गायत्री की जयन्ती

जेष्ठ सुदी 10 तारीख 10 गुरुवार को गायत्री जयन्ती है। इस तिथि को वह महा ज्ञान गंगा ब्रह्मा के अन्तराल से निकलकर मानव जाति के समक्ष प्रकट हुई थी। इसी दिन भगीरथ जी परम पावनी गंगा माता को स्वर्ग से पृथ्वी लाने में समर्थ हुए थे। इस प्रकार गायत्री और गंगा की जन्म जयन्ती यह गंगा दशहरा ही है। यह हमारा परम पावन पुनीत पर्व है।

गायत्री जयन्ती के दिन हम सबको यथा सम्भव श्रद्धाँजलि अर्पित करनी चाहिए। जप, हवन, व्रत, उपवास, पाठ, दान, मौन ब्रह्मचर्य, प्रवचन, मंत्र, लेखन आदि शुभ कार्य हमें व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से अधिकाधिक उत्साहपूर्वक बड़े परिमाण में प्रयत्न करना चाहिए।

गायत्री ज्ञान का प्रसार भी इस अवसर का श्रेष्ठ काम है। गायत्री माता की महिमा एवं शक्ति को घर-घर पहुँचाने के लिए जो संकल्प गायत्री संस्था की ओर से लिया गया है वह अभी आधे के करीब अपूर्ण पड़ा हुआ है। उसकी पूर्ति करना हम सब का परम पवित्र उत्तरदायित्व है। अपने परिचितों एवं मित्रों को अखण्ड ज्योति का सदस्य बनाकर गायत्री साहित्य पड़ने के लिये प्रोत्साहन देकर हमें उस कर्त्तव्य की पूर्ति में हमें योग देना और गायत्री का प्रचार भी आवश्यक धार्मिक कृत्य है।


VigyapanSuchana

गायत्री यज्ञ विधान

गायत्री यज्ञ विधान- पुस्तक प्रकाशित होने की सूचना कई माह पहले प्रकाशित हो गई थी पर वह प्रेस सम्बन्धी कठिनाईयों के कारण अभी तक तैयार नहीं हो सकी थी। कई ऑर्डर वापिस करने पड़े थे। अब वह तैयार हो गई है, जिन्हें मंगवानी हो मंगा लें। मूल्य की पुस्तक 3॥) रु॰ डाक खर्च ॥।) अलग।

वर्ष-14 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-6


माता का प्यार

(श्री धुन्धीसिंह शर्मा, बड़ेसरा)


माता का प्यार (Kavita)

प्यारा तुम्हारा ही तो माँ इन गीतों में साकार हो गया। बरसाया पीयूष मरुस्थल सोने का संसार हो गया॥

गला दिया तुमने निज जीवन विश्व वाटिका यह लहराई। आँधी पानी में आँचल ढक बुझती दीपक शिक्षा बचाई॥

क्रोध तुम्हारा उमड़ पड़ा तो चण्डी का अवतार हो गया। प्यार तुम्हारा ही तो माँ0

रोती ठोकर, खाकर दुनिया थपकी खाकर, फिर सो जाती। उमड़ तुम्हारी करुणा धारा फूलों पर मोती बिखराती॥

प्यारा तुम्हारा तूफानों में नैया का पतवार हो गया। प्यार तुम्हारा ही तो माँ0

किसे भला अवकाश कि सुनले क्षण भर मेरी करुण कहानी। तुम्हीं न हो तो प्राणों में ढालूँ इन आँखों का पानी॥

हाथ लगा दो करुणामय बस मेरा बेड़ा पार हो गया। प्यार तुम्हारा ही तो माँ इन गीतों में साकार हो गया॥


नरमेध की आवश्यकता

छुटपुट कार्य-छुटपुट प्रयत्न से पूरे हो जाते है पर महान् कार्यों को पूरा करने के लिये प्रयत्न भी महान् ही करने पड़ते है। छोटे प्रयत्नों से महान् कार्य नहीं हो सकते। अमरता, जीवन मुक्ति अथवा देवत्व का अधिकार प्राप्त करने के लिए सामान्य प्रयत्न से काम नहीं चलता उसके लिये असामान्य त्याग करना पड़ता है। अपना उद्धार करना हो या दूसरों का कल्याण करना हो दोनों का कार्य अपना समुचित मूल्य चुकाना माँगते हैं।

संसार में अनेक महान् पुरुष हुए है उन्होंने अपनी कीर्ति अमर की है, अपनी आत्मा का कल्याण किया है, साथ ही संसार की अनेक आत्माओं को प्रकाश देकर परम शान्तिदायक स्थिति तक पहुँचाया है। पर यह सब उनसे हो तभी सका है जब उन्होंने त्याग किया है। अपनी भावनाओं, इच्छाओं, क्रियाओं, सामर्थ्यों को निरन्तर सात्विक दिशा में अग्रसर करके ही कोई व्यक्ति महान् बन सकता है।

किसी भी राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति उस देश के महान पुरुष ही होते है। धन, दौलत या विद्या बुद्धि से कोई देश महान् नहीं बनता, इन वस्तुओं के आधार पर प्राप्त की हुई चमक कुछ ही दिनों में फीकी पड़ जाती है और उसे नष्ट होने में देर नहीं लगती। पर महान व्यक्ति युग युगान्तरों तक जनता को प्रकाश, साहस, प्रेरणा एवं पथ प्रदर्शन प्रदान करते रहते। संसार में असंख्यों धनी मानी, राजा, रईस होते और मरते रहते हैं। उन्हें कोई जानता तक नहीं पर हरिश्चन्द्र, शिवि, दधीच, मोरध्वज, हकीकत राय, बन्दा वैरागी, शिवाजी, प्रताप, बुद्ध, महावीर, गाँधी, मीरा, सूरदास आदि महानुभावों का यश अमर है। उनका मूल्य पृथ्वी के समस्त धनाध्यक्षों की अपेक्षा अधिक हैं। ऐसे ही नर रत्नों के कारण निर्धन होते हुए भी हम अपना मस्तक गर्व से ऊँचा रखते है।

किसी समय हमारी परम्परा यह थी कि जनता जनार्दन की सेवा द्वारा आत्म कल्याण प्राप्त करने के लिए लोग अपना उत्सर्ग करते थे। जीवन का सबसे बड़ा लाभ यही समझा जाता था। लोग इस मञ्जिल पर एक दूसरे से आगे बढ़ने के लिये इस सड़क पर बाजी लगाकर कदम उठाते थे। जब लोगों की ऐसी मनोवृत्ति थी तो अनेकों महापुरुष यहाँ उत्पन्न होते रहते थे और उन्हीं के बलबूते पर यह देश विश्व का मुकुट मणि होने का दावा करता था। भारत की सबसे बड़ी विशेषता आत्मत्यागी, लोक सेवी, उच्च चरित्र के व्यक्ति पैदा करना रही है। यही हमारी महानता का एकमात्र कारण रहा है।

आज लोगों की मनोवृत्तियाँ पूर्व काल की अपेक्षा उलटी हो गई है। हमारी निर्धनता एवं दुर्दशा का एक कारण यही है। हर आदमी चमड़ी और दमड़ी का मजा उठाने के लिये आतुर हो रहा है। प्राप्त तो जो होता है सो ही होता है पर तृष्णा पर्वत से बढ़कर रहती है। नीति-अनीति, पाप-पुण्य, उचित-अनुचित का विचार छोड़कर के भी लोग भौतिक वस्तुओं के संग्रह और वासनाओं एवं तृष्णाओं की पूर्ति के साधन जुटाने में लगे रहते है। त्याग की बात मूर्खता समझी जाती है। जो लोग कुछ राई रत्ती त्याग भी करते है उनका उद्देश्य यश, प्रतिष्ठा, मान, बड़ाई होता है। तोले भर लगा करके मन भर बड़ाई लूटने की घात लोग लगाया करते है। सार्वजनिक संस्थाओं में पद पाने के लिये तो जूते चलते हैं उनसे स्पष्ट हो जाता है कि यह लोक सेवक बनने का ढोंग करने वालों का वास्तविक उद्देश्य क्या है? इसी प्रकार त्यागी का वेश बनाकर लाखों साधु वैरागी मुफ्त का माल चरते हुए निरुद्देश्य तो घूमते हैं पर जो परमार्थ साधना में श्रम, संयम, त्याग एवं सेवा साधन करना आवश्यक माना गया है उससे दूर भागते हैं तो प्रकट होता है कि इन लोगों की मनोभूमि भी क्या है? राज नैतिक शासक, सामाजिक नेता, धार्मिक सन्त महन्त आदि जो लोग त्याग एवं परमार्थ को अपना लक्ष घोषित करते है उनकी भी जब यह स्थिति है तो सामान्य लोग भौतिक प्रयोजनों पर ही जीवन भर जान देते रहें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है।

जनता का दृष्टिकोण धन प्रधान होता जाता है। जिनके पास जितना अधिक मादिक पदार्थ, सत्ता, शक्ति, संगठन है वह उतना ही बड़ा माना जाता है। इस दृष्टि कोण का ही फल है कि प्राचीनकाल की भाँति अब सच्चे आत्म त्यागी महापुरुष बनने की आकाँक्षा किसी विरले को ही होती है। जिनकी होती है वे आवश्यक परिश्रम, त्याग एवं सफलता के लिए अभीष्ट धैर्य के अभाव में अधिक आगे नहीं बढ़ पाते। कुछ ही दिनों में हिम्मत हारकर पीछे लौट पड़ते रहे। यह कठिनाई ही वह कारण है कि भारतवर्ष ऊँचा नहीं उठ रहा है। जब तक सच्चे आत्म त्यागी आगे न आयेंगे तब तक नैतिक, बौद्धिक, आत्मिक, चारित्रिक उन्नति नहीं हो सकती और इस उन्नति के बिना कोई पाँच वर्षीय तथा दस वर्षीय योजना लोगों के अगणित कष्टों को दूर नहीं कर सकती। रोटी का प्रश्न महत्वपूर्ण तो है, आर्थिक उन्नति से मनुष्य की सुविधाएँ तो बढ़ती है पर वस्तुतः जनसाधारण को जिन असंख्यों उलझनों का सामना करना पड़ता है उनका कारण मानसिक और नैतिक है, हमारी आँतरिक स्थिति जब तक ऊँची नहीं होती तब तक भौतिक साधनों का प्रचुर परिणाम भी अपने लिए तथा दूसरों के लिए सुख शान्तिदायक नहीं हो सकता। अमेरिका अत्यधिक धनी है पर उसकी स्वार्थपरता समस्त विश्व के लिए और खुद उसके लिए भी सर्वनाश का कारण बनती चली जा रही है।

संसार में शिक्षा बढ़ती जाती है पर वस्तुतः आत्मिक दृष्टि से वह घोर अज्ञान एवं अविद्या में फंसता जा रहा है। कारण कि नैतिक दृष्टि से संसार का प्रभाव पूर्ण पथ-प्रदर्शन कर सकने वाले महान पुरुष अब दीख नहीं पड़ते। बिना प्रकाश के अन्धकार कैसे दूर हो? यह प्रकाश तेल-बत्ती से नहीं अपने आपको जलाने से उत्पन्न होता है। प्राचीन काल के महापुरुषों ने अपने आपको जलाकर ही संसार को प्रकाश दिया था। आज भी उस सत्य एवं तथ्य की आवश्यकता एवं उपयोगिता ज्यों की त्यों बनी हुई है। अपने व्यक्तिगत साधन सुविधाओं को ही नहीं व्यक्तिगत इच्छा आकाँक्षाओं को भी परमार्थ के लिए त्याग करने वाले व्यक्तियों की आत्मा में ही वह अग्नि पैदा होती है जिससे अपना तथा अनेकों का सच्चा कल्याण हो सके।

प्राचीन काल में जब कभी जनता का नैतिक स्तर अधिक नीचा गिर जाता था तो उसे उठाने के लिए “नरमेध यज्ञ” किये जाते थे। नरमेध में मनुष्यों की बलि चढ़ाई जाती थी। वेद ध्वनि के साथ अग्नि भगवान की वेदी पर कुछ व्यक्तियों को सर्वस्व होमा जाता था। ऐसा यज्ञ देखकर जनता की अन्तरात्मा को एक चोट लगती थी, एक रोशनी मिलती थी और वह सम्मुख एक महान आदर्श उपस्थित देखकर अपनी स्वार्थपरता पर लज्जा अनुभव करके मानवोचित आदर्शों की ओर मुड़ती थी। नरमेध का वास्तविक तात्पर्य है किन्हीं व्यक्तियों का आध्यात्मिक आदर्शों के लिये साँसारिक और मानसिक दृष्टि से अपने आपको पूर्णरूपेण समर्पण कर देना और जब तक वह जिये केवल निर्धारित आदर्श के लिए ही सोचना ओर काम करना। मनुष्य को मारकाट कर होम करने की बात मूर्खतापूर्ण है। ऐसा शास्त्रों का आदेश नहीं है। शास्त्र तो नरमेध का यज्ञ पशु उसी को मानते है जो अपनी समस्त इच्छाओं और वस्तुओं का लाभ किसी निर्धारित लक्ष के लिए कर देता है।

अब नरमेधों की प्रथा बन्द हो गई है। उसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है ताकि हमारे देश की हीनता का वास्तविक कारण महापुरुषों का अभाव दूर हो सके। कुछ ऐसी आदर्शवादी, आत्मत्यागी आत्माओं को आगे आने पर ही जनता का नैतिक स्तर ऊँचा हो सकता है। नई इमारतें बनाने पर उसकी नींव में प्राचीन काल में बलि प्रदान की जाती थी। आत्मिक वातावरण तैयार करने के लिए, संसार को सुख शान्ति का प्रकाश देने के लिए जिसे युग निर्माण की आवश्यकता है उसके लिए आज भी ऐसी ही नर बलियों की आवश्यकता है। पीड़ित मानवता के पुनरुद्धार के लिए आज प्राचीन काल जैसे नरमेध रचाने की भारी आवश्यकता अनुभव हो रही है।

गायत्री के अक्षरों में सन्निहित ज्ञान विज्ञान के द्वारा-शिक्षा उपासना द्वारा-आज का दुखदायी युग बदल सकना सम्भव है। आज इस महाशक्ति की शक्तियाँ प्रसुप्त अवस्था में पड़ी हुई है उन्हें जागृत किया जा सके तो संसार के अगणित प्राणियों की समुद्र जैसी अथाह पीड़ा का निवारण हो सकता है। पर ऐसे ‘शक्ति जागरण’ के लिए नरमेध की आवश्यकता पड़ेगी। आत्म दानी आत्माएँ अपने आप की बलि चढ़ाकर ही उस शक्ति को प्रस्फुटित कर सकती है जो संसार के वर्तमान त्रासदायक वातावरण को बदल सके। आज अणु युद्ध के बादल गरज रहे है, पृथ्वी प्रलय की गोद में जाने के भय से काँप रही है, आज मानवता को दानवता ने ग्रस लिया है वह अपने परित्राण के लिए जुहार मना रही है। इस संकट को उतारने के लिए कुछ दधीचि चाहिए जो नरमेध के लिए अपनी बलि देने को प्रस्तुत हों।

जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ न हों, जो व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं और साँसारिक सुविधाओं को लात मारने को तैयार हों, ऐसी निर्मल आत्मा वाले नर नारियों की नरमेध के लिये आवश्यकता है। उन्हें कत्ल करके अग्नि में जलाया तो नहीं जायगा पर शेष जीवन को प्रायः ऐसी ही कष्ट साध्य कसौटी पर कसा जायगा। ऐसे यज्ञ पशु को कुछ समय तक खूब चराकर मोटा करते हैं वैसे ही जो नरमेध के बलि पशु होंगे उन्हें समुचित समय तक शिक्षा एवं साधना द्वारा आत्मिक रूप से परिपुष्ट किया जाएगा। ऐसा बलिष्ठ आत्माओं की बलि ही अभीष्ट परिणाम उपस्थित करेगी।

हम नरमेध यज्ञ का आयोजन करना चाहते हैं। गायत्री माता के पुरश्चरण यज्ञ हो चुके अब बलि देनी शेष है। उसके लिये हमें कुछ प्रकाशपूर्ण आत्माओं की आवश्यकता है। उन्हें ढूँढ़ने के लिए हमारी आंखें चारों ओर घूम रही है, हमारा अञ्चल चारों दिशाओं में पसारा हुआ है। आशा और निराशा के झूले में अन्तरात्मा झूल रही है। निराशा इसलिए कि चमड़ी और दमड़ी का गुलाम इस आज की दुनिया में कोई ऐसे कष्ट साध्य हेतु के लिये अपने को देने का साहस क्यों करेगा? आशा इसलिए कि सर्वस्व त्यागी ऋषियों का रक्त अभी किन्हीं की नाड़ियों में अवश्य बना होगा। उनके कानों में जब यह याचना भरी युग पुकार पड़ेगी तो निश्चय ही वे चुप न बैठे रह सकेंगे।

-श्रीराम शर्मा आचार्य।


प्रार्थना आवश्यक है।

(आचार्य विनोबा भावे)

