अपने सुझाव और सहयोग की सूचना देना न भूलिए।
पिछले अंक में साँस्कृतिक पुनरुत्थान की योजना उपस्थित की जा चुकी है। अखण्ड-ज्योति और गायत्री परिवार के सदस्यों को इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य करना है। समय की पुकार, कर्त्तव्य की चुनौती और ईश्वरीय प्रेरणा के आधार पर बनी हुई इस कार्यप्रणाली से मुख मोड़ना जागृत आत्माओं के लिए किसी भी प्रकार उचित न होगा। राष्ट्र निर्माण का, धर्म प्रसार का, प्राचीन भारतीय गौरव की प्रतिष्ठापना का, पुनीत कार्य ऐसा है जिसे व्यक्तिगत कठिनाइयों की उपेक्षा करके भी हमें पूरा करना चाहिये।
प्रस्तुत योजना ऐसी हैं जिसमें हर परिस्थिति के हर योग्यता के व्यक्ति अपने-अपने ढंग से भाग ले सकते हैं। जहाँ इच्छा और अभिरुचि होती है, वहाँ कोई न कोई मार्ग अवश्य निकल आता है। व्यस्त से व्यस्त, कठिनाइयों और उलझनों में फँसे हुए, रोगी अयोग्य व्यक्ति भी उस महान कार्यक्रम में किसी न किसी रूप में अवश्य भाग ले सकते हैं। हम चाहते हैं कि अपने परिवार का एक भी व्यक्ति ऐसा न रहे जो किसी न किसी रूप में इस महान कार्यक्रम में भागीदार बनने से वंचित रह जाय।
सितम्बर के अंक में प्रस्तुत योजना के सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने विचारों की अभिव्यक्ति हमें लिखनी चाहिये। हम अपने प्रत्येक परिजन से यह आशा करेंगे कि अक्टूबर मास में एक विस्तृत पत्र हमें भेजें जिसमें (1) प्रस्तुत योजना को सफल बनाने संबंधी अपने सुझाव तथा (2) उनमें अपने भाग लेने संबंधी सम्भावनाएं तथा दैनिक, साप्ताहिक तथा मासिक रूप से कुछ समय इनके कार्यों के लिए निकाल सकने की सम्भावना का उल्लेख करना चाहिए। यह पत्र आने पर आपसी परामर्श से कुछ न कुछ ऐसा कार्यक्रम अवश्य बन सकेगा जो वर्तमान स्थिति में भी आपके लिये सम्भव हो सके।
जो लोग पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हैं और धर्म प्रसार के योग्य जिनमें भावना हैं उन्हें नरमेध के लिए प्रस्तुत होना चाहिए। जो ऊँची आध्यात्मिक भावना वाले हैं पर गृहस्थ की जिम्मेदारियों से छूटने की स्थिति में नहीं हैं, वे आत्म दान करके, परमार्थ बुद्धि से गृहस्थ को पालते हुए तथा लोक सेवा में भाग लेते हुए जीवन मुक्त की स्थिति तक पहुँच सकते हैं। साधारण काम काजी लोग अपने व्यस्त जीवन में भी थोड़ा बहुत बहुत साँस्कृतिक कार्यक्रम रखकर अपनी सेवा भावना को चरितार्थ कर सकते हैं। जिनके पास कुछ विशेष काम नहीं हैं, पर गृहस्थ की जिम्मेदारी हैं वे यदि प्रभु पूर्ण ढंग से बात चीत करने की योग्यता रखते और गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए देश करना चाहते हों तो उसके परिवार के लिए भी कुछ व्यवस्था सोची जा सकती है। कुछ ऐसी शिथित महिलाओं की भी आवश्यकता है जो अखण्ड-ज्योति प्रेस की व्यवस्था तथा साहित्य निर्माण, सम्पादन आदि महत्वपूर्ण कार्यों में लग कर धर्म सेवा करती हुई, अपने जीवन को धन्य बना सके। इसी प्रकार हर व्यक्ति चाहे वह बीमार, वृद्ध, स्त्री, घर से बाहर जा सकने में भले ही असमर्थ हो-धर्म स्थापना के महान कार्य में किसी न किसी रूप में अवश्य भाग ले सकता है। किसके लिए क्या कार्य उपयुक्त रहेगा-यह व्यक्तिगत रूप से या पत्र व्यवहार द्वारा निश्चित किया जा सकता है।
अपने प्रत्येक आत्मीय परिजन, स्नेही, साथी तथा अनुयायी को हम इस महान अभियान में साथ चलने के लिए आमन्त्रित करते हैं। यह आमन्त्रण एक विशेष प्रेरणा के आधार पर दिया जा रहा है इसलिए दीखता है कि हमारे स्वजनों द्वारा उसकी उपेक्षा न की जा सकेगी।
विनीत-
श्री राम आचार्य।
वर्ष-14 संपादक-श्री राम शर्मा, आचार्य अंक-10
(श्री. विद्यावती मिश्र)
जो कुछ भी थोड़ा सुख तेरे पास उसे भी त्याग!
जब तक शेष रहेगा तब तक नहीं मिलेगी शान्ति, दूर न हो पायेगी तब तक तेरे मन की भ्रान्ति,
प्राप्त न होगा भाव कुसुम को पावन तुष्टि पराग! जो कुछ भी थोड़ा सुख तेरे पासे उसे भी त्याग!
यह सुख का ही त्याग कहाया गीता में निष्काम, उर का अन्तर्द्वन्द्व स्वयं ही कुरुक्षेत्र संग्राम,
वही कृष्ण बन सका कि जिसने पाया पूर्ण विराग! जो कुछ भी थोड़ा सुख तेरे पास उसे भी त्याग!
पग को बाँधे मोह स्वप्न का और सत्य की प्यास, मधुर प्राप्ति लिप्सा को तज कर ले ले तू संन्यास,
विष न मिलेगा, कभी किसी से मत तू अमृत माँग! जो कुछ भी थोड़ा सुख तेरे पास उसे भी त्याग!
ममत्व ही बंधन का कारण होता है। जड़ भरत जैसे वीत राग महात्मा का जब मृग शावक पर ममत्व हो गया तो उन्हें उस ममता के बन्धन में बँधकर अगले जन्म में मृग की योनि को भुगतने के लिए बाध्य होना पड़ा था। राजा जनक यद्यपि विशाल राज पाट के स्वामी थे पर ममता के अभाव में वे कर्मयोगी भव बन्धन मुक्त ही रहे।
संसार में शरीर को जीवित रखने के लिए कुछ न कुछ वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती ही है। गृह त्यागी गुफाओं में रहने वाले सर्वत्यागी संन्यासी भी कुछ न कुछ वस्तुएं पास रखते हैं-माला, कमण्डल, कोपीन मृगछाला, सरीखी अनेक वस्तुएं उनके पास रहती हैं। यदि उन्हीं में उनकी आसक्ति हो जाय ममता का बन्धन बँध जाय तो वह तुच्छ सी वस्तुएं ही उन्हें भवबन्धन में बाँधे रह सकती हैं। इसके विपरीत सम्पदा एवं विस्तृत परिवार होते हुए भी कृष्ण जी अपनी अनासक्त वृत्ति के कारण योगेश्वर ही नहीं भगवान तक हो सके।
जीव भव बन्धनों में बंधा हुआ है। यह बन्धन ममता और वासना के हैं। इन्हीं के कारण संस्कार बनते हैं कर्मयोग प्रारब्ध एवं लेन-देन का चक्र चलता है। जिससे आवागमन के बन्धनों में बंधा हुआ जीव चौरासी लाख योनियों में घूमता रहता है। मुक्ति की सभी आकाँक्षा करते हैं। यह मुक्ति इन ममता और वासना के संस्कारों से छुटकारा पाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। इन दोनों से जिसे छुटकारा मिल गया वह शरीर रहते हुए ही जीवन मुक्त है। उसके लिये फिर और कोई बन्धन शेष नहीं रह जाता।
अनेक प्रकार के साधन जप तप तीर्थ यात्रा दान पुण्य व्रत उपासना कथा कीर्तन योगाभ्यास आदि इसी प्रयोजन के लिए किये जाते हैं कि ममता और वासना के बन्धन क्षीण हों। समस्त अध्यात्म साधनाओं का यह एक ही उद्देश्य है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही ऋषियों ने देश काल पात्र के अनुसार अनेक प्रकार के साधन विधानों का निर्माण किया है।
इन अनेक साधनों में एक बहुत ही महत्वपूर्ण सरल, एवं प्रभावशाली उपाय समर्पण है अपनी वस्तुओं को भगवान के समर्पण करके उन्हें प्रसाद स्वरूप उपयोग करना-अपनी सम्पत्तियों को भगवान की धरोहर समझकर उनके मुनीम जैसी अपनी स्थिति रखना-परिवार को भगवान का बगीचा और अपने को उनका माली मानना इन्द्रियों के सन्मुख आये हुए अनायास भोगों से ही सन्तुष्ट रहना-आदि प्रक्रियाएं ऐसी हैं जिन्हें व्यवहारिक जीवन में यदि ढाल दिया जाय तो मनुष्य आसक्ति कामना वासना, चिन्ता, तृष्णा, शोक आदि से छुटकारा पा सकता है। केवल विशुद्ध कर्त्तव्य पालन करते रहने से उसका हर कार्य यज्ञ रूप बन जाता है और साधारण गृहस्थ जीवन यापन भी योग साधना जैसा शुभ फलदायक होता है। इसलिए अध्यात्म विद्या के वेत्ता लोग समर्पण की साधना पर बहुत अधिक जोर देते हैं। योगी अरविन्द घोष ने अपने ग्रन्थों में सबसे अधिक इस बात पर जोर दिया है कि माता के चरणों में यदि जीव सच्चे हृदय से आत्म समर्पण कर दें तो उसे और कुछ करना तथा पाना शेष नहीं रह जाता। गीता में भगवान कृष्ण ने भी पग-पग पर इसी महान प्रक्रिया का संदेश दिया है।
मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युँजन्मदाश्रयः।
असंशयं समग्रं माम् यया ज्ञास्यसि तच्छृणु॥
गीता 7/1
हे पार्थ अपना मन मुझ में आसक्त कर, मेरा आश्रय लेकर योग कर, तो निश्चय ही मुझे सम्पूर्ण रूप से जान लेना।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पित मनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्य संशयम!।
8/7
निरन्तर मेरा स्मरण करता हुआ युद्ध कर। अपना मन और बुद्धि मुझे अर्पण कर देने पर निस्सन्देह तू मुझे ही प्राप्त कर लेगा।
यत्कारोषि यदश्तासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥
8/27
जो कर्म करे, भोग करे, यज्ञ करे, दान दे, तप करे सो सब मेरे अर्पण कर।
मन्मनाभव मद्भक्तो मद्याजी माँ नमस्कुरु।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥
9/33
मुझ में मन लगा मेरा भक्त बन, मेरे लिये यज्ञ कर, मुझे नमस्कार कर, मुझ में लग और अपनी आत्मा को मुझ में संलग्न कर। इस प्रकार तू मुझे ही पावेगा।
मथ्येव मन आधस्व मयित्रुंद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥
मन को मुझे सौंप बुद्धि का मुझे अर्पण कर, ऐसा करने से तू निश्चय ही मुझे प्राप्त करेगा मेरे में ही निवास करेगा।
सर्व कर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्वयपाश्रयः। भत्प्रसादा वाप्नोति शाश्वतं पद मव्ययम्॥
मुझे आत्म समर्पण करने वाला- सब कर्मों को सदा करते रहते हुए भी मेरी कृपा से अविनाशी परम पद को पाता है।
तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्पराँ शान्ति स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम॥
हे अर्जुन! सर्वतोभावेन उस परमात्मा की शरण में जा। उसकी कृपा से तू परम शान्ति और परम धाम को प्राप्त होगा।
सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज। अहंत्वा सर्वे पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
सब कर्मों को त्याग कर तू केवल मेरी शरण में आ, तुझे सब पापों से छुड़ा दूंगा। शोक मत कर।
भगवान ने “समर्पण” को सर्वोत्तम साधना के रूप में इसलिए उपस्थित किया है कि इसके द्वारा ममता ओर मोह के बन्धनों पर सीधा एवं तीव्र प्रहार होता है। मकान जायदाद को, पशु को, वस्तुओं को बेच देने पर जब मन में यह भाव समा जाता है कि अब इन पर हमारा स्वामित्व नहीं रहा तो उनके प्रति चिर संचित ममता बात में समाप्त हो जाती है। फिर उसके संबन्ध में चिन्ता करने की कोई बात शेष नहीं रह जाती। कन्या दान कर देने पर पिता की अपनी बेटी के सम्बन्ध में चिन्ताएँ ओर जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती है। मुनीम को यद्यपि मालिक से अधिक काम करना पड़ता है पर उसे अपने भीतर चिन्ता और परेशानी प्रतीत नहीं होती। राजा हरिश्चन्द्र भंगी की सेवा करते रहे पर उस चाण्डाल कर्म की कोई छाप उनके मन पर न जमी। कैदी जेल में काम करता है पर उसे जेलखाने की जिम्मेदारी का भार नहीं रहता। बालक माता की गोदी में पूर्ण निश्चिंत रहता है। पत्नी पति के घर में जाकर पूर्ण सुरक्षा एवं निश्चिंतता अनुभव करती है।
अपनी वस्तुओं को जितना ही हम समर्पण करते हैं उतना ही दान का महान पुण्य फल आत्म संतोष के रूप में उसी क्षण अनुभव होता है। जब पैसा पाई या छोटी मोटी चीजें किसी को दान करने पर आत्मा में उल्लास अनुभव होता है तो बड़े परिणाम में समर्पण कर देने से तो बहुत भारी संतोष होना निश्चित ही है। भोजन का थाल भगवान को सच्चे हृदय से समर्पण करके यदि यदि उस आहार को भगवत प्रसादरूप से ग्रहण किया जाय तो वह साधारण भोजन भी बड़ा तृप्तिकारक होता है। यदि मनुष्य अपने परिवार को भगवान को अर्पण करके उसका माली मात्र अपने को अनुभव करे तो वह निस्सन्देह उसे वैसा ही आत्म संतोष होगा जैसा किसी अत्यन्त परमार्थरत को होता है। भरत जी ने 14 वर्ष तक राम के खड़ाऊँ गद्दी पर रख कर ऐसा ही राज्य किया था, ऐसा राज्य करने में कितना बड़ा आनन्द आता है। उसे कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है। यजुर्वेद ने “तेन त्यक्तेन भुँजीथा” कहते हुए यही रहस्य खोला है कि यदि तुम त्याग करके भोग करो तो संसार में जीवन धारण करने का सच्चा आनन्द प्राप्त हो जाएगा।
वस्तुओं को भगवान को दान करने के क्षेत्र से ऊँचे उठ कर आत्मदान के क्षेत्र तक जा पहुँचने पर तो सब कुछ ही मिल जाता है, राजा बलि ने अपना सर्वस्व शरीर भी भगवान को दे दिया था। इस दान के बाद उन्होंने जो पाया वह उससे कम मूल्य का नहीं है। राजा हरिश्चन्द्र ने राजपाट, स्त्री, पुत्र यहाँ तक कि अपना शरीर भी दे डाला, इसके बदले में जो कुछ उन्हें मिला उससे वे निहाल हो गये। कोई गरीब आदमी अपने लड़कों को किसी धनी को दत्तक पुत्र रूप में दे दे तो वह लड़का उस धनी का पुत्र तो अवश्य बनता है, अपने पुराने पिता से रिश्ता भी तोड़ता है, पर उस नये धनी पिता की विशाल सम्पत्ति का क्षण भर में अधिकारी भी बन जाता है। वधू जब वर के गले में वरमाला पहनाती है तो तत्क्षण पति की सारी सम्पत्ति पर, मनोभूमि पर उसका अधिकार हो जाता है। आत्म दान का महत्व ऐसा ही है। भगवान की शरण में अपने को सौंपने पर मनुष्य उनकी विश्व विभूति का तत्क्षण अधिकारी बन जाता है। दान वस्तुतः अनेक गुनी प्राप्ति करने का एक बड़ा ही प्रत्यक्ष एवं वैज्ञानिक तरीका है।
गत अंक में आत्म त्याग, आत्म दान, आत्म सेवा, आत्म निर्माण की जो चार साधनाएं बताई गई हैं वे आत्म कल्याण की उत्तम एवं सरल साधनाएं हैं। भगवान ने गीता में कहा है-’गायत्री छन्दसामहम्’ वेद मन्त्रों में गायत्री मैं स्वयं ही हूँ। भगवती गायत्री माता को आत्म समर्पण वस्तुतः ईश्वर को ही आत्म समर्पण है। पिता से माता का दर्जा बड़ा है। आदि गुरु माता ही होती है। इस प्रकार पुल्लिंग राम, कृष्ण, विष्णु आदि इष्ट देवों से स्त्री लिंग गायत्री ब्रह्म का दर्जा किसी भी प्रकार कम नहीं ठहरता। सीताराम, राधाकृष्ण, लक्ष्मी नारायण, उमा महेश आदि नामों में पहले माता, पिता पीछे हैं। उनकी गोदी में अपने आपको सौंप कर मनुष्य गीता में कहे हुए आत्म समर्पण के महान लाभों का अधिकारी बन सकता है।
