बन्धन रूप हैं।

यहाँ यज्ञ का अर्थ परमार्थ पूर्ण एवं अनासक्त साधना से किये हुए सत्कर्म से ही है। हवन तो मनुष्य हर घड़ी कर नहीं सकता, हवन के अतिरिक्त भी उसे बहुत से काम करने पड़ते हैं। यहाँ तो परमार्थ की कर्त्तव्यमयी स्वार्थ रहित भावना द्वारा जीवन का प्रत्येक कार्य करने का आदेश है। जो कर्म इस भावना से नहीं किये जाते अर्थात् स्वार्थ की संकुचित बुद्धि से किये जाते हैं वे जीवन को जन्म मरण की फाँसी में बाँधने वाले सिद्ध होते हैं।

इस यज्ञ भावना से रहित व्यक्ति को उसकी स्वार्थ परता के कारण सर्वत्र निन्दा, घृणा, दण्ड, द्वेष एवं दुर्भावना का शिकार बनना पड़ता है। सच्चे मन से उसे कोई नहीं चाहता, उसका कोई सच्चा मित्र भी नहीं होता, फलस्वरूप साँसारिक दृष्टि से भी वह उन्नति नहीं कर पाता और न सच्चे सहयोग से मिलने वाला सुख ही उसे प्राप्त होता है। ऐसा स्वार्थी मनुष्य चाहे कितना ही धनी हो जाय लोक निन्दा, सन्मित्रों के अभाव एवं अपनी दूषित मनोवृत्ति के कारण उत्पन्न होते रहने वाली नाना प्रकार की कठिनाइयों से सदा चिन्तित, भयभीत एवं दुखी रहता है। कहा भी है-

नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यःकुरुसत्ताम।

गीता 4 । 31

हे अर्जुन, यज्ञ (भावना) रहित मनुष्य को इस लोक में भी सुख नहीं, फिर परलोक का सुख होगा ही कैसे?

इसलिए भगवान ने यही कहा है कि परमार्थ को प्रधान और स्वार्थ को गौण रखो। कर्त्तव्य कर्म करते हुए जितना कुछ मिल सके, उसी से सन्तुष्ट रहो। अनीति की मिठाई से नीति की सूखी रोटी का अधिक मान करो। क्योंकि ईमानदार और कर्त्तव्य परायण व्यक्ति को भले ही स्वल्प साधन एवं थोड़ी वस्तुएं प्राप्त हों पर वह उस थोड़े से ही पूर्ण स्वास्थ्य, सद्भावपूर्ण परिवार एवं आनन्दमय जीवन का अधिकारी बन सकता है। जब कि अनीतिवान् व्यक्ति प्रचुर साधन सामग्री के स्वामी होते हुए भी बीमारी, गृह कलह, राज दण्ड, शत्रुता, वासना, आदि के उपद्रवों से घिरे हुए नाना प्रकार के दुख पाते रहते हैं और अपना धन इन्हीं नालियों में हो बहाते रहते हैं।

धर्म कर्त्तव्यों को यज्ञ मानना और उसी के प्रसाद स्वरूप जो यज्ञाशिष्ट (पुरोडास) प्राप्त हो उससे सन्तुष्ट रहना जीवन निर्वाह का एक परम पुनीत मार्ग है। गीता में इस जीवन नीति की बड़ी प्रशंसा की है-

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्

गीता 4।31

यज्ञ से बचे हुए अमृत को खाने-पीने वाले व्यक्ति सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं।

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः।

भुँयन्ते ते त्वधं पापा ये रचन्त्यात्मकारणात्॥

गीता 3।13

यज्ञ से बना हुआ अवशिष्ट खाने वाला सर्व पाप से छूट जाता है। जो केवल अपने लिए ही बनाता है वह पाप खाता है।

यह यज्ञ भावना ही संसार के पारस्परिक सहयोग को कायम रखे हुए है। इसे त्यागकर तो मनुष्य असुर हो जाता है और हिंसक पशुओं की तरह एक दूसरे को लूट खाने में जुट पड़ता है। ऐसी स्थिति में तो मनुष्य जाति का तथा संसार का नाश ही हो सकता है।

इस संसार का ही नहीं, समस्त लोकों, नक्षत्रों मण्डलों, ब्रह्माण्डों, अणु-परमाणुओं का कार्यक्रम भी पारस्परिक सहयोग, त्याग एवं आदान-प्रदान से ही चल रहा है। यही भावना सबको परस्पर जोड़े हुए है। वेद से तथ्य का प्रतिपादन करते हैं-

अयं यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः।

ऋग् 1।164।36

यह यज्ञ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की नाभि है- बाँधने वाला है।

यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः।

अथर्व 9।10।14

यज्ञ ही समस्त विश्व ब्रह्माण्ड का केन्द्र मूल है।

इस यज्ञ की रक्षा करना और बढ़ाना हम सबका परम पावन आध्यात्मिक कर्त्तव्य है। इसी कर्त्तव्य की ओर ध्यान दिलाने के लिए वेद भगवान हम सबसे पूछते हैं-

को यज्ञ कामः? क उ पूर्ति कामः?

यज्ञ की चिंता कौन रखेगा? उसकी पूर्ति कौन करेगा? इसका उत्तर हमें अपने को इसके लिए उपस्थित करके देना चाहिए।


यज्ञ द्वारा तीन ऋणों से मुक्ति

स्थूल यज्ञ में देव पूजा इसलिए भी की जाती है कि तत्वों, देव आदर्शों, देव गुणों एवं देव कर्मों की ओर अभिरुचि एवं प्रवृत्ति बढ़े। पूजा के पीछे कोई भावना न हो, कोई उद्देश्य एवं आदर्श न हो तब तो वह देव पूजा एक अंध परम्परा मात्र रह जायगी। ऐसी पूजा से कोई विशेष लाभ नहीं मिलता।

कोई व्यक्ति किसी सत्पुरुष के दर्शन को तो दौड़ा आय पर उसकी शिक्षाओं पर ध्यान न दें तो उस दर्शन मात्र से उसे क्या लाभ होगा? जिस महापुरुष के प्रति उसे श्रद्धा है उसकी शिक्षाओं का तथा विशेषताओं का अनुकरण किया जाय तो बिना दर्शन के भी लाभ प्राप्त किया जा सकता है। अनेकों रूढ़िवादी, अंधविश्वासी केवल देव पूजा का कर्मकाण्ड करके अपना कर्त्तव्य पूरा मान लेते हैं। देवत्व को अपने में धारण करना देव पूजन का प्रधान उद्देश्य है। यदि हमारे विचार और कार्य असुरता से भरे हुए हैं, तो देव पूजन करने की चिह्न पूजा से क्या लाभ? अध्यात्म यज्ञ में अपनी अन्तरात्मा में देव तत्वों का आह्वान किया जाता है और दैवी सम्पदाओं से अपने को परिपूर्ण बनाया जाता है। गीता के 16 वें अध्याय में सद्भावनाओं, सद्गुणों और सत्व कार्यों के 26 लक्षणों को दैवी सम्पदा बताया गया है। जिनमें इन तत्वों की अधिकता होने लगे, समझना चाहिए कि वह देव उपासक है। इसके विपरीत लक्षणों वाला व्यक्ति चाहे वह कितने ही विधि-विधान सहित देव-पूजा करता हो-देव पूजक होते हुए भी असुर रहने वाले रावण की तरह निंदनीय ठहराया जायगा। अध्यात्म यज्ञ की देव पूजा का वास्तविक तात्पर्य अपने में देवत्व की अभिवृद्धि करना ही है।

अग्नि पूजा का आध्यात्मिक मर्म कर्त्तव्य निष्ठा है। अपने धर्म मार्ग को न छोड़ना, कर्त्तव्य धर्म रूपी हवन में अपना सब कुछ झोंक देना-होम देना ही सच्चा अग्नि पूजन है। अपने आवश्यक कर्त्तव्यों को पूरा करने में मनुष्य को सदैव जागरुक रहना चाहिये। अपने प्रति, अपने परिवार के प्रति, समाज के प्रति, राष्ट्र के प्रति, विश्व के प्रति, समस्त प्राण धारियों के प्रति जो कर्त्तव्य हैं, उन्हें पूरा करने में दत्त-चित्त रहना, यज्ञ भावना का ही प्रतीक है।

यजुर्वेद 2।131 में पितृ यज्ञ का वर्णन है। उसका तात्पर्य है पितृजनों के प्रति अपने कर्त्तव्यों को पूरा करना। पिता को गार्हपत्याग्नि, माता को दक्षिणाग्नि, आचार्य को आह्वानीय अग्नि कहा गया है। इन तीन अग्नियों में पितृ यज्ञ किया जाता है। उसका तात्पर्य है इन तीनों का आदर करना। इनकी सामर्थ्यों को बढ़ाने के लिए सहयोग देना तथा इनका आज्ञानुवर्ती होना। यही सच्चा पितृ यज्ञ है। इसी प्रकार मनुष्य जाति के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करना- नरमेध, राष्ट्र के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करना- अश्वमेध, अपनी इन्द्रियों को कुमार्ग गमन से बचाकर सन्मार्ग में लगा देना- गौ मेध, अपनी आत्मा के कल्याण के लिए अपनी शारीरिक, मानसिक तथा साँसारिक समस्त सम्पदाओं को लगा देना- सर्वमेध है। इन्हीं महान यज्ञों तक यजमान को पहुँचाना अग्निहोत्र का प्रधान लक्ष्य है।

यज्ञ में भावना ही प्रधान है। जैसी उच्च या निकृष्ट भावना से कोई कर्म किया जाता है, उसके अनुकूल ही उसका परिणाम मिलता है। कोई कार्य बाह्य दृष्टि से कितना ही उत्तम क्यों न दिखता हो, पर यदि उसके पीछे नीच उद्देश्य छिपा हुआ है तो उसका कोई अच्छा परिणाम न होगा। भावना की निकृष्टता के कारण विष मिले हुए दूध के समान वह गन्दा हो जायगा। इसके विपरीत यदि उच्च भावना से प्रेरित होकर कोई ऐसा कार्य भी करना पड़े जो देखने में निन्दनीय प्रतीत होता हो तो भावना की उत्कृष्टता के कारण वह भी शुभ फलदायक होता है। डॉक्टर का फोड़ा चीरना-एक निष्ठुर कार्य प्रतीत होता है पर उसके मन में रोगी का दुख दूर करने की भावना है। इसलिए वह चीर-फाड़ की निष्ठुरता भी दया ही है। इसी प्रकार बहेलिए का चिड़ियों को दाना फेंकना चाहे बाहरी आँखों से दाना या दया का कृत्य भले ही दिखे, पर उसका वास्तविक उद्देश्य चिड़ियों को पकड़ना है। इसलिए वह दाना फेंकना भी उसकी अधोगति का ही कारण बनता है। गीता ने भावना की प्रधानता को ध्यान में रखकर अन्य कर्मों की भाँति यज्ञ को भी सात्विक, राजस, तामस अर्थात् उत्तम, मध्यम, निकृष्ट विभागों में बाँटा है -

अफलाकाँक्षिभिर्यज्ञो विधि दृष्टो व इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्विकः॥

(गीता 17/11)

जो यज्ञ, शास्त्र विधि से नियत किया हुआ है तथा उसे करना कर्त्तव्य ही है ऐसा मानकर, फल को न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्विक है।

अभिसन्धाय तु फलं दन्भार्थमपि चैव यत्।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्॥

(गीता 14।12)

जो यज्ञ केवल प्रदर्शन के लिए अथवा फल को भी लक्ष्य रख कर किया जाता है, उसे हे अर्जुन तू राजस जान।

विधिहीनमसृतुष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥

(गीता 17। 13)

शास्त्र विधि से हीन, अन्नदान से रहित एवं बिना मंत्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किये हुए यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं। इन यज्ञों का फल उनके बाह्य रूप के अनुसार नहीं वरन् कर्त्ता की भावना के अनुसार होता है-

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः।

(गीता 14 । 18)

सतयुग में स्थित हुए मनुष्य ऊपर उठते हैं, उच्च गति को प्राप्त करते हैं, रजोगुण में स्थित बीच में ही लटकते रहते हैं तथा निकृष्ट मार्ग पर चलने वाले तामस मनुष्य अधोगामी होते हैं।

