पहले इसे पढ़ लीजिये।

(1) ‘अखण्ड-ज्योति’ का नया वर्ष जनवरी से प्रारम्भ होता है। सो अधिकाँश ग्राहकों का चन्दा भी दिसम्बर में ही समाप्त होता है।जिनका चन्दा दिसम्बर में समाप्त होता है, उनसे प्रार्थना है कि अपना चन्दा मनी-आर्डर से अविलम्ब भेज दें।

(2) सन् 56 से अखण्ड ज्योति की पृष्ठ संख्या ड्यौढ़ी हो जायगी, किन्तु चन्दा ड्यौढ़ा न करके केवल।।) ही बढ़ाये गये हैं। अब 2।।) नहीं 3) ही चन्दा स्वीकार किया जायगा। एक वर्ष से कम के लिये ग्राहक नहीं बनाये जाते।

(3) कई सज्जन आलस्यवश चन्द समय पर नहीं भेजते, कई मास बीत जाने पर सुधि लेते हैं, तब तक पिछले अंग समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि अखण्ड ज्योति उतनी ही छपती हैं, जितने ग्राहकों का चन्दा प्राप्त होता है। वर्ष की फाइल अधूरी न रहे, इस कठिनाई से बचने के लिये चन्दा दिसम्बर मास में ही भेज देना चाहिये।

(4) अखण्ड ज्योति की वी. पी. मंगाना अपने ।।) बिल्कुल व्यर्थ बरबाद करना हैं। 3) चन्दा और ।।) वी. पी. का डाक खर्च कुल 3।।) की वी. पी. पहुँचती हैं और उसके लौटे आने पर इस वी. पी. खर्च की हानि हमें उठानी पड़ती है। इसलिये वी. पी. न मंगा कर मनी आर्डर से चन्दा भेजना ही सब प्रकार सुविधाजनक है।

(5) मनीआर्डर कूपन पर अपना पूरा पता तथा ग्राहक नम्बर लिखना न भूलना चाहिये। नये ग्राहक मनीआर्डर कूपन पर “नये ग्राहक” शब्द अवश्य लिख दे।

(6) जो सज्जन बीच के किसी मास में ग्राहक बने हैं, उन्हें सन् 56 के शेष महीनों का चन्दा भेजकर अपना वर्ष जनवरी से ही आरम्भ करा लेना चाहिये। उन्हें अपना हिसाब इस प्रकार जोड़ना चाहिये:-

“सन् 55 के अंकों का मूल्य 2।।) के हिसाब से काट कर , शेष जो बचे, उसको सन् 56 के 3) में से कम कर लें और शेष पैसा भेज दें।”

(7) यों पिछले वर्षों भी ‘अखण्ड ज्योति’ की कागज छपाई की लागत ग्राहकों से प्राप्त होने वाले चन्दे से मुश्किल से ही पूरी हो पाती थी। फिर इस वर्ष तो पृष्ठ ड्योढ़े किये गये हैं और चन्दा।।) ही बढ़ा हैं। ऐसी दशा में घाटा जाने की निश्चित सम्भावना है। इस कठिनाई की पूर्ति तभी हो सकती हैं जब ग्राहक संख्या बढ़े। आप कुछ ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करके ‘अखण्ड ज्योति’ की सहायता ओर दूसरी को सद्ज्ञान की-सन्मार्ग की प्रेरणा देने का सत्कार्य कर सकेंगे। इसके लिए आपसे विशेष अनुरोध है।

(8) यहाँ से हर महीने दो बाद जाँच कर ठीक समय पर अखण्ड ज्योति भेजी जाती हैं। 1- पते में गलती, 2- डाक की गड़बड़ी, 3- पता बदल लेने पर भी उसकी सूचना न देना, प्रायः यही कारण अंक न पहुँचने के होते हैं। यदि किसी मास अंक न पहुँचे तो उसी मास ता. 15 के लगभग सूचना देकर दूसरