गायत्री माता

(श्री व्यंकटेश शर्मा, खलघाट)


गायत्री माता (Kavita)

माता-सी प्रिय गायत्री माता! तुल सकता इसकी तुलना में, कैसे और किसी का नाता?

जन्म दिया निज तनु तत्वों से, पालन किया सकल सत्वों से, लिया हमें आजन्म अंक में,

विषद् वेद वाणी की दाता। माता-सी प्रिय गायत्री माता॥

अग्रज अनुज अतुल उपजाये, सती सुता सज्जन सुत पाये, दिग्विजयी विज्ञान विशारद-

विस्तृत ब्रह्मज्ञान की दाता-माता-सी प्रिय गायत्री माता॥

क्या समता इसकी ममता की। अमित कथा इसकी क्षमता की॥ भव्य भावना भरित विभूषि-,

विभव विभूति-अभय भय त्राता। माता-सी प्रिय गायत्री माता॥

वंचित हो इसके प्रसाद से, तज सच्ची सेवा प्रमाद से, कर असहाय हाय! जनन को-,

जग जन कौन नहीं दुःख पाता। माता-सी प्रिय गायत्री माता।


गायत्री जीवन की एक आवश्यकता

(श्री रामकृष्ण स्थापक “राकेश” बी. ए. लखनादौन)

गायत्री ब्रह्म की वह शक्ति है जिससे मनुष्य अपना सम्बन्ध स्थापित करके अपने जीवन विकास के मार्ग में बड़ी सहायता प्राप्ति कर सकता है। ईश्वर की शक्तियाँ अनेक रूप में इस विस्तृत ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। उन सबमें प्रमुख शक्ति गायत्री ही है।

गायत्री का सर्वविदित लाभ यह है कि उससे हमारे पूर्वजन्मों के कुसंस्कार मिट जाते हैं और कुपात्रता दूर होती है। संस्कारी और सत्पात्र होना ही सच्चे अर्थों में गायत्री की शिक्षा ग्रहण करना है। जो लोग प्रायः अपने दैनिक जीवन की क्षुद्र कठिनाइयों के निवारण हेतु इस ब्रह्मशक्ति की सकाम उपासना करते हैं, वे इस प्रचण्ड शक्ति की महिमा से अनभिज्ञ हैं। बहुत बड़े दानी से जो कि सैकड़ों अशर्फियों और मुहरें दान दे रहा है यदि कोई याचक रोटी का टुकड़ा माँगे तो उस दानी व्यक्ति का अपमान करना है। माँगने वाले को पागल या अज्ञानी ही कहा जायगा। क्योंकि रोटी को तो कोई भी थोड़े परिश्रम से प्राप्त कर सकता है। यदि कोई वस्तु माँगनी ही हो तो देने वाले की योग्यता के अनुसार होनी चाहिये और साथ ही माँगने वाले को भी स्वयं माँगने वाली वस्तु के योग्य होना चाहिये। और जब इस प्रकार याचक और दाता दोनों योग्य होवें तभी किसी वस्तु का आदान प्रदान हो सकता है।

माँगने वाले को ऐसी कोई दुर्लभ वस्तु माँगनी चाहिये जो अपने प्रयत्नों से या साधारण साधनों के द्वारा प्राप्त न की जा सके। साँसारिक वस्तुओं को तो मनुष्य किसी न किसी रूप में अपने प्रयत्नों से प्राप्त कर ही लेता है। या मित्रों सम्बन्धियों आदि से माँगकर अपना कार्य चला सकता है। और यदि न भी मिले तो उस वस्तु विशेष के अभाव में भी अपना कार्य चला सकता है। कामना तो ऐसी दुर्लभ और मूल्यवान वस्तु की करनी चाहिये जो सरलता से प्राप्त न हो सके।

अब प्रभु उठता है कि ऐसी दुर्लभ और मूल्यवान् वस्तु क्या हो सकती है? वह है सद्बुद्धि सुसंस्कारिता, सत्पात्रता, दिव्यदृष्टि जिसने इन चीजों को प्राप्त कर लिया उसे फिर कोई वस्तु माता से माँगनी आवश्यक रह नहीं जाती है। गायत्री वेदों की माता है। वह क्रोध, लोभ, मोह आदि पापों का नाश करके मनुष्य को उत्तम मोक्ष की प्राप्ति कराती है। इस लोक में और परलोक में गायत्री से बढ़कर पापों को नाश करने वाली और कोई शक्ति नहीं है।

तप की महत्ता अनादि काल से लेकर वर्तमान काल तक चली आ रही है। पूर्व काल में तप ही प्रथम था तप के प्रभाव से ही वे लोग प्रतापी कहलाते थे। आजकल हम जिन्हें सुखी देख रहे हैं वह उनकी पूर्व संचित तपस्या का ही प्रभाव है। यह तपस्या ही धीरे-धीरे घट रही है यदि उसकी ओर ध्यान न दिया जावे तो आजकल के सुखी व्यक्ति भी बाद में क्षुद्र प्राणी सदृश्य हो जावेंगे। गायत्री के द्वारा ही तप साधन किये जाते थे और किये जाते हैं क्योंकि यही रास्ता एकमात्र सरल, सर्वसुलभ, हानि रहित, शीघ्र फलदायी और ग्रही-विरक्त स्त्री-पुरुष सभी के लिये सुसाध्य है।

जो व्यक्ति जिस वस्तु से लाभ उठाना चाहता है उसे उसके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेनी चाहिये। यदि किसी के पास बेशकीमती तलवार होवे और यदि वह उसे चलाना न जाने तो उसका तलवार रखना व्यर्थ ही है। गायत्री 24 अक्षरों का मन्त्र है जिसमें बीज रूप से उस महान् अध्यात्म विज्ञान की सभी बातें बीज रूप से मौजूद हैं इसलिए इसे भारतीय संस्कृति का बीज मन्त्र कहते हैं।

गायत्री को बहुधा लोग झाड़ फूंक का मन्त्र या जिससे धन, सन्तान, स्त्री, लाभ विजय प्राप्त हो सकती हैं, ऐसा समझते हैं। यह जानकारी अधूरी है हालाँकि ये उपरोक्त लाभ साधक को अपने आप प्राप्त होते हैं। गायत्री का सर्वोपरि महत्व यह है कि उसका एक एक अक्षर उन शिक्षाओं, आदर्शों और सिद्धान्तों पर प्रकाश डालता है जिनके द्वारा शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं को ठीक और सही तरीके से सुलझाया जा सके।

गायत्री विश्व धर्म है। गायत्री को यदि चारों वेदों के साथ तोला जावे तो वेदों से गायत्री का पलड़ा भारी होगा। यह वर्णन पुराणों में बड़े सुन्दर अलंकारिक ढंग से वर्णन किया जाता है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य अन्य शिक्षाओं में कितनी ही योग्यता और विद्वत्ता प्राप्त क्यों न कर ले परन्तु जब तक उसे गायत्री के 24 अक्षरों में सन्निहित शिक्षाओं का ज्ञान प्राप्त नहीं है वह योग्य विद्वान् अनुभवी कुछ भी नहीं है। क्योंकि अन्य अनेक शिक्षाएँ तो केवल साधन और सुविधाएँ ही प्रदान करती हैं परन्तु गायत्री तो जीवन जीने की कला सिखाती है। यदि हमें सुखी बनना है तो सुख साधनों के प्रयोग की विधि जानना जरूरी है, तलवार रखने का लाभ उसे ही मिलेगा जो तलवार को चलाना जानता हो जीवन उसी का सफल है जो जीवन जीने की विद्या जानता हो। गायत्री गीता, गायत्री रामायण और गायत्री स्मृति के आधार पर यदि मनुष्य इन 24 अक्षरों में सन्निहित सिद्धान्तों पर ध्यान दे तो निश्चय ही मनुष्य सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी स्वर्गीय सुख शान्ति का अनुभव करता हुआ अपने मानव जीवन को धन्य और सफल बना सकता है।

गायत्री उपासना मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। यह केवल श्रद्धा, शास्त्रवचन, परम्परा धार्मिक प्रथा या विश्वास पर आधारित क्रियाकाण्ड नहीं है वरन् बुद्धि संगत, विज्ञान सम्मत एवं प्रत्यक्ष व्यवहार में उपयोगी, अनुभव उपस्थित करने वाला महासत्य है। मैंने इसी रूप में गायत्री को समझा है और तदनुरूप ही उसकी उपासना में सच्चे मन से संलग्न होने का संकल्प कर रहा हूँ।


गायत्री के अनुभव

(श्री आनन्द स्वामी जी महाराज भूतपूर्व श्री खुशाल चन्द जी खुशद संस्थापक हिन्दी, उर्दू मिलाप)

गायत्री का जिक्र आते ही इस शरीर की कहानी सामने आ जाती हैं। छोटी अवस्था में यह शरीर जलालपुर जटाँ में था एक छोटे से गाँव में जो अब पाकिस्तान में है। इस शरीर से तो सारी दुनिया का रहने वाला हूँ सारी दुनिया ही मेरा घर है परन्तु इस शरीर का घर उस गाँव में था। गाँव छोटा था परन्तु व्यापार और दस्तकारी के लिये मशहूर था। गाँधी जी के स्वदेशी आन्दोलन से पहले ही खादी वहाँ बनती थी। उसे गुजराती कपड़ा कहा जाता था और दूर तक वह कपड़ा बिकने को जाता था। इसलिए पहले दिन से ही इस शरीर को स्वदेशी कपड़ा पहनने को मिला। उसके बाद कभी विदेशी कपड़ा नहीं पहना।

बचपन की बात है मैं छठी या सातवीं क्लास में पढ़ता था और बुद्धू (मूढ़मति) था। कुछ नहीं आता था। स्कूल में पहली घण्टी से ‘स्टेन्ड औन दी बेंच’ होता और फिर चौथी घण्टी पर जब तक स्कूल बन्द होता तब तक बेंच पर खड़ा रहता। क्लास का मानीटर तमाचे मार-मार कर मेरा गाल लाल कर देता था। घर में आता तो पिता जी मारते थे। कहते थे तू नालायक है। किसी काम का नहीं है। मैं रो-रो कर कहता “पिता जी बहुत कोशिश करके पढ़ता हूँ परन्तु क्या करूं जो पढ़ता हूँ वह याद नहीं रहता” वह कहते “तू बिल्कुल निकम्मा है। अहमक है।” रोज-रोज के इस अपमान से, रोज-रोज की इस मार से मैं इतना दुःखी हुआ कि इस छोटी सी आयु में आत्महत्या करने की इच्छा जाग उठी। जीने की कोई इच्छा न रही। सोचा दुःख और इस अपमानजनक जीवन से मर जना अच्छा है। एक दिन 12 बजे स्कूल से छुट्टी हुई तो मैं सीधा बरसाती नाले पर गया जो हमारे गाँव के सहारे बहता था। ‘देवाला’ कहते थे उसे। वर्षा ऋतु थी, नदी भरी हुई थी। वर्षा का जल तेजी के साथ बह रहा था। मैंने पुल पर खड़े होकर छलाँग लगादी, निश्चय कर लिया कि मर जाऊँगा अब। जीऊँगा नहीं परन्तु भगवान को इस शरीर से कुछ काम लेना था। इसलिए यत्न करके भी मर नहीं सका। गोते खाता रहा बेहोशी की हालत में कोई-2 मील दूर नीचे किनारे पर जा लगा, इस्लाम गढ़ के पास। वहाँ के लोगों ने देखा ‘अरे! यह तो मुँशी गनेश दास का लड़का है’ मुझे उठाकर घर में पहुँचा दिया। मरना मेरी किस्मत में नहीं लिखा था।

परन्तु तभी स्वामी नित्यानन्द जी जलालपुर में आये। हमारे बाग में ठहरे। पिताजी ने हुक्म दिया “इन्हें रोटी खिलाने तू जाया कर” पर हुक्म शायद इसलिए कि मुझसे नालायक और निकम्मा आदमी उनके घर में न था। मैं रोज जाता और उन्हें रोटी खिला आता।

एक दिन पिताजी ने कहा ‘जा भैंस को पानी पिला लो’, मैं उसे गाँव के बाहर उस जोहड़ के पास ले गया जिसे “मसदी दाता” कहते थे। भैंस ने पानी पिया- पानी पीकर गहरे पानी में चली गई। मैं अब थोड़ा सा उसे बाहर निकालूँ तो कैसे। बहुत शोर मचाया। ढेले मारे तो भैंस जोहड़ से निकल कर दूसरे किनारे पर जा पहुँची। वहाँ एक जमींदार के खेत में घुस गई। जितनी देर में मैं दूसरी तरफ पहुँचा उतनी देर में उसने खेत का किनारे का हिस्सा ही नष्ट कर दिया। इधर से मैं भागा हुआ गया उधर से जमींदार आ गया। उसने इतना मारा कि हड्डियाँ दुखने लगीं। उस दिन मुझे स्कूल में भी मार पड़ी थी। घर आया तो पिता जी ने गुस्से से कहा “इतनी देर लगाकर क्यों आया है?” और तब उन्होंने भी मारा। मैं हैरान था कि हे भगवान्! क्या करूं? आँखें नहीं रोती थीं दिल रोता था। तभी पिताजी ने कहा “जा बाग में स्वामीजी को रोटी दे आ। मैं रोटी लेकर स्वामीजी के पास पहुँचा, वह खाते रहे। मैं एक तरफ उदास और निराश खड़ा रहा। वह देखते रहे। भोजन कर चुके तो बोले “खुशालचन्द क्या बात है? तू आज उदास क्यों है? बहुत दुखी मालूम होता है तू?” उनकी बात सुनकर मेरी आँखों में आँसू आ गये। गोद में बिठा लिया। बोले- “तुझे क्या हुआ क्यों इतना दुखी है? मैंने रो रोकर सारी कथा उन्हें सुनादी। उन्हें बताया कि कोशिश करने पर भी मुझे कुछ याद नहीं होता। मेरी अक्ल खराब है। उन्होंने कहा ‘अरे’ इसका इलाज तो बता सकता हूँ। बैठ जा मेरे पास” और एक कागज लेकर उस पर गायत्री मंत्र लिख दिया। बोलें “यह है तेरे रोग का इलाज” जब परिवार के सब लोग सोते हुए हों तो सुबह प्रातः 3 बजे उठकर नहा धोकर इसका जाप किया कर” तब उन्होंने गायत्री मन्त्र का अर्थ भी बताया और और जो अर्थ उस वक्त उन्होंने बताया वह आज भी मुझे भूला नहीं।

“हे रक्षक! प्राण प्यारे दुःखों को दूर करने वाले आनन्द को देने वाले, मैं तेरे सुन्दर दिव्य रूप का ध्यान करता हूँ, मेरी बुद्धि को अपनी तरफ ले चल”।

तभी से प्रातः उठने लगा। समय पर उठ सकूँ इसलिए बहुत तेज अलार्म वाली एक घड़ी खरीदी। उठने के बाद भी नींद आती तो बार-बार आँखों पर छींटे लेता। परन्तु देखा कि पानी से भी नींद दूर नहीं आने लगती हैं। उन दिनों मेरी चोटी बहुत लम्बी थी। पाँवों में खड़ाऊं पहनता था। पीली धोती पहनता था। पिताजी हम सब भाइयों को इसी ब्रह्मचारी वेश में रखते थे। मैंने सोचा कि चोटी को नींद रोकने के लिये इस्तेमाल करना चाहिये। छत के साथ एक रस्सी बाँध दी। जाप के लिए बैठने लगता तब उसका दूसरा सिरा कसकर चोटी के साथ बाँध देता और तब जैसे ही नींद आती, सिर होता नीचे रस्सी खिंचती ऊपर, चोटी तन जाती, नींद खुल जाती और मैं फिर जाप करने लगता।

इसी तरह पाँच छः महीने गायत्री का जाप करते हुए गायत्री का असर होने लगा।

पहले परीक्षा होती थी तीन प्रश्न होते थे, वह तीनों ही गलत होते थे। अब एक सवाल ठीक होने लगा। मैं परीक्षा में पास हो गया। मास्टरों ने कहा तूने जरूर किसी की नकल लगाई होगी। तेरे तो पास होने की उम्मीद न थी। मैंने कहा- “नकल नहीं लगाई मैंने सिर्फ गायत्री का जाप किया है।” उन्होंने शायद यह बात समझ नहीं पाई परन्तु उसके बाद हर इम्तहान में पास होने लगा।

उन्हीं दिनों मैंने कविता भी लिखी मेरे उस्ताद मास्टर काकार मजी थे। उन्होंने इस कविता को पढ़ा और इतने खुश हुए कि उसी वक्त मुझे जेब से एक पौंड इनाम में दिया।

मैंने यह बात घर जाकर पिता जी को सुनाई उन्होंने इनाम देखा, कविता देखी और अपने पास से एक और पौंड इनाम में दे दिया। इससे कुछ महीने बाद एक और वाकया हुआ। आर्य समाज जलालपुर जटाँ का सालाना जलसा था। महात्मा हंसराज जी का एक भाषण जलसे में हुआ। मैं महात्मा जी के लेक्चर की रिपोर्ट लेने लगा। रात को बैठकर सारी रिपोर्ट लिखी। प्रातः ही उसे महात्मा जी के पास ले गया। वह पूछने के लिए कि कहीं कोई गलती तो नहीं हो गई। उन्होंने रिपोर्ट को देखा। तो बोले “क्या तू शॉर्टहैंड जानता है? ‘जी नहीं’ शॉर्टहैंड क्या होता है?” वह बोले “किसका लड़का है तू?” मैंने कहा ‘आर्य समाज के मन्त्री का। गणेश दास जी हैं न वह मेरे पिता हैं’ इसी समय मेरे पिताजी भी उसी जगह आ गये।

महात्माजी ने पूछा, मुंशी जी!

‘यह आपका लड़का है’।

पिता जी ने कहा ‘जी’।

महात्माजी बोले ‘क्या कराते हो इससे’?

पिताजी ने बताया ‘यह पढ़ने में बहुत अच्छा नहीं इसलिए इसको जुराबों का कारखाना लगा दिया है।’

इन दिनों मैं जुराबें बुनने का काम करता था। पन्द्रह मशीनें थीं। मेरे पास 15 आदमी काम करते थे। मगर सबसे ज्यादा मैं जुराबें बुनता था। दूसरों को जुराबें बुनना सिखाता भी था। इसलिये सारे जलालपुर में नौजवान लड़के मुझे उस्ताद जी कह कर पुकारते थे।

महात्मा जी ने सब यह कुछ सुना और कहा “इस काम के लिए लड़का ठीक नहीं। मुँशीजी ‘इसे मुझको दे दो।’ मैं इसको काम पर लगाऊँगा। जिसके यह काबिल है।”

पिताजी ने कहा ‘मैं इन्कार कैसे कर सकता हूँ’। यह आपका बच्चा है जैसे आप चाहें करें।

उसके बाद कई दिन बीत गये। एक दिन महात्मा जी का पत्र आया कि खुशालचन्द को लाहौर भेज दो।

मैं वहाँ गया। आर्य गजट में नौकर हुआ। 30) महीना तनख्वाह मुकर्रर हुई, गाँव के लोगों को जब पता लगा तो वह हैरत में बोले 30) रुपया महीना एक रुपया रोज- देखो भाई मुँशीजी का पुत्र तो बहुत बड़ा आदमी बन गया है।

आर्य गजट में काम करते-करते मैं उसका सम्पादक भी बना कितने ही वर्ष बीत गये।

1921 तक आर्य गजट के सम्पादक के तौर पर काम किया, तभी मालावार में भोपला बगावत हुई। मुसलमानों ने 2॥ हजार हिन्दुओं को जबरदस्ती मुसलमान बना लिया। महात्मा हंसराज जी के हुक्म से रिलीफ का कार्य करने के लिए वहाँ पहुँचा।

वहाँ से मैं वापिस आया तो अफसोस हुआ कि कि देश के अखबार कुछ खबरों को छापते नहीं। गलत किस्म के हिन्दू-मुस्लिम फसाद की थ्योरी बनाकर वह सत्य को दबा देना चाहते हैं। हिन्दुओं पर कोई जुल्म हो तो भी उनकी बात कोई छापना नहीं चाहता। मैंने महसूस किया कि इस तरह हिन्दू-मुस्लिम इत्तहाद कभी होगा नहीं। हिन्दू-मुस्लिम इत्तहाद जरूरी है। परन्तु वह इत्तहाद तब हो सकता है जब हिन्दू भी उतने ही संगठित और मजबूत हों जितने कि मुसलमान हों। वरना मिट्टी और पत्थर का मिलाप कभी होता नहीं। पत्थर-पत्थर का मिलाप हो सकता है। इस ख्याल को सामने रखकर मैंने “मिलाप” अखबार शुरू किया। इसलिए कि देश में मिलाप की-हिन्दू-मुस्लिम इत्तहाद की-हिन्दू, हिन्दू मिलाप की चरित्र को ऊँचा करने की सदाचार को प्रोत्साहन देने की, सत्य की रक्षा करने की-इन्साफ को रखने की स्प्रिट पैदा की जाय।

यह आदर्श लेकर “मिलाप” जब निकला तो कई लोगों ने कहा “इस अकेले आदमी से क्या अखबार चलेगा” एक दो हफ्तों की बात फिर बन्द हो जावेगा।

परन्तु एक दो हफ्ते तो नहीं “मिलाप को चलते पूरा एक वर्ष हो गया। तो लोगों ने कहना शुरू किया “कहीं से रुपया ले लिया होगा” इसी से अखबार चलाता है। परन्तु यह बात तो ठीक न थी। कभी किसी से कोई रुपया मैंने लिया नहीं “मिलाप” यदि चलता था तो किसी के रुपया से नहीं बल्कि ईश्वर की कृपा से। ‘मिलाप’ सफल हुआ तो इसके बाद ‘हिन्दी मिलाप’ भी निकाला। लोगों ने कहा अब इसका अन्त आ गया है” परंतु अन्त तो आया नहीं “हिन्दी मिलाप” में करीब-करीब एक लाख रुपया घाटा डाला गया। इसके बावजूद वह चलता रहा। अब भी चलता है।

तब भगवान कृपा होने लगी। ताँगे, मोटरें, गाड़ियाँ, गाय, भैंसे-सभी कुछ आ गया। बेटे हुए, बेटियाँ भी, धन, दौलत लाखों की जायदाद, यह सब कुछ मिला-क्योंकि गायत्री माता ने कहा है कि मैं सब कुछ देती हूँ! धन, दौलत, ताकत, इज्जत, आयु, सन्तान, सब कुछ,-माँ की कृपा से यह सब कुछ मिला।

उन्हीं दिनों लाहौर के अन्दर यूनीवर्सिटी हाल में पंजाब के गवर्नर पर गोली चली। चार नौजवान पकड़े गये। उन पर गवर्नर को कत्ल करने की साजिश का मुकदमा चला। रनवीर भी उनमें से एक था। सैशन जज ने उसे फाँसी की सजा का हुक्म दे दिया।

तभी एक हादसा हुआ। मैं जोगींद्र नगर आर्य समाज के जलसे में गया हुआ था। एक पत्थर से पाँव फिसल गया। मैं पहाड़ से नीचे जा गिरा। रीढ़ की हड्डी टूट गई। जख्मी होकर मैं लाहौर में पहुँचा। सारा धड़ प्लास्टर से जकड़ दिया गया। एक तखत पोश पर मुझे लिटा दिया गया। बोलना मना था। हिलता जुलता भी न था। लोग रनवीर को फाँसी देने के कारण मेरे पास हमदर्दी करने के लिये आने लगे। सीढ़ियों पर चढ़ते समय रोती सी सूरत बना लेते, आवाज को भारी कर लेते, आंखों में आँसू ले आते, परन्तु जब वह मेरे पास आते तो मैं उन्हें हँसता हुआ मिलता।

वे मुझे मुस्कराता हुआ देखते तो हैरान होकर कहते “तेरे सीने में दिल है या पत्थर! बेटे को फाँसी का हुक्म हो गया है खुद तख्तपोश पर पड़ा है फिर भी हँसता हैं।’ मैं तो विश्वास के साथ कहता कि अगर मेरा कल्याण इसी में है कि मेरा बच्चा फाँसी पर लटके तो वह कभी न रहेगा और अगर मेरा कल्याण इसमें हैं कि मेरा बच्चा बच जाय तो दुनिया की कोई भी शक्ति उसको मेरे से छीन न सकेगी। लोग रोते थे रनवीर के लिये- परन्तु मैं नहीं रोया, एक भी आँसू मेरी आँखों से नहीं निकला।

एक दिन स्वामी सन्तदेव अनार कली में मुझे मिले। वह महाराजा जम्मू काश्मीर के गुरु थे। मेरे पिता जी के साथ और मेरे साथ उन्हें बहुत प्रेम था। गाड़ी में बैठकर वह सामने आ रहे थे। मैंने हँसकर उन्हें नमस्ते की। गाड़ी को रोककर वह नीचे आ गये। बोले “खुशाल चन्द। तेरा रनवीर तेरे पास अब आया ही समझ’। रनबीर इन दिनों जेल में मृत्यु पर फतह पाने वाले मंत्र का जाप कर रहा था। मैंने समझा स्वामी जी इस जाप का जिक्र कर रहे हैं या फिर अपनी आत्मिक शक्ति से बात कर रहे हैं। हँसकर पूछा “क्या आपने यह बात ध्यान में देखी?” वह बोले ‘नहीं’ तेरा चेहरा देखकर यह बात समझ में आई। जो इतनी मुसीबत में इस कदर खुशहाल रह सकता है, इस तरह हँस सकता है उसके बेटे उससे कौन छीन सकता है और वह बात ठीक हुई। रनवीर का बाल भी बाँका न हुआ।

परन्तु गायत्री माता सिर्फ इस लोक को ही नहीं देती परलोक भी देती है। लोक और परलोक दोनों का सुधार करती है। द्विज को पवित्र करने वाली वह माता आयु, प्राण, प्रजा, पशु, प्रीति, धन, दौलत, और ब्रह्म वर्चस् को देकर ब्रह्मलोक को ले जाती है।

उसी ने सब कुछ देकर इज्जत, दौलत, सन्तान, बेटे, बेटियाँ, मोटरें, सम्बन्धी इस प्यार भरी गायत्री माँ ने कहा- मार सबको लात, मेरे साथ आ मैं तुझे ब्रह्मलोक में ले चलूँगी और सब कुछ छोड़कर यह गेरुए कपड़े पहनकर माँ के दिखाये हुए मार्ग पर चल पड़ा।

आठ नौ वर्ष की इस छोटी आयु से लेकर 70 वर्ष की इस आयु तक हाँ 70 वर्ष का हो गया है यह शरीर मैं नहीं मैं तो आनन्द स्वामी हूँ। आनन्द स्वामी की आयु सिर्फ 4 साल साढ़े तीन महीने होती है आज। परंतु शरीर की उम्र के 70 वर्षों में आठ वर्ष से 70 तक एक दिन भी मुझे याद नहीं जब मैंने गायत्री माता की गोद में बैठकर अमृत न पिया हो।


हमारे सिद्ध पुरुष पूर्वज

(श्री मोतीलाल गोस्वामी, जगेली)

मेरे वंश में श्री सन्त भटुकनाथ बाबा के नाम से एक सिद्ध पुरुष अंदाजी आज से 500 वर्ष पूर्व हो चुके हैं। जो अभी तक, मालूम हुआ है कि, गिरिनार पर्वत पर जीवित हैं और अदृश्य रूप से रह कर गायत्री की तपस्या कर रहे हैं। उनके स्थान पर खण्डहर के रूप में अब भी पक्का मठ जंगल में मौजूद है, जहाँ पर अब भी हम लोग पूजा करने जाते हैं और जो आदमी कुछ सच्चे दिल से वहाँ जाते हैं और जो आदमी कुछ सच्चे दिल से वहाँ माँगता है प्रायः मिल जाता है। कहते हैं उस समय मुसलमानों का राज्य प्रायः सम्पूर्ण भारतवर्ष में था, तथा मुसलमान बादशाह मुसलमानी धर्म प्रचार करने का विशेष प्रयत्न कर रहा था, परंतु मेरे इलाके के बाबा के प्रभाव से मुसलमानी धर्म का प्रचार होने में बहुत दिक्कत होती थी, इसलिए धर्म प्रचारक सब बाबा को वहाँ से भगाने की कोशिश करने लगे। बाबा के साथी पर पुर्णियाँ में स्नान करते समय हाथी से पिचवाना चाहा उस हाथी को बाबा ने हाथ से ठेलकर गिरा दिया। अंत में उन लोगों ने बहुत से उत्सात करके हारने पर बाबा के मठ में गौ माँस बँधवा दिया, जिसको बाबा ने रसगुल्ला बना दिया, परंतु उस स्थान पर से उनका मन उखड़ गया तथा एक रात को अपने साथियों के साथ न मालूम किधर चले गये, जाने के पहले ही अपने भाई को अपने स्थान पर बुलाकर बहुत कुछ समझाकर बहुत तरह से आशीर्वाद दिया और कहा कि तुम्हारा वंश बराबर चलता रहेगा तथा बराबर सुखी रहेगा। जाने की रात में अपने स्थान के चारों तरफ 1200 कौड़ी बाँस का बाड़ा एक ही रात में उत्पन्न कर दिया जो अब भी कुछ बाँस तथा जंगलमय हैं। उनके जाने पर वहाँ की जनता तथा बनैली के राजा साहब को बहुत दुःख हुआ। पीछे एक सिद्ध पुरुष से ही राजा साहब को पता लगा कि वे गिरिनार पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं।


Quotation

विश्वा द्वेषाँसि प्रमुमुग्ध्स्मत्। ऋग. 4।1। 4

हे प्रभो! हम से सब द्वेषों को पूरी तरह छुड़ा दो।

अश्रद्धामनृतेष्दधात श्रद्धाँ सत्ये प्रजापतिः। यजु. 19/77 ।

प्रभु ने झूँठ में अश्रद्धा को और सत्य में श्रद्धा को रखा है।

अशितावत्यतिथौ अश्नीयात्। अथर्व 9। 6। 8

अतिथि को खिला देने पर ही स्वयं खावे।


बाबा मगनानंद जी की कुछ स्मृतियाँ

(श्री वीरेन्द्र सिंह वर्मा, खातौली)

1-माता के अनन्य भक्त बाबा मगनानंद जी की सेवा में एक नहीं कितने ही व्यक्ति रहते। एक बार दो भक्तों ने (धाबाई श्री रतनलाल जी व श्री सीताराम जी) संसार को मिथ्या जानकर यह निश्चय किया कि संसार को त्यागकर एक मात्र बाबा की सेवा में ही रहकर ईश्वर स्मरण किया जावे। आपस में सलाह हुई कि यों तो बाबा शिष्य बनावेंगे नहीं। अतः जब बाबा प्रसाद पाकर उठें तो उनके काठ के पात्रों में जो उच्छिष्ट बचे उसे उनके सामने खाकर बाबा से प्रार्थना की जावे कि हमें मार्ग बतलाइये। तथा अब अपनी शरण में ही हमें रखिये। हम आपके शिष्य हो चुके हैं। ऐसा निश्चय करके वे भोजन के समय बाबा के पास आये तथा उस समय की प्रतीक्षा करने लगे। आश्चर्य तो यह है कि उस दिन बाबा ने झूठन छोड़ना तो दूर रहा, बल्कि उन काठ के पात्रों को भी धोकर पी लिया। साथ ही उनको समझाया कि ऐसा करने में कोई लाभ नहीं। संसार में रहते हुए ही उच्च कोटि की साधना की जा सकती है। इन दो सज्जनों में से एक अभी जीवित है।

2- एक उत्सव के सम्बन्ध में एक दुकान के 92) तथा कुछ आने चावलों के धाबाई जी को अलसी की फसल पर दुकानदार को देने थे। इसके बाद बाबा शिवपुर (मध्य भारत) में जो खातौली से 14 मील है मोती हुई नामक स्थान पर जा विराजे। श्री धाबाई जी ऊँट पर चढ़कर शाम को बाबा की सेवा में अवश्य जाते तथा सबेरे कचहरी के समय तक वापिस खातौली लौट आते। अलसी आ जाने पर उसी दुकान पर भरवादी गई तथा उनके पीछे उनका आदमी जाकर अलसी के रुपये भी ले आया। दुकान के मुनीम ने अपने सेठ को चावलों के जो रुपये काटने थे उनका स्मरण कराया, परंतु सेठजी ने बिना उनकी उपस्थिति के कुछ जिक्र नहीं किया। तथा कहा कि धाबाई जी के आने पर देखा जावेगा। ठीक उसी समय बाबा ने मोती कुई पर धाबाई जी से फरमाया कि भाई! शायद चावलों के रुपये नहीं गये हैं, दे देने चाहिये। उक्त सज्जन ने निवेदन किया कि अलसी आ गई हैं, एक दो दिन में रकम जमा हो जायगी। इसके बाद वे ऊँट पर चढ़कर खातौली की ओर चल पड़े। रास्ते में क्या देखते हैं कि बीच सड़क में रुपयों की एक थैली पड़ी हुई है कि जिसमें पिच्चानवे रुपये हैं। उन्होंने थैली को ऊँट पर सामने रख लिया तथा विचारा कि यदि खातौली तक किसी ने थैली का पता आ पूछा तब तो ठीक, वर्ना बाबा ने ये रुपए चावलों के लिये ही प्रदान किए हैं। खातौली तक थैली का पता किसी ने नहीं पूछा और धाबाई जी ने चावलों के रुपये उसी दिन दुकान पर जमा कर दिये।

3- शेष बचे 2) या 2॥) रुपयों का गाँजा बाबा के लिये खरीद लिया। इस गांजे को खरीदते हुये मध्य भारत के एक जकाती ने उन्हें देखा था। स्वयं धाबाजी को तो किसी प्रकार का भय था ही नहीं। वे समझते थे कि बाबा के विषय में तो कोई मना भी नहीं करेगा, परंतु उस जमाती ने उनका ऊँट समेत चालान कर देने का मन ही मन संकल्प किया तथा इसे कार्य रूप में परिणत करने के लिये जकात पर से गुजरते हुए उन सज्जन को तम्बाकू पीने के बहाने बुलाकर प्रेम से बिठा लिया तथा चुपके से गिरदावर जकात को जो उस दिन वहाँ दौरे पर आया हुआ था, इशारा किया कि इस ऊँट पर थैले में गाँजा है। पहले तरकीब से देख लिया जावे परंतु गिरदावर के देखने पर गाँजा नहीं, बल्कि जरदा निकला। गिरदावर ने जकाती को बहुत फटकारा कि क्या इस तरह एक भले आदमी की प्रतिष्ठा बिगड़वाना चाहते हो। यह जकात खातौली से लगभग 4 फर्लांग दूर है। शिवपुर पहुँच कर जब धाबाई जी ने पहले बाबा को धोक दी तब बाबा ने ये शब्द फरमाये थे कि देखो भाई! मैं तो समझता रहूँ कि तुम खातौली हो तथा घर वाले यह समझें कि तुम मेरे पास हो, परंतु ऐसे कर्मों से तुम्हारा चालान होता फिरेगा। उत्तर में उनने यही निवेदन किया कि अब भविष्य में ऐसा नहीं होगा। खातौली वापिस लौटने पर उनको यह घटना सुनने को मिली।

4- मेरे नाना एक बार बाबा की सेवा में बैठें हुए थे। बाबा ने बैठे-बैठे फरमाया कि देख तू तो यहाँ बैठा हुआ है, परन्तु तेरे खलिहान में आज नुकसान हो रहा है। मेरे नाना ने उत्सुकतापूर्वक पूछा कि बाबा कैसे? इतना सुनते ही बाबा ने कहा कि देख यह जो बगूला उड़ता हुआ जा रहा है, इसमें तेरे गेहूँ भरे हुए हैं और ज्यों−ही बगूला (हवा का बवंडर) समीप आया, बाबा के यह फरमाने पर कि सब मत लेजा कुछ यहाँ भी रखजा लगभग 20-25 सेर गेहूँ का उस हवा के बवंडर में से ढेर लग गया।

बाबा के जीवन की ऐसी कई घटनाएँ हैं कि जिनको लिखने से एक छोटी पुस्तिका ही तैयार हो सकती है।

कार्तिक शुक्ल 12 को सम्वत् 1974 में दिन के 11 बजे आनन्दपूर्वक बाबा परमधाम को पधारे यह स्थान नागदा ग्राम के पास भूतेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध है। बाबा अपनी स्वाभाविक मुद्रा से विराजे हुए थे तथा भक्त मण्डली से बातें कर रहे थे। अन्तिम समय जब आया तब बाबा ने नेत्र मूँदे तथा भक्त मण्डली से कहा कि कुछ माँगो। सब हाथ जोड़कर विस्मय से उनकी ओर देखने लगे। उसी समय बाबा की गर्दन झुकी तथा एक जोर की आवाज के साथ बाबा का आत्मा मस्तक को विदीर्ण करता हुआ परब्रह्म में लीन हो गया।

बाबा के जीवन से सैकड़ों व्यक्तियों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली। उनका जीवन तथा उनकी गाथायें अनूठी हैं। बाबा ऐसे स्थानों पर विराजे हैं कि जिस समय रात में बड़े-बड़े शेरों के भय से दल आदमी भी नहीं ठहर सकते थे, पर सिद्ध पुरुषों की सामर्थ्य को भला कौन आँके?


गायत्री शक्ति और मेरे अनुभव

(पं. मनोहर लाल मण्डाहर बी. ए. नागपुर)

मैं 20 साल से भी ज्यादा गायत्री माता का सेवक हूँ और इस 36 साल के छोटे जीवन में माता की अपार कृपा से जीवन सुखी और आनन्द से व्यतीत हो रहा है। गायत्री साधना से क्या-क्या लाभ होते हैं इनका मैं निजी अनुभव कर चुका हूँ, मेरे बगैर माँगे माता ने मुझे सब सुख साधन, विद्या, यथा शक्ति, धन, सुशील स्त्री, दो पुत्र, दो लड़कियाँ, अच्छा परिवार दिया है और अब तक हर काम में माता सहायता करती है।

मेरे पितामह और स्वयं पिताजी गायत्री माता के परम भक्त थे। पिताजी ने गायत्री माता की कृपा से अपने जीवन में व्यापार में लाखों कमायें और लाखों गंवायें, किसी स्कूल या कालेज में न पढ़कर भी सब विद्याएँ जानना, सब कुछ देकर सेवा करना, सारी आयु दयानतदारी और मिलनसारी को न छोड़ना और पूर्ण आयु 67 साल भोगकर सुखी-सुखी गायत्री जाप करते हुए सदा के लिये माता की शरण में जाना- यह सब माता गायत्री का वरदान ही कहा जा सकता है। मैं इसी सुखी परिवार में जन्मा, बड़ा हुआ और पिता के व्यापार में हानि लाभ से मुझे भी कई अनुभव हुए। इसलिये धन को मैंने कोई जीवन में ऊँचा स्थान नहीं दिया। छोटेपन में उन्हीं की प्रेरणा से गायत्री की ओर झुका। आगे चल कर शनैः-शनैः कई महात्माओं और महापुरुषों की कृपा से उन्नति के पथ की ओर बढ़ता रहा हूँ।

मुझे गायत्री साधन से कई अनुभव हुए हैं उनको आपकी जानकारी के लिए यहाँ लिखता हूँ। उनसे आपका उत्साह बढ़ेगा ऐसी मेरी आशा है। जो कुछ लिख रहा हूँ अक्षर-अक्षर सत्य हैं, आप इस रचना को जीवन में करके स्वयं अनुभव कर सकते हैं। मेरे अपने जीवन में तथा मेरे निकटवर्ती अनेक व्यक्तियों के जीवन में जो गायत्री उपासना द्वारा अनेकों लाभ हुए हैं उन सबका विस्तृत वर्णन करके पाठकों अमूल्य समय लेना नहीं चाहता। उन घटनाओं के आधार पर जो निष्कर्ष निकलते हैं वे नीचे दिये जाते हैं। यह निम्नलिखित तथ्य पूर्ण सत्य हैं। प्राचीन काल के ऋषियों से लेकर आज के सामान्य गायत्री उपासकों तक को यह अनुभव समान रूप से होते रहते हैं।

1. गायत्री के सच्चे उपासक की कभी भी अकाल मृत्यु नहीं हो सकती- यहाँ तक कि उसके अपने परिवार-अपने बाल बच्चे तक अकाल मृत्यु से नहीं मर सकते। कोई शक्ति हर समय साधक की रक्षा करती है। गायत्री प्राणों की रक्षा करती है यह कथन अपने अनुभव के आधार पर सत्य है। हम सब स्वयं पाकिस्तान में गोलियों से बचे- माता ने अपने आप हमें बचाने के साधन पैदा किये और इज्जत के साथ वहाँ से पूर्वी पंजाब में आये।

2. सुखी परिवार और गृहस्थ जीवन- मेरे गृहस्थ जीवन को 16 साल हो जायेंगे और नियम पूर्वक रहने से सब तरह से गृहस्थ जीवन सुखी है। दो लड़के, दो लड़कियाँ, सुशील और धर्म परायण धर्म पत्नी से जीवन स्वर्ग बना हुआ है।

3. गायत्री का उपासक और उसका परिवार सदा बीमारियों और रोग कष्टों से बचते हैं। गायत्री उपासक को दिल की बीमारी वगैरह नहीं हो सकती। क्षय रोग और दूसरे रोग दूर भाग जाते हैं।

4. गरीबी और दरिद्रता दूर भाग जाती है। बिगड़े हुए काम बन जाते हैं और सुख समृद्धि के साधन मिलते हैं। चरित्र बल से सब कुछ मिल जाता है।

5. अच्छे मित्रों का मिलना।

6. गायत्री माता के सहारे के सिवाय किसी तरफ सहायता की याचना न करना। अपने पर विश्वास।

7. विद्या, संगीत और कला का शौक। घर में अच्छी अच्छी पुस्तकें पत्रिकाएँ मँगवाना और स्वयं आप पढ़ना व परिवार को पढ़ाना।

8. शारीरिक ज्ञान- नेचर क्यौर आयुर्वेदिक और होमियोपैथिक से सरल चिकित्सा करना।

9. नशे की चीजों से घृणा करना- शराब, सिगरेट वगैरह और दूसरे व्यसनों, जुआ वगैरह से घृणा।

10. नित्य स्वास्थ्य का ख्याल प्रातः व्यायाम स्वयं करना और दूसरों को करने के लिये उत्साह देना, योग के आसन, यथा शक्ति सरल प्राणायाम करना जिससे शरीर का निरोग होना। स्वास्थ्य सम्बन्धी पुस्तकें स्वयं खरीद कर पढ़ना और दूसरों को अनुभव देना।

11. निष्काम सेवा, सादा जीवन और सच्चा व्यवहार।

12. गायत्री उपासना के बारे में आर्य समाज और सनातन धर्म वालों में कोई झगड़ा नहीं इसलिए संकुचित हृदय का न बनना और विशाल हृदय से खण्डन मण्डन को छोड़ते हुए सबको मिलाने और एक मंत्र पर लाने की कोशिश करना।

13. धन तो जो मिलना है मिलेगा ही, इसलिए रात दिन की चिंता छोड़ कर आगे पग बढ़ाना, जो जरूरत से अधिक है उसे शुभ कामों, यज्ञ आदि कार्यों में लगा देना। मैंने धन को आज तक ज्यादा दर्जा नहीं दिया इसलिये कज्जल की चिंताओं से बचा हुआ हूँ।

14 शत्रुओं का न होना।

15. स्त्रियों को भी गायत्री साधना का पूर्ण अधिकार है। मैं छोटी-छोटी लड़कियों और बालकों को इस ओर लाने की बहुत कोशिश करता हूँ।

16. गायत्री माता ने मेरी प्रार्थना पर पिछले दिनों मेरे एक मित्र के पहले छोटे तीन चार दिन के बच्चे को जीवन दान दिया और मेरी लाज रखी क्योंकि उनका नमक खाने से मेरा भी फर्ज था कि उनके सुख के लिये प्रार्थना करता।

17. स्वयं अपनी छोटी लड़की जो मुँह में कुछ डालकर प्राण देने को थी, गायत्री माता की कृपा से मेरे स्वयं घर पर अक्समात होने और दूसरी बार मुँह में हाथ डालकर गले में अटकी हुई चीज को निकाल सका। गायत्री माता ने उसे प्राण जीवन दिया।

18. मेरा अनुभव है कि जिसने भी मुझे तंग किया या द्वेष किया उसे माता ने जरूर मेरे कहने के बगैर सजा दी है। गायत्री के साधक के हित के लिये माता शत्रुओं का दमन करती है।

गायत्री साधना कभी किसी की निष्फल नहीं जाती और फिर सरल है और विघ्न भी वैसे नहीं आते।


दो बार धारा सभा की मेम्बरी

(श्री भोपालसिंह जी एम. एल. ए., गोठड़ा)

गायत्री की माला 1996 के आसोज सुदी 10 से 1-2 रोज जपना शुरू कर दिया था। मगर नियम पूर्वक संध्या और 500-500 जपयान 1000 जप रोज सम्वत् 2004 से जपता आ रहा हूँ। समय पर जप करने या संध्या करने की बहुत कोशिश करता हूँ मगर दिन का समय सुबह से शाम तक ही रहता है और शाम का समय 12 बजे रात तक। इसमें यह आवश्यक है कि जब तक संध्या न की जाय खाना नहीं खाता हूँ। जब भगवती की कृपा होगी तभी समय का पालन होगा।

जब बीमार होता हूँ तो मानसिक जप कर लेता हूँ मगर रोज हर हालत में आज तक तो 1000 जप रोज करता रहा हूँ, और मन में माता की पूर्ण कृपा समझता हूँ। मेरा जैसा छोटा आदमी इतना कम लिखा पढ़ा होते हुए भी एक दफा तो सन् 1947 में धौलपुर धारा सभा का सदस्य होने का सुअवसर पा चुका है और दूसरी दफा अभी चुनावों में राजस्थान धारा सभा का सदस्य होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। और वह भी राजस्थान के सबसे बड़े किसान नेता बलदेव राम जी जो “किसान केशरी” कहलाते थे उनको 3254 वोटों से हराकर यह सब मुझ तुच्छ को इतना सम्मान भगवती गायत्री की कृपा ही का फल है।

कुछ समय पूर्व मुझे टी. बी. की बीमारी हो गई सो जयपुर सेनोटेरियम टी. बी. अस्पताल में भरती करा दिया गया। ताप और खाँसी ने 2 साल तक नहीं छोड़ा और जब अस्पताल में भरती हुआ और माँ से प्रार्थना की कि हे माँ! क्या यहाँ इस तरह के अव्यवस्थित जीवन की अपेक्षा तो तू मेरे प्राण ले ले वह ठीक है। इस पर भगवती ने वह चमत्कार दिखलाया सो डॉक्टर सरजन ने 20 दिन में ही देखकर फोटो लेकर कहा कि तुमने कोई जादू किया है जो दो वर्ष में ठीक होने की उम्मीद नहीं थी सो 20 दिन में असर हुआ है। सच बताओ क्या किया है? तमाम बीमारी का हाल भी बताओ क्या किया है। मैंने कहा भाई माता गायत्री का मन ही मन जप करो भगवती तुमको भी इसी तरह ठीक करेगी और मेरा ज्यादा आग्रह देखकर सरजन ने मुझे गाँव रहकर ही इलाज कराने की सलाह दे दी, सो गाँव में ही मैंने इलाज कराया और अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ। मुझको इतना भगवती का भरोसा है कि जो मेरे दिल में लालसा होती है कि अमूल्य काम भगवती होना चाहिए। वह देरी से हो या जल्दी थोड़ा हो या ज्यादा मगर होकर रहता है।


Quotation

अपघ्नंतो अराव्णः ऋग्. । 9। 63। 5

हम दुष्ट जनों को दण्डित कर आगे बढ़ें।

ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियौष्ट। अथर्व 3। 30। 5

बड़ा बनने की इच्छा वालो! ज्ञानी बनो, बिछड़ो मत।


गायत्री उपासना के कुछ अनुभव

(श्री व्यंकटेश दयाराम शर्मा, खलघाट म.भा.)

मेरे लिए दुनिया में जितने सहयोगी, प्रेमी, कुटुम्बी, सेवा भावी, मित्र और अधिकारी, जो कुछ कहा जाय, सब मेरे गुण, धर्म और स्वभाव से विपरीत थे, और आज तक हैं। मैं उसे समय विचारता था कि भगवान ने मुझे ऐसा अभागा क्यों पैदा किया जो संसार में मेरा कोई नहीं और न मैं, किसी को अपना कह सकूँ ऐसा भी कोई नहीं है।

लेकिन उस परिस्थिति में भी मैं चुप रहा और जैसे-तैसे अपना समय व्यतीत करता रहा, मैं सोचता कुछ था होता कुछ था, भगवान की इच्छा बड़ी प्रबल होती है। जिसका कोई सहायक नहीं उसे भगवान का सहारा होता है। यही पूर्वानुभव जो महापुरुषों ने निर्धारित किया है, उसी के आधार पर मुझे भी भगवती वेदमाता गायत्री का आश्रय मिला और उसके द्वारा मेरे गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन- होकर मेरी उन्नति का मार्ग खुला। कल मैं आशा करता था आज मेरी आशा करते हैं, पिछली परिस्थिति को मैं धन्यवाद देता हूँ, कि अच्छा हुआ जो मुझे किसी ने सहारा नहीं दिया, अन्यथा आज मुझे उनका ऋणी रहना पड़ता तथा यह उच्चकोटि की साधना प्राप्त होती या नहीं।

गायत्री जप के लाभ :-

1- गुरुदेव के प्रति अपार श्रद्धा तथा उनके द्वारा मार्ग प्रदर्शन।

2- दैवी आत्मबल प्राप्त दूरदर्शिता और सहयोग की प्राप्ति।

3- पत्नी के कठिन रोग से छुटकारा।

4- मृत पुत्र को जीवन दान और उसके विचित्र चमत्कार।

5- नौकरी में विरुद्ध जनता के प्रति सफलता।

6- आर्थिक स्थिति का उचित सुधार।

7- नाव दुर्घटना में नवजीवन मिला।

8- गृहों की वक्र दृष्टि में मानसिक शान्ति बनी रहना।

9- असम्भव कार्य भी सम्भव होते देखे गये।

उपरोक्त बातों के अतिरिक्त और छोटे-मोटे कई व्यक्तिगत अनुभव हुए, परन्तु इन बताये हुए संकेतों के पीछे महत्वपूर्ण इतिहास एवं रहस्य है जिनका विस्तृत वर्णन फिर कभी किया जावेगा।

इस उपासना के प्रति मेरी अपार श्रद्धा है और मेरे जीवन में और प्रतिदिन के कार्यक्रम में इसका विशेष स्थान है। इसके फलस्वरूप मैं अपनी साधारण परिस्थिति को बड़े ही सुन्दर ढंग से संचालन कर रहा हूँ।

आत्मबल बढ़ जाने से कई नए नए विषयों का ज्ञान प्राप्त हो गया है।

हमारे यहाँ प्रतिदिन अग्निहोत्र होता है, इससे हमारा आनन्द और बढ़ जाता है।

गायत्री माता की शरण में आने पर मुझे कई सिद्ध पुरुषों की भी कृपा प्राप्त हुई। उनमें से एक दो का परिचय इस प्रकार है :-

वालीपुर के महात्मा गजानंद जी का जन्म नार्मदीय कुल में एक साधारण ब्राह्मण के घर में हुआ था, ये साधारण पिता की सन्तान होने से इनकी शिक्षा दीक्षा तो विशेष नहीं हुई, लेकिन अकस्मात अनुभवी योग्य सद्गुरु की प्राप्ति हो जाने से, इनके मन में भगवती की उपासना का अंकुर जग गया और उनके दर्शाये मार्ग से सब कुछ छोड़कर, तपश्चर्या करने लग गये।

इनका प्रतिदिन का कार्यक्रम है कि प्रातः 3 बजे रात्रि से जल में खड़े होकर गायत्री का जप किया करते हैं और तीन बजे दिन तक हवन, पाठ आदि से निवृत्त होते हैं। अन्न आहार कई दिनों से नहीं किया है फलाहार पर रहते हैं। इस तपश्चर्या के प्रभाव से आज ये इच्छाचारी महात्मा हो गये हैं। क्षण भर में जहाँ जाना चाहें चले जाते हैं और वापिस भी आ जाते हैं। इनकी मढ़ी 1 एकड़ के क्षेत्र में बनी है जहाँ ये 15 वर्ष से तपश्चर्या कर रहे हैं। इनके हवन कुण्ड में 8-10 साल से अग्नि नहीं बुझी है नवरात्रियों में प्रतिवर्ष सवालक्ष गायत्री मन्त्र से आहुतियाँ दी जाती हैं।

हजारों दर्शक आते हैं उनकी भोजन व्यवस्था आदि मढ़ी पर ही होती है। महाराज अपनी मढ़ी छोड़कर कही नहीं जाते हैं और सब व्यवस्था हो जाती है।

सन्त हरीहर जी नागझिरी-जाति के गुजराती ब्राह्मण हैं। गृह कलह और मानसिक अशान्ति से विवश होकर इन्होंने गृह त्याग दिया, और सच्ची शान्ति की खोज में फिरने लगे। कई देवी देवताओं की सतत् उपासना करते रहे, लेकिन जिस प्रकार से अपना जीवन बनाना चाहते थे वैसा ही बना सके। अन्त में श्रवण करते करते जमदग्नि आश्रम परशुराम कुण्ड आये और वहाँ इनका एक महात्मा से परिचय हुआ और उनको इन्होंने अपनी व्यथा सुनाई, तब महात्मा जी ने कहा यदि तुम्हें शान्ति शीघ्र प्राप्त करना है तो गायत्री का जप करो। इनके ध्यान में वह बात जम गई कि ब्राह्मण को बिना गायत्री के किसी भी प्रकार सफलता नहीं मिल सकती है। ऐसा निश्चय करके ये औंकारेश्वर क्षेत्र में आये, वहाँ उन्होंने गायत्री की तपश्चर्या की। उसके आश्चर्यजनक अनुभव प्राप्त हुए और इन्हें सच्ची शान्ति प्राप्त हुई। आजकल ये मौन हैं।


गायत्री माता की शाँतिदायक गोद

(श्री जगदीश दत्त जी श्रोत्रिय, बिजनौर)

बहुत दिन की पुरानी बात है। मेरे हाथ अकस्मात् सुन्न हो गये। सुई चुभोने पर भी दर्द न होता था, हाथों की क्रियाशक्ति कुँठित हो चली, मैं बहुत घबराया। डॉक्टर और वैद्यों ने रोग की भावी भयंकरता को बढ़ा-चढ़ा कर चिंतित किया तो मैं घबरा गया। एक विज्ञ महानुभाव ने मुझे 24 लक्ष गायत्री जप का अनुष्ठान करने की सलाह दी। मैं श्रद्धा और तन्मयता के साथ उसे पूर्ण करने में लग गया। माता की कृपा से वह रोग कुछ ही दिनों में बिल्कुल अच्छा हो गया।

कहते हैं कि गायत्री उपासकों की सन्तान सुखी रहती है और फलती फूलती है। इस बात को भी मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से सही पाया है। अनेक झंझटों में फँसे रहने तथा आर्थिक तंगी रहने पर भी दो पुत्र, पुत्र वधू, कन्या, सभी एम. ए. पास किये हैं। बड़ा लड़का जप पूर्ण होने से पहले ही 200) का नौकर हो गया। दूसरे की वकालत शनैः-2 उन्नत हो रही है। कन्या एम॰ ए॰ के बाद पी0 एच0 डी0 की तैयारी में लगी हुई है।

काफी दिन हो गये मेरे विरुद्ध एक मुकदमा चल रहा था। जज ने मेरे वकील को यह सूचना दे दी भी कि फैसला मेरे विरुद्ध निश्चित किया गया है। मैं इस सूचना से बड़ा चिंतित हुआ और अपने एकमात्र अस्त्र-उपासना में जुट गया। 3-4 दिन बाद फैसले की तारीख थी। अदालत में पहुँचने पर देखा कि जज का विचार बिल्कुल बदल गया है और उसने पूर्व सूचना के बिल्कुल प्रतिकूल मेरे पक्ष में ही फैसला दिया।

मेरी कन्या जिसने एम॰ ए॰ कर लिया है उसके लिए वर ढूँढ़ने की बड़ी चिन्ता रहती थी। लगातार 6 वर्ष से यही एक कार्य था किन्तु जहाँ जाता वहीं असफलता मिलती। निराश होकर एक गायत्री अनुष्ठान करने की ठानी। उसका परिणाम आशातीत हुआ। आशातीत योग्य वर मिला। जो डबल एम॰ ए॰ और पी0 एच0 डी0 हैं। शिक्षा के लिए जर्मन जाने की तैयारी वर मिला है। इस अर्थ लोलुप युग में मुझसे दहेज के लिए एक पैसे की माँग नहीं की गई और शादी बड़े आनन्दमय वातावरण में सम्पन्न हो गई।

अनुष्ठान की पूर्ति पर यज्ञ करने के लिए जैसे कि अर्थाभाव के कारण चिन्ता हो रही थी। तारीख 26-4-54 को अचानक कल्पनातीत स्थान से ठीक अनुमानिक व्यय को पूर्ण करने वाली रकम का बीमा आ गया। जो माता की कृपा के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। ऋण लेने की तैयारी थी, माता ने लज्जा रख ली मैं गदगद हो गया।

एक बार मैं घोर घने जंगल में फँस गया। सिंह सूअर आदि से जंगल पूर्ण था। वर्षा हो रही थी, रात अँधेरी थी, मैं अकेला था। उस भयंकर वातावरण में दिल धड़क रहा था, प्राण रक्षा के लाले पड़ रहे थे। गायत्री माता को पुकारने के अतिरिक्त और कोई उपाय दिखाई न पड़ता था। भय संत्रस्त स्थिति में मन ही मन माता को पुकारता हुआ आगे बढ़ रहा था कि आश्चर्य की तरह एक ताँगा उधर आ पहुँचा और मुझे बिना किराये बिठाकर मेरे स्थान पर पहुँचा आया। उस स्थान पर उस समय ताँगे का पहुँचना और ऐसे घने जंगल में से पार निकालना एक प्रत्यक्ष दैवी कृपा ही थी।

मेरे गायत्री उपासना के अनुभवों में से कुछ यह हैं। माता का अंचल पकड़ने वाले को क्या नहीं मिल सकता? सब कुछ मिल सकता है।


मन्त्र लेखन की साधना

(श्री परशुराम जी आर्य, ओवर सीयर)

सबसे पहले यह बताना अच्छा होगा कि मैं कट्टर आर्य समाजी हूँ। हर बात को बुद्धिपूर्वक विवेक तथा तर्क की कसौटी पर कसकर ही स्वीकार करता हूँ। गायत्री की महिमा तथा उसकी उपासना के महत्व को मैं बहुत समय से जानता हूँ। पर जब गायत्री मन्त्र लेखन की साधना का वर्णन अखण्ड-ज्योति में पढ़ा तो उस पर विशेष मनोयोग पूर्वक विचार किया तो लगा कि यह साधना अन्य साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण होगी।

इससे पूर्व भी मैंने श्री स्वामी शिवानन्द जी द्वारा प्रकाशित एक पत्रक में पढ़ा था कि जप की अपेक्षा मन्त्र लेखन का लाभ विशेष है। मन्त्र लेखन की अनेक विशेषताएँ हैं जैसे 1- मन्त्र लिखते समय हाथ, मन, जीभ और आँख चारों एक साथ मंत्र में लग जाने से चित्त की एकाग्रता बढ़ती है। 2- मन्त्र शक्ति से मन वश में होकर नम्र बन जाता है। उससे कोई भी आध्यात्मिक या साँसारिक काम बहुत शीघ्र और अच्छी तरह से करा सकते हैं। 3- मन्त्र या ईश्वर नाम के असंख्य आघात लगने से मन पर चिरस्थायी आध्यात्मिक साधना में शीघ्र प्रगति होती है। 4- किसी प्रकार की मानसिक शान्ति या चिन्ता दूर होकर मन को शान्ति मिलती है। 5-मन्त्र लेखन पुस्तिका में और स्थान में आध्यात्मिक आन्दोलन और शक्ति पैदा होती है जो साँसारिक तथा आध्यात्मिक प्रवृत्तियों में अदृश्य सहायता करती है। 6- मन्त्र योग का यह प्रकार (लेखन) आधुनिक चंचल स्वभाव की जनता के लिए अधिक सिद्धिप्रद है। उनके लिए माला की सहायता से जप करने में चित्त को बाहरी जगत् की वस्तुओं में भटकने से रोकना अति कठिन है। 7-शास्त्रों में बताये गये भिन्न-भिन्न प्रकार के जपों में से मन्त्र लेखन (लिखित जप) सबसे उत्तम है। इससे चित्त की एकाग्रता होती है और क्रमशः ध्यान की स्थिति प्राप्त होती है।

मन्त्र लेखन-लिखित जप-करने की साधना की ऐसी ही अनेक विशेषताएं मुझे सूझ पड़ी और 1-5-53 से गायत्री मन्त्र लेखन की साधना आरम्भ कर दी। और एक वर्ष में 125000 (सवालक्ष) मन्त्र लिखने का एक अनुष्ठान पूर्ण कर लिया। किसी दिन कम किसी दिन ज्यादा लिखा गया है। किसी दिन तो 800 तक लिखे गये। औसत 360 प्रतिदिन लिखने का पड़ा। साधारणतः एक गायत्री मन्त्र लिखने में 1 मिनट लगता है इस प्रकार कोई व्यक्ति यदि 3 घण्टे रोज लेखन साधना करे तो एक वर्ष में पूरी कर सकता है। पर अपनी आरम्भ की शिथिलता को पूरा करने के लिए मुझे तो अन्तिम दिनों में आठ-आठ, दस-दस घण्टे लिखना पड़ा है। मेरे जैसे 60 वर्ष की आयु के व्यक्ति के लिए निस्संदेह इतना श्रम कठिन ही है। पर माता ने ही यह साहस तथा उत्साह दिया जिसके बल पर एक वर्ष में यह अनुष्ठान पूर्ण हो गया। गत चैत्र की नवरात्रि में गायत्री तपोभूमि में आकर इस लेखन का दशाँश 12500 आहुत का हवन मैंने कर दिया।

एक वर्ष की इस तपश्चर्या का अनुभव इतना मधुर है कि गूँगे के गुं़डडडडडड की तरह इसका लाभ बता सकना कठिन है। स्वयं अनुभव करके इस मार्ग पर चलकर ही इस प्रकार की तपस्या के लाभों को जानना और अनुभव किया जा सकता है। यों गायत्री उपासक मैं बहुत समय से हूँ। गायत्री जप और अग्निहोत्र मेरा नित्यकर्म हैं। उसी के प्रताप से अनेक बाधाएँ पार की हैं और इस समय भी सुव्यवस्थित जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। मेरे दूसरे साथी जबकि 60 वर्ष की आयु में जीर्ण शीर्ण हो चुके हैं तब भी मैं अभी तक युवा पुरुष की तरह श्रम करने योग्य अपने स्वास्थ्य को पाता हूँ। आध्यात्मिक सफलताओं की तो चर्चा न करना ही ठीक है।

भौतिक या दुनियावी लाभ की एक जीती जागती बात आपके सामने पेश करता हूँ :-

मैं 1-11-48 के 5 वर्ष आयु पूरी हो जाने पर रिटायर्ड हुआ। राजकीय कार्य के लिए ऐसे मनुष्य को लेना मना है फिर भी कुछ रियायत 58 वर्ष की आयु तक की जा सकती है और साठ के पश्चात तो कतई असम्भव है।

मैं 53 के आरम्भ में अर्थात् 59 वर्ष की आयु में सरकार से एक ओवर सीयरी की जगह के लिए प्रार्थना की जो उन्होंने अस्वीकार कर दी। कोई आशा न रखते हुए भी एक वर्ष पीछे फिर प्रार्थना की अर्थात् जबकि मैं पूरा 60 का हो चुका पर इस मर्तबा मुझे इन्टरव्यू के लिये 16-6-54 को बुलाया गया। इंटरव्यू पूरी तरह से सफल रहा और अब राजस्थान में पुनः सरकारी सर्विस पर नियुक्त हुआ हूँ।

अपने अन्य साथियों से भी मेरी यह प्रार्थना निरन्तर रहती हैं कि वे गायत्री मन्त्र की लिखित साधना अवश्य करें। यह साधना का एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रकार है।


तन्दुरुस्ती, प्रतिष्ठा और आजीविका की पुनः प्राप्ति

(श्री शिव भगवान जी सोमानी, कालियाचक्र)

विराट नगर (नेपाल) से सं0 2007 में, अपने पुत्र की शादी के लिए सीकर आया और फिर वहीं रहने लगा। दैव संयोग से मैं सट्टे की लाइन में पड़ गया और आखिर नतीजा खराब निकला। सट्टे में काफी नुकसान हुआ। यहाँ तक कि मेरी धर्मपत्नी के तथा लड़की के भी सब जेवर उसी में चले गये।

चिन्ता और परेशानी का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ा। शरीर कमजोर हुआ। आखिर राजयक्ष्मा (टी. बी.) तथा भगन्दर के दो प्राणघातक रोगों ने मुझे ग्रसित कर लिया।

मेरे साले शिवरतन जी मारुमाले गाँव [नासिक] में एक प्रसिद्ध साड़ियों के व्यापारी हैं। उन्हें जब मेरी बीमारी का पता लगा तो दौड़े हुए आये। कहाँ कराया जाय इस पर विचार हुआ। बीमारी बढ़ गई थी इसलिए निश्चय हुआ कि सीकर से भाले गाँव जाया जाय। और वहाँ वे शिवरतन जी के साथ बम्बई जाकर इलाज कराया जाय। मेरी स्थिति इतनी गिर गई थी कि चारपाई पर से उठना बैठना मुश्किल हो रहा था। सभी को मेरे जीवन से निराशा होती जा रही थी।

भाले गाँव से हम लोग बम्बई पहुँचे और वहाँ पहुँच कर अनेक सुप्रसिद्ध डाक्टरों से बीमारी का निदान कराया। टी. बी. विशेषज्ञ डॉक्टर बिलमोरिया ने ऐक्सरे, सीना, पेशाब, खून, पाखाना आदि की परीक्षा की और रिपोर्ट लिखकर दी कि बीमारी तीसरी स्टेज को पहुँच चुकी है। 15 दिन में ही बीमार की हालत काबू से बाहर हो जायगी। डॉक्टर ने यह भी कहा कि फेफड़ा गल गया है इसलिए कई पसलियाँ काट कर निकालनी पड़ेंगी।

उस रिपोर्ट का हमारे साले साहब पर बहुत गम्भीर आघात लगा, वे बहुत दुखी थे। उनकी मुखाकृति देखकर स्थिति की गम्भीरता समझने में मुझे भी देर न लगी। आखिर सब बात मालूम हुई। पसलियाँ कट जाने जैसे बड़े आपरेशन को बर्दाश्त करने लायक न तो मेरा स्वास्थ्य था और न साहस।

शिवरतन जी गायत्री के अनन्य उपासक हैं। उन्हें माता की शक्ति पर बहुत भारी विश्वास है। उनने गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ के अनेक स्थल मुझे सुनाये और गायत्री उपासना करने के लिये मुझे से आग्रह किया। प्राण रक्षा के लिए मनुष्य सब कुछ करने को तैयार हो जाता है। फिर गायत्री उपासना जो एक बहुत ही उत्तम और सरल काम है उसके लिए मैं प्रसन्नतापूर्वक तैयार हो गया। माले गाँव लौटकर एक साधारण इलाज चालू करा दिया और पूरी तत्परता के साथ मैं गायत्री उपासना में लग गया।

चारपाई पर पड़े-पड़े पूरे समय मन ही मन गायत्री माता का जप और ध्यान करता रहता। बीज संपुट ‘ऐं’ का प्रत्येक मन्त्र के पश्चात् सम्पुट लगाकर जप करता था। इसी क्रम को चलते हुए 75 दिन हो गये। एक दिन दोपहर के भोजन के बाद मैं अर्ध निद्रा में लेटा हुआ था, देखा कि एक सुन्दर देवी मेरे सिरहाने बैठी है और मेरे बायें हाथ को पकड़कर हस्त रेखा देख रही है। मैंने पूछा पुरुष का तो दाहिना हाथ देखा जाता है। आप मेरा बाँया हाथ क्यों देखती हैं। उत्तर मिला कि रोगी का बाँया हाथ ही देखा जाता है। मैंने फिर पूछा हाथ में आपने क्या देखा? उत्तर मिला कि तुम्हारा कल्याण हो, अब बीमारी अच्छी हो गई है।

आँख-खुली चारों और मैंने ध्यानपूर्वक देखा तो वहाँ कोई स्त्री न थी। मैंने जान लिया कि यह गायत्री माता ही थीं और मुझे अभयदान देने आई थी। प्रसन्नता से मेरा चित्त प्रफुल्लित हो रहा था।

दिन पर दिन हालत सुधरती गई और मैं थोड़े ही समय में इन टी. बी. तथा भगन्दर की प्राणघातक बीमारियों को परास्त करके पूर्ण स्वस्थ हो गया। स्वस्थ होने के बाद कुछ दिन इधर-उधर टक्करें खाने के बाद व्यापार भी ठीक प्रकार जम गया। अब हमारे फार्म में 10 आदमी मुनीम गुमाश्ते काम करते हैं।

मेरी धर्मपत्नी को गायत्री माता पर अनन्य श्रद्धा है। उसकी विशेष साधनाएं, तपश्चर्याएँ, नवरात्रि साधनाएँ चलती रहती हैं। नित्य भी काफी समय तक वह गायत्री उपासना करती हैं।

मैं भी माता को भूला नहीं हूँ। कुछ न कुछ समय उनके चरणों में लगाकर चित्त की शान्ति प्राप्त करता रहता हूँ। मैंने अपनी गई तन्दुरुस्ती, प्रतिष्ठा, आजीविका सभी कुछ माता की कृपा से प्राप्त की हैं जो कुछ प्राप्त करना शेष है, आशा है वह भी प्राप्त हो जावेगा।


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विवेक वचनावली

तन कौ जोगी सब करै, मन कौ करै न कोय। सब सिधि सहिजै पाइये, जो मन जोगी होय॥

राम बुलावा भेजिया, कबिरा दीना रोय। जो सुख प्रेमी संग में, सो बैकुण्ठ न होय॥

भाव भाव की सिद्धि है, भाव भाव में मेल। जो मानों तो देव है, नाहिं मानो तो डेल॥

डर उछाव हित धरम सौं, असुभ करम की हानि। मन प्रसन्न रुचि अन्न सौं, ज्यों ज्वर छूटैं जानि॥

गावन में रोवन अहै, रोवन में ही राग। एक रागी ही में, एक ग्रही वैराग॥

सिद्ध होत कारज सबै, जाके जिस विश्वास। पूजत ऐपन कौ हथा, तिय जिय पूरै आस॥

जो पै जैसो होय तेहि, तैसो ही मिल ताय। मिलै गठकटा चोर कों, साह हि साह मिलाय॥


मृत्यु के मुख में से वापसी

(श्री रामसहाय जी तिवारी, झाँसी)

मैं रेल चलाने की नौकरी करता हूँ। कुछ वर्ष पहले माघ मास में मैं एक दिन गाड़ी लेकर इटारसी गया हुआ था। इसी दिन धर्मपत्नी ने भूल से एक बड़ी गलती कर डाली। पत्थर के कोयलों की जलती हुई सिगड़ी घर के अन्दर रख कर किवाड़ बन्द करके वह सो गई। उस दिन ठण्ड अधिक थी। धर्मपत्नी ने सोचा रात को एक बजे मैं घर आऊँगा तो अँगीठी के पास बैठ कर गरम हो लूँगा और गरम भोजन करूंगा। पर उन्हें यह मालूम न था कि पत्थर के कोयले की गैस क्या हानि करती है। रात को 1 बजे जब मैं घर लौटा तो देखा कि पत्नी तथा बच्चा मृत-तुल्य अवस्था में पड़े हुए हैं। डॉक्टर का इलाज आरम्भ कराया गया पर उनकी स्थिति देखकर किसी को विश्वास न होता था कि वह बच सकेंगे। इलाज हो रहा था और मैं उनके समीप बैठा हुआ गायत्री माता को पुकार रहा था। गायत्री माता तक ही मेरी दौड़ थी, उन्हीं के चरणों में मन अटका हुआ था। वे जिस पर कृपा करें उसकी सभी विपत्तियों को टाल सकती हैं।

60 घण्टे बाद उनको होश हुआ। दोनों मृत्यु के मुख में से वापस लौट आए। तब से हम दोनों “पति-पत्नी” विशेष श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करने लगे। माता ने हमें एक और पुत्र दिया उसका नाम सूर्य नारायण रखा गया। उसमें कुछ विशेषताएँ ऐसी ही हैं जिससे यह नाम रखना पड़ा।

गायत्री की नियमित उपासना करने से पूर्व मुझ में कई दुर्व्यसन थे। तम्बाकू, सुपारी इतनी खाता था कि एक मिनट भी उनके बिना नहीं रह सकता था। इंजन में रहने वाले को वैसे ही सारे समय भारी गरमी का सामना करना पड़ता है। इस पर भी तम्बाकू खाने की इतनी भरमार। इसका प्रभाव स्वास्थ्य पर बुरा ही पड़ रहा था, पर आदत से मजबूरी थी। पैसा भी बहुत खर्च होता था और स्वास्थ्य भी बिगड़ता था। मैं चाहता था कि इसे छोड़ दूँ पर छूटती न थी। आदत ने इतना मजबूर कर रखा था कि छोड़ने के सभी विचार निष्फल हो जाते थे। पर गायत्री उपासना आरम्भ करने पर मेरे भीतर से कुछ ऐसा आत्मबल बढ़ा कि साहसपूर्वक तमाखू छोड़ने का संकल्प किया और जो बात असम्भव दीखती थी वह सम्भव हो गई। तमाखू दुष्टिनी से मेरा पीछा छूटा और स्वास्थ्य तथा पैसा की भयंकर बर्बादी से बचत हो गई।

यों मेरी कुछ विशेष साधना नहीं है पर इस छोटी सी साधना का ही एक चमत्कार सुनिये। हमारी जन्म भूमि घीसामिसर का पुरवा नामक गाँव में है जो सुल्तानपुर जिले में है। छुट्टी पर एक बार घर गया हुआ था। दरवाजे पर बैठा रामायण पढ़ रहा था कि पड़ौसी की धोबिन के रोने धोने का कोलाहल मचा। मैं रामायण बन्द करके वहाँ गया तो देखा कि उसका बच्चा मर रहा है। बच्चे को हाथ से जाते देखकर माता का रोना स्वाभाविक ही है। मैं जानता था कि मृत्यु से किसी को बचाना कठिन है फिर भी प्रयत्न करने में क्या हानि? मैंने गायत्री मन्त्र से जल अभिमंत्रित किया और बच्चे को पिलाया तथा उस पर छिड़का। माता की कृपा हुई और बालक की स्थिति तत्काल सुधरने लगी। एक दो दिन में ही बच्चा स्वस्थ हो गया। यह घटना चारों ओर फैली, लोग मुझे कोई बड़ा मंत्र शक्ति सम्पन्न सिद्ध पुरुष मानने लगे और अपनी-अपनी कठिनाई लेकर मेरे पास आने लगे। मैं इस झंझट से घबराया और छुट्टी अधूरी ही छोड़कर घर से वापिस लौट आया।

तब से मैं और भी अधिक श्रद्धा भक्ति के साथ माता का भजन करता हूँ। मेरी आत्मिक तथा साँसारिक उन्नति हो रही है।


गायत्री उपासना से प्रेतबाधा की निवृत्ति

(श्री भोगालाल मोहनलाल जानी, मोटा चेखला)

गत वर्ष मैंने सवालक्ष गायत्री का अनुष्ठान किया था। वेदोक्त संध्या, स्नान, जप सब तीनों काल होती थी। पन्द्रह दिन के बाद रात को मैं सो रहा था अर्ध जागृत नींद में था उस वक्त 12-1 बजे मेरे कमरे में से एक अति भयानक श्याम आकृति का अर्धअंग दिखाई पड़ा, जिसका हाथ लम्बा होने लगा मेरी ओर आने लगा, लम्बा हुआ, हाथ ने मेरा गला जोर से दबाया, मुझे बड़ी परेशानी हुई मैं घबराने लगा उस काली आकृति के हाथ को जोर से पकड़ कर वेद माता का मंत्र शुरू कर दिया, आश्चर्य की बात यह हुई कि जप शुरू करते ही श्याम मनुष्य आकृति अदृश्य हो गई। जिसके बाद ऐसी कोई विघ्न की घटना बनी नहीं है। हमारे घर में जो प्रेत बाधा बहुत दिनों से घुसी हुई थी वही प्रेत इस अनुष्ठान से कुद्ध होकर हमें डराना चाहता था पर गायत्री उपासना की शक्ति के आगे उसका कुछ बस न चल सका। रात्रि को सफेद प्रकाश, सफेद वस्त्र में पुरुष और पदार्थ स्वप्न में दिखाई देते थे। 40 दिन में अनुष्ठान समाप्त हो गया। आखिरी दिन अन्तिम रात्रि को चार बजे 12-14 वर्ष की बालिका का स्वप्न में दर्शन हुआ। उस बालिका ने हमें शक्कर का प्रसाद देकर चली गई। प्रसाद हाथ में लिया और आँख खुल गई। ऐसी घटना अनुष्ठान काल में हुई थी। दूसरे दिन ब्रह्मभोज करवाया, पुरश्चरण समाप्त हो गया।

साधना से एक बड़ा लाभ यह हुआ कि मेरी औरत जो 10 साल से प्रेतबाधा से पीड़ित थी। प्रतिदिन जोर-जोर से रोती थी एक-एक घण्टा तक रोती रहती, गाँव के सारे लोग जमा हो जाते थे। हाथ पैर भी खिंचा जाता था। जोर भी बहुत करती मैंने विद्वान ब्राह्मण से उसका उपाय पूछा लेकिन वे न बता सके। इधर-उधर से ताबीज धागा लाकर बाँधता पर उनसे कोई लाभ न होता। हम तीनों को बड़ी परेशानी रहती थी। मैंने गायत्री अनुष्ठान शुरू किया तो उस दरमियान ही पीड़ा बन्द हो गई।

मेरा गाँव साबर काँठा जिले में घड़ी नामक है। तालुका प्राँतिज है। मैं गुजराती स्कूल में अध्यापक की नौकरी करता हूँ। मेरी उम्र 31 साल की है। कुटुम्ब में पिताजी गुजर गये हैं, माता वृद्ध हैं। हम तीन भाई हैं और तीन बहनें। घर पर खेती का धंधा चलता है। मैं जाती से मोढ़ चातुर्वेदिय ब्राह्मण हूँ, मैंने गुजराती, प्राथमिक शालाँत परीक्षा उत्तीर्ण की है, हिन्दी की भी तीन किताब पढ़ी हैं।

गायत्री साधना से हमारी आध्यात्मिक उन्नति बढ़ती है। साधन बढ़ाने की भी तमन्ना होती है। हमें कार्य में सफलता भी मिली है। भय, शोक, क्रोध, लोभ, मोह वगैरह दुर्गुण कम होते हैं। पुण्य पुरुषों की प्राप्ति होती है। सत्, संन्यासी, ब्रह्मचारियों का मिलन कभी-कभी होता है। मैं जिधर जाता हूँ वहाँ के लोग बड़े प्रेम से आदर करते हैं- हमारी पाठशाला में कैसा कोई भी इंस्पेक्टर साहब आता है लेकिन मेरी क्लास में आते ही शाँत हो जाता हैं और मेरे कार्य की प्रशंसा करता है। जन समाज पर अद्भुत प्रभाव पड़ता है। आज भी वेद माता का स्मरण करता हूँ। साधन से लाभ की अपेक्षा रखता नहीं हूँ इस साल में चांद्रायण की साधना करने की इच्छा है फिर माता की इच्छा।

मैं एक दफा भजन में गया था, भजन शुरू होने लगे। थोड़ी देर पीछे एक बनिये की लड़की को अंग में प्रेत आ गया और उठकर दौड़ने लगी। वह जाती थी रास्ते के बीच में गिर पड़ी उसे कुछ ज्ञान न रहा। भजन में आने वाले लोग जमा हो गये बेचारी लड़की हैरान हो रही थी कोई उपाय मालूम न पड़ा। थोड़ी देर सोचकर मैंने शुद्ध जलपात्र मँगवाया गायत्री मंत्र से मंत्रित किया और उसकी आँखों में छिड़कने लगा थोड़ी ही देर में प्रेत चला गया। लड़की शुद्धि में आ गई और घर पर चली गई। एक वक्त अभिमंत्रित जल पिलाने से भी ऐसा ही आराम हुआ था। इस प्रसंग से मेरी श्रद्धा और बढ़ी।

गायत्री साहित्य में मैंने पहली बार गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार किताब पढ़ी, इसके पीछे सब साहित्य मथुरा से मँगवाया। अखण्ड-ज्योति का सदस्य भी बना हूँ।


संकट में सहायता करने वाली गायत्री माता

(श्री शम्भु प्रसाद मिश्र, हृदयनगर)

(1) अर्थ संकट में संरक्षण

मध्य प्रदेश में मालगुजारी उन्मूलन के पश्चात मेरा मुख्य धंधा केवल कृषि कर्म शेष रह गया। सन् 50 ई. में यहाँ मालगुजारी प्रथा का अन्त हुआ। तभी से मैं अर्थ संकट से घिरा रहता था क्योंकि पूर्वजों की बनाई सम्पूर्ण जमींदारी को राज्य विधेयक द्वारा छीन लिया गया। गत मई 53 से मैंने अत्यधिक अर्थ संकट अनुभव किया। गृहस्थी बड़ी, खर्चे अधिक और आपद न्यून यहाँ तक कि आवश्यकता पर उधार कर्ज में भी द्रव्य मिलना कठिन था। मैं दिन-रात अपने खर्चें की पूर्ति के लिये चिन्ता में लीन रहता। तब ऐसे कठिन समय में मैंने अपनी इष्ट माता से द्रव्य की सहायता की माँग की। जिस दिन मैंने इष्ट माता गायत्री से द्रव्य सहायता की प्रार्थना की उसके दूसरे दिन मुझे सूचना प्राप्त हुई कि “मध्य प्रदेश सरकार” के उप प्रधान सचिव माननीय श्री नरेश चन्द्रसिंह जी 20 मई 53 ई. को हृदयनगर में आवेंगे।

मेरे पास एक बड़ा जंगल था उसमें बहुत से सागौन आदि के वृक्ष थे। पर सरकारी प्रतिबन्ध के कारण उन्हें बेचने काटने का अधिकार न था। पैसे की तंगी दूर होने का एक ही उपाय सूझ रहा था कि यदि इस जंगल को काटने की स्वीकृति मिल जावे तो कठिनाई दूर हो। पर मेरे लिए वह प्रतिबन्ध क्योंकर हटेगा, यह एक निराशा की बात थी। मैंने गायत्री उपासना पर पूरा बल लगा दिया और नियत तारीख पर अपनी अर्जी लेकर उस प्रधान सचिव के समक्ष उपस्थित हुआ। इसे माता की कृपा ही कहना चाहिए कि जंगल काट लेने की स्वीकृति मुझे मिल गई। फलस्वरूप 500 सागौन के दो-दो फुट से अधिक मोटे वृक्ष मैंने उसी दिन बेच दिये। उनका रुपया आने से उलझी हुई सभी आर्थिक कठिनाइयों का समाधान हो गया।

2. लगभग दो साल से मेरा स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ था। शरीर निर्बल, कफ, खाँसी, श्वांस की अत्यधिक तकलीफ, साथ ही गुदा रोग की शिकायत, आयुर्वेदिक उपचार और डाक्टरी परीक्षा आदि सभी उपाय शरीर रक्षा के लिये हो रहे थे, परन्तु शारीरिक निर्बलता बढ़ती ही गई, यक्ष्मा और श्वांस ऐसे भयंकर रोगों का दौरा। सब घर वाले सम्बन्धी जन समझते थे यद्यपि बीच-बीच में दवाओं के प्रभाव से व भगवत् कृपा से स्वास्थ्य लाभ के लक्षण दीखते थे, परन्तु हम सब लोगों को मेरे स्वास्थ्य के प्रति महान चिन्ता थी। पण्डितों ज्योतिषियों ने महामृत्युँजय मन्त्र विशेष संख्या में आरोग्यता लाभ के लिये जप कराने की व्यवस्था दिये और महामृत्युँजय मन्त्र जप आरम्भ कराने के लिये भी मैं प्रबन्ध कर रहा था परन्तु उसी समय गत श्रावण 2020 वि. यानी एक माह के भीतर ही में कफ खाँसी से विशेष कष्ट के कारण पुनः बुरी तरह रोग ग्रस्त हो गया। घर के लोग मेरे पलंग के पास छोटी टोकनी में राख रख देते थे। प्रातः टोकनी कफ से भरी मिलती रात भर पूरी नींद लेना कठिन था, यों चिकित्सा चालू थी। दवा मैं ले रहा था पर प्रारब्ध भोग को मिटाने की शक्ति तो केवल परमात्मा में ही है। मैंने गायत्री उपासना के अवलम्बन को संभाला क्योंकि मुसीबत के समय प्राण रक्षा करने वाली एक मात्र शक्ति वही है। मेरा रोग धीरे-धीरे घटना आरम्भ हुआ और कुछ ही दिनों में स्थिति सुधर गई। अब टोकनी रखने की जरूरत नहीं रात भर पूरी नींद आती है। यों चमत्कार पूर्ण भयंकर रोग से छुटकारे का मूल कारण वहीं वेदमाता गायत्री की रहस्यमय कृपा है व प्रत्यक्ष दैवी कला है। जो श्री गायत्री माता अपने भक्त पुत्रों को सदा प्रदान करती हैं, जो पुत्र अपनी इष्ट माता गायत्री की शरण में पूर्ण विश्वास के साथ रहते हैं, उनके सभी कार्य सफल होते हैं, उन्हें चारों पदार्थ अवश्य ही प्राप्त होते हैं।


ऋण के बोझ से छुटकारा मिला।

(श्री पुरुषोत्तम दास मगन लाल पटेल, सरढ़व)

कुछ वर्ष पूर्व में बड़ी आर्थिक कठिनाई में फँस गया था। साधारण काम काज था पर दुर्भाग्यवश 12 हजार रुपया नुकसान हुआ और कर्जे का भारी बोझ सिर पर चढ़ गया। लेनदारों के तकाजे पर तकाजे हो रहे थे पर अदायगी की कोई सूरत नजर न आती थी। कई बार तो लज्जा और घृणा से आत्महत्या तक करने को जी चाहता था।

कोई मार्ग न सूझने पर मैंने गायत्री उपासना का सहारा लिया। कुछ समय पूर्व मैंने गायत्री की महिमा सन्त महात्माओं से सुनी थी। अहमदाबाद के एक सज्जन ने भी इस सम्बन्ध में मुझे बहुत कुछ बताया था। अखण्ड-ज्योति को भी देखा था और उससे प्रेरणा प्राप्त की थी। उन सब बातों की प्रतीक्षा करने का यही अवसर था। मैंने पूरी भक्ति भावना के साथ गायत्री उपासना आरम्भ कर दी और प्रतीक्षा करने लगा कि देखें किस प्रकार मुझे इस ऋण भार से मुक्ति मिलती है।

काफी समय उपासना करते बीत गया पर कोई चमत्कार न दीखा। निदान भीतर से ऐसी प्रेरणा हुई कि अपना जो मकान है उसे बेचकर ऋणदारों को चुका दिया जाय। माता जी की कृपा से कीमत अच्छी आई। मकान अच्छे दामों को बिका। आवश्यक कर्जे चुका कर शेष का एक छोटा मकान और खरीद लिया। जैसे ही एक छोटा मकान और खरीद लिया कि उसके भी महंगे दाम के खरीददार लग गये। आखिर उसे भी कुछ मुनाफा लेकर बेचा और बचत के रुपये ऋण में चुकाये।

इस प्रकार की लौट पलट कई बार की। इन्हीं मकानों की खरीद बेच में सारा ऋण केवल मुनाफे में चुक गया और रहने के लिये जैसा पहले मकान था उसी सुविधा का दूसरा लाभ में बच गया। इस प्रकार केवल लौट फेर तो करनी पड़ी पर मकान भी बच रहा और कर्ज भी चुक गया। जो थोड़ा पैसा बचा उससे दुकान आरम्भ की जो अब अच्छी चलती है और सब कार्य शान्तिपूर्वक होते चलते हैं।

अब मेरा प्रतिदिन तीन हजार गायत्री जप नित्य होता है। दो ढाई मास से गाँव से दूर खेत में जो झोंपड़ी है उसी में जप तथा हवन करने की व्यवस्था की है। इस प्रकार दुकान के कार्य से बचे हुए समय को एकान्त साधना में लगाकर विरक्त जीवन व्यतीत करने का अवसर मिल रहा है। दुकान चलाने के लिए एक विश्वस्त साथी भी माता की कृपा से मिल गया है। जिसके कारण पूजा पाठ तथा व्यापार में किसी प्रकार अड़चन नहीं होती।

माता की कृपा से सभी कुछ सम्भव है। उनकी कृपा से पर्वत जैसी दीखने वाली कठिनाई, राई जैसी हल्की होकर समाप्त हो सकती है। मेरे साथ तो ऐसा ही हुआ है।


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जोति सरूपी हिय सवै, सब शरीर में जोति। दीपक धरिये ताक में, सब घर आभा होति॥ देखत है जग जात है, तउ ममता सो मेल। जानत हूँ मानत नहीं, देखत भूलौ खेल॥ जेहि जेतो निहचै तित, देत दई पहुँचाय। सक्कर खोरे को मिलै, जैसे सक्कर आय॥


बाघ को भी परास्त करने वाला अस्त्र

(श्री मुनिलाल चौधरी, मोतिहारी)

मेरे एक मित्र है। नाम रघुनाथ शुक्ल ग्राम बसवरिया पोस्ट मोतिहारी जिला चम्पारन। बसमैत ब्राह्मण है। गत वर्ष शत्रुओं ने इन पर लूट और कत्ल करने का मुकदमा लगा दिया। गिरफ्तार होने पर जमानत भी न होती थी इसलिए वे अपने बचाव के लिए नेपाल की सीमा में चले गए और अपने छुटकारे के लिए गायत्री उपासना करने लगे।

एक दिन वे पहाड़ के रास्ते सायंकाल को सात बजे एक जगह जा रहे थे। रास्ते में क्या देखते हैं कि उनसे 15-20 गज की दूरी पर बीच रास्ते में एक बड़ा विशालकाय बाघ बैठा हुआ है। मनुष्य को इतना पास देखकर बाघ उठकर और खड़ा हो गया। शुक्ल जी को ऐसा लगता था कि क्षण भर में वह हमला करने वाला है। हाथ खाली थे कोई हथियार भी पास में नहीं था जिससे आत्म रक्षा करते। विवश वे मृत्यु की घड़ी गिनने लगे। ऐसे समय पर उन्हें एक उपाय सूझा कि मन ही मन तीव्र भावना के साथ गायत्री माता को पुकारने लगे, गायत्री मन्त्र का जप करने लगे। वे सोचते थे कि यदि प्राण न बच सके तो भी गायत्री मन्त्र का जप करते हुए मरने से आत्मा की सद्गति ही होगी।

शुक्ल जी का यह हथियार अचूक निकला उसने दुनाली बन्दूक का काम किया। गुर्राता हुआ बाघ पानी-पानी हो गया। उसने उठी हुई गर्दन नीचे झुकाई और कुत्ते की तरह दुम हिलाता हुआ चुपचाप चला गया और दूर जाकर उधर से पीठ फेर कर खड़ा हो गया। शुक्ल जी उसकी बगल से सकुशल निकल गये।

इस घटना के बाद अनन्य गायत्री भक्त बन गये हैं। उनकी आपदाएँ एक-एक करके सभी शान्त होती चली जा रही हैं। गायत्री की शक्ति की तुलना का और कोई अचूक हथियार इस संसार में नहीं है। इसी से उसे “ब्रह्मास्त्र” कहा जाता है।


आपत्ति ग्रस्तों की सहायता

(श्री स्वामी योगानन्द जी सरस्वती अशोकगढ़)

गायत्री हृदय रूपी मानसरोवर में प्रकट होकर सपरिवार साधक को भवसागर से पार ले जाती है। गायत्री साधना के फलस्वरूप सूक्ष्म शरीर के कुछ गुप्त, कोषों, चक्रों, गुच्छकों, ग्रंथियों का विकास होता है, जिसके कारण दिव्य शक्तियों का बढ़ना अपने आप शुरू हो जाता है। बुद्धि की तीव्रता, शरीर की स्वस्थता, सत्पुरुषों की मित्रता, व्यावसायिक सहायता, कीर्ति, प्रतिष्ठा, पारिवारिक सुख-शान्ति, सुसन्तति व्याधियों से निवृत्ति, शत्रुता का निवारण सरीखे अनेकों लाभ अनायास ही मिलने लगते हैं। कारण यह है कि आत्मबल बढ़ने से, दिव्य शक्तियाँ विकसित होने से, गुण कर्म स्वभाव में आशाजनक परिवर्तन हो जाने से अनेक ज्ञात अज्ञात बाधाएँ हट जाती हैं और सूक्ष्म तत्व अपने में बढ़ जाते हैं, जो उन्नति की ओर ले जाते हैं।

सन् 1952 ई. में आपने जो अखण्ड-ज्योति गायत्री अंक पढ़ा होगा, उसमें मेरा आग्नेयास्त्र सम्बन्धी लेख पढ़ा होगा, वह इस दास का साधारण अनुभव था। माता गायत्री सर्व शक्तिमान है इसलिए इसमें अचम्भे की कोई बात नहीं है उसकी शक्ति अनन्त है जिसका वर्णन वेद भी नेति-2 करते हैं।

1952 ई. में मिर्जापुर नगलिया में गायत्री पाठशाला चल रही थी उस समय की बात है यहाँ पर एक नदी बहती है और उस नदी की गोचर भूमि में चार पाँच गाँव की गाय चरती हैं। उसको असुर वृत्ति के लोगों ने कब्जाना चाहा। और गऊ वालों ने रोका तो उसमें कुछ झगड़ा हो गया था, असुर वृत्ति वाले लोगों ने पुलिस को अपने पक्ष में मिला लिया था उनकी मदद करने को वहाँ आये। और उनकी गाय हरली तो नगरिया में बैठक हुई सब लोग अपनी कह रहे थे। मुझसे बूझा कि स्वामी जी आप भी कुछ मदद करेंगे या नहीं, मैंने कहा मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ लोगों ने कहा आल्हा और ऊदल की सहायता अमर गुरुदयाल करते थे उसी प्रकार आपको हमारी सहायता करनी होगी। भगवान श्री कृष्ण जी ने तो गऊ खुद चराई थी। तुम्हारा तो गायों की सेवा करना धर्म है। इसके बाद उसमें एक सभा हुई और उनमें सरपंच लाल सिंह वर्मा भी थे। वह सब मिलकर वहाँ आये कि जहाँ पर गऊ थीं, तो दरोगा जी ने सबको गिरफ्तार कर लिया, और उन सब लोगों को बुलन्द शहर जेलखाने भेज दिया। और मुकदमा चलाना शुरू किया, जो लोग पकड़े गये थे उनका पक्ष न्यायपूर्ण था। मुझे उन पर दया आई मैंने गायत्री शक्ति का सहारा लिया। माता गायत्री का विशेष साधन करने लगा आठ ही दिन कर पाया था कि नौवें दिन जेल में 3 बजे कैदियों को माता का दर्शन हुआ माता ने कहा आज चार बजे ही को घर आ जाना तुम लोगों को कोई नहीं रोक सकता है। ऐसा ही हुआ उन लोगों को कैद से रिहा किया और चरागाह भी उनको दे दिया गया। उन लोगों ने मिलकर गायत्री यज्ञ किया और प्रसाद भी बाँटा।

ठा. रामचन्द्रजी वर्मा बड़ी मुसीबत में फँसे थे उनके बालकों को ससुराल वाले नहीं भेजते थे और वह टुकड़ा-2 को तंग थे, वह हमारे पास आये और हमसे कहा स्वामीजी मुझे ऐसा उपाय बताओ, जिससे मेरे बालक मुझे मिल जाये, तो आपका बड़ा अहसान होगा, मैंने इतवार का उपवास बताया। उसने ऐसा ही किया, माता की कृपा से उसे आर्थिक उन्नति भी हुई और उसके बालक भी मिल गये जब से वह इतवार का व्रत रखता है और माता की थोड़ी बहुत उपासना भी करता है।

मंगलपुर के राधारमन गुप्ता को शादी की बड़ी चिंता थी, माता की थोड़ी ही उपासना कर पाया है सन् 1953 ई. में उसकी शादी अलीगढ़ से बड़ी धूमधाम से हुई और तीन चार हजार रुपया भी मिला था हमारे साथी जनकाराम जय प्रकाश शर्मा भहोरी निवासी की शादी की कोई आशा नहीं थी माता की कृपा से उनकी भी शादी बड़ी धूमधाम से हुई और योग्य पत्नी मिली।

गायत्री माता की कृपा से रोगियों को स्वास्थ्य लाभ मिला है, यह अनेक रोगियों पर आजमाया है 5-8-1952 में गायत्री प्रचार करने मैथना गया था वहाँ हमारा नाम सुनकर महाशय वेदरामसिंह वर्मा की बहन भी आई हुई थी उनको प्रसूत का रोग पड़ता था उनको दस-दस बार दौरा होता था डॉक्टर और हकीमों ने उसको लाइजाल कर छोड़ दिया था। हमसे उसकी चिकित्सा करने को कहा गया, मैंने उसकी चिकित्सा आरम्भ की गायत्री मंत्र से मंत्रित जल सुबह और शाम पिलाया करता था। माता की कृपा से 15-8-1952 ई. में उसे पूर्ण आराम हो गया था और अब पूर्ण निरोग हैं।

श्री सोराजसिंह कोटा निवासी को प्रमेह रोग हो गया था उसने दिल्ली, मेरठ और बुनलंद शहर आदि में चिकित्सा कराई मगर सिवा निराशा कहीं पर आशा नजर नहीं आई। रोग यहाँ तक बढ़ गया कि चिकित्सक लोगों ने असाध्य करके छोड़ दिया था, फिर उसके ससुर साहब अशोकगढ़ लाये, वहाँ पर भी चिकित्सा कराई गई, कोई फायदा नहीं हुआ। मैं उस समय में ठा. हरपालसिंह के यहाँ आया था। श्री हरपालसिंह वर्मा ने सोराजसिंह को हमें दिखाया था मैंने उसे देखा तो उसकी बहुत बुरी दशा थी बचने की कोई आशा नहीं थी। उनको डॉक्टर टी. बी. बताते थे। मैंने उसकी चिकित्सा आरम्भ की, प्रातःकाल गायत्री मंत्र से पढ़कर जल पिलाया जाता था, और गायत्री चालीसा पाठ और गायत्री मंत्र जाप कराया जाता था, माता की कृपा से वह निरोग हो गये। अब सानन्द हैं और 19-1-52 ई. को अखत्यारपुर से मैंथना जगतपुर आया था, वहाँ पर एक लड़की भूत बाधा में परेशान थी, वहाँ बहुत से चिकित्सक लोग दवाओं की देमार थी मैंने उसे देखा था और सारे शरीर में दर्द हो रहा था मैंने गायत्री मन्त्र से पढ़ जल पिलाया, तो उसे उसी दम आराम हो गया, वह लोग अचम्भे में हो गये थे। और भी अनेक अनुभव हुए हैं।

गायत्री सद्बुद्धि जिस मस्तिष्क में प्रवेश करती है वह अंधानुकरण करना छोड़कर हर प्रश्न पर मौलिक विचार करता है। वह उन चिंता, शोक, दुःख आदि से छुटकारा पा लेता है, जो कुबुद्धि की भ्रान्त धारणाओं के कारण मिलते हैं। संसार में आधे से अधिक दुख कुबुद्धि के कारण हैं, उन्हें गायत्री की सद्बुद्धि जब हटा देती है तो मनुष्य सरलता, शाँति, सन्तोष और प्रसन्नता से परिपूर्ण रहने लगता है।


स्वभाव में परिवर्तन

(श्री सेवाराम कौशल खलघाट म. भा.)