भगवान को आत्म समर्पण कर देने के उपरान्त अन्तरात्मा में बैठा हुआ परमात्मा गुरु रूप में पथ प्रदर्शन करता है परन्तु आरम्भिक साधकों में उतनी क्षमता नहीं होती कि उन सन्देशों को सुन, समझ सके और उनका अनुकरण कर सके। इस आरम्भिक कठिनाई में गायत्री संस्था की ओर से साधकों को सहायता दी जाती है। माता को आत्म समर्पण करने के बाद उनके विचार तथा कार्य किस प्रकार के होने चाहिए इस सम्बन्ध में सदैव पथ प्रदर्शन किया जाता रहता है। जिससे मार्ग दर्शन के अभाव में उनकी प्रगति रुकने नहीं पाती।
जो लोग निरन्तर चिन्ताओं में व्यस्त रहते हैं, नाना प्रकार के जंजालों से जिनका चित्त सदा उद्विग्न रहता है, जो अपने आप को दुखी पीड़ित संत्रस्त अभावग्रस्त अनुभव करते रहते हैं, वे आत्म समर्पण करके अपना सब बोझ माता पर ढाल सकते हैं। मालिकी में कितनी परेशानी है और मुनीमी में कितना आनन्द है जिसने इस रहस्य का अनुभव कर लिया उसे हर घड़ी आनन्द ही और उल्लास ही रहता है। जिस प्रकार भगवत् प्रसाद स्वरूप भोजन करने से वह आहार अमृतमय बन जाता है, उसी प्रकार जीवन को भगवत् अर्पण करके उनके कार्यों, उनके आदर्शों के अनुसार जीवन जीने से भी स्वर्गीय शान्ति का अनुभव होता है। ऐसे जीवन में पाप बहुत कम बन पड़ते हैं, थोड़े में संतोष हो जाता है और निरर्थक कामों में उलझे रहने की अपेक्षा नर देह को सफल बनाने वाले कामों में प्रवृत्ति बढ़ जाती है।
आत्म कल्याण के इच्छुकों को एक सुनिश्चित आधार पर उत्तम जीवन बनाने का यह सुव्यवस्थित कार्यक्रम है। जिन्हें इस ओर प्रेरणा हो वे गत मास के अंक के आधार पर अपने संबन्ध में निश्चय कर सकते हैं। ऐसे संकल्प जितने अधिक होंगे उतना ही संसार का कल्याण होगा।
(संत बिनोवा)
मनुष्य समाज में रहता है इसलिये उसका मुख्य धर्म समाज-सेवा ही है। वही सच्ची भक्ति भी है। सच्ची भक्ति समाज की सेवा में रहती है। सबके हृदय में नारायण हैं। नर, नारी, बालक, हर एक के हृदय में उसका वास है। उसकी सेवा के लिये हमें यह मनुष्य देह मिली है। इस देह का उपयोग समाज सेवा के लिये, दीन-दुखियों के लिये होना चाहिये। अगर ऐसा नहीं करते तो मानव देह का प्रयोजन मिट जाता है। फिर जानवर और मानव देह में भेद नहीं रह जाता। खाना, पीना, प्रजनन, मौत तो सबको आते हैं पर मनुष्य में कुछ और भी आते हैं। इसलिये शास्त्र ने कहा है कि मनुष्य देह दुर्लभ है। अनेक जन्मों की कमाई से मनुष्य देह हासिल होती है। यह क्यों कहा गया था? क्योंकि मनुष्य देह से सेवा हो सकती है। भोग तो जानवर-देह भी करती है पर सेवा मनुष्य देह से ही हो सकती है। मनुष्य अपना शरीर दूसरे के लिये खपा सकता है, परोपकार में लगा सकता है। इसलिये मनुष्य देह दुर्लभ मानी गई है।
आदमी को दौलत छोड़कर जाना होता है पर प्रेम उसके साथ जाता है। प्रेम को लेकर ईश्वर के पास पहुँचते हैं। जिसने जितना धर्माचरण किया परोपकार किया, सत्कर्म किया, उसे लेकर जायेगा। हर एक को ईश्वर के आगे खड़ा होना है। पूछा जायेगा मैंने तुझे जो मनुष्य का चोला दिया था तो तू ने क्या किया? इसलिये हम कहते हैं कि जिसके पास जो है उसका एक हिस्सा जरूर दें। पहले दे, पीछे खायें।
वह कहता है कि मेरे पास है ही क्या और पाँच हजार वाले की तरफ देखता है। पाँच हजार वाला लाख वाले की तरफ और लाख वाला करोड़ वाले की तरफ देखता है। इस तरह से मत्सर ही मत्सर बढ़ता है। हर एक अपने को दुखी ही समझेगा। इसके खिलाफ अगर हम नीचे की तरफ देखें तो सुखी होंगे। एक रुपये वाला आठ आने वाले की तरफ देखे और आठ आने वाला चार आने वाले की तरफ देखे। आठ आने वाला मन में कहेगा कि उसके पास तो चार ही आने हैं, अगर मैं दो पैसे दे दूँ तो उसके साढ़े चार आने हो जायेंगे। जिसके पास एक रोटी है पर जिसे दो की जरूरत हो वह भी देखेगा कि ऐसे लोग भी मौजूद हैं जिनको एक भी रोटी नसीब नहीं है। इसलिये उसका धर्म हो जाता है कि उस रोटी का कुछ हिस्सा उसे दे जिसके पास कुछ भी नहीं है। इस तरह अपने से नीचे की तरफ देखने से उदारता आयेगी, दया आयेगी, प्रेम फैलेगा, धर्म बढ़ेगा। हर कोई समझेगा कि दूसरे को देना धर्म है, धर्माचरण करने की मेरी जिम्मेदारी है।
हम सब एक दूसरे को अपना भाई समझें और उनकी खातिर अपने को मिटा दें। लेकिन वेद तो एक कदम और आगे जाते हैं और कहते हैं कि हम भाई भाई की तरह रहें, ऐसे भाई बने जिसमें न कोई ज्येष्ठ हो न कोई कनिष्ठ हो, न छोटा भाई हो, न बड़ा। सब बराबर हों। गीता ने कहा है कि इस तरह जो समता की दृष्टि रखता है। उसने दुनिया को इसी जन्म में जीत लिया है। दुनिया को जीत लेने की युक्ति है कि समता की कोशिश करें। समता न आये तो हमारी जिम्मेदारी नहीं, उसकी है। अपनी जिम्मेदारी यह जरूरी है कि अपने से जो नीचे हैं उनकी चिंता किया करें।
आपने सुना होगा कि आज कल ‘डेथ-ड्यूटी’ याने मरने पर कर लग गया है। टैक्स याने आपसे पैसा लेकर समाज में लगा देना। इसका मतलब यह होता है कि आपकी जो संपत्ति है उसका काफी हिस्सा सरकार आपके मरने पर ले लेगी। हम पूछते हैं कि जब मरने पर देना है तो मरने के पहले ही क्यों नहीं देते? अगर नहीं देते हो तो इसके माने यह हुए कि लोग आपकी मृत्यु की वासना करें। वे कहेंगे कि जितनी जल्दी मरे उतना ही अच्छा है। इसमें क्या इज्जत है हमारे मरने का दूसरे लोग इन्तजार करें? इससे बढ़कर दूसरा अपमान क्या होगा? जंगल में शेर रहता है, वह जिन्दगी भर क्रूरता करता है। जब बूढ़ा होता है और चल-फिर नहीं सकता तो एक जगह बैठा रहता है। उसके पास पेड़ के ऊपर बैठा हुए कौए उसके मरने की राह देखते हैं। जहाँ उसके प्राण निकले कि उनकी मेहमानी शुरू हो गई। गिद्ध की तरह फिर उस पर लिपट जाते हैं। और उसकी बोटी-बोटी नोंचते हैं। इसी तरह आपके मरने का इन्तजार दूसरे लोग करते हैं। मनुष्य का जीवन इससे बदतर क्या हो सकता है कि हमारी मृत्यु की वासना की जाये। इससे बेहतर यह है कि जीते जी दे डालिए। हर्ष महाराज हर साल प्रयागराज आकर अपनी संपत्ति लुटाते थे। अनेक राजा ऐसा करते थे। हिन्दुस्तान की बादशाहत की खूबी यह थी कि वे तिनके के समाज राज्य को छोड़ कर प्रजा की सेवा में रहते थे। ऐसे महान देश में हम इतने छोटे दिल वाले बन गये कि जीते जी नहीं देते। हम नहीं समझते कि इससे भी बढ़ कर कोई दुर्भाग्य हो सकता है? इसलिये आपसे प्रार्थना है कि छटा हिस्सा देने की छोटी सी माँग को पूरा कीजिये, दिल खोल कर दीजिये और धर्म समझकर दीजिये।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी)
एक दिन भाष्कलि ने अपने गुरु से पूछा- ‘उपनिषदों का वह ब्रह्म कहाँ है?’ परन्तु गुरु निरुत्तर रहे। चेले ने बार-बार पूछा परन्तु गुरु ने कोई उत्तर नहीं दिया, वह मौन रहे। अन्त में गुरु ने कहा- “मैं तुम्हें बार-बार बताता रहा हूँ परन्तु तुमने समझा ही नहीं। मैं क्या करूं? उस ब्रह्म को शब्दों में नहीं बखाना जा सकता, उसे तो मौन साधना के द्वारा ही जाना जा सकता है। उसके लिये अनन्त शान्ति को छोड़ कर और कोई रहने का स्थान नहीं है- “अयम् आत्मा सन्तो” आत्मा शान्त मौन है।
मौन ही आत्मा है, मौन ही ब्रह्म है, मौन ही सत्य है, मौन ही अमर आत्मा है, मौन ही ईश्वर है। मौन ही इस मन, प्राण और शरीर का आधार है। मौन ही इस ब्रह्माण्ड का क्षेत्र है, मौन ही एक जीवित शक्ति है, मौन ही वास्तविकता है। वह शक्ति जो समस्त ज्ञान से परे है वह मौन है। जीवन का उद्देश्य मौन है, तुम्हारे अस्तित्व का ध्येय मौन है। मौन ही भीतर है। इसको इस बकवादी मन को मूक कर देने से ही जाना जा सकता है। अगर तुम भीतर से अनुभव कर सकते हो तो इसे बाहर भी प्रदर्शित कर सकते हो।
सहारा के रेगिस्तान का संदेश मौन है। हिमालय का संदेश मौन है। कैलाश पर्वत की बर्फ से ढकी हुई उन चोटियों पर रहने वाले नग्न अवधूत का संदेश भी यही है। प्रभु दर्शानामूर्ति का अपने चारों शिष्य सनक, सनातन, सनन्दन और सनतकुमार को यही संदेश था। जब हृदय गदगद हो उठता है, जब अतीव प्रसन्नता होती है तब मनुष्य मौन हो जाता है। मौन की प्रभुता को कौन बखान सकता है।
हार तथा निराशा से खोए हुए विरक्त हृदय के लिए इस मौन से बढ़ कर और कोई उपचार नहीं है। जिनका हृदय गृह क्लेशों तथा जीवन की अन्य-अन्य बातों से विक्षिप्त हो उठता है, उनके लिये इस मौन से बढ़कर शान्तिदायक और कुछ भी नहीं है।
प्रगाढ़ निद्रा में तुम इस मौन के सन्निकट होते हो परंतु तुम अविद्या के क्षीण पर्दे के कारण अलग रहते हो। अर्धनिशा की प्रगाढ़ निद्रा उस मौन का अभ्यास देती है।
मौन स्वर्ण है। मौन शब्दों से अधिक जोर से बोलने वाला है। सन्त और महात्मा बोला नहीं करते। मौन ही व्यवहार का साधन है। जो वास्तव में इच्छुक हैं तथा ऋषि मुनियों के साथ रहते हैं, वही इस मौन का महत्व समझते हैं।
उस महा मौन के भीतर ही तुम्हें प्रभु का अस्तित्व मिल सकता है। नित्य प्रातः चार बजे से मौन व्रत धारण करने का अभ्यास करो, तथा उस समय अपने मन ओर इन्द्रियों को बाह्य पदार्थों से अलग कर दो। ईश्वर की भाषा मूक है। इस मूक भाषा को सीखने की चेष्टा करो। एकाग्रचित्त होकर इस मौन की ध्वनि रहित ध्वनि को सुनो। तुम्हें यह मार्ग बताएगा, यह तुम्हारे सन्देहों को दूर करेगा, यह तुम्हें उत्साहित करेगा। नवजात शिशु से इस मौन का पाठ पढ़ो और ज्ञानी बनो।
आरम्भ में जब चारों ओर अन्धकार था, तब शान्ति थी। मौन सत् है, मौन चित् है, मौन आनन्द है- मौन पवित्र है, सर्व व्यापक है, अमेद्य है और जागृति है। प्रलय के समय माया इसमें बीज की भाँति छिपी रहती है। आरम्भ में महाकल्प ब्रह्म इच्छा करते हैं और उससे स्पन्दन उठती है। उससे तीनों गुणों का समाधान छिन्न-भिन्न हो जाता है। सत्व, राजस और तामस दृष्टिगोचर होते हैं, तब संसार चक्र चलने लगता है। राजस ही इस संसार में इतना कोलाहल तथा चल-चलाहट जाग्रत करता है। राजस वासना है, राजस ही गति है।
साधारणतः निर्वाक बैठना तथा किसी से न बोलना ही मौन है। जब तुम्हारा मित्र तुम्हें नहीं लिखता है तब तुम कहते हो कि न जाने वह बर्फ की भाँति चुप है। जब कोई भाषण देता है और सब निःशब्द सुनते हैं तब हम कहते हैं कि उसने अमेद्य शाँति के बीच भाषण दिया। जब लड़के कक्षा में बहुत शोर मचाते हैं तब अध्यापक कहता है “चुप रहो जी” यह सब शारीरिक मौन है।
अगर तुम दृष्टि को वस्तुओं की ओर से हटा लो अथवा प्रतिहार अथवा दान का अभ्यास करो तब इसे नेत्र विषय का मौन कहेंगे। इसी प्रकार समस्त इन्द्रियों का मौन होता है। अगर कानों से ऐसा किया जाय तो इसे कानों का मौन कहेंगे। इसी प्रकार एकादशी का निर्जला व्रत जिह्वा का मौन कहा जाता है।
परन्तु इस मन का मौन होना आवश्यक है। तुम मौन रख सकते हो, परंतु मन तब भी हवाई किला बना रहा होगा, संकल्प उठ रहे होंगे, चित्त में स्मृतियाँ उठ रही होंगी। कल्पना तक तथा अन्य मस्तिष्क की शक्तियाँ अपने-अपने कार्य दनादन कर रही होंगी। तब तुम्हें वास्तविक शान्ति कहाँ से हो सकती है, मस्तिष्क का काम बन्द हो जाना चाहिये। भीतरी इन्द्रियाँ सब बन्द हो जानी चाहिए। मन की लहरें उठनी बन्द हो जानी चाहिए। मन को ब्रह्म के आनन्द-सागर में शाँति हो जानी चाहिए। तब ही तुम अनन्त शाँति का, मौन का, अनुभव कर सकोगे।
निःसन्देह यह सत्य है कि अभ्यास पर सब कुछ निर्भर है। तुम जानते हो कि अभ्यास ही मनुष्य को सब कुछ बना सकता है। जब तुम अपने उद्देश्य के निकट पहुँचने लगते हो उस समय की प्रसन्नता का ध्यान करो। तुम्हें तब अनन्त शाँति होगी। अमृत को पूर्ण शाँति में- मौन में पीवो जिस प्रकार अमालका का फल हाथ में खुलता है उसी प्रकार मौन में आत्मा के रहस्य एक-एक करके खुलते हैं। अविद्या, माया और उसके फल मोह, भय इत्यादि भाग जायेंगे। उस समय चारों ओर प्रसन्नता होगी, ज्ञान होगा, पवित्रता होगी और अनन्त आनन्द होगा।
मन को पवित्र करो और चिन्तन करो और शाँत रहो। मन को शान्त करो, उठते हुए भावों को ताकि बकवादी विचारों को चुप कर दो। अपने हृदय को भीतरी भागों में ले जाओ और अनन्त शान्ति का अनुभव करो। यह मौन रहस्यमय है। इस मौन में प्रवेश करो। इसे जानो और स्वयं मौन बन जाओ-महामौनी बन जाओ। अब तुम जीवन मुक्त हो गए हो।
(श्री यज्ञनारायण चतुर्वेदी)
स्वाध्याय का अर्थ है आत्म-शिक्षण, जिसमें हम आत्म चिन्तन, मनन और अध्ययन का भी समावेश पाते हैं। स्वयं जब हम परिश्रम के द्वारा किसी वस्तु विशेष का समाधान करते हुए उत्तरोत्तर उन्नतोन्मुख होकर किसी नवीन वस्तु की खोज के निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तब उसको हम स्वाध्याय द्वारा उपार्जित वस्तु कहते हैं। नवीनता का समारम्भ किसी स्वाध्यायी व्यक्ति द्वारा हुआ और उसकी अविरल तारतम्यता उन्हीं के द्वारा चल रही है। उत्तरोत्तर नवीनता का आविष्कार होने का अर्थ है उन्नति के सोपान पर आरोहण। स्वाध्याय द्वारा प्राप्त ज्ञान वास्तव में ज्ञान होता है। जो ज्ञान हम बलपूर्वक किसी दूसरे से प्राप्त करते हैं वह टिकाऊ कदापि नहीं होता। वह पिंजरबद्ध कीर की नाइ समय पड़ने पर हमारे मस्तिष्क से फूद्दका मारकर उड़ जाता है और पुनः आने का नाम भी नहीं लेता। संसार में जितने महापुरुष हुए हैं उनके जीवन में केवल यही विशेषता रही है कि वे अपने जीवन भर स्वाध्यायी रहे हैं। जैसे-जैसे उनमें स्वाध्याय की मात्रा बढ़ती गई है तैसे तैसे वे संसार में चमकते तथा सफल होते गए हैं।