क्रिया यज्ञ में विधि विधान के शास्त्रोक्त होने का ध्यान रखा जाता है और भाव यज्ञ में आन्तरिक भावना की पवित्रता, सात्विकता, सचाई एवं सदुद्देश्य को महत्व दिया जाता है। उच्च भावना रख कर किये जाने वाले साधारण कार्य भी यज्ञ रूप हो जाते हैं।

मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह स्वयं ही अपनी सब जरूरतें पूरी नहीं कर लेता। वरन् अनेक व्यक्तियों, पशुओं, वृक्षों वनस्पतियों तथा ईश्वरीय शक्तियों की सहायता से उसका जीवन क्रम चलना सम्भव होता है। यदि दूसरों का सहयोग उसे न मिले तो उसका काम एक क्षण के लिए भी न चले। यहाँ तक कि जीवन धारण करना भी दुर्लभ हो जाय। अन्न, वस्त्र, औषधि, घर, जूते, पुस्तक आदि वस्तुएं प्राप्त करने के लिए सहस्रों दूसरों का सहयोग नित्य अपेक्षित होता है। जो ज्ञान, विद्या, शिक्षा स्वभाव, पद, कीर्ति आदि हमें उपलब्ध है, वह भी दूसरों के सहयोग से ही है। गर्भ में आने के समय से लेकर चिता में जलने तक हर घड़ी मनुष्य दूसरों के सहयोग, कृपा भाव, दान, अनुग्रह प्राप्त करता रहता है। इसलिए उसे उचित है कि इन ऋणों से अपने को उऋण करने के लिए कृतज्ञता पूर्वक संसार की सेवा करे। अपने ऊपर लदे हुए दूसरों से असंख्य उपकारों का ऋण चुकाकर उऋण होने का प्रयत्न करे। शास्त्र का भी ऐसा ही आदेश है-

जायमानो वै ब्राह्मणास्त्रिभिऋणैऋण वान् जायते। ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यों यज्ञेन देवेभ्यः प्रजया प्रितृभ्यः॥

तैत्तिरीय संहिता 3।105

द्विज, जन्मते ही ऋषि ऋण, देव ऋण, और पितृ ऋण, इन तीन प्रकार के ऋणों से ऋणी बन जाता है। ब्रह्मचर्य के द्वारा ऋषि ऋण से, यज्ञ द्वारा देव ऋण से और सन्तति को सुयोग्य बनाने से पितृ ऋण से छुटकारा मिलता है।

ऋषि, देव, पितृ हमारे ऊपर अनन्त कृपा पूर्वक हमें बहुत कुछ देते हैं। सद्ज्ञान ऋषियों का दिया हुआ है। अनेक साधन सामग्री तथा सुखोपभोग की सामग्री देवों द्वारा दी हुई है। असमर्थ अवस्था में सामर्थ्य प्रदान करने वाले वे उपकार पितृओं के हैं। जिनके द्वारा सब प्रकार से दीन-हीन नवजात शिशु पाला-पोषा जाता है और अन्त में सब प्रकार के सामर्थ्यों से परिपूर्ण मनुष्य बन जाता है। इन दोनों के उपकार प्राप्त न हों तो मनुष्य की कैसी दुर्गति हो इसकी कल्पना करना भी कठिन है।

इन ऋणों से उऋण हुए बिना कोई व्यक्ति छुटकारा नहीं पा सकता। जो लोग दूसरों का कर्ज मारने की चेष्टा करते हुए ‘विरक्त’ बनने का ढोंग रचते हैं वे वस्तुतः कृतघ्न हैं। उन्हें मुक्ति तो क्या मिलेगी, उल्टे हजारों गुनी जटिल बंधन पाश में बँधना पड़ेगा। साधु या संन्यासी तो ईश्वर उपासना करते हुए अधिकाधिक लोग सेवा करने के लिए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों को छोड़ते हैं। स्वार्थपरता को न छोड़कर कर्त्तव्य पालन एवं लोक सेवा द्वारा उऋण होने की कठिनाई या मेहनत से जी चुराकर जो आलस्य और हराम खोरी पर उतर आते हैं और कहते हैं संसार तो माया है दूसरों के लिए हम कोई प्रयत्न क्यों करें, ऐसे लोगों को साधु महात्मा या त्यागी वैरागी कहना भी इन पवित्र शब्दों को कलंकित करना है। साहु वह है, जो अपना ऋण दूसरों पर छोड़े, जो स्वयं सब का कर्जदार बैठा है और बदला चुकाने के समय कतराता है वह तो पक्का चोर है। उसे न तो साहु कह सकते और न साधु। प्रत्येक व्यक्ति को उपरोक्त तीन ऋणों से उऋण होने का प्रयत्न करना चाहिए। इस उऋण के उपाय तैत्तिरीय संहिता के उपरोक्त वाक्य में बना दिये गये हैं।

(1) ब्रह्मचर्य द्वारा ऋषि ऋण से छुटकारा मिलता है। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल स्त्री सम्भोग न करना ही नहीं है। वरन् उसका वास्तविक तात्पर्य सभी इन्द्रियों का संयम करना और ब्रह्म में चरण रखना अर्थात् आस्तिकता को अपनाना है। इन्द्रियों के संयम से, शारीरिक और मानसिक शक्तियों की रक्षा होती है और असंयमी आचरण के कारण जो समय, धन, स्वास्थ्य एवं आत्म बल नष्ट होता है, वह बच जाता है। इस असंयम से बचे हुए और संयम द्वारा बढ़े हुए बल को जब मनुष्य आस्तिकता में धर्म मार्ग में लगाता है तो वह व्यक्ति सब दृष्टि में महान् बन जाता है। उसकी सर्वांगीण उन्नति होती है। ऋषि स्वयं महान होते हैं, हमें भी ऋषि ऋण से मुक्त होने के लिए अपने को ज्ञान, धन, बल, संगठन आदि सभी दृष्टियों से बलवान बनाना चाहिए, ताकि ऋषि पक्ष की परम्पराओं को आगे बढ़ाने के लिए अपने को आदर्श एवं उदाहरण के रूप में उपस्थिति कर सकें।

(2) देव ऋण से छुटकारा यज्ञ द्वारा होता है। यज्ञ द्वारा देव शक्तियाँ परिपुष्ट कैसे-कैसे होती हैं, उसका विज्ञान पीछे बताया जा चुका है। अध्यात्म क्षेत्र में यज्ञ का अर्थ है त्याग। अपने निर्वाह के लिए अपनी सामर्थ्य का न्यूनतम भाग उपयोग करना और अधिकतम भाग लोकहित के लिए लगा देना यही यज्ञ भावना है। देव हमें नाना प्रकार के सुख साधना देते हैं। हमें किसी को कुछ नहीं देना चाहिए? अवश्य ही देना हमारा कर्त्तव्य होना चाहिए ‘देव’ वे कहलाते है कि जो देते है। देने वालों की श्रेणी में अपने को रखने से हम भी ‘देव’ बन सकते हैं। धन देना ही दान नहीं है। ज्ञान, समय, श्रम, सलाह, सद्भाव, शिक्षा, सहयोग आदि देकर हम अपनी स्थिति के अनुसार दूसरों को बहुत कुछ देते रह सकते हैं। देने की भावना हो तो प्रतिक्षण वैसे अवसर उपलब्ध हो सकते हैं। ऋषि मुनि तो पूर्णतया निर्धन होते थे, पर वे इतना देते थे कि उनके दान की तुलना धन कुबेर भी नहीं कर सकते। देने की किन्तु विवेकपूर्वक देने की भावना से हम देव ऋण से मुक्त होते हैं किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कार्य एवं पात्र कुपात्र का विचार न किया जाय, तो वह दान हत्या के समान भयंकर दुखदायी भी होता है। इसलिए देव श्रद्धा से छुटकारा पाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए।

(3) तीसरा ऋण है- पितृ ऋण। पितर हमें सुयोग बनाते हैं। हम भी भावी सन्तान को सुयोग बनावें। आज के युग में अधिक बच्चा पैदा करना राष्ट्रीय पाप है। क्योंकि जब जनसंख्या की अधिकता से अन्न का पुरा न पड़ता हो, अन्न के अभाव से अनेक लोग भूखों मरते हों, तब उनके पास छीनने के लिए और नये हिस्सेदार बढ़ाना कोई बुद्धिमानी नहीं है। बच्चों की संख्या बढ़ाने के लिए नहीं वरन् उनकी योग्यता बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। भावी पीढ़ी के उचित निर्माण के लिए ध्यान न दिया जायगा तो भविष्य अंधकार मय बनेगा। आज कुसंस्कारों की बढ़ोतरी से नई पीढ़ियां, उद्दण्डता-उच्छृंखलता, अवज्ञा, आलस, विलासिता आदि बुराइयों की ओर बढ़ रही है, इस बाढ़ को न रोका गया तो भविष्य का ईश्वर ही मालिक है। इसलिए बच्चों को भविष्य के सुयोग नागरिक एवं महान सत्पुरुष बनाने के प्रयत्न करते हुए पितृ ऋण से उऋण होना चाहिए। अपने या पराये जिन बच्चों की ऐसी सेवा की जाय, वह पितृ ऋण की उऋणता ही है।

पितर का अर्थ गुरु भी है। जिस प्रकार सत्पुरुषों ने हमें सद्ज्ञान दिया और अच्छे मार्ग पर चलाने के लिए अनेक प्रकार प्रयत्न किये, वैसे ही हमारे लिए उचित है कि दूसरों को सद्ज्ञान देने और सत् मार्ग पर लगाने के लिए प्रयत्न करें। यह पितृ परम्परा जारी रखने की भावना सब की हो तो दूसरों को ऊँचा उठाने का प्रयत्न करते हुए सम्पूर्ण विश्व को सुयोग बनाया जा सकता है।

तीनों ऋणों से उऋण होने के लिए हम में से प्रत्येक को ध्यान रखना चाहिए। ऋषि, देव और पितृ भी इस यज्ञ भावना से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। उनका यज्ञ यह यज्ञ भावना ही है। इसी को यज्ञ से यज्ञ करना कहते हैं। देवों की महानता इस यज्ञों के यज्ञ-आध्यात्मिक यज्ञ पर निर्भर थी। इसी से वे इतने उच्च अधिकारी बने।

यज्ञेन यज्ञ मय जन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमा न्यासन्। तेहनाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे सन्ति देवाः।

देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ किया, जो प्रथम धर्म था। इसी से वे उस महान् स्वर्ग को गये जहाँ पूर्व काल में ऋषि गये हैं।

देवों ने हमें मार्ग दिखाया। हमारा कर्त्तव्य है कि इस यज्ञ मार्ग पर चलते हुए उस महान परम्परा को कायम रखें और उऋणता का आत्म सन्तोष प्राप्त करते हुए जीवन के महान लक्ष्य को उपलब्ध करें।


अग्नि की शिक्षा तथा प्रेरणा

अग्नि भगवान के स्थूल रूप का पूजन करने के लिए सुन्दर-सुन्दर हवन सामग्रियों से कुण्ड रूपी मुख्य में आहुतियाँ दी जाती है। सूक्ष्म पूजन के लिए अग्नि रूपी तेजस्वी भगवान को अपने अन्तःकरण में धारण करना होता है और उनके गुणों को अपनाकर स्वयं अग्नि रूप बनना होता है।

अग्नि भगवान से ऐसी ही प्रार्थना यजमान करता है कि-

ॐ अयन्त इध्म आत्मा जातवेद स्तेन इध्मस्व वर्धस्व च इद्धय वर्धय।

आश्वलायन गृह्य सूत्र 1।10।18

“हे अग्नि देव! आप प्रदीप्त होओ और हमें भी प्रदीप्त करो। जो गुण आप में है उन्हें ही धारण करें” ऐसी प्रार्थना इस मंत्र में दी गई है। अग्नि यज्ञ का सच्चा उपासक वही कहा जाएगा, जो अपने इष्टदेव में तन्मय होकर उसके समान गुणों वाला बनने का स्वयं भी प्रयत्न करे।

स्थूल अग्नि की स्थापना और पूजन का स्थान हवन कुण्ड ही है, साथ ही उस यज्ञ की सूक्ष्म महत्ता को स्थापित करने का वास्तविक स्थान हृदय अन्तःकरण है। उस अग्नि में स्वत्व गुण के धारण करके अपने अग्नि रूप-अग्नि गुण सम्पन्न बनाने का प्रयत्न ज्ञानी लोग अपनी ज्ञान बुद्धि द्वारा करते हैं तभी उनका जीवन अग्नि रूप यज्ञमय बनता है।

