सद्विचार निर्झर

-मैंने कोई ऐसा आदमी नहीं देखा जिसने अपने आप को तुच्छ-हीन और बेकार समझते हुए कोई महान कार्य किया हो। जितनी योग्यता का हम अपने आपको समझेंगे उतना ही महत्व पूर्ण कार्य कर सकेंगे।

-मन में यदि भोग है तो मंदिर में जाकर भी भोगी को ही पूजेंगे। वहाँ जाकर देखेंगे- भगवान के क्या गहना है, कैसी पोशाक है।

-जिस समय कोई युगावतार होता है उस समय उसी के साथ-साथ जगत में कुछ विलक्षण विभूतियाँ भी अवतीर्ण हुआ करती हैं जो भस्म से ढंकी हुई अग्नि की तरह स्थान-स्थान पर छिपी रहती हैं, परन्तु समय पर अवतारी पुरुष का संकेत मिलते ही प्रकाश में आकर अपना पावन कार्य करने लगती हैं।

-सारे विश्व में एक ही तत्व काम कर रहा है एक ही जीवन एक ही सत्य वर्तमान है। सब इस दैवी प्रवाह की ओर जा रहे हैं जो ईश्वर तक जाता है। इस तरह की मनोभावनाएं खाने से हमें एक अलौकिक प्रोत्साहन प्राप्त होता है। हमारे मन का भय नष्ट हो जाता है।

-हम उसी परम तत्व के अंश हैं हम उससे अलग नहीं हैं। जो गुण ईश्वर में हैं वह हमें भी भली- भाँति प्राप्त हो सकते हैं, क्योंकि हम उसी के अंश हैं, हम पूर्ण और अमर हो सकते हैं, क्योंकि पूर्ण परमात्मा से हमारी उत्पत्ति है।

-जितना हम दैवी तत्व से एकता का सम्बन्ध जोड़ेंगे, जितना हम अपने परम पिता परमात्मा में तन्मय होंगे, उतना ही हमारा जीवन शान्तिमय, आश्वासन पूर्ण और उत्पादन शक्ति युक्त होगा।

-प्रेम ही सब रोगों की अद्भुत औषधि है। प्रेम ही जीवनदाता है। प्रेम ही जीवन है। प्रेम ही हमारी व्यथाओं का शमन करने वाला है। प्रेम ही जीवन का वास्तविक आनन्द देने वाला है।

वर्ष-14 संपादक-श्री राम शर्मा, आचार्य अंक-11


नव चेतना


नव चेतना (Kavita)

नये देश को मैं नई भक्ति दूँगा! जगा देश सारी मिटी कालिमा है,

चतुर्दिक छिटकने लगी ललिमा है, निशानाथ सोये जग अंशुमाली,

मगर अर्चना की अभी रिक्त थाली, प्रगति-पंथ पर वेग से बढ़ चलें जो-

करोड़ों पगों को नई शक्ति दूँगा! जवानी न रुकती कभी आँधियों से,

जवानी सहमती न बरबादियों से, जवानी ने चाहा कि फिर करके छोड़ा,

जवानी ने डरकर कभी मुँह न मोड़ा, कसम खाके उट्ठी जवानी हमारी-

मैं बलि की जवानों को आसक्ति दूँगा! नये देश को मैं नई भक्ति दूँगा!

न होगा कभी दृष्टि से लक्ष्य ओझल, बनेगा हमारा हृदय-बल ही सम्बल,

अतुल शक्ति अपने पगों में छिपी है, झुकेगा किसी दिन इन्हीं पर हिमाचल,

धरा पर नया स्वर्ग बसकर रहेगा- मनुज को विवशता से मैं मुक्ति दूँगा!

अभी कल्पना हो सकी है न पूरी, अभी साधना रह गई है अधूरी,

अभी तो खुला द्वार केवल प्रगति का, अभी लक्ष्य में शेष है और दूरी,

बिना लक्ष्य की प्राप्ति के जो न लौटे- मैं ऐसी प्रखर शक्ति के व्यक्ति दूँगा!

नये देश को मैं नई भक्ति दूँगा!


मनुष्य, देव और असुर

(श्री लालचन्द्र जी)

देव भी मनुष्य हैं और असुर भी मनुष्य हैं, देवों से जगत में दिव्य ऐश्वर्य वैभव बढ़ता है और सर्वहित होता है। असुरों की इच्छा सदा केवल अपना ही ऐश्वर्य वैभव बढ़ाने की होती है और उनकी बड़ी ऐश्वर्य शक्ति जगत में द्रोह, कलह और उपद्रव फैला कर अन्ततः मनुष्यों में परस्पर युद्ध उत्पात करके जगत के विध्वंस का कारण बनती है। असुर साम्राज्यवादी होते हैं, वे केवल अपनी ही बढ़ती चाहते हैं, और छल कपट, दंभ, अत्याचार से सरल सीधे लोगों को पराधीन कर के उनका हर प्रकार से शोषण करते हैं।

असुरों के प्रभाव से मनुष्य की कामना, लालसा में बदल जाती है भावना का स्थान परस्पर की स्पर्धा ले लेती है और आपस में सत्कार प्रेम और उदारता के स्थान पर ईर्ष्या, द्वेष और घृणा मनुष्यों के हृदय में विलास बस जाते हैं। मानव हृदय विलास प्रिय हो जाता है और प्रेय की ओर रुचि बढ़ते-बढ़ते मनुष्य श्रेय से अलग-सा होने लगता है असुरों के प्रभाव से साधारण जनों में मिथ्याचार, दिखावा, धोखा फैलता है और मनुष्यों की वृत्ति पापमयी स्वार्थी और मलिन हो जाती है। असुर लोगों की शिक्षा, दीक्षा भी उन्हीं लोगों के अनुकूल हुआ करती है। वे शिक्षा मानवता के विकास की नहीं देते, बल्कि उनकी शिक्षा में कोरे आचार-विचारों की ही भरमार होती है। संक्षेपतः असुरों में हिंसक पशुओं की सी वृत्ति अधिक और मानव स्वभाव के विकास का पर्याप्त अवसर न मिलने के कारण असुर समाज में विलासिता का ही दौर-दौरा रहता है। मदिरापान, माँस भक्षण आदि ही उन्हें रुचते हैं और चाय आदि की भरमार के कारण उनका स्वभाव चंचल तथा क्रूर होता है। उनके प्रेम में व्यभिचार, बर्ताव में कपट, व्यवहार में छल तथा आपस में राग रहता है। आपस में भी ऊपरी ही प्रीति होती है जो स्वार्थपूर्ति तक टिकती है। उनका प्रेम वास्तव में मोह युक्त अथवा आसक्ति से बंधा हुआ होता है। असुर स्वभाव वाले लोग प्रेम करना जानते ही नहीं, उनका प्रेम विलासिता तथा काम लिप्सा में समाप्त होता है। प्रेम तो दैवी गुण है। प्रेम से मनुष्य पवित्र होता है। समता दृढ़ होती है और हृदय में कर्त्तव्य करने की स्फूर्ति बढ़ती है। सत्य और प्रेम असुर वृत्ति में नहीं दिखाई दिया करते, वहाँ तो दिखावा है, वास्तविकता नहीं।

जो कोई भी स्वार्थी है, जो केवल अपने ही प्राणों का पोषण जानता है जिसे केवल अपनी ही फिक्र है, जिसका ध्येय केवल अपने शरीर की रक्षा है, वही असुर है। असुरत्व की भित्ति स्वार्थ है, देवत्व की नींव उदारता है। जिसका स्वार्थ सीमित है मर्यादा के अन्दर है वह साधारण मानव है। जो अपने स्वार्थ का दमन करके पर हित में लगे हैं वे देव हैं। जो केवल अपनी ही स्वार्थ-पूर्ति में तत्पर हैं, वे असुर हैं।

असुर अभिमानी, क्रोधी और अन्यायी होते हैं। वे धर्म नहीं समझते और उनका आचरण सदा कुटिलता, हिंसा, निर्दयता और कठोरता का होता है। असुर लोगों में पाशविक शक्ति विपुल होती है पर उनमें आत्मिक तेज और ओज नहीं होता। असुर लोग बलवान होते हुए भी सदा अपने अत्याचारों के कारण जनता से भयभीत रहते हैं। असुर लोग निर्लज्ज, लोभी, क्षुद्र, द्वेषी, ईर्ष्यालु, कामी तथा पापाचारी होते हैं। असुर लोगों में दर्प, निन्दा क्रूरता, शठता, पिशुनता, कृपणता, मलिनता आदि दुर्गुण पाए जाते हैं। असुरों को समता नहीं आती, वे विषमता में ही सुख मानते हैं। असुरों का गन्तव्य है कि वे तो ऐश्वर्यशाली हों और अन्य जन उनके अधीन रह कर उनकी आज्ञा पालन करते रहें। असुरों में आपस में तो समता तथा राग और स्नेह होता है, पर अन्य लोगों के साथ उनका बर्ताव घमंड का होता है। अहंकार का विकृत रूप असुरों में ही देखा गया है। असुर लोग बहुत डींगे मारते हैं अपनी कीर्ति के लिए बहुत उत्सुक रहते हैं सदा यश की कामना करते हैं पर उन्हें न तो सत्पुरुषों में यश ही मिलता है और न भले मनुष्य उनकी कीर्ति ही करते हैं। यश चाहते हुए भी असुर गण सदा अपयश के ही भागी होते हैं। असुरों की प्रीति में सरलता नहीं होती। धोखा, टेढ़ापन, और कुटिलता ही उनकी नीति के आधार होते हैं। असुर लोग जनता के हृदयों पर राज्य नहीं कर सकते, वे केवल शरीरों पर अत्याचार करके अपने अधिकारों का प्रदर्शन किया करते हैं। संसार की हानि सदा से असुरों के कारण ही हुई है।

असुरों में हठ बहुत देखा गया है, वे हारने पर भी ढीठ बने रहते हैं, वृथा बकवास करना और डींगें मारना उनका मुख्य लक्षण है। अपनी डींगें मारना उनकी आदत होती है। उनमें दम, दान और दया नहीं होती। उनमें बैर वृत्ति, कृपणता, बैर भाव, क्रूरता आदि दोष देखे गए हैं, असुरों के भाष कटु, उनकी वाणी कठोर, उनकी जीवन-चर्या दम्भ से भरी होती है। असुर लोग प्रायः साधारण लोगों में भले से बने रहकर उन्हें ठगा करते हैं और अपना स्वार्थ पूरा किया करते हैं।, संक्षेपतः असुरों में सारे लक्षण रजोगुण के पाए जाते हैं, काम और क्रोध, जिनकी उत्पत्ति ही रजो गुण से कही गई है, असुरों के द्वारा जगत का कल्याण कभी नहीं हुआ सर्वहित उनका ध्येय ही नहीं होता। असुर लोग सदा स्वार्थी होते हैं और यह अनुभव सिद्ध बात है कि स्वार्थ यदि सीमित न रहे तो सदा विनाश का कारण होता है।

देव मनुष्य असुर मनुष्यों से विपरीत गुण वाले होते हैं। देवों में परस्पर प्रेम मेल मिलाप, तथा समता के भाव विशेष होते हैं। देव मनुष्यों में अन्यता का भाव नहीं होता, वे सबसे अनन्यता का, विमल प्रेम का व्यवहार करते हैं, और इसी कारण सदा अभय रहते हैं। देव मनुष्यों का अन्तःकरण शुद्ध रहता है। उनमें ऋजुता तथा सरलता होती है। अहिंसा, सत्य, शान्ति, तेजस्विता, स्थिरता दृढ़ता, धैर्य, ज्ञान, दक्षता, उदारता, आदि सद्गुण देव मनुष्य में विकसित होते रहते हैं। देव मनुष्य प्रिय वादी गम्भीर, दयावान, संयमी, सदाचारी और त्यागी देखे गये हैं। यश की भावना देव मनुष्यों में ही चरितार्थ होती है। देवों का अन्तःकरण शुद्ध होता है। शुद्ध पवित्र अन्तःकरण में ही ज्ञानयोग की व्यवस्थिति होती है। देव मनुष्य सदा अभय रहते हैं क्योंकि वे किसी की हानि नहीं करते, सब का हित चाहतें और करते रहते हैं और जनता उनके लिए प्राण तक देना कर्त्तव्य समझती है। देव लोग सर्वप्रिय होते हैं। जो अधिकार, बल से, शक्ति से, असुरों को नहीं मिलता, वह अधिकार देवों को उनके उदार चरित्र होने के कारण उन्हें जनता स्वयं भेंट करती है, वे जनता के हृदयों के राजा होते हैं। जनता के हृदय में उनका निवास होता है क्योंकि वे जनता के सुख-दुःख के साथी होते हैं। जनता उनका आदर करती है। देव मनुष्य निष्काम सेवा में ही अपनी तृप्ति और प्रसन्नता समझते हैं वे लेने के स्थान पर देने में ही तत्पर रहते हैं। दर्प और दंभ तो उन्हें छू भी नहीं सकते, वे सदा नम्र और सरल स्वभाव के ही होते हैं देव मनुष्य नित्य आत्मपरीक्षण द्वारा अपने आपको ठीक-ठीक देखकर अपने दोष दूर करते रहते हैं। देवों में अन्दर बाहर की पवित्रता स्पष्ट झलकती है। देव लोग त्याग पूर्वक तथा संन्यासी रहकर सब भोग भोगते हैं वे असुरों की भाँति लोलुप तथा लम्पट नहीं होते। देव मनुष्यों की वृत्ति निश्चल, एकाग्र तथा स्थिर होती है, उनमें अभिमान नहीं होता आत्म सम्मान होता है। शक्तिशाली होते हुए भी वे नम्र देखे गए हैं। उदारता उनका एक विशेष लक्षण होता है, देव मनुष्यों में अन्य जनों को ठीक-ठीक पहचानने की क्षमता होती है इसलिए उनकी सफलता चिरस्थायी होती हैं, देव मनुष्यों में सत्वगुण प्रधान होता है। वे सदा प्रसन्न चित्त अपने कर्त्तव्यों को समझने वाले और समझबूझकर कर्त्तव्य पालन करने वाले हुआ करते हैं। देव लोग सदा अपने वचन को निभाते हैं, वे अपनी प्रतिज्ञा का प्राणपण से पालन करते हैं। सत्यनिष्ठा उनके जीवन की विशेषता होती है, वे सदा कर्त्तव्यरत और कर्मफल-त्यागी होते हैं, वे अपने आपको सात्विक दान तथा ज्ञानयुक्त भोग में व्यय करके सदा प्रफुल्लित रहते हैं। देव मनुष्यों को कभी चिंता, भय, शोक और रोग नहीं घेरते, वे सदा स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट होते हैं। उनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। उनका शरीर सुन्दर तथा मन पवित्र होता है वे सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के उपासक होते हैं। देव लोग जनार्दन पूजा के लिये विख्यात हैं। निष्काम जनसेवा में ही उन्हें प्रसन्नता मिलती है। देव मनुष्यों में ही वास्तविक पुरुषार्थ देखा गया है। उन्हें आत्मप्रसाद मिलता है वे जीवन-संग्राम में विजयी होकर जीवन को खेल तथा संगीत के रूप में देखते हैं, और नित्य आनन्द मग्न कर्त्तव्य में लगे रहते हैं।

उदार चरित्र देव हैं और कृपण लोग असुर हैं। कृपण तो वास्तव में है ही कृपा का पात्र, तरस के योग्य। क्योंकि कुमति तथा आसुरी बुद्धि के कारण वह ऐश्वर्य रखता हुआ भी दरिद्री है। उसके मन में संकीर्णता है, असुर सदा चिन्तातुर देखे गये हैं।

उनके छोटे दिल, उनके कठोर बर्ताव, उनके छल कपट, उनके ईर्ष्या, द्वेष और घृणा, उन्हें कभी निश्चिंत रख ही नहीं सकते। देव जन सदा आत्म तृप्त और सन्तोषी होते हैं देवत्व में जीवन का विकास है असुरत्व में जीवन का ह्रास है।


पहले अपने को सुधारो

(श्री स्वामी शिवानन्द जी)

संसार में इधर-उधर निरुद्देश्य होकर विचरण न करो। अपना उद्देश्य निश्चित करके चलो। ज्ञान की पहाड़ी पर धीरे-धीरे दृढ़ता के साथ चढ़ कर उस चोटी पर पहुँचो जहाँ पर अमृतत्व का भव्य भवन स्थापित है।

अध्यात्म के मार्ग में निरन्तर कठिनाइयाँ एवं असफलताएं आती रहती हैं। इसलिए इस मार्ग में चलने के लिए अध्यवसाय, जागरुकता एवं अपरिमित साहस की आवश्यकता है।

जब धीरे-धीरे हृदय की ग्रन्थियाँ शिथिल हो जाती हैं और वासनाएं क्षीण होने लगती हैं। -जब कर्म के बन्धन ढीले पड़ते हैं और अज्ञान कम होता है-जब कमजोरी नष्ट हो जाती है तब तुम अधिकाधिक शान्त एवं शक्तिशाली बन जाते हो। तब तुम्हें अपने अन्दर से ही प्रकाश प्राप्त होने लगता है। तब तुम नित्य-प्रति अधिक दिव्य बनते जाते हो।

आसुरी शक्तियों पर विजय प्राप्त करना बड़ा कठिन है। चित्त-वृत्तियों को एकाग्र करना ध्यान लगाना भी एक कठिन काम है। लेकिन जागरुकता, अध्यवसाय, निरन्तर अभ्यास, सतत् प्रयत्न सत्संग और दृढ़ संकल्प शक्ति द्वारा सारी कठिनाइयाँ दूर हो जायेंगी और मार्ग सुगम सुहावना और आकर्षक बन जायगा।

साहस के साथ मन से संघर्ष करो। प्यारे साधक! आगे बढ़ो! संघर्ष जारी रखो। साहसी बनो! युद्ध के अन्त में तुम्हें शाश्वत आनन्द, अमृतत्व का भव्य-भवन और ब्रह्म के अक्षय पद प्राप्त होंगे।

