गत अंक में अश्विन के शिविर की चर्चा की जा चुकी है। जीवन को उत्तम बनाने वाले उपयोगी ज्ञान को अन्तःकरण में गहराई तक प्रवेश कराने के लिये यज्ञ, पुरश्चरण द्वारा आत्म शुद्धि के साथ-साथ ज्ञान का आदान-प्रदान किया जाय तो ऐसे ज्ञान को कार्य रूप में फलित होने की आशा की जा सकती है। नवरात्रि में अनेक व्यक्ति जप अनुष्ठान करते हैं। यदि वे गायत्री तपोभूमि के तीर्थ में किये जावें तो निश्चय ही उसका फल बहुत अधिक होता है। यज्ञ, अनुष्ठान और सत्संग का यह बहुत ही बहुमूल्य स्वर्ण सुयोग है। मथुरा, वृन्दावन, एवं गोवर्धन के दर्शनों के लिये भी कार्यक्रम रखा गया है। इस प्रकार एक उत्तम तीर्थ यात्रा भी हो जायेगी। जिन्हें अवकाश मिल सके उन्हें ऐसे अमूल्य अवसर पर आने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिये। इन दस दिनों का शक्ति संचय प्रायः एक वर्ष तक के लिये समुचित बल दे जाता है। मनुष्य सदा साँसारिक कार्यों में लगा रहता है। थोड़े दिन आत्म चिन्तन, तप, साधन, सत्संग, तीर्थ यात्रा जैसे सत्कार्यों के लिये भी अवश्य निकालना चाहिये। जिन्हें आना हो उन्हें पूर्व स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिये। क्योंकि एक सीमित संख्या में उतने ही व्यक्तियों को हम आने देते हैं जिनके साथ समुचित श्रम करना तथा ध्यान देना सम्भव हो सके। बड़ी भीड़ में सदा ही अव्यवस्था अधिक और लाभ कम होता है।
आश्विन सुदी 1 से लेकर आश्विन सुदी 10 तदनुसार ता0 27 सितम्बर चन्द्रावार से लेकर 6 अक्टूबर बुधवार तक दस दिन का गायत्री महापुराण, गायत्री महायज्ञ तथा साँस्कृतिक शिक्षण शिविर होगा। दस दिनों में सभी आगन्तुक एक-एक 24 हजार का लघु पुराण तथा जप का शताँश हवन करेंगे। प्रातः काल 6 बजे से 10 बजे तक जप तथा हवन का कार्यक्रम चला करेगा। सायंकाल 2 से 6 बजे तक साँस्कृतिक शिक्षण शिविर की क्रमबद्ध शिक्षा होगी। इस प्रकार 10 दिनों में दोनों ही महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न हो जावेंगे। आने वालों को ता0 26 सितम्बर रविवार की शाम तक मथुरा पहुँच जाना चाहिए। ताकि आश्विन सुदी 1 को प्रातःकाल से गायत्री महापुरश्चरण में सम्मिलित हो सकें।
ठहरने के लिए गायत्री तपोभूमि में स्थान है सभी लोग तपस्वी जीवन व्यतीत करेंगे। सामान्य तय दस दिन के लिये सात्विक भोजन की व्यवस्था की गई है। अन्न के सभी संस्कार ऐसे कराये जायेंगे कि वह फलाहार के सदृश्य सात्विक हो जाय। (10 दिन के लिये 10) भोजन व्यय लगेगा जो पहले ही जमा कर देना चाहिये, ताकि आवश्यक वस्तुएं खरीदने में सुविधा हो। जो लोग फल दूध आदि की अपनी व्यवस्था अलग से करना चाहें वे पहले ही इसकी सूचना दे दें, ताकि उनके लिए भोजन प्रबन्ध न किया जाय। सभी की पोशाक एक सी रहेंगी। धोती, कुर्ता तथा कन्धे पर पीले दुपट्टे। पजामा तथा पतलून पहनकर आना उचित न होगा। अपना पूरा बिस्तर तथा थाली, लोटा, कटोरी साथ लाना चाहिये। गायत्री तपोभूमि वृन्दावन रोड़ पर मथुरा से 1 मील पर है। इस शिविर में स्त्रियाँ भी आ सकती हैं पर जिनकी गोदी में बहुत छोटे बच्चे हैं उन्हें न आना चाहिये। क्योंकि बहुत छोटे बच्चों के रोने-धोने तथा टट्टी पेशाब करने से शुद्धता तथा व्यवस्था में गड़बड़ी फैलती है।
जीवन की सभी महत्वपूर्ण समस्याओं पर शिविर में क्रमबद्ध रूप से उच्चकोटि के प्रवचनों की व्यवस्था की जायेगी। जिनके आधार पर मनुष्य अपने जीवन का सर्वांगीण विकास करता हुआ सच्ची शान्ति का अधिकारी बन सके। शिक्षण शिविर के शिक्षा कार्य को भली भाँति हृदयंगम कराने के लिए परीक्षा की व्यवस्था भी रखी गई है। उत्तीर्ण होने वालों को साँस्कृतिक विश्व विद्यापीठ के बड़े साइज के तिरंगे छपे हुए सुन्दर प्रमाण पत्र भी दिये जायेंगे। जिनके यज्ञोपवीत न हुए हों उनके लिए बिना खर्च के यज्ञोपवीत संस्कार का यह सुअवसर है।
सस्ती, सुन्दर, उपयोगी एवं अनुभवपूर्ण, अपने ढंग की अनोखी पुस्तकें।
ये बाजारू किताबें नहीं हैं। इनकी एक-एक पंक्ति गहरे अनुभव और अनुसंधान के आधार पर लिखी गई हैं। इन पुस्तकों की उपयोगिता, सुन्दर और सस्तेपन की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही है। आप भी इन पुस्तकों को मँगाइए और पढ़कर लाभान्वित हूजिए।
बिगड़े हुए स्वास्थ को बनाने वाली पुस्तकें
(1) सूर्य चिकित्सा विज्ञान
(2) प्राण चिकित्सा विज्ञान
(3) स्वस्थ बनने की विद्या
(4) भोग में योग
(5) बुद्धि बढ़ाने के उपाय
(6) आसन और प्राणायाम
(7) तुलसी के अमृतोपम गुण
(8) महान जागरण
(9) तुम महान हो
(10) घरेलू चिकित्सा
(11) बिना औषधि के कायाकल्प
(12) पंचतत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण
(13) दीर्घ जीवन के रहस्य
(14) नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा
(15) रक्तदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा
(16) दूध की आश्चर्यजनक शक्ति
(17) उन्नति का मूल मन्त्र ब्रह्मचर्य
(18) उपवास के चमत्कार
(19) स्त्री रोग चिकित्सा
(20) बाल रोग चिकित्सा
(21) निरोग जीवन का राजमार्ग
(22) कब्ज की सरल चिकित्सा
(23) चिरस्थायी यौवन
(24) सौंदर्य बढ़ाने के ठोस उपाय
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें
(1) मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार
(2) धनवान बनने के गुप्त रहस्य
(3) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि
(4) मरने के बाद हमारा क्या होता है।
(5) मित्र भाव बढ़ाने की कला
(6) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान
(7) संजीवनी विद्या
(8) अमृत पारस और कल्प वृक्ष की प्राप्ति
(9) हमें स्वप्न क्यों दिखते हैं?
(10) विचार करने की कला
(11) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं?
(12) लेखन कला
(13) सफलता के तीन साधन
(14) शिक्षा और सूत्र की रहस्यमय विवेचना
(15) जिन्दगी कैसे जिएँ
(16) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान
(17) सौभाग्य बढ़ाने की कला
(18) अमृत कला
(19) प्रसिद्धि और समृद्धि
(20) हमारी पारिवारिक समस्याएँ
(21) जीवन संगीत
(22) मनचाही सन्तान
(23) दाम्पत्ति जीवन का स्वर्ग
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें
(1) ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?
(2) क्या धर्म? क्या अधर्म?
(3) गहना कर्मणो गति
(4) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश
(5) शास्त्र मंथन का नवनीत
(6) शक्ति संचय के पथ पर
(7) आत्म गौरव की साधना
(8) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान
(9) आँतरिक उल्लास का विकास
(10) आगे बढ़ने की तैयारी
(11) आध्यात्म धर्म का अवलम्बन
(12) ब्रह्मविद्या का रहस्योद्घाटन
(13) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग
(14) विवेक सत्सई
(15) आध्यात्मिक विद्या का प्रवेश द्वार
(16) प्रेम का रहस्य
(17) भारतीय संस्कृति का बीजमंत्र यज्ञोपवीत
(18) यज्ञोपवीत द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति
(19) दैनिक जीवन में मनोवैज्ञानिक के प्रयोग
(20) हमारे आँतरिक शत्रु
(21) हँसी-खुशी का जीवन
(22) क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें
(1) मैं क्या हूँ?
(2) परकाया प्रवेश
(3) स्वर योग के दिव्य ज्ञान
(4) जीव जन्तुओं की मूक भाषा
(5) वशीकरण की सच्ची सिद्धि
(6) ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग
(7) यम नियम
(8) प्रत्याहार धारणा ध्यान और समाधि
(9) मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा
(10) हस्तरेखा विज्ञान
(11) गृहस्थ योग
(12) प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार
(13) विचार संचालन विद्या
(14) सुखी वृद्धावस्था
(15) आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग
(16) प्रत्यक्ष फल दायिनी साधनाएँ
(17 योग के नाम पर मायाचार
(18) जादूगरी का छल
(19) सम्मोहन विज्ञान
(20) चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग
(21) मधुर सम्बन्धों का रहस्य
(22) हमारी सभ्यता के फल
गायत्री विद्या के अनुपम ग्रन्थ रत्न
(1) गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग)
(2) गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग)
(3) गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग)
(4) गायत्री यज्ञ विज्ञान
(5) गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार
(6) सचित्र गायत्री शिक्षा
(7) गायत्री चित्रावली
(8) गायत्री का मन्त्रार्थ
(9) गायत्री सहस्रनाम
(10) गायत्री का वैज्ञानिक आधार
(11) गायत्री ही कामधेनु है।
(12) वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री
(13) गायत्री के सर्वसुलभ साधना
(14) गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग)
(15) गायत्री के चौदह रत्न (द्वितीय भाग)
(16) अनादि गुरु मंत्र गायत्री
(17) विपत्ति निवारिणी गायत्री
(18) स्त्रियों का गायत्री अधिकार
(19) सचित्र गायत्री
(20) गायत्री हवन विधि
(गायत्री चालीसा और गायत्री का तिरंगा चित्र)
पुस्तकें मंगाने के नियम
1- छः रुपये से कम मूल्य की पुस्तकें होने पर डाक खर्च मँगाने वाले के जिम्मे होगा।
2- छः रुपये या इससे अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च हम अपना लगा देते हैं। इसलिए मँगाने वाले का लाभ इसी में है कि वे कम से कम छः रुपये की पुस्तकें मँगाये।
3- तीन रुपये से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती।
4- हमारी पुस्तकें इतनी सस्ती हैं कि उन पर ग्राहकों को कोई कमीशन नहीं दिया जा सकता। कमीशन का कम मूल्य पर पुस्तकें लेने के लिए लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
वर्ष-14 संपादक-श्री राम शर्मा, आचार्य अंक-9
(श्री भगवती प्रसाद वाजपेयी)
जग रे, जीवन के राग जाग, प्राणों की धूमिल आग जाग!
जो गिरते-गिरते उठ न सके, जो रोते-रोते हँस न सके, उन मरणशील इतिहासों के- उपवन के सुगम पराग जाग!
जग रे, जीवन के राग जाग! प्राणों की धूमिल आग जाग!!
अन्तः निःसृत निःश्वासों में- अपमान भरे उपहासों में- जिनका अणु-अणु हो गया भस्म, उनके संस्मरण विहाग जाग!
जग रे, जीवन के राग जाग, प्राणों की धूमिल आग जाग!!
पीड़ित जन की परवशता में, शोषित दल की दुर्बलता में, जो चिनगारियाँ सुषुप्त रहीं- उनकी लपटों के नाग जाग!
जग रे, जीवन के राग जाग, प्राणों की धूमिल आग जाग!!
संसार में अनेक संस्कृतियाँ हैं और उनके पीछे विशेष आदर्श, सिद्धान्त मनोभाव एवं कार्यक्रम छिपे होते हैं। मनुष्य का मानसिक स्तर प्रायः सामने उपस्थित संस्कृतियों में से ही किसी को अपनाता है। तद्नुसार उसके विचार एवं मनोभाव उस ढांचे में ढलने लगते हैं, उसके कार्य भी वैसे ही होने लगते हैं।
अभी इसी मास दिल्ली में एक पादरी ने ईसाई धर्म को छोड़कर हिन्दू धर्म में प्रवेश किया है। यह सज्जन जन्मतः भारतीय है। पर बहुत वर्षों से ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे थे। उन्होंने इस धर्म परिवर्तन का कारण बताते हुये कहा है कि मैंने अपने लम्बे अनुभव काल में यह भली प्रकार देख लिया कि ईसाई होने के बाद मनुष्य की मनोभावना किसी अन्य देश के साथ जुड़ जाती है। और वह उसी के रंग में रंग जाता है। यहाँ के अनेकों मुसलमानों का उदाहरण स्पष्ट है। वे अपनी जन्मभूमि की परवाह नहीं करते, अपने पूर्वजों का आदर नहीं करते, अपने देश के महानुभावों से उन्हें कोई प्रेम नहीं, मक्का इस्लाम मुस्लिम देश, अरबी फारसी लिपि तथा इन्हीं देशों के वीर पुरुषों एवं भाषाओं से उनका मानसिक सम्बन्ध जुड़ा रहता है फलस्वरूप ये लोकाचार की दृष्टि से भारतीय रहते हुए भी मानसिक दृष्टि से विदेशी बन जाते हैं। यह बात किसी विशेष पर लाँछन लगाने के लिए नहीं कही है। यह तो एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है जो ऐसी स्थिति होने पर सभी पर लागू होता है।
इस तथ्य को अंग्रेज मनोवैज्ञानिक भली प्रकार जानते थे। वे अधिक विद्वान थे, इसलिए उन्होंने मध्यकाल के मुसलमानों शासकों की तरह बलपूर्वक कर्म परिवर्तन की नीति को न अपनाकर पीछे की खिड़की से होकर प्रवेश किया उन्होंने वह नीति अपनाई कि धर्म चाहे कोई भी रहे पर संस्कृति हमारी चले। लार्ड मैकाले प्रभृति चतुर व्यक्तियों ने अपनी सारी बुद्धिमत्ता खर्च करके स्कूलों, कालेजों दफ्तरों राज दरबारों तथा अनेक द्वारों से यह प्रयत्न किया कि यहाँ के निवासी हमारी संस्कृति अपना लें तो हमारे सजातीय हो जायेंगे। जन्म से वे भारतीय रहे पर मस्तिष्क में अंग्रेज ही होंगे। काले अंग्रेज पैदा करने की उनकी योजना प्रसिद्ध है। उनकी दूरदर्शिता की प्रशंसा करनी पड़ती है कि वे इस सम्बन्ध में शत-प्रतिशत सफल रहे। अंग्रेज हिन्दुस्तान छोड़ कर चले गये अंग्रेजियत को रत्ती भर भी क्षति नहीं पहुँची, सच तो यह है कि वह इन दिनों और अधिक बढ़ी है। साहसी ठाठ-वाट, रहन-सहन, तरीके तहजीब तेजी से फैलते जा रहे हैं।