अविदन्ते अतिहितं यदासीत यज्ञस्यधाम परमं गुह्यात्। ऋग्. 1।811

यज्ञ का वास्तविक निवास स्थान हृदय रूपी गुफा में है। वह अत्यन्त गुप्त है परन्तु ज्ञानी सत्पुरुष उसे प्राप्त कर लेते हैं।

यज्ञ को अग्निहोत्र कहते हैं। अग्नि ही यज्ञ का प्रधान देवता है। हवन सामग्री को अग्नि के मुख में ही डालते हैं। अग्नि के ईश्वर रूप मानकर उसकी पूजा करना ही अग्निहोत्र है। अग्नि रूपी परमात्मा की निकटता का अनुभव करने से उसके गुणों को भी अपने में धारण करना चाहिए एवं उसकी विशेषताओं को स्मरण करते हुए अपने आपको अग्निवत् होने की दिशा में अग्रसर बनना चाहिए। नीचे अग्नि देव से प्राप्त होने वाली शिक्षा तथा प्रेरणा का कुछ दिग्दर्शन कर रहे हैं।

(1) अग्नि का स्वभाव उष्णता है। हमारे विचारों और कार्यों में भी तेजस्विता होनी चाहिए। आलस्य, शिथिलता, मलीनता, निराशा, अवसाद यह अंध तामसिकता के गुण है, अग्नि के गुणों से यह पूर्ण विपरीत हैं। जिस प्रकार अग्नि सदा गरम रहती है कभी भी ठण्डी नहीं पड़ती, उसी प्रकार हमारी नसों में भी उष्ण रक्त बहना चाहिए, हमारी भुजाएँ काम करने के लिए फड़कती रहें, हमारा मस्तिष्क प्रगति शील बुराई के विरुद्ध एवं अच्छाई के पक्ष में उत्साह पूर्ण कार्य करता रहे।

(2) अग्नि में जो भी वस्तु पड़ती है उसे वह अपने समान बना लेती है। निकटवर्ती लोगों को अपना गुण-ज्ञान एवं सहयोग देकर हम भी उन्हें जैसे ही लकड़ी कोयला आदि साधारण वस्तुएँ भी अग्नि बन जाती हैं, हम अपनी विशेषताओं से निकटवर्ती लोगों को भी वैसा ही सद्गुणी बनाने का प्रयत्न करें।

(3) अग्नि जब तक जलती है तब तक उष्णता को नष्ट नहीं होने देती। हम भी अपने आत्मबल से ब्रह्म तेज को मृत्यु काल तक बुझने न दें।

(4) हमारी देह “भस्मान्तं शरीरम्” है वह अग्नि का भोजन है। न मालूम किस दिन यह देह अग्नि की भेंट हो जाय इसलिए जीवन की नश्वरता को समझते हुए सत्कर्म के लिए शीघ्रता करें और क्षणिक जीवन के क्षणिक सुखों के निमित्त दुष्कर्म की मूर्खता से बचें। जीवन की गतिविधि ऐसी रहे कि किसी समय मृत्यु सामने आ खड़ी हो, देह अग्नि को भेंट करनी पड़े तो किसी प्रकार का पछतावा न हो। अग्नि रूपी यमराज का हम नित्य दर्शन एवं पूजन करते हुए उसके साथ आत्मज्ञात होने की तैयारी करते रहें।

(5) अग्नि पहले अपने में ज्वलन शक्ति धारण करती है तब किसी दूसरी वस्तु को जलाने में समर्थ होती है। हम पहले स्वयं उन गुणों को धारण करें, जिन्हें दूसरों में देखना चाहते हैं। उपदेश देकर नहीं वरन् अपना उदाहरण उपस्थित करके ही हम दूसरों को कोई शिक्षा दे सकते हैं। जो गुण हममें होंगे वैसे ही गुण वाले दूसरे लोग भी हमारे समीप आवेंगे और वैसा ही हमारा परिवार बढ़ेगा। इसलिए जैसा वातावरण हम अपने चारों ओर देखना चाहते हों पहले स्वयं वैसे बनने का प्रयत्न करें।

(6) जैसे अग्नि मलीन वस्तुओं को स्पर्श करके स्वयं मलीन नहीं बनती वरन् वस्तुओं को भी अपने समान पवित्र बनाती है। वैसे ही दूसरों की बुराइयों से हम प्रभावित न हों। स्वयं बुरे न बनने लगें वरन् अपनी अच्छाइयों से उन्हें प्रभावित करके पवित्र बनावें।

(7) अग्नि जहाँ रहती है वहीं प्रकाश फैलाती है हम भी ब्रह्म अग्नि के उपासक बनकर ज्ञान का प्रकाश चारों ओर फैलावें। अज्ञान के अंधकार को दूर करें। तमसो मा ज्योतिर्गमय- हमारा प्रत्येक कदम अन्धकार से निकलकर प्रकाश की ओर चलने के लिए पड़े।

(8) अग्नि की ज्वाला सदा ऊपर को उठती रहती है। मोमबत्ती की लौ को नीचे की तरफ उलटें तो भी वह ऊपर की ओर ही उलटेगी। इसी प्रकार हमारा लक्ष्य, उद्देश्य एवं कार्य सदा ऊपर की ओर ही रहे, अधोगामी न बने।

(9) अग्नि में जो वस्तु डाली जाती है उसे वह अपने पास नहीं रखती वरन् उसे सूक्ष्म बनाकर वायु को देवताओं को बाँट देती है। हमें जो वस्तुएँ सम्पदाएँ ईश्वर की ओर से-संसार की ओर से मिलती हैं उन्हें केवल उतनी ही मात्रा में ग्रहण करें जितने से जीवन रूपी अग्नि को ईंधन प्राप्त होता रहे। शेष का परिग्रह, संचय या स्वामित्व का लोभ न करके उसे लोकहित के लिए ही अर्पित करते रहें। अग्नि में चाहे करोड़ों रुपयों की सामग्री होगी, जब वह अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कुछ नहीं चुराती और पीछे के लिए संग्रह नहीं करती है वरन् तत्क्षण उस सामग्री को सूक्ष्म बनाकर वायु को लोकहित के लिये बाँट देती है। वैसे ही हमें जो ज्ञान, बल, बुद्धि, विद्या आदि उपलब्ध हैं उनका उपयोग स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिये ही करें।

(10) जैसी अग्नि हवन कुण्ड में जलती है वैसी ही ज्ञानाग्नि अन्तःकरण में, तप अग्नि इन्द्रियों में, काम अग्नि देह में प्रज्वलित रहनी चाहिए। यहाँ यज्ञ का आध्यात्मिक स्वरूप है।

हम यज्ञ करके अग्नि देवता से शिक्षा एवं दीक्षा ग्रहण करें। उससे प्रकाश ग्रहण करें और उसका अनुगमन करके आत्म कल्याण तथा परमार्थ साधना में संलग्न हों।


यज्ञ और पशुबलि

यज्ञों की अनेक कोटियों में एक कोटि ‘पशु यज्ञ’ की भी आती है। एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं। पशु शब्द के भी अनेक अर्थ हैं पर कुछ संकुचित विचार के व्यक्ति वेद और यज्ञ की मूलभूत भावना के विपरीत उसका अर्थ पशु हिंसा करने लगे। अर्थ का अनर्थ हुआ। मध्यकालीन युग में लोगों ने सचमुच ही पशु यज्ञ का वास्तविक रूप न समझ कर पशु हत्या आरम्भ कर दी और घोड़े, गाय, बकरे, सर्प एवं मनुष्य तक मार-2 कर होमने शुरू कर दिये।

यह हत्याकाण्ड जब फैला तो उसके विरुद्ध जनता में घोर घृणा उत्पन्न हुई। यज्ञों की निन्दा हुई लोग यज्ञों का विरोध करने लगे। बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने इस प्रकार की हिंसा का डट कर विरोध किया और धीरे-धीरे वह अनर्थ बन्द होता गया। अब जीवों को मारकर हवन तो नहीं होता पर ‘दुर्गा’ आदि पर भैंसे, बकरे काटने की प्रथा अब भी विद्यमान है। इन अज्ञान मूलक बातों का जितना विरोध हो उतना ही उत्तम है और हमारे पवित्र धर्म को कलंकित करने वाली यह घृणित प्रथाएं जितनी जल्दी बन्द हो जायें उतना ही उत्तम है।

वैदिक पशु यज्ञ का वास्तविक तात्पर्य क्या है, नीचे की पंक्तियों में इस पर कुछ प्रकाश डाला जाता है।

उपनिषद् का वचन है-

‘काम क्रोध लोभादयः पशवः’

अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, मोह यह पशु हैं। इन्हीं को मारकर यज्ञ में हवन करना चाहिए। आलंकारिक रूप से यह आत्म शुद्धि की, कुविचारों, पाप-तापों, कषाय कल्मषों से बचने की शिक्षा है।

यज्ञ को ‘अध्वर’ भी कहते हैं। अध्वर का अर्थ है- ‘वह कार्य जिसमें हिंसा न होती हो।’ यज्ञ के ऋत्विजों में एक सदस्य तो विशेष रूप से ऐसा नियुक्त होता है जो देखे कि कहीं कोई हिंसा तो इस पुण्य कार्य में नहीं हो रही है। इस निरीक्षक हो अध्वर्यु कहते हैं। विचार करने की बात है कि जिस यज्ञ में हिंसा न होने का इतना ध्यान रखा गया है पंच भू-संस्कार की क्रिया में छोटे-छोटे जीव जन्तुओं की प्राण रक्षा के लिए पहले से ही पूरी सावधानी बरतने की व्यवस्था है। उस कार्य में पशु सरीखे बड़े-बड़े जीवों की निर्दय हत्या करने का विधान कैसे हो सकता है?

जिन ब्राह्मण ग्रन्थों में पशु यज्ञ का वर्णन है वह केवल अलंकार रूप है। उसमें एक कथानक बना कर किसी सूक्ष्म विज्ञान पर प्रकाश डाला गया है। लोग उस आर्ध शैली के वास्तविक तात्पर्य को भूल कर अर्थ का अनर्थ करने लगे। शतपथ ब्राह्मण में पशु यज्ञ का वर्णन इस प्रकार मिलता है-

पुरुषं हवै देवा अग्रे पशुमाले भिरे।

तस्यालब्धस्य मेघोऽपचक्राम।

सोऽश्वं प्रविवेश। तेऽश्वमालभन्त। तस्यालब्धस्य मेघोपचक्राम। स गा प्रविवेश। ते गामा लभन्त। तस्या लब्धाया मेघोपचक्राम। सोऽवि प्रविवेश। तेऽविभालभन्त। तस्यालब्धस्य मेघोऽपचक्राम। सोऽजं प्रविवेश। तेऽजभालभन्त। तस्यालब्धस्य मेघोऽपचक्राम। स इमाँ पृथ्वीं प्रविवेश। तंखनन्त। इवान्वीषुः। त अन्वविंदन्। तौ इमौ ब्रीहियवा। स यावद्वीर्यवद्ध। ह वा अस्य एते सर्वे पशु आलब्धाः स्युः तावद्वीर्यवद्धास्य हविरेव भवति। य एवमेतद्वेद। अन्नो सा संपद्यदाहुः पंक्ति पशुरिति।

-शतपथ ब्रा. 1।2।3।6-9

अर्थात्- आरम्भ में देवों ने पुरुष का बलिदान किया। उसी समय उससे पवित्र भाग चला गया और वह घोड़े में प्रविष्ट हुआ। उन्होंने घोड़े को मारा। मारते ही उससे पवित्र भाग चला गया और वह गौ में प्रविष्ट हुआ। उन्होंने गौ की बलि की, उसी समय उससे से भी वह पवित्र भाग चला गया और वह मेढ़े में चला गया। उन्होंने मेढ़े की बलि की, उसी समय उससे पवित्र भाग चला गया और बकरे में प्रविष्ट हुआ। उन्होंने बकरे को मारा उसी समय उससे पवित्र भाग चला गया और वह इस पृथ्वी में प्रविष्ट हुआ। तब देव उस पृथ्वी को खोदने लगे। भूमि खोदने से उनको चावल और जौ प्राप्त हुए। इन चावल और जौ से जो हवि किया जाता है, उसका वीर्य और बल उतना ही होता है कि जितनी वीर्य पूर्वोक्त हवियों का होता है।