अभी हमने यहाँ की जो प्रार्थना चलती है, उसको सबके लिये ऐच्छिक बना दिया है। अब तक यह आवश्यक मानी गई थी- लड़कियों के लिए और शिक्षकों के लिए भी। लेकिन कुछ शिक्षक कई कारणों से आ नहीं सकते थे। फिर भी लड़कियों के लिये तो वह नियम लागू ही होता था, इसलिए वे आती थी या उनको आना ही पड़ता था। तो सोचा गया कि शिक्षकों की और लड़कियों की हालत प्रार्थना के बारे में तो समान ही होनी चाहिये। परमेश्वर के सामने कोई भेद-भाव नहीं होता अगर शिक्षकों के लिये हम वह चीज आवश्यक नहीं कर सकते है तो लड़कियों के लिए भी क्यों आवश्यक की जाय? यों सोचकर हिम्मत से एक कदम उठा लिया कि यह ऐच्छिक चीज रहेगी, जिन लड़कियों को आना होगा, आवेंगीं, जो नहीं आना चाहती है वे नहीं आयेंगी। लेकिन तब से मैं देखता हूँ कि बहुत सारी लड़कियाँ आती तो हैं।

भोजन के लिए तो ऐसी बात नहीं होती कि लाजिमी तौर पर सबको खाना ही चाहिए। अगर भूख नहीं है तो खाना छोड़ भी सकते है। फिर अक्सर रोज भूख लगती है और हम खाना खाते है। बीमारी होती है तो न खाना ही अच्छा होता है। उस रोज खाना छूटता है। लेकिन ऐसे रोज कम होते हैं। यद्यपि खाने के बारे में हम सोच सकते है कि कई मर्तबा खाने से न खाना बेहतर होता है, वैसा प्रार्थना के बारे में, भक्ति के बारे में, परमेश्वर के भजन के बारे में नहीं सोच सकते। उसमें कोई प्रसंग हम सोच नहीं सकते जब कि उपासना छोड़ना बेहतर होता है, उपासना करने की अपेक्षा। हाँ, ऐसा कोई मौका हो सकता है कि नजदीक किसी घर में आग लग गई है और हमारा उपासना का समय भी वही है, तो हम उस समय उपासना को छोड़ सकते है और उसी भाव से उस घर की आग बुझाने के काम में लग सकते हैं। लेकिन फिर भी हम दूसरा समय ढूंढ़ेंगे और प्रार्थना कर ही लेंगे। बिना प्रार्थना किये आयेंगे नहीं। सोना तो हमारे हाथ की बात होती है। वह दिन के कार्यक्रम का आखिर का काम होता है, तो प्रार्थना करके ही हम सोयेंगे।

प्रार्थना कोई याँत्रिक क्रिया नहीं है। भूख की जो उपमा दी है वह भी इस चीज के लिए उतनी अच्छी नहीं है। भूख से बढ़कर यह चीज है। हमारे पास वर्णन के लिए शब्द नहीं है, इसलिए तुलना करते है, लेकिन दरअसल यह ऐसी चीज नहीं है कि इसकी उपयोगिता का वर्णन करने के लिए हमारे पास शब्द नहीं है और दुनिया के सब अनुभवी लोगों ने इसको महसूस किया है। भिन्न-भिन्न धर्म दुनिया में चलते है, अनेक अनुभवी पुरुषों ने तपस्या की है और उन धर्मों का विकास तपस्वी पुरुषों की तपस्या से हुआ हैं। फिर भी धर्मों की विचार-श्रेणियों में कहीं न कहीं थोड़ा-थोड़ा फरक होता ही है। इतना होते हुए भी इस बारे में कोई फरक नहीं है कि परमेश्वर का भजन, उसका नाम-स्मरण, व्यक्तिगत तौर पर और सामुदायिक तौर पर सबको मिलकर करना। अकेले अपने एकान्त में भी करना मनुष्य के जीवन के लिए, उसकी उन्नति के लिए, सामाजिक उन्नति के लिए, चित्तशुद्धि के लिए, आत्म-निष्ठा की प्राप्ति के लिए, शोक, मोहादि प्रसंगों में सावधान रहने के लिए अतिशय उपयोगी है। इस विषय में कोई विचार-भेद किसी धर्म में मैंने नहीं देखा है। इसलिए जो चीज इतनी महत्व की है, उसको लाजिमी बनाकर उसका महत्व हम क्यों कम करें? तो हमने सोचा कि इसकी लाजिमी रखने की जरूरत नहीं है और खुशी की बात है कि लड़कियाँ बहुत सारी आ ही जाती है।

अब यह जो प्रार्थना का कार्य हम करते है, वह हमारे जीवन में दिन भर के जो काम होते है, उन सबकी समाप्ति का, आखिर का कार्य होता है। जितना भी हमने दिन भर में किया है, भला प्रयत्नपूर्वक, और बुरा भी किया होगा भूल से, बिना सोचे वह सारा का सारा लेकर हम भगवान के सामने खड़े हो जाते है और उससे कहते है, “हे दयालु तु सर्वज्ञ है। हर चीज तू जानता है। हम शब्दों से बोले तभी तू समझेगा, ऐसी बात नहीं है। फिर भी बोले बगैर हमारा समाधान नहीं होता है, तो बोलते हैं और शब्दों से प्रार्थना करते है कि जो भी हमसे अच्छे काम हुए होंगे, उनका अहंकार हमें न लगे। उस अहंकार से हम बचें और निरहंकार होकर इसी तरह अच्छे काम हम करें, ऐसी बुद्धि हम बालकों को दें। और जो कभी बुरे काम हमारे हाथ से हुए होंगे, बहुत से तो हमने पहचाने भी नहीं होंगे कि वे बुरे है, कुछ पहचाने होंगे, लेकिन अज्ञान से किये होंगे, उन सबके लिये हमें क्या करना? यानी उनकी जो सजा होगी वह नहीं देना, ऐसा इसका मतलब नहीं है, सजा हमें जरूर देना, वह सजा ही तेरी क्षमा होगी। हम सजा से बचना नहीं चाहते। उन दोषों से, उन पापों से बचना चाहते है, तो हम आपकी क्षमा चाहते हैं। हमको जो भी शिक्षा देना है वह जरूर देना और वैसे दोष हमसे न बनें, ऐसी कृपा हम पर करना।”-इस तरह से अपना दिल उसके सामने हम खोल दें, तो एक नवीन प्रकाश हृदय में आता है और शक्ति का संचार होता है। दुनिया में वैसा कोई भी दूसरा शक्ति संचय मौजूद नहीं है कि जहाँ से हम ले ही लें, वह क्षीण नहीं होता हो। ऐसा यही एक संचय है परमेश्वर, परमेश्वर जो हमारे सबके हृदय में है। जितने अन्दर हम जा सकते हैं, उससे भी वह अन्दर है। इसके लिए एक अच्छा शब्द हमने तामिल में देखा ‘कड़बन’ यानी जितने तक हम सोच सकते है उससे भी वह परे है। और परमात्मा का अर्थ भी यही है कि वह सबसे परे है। वहाँ तक हमारी पहुँच नहीं है। लेकिन एक तरह से है भी। उसका ज्ञान अगर हम चाहते हैं तो वह हमारे छोटे दिमाग में समा नहीं सकता। वह हमारी बुद्धि से परे चीज है, लेकिन उसका प्रेम अगर हम चाहते हैं तो वह हमको मिल सकता है, उसको हम पहचान सकते है। लड़का होता है वह माता की शक्ति क्या जाने? उसका ज्ञान क्या जाने? लेकिन माता के प्रेम को तो वह जानता है, पहचानता है। प्रेम को पहचानने के लिए कोई खास विद्या की जरूरत नहीं रहती। एक जानवर भी प्रेम को पहचानता है। ओर जहाँ प्रेम है, वहाँ परमेश्वर है। परमेश्वर की सर्वोत्तम निशानी अगर है तो प्रेम है। इस दृष्टि से उसके पास हमारी पहुँच है, ज्ञान दृष्टि से नहीं। और हम ज्ञान चाहते भी नहीं। हम प्रेम ही चाहते हैं और उसकी कृपा चाहते है।

इस तरह से जब हममें से छोटे-बड़े सब तक साथ हो जाते है तो हम सबको एक ऐसी तालीम मिलती है नम्रता की कि हमारे जो भेद है, वे वहाँ रहते ही नहीं। व्यवहार में जो भेद योग्य ही कहलायेंगे। यहाँ मिथ्या ऊँच-नीच भाव आदि अयोग्य भेदों को हम छोड़ दें- जैसे गुरु है, उसकी इज्जत, प्रतिष्ठा विद्यार्थी के मन में होनी चाहिए। विद्यार्थी को यह जरूर महसूस होना चाहिये कि यह हमारा मार्गदर्शक है, नेता है, पूज्य है, हम इसके पैरों के सेवक है। इस तरह का भेद अवश्य योग्य है। लेकिन उस भेद को भी हम भूलें, ऐसी कोई जगह होनी चाहिए। सिवा परमेश्वर के ऐसी जगह नहीं मिल सकती। तो उस जगह पर पहुँचना और छोटे-बड़े मिलकर उसके सामने झुक जाना, एक बड़ी अच्छी नम्रता की तालीम है।

ये कुछ विचार यहाँ मैंने इसलिए कहे कि अब मैं कल यहाँ से जा रहा हूँ और जितने दिन यहाँ रहा उतने समय में लड़कियों के कुछ वर्ग भी लिए। लेकिन उनके साथ भोजनादि नहीं हुआ है। फिर भी हमने महसूस यह किया है कि यह जो प्रार्थना का भोजन, यह जो अमृत, हम सबने साथ मिलकर चखा है, वह बहुत मीठा लगा है, उसकी मधुरता और भी बढ़ सकती है अगर हम चित्त के धोने का निरन्तर प्रयत्न करें और शुद्ध चित्त लेकर यहाँ आ जायं। प्रार्थना की जो बाह्य व्यवस्था है वह भी हम ठीक से करें तो मधुरता और भी बढ़ सकती है और वह निरन्तर बढ़ ही सकती है, क्योंकि चित्त की शुद्धि का कोई अन्त ही नहीं है। कपड़े की शुद्धि का तो अन्त है। हम जानते है कि सफेद कपड़ा एक हद तक साफ हो गया तो उसके आगे वह फट ही जायगा। उसकी स्वच्छता की सीमा आ गई। वैसी चित्त की स्वच्छता की कोई सीमा नहीं।


बापू और भगवन्नाम

(श्री हनुमान प्रसाद जी पोद्दार)

पुरानी बात है। बम्बई में श्री बालूराम जी ‘रामनाम के आढ़तिया’ आये हुए थे वे लोगों को नाम-जप करने का नियम दिलवाते और अपनी बही में उनकी सही करवा लेते थे। लाखों सही करवाई होंगी उन्होंने। बहियों के ढेर थे उनके पास। उनकी बही में सभी सम्प्रदायों और मतों के हस्ताक्षर मिलेंगे। यहाँ तक कि मुसलमान, ईसाई, पारसी, आदि से भी वे उनके अपने मन और विश्वास के अनुसार प्रतिदिन प्रभु प्रार्थना करने की प्रतिज्ञा करवाया करते थे। यही उनकी आदत थी। उन दिनों पूज्यपाद महामना मालवीय जी महाराज और पूज्य महात्मा जी- दोनों ही बम्बई पधारे हुए थे। आढ़तिया जी ने सेठ जमना लाल जी से तो सही करवा ही ली थी, उन्होंने कहा महात्मा जी और श्री मालवीय जी के पास भी मुझे ले चलो’। श्री जपना लाल जी ने मुझको बुलवाया और हम तीनों लेबरनम रोड़ पर महात्मा जी के पास गए। सेठजी ने आढ़तिया जी का परिचय कराया। बापू बहुत ही प्रसन्न हुए और हंस-हंसकर आढ़तिया जी की बहीं देखने और उनकी तारीफ करने लगे। आढ़तिया जी ने बही खोलकर सामने रखदी और बही करने का अनुरोध किया। इस पर महात्मा जी ने मुस्कराकर कहा- ‘जब में अफ्रीका में था, तब तो रामनाम की माला बहुत जपा करता था, परन्तु अब तो दिन-रात जो कुछ करता हूँ सब राम नाम के लिए ही करता हूँ। इसलिए मैं खास समय और संख्या के लिए हस्ताक्षर क्यों करूं?’ आढ़तिया जी को बापू की बात सुनकर सन्तोष हुआ। फिर हम लोग राजा बहादुर श्री गोविन्दलाल जी पित्ती के बंगले पर जहाँ पूज्य मालवीयजी ठहरे हुए थे, गये। मालवीय जी सुनकर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने आढ़तिया जी की बहीं में लिख दिया- मैंने जब से होश संभाली भगवान का नित्यप्रति स्मरण करता हूँ और जब तक जीऊँगा, करता रहूँगा।’

‘कल्याण’ का ‘भगवन्नामाँक निकलने ही वाला था। सेठ जमनालाल जी को साथ लेकर मैं बापू के पास गया, रामनाम पर कुछ लिखवाने के लिए। बापू ने हंसकर कहा- ‘जमनालाल जी को क्यों साथ लाए। क्यों मैं इनकी सिफारिश मानकर लिख दूँगा। तुम अकेले ही क्यों नहीं आये? सेठ जी मुस्कराये। मैंने कहा- ‘बापू जी! बात तो सच है, मैं इनको इसीलिए साथ लाया कि आप लिख ही दें। बापू हंसकर बोले, ‘अच्छा, इस बार माफ करता हूँ, आइन्दा ऐसा अविश्वास मत करना। फिर कलम उठायी और तुरन्त नीचे लिखा सन्देश दिया-

‘नाम की महिमा के बारे में तुलसीदास ने कुछ कहने को बाकी नहीं रखी है। द्वादश मन्त्र अष्टाक्षर सब इस मोहजाल में फंसे हुए मनुष्य के लिए शान्तिप्रद हैं इसमें कुछ भी शंका नहीं है। जिससे जिसको शान्ति मिले उस मन्त्र पर वह निर्भर रहे। परन्तु जिनको शान्ति का अनुभव ही नहीं है और जो शान्ति की खोज में हैं उसको तो अवश्य रामनाम पारसमणि बना सकता है। ईश्वर के सहस्र नाम कहे है उसका अर्थ यह है कि उसके नाम अनन्त है। गुण अनन्त है। इसी कारण ईश्वर नामातीत और गुणातीत भी है। परन्तु देहधारी के लिए भी राम नाम रूपी एकाक्षर मन्त्र का सहारा ले सकता है। वस्तुतः राम उच्चारण में एकाक्षर ही है और ॐकार और राम में कोई फरक नहीं है। परन्तु नाम-महिमा बुद्धिवाद से सिद्ध नहीं हो सकती है। श्रद्धा से अनुभव साध्य है।’

सन्देश लिखकर मुस्कराते हुए बापू बोले- ‘तुम मुझसे ही सन्देश लेने आए हो जगत को उपदेश देने के लिए या खुद भी कुछ करते हो? रोज नाम−जप करो तो तुम्हें सन्देश मिलेगा, नहीं तो मैं नहीं दूँगा। मैंने कहा- ‘बापू जी, मैं कुछ जप तो रोज करता ही हूँ, अब कुछ और बढ़ा दूँगा।’ बापू ने यह कहकर कि- ‘भाई, बिना कीमत ऐसी कीमती चीज थोड़े ही दी जाती है’- मुझे सन्देश दे दिया। सेठजी को कुछ बात करनी था। वे ठहर गए। मैंने स्पर्श किया और आज्ञा प्राप्त करके मैं चला आया।

मैं बम्बई से राजपूताना जा रहा था। अहमदाबाद से बापू के दर्शनार्थ रुक गया। वेटिंग रूम में सामान रखकर साबरमती आश्रम पहुँचा। दोपहर का समय था। बापू उठे कुछ लिखे रहे थे। मैंने जाकर चरणों में प्रणाम किया बापू ने सिर पर हाथ रखकर पास बैठा लिया। मेरे हाथ में ‘कल्याण’ का अंक था। वे उसे लेकर देखने लगे। ‘कल्याण के द्वारा प्रति वर्ष कुछ समय के लिए षोडराक्षर मन्त्र के जाप के लिए ग्राहकों से अनुरोध किया जाता है और जप का समय पूरा हो जाने पर जप किये जाने वाले स्थानों का नाम तथा जप की संख्या ‘कल्याण’ में छापी जाती है। उस अंक में वह संख्या छपी थी। संख्या मुझे याद तो रही है, परन्तु दस करोड़ से कुछ ज्यादा ही थी। बापू ने उसी को पढ़ा और सब बात सुनीं। सुनकर बहुत ही सन्तुष्ट हुए, कहा- ‘तुम बहुत अच्छा करा रहे हो। इतने जप करने वालो में कुछ भी यदि हृदय से जप करने वाले निकलेंगे तो उनका तथा देश का बड़ा कल्याण होगा।’


अपनी अन्तरात्मा को जागृत कीजिए।

(श्री स्वामी शिवानन्द जी)

जब मनुष्य भय या आतंक की अवस्था में होता है, तब वह विश्व में होने वाली घटनाओं को सही रूप में नहीं देख सकता। शान्त और निरपेक्ष होकर ही मन उन घटनाओं को समझ सकेंगे।

हम प्रारम्भ में ही कह देना चाहते हैं कि ईश्वर के विषय में मनुष्य का विचार विकृत होता है और वह आग्रह-पूर्वक अपने उस विचार से चिपका रहना चाहता है। आदि, मध्य और अन्त ये तीनों चीजें संसार के पदार्थों में है। यह एक ऐसा प्राकृतिक नियम है जो कभी नहीं टूटता। ईश्वर के अन्दर उत्पन्न करना, रक्षा करना और नष्ट करना- ये तीनों गुण वर्तमान है। परन्तु मनुष्य कभी भी ईश्वर के इस तीसरे गुण को मानने को तैयार नहीं। मनुष्य का दृष्टिकोण प्रायः अपूर्ण रहता है और वह सत्य के केवल उस भाग को स्वीकार करना चाहता है, जो उसे प्रिय लगता है। ईश्वर के अन्दर उत्पन्न करना और रक्षा करना ये दो गुण है, उनके लिए वह निरन्तर ईश्वर की प्रशंसा करता है और गीत गाता है। लेकिन जब विनाश सामने आता है- जो कि तर्कसम्मत तथा अनिवार्य परिणाम है- तब वह काँप उठता है और भगवान से हस्तक्षेप करने की प्रार्थना करता है। सच तो यह है कि वह भ्रमवश विनाश को किसी तीसरी शक्ति का कार्य समझता है, जिसमें ईश्वर का कोई हाथ नहीं है। लेकिन मनुष्य को साहस-पूर्वक सच्चाई स्वीकार करनी चाहिये। उसे ईश्वर के सभी रूपों को मानना चाहिये। न्याय के जगत् में भावना की आवश्यकता नहीं।

अगर कोई व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह तुम्हारे ऊपर आक्रमण करता है, तो तुम उससे अपनी रक्षा कर सकते हो। लेकिन जब तुम्हारे कर्म ही तुम पर आक्रमण करें, तब तुम किस प्रकार अपनी रक्षा कर सकते हो?

