अपने बालकों को मथुरा भेजिए।

(स्वल्प काल में जीवन कला सीखने का स्वर्ण सुयोग)

जेष्ठ सुदी 1 से लेकर पूर्णिमा तक 15 दिन का जो ज्ञान सत्र गायत्री तपोभूमि में होने जा रहा है। उसका महत्व भी असाधारण है। इन दिनों स्कूलों की छुट्टियाँ होती हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के बालकों को उत्तम जीवन यापन करने की शिक्षा देने के लिए यह आयोजन इस दृष्टि से किया गया है कि वे अपने मन में कुछ सुसंस्कारों की स्थापना करके अपने परिवार के लिए उपयोगी एवं सन्तोषदायक एवं अव्यवस्थित चित्त वृत्तियों के कारण मनुष्य को अपने जीवन में पग-पग पर जो असफलताएं एवं परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं, वे न उठनी पड़ें। शिक्षा के साथ-साथ सरस्वती यज्ञ का आयोजन भी इसी दृष्टि से किया गया है कि जो कभी केवल मौखिक शिक्षा से नहीं हो सकती, वह उन दिनों उत्पन्न किए गए सद्बुद्धिवर्धक वातावरण के द्वारा पूर्ण हो सके। आशा की जाती है कि इस सत्र में शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों में से अधिकाँश का अच्छा लाभ होगा। माता-पिताओं को चाहिए कि अपने बालकों को इस समय भेजें। स्मरण रहे रोगी, पागल, दुर्व्यसनी, परिश्रम से जी चुराने वाले, फैशनपरस्त, उद्दंड, आदेशों की पालन करने की प्रतिज्ञा न करने वाले छात्र इस समय नहीं लिए जावेंगे। उनके लिए कभी फिर कोई विशेष आयोजन करेंगे। इस समय ऐसे थोड़े भी शिक्षार्थी आ जायें तो इससे कार्यक्रम सारा अव्यवस्थित हो सकता है। स्वीकृति प्राप्त किए बिना कोई सज्जन न आवें।

मनोविज्ञान शास्त्र के माने हुए अनुभवी विद्वान एवं जीवन निर्माण कर्त्ता के विशेषज्ञ प्रो. रामचरण महेन्द्र इस शिक्षा सत्र का संचालन करेंगे, और भी कई उच्च कोटि के शिक्षा विशेषज्ञ शिक्षण कार्य करेंगे। दैनिक कार्यों से प्रतिदिन छात्रों की परीक्षा होती रहेगी और उत्तीर्ण छात्रों को बड़े साइज का अत्यन्त ही आकर्षक छपा हुआ प्रमाण पत्र दिया जायगा। स्वल्प काल में अनेक सद्गुणों के विकास का यह अच्छा आयोजन है। अखण्ड-ज्योति परिवार के छात्रों को इसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिए।

अपना आवश्यक वस्त्र तथा थाली, लोटा, कटोरी, गिलास, साथ लाने चाहिए। भोजन सामग्री तपोभूमि में उपलब्ध रहेगी। जो अपना भोजन व्यय स्वयं उठा सकें, वे खाद्य सामग्री के पैसे दे सकते हैं। असमर्थों को पैसे देने के लिए बाध्य न किया जायगा।

इस शिक्षा क्रम को सफल बनाने के लिए कुछ उच्च शिक्षित एवं अनुभवी महानुभावों की भी आवश्यकता है। आशा की जाती है वे बिना मार्ग व्यय या पारिश्रमिक आदि माँगे इस पुनीत कार्य के लिए विशुद्ध सेवा भावना से अपना समय एवं सहयोग देंगे।

वर्ष-14 संपादक-श्री राम शर्मा, आचार्य अंक-5


साधना पथ

(श्री रामकिशोर तिवारी)


साधना पथ (Kavita)

मैं तुम्हारी साधना का दीप बन जलता रहूँगा। मैं तुम्हारी भावना का पुष्प बन खिलता रहूँगा॥

हिय हिलोरें ले रहा है, आज हुलसित कामना है। मृदु मिलन की आस ले, यह साधना यह अर्चना है॥

प्रेम पथ पर स्वस्थ श्रद्धा से सदा चलता रहूँगा। मैं तुम्हारी साधना का दीप बन जलता रहूँगा॥

इस भटकते पथिक को, पथ का किनारा मिल चुका है। मुस्कराती वेदना का, दर्द उर को मिल चुका है॥

कामना तेरे मिलन की, जन्म भर करता रहूँगा। मैं तुम्हारी साधना का दीप बन जलता रहूँगा॥

दूर तुम हो देव! इन व्याकुल दृगों से। छुट गया हो नीड़, प्रिय, जैसे भागों से॥

आधार लेकर प्रीति का मैं वन्दना करता रहूँगा। मैं तुम्हारी साधना का दीप बन जलता रहूँगा॥

स्वर्ग से मुझको धरा पर, मत गिराओ। मैं पुजारी हूँ तुम्हारा, कर कमल आगे बढ़ाओ॥

हो भले ही सघन निशि मैं तारिका गिनता रहूँगा। मैं तुम्हारी साधना का दीप बन जलता रहूँगा॥


आध्यात्मिक पतन से सावधान

(श्री लालजीराम शुक्ल एम. ए.)

जब कोई मनुष्य अपने आपको अद्वितीय व्यक्ति समझने लगता है और अपने आपको चरित्र में सबसे श्रेष्ठ मानने लगता है तब उसका आध्यात्मिक पतन होता है। आध्यात्मिक पतन के बाद उसका सर्वनाश ही हो जाता है। अपने आपको दूसरे से उच्च समझना विश्वात्मा से विरोध करना है। इसका अर्थ अपने आपको सर्वात्मा अर्थात् परमात्मा से अलग करना है। विश्वात्मा ही हमको शारीरिक, मानसिक और नैतिक बल प्रदान करती है। जब तक हमारा इससे सम्बन्ध रहता है हम अपने आप में शक्ति और प्रतिष्ठा की अनुभूति करते हैं और हमारे अपने विचारों और कार्यों में एकता रहती है। जब हम विश्वात्मा से अपना सम्बन्ध तोड़ देते हैं तो हमारी सभी योग्यताएं नष्ट हो जाती हैं। हमारे गुण फिर दुर्गुण बन जाते हैं।

जब कोई व्यक्ति दूसरे लोगों को अपने से नीचा समझने लगता है तो अहंकार का उदय होता है। यह अहंकार की भावना दूसरों को हानि पहुँचाने वाले कार्यों के रूप में प्रकाशित होती है और अहंकारी व्यक्ति मानसिक अशान्ति का अनुभव करने लगता है। यह मानसिक अशान्ति अपने आपको सुधारने की चेतावनी देती है। अगर वह व्यक्ति इस चेतावनी के अनुसार अपने आपको नहीं सुधार लेता और अपने अनुचित कृत्यों के लिए प्रायश्चित नहीं करता तो अहंकार की प्रवृत्ति तथा दूसरों को हानि पहुँचाने वाले कार्य करने की प्रवृत्ति दोनों ही बढ़ती जाती है और व्यक्ति का सर्वनाश कर डालती है। इस सर्वनाश से वही व्यक्ति बच सकते हैं जिनमें परोपकार की भावना हो। हमारी प्रत्येक भूल अनेक दूसरी भूलों का कारण होती है। यदि कोई मनुष्य पहली भूल के बाद अपने आपको सम्हाल ले तो उसे अपने आपको बड़ा भाग्यवान समझना चाहिए। किन्तु त्याग के बिना अपने आपको सुधारने की ऐसी प्रवृत्ति सम्भव ही नहीं। जब तक हम में अहंकार की भावना रहेगी, त्याग की भावना का उदय होना कठिन है।

अपने आपको दूसरों से उच्च समझने की भावना दूसरों के आदर पाने की इच्छा के रूप में प्रकाशित होती है। अपने आपको दूसरों से बड़ा समझने वाला व्यक्ति दूसरों की शिष्टाचार की छोटी-छोटी गल्तियों को अपना अपमान समझ बैठता है। इससे उसका क्रोध बढ़ता है और कभी-कभी हिंसात्मक कार्यों में प्रकाशित हो उठता है। वह ऐसे कार्यों को कर बैठता है जो वह अपनी चेतनावस्था में अन्यथा कभी नहीं करता। इन कार्यों के परिणाम स्वरूप उसके ऊपर अनेक विपत्तियाँ आ जाती है।

इस विषय में हमारे यहाँ अम्बरीष और दुर्वासा ऋषि की कथा प्रसिद्ध है। दुर्वासा ऋषि अपने आपको दूसरों से उच्च समझने की भावना के शिकार थे। वे अपने आपको सबसे बड़ा तपस्वी मानते थे। अतएव उन्होंने अम्बरीष के एक साधारण उपवास के तोड़ने को ही अपना अपमान समझ लिया। उन्होंने अम्बरीष को शाप दिया लेकिन उस शाप का भागी उन्हीं को होना पड़ा। अगर हम किसी निर्दोष व्यक्ति पर क्रोध करते हैं तो भले ही हम उस समय उसको कुछ नुकसान पहुँचा दें, किन्तु अन्त में वह क्रोध हमारी हानि करता है। वह हमारी समस्त आध्यात्मिक शक्तियों का विनाश कर डालता है। अम्बरीष को शाप देते ही ऋषि दुर्वासा अपनी ही मानसिक शक्ति खो बैठे। भगवान विष्णु और शंकर भी दुर्वासा ऋषि को शरण नहीं दे सके। उनको अपने ध्यान तथा अन्य दूसरी आध्यात्मिक क्रियाओं में भी शान्ति नहीं मिली। अन्त में उनको झुकना पड़ा और राजर्षि अम्बरीष से क्षमा याचना करके अपनी अहंकार की भावना का नाश करना पड़ा तभी उन्हें शान्ति प्राप्त हुई।

उपरोक्त कथा में हम राजा अम्बरीष को विश्वात्मा का एक प्रतिरूप मान सकते हैं। ऋषि दुर्वासा ने इस विश्वात्मा को अपने से नीचा गिनकर उससे प्रतिद्वंद्विता स्थापित की और इससे वे आध्यात्मिक पतन की ओर बढ़े। इनकी आत्मा ने उनको बचाने के लिए मानसिक अशान्ति के रूप में चेतावनी दी। वे ऋषि थे, बड़े त्यागी थे, अपने आपको सुधारने में समर्थ हुए। अगर उनके स्थान पर कोई अन्य साधारण व्यक्ति होता तो उसका आत्म विनाश निश्चित था।

जब हम आध्यात्मिक उन्नति की अवस्था में रहते हैं तो हमारे हृदय में विश्वात्मा के प्रति लगन और दूसरों के प्रति क्षमा का भाव उदय होता है। तभी हमें मानसिक शक्ति प्राप्त होती हैं। मानसिक असाधारणता किसी भारी आध्यात्मिक त्रुटि की द्योतक होती है। जब हम इस अवस्था को प्राप्त करते हैं तो हमारे सभी विपत्तियों के मार्ग खुल जाते हैं। अपने आपको दूसरों से उच्च समझना भी मन की एक असाधारण अवस्था है। उच्च बुद्धि और उच्च चरित्र प्राप्त करना उत्तम है, किन्तु अपने आपको ऊंचा समझने की भावना आत्म विनाशक है। इस भावना के कारण हमारी आध्यात्मिक शक्तियों का अनुचित रूप से प्रकाशन होता है और आत्मोन्नति की सभी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। किसी भी चीज की अधिकता बुरी होती है। जब हमारी आध्यात्मिक शक्तियों का बाह्यीयकरण चर्म सीमा पर पहुँच जाता है तो हमारे हृदय में आत्महीनता की भावना का उदय होता है जिसका परिणाम मानसिक अशान्ति होती है। प्रत्येक मनुष्य में विश्वात्मा की शक्ति विद्यमान रहती है। जब तक वह इस शक्ति को विश्वात्मा के कार्य में ही लगाता है, उसकी आध्यात्मिक शक्ति अक्षुण्ण बनी रहती है। किन्तु वह जब इस शक्ति को अपनी ही शक्ति समझ बैठता है और उसे अपने ही हित के कार्यों में लगता है तो धीरे-धीरे यह शक्ति नष्ट होती है और अन्त में मनुष्य अपना ही विनाश कर डालता है।

जो व्यक्ति अपनी मानसिक शान्ति स्थिर रखना चाहता है उसको दूसरों की आलोचनाओं से चिढ़ना नहीं चाहिये। उसकी अपनी प्रशंसा के प्रति भी अपने कान मूँद लेना चाहिए। हमारे सामने हमारी प्रशंसा करने वाले व्यक्ति बड़े ही खुशामदी होते हैं। ऐसे लोग हमारी प्रशंसा करके हमारा अहित ही करते हैं। यदि कोई व्यक्ति हमारे अपरोक्ष में हमारी निन्दा करता है तो हमारा कर्त्तव्य है कि हम उससे न चिढ़कर उसके द्वारा कही गई सभी निन्दनीय बातों पर ध्यान दें और उनकी सहायता से अपने चरित्र को सुधारने की चेष्टा करें। अगर हम उनकी बिल्कुल परवाह न करें तो भी अच्छा है। इस संसार में कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो आलोचना और निन्दा से परे हो, सभी में कोई न कोई दोष अवश्य होता है। फिर हम अपने ही को ऐसा उच्च व्यक्ति क्यों समझे जो कि निन्दा के योग्य ही न हो। हमारी बुद्धि और शक्ति सभी एक विश्वात्मा की देन है। इसी विश्वात्मा या परमात्मा से अपना सम्बन्ध स्थापित कर हम निश्चय ही अपना उत्थान कर सकते हैं और इसी परमात्मा को भुलाकर हम निश्चय ही अपना पतन भी कर सकते हैं। अगर कोई मनुष्य बड़ा है तो केवल इसलिए कि उसने विश्वात्मा या परमात्मा से तादात्म्य स्थापित कर लिया है। अपने आपको दूसरों से उच्च समझने की भावना परमात्मा से सम्बन्ध विच्छेद की द्योतक है और हमारा आध्यात्मिक पतन है। यह सभी प्रकार के दुःखी का आगमन सरल कर देती है और हमारे मानसिक सन्तुलन को नष्ट कर देती है। मानसिक सन्तुलन के विनाश के साथ ही हमारे कार्यों का सन्तुलन भी नष्ट हो जाता है और हम परमात्मा से सम्बन्ध विच्छेद कर अपना ही पतन कर डालते हैं।


अपने को शक्तिशाली बनाइए।

(श्री अगरचन्द नाहटा)

विश्व का प्रत्येक प्राणी यही चाहता है कि वह शक्तिशाली बने क्योंकि दुर्बल मनुष्य को तो जीने का कोई अधिकार नहीं। उससे तो भगवान भी रूठ जाते हैं। अनेक रोग, शोक, भूत, प्रेत उसे आ दबाते हैं। तब शक्तिशाली जिधर भी अपनी आँख फेरता है, उसका दबदबा नजर आता है। शक्तिशाली की पूर्ण सेवा देवता भी करते हैं। आत्म-रक्षा करते हुए जीवन धारण करने और जीवन को कृतकृत्य और सफल बनाने के लिए सशक्त बनना बहुत ही आवश्यक है। शक्तिशाली व्यक्ति के चमत्कारी कार्यों को लोग युगों तक स्मरण करते रहते हैं। प्राणी मात्र का अनन्त हित साधन करने वाले सभी व्यक्तियों ने किसी न किसी तरह की शक्ति की विशेष रूप से साधना की थी और सुप्त शक्तियों को जागृत व विकसित करके ही वे महापुरुषों की कोटि में सम्मिलित हुए। हम सब प्रतिपल जीवन में शक्ति की आवश्यकता का अनुभव करते हैं। शक्ति के बिना जीवन एक तरह से जीवन ही नहीं है। मुर्दों का सा जीवन भला जीवन ही क्या? जिसमें उमंग नहीं, उत्साह नहीं, साहस व दृढ़ता नहीं, वह जीवन ही बेकार है।

(1) आत्मिक शक्ति के चमत्कार

शक्तियाँ अनेक प्रकार की होती हैं। स्थूल रूप से उनका वर्गीकरण करें तो 1-शारीरिक 2- वाचिक 3-बौद्धिक 4- मानसिक एवं 5-आध्यात्मिक, ये पाँच प्रकार की शक्तियाँ प्रधान हैं। इनमें क्रम से एक दूसरे से उच्च स्तर की है और इनमें एक दूसरी का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध भी है। भारत के मुनि ऋषियों ने इन पाँचों में से आध्यात्मिक शक्ति को ही सर्वप्रिय माना है। इसके बिना अन्य शक्तियाँ अनर्थ एवं उत्पात का कारण भी हो सकती हैं। वास्तव में विचार किया जाय तो आत्मा के कारण ही अन्य चारों शक्तियों का अस्तित्व है। आत्मा के बिना शरीर जड़ है और जड़ में कोई वाचिक, मानसिक, बौद्धिक आदि कोई भी शक्ति नहीं होती। जहाँ तक आत्मा का विद्युत करंट इनके साथ है वहीं तक इनमें प्रकाश है। शक्ति का मूल्य केन्द्र आत्मा ही है। जब पावर हाउस बन्द हुआ तो सभी बल्ब गुल हो जायेंगे। इसीलिए भारतीय विचारकों ने आध्यात्मिक शक्ति को प्रधानता देते हुए उसी की साधना पर जोर दिया है। फलतः आत्मिक शक्ति के जो चमत्कार उन्होंने दिखलाये, वे विश्व भर में अनोखे हैं।

