(श्री॰ चन्द्र ‘प्रयाग’)
जगमग जीवन ज्योति निराली।
वह जीवन क्या जहाँ न जीवन की परिभाषा, वह मानव क्या जहाँ न मानवता की आशा, जग जाएं जन, जागरुक हो जीवन की गति, देश धर्म की ममता ही हो मानव की मति वही सफल जीवन है, जिसने जग भर की पीड़ा अपनाली॥
जगमग जीवन ज्योति निराली।
वही मनुज है जिसने मन को मानवता का पाठ पढ़ाया, वही मनुज है जिसका गौरव जगती के कण कण ने गाया, भूले और त्रस्त राही को जिसने सच्ची राह दिखाई, तल तिल गला स्वयं पर जिसने जग को जीवन सुधा पिलाई, दोनों की सेवा कर नर ने नारायण की पदवी पाली॥
जगमग जीवन ज्योति निराली। एक बार फिर अन्धकार में, मानव महा प्रकाश दिखादो, सोये नर के तन में नारायण का सेवा भाव जगा दो, पृथ्वी के कोने कोने में, जीवन का सुहाग चमका दो, चाहे जलना पड़े स्वयं पर डरो न, दीपक ज्योति जला दो, महाज्योति से ज्योति मिलादो, मिट जाये ममता तनवाली॥
जगमग जीवन ज्योति निराली
(स्वामी शिवानन्दजी महाराज)
अपना कर्त्तव्य पालन करता हुआ एक भंगी भी ईश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकता है, यदि वह फल की इच्छा न रखता हुआ कर्तापन के अभिमानरहित होकर अपने सारे कार्य और उनके फल ईश्वरार्पण कर देता है। जीवन के किसी भी आश्रम में हर एक मनुष्य को ईश्वर−प्राप्ति सम्भव है। हिन्दू धर्म में यही सौंदर्य है।
जो मनुष्य संकल्पों और राग द्वेष से मुक्त है और जिसको आत्मज्ञान है वह निष्कर्म अवस्था को प्राप्त हुआ कहा जा सकता है। यदि कोई परमात्मा के लिये कर्म करता है तो उसके लिये कर्म−बन्धन नहीं है, ईश्वर−बुद्धि से कर्म करते रहने से उसका चित्त शुद्ध हो जाता है।
जो डाक्टर अस्पताल में काम करता है, उसे समझना चाहिये कि सारे रोगी एक भगवान् ही के अनेक रूप हैं, उसे सोचना चाहिये कि यह शरीर परमात्मा का चलता फिरता मन्दिर है और अस्पताल बड़ा मन्दिर वृन्दावन या अयोध्या है। उसे समझना चाहिये कि मैं अपने सारे कार्य अपने प्रभु की प्रसन्नता के लिये कर रहा हूँ, अपने अपने अधिकारियों की प्रसन्नता के लिये नहीं। अपने भले−बुरे सारे कार्य ईश्वर के चरणों में अर्पण करके, ‘ॐ तत्सत् कृष्णार्पणमस्तु’ या ‘ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु’ कार्य के अन्त में और सोते समय कहना चाहिये, यही ज्ञानाग्नि है जो कर्मों के फल को भस्म करके चित्त−शुद्धि, आत्म ज्ञान और मोक्ष प्राप्त करा देती है, उसे स्वप्न में भी यह नहीं सोचना चाहिये कि मैंने अमुक सत्कर्म किया है मुझे स्वर्ग में उच्च पद प्राप्त होगा। या अगले जन्म में धनवान बनूँगा। इस प्रकार के निरन्तर अभ्यास से वह धीरे−धीरे अनासक्ति योग को प्राप्त कर लेगा, अपने गृहस्थ−कार्य करती हुई स्त्री को भी यही मानसिक भावना रखनी चाहिए। इस प्रकार से सारे कार्य अभ्यास रूप बनाये जा सकते हैं। ये सब देव−पूजा बन जाते हैं, यदि ठीक−ठीक मानसिक भावना से कार्य करे तो हर एक मनुष्य जीवन की किसी भी अवस्था में ईश्वर−प्राप्ति कर सकता है। ऐसा हरगिज न सोचो कि मैंने उस मनुष्य की सहायता की है। यही सोचो कि उस मनुष्य ने मुझे सेवा करने का अवसर दिया है और सेवा ने मेरी चित्त−शुद्धि में सहायता की है, मैं उस मनुष्य का आभारी हूँ। कुंभक करके दो घण्टे तक श्वास रोक लेना, चौबीस घण्टे माला फिराना, जबान का तन्तु कटवा कर खेचरी मुद्रा कर के जमीन के नीचे कोठरी में बिना भोजन किये चालीस दिन तक समाधि में बैठ जाना, गर्मी के जलते हुये सूरज में एक टाँग से खड़े रहना, दोपहर के सूर्य की ओर त्राटक करना, सुनसान अकेले जंगलों में ‘ॐ ॐ’ चिल्लाना, संकीर्तन करते हुये आँसुओं का समुद्र बहाना, इन सब बातों से कोई लाभ नहीं हो सकता, जब तक सारे जीवों में परमात्मा के लिये तड़पाता हुआ प्रेम न हो और सारे जीवों में ईश्वर−सेवा करने की अधिक चाहना न हो। आजकल के साधक इन दो आवश्यक गुणों में शून्य पाये जाते हैं और यही कारण है कि वे एकान्त में ध्यान करके भी उन्नति प्राप्त नहीं करते। मैंने अपने इस जीवन के अनुभव में अनेकों भक्तों को देखा है, जिनके गले में और कलाइयों पर छह माला के कण्ठे पड़े रहते हैं, और हाथ में लम्बी जप माला होती है और दिन−रात ‘हरे राम हरे कृष्ण’ कहते रहते हैं। ये भक्त मरते हुए रोगी के निकट कभी नहीं जायेंगे, उसको एक बून्द पानी या दूध नहीं देंगे, उसको कभी नहीं पूछेंगे कि भाई तुम क्या चाहते हो, मैं तुम्हारी सेवा किस प्रकार कर सकता हूँ। तमाशा देखने के लिये दूर से खड़े हुए उसको देखते रहेंगे। क्या आप इन लोगों को सच्चे भक्त और वैष्णव कह सकते हैं, क्या उनके भजन और ध्यान से जरा−सा भी लाभ हो सकता है। वह ईश्वर−प्राप्ति की आशा कैसे कर सकते हैं, जब सारे जीवों में परमात्मा को देखने के लिये उनकी आँखें खुली हैं, और इन सारे रूपों में उसकी सेवा करने के लिये उसके हृदय में भाव नहीं है। हर एक की अनन्त प्रेम से सेवा करो, कर्तापन का अभिमान न करो और फल की इच्छा न करो, आप ईश्वर की सेवा है। काम पवित्र है, कर्म की दृष्टि से कोई काम नीच नहीं है। टट्टी साफ करने का भी काम यदि ठीक−ठीक मानसिक भाव से किया जावे तो वह भी ईश्वर−प्राप्ति के लिये योग−क्रिया बन जायगा।
जिस मनुष्य की बुद्धि में भ्रम हो जाता है, अहंकार से वह आत्मा को अपना शरीर मन प्राण और इन्द्रियाँ समझ लेता है और शरीर इन्द्रियों के सारे गुण आत्मा में आरोप करता है। इसलिये वह अज्ञान से समझता है कि मैं करता हूँ। असल में प्रकृति के गुण सारे कार्य करते हैं।
जो मनुष्य समाज की सेवा करता है वह असल अपनी ही सेवा करता है। जो मनुष्य दूसरों की सहायता करता है वह असल में अपनी सेवा करता है, यही बड़ी जरूरी बात है। जो मनुष्य आपको सेवा के लिये अवसर देता है उसका बड़ा अहसान मानो।
जब आप दूसरों की सेवा करो तो बड़बड़ाओ मत बल्कि सेवा करके प्रसन्न हो सेवा के लिये तैयार रहो। सेवा के लिये अवसर ढूंढ़ो और एक भी अवसर न खोओ। अवसर बनाओ और अच्छी सेवा के लिये क्षेत्र बनाओ। दो घण्टे रोज निष्काम भाव से किसी भी ढंग से सेवा करो। इससे आपका चित्त शुद्ध होगा। याद रक्खो परमात्मा समाज का श्रोता है। सारा संसार विराट् रूप परमात्मा की लीला है। जब आप किसी मित्र से मिल कर उसकी ओर मुसकाते हो तो बदले में मुसकान की आशा रखते हो, जब आप किसी को एक गिलास पानी देते हो तब किसी चीज की बदले में आशा रखते हो। संसार मनुष्य का यह जन्म−सिद्ध स्वभाव है। आशा रहित कार्य करने के लिये आपको अपने मन को कुशलता से धैर्य से साधना होगा, क्योंकि संसारी मनुष्यों के मन मलीन होते हैं इसलिए वह निष्काम कर्म के सच्चे भाव को नहीं समझ सकते। कुछ समय तक तीव्र सेवा करो तब आपको निष्काम कर्म−योग का भाव समझ में आवेगा। यदि आप में सच्ची लगन है और नित्य अपने लक्ष्य को सामने रख कर दृढ़ प्रयत्न करते हो तो लक्ष्य को प्राप्त करने का समय दूर नहीं है।
नया साधक समझता है कि मेरे गुरु ने मुझको नौकर या चपरासी जान रक्खा है। वह मुझसे छोटे−छोटे काम कराते हैं। जिसे मनुष्य ने कर्म योग के महत्त्व को समझ लिया है वह हर एक कार्य को योग−क्रिया या भगवत् पूजा ही समझेगा। उसकी दृष्टि में कोई काम नीच नहीं है। हर एक काम नारायण−सेवा के लिये ही है। कर्म योगी की दृष्टि में सारे कार्य पवित्र हैं। जो साधक संसारी मनुष्यों से अपने को नीच समझते हुए कार्य करने में प्रसन्न होता है, वही शक्ति शाली योगी बनेगा, वह अहंकार और अभिमान से मुक्त रहेगा, उसका पतन नहीं होगा, उसको अभिमान का काँटा नहीं लग सकता।
कर्म योग मन को ज्ञान−प्राप्ति के योग्य बना देता है यह दृष्टिकोण को विशाल करता है और एकता के मार्ग में सारी बाधाओं को दूर कर देता है। चित्त शुद्धि के लिये कर्मयोग बड़ा प्रभावशाली साधन है।
जब दूसरों की भलाई करना मनुष्य−जीवन का अंग बन जाता है तब उसमें जरा−सी भी स्वार्थभावना नहीं रहती वह दूसरों की सेवा और भलाई करके बड़ा प्रसन्न होता है। निःस्वार्थ कर्म करने से उसको आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। स्वार्थरहित सेवा करने से आपका चित्त शुद्ध होता है। अहंकार, घृणा, वैर, ऊँचेपन का भाव और इनके ही समान दूसरे दुर्गुण दूर हो जायेंगे। आप में नम्रता, शुद्ध प्रेम, सहानुभूति, सहनशीलता और दया आ जायगी। जुदाई का भाव जाता रहेगा, स्वार्थ भी दूर हो जायगा। आपका दृष्टिकोण विशाल हो जायगा, आप एकता का अनुभव करने लगेंगे। अन्त में आप आत्म−ज्ञान प्राप्त कर लेंगे, आप सब में एक और एक में सबका अनुभव करेंगे।
प्रायः लोग अधीर हो जाते हैं, और थोड़ी सी सेवा करने के बाद सिद्धियों की आशा करने लगते हैं। सच्चा कर्मयोगी जो विनय और आत्मभाव सहित सबकी सेवा करता है वह संसार का सच्चा स्वामी बन जाता है, सब उसका आदर और सम्मान करते हैं। जितनी अधिक सेवा आत्मभाव सहित आप करोगे उतनी ही अधिक और सामर्थ्य आपको प्राप्त होगी। इसका अभ्यास करो और अनुभव कर लो।
यदि आप इस आध्यात्मिक मार्ग में उन्नति करना चाहते हो तो आपको जीवन पर्यन्त नित्य सब प्रकार की सेवा अवश्य करनी चाहिए तभी आप सुरक्षित रह सकोगे। प्रसिद्ध योगी बन जाने पर भी सेवा करनी न छोड़ो। आपके शरीर की प्रत्येक हड्डी, नस और रोम−रोम में सेवा का भाव भर जाना चाहिए। तभी आप सच्चे कर्मशील वेदान्ती बन जाओगे। क्या भगवान् बुद्ध से बढ़ कर भी कोई वेदान्ती या कर्मयोगी हो सकता है। वह निश्चय ही अद्वितीय आत्मा है। यदि ठीक−ठीक मानसिक भाव से दृढ़ परिश्रम से निस्वार्थ सेवा करो तो आप भी गौतम बुद्ध बन सकते हो।
निष्काम कर्मयोग के अभ्यास में प्रयास निष्फल नहीं होता। कोई हानि भी नहीं होती। पीछे को लौटना भी नहीं पड़ता। इसका थोड़ा−सा भी अभ्यास जन्म−मरण के महान भय से बचाता है। कर्मयोग का फल ज्ञान रूप में आपको मिलेगा और आत्मा का सच्चा सुख मिलेगा।
निरन्तर निष्काम सेवा के अभ्यास में आपका चित्त शुद्ध हो जाय। आप संसार में सुख−शान्ति और आनन्द का विस्तार करने वाले शक्ति शाली योगी बन जाओ। समस्त जीवों के कल्याण में आपको आनन्द मिले। जब कि आप मनुष्य−समाज की सेवा कर रहे हो आपका मन परमात्मा में लगा रहे। आप कर्मयोग की कला और विज्ञान को समझो। आपके सारे कार्य प्रभु की पूजा बनें। कर्मयोग के अभ्यास से इसी जन्म में आप सबको कैवल्य−मोक्ष प्राप्त होवे।
(श्री स्वामी शरणानन्द जी)
अपने कर्त्तव्य से दूसरों के अधिकार को सुरक्षित रखना धर्म है, अर्थात् सेवा के लिए सभी को अपना समझो, किन्तु अपनी प्रसन्नता के लिए केवल सर्व समर्थ भगवान् को ही अपना मानो। ऐसी भावना दृढ़ होने पर एक विचित्र अनुपम बल आ जाता है, जिससे प्राणी कर्त्तव्यपरायण होकर अपने ही में अपने परम प्रेमास्पद भगवान को अनुभव कर लेता है।
मन के दूषित हो जाने पर ही प्राणी दुःखी होता है। पराये दोष न देखने से, किसी का बुरा न चाहने से, संसार को असत्य समझने से, प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करने से मन शुद्ध हो जाता है मन के शुद्ध हो जाने पर व्यर्थ चिन्तन मिट जाता है। व्यर्थ चिन्तन मिटते ही सार्थक चिन्तन अर्थात् स्मरण, चिन्तन, ध्यान, स्वतः होने लगता है। अतः मन को शुद्ध करने के लिए प्राणी को सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये। इसमें हार स्वीकार करना भूल है, क्योंकि मन को शुद्ध करने के लिये प्रत्येक प्राणी सर्वदा स्वतंत्र है। परतंत्रता केवल उपभोग में है, उपार्जन में नहीं।
वर्तमान गतिशील क्षणभंगुर जीवन को सत्य समझना प्रमाद है, जिसे मिटाना चाहिये। प्रत्येक कार्य भगवत् नाते, योग्यता, ईमानदारी तथा परि श्रमपूर्वक करते रहना चाहिये और कार्य के अन्त में सहज भाव से चलते−फिरते उठते−बैठते हृदय से प्रेम पात्र को पुकारना चाहिये। यही सच्चा भजन है।
विचारशील उसी का स्मरण करते हैं, जिसे प्राप्त करना है और सेवा उसी की करते हैं, जिससे छुटकारा पाना है।
अपने को शरीर से असंग कर प्रेमी बन जाओ। शरीर से मिलाकर तो प्रत्येक प्राणी किसी न किसी का प्रेमी बना ही रहता है, परन्तु उसकी प्रीति की वही दशा होती है जो नदी के शुद्ध जल की दशा किसी गड्ढे में आबद्ध हो जाने से होती है। अतः प्रीति जैसे अलौकिक प्रवाह को किसी वस्तु, अवस्था एवं परिस्थिति में आबद्ध मत होने दो। प्रीति का प्रवाह जाग्रत होते ही मन, इन्द्रिय आदि सभी अपने अपने स्वभाव को त्याग कर प्रीतिमय बन जाते हैं। परन्तु यह तभी सम्भव है, जब हम स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों शरीरों से अपने को असंग कर प्रेमी बन जावें। शरीर से असंग होने के लिए विचार के अतिरिक्त किसी अभ्यास की आवश्यकता नहीं है। विचाररूपी−सूर्य उदय होते ही देह−अभिमान−रूपी अंधकार सदा के लिये मिट जाता है।