हमारा किसी संस्कृति से द्वेष नहीं है। अच्छी बातें सभी से सीखनी चाहिए और बुरी बातें चाहे वे अपनी या परम्परागत ही क्यों न हों छोड़ने को सदैव तत्पर रहना चाहिये। विवेकशील व्यक्तियों के लिए यही मार्ग उचित है। यदि इस कसौटी पर कस कर भारतीय आदर्शों और जीवन यापन की पद्धतियों का परित्याग किया जाता तो हमें प्रसन्नता होती पर वस्तुतः ऐसा हो नहीं रहा है। जिस प्रकार अनेक अन्धविश्वास, भ्रम, पाखण्ड, व्यसन एवं दुर्गुणों को मनुष्य अनजाने ही वातावरण के प्रभाव से अपना लेता है उसी प्रकार विदेशी संस्कृति को भी हमने अपना लिया है। इस ‘स्व’ त्याग और ‘पर’ ग्रहण का प्रसाद यदि केवल बोल-चाल, पहनाव उढ़ाव, खान-पान, वेश विन्यास, रहन-सहन तक ही प्रभाव रहता तो कोई विशेष हानि न थी पर ऐसा हो सकना सम्भव नहीं है क्योंकि आचार और विचार आपस में अत्यन्त घनिष्ठ रूप से जुड़े हुए हैं। जिस प्रकार मुसलमानी पोशाक, भाषा, रीतिरिवाज, खान-पान अपना लेने पर मस्तिष्क पर भी मुसलमानी आदर्श जम ही जाते हैं उसी प्रकार अंग्रेजियत हमारे व्यवहार में गहरी घुस जाय तो मस्तिष्क में स्वार्थ तो भारतीय रह सकते हैं पर आदर्शों का रह सकना सम्भव नहीं है।
पाश्चात्य देशों में अनेक अच्छाइयाँ हैं। उनकी परिश्रम शीलता, कार्य कुशलता, साहस, नियमितता, देशभक्ति, शिष्टाचार आदि प्रशंसनीय हैं, यह बातें ऐसी हैं जो उनसे हमें सीखनी चाहिए पर कुछ बातें उनमें ऐसी भी हैं जो उनके लिए गले का सर्प बनी हुई हैं ओर जो कोई उन बातों को ग्रहण करेगा वह भी उसी नागपाश में बँध कर अपनी दुर्गति करावेगा। भोगवाद, भौतिकवाद उनका प्रधान दृष्टिकोण है। इसी कमजोरी के कारण उनमें अनेक कठिनाइयाँ उत्पन्न हो गई हैं उदाहरण के लिए दाम्पत्ति जीवन बिल्कुल अस्त-व्यस्त हो रहा है। रूप और भोग के प्यासे स्त्री-पुरुष हर मौसम के लिए नया जोड़ा ढूँढ़ने और पुराने को छोड़ने की तैयारी में लगे रहते हैं। फलस्वरूप पति-पत्नी में से किसी को किसी पर विश्वास नहीं होता और वे एक दूसरे का सच्चा या आजीवन साथी नहीं बन सकते हैं। इस इन्द्रिय लोलुपता, रूप पिपासा ने उनका दाम्पत्ति जीवन ही नहीं पारिवारिक जीवन भी अस्त-व्यस्त कर दिया है। माँ-बाप और बेटे-बेटी में भी कोई वास्तविक या ठोस सम्बन्ध नहीं रह गये हैं। इसी प्रकार अपनी विलासिता की खर्चीली आवश्यकताएँ बहुत बढ़ा लेने से उन्हें दूसरे व्यक्तियों या देशों का शोषण करना पड़ता है। पूँजीवाद, साम्राज्यवाद, उपनिवेशवाद उसी के फलस्वरूप पैदा हुए हैं। विज्ञान और उत्पादन में उन्होंने बहुत उन्नति की है पर उनकी यह खर्चीली विलासिता भौतिकवादी दृष्टि उस उन्नति से किसी को लाभ पहुँचाने के स्थान पर संसार भर के बनी हुई है। पिछले 40 वर्षों से युद्धों के ही षड़यन्त्र चल रहे हैं करोड़ों आदमी गाजर मूली की तरह कट चुके और अब तो अणुबम इस धरती को ही प्राणी रहित बना डालने को तुले हुए हैं।
पाश्चात्य संस्कृति और भारतीय संस्कृति का यही अन्तर है। प्रत्येक संस्कृति में एक आदर्श छिपा होता है और उस आदर्श की दिशा में अग्रसर करने वाले आचार व्यवहार उसी के साथ जुड़े रहते हैं। यही सब मिलकर संस्कृति बनती है। भारतीय संस्कृति में दाम्पत्ति जीवन इन्द्रिय लिप्सा व रूप सौंदर्य पर आधारित नहीं है वरन् दो आत्माओं का एक आध्यात्मिक मिलन है जिसमें स्त्री-पुरुष इतने अनन्य होकर एक दूसरे से मिलते हैं कि इस जीवन में एक दूसरे को छोड़ने की तो कल्पना भी नहीं करते वरन् स्वर्ग में फिर मिलने की कामना करते हैं। भारतीय ललनाओं के सतीत्व का इतिहास स्वर्णाक्षरों में जगमगा रहा है। यहाँ ललनाएँ पतियों के प्रति अपनी वफादारी के प्रमाण स्वरूप अपने प्राणों को तिनके की तरह त्याग देने में प्रसन्नता अनुभव करती रही हैं। यहाँ के पुत्र अपने माता-पिताओं को कन्धे पर काँवर में बिठाकर तीर्थ यात्रा कराते रहे हैं, चौदह वर्ष का वनवास भोगते रहे हैं, अपनी युवावस्था पिताओं को दान करते रहे हैं, जीवन भर ब्रह्मचारी रहने का व्रत लेने में भी संकोच नहीं करते रहे हैं। जीवित अवस्था तक ही पितृ भक्त रहे सो बात नहीं, पीड़ितों तक उन्हें पिण्डदान और तर्पण से सन्तुष्ट करते रहने के लिए उद्यत रहते रहे हैं। एक भाई को दूसरे भाई के लिए क्या करना चाहिए इसके उदाहरण यहाँ जैसे अन्यत्र प्राणियों तथा जीव जन्तुओं के प्रति क्या कर्त्तव्य है इसका परम उदार आदर्श हमारी संस्कृति में ओत-प्रोत हो रहा है। इसी का परिणाम है कि यह देश अनादि काल से समस्त संसार का नैतिक पथ प्रदर्शन करता रहा है।
भारतीय संस्कृति की आत्मा त्याग, तप, संयम, सेवा, कृतज्ञता, उदारता के सिद्धान्तों से परिपूर्ण है। उन्हीं सिद्धान्तों से प्रेरित होकर यहाँ आत्म त्यागी ऋषि उत्पन्न होते रहे, सतियाँ और पतिव्रताएं अपने उदाहरण उपस्थित करती रहीं समाज सेवी और धर्म कर्त्तव्यों के लिये प्राण देने वाले सद्गृहस्थ घर-घर में होते रहे। पृथ्वी के चक्रवर्ती शासन रहे। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी भर के राजाओं को जीता एक चप्पा जमीन भी अपने लिये न रखी। राम ने सोने की लंका जीती पर वहाँ से घर के लिए एक लोहे की कील भी साथ न लाये। ऐसे उज्ज्वल चरित्रों से भारतीय इतिहास का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है।
कारण यही है कि आर्य सिद्धान्तों को व्यवहारिक जीवन में कूट-कूट कर भर देने के लिये जो रीति-रिवाज, आचार-विचार, संस्कार आदि की व्यवस्था थी उस पर सब लोग स्वभावतः चलते रहते थे, फलस्वरूप व्यक्तियों का निर्माण ऐसा ही होता था जिससे वे महापुरुष सिद्ध होते। यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है।
पाश्चात्य संस्कृति भोग संचय, स्वामित्व, ऐश आदि ऐहिक सुख साधनों पर अवलम्बित होने से उसके रीति-रिवाज व्यवहार आदि भी वैसे ही हैं और उस ढांचे में मनुष्य ढालना भी वैसा ही है। हमारे शासक अपने को गाँधी जी का अनुयायी कहते हुए नहीं थकते पर जिस वातावरण में उनके मस्तिष्कों का निर्माण हुआ है वह खद्दर में लिपट जाने पर भी बदलता नहीं। राष्ट्र भाषा का प्रश्न गौवध, विदेशी शराबों, सिगरेटों तथा अनेक विलासिता की वस्तुओं का द्रुतगति से आयात, मिनिस्टरों के ऊँचे वेतन, छोटी-छोटी बातों पर गोलीकाण्ड, गुंडों को निडर बनाने वाले लुँज-पुँज कानून, शासन यन्त्र में भ्रष्टाचार आदि अनेक बातें आज भी ऐसी हैं जो भारतीय दृष्टिकोण एवं परम्पराओं के अनुकूल नहीं बैठतीं फिर भी चूंकि अंग्रेजियत के अनुसार वे ठीक हैं इसलिए चल रही हैं। चाणक्य जैसे कुटियाओं में रहने वाले, जनक जैसे खेत करके पेट भरने वाले, विक्रमादित्य जैसे वेश बदलकर घर-घर जाकर प्रजा का सुख-दुख पूछने वाले, प्रजा की इच्छा पर पत्नी को त्याग देने वाले शासक यदि आज रहे होते तो भारत का निर्माण दूसरे ही ढंग से हुआ होता। आज तो लड़के और लड़कियाँ जो कुछ पढ़ते हैं उनसे अधिक वहाँ के वातावरण के कारण वे विदेशी संस्कृति में अपने को ढालते हैं। जूलियस, हेमलेट आदि के नाटकों में जो कुछ उन्हें मिलता है वह ही उनके जीवन में परिलक्षित होता है। प्राचीन परम्पराओं, भावनाओं, मान्यताओं में जो आत्मगौरव की भावनाएं भरी हुई थीं, अनेक पूर्वजों के प्रति जो मान था, धर्म ग्रन्थों और आचार संहिताओं में जीवन को महान बनाने वाले जो तथ्य भरे हुए थे वे आज उपेक्षित और तिरस्कृत हो रहे हैं। भारतीय ढंग का खान-पान, आहार-विहार, रहन-सहन, वेषभूषा, भाषा यह सब बातें तो गंवार बेवकूफी, ढोंग, मूढ़ विश्वास, सड़े दिमागों की उपज समझी जाती हैं। ‘स्व’ को लोग भूलते जा रहे हैं, हमारे पूर्वज जंगली थे, बन्दर की औलाद थे, वेद मध्य एशिया से यहाँ हमलावरों की तरह आये थे, वेद गड़रियों के गीत हैं, आदि मान्यताएं उन्हें अपने मन से घृणा करती हैं, साहबी ठाट-बाट आचार व्यवहार उन्हें बड़ा अच्छा लगता है क्योंकि वह आधुनिक है, सुधरा हुआ है।
हम छोटी बातों पर उलझने वाले नहीं हैं। हमारी दृष्टि एक ही मूल तथ्य पर टिकी हुई है। जीवन के दो दृष्टिकोण जहाँ से आरम्भ होते हैं वही स्थल विचारणीय है। श्रेय और प्रेय, त्याग ओर भोग यह दो विरोधी तत्व इस संसार में हैं और इन दोनों के विपरीत ही परिणाम हैं। एक का परिणाम है-परस्पर सौहार्द, प्रेम, सेवा, सहायता, मैत्री, शान्ति, दीर्घायु, श्री, सद्बुद्धि, सादगी, सद्गति। दूसरी का परिणाम है-अतृप्त वासना, अशान्ति, कलह, द्वेष, उत्पीड़न, दारिद्र, रोग, युद्ध, कृत्रिमता, दुर्गति। इन दोनों संस्कृतियों का आदि अन्त इसी प्रकार है। इन सड़कों पर जो मील के पत्थर लगे हुए हैं उन्हें व्यवहारिक रीति-नीति से समझा जा सकता है। श्रेय प्रधान संस्कृति को अपनाने वाला व्यक्ति दिन-दिन अधिक सात्विक भोजन की खोज करेगा, वेष-भूषा में सादगी लावेगा, ऋषि प्रणीत अप्राप्त वचनों का अधिक मनन करेगा और दैनिक कार्यक्रम में उन क्रियाओं का अधिक उपयोग करेगा जो अन्तःकरण पर श्रेयष्कर संस्कारों की छाप डालती हैं। इसके विपरीत प्रेम प्रधान भौतिक संस्कृति पर आस्था रखने वाला दिन-दिन अधिक तामसिक आहार ढूँढ़ता जायेगा, माँस, मछली, अण्डे, मदिरा, तमाखू, मिर्च, मसाले, प्याज, लहसुन जैसी तामसिक वस्तुओं की ओर उसकी रुचि बढ़ेगी। नाच तमाशे, व्यभिचार, चटोरापन, गपशप, निन्दा, चुगली, ताश शतरंज, जैसे विषयों में मन लगा रहेगा। अपनी प्रभुता, सत्ता विशेषता, बड़प्पन सिद्ध करने लोगों को अपना वशवर्ती करने के लिये अपव्यय, दर्प, अहंकार, ऐंठ, कटुभाषण, निन्दा, चुगली, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, युद्ध उत्पीड़न, छल, षड़यन्त्र आदि का आश्रय लेगा। इन सब बातों की उलझन उसके मस्तिष्क में इतनी भरी रहेगी कि जीवन का महत्व, मनुष्य जन्म की जिम्मेदारी, इंसानियत के कर्त्तव्य, आत्म चिन्तन, परमार्थ, आदि बातों की ओर उसका मन ही न चलेगा। कुछ इच्छा भी उठी तो जरा सी कठिनाई आते ही वह समाप्त हो जायेगी।
यह दो संस्कृतियाँ जीवन की दो दिशाएं हैं। लोग इन्हीं में से एक को पकड़ते हैं और उन्हीं के अनुसार फल भोगते हैं। आज अधिकाँश व्यक्ति भोगवादी भौतिक संस्कृति को अपना रहे हैं। उसी आधार पर अपना फैशन, बोलचाल, रहन-सहन, रीति रिवाज, आचार विचार अपना रहे हैं। तद्नुसार परिणाम भी सामने हैं। दाम्पत्ति प्रेम और सम्मिलित परिवार प्रणाली अब लुँज पुँज हो चुकी है। विवाह के लिए जहाँ पहले शीलवती कुल कन्याएँ ढूँढ़ी जाती थीं, वहाँ अब लड़के रंग, रूप, लावण्य, हावभाव, वेश विन्यास, नाच गान आदि के आधार पर वधुएँ ढूँढ़ते हैं। लड़कियाँ भी इस दिशा में तेजी से अग्रसर हो रही हैं। इस प्रकार यहाँ भी योरोप जैसी पारिवारिक व्यवस्था होती जा रही है। कौटुम्बिक उत्तरदायित्व जो इस देश का प्रधान आचार था। अब सबके मन में से लुप्त प्रायः होता जा रहा है। व्यापारी, मजदूर, पुरोहित, डॉक्टर, वकील, अध्यापक, शासक, नेता आदि सभी वर्ग अपने-अपने कर्त्तव्य धर्मों की अपेक्षा व्यक्तिगत स्वार्थ साधन को महत्व देने लगे हैं। इस भौतिकता प्रधान दृष्टिकोण के कारण राष्ट्र निर्माण की सभी योजनाएँ व्यर्थ होती चली जा रही हैं। जब तक छलनी में यह छेद रहेंगे तब तक उसमें कितना ही दूध डाला जाय कुछ भी लाभ न होगा।
व्यक्तिगत उन्नति तथा सुशांति तथा सामाजिक स्थिरता तथा सुव्यवस्था के लिए अन्ततः श्रेय प्रधान-त्यागमयी भारतीय संस्कृति की ही आवश्यकता पड़ेगी। जब भौतिक तृष्णाओं से पीड़ित दुनिया थकान और पीड़ा से चूर हो जायेगी तब उसके लिए अन्ततः एक मात्र यही आश्रय होगा। भौतिकता बढ़ती रही तो मनुष्य जाति का ही नहीं इस पृथ्वी गृह का भी अणु परमाणुओं के संघर्ष से नष्ट होना निश्चित है। मनुष्य को चाहे आज चाहे कल अपनी सुख शान्ति की रक्षा के लिये उन्हीं आदर्शों को अपनाना पड़ेगा, जिनको सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने हजारों वर्षों के तप तथा विचार द्वारा निर्धारित किया था। उन आदर्शों को एक दिन में एक दम कोई अपनी आदत में शामिल नहीं कर सकता। उन्हें स्वभाव रूप में अभ्यस्त में बन लेने के लिये जिन-जिन उपचारों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें ही साँस्कृतिक आचार कहते हैं। उनकी महत्ता को समझना, स्वीकार करना तथा आचरण में लाना-यही हमारे लिए सब प्रकार श्रेयस्कर कर्त्तव्य है।
धर्म, शिक्षा, न्याय, सभ्यता, विज्ञान कला आदि मानव जीवन की आवश्यक प्रवृत्तियों की जन्मभूमि यह भारत भूमि है। ज्ञान विज्ञान का सर्वप्रथम उद्भव यहाँ से हुआ है। ऋग्वेद संसार की आदि पुस्तक मानी जाती है। समस्त भूमण्डल के लिए ज्ञान विज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करने और फैलाने वाला यह भारत ही है। पशु को मनुष्य बनाने वाली जिस सभ्यता और संस्कृति का उद्भव यहाँ हुआ। वह किसी देश, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग या समाज के लिए नहीं, वरन् समस्त संसार के लिए है। भारतीय सभ्यता-मानवता की, समस्त मनुष्य जाति की अत्यन्त ही विवेक एवं दूरदर्शिता से भरी हुई जीवन पद्धति है। इसे अपनाने पर मनुष्य अगणित प्रकार की असुविधाओं, विकृतियों, और बुराइयों से बच कर सुख, समृद्धि, सफलता और सद्गति का अधिकारी बनता है। तत्वदर्शी ऋषियों ने इसी दृष्टि से अनेक प्रकार के आदर्श, नियम, प्रतिबन्ध, रीति रिवाज, आचार विचार विनिर्मित किये थे। इनमें अन्धविश्वास या मूढ़ परम्परा के लिए रत्ती भर भी स्थान नहीं है। यह समस्त साँस्कृतिक ढांचा मानव जाति के कल्याण को ध्यान में रखकर ही खड़ा किया गया है। इसकी एक-एक ईंट विज्ञान, तत्वज्ञान और दूरदर्शिता से परिपूर्ण है।