(2) मानसिक विकास

विश्व के सभी प्राणियों का विकास एक सा नहीं होता। उनमें रुचि व प्रकृति, योग्यता की बहुत विचित्रता पाई जाती है। अतः जो व्यक्ति उच्च कक्षा की आत्मिक शक्ति के विकास की योग्यता का अपने में अनुभव नहीं करते या उनकी रुचि ही उस ओर नहीं हो, उनके लिए मन एवं शारीरिक आदि अन्य शक्तियों की उपासना, दूसरा विकल्प है। इन शक्तियों के अनेक साधन हमारे ग्रन्थों में उल्लिखित हैं। मानसिक शक्ति के विकास के लिए चित्तवृत्ति की एकाग्रता को प्रधानता दी गई है जिससे बिखरी हुई शक्ति इकट्ठी हो जाय। बुरे कार्यों की ओर धावित मन को उधर से खींचकर जहाँ हम लगाना चाहें, लगा सकें। मानसिक दुर्बलता कम होकर साहस का संचार हो। हम मनस्वी एवं दृढ़ मनोबली बनें। वस्तु रूप का गहराई से विचार कर सके और इच्छित कार्य में दृढ़ता से आगे बढ़ सकें। यह मानसिक शक्ति के विकास के सुफल है।

(3) बौद्धिक विकास

हमारे यहाँ बौद्धिक विकास के लिए व्यवस्थित शिक्षा प्रणाली की व्यवस्था की गई है। विविध ग्रन्थों के अध्ययन से हमारी बुद्धि तीव्र हो, उपज तुरन्त हो, सूझ पेनी होती है। इशारे मात्र से सारी बातों की वास्तविकता को जान सकें एवं उलझनों को सुलझा सकें। यही बौद्धिक शक्ति के विकास का उद्देश्य हैं।

(4) शारीरिक विकास

शारीरिक जीवन के विकास के लिए व्यायाम एवं परिश्रमी जीवन को महत्व दिया गया है। नियमित अभ्यास से शारीरिक शक्ति का अद्भुत विकास हो सकता है। सर्कस के खेलों में शारीरिक शक्ति के चमत्कारों को देख लोग दंग रह जाते हैं। हमारे आयुर्वेद में शारीरिक और बौद्धिक शक्ति बढ़ाने वाले अनेक पदार्थों के सेवन की चर्चा है। जिनसे पाचन क्रिया ठीक हो क्षुधा का उद्दीपन होकर रस की अभिवृद्धि हो, ऐसे अनेक प्रयोग ग्रन्थों में मिलते हैं। वीर्य रक्षा और उसकी अभिवृद्धि की ओर भी ध्यान दिलाया गया है। इन सबसे हम शारीरिक शक्ति का विकास कर सकते हैं।

(5) वाचिक शक्ति-

शब्दों में बड़ी भारी शक्ति है। उनका उपयोग ठीक से कर सकने की कला सीखिये। व्यक्तित्व कला के विकास का प्रयत्न करिये। संकोच व भय को छोड़ अपने विचार व अनुभव प्रकाश में लाते रहिये। गहरा अध्ययन एवं चिन्तन हो, जो कुछ कहा जाय स्व पर हितावत् हो, यहीं ध्यान रखिये।

हमें अपनी रुचि-योग्यतानुसार इन शक्तियों के विकास का प्रयत्न हर समय करते रहना चाहिए। हम भारतीय सदा इस क्षेत्र में शक्ति सम्पन्न रहे हैं, पर आज सभी क्षेत्रों में शक्तिहीन हो गये हैं। अतः पुनः अपनी पूर्व प्रतिष्ठा प्राप्ति के लिए शक्ति संचय के उपासक बनिये।

शिव और शक्ति का जोड़ा माना जाता है। इसका आध्यात्मिक भाव यही है कि शक्ति का उपभोग शिव कल्याण रूप वाक्यों में करिये अशिव में नहीं।


ठंडे दिमाग से विचार किया करें।

(प्रो. मोहन लाल वर्मा एम.ए., एल. एल. बी.)

ठंडा दिमाग मनुष्य की बहुमूल्य देन है। जिस व्यक्ति ने ठंडे दिमाग से जीवन की नाना विषम समस्याओं पर विचार करने की आदत का विकास किया है, वह संकट, विपत्ति या उत्तेजना के उद्दीप्त क्षणों में, जीवन के प्रत्येक मोर्चे पर सफल होता रहेगा।

एक महान साहित्यिक ने वर्षों दिन-रात घोर मानसिक परिश्रम कर एक महत्वपूर्ण मौलिक ग्रन्थ रत्न की रचना की थी। इसे वह अपने जीवन की सबसे मूल्यवान वस्तु समझते थे। संयोग से एक दिन पुस्तक को मेज पर खुली लैम्प जलता हुआ छोड़कर किसी जरूरी काम से बाहर गये। थोड़ी देर पश्चात् लौटे तो क्या देखते हैं कि कुत्ते ने लैम्प पुस्तक पर गिरा दिया है और वह जलकर खाक हो चुकी है। वह स्तब्ध हो गये। उनके इतने वर्षों के परिश्रम का यह दुष्परिणाम। अन्य कोई तेज दिमाग या उत्तेजक स्वभाव वाला व्यक्ति होता तो क्षोभ के आवेश में पागल हो जाता। किंतु उन्होंने इतना कहा- “राम तुम नहीं जानते मेरी कितनी भारी क्षति की है।” उनके ठंडे दिमाग ने उन्हें पागलपन, निराशा, नाउम्मीदी से बचाया। उन्होंने पुनः सतत् परिश्रम एवं दीर्घकाल की साधना से पुनः उस ग्रन्थ रत्न को स्मृति से लिख दिया।

एक व्यक्ति ने एक नेवला पाला। नेवला बड़ा स्वामी भक्त और विश्वास पात्र था। एक दिन घर का मालिक अपने छोटे बच्चे को खाट पर सुलाकर नेवले को रक्षक बना, किसी आवश्यक कार्य से बाहर गया। ऐसा प्रायः वह किया ही करता था। जब वापस लौटा तो दरवाजे पर नेवले को देखा किन्तु उसका मुँह रक्त से सना हुआ था। “इसने मेरे बच्चे को मार डाला है। उसी का रक्त इसके मुँह पर लगा हुआ है।” यह कुकल्पना मन में आते ही गृह स्वामी का दिमाग गर्म हो उठा। उसने फौरन लाठी से नेवले को मार डाला। जब अन्दर आया तो देखा बच्चा निश्चित सो रहा है। पर चारपाई के नीचे एक काला सर्प टुकड़े-टुकड़े होकर पड़ा है। उसे मालूम हुआ कि स्वामी भक्त नेवले ने सर्प से लड़कर बच्चे की रक्षा की थी। उसे अपने दिमाग की गर्मी एवं जल्दबाजी पर बड़ा दुःख हुआ। यह पुरानी कहानी गर्म दिमाग वालों के लिए गहरे मर्म से परिपूर्ण है।

“ठण्डा दिमाग” का तात्पर्य है, शान्ति स्थिर चित्त से सोचने, निर्णय करने की शक्ति, मन को सन्तुलित रखने की आदत, विवेक बुद्धि को सदा सर्वदा जागरुक रख कर जीवन में प्रविष्ट होने की प्रवृत्ति। वास्तव में शान्त चित्त से निर्णय करना जीवन में बड़ा उपयोगी है। बड़े-बड़े राष्ट्रों के मामलों को देखिये, बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ कितना सोच-विचार कर निर्णय करते हैं। जल्दबाजी या क्षणिक उत्तेजना अथवा आवेश में कोई कुछ नहीं करता।

सरकारी अदालतों में मारपीट, खून, चोरी इत्यादि के अनेक मुकदमे नित्य पहुँचते हैं। लड़ने-झगड़ने वाले चाहा करते हैं कि निर्णय जल्दी से जल्दी हो, किन्तु फैसला दो तीन वर्ष में होता है। तब तक दोनों झगड़ने वालों के दिमाग ठण्डे हो लेते हैं और सम्भव है वे अपनी गलती भी अनुभव करते हों। यदि तुरन्त फैसले होने लगें, तो तनाव और अपराध और भी अधिक बढ़ते रहें। कानून की शरण लेने का सबसे बड़ा लाभ यही है कि यह गर्म दिमागों को धीरे-धीरे ठण्डा कर देता है। एक स्थिति ऐसी आती है जब व्यक्ति स्वयं ईमानदारी से सोचकर निर्णय करने के पक्ष में हो जाता है और आपसी समझौता हो जाता है।

आप ठण्डा दिमाग रखा करें, तो मन में आने वाली क्षणिक उत्तेजना, घबराहट, विक्षोभ, आत्मग्लानि, निराशा से बच सकते हैं। क्षणिक भावावेश में मनुष्य का विवेक पंगु हो जाता है, बुद्धि पर भावना का पर्दा छा जाता है, और इच्छा शक्ति पंगु सी हो जाती है। गर्म दिमाग का व्यक्ति ऐसे आवेश में दूसरों का सिर फोड़ेगा, क्रोध करेगा, कत्ल कर बैठेगा या आत्मग्लानि का शिकार होकर आत्म हत्या करने से न चूकेगा। गर्म दिमाग चिड़चिड़ा, अस्थिर और उत्तेजक होता है। उसे आवेश में उचित-अनुचित का विवेक तक नहीं रहता। ऐसे व्यक्ति सबसे रूठे हुए, भिन्न मन, संकुचित दृष्टिकोण और विचित्र स्वभाव वाले होते हैं।

ठण्डे दिमाग वाले व्यक्ति में दो अमोध गुण होते है। मानसिक संतुलन एवं विवेक की स्थिरता। ऐसा व्यक्ति दूरदर्शी और संयमी होता है, और व्यर्थ के छोटे-मोटे झगड़ों, शिकायतों या झंझटों में नहीं उलझता। वह गलतफहमी में नहीं फंसता। जहाँ दूसरे के दृष्टिकोण को सहानुभूति पूर्वक सुनने-समझने की वृत्ति है, जहाँ जल्दबाजी पिशाचिनी नहीं है, जो दूसरों से ऊबता या चिढ़ता नहीं है, वह गलतफहमी में नहीं पड़ सकता।

ठंडा दिमाग आपकी आन्तरिक शान्ति, सुचारुता, नियन्त्रण एवं क्रमानुसार काम करने की अच्छी आदतों का द्योतक है।

एक मनोवैज्ञानिक ने लिखा है कि ठण्डे दिमाग का सबसे बड़ा लाभ यह है कि हमारे सारे दिन के नाना जटिल कार्य सुचारुता से सम्पन्न हो जाते हैं, उनमें कोई गलती नहीं रहती, मन सन्तुष्ट रहता है और रात्रि में सुख सन्तोषमयी निद्रा का आनन्द आता है।

वास्तव में ठंडा दिमाग तथा मीठी नींद-इन दोनों अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। वही व्यक्ति शान्तिमय निद्रा का आनन्द लूटता है जो निश्चिन्त मन, बिना तनाव वाले रक्तकोष, बेकार के अनर्थकारी विचार और अनर्थकारी कल्पनाओं से मुक्त मस्तिष्क लेकर रात्रि में शय्या ग्रहण करता है। दिमाग पर अनावश्यक मानसिक भार डालने से भयंकर स्वप्न और टूटी-फूटी निद्रा आती है।

जब आप क्रोध की उत्तेजना में पागल से हो रहे हों, तो ठंडे दिमाग से काम कीजिए। उत्तेजना के शान्त होने पर आप देखेंगे कि आप ऐसा कार्य करने चले थे, जिस पर अन्ततः आपको पछताना पड़ता। आवेश में विवेक बुद्धि दब जाती है और उचित-अनुचित का ज्ञान नहीं रह जाता।

जब आप निराशा और नाउम्मीदी के पोच विचारों से ढके हुए हों, तो दिमाग को शान्त एवं निर्मल कीजिए। कुछ समय के लिए उस कार्य को छोड़कर कोई नवीन कार्य हाथ में लीजिए, स्वल्पाहार कर जलपान कर लीजिए। मन में ताजगी आने पर पुनः नवीन रीति से अपने जीवन की जटिलताओं पर विचार कीजिए। शान्त चित्त से विचार करने पर अवश्य आप कोई नया हल ढूँढ़ निकालेंगे।

जब आप व्यापार में घाटा, पुत्र का परीक्षा में असफल होना, किसी हितैषी की मृत्यु, घर में चोरी या अन्य किसी आकस्मिक विपत्ति से त्रस्त हो रहे हों, तो धैर्य से काम कीजिए और मन को ठंडा हो लेने दीजिए। ठंडे दिमाग में उच्चविचार और विवेक पूर्ण रूप से कार्य करते हैं और नए-नए हल निकल आते हैं।

जब आप किसी सम्बन्धी के दुर्व्यवहार से खिन्न हो तो जल्दी में अपना मनुष्यत्व न खो बैठिये, वरन् निष्पक्षता से विचार कीजिए सम्भव है, स्वयं ही गलती पर हों। मान लीजिए दूसरा ही गलती पर है, फिर आप क्या करें? उसका दिमाग ठंडा होने दीजिए। विवेक बुद्धि जागृत होने पर वह स्वयं अपनी दुर्बलता पर ग्लानि का अनुभव करेगा।

दिमाग की उद्विग्नता एक अति मानवीय स्थिति है मनुष्य पशुत्व की निम्न कोटि पर सरक आता है। अतः इस मनःस्थिति में किया हुआ कार्य सदा त्रुटिपूर्ण होता है।


प्रेम सम्बन्धों को काटने की कैंची

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)

लेन-देन देखने में कितना अच्छा और उपकारी रिवाज लगता है। किसी के यहाँ खुशी का अवसर है, आप अपनी ओर से कुछ प्रेमोपहार देते हैं। लेने वाले को हर्ष होता है। वह सोचता है कि आप उसके मित्र हैं, सुहृद हैं, सच्चे हितैषी हैं। त्यौहारों पर मिठाई विवाह के अवसरों पर वस्त्र एवं रुपये, जन्म पर नाना वस्तुएं, वर्षगाँठ पर मुबारकबाद की अनेक योजनाएँ आप नित्य कार्यान्वित करते हैं। पर वास्तव में लेन-देन अनेक झगड़ों की जड़ है।

हमारे एक निकट सम्बन्धी की आप बीती सुन लीजिए। उनकी पुत्री के जन्मोत्सव पर उनकी पत्नी की सहेली ने कुछ वस्त्र भेंट किये। पत्नी प्रसन्न हुई। वे वस्त्र शौक से छोटे बच्चे को पहनाये गए।

कुछ मास पश्चात् इस सहेली की पुत्री हुई। यह जरूरी था कि मित्र की पत्नी इस शुभ अवसर पर वस्त्रों का उपहार देती। उन्होंने बड़े प्रेम से वस्त्र पहनाये और भेंट किये। लेकिन यह क्या? सहेली को वे पसन्द न आये। वे बोल उठी, मैंने सब वस्त्र रेशम के दिये थे और मुझे सूती दिये गये। क्या मैं इस योग्य नहीं कि मेरी पुत्री रेशम पहने।” बस तनातनी ठन गई। दोनों में बोलचाल बन्द। फिर घर आना-जाना भी बन्द। अन्ततः मित्रता बिल्कुल टूट गई।

सोच कर देखिये, यदि यह व्यर्थ सभ्यता का ढोंग दोनों के मध्य में न होता और लेन-देन में पारस्परिक प्रतियोगिता की भावना न होती, तो मित्रता क्यों टूटती।

हम जो कुछ दूसरे को देते हैं, उससे ज्यादा माल या ज्यादा अच्छी चीज बदले में लेने की कामना करते हैं। यह आशा दूसरे की हैसियत से बढ़ी-चढ़ी होती है। दूसरा अपनी हैसियत के अनुसार देता है, किन्तु आपकी आशाएँ तो संसार की स्थिति भूल कर आकाश में विहार करने लगती हैं। बेचारे की स्थिति आप भूल कर उसे अपनी हैसियत से नापते हैं। फलतः उसकी दी हुई चीज आपको पसन्द नहीं आती। आप इसे अपना अपमान समझते हैं और वर्षों का प्रेम सम्बन्ध लेन-देन के चक्र में आकर टूट-फूट जाता है।

विवाहों के अवसर पर लेन-देन बड़ा भयंकर रूप धारण करता है। कुछ व्यक्ति निर्लज्ज होकर दहेज आदि का सौदा करते हैं और देने में तनिक सी भी कमी होने पर तूफान मचा देते हैं। मुँह से कुछ न माँग कर कन्या पक्ष से बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधे रहते हैं। देने में कमी आने से कन्या को अनेक अमानवीय व्यंग्य या यन्त्रणाएं दिया करते हैं। ये दोनों ही निंद्य स्वरूप हैं, और त्याज्य हैं।

लेन-देन का प्रश्न सम्मुख आते ही पुराना प्रेम टूट जाता है। हम व्यापारी के स्तर पर आ जाते हैं। एक दूसरे का शोषण करना चाहता है। कम देकर अधिक हड़पने की आकाँक्षा करता है। यह स्वार्थमयी मनः स्थिति प्रत्येक धार्मिक व्यक्ति के लिए अशोभनीय है।

शेक्सपीयर इस तथ्य से भली-भाँति परिचित था। “न कभी किसी को कुछ दो, न लो।” उसका तात्पर्य रुपया उधार देना या लेने की मूर्खता से है। किन्तु हम इसका व्यापक अर्थ ले सकते हैं। जो व्यक्ति देता है, वह उससे अधिक लेने की आशा करता है। यदि आप किसी से एक वस्तु उधार लेते हैं तो कल को वह आप से दो वस्तुएं लेने की इच्छा करेगा। आप न दे सकेंगे तो मनमुटाव होगा। प्रेम कटुता में बदला जायगा।

रुपये का लेन-देन सबसे अनर्थकारी है। मित्र को रुपया ऋण पर देना मानो उसकी मित्रता की जड़ खोद डालना है। न आप उससे अपना वापस माँग सकते हैं, न रुपया बिना लिए छोड़ ही सकते हैं। एक अजीब असमंजस में आप पड़ जाते हैं। एक तो स्वयं अपना रुपया वापस माँगते हुए आपको लज्जा आती है, दूसरे मित्र अपने जाने पहचाने का रुपया होने के कारण उसे यथा समय लौटाने के इच्छुक नहीं होते।

वे व्यापार ठप्प होते हैं जिनमें उधार देने की प्रवृत्ति अधिक होती है। नियम वही है। जिसके पास एक बार अधिक रुपया कर्ज बढ़ जाता है वह उसे लौटाना नहीं चाहता। दूसरी दुकान से खरीदना प्रारम्भ कर देता है। ग्राहक और रुपया दोनों ही चले जाते है।

पुत्र-पुत्री में क्या अन्तर है? दोनों एक ही माता पिता की सन्तानें हैं, उतने ही श्रम से उनका पालन पोषण शिक्षण विवाह इत्यादि हुए हैं। क्या कारण है कि विवाहित पुत्री को घर बुलाते हुए माता-पिता सकुचाते, कतराते हैं?