स्मरण करने योग्य केवल वही है, जिसे सदैव के लिये प्राप्त करना है जिसे प्राप्त करना है वह वास्तव में सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वत्र, सर्वरूप से विद्यमान है, अथवा यों कहो कि सब कुछ उससे ही प्रकाशित है। उसका स्मरण करते ही जगत् का विस्मरण हो जाता है।
जिससे देश−काल की दूरी नहीं होती, उससे केवल न जानने की दूरी होती है। न जानने की दूरी यथार्थ विचार से ही मिटती है, किसी अभ्यास से नहीं।
अभ्यास तो केवल अपनी बनाई हुई आदतों तथा इच्छाओं के परिवर्तन के लिये किया जाता है। भला, बुरा, ऊँचा, नीचा प्राणी अपने को इच्छाओं में आबद्ध करके ही मानता है। प्राणी वास्तव में तत्व में महान् तथा पवित्र है। प्रेम−पात्र का नित्य सखा एवं साथी है। अर्थात् स्वभाव से ही निर्विकार हैं। अतः अपनी इच्छा तथा आदतों से मुक्त होना ही संसार से मुक्त होना है।
मन की शुद्धि अशुद्ध संकल्पों के त्याग करने मात्र से ही हो जाती है। उसके लिये किसी बाह्य अभ्यास की आवश्यकता नहीं होती। बाह्य अभ्यास उन्हीं प्राणियों को करना पड़ता है जो अशुद्ध संकल्पों को सहज भाव से मिटा नहीं सकते।
अशुद्ध संकल्प मिटने पर विवेक उत्पन्न होता है, जिससे मोह की निवृत्ति हो जाती है। मोह मिट जाने पर स्वतः अनुराग की गंगा लहराने लगती है।
प्रथम आगे−पीछे के व्यर्थ संकल्पों का त्याग करो। उसके पश्चात् अशुद्ध संकल्प मिटा दो। फिर शुद्ध संकल्पों द्वारा वर्तमान कार्य कर डालो। कार्य के अन्त में निःसंकल्पता आ जावेगी। ज्यों−ज्यों निःसंकल्पता स्थायी होती जावेगी, छिपी हुई शक्ति का विकास एवं विवेक उत्पत्ति स्वतः होती जावेगी। अतः निःसंकल्पता प्राप्त करना ही प्राणी का पुरुषार्थ है।
उनकी अहैतुकी कृ पा का विधान अलौकिक है। उसे वही प्रेमी जानते हैं जो सब प्रकार से उनके होकर अचिन्त्य हो गए हैं। उसमें बुद्धि के व्यापार के लिये कोई स्थान नहीं है। उनके हो जाने का स्वाभिमान ही उनका परम पुरुषार्थ है। उनका होने पर प्राणी अपना मूल्य संसार से अधिक कर लेता है और अपने से उनका मूल्य अधिक मान लेता है, अर्थात् उनकी कृपा का भरोसा ही उसका मुख्य साधन बन जाता है।
अभ्यास उन्हीं प्राणियों को करना पड़ता है जो अपने से संसार का मूल्य अधिक मानते हैं। जिन्होंने सरल विश्वास तथा गुरुजनों की कृपा से उनके हो जाने का महत्त्व भली भाँति समझ लिया है, उनके लिये कोई अभ्यास शेष नहीं रहता। ऐसा कौन सा दोष है जो उनका हो जाने पर मिट नहीं जाता? ऐसा कौन−सा गुण है जो उनकी कृपा से आ नहीं जाता? यह भली भाँति समझ लो कि अभ्यास का बोझा उन्हीं को उठाना है, जिन्होंने वस्तुओं के बदले में अपने को बेच दिया है।
(श्री अज्ञात)
क्रोध शक्ति की कमी का परिचायक है। मानसिक शक्ति की कमी हो जाने पर क्रोध का वेग विवेक से रुकता नहीं। जब क्रोध आता है तब विवेक दूर भाग जाता है जैसे कि उन्मत्त हाथी जब जंजीर तोड़ लेता है, तो महावत दूर भाग जाता है। क्रोध के द्वारा मानसिक शक्ति का ह्रास भी होता है। कारण और कार्य एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। मानसिक शक्ति की कमी से क्रोध आता है और क्रोध से मानसिक शक्ति की कमी भी होती है। साधारणतया क्रोध दूसरे पर प्रकाशित होता है। उसका लक्ष्य दूसरों की हानि करना होता है। जब वह अपने लक्ष्य में सफल होता है, तो मानसिक शक्ति के ह्रास का शीघ्र पता नहीं चलता किन्तु जिस समय वह अपने लक्ष्य में सफल नहीं होता, वह अपने प्रति ही झीखने लगता है। इस स्थिति में मनुष्य अपने आप को कोसने लगता है। अपनी कमजोरी को बड़ी तीव्रता से अनुभूति करने लगता है। यह अनुभूति आत्म निर्देश बन जाती है जिसके कारण मनुष्य वास्तव में कमजोर और निराशावादी बन जाता है।
क्रोध का आवेश एक बार आने पर साधारण चतुराई के विचारों से वह नियन्त्रित नहीं होता। क्रोध की अवस्था में मनुष्य विक्षिप्त मन हो जाता है, उसकी चतुराई उसके काम नहीं आती। चतुराई साँसारिक दृष्टि का नाम है। क्रोध इससे अधिक प्रबल होता है। क्रोध के रोकने के लिये विशेष दृष्टि की आवश्यकता है। क्रोध उसके रोकने अथवा निराकरण के पूर्व अभ्यास से रुकता है। क्रोध का निराकरण विरक्ति और प्रेम से होता है। यदि संसार के प्रति अमोह का व्यवहार तथा उसके प्राणियों के प्रति मैत्री भावना का अभ्यास मनुष्य ने पहले किया है तो वह अभ्यास क्रोध आने की अवस्था में उसे अविवेकयुक्त काम करने से रोक देता है। क्रोध का स्वभाव है कि यदि वह क्षणभर के लिए रोक दिया जाय, तो वह सब समय के लिए रुक जाता है। विलियम जेम्स का कथन है कि क्रोध आने पर दस तक गिनती कहो तो क्रोध विलीन हो जाता है। क्रोध की अवस्था में हम कभी−कभी बालक जैसा व्यवहार करने लगते हैं−पीछे ऐसे व्यवहार पर ही आत्म ग्लानि होने लगती है, अथवा उन पर हँसी आती है। ऐसा एक बार होने पर कई बार ऐसा ही हम करते रहते हैं। यही जीवन का भारी रहस्य है। बड़े−बड़े विद्वान् जब क्रुद्ध होते हैं, तब अपना सिर आप ही फोड़ने लगते हैं। अपना ही नुकसान करने से उन्हें सन्तोष होता है। इस प्रकार बराबर क्रोध प्रदर्शन करने से उनका स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, तो कितने ही लोग समय से पूर्व ही काल−कवलित हो जाते हैं। इन सब बातों को जान कर भी क्रोध रोके नहीं रुकता। फिर रोकने का उपाय क्या है?
अभिमान की कमी और प्रेम की वृद्धि क्रोध को रोकती है। जिन्हें बातों से अभिमान की वृद्धि होती है, उन्हें त्यागना चाहिए। चापलूसी की बातें सुनने से अभिमान की वृद्धि होती है। अभिमान की वृद्धि मानसिक शक्ति के ह्रास का सूचक है। जिस प्रकार विद्युत−शक्ति के रखने के लिए इन्स्यूलेटर की जरूरत पड़ती है उसी प्रकार मानसिक शक्ति को कायम रखने के लिये इन्स्यूलेटर की जरूरत है। अतएव जिस व्यक्ति को अपनी मानसिक शक्ति कायम रखना है, उसे जान बूझकर प्रतिदिन अपने साथियों से थोड़ी देर के लिए अलग हो जाना चाहिए। उसे सब समय समाज में न रहना चाहिए। समाज के लोगों में उनकी सेवा करने के लिए तथा अपने प्रेम−प्रदर्शन भर के लिए आना चाहिए, पीछे उसे अपने आप में चला जाना चाहिए। जो मनुष्य किसी भारी विचार में लगा रहता है वह सामाजिक कार्यों में उतना ही भाग लेता है, जितना कि अति आवश्यक है। ऐसा करने से वह अपनी मानसिक शक्ति का ह्रास नहीं होने देता। उसके ध्वंसात्मक संवेग पहल से ही निर्बल हो जाते हैं, और अगर वे किसी समय उत्तेजित भी हुए तो वह उन्हें सरलता से काबू में कर लेता है।
समाज में दो प्रकार के व्यक्ति होते हैं—एक वे जो क्षण भर भी अकेले नहीं रह सकते। यदि उन्हें अकेला रहना पड़ जाय तो वह पागल हो जावें, और दूसरे वे जो समाज में आने से डरते हैं। जब तक समाज में रहते हैं सतर्क रहते हैं, सदा उससे भागने की चेष्टा में रहते हैं और जब वे उससे अलग हो जाते हैं तो अपने−आपको सुखी पाते हैं। पहले प्रकार के व्यक्ति बहिर्मुखी कहलाते हैं और दूसरे प्रकार के अन्तर्मुखी। पहले प्रकार के लोग प्रसन्न चित्त दिखाई देते हैं। दूसरे प्रकार के लोग दुखी दिखाई देते हैं पर होते हैं शान्त। पहले प्रकार के लोगों का क्रोध अति प्रबल होता है। वे सभी से अपने प्रसन्न रखे जाने की आशा करते हैं। पर जब यह आशा पूरी नहीं होती तो उनका क्रोध अपरिमित हो जाता है। जब इस क्रोध का प्रदर्शन किसी दूसरे व्यक्ति पर नहीं होता, तो वह निराशा में परिणत हो जाता है। इस तरह समाज में अधिक रहने कि इच्छा क्रोध और निराशा मूलक होती है। यह इच्छा मनुष्य को परावलंबी बनाती है तथा स्वावलंबन को कम करती है। ऐसी ही अवस्था में क्रोध हमें अपने आवेश में उड़ा लेता है। जिस प्रक्रिया से हम स्वावलम्बी बनते हैं उसी से हम क्रोध पर विजय पाते हैं। अंतर्मुखी होना स्वार्थी बनना नहीं है। जो दूसरों की सेवा से बचना चाहते हैं, वे वास्तविक अन्तर्मुखी नहीं हैं वे स्वार्थी हैं। अन्तर्मुखी दूसरों की सेवा करने में सब से आगे और दूसरों से सेवा ग्रहण करने में सब से पीछे रहता है।
प्रत्येक भाव के संस्कार हमारे अदृश्य मन में रहते हैं और इन संस्कारों के अनुसार हमारा आचरण बनता जाता है। जो व्यक्ति अपने मन के कुसंस्कारों को तुरंत मिटा देता है वह बड़ा बुद्धिमान है। क्रोध के संस्कार प्रेम से मिटते हैं। जिसे व्यक्ति के प्रति क्रोध कि या जाय उसके प्रति शीघ्रातिशीघ्र प्रेम प्रदर्शित करना चाहिए। कभी भी अपनी भूल को स्वीकार करना बुरा नहीं है। भूल स्वीकार करने से मन बलवान होता है तथा उसकी भूल करने की प्रवृत्ति जाती रहती है। यहाँ यह सोचना उचित नहीं कि क्रोध जिस व्यक्ति पर किया गया वह तुच्छ है अथवा उससे हमारा कोई प्रयोजन आगे न होगा। हमें दूसरों से कुछ प्रयोजन भले ही न हो अपने आप से तो अवश्य प्रयोजन है। दूसरों के प्रति क्रोध करके हम अपने आपके प्रति अन्याय करते हैं इस अन्याय का प्रतिकार हमें तुरंत करना चाहिए। यदि ऐसा न किया जाय तो अन्याय की प्रवृत्ति प्रतिक्षण बढ़ती जाती है जिसका आगे चलकर भयंकर परिणाम होता है। अन्याय का प्रायश्चित पश्चात्ताप में नहीं है, न्याय में है। दूसरों के प्रति किए अनर्थ का पाप उनकी सेवा करने से दूर होता है। क्रोध का प्रतिकार प्रेम है न कि आत्मग्लानि, वह उसका स्वाभाविक परिणाम है। प्रेम, क्रोध और उसके सभी परिणामों को नष्ट करता है।
—मनुष्य की सचाई का एक मात्र निर्णयात्मक प्रमाण यह है कि वह अपने सिद्धान्तों के लिए सब कुछ स्वाहा कर देने को तैयार रहे।
—साधारण योग्यता को बुद्धिमानी के साथ काम में लाने से प्रशंसा होती है। उससे इतनी सफलता मिलती है जितनी वास्तविक चमक में नहीं होती।
—आत्मविश्वास की कमी ही हमारी बहुत−सी असफलताओं का कारण होती है। शक्ति के विश्वास ही में शक्ति है। जिन्हें अपने ऊपर विश्वास नहीं, वे सबसे अधिक निर्बल हैं, चाहे कितने ही बलवान क्यों न हों।
—“तुम उतने ही जवान हो जितना तुम्हें विश्वास है, और उतने ही बूढ़े हो जितना तुम्हें सन्देह है।”
—“तुम उतने ही जीवन हो जितनी तुम में आत्मदृढ़ता है और उतने ही बूढ़े हो जितना तुम्हें भय है।”
(श्री लालजीराम शुक्ल)
प्रत्येक कार्य की सफलता, हेतु पर निर्भर है—यह आध्यात्मिक विचार का मूल−तत्व है। जिस कार्य का हेतु बुरा है वह कार्य ऊपरी दृष्टि से कितना ही अच्छा क्यों न हो, बुरा ही है। वह मनुष्य का आध्यात्मिक पतन करता है। हमारे कार्यों का हेतु जीवन के आदर्श के ऊपर निर्भर रहता है। आदर्शहीन व्यक्ति के कार्यों के अनेक हेतु होते हैं, आदर्शवान् व्यक्ति के कार्य अनेक होते हुए भी हेतु एक ही होता है, वह है—अपने आदर्श की प्राप्ति।
भारतवर्ष के वर्तमान हिन्दू−समाज में आदर्शहीनता पाई जाती है। यही इस राष्ट्र के पतन का प्रधान कारण है। हम जो कार्य करते हैं, वह अपने लिये करते हैं। उससे दूसरों का क्या लाभ होगा, इस विषय पर हमारा ध्यान नहीं जाता, यह बात अवश्य है कि मनुष्य के प्रत्येक कार्य से किसी न किसी प्रकार समष्टि का लाभ ही होता है, किन्तु जब तक वह लाभ हमारी चेतना के समक्ष हेतु−रूप में नहीं आता, तब तक उस लाभ का श्रेय हमें नहीं। उससे हमारा कोई आध्यात्मिक लाभ नहीं होता।
आज हिन्दू−संस्कृति की यह दशा है कि इसका जीवन ही दूसरों की कृपा पर निर्भर है। कहीं हमारी संस्कृति ने ही तो हमें निर्बल नहीं बनाया? यह विचार चिंतनशील व्यक्ति यों के मन में बार−बार आता है। यदि भारतीय संस्कृति सर्वोच्च है, तो वह अपना संरक्षण अपने आप क्यों नहीं कर सकती? हम दूसरे राष्ट्रों के अधीन क्यों बने हैं? एक अँग्रेज लेखक का कथन है कि जब संस्कृतियों में संघर्ष होता है, तो
निर्बल संस्कृति को सबल संस्कृति धर दबाती है। राजनैतिक विजय, एक संस्कृति की दूसरी संस्कृति के ऊपर विजय करने की एक मुहर लगा देती है। भारत वर्ष एक समय, संसार का आध्यात्मिक गुरु था। आज वह सब प्रकार के विचारों की भिक्षा दूसरों से माँगा करता है। अनेक लोगों का कथन है कि हमारी राजनैतिक पराधीन अवस्था में भी हम संस्कृति की दृष्टि से सब से ऊँचे हैं। क्या इस प्रकार के विचार में कुछ सत्यता है?
