‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा प्रकाशित अमूल्य पुस्तकें।

हर एक पुस्तक की एक-एक पंक्ति गहरे अनुभव एवं अनुसंधान के साथ लिखी गई है।

बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें

सूर्य चिकित्सा विज्ञान 2. प्राण चिकित्सा विज्ञान 3. स्वस्थ बनने की विद्या 4. भोग में योग 5. बुद्धि बढ़ाने के उपाय 6. आसन और प्राणायाम 7. तुलसी के अमृतोपम गुण 8. महान जागरण 9. तुम महान हो 1. घरेलू चिकित्सा 11. बिना औषधि के कायाकल्प 12. पंच तत्वों द्वारा रोग निवारण 13. दीर्घजीवन के रहस्य 14. नेत्र रोगों की चिकित्सा 15. स्वप्न दोष की चिकित्सा 16. दूध की आश्चर्यजनक शक्ति 17. उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्य 18. उपवास के चमत्कार 19. स्त्री रोग चिकित्सा 20. बाल रोग चिकित्सा 21. निरोग जीवन का राजमार्ग 22. कब्ज की सरल चिकित्सा 23. चिरस्थायी जीवन 24. सौंदर्य बढ़ाने के उपाय।

जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें

मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार 2. धनवान बनने के गुप्त रहस्य 3. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि 4. मरने के बाद हमारा क्या होता है 5. मित्र भाव बढ़ाने की कला 6. आकृति देखकर मनुष्य पहिचान 7. संजीवनी विद्या 8. अमृत पारस और कल्पवृक्ष 9. स्वप्न क्यों दीखते हैं 10. विचार करने की कला 11. हम वक्ता कैसे बन सकते हैं। 14. शिखा और सूत्र की विवेचना 15. दैवी संपदाएं 16. कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान 17. सौभाग्य बढ़ाने की कला 18. प्रभावशाली व्यक्तित्व 19. अमृतकण 20. प्रसिद्धि और समृद्धि 21. हमारी पारिवारिक समस्याएं 22. हमारे आन्तरिक शत्रु 23. दाम्पत्य जीवन का स्वर्ग 24. मनचाही सन्तान।

पता ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा

उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें

ईश्वर कौन है? कहाँ है? 2. क्या धर्म? क्या अधर्म? 3. गहना कर्मणोगति 4. जीवन की गुत्थियों पर प्रकाश 5. शास्त्र मंथन की नवनीति 6. शक्ति संचय का पथ 7. आत्मगौरव की साधना 8. प्रतिष्ठा का सोपान 9. उल्लास का विकास 10. आगे बढ़ने की तैयारी 11. अध्यात्म धर्म का अवलम्बन 12. ब्रह्म विद्या का रहस्य 13. ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग 14. विवेक सतसई 15. अध्यात्म विद्या का प्रवेश 16. वैज्ञानिक अध्यात्मवाद 17. प्रेम का रहस्य 18. भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र यज्ञोपवीत 19. यज्ञोपवीत द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति 20. जीवन संगीत 21. दैनिक जीवन में मनोविज्ञान के प्रयोग 22. हंसी-खुशी का जीवन 23. क्यों खायें? क्या खायें? कैसे खायें?

गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें

मैं क्या हूँ? 2. परकाया प्रवेश 3. स्वर योग से दिव्य ज्ञान 4. वशीकरण की सिद्धि 5. जीव जन्तुओं की मूक भाषा 6. ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग 7. यम नियम 8. प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि 9. मैस्मरेजम की शिक्षा 10. हस्तरेखा विज्ञान 11. गृहस्थ योग 12. प्रार्थना के चमत्कार 13. विचार संचालन विद्या 14. सुखी वृद्धावस्था 15. आत्मोन्नति का मार्ग 16. प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं 17. योग के नाम पर मायाचार 18. जादूगरी या छल 19. सम्मोहन विज्ञान 20. चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग 21. मधुर संबंधों का रहस्य।

मूल्य में कमी के लिए लिखा पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है। 6 रु. से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।

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वर्ष-14 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक-3

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अब चरण किसकी प्रतीक्षा

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)


अब चरण किसकी प्रतीक्षा (Kavita)

लक्ष्य है, पथ है, उदय है, अब चरण किसकी प्रतीक्षा?

है नहीं पाथेय कुछ भी, और कोई भी न सहचर। रच रही है राह पगध्वनि और गति है, श्वास का स्वर॥

मौन जीवन की समीक्षा! अब चरण किसकी प्रतीक्षा!

दिवस एकाकी, अकेले चाँद सूरज, निशि अकेली। पूर्ण प्रति सत्ता, स्वयं ही पूर्ति, सीमा है पहेली॥

अब मनुजता की परीक्षा! अब चरण किसकी प्रतीक्षा!

है प्रतीक्षा ही यहाँ पर, हार की असफल कहानी॥ है अकेलापन स्वयं जप, और जागृति की निशानी॥

मत नियति से माँग भिक्षा! अब चरण किसकी प्रतीक्षा!


सिद्धि का मूल- साधन है!

(श्री अगर चन्द्र जी नाहटा)

प्राणीमात्र को कुछ न कुछ इच्छा लगी रहती है और अपनी-अपनी कामना पूर्ति हो जाय, यह सभी प्राणी चाहते हैं। सारी प्रवृत्तियाँ किसी न किसी इच्छा की पूर्ति के लिए ही होती हैं। अच्छी हो या बुरी। जिस अभीष्ट के लिये हम निरन्तर प्रयत्नशील हैं वह प्राप्त हो जाय, यह इच्छा किसे नहीं होती? हाँ, सबकी चाह अलग-अलग अवश्य है। कोई कुछ चाहता है और कोई कुछ और ही, पर चाह कुछ न कुछ पाने की सबको अवश्य है। इसीलिए प्रवृत्तियाँ भी अलग-अलग प्रकार की होती हैं। जिसे जिस स्थान जाना है वह उसी के पहुँचने वाले मार्ग को अपनायेगा न। चाह मात्र से ही कार्य सिद्धि नहीं होती। अतः उसकी प्राप्ति के लिए अनुकूल प्रवृत्तियाँ अपनानी पड़ती हैं। साध्य को निश्चित कर साधनों को अपनाने से सिद्धि मिलती है। अतः सिद्धि का मूल साधना में है।

इच्छित कार्य का पूर्ण होना ही उसकी सिद्धि है। इच्छाएं अनेक तो कार्य भी अनेक होंगे ही और कार्य विविध, तो उनके फल भी भिन्न-भिन्न होंगे। अतः सिद्धि भी विविध प्रकार की समझिये। व्यक्ति जो परिणाम चाहता है, उसकी प्राप्ति ही उसकी सिद्धि है। साधना का फल ही सिद्धि है। सिद्धि मिली तो साधना की पूर्णता हुई।

सिद्धि के लिए साधना की आवश्यकता है उसके बिना सिद्धि नहीं मिल सकती। साधना द्वारा सुषुप्त शक्तियाँ जाग्रत होती हैं, एवं जाग्रत शक्तियाँ सबल बनती है, जिससे सिद्धि सहज हो जाती है। वास्तव में आत्मा की अनेक शक्तियाँ सुषुप्त अवस्था में पड़ी हुई हैं, जो आवरित हैं उनका भान ही पहले नहीं होता। इसलिए मनुष्य कह बैठता है कि मैं इसे नहीं कर सकता, या मेरे लिए यह असंभव है, क्योंकि अंतर्गत गुप्त शक्तियों के संबंध में उनकी कल्पना ही नहीं होती, जब दूसरे व्यक्तियों को उस काम को करते देखता है, तो विचार होता है कि यदि वह परमार्थ कर सकता है तो मैं क्यों नहीं कर सकूँगा? इसलिए कहा गया है कि साधनाओं में बल प्राप्त करने के लिए किसी पूर्ण साधक का आदर्श सामने रखना चाहिये। संभव हो तो उसके सान्निध्य में साधना प्रारंभ करना चाहिये। प्रभु को देखकर अपनी अन्तर्निहित प्रभुता का भान होता है, और महापुरुषों की साधना पर विचार करने से ही साधना की प्रेरणा मिलती है, मार्गदर्शन व बल मिलता है, दृष्टान्त के लिए कहा गया है-

अज कुल गत केहरी लहे रे।

निज पद सिंह निहाल।

तिमि प्रभु भक्ति भवि लहे रे।

आत्म शक्ति संभाल... अजित जिन गरजे रे।

(श्रीमद् देवचन्द्र रचित)

अर्थात्- एक सिंह का बच्चा बकरियों के टोले में जन्मते ही रहने लगा। इसलिए वह अपने आपको उसके जैसा बकरा मान बैठा, अपने सिंहत्व के बल पौरुष को भूल गया, पर बड़े होने पर अचानक एक दिन अपने ही जैसे सिंह को देखा और जब अन्य बकरियों का झुण्ड भाग खड़ा हुआ तो उसने सोचा इनके भागने का कारण क्या? विचार करने पर उसने अपने स्वरूप को जाना, उसे अपने बल पौरुष का भाव हो आया, वैसे ही प्रभुवत् अपना आत्मा है पर यह जीव अनादि संस्कारों से स्वरूप भुला बैठा है, प्रभु दर्शन कर उसे अपनी प्रभुता स्मरण हो आती है और वह साधन पथ में प्रवृत्त हो जाता है।

शक्ति साधना में ही है या साधना द्वारा ही शक्ति प्रकट व प्राप्त की जा सकती है। फिर इसका उपयोग सही दिशा में किया जाय या उल्टी दिशा में, यह तो साधक पर निर्भर है। मंत्र को लीजिए, अक्सर वही है जो हम रात दिन व्यवहार करते हैं, केवल उनका अमुक शक्ति का संयोजन, उच्चारण कर दिया जाता है, पर इतने ही से उनका फल नहीं मिलता है। उसमें जो फलदात्री शक्ति का विकास या प्रादुर्भाव होता है, उसका कारण तो उस मंत्र की साधना करने में है। अमुक परिमाण में, अमुक तरीके से उसका जप किया जाय, तो शब्दों में साधना के द्वारा एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। वही उस मंत्र की सिद्धि है, वही फलती है। वास्तव में साधना से आत्म विश्वास ही फलता है। शब्द तो निमित्त मात्र हैं, शब्द मंत्र तो वही का वही है पर साधना की कमीवेशी के कारण सबको सिद्धि एक जैसी नहीं मिलती। किसी का झण्डा ऐसा रामबाण होता है कि तुरन्त फल देता है। तब वही मन्त्र दूसरा व्यक्ति बोलता है पर उससे वैसा चमत्कार उत्पन्न नहीं देखा जाता। साधना के तारतम्य से ही सिद्धि का तारतम्य होता है, साधना का तारतम्य योग्यता व प्रयत्न के अन्तर के कारण रहता है, व हर प्रकार की सिद्धि में साधना की आवश्यकता ही है।

अब हमें देखना यह है कि साधना कहते किसे हैं? साधक साध्य की प्राप्ति के लिए जो अनुकूल प्रयत्न करता है वही प्रयत्न साधना है। किसी कार्य को अनेक बार करना अभ्यास कहलाता है, और साध्य को ठीक कर उस दिशा में अभ्यास बढ़ाते जाना ही साधना है।

कार्य की गुरुतर व सामान्यता के कारण साधना भी चिरकालीन व अल्पकालीन होती है, दीर्घकालीन साधना में अडिग धैर्य की बड़ी आवश्यकता होती है। जब चाहा, फल नहीं मिल जाता। फल देने की शक्ति विकसित हो जाय व अपने गुण ग्रहण की योग्यता हो तभी फल मिल सकता है। किसी-किसी साधना को वर्षों तक निरन्तर करना पड़ता है, उसका फल तुरन्त चाहें तो कैसे मिल सकता है? कहा गया है-

धीरे-धीरे ठाकराँ, धीरे सब कुछ होय। माली सीचे सौ घड़ा, ऋतु आया फल होय॥

जब तक साधना अधूरी है उसकी फलरूप सिद्धि की अधूरी रहेगी, साधना जितनी ही निर्बल होगी, फल सिद्धि उतनी ही कच्ची होगी। अतः उतावले करने से काम नहीं चलता है। जिसको जितने समय तक जिस ढंग से करना आवश्यक है, उसे उसी प्रकार, उतने समय तक करते रहने से फल मिलेगा, स्त्री गर्भ में वीर्य पड़ते ही बच्चा नहीं हो जाता, उसे परिपक्व बनने के लिए 9 महीने लग जाते हैं, इससे पहले यदि प्रसव होता है, तो कच्चाई रह जाती है, 2-4 महीने में प्रसव हुआ बच्चा आकार नहीं पा सकेगा। माँस पिंड उसी रूप में ही निकल जायेगा। उतावली करने से नुकसान है, उसी प्रकार जितना प्रयत्न, समय व श्रम उपेक्षित है उतना होने से ही फल मिलेगा। धैर्य से साधना करते जाना अनुकूल साधन जुटाते जाना व उसका बल बढ़ाते जाना आवश्यक है।

दूसरी बात साधना में विघ्न बाधाएं भी आती हैं, उनसे विचलित नहीं होना चाहिए। विघ्न बाधाएं परीक्षा रूप हैं। उनमें डटे रहने से बल मिलता है, सिद्धि सहज व शीघ्र हो जाती है। विघ्न बाधाओं से विचलित हुआ तो, किये कराये पर पानी फिर जाता है, व्यर्थ चला जाता है। भविष्य में उस निराशा व असफलता के कारण मन निरुत्साह हो जाता है। अतः कोई कार्य प्रारंभ करने की इच्छा ही नहीं होगी।

अधैर्य से ‘काँत्यो पिन्ज्यो भुयो कपास’ या बिना व्यवस्था गुड़गोबर हो जाता है। अतः साधना करते हुए जो विघ्न-बाधाएं आयें उनको शाँति के साथ सहन करते हुए, पार कर जाना पड़ता है।

साधना प्रारंभ करने के लिए उत्कट इच्छा, दृढ़ निश्चय, परिपूर्ण आत्मविश्वास व पूरी लगनपूर्वक निरन्तर प्रयत्न का होना परम आवश्यक है, उत्कट इच्छा के बिना साधना में रस नहीं मिलेगा। रस न मिलने पर अधिक दिन चलाये रखना कठिन हो जाता है। सिद्धि के लिए जितनी भूख, इच्छा, बेचैनी होगी, साधना में उतना ही बल एवं रस मिलेगा। इस प्रकार दृढ़-निश्चय के बिना उत्साह मन्दता आती रहेगी। विघ्न बाधाएं आते ही मन उचट जायेगा, आगे बढ़ने का उत्साह जाता रहेगा।

फिर तो साधना के द्वारा सिद्धि मिलना सुनिश्चित प्रतीत नहीं होगा। अतः साधना पूर्ण नहीं होगी। मन में यदि दुविधा रही तो फल पाते न देख उसे व्यर्थ समझते ही शिथिलता आ जायेगी, अतः मन में अखण्ड आत्म विश्वास होना चाहिये कि फल में देरी कारणवश हो सकती है, पर साधना कभी निष्फल नहीं जाती। देर सबेर फल अवश्य मिलेगा ही। अतः बीच में छोड़ देने की आवश्यकता नहीं। कार्य करते रहना है। जब साधना सिद्धि के योग्य हो जायेगी, फल स्वयं मिल जायेगा। साधना से सिद्धि का घनिष्ठतम संबंध है। यावत साधना की पूर्णता ही सिद्धि है। वस्तुतः एक ही वस्तु के दो छोर हैं। एक छोर से आरंभ होता है। जितना-जितना आगे बढ़ा जाता है दूसरा छोर नजदीक आने लगता है। और उस छोर पर पहुँच जाना ही तो सिद्धि है। बीच में ही प्रतिकूल संयोगों से अटक गये, प्रवृत्ति में शिथिलता आ गई, छोड़ दी, तो बीच में ही लटके रहेंगे, यावत ‘इतो भ्रष्टः ततः भ्रष्ट’ से हो जायेंगे।

सिद्धि साधनों पर ही आश्रित नहीं, साधना पर आश्रित है। एक व्यक्ति को साधन अधिक मिलने पर ही यदि वह साधना ठीक से नहीं करेगा तो सिद्धि नहीं मिलेगी या कम मिलेगी। तब दूसरे व्यक्ति को साधन कम ही मिले हों पर साधना ठीक करता है, तो सिद्धि सहज में ही परिपूर्ण मिलेगी। एक धनी के लड़के को पुस्तकें व शिक्षा आदि के साधनों की कमी नहीं होती पर वह उतनी लगन व निष्ठा से काम नहीं करता। अतः उतनी सफलता नहीं मिलती। जबकि गरीब विद्यार्थियों को पुस्तकें इधर-उधर से माँग जाँच कर देखनी पड़ती है, पूछताछ भी दौड़ धूप करके करनी होती है। पर उसे साधना अधिक करने से सफलता अधिक मिलती है।

‘यादृशीर्साधनायस्य-सिर्द्धिर्भवति तादृशी...’