कारण लेन-देन का विषम प्रश्न है। हमारे समाज की त्रुटिपूर्ण रचना कुछ इस प्रकार की है कि पिता को विवाह के पश्चात् भी प्रत्येक बार पुत्री को कुछ वस्त्र, आभूषण, रुपये तथा अन्य छोटा-मोटा सामान देना ही पड़ता है। अनेकों ऐसे अवसर आते हैं जिन पर देना ही देना रहता है। पुत्री जब कभी आती है मन ही मन पिता से कुछ लेने की गुप्त आकाँक्षा लेकर आती है। इस लेन-देन से घबरा कर अनेक माता-पिता पुत्री के आगमन से कतराने लगते हैं। यदि लेन-देन का प्रश्न सम्मुख न आये, तो स्नेह अटूट रह सकता है।

मित्र तथा निकट सम्बन्धियों के मधुर सम्बन्ध मानवीय भावनाओं की दृष्टि से बड़े सुन्दर हैं। हमें अपने मित्रों, सुहृदों, सम्बन्धियों से उत्तम सम्बन्ध अवश्य रखने चाहिए। अपने सहयोग, सलाह, पथ-प्रदर्शन, श्रमदान से उनका हाथ बंटाना चाहिए पर यथा सम्भव लेन-देन की संकुचित वृत्ति को मध्य में न आने देना चाहिए। अमुक ने हमें दावत दी, हम भी दें। हमें चाय पिलाई, हमें भी अवश्य पिलानी चाहिये। हमें अमुक उपहार दिया था, हम उससे बढ़-चढ़ कर दें, विवाह में टीके का रुपया दिया, हमें एक के स्थान पर दो देने चाहिए। ये प्रश्न निकट भविष्य में कटुता उत्पन्न करने वाले हैं।

वास्तव में होना यह चाहिए कि मित्रों या निकट सम्बन्धियों में अर्थ सम्बन्धी लेन-देन न रहे। यदि रहे तो इतना कम कि दूसरा न दे सके, तो किसी के ऊपर बड़ा भार न पड़े। कर्ज तो बिल्कुल ही न दिया जाय। यदि दिया जाय तो मन में यह सोचकर कि इसे वापस न लेंगे। या स्वयं जब मित्र या सम्बन्धी लौटाएंगे, तभी ले लेंगे।

लेन-देन का एक स्वरूप साझे का व्यापार है। तीन या चार व्यक्ति पूँजी एकत्रित कर कोई व्यापार प्रारम्भ करते हैं। प्रारम्भ में उन्हें कुछ उत्साह रहता है, किन्तु कुछ काल के पश्चात् उनकी रुचि और दिलचस्पी कम होने लगती है। एक या दो व्यक्ति दूसरों की अपेक्षा अधिक कार्य करते हैं। शेष लाभ में से हिस्सा बंटाना मात्र चाहते हैं। धीरे-धीरे व्यापार ठप्प हो जाता है और पूँजी मारी जाती है।

लेन-देन में ‘देन’ अर्थात् देना कठिन और श्रम साध्य है। मनुष्य की यह प्रवृत्ति है कि उसके अधिकार में जो थोड़ा बहुत चीज आ जाती है, चाहे वह उधार माँगी हुई पुस्तक, थर्मामीटर, फर्नीचर, दरी, बर्तन, सीढ़ी या फाउन्टेन पेन ही क्यों न हो, उस वस्तु के प्रति एक कच्चा सा मोह हो जाता है। वह उससे पृथक नहीं होना चाहता। वापस देते हुए उसका मोह जोर मारता है। अतः वह चीज को वापिस करना टालता रहता है। एक दिन, दो दिन, सप्ताह, मास निकलते जाते हैं। जब दूसरे के पुनः-पुनः तकाजे आते हैं, तब भी उसकी मोह निद्रा भंग नहीं होती। मामूली तकाजों की कोई भी परवाह नहीं की जाती। सख्त तकाजा करने से वस्तु तो वापस आ जाती है (चाहे टूट-फूट कर ही सही) किन्तु प्रेम सम्बन्ध टूट जाता है।

शुद्ध प्रेम लेन-देन पर आधारित नहीं होता। लेन-देन की प्रवृत्ति साँसारिकता है, कोरा दिखावा मात्र है। जहाँ लेन-देन की कृत्रिमता है, वहाँ निर्मल प्रेम कैसे निर्भर रह सकता है?

लेन-देन कीजिए पर अपनी बुद्धि विवेक को साथ रखिये। इस दिशा में अति करना आपके सम्बन्धियों के लिए हानिकर हो सकता है।


काम-विकार का परिमार्जन करिए।

(श्री दौलतराम कटरहा बी.ए.)

मनुष्य के काम क्रोधादि छः रिपु हैं। इन सब में काम की गणना सर्वप्रथम की जाती है। यह मनुष्य को नाना विधि नाच नचाता रहता है। जो कोई भी इस नाच से त्रस्त हो उठता है वह इससे मुक्त होने का उपाय करता है पर बहुधा मुक्त होने पर भी अपने को असहाय पाता है।

मैंने एक दिन मौका पाकर एक वृद्ध संन्यासी से यही प्रश्न पूछा। मैं उनकी परीक्षा नहीं ले रहा हूँ यह विश्वास उन्हें दिलाने के लिए मैंने स्वयं कहना शुरू किया। पार्वती जी को विवाह मण्डप में आते हुए देख कर सभी दर्शक मोहित हो गये थे। देवताओं ने उन्हें भगवान शिव की अर्द्धांगिनी और जगन्माता जानकर मन ही मन प्रणाम किया। महात्मा तुलसीदास जी ने स्वयं लिखा है-

-जगदम्बिका जानि भव वामा। सुरन मनहि मन कीन्ह प्रणामा॥

देवता लोग जगन्माता के अप्रतिम एवं अलौकिक सौंदर्य को देखकर मोहित हो गये और वे उन्हें मानसिक प्रणाम कर उस मोह से मुक्त हुए।

यद्यपि उपर्युक्त घटना ऐतिहासिक नहीं है तथापि हमें अपने मोह को दूर करने का एक सरल उपाय बताती है। जहाँ कहीं भी हमें अपने चित को मोहने वाला सौंदर्य दीखे तो (उसे परमात्मा का रूप जानकर) वहीं हम श्रद्धा और आदरपूर्वक मन ही मन प्रणाम करें और अपना मस्तक श्रद्धा से थोड़ा नीचा कर लें। मेरा विश्वास है कि यह आदरपूर्वक किया हुआ मानसिक प्रणाम हमारे मोह के वेग को अवश्य ही हल्का कर देगा।

मानसिक प्रणाम के साथ मैं मस्तक को थोड़ा नीचा कर लेना आवश्यक समझता हूँ। मन और शरीर का अन्योन्य सम्बन्ध है। यदि शरीर से कोई भाव प्रकट किया जायेगा तो मन पर उसका कुछ न कुछ प्रभाव पड़ेगा ही। उसी तरह यदि मन में कोई भाव है तो शरीर के किसी न किसी लक्षण से, भले ही वह अत्यन्त सूक्ष्म हो, वह प्रकट होना ही चाहिए। इस रीति से जब मन के मोहाभिभूत होने पर भी हम अपने कर्त्तव्य को स्मरण रख कर शरीर से आदर-भाव प्रकट करते हैं अर्थात् श्रद्धा पूर्वक अपना सिर तनिक झुका लेते हैं तो इस नमन का प्रभाव हमारे मन पर अनिवार्य रूप से पड़ता ही है। नमन का प्रभाव तो अमोघ है, अनिवार्य है। वह अपने पर पड़े हुए मोहावरण को भेद कर छिन्न-भिन्न करने में हमारी सहायता करता है।

सम्भव है कोई कहे कि यदि नीच जाति में ऐसा सौंदर्य दीखे तो उसे भी वैसा ही प्रणाम किया जाये। मैं समझता हूँ कि अवश्य करना चाहिये। भगवान कृष्ण ने स्वयं कहा है कि जो-जो भी विभूति युक्त अर्थात् ऐश्वर्य युक्त एवं कान्ति युक्त और शान्ति युक्त वस्तु है, उस उसको तू मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जान”। (गीता 10-41) अतएव इस कारण भी हमें सौंदर्य और शोभा को प्रणाम करने में संकोच न करना चाहिए।

मैं नहीं समझता कि किसी को किसी भी अन्य जाति की स्त्री को मानसिक प्रणाम करने में क्यों संकोच होना चाहिये। प्रमाण से तो सौहार्द भाव बढ़ेगा ही और कटुता दूर होवेगी। प्रणाम से हमारे विकार शान्त होवेंगे।

जिन लोगों पर मेरा कुछ प्रभाव पड़ता है, उन्हें मैं चार वस्तुओं को भी मानसिक प्रणाम करने के लिए कहता हूँ। मेरे लिए मानसिक प्रणाम के पात्र हैं-मजदूर, मेहतर, मस्जिद और महिला। इस विधि प्रणाम करने से मैंने अनुभव किया है कि मेरा गर्व बहुत कुछ दूर हुआ है।

हिन्दू को तो किसी भी जीवधारी को प्रणाम करने में न झिझकना चाहिए। वह तो वृक्ष, वाराह आदि निकृष्ट कहे जाने वाली योनियों में भी भगवान का अवतार लेना मानता है। जो समस्त विश्व को ‘सियाराम मय’ देखना चाहता है उसे तो यह हिचक छोड़नी ही पड़ेगी। अन्यथा यह हिचक उसे कभी आगे न बढ़ने देगी।

तुलसीदास जी की नम्रता तो देखिए। वे कहते हैं-

जड़ चेतन मय जीव जत, सकल राम मय जानि। बन्दौं सबके पद कमल, सदा जोरि जुग पानि॥

जिसने सब जीवों को प्रणाम किया उसके हृदय में गर्व कहाँ रहा? फिर नारी-कुल के लिए भी उसके हृदय में काम-विकार कहाँ रहा? यदि ऐसा भाव रखने के कारण ही उस महापुरुष को भगवान दर्शन हुए हों तो कौन आश्चर्य!

क्या काम-विकार बाधक है? मैं समझता हूँ कि कामियों के लिए सुखकर होने के साथ-साथ साधकों के लिए भी वह सुखकारी है। मैं कह सकता हूँ कि यदि मुझमें काम-विकार न होता तो उसे शान्त करने के लिए मैं संभवतया स्त्री-जाति को जगन्माता का रूप समझने की चेष्टा न करता। जो शायद न करता वह काम-विकार ने बरबस करा लिया। प्रभु से प्रार्थना है मुझे परीक्षा में न डाल, डोले तो साथ न छोड़।


यह गौ हत्या बन्द क्यों नहीं होती?

(गौ हत्या निरोध समिति)

गौ वंश भारतीय संस्कृति का प्रतीक, धर्म का मान बिन्दु, भारत के आर्थिक ढांचे का आधार स्तम्भ और हमारे जीवन का सहारा है। वेदों में स्थान-स्थान पर गौ को अघ्न्या(जिसकी कभी हत्या न हो) तथा विश्व की आयु लिखा, रुद्रों की माता, वसुओं की पुत्री, आदित्यों की बहन कहा। अथर्ववेद में गौ हत्यारे को शीशे की गोली से मार डालने की आज्ञा दी गई। गाय को सर्वदेव पूज्य तथा सर्वदेवमयी माना। उपनिषदों, पुराणों, रामायण तथा महाभारत में स्थान-स्थान पर गौ महात्म्य भरा है। करोड़ों लोग गौ के शरीर से तैंतीस करोड़ देवताओं का वास मानते हैं। महात्मा बुद्ध ने गौ रक्षा की ओर ध्यान दिलाया, जैन धर्म ने भी गौ रक्षा को महत्व दिया। महर्षि स्वामी दयानन्द जी सरस्वती ने गौ हत्या बन्द कराने के लिए बहुत बड़ा आन्दोलन किया तथा गौ नाश से राजा और प्रजा दोनों का नाश बतलाया। गुरु नानक से लेकर गुरु गोविन्द सिंह जी तक सभी गुरुओं ने भी गौ रक्षा के प्रश्न को महत्व दिया। गुरु रामसिंह जी और उनके नामधारी सिखों ने अनेक कष्ट उठाये, कितने ही नामधारी सिख तोपों से उड़ाये गये और फाँसी पर चढ़े। संत कबीर, चैतन्य महाप्रभु ओर गोस्वामी तुलसीदास ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा।

भगवान श्री कृष्ण चन्द्र जी ने गौ रक्षा और गौ पालन का आदर्श उपस्थित किया। चक्रवर्ती राजा दिलीप गौ के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार हुए। महर्षि वशिष्ठ ने अनेक कष्ट उठाये तथा महर्षि जमदग्नि ने अपने शरीर तक का बलिदान दिया। मुसलमानों और अंग्रेजों के राज्य में कितने ही लोगों ने गौ हत्या बन्द कराने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगाई। इन बातों से यह सिद्ध होता है कि भारत के लोग सदैव से गौ हत्या के विरोधी रहें, गौ रक्षा का प्रश्न उनका धार्मिक अथवा साँस्कृतिक प्रश्न है। बाबर, हुमायूं, अकबर, जहाँगीर तथा कुछ अन्य मुसलमान बादशाहों ने भी यहाँ के लोगों की भावना को दृष्टि में रखते हुए गौ हत्या को बन्द किया।

धार्मिक और साँस्कृतिक भावना के अतिरिक्त आर्थिक दृष्टि से भी गौ रक्षा का प्रश्न कम महत्व नहीं रखता। केन्द्रीय सरकार की पशु अनुसंधान संस्था इज्जत नगर के डॉ. एन. डी. केहर एम. एस. एस. डी. के मतानुसार भारत को गौ धन से तीन अरब नब्बे करोड़ रुपये वार्षिक आमदनी होती है। यह भारत की कुल आय का 25 प्रतिशत से भी अधिक भाग है। इतनी अधिक आय रेलवे, कपड़ा, चीनी, लोहा, इत्यादि किसी भी दस्तकारी या व्यापार से अधिक आय होती है, वह उस पर अन्य व्यापारों से अधिक ध्यान देता है। संसार के अन्य देशों में खेती घोड़ों तथा मशीनों से होती है। पर भारत की खेती का आधार है गौ वंश। बैल, हल, गाड़ी, कुएँ, रहट चलाते हैं। भूमि को उर्वरा रखने के लिए गोबर और गौ-मूत्र सस्ती और सुलभ खाद है। अन्न, साग, सब्जी, दूध, घी, दही और छाछ आदि जो हमारे जीवन का मुख्य सहारा है, उनके उत्पादन का मुख्य साधन भी गौ वंश ही है। वास्तव में भारतीयों के जीवन और भारत की समृद्धि बहुत कुछ गौ वंश पर ही निर्भर है। गौ वंश के दस महत्व और आवश्यकता को दृष्टि में रखते हुए हिन्दू राजाओं ने ही नहीं, प्रायः मुसलमान बादशाहों ने भी गौ हत्या निषेध और गौ वंश की उन्नति के कार्य किये।

कुछ मुसलमान बादशाहों ने हिन्दुओं को अपमानित करने के लिए गौ हत्या आरम्भ की, पर उन दिनों नाममात्र गौ हत्या होती थी। आर्थिक गौ हत्या का आरम्भ अंग्रेजों ने खाल व्यापार बढ़ाने, हिन्दू-मुस्लिम झगड़े कराने तथा देश के लोगों की शारीरिक शक्ति को कमजोर करने के लिए किया। भारतीय गायों की खालें संसार भर में अच्छी होने के कारण भारत को खाल बाजार का एक प्रमुख केन्द्र बना दिया। कितने ही अच्छे मुसलमान बादशाहों ने हिन्दुओं को प्रसन्न करने के लिए गौ हत्या बन्द की, पर अंग्रेजों ने हिन्दू-मुसलमानों को लड़ाने के लिए गौ हत्या का हथियार चलाया। जिस भारत में अतिथियों को पानी की जगह दूध पिलाया जाता था, जहाँ मुस्लिम काल में भी एक आना सेर घी मिलता था। पर्याप्त दूध, घी मिलने के कारण भारतीयों की शारीरिक शक्ति एक विशेष स्थान रखती थी, अंग्रेजों ने इस शारीरिक शक्ति को नष्ट करने के लिए गौ धन का ह्रास और विनाश किया। अंग्रेजों ने इससे भी अधिक गौ को जो नुकसान पहुँचाया वह है भावना को दूषित करना। अंग्रेजी राज्य से पहले सब हिन्दू ही नहीं लाखों मुसलमान भी गौ हत्या के नाम से घृणा करते थे। गौ हत्या के लिए लोग अपने प्राणों तक की बाजी लगाते थे। गौ हत्या के पक्ष में किसी को मुख खोलने तक की हिम्मत न थी, पर जैसा कि मैकाले ने कहा था अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से ऐसे लोगों की एक बहुत बड़ी संस्था हो जायगी, जिसका रंग तो भारतीय होगा पर हृदय अंग्रेज। मैकाले का यह स्वप्न पूरा हुआ। देश में कितने ही हिन्दू जिनके पूर्वज गौ रक्षा को परम धर्म मानते थे, आज गौ हत्या एवं गौ वंश के ह्रास और निराश करने कराने के वकील बन गये और यही लोग गौ हत्या के प्रमुख कारण है।