आदर्श सिद्धान्त और मान्यताएं जो भारतीय संस्कृति में है वे मनुष्य के लक्ष्य, उद्देश्य और कार्य क्रम को देवत्व की ओर ले जाने वाली हैं। उन्हें अपना लेने के बाद मनुष्य ऊँचा ही उठता है नीचे नहीं गिरता। इस सर्वांगीण उत्कर्ष को चारों ओर से मजबूत बनाने, प्रोत्साहित करने के लिए लोकाचार के अनेकों समाजिक कार्यक्रम, विधान एवं व्यवहार बनाये गये हैं। इनका प्रयोजन भौतिक विज्ञान एवं मनोविज्ञान के आधार पर मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव, विचार एवं आचरण को देवत्व की ओर अग्रसर करना है। ऊँचे आदर्श और जीवनयापन के प्रभावशाली तरीके इन दोनों का सम्मिश्रण ही मनुष्य को महानता की ओर ले जाता है। ऋषियों ने ऐसी ही व्यवस्था बनायी थी और उसी के आधार पर तुच्छ मानव प्राणी को महापुरुष के उच्च स्थान तक ले जाने में वे सफल हुए थे। इस प्रयोग का नाम ही भारतीय संस्कृति है।
जब भारतीय संस्कृति का लोग महत्व समझते थे, उस पर विश्वास करते थे, उसको आचरण में लाते हुए अपना गौरव समझते थे, तब इस देश में घर-घर महापुरुष उत्पन्न होते थे। भौतिक समृद्धि और सामाजिक सुख शान्ति की कमी न थी। इस संस्कृति के ढांचे में ढले हुए नर रत्न अपने प्रकाश से समस्त संसार में प्रकाश उत्पन्न करते थे और उसी आकर्षण के कारण विश्व की जनता उन्हें जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं भू सुर-पृथ्वी के देवता मानती थी। यह देश स्वर्ग की अपेक्षा भी श्रेष्ठ समझा जाता था। अतीत का इतिहास इस तथ्य का मुक्त कण्ठ से उद्घोष कर रहा है।
भारतीय संस्कृति के प्रभाव से प्रभावित प्रत्येक परिवार में स्वर्गीय शान्ति एवं सद्भावनाओं का निवास रहता था। पिता और पुत्र के बीच कैसे सम्बन्ध थे इसका उदाहरण देखना हो तो विमाता की आज्ञा से 14 वर्ष के लिए वनवास जाने वाले राम, अन्धे माता पिता को कन्धे पर काँवर में बिठाकर तीर्थ यात्रा कराने वाले श्रवण कुमार, पिता के दान करने पर यमपुर खुशी से प्रस्थान करने वाले नचिकेता का चरित्र पढ़ लेना चाहिये। भाई का भाई के प्रति क्या कर्त्तव्य है इसकी झाँकी राम, लक्ष्मण और भरत का चरित्र पढ़ लेने से सहज ही हो जाती है। कौरवों को जब यक्षों ने बन्दी बना लिया तो युधिष्ठिर ने भ्रातृ प्रेम के वशीभूत होकर उन्हें छुड़वाया। पुष्कर के दुर्व्यवहार को भुलाकर नल ने अपने भाई को क्षमा ही कर दिया। ऐसे भ्रातृ प्रेम के उदाहरण पग-पग पर मिलेंगे। सच्चे मित्र कैसे होते हैं, यह कृष्ण ने सुदामा और अर्जुन के साथ अपना कर्त्तव्य पालन करके दिखाया था।
पति पत्नी के बीच कैसे सम्बन्ध होने चाहिए इसके उदाहरण पत्निव्रती पुरुष और पतिव्रता नारियों के पग-पग पर उपस्थित किये हैं। सीता, सावित्री, शैव्या, दमयन्ती, गाँधारी, अनुसूया, सुकन्या आदि की कथाएँ घर-घर गाई जाती हैं। पर स्त्री को माता एवं पुत्री समझने वाले भी सभी कोई थे। शिवाजी द्वारा, यवन कन्या को सुरक्षित रूप से सम्मानपूर्वक राजमहल में पहुँचा देना, अर्जुन का उर्वशी को लौटा देना, कच का रूपगर्विता देवयानी का प्रस्ताव अस्वीकार करना, सूर्पणखा का लक्ष्मण द्वारा उपहास करना जैसे अखण्ड ब्रह्मचारी प्रचुर संख्या में परिलक्षित होते थे।
अतिथि सत्कार के लिए मोरध्वज का अपना पुत्र दे देना, भूखे बहेलिये के लिये कबूतर कबूतरी को अपना शरीर दे देना, दुर्भिक्ष पीड़ित समय में अनेक दिनों से भूखे ब्राह्मण परिवार का अपनी थाली की रोटियां चाण्डाल को दे देना आदि अनेकों वृत्तांत महाभारत में देखे जाते सकते हैं। शरणागत कबूतर की रक्षा के लिये राजा शिवि ने अपना माँस काट कर दे दिया था। कुन्ती ने ब्राह्मण कुमार के बदले अपने पुत्र भीम को राक्षस का आहार बनने के लिये भेजा था।
अपने स्वार्थ, सुख-साधन, धन सम्पदा संग्रह, ऐश आराम को लात मार कर अपनी आत्मा का कल्याण करने के निमित्त लोक सेवा और परमार्थ में जीवन व्यतीत करने में यहाँ के लोग अपने जीवन की फलता मानते रहे हैं। गौतम बुद्ध अपने राजपाट और सुख सौभाग्य को छोड़कर हिंसा और अज्ञान में डूबे हुए संसार को दया और आत्म ज्ञान की शिक्षा देने के लिए निकल पड़े। महावीर ने लालची और विषयासक्त दुनिया को त्याग और संयम का पाठ पढ़ाने के लिए अपना जीवन उत्सर्ग किया। भागीरथ ने राज सुख को छोड़कर दीर्घकाल तक कठोर तप किया और प्यासी पृथ्वी को तृप्त करने के लिए तरण तारणी गंगा का अवतरण कराने का महान कार्य सम्पादन किया। नारदजी कुछ घड़ी भी एक स्थान पर न ठहर कर आत्म ज्ञान का प्रसार करने के लिए हर घड़ी पर्यटन करते रहते थे, व्यास जी ने संसार को धर्मज्ञान देने कि लिए अष्टादश पुराणों की रचना की। आदि कवि वाल्मीकि ने रामायण की रचना करके मानव जाति को कर्त्तव्य पथ पर चलने के लिए अग्रसर किया। चरक, सुश्रुत, बाणभट्ट, धन्वन्तरि, प्रभृत ऋषियों ने जीवन भर जड़ी बूटियों, धातुओं, विषों आदि का अन्वेषण करके रोगग्रस्त पीड़ितों का दुख करने के लिए सर्वांगपूर्ण चिकित्सा शास्त्र का आविर्भाव किया। ज्योतिष विद्या की महान खोज, आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों की गतिविधियों और उनका मनुष्य जाति पर जो प्रभाव पड़ता है उसकी खोज करने वाले वे ऋषि ही थे। सूर्य सिद्धान्त, मरकन्द, प्रह्लाद आदि को देखने से आश्चर्य होता है कि उस समय बिना वैज्ञानिक यन्त्रों के इस प्रकार की शोध करके संसार को महान ज्ञान देने के लिए उन्हें कितना श्रम करना पड़ता होगा।
सदा अपने को तप से तप्त करके अपनी महान सेवाएँ विश्व मानव के उत्कर्ष में लगाने वाले ऋषियों की जीवनियाँ पढ़ने पर मनुष्य की अन्तरात्मा उनके चरणों पर लौट जाने को करती है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, जन्मदग्नि, कश्यप, भारद्वाज, कपिल, कणाद, गौतक, जैमिनी, पाराशर, याज्ञवलक्य, शंक, कात्यायन, गोमिल, पिप्लाह, शुकदेव, श्रंगी, लोमश, धौम्य, जरुत्कार, वैशम्पायन आदि ऋषियों ने अपने को तिल-तल जलाकर संसार के लिये वह प्रकाश उत्पन्न किया जिसकी आभा अभी तक बुझ नहीं सकी है। सूत और शोनक निरन्तर प्राचीन काल के महापुरुषों की गाथाएँ, विरुदावलियाँ धर्मचर्चाएँ सुना-सुना कर मानव जाति की सुप्त अन्तरात्माओं को जगाया करते थे। दधीचि ने असुरत्व से देवत्व की रक्षा के लिए अपनी हड्डियां ही दान कर दीं। धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिये बन्दा वैरागी खौलते तेल के कढ़ाव में प्रसन्नतापूर्वक कूद पड़ा। हकीकततराय के कत्ल, गुरु बालकों के जीवित दीवारों में चुन जाने की कथाएँ आज भी धर्म कर्त्तव्य की उपेक्षा करके धन संग्रह और इन्द्रिय भोगों में लगे हुए लोगों पर देती हुई आकाश में विहार कर रही है।
आज अधिकाँश पण्डित, पुरोहित, साधू, ब्राह्मण आदि संसार को मिथ्या बताते हुए मुक्त का माल चरते रहते हैं और आलस्य प्रमाद से चित्त हटा कर संसार का बौद्धिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए कुछ भी श्रम नहीं करते पर भारतीय संस्कृति की परम्परा इसके सर्वथा भिन्न रही है। साधुता और ब्राह्मणत्व आदर्श दूसरा ही है। शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, सिख धर्म के दस गुरु, दयानन्द, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, चैतन्य, कबीर, विवेकानन्द, रामतीर्थ आदि असंख्यों धर्मगुरु लोक हित के लिए जीवन भर घोर परिश्रम प्रयत्न और परिभ्रमण करते रहे। उन्होंने लोक सेवा को एकान्त मुक्ति से अधिक महत्व दिया। भगवान बुद्ध जब अपनी जीवन लीला समाप्त करने लगे तो उनके शिष्यों ने पूछा-आप तो अब मुक्ति के लिये प्रयाण कर रहे हैं। बुद्ध ने उत्तर दिया-जब तक संसार में एक भी प्राणी बन्धन में बँधा हुआ है तब तक मुझे मुक्ति की कोई कामना नहीं है। मैं मानवता का उत्कर्ष करने के लिए बार-बार जन्म लेता और मरता रहूँगा। स्वामी दयानन्द सरस्वती भी योग साधना करने हिमालय में गये थे पर उन्हें वहाँ ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि लोक सेवा ही सर्वोत्तम योग साधना है। स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञान ग्रस्त जनता में ज्ञान प्रसार करने को ही अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष्य में विषपान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही पण्डित शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह कामना हो तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिखों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये। शिष्य भी तब ऐसे ही होते थे एकलव्य आरुणि, उद्दालक, धोक्य, नचिकेता आदि शिष्यों के चरित्र पढ़ने से अपनी संस्कृति पर सहज ही गर्व होने लगता है।
भारतीय संस्कृति में पले हुए राजा कैसे होते थे इसका उदाहरण राजा जनक के जीवन से मिल सकता है। वे अपने गुजारे के लिये स्वयं खेती करते थे और राज्य कोष से एक पाई भी अपने लिए न लेकर उसे जनता के निमित्त ही खर्च करते थे। जनक को अपना खेत जोतते समय हल की नोक की उचाट से एक कन्या मिली थी, हल की नोक को संस्कृति में सीता कहते हैं, इसलिए जनक ने अपने खेत में मिली हुई इस कन्या का नाम भी सीता रखा था। महर्षि विश्वामित्र को जब किसी यज्ञीय (लोक हितकारी) कार्य के लिए धन की आवश्यकता पड़ी तो राजा हरिश्चन्द्र ने समस्त राज्य कोष ही दान नहीं कर दिया वरन् अपने तथा अपने स्त्री-बच्चों के शरीर को बेच कर भी उसकी पूर्ति की और एक सच्चे राज का आदर्श उपस्थित किया। छत्रपति शिवाजी का विशाल राज्य था उसे उन्होंने समर्थ गुरु रामदास के चरणों में अर्पित कर दिया था और स्वयं गुरु की आज्ञानुसार एक मुनीम की तरह इसका संचालन करते थे। भारत भी राम की चरण पादुकाओं को शासक मानकर स्वयं एक तुच्छ सेवक की भाँति 14 वर्ष राज्य चलाते रहे। धौलपुर की राजगद्दी के मालिक नृसिंह भगवान और मेवाड़ की राजगद्दी के मालिक भगवान एकलिंग जी माने जाते थे। पीछे यद्यपि यह बात दिखावा मात्र रह गई, पर आरम्भ में यह त्याग भी उसी शृंखला का एक प्रतीक अवश्य था। विक्रमादित्य प्रजा की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वेश बदले प्रजाजनों के बीच घूमता रहता था। राणा प्रताप राजसुख की परवाह न करके जीवन भर स्वाधीनता संग्राम में धर्म युद्ध लड़ते रहे। महान राजपुत्र दुर्गादास राठौर को लड़ाई में रोटी भी नसीब नहीं हो पाती थी तो वह घोड़े पर चढ़ा हुआ भाले की नोंक में छेद कर भुट्टे भून खाता था और स्वाधीनता संग्राम लड़ता रहता था। छत्रसाल की गाथा सर्वविदित है। ऐसे होते थे यहाँ के शासक! राज्यों के मन्त्री प्रधान मन्त्री कैसे होते थे उसका नमूना चाणक्य का जीवन है। यह विश्व का अभूतपूर्व कूटनीतिज्ञ एवं घास-फूँस की झोपड़ी में गरीब लोगों की भाँति रहता था और राज्य कोष से अपने व्यय के लिये कुछ भी नहीं लेता था।
धन सम्पत्ति जिनके पास होती थे वे उसे सात पीड़ियों के लिए तिजोरी में बन्द नहीं करते थे वरन् तात्कालिक लोक हित के लिये उसे मुक्त हस्त से दान करते रहते थे। राजा कर्ण का दान वीरता प्रसिद्ध है। कहते है कि वे सवा मन स्वर्ण रोज दान करते थे। कृष्ण ने जब उनकी दान वीरता की परीक्षा कराई तो उसने अपनी जान जोखिम में डालकर कवच-कुण्डल दिये हैं। मरते समय ही दाँत तोड़ कर उसमें लगा हुआ स्वर्ण दान करे याचकों को विमुख नहीं लौटने दिया है। मोरध्वज ने अपने पुत्र को दिया है। राजा बलि ने तीनों लोक का राज्य ही नहीं अपना शरीर भी उस समय लोक सेवा के प्रतीक समझे जाने वाले ब्राह्मण-वामन-को दान दिया है। जरूरतमंदों के लिए लोग अपनी परसी थाली तक दान कर देते थे। भामा शाह ने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति तिनके की तरह राणा प्रताप को दे डाली। राजा महेन्द्र प्रताप अपना राजपाट राष्ट्रीय शिक्षा के लिए अर्पित करके भारतीय स्वाधीनता के लिये विदेश भागे थे। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी का राज्य प्राप्त करके उसे दान किया था। सुभाष बोस को वर्मा में भारतीयों ने अपना सर्वस्व स्वाधीनता संग्राम चलाने के लिए दिया था। उससे पूर्व श्री बोस भारत की अपनी लाखों रुपये की सम्पत्ति को राष्ट्र के लिए सौंप कर उसको सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित कर गये थे। सी.आर. दास अपनी बैरिस्टरी में हजारों रुपया महीना कमाते थे वह सारा का सारा कई बार कर्ज लेकर भी सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे। जमुनालाल बजाज ने अपने को गाँधी जी का पाँचवाँ दत्तक पुत्र घोषित करके अपनी सारी सम्पत्ति महात्मा गाँधी के चरणों में अर्पित कर दी थी।
ईश्वर चन्द विद्यासागर, राजा राममोहन राय, गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविन्द रानाडे, गणेश शंकर विद्यार्थी, श्रद्धानन्द, सर्वदानन्द, दर्शनानन्द, लेखराम, हैडगेवार आदि का जीवन जिस प्रकार से व्यतीत हुआ है। उसमें भारतीय संस्कृति की झाँकी देखी जा सकती है। भूषण, गंगा और चन्दवरदाई आदि ने चारणों में अपनी ओजस्वी वाणी और कविता से अनेकों निष्प्राणों को प्राणवान बनाया। गंगा इसी अपराध में हाथी के पैर के नीचे कुचलवाये गये, चन्द वरदाई ने गजनी में जो कष्ट सहा वह किसी से छिपा नहीं है। सन 57 से लेकर स्वाधीनता के हिंसात्मक संग्राम के क्रान्तिकारी वीर सैनिक और सन् 21 से लेकर सन 47 तक की अहिंसात्मक राज्य क्रान्ति में अगणित व्यक्तियों ने जो त्याग किये हैं उनकी गाथायें पढ़ते सुनते हुए भुजाएं फड़कने लगती हैं। पाकिस्तानी बर्बरता के सामने सिर न झुकाकर अपने धर्म को अक्षुण्य रखने के लिये पंजाब और बंगाल के लाखों स्त्री-पुरुषों ने जो त्याग किये हैं उनका स्मरण करके चित्तौड़ की रानियों के जौहर और गुरु गोविन्द सिंह के कुछ पुत्रों की स्मृति ताजी हो जाती है।