साधना करते समय तो दत्तचित्त हो उसको आगे बढ़ाने का ही प्रयत्न करते रहना चाहिये। फल की उस समय चिन्ता न हो। फल तो अवश्य मिलेगा ही, यह आत्मविश्वास भर चाहिये। हर समय फल प्राप्ति सम्मुख रहा, वही मुख्य रहा तो साधना ठीक से नहीं होगी। मन की शक्ति बिखर जायेगी। यह ठीक है कि लक्ष्यविहीन साधना निष्फल है। लक्ष्य एवं साध्य निश्चित हो। पर हर समय ही यदि फल का ही ध्यान रहा तो फल पाने में देरी होने लगेगी। प्रयत्न शौथल्य से दूसरी बात यह है कि जो फल माँगता है उसे तो उतना ही मिलता है, पर जो माँगता नहीं जो अपना कार्य ठीक से किये जाता है, उसे अपेक्षाकृत फल अधिक ही मिलेगा। फल माँगना तो सौदा हो गया। उसका मोल तो माँग ले जितना ही है, तब फलाकाँक्षा रहित साधना का फल अपरिमित है। इसीलिए गीता में कहा गया है कि कार्य करते जाओ, फलाकाँक्षा न रखो। प्रकृति के घर में अन्धेर नहीं, जो बिना माँगे मिलेगा नहीं, उसे उलटा अधिक मिलेगा, निस्वार्थ साधना के कारण।

साधना को आगे बढ़ाने के लिये यह परमावश्यक है कि साधना में अहंकार न आने का लक्ष्य रखा जाय। मैं ऐसी व इतनी अच्छी साधना करता हूँ, दूसरा वैसी कर नहीं सकता, वह मेरे सामने तुलना में करता ही क्या है? जब भी ऐसा अहंकार हृदय में उदित हुआ कि आगे बढ़ना रुक जायेगा, पतन का वहीं से प्रारंभ हुआ समझिये। जब तक वह यह मानता है कि अभी चलना बहुत दूर है, अभी तक पहुँचे ही कितनी दूर हैं, अमुक महापुरुष ने कैसी जबर्दस्त साधना की, उसके सामने मेरी साधना का ठिकाना ही क्या? तो वह अपनी कमी देखकर और अधिक बल के साथ आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, पर जहाँ अहंभाव बढ़ा कि बेपरवाही आई। अहं में क्रोध आदि बढ़ते हैं। गाड़ी पटरी से उतर जाती है, पीछे उसके पतन का क्या ठिकाना। जहाँ तक उसको सम्भालने वाला साधन नहीं मिलेगा, पतनोन्मुख पत्थर लुढ़कता ही रहेगा। चढ़ने में देर लगती है, प्रयत्न करना पड़ता है, गिर पड़ना तो सहज ही होता है, तुरन्त होता है, एक पत्थर को ऊपर चढ़ाने में कितना समय व शक्ति लगती है, गिरने में सैकिंड भी नहीं लगते।

साधना का उद्देश्य साकार से निराकार की ओर बढ़ना है, व उसकी पूर्णता तक पहुँच जाना है। साधन, भजन साकार होता है पर उसके द्वारा निराकार में पहुँच जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो भावना से निराकार भी साकार हो जाता है, प्रारंभ में जो सिद्धि हमें हृदयगम्य व अगोचर होती है, वही साधना के द्वारा अनुभवगम्य व दृष्टिगोचर हो जाती है। कल्पना का सत्य साकार उपस्थित होता है। कल्पना के पंख लग जाते हैं। साधना द्वारा जो चाहे हो सकता है। जो पहले विचार रूप में था, वह प्राप्त होने पर सम्मुख व प्रत्यक्ष हो जाने से साकार हुआ ही समझिये। साधना से असाध्य सुसाध्य एवं असंभव सम्भव हो जाता है।

प्रत्येक कर्म की कुशलता साधना पर अवलम्बित है। संगीत को ही लीजिये, कई वर्षों की साधना से स्वर एवं वादन की कुशलता प्राप्त होती है। तो आध्यात्मिक साधना तो बहुत बड़ी चीज है। उसके लिए और भी अधिक तल्लीनता एवं प्रयत्न की आवश्यकता होगी ही, अतः सिद्धि चाहिये, तो साधना करते रहिये।

किसी भी कार्य की सफलता उसमें मन, वचन, तृष्णा की सम्पूर्ण शक्तियों के नियोजित करने पर ही निर्भर है। मन किधर ही है पर वचन और काया की प्रवृत्ति मन्त्रवत् हो रही है। जब मन में ही करने की इच्छा नहीं, पर दबाव से लोक दिखावे के लिए प्रवृत्ति चाहते हैं तो उसका इच्छित फल कभी नहीं मिल सकेगा। अतः साधना करने में पूरी लगन से जुटना आवश्यक है।

बाधक कारणों के हटाये बिना भी साधना कार्यकारी नहीं होती। इसलिए जो सहायक हों उन्हें अपनावें व जो बंधन हों उनसे दूर रहने का ध्यान करें। जिस कार्य के लिये जिन साधनों की आवश्यकता है पहले उनको सरल करने का प्रयत्न करिये। सीरा बनाना है तो आटा, चीनी, घी, अग्नि, पानी, कढ़ाई, कड़छी, सब साधन चाहिये। उनके बिना सीरा बनेगा कैसे? जहाँ तीव्र साधना की इच्छा है, वह ध्यानपूर्वक साधन जुटा ही लेगा, स्वयं भी मिल जायेंगे उसका काम रुकेगा नहीं।

सफलता न मिलने पर हम प्रायः साधनों को दोष देते रहते हैं पर अपनी कमी पर विचार नहीं करते। यह हमारी महान भूल है। साधक को प्रतिमास आत्म निरीक्षण करते रहना आवश्यक है। जब भी जहाँ जितनी भी अपनी त्रुटि मालूम हो तुरन्त उसे सुधारने व दूर करने का प्रयत्न करिये।


श्रेष्ठतम कार्य करें।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

स्वेट मार्डन ने एक अमेरिकन लखपति को सफलता के रहस्य पर प्रकाश डालते हुए लिखा है-

‘वह पहले पहल केवल सात डालर प्रति सप्ताह वेतन पाते थे, किन्तु धीरे-धीरे उसका वेतन दस हजार डालर प्रति वर्ष हो गया। वह उसी संस्था के एक हिस्सेदार बन गये। सदा उनकी इच्छा यह दिखाने की रही कि वे श्रेष्ठतम कार्य द्वारा अपने आपको सर्वश्रेष्ठ घोषित करा सकें। जिस उच्चकोटि का वे कार्य करते थे, उसने सबका शीघ्र ही ध्यान आकृष्ट किया। तीन वर्ष के अनन्तर अच्छे माल की उनकी इतनी अच्छी परख हो गई थी कि दूसरी कंपनी ने उन्हें तीन हजार डालर अधिक देकर विदेश भेजने का प्रस्ताव रखा था। किन्तु अपनी संस्था के प्रति स्वामिभक्ति के कारण वे न जा सके। कुछ व्यक्ति कहेंगे कि उनकी मूर्खता थी, जो इतना अच्छा वेतन छोड़ दिया, किन्तु सर्वश्रेष्ठ कार्य करने की इच्छा और अपनी संस्था के प्रति भक्ति भावना उन्हें रोके रही।

जब आप साधारण कोटि का कार्य करते हैं, तो न केवल अपने मालिक को धोखा देते हैं, स्वयं अपने आपको धोखा देते हैं। आपके मालिक को इतनी हानि नहीं होती, जितनी साधारण या निम्न कोटि का कार्य करने से स्वयं आपको होती है। मालिक का तो तीन चार आने का ही नुकसान होगा, किन्तु अधूरा, बेमन से किया हुआ निम्न कोटि का कार्य आपको एक नीचे स्तर पर ला पटकेगा। आपको आलस्य दबा लेगा और फिर आप वैसा ही साधारण कार्य ही करने के अभ्यस्त हो जायेंगे। ऊंची कोटि का श्रेष्ठ कार्य जिसमें अपेक्षाकृत अधिक ध्यान, श्रम, अध्यवसाय लगते हैं, करने को तबियत न करेगी। आपका आत्मविश्वास धीरे-धीरे समाप्त हो जायेगा और एक दिन ऐसा आयेगा जब आप वैसा ही साधारण सा कार्य करने के अभ्यस्त हो जायेंगे। जो व्यक्ति अपने श्रेष्ठ कार्य के लिये प्रसिद्ध था, वही साधारण श्रेणी में खिसक आये, तो यह उसका दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।

जिस कार्य को आप हाथ में लें, उसे इतनी लगन से कीजिये कि आपका ट्रेड मार्क श्रेष्ठता, उच्चता, सौंदर्य का प्रतीक हो। लोग उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति देखते ही कह उठें, कि अमुक व्यक्ति का बनाया या किया हुआ कार्य है। फैक्ट्रियों से निकला हुआ हर एक बर्तन या बना हुआ माल भी आपके लिए इतने महत्व की वस्तु नहीं जितना हाथों या मस्तिष्क से किया हुआ कार्य। वे अपनी पुरानी साख से साधारण कार्य किया करते हैं, मामूली चीजें भी किसी प्रकार बाजार में खपा सकते हैं, लेकिन आप एक सदा चलती हुई फैक्ट्री हैं। नए-नए व्यक्ति आपके संपर्क में आते हैं, अतः पुरानी साख प्रायः कार्य नहीं करती। नए ढंग से प्रत्येक स्थान पर आपको अपनी साख बनानी पड़ती है।

आपका व्यापार किसी भी कोटि या श्रेणी का हो सकता है, लेकिन आप भी चाहें तो अपना कार्य सर्वाधिक सुन्दरता और श्रेष्ठता से सम्पन्न कर सकते हैं। आपका प्रत्येक कार्य एक फैक्ट्री से बन कर निकली हुई वस्तु जैसा है। इसमें आपके चरित्र की महत्ता, कुशलता और कलात्मकता उद्दात्तता प्रकट होती है।

आप जो कुछ करें, चाहे वह घर का कार्य हो या दुकान, आफिस अथवा सार्वजनिक सेवा के क्षेत्र में हो जिसमें आपको तनिक भी आय न हो, फिर भी आप अपने कार्य को अधूरे या बेमन से, भौंड़े रूप में न कीजिए। उस पर लगकर पूर्ण निष्ठा से तन्मय होकर इतना अच्छा बनाइये जितना आप बना सकते हैं। आप में जितनी भी कार्य कुशलता है, उसे लगाकर पूर्ण रूप से अपना कार्य निकालिये। आप देखेंगे कि इस कार्य की मौलिकता और कुशलता की सर्वत्र प्रशंसा होगी। स्वयं आपकी अन्तरात्मा भी इससे सन्तुष्ट रहेगी।

श्रेष्ठता और उच्चता के विकास के लिए किसी की याचना नहीं करनी पड़ती। उत्तमता से सम्पन्न कार्य स्वयं एक बड़ी सिफारिश के समान है। जो व्यक्ति अपने कार्य में कुशलता प्राप्त करता है, वह नेता बनकर पूजा जाता है।

हमारे एक मित्र प्रोफेसर हैं पण्डित हरीराम तिवारी। आपकी विशेषताएं दूर से ध्यान आकृष्ट करती हैं। पण्डित जी शुद्ध खद्दर धारी ब्राह्मण हैं। वर्ष भर में दो कुर्तों, दो धोतियाँ, दो बनियान और ठीक चार जाँगिये; जाड़ों के लिए एक कोट, एक बन्डी-कपड़ों के नाम बस यही उनके पास हैं। स्वयं वस्त्र धोते हैं लेकिन जब कभी उन्हें देखिए वस्त्र दूध के समान सफेद स्वच्छ। चेहरे पर पौरुष और वीर्य से युक्त कांतिमान त्वचा। कार्य में हाल यह है कि एक पुस्तक भी रखेंगे तो क्रम से, श्रेष्ठता से। सफाई की दृष्टि से घर आदर्श बना है। जलाने की लकड़ी तक एक क्रम से सजी हुई, वस्त्र, पुस्तकें घर की वस्तुएं, जीवन के हर क्षेत्र में पंडित जी श्रेष्ठता के पुजारी हैं। श्रेष्ठता के पुजारी के लिए यह आवश्यक नहीं कि उसके पास रुपया पैसा खूब हो, बड़ा भारी मकान हो, बीस जोड़ी वस्त्र हों, या आभूषण हों, नहीं, इनमें से कोई भी जरूरी चीज नहीं है। बस मन में श्रेष्ठतम तन्मयतापूर्वक कार्य करने की उत्कट भावना और आदत होना आवश्यक है। यदि आप चाहें, तो कार्य को ढीले-ढाले रूप में न कर सुधार संवार कर भी कर सकते है। आपका यह विचार गलत है कि श्रेष्ठतम रूप में करने में समय अधिक लगता है। जिस व्यक्ति में सुघड़ता आदत का एक अंग बन जाती है, वह कम समय में भी उतनी ही सुचारुता से कार्य कर लेता है जितना दूसरे व्यक्ति बिगड़े या अधूरे ढंग से करते हैं।

संभव है, आपके अधूरे और बेढंगे कार्य का कारण कार्याधिक्य हो। क्या अपने अपने जिम्मे अनेक छोटे-बड़े कार्य ले लिये हैं? यदि ऐसा है, तो आप विवेक पूर्ण रूप से उनमें से सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यों का चुनाव कर शेष को छोड़ दीजिए। जिनको चुनिये, उन्हें श्रेष्ठतम तरीके से कीजिए।

मैं एक ऐसे व्यक्ति को जानता हूँ जो अपने हस्ताक्षर तक करने में इतने सावधान और सचेत है कि कोई अक्षर अस्पष्ट या असुन्दर नहीं लिखते। व्यक्तिगत पत्रों तक में एक-एक अक्षर, कॉमा, या चिन्हों के संबंध में सचेत रहते हैं। गलत चिन्हों वाला पत्र, गलत शब्द या उलटा लगा हुआ टिकट पत्र की तारीख में गलती या अन्य छोटी से छोटी बात के लिए श्रेष्ठता के पुजारी हैं। फल यह है कि वह हर एक कार्य में आदर्श समझे जाते हैं, सर्वत्र उनका सम्मान है, उनके मुख्य अफसर उन पर पूर्ण विश्वास रखते हैं।

जीवन में यह नियम बना लीजिए कि या तो हम कोई भी कार्य अपने हाथ में लेंगे नहीं, यदि लेंगे तो उसे ऐसी उत्तमता और श्रेष्ठता से सम्पन्न करेंगे कि हमारा ट्रेड मार्क उस पर लग सके। हमारी श्रेष्ठता और उच्चता उस पर देदीप्यमान रहेगी। जो कुछ कार्य आपके हाथ से निकले उस पर आपके चरित्र की छाप अवश्य रहे।

एक युवती एक पत्रालय में कार्य करती थी। वह कहा करती थी कि वह इसलिए श्रेष्ठतम कार्य नहीं करती क्योंकि पत्र वाले उसे “यथेष्ट पारिश्रमिक नहीं दे पाते थे।” यह दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण है। “यथेष्ट पारिश्रमिक प्राप्त नहीं होता इसलिए अच्छा कार्य क्यों करें”- यह एक नितान्त भ्राँतिपूर्ण तथ्य है। इस त्रुटिपूर्ण दृष्टिकोण की वजह से बहुत से व्यक्ति अपनी उच्चतम शक्तियों का विकास ही नहीं कर पाते। मामूली व्यक्ति बने रहते हैं। कम वेतन बुरा काम करने के लिये कोई बड़ा कारण नहीं है। जो वेतन आपको प्राप्त होता है, उसका काम से कोई बड़ा संबंध नहीं होना चाहिये। यहाँ प्रश्न आपके चरित्र का है, वेतन या पारिश्रमिक का नहीं। सच्चा व्यक्ति अपने कार्य को अच्छा ही करेगा, चाहे उसे वेतन अथवा पारिश्रमिक कितना ही क्यों न प्राप्त हो, चाहे बिल्कुल भी न मिले। संसार के इतिहास में जो व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ कार्य कर गये हैं, उन्हें पारिश्रमिक आधा, बहुत कम, कहीं तो बिल्कुल ही नहीं प्राप्त हुआ। तुलसीदास जी का ‘रामचरित मानस’, सूर का ‘सूरसागर’, नानक और कबीर के दोहे, या शेक्सपीयर के विश्व विद्युत नाटकों का मूल्य नहीं के बराबर चुकाया गया था।

अधूरे काम करने से न केवल आपको वेतन कम मिलता है आपका चरित्र, परिवार और वर्ग लाँछित होता है। आपके मनुष्यत्व पर धब्बा लगता है। आपका बदनाम होता हुआ चरित्र रुपये पैसे से कहीं अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण है। हम जिस भावना से किसी कार्य को हाथ में लेते हैं, वह हमारे चरित्र के रगरेशे में प्रविष्ट हो जाता है। यहाँ हमारी अन्तरात्मा का प्रश्न है और रुपये के कारण हमें अपनी अन्तरात्मा को आघात नहीं पहुँचाना चाहिये।

यदि कोई व्यक्ति अपने चरित्र और शक्तियों का सर्वश्रेष्ठ रूप अपने कार्य में प्रकट करता है- हृदय और आत्मा का पूर्ण सामंजस्य रखता है तो एक न एक दिन उसका मालिक उसे देखता ही है, और प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। अच्छा और मनोयोग पूर्वक किया हुआ कार्य स्वयं अपना मार्ग निर्दिष्ट करता और अपनी सिफारिश करता है। यदि आपने दो रुपये पाकर दस रुपये का काम कर दिखाया, तो निश्चय जानिये यह आपके लिए सबसे बड़ी सिफारिश है। अधूरा कार्य, वेतन से किया हुआ कार्य, फूहड़पन से सम्पन्न काम आपको बदनाम करने वाला है। नहीं, कम पैसे पाकर आप कितना अधिक और कितना श्रेष्ठ कार्य कर सकते हैं, अपना यही नियम रखिये। अपने मालिक को अधिक कार्य, सतत परिश्रम, अपनी बुद्धि आदि से कम वेतन देने के लिये लज्जित कर दीजिये, आपकी सफलता में चरित्र की यह निष्ठा आपको सदैव ऊंचा रखने वाली है। आपके चरित्र का जैसा प्रभाव आपके मालिक पर पड़ता है वह अपना महत्व रखता है। मालिक नहीं तो, अन्य कोई संपर्क में आने वाला व्यक्ति अवश्य उससे प्रभावित होगा और आप ऊंचे उठेंगे।

हमारे देखने में यही आया है कि हृदय से कार्य करने वाला व्यक्ति आर्थिक दृष्टि से भी सदा-सर्वदा ऊंचा उठा है साथ ही उसे प्रतिष्ठा भी प्राप्त हुई है। स्वयं उसका आत्म विश्वास निरन्तर बढ़ा है। युवकों को यही दृढ़-संकल्प लेकर जीवन में प्रविष्ट होना चाहिए कि संसार की सफलता का एक ही मार्ग है और वह अपने हाथ के काम को श्रेष्ठतम रूप में करना।


बकवाद मत कीजिए।

(प्रो. लालजीराम शुक्ल एम. ए., बी.टी.)