काँग्रेस ने आरम्भिक दिनों में हिन्दू जनता की सहानुभूति प्राप्त करने के लिए गोरक्षा का समर्थन किया। 1921 में जब मुसलमान खिलाफत के नाम पर सरकार से सहयोग करते थे, 1921 की गोपाष्टमी को दिल्ली के पटौदी हाउस में महात्मा गाँधी जी, पं. मोतीलाल नेहरू, ला. लाजपत राय, हकीम अजमल खाँ, डॉ. अन्सारी, श्री देशबन्धु गुप्त, पं. नेकीराम जी शर्मा, पं. इन्द्रविद्यावाचस्पति तथा श्री आसफअली आदि प्रसिद्ध कांग्रेसी नेताओं और सैकड़ों लोगों की उपस्थिति में गौ रक्षा कराने के लिए सरकार से पूर्ण सहयोग करने का प्रस्ताव पास किया। महात्मा गाँधी जी ने 1926 में गौ रक्षा को आवश्यक समझते हुए कहा- “मैं स्वराज्य के लिए भी गौ रक्षा का आदर्श नहीं छोड़ सकता”। गाँधी जी ने 25 जनवरी 1925 के “नवजीवन” में लिखा कि “हिन्दुस्तान में हिन्दुओं के साथ रहकर गौ वध करना हिन्दुओं का खून करने के बराबर है। गौ हत्या मेरी हत्या है।” गाँधी जी ने गौ रक्षा को हिन्दुत्व का मुख्य लक्षण टहराया तथा जो लोग प्राचीनकाल में गौ माँस खाने की बात कहते हैं, उनका विरोध किया। श्रद्धेय बाल गंगाधर तिलक, ला. लाजपत राय, पं. मदनमोहन मालवीय सब गौ हत्या निषेध के समर्थक रहे। देश के कितने ही इलाकों में चुनावों के समय काँग्रेसी उम्मीदवारों ने गौ रक्षा के नाम पर वोट प्राप्त किये। जनता को आशा ही नहीं विश्वास था कि देश के स्वतन्त्र होते ही गौ हत्या बन्द हो जावेगी।

काँग्रेस नेताओं ने गौ रक्षा और गौ हत्या बन्द करने के लिए विधान की धारा 84 बनाई, तरह-तरह की कागजी योजनाएँ भी तैयार की पर अंग्रेजी राज्य की अपेक्षा गौ हत्या तो बढ़ी ही, महात्मा गाँधी जी के सिद्धान्तों और आदेशों को ठुकराकर, गौ वंश को निकम्मा बनाकर नष्ट करने वाले नकली घी, नकली दूध और नकली खाद तथा ट्रैक्टर आदि को भी सरकार ने अनुचित प्रोत्साहन दिया। महात्मा गाँधी जी ने जिस वनस्पति घी को देश के साथ किये जाने वाला सबसे बड़ा धोखा बतलाकर इसकी उपेक्षा करने वाले को भी हिन्दुस्तान का छात्र बतलाया था। जिस वनस्पति घी के विरुद्ध दो तिहाई राज्य सरकारों, केन्द्रीय एसेम्बली के सदस्यों और काँग्रेस कार्यकारिणी ने भी मत दिया था, सरकार इन सबको ठुकराकर वनस्पति घी वालों की वकील बन गई और रंग डालने की माँग को भी खटाई में डाल दिया। अमेरिका, इंग्लैंड आदि जिन देशों में प्रायः लोग गौ माँस खाते हैं, वहाँ ऐसी अच्छी गायों का कत्ल नहीं होता, जैसा आज हमारे देश में हो रहा है। कसाई को वृद्ध और अपंग गौ के कत्ल से चालीस या पचास प्रतिशत और अच्छी नव-जवान गौ के कत्ल से शत प्रतिशत लाभ होता है। अतः कसाई अच्छे पशु को ही कत्ल करने का प्रयत्न करता है। अंग्रेजी राज्य में प्रायः गौ वध कसाई खानों में ही होता था, उसकी गिनती हो सकती थी पर आज कसाई निर्णय होकर घरों, खेतों और जंगलों में गौ वध करता है। जिसकी गिनती भी नहीं हो सकती। कत्ल का अनुमान लगाने का एक ही प्रमाणित साधन है, खालों का निर्यात। भारत सरकार की निर्यात विकास कमेटी 1948 तथा केन्द्रीय कृषि मंत्रालय के 20 दिसम्बर 1950 के पत्र द्वारा लाखों के निर्यात के लिए गौ हत्या जारी रखने की दलील दी गई है, अतः यह सिद्ध है कि जिन खालों का निर्यात होता है वे प्रायः कत्ल करने से ही प्राप्त की जाती हैं। प्रधानमंत्री पं. नेहरू जी ने 3 फरवरी 1954 को गौ हत्या निरोध समिति के शिष्ट मण्डल को बताया कि 1946 की अपेक्षा आज गौ हत्या बहुत कम होती है। काँग्रेस के अन्य नेता भी ऐसा ही प्रचार करते हैं, पर सरकार रिपोर्ट के अनुसार 1946 की अपेक्षा आज चार गुणा गौ हत्या बढ़ी। सरकारी खाल तथा निर्यात रिपोर्ट के अनुसार सम्मिलित भारत से 1946 में 2,29,500 बछड़ों की खालें, 1,40,000 गायों की कच्ची खालें, 17,20,000 गायों की पक्की खालें तथा दस हजार तैयार चमड़े, कुल 21,09,500 गायों की खालें विदेश को गई। पशु संख्या के अनुपात से पाकिस्तान की एक चौथाई खालें कम होकर खण्डित भारत की 1945-46 तथा 1952-53 के निर्यात के अंक इस प्रकार हैं-

1945-46 बछड़ों की खालें 172000, गायों की कच्ची खालें 105000, गाय की टैण्ड खालें 1300000, तैयार खालें 7500, जोड़ 1584500।

1952-53 बछड़ों की खालें 2007951, गायों की कच्ची खालें 10000, गाय को टैण्ड खालें 4609173, तैयार खालें 150000, जोड़ 6777124।

पिछले छः सालों में कत्ल किये हुये चमड़े की चीजों का व्यापार और व्यवहार भी बढ़ा, उसके अंक मालूम न हो सके। पर यह संख्या तीस पैंतीस लाख से कम नहीं। यदि केवल मात्र लाखों के निर्यात के अनुमान लगाया जाय जो भी 1946 की अपेक्षा चार गुणा से अधिक गौ हत्या बढ़ी है। अंग्रेजी राज्य के समय 15-16 लाख रुपये का बूढ़े पशुओं की विशेषतया भैंसों, कटडों का सूखा माँस बर्मा आदि सुदूर पूर्व के देशों को जाता था। पर 1 जुलाई 1952 से 30 जून 1953 तक सरकारी कष्टम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार 56 लाख रुपये का गौ माँस, गौ की आंतें, जिह्वा आदि विदेशों को बम्बई, कलकत्ता, मद्रास से केवल तीन बन्दरगाहों से भेजी गई हैं। भारत में कुल 22 बन्दरगाहें हैं। अन्य 19 के अंक अभी नहीं मिले हैं मछलियों के साथ और जहाज राशन के नाम से जो गौ माँस ले जाया जाता है, उसके अंक भी प्राप्त नहीं हो सके। ठीक तो नहीं कहा जा सकता पर अनुमान एक करोड़ से कम का गौ माँस आदि का निर्यात भारत से नहीं होता। सरकारी रिपोर्टों और कुछ इलाकों की जाँच के आधार पर निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि आज देश में गौ को मूली गाजर की तरह काटा जा रहा है, कोई पाबन्दी नहीं।


Quotation

करत करत अभ्यास के, जड़ मत होत सुजान। रसरी आवत जात तें, सिल पर परत निसान॥

भली करत लागे विलम, विलम न बुरे विचार। भजन बनावत दिन लगे, ढ़ाहत लगे न बार॥

का रस में का रोस में, अरि को जनि पतियाय। जैसे शीतल तप्त जल, डारत अग्नि बुझाय॥

होय भले को सुत बुरो, भला बुरे को होय। दीपक ते काजल प्रकट, कमल कीच ते होय॥

होय भले चाकरन ते, भले धनी को काम। त्यों अंगद हनुमान ते, सीता पाई राम॥

बिना कहेऊ सतपुरुष, पर की पूरैं आस। कौन कहत है सूर को, घर-घर करत प्रकाश॥


सर्प-विष और उसके प्रतीकार

(श्री चन्द्रभूषण मिश्र, आयुर्वेदाचार्य)

सर्प-दंश की चिकित्सा के पूर्व यह जान लेना आवश्यक है कि किस-किस स्थान विशेष का काटा हुआ मनुष्य नहीं बच सकता और चिकित्सा भी निष्फलप्राय होती है।

अश्वत्थ देवायतन श्मशान,

बाल्मीक सन्ध्यासु चतुष्पथेषु।

याम्ये स पित्र्ये परिवर्जनीया,

ऋक्षे नरा मर्मसु ये च दष्टा॥

(सुश्रुत-कल्प 4)

तात्पर्य यह कि पीपल वृक्ष के ऊपर या नीचे, मन्दिर में, श्मशान में, मरुभूमि या रेत पर, संध्या में, जहाँ चार रास्तों का एक सन्धि-स्थान हो तथा नर्म स्थान-जैसे ललाट, सिर, कण्ड तथा छाती प्रभृति में, यदि साँप काट ले तो बचना असम्भव-सा हो जाता है। फिर भी इलाज अवश्य करना चाहिए।

तीन अवस्थाएँ

सर्पदंश मनुष्य की तीन अवस्थाएँ होती है, जो संक्षेप में इस प्रकार हैं-

प्रारम्भ में जब साँप काट लेता है तब साँप के काटते ही विष शरीर के रक्त में मिलकर शिरा धमनी तथा रसायनी के द्वारा रक्त के दौरान के हिसाब से फैलने लगता है तथा रक्त विष के कारण दूषित हो जाता है। इस दशा में विषाक्त रक्त काला, पीला या सफेदी लिये भदरंग हो जाता है और मानव शरीर में बड़ी गर्मी मालूम होती है।

दूसरी दशा में विष माँस-पेशियों को दूषित करने लगता है। यही कारण है कि आँख, मुँह, दाँत, नख और शरीर साँप के भेद के हिसाब से कृष्ण, पीत, सफेद देख पड़ते हैं। धीरे-धीरे तन्द्रा-सी आने लगती है। सन्धियों में बहुत दर्द होता है और चक्कर-सा आने लगता है। आमाशय तथा पक्वाशय में विष का प्रभाव स्थिर हो जाता है।

तीसरी दशा में सर्प का विष प्रायः सभी धातुओं को दूषित करता हुआ शुक्राशय में पहुँच कर हृदय तथा फुफ्फुस की शक्ति को नष्टप्रायः करने लगता है। इस दशा में मनुष्य की संज्ञा एकदम नष्ट हो जाती है। शरीर के रोम कूपों से पसीना अधिकाधिक आने लगता है और कण्ठ में कफ की गाँठ पड़ जाती है, इसी कारण अन्त में श्वास का आना-जाना बन्द हो जाता है और प्राणवायु नष्ट होने लग जाती है। यह अन्तिम अवस्था है।

तुरन्त ही दंश-स्थान को तेज छुरी से 1॥-1॥ इंच चीरकर एक इंच तक का माँस निकाल दे। ऊपर से गर्म पानी से धोते रहना चाहिए। इस क्रिया से रक्त का निकलना जारी रहेगा और विष भी निकल जायेगा। यह उपाय साँप के काटते ही आध घण्टे तक का है। ऐसा न होना चाहिए कि साँप का विष समूचे शरीर में फैल गया हो और घण्टे दो घण्टे तक यही उपाय किया जाय, अन्यथा अधिक रक्त निकाल देने से कहीं-कहीं हानि भी देखी गई है।

कहाँ तक विष का प्रभाव पहुँचा है, इसकी सबसे आसान पहचान यह है कि जहाँ तक विष का प्रभाव पहुँचा होगा वहाँ तक का रोम (केश) एक दम झुक जायगा, और यह कि जब तक विवर्ण रक्त काला, पीला एवं कुछ सफेदी लिए हुए भदरंग खून गिरता रहे, तब तक समझना चाहिए कि रक्त अभी विष के कारण दूषित है और जब लालिमा लिये हुये रक्त कुछ देर तक निकलता रहे तो समझना चाहिये कि अच्छा रक्त आ रहा है, विष का प्रभाव नष्ट हो गया। इसके बाद दंश स्थान को पुनः अगल-बगल से चारों-ओर पोंछकर ऊपर से गन्धक का तेजाब गिरा दें अथवा कार्बोनिक एसिड या पोटास उसमें डाल दें तथा आयडोफार्म गौज कटे स्थान में भरकर बैण्डेज बाँध दें। इस उपाय से बहुत लाभ देखा गया है।

एक यह भी उपाय है कि लोहे को गर्म कर काटे हुए स्थान को जला दें, बाद में शिरीष वृक्ष की छाल के स्वरस में केले की जड़ को पीसकर लेप करें तो विष नष्ट होगा।

खतरे की हालत में

अगर किसी कारण से पूर्व कथित उपायों से लाभ दृष्टिगोचर न हो, विष बढ़ता ही जा रहा हो अग्निदाह तथा रक्त-स्राव से लाभ न हो रहा हो तो जीवन बहुत बड़े खतरे में पड़ जाता है और चिकित्सा में बड़ी कठिनाई आ जाती है।

इस दशा में सर्वांग प्रसूत विष के निवारण के लिए फिर उपाय यही है कि नसों एवं शरीर के कई भागों कई जगह चीर-चीर कर शरीर का विषाक्त रक्त बाहर निकाल दिया जाय और बाद में उन चीरे हुए स्थानों पर शिरोष की जड़ की छाल पीस कर लेप कर दें। इसके प्रभाव से विष नष्ट होने लग जायगा। किन्तु यह सबके लिये हितकर नहीं है, जैसा कि आचार्य सुश्रुत ने कहा है-

गर्मिणीबालवृद्धनाँ सिराव्यधन वर्जितम्। विषार्त्तानाँ यथोदिष्टं विधानं शम्यते मृदु॥

इन सभी बातों को ध्यान में रखते हुये चिकित्सा करनी चाहिये। यदि विष धीरे-धीरे फैलकर आमाशय में पहुँच गया हो तो यथाशीघ्र वमन कराकर विष बाहर निकाल देना चाहिये। ऐसा न करने पर विष आमाशय के बाद पक्वाशय में पहुँच कर अन्तड़ियों में फैल जाता है और बाद में हृदय एवं फुफ्फुस को दूषित कर डालता है। इस स्थिति में पंचकर्म- याने वमन, विरेचन, नस्य, विरुह तथा अनुवासन-चिकित्सा का स्तम्भ माना गया है, अतः पंचकर्म द्वारा उपचार करने से अत्यधिक लाभ होता है।

इसी चिकित्सा के प्रसंग में आचार्य ने कहा भी है कि-

किमत्र बहुनोक्तेन जैगलेनैव तक्षणम्। घृतं शीताम्बुना श्रेष्ठ भेषजं सर्पदंश के॥

जमालगोटे को पानी में पीसकर पीने से साँप का काटा हुआ तत्काल अच्छा हो जाता है। जमालगोटे में एक विशेष गुण यह भी है कि बिच्छू के काटे हुए स्थान पर लेप करने से बिच्छू का विष बहुत जल्द उतर जाता है।

त्रिवृद्धिशल्ये मधुकं हरिद्रे,

रक्तानरेन्द्रो लवणउच वर्गः।

कटुत्रिकं चैव विचूर्णितानि,

श्रृंगे निदध्यान्मधु संयुतानि॥

ऐषोऽगदो हन्ति विषप्रयुक्त,

पानाँजनाभ्यंजन नस्य योगैः

अवार्य वीर्यो विषवेगहंता ,

महागोदो नाम विष्पप्रभावः॥

(सुश्रुत-कल्प 5)

-त्रिवृत, इन्द्रायण की जड़, जेठी मधु, हरदी, दारुहल्दी, मंजीठ तथा सभी प्रकार के लवण, इन सब दवाओं को सम भाग लेकर मधु में मिला दें और गौ शृंग में भर कर उसका मुँह गौ शृंग से ही बाँधकर पन्द्रह दिनों तक स्थिर एक स्थान में छोड़ दें। इसके बाद इसके प्रयोग से शत प्रतिशत लाभ उठायें। इसे ही आचार्यों ने महाअगढ़ के नाम से सम्बोधित किया।

इस महा गुणकारी औषधि को गौ दुग्ध अथवा मधु में दो आने भर मिलाकर सर्पदंश से पीड़ित मनुष्य को खिलावें, आँखों में अंजन करें, नस्य दें तथा सर्पदंश स्थान पर लेप करें।

यह औषध भयंकर सर्प-विष को नष्ट कर डालती है। इस तरह की दवाएं प्रायः प्रत्येक गृहस्थ के यहाँ वर्षा ऋतु में तैयार करनी चाहिए, ताकि आवश्यकता पड़ने पर सभी के प्राण बचें। यह दवा अन्तिम अवस्था में भी उपयोगी सिद्ध हुई है।

अन्य योग

1- कच्ची फिटकरी 5 तोला, गाय का दूध 10 तोला पीसकर पिलावे तथा दंश-स्थान पर लेप करें।

2- फिटकरी का लावा 6 माशा, कालीमिर्च 1 माश, गर्म जल 10 माशा पीसकर बारम्बार पिलावें, बहुत लाभ होगा।

3- घी, नेउन, मधु, पीपल, अदरक, कालीमिर्च और सेंधा नमक- इन सातों को बराबर-बराबर एकत्र पीसकर आने भर की मात्रा में सर्पदंश रोगी को सात छटाँक निम्न के क्वाथ में या शिरीष वृक्ष की छाल के क्वाथ में देने पर क्रोध युक्त सर्प का काटा हुआ भी विष फट जाता है और रोगी अच्छा होने लगता है।

सर्प का काटा हुआ रोगी प्रायः संज्ञाहीन हो जाता है। लोग समझते है कि वह मर गया। मृत्यु की भली प्रकार परीक्षा किये बिना सर्पदंशित रोगी को अंत्येष्टिज न करना चाहिए। मृतक और संज्ञाहीन का अन्तर इस प्रकार जान सकते हैं-

अन्तिम अवस्था की परीक्षा

(क) संज्ञाहीन जीवित पुरुष की आँखों की पुतली में यदि चमक हो तो जानना चाहिए कि रोगी अभी जिन्दा है।

(ख) रोगी को प्रकाश में रख कर आँखों की पलक को उठाकर देखना चाहिए, अगर देखने वालों का प्रतिबिम्ब रोगी के नेत्रों में पड़ें तो समझना चाहिए कि रोगी जीवित है। इसी तरह रात्रि में यदि ऐसी बात हो तो दीप को उसके सामने कर पलक उठाकर देखना चाहिए। यदि रोगी के नेत्र में दीप का प्रतिबिम्ब दीख पड़े तो समझना चाहिए कि रोगी जीवित है।

(ग) रोगी की नाक और मुँह को दबाकर देखने से, सुई या पिन के चुभाने से अथवा लोहे को गर्म कर दागने से यदि कुछ भी कम्पन मालूम पड़े तो समझना चाहिए कि रोगी अभी जीवित है।


घर का आँगन-आफिस की कुर्सी नहीं

(श्रीमती रेणुका देवी बी.ए.)