शिक्षा की पूर्णता स्वाध्याय द्वारा होती है। जिस शिक्षा पद्धति में जितनी ही अधिक ईश्वर प्रदत्त शक्तियों को बढ़ाने की क्षमता होती है वह उतनी ही अधिक सफल कही जाती है-कारण यदि उसके द्वारा हमारी उन शक्तियों का प्रस्फुरण होता है तो स्वाध्याय के द्वारा उन्हीं का तद्रूप विकास ओर परिवर्तन भी होता है। यदि उसके द्वारा हमें किसी शब्द का प्रारम्भिक परिचय मिलता है तो स्वाध्याय द्वारा हम उस शब्द विशेष के अन्तस्थल तक पहुँचते हैं। दोनों में चोली दामन का साथ है। शिक्षा का अर्थ हमें यहाँ लिखने अथवा पढ़ने तक ही सीमित नहीं समझना चाहिए। बालक को यदि माँ- ‘ताई’ और ‘अम्मा’ कहना सिखाती है तो उसे भी हम उसकी प्रारम्भिक शिक्षा ही कहेंगे। एक व्यक्ति जो कि लिखना अथवा पढ़ना नहीं जानता वह भी स्वाध्यायी हो सकता है और स्वाध्याय के द्वारा पढ़ने अथवा लिखने की कला उसे स्वयं आ जाती है। तात्पर्य यह कि आदर्श शिक्षा के द्वारा हम जहाँ स्वाध्यायी हो सकते हैं वहाँ स्वाध्याय द्वारा शिक्षित भी हो सकते हैं। दोनों एक दूसरे के द्वारा साध्य है। अब यहाँ पर यह प्रश्न आप पूछ सकते हैं कि शिक्षितों की संख्या तो पर्याप्त है तो क्या उतने ही स्वाध्यायी भी हैं? इसका उत्तर यही होगा कि यदि उन शिक्षितों की शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं व्यवसायिक आदि शक्तियों का विकास एवं प्रस्फुरण प्राप्त शिक्षा द्वारा हो चुका है तो निःसन्देह वे स्वाध्यायी होंगे। उपर्युक्त शक्तियों के विकास का आधार स्तम्भ शिक्षा विशेष की पद्धति में निहित रहता है। यदि हमारी शिक्षा पद्धति दूषित है तो स्वभावतः हमारी शक्तियों का ह्रास होगा। ऐसी बात नहीं कि कोई भी व्यक्ति उपर्युक्त शक्तियों के बिना संसार में आया हो। सभी में इन शक्तियों का समावेश रहता है। संस्कार और शिक्षा विशेष के द्वारा वे घटती या बढ़ती हैं। जिस तरह से उगते हुए पौधे को बढ़ाने तथा विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में जल, रोशनी और हवा आदि न मिलें तो वह तुरन्त ही पीला पड़कर तथा मुरझा कर नष्ट हो जाता है, उसी भाँति हमारी ईश्वर प्रदत्त इन शक्तियों का भी हाल है। यथेष्ट शिक्षा के अभाव में इनका विनष्ट हो जाना स्वाभाविक ही है। उस समय हम कहते हैं कि अमुक लड़का अपने शुरू जीवन में ही ज्यादा और मन्द बुद्धि का है। उसमें किसी भी तरह के काम को करने की क्षमता तनिक भी नहीं है। वहाँ प्रकृति का दोष नहीं- शिक्षा तथा संस्कार विशेष का होता है। किसी वस्तु को देखने की शक्ति तो सभी को प्राप्त हैं, किन्तु निरीक्षण की शक्ति उसी में रहती है जिसकी कि शक्ति शिक्षा तदुपरान्त स्वाध्याय द्वारा विकसित हो चुकी हो। पेड़ से गिरते हुए फलों और पत्तों को आदि काल से ही लोग देखते आ रहे हैं किन्तु सर आइजक न्यूटन ही एक ऐसा व्यक्ति था कि जिसने अपनी निरीक्षण शक्ति के द्वारा इस बात को सिद्ध कर दिखाया कि पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है। अस्तु, लिखने पढ़ने, चलने फिरने, देखने सुनने तथा स्थूल जगत् की व्यवहारिक बातों का ज्ञान तो प्रायः अधिकाँश शिक्षित संज्ञक लोगों में होता ही है किन्तु क्या वे पूर्ण शिक्षित होते हैं? स्वाध्यायहीन शिक्षा व्यर्थ और अनुपादेय होती है और स्वाध्यायी न होता हुआ शिक्षित अशिक्षित ही है।
शिक्षा तथा संस्कार के अतिरिक्त स्वाध्यायी व्यक्तियों में कपित्य अलौकिक गुण भी होते हैं। उनके विचारों में दृढ़ता का होना अत्यन्त आवश्यक होता है क्योंकि स्वाध्याय की साधना करते हुए न मालूम कितनी जगहों से उन्हें विचलित होना पड़ता हैं। कभी-कभी हानि भी उठानी पड़ती है। तब कहीं जाकर उन्हें सफलता मिलती है। सच है सुकार्य सदा ही कष्टसाध्य है। एकलव्य को गुरु जी महाराज किन्हीं शब्दों द्वारा दुत्कार देते हैं। यदि उसमें दृढ़ संकल्पता न होती तो तत्काल ही निरुत्साहित होकर अपने घर लौट जाता। किन्तु नहीं, उसकी स्वाध्यायता और भी अधिक जागृत हो उठती है। फलतः एक दिन वही एकलव्य अर्जुन से भी बढ़ कर धनुर्धर बनकर गुरुजी के सामने आता है। अब आप अनुमान लगा सकते हैं कि स्वाध्याय में इतनी शक्ति है कि बिना शिक्षक अथवा रास्ता दिखलाने वाले के भी सफलता पूर्वक आगे बढ़ा जा सकता है।
स्वाध्यायी व्यक्तियों में एकाकीपन और लोक कल्याण की भावना अधिक रहती है। यह बात स्वाभाविक ही है कि एकाकीपन में हम अपने मस्तिष्क का सन्तुलन अधिकाधिक कर पाते हैं। कवियों और कलाकारों के जीवन चरित्र को पढ़ते समय हम उनके आरम्भिक जीवन के पन्ने को जब पलटते हैं तो पता चलता है कि एकाकी अवस्था में रहकर घंटों पहले गुनगुनाया करते थे। हाँ, एकाकीपन और प्रकृति का घनिष्ठ सम्बन्ध है। एकाकीपन को पसन्द करने वाला व्यक्ति प्रकृति प्रेमी होता है। प्रकृति का अध्ययन कितना मनोरंजक और ज्ञान वर्धक होता है। निरीक्षण शक्ति प्रधान वाला व्यक्ति सदा प्रकृति प्रेमी ही रहा है। ज्ञान का अगाध समुद्र प्रकृति में वर्तमान है। स्वाध्यायी उसमें डुबकियाँ लगाते हैं और मोतियों की लड़ी निकालते चले जाते हैं- धतूरे में प्राणनाशक शक्ति वर्तमान है, पेड़ से गिर कर पत्ते सीधे जमीन पर ही विश्राम लेते हैं अवश्य पृथ्वी में आकर्ष शक्ति है। आदि आदि।
सदाचार और स्वाध्याय का घनिष्ठ सम्बन्ध है। सच्चरित्र व्यक्ति ही स्वाध्यायी होता है। दुश्चरित्रों में इतनी सामर्थ्य कहाँ कि वे किसी वस्तु विशेष पर अधिक काल तक मनन और अध्ययन कर सकें। उनकी नैतिक शक्ति नष्ट रहती है अतः वे उचित अनुचित तथा तथ्य युक्त और निस्सार वस्तुओं की सम्यक् विवेचना ही नहीं कर सकते हैं। जब उनमें विवेचना करने की शक्ति ही वर्तमान नहीं हैं तो भला वे आगे क्या बढ़ सकते हैं। सदाचार से ही शारीरिक स्वास्थ्य और औद्योगिक प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। बिना स्वास्थ्य के संसार में हम किसी भी प्रकार की साधना नहीं कर सकते हैं तथा औद्योगिक प्रवृत्ति में हम सदैव आगे बढ़ने से हिचकते रहेंगे।
स्वाध्यायी पुरुषों से युक्त देश का ही भविष्य उज्ज्वल है और वही उन्नतिशील राष्ट्रों के समकक्ष में बैठने का भी अधिकार है। हमें स्वाध्यायी बनाने के लिए हमारी शिक्षापद्धति विशेष रूप से सहयोग प्रदान करती है। शिक्षा की पद्धति ऐसी होनी चाहिए कि हमारी ईश्वर प्रदत्त शक्तियों का विकास हो सके। उन शक्तियों के विकास होने पर हम में उपर्युक्त गुण स्वभावतः आ जायेंगे। आधुनिक शिक्षा पद्धति अत्यन्त दूषित है और हमें निकम्मा बनाने वाली है। आम दिन शिक्षा के ढांचे का पुनः निर्माण होने जा रहा है। क्या हम आशा कर सकते हैं कि स्वाध्याय की प्रेरणा देने वाली वह शिक्षा होगी।
जब तक मनुष्य का बचपन रहता हैं तब तक वह अपने माता पिता से तरह-तरह की फरमाइशें करता रहता है। छोटा बच्चा अपनी हर जरूरत के लिये माता पिता से फरियाद करता है। बच्चे के छोटे तथा कमजोर होने के कारण माता-पिता उस पर दया करते हैं और उसकी उपयोगी वस्तुओं को जुटाने के लिये यथा सम्भव प्रयत्न भी करते हैं। परन्तु जब बच्चा बड़ा हो जाता है तो उसे वृद्ध माता पिता से अपनी आवश्यक वस्तुएं माँगने में संकोच लगता है। वह सोचता है माता पिता ने मुझे पाल पोस कर जवान बना दिया और सब प्रकार समर्थ कर दिया, अब उनसे सदा माँगते रहना ही मेरे लिये उचित नहीं, अब तो मुझे उनकी सेवा करनी चाहिये, उनकी इच्छाओं और आवश्यकताओं को समझना तथा पूर्ण करना चाहिए। उनकी इच्छाओं और आवश्यकताओं का ध्यान न रखकर युवावस्था में भी उनसे ही अपनी जरूरत की चीजें माँगते रहना उचित नहीं। श्रवण कुमार आदि अनेक मातृ पितृ भक्त ऐसे हुए हैं जिसने अपनी कठिनाइयों की रत्ती भर चिन्ता न करते हुये माता पिता की इच्छा और अभिलाषा पूर्ण करने के लिए अपना जीवन अर्पण कर दिया। यही एक सच्ची सन्तान का आदर्श हो सकता है। निकम्मे लड़के तो बूढ़े माँ बाप को अन्त समय तक त्रास देते रहते हैं और अपने लाभ के लिए उन्हें परेशान करते रहते हैं।
हम सब ईश्वर की सन्तान हैं। परमात्मा ने अनेक प्रकार की सुविधाएं देकर हमें बड़ा कर दिया मानव शरीर जैसा बहुमूल्य वाहन, स्वास्थ्य, बुद्धि, विद्या, परिवार, आजीविका, मित्र आदि साधन देकर इस योग्य बना दिया कि संसार में सभी प्रकार जीवन निर्वाह कर सकें। उसने हमारी अन्तरात्मा में सद्बुद्धि की एक पुकार भी पैदा की है, जिसकी सलाह पर आचरण करने से हमें सदैव सुख और सुविधाएं ही उपलब्ध होती रह सकती हैं। हम करते यह हैं कि उस अन्तरात्मा की पुकार को पग-पग पर ठुकराते हैं- अनुचित मार्ग अपनाते हैं, अनावश्यक इच्छाएं करते हैं, अवाँछनीय तृष्णाओं और वासनाओं का जंजाल अपने ऊपर लाद लेते हैं, इतना सब करने के बाद, इनकी गड़बड़ियों के फल स्वरूप जो नाना प्रकार की परेशानियाँ, चिन्ताएं, पीड़ाएं कमियाँ अनुभव होती हैं इन्हें हमारी मनमर्जी के अनुसार हल करने के लिये परमात्मा से आशा करते हैं और जब वह हमारी उल्टी गतिविधि, उल्टी तृष्णा को पूर्ण नहीं करता तो कभी अपने ऊपर कभी अपने भाग्य के ऊपर, कभी परमात्मा के ऊपर नाराज होते हैं। हम में से अधिकाँश व्यक्ति इसी प्रकार के जंजालों में उलझे रहते हैं। परमात्मा को पुकारते तो हैं पर अपनी ऊटपटाँग गतिविधि से उत्पन्न भोंड़ी समस्याओं को हमारी तृष्णा और वासना के अनुरूप हल करने के लिए पुकारते हैं। शरीर का बचपन समाप्त हो गया पर मानसिक बचपन नहीं जाता।
माता पिता छोटे बच्चे की टट्टी धोते हुए कुछ संकोच नहीं करते पर यदि जवान बेटा पाखाने में टट्टी न जाकर माता से बचपन की भाँति टट्टी समेटवाने की क्रिया करावे तो माता उसके इस कार्य को अनुचित ही समझेगी। जब बेटा समर्थ हो गया तो माता की इच्छा अभिलाषाओं को पूर्ण करने लिए उसे कुछ करना चाहिये था न कि उलटे उसे उन अनावश्यक बातों के लिये परेशान करना-जिनमें से अधिकाँश तो बिल्कुल निरर्थक होती हैं और अधिकाँश ऐसी होती हैं कि मनुष्य अपनी समझ और कार्य प्रणाली में थोड़ा हेर-फेर कर ले तो उन्हें आसानी से हल कर सकता है। पर उतना कष्ट कौन करे। आत्म निरीक्षण, अपनी त्रुटियों को ढूँढ़ना, अपने विचारों आदतों और कार्यों में सुधार करना उस झमेले में पड़ने की बजाय लोग अपनी ओछी इच्छाओं को परमात्मा से पूर्ण करने की मनौती मानते रहते हैं। ऐसे लोगों के प्रति परमात्मा की मान्यता वैसी ही रहती है, जैसी पिता से टट्टी समेटने वाले जवान बेटे के प्रति पिता की रह सकती हैं। हम भक्ति करते हैं, प्रार्थना करते हैं, पूजा करते हैं, पर उसके भीतर जो कुछ छिपा रहता है वह लगभग इसी श्रेणी का होता है। दयालु पिता कई बार हमारी कुछ आवश्यकताएं पूर्ण भी कर देते हैं पर उनके मन में हमारे प्रति कोई सद्भाव उत्पन्न नहीं होता। क्योंकि प्रभु इतना कुछ देने के बाद जवान बेटों से तरह-तरह की फरमाइशों की नहीं, वरन् अपनी इच्छाओं की पूर्ति की आशा रखते हैं। जैसी कि सभी माता पिता अपनी समर्थ सन्तान से रखते हैं।
परमात्मा मनुष्य का बहुमूल्य शरीर हमें इसलिए प्रदान नहीं करता कि हम अपनी आवश्यकताएं, लालसाएं, वासनाएं, तृष्णाएं बढ़ाते जावें और उनकी पूर्ति के लिए दिन-रात परेशान रहने में ही सारा समय लगा दें। मनुष्य जीवन का उद्देश्य यह है कि जीव अपने विवेक को जागृत करके चिर संचित कुसंस्कारों से अपनी मनोभूमि को शुद्ध करे, भव बन्धनों को काटे, दूसरों की सेवा करे और अपने आदर्श चरित्र द्वारा संसार के सामने उदाहरण उपस्थित करके अपनी कीर्ति को अमर करे। इस लक्ष को प्राप्त करने के लिये जो प्रयत्न करते हैं वे ही ईश्वर को प्रिय लगते हैं और उन्हीं को वे अपना सच्चा प्रेम, वात्सल्य तथा अनुग्रह प्रदान करते हैं। ऐसा अनुग्रह प्राप्त कर लेना ही जीवन की सार्थकता है। इस मार्ग पर चलने के लिये मनुष्य को छः कार्यक्रम अपनाने पड़ते हैं। (1) अपनी आवश्यकताएं कम से कम रखना, (2) अपनी वस्तुओं को ईश्वर की वस्तु समझ कर अपने को उनका ट्रस्टी संरक्षक मात्र समझना, (3) सामने उपस्थित कठिनाइयों से परेशान न होकर उन्हें विवेक पूर्वक सुलझाना-जो न टल सकें उन्हें प्रारब्ध भोग समझकर धैर्य पूर्वक सहना (4) मन को भगवान में लगाये रखने के लिए भजन साधन करना, (5) अपने कुविचारों, दुर्गुणों, तथा अकर्मों को हटाने तथा घटाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना, (6) दूसरों की भलाई के लिए कुछ न कुछ काम ईश्वर की सेवा समझकर नित्य ही करते रहना। जो व्यक्ति इन छः कार्यक्रमों को जितने अंशों में अपनाता हैं, वह उतना ही भगवान का भक्त है। परमपिता उससे उतना ही प्रसन्न और सन्तुष्ट रहता है। जिसके कार्य इन छः बातों से जितने ही विपरीत हैं समझना चाहिये कि वह ईश्वर की उतनी ही अवज्ञा कर रहा है और उसका कोप भाजन बन रहा है।
सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन प्राप्त करने का अलभ्य अवसर प्राप्त करने के पश्चात् सबसे बड़ी बुद्धिमानी यह है कि अपने आपको भव बन्धनों से मुक्त करने के लिए सच्चे हृदय से और पूरी सावधानी के साथ लग जायें। शरीर को जीवन यात्रा के प्रयोजनों में और मन को भगवान में लगाये रहें। सत्कर्मों के द्वारा अपना आदर्श उज्ज्वल करना- प्रभु के बगीचे संसार को अधिक सुरम्य बनाने के लिये निरन्तर लोक सेवा एवं परमार्थ के कार्यों में संलग्न रहना यही जीवन का सर्वोत्तम सदुपयोग है। भगवान हम से ऐसी ही आशा रखते हैं। वे सब कुछ देकर हमें समर्थ इसलिये बनाते हैं कि हम उनके आदेशों और प्रयोजनों को पूरा करें। तृष्णाओं और वासनाओं को बढ़ाते रहकर नाना प्रकार की कामनाएं करते रहना ईश्वर को प्रसन्न करने का नहीं नाराज करने का तरीका है।