आस्तिकता की प्रतिष्ठापना के लिए घोर तप करने वाले लोगों की संख्या कम नहीं है। ध्रुव, प्रह्लाद, सरीखे भक्त प्राचीन काल में हुए हैं और मध्यकाल में सूर, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस, रैदास, कबीर, दादू, रामानन्द, रामानुज, षटकोपाचार्य, तिरुवल्लुवर जैसे सन्तों की संख्या बहुत बड़ी है। अनीति के निवारण के लिए त्रेता में ऋषियों ने अपना खून निकाल-निकाल कर एक घड़ा भरा था और वह रक्त घट अन्त में राक्षसों के विध्वंस करने के निमित्त-सीता जन्म-का हेतु बना था। इसी मार्ग पर यह आस्तिक सन्त अपनी साधना, भक्ति, ज्ञान, दीक्षा आदि के द्वारा अनीति निवारण और धर्म विस्तार का कार्य करते रहे हैं।
विश्व मानव की सेवा के लिए भारतीय स्त्रियाँ भी पुरुषों से पीछे नहीं रही हैं। उनका कार्यक्षेत्र पुरुषों के समान विस्तृत क्षेत्र में न रह कर सीमित क्षेत्र में रहा है इसलिये उन्हें यश उतना नहीं मिला है। केवल कुछ पतिव्रता स्त्रियों के कौतूहलपूर्ण चरित्रों का ही ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन आया है पर सच बात यह है कि भारतीय नारी ने प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से अधिक कार्य किया है। उन्हीं की प्रेरणा और छत्रछाया से समर्थ होकर पुरुष जाति कुछ कर सकने में सफल हो सकी। इसीलिए उनका नाम पुरुषों से पहले लिया जाता रहा है। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मीनारायण, उमामहेश, मायाब्रह्मा, सावित्री सत्यवान आदि नामों में पहला नाम नारी का और दूसरा नर का है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं रहा है जिनमें भारतीय नारी ने महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन न की हो। वेदों के दृष्टा जिस प्रकार विश्वमित्र आदि ऋषि हुए हैं वैसे ही ऋषिकाएँ-स्त्रियाँ भी हुई हैं। ऋग्वेद 10।85।10-134।10-39।10- 40।8-91। 10-95।5-28। 8-91 आदि अनेकों सूत्रों की दृष्टा घोषा, गोधा, विश्वधारा, अपाला, जुहू, अदिति, सरमा, रोमशा, लोपा मुद्रा, शास्वती, सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ ही हैं। मनु की पुत्री इडा बड़ी प्रकाण्ड याज्ञक थीं। उसने अपने पिता का यज्ञ कराया था। मैत्रेयी एक समय की अद्वितीय विद्वान थी। शाण्डिल्य की पुत्री श्रीमती से अत्यन्त कठोर तप किए थे। महाभारत में शान्ति पर्व के अध्याय 30 में सुलभा नामक एक विदुषी का वर्णन है जिससे शास्त्रार्थ में राजा जनक जैसे ब्रह्मज्ञानी के छक्के छुड़ा दिये थे। भागवत में स्वधा की पुत्री वयुना और धारिणी का वर्णन है वे विज्ञान विद्या में निष्णात् थीं। ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित वेदवती को चारों वेद सस्वर कण्ठाग्र थे। भारती देवी नामक महिला ने शंकराचार्य से ऐसा शास्त्रार्थ किया था कि बड़े-बड़े विद्वान भी अचम्भित रह गये थे। उसके प्रश्नों से निरुत्तर होकर शंकराचार्य को उत्तर देने के लिये कुछ मास की मोहलत माँगनी पड़ी थी।
युद्ध कला प्रणीत कैकेयी को दशरथ जी लड़ाई में अपने साथ ले गये थे और जब रथ टूटने लगा तो कैकेयी ने ही उसका तात्कालिक उपचार करके पराजय से बचाया था। मदालसा, महामाया के चरित्र भी प्रसिद्ध हैं। चित्तौड़ की रानियाँ, बूँदी की रानी दुर्गावती, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, चाँदबीवी, आदि के पराक्रम दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है। द्रौपदी, गान्धारी, कुन्ती आदि की असाधारण योग्यता के सुनते-सुनते तृप्ति नहीं होती। मीरा ने लोक-लाज छोड़ कर राज परिवार त्याग कर जनता जनार्दन के हृदयों में भक्ति का दिव्य रस ओत-प्रोत किया था। समाज सुधार और राजनैतिक क्षेत्रों में प्राण प्रण से संलग्न महिलाएँ इस शताब्दी में भी कम नहीं हुई हैं।
महापुरुषों और महान नारियों के दिव्य चरित्र से भारतीय इतिहास का पन्ना-पन्ना जगमगा रहा है। जहाँ घर-घर में ऐसे नर रत्न-पैदा होते रहे हैं जिनके उज्ज्वल चरित्र प्रकाश स्तम्भों की भाँति आज भी गिरी हुई मनुष्य जाति का पथ प्रदर्शन करने के लिए जाज्वल्यमान हो रहे हैं। यह क्रम इस देश में केवल इसलिये चलता रहा है कि यहाँ ऋषि प्रणीत संस्कृति के प्राँत लोगों की गम्भीर आस्था रही है। इन धर्म शास्त्रों, ऋषि प्रणालियों, आप्त वचनों का अनुगमन करने के लिये लोग श्रद्धापूर्वक हृदय और मस्तिष्क के द्वार खोले रहे हैं। आज भोगवादी भौतिक संस्कृति ने उस हमारी सनातन परम्परा से जनसाधारण को विमुख कर दिया है। फलस्वरूप सर्वत्र घोर अशान्ति, दारिद्र, रोग, शोक, भय, उत्पीड़न, तृष्णा और वासना से सभी के हृदय जर्जर हो रहे हैं।
हमारा निश्चित विश्वास है कि भारतीय संस्कृति ऋषि प्रणीत-रीति नीति-अपना करके ही मनुष्यता का उत्कर्ष हो सकता है। अन्यथा वर्तमान गति-विधि उसे सब प्रकार नष्ट करके ही छोड़ेगी। सत्य अमर है, श्रद्धा अमर है, धर्म अमर है, प्रेम अमर है, न्याय अमर है ये कभी मन्द भले ही हो जावें पर मर नहीं सकते। भारतीय संस्कृति भी अमर है, वह आज तमसाच्छन्न हो रही है पर कल अवश्य ही निर्मल होगी। हमारी अन्तरात्मा कहती है कि वह पुनः सजीव होगी और उसकी विजय डुगडुगी फिर एकबार विश्व में बजेगी।
हम उस भविष्य की प्रतीक्षा करते हैं जिसमें भारत में घर-घर अपने प्राचीन आदर्शों की भावना एवं मान्यता का विकास होगा। लोग आपस में ऐसे व्यवहार रखेंगे जैसे प्राचीन भारत में रखे जाते थे। माँ-बाप, भाई-बहिन, भाई-भाई, पिता-पुत्र, सास-बहु, स्त्री-पुरुष, स्वजन-सम्बन्धी, बन्धु-बन्धुओं के बीच ऐसे प्रचुर एवं प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होंगे जिन्हें देख कर देवता भी ईर्ष्या करें। पुरुष स्त्रियों के प्रति और स्त्रियाँ पुरुषों के प्रति अत्यन्त ही पवित्र भावनाएं रखा करेंगे। व्यापारी और ग्राहक के बीच उचित मुनाफे पर ठीक वस्तुओं का ईमानदारी के साथ क्रय-विक्रय होगा। मजदूर पूरा काम करने में और मालिक पूरी मजदूरी देने कसर न रखेंगे। आलस्य को, काम से जी चुराने को मानवीय अपराध समझा जायेगा और हर आदमी पसीना बहावे बिना रोटी खाना पसन्द न करेगा। मनुष्य परस्पर सहिष्णु, सहनशील, एक दूसरे की स्थिति और कठिनाई को समझने वाले, तथा उदार व्यवहार करने वाले होंगे। छल, चोरी, व्यभिचार, बेईमानी, दगाबाजी, विश्वासघात, अनीति, अन्याय आदि से लोग वैसे ही घृणा करेंगे जैसे अखाद्य और अभक्ष को भूख रहने पर भी कोई नहीं खाता। संयम, सदाचार और नियमित जीवन के कारण सब लोग निरोग और दीर्घजीवी रहेंगे। सन्तोषी और परिश्रमी होने के कारण उन्हें किसी बात का घाटा न रहेगा। परस्पर स्नेह और सद्भावों के कारण आपसी व्यवहार स्वर्गीय सुख जैसे मधुर हो जाएंगे।
यह बातें आज की स्थिति में तुलना करते हुये असम्भव सी दीखतीं हैं पर वस्तुतः ये कुछ भी कठिन नहीं हैं। भारतीय संस्कृति के यह सहज फलितार्थ हैं इस देश में लाखों करोड़ों वर्षों तक लगातार ऐसा ही वातावरण स्थिर रहा है। हमारी यही विशेषताएं हैं। यदि हम अनार्य संस्कृति की कीचड़ में से अपने पैर निकाल लें और आर्य संस्कृति की ओर कदम बढ़ाएं तो उस प्राचीन इतिहास की पुनरावृत्ति होना बिल्कुल सहज और स्वाभाविक है। इस भूमि में वह विशेषताएं है कि वे सहज विकास करती रहें तो घर-घर में राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, भीम अर्जुन, गाँधी, जवाहर पैदा हो सकते हैं और सब प्रकार की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होते हुए हम भटके हुए संसार को सही रास्ते पर ला सकते हैं। आइए, अपने उसी प्राचीन गौरव को वापिस लाने के लिए हम सब मिल कर भागीरथ प्रयत्न करें।
भारतीय संस्कृति की-विचारधारा एवं जीवन- यापन पद्धति को अपनाकर हम अपने परिवार का, समाज का-समस्त संसार का वातावरण, सद्भावना, प्रेम, सहयोग, सहृदयता, धार्मिकता और सुख शाँति से परिपूर्ण बना सकते हैं। इसलिये यह ऋषि प्रणीत राज मार्ग हमारे लिए सब प्रकार श्रेयष्कर है। परन्तु यदि इस और ध्यान न दिया गया और आज जनता की मनोदशा जिस भौतिक संस्कृति को अपनाने के लिए बढ़ रही है। उसकी प्रगति यदि जारी रही तो यह भी निश्चित है कि हम थोड़े ही समय में एक घोर अव्यवस्था भरी उलझनों में जा फंसेंगे। आज हमारी मनोवृत्तियाँ किस दिशा में बढ़ रही हैं और उनकी प्रगति हमें कहाँ ले पहुँच सकती है आइए, इस प्रश्न पर कुछ विचार करें।
आज जैसी हवा बह रही है, उसका प्रभाव हर आदमी पर यह पड़ता है कि-मुझे अधिक से अधिक धन संग्रह करना चाहिये। धन की आवश्यकता शरीर को जीवित रखने के लिये अन्न, वस्त्र, घर, पुस्तक आदि आवश्यक वस्तुएँ प्राप्त करने के लिए है। साधारण प्रयत्न से इतना धन आसानी से कमाया जा सकता है कि हमारी उचित आवश्यकता पूरी होती रहे। पर धन उपार्जन की इस मर्यादा को भूल कर लोग अधिकाधिक संग्रह करने में लगे हुये हैं। जिसके पास जितना अधिक धन है उसे उतनी ही अधिक तृष्णा हैं। ठाट बाट, विलासिता, ऐश आराम, शेखीखोरी की झूठी आवश्यकताएँ लोग बढ़ाते जा रहे हैं। उसकी पूर्ति के लिये जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक धन कमाने की इच्छा होती है। अपने समीपवर्ती लोगों को इसी दशा में तेजी से बढ़ते देख कर सभी की इच्छा एक दूसरे से बाजी मार ले जाने की होती है। फलस्वरूप लोग उचित अनुचित, न्याय अन्याय, धर्म अधर्म का विचार छोड़ कर जैसे बने वैसे जल्दी से जल्दी अधिक से अधिक धन बटोरने में कमर कस कर तत्पर हो जाते हैं।
जुआ, चोरी, उठाईगीरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार, दगाबाजी, जालसाजी, रिश्वत, लूट, डकैती, हत्या, विश्वासघात, कन्या विक्रय, छल, पाखण्ड प्रपंच, षड़यन्त्र, उत्पीड़न, वेश्यावृत्ति आदि नाना प्रकार के दुष्कर्म करके धनी बनने का उपाय करते हैं। इस घुड़दौड़ में कई व्यक्ति तो बिल्कुल निर्दोषों ओर दीनहीनों को इस बुरी तरह पीस डालते हैं कि उनकी आत्मा जन्म भर कराहती रहती है। कई बार धीरे-धीरे दूसरों को ऐसा चूसा जाता है कि वह बेचारा सब कुछ गंवा कर चतुर पुरुषों का ऐश्वर्य बढ़ाने के लिये बलि हो जाता है। रोगियों को डॉक्टर, मुवक्किलों को वकील, छिछोरों को वेश्या, श्रद्धालुओं को पाखण्डी, चूस कर किस प्रकार निस्वत्व बना देते हैं इसकी कहानी बड़ी करुणाजनक है। खाद्य पदार्थ बेचने वाले, जेवर बनाने वाले, नशे के दुकानदार, माँस चर्बी के व्यवसायी जो कुछ करते हैं उससे ईमान की आत्मा काँप जाती है। ऐसे कुकृत्य भूख नहीं-तृष्णा कराती है।
यह धन की तृष्णा यदि बढ़ती रही, त्याग, सन्तोष, दान, अपरिग्रह, धन का राष्ट्रीयकरण आदि का अंकुश न लगे तो निश्चय है कि एक मनुष्य अपनी हविश बुझाने के लिए दूसरों को भेड़ियों की तरह फाड़ खाने लगेगा। वैसे ही बानग बनते जा रहे हैं। सब ओर लूट खसोट का बोलबाला है। दृष्ट, गुण्डे, डाकू, हत्यारे तलवारें लेकर डकैती, लूट, हत्या करते हुए गाँव-गाँव नृशंसतापूर्ण आतंक पैदा कर रहे हैं। बहुत कम स्थान ऐसे हैं जहाँ लोग अपने को सुरक्षित समझते हों। पढ़े लिखे लोग दूसरे ढंग से, सश्य तरीकों से डाके मारते हैं। जिनके हाथ में शक्ति है वे भी उससे व्यक्तिगत लाभ चलाने की पूरी-पूरी कोशिश करते हैं। एक देश दूसरे को अपने फौलादी पंजों में कस कर चूस जाने के लिए कटिबद्ध है। आज अन्तर्राष्ट्रीय स्थिति को जो लोग समझते हैं वे जानते हैं कि पूँजीवादी और साम्राज्यवादी देश ऊँचे सिद्धान्तों की दुहाई देने की धूर्तता के साथ साथ कैसी पैंतरेबाजी से अपने फौलादी पंजे फैला रहे हैं।
यह सब बढ़ता गया तो इसका अन्त कहाँ होगी? परस्पर विश्वास उठ जायेगा, एक दूसरे को अपनी शक्ति मात्र समझने लगेगा। हर व्यक्ति अपने को असुरक्षित समझेगा, प्रेम और उदारता नाम की कोई वस्तु न रह जायेगी, निर्बलों को बलवानों का त्रास रहेगा और वह बलवान अपने से अधिक बलवानों की आकांशा से काँपता रहेगा, साधनहीन लोग भूखों मरेंगे, साधन सम्पन्न ऐयाशी करके बीमार पड़ेंगे, घर-घर कलह का वातावरण बनेगा, एक वर्ग दूसरे वर्ग से लड़ेगा, एक समाज एवं देश अपने से भिन्न के साथ शीतयुद्ध या अग्नियुद्ध ठानेगा, इस संघर्ष में मानवीय संस्कृति का कचूमर निकल जायेगा, केवल घोर अव्यवस्था ही हाथ रहेगी। धन की तृष्णा के वशीभूत गरीब और अमीर सभी नष्ट होंगे। मनुष्य जीवन का जो आनन्द मिलना चाहिए था, जो दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करनी थी उनसे वह सर्वथा वंचित रह जाएंगे। भौतिक संस्कृति का यह प्रथम सोपान लोगों को सत्कर्मों की और न बढ़ने देगा। दान, त्याग, उदारता सेवा, साधना, स्वास्थ्य, परमार्थ आदि के लिए रुचि और समय न बचने देगा, इन प्रवृत्तियों से रहित मनुष्य को बिना सींग पूँछ का पशु ही समझना चाहिए। ऐसे ही पशुओं से सारी पृथ्वी को वह भौतिक संस्कृति भर देगी।