अभी परसों शाम को मैं अपनी नौ साल की लड़की के साथ बैठी अपने लड़के के लिए, जिसकी आयु 12 साल की है, कपड़े सी रही थी। मेरी लड़की बहुत देर तक कपड़ों की सिलाई को देखती रही। सिलाई जब खत्म होने को आई तो उसने एक ठण्डी-साँस लेकर धीरे से कहा- “माँ, मैं भी लड़का होती तो ऐसे ही कपड़े पहनती!”

मैंने पूछा- “क्यों, तू लड़का क्यों होना चाहती है?”

“हाँ ,मैं लड़का ही होना चाहती हूँ!”

“मगर क्यों? लड़के क्या लड़कियों से किसी बात में अच्छे होते है!”

कई बार पूछने पर भी, लड़की ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर मैं समझ गई कि उसके मन में यही ख्याल जमा था कि लड़का होना लड़की होने की अपेक्षा ज्यादा अच्छा है। कोई खास वजह उसकी उससे पूछना व्यर्थ था, क्योंकि वह बता ही न पाती, मगर मैं इस बात को जानती हूँ कि जो मेरी लड़की का ख्याल है, वह 95 प्रतिशत स्त्रियों की भी जन्म प्रधान भावना है। लड़कों के बराबर साधन, देख-रेख और आराम मिलने पर भी-जैसा कि मैंने अपनी लड़की को दे रखे हैं- हर लड़की को हमेशा यह अनुभव होता रहता है कि आखिर वह एक लड़की ही है और लड़कों से हीन है। यही बात वयःप्राप्त स्त्रियों के बारे में भी सच है।

यह हीन-भावना क्या स्वाभाविक है? इसमें कितनी यथार्थता है?

मैं पश्चिम की स्त्रियों के बारे में नहीं जानती, सिर्फ अपने देश की कुछ जातियों की स्त्रियों का अनुभव मुझे है। मेरा अनुभव है कि हमारे यहाँ स्त्री के जीवन का आरम्भ ही सहने से होता है। आचार विवेचना को अलग रखकर उसे अपने स्वभाव में न्याय या अन्याय सबको सहने की सहिष्णुता लानी पड़ती है। विवाह के लिए भी 90 प्रतिशत स्त्रियों को अपनी स्वाधीनता, अपनी आवाज, अपने आत्म सम्मान के सब लक्षण मिटा देने पड़ते हैं। एक लम्बे काल से पुरुषों ने स्त्रियों के मन और मुँह को इस प्रकार बाँध रखा है कि स्वाधीनता के प्रति विमुखता अब उनके स्वभाव का एक खास अंग बन गई है।

एक बात और है, स्वभाव में सहन करने की आदत वहीं आती है, जहाँ व्यक्ति या तो दुर्बल हो या परिश्रमी। स्त्रियाँ दुर्बल भी हैं, परिश्रमी भी। इसके अलावा उनमें स्वभाव की एक विशेषता और है-वह प्रबल अत्याचार से आहत होकर भी उसके खिलाफ शिकायत नहीं करती। पुरुषों ने स्त्रियों की इस निःसहायता का हमेशा लाभ उठाया है।

जैसा अस्वास्थ्यकर और घुटा जीवन स्त्रियों को बिताने के लिए विवश होना पड़ता है, उसकी दो ही प्रतिक्रियाएँ उनके जीवन में होती हैं। पहली- या तो वह पुरुषों के बराबर पहुँचने की चेष्टा करती है और जिन सौभाग्यवतियों को ऐसा करने का अवसर नहीं मिलता, वह सासुओं, ननदों और जेठानियों के बेहिसाबी दिमाग से परेशान होकर एक ही आकाँक्षा को मन में प्रबल करते रहती हैं कि उम्र आने पर वह स्वयं भी अन्ध प्रभुत्व शक्ति को पायें।

दूसरी बात को छोड़कर मैं पहली ही बात की चर्चा इस लेख में करूंगी। मेरा कहना है कि स्त्री की पुरुष के बराबर पहुँचने की चेष्टा दुःसाध्य है। वजह साफ और सीधी है। स्त्री और पुरुष में अनिवार्य असमानता है और दोनों की निजी शक्ति सम्पूर्णतः अपने-अपने क्षेत्रों में ही प्रकट हो सकती है। इसके अन्यथा होने से उस शक्ति का रूप कृत्रिम और विकृत हो जाता है।

मैं यहाँ यह बहस नहीं करना चाहती कि पुरुष महान है या स्त्री? कर्म और संघर्ष के क्षेत्र में अनेक बाधाओं को लाँघ कर पुरुष अपनी योग्यता और श्रेष्ठता दिखाते आये हैं, सभी बड़े-बड़े वैज्ञानिक, भौगोलिक आविष्कार उन्होंने किये हैं। साहित्य, राजनीति, धर्म और व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रों में पुरुषों की ही जय-जयकार सुनाई देगी। कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दो-चार स्त्रियों के नाम भी सुनने में आ जायेंगे। इतिहास में स्त्रियाँ चमकी हैं तो पुरुषों के प्रकाश की प्रतिच्छाया में, स्वयं अपनी महत्ता से कम। अधिकतर वह इतिहास के ‘अन्धकार’ में ही रही हैं।

मैं अब अपने मुख्य विषय पर आ गई हूँ। कहना चाहती हूँ कि इसी ‘अन्धकार’ में स्त्रियों को अपनी दक्षता दिखलाने का मौका मिला है और यही स्त्री का स्वाभाविक क्षेत्र है। यही विधाता की इच्छा है कि वह प्रकाश में न आकर, जितना वह है उतने ही में सम्पूर्ण है, ऐसी भावना रखे। यही स्त्रियों की अमोघ शक्ति है। इस क्षेत्र में अपना वास्तविक स्थान पाकर स्त्री जान जाती है कि उसे पुरुषों की स्पृहा करने की जरूरत नहीं। स्पृहा करने वही निकलती हैं जिन्हें अपनी जगह पाने का उचित अवसर नहीं मिलता।

सौभाग्यवश मुझे उतनी शिक्षा पाने का मौका मिला जितनी आजकल के औसत पुरुष को मिलती है। उस शिक्षा के सार्टीफिकेट के बल पर मैं चाहती तो किसी आफिस में नौकरी करके “स्वतन्त्र” जीवन जिसे बिताने की चाह शुरू-शुरू में हर पढ़ी लिखी लड़की के दिल में आती है।

लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि मैं यह भी जानती थी कि ऐसा करने से मेरी पुरुषों के बराबर ऊँचा उठने और अपने घरों में आप खड़े होने की एक कामना तो जरूर पूरी हो जाती, लेकिन अपने जीवन-लोक में रस न ला सकती। स्त्री का जीवन मन चाहे जीवन-साथी को पाये बिना अधूरा ही है, इस बात को हर स्त्री चाहें उसने कालेज के नोट्स याद किये हों या नहीं, अच्छी तरह जानती है। और स्त्री बुद्धिमती हो तो वह अपने वैवाहिक जीवन में अपने पति पर आश्रित रह कर भी वैयक्तिक आजादी को कायम रख सकती है।

गृहस्थ जीवन की ओर पुरुषों का ध्यान बहुत कम रहता है। इस विभाग को उन्होंने स्त्रियों को ही सौंप दिया है। यहाँ जो स्त्री पुरुषों का मन रख कर चलने का कौशल जानती हैं, वह घर की पूर्ण स्वामिनी बनी रहकर भी पुरुषों को इस भुलावे में रख रह सकती है कि असल घर की नैया को वे ही चला रहे हैं। हर समझदार पुरुष इस भुलावे में रहना चाहता है। उसे खुशी होती है, जब वह बच्चे से सुनता है कि उनको उनकी माँ ने यह कह डरा दिया था कि-“देखो, आखिर मुझे तुम्हारे पिताजी से शिकायत करनी पड़ेगी। नहीं तो मान जाओ अभी।” या विवाह आदि उत्सवों में भेंट लेन-देन के प्रसंगों पर स्त्री अपने अन्तिम निश्चय को यह कहकर टाल दे कि “मैं पहले उनसे पूछ लूँ।” आदि आदि।

99 प्रतिशत पुरुष ऐसे मामलों में सिवाय मन में खुश होने और अपनी स्त्री को बड़ी अक्लमन्द समझने के और कुछ नहीं करते। बाद में सारे निश्चय सारे काम स्त्री को ही अपनी मर्जी से करने पड़ते हैं, मगर इसमें पुरुष और स्त्री दोनों सम्मिलित रहते हैं और मैं समझती हूँ कि बारीकी से देखा जाय तो यहाँ भी स्त्री, पुरुष पर अपनी सहज स्वाभाविक शक्ति के बल पर विजय प्राप्त करती है।

मैं जानती हूँ कि ऐसी लड़कियाँ भी हैं जो गर्व से कहती हैं कि उन्हें पुरुषों को बहलाने की जरूरत नहीं। वे पुरुषों जैसी विद्वता हासिल करके ही विजय प्राप्त करना चाहती हैं-घर के बाहर जाकर उच्च पद प्राप्त करने और मशीन की तरह सिर्फ एक ताल, एक दिशा में चलती रहकर। शायद अन्त में वह अपना ध्येय प्राप्त कर भी लेती हों, मगर वे खोती रहती हैं-अपने जीवन की माधुर्यता-वह वस्तुएँ जो स्त्रियों की अपनी पूँजी है।

क्यों नहीं हम स्त्रियाँ अच्छी तरह इस बात को समझ लेतीं कि अपने और अपनी छोटी सी गृहस्थी के जीवन में आनन्द और माधुर्य लाना ही हमारा स्वाभाविक कार्य है? सुखी घर का निर्माण करके कोई भी स्त्री सफल कहे जाने वाले पुरुष पर आसानी से हावी हो सकती है। पुरुष ऐसी स्त्री को अपने पास समझने में गर्व और सन्तोष समझता है।

स्त्रियाँ पढ़ें, और जीवन भर अधिक से अधिक ज्ञान हासिल करती रहे और सभ्यता की प्रगति की धारा से अपने को अलग न रखें, यह मैं अवश्य चाहती हूँ। बिना ज्ञान के स्त्री एक गुड़िया मात्र है, जो बनी सजी रहने पर ही अच्छी दीखती है, मगर जिसमें आत्मा नहीं होती।

मगर स्त्री में ज्ञान के साथ आनी चाहिए उदारता और सबके लिए सदा व्यक्ति स्नेह की भावना और वह बुद्धि जिसे मैं ‘स्त्री-बुद्धि’ के अलावा और कोई मान नहीं दे सकती।

टोने-टोटकों और पुरानी कुरीतियों के प्रति अन्ध-श्रद्धा मैंने पढ़ी स्त्रियों में भी देखी हैं। स्त्रियाँ अपने को निरर्थक आचारों से मुक्त करके घरों की अवस्थाओं में वह शान्त क्रान्ति पैदा कर सकती हैं, जो पुरुष सैकड़ों बिल और कानून बनाकर भी नहीं कर सकते।

पुरुष को भी स्त्री के सकरुण स्नेह की हमेशा जरूरत रहती है। पुरुष रूपी मशीन में यह स्नेह मशीन को चलाने वाली शक्ति का काम करता है। स्त्री के स्नेह का स्थान पुरुष द्वारा आयोजित कोई भी चीज नहीं ले सकती। अपने स्नेह-दान से स्त्री पुरुष का सबसे अन्तिम दुर्ग-उसका आत्मा-गर्व भी सहज ही में जीत लेती है। दुनिया के बड़े से बड़े वीर और दार्शनिक लोग स्त्रियों के सामने स्वयं परास्त हुए हैं।

लेकिन स्त्री यह स्नेह-दान कर सकती है घर के प्राँगण में ही, आफिस की कुर्सी पर बैठकर नहीं। यह स्नेह का दान स्त्री की अपनी चीज है। वह दान पुरुष द्वारा स्त्री को दी गई चीजों- घर, रुपया, सहारा-की तुलना में बहुत हल्का दीखता है, मगर जो इस दान को पाते हैं वही पुरुष जानते हैं इसकी बड़ाई को। इसी तरह घर की दुनिया बाहर से देखने में छोटी अवश्य लगती है, मगर उसकी गहराई असीमित है।

ऊपर मैंने ‘स्त्री-बुद्धि’ की बात कही। ‘स्त्री-बुद्धि’ स्त्री की सबसे बड़ी सहायता है। मैं शब्दों में इस बुद्धि का परिचय नहीं दे सकती, क्योंकि वह अनिर्वचनीय है। मगर इस बुद्धि द्वारा स्त्री अपने को पुरुष के हाथ में सौंपकर जिन्दगी की कश्मकश से अपने को बचा लेती है। पुरुष के लिए “सुखमिति वा दुखमिति” होकर वह अपने लिए आजन्म आश्रम का प्रबन्ध कर लेती है। पति उसके लिए हर क्षण का सहारा ही नहीं, जीवन-बीमा भी बन जाता है। यही स्त्री-बुद्धि स्त्री के पोशाक के चयन रंगों के चुनाव और वेशभूषा के बनाव में प्रकट होती है।

अन्त में मैं फिर कहती हूँ कि यह स्त्री-बुद्धि स्त्री के लिए आश्चर्यजनक सत्य है। स्त्री चाहे तो इस बुद्धि का त्याग करके अपने स्वभाव का गला घोंट करके, अपने जीवन-स्रोत को पुरुषों के पत्थर के बने हुए रास्ते पर भी ले जा सकती है मगर इस काम में वीरता हो सकती है, आराम नहीं। मन की इच्छा न रहते हुये भी जो स्त्रियाँ उस रास्ते पर चलती हैं, उनकी दुर्गति अत्यन्त सोचनीय हो जाती हैं।


उतावली का दुष्परिणाम

(श्री विट्ठलदास जी मोदी सम्पादक-’आरोग्य’)

आपके काम अटके हुये हैं, पूरे नहीं हो पा रहे हैं। आप उन्हें खत्म करने को उनसे जी-जान से लड़ रहे हैं। फिर भी हार ही आपके पल्ले पड़ती है। यह क्यों? इसलिए कि आप उन्हें पूरा करने की जल्दी में रहते हैं, जल्दबाजी से काम लेते हैं। आप पीछे रह जाते हैं, क्योंकि आप चलना नहीं, दौड़ना भी नहीं, बहुत तेज दौड़ना चाहते हैं। आनन्द के साथ उन्हें करना नहीं जानते।

अभी कल की बात है, मेरे आफिस में एक नया टाइपिस्ट आया। वह गजब की तेजी से टाइप करता था। मैंने उसे बुलाया और उसे अपने अन्य सहयोगियों को भी तेजी से टाइप करने की शिक्षा देने को कहा। मैं और उसके सारे सहयोगी टाइपिस्ट यह सुनकर हैरान हो गये। जब उसने कहा कि तेजी से टाइप करने के लिए जरा धीरे से (धीरज से) टाइप कीजिए। उसने बताया कि मेरा यह अनुभव है कि जिस सप्ताह मैं अपना टाइप करने की गति आधी रखने की कोशिश करता हूँ, आनन्द के साथ टाइप करता हूँ, उस सप्ताह के अन्त में मेरी टाइप करने की गति निश्चित रूप से सदा से अधिक हो जाती है। इस नये टाइपिस्ट का कहना है कि यह नियम सभी कामों में काम देता है।