हमारा मत है कि जब तक हम अपने आपको स्वतन्त्र नहीं बना लेते, तब तक हम यह नहीं कह सकते कि हम दूसरे लोगों से अच्छे हैं, दास का स्थान स्वामी से हर समय नीचा रहता है। यदि स्वामी का आध्यात्मिक पतन होता है, तो उसके दास का भी साथ साथ हो जाता है। क्या भारतवर्ष के लोग, मन से आधुनिक खून−खराबी न चाहने के कारण, अपने आपको लड़ाई के, हत्या के काम से रोक सकते है? जिस समय भारतवर्ष के आध्यात्मिक ज्ञान का सूर्य चमकता था, उस समय वह स्वतन्त्र राष्ट्र भी था।
मौर्य−काल का इतिहास देखिए। सिकन्दर ने समस्त पश्चिमी राज्यों पर विजय प्राप्त की, पर उसकी हिम्मत भारतवर्ष में व्यास नदी से आगे बढ़ने की न हुई। त्यों-ही वह भारतवर्ष से गया, उसके राज्य का अन्त तुरन्त हो गया। यहाँ तक कि जब वह भारतवर्ष की सीमा पर था, तभी उसने सुन लिया कि उसके द्वारा नियुक्त पंजाब का शासक मार डाला गया जब उसके सेनापति सेल्यूकस ने फिर से भारत पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा की, तो उसे अपने हाथ का राज्य भी खोना पड़ा। इसी काल में चाणक्य कालनूस, मन्दानीस आदि जैसे प्रबल विचार वाले ब्राह्मण और योगी थे। कालनूस ने अपने शरीर को जला दिया, क्योंकि उसे साँसारिक सुखों का प्रलोभन हो गया था। जिस चाणक्य ने महाराज चन्द्रगुप्त को गद्दी पर बिठाया, वह स्वयं एक पर्णकुटी में रहता था। मैगस्थनीज ने भारतवर्ष के आध्यात्मिक विचार करने वालों की सभा का वर्णन किया है, उससे जान पड़ता है कि उस समय भारत−भूमि न सिर्फ कर्मयोगियों की, बल्कि तपस्वी और त्यागी महात्माओं की भी भूमि थी। तब क्या हम यह कह सकते हैं कि इस समय हमारा राजनैतिक पतन होते हुए भी हम आध्यात्मिकता में सर्वोच्च हैं?
हमारे जीवन में बड़े बड़े, ऊँचे−ऊँचे आदर्श दिखाई देते हैं, पर ये आदर्श वास्तव में व्यावहारिक जीवन में किसी प्रकार का अपना प्रभाव नहीं दिखाते। जब तक कोई आदर्श व्यावहारिक जीवन को परिवर्तित या प्रभावित नहीं करता, उसे अपनी कमजोरी छिपाने का एक बहाना मात्र समझना चाहिए। अति उच्च आदर्श होना और आदर्शहीनता मनोवैज्ञानिक दृष्टि से एक ही तत्व के दो पहलू हैं।
हमारे जीवन में आज व्यावहारिक वेदान्त की कमी है। यह व्यावहारिक वेदाँत क्या है? अपनी आत्मा को शरीरबद्ध न मानकर सर्वव्यापी मानना, दूसरे के हित को अपने हित जैसा समझना, समष्टि के हेतु ही जीना−यही व्यावहारिक वेदाँत है। एक तरफ हमारे देश के लोग भारी धार्मिकता दिखाते हैं, दूसरी ओर वे समय पड़ने पर समाज के लिए थोड़े−से भी स्वार्थ का त्याग नहीं कर सकते। बिना स्वार्थ−रूपी बकरे का बलिदान किये, यदि कोई आध्यात्मिक यज्ञ को सफल बनाना चाहता है, तो यह उसकी नादानी है। हमारे देश में आज वेदान्तियों की कमी नहीं है। वास्तव में वेदान्त का पठन−पाठन भी तुच्छ स्वप्न की सिद्धि के लिए होता है। इस प्रकार की प्रवृत्ति मुसलमानों के आगमन के समय ही हमारे देश की, प्रबल हो गई थी, तभी तो यहाँ मुसलमानी यहां स्थापित हो सका। इस प्रकार के पठन−पाठन के विषय में ही कबीरदास ने कहा है—
पंडित और मसालची, डडडडड डडडडड डडडडड औरन को करें चाँदनी, डडडडडड डडडडडड डडडडडड
यह कथन निर्विडडडडड डडडडड डडडडड उत्थान और पतन डडडडड डडडडड डडडडड डडडडड निर्भर है। इस डडडडड डडडडड डडडडड डडडडड अपरोक्ष डडडडड डडडडड डडडडड डडडडड डडडडडडडडडड अंग एक दूसरे पर आश्रित हैं। जिसका बाह्य व्यवहार शुद्ध है, वही आत्म−ज्ञान का अधिकारी होता है और आत्म ज्ञान होने पर बाह्य व्यवहार अपने आप शुद्ध हो जाते हैं—“ज्ञानाग्नि कर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा” बाह्य शुद्ध आचरण एक दृष्टि से अन्तर शुद्धि का प्रतीक मात्र है। हम जिस मनुष्य के व्यावहारिक जीवन में पद−पद पर स्वार्थपरता देखते हैं, उसके विषय में हम कैसे कह सकते हैं, कि उसका आन्तरिक जीवन शुद्ध है। जो व्यक्ति कभी अपने पड़ौसियों, समाज व राष्ट्र के बारे में कोई विचार ही नहीं करता, क्या उसके विषय में यह कहा जा सकता है कि उसके जीवन का लक्ष्य ऊँचा है? हम भारतवर्ष के लोगों में यही बात देख रहे हैं। बिना कर्म के अपरोक्ष अनुभूति लाभ करने की योग्यता किसी व्यक्ति में नहीं आती। इस बात को हमारे देश के पंडित गण भूल गये हैं। गीता का प्रवचन, जीवित शिक्षा न होकर दूर से प्रशंसा करने की वस्तु बन गई है।
मनुष्य को कोई भी कार्य समष्टि के लाभ की दृष्टि से करना चाहिए—यही तो डडडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडड डडडडडडड डडडडड डडडडड डडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडडडड डडडडडडड डडडडडड डडडडडड डडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडड डडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडड डडडडड डडडडडडडड डडडडडडडड डडडडडडड डडडडडडड डडडडडडडड भी लक्ष्य समाज−सेवा है, तो उसे सर्वोत्कृष्ट समझना चाहिए। इस प्रकार का कार्य ही आत्मोद्धार करता है। जिसे समाज में स्वार्थी व्यक्ति ही रहते, हैं, वह अपने आप पतित हो जाता है। जिस समाज में समष्टि −बुद्धि से कार्य करने वाले व्यक्ति रहते हैं वह अपने आप उठ जाता है। मनुष्य अभ्यास का दास है। जो मनुष्य जिस प्रकार की मनोवृत्ति में अभ्यस्त रहता है, वह संकट के समय उसी प्रकार का आचरण करता है। जब स्वार्थ−बुद्धि से अभ्यस्त लोगों को किन्हीं दूसरे लोगों का सामना करना पड़ता है, तो वे परास्त हो जाते हैं, क्योंकि वे एक दूसरे के लिए अत्यन्त त्याग करने में असमर्थ सिद्ध होते हैं। यही किसी देश के राजनैतिक तथा आर्थिक पतन का कारण है।
मनुष्य को चाहिए कि कोई काम प्रारम्भ करते समय उसके हेतु का भली प्रकार से निरीक्षण करे। प्रत्येक काम अपने हेतु के चिन्तन में हमें अभ्यस्त करता है, अतएव काम की मौलिकता उसके हेतु में ही है। विद्वान् पुरुष को चाहिये कि वह अपने जीवन के कार्यों का अन्तिम हेतु स्वार्थ साधन न बनावे। स्वार्थ साधन को अनन्त के प्राप्ति की सीढ़ी माने। मनुष्य का जीवन पानी के बुद-बुदे के समान है, पर उस बुदबुदे का आश्रय अनन्त जल है, हमें इस आश्रय को अपनी कल्पना से अलग न करना चाहिए। सब लोग इस प्रकार के कार्य नहीं करते, जो दूसरों का ध्यान आकर्षित कर सकें, पर सभी लोग ऐसे कार्य कर सकते हैं, जो उन्हें अनन्त से मिलादें, जिनसे उन्हें आत्म ज्ञान और आत्म शान्ति हो। इस प्रकार के व्यक्ति समाज की मौलिक सेवा करते हैं—समाज के लोगों के मन से अपने आचरण द्वारा स्वार्थ बुद्धि को हटाते हैं, धर्म प्रदान करते हैं। उनके संपर्क से वह शक्ति दूसरों में आती है, जिससे वे अपना सर्वस्व समष्टि के उद्धारार्थ निछावर करने के लिये तत्पर हो जाते हैं।
(श्री॰ लक्ष्मीनारायण राजपाली)
डडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडड डडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडड डडडडडडडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडडडडडड डडडडडड डडडडडडडड द्वारा। रजोगुण मारता है, धन के द्वारा और तमोगुण मारता है, स्त्री द्वारा। कामिनी−कंचन−कीर्ति यही त्रिगुण की तिकड़म है। यही तीन निशाचर जीवात्मा का सत्यानाश किया करते हैं।”
पर, जब हम साँसारिक द्वन्द्वों से अपने को पृथक हाथ डडडड, एक क्षण के लिए भी, धाँय−धाँय धधकते डडडडडड, डडडड जगत् के अर्थहीन आडम्बरों का तिरस्कार कर, डडडडडड शान्तिमय निर्जन स्थान में, शान्ति का आवाडडडडड के साथ सहयोग देते हुए, डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड धारा प्रवाह के मूक डडडडड डडडडड डडडडड डडडडड डडडड अस्पष्ट संगीत में और डडडड डडडडड डडडडडड डडडडडड आभास देखते डडडड डडडड डडडडड डडडडड ज्योतिर्मयी छटा का−दिव्य आलोक का−आविर्भाव होता है, जो हमें हमारे दिव्य मय होने का बोध कराता है। निस्सन्देह, कुछ क्षण के लिए हमें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाता है और मन−शरीर−इन्द्रिय जनित विकारों की असत्यता और निरर्थकता का भी पूरा पूरा पता चला जाता है। शान्त चित्त से विचार करने, मनन करने से हमारे हृदय में उन सात्विक विचारों का प्रादुर्भाव होता है, जो आत्मा में एक नई आशा, एक नवीन ज्योति तथा एक दिव्य विभूति का संचार करते हैं। हम में सत्−असत् की यथार्थता को तौलने की शक्ति अंकुरित हो जाती है।
“जिन असार वस्तुओं के लिए माथा−पच्ची की, वह प्रयास बेकार हो रहा, ख्याति पाई, उसमें भी निस्सारता थी, धनोपार्जन किया, वह भी दुरुपयोग में विनष्ट हुआ। सगे साथी−सम्बन्धी सारे−सर्वथा स्वार्थी निकले, विश्वासपात्र मित्रों ने विश्वासघात किया। जिसके प्रेम पाश में फँस कर प्राणों की बाजी लगाई और अपने को मिटाया, उसने विरक्त ता प्रदर्शित की−ठुकराया।”
पर, इस वैराग्य−मय स्थिति में हम अधिक समय तक टिकने नहीं पाते। हमारे विशुद्ध विज्ञान को, दिव्य विचार को, पुनः साँसारिक प्रलोभन, मधुर रूप धारण कर, थपेड़ मारता है, ठेस लगाता है। अमृत के धोखे में हम विष पान करने लग जाते हैं, फलतः शीघ्र ही अपने को भीषण पतन की कन्दरा में गिरा हुआ पाते हैं। “बुद्धिमान पुरुष के भी मन को यह प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ बलात्कार से हर लेती हैं।” हम फिर छोटी छोटी वस्तुओं की, साधारण चिन्ताओं की, मामूली झगड़ों की तथा सारहीन आकाँक्षाओं और अर्थहीन आशाओं−निराशाओं की उधेड़−बुन में विनष्ट होने लगते हैं।
पर, क्या ऐसा ही सदा होता रहेगा? जब हमें संसार के ही मध्य रहना है−जीवन नाटक में नाट्य रचाना है−तो क्या हमें सदा अस्थायी और सारहीन वस्तुओं का ही आश्रय ग्रहण करना पड़ेगा? आशा निराशा के भँवर में चक्कर खाते रहना पड़ेगा? अथवा, संसार चक्र में रहते हुए भी, क्या हम उसके मध्य में शान्ति−आनन्द का स्थान प्राप्त कर सकते हैं?
योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा अपनी दिव्य वाणी गीता में बताये हुए जिन तीन साधनों के सहारे हम अपने को अनन्त आनन्द की ओर अग्रसर कर सकते हैं, वे साधन पाठकों के हितार्थ यहाँ प्रस्तुत किये जाते हैं (1) इन्द्रिय भोग के विषयों में आसक्त न होना, (2) कर्मफल की इच्छा न रखना, और (3) सदा सर्वदा सत्य आत्मा में ध्यान। संक्षेप में तीनों साधनों पर क्रमशः विचार करते हैं।
प्रश्न साधन निरन्तर अभ्यास तथा रोग द्वारा उपलब्ध हो सकता है।
“जो कोई अनित्य वस्तु में आसक्त और उसके आगमन में हृष्ट होता है, वह उसके नाश या अभाव में दुखी और व्यथित होता है। इस अवस्था को अज्ञान कहते हैं। अज्ञान से अनश्वर आत्मा का सनातन भाव और अन्वय आनन्द घिर जाता है, केवल क्षणस्थायी भाव और वस्तु में मत्त होकर रहता है, उसके नाश के दुःख से शोक सागर में निमग्न होता है।”
पर, इन्द्रिय भोग के विषयों में इस प्रकार आसक्त तथा आच्छन्न न होकर “जो विषय के सब स्पर्शों को सहन कर सके, अर्थात् जो द्वन्द्व की प्राप्ति करके भी सुख दुख, शीत उष्ण, प्रिय अप्रिय, मंगल अमंगल और सिद्धि असिद्धि में हर्ष और शोक का अनुभव कर समान भाव से प्रफुल्ल चित्त और स्मित—वदन रह सके, वही पुरुष राग द्वेष से मुक्त होता है और अज्ञान का बन्धन काट कर सनातन भाव और आनन्द की प्राप्ति करने में समर्थ होता है,—अमृतत्वाय कल्पते।”
दूसरा साधन है—कर्मफल की इच्छा न रखना। “योगस्थ होकर, आसक्ति परित्यागपूर्वक, सिद्धि और असिद्धि में समान होकर तुम कर्म का अनुष्ठान करो चित्त की इस समता का ही नाम योग है।” यह प्रश्न उठ सकता है कि अपेक्षा कृत अच्छे−बुरे का विचार करके कार्य करने से, पाप के भय से पुण्य के लिए कठिन चेष्टा की आवश्यकता के कर्म करना मुश्किल हो जाता है। किन्तु जो मुक्त पुरुष अपनी बुद्धि और इच्छा को भगवान् के साथ युक्त कर चुका है वह इस द्वन्द्वमय संसार में पाप और पुण्य दोनों का परित्याग कर देता है। निस्सन्देह “जो ज्ञानी पुरुष फलकामना का परित्याग करके भगवान् से साथ युक्त होकर कर्म करते हैं वह जन्म बन्धन से मुक्त हो जाते हैं एवं उसी परमपद को प्राप्त होते हैं जहाँ शोक−दुःखमय मानव−जीवन की यंत्रणा का भोग नहीं करना पड़ता।”