मानव-जाति ने जो भूलें की है, उनके लिये दण्ड का जब विधान होता है, तब कोई भी उसे बचा नहीं सकता। इसीलिये हमारे पूर्वज कहा करते थे कि मनुष्य को हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिये। अगर अच्छे काम किये जायेंगे, तो उनका फल भी अच्छा ही होगा। अगर तुम किसी को हानि नहीं पहुँचाओगे, तो कोई भी तुम्हारी हानि नहीं कर सकता।

मनुष्य का अज्ञान तब स्पष्ट समझ में आ जाता है, जब वह अपनी की हुई भूलों और उनके परिणाम के लिए ईश्वर को दोषी ठहराता है, शताब्दियों से सन्त-महात्मा चिल्ला-चिल्ला कर कहते आये हैं कि मनुष्य को सदा अच्छे काम ही करने चाहिए और बुरे काम छोड़ देने चाहिए। उन्होंने यह भी बताया है कि कौन-सा काम अच्छा है और कौन-सा काम बुरा।

समाज ने हमेशा ऐसे लोगों को दण्ड ही दिया है। लेकिन महात्माओं ने अपना मार्ग कभी नहीं छोड़ा। क्या यह हमारे ऊपर ईश्वर की कृपा नहीं है? लेकिन मानव-जाति ने इनसे कितना लाभ उठाया है? अगर आप थोड़ी-सी भी गम्भीरता से विचार करें, तो आपको पता लगेगा कि मानव-जाति ने महात्माओं की उन शिक्षाओं की अवहेलना की है, जो शास्त्रों में लिखी हुई है।

थोड़ा-सा विचार करो। मनुष्य अपने मन में ईश्वर का एक रूप निश्चित कर लेता है और वह उसी रूप को देखना चाहता है। अगर उसे इस रूप के अतिरिक्त कोई दूसरा रूप दिखाई पड़ता है तो वह उसे मानने को तैयार नहीं। हम अपने मन में सोच रखते है कि दया, न्याय और कृपा क्या वस्तुएँ हैं और हम चाहते है कि वे उसी ढंग से संसार में प्रकट हों, जिसको हम पसन्द करते हैं। ईश्वर को उस ढंग से नहीं समझा जा सकता जिस ढंग से हम अपने लिए पत्नी की खोज करते हैं। पत्नी की खोज में हम कह सकते है- ‘वह इस तरह की सुन्दर हो, उसकी आंखें, नाक और कान ऐसे हों और उसकी आवाज ऐसी हो’ परन्तु यह चीज ईश्वर के साथ कैसे लागू की जा सकती है? किसी जगत-प्रसिद्ध नायक से पाँच मिनट गाना सुनने के पश्चात अगर हम यह कहने लगें कि जरा ऐसा गाओ, जो हमें अच्छा लगे, तो यह कितना मूर्खतापूर्ण होगा? ईश्वर के विषय में जो भ्रान्त धारणाएँ हमारे मन में आ गई है, उसका कारण यह है कि हमें विश्वास नहीं कि ईश्वर शिव-रूप है और वह जो कुछ करेगा, वह अच्छा ही होगा। संसार की प्रत्येक वस्तु में गुण-दोष है, परन्तु ईश्वर ही एक ऐसा है, जिसमें कोई दोष नहीं। जो इस रहस्य को जानता है, वह कभी कठिनाइयों से घबड़ाता नहीं।

मनुष्य सच्चे प्रेम और विश्वास को नहीं जानता अगर तुम से प्रेम करने वाला व्यक्ति प्रेम करना छोड़ दे और तुम भी इसी कारण प्रेम न करो, तो यह कोई प्रेम नहीं है। सच्चा प्रेम हमेशा रहता है। परीक्षा के समय जो विश्वास कम हो जाय वह विश्वास ही नहीं। सच्चा विश्वास बाहरी चीजों पर निर्भर नहीं। चाहे कितनी ही विपत्तियाँ क्यों न आयें, वह कायम रहता है। अगर भावना को प्रधानता दी जावेगी, तो उसका परिणाम भी विनाशकारी होगा।

प्रेम और दया मनुष्य के लिए अच्छे हैं लेकिन उस प्रेम के कारण ईश्वर में विश्वास कम नहीं होना चाहिए। मनुष्य संसार की घटनाओं के विषय में जो जल्दबाजी में निर्णय देता है, उसका कारण संकुचित दृष्टिकोण है। वह भौतिक अनुभवों और घटनाओं को ही सब कुछ मानता है। भौतिक हिंसा से वह घबड़ा जाता है। लेकिन वास्तव में मानसिक क्रूरता और अत्याचार शारीरिक कष्टों से कहीं बढ़कर है। प्रत्येक समाज या परिवार में कुछ ऐसे लोग होते है जो दूसरों पर निर्भर रहते हैं तथा चुपचाप कष्ट सहन करते रहते है। उनके इस भयंकर कष्ट का परिणाम यह होता है कि वे विवश होकर आत्म-हत्या कर लेते है। लेकिन कोई इस बात पर विचार नहीं करता। आज भी इस समय असंख्य आत्माएँ कारागारों और चिकित्सालयों में कष्ट से कराह रही है। लेकिन हममें से कितने लोग ऐसे हैं, जो इसका अनुभव करते हैं? अगर हमारा दृष्टिकोण संकुचित न होता, तो हम भी ईसा या बुद्ध की तरह उनके कष्ट का अनुभव कर सकते थे। शताब्दियों से हत्याएँ होती चली आ रही हैं, पर हम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। पर जब ऐसी घटनाएँ विशाल पैमाने पर होती हैं, तो मनुष्य ईश्वर के न्याय और भलाई में सन्देह करने लगता है। वैसे तो मनुष्य इन अनियमित और अव्यवस्थित हत्याओं से भयभीत होता है, परन्तु तब भी वह व्यवस्थित और संगठित युद्ध कला में विश्वास करता है। यह कितना बड़ा भ्रम है? वह बड़े उत्साह के साथ इसमें काम करता है। बड़े से बड़े शिक्षित संस्कृत और बुद्धिमान व्यक्ति भी युद्ध में सहायता करके यश प्राप्त करने की इच्छा रखते थे। “मेरा पुत्र, भतीजा या पोता आर. ए. एफ. या ईर्स्टन कमान मैं है” यह कहते हुए वे गर्व का अनुभव करते थे। वह इस बात को अच्छी तरह जानते थे कि उनके इस काम का परिणाम यूरोप या जापान के निवासियों के घर नष्ट करना है- नागरिकों का नृशंसतापूर्ण वध करना है जिनमें दूर यूरोप और मध्यपूर्व के स्कूलों में शिक्षा पाने वाले बच्चे भी शामिल है। लेकिन तब भी वह युद्ध से विमुख नहीं हुए। मनुष्य की बुद्धि कितनी पवित्र है कि वह अपने कर्मों पर कभी विचार नहीं करता। युद्ध काल में भोजन का कष्ट रहा- यात्रा करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा- मकानों का अभाव रहा और जीवन के लिये आवश्यक अनेक पदार्थों की कमी रही, पर तब भी हम लोग अपने को मनुष्यकृत शासन-व्यवस्था के अनुकूल बनाने का प्रयत्न करते रहे। लेकिन दुःख का विषय है कि हम लोग अपने को ईश्वरीय शासन व्यवस्था के अनुकूल नहीं बनाना चाहते।

प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों ने शास्त्रों की रचना केवल क्षणिक मनोविनोद के लिए नहीं की थी। उनके अन्दर जीवन के गहन तत्व छिपे पड़े है। ईश्वर के कार्य और नियम महत्वपूर्ण है। यह बात ठीक है, पर जो आंखें खोलकर देखना चाहते है उसे साफ दिखाई पड़ते हैं।

महात्माओं का जीवन लोक-कल्याण के लिए होता है। ईश्वर के पुत्र होने के नाते वह उसके नियम का पालन करते है। वे घटनाओं को ऐतिहासिक दृष्टि से देखते है। उन्हें इस बात का विश्वास होता है कि जो बातें आज कष्टप्रद तथा दुःखपूर्ण जान पड़ती है, उनसे अच्छा परिणाम ही निकलेगा।

प्रिय आत्मा! भगवत्कृपा का दरवाजा तुम्हारे लिए खुला हुआ है। लेकिन मनुष्य मूर्खतावश इस पर ध्यान नहीं देता। वह नित्य वही काम करता है, जो धर्म के विरुद्ध है। उसने जान-बुझ कर सत्पथ छोड़ दिया है और अच्छे परिणाम की आशा करता है। अब मनुष्य को जागना चाहिए और अपनी भूल समझ लेनी चाहिए। ईश्वर विश्वरूप है। उसके हृदय में सबके लिए प्रेम और दया है।


तेरा कौन है?

(श्री सावित्री देवी जी फिल्लोर,)

तेरा कौन है। तेरा अपना कौन है? और सब काम छोड़कर पहिले वह पता लगा ले कि तेरा अपना कौन है?

यह जो चारों तरफ अपनी चमक दमक द्वारा तेरा मन हरने के लिए आते है, ये तेरे हृदय को शान्ति नहीं दे सकेंगे। जो बिना बुलाए मेहमान सज-धज कर चमकीले भड़कीले वेश बनाकर सदा तेरे इर्द−गिर्द घूमते रहते है। भ्रम में न आना कि वे तेरे नजदीकी नहीं है? वे तुझ से बहुत दूर है, कोसों दूर है।

जो अपनी मनोहर चेष्टाओं से, वचनों से, और अन्य नाना उपायों से तेरा मन बहलाते रहते हैं, तुझे आनन्द से खिला देते है, उनके हाथों में हाथ? वह दीपक नहीं है जो कि तेरे असली अकेले घनघोर, अन्धेरे मार्ग को प्रकाशित कर सकेगा।

जो सभी प्रकार की सभा समाजों में आकर एक निस्सार शब्दावली गरज कर सुना जाते है, क्या तू समझता है कि भंवर में पड़ी तेरी नैया को वे पार लगा देंगे? जो हर एक भीड़ के आगे शोर मचाते हुए चलते है क्या तू समझता है कि आवश्यकता पड़ने पर वे तेरे काम आवेंगे? जो जल के ऊपर सदा फेन की तरह तैरते रहते है क्या तू समझता है, कि तेरी वह गहरी सेवा कर सकेंगे, तेरा उपकार कर सकेंगे?

जब शान के साथ तेरा रंगीली मण्डली राजमार्ग पर इतराती हुई निकलती है तब जो सड़क के एक किनारे से चुपचाप निकल जाता है, शायद वही तेरा है। जब भारी भारी जलसों के घटनापूर्ण उपदेश हो रहे होते है, तब जो मण्डप के एक कौने में आत्म निरीक्षण करता हुआ बैठा है, शायद वही तेरा है जो समुद्र जल में छिपे मोतियों की तरह, नम्रता वश भी तुम से प्रेम रखता हुआ भी दूर रहता है, वह तेरा है और क्या? जो तुझे चमकाने के लिए तपाता है, और तेरी तप-क्लेश की अवस्था को आनन्द से निरीक्षण करता रहता है, वह निश्चय ही तेरा है।

विपत्ति का सायंकाल आने पर अब कि सब तेरे मित्र पखेरू स्वार्थ साधन नामक आवश्यक कामों से अपने-अपने बसेरों की ओर उड़ जाते है, तब जो तेरे साथ रह जाता है, वही तेरा है। जब इन्द्रियों की शक्ति क्षीण हो जाती है, तेरा आशामय संसार विलीन हो चुका होता है, तब तुझे धीरज बँधाने वाला चैतन्य जहाँ से मिलता है, वही तेरा है। जब सब ओर से हार हो जाती है, कोई बस नहीं चलता, निस्सहायता की पराकाष्ठा हो जाती है, तब जो ठीक समय पर आकर तेरा हाथ पकड़ लेता है, वही एकमात्र तेरा है।

संसार में, अपना, पराया जानना बड़ा कठिन है, पर इसके बिना कुछ, बन नहीं सकता। यदि पराये, को अपना समझ लिया तो पछताना पड़ेगा। पछताना और इसके सिवाय कुछ भी नहीं है। इसलिए कहना पड़ता है कि पहिले सब धन्धे छोड़कर पहिले एक बार यह पता लगा ले कि तेरा कौन है। तेरा अपना कौन है?

==================================

करत करत अभ्यास के, जड़ मति होत सुजान। रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान॥

भली करत लगे विलम, विलम न बुरे विचार। भवन बनावत दिन लगे, ढाहत लगे न बार॥

का रस में का रोस में, अरि को लनि पतियाय। जैसे शीतल तप्त जल, डारत अगिन बुझाय॥

होय भले को सुत बुरो, भलो बुरे को होय। दीपक ते काजल प्रकट, कमल कीच ते होय॥

==================================


मन का भार हलका कीजिये।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र)

क्या आप मन ही मन दुःखी रहते है? क्या अन्दर ही अन्दर घुने जा रहे है? कोई आन्तरिक दुःख, पीड़ा या अन्तर्वेदना आपको व्यथित-पीड़ित कर रही है? कोई दुर्दयनीय विषम मानसिक व्यथा आपको परेशान रखती है? यदि दुःखी, पीड़ा, कसक, वेदना या आन्तरिक हाहाकार से विह्वल रहते हैं, तो आपको सावधान हो जाना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि आप पर कोई गंभीर और स्थायी मानसिक कष्ट आने वाला है। इस स्थिति से जितनी शीघ्रता से हो छुटकारा प्राप्त कीजिए।

मानसिक दुःख का कारण गुप्त मन में कटु स्मृतियों या भावी आशंकाओं को सहेजना और विपरीत विचार रखकर निरन्तर उन्हें पोसते जाना है। मानसिक कष्टों से आक्रान्त व्यक्ति अन्दर ही अन्दर घुले जाते है, ऊपर से हँसते रहने पर भी अन्दर से नैराश्य की काली छाया उन पर पड़ती रहती है। जब वे एकान्त में होते हैं, तो विक्षुब्ध होकर रोते है, अश्रुधारा बहाते है। संसार उन्हें अंधकारमय और नैराश्यपूर्ण प्रतीत होता है।

आप मन में कष्ट, पीड़ा लिए फिरते है, तो मानो अपने साथ भयंकर अत्याचार कर रहे है, अपनी महत्वाकांक्षाओं और उल्लास पर पानी फेरकर जीवन उजाड़ रहे है। अपने मन का भार हलका कीजिए।

मन में गुप्त इच्छाओं, दलित भावनाओं को रखना अनेक प्रकार के मनोवैज्ञानिक रोगों की सृष्टि करना है। गुप्त मन में कष्ट रखना रुई में अग्नि छिपाये रखने के अनुरूप घातक है।

जैसे आप कूड़ा करकट बाहर नाली में फेंक कर अपने घर को झाड़ते, बुहारते, स्वच्छ करते है, वैसे ही अपने मन के रुके हुए इन दुष्ट विकारों को फेंक दीजिए, बाहर निकाल दीजिए। निम्न उपायों से आप आन्तरिक गन्दगी से सहज ही मुक्ति पाकर गुप्त मन को स्वच्छ कर सकते है।

अपने इष्ट मित्रों की संख्या में वृद्धि कीजिए। आत्म भाव का जितना व्यापक प्रसार होगा। उतना ही मन का भार हलका होगा। इनसे आप खुल-खुल कर बातें कीजिए। अपने मन की व्यथा इन्हें अपनी अनुभूतियाँ सुनाकर हलका कर सकते है।

मनुष्य यह चाहता है कि कोई उसकी अंतर्कथाएँ सुने, उसके साथ सम्वेदना प्रकट करे, उसे सच्ची सान्त्वना प्रदान करे और निरन्तर ऊँचा उड़ने की प्रेरणा प्रदान करे। आपका यह मित्र दुःख भरी कहानियाँ सुनकर मन की व्यथा को हलका करेगा। सच मानिए, आपकी बात सुनकर किसी दूसरे से कह देना मन के भार को हलका करने का एक अमोघ साधन है।