इन्हीं दिनों मैं स्वयं सितार पर एक नई गत बजाना सीख रहा था। मैंने इस काम में भी अपने इस नये टाइपिस्ट की सीख से काम लेना शुरू किया। यह नई गत मैं पकड़ नहीं पर रहा था। मेरे सितार शिक्षक ने जो स, र, ग, म लिखा दिया था उसे उनकी-सी तेजी से बजा लेना चाहता था। पर हमेशा असफल होता था और मन में बड़ी खीज उठती थी। खैर, मैंने बहुत धीरे-धीरे बजाना शुरू किया, बहुत धीरे-धीरे। हर तार पर अँगुली ठीक तरह रखता, हर तार को पूरा बजाता और एक सप्ताह बाद मैंने देखा कि वह मनचाही तेजी से, पर साथ ही सही तरीके से बजा रहा हूँ। मालूम होता था सितार खुद ही बज रहा है। यह देख कर मैं और मेरे सितार शिक्षक दोनों ही बहुत आश्चर्य में थे।

तब मैं काम धीरे रस पूर्वक करने की रीति प्रत्येक कार्य में लगाता हूँ और मुझे कभी इससे अपने काम के प्रति शिकायत नहीं हुई।

बात यह है कि किसी भी चतुराई भरे काम करने की रीति या कला तब तक पूर्णतः हस्तगत नहीं हो सकती जब तक कि उसके कार्य की पद्धति हमारे अंतर्मन में स्थापित न हो जाय- जब तक कि हम उस पद्धति की ओर ध्यान दिये बिना उसे करने न लग जाय और जब तक उस कार्य के करने में हमें आनन्द न आने लगे। यदि बाँसुरी बजाने वाला सोचे कि उसे बाँसुरी के किस रन्ध्र के बाद किस रन्ध्र पर अँगुली रखनी चाहिये तो क्या वह कभी बाँसुरी बजा सकता है? उसका अंतर्मन उसकी अँगुलियों को स्वयं चलाता रहता है।

पर जब हम उतावली से काम लेते हैं तब हमारे अंतर्मन को अपना काम स्वाभाविक रीति से करने में बाधा पड़ती है। जल्दबाजी की दशा में मस्तिष्क तेजी से काम करने की इच्छा का भार काम पर लाद देता है, इससे अंतर्मन की काम करने की अपनी गति बिगड़ जाती है और काम जल्दी होने के बजाय देरी से होता है।

जब हम काम या कला सीखते हैं तब हम जो करते हैं वह सोचकर करना पड़ता है पर बार-बार वहीं काम करने पर उसकी पद्धति हमारे अंतर्मन पर अक्सर हो जाती है, कार्य के साथ जोर या जबरदस्ती अंतर्मन की इस स्वाभाविक पकड़ में बाधा पहुँचाती है। कार्य को धीरे-धीरे सीखने पर उस पर जल्दी का बोझ न डालने पर हम उस कार्य को पूरी तरह सीखते हैं और उसे फिर हम बिना प्रयास के बड़ी आसानी से कर सकते हैं।

जल्दबाजी का हमारे काम करने की गति से कोई सम्बन्ध नहीं है। जल्दबाजी तो केवल एक मानसिक अवस्था है। टाइप करने वाला व्यक्ति आपको बहुत धीरे-धीरे टाइप करता दिखाई दे सकता है, पर वह यदि उतना भी जबरदस्ती से करता है, गति में तेजी लाने के लिए अपनी पूरी इच्छा शक्ति लगा रहा है तो वह जल्दबाजी से काम ले रहा है। इसके विपरीत वह जो दूसरा विद्यार्थी बिना किसी प्रयास के, अपने पर बिना किसी तरह का जोर डाले दूनी तेजी से टाइप करता है, मन में उसके कोई तेजी नहीं है, तेजी से काम करने का उसके मस्तिष्क पर कोई भार नहीं है। वह अपना काम तेज करता है, पर मन से जल्दी नहीं।

काम धीरे सीखने की पद्धति का रहस्य यह है कि यह हमें अभ्यास का मौका देता है और हमारे मस्तिष्क को कार्य के भार से मुक्त रखता है।

उतावली केवल धोखा है। यह सोचना कि कार्य यदि जल्दी-जल्दी किया जाय तो ज्यादा हो सकता है, भूल है, बल्कि सत्य इसके बिल्कुल विपरीत है। जल्दबाजी, उत्सुकता, दबाव और इन सबसे दिमाग पर पड़ने वाला खिंचाव हमारे कार्य की गति धीमी ही नहीं कर देता बल्कि ऐसी दशा में काम घटिया प्रकार का भी होता है। मन की इस दशा का प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। अक्सर उतावली में रहने वालों को स्नायु-दौर्बल्य रोग आ घेरता है और उनके मन की शान्ति चली जाती है।

जल्दबाजी से दूर रहने वाले का जीवन शान्ति पूर्ण होता है और वह काम को बड़े आराम और आनन्द से करता है। शान्त, गम्भीर विचारवान पुरुष ही जीवन में कुछ कर पाते हैं। भाग-दौड़, देर होने के डर से पीड़ित व्यक्ति काम को खराब ही करते हैं।

जल्दबाजी शान्ति, स्वास्थ्य और प्रसन्नता को हरती है और यह जितना काम आदमी कर सकता है, उतना नहीं करने देती। तक आप हड़बड़ाकर अपना काम क्यों बिगाड़ें।


Quotation

सद्विचार

-जो स्वयं का ही सोचा करता है वह अपना शत्रु है और शत्रुओं से घिरा रहता है। जो अपने को भुला देता है वह अपना रक्षक है और मित्रों से घिरा रहता है।

-प्रसिद्धि वीरोचित पराक्रम की सुगन्ध है।

-हमारा जीवन एक छोटी पुस्तक सा है जिसे केवल विनोद के लिए कोई महान व्यक्ति पढ़ रहा हो।

-कुलीनता का सबसे सच्चा चिह्न दया है।

-क्या तुम जीवन से प्रेम करते हो? तो फिर समय को व्यर्थ नष्ट न होने दो क्योंकि वही तो जीवन तत्व है।


शाक, भाजी और फलाहार

(श्री अवनीन्द्र कुमार विद्यालंकार)

डॉक्टर और भोजन-शास्त्रियों का कहना है कि शरीर को स्वास्थ्य और कार्यक्षम तथा शक्ति सम्पन्न रखने के लिए प्रतिदिन कम से कम 3 छटाँक शाक सब्जी खाना चाहिये। शरीर के अवयवों का संचालन ठीक तरह से हो, इनके लिए भोजन में पत्तों के शाक, और सब्जी का होना आवश्यक है। पर भारत के गाँवों में यदि कोई व्यक्ति दौरा करे तो यह देखकर उसको आश्चर्य होगा कि गाँव वाले आलू ओल आदि सब्जियों के अलावा अन्य शाक सब्जी उसी समय खाते हैं, जब गाँव के हाट में बिकने आती है या उनके घर के आँगन में उत्पन्न हुई हों। तोरी, सेम, कद्दू, अनायास या थोड़े आयास से घर के आँगन में हो जाते हैं। इसके अतिरिक्त गाँव के लोग शाक, सब्जी के लिए शहरों पर ही आश्रित हैं, अपनी खेतों पर नहीं। शहरों के समीपवर्ती गाँवों के किसान या कोहरी यदि शाक, सब्जी बोते हैं, जो अपने लिए नहीं, बल्कि शहर के शौकीन बाबुओं के लिए। शाक, सब्जी हमारे भोजन का अभी तक आवश्यक अंग नहीं बना है। न यह समझा जाता है कि शरीर के अन्दर रक्त और संचालन और सब अवयवों की वृद्धि और मैदा साफ करने के लिए शाक सब्जी का प्रतिदिन सेवन आवश्यक है। जो हाल शाक सब्जी का है, वही हाल फलों का है। फल भी अभी तक हमारे भोजन का आवश्यक अंश नहीं बना है। आम्ल रस के फलों जैसे सन्तरा, नागफनी, नीबू की जाति के फल का भारत में प्रति व्यक्ति व्यवहार 3-2 पान्ड से ज्यादा नहीं है। इसके विपरीत अन्य देशों में इनका प्रति व्यक्ति व्यवहार इस प्रकार है-

फिलिस्तीन 222 पौंड, स्पेन 85 पौं., संयुक्त राष्ट्र अमरीका 54 पौं., ब्राजील 53 पौं., मिस्र 30 पौं., ब्रिटेन 27 पौं., भारत 3 पौंड।

यही हाल अंगूर के व्यवहार और खपत का है-

तुर्की 84 पौंड, बलगेरिया 56 पौं., अर्जेंटाइना 43 पौं., ग्रीस 30 पौं., इटली 18 पौं., संयुक्त राष्ट्र अमरीका 17 पौं., स्पेन 10 पौं., भारत 0.1 पौंड।

हिमालय प्रदेश के कमिश्नर श्री एन. सी. मेहता का कहना है कि हमारी जनता का आहार शोकजनक रीति से अपर्याप्त है। अच्छाई विविधता दोनों दृष्टियों से कमी है, यद्यपि पौष्टिक भोजन और अर्थ प्राप्ति दोनों दृष्टियों से शाक-सब्जी और फलों की लाभजनक खेती के लिए असीम अवसर प्राप्त हैं।

दुनिया मशीन युग में रह रही है। असल की शक्ति की जरूरत नहीं रही है, फलतः उसका भोजन भी बदल रहा है। भारी शक्ति उत्पादन खाद्य पदार्थों की जगह हल्का संरक्षणात्मक भोजन ले रहा है और इस दौड़ में फल सबसे आगे हैं। संयुक्त राष्ट्र अमरीका में 1909 की अपेक्षा में गेहूँ, माँस, आलू, अनाज की खपत में 1928 के अन्दर पर्याप्त कमी दिखाई दी है। इस अवधि में संतरा, नींबू और अंगूर आदि की खपत दो-तीन गुना अधिक हो गयी। हाल की खोज ने सिद्ध कर दिया है कि फलों और शाक सब्जी के बिना कोई आहार सन्तुलित नहीं हो सकता, पर आश्चर्य है कि माता की ‘फुल्ल कुसमित द्रूमदल शोभनीम्” से स्मृति करने वाले अपने आहार में शाक-भाजी और फलों को उचित स्थान नहीं दे रहे हैं। क्या यह आश्चर्य का विषय नहीं है।

फलों का सेवन भारत के लिए कोई नयी बात नहीं है। वैद्य लोग आयु कल्प कराते ही है। कनखल के एक वैद्य अतिसार का इलाज खरबूजों से ही करते थे। इसलिए रोग निवृत्ति और स्वास्थ्य सुधार के लिए फलों का उपयोग इस देश के लिए नया नहीं है। आहार शास्त्रियों ने विटामिन नामक एक नवीन शक्ति प्रदायक और रोग निवारक तत्व की खोज की है। यह फलों और सब्जियों में प्रभूत मात्रा में पाया जाता है। दूसरी बात यह है कि फलों में 81 प्रतिशत पानी होता है। आन्तरिक शरीर के पक्षालन के लिए भी पानी आवश्यक है। स्नान से बाह्य शुद्धि होती है। पानी अधिक पीना सम्भव नहीं है। पर फलों द्वारा पर्याप्त पानी पिया जा सकता है और अन्तः शरीर के स्नान के लिए यह आवश्यक है। तीसरी बात यह है कि फलों के वृक्ष गाँवों में लगने से गाँव छायादार रहेंगे, वर्षा अच्छी होगी और जमीन नयी रहेगी और इससे फसल भी अच्छी होगी। वृक्षों के लगाने से ईंधन की भी समस्या हल हो जायेगी और गोबर उस अवस्था में न जलकर खेत की उत्पादक शक्ति बढ़ायेगा। इसलिये प्रत्येक गाँव में ‘वृक्षा रोपण सप्ताह’ मनाया जाना चाहिए और गाँव में रहने वाले प्रत्येक व्यक्तियों को इस बात की देख करनी चाहिये कि प्रति वर्ष वह कम से कम एक पेड़ अवश्य लगावे। नीम का पेड़ जहाँ छाया देता है, वहाँ मच्छरों को भी दूर रखता है, मलेरिया से बचाता है और उसके पत्ते और निम्बोली रक्त शुद्ध करती हैं। फल वस्तुतः प्राकृतिक वैद्य और हकीम हैं। भारत के घर-घर में वृक्षों की पूजा होती है, पर दुःख यह है कि यह पूजा निर्जीव और निष्प्राण होती है। पूजा की परिपाटी पाल रहे हैं, पर असली काम भूल गये हैं।

औषधि

गाजर का रस चर्म रोगों को दूर करता है। पायोरिया आज घर-घर में है। इसका कारण यह है कि अधिक अम्ल वाले भोजन गेहूँ, माँस, मछली, रोटी, पानी आदि के सेवन से उत्पन्न होता है। इसके विपरीत सब्जी, विशेषतः शाक, फल और दूध अलकली भस्म वाले है। इसका बाहुल्य होने पर पायोरिया न होगा और दाँत खराब न होंगे। इस प्रकार बन्दगोभी मधुमेह की अचूक दवा है। संतरा इन्फ्लुएंजा को दूर रखता है। रक्त आदि की बीमारी में रोगियों को दो-तीन उपवास करने के बाद संतरा का रस दिया जाता है। महात्मा जी तो सदा उपवास की समाप्ति सन्तरे या मौसमी के रस से करते थे। अमर शहीद श्रद्धानन्द कहा करते थे कि बरसात के दिनों में प्यास लगने पर दो-तीन सन्तरे ले लेते हैं। यही बात अंगूर और भेद फूट के बारे में है। भेद फूट तो अनेक चर्म रोगों को दूर करता है। टमाटर और संतरा सूखे की बीमारी में अत्यधिक उपयोगी है। अनाज के अम्ल का प्रतिरोधक अलकली आरम्भ फलों में होता है। अतः शाक-भाजी और फलों का व्यवहार आहार में प्रतिदिन बढ़ाना चाहिए यह तभी सम्भव है जब प्रत्येक व्यक्ति कम से कम एक वृक्ष रोपे तो इस प्रकार हम सच्चे अर्थों में वृक्षापन करेंगे?


इस शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन होना चाहिए।

(श्री राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद)

पटना विश्वविद्यालय के समावर्तन में दीक्षान्त भाषण करते हुए राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने वर्तमान शिक्षा पद्धति पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला था। उसका एक अंश नीचे उपस्थित है-

विवेक बुद्धि और विचार शक्ति

मेरा यह मत है कि शिक्षा के तीन उद्देश्य होते हैं। जिनमें से दो उद्देश्य तो व्यक्ति के अपने निजी जीवन से सम्बन्ध रखते हैं और तीसरा व्यक्ति के सामूहिक जीवन से सम्बन्धित है। प्रथमतः शिक्षा का प्रयोजन है कि व्यक्ति की ईश्वर प्रदत्त यह सहज विवेक बुद्धि मानव को जन्म से ही प्रकृति या ईश्वर से मिली हुई होती है किन्तु अपनी नैसर्गिक अवस्था में इसकी सामर्थ्य और सक्षमता अत्यन्त सीमित होती है। यदि कोई व्यक्ति केवल उसी के सहारे छोड़ दिया जाय तो अपनी देश काल की सीमाओं के कारण वह उससे न तो अपना ही कोई लाभ उठा सकेगा और न अपने अन्य भाइयों का कोई भला कर सकेगा। किन्तु यदि उसकी विवेक बुद्धि को पिछली पीढ़ियों की संचित अनुभूति से सम्पन्न कर दिया जाता है तो उसकी शक्ति ओर सक्षमता बहुत बढ़ जाती है। क्योंकि उस अवस्था में उसे अपने और बाह्य चराचर जगत के बारे में ऐसी अनेक उपयोगी और आवश्यक बातें ज्ञात हो जाती हैं जिन्हें वह केवल अपनी विवेक या विचार शक्ति से न जान सकता था। दूसरे शब्दों में इस प्रक्रिया द्वारा उसकी विवेक बुद्धि इतनी सक्षम और सामर्थ्यवान हो जाती है कि उसके सहारे वह अपने को और अपने चारों ओर के जड़ और सजीव को समझने और उसमें रहकर अपने जीवन को ठीक दशा में चलाने के योग्य होता है। यह कहना अनुचित न होगा कि हर नई सीढ़ी को पिछली सीढ़ी की अनुभूति से परिचित और सम्पन्न करना और ऐसा करके नई सीढ़ी की विवेक बुद्धि को और विचार शक्ति को और अधिक सामर्थ्यवान बनाना इसी प्रक्रिया को शिक्षा कहा जाता है।

कर्मेन्द्रिय का प्रशिक्षण

शिक्षा का दूसरा प्रयोजन यह है कि प्रत्येक मानव को अपनी कर्मेन्द्रियों का ऐसा प्रयोग सिखाये जो उसे अपनी शारीरिक और अन्य प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए योग्य बना सके। इन कर्मेन्द्रियों के उचित प्रयोग के लिये ज्ञान की तो आवश्यकता होती है साथ ही सभ्यता की भी आवश्यकता होती है। कितना ही सबल व्यक्ति क्यों न हो, कितना ही स्फूर्तिमय क्यों न हो, वह तब तक कुछ अधिक फलमय कार्य नहीं कर सकता जब तक कि उस कार्य के सम्पादन के लिए उसकी कर्मेन्द्रिय को आवश्यक प्रशिक्षा न मिली हो अथवा उन्हें उसका अभ्यास न कराया गया हो।