निरन्तर प्रयत्न करते रहो। निराश मत हो। मार्ग में तुम्हें प्रकाश मिलने वाला है। सब जीवों की सेवा करो सत्य से प्रेम करो। शान्त बनो। नियमपूर्वक ध्यान लगाओ। तुम्हें शीघ्र ही सुन्दर जीवन और परम शान्ति प्राप्त होगी।

अगर तुम्हें सत्य की थोड़ी भी झाँकी मिल जायगी तो तुम्हारा सारा जीवन ही बदल जायगा। तुम्हारे हृदय में नवीनता आ जायगी और तुम्हारा दृष्टिकोण भी नवीन होगा। आध्यात्मिक जीवन की एक नवीन लहर तुम्हारे सारे शरीर में प्रवेश कर जायगी। उस समय तुम्हारी जो अवस्था होगी उसका वर्णन कर सकना असम्भव है।

तुम व्यर्थ ही अपने बन्धन क्यों बढ़ाते हो? दिव्यता तुम्हारा जन्म-सिद्ध अधिकार है। तुम उसको आज ही क्यों नहीं प्राप्त कर लेते? विलम्ब का अर्थ है तुम्हारे कष्टों के दूर होने में विलम्ब। तुम इन बन्धनों को किसी भी क्षण नष्ट कर सकते हो। यह तो तुम्हारे हाथ में है। फिर इन्हें आज ही क्यों नहीं नष्ट कर डालते? यह स्वतन्त्रता ही अमरता और शाश्वत आनन्द है।

तुम्हारे अन्दर जो दिव्य-शक्ति है वह बाहर की सभी-शक्तियों से बड़ी है। इसलिए किसी बात से डरो मत। अपने अन्तरात्मा पर विश्वास रखो।

अपना सुधार करो। अपने चरित्र का निर्माण करो। हृदय को पवित्र बनाओ। सद्गुणों को अपने अन्दर बढ़ाओ। बुराइयों को निकालो। अनुशासन के द्वारा अपने अन्दर की पाशविक शक्तियों को दैवी शक्तियों का दास बना डालो। इसके लिए तुम्हें तप, संयम और ध्यान की भी आवश्यकता पड़ेगी। यहाँ से तुम्हारी स्वतंत्रता प्रारम्भ होती है।

बिना त्याग के तुम कभी सुखी नहीं बन सकते। बिना त्याग के तुम कभी मोक्ष भी प्राप्त नहीं कर सकते। इसलिए प्रत्येक चीज का त्याग कर दो और त्याग को अपने जीवन में सर्वोत्तम स्थान दो।

पहले तुम भले आदमी बनो। अपनी इन्द्रियों पर अधिकार रखो। तब सात्विक मन से आसुरी मन पर विजय प्राप्त करो। तब दिव्य प्रकाश अपने आप प्राप्त होगा। तभी तुम्हारे अन्दर दिव्यता धारण करने की पवित्रता आयेगी। जब तक तुम इन्द्रियों पर विजय प्राप्त नहीं कर लेते तब तक तुम्हें तप, संयम और प्रत्याहार का अभ्यास करना होगा।

भगवत्कृपा और चरित्र की शक्ति-इन दो चीजों की चट्टान के ऊपर तुम आध्यात्मिक जीवन की दृढ़ नींव डालो। ईश्वर और उसके शाश्वत नियम की शरण जाओ। फिर संसार में या अन्यत्र कोई ऐसी शक्ति नहीं जो तुम्हारी उन्नति को रोक सके। फिर आत्मानुभूति निश्चित है। तुम्हारे लिए असफलता जैसी कोई चीज नहीं रहेगी।

पहले अपने हृदय को पवित्र बनाओ और फिर दृढ़ता के साथ योग के सोपान पर चढ़ो। अपने अन्दर साहस रखो। ऋतम्भरा प्रज्ञा को प्राप्त कर सोपान की चोटी पर पहुँचकर ज्ञान-मन्दिर में प्रवेश करो।

कष्टों के सहन करने से मनुष्य की आत्मा पवित्र बनती है। वे मनुष्य के पाप और कलंक जला डालते हैं। फिर दिव्यता प्रकट होती है। वे आत्मिक-शक्ति बढ़ाकर दृढ़ इच्छा शक्ति प्रदान करते हैं। इसीलिये हम कह सकते हैं कि कष्ट भी गुप्त रूप से मनुष्य का कल्याण करते हैं।

ध्यान और पूजा से आत्मिक-शक्ति प्रकट होती है। इसलिए नियम पूर्वक ध्यान का अभ्यास करो। तुम्हें शीघ्र ही निर्विकल्प समाधि प्राप्त होगी।

मन को शान्त करके एक स्थान पर बैठ जाओ। यह अनुभव करो कि तुम इस शरीर और मन दोनों के स्वामी हो। हृदय के भीतरी भाग में प्रवेश करो और शान्ति के अगाध सागर में गोते लगाओ।

अज्ञान के कारण तुमने चारों ओर जेल की दीवारें खड़ी कर रखी हैं। विवेक द्वारा तुम उन्हें नष्ट कर सकते हो।

जब बिजली के लैम्प पर कपड़ा लगा होता है तब प्रकाश साफ नहीं दिखाई पड़ता है पर जब कपड़ा हटा दिया जाता है तो प्रकाश बिल्कुल साफ होता है। उसी प्रकार यह स्वयं प्रकाशवान आत्मा पंचकोषों से आवृत है। शुद्ध आत्मा का ध्यान करने से और “नेति-नेति” का अभ्यास करने से ही आत्मा का प्रकाश प्रकट हो सकेगा।


कर्त्तव्य पथ पर दृढ़ रहिए।

(श्री पं. देवदत्त शास्त्री)

निन्दन्तु नीति निपुणा यदि वास्तु वन्तु

लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेच्छम।

अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा

न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥

‘नीति-विशारद लोग चाहे निन्दा करें अथवा प्रशंसा, लक्ष्मी आवे अथवा स्वेच्छानुसार चली जाय, मृत्यु आज हो अथवा युग-युगान्तर में, किन्तु कर्त्तव्यनिष्ठ, धीर पुरुष न्याय के पथ से विचलित नहीं होते।’ जिस समय साँसारिक सन्तापों से पुरुष उद्विग्न हो जाता है उस समय उसका मन स्थिर नहीं रहता। मनुष्य की इच्छा स्वभावतः अनन्त सुख के भोग करने की है, इस स्वाभाविकता को वह भूल कर यदि संसार के अनुतापदायी विविध विषयों में अनुरक्त हो जाय तो उसके भाग्य में शोक के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहेगा।

अपनी वृत्तियों को शान्त और सहनशील बनाना मनुष्य मात्र का कर्त्तव्य है। मन की वृत्ति को विवेकपूर्ण रखने से जिस प्रकार अतीव निर्धन सुदामा को अपने दारिद्र्य का, हरिश्चन्द्र को नीच सेवा का और वीर केशरी छत्रपति शिवाजी को कठोर कारागृह का घोर दुःख अनुभव नहीं हुआ उसी प्रकार प्रत्येक विवेकी कर्त्तव्यनिष्ठ व्यक्ति को दुःख प्रतीत नहीं होता। इतना ही नहीं, किन्तु सत्पुरुषों की भाँति वह अपने ध्येय से विमुख भी नहीं हो सकता। अतएव बाह्य उपाधियों पर निर्भर रहने की कोई आवश्यकता नहीं। सुख दुःख का स्थान मन है इसलिए यह ध्रुव सत्य है कि जिस प्रकार मन की भावना होगी उसी प्रकार मनुष्य को सुख अथवा दुःख का मान होगा।

महान् दुःखों की उत्पत्ति का केन्द्र मन ही है, इसलिए मनुष्य को चाहिए कि कर्त्तव्यारुढ़ होकर महासुख की खोज भी उसी जगह करे? भविष्यत् में क्या होगा? यह बात जब हमारी समझ में नहीं आती तब भावी संकट का स्वरूप हमें विशाल और भयानक दिखाई देने लगता है। ऐसी अवस्था में कर्त्तव्याकर्त्तव्य का विवेक नहीं रहता। अनेकों मार्गों के चित्रपट हमारी दृष्टि के सामने आने लगते हैं। निदान किसी न किसी मार्ग का अवलम्बन करना ही पड़ता है। परन्तु अपने जीवन में हम चाहे जिस मार्ग से जायं, हमें इस बात का दृढ़ विश्वास रखना चाहिए कि हम किसी एक पथ-दर्शक के अनुगामी हैं। सच पूछा जाय तो वह मार्गदर्शक सदा हमारे ही पास रहता है। विवेक और सद्विचार ही ईश्वर निर्मित गुरु हैं। जो व्यक्ति इनकी आज्ञानुसार कर्त्तव्य करेगा वह कभी भी आपत्ति में न फँसेगा। निखिल-शास्त्र-सम्पन्न पुरुष यदि विवेक और सद्विचारों से शून्य है तो वह दुःख उठायेगा और उचित मात्रा में दुखी अवश्य होगा। धर्म भी एक उत्तम पथ प्रदर्शक है, किन्तु इस मार्ग में विविध कारणों से अनेक प्रकार के विघ्न पड़ जाने की आशंका बनी रहती है। विश्वास किस बात पर किया जाय? इस विषय में शंका उत्पन्न हो तो भी हमें अपना कर्त्तव्य निश्चित करने में कोई बाधा उपस्थित न होनी चाहिए। हमें प्रत्येक परिस्थिति में अपने कर्त्तव्य पर दृढ़ रहने की आदत डाल लेनी चाहिए।

जीवात्मा को ईश्वर-प्राप्ति का सबसे वृहत् साधन मानव शरीर मिला है। इसके द्वारा सभी व्यक्ति स्वर्ग-अपवर्ग जैसे दुर्लभ पदों की प्राप्ति कर सकते हैं। इसीलिए विषयी पुरुषों से लेकर त्यागी योगी महापुरुष भी इस शरीर की रक्षा करते हैं। जिस सन्दूक में द्रव्य रहता है उसकी रक्षा के अनेक उपाय किए जाते हैं। जिस शरीररूपी सन्दूक के गर्भ में ईश्वर-रूपी अमूल्य रत्न है भला साधु, महात्मा, गृहस्थ आदि उसकी बिना रक्षा किये हुए कैसे रह सकते हैं। तात्पर्य यह है कि कर्त्तव्याकर्त्तव्य के सम्पादन में शरीर का भी प्रमुख भाग रहता है। कर्त्तव्य-निष्ठा स्नेहमयी माता के समान मनुष्य की अभिभाविका है। कोई व्यक्ति यदि विषय वासनाओं से विरक्त हो मनुष्य समाज को त्याग कर एकान्तवास करने लग जाय और अपने को इतने से ही कृतकृत्य समझने लगे तो यह उसकी कर्त्तव्य निष्ठा नहीं स्वार्थ निष्ठा होगी। दूसरों के लिए उपयोगी होना ही हमारा मुख्य कर्त्तव्य है। उसी से हमारा जन्म सफल और जीवन सुखी एवं आनन्दमय हो सकता है। कुछ लोगों की गलत धारणा यह है कि जो कार्य हमें इष्ट है उसे करने के लिए यदि हम पूर्ण रूप से स्वाधीन हों तो इसके समान कोई अन्य सुख ही नहीं है। यह निश्चित है कि एक आदमी से सभी कर्त्तव्य पूरे नहीं किये जा सकते, तथापि यह धारणा अवश्य रखनी चाहिए कि हमसे जितने भी कर्त्तव्य, कर्म हों, उनका परिणाम अच्छा ही हो। हममें भीम का सा बल नहीं है, दूसरों की दुष्ट बुद्धि को नष्ट करना भी हमें नहीं आता, परन्तु स्वयं हमारे शरीर में जो अवगुण हैं उन्हें हम निकाल सकते हैं।

हमारा कर्त्तव्य है कि भय, लोभ, ईर्ष्या और क्रोध आदि दुर्गुणों को स्थान न दें, क्योंकि क्रोधादि की उत्पत्ति से अविवेक जाग्रत होता है। ज्ञान शून्य मनुष्य स्वभावतः कृपण हो जाते हैं। उन्हें चेतन और अचेतन का ध्यान नहीं रहता। अविवेक सर्वनाश का प्रथम सोपान है, क्योंकि “विवेक भ्रष्टानाँ भवति विनिपातः शतमुखः।” विवेकरहितों के पद-पद में विनाश की आशंका का यही कारण है कि अविवेक के बाद स्मृति का नाश सम्भावित है। स्मरण शक्ति भ्रष्ट हो जाने पर मनुष्य कार्याकार्य विवेक-शून्य हो जाता है। उसकी स्मृति इस प्रकार छिन्न-भिन्न हो जाती है कि वह उसके द्वारा कोई सिद्धि नहीं प्राप्त कर सकता। स्मृति भ्रष्ट होने से बुद्धि का भ्रष्ट होना आवश्यक है। बुद्धि-भ्रष्ट व्यक्ति ही कर्त्तव्य-च्युत होता है। उसके प्रत्येक कार्य में निर्दयता, अपटुता, कटुता, प्रतिघातिता, जड़ता आदि दोषों का समावेश होता है। उपर्युक्त क्रमिक दोषों से मनुष्य इतना पतित हो जाता है कि सद्गति और लौकिक-प्रतिष्ठा दोनों से उसे हाथ धोना पड़ता है। अपनी उन्नत अवस्था से अधःपतन की ओर जाना कर्त्तव्य भ्रष्ट होना है। वस्तुतः बुद्धियोग के द्वारा मनुष्य सच्चा कर्त्तव्यनिष्ठ बन सकता है। इसके बिना हम सत्य की उपलब्धि नहीं कर सकते। बिना सत्य के कोई सुख नहीं मिलता। बिना निर्मल बुद्धि के जीवन का कोई मूल्य नहीं। बुद्धि योग ही हमें कर्त्तव्य-सिद्धि प्रदान कर सकता है। कर्त्तव्य के मर्म को भली भाँति समझ लेना जीवन का वास्तविक महत्त्व समझना है। यथाशक्ति सत्कर्म करने का नाम कर्त्तव्य-पालन है। कर्त्तव्य पालन जितना कहने में सरल है उतना ही करने में कठिन है।

इसलिए कर्त्तव्य निष्ठा को कठिनाइयों का सामना करने में सदैव सन्नद्ध रहना चाहिए। सत्य, न्याय और परोपकार पर सदा दृढ़ रहना कर्त्तव्यनिष्ठ की दृढ़ निष्ठा है। गिरे को ऊँचा उठाना, दीन-दुखियों की मदद करना, साधु-रक्षण, दुष्ट संहार आदि प्रत्येक सत्कर्म कर्त्तव्य-पालन के उदाहरण हैं। हमें कर्त्तव्य निष्ठ बनने के लिए प्रकृति की प्रेरणा और सहायता सदैव मिलती है। वह स्वयं उदाहरण बन कर हमारी दृष्टि के सामने खड़ी मुस्कराया करती है। जब हम अंतःहृदय से विचार करते हैं तो भगवती प्रकृति सूर्य, चन्द्र और ताराओं के रूप में कर्त्तव्य पालन करने में तत्पर दिखाई देती है। त्रैलोक्य में कितनी ही उत्क्रान्तियाँ और परिवर्तन क्यों न हों, परन्तु हम इन्हें अपने कार्य पर सदैव अटल देखते हैं। इनके कर्त्तव्य की डोरी कभी ढीली नहीं पड़ती। अनवरत परिश्रम से परिश्रान्त भी वे नहीं उकताते। प्रकृति का एक लघु उदाहरण हमारे सामने पुष्प का है। वह चाहे सुसज्जित वाटिका या उपवन अथवा निर्जन वन में जहाँ कहीं भी हो समय से मुकुलित होगा, प्रफुल्लित होगा, गन्ध बिखेरेगा और फिर समय पाकर मुरझा जायगा। वह किसी की अपेक्षा नहीं करता कि मुझे कोई देखे या सूँघे अथवा सराहे। कर्त्तव्य मक्खन से भी अधिक कोमल और अग्नि से भी अधिक कठोर होता है। कर्त्तव्य-पालन में जिस प्रकार औचित्य का समावेश रहता है उसी प्रकार उसमें अनौचित्य की चरमसीमा भी रह सकती है। यही कर्त्तव्य की विलक्षणता है। यह वैलक्षण्य हमें जड़ प्रकृति में भी दिखाई पड़ता है। जैसे एक हरा भरा वृक्ष ढेला मारने पर भी फूल पुष्प दान करता है-केवल अपना कर्त्तव्य समझ कर। यहाँ तक कि जब जड़ से भी काटा जाने लगता है तो भी अपनी छाया काटने वाले के ऊपर से नहीं हटाता। यह तो कर्त्तव्यनिष्ठा की कोमलता और परोपकारिता का उदाहरण है। अब कठोरता में अग्नि को देखिए-अग्नि का प्रधान कर्त्तव्य हर एक पदार्थ को भस्मसात् करना है। चाहे जो कुछ हो वह जला डालता है। यहाँ तक कि गोद तक का बालक भी यदि उसके निकट आ जाय तो वह अपना कर्त्तव्य समझ कर उस निरीह अबोध शिशु को अकारण भस्म कर देगा।