“संसारबद्ध अज्ञानी व्यक्ति कीचड़ से भरे हुए जल के समान कामना के सामान्य वेग से विचलित हो उठते हैं, योगी चेतना के विशाल समुद्र के समान है, वह सभी समय समुद्र की भाँति पूरित होता रहता है तथापि वह आत्मा की विराट शान्ति में स्थिर और निश्चल है, समुद्र में जैसे जल प्रवेश करता है, वैसे ही संसार की समस्त कामनाएँ उसमें प्रवेश कर जाती हैं—तथापि उसे कोई कामना नहीं होती, वह तनिक भी विचलित नहीं होता। साधारण व्यक्ति ‘मैं, मेरा, इन सब दुखदायक भावों से भरे रहते हैं, किन्तु योगी पुरुष सर्व व्यापक आत्मा के साथ एक होकर रहता है, एवं उसमें ‘मैं’ मेरा’ का भाव नहीं होता। वह दूसरों की तरह कार्य तो करता है किन्तु वह सारी कामना, सारी लालसा को छोड़ चुका है। वह परम शान्ति पाता है, बाह्य दृश्यों से कभी विचलित नहीं होता। वह परमात्मा के अन्दर अपनी क्षुद्र ‘अहंता’ को निर्वासित कर देता है, वह उसी एकत्व में निवास करता है, एवं मृत्युकाल में उसी ब्राह्मी स्थिति में रहते हुए ब्रह्म निर्वाण लाभ करता है।”
तीसरा साधन−ध्यान अत्यन्त उपयोगी होने के साथ साथ अत्यन्त कठिन है। यह साधन अपने व्यक्ति त्व को सत्य आत्मा के रूप में देखने के सतत् अभ्यास पर निर्भर है—उसके लिए निरन्तर प्रयास की आवश्यकता है। यह साधन कुछ समय निकाल कर किया जा सकता है। “शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं—ऐसे अपने आसन को, ने बहुत ऊंचा और न बहुत नीचा स्थिर स्थापन करके—उस आसन पर बैठ कर, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में करके, तथा मन को एकाग्र करके, अन्तःकरण की शुद्धि के लिये योग का अभ्यास करे। काया, शिर और ग्रीवा को समान और अचल धारण किए हुए दृढ़ होकर, अपने नासिका के अग्रभाग को देखकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ, ब्रह्मचर्य के व्रत में स्थिर रहता हुआ, भयरहित तथा अच्छी प्रकार शान्त अन्तःकरण वाला और सावधान होकर, मन को वश में करके, मेरे में लगे हुये चित्त वाला और मेरे परायण हुआ स्थित होवे। इसे प्रकार आत्मा को निरन्तर परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ, स्वाधीन मन वाला योगी, मेरे में स्थित−रूप परमानन्द पराकाष्ठा−वाली शान्ति को प्राप्त होता है।
‘जिस अवस्था में योग के अभ्यास से निरुद्ध हुआ चित्त उपराम हो जाता है, और जिस अवस्था में (परमेश्वर के ध्यान से) शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा, परमात्मा को साक्षात् करता हुआ, सच्चिदानन्द घन परमात्मा में ही संतुष्ट होता है तथा इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है उसको, जिस अवस्था में स्थित हुआ यह योगी भगवत् स्वरूप से चलायमान नहीं होता है, और (परमेश्वर की प्राप्ति रूप) जिस लाभ को प्राप्त होकर, उससे अधिक दूसरा (कुछ भी) लाभ नहीं मानता है, और (भगवान् प्राप्तिरूप) जिस अवस्था में स्थित हुआ योगी, बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता है, और जो दुःख रूप संसार के संयोग से रहित है (तथा) जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग, न उकताए हुए चित्त से अर्थात् तत्पर हुए चित्त से, निश्चयपूर्वक करना कर्त्तव्य है।”
इसलिए मनुष्य को चाहिए कि ‘संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेषता से अर्थात् वासना और आसक्ति −सहित त्याग कर और मन के द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सब ओर से अच्छी प्रकार वश में करके, क्रम−क्रम से (अभ्यास करता हुआ) उपरामता को प्राप्त होवे तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके (परमात्मा के सिवाय और) कुछ भी चिन्तन न करे।”
परन्तु जिसका मन वश में नहीं हुआ उसको चाहिए कि यह स्थिर न रहने वाला और चंचल मन जिस कारण से साँसारिक पदार्थों में विचरता है, उसे उससे रोक कर, (बारम्बार) परमात्मा में ही निरुद्ध करे। क्योंकि जिसका मन अच्छी प्रकार शान्त है (और) जो पाप से रहित है (और) जिसका रजोगुण शान्त हो गया है, ऐसे इस सच्चिदानन्द−घन ब्रह्म के साथ एकीभाव हुए योगी को अति उत्तम आनन्द प्राप्त होता है।” और वह ‘पाप रहित योगी इस प्रकार निरन्तर आत्मा को (परमात्मा) में लगाता हुआ, सुखपूर्वक परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति−रूप अनन्त आनन्द को अनुभव करता है।
(श्री ज्वालाप्रसाद गुप्ता, एम. ए )
परम दयालु पिता परमात्मा ने सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर हमें इस लिये नहीं प्रदान किया है कि हम अपनी आवश्यकताएँ, लालसाएँ, वासनाएँ तथा तृष्णाएँ दिन प्रतिदिन बढ़ाते जावें और उनकी पूर्ति के साधन में अहिर्निश परेशान रहने में ही सारा समय व्यर्थ गँवा दें। मनुष्य जीवन का पवित्र उद्देश्य यह है कि जीव अपने बुद्धि ओर विवेक को जागृत करके चिर संचित कुसंस्कारों से अपने चित्त को शुद्ध करके जाति, समाज तथा देश की सेवा करे और अपने आदर्श चरित्र और सत्कार्यों द्वारा संसार के सामने उत्तम उदाहरण उपस्थित करके अपनी कीर्ति को अमर करे। इसके लिये आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने कुविचारों, दुर्गुणों, तथा कुकर्मों को हटाने तथा घटाने के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहें और ईश्वर की सेवा समझ कर नित्य ही करते रहें। सत्कर्मों के द्वारा अपना आदर्श उज्ज्वल करना प्रभु के सुन्दर बगीचे−संसार को अधिक सुरम्य बनाने के लिये निरन्तर लोक सेवा एवं परमार्थ के कार्यों में संलग्न रहना यही जीवन का सर्वोत्त सदुपयोग है।
वास्तव में परम पिता परमेश्वर सत् है, इसलिये उसके निमित्त किये जाने वाले कर्म भी सत्कर्म हैं।
“कर्म चैव तदर्थेयं सदित्येवाभिघीयते॥”
ईश्वरार्थ और ईश्वरार्पण दोनों ही प्रकार के कर्म मुक्ति देने वाले हैं। भगवान् कृष्ण ने स्वयं गीता में स्थान स्थान पर इस प्रकार कर्म करने की आज्ञा अर्जुन को दी है।
इसलिये यज्ञ, दान, तप, सेवा, पूजा या जीविका आदि के सभी कर्म ईश्वरीय ही करने चाहिये। जैसे सच्चा सेवक प्रत्येक कार्य स्वामी के नाम पर, उसी के निमित्त, उसी की इच्छा के अनुसार करता हुआ किसी कर्म अथवा धन पर अपना अधिकार नहीं समझता और स्वप्न में भी किसी वस्तु पर उसके अन्तःकरण में ममत्व का भाव न आने से वह न्याययुक्त की हुई प्रत्येक क्रिया में हर्ष शोक से मुक्त रहता है, उसी प्रकार हमें उचित है कि हम अपने अधिकार गत धन, परिवार आदि सामग्री को ईश्वर की ही समझ कर उसकी आज्ञा के अनुसार उसी के कार्य में लगाने की न्याययुक्त चेष्टा करें और जो भी नवीन कर्म अथवा क्रिया करें उसे उसकी प्रसन्नता और आज्ञा के अनुकूल ही करें।
अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर की इच्छा का पता किस प्रकार चले? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि हम इस सम्बन्ध में ईश्वर से पूछ सकते हैं। वह हमारे हृदय में विराजमान हैं।
सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्ठे, मत्तःस्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।
हमारे लिये क्या करना उचित है और क्या अनुचित है यह बात हम अपने हृदयस्थ परमात्मा से यदि जानना चाहेंगे तो वह न्याय प्रभु हमारे हृदय में सत्प्रेरणा ही करेंगे। जब कोई व्यक्ति सद्भाव से परामर्श लेता है तो उसे पवित्र आत्मा द्वारा सत्परामर्श ही प्राप्त होता है। हमारा कर्त्तव्य है कि हम अपने अन्तरात्मा की सच्ची पुकार को सुने, उस पर चलें और उसको ठुकरा न दें।साधारणतया जैसे कोई अपनी आत्मा से पूछता है कि चोरी, व्यभिचार, झूठ और कपट आदि कर्म कैसे हैं? तो उत्तर मिलता है कि त्याज्य हैं—निषिद्ध हैं। इसी प्रकार ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा और सेवा आदि के विषय में आत्मा की सम्मति माँगने पर उत्तर मिलता है कि अवश्य पालनीय हैं। अज्ञान, राग, द्वेष और संशय आदि दोषों द्वारा हृदय के आच्छादित रहने पर किसी विषय में निश्चित उत्तर नहीं मिलता। अतः ऐसे अवसर पर अपनी दृष्टि में जो भगवान के तत्व को जानने वाले महापुरुष हों उनके द्वारा बतलाये हुये विधान को ईश्वर की आज्ञा मान कर तद्नुकूल आचरण करना चाहिये।
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखने तथा उन पर चलने के अतिरिक्त संसार में किसी जीव को कभी भी किसी प्रकार से दुःख भय और क्लेश नहीं पहुँचाना चाहिये और न पहुँचाने की इच्छा या प्रेरणा ही करनी चाहिये। यदि कोई किसी को कष्ट पहुँचाता हो तो उसको किसी प्रकार से न तो सहायता ही देनी चाहिये और न उसका अनुमोदन ही करना चाहिये। इतना ही नहीं, वरन् हृदय में प्रसन्नता भी न माननी चाहिये। इस प्रकार मन, वचन और कर्म द्वारा सत्कार्य करके ही हम अपना हम अपना जीवन सार्थक बना सकते हैं, अन्यथा हम में और पशुओं में कोई अन्तर नहीं रहता हमारा मनुष्य जीवन व्यर्थ तथा निरर्थक है।
(योगी अरविन्द)
हर एक आदमी यह कह रहा है कि अब सत् युग नहीं रहा, ईमानदारी विश्वास, सत्यता इस संसार से विदा ले गई। अब तो कलियुग आ गया है और बढ़ता चला जा रहा है। पर इस सतयुग के सम्बन्ध में किसी न विचार नहीं किया कि आखिर यह है क्या? सतयुग कोई ऐसी चीज तो है नहीं जो कि जन्म जन्मान्तर में किसी एक निश्चित समय पर ही आवेगा और फिर बहुत समय के लिए आँखों के सामने से गायब हो जायगा। सतयुग और कलियुग को तो हम अपने विचारों से स्वयं बना सकते हैं। जिस समय इस जाग्रत जीवन का अधिकार समाप्त करके मनुष्य सूक्ष्म जीवन का अधिकार समाप्त करके मनुष्य सूक्ष्म जीवन में पहुँच जाता है, कामना, वासना, संस्कार आदि से किसी भी तरह का अपना सम्बन्ध नहीं रखता इस स्थूल शरीर में अवस्था भेद के अनुसार अपने जीवन की और अवस्था भेद की समता नहीं रखता अर्थात् आधार और आधे यों के सम्बन्धों को दूर कर देगा उसी समय इस संसार में सतयुग का पुनः उदय होगा। इस पृथ्वी पर रहने वाली मनुष्य जाति मन बुद्धि और शरीर को ही सब कुछ समझती और बतलाती है। इन्हीं के चक्कर में पड़ी वह अनेक प्रकार के खेल खेला करती है। परलोक की खोज खबर वह नहीं रखना चाहती। वहाँ की चर्चा को उसने भुला दिया है। आज फिर नये सिरे से हमें उसकी चर्चा जारी करनी होगी, सोई हुई शक्ति को फिर जगाना होगा अहंकार को दबा कर रखना होगा। हम दिव्य लोक के जीव हैं, यह ज्ञान हमें फिर से पाना होना, यही सत्ययुग की स्थापना करेगा, इसीलिए हमें साधना और तपस्या करनी है। यदि इस प्रयत्न से एक बार भी हम लोग उस स्थान तक पहुँच गये तो पीड़ाओं तथा वेदनाओं से छुटकारा पाकर सिद्ध बनकर सत्य और आनन्द की लीला में प्रविष्ट होकर इस मृत्युलोक को ही स्वर्ग में बदल देंगे। सतयुग के लोग स्वर्ग लोग का पता लगा कर इस भूलोक को छोड़ कर वहाँ उस महत् लोक में पहुँचते थे। लेकिन हम लोग स्वर्ग लोक के अधिकारी बन कर इस पृथिवी को नहीं त्यागेंगे। हम इस मृत्युलोक में ही स्वर्ग की लीला का आनन्द लेंगे।
जब तक माया के फंदे से जीव नहीं छूटता है और भेद भाव के विचार मन में भरे रहते हैं तब तक उसे वास्तविक ज्ञान नहीं होता है माया के फन्दे से छूटकर और भेद भाव के विचारों को भावनाओं को निकालने पर ही उसे ज्ञान होता है, तब दिव्य दृष्टि से देखने लगता है। उसमें तथा ब्रह्म में किसी प्रकार का अन्तर नहीं रह जाता। वास्तव में समस्त ब्रह्माण्ड, यह संसार, हमारा शरीर सभी कुछ ब्रह्म मय है इसलिए इस तरह का ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर मृत्युलोक में विचरण करते हुए एक बार फिर से सतयुग की स्थापना करने का भार हम लोगों के ऊपर है जिसे कि पूरा करना है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
मानव जीवन का सदुपयोग दो प्रकार से किया जा सकता है (1) आत्म−निर्माण द्वारा (2) राष्ट्र निर्माण द्वारा। इससे प्रथम साधन अर्थात् आत्मनिर्माण पर विचार करें तो विदित होता है कि आत्म−निर्माण निम्न साधनों से संभव है:—
(1) शरीर रक्षा से
(2) भावनाओं पर विजय प्राप्त करने से
(3) बुद्धि विकास से
(4) आत्मज्ञान से
शरीर सम्पदा
आत्मनिर्माण का प्रथम साधन मानव का शरीर है। शरीर वह यंत्र है, जिसकी सहायता से मानव संसार में कर्म पथ पर अग्रसर होता है, नाना कर्त्तव्यों का पालन करता है, तथा संसार, समाज देश और विश्व की प्रगति समझता है। संसार कैसा हैं? उसमें कितनी प्रगति हो रही है? किस दिशा में हो रही है? कितनी अच्छाई या बुराई है, यह मानव के शरीर पर अवलम्बित है। जिस प्रकार सावन के अंधे को सर्वत्र हरा ही हरा दृष्टिगोचर होता, उसी प्रकार रोगी शरीर वाले को सम्पूर्ण संसार रोग से आक्रान्त डूबता हुआ, नष्ट होकर काल कलवित होता हुआ प्रतीत होता है अस्वास्थ्यकर स्थानों, निंद्य पेशा करते हुए व्यक्ति यों को संसार में भोग−विलास, शृंगार उत्तेजक पदार्थ, इत्यादि के अतिरिक्त कुछ नहीं है। जिसने अपने शरीर को मद्य, तम्बाकू, चरस, पोस, इत्यादि उत्तेजक पदार्थों पर पाला है, वह व्यक्ति पशुत्व की श्रेणी में पड़ा पड़ा नारकीय कीट पतंगों का जीवन व्यतीत करता है।