साथ रहने की कला

शिक्षा का तीसरा प्रयोजन मेरे विचार में यह है कि अपने जैसे ही सब व्यक्तियों के साथ रहने और उनके साथ काम करने के लिए आवश्यक गुणों का व्यक्ति में उदय हो जाना। इच्छा से अथवा अनिच्छा से प्रत्येक व्यक्ति को अपने ही जैसे अन्य व्यक्तियों के साथ तो रहना ही पड़ता है। कोई भी दुनिया से दूर अपनी-अलग कुटिया नहीं बना सकता और न बना पाता है। एकाकी जीवन कवि की सुन्दर कल्पना के अतिरिक्त वास्तविक तथ्य न तो है और न हो सकता है। कुछ क्षण के लिए चाहे व्यक्ति एकाकी रह सके किन्तु सर्वदा वह एकाकी रह ही नहीं सकता। अतः जब सामूहिक जीवन-मानव जीवन का अनिवार्य तथ्य है तब यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति को साथ रहने की कला आ जाए।

पिछली शताब्दियों में जब सामूहिक जीवन का क्षेत्र सीमित था और जब आर्थिक क्रियाएँ इतनी संकेंद्रित न हुईं थीं। इन तीनों प्रयोजनों के लिए संगठित प्रयास करने तथा उनमें प्रतिक्षण संतुलन बनाये रखने की विशेष आवश्यकता न थी किन्तु आज तो सामूहिक जीवन का क्षेत्र भूमण्डल व्यापी है और आर्थिक क्रियाओं का सीमातिरेक संकेन्द्रण हो गया है। अतः आज इस बात की अत्यन्त आवश्यकता पैदा हो गई है कि प्रत्येक व्यक्ति का विशेष प्रक्रिया द्वारा इन तीनों बातों से पूर्ण परिचित ही न कराया जाय बल्कि उसको कार्यरूप में अपनाने के योग्य भी बना दिया जाय।

शैक्षणिक क्रान्ति का अभाव

अतः पिछली कुछ शताब्दियों में सार जगत भर में अतीत से दाय में मिली शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन की आवश्यकता लोगों को महसूस होती रहती है और उसमें विभिन्न प्रकार के परिवर्तन भी होते रहे हैं। यह कहना अनुचित न होगा कि जगत भर में शिक्षा-क्षेत्र में भी एक ऐसी क्राँति पिछले दिनों होती रही हैं जैसी कि आर्थिक और राजनैतिक जगत में हुई है। किन्तु दुर्भाग्यवश हमारे देश में शिक्षा के बारे में वैसी व्यापक क्रान्ति नहीं हुई है। इस दिशा में लोगों का ध्यान तो गया है किन्तु कार्यक्षेत्र में उसका कोई उल्लेखनीय फल दिखाई नहीं पड़ता।

यह ठीक है कि किसी सीमा तक हमारी शिक्षा संस्थाएँ शिक्षा के प्रथम प्रयोजन को पूरा करती है। इन संस्थाओं को पिछली पीढ़ियों की संचित अनुभूति से किसी सीमा तक परिचित अवश्य कराया जाता है। किन्तु इस परिचय कराने का जो उद्देश्य है अर्थात् विवेक बुद्धि को सजग, सक्षम और सामर्थ्यवान बताता, वह पूरा नहीं हो रहा है। हमारी नई पीढ़ी के युवक-युवती विचारपुँज नहीं हो पाते। यह ठीक है कि इन शिक्षा-संस्थाओं से भी यदाकदा कुछ विरले व्यक्ति निकलते हैं, जिनकी विवेक-बुद्धि और विचार-शक्ति पूर्ण रूपेण सजग और सामर्थ्यवान होती हैं किन्तु इन इने-गिने व्यक्तियों के नाम पर ही यह कहना ठीक न होगा कि ये शिक्षा-संस्थाएँ मानव के मानसपटल को खोल रही हैं और उसे ज्योतिर्मय कर रही है। मेरा यह विचार है कि इस दशा में उसकी असफलता के अनेक कारण हैं, जिनमें से कुछ प्रमुख कारणों की ओर संकेत कर देना अनुचित न होगा।

जिनमें से एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कारण तो यह लगता है कि पिछली पीढ़ियों की जिस अनुभूति से हमारी शिक्षा-संस्थाएँ हमारे युवक-युवतियों का परिचय करा रही हैं। उसके बहुत बड़े भाग का इन युवक-युवतियों के अपने निजी दैनिक जीवन अथवा अपने चारों ओर के जगत और अपने सामूहिक जीवन से कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है। अतः अतीत की वे बातें इन युवक-युवतियों को कुछ अन-पहचानी, कुछ अनुपयोगी, कुछ अछूती सी लगती हैं और वे उनके मस्तिष्क का भार बनकर रह जाती हैं, जिन्हें वे संस्था के निकलने के पश्चात बहुत जल्दी ही भूल जाते हैं। दूसरा कारण यह भी है कि जिस भाषा माध्यम द्वारा इस अतीत की अनुभूति से उनका परिचय कराया जाता है वह भी उनके दैनिक और सामूहिक जीवन की वस्तु नहीं है और इस लिए पूरा प्रयास करने पर भी उनके लिए कुछ अपरिचित ही बनी रहती है। अतः अतीत की अनुभूति उनके विवेक-दीप को ज्योतिर्मय करने के लिये दियासलाई न होकर उस दीपक के तेल को सोखने वाला सोखता ही रहता है। जहाँ अतीत की अनुभूति उनकी बुद्धि की सामर्थ्य को सहस्रगुनी शक्ति प्रदान करने वाला लीवर होनी चाहिये। वह हमारी बुद्धि को पंगु और अपाहिज करने वाली कोढ़ बन गई है।

किन्तु बात इतनी ही नहीं है। शिक्षा के अन्य दो प्रयोजनों को पूरा करने का कार्य तो हमारी शिक्षा संस्थाएँ लगभग कर ही नहीं रही हैं। हमारे यहाँ सम्भवतः ऐसी कोई विरली ही संस्था हो जहाँ इस बात का प्रयास किया जाता हो कि व्यक्ति को इतना कार्य कुशल बना दिया जाय कि वह अपने हाथ के परिश्रम से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक धन सामग्री पैदा कर ले। व्यवसाय, कृषि, उद्योग इत्यादि के व्यावहारिक प्रशिक्षण का प्रबन्ध तो हमारे यहाँ लगभग नहीं के बराबर हैं। हमारे प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों का तो इस व्यावहारिक अभ्यास से कोई वास्ता है ही नहीं। हमारे उच्च शिक्षालयों में से ही इने-गिने को छोड़कर अन्यों का उस बात से कोई सम्बन्ध नहीं है। उनमें से लगभग सभी अपने विद्यार्थियों को पिछली पीढ़ियों या वर्तमान पीढ़ी के प्रौढ़ लोगों के कुछ विचारों से परिचय कराने में संलग्न हैं। स्वभावतः यह परिणाम हो रहा है कि इन शिक्षालयों के स्नातक चाहे वाक्चतुर हों किन्तु कार्य कुशल नहीं होते। जब तक विदेशी साम्राज्य के दलाल की हैसियत से उन्हें अपना जीवन चलाना पड़ता था तब तक तो उनकी वाक्चातुरी उनको लाभदायक थी किन्तु अब जब अपनी गाढ़ी मेहनत से नवभारत का हमें निर्माण करना है उस समय तो इस वाक्चातुरी का वैसा महत्व हो ही नहीं सकता। परिणाम यह हो रहा है कि हमारे यहाँ का वाक्चातुर स्नातक भी आज जीवन में अपने लिए स्थान बनाने में सफल होने में पर्याप्त कठिनाई और असफलता अनुभव कर रहा है।

इतना ही क्यों? वर्षों के परिश्रम को इस प्रकार अपने वैयक्तिक जीवन के लिए अनुपयोगी और फलहीन होते देख अनेक युवकों के मन में अपने भाग्य और अपने भाइयों के प्रति एक प्रकार का अन्ध रोष पैदा हो रहा है और ये समझ नहीं पा रहें है कि क्या करने से उन्हें अपनी मुश्किलों से छुटकारा मिल सकता है। साथ ही हमारे शिक्षालयों में पढ़ने वाले युवक-युवतियाँ आज अतीत की उस अनुभूमि का भी कोई परिचय हासिल नहीं कर पा रहे हैं जिसका उन्हें वहाँ परिचय कराने का प्रबन्ध है। मैं समझता हूँ कि शिक्षा के स्तर में गिरावट की जो आज आम शिकायत है उसका बड़ा कारण यह है कि हमारे नवयुवकों और नवयुवतियों को उस शिक्षा प्रक्रिया से लाभ नहीं पहुँचता जो हमारे यहाँ के हर प्रकार के शिक्षालयों में आज जारी है।

इस विष का प्रसार वैयक्तिक क्षेत्र में सीमित न रहकर आज हमारे सामूहिक क्षेत्र में भी फैल रहा है। हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था सामूहिक जीवन के लिए आवश्यक गुणों का अभ्यास तो हमारी नई पीढ़ी के लोगों को कराती नहीं। ऐसी हमारी नई पीढ़ी के लोगों में यदि उन गुणों का अभाव हो जो सुन्दर और सफल सामूहिक जीवन के लिए आवश्यक है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। शिक्षा व्यवस्था का यह ध्येय और प्रयोजन ही नहीं मालूम पड़ता है कि वह नई पीढ़ी के लोगों को सामूहिक जीवन के लिए आवश्यक गुणों में दीक्षित करें।

सच तो यह है कि प्रयोजन की दृष्टि से हमारी वर्तमान शिक्षा व्यवस्था कुछ वैसी ही असन्तुलित और बेढंगी है जैसा कि मटकी जैसा पेट और ककड़ी बाँह और पाँव वाला शरीर होता है। किसी कारण से क्यों न हो आज हमारी शिक्षा संस्थाओं का सारा प्रयास अपने विद्यार्थियों को ज्ञान के सीमित स्वरूप से परिचित कर देना ही है और व्यक्ति को कार्य कुशल और सहजीवी बनाने का नहीं है। अतः मैं समझता हूँ कि अन्य सुधारों के साथ-साथ हमारी शिक्षा व्यवस्था में उसके उद्देश्यों में सन्तुलन स्थापित करने की भी आवश्यकता है।

हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि हमें किस संख्या में विचारक और कार्य कुशल लोग तैयार करने हैं। यह तो स्पष्ट ही है कि हर युग और हर देश में विचारकों और कर्मियों दोनों की ही आवश्यकता होती है किन्तु जिन परिस्थितियों में आज हमारा देश है उनमें हमें कोरे विचारों की अपेक्षा कर्मियों की अधिक आवश्यकता है। अपने करोड़ों देशवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें शीघ्रातिशीघ्र अपना आर्थिक उत्पादन बढ़ाना है। किन्तु उसके बढ़ाने की शर्तों में यह भी शामिल है कि हमारे यहाँ के लोगों का स्वास्थ्य अच्छा हो और वे आधुनिक आर्थिक और औद्योगिक संगठन और प्रक्रियाओं से परिचित हों। इन तीनों बातों के लिए ही हमें लाखों कर्मियों की आवश्यकता है। किन्तु इन सब कर्मियों को यह समझ लेना होगा कि केवल अपने कौशल के आधार पर यह अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता कि वे अपने देश के अन्य भाइयों से बहुत अधिक पारिश्रमिक पायें। वरन् उन्हें तो इस कार्य में इस प्रकार और विश्वास से लगना है कि कष्ट सह कर भी उन्हें आगे की पीढ़ियों के जीवन को सम्पन्न बनाने के लिए साधन जुटाने हैं और प्रबन्ध करना है। अतः मेरा विचार है कि हमारी शिक्षा संस्थाओं में कार्य कुशलता पर अधिक जोर दिया जाना चाहिये और उसमें व्यावसायिक प्रशिक्षा प्रदान करने का प्रबन्धन होना चाहिए। यदि हर नगर और हर जिले में इस प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षा केन्द्र बन जायं अथवा यदि वहाँ की वर्तमान शिक्षा संस्थाएँ अपना इस प्रकार कायाकल्प कर ले तो मैं समझता हूँ कि हमारी शिक्षा व्यवस्था का भोंड़ापन बहुत कुछ कम हो जायेगा।

साथ ही मैं समझता हूँ कि सामूहिक गुणों की दीक्षा का भी हमारी शिक्षा संस्थाओं में प्रबन्ध होना चाहिए। सामूहिक उद्योग की शिक्षा केवल क्रीडा क्षेत्र में ही न दी जाकर वह जीवन के अन्य भागों में ही दी जानी चाहिए। उसका एक प्रकार यह हो सकता है कि शिक्षालयों में ऐसी टीमें बनें जो सामुदायिक विकास के कार्यों में होड़ बन्द कर भाग लें।


जीवन जीने की विद्या का व्यावहारिक शिक्षण

आप भी अपने बालकों को इस स्वर्ण सुयोग से लाभान्वित होने दीजिए।

मनुष्य के लिए सबसे आवश्यक वह शिक्षा है जिसके आधार पर वह जीवन यापन की विविध समस्याओं को समझ सके। सामने आती रहने वाली विविध गुत्थियों पर सुलझे हुए मस्तिष्क से विचार कर सके और उनका ठीक हल निकाल सके। विद्या उसी को कहना चाहिए, जो मनुष्य के गुण स्वभाव, विचार, दृष्टिकोण, बल, विवेक, चातुर्य एवं शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावे। प्राचीन काल में इसी उद्देश्य को लेकर गुरुकुल चलते थे।

हम अपने बच्चों को स्कूल कालेजों में पढ़ाते हैं ताकि वे आजीविका उपार्जन में सफल हों तथा सभ्य कहलावें। इसके अतिरिक्त हमें बालकों को वह शिक्षा भी दिलाने का प्रयत्न करना चाहिए। जिसके आधार पर वे उन्नतिशील जीवन की ओर अग्रसर हो सकें। शरीर को स्वस्थ रखना, वाणी से मधुर बोलना, मन से उचित विचार करना, दूसरों के साथ सद्व्यवहार परिश्रम में उत्साह, स्वच्छता और सादगी, व्यसनों से घृणा, बड़ों का सम्मान माता-पिता की सेवा, गुरुजनों का अनुशासन, शिष्टाचार का पालन, व्यवहार में चातुर्य, विपत्ति में धैर्य, इन्द्रियों पर नियंत्रण, अनिष्टों से सतर्कता, उन्नति की आकाँक्षा, धार्मिक प्रवृत्ति, कर्त्तव्य निष्ठा, सज्जनों से मित्रता, अध्ययन में प्रीति आदि उत्तम प्रवृत्तियों को जागृत करके जीवन को सुव्यवस्थित बनाने का ज्ञान जब तक बालकों को प्राप्त न होगा तब तक वे कितनी ही ऊँची कक्षाएँ उत्तीर्ण कर लें, अपने लिए तथा अपने सम्बन्धित व्यक्तियों के लिए सुख शान्ति उत्पन्न न कर सकेंगे।

जीवन को उत्तम प्रकार से जीने के लिए एक ऐसी शिक्षा पद्धति की आवश्यकता है, जो उपरोक्त विषयों को सिद्धान्त रूप से तथा व्यवहारिक रूप से छात्रों के मस्तिष्क तथा हृदय में बिठा सके। इन्हीं विषयों की पुस्तकों का पाठ्यक्रम रहे। प्रवचन, शंका समाधान, प्रश्नोत्तर, स्वयं विचार करने एवं निष्कर्ष निकालने के लिए प्रोत्साहन, की पद्धति से जीवन की विभिन्न समस्याओं का शिक्षण प्रधान रूप से दिया जाय। गणित, इतिहास, भूगोल, ज्योमेट्री आदि गौण एवं ऐच्छिक विषय रहें। जो लोग स्कूली प्रमाण पत्र लेकर नौकरी करने का लक्ष नहीं रखते उनके लिए तो वस्तुतः ऐसी ही शिक्षा की आवश्यकता है। ऐसा शिक्षण ही उन्हें संसार की संघर्षमय परिस्थितियों का मुकाबला करके जीवन को सफल बनाने में सहायक हो सकता है। आज ऐसे विद्यालयों की बड़ी आवश्यकता है जो बालकों को पढ़ाने-लिखाने तक ही सीमित न रहकर अपना प्रधान कार्य बालकों का निर्माण करना बनावें। उनका पाठ्यक्रम एवं शिक्षण इसी आधार पर बने।

इस महान कार्य की पूर्ति के लिए हम “सरस्वती यज्ञ” के साथ अग्रसर हो रहे हैं। गर्मियों की छुट्टियों में 15 दिन के लिए एक शिक्षा शिविर का आयोजन गायत्री तपोभूमि मथुरा में किया जा रहा है। ज्येष्ठ सुदी 1 से लेकर ज्येष्ठ सुदी 15 सम्वत् 2011 तदनुसार तारीख 2 जून से लेकर 16 जून, सन् 1954 तक यह सत्र चलेगा। इसमें 16 से 40 वर्ष तक आयु के शिक्षार्थी भाग ले सकेंगे।

इनमें उपरोक्त विषयों की ही शिक्षा दी जायेगी। शिक्षार्थी के मन में जमे हुए अस्त-व्यस्त विचारों को सुव्यवस्थित करके उन्हें उस दिशा में प्रेरित करने का प्रयत्न किया जायेगा। जिसमें उन्नति, समृद्धि, कीर्ति, स्वस्थता, दीर्घायु, प्रतिष्ठा, मैत्री एवं सुख शान्ति की प्राप्ति होती है। इन्हीं विषयों की पुस्तकें पढ़ने को दी जायेंगी। इन्हीं विषयों पर प्रवचन होंगे, इन्हीं विषयों पर प्रश्नोत्तर एवं शंका समाधान के रूप में छात्रों की गुत्थियों को सुलझाया जायेगा। शिक्षार्थियों को विचार करने की वह पद्धति सुझाई जाएंगी जिससे वे सही निष्कर्ष पर अपने आप पहुँच सकें।