उपरोक्त कथानक का तात्पर्य यह है कि पुरुष, घोड़ा, गौ मेंढ़ा, बकरा आदि से तो देव काल में ही पवित्र भाग तिरोहित हो चुका है। इनकी पवित्रता पहले ही समाप्त हो गई है, इसलिए वेदों के आरम्भ काल में ही ब्राह्मण ग्रन्थों ने यह घोषित कर दिया था कि अब केवल आदि पृथ्वी से उत्पन्न होने वाले पदार्थों में ही हवि के योग्य पवित्र तत्व हैं, पशुओं में वह पवित्र तत्व नहीं है कि वे हवि के काम आ सकें। इस कथानक में पशु वध का समर्थन नहीं वरन् अलंकारिक रूप से निषेध किया गया है। इनमें तो अन्नादि पृथ्वी के गर्भ से उत्पन्न वनस्पतियों को ही पवित्र हवि माना है। ऐसी ही मान्यता ऐतरेय ब्राह्मण में भी प्रकट की गई है।

पशुभ्यो वै मेघ उदक्रामंस्तौ ब्रीहि श्चैव यवश्च भूतावर्जयाताम्।

ऐतरेय 2। 2। 21

पशुओं में से हवनीय तत्व पृथ्वी में चला गया जो चावल और जौ के रूप में ऊपर आया है।

मेध शब्द का मेधा और मेधावी अर्थ है। मेधा को अंग्रेजी में कलचर कहते हैं। किसी वस्तु को सुव्यवस्थिति ढंग से बनाना, सुधारना या उन्नति करना, मेध शब्द का वास्तविक अर्थ है। गौमेध, अश्वमेध, नरमेध आदि शब्दों का अर्थ गाय घोड़े या मनुष्य मारकर हवन करना नहीं वरन् गौ-पृथ्वी, मेध-उन्नत करना है। भूमि को कृषि के लिए भली प्रकार तैयार करना ही गौमेध है। अश्व-राष्ट्र, मेघ-करना। राष्ट्र की उन्नति समृद्धि एवं सुरक्षा के प्रयत्न करना एवं एक विश्व राष्ट्र (लीग आफ नेशनल) की स्थापना ही अश्वमेध है। इसी प्रकार मनुष्य को सुसंस्कृत बनाना, दोष दुर्गुणों से मुक्त करना नरमेध है।

मनुस्मृति में नर यज्ञ शब्द अतिथि पूजन के लिए आया है।

‘नृ यज्ञों अतिथि पूजनम्’

यदि कोई व्यक्ति अतिथि पूजन न करके मनुष्यों को मारना आरम्भ कर दे तो इसे मनु का दोष नहीं वरन् उसकी बुद्धि का ही दोष कहा जायगा।

चरक संहिता में ‘अजा’ औषधि का वर्णन है-

अजानामौषधि रज श्रृंगीति विज्ञायते।

-चरक. चिकित्सा प्र. 1

क्या कोई उपरोक्त वाक्य में वर्णित अजा बूटी के स्थान पर बकरी की औषधि बनावेगा?

महाभारत में भी अजा का अर्थ औषधि और बीज ही किया गया है-

बीजैर्यज्ञेषु यष्टव्य मिति वा वैदिकी श्रुतिः। अज संज्ञानि बीजानि, छागं नो हन्तुमर्हष॥ नैष धर्मः सताँ देवा यत्र वध्यते वै पशु।

महाभारत शान्ति 337

अर्थात् बीजों का यज्ञ में हवन करना चाहिए। ऐसी ही वेद की श्रुति है। ‘अज’ संज्ञक बीज होते हैं, इसलिए बकरे का हनन करना उचित नहीं। जिस कर्म में पशु की हत्या होती है वह सज्जनों का धर्म नहीं।

ऐतरेय ब्राह्मण 1। 2। 10 में “पशवो वा इला” इस पृथ्वी को ही पशु कहा गया है। अन्य स्थानों पर जीवात्मा में भी पशु कहा गया है। क्या इन सब को काट कर होमा जायगा?

अन्न से बनी हुई वस्तु तथा (रोटी पूरी आदि) खाद्य पदार्थों को भी पशु माना गया है और उसके विभिन्न अंगों की पशु अंगों से तुलना की गई है देखिए-

यदा पिष्ठान्यथलोमानि भवन्ति। यदाप आनयति अथ त्वग्भवन्ति यदासंयोत्थय माँसं भवति। संतत इव हि तर्हि भवति संततमिव हि माँसं यदाशृतोऽथास्ति भवति। दारुण इव हि तर्हि भवति। दारुणमित्यास्थि।

अथ यदुद्वासयन्नभिधारयति तं मज्जानं ददाति ऐसो सा सम्पद्यदाहुः पंक्तिः पशुरिति।

- शत 1।2।3।9

अन्न का पिसा हुआ आटा ही रोम (बाल) है। जब उस पिसे हुए आटे में जल मिलाते हैं तो वह चमड़ा हो जाता है (क्योंकि चमड़े के समान कोमल होता है जब वह आटा गूंथा जाता है तो माँस कहलाता है क्योंकि तब वह माँस के समान चिकना होता है।) जब वह सेका जाता है तब अस्थि कहलाता है (क्योंकि अस्थि कड़ी होती है) जब उसमें घी डाला जाता है तो उसका नाम मज्जा होता है।

प्राचीन आर्य ग्रन्थों में- पशुओं को मारकर हवन करने का कोई विधान नहीं है। पशुओं के नाम से मिलते-जुलते शब्दों का अर्थ ठीक प्रकार न समझकर अन्धकार युग में अज्ञानी लोगों ने हवन में पशुवध करने का अनर्थ भी किया है। इस अनर्थ मूलक प्रथा को प्रचलित कराने में ब्राह्मणों की स्वार्थपरता भी कारण रही हो तो कोई आश्चर्य नहीं। भगवान बुद्ध ने पशुबलि आरम्भ होने के इतिहास पर कुछ प्रकाश डाला है। पाली के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सुत्त निपात’ के ‘ब्राह्मण धार्मिक सुत्त’ भाग से कुछ उदाहरण नीचे उपस्थित करते हैं-

भगवान बुद्ध जब श्रीबस्ती नगरी के जेतवन बिहार में थे तब एक कौशल देशीय वृद्ध ब्राह्मण उनके पास आये और भगवान से पूछा-क्या इस काल में प्राचीन ब्राह्मणों का धर्म पालन करने वाला कोई ब्राह्मण हैं? बुद्ध ने उत्तर दिया-इस काल में ऐसा कोई ब्राह्मण नहीं दीखता। क्योंकि ब्राह्मणों के जो धर्म एवं गुण हैं वे उनमें दिखाई नहीं पड़ते। उन्होंने ब्राह्मणत्व के इस पतन का दुख पूर्ण इतिहास बताते हुए कहा-

सुखुमाला महाकाया वण्णवन्तो यप्तस्सिनो।

ब्राह्मणा सेहि धम्मेहि किच्चाकिच्चेसु उत्सुका। यावलो के अबत्तिसु सुखमेधित्थ यम्पजा ॥15॥

जब तक ब्राह्मण कोमल भावनाओं वाले, स्वस्थ, सुकर्मी, यशस्वी व उत्साही रहे तब तक संसार में प्रजा के सुख की वृद्धि होती रही।

तेसं आसीविपल्लासो दिखान अणुतो अणुँ।

राजनो च वियाकारं नारियो समलंकता ॥16॥

रथेचाजंज संयुक्ते सुकतेचित्त सिव्वने।

निवेसने निवेसेच विभत्ते भाग सोभिते ॥17॥

गोमण्डलपख्वूल्हं नारीवरगणायुतं। उलारं मानुसं भोगं अभिज्झायिंसु ब्राह्मणा ।18॥

उन ब्राह्मणों की गतिविधि उल्टी हो गई। धीरे-धीरे वे तब त्याग छोड़कर राजकीय ठाठ बाटों, सुन्दर-सुन्दर स्त्रियों, बढ़िया घोड़ों वाले रथों, चित्र-विचित्र परिधानों, अनेक कमरों वाले महलों, गौओं तथा रमणियों के भोग विलास में ललचा कर वे लोभ में फँस गये।

ते तत्थ मन्ते गन्थेत्वा ओकाकं तदुषागमुँ।

पभूत धनासिधंजो यजस्सु बहु ते धनं ॥19॥

तब वे मन्त्रों के संग्रह से एक यज्ञ पद्धति बनाकर राजा इच्वाकु के पास गये और कहा तेरे पास बड़ा धन-धान्य है तू यज्ञ कर।

ततो च राजा संञतौ ब्राह्मणेहि रथेसभो।

अस्समेधं पुरिसमेधं सम्मपासं वाजपेप्यं निरगगलं

एते यागे यजित्वान ब्राह्मणानं अदाघम् ॥20॥

तब ब्राह्मणों की आज्ञानुसार राजा ने अश्वमेध, पुरुषमेध, शम्याप्रास (सत्रयज्ञ) वाजपेय, निरर्गल (सर्वमेध) यज्ञों को करके ब्राह्मणों को धन दिया।

गावो सयनञ्च वत्थंच नारियो समलंकता। रथेचाजञ्जसंयुत्ते सुकते चित्त सिव्वने ॥21॥

निवेसनानि सम्मनि सुविभत्तानि भागसो।

नानाधञ्जस्य पूरेत्वा ब्राह्मणानं अदाधनं ॥22॥

गौएँ, गलीचे, कीमती पोशाकें, रूपवती स्त्रियाँ, बढ़िया रथ, रंगीन चित्र, विशाल भवन तथा नाना प्रकार के धान्यों से पूरित धन ब्राह्मणों को दिया।

ते च तत्थ धनं लद्धा सन्निधिंसमरोचयुँ।

तेसं इच्छावतिण्णानं भीय्योतण्हा पवड्ढथ।

ते तत्थ मन्ते गन्थेत्वा ओक्काकं पुनुवागमुँ ॥23॥

उन ब्राह्मणों ने राजा से धन प्राप्त करके अमीर होना चाहा। उनकी तृष्णा और अधिक बढ़ी। तब ये उस समय के मन्त्रों का संग्रह करके पुनः इच्वाकु राजा के पास गये और बोले-

यथा आपाचं पठवी हिरञ्जं धन धानियं।

एवं गावों मनुस्सानं परिक्खारों सोहि पाणिने।

यजस्सु बहु से वित्तं यजस्सु बहु ते धनं ॥24॥

जैसे जल, पृथ्वी, स्वर्ण और धन धान्य हैं वैसे ही गाय भी आवश्यक वस्तु है। तू इनका यज्ञ कर। तेरे पास बहुत धन है तू यज्ञ कर।

ततो च राजा सञ्ञत्तो ब्राह्मणे हि रधे सभो।

नेकसत सहस्सियो गावो अञ्ञे अधातयि ॥25॥

तब ब्राह्मणों से प्रेरणा पाकर राजा ने सैकड़ों हजारों गौओं का यज्ञ में वध किया।

न पादा न विसाणेन नारसुहिंयान्ति केनचि।

गावो एलक समाना सोरता कुम्भ दूहना॥

ता विसाणे गहत्वान राजा सत्येम घातयि ॥26॥

भेड़ के समान ही गौएँ- जो न पैर से न सींग से न किसी अन्य अंग से किसी को दुख देती हैं, वरन् घड़े भर कर दूध देती हैं उनके सींगों को पकड़ कर राजा ने वध किया।

ततो च देवता पितरो इन्दो असुर रक्खसा।

अधम्मो इति पक्कन्दुँ यं सत्यं निपती गवे ॥27॥

तब देवता, पितर, इन्द्र, असुर और राक्षस सब एक स्वर से चिल्लाये कि यह गौ पर शस्त्र चलाना घोर अधर्म है।

तयो रोगा पुरे आसु इच्छा अनसनं जरा।

पसृनञ्च समारम्भा अट्टान वुतिमागभुँ ॥28॥

प्राचीन काल में केवल तीन रोग थे- तृष्णा, भूख, बुढ़ापा। पर यज्ञों में पशु वध करने से 98 प्रकार के रोग फैल गये।