हमारी जननी भारत भूमि ने अपने गर्भ से प्रायः कर्त्तव्यनिष्ठ पुत्रों को ही पैदा किया है। और आज भी उसकी गोद ऐसे लालों से खाली नहीं है। सतयुग में हमें शिवि, दधीचि, हरिश्चन्द्र जैसे दृढ़प्रतिज्ञ कर्त्तव्यनिष्ठ महापुरुषों के उदाहरण मिलते हैं, जिनसे समस्त विश्व आज भी शिक्षा ले रहा है। त्रेता में मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम ने अपनी सगर्भा पत्नी सीता को पुनः निर्वासित कर कर्त्तव्य का पालन किया। द्वापर में धर्मराज युधिष्ठिर आदि राज-वंशोंत्पन्न सपूतों ने अपनी कर्त्तव्यनिष्ठा की मर्यादा रखी। कलियुग घृणित और दुष्कर्मों का केन्द्र कहा जाता है। परन्तु हिन्दू-कुल-सूर्य महाराणा प्रताप, छत्रपति शूरवीर कर्त्तव्यनिष्ठ पुत्रों ने जननी और जन्म भूमि को लज्जित नहीं होने दिया। कर्त्तव्य एकदेशीय या किसी व्यक्ति की सम्पत्ति नहीं है, उसके लिए सभी समान हैं और वह सर्वत्र व्याप्त है। कर्त्तव्य परमात्मा की प्रेरणा का एक अमूल्य रत्न है जो हर एक को शीघ्र नहीं मिलता। उसमें तीव्रता और मधुरता दोनों हैं। कर्त्तव्यनिष्ठा ही क्षुद्र मानव को सुर नर बन्ध बना देती है। इसी की बदौलत समाज और राष्ट्र का अभ्युत्थान हुआ करता है। सारी समृद्धियाँ और प्रत्येक संघर्ष में विजय कर्त्तव्य निष्ठा पर ही अवलम्बित रहती है।


विचारों पर नियंत्रण कैसे किया जाय।

(प्रो. लालजीराम शुक्ल)

मनुष्य के विचार ही उसे दुःखी और सुखी बनाते हैं। जिसके विचार नियंत्रित हैं, वह सुखी है। दुःखी मनुष्य अपने दुःख का कारण स्वयं को न मानकर किसी बाह्य पदार्थ को मान लेता है। इस प्रकार की मानसिक क्रिया को आधुनिक मनोविज्ञान में ‘आरोपण-क्रिया’ कहते हैं। इस प्रकार कतिपय व्यक्ति अपने शत्रुओं, मित्रों एवं संबंधियों को और कोई-कोई अपने भाग्य को ही कोसा करते हैं। वे अपनी ओर नहीं देखते। आत्म निरीक्षण करने वाला व्यक्ति शीघ्र ही समझ जाता है कि विचार ही मनुष्य के शत्रु, मित्र, संबंधी अथवा भाग्य होते हैं। जिस मनुष्य के विचार उसके अनुकूल हैं वह सभी प्रकार के लोगों, परिस्थितियों और भाग्य को अपने अनुकूल पाता है। विचारों के दूषित हो जाने पर वातावरण दूषित हो जाता है और मित्र शत्रु और सफलता विफलता बन जाती है।

विचारों को अनुकूल बनाना सरल नहीं। विचार अभ्यास से अनुकूल अथवा प्रतिकूल होते हैं। जो मनुष्य जिन विचारों का आदी हो जाता है, उसके मन में वही विचार बहुधा आते हैं। साँसारिक बातों का चिन्तन करने वाले व्यक्ति को उन्हीं विचारों में रस मिलता है। ज्ञान चर्चा उसके लिए रसहीन होती है। ज्ञान चर्चा मनुष्य की इच्छाओं का नियंत्रण करती है, उनकी तृप्ति नहीं करती। अतएव इस प्रकार की चर्चा में आनंद की अनुभूति करना एक स्वाभाविक सी बात होती है।

विचारों पर धीरे-धीरे नियंत्रण हो पाता है। सभी आवेशपूर्ण विचार मन को निर्बल बनाते हैं। कितने ही लोग अपने विचारों से अत्यंत परेशान रहते हैं। वे अपने कुविचारों को मन से निकालना चाहते हैं, पर वे विचार प्रबल से प्रबलतर होते जाते हैं। ऐसी अवस्था में कभी-कभी मनुष्य विक्षिप्त तक होता देखा गया है।

इस प्रकार की स्थिति मानसिक दुर्बलता का परिणाम होती है। यह मानसिक दुर्बलता बार-बार आवेशपूर्ण विचारों को मन में आने देने से उत्पन्न होती है। हर समय विचारों को नियंत्रण में रखने की चेष्टा करने से मनुष्य की इच्छा शक्ति बलवान हो जाती है। श्री एडवर्ड कार्पेन्टर का कथन है कि विचार को पहले क्षण मार डालो, फिर उसके अनुसार जो करना चाहते हो करो।

मानव-स्वभाव स्वभावतः पाशविक प्रवृत्तियों की ओर दौड़ता है। जब हमारे पास कोई उपयोगी कार्य नहीं होता, हम बरबस पाशविक प्रवृत्तियों की तुष्टि में लग जाते हैं। अतएव सत्कार्य में अपने आपको लगाए रखना बुरे विचारों के नियंत्रण के लिए आवश्यक है।

अवाँछनीय विचारों के नियंत्रीकरण का सब से सुन्दर उपाय भगवान् बुद्ध ने बताया है। यह उपाय ‘उदान्’ नामक बौद्ध-ग्रन्थ में उल्लिखित है। यह यौगिक और मनोवैज्ञानिक है। अतएव इस प्रसंग में उल्लेख योग्य है।

भगवान् बुद्ध एक बार अपने एक शिष्य के साथ कहीं ठहरे हुए थे। उस शिष्य के मन में यत्र-यत्र भ्रमण करने की भावना उठी। उसने भगवान् बुद्ध से आज्ञा माँगी। भगवान् ने पहले तो आज्ञा न दी, पर उसके बार-बार आग्रह करने पर उन्होंने आज्ञा दे दी। शिष्य ने आस-पास के अनेक स्थान देखे, जिनमें उसे एक बड़ी सुन्दर वाटिका दिखाई दी। इस वाटिका को देखकर उसके मन में विचार में आया कि मैं यहाँ बैठकर योगाभ्यास करूं। अतएव उसने भगवान् से वहाँ जाकर योगाभ्यास करने की आज्ञा माँगी। बुद्ध ने उसके आग्रह करने पर आज्ञा दे दी। तब वह उस वाटिका में जाकर योगाभ्यास करने लगा, पर ज्यों−ही उसने अपना कार्य प्रारंभ किया कि उसके मन में अनेक कुतर्क उठने लगे।

अन्त में वह भिक्षु भगवान् बुद्ध के पास आया और कहा कि महाराज, ज्यों−ही मैंने योगाभ्यास प्रारम्भ किया, मेरे मन में काम-वितर्क, व्यापार-वितर्क और विहिंसा-वितर्क आने लगे। मैं इन वितर्कों को रोक नहीं सका। अतएव मुझे इनको रोकने का उपाय बताइए। भगवान ने इस प्रश्न के उत्तर में कहा कि जिस व्यक्ति का मन वैराग्य में दृढ़ नहीं हुआ उसे अकेले रहना उचित नहीं है। उसे सदा संघ में रहना चाहिए। संघ में रहने से मनुष्य के विचार विकृत नहीं हो पाते। फिर प्रत्येक साधक को निम्नलिखित चार धर्मों का सदा अभ्यास करते रहना चाहिए-(1) दुर्गुणों पर विचार (2) मैत्री भावना का अभ्यास (3) आनापान सति का अभ्यास और (4) संसार की अनित्यता के विचार का अभ्यास।

मनुष्य का मन सदा राग और द्वेष के बीच घड़ी के लटकन के समान इधर से उधर डोलता रहता है। इसके कारण मनुष्य को साम्यावस्था प्राप्त नहीं होती। मन के सदा अस्थिर रहने से मनुष्य कोई काम लगन के साथ नहीं कर पाता। राग मनुष्य के मन में अनेक प्रकार के ऐसे संस्कार पैदा कर देता है जिनसे मानसिक ग्रन्थियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। रागात्मक मनोवृत्ति की पूरक द्वेषात्मक मनोवृत्ति है। जब एक व्यक्ति के प्रति राग होता है तो उसके विरोधी के प्रति हमारे मन में द्वेष भावना उत्पन्न हो जाती है। जो हमारे स्वार्थ के साधक होते हैं उनके प्रति हमारा प्रेम रहता है और जो हमारे स्वार्थ में बाधक होते हैं उन्हें हम द्वेष की भावना से देखते हैं।

राग की विनाशिनी अशुभ भावना और द्वेष की विनाशिनी मैली भावना है। प्रत्येक पुरुष को सुन्दरी के प्रति अनुराग रहता है। यह अनुराग उसके अचेतन मन में बैठा रहता है। संन्यास धारण कर लेने पर भी यह अनुराग उसके मन से नहीं जाता। रूपवती स्त्री के प्रति सभी पुरुषों की शुभ भावना होती है। रूप के दुर्गुण कामातुर पुरुष को नहीं दिखाई देते। रूप का बार-बार चिन्तन करने से कामवासना प्रबल होती जाती है। इस रागात्मक मनोवृत्ति के विनाश के लिए रूप के दुर्गुणों पर विचार करना आवश्यक है। मुर्दे की कल्पना से संसार के रूपवान व्यक्तियों के प्रति आकर्षण नहीं रहता। इसी प्रकार धन और मान आदि के दुर्गुणों पर चिन्तन करने से इनके प्रति भी विरक्ति सी हो जाती है।

यहाँ यह बतलाना आवश्यक है कि राग और द्वेष किसी बात के सोचने मात्र से नहीं नष्ट होते। इसके लिए प्रतिदिन अभ्यास की आवश्यकता होती है। प्रतिदिन का अभ्यास आत्मनिर्देश का काम करता है। जो विचार हमारे अचेतन मन को प्रभावित नहीं करता, वह हमारे चरित्र का सुधार नहीं कर सकता। विचार-मात्र से इच्छाशक्ति दृढ़ नहीं होती। कितने ही पोथी-पंडित अनेक प्रकार का ज्ञानोपदेश दूसरों को दे सकते हैं, पर आप स्वयं अपने मन को वश में नहीं रख पाते। वे स्वयं उन वासनाओं से मुक्त नहीं हुए, जिनसे वे दूसरों को मुक्त करने की इच्छा करते हैं। मनुष्य में सामर्थ्य बुद्धि नहीं, वरन् अभ्यास लाता है। अभ्यास से मनुष्य का स्वभाव ही परिवर्तित हो जाता है।

मैत्री-भावना क्रोध की विनाशिनी है। जिस प्रकार अशुभ भावना से कामवासना का निराकरण होता है उसी प्रकार मैत्री भावना से क्रोध का निराकरण होता है। जिस व्यक्ति में अपने क्रोध को रोकने की जितनी अधिक क्षमता होती है उसका मन उतना ही शाँत रहता है, और उसकी शक्ति उतनी ही अधिक होती है। जो व्यक्ति सबके प्रति मैत्री भावना का अभ्यास करता है वह दूसरों की ओर से निर्भीक रहता है, उसकी मानसिक शक्ति व्यर्थ के विचारों में नहीं लगती। अमैत्री भावना का अभ्यास करने वाला व्यक्ति सदा भय के वातावरण से बचने के लिए अनेक प्रकार की योजनायें बनाया करता है। इस प्रकार उसकी मानसिक शक्ति अधिकाँशतः कल्पित शत्रुओं से लड़ने में ही खर्च हो जाती है। वह निर्बल हो जाता है। यदि ऐसी अवस्था में उसके मन में कोई अशुभ विचार उत्पन्न हो जाए तो वह उस विचार को अपने मन से निकाल नहीं सकता। अमैत्री भावना और कायरता एक दूसरे के पूरक हैं। मैत्री भावना शान्ति और पौरुष की वर्धक है।

सभी प्रकार के वितर्कों का नाश करने का सुगम और अचूक उपाय ‘आनापान सति’ का अभ्यास है जो मनुष्य की मानसिक शक्ति को संचित रखता है। वह प्रत्येक अशुभ विचार को शुभ विचारों में परिणत कर देता है। यदि किसी प्रकार का संकल्प मन में उठते ही मनुष्य इस अभ्यास में अपने आपको लीन कर दे तो उसका संकल्प सत्य हो जाय।

हम सदा अपनी मानसिक शक्ति को व्यर्थ संकल्प और विकल्प में खर्च करते रहते हैं। यदि संकल्प के बाद हम प्रतिभावना मन में न लावें, अर्थात् किसी प्रकार का संदेह संकल्प की सफलता में न लावें तो हमारा कोई भी संकल्प विफल न हो, पर इसके लिए चेतना की धारा को रोकना अत्यन्त आवश्यक है। चेतना की धारा ‘आनापान सति’ के अभ्यास से रुक जाती है। न केवल सभी प्रकार के बुरे विचार ‘आनापान सति’ के अभ्यास से नष्ट हो जाते हैं, वरन् सभी प्रकार के मानसिक और शारीरिक रोग ‘आनापान सति’ के अभ्यास से खत्म हो जाते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान की यह एक मौलिक खोज है कि आत्मनिर्देश से मनुष्य अपनी मानसिक और शारीरिक सभी प्रकार की बीमारियों को समूल नष्ट कर सकता है। पर आत्मनिर्देश का उचित उपयोग करना साधारण व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं। इच्छा और शुभ आत्मनिर्देश साथ नहीं रहते। जो मनुष्य इच्छा को मार सकता है वही आत्मनिर्देश का वास्तविक लाभ उठा सकता है। इच्छा को मारने के लिए चेतना के प्रवाह को रोकना आवश्यक है और यह ‘आनापान सति’ से संभव है। जो व्यक्ति अपनी चैतन्य को अलग कर देने में जितना समर्थ होता है वह शुभ आत्मनिर्देश से उतना ही लाभ उठाता है।

संसार की अनित्यता का अभ्यास अहंकार का विनाशक है। जिस व्यक्ति का अहंकार जितना अधिक होता है उसके दुःख भी उतने ही अधिक होते हैं। अहंकार की वृद्धि एक प्रकार का पागलपन है। अहंकारी पुरुष जिद्दी होता है। वह जिस बात को सत्य मान बैठता है उसके प्रतिकूल किसी की कुछ सुनने को तैयार नहीं होता। जो उसका विरोध करते हैं, उनका वह घोर शत्रु हो जाता है।

अहंकार का आधार संसार के अनित्य पदार्थों से अपना एकत्व स्थापित करना है। कोई अपने को धन में और कोई मान एवं कीर्ति में अपने आपको खो देते हैं। इनकी अनित्यता पर विचार करने से मनुष्य अपने आपको समझने की चेष्टा करता है। वह फिर अपने शत्रुओं की संख्या घटा देता है। जिस व्यक्ति का अहंकार जितना अधिक होता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। अपने अहंकार के कारण वह इतने शत्रुओं को पैदा कर लेता है। वह अपने शत्रुओं के विनाश की इच्छा करता रहता है। पीछे उसके ये विचार आत्मविनाश के विचारों का रूप धारण कर लेते हैं।

आधुनिक मनोविज्ञान का यह एक सरल सिद्धान्त है कि दूसरों के विनाश के विचार ही आत्मविनाश के विचारों में परिणत हो जाते हैं। परघात और आत्मघात की भावनाएं एक दूसरे की पूरक हैं। हमारे चेतन मन में यदि एक प्रकार की भावनाएं प्रबल होती हैं तो हमारे अचेतन मन में दूसरे प्रकार की भावनाएं प्रबल हो जाती हैं। इस प्रकार दूसरे के विनाश की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपना ही विनाश कर डालता है।

जो व्यक्ति अहंकार की भावना से मुक्त हो जाता है, उसका कोई शत्रु नहीं रहता। उसके विचार भी उसके शत्रु नहीं होते। ऐसे व्यक्ति को किसी प्रकार की विक्षिप्तता नहीं सताती। अहंकार रहित व्यक्ति के विचार सर्वात्मा के विचार होते हैं। विश्व में नवस्पन्दन पैदा करने की उनमें शक्ति आ जाती है। अहंकार मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति के विनाश का सूचक है। मनुष्य में आध्यात्मिकता का उदय होते ही अहंकार का विनाश हो जाता है। वह स्वयं को सभी प्राणियों में देखने लगता है। उसका मन इस प्रकार शान्त और आनन्दमय हो जाता है। अतएव अहंकार का विनाश अपने विचारों को नियंत्रण में रखने का सर्वोत्तम और अन्तिम उपाय है। इसके लिए संसार की अनित्यता के विचार का अभ्यास करना परमावश्यक है। संसार के वैभव की सत्यता में विश्वास रखने वाले व्यक्ति में अहंकार का अभाव होना असंभव है।


Quotation

यदि जीवन में बुद्धिमानी की कोई बात है तो वह एकाग्रता है, और यदि कोई खराब बात है तो वह है अपनी शक्तियों को बखेर देना। बहुचित्रता कैसी भी हो, इससे क्या? वह चीज अच्छी है, जो सारे खिलवाड़ और भ्रम की चीजों को दूर कर देती है और हमें हृदय से अपने काम करने के लिए भेजती है?

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जो व्यक्ति जीवन में केवल एक बात ढूँढ़ता है, वह आशा कर सकता है कि जीवन समाप्त होने के पहले उसे वह प्राप्त हो जायगी।


सफाई, सुव्यवस्था और सौंदर्य

(प्रो. मोहन लाल वर्मा बी. ए., एल. एल. बी.)