इस शिक्षा शिविर का संचालन मनोविज्ञान शास्त्र के माने हुए विद्वान प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए. डी. लिट् करेंगे। उनके निकट संपर्क में रहने तथा व्यावहारिक शिक्षण से लाभ उठाने का यह अवसर शिक्षार्थियों के लिए स्वर्ण सुयोग है। शिक्षण कार्य के लिए भारत वर्ष के सुदूर प्रदेशों से उच्चकोटि के शिक्षा विशेषज्ञ एवं मनोविज्ञान शास्त्र के सूक्ष्म तत्वों को समझने वाले विद्वान भी पधारेंगे। हमारा भी 15 दिन का पूरा समय शिक्षार्थियों के लिए होगा।

छात्रों की मनोभूमि की उपरोक्त शिक्षा पद्धति को ग्रहण करने योग्य बनाने के लिए, बुद्धि में तीव्रता उत्पन्न करने के लिए उन्हीं दिनों एक “सरस्वती यज्ञ” होगा। जो शिक्षा के साथ-साथ पन्द्रह दिन तक चलता रहेगा। छात्रों की बुद्धि शुद्ध एवं तीव्र करने के लिए यह यज्ञ शक्तिशाली एवं प्रभावपूर्ण आयोजन है। इस यज्ञ द्वारा ऐसा सूक्ष्म वातावरण उत्पन्न किया जायेगा जिसमें रहने से मस्तिष्क की कतिपय महत्वपूर्ण शक्तियों का समुचित विकास हो सके।

शिक्षण की कोई फीस नहीं, ठहरने का कोई शुल्क नहीं, भोजन का कोई बाधित खर्च नहीं, किसी को कुछ देने को नहीं कहा जायगा। धनी और निर्धन सभी छात्र गुरु-प्रह में एक साथ एक स्थिति में रहेंगे। प्राचीन काल में छात्र अपने पितृ ग्रह की भाँति ही गुरुकुलों में रहते थे और वहाँ उन्हें पिता-माता जैसा ही समुचित वात्सल्य, स्नेह, एवं सुविधा साधन उपलब्ध होता था वैसा ही पन्द्रह दिन के इस शिक्षण शिविर में भी छात्रों को प्राप्त होगा। प्राचीन गुरुकुल प्रणाली की एक झाँकी का रसास्वादन इन थोड़े दिनों तक आगन्तुक लोग करेंगे और उसकी एक उत्तम छाप अपने मनों पर लेकर लौटेंगे। अपने आवश्यक वस्त्र, बिस्तर, लोटा आदि सबको साथ लाना चाहिए। कन्धे पर डालने का दुपट्टा भी सबके पास होना चाहिए। जो पन्द्रह दिन के लिए पीला रंग लिया जायगा। सफेद कुर्ता और धोती यही सबकी एक सी पोशाक रहेगी।

छात्रों की व्यक्तिगत समस्याओं पर विशेष रूप से ध्यान दिया जायगा। उनके दिव्य प्रति के कार्यों के आधार पर प्रतिदिन परीक्षा नम्बर दिये जाते रहा करेंगे और तद्नुसार उन्हें अन्त में उत्तीर्ण अनुत्तीर्ण किया जायेगा। उत्तीर्ण छात्रों को बड़े साइज के अत्यन्त सुन्दर प्रमाण पत्र दिये जावेंगे। यदि सम्भव हो सका तो इस प्रकार की शिक्षाप्रणाली को स्थायी विद्यालय का रूप देने का विचार है।

हमारा विश्वास है कि 15 दिन के लिए यहाँ आने वाले और इस शिक्षा को प्राप्त करने वाले छात्र, उतनी आवश्यक बातें सीखकर जायेंगे जितनी शायद उन्हें अन्यत्र बहुत समय एवं प्रयत्न करने पर भी उपलब्ध न होतीं।

एक सीमित संख्या में ही छात्रों की शिक्षा एवं व्यवस्था यहाँ सम्भव है। इसलिए जिन्हें आना हो वे निम्नलिखित प्रश्नों का विस्तृत उत्तर “गायत्री तपोभूमि मथुरा” के पते पर ता. 15 मई तक भेज दें। और स्वीकृति पत्र प्राप्त हो जाय तो ता0 1 जून की शाम तक मथुरा आ जावें ताकि ता. 2 जून से विधिवत संस्कार के साथ उनकी शिक्षा आरम्भ हो सके। बिना स्वीकृति पत्र प्राप्त किए कोई सज्जन न आवें अन्यथा उनके शिक्षण आदि की कोई व्यवस्था की जिम्मेदारी न होगी। इन बातों के उत्तर लिखें-

[1] पूरा नाम [2] पत्र भेजने वाले का पूरा पता [3] आयु [4] जाति [5] अब तक की शिक्षा [6] स्वास्थ्य की वर्तमान स्थिति [7] शरीर में कोई रोग हो तो उसका भी उल्लेख [8] व्यवसाय [9] कुटुम्ब में कौन-कौन हैं? [10] आपके जीवन में जो कठिनाईयाँ इस समय हो उसका सविस्तार वर्णन [11] आपके शरीर स्वभाव, मन तथा चरित्र में जो त्रुटियाँ हों उनका पूरा विवरण [12] मथुरा आने पर पूर्ण अनुशासन में रहना, निर्धारित नियमों का पालन करना और साथियों के साथ उदारता एवं सेवा भावना का व्यवहार करना आपको स्वीकार है न? [13] कोई विशेष बात इन प्रश्नों के अतिरिक्त बताने को और भी हो तो उसका उल्लेख [14] मथुरा आने के सम्बन्ध में आपके संरक्षकों अभिभावकों की स्वीकृति का लिखित प्रमाण पत्र साथ भेजिए।

इन 14 प्रश्नों का उत्तर आने पर आवश्यक परामर्श तथा स्वीकृति आदि भेजी जा सकेगी। तद्नुसार ही शिक्षार्थियों को मथुरा आना उचित है।


गायत्री महायज्ञ की सफलतापूर्वक समाप्ति

चैत्र शुक्ल 13, 14, 15 को गायत्री महायज्ञ सफलतापूर्वक सम्पन्न हो गया। एक दो दिन पहले से ही यज्ञ में भाग लेने वाले ऋत्विज् आना आरम्भ हो गये थे और धीरे-धीरे करके एक सप्ताह में सभी अपने अपने स्थानों को वापिस चले गये देश के सुदूर प्रदेशों से लगभग 125 गायत्री उपासक आये थे। यह सभी निष्ठावान गायत्री उपासक एवं सुसंस्कृत महानुभाव थे लगभग 75 स्थानीय व्यक्तियों को मिलाकर 200 के करीब इस पुण्य आयोजन का पूर्ण करने में लगे रहें।

यह एक सप्ताह प्राचीन काल के ऋषि आश्रमों का स्मरण दिलाता था। गायत्री महापुरश्चरण का जप पूर्ण करने के लिये पुरुष तथा महिलाएँ सूर्योदय से पूर्व ही अपने-अपने आसनों पर बैठ जाते थे और प्रायः 5 घण्टे सुबह और लगभग 3॥ घण्टे शाम को निष्ठापूर्वक गायत्री महायज्ञ का जप करते थे। अधिकाँश ने तो तीन दिन में ही 24 हजार जप के लघु अनुष्ठान पूर्ण किये। सफेद धोती कुर्ता सभी की एक सी पोशाक-कन्धे पर पीले दुपट्टे एक रूपता समस्वरता का बहुत ही उत्तम दृश्य उपस्थित करते थे।

महायज्ञ प्रायः 6॥ बजे से आरम्भ होकर मध्याह्न को 12 बजे तक और दोपहर को 2 बजे से शाम को 6 बजे तक 8॥ घण्टे नियमित रूप से चलता था। 10 होता बैठते थे। यह अपनी बारी से बदलते रहते थे स्त्रियाँ भी पुरुषों की ही भाँति जप और हवन में भाग लेती थी। सब कार्य पूर्ण शास्त्रोक्त रीति से सात वेदपाठी आचार्यों की संरक्षता में सम्पन्न हुआ। पूर्णाहुति के उपरान्त प्रसाद, यज्ञ भस्म एवं “गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध” पुस्तिकाएं वितरण की गई, लगभग 40 व्यक्तियों के यज्ञोपवीत हुए और उन्हें गायत्री मन्त्र दिया गया। निर्धारित संख्या में जप और हवन सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ। रात्रि के समय प्रतिदिन 7॥ से 10॥ बजे तक महत्वपूर्ण प्रवचन होते थे। इस प्रकार शौच, स्नान, भोजन और थोड़ा विश्राम का समय छोड़कर प्रातः 4 बजे से रात्रि को 10॥ बजे तक की निरन्तर तपश्चर्या चलती रहती थी। परस्पर सबका आपसी परिचय कराया गया और अनेकों ने उत्साह वर्धक अनुभव सुनाये।

इस महापुरश्चरण एवं गायत्री महायज्ञ का आयोजन ऐसी व्यापक सूक्ष्म शक्ति उत्पन्न करने के संकल्प के साथ-साथ किया गया था जिसके द्वारा लोगों की मनों भूमिका में सात्विक परिवर्तन हो और आत्मबल का प्रकाश बढ़े। जिस प्रकार कुम्हार अवा लगाकर एक ही समय में एक ही अग्नि योजना से सैकड़ों बर्तनों को पका देता है उसी प्रकार इस महापुरश्चरण की दिव्य ऊष्मा से अनेकों साधकों की साधना का वैसा परिपाक हुआ जैसा अलग-अलग से अनेक वर्षों तक प्रयत्न करने पर भी सम्भव न था। अनेकों साधकों ने प्रत्यक्ष रूप से यह अनुभव किया कि इस वातावरण में तीन-चार दिन ही रहकर हमने वह पाया है जो वर्षों तक लम्बी साधना करने पर भी उपलब्ध न हो सका था। साधकों की पारस्परिक प्राण शक्ति का आपसी विनिमय तपोभूमि के प्रभावशाली वातावरण का प्रभाव, गुप्तवेश में उपस्थित अत्यन्त उच्च कोटि के तपस्वियों की सान्निध्य, महायज्ञ एवं महापुरश्चरण द्वारा आहूत देव शक्तियों का स्थापत्य, यज्ञ संयोजक की विशेष प्रेरणा इन सब बातों के कारण-यह आयोजन देखने में सामान्य होते हुए भी वस्तुतः असामान्य था। इस असामान्य वस्तुस्थिति को उन दिनों तपोभूमि में ठहरे हुए प्रत्येक व्यक्ति ने प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया। जिस सूक्ष्म शक्ति का अनुभव इस आयोजन द्वारा किया गया है, वह अपना काम कर रही है। सूक्ष्म दर्शी लोग ही जानते हैं कि इसके परिणाम किस-किस क्षेत्र में कितने व्यापक एवं कितने महान होने जा रहे हैं।

सभा सम्मेलनों की इस आयोजन की तुलना करना किसी भी प्रकार उचित न होगा। प्रचारात्मक एवं प्रदर्शनात्मक इसे बिल्कुल ही नहीं रखा गया था। शहर से एक मील दूर-जंगल में यमुना के पुण्य पुलिन पर शाँतिमय वातावरण में इसे इसीलिए रखा गया कि अनाधिकारी भीड़ वहाँ न पहुँचे और जिस सात्विकता एवं गम्भीरता से ऋषि कल्प वातावरण में यह अनुष्ठान करना है वह शाँतिपूर्वक पूर्ण हो सके। माता की कृपा से वह कार्य बड़े ही उत्तम प्रकार से सम्पन्न हो गया। गत वर्ष की भाँति इस वर्ष भी इस महापुरश्चरण के खर्च की अधिकाँश पूर्ति गायत्री उपासकों द्वारा की गई। कुल मिलाकर 650 रुपये की कमी रही।

ऐसे आयोजन समय-समय पर अन्यत्र भी होने आवश्यक हैं। आज कल मानव हृदयाकाश में जो विकृति आ गई है, प्रकृति की तृतीय भूमिका में जो विक्षोभ उत्पन्न हो रहा है उससे सम्पूर्ण मानव जाति मानसिक एवं निर्वाह क्षेत्रों में नाना प्रकार के कष्ट पा रही है। इनका समाधान करने के लिए ऐसे सात्विक शक्तिशाली एवं शास्त्रोक्त सूक्ष्म चेतना उत्पन्न करने वाले आयोजनों की बड़ी आवश्यकता है। ऐसे आयोजनों के अभाव में केवल राजनीतिक एवं समझ कार्य उस पूर्णता तक नहीं पहुँच सकते, जिस पर पहुँचकर ही मानव जाति के लिए शान्तिपूर्ण जीवन यापन करना सम्भव होता है।

मंत्र लेखन यज्ञ

गायत्री मंत्र लेखन यज्ञ मन्द गति से चल रहा है। इस दिशा में साधकों का उत्साह कुछ शिथिल होता जाता है, जो ठीक नहीं है अब तक करीब 80 करोड़ मंत्र आ चुके हैं। यह संख्या 125 करोड़ पूरी करनी है। सो इस दिशा में प्रयत्न जारी रहना चाहिए। जो लोग अपने हिस्से का मंत्र लेखन पूरा कर चुके हो वे भी यह लेखन साधना जारी रखें एवं नये मंत्र लेखक उत्पन्न करें। साधारणतः 2400 मंत्रों की प्रत्येक साधक से आशा की गई। इससे अधिक लिखना यह लेखन साधना बारंबार जारी रखना और भी अधिक प्रशंसनीय है।

गायत्री उपासना के अनुभव

सदा की भाँति अखण्ड-ज्योति का जुलाई का अंक गायत्री अंक होगा। उसमें गायत्री उपासना से हुए भौतिक एवं अध्यात्मिक अनुभवों के दर्शन रहेंगे। जिन्हें स्वयं कोई उत्साह वर्धक अनुभव हुए हो। अथवा जिन्हें किन्हीं अन्य जीवित या स्वर्गीय महामानव की गायत्री अनुभव विदित हो वे उनका विस्तृत वर्णन लेख रूप में भेजने की कृपा करें ताकि उन्हें जुलाई के विशेषाँक में स्थान दिया जा सके।

परमार्थ प्रेमियों की आवश्यकता

जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियों का भार नहीं, ऐसे आत्म कल्याण एवं लोग सेवा की भावना वाले सज्जनों की आज राष्ट्र को भारी आवश्यकता है। अपनी शिक्षा, साधना तथा तपश्चर्या को बढ़ाते हुये भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए अपना जीवन लगाना चाहे वे गायत्री तपोभूमि अपना घर बनाकर लक्ष्य प्राप्ति के लिए अग्रसर हो सकते हैं। ऐसे सज्जन पत्र व्यवहार करें। उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था तपोभूमि करेगी।


अपनी अस्थियाँ जलाता चल!


अपनी अस्थियाँ जलाता चल (Kavita)

लोहे के पेड़ हरे होंगे, तू गान प्रेम का गाता चल, नभ होगी यह मिट्टी जरूर, आँसू के कण बरसाता चल।

सिसकियों और चीत्कारों से जितना भी हो आकाश भरा, कंकालों का हो ढेर, खप्परों से चाहे हो पटी धरा।

आशा के स्वर का भार पवन को लेकिन, लेना ही होगा, जीवित सपनों के लिए मार्ग मुर्दों को देना ही होगा।

रंगों के सातों घट उड़ेल, यह अँधियाली रंग जायेगी, ऊषा को सत्य बनाने को जावक नभ पर छितराता चल।

आदर्शों से आदर्श भिड़े, प्रज्ञा प्रज्ञा पर टूट रही, प्रतिमा-प्रतिमा से लड़ती है, धरती की किस्मत फूट रही।

आवर्त्तों का है विषम जाल, निरुपाय बुद्धि चकराती है, विज्ञान-यान पर चढ़ी हुई, सभ्यता डूबने जाती है।

जब-जब मस्तिष्क जयी होता, संसार ज्ञान से जलता है, शीतलता की है राह हृदय, तू यह संवाद सुनाता चल।

सूरज है जग का बुझा-बुझा, चन्द्रमा मलिन सा लगता है, सबकी कोशिश बेकार हुई, आलोक न इनका जगता है।

इन मलिन ग्रहों के प्राणों में, कोई नवीन आभा भर दे, जादूगर! अपने दर्पण पर घिसकर इनकी ताजा कर दे।

दीपक के जलते प्राण दीवाली तभी सुहावन होती है, रोशनी जगत को देने को, अपनी अस्थियाँ जलाता चल।

क्या उन्हें देख विस्मित होना, जो हैं अलमस्त बहारों में, फूलों को जो हैं गूँथ रहे, सोने-चाँदी के तारों में।

मानवता का तू विप्र! गन्ध-छाया का आदि पुजारी है, वेदना-पुत्र! तू तो केवल जलने भर का अधिकारी है।

ले बड़ी खुशी से उठा, सरोवर में जो हँसता चाँद मिले, दर्पण में रचकर फूल मगर, उसका भी मोल चुकाता चल।

काया की कितनी धूमधाम, दो रोज चमक बुझ जाती है, छाया पीती पीयूष, मृत्यु के ऊपर ध्वजा उड़ाती है।

लेने दे जग को उसे, ताल पर जो कलहंस मचलता है, तेरा मराल जल के दर्पण में नीचे-नीचे चलता है।

कनकाभ धूल झड़ जायेगी, ये रंग फूली उड़ जायेंगे, है सौरभ केवल अमर, उसे तू सबके लिए जुगाता चल।

*समाप्त*

(श्री रामधारी सिंह ‘दिनकर’)