भौतिक संस्कृति का दूसरा सोपान है- कामुकता की अपवित्र भावना। नर-नारी को और नारी-नर को अपवित्र वासना की दृष्टि से देखने लगे हैं और उसके लिए अनावश्यक, अवाँछनीय, उत्तेजक वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं। सिनेमाओं में ऐसे चित्र दिखाये जाते हैं जिनमें युवती स्त्रियों के वे क्रिया कलाप, हाव भाव, वेश विन्यास दिखाये जाते हैं जिनका सार्वजनिक प्रदर्शन सर्वथा अनैतिक है। उनके देखने से दर्शकों के मन में वासनापूर्ण उत्तेजना ही उत्पन्न होती है। कमरों में, घरों में, दुकानों में जहाँ देखिए, युवती स्त्रियों के भड़कीले चित्र टंगे मिलेंगे, अश्लील साहित्य की तो बाढ़ सी आ रही है। गन्दे से गन्दे कोकशास्त्र, कामशास्त्र, उपन्यास, दुकानों में घास फूँस की तरह भरे पड़े हैं। पुरुष वर्ग जब युवा स्त्री पर दृष्टि डालता है तो उसमें वासना भरी होती है। स्त्रियाँ भी प्राचीन परम्पराओं को छोड़ कर उसी प्रवाह में बहने लगी हैं। वे घर से बाहर भड़कीली पोशाक, उत्तेजक सजावट तथा बेपर्दगी से भरे हुए तरीके के साथ निकलती हैं कि अनायास ही दूसरों को उनके शील पर संदेह होने लगता है। दाम्पत्ति जीवन में बुरी तरह विकृतियाँ आ रही हैं। अपने-अपने क्षेत्र में संतुष्ट न रह कर नर-नारी भौंरे और तितली बनते जा रहे हैं। ब्रह्मचर्य की मर्यादाएं टूट रही हैं। संयम को लोग अनावश्यक समझने लगे हैं। माता, पुत्री और बहिन का भाव दिन-दिन घटता जा रहा है और नर का नारी के प्रति-नारी का नर के प्रति अनैतिक अवाँछनीय आकर्षण बढ़ रहा है। तद्नुसार व्यभिचार का बोलबाला होता जा रहा है।
रूप और सौंदर्य की प्यास बढ़ रही है। दाम्पत्ति जीवन का आध्यात्मिक पहलू टूट रहा है और केवल रूप यौवन की दृष्टि से पति-पत्नी का चुनाव, परित्याग एवं हेर-फेर होने लगा है। लड़के अब यह फरमाइश करते हैं हमें अपनी रूपवती लड़की पसन्द करने दी जाय। वे यदि गुणों की-स्वास्थ्य की-शिक्षा की-स्वभाव की-भावना की परीक्षा करते कराते तो एक बात भी थी पर यह बातें तो क्षण भर में दृष्टि मात्र में पूरा हो नहीं सकतीं। इनकी उन्हें जरूरत भी नहीं। वासना और विलासिता के लिए रूप यौवन पर्याप्त है सो उसे ही वे देख कर विवाह करने के लिये आग्रह करते हैं। अब बहुत ही शीघ्र यह रोग लड़कियों में महामारी की तरह फैलने वाला है, वे पिता-माता के कहने से नहीं अपनी पसन्द के रूप यौवन वाले लड़के देखेंगे। काले साँवले, नाख सिख में जो जरा भी कम रूप वाला बैठेगा उन लड़कों को लड़कियों आँख उठा कर भी न देखेंगी। रूप सौंदर्य तो बहुत थोड़े लड़के-लड़कियों में होता है, शेष सच तो इस देश में ऐसे वैसे ही होते हैं। इसलिए रूपवान लड़कियों के लिए इच्छुकों में घोर प्रतिद्वंद्विता होगी और ऐसे वैसे रंग रूप के अधिकाँश लड़की-लड़के या तो अविवाहित रहेंगे या मन मसोस कर अपने दुर्भाग्य के लिए सिर धुनते रहेंगे। जब यह असन्तोष बढ़ेगा तो तलाक तैयार है। रूपवान लड़के लड़की भी अधिक अच्छा जोड़ा ढूँढ़ने के लिए नये फूल की तलाश में रहेंगे और सैकिंड हैन्ड से पीछा छुड़ाना चाहेंगे। योरोप अमेरिका में यह समस्या आयकर रूप में उपस्थित है। स्त्री-पुरुष “नयी ऋतु के लिए नया जोड़ा” तलाश करने की फिक्र में रहते हैं स्त्री पुरुष में से किसी को किसी का विश्वास नहीं, किसी के साथ कोई अपना स्थायित्व नहीं समझता। फलस्वरूप दाम्पत्ति जीवन, पारिवारिक जीवन सब व्यस्त हो रहे हैं। इस संघर्ष में संतान को अनाथों की तरह निर्वाह करना होता है। ठीक यही स्थिति कुछ समय बाद हमारे देश में उत्पन्न हो जायेगी। दाम्पत्ति जीवन के आध्यात्मिक महत्व को- काले, कुरूप, कोढ़ी, अन्धे साथी को भी निबाहने की प्रवृत्ति जब स्त्री पुरुषों में से निकल जायेगी तो पशु लिप्सा, वासना, कामुकता के अतिरिक्त दाम्पत्ति जीवन में और कोई आकर्षण न रहेगा। जब जिसे इसमें कुछ कमी आती दीखेगी तब वह दूसरे को साथ छोड़ कर पल्ला झाड़ अलग हो जायेगा। आज पुरुषों की ओर से इस प्रकार का बहुत उत्साह है, कल निश्चित रूप से वह स्त्रियों में बढ़ेगा। ये मारपीट, ताड़ना, धमकी, धौंस, पवित्रता का उपदेश आदि बातों को पूर्णतया उपेक्षा करके पुरुषों को अंगूठे पर नचायेंगी और आज जो उत्साह पुरुष दिखा रहे हैं उससे दस कदम आगे बढ़ कर रहेंगी।
जो लोग आज दहेज की लम्बी-लम्बी फरमाइशें करते हैं वे कुछ ही दिन बाद योरोप की भाँति लड़कियों को भारी उपहार दिये बिना विवाहित होने के लिए तरसते रहेंगे। दहेज के कुकृत्य से लड़कियों के पिताओं को जो कष्ट सहना पड़ता है उन की प्रतिक्रिया उन लड़कियों पर भी होती है। वे विवाह तो कर लेती हैं पर घृणा, क्रोध और प्रतिशोध को साथ लेकर पतिगृह में जाती हैं। यह असन्तोष एक दिन भयंकर रूप से फूटेगा और आज जैसे अछूतों के मन में स्वयं के प्रति घृणा एवं विद्वेष भाव भरे हुए हैं कल स्त्रियों के मन में भी पुरुषों की प्रताड़ना, प्रतिबन्ध, दहेज आदि एक पक्षीय अन्याय पूर्ण व्यवहार के प्रति भयंकर विद्रोह उत्पन्न होगा। फलस्वरूप समाज की स्थिति विषम हो जायेगी।
पुरुषों को उनके दुष्कृत्यों का दण्ड न मिले इसकी चिन्ता हमें नहीं है। हमें तो चिन्ता यह है कि दाम्पत्ति जीवन में अत्यन्त मधुर संबंध, श्रद्धा, आत्मीयता, सहिष्णुता, सेवा की भावना को जब रूप पिपासा नष्ट कर देगी तो उस असन्तोष का प्रतिफल सन्तान पर पड़ेगा। ऐसी सन्तान सूक्ष्म मनोनैतिक एवं आध्यात्मिक नियमों के आधार पर अनेक प्रकार के मानसिक दुर्गुणों से परिपूर्ण होती है। नई पीढ़ियाँ जब इस प्रकार खराब होंगी तो अनेक प्रकार की अनैतिकताओं और बुराइयों की बाढ़ आ जायेगी। ये क्षुब्ध असंस्कृत मनोभूमि लेकर जन्में हुए लड़के जब बड़े होंगे तो वैसे ही उत्पात करेंगे जैसे प्राचीन काल में असुर किया करते थे। असंतुष्ट पति-पत्नी के संयोग से सुसंस्कृत सन्तान उत्पन्न होने की आशा नहीं की जा सकती। व्यभिचारी ओर व्याभिचारिणी स्त्री-पुरुष कभी भी सदाचारी सन्तान के माता-पिता बनने का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर सकते। दाम्पत्ति जीवन में से आर्य संस्कृति को हटाकर भौतिक संस्कृति को, रूप यौवन को प्रतिष्ठित कर देने के बाद में अपने घरों में नर रत्न उत्पन्न करने की आशा का भी परित्याग करना पड़ेगा। वह तो तभी सम्भव था जब साँसारिक अनेक त्रुटियाँ रहते हुए भी विवाह को आध्यात्मिक एकता मानकर पति-पत्नी एक दूसरे को भारी आत्म त्याग करके भी प्रसन्नता पूर्वक निर्वाह लेना अपना कर्त्तव्य समझते थे।
काँचन और कामिनी यह भौतिक संस्कृति के दो प्रधान आधार हैं। इनके साथ साथ शेखीखोरी बनावट, फैशन ऐयाशी, उद्दण्डता, उच्छृंखलता, अराजकता, अनैतिकता, अशिष्टता, अहंभावता, समाजिक, मर्यादाओं का उल्लंघन कृतघ्नता, स्वेच्छाचार, अभक्ष भोजन, नास्तिकता, धर्म कर्त्तव्यों का उपहास, गुरुजनों की अवज्ञा, सद्ग्रन्थों में अरुचि आदि अनेक सोपान यथा अवसर उत्पन्न होते जाते हैं। नशेबाजी में, तमाखू, सिगरेट, शराब, भाँग, गाँजा आदि पीने में लोग इतना पैसा फूँक देते हैं जितना कि इस देश में शिक्षा पर भी व्यय नहीं होता। फैशनपरस्ती की चीजें इतने दाम की खरीदी जाती हैं जितना कि दूध घी में भी खर्च नहीं होता। मिर्च मसाले, माँस मछली, अण्डे शराब आदि अभक्षों से रक्त दूषित और मस्तिष्क क्रोधी होता चला जा रहा है। धार्मिकता एवं आस्तिकता के वातावरण से विमुख होते जाने के कारण परलोक, परमार्थ, आत्म कल्याण, ईश्वर प्राप्ति जैसी बातें कपोल कल्पित मालूम पड़ती हैं। कोई-कोई तो धर्म को ‘अफीम की गोली’ बताते हैं और किसी भी प्रकार अपना अभीष्ट साध लेना बुद्धिमता मानते हैं।
इस प्रकार की अनेकों बातें हैं जिनकी चर्चा विस्तार पूर्वक कर सकना इन थोड़ी पंक्तियों में सम्भव नहीं है। चौराहे के मोड़ पर से कुछ ही कदम गलत पड़ जावें, पूर्व जाने वाली सड़क की अपेक्षा पश्चिम जाने वाली सड़क पर चलना आरम्भ हो जाय तो कुछ ही समय में अभीष्ट स्थान बहुत दूर निकल जाता है। इसी प्रकार आर्य संस्कृति को अपनाकर जीवन को महान बनाना जितना सरल होता है। उसके विपरीत अनार्य संस्कृति को अपनाने से वह कठिन हो जात है। लोग पुण्यात्मा बनने की अपेक्षा पापात्मा बनते जाते हैं। बुराइयाँ बढ़ते जाने से हर व्यक्ति अपने को परेशानी, चिन्ता ओर अव्यवस्था से घिरा हुआ पाता है। छोटा सा रोग बढ़ता रहे तो वह कुछ समय बाद असाध्य बन जाता है। उसी प्रकार कुमार्ग की और पैरों की गति बढ़ाना, चाहें वह मन्द गति से ही क्यों न हो भयंकर ही सिद्ध होता है।
राष्ट्र निर्माण के लिए सरकारी और गैर सरकारी अनेकों प्रयत्न एवं आयोजन होते हैं पर उनका सफल होना तब तक सम्भव नहीं, जब तक उन योजनाओं को कार्यान्वित करने वाले व्यक्ति ईमानदार नहीं। आदमी बेईमान हो तो वह अपना स्वार्थ साधने के लिये बड़े उपयोगी कार्य में ऐसे छेद छोड़ सकता है जिससे वह असफल ही रहे। देखा जाता है कि जहाँ रिश्वती, इंजीनियर, ओवर सीयर, ठेकेदार मिल जाते हैं वहाँ ऐसे मकान आदि बनवाये जाते हैं जो चन्द ही दिनों में ढह जायें। इस प्रकार देश की बहुत भारी रकम लग जाने पर भी वह व्यर्थ साबित होती है। राष्ट्र के पुनरुत्थान के लिए सबसे अधिक जिस वस्तु की आवश्यकता है वह है व्यक्तियों की ईमानदारी। एक संस्कृति को अपनाने पर हमारा दृष्टिकोण ईमानदारी का बनता है दूसरी को अपनाने से बेईमानी का, एक हमें उन्नति की ओर ले जाती है दूसरी ईमानदारी की ओर, एक का परिणाम उत्कर्ष है दूसरी का सर्वनाश। इन दोनों में से हम जिसे चाहें अपना सकते हैं। यदि सर्वनाश से बचना है तो हमें पूरी शक्ति से अपने प्राचीन विचारधाराओं, सिद्धाँतों और आदर्शों को पुनर्जीवित करने के लिए तत्परता पूर्वक घोर प्रयत्न करना पड़ेगा।
जो मनुष्य जितना छोटा होता है, संकुचित, संकीर्ण, अनुदार, तुच्छ तथा नीच होता है उसकी मनोवृत्तियां उतनी ही संकीर्ण तथा स्वार्थी होती हैं। ऐसे मनुष्य जब भी विचार करते हैं अपने संकुचित स्वार्थों की दृष्टि से सोचते विचारते हैं। वैसी ही इच्छा आकाँक्षाएं और कामनाएं करते हैं। जैसे-जैसे मनुष्य का आत्मिक विकास होता जाता है वह अपने पन का दायरा बढ़ाता जाता है। किसी व्यक्ति के आत्म विकास की कसौटी यह है कि यह जो कुछ सोचता-करता, कमाता है वह केवल अपने लिए ही करता है या दूसरों के निमित्त ही। जिसका दायरा जितना बड़ा है, जो दूसरों में जितनी आत्मीयता रखता है वह उतना ही बड़ा महापुरुष है। श्रेष्ठ पुरुषों का सर्वप्रधान लक्षण यह है कि वे वसुधैव कुटुम्बकम के सिद्धान्त को मानते हैं। इन्हें सबके अन्दर अपनी आत्मा और अपनी आत्मा में सब कोई समाये हुये दृष्टिगोचर होते हैं। ज्ञानी पुरुषों का स्वार्थ विकसित होकर परमार्थ का रूप धारण कर लेता है।
आत्मोन्नति के लिये दो मार्ग हैं (1) आत्मावलम्बन (2) आत्मसिंचन। आत्मावलम्बन कहते हैं अव्यात्मिक व्यायामों को, जिस प्रकार दण्ड, बैठक, कुश्ती, दौड़ आदि द्वारा शारीरिक व्यायाम के द्वारा शरीर की नस नाड़ियों को मजबूत बनाया जाता है उसी प्रकार जप, ध्यान, योग, साधन, मौन, अनुष्ठान, तपश्चर्या आदि के द्वारा अन्तरंग शक्तियों को परिपुष्ट किया जाता है। दूसरा साधन है आत्म सिंचन। आत्म सिंचन का अर्थ है आत्मा की रुचि, इच्छा, आकाँक्षा, प्रकृति, पुकार एवं आवश्यकता को पूर्ण करना। जिस प्रकार व्यायाम से भी अधिक शारीरिक स्वस्थता के लिये ठीक आहार विहार की, अन्न, दूध, घी, स्नान, सफाई ब्रह्मचर्य आदि की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार आत्मा का स्वार्थ-जिसे परमार्थ कहते हैं पूर्ण करने पर ही आत्मिक भूमिका स्थिर रहती है। व्यायाम तो बड़े कठोर किये जाएं पर आहार विहार की अव्यवस्था हो तो वह व्यायाम शरीर को अभीष्ट लाभ नहीं दे सकता इसी प्रकार कोई व्यक्ति पूजा पाठ तो खूब करता हो पर जन कल्याण से लोक सेवा से उदासीन हो तो उसकी साधना एकाँगी, अपूर्ण, अधूरी एवं असफल ही रहेगी। जिस प्रकार गाड़ी के दो पहिये होते हैं, एक पहिये का रथ नहीं चलता उसी प्रकार आत्म कल्याण के लिए आत्मावलम्बन तथा आत्म सिंचन दोनों की ही आवश्यकता है। आत्म कल्याण रूपी पौधे के लिए एक को खाद कहा जा सकता है तो दूसरे को पानी दोनों की ही समान उपयोगिता है। पर खेद यह है कि आज सर्वत्र एकाँगी लंगड़ी दौड़ हो रही है। सार्वजनिक सेवा के लिये उत्साह रखने वाले, ईश्वर उपासना की ओर ध्यान नहीं देते उसे अनावश्यक समझते हैं। इसी प्रकार साधनारत व्यक्ति लोकहित की भावना को तिलाँजलि देकर केवल अपनी इष्ट सिद्धि, स्वर्ग, मुक्ति आदि की बात सोचते रहते हैं। प्राचीन काल के सभी ऋषि मुनि, सत्पुरुष, महात्मा ज्ञानी इन दोनों ही कार्यों को समान रूप से महत्व देते थे। तभी वे अभीष्ट परिणाम प्राप्त करने में सफल होते थे।