सफाई एक दैवी गुण है। अंग्रेजी में एक कहावत है जिसका तात्पर्य है कि सफाई से रहना देवत्व के समीप रहना है। जो साफ रहता है, अपने रहन-सहन द्वारा देवत्व प्रकट करता है। सफाई से सौंदर्य वृद्धि होती है। और साधारण वस्तु भी अपने आकर्षण रूप में प्रकट होती है। वस्तुओं का जीवन बढ़ जाता है। मशीनों की सफाई करने, या समय-समय पर कराते रहने का तात्पर्य उसकी कार्य शक्तियों को बढ़ा लेना है।

जब किसी मशीन को ओवर हाल (आमूल नए ढंग से फिटिंग) किया जाता है, तो न केवल सफाई हो जाती है, प्रत्युत सब पुर्जों को साफ कर नए सिरे से रखने के कारण उनमें नई स्फूर्ति का संचार होता है। जो पुर्जे चूँ-चूँ चर्र-चर्र करते थे, वह थोड़े से तेल से सहज स्निग्ध होकर मजे में चलने लगते हैं। उनकी कार्य शक्ति बढ़ जाती है।

इसी प्रकार मानव शरीर रूपी मशीन का हाल है। हमारे शरीर में अनेक छोटे बड़े सूक्ष्म पुर्जे हैं। हमारा शरीर, मस्तिष्क, हृदय, फेफड़े, उदर अनेक ग्रन्थियों से मिलकर बना है। इन पुर्जों में निरन्तर भोजन को पचाकर रक्त बनाने की क्रिया के कारण मैल एकत्रित हो जाता है। जीवन में पैसों के लिए हम शरीर को अधिक घिस डालते हैं। प्रायः नेत्रों की ज्योति क्षीण पड़ जाती है, गाल पिचक जाते हैं, दाँत गिर जाते हैं, पाचन विकार उत्पन्न हो जाते हैं। ये सब रोग शरीर की अधिक घिसावट के दुष्परिणाम हैं। यदि हम शरीर की आन्तरिक एवं बाह्य दोनों प्रकार की सफाई का ध्यान रखें, तो शरीर मन प्राण में नई स्फूर्ति, नई शक्ति और प्रेरणा का संचार हो सकता है।

भारत में जिस तत्व की बड़ी कमी मिलती है वह सफाई है। सुव्यवस्था और सौंदर्य इसके पुत्र-पुत्री हैं। लोगों के पास मान प्रतिष्ठा, उत्साह है पर स्वच्छता और सुव्यवस्था का बड़ा अभाव है। दुकानें, गलियाँ, सार्वजनिक स्थान, भोजन तथा मिठाई के बाजारों में आप पत्तों के ढेर, जूठन, मैल, मक्खियाँ, नालियों में भरा हुआ कीचड़ विष्ठा देखकर हमें हिन्दुस्तानियों की गंदी आदतों पर लज्जा आती है। लोग बड़ी-बड़ी धर्मशालाएं बनाते हैं, पर उनमें सफाई पर ध्यान नहीं देते। टट्टियों तथा नालियों की सफाई पर व्यय नहीं करते। सार्वजनिक टट्टियों में सभ्य व्यक्ति को जाते हुए शर्म आती है। मेहतर अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं करते। अधिकारी वर्ग देख रेख के मामले में शिथिलता दिखलाता है। टट्टी विष्ठा से सने घिनौने स्वरूप रेल के डिब्बों और रेल के स्टेशनों पर पाई जाने वाली टट्टियों में भी देखे जाते हैं। जितना बड़ा शहर, उसकी गलियों में उतना ही अंधेरा, बदबू और गन्दगी पाई जाती है। जहाँ मवेशी बाँधे जाते हैं वहाँ का तो कहना ही क्या?

सफाई एक सार्वजनिक आदत है। हम भारतीयों को अपनी सार्वजनिक गन्दगी पर लाज आनी चाहिए। जहाँ दूसरे राष्ट्रों में सफाई की ओर विशेष ध्यान दिया जाता है, सरकार पर्याप्त व्यय करती है, म्यूनिस्पैलिटी बहुत ध्यान देती है, प्रत्येक नागरिक सार्वजनिक सफाई की ओर ध्यान देता है, वहाँ हमारे यहाँ कोई भी इस ओर ध्यान नहीं देता। नागरिक, विशेषतः ग्रामीण व्यक्ति और नारी समाज इतने पिछड़े हुए हैं कि जहाँ कहीं जाते हैं सार्वजनिक स्थानों को गन्दा छोड़ जाते हैं। कूड़ा करकट सड़कों पर डाला जाता है। केले, सन्तरे, तथा अन्य फलों के छिलके सड़कों पर डाले जाते हैं और कितने ही व्यक्ति उनसे फिसलकर घायल होते हैं। सिनेमा में मूँगफली के ढेर के ढेर छिलके, बीड़ी सिगरेट के टुकड़े, पान की पीक यत्र-तत्र फैले हुए मिलते हैं। स्टेशनों को हर आधे घण्टे पश्चात् साफ किया जाता है पर वह गन्दा होता जाता है। यह हमारी गन्दी आदत की सूचक हैं। हमें अपनी इन आदतों पर लज्जित होना चाहिए।

शारीरिक स्वच्छता के दो अंग हैं-बाह्य तथा आन्तरिक सफाई। नित्यप्रति मालिश और व्यायाम के पश्चात् स्नान करने से और खुरदरे तौलिये से पोंछने से शरीर स्वस्थ होता है। प्रायः लोग बार-बार स्नान करने का क्रम करते हैं, जल में पड़े रहते हैं असंख्य गोते लगाते हैं, बाल्टी पर बाल्टी पानी डालते हैं लेकिन सच्चे अर्थों में यह स्नान नहीं है। जब तक शरीर के रोमकूप स्वच्छ नहीं होते और त्वचा का संचित मल दूर नहीं होता, तब तक शरीर की स्वच्छता नहीं हो सकती। खुरदरे तौलिये को पानी में भिगो कर त्वचा पर रगड़ने से त्वचा साफ होती है। नाखूनों को काटना, नासिका द्वार को स्वच्छ रखना, जिह्वा की स्वच्छता ये प्रायः उपेक्षित रहते हैं। इन पर बड़ा ध्यान देने की आवश्यकता है।

आन्तरिक स्वच्छता का साधन उपवास है। पन्द्रह दिन पश्चात् उपवास करने से संचित भोजन पच जाता है, मल पदार्थ निकल जाते हैं और पेट की बीमारियाँ दूर होती हैं। हमारे देश में उपवास धर्म के अंतर्गत इसीलिये रखा गया है कि सब इससे लाभ उठा सकें। यथासाध्य ठण्डे जल से स्नान करें। मूत्र-त्याग और मल-त्याग के पश्चात् इन्द्रियों को शीतल जल से धो डालें।

आपका घर वह स्थान है, जिसके वातावरण में आप पलते, वायु पाते, संसर्ग से प्रभावित होते हैं। प्रतिदिन हमारा 14-14 घण्टे का जीवन घर ही में व्यतीत होता है। घर चारदीवारी कमरों, फर्नीचर, वस्त्रों तथा विभिन्न स्थानों पर जो समय हम व्यतीत करते हैं, उनसे हमारी आदतों और स्वास्थ्य का निर्माण होता है। घर जितना ही स्वच्छ और सुव्यवस्थित होगा, उसमें उतनी ही स्वच्छ वायु तथा आनन्द प्राप्त हो सकेगी। यदि आप दुकानदार हैं, या आफिस में आठ घण्टे व्यतीत करते हैं, तो दुकान और आफिस के वातावरण का भी प्रभाव गुप्त रूप से पड़ता है। मान लीजिये आप तम्बाकू, शराब, गाँजा, चरस अथवा जूते की दुकान करते हैं। इन वस्तुओं की बदबू निरन्तर आपके स्वास्थ्य पर प्रभाव डालती रहती है। अतः हमें चाहिये कि हम अपने घर, दुकान या ऑफिसों को खिलौनों की तरह साफ-स्वच्छ रखें।

स्वच्छ घर में रहने वाले की आत्मा प्रसन्न रहती है। आप स्वच्छ धुले हुए वस्त्र पहन कर देखें मन कितना खिला रहता है। इसी प्रकार सफेद पुता हुआ कमरा, स्वच्छ फर्नीचर, स्वच्छ वस्त्र, स्नान से स्वच्छ शरीर, आपको प्रसन्न करने वाले हैं।

स्वच्छ रख कर हम अपने घर के सौंदर्य की वृद्धि करते हैं और चीजों के जीवन को बढ़ा लेते हैं। हमें आन्तरिक शान्ति प्राप्त होती है। सफाई प्रकृति का अंग बन जाने से सर्वत्र सौंदर्य की सृष्टि करती है।

आफिस, घर और दुकान में छोटी-बड़ी असंख्य वस्तुएं होती हैं। इनमें कुछ ऐसी हैं जिनका नित्य प्रयोग होता है, तो कुछ ऐसी होती हैं जो देर से निकलती और काम में आती हैं। कुशल व्यक्ति अपने घर, दुकान या आफिस की वस्तुओं की व्यवस्था इस प्रकार करते हैं कि आवश्यकता पड़ते ही, तुरन्त जरूरत की चीज मिल जाती है। ग्राहक आकर जिस छोटी वस्तु की माँग करता है, चतुर दुकानदार एक क्षण में उसे प्रस्तुत कर देता है। घर में दवाई से लेकर सुई डोरा आलपिन तक एक क्षण में मिल जानी चाहिये। आफिस की फाइल का कोई कागज जरा देर में अफसर के सम्मुख आना चाहिए। पुस्तकालय में जो पुस्तक माँगी जाय, तुरन्त पाठक को प्राप्त हो जानी चाहिए।

अव्यवस्थित दुकानदार, अफसर या परिवार का मुखिया उस व्यक्ति की तरह है, उर्द, मूँग, मसूर, गेहूँ, जो इत्यादि भिन्न-भिन्न अनाजों को एक साथ मिश्रित कर लेता है और जरूरत के समय उनको पृथक करने में व्यर्थ शक्ति का क्षय करता है। वह न गेहूँ निकाल सकता है, न उर्द न मूँग। और यदि निकालता भी है तो उस समय जब उसके हाथ से अवसर निकल जाता है। यदि प्रारम्भ से ही वह व्यवस्था से इन अनाजों को अलग-अलग रखता तो क्यों इतना श्रम और समय नष्ट होता!

प्रायः अफसर लोग चिल्लाया करते हैं और क्लर्क फाइलों को, भिन्न-भिन्न पत्रों को, रेफरेन्सों को तलाश करते हुए थक जाते हैं। दुकानदार वस्तुओं को गलत स्थान पर रख कर झींकते रहते हैं। घर में दियासलाई, चाकू, नालादानी, साबुन, तौलिया, रुमाल, हाथ का थैला, पेन्सिल, कलम इत्यादि प्रायः अव्यवस्थित होने से बड़ा हल्ला मचता रहता है। जो डॉक्टर अपने यहाँ भिन्न दवाइयों को क्रम व्यवस्था से नहीं रखते, वे पछताते रहते हैं। सर्वत्र व्यवस्था की आवश्यकता है।

आप चाहे जिस स्थिति, वर्ग या स्तर के व्यक्ति क्यों न हों, क्रम और व्यवस्था की आपको सबसे अधिक आवश्यकता है। व्यवस्था से आपका कार्य सरल होगा, समय की बचत होगी और जल्दी और काम कर सकेंगे। मन में किसी प्रकार की उलझन उपस्थित न होगी। काम करने को तबियत करेगी।

जिस व्यक्ति में अपनी वस्तुओं को एक निश्चित क्रम और व्यवस्था से रखने की आदत होती है, वह उनको उचित स्थान पर रख कर सौंदर्य की सृष्टि करता है। पं. जवाहर लाल नेहरू जब जेल में थे, तो उनके पास कुछ गिनी चुनी वस्तुएं थीं- हजामत का सामान, कंघा, कलम, दवात, कागज इत्यादि। लेकिन वे अपनी आत्म कथा में लिखते हैं कि उन्होंने उन्हीं को क्रम और व्यवस्था से रख कर सौंदर्य सृष्टि की ओर अपनी आत्मा को आनन्दित किया था। आपके पास जो भी वस्तुएं हों, उन्हीं को किसी निश्चित क्रम-व्यवस्था से रख कर सौंदर्य और उपयोगिता में वृद्धि कर सकते हैं।

अपने घर के पृथक-पृथक कमरों को लेकर यह निश्चित कीजिए कि आप उस कमरे को किस कार्य के लिए रखना चाहते हैं-बैठक, स्टोर, प्राइवेट कमरा, औरतों के बैठने-उठने का कमरा, भोजन करने का कमरा इत्यादि। प्रत्येक कमरे को उसी कार्य के लिए क्रमवार सुव्यवस्थित कीजिए।

मान लीजिए, बाहर वाले 1 कमरे को आप बैठक बनाना चाहते हैं। इसमें एक मेज, कुर्सी, सोफासेट, या फर्श तकिया इत्यादि रखिए, पाँव पोंछने के लिए पायदान, दीवारों पर कुछ कलेण्डर और एक-दो अच्छे चित्र, खूँटी और जूता रखने का स्थान। इस कमरे में व्यर्थ की चीजें, खूँटियों पर कपड़े या फालतू वस्तुएं नहीं रहनी चाहिए। मेन्टलपीस पर कलात्मक रूप से सजे हुए फूलदान और एक दो फोटो। अधिक सजावट भी असभ्यता की निशानी है।

आपके स्टोर में अनाज, दालें, महीने भर के कुटे हुए मसाले, घी, तेल, गुड़, चीनी, एक ओर वस्तुओं के सन्दूक तथा अन्य घर की वस्तुएं रहनी चाहिए। यदि मकान छोटा हो तो क्रम से रखी हुई लकड़ियाँ और उपले भी रह सकते हैं। मिट्टी का तेल और लालटेन भी रखी जा सकती है। सोने के कमरे में भी वस्तुएं कम ही रहें क्योंकि फालतू वस्तुओं से मच्छर होते हैं। रसोई में भी भिन्न-भिन्न बर्तन क्रम से सजे रहें। सीने, काढ़ने, बुनने और कातने का सब सामान एक स्थान पर सजा रहे। मशीन हो तो स्वच्छ तेल लगी हुई रहे। पुस्तकालय हो तो उसकी सब पुस्तकें विषय वार सजी रहें, जिससे जिस समय आवश्यकता हो निकाली जा सकें। संक्षेप में, आपके पास जो भी स्थान हो, जो जो वस्तुएं हों, वे स्वच्छ से स्वच्छ और सबसे आकर्षक रूप में मौजूद रहें, जिन्हें देखकर आपको भी प्रसन्नता हो और देखने वाले भी प्रसन्न रहें।

हमारे घरों में वस्त्रों की जो दुरावस्था है, उसे देखकर क्षोभ होता है। प्रायः स्त्रियाँ महंगे से महंगे रेशमी वस्त्र खरीदती हैं पर उनके साथ अकथनीय अत्याचार होता है। इधर उधर फेंका जाता है, आले या कोने में मैले पड़े रहते हैं, धोबी 20-20 दिन में धोकर वापिस नहीं लाता। यदि हम वस्त्रों की उचित व्यवस्था रखें, मैला होने पर स्वयं उसे धो लिया करें, तो हम आधे वस्त्रों में मजे से काम चला सकते हैं, रुपया बचा सकते हैं, और स्वच्छ भी रह सकते हैं। महंगे कपड़े बना लेना आसान है पर उनकी सेवा करना उनसे अधिकतम लाभ उठाना कुशलता और चतुराई का काम है।

वस्त्रों के संदूक या अलमारी में वस्त्रों को करीने से रखना चाहिए। इससे वस्त्रों के कोने सिकुड़ने या मुड़ने नहीं पाते और इस्तरी नहीं टूटती। रेशमी साड़ियों को कागज में लपेट कर पृथक रखना चाहिये। फिनायल की गोलियाँ रखने से वस्त्र विशेषतः साड़ियाँ कीड़ों से बची रहती हैं।

वस्तुओं की सम्हाल और व्यवस्था और भी आवश्यक है। सम्हाल कर रखने से मशीन का जीवन कई गुना बढ़ जाता है, जबकि तनिक सी लापरवाही से कीमती चीजें भी जल्दी ही नष्ट हो जाती हैं। लेखक के पास एक फाउन्टेन पेन है। इसका मूल्य तीन रुपये के लगभग है। अभी तक दस वर्ष से भी ऊपर यह काम कर चुका है। अब भी ठीक हालत में है। इसी प्रकार घड़ी दस वर्ष, जूता दो वर्ष, चलता है। वर्ष में तीन कमीज और चार पाजामों से काम चलता है। साइकिल को 26 वर्ष हो चुके हैं। यदि प्रत्येक वस्तु को उचित देख−रेख से रखा जाय तो वह कई गुना अधिक काम देती है।

क्या आप जानते हैं कि आपका फाउन्टेन पेन घिस कर नहीं, खोकर नष्ट होता है। पेन्सिलें कभी पूरी तरह काम में नहीं आतीं, कोई माँग लेता है अथवा खो जाती हैं। चाकू और रुमाल भी प्रायः खोते हैं। नालेदानी घर में अनेक होती हुई भी इधर-उधर रख कर भुलादी जाती है। कीमती साड़ियाँ पहनी नहीं जातीं, सन्दूकों में रखी रहती हैं और कीड़ों का भोजन बन कर नष्ट होती हैं। जिस साड़ी पर सबसे अधिक व्यय होता है, वह उतनी ही कम पहनी जाती हैं आभूषणों पर औरतें प्राण देती हैं, किन्तु वे खोकर नष्ट होते हैं, इनके कारण चोरियाँ होती हैं औरतें चुरा ली जाती हैं और अपमानित होती हैं।

यदि आप अपनी थोड़ी सी वस्तुओं को क्रम व्यवस्था से सजाकर रखें, तो इन्हीं की सहायता से हम घर की शोभा में वृद्धि कर सकते हैं। सौंदर्य के लिए अधिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है। जो थोड़ी सी चीजें हैं, उन्हीं की सहायता से आप सौंदर्य की उत्पत्ति कर सकते हैं। बस आपकी दृष्टि में कलात्मकता अपेक्षित है। कलात्मक दृष्टि से हर वस्तु का एक नियत स्थान है, जहाँ वह सुन्दरतम लग सकती है। घर की शोभा इस बात में है कि आप उस स्थान को खोज निकालें। प्रत्येक वस्तु के लिए एक स्थान नियत करें। घर का प्रत्येक सदस्य उस वस्तु को उठा कर वस्तु को नियत स्थान पर रखे। आपके कमरे में एक चित्र हो, या कैलेन्डर लेकिन यदि वही स्वच्छ हो, मैल का नाम निशान न हो, तो वही आकर्षक प्रतीत होता है।

सौंदर्य व्यवस्था पर निर्भर है। जूते कैसे नगण्य हैं, किन्तु यदि आप उन्हीं को पॉलिश कर सजाकर क्रमानुसार रखें, अपने सन्दूकों को स्वच्छ कर उन पर स्वच्छ वस्त्र बिछा लिया करें, चारपाइयों की चादरों को गन्दा न होने दें, कुर्सियों, मेजों, पुस्तकों की धूल झाड़ते रहें, तो निश्चय जानिए घर की चीजों में ही सौंदर्य प्रस्फुटित होगा और आपको अपने साधारण घर में ही आनन्द प्राप्त होगा। आत्मा प्रसन्न रहेगी और मन में यह साहस रहेगा कि आप अच्छे तरीके से रहते हैं।