अस्वस्थ रोगी, मनुष्य के विचार भी अस्वास्थ्यकर अनिष्ट ही होते हैं। यह संसार को अहंकार की संकीर्णता में बंधा हुआ देखता है। रोगी शरीर तो अपना क्या भला कर सकता है, तथा दूसरों का क्या कल्याण कर सकता है। उसके विचार बासी, योजनाएं रोगी, कल्पनाएं दूषित, वासनाएं प्रदीप्त, इच्छाएं अनिष्ट कर ही रहेंगी।
आत्म−निर्माण के इच्छुकों! नीरोग और स्वस्थ शरीर बनाओ, जिससे तुम स्वयं अनिष्टकर चिन्तन से बच सको, तथा अहितकर कल्पनाओं से बच कर अपना जीवन दिव्य प्रबन्ध से सुव्यवस्थित कर सको। तुम्हें वही ग्रहण करना चाहिये जो शुभ हो। स्वास्थ्य, पवित्र भोजन, सात्त्विक वस्तुओं के भोजन पर निर्भर है। तुम जो भोजन करते हो, उसी के अनुसार तुम्हारी भावनाओं का निर्माण होता है। सात्त्विक वस्तुओं−गेहूँ, चावल, फल, तरकारियाँ, दूध, मेवे, इत्यादि पर बना हुआ स्वस्थ मनुष्य आत्म निर्माण सरलता से कर सकता है। उसकी भावनाएं तामसी वस्तुओं की ओर आकृष्ट न होंगी। वह दूसरों के प्रति कभी घृणा−द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध की भावनाएं नहीं ले जायगा। इसके विपरीत माँस, मादक द्रव्य, तामसी उत्तेजक पदार्थों, मद्य इत्यादि के बल पर स्वस्थ शरीर अन्दर से खोखला रहेगा। वह उस रेत की दीवार की भाँति है, जो जरा से धक्के से धराशायी हो सकता है। नींद परिश्रम, श्वास−प्रश्वास के व्यायाम, दूध छाछ, फलों के रस ये सभी तत्व शरीर की रक्षा के लिये अमूल्य हैं। उपवास द्वारा रोग से भक्ति तथा अंतरंग शुद्धि करते रहना अनिवार्य है।
आत्मनिर्माण की दूसरी साधना है भावनाओं पर विजय। गन्दी वासनायें दग्ध की जाएं, तथा दैवी सम्पदाओं का विकास किया जाय तो उत्तरोत्तर आत्मविकास हो सकता है। कुत्सित भावनाओं में क्रोध, घृणा, द्वेष, लोभ और अभिमान, निर्दयता, निराशा अनिष्ट भाव प्रमुख हैं। धीरे धीरे इनका मूलोच्छेदन कर देना चाहिए। इनसे मुक्ति पाने का एक यह भी उपाय है कि इनके विपरीत गुणों, धैर्य, उत्साह, प्रेम, उदारता, दानशीलता, उपकार, नम्रता, न्याय, सत्यवचन, दिव्य भावों का विकास किया जाय। ज्यों−ज्यों ये दैवी गुण विकसित होंगे, दुर्गुण स्वयं दग्ध होते जायेंगे। दुर्गुणों से मुक्ति पाने का यही एक मार्ग है। आप प्रेम का द्वार खोल दीजिए, प्राणिमात्र को अपना समझिये, समस्त कीट पतंग−पशु पक्षियों को अपना ही समझा कीजिए। संसार से प्रेम कीजिए। आपके शत्रु स्वयं दब जायेंगे मित्रता की अभिवृद्धि होगी। इसी प्रकार धैर्य, उदारता, उपकार इत्यादि गुणों का विकास प्रारम्भ कीजिए। इन गुणों की ज्योति में आपके शरीर में कोई कुत्सित भावना शेष न रह जायगी।
अनिष्ट भाव से स्वयं दूसरे की ही हानि नहीं होती किन्तु तुम्हारी स्वयं की भी हानि होती है। उसकी हानिकारक तरंगें विश्व में व्याप्त होकर वातावरण को दूषित करती हैं महायुद्ध होते हैं जिसमें असंख्य व्यक्ति यों का संहार होता है।
आत्मनिर्माण का तृतीय साधन है—बुद्धि विकास। इससे सत्कर्म तथा दुष्कर्म का विवेक जागृत होता है। शुभ क्या है? अशुभ किसे कहते हैं? किसमें अधिक से अधिक व्यक्ति यों का भला है? इत्यादि का ज्ञान मनुष्य को बुद्धि के विकास द्वारा ही प्राप्त होता है बुद्धि विकास के चार मुख्य साधन हैं—सत्संग, अध्ययन, विचार और भूल।
सत्संग से कुटुम्ब और समाज का कल्याण होता है। जिन अध्यात्मवादियों, ऋषि−महात्माओं, विद्वानों या विचारकों ने संसार में आध्यात्मिक उन्नति की है, उनके संपर्क में आने से मनुष्य को संसार विषमताओं से बचने के अनेक साधन प्राप्त होते हैं, अपनी समस्याओं का हल निकलता है, आगे आने वाली कठिनाइयों से युक्ति के साधन एकत्र करने में सहायता प्राप्त होती है।
अध्ययन से मनुष्य महापुरुषों का सत्संग प्राप्त करता है। पुस्तक का अर्थ है किसी विद्वान का सर्वदा सोते जागते पुस्तक के पृष्ठों के रूप में आपके समक्ष रहना। पुस्तकों से ऐसे महापुरुषों से संपर्क स्थापित हो सकता है, जो इस संसार में नहीं हैं, किन्तु मानव जगत् में अपनी छाप छोड़ गये हैं। नैतिक, मानसिक, आध्यात्मिक विकास के हेतु उत्तमोत्तम धार्मिक ग्रंथों का नियमित स्वाध्याय अतीव आवश्यक है। घर में उत्तम ग्रंथों का संकलन रखने से घर का वातावरण शुद्ध होता है। शुभ विचार की लहरें सर्वत्र व्याप्त हो जाती हैं। सद्विचार से रमण करने में बुद्धि विकास का क्रम उचित दिशा में होता है। सद्विचार मन में शिव भावना, सत्य भावना, और दिव्य भावना जाग्रत रखता है। स्मरण रखिये, “जहाँ आप हैं, वहाँ परमात्मा है, जहाँ परमात्मा है, वहाँ आप हैं” आपका जीवन और व्यवहार दिव्य प्रबन्ध से सुव्यवस्थित है। परमात्मा आपसे प्रेम करता है और सदैव आपका सहायक है। आप कभी दुःखी, भ्रान्त या निराश नहीं हो सकते क्योंकि आपका संचालक परमात्मा है। संसार के सब प्राणी आपके आत्म−बंधु हैं, आपका शरीर परमात्मा का निवासस्थान है। इस प्रकार की दिव्यभावना में अपना जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति सफलता से आत्मनिर्माण कर सकता है।
भूल से बुद्धि−विकास होता है, एक भूल का अर्थ है आगे के लिए अकलमन्दी। संसार के अनेक पशु भूल से विवेक सीखते हैं लेकिन मनुष्य उनसे बहुत जल्दी सीखता है। भूल का अर्थ है कि भविष्य में आप अपनी गलती नहीं दोहरायेंगे। भूल से अनुभव बढ़ता है। संसार में व्यक्ति के अनुभव का ही महत्व है। अनुभव अनेक भूलों द्वारा अर्जित सद्ज्ञान है। भूल यदि दोहराई न जाय, तो बुद्धि−विकास में बहुत सहायता करती है। महापुरुषों के जीवन में अनेक क्षण ऐसे आये हैं जब वे भूलों के बल पर महान बने हैं।
आत्मनिर्माण का अन्तिम साधन है आत्म−भाव का विस्तार। साधक की दृष्टि से विकास का सबसे उच्च स्तर यही है। इस स्तर पर पहुँचने से साधक सर्वत्र आत्मभाव का दर्शन करता है। प्रत्येक व्यक्ति , वस्तु तथा जगत् को वह ब्रह्म रूप देखता है। अपने शरीर को वह परमात्मा का ग्रह समझता है। वह जिस वस्तु को देखता है वे सब उसकी आत्मा के अंग प्रत्यंग हैं। उसकी आत्मा का दायरा सुविस्तृत होता है, जिसमें शत्रु मित्र सभी सम्मिलित रहते हैं। वह जो देखता है, स्पर्श करता है, भाषण करता है, उसमें आत्मा का अस्तित्व है। जो भोजन करता है, श्वास लेता है सब ब्रह्मरूप चेतन अमृत है।
ऐसा साधक अपने आपको शरीर नहीं, आत्मा समझता है। वह देश, जाति, वर्ण की संकुचित भूमि से उठ कर सब मनुष्यों में एक रस बहने वाली आत्मा को ही देखता है। संसार की वासनाओं की तरंगें उसे दुखी नहीं करतीं, क्योंकि वह तो स्थिर वस्तु आत्मा में ही विश्वास करता है। वह देहपूजा में रत नहीं रहता, वरन् आत्मा की आराधना करता है।
उसकी आत्मिक दृढ़ता से टकरा कर सुख दुःख, जय पराजय हानि लाभ, मान−अपमान, प्रिय−अप्रिय प्रसंग टूक−टूक हो जाते हैं। उसे आत्मा के अतिरिक्त और कुछ नहीं दीख पड़ता। एक दिव्य आयोजन का दर्शन वह सर्वत्र करता है। उसके लिए कोई स्थान आत्मा से खाली नहीं है।
सच्चा ज्ञान मनुष्य को अपनी आत्मा से ही मिलता है। इस स्तर पर मनुष्य इतना ऊँचा उठता है कि उसे साँसारिक मोह, माया, त्रुटियाँ, आलोचनाएं नहीं सतातीं। उसका मन पवित्र और निर्भय हो जाता हैं। इस आत्मदृष्टि के पाने से रोग, दुःख शोक आदि पास नहीं फटक सकते। आत्मा के ज्ञान से क्या नहीं जाना जा सकता? सच्ची शान्ति, सच्चा सुख, सच्ची ज्योति आत्मा में ही प्राप्त है।
आत्मदृष्टि वाला व्यक्ति संसार के प्राणिमात्र को अपना आत्मबन्धु मानता है। “मैं” के स्थान पर “हम सब” की भावनाएं रखता है। युधिष्ठिर की भाँति वह कुत्ते जैसी घृणित चीज को भी अपने साथ रखना चाहता है। सभी की उन्नति हो, सभी आगे बढ़ें, जितना मिले सभी बाँट कर खायें खुश रहें सामूहिक रूप से मिलकर संसार का आनन्द लें− ऐसे विचारों में मस्त रहने के कारण उसके आत्मभाव का दायरा खूब बढ़ता है और उसमें जनसमाज के अतिरिक्त पशु पक्षी कीट पतंग जलचर थलचर तथा अन्य छोटे जीवों को भी बराबर का स्थान प्राप्त होता है।
संकीर्णता आत्मा में नहीं है आत्मा का विस्तार अनन्त है। विश्वात्मा में सभी कुछ सम्मिलित है। परमात्मा नहीं चाहता कि उसके पुत्रों में खुदगर्जी की विषैली अग्नि प्रज्ज्वलित हो। वह अकेला खाने की दुष्प्रकृति को मानव−समाज से दूर करना चाहता है। उसके राज्य में सबक पास बराबर का हिस्सा है, प्रेम, सौजन्य, सहानुभूति, सहायता—यही आत्मभाव के नाना उपकरण हैं। शास्त्रों में अनेकों स्थानों पर कहा गया है,” जो अकेला खाता है, वह पाप कमाता है, जो अपने लिए सोचता है, वह नर्क की बात सोचता है।”
आत्मभाव का दायरा विस्तृत कीजिए, सामूहिक उन्नति की बात सोचिये। सबको आत्मा मानकर सबकी उन्नति, सबके कल्याण की बात सोचें और इसी योजना को कार्यान्वित करें, तो राष्ट्रनिर्माण हो सकता है। व्यक्ति गत उन्नति से अधिक लाभ नहीं है। सब की उन्नति में अपनी उन्नति सोचने से आत्मा का विस्तार होता है।
“मैं आरोग्यता, प्रेम, और भ्रातृभाव के विचारों की लहरें समस्त विश्व के प्राणिमात्र को भेजता हूँ। संसार में मेरा कोई भी द्वेषी नहीं है। मैं सब मनुष्यों में परमात्मा का दर्शन करता हूँ। सब लोग सुखी हों, अभय हों, रोगरहित हों, सबका कल्याण हो। मैं प्राणिमात्र को क्षमा करता हूँ, वे मुझे क्षमा करे”—ऐसी भावनायें प्रत्येक अध्यात्मवादी को मन में रखनी चाहिए।
(श्री मोहनलाल वर्मा, बी.ए., एल.एल.बी.)
सुप्रवृत्तियों के विकास से अच्छी आदतों का निर्माण होता है, मनुष्य अपने उत्तम गुणों का विकास करता है और चरित्र में, अंधकार में प्रविष्ट दुर्गुणों का उन्मूलन होता है। अतः हमें प्रारंभ से ही यह जान लेना चाहिए कि हम किन किन गुणों तथा आदतों का विकास करें।
नैतिकता:—
उत्तम चरित्र का प्रारंभ नैतिकता से होता है। नैतिकता अर्थात् श्रेष्ठतम आध्यात्मिक जीवन हमारा लक्ष्य होना चाहिए। नैतिकता हमें सद् असद्, उचित अनुचित, सत्य असत्य में अन्तर करना सिखाती है। नैतिकता सद्गुणी जीवक का मूलाधार है। यह हमें असद् आचरण, गलतियों अनीति और दुर्गुणों से बचाती है। नैतिकता का आदि स्रोत परमेश्वर है। अतः यह हमें ईश्वरीय जीवन व्यतीत करने की शिक्षा प्रदान करती है। यह वह जीवन शास्त्र है जो हमारे जीवन के कार्यों की आलोचना कर हमें उच्च आध्यात्मिक जीवन की ओर प्रेरित करती है।
नैतिकता धर्म का व्यवहारिक स्वरूप है। हम प्रायः उत्तम ग्रन्थ पढ़ते हैं, अनेक जीवन सूत्र जानते हैं किन्तु उत्तम आचरण जीवन में नहीं करते हैं। नैतिकता उस ज्ञान के व्यवहार और प्रयोग का नाम है। यह हमें जीवन को सही रूप में जीना सिखाती है। हमें क्या करना चाहिए? हमारा क्या कर्त्तव्य है? सही मार्ग कौन सा है? किस कार्य से हमें सर्वाधिक आत्म संतोष प्राप्त हो सकता है?—यह नैतिकता के मूल प्रश्न हैं। आपको वही करना चाहिए, जो उचित है, सबसे अधिक फल
देने वाला है, जिसमें कोई गलती नहीं है। यह सब ज्ञान हमें नैतिकता से जीवन व्यतीत करने पर प्राप्त होते हैं।
नैतिकता के बिना धर्म का कोई अर्थ नहीं है। यह अव्यावहारिक और कल्पना शील बनता है। बिना नैतिकता के धर्म एक ऐसे वृक्ष के समान है जिसमें जड़ नहीं है। बिना नैतिकता के व्यवहारिक जीवन ऊँचा नहीं उठ सकता, न ईश्वरीय तथ्यों का जीवन में प्रकाश हो सकता है।
संयम :—
नैतिकता जीवन की आधार शिला संयम पर निर्भर है। संयम का तात्पर्य है अपने ऊपर अनुशासन रखना, विवेक के अनुसार शरीर को चलाना इत्यादि। संयमी व्यक्ति अपने मन, वचन, तथा शरीर पर पूर्ण अधिकार रखता है। वह उसे उचित ढंग से चलाता है और मिथ्या प्रलोभनों के वश में नहीं आता। जैसे ही कोई प्रलोभन मन मोहक रूप धारण कर उसके सम्मुख आता है, वैसे ही आत्म−अनुशासन उसकी रक्षा को आ उपस्थित होता है।
संयम हमारे असंयमी उन्मुक जीवन को अनुशासन में लाता है। संयम हमें उचित और विवेक पूर्ण मर्यादा में रहना सीखता है। जो वस्तुएं, आदतें अथवा कार्य हानिकर हैं, उनसे हमारी रक्षा करता है।