क्या आपके गुप्त मन में मिथ्या, भय, शंकाएँ, रहती है? यदि ऐसा है, तो इनका दूसरों से समाधान कर निकाल दीजिए, अन्यथा इसके फल भयंकर हो सकते है। मनोवैज्ञानिक सलाह पूछने वाले एक पाठक का यह पत्र देखिये और फल की भयंकरता पर विचार कीजिए।

आपके सुन्दर तथा मनोवैज्ञानिक लेख पढ़ कर मन को अत्यन्त शान्ति प्राप्त होती है और एक नया मार्ग दिखाई पड़ता है। परन्तु क्या बताऊँ मेरे मन पर एक बोझा है, जिसे हटाने की लाख कोशिश करने पर भी हलका नहीं हो पाता और वह बोझा है शारीरिक जो कि समय के बहाव के साथ मानसिक रूप धारण कर चुका है। दुर्भाग्यवश अपनी कमअकली के कारण मेरा चेहरा अत्यन्त कुरूप बन गया है। मुंहासों और काले दागों ने मेरे मुख के लावण्य को हटा कर अजीब सा बना दिया है। दिल तो चाहता है कि चमड़ी को उधेड़ दूँ। उपचार भी करता हूँ तो बेफायदा। दूसरों के सामने ऐसा भद्दा और कान्तिहीन मुख को ले जाते हुए लज्जा सी अनुभव होती है। बचपन की स्मृति याद आती है तो मन और भी दुःखित होता है। कभी-कभी नौबत यहाँ तक पहुँचती है कि आत्म-हत्या कर लूँ। मेरा मन अत्यन्त दुःखित और मलीन है किसी काम में मन नहीं लगता। सब व्यर्थ सा जान पड़ता है। मानसिक व्यथा के कारण मन में कभी प्रसन्नता नहीं रहती। जीवन निराशापूर्ण और अंधकार मय लगता है। इस चेहरे की कुरूपता ने मेरे मन और मस्तिष्क को घुन के समान चाट लिया है।

इस पत्र में अभिव्यक्त समस्त मानसिक कष्ट केवल आत्मग्लानि और हीनत्व भावना की ग्रन्थि के कारण है। मुँहासा होना यौवन के आगमन का प्रतीक है। पेट में कब्ज के कारण या रक्त में उष्णता के कारण मुँहासे हो सकते है। प्रायः अनेक संवेदनशील व्यक्ति ऐसी, या और छोटी-छोटी नगण्य बातों को लेकर मानसिक वेदना से परेशान रहते है। अपनी दुख कहें, तो दूसरे उसमें हिस्सा बटावें, कुछ कम करें। दुख बटे। अन्दर ही अन्दर मानसिक कष्ट को पोसते रहने से आत्म-हत्या जैसी घृणित स्थिति तक आ सकती है। अतः गुप चुप कष्ट को दूसरों से कहकर सलाह लीजिए, उसका हल ढूँढ़िये। अनेक व्यक्ति गुप्त घृणित रोगों के शिकार होकर मन ही मन पश्चाताप किया करते है, झूठे वैद्यों या हकीमों के चक्र में पड़कर रुपया नष्ट करते हैं। यह भयंकर भूल है। जब आप अपनी समस्या को दूसरों पर प्रकट करते है कहते है, या लिखते है, तो वह मन से दूर हो जाती है। गुप्त भार हलका हो जाता है। किसी गुपचुप पीड़ा के कारण आत्म-हत्या कर बैठना भयंकर पाप है।

कोई ऐसी समस्या नहीं जिसका हल न हो, कोई ऐसी परिस्थिति नहीं जिसे सुधारा न जा सके। संसार की जटिल से जटिल मानसिक, सामाजिक समस्या का कोई हल हो सकता है, जिससे जीवन स्थिर रह सकता है और समस्या का निवारण भी हो सकता है।

क्या आप कुरूपता से व्यग्र हैं? यह स्मरण रखिए कि पुरुष का सौंदर्य उसके चेहरे या त्वचा, रूप की बनावट में न होकर उसके पुरुषत्व में है। पुरुष होकर न्याय नारी-सुलभ लज्जा या कमनीयता की आकाँक्षा न कीजिए। अपनी शक्ति की वृद्धि कीजिए। स्त्रियाँ प्रायः कुरूप, बेडौल, काले रंग के या वीर, साहसी, निर्भय शक्तिशाली वरों को पसन्द करती है। पुरुष का भूषण उसका पुरुषत्व, उसका साहस, ओज और वीरता है।

क्या आप किसी दिशा विशेष में पाई जाने वाली अपनी न्यूनता, या कमजोरी से तो परेशान है, किन्तु क्या आपने अपने गुणों और विशेषताओं की ओर भी ध्यान दिया है? यदि अपने गुण नहीं देखे है, तो अपने साथ भारी अन्याय किया है।

आप में कुछ गुण हैं, अवश्य है। बहुत बड़े पैमाने में है। कभी अपने गुणों को खोज निकालने और सतत अभ्यास से उन्हें विकसित करने की है। संभव है, आप कुशल वक्ता, व्यापारी, सेक्रेटरी, या अध्यापक बन सकते है। संगीत, साहित्य, कला इत्यादि में आपको प्रसिद्धि प्राप्त हो सके। संभव है नेतृत्व करने के गुण आप में भरे पड़े हों। दुनिया में हजारों एक से एक बड़े और महत्वपूर्ण कार्य आपके करने की प्रतीक्षा कर रहे है। यदि आप तन मन से उनमें लग जायं तो निश्चय जानिए आपके मन का भार हलका हो सकता है। क्षतिपूर्ति का नियम आपके लिए कल्याणकारी है। विधि के विधान में सर्वत्र न्याय है। परमेश्वर ने एक बात की एक स्थान पर कमी रखी है, तो दूसरी ओर उससे भी शक्तिशाली गुणों का प्रादुर्भाव किया है। वह एक चीज छीनते हैं, तो दस देते भी है। उनके विधान में कोई कमी नहीं है। सर्वत्र प्राचुर्य है। मुक्त हस्त से इस अक्षय भंडार से गुणों का दान निरन्तर होता रहता है।

अपने व्यक्तित्व का विश्लेषण सहृदयता से कीजिए। स्वयं न करें, तो किसी मनः विश्लेषण वाले विशेषज्ञ से कराइये। अपने गुणों का विकास कर अपने क्षेत्र में महान बनिए। निश्चय जानिए, संसार में आपके लिए कहीं न कहीं बड़ा महत्वपूर्ण स्थान है।

मानसिक भार हलका करने के लिये संगीत से उत्तम, अमोघ औषधि दूसरी नहीं है। सुमधुर स्वर में गाना गाने से मन की दुःख पीड़ा को बाहर निकलने के हेतु एक द्वार प्राप्त हो जाता है। संचित मानसिक-भार बह जाता है। मन हलका हो जाता है। आदि काल से वेदना के निवारणार्थ भक्त, योगी तथा साँसारिक व्यक्ति संगीत का उपयोग करते रहे है।

यह न समझिये कि आप अच्छा गा नहीं सकते, तो न गायें। यह कुछ नहीं। चाहे आप अच्छा गाना गाना जानते हों, अथवा नहीं, अवश्य गाइए, अकेले में जाकर गाइए। भगवान् की मूर्ति के समक्ष अपने पाप शंका, व्यथाओं को बहा दीजिए। पश्चातापमयी वाणी में मन को हलका करने की अद्भुत शक्ति है। “मो सम कौन कुटिल खल कामी”-कवि के इस पश्चाताप भरे गान से उसे कितनी मानसिक शान्ति प्राप्त हुई होगी, वह एक संगीत प्रेमी ही जान सकता है।

यदि कोई प्रेमी बन्धु, परिवार का सदस्य हितैषी मित्र स्वर्गवासी हो गया है और आप दुःख का अनुभव कर रहे है, तो कृपया डालिए। फूट-फूट कर रो दीजिए। अश्रुधारा के साथ आपके मन का भार बह जायगा। आप हलके हो जायेंगे। मन में व्यथा को रखना घातक है। इस विष को आँसुओं से धो डालना शान्ति और मानसिक स्वास्थ्य का सूचक है। रोना एक मनोवैज्ञानिक शान्ति मार्ग है। रोकर हम मन का भार हलका करते है।

अपने व्यक्तित्व का अध्ययन कर उन रुचिकर कार्यों की एक सूची बनाइए, जिनमें आप विशेष दिलचस्पी रखते हैं- बागवानी, साहित्य कला, चित्रकारी, खेल-कूद इत्यादि। इनमें इस तल्लीनता से संलग्न हो जाइए कि पुरानी व्यथाओं के बारे में सोचने-विचारने का अवकाश ही न प्राप्त हो। खाली मन शैतान का घर कहा गया है। अतः यदि आप खाली हाथ रहेंगे, तो पीड़ा का आक्रमण हो सकता है। व्यस्त जीवन से मन को कुछ न कुछ करने का आधार मिल जाता है और दुःख का बोझ घट जाता है।

मुस्कराने का स्वभाव बनाकर हर समय मन्द-मन्द मुस्कराने का नुस्खा आजमाइए। हँसने और मुस्कराते रहने से मानसिक तनाव दूर होता है और मन में ताजगी का संचार होता है। डॉक्टर पैस्किड, डॉ. पैवक इत्यादि ने नवीन मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों से यह प्रमाणित किया है कि हँसकर दुःखों का निवारण करना कोरी भावुकता मात्र नहीं प्रत्युत एक निगूढ़ मनोवैज्ञानिक तथ्य है।

डॉ. पैस्किड ने लगभग 150 प्रयोग मनोवैज्ञानिक प्रयोगशालाओं में किए है। वे लिखते है कि हँसने से मनुष्य के थके हुए मज्जातन्तु सचेत एवं पुनः नवस्फूर्ति और ताजगी से युक्त हो जाते है। मन का भार कम हो जाता है। इसके विपरीत क्रोध, आवेश और उत्तेजना के खिंचाव में भरे रहने से माँसपेशियों में अनुचित दबाव आ जाता है। हँसने से रुका हुआ तनाव दूर होकर मनः शान्ति आती है। हँसकर हम कितने ही आंतरिक अवयवों तथा निष्क्रिय माँसपेशियों को व्यायाम देते हैं। चिन्ता, भय, क्रोध, या चिड़चिड़ाना थकान उत्पन्न करते है। इससे जीवनशक्ति का क्षय होता है।

प्रतिहिंसा की अग्नि को दमन करने वाली दवा है, हँसना और मुस्कराना। आप दुकानदार है ग्राहक शिकायत करते है, आप क्लर्क है और मालिक झिड़कियाँ देते या जुरमाना कर देते है, घरवाली अपनी बड़ी बड़ी फरमाइशें पेश करती है, तो इन सभी कुटिल मानसिक अवस्थाओं में मुस्कराने के नुस्खे से काम निकालिए अर्थात् मन को उनके विपरीत संकेतों से प्रभावित मत होने दीजिये।

मृदु मुस्कान द्वारा उत्पन्न स्निग्ध वातावरण से हम अन्दर ही अन्दर एक ऐसी शीतलता का अनुभव करते है जो हमें संसार के प्रकोप से, बाहर के दूषित वातावरण से बचाता है।

हमने एक स्थान पर लिखा है, मैं ऐसे प्रसन्न स्वभाव, जो सदैव प्रत्येक वस्तु को अच्छे दृष्टिकोण से देखने का आदी है, प्राप्त करना अधिक पसन्द करूंगा, बनिस्बत इसके लिए मैं दस हजार पौण्ड वार्षिक आय की जायदाद का स्वामी बन जाऊँ।

त्कोफेनर के अनुसार, प्रसन्नता प्रत्यक्ष और शीघ्रतम लाभ है। वह अन्य सिक्कों की तरह केवल बैंक का ही सिक्का नहीं, वरन् प्रत्यक्ष सिक्का है। धन प्रसन्नता का सबसे छोटा साधन है, और स्वास्थ्य सबसे अधिक।

ऊपर आपने पाश्चात्य चिकित्सकों तथा विद्वानों के विचार देखे। भारत में भी प्रफुल्लता की शक्ति को स्वीकार किया गया है। सुप्रसिद्ध चिकित्सक श्री विट्ठलदास मोदी के अनुसार, मुस्कराना हमारे हमारे स्वास्थ्य के लिए तो आवश्यक है ही, जीवन की कठोरता एवं संघर्ष को भी कम करता है। मोदी जी के विचार देखिये :-

“क्रोध, आशंका, चिन्ता, डर आदि मानसिक रोग है। जिस प्रकार शारीरिक रोगों का हमारे चेहरे पर प्रभाव पड़ता है, उसी तरह हमारे चेहरे पर प्रभाव पड़ता है। इन रोगी की दवा है- प्रसन्न चित्त रहना, मुस्कराना। मुस्कराना वह दवा है, जो इन रोगों का निशान आपके चेहरे से ही नहीं उड़ा देगी, वरन् इन रोगों की जड़ भी आपके दिल से निकाल देगी। यह हो नहीं सकता कि मुस्कराने वाले का दिल काला या भारी रहे।

मुस्कराहट की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया

जब आप मुस्कराते है, तो अपने आन्तरिक मन को एक स्वस्थ स्वसंकेत देते है। दर्पण में अपना खिला हुआ मुख कमल देखकर आपको आन्तरिक आह्लाद होता है। इसका विद्युत प्रभाव आपके सम्पूर्ण शरीर पर पड़ता है। माँस-पेशियाँ स्फूर्ति से उद्वेलित हो उठती हैं और काम में मन लगता है। मुस्कराने वाला व्यक्ति ही अपने अवयवों को पूर्ण स्वस्थ दशा में रख सकता है।

मुस्कराने का दूसरा अर्थ यह है कि आपका मन मधुर कल्पनाओं, शुभ भावनाओं तथा पवित्र विचारों से परिपूर्ण है। इन पवित्र संकल्पों से ऐसी किरणें निकलती है, जो मानसिक स्वास्थ्य को उत्तम स्थिति में रखती है। जब मुस्कराहट स्थायी रूप से आपके स्वास्थ्य का एक अंग बन जाती है, तो स्वभाव में एक महान परिवर्तन हो जाता है। ऐसे मधुर स्वभाव से हमारा सर्वत्र स्वागत किया जाता है।


आत्म शान्ति का मूल केन्द्र

(श्री विजय लक्ष्मी सिन्हा, इलाहाबाद)

“इस चंचल भवसागर में शान्ति कहाँ?” ऐसी लोगों की धारणा है परन्तु ऐसा नहीं सोचना चाहिये। इस समुद्र की अभिलाषा रूपी लहरें चंचल हैं। तथापि समुद्र गम्भीर है। यदि हम हृदय को शान्त कर लें तो हमें शान्ति प्राप्त हो सकती है। बहुधा लोग यह सोचते है कि घर-बार छोड़दो वन में तपस्या करो तो शान्ति प्राप्त हो सकती है किन्तु ऐसा नहीं है। कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है कि घर के माया जाल छोड़ पर भी शान्ति नहीं मिलती। ज्ञानवान हो गये, संसार से विरक्ति हो गयी किन्तु हृदय में चैन नहीं शान्ति नहीं।

जो लोग संसार में ही रहना चाहते है, गृहस्थी का बोझ उठाये हुए हैं वे साँसारिक विषयों की प्राप्ति में शान्ति की प्राप्ति समझते है। शान्ति को प्राप्त करने के लिए विविध व्यक्तियों तथा वस्तुओं से मुहब्बत जोड़ते है इतने पर भी शान्ति नहीं मिलती। धन की आवश्यकता का अनुभव करते है। धन उनके पास हो वह उससे भी अधिक धन की इच्छा करते है इस प्रकार वे विविध क्षेत्रों में ढूंढ़ते हुए भी शान्ति की प्राप्ति नहीं कर पाते।

यदि शान्ति धन में, भोग-विलास में अर्थात् साँसारिक वस्तुओं में नहीं है और न तो संसार से विरक्ति एवं वैराग्य में ही है तो शान्ति है कहाँ? अरे ए, शान्ति के इच्छुक यदि शान्ति की अभिलाषा करते हो तो तनिक दूसरी ओर भी दृष्टि डालो। देखो शान्ति तो अपने हृदय में, अपने कर्म एवं कर्तव्य में विराजमान है।

किसका कर्तव्य क्या है? इसका भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिये लेखा तो तैयार नहीं किया जा सकता परन्तु यह तो निश्चय ही है कि मानव जन्म में प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी कर्त्तव्य होता है तथा प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए। हाँ, साधारण तौर पर यह बतलाया जा सकता है कि कर्त्तव्य क्या है। जो कार्य करणीय है वही कर्तव्य है किसी का भला करना, परोपकार करना, दया करना, क्षमा करना, यदि गृहस्थ है तो अपने परिवार को समुन्नत बनाना, सदस्यों का भली प्रकार से भरण-पोषण करना सबकी सेवा करना अपने समाज एवं राष्ट्र की उन्नति में सहयोग देना सभी करणीय है तथा सभी कर्त्तव्य हैं। इस विश्व में समय-समय में नए-नए कर्त्तव्य उपस्थित होते रहते हैं यथा जब मनुष्य बालक रहता है तो उसका कर्त्तव्य माता-पिता एवं अपने गुरु की आज्ञा का पालन करना श्रेष्ठ कर्त्तव्य है, आगे चलकर स्त्री-पुत्र की रक्षा करना, उनका भरण-पोषण करना तथा समाज एवं राष्ट्र की उन्नति करना कर्त्तव्य हो जाता है और ईश्वरी वासना तो सदैव ही एक कर्त्तव्य रहता है।