भगवान बुद्ध ने अपने अष्टाँगी मार्ग में बकवाद न करने के लिए उपदेश दिया है। उन्होंने वाणी के विषय में चार प्रकार का संयम बतलाया है- झूठ नहीं बोलना, चुगली नहीं करना, निंदा नहीं करना, और बकवाद नहीं करना। झूठ बोलने, चुगली करने और निन्दा करने को तो साधारणतः सभी बुरा मानते हैं, बकवाद करना बहुत कम लोग बुरा समझते हैं। बकवाद करना क्यों बुरा है, इसका ज्ञान और निदिध्यासन आवश्यक है।

बकवाद करने की तीन बुराइयाँ प्रत्यक्ष हैं। एक, मानसिक शक्ति खर्च होती है, दूसरे, आत्मनिरीक्षण का अभाव होता है, तीसरे, भलाई न करके बुराई ही अधिक हो जाती है। इन तीनों बातों के अनुभव में घटना आवश्यक है। जब तक हम किसी प्रकार की आदत के बुरे परिणाम को ठीक से मन में नहीं बैठा लेते, वह आदत नहीं छूटती। कोई भी बुरी आदत छुड़ाने के लिए इतना ही आवश्यक नहीं कि हमारी बुद्धि अथवा ज्ञात-मन उसके छोड़ने की आवश्यकता समझ ले। उसे छुड़ाने के लिए उसके अचेतन मन में परिवर्तन करना आवश्यक है।

बुद्धिमात्र से समझी गयी बात समय पड़ने पर काम नहीं आती। जो बात भावपूर्ण मनन के द्वारा मन के अन्दर बैठायी जाती है, वही काम में आती है।

बकवाद करने से मानसिक शक्ति का ह्रास होता है। बकवाद उस प्रकार के बोलने को कहते हैं जिसके विषय में न तो पहले से कुछ भी सोचा गया हो और न बोलना आरंभ हो जाने पर किसी प्रकार समय का प्रतिबंध हो। जिस बात का लक्ष्य, क्रम और समय निश्चित हो वह बकवाद नहीं है। पर जब हम साधारणतः समाज में आते हैं तब न तो हमारे बातचीत करने का कोई लक्ष्य होता है, न उसके विभिन्न पहलुओं का कोई क्रम होता है और न कोई समय की अवधि होती है। ऐसी अवस्था में मानसिक शक्ति का संचय नियम के पालन से होता है।

जो भाप साधारण गर्मी पाकर उड़ जाती है, वही जब निश्चित स्थान पर रखी जाती है और उसे निश्चित नियम के अनुसार प्रकाशित किया जाता है तो वह बड़े-बड़े कल और कारखानों को चलाती है। जो आग- जंगल में व्यर्थ खर्च होती है और किसी का फायदा न कर नुकसान करती है, वही आग जब पूर्व निश्चित स्थान पर निश्चित रूप से नियम के अनुसार जलायी जाती है तो भारी उपयोगी शक्ति बन जाती है। इसी तरह बोलना समाज के लिये भलाई करने वाला है। उससे आत्मविकास होता है और दूसरों के समक्ष प्रकाशित नहीं करता उसकी प्रतिभा स्फूरित नहीं होती। वह समाज की सेवा करने में असमर्थ रहता है। अपने ज्ञान की वृद्धि के लिए और निश्चय को दृढ़ करने के लिए दूसरों के साथ विचार-विनिमय करना परमावश्यक है। इसके लिए हमें अपने विचार दूसरों के समक्ष रखने पड़ते हैं और दूसरों के विचार सुनने पड़ते हैं। पर जब यही बोलना लक्ष्यहीन, क्रमहीन और बेसमय का हो जाता है तो इससे लाभ न होकर हानि ही होती है। सुनने वाले के मन पर इस प्रकार के बोलने वाले का कोई लाभदायक स्थायी प्रभाव नहीं पड़ता।

अधिक बोलने वाला व्यक्ति बहुत सी बातें व्यर्थ कह डालता है। इन बातों की व्यर्थता सुनने वाले समझ जाते हैं। इसका ज्ञान बोलने वाले को नहीं रहता। इसके कारण जो कुछ महत्व की बातें भी वह व्यक्ति कहता है वह भी व्यर्थ ही समझी जाती हैं। सुनने वाले हमारी बातों को महत्व तभी देते हैं जब वे सुनने को उत्सुक हों और उनकी इच्छा संतुष्ट करने के लिए हम कुछ कहें, किन्तु जब हम बात करने के लिए उत्सुक रहते हैं और सुनने वाले मानों अपने अनजाने अनायास अथवा अपनी इच्छा के विरुद्ध सुनते रहते हैं तो हमारी बातों का कोई लाभ नहीं होता। प्रत्येक बात की प्रभावात्मक शक्ति हमारे ऊपर मनन करने पर निर्भर है। जिस बात के ऊपर हमने मनन नहीं किया उसका प्रकाशन करना ही व्यर्थ होता है।

इस प्रकार की बातें करने से हमारे प्रति लोगों में सम्मान का भाव न होकर अनादर का भाव हो जाता है। यही कारण है कि अधिक बात करने वाला विरला ही व्यक्ति समाज में सम्मानित रहता है। अधिक बकवाद करने से शारीरिक शक्ति क्षीण होती है। जो जितना ही अधिक बोलता है उसकी आयु उतनी ही अधिक क्षीण होती है। आयु चार बातों से क्षीण होती है। बकवाद करना, जल्दी-जल्दी सब काम करना, अति विषय भोग करना और चिन्ता करना। जिस प्रकार विषय भोग करने से मनुष्य को सुख होता है उसी प्रकार बातचीत करने से सुख होता है। नियमित रूप से होने पर दोनों ही रचनात्मक आनन्द उत्पादित करते हैं। और उनका परिणाम भी भला होता है। पर जब अनियम से इनमें से कोई भी काम किया जाता है तो दोनों का परिणाम विनाशकारी होता है।

बकवाद करना आत्म-निरीक्षण की शक्ति कम कर देता है। बकवाद करने की आदत एक प्रकार की नशाखोरी जैसी आदत के समान है। जैसे नशाखोरी की आदत पड़ जाने पर सरलता से नहीं छूटती। प्रत्येक आदत एक विशेष प्रकार का आनन्द उत्पन्न करती है। इसी आनन्द प्राप्ति की चाह उस आदत को मन से निकलने नहीं देती। पर सभी बुरी आदतें मनुष्य को बहिर्मुखता का परिणाम है। और उससे उसकी बहिर्मुखता और भी दृढ़ हो जाती है। इससे मनुष्य में आत्मनिरीक्षण की शक्ति नष्ट हो जाती है। अतएव बकवाद करने वाला मनुष्य शीघ्र ही संकट में पड़ जाता है, और निन्दा का पात्र बन जाता है। उसके मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। बकवाद का अन्त निराशावादिता और चिन्ता में होता है।

बकवाद करना अपने आप में सुखी न रहने का भाव प्रदर्शित करता है। जो व्यक्ति अपने आपको आध्यात्मिक चिन्तन से सुखी नहीं बना सकता, अर्थात् उसके मन में आध्यात्मिक विचारों का अभाव है उसे बलात् बकवादी बनना पड़ता है। जो व्यक्ति समाज में रहने को जितना अधिक उत्सुक है वह अपने आप में उतना ही अधिक दुखी होता है। अपने दुःख को भुलाने और अपनी आन्तरिक अशाँति का विस्मरण करने के लिए ही मनुष्य बकवाद की शरण लेता है। पर इस प्रकार उसकी शक्ति का और भी ह्रास होता है और उसमें आनन्द प्राप्ति की योग्यता और भी कम हो जाती है।

इस तरह जब एक हद तक मनुष्य अपनी बहिर्मुखता बढ़ा लेता है तो वह प्रायः विक्षिप्त हो जाता है।

बकवाद करने से तीसरी हानि यह है कि उससे हम अपने अनजाने ही वैसे ही पाप कर डालते हैं जो झूठ बोलने, निंदा करने और चुगली करने से होते हैं। बकवाद करने वाले व्यक्ति में अपनी बात का प्रभाव दूसरों पर जमाने की उत्कट इच्छा होती है। यह इच्छा उसमें आत्महीनता की मानसिक ग्रंथि की उपस्थिति का सूचक है। यही ग्रंथि निन्दा और चुगली तथा झूठ बोलने का प्रधान कारण होती है। अंग्रेजी लेखक कावेट महाशय का कहना है कि जब दो चार लोग एक जगह एकत्र होते हैं तो अनुपस्थित व्यक्तियों की बुराई करने में ही वे लग जाते हैं और उसके आचरण की आलोचना होने लगती है। उनके इस कथन से यह प्रत्यक्ष है कि मनुष्य स्वभावतः दूसरों की स्तुति में आनन्द न लेकर उसकी निन्दा में ही आनन्द लेता है। अतएव समाज में अधिक मिलना और बकवाद करना अपने आपको झूठ, निन्दा और चुगली के पाप का भागी बनाना है। किसी भी घण्टे भर चलने वाली बात का यदि विश्लेषण किया जाय तो हम अधिकतर उपर्युक्त आवाज ही पावेंगे। इससे मनुष्य को सदाचार की नहीं, दुराचार की प्रवृत्ति दृढ़ होती है।

बकवाद करने को इसीलिए धर्म शिक्षा में त्याज्य कहा है। बकवाद करते समय न फिर हम दूसरों की निन्दा करते हैं वरन् दूसरों की निन्दा सुनते भी हैं पर निन्दा सुनना भी एक प्रकार का पाप है। जब इसके संस्कार दृढ़ हो जाते हैं तो अनेक प्रकार के अवांछनीय कार्यों में प्रकाशित होने लगते हैं। बकवाद में हम अनजाने दूसरों की कही बात ऐसी जगह कह देते हैं। जहाँ उसे न कहना चाहिये। इससे हमारी भारी क्षति होती है। अतएव व्यवहार कुशलता की दृष्टि से भी बकवाद करना त्याज्य है।


स्वावलम्बी बनना आवश्यक है।

(श्री भगवान दास केला)

जार्ज बर्नार्डशा का कथन है कि-पुरुष समाज से जितना ले, उतना ही समाज को वापिस कर दे, वह साधारण भद्र पुरुष कहा जाता है। जो सभ्य पुरुष समाज से जितना ले, उससे अधिक उसे लौटा दे, वह विशिष्ट भद्र पुरुष है और जो शरीफ आदमी अपना समस्त जीवन समाज में लगा दे और बदले में समाज से कुछ भी न चाहे, यह असाधारण सभ्य एवं भद्र पुरुष कहा जाता है। हम सब जिन्दा रहना चाहते हैं और जिन्दा रहने के लिए तरह-तरह के अनेक काम किया करते हैं। बात यह है कि अपने शरीर की रक्षा या भरण-पोषण के लिए हमें कुछ चीजों की अत्यन्त आवश्यकता होती है, उन चीजों के बिना हमारा काम नहीं चलता है। यों तो हमें सबसे अधिक आवश्यकता हवा की होती है, पर क्योंकि वह आमतौर से बिना कुछ खर्च या मेहनत के मिलती है, उसे हम अपनी मुख्य या प्रारंभिक आवश्यकताओं में नहीं गिनते। हमारी खास जरूरतें ये मानी जाती हैं- भूख मिटाने या शरीर की परवरिश के लिए भोजन, सर्दी-गर्मी से बचने के लिए कपड़ा, धूप, वर्षा, ओले या बहुत ठण्डक से बचने और जानवरों से रक्षा करने के लिये मकान, कभी बीमार पड़ जायें तो रोग से छुटकारा पाने के लिए औषधियाँ और जी बहलाने के लिए कुछ मनोरंजन का सामान। साधारण तौर से प्रारंभिक अवस्था में आदमी जितने काम करता है वह प्रायः अपनी इन जरूरतों को पूरा करने के लिए करता है।

आदमी को अनुभव से मालूम हुआ है कि वह अकेला रह कर इन जरूरतों को आसानी से या अच्छी तरह पूरा नहीं कर सकता। हमें एक दूसरे की सहायता की जरूरत होती है। जो आदमी अपने काम से दूसरों को लाभ पहुँचाता है, उसे बदले में दूसरे आदमियों द्वारा बनायी हुई चीजों के उपयोग का लाभ मिल जाता है। वह ऐसी चीजों के बनाने में लगा रह सकता है, जिन्हें बनाने की उन्हें सुविधा होती है। यह नहीं होता कि उसे अपनी जरूरत की सभी चीजें खुद ही बनानी पड़ें और यह बात बहुत मुश्किल क्या, करीब-करीब असंभव है कि कोई आदमी अपने जीवन निर्वाह की सभी चीजें अपने आप बना सके। बात यह है कि अकसर एक चीज को बनाने के लिए दूसरी कई चीजों, औजार आदि की जरूरत पड़ती है और कोई आदमी इन सब चीजों और औजारों को खुद ही बनाना चाहे तो जब तक ये बनकर तैयार न हों, उसका निर्वाह नहीं हो सकता। इस प्रकार आदमी को दूसरों की सहायता और सहयोग लेने की आवश्यकता होती है। इसलिए आदमी मिल-जुल कर समाज में रहते हैं। दूसरा आदमी या समूह दूसरा काम करता है। हम दूसरों को कुछ चीजें बना कर देते हैं और बदले में अपने उनकी सहायता या उनकी बनाई हुई चीजें लेते हैं। इस तरह सब काम चलता है।

ऊपर कहा गया है कि कोई आदमी अपनी जरूरत की सब चीजें नहीं बना सकता। पर यह आवश्यक है कि वह समाज के दूसरे आदमियों के लिए कुछ ऐसी चीजें बनाये या ऐसा काम करे जिसके बदले में वह दूसरों से अपनी जरूरत की चीजें ले सके और अपना निर्वाह कर सके। इस तरह कोई न कोई धंधा करना सबके लिए जरूरी है। बिना कोई उद्यम, रोजगार या काम-धंधा किये आदमी की गुजर नहीं हो सकती। यही कारण है कि हम समाज में लोगों को तरह-तरह के काम करते हुए देखते हैं- कोई अनाज पैदा करता है, कोई आटा पीसता है, कोई बर्तन बनाता है, कोई कपास ओट कर रुई तैयार करता है और कोई रुई से सूत कातता या सूत का कपड़ा बुनता है। कुछ आदमी ऐसे हैं, जो कोई चीज पैदा या तैयार नहीं करते, वे व्यापार करते हैं। जिसके पास एक चीज अधिक होती है, उससे वह चीज लेकर दूसरे ऐसे आदमी को देते हैं, जिसे उसकी जरूरत होती है और जो दूसरे आदमियों के लिये उपयोगी चीजें दे सकता है। कुछ आदमी बालकों को पढ़ना-लिखना सिखाते हैं और कुछ आदमी रोगियों को दवा-दारु देने का काम करते हैं। इस तरह समाज में किसान, कारीगर, व्यापारी, अध्यापक और वैद्य आदि अपने-अपने काम से दूसरों की सहायता करते हैं और बदले में अपने जीवन निर्वाह के लिये विविध वस्तुएं पाते हैं।

हम में से हर एक आदमी को कोई न कोई धंधा या व्यवसाय करना जरूरी है, जिससे हमारा और हमारे आश्रित हमारे परिवार वालों का जीवन-निर्वाह हो सके। हर एक आदमी को स्वयं अपने हित के लिए भी स्वावलम्बी होना चाहिए। यह बात इतनी सरल और स्वाभाविक नहीं होती। सभी आदमी इसे ठीक समझते हैं तो भी वर्तमान अवस्था में इस पर बहुत जोर देने की और इसे कुछ साफ करने की जरूरत है।