यों सभी ऋषि कोई न कोई परमार्थिक कार्य अपनी साधना के साथ अवश्य करते रहते थे पर कुछ ऋषियों का उदाहरण तो ऐसा है कि उन्होंने लोक सेवा को ही अपनी सर्वोपरि साधना बना लिया था। साधारण दैनिक नित्य नियमित उपासना के अतिरिक्त वे अपना अधिकाँश समय लोकहित के लिये ही लगाते थे। समय की पुकार के कारण सत्पुरुषों को अनेक बार ऐसे ही कार्यक्रम बनाने पड़ते हैं। मुहल्ले में आग लगे तो सब लोग अपना आवश्यक कार्य छोड़ कर उसे बुझाने दौड़ते हैं ताकि वह आग अन्य घरों को नष्ट करती हुई उनके घर को भी स्वाहा न कर दे। अधिक विकृत समय की भी ऐसे ही अग्निकाण्ड से तुलना की जाती है। ऐसी विपन्न परिस्थितियों में ऊँची आत्माएं अपने कार्यक्रम में ईश्वर की प्रेरणा से हेर-फेर करती हैं। वे साधना उपासना को साधारण सीमा तक रख कर लोक में फैली हुई बुराइयों के लिये कटिबद्ध हो जाती हैं। श्री शंकराचार्य जी ने अपना पूरा समय ज्ञान प्रसार के लिये दर-दर भटकते रहने में लगाया। भगवान शंकर ने उन्हें स्वयं यह आदेश दिया था कि तुम समाधि लगाने में नहीं संसार से अज्ञान मिटाने की साधना करो। स्वामी दयानन्द सरस्वती हिमालय की कन्दराओं में साधना करने जा रहे थे तो उनको दैवी सन्देश प्राप्त हुआ कि लोग अज्ञान में डूबे हुये हैं उनको ज्ञान देने में लगो आज के समय यही तपस्या सर्वश्रेष्ठ है। भगवान बुद्ध ने कठोर तप किया तो उन्हें अन्तः प्रेरणा हुई कि संसार में बुद्धत्व का प्रकाश करो, वे अपनी तपोभूमि छोड़ कर प्रवचन करते हुए भ्रमण करने लगे। भगवान महावीर ने भी यही किया भीम ने राज महल छोड़कर अपना स्थान भक्तजनों के बीच बनाया सूत शौनक तो सदा कथा प्रवचन ही करते रहते थे। व्यास जी का पूरा जीवन सत् साहित्य निर्माण करते रहने में ही व्यतीत हो गया। देवर्षि नारद का सबसे ऊँचा पद इसलिए मिला कि अन्य ऋषि जहाँ व्यक्तिगत शक्ति सम्पादन के लिए नाना प्रकार की योग साधनाओं में अधिक समय लगाते थे वहाँ नारद जी उस ओर अधिक ध्यान न देकर आत्मशक्ति के प्यासे संसार पर अमृत वर्षा करने के लिए निरन्तर भ्रमण करते रहने का महान् संकल्प लेकर उस पुनीत कार्य में सर्वतोभावेन जुट गये। भगवान ने उनकी यह उत्कृष्ट परमार्थ भावना निस्वार्थता, करुणा, सहृदयता देखी तो अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें देवर्षि माना तथा यह विशेष छूट दी कि वे किसी भी समय बे रोक-टोक सशरीर भगवान के लोक में जा सकते थे। यह सौभाग्य और किसी ऋषि या देवता को प्राप्त न था क्योंकि उतनी उत्कृष्ट परमार्थ भावना भी और किसी की न थी।
साधारण शान्ति के समय में आमतौर से ऊंची आत्माएं बहुधा एकान्तिक शान्तिमयी साधनाओं में अधिक समय लगाती हैं पर जब संसार की परिस्थितियाँ विपन्न होती हैं, लोग कुमार्ग गामी हो जाते हैं, तो बुराई के आक्रमण से भलाई की रक्षा करने के लिये वे लोग लोक कल्याण के प्रयत्नों को ही साधना मान लेते हैं और उस कार्य में वैसी ही श्रद्धा तथा तत्परता पूर्वक संलग्न होते हैं। जैसे कोई हठयोगी अपनी कष्टसाध्य तपस्या में पूर्ण तन्मयतापूर्वक लग जाता है। समय-समय पर अनेकों योगी, महापुरुष, देवदूत, अवतार इस युग धर्म का अनुसरण करके लोग सेवा के लिए कटिबद्ध होते रहे हैं। इसमें उनकी करुणा, दया, सेवा भावना आदि महात्माओं का प्रकाश तो होता ही है साथ ही लाभ की दृष्टि से भी वे एकान्त सेवी साधकों से किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहते। शास्त्रों में बताया गया है कि-अन्नदान, वस्त्रदान, गौदान, स्वर्णदान आदि जितने भी दान संसार में है उन सबसे हजार गुना अधिक पुण्य फल ज्ञानदान का होता है। यह भी लिखा है कि-किसी की प्रेरणा से कोई व्यक्ति यदि सत्मार्गगामी होता है तो उसके पुण्य का दसवाँ भाग उस प्रेरक को भी प्राप्त होता है। इस प्रकार यदि कोई व्यक्ति अनेक व्यक्तियों को सन्मार्गगामी बनाने के कार्य में प्रवृत्त हो जाय तो उन लोगों के सुकृतों का दशांश पाकर इतना अधिक पुण्य लाभ कर सकता है जितना अपनी अकेली साधना से किसी भी प्रकार सम्भव न होता। बीमा कम्पनी के एजेन्टों को एक रिन्यूअल कमीशन मिलता है। बीमेदार का बीमा जब तक चलता रहेगा तब तक उस बीमे को कराने वाला एजेन्ट घर बैठे अपना कमीशन बीमा कम्पनी से पाता रहेगा। शुभ कर्मों में दूसरों को प्रेरित करना भी एक प्रकार की बीमा एजेन्सी लेना है, इसमें एक बार का प्रयत्न, चिरकाल तक पुण्य लाभ कराते रहने वाला फलदार वृक्ष सिद्ध होता है।
अपने परिवार के आत्म-कल्याण प्रेमियों को हम दोनों की सलाह देते रहते हैं। आत्मावलम्बन के लिए गायत्री उपासना, जप, ध्यान, पुरश्चरण आदि की साधना करनी चाहिए और आत्म सिंचन के लिए अपने- अपने क्षेत्र में ज्ञान प्रसार का कोई न कोई कार्य अवश्यमेव करते रहना चाहिए। हमें हमारे जीवन के लिए भी यही कार्यक्रम अपनाने का दैवी आदेश हुआ है तद्नुसार हम निष्ठापूर्वक एक स्थिर कार्यक्रम में संलग्न हैं। हमारे परिजनों के लिए भी यही मार्ग श्रेयस्कर हो सकता है। आज चारों और और अज्ञान फैला हुआ है, कुविचारों और कुकर्मों की बाढ़ आई हुई है। धन की तृष्णा और इन्द्रिय लिप्सा सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है। इन प्रवृत्तियों की रोक थाम करने के लिए जनता की अन्तरात्मा में प्रसुप्त पड़ी हुई सद्भावनाओं को जगाना पड़ेगा। इस जागरण का शंखनाद करने के लिए सद्भावनायुक्त सत्पुरुषों की बड़ी भारी आवश्यकता है। आज की स्थिति में इस युग धर्म के लिए, समय की पुकार के लिए अपना समय देना गुफाओं में रह कर योग साधना करने से किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण कार्य नहीं है। गायत्री माता और यज्ञ पिता की उपासना के साथ भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिये काम करने का कार्यक्रम ऐसा है जिसमें आत्मावलम्बन और आत्मसिंचन के दोनों उद्देश्य पूर्ण होते हैं और अपना तथा संसार का भला करते हुये जीवन लक्ष प्राप्त करने का मार्ग सरल होता है।
अपनी आत्मा का कल्याण करने के लिए हमें अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने के साथ साथ आध्यात्मिक साधना तथा लोक सेवा के दो महान कर्त्तव्यों को भी पूरा करना है। लोक सेवा के अनेक कार्य हैं, सभी का महत्व है, पर साँस्कृतिक पुनरुत्थान का लोक सेवी कार्यक्रम ऐसा है जिसकी महानता अन्य सभी कार्यक्रमों से अधिक है। गरीबी और बेकारी के लिए उद्योग का विकास होना चाहिए, अस्वस्थता और दुर्बलता निवारण के लिए पौष्टिक खाद्य और व्यायाम का प्रसार होने की आवश्यकता है। सरकार पंचवर्षीय योजनाओं द्वारा बहुत से उपयोगी कार्य प्रारम्भ कर रही है। अनेक संस्थाएं, राजनैतिक पार्टियाँ अपने-अपने ढंग से जनता की सुख-सुविधाओं को बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील है। ये सभी कार्य सराहनीय हैं। अच्छी भावना, अच्छी बुद्धि और अच्छी प्रक्रिया के साथ प्रारम्भ किया हुआ प्रत्येक कार्य उत्तम ही होता है। इन उत्तम कार्यों में सर्वोत्तम कार्य यह है जिसके ऊपर मनुष्य जाति का आधार और भविष्य निर्भर है। भावना की दृष्टि से यदि राष्ट्र गिरा हुआ रहेगा तो शारीरिक, आर्थिक, बौद्धिक, राजनैतिक, दृष्टि से होते हुए भी सुखी रहना संभव न हो सकेगा। निकृष्ट भावनाओं, पतित विचारधाराओं वाले मनुष्य आत्म अभ्यास, आत्मगौरव तथा आत्मज्ञान खो बैठते हैं फलस्वरूप उनकी साँसारिक उन्नतिशीलता गरम तवे पर पानी का बूंदों की तरह नष्ट हो जाती है। और उनके हिस्से में केवल क्रोध ही शेष रहता है।
इसलिए सब प्रकार की उन्नति एवं सब प्रकार लोक सेवा में सर्वश्रेष्ठ जनसाधारण की मानसिक स्थिति को व्यवस्थित करना है, इसी का नाम साँस्कृतिक पुनरुत्थान है। इसी के कारण हम लोग भूतकाल में महान थे और इसी आधार पर भविष्य में अपने खोये हुए गौरव को प्राप्त करने में समर्थ हो सकेंगे। हम लोगों के लिए इसी कार्यक्रम की भूमिका को सम्पादन करना उचित होगा।
गत मास की अखण्ड-ज्योति में साँस्कृतिक पुनरुत्थान की व्यवहारिक योजना प्रस्तुत की जा चुकी है। बीस सूत्री कार्यक्रम विस्तार पूर्वक बनाया जा चुका है। उन्हें कार्यान्वित करने के लिए हमें जन साधारण के सामने अपनी संस्कृति की उपयोगिता सिद्ध करनी पड़ेगी क्योंकि यह बुद्धि प्रधान युग है किसी को कोई बात तर्क, प्रमाण, उदाहरण, विज्ञान, आदि के आधार पर उपयोगी सिद्ध नहीं कर दी जाती तब तक केवल प्राचीनता के आधार पर उसे मानने के लिए तैयार नहीं किया जा सकता। किसी व्यक्ति को किसी तथ्य के संबंध में यदि गहरी मनोभूमि तक प्रभावित कर दिया जाय तो वह उस पर अमल करने को तत्पर हो सकता है। एक प्रकार का वातावरण बना देने पर ही कई व्यक्ति प्रभावित होते हैं और उस दिशा में चलने को उत्साहित हो जाते हैं। स्पष्टतः स्थूल से सूक्ष्म की शक्ति अधिक है। पहले हर वस्तु विचार रूप में होती है फिर क्रिया रूप में आती है। काम विचार का ही फलितार्थ है। पहले कोई बात विचार भूमिका में आती है और तत्पश्चात् अवसर पाकर वह कार्य रूप में परिणत हो जाती है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान की प्रक्रिया पहले जनसाधारण के बुद्धि क्षेत्र में संचारित करनी पड़ेगी तभी उसका कार्यरूप में परिणत होना संभव हो सकेगा।
(1) भारतीय संस्कृति की महत्ता और उपयोगिता प्रतिपादन करने के लिए तर्क, प्रमाण, विज्ञान, उदाहरण, लाभ आदि के आधार पर गंभीर अन्वेषण करना।
(2) उस अन्वेषण के निष्कर्षों को वाणी तथा लेखनी द्वारा जनता के मस्तिष्क में गहराई तक प्रवेश कराना।
(3) स्वयं उन आदर्शों के अनुकूल चलने का प्रयत्न करना और दूसरों को उस मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहन देना।
यह तीन ही कार्य क्रम ऐसे हैं जिनकी आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुसार अनेक प्रकार के आयोजन किये जा सकते हैं। (1) सभाओं द्वारा इन तथ्यों का प्रचार (2) साप्ताहिक, पाक्षिक या पारिवारिक सत्संगों का जगह-जगह आयोजन करके उन विचारों का विस्तार (3) समय-समय पर व्यक्तिगत वार्तालाप द्वारा उन विषयों की चर्चा (4) इन विषयों पर खोजपूर्ण समस्त साहित्य की रचना (5) उन पुस्तकों को स्वयं मंगा कर लोगों को पढ़ कर बताते रहने की सेवा व्यक्तिगत रूप से उसी प्रकार करते रहना जैसे कोई चलता-फिरता पुस्तकालय कर सकता है। (6) ऐसे साहित्य को बेचने के लिए उसी प्रकार फेरी लगाना जिस प्रकार ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए अमीर तथा ऊंचे अफसर भी पैसे दो-दो पैसे की पुस्तकें बेचने निकलते हैं और इसमें कोई शर्म न समझकर एक परमार्थ समझते हैं। (7) षोडश संस्कारों में से जितने संस्कार आसानी से हो सकें उन्हें अधिक लोगों के घरों में कराने की ऐसी व्यवस्था करना जो अधिक खर्चीली न हो (8) त्यौहारों पर सामूहिक सभाएं करना और उस पर्व की महत्ता को समझाना (9) ऐसे पण्डित और उपदेशक तैयार करना जो संस्कार, त्यौहार, कथा, प्रवचन आदि द्वारा उन साँस्कृतिक रहस्यों को भली प्रकार समझा सकें। (10) जप यज्ञ आदि के सामूहिक आयोजन करना (11) गायत्री मन्त्र लेखन तथा नियमित उपासना पर अधिक बल देना (12) समय-समय पर ऐसे शिक्षण शिविरों का आयोजन जिनमें शिक्षार्थियों को साँस्कृतिक पुनरुत्थान के संबंध में सभी बातें भली प्रकार समझाई जावें (13) संगीत, प्रदर्शनी, एकाँकी नाटक, वार्ता, प्रदर्शन, मैजिक लालटेन, कीर्तन, कथा, प्रवचन, प्रतियोगिता, गोष्ठी सभा आदि द्वारा साँस्कृतिक सिद्धान्तों की ओर लोगों की चित्त वृत्तियाँ मोड़ना! (14) कार्यक्रमों की पूर्ति के लिए आर्थिक व्यवस्था करना इस प्रकार के कार्यों में हम सब लोग विशेष रुचि लें और अपनी परिस्थिति के अनुसार जो कार्य बन सके उसके अनुसार अपने-अपने क्षेत्र में कार्य आरम्भ करें तो निश्चय ही बहुत कार्य हो सकता है। हमारा परिवार इतना बड़ा है कि यदि सब लोग सच्चे मन से इस दिशा में कदम उठावें तो आशाजनक कार्य हो सकने में सफलता मिल सकती है।
साँस्कृतिक प्रचार हमारा मुख्य कार्यक्रम होना चाहिए। धर्म का संदेश अधिक से अधिक विस्तृत जन समुदाय तक पहुँचाने के लिए जो जितना परिश्रम एवं त्याग कर सकता हो उतना अवश्य ही करना चाहिए। मथुरा का केन्द्र इस दिशा में बहुत कार्य करने जा रहा है। (1) घोर परिश्रमपूर्वक साँस्कृतिक महत्ता को प्रतिपादन करने वाला अनुसंधान (2) उन सिद्धान्तों को फैला सकने वाले कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण (3) कठोर साधनाओं तपश्चर्याओं द्वारा वह शक्ति उत्पन्न करना जिससे यह महान साँस्कृतिक अभियान सफल हो सके। प्रधान रूप से यह तीन कार्यक्रम मथुरा में आरम्भ होने जा रहे हैं। इनके और भी सहायक कार्य समय-समय पर होते रहेंगे।
मनुष्य जीवन के उत्तरदायित्व को पूर्ण करने के लिए, आत्मकल्याण के लिए साँस्कृतिक पुनरुत्थान की पुनीत लोक सेवा में हम सब को प्रयत्नशील होना है। हम अपने सभी परिजनों को इस युग परिवर्तनकारी राष्ट्र निर्माण कार्य के लिए आह्वान करते हैं। हम लोग कंधे से कंधा मिलाकर इस दिशा में कार्य संलग्न होंगे और एक आदर्श की स्थापना करेंगे ऐसी भागवत प्रेरणा हमें प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है।
महान कार्य ही जीवन के सदुपयोग के प्रतीक हैं। उसका मनुष्य जीवन सफल है जो जीवन को सत्कार्यों में लगा सके। पेट पालने में तो पशु और कीड़े मकोड़े भी प्रवीण होते हैं। मनुष्य जन्म इससे ऊँचे कार्य करने के लिए प्राप्त होता है। अपना और दूसरों का कल्याण करने में जिसकी प्रवृत्ति है समझना चाहिए कि वही मनुष्य मनुष्य जन्म की महत्ता को समझ सका है। आइये हम सब मनुष्य जीवन का महत्व समझें और उसे माता के चरणों में अर्पण करके अपने को धन्य बना दें।