यदि कोई व्यक्ति यह सोचे कि संसार के अन्य कार्यों को करते हुए ईश्वरी वासना नहीं हो सकती तो यह भूल है। यह कर्त्तव्य तो जन्म से लेकर जीवन पर्यन्त तक बना रहता है। सब कर्त्तव्यों का पालन करते हुए इस कर्त्तव्य का भी पालन अवश्य करना चाहिए। ईश्वरी वासना का अर्थ है हृदय से ईश्वर का चिन्तन करना। संसार से विरक्ति ही ईश्वरी वासना नहीं है।

संसार में अपने कर्त्तव्यों का पालन करते हुए हुए ईश्वर का चिन्तन भी करने से सच्ची शान्ति प्राप्ति हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों का पालन न करे, अपने आश्रितों की रक्षा एवं देख-रेख न करे तथा घर-बार छोड़कर दूर घन-घोर जंगल में जाकर तपस्या करे तो उसे सच्ची शाँति का अनुभव नहीं हो सकता, भले ही वह ज्ञानी हो जाय, ब्रह्म को समझ ले किन्तु उसे सच्ची शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती है। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति अदनिश भोग-विलास एवं सुखों में निरत रहता है और ईश्वर का ध्यान नाममात्र को भी नहीं लेता, वह समझता ही नहीं कि प्रभु का ध्यान एवं मनन कुछ क्षण तक करना भी उसका कर्त्तव्य है तो सच्ची शान्ति से उसे भी अवश्य ही वंचित रहना पड़ेगा।

उपरोक्त बातों से यह निष्कर्ष निकलता है कि सच्ची शान्ति स्व कर्त्तव्य पालन से ही होती है, हमें शान्ति ढूंढ़ने के लिए कही जानी नहीं पड़ता वरन् स्व कर्त्तव्य पालन से वह स्वयं चली जाती है जिस प्रकार मृग के अन्दर ही कस्तूरी रहती है और हिरन उसकी सुगन्धि के कारण चारों ओर वन में उसे ढूंढ़ता है वह नहीं जानता कि कस्तूरी तो उसी के नाभि के अन्दर उपस्थित है, उसी प्रकार हिरन रूपी व्यक्ति भी कस्तूरी रूपी शक्ति को पाने की अभिलाषा से त्याग एवं विरक्ति अथवा साँसारिक विषय रूप वन में ढूंढ़ता है। पर वस्तुतः वह उसके अन्दर ही है।

==================================

विवेक प्रश्नावली।

होय भले चाकरन ते, भले धनी को काम। ज्यों अंगद हनुमान ते, सीता पाई राम॥

बिना कहेउ सतपुरुष, पर की पूरें आस। कौन कहते है सूर को, घर-घर करत प्रकाश॥

कछुकहि नीच न छेड़िये, भलों न वाकोसंग पाथर डारे कीच में, उछरि बिगारे अंग॥

सज्जन को दुख ही दिये, दुर्जन पूरे आस। जैसे चन्दन को घिसे, सुन्दर देत सुवास॥

==================================


मन्त्र शक्ति का रहस्य

(श्री भगवान्नारायण भार्गव)

मन्त्र या जप के प्रभाव को समझने के लिए शब्द विज्ञान, मनोविज्ञान, वायु तथा विद्युत विज्ञान की कुछ सहायता लेनी होगी। अनेक धर्मों में शब्द का महत्व ऊँचा माना गया है, आर्य तो शब्द को ब्रह्मरूप मानते है। शब्द चाहे जड़ का हो या चेतन का- चेतन में भी मानव का हो या पशु-पक्षी का- सभी का प्रभाव न केवल प्राणियों पर किन्तु प्रकृति पर भी अवश्य पड़ता है। इस तथ्य को मूर्ख से भी मूर्ख स्वीकार करेगा। मेघ गर्जन, बिजली की कड़क का प्रभाव पशु पक्षियों पर ही नहीं मानवों पर भी अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार पड़ता है। होम्योपैथिक प्रणाली के अनुसार इन शब्दों से प्रकृति विशेष के रोगियों का रोग घटता बढ़ता है। नदी के कल-कल का प्रभाव कवियों तथा प्रकृति के इतर पुजारियों पर पड़ता ही है। सिंह गर्जन सुनकर किसी को भय और किसी को उत्तेजना और वीर भाव उत्पन्न होता है। कोकिल या मयूर के गाने से किसी को भय की भावना नहीं होती। शब्द से ही हम दूसरे मनुष्यों को प्रभावित करते है किसी में क्रोध उत्पन्न कर देते है तो किसी में प्रेम, किसी में कामना तो किसी में वात्सल्य प्रेम या वैराग्य! फिर शब्द शैली और शब्द योजना की विभिन्नता से भिन्न-भिन्न प्रकार के भावों तथा रसों का प्रादुर्भाव होता है। शब्द क्या शब्द के रचना करने वाले अक्षरों से भी भिन्न-भिन्न रस उत्पन्न होते है। करुण रस में तथा शृंगार रस में कोमल, कान्त, पदावली अभीष्ट होती है किन्तु वीर, रौद्र और वीभत्स रसों की शब्दावलि विपरीत होती है। संसार की सभी भाषाओं के छन्दालंकार शास्त्र से शब्दाक्षर विन्यासानुपात और उनके विपर्यय तथा तारतम्य के प्रभाव को स्वीकार किया है।

युद्ध सम्बन्धी प्राचीन कार्यों में कितने कर्ण-कर्कश शब्दाक्षरों का प्रयोग होता था। शब्दों ही से युद्ध छिड़ जाता है, शब्दों ही के कारण प्राण हास्य और रुदन करने लगते है। यदि हमारे शब्दों में वास्तविक शक्ति हो तो दौड़ता हुआ विषधर सर्प भी रोका जा सकता है और वश में किया जा सकता है। चञ्चल मृगों को अपनी ओर आकृष्ट करके निश्चल और शान्त कर सकते है और पागल हाथी की उन्मत्तता को भी दूर कर सकते हैं।

मन्त्रों की शक्ति को थोड़े समय के लिए अभी दूर रहने दीजिए। संगीत ही में वशीकरण और रोगशमन की शक्ति आज भी पाई जाती है। संगीत से शिर पीड़ा और वमनोद्वेग रुकते मैंने देखा है। यह है केवल शब्द विज्ञान की लीला। उसके साथ भावना का पुट दे दीजिए। मनोविज्ञान की सहायता से लीजिए सोने में सुहागा हो गया। मानव विशेष युक्त शब्दों का क्या प्रभाव होता है इसके प्रमाण जीवन के पल-पल में प्राप्य है। कुत्ते-बिल्ली आदि में तो मानव बुद्धि नहीं है परन्तु प्रेममय शब्दों को और घृणा क्रोध भरे शब्दों को वे भी पहिचानते है तथा उन्हीं भावनाओं के परिणामस्वरूप कार्य भी करते है। हमारी विचारशक्ति और आन्तरिक इच्छा शक्ति का प्रतिबिम्ब शब्दों द्वारा विलक्षण रीति से मनुष्यों पर तो पड़ता ही है पशु पक्षियों क्या वृक्षों तक पर पड़ता है। फिर एक ही शब्द पृथक्-पृथक् भावनाओं से उच्चारण करने पर पृथक-पृथक प्रकार के फल को प्रकट करता है। जैसे “क्यों बे बदमाश” क्रोध में कहने से क्रोध और घृणा का अभिभावक होता है, अपने बच्चे के प्रति प्रेम से कहने पर प्रेमोल्लास प्रकट करता है। एक ही स्त्री को कोई बेटी, कोई माता, कोई भगिनी, कोई प्रियतमा कहकर पुकारता है परन्तु प्रत्येक पुकार में विविध भावनाओं की तरंग का आदुर्भाव होता है और प्रतिक्रिया में भी भिन्नता होती है। मैस्मरेजम या हिप्नोटिज्म में यद्यपि मन्त्रों का प्रयोग नहीं होता है किन्तु वहाँ भी शब्द योग और इच्छा शक्ति योग के संपर्क से काम लिया जाता है बड़े-बड़े रोग अच्छे हो जाते है मनुष्यों के स्वभाव तक में परिवर्तन किसी-किसी अवस्था में होते देखा गया है। तात्पर्य यह है कि विशेष शब्दविन्यास में जब विशेष भावनाओं का रस मिश्रण किया जाता है विशेष प्रभाव पड़ता है। यह भी एक स्वीकृति तथ्य है कि प्रत्येक प्राणी में आकर्षण या विद्युत शक्ति है क्योंकि सभी प्राणी जगदात्मा के एक सूत्र की मणियाँ है या कहिये सभी में एक ही विद्युत तरंग के कण वर्तमान है ऐसा न होता तो अहैतुक और तास्तकालिक प्रेम तथा घृणा के भाव जो संसार में दृष्टिगोचर होते है न होते। स्वाभाविक द्वेष तथा प्रेम इसके प्रमाण है।

आप शब्दों का उच्चारण जोर से न भी करें केवल मन से ही उन शब्दों को किसी के प्रति लक्ष्य करके अभ्यास रूप से दुहरावे तो उन मूक शब्दों का विचार तरंग द्वारा उस पर प्रतिबिम्ब पड़ता है और उसके मन में उसी प्रकार से उद्वेलन होगा। यह एक अनुभव की बात है कि आप किसी घोर दुष्ट वासनामय स्त्री पुरुष के पास जाकर चुपचाप भी बैठे रहें तो भी उसके मूल विचारों का आप पर अवश्य प्रभाव पड़ेगा और यदि आपके विचार उससे विपरीत है तो आप घबराकर वहाँ से भाग जायेंगे। उसी प्रकार अच्छे विचारों के सज्जनों के पास बैठने से भी मूक विचारों का असर पड़ता है। शब्द भावना और प्राकृतिक विद्युत शक्ति से हम दूसरों पर सत तथा असत् प्रभाव डाल सकते है। अब देखना यह है कि शब्दों तथा विचारों का प्रभाव वायु के स्तरों में तथा आकाश मण्डल में कहा कितना और किस प्रकार पड़ता है। हमारे संगीत शास्त्र में राग-रागनियों के स्वरूप तथा गुणादि का बड़े विस्तार से वर्णन है, उनके प्रभावों का भी दिग्दर्शन कराया गया है। प्राचीन पुस्तकों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि दीपक राग के गाने से दीपक जल जाते थे, मेघराज से वर्षा हो जाती थी। पर आज हमारी आंखें पाश्चात्य सभ्यता तथा विदेशी गौरव से चौंधियाई हुई है। हम इन बातों के अनुसंधान में समय नष्ट नहीं करना चाहते, न इन पर विश्वास करते है। हाँ, यदि कोई पाश्चात्य विद्वान् इन तत्वों तथा तथ्यों का पोषण मात्र कर दे तो हम उसके अन्धविश्वासी हो सकते है। मैंने पढ़ा है कि इसी शताब्दी में कई बार गायकों द्वारा प्रयोग करके देखा गया है कि विविध राग-रागनियों की तान अलापने पर परदो पर तथा चूर्ण विशेष विस्तृत वायु मण्डल में उनकी रूप रेखा नाचती दिखाई और गान समाप्त होते ही वे रूप अन्तर्हित हो गये। एक बार लार्ड लिटन के कमरे में प्रसिद्ध अन्वेषिका श्रीमती बाट्स इन्स द्वारा यह प्रयोग देखा गया।

एक प्रकार के राग से एक ही प्रकार ही आकृति प्रकट हुई, दूसरे से दूसरी। फ्रांस में भी एक बार लेडीलेंग ने एक राग छेड़ने पर देवी मैरी के दर्शन क्राइस्ट को गोद में लिए हुए किए। भैरवराग छेड़ने पर भैरव जी के दर्शन हुए इटली में भी इसका प्रयोग किया गया है और वहाँ गायिका के स्वरों के प्रभाव से रेत में चित्र बनते देखे गये। वह चित्र माता सरस्वती जी पुस्तक धारिणी वीणा धारिणी का था। शब्द के संघर्ष की शक्ति विद्युदाच्छन्न आकाश मण्डल में हजारों मीलों तक विस्तृत होती है। इसके वैज्ञानिक प्रमाण रेडियो और बेतार के तार है। आधुनिक काल में विशेष यन्त्रों द्वारा हमारी वाणी इतनी दूर पहुँचाई जा सकती है। प्राचीन काल में सिद्ध पुरुष बिना किसी यन्त्र के अपने योग बल से केवल अपनी वाणी का ही प्रसार सुदूरस्थ प्रदेशों में ही न कर वरन् एक स्थान में स्थित अपने शरीर द्वारा हजारों कोसों दूर पर स्थूल क्रियाएँ भी प्रदर्शित कर सकते थे। वे क्रियाएँ आज भी संभव हो सकती है। यदि हम योगिक क्रियाओं की ओर अपना गम्भीर ध्यान दें और विस्मृत क्रियाओं और उनके उपेक्षित तत्वों का अनुसन्धान करने और उनकी साधना करने में समय तथा शक्ति का व्यय करें। हम यदि यह समझते हों कि हमारी वाणी का प्रसार बिना यन्त्र के केवल वहीं तक है जहाँ तक वह सुनाई देती हो तो हम भूल करते है। एक बड़े जलाशय में आप एक छोटा सा कंकड़ डालें तो देखेंगे कि उस छोटे से कंकड़ की ताड़ित संघर्षणा में जल में चक्र बनकर समस्त तड़ाग के घेरे में पड़ता ही जायगा ठीक उसी प्रकार जो शब्द हमारे कण्ठ से निकलता है वह सारे वायुमण्डल में फैलकर अपनी तरंगों का प्रभाव डालता है। हमारी मानसिक शक्ति का प्रसाद और संघर्ष बल इससे भी अधिक है क्योंकि मन की प्रगति और बल शरीर से अत्यन्त प्रबल और तीव्र है। हम यहाँ बैठे-बैठे संसार के किसी व्यक्ति विशेष को ध्यान में लाकर उस पर अपनी प्रबल इच्छा शक्ति द्वारा अपने विचारों का प्रभाव डाल सकते है। इसका यदि हम स्वयं परीक्षण करें तो हमें विश्वास प्रत्यक्ष रूप से हो जावेगा। निकट स्थान पर ही इस तत्व का परीक्षण करके देखिए। आप में से कितने ही महानुभावों को वह अनुभव कई बार हुआ होगा कि आप एक विषय पर अपने मित्र से वार्तालाप करने के लिए विचार करते हुए गए, पहुँचने पर आप तो विचार करते ही रहे और जो विचार आपके हृदय में थे वे ही आपके मित्र ने प्रकट कर दिए। आप किसी से कोई प्रश्न करने को उद्यत हुए कि उसने उसका उत्तर आपको पहिले ही दे दिया। बाह्य विद्युत शक्ति का बल कहीं अधिक है, विचार विनिमय शब्दों से नहीं हृदयान्तरित तार से ही हो जाता है। हमें इसके प्रमाण दैनिक जीवन में ही प्राप्त होते है परन्तु हम उन पर ध्यान नहीं देते।

जब शब्द, भाव, विचार, वायु विद्युत तथा आकाश का पृथक तथा सम्मिलित प्रभाव हमारे जीवन के साधारण व्यवहार से पशु-पक्षी, प्रकृति तथा मानवजाति पर नित्य पड़ना प्रत्यक्ष रूप से सिद्ध है तो इसमें क्या आश्चर्य की बात है कि हमारे ऋषि-मुनियों ने आत्मयोग द्वारा विशेष साधनों से शब्द-विज्ञान मनो-विज्ञान आदि के अनुसन्धानित आधार पर विशिष्ट शब्द विन्यास की योजना से मन्त्रों की रचना करके उनकी विधिवत् सिद्धि द्वारा संसार का कल्याण किया। इन्हीं तत्वों की विवेचना के आधार पर यह निश्चित धारणा स्थिर हुई है कि मन्त्र द्वारा अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती है। रोग, आपत्ति और संकटों का शमन होता है और इष्टदेव के दर्शन से कामनाएँ पूर्ण होती है। एक विचार को आप बार-बार हृदय में दुहरावें और उसका अभ्यास करें तो वह विचार आपके मस्तिष्क में ऐसा अंकित हो जाता है कि वह आपके स्वभाव में परिणत हो जाता है और उसका एक अंग बन जाता है और उस स्वभाव तथा संस्कार से बाह्य जगत प्रभावित होता है। इसी प्रकार किसी मन्त्र या मन्त्रों के स्तोत्र के पुरश्चरण से सिद्धियाँ प्राप्त करके संसार का कल्याण निश्चय रूप से किया जा सकता है।