राजा अपने सेनापतियों और मंत्रियों से अधिक प्रसन्न रहता है क्योंकि वे उसके शासन की व्यवस्था ठीक रखने और राज्य बढ़ाने में सहायक होते हैं। ईश्वर के सेनापति और मंत्री वे हैं जो उसके आदेशों और उद्देश्यों को संसार में प्रतिष्ठित करने के लिए अपने जीवन को अर्पण करते हैं। यों राजा के द्वार पर भिखारी राजा के व्यक्तिगत प्रेम के अधिकारी नहीं हो सकते। क्योंकि संसार का यही नियम है कि “माँगने वाले को तिरस्कार और देने वाले को सम्मान मिलता हैं।” ईश्वर ने हमें बहुत कुछ दिया है अब हमारी बारी है कि हम उसे कुछ दें। ईश्वर की शरण में अपने को अपूर्ण करके उसके आदेशों तथा उद्देश्यों की अपने में, समस्त संसार में, मानव मात्र में स्थापना करने के लिए श्रद्धा और तत्परता पूर्वक संलग्न हों। यह गतिविधि अपनाने के पश्चात् हमारा कल्याण सुनिश्चित हो जाने में कोई सन्देह नहीं रहता।
इस ईश्वरार्पण संकल्प के लिए-आत्मदान के लिए भावना वाले चैतन्य आत्मा वाले सक्रिय सत्पुरुषों के लिए एक आज की देश, काल, पात्र, की स्थिति के अनुरूप सुव्यवस्थित योजना सर्वसाधारण के सामने उपस्थित है। गत अंक में नरमेध एवं आत्मदान के नाम से इसका कार्यक्रम रखा जा चुका है। जिन्हें प्रेरणा हो वे उनमें से किसी अपने को प्रविष्ट कर सकते हैं।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
मनुष्य में सब देवता सोये हैं, तो सब राक्षस भी किसी कोने में छुपे हुए हैं। मनुष्य के शरीर में देवत्व की सब गुँजाइशें भर दी हैं। देवताओं में प्रस्तुत सब सद्गुणों का निवास मानव शरीर में हैं। हमारे प्राचीन ऋषि मुनियों ने जो जीवन व्यतीत किए थे, वे ऐसे थे जिनमें देवताओं के तत्व प्रकट हुए थे।
इस भूमि में जो स्वर्ग भरा हुआ है, जो जो दिव्य विशेषताएं हैं, यदि उनके लिए हृदय के द्वार खोल दें तो आप का देवत्व विकसित हो सकता है। भारतभूमि देवताओं की पवित्र भूमि है इसके कण-कण में देवत्व भरा हुआ है। हम भारतभूमि में जन्में हैं अतएव हमें अपने को भाग्यशाली समझना चाहिए।
वास्तव में शरीर की अधिक महत्ता नहीं है। राक्षस और देवता दोनों के बाह्य शरीर एक से ही होते हैं। हमारी आन्तरिक भावनाएं, सद्गुण, सात्विकता और पवित्रता ही हमें देवत्व की ओर अग्रसर करतीं है। हमारी अच्छाइयों का सम्बन्ध देवत्व से है। श्रवणकुमार, प्रह्लाद, ध्रुव इत्यादि मानव शरीरों में देवता ही थे। एक बार श्रवण अपने पिता माता को टाँगे-2 लादे-2 थक गया। उसने क्रोधित होकर माँ बाप को फेंक देना चाहा। उसके पिता ने कहा कि कुछ और आगे ले चलो। श्रवण कुमार जैसे ही आगे-2 चला, उसके हृदय में देवत्व का प्रादुर्भाव हुआ। उसे अपनी गलती अनुभव हुई और उसने अपने पिता से बार-बार क्षमा माँगी। उसके पिता यह दिखाना चाहते थे कि एक पुत्र पिता के लिए क्या क्या कर सकता है। हरिश्चन्द्र, युधिष्ठिर, कर्ण इत्यादि हमारे लिए प्रकाश स्तम्भ हैं।
इस भारत भूमि के अतीत कालीन इतने दिव्य संस्कार फैले पड़ें हैं, इसका अतीत इतना उज्ज्वल है कि यदि आप अपना हृदय उसके लिए खोल दें, तो निश्चय जानिये आप में जरूर देवत्व के गुण प्राप्त होंगे। हमारी सात्विकता और पवित्रता निरन्तर प्रकाशित होंगी, हम ऊंचे उठते रहेंगे, और राक्षस तत्व से मुक्त होते रहेंगे।
देवताओं की प्रथम विशेषता है, (देव अर्थात् देने वाला) सदैव देने वाले, दान करने वाले। यह देना (या दान) अनेक प्रकार का हो सकता है। श्रम, धन, स्नेह, प्रेम, करुणा, सहानुभूति आदि को देना। देवता भावनाओं से परिपूर्ण हैं। देवताओं की पूजा करने से वे प्रसन्न होते हैं। वे कम लेते हैं, अधिक से अधिक देते हैं। यदि हम समाज से कम से कम लेकर अधिक से अधिक दें, तो हम देवता बन सकते हैं। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि ज्ञानी संत महात्माओं में कमाने की असंख्य योग्यताएं थी, तो उससे बहुत धन प्राप्त कर सकते थे, लेकिन उन्होंने लिया नहीं त्याग किया। उन्होंने आयुपर्यन्त कुछ न कुछ यहाँ तक कि सर्वस्व दान दे डाला। ऐसे श्रमी, दानी, उदार महात्मा मानव शरीरों के रूप में देवता ही थे।
गायत्री का “देवस्य” हमें यह शिक्षा देता है कि हम कम से कम लें और अधिक से अधिक श्रम प्रदान करें। हम समाज की अधिक से अधिक सेवा करें, और आय के रूप में कम से कम लें। अधिक लेना स्वार्थ का प्रतीक है। अधिक लेना संकुचितता है, आपकी निर्बलता है, राक्षसत्व की ओर पतन है।
देवताओं की दूसरी विशेषता यह है कि वे स्वर्ग में रहते हैं तो क्या आप भी स्वर्ग में निवास कर सकते हैं? हाँ, आप रह सकते हैं। ईमरसन लिखते हैं कि यदि मुझे नर्क में भी रहना पड़ा तो अपने स्वभाव से नर्क को भी स्वर्ग बना लूँगा। वास्तव में अपने स्वभाव की उदात्तता, मधुरता, अच्छाई के कारण हम स्वर्ग की सृष्टि कर सकते हैं। यदि हम दूसरों पर विश्वास करें, प्रेम करें, सहानुभूति दिखलाएं, ऊंचा उठाएं, अच्छाइयाँ बढ़ावें, तो विश्वास रखिए आपका देवत्व जरूर विकसित होगा। प्रेम और अच्छाइयों के विकास से खराब पथभ्रष्ट भी सुपथ पर आ जाते हैं। सद्व्यवहार का गहरा प्रभाव पड़ता हैं। सद्भावनाएं जैसी जाती हैं, दुगुनी चौगुनी हो कर देने वाले के पास लौटती हैं। वे चारों ओर पवित्र वातावरण की सृष्टि करती हैं। आपकी सद्भावनाएं और सद्व्यवहार आपके अन्दर व्याप्त दैवी तत्व के प्रतीक हैं। इसका विकास प्रति दिन के सद्व्यवहार द्वारा करते रहें।
हमारे अन्दर अच्छाइयों का भण्डार भरा पड़ा है। हमारी तरह अन्य मानवों में भी सद्गुण भरे हैं। यदि हम अपने अन्दर देवत्व को विकसित कर लें, तो अन्य व्यक्ति भी हमारे अनुकरण पर अपनी सात्विकता और पवित्रता के सद्व्यवहार से एक अच्छे वातावरण की सृष्टि करते हैं। हमारा यह पवित्र कर्तव्य है कि इस दिव्य वातावरण की परिधि का निरन्तर विस्तार करते रहें। जितने अधिक व्यक्ति हमारे इस वातावरण के अंतर्गत आयेंगे, उतने अधिक वे गुप्त रूप से देवत्व का विकास कर सकेंगे।
देवता अमर होते हैं। हम भी अमर बन सकते हैं। जिस व्यक्ति की कीर्ति अमर है, वह शरीर रूप से न सही आत्मिक रूप से अजर अमर है। बुद्ध, गाँधी, ईसा, क्या मर गए? नहीं, अपनी कीर्ति के कारण अमर हैं। उनकी कीर्ति अक्षय है। वे सदा अमर बने रहेंगे। यदि हम भी अपनी मान प्रतिष्ठा की वृद्धि करें, तो देवत्व का विकास कर सकते हैं।
जो शरीर के लिए जीते हैं, वे मरते हैं। जो पेटू होते हैं, वे मरते हैं। जो शरीर की खुजली मिटाने और भोगों की तृप्ति के लिए जीते हैं, वे निकृष्ट जीवन व्यतीत करते हैं। उस आदमी की मौत आती है, जो दूसरों का हृदय दुखाता है। इन्द्रिय तृप्ति तो पशु भी करते हैं, उदर एवं कामेन्द्रिय की क्षुधा वे भी तृप्त करते हैं। यदि हम इसी गन्दगी के नीचे जीवन में फंसे रहें, तो हम पशुत्व की कोटि में ही रहते हैं। यह निकृष्ट जीवन मानव के लिए अशोभनीय है।
देवता वृद्ध नहीं होते, सदा युवक बने रहते हैं। अक्षय यौवन उनकी विशेषता है उनकी विशेषताओं का जो सौंदर्य है, वह उन्हें युवक बनाता है देवता हंसता है, मधुर मुस्कान उसके मुख पर खेलती रहती है। मृत्यु तक से वह मुस्करा कर व्यवहार करता है। मृत्यु हमारा अन्तिम अतिथि है। जो व्यक्ति निराशा की भावना से मुक्त है, उदासी जिनके पास नहीं आती, जो प्रफुल्ल है वह देवता है। युवक की भावना है कि अपने कर्त्तव्य पर स्फूर्ति से जोश से लगा रहे, आगे बढ़ता रहे, आनन्द पूर्वक जिए। देवत्व की भावना कहती है कि हम नवयुवक की भावना लेकर जिएं। हम राक्षसत्व (पशुत्व) का हमेशा विरोध करते रहें। अपने परमार्थ, लोक सेवा, सद्व्यवहार के रूप में देवत्व का विकास करते रहें। आप अपने को सुधारिये, पूर्ण समाज सुधर जायेगा। आप स्वयं देवता बनिये, सम्पूर्ण समाज, देश और विश्व देवताओं से भर जायेगा।
विश्वास कीजिए, आप स्वयं एक देवता हैं। जिस काम को करने से आपके मन में नीचता, ओछापन, हिंसा, स्वार्थ, घृणा और क्रोध उत्पन्न होता है, वह आपके आचरण के योग्य नहीं है। आपका सरोकार दुष्टता और पशुत्व से कदापि नहीं है। आप कुपथ पर नहीं जा सकते। आपका पग बुराई की ओर नहीं बढ़ सकता। आप तो देवत्व के सब गुणों से परिपूर्ण समुन्नत आत्मा हैं। परमेश्वर के एक दिव्य अंश हैं।
व्यक्ति विशेष, जाति विशेष, देश विशेष के नाते आज कोई कार्य न करें। आपका धर्म व्यक्ति का धर्म नहीं है वह तो समाज और सारे देश का है। कोई जाति अथवा धर्म अपनी संकुचित परिधि में आपको बाँध नहीं सकता। आपका आचरण किसी के लिए हानिकारक न हो, दुःखकर न हो, हिंसा, द्वेष, ईर्ष्या से परिपूर्ण न हो। आप तो समस्त मानवता मात्र की भलाई को दृष्टि में रखकर देवत्व का आचरण करें और दूसरों की सद्भावनाओं, श्रेष्ठताओं और पवित्रताओं का आदर करें।
महर्षि रमण का वचन है, “दैवी ज्ञान हुए बिना मनुष्य को अपनी कीमत नहीं मालूम होती और इसीलिये अपने विषय में वह औरों से जानना चाहता है, जबकि अपने सम्बन्ध में वह अपनी आत्मा से विश्वस्त किन्तु दृढ़ता पूर्वक जानकारी कर सकता है। साँसारिक दृश्य पर देव मोहित नहीं होते क्योंकि निरन्तर अंतःदृष्टि रखने के कारण उन्हें अपने भीतर ही उससे अधिक महत्वपूर्ण चीजें मिल जाती हैं।”
(श्री सुरेन्द्र नाथ सक्सेना, उरई)
संसार के प्रत्येक मनुष्य के सामने कुछ न कुछ कठिनाइयाँ होती ही हैं। सोना तपने से उज्ज्वल होता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी कठिनाइयों में तपने से महान और शक्तिशाली बनता है। आज तक ऐसा कोई भी महान पुरुष नहीं हुआ जिसके मार्ग को कठिनाइयों ने रोका न हो।
यदि हमारे भाग्याकाश पर कठिनाइयों के काले काले मेघ उमड़ा रहे हैं, तो हमें घबराना नहीं चाहिये। ऐसे समय में अपने मस्तिष्क के सन्तुलन को बिगाड़ लेना, अपने भाग्य का अपने हाथों सत्यानाश करना है। यह स्मरण रखने योग्य वाक्य हैं कि “हम अपने भाग्य के निर्माता हैं।” जैसा हम करेंगे वैसा हमें भोगना भी पड़ेगा। अतः पहली वस्तु यह हैं कि कठिनाइयों को अपने सामने देखकर हम घबरायें नहीं, उनका वीरता के साथ सामना करे। हो सकता है हमारी कठिनाइयाँ ही हमारी उन्नति और सफलता की सीढ़ी बन जायें। नैपोलियन के मार्ग में जब आल्पस पर्वत रुकावट बन कर अड़ गया तो उस धीर वीर पुरुष ने जिस साहस के साथ उसे सेना सहित पार किया, वह इतिहास के पन्नों पर सदैव अमिट रहेगा। दूसरी ओर स्थित शत्रु सेना भी उसकी वीरता देखकर नत मस्तक हो गई। नैपोलियन को विजय भी प्राप्त हुई। किन्तु इसके विरुद्ध यदि वह वीर अपने धैर्य को खो देता तो सम्भवतया उसका नाम आज उतने उत्साह और जोश से नहीं लिया जाता, न उसे सफलता ही मिलती।
इसके बाद की विचारणीय बात है “कठिनाई होने का कारण जानना।” जैसी भी कठिनाई हमें पार करनी हो, उसका कारण जानना अत्यन्त आवश्यक है। मान लीजिए आपके सामने आर्थिक कठिनाई है। रुपये पैसे का अभाव आपकी और आपके परिवार की उन्नति नहीं होने देता। इस कठिनाई का कारण जानिए। या तो आपके परिवार की सदस्य संख्या अधिक है, अथवा खर्च अधिक करने की परिवार वालों की आदत है, या धन कमाने के साधन आपके पास कम हैं, इसके अतिरिक्त और भी कई कारण हो सकते हैं। सदस्य संख्या परिवार की अधिक हैं तो संपत्ति निग्रह का पाठ आप अपने आप सीख लीजिए। खर्चीलेपन की आदत को उसके दुष्परिणाम सोच-सोच कर त्याग दीजिये। यदि आपके पास धन कमाने का साधन न हो तो शरमाइये नहीं, अपने रहन-सहन के स्तर को नीचा करिये, छोटे से छोटे काम को प्रसन्नता के साथ करिये। कोई भी काम मिले चाहे वह खोमचा लगाने, जूते गाँठने का ही क्यों न हो, कर डालिये। आदमी अपने विचारों से महान और नीच होता है। अतः अपने विचार सदैव ऊंचे रखिये। काम चाहे कोई भी क्यों न हो, सदैव पूज्यनीय वस्तु है।
इस प्रकार चाहे कैसी भी कठिनाई क्यों न हो उसका हल हो सकता है, पर इसके लिए शान्त चित्त और विवेक की आवश्यकता है। इनका आश्रय लेकर आप अपनी कठिनाइयों को भी अपनी सफलता का रहस्य बना सकते हैं।
अधिकतर सभी कठिनाइयों के हल हमें अपने में मिल सकते हैं। दुनिया की सभी कठिनाइयाँ मनुष्य की ही बनाई हुई हैं और मनुष्य ही उन्हें दूर भी कर सकता है। बस एक बार थोड़े से चिन्तन की आवश्यकता है। हम अपने दुर्गुणों को जितना ही दूर करेंगे हमारे जीवन में कठिनाइयाँ उतनी ही कम होती जायेंगी। यदि आप मृदुभाषी और व्यवहार कुशल हैं तो आपके मित्र सदैव आपके कल्याण के लिये तत्पर रहेंगे। सभी लोग आपसे प्रेम करेंगे, आपकी कठिनाइयों को दूर करने में सहायता देंगे। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति झगड़ालू और क्रोधी स्वभाव का है तो उसे पग-पग पर अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। फलस्वरूप उसका जीवन दुखों से परिपूर्ण हो जायेगा।
जरा-जरा सी कठिनाइयों के कारण घबड़ाना छोड़िए। मस्तिष्क को सन्तुलित रखने का अभ्यास करिए। इसमें आपको कुछ प्रयत्न करना पड़ेगा। पहले असफलता भी मिल सकती है, पर सतत् प्रयत्न द्वारा आपका मस्तिष्क अपने आप सन्तुलित रहने लगेगा। क्रोध अधैर्य आदि आपसे दूर हो जायेंगे।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा बी. ए., एल. एल. बी.)