आज से पूर्व मुझे जितना निर्दयी, कठोर कहा जाय, उतना ही कम होगा। मेरा स्वभाव बहुत गर्म तथा साम्प्रदायिक विचारधारा होने से मैं “सेनापति” कहलाता था। जहाँ तहाँ लोग मुझे सेनापति के नाम से पुकारने लगे। घर से लेकर बाहर तक सगे संबंधी सभी मुझे क्रोधी तथा गर्म स्वभाव का जानकर मुझसे भय खाते थे और मुझे किसी प्रकार का सहयोग नहीं देते थे तथा मैं भी अपने गर्म स्वभाव के कारण उन्हें कुछ नहीं समझता था, यदि वास्तव में देखा जाय तो, मेरे सगे सम्बन्धी, भाई बन्धु सभी अच्छे विचारधारा के होकर प्रतिष्ठित पुरुष हैं, लेकिन मैं क्रोध रिपु के अधिकार में होने से उनका बैरी बना हुआ था।

जब आज से मुझे गायत्री माता ने अपनी गोद में लिया, मैं रो रोकर माँ माँ पुकारता रहा, पागल सा फिरता फिरा, इधर उधर मारा मारा फिरने लगा सबके पास जाकर, दया की भीख माँगने लगा। पहले तो वह मुझ से भय खाने लगे परन्तु ऐसा परिवर्तन उन्हें आश्चर्य हुआ। और सोचने लगे कि यह कहीं पागल तो नहीं हो गये-वेदमाता से सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। जब सद्बुद्धि का प्रकाश मेरी आत्मा में आ गया तो वहाँ अज्ञान अन्धकार कैसे रह सकता है। तथा मेरी सच्ची पुकार को कौन नहीं सुन सकता था। सबको मुझ पर भरोसा हुआ तथा इस प्रकार बदली हुई परिस्थिति को देखकर, सबको आश्चर्य हुआ तथा मेरा सारा परिवार गायत्री उपासक हो गया और मुझे सहयोग प्राप्त होने लगा।

जब मैं गायत्री तपोभूमि की पुण्य प्रतिष्ठा के समय मथुरा गया और पूज्य गुरुदेव आचार्य जी के दर्शन किये, मानों मेरा हृदय उस वेदमाता के सुपुत्र, आपका याज्ञवलक्य तपस्वी महापुरुष के दर्शन से जगमगा गया, और मैंने अपना पुनीत जीवन समझा, बस यहीं मेरा लक्ष्य, उद्देश्य एवं प्रधान कर्त्तव्य था और यही से मेरा कायाकल्प आरम्भ होता है।

मेरे गुण, कर्म, स्वभाव में भारी परिवर्तन हुआ। मैं कठोर से नम्र हो गया, कुटिल से दयालु हो गया, काम और क्रोध पर पूरी तरह विजय पा लिया है।

कहने का तात्पर्य यह है कि मेरे, मन वचन और कर्म में सात्विकता आ गई और उसी के अनुसार अपना जीवन बनाने लगा। मेरे व्यवहार और कर्म को देखकर मेरी धर्मपत्नी ने भी इस उत्तम मार्ग को अपनाया और वह भी लाभान्वित हुई। इसका विशेष विस्तृत वर्णन वह स्वयं अलग से करेंगी।

मैंने एक पुरश्चरण किया उस समय मुझे दिव्य ज्योति के दर्शन हुए थे। इस पुरश्चरण के पूर्व मेरे घर कभी भी ब्राह्मणों का पदार्पण नहीं हुआ था। न कभी कोई शुभ कार्य ही हुए थे। इस वेदमाता की असीम कृपा से अच्छे-अच्छे विद्वान, पण्डित, गुणी, साधु महात्मा मेरी झोंपड़ी पर आते हैं तथा उनका स्वागत करके अपने को बड़ा भाग्यशाली अनुभव करता हूँ।

मैंने अपना व्यापार भी हविष्यान्न (चावल) बेचने का रखा है इसमें मेरी जीविका चलती है और हम आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। हमारा अधिकाँश समय माता की सेवा, उपासना और प्रचार में ही बीतता है। मैं, मेरे सहयोगी बन्धु तथा मेरे अनुभव के पाठकों से निवेदन करता हूँ कि वे वेदमाता की उपासना करें, क्योंकि पुत्र को सच्चा सुख माता की गोद में ही मिलता है।

उपासना अनुभव का सार- वेदमाता की उपासना मनुष्य को कुमार्ग से सुमार्ग पर लाने में जादू का सा असर करती है, एक बार अनुभव करके देखें।


प्रारब्ध भोगों का सरल भुगतान

(श्री रामचन्द्र प्रसाद गुप्त, दानापुर केन्ट)

मेरा आरम्भिक जीवन बड़ा असंयत और अव्यवस्थित रहा है। उन भूलों के कारण शरीर खोखला हो गया, स्वास्थ्य से हाथ धोना पड़ा, आये दिन की बीमारियों के पंजे में फँसा और फिर सन् 45 में बुरी तरह चारपाई पर पड़ गया।

डाक्टरों ने इसे भी प्लूरिसी बताया, इस रोग में 411 वर्ष तक जो-जो तकलीफ सही हैं, चिर स्मरण रहेगा। लगभग तीन वर्ष तक खाट से उठने की आज्ञा न मिली खाना भी लेटे-लेटे खाता था। इस बीमारी में पिता जी ने भी बहुत तकलीफ सही है। डॉ. घोंसल ने तीन महीने तक सिर से लेकर कमर का बाँह छोड़कर पलस्तर लगवा दिया था जिससे मैंने बहुत कष्ट सहा। कई बार ऐसा मालूम पड़ा था कि अब प्राण नहीं रह सकता क्योंकि कष्ट चरमसीमा तक पहुँच चुका था। उस समय जीवन की सभी घटनाएँ वायस्कोप की तरह आँखों के सामने नाचती थीं, छोटी छोटी गलती जिसे एकदम भूल चुका था, नेत्रों के सामने साकार रूप होकर नाच रही थी। अपने अपराधों का स्मरण कर छाती भर आई आँखों में आँसू निकल आये, उस समय शिर धुनता था, कि हाय मैं इस जगत में आकर कुछ कर न सका, उलटे पाप के बोझ सिर पर लिये जा रहा हूँ। उस समय मैं रो रोकर ईश्वर से कहता था, प्रभु अधिक नहीं तो एक या दो वर्ष का समय दे दो अपने पापों का प्रायश्चित कर लूँगा, अब ऐसी भूलें नहीं करूंगा आदि।

उस समय आत्मा से यही आवाज आती थी कि “घबराओ नहीं तुम्हारी अभी मृत्यु नहीं होगी, एक ठोकर दिया गया, जिससे आगे चलकर सँभल सको। अगर इससे नहीं चेतोगे तो आगे बड़ी दुर्दशा होगी” इसके बाद वह दृश्य हट गया और मैं धीरे-धीरे आरोग्यता लाभ करने लगा। अब मैं बखूबी समझ गया हूँ, कि मरने के समय आँसू क्यों निकलते हैं?

मैं अभी पूर्ण निरोग भी नहीं हुआ था, कि दवाओं में उलट फेर होने से फिर रोग बढ़ने लगा बरसात का मौसम था, नीचे आँगन में मैं पाखाना के लिए जाता था। ठण्डी हवा बरसात का समय मुझे सर्दी खाँसी हो गई। यह सर्दी आज तक अच्छी नहीं हुई है। दवाओं में सुधार होने से फिर लाभ होने लगा, परन्तु पूर्ण निरोग नहीं हुआ। रोग कभी घट जाता कभी बढ़ जाता सभी लोग परेशान थे। इसी समय काशी के एक ताँत्रिक पण्डित जी दानापुर में आये।

उन्हें दिखलाया गया, उन्होंने अच्छा कर देने का 30) में ठेका लिया, उनके कहे मुताबिक पूजा का इंतजाम हो गया। उन्होंने 11 दिन तक पाठ स्तुति किया, बारहवें दिन हवन किया। जिससे मुझे सर्दी, खाँसी और कमजोरी छोड़कर और कोई कष्ट नहीं रहा। पण्डित जी से सर्दी खाँसी का भी करार था, उसे अच्छा न होने पर 5) रु0 रोक लिया गया। पटना के प्रसिद्ध डॉ0 टी. एन. बनर्जी ने मेरा लगभग तीन वर्ष इलाज किया था, तथा उन्हीं की दवा चल रही थी। उनसे जो लाभ हुआ उसे 11 दिन में पण्डित जी ने कैसे कर दिया? यह प्रश्न मेरे मस्तिष्क में चक्कर लगाने लगा।

मैंने तान्त्रिक जी से बहुत पूछा पर वे दो चार बातों के अतिरिक्त अधिक नहीं बताये। उससे मेरी जिज्ञासा शान्त नहीं हुई, बल्कि उनके छिपाव करने पर दुःख हुआ। मेरा स्वभाव है कि जिस बात के पीछे पड़ जाता हूँ कुछ न कुछ ईश्वर की कृपा से जानकारी हासिल कर ही लेता हूँ। मैंने तन्त्र विद्या की चन्द बातें मालूम कर ही लीं और तान्त्रिक साधना का विचार करने लगा। लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। इसी अवसर पर मेरे मित्र विश्वनाथ प्रसाद जी के बड़े भाई दुर्गाप्रसाद जी ने “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका मंगाया था, मैंने मन बहलाने के लिए मंगाकर पढ़ने लगा। गायत्री महिमा पढ़कर मन प्रसन्न हुआ, और कई छोटी-छोटी पुस्तकें मंगवाकर पढ़ी, पढ़ कर खाट पर बैठे-बैठे ही मानसिक साधना को आरम्भ कर दिया। उस समय मकान मालिक ने मकान से निकालने के लिये कैन्टोमेंट से मुकदमा चलवा दिया था, मैंने परीक्षा का यही अवसर अच्छा समझा, विधि विधान से करना उस समय मुश्किल था, जैसे तैसे 1 माला जपने लगा। और मुकदमा जिता देने की प्रार्थना करने लगा। कैन्टोमेंट बोर्ड के कई मेम्बर मकान मालिक के दोस्त थे। सरकारी मुकदमा मेरे ऊपर चल रहा था। कोई नहीं कह सकता था, कि आसानी से यह मामला सुलझेगा, लेकिन आश्चर्य। कैन्टोमेंट के ऑफीसर ने समझौता कर लिया। जिसकी कोई आशा नहीं थी। 20) में समझौता हो गया।

इससे गायत्री के प्रति मेरी श्रद्धा और विश्वास बहुत बढ़ गयी। इस मामले में कई व्यक्ति मकान मालिक से मिलकर तंग कर रहे थे, उन्हें भी लज्जित होना पड़ा। इस तरह दो तीन कामनाएँ माता ने पूरी कीं, जिससे श्रद्धा भी बढ़ती गई। रुचि बढ़ने पर और भी कई पुस्तकें मँगाकर पढ़ीं, 5 मई सन् 50 से जप आरम्भ किया था कुछ दिन बाद खाट से नीचे जमीन पर आसन लगाकर जप करने लगा। बात बिगड़ने से पेट में गड़बड़ी रहती थी। जब उपासना में बैठता तो पेट गुड़गुड़ाता और अधोवायु निकलने लगता, इतना ही नहीं घण्टा भर अगर एक आसन से बैठे-बैठे जप करता तो दो चार बूँद धात निकल जाता था। उपासना के समय यह तमाशा देखकर कभी-कभी हतोत्साहित हो जाता था। साधना चालू रखे तो यह लीला, न करे तो मन नहीं मानता था। जैसे तैसे चालू रक्खा छोड़ा नहीं, माँ की दयालुता पर भरोसा था। मैंने ठान लिया था, कि चाहे जो कुछ हो, उसे छोड़ नहीं सकते। यह विकट परिस्थिति बहुत कम लोगों के आगे आयी होगी। मेरे पास कातर वाणी, दृढ़ श्रद्धा और विश्वास के सिवा और क्या था? मैं इन्हीं को अपनाकर आगे बढ़ रहा था। इससे क्या लाभ हुआ? इस विषय में मैं यहाँ कहूँगा, कि माता की दया और गुरुदेव के अनुग्रह से वर्षों का मंजिल कुछ ही दिनों में तय किया। अज्ञान अन्धकार हटता जाता है, आत्मा के ऊपर जमा हुआ मल, कुसंस्कार आदि नष्ट होता जाता है।

सन् 1951 में हाथ में “कोल्ड अबसेस हो गया प्लूरिसी रोग से मेरा दाहिना हाथ ऊपर नहीं उठता था। डॉ. ने बताया कि पठ्ठे की हड्डी जम गयी है, वहीं से रीम आकर जमने से ‘काल्ड+अबसेस’ हो गया है, आपरेशन कराना होगा। मैं बड़े फेर में पड़ा। डॉ. जी. पी. गुप्ता ने कहा जहाँ से रीम चला है, अगर वहाँ आपरेशन किया जायेगा तो हाथ हिलाने डुलाने लायक भी नहीं रहेगा। निदान पटना के प्रसिद्ध डॉ. केपटन, एन. पाल के यहाँ जाकर दिखलाया गया।

उन्होंने थोड़ा सा आपरेशन करके रबर की नली लगादी जिससे रीम रुकने नहीं पाता था साथ ही पेन्सलीन और स्पेटोमाईसीन भी चालू कर दिया। 20 दिन से भी अधिक समय बीत गया लेकिन रीम बन्द नहीं हुआ। तब डॉ0 पाल ने कहा तीन या अधिक 7 दिन तक और देखेंगे रीम रुक गया तो ठीक, नहीं तो जहाँ से रीम चलता है, वहाँ तक आपरेशन करना होगा।

डॉ0 पाल चीर फाड़ के नामी डॉक्टर हैं, पटना में वे जख्म आदि के पुराने अनुभवी हैं। उनकी बात सुनकर मुझे बड़ी दुःख हुआ, क्यों कि डॉ0 जी. पी. गुप्ता ने पहले ही कह दिया था कि वहाँ पर आपरेशन करने से हाथ बे काम हो जायगा। क्योंकि हड्डी में दाग होने से छिलना पड़ता इससे हड्डी और नसें बेकार हो जाती। मेरी दाहिनी भुजा बेकार हो जायेगी इसकी कल्पना से ही दुःख होने लगा, मैंने सोचा जब हाथ बेकार हो जायगा तो हम जीकर ही क्या करेंगे जान दे देना ही अच्छा है। उस समय जख्म के कारण लेटे-2 ही एक दो माला जप करता था। उस दिन जप में भी मन नहीं लगा। भावी अनिष्ट की आशंका दिल में उथल पुथल मचा हुआ था।

मैंने कातर होकर अश्रुपूर्ण नेत्र से माँ से अपनी दर्दभरी कहानी कही, मुझे ऐसा लगा मानों माँ सामने खड़ी हैं, और कह रही हैं, ‘घबराओ नहीं तुम शीघ्र अच्छे हो जाओगे” लेकिन इस बात पर पूर्ण विश्वास नहीं हुआ, क्योंकि उन दिनों बरसात का महीना था पूर्वईया हवा जोरों में चल रही थी। दूसरे उस दृश्य को मैंने कल्पना ही समझा लेकिन दिल कहता था, वह दिव्यवाणी है, असत्य न होगी।

उसी दिन से रीम सूखने लगा, तीन चार दिन में बहुत कम हो गया अब आपरेशन का डर भी कम हो गया, एक दिन डॉ0 पाल ने किताब निकाल कर दिखाया और कहा, देखिए मैं आपके आपरेशन का रूपरेखा तैयार कर लिया था, लेकिन आप का भाग्य। “वास्तव में इस जख्म को इस तरह सूखते देख, जिसकी आशा नहीं थी, डॉ0 पाल भी आश्चर्य चकित थे।

इसी बीच में एक और संकट से माता ने रक्षा की। हम कुछ ही दिन में अच्छा होकर घर चले आये। इस घटना को 3 वर्ष के लगभग हो रहा है। मैं बड़ा अनुष्ठान आज तक नहीं कर सका हूँ। थोड़ी बहुत दैनिक साधना टूटी फूटे नियम से कर रहा हूँ। माता की दया और गुरुदेव की कृपा से जन्म जन्मान्तर के पड़े कुसंस्कार धीरे-2 हटते जा रहा हैं।

अगर माता की दया और गुरुदेव का अनुग्रह होगा तो आत्म दर्शन कर सकूँगा, ऐसी आशा और विश्वास से साधना में लगा हूँ।

मन भड़क-भड़क कर पुराने ढंग पर चलता है, परन्तु उसका अब वश नहीं चलता, पछता-पछता कर फिर अपने जगह पर लौट आता है। गायत्री तू धन्य है, तेरी महिमा अपार है, वाणी में सामर्थ्य नहीं है जो तेरा गुण गा सके। मेरे जैसे पापी को जब सत् मार्ग पर ला सकती है, और कठिन प्रारब्ध भोगों को सरल कर सकती है तो जो धर्मात्मा, पुण्यात्मा है, उनकी तो बात ही दूसरी है।


गायत्री की शरण से नवजीवन दान

(श्री रामेश्वर शर्मा, अध्यापक धरम पुरी)

मेरा इकलौता पुत्र दो बार बहुत अधिक बीमार हुआ उस समय मैं घर से बाहर 1 मील दूर था लेकिन वेदमाता की शरण में रहने से उसे किसी प्रकार का कोई संकट नहीं आया?

जिस समय मेरा बच्चा पहली बार बीमार हुआ उस समय इसे सूखा रोग हो गया था और इसके बचने की कोई आशा नहीं रही तथा मैं बच्चों की चिकित्सा से बिल्कुल अनभिज्ञ था कि इनकी चिकित्सा किस प्रकार की जाती है।

इस चिंता से दुःखी होकर एक दिन मैं अपने परिचित साथी के पास खलघाट आया और उनसे सारा हाल कहा। उन्होंने मुझे सब प्रकार से धैर्य बंधाया और कहा कि प्रत्येक कार्य को गायत्री माता के आश्रय में छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए सफलता अवश्य मिलती है मैंने उनके कहे पर विश्वास किया और गायत्री जप के साथ दवाई देना शुरू किया, बच्चे का सूखा रोग मिट गया और एक माह में बच्चा पूर्ण तन्दुरुस्त हो गया, तब से मेरा आत्म विश्वास दृढ़ हो गया और मैं माता की उपासना और अधिक लगन से करने लगा।

दूसरी बार बच्चा बीमार पड़ा, इस बार उसे ब्रेंको निमोनिया, और डिप्थेरिया हो गया। आशा निराशा में परिणत हो गई, क्या किया जाय कुछ समझ में नहीं आता था, मैं शान्त होकर बैठ गया और माता से प्रार्थना करने लगा, तथा मेरे साथी महोदय ने विशेष रूप से किये गये गायत्री यज्ञ की भस्म बच्चे को लगाई, जिससे उसे शान्ति मिली और आशा बंधी। दो चार दिन की साधारण चिकित्सा के बाद उसे आराम हुआ। कुछ भी हो गायत्री मन्त्र में संजीवनी शक्ति विद्यमान है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव मैंने किया है।

आज से मैंने अपना जीवन वेदमाता की सेवा और प्रचार में लगाया है। मैं बहुत अधिक समय यथा तन मन धन से माता की उपासना करता हूँ। इसके फलस्वरूप मुझे आरोग्यता, ज्ञान, प्रतिष्ठा, और उन्नति की दशा का अनुभव हो रहा है। भविष्य में मैं क्या बन जाऊँ यह कह नहीं सकता। इतनी सरल और कष्ट रहित साधना जो नहीं करें उनके समान अभागा इस दुनिया में और कौन है। मेरे अनुभव तथा मेरा दृढ़ विश्वास इस बात का द्योतक है कि वेदमाता गायत्री की शरण में रहने वाला कभी भी दुःखी नहीं रहता है।


महाशक्ति की समीपता

(डॉ. जे. निगम, कानपुर)

बहुत समय से मैं गायत्री उपासना में लगा हुआ हूँ। मेरी साधना जिस गति से बढ़ती है उसी अनुपात से मुझे माता की कृपा के अनेकों अनुभव भी होते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि कोई शक्ति मेरे चारों ओर भरी हुई है और वह मुझे निरन्तर प्रेरणा एवं पथ प्रदर्शन प्रदान करती है। अनेकों व्यक्ति मुझसे अनेकों अज्ञात बातें पूछने आते हैं उन्हें ऐसा विश्वास है कि मुझे कोई विशेष सिद्धि प्राप्त है। कारण कि बताई हुई प्रायः सभी बातें सही निकलती हैं और जिसे जो कार्य बता देते हैं वह उनके लिए सफलता प्रदान करने वाला ही बन जाता है।

कोई विशेष साधना सिद्धि मैं नहीं जानता गायत्री ही मेरा इष्ट है। इसी की जो कुछ साधना बन पड़ती है करता रहता हूँ। इससे मुझे ऐसा प्रतीत होता रहता है कि कोई महान शक्ति हर घड़ी साथ-साथ फिरती है और उसकी सहायता समय पर आसानी से प्राप्त की जा सकती है।

बहुधा अनेक व्यक्तियों को छोटी मोटी सहायताएं इस महाशक्ति द्वारा पहुँचाता रहता हूँ। अपने घर परिवार में भी ऐसे ही अनुभव होते हैं। अपने परिवार के अभी हाल के ही अनुभव पाठकों के सामने प्रस्तुत करता हूँ। उन्हीं से अन्य ऐसी ही घटनाओं का अनुमान लगाया जा सकता है।