शब्दोच्चारण भी कई प्रकार का है। वह शब्द वह जो दूसरों को सुनाई देता है उसमें कण्ठ जिह्वा वह अन्य शरीराँग का योग होता है दूसरा वह शब्द है जिसमें जिह्वा का आश्रय न लेकर केवल कण्ठ से ही उच्चारण होता है। तीसरा वह शब्द जिसमें केवल आपकी श्वाँस ही कार्य करती है। चौथा शब्द है जिसको आप हृदयान्तर अथवा अन्तःकरण में ही उच्चारण करते हैं परन्तु उसकी भीमकाय तरंगें सारे ब्रह्माण्ड को आप्लावित कर देती है। पाँचवाँ शब्द अनहद शब्द है जिसका उच्चारण आप वास्तव में करते ही नहीं। इन सब तथ्यों के विज्ञानों महर्षियों तत्वदर्शियों ने लोक-कल्याण के लिए मन्त्रों का निर्माण गुप्त दिव्य-शक्तियों की मन्त्रणा से और साधन से किया था। उनका सूक्ष्मतर मननयोग जो मन्त्रों में वैज्ञानिक क्रियाओं से सन्निहित वाह्य वायु तथा विद्युत के अभ्यन्तर सूक्ष्म स्तर की तरंगों द्वारा जड़ और जंगम पर यदि अपना अचूक प्रभाव डालता है तो क्या आश्चर्य है। किसी मन्त्र का जप हो या ईश्वर भजन प्रार्थना मन्त्र का कीर्तन हो उपरोक्त वैज्ञानिक तत्वों की प्रतिक्रिया उन सब में प्रगाढ़ रूप से दृष्टिगोचर होती है और उनके प्रभाव का विस्तार अनन्त होकर के तार द्वारा हृदयों में प्रवेश करता है। मन्त्रों का अनुष्ठान एक ही स्थान में अथवा एक ही समय में अनेकों स्थानों में किए जाने पर वायुमण्डल मात्र में एक विशेष उद्वेलन और संघटन उत्पन्न करता है। जिसका सामूहिक प्रतिफल समष्टि पर अंकित हो जाता है। यही कारण है कि धार्मिक आचार्यों ने पूजा, संध्या समाज प्रार्थना के कुछ निश्चित समय नियत कर दिये हैं। मन्त्र सिद्ध करके मनुष्य अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार प्रयोग करता है। मन्त्र तामसी, राजसी या सात्विकी नहीं है ये तो मनुष्य के गुण और स्वभाव के विशेषण हैं। सिद्धियों के दुरुपयोग से सदाचार, संयमी, ब्रह्मचारी सदा स्वयं बचते है और दूसरों की रक्षा करते है। कहा जाता है कि आज कल केवल प्रयोग तथा प्रत्यक्ष पर ही लोग विश्वास करते हैं। ठीक हैं हम कब कहते हैं कि अन्धविश्वास किया जावे। ‘प्रयोग कीजिए’ परीक्षण कीजिए, स्वयं साधन कीजिये।


तुलसी सब रोगों की दवा

(श्री सत्य प्रकाश अग्रवाल मथुरा)

जिस प्रकार प्राणियों में मनुष्य, छन्दों में गायत्री देवताओं में इन्द्र, नदियों में गंगा, पर्वतों में हिमालय और हाथियों में ऐरावत हाथी श्रेष्ठ है उसी प्रकार वनस्पतियों में तुलसी का पौधा ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यही कारण है कि हिन्दू परिवारों में घर की पवित्रता की रक्षार्थ तुलसी का पौधा रखा जाता है। हमारे यहाँ भगवान की पूजा भी बिना तुलसी के नहीं हो पाती। शालिग्राम की पूजा बिना तुलसी दल चढ़ाए पूर्ण होती ही नहीं है, बिना तुलसी के भगवान का प्रसाद भी नहीं बनता। हिन्दू समाज में जो तुलसी का इतना मान होता है, उसकी इतनी रक्षा व पूजा होती है, वह किसी अंधविश्वास के कारण नहीं वरन् उसके अद्भुत गुणों के कारण है। अत्यन्त प्राचीन काल में जबकि बहुत से देशों में मानव जीवन का विकास भी नहीं हुआ था, हमारे ऋषि मुनियों ने तुलसी के गुणों को अच्छी तरह जान लिया था और उसके गुणों के कारण ही उसको हिन्दुओं के लिए इतना महत्वपूर्ण बना दिया जिससे तुलसी का पौधा हर समय उसके पास सुलभ रहे। जब मनुष्य मृत्यु के समीप होता है, बड़े से बड़े डॉक्टर, वैद्य फेल होकर चले जाते है तब केवल तुलसी की पत्ती और गंगा जल ही दिया जाता है, और देखा भी गया है कि कभी गंगाजल के गले के नीचे उतरते ही मरणासन्न मनुष्य भी अच्छे हो जाते हैं अथवा कष्ट से छूट जाते है। तुलसी के इन्हीं गुणों के कारण इसकी इतनी प्रतिष्ठा व पूजा हमारे समाज में है।

तुलसी से अनेकानेक लाभ की दवाइयां बनती है। तुलसी की जड़, पत्ती, डंठल, बीज सभी औषधि का काम देती है, और अत्यन्त उपयोगी हैं। इसकी पत्तियाँ खाने से शरीर में स्फूर्ति एवं तेज आता है, जड़ ठंडक रखती है और बीज मस्तिष्क की शान्ति प्रदान कर कार्य की ओर अग्रसर करते है। तुलसी में अभूतपूर्व सुगन्धि होती है जो वायु को शुद्ध करती है। जहाँ तुलसी का पौधा होता है वहाँ की वायु शुद्ध रहती है, जलवायु स्वास्थ्य उपयोगी होती है, वातावरण शान्तिमय रहता है। जैसा कि तुलसी के सम्बन्ध में हिन्दू ग्रन्थों में लिखा है।

तुलसी गन्धमादाय यत्र गच्छति मारुतः। दिशो दिशश्च पूतास्यभूर्त ग्रामश्चतुर्विधः॥

‘अर्थात् तुलसी की गन्ध लेकर वायु जहाँ कहीं पहुँचती है, उस दिशा में रहने वाले प्राणी तथा सभी स्थान पवित्र हो जाते हैं,

जहाँ तुलसी होती है वहाँ मच्छर इत्यादि नहीं होते, वहाँ रोग भटकने भी नहीं पाते। तुलसी की गन्ध से सब मच्छर इत्यादि मर जाते है। जैसा कि ग्रन्थों में है।

“तुलसी काननञ्चैव गृहे यस्यवतिष्ठति। तत् गृहतीर्थ भूत हिना यान्ति यम किंकरा॥”

अर्थात् जिस घर में तुलसी रहती है वह घर तीर्थ के समान है। वहाँ यमदूत (मच्छर, सर्प, बिच्छू इत्यादि नहीं जाते।

तुलसी का महत्व एक और निम्न उदाहरण से स्पष्ट है। कुछ ही दिन पूर्व हमारे एक परिवार के ही पूज्य महानुभाव तपैदिक के मरीज जो जीवन से निराश थे उन्हें डाक्टरों, वैद्यों ने जवाब दे दिया था, उन्हें एक तुलसी के बगीचे में रखा गया। दो महीने उसने स्वास्थ मय लाभ को प्राप्त किया। अब पाठकों की सुविधा के लिए तुलसी का दवाई की तरह प्रयोग बताया जा रहा है।

तुलसी का प्रयोग

मलेरिया पर :- मलेरिया की तो तुलसी शत्रु है। तुलसी मलेरिया के कीटाणुओं को भगाती है। मलेरिया के मरीज को जितनी हो सके (अधिक से अधिक 50 या 60 तुलसी की पत्तियाँ प्रतिदिन खानी चाहिए तथा काली मिर्च पीसकर तुलसी के रस के साथ पीनी चाहिए। इससे ज्वर जड़ से नष्ट हो जायेगा।

ज्वर पर :- तुलसी का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाना चाहिए, इसके बाद रजाई ओढ़कर कुछ देर सो रहिए, पसीना आकर बुखार उतर जायगा।

खाँसी पर :- तुलसी और अडूसा के पत्तों को बराबर मात्रा में घोट कर पीजिए।

जी घबड़ाने पर :- तुलसी की पत्तियाँ 1 तोला और काली मिर्च 1 मासा पीसकर शहद के साथ चाटिए। आपका जी नहीं घबड़ायेगा तथा चित्त प्रसन्न रहेगा।

कान के दर्द पर :- तुलसी की पत्तियों को पीसकर उनके रस में रुई को भिगोकर कान पर रखे रहिए। दर्द फौरन बन्द हो जायगा।

दांतों के दर्द पर :- तुलसी और काली मिर्च पीसकर उसकी गोलियाँ बनाकर पीड़ा के स्थान पर रखने से दर्द बन्द हो जायगा।

गले के दर्द पर :- तुलसी की पत्तियों को पीसकर शहद में चाटने से गले का दर्द बन्द हो जावेगा।

जुकाम पर :- तुलसी का रस पीजिए और तुलसी की सूखी पत्तियाँ खाइए। अगर हो सके तो तुलसी की चाय भी पीजिये। जुकाम नष्ट हो जायेगा।

फोड़ो पर :- तुलसी की एक छटाँक पत्तियों को औटा लीजिए और उसके पानी को छानकर फोड़ो को धोइये, दर्द बन्द हो जायेगा तथा विष भी नष्ट हो जावेगा।

सिर दर्द पर :- तुलसी की पत्तियों के रस को और कपूर को चन्दन में घिसिये। खूब गाढ़ा करके उसे सिर पर लगाइये। सिर दर्द बंद हो जाएगा।

जल जाने पर :- तुलसी का लेप बनाकर उसमें गोले का तेल मिलाकर जले हुए स्थान पर लगाइये।

आंखों के रोग पर :- तुलसी का लेप बनाकर आंखों के आस-पास रखना चाहिए। इससे आँख ठीक हो जाती है। अगर हो सके तो तुलसी के रस में रुई को भागो कर पलक के ऊपर रखिए। इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है।

पित्ती निकलने पर :- तुलसी के बीजों को पीसकर आँवले के मुरब्बे के साथ खाने से पित्ती दूर हो जाती है।

जहर खा लेने पर :- तुलसी की पत्तियों को पीस कर उनको मक्खन के साथ खाने से विष दूर होता है।

बाल झड़ने पर अथवा सफेदी होने पर :- तुलसी की पत्तियों के साथ आँवले से सिर धोने पर बाल न तो सफेद होते है और न झड़ते हैं।

तपैदिक होने पर :- तपैदिक के मरीज को किसी तुलसी के बगीचे में रहना चाहिये और अधिक से अधिक तुलसी खानी चाहिये इससे वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जावेगा। तुलसी की आव-हवा का तपैदिक के मरीज पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। तुलसी की गन्ध से तपैदिक के कीटाणु मर जाते है। रोगी शीघ्र स्वस्थ होकर स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त करेगा।

इसी तरह साँप के विष को दूर करने के लिये भी तुलसी एक अमूल्य औषधि है। साँप के काट लेने पर तुरन्त ही रोगी को तुलसी की पत्तियाँ खिलानी चाहिये। इसके बाद जहाँ साँप ने काटा है उस जगह को शीघ्र ही चाकू से काट देना चाहिये तथा घाव के ऊपर एक कपड़ा बड़ी मजबूती से कसकर बाँध दीजिये। इसके पश्चात जहां साँप ने काटा है वहाँ तुलसी की सुखी जड़ को घिस कर मक्खन मिलाकर उसकी पट्टी बाँधनी चाहिए। पट्टी विष को अपनी तरफ खींचेगी। जिससे उसका रंग काला पड़ जायेगा। रंग काला पड़ते ही दूसरी पट्टी बाँधनी चाहिये। जब तक पट्टी का रंग बिलकुल सफेद ही न रहे यह क्रम जारी रखना चाहिये। शीघ्र ही साँप का विष उतर जायगा।

इन सब गुणों के अतिरिक्त तुलसी और बहुत से रोगों को दूर करती है। तुलसी की पत्तियों को सुखाकर उनको कूटकर छान लेना चाहिये और फिर नहाते समय दूध अथवा दही के साथ शरीर पर मलना चाहिये। इस प्रकार तुलसी साबुन का काम भी दे सकती है। तुलसी की पत्तियाँ और काली मिर्च सुबह नहा धोकर खानी चाहिये इससे दिन भर चित्त प्रसन्न रहता है, दिनभर शरीर में स्फूर्ति रहती है और मन शान्त रहता है। तभी तो शास्त्रों में भी लिखा है :-

“महा प्रसाद जननी, सर्व सौभाग्य वर्दिधुनी। आदि व्याधि हरि निर्त्य, तुलसित्वं नमोस्तुते॥”


यज्ञ द्वारा अनेक प्रयोजनों की सिद्धि

(अप्रैल अंक से आगे)

निरोगता, बलिष्ठता और दीर्घायु के लिए-

स्वास्थ्य का केन्द्र सूर्य है। सूर्य में रोग निवारिणी प्रचण्ड शक्ति मौजूद है। इसका उपयोग करने से नाना प्रकार के कष्ट साध्य रोग दूर हो सकते है और शारीरिक कष्टों से छुटकारा पाकर मनुष्य निरोगता पूर्वक दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता। ऐसे प्रयोजनों में सूर्य गायत्री का उपयोग करना ठीक है।

सन्तान उत्पादक तत्व सूर्य से आते है। कुन्ती ने कुमारी अवस्था में सूर्य का आवाह्न करके कर्ण को जन्म दिया था। सन्तान रहित, मृतवत्सा, गर्भपात होते रहने वाली, प्रसव में अत्यन्त कष्ट सहने वाली तथा जननेन्द्रिय सम्बन्धी अवस्था वाली महिलाओं के लिए सूर्य गायत्री का उपयोग विशेष फलप्रद होता है।

जो वनस्पति, औषधियाँ जिस रोग के लिए आयुर्वेद ग्रन्थों में गुणकारक मानी गई है जिन्हें घृत एवं शर्करा में मिलाकर सूर्य गायत्री के साथ रोगी के निकट हवन करें तो साधारण औषधि चिकित्सा की अपेक्षा उसका परिणाम अधिक उत्तम होता है। औषधि, सेवन के साथ साथ उन्हीं वनस्पति औषधियों का हवन भी होता रहे तो दूना लाभ होता है। जिस रोग में किन औषधियों का हवन उपयुक्त है उसका उल्लेख इस लेख के अन्त में करेंगे।

सूर्य गायत्री का मन्त्र यह है :-

ॐ भूर्भुवः स्वः भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नः सूर्यो प्रचोदयात्।

सूर्य गायत्री के साथ जिन वस्तुओं के हवन से जो लाभ होता है उसका वर्णन इस प्रकार मिलता है :-

स प्ररोहाभिराद्राभि र्हुत्वा आयु समाप्नुयात। समिद्भिः क्षीर वृक्षरर्हुत्वायुष मवाप्नुयात॥

पलास की समिधाओं से होम करने पर आयु की वृद्धि होती है। क्षीर-वृक्षों की समिधा से हवन करने से भी आयु बढ़ती है।

व्रीहीणाँ च शर्त हुत्वा दीर्घचायुवाप्नुयात्।

यवों की सौ आहुतियाँ नित्य देने से दीर्घजीवन मिलता है।

सुवर्ण कमलं हुत्वा शतमायुरवाप्नुयात्। दूर्वाभिपयसा वापि मधुना सपिषापि वा॥

शतं शतं च सप्ताहमयमृत्युँ व्यपोहति। शमी समिद्भिरन्ने न पयसा वा च सर्पिषा॥

सुवर्ण कमल के होम से मनुष्य शत जीवी होता है। दूर्वा, दुग्ध, मधु, घृत, की सौ सौ आहुतियाँ देते रहने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। शमी की समिधाओं से तथा दूध और घृत से हवन करने पर भी आयु का भय जाता रहता है।

आयुषे साज्य हविषा केवले नाथ सर्पिषा। दूर्वात्रि कैस्तिलैमन्त्री जुहयात्रि सहस्रकम्॥

दीर्घ जीवन की इच्छा करने वाला मनुष्य घृत, अथवा धी युक्त खीर, दूर्वा एवं तिलों से तीन हजार आहुतियाँ दे।

शतं शतं च सप्ताहमपमृत्युँ व्यपोहति। न्यमोघ समिधो हत्वा पायसं होमयेत्ततः॥

वट वृक्ष की समिधाओं से प्रतिदिन सौ आहुतियाँ देने से मृत्यु का भय टल जाता है।

रक्तानाँ तण्डुलानाँ च घृताक्तानाँ हुताशने। हुत्वा वल मवाप्नोति शत्रुभिर्नस जीयते॥

लाल चावलों को घी में मिलाकर अग्नि में हवन करने से बल की प्राप्ति होती है और शारीरिक शत्रुओं (रोगों) का क्षय होता है।

हुत्वा करवीराणि रक्तानि ज्वालमेज्वरम्।

लाल कन्नेर के फूल से हवन करने पर ज्वर चला जाता है।

आमुस्य जुहुयात्पत्रैः पयोक्तैः ज्वर शान्तये॥

ज्वर को शान्त करने के लिये दूध में भिगोकर आम के पत्तों का हवन करें।

वचभिः पयसिक्ताभिः क्षयं हुत्वा विनाशयेत्। मधु त्रितय होमेन राज यक्ष्मा विनश्यति॥

दूध से बच को अभिषिक्त करके हवन करने से यक्ष रोग दूर होता है। दूध, दही, घी इन तीनों को होमने से भी राजयक्ष्मा नष्ट हो जाती है।

लताः वर्वेसु विच्छिद्य सोमस्य जुहुयात् द्विजः। सोमे सूर्यण संयुक्ते प्रयोक्ता, क्षय शान्तये॥

अमावस्या के दिन सामलता की डाली से होम करने पर क्षय दूर होता है।

केसुमैः शंख वृक्षस्य हुत्वा कुष्टं विनाशवेत्। अपस्मार विनाशस्तादयामार्गस्य तण्डुलैः॥