मनुष्य का अधिकाँश जीवन परिश्रम का जीवन है। जैसे बिना भोजन तथा वायु के जीवन असम्भव है, बिना श्रम के जीवन नीरस और शिथिल है। प्रत्येक मानव विशेषण से विभूषित होने वाले व्यक्ति में “परिश्रम” वह दिव्य गुण है जिसके द्वारा वह संसार में विकसित होता है, अपने शरीर, मस्तिष्क तथा आत्मा के गुणों की वृद्धि करता है। परिश्रम हर प्रकार, हर स्थिति तथा वर्ग के व्यक्ति के लिए एक आवश्यक तत्व है।
जब संसार के सब जीव श्रम द्वारा शक्ति का अर्जन कर रहे हैं, तो आप कैसे निष्क्रिय रह सकते हैं? बिना श्रम के कोई भला क्योंकर अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान तथा उत्तरदायित्व की रक्षा कर सका हैं?
परिश्रम सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है। इसके द्वारा हमारा सम्बन्ध अन्य व्यक्तियों तथा वस्तुओं से होता है। यदि हम जीवन चरित्रों का अध्ययन करें, तो हमें विदित होगा कि सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति प्रायः कठिन श्रम करने के अभ्यस्त रहे हैं, अपने आविष्कारों में सतत् लगनशील और उत्तरदायित्वों में वीर और दृढ़ रहे हैं। संसार में आप जिन कार्यों से चमत्कृत होते हैं, वे मानव हाथों या मस्तिष्क के श्रम के अद्भुत चमत्कार हैं। उनमें श्रम का सौंदर्य और स्थायित्व है। श्रम प्रगति का चिन्ह है।
बफून कहा करते थे, “प्रतिभाशाली व्यक्तियों की प्रतिभा का मूल मंत्र उनके धैर्य में है। वे किसी विरोध से भी हिम्मत पस्त न होते थे, न थकते ही थे। वे प्रत्येक मिनट का उचित उपयोग करते थे। अपेलीज प्रत्येक दिन कुछ न कुछ अवश्य लिखते थे। न्यूटन निरन्तर धैर्य और सतर्कता से प्रकृति का निरीक्षण किया करते थे। वाट कहा करते थे, “हमें यह जानना चाहिये कि किस बात से काम चलेगा, किससे नहीं।” वास्तव में जो व्यक्ति धैर्य के साथ निरीक्षण करने की बुद्धि विकसित कर लेता है, वह अच्छा श्रम कर पाता है। वह सत्यता और सही रूप में प्रत्येक तथ्य को देखता है। एक बार न्यूटन ने कहा था कि उन्होंने जिस गुण के विकास में सबसे अधिक ध्यान दिया था, वह यह था कि वे किसी समस्या को अपने मानव चक्षुओं के सम्मुख बहुत देर तक रख सकते थे और जीवन के अनुभवों से उनकी सत्यता मालूम करते रहते थे, यहाँ तक कि उन्हें समस्या का हल प्राप्त हो जाता था।
आपके कार्य में अनेक विघ्न बाधाएं प्रतिरोध एवं प्रतिकूलताएं पड़ेंगी, लेकिन ये कठिनाइयाँ वास्तव में हमारी सहायक शक्तियाँ हैं, जो पग-पग पर हमारी शक्तियों की परीक्षा करती हैं और हमें दृढ़वर बनाती हैं। वे हमें अनुभव देती हैं और अध्यवसायी बनाती हैं।
हरकूलीज नायक यूनानी वीर का सिर शेर की खाल से ढ़का होता था और शेर के पंजे उसके गले के नीचे चुभते रहते थे, जिसका तात्पर्य यह था कि जब कठिनाइयों पर विजय प्राप्त हो जाती है, तो वे हमारी सहायक शक्तियाँ बन जाती हैं।
घटनाएं परिस्थितियों से सम्बन्धित रहती हैं। उनका फल हमारे चरित्र पर निर्भर रहता है। आप किसी घटना के प्रति वैसी प्रतिक्रिया दिखाते हैं, यही कसौटी है। एक प्रतिभाशाली व्यक्ति के लिये असफलता सफलता का सोपान हो सकता है, जबकि एक कमजोर व्यक्ति के लिए वही एक खन्दक बन सकता है, जिसमें से निकलना असम्भव हो। सब कुछ हमारी इच्छा शक्ति और संकल्प पर निर्भर है। जहाँ चाह है वहाँ राह अवश्य निकल आती है।
जिस वस्तु या जिन वस्तुओं को आप मूल्यवान समझते हैं, उसका मूल्य श्रम ही हैं। श्रम के बिना उसकी प्राप्ति असम्भव थी। महान पुरुषों की सफलता का गुर निरन्तर अनवरत श्रम है। उन्होंने जो कार्य हाथ में पकड़ा, वे लगातार उसी को आगे लेकर बढ़ते रहे हैं। हम यह मानते हैं कि उनमें जन्मजात प्रतिभा, बुद्धि तीव्रता रही होगी किन्तु उनमें जिस गुण का आधिक्य था, वह परिश्रम था। श्रम को सजा मत मानिये प्रत्युत आशा और उत्साह का सम्मिश्रण कीजिये।
सेन्ट अगस्टाइन कहा करते थे, “आलस्य में बिना कुछ किये निष्क्रिय पड़े रहना सबसे कठिन कार्य है। वह व्यक्ति धन्य है जो अपना जीवन और शक्तियाँ उत्तम कार्यों की सिद्धि में लगाता है और अपनी योजनाएं पर्याप्त सोच समझ कर निर्मित करता है। न केवल बड़ी योजनाओं में, छोटी तथा मामूली योजनाओं तक में श्रम की अतीव आवश्यकता पड़ती है। आलस्य में सम्पत्ति अर्जित करने में लगे हुए समय से आधे समय में ही नष्ट हो जाती हैं।”
एक संस्कृत कहावत का सार है- लक्ष्मी उस नर शिरोमणि के साथ रहती है, जो सर्वाधिक श्रम करता है। वे व्यक्ति दुर्बल हैं, जो भाग्य को ही निर्माण करने वाली शक्ति माने बैठे हैं।
इस देश के नवयुवकों का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य है। बेकारों की संख्या बढ़ाने वाले कुछ व्यक्ति तो वास्तव में काम न मिलने से परेशान हैं, किन्तु अधिकाँश में उनसे ऐसी संख्या वाले अधिक हैं जो आलसी, बेकार, निठल्ले और मुफ्त में सब कुछ चाहने वाले हैं। जो पेशे अधिक परिश्रम चाहते हैं, उनमें वे दिलचस्पी नहीं लेते। उन नौकरियों की ओर दौड़ते हैं जिनमें कम मेहनत करनी पड़ती है। काम न करके, वे आलस्य में अपनी शक्तियों का उपयोग नहीं किया जाता, वे अन्ततः नष्ट हो जाती हैं। शारीरिक और मानसिक शक्तियों के प्रति आलस्य भावना अनर्थकारी है। आलस्य ने उन्हें पतित और कमजोर बना दिया है। कुछ दिनों तो मनुष्य को आलस्य में कुछ आकर्षण प्रतीत होता है, किन्तु बाद में खाली बैठे ठाले रहना भी बेमजे हो जाता है। आलस्य में आनन्द मनाने, प्रसन्न रहने की शक्ति मारी जाती है। जिस व्यक्ति के जीवन में सदा छुट्टी ही रहती हो, वह छुट्टी के आनन्द को क्या समझ सकता हैं। बिस्तर पर पड़े रहने वालों ने कब क्या किया है? उन्हें अपने सोने से ही कुछ फुरसत मिली है? बड़े-बड़े अवसर निकले चले जाते हैं, और वे सोये पड़े रहते हैं। जिसे हम आलस्य कहते हैं, वह हमारी शक्तियों के पंगु होने की एक निशानी है।
आलस्य जीवित व्यक्ति की समाधि की तरह हैं। आलसी व्यक्ति न अपनी उन्नति, सेवा, या प्रगति कर सकता है, न समाज, देश अथवा परमेश्वर के ही काम आ सकता है। वह तो चूहे खटमल या मक्खी मच्छरों की तरह व्यर्थ ही इस सृष्टि के अन्त को नष्ट करता है। जब उनके मरने का समय आता है, तो वे गाय, भैंस या अन्य पशुओं की तरह नष्ट हो जाते हैं। वे जो कुछ करते हैं वह बंजर भूमि की तरह व्यर्थ है। आलस्य समय की बरबादी है।
पुराने यूनानी लोग कार्य को एक सामाजिक आवश्यकता समझते थे। सोलन कहते है कि जो व्यक्ति काम नहीं करता था अथवा उससे जी चुराता था, वह कोर्ट के सुपुर्द कर दिया जाता था। एक दूसरे यूनानी वेत्ता का कथन है कि “जो व्यक्ति काम से जी चुराता है, वह चोर डाकू है।” श्रम करने वाले व्यक्ति अपराधी नहीं होते। उनकी वृत्तियाँ शुभ कार्यों में लगती हैं। वे ऊंचाई की ओर चढ़ते हैं। आलसी व्यक्ति का दिमाग झगड़ों की जड़ है। उसमें रह रह कर शरारत और खुराफातें उठा करती हैं। खाली बेकार बैठ कर हम पाप की ओर प्रवृत्त होते हैं। जो व्यक्ति अपने को कार्य से मुक्त समझता हैं वह दया का पात्र है साथ ही सजा का हकदार है। यदि आप अशिक्षित हैं तो थोड़े से श्रम से शिक्षित बन सकते हैं, यदि पिछड़े हुए हैं तो मेहनत से त्याग कर आगे निकल सकते हैं, यदि दुर्बल हैं तो सशक्त और साहसी हृष्ट पुष्ट बन सकते हैं और प्रतिष्ठा का जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
प्रलोभन आलस्य की शक्ल में आता है और हमें कर्म मार्ग से च्युत करता है। “तनिक विश्राम कर लें”- ऐसा विचार मन में आते ही, वह अपनी शक्तियों को समेट लेता है। इस “तनिक” से उसकी शक्तियों को पूरा काम नहीं मिल पाता। फलतः वह अपनी सृजनात्मक शक्तियाँ खो बैठता है।
अरस्तु ने कहा है, “आनन्द एक शक्ति है। दैनिक पर्यवेक्षण से आपको विदित होगा कि आनन्द और स्वास्थ्य की आलस्य से पुरानी शत्रुता है। अनेक व्यक्तियों के जीवन में असंख्य अवसर आते हैं, उनकी प्रसन्नता की प्राप्ति के बहुत से साधन हो सकते हैं। समय का सदुपयोग कर ये व्यक्ति कहीं के कहीं पहुँच सकते हैं। फालतू वक्त में अपनी गुप्त शक्तियाँ बढ़ा कर ये अपने आपका आमूल परिवर्तन कर सकते हैं और इन्हीं आलसियों में ऐसे अनेक व्यक्ति निकल सकते हैं जो शानदार फल प्राप्त कर सकते हैं, पर शोक! ये अपनी मोह निद्रा में सोये पड़े रहते हैं। इन सदा के लिये अपने हाथ से भागते हुए मिनटों, घण्टों, दिनों, और सप्ताहों को मजबूती से नहीं पकड़ते। इन्हें व्यर्थ मत क्षय होने दीजिये वरन् अपने कार्य से स्थायी बनाइये।”
यौवन का समय स्वर्ण युग है। जीवन के ये बहुमूल्य क्षण मनुष्य को किसी विशेष दिशा में मोहने के लिये समर्थ हैं। आपकी शक्तियाँ अपने पूरे उभार पर रहती हैं और उनसे खूब परिश्रम लिया जा सकता है। प्रौढ़ हो जाने पर ये शक्तियाँ चाँदी की तरह हैं। चाँदी के जिस प्रकार अनेक उच्च उपयोग हो सकते हैं उसी प्रकार प्रौढ़ जीवन के समय से भी प्रचुर लाभ उठाया जा सकता हैं। वृद्धावस्था का युग सीसे की तरह है, जिसके उपयोग हैं पर बड़े नहीं। फिर भी अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार उसका भी कुछ न कुछ उपयोग हो ही सकता है।
यदि कार्य करें, लेकिन देर से झिका कर दुख देकर करें, तो क्या लाभ? कार्य तो वही उत्तम है, जो उचित समय पर समयानुकूल ही कर दिया जाय जब समय निकल गया, तो उसे करने से न लाभ हो सकता है न प्रशंसा ही प्राप्त हो सकती है। नियम पूर्वक ठीक समय पर कार्य पूर्ण कर देना परमेश्वर का एक आशीर्वाद है। टालने या देर से करने के कारण, अनेक बड़े व्यक्तियों का पतन हुआ है।
कुछ व्यक्तियों का असफल होने के कारण क्रम तथा व्यवस्था की कमी है। वे काम खूब करते हैं किन्तु सब अव्यवस्थित, टूटा फूटा, बेतरतीब, विशृंखल। जब तक ठीक योजना न बनाई जाय, और अपने कार्य को क्रमानुसार पूर्ण न किया जाय, तब तक स्थायी लाभ प्राप्त नहीं होता, प्रत्युत कार्य अधूरा सा ही रह जाता है।
क्रम तथा सुव्यवस्था सर्वत्र लाभदायक है। घर हो, या आफिस, दुकान या और कोई अस्पताल, सुव्यवस्था अमित फल देने वाली है। व्यवस्थित व्यक्ति थोड़े से श्रम से बहुत काम निकाल सकता है, थोड़ी वस्तुओं से बहुत सा लाभ प्राप्त कर सकता है तथा रुपया भी बना सकता है। आपके घर, दुकान या आफिस की प्रत्येक वस्तु का एक नियत स्थान होना चाहिए। प्रत्येक सदस्य वस्तु को उसी नियत स्थान पर रखे, इधर-उधर न फैलायें। जो वस्तु जहाँ से उठाई जाय वहीं रखी जाय, जो पुस्तक अलमारी के जिस स्थान पर रखी है, वहीं रखी जाय। घर में आपका चाकू, दियासलाई, लिखने पढ़ने की वस्तुएं, कपड़े, कुर्सी, मेज, कंघा, शीशा इत्यादि का जो स्थान नियत हो चुका है वहीं पहुँचना चाहिये। लिखने-पढ़ने, हिसाब-किताब, ऋण या मिलने-जुलने में भी समय और क्रम का ध्यान रखें। पहले सबसे महत्वपूर्ण कार्य हाथ में लें, फिर कम महत्वपूर्ण, फिर अन्य साधारण काम। प्रायः लोग मामूली कामों को पहले हाथ में ले लेते हैं जबकि महत्वपूर्ण कार्य यों ही पड़े रह जाते हैं।
काम में समय की पाबन्दी का सतर्कता से ध्यान रखें। बिना समय की पाबन्दी के मनुष्य चिन्तित रहता है, तथा काम को पर्वत की तरह भारी ओर दुरूह कष्ट साध्य बनाता है। नियत समय पर कार्य करने का गुण सर्वत्र प्रशंसित होता है। ऐसे व्यक्ति पर सब विश्वास करते हैं और जिम्मेदारी के कार्य प्रदान करते हैं।
जीवन एक प्रगति है। यह उन्नति और श्रेष्ठता की ओर बढ़ना है। हम आशामय प्रयत्नों से निरन्तर आगे बढ़ते चलते हैं। प्रायः कठिनाई सत्य प्राप्ति में एक गुरु का कार्य करती है। विरोध हमारी गुप्त शक्तियों को जागृत करता है और आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करता है। अधिक कठिनाइयाँ पड़ने पर हमारा आत्म विश्वास बढ़ता है, विनम्रता आती है और सहिष्णुता की शक्तियाँ बढ़ जाती हैं।
आपके जीवन बन्द पानी की तरह एक स्थान पर बंधा हुआ सड़ता गलता नहीं होना चाहिए। यदि आप उसे आगे नहीं बढ़ायेंगे, जीवन में प्रवाह नहीं लायेंगे, तो वह पीछे की ओर (पतन, आलस्य और मृत्यु) चलने लगेगा। जहाँ हमें कठिनाइयाँ मिलें, उनकी परवाह न करते हुए हमें आगे बढ़ जाना चाहिए। सर फिलिप सिडनी का मूल मन्त्र हमें प्रेरणा देने वाला है-”मैं सफलता और कार्य सिद्धि का मार्ग मालूम कर लूँगा। यदि न मिला, तो स्वयं निर्माण कर लूँगा।” यदि आपको अपना मार्ग नहीं मिलता, तो अपनी मौलिकता, बुद्धि, तथा अध्यवसाय से उसे मालूम क्यों नहीं कर लेते।
आराम तथा विलास में रहने से मनुष्य जीवन भर बच्चा ही बना रहता है, कठिनाइयों और विरोधों में रहने से उसमें पुरुषोचित शक्ति और सामर्थ्य की वृद्धि होती है।
बड़े बनने वाले व्यक्तियों के जीवन का अध्ययन करने से विदित होता है कि उनमें कुछ अपूर्णताएं, त्रुटियाँ या प्रकृति की ओर से कुछ कमजोरियाँ थीं। इन कमजोरियों को दूर करने की प्रतिक्रिया ने उन्हें ऊंचा उठाकर आसमान तक चढ़ाया था। चरित्र की दृढ़ता या कमजोरी की सच्ची परीक्षा तब ही होती है जब बाह्य परिस्थितियों में कोई असाधारण परिवर्तन होता है, या कोई विरोध उत्पन्न होता है। विरोध से मनुष्य को अपनी सब शक्तियों के सामूहिक बल पर अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करनी होती है। अनेक छुपी हुई शक्तियों का विकास होता है। कठिनता एक भारी हल है। उसे चलाने के लिए लोहे से सख्त हाथों की आवश्यकता है।