एसो अधम्यो ओक्कन्तो पुराणो अहु।

अदूसिकायो इञ्ञन्ति धम्मा धंसेन्ति याजका 29

इस प्रकार यह पापकर्म (पशु यज्ञ) आरम्भ हुआ। और इस अधर्म से यज्ञ कराने वाले ब्राह्मण धर्म से पतित हो गये।

एवं धम्मे वियापन्ने विभिन्ना सुद्दवेसिका।

पुथु विन्ना खत्तिया पतिं भरिया अवमञ्ञय ॥30॥

“ब्राह्मणों के पतित होने पर क्षत्रिय भी धर्म च्युत हुए, वैश्य और शुद्र भी अपनी मर्यादा छोड़कर छिन्न-भिन्न हो गये। स्त्रियाँ पतियों का अपमान करने लगी।”

उपरोक्त उदाहरण में पशुबलि का प्रचलन ब्राह्मणों की स्वार्थपरता से हुआ मालूम होता है। शास्त्र का मर्म ठीक प्रकार से न समझना और एक शब्द के जो कई अर्थ होते हैं। उनको ठीक प्रकार न समझकर अर्थ को अनर्थ कर बैठने का अज्ञान भी इसका कारण हो सकता है। जो भी हो पशुवध- सो भी यज्ञ जैसे पवित्र कार्य के सम्बन्ध में करना, कभी भी उचित नहीं ठहराया जा सकता।

विचार करने की बात यह है कि नित्यप्रति की अनिवार्य हिंसा के दुख से दुखित होकर उसका प्रायश्चित करने के निमित्त जिस संस्कृति में नित्य पाँच यज्ञ करने का विधान है उससे जानबूझ कर बड़े-बड़े पशु मारकर होमने की बात हो सकती है इसकी कल्पना करना भी कठिन है देखिए-

पंचसूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्युपस्करः।

कण्डिनी चादकुम्भश्च बध्यते यास्तु वाहयन्।

तासाँक्रमेण सर्वांसाँ निष्कृर्त्यथं महर्षि भिः।

पंच क्लृप्ता महायज्ञा प्रत्यहं गृहमेधिनाम्।

- मनु॰ 3।68,69

प्रत्येक गृहस्थ के यहाँ चूल्हा, चक्की, झाडू ओखली और जलपात्र यह पाँच हिंसा के स्थान हैं। इनको काम में लाने से गृहस्थ पाप में बँधता है। इनसे छूटने के लिए पाँच महायज्ञ ऋषियों ने कहे हैं।

इतिहास में ऐसे वर्णन उपलब्ध हैं जिसमें घोड़ा तो क्या चींटी तक की भी हत्या नहीं की गई देखिए-

तस्य यज्ञो महानासीदश्वमेधो महात्मनः। वृहस्पतिरूपाध्यायस्तत्र होता वभूवह॥

प्रजापति सुताश्चात्र सदस्याश्चा भवंसस्त्रयः।

ऋषिर्मेधातिथिश्चैव तण्ड्यचश्चैव महानृषिः॥

ऋषिः शान्तिर्महाभागस्तथा वेद शिराश्चयः।

ऋषि श्रेष्ठश्च कपिलः शालिहोत्र पितास्मृताः॥

आद्यः कठस्तैरिश्च एते पोडस ऋत्विजः

संभूताः सर्व सम्भारास्तोस्मिन् राजन्महाक्रतौ।

न तत्र पशुघातीऽभूत स राजै-रास्थितोऽभवत्।

महा. शान्ति 33-38

उस राजा का बहुत विशाल अश्वमेध हुआ। उसमें बृहस्पति उपाध्याय थे। प्रजापति के पुत्र सदस्य बने। मेधा तिथि, ताण्ड्य, शान्ति, वेदशिरा, कपिल, कठ, तैत्रिदि और बड़े-बड़े ऋषि उसी यज्ञ में ऋत्विज् थे। उस यज्ञ में सामग्री तो विपुल थी पर एक भी पशु का वध न हुआ।

कोई निर्दोष जीव चाहे यज्ञ में मारा जाय, देवी के ऊपर चढ़ाया जाय, चाहे वह कसाई खाने में काटा जाए परिणाम वही प्राप्त होता है जो हत्यारों को होना चाहिये। भागवत में ऐसे ही हत्यारे एक राजा के सम्बन्ध में वर्णन आया है-

भो भोः प्रजापते राजन्य शून्यश्य त्वयाध्वरे।

संज्ञापितान् जीव संघान्निघृणेन सहस्त्रशः।

एते ता सम्प्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव।

सम्परेतमयः कुटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः।

भागवत 4। 25।7-8

हे राजन्- तेरे यज्ञ में सहस्रों पशु निर्दयता पूर्वक मारे गये। वे तेरी क्रूरता को याद करते हुए क्रोध में भरे हुए तीक्ष्ण हथियारों से तुझे काटने को बैठे हैं।

यज्ञ में मारा हुआ पशु स्वर्ग जाता है इस मनगढ़ंत कहानी की मसखरी उड़ाते हुए एक तार्किक ने बहुत अच्छा प्रश्न उपस्थित किया है-

पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति।

स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते।

यदि ज्योतिष्टोम में मरा हुआ पशु स्वर्ग चला जाता है तो यजमान अपने बाप को यज्ञ में क्यों नहीं हवन कर देता, ताकि वह स्वर्ग को चला जाय।

यज्ञों के सम्बन्ध में यह कलंक लगाना किसी भी प्रकार उचित नहीं कि उनमें हिंसा का विधान है। मध्यकाल में कुछ लोगों ने ऐसे कुत्सित कर्म करके यज्ञ को बदनाम अवश्य कराया है। पर उनके कृत्यों से यज्ञ की शाश्वत मूल भावना में वस्तुतः कोई परिवर्तन नहीं होता। यज्ञ का उद्देश्य महान है। वह सम्पूर्ण संसार को प्राणदान करने वाला है। गंगा में कोई व्यक्ति गन्दगी फेंके तो उससे गंगा कलंकित नहीं होता। इसी प्रकार पशु हिंसा का अनर्थ उनके नाम पर किसी समय किया भी गया हो तो भी यज्ञ भगवान का विशुद्ध रूप सदा पवित्र ही रहेगा।

‘दक्षिणा वाद’ का निंदनीय रूप

ब्राह्मण को भू सुर भी कहते हैं। भूसुर का अर्थ है पृथ्वी का देवता। अन्य मनुष्य तो मानवता के साधारण नियमों का पालन करते हुए अपने कर्त्तव्य धर्म की रक्षा ही कर पाते हैं। पर ब्राह्मण इससे बहुत आगे बढ़ा होता है वह अपने ऊपर संयम, त्याग, तपस्या के कठोर नियमों का पालन करके अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताएं न्यूनतम बना लेता है, यहाँ तक कि भोजन वस्त्र में भी इतनी कमी करता है कि उसका जीवन निर्वाह अत्यन्त ही सरल हो जाय। कारण यह है ब्राह्मण को अपनी शक्तियों का अधिकतम भाग परमार्थ में, लोक सेवा में, भगवत् आराधना में लगाना होता है। यदि वह अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और आवश्यकताओं को बढ़ा ले तो फिर वह अपने अभीष्ट उद्देश्यों को पूरा नहीं कर सकता। ब्राह्मण सदा से इस तथ्य को भली प्रकार समझते रहे हैं और साँसारिक प्रलोभनों से बचते रहे हैं। उनकी इस त्याग वृत्ति ने ही उन्हें भूसुर बनाया। समस्त समाज में वे श्रेष्ठ गिने गये। संसार ने उनके त्याग का प्रत्युपकार अपने अन्तःकरण की सच्ची श्रद्धा उनके चरणों पर उड़ेल कर चुकाया। इस गये-गुजरे जमाने में भी सच्चे ब्राह्मणों के वंशजों का मान इसलिए होता है कि इनके पूर्वज किसी समय में भूसुर थे। आज ये अपने पूर्वजों जैसे श्रेष्ठ नहीं रहे तो यदि उन भूसुरों की महानता का एक कण भी इनमें शेष होगा तो भी ये प्रणाम करने योग्य हैं। आज भी ब्राह्मण को अपने पूर्वजों की विशेषताओं के कारण मान प्राप्त होता है और उन्हें सब लोग झुककर प्रणाम करते हैं। ब्राह्मणत्व की माता गायत्री और पिता यज्ञ हैं। भगवान मनु ने कहा है कि कोई व्यक्ति जन्म से ही अलग नहीं होता वरन् स्वाध्याय, व्रत, होम, वेद, ज्ञान, तप, यज्ञ आदि द्वारा उसे ब्राह्मण बनाया जाता है। यथा :-

स्वाध्यायेन व्रतैर्होमैस्त्रैविद्येनज्ययासुतैः

महायज्ञैश्च यज्ञश्च ब्राह्मी यं क्रियते तनुः॥

स्वाध्याय, व्रत, होम, त्रियै विद्या के ज्ञान, धार्मिक सन्तानोत्पादन, यज्ञ तथा महायज्ञों से यह शरीर ब्राह्मण किया जाता है।

वेद जननी गायत्री की उपासना से स्वाध्याय, व्रत, वेदज्ञान आदि का आरम्भ होता है और यज्ञ का ताश्चर्या से सम्बन्ध है। इस प्रकार गायत्री माता और यज्ञ पिता से ही ब्राह्मणत्व का जन्म होता है। माता-पिता की महिमा बढ़ाना, उनके महत्व को उज्ज्वल एवं प्रकाशवान करना सत्पुत्र का कर्त्तव्य है। पूर्व काल में ब्राह्मण लोग बड़े प्रयत्न, उत्साह, लगन एवं श्रम से स्वयं गायत्री उपासना करते थे और सभी द्विजों को इस कल्याण कारक मार्ग पर प्रवृत्त करके उन्हें सुख शान्ति के परमलक्ष्य तक पहुँचाने का पुण्य लाभ करते थे। इसी प्रकार स्वयं यज्ञ करते थे और अन्य अधिकारियों को प्रेरणा पूर्वक यज्ञ करके विश्व कल्याण के एक महान परमार्थ का आयोजन करते थे। उन्हें यज्ञादिक में कोई दान दक्षिणा मिलती थी तो उसके एक कण का उपयोग भी व्यक्तिगत भोग ऐश्वर्य में नहीं करते थे वरन् इस हाथ लेकर उसे यज्ञ, गुरुकुल, ग्रन्थ निर्माण, सत्संग आयोजन, चिकित्सा, आदि कार्यों में लगा देते थे। ब्राह्मण का कर्त्तव्य ही यह था (1) विद्या पढ़ना-विद्या (2) दान लेना-दान देना (3) यज्ञ करना-यज्ञ कराना। स्पष्ट है कि ब्राह्मण जीवन की गतिविधि परमार्थ मय ही होती थी। वह वेद विद्या (गायत्री) यज्ञ और परमार्थ (दान) में निरन्तर संलग्न रहता था।

समय के कुचक्र ने ब्राह्मण का भी पतन कर दिया। वह अपने कर्त्तव्य धर्म को भुलाकर लोभ में फँसने लगा। कष्ट साध्य तपश्चर्याओं और लोक सेवा की प्रवृत्तियों से आँख चुराकर-पैर पुजाने और दक्षिणा बटोरने के लालच में फिसलने लगा। धीरे-धीरे जब यह प्रवृत्ति अधिक बढ़ी तो उसने दक्षिणा बटोरना ही अपना लक्ष्य बना लिया। जिस कार्य में उन्हें अधिक दक्षिणा मिल उसे ही करना उनने लक्ष्य बनाया। लोगों से कहने लगे स्वाध्याय, उपासना, तप, यज्ञ आदि में समय और धन खर्च करने की अपेक्षा भरपूर दक्षिणा हमें दो और स्वर्ग के अधिकारी बन जाओ। ऐसे अनेक श्लोक उनने पुस्तकों में सम्मिलित कर लिए और दक्षिणावाद का झण्डा गाड़ दिया। सारे धर्म कर्म की धुरी दक्षिणा बन गई।

ब्राह्मण को उसकी शारीरिक आवश्यकता की वस्तुएं अन्न, वस्त्र, दूध (गौ) यज्ञ में दी जाती थी ऐसा प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख है।