शंख वृक्ष के पुष्पों से यदि होम किया जाय तो कुष्ठ रोग अच्छा हो जाता है। अणमार्ग के बीजों से हवन करने पर अपस्मार (मृगी) रोग अच्छा होता है।

प्रियंगु पायसाज्यै श्च भवेद्धोमादिभिः प्रजा।

प्रियंगु दूध और घी से होम करने पर सुसन्तति प्राप्त होती है।

निवेश भास्कारायान्नं पायसं होम पूर्वकम्। भोजयेत दृतुस्नाताँ पुत्रं परमवाप्नुयात्॥

सूर्य नारायण को होम पूर्वक क्षीर अर्पण करके ऋत स्नान की हुई स्त्री को शेषाँरा खिलाने से पुत्र की प्राप्ति होती है।

गर्भपातादि प्रदराश्वान्ये स्त्रीणाँ महारुजः। नाशमेष्यन्तिते सर्वे मृतवत्सादि दुःखदा॥

गर्भपात, प्रदर, मृत संतति की उत्पत्ति आदि सर्व रोग नष्ट होते हैं।

क्षीर वृक्ष समिद्धोमादुन्मादोऽपिविनश्यति। औदुम्यर समिद्धोमादति मेह क्षयं ब्रजेत्॥

क्षीर वृक्ष की समिधाओं से हवन करने पर उन्माद रोग नहीं रहता। औदुम्बर की समिधाओं से हवन किया जावे तो प्रमेह नष्ट होता है।

प्रमेहं शमयेद्धत्वा मधुनेक्षुर सेनवा। मधुत्रितय होमेन नयेच्छन्ति मसूरिकाम्॥

प्रमेह की शान्ति के लिए मधु अथवा ईख के रस से हवन करना चाहिये। मसूरिका (चेचक) का निवारण करने के लिये मधु त्रितब (दूध, दही, घी) होमना चाहिये।

कपिला सर्विषा हुत्वा नयेच्छान्ति मसूरिकाँ।

गौ के घी से हवन करने पर चेचक दूर होती है।

उदुम्बर वटाश्वत्थैर्गोगजाश्वामभं हरेत।

गाय के सभी रोगों की शान्ति के लिए गूलर, हाथी के रोगों के निवारण के लिए वट और घोड़े के रोग दूर करने के लिए पीपल की समिधाओं का हवन करना चाहिए।

उद्वेग शान्ति के लिए :-

चन्द्रमा को ‘रसाधिप’ कहा गया है। उससे पृथ्वी पर रस और वनस्पति की उत्पत्ति होती है। वर्षा के लिये वरुण और पर्जन्य को प्रेरित करना भी चन्द्रमा का काम है। सन्तान की उत्पत्ति, उसकी शोभा और कुरूपता का भी चन्द्र शक्ति से सम्बन्ध है जिस बालक को जितना चन्द्रतत्व प्राप्त हो जाता है वह उतना ही सुन्दर, सौम्य, तथा शान्त प्रकृति का होता है। अश, पशु, प्रजा, सन्तान, वनस्पति, वृक्ष, वर्षा आदि के लिए चन्द्रमा की आराधना फलवती होती है।

मानसिक उत्तेजना, क्रोध, अन्तर्दाह शरीर और मन में विषों का संचय आदि उष्णताओं का चन्द्र गायत्री से समाधान होता है। अन्तरात्मा की शान्ति, चित्त की एकाग्रता के लिए भी उसका विशेष प्रभाव होता है। चन्द्र गायत्री यह है :-

ॐ भूर्भुवः स्वः क्षीर पुत्राय विद्महे, अमृत तत्वाय, धीमहि, तन्नः चन्द्रः प्रचोदयात्।

इस मन्त्र द्वारा हवन करने से क्या परिणाम होते है इसका विवरण इस प्रकार है :-

शान्ति कामस्तु जुहुयात् सावित्री मक्ष्तैः शुचिः।

शान्ति की कामना करने वाले के अक्षतों के साथ गायत्री से हवन करना चाहिए।

गवाँ क्षीरं प्रदीतेऽग्नौ जुह्वतस्तत्प्रशाम्यति।

गाय के दूध का अग्नि में हवन करने से शान्ति प्राप्त होती है।

कोटि होमं तु यो राजा कारयोद्विधि पूर्वक्म्। न तस्य मानसो दाह इह लोके परत्र च॥

जो राजा एक करोड़ आहुतियों से विधिपूर्वक हवन करता है उसका चित्त स्थिर और शान्त रहता है। उसे मानसिक दाह इस लोक और परलोक में दुःख नहीं देते।

संयुक्तेः पयसाः सत्रैः पुष्पैवों वे त्सस्य च। पावसेन शतं हुत्वा सप्ताहं देष्टि माप्नुयात्।

बेंत के वृक्ष के फूल अथवा पत्तों में हिलाकर क्षीर से हवन करने पर वर्षा होती है।

नाभि दध्ने जले जप्त्वा सप्ताहं वृष्टि माप्नुयात्। जले भस्म शतं हुत्वा महावृष्टि निवारयेत्॥

नाभि पर्यन्त जल में खड़े होकर एक सप्ताह एक गायत्री जपने से वर्षा होती है और जल में सौ बार हवन करने से अतिवृष्टि हो रही हो तो उसका निवारण होता है।

करीष च्चर्णेर्वत्स्य हुत्वा पशुमशप्नुयात्।

बछड़े के गोबर को होम करने में पशुओं की तथा अन्नों की प्राप्ति होती है।

अन्नं हुत्वाप्नुयादन्नं ब्राही ब्रीहिपतिर्भवेत्।

अन्न का हवन करने से अन्न प्रचुर मात्रा में उपजता है। यवों का होम करने से यव खूब उत्पन्न होते है।

तदेवह्यनले हुत्वा प्राप्नोति बहु साधनम्। अन्नादि हवनान्नित्य मन्नाद्यं च भवेत्सदा॥

अन्नों का नित्य हवन करने से पृथ्वी पर पर्याप्त मात्रा में अन्न प्राप्त होता है।

रक्त चन्दन मिश्रं तु सघृतं हव्य वाहने। हुत्वा गोमय माप्नाति सहसं गोमयं द्विजः॥

रक्त चन्दन को घी में मिलाकर अग्नि में हजार बार आहुति देने से पशुओं से घी, दूध और गोबर भले प्रकार प्राप्त होता है।

पारिवारिक क्लेश, द्वेष, वैमनस्य आदि को शान्त करके शीतल मधुर सम्बन्ध उत्पन्न करने के लिए भी चन्द्र गायत्री विशेष फलप्रद होती है।

सिद्धि और सफलता के लिए :-

असफलता, निराशा, चिन्ता और खिन्नता उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करके सफलता का आशाजनक वातावरण उत्पन्न करने की स्थिति उत्पन्न करने में सरस्वती शक्ति का विशेष महत्व है। बुद्धि वृद्धि, अभिष्ट वस्तुओं की प्राप्ति, सुख शान्ति, परीक्षा उत्तीर्णता आदि के लिए सरस्वती गायत्री का प्रयोग किया जाता है।

-क्रमशः


मालिश के अद्भुत लाभ

(श्री लक्ष्मी नारायण टंडन एम. ए. प्रेमी)

प्रायः बड़े नगरों में आपने सायंकाल के समय पार्कों तथा ऐसे स्थानों में, जहाँ वायु-सेवन या मनोरंजनार्थ लोग एकत्रित होते है, सर में तेल मालिश करने वालों को अवश्य देखा होगा। कुछ मालिश करने वाले तो अपने हुनर में इतने पटु होते है कि उनका दावा है कि सिर मालिश करके वह आपको निद्रित कर देंगे। आदमी सो भले ही न जाय, पर खुमारी तो मालिश कराते समय आ ही जाती है। सर मालिश में मनुष्य आनन्ददायक सनसनी का अनुभव करता है। मालिश केवल आनन्द प्रदान करती हो, यही नहीं, इससे कई प्रकार के छोटे मोटे रोग भी स्वयं दूर हो जाते है। अतः मालिश को भी हम प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत लेते है।

मालिश करने की कला का ज्ञान नया नहीं है। इस बात का पुष्ट प्रमाण मिलता है कि यह कला अत्यन्त पुरातन है। भारतवर्ष ही नहीं, चीन, मिश्र, फारस तथा टर्की आदि में भी पुरातन काल से लोग मालिश की उपयोगिता और प्रयोग जानते थे। ग्रीस तथा यूनान देश में आरोग्योपचार के रूप में ही नहीं, विलासिता के रूप में भी इसका बोलबाला था। भारतवर्ष में तो इस कला पर नाइयों की बपौती थी। धनियों के तो हाथ, पैर, सर आदि नित्य दबाने को नौकर ही रखे जाते है। निर्धन भी यदा-कदा इसके द्वारा सुख और आरोग्य का भोग करते है। हाथ, पैर तथा शरीर दबाना भी मालिश के अंतर्गत है। रुकावट दूर करने के लिए शवासन तथा मालिश से उत्तम कोई इलाज है ही नहीं। स्नायु शूल के लिए की मालिश लाभप्रद होती है। कहते हैं कि जूलियस सीजर (प्रसिद्ध रोमन सम्राट) इस रोग से पीड़ित था तथा नित्य मालिश कराता था। योरोपीय चिकित्सा प्रणाली के प्रवर्तक हिपक्रेटस तो अनेक रोगों में मालिश की ही सिफारिश कर गए है। इस प्रकार के संसार के समस्त देशों में पुरातन काल से ही इसका ज्ञान लोगों को था। पर मालिश को वैज्ञानिक रूप 17 वीं शताब्दी से चिकित्सकों ने दिया। शरीर विज्ञान का ज्ञान ज्यों ज्यों बढ़ता गया त्यों-त्यों मालिश की महत्ता भी बढ़ती गई। रक्त-प्रवाह की व्यवस्था के विषय में ज्ञात होने पर तो मालिश को चिकित्सा का रूप मिला। आज तो संसार के समस्त सभ्य और उन्नत देशों में मालिश एक वैज्ञानिक चिकित्सा-प्रणाली के रूप में मान्य है।

मालिश जैसी साधारण प्रणाली से रोग कैसे दूर हो सकते है, इसका समझना अत्यन्त सरल बात है। यह तो हम जानते ही हैं कि शरीर में रक्त का परिभ्रमण होता है। रक्त जितनी तेजी से शरीर में घूमेगा, फेफड़ों को उसकी उतनी जल्दी-जल्दी सफाई करने के लिए अधिक से अधिक ऑक्सीजन वायु से से घसीटनी पड़ेगी। रुधिर तो शुद्ध ऑक्सीजन से ही होता है, यह तो हम जानते ही हैं व्यायाम करने, तेज चलने या दौड़ने अथवा किसी प्रकार का परिश्रम करने से इसी से साँस तेजी से चलने लगता है, हम हाँफने लगते हैं। रक्त जब तेजी से घूमेगा और सारी शरीर में ठीक से और समुचित मात्रा में पहुँचेगा तो स्वाभाविक ही है कि शरीर के दबे हुए विकार उमड़ेंगे और शरीर के अंदर की गन्दगी और विकार अपने स्थान से हटने को बाध्य होंगे। यह मल, पेशाब, पसीना तथा श्वाँस आदि के रूप में शरीर से बाहर निकलेगा। ये विभिन्न स्थानों के विकार नियमित रूप से जब निकलने लगेंगे क्योंकि समान रूप से रक्त का संचालन नित्य अभ्यास से स्थायी बन जाता है- तो स्थायी लाभ तथा आरोग्य स्वाभाविक ही है। और यही लाभ अस्थायी या सामयिक नहीं होगा। मालिश करने से रक्त का संचालन ठीक से होता है। इस प्रकार हमने देखा कि वास्तविक लाभ मालिश से नहीं वरन् मालिश द्वारा रक्त-संचालन की क्रिया के सुधरने से होता है। और रक्त-संचालन क्रिया सब से अधिक मालिश से ही ठीक होती है। अब जब शरीर से विकार दूर होगा तो स्नायु तथा शरीर के अंग शुद्ध और पुष्ट होंगे, शरीर में नव जीवन तथा स्फूर्ति आयेगी, शरीर के आत्म-रक्षा मूलक यंत्र स्वतः ही संजीवित हो उठेंगे। पर इन सब के लिए नियमित रूप से वैज्ञानिक आधार पर नित्य-प्रति उचित मात्रा में मालिश की आवश्यकता है। और जब आत्मा-रक्षक-यंत्र सजग और सबल हो जायेंगे रोगों के प्रतिरोध करने के शक्ति भी बढ़ जायगी। अतः बाहरी रोगों के आक्रमणों का भय और कुप्रभाव जाता रहेगा।

संभवतः आपने सुना होगा कि पहलवान लोग अपने शागिर्दों से मालिश स्वयं भी कराते हैं, उन्हें भी मालिश कराने पर जोर देते हैं। यह कहावत ठीक ही है कि मालिश कराने वाला कुश्तीबाज से अधिक स्वस्थ होता है। मालिश कराने से केवल शरीर ही पुष्ट नहीं होता, रक्त ही शुद्ध नहीं होता, शरीर के विकार तथा रोग ही नहीं निकलते, हमारे आत्म-रक्षक-यंत्र ही सशक्त नहीं होते, वरन् शरीर की खाल शीशे के समान निर्मल, चिकनी और चमकीली हो जाती है, बुढ़ापा आने नहीं पाता, आयु बढ़ती है, आया हुआ बुढ़ापा वापस लौटने को बाध्य होता है तथा जवानी अधिक दिनों तक रहती है।

मालिश से फेफड़ों की शक्ति बढ़ती है, उनकी कार्यक्षमता बढ़ती है, यह तो बताना ही नहीं रहा। मालिश से गुर्दों तथा आँतों की भी शक्ति और क्रियाशीलता बढ़ती है। पेट की मालिश करने से आंतें और गुर्दे अधिक क्रियाशील होते है। अतः पखाने तथा पेशाब के रूप में मल-विसर्जन की क्रिया उत्तम रीति से होने लगती है और जहाँ कोष्ठ की सफाई हुई, कब्ज की शिकायत दूर हुई, किडनियाँ सदा पेशाब के साथ शरीर में संचित विष को निकलने में समर्थ हुई कि शरीर से रोग भागा। सब रोगों की जड़ तो पेट की खराबी कब्ज है न? और जब कब्ज ही नहीं तो फिर रोग की जड़ ही कट गई। और जो पहले का संचित विष है, वह अधिक पेशाब होने से (क्योंकि किडनियाँ अधिक क्रियाशील हो जाती हैं) दूर होने लगता है। यूरिक एसिड जहाँ पेशाबों द्वारा अधिक निकला कि अनेक रोग दूर हुए। अतः पेट की मालिश कराना कितना अधिक लाभप्रद है, इसे बताना आवश्यक नहीं। कब्ज तथा बदहजमी के रोगियों, के पेट की, अन्य बीमारियों के रोगियों तथा पेशाब सम्बन्धी बीमारी के रोगियों के लिए तो मालिश रामबाण है। ‘हींग लगे न फिटकरी रंग भी चोखा होय’ के अनुसार मालिश में न बहुत टीमटाम की आवश्यकता है और न खर्च की। पैसे दो पैसे का तेल और मालिश कराने तथा करने वाला दो प्राणी और बस इस प्राकृतिक चिकित्सा से लाभ लीजिए। दो मित्र यदि आपस में एक दूसरे के तेल मलने का भार ले लें तो एक पैसे का भी खर्च नहीं रहा, फिर तेल मलने में व्यायाम का फल मुफ्त में मिल जायगा और मालिश के लाभ तो हैं ही। आपस में हँसते बोलते न काम की गुरुता का मान होगा और न अधिक समय ही लगेगा। यदि यह भी संभव न हो तो भगवान ने अपने हाथ पैर दिए है। स्वयं ही अपने शरीर में मालिश करें। एक पंथ दो काज। व्यायाम भी और मालिश दोनों के लाभ।

मालिश कितने प्रकार की होती है, किससे मालिश नहीं कराना चाहिये, मालिश में किन किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, मालिश किस वस्तु से होनी चाहिए, तथा किन रोगों में मालिश अधिक लाभप्रद है, यह दूसरे लेख में लिखूँगा। किन्तु यहाँ केवल यह बताता हूँ कि साधारणतया कड़ुवे तेल से मालिश करना चाहिए। क्या यह अच्छा हो यदि कड़ुवा तेल कुछ समय के लिए धूप में रख दिया इसमें सूर्य की किरणों के प्रभाव से स्वतः विटामिन डी पैदा हो जाता है। धूप में खड़े होकर शरीर में तेल मलने से भी स्वतः विटामिन डी शरीर को मिलता है। अतः गरीबों को विटामिन डी बिना फल आदि खाये कितनी सुविधा और बिना पैसे के मिल जाता है। जाड़े में तो धूप में तेल मलना यों भी अच्छा लगता है। और गरमी में आपसे चिलचिलाती धूप में तेल मलने की सलाह कोई नहीं देगा। प्रातः के समय काम यह आप कर सकते है।