1-चन्द महीना हुआ जब कि मेरी स्त्री के बच्चा हुआ था वह जब मायके से मेरे यहाँ पर आई और उसी दरमियान मैंने नवदुर्गा का अनुष्ठान करके हवन सुबह को कर रहा था। उसको भी हवन के पास बैठने को कहा तो वह कहने पर चारपाई से उठकर मेरे हवन में न आकर कहा जाड़ा है, हम लेटे हैं उसी वक्त मेरे जबान से निकल गया, जाओ पड़ी रहो उसी दिन से सख्त बीमार हो गई। हर प्रकार का इलाज किया गया मगर लाभ न हुआ। तब मैंने गायत्री जी का हवन करके उसको हवन के पास बैठाकर के पूजा की तो उसी दिन से वह अच्छी होने लगी और बिना हमारे पिता ऋणग्रस्त होने के कारण साधारण कच्चे देहाती बनावट के मकानों में रहते थे और मकान जरूरत से ज्यादा टूटे फूटे छोड़कर स्वर्गवासी हो गये थे। मैं भी ऋण भार के कारण उन्हीं में गुजर करता रहा। पर सन् 1991-92 से कुछ माता की कृपा हो जाने के कारण हर बातों में हर कामों की वृद्धि होने लगी। मकान बनाने की इच्छा हुई और सन् 1994 में पक्का मकान सादा बनाना चाहा पर अनायास मुझे कुछ मालूम ही नहीं पड़ा और करीब 3 हजार रुपया के खर्चे से इतना बड़ा दुहरा (दो मंजिल) मकान बना कि इस वक्त यदि बनाया जाय तो 25 हजार रुपया की लागत से बनेगा जो मेरी हैसियत से बाहर बन गया है।

मुझे सन् 1991 में बीमारी जो हुई थी वह इतनी जबरदस्त थी कि सब ही ने मेरा अखीर समझ लिया था। पर उस परमपिता की कृपा से बच गया और भी छूट पुट कई दुश्मनों ने अकारण के झगड़े तैयार किये पर उस गायत्री माता की कृपा से सब ही को मुँह की खानी पड़ी। सत्य की विजय होती है ऐसा मैंने आजमा कर देखा। अब सरकार ने मालगुजारी ले ली है सिर्फ काश्तकारी बची है। मेरी मालगुजारी के वक्त काश्तकार 16 एकड़ जमीन का सिर्फ 75) रु0 में बेदखल हो गया, और मैंने जमीन पर कब्जा ले लिया। इसके बाद उस जमीन के खरीददार खड़े हो गये। एक हजार रुपया में 16 एकड़ जमीन माँगने लगे। उस परम पिता ने मुझे प्रेरणा दी कि मैंने अपनी खुशी से उस जमीन में से 5 एकड़ जमीन रखकर बाकी 11 एकड़ जमीन उस काश्तकार को वापिस कर उसके लड़के के नाम पट्टा लिखकर दे दिया। रुपया का लालच न किया, निदान कुछ दिन बाद वही 5 एकड़ जमीन मेरे पास से 1200) रुपये में बिक गई। इस प्रकार गायत्री माता की उपासना के फलस्वरूप मेरी अनेकों कठिनाई हल होती गई हैं और सुविधाएँ बढ़ी हैं। शेष जीवन की कठिनाइयों को भी वे इसी प्रकार पार कर देंगी, ऐसी आशा है।


जान माल की भयंकर क्षति से बचे

(श्री जसवन्त सिंह राजाबल, पीपलू)

कुछ समय से हम कई मित्र गायत्री उपासना में लगे हुए हैं। हम लोगों की जैसी कुछ टूटी फूटी साधना है उसके हिसाब से देखा जाय तो हम लोगों को माता का सहारा भी सन्तोषप्रद मिल रहा है। गत वर्ष गर्मियों में तो हम लोग एक भारी दुर्घटना तथा जान-माल की भयंकर क्षति से बाल-बाल बच गये। रक्षा में गायत्री माता की कृपा ही प्रधान कारण थी।

गत गर्मी की छुट्टियों में मैं व शम्भू सिंह जी हमारे बहुकुटुम्ब सहित सीताबाड़ी के मेले में गये। एक तो मुझे दो बैल बेचने थे दूसरे सब सीताबाड़ी पवित्र स्थान को देखना व स्नान करना चाहते थे। रास्ते में रेलावन ग्राम की पार्वती नदी की ररक में हमारी असली गाड़ी जिसमें औरत समाज बैठा हुआ था, बैल के नीची गर्दन कर देने के कारण गैल में ही रुक गई। दौड़ बहुत ही भयानक व संकरी थी। पीछे वाली गाड़ी भी चलती दौड़ में दौड़ी, उस वक्त तक गाड़ी दौड़ चुकने पर हमें पिछली गाड़ी वालों की आवाज द्वारा मालूम हुआ कि दौड़ में गाड़ी रुकी हुई है। पर अब क्या हो सकता था। मैं दोनों गाड़ियों के बीच में बन्दूक लेकर चल रहा था। पर अब मैं भी क्या कर सकता था। इस प्रकार गाड़ीवान के जोर से बैलों की रास खींचने के कारण एक बैल पीछे पूठ पर गाड़ी का धक्का जोर से लगने के कारण अगली गाड़ी के आने से पहले ही गड़ार में गिर पड़ा व उठ गया व फिर गिर पड़ा व वह बैल अपने सींग के बल ऐसा पड़ा कि सारी गाड़ी भी उसी पर आ गई। आस-पास की भीड़ में हाहाकार मच गया जो गाड़ियाँ वहाँ पर रुकी हुई आराम कर रहे थे उनमें हमारा औरत समाज भी रोने लग गया क्योंकि दोनों गाड़ियों में 8 बच्चे 5 साल तक की उम्र के थे। अतः मेरे भी होश गुम हो गये। मैंने एकदम अपने आपको सम्हाल कर के अपना कन्धा गाड़ी के पहिये से लगा दिया। कुँ0 शम्भु सिंह जी अपने हाथ में एक 4 वर्षीय बालक को लेकर जल्दी से कूद पड़े। मेरे मामा श्री मदन सिंह जी बहाली बगैरा ने उस बैल को खींचकर निकाला उस नये बैल का एक सींग पूर्णतया टूटा हुआ था वह देखकर हमें और भी अधिक दुःख हुआ क्योंकि उसे 1 महीने पहिले ही हमारे बड़े मामा ने 200) में मोल लिया था। सींग को वापस मिलाकर भगवती का नाम लेकर बाँध दिया। आज तक ऐसे सींग जुड़े हुए नहीं सुने थे पर यह सींग तो केवल स्प्रिट डालते रहने से ही अच्छा हो गया वह बैल आराम से हमारे मामा के कास्त में काम आ रहा है।

दूसरी घटना वापस आते समय रात के वक्त रास्ते में चोरों से मुठभेड़ हुई। उस समय भी भगवती का स्मरण करने से साक्षात बचाव हुआ, न मालूम क्यों वह खाँस कर ही रह गया और उसने कोई छेड़-छाड़ नहीं की इसे भी माता का ही प्रसाद समझता हूँ। फिर वापस उसी नदी रेलावन ग्राम में आने पर कुंए पर पानी पीते हुए रवाना होकर वहाँ पर 1000) की दोनाली नं0 12 बन्दूक भूलकर 1 मील चले जाने के पश्चात बन्दूक की भूल आने की याद आई। उसी गर्मी के समय में दिन के 2 बजे मैवहाली मामा का लड़का विजेन्द्र सिंह भागते हुए गये। मुझे निराशा व आशा कि विचारों ने खूब खिलाया भुलाया पर निश्चित स्थान पर पहुँचने पर माता की कृपा का प्रसाद तैयार मिला। उस बन्दूक की एक भले पुरुष ने सब ग्राम के मौजिज आदमियों को इकट्ठा करके उठाया था क्यों कि उसे यह मालूम था कि फला ग्राम के वासियों की यह चीज है, पर हम उसे नहीं जानते थे। इस प्रकार से 1000) का नुकसान भगवती की कृपा से बचा व साथ में सरकार के नियमों से बचे अन्यथा दुनाली बन्दूक खो जाने पर सरकार खैंचातान करती। इसके उपलक्ष में ग्राम आते ही ब्रह्मभोज मेरे बड़े मामा ने किया व हवन भी करवाया इसके बाद अर्धांगिनी का इलाज कम पैसा में ही दवाइयाँ व इन्जेक्शन के द्वारा हुआ। इस प्रकार छोटी मोटी घटनाएं तो कितनी ही हैं। जिनमें माता की सहायता अप्रत्यक्ष रूप से प्राप्त हुई। 10 भैंसे, बाबा साहब की 8, व 2 मेरी 5 दिन बाद मिली।


उन्नति की ओर प्रगति

(श्री ओउम प्रकाश त्यागी, सीकरी बुजुर्ग)

गत वर्ष मैंने नित्य दो मालाओं का नियम कर खा था। गायत्री लेखन के कारण मानसिक अवस्था माता के चरणों में ही रहती थी। रात को सोते व वह को उठते समय का ध्यान भी चलता है। दिन में भी ज्यादा समय माता का स्मरण बना रहता है। इस वर्ष मैंने आश्विन के नवरात्रों का अनुष्ठान भी किया है।

समय पाकर मैंने चालीस दिन का सवा लाख का एक अनुष्ठान भी कर लिया है। इस अनुष्ठान से मेरा बड़ा हित हुआ है। सबसे पहला स्वास्थ्य लाभ दूसरा हमारा पति पत्नी का पारिवारिक कलह प्रायः समाप्त ही समझना चाहिए। यह कलह मेरे जीवन में सबसे बड़ी परेशानी थी जिसके कारण किसी भी काम में चित्त न लगता था। इस समय माता की बड़ी कृपा है। अनुष्ठान के बीच में ही ऐसे कारण बनने लगे थे जिससे पैसे की कमी से फिक्र न होती थी।

आत्मिक शान्ति यदि मुझे ही हो होती तो कोई आश्चर्य की बात न थी। मेरी पत्नी तथा बच्चे व मेरे चौथे भाई के परिवार में भी बहुत शाँति है। हम दोनों भाई एक ही हवेली में रहते हैं ऐसा ज्ञात होता है माता पूरी तरह प्रसन्न हैं। जिस कमरे में मैं पूजा करता हूँ किसी समय भी जब उसमें घुसता हूँ तो ऐसा मालूम होता है कि मेरे अन्दर कोई शक्ति विराजमान है, घुसते ही अन्तः करण खुशी से गदगद होने लगता है।

मैं पहले से भी गायत्री का जाप किया करता था। जिसके कारण कई बार अच्छी नौकरी पर भी पहुँचा। कई बार मुझे बड़े संकटों से बचाया। उस समय मैं यह न समझ पाया कि वह सब माता का प्रसाद है। अब मुझे उस सबका स्मरण होता है तो दिल गदगद हो उठता है। एक बार तो मैं दिल्ली में ट्राम के नीचे आ गया था, साईकिल पर सवार था क्षणभर में सब कुछ हो गया यह भी पता न चला कि किधर से उसके नीचे पहुँचा। निकलने पर साईकिल एक तरफ ठीक हालत में पड़ी मिली, मेरे भी खास चोट न आई साईकिल उठाकर दफ्तर चला गया।

अब मेरा यह प्रण है कि सामर्थ्य के अनुसार माता की सदा सेवा करता रहूँगा। गायत्री प्रचार को बढ़ाने में सहायक बनूँगा। हम छः प्राणी हैं, मैं, मेरी स्त्री, दो लड़के व दो लड़की, सब ही माता के दास हैं। माता को याद करते रहते हैं। मेरे कई सम्बन्धी व मित्र मेरे विचार के बनते जा रहे हैं।


अनेक आपदाएँ टलीं

(श्री ज्वाला प्रसाद शर्मा, मेवानगला)

गत वर्ष मैं होली से पहले अपनी बहिन लिवाने देवा नामक ग्राम जिला मैनपुरी में गया। तो वहाँ से मुझे नहीं आने दिया। मेरा तो नियम ही था पूर्णिमा को हवन करने का सो मैंने हवन विधि सहित किया। दूसरे दिन जब होली का गाना बजाना वहाँ के मुखिया के घर से शुरू हुआ तो मुखिया अपने 4-5 वर्ष के बच्चे को गोदी में लिये था और बच्चा सो गया। सो मुखिया उस बच्चे को चारपाई पर सुलाने गये और बच्चे को ज्यों−ही सुलाया वैसे ही मुखिया के हाथ में बिच्छू ने काट लिया और काटते ही उन्होंने एक दम जैसे बच्चे को छोड़ा वैसे ही बच्चा भी काट लिया। वहाँ बिच्छू बहुत चढ़ता है और थाली से उतरता है। अब वहाँ होली बन्द हो गई और सभी लोग घबड़ा गये और थाली बजने लगी जस होने लगे बच्चे के काटे में मुखिया तो अपना दुःख भूल गये और उनका विष उतर भी गया। परन्तु बच्चे का विष थाली से भी नहीं उतरा और झाग डाल गया तो स्त्रियाँ रोने लगीं और सारा गाँव हाहाकार करने लगा।

इतने ही में किसी ने मेरा पता दिया कि ज्वाला प्रसाद इलाज करते हैं। अब मेरे पास एक आदमी बहुत घबड़ाया हुआ आया और मुझे सारा हाल बताया। अब मेरे पास कोई औषधि तो थी ही नहीं फिर भी मैं गुरुदेव तथा भगवती गायत्री का नाम लेकर यज्ञ की भस्म लेकर वहाँ गया तो देखा कि सभी लोगों की बड़ी असहनीय दशा थी और उस बच्चे के शरीर पर अनेकों दवाएं लगी हुई थीं। मैंने सारी दवाओं को साफ कराया और गायत्री मंत्र पढ़कर उसके शरीर पर भस्म की मालिश की और मालिश करते ही दो मिनट के अन्दर उसकी दाँती खुली। दाँती खुलते ही मैंने कुछ भस्म उसको गंगाजल के साथ पिलाई, पीते ही बच्चा कुछ रोया और फिर शान्त हो गया। फिर मैंने कहा सब लोग यहाँ से चले जाओ बच्चे को सोने दो फिर बच्चा सो गया और सुबह को ठीक उठा।

एक घटना अभी हाल में हुई। हमारे सगे भाई अनुसार नाधै जिला बदायूँ में रहते हैं। खबर सुधार लेने वहाँ गया था तो देखा कि हमारी भाभी को भूतोन्माद हो गया जो रात्रि आदि में चाहे जहाँ चल देती, अंट संट बातें करती, कुछ खाती न पीती और सब घरवालों से झगड़ती। एक दिन मैं सन्ध्या कर रहा था इतने में उनकी हालत बहुत खराब हो गई तो उनका भतीजा भागा हुआ आया और बोला कि सन्ध्या फिर करना पहले घर आओ, माता जी को बहुत गड़बड़ी है। मैं माला जप रहा था और पूरी करके वहाँ पहुँचा तो जैसे ही नब्ज़ देखने को हाथ बढ़ाया वैसे ही बहुत जोरों से उठने लगीं और बोली मुझसे कि तू यहाँ भी आ गया तेरे घर तो मेरी दाल गली नहीं। फिर मैंने कहा कि तू कहाँ से आया है मैं तुझे यहाँ भी नहीं रहने दूँगा मैंने कहा इसको डाँटों और गंगाजल मँगाया फिर मैंने गंगाजल अभिमन्त्रित करके दिया कुछ ही देर में शान्ति मिली और मैंने विचार किया कि यदि न गया तो इसके हाथ से गायत्री यज्ञ कराऊँगा परन्तु उनको उसी दिन से आराम हो गया।

इसी प्रकार हमारे भतीजे की शादी होकर आई तो उसकी बहू के पेट में इतना विकट दर्द हुआ कि बेचारी दर्द से सारे घर में लोटी लोटी फिरे और उनको अनेक दवाइयाँ दी कुछ फायदा न हुआ। तब मैंने अभिमन्त्रित करके जल और गंगाजल मिलाकर पिलाया, पीते ही वह आराम से सो गई और इसी प्रकार की अनेक घटनाएँ और भी मुझे हुई और होती रहती हैं। विस्तारमय से नहीं लिख रहा हूँ और सत्संग वगैरह के तो अवसर मिलते ही रहते हैं।


गायत्री उपासना के अनंत लाभ

(पं. रामचन्द्र व्यास बागली)

इस समय मेरी आयु 54 वर्ष की है। मैं यह नहीं कहता कि मेरा कोई दोष न था। सारे दूसरे लोग मेरे दुश्मन बन गये। दोष मेरा भी न था परन्तु जिन लोगों ने दुश्मनी की उनके साथ मेरी कोई दुश्मनी नहीं थी। उनका मैंने कोई दोष नहीं किया अकारण मेरे शत्रु बने।

भगवती की असीम कृपा व दया से बड़े-बड़े रईस, जागीरदार मेरे विरुद्ध होते हुए मेरा कुछ भी नुकसान न कर सके।

मैंने किसी कालेज या बड़ी पाठशाला में विद्या अध्ययन नहीं किया। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण मेरे पूज्य पिता जी ने ही हिन्दी का कुछ बोध करा दिया था।

मैं प्रारम्भ से आजतक गायत्री उपासना करता आया हूँ। इसके प्रभाव से मुझे अच्छी नौकरियाँ मिली। वकील के पद से कोर्टों में मुख्तारी द्वारा प्रेक्टिस की, जागीरों में उच्च पदों पर काम किया, मामूली लिखा पढ़ा होने पर मजिस्ट्रेटी के पद पर भी पाँच वर्ष तक कार्य किया।

कई बड़े-बड़े संकट आये। दुर्व्यसनों का भी शिकार हुआ। भगवती के जप व अनुष्ठान से अब संकट दूर हुये शत्रुता का अन्त हुआ। अर्थात् दुर्व्यसनों का अन्त हुआ।

मेरी आर्थिक स्थिति अत्यन्त कमजोर होने की दशा में मित्रों ने, नातेदारों ने, घनिष्ठ निकटवर्ती काकी, मामाओं ने कोई साथ किसी प्रकार का नहीं दिया। जिन मित्रों के लिए मैंने अपने सम्पूर्ण जीवन भर साथ दिया उनने भी समय आने पर मेरे साथ दुर्व्यवहार किया और मेरे जीवन के हर कार्य में उनने रुकावट की। परन्तु भगवती की दया से मुझे सफलता ही मिली।

आज मेरे चार लड़के अच्छी शिक्षा पा चुके। मैट्रिक, बी. ए., बी. ए. एल. एल. बी., साहित्य रत्न, विशारद परीक्षाओं में अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण हुए और चारों इस समय अच्छी सर्विस में हैं। बड़ा पुत्र मदनलाल व्यास शहर इन्दौर टेलीग्राफ में सिनगनेसर हैं। उससे छोटा शिवलाल व्यास रसलपूरा (महू) हाईस्कूल में अध्यापक है। और इस वर्ष एल. एल. बी. के फाइनल इम्तहान में शिक्षा पा रहा है। तीसरा बेणीमाधव हाईस्कूल सनवास में अध्यापक है। बी0 ए0 है। चौथा रघुनन्दन व्यास एम॰ ए॰ है। भोपाल में टेलीफोन एक्सचेंज आफिस में टेलीफोन आपरेटर है। पाँचवाँ लड़का शिवाजी राव हाईस्कूल इन्दौर में शिक्षा पर रहा है, इस वर्ष मैट्रिक में है।

माता पिता के देहावसान के पश्चात कुटुम्बियों ने अधिक सताया, मित्रों ने साथ नहीं दिया। परन्तु माता गायत्री ने साथ दिया। लड़कों की शिक्षा लड़कों के विवाह, माता पिता के उत्तर कर्म, जाति, भोज आदि सभी कार्य हुए। जिनमें हिसाब जोड़ा जाय तो कई हजार रुपया होता है। यह सब कैसे हो गया भगवती ही जाने।

लड़कों के सम्बन्ध सगाई के करने कराने में कुटुम्बियों का कोई हाथ नहीं घर की स्थिति अत्यन्त नाजुक दरिद्रता ने कुछ समय के लिये अच्छा मुकाम किया। इस दरिद्री अवस्था में नातेदारों की, घनिष्ठ मित्रों की भगवती न पहचान कराई। यह भी भगवती का प्रसाद ही था।

पं. शिवदत्तजी शुक्ल उज्जैन गुदड़ी बाजार के लेख भगवती उपासना के सम्बन्ध में कल्पवृक्ष मासिक पत्र उज्जैन में आते थे। उनको देख देखकर मुझे अत्यन्त लाभ हुआ। मैं स्वयं पण्डित शिवदत्त जी के पास गया। उनके उपदेश के सवा सवा लक्ष के अनुष्ठान किये। पंडितजी ने कहा कि नित्य ब्रह्म मुहूर्त में 1000 जप व उसका दशाँश हवन 6 वर्ष तीन मास तक करो तो तुम्हारा गायत्री पुरश्चरण हो जायगा। मैंने पं0 शिवदत्तजी के उपदेश को ग्रहण किया और भगवती की कृपा से 6। वर्ष तक 1000 जप व दशाँश हवन का कार्य चलता रहा। इसी 2400000 लक्ष जप हवन का प्रताप है कि आज सफलता के दर्शन करता हूँ।


प्राणघातक संकटों से मुक्ति

(डॉ0 एस॰ सी0 गोस्वामी, मथुरा)

5 वर्ष पूर्व जब मेरी आयु केवल 20 वर्ष की थी विधाता ने ऐसे ऐसे क्रूर आरम्भ किये कि मैं तिलमिला उठा। शब्दों के द्वारा उन स्थितियों को समझाना असम्भव ही है। कोई भुक्तभोगी ही समझ सकता है। पितृ वियोग होने के बाद भी देवता समान श्रेष्ठ भ्राता ने पिता का अभाव न मालूम होने दिया। लेकिन नियति का यह सौभाग्य देखकर भी शायद ईर्ष्या हुई होगी। उसने सर्वगुण सम्पन्न भाई को भी पिता की मृत्यु के कुछ समय पश्चात् ही छीन लिया।

मुसीबतें आती हैं तो चारों ओर से आती हैं। गृहस्थी का भार मेरे कमजोर कन्धों पर आ पड़ा। पिताजी इस जिले के नामी होम्योपैथिक डाक्टरों में थे। उनका स्मृति चिन्ह, उनका दवाखाना कैसे चले? बड़ी विकट समस्याएं सामने थीं। यद्यपि पिताजी की उचित व्यवस्था द्वारा रोटियों का घाटा नहीं था, परन्तु दुनिया में और भी बहुत समस्याएँ ऐसी हैं जिनको हल करना बड़ा मुश्किल हो जाता है।

कुछ दिन बाद नाना प्रकार की दुश्चिन्ताओं के परिणामस्वरूप मैं भयंकर रोग द्वारा ग्रसित हो गया। रोग का नाम था “टी. बी. ग्लाडस” यानी कण्ठमाला एक एक करके नौ गाँठें बड़ी भयंकर रूप से फूट निकलीं साथ-साथ ज्वर भी रहने लगा। डाक्टरों से पूछने पर बताया गया कि यह सबसे भयंकर किस्म की “कण्ठमाला” है इस रोग में बहुत कम रोगी बचते हैं।

बड़ी विचित्र स्थिति थी। माँ दिन रात रो रोकर जान दिये देती थी। उसका रोना भी उचित था। दो लड़कों में से बड़े लड़के मोटर दुर्घटना से मर चुके, एक मैं बचा हूँ उसे यह राजरोग लग गया। तरह तरह के राय मशवरे चिकित्सा सम्बन्धी दिये गये लेकिन अंत तक यह निश्चय न हुआ कि कौन सी चिकित्सा कराई जाय।

एक दिन चित्त बड़ा दुःखी हो गया, मैं अपने कमरे में लेटा दुःखी होकर रोने लगा, और मन ही मन पिताजी की याद करके दुःखी होने लगा न जाने कब आँख लग गई। स्वप्न में पिताजी ने दर्शन दिए वे मुझे आशीर्वाद देकर बोले बहादुरी से अपनी परिस्थितियों का मुकाबला करो भगवान कल्याण करेंगे। कुछ और भी बातें बताई जिन्हें कारणवश में कहने में असमर्थ हूँ। निद्रा खुल गई घर में सब को मैंने स्वप्न की बात बताई तो सब लोगों ने मेरी बात पर विश्वास न किया।

हालत बजाय सुधरने के दिनों दिन खराब होने लगी अन्त में उनका इलाज बन्द कर दिया। दो एक डाक्टरों की दवा कुछ दिन और की गई पर मर्ज बढ़ता ही गया ज्यों-2 दवा की। किसी ने सलाह दी मृत्युँजय मन्त्र गायत्री का जप करो। बात मन में जम गई।

एक मन होकर गायत्री साधना प्रारम्भ कर दी दो वर्ष की कठिन साधना के बाद मेरा रोग दूर हो गया मैं स्वस्थ हूँ परन्तु एक मानसिक रोग शेष रह गया। अन्त में उस रोग का इलाज बहुत कुछ आचार्य जी पूज्यनीय श्रीयुत श्रीराम शर्मा जी अखण्ड-ज्योति के सम्पादक एवं गायत्री तपोभूमि के अधिष्ठाता ने किया। इनके श्री चरणों की कृपा से मुझे गायत्री माता की महिमा का अनुभव हुआ। तब से मैंने माँ के श्री चरणों में आश्रय ले लिया है एवं भगवती की अनुकम्पा से बड़े-2 कठिन टी. बी. सरीखे रोगियों को अच्छा करने में सफलता प्राप्त कर चुका हूँ एवं अब धीरे-2 यह विश्वास होने लगा है कि माँ के आशीष से मैं अवश्य अपने पिता का नाम और यश फिर से स्थापित करने में सफल हो सकूँगा।