गौ दद्यात यज्ञवानन्ते ब्रह्मणे वासमी तथा।

-कात्यायन

यज्ञ के अन्त में ब्राह्मण को गौ और वस्त्र देना चाहिए। गौ, अन्न, वस्त्र जैसी सस्ती और अधिक संख्या में जमा करने में असुविधाजनक वस्तुओं को लेने के स्थान पर उसने सोना-चाँदी आदि कीमती और अधिक मात्रा में आसानी से संग्रह हो सकने वाली वस्तुओं के विधान बनाये। यथा-

सुवर्णं परमं दानं सुवर्णं दक्षिणा परा।

सर्वेषामेव दानानाँ सुवर्णं दक्षिणेष्यते।

सोने का दान ही परम दान है। सोने की दक्षिणा ही विशेष दक्षिणा है। दानों में स्वर्ण का दान ही प्रशंसनीय है।

एकादश स्वर्ण निष्काः प्रदातव्या सदक्षिणाः।

पलान्येकादश तथा दद्याद्वित्तानुसारतः

अन्येभ्योऽपि यथाशक्ति द्विजेभ्यो दक्षिणें दिशेत्

यज्ञ कराने वाले को 15 अशर्फी देनी चाहिए। अपनी सामर्थ्य ठीक हो तो 44 तोले सोना देना चाहिए। अन्य ब्राह्मणों को भी शक्ति भर दक्षिणा देनी चाहिए।

‘दक्षिणा च फलप्रदा।’ दक्षिणा ही फल देने वाली है। ‘सर्वेषा कर्मणं देवि सारभूता च दक्षिणाँ।’ सब कर्मों में दक्षिणा ही सार है। ‘दक्षिणा दक्षतेः समर्धयात कर्मणः व्यद्ध सलर्धयतीति।’ यदि यज्ञ कर्म में कुछ न्यूनता रह जाती है तो दक्षिणा बढ़ा देने से उसकी पूर्ति हो जाती है।

माषाणं षोडशादूर्ध्व कुर्याद्धेम पवित्रकम।

तेभ्यः स्वल्पतरं न्यूनं न कुर्वीत् कदाचन॥

सोलह मासे से अधिक भारी सोने की पवित्री बनावे। इससे जरा भी कम वजन न हो।

वस्त्र युग्मं महावस्त्रं केयूरं कर्णभूषणम।

अंगुलिभूषणश्चैव मणि बन्धस्य भूषणम।

कण्ठाभरण युक्तानि प्रारम्भे धर्म कर्मणः।

पुरोहिताय दत्वाऽय ऋत्विग्भ्यश्चापि दाप्येत्॥

- लिंग पुराण

धोती, दुपट्टा, दुशाला, कानों के आभूषण, कर्ण फूल, अंगूठी कंगण, गले का हार यह वस्तुएँ धर्म कर्म आरम्भ करते ही पुरोहित और ऋषित्वों को दान करें।

दक्षिणात्द्युत्तमा मध्यमाचाधमेति त्रिधामता।

तत्र सौवर्ण निष्काणि दस साहस्त्रिकोत्तमा।

तदर्धं मध्यमा प्रोक्ता तृतीया त्रिसहाका॥ -महार्णवे

दक्षिणा तीन प्रकार की कही गई है। उत्तम 10 हजार निष्क (36250 रुपया) मध्यमा 5 हजार निष्क (18125 रुपया) अधम दक्षिणा 3 हजार निष्क (10875 रुपया) होती है।

कभी-कभी ऐसा भी होता था कि मन चाही दक्षिणा न दे सकने पर यजमान लोग दक्षिणा उधार कर देते थे। उधार पटाने की जब उनमें सामर्थ्य न होती थी, ब्राह्मण तकाजा करते थे, फिर भी वह वसूल न हो पाता था, ऐसी दशा में यजमान को नरक जाने का भय दिखाया गया। देखिए-

कर्ताकमणि पूर्णोऽपि तत्क्षणात यदि दक्षिणाम्।

न दद्यात् ब्राह्मणेभ्यश्च दैवेनाज्ञानतोऽथवा।

मुहूर्ते समतीते च द्विगुणा सा भवेद् ध्रुवम्॥

एकरात्रे व्यतीते तू भवेद्दस गुणा च सा।

त्रिरात्रेवै दशगुणं सप्ताहे द्विगुणा ततः।

मासे लक्षगुणा प्रोक्ता ब्राह्मणानाँ व वर्द्धते।

सम्वत्सरे व्यतीते तु सा त्रिकोटि गुणा भवेत्।

कर्म तद् जमानानाँ सर्व वै निष्फलं भवेत।

स च ब्रह्मस्वापहारी न कर्मार्होऽशुचिर्नेरः।

दरिद्री व्याधि युक्तश्च तेन पापेन पातकी।

तद्गृहाधाति लक्ष्मी च शापं दत्वा सुदारुणम्।

पितरो नैव गृह्णन्ति तद्दतं श्राद्ध तर्पणम्।

एवं सुराश्च तत्पूजाँ तद्दत्रं पावका हुतम्।

-ब्रह्मवैवर्त

यज्ञ आदि कार्य पूरा हो जाने पर भी जो दैव योग से अज्ञानवश दक्षिणा नहीं देता तो प्रति क्षण वह दक्षिणा दूनी होती जाती है। एक रात बीत जाने पर छः गुनी, तीन रात बीत जाने पर दस गुनी, सात दिन बीत जाने पर बीस गुनी, एक महीना बीत जाने पर लाख गुनी, एक वर्ष बीत जाने पर करोड़ गुनी हो जाती है। और यजमान का वह सब कर्म निष्फल हो जाता है। वह यजमान ब्रह्मधन का चोर, सत्कर्मों के अयोग्य, और अपवित्र हो जाता है। तथा उस भयंकर पाप के कारण दरिद्री एवं व्याधि ग्रस्त हो जाता है। लक्ष्मी उसके घर से कठिन श्राप देकर अन्यत्र चली जाती है। पितृगण उसके हाथ का श्राद्ध तर्पण ग्रहण नहीं करते। देवता उसकी आहुति तथा पूजा को स्वीकार नहीं करते।

नार्ययेद् यजमानश्च्ौद् याचितारं च दक्षिणाम्।

भवेद् ब्रह्म स्वापहारी कुम्भी पाकं व्रजेद् ध्रुवम्।

ततो भवेत् स चाण्डालो व्याधि युक्ते दरिद्रकः।

पातयेत् पुरुषान सप्त पूर्वकान् वे पूर्व जन्मनः।

उधार की हुई दक्षिणा का तकाजा करने पर भी यदि यजमान दक्षिणा नहीं देता तो वह ब्रह्म धनहारी निश्चय ही कुम्भी पाक नरक में पड़ता है वहाँ एक लक्ष वर्ष रहता है और यम दूतों द्वारा कुटता-पिटता है। इसके बाद वह चाण्डाल, व्याधि ग्रस्त, दरिद्री बनता है। उसकी सात पीढ़ी के पूर्वज नरक में चले जाते हैं।

यत्कर्म दक्षाणाहीनं कुरुते मूढ़धीशठः।

सपापी पुण्य हीनश्च.......॥

जो दक्षिणा रहित कर्म करता है वह मूढ़ बुद्धि शठ, पापी, पुण्य हीन है।

यों यज्ञ कराने वाले ब्राह्मणों को दक्षिणा देना उचित और आवश्यक है, शास्त्रों में इसका उल्लेख भी है। साधारण विवेक बुद्धि से सभी यज्ञ कराने वाले यथा शक्ति देते भी है पर दक्षिणावाद को-ऐसे निकृष्ट रूप में उपस्थित करने से यज्ञ कराने वालों का मान बढ़ा नहीं, वरन् घटा ही। दक्षिणा और ब्रह्मभोज का बहुत बोझ होने पर यजमान लोगों के लिए यज्ञादि करना कठिन हो गया। उनकी उपेक्षा होने लगी और धीरे-धीरे उनकी प्रथा ही घट गई। उसकी हानि सभी को हुई, ब्राह्मणों को सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीरने की कोशिश से केवल पछताना हाथ लगा। यजमान यज्ञ से प्राप्त होने वाले लाभों से वंचित हो गये। संसार में अवाँछनीय वातावरण बड़ा और उसकी शुद्धि न होने से जनता दैवी कृपाओं से वंचित होकर सुख शान्ति से वंचित हो गई। इस प्रकार दक्षिणावाद किसी के पक्ष में भी हितकर सिद्ध न हुआ, वरन् सभी की हानि हुई। यज्ञ रहित ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से च्युत हुए और उनने अपनी वेदमाता तथा यज्ञपिता को उपेक्षित, लाँछित एवं अस्त-व्यस्त दशा में डाल दिया। अब ऐसे विद्वान याज्ञिकों की आवश्यकता है जो यज्ञ विद्या का प्रसार करने के लिए निर्लोभ एवं निःस्वार्थ भाव से उद्यत हों। तभी यज्ञ विद्या का समुचित विकास होना सम्भव है।


यज्ञ में सहयोग करना कर्त्तव्य है।

यज्ञ की उपेक्षा करना, निन्दा करना, असहयोग करना या उसमें विघ्न उत्पन्न करना बहुत ही निन्दनीय बात है। शास्त्रकारों ने ऐसे लोगों की निन्दा की है और उन्हें अधोगामी बताया है। ऐसी स्थिति से बचने का सभी को प्रयत्न करना चाहिए। यथासम्भव स्वयं यज्ञ करना उचित है, कम से कम दूसरों के प्रयत्न में उत्साह जनक सहयोग तो अवश्य ही करना चाहिए।

तामिस्त्रमन्धतामिस्र महा रौरव ररवौ।

असिपत्र वनं घोरं कालसूत्र भव चिकम्।

विनिन्दकाकाँ वेदस्य यज्ञ व्याघात कारिणाम्। स्थान मेतत् समाख्यातं स्वधर्म त्यागिनश्चवे।

-विष्णु पुराण 6।1।41-42

वेद की निन्दा करने वाले तथा यज्ञ में विघ्न पहुँचाने वाले धर्म घाती के लिए तामिस्र, अन्धतामिस्र, रौरव, महारौरव, असिपत्र तथा कालसूत्र नामक नरक बने हुए हैं जहाँ वह चिरकाल तक घोर कष्ट पाता है।

देवान ह चै यज्ञेन यजमानास्तानसुररक्षसानि ररक्षुर्न यक्ष्यध्वमिति। यद्यदरक्षं स्तस्माद्रक्षाँसि।

-शतपथ

एक समय देवगण यज्ञ कर रहे थे। राक्षसों ने उनके यज्ञ में अनेक प्रकार के विघ्न किये और कहा यज्ञ न करो। इसी कारण उनकी राक्षस संज्ञा हुई। राजा बेन ने घोषणा की थी।

न यष्टव्यं न दातव्यं न होतव्यं द्विजाः क्वचित।

-भागवत 4।14।6

अर्थात् उसके राज्य में यज्ञ और दान न हों, उनकी यह नीति ही उसे दुर्गति को ले गई।

गीता में भगवान ने यज्ञ रहित मनुष्य की भर्त्सना करते हुए कहा है कि ऐसे मनुष्यों के लोक और परलोक दोनों बिगड़ते हैं।

नायं लोकोऽस्त्य यज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।

-गीता

हे अर्जुन, यज्ञ न करने वाले को इस लोक का भी सुख नहीं मिलता, फिर परलोक के सुख की तो बात ही क्या है।

नास्त्य यज्ञस्य लोको वै नायज्ञो विन्दते शुभम्।

अयज्ञो न च पूतात्मा नश्यतिच्छिन्न पर्णवत

-शंख

यज्ञ न करने वाला मनुष्य लौकिक और पारलौकिक सुखों से वंचित हो जाता है। यज्ञ न करने वाले की आत्मा पवित्र नहीं होती और वह पेड़ से टूटे हुए पत्ते की तरह नष्ट हो जाता है।

या वै प्रजायज्ञे अनन्वाभक्ताः पराभूता वै ताः। एवमेवैतद्या इमाः अपरा भूतास्ता यज्ञमुखं आभजति।

(कृष्ण यजु॰ 3। 1 20)

जो लोग यज्ञ में सहयोग नहीं करते वे निन्दनीय हैं। यज्ञ में सहयोग करने वाले लोग ही प्रशंसा के पात्र हैं।