पीठ की मालिश अवश्य ही अपने हाथ से संभव नहीं है। अतः या तो किसी से खुशामद करके यह काम करालें और या फिर पीठ को भगवान के आसरे छोड़ दें। रुपए में सोलह आने पर नहीं तो पन्द्रह आने भर ही लाभ सही। जो अधिक कमजोर या रोगी है, वह बहुत हल्के हल्के ही मालिश करें। मालिश की तारीफ यही है कि शरीर में तेल सोख जाय। शरीर या जोड़ों में दर्द होने पर तो मालिश आप सब ने कराई ही होगी। पैदल वद्रिकाश्रम यात्रा करने वालों का कहना है कि नित्य 10-15 मील चलकर सायंकाल को जब थक कर चट्टी में पहुँचते थे तो गरम पानी करके उससे विशेष रूप से खूब पैर सूतते थे तथा और शरीर की तब थकावट बिलकुल दूर हो जाती थी। यह है मालिश का तुरंत प्रभाव।

शरीर से मैल निकालने वाले यंत्र विशेष रूप से मालिश से प्रभावित हो जाते हैं, यह बताया ही जा चुका है। रक्त से नित्य प्रति अधिक मात्रा में विष निकलने में किडनियाँ समर्थ होती हैं, आंतें पखाना फेंकने में पूर्ण समर्थ होती हैं यह भी बताया जा चुका है। श्वास-प्रश्वास जब गहरा होगा तो फेफड़े अधिक ऑक्सीजन वायु से ग्रहण करेंगे ही तथा कार्बन डाई ऑक्साइड को अधिक मात्रा में फेकेंगे ही। साथ ही शरीर में रोम-कूप भी खुलेंगे। पसीने के रूप में शरीर का विष खूब निकलने लगता है इससे उन लोगों को जिन्हें सर्दी अधिक सताती है या जिन्हें सर्दी जल्दी लग जाने का रोग होता है (मैं स्वयं सैनसिबिल टू कोल्ड हूँ, और मैंने मालिश से लाभ उठाया है) उनका कष्ट जाता रहता है क्योंकि न केवल रोम-कूपों में विष निकलने की क्षमता बढ़ जाती है वरन् मालिश से शरीर के चमड़े का स्वास्थ्य भी बढ़ जाता है। लाल तथा श्वेत कण दोनों ही रक्त में अधिक बनेंगे। और हम जानते ही है कि रक्त के वह लाल और श्वेत कण जहाँ बलवान हुए तो इनमें बाहरी रोगों के कीटाणुओं से लड़ने में सफलता मिलेगी। अतः हम पर रोग आक्रमण न कर पायेंगे। इसलिए हमें नियमित रूप से नित्य प्रति मालिश करना चाहिए। कमजोर नाड़ियाँ, बलवान हो जाती है। लीवर के काम करने की क्षमता बढ़ जाती है। और लीवर ठीक होने से शरीर का कार्य और भी अच्छे रूप से होने लगता है।


युग परिवर्तनकारी शिक्षा का स्थायी आयोजन

ता. 02 जून से 16 जून तक 15 दिन के लिये सरस्वती यज्ञ की योजना पूर्णतया प्रस्तुत हो चुकी है। इस शिक्षा सत्र की उपयोगिता आवश्यकता एवं योजना को सर्वत्र बहुत पसन्द किया गया है। देश भर में विचार शील व्यक्तियों ने सफलता एवं शुभ कामना के सन्देश भेजे है।

इस शिक्षा शिविर में भर्ती होने के लिए आश्चर्य जनक संख्या में हिन्दुस्तान के कोने कोने से छात्रों के प्रार्थना पत्र आये है। पर इस गर्मी की ऋतु में ठीक प्रकार ठहर सकने के लायक गायत्री तपोभूमि में स्थान न होने के कारण 60 छात्रों को ही स्वीकृति दी जा सकी। इन छात्रों में अधिकाँश सुशिक्षित है।

यह शिक्षा सत्र अपने ढंग का अनोखा है। व्यक्ति के व्यक्तिगत सद्गुण, दृष्टिकोण, व्यक्तित्व, स्वास्थ्य एवं आचरण को उत्तम बनाने के लिए व्यावहारिक शिक्षा की ऐसे आयोजनों की वस्तुतः आज इतनी अधिक आवश्यकता है जितनी पहले कभी न थी। आज शिक्षा, भौतिक सामग्री, चतुरता, चिकित्सा आदि की उन्नति के लिये घुड़दौड़ मची हुई है। नाना प्रकार के सामाजिक एवं राष्ट्रीय आयोजन हो रहे है। पर मनुष्य का आत्मिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य एवं शारीरिक स्वास्थ्य दिन दिन दुर्बल होता जा रहा है। आन्तरिक दुर्बलता के बढ़ते जाने के कारण वास्तविक स्थिति खोखली हो रही है। फलस्वरूप सर्वत्र अशान्ति, कलह, विद्वेष, छल, कपट, बीमारी, परेशानी गरीबी, विलासिता, दुर्भावना आदि बुराइयाँ बढ़ती जाती है। ओछे और छोटे आदमियों से कोई समाज एवं राष्ट्र उन्नतिशील नहीं हो सकता। हमारा वास्तविक विकास भी इसी कारण सर्वथा अवरुद्ध हो रहा है। जिस भारत भूमि में घर घर सत्पुरुष, महापुरुष एवं देव पुरुष उत्पन्न होते थे, वहाँ आज मानवीय गुणों से युक्त मनुष्यों के दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। इसका कारण उसी सच्ची शिक्षा का अभाव ही है जो मनुष्य के अन्दर छिपी हुई महत्ता को विकसित करने में समर्थ होती है।

मनुष्य जीवन को सफल, सुविकसित, स्वस्थ एवं सुख शाँतिमय बनाने वाला दृष्टिकोण प्रदान करने वाली शिक्षा का व्यवस्थित आयोजन ही हमारी अनेकों समस्याओं को हल करने में, उलझनों को सुलझाने में समर्थ हो सकता है। इसलिए गायत्री तपोभूमि द्वारा इस प्रकार की शिक्षा का ठोस कार्यक्रम बनाने का निश्चय किया गया है। 2 जून से आरम्भ होने वाला यह 15 दिवसीय सत्र उसका श्रीगणेश मात्र है। भविष्य में इस प्रकार की शिक्षा को यहाँ पर एक साँस्कृतिक विद्यापीठ के रूप में यहाँ स्थायी कर देने का विचार किया गया है। जितने अधिक छात्रों के प्रार्थना पत्र इस बार आये है उसे देखते हुए ऐसा अनुभव किया जाता है कि लोग इस प्रकार के साँस्कृतिक शिक्षण की आवश्यकता अनुभव करते है इस साँस्कृतिक आवश्यकता एवं आध्यात्मिक पिपासा को पूर्ण करने में उपेक्षा करना हमारे लिए एक धार्मिक अपराध से कम न होगा। जो लोग समाज की इस आत्मिक पिपासा को तृप्त करे सकते है यदि वे उससे मुख मोड़ें या आँख चुरावें तो यह यह बहुत ही बुरी बात होगी। हम लोगों ने अपने इस परम पुनीत कर्त्तव्य का पालन करने का निश्चय किया है।

इस बार अनेकों छात्रों के प्रार्थना पत्र अस्वीकृत करने पड़े इसका हमें खेद है। पर 60 से अधिक छात्रों के रहने और शिक्षा दीक्षा के योग्य, समुचित स्थान एवं व्यवस्था न होने के कारण सबको बुला सकने में हम असमर्थ ही थे। आगे से ऐसे शिविर बराबर चलाते रहने का विचार किया गया है। हर महीने 15 दिन की शिक्षा शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक रहा करेगी। स्कूल खुल जाने से स्कूली छात्रों को सम्भव है उनमें आने की अधिक सुविधा न हो पर इस शिक्षण को उन्हीं तक सीमित नहीं रखा गया है। 16 वर्ष की आयु से अधिक छोटे, बिलकुल अशिक्षित, रोग ग्रस्त, व्यसनी, दुर्गुण, उद्दण्ड, अवज्ञाकारी लोगों को छोड़कर अन्य सभी आयु और वर्ग के छात्र इसमें शिक्षा पा सकेंगे। हर बार एक छोटी सीमित संख्या में ही छात्र लिये जावेंगे ताकि उनकी व्यक्तिगत समस्याओं को समझने तथा सुलझाने पर अधिक ध्यान तथा समय देना सम्भव हो सके।

सम्मिलित भोजन बनवाने पर प्रायः 1) प्रतिदिन दोनों समय का खर्च आता है। जो लोग इसमें भी किफायत करना चाहें वे अपने हाथों बनाकर और भी कम खर्च में काम चला सकते है। साधारणतः यह अपेक्षा की जाती है कि छात्रों को अपने भोजन का व्यय स्वयं ही उठाना चाहिये। पर जो छात्र नितान्त असमर्थ होंगे उनके प्रार्थना पत्रों पर विचार करके तपोभूमि की ओर से भी भोजन दिया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त शिक्षा आदि की कोई फीस नहीं है।

शरीर को स्वस्थ रखना, वाणी से मधुर बोलना, मन में उचित विचार रखना, दूसरों के साथ सद्व्यवहार, परिश्रम में उत्साह, स्वच्छता और सादगी व्यसनों से घृणा, बड़ों का सम्मान, गुरुजनों का अनुशासन, शिष्टाचार का पालन, व्यवहार में चातुर्य विपत्ति में धैर्य, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, अनिष्टों से सतर्कता, उन्नति का मार्ग, धार्मिक प्रकृति, कर्त्तव्य, शिष्टा, सज्जनों से मिलना, अध्ययन में प्रवृत्ति आदि उत्तम प्रवृत्तियों को जागृत करके सुव्यवस्थित बनाने, जीवन को उत्तम प्रकार से जीने के लिए उपरोक्त विषयों को सैद्धांतिक रूप से तथा व्यावहारिक रूप छात्रों के मस्तिष्क तथा हृदय में बिठाने का शिक्षण होगा। इन्हीं विषयों की पुस्तकों का पाठ्यक्रम रहेगा। प्रवचन, शंका-समाधान, प्रश्नोत्तर तथा स्वयं विचारने और निष्कर्ष निकालने की पद्धति से शिक्षा दी जायगी, प्रतिदिन निर्धारित विषयों को कार्य रूप में भी परिणत करना पड़ेगा। प्रतिदिन के कार्यों के आधार पर, शिक्षा हृदयंगम करने या न करने की व्यावहारिक परीक्षा के आधार पर शिक्षार्थी उत्तीर्ण होंगे। उत्तीर्ण छात्रों को बहुत ही आकर्षक बड़े साइज का तिरंगा छपा हुआ इस शिक्षण संस्थान-साँस्कृतिक विश्व विद्यापीठ- का प्रमाण पत्र दिया जायगा। गायत्री उपासना तथा यज्ञ में सम्मिलित होना सभी के लिए अनिवार्य रहेगा। कुछ और भी ऐसे आध्यात्मिक उपचार किये जाया करेंगे जिनसे शिक्षार्थियों के बौद्धिक विकास तथा आत्मोन्नति में सहायता मिले।

अगला शिक्षा सत्र सम्भवतः आषाढ़ सुदी प्रतिपदा ता. 1 जुलाई 54 से लेकर आषाढ़ सदी पूर्णिमा ता. 15 जुलाई तक पन्द्रह दिन का होगा। जिन्हें इस जून के शिक्षा सत्र में स्वीकृति नहीं मिल सकी है, उन्हें यदि सुविधा हो तो वे उस अगले सत्र में आने के लिए स्वीकृति प्राप्त कर सकते है।

जीवन जीने की विद्या का व्यावहारिक शिक्षण कक्षा ही अभी चालू की जा रही है। पर निकट भविष्य में ही संस्कृत, वेदपाठ, यज्ञ, षोडश संस्कार आदि की शिक्षा तथा सम्भव हो सकी तो शिल्प शिक्षा चिकित्सा शिक्षण, सत्साहित्य निर्माण शिक्षा, का भी प्रायोजन होगा। यह सब कक्षाएँ क्रमशः खुलती चलेंगी। और सम्भव हो सका तो देश भर में स्थान स्थान पर ऐसे शिक्षण शिविर करने का आयोजन किया जायगा। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने वाली प्रवृत्तियों का विकास करना ही सार्वभौम विश्व संस्कृति है। इस संस्कृति को सुविकसित करने को व्यवस्थित शिक्षा पद्धति का एक क्रमबद्ध रूप दिया जा रहा है। इसका नामकरण “साँस्कृतिक विश्व विद्यापीठ” कर दिया गया है। गायत्री तपोभूमि का यह विद्यालय उस नीति, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, आचार विचार एवं महान सन्देश को विश्वव्यापी बनाने का योजनाबद्ध कार्य करेगा जो गायत्री माता के 24 अक्षरों में बीज रूप से सन्निहित है और जिनके ऊपर समस्त मानव जाति एवं संसार का भविष्य निर्भर है।

अखण्ड ज्योति का यह अंक जिन दिनों पाठकों के हाथ में पहुँचेगा, उन्हीं दिनों साँस्कृतिक विश्व विद्यापीठ का वह प्रथम सत्र का लगभग 60 छात्रों की शिक्षा आयोजन के साथ आरम्भ हो रहा होगा। देखने में यह कार्य छोटा सा है पर राष्ट्र निर्माण के महत्वपूर्ण बीजाँकुर उसमें छिपे हैं। आज कौन जानता है कि माता इस छोटे से माध्यम द्वारा कितना बड़ा कार्य सम्पादन करने का आयोजन कर रही है। इस प्रकार की योजनाओं को सफल बनाने के लिए अनेक प्रकाशवान आत्माओं को जीवनों की आहुतियाँ अपेक्षित होती है। आज गायत्री तपोभूमि तथा उसके कार्यकर्त्ताओं की शक्ति नगण्य है पर कल जब अनेक जागृत आत्माएँ इस युग परिवर्तनकारी महान ज्ञान यज्ञ में अपनी परम निस्वार्थ आहुतियाँ अर्पण करेंगी तो निश्चित रूप से कार्य क्षमता बहुत बढ़ जायेगी और वह महान कार्य सफलता पूर्वक सम्पादित हो सकेगा। इस अंक के प्रारम्भिक पृष्ठों में इन्हीं प्रयोजनों के लिए नरमेध यज्ञ की पुकार की गई है। नरमेध यज्ञ की आवश्यकता सुनकर दधीच जैसे ऋषियों की सन्तान का रक्त ठण्डा पड़ जाय ऐसा नहीं हो सकता। ऐसे आत्म बलिदानी नरमेध के ‘बलि पशुओं’ के रक्त के गारे और हड्डियों की ईंटों से ही हमारा साँस्कृतिक पुनरुत्थान होगा। यह पुनरुत्थान- युग परिवर्तन का एक विशाल आयोजन है जिसके द्वारा संसार की वर्तमान अशान्तियों के स्थान पर सच्ची सुख शान्ति की, सच्ची समृद्धि और सद्भावनाओं की स्थापना सम्भव हो सकेगी। आइए, हम तुच्छ स्वार्थी की कीचड़ से ऊपर उठकर माता की इच्छा और युग की पुकार को पूर्ण करने में संलग्न हों।


ऐक्य-विजय


ऐक्य-विजय (Kavita)

चट्टानों की ठोकर खाकर, बोल उठी लहरों की टोली। आज हमें किसने टोका है, आज हमें किसने रोका है?

सरल तरल जीवन लेकर, जग को जीवन देने निकली है। ओ चट्टानों, भूल न जाना, हम लहरें गिरि-राज लली है।

तुम गिरिक के टूटे टुकड़े हो, तुम कुल घालक हो कुल द्रोही! तुम पर ठोकर मारा करते है, सदैव अनजान बटोही!

एक भयंकर अट्टहास कर उठीं, सुदृढ़ पाषाण-शिलाएँ। बोली “ओ लहरो, ठहरो, हम तुमको अपनी शक्ति बताएँ!”

हमें है वह चट्टान कि जिनको, विक्रम शाली सत्ता धारी। सौंपा करते है अपनी, रक्षा की भारी जिम्मेदारी!

हम चट्टानें निर्मित करती, सुदृढ़ दुर्ग के परकोटों को। हम हंस कर झेला करती है, गोलों की भीषण चोटों को!

सम्भव है, मिट्टी के ढेलों को, प्रवाह में फोड़ सको तुम। किन्तु असम्भव है मेरे भी, वक्षस्थल तो तोड़ सको तुम!

लहरें बोली “यह सच है, तुम नहीं अचानक हिल सकती हो; किन्तु हमारी तरह कभी तुम, नहीं एक में मिल सकती हो!

तुम्हें नहीं सहयोग सुहाता, पास तुम्हारे खंडित बल है! किन्तु हमारी बूँद-बूँद को, सुखद सम्मिलन का संबल है!

हमें अलग करने वाले, पथ के रोड़ों, तुम भूल न जाना! हमें अलग होकर आता है, अवसर पाते ही मिल जाना॥

दो धारा में बाँट भले दे, पाहन! पथ-अवरोध तुम्हारा। पर आगे बढ़कर मिल जाना, रहा सदैव स्वभाव हमारा॥

चट्टानें बोली- “देखेंगे, कितनी सत्य तुम्हारी बातें!’ इस घटना को दिन बीते, रातें बीती, बीती बरसातें!!

एक ओर था चट्टानों का, दम्भ भरा दल भारी भरकम! एक ओर था लहरों का संगठित, और अनवरत परिश्रम॥

चट्टानें बिछ गई धरा पर घिस-घिस कर बन गईं मरुस्थल। किंतु विजयिनी तरल तरंगें, गीत गा रहीं कल-कल छल-छल!

*समाप्त*

(ले. श्री फूलचन्द्र ‘पुष्पेन्दु’)