समाज में दो प्रकार के आदमी तो स्पष्ट ही ऐसे हैं, जो स्वावलम्बी जीवन नहीं बनाते, कोई व्यवसाय साथ नहीं करते- भिखारी और चोर। खासकर भारतवर्ष में तन्दुरुस्त और हट्टे-कट्टे होते हुए भी मुफ्त का खाने में कुछ संकोच नहीं करते। कुछ आदमी गेरुआ वस्त्र पहिन लेते हैं, कुछ शरीर पर राख मल लेते हैं, या धूनी रमा लेते हैं, कुछ किसी देवी देवता की मूर्ति के पुजारी बन बैठते हैं, या अन्य प्रकार से सर्वसाधारण को भ्रम में डाल कर उनकी श्रद्धा और दानशीलता से अनुचित लाभ उठाते हैं। भोले-भाले लोगों की उदारता के कारण ये लोग आलसी और निरुद्यमी जीवन बिताते हैं। यह ठीक है कि अपाहिज, बूढ़ों और कमजोर आदमियों को समाज की सहायता और सहानुभूति पाने का अधिकार है, लोगों का कर्त्तव्य है कि उनकी जरूरतें पूरी करने में भरसक योग दें। इसी तरह जो साधु संन्यासी घूमकर देश में धार्मिक अर्थात् नैतिक बातों का प्रचार करें, जनता में नागरिकता के भाव भरें, वे भी गृहस्थियों की ओर से भोजन वस्त्रादि की सुविधाएं प्राप्त करें। लेकिन निखट्टू आलसी या ढोंगी आदमियों को समाज से किसी प्रकार की सहायता या सहानुभूति पाने की आशा नहीं करनी चाहिये। जनता को चाहिये कि उनके प्रति कड़ा रुख धारण करके उन्हें स्वावलम्बी बनने के लिए मजबूर करे।

जो आदमी चोरी करके अपना निर्वाह करता है, उसे राज्य की ओर से दण्ड मिलने का नियम है। जब कभी उसका चोरी करना साबित हो जाता है तो उसे सजा दी जाती है। हाँ, कभी कुछ आदमी पकड़ में नहीं आते और कुछ समय मुफ्त का माल खाते रहते हैं। क्योंकि इनसे जनता की सहानुभूति नहीं होती, जैसी कि भिखारियों या साधु संन्यासियों से होती है, ये लोग चोरी के काम में बहुत अधिक सफल नहीं होते। परन्तु चोरों को राज्य की ओर से दण्ड मिलने की ही व्यवस्था काफी नहीं है। विचार यह किया जाना चाहिए कि ये आदमी चोरी क्यों करते हैं और किन उपायों के काम में लाये जाने से ये स्वावलम्बी बन सकते हैं। मिसाल के तौर पर अगर इन्हें अपनी आजीविका का कोई योग्य काम नहीं मिलता तो वैसे काम की व्यवस्था करना समाज और राज्य का कर्त्तव्य है, उन्हें इस कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए।

भिखारियों और चोरों के अलावा और भी कुछ आदमी कोई व्यवसाय नहीं करते, स्वावलंबी जीवन नहीं बिताते। धनवानों या रईसों के लड़के खाली बैठे अपने माँ-बाप की कमाई का उपभोग करें, इसमें बहुत कम आदमियों को एतराज होता है। कितने ही आदमी तो अपने चाचा, ताऊ या मामा आदि के आसरे पड़े रहने को भी बुरा नहीं समझते। इन बातों में सुधार तभी हो सकता है जब लोकमत काफी प्रबल हो। हर एक युवक और युवती के हृदय में यह बात बैठा दी जानी चाहिए कि उसे समाज के उपयोगी कोई न कोई कार्य अवश्य करना चाहिए। सिवाय उस दिशा के जबकि हम में काम करने की शक्ति या योग्यता न हो, हमें हमेशा स्वावलम्बी जीवन बिताना चाहिए। खेद है कि बहुत से आदमी कुछ काम धंधा न करते हुए खाने-पीने और मौज उड़ाने को बड़प्पन की निशानी समझते हैं। असल में यह मनुष्य का बड़प्पन नहीं ओछापन है और उसे इसके लिए लज्जा आनी चाहिए कि समाज की कोई सेवा न करते हुए वह अपने लिए उपयोगी चीजें खर्च करे। हर एक नागरिक कोई न कोई व्यवसाय करने वाला, स्वावलम्बी जीवन बिताने वाला होना चाहिए। हमें अधिक नहीं तो उतना तो समाज को देना ही चाहिए, जितना उससे लेते हैं।

आदमी के लिए व्यवसाय की आवश्यकता सिर्फ इसीलिए नहीं है कि उससे उसका निर्वाह होता है। व्यवसाय से आदमी को मानसिक लाभ भी बहुत है। काम करने की ओर उसकी स्वाभाविक रुचि होती है। जब वह अपने परिश्रम का फल पाकर अपना निर्वाह करता है तो उसे एक विशेष प्रकार का आनन्द होता है, उसमें आत्मविश्वास बढ़ता है, उसमें स्वतंत्र रूप से सोचने, साहस करने का भाव रहता है। उसे दूसरों के सामने खामख्वाह दबना या सिर नवाना नहीं पड़ता। ये बातें किसी भिखारी, चोर या मुफ्तखोर में नहीं हो सकती। काम करने से आदमी का अनुभव बढ़ता है, वह पीछे उस काम को अच्छी तरह कर सकता है, वह प्रगति या विकास के पक्ष में आगे बढ़ता है। इसके विपरीत जो आदमी कोई कार्य नहीं करता, जिसे कुछ कठिनाइयों का सामना करने का अवसर नहीं मिलता, वह आगे क्या बढ़ेगा? इस प्रकार मानसिक गुणों के विकास के लिये भी हर आदमी को कोई न कोई व्यवसाय करना जरूरी है।


उत्तम सन्तान कैसे प्राप्त हो?

बालक के शरीर की उत्पत्ति माता-पिता के शरीर से होती है। जैसी खरी-खोटी धातु लगाई जायेगी वैसा ही बर्तन बनेगा। जैसी ईंट, चूने का प्रयोग होगा वैसा ही मकान बनेगा। यदि माता-पिता के शरीर स्थूल या सूक्ष्म रोगों से ग्रसित हैं तो सन्तान पर भी उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा।

शरीर शास्त्र के ज्ञाता यह भलीभाँति जानते हैं कि कितने ही रोग ऐसे हैं जो पीड़ियों तक चलते हैं। कुष्ठ, उपदंश, मृगी, उन्माद, अर्श, क्षय आदि के बीजाणु माता-पिता के शरीर में विद्यमान हों तो, बहुधा उनका प्रभाव सन्तान में भी देखा जाता है। माता-पिता के रंग रूप की छाया भी बालकों पर रहती है। गोरे या काले माता-पिता की सन्तान प्रायः अपने माता-पिता के रंग की ही होती है। माँ-बाप के शरीर की कृशता या स्थूलता भी बालकों पर प्रकट होती देखी गई है।

वेष, भाषा, संस्कृति, रुचि, आहार, विहार, आचार, विचार आदि बातों में भी बच्चे अपने माँ-बाप का अनुसरण करते हैं। छोटा बालक माँ के उदर में ही उन बातों के बहुत कुछ संस्कार ग्रहण कर लेता है और जन्म धारण के पश्चात उन बातों को सहज ही अपनाने लगता है। इस प्रकार शारीरिक और मानसिक दृष्टि से बालक सत्तर प्रतिशत अपने जन्मदाता शरीरों की प्रति मूर्ति होता है। वंश, जातियाँ, नस्ल, वर्ण आदि विभागों के मूल में यही तत्व काम करता है। यदि माता-पिता का प्रभाव सन्तान पर न आता तो इस प्रकार का वर्गीकरण दृष्टिगोचर न होता और नीग्रो, चीनी, पंजाबी, बंगाली, मद्रासी, यूरोपियन आदि जातियों में जो आकृति, रंग, स्वभाव आदि में जो अन्तर दिखाई पड़ता है वह भी न दीखता।

पिता-माता के शरीर स्वभाव और प्रवृत्तियों का अनुसरण प्रायः अन्य सभी जीव जन्तुओं की भाँति मनुष्य जाति में भी होता है। साथ ही मनुष्य के मानसिक और आध्यात्मिक सम्पत्तियों का उत्तराधिकारी उसके आत्मजों को मिलता है। हम माता-पिता के धन सम्पत्ति एवं यश-अपयश के ही नहीं उनकी आन्तरिक विशेषताओं, आध्यात्मिक सम्पदाओं के भी उत्तराधिकारी होते हैं। उत्तम ब्राह्मण कुल में बहुधा सात्विक कुल के बालक जन्मते हैं और बधिक, मलेक्ष्छ एवं कसाइयों के घरों में वैसी ही प्रकृति के बच्चे जन्मते और बनते हैं।

यों हर जीव अपने पूर्ण जन्मों के स्वतंत्र संस्कार और प्रारब्ध साथ लाता है। इसलिए कभी-कभी संतान माता-पिता से भिन्न स्वभाव की होती देखी गई है, पर ऐसा होना अपवाद स्वरूप ही है। अधिकाँश बच्चे अपने जन्मदाताओं के गुण-कर्म स्वभाव के होते हैं। भारतीय वर्ण व्यवस्था में इस तत्व को प्रमुख आधार मानकर जन्म एवं वंश को प्रधानता दी गई है। एक शरीर त्यागकर जीव जब दूसरे शरीर में जाने को होता है तो वह अपनी संचित रुचि और प्रवृत्ति के अनुकूल स्थान को ढूंढ़ता है। रेलगाड़ी के फस्ट क्लास डिब्बे में यात्रा करने वाले यात्री स्टेशन पर उतर कर फस्ट क्लास के यात्रियों के लिए बने हुए विशेष मुसाफिरखाने में चले जाते हैं और तीसरे दर्जे में यात्रा करने वाले उसी दर्जे के निमित्त बने हुए मुसाफिरखाने में जा बैठते हैं। वैसे ही जीव भी अगले जन्म के लिए अपने उपयुक्त वंश में जा पहुँचता है। आकाश में उड़ते हुए पक्षी तथा कीट पतंग अपनी रुचिकर वस्तुओं को ढूँढ़ते फिरते हैं और जब अनुकूल अभीष्ट वस्तु मिल जाती है तब उसे प्राप्त करने के लिए नीचे-ऊपर आते हैं। गिद्ध मृत माँस को, कौए विष्ठा को, भौंरा फूलों को, बाज चिड़ियों को ढूँढ़ते फिरते हैं। जहाँ उनकी मनचाही वस्तु दिखाई देती है वहीं उतर पड़ते हैं। जीवों को प्रारब्ध तो अपने कर्मानुसार ही भुगतने पड़ते हैं, जो हर कुल और वंश में भुगते जाने संभव है- पर जन्म लेने के लिये वे अपनी पूर्ण संचित रुचि के अनुकूल स्थिति ही ढूँढ़ते हैं और दयामय प्रभु उन्हें इच्छित वातावरण में ही जन्मने का अवसर प्रदान कर देते हैं।

माता-पिता की जैसी आध्यात्मिक भूमिका होती है, उसी के अनुरूप प्रारब्ध संस्कार वाले जीव उनके शरीर में प्रवेश करके उस वातावरण में जन्म धारण करते हैं। इसलिए यदि अपने घर में उत्तम सन्तान को जन्म देना है तो उसके लिए अपने आपको उत्तम बनाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जो लोग स्वयं पतित दशा में हैं, जिनकी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक स्थिति गिरी हुई है, उनकी सन्तान भी दीन-हीन ही रहेगी।

सन्तानोत्पादन एक महान उत्तरदायित्व है, जिसे उठाने के लिए बहुत समय पूर्व तैयारी करने की आवश्यकता है। किसी महत्वपूर्ण कार्य को सफलता पूर्वक पूर्ण करने के लिए जिस प्रकार उसके लिए सभी आवश्यक उपकरण इकट्ठे करने पड़ते हैं, उसी प्रकार उत्तम सन्तान प्राप्त करने के लिए जहाँ बालक की उत्तम शिक्षा दीक्षा की आवश्यकता है, वहाँ उसके जन्म से पूर्व वे परिस्थितियाँ उत्पन्न कर लेनी भी आवश्यक है जिनमें कोई उत्तम जीवन स्थान, उत्तम फसल प्राप्त करने के लिए किसान ग्रहण करता है। पौधों को सींचने और रखवाली की व्यवस्था करता है किन्तु यदि भूमि की अच्छी जुताई, परिपुष्ट बीज आदि की पूर्ण तैयारी ठीक प्रकार न हो तो सिंचाई और रखवाली की अच्छी व्यवस्था भी निष्फल चली जाती है और किसान वैसी फसल न कर सकेगा, जैसी कि वह चाहता है।

कहा गया है कि सन्तान के कारण उसके पितरों को नरकगामी होना पड़ता है। कारण स्पष्ट है कि सन्तान को समुचित पूर्ण तैयारी के बिना ही उत्पन्न कर डालना एक भारी पाप है, जिसका दण्ड उसे पारलौकिक जीवन में तो मिलता ही है, लौकिक जीवन में भी उसकी कम दुर्गति नहीं होती। सन्तान की हीनता और नीचता से जो अनुचित कार्य होते हैं उसे पिता-माता की भी निन्दा होती है, क्योंकि वे सुयोग्य सन्तान उत्पन्न करने का अपना उत्तरदायित्व पूरा करने में सफल न हो सके। जो व्यक्ति अनधिकार चेष्टा करते हैं वे निन्दा के पात्र होते हैं। मनुष्योचित गुण जिसमें न हो वह तो पशु ही है। पशुओं की भाँति केवल काम प्रेरणा से गर्भाधान में प्रवृत्त हो जाना और एक असंस्कृत जीव उत्पन्न कर देना-पशु प्रवृत्ति है। यह मनुष्यता के प्रति, देश और जाति के प्रति एक अपराध भी है। क्योंकि उनके पाशविक उद्देश्य के फलस्वरूप जो बालक उपजते हैं, संसार के लिए अहितकर और अवाँछनीय कार्य करते हैं उनसे पृथ्वी का बोझ बढ़ता और संसार में अनीति तथा अशाँति की वृद्धि होती है। इस गड़बड़ी की जिम्मेदारी उन माता-पिता पर है जो सन्तानोत्पत्ति का महान् उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य करने से पूर्व उसकी भावी संभावनाओं पर विचार नहीं करते। ऐसी गैरजिम्मेदारी किसी व्यक्ति की लौकिक और पारलौकिक दुर्गति का ही कारण हो सकती है। ऐसे पिता नरकगामी नहीं होंगे तो क्या स्वर्गगामी होंगे?

आज हमारे परिवार क्लेश और कलह से भर रहे हैं। उनमें प्रधान कारण असंस्कृत सन्तान है। घर के मुखिया एवं बड़े-बूढ़े छोटों की उद्दण्डता, उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, चोरी, स्वार्थपरता, अशिष्टता से परेशान देखे जाते हैं। स्कूलों में अध्यापक सिर धुनते हैं, घर में अभिभावकों की आँतें-पीतें जलती हैं। क्या लड़कियाँ क्या लड़के सभी की चाल बेढंगी है। जब तक बचपन रहता है तब तक उद्दण्डता करते हैं, कुछ समझदार होते हैं तो वासना और विलासिता की ओर झुक पड़ते हैं, बड़े होने पर उनकी कार्य पद्धति स्वार्थपरता से ओत-प्रोत हो जाती है। माता-पिता के लिए, संस्कृति के लिए, मनुष्यता के लिए यह अभिशाप ही सिद्ध होते हैं। हमारी नई पीढ़ियां इसी मार्ग का अनुसरण कर रही हैं। कोई विरले ही भाग्यशाली घर ऐसे होंगे जिनमें कर्त्तव्यपालन, शिष्टाचार, सद्भावना, सेवा, त्याग, आत्मीयता एवं सदाशयता का अमृत बरसता हो। प्राचीन काल में जो स्थिति घर-घर थी वह आज कहीं दिखाई नहीं पड़ती, जो बातें पूर्व काल में कहीं नहीं देखी जाती थीं वे घर-घर में मौजूद है। परिस्थितियों में इतना भारी परिवर्तन हो जाने के कारणों में सबसे बड़ा माता-पिता की गैर जिम्मेदारी है, जो सन्तानोत्पत्ति के लिए आवश्यक योग्यता प्राप्त किये बिना इस भारी उत्तरदायित्व को कंधे पर उठाने का दुस्साहस कर बैठते हैं। इन्हीं भूलों के कारण आज हमारा पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन विषाक्त बनता चला जा रहा है।

यह सभी जानते हैं कि माता-पिता को अपने शरीर का पूर्ण विकास कर लेने तक, युवावस्था तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। वासना पूर्ति के लिए नहीं, सन्तानोत्पत्ति के लिए काम सेवन करना चाहिए। गृहस्थ जीवन में भी पूर्ण संयम का पालन करने से बलवान, निरोग, बुद्धिमान और दीर्घजीवी सन्तान पैदा होती है। परन्तु इस तथ्य को बहुत कम लोग जानते हैं कि माता-पिता के शुद्धाचरण का बच्चे पर क्या प्रभाव पड़ता है। बालक केवल हाड़ माँस का ही नहीं होता, उसमें अन्तः चेतना का भी प्रमुख भाग रहता है और इस चेतना में भी माता पिता की बौद्धिक चेतना का भाग रहता है। यदि माता-पिता के मन में, मस्तिष्क में, अन्तःकरण में, कुविचार, स्वार्थपरता, वासना, असंयम, अनुदारता की वृत्तियाँ भरी हुई हैं तो वह उसी रूप में या थोड़े बहुत परिवर्तन रूप में बालक में भी प्रकट होंगी। जैसे कोढ़ी या क्षय ग्रस्त स्त्री-पुरुषों के रज-वीर्य से दूषित रक्त वाले बालक जन्मते हैं वैसे ही बौद्धिक एवं नैतिक दृष्टि से रोगी लोगों की सन्तान भी पतित मनोभूमि की होती है।