आपका श्रम चाहे शारीरिक हो, अथवा मानसिक, आपको चाहिए कि आप पूरी शक्तियों और एकाग्रता से उसमें संलग्न हो जायें तन्मयता पूर्वक उसे सम्पन्न करते रहें और जब तक उसे पूरा न कर डालें कदापि न छोड़ें। अपने पसीने की आय से हमें समुन्नत होना चाहिए।
धन की त्रुटियाँ बताते हुए प्रायः कहा जाता है कि इससे हमारी नैतिकता को धक्का लगता है, सहानुभूति, दया, करुणा का लोप होने लगता है, लेकिन गरीबी इससे भी बुरी है, निंद्य है। गरीबी से मनुष्य का साहस और उत्साह मारा जाता है, सच्चा और प्रतिष्ठित होना कठिन हो जाता है। अतः श्रम द्वारा अपनी गरीबी को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए।
श्रम के साथ विश्राम और मनोरंजन का भी उचित सम्मिश्रण होना अपेक्षित है। आप परिश्रम करें और थकने पर पर्याप्त विश्राम करें। मनोरंजन द्वारा मन का भार दूर करें जिससे नया उत्साह और शक्ति प्राप्त हो सके।
अपने कार्य में निरंतर संलग्न रहना, मन उचाट न कर उसमें समृद्धिशील बनने का प्रयत्न करते रहना मनुष्य के लिए सबसे स्वस्थ शिक्षा है। जो अपनी शक्तियों का सुचारु उपयोग श्रम में करता चलता है, वह कठिन कार्यों में भी सफलता प्राप्त करता जाता है। समृद्धि उसके साथ चलती है।
श्रमशील व्यक्ति तड़के उठता है और अपने काम पर यथा समय जाता है। वह एक सेकिंड भी व्यर्थ नष्ट नहीं करता। वह सतर्क और जागरुक बना रहता है, अवसरों को व्यर्थ नहीं जाने देता। आपने पर्याप्त समझ बूझ कर अपना जो भी कार्यक्रम उद्देश्य या मूल काम निश्चित किया हो, उसमें दृढ़ता से लग जाइये अपने निश्चयों के प्रति सच्चे रहिए। ध्यान रखिए कि आलस्य, तन्द्रा, विलास, या बीमारी की केंचुली आपके इर्द गिर्द चिपटी न रह जाय।
(श्रीमती प्रीतम देवी महेन्द्र)
जो शक्ति पृथ्वी को धारण किए हुए है वह क्रियाशीलता है। यदि पृथ्वी अपनी धुरी पर न घूमे तो वह गिर पड़ेगी। इसी प्रकार यदि हम अपनी क्रियाशीलता परिश्रमशीलता त्याग दें, तो जीवन संग्राम में अवरोध उत्पन्न हो जायेगा। क्रियाशीलता ही हमारे जीवन का सब कुछ है।
रुपये के परिवर्तन में हम सब कुछ पा जाते हैं। पर रुपया वास्तव में क्या है? यह है, हमारा संचित श्रम। श्रम को स्थूल रूप प्रदान कर रुपया, जमीन, जायदाद बना लेते हैं। इसी संचित श्रम से हम दूसरों का विभिन्न प्रकार का श्रम खरीदा करते हैं। यदि यह श्रम के विनिमय की प्रथा रुक जाय, तो संसार का समस्त कार्य रुक सकता है। लेकिन प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर, मन, बुद्धि के अनुसार समाज का कुछ न कुछ कार्य करता है। किसी का श्रम शारीरिक है। तो किसी का मानसिक रहता हैं। इसी श्रम के आदान-प्रदान से समाज का कल्याण होता है।
क्रियाशीलता प्रकृति में है। हवा और जल तक बिना क्रिया सड़ने गलने लगेंगे चाकू को जितना पड़ा रखेंगे, निष्क्रिय रखेंगे, जंग से नष्ट हो जायेगा। इसी को यदि प्रयोग में लाएं, तो तेज चमकदार और सुन्दर बन जायेगा। ऐसा ही मानव जीवन है। यदि हम अपनी शक्तियों का सदुपयोग करते रहेंगे, तो मन के दुर्विकार, कूड़ा-करकट मैल, दुर्गन्ध, सड़न अव्यवस्था, आलस्य और दारिद्रय नष्ट हो जायेंगे। क्रियाशील रहने से हमारी चैतन्यता, जागरुकता, शुचिता, और सात्विकता की वृद्धि होती हैं। मनुष्य अन्दर और बाहर से स्वच्छ एवं प्रसन्न रहता है।
समय रूपी ताले में परिश्रम रूपी ताली डालने से इस पृथ्वी के सब सुख सम्पत्ति प्राप्त होते हैं। परिश्रमशील व्यक्ति सब कुछ कर सकता है-एक चौपाई का टुकड़ा देखिए-
सकल पदारथ है जग माहीं। कर्महीन नर पावत नाहीं॥
इसमें गोस्वामी जी ने ज्ञान और अनुभव का अखण्ड भण्डार भर दिया है। भगवान ने मनुष्य को संसार में भेजते समय यह क्रम रखा है कि कर्म निष्ठा, और परिश्रमशीलता से ही सब सम्पदाएं प्राप्त हों। विश्व कर्म प्रधान है। जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल चखता है। तरह-तरह के फल लोगों को मिल रहे हैं, किसी की आरती उतर रही है, जय ध्वनि बोली जा रही है, यानी प्रतिष्ठा दी जा रही है, प्रशंसा की जा रही है। ये वे व्यक्ति हैं जिन्होंने श्रम द्वारा संसार के समय का उपयोग किया है। श्रम की पूँजी से जो चाहे खरीद लीजिए।
लोग अभावग्रस्त क्यों हैं? वे व्यक्ति जिन्होंने पूरी परिश्रम शीलता से काम नहीं किया है। पूरी निष्ठा नहीं लगाई है। भगवान उसी का फल देंगे, जो आपने किया है। उन्होंने श्रम के ऊपर सब व्यवस्था रखी है। वे परम न्यायकारी हैं वे देखते हैं की कौन सही सही परिश्रम कर रहा है। सही परिश्रम की कसौटी पर ही हमें साँसारिक की मान प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि प्राप्त होती है।
समय और श्रम की उपयोगिता ही मुख्य है। जो काम से जी चुराते हैं, वे मरते हैं, गरीब रहते हैं और पग-पग पर अपमानित होते हैं। जो फालतू आलसी निकम्मे शैतान हैं। वे लड़ेंगे झगड़ेंगे, जुआ खेलेंगे, परेशान, करेंगे। यह शैतान आपके दिमाग पर अधिकार न कर ले, यह सावधान रहें। मन के शैतान को काम दीजिए। शारीरिक श्रम की भी उपेक्षा मत कीजिए। श्रम और सम्पत्ति में कोई अन्तर नहीं है। किसान पृथ्वी की छाती चीर कर भोजन उत्पन्न करता है, मलाह नदी की छाती चीर कर चलता है। जय, प्रशंसा, मान, प्रतिष्ठा, रुपया पैसा, जायदाद यह सब श्रम के पुरस्कार ही है।
महाभारत में एक स्थान पर कहा गया है कि दोनों भुजाओं का कमाया हुआ अन्न हमारे पेट को मिलना चाहिए, बुद्धि की कमाई हमारे मन को मिलनी चाहिए। बुद्धि से लोग अधिक कमा कर प्रायः फालतू अपव्यय करते हैं। शारीरिक श्रम से कम पैसा मिलता है, लेकिन उसके बिगड़ने की भी कम गुँजाइश है। बुद्धि की कमाई धर्म, यज्ञ, दान, पुस्तक क्रय, ज्ञान वर्धन में व्यय होनी चाहिए। हमारी परम्परा ऐसी रही कि राजा जनक तक हल जोत कर जीविका उपार्जन करते रहे। खेती का रुपया पसीने का रुपया है। श्रम का रुपया है। नसीरुद्दीन कुरान लिखकर अपनी जीविका उपार्जन करता था। उसकी पत्नी उसके लिए भोजन की व्यवस्था करती थी। वह टोपी बनाया करता था। बाजार में किसी के यहाँ रखवा कर साधारण मूल्य पर ही उन्हें बिकवाता था। गाँधी और बिनोवा श्रम की प्रतिष्ठा के ज्वलन्त उदाहरण हैं। उनके यहाँ जल तक मनुष्य खींचते रहे। स्वयं अपना काम करते रहे। व्यक्तिगत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए स्वयं ही परिश्रम करने की जरूरत है।
श्रम मनुष्य की अभूतपूर्व वस्तु है। श्रमदान यज्ञ मनुष्य की श्रम की प्रतिष्ठा का एक जीता जागता रथ है। कर्म ही मनुष्य को ऊपर उठाने वाला है। भगवान स्वयं कर्म रत हैं। वे एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रहते। यदि वे क्षण के लिए कर्म करना बन्द कर दें, तो इस सृष्टि का प्रत्येक कार्य रुक जाय। वे निरन्तर कार्यरत हैं। हम भी उससे शिक्षा लें और अपने अपने ढंग से परिश्रम करते रहें। बच्चे युवक वृद्ध महिलायें सब आयुपर्यन्त कुछ न कुछ श्रम कर सकते हैं।
परिश्रम करने की मूल वृत्ति किसी न किसी विशेष उद्देश्य के लिए प्रयत्न करना है। एक उद्देश्य को रखकर हमें उसकी प्राप्ति के लिए परिश्रम करना उचित है। एक दिशा में प्रबल फल शीघ्र देता है। कई बार सामान्य परिश्रम या संयोग से कोई बड़ी बात हो जाती है। यकायक कुछ व्यक्ति अमीर बन जाते हैं या प्रयत्न विफल हो जाते हैं। लेकिन यह स्थिति असाधारण है। बिना श्रम के आई हुई सम्पत्ति स्वयं निकल जाती है, स्थायी लाभ नहीं होता। फालतू पैसा अभिमान का नशा उत्पन्न करता है। कर्म को कर्त्तव्य समझ कर निरन्तर श्रम कीजिए और भिन्नता से निराश मत रखिये। प्रत्येक क्षण कर्म करते रहने से गुप्त शक्तियों का विकास होता है और जीवन दीर्घ बनता है। जीवन में जो समय की पूँजी पड़ी है, उसे निचोड़ कर तरह-तरह की सम्पदाएं प्राप्त कीजिए।
श्रुति कहती हैं- जीवन एक संग्राम है। इस जीवन में वही विजयी होता है, जो सीना तानकर आफतों का मुकाबला कर सकता है। आफतों की घनघोर घटाओं में बिजली की तरह मुस्करा सकता है, परिस्थितियों का दास न बन कर, उनका दृढ़निश्चयी स्वामी बनता है। जो हट जाना पसन्द करता है, पर झुकना नहीं।
कर्त्तव्य और कर्म को छोड़कर जो कृष्ण कृष्ण जपा करते हैं वे भगवान के द्वेषी हैं, क्योंकि भगवान कर्म करने के लिए ही तो अवतार लेते हैं। मनुष्य की चमत्कारी शक्तियों का विकास कर्म करने से ही होता है।
(श्री. दौलतराम कटरहा)
हनुमान जी सीता की खोज में लंका को जा रहे थे। देव, गंधर्व, सिद्ध और ऋषियों ने उनकी बल-बुद्धि की परीक्षा के लिए नाग माता सुरसा को प्रेरित किया। सुरसा ने हनुमान जी का मार्ग रोक लिया और उन्हें सशरीर निगल जाने के लिए अपना मुँह फैलाया। हनुमान जी ने भी उसे विफल मनोरथ करने के लिए अपने योगबल से अपने शरीर को बढ़ाया। हनुमान जी बढ़े तो सुरसा भी बढ़ी। तुलसी दास जी ने इस सम्बन्ध में लिखा है कि-
जस जस सुरसा बदन बढ़ावा। तासु दुगुन कपि रूप दिखावा॥
कुछ देर तक एक दूसरे को छकाने के लिए योगबल द्वारा अपने-अपने शरीर को बढ़ाने की होड़ चलती रही। किंतु हनुमान जी का लक्ष्य तो उस समय सीता की खोज करना था। वे होड़ के फंदे में फंस जाते तो लक्ष्य भ्रष्ट हो जाते। लक्ष्य विशेष को सम्मुख रख कर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति को फिजूल बातों में नहीं उलझना चाहिए। अतएव उन्होंने झट अपने शरीर को छोटा कर लिया और सुरसा के मुख में प्रवेश कर तुरन्त ही बाहर निकल आए। इस प्रकार उन्होंने सुरसा को संतुष्ट किया और अपना कार्य भी पूरा किया।
सुरसा और हनुमान की कथा स्थूल दृष्टि से भले ही कल्पित हो पर एक भिन्न दृष्टिकोण से देखें तो वह सोलहों आने सच मालूम होगी। मानव समाज में सुरसाओं की कमी नहीं हैं। जब दो व्यक्ति झगड़ते हैं तो सुरसा देवी की रूह मानो उनमें उतर आती है। कोई एक बात कहता है तो दूसरा दो कहने के लिए तैयार रहता है। उसने दो कही कि उसका विपक्षी फौरन चार कहने को तैयार हो जाता है। इस प्रकार आपस की बात बढ़ती ही जाती है और परिणाम बुरा होता है। हनुमान जी तो अपने बुद्धि-कौशल से सुरसा से झट निपट गए थे और साधारण लवणार्णव पार कर गए थे लोग सुरसाओं के जाल में फंस कर नहीं, उतरते और विपदार्णव में निमग्न हो जाते हैं। विपदार्णव से तो वही उबरता है जिसमें हनुमान जी जैसी चातुरी और उद्देश्य की एकता होती है। जिसके जीवन का कोई विशेष उद्देश्य नहीं होता वह तो फालतू बातों में फंसकर डूब मरता है।
जब दो व्यक्ति झगड़ते हैं तो कोई भी व्यक्ति अपने को अपने प्रतिद्वन्द्वी से छोटा साबित नहीं होने देना चाहता।
कोई भी दूसरे से अपने को पीछे नहीं रखना चाहता क्योंकि पीछे रहने का अर्थ समझा जाता है पराजय। हार कोई पसन्द नहीं करता, सभी जीत चाहते हैं, फिर चाहें होड़ एक अच्छे काम के करने में होवे अथवा बुरे काम में। बहस करने में होड़, खर्च करने में होड़, बाहरी दिखावे में होड़, फैशन में होड़, सिनेमा देखने में होड़, दूसरों को ठगने में होड़, मुफ्तखोरी घूँसखोरी में होड़, गाली देने में होड़, कामचोरी में होड़, कहाँ तक कहें जीवन के हर भले बुरे क्षेत्र में होड़ लगी हुई है। इस होड़ से कोई विरला भाग्यवान ही बच निकलता है और अपने आपको अपने एक मात्र उद्देश्य की सिद्धि में लगाता है।
किन बातों में प्रतिद्वन्द्विता अच्छी होती है और किन बातों में बुरी, इसका विवेक न रखकर झूठी शान के पीछे लोग मर मिटते हैं। बाजी खाने से मानो चौहानी घटती है, इसलिये कोई पाँव पीछे नहीं देना चाहता। किन्तु बुद्धिमान लोग झूठे बड़प्पन की परवाह नहीं करते, वे तो व्यर्थ की बातों में हार जाना ही पसन्द करते हैं इसलिये जीवन में सफल होते हैं और सुख से रहते हैं। अमुक व्यक्ति ने अपनी लड़की का विवाह इतनी धूम धाम से किया, मैं भी इतनी धूम-धाम से विवाह करूंगा, अमुक व्यक्ति इतने ठाठ-बाठ से रहता है, मैं भी ऐसे ही ठाठ-बाठ से रहूँगा, अमुक व्यक्ति अपनी ड्यूटी के समय में केवल अमुक समय तक ही काम करता है, मैं भी कम समय तक ही काम करूंगा, इस प्रकार की झूठी शेखी में बुद्धिमान व्यक्ति नहीं पड़ते। बुद्धिमान व्यक्ति तो ओछी बातों में हार को गले गलाते हैं और हार कर ही अच्छे अर्थों में जीत जाते हैं। हनुमान जी को हारा हुआ कौन मानता हैं? हनुमान जी के परमाराध्य रामचन्द्र जी ने परशुराम जी से कहा था-
देव एक गुण धनुष हमारे। नवगुण परमपुनीत तुम्हारे।
सब प्रकार हम तुम सनहारे। भारत हूँ पाँ परिय तुम्हारे॥
तो राम को हारा हुआ कौन कहता है? बुद्धिमान लोग तो कहते हैं कि-
“जग जिति हारे परशुधर हारि जिते रघुराउ”
सारे संसार को जीत कर भी परशुराम जी हार गए और अपनी हार को स्वीकार करके भी दशरथी राम जीत गया। अपरंच रावण को विजयी कौन कहता है जिसका कौल था-
“क्या रामचन्द्र से मेरी साहिबी कम है। न दूँगा जानकी जब तक दम में दम है।”
अतएव हमें हार और जीत के सच्चे रहस्य को समझना चाहिए, झूठी शान के लिए नहीं मरना चाहिए और व्यर्थ की होड़ाहोड़ी छोड़नी चाहिए।
(कुमारी सावित्री चौहान बी. ए. एल. टी.)