मनुष्य तथा पशु, उच्च तथा निम्न कोटि के जीवन में क्या अन्तर है? मनुष्य गन्दगी, त्रुटि, ज्यादती, खराबी, दुर्भाव से अपने आपको रोक सकता है, पशु में यह नियंत्रण नहीं होता। वह वासना के प्रवाह में अन्धा हो जाता है उसे हिताहित, कर्त्तव्य−अकर्त्तव्य, विवेक अविवेक का ज्ञान नहीं होता। मनुष्य संयम द्वारा अपनी इन्द्रिय मन तथा शरीर पर अनुशासन कर सकता है।
विवेक के विकास से संयम आता है। जैसे जैसे मनुष्य का विवेक बढ़ता है उसे यह ज्ञान होता है कि किस बात के अनियंत्रण से क्या क्या हानियाँ संभव हैं। वह इनसे अपनी रक्षा करने का प्रयत्न करता है। फलतः उसका आत्म विकास होता है।
संयम का प्रयोग पाँचों इन्द्रियों के विग्रह में करना चाहिए। हमारी इन्द्रियों के अमर्यादित और अनियंत्रित हो जाने से अनेक रोग पाप दुर्भावों की सृष्टि होती है। अतः सर्वप्रथम इन्द्रिय निग्रह से ही संयम का प्रयोग करना चाहिए।
जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं जिसमें संयम का उपयोग का हो। संयमी व्यक्ति अपनी वासनाओं के परिष्कार द्वारा दीर्घजीवन प्राप्त करता है और शरीर को रोग मुक्त रखता है।
संयम अनुशासन का पिता है और हमें वैराग्य भावना प्रदान करता है, योग मार्ग पर एकाग्रता पूर्वक चलने की शिक्षा प्रदान करता है। यह हमारी शक्ति को संग्रह, बुद्धि को स्थिर और मन को अनुशासन से परिपूर्ण करता है।
परिस्थितियों के अनुकूल ढल जाना :—
अपने आपको नई नई विषम तथा विरोधी परिस्थितियों के अनुसार ढाल लेना, इच्छाओं, आवश्यकताओं और रहन सहन को नवीन परिस्थितियों के अनुसार घटा बढ़ा लेना एक बड़ा गुण है। मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरे व्यक्तियों, चाहे वे कैसे ही गुण स्वभाव के क्यों न हों, के अनुसार अपने को ढालना सीखे। नई परिस्थितियाँ चाहे जिस रूप में आयें, उसके वश में आ जायं। अच्छी और बुरी आर्थिक परिस्थितियों के अनुसार अपने को घटा बढ़ा लिया करें।
अधिकाँश व्यक्ति दूसरे के अनुसार अपने को ढाल नहीं पाते, इसलिए वे दूसरों का हृदय जीत नहीं पाते, न झुक सकने के कारण वे सफल नहीं हो पाते। पत्नी पति के अनुसार, पति पत्नी के अनुसार, विक्रेता ग्राहक के अनुसार, मातहत अफसर के अनुसार, विद्यार्थी गुरु के अनुसार, पुत्र पिता के अनुसार न ढल सकने के कारण दुःखी रहते हैं।
आप बेंत की तरह लचकदार बनें जिससे अपने को हर प्रकार के समाज के अनुसार ढाल लिया करें। इसके लिए आप दूसरे की रुचि, स्वभाव, आदतों और मानसिक स्तर का ध्यान रखें। शक्कर से मीठे वचन बोलें, प्रेम प्रदर्शित करें, दूसरों की आज्ञाओं का पालन करें। आपसे बड़े व्यक्ति यह चाहते हैं कि आप उनकी आज्ञा का पालन करें। सभ्यता पूर्वक दूसरे से व्यवहार करें। ढलने की प्रवृत्ति से मित्रताएं स्थिर बनती हैं, व्यापार चलाते हैं, बड़े बड़े काम निकलते हैं। इस गुण से इच्छा शक्ति बढ़ती है और मनुष्य अपने ऊपर अनुशासन करना सीखता है। इससे आत्मबलिदान की भावना का विकास होता है, स्वार्थ नष्ट होता है।
विरोध तथा प्रतिकूलता में धैर्य :—
विपत्ति, दुख या वेदनामय जीवन एक बड़ा शिक्षक है। यह वह स्थिति है जिसमें चारों ओर से कष्ट आते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड़ जाती है, मन दुखी रहता है और कहीं से कोई सहारा नहीं दीखता। विपत्ति ऐसी घटनाओं का क्रम है, जो सफलता का शत्रु है और आनन्द को नष्ट करने वाला है। यह दुःख की मनः स्थिति है।
विपत्ति दूसरे रूप में एक वरदान सिद्ध होती है। जो व्यक्ति धैर्य बनाये रखता है, वह अन्ततः विजयी होता है। विपत्ति से हमारी इच्छा शक्ति में वृद्धि होती है और सहिष्णुता प्राप्त होती है। इससे हमारा मन ईश्वर की ओर प्रवृत्त होता है। अन्ततः इससे वैराग्य की प्राप्ति होती है। सत्य की पहली सीढ़ी है। विपत्ति वह गुरु है जो मनुष्य को उद्योगी और परिश्रमशील बनाता है। इससे मनुष्य की सोई हुई शक्तियाँ जाग्रत हो जाती हैं, साधारण कार्य करती हुई शक्ति तीव्र हो जाती हैं और जागरुकता प्राप्त होती है। समृद्धि के प्रकाश में आनन्द मनाना साधारण सी बात है, किन्तु प्रतिकूलता और विपत्ति में स्थिर बुद्धि रखना।
आप विपत्ति में चिंतित न रहें, धैर्य धारण करें, प्रसन्न मुद्रा बनाएँ, हँसते रहें आत्मा से शक्ति खींच कर अपनी समस्याओं को नवीन रूप में विचार करें। आपकी आत्मा में विपत्ति से जूझने की अनन्त शक्ति है। इसे अनुभव करें।
सोच कर देखिए, प्रशान्त सागर में रह कर क्या कोई सफल नाविक बन सकता है? सागर की उत्ताल लहरों से जूझ कर आँधी तूफान को झेल कर ही बड़े कप्तान बनते हैं विपत्ति के समुद्र में ही आप जीवन के कप्तान बनते हैं। आपके धैर्य, साहस, लगन, शक्ति , अध्यवसाय की परीक्षा विपत्तियों के भयंकर तूफानों में ही होती है। विपत्ति में चारों ओर से घिर कर हम नई नई बातें खोजते हैं, नई खोजें करते हैं, खूब सोचते विचारते और अपने व्यक्ति त्व का विकास करते हैं। विपत्ति हमारे मित्रों को परखने की सच्ची कसौटी है। विपत्ति एक ऐसा साँचा है, जो हमें नए सिरे से ढालता है और विषम परिस्थितियों से युद्ध करना सिखाता है।
विपत्ति संसार के बड़े बड़े महात्माओं, राजनीतिज्ञों, विद्वानों पर आई है। वे उसमें तपे, पिसे, कुटे और मजबूत बने हैं। फिर आप क्यों निराश होते हैं? काले बादलों की तरह वह हवा में उड़ जाने वाली क्षणिक वस्तु है। यह तो आपकी इच्छाशक्ति और दृढ़ता की परीक्षा लेने के लिए आती है।
जागरुकता :—
जो जीवन में जागरुक रहता है, उन्मत्त होता रहता है। जो तन्द्रा आलस्य या विलास में सोया रहता है, क्षय और पतन को प्राप्त होता है। जागरुक व्यक्ति अपने चारों ओर, संसार में देश तथा समाज में होने वाले क्रम तथा घटनाओं पर तीखी दृष्टि रखता है और उनसे लाभ उठाता है।
जागरुकता वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति मानसिक तथा शारीरिक दृष्टि से चौकना रहता है। उसका मन संसार की प्रगति को देखता रहता है। उसमें शैथिल्य और आलस्य नहीं रहता। सतर्क पहरेदार की भाँति वह अपने इर्द गिर्द के परिवर्तनों को देखता और उनसे लाभ उठाता है। डाक्टर को देखिए, सिपाही या मल्लाह को देखिए, वे कैसे चुस्त, सतर्क, जागरुक रहते हैं। अपने काम पर तीखी दृष्टि लगाये रहते हैं। आध्यात्मिक जगत् के पथिक के लिए जागरुकता अतीव आवश्यक गुण है।
जीवन में अपने कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्वों, आगे आने वाली जिम्मेदारियों, व्ययों के प्रति जागरुक रहिये। आपकी प्रगति कैसी हो रही है, आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक, शारीरिक सभी रूपों में आप कितना आगे बढ़ रहे हैं, अथवा नीचे सरके आ रहे हैं?—यह चौकन्ने हो कर नापते रहिये। चौकन्ना व्यक्ति आने वाले खतरों से मार नहीं खाता। जरासा खतरा देखते ही वह गिलहरी की तरह जागरुक हो उठता है और बच निकलता है।
वे ही व्यक्ति अधिक वेतन प्राप्त करते हैं, जिनमें जागरुकता की अधिक आवश्यकता होती है। एंजिन तथा हवाई जहाज के चालक, बम चलाने वाले, मोटर ड्राइवर, डाक्टर, इंजीनियर, मजिस्ट्रेट इत्यादि सब ही को जिस गुण की अतीव आवश्यकता है, वह सतत् चेतनशीलता है।
शरीर में रोगों की ओर से सतर्क रहिये। तनिक सी लापरवाही से इन रोगों का अत्यधिक विकास हो सकता है। तनिक सी अशिष्टता से लड़ाई, झगड़ा, मुकदमेबाजी तक की नौबत आ सकती है। चारों ओर से आक्रमण आ सकते हैं पर जागरुकता सबसे हमारी रक्षा कर सकती है। अच्छा सेनापति सब जरूरतों के लिए तैयार रहता है।
मृदुता :—
स्वभाव की मृदुलता ग्रहण करें। मृदुल स्वभाव उस व्यक्ति का है जिसे देख कर स्वतः मन में उसके प्रति आकर्षण का भाव उत्पन्न होता है। उसके मुख, स्वभाव तथा चरित्र से मानसिक आकर्षण, प्रेम, तथा आनन्द प्रस्फुटित होता है। मृदुलता के अंतर्गत वे सभी विधियाँ आती हैं जिनके द्वारा मनुष्य दूसरों को प्रसन्न रखता तथा हृदय में अपने प्रति प्रेम उत्पन्न करता है। उसका सबके प्रति प्रेममय, मित्रतापूर्ण व्यवहार होता है। उसका व्यवहार मित्रों और हितैषियों को उसकी ओर आकर्षित करता है। उसमें चिड़चिड़ापन, उत्तेजना, क्रोध, कटुता, कुढ़न इत्यादि नहीं होती।
मृदु व्यक्ति बड़ा मीठा हंसमुख स्वभाव रखता है सभ्यतापूर्ण ढंग से व्यवहार करता है और प्रेम सहानुभूति से स्निग्ध रहता है। जो व्यक्ति उसके संपर्क में आता है, उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
मृदु व्यक्ति सदा दूसरों को प्रसन्न रखने और प्रेम करने की बात सोचता रहता है उसके मित्रों की संख्या में उत्तरोत्तर वृद्धि होती जाती है। वह उदार, दयावान, और प्रेममय रहता है। इन सद्गुणों के कारण मृदुल व्यक्ति सब स्थितियों और सब प्रकार के व्यक्ति यों से बड़ा अच्छा निभाव कर लेता है।
यथा शक्ति दूसरों से प्रेम कीजिए। सहानुभूतिपूर्ण ढंग से अप्रिय कामों को कीजिए। जिससे भी मिलें आपके वाक्य, शब्द और अक्षर प्रेम से सरस स्निग्ध रहें। जगत् के विदग्ध हृदयों को आपके शब्दों से ऐसा मरहम प्राप्त हो कि वे अपने संताप भूल सकें और दो घड़ी अपने महत्त्व का अनुभव कर सकें।
(राबर्ट आर. उडीग्राफ)
सदियों से मनुष्य अपने विकास के लिए चिंतित रहा है। उसका भगीरथ प्रयत्न तो यही रहता है कि वह जीवन के सभी क्षेत्रों में पूर्ण विकास एवं सफलता प्राप्त करे। वह अपने अस्तित्व को अधिक टिकाऊ और सुविस्तृत बनाने का महत्वाकाँक्षी है। वह जाने या न जाने, उसकी स्थिति मजबूत होने से उसके समाज की रीढ़ भी पुष्ट होती रहती है और इस प्रकार व्यक्ति और समाज का विकास निरंतर अबोध गति से आगे की ओर उन्मुख होता चला जा रहा है। इस विकास के मूल में एक ऐसी भावना है जो विश्व के कर्मक्षेत्र का प्राण है—वह है काम करने की, समय का पूरा−पूरा लाभ उठा लेन की भावना। इसी भावना से अनुप्राणित होकर अगणित मस्तिष्क और अगणित हाथ−पैर इसकी अनंत साधना में दिन रात रत रहते हैं और सर्वांगीण विकास की ओर पैर बढ़ाते चले जाते हैं।
मनुष्य अपने अल्पकालीन जीवन में बहुत−कुछ कर लेना चाहता है, पर वह कुछ कर जाता है और कुछ अधूरा छोड़ जाता है। यह अधूरा काम या तो उसके उत्तराधिकारी करते हैं या और कोई। जीवन में सभी काम न कर पाने के सम्बन्ध में उसकी शिकायत रहती है—साधनों के अभाव की, अनुकूल वातावरण की, उपयुक्त सहयोग के अभाव की और सबसे बढ़कर पर्याप्त समय के अभाव की। यह ठीक है कि हम अपने सभी विचारों को ठोस रूप नहीं दे पाते, परन्तु जीवन में उतार−चढ़ाव तो स्वाभाविक ही हैं। हाँ, यदि हम दृढ़व्रती हुए तो हमारे पहले सफलता अधिक पड़ती है
और निर्बल−हृदय हुए तो हमारे पहले सफलता अधिक पड़ती है और निर्बल−हृदय हुए तो हमारे महत्त्वपूर्ण काम बिछुड़ जाते हैं और हम पथ−भ्रष्ट होकर पछताते हुए अपनी जीवन लीला समाप्त करते हैं।
क्षोभ, दुःख और पश्चात्ताप का यह वातावरण क्या संतोष, सुख और आनन्द के रूप में नहीं बदला जा सकता? उत्तर ‘हाँ’ में दिया जाता रहा है और मैं भी अपनी राय ऐसी ही कुछ रखता हूँ। पर मेरी ‘हाँ’ का तात्पर्य उस वर्ग से है, जो मिला हुआ समय व्यर्थ नहीं जाने देता और जो आलस्य, तंद्रा या अनुत्तरदायित्व के लोगों से मुत्त रहता है। दूसरा वर्ग ऐसा हो सकता है जो कर्मठ होने पर भी अपने कामों को पूरा न कर पा सकने की शिकायत करता है। शायद उसे मिले हुए समय का, अवसर का, पूरा−पूरा उपयोग करने की विधि का ज्ञान नहीं अथवा इस बात का ज्ञान होते हुए भी वह उस ज्ञान की अवहेलना करता है और समय−असमय काम करके पछताता भी है। समस्या समय−असमय या समय पर आवश्यक−अनावश्यक काम करने की है।
बहुधा ऐसे उदाहरण सामने आये हैं जिनमें कहा गया है कि यदि अवसर न चूकते तो आज और ही कुछ होते, विगत दिनों के क्षण पुनः प्राप्त हो जाय तो कुछ कर दिखाते, अब वह पौरुष नहीं रहा, वह समय नहीं रहा, अन्यथा धरती से पानी निकाल कर दिखा देते। यह तो लगभग उन सभी का कहना है जो जमाना देख चुके हैं। पर जिन्हें अभी बहुत−कुछ देखना है, जिन्हें अपने कंधों पर रखे बोझों से हल्का होना है, वे भी नहीं चेतते। उनकी तंद्रा, उनकी लापरवाही अभी तक ज्यों−की−त्यों जारी है।
कठिनाइयों से मुक्ति पाने के लिए कहीं दूर नहीं जाना है। समय के प्रतिफल−प्रतिक्षण का हिसाब रखा जाय और अपनी−अपनी सुविधानुसार अपने−अपने कामों को पूरा किया जाय तो व्यर्थ के बखेड़े क्यों उठ खड़े हों? आए−दिन भीतर−बाहर की अशाँति का शिकार क्यों होना पड़े?