व्यभिचार जन्य जारज और वर्णशंकर सन्तान आमतौर से दुष्ट दुराचारी एवं कुसंस्कारों से भरी हुई होती है क्योंकि उनके माता-पिता में पाप वृत्तियों की प्रधानता रहती है। जिन स्त्री-पुरुषों में परस्पर द्वेष, घृणा एवं मनोमालिन्य रहता है, उनके बच्चे प्रायः कुरूप और बुद्धिहीन होते हैं। डॉक्टर फाउलर ने इस संबंध में बहुत खोजबीन की है। उन्होंने बहुत से बालकों की विशेषताओं का कारण उनके माता-पिता की मानसिक स्थिति को पाया है, शारीरिक दृष्टि से गिरी हुई माता-पिता के द्वारा उन्होंने उत्तम स्वास्थ्य के बालकों की उत्पत्ति का कारण उन्होंने दंपत्ति का पारस्परिक सच्चा प्रेम पाया। इसी प्रकार उन्हें इस बात के भी प्रमाण मिले कि उद्विग्न मनोदशा के दंपत्ति शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अच्छी स्थिति के होने पर भी बीमार और बुद्धिहीन सन्तान के जनक बने।

डॉक्टर जान केवन ने मनोविज्ञान की दृष्टि से इस सम्बंध में विशेष शोध की है और वे अनेक उदाहरणों एवं प्रमाणों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि यदि माता-पिता सद्गुणी, अच्छे स्वभाव के, कर्त्तव्यनिष्ठ, नीतिवान और धर्मात्मा हैं तो उनकी शारीरिक अपूर्णताओं और विकास की अन्य सुविधाओं के अभाव में भी बालक उत्तम शरीर और मन वाले उत्पन्न होते हैं। कभी-कभी जो प्रतिकूल अपवाद देखे जाते हैं उनमें भी मानसिक प्रतिकूलताओं को ही उनने निमित्त कारण पाया है। धर्मात्मा लोग भी जब किसी अनीति से पीड़ित होते हैं और उनके मन में पीड़ा, उद्वेग एवं प्रतिहिंसा की अग्नि जलती है तो उसके बुरे संस्कारों से बालक की मनोभूमि भर जाती है। इसी प्रकार कभी-कभी बुरे आदमी भी परिस्थिति वश उच्च विचारधारा से भरे होते हैं तो उसकी उत्तम छाया भी बच्चों पर आती है। पुलस्त्य ऋषि के घर रावण का हिरण्य कश्यप के घर प्रहलाद का जन्म होने जैसी घटनाओं में उनके माता-पिता की मनोदशा के परिवर्तनों को ही कारण माना है।

हमें नीतिवान एवं चरित्रवान होना चाहिए। क्योंकि यह सफलता समृद्धि और उन्नति का, सुपरिचित मार्ग है। हमारा यह कर्त्तव्य है कि वह अपनी मनोभूमि को, अपने दृष्टिकोण को, उच्चकोटि के आदर्शों से ओत-प्रोत करें, क्योंकि इसी मार्ग पर चल कर लोक और परलोक की सुख शाँति संभव है। आज कुपात्र सन्तान की बाढ़ आई हुई है और सम्पन्न सन्तति के दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं।


ज्ञान शक्ति बढ़ाने के उपाय

(श्रीमती शाँति लाहोटी एम.ए.बी.टी.)

जिस मनुष्य की जितनी ज्ञान शक्ति विकसित होगी उसका जीवन उतना ही सुखमय होगा। अब प्रश्न है कि ज्ञान शक्ति का विकास कैसे किया जाय? क्या इसके लिए कोई औषधि है या चिकित्सा है? वास्तव में यह मनुष्य के प्रयत्न पर निर्भर करता है कि वह अपनी ज्ञान शक्ति का विकास करे या न करे। यह शक्ति सबके पास होती है, पर उसे विकसित कुछ प्रयत्नशील ही कर पाते हैं। यहाँ पर कुछ उपाय बताये जाते हैं जिनके द्वारा ज्ञान शक्ति का विकास करने में सहायता मिलेगी।

1. सर्वप्रथम मनुष्य को किसी भी वस्तु को देखने के अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। भगवान की सृष्टि में कोई भी वस्तु असुन्दर नहीं है। यह केवल दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि हम किसी वस्तु में सुन्दरता देखें और किसी में असुन्दरता। एक गुरु ने अपने शिष्य से पूछा कि संसार में कौन सी वस्तु असुन्दर है? शिष्य जब पूरे संसार का भ्रमण करके वापिस आया तो कहा कि गुरुदेव मुझे तो भगवान की सृष्टि में कोई भी वस्तु असुन्दर दृष्टिगत नहीं हुई। वस्तुतः इस संसार में कोई भी वस्तु असुन्दर नहीं है। मनुष्य बहुधा वस्तु की अच्छाई पर दृष्टिपात न करके बुराई पर करता है। इससे उसे बहुत कम वस्तुओं में रुचि होती है और उसका ज्ञान भी कुछ ही वर्षों तक सीमित होता है। अतः मनुष्य को अपनी रुचि को परिष्कृत करना चाहिए। प्रत्येक वस्तु में रुचि रखनी चाहिये। जिस कार्य में जितनी अधिक रुचि होगी वह उतना ही सरल हो जायेगा। हम प्रत्येक वस्तु में अच्छाई देखने की आदत डालें। जितनी ही हमारी रुचि परिष्कृत होगी उतना ही कार्य करने में आनन्द मिलेगा और ज्ञान का विकास भी होगा।

2. मनुष्य के जीवन में आशा-निराशा, सफलता-असफलता, हानि-लाभ, सुख-दुःख के क्षण आते रहते हैं, जो इनसे प्रभावित न होकर दृढ़ संकल्प के साथ ध्येय में लगे रहते हैं उन्हीं की जीवन में विजय होती है। प्रायः मनुष्य थोड़ी सी कठिनाई में ही निराशा व निरुत्साहित हो जाते हैं, छोटी-छोटी बातों पर चिन्तित होकर अपने मस्तिष्क की शक्ति को व्यय कर देते हैं जिससे उनके ज्ञान के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। यही नहीं उनकी स्मरण शक्ति तक नष्ट हो जाती है। उनकी अपने कार्यों में रुचि नहीं रहती। यह स्थिति मानसिक विकास के लिए घातक है। हमारा बौद्धिक विकास तभी होता है जब अपना प्रत्येक कार्य उत्साह से करते रहा जाय।

3. प्रायः मनुष्य का स्वभाव सरल कार्य को करने का होता है। अगर कभी कोई कठिन कार्य करना पड़ जाये तो उन्हें बड़ी परेशानी अनुभव होती है। कुछ मनुष्य तो कठिन कार्य करने का साहस ही नहीं करते। कुछ करते हैं तो परेशानी होने के कारण बीच में ही छोड़ देते हैं। कोई विरले ही मनुष्य होते हैं जो अनेकों कठिनाइयों और बाधाओं के होने पर भी अपने ध्येय में लगे रहते हैं। ऐसे ही व्यक्तियों की ज्ञान-शक्ति का विकास होता है। वास्तव में जिस प्रकार से शारीरिक परिश्रम न करने से स्वास्थ्य खराब हो जाता है उसी प्रकार मानसिक परिश्रम न करने से मस्तिष्क भी अस्वस्थ हो जाता है। जो मनुष्य कठिन कार्य करने से घबराते हैं उनका मस्तिष्क बलहीन हो जाता है। यही कारण है कि शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयों से डरने वाले मनुष्य जीवन में कोई बड़ी उन्नति नहीं कर पाते। जब तक परिश्रम द्वारा मस्तिष्क को सुदृढ़ नहीं बनाया जावेगा तब तक वह कैसे स्वस्थ रह सकता है। हममें से अधिकतर मनुष्यों की यह विचारधारा हो गई है कि ‘जो साहस और वीरता के कार्य करने की शक्ति हमारे पूर्वजों में थी वह हम में नहीं है। वीरता और साहसी कार्य तो विशिष्ट पुरुष नेता ही कर सकते हैं।’ यह धारणा बिलकुल गलत है। यह मनुष्य पर निर्भर करता है कि वह अपनी शक्तियों का कहाँ तक उपयोग करे। जो अपनी शक्तियों का जितना उपयोग करेगा वह उतना ही उन्हें विकसित कर सकेगा। इसके लिये यह आवश्यक है कि हम कठिन कार्य करने का अभ्यास डालें। पाश्चात्य देशों में बच्चों को प्रारंभ से ही स्वावलम्बी होने की आदत डाली जाती है। प्राचीन काल में हमारे देश में भी बालकों को गुरुकुलों में भेज कर कठोर शारीरिक और मानसिक काम करने का अभ्यासी बनाया जाता था। तभी वे सब दृष्टियों से बलवान होते थे। मनुष्य को कठिन कार्य करने की आदत डालनी चाहिये जिससे उसकी गुप्त शक्तियाँ जागृति हों और ज्ञान शक्ति का विकास हो।

4. किसी भी कार्य को करने के लिए उस पर मस्तिष्क की चित्तवृत्तियों का केन्द्रित होना आवश्यक है। जब तक मस्तिष्क पूरी तरह केन्द्रित नहीं होगा तब तक किसी भी कार्य में पूर्ण सफलता नहीं मिलेगी। मस्तिष्क को केन्द्रित करने के लिए उस कार्य में रुचि होना आवश्यक है। अगर हमें कार्य में रुचि नहीं होगी तो हमारा मन भी उस पर केन्द्रित नहीं होगा, जिसके परिणामस्वरूप वह कार्य कठिन हो जायेगा और सफलता भी नहीं मिलेगी। अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि अगर किसी कार्य में रुचि न हो तो कैसे उत्पन्न की जाये? इसके लिये दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। जो भी कार्य या वस्तु हो उसके बारे में सुन्दर कल्पना करनी चाहिये तब ही उसमें रुचि होगी। बच्चों में यह आदत प्रारंभ से ही डालनी चाहिये। प्रायः माता-पिता को यह शिकायत रहती है कि बच्चे किसी भी कार्य में ध्यान नहीं देते हैं या उन्हें बहुत कम ज्ञान होता है। वास्तव में बच्चों का मस्तिष्क अपरिपक्व होता है। जिस कार्य को कराना हो उसके लिए पहले उनमें रुचि उत्पन्न करनी चाहिए। जब उन्हें किसी कार्य में रुचि होगी तो उनका मन स्वयमेव केन्द्रित हो जायेगा। यदि हमें अपनी ज्ञान शक्ति का विकास करना है तो दृष्टिकोण में परिवर्तन करना आवश्यक है। अपने कार्य एवं लक्ष्य में अच्छाई देखने की कल्पना भली प्रकार करनी चाहिये। कार्य के प्रति रुचि उत्पन्न हो। जब कार्य में रुचि होगी तो मन की शक्ति उस पर केन्द्रित होगी। जब मस्तिष्क केन्द्रित होगा तो वस्तु का ज्ञान भी प्राप्त होगा। जितना अधिक ज्ञान प्राप्त होगा उतना ही मस्तिष्क का विकास होगा। मस्तिष्क के विकास पर ही व्यक्तित्व का विकास निर्भर करता है और व्यक्तित्व के विकास पर मनुष्य की उन्नति होती है जिससे उसका जीवन सुखमय बन जाता है।


जीवन का यह सूनापन

(प्रो. मोहन लाल वर्मा एम.ए.एल.एल.बी.)

“मुझे जीवन में बड़ा अकेलापन सा प्रतीत होता है। सूनापन काटे नहीं कटता। मैं प्रायः अकेला-अकेला रहता हूँ, कोई मुझ से बोलता नहीं, बातें नहीं करता, मुझसे मित्रता नहीं करता। क्या मनुष्यों की भीड़-भाड़ से भरे हुए जगत में मैं सूना-सूना ही, एकाकी रहूँगा। मेरा मन जीवन से उचट गया है। क्या मुझ में कोई गुण नहीं है? क्या कोई मेरी विशेषता नहीं, जिससे मैं दूसरों को आकृष्ट कर सकूँ? जीवन मुझे एक ऐसा कारावास प्रतीत होता है, जिसमें किसी कैदी को एकाँत में बंद कर दिया जाय। उफ् जीवन का यह सूनापन मैं क्या करूं?”

मेरे एक पाठक की समस्या इस पत्र में प्रकट हुई है। अंग्रेजी में एक कहावत है किसी को एकान्त कारावास कर देना। नैपोलियन के युग में कैदियों को कोवेन्ट्री नामक स्थान पर भेज कर एकाँत कारावास कर दिया जाता था। तब से कोवेन्ट्री भेजने का अर्थ है, सब संगी साथियों, समाज परिवार से पृथक कर देना। अनेक व्यक्ति इसी प्रकार अपने आपको पृथक कर एकान्त के दुखद कारावास में पड़े रहते हैं।

आज के भौतिकवादी युग में पड़ौसी एक दूसरे को नहीं जानते, परिचय प्राप्त नहीं करते, अलग-अलग से पड़े रहते हैं। प्रत्येक अपने काम से काम रखता है, उनका जीवन स्वकेन्द्रित है। उन्हें दूसरों में कोई दिलचस्पी नहीं।

अकेलापन या सूनापन उत्पन्न करने में स्वयं हमारा ही दोष है। हम स्वयं ही जीवन की शुष्कता के उत्तरदायी हैं। हम ही इसे दूर कर सकते हैं।

मनुष्य स्वभावतः मित्रता चाहते हैं। समाज की भावना उनमें बड़ी उत्कट होती है। वे चाहते हैं कि परस्पर एक दूसरे से मिलकर एक दूसरे के सुख-दुःख, हर्ष-विषाद में हिस्सा बटाएं, मित्रता उत्पन्न करें। वे सहयोग चाहते हैं, दूसरों से सहयोग की आकाँक्षा करते है। लेकिन साथ ही कुछ ऐसे भी व्यक्ति हैं जो दैनिक कार्य के दास हैं। कोल्हू के बैल की भाँति सुबह से सायंकाल तक वही कार्य करते रहते हैं। साँसारिकता की उधेड़ बुन में संलग्न रहते हैं, एक छोटे से मित्रता के दायरे से सन्तुष्ट हो जाते हैं। यदि कोई उनकी मित्रता के दायरे में आना चाहता है तो वे उसे पर्याप्त प्रोत्साहन प्रदान नहीं करते। यह नितांत अनुचित है। ऐसा नहीं होना चाहिए। आप सोचकर देखिये, समाज में रह कर यदि आप अपने पास आने वाले व्यक्ति का ऐसे तिरस्कार करते जायेंगे, तो क्या होगा? सूनापन अवश्य आयेगा।

एक कवि ने लिखा है-

एकाकीपन का अन्धकार, दुःसह है इसका मूक सार, इसके विषाद का रे न पार।

हम पूछते हैं, ‘आखिर इस एकाकीपन का कौन जिम्मेदार है। इसे कौन उत्पन्न करता है?’ आपके जीवन में जो कुछ अच्छा बुरा है स्वयं आपके द्वारा उत्पन्न किया हुआ है? एकाकीपन खुद आप पैदा करते हैं, तो उसे निकाल भी सकते हैं? इसका दुःसह भार आप स्वयं ही हलका कर सकते हैं। यदि जीवन के चतुर्दिक् आपको अगणित चीत्कारें प्रतीत होती है, क्षण-क्षण हृदय निसंग व्यर्थ, विफल प्रतीत होता है, प्राण विकल है, तो इस दयनीय मनः स्थिति से मुक्त होने को तत्पर हो जाइये।

जो व्यक्ति किसी प्रकार भी आपसे दिलचस्पी रखता है, अथवा जिसमें आपको रुचि है, उससे संपर्क स्थापित कीजिए, रिश्ता बनाये रखिये और छोटे-छोटे प्रयत्नों से निरन्तर उसे जोड़ते चलिये। आप में आत्म विश्वास की कमी है। इसी कारण आप दूसरों से बच-बच कर रहते हैं। उनमें घुल-मिल नहीं पाते।

आप क्यों आत्म विश्वास की न्यूनता का अनुभव कर रहे हैं? यह आपकी गलतफहमी के अतिरिक्त कुछ नहीं है। सच मानिये, यह समझ कर कि आप में मौलिकता नहीं है, आप अपने साथ बड़ा भारी अत्याचार कर रहे हैं। आप अपने अन्दर विश्वास रख कर दूसरों से मिलें, बरतें, उनके जीवन में प्रविष्ट हो। स्वयं अपने विश्वासों और विचारों में पूरी-पूरी आस्था रखें। जो कुछ सोचें आत्म विश्वास के साथ सोचें। ऐसी आदत पड़ने पर आप दूसरों के समक्ष जाते हुए दृढ़ता का अनुभव करेंगे और एकाकीपन से मुक्त होंगे।

मन्दिरों, साहित्यिक संस्थाओं, समाज में रहने वाली अनेक संस्थाओं का एक व्यावहारिक पक्ष होता है। प्रत्येक नगर में आपको ऐसी साहित्यिक संस्थाएं मिल जायेंगी, जिनमें आप नए-नए मित्र पाकर एकाकीपन दूर कर सकते हैं।

सायंकाल स्कूल कालेजों या प्राइवेट संस्थाओं में शिक्षा का प्रबंध रहता है। इनमें थोड़ा बचा हुआ समय व्यतीत करने से आप अकेलेपन को एक उन्नत कार्य में व्यय कर प्रसन्नता प्राप्त कर सकते हैं।

स्मरण रखिये, व्यस्त रहना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बड़ा उत्तम है। आप यदि व्यस्त रहें, कोई उन्नत कार्य करते रहें, तो आप जीवन का सूनापन कदापि अनुभव न करेंगे।