स्नेह एक आध्यात्मिक वस्तु है, शारीरिक नहीं जिसका प्रति रूप जननी की वात्सल्यता में प्रतिबिम्बित है। सच्चा स्नेही व्यक्ति अपने स्नेह का प्रतिदान कभी नहीं चाहता। वह अपने स्नेह-पात्र पर अपना स्नेह अर्पण करके भी उससे कुछ याचना नहीं करता। उसमें तो निःस्वार्थ भावना होती है और होता है देवत्व। उसमें लाभ हानि, रस-नीरसता अथवा हर्ष एवं विषाद का तो प्रश्न उठता ही नहीं। उसका सच्चा सुख स्नेह प्रदान करने में है, भौतिक प्राप्ति में नहीं। देने में ही सच्चा सन्तोष है, लेने में नहीं। अनन्त अन्तरिक्ष के समान निस्सीम एवं विशाल उदधि की उर्मियों सदृश्य शीतल तथा प्रभावशाली स्नेह एक स्वर्गीय विभूति है। वही कारण है कि अनिर्वचनीय स्नेहशील जननी तथा जन्मभूमि का पद स्वर्ग से भी अधिक श्रेष्ठ माना गया है-
“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।”
क्यों स्नेह इसी विचार से किया जाता है कि जीवन रसमय बने? मनुष्य स्नेह को भी अन्य भौतिक पदार्थों की भाँति एक आदान-प्रदान करने का सौदा समझता है और स्नेह की पवित्रता का प्रतिबिम्ब साँसारिक सुखोपभोग की कल्मषता में पर्यलक्षित करने की भयंकर भूल करके अपने आत्मिक विकास के श्रम को अवरुद्ध कर पतनोन्मुख होता है तथा संसार में अपयश का भागी होता है।
यदि मानव रस की ही प्राप्ति के लिए स्नेह करने का अभिनय करता है तो स्नेह का पवित्र नाम कलंकित होता है। रस तो अन्य साँसारिक वस्तुओं से प्राप्त होता है। फिर उसकी प्राप्ति के लिए स्नेह का मिथ्या जाल रचने की आवश्यकता ही क्या? रस की उत्पत्ति तृष्णा से होती है। इस प्रकार रस साँसारिक सुखोपभोग का ही दूसरा नाम है जो कि क्षण भंगुर है, विनश्वर है, चिरस्थायी नहीं। विनश्वर वस्तु मिथ्या है, सत्य नहीं। स्नेह की साधना में वह तीव्र आलोक है जिसके समक्ष विलासिता का वैभव प्रकम्पित होकर अस्तित्व विहीन हो जाता है। इसके विपरीत स्नेह के रूप में मोह तथा विलासिता मानव के पतन का द्वार खोलती है।
स्नेह एक साधना है, एक बलिदान है जो आत्मा को पवित्रता प्रदान करता है और देता है त्याग की भव्य भावना जिससे रस लोलुपता की पिपासा नहीं शान्त होती वरन् आत्मिक शान्ति प्राप्त होती है। स्नेह व्यथा नहीं देता, देता है सच्चा सन्तोष और अनन्त शान्ति। इसके विपरीत कुछ व्यक्ति स्वार्थ सिद्धि तथा सन्निकटता में ही स्नेह का स्थायित्व देखते हैं। किन्तु, स्वार्थ सिद्धि माया का अल्पकालिक बाह्य प्रदर्शन है तथा सन्निकटता मोह का प्रतिरूप है स्नेह नहीं।
स्नेह और मोह में अन्तर है। एक है सूर्य तो दूसरा है दीपक जिसके अधःभाग में विचार अन्धकार है और जो ज्योति है वह भी समयाधीन एवं क्षणिक। सूर्य सबको आलोक प्रदान करता है एक कर्त्तव्य की साधना के प्रतिरूप में, प्रतिदान की भावना से प्रेरित होकर नहीं। अतः उसका स्नेहालोक सर्वहिताय विश्वव्यापी है। इस प्रकार का रवि-रश्मि तुल्य स्नेह दो ही रूपों में प्राप्त हो सकता है- ईश्वर की कृपा तथा जननी की वात्सल्यता में। मानव श्रद्धा, शक्ति तथा उपासना द्वारा स्वर्गीय स्नेह के ऋण से उऋण होने का दम्भयुक्त प्रयास करता है। ऐसा प्रयास उपहासास्पद है, क्योंकि उपासना तथा भक्ति आदि प्रतिदान नहीं हैं, वह तो उपास्य के प्रति उपासक की कृतज्ञता का प्रकटीकरण नाम है। यह स्नेह के प्रतिदान का स्वरूप नहीं है।
संसार में प्रायः ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जो किसी विकसित प्रसूत के रूप रंग पर मोहित होकर उसका रस पान करने के लिए उस पर स्नेह प्रदर्शित करने का अभिनय मात्र करते हैं। उनका वह स्नेह, स्नेह नहीं होता। वह तो एक आडम्बर होता है जिसके अभ्यंतर केवल वासना की तृप्ति की चाह होती है। मधुकर के समान उनकी चंचल चाह मर्यादा की सीमा तक सीमित नहीं रहती। क्या यह वासनागत निकृष्ट तृप्ति की पिपासा का गर्हित स्वरूप नहीं है? माया का मिथ्या जाल नहीं हैं? क्या एक मृग मरीचिका नहीं है जिसके पृष्ठ भाग में धोखे का भयंकर पाश विस्तारित है? आश्चर्य मानव हृदय इसी पाश में छले जाने के लिए आतुर रहता है और इसी वंचना को ही सुखोद्रेक समझता है।
मोह के आवरण में ग्रस्त प्रायः अधिकाँश जन वासना के अन्धकार में भटकने को ही स्नेह की खोज को वे अपने जीवन का ध्येय समझ बैठे हैं। मृग-मरीचिका का अनुगमन करने से केवल निराशा एवं पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ भी हस्तगत नहीं होता। भूले हुए मानव! वासना में तृप्ति कहाँ? रस में शान्ति की शीतलता एवं स्नेह की स्निग्धता कहाँ? रसानुभूति मोह से उत्पन्न क्षणिक तृप्ति होती है, चिरस्थायी स्नेह का सुख नहीं। नैसर्गिक शान्ति प्रदाता स्नेह का निवास निकेतन है- त्याग, बलिदान एवं उपासना की साधना में।
(श्री लक्ष्मी प्रसाद जी रमा, हटा)
“ब्रह्मचर्येण विद्या विद्यया ब्रह्मलोकम्।”
“वीर्य रक्षा के द्वारा ही विद्या प्राप्त होती है और विद्या पढ़ने से ही मनुष्य ब्रह्म लोक का सुख पाता है।”
ऊपर के मन्त्र में यह बात कही गयी है, ब्रह्मचर्य ही विद्या का मूल है बिना ब्रह्मचर्य के उपलब्धि नहीं हो सकती, ब्रह्मचर्य और विद्या में वृक्ष और शाखा के समान सम्बन्ध है, यही कारण है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही विद्या का अध्ययन करने का नियम प्राचीन काल से प्रचलित किया गया था, ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य की अवस्था ही में वेद वेत्ताओं का अभ्यास कर लेते थे और जब तक विद्या प्राप्त नहीं हो जाती थी गृहस्थाश्रम में पैर नहीं रखते थे, जो विद्या ब्रह्मचर्य के द्वारा गृहीत होती है वह कभी स्खलित नहीं होती, वीर्य के प्रभाव से ज्ञान के गूढ़ तत्वों का शीघ्र ही हृदयंगम हो जाता है, विद्यार्थी की धारणा शक्ति सदा जागृत और तीव्र रहती है। जिससे कि वह थोड़े ही अभ्यास से विशेष लाभान्वित होता है, जो लोग ब्रह्मचर्य युक्त विद्या अध्ययन करते हैं वे ही उच्च तथा यशस्वी विद्वान बन सकते हैं और उन्हीं की विद्या में वैज्ञानिक तथा गणित सम्बन्धी नवीन-नवीन आविष्कार करने की शक्ति उत्पन्न होती है-
कहने का अभिप्राय यह है कि विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य के पालन से विद्या और दीर्घ जीवन प्राप्त हो सकता है, जो जितना ही दीर्घ जीवी होना चाहता है वह उतना ही वीर्य की रक्षा करे, वीर्य का व्यय ही जीवनी शक्ति का प्रधान नाशक है प्राचीन अथवा अर्वाचीन समय में एक भी व्यभिचारी पुरुष दीर्घजीवी होते नहीं देखा गया, इतिहास में दीर्घजीवी पुरुषों के जीवन चरित्र के पढ़ने में वह बात पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुकी है कि व्यायाम और ब्रह्मचर्य के पालन से ही उनको विद्या और दीर्घजीवन प्राप्त हुआ था, आज भारत को इसी की जरूरत है, इसके प्रत्येक युवक युवतियों को व्यायाम और ब्रह्मचर्य के द्वारा बल-संचय करने की ओर सबसे पहले ध्यान देना चाहिये, इससे ओजबल, तेज और प्रताप बढ़ता है, जो ‘ओजबल’ के आश्रित न हो अथवा जो इसका कोई अन्य स्थूल व सूक्ष्म रूप न हो, यह ओजबल, स्मरण-शक्ति, संकल्प शक्ति व मेधा और मस्तिष्क-शक्ति को बढ़ाता और शरीर को पुष्ट करता, वीर्य बल और पराक्रम प्रदान कर शरीर की पूर्ण शुद्धि कर देता है, इसका सुदृढ़ अभ्यास शरीर में नवयौवन का संचार करता है स्नायुओं को नवीन बल देता है और साधकों को ‘कायाकल्प’ की पूर्ण सुविधा प्रदान करता हुआ इस योग्य बना देता है कि वे मनुष्य जीवन की नित्य की ही संग्राम भूमि में, प्रारब्धगत सभी कठिनाइयों और विघ्न बाधाओं का सामना हर्षपूर्वक कर सकें।
अखण्ड ब्रह्मचर्य के दिव्य ओजबल से सुरक्षित और सुदृढ़ बना हुआ मनुष्य, योगी व ज्ञानी लक्ष्मण की तरह अखिल विश्व को कौतुक में ही चलायमान और कल्पित कर सकता है, समुद्र की गति को रोक सकता हैं, पहाड़ को फूँककर उड़ा सकता है, प्रकृति को अपनी दासी बना सकता हैं? संसार में ऐसा कौन सा दुष्कर कार्य है जो वह नहीं कर सकता, इस “ओजबल” के ही प्रताप से शरण में आयें हुए, धर्म रूपी कपोत की रक्षा के लिए राजा ‘शिवी’ ने इन्द्र को सभी अंग काट-काट कर अपना समस्त शरीर, तुला पर रख दिया था, देवासुर संग्राम में, देवताओं की जय और असुरों की पराजय के लिए “दधिचि” ने अपनी हड्डी ही देवताओं को दान कर दी थी, और प्रातः स्मरणीय महाराजा हरिश्चन्द्र ने, सत्य की परीक्षा में महर्षि विश्वामित्र को दिये हुए साम्राज्य की दक्षिणा चुकाने के लिए, अपने प्राण से भी प्यारे पुत्र रोहिताश्व और राज महिषी शैव्या को एक वेश्या के हाथ और अपने को चाण्डाल की वृत्ति के लिये ही सहर्ष बेच दिया था।
भगवान के अनन्य भक्त भीष्मपितामह ने अपने पिता के विषय वस्तु के लिये जीवन पर्यन्त ब्रह्मचारी रहने की ही भीष्म प्रतिज्ञा करके, अपने “देवव्रत” नाम को भीष्म रूप से ही चरितार्थ कर दिखाया, जिसके कारण स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अपने भक्त भीष्म की प्रतिज्ञा निबाहने के लिए, महाभारत के युद्ध में राजा दुर्योधन को दी हुई शस्त्र ग्रहण न करने की अपनी प्रतिज्ञा ही तोड़ दी।
भगवान राम के सेवक और अनुचर बाल ब्रह्मचारी हनुमान लंका तक पहुँच जाने के लिए स्वयं भगवान राम को जिस समुद्र पर सेतु निर्माण करना पड़ा था उसे योंही सहज तैरकर पार कर गये थे।
राम-रावण संग्राम में “मेघनाथ” वध के लिए लक्ष्मण जी ने वनवास के 14 वर्ष बिना अस्त्र और नींद के ही बिता दिये, गाँडीव धनुषधारी महावीर अर्जुन को उर्वशी जैसी अप्सरा ब्रह्मचर्य व्रत से डिगा नहीं सकी, इस प्रकार “ब्रह्मचर्य” और “ओजबल” की महिमा का अन्त नहीं हैं।
गायत्री परिवार के सदस्य वे सभी सज्जन बन सकते हैं जिन्होंने पूरा गायत्री साहित्य पढ़ लिया है और नियमित रूप से गायत्री उपासना करते हैं। ऐसे सज्जनों को समय-समय पर मार्ग दर्शन कराने एवं आवश्यक सहयोग देने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न किया जाता रहता है। इस प्रकार गायत्री परिवार के सदस्य बन कर अनेकों सुसंस्कारी महानुभाव अपनी आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करते रहते हैं।
इस साधारण सदस्य श्रेणी से ऊंची एक और श्रेणी है जिन्हें गायत्री पुत्र कह सकते हैं। आवश्यक ज्ञान और उपासना के द्वारा जिनकी निष्ठा स्थिर हो गई है वे इस श्रेणी में प्रविष्ट होते हैं।
आरम्भ में साधारणतः अनेक लोग सकाम कामनाओं से गायत्री उपासना की ओर अग्रसर होते हैं। मनुष्य साधारणतः अनेक कामनाओं मुसीबतों चिंताओं और अभावों से घिरा रहता है उनसे छुटकारा पाने के लिये जहाँ अनेक प्रकार के अन्य उपाय किया करता है, उन्हीं में एक उपाय उपासना को भी मान लेता है। गायत्री उपासना से संसार की अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक मात्रा में, अधिक सरलता से और अधिक शीघ्र लाभ होता है, यह एक निश्चित तथ्य है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक व्यक्ति की, प्रत्येक प्रार्थना गायत्री माता अवश्य ही पूर्ण कर देती है।
अन्य पुरुषार्थों की भाँति उपासना भी एक आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। जिस प्रकार अन्य पुरुषों का आवश्यक सत्परिणाम होता है, उसी प्रकार गायत्री उपासना का भी होता है। परन्तु वह परिणाम सबके लिए समान रूप से सुखकर नहीं होता। मान लीजिए एक दानी व्यक्ति प्रसन्न होकर 10 आदमियों को एक-एक हजार रुपया देता है। तो देने की रकम समान होते हुए भी सबको एक समान लाभ न होगा। जिस पर दस हजार रुपया कर्ज था उसे वह एक हजार जो मिला था उसे दे देने पर भी नौ हजार ऋणी ही रहा। कर्जदार उसे पहले की भाँति ही तकाजे नालिश आदि से परेशान करता रहे। जिस आदमी पर एक हजार कर्ज था उसे केवल कर्जदारों से छुटकारा मिला पर घर में कुछ बढ़ोत्तरी न दीखी। जिसके ऊपर कुछ भी कर्ज न था उसे केवल एक हजार नकद दीख रहा है। जिसके घर में पहले से भी कुछ था, उसे यह एक हजार की नई सहायता मिल जाने से और भी उन्नति एवं सुविधा जनक स्थिति प्राप्त हो गई। देने वालों ने चारों को एक सी सेवा पर प्रसन्न होकर एक सा उपहार दिया पर लेने वालों की परिस्थिति भिन्न होने से उनकी स्थिति में परिवर्तन समान रूप से न हुआ। यही बात उपासना क्षेत्र में भी होती है। मानव प्राणी के साथ उसके पूर्व जन्मों के सुकृत दुष्कृतों से उत्पन्न अनेक प्रारब्ध बंधे होते हैं। कृत कर्मों के भोग से इस संसार का कोई प्राणी बच नहीं सकता ऐसा परमात्मा का अटल नियम है। इन प्रारब्धों में उपासना से आवश्यक सुधार तो अवश्य होता है पर हर व्यक्ति अपनी अल्प बुद्धि के कारण उसका अनुभव ठीक प्रकार नहीं कर सकता। जिसके आरम्भ में 10 मन कष्ट हैं उपासना से यदि उसमें से 5 मन कष्ट कम किया तो उस मनुष्य के लिए यह जानना कठिन है कि मेरा 5 मन कष्ट घटा या नहीं, वह तो सामने उपस्थित 5 मन कष्ट देखकर भी बहुत दुख मानता है और अपनी उपासना को व्यर्थ मानता है। कई बार तो वह यहाँ तक कह बैठता है कि यह 5 मन कष्ट उपासना के ही फलस्वरूप आया है, यदि उपासना न करता तो यह कष्ट क्यों आता? दूसरे उपासकों को अधिक लाभ और अपने को स्वल्प लाभ मिलते देख कर भी कई व्यक्तियों के मन में भी कई प्रकार के भ्रम होने लगते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि कभी तो उपासना का विशेष लाभ हुआ और कभी वैसे सत्परिणाम सामने न आ सके ऐसी अवस्था में साधक के मन में अनास्था उत्पन्न होने लगती है।