जीवन में अधिक वस्तुओं की आवश्यकता नहीं है, बल्कि जो थोड़ी सी वस्तुएं हों उन्हीं से सबसे अधिक, सबसे सुन्दर क्रम व्यवस्था से काम लेने में आनन्द है। जिनके पास अधिक वस्तुएं पड़ी रहती हैं, उनमें से आधी ही काम में आती हैं, शेष अनावश्यक, जंग लगी हुई, निष्क्रिय, अव्यवस्थित, बेकार पड़ी रहती हैं। आप अधिक वस्तुओं के संचय के मोह में न पड़ें, वरन् अपनी थोड़ी सी वस्तुओं को सम्हाल कर प्रयोग में लाएं। सार्वजनिक स्थानों की सफाई, सुव्यवस्था एवं सौंदर्य का उत्तरदायित्व आप पर है। आप एक श्रेष्ठ नागरिक हैं। समाज की उन्नति में आपका महत्वपूर्ण स्थान है। आपकी आदतों से समाज बनता-बिगड़ता समुन्नत-अवनत होता है। अतः आप सार्वजनिक स्थानों को कार्य में लेते समय उनकी सफाई और सुव्यवस्था के सम्बन्ध में बड़े सावधान रहें।

यदि आप धर्मशाला में टिकें, तो उसके कमरे या इर्द-गिर्द की सफाई का ध्यान रखें, कमरे को वैसा ही सुन्दर छोड़कर जायं, जैसा वह आपको मिला था, पब्लिक पाखानों का ठीक इस्तेमाल करें। पेशाबघरों में सर्वत्र ध्यान रखें। पब्लिक पार्क, मन्दिर, सार्वजनिक बिल्डिंगों को बिगड़ने न दें। रेल के डिब्बे हम सबके काम आते हैं किंतु हम सफर के पश्चात् उन्हें छिलकों, पत्तों, पानी, धूल-मिट्टी से सना हुआ, जूठन से परिपूर्ण छोड़कर उठते हैं। यह हमारी गन्दी आदतों की परिचायक गन्दी वृत्ति की द्योतक हैं। हर सार्वजनिक स्थान सबके बैठने उठने के कार्य में लेने के लिए बना हुआ है। यदि हम में से प्रत्येक उसे अच्छी तरह प्रयोग में लाये, तो वह अधिक दिन चल सकता है और सबको आकर्षक लग सकता है। सार्वजनिक स्थान हमारे हैं। जैसे हम अपनी वस्तु की सफाई और सुरक्षा का ध्यान रखते हैं, उसी प्रकार हमें सार्वजनिक वस्तुओं तथा स्थानों का ध्यान रखना चाहिये।

जो समर्थ हैं, अपनी शक्ति या रुपये का दान दे सकते हैं, उन्हें सार्वजनिक स्थानों, पार्कों, पुल, धर्मशालाओं, पब्लिक स्कूलों, टहलने के स्थानों, मन्दिरों, स्नान के घाटों, रेल के डिब्बों, टट्टियों, प्लेटफार्मों की स्वच्छता और व्यवस्था का पूर्ण ध्यान रखना चाहिये। अपने रुपये से मरम्मत या नई वस्तुएं बनवाने में पीछे नहीं रहना चाहिए। रुपया दान देने के स्थान पर मरम्मत या पुताई करा देना श्रेयस्कर है।

अपने देश, समाज तथा शरीर की सफाई, सुव्यवस्था और सौंदर्य में हम सबका अत्यन्त महत्वपूर्ण दायित्व है। हमें चाहिए कि अपनी जिम्मेदारी अनुभव करें।


आत्मग्लानि और उसे दूर करने के उपाय।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)

आपसे अनजान में या बिना सोचे समझे असावधानी में कोई पाप हो गया। आपको इस दुष्कृत्य पर पश्चाताप और आत्मग्लानि है। आपके हृदय का रोम-रोम पश्चाताप से क्लान्त है। आप अपने पाप कर्म पर पर्याप्त दुखी हो चुके हैं। एक बार बौद्धिक तथा मानसिक दृष्टि से पश्चाताप कर लेना ही यथेष्ट है। जब पश्चाताप मर्यादा का अतिक्रमण कर जाता है तो यह एक भावना ग्रन्थि या कम्प्लेक्स का रूप ग्रहण कर लेता है, जिसे आत्मग्लानि या रिमोर्स कहते हैं। अधिक दिन तक मन में शोक और आत्मग्लानि के भाव रखने से मनुष्य की बड़ी मानसिक हानि होती है। अधिक पश्चाताप या शोक करने से बहुत सी सृजनात्मक शक्ति का अपव्यय होता है।

मैंने ऐसे कई नवयुवक देखे हैं, जिनसे अनजान में या अबोध अवस्था में कोई पाप या दुष्कर्म हो गया था, पर जो जिन्दगी भर पश्चाताप करते रहे और विगत पाप से अपने को साफ न कर सके। अपनी करनी पर सदैव दुःख मनाते रहे।

आज भी ऐसे अनेक धर्म भीरु व्यक्ति देखने में आते हैं, जो लज्जावश किसी भयानक दोषी की भाँति मुँह छिपाये दारुण मानसिक यातना, अपमान, निरादर अथवा आत्मग्लानि की स्थायी भावना का अनुभव किया करते हैं। देश के लाखों हीरे बचपन के अन्धकार या अबोध अवस्था में किये गये दुष्कर्म, हस्तमैथुन, वासना, लोलुपता, वैश्यागमन इत्यादि के शिकार बन कर आयु भर पछताते, रोते कलपते रहते हैं। अपने आपको धिक्कारते रहते हैं। आत्मग्लानि के आधिक्य के कारण सामाजिक जीवन में पदार्पण नहीं कर पाते या सार्वजनिक कार्यों से डरते घबराते रहते हैं। उनकी आकाँक्षाएं अभिलाषाएं और उमंगें अधखिली कली की भाँति असमय ही मुरझा जाती हैं। उन्हें चाहे कितना ही अच्छा कार्य आता हो, ऊंचे उठने, योग्यताओं का प्रदर्शन करने की कैसी ही शक्ति क्यों न हो, वे बराबर चुप्पी धारण किये रहते हैं। वे हृदय खोलकर अपने मन की गाँठें खोल देना चाहते हैं, किन्तु आँखें चार करने में उन्हें लज्जा और गुप्त भय सा अनुभव होता है। दृष्टि नीचे किए रहना, बात-बात में शर्मा जाना, नवयौवना स्त्री को भले ही आभूषित करता रहे, किन्तु पुरुषों के लिए विशेषतः महत्वाकाँक्षी के हेतु, यह बड़ा भारी मानसिक दोष है। अधिक आत्मग्लानि के शिकार बन कर या अति शोकग्रस्त रह कर हम बिना अपराध के ही अपराधी बन जाते हैं। अनेक बार तो नीची दृष्टि देख कर लोग उन्हें दोषी और अपराधी भी समझ बैठते हैं। उफ्! कैसी कारुणिक दशा है उस व्यक्ति की, जो भला चंगा होते हुए भी पग-पग पर इसी कारण अपने को नीच और अति साधारण समझता है, क्योंकि उससे एक बार पाप हो गया था। अति आत्मग्लानि ग्रस्त व्यक्ति जब बाजार में निकलता है, तो उसके मन में यही गुप्त भय रहता है कि दुनिया के सभी व्यक्ति उसी के पाप, त्रुटि या कमजोरी को तीखी दृष्टि से देख रहे हैं। चाहे वह कहीं हो उसे ऐसा अनुभव होता है कि संसार उस की प्रत्येक क्रिया, हाव-भाव प्रत्येक छोटी बात को घूर-घूर कर देख रहा है, जैसे पत्थर-पत्थर में हजारों नेत्र हों जो उसे हड़पकर डालने पर तुले हुए हैं।

अपने पाप का पश्चाताप करना उचित है। आप से कोई दुष्कर्म हो गया है, तो उसके लिए प्रायश्चित करें, भविष्य में उसे कभी न करने की सौगन्ध लें, बड़े सावधान रहें, कुसंग और कुमित्रों से बचे रहें, गन्दे स्थानों पर न जायं, कुविचार मन में न आने दें। लेकिन जब आप यह सब कुछ कर चुकें, तो निरन्तर बीती हुई बातों में कदापि लिप्त न रहें।

कैथरीन मैन्सफील्ड लिखते हैं, “आप इसे अपनी जिन्दगी का नियम बना लीजिये कि कभी पश्चाताप न करेंगे और बीती हुई अप्रिय बातों को भूल जायेंगे। आप बिगड़ी हुई बातों को कदापि नहीं बना सकते-ऐसा करना कीचड़ में सने रहने के समान दूषित है।”

आत्मग्लानि का एक कारण गुप्त भय है। दूसरा साहस की कमी है। इस मानसिक रोगी के मानसिक संस्थान में गुप्त भय तथा डरपोक पन अत्यधिक वर्तमान रहता है। वह लोगों से डरता है कि कहीं उसकी गुप्त बातें प्रकट न हो जायं। मनुष्यों की भीड़ उसके हृदय में भय का संचार कर देती है। जहाँ दो चार व्यक्ति दिखे कि उसे अनुभव होना शुरू हुआ जैसे वे सब उसी को देखने के लिये एकत्रित हों, वे उसका मजाक कर रहे हों, उसके पापों और पुराने दुष्कर्मों की आलोचना कर रहे हों। आत्मग्लानि ग्रस्त व्यक्ति सभा समितियों में सम्मिलित नहीं होता, दस व्यक्तियों के बीच में बोलने से घबराता है, यहाँ तक कि छोटे-छोटे बच्चों में भी आँखें ऊंची कर अपने विचार प्रकट करने का साहस उसे नहीं होता। वह अपने उच्च सहयोगी कर्मचारियों से मिलने बोलने में घबराता है। अपरिचितों से घबराता है। अपनी योग्यता एवं क्षमता में उसका आत्मविश्वास लुप्त हो जाता है। भय तथा डरपोकपन के अतिरिक्त आत्मग्लानि के कारणों में उदासीनता, गम्भीरता, लज्जा, निरुत्साह, आशंका और गुप्तरोग हैं।

आत्मग्लानि बढ़ने न दीजिए, अन्यथा यह स्थायी नैराश्य और नाउम्मीदी, स्वाभाविक मानसिक दुर्बलता का रूप धारण कर लेंगी। हम प्रत्येक घटना को अपने पक्ष में ही तय होने की कामना किया करते हैं घटनाओं को व्यक्तिगत स्वार्थ की दृष्टि से देखते हैं, अपने व्यक्तिगत मापदण्डों से नापते हैं। यदि ये घटनाएं हमारे पक्ष में घटित नहीं होतीं, तो हम भिन्न हो जाते हैं, क्रुद्ध होकर ईर्ष्या अथवा प्रतिशोध से जलने-भुनने लगते हैं। यह सत्य है कि हम अपना रोष स्पष्टतः प्रकट नहीं करते, किन्तु अन्दर ही अन्दर यह हमें खोखला किया करता है। दूसरों पर तो इसका कुछ प्रभाव पड़ता नहीं उलटे हमारी ही हानि हो जाती है। फिर हम क्यों अपनी आशाओं को ऊँचा चढ़ाएं? फिर कल्पना के महल खड़े करते रहें? फिर चारों ओर से टकराकर क्यों आत्मग्लानि के शिकार बनें!

अपने पापों पर पछतावा करने के पश्चात् और उसके ध्यान में निरत मत रहिए। दूसरे व्यक्ति भी इन्हीं परिस्थितियों में से होकर गुजरे हैं।

वास्तव में हम में से पूर्ण निश्छल, पाक साफ, दोष मुक्त कोई भी व्यक्ति नहीं है। एक बार ईसा महान ने कहा था-”वह मेरे ऊपर पत्थर मारे, जिसने कभी पाप न किया हो।” यह सुन कर उन्हें दण्ड देने वालों की निगाहें झुक गई। उनके पुराने पाप 1-1 करके उनकी स्मृति पर उभर आये और वे शरमा गए।

अपने पापों पर व्यर्थ का शोक और पश्चाताप छोड़कर नये सही जागरुक रूप में जीवन में प्रविष्ट हूजिए। व्यर्थ का डर या पोचपन निकालिए और खोये हुए आत्म विश्वास को बनाइए।

मि. मिल्टन पावेल साहब का कथन है कि यदि आप किसी आत्मग्लानि के रोगी को ठीक करना चाहें तो उसके मन से गुप्त भय और डरपोकपन, भीरुता निकालिये। अपनी योग्यता और क्षमता पर अविश्वास करने के कारण ही रोगी दारुण मानसिक यातना भोग है। अतएव उसमें साहस और आत्मविश्वास उत्पन्न करने की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए। मनुष्य का आत्मविश्वास ही वह अमोघ शक्ति है, जिसके कारण वह उत्साही, क्रियाशील रहता है तथा सार्वजनिक एवं सामाजिक जीवन में सफलता प्राप्त करता है।

प्रिय पाठक! तनिक सोच कर तो देखो, जिस मनुष्य के मन से भय, चिन्ता, शंका, डर, सन्देह, निराशा, लाचारी और निर्बलता टपक रही है, क्या कभी वह कोई महत्वपूर्ण कार्य कर सकेगा? शंका और सन्देह हमारी उन्नति में बड़ी बाधाएं है। ये हमारी मानसिक एकाग्रता में बाधक हैं और हमारे निश्चय को ढीला कर देने वाले दुष्ट विकार हैं। ये हमें निज उद्देश्य से चल-विचल कर देने वाले फिसलते पत्थर हैं।

संसार में हमें अविचल साहस एवं धैर्य से कार्य करना चाहिये। बहुत से मनुष्यों की सफलता और समृद्धि का कारण यही है कि वे अपनी शक्तियों और सामर्थ्य में पूर्ण विश्वास कर सकते हैं।

“हम कार्य कर सकते हैं, हमें ऊँचे दर्जे की सफलता प्राप्त होगी, हम निरन्तर प्रभुता प्राप्त करते जा रहे हैं, ऊँचे उठते जा रहे हैं, निरन्तर उन्नति के प्रशस्त पथ पर आरुढ़ हैं”-इन दिव्य संकेतों से अपनी आत्मा को सराबोर करते रहिये और इन्हें अपने मानसिक संस्थान का एक यज्ञ बना लीजिए, प्रचुर लाभ होगा।

प्रिय पाठक! योगी की तरह एकाँतवासी न बनो। जहाँ तक बने साहस पूर्ण ढंग से सामाजिक कार्यों में भाग लो। तुम व्यर्थ ही डरते किस लिए हो? क्या तुम नहीं जानते कि अन्य व्यक्ति भी तुम से अधिक नहीं जानते। वे भी मामूली ही हैं। जरा हिम्मत से काम लो।

अवसर मिले तो किसी सभा, समिति में सम्मिलित हो जाओ और बेधड़क गाना-बजाना या खेल कूद आदि सीख लो, जिससे तुम अपने क्लब के लोगों से खूब मिल जुल सको। पहले पहले यदि झेंपना पड़े तो घबड़ा न जाओ, प्रत्युत डटे रहो। जहाँ मन में आत्मग्लानि उत्पन्न हो, तुरन्त उसे मिटाने के लिए विपरीत कार्य करो। निरुत्साह के स्थान पर उत्साह और उल्लास धारण करो। जहाँ हृदय में लज्जा, संकोच अथवा भय आवे, वहीं साहस पूर्ण जीवन व्यतीत करो। “हिम्मते मरदाँ मददे खुदा।” बिना हिम्मत संसार में मनुष्य का कोई मूल्य नहीं है।

ढीले वस्त्र पहनो, जिससे गहरा श्वास निश्वास हो सके। माँस पेशियों को फुलाना आत्मग्लानि को भगाने में बहुत सहायक होता। किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए किसी से मिलने जाना हो तो लज्जा न कर अवश्य वहाँ जाओ। जी न चुराओ। मन में यह निश्चय करो कि डरोगे नहीं, संकोच और भय न करोगे। पुराने पापों की बात न सोचोगे।

पश्चाताप की अधिकता मनुष्य की मौलिकता तथा नई शक्तियों का ह्रास करने वाली है। अतः उससे मुक्त रहिए, मंगलमय भविष्य की आशा रखिए।


यज्ञ द्वारा कुछ विशेष प्रयोजनों की सिद्धि

सिद्धि और सफलता के लिए :-

असफलता, निराशा, चिन्ता और खिन्नता उत्पन्न करने वाली परिस्थिति पर विजय प्राप्त करके सफलता का आशाजनक वातावरण उत्पन्न करने की स्थिति उत्पन्न करने करने में सरस्वती शक्ति का विशेष महत्व है। बुद्धि वृद्धि अभीष्ट वस्तुओं की प्राप्ति, सुख शान्ति, परीक्षा में उत्तीर्ण आदि के लिए सरस्वती गायत्री का प्रयोग किया जाता है। मंत्र यह है :-

ॐ सरवत्यै विद्महे, ब्रह्म पुत्र्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्।

इस मन्त्र के साथ किन वस्तुओं के हवन का क्या परिणाम होता है, इसका विवरण इस प्रकार है-

पयोहुत्वाप्नु यान्मेधामाज्यं बुद्धिमवाप्नुयात्। अभिमंत्रयपि वेद् ब्राह्मं रसं मेधामवाप्नुयात्॥

दूध का हवन करने से तथा घृत की आहुतियाँ देने से बुद्धि वृद्धि होती है। मंत्रोच्चारण करते हुए ब्राह्मी के रस का पान करने से चिर ग्रहिणी बुद्धि होती है।

घृतस्याहुति लक्षेण सर्वान्कामानवाप्नुयात्। पंच गव्याशनो लक्षं जपेज्जाति स्मृतिर्भवेत्॥

एक लाख घी की आहुति देने से सब कामों की सिद्धि होती है। पंचगव्य पीकर एक लाख जप करने से स्मरण शक्ति की वृद्धि होती है।

अश्वत्थ समिधो हुत्वा युद्धादो जयमाप्नुयात्। अर्कस्य समिधो हुत्वा सर्वत्र विजयी भवेत्।

पीपल की समिधाओं से हवन करने पर युद्ध में विजय प्राप्त होती है। आक की समिधाओं से हवन करने पर सर्वत्र ही विजय होती है।

तिलानाँ लक्ष होमेन घृताक्तानाँ हुताशने। सर्वकाम समृद्धात्मा पराँ सिद्धिमवाप्नुयात्॥

घी मिलाकर तिलों से एक लाख आहुतियों का हवन करने से सब कामों की सफलता होती है तथा परम सिद्धि प्राप्त होती है।

गुड्च्याः पर्व विच्छिन्नः पयोक्ताजुहुयात द्विजः। एवं मृत्युन्जयो होमः सर्व व्याधि विनाशनः॥

जो द्विज गिलोय की समिधाओं को दूध में डुबो कर हवन करता है, वह सम्पूर्ण बाधाओं से विनिर्मुक्त होता है।

शतं शतं च सप्ताहं हुत्वाश्रिय मवाप्नुयात्। लाजैस्तु मधुरोपेतैर्होमे कन्यामवाप्नुयात्।

अनेन विधिना कन्या वरमाप्नोति वाँछितम्॥

मधुत्रय (दूध, दही, घी) मिलाकर लाजा (खील) से सात दिन तक हवन करने से वर को सुन्दर कन्या प्राप्त होती है और इसी विधि से हवन करने पर कन्या को इच्छित वर प्राप्त होता है।

हुतादेवी विशेषेण सर्व काम प्रदायिनी।

गायत्री की सरस्वती शक्ति हवन करने से सर्व कामनाएं पूर्ण करती है।

सम्पत्ति और समृद्धि के लिए :-

साँसारिक वस्तुओं के अभाव को मिटाने और जीवनोपयोगी आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए लक्ष्मी गायत्री का प्रयोग होता है। महा गायत्री की सतोगुणी शक्ति को सरस्वती, रजोगुणी शक्ति को लक्ष्मी और तमोगुणी शक्ति को दुर्गा कहते हैं। लक्ष्मी गायत्री का उपयोग अभाव, दारिद्र, आदि असुविधाजनक परिस्थितियों को दूर करने के लिए किया जाता है। लक्ष्मी गायत्री मन्त्र यह है :-

ॐ महालक्ष्म्यै विद्महे, विष्णु प्रियायै धीमहि। तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्।

इस मन्त्र का हवन किन वस्तुओं से करने पर क्या परिणाम होता है इसका विवरण इस प्रकार है-

अथ पुष्टिं श्रियं लक्ष्मी पुष्पैर्हुत्वाप्नुयात् द्विजः। श्री कामो जुहुयात्पद्मैः रक्तैः श्रियमवाप्नुयात्॥

लक्ष्मी की आकाँक्षा वाले मनुष्य को गायत्री के साथ रक्त कमल के पुष्पों से हवन करना चाहिए। इससे शोभा, पुष्टि और कीर्ति भी मिलती है।

हुत्वाः श्रियमवाप्नोति जाती पुष्पैर्नवैः शुभः। शालि तण्डुल होमेन श्रियमाप्नोति पुष्कलाम्॥

जाती के नवीन पुष्पों के हवन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। शाली चावलों का हवन भी लक्ष्मी प्राप्त कराने वाला है।

श्रियमाप्नोति परमाँ मूलस्य सकलेरपि। समिद्भिः बिल्व वृक्षस्य पायसेन च सर्पिषा॥

बिल्व वृक्ष की जड़ की समिधाओं को खीर तथा घी के साथ हवन करने से लक्ष्मी प्राप्त होती है।

हुत्वा वेतस पत्राणि घृताक्तानि हुताशने। लक्षाधिपस्य पदवीं सार्वभौमं न संशयः॥

वेत पत्रों को घी में मिलाकर हवन करने से लक्ष्मी पति को पदवी मिलती है।

त्रिरात्रि पोषितः सम्यग् घृतं हुत्वा सहस्रशः। सहस्रं लाभमाप्नोति हुत्वाग्नौ खादिरै धनम्।

तीन रात उपवास करके अच्छी प्रकार से एक हजार घी की आहुति खादिर की समिधाओं से देने पर धन प्राप्त होता है।

पलाशैः समिधैश्चैव घृताक्तानाँ हुताशने। सहस्र लाभमाप्नोति राहु सूर्य समागमे॥

सूर्य ग्रहण के अवसर पर पलाश की समिधाएं घृत के साथ हवन करने से धन लाभ होता है।

हुत्वातु खादिरं वह्नौ घृताक्तं रक्त चन्दनम्। सहस्रं हेममाप्नोति राहुचन्द्र समागमे॥

चन्द्रग्रहण के अवसर पर खादिर तथा रक्त चंदन को घृत समेत हवन करने से धन प्राप्त होता है।

श्री कामस्तु तथापद्मै विल्वैः कंचन कामुकः।

काँचन और कामिनी की इच्छा करने वाला कमल पुष्प या बेलपत्रों के द्वारा हवन करे।

रक्तोत्पलं शतं हुत्वा सप्ताहं हेम प्राप्नुयात्।

लाल कमल के पुष्पों के हवन से धन प्राप्त होता है।

शमी विल्व पलाशानामर्कस्य तु विशेषतः। पुष्पाणाँ समिधश्चैव हुत्वा हेममवाप्नुयात्॥

शमी, बिल्व, पलाश की समिधाएं विशेषतः आक के पुष्प इनका हवन करने से धन लाभ होता है।

अरुणाब्जैस्त्रिमध्वक्तैर्जुहुयादयुतं ततः। महालक्ष्मीर्भवत्तेस्य षटमासान्न संशयः॥

लाल कमल और शहद की दस हजार आहुति देने से छः महीने में धन लाभ होता है।

अनिष्ट निवारण के लिए :-

नाना प्रकार के संकट मनुष्य जीवन में आते रहते हैं। शत्रुओं का आक्रमण, षडयंत्र, द्वेष, मुकदमा, सर्प आदि का भय, चोर, डाकू गुण्डों का आतंक, युद्ध, दैवी प्रकोप, उपद्रव, गृहकलह, विद्रोह आदि की घटनाएं मन में विक्षोभ उत्पन्न करती हैं। इन विपरीत परिस्थितियों को समाप्त करने के लिए गायत्री महामंत्र की तमोगुणी शक्ति दुर्गा का प्रयोग किया जाता है। यह शक्ति मनुष्य का आत्मिक विकास तो नहीं करती पर असुविधाओं का निवारण करने में सहायक अवश्य होती है। कई साधक ताँत्रिक वाममार्गी उपचारों से इसी दुर्गा शक्ति द्वारा दूसरों का अनिष्ट भी करते हैं पर यह उचित नहीं। अपनी धर्मयुक्त रक्षा के लिए दुर्गा शक्ति का सामयिक उपचार करना उचित है।

दुर्गा गायत्री का मन्त्र यह है :-

ॐ गिरजायै विद्महे, शिवप्रियायै धीमहि। तन्नो दुर्गा प्रचोदयात्।

इस मन्त्र का उपचार प्रयोग इस प्रकार होता है।

गायत्री चिन्तयत्तत्र दीप्तानल समप्रभाम्। घातयन्ती त्रिशूलेन केशेष्वाक्षिप्य वैरिणम्॥

एवं विधा च गायत्री जप्तव्या राज सत्तम। होतव्या च यथा शक्त्या सर्वकाम समृद्धिदा॥

प्रज्वलित अग्नि के समान आभा वाली गायत्री का चिन्तन करता हुआ ऐसा ध्यान करें कि शत्रु के केशों को पकड़ कर अपने त्रिशूल से उसका नाश कर रही है। इसी ध्यान में जप और हवन करने से शत्रुओं का नाश होता है।

गो घृतेन सहस्रेण लोध्रेण जुहुयाद्यदि। चौराग्नि मारुतोत्थानि भयानि न भवन्ति वै॥

लोध को गौ घृत के साथ एक हजार आहुति देने से चोर, अग्नि, वायु आदि के उपद्रवों का भय दूर होता है।

अश्वत्थ समिधो हुत्वा युद्धादौ जयमाप्नुयात्। अर्कस्य समिधो हुत्वा सर्वत्र विजयी भवेत्॥

पीपल की समिधाओं के हवन से युद्ध में विजय प्राप्त होती है। आक की समिधाओं से हवन करने से सर्वत्र ही विजय होती है।

सौवर्णे राजते वापि पात्र ताम्रचेऽपिवा। क्षीर वृक्ष मयं वापि निवृणे मृन्मयेऽपिवा।

सहस्रं पंच गव्येन हुत्वा सुज्वलितेऽनिले। क्षीर वृक्ष मयैः काष्ठैः शेषं सम्पादयेत्छनैः।

अभिचार समुत्पन्ना कृत्या पापं च नश्यति॥

सुवर्ण, चाँदी, ताँबा के बने अथवा दूध वाले वृक्षों की लकड़ी से बने पात्र में पंचगव्य रखकर दुग्ध वाले वृक्षों की लकड़ियों से हवन करें। इस प्रकार अभिचार द्वारा उत्पन्न कृत्या (मारण प्रयोग की घात) शान्त होती है।

एवं यः कुरुते राजा लक्ष होमं यत व्रतः। न तस्य शत्रवः संख्ये अग्ने तिष्ठन्ति कर्हिचित्॥

जो व्रत पूर्वक गायत्री के एक लक्ष होम करता है उसके शत्रु युद्ध भूमि में उसके आगे कदापि नहीं ठहरते।

धत्तूर विष वृक्षाक्ष भूरुहोत्थान्समिद्वरान। राजी तैलेन संलिप्तान् प्रयक्सप्त सहस्रकम्। जुहूयात् संयतो मन्यी रिपुर्यमपुरं व्रजेत्॥

धतूरा, कुचिला तथा सरसों के तेल से युक्त समिधाओं से प्रथम सात हजार आहुति जितेन्द्रिय होकर दे तो शत्रु यमपुर को पहुँच जाता है।

सप्तरात्रं प्रजुहुयात् सिद्धार्थ स्नेह लोलितैः। आर्द्रवस्त्रो विष्टि काले मरीचैर्मनुनामुना।

निगृह्यते ज्वरेणारि प्रलयाग्नि समेन सः।

सात रात तक सरसों के तेल से युक्त मिर्चों द्वारा हवन करें। गीला वस्त्र धारण करके वर्षा काल में यह प्रयोग करें ऐसा करने से शत्रु को प्रलयाग्नि सदृश्य ज्वर हो जाता है।

अर्धरात्रिषु बलिं चरुणा सर्व सिद्धिदा। कृत्या रोग भय द्रोह भूतादिन्नात्र संशयः॥

आधी रात्रि में चरु बना कर सिद्धिदायक बलि प्रदान करे ऐसा करने से रोग, भय, द्रोह, तथा भूत आदि का भय नहीं रहता।

दुर्गा का आधार लेकर ही दूसरों को हानि पहुँचाने वाले ताँत्रिक हवन किये जाते हैं। ऐसे प्रयोगों से कर्ता का भी कालान्तर में अनिष्ट ही होता है। इसलिए ऐसे प्रयोगों के सम्बन्ध में उपेक्षा करना ही उचित है।

शमी समिद्भिः शाम्यति भूत रोग ग्रहादयः।

शमी की समिधाओं से हवन करने पर भूत रोग एवं ग्रहादि की शान्ति होती है।

आर्द्राभिः क्षीर वृक्षस्य समद्भिः जुहुयात् द्विजः। जुहुयाच्छकलैर्वापि भूत रोगादि शान्तये॥

दूध वाले वृक्षों की गीली समिधाओं से हवन करने पर बुरी ग्रह दशा की शान्ति होती है। भूत रोग आदि की शान्ति के लिये सम्पूर्ण प्रकार की समिधाओं से हवन करना चाहिये।

अभिमन्त्रय शतं भस्मन्मसद् भूतादि शान्तये। शिरसा धारयेद् भस्म मन्त्रयित्वा तदित्यृचा॥

हवन की भस्म को गायत्री मन्त्र से अभिमंत्रित करके लगाने से भूत प्रेत की शान्ति होती है।

भूत, प्रेत, पिशाच, ब्रह्मराक्षस आदि के उपद्रवों से ग्रस्त रोगियों के लिए दुर्गा गायत्री का प्रयोग करने से रोगी का उन दुष्टों से सरलता पूर्वक पीछा छूट जाता है।

इन पंक्तियों में कुछ थोड़े से ही प्रयोग वर्णित हैं। इनके अतिरिक्त गायत्री महामन्त्र एवं उसके अंतर्गत 24 गायत्रियों के प्रयोग द्वारा अनेकों प्रकार के हवन होते हैं। वेदमन्त्रों एवं ताँत्रिक कौल मन्त्रों के द्वारा विस्तृत विधान वाले स्वतन्त्र यज्ञ इनसे पृथक हैं। इन उपरोक्त प्रयोगों में दूध वाले वृक्षों की समिधाओं तथा मधुत्रय (दूध, दही, घृत) की आहुतियों का प्रयोग प्रायः सभी प्रयोजनों में बार-बार आता है। इससे कुछ भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। इनमें उन वस्तुओं के लाने, परिमार्जित करने, प्राणवान् बनाने की विधियाँ पृथक हैं, जिस विधि से इन वस्तुओं को प्रयुक्त किया जाता है वह वैसे ही गुण वाली बन जाती है। पानी में जैसा रंग डाला जाय वह उसी रंग का हो जाता है। उसी प्रकार यह वस्तुएं यद्यपि साधारण हैं और विविध प्रयोगों में आती हैं। इनको जिस विधि से प्रयुक्त किया जाता है तदनुसार ही उनकी शक्ति और सामर्थ्य बनती एवं बढ़ती घटती है।


स्वाध्याय आवश्यक है।

(श्री विक्रमादित्य जी आचार्य)

स्वाध्याय शब्द का अर्थ है स्व+अध्याय, अर्थात् अपना अध्ययन या अपने को जानना या आत्म-निरीक्षण करना। यह संसार जिसे हम नित्य-प्रति देखते हैं क्या है? हमारा इससे क्या सम्बन्ध है? हमारा वास्तविक स्वरूप कैसा है? हमारे जीवन का लक्ष्य क्या है? हम अपने आस-पास अनेक जीवों को देखते हैं उनके साथ हमें कैसा बर्ताव करना चाहिये? जो ग्रन्थ इन प्रश्नों का उत्तर देते हैं या देने का यत्न करते हैं उन ग्रन्थों के अध्ययन को हम स्वाध्याय कहते हैं।

हमारे प्राचीन ग्रन्थ स्वाध्याय की महिमा से भरे पड़े हैं। हमारे तत्ववेत्ता ऋषियों ने स्वाध्याय को जीवन की उन्नति के लिए आवश्यक अंग माना था। योग सूत्रों के रचयिता महामुनि पातंजलि ने तो स्वाध्याय को श्रष्टाँग योग के पाँच में से एक नियम माना है। उन्होंने लिखा है-

“शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान ये पाँच नियम हैं, जिस प्रकार आन्तरिक और बाह्य पवित्रता, सन्तोष, तप और ईश्वर का स्मरण ज्ञान प्राप्ति में सहायक हैं उसी प्रकार स्वाध्याय भी सहायता पहुँचाता है। स्वाध्याय के बिना हम ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे इसमें सन्देह है।”

हम अपनी वर्तमान अवस्था से कभी सन्तुष्ट नहीं होते। यद्यपि हम जानते हैं कि हमारे अन्दर कुछ कमी है और एक सीमा से आगे काम नहीं कर सकते। पर तब भी हम अधिक शक्ति प्राप्त करने के लिए यत्न करते रहते हैं। हमारे अन्दर कोई एक ऐसी अज्ञान शक्ति है जो हमें निराश नहीं होने देती और निरन्तर अधिक उन्नति के लिए प्रेरणा करती रहती है। हम इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं, कि यह शक्ति हमें तभी चैन लेने देगी जब हम पूर्णता को प्राप्त कर लेंगे-अर्थात् इतनी उन्नति कर लेंगे कि जिससे आगे बढ़ना असम्भव हो जाय। इस पूर्णता की प्राप्ति के लिए स्वाध्याय बड़ी जरूरी चीज है। सत्य तो यह है कि स्वाध्याय हमारे लिए अनिवार्य है।

प्रत्येक देश में समय-समय पर महापुरुष जन्म लेते रहते हैं वे अपनी अलौकिक शक्ति से संसार का उपकार करते हैं। भूले-भटके को उन्नति के मार्ग पर अग्रसर करते हैं। पर वे अपने नश्वर शरीर से हमारा अधिक लाभ नहीं कर पाते। उनका यह भौतिक शरीर कुछ समय पश्चात नष्ट हो जाता है। पर वे हम लोगों के लिए एक ऐसी वस्तु छोड़ जाते हैं जो कभी नष्ट नहीं हो सकती, जिसमें हम हर समय लाभ उठा सकते हैं। हजारों वर्षों पूर्व भगवान् कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। उपदेश देने वाले के शरीर का तो अब कहीं पता नहीं पर हाँ गीता एक ऐसा ग्रन्थ अवश्य हमारे पास है जो ज्ञान का भण्डार है और हम उसको पढ़ कर अपना ज्ञान बढ़ा सकते हैं। उपनिषदों के ऋषियों के कहीं दर्शन नहीं होते पर उनकी अमर कृतियों को पढ़ कर हम कृत-कृत्य हो जाते हैं। बुद्ध, ईसा और मुहम्मद के नश्वर शरीर ढूँढ़ने से भी कहीं नहीं मिलेंगे पर उनके लिखे ग्रन्थों को पढ़ कर हम उनके विचारों को जान सकते हैं। जब हम महापुरुषों के इन ग्रंथों को पढ़ते हैं तो ऐसा जान पड़ता है कि हम उनके पास बैठे हुए हैं। उनसे बातें कर रहे हैं। इस प्रकार हमने देखा कि स्वाध्याय महापुरुषों से मिलने का एक साधन है।

स्वाध्याय के सम्बन्ध में आजकल लोगों में एक बड़ा भ्रम पैदा हो गया है। हम उस भ्रम को दूर कर देना भी अपना कर्त्तव्य समझते हैं। मुद्रण-कला के आविष्कार से हजारों पुस्तकें प्रतिदिन छपती हैं। इन पुस्तकों में से अधिकाँश तो ऐसी होती हैं कि जिनमें पढ़ने से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। किसी भी प्रकार की पुस्तक का पढ़ना स्वाध्याय नहीं कहला सकता। कुछ लोगों में पुस्तकें पढ़ने की एक लत पड़ जाती है। पुस्तकें भी पढ़े बिना उनसे रहा नहीं जाता। कैसी ही पुस्तक हो उन्हें पढ़ने को चाहिये। उससे लाभ होगा या हानि इसकी परवाह नहीं। इन लोगों के हाथ में जो पुस्तकें दिखाई पड़ती हैं वे हैं-अश्लील उपन्यास, काम वासना को उत्तेजित करने वाली कहानियाँ, बाजारू कवियों की गन्दी कविताएं और सिनेमा के चलते हुए गाने। ऐसी पुस्तकों के अध्ययन को हम स्वाध्याय कदापि नहीं कह सकते। इनको स्वाध्याय के लिए रखना महान भूल है। इनके पढ़ने से समय और धन दोनों ही नष्ट होते हैं।

अगर हम किसी व्यक्ति के विचारों को जानना चाहते हैं तो हमें उसके पुस्तकालय में जाना चाहिये। उसके पुस्तकालय में जैसी पुस्तकें होंगी वैसे ही उसके विचार होंगे। कवि को घर में आपको कवियों की पुस्तकें अधिकता से मिलेंगी और दार्शनिक के यहाँ आपको दर्शन के ग्रंथ ही दिखाई पड़ेंगे। दूसरी ओर कामी और विषयासक्त व्यक्ति के यहाँ आपको विषयों को उत्तेजना देने वाले साहित्य के ही दर्शन होंगे। पुस्तकें हमारे विचारों को बनाने और बिगाड़ने में बड़ा काम करती हैं इसलिये हमें इनके चुनाव में बड़ी सावधानी रखनी चाहिए। गन्दे और समाज पर बुरा असर डालने वाले साहित्य को हमें अपने पास कभी भूल कर भी नहीं रखना चाहिए, अगर कोई मुफ्त में भी दे तब भी ग्रहण नहीं करना चाहिए।


गायत्री उपासना के सामूहिक आयोजन

गायत्री हमारी आध्यात्मिक सम्पत्ति है। ईश्वर प्रदत्त इस अलम्ब वरदान को ऋषियों ने दीर्घकालीन तपश्चर्याओं के द्वारा प्राप्त करके हमारे लिए उपलब्ध किया है। और वे अपनी इस महत्वपूर्ण शोध को, खाती को हमारे लिए इसलिए छोड़ गये हैं कि इसका शुभोचित उपयोग करके अपने आत्मिक और साँसारिक जीवन को सुव्यवस्थित एवं सुख शान्तिमय बना सकें। जिन पर ईश्वर का अनुग्रह होता है वे इस पारसमणि को पहचानते और अपनाने का प्रयत्न भी करते हैं और समुचित लाभ भी उठाते हैं।

गायत्री के सम्बन्ध में एक बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिए कि यह सामूहिक शक्ति है। कोई व्यक्ति केवल अपने लिए ही इसे सीमित करे तो यह गायत्री की मूल भावना के विपरीत कार्य होगा। ‘धियो योनः’ पद में जो नः शब्द है वह ‘बहुवचन; सामुदायिक अर्थ का बोधक है। गायत्री जपने वाला ‘केवल अपने लिए’ नहीं वरन् “हम सबके कल्याण के लिए” यह उपासना करता है। समाज का, संसार का, देश और जाति के कल्याण की बात को भुलाकर केवल अपने फायदे के लिए ही जो कार्य किए जाते हैं वे “स्वार्थ” कहलाते हैं। गायत्री मन्त्र निश्चय ही स्वार्थ नहीं-वह तो परमार्थ है-सबके कल्याण के लिए है। गायत्री साधना के साथ यज्ञ का, दान का, ब्राह्मण भोजन का सम्बन्ध इसलिए जोड़ा गया है कि केवल अकेला एक व्यक्ति चुपचाप जप करके एक कोने में न बैठा रहे वरन् संसार की वायु शुद्धि एवं शुभ वातावरण के निमित्त हवन भी करे, दान देकर समाज की कुछ भलाई भी करे। सच्चे लोक सेवकों परमार्थ प्रसारक ब्राह्मणों को भोजन आदि से तृप्त करके उनकी सामर्थ्य भी बढ़ावें। यह सब बातें परमार्थ रूप हैं-सामूहिक लाभ के लिए हैं। गायत्री की मूल भावना जो “नः” शब्द में स्पष्ट है। हमें सामूहिक रूप से कार्य करने के लिए बलात् प्रेरित करती है। जिसमें यह लोकहित की भावनाएँ उठें, समझना चाहिए कि यही व्यक्ति गायत्री माता का पयपान करने की स्थिति में पहुँचने वाला है।

सच्चे गायत्री उपासक को सच्चा गायत्री प्रचारक भी बनना पड़ता है। जिस वस्तु को हम अपने लिए कल्याणकारक समझते हैं उससे दूसरों को भी लाभ उठाने के लिए क्यों न प्रेरणा दें? परमार्थ भावना का उद्देश्य ही लोक सेवा और जन कल्याण में प्रवृत्त होना है। गायत्री की विशेषता ही सामूहिक जनकल्याण की है। नैष्ठिक उपासकों में वह स्वयमेव पैदा होती है। सच्चे अध्यात्म-पथावलम्बियों में यह भावना रोके नहीं रुकती। हमारे स्वयं के पैर को कोई जबरदस्ती इस मार्ग पर बढ़ाये लिए जा रहा है। हम देखते हैं कि जो और लोग भी कुछ गहरे उतरते जाते हैं, उन्हें भी बलात् कोई शक्ति इसी मार्ग पर लगा देती है। वे अपनी कठोर व्यक्तिगत साधना की अपेक्षा-सामूहिक गायत्री विस्तार के आयोजनों का महत्व किसी भी प्रकार-रत्ती भर भी कम नहीं समझते। वरन् अधिक उत्साह पूर्वक इस दिशा में अवसर होते हैं।

इन दिनों ऐसे अनेक उदाहरण मिले हैं कि किन्हीं व्यक्तियों ने अपनी अन्तरात्मा की प्रेरणा से गायत्री प्रचार के लिए झिझकते छोटे-मोटे कदम उठाये पर प्रयत्न आरम्भ करते ही अनेकों सत्पुरुषों का सहयोग उसमें मिला और वे समारोह उनकी कल्पना से भी अनेक गुने सफल हुए। ईश्वरीय बल जिन कार्यों के पीछे होता है निस्संदेह वे ऐसे ही सफल होते हैं।

अभी हाल में गतमास आगरा के श्री सीताराम जी अग्रवाल एडवोकेट के मन में गायत्री साहित्य पढ़ने से यह संकल्प उत्पन्न हुआ कि एक सामूहिक गायत्री यज्ञ किया जाय। वे अपने संकल्प को चरितार्थ करने के लिए उठ खड़े हुए। अनेक धार्मिक प्रवृत्ति के सज्जनों के घरों पर जा जाकर उन्हें यह प्रेरणा की कि 15 दिन में 24 हजार गायत्री का अनुष्ठान अपने-अपने घरों पर विधि पूर्वक करें। जो तैयार हो गये उन्हें-उन्होंने मालाएं गोमुखी आदि भेंट की और सारे नियम समझाये। इस प्रकार प्रयत्न करने से लगभग 40 अनुष्ठान कर्त्ता नर-नारी तैयार हो गये। यज्ञ की व्यवस्था एक सार्वजनिक सुन्दर स्थान पर प्रातःकाल होती रही, जिसमें सभी अनुष्ठान कर्त्ताओं ने अपने जप का शताँश हवन किया। प्रतिदिन सायंकाल धार्मिक विद्वानों के भाषण होते रहे। जिसे सुनने के लिये हजारों की संख्या में जनता आती रही, गायत्री साहित्य का वितरण हुआ। महिलाओं द्वारा कीर्तन हुआ। इस पुनीत आयोजन में जनता ने बहुत अभिरुचि प्रकट की, और बड़ी धार्मिक भावना तथा प्रेरणा ग्रहण की। आयोजन कर्त्ताओं को श्रेय, प्रकाश, आनन्द और उत्साह प्राप्त हुआ। अनेक सज्जनों ने इस पुनीत कार्य में उत्साह वर्धक सहयोग दिया। आशा से अधिक सफलता मिली। ऐसी ही प्रेरणा आगरा, जमुना किनारे के विश्वम्भर नाथ जी खण्डेलवाल को हुई है। उनके साधारण प्रयत्न से अब तक 40 अनुष्ठान कर्त्ता तैयार हो चुके हैं और बसंत पंचमी को पूर्णाहुति की तैयारी की जा रही है।

कुछ मास पूर्व अलीराजपुर के जेलर श्री देशमुख, एस. डी. ओ. श्री जाधव जी, हैड मास्टर श्री शिरदे सज्जनों के साधारण प्रयत्न से एक बहुत बड़ा गायत्री महापुरश्चरण हुआ था। जिसका नयनाभिराम दृश्य देखकर दर्शकों को प्राचीन भारत की प्रत्यक्ष अनुभूति होती थी। 500 व्यक्तियों का ब्रह्म-भोज तथा ऐसा विशाल आयोजन था जैसा एक व्यक्ति हजारों रुपये खर्च करने पर भी नहीं कर सकता, पर वह सामूहिक प्रयत्न होने के कारण बिना कोई याचना चन्दा आदि किये स्वेच्छा सहयोग से ही सब कुछ हो गया।

पं. गोपाल दास जी महाराज जोधपुर निवासी ने 24 गायत्री महायज्ञ कराने का संकल्प किया है। प्रयत्न करके उन्होंने आधे से अधिक पूर्ण कर लिये हैं। शेष के पूर्ण होने में भी अधिक विलम्ब लगने वाला नहीं है।

खास गाँव के श्री ब्रह्मचारी जी महाराज ने 24 लक्ष गायत्री मन्त्र लेखन कराने का संकल्प किया है। वे उस प्रान्त में घूम-घूम कर कापियाँ बाँट रहे हैं। और मन्त्र लिखा-लिखा कर मथुरा भेज रहे हैं। कापियाँ बाँटने का खर्चा भी कुछ सत्पुरुषों के सहयोग से आसानी से पूरा हो रहा है। 24 लक्ष मंत्र लेखन कराने के बाद एक विशाल पूर्णाहुति कराने का उनका विचार है।

बैंगलोर की अध्यापिका शाँता बाई ने केवल महिलाओं से गायत्री जप, गायत्री कीर्तन, गायत्री चालीसा पाठ, तथा गायत्री यज्ञ का विशाल आयोजन जप कराया था। इस पुण्य आयोजन में भाग लेने वाली महिलाओं को अनेकों साँसारिक लाभ हुए हैं, ऐसी सूचना हमारे पास आई थी।

यह तो दो चार वृत्तांत लिखे हैं, जिनमें से प्रत्येक का विवरण आश्चर्यजनक है। इतने स्वल्प प्रयत्न से इतने सफल आयोजन सम्पन्न हो जाते हैं। इन्हें देख कर यही कहना पड़ता है कि इन सत्कार्यों के पीछे कोई दैवी प्रेरणा शक्ति काम करती है।

गायत्री उपासना के सामूहिक आयोजनों का प्रबन्ध करना अपने एकाँकी छोटे-मोटे अनुष्ठानों की अपेक्षा निश्चय ही अधिक उच्च कोटि का पुण्य है। जिन को सुविधा हो, जिनके अन्तःकरण में प्रेरणा हो उनको ऐसे शुभ प्रयत्नों के लिए अवश्य ही उत्साह प्रकट करना चाहिए। एक दो प्रभावशाली सहयोगियों के साथ कार्य आरम्भ किया जाय। नीचे कुछ ऐसे ही कार्यक्रम उपस्थित किये जाते हैं।

(1) अपने पास पूरा गायत्री साहित्य मंगा लीजिये। धार्मिक प्रकृति के 24 व्यक्ति या कम से कम 10 व्यक्ति ऐसे तलाश कीजिए जो उसे पढ़ने की प्रतिज्ञा करें। उनके घर जा जाकर क्रमशः एक-एक पुस्तक पढ़ने दीजिए और वापिस लाइए। इस प्रकार 24 व्यक्तियों को वह साहित्य पूरा पढ़ा दिया जाय। अन्त में जिन-जिन ने यह पुस्तकें पढ़ी हों वे 108-108 आहुतियों का हवन कर लें। जिनने पुस्तकें पढ़ी हों उनमें से कोई चाहें तो इसी प्रकार अपना साहित्य मंगाकर ओर नये 10 या 24 को पढ़ा सकते हैं।

(2) अपने आस-पास कम से कम 24 व्यक्ति ऐसे ढूँढ़िये जो 24 हजार मंत्र का अनुष्ठान कर सकें। यह कम से कम 6 दिन में और अधिक से अधिक 24 दिन में पूरा करना चाहिए। ब्रह्मचर्य से इन दिनों रहना आवश्यक है और भी जो सात्विकताएँ बरती जा सकें उत्तम हैं। 24 हजार जप करने वालों को 240 आहुतियों का हवन करना है सो क्रमशः सब लोग करते रहें। हवन अन्तिम तीन दिनों में अथवा एक ही दिन सबका हो सकता है। यह एक पूर्ण पुरश्चरण है।

(3) यदि 24 से अधिक साधक मिल सकें और वे प्रतिदिन कुछ समय भी अधिक लगा सकें तो 24 लक्ष जप का महापुरश्चरण कराया जा सकता है। जिसने जितनी मालाएँ की हैं उन्हें उतनी ही आहुतियों का हवन करना चाहिए।

(4) गायत्री चालीसा के 2400 पाठों का अनुष्ठान 10 व्यक्ति 10 दिन में कर सकते हैं। इसमें प्रतिदिन 24 पाठ करने में 2-3 घण्टे से अधिक समय नहीं लगता। इसमें कोई विशेष प्रतिबन्ध नहीं है। रात्रि में अथवा मध्याह्न में सुविधा के समय भी यह हो सकता है। जहाँ अधिक व्यक्ति मिल सकें या अधिक समय लिया जा सके वहाँ 24 हजार पाठ कराये जा सकते हैं। जिसने जितने पाठ किये हों वह उतनी ही आहुतियों का हवन कर लें।

(5) गायत्री मन्त्र लेखन प्रतिदिन 500 मन्त्र लिखने के हिसाब से 24 दिन में 24 हजार मन्त्र लिखे जा सकते हैं। इसके लिए अधिक से अधिक 40 दिन का समय रखा जा सकता है। इनमें भी समय तथा ब्रह्मचर्य आदि का प्रतिबन्ध नहीं है। कम से कम 10 व्यक्तियों से यह अनुष्ठान 24000 मन्त्र लेखन का हो सकता है। इसमें प्रतिव्यक्ति को कम से कम 240 आहुति का हवन कराना चाहिए।

यह पाँच प्रकार के कार्यक्रम ऐसे हैं जिन्हें ऐसे प्रभावशाली व्यक्ति जो दूसरों को उचित रीति से समझा सकने की क्षमता रखते हों बड़ी आसानी से पूरा कर सकते हैं। प्रारम्भिक आयोजन के लिए मालाएँ, गायत्री चालीसा या मन्त्र लेखन के लिए कापियाँ आयोजन कर्त्ता यदि अपने पास में से वितरण करे तो 4-6 रुपये में सब काम चल सकता है। अपील नियम आदि छपाये जाएं तो भी उनमें कोई भारी खर्च नहीं होगा। हवन जिन्होंने नहीं किया है, उन्हें बहुत भारी वस्तु मालूम पड़ती है, पर जिन लोगों के अभ्यास में वह है वे जानते हैं, कि अधिक धन हो तो हवन में बहुमूल्य सामग्री, मण्डप दक्षिणा, प्रसाद, ब्रह्म भोज आदि में चाहे जितना खर्च हो, सकता है पर जहाँ धन की कमी हो वहाँ तिल, जौ चावल, शकर, घी तथा सुगन्धित सामग्रियों के सम्मिश्रण से सस्ती सामग्री भी बन सकती है और गरीब आदमी भी उस व्यवस्था को आसानी से कर सकते हैं। जहाँ धन की कमी होती है वहाँ उदार हृदय पण्डित बिना दक्षिणा या कम दक्षिणा में भी कृत्य करा देते हैं। वैसा न हो तो भी हवन विधि कुछ मुश्किल नहीं है। मथुरा आकर शास्त्रोक्त पूर्ण विधान 3 दिन में भली प्रकार सीखा जा सकता है। प्रवचन के लिए जहाँ विद्वान व्यक्ति नहीं वहाँ तो ठीक ही है अन्यथा गायत्री ग्रन्थों में से महत्वपूर्ण अंश पढ़ कर सुनाते रहने से वह कार्य हो सकता है। कीर्तन आदि करने वाले, संगीत जानने वाले स्त्री-पुरुष हर जगह मिल जाते हैं। हवन प्रवचन आदि के मंच, मण्डप सुसज्जित बनाने में मनुष्य की कला प्रियता, थोड़े से सामान में ही बहुत शोभा उपस्थित कर सकता है। यह सब कार्य बहुत सरल है। फिर ऐसे शुभ कार्यों के लिए सहयोग भी अनायास ही मिलता है हमारा सहयोग एवं पथ-प्रदर्शन भी ऐसे पुनीत आयोजनों में सदा ही रहता है। शुभ और सच्चाई से खरे हुए कार्यों में भाग लेने की, हाथ बटाने की, सहायता देने की प्रेरणा अनेकों व्यक्तियों के हृदय में स्वाभाविक ही उठती है और वे सब कार्य बड़ी सुविधा पूर्वक हो जाते हैं।