मान लीजिए, आप दिन भर काम करके थक गए हैं और अब थोड़ा−सा विश्राम करने के बाद अपने अधूरे कामों को पूरा करने के लिए, कुछ खरीदने के लिए या घूमने, मिलने−मिलाने के लिये, आप घर से निकल पड़े। रास्ते में आपको ऐसा व्यक्ति मिला जिससे मिलना निताँत आवश्यक था। पता नहीं, इसके बाद वह फिर कब या किस समय मिले? पर मुश्किल यह है कि वह व्यक्ति एक अन्य व्यक्ति से बात कर रहा है। अब न तो आप उसे बीच में टोक सकते हैं और उससे बिना बात किये चले जाना ही चाहते हैं। इसका भी कुछ ठीक नहीं कि उन दोनों की वार्ता कब तक चले। बहुत सम्भव है कि आप रुके रहें−आधे घंटे या पूरे घंटे तक। प्रश्न यह है कि क्या आप घंटे भर यों ही उन दोनों की ओर ताकते खड़े रहेंगे? आप शायद कहेंगे कि उन्हें देखकर, या उस स्थान के चारों ओर के कार्य−व्यापार पर दृष्टि डाल कर बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। कह नहीं सकता कि आपके इस कथन में कहाँ तक सत्य है, परन्तु इस कथन का कोई प्रत्यक्ष मूल्य नहीं। वह तो प्रयास करने पर अध्ययन−योग्य सामग्री प्राप्त करने पर ही सम्भव हो सकेगा। जब आपको ठहरना ही पड़ गया तब आप उस पूरे घंटे भर करेंगे क्या? क्या आपकी जेब में कुछ लिखने को है, पढ़ने को है, पूरा करने का है, या किसी अधूरी योजना पर पुनः पूरी तरह से विचार करने को है, अधूरा काम निबटाने को है? पता लगाने पर, सोचने पर, कुछ न−कुछ अवश्य निकल ही आएगा और वह ‘कुछ’ ऐसा होगा कि बिना उस स्थान से दूर गए हुए आप उसे पूरा करने में समर्थ होंगे। वास्तविक दृष्टि से समय के पूरे पूरे उपयोग की यही विधि अपनानी है, अपने जीवन में व्यवहृत करनी है।
कभी−कभी यह शिकायत आती है कि क्या 24 घंटे अपने आपको कामों की चक्की में ही पिसते रहें? वास्तव में ऐसी सलाह न तो कोई देगा और न कोई मानेगा। अपने खाली समय के प्रतिक्षण−प्रतिपल का उपयोग करने का अर्थ यह है कि आप उस क्षण में वही काम करें, जिसमें आपको रुचि है। अपना काम करने में तो रुचि होती ही है, साथ ही दूसरों को समझाने या सहायता देने का कार्य भी आपको, मेरा विचार है, रुचिकर ही होगा। आप जरा काम करके तो देखिये। बड़ा संतोष होगा। रुचि अधिकाधिक बढ़ेगी। अधिक समय तक उस कार्य में लगे रहने पर आपको थकान न मालूम पड़ेगी। आपकी सहायता प्राप्त करने के लिए आपके घर वाले, परिवार वाले ही उत्सुक नहीं हैं बल्कि घर के बाहर की दुनिया में भी सैकड़ों हजारों ऐसे हैं, जिन्हें आपकी, आपके धन की, आपके समय की आवश्यकता है। आप उनके पास, जब समय मिले, पहुँच जाइए, उन्हें बाँह पकड़कर ‘बंधु’ कह कर उठाइए, वे बिना कौड़ी के आपके अभिन्न मित्र हो जाएंगे। सवाल है काम में और उसके प्रतिपादन में, करने में, रुचि लेने का।
आप की आँखें खराब हैं। डाक्टर महोदय ने सलाह दी है कि इधर−उधर के विज्ञापनों के फेर में न पड़ कर केवल एक प्राकृतिक उपाय का प्रयोग करें। वह यह कि आँखों को हथेलियों से बंद कर लीजिए, मन−ही−मन काली−काली वस्तुओं की कल्पना कीजिए और तत्पश्चात् पूर्ववत् हो जाइए। अब यदि आप अवसर मिलते ही नित्यप्रति इस प्रयोग को पूरा करलें तो निस्संदेह समय का पूरा पूरा उपयोग होगा, साथ ही स्वास्थ्य लाभ भी कर लेंगे।
आप बहुधा अपने सामने कामों की बाढ़ देख कर घबड़ा जाते हैं और यही विचारते हैं कि कौन काम कब किस समय किया जाय—समय ही नहीं मिलता। यह कहना उचित नहीं लगता। आप कई अवसर पाते हैं, पर इधर−उधर करके व्यर्थ ही उन्हें हाथ से चले जाने देते हैं। समय पाते ही काम करने की सोचिए और करके देखिए। हाँ, आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी कि आपके अल्पकालीन जीवन में व्यर्थ की बातचीत करने का समय नहीं है। रास्ते में, अपने घर पर या किसी के भी घर पर, व्यर्थ बात न करने का आप प्रण कर लें। फिर देखिए आपको कितना समय मिलता है।
अधिकाँश माता−पिता कहा करते हैं कि वे अपने बच्चों को सिखाने−पढ़ाने के लिए समय ही नहीं पाते। पर कुछ ऐसे उदाहरण आए हैं, जहाँ माता ने रोटी पकाते−पकाते ही बालक को अनेक पाठ याद करा दिये अथवा पिता ने कपड़े पहनते−पहनते पुत्र को गणित के कई सिद्धान्त समझा दिए।
मैंने कई बार ऐसी महिलाओं तथा बालिकाओं को देखा है कि जो रेलगाड़ी, मोटर अथवा ताँगे आदि की प्रतीक्षा करते समय बच्चों या बूढ़ों के लिए कुछ-न-कुछ बुना ही करती हैं। यही बात चित्र-रेखाचित्र बनाने वैयक्तिक सेवा-भाव की महिमा बताने, दैनिक या आकस्मिक घटनाओं के निराकरण के लिए उपयोगी डाक्टरी या वैद्यकी उपाय समझाने, किसी महत्त्वपूर्ण स्थान की यात्रा करने, महान् पुरुषों के चरणों में बैठकर कुछ सीखने तथा अन्य ऐसी ही कम-से-कम समय लेने वाली बातों के सम्बन्ध में भी लागू होती है।
समय का सदुपयोग करने का तात्कालिक संतोष तो होता ही है, परन्तु मेरे जैसे कुछ ऐसे लेखक भी हैं जिन्होंने क्षणों और पलों को बटोरकर कई एक लेख लिखे हैं और पुस्तकें लिखने की योजनाएं, यात्रा की योजनाएं या अवकाश के किसी दिन का सारा कार्य-क्रम बनाने आदि में भी सफलता प्राप्त की है। इसके लिए सुबह-शाम करना या तिथियाँ निश्चित करना व्यर्थ-सा लगता है। विचार उठा, अवसर मिला और काम पूरा किया। यही मूलमंत्र है समय का पूरा पूरा उपयोग करने और विचारों को सार्थक बनाने का।
(प्रो. पी. रामेश्वरम्)
दूसरों के दोष देखना कठिन बात नहीं है। सहज ही, छोटी मोटी भूलों को पकड़ कर किसी की भी आलोचना की जा सकती है। तिल का ताड़ बनाया जा सकता है। शब्दों की भी आवश्यकता नहीं। केवल भू−भ्रंगियों द्वारा नाक सिकोड़ कर अथवा मुँह बिचकाकर आप किसी भी व्यक्ति की आलोचना कर सकते हैं, तथा उसकी भूलों को प्रकाश में ला सकते हैं। किन्तु आलोचना करने से अथवा गलती पकड़ने से क्या वह व्यक्ति आपसे सहमत हो सकता है? “तुम बहुत फूहड़ हो। कितनी गन्दी पड़ी है अलमारी और फाइलों का यह हाल है? वास्तव में तुम क्लर्की के योग्य नहीं हो।” यह हैं कुछ नपे तुले शब्द, जो एक अधिकारी अपने क्लर्क अथवा सेक्रेट्री से कहता है। यह वाक्य किसी भाँति एक छुरी से कम नहीं है। सीधे सीधे श्रोता के आत्माभिमान पर चोट करता है। उसके अहंभाव, निर्णय−बुद्धि तथा चतुरता पर प्रहार करता है। क्या इससे वह अपना मस्तिष्क बदल देगा। कदापि नहीं प्लेटो और कान्ट के महान तर्कशास्त्र का आश्रय लेकर भी उससे बहस की जाय, तो भी व्यर्थ होगा। क्योंकि आलोचना के इस वाक्य ने उसकी भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।
दूसरों के दोष देखना और आलोचना करना एक दो धार वाली तलवार है, जो आलोचक एवं आलोच्य दोनों पर चोट करती है। शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करने का इससे सरल मार्ग और कौन सा हो सकता है? एक विद्वान का अनुभव है कि “मैं जब तक अपनी पत्नी के दोष ही देखता रहा, तब तक मेरा गृहस्थ जीवन कदापि शान्तिमय नहीं रहा”। इस प्रकार की प्रवृत्ति उत्पन्न होने पर सामने वाले व्यक्ति के दोष ही नजर पड़ते हैं, गुण नहीं। गुण—यदि उसमें हों भी−तो इस भाँति छिप जाते हैं जैसे तिनके की ओट पहाड़ छिप जाते हैं। पाश्चात्य सुप्रसिद्ध विचारक बेकन के अनुसार—पर छिद्रान्वेषण करना महा मानस रोग है। इससे मुक्त हो जाना ही चाहिये। मैथ्यू आर्नल्ड ने कहा था कि ‘दूसरों के दोष देखना−भगवान के प्रति कृतघ्न होना है।
दीपक लेकर ढूँढ़ने पर भी सम्भवतः अभी तक कोई भी व्यक्ति प्राप्य नहीं हो सकता जो सर्वांग पूर्ण हो। जिसमें कोई कमी न हो। ऐसा व्यक्ति अभी तक उत्पन्न ही नहीं हुआ वह तो भविष्य में कभी होना है। तब तक किसी को गलत बनाना, काट छाँट करना कहाँ तक उचित है? डाक्टर जौन्सन कहा करते थे “श्रीमान! स्वयं परमात्मा भी, आदमी के अन्तिम दिन से पूर्व उसके सम्बन्ध में कोई निर्णय नहीं देता। फिर हम और आप ही किसी को गलत कैसे कह दें?” हमारे हृदय में भी वही भाव होने चाहिये कि अपने परिचितों, प्रियजनों, मित्रों तथा अन्य लोगों की नग्नता और बुराइयों को व्यर्थ में ही न देखते फिरें। गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में हमारा स्वभाव कपास के समान निर्मल होना चाहिए:—
साधु चरित शुभ सरिस कपासू। सरस विसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख पर छिद्र दुरावा। बन्दनीय जेहि जग जसु पावा॥
स्वयं कष्ट सहन करले किन्तु दूसरों के दोष छिपावे यह सज्जनों का गुण माना गया है। मुस्लिम धर्म ग्रन्थ की एक कथा है कि हजरत नूह एक दिन शराब पीकर उन्मत्त हो गये। उनके वस्त्र अस्त व्यस्त हो गये और अन्ततः वे नंगे हो गये। उनके पुत्र शाम और जैपेथ उलटे पैरों उन तक गये और उन्हें एक कपड़े से ढक दिया। उन्होंने अपने प्रिय पिता का नंगापन नहीं देखा। हमारे हृदय में भी यही भाव होना चाहिये कि अपने प्रियजनों की नग्नता अर्थात् उनकी बुराइयाँ व्यर्थ में ही न देखते फिरा करें।
कष्ट सह कर भी दूसरों के दोष छिपाने और उनकी आलोचना न करने का महत्व बहुत पहले ही जान लिया गया था। ईसा मसीह से भी 2200 वर्ष पूर्व मिश्र के प्राचीन राजा अख्तुई ने कहा था “दूसरों की भूल मत पकड़ और यदि नजर पड़ ही जाय तो कह मत” क्राइस्ट ने भी यही कहा था कि “यदि तू चाहता है कि तेरे दोषों पर विचार न किया जाय, तो तू भी दूसरों के दोषों पर विचार न कर”।
अधिकतर व्यक्ति शिकायत करते हैं कि अमुक मित्र ऐसा है, अमुक सम्बन्धी ऐसा है। उनकी यह कमी है, आदि आदि। पर उस व्यक्ति के उन गुणों पर विचार ही नहीं करते जोकि अन्य व्यक्ति यों में उपलब्ध नहीं हैं और जिनके कारण उन अनेक उलझनों से बचे हुए हैं जिनमें अन्य व्यक्ति परेशान हैं। महर्षि बाल्मीकि ने भगवान राम की प्रशंसा करते हुए बार बार उन्हें ‘अनुसूय’ कह कर स्मरण किया है। अनुसूय अर्थात्—किसी के गुणों में दोष न देखने वाले।
पर दोष−दर्शन के पाप से मुक्ति पाने के लिये, गुण−चिन्तन का अभ्यास डालना चाहिए। प्रतिपक्षी के गुणों का विचार करना चाहिये। चीनी कवि यू−उन−चान की कविता की कुछ पंक्ति यों का अनुवाद हमारे इस कथन का समर्थक है:—
‘हे प्रभु! मुझे शत्रु नहीं—मित्र चाहिये तदर्थ मुझे कुछ ऐसी शक्ति दे। कि मैं किसी की आलोचना न करूं—गुणगान करूं”।
बैंजामिन फ्रैंकलिन अपनी युवावस्था में बहुत नटखट थे। दूसरों की आलोचना करना, खिल्ली उड़ाना उनकी आदत बन चुकी थी। क्या पादरी, क्या राजनीतिज्ञ सभी उनके गाने हुए शत्रु बन चुके थे। बाद में इस व्यक्ति ने अपनी भूल सँभाली और अन्त में जब वह उन्नति करते करते अमेरिकन राजदूत होकर फ्रांस में भेजे गये तो उनसे पूछा—“आपने अपने शत्रुओं की संख्या कम करके मित्र कहाँ से बना लिये?” उन्होंने उत्तर दिया—“अब मैं किसी की आलोचना नहीं करता और न किसी के दोष उभार कर रखता हूँ। हाँ—अलबत्ता—किसी का गुण मेरी दृष्टि में आ जाता है तो उसे अवश्य प्रकट कर देता हूँ। यही मेरी सफलता का रहस्य है”।
(श्री आर्थर एस. बेस्ट)
व्यक्ति यों की संख्या बहुत ही अधिक है जो यह समझते हैं कि परिस्थितियाँ उनकी अनुकूल नहीं हैं और उन्हें उन्नति करने का अच्छा मौका नहीं मिल रहा है। वास्तविक कठिनाई यह है कि जीवन संघर्ष में वे साधारण लोगों की तरह हो गये है—उन्होंने कठिनाइयों से ऊपर उठने की कोशिश ही नहीं की है और स्वयं अपना अस्तित्व ही मिट जाने दिया है।
हमें इस प्रकार की असफलता का कारण ढूँढ़ निकालने की कोशिश करनी चाहिये क्योंकि यह वाकई एक बहुत बड़ा दुःख है।
असफलता का यह कारण ढूंढ़ते वक्त देखा गया है कि कुछ में इच्छा शक्ति की कमी होती है। वह जीवन−रण में बहुत आसानी से हरा दिये जाते हैं।
कुछ व्यक्ति इसलिए असफल होते हैं कि उनमें मान, प्रतिष्ठा, उन्नति आदि की कोई इच्छा नहीं होती। जो कार्य वे करते हैं, उसका सिवाय इसके कि उससे खाने पीने का सामान, कपड़े और थोड़े से आराम का प्रबन्ध होता है और कोई भी अर्थ नहीं होता।
अनेक व्यक्ति आत्मविश्वास की कमी के कारण असफल होते हैं। वे अपने गुणों में पूरी तरह विश्वास नहीं रखते और अपनी परीक्षा होने से डरते हैं। वे जिम्मेदारी के नाम से ही काँप जाते हैं।
सबसे ज्यादा मनुष्य जीवन में अपने सामने कोई लक्ष्य अथवा ध्येय न होने के कारण असफल होते हैं। उनके सामने कोई लक्ष्य नहीं होता और वे मामूली तौर से ही जीवन−यापन करने में सन्तुष्ट रहते हैं।
यदि तुम सफलता प्राप्त करना चाहते हो, वह सफलता अपने व्यापार को पूरी ऊँचाई पर ले जाने की हो या अपने घर को एक आदर्श घर बनाने की हो, तो तुम्हारे सामने कोई निश्चित लक्ष्य होना चाहिए।
केन्द्रित विचार और स्फूर्ति को किसी कार्य की पूर्ति के लिए पूरी तरह लगाने का मतलब ही लक्ष्य है।
कोरे स्वप्नों, निरर्थक इच्छाओं और केवल प्रस्तावों से कुछ नहीं बनता।
यदि एक मनुष्य के सामने कोई चुना हुआ लक्ष्य है और वह इच्छा और शोक से भरा है तो उसके लिये उन्नति करने के असंख्य मौके हैं।
केवल कठिनाइयों के कारण ही निश्चित लक्ष्य वाले व्यक्ति अपनी कोशिशों से नहीं डिगाये जा सकते, बल्कि कठिनाइयाँ पड़ने पर वे और अधिक उत्साह से उनका सामना करने को तैयार हो जाते हैं।
अपने सामने कोई निश्चित ध्येय अथवा रास्ता होना चाहिए। उसे इसको बिलकुल पूरी तरह जानना चाहिए, यहाँ तक कि वह उसे कागज पर लिख सके। ऐसा करने से वह समय समय पर की गई अपनी उन्नति को अनुभव कर सकेगा और भूलों को सुधारकर परिवर्तन भी कर सकेगा।
यदि तुम्हारे सामने एक निश्चित काम है, तो स्वयं अपने हृदय से पूछो कि क्या यह वाकई निश्चित और महत्त्वपूर्ण लक्ष्य है अथवा केवल क्षणिक ही, जो कि शीघ्र ही मिट जाने वाला है?