गायत्री उपासना का मूल एवं सुनिश्चित लाभ आत्म निर्माण, आत्म शुद्धि, एवं आत्म कल्याण है। पर मनुष्य इतना भौतिक, इतना बहिर्मुखी हो गया है कि हर काम में यहाँ तक कि उपासना जैसे विशुद्ध आत्म कल्याणकारी कर्त्तव्य को भी नैतिक लाभ के लिये ही करना चाहता है। पशु में लोभ और भय यह दो की भावना प्रधान होती है, बालबुद्धि का मनुष्य भी एक प्रकार का पशु ही है। उसे कुछ प्रलोभन देकर उपासना मार्ग पर अग्रसर करने के लिये भी ऋषियों ने प्रयत्न किया है। अनेक प्रकार के व्रत, तप, उपासना, अनुष्ठान, पूजन, स्त्रोत, पाठ, तीर्थ यात्रा, कथा श्रवण आदि के बड़े बड़े आकर्षक महात्म्य वर्णन किये हैं, बहुत बहुत लाभ बताये हैं, वो इसलिए कि लोभी मनुष्य कदाचित इसी बहाने उपासना पथ पर आकर्षित होकर आत्म कल्याण में लगे। ऋषियों को आशा थी कि थोड़ी दूर तक सकाम भावना से साधना पथ पर चलने के उपरान्त साधक वस्तुस्थिति को समझ लेगा और उपासना के भौतिक नहीं आध्यात्मिक लाभ को लेने के लिये तत्पर हो जायगा।
पर देखा गया है कि अब मनुष्य का दृष्टिकोण बहुत अधिक स्थूल भौतिक स्वार्थपूर्ण हो गया है। वह उपासना से केवल भौतिक लाभ प्राप्त करना चाहता है। जब तक वह लाभ रहता है तब तक प्रसन्न रहता है और जब उसमें कमी या देरी होने लगती है तो अधीर होकर पूजा पाठ छोड़ बैठता है। वह चाहता है कि कर्म फल, प्रारब्ध पूर्व जन्मों के सुकृत दुष्कृतों का परिपाक आदि के तथ्य तो एक ताक पर उठा कर रख दिये जायें और उपासना के थोड़े से प्रयत्न से उसे मनमानी मात्रा में लाभ प्राप्त होते रहें। यह इच्छा पूर्णतया सफल तभी हो सकती है जब पूर्व जन्मों के फलों की, प्रारब्धों की सनातन व्यवस्था संसार में से उठ जाय। उस उलझन को खो बैठते हैं और इस मार्ग से विमुख हो जाते हैं। गायत्री परिवार के जो सदस्य बनते हैं उनसे से कइयों की ऐसी ही स्थिति हो जाती है। अपने परिजनों के लिये हम भी यथा सम्भव सहयोग करते हैं, माता भी उन्हें सर्वथा निराश नहीं रहने देती। उनकी उपासना के श्रम के मूल से कहीं अधिक लाभ ये किसी न किसी प्रकार दे ही देती हैं, पर वे लोग जो-
पर्वत सम पातक करें, करें सुई को दान। ऊंचे चढ़ कर देखते, कितनी दूर विमान॥
थोड़ा सा पूजा पाठ करके पर्वत सदृश्य प्रारब्ध को टालना चाहते हैं, ‘कन’ देकर ‘मन’ माँगते हैं, सदा ही पूर्ण मनोरथ नहीं हो सकते। हर मनुष्य की हर कामना पूर्ण कर सकना गायत्री क्या-किसी भी देवता, मन्त्र, उपचार, सिद्ध पुरुष के बस की बात नहीं है। सुख और दुख के-हानि लाभ के ताने-बाने से मनुष्य का जीवन बुना हुआ है। यह धूप छाँह हर किसी के जीवन में आती जाती रहती हैं। एक ही प्रकार का समय सदा रहना कभी सम्भव नहीं। इन खट्टी मिट्ठी परिस्थितियों का जिस धैर्य, साहस, विवेक और पुरुषार्थ पूर्वक समाधान हो सकता है उन्हें प्राप्त करना ही उपासना का वास्तविक लाभ है।
एक कक्षा की पढ़ाई के बाद दूसरी कक्षा में चलना होता है, बालपन पूरा होने पर युवावस्था में प्रवेश करना होता है। साधना क्षेत्र के साधारण उपासकों को भी ऊंची कक्षा में चढ़ना चाहिये। सकाम उद्देश्यों तक सीमित रहने वाले उपासना के वास्तविक लाभ को प्राप्त नहीं कर सकते। भिखारी लोग किसी दानी के दरवाजे पर खड़े रहते हैं तो उनकी पात्रता और दानी की दया के अनुसार उन्हें यथा अवसर कुछ मिलता रहता है, पर भिखारियों की हर कामना को पूर्ण करना दानी का कर्त्तव्य नहीं है। भिखारियों की आवश्यकता का समाधान भी दान से नहीं हो सकता। प्रार्थना करने मात्र में जो लाभ प्राप्त होता है वह सीमित होता है। असीम लाभ का अधिकारी वही है जो दानी के साथ आत्म सम्बन्ध स्थापित करके अपने को उसका एक अंग बन लेता है। ऐसी दशा में ही उसे पूर्ण अधिकार प्राप्त हो सकता है। स्त्री अपने पति की और पुत्र अपने पिता की सम्पत्ति का अधिकारी इसी आधार पर होते हैं कि वह अपने को उस व्यक्ति की इच्छाओं और भावना के अनुसार ढाल कर अपने आपको उसका एक अंग बना लेते हैं। दूसरी श्रेणी के लोगों का भाव तथा कार्य भी यही होता है।
गायत्री उपासकों में आरम्भिक श्रेणी के लोगों की संख्या अधिक होती है। ये लोग लाभ होने पर उत्साहित और लाभ न होने पर निराश हो जाते हैं, भिखारियों की भीड़ दरवाजे पर से हट जाय इसमें ईश्वर को भी सन्तोष ही होता है। पर जो लोग ऊंची श्रेणी के होते हैं अपने भौतिक लाभों की याचना करना छोड़ कर माता पिता की इच्छा और आज्ञा के लिए आत्म समर्पण करते हैं वे उनकी वात्सल्य के सच्चे अधिकारी बनते हैं। ऐसे लोगों को पहला काम यही करना होता है कि माता के मिठाई खिलाने और आपरेशन के लिए डॉक्टर के पास ले जाने में समान रूप से दया, करुणा एवं वात्सल्य का अनुभव होता है वे दोनों ही स्थितियों में श्रद्धालु रहते हैं। अपने लिये कुछ भी-सुख भी-न माँगकर माता के चरणों पर उनके आदर्शों पर अपना जीवन उत्सर्ग कर देते हैं।
गायत्री परिवार के अनेक सदस्य हैं। इनमें से अनेक बालक्रीड़ा में रूठते-भटकते, हंसते-रोते रहते हैं। कुछ उत्साह दिखाते हैं कुछ निराश हो जाते हैं। इस श्रेणी से ऊंची श्रेणी के उपासकों की आवश्यकता है। अपने परिवार में से अब हम दूसरी श्रेणी के लोगों को ढूँढ़ना चाहते हैं। क्योंकि उन्हीं के ऊपर संसार का भविष्य बहुत कुछ निर्भर करेगा और वे ही इस महान शक्ति के वास्तविक लाभों से कुछ प्राप्त कर सकेंगे।
दूसरी ऊंची श्रेणी के लोग अपने किसी स्वार्थ की चिन्ता न करके माता को आत्म समर्पण कर देते हैं और उनके आदेशानुसार अपने जीवन को लगाते हैं। आज गायत्री माता की जानकारी लुप्त प्रायः हो गई है उसकी समुचित प्रतिष्ठा करके अनेक आत्माओं का कल्याण करना माता की सर्वोत्तम सेवा है। उन्होंने हमें भी ऐसा ही आदेश दिया है तद्नुसार एक निश्चित कार्यक्रम में हम लगे हुए हैं। इस दिशा में कन्धे से कन्धा लगा कर काम करने वाले ऐसे साथियों की आवश्यकता है जो दूसरी ऊंची कक्षा में महत्व को समझते हों या समझने में दिलचस्पी रखते हैं।
-आपत्तियाँ बहुधा आशीर्वाद होती हैं। जीती हुई कठिनाइयाँ न केवल हमें शिक्षा ही देती हैं, बल्कि वे प्रयत्नों में हमें साहसी बताती हैं।
-”क्या तुम्हें अपने जीवन से प्रेम हैं? तब समय को व्यर्थ नष्ट मत करो, क्योंकि जीवन उसी से बना है।”
-”जीवन का सबसे बड़ा पुरस्कार, जीवन की सबसे बड़ी दौलत समय है।”
-”संसार का संचालन करने के लिए हम बंधे हुए नहीं हैं, लेकिन ईश्वर ने हमारे लिए जो काम बताया है, उसे अपनी सारी शक्ति लगाकर पूरा करने के लिए हम बंधे हुए हैं।
-काम का चुनाव करते समय अपने हृदय से कभी मत पूछो कि कौन सा अव्यवसाय करके हम प्रसिद्धि या धन प्राप्त कर सकेंगे। उसी काम को चुनो जिसमें तुम अपनी मनुष्यता की सारी शक्ति लगा सकते हो और अपने को ऊंचा बना सकते हो। तुम्हारे लिए न तो धन की आवश्यकता है, न प्रसिद्धि की और न कीर्ति की-तुम्हें केवल महानता की जरूरत है।
-”यदि जीवन में बुद्धिमानी की कोई बात है तो वह एकाग्रता है, और यदि कोई खराब बात है तो वह है अपनी शक्तियों को बखेर देना। बहुचित्रता कैसी भी हो, इससे क्या? वह चीज अच्छी हैं जो सारे खिलवाड़ और क्रम की चीजों को दूर कर देती हैं और हमें हृदय से अपने काम करने के लिये भेजती हैं?”
-”जो व्यक्ति जीवन में केवल एक बात ढूँढ़ता है, वह आशा करता है कि जीवन समाप्त होने के पहले उसे वह प्राप्त हो जायगी।”
-” शिष्टाचार के द्वारा कोई भी मनुष्य संसार में अपनी उन्नति कर सकता है।”
-”तुम्हें क्या चाहिए? तुम्हें जो कुछ चाहिए उसे आनी मुस्कराहट से प्राप्त करो, न कि तलवार के जोर से? जीवन का तीन चौथाई अच्छा चाल चलन है।”
-”मनुष्य की सच्चाई का एकमात्र निर्णयात्मक प्रमाण यह है कि अपने सिद्धान्त के लिए वह अपना सब कुछ स्वाहा कर देने को तैयार रहे।”
-जब कभी आपको ऐसा मालूम हो कि चिन्ताजनक विचार आप पर अपना प्रभाव जमाना चाहते हैं, उदासी का आप पर आक्रमण होना चाहता है, तब आप स्थिर, शान्त ओर तन्मय होकर अपने हृदय केन्द्र से इस तरह के उद्गार निकालें मैं मनुष्य हूँ! मेरी आत्मा दिव्य है, निर्दोष है। अनन्त शक्तियाँ गुप्त रूप से उसमें विद्यमान है। वह सुख, शान्ति, आनन्द और पूर्णता का आगार है। भला ऐसी दशा में वहाँ दुःख, चिंता, रोग, शोक का क्या काम।”
-”यदि हम चाहते हैं कि हमारे मन मन्दिर से अंधकार निकल जाय तो हमें चाहिए कि अपने मन को प्रकाश से आलोकित कर लें। यदि हम चाहते हैं कि हमारे मन से विरोध भाव निकल जाये तो हमें चाहिये कि अपने मन को ऐक्य के विचारों से भर लें। यदि हम चाहते हैं कि हमारे मन से क्रूरता निकल जाय तो हमें चाहिये कि अपने मन को सौंदर्य के विचारों से पूर्ण कर लें।”
-”सारे विश्व में एक ही तत्व काम कर रहा है। एक ही जीवन, एक ही सत्य वर्तमान है। हम सब उस दैवी प्रभाव की ओर जा रहे हैं जो ईश्वर तक जाता है। इस तरह की मनोभावना रखने से हमें एक अलौकिक प्रोत्साहन प्राप्त हो जाता है, हमारे मन का भय नष्ट हो जाता है।”
-”यदि आप बड़े पदार्थों की आशा करते हैं और अपने मनोभावों को विशाल बनाये हुए हैं तो आपको बड़ी ही ऊँचे दर्जे की सफलता प्राप्त होगी।
आश्विन सुदी 1 से गायत्री तपोभूमि में गायत्री महापुरश्चरण तथा साँस्कृतिक शिक्षण शिविर का महत्वपूर्ण आयोजन बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से आरम्भ हो गया है। भारतवर्ष के कौने-कौने से धार्मिक प्रवृत्ति के सत्पुरुष इस यज्ञ में सम्मिलित होने के लिये आये हुए हैं। प्रातः 5॥ से 9॥ तक जप तथा यज्ञ 4 घण्टे चलता है। मध्याह्न को 2 से 6 बजे तक साँस्कृतिक शिक्षण शिविर की कक्षाएं चल रही हैं। प्रत्येक व्यक्ति 24 सहस्र का अनुष्ठान और उसका शताँश हवन करेगा। मार्जन, तर्पण आदि की शास्त्रोक्त विधि के अनुसार सब लोग अनुष्ठान कर रहे हैं। शिक्षण शिविर में दी हुई शिक्षाओं को हृदयंगम करने न करने की परीक्षा होंगी और उत्तीर्ण व्यक्तियों को साँस्कृतिक विश्व विद्यापीठ के प्रमाण पत्र दिये जावेंगे। इसी बीच में मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, गोवर्धन की तीर्थ यात्रा भी रखी गई है। 10 दिन में यह सूत्र ता0 6 अक्टूबर को समाप्त हो जायेगा। इसका पूरा विवरण अगले अंक में दिया जायेगा। क्योंकि यह अंक तैयार होते समय तक इस पुनीत आयोजन का आरम्भ ही हुआ है।
(श्री नवीन)
क्या कभी निरखा नहीं है, संचरण करते? अस्थि पन्जर को धरा पर निज चरण धरते?
अस्थि पन्जर वह कि जिसकी मुष्टिका भर अस्थि-
बन गई है इस धरित्री की चिरन्तन स्वस्ति,
अस्थि पन्जर वह कि जिसकी कण्ठ ध्वनि में अस्ति, सुन जिसे लज्जित हुई है अलज, उद्धत नास्ति,
इस अदेही को भवाम्बुधि-सन्तरण करते- क्या कभी निरखा नहीं निज संचरण करते?
एक निष्ठ, प्रतिष्ठ, अविचल एकरस, इक ध्यान, अनुच्छिष्टा, एक इष्टा, साधना, इक तान,
एक भाव विभूति जिसकी पूर्ण जन कल्यान, राग जिसके हो गये हैं सकल अन्तर्धान,
राम जिसके प्राण को क्षण-क्षण वरण करते, देख लो उस सन्त को जग में चरण धरते।
बचपन जिसके मन्त्र हैं है गान जिसका साम, करे अजपा जाप जिसके रोम आठों याम,
भू रहित को भूमि देना यही जिसका काम, जगत पूजित ऋषि बिनोवा है उसी का नाम,
मन्द्र जिसके बैन भारत का गगन भरते, निरख लो उस अस्थि पन्जर को चरण धरते।
“चरै वेति” संदेश लेकर यह चरण आये, चरण क्या ये युग युगों के आभरण आये,
कर्म कृति संन्यास का शुभ समन्वय लाये, जन गणों ने इन पदों में मुक्ति-कण पाये,
ये चरण आये तिमिर का आवरण हरते। ज्योति देते ये चरण हैं संचरण करते।
इस अभा में कहा जिसने, भस्म हो रे ध्वाँत। रक्त नख शार्दूल से बोला कि हो जा शान्त।
शिथिल पग जग से कहा जिसने कि उठ रे क्लाँत। बुद्धि से बोला कि री हो न अब उद्भ्रान्त।
देख लो उस सन्त को अब संचरण करते। अस्थि पंज को निहारो निज चरण धरते।
*समाप्त*