धार्मिक प्रकृति के लोग कुछ न कुछ दान पुण्य, कथा कीर्तन, करते ही रहते हैं, यदि वे इस प्रकार पुनीत आयोजनों में अपना धन समय और श्रम लगावें तो वस्तुतः वे परम श्रेय प्राप्त कर सकते हैं। अपने लिए और दूसरों के लिए कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। वानप्रस्थ, संन्यासी, कथा वाचक, पुरोहित प्रकृति के ऐसे मनुष्य जिनने धार्मिक जीवन बिताने का लक्ष्य बनाया है और जिनके पास समय भी है वे दूसरों को प्रेरणा देकर ऐसे आयोजन कराते रहने में अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं। जोधपुर के पं. गोपालदास जी, खाम गाँव के ब्रह्मचारी जी इस प्रकार के आयोजन कराते रहने की पुनीत योजनाओं में लगे हुए हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि -शुभ कार्यों की प्रेरणा देने वालों को उन कृत्यों का दसवाँ भाग व पुण्य का भागीदार बनना पड़ता है। इस प्रकार अनेकों व्यक्तियों से शुभ कार्य कराते रहने से इतना पुण्य फल संचय हो जाता है, जितना एकाकी साधना में चौबीस घण्टे लगे रहने पर भी सम्भव नहीं है।

गायत्री विद्या की जानकारी तथा गायत्री उपासना साधना की प्रक्रिया का प्रसार करना मानव जीवन की अनेक कठिनाईयों को सरल करने का परम पुनीत मार्ग है। आज के समय में यह सर्वोपरि आवश्यक है।


तपोभूमि में गायत्री महापुरश्चरण

(पं. राजकिशोर मिश्रा, पटियाली)

गायत्री तपोभूमि में आश्विन की नवरात्रि का गायत्री महापुरश्चरण बड़े ही आनन्द पूर्वक सम्पन्न हुआ। मथुरा शहर से एक मील दूर, यमुना तट पर यह तपोभूमि ऐसे पुनीत स्थान पर अवस्थित है जहाँ पूर्व काल में अनेक संतों ने तपश्चर्याएं करके सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। इस स्थान पर जो भी साधन किये जाते हैं वे बड़े अद्भुत रूप से सफल होते हैं। इस बार का यह महापुरश्चरण भी ऐसा ही सफल रहा। उड़ीसा, गुजरात, हैदराबाद, राजस्थान, मध्यप्रदेश, बिहार, आदि प्रायः प्रान्तों से गायत्री उपासक लगभग 100 की संख्या में आये थे।

आश्विन शुक्ल 1 को प्रातःकाल सब लोग 24 हजार अनुष्ठान का संकल्प लेकर साधना में प्रवृत्त हो गए। तपस्वी जीवन के कष्टसाध्य नियमों को प्रायः सभी ने बड़ी प्रसन्नता पूर्वक निभाया। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में उठकर सब लोग नित्यकर्म स्नानादि से निवृत्त होकर गायत्री जप में संलग्न हो जाते थे। पीले दुपट्टे ओढ़े हुए पंक्ति बद्ध साधना करते हुए साधकों का दृश्य बड़ा ही हृदयग्राही होता था। प्राचीन काल में तपोवनों में ऋषिगण इकट्ठे होकर किस प्रकार वेदोक्त साधनाएँ करते होंगे इसकी एक प्रत्यक्ष झाँकी देखकर दर्शक के मन में सहज ही आस्तिकता का उदय होता था।

यज्ञ सूर्योदय होते ही आरम्भ हो जाता था। 108 आहुतियों का हवन करके दस-दस उपासकों की टोली उठती जाती थी और नई टोलियाँ आती जाती थी। इस प्रकार दस बजे तक क्रम चलते रहते। सभी साधक अपने जप में शताँश हवन से कीं अधिक हवन कर लेते थे। 10 बजे जब हवन समाप्त होता तो उस दिन की सभी हवन करने वाली टोलियाँ आकर शास्त्रोक्त विधि से तर्पण, मार्जन, आदि कृत्य करती और सामूहिक प्रार्थना तथा प्रदक्षिणा के साथ उस दिन का कार्य-क्रम समाप्त होता है।

मध्याह्न को भोजन विश्राम के उपरान्त 2 से 6 बजे तक प्रवचन होते। जिसमें गायत्री, यज्ञ धर्म, अध्यात्म, संस्कृति, नीति, व्यवहार तथा मनुष्य जीवन की विभिन्न समस्याओं पर प्रकाश डाला जाता है। आचार्य जी का इन दिनों 9 दिन तक केवल जल लेकर उपवास रहता है तो भी वे डेढ़ दो घंटे ही मार्मिक प्रवचन प्रतिदिन करते अन्य विद्वान वक्ताओं का क्रम प्रतिदिन बदलता रहता। सत्संग का यह स्वर्णीय समय बड़ा ही प्रभावोत्पादक होता। प्रातः काल जप, यज्ञ आदि से शुद्ध एवं परिष्कृत हुई आत्माओं में सच्चे अन्तःकरणों से निकले हुए उद्गार जोती हुई भूमि पर बीज बोने का काम करते थे। इन प्रवचनों का लोगों पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा, जितना हजारों कथा व्याख्यान सुनने पर भी पड़ना कठिन है।

एक दिन प्रवचन, दूसरे दिन तीर्थ यात्रा यह क्रम बनाया गया या तीर्थ यात्रा का कार्यक्रम ऐसा रखा गया था कि 4 दिन में मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, महावन, ब्रह्माण्डघाट, दाऊजी, गोवर्धन, जतीपुरा, राधाकुण्ड, नंदगाँव बरसाना आदि सभी प्रमुख स्थान भली प्रकार देख लिए गये। करीब 5 रुपये कुल किराया खर्च पड़ा। लारियाँ तपोभूमि में आकर सबको ले जाती थीं और वहीं उतार जाती थीं। ठहरने और भोजन की समुचित व्यवस्था थी। इस प्रकार की सामूहिक तीर्थ यात्रा में ऐसा आनन्द रहा जैसा अकेली यात्राओं में प्राप्त हो सकना कभी भी संभव नहीं है। 10 दिन का दोनों समय का भोजन व्यय 10) रखा गया था। जो प्रायः सभी ने जमा करा दिया था।

गीता प्रेस गोरखपुर वाले श्री जयदयाल गोयन्दका भी इस पुनीत अवसर पर पधारे और उनका गायत्री महामन्त्र की महत्ता पर एक घण्टा बड़ा ही मार्मिक प्रवचन हुआ। वे इस आयोजन को देखकर प्रसन्नता से पुलकित और गदगद हो गये। उन्होंने 101) दान भी दिए।

जैसे पवित्रतम एवं भावना पूर्ण वातावरण में यह महापुरश्चरण हो रहा था, उससे तपोभूमि में एक अलौकिक आध्यात्मिक तत्व का उद्भव होते हुए लोगों ने प्रत्यक्ष देखा। अनेकों साधकों को बड़ी ही दिव्य अनुभूतियां हुई जिनके कारण उन्होंने अपने जीवन को सफल एवं धन्य हुआ माना। गायत्री तत्व का प्रत्यक्ष अनुभव करने वालों में जाँजमेर (गुजरात) के भट्ट धीरज लाल मन्छाराम जी अग्रणी रहे। यह महात्मा लम्बे समय से मौन रह कर अत्यन्त निष्ठा और पवित्रता पूर्वक गायत्री पुरश्चरण कर रहे हैं। इन्हें जो लालसा थी उसके संबंध में उन्हें माता की प्रेरणा हुई कि वह तुम्हें मथुरा प्राप्त होगी। तद्नुसार वे बिना किसी पूर्व तैयारी के तुरन्त मथुरा चल पड़े और अन्ततः उन्हें यहाँ आकर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त हुआ। इसी प्रकार और भी कई साधकों को दिव्य अनुभव हुए उनकी आँखों में से कई दिन आनन्द के आँसू निरन्तर बरसते रहे। यद्यपि ऐसे लोगों ने अपने साक्षात्कार का पूरा वृत्तान्त आचार्य जी को बता दिया था फिर भी विषय गोपनीय होने के कारण उसका विवरण अन्य लोगों को पूछने पर भी नहीं बताया गया।

अन्तिम दिन पूर्णाहुति में सभी साधकों ने एक साथ भाग लिया। सभी कृत्य पूर्ण शास्त्रोक्त रीति से सम्पन्न हुए। यहाँ का वातावरण ऐसा प्रेम पूर्ण एवं स्वर्गीय बन गया था कि जाते समय लोगों के दिल टूट रहे थे। उस समय लोगों कि आँखों में से प्रेम गंगा उमड़ रही थी। कितने ही तो बालकों की तरह फूट-2 कर रो रहे थे। साँसारिक कर्त्तव्यों के कारण विलग होना पड़ रहा था पर मन सबका यहाँ ही अटका हुआ था। यदि विवशता न होती तो इस साक्षात् स्वर्ग को छोड़ कर कोई भी यहाँ से जाने को तैयार नहीं होता। 9 दिन के निराहार उपवास के कारण आचार्य जी का शरीर और भी दुर्बल हो गया था फिर भी अपने सभी कर्त्तव्य भली प्रकार पूरे कर रहे थे।

आगे के लिए यह निश्चय हुआ है कि प्रति वर्ष आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में ऐसे ही 24 लक्ष जप के दो महापुरश्चरण हुआ करेंगे और जून की छुट्टियों में विद्यार्थियों के लिए साँस्कृतिक शिक्षण शिविर हुआ करेगा। अधिक यज्ञ और तप होने से तपोभूमि की भूमि में यह दिव्य प्रभाव बढ़ेगा। जिससे इस पुनीत स्थान में प्रवेश करने व लोगों स्वल्प प्रयत्न से अधिक शान्ति एवं शक्ति मिल सके। अपने घरों पर साधना करने की अपेक्षा यहाँ के शक्तिशाली वातावरण में किया हुआ तप निश्चय ही अनेक गुना अधिक परिणाम कारक होगा। यह एक सिद्धपीठ इस तपोभूमि को बनाने के लिए आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में यहाँ महापुरश्चरणों की सदा ही व्यवस्था रहेगी। अगले चैत्र के महापुरश्चरण के अन्त में पूर्णाहुति के दिन ही नरमेध यज्ञ भी होगा। जिसमें गायत्री माता, यज्ञ पिता एवं भारतीय संस्कृति के लिए जो लोग जीवन दान करेंगे, उनके महत्व पूर्ण संकल्पों को शास्त्रोक्त विधि से वृहत समारोह पूर्वक सम्पन्न कराया जायगा और बताया जायगा कि प्राचीन काल में किस प्रकार नरमेध यज्ञ होते थे।

तपोभूमि में 24000 के लघु अनुष्ठान 2400 की संख्या में हों ऐसा संकल्प किया है। इस संकल्प के दो लाभ हैं। एक तो इतना तप होने से यह तीर्थ सच्चे अर्थों में ‘सिद्धपीठ’ बन जायेगा और दूसरे जो तपस्वी यहाँ तप करेंगे उन्हें अन्यत्र कहीं भी गायत्री उपासना करने की अपेक्षा अधिक सफलता मिलेगी। इसलिए आगामी नवरात्रियों में मथुरा अधिक संख्या में लोगों को न आने की वैसी कड़ाई न बरती जायेगी जितनी अब तक बरती जाती रही है।

लोग श्रोत स्मार्त यज्ञों के शास्त्रोक्त विधानों को भूल गये हैं। अच्छे कर्मकाण्डी पंडितों का मिलना कठिन हो रहा है। देश में सात्विक वातावरण पैदा करने के लिए यज्ञों की बड़ी आवश्यकता है क्योंकि उनके बिना उस प्रचण्ड शक्ति का आविर्भाव नहीं हो सकता जो समय और वातावरण को अदृश्य रूप से परिवर्तित करने में समर्थ होती है। ठीक यज्ञों के लिए अच्छे याज्ञिकों की भी आवश्यकता है। इसलिए यह भी निश्चय किया है कि तपोभूमि में यज्ञों की शास्त्रोक्त विधि व्यवस्था की सांगोपांग शिक्षा देने के लिए एक विद्यालय की स्थापना की जाय, यज्ञीय वनस्पतियाँ पैदा की जाएं, यज्ञपात्र, कुण्ड आदि सभी की शिक्षाएं यहाँ हों। षोडश संस्कारों और पर्व त्यौहारों का विधान भी सिखाया जाय। जिससे हमारा समाज वस्तुतः सुसंस्कारी बन सके।

क्योंकि अभी हमारे साधन बहुत सीमित हैं। वैसा विद्यालय चलाने के लायक अर्थव्यवस्था जुटाने में भारी कठिनाई है। इसलिए तात्कालिक कार्यक्रम यह बनाया गया है कि चैत्र वदी 5 सं. 2011 तद्नुसार 13 मार्च सन् 1955 से एक मास या छः सप्ताह का एक शिक्षण शिविर किया जाय, जिसमें विभिन्न प्रकार के यज्ञों तथा अन्य कर्मकाण्डों की शास्त्रीय शिक्षा देकर कुछ ऐसे याज्ञिक तैयार किए जायं जो यज्ञविद्या का चमत्कार दिखा सकने लायक स्थिति तक पहुँच सकें।

गायत्री सम्बन्धी आवश्यक सभी जानकारियाँ एक स्थान पर अत्यधिक सस्ते रूप में छापने के लिए इस महापुरश्चरण में आये हुए साधकों ने बहुत जोर दिया। तद्नुसार “अखण्ड-ज्योति, प्रेस” ने तीन हजार रुपये का घाटा देना स्वीकार करके एक ‘गायत्री ज्ञान अंक’ जनवरी 55 में छापने की व्यवस्था की है। इस ज्ञान अंक में इतनी सामग्री ठूँस दी जायगी कि एक नये व्यक्ति को सब कुछ नहीं तो काम चलाऊ बहुत कुछ मिल जायेगा। बिना कुछ अधिक पूछ-ताछ की अपेक्षा रखे इस अंक में साधारण अंकों को बराबर या उससे अधिक पृष्ठ रहेंगे दो चित्र भी भीतर रहेंगे पर असली लागत की अपेक्षा इसका मूल्य आधा रखा जायगा। यह अंक उतना ही अधिक छपेगा जितना तीन हजार घाटा देकर छप सकेगा। हर बार घाटा देते रहना भी संभव नहीं इसलिए दुबारा इसके छपने की भी आशा नहीं है। ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक या गायत्री प्रेमी जितनी अधिक संख्या में इन्हें दान के लिए या बेचने के लिए मँगाना चाहें अपनी कापियाँ अभी से रिजर्व करा लें।

आश्विन की नवरात्रि का गायत्री महापुरश्चरण बड़े ही स्वर्गीय एवं आनन्द मय वातावरण में समाप्त हो गया। जहाँ उससे अदृश्य वातावरण में बड़े ही महत्वपूर्ण तत्व उत्पन्न हुए हैं एवं सम्मिलित होने वालों को आशातीत शान्ति मिली है वहाँ आगे के लिए कुछ कार्यक्रम भी बने हैं। जिनमें 4 मुख्य हैं (1) सामूहिक उपासना आयोजनों का कार्यक्रम जिसके सम्बन्ध में पिछले पृष्ठों पर एक लेख छपा है। (2) आगामी चैत्र की नवरात्रि में अधिक उपासकों को तपोभूमि के महापुरश्चरण में भाग लेने आने के लिए प्रोत्साहन (3) चैत्र वदी 5 ता0 13 मार्च से एक या डेढ़ महीने के लिए शास्त्रोक्त यज्ञ विधि का शिक्षण शिविर (4) आश्चर्यजनक सस्ता एवं अपनी सामर्थ्य से अधिक घाटा देकर छपने वाला जनवरी 55 का ‘गायत्री ज्ञान अंक’। इन चारों कार्य क्रमों के लिए यथासम्भव सहयोग करना और इन्हें आगे बढ़ाने के लिए उत्साहपूर्वक शक्ति भर प्रयत्न करना, हम सब का परम पुनीत कर्त्तव्य है।


अमृत पुत्र अभिनन्दन!


अमृत पुत्र अभिनन्दन (Kavita)

जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन! माँग रही म्रियमाणा मनुजता है तुमसे नवजीवन!

सिसकियाँ और चीत्कार भरे हैं सभी ओर अम्बर में, सुलग रही विद्वेष वह्नि पर, जन-जन के अन्तर में,

हरो हृदय का ताप-पाप, कर स्नेह-सुधा रस-वर्षण! जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन!

यह प्रज्ञा का द्वन्द्व आज, आदर्शों की टकराहट, प्राचीरों से घिरी विकल कर रही सभ्यता छटपटाहट,

कुसुम-सरों से काटो उसके कठिन लौह के बन्धन! जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन।

तुम आओ किरणों के रथ पे, अन्धकार मिट जाये, निस्तरंग जीवन-सागर में लाल लहर लहराये,

बाँटो जग में स्निग्ध विभाकरण जला-जला निज यौवन! जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन!

देखा, हार रहे हैं वे भी जिन्हें गर्व भुजबल का, पौरुष की फीकी परिभाषा, बुझता तेज अनल का;

छाया पुर के चाँद दिखाओ अपना ज्योतित आनन! जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन!

तुम वंशी के कोमल स्वर से कर दो असि को कुँठित, भौतिकता के शव में कर संस्कृति की आत्मा जागृत,

नश्वर वीणा पर गाओ कवि शाश्वत गीत चिरंतन! जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन!

प्रकटे स्वर्ण-शस्य धरती पर आगत मंगलमय हो, नूतन युग के नव मानव की दिशि-दिशि में जय-जय हो,

नई चेतना के निर्माता, करो अमर व सर्जन! जगती के विषमय आँगन में अमृत पुत्र अभिनन्दन!

*समाप्त*

(प्रो. आनन्द नारायण शर्मा, एम. ए.)