क्या यह लक्ष्य तुम्हें काम करने को मजबूर करता है, विचारों को बढ़ाता है, जोश दिलाता है, विश्वास बँधाता है, साहस और पक्का निश्चय पैदा करता है।
केवल एक निश्चित ध्येय होने का अर्थ यह नहीं कि तुम अवश्य ही सफलता प्राप्त करोगे, लेकिन सामने लक्ष्य होने से उस दिशा में तुम्हारे प्रयत्न बढ़ जायेंगे और तुम अधिक काम कर सकोगे।
ध्येय निश्चित होने पर तुम उसकी प्राप्ति में लग जाते हो। यह सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण है। यह तुम्हारी योग्यता, साहस, सहनशक्ति और स्फूर्ति को ललकारता है और अधिक काम पर लगाता है।
किसी एक निश्चित ध्येय की प्राप्ति का पक्का विचार कर लो। एक मनुष्य ने कहा है—“महत्वपूर्ण यात्रा में जहाज का डूब जाना, निरर्थक जीवन को इधर उधर थिथले पानी में खोने से कहीं अच्छा है।”
मिस जेनेली, भूतपूर्व मिश्र मन्त्री पार्लियामेंट, अपनी सफलता के तत्व को लिखती हुई कहती हैं—“मेरे लिए सौभाग्यवान होने का मतलब ऐसे काम अथवा लक्ष्य का पूरा होना, जिसमें मनुष्य पूरा विश्वास रखता है, जो किए जाने योग्य है अथवा जिसको पूरा करने में उसकी तमाम शक्तियाँ केन्द्रित होकर लग जाती हैं। मैं इसमें विश्वास नहीं करती कि प्रसन्नता भी कोई ऐसा ध्येय है जोकि स्वयं ही मिल जाये, वरन् ठीक प्रकार से जीवन व्यतीत करने के फलस्वरूप ही प्रसन्नता मिलती है।”
अपने जीवन के ध्येय अथवा लक्ष्य को मालूम करने में अपनी तमाम शक्तियाँ केन्द्रित कर दो, क्योंकि उसी लक्ष्य में तमाम शक्तियाँ छुपी हुई हैं।
जीवन को सफल बनाने के लिए तीन बातें बहुत जरूरी हैं।
1—आत्म−खोज सफलता के लिए आवश्यक है। अपने को जानने और समझने का मतलब जीवन में अवश्य आने वाली तमाम कठिनाइयों और निराशाओं से अपने को सुरक्षित रखना है।
क्षण भर के लिए उन सब भावों, विचारों, इच्छाओं एवं कार्यों पर जिन पर कि तुम्हारा अस्तित्व निर्भर है दृष्टिपात करो। याद रखो, वही सफलता अथवा असफलता का निश्चय करते हैं।
तुम घृणा, भय, सन्देह, चलन, कटुता, अनमनापन, प्रेम, साहस, विश्वास, इरादा, ध्यान, प्रशंसा, प्रसन्नता, हिम्मत से जितने अधिक प्रभावित होगे, उतनी ही तुम्हारी सफलता भी। सफलता इन सब गुणों पर काफी हद तक निर्भर है।
हम सब में अनजाँची शक्ति और बेमालूम कमजोरी बहुत अधिक है। हम अपनी ताकत का, जोकि बहुत कुछ कर सकती है अनुभव नहीं कर सकते।
तुम स्वयं अपने को पूरी तरह से जानने और आत्म विश्लेषण के प्रयत्न में निडर और ईमानदारी से लगे रहो, सफलता तुम अवश्य अपने निकट पा सकोगे।
2—आत्म−नियन्त्रण सफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इससे उत्पन्न अच्छी आदतें शरीर स्वस्थ रखती हैं।
कोई नवयुवक पूर्ण रूपेण आत्मानुभव नहीं कर सकता जब तक कि वह शारीरिक नीति से स्वस्थ न हो।
खाने पीने से सावधानी, दाँतों की रक्षा, शरीर की सफाई, नींद की आवश्यकता का लक्ष्य तो इतना स्पष्ट है कि उन पर जोर देने की आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती है। तो भी कुछ ऐसे नवयुवकों को जानता हूँ जो अपने मोटर के इञ्जिन की अपने शरीर से कहीं अधिक परवाह करते हैं और ऐसी युवतियाँ भी हैं, जिन्हें स्वास्थ्य की अपेक्षा साड़ी की अधिक फिक्र है।
वातावरण एवं पुश्तैनी आदतों से रक्षा करने के लिए सत्य ज्ञान के सहारे अपने भावों एवं इच्छाओं का ठीक नियन्त्रण बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
तुम्हारे अन्दर अपनी आदतों और क्रोध को पचा लेने की शक्ति होनी चाहिए।
कुछ तरुणों ने दिन का काम बुरी भावना एवं क्रोध में प्रारम्भ करने की आदत डाल ली है। यह सफलता के लिए बहुत बाधक है। वास्तव में आत्म नियन्त्रण ठीक तरह रहने का तत्व है।
3—आत्म−स्पष्टीकरण—सफलता प्राप्त करने के लिए तुम में अपने को दूसरों पर पूरी तरह जाहिर करने की शक्ति होनी चाहिए।
यदि तुम अपने को पूरी तरह जाहिर कर सकते हो और स्पष्टीकरण की इच्छा को पूरा करने की जिम्मेदारी को मंजूर करते हो तो तुम्हारी यह योग्यता वाकई बहुत महत्वपूर्ण है।
तुम्हें अपने काम में पूर्णरूपेण दक्ष होना चाहिए। बारीकियों पर ध्यान देना दक्षता के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, परन्तु इन्हीं बारीकियों पर ध्यान नहीं देते।
बाहरी सूरत शक्ल और वेश विन्यास भी आत्म स्पष्टीकरण में बहुत उपयोगी हैं। बाहरी शक्ल के देखने से ही जीवन की बारीकियों की तरह दिये गये ध्यान का पता चल जाता है। योग्य और उन्नत आदमियों के साथ लगातार रहने पर मैंने उनको भी अपनी वेष भूषा पर काफी ध्यान देने वाला पाया है। इसका मतलब यह नहीं है कि तुम रात−दिन फैशन में डूबे रहो, बल्कि यह कि हौलूपन से बचो और साफ स्वच्छ−व्यवस्थित रहो।
जो कुछ तुम कहो तुम्हारे लिए बन्धन स्वरूप होना चाहिए। भविष्य के लिए कोई भी बात भयावह नहीं है जितनी अपने शब्दों को पूरा न करना। तुम जो वायदा करो उसे अवश्य पूरा करो।
अब तुम आत्म−खोज, आत्म−नियन्त्रण और आत्म−स्पष्टीकरण के महत्व को पहचान लोगे, तो तुम निश्चित रूप से सफलता के मार्ग में आगे बढ़ते चले जाओगे। सफलता से मेरा मतलब अपने को जीत लेना और मानव जीवन के किसी काम आने योग्य होना है।
मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि संसार में उन्नति करने के लिये सुशील होना कितना अच्छा है।... मैं प्रायः प्रत्येक कार्य को इस दृष्टि से करता भी हूँ। परन्तु जब कभी ऐसा अवसर उपस्थित होता है कि यथार्थ से इसमें विरोध की आशंका होने लगती है, उसी क्षण मैं रुक जाता हूँ। सुशील होना अच्छा है, पर अतिशय नम्रता में मैं विश्वास नहीं करता। मेरा आदर्श है समदर्शिता। जिसमें हर किसी के साथ समान बर्ताव करने की शिक्षा दी जाती है। साधारण मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपने स्वामी समाज के आदेशों का पालन करे। परन्तु सत्य के पुत्र इस नियम से बाध्य नहीं होते। यह एक सनातन मर्यादा चली आ रही है कि हर एक को यहाँ अपनी परिस्थिति के अनुसार वातावरण और समाज की प्रगति देख कर चलना पड़ता है। इसके लिये समाज उसे हर तरह की सुविधाएँ देने को तैयार है। परन्तु सत्य का पथिक इसके विपरीत अकेला खड़ा होकर समाज की गति−विधि का निरीक्षण किया करता है। यों तो समाज का दास बन कर मनुष्य को जीवन के सभी प्रकार के आनन्द भोगने को मिल सकते हैं, और समाज के प्रतिकूल चलने वालों का जीवन नितान्त कष्टमय व्यतीत होता है, पर अन्तिम सत्य यह नहीं है। समष्टि की पूजा करने वाले क्षण में विलीन हो जाते हैं, सत्य के पुजारी संसार में अमर होकर रहते हैं।
मैं यहाँ की तुलना जला कर राख कर देने वाली शक्ति से करूंगा। जहाँ कहीं वह प्रवेश करती है, सब मिलकर स्वाहा हो जाता है। कोमल पदार्थों पर उसका प्रभाव शीघ्र पड़ता है, ठोस पदार्थ तनिक देर में पिघलते हैं। परन्तु वह शक्ति प्रत्येक दशा में अपना काम करती अवश्य है। इसे समझो। यौवन और सौंदर्य के मोह क्षणिक है, जीवन और सम्पत्ति नाशवान्, नाम और यश स्थायी नहीं हो सकते, यहाँ तक कि पर्वत भी धूल में मिल जाते हैं। मित्रता और प्रेम का भी विनाश होकर रहेगा। केवल सत्य का सम्बन्ध सनातन से है। हे मेरे सत्य देवता! तुम्हीं मेरा पथ निर्दिष्ट करना। मैं अब अपने को दूध और शहद में परिणत नहीं कर सकता। मुझे वैसा ही बना रहने दो जैसा कि मैं हूँ। निर्भय होकर, बिना क्रय−विक्रय करते हुए मैत्री और वैर की भावना छोड़ कर, हे संन्यासी! सत्य का पल्ला पकड़ और इसी क्षण से संसार से अपने को मुक्त हुआ जान। भविष्य की चिन्ता क्यों करता है? क्योंकि साँसारिक लिप्सा तुझे नहीं छोड़ती? सत्य! तू ही मेरा पथ−निर्देशक बन। मुझे धन, यश और नाम से कोई प्रयोजन नहीं है। मेरे लिये ये धूलि के समान हैं। मैं केवल अपने भाइयों की सहायता करने आया हूँ।
मनु के शब्दों में संन्यासी का कर्त्तव्य है, “अकेले रहो और बिना साथी के चला करो।” सारी मैत्री और सम्पूर्ण प्रेम बन्धन है। महर्षियों! तुम्हारे विचार कितने सन्तुलित और ध्रुव थे। सत्य के देवता की सेवा करने का अधिकारी वह व्यक्ति नहीं है,जो दूसरे का आश्रय ढूँढ़ता है। मेरे अन्तर! शान्त हो जा। अकेला विहार करना सीखो। ईश्वर तेरा साथी है। केवल ईश्वर की व्यापक सत्ता का ही अनुभव हमें चारों ओर होता है। मन, तू निर्भय क्यों नहीं होता? स्वच्छन्द होकर विचरण कर। लोगों को चीखने चिल्लाने दिया करो। मेरी उनके विषय में भर्तृहरि के शब्दों में यही धारणा बनी हुई है कि—संन्यासी तू! अपने मार्ग पर चलता जा। कोई तुझको पागल कहेंगे, कोई चाण्डाल कह कर घृणा करेंगे। ऐसे लोग भी होंगे, जो तुझे ऋषि मानकर तेरी बातें बड़े ध्यान से सुनेंगे। साँसारिक जन की बातों का बुरा न मान। हाथी के पीछे कितने ही कुत्ते भौंकते रह जाते हैं। वह सीधा अपने मार्ग पर चला जाता है। जब कोई महान् आत्मा पृथ्वी पर जन्म लेता है, तो उस पर भौंकने वाले लोगों का अभाव नहीं रहता।
विशद् गायत्री महायज्ञ:—
महायज्ञ का कार्यक्रम निर्धारित संकल्प एवं कार्यक्रम के अनुसार बड़े ही सुव्यवस्थित ढंग से चल रहा है। तपोभूमि में निवास करने वाले याज्ञिक लोगों की दिनचर्या ऐसी रहती है जिससे उन्हें आध्यात्मिक साधना एवं शास्त्रीय ज्ञान प्राप्त के लिए समुचित अवसर मिलता है। सायंकाल के 4 बजे से नियमित रूप से शास्त्रीय शिक्षा की कक्षा आरंभ हो जाती है। संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् ब्रह्मचारी जगतनारायणजी एवं आचार्य जी इन कथाओं का अध्यापन करते हैं। अतः सायं विधिवत् वेद मन्त्रों से गायत्री माता की पूजा अर्चा सामूहिक रूप से बड़े ही हृदयग्राही रूप से की जाती है। अब तक प्रातःकाल में अध्ययन काल तक गायत्री मन्त्र से हवन करने का काम क्रम चल रहा है। नवरात्रि बाद वेद पारायण यज्ञ तथा अन्यान्य यज्ञों का कार्यक्रम आरंभ किया जायगा। अब तक देश के सुदूर प्रान्तों से आ आकर अनेक नैष्ठिक गायत्री उपासक मथुरा महायज्ञ में भाग ले चुके हैं। अपने−अपने स्थानों पर तो बड़ी संस्था में लोग भाग ले रहे हैं। यज्ञ के अन्त तक भागीदारों की निर्धारित संख्या पूर्ण हो जायगी ऐसी आशा की जाती है। संरक्षण व्यवस्था में जो अपूर्णता है वह भी धीरे−धीरे पूरी होती जा रही है।
नवरात्रि:—
चैत्र की नवरात्रि में देश भर में गायत्री उपासना का आयोजन हो रहा है। इस पुण्य पर्व पर सर्वत्र 24 हजार जप के अनुष्ठान किये जा रहे है। गायत्री तपोभूमि में भी बड़ी संख्या में उपासक लोग आये हुए हैं और परम सात्विक वातावरण में अपनी तपश्चर्या कर रहे हैं। इन दिनों गायत्री तपोभूमि में प्राचीन काल के ऋषि आश्रमों का दृश्य उपस्थित है। यज्ञ धूम्र और वेद ध्वनि में यहाँ का वातावरण स्वर्गीय शान्ति प्रदान करने वाला दृष्टिगोचर होता है। नियन्त्रित कार्यक्रम के अनुसार इन दिनों गायत्री महापुरश्चरण, यज्ञ, तीर्थयात्रा, प्रचलन आदि भली प्रकार चल रहे हैं, उनका सचित्र विवरण पाठकों को अखंड−ज्योति के पृष्ठों पर पढ़ने को मिलता रहेगा।
सरस्वती यज्ञः—
ज्येष्ठ सुदी 1 से ज्येष्ठ सुदी 10 तदनुसार ता॰ 22 मई से 31 मई तक 10 दिन का सरस्वती यज्ञ गत वर्ष की भाँति होगा। इसमें बुद्धिवर्धक सरस्वती मन्त्रों से आहुतियाँ दी जाएंगी तथा ब्रह्मी, वच, शतावरि, गोरखमुण्डी, अष्टवर्ग गुरुच कमल पुष्प आदि बुद्धिवर्धक औषधियों का ही हवन किया जायेगा। साथ ही मानसिक, आतंक, चारित्र्यक उत्कर्ष करने वाले प्रवचनों की व्याख्यान माला इन 10 दिनों में पूर्ण की जायगी। समीपवर्ती तीर्थयात्रा का भी शिक्षाप्रद कार्यक्रम रहेगा तथा अनेक सुविज्ञ व्यक्ति यों के प्रवचन होंगे। विद्यार्थियों एवं बुद्धि जीवियों के लिये यह अवसर बहुत ही लाभप्रद है। स्कूलों की इन दिनों छुट्टियाँ भी रहती हैं। जो लोग इस यज्ञ में आना चाहें वे पहले से ही स्वीकृति प्राप्त कर लें, क्योंकि यहाँ स्थान थोड़ा होने से सीमित संख्या में ही स्वीकृति दी जाती है। बुद्धि−वृद्धि, मानसिक शक्ति यों का विकास एवं चित्त की उद्विग्नता को शान्त करने के लिए सरस्वती यज्ञ में भाग लेना निश्चय ही बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।
साँस्कृतिक पुनर्निर्माण की शिक्षा:—
भारतीय समाज को प्राचीन साँस्कृतिक आधार पर पुनर्निर्माण करने के लिए गायत्री तपोभूमि में अनेक प्रकार के छात्रों की सांगोपांग शिक्षा पद्धति, षाडस संस्कार, पर्व, व्रत त्यौहार आदि का शास्त्रोक्त रीति में करने की व्यवस्थित शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। उनके लिए ऐसे छात्रों की आवश्यकता है जो संस्कृत जानते हों तथा दूसरों को प्रभावित करने एवं पथ प्रदर्शन करने की योग्यता रखते हैं। इस शिक्षा के लिए 18 वर्ष से कम की आयु न होनी चाहिए। अब तक कई व्यक्ति यों को संस्कृत ज्ञान के अभाव तथा दुर्बल व्यक्ति त्व के कारण अस्वीकृत करना पड़ा है। चूँकि यह शिक्षा राष्ट्र का साँस्कृतिक पुनर्निर्माण करने वाले कार्यकर्ता तैयार करने की दृष्टि से आरंभ किया है इसलिए है लोग इसके उपयुक्त हों वे ही प्रार्थना−पत्र भेजें।
(श्री शेख वली मुहम्मद नजीर)
यह पैंठ अजब है दुनिया की और क्या क्या जिन्स इकट्ठी है। याँ माल किसी का मीठा है और चीज किसी की खट्टी है।। कुछ पकता है कुछ भुनता है, पकवान मिठाई पट्टी। जब देखा खूब तो आखिर को ना चूल्हा भाड़ न भट्टी है।। गुल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मिट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, यह धोके की सी टट्टी है ।।1।।
कोई ताज खरीदे हँस-हँस कर, कोई तख्त खड़ा बनवाता है। कोई कपड़े रंगे पहिने है, कोई गुदड़ी ओढ़े जाता है।। कोई भाई, बाप, चचा, नाना कोई नाती, पूत कहाता है। जब देखा खूब तो आखिर को, ना रिश्ता है न नाता है।। गुल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मिट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, यह धोके की सी टट्टी है ।।2।।
कोई सेठ महाजन लाखपती, बज्जाज कोई पंसारी है। याँ बोझ किसी का हलका है, और खेप किसी की भारी है।। क्या जाने कौन खरीदेगा और किसने जिन्स उतारी है। जब देखा खूब तो आखिर को दल्लाल न कोई व्यौपारी है।। गुल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मिट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, यह धोके की सी टट्टी है ।।3।।
कोई बनिया है, कोई तेली है, कोई बेचे पान तमोली है। कोई सर पर रखकर खींचे है, कोई बांधे फिरता झोली है।। कहीं गोन है ढीली नाजों की, कहीं ठेला-ठेली खोली है। जब देखा खूब तो आखिर को, एक दम की बाला ढोली है।। गुल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मिट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, यह धोके की सी टट्टी है ।।4।।
अब किसका रंग बुरा कहिए, और किसका रूप भला कहिये। एक दम की पैंठ लगी है यह, अम्बोह मजा चरचा कहिये।। यह सैर तमाशा देख नजीर, अब जा कहिये बेजा कहिये। कुछ बात नहीं बन आती है, चुपचाप पहेली क्या कहिये।। गुल शोर बबूला आग हवा और कीचड़ पानी मिट्टी है। हम देख चुके इस दुनिया को, यह धोके की सी टट्टी है।।
*समाप्त*