खेल और मनोरंजन के अनेक कार्य मित्रता उत्पन्न करने के नए स्थल हैं। टेनिस एक अच्छा खेल है। साइकिल द्वारा यात्राएं बड़ी मजेदार होती हैं। आप इनके द्वारा प्रकृति का साहचर्य भी प्राप्त कर सकते हैं। मीटिंगों, होटलों, प्रतियोगिताओं, थियेटरों, सिनेमा, रेल, साहित्यिक गोष्ठियों में आप नई प्रेरणाएं प्राप्त कर सकते हैं।

नए व्यक्तियों से मत शरमाइये, उनसे बातें करते हुए हकलाने मत लगिये, वरन् निधड़क होकर अपना दृष्टिकोण अभिव्यक्त कीजिए। एकाकीपन और दूसरों से अलग-अलग रहने की कमजोरी स्वयं आपकी एक मानसिक कमजोरी है। दूसरों के सामाजिक जीवन पर लुब्ध दृष्टि से देखने के स्थान पर, स्वयं आप भी मिलनसार बनने का प्रयत्न कीजिए। बच्चों जैसी अनुचित लज्जा, या अपनी हीनता का दुर्भाव आपको पस्त न करे, यह ध्यान रखिये। शारीरिक कुरूपता, या दुर्बलता ऐसे कारण नहीं है, जो कि आपको दूसरों से पीछे रखें। सच मानिये, आप में दूसरों के सहयोग की अपूर्व शक्तियां छिपी पड़ी हैं।

सूनापन और अकेलापन का कारण दूसरों से जनता, पड़ौसी, मित्र, साँसारिक वस्तुएं, मनोरंजन के कार्य इत्यादि सम्पर्कों का अभाव है। यदि आप इन सम्पर्कों की वृद्धि करते चलें, और उन्हें अक्षुण्ण बनाये रहें, टूटने न दें, तो यह अकेलापन दूर हो सकता है। जो जितने अधिक संपर्क रखता है, वह उतना ही प्रसन्न रहता है। ये संपर्क एक प्रकार की ऐसी खिड़कियाँ हैं जिनमें होकर आप मानव के नए-नए रूप देख कर आन्तरिक शाँति और सन्तुलन का अनुभव कर सकते हैं। मनुष्य अपने बंधु बान्धव से हिल-मिल कर ही प्रसन्नता से जी सकता है, यह मत भूलिये।


नए ढंग से जीवन व्यतीत कीजिए।

(श्रीमती प्रीतम देवी महेन्द्र)

चार्ल्स डिकेन्स ने ‘इटली के चित्र’ नामक पुस्तक में तीन ऐसी स्त्रियों की चर्चा की है, जो इटली छोड़कर किसी नए देश में जाकर रहने और जीवन को नए ढंग से ढालने के लिये इच्छुक थी। वे किसी गर्म प्रदेश में जाना चाहती थी किन्तु वे धार्मिक पुस्तकों, पुराने रूढ़िवादी विचारों और अतीत के संस्कारों के कारण एक बन्दी जैसा जीवन व्यतीत कर रही थी। वे सदा बाहर जाने की ही सोचती रहीं, किन्तु जा न सकी। एक स्थान पर टिके रहने का मोह सदा उन्हें जकड़े रहा।

क्या आप भी अतीत के मोह, या स्थान के बंधन का अनुभव करते हैं। क्या अपने अन्दर कुछ ऐसी जंजीरों का अनुभव करते हैं, जो आपको पुरानी चीजों, स्थानों, विचारों से जकड़े हुए हैं? क्या आप अबाध और सृजनात्मक जीवन नहीं व्यतीत कर रहे हैं? क्या आप पुराने जीवन में प्राप्त सामग्री कार्य वस्तु या ज्ञान से संतुष्ट होकर निश्चेष्ट जड़वत् हो गये हैं।

शाब्दिक दृष्टि से हम अपने अनुभव का कुछ भी नहीं विस्मृत करते, वह हमारे गुप्त मन में, किसी न किसी रंध्र में निवास करता है। हमारा यह अनुभव दैनिक जीवन के किसी न किसी कार्य को अपने ढंग से प्रभावित करता रहता है। उपयुक्त वातावरण में स्वप्नों या हिमोटिक निद्रा में-हमारी ये अतीत कालीन स्मृतियाँ जागृत होकर चेतना की सतह पर आ जाती हैं। हम अपने पुराने जीवन तथा अनुभवों से मुक्त नहीं हो पाते। हमारे मस्तिष्क का ऐसा ही आश्चर्यमय विधान है।

किन्तु निरन्तर अतीत के कटु-मृदु अनुभवों में निवास करना, अपने मौजूदा जीवन को भी उसी से परिचालित होते रहने देना, मानसिक तथा नैतिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। विकास एवं परिपक्वता तथा मानसिक सन्तुलन तभी स्थिर रह सकता है, जब आप पुरानी बातों को, पुराने कष्ट, दुःख, गलतियों तथा अविवेकपूर्ण कृत्यों को विस्मृत कर आगे बढ़ें। अतीत को पीछे छोड़ दें। हमें आवश्यकता इस बात की है कि हम पुरानी असफलताओं तथा गलतियों या अपनी दुर्बलताओं को भूल कर या उनकी अवहेलना कर नए ढंग से जीवन व्यतीत करें।

जॉर्ज बेनफील्ड अतीत को भूलने तथा नए सिरे से जीवन व्यतीत करने की सलाह देते हैं। आपने कुछ बड़े सुन्दर उदाहरण इस प्रकार दिए हैं-

‘हाँ, मैं जानती हूँ, प्रिय’ एक नवयुवती पत्नी ने अपने युद्ध से लौटे हुए सैनिक पति से कहा- ‘उस रेगिस्तान तथा युद्ध स्थल में आपकी सेना की टुकड़ी सर्वश्रेष्ठ रही होगी। आप तथा आपके संगी साथी वीर रहे होंगे। किन्तु अब तो आप एक शाँत नागरिक का जीवन व्यतीत कर रहे हैं, आपको युद्ध की पीड़ा, हाहाकार, कठिनाइयाँ, अभाव तथा पीड़ा भूल जाना चाहिए। जो बीता सो गया, सदा के लिए मर गया। जो मर गया, उस जीवन से अनुचित मोह किस अर्थ का है?’

यह सुनकर मानसिक तनाव तथा थकान से चकनाचूर पति खिन्न होकर पत्नी पर बरस पड़ा। लेकिन पत्नी ने अतीत को भूल कर जो नए सिरे से नए प्रकार नई भावनाओं, सम्पर्कों, नई उमंगों वाला नागरिक जीवन बिताने का जो सुझाव पति को दिया था, वह उचित मनोवैज्ञानिक सलाह थी।

युद्ध काल में जो युद्ध भूमि पर लड़े थे, या देश के शरणार्थी जिन्होंने देश के विभाजन के युग में असंख्य कठिनाइयाँ, अभाव और अत्याचार सहे हैं, उन्हें अतीत से नाता तोड़ कर नए सिरे से जीवन व्यतीत करने की अतीव आवश्यकता है। नए जीवन के लिए पुरानी असफलताओं के विचारों को छोड़ देना चाहिए।

अतीत के मधुर सुखमय स्थलों, अनुभवों या क्षणों की याद करना अपने मौजूदा जीवन के, आज के जीवन के सुखों आनन्दों को किरकिरा कर देना है। जो अब है, जीवन के जो बहुमूल्य क्षण अब हमारे पास हैं, क्यों न हम उनकी उपयोगिता समझें और उनका आनन्दमय उपयोग करें। उन तीरों के लिए क्यों कलपते-कराहते रहें जो सदा के लिये हमारे हाथ से छूट चुके हैं।

एक प्रौढ़ विवाहित दंपत्ति उन प्रारंभिक जीवन के मादक-मोहक सपनों की स्मृति में डूब कर दुःखी रह सकता है जो उन्होंने जीवन के सुनहरे प्रभाव में एक दूसरे के संपर्क में व्यतीत किये थे। हम जानते हैं कि वे दिन वास्तव में बड़े अच्छे रहे होंगे, किन्तु उनकी याद की कसक अब के जीवन को शूलमय क्यों बनाये? यदि यह दंपत्ति अपनी आज की परिपक्व मित्रता, प्रेम की गहनता, सुख-दुःख में सहवास द्वारा प्राप्त आत्म-सन्तोष को महत्व प्रदान करें, तो मौजूदा जीवन सुखी सन्तुष्ट हो सकता है। उन्हें आनन्द के उन अवसरों से लाभ उठाना चाहिए जो आज का परिपक्व जीवन उन्हें प्रदान करता है।

पुरानी असफलताओं से नाता तोड़ लेना ही हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए उत्तम है, अन्यथा उनसे उत्पन्न आत्महीनता और आत्म ग्लानि हमें स्नायविक दुर्बलता का शिकार बना सकती है। जिन व्यक्तियों के प्रति आपकी नाराजगी है, जिनके प्रति आप ईर्ष्या करते हैं, जिन्होंने जीवन में आपका कभी अनिष्ट किया है, उनके प्रति मन में जो वैर भाव हैं, उसे तुरन्त निकाल दीजिए। नए सिरे से उनसे संपर्क स्थापित कीजिए। यदि आप सद्भावना से उनकी ओर आकृष्ट होंगे, तो निश्चय जानिए, आपके नए संबंध मधुर बनेंगे।

आपसे पुराने जीवन में जानकर अथवा अनजान में जो गलती हो गई थी, भला अब तक, आज तक उसके लिए चिन्तित रहने से क्या लाभ है? इससे मस्तिष्क की उर्वरा कल्पना शक्ति और उत्पादक विचारधारा पंगु हो जाती है।

जिन गलतियों के लिए आप वास्तव में दुःखी हैं, उन्हें भविष्य में कभी न दुहराने का संकल्प कर नए सिरे से जीवन को ढालिये।

क्या आपको ईसा महान का वह वाक्य स्मरण है जो उन्होंने प्रायश्चित करने वाले एक पापी को मूल मंत्र के रूप में दिया था। उन्होंने कहा था-’शान्ति में प्रविष्ट हूजिये और भविष्य में कभी ऐसा पाप न करने का दृढ़ संकल्प कीजिए।’ वास्तव में अतीत को, उसके दुःख, तकलीफों, पीड़ा, हाहाकार, असफलताओं को दफना दीजिए, और नए सिरे से उत्साह एवं नई उमंग से जीवन व्यतीत कीजिए।

नया जीवन व्यतीत करना कठिन नहीं है। नए सिरे से अपना कमरा सजाइये, नया प्रोग्राम, हो सके तो नए वस्त्र, नई पुस्तकें, नया वातावरण चुन लीजिए। जिन वस्त्रों को अभी तक इस्तेमाल करते हैं, उन्हें छोड़ कर नए कपड़े प्रयुक्त कीजिये। नए प्रकार का भोजन खाना प्रारंभ कीजिये। जीवन में नया प्रोग्राम बना कर वैचित्र्य उत्पन्न करना, विविधता लाना और पुरानी लीक से तोड़ कर नई दिशा में चलना सरसता उत्पन्न करता है।

प्रत्येक दिन आपको समृद्धि और पूर्णता, आशा और उत्साह की ओर ले जा रहा है। सर्वत्र आपके लिए प्रसन्नता, आनन्द और सुख आ रहा है, फिर अतीत के शूल और कंटकों से आपका क्या सरोकार?

जीवन को एक यात्रा समझिये। इसमें काँटेदार झाड़-झंखाड़ और कंकरीले-पथरीले स्थान भी हैं, तो मधुर पवन से स्निग्ध हरित-पुष्पित उद्यान, कल-कल निनादित सरिताएं और संगीतमय स्थल भी हैं। आनन्द अधिक है, प्रकाश और संगीत, यश प्रतिष्ठा और समृद्धि अधिक है। उन्हीं से आपका निकट संबंध है। अनन्त सुख सौंदर्य की ओर आप प्रतिदिन आगे चल रहे हैं फिर जीवन-यात्रा में पीछे छूटे हुए कंटीले-पथरीले स्थलों की स्मृति रखने की क्या आवश्यकता है। जो अवसर हाथ से निकल गये उनके लिए हाथ मल-मल कर पछताना नए अवसरों को भी हाथ से निकालना है।

कटु अतीत से नाता तोड़ कर नए ढंग से, नए उत्साह और यौवन से मधुर उल्लासित जीवन व्यतीत कीजिए।


कुम्भ पर्व की दुर्घटना

कुम्भ पर्व पर जो दुर्घटना घटी अगणित मनुष्य जिस दयनीय दुर्दशा के शिकार हुए उसकी कल्पना मात्र से दिल दहल जाता है। व्यवस्था करने वाले राजकीय कार्यकर्ताओं की अयोग्यता, एवं दूरदर्शिता इसमें प्रधान कारण रही। यों आरंभ से ही बड़े-बड़े प्लान बनाये गये, नई-नई स्कीमें उपस्थित की गई, बहुत धन व्यय किया गया और बहुत ढोल पीटे गये पर अयोग्य और अहंमन्य लोगों के कार्यों में जिस प्रकार केवल सदा परेशानी ही उत्पन्न होती है उसी प्रकार इस बार भी हुआ। जिनका इस वर्ष से संबंध है वे सभी असन्तुष्ट एवं परेशान रहे और अन्त में एक ऐसी दुर्घटना घटित हो गई जैसी किसी धार्मिक मेले में अब तक के इतिहास में कभी नहीं हुई थी।

शासन व्यवस्था में, शासकों की मनोवृत्ति में परिवर्तन अपेक्षित है। साथ ही यह भी आवश्यक है कि मेलों में बहुत बड़ी संख्या में जाने की जन मनोवृत्ति को भी बदला जाय। पर्व जब आते हैं तब ग्रह, नक्षत्र, योग, ऋतु एवं आध्यात्मिक तत्वों की चलती-फिरती सामयिक परिस्थिति के कारण ऐसे वैज्ञानिक सुयोग बनते हैं कि उन समयों पर आध्यात्मिक परमार्थिक कार्य करने से अधिक सत्परिणाम होता है, साथ ही साँसारिक कार्य किये जायं तो वे असफल रहते हैं। जैसे ग्रहण काल में जप, तप दान, पुण्य का फल अधिक उत्तम होता है पर उसी समय यदि गर्भाधान, भोजन, शयन आदि कार्य में किये जायं तो वे हानिकारक होते हैं। यह बात अन्य पर्वों के संबंध में भी है। पर्व के समय एक विशेष महत्व का वातावरण रहता है। उसमें अपने-अपने ढंग से सभी को सत्कार्य, धार्मिक आयोजन करने चाहिये।

प्राचीन काल में जनसंख्या अधिक न थी। यातायात के साधन बड़े कष्टसाध्य थे तीर्थयात्रा के लिये बहुत कम लोग साहस करते थे। जिनमें ऐसा साहस हो उन्हें थोड़ी-थोड़ी संख्या में अलग-अलग जाने की अपेक्षा एक ही स्थान पर एकत्रित होकर सत्संग, प्रवचन, परस्पर सम्मेलन आदि की सुविधा का ध्यान रख कर किसी विशेष पर्व पर किसी विशेष स्थान के महात्म्य की स्थापना की गई थी। उस महात्म्य को विचार करके देश भर के धार्मिक व्यक्ति एक स्थान पर सम्मिलित होते थे और सचमुच उससे सभी को बड़ी शाँति एवं प्रसन्नता प्राप्त होती थी। प्राचीन काल के ऐसे ही मेले थे।

आज स्थिति बिलकुल बदल गई है। जन- संख्या बढ़ी है, यातायात के साधन सरल हुए हैं, अन्धविश्वास बढ़ा है। पर्वों में भौतिक आकर्षणों एवं व्यापारिक हलचलों ने प्रधानता ले ली है। फलस्वरूप ऐसे लोग इन मेलों में धर दौड़ते हैं जो ज्ञान, धर्म, साधन, अध्यात्म को तो समझते नहीं- मेला देखने या डुबकी मारकर भवसागर से तर जाने की इच्छा धारण किये होते हैं। समय की समाज की अगणित बुराइयों ने इन पर्वों के समय होने वाले मेलों को भी ग्रस लिया है, इनमें जाकर साधारण जनता केवल परेशानियाँ ही प्राप्त करती है। भारी धन व्यय, यात्रा की परेशानी, समय एवं श्रम का लगना, भारी भीड़-भाड़ के दूषित वातावरण से बीमारियाँ फैलने की शंका आदि अनेक कठिनाइयों की तुलना में डुबकी मारने का पुण्य कम ही ठहरता है, इस प्रकार साधारण यात्री तो घाटे में रहता है, केवल चोर, लुटेरे, ढोंगी, जेबकट, व्यापारी, पण्डे, रेल, मोटर ताँगा आदि सवारियों वाले, होटल, धर्मशाला वाले आदि लोग ही नफे में रहते हैं।

यों तीर्थयात्रा, देशाटन, पर्व स्नान आदि सभी आवश्यक हैं, पर इनकी तैयारी करते समय एक बात अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि वहाँ इतनी भीड़ तो न होगी जो अभीष्ट लाभ प्राप्त करने के स्थान पर मानसिक शाँति को नष्ट करने वाली हो। जहाँ ऐसी संभावना हो और स्नान दर्शन के अतिरिक्त अन्य कोई सत्संग आदि का सुयोग न हो, वहाँ जाने की अपेक्षा ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि अपने स्थान पर या कम भीड़ के स्थान पर उन साधन, तप, सत्संग, यज्ञ आदि का आयोजन किया जाय तो ऐसे पर्वों पर अभीष्ट हैं।