अयज्ञियो हतवर्चा भवति। अथर्व 12 । 2 । 37

यज्ञ रहित मनुष्य का तेज नष्ट हो जाता है।

इसलिए यज्ञ की न तो उपेक्षा करनी चाहिए और न उसका कभी असहयोग करना चाहिए। वरन् जहाँ सुन पाये कि अमुक जगह यज्ञ हो रहा है वहाँ बिना बुलाये आ पहुँचे और श्रद्धा पूर्वक परमार्थ बुद्धि से उसमें सहयोग करें। कहा भी है-

अनाहूतोऽध्वरं व्रजेत्।

अर्थात्- बिना बुलाया भी यज्ञ में सम्मिलित हो।

जो लोग सार्वजनिक यज्ञों की व्यवस्था करते हैं उन्हें एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि यज्ञ के निमित्त संग्रह हुए व दान में आये हुए धन में से एक पाई भी स्वार्थ में न लगावें। यज्ञ के धन में से चुराया हुआ पैसा मनुष्य की घोर दुर्गति का कारण होता है। यथा-

यज्ञार्थमर्थभिक्षित्वा यो न सर्व प्रयच्छति।

स याति भासताँ विप्रः काकताँ वा शतं समाः।

-मनु

यज्ञ के निमित्त इकट्ठे किये समस्त धन को जो यज्ञ में ही नहीं लगाता, वह सौ वर्ष तक मुर्गे या कौए की योनि में दुख भोगता है।

यज्ञार्थ लब्धमददद् मासः को कोऽपि वा भवेत्।

-आचराब्याय 127

जो व्यक्ति यज्ञ के लिए एकत्रित धन को पूर्णतया यज्ञ में ही नहीं लगा देता वह कौए या मुर्गे की योनि में जाता है।

यज्ञ में रही हुई त्रुटियाँ

यज्ञ में जिन वस्तुओं की आवश्यकता है, कई बार वे सब उपलब्ध नहीं होती। कई बार यज्ञ आदि कर्म करने की इच्छा रखने वाले की परिस्थिति ऐसी नहीं होती कि उन सब वस्तुओं को जुटा सके। धनाभाव, समयाभाव अथवा जानकारी की कमी से सब वस्तुएं प्राप्त नहीं हो सकती, जिनका उस में विधान है। ऐसी दशा में कितने ही व्यक्ति निराश हो जाते हैं और उस शुभ कर्म को करने का विचार ही छोड़ देते हैं। कारण यह है कि कई अविवेकी मनुष्य इस प्रकार का भय लगा देते हैं कि पूर्ण विधान की सम्पूर्ण वस्त्र पूरी-पूरी मात्रा में न होंगी तो यज्ञ निष्फल हो जायगा या उसका विपरीत परिणाम होगा, कोई उल्टी हानि होगी। यथाशक्ति, सामर्थ्यानुसार या जितना भी बन पड़े उतना भी शुभ है। जो अशर्फी दान नहीं कर सकता, वह पैसा भी दान न करे यह कोई दलील नहीं हैं जो अशर्फी या रुपया दान नहीं कर सकता, वह पाई पैसा जो कुछ भी सत्कर्म में लगा दे उतना भी उत्तम ही है। अन्य शुभ कर्मों की भाँति यह बात यज्ञ पर भी लगा होती है। ऋषियों ने इस सम्बन्ध में भली प्रकार स्पष्टीकरण किया है और बताया है कि लिखी हुई वस्तुएं उपलब्ध न होने पर उनके स्थान पर अन्य वस्तुएं लेकर भी काम चलाया जा सकता है या कम वस्तुएं भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। देखिये-

घृतार्थे गोघृतं ग्राह्यं तदभावे तु माहिषम्।

आजं वा तदभावे तु साक्षत्तैलमयीप्यते॥

तैलाभावे ग्रहीतव्यं तैलं जर्तिल सम्भवम्॥ तद्भावेऽतसीस्नेहः कौसुम्भः सर्पषोद्धवः॥ वृक्षास्नेहीऽथवा ग्राह्यः पूर्णलाभे परः परः।

तदभावे यव व्रीहि श्यामाकान्यतमोद्भवः।

-मण्डन।

यज्ञ में गाय का घी सर्वोत्तम है। वह न मिले तो भैंस का घी लें। उसके अभाव में बकरी का, वह भी न हो तो शुद्ध तेल-जर्तिल, तीसी, कुसुम या सरसों का लें। वह भी प्राप्त न हो तो गोंद या जौ, चावल, साँवा आदि की चिकनाई से काम चलाएं। ऐसा ही मत बोधायन का भी हैं-

यथोक्तवस्त्व संपतौ ग्राह्यं तदनुकारियेत्।

यवानाभिव गोधूमा ब्रीहीणामिव शालयः

आज्यंद्रव्य मनादेशे जुहोतिषु विधीयते।

दध्य लाभेपयः कार्य मघ्व लाभे तथा गुडः।

घृत प्रतिनिधिं कुर्यात्पयोवादधिवा बुधः।

आज्यहोमेषु सर्वेषु गव्य मेव घृतं भवेत।

तदभावेमहिष्यास्तु आजमाविकमेववा।

तदभावे तुतैलं स्यात्तदभावेतुजार्तिलम्॥

तद्भावेतु कौसुम्भं तदभावे तु सार्पषम्।

होमादि कर्म में विहित वस्तु प्राप्त न होने पर उसी के तुल्य अन्य पदार्थ से काम चलावे। जैसे जौ के न मिलने पर गेहूं, ब्रीहि (बढ़िया चावल) न मिलने पर शालि के चावल, सुतों के अभाव में काँस कर, दही के अभाव में दूध, मधु के अभाव में गुड़, घी के स्थान पर दूध या दही लेवे। घी से मतलब गौ घृत का है पर न मिले तो भैंस, बकरी या भेड़ का ले लें, वह भी न मिले तो तिल के, कसूम के, सरसों आदि के तेल से होम करें।

शतपथ ब्राह्मण 11। 2। 4 ।4 में याज्ञवलक्य जी आपातकालीन हवन के सम्बन्ध में इस प्रकार अपना अभिमत प्रकट करते हैं,

‘यत्पयोनस्यात् केन जुहुयात।’

प्रश्न- यदि दूध घी न हो तो किससे हवन करें?

‘ब्रीहियवाभ्यामिति।’

उत्तर- धान या जौ से करें।

“ब्रीहि यवौ न स्याताँ केन जुहुयात?”

प्रश्न- यदि धान और जौ भी न हों तो किससे हवन करें?

“या अन्या ओषधय इति,”

उत्तर- जो और औषधियाँ हों उनसे ही करें।

‘यदन्या ओषधयो न स्युः केन जुहुया इति?’

प्रश्न- यदि अन्य औषधियाँ भी न हों तो क्या होम करें?

‘या आरण्या औषधय इति-’

उत्तर- जंगली अनाज से करें।

‘यदि आरण्या औषधयों न स्युः केन जुहुयाँ इति?’

प्रश्न- यदि जंगली अनाज भी न हो तो क्या करें?

‘वानस्पत्येनेति’

उत्तर- वनस्पतियों का हवन करें।

यदि वानस्पत्यं न स्यात केन जुहुयात्?

प्रश्न- यदि वनस्पतियाँ भी न हो तो क्या करें?

‘अद्भिरिति’

उत्तर- जल से ही होम करें।

यदापोनस्युः केन जुहुया इति?

प्रश्न- यदि जल भी न हो तो क्या करें?

नवाऽइह तर्हि किंच ना सीदथैतद हुतैव सत्यं श्रद्धायामिति।

यदि कुछ न हो तो बिना आहुति दिये ही श्रद्धा रूपी अग्नि में सत्य रूपी हविष्य की आहुति दें।

कुछ भी हव्य वस्तु न मिलने पर केवल समिधाओं से भी हवन करने का वेदों में उल्लेख आता है। देखिए-

यदग्ने कानि कानि चिदाते दारुणि दध्मसि।

ताजुषस्वय विष्ठय।

नहि में अस्त्यध्यना न स्वधितिर्वनन्वति।

अथैता दृग् भरामिते। ऋग्वेद 8।102।19,20

हे अग्नि देव, मैं केवल छोटी-छोटी समिधाएँ लाया हूँ। इन्हें ही स्वीकार करो। मेरे पास न तो घी उत्पन्न करने वाला गौ है और पेड़ काट कर बड़ी समिधाएँ ला सकने लायक कुल्हाड़ी है। इसलिए जो कुछ लाया हूँ उसे ही स्वीकार करो।

गीता में भगवान ने स्पष्ट किया है कि शुभ कर्मों का कभी अशुभ परिणाम नहीं होता। “प्रत्यवायो न विद्यते” का आशय यही है कि सत्कर्म का अच्छा ही फल होता है बुरा नहीं। बुरा परिणाम तो कुविचारों या दुष्कर्मों से ही होना सम्भव है। सत्कर्मों में कोई त्रुटि रह भी जाय तो भगवान से सच्चे हृदय से क्षमा प्रार्थना कर लेने पर उसका दोष दूर होता है। यज्ञ के अन्त में ऐसी ही क्षमा प्रार्थना की भी जाती है जिससे उसमें रही हुई त्रुटियों का सहज ही परिमार्जन हो जाता है। कहा गया है कि-

प्रमादात् कुर्वताँ कर्म प्रच्यवेताध्वरेषुयत्। स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्णं स्यादितिश्रुतिः॥

प्रमाद आदि कारणों से यदि कोई गलती यज्ञ कर्म में रह जाती है तो भगवान से स्मरण मात्र से ही उसकी पूर्णता हो जाती है। ऐसे ही अभावों की पूर्ति के लिए क्षमा याचना स्वरूप यज्ञ के अन्त में भगवान से प्रार्थना की जाती है-

यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपो यज्ञक्रियादिषु। न्यून सम्पूर्णताँ याति सद्योवन्दे तमच्युतम॥

जिनके स्मरण एवं नामोच्चारण से तप यज्ञ आदि की न्यूनता तुरन्त पूर्ण हो जाती है उन भगवान को मैं भक्ति पूर्वक प्रणाम करता हूँ।

यज्ञ भावना भारतीय संस्कृति की मूलभूत भावना है। भारतीय जीवन यज्ञमय होता है। उसके आदर्श, उद्देश्य, विचार, भाव एवं कार्यों में यज्ञ भावना ओत-प्रोत रहनी चाहिए। यज्ञ का अर्थ है दान, संगतिकरण, देव पूजन। भारतीय संस्कृति की शिक्षा है कि हमारे जीवन में उदारता, लोक सेवा परमार्थ समाज हित एवं आत्म त्याग के लिए प्रमुख स्थान होना चाहिए यही दान है। एकता, मेल, संगठन, सद्भाव, शिष्टाचार, आत्मीयता, प्रेम, सहयोग आदि गुण संगतिकरण शब्द के अंतर्गत आते हैं। सत्पुरुषों का आदर, मर्यादाओं का अनुशासन सूक्ष्म अध्यात्मिक तत्वों के प्रति सुदृढ़ आस्था-यह देव पूजन है। इन अर्थों को जो जितना ही अपने व्यावहारिक जीवन में संमिश्रित करता है वह उतना ही बड़ा याज्ञिक है।

हर मन्त्र के साथ हम ‘स्वाहा’ बोलते हैं। स्वाहा का अर्थ है- मधुर भाषण। हमारे मुख से जब भी वाक् देवी-वाणी निकले तब वह कल्याण कारक, शान्ति दायक, एवं साधनाओं से परिपूर्ण हो। आहुतियों के अन्त में ‘इदमनमम’ कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि शुभ कर्मों को भी यश आदि स्वार्थों की दृष्टि से नहीं परमार्थ के उद्देश्य से ही करना चाहिए। इदमनमम- यह मेरा नहीं है। जो कुछ भी अच्छा चाहिए अपने को नहीं। इसी प्रकार साँसारिक वस्तुओं-धन, सम्पदा, स्वास्थ्य समय आदि को अपना ही मानना अपने ही स्वार्थ के लिए प्रयुक्त करना अनुचित है। इदमनमम- यह मेरा नहीं है यह तो परमार्थ के निमित्त सौंपी हुई अमानत है। ऐसा ही अपने धन वैभव के बारे में सोचना चाहिए। यज्ञ भावना लोभ, मोह, स्वार्थ, मद आदि निकृष्ट वृत्तियों का परिमार्जन कर हमें सच्चा मनुष्य बनाती है। यज्ञ भावना ही संसार की समस्त गुत्थियों का एकमात्र हल है। इस भावना को जीवित जागृत रखने के लिए यज्ञ किए जाते हैं। अनेक भौतिक लाभों के अतिरिक्त यज्ञ का प्रधान लाभ और उद्देश्य यही है। यज्ञ भावना को सजीव रखना हमारा कर्त्तव्य है।