बच्चों की सुख-शान्ति

(श्री नर्मदा बाई शर्मा, खलघाट म॰ भा0)

मेरे पति देव लगातार बहुत दिनों से उपासना करते थे, उनके नियमित कार्य को देखकर मेरे मन में भी प्रबल इच्छा हुई कि मैं भी लगातार उपासना करूं। लेकिन कोई सुविधा न होने के कारण तथा छोटे-2 बच्चों का लालन पालन और उनकी पूर्ण जिम्मेदारी मुझ पर होने से, मुझे समय नहीं मिलता था, न पति देव का भी मुझ पर ऐसा प्रभाव था कि वे मुझसे कह सकें कि तुम भी माता की उपासना करो। गृहकार्य की पूर्णतया जिम्मेदारी मुझ पर ही होने से उचित समय नहीं मिलता था। इससे मैं भय खाती थी इस विषय पर मैंने एक दिन पति देव से पूछा क्या मैं उपासना नहीं कर सकती। पतिदेव ने कहा क्यों नहीं तुम पर तो माता की विशेष कृपा बहुत ही शीघ्र होती है। फिर मैंने कहा कि हमें संध्या के दोनों समय तो गृह कार्य अधिक रहता है फिर कैसे करूं तथा कब करूं तब उन्होंने कहा गृहस्थी पतिव्रता स्त्री को पति की सेवा के बाद, या गृहकार्य से पूर्ण निवृत्त हो जाने के बाद ही उपासना करनी चाहिए। तब से मैंने अपना नियम बना लिया है, मैं प्रातःकाल जप करने के बाद भोजन करती हूँ और सायंकाल जप करने के बाद सोती हूँ। इस प्रकार मेरा उपासना क्रम लगातार चल रहा है।

एक समय मेरा छोटा बच्चा दो साल का था और वह बहुत अधिक बीमार पड़ा। उसकी बचने की आशा नहीं दीखी। जब मैंने उसके दीर्घ जीवन की भीख माँगी और वह मुझे मिली। जब बच्चा स्वस्थ हुआ तब उसने थोड़े दिनों तक कई प्रकार के विचित्र चमत्कार बताए जप से बच्चा आज तक बीमार नहीं पड़ा और उसकी हालत, स्वास्थ्य, सुन्दरता, सद्गुण, और स्वभाव इतना अच्छा है कि मानों कोई होनहार बालक दिखाता है।

मेरे कहने से मेरी जिन दो बहिनों ने यह उपासना आरम्भ की है उनका भी गृहस्थ जीवन और वर्तमान परिस्थिति बहुत अच्छी है।

यह कहना किसी भी प्रकार उचित नहीं कि स्त्रियाँ गायत्री का जप न करें। स्त्रियों को पशु की तुलना में गिनने वाले संकीर्ण हृदय लोगों को यह सोचना चाहिये कि गायत्री माता भी तो नारी हैं। यदि नारी नीच और घृणित है, उसे वेद का, यज्ञ का, पूजा उपासना का कुछ भी अधिकार नहीं तो फिर गायत्री माता भी तो नारी है उन बेचारी की भी पुरुषों से पूजा उपासना करने का क्या अधिकार हो सकता हैं।

मैं विशेषकर उन बहिनों से निवेदन करती हूँ जिन्हें अपनी सास, पति अथवा अन्य जनों से त्रास होता हो, जिनका जीवन गरीबी से व्यतीत हो रहा हो तथा जिन्हें कोई गुप्त या प्रकट रोग हों या कोई आवश्यकता हो या अशान्ति हों। वे अन्य किसी का आश्रय छोड़कर अपना ध्यान वेदमाता गायत्री के चरणों में लगावें और उनसे प्रार्थना करें, उन्हें शीघ्र ही सब दुःखों से छुटकारा मिलेगा। वे समय की कोई चिन्ता न करें। माता को पुकारने का सदा ही समय है जब उन्हें क्लेश हों या अशान्ति हो, तथा आश्रय की आवश्यकता हो उस समय जिस परिस्थिति में ही एकदम माता का जप आरम्भ करो। उन्हें तत्काल फल मिलेगा तथा साधारण तथा नित्यकर्म में इतना नियम अवश्य रखें कि प्रातः किसी भी समय जप करने के बाद भोजन करें अथवा सायंकाल जप करने के बाद सोवें, तो माता उनकी प्रार्थना शीघ्र सुन कर उन्हें शीघ्र अच्छा फल देवेगी। जो जैसी कामना से जप करेंगी उन्हें वैसा ही फल मिलेगा। मैं निवेदन करती हूँ कि मेरी सुखी अथवा दुखी बहिनें इस उत्तम कार्य को कुछ दिन परीक्षण के तौर पर ही अनुभव करें कि वेदमाता कितनी जल्दी कृपा करती हैं। माता का प्यार पुत्रों की अपेक्षा पुत्रियों पर विशेष रहता है, ऐसा जानकर माता की शरण में जावें।


माँ की कृपा के अनुभव

(श्री छित्रपाल जोशी, सीकर)

उपवीत संस्कार होते ही मेरी भगवती गायत्री के प्रति स्वाभाविक श्रद्धा हो गई, अध्ययन की अवस्था थी, इसलिए विशेष न कुछ कर ही सकता था न विशेष जानकारी ही थी, उस समय मैं बनारस राजस्थान संस्कृत कालेज का स्नातक था, उस समय प्रातः 4 बजे उठकर शौचादि से निवृत्त होकर गंगाजी जाता और स्नान संध्या करके केवल 10 मालाएँ जपता। फिर आकर अपने पठन पाठनादि कार्यों में लग जाता, उस समय घर की परिस्थिति उतनी अच्छी न होने के कारण आर्थिक कमी का अनुभव हुआ करता था। जब विशेष कमी का अनुभव हुआ तो मन ही मन में माँ से प्रार्थना होने लगी, और दो ही दिन बीते कि 1 आदमी अक्सर से चला हुआ आया। आकर हमारे अध्यक्ष जी से बोला शतचण्डी के लिये दो पण्डितों की आवश्यकता है मेरे ऊपर कोई विशेष स्नेह अध्यक्ष का नहीं था फिर भी मुझे तथा एक मेरे अन्य मित्र को भेजा गया और हम लोगों से समागत महानुभाव को सन्तोष भी पूर्ण रूप से हो गया।

हम लोगों ने वहाँ जाकर अन्य पण्डितों के साथ 10 रोज पाठ किया और समाप्ति के रोज 10) रोज के हिसाब से 100) और अन्य वस्तुएं भी प्राप्त की जिससे परीक्षा आदि का व्यय सुचारु रूप से निकल गया, उस समय बनारस जैसे नगर में पण्डितों की कोई कमी नहीं थी। किन्तु भगवती ने हमें कुछ आर्थिक सहायता देनी थी। विशेष क्या तब से आज तक आर्थिक कष्ट का अनुभव नहीं किया। इस छात्रावस्था में और भी कई ऐसे अनुभव हुए जिनका प्रकाशन करना गुरुदेव ने मना कर दिया।

फिर अध्ययन समाप्त करके काम करना शुरू कर दिया और उपासना का काम ढांचे पर चलता रहा ही। मैं यह भी कभी अनुभव करता रहा कि बिना सद्गुरु के उपासना उतनी लाभदायक नहीं होती। तान्त्रिक शिक्षा दीक्षा की मुझे विशेष इच्छा थी। ज्यों-ज्यों समय बीता लगन भी बढ़ी। अभी जो कृष्ण पक्ष में ग्रीष्मावकाश होने के कारण हरिद्वार ऋषिकेश का विचार करके मैं तथा माता जी एक घनिष्ठ मित्र के साथ इस आशा में चल पड़े कि सम्भव है हिमालय में किन्हीं गायत्री के अनुभवी महात्मा के दर्शन हों और उनकी सहायता से कुछ सहारा मिले।

ऋषिकेश पहुँचकर अनेक लोगों ने पूछा कि यहाँ कोई गायत्री उपासक सन्त भी हैं क्या? किन्तु सन्तोषजनक उत्तर न पाकर चित्त में बड़ी निराशा होने लगी कितने ही दिन ऐसे ही बीत गये। 1 दिन बाबा काली कमली वाले के क्षेत्र में किसी अनुभवी सज्जन से भेंट हुई और अपनी बातों के क्रम में ही उनने बताया कि यहाँ गायत्री स्वरूप नाम के एक अच्छे गायत्री उपासक महात्मा हैं।

मैंने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया और दूसरे रोज नीलकण्ठ भ्रमण का विचार किया जो स्थान गीता भवन से 7 मील की चढ़ाई पर है। दो साथी उत्तर प्रदेश के थे? मैं था तीनों मित्र प्रातः 5 बजे रवाना होकर 8॥ बजे पहुँचे। वहीं जाकर स्नान किया भोजन की व्यवस्था करके, एक अतिथि को भिक्षा देकर भोजन किया और कुछ देर आराम करके इधर उधर घूम रहे थे। इतने में एक महात्मा जिसके साथ दो गृहस्थ आते हुए दिखाई दिए, समीप आने पर प्रणाम किया। उन महात्मा जी ने मेरी तरफ एक दफा दृष्टि डालकर देखा और कहा, स्वर्गाश्रम में हमारी कुटिया में आना मैंने उसी समय विचार लिया कि माँ की कोई विशेष कृपा हुई है। मैंने जब एक आदमी से पूछा तो मालूम हुआ महात्मा गायत्री स्वरूप जी आप ही हैं। दूसरे रोज उसकी शरण में गया संतप्त हृदय को शान्त किया, जो मेरी इच्छाएँ थीं सब पूर्ण हो गई, शंकाओं का निपटारा हो गया मेरी तान्त्रिक साधना की इच्छा थी वह भी पूर्ण हो गई। अधिक क्या लिखूँ वहाँ मैंने सर्वस्व पाया।


परीक्षा में सफलता

(श्री श्याम बिहारी लाल मिश्र, फैजनगर)

मेरे दादा गायत्री माता की उपासना करते हैं। और कुशल उपासक हैं और अपना अधिक समय गायत्री की सेवा में व्यतीत करते हैं। मैंने प्राथमिक शिक्षा निज ग्राम में ही प्राप्त की, तथा माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के लिये मिडिल स्कूल मदनापुर, शाहजहाँपुर मण्डलार्न्तगत गया, और वहाँ से मिडिल कक्षा उत्तीर्ण की, तत्पश्चात दादा तथा चाचा ने इंग्लिश भाषा से मेरा अधिक प्रेम न देखकर तथा देव भाषा संस्कृत की ओर मेरी अभिरुचि देखकर मुझे एक पाठशाला संस्कृत पढ़ने के लिये प्रवेश कराया। मैं परिश्रम में लग गया शिक्षा अध्ययन करने, किन्तु दुर्भाग्य वशात् में परीक्षा से दो मास पूर्व रुग्ण हो गया। स्वस्थ होने पर ध्यान हुआ कि परीक्षा के केवल 10 दिन शेष हैं। मैंने अपने दादा जी से कहा कि मैं परीक्षा मैं सफल नहीं हो सकता अतएव में परीक्षा में सम्मिलित नहीं होऊँगा। दादाजी मुझसे कहने लगे कि बेटा तू गायत्री माता की साधना कर और उनसे विनय कर कि हे माता! अपने पुत्र को सफलता दे। मैंने दादा के कथन मानकर माता के चरणार्विन्दों में मन लगा परीक्षा में सम्मिलित हुआ माता की कृपा दृष्टि हुई और परीक्षा परिणाम घोषित होने पर मैं अपनी देय परीक्षा संस्कृत प्रथमा में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। तब से निरन्तर मेरा मन माता के श्री चरणों में लगा रहता है तथा मेरा जीवन सुखमय व्यतीत हो रहा है। मैं इस समय अपने जिले से शिक्षक पदारुढ होकर अध्ययन कार्य करता हूँ। यह माता की ही अनुकम्पा है, कि मेरी जटिल से जटिल समस्याएँ शीघ्र ही हल हो जाती हैं।


गायत्री एक अमोघ अस्त्र

(श्री रामचन्द्र प्रसाद, दानापुर केन्ट)

गायत्री की महिमा अपार है, वेद शास्त्रों ने जगह-जगह वेदमाता की स्तुति की है। ऋषियों ने ऋषितत्व देवताओं ने देवतत्व गायत्री से ही प्राप्त किये हैं। कामनाओं की सिद्धि के लिये पहले ऋषि महर्षि भिन्न भिन्न प्रकार से प्रयोग करते थे। हजारों प्रकार के विधान हमारे पूर्वजों को मालूम थे। यज्ञ वेदी से द्रौपदी को प्रगट करना उन दिनों साधारण बात थी, हम लोग आलस्यवश उन अमूल्य विधानों, प्रयोगों को भूल गये हैं। शुक्राचार्य ने यज्ञ द्वारा ऐसी शक्ति राजा बलि को प्राप्त करा दी, कि उनके आगे इन्द्र भी नहीं ठहर सके। जब तक आर्य जाति माता की आराधना करती रही, धन जन शक्ति से भरी रही। आज वेदमाता को भूलकर हम लोग पददलित हो रहे हैं। घर-घर में असंतोष, अभाव और अशक्ति की आग सुलग रही है।

पूर्व काल में औरों की तो बात ही क्या, स्वयं भगवान राम और कृष्ण भी गायत्री आराधना करते थे। उस समय गायत्री का त्याग बहुत बड़ा समझा जाता था। फलतः उस समय देश कैसा उन्नत था। अन्न, धन, दूध, घी आदि की कमी न थी। जब से हम लोगों ने माता की अवहेलना की दीन हीन कंगाल होते गये। अगर अब भी हम लोग पूर्वजों के बताये मार्ग पर चलें, तो फिर गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त कर सकते हैं, अकाल महामारी संकट आदि से मुक्ति पा सकते हैं। भगवान कृष्ण ने महाभारत के अश्वमेध पर्व में गायत्री की बड़ी महिमा गाई है, यथा :-

“जो प्रतिदिन सुबह शाम को विधिवत संध्योपासना करते हैं, वे वेदमयी नौका का सहारा लेकर इस संसार समुद्र से स्वयं तर जाते हैं, और दूसरों को भी तार देते हैं। जो ब्राह्मण सबको पवित्र करने वाली वेदमाता गायत्री देवी का जप करता है, वह समुद्र पर्यन्त पृथ्वी का दान लेने पर भी प्रतिग्रह के दोष से दुःखी नहीं होता, तथा सूर्य आदि ग्रहों में से जो उसके लिए अशुभ स्थान में रहकर अनिष्ट होते हैं वे भी गायत्री जप के प्रभाव से शान्त, शुभ और कल्याणकारी हो जाते हैं। जहाँ कहीं क्रूर कर्म करने वाले भयंकर पिशाच रहते हैं, वहाँ जाने पर भी वे उस ब्राह्मण का अनिष्ट नहीं कर सकते। वैदिक व्रतों का आचरण करने वाले पुरुष पृथ्वी पर दूसरों को पवित्र करने वाले होते हैं। प्रजापति मनु का कहना है, शील, स्वाध्याय, दान, शौच, कोमलता और सरलता ये सद्गुण ब्राह्मण के लिये वेद से भी बढ़कर हैं। जो ब्राह्मण भूर्भुवः स्वः इन व्याहृतियों के साथ गायत्री का जप करता है, वेद के स्वाध्याय में संलग्न रहता और अपनी ही स्त्री से प्रेम करता है, वही जितेन्द्रिय, वहीं विद्वान और वही इस भू मण्डल का देवता है। जो प्रतिदिन सन्ध्योपासना करते हैं, वे निःसन्देह ब्रह्मलोक को प्राप्त होते हैं। केवल गायत्री मात्र जानने वाला ब्राह्मण भी यदि नियम से रहता हो तो वह श्रेष्ठ है। किन्तु जो चारों वेदों का विद्वान होने पर भी सबका अन्न खाता, सब कुछ बेचता और नियमों का पालन नहीं करता, वह उत्तम नहीं माना जाता।

पूर्व काल में देवता और ऋषियों ने ब्रह्माजी के सामने गायत्री मन्त्र और चारों वेदों को तराजू पर रख कर तौला था। उस समय गायत्री का पलड़ा ही चारों वेदों से भारी साबित हुआ। जैसे भ्रमर खिले हुए फूलों से उनके सारभूत मधु को ग्रहण करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण वेदों से उनकी सारभूत गायत्री को ग्रहण किया गया है। इसलिए गायत्री सम्पूर्ण वेदों का प्राण कहलाती है। गायत्री के बिना सभी वेद निर्जीव हैं। नियम और सदाचार से भ्रष्ट ब्राह्मण चारों वेदों का विद्वान हो तो भी वह निन्दा का ही पात्र है, किन्तु शील और सदाचार से युक्त ब्राह्मण यदि केवल गायत्री जप करता हो तो भी वह श्रेष्ठ माना जाता है। प्रतिदिन 1000 गायत्री मन्त्र का जप करना उत्तम है, सौ मन्त्र का जप करना कनिष्ठ माना गया है। कुन्ती नन्दन गायत्री सब प्राणों को नष्ट करने वाली है, इसलिये तुम सदा उसका जप करते रहो।

महाभारत आश्वमेधिक पर्व से उद्धत गायत्री मन्त्र में ईश्वर से सद्बुद्धि के लिए प्रार्थना की गई है, सद्बुद्धि के बिना धन, वैभव, शक्ति आदि सभी निष्फल हैं। जिन्हें सद्बुद्धि प्राप्त है, उन्हें किसी बात की कमी नहीं रहती, रोग, शोक, दुःख, दारिद्र आदि उसे परेशान नहीं कर सकते। गायत्री वह सतोगुणी शक्ति है, जो साधकों को बलात् पशुतत्व से ऊपर उठाकर देवतत्व की ओर ले जाती है। इन्हीं सब बातों को विचारकर और लाभों को देखकर ऋषि महर्षि ने गायत्री उपासना पर बहुत जोर दिया है, और त्यागने वाले की निन्दा की है। ऋषियों का अनुभव और विश्वास है, कि अगर केवल गायत्री को भी द्विज अपनाये रहेंगे तो धन, जन और आत्मबल से परिपूर्ण रहेंगे। उन्हें कुछ भी अप्राप्त न रहेगा।

हमारे कई मित्र उपासना में संलग्न हैं, उनके कुछ अनुभव पाठकों के लाभार्थ लिख रहे हैं राम सेवक सिंह वैद्य छितगाँव निवासी की लड़की आठ साल पूर्व आग से बुरी तरह जल गई थी, शरीर जल जाने से पीड़ा से बेचैन थी। खबर पाकर राम सेवक सिंह अपनी लड़की को देखने गये। उस समय लड़की बेहोश थी। घरवालों ने कहा कि सावधानी न की जाती तो वह जल मरती फिर भी हाल चिन्ताजनक है। रामसेवक सिंह ने जाकर देखा कि लड़की के कई अंग जल गये हैं, और वह बेहोश है। यह देखकर वह बहुत दुःखी हुए और माता का स्मरण ध्यान करते हुए अनिमन्त्रित हस्त से स्पर्श किया। आठ दस मिनट में लड़की ने आंखें खोल दी और कहा बाबूजी अब जलन पीड़ा बहुत कम हो गई है, और शीतलता अनुभव कर रहीं हूँ। मरणासन्न लड़की में यह चमत्कारी परिवर्तन देखकर लड़की के पिता को प्रसन्नता हुई। माता की दयालुता देखकर उनका हृदय भर आया उन्होंने कहा “बेटी तुम जल्दी ही अच्छी हो जाओगी, चिन्ता न करो”। वह लड़की शीघ्र अच्छी हो गयी।

अभी 4-5 मास की बात है, राम सेवक सिंह जी की स्त्री ने पुत्र प्रसव किया, बाद बच्चा और उसकी स्त्री बीमार हो गई। बच्चे की हालत बिगड़ती गई। दो तीन मास के शिशु की चिकित्सा कराई गई थी, एक दिन बच्चे की नाड़ी आदि बन्द हो गई और मृत्यु का लक्षण प्रकट होने लगा। दवादारु से निराश हुए रामसेवक सिंह ने माता की शरण ली। बच्चे को गोद में लेकर अपने पूजा स्थान पर चले आये और माता का ध्यान करके कहा यह आपकी दी हुई धरोहर है, आपकी इच्छा हो तो रहने दीजिए या बुला दीजिये। यह बात कह ही रहे थे कि बच्चा जो कि बदहालत में था, एकाएक हँस पड़ा। उसे हँसते देख सभी आश्चर्यचकित हुए, औरतें मृत्यु का लक्षण समझ रोने लगीं, लेकिन रामसेवक सिंह ने कहा कि माता ने मेरी पुकार सुनली है, अब बच्चा नहीं मरेगा”। बाद में धीरे-धीरे बच्चा अच्छा हो गया और अभी तक अच्छा है।

मनराम साँव मेरे मित्र हैं, उनका घर भरोली गाँव में (जो जिला आजमगढ़ में पड़ता है) है, उनके मौसेरे भाई चन्द्रिका प्रसाद को दो साल हुये न जाने क्या हुआ वे अर्ध विक्षिप्त हो गये, साथ ही खाँसी और पेशाब की बीमारी भी उन्हें हो गई थी। दवा दारु भी किया गया, ओझा स्याने को दिखाया भी गया, लेकिन अच्छा न हो सका, कोई बीमारी बताता, कोई भूत प्रेत का प्रकोप बताता, उनके अभिभावक 1 साल से अधिक इससे परेशान रहे, बहुत खर्च भी किया, लेकिन हालत वैसी ही रही। मनराम साँव सम्वत् 2009 में नवरात्रि करने दानापुर से अपने घर आजमगढ़ आये। परिवार के लोगों ने चन्द्रिका प्रसाद की हालत मनराम से कहा मनराम ने अपने मौसेरे भाई को नवरात्रि में अभिमन्त्रित जल पिलाते थे, और मनराम के समीप ही वे भी जप थोड़ा बहुत करते थे। पूर्णाहुति के बाद चन्द्रिका प्रसाद रोग मुक्त हो गये, खाँसी आदि भी ठीक हो गई।

भाई मनराम ने गायत्री मन्त्र द्वारा बहुत से रोगियों को अच्छा किया है, विस्तारमय से नहीं लिखते। दानापुर निवासी पं0 त्रिवेणी पाण्डेय के सुयोग्य पुत्र पं0 भोलानाथ पाण्डेय मेरे मित्र हैं, डेढ़ साल से गायत्री उपासना में संलग्न हैं, सवा लाख के दो अनुष्ठान भी कर चुके हैं।

सम्वत् 2010 आषाढ़ महीना में भोलानाथ जी की बहिन की शादी थी। समय पर बारात आयी, भोज का इन्तजाम घर में जगह कम होने से बाहर किया गया था। पंच लोग सब पंक्ति में भोजन करने बैठे तो वृष्टि होने लगी। अब तो पं0 भोलानाथ जी और उनके पिता भारी फेर में पड़े। पण्डित भोलानाथ जी अपने पिता और भाई को देख−रेख करते रहने को कहकर स्वयं पूजा स्थान पर चले गये और 1-1॥ घण्टा वृष्टि रुक जाये ऐसी प्रार्थना भगवती से करके, गायत्री मन्त्र जपने लगे। लगभग 1 माला जप किया होगा कि वर्षा रुक गई। बरात में आए हुए लोग यह देख कर दंग रह गये, और सभी पं0 भोलानाथ जी की प्रशंसा करने लगे। सभी ने प्रसन्न चित्त से भोजन किए पान-सुपारी लेकर जब बिदा हुए तो कुछ देर बाद पुनः वृष्टि होने लगी, और बहुत देर तक होती रही। पण्डित भोलानाथजी का इस घटना से माता के प्रति श्रद्धा विश्वास पहले की अपेक्षा बढ़ गया।

पं. भोलानाथ जी पाण्डेय के मामा पं0 रामधनी पाण्डेय सम्वत् 2011 चैत्र शुक्ल पक्ष में मुजफ्फरपुर के गाँव में अपने यजमान के यहाँ रात को ठहरे हुए थे, उस यजमान से गाँव में ही किसी से दुश्मनी चल रही थी। पं0 धनीरामजी रात को सोये हुये थे, उनका यजमान जो कि जमींदार था पास ही वह भी सोया हुआ था। अर्ध रात्रि के लगभग कुछ आदमी हथियारों से लैस होकर वहाँ पहुँचे, और रामधनी के यजमान को सोता देखकर बगल में भाला मारा, भाला लगते ही वह चिल्ला उठा, रामधनी पाण्डेय भी आवाज सुनकर जाग गये। डाकू भेष में आये हुए लोगों ने इन्हें जागते देखकर अपने साथियों से पूछा यह बगल में कौन सोया हुआ है, साथी ने कहा यह परदेशी पण्डित जी हैं, दूसरे डाकू ने कहा इसने हम लोगों को देख लिया है इसे मारो, डाकुओं ने पण्डितजी को मारने के लिये भाला उठाया, मारने को उद्यत देख कर पं0 धनीरामजी की बुद्धि ठिकाने न रही वह गायत्री उपासना करते थे, जोर-जोर से माता-माता चिल्लाने लगे। इसे सुनकर डाकू ने कहा, माता-माता चिल्ला रहा है मारो साले को, इतना सुनते ही दूसरे साथी ने जोर से भाले का वार किया। लेकिन धन्य है, गायत्री देवी, जोर से चलाया हुआ भाला ओठ पर जरा सा चिन्ह देते हुए निष्फल गया। पं0 रामधनी बाल-बाल बच गये।


पहेली का प्रथम पुरस्कार जीता

(श्री रामेश्वर जी, उरई)

मेरे एक मित्र के कथनानुसार हम दोनों मावौगढ़ गये। वहाँ पर पं0 छोटे लाल से वार्तालाप हुआ। उन्होंने बतलाया कि प्रतिदिन 11 माला जपकर 100 दिन गायत्री 1 लक्ष जप करो तुम्हारी मनोकामना सिद्ध होगी। लौटकर हमने प्रतिदिन 3000 के हिसाब से जप करना प्रारम्भ किया किन्तु हमारा जप 2-2 से अधिक न चल सका क्योंकि हम लोगों के सिर में दर्द होने लगा। यह सब अगस्त 1953 के अन्तिम सप्ताह में हुआ।

सितम्बर में मेरे मन में अरुण वर्ग पहेली की पूर्ति भेजने की स्फुरणा हुई तथा मैंने तीन वर्ग भेजे। माता की कृपा से प्रथम प्रयास में ही पहेली का प्रथम पुरस्कार मिला।


नरमेध सम्बन्धी स्पष्टीकरण

गत मास नरमेध यज्ञ की आवश्यकता पर बल दिया गया था। उसके संबंध में इन दिनों पर्याप्त चर्चा हुई है। अनेकों व्यक्तियों के इस सम्बन्ध में अनेक प्रकार के पत्र आये हैं उनमें कुछ स्पष्टीकरणों की अपेक्षा की गई है। तदनुसार, इस सम्बन्ध में कुछ चर्चा इस अंक में की जा रही है।

जैसा कि गत अंक में भली प्रकार स्पष्ट किया जा चुका है। यह समझ लेना चाहिए कि यज्ञ में किसी प्रकार की जीवहिंसा नहीं होती। यज्ञ को ‘अध्वर’ कहा गया है। अध्वर का अर्थ है वह कार्य जिसमें हिंसा न होती हो। यज्ञ के विशाल आयोजन में आलस्य, प्रमाद भूल आदि के कारण कहीं कोई जीवहिंसा का अवसर आ जाय, उसे देखने एवं रोकने के लिए एक विशेष अधिकारी नियुक्त किया जाता है जिसका नाम “अध्वर्पु’ होता है। गत मास के अंत में तथा जनवरी के यज्ञ अंक में हम इस सम्बन्ध में भली प्रकार प्रकाश डाल चुके हैं। प्राचीनकाल में गोमेध, अश्वमेध, नरमेध आदि जो यज्ञ होते थे उनमें भी हिंसा कदापि न होती थी, कोई जीव मारा या होमा न जाता था। ऐसी कुप्रथा तो कुछ काल तक घोर अन्धकार युग में चली थी और वह भगवान बुद्ध के अवतार के साथ ही समाप्त भी हो गई। अब तो वैसा कोई प्रसंग या अवसर सैकड़ों वर्षों से ऐसा नहीं आया जिसमें कोई जीव हवन किया गया हो। फिर मनुष्य को मारकर होमने की तो कल्पना भी मूर्खता पूर्ण है। यह सब बातें गत अंक में बहुत स्पष्ट हैं। जिन्होंने ध्यानपूर्वक उसे पढ़ने का कष्ट न किया हो उनके अतिरिक्त और किसी को कोई भ्रम होने की सम्भावना नहीं है।

नरमेध का अर्थ है मनुष्य द्वारा किसी विशेष उद्देश्य के लिए आत्म त्याग करना। अपने व्यक्तिगत स्वार्थों, इच्छाओं, महत्वाकाँक्षाओं, सुविधा को तिलाञ्जलि देकर एक विशेष लक्ष में तन्मय हो जाना। यह लक्ष, यह उद्देश्य परमार्थमय यज्ञमय होना चाहिए तभी उसे मेध कहा जायगा। यों अनेक व्यक्ति अनेक प्रकार के परमार्थिक कार्यों में लगे हुए दीखते हैं। बहुत लोग अपने प्रिय परमार्थिक कार्यों के लिए बहुत कुछ समय तथा धन भी देते हैं। पर उनमें से अधिकाँश को यज्ञ की लोकेषणा की कामना रहती है। संस्थाओं को चलाने में अनेक व्यक्ति बहुत कार्य करते हैं पर वे ही लोग पद न मिलने पर मंत्री प्रधान आदि न बनाये जाने पर, नाम आदि न छपने पर न छपने पर उन कार्यों से विरत हो जाते है। है और अपने प्रतिद्वन्द्वी से बहुत ही निम्नस्तर पर लड़ते झगड़ते हैं, यहाँ तक कि उस पूर्व निमित्त कार्य तक को नष्ट करने में नहीं शरमाते। काँग्रेस, आर्य समाज आदि अनेकों संस्थाएँ इसी लोकेषणा की अग्नि में अपनी लोक प्रियता तथा सेवा शक्ति को नष्ट किये दे रही हैं। भाषावाद, शान्तवाद, जातिवाद, संस्थावाद आदि के नाम पर जो घोर संघर्ष ‘लोक सेवक’ कहलाने वालों में हो रहा है वह किसी से छिपा नहीं है। लोकेषणा की यश पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की डायन ही उन लोक सेवकों को जो अपना बहुत समय, धन, सहयोग आदि उत्तम कार्यों में देते रहे हैं, इतना क्षुद्र और घृणित बना देती है कि उनके द्वारा कोई वास्तविक कार्य नहीं हो सकता।

नरमेध का अर्थ अपनी भौतिक सुख सुविधाओं को, साधन सामग्रियों को ही परमार्थ के निमित्त परित्याग करना मात्र ही नहीं है वरन् आगे बढ़कर लोकेषणा कीर्ति, प्रतिष्ठा, प्रशंसा आदि की मानसिक कमजोरियों को छोड़ना भी है। शारीरिक भोग, ऐश्वर्य और आराम की परवाह न करते हुए निर्धारित लक्ष में मनसा वाचा कर्मणा से तन्मय हो जाना ही सच्चा आत्म त्याग है। इसी को नरमेध कहा गया है।

महात्मा गाँधी जी ने कहा था कि “यदि मुझे केवल 100 सच्चे कार्यकर्ता मिल जायं तो मैं उन्हीं से एक वर्ष में स्वराज्य प्राप्त करके दिखा सकता हूँ।” उनकी चुनौती बिल्कुल सच्ची थी, ऐसे सौ व्यक्ति जो आन्तरिक दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त करके प्रचण्ड निष्ठा के साथ लक्ष में तन्मय हो जावे मिलना हँसी खेल रही हैं। यों चींटी मक्खी की मौत लाखों आदमी रोज ही मरते रहते हैं, और पेट भरने तक का मोहताज रहने वाले भी “त्यागी” भी सर्वत्र प्रचुर परिणाम में मौजूद हैं। पर आत्म त्याग, विवेक और भावनापूर्वक इतना सब करने के लिये स्वयं आगे बढ़ना अत्यन्त ही दुर्लभ और कष्ट साध्य कार्य है। तरह-तरह की कामनाएँ और कमजोरियाँ मनुष्य की मनोभूमि को प्रायः विचलित करती रहती हैं। उन पर सर्वदा विजय प्राप्त करते रहने का व्रत लेना सचमुच इतना कठिन है जितना मरना या धन सम्पत्ति को छोड़ देना भी कठिन नहीं है। इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए ऐसी कठोर प्रतिज्ञा पर अंगद की तरह पैर जमा देने वाले को आत्म मेध करने वाला, सर्वस्व त्याग करने वाला कहा जाता है। ऐसा आत्म त्याग देवताओं की साक्षी में, यज्ञ भगवान में सम्मुख वैसी ही तत्परता से किया जाता है जैसा कि विवाह के समय देवताओं को साक्षी देकर वर-वधू एक दूसरे के लिए आत्म त्याग करते हैं। परमार्थमय जीवन लक्ष और उसके प्रति अत्यन्त पवित्र भावनाओं के साथ आत्म त्याग यही नरमेध है।

हजारों साधारण जेल यात्री महात्मा गाँधी के लिए इतने उपयोगी नहीं हुए जितने कि यदि उन्हें सचमुच के आत्म त्यागी एक सौ व्यक्ति भी मिल जाते तो वे होते। कारण यह है कि सच्चे आत्म त्यागी की शक्ति परमाणु बम से भी अधिक होती है, उसके भीतर सच्चा आत्मबल भरा होता है, उसकी वाणी और क्रिया में वह प्रभाव रहता है कि साधारण जनता उसका पथप्रदर्शन स्वीकार करने में अधिक आनाकानी नहीं करती। ऐसे थोड़े से भी व्यक्ति साधारण श्रेणी के हजारों व्यक्तियों से अधिक शक्तिशाली होते हैं। युग परिवर्तन जैसा महान कार्य तो ऐसे ही लोगों पर बहुत कुछ निर्भर रहता है।

वर्तमान काल की व्यापक दुर्व्यवस्था को हटाने तथा साँस्कृतिक, नैतिक, एवं धार्मिक पुनरुत्थान करने के लिए कुछ ऐसे व्यक्तियों की अत्यधिक आवश्यकता है जो नरमेध के लिए बनाई हुई उपरोक्त शर्तों को पूरा करते है। उनके जीवन का भावी कार्यक्रम उनकी योग्यताओं के आधार पर होगा। पर घोर श्रम, अत्यन्त सादगी का जीवन, तथा निर्धारित लक्ष के लिये निरन्तर मनसा वाचा कर्मण, अनुशासन पूर्वक, व्यवस्थित कार्य करते रहना उनके लिए आवश्यक रहेगा। ऐसे व्यक्तियों की शारीरिक एवं बौद्धिक क्षमता भी ऐसी होनी चाहिए जिससे संसार को कुछ सहायता, सेवा एवं सुविधा प्राप्त हो सके। आलसी, बूढ़े, बीमार, निकम्मे, अशिक्षित ऐसे जो स्वयं अपने के लिए या अपने घर वालों के लिए भार रूप हैं, वे इस महान कार्य का बोझ अपने ऊपर न उठा सकेंगे। जिनके पीछे पारिवारिक खर्च चलाने के लिए कमाने की जिम्मेदारियाँ हैं, वे लोग भी इस दिशा में उपयुक्त न होंगे।

नरमेध की आज अत्यधिक आवश्यकता है। गायत्री संस्था ने जिस नैतिक, साँस्कृतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम को पूरा करने का व्रत लिया है उसे आगे चलाने के लिये ऐसे ही कुछ आत्म त्यागी व्यक्तियों की आवश्यकता है। इस देश की भूमि आत्म त्यागी व्यक्ति उत्पन्न करने का गुण रहा है। आत्म बलिदानियों की जब भी आवश्यकता पड़ी है तब लोग एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हुए आगे बढ़ते रहे हैं। आज वैसी ही आवश्यकता की दैवी पुकार अन्तरिक्ष से उठ रही है, उसकी गुञ्जन प्रतिध्वनि स्वरूप इन पत्तियों में अपील उपस्थित की जा रही है। हम राष्ट्र के नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए नरमेध रचना चाहते हैं। हमें बलि पशुओं की आवश्यकता है। दिशाएँ पूछ रही हैं कि क्या ऐसे आत्म त्यागी व्यक्ति अब संसार में नहीं रहे? हमारा अनुमान है कि यह याचना अधूरी न रहेगी, कोई माई के लाल अपना आत्म दान करेंगे और यह महान लक्ष अधूरा न रहेगा।


सरस्वती यज्ञ और साँस्कृतिक शिक्षा

गत मास सरस्वती यज्ञ और साँस्कृतिक शिक्षण शिविर गायत्री तपोभूमि में सानन्द सम्पन्न हो गया। देश के कौने-कौने से आये हुए लगभग 50 सुशिक्षित छात्रों ने इसमें शिक्षा प्राप्त करने के निमित्त भाग लिया। प्राचीन काल में गुरुकुल शिक्षा पद्धति का कैसा महत्वपूर्ण प्रचार रहता होगा इसका एक छोटा सा दृश्य प्रत्यक्ष रूप से आँखों के सामने आ जाता था। सब लोग श्रमदान, आश्रम की सफाई, पौधों की सिंचाई, जल भरना आदि कार्य स्वयं ही पूरा कर लेते थे। किसी नौकर की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। केवल दो ही बार परम सात्विक ढंग से बनाया हुआ भोजन करने से छात्रों की भोजन सम्बन्धी अनेक बुरी एवं अनावश्यक आदतें छूट गई। सभी छात्रों को भारतीय वेशभूषा में रहना, कन्धे पर पीले दुपट्टे डालकर ब्रह्मचारी के रूप में रहना बहुत ही भला मालूम पड़ता था।

प्रातः काल 4 बजे सब लोग सोकर उठ बैठते थे। शौच, श्रमदान और स्नान से 6 बजे से निवृत्त हो जाते थे। छः से आठ बजे तक छात्रगण सरस्वती यज्ञ में सम्मिलित रहते थे। यह यज्ञ आगन्तुक छात्रों के मस्तिष्कों में बुद्धि वृद्धि एवं सद्गुणों के विकास के लिए शास्त्रोक्त विधि से किया गया था। इसमें कमल पुष्प, ब्राह्मी आदि बुद्धिवर्धक औषधियों के हवन का विशेष आयोजन था।

यज्ञ के बाद शिक्षण कार्य प्रारम्भ होता था। डॉ0 परशुराम शर्मा ईश्वर प्रार्थना करते थे। इसके बाद आचार्य जी का गायत्री का एक-एक शब्द को आधार मानकर भारतीय संस्कृति के अनुकूल जीवन यापन करने की पद्धति पर भाषण होता था। तदनन्तर प्रो0 रामचरण महेन्द्र मनोविज्ञान शास्त्र के आधार पर बुरी आदतों और विचारधाराओं को छोड़कर मानसिक संस्थान के पुनर्निर्माण के सम्बन्ध में व्यावहारिक सलाह देते हुए भाषण करते थे। दस बजे से तीन बजे तक छात्रगण भोजन विश्राम और निर्धारित स्वाध्याय करते थे। डायरी लिखते थे, बताये हुए विषयों पर नोट तैयार करते थे। जिनको जाँच करके उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण होने के नम्बर दिये जाते थे।

तीन से छः बजे तक फिर शिक्षण शिविर होता था। जिसमें डॉ0 परशुराम शर्मा पं0 अशर्फी लालजी मुख्तार बिजनौर, पं0 गौरी शंकर द्विवेदी, चन्दवाड़ मथुरा के उच्च कोटि के प्रतिष्ठित नागरिक एवं विद्वान भाषण दिया करते थे। छः से सात बजे तक लाठी चलाने की शिक्षा दी जाती थी। सात बजे के अनन्तर शौच स्नान से निवृत्त होकर भोजन होता और प्रार्थना करके सब लोग सो जाते। दोपहर के विश्राम के 5 घण्टों में एक एक करके महेन्द्र जी तथा आचार्य जी छात्रों को व्यक्तिगत परामर्श सुझाव और पथ प्रदर्शन करने के लिए एकान्त में बुलाते रहते। छात्रों के व्यवहार, रहन सहन, बातचीत आदि में उन्मत्तता उत्पन्न करने का विशेष ध्यान रखा जाता था। एक दिन वृन्दावन यात्रा हुई। वृन्दावन के सभी महत्वपूर्ण स्थान प्रो0 वृज भूषण जी एम. ए. ने बड़े ही परिश्रमपूर्वक दिखाए। एक दिन मथुरा की परिक्रमा बने नंगों पैर दी और मथुरा के महत्वपूर्ण स्थानों का दर्शन किया।

यह शिविर सब दृष्टियों से बड़ा सफल रहा। छात्रों पर भारी प्रभाव पड़ा और वे जीवन में बहुमूल्य परिवर्तन लेकर गये है। जिनका विस्तृत विवरण अगले अंक में उन छात्रों या उनके अभिभावकों द्वारा लिखा हुआ उपस्थित किया जायगा। हर महीने शिक्षण शिविर करने की योजना को अभी कुछ समय के लिए स्थगित रखा गया है। इस वर्ष चार-चार महीने बाद ऐसे ही आयोजन होंगे। अगला शिविर आश्विन की नवरात्रि में 10 दिन के लिए होगा। इसमें आने के लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए।


एक सच्ची घटना

(श्री मन्नूलाल तिवारी, पिछोर झाँसी)

मैं पिछोर झाँसी (मध्य भारत) का निवासी हूँ। जाति ब्राह्मण है, शिक्षा हिन्दी मिडिल व हिन्दी विशारद है, आजकल ग्रामीण पाठशाला में अध्यापक हूँ। मुझे माता गायत्री का जो अनुभव हुआ है उसे अपने भाइयों के समक्ष प्रकट कर रहा हूँ। गत जुलाई सन् 53 में 4 तारीख को मैं दस्तों की बीमारी में ग्रस्त हुआ और मुझे बहुत ही खूनी दस्त प्रारम्भ हुए। यहाँ तक कि 100-150 तक हो गये बहुत कमजोर हो गया था। भूख व नींद जाती रही। कई दवाइयाँ की किन्तु सफलता नहीं मिली। हताश होकर मैं अपना अधिकाँश समय गायत्री उपासना में लगाने लगा।

एक दिन 4॥ बजे के समय कुछ नींद सी आई तो मैं सोच रहा था कि सभी उपचार हो चुके किन्तु तबीयत ठीक नहीं होती अब तो हे माता! मृत्यु हो जाना उचित है। तो मैं स्वप्न में क्या देखता हूँ कि पश्चिम दिशा की ओर से वेदमाता शेर पर आरुढ़ हुई पूर्व की ओर को आ रही हैं। मैं उन्हें उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहता हूँ कि कोई यह संन्यासिनी है। माता मेरे सिर पर हाथ रखकर कहती हैं कि मैं संन्यासिनी नहीं हूँ, वेदमाता हूँ। मैं रोकर माताजी से प्रार्थना करता हूँ कि मेरी क्या ऐसी दशा रहेगी मैं तो मरा जा रहा हूँ। तो माता ने वरदान दिया कि अब ऐसी दशा न रहेगी। इतने में शेर ने मेरा बाँया हाथ पकड़कर खूब जोर से चूसा और हरा नीला सा जहर निकालकर कहा कि मैंने तेरे हाथ से जहर चूस लिया जाओ अच्छे हो जाओ।

इस स्वप्न ने मुझे आश्चर्य में डाल दिया। माता का सन्देश सफल होने लगा। बीमारी घटी और कुछ ही दिनों में खूनी दस्त बिल्कुल बन्द हो गये। मैं बहुत शीघ्र अच्छा हो गया जो कि छः माह में ठीक नहीं हो सकता था। आज भी वह दृश्य मेरे सामने आँखों में समाया हुआ है।

दूसरे मेरा एक जगह से स्थानान्तर नहीं होता था, जो माता की कृपा से हो गया। इसके बाद इच्छित स्थान की प्राप्ति हुई है और वहाँ एक बाई महाराज जो उच्च कोटि की तपस्विनी सती साध्वी हैं, उनका दर्शन तथा सत्संग का अच्छा जीवन में अवसर प्राप्त हुआ है। ऐसे कई और भी अनुभव हैं जो महत्वपूर्ण हैं। मैं दावे के साथ कहता हूँ कि जो कार्य किसी और मन्त्रों से पूर्ण हो सकता है वह गायत्री से भी शीघ्र हो सकता है।


कष्ट निवारिणी माता

(श्रीमती पं0 चन्दा देवी मिश्रा, बरेली)

विवाह होने के पश्चात मैं ससुराल आई। दो बच्चे होने के पश्चात एक सम्बन्धी के यहाँ जाने परे रास्ते में किसी बाधा ने धर दबाया। मैं यहाँ से बीमार होकर बरेली आई, मैंने अधिक उपचार इलाज अपनी सामर्थ्य से ज्यादा कराया पर हर कहीं से कोरा उत्तर मिला और निराशा बढ़ती गई। यहाँ तक कि कई बार गर्भपात हुआ। हमारे पतिदेव चिन्ता में अधिक दुर्बल परेशान रहते, उन्होंने काफी रुपया हमारे इलाज में लगाया परन्तु कहीं से भी लाभ नहीं हुआ।

हमारे मकान में किरायेदार पं0 यशोदा नन्द मुनीम रहते हैं। उनने गायत्री की महिमा हमें बताई और विश्वास दिलाकर कहा कि गायत्री उपासना आकर्षित करने से आपका कष्ट मिट जायगा।

मुनीम जी की प्रेरणा से हमने गायत्री उपासना की तो अब करीब एक साल के लगभग होने आया धीरे-धीरे रोग अपने आप स्वयं घटता गया। अब समय पाकर गत चैत्र की नवरात्रि में चैत्र सुदी 2 को रात्रि के 2 बजे शान्तिपूर्वक सन्तान का जन्म हुआ है। हम सब लोगों को गायत्री माता पर अटूट विश्वास हो गया है।

माता को कोटि धन्यवाद है जिनकी कृपा से हमारा दुख दूर हुआ। सचमुच यह ठीक ही कहा है कि जो माता की शरण लेता है उसे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पदार्थ मिलते हैं।


गायत्री महिमा


गायत्री महिमा (Kavita)

अगर चाहते हो निज रक्षा, गायत्री गुण गान करो।

नित्य शुद्ध एकाँत भूमि में, जगजननी का ध्यान करो॥

दुःख काट कर निज भक्तों की माता रक्षा करती है।

सुख सौभाग्य बढ़ा देती है, शाँति सुधारस भरती है॥

नहीं समुद्र सरोवर के तट, शाँत भाव से खड़े-खड़े।

गायत्री का जप करते थे, जब द्विज पुँगव बड़े-बड़े॥

बढ़ता था श्री मार्तण्ड का, उनमें तेजस् दिव्य प्रचण्ड।

स्वर्ग भूमि से अधिक सुखी था, मित्र तभी यह भारतखण्ड॥

सूर्य ब्रह्म के ग्रन्थि बंध से, हो जाती है निर्मल बुद्धि।

पाप ताप सब कट जाते हैं, आ जाती है सच्ची शुद्धि॥

वाल्य काल ही जिनको यह मन्त्र सुनाया जाता है।

आलस दम्भ प्रमाद न उनकी संतानों में आता है।

द्विजो उठो! तप से प्रवृत्त हो गायत्री का जाप करो।

पार करो भारत की नैया, दूर सकल अभिशाप करो॥

शक्ति पुँज है साधन पथ, यौं शास्त्र सदा से गाता है।

आर्य जाति की रक्षा करती, श्री गायत्री माता है॥

गायत्री को नहीं जानता, संध्या कभी न करता है।

ऐसा कर्महीन ब्राह्मण अपने को फिर क्यों ब्राह्मण कहता है॥

इधर-उधर बाबा लोगों से कान फुकाता फिरता है।

छोड़ वेदमाता को अंधा नर्क गर्त में गिरता है॥

पूज्य हो रही जब भारत के घर-घर श्री गायत्री थी।

विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि थे, सती सिया सावित्री थी॥

जब से वैदिक धर्म भूल कर, गायत्री से हीन हुए।

कपटी कायर क्रूर कुटिल, तब से नर पामर दीन हुए॥

यद्यपि वैदिक यज्ञ बहुत हैं, जिनमें बड़े-बड़े हों दान।

तो भी मनु कथनानुसार है, गायत्री जप यज्ञ प्रधान॥

श्रद्धा भक्ति सहित विश्वासी निश्चित जप जो करते हैं।

पाप राशि को छिन्न-भिन्न कर भवसागर से तरते हैं॥

*समाप्त*

(पं. नन्द किशोर जी शुक्ल)