इस दिशा में गायत्री परिवार की ओर से एक महत्वपूर्ण आरंभ एवं पथ-प्रदर्शन किया गया है। यह कुम्भ का महापर्व कुछ ऐसी विशेषताओं के साथ आया था। जैसे योग पिछले सौ वर्षों में नहीं आये। इस शुभ अवसर पर सवालक्ष व्यक्तियों को गायत्री विद्या का ज्ञान दान करने का संकल्प किया गया। इसलिए हर सदस्य को प्रेरणा की गई कि वह अपने-अपने स्थान में गायत्री ज्ञान प्रचार के लिए समय लगावें। अत्यन्त सुन्दर और सस्ते ट्रैक्टों को वितरण करने या बेचने में कुछ पैसे व्यय करें। इस दशा में लोगों ने यथासंभव कुछ किया था। जितना कुछ समय, काम एवं धन इस काम में किसी का लगा वह निश्चित रूप से उसके लिए तथा जनसाधारण के लिए धर्म वृद्धि करने में सहायक हुआ। यात्रा में हर यात्री को काफी समय और पैसा खर्च करना पड़ता है। उतना यदि इस प्रकार रचनात्मक कार्यों में लगाया जाय तो अदृश्य ही उस स्नान से अधिक पुण्य फल प्राप्त हो सकता है।

गायत्री संस्था ने प्रयाग जाने की किसी को प्रेरणा नहीं की, न कोई ऐसा आयोजन का आमन्त्रण किया कि लोग प्रयाग पहुँचे। कारण कि इस पर्व काल की महत्वपूर्ण घड़ियों को परेशानी में व्यतीत करने की अपेक्षा उनका कोई ठोस रचनात्मक उपयोग होना ही सब दृष्टियों से उचित था।

अमर्यादित भीड़ का एकत्रित होना सब दृष्टियों से अवाँछनीय है, उससे वहाँ का वातावरण विक्षुब्ध हो हो जाता है। समुचित आध्यात्मिक लाभ उठाने की स्थिति नहीं रहती। साथ ही दुर्घटनाएं घटित होने की तथा अनैतिक प्रवृत्तियों के बढ़ने की संभावना अधिक रहती है। इसलिए जो लोग ऐसे अवसरों पर जिस दृष्टि से जाना चाहते हैं उसी दृष्टि से विचार करके देखें कि क्या वह उद्देश्य सफल होगा? यदि वह उद्देश्य ठीक प्रकार पूरा होने की संभावना न हो तो यह उचित है कि मेले के समय तथा धन को किसी दूसरे प्रकार से उपयोगी एवं परमार्थिक कार्यों में लगाया जाय। कुँभ पर्व पर ‘अभिज्ञान’ आयोजन एक उत्तम आदर्श रहा। नवरात्रियों में भी अनेक लोग देवी के दर्शनों को जहाँ-तहाँ जाते हैं जहाँ यात्रियों की अनावश्यक भीड़ जमने की संभावना हो, वहाँ जाने की अपेक्षा घर पर या किसी उत्तम वातावरण में रह कर अनुष्ठान आदि की साधना करना ही अधिक उत्तम है। आशा है कि पर्व मनाते समय विज्ञ पुरुष ऐसे ही शुभ आयोजनों की महत्ता पर ध्यान केन्द्रित करेंगे।

कुम्भ पर्व की हृदय विदारक दुर्घटना जहाँ हमारे मन में अनेक विचार और भाव उत्पन्न करती है वहाँ एक महत्वपूर्ण विचार यह भी है कि अमुक पर्व पर अमुक स्थान पर जाना ही पुण्य है। यह सोचने की अपेक्षा व उस शुभ अवसर पर अपने समय और श्रम को विवेकपूर्ण सत्कर्मों में लगाने की बात सोची जाय। इसका परिणाम व्यक्ति तथा समाज के लिये उत्तम होना अधिक संभव है।


होली की पौराणिक पृष्ठभूमि

(श्री पौराणिक शास्त्री)

हिन्दू संस्कृति में प्रचलित प्रायः समस्त उत्सवों में होलिकोत्सव का विशेष महत्व है। इसका सर्व-सामान्य स्वरूप केवल भारत के विभिन्न भागों में ही नहीं बल्कि संसार के अन्य राष्ट्रों में भी किसी न किसी रूप में पाया जाता है। मूलतः इस उत्सव के दो अंग आर्य संस्कृति में पाये जाते हैं। एक है होलिका-दहन और उसके साथ-साथ कीचड़, कालिख और भद्दा रंग डालना, नंगे स्वाँगों का प्रदर्शन करना और अश्लील कबीर और जोगीरे गाना तथा दूसरा अंग है वसन्त का उत्सव मानना, अबीर, गुलाल जैसे नेत्र रञ्जक रंगों को छोड़ना, छुड़वाना और साथ ही साथ होली, फाग, झूमर-वसन्त आदि रागों को गा-बजाकर उत्सव एवं समारोह मनाना। ये दोनों परस्पर भिन्न रस्में आपस में हिलमिल कर इस उत्सव को इस प्रकार सराबोर कर चुकी हैं कि आज यह निश्चय रूप से नहीं कहा जा सकता कि ये कब एक दूसरे में मिलीं। आइए, अब जरा प्राचीन हिन्दू धर्म-ग्रंथों, शास्त्रों, पुराणों पर दृष्टि डालें और देखें कि होली का शास्त्रीय स्वरूप क्या है?

शास्त्रों के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अंतिम तिथि को होली का उत्सव मनाया जाना चाहिए। कभी-कभी यह पूर्णिमा दो दिन पड़ जाती है। ऐसी अवस्था में दूसरी पूर्णिमा को ही होली जलानी चाहिए। जिस दिन प्रदोष के समय पूर्णिमा वर्तमान हो, भद्रा न हो, उस दिन सूर्यास्त के उपरान्त ही होली जलाने का विधान है। भद्रा के आरंभ की पाँच घड़ी ‘भद्रा का मुख’ और इसके उपरान्त की तीन घड़ी ‘भद्रा की पूँछ’ कही जाती है। कहीं-कहीं भद्रा की ‘पूँछ’ में होली जलाने की छूट शास्त्रकारों ने दी है किन्तु प्रायः सभी आचार्य शास्त्रियों ने दिन, प्रतिपदा, चतुर्दशी तथा में होली प्रज्ज्वलित करने का विरोध किया है। उनका ऐसा विश्वास है कि जहाँ इन तिथियों एवं समयों में होली जलाई जाती है वहाँ वर्ष भर के अन्दर ही क्या मनुष्य, क्या राज्य, सभी का नाश हो जाता है। यथा-

प्रतिपद भूत भद्रासु यार्चिता होलिका दिवा। संवत्सरंतु न द्राष्ट्रं पुर दहति साद्भुतम्॥

पुराण समुञ्चय में लिखा है कि भद्रा में होली जलाने से देश में शीघ्र ही उत्पात आरंभ हो जाते हैं तथा उस गाँव या शहर में अशाँति रहती है।

होली के अवसर पर काष्ठ संचय करने की अनेक कुप्रथाएं हमारे हिन्दू समाज में प्रचलित हैं। लकड़ी का चोरी करना धर्म माना जाता है। ऋतुओं के विभाजन के समय पता नहीं कब से माघ और फाल्गुन को शिशिर तथा चैत्र एवं वैशाख को वसंत माना गया है किन्तु आजकल तो माघ की पंचमी से ही वसंत का आगमन मान लिया जाता है। माघ के शुक्ल पक्ष की पंचमी को जिसे वसंत पंचमी भी कहते हैं, रात को ही होली का प्रतीक एक काष्ठ या रेंड प्रत्येक गाँव, मुहल्ले या टीले में गाड़ दिया जाता है। उसी दिन से काष्ठ-संचय प्रारंभ हो जाता है और वसन्त राग या चौताल आदि गाये जाने लगते है। पर शास्त्रों में फाल्गुन शुक्ल पक्ष की पंचमी से पूर्णिमा तक दस तिथियों में लकड़ी संचय करने का विधान है इन दस दिनों लकड़ी की चोरी करना शास्त्रकारों को भी मान्य था। यथा-

पंचमी प्रमुखास्तास्तु तिथ योनन्त पुण्यदाः। दश स्युः शोभनास्तासु काष्ठस्तयं विधीयते॥

इतना ही नहीं, आजकल की गाली-गलौज की प्रथा भी शास्त्र सम्मत है। उनका तो यहाँ तक कहना है कि होलिकोत्सव के अवसर पर जो किसी कारणवश गाली-गलौज नहीं बकता वह पाप का भागी होता है और उसे इसके लिए प्रायश्चित करना चाहिए। वास्तव में समाज-शास्त्रियों ने मानव के इस पशु-धर्म को वर्ष में एक बार निरर्गल रूप में छोड़ने की छूट देकर अपनी चतुराई का ही परिचय दिया है।

नारदीय पुराण के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को सूर्यास्त होने पर प्रदोष काल में घर के चौड़े आँगन, किसी चौराहे या किसी निश्चित स्थान पर गोबर से लिपी-पुती भूमि पर सूखी लकड़ी, गोबर के कंडे, घास-फूस आदि इकट्ठा करना चाहिए और उसे जलाकर होलिका का विधिवत पूजन करना चाहिए।

फाल्गुने पौर्णमायान्तु होलिका पूजनं स्मृतम्। पंचयं सर्वकाष्ठानाँ पालालानान्च कारयेत्॥

जैसा कि ज्योति निबंध के निम्नाँकित श्लोक से स्पष्ट है, होलिका दहन के लिए किसी चाण्डाल या प्रसूता स्त्री के घर से आग मंगानी चाहिए और वह भी वयस्कों द्वारा नहीं बल्कि बच्चों द्वारा।

चाण्डाल सूतिका गेहाच्छिशु हरित वह्विना। प्राप्तयाँ पूर्णिमायान्तु कुर्यात्तकाष्ठ दीपनम्॥

होली जलाने के पूर्व निम्नलिखित मंत्र पढ़ना चाहिए-

दीपयाम्यद्यते घोर चिन्ति राक्षसी। सत्तमहिताय सर्व जगताँ प्रीतये पार्वतीयये॥

अर्थ यह है कि आज हम चिन्ता तथा दुःख देने वाली राक्षसी को जला रहे हैं। यह कार्य भगवान शिव को प्रसन्न करने तथा सारे संसार के कल्याण के लिए किया जा रहा है।

होली जलाने के पूर्व होलिका को अर्घ्य देने का भी विधान शास्त्रों में है। अर्घ्य का मंत्र इस प्रकार है-

होलिके च नमस्तुभ्यं दृष्टा तेजो बिमर्दिनी। सर्वपिद्रव शास्त्यर्थ गृहाणर्घ्य नमोस्तुते॥

अर्घ्यदान के उपरान्त आग जलाते समय अग्नि की प्रार्थना करनी चाहिए, जिसका मंत्र इस प्रकार है-

यन्मया शीतभीतेव निषिद्धाचरणं कृतम्। तर्त्सव क्षम्यताँ वहि यतः सर्व सहोभव॥

अब सुनिये होली जलाने की विधि क्या है। जलती हुई काष्ठ या घास फूस के ढेर में नारियल, बिजौरा, धान का लावा, नीबू के फल तथा घी मिश्रित दूध आदि डालकर रक्षोघ्न मंत्रों को पढ़कर हवन करना चाहिये-

ततोऽभ्युक्ष्य चितिं सर्वा साज्येन पयसा सुधीः। नारिकेलानि देयानि, बीजपुर फलानि च॥

होली जलाते समय होली के शव की पूजा एवं प्रार्थना का विधान भी शास्त्रों में है। होली से आग की लपट निकलने पर निम्नाँकित मंत्रों में से किसी एक को पढ़ते हुए उसकी तीन बार परिक्रमा करनी चाहिए-

असृक्या भय संत्रस्ते। कृतात्वं होलिवालिशैः। अतस्त्वं पूजयिष्यामि भूतेभूति प्रदाभव।

होलिकायाँ प्रज्वलितायाँ तमग्नि त्रिपरिक्रम्य। तेन शब्देन सायासा राक्षसी तृप्तिमापुयात्॥

शव पूजन के कुछ मंत्र इस प्रकार हैं-

अतो माँ पाहि मीतिन्यो मतिवापत्यमात्मन। आयुर्देहि यशो देहि शिशूनाँ कुरु रक्षणम। शत्रूणाँ च क्षयं देहि होलिके पूजिता सदा।

इस होलिका के शव-पूजा एवं प्रार्थना के मंत्रों से यह स्पष्ट ध्वनित होता है कि होलिका विशेषतया बालकों के मनोरंजन का त्यौहार है।

इस प्रकार होली जलाने के उपरान्त सारी रात गीत वाद्य और नृत्य में व्यतीत करनी चाहिए-

गीत वाद्योस्तथा नृत्यैः सा नीयते जनैः।

होली जलाने के दूसरे दिन अर्थात् घूरेड़ी के दिन होली का भस्म (राख) लेकर शरीर पर धारण करना चाहिए, जिसका मंत्र इस प्रकार है-

वन्दितासि सुरेन्द्रेण ब्रह्मणा शंकरेण च।

अतस्त्वं पाहि नो देवि विभूतिर्भूतिप्रदा भवेत्॥

इन्द्र, ब्रह्मा तथा शंकर द्वारा सम्मानित हे होलिके तू मेरी रक्षा कर और यह राख हमारे सुख समृद्धि की वृद्धि करे।

ऐसा प्रतीत होता है कि राख लगाने की यही प्रथा कालान्तर में कीचड़, मलमूत्र, गंदे पानी आदि के भी डालने की प्रेरणा देने वाली बन गई। शरीर पर राख धारण करने के उपरान्त तेल लगाने का भी विधान शास्त्रों में है। कुछ शास्त्रकारों के मतानुसार तो इस दिन चौसठ योगिनियों की पूजा या यात्रा करनी चाहिए।

होली के दिन नित्य कर्मों से निवृत्त होकर समस्त ऐहिक कामनाओं की सिद्धि के लिए आम का बौर चन्दन के साथ मिलाकर पीना चाहिए-

चूतमप्रयं बसन्तस्य माकन्द कुसुमेन सह। स चन्दनं पिवभ्यद्य सर्वकामार्थ सिद्धये॥

होली सर्वसाधारण का त्यौहार है और इस दिन छोटे-बड़े ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाकर सभी परस्पर हिलमिल कर इस समारोह को प्राचीन काल से ही मनाते आए हैं। यह इसी से स्पष्ट है कि हमारे शास्त्रों में इस दिन चाण्डाल के स्पर्श करने का विशेष महत्व वर्णित है। भविष्य पुराण में तो यहाँ तक लिखा है कि जो व्यक्ति इस दिन चाण्डाल का स्पर्श करता है, उसे आगामी वर्ष किसी प्रकार की विपत्ति या आधि-व्याधि नहीं सताती है। यथा-

चैत्रे मासि महबाहो पुण्ये तु प्रतिपद्दिने। यस्तत्र श्वपचं दृद्वा स्नानं कुर्याश्चरोत्तमः।

न तस्य दुरितं किचिद् आधिवो व्याधयो नृप।

कुछ शास्त्रों में चाण्डाल स्पर्श के स्थान पर केवल दर्शन का ही विधान बताया गया है।

होलिकोत्सव में बच्चों के आमोद-प्रमोद पर विशेष रूप से जोर दिया गया है। इस अवसर पर उन्हें निःशंक होकर मनमाने तौर से हंसने बोलने, खेलने कूदने एवं गाने बजाने की पूर्ण छूट दी गई है-

अभयं सर्वलोकानाँ दातव्यं पुरुषये। यथा-हयशंकिता लोका रमन्ति च हसन्ति च। दारुजानि च खड्गानि शिशिवः सप्रहर्षिताः॥

समरोत्सुक योद्धाओं की भाँति बच्चों को लकड़ी की तलवार लेकर अत्यन्त हर्ष एवं उल्लासपूर्वक घर से बाहर निकलकर खेल-कूद मचाना चाहिए, किन्तु होली की रात्रि के समय बच्चों की रक्षा की ओर भी संकेत किया गया है, जैसा कि भविष्योत्तर पुराण के निम्नाँकित श्लोकों से प्रकट है-

अस्याँ निशागमे फर्थ। संरक्ष्या शिशवो गृहे।

होलिका दहन के धुएं के प्रति भी शुभाशुभ की कामनाएं पुराणों एवं फलित ज्योतिष के ग्रंथों में लिखा है कि यदि होलिका की लपटें पूर्व दिशा की ओर जायं तो वह राजा प्रजा के लिए सुख-समृद्धि का सूचक है। अग्निकोण में अग्नि का भय, दक्षिण तथा नैऋत्य में दुर्भिक्ष, युद्ध, संकट की संभावना, उत्तर में समस्त राष्ट्र को अन्न सुख, ईशान में प्रजा में सुख-शाँति, पच्छिम में विपुल वृष्टि, वायव्य में आँधी तूफान का सूचक है।


विवेक वचनावली


विवेक वचनावली (Kavita)