पशु अपना पेट पालने, अपनी इन्द्रिय लिप्साएं पूरी करने के लिए जीता है। मनुष्य को पशु से ऊंचा सिद्ध करने वाली विशेषता यह है कि वह आत्मकल्याण के महत्व को पहचानता है और इसके लिये सर्वोपरि साधन-परोपकार-को अपनाता है। जो मनुष्य परमार्थ से परोपकार से-लोक सेवा से -उदासीन हैं उन्हें पशु ही मानना चाहिये। धनवान विद्वान, बलवान, रूपवान होने से किसी व्यक्ति को कुछ भी महत्व नहीं बढ़ता, केवल वह कुछ मौज-मजा अधिक कर सकता है पर इससे उसकी महानता में कोई वृद्धि नहीं होती है। जिसका धन, ज्ञान, बल, चातुर्य, पद, समय दूसरों को ऊँचा उठाने में, राष्ट्र, समाज और धर्म का उत्कर्ष करने में नहीं लगता, वह अपने लिए कितना ही बड़ा क्यों न बने, विवेक की दृष्टि से वह नितान्त तुच्छ और नीच ही रहेगा। आज ऐसे नरपशुओं की कमी नहीं है जो धन की तृष्णा और इंद्रिय लिप्सा इन दो बातों के अलावा तीसरी बात पर विचार नहीं करते। पशु तो पेट भर जाने पर और इन्द्रिय तृप्ति हो जाने पर शान्ति के लिए विश्राम करता है पर इन्हें तो जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त दिन-रात इसी गोरख धन्धे में लगना पड़ता है। काम चलाऊ साधन सामग्री जिन्हें उपलब्ध है ये भी तृष्णा से पागल मृग की तरह हर समय तृष्णा और वासना के रेतीले प्रदेश में कुलांचे भरते रहते हैं। इन्हीं बाल क्रीड़ाओं में जब जीवन लीला समाप्त हो जाती है, काल की कराल ढ़ाढ़ें उन्हें चबाने लगती तब वे सोचते हैं कि मनुष्य जन्म जैसे महान सुअवसर के साथ हम कैसी खिलवाड़ करते रहे और भव बन्धनों से छुटकारा पाने का कैसा अमूल्य अवसर हाथ से गंवा दिया। कहते हैं कि मृत्यु के समय हजार बिच्छुओं के काटने के समान पीड़ा होती है, उसका कारण शारीरिक कष्ट नहीं वरन् वह मानसिक वेदना है जो मनुष्य जैसे सौभाग्य को व्यर्थ गंवा देने के कारण होती है।
प्राचीन काल में भारत भूमि का प्रत्येक व्यक्ति इस तथ्य को भली प्रकार जानता था। इसलिए कितने ही व्यक्ति आजीवन ब्रह्मचारी रह कर अपनी आवश्यकताएं नहीं बढ़ने देते थे और अनेकों पारिवारिक झंझटों से निश्चिन्त रह कर परमार्थ कार्यों में लगे रहते थे। जो गृहस्थ में प्रवेश करते थे वे पहला लड़का समर्थ होते ही उसे छोटे भाई बहिनों की जिम्मेदारी सौंप कर समाज सेवा में प्रवृत्त होने की तैयारी करने लगते थे। जब गृह व्यवस्था का भार बच्चे उठा लेते थे और अपनी तैयारी परिपक्व हो जाती थी तब संन्यास ले लेते थे। इस प्रकार राष्ट्र को अनेकों अनुभवी कार्यकर्त्ता बिना वेतन दिये ही मिल जाते थे और उनके प्रयत्नों से इस देश का वातावरण सदा उन्नतिशील रहता था। आज लोग लोभ मोह में इतने निमग्न हो गये हैं। कि घर वाले तिरस्कार करते हैं। उनकी कोई उपयोगिता नहीं समझते तो भी अपनी टाँग अड़ाना अपनी मालिकी चलाना नहीं छोड़ते। परमार्थ की बात तो दूर आयु जैसे-जैसे समाप्त होती जाती है। वैसे-वैसे ही उनकी तृष्णा और वासना दूनी होती जाती है। स्वार्थ से बाहर की किसी बात पर ध्यान ही नहीं जाता। लोक सेवा की बात, आत्मकल्याण की बात उन्हें उपहासास्पद मालूम पढ़ती है। ऐसी पशुवृत्ति जिस समाज में घुसी हुई हो उसको कल्याण की आशा करना कठिन ही है।
यदि हम भारत भूमि को अवनति के गर्त में गिरने से रोकना चाहते हैं। और प्राचीन काल की विशेषताओं की पुनः प्रतिष्ठापना करना चाहते हैं तो प्राचीन काल की उस परम्परा को भी जागृत करना पड़ेगा जिसके अनुसार लोग अपने जीवन का अधिकाँश भाग लोग सेवा के लिए समर्पण करते थे। सच्चे, आत्मत्यागी मनुष्य ही अपनी सच्चाई, अनुभवशीलता और त्यागवृत्ति के कारण दूसरों को प्रभावित करने एवं ऊँचा उठाने में समर्थ हो सकते हैं। नौकरी या फीस के उद्देश्य से उपदेश की बात करने वाले पेशेवर लोगों के लैक्चर चाहे कितने ही धुँआधार क्यों न हों उनका वास्तविक प्रभाव किसी पर भी नहीं पड़ता। वे केवल जनता का मनोरंजन कर सकते हैं, कानों की खुजली मिटा सकते हैं। राष्ट्र निर्माण ऐसे लोगों से नहीं हो सकता। जनता का मानसिक स्तर ऊँचा उठाने के लिये संकल्पवान, भावनावान, निष्ठावान तपस्वी और कठोर परिश्रम में संलग्न व्यक्तियों की आवश्यकता है। इन गुणों के आधार पर ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान सम्भव हो सकेगा। आज आलसी, हरामखोर, कामचोर, घोर स्वार्थी, मानसिक दृष्टि से अपाहिज लोग ही अधिकाँश में साधु बाबाजी बने घूमते हैं। इनसे कुछ आशा करना बालु में से तेल निकालने की बराबर है। अब ऐसे साधुओं की आवश्यकता है जो वेष न रंगे पर मन को गहरे रंग में रंग डाले और युग परिवर्तन जब कभी भी हुआ है ऐसे ही आत्म त्यागी लोगों के द्वारा हुआ है।
भारत में सांस्कृतिक पुनरुत्थान करने का महान कार्य करने के लिये आत्मदान देने वाले लोगों की आवश्यकता है। बिना बलिदान के ऐसे कार्य पूर्ण नहीं होते। प्राचीन काल में जब वर्णाश्रम जीवित था लोग अपने जीवन का बहुत थोड़ा भाग साँसारिक कार्यों में लगा कर शेष को परमार्थ के लिये अर्पण कर देते थे। इस प्रकार कोटि-कोटि सत्पुरुषों के जीवन पुण्यों की श्रद्धाँजलि माता के चरणों पर चढ़ती रहती थी। साँस्कृतिक सुरक्षा के लिये एक बड़ी सेना स्वयमेव संगठित होती रहती थी और समय-समय पर जो विकृतियाँ उत्पन्न होती रहती थीं उनका तत्काल सुधार होता चलता था। अब वह पद्धति टूट गई। सुयोग्य लोक सेवी आगे आना बन्द हो गये। ऐसे लोक सेवियों के लिये जनता ने आदर तथा सुदृढ़ निर्वाह व्यवस्था पहले ही कर रखी थी। मन्दिर, मठ, सदावर्त, अन्न क्षेत्र, धर्मादे, मिष्ठादान, दक्षिणा आदि में लाखों करोड़ों रुपया इन्हीं लोगों के निर्वाह के लिये नियत था। साधु, सन्त, महात्मा पण्डित, पुरोहित, पुजारी, गुरु आदि के लिये जनता के मन में अपार श्रद्धा भी थी। इस प्रकार इस लोक सेवी सेना का सब कार्य व्यवस्था पूर्वक चलता रहता था। जब सच्चे अधिकारी लोगों ने में आना बन्द कर दिया तो एक बड़ा सुविधा जनक स्थान खाली देखकर हराम खाऊ धूर्त लोगों की भीड़ दौड़ पड़ी और उन पुनीत स्थानों पर कब्जा करके अपनी बुराइयों से समाज को भी बुरा बनाने में लग गये। हमारे अधः पतन का एक बहुत बड़ा कारण यह भी है। लाखों व्यक्ति जिस रचनात्मक कार्य में पूर्ण तत्परता के साथ लगे रहते थे वह रचना तो बन्द हो गई उलटे जड़ खोदने वाली नकली भीड़ उलटे कार्य करने के लिए वहाँ आ गई। ऐसी दशा में अवनति का होना स्वाभाविक था।
अब नये युग का सूत्रपात करने के लिये आत्म-त्यागी, आत्म-बलिदानी सच्चे साधु कर्मवीरों की आवश्यकता है। पिछले दो तीन अंकों में अखण्ड ज्योति द्वारा इस संस्था की यही पुकार उद्घोषित की जा रही है। नरमेध का अर्थ ऐसे ही पुनीत कार्यों के लिये अपने जीवन को समर्पण करना है। इस कसौटी पर अपने आपको कसवाने में लोगों को झिझक लगती है। साधु हो जाना सहज है क्योंकि उसमें सब प्रकार की जिम्मेदारी छोड़ कर निरुद्देश्य? स्वेच्छाचारी जीवन बिताने और हर जगह भोजन तथा मान पाने की सुविधा रहती है। पर सच्चे साधु बनने में तो आदमी को पसीना बहाना पड़ता है। साधुता की परीक्षा देनी होती है, और समाज के कष्ट को अपना कष्ट, दूसरों के हित को अपना हित मान कर चलना पड़ता है। जिम्मेदारी और परिश्रम से डर कर तो साधु ही बने थे। यदि उसमें भी वही दोनों बातें सिर पर आ पड़ें तब उनको साधु होने से क्या फायदा हुआ। भगवान का भजन तो आदमी हर स्थिति में कर सकता है, गृहस्थ में भी वह सब हो सकता है। भजन के लिये घर त्यागने की कोई जरूरत नहीं है। कपड़े रंगना और घर त्यागना तो लोकसेवा के व्रत का प्रतीक है। इस प्रतीक के उद्देश्यों को जो पूर्ण करते हैं वस्तुतः उन्हीं की साधुता वास्तविक कही जा सकती है। अन्यथा कोई भजन के बहाने कोई किसी बहाने आराम की निर्द्वन्द्व जिन्दगी बनाने का अवसर ढूँढ़ते ही रहते हैं और वे जिन्हें मिलना होता है उन्हें मिल भी जाता है। यह एक संयोग की ही बात है, साधुता बिल्कुल दूसरी बात है। साधु का हृदय इतना कोमल होता है कि वह जन समाज की दुर्दशा देख कर आँसू बहाये बिना नहीं रहता, उनकी पीड़ा से पीड़ित हुये बिना नहीं रह सकता और धर्म, समाज, राष्ट्र एवं आत्मा के कल्याण के लिए कठोर कर्त्तव्य पालन करने के निमित्त अपना सर्वस्व त्याग करने के लिये तत्पर हो जाता है।
साँस्कृतिक पुनरुत्थान यदि हमें अभीष्ट है तो उसके लिये नारद और दधीच जैसे आत्मत्यागियों को आगे आना होगा। नये युग के लिए नये प्रकार के सन्तों की आवश्यकता है। मालपुआ खाने वाले और पैर पुजाने वालों की नहीं, अब भागीरथ के समान ज्ञान गंगा का अवतरण कराने वाले तपस्वियों की पुकार है। सच्चे आत्म त्यागी सदा ही बहुत थोड़े होते रहे हैं पर होते हर युग में रहे है। यदि न होते तो धर्म की रक्षा और संस्कृति की सुव्यवस्था अब तक बनी न रही होती। जब धर्म की ग्लानि, और अधर्म का अभ्युत्थान होता रहा है वे दुष्कृतों को विनाश करने और साधुता का परित्राण करने के लिये ईश्वरीय प्रेरणा का संसार में आगमन होता रहा है। उस प्रेरणा से प्रेरित होकर अनेक जागृत आत्माएं उस ईश्वरीय उद्देश्य को पूर्ण करने में लग जाती है। हम देखते हैं कि इस प्रकार की प्रेरणा और भावनाएं आज अनेक व्यक्तियों के हृदय में काम कर रही हैं। पिछले दिनों इस सम्बन्ध में जब से व्यवस्थित कार्यक्रम बनाया जा रहा है तब से अनेकों पुण्य आत्माएं इस दिशा में कार्य करने के लिए तैयारी करने में लगी हुई हैं। ऐसे कितने ही पत्र हमारे पास आये हुए हैं जिनमें चिरकाल से केवल भजन और एकान्त सेवन करने वाले महात्मा अब अपनी साधना का प्रधान अंग धर्म प्रचार को बनाने वाले हैं। कई ऐसे व्यक्ति जो पारिवारिक उत्तरदायित्व को पूर्ण कर चुके हैं, पैंशन पा रहे हैं, जिनके बाल बच्चे घर का काम सम्भाल रहे हैं अथवा जिनकी स्थायी आमदनी है कि आश्रितों का काम भली प्रकार चलता रह सकता है, अब अपना पूरा समय देश की मनोदशा सुधारने की साधना में लगाने के लिये कटिबद्ध हो रहे हैं। योगियों और साधकों की साधनाएं अनेक प्रकार की होती हैं, इन सब साधनाओं में आज के युग के उपयुक्त साँस्कृतिक पुनरुत्थान की साधना है। क्योंकि उसमें आत्मा का कल्याण वैसा ही होता है जैसा हठयोग, जपयोग लययोग, प्राणयोग आदि द्वारा होना सम्भव है। अपने कल्याण के साथ संसार का भी कल्याण होने से यह साधना दुहरे पुण्यफल का हेतु बन जाती है। इस प्रकार यह अन्य साधनाओं की अपेक्षा दूना सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली है। यह सोच के विचारवान आत्मत्यागी, भागवत भक्त, परमार्थ प्रेमी, विरासत एवं साधुता की ओर अग्रसर होने वाले कर्त्तव्यपरायण साधु बनने में अधिक महानता देख रहे हैं। निवृत्त प्रधान एकान्तवासी महानुभाव उस मार्ग को बदल कर इस अत्युत्तम कार्यक्रम की उपयोगिता स्वीकार करने जा रहे हैं।
कुछ ऐसे सज्जनों के भी पत्र हमें मिले हैं जो अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को लगभग पूर्ण कर चुके हैं परन्तु घर रह कर ही इस साँस्कृतिक साधना को करना चाहते हैं क्योंकि अभी कुछ महत्वपूर्ण घरेलू काम करने उन्हें शेष रह गये हैं। तीसरे प्रकार के वे लोग हैं जिनका उत्साह इन कार्यों के लिए बहुत भारी है परन्तु परिवार के कारण पोषण की जिम्मेदारी अपने ऊपर रहने के कारण आजीविका सम्बन्धी कार्यों को करते रहना भी आवश्यक है। वे अपने बचे हुए समय को इस सेवा कार्य में लगाने के उत्सुक हैं। विद्यार्थी वर्ग विद्याध्ययन करते हुए साँस्कृतिक ज्ञान उपार्जन करने को उत्सुक मालूम पड़ता है। कुछ महिलाओं के पत्र भी ऐसे आये हैं जिनकी अधिक उपयोगिता उनके परिवार में नहीं है। बच्चों का बोझ भी उन पर नहीं हैं, इसलिए अपने को भगवान के चरणों में अर्पण करके अपने जीवन को सफल बनाना चाहती हैं।
इन प्रस्तावों से हमारा हृदय प्रसन्नता से भर जाता है। ऐसा लगता है कि कोई ईश्वरीय प्रेरणा हमारे भीतर ही नहीं हमारी ही शाँति अनेक आत्माओं के भीतर अपना कार्य कर रही है और उन्हें ऐसे मार्ग पर चलने के लिये तैयार कर रही है जिससे भारत भूमि के प्राचीन गौरव की प्रतिष्ठापना का साँस्कृतिक पुनरुत्थान का महान कार्य पूर्ण हो सके। भावना इन सभी की एक है पर परिस्थितियों के कारण समय और अवसर सबका समान नहीं। इसलिए जिनको जैसा अवसर है उनको उसी श्रेणी में रखने और ही कार्यक्रम देने का निश्चय किया गया है। साधारणतया इनकी श्रेणियाँ इस प्रकार रखी जा रही हैं-
(1) आत्म-त्यागी- जो अपने समय शरीर और मन वचन कर्म को ज्ञान ओर परमार्थ के निमित्त-समाज और धर्म के निमित्त-गायत्री और यज्ञ के निमित्त-सर्वतो-भावेन अर्पण करें। शेष जीवन को इन्हीं कार्यों के निमित्त लगायें। ऐसे लोगों का पारिवारिक जिम्मेदारियों से पूर्ण मुक्त होना आवश्यक है। ऐसे लोगों को एक प्रकार का संन्यासी सर्वत्यागी माना जायेगा।
(2) आत्म-दानी- जो कमाने की चिन्ता से मुक्त हैं, पर घर की देख भाल रखना जिनके जिम्मे शेष हैं वे मन से अपने को धर्म के निमित्त अर्पण करते हैं परन्तु इस आशा के साथ कि संस्था उन्हें अपना मान लेने के उपरान्त पारिवारिक व्यवस्थाओं को भी एक उपयोगी कार्य मान कर उचित समय तक अपने प्रतिनिधि के रूप में काम करने देगी। ऐसे लोग अपने घर की व्यवस्था की सामान्य देख भाल करते हुए अपना शेष समय अपने निकटवर्ती क्षेत्र के कार्य करने के लिये लगाते रह सकते हैं। जिस प्रकार कन्या का दान कर देने के बाद भी वह पिता के घर में सहयोग करती रह सकती है, उसी प्रकार आत्मदानी अपने जीवन का प्रधान कार्य लोक सेवा समझते हुए, साधारण गृह व्यवस्था करते रह सकते हैं। ऐसे लोगों को वानप्रस्थी कहा जा सकता है।
(3) आत्म-सेवी - पारिवारिक जिम्मेदारी को पूरा करते हुए कुछ न कुछ समय नियमित रूप से साधना के लिए तथा जन सेवा के कार्यों में लगाते रहना। जिस प्रकार शरीर का, परिवार का एवं अर्थ व्यवस्था का ध्यान रखा जाता है उससे कम ध्यान लोक सेवा का न रखा जाय। ऐसे लोग सद्गृहस्थ एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान सेना के सैनिक तथा स्वयं सेवक कहे जा सकते हैं।