इस मास का सर्वश्रेष्ठ यज्ञ

कुम्भ के अवसर पर गायत्री परिवार की ओर से सवालक्ष व्यक्तियों को गायत्री विद्या का ज्ञान दान करने का संकल्प गत अंक में छपा था। वह एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण संकल्प है। क्योंकि गायत्री साधना बढ़ेगी तब जब उसके सम्बन्ध में समुचित जानकारी हो। आज तो लोग गायत्री विद्या का महत्व और विज्ञान जानना तो दूर, उसका नाम तक नहीं जानते। इसलिए यदि भारत भूमि में प्राचीन काल की भाँति गायत्री माता की पुनः प्रतिष्ठा करनी है, इस महाशक्ति से भारत माता को प्राचीन वैभव, गौरव एवं बल से सुसज्जित करना है तो निश्चय ही पहला कार्य गायत्री माता के महत्व से जनता को परिचित कराना ही होगा। इस कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी हम सब गायत्री उपासकों की है। यह कुम्भ पर्व 12 वर्ष बाद आता है। इसका एक मात्र उद्देश्य ज्ञान प्रसार है। प्राचीन काल में लम्बी यात्राएं करके अपनी साधनाएं छोड़कर महात्मा ज्ञानी, विद्वान कुम्भ पर पहुँचते थे और जनता को सद्ज्ञान की शिक्षा देते थे। आज सभी अव्यवस्थाओं की भाँति कुम्भ पर्व भी मेला ठेला बनता जा रहा है पर उसके मुख्य उद्देश्य में तनिक भी परिवर्तन नहीं होता। ज्ञान प्रसार ही उसका उद्देश्य है। इसको जो जितनी मात्रा में पूरा करता है वह उतना ही कुम्भ पर्व का फल प्राप्त करता है।

हम सब लोग इस पर्व पर ‘महा’ अभियान का आयोजन कर रहे हैं। यह एक अश्वमेध से अधिक पुण्य फलदायक है। इस यज्ञ में भाग लेने के लिए भावना, समय और श्रम की अधिक आवश्यकता है। अन्य होम यज्ञ केवल धन खर्च कर देने मात्र से भी हो सकते हैं। पर इस अभिज्ञान यज्ञ में शामिल होने वालों को उसी प्रकार भावना श्रम तथा समय लगाना आवश्यक है। जिस प्रकार सवा लक्ष अनुष्ठान में 40 दिन तक और 24 हजार अनुष्ठान में 9 दिन तक निष्ठापूर्वक नियमित समय लगाना पड़ता है। ‘अभिज्ञान’ तप नारद जी करते थे। अन्य कोई ऋषि इस तप को न कर सका और न नारद की भाँति भगवान का प्रिय बन सका। नारद जी कुछ घड़ी भी एक स्थान पर नहीं ठहरते थे और भगवद् भक्ति के प्रसार में ही सारा समय लगाते थे। यही उनकी एकमात्र साधना थी। इस अद्भुत साधना ने ही उन्हें भगवान का प्राणप्रिय आत्मीय बना दिया था।

हममें से अनेक लोग अपने-अपने आत्मिक या भौतिक स्वार्थों के लिए समय-समय पर जप अनुष्ठान, होम, दान, तप आदि करते हैं। माता हमारे रोने पर दवा करके चुप करने के लिए कुछ वस्तु कुछ दम-दिलासा देती भी है। पर रोने मात्र से माता का वात्सल्य कौन प्राप्त कर सका है? अपनी बात आगे न रखकर माता की प्रसन्नता के लिए जो बालक कुछ करता है वह रोने वाले की अपेक्षा माता के हृदय में अपना स्थान बना लेता है।

इस बार ऐसा ही अवसर है जबकि हमें अपने लाभों के लिए नहीं वरन् माता का गौरव बढ़ाने के लिए ही वह अभिज्ञान करें। 40 दिन 24 दिन या 9 दिन का पूरा समय इस महानुष्ठान के लिए देकर नारद ऋषि की साधना का एक छोटा अनुकरण करें, जिस प्रकार हम अपनी कन्या के विवाह में, मेम्बरी जीतने में, व्यापार में प्रियजनों की बीमारी में, भयंकर मुकदमे से जी-जान एक कर देते हैं, खाना-सोना भूल जाते हैं, हानि-लाभ की परवाह नहीं करते, इस प्रकार की तत्परता के साथ हम कुछ समय माता के निमित्त, उसका गौरव बढ़ाने के लिए लगावें तो निश्चय ही यह कार्य एक साधारण महत्व के अनुष्ठान एवं यज्ञ की अपेक्षा भी अधिक सत्परिणाम उत्पन्न करेगा, वह हमें माता के अधिक समीप जायेगा। ज्ञान प्रसार से बढ़कर और कोई पुण्य इस भूतल पर नहीं है। जिनने अभी तक इस दिशा में कुछ नहीं किया है। वे आज ही कुछ करने की योजना बनावें, जो कुछ कर चुके हैं उन्हें और अधिक करना चाहिए। अत्यन्त ही सुन्दर तिरंगे मुख पृष्ठों की बहुत सस्ती पुस्तिकाएँ केवल इसी उद्देश्य के लिए छापी गई हैं। (1) गायत्री की गुप्त शक्ति (2) सुख-शान्ति दायिनी गायत्री (3) गायत्री से बुद्धि विकास (4) गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ (5) गायत्री का अर्थ सन्देश (6) स्त्रियों की गायत्री साधना (7) गायत्री उपासना कैसे करें? (8) गायत्री से यज्ञ का संबंध, आठों ही पुस्तकें गायत्री विद्या सम्बन्धी बहुत कुछ जानकारी उपस्थित करती है। इस पूरे सैट का मूल्य दस आना मात्र है, 14 जनवरी मकर संक्रान्ति से होकर 13 फरवरी कुम्भ संक्रान्ति तक इस साहित्य को बेचने या उपहार देने के लिए हम सब पूरा-पूरा प्रयत्न करें, प्रतिदिन 1 के हिसाब से 20 दिन में 30 सैट प्रसारित करने का प्रयत्न सफल होना बहुत सरल है। 1) की पुस्तकें बेच सकना या वितरण कर सकना कोई ऐसा कार्य नहीं हैं जिसे थोड़ी सी भी इच्छा, श्रद्धा, भावना और सामर्थ्य रखने वाला व्यक्ति न कर सके। जो इतना भी न कर सके वे 10 सैट) को तो प्रचारित कर ही सकते हैं।

यह तो एक साधारण ‘कोटा’ है जिसको पूरा करने की आशा उन सभी से की जानी चाहिए जो अपने को ‘गायत्री माता का भक्त’ कहते हैं। जो समय-समय पर अपने मतलब के लिए तो माता को पुकारते हैं पर उसकी प्रतिष्ठा एवं प्रसन्नता के लिए कुछ नहीं करना चाहते ऐसे लोगों की श्रद्धा संदिग्ध ही मानी जायगी। हम चाहते हैं कि कुछ ऐसे भी व्यक्ति निकलें जो इस पुण्य पर्व के अवसर पर अपना पूरा समय इसी कार्य में लगायें। पूर्व काल में अनेक उदाहरण ऐसे मिलते हैं जिनमें आध्यात्मिक मार्गों के साधनों की कष्ट सहिष्णुता, तप, त्याग, तथा सामर्थ्य से बहुत ऊँचे प्रण पूरे करने के चरित्र हैं। क्या आज कोई भी उदाहरण नहीं हो सकते? यह अवसर ऐसी ही परीक्षा का है, हम चाहते हैं कम से कम कुछ उदाहरण ऐसे अवश्य ही सामने आवें जिन पर गायत्री परिवार गर्व कर सके और उनसे प्रकाश लेकर अन्य व्यक्ति अपने पैरों की गति को तीव्र कर सकें। हमें ऐसी कुछ आत्माएँ दिखाई पड़ रही हैं उनके प्रयत्नों का सचित्र उल्लेख पाठक अगले अंकों में इन पंक्तियों में देखेंगे। कुम्भ पुण्य पर्व के लिए प्रकाशित हुए सस्ते सुन्दर गायत्री साहित्य का विस्तार करना अभिज्ञान की नारदीय योजना का प्रधान कार्यक्रम है। हम में से हर एक इसके लिए शक्ति भर प्रयत्न करे। अकेला या अपनी मण्डली समेत प्रचार के लिए निकले और अपने स्वजनों, मित्रों, परिचितों को गायत्री का महत्व बताते हुए इस साहित्य को दें। तथा उन्हें प्रभावित करे कि वे भी कुछ धन इस कार्य में खर्च करें। इस प्रकार अनेक व्यक्तियों का जो कोई सहयोग प्राप्त कर सकेगा वही अधिक कार्य कर पावेगा। यह ध्यान रखना चाहिए कि पुस्तकें साधुओं या ब्राह्मणों को ही देने के लिए नहीं है। उनमें तो बहुत कम अधिकारी मिलते हैं। इनका प्रचार तो साधारण धार्मिक जनता में करना हैं। इसलिए दवादारु के नोटिसों की तरह चाहे जहाँ इनको बाँट देना उचित नहीं। इसका प्रचार क्षेत्र मुख्य तथा धार्मिक वृत्ति के सद्गृहस्थों में होना चाहिए। अपने नगर में ही नहीं इन्हें तो डाक द्वारा परिचितों, मित्रों, स्वजन संबंधियों में भेजना चाहिए और हो सके तो उन्हें गायत्री उपासना की प्रेरणा के लिए एक-एक पत्र भी लिखना चाहिए।

इस पुण्य पर्व पर किया हुआ संकल्प अधूरा नहीं रहना चाहिए। सवालक्ष व्यक्तियों का गायत्री का ज्ञान देने के लिए हमें असाधारण श्रम तथा साहस का परिचय देना है। अपने लिए हम जीवन भर पुरुषार्थ करते रहे हैं। आइए, इस बारह वर्ष बाद आने वाले पुण्य पर्व पर माता का गौरव पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए भी कुछ त्याग, परिश्रम एवं पुरुषार्थ करें।


इस युग का यज्ञ


इस युग का यज्ञ (Kavita)

[1]

जल जाती जिसकी वेदी पर जग में व्याप्त विषमता, जीवन सौम्य, सरस कर देने की है जिसमें क्षमता,

अनाचार, अविचार, दुखद व्यापार जहाँ मिट जाते, हिंसा-प्रतिहिंसा के दुर्बल भाव नहीं हैं आते,

शपथ जिसे निष्काम कर्म की, विज्ञ वही इस युग का। जीवन को जागृति-मय कर दे, यज्ञ वही इस युग का॥

[2]

युद्ध, दमन, शोषण की जग में जली हुई है ज्वाला, बना हुआ प्रति राष्ट्र रक्त की आहुति देने वाला,

सृष्टि-तत्व को यदि ताँडव का अभी न ज्ञान हुआ है, व्यर्थ धर्म दर्शन संस्कृति का अनुसंधान हुआ है।

बहुत दूर है सत्य स्वयं जब शिव भय मान रहा है। पर मेरा मनु शाँति यज्ञ का दृढ़ व्रत ठान रहा है॥

[3]

यश की मलय न मिले किंतु, संतोष सुरभि तो बिखरे, जीवन के संघर्षों में विश्वास हृदय का बिखरे,

काँटे दूर न हों पर फिर भी हो सुमनों की रक्षा, पथ स्वयं ही चरणों को दे लक्ष्य प्राप्ति की दीक्षा,

कर्म और फल दोनों का हो भागी करने वाला। मानवता का अभिभावक यह जीवन-यज्ञ निराला॥

[4]

मन के कलुषित भाव स्वयं ही जल कर के मिट जायें, मन-मरुथल में मधु से प्लावित हो सुरसरि लहराये,

मन्दिर-सा व्यक्तित्व सत्य की प्रतिमा को बिठलाये, प्रति आगंतुक जहाँ अतिथि के सम ही आदर पाये।

स्वयं पूर्ण कर दे अभाव को जब मानस का सृष्टा। भाव-यज्ञ के लिए चिरंतन है कवि मन की निष्ठा॥

*समाप्त*

(श्री शिवशंकर जी मिश्र एम. ए.)