कठिन राम कौ काम है, सहज राम कौ नाम। करत राम कौ काम जे, परत राम सों काम॥

दीननु देखि घिनात जे, नहिं दीननु सो काम। कहा जानि के लेत हैं, दीनबंधु कौ नाम॥

रहिमन राम न उर धरै, रहै विषय लपटाय। भुस खावै पशु आप तें, गुड़ गुलियाये खाय॥

जो जन प्रेमी राम के, तिनकी गति है येह। देही से उद्यम करें, सुमिरन करें विदेह॥

ज्ञान गम्य कहते सभी, ज्ञानी नर दिन रात। उसे चाहते देखना, परम निराली बात॥

चलौ चलौ सब कोइ कहैं, मोहिं अन्देसा और। साहब सूँ परचय नहीं, ये जइहै किस ठौर॥

कबीर हरि के नाम सूँ, प्रीति रहै इकतार। ता मुख तें मोती झरें, हीरा अन्त न पार॥

राम रसायन प्रेम रस, पीवत अधिक रसाल। कबीर पीवन दुलभ है, माँगे शीश कलाल॥

कबीर हंसना दूर करि, करि रोबना सो चित्त। बिन रोये कैसे मिले, प्रेम पियासा मित्त॥

जो रोऊं तो बल घटै, हंसों तो राम रिसाय। मन ही माँहि बिसुरना, ज्यों धुन काठहि खाय

सुखियाँ सब संसार है, रहै खाय कैं सोय। दुखिया दास कबीर है, जगि बिसरै कै होय॥

बासर सुख ना रैन सुख, ना सुख सपने महि। कबीर बिछुरा राम से, ना सुख सपने महि।

कबीर बिछुरा राम से, ना सुख धूप न छाँह॥

प्रेम व्यथा तन में बसै, सब तन जर्जर होय। राम वियोगी ना जियै, जियै तो बौरा होय॥

प्रेम पियाला जो पियै, सीस दच्छिना देय। लोभी सीस न दै सकै, नाम प्रेम का लेय॥

लाली मेरे लाल की, जित देखो तित लाल। लाली देखन मैं गई, मैं भी ह्वै गई लाल॥

प्रेम प्रेम सब कोई कहे, प्रेम न चीन्हें कोय। आठ पहर भीना रहे, प्रेम कहावै सोय॥

पिजर प्रेम प्रकासिया, जागा जोग अनन्त। संसय छूटा सुख भया, मिला पियारा कन्त॥

पिंजर प्रेम प्रकासियाँ, अन्तर भया उजास। मुख कस्तूरी मँहक सी, वाणी फूट वास॥

ममता मेरा क्या करै, प्रेमी उघाड़ी पौलि। दरसन भया दयाल का, सूलि भई सुख सौड़॥

मेरा मुझको कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर। तेरा तुझको सोंपते, क्या लागत है मोर॥

कबीर सीप समुद्र में, रटै पियास पियास। समुद्रहि तिनका सम गिनै, स्वाति बूँद की आस।

माँगत डोलत है नहीं, तज घर अनत न जात। तुलसी चातक भगत की, उपमा देत लजात॥

तुलसी केवल राम पद, लागै सहज सनेह। तो घर घट बन बाट महं, कतहु रहे किन देह॥

कहा भयो वन वन फिरे, जो बन आई नाहिं। बनते बनते बन गयेउ, तुलसी घर ही माँहि॥

कबीर मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर। पीछे लागे हरि फिरत, कहत कबीर कबीर॥

सर्व भूत में आतमा, आतम में सब भूत। यह गूढार्थ जिन्हें विदित, उनका ज्ञान प्रभूत॥

अचरज को कासों कहें, बिन्दु में सिन्धु समान। रहिमन अपने आपते, हैरन हार हिरान॥

हेरत हेरत हे सखी, रह्यो कबीर हिराय। बूँद समानी समद में, सो कब हेरी जाँय॥

लेत आत्म अनुभूति रस, शूर सबल स्वाधीन। सके न करि कबहूँ कहूँ आत्मलाभ बलहीन॥

कबीर एक न जानियाँ, बहु जाना क्या होहि। एक ते सब होत है, सब ते एक न होहि॥

विद्या, बल, धन, रूप, यश, कुल सुत बनिता मान सभी सुलभ संसार में, दुरलभ आतम ज्ञान॥

घीव दूध में रमि रह्या, व्यापक ही सब ठौर। दादू बकता बहुत है, मथि काढ़े ते और॥

काम, क्रोध, मद, लोभ की, जब लगि मन में खान। तब लगि पण्क्षित मूरखौ, तुलसी एक समान॥

मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जानि। दसवाँ द्वारा देहुरा, तहाँ ज्योति पहचानि॥

गायत्री चर्चा-


गायत्री प्रेमियों को आवश्यक सूचनाएं

(1) ‘अभिज्ञान’ आयोजन

कुम्भ पर्व पर सवालक्ष व्यक्तियों को गायत्री विद्या का ज्ञान दान देने के लिए जो ‘अभिज्ञान’ आयोजन किया गया था, उसकी गतिविधि सन्तोषजनक रीति से चल रही है। निष्ठावान गायत्री प्रेमी उसमें उत्साहपूर्वक भाग ले रहे हैं। पर अभी इस संकल्प का आधे से भी कम भाग पूर्ण हो सका है। जितना हो चुका है उससे अधिक करने को बाकी पड़ा है। इसलिए जब तक यह संख्या पूर्ण न हो जावे ‘अभिज्ञान’ आयोजन का संकल्प जारी रहेगा उसकी पूर्ति के लिए प्रयत्न जारी रखने होंगे।

जिस प्रकार 24 हजार जप का छोटा अनुष्ठान होता है इसी प्रकार 24 व्यक्तियों को गायत्री ज्ञान दान देने का भी एक ‘अनुज्ञान’ है। इसका पुण्य भी अनुष्ठान से कम नहीं है। जिन सज्जनों ने अभी तक थोड़े-थोड़े सैट मंगाये हैं वे शेष और मंगाकर 24 पूरे कर लें। और उन्हें अपने क्षेत्र में दूर-दूर तक सत्पात्रों के पास पहुँचाने का प्रयत्न करें। बेचना या वितरण करना अपनी सुविधा पर निर्भर है। यह सैट उधार भी मंगाये जा सकते हैं और सुविधानुसार मूल्य भेजा जा सकता है। जिन्हें कुछ अधिक उत्साह एवं अवसर हों वे 108 सैट मंगाकर एक दानमाला अथवा सवालक्ष अनुष्ठान की भाँति 125 सैटों का प्रसार करें। कुछ प्रभावशाली व्यक्ति 240 या 1000 व्यक्तियों को इस महाज्ञान का दान दे सकते हैं। न्यूनाधिक मात्रा में हर गायत्री प्रेमी को इस ज्ञान प्रचार अभिज्ञान संकल्प में अपना योग देना चाहिए। पाँच-पाँच पैसे मूल्य का अत्यन्त सस्ता एवं सुन्दर आठ पुस्तकों का प्रचार साहित्य केवल इसी उद्देश्य के लिए प्रस्तुत किया गया है।

जो लोग गायत्री माता के महत्व से परिचित हैं, उन्हें इस बात से भी परिचित होना चाहिए कि इस विधान की जानकारी देश के कोने-कोने में पहुँचाने से ही भारतीय आत्मबल का विकास होगा। केवल अपने जप से संतुष्ट होकर बैठा रहना पर्याप्त न होगा, माता के संदेश एवं महत्व को घर-घर में पहुँचाना भी हमारी साधना का एक प्रधान भाग है। जप अनुष्ठान की अपेक्षा यह ‘अनुज्ञान’ साधना भी किसी प्रकार माता को कम प्रसन्न करने वाली नहीं है।

(2) धन्यवाद प्रकाशन स्थगित : कुँभ पर्व पर प्रयाग में हुई हृदय विदारक दुर्घटना से समस्त गायत्री परिवार अत्यन्त दुखी हुआ है। कितने ही व्यक्तियों ने व्रत रखे हैं और उन दिवंगत आत्माओं की शाँति के लिए हवन, अनुष्ठान, श्राद्धतर्पण आदि साधन किये हैं। निःसंदेह इतने तीर्थ यात्रियों की इस प्रकार करुणाजनक अकाल मृत्यु होना सभी के हृदय को आघात लगाने वाली बात है।

गत मास जिन लोगों ने उत्साहपूर्वक गायत्री ज्ञान प्रसाद में भाग लिया है और अधिक संख्या में सैट मंगाकर अपने क्षेत्रों में वितरण किये हैं उनके चित्र, नाम परिचय आदि इस अंक में छपने की योजना थी, प्रयाग में भी जो दल प्रचार करने गया था उसका भी फोटो छपना था पर इन सभी सज्जनों ने पत्र या तार भेजकर उस शोकपूर्ण घटना के अवसर पर यह चित्र, परिचय आदि का प्रकाशन न करने का ही आग्रह किया है। हम भी उनकी इस भावना से सहमत हैं तदनुसार गायत्री प्रचार ‘अभिज्ञान’ में अधिक उत्साह से भाग लेने वालों के फोटो परिचय आदि अभी नहीं छापे जा रहे हैं। इस यज्ञ के पूर्ण होने पर एक ‘अभिज्ञान यज्ञ का सचित्र इतिहास’ ही प्रकाशित होगा जिसमें इस महान कार्य में भाग लेने वाले महानुभावों के अनुकरणीय कार्यों का विवरण रहेगा।

(3) गायत्री महायज्ञ का निमंत्रण : ऐसा निश्चय किया गया है कि प्रति वर्ष चैत्र शुक्ला त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा को गायत्री तपोभूमि में एक महायज्ञ हुआ करे। जिसमें जप, पाठ, यज्ञ, आदि का शास्त्रोक्त विशद आयोजन रहा करे। जिसमें एक शास्त्रोक्त सर्वांग पूर्ण यज्ञ एवं पुरश्चरण के साथ-साथ गायत्री परिवार के सदस्य आपस में मिल-जुल भी लिया करें और आवश्यक विषयों पर वह परामर्श एवं आत्म स्पर्श भी होता रहे जो पत्र द्वारा संभव नहीं है।

इस वर्ष यह आयोजन चैत्र शुक्ला त्रयोदशी, चतुर्दशी पूर्णिमा संवत् 2011 वि. तदनुसार तारीख 16-17-18 अप्रैल सन 1954, शुक्रवार, शनिवार, रविवार को होगा। इसमें सीमित संख्या में ही गायत्री उपासक भाग लेंगे। अधिक भीड़ एकत्रित होने से साधनात्मक कार्य ठीक प्रकार नहीं हो पाते इसलिए इसमें भी अधिक संख्या में लोग सम्मिलित न किये जावेंगे। जिन्हें मथुरा आना हो वे अपना परिचय लिखकर स्वीकृति प्राप्त कर लें। आगन्तुकों को ता. 15 की रात तक आ जाना चाहिए ताकि ता. 16 को प्रातः काल यज्ञ में भाग ले सकें।

यज्ञ में सम्मिलित होने वालों का पीले दुपट्टे, सफेद कुर्ता, धोती, पैरों में चर्म रहित जूते यही पहनावा रहेगा। स्त्रियाँ पीली धोती और पीली चादर रखें। तीनों दिन यज्ञावशिन्न हविष्यान्न ही सब को भोजन मिलेगा। भूमि शयन आदि तपश्चर्याएं उन तीन दिनों सभी के लिए आवश्यक होगी।

(4) नवरात्रि साधना : नवरात्रि के 9 दिन गायत्री उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ समय है। खेती में जिस प्रकार बीज बोने का एक विशेष समय होता है। ऋतु काल गर्भावान के लिए उपयुक्त होता है, उसी प्रकार गायत्री की विशेष साधना के लिए नवरात्रि का पर्व बहुत ही शुभ है। दिन और रात्रि की मिलन बेला को संध्या कहते हैं और सन्ध्याकाल में ‘सन्ध्या’ करना विशेष फलप्रद होता है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं की मिलन बेला में आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि आती है। इन दिनों में किया हुआ साधन अन्य समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है।

इस चैत्र की नवरात्रि ता. 4 अप्रैल रविवार को आरंभ होगी। पंचमी और षष्ठी एक ही दिन हो जाने पर इस वर्ष नवदुर्गा एक दिन घटी है। पर गायत्री उपासना के लिए पूरी नौ रातें ही आवश्यक होती हैं। उनमें घट-बढ़ का ध्यान नहीं रखा जाता। इसलिए इन दिनों 24 हजार का अनुष्ठान करने वालों के लिए पूर्णाहुति ता. 12 सोमवार को ही होगी। प्रातः काल अपना साधन पूर्ण करके हवन करते हुए साधन समाप्त किया जायेगा।

24 हजार गायत्री जप का लघु अनुष्ठान 9 दिन में पूर्ण करने के लिए प्रतिदिन 25 मालाएं जपनी होती हैं। जो 2-3 घंटे में आसानी से जपी जा सकती हैं। इतना समय केवल 9 दिन तक निकालना कार्य व्यस्त लोगों के लिए भी कुछ कठिन नहीं है। जो लोग प्रातःकाल इतना समय नहीं निकाल सकते वे अधिक जप प्रातः और शेष सायंकाल को कर सकते हैं।

प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर पूर्व की ओर मुख करके आसन पर बैठना चाहिए। घी का दीपक या धूपबत्ती में अग्नि और पात्र में जल स्थापित रहे। संध्या गायत्री पूजन तथा गुरु पूजन के बाद जप आरंभ कर देना चाहिए। अनुष्ठान में गुरु का चित्र रखकर अथवा नारियल को गुरु का प्रतीक मान कर उसका पूजन करना चाहिए। जप के अन्त में जल को सूर्य के सम्मुख अर्घ्य चढ़ा देना चाहिए।

इन दिनों जिससे जितनी तपश्चर्या बन सके उतनी ही उत्तम है। 1. ब्रह्मचर्य 2. उपवास यह दो तप प्रधान हैं। जो लोग फलाहार पर नहीं रह सकते वे बिना नमक का फलाहार एक समय लेकर काम चलावों यह भी अर्ध उपवास है। इन प्रधान दो व्रतों के अतिरिक्त नवरात्रि में अन्य तितीक्षाएं भी उत्तम हैं।

1. भूमि शयन 2. चमड़े के जूतों का त्याग 3. पशुओं की सवारी का त्याग 4. शृंगार सामग्रियों का त्याग 5. अपना भोजन, जल, वस्त्र धोना, हजामत आदि शारीरिक कार्य स्वयं करना 6. प्रतिदिन कुछ समय मौन आदि संयम नियमों को पालने का यथासंभव प्रयत्न करना चाहिए।

जप के साथ हवन की भी आवश्यकता है। 24 हजार के अनुष्ठान में कम से कम 240 आहुतियों का हवन अवश्य करना चाहिये। प्रतिदिन 24 आहुतियाँ और अन्तिम दिन 48 करने से वह पूरा हो जाता है। नित्य न हो सके तो 240 आहुतियों का हवन अन्तिम दिन भी हो सकता है।

जो साधक अपनी नवरात्रि तपश्चर्या की पूर्व सूचना हमें दे देंगे उनके साधन का संरक्षण उनकी त्रुटियों का परिमार्जन, आवश्यक पथ-प्रदर्शन तथा अनुष्ठान का परिपोषण यहाँ पर होता रहेगा। जो साधक अपना हवन न कर सके वह भी हमें सूचित कर दें तो उनके निमित्त शास्त्रोक्त विधि से हवन यहाँ कर दिया जायेगा।

अनुष्ठान की पूर्णता पर ब्राह्मण भोजन, तथा कुछ दान पुण्य करने का नियम है। जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत दुर्बल हो वे कम से कम 24 आटा छटाँक आटा 24 तोले गुड़ मिलाकर गौओं को खिला दें। दान पुण्य का एक सर्वोत्तम तरीका यह है कि ॥= मूल्य वाली 8 छोटी पुस्तकों के कुछ सैट मंगाकर अपने आस-पास के सत्पात्रों में वितरण कर दिए जावें।

गायत्री चालीसा अनुष्ठान : नवरात्रि में गायत्री चालीसा के 108 पाठों का अनुष्ठान होता है। 9 दिन में नित्य 12 पाठ करने से 108 पूरे हो जाते हैं। स्त्रियाँ बच्चे, रोगी, वृद्ध एवं अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त सभी इस अनुष्ठान को आसानी से कर सकते हैं। इसमें किसी विशेष नियम प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है। अन्त में 40 गायत्री चालीस प्रसाद स्वरूप सत्पात्रों को वितरण कर देने चाहिए।


साधना


साधना (Kavita)

लगन लिये बढ़ जाओ साधक, जग में कुछ दुःसाध्य नहीं है!

[1]

विश्व बदल जायेगा क्षण में मन को जब निःशंक करोगे। धरे हथेली पर प्राणों को, स्नेह सरोवर में बिहरोगे॥

सद्य सफलता तुम्हें मिलेगी, इसमें कुछ व्यवधान नहीं है!

[2]

बने रहो तुम अडिग हिमालय, अगणित बाधा आयें जायें। हो हताश धीरज मन तजना, अगर डरायें असफलतायें॥

लक्ष्य वेध का बिन्दु एक है, उसमें कोई भेद नहीं है!

[3]

महाकाल भी मौन रहेगा, यदि न रहे ममता का बंधन। काम क्रोध को जीत लिया तो, नियत करेगी तब अभिनन्दन॥

दीप साधना का बुझता है- मन में यदि विश्वास नहीं है!

[4]

करो साधना पर मत देखो, कैसा शुभ परिणाम मिलेगा। ऋद्धि सिद्धि की बात न सोचो, तुम्हें स्वयम् वरदान मिलेगा॥

लक्ष्य ध्येय की तन्मयता से, दूर कहीं भगवान नहीं है!

*समाप्त*

(श्री रमेशजी सुधाँशु)