(4) आत्म-निर्माता- अपने अनुभव एवं ज्ञान को स्वाध्याय तथा आत्म चिन्तन द्वारा ऐसा बनाना कि सुसंस्कृत समाज का अपने आपको एक महत्वपूर्ण अंग सिद्ध कर सकें। अपने आपको इस प्रकार के गुण कर्म और स्वभाव का बना सकें कि जिसे देख कर लोग यह समझ सकें कि सुसंस्कृत संस्कारित व्यक्ति किस प्रकार के होते हैं। विद्यार्थी वयोवृद्ध, रोगी, कन्याएं, महिलाएं आदि इस श्रेणी वे लोग आते हैं जिनको अधिकतर जन समाज से अलग रह कर एक सीमित क्षेत्र के काम करना होता है। महिलाएं अपनी सहेलियों में अथवा किसी विवाह उत्सव में जाने पर उत्तम विचारों का प्रसार कर सकता है, उपरोक्त चार श्रेणी पुरुषों की भाँति परमार्थ प्रेमी महिलाओं की भी हो सकती हैं।
हमारे पास सुयोग्य महिला कार्यकर्त्रियाँ नहीं हैं। इसलिए स्त्रियों के लिए कोई व्यापक योजना नहीं बन पा रही है क्योंकि हम सदा से इस बात के पक्षपाती हैं कि स्त्रियों और पुरुषों के कार्य क्षेत्र अलग-अलग रहने चाहिये। स्त्रियों में स्त्रियाँ ही काम करे जिससे कभी किसी विकृति की सम्भावना न रहे। अभी अखण्ड-ज्योति सम्पादक की माता जी, धर्म पत्नी तथा बहिन ने मिल कर योजना बनाई है कि अखण्ड-ज्योति प्रेस तथा कार्यालय का कार्य ऐसा है जो घर के भीतर हो सकता है। इस कार्य को स्त्रियाँ भी आसानी से कर सकती हैं। पुरुष इस कार्य को छोड़ कर अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के लिये बाहर रहें और इस संस्था का आदि से अन्त तक पूरा कार्य महिलाएं ही सम्भाल लें। जिस प्रकार आत्म त्यागी पुरुष अपना जीवन दान देकर समाज सेवा करेंगे, उसी प्रकार इस छोटे क्षेत्र में रह कर महिलाएं भी देश-व्यापी ज्ञान प्रसार का महान कार्य प्रेस प्रकाशन एवं लेखन के द्वारा कर सकती हैं।
जो महिलाएं पारिवारिक उत्तरदायित्वों से मुक्त हो चुकी हैं अथवा जिनका विचार पारिवारिक उत्तरदायित्व में प्रवेश करने का नहीं है ऐसी शिक्षित महिलाएं यदि ब्रह्मचर्य, शील और सदाचारपूर्वक जीवन लगाना चाहें और अध्यात्म साधना, स्वाध्याय, यज्ञ, व्रत तथा ज्ञान प्रसार के कार्यों के लिये शेष जीवन को देना चाहें तो मथुरा में उनको इस परिवार में भर्ती किया जा सकता है। थोड़े समय श्रम करने से वे अपने निर्वाह खर्च तो बड़ी आसानी से वहाँ ही उपार्जित कर सकती हैं। एक दो ऐसी अशिक्षित देवियों के लिये भी गुंजाइश हो सकती है जो शारीरिक श्रम में उत्साही हों और घरेलू काम काजों में हाथ बंटा लिया करें। इच्छुक महिलाएं- इस पते पर पत्र व्यवहार कर सकती हैं। श्रीमती भगवती देवी धर्मपत्नी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा।
उपरोक्त चारों प्रकार के परमार्थ परायण व्यक्तियों के समुचित पथ प्रदर्शन एवं सहयोग की व्यवस्था की जायगी। किसी को नौकरी पाने या आर्थिक लाभ मिलने की आशा नहीं करनी चाहिए। जो अपनी आर्थिक जिम्मेदारियों तथा व्यक्तिगत चिन्ताओं से जितने मुक्त हैं, उनके लिये उतना ही यह सेवा मार्ग सुविधा जनक होगा। गायत्री माता से कुछ साँसारिक लाभ पाने के लोभी नहीं, उनके चरणों पर अपनी सामर्थ्य को अर्पण करके अपने को धन्य मानने वाले त्यागी ही इस दिशा में ठीक प्रकार कदम उठा सकते हैं। आत्म दानी, आत्म सेवी, आत्म निर्माता तीन श्रेणी के व्यक्ति अपना संकल्प घर रह कर ही कर सकते हैं और अपनी परिस्थितियों के अनुसार साधना तथा सेवा का कार्य आरम्भ कर सकते हैं, पर आत्म-त्यागियों का कार्यक्रम दूसरा ही होगा। उनके संकल्प को समारोहपूर्वक घोषित किया जायेगा। एक बड़ा विशाल नरमेध यज्ञ अगले वर्ष हम करने जा रहे हैं। इसमें कोई मनुष्य काट कर हवन नहीं किया जायेगा पर वह अपने मन, बुद्धि, प्राण, जीवन, इच्छा, आकाँक्षा आदि को परमार्थ के लिए-यज्ञ भगवान के लिये आहुति देता हुआ संकल्प करेगा। नरमेध यज्ञ के बारे में लोगों की बड़ी भ्राँतियाँ हैं, उन्हें निवारण करने और उस और उस वैदिक संस्कृति के महान उपकरण को प्रत्यक्ष करने के लिये यह आयोजन किया जा रहा है। उस युग में आत्म त्यागी लोग समाज सेवा के लिए जीवन अर्पण करते थे। उनका शुभ संकल्प समारोह पूर्वक यज्ञ भगवान की साक्षी में उद्घोषित होता था, ताकि उसकी सफलता अधिक सुनिश्चित हो जाय। वह पद्धति बहुत दिनों से भ्रम एवं अज्ञान के गर्त में चली गई। अब उसे पुनः प्रकट करने के लिए साँस्कृतिक पुनरुत्थान के महान आयोजन के साथ प्रारम्भ किया जा रहा है। नरमेध यज्ञ में अपनी आहुतियाँ देते हुए हम लोग इस अभियान के लिए अग्रसर होंगे। चित्तौड़ की रानियों ने जलती हुई चिताओं में अपने शरीरों को धर्म रक्षा के लिए अर्पण किया था। हम साँस्कृतिक पुनरुत्थान के धर्म यज्ञ में प्राचीन महानताओं की प्रतिष्ठापना के लिये अपने मन, वचन, कर्म की सर्वस्व की आहुतियाँ देने को बढ़ेंगे। यही नरमेध यज्ञ है। इसका आयोजन विशाल पैमाने पर अगले वर्ष होगा। इसमें आत्मबलि देने वाले हुतात्मा न मिलें ऐसा नहीं हो सकता। भारत भूमि निर्वीय नहीं हुई है। ऋषियों की सन्तान के रक्त में अभी जीवन बाकी है। दधीच, सुनिशेष, भागीरथ, नारद, आदि की परम्परा नष्ट हो गई ऐसा कहने को न मिलेगा। भारत भूमि त्यागी वीरों के लिए प्रसिद्ध रही है। नरमेध में अपनी आहुति देने के लिये भी कुछ न कुछ हुतात्माओं के मन में अन्तः प्रेरणा उत्पन्न होगी और नरमेध में आहुतियाँ पड़ेंगी। श्री तारकेश्वर झाँ का संकल्प पिछले महीने अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित हो चुका है और भी कुछ संकल्प शीघ्र ही सामने आ रहे है ऐसा हमें स्पष्ट दीखता है।
धर्म और संस्कृति के लिये जीवन दान देना आराम तलबी छोड़कर घोर परिश्रम करने का व्रत लेना, स्वार्थ को तिलांजलि देकर परमार्थ के लिये अपनी आहुति देना, यह सब कोई साधारण त्याग नहीं है। ऐसे त्यागियों का समुचित सम्मान करना उनके व्यक्तित्व का नहीं वरन् उस त्याग भावना और कर्म वीरता का मान करना है। निश्चय किया गया है कि जीवित रहते उनके पुनीत व्रत के सम्बन्ध में समुचित जानकारी जनता को कराई जायेगी। उनके चित्र, मनोभाव एवं कार्य जनता के सम्मुख लाये जायेंगे और उनका स्वर्गवास होने के बाद उनके सचित्र जीवन वृत्तान्त, प्रवचन एवं कार्य अत्यन्त सुन्दर पुस्तकों के रूप में प्रकाशित किये जायेंगे। चूँकि आत्मत्यागियों का घर एक प्रकार से गायत्री तपोभूमि ही होगा, इसलिये उनके शरीर की समाधि स्मारक वहाँ बनाया जायगा। यह स्मारक मूल्यवान कलापूर्ण और चिरस्थायी बनाये जायेंगे। उन पर स्वर्गीय आत्मा का जीवन वृत्तांत धातुओं के अक्षरों में जड़ा रहेगा। यह स्मारक यहाँ आते रहने वाले लाखों धर्मप्रेमी यात्रियों को चिरकाल तक एक प्रकाश एवं सन्देश देते रहेंगे। ऐसे आत्म-त्यागियों की कभी मृत्यु नहीं होती। दधीच की हड्डियाँ मात्र गई हैं उनका यश तब तक नहीं मर सकता जब तक इस संसार में सूर्य चन्द्र मौजूद हैं। इन हुतात्माओं का भी कार्य लगभग वैसा ही होगा। तद्नुसार उन्हें वैसा ही श्रेय मिलना भी स्वाभाविक है। इस युग में नरमेध यज्ञ नया ही हो रहा है, इसका कौतूहल देखते ही जनता नहीं आवेगी वरन् सच्ची बात यह है कि युग प्रवाह के विपरीत परमार्थ के लिए इस प्रकार का यह विलक्षण त्याग देखने को ही जन समूह उमड़ेगा। नरमेध में आहुति देने वाले हुतात्मा व्यक्ति ही वस्तुतः जनता के आकर्षण-केन्द्र होंगे। साँस्कृतिक पुनरुत्थान का महान कार्य ईश्वरीय प्रेरणा से हो रहा है। वह भगवान के सुनिश्चित विधान के अनुसार पूर्ण होकर रहेगा। प्रश्न केवल श्रेय का है। जिनकी आत्मा को प्रभु यह श्रेय देने की सोच रहे होंगे, उन्हीं के अन्दर वे ऐसी प्रेरणा भी करेंगे।
परिस्थिति और योग्यता के अनुकूल इनके कार्यक्रम भी भिन्न ही होंगे। सबके कार्यक्रम एक से नहीं हो सकते वह तो पत्र व्यवहार एवं परामर्श से तय होंगे। आत्म-त्यागी और आत्म-दानियों के संकल्प मथुरा में ही स्वीकार किये जायेंगे। आत्म-सेवा और आत्म-निर्माता अपने संकल्प पत्रों से भी भेज सकते हैं। जब नरमेध यज्ञ होगा तब इस सेना के सैनिकों का परिचय छापने के लिए अखण्ड-ज्योति का एक विशेषाँक भी प्रकाशित किया जायेगा।
इन पंक्तियों के द्वारा हम ऋषि रक्त के अन्दर छिपे हुए त्याग तत्व को आह्वान करते हैं। ऐसा त्याग जिस आत्मा में भी, जहाँ भी, जिस स्थिति में भी मौजूद हो, हम चाहते हैं कि वह वहीं से बोले, वहीं से उठे, वहीं से चमके और अपनी परिस्थिति के अनुरूप वहीं से कार्य आरम्भ कर दे। युग निर्माण की इस बेला में बलिदानों की आवश्यकता है जो जितना कर सकता हो उसे उतना करने के लिये लाभ और वासना पर काबू करके इस पुनीत मार्ग पर अग्रसर होना चाहिये।
गायत्री संस्था के सदस्य प्रत्येक नवरात्रि में यथा सम्भव अपनी पूजा में कुछ न कुछ अभिवृद्धि करते हैं। जिन्हें अधिक अवसर है वे इन दिनों जप, हवन, उपवास, मौन, तप, दान आदि के अधिक आयोजन करते हैं। जिन्हें कम अवसर है वे भी अपनी परिस्थितियों के अनुसार उपासना का कोई न कोई विशेष कार्यक्रम बनाते हैं। आश्विन की नवरात्रि समीप है। उसके सम्बन्ध में निम्न सूचनाएं हैं-
(1) उपासना की नवरात्रि में पूरे नौ दिन होते हैं। तिथियों के घटने बढ़ने से नवरात्रि घटती बढ़ती नहीं। इस बार दो प्रतिपदा हो जाने से एक दिन बढ़ा है पर उपासना ता. 27 सितम्बर चन्द्रवार से आरम्भ होकर 5 अक्टूबर मंगलवार तक ही रहेंगी। इन नौ दिनों में जो साधना की जाय उसकी पूर्णाहुति अन्तिम दिन की जा सकती पर यदि उतना समय न हो तो दसवें दिन 6 अक्टूबर को भी हवन कर लें।
(2) इन दिनों अपना आचरण, व्यवहार, आहार, विहार अधिकतम शुद्ध और सात्विक रखना चाहिये। बुराइयों से जितना अधिक बच सकना सम्भव हो उतना प्रयत्न करना चाहिए। इन नौ दिनों ब्रह्मचर्य तो रखना ही चाहिए। उपवास करना जिनके लिए सम्भव हो वे वैसा करें। अन्यथा मिर्च, मसाले, उत्तेजक, गरिष्ठ, राजसिक और तामसिक वस्तुओं को तो हटा देना ही चाहिए। सादा सरल, सुपाच्य, कम मात्रा में, अधिक शुद्धतापूर्वक भोजन की व्यवस्था अपनी परिस्थिति के अनुसार करनी चाहिए। जो अब तक कुछ भी साधना नहीं करते उन्हें, भी नवरात्रि में थोड़ी बहुत गायत्री उपासना अवश्य करनी चाहिये।
(3) कुछ तपश्चर्याएं भी इन दिनों करने योग्य हैं जैसे (अ) भूमि या तख्त पर शयन (ब) चमड़े की वस्तुओं का त्याग (स) अपनी शारीरिक सेवाएं स्वयं करना, कपड़े धोना, हजामत बनाना, भोजन बनाना आदि कार्यों में दूसरे मनुष्यों की सेवा न लेकर इन सब कार्यों को स्वयं ही करना। मौन, एकान्त सेवन, ब्रह्मचर्य, पशुओं की सवारी पर न बैठना, स्वाध्याय, आत्मचिन्तन, उपासना आदि तप करने से मन तथा शरीर की विशेष शुद्धि होती है।
(4) नौ दिन में 24 हजार गायत्री मन्त्र जप का लघु अनुष्ठान बहुत ही उत्तम है। प्रतिदिन 23 माला जप करने से यह पूरा होता है। इतना जप करने में कम से कम 2 घण्टा और अधिक से अधिक 4 घण्टे लगते हैं। प्रातः काल एक ही बार अथवा प्रातः साँय दोनों समय करके इतना जप कर लेना कुछ अधिक कठिन नहीं है।
(5) नौ दिन में 108 पाठ गायत्री चालीसा के करने में प्रतिदिन 12 पाठ होते हैं। इसमें करीब डेढ़ दो घण्टे लगते हैं।
(6) नौ दिन में 2400 मन्त्र का भी एक अनुष्ठान हो सकता है। प्रतिदिन 265 मन्त्र लिखे जाते हैं। यह करीब 4 घण्टा प्रतिदिन का काम है।
(7) अनुष्ठान करने वाले यदि पूर्व सूचना दे देंगे तो उनकी साधना का संरक्षण, पथ प्रदर्शन, तथा विधि-विधान में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन मथुरा में किया जाता रहेगा। इससे अनुष्ठान की पूर्णता अधिक सुनिश्चित हो जाती है। जो सज्जन अपना हवन स्वयं न कर सकते हों उनकी सूचना आने पर उनके निमित्त शास्त्रोक्त हवन गायत्री तपोभूमि में कर दिया जायेगा।
(8) अनुष्ठान के अन्त में हवन के अतिरिक्त कुछ दान पुण्य ब्राह्मण भोजन आदि करना भी आवश्यक होता है। पुण्य वाली छोटी गायत्री प्रचार पुस्तिकाओं का वितरण अन्नदान आदि से उत्तम है। साधारणतया ज्ञान की पुस्तकें अनुष्ठान कर्त्ताओं को वितरण करें तो ब्राह्मण भोजन और प्रसाद वितरण की आवश्यकताएं पूर्ण हो सकती हैं।
(9) (अ) जिन सज्जनों ने ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न किया है उनके लिये अनेक धन्यवाद, (ब) जुलाई का गायत्री अंक अब बिल्कुल समाप्त हो गया है, उसे भेजने में लाचारी है, (स) गायत्री मन्दिर की इस मास की सहायताएं अगले मास छपेंगी।
पिंजरे का पंछी पिंजरे में, वन का पंछी वन में था; एक बार दोनों मिल बैठे, क्या विधना के मन में था?
वन पंछी बोला, भाई, दोनों वन में रहें चलो। पिंजरे वाला बोला, आओ भाई इसमें रहो-पलो॥
वनवासी ने कहा, नहीं मैं नहीं बंधूँगा बन्धन में। पिंजरे वाला बोला, कैसे, मैं निकलूँ बीहड़ वन में?
बन का पंछी बाहर बैठा, गाता था जंगल के गीत, पिंजरे वाला रटे-रटाये, पढ़ता था, दोनों विपरीत;
वन पंछी ने कहा कि भाई, गाओ तो जंगल के गीत। पिंजरे वाला बोला भाई, तुम्हीं सीख लो मेरा गीत॥
वन-पंछी ने कहा, मुझे, वे तौर-तरीके नहीं भाते। पिंजरे वाला बोला, मुझको, वन के गीत नहीं आते॥
आसमान नीला विस्तृत है, बाधा का कुछ काम नहीं, पिंजरे वाला बोला, पिंजरा बन्द, रन्ध्र का नाम नहीं,
भर उड़ान देखो मेघों में वन का पंछी बोल उठा। अनुभव करो जरा संयम-सुख पिंजरे वाला डोल उठा॥
वन पंछी ने कहा, किन्तु, उड़ने का यहाँ सुपास कहाँ। पिंजरे वाला बोला, मेघों में, रुकने की आस कहाँ?
एक दूसरे की खातिर, बेचैन मगर मिलना दूभर, तीली में से चोंच डालकर रह जाते थे छू-छू कर;
मन का दरद जताना चाहा, लेकिन कुछ जतला न सके। पड़े रहे लाचार फड़कते, पास-पास पर आ न सके॥
पिंजरे की खिड़की पर था, सन्देह इधर इन आँखों में। और झिझक थी आसमान से, हाय उधर उन पाँखों में ?
*समाप्त*
(श्री रविन्द्रनाथ ठाकुर की एक कविता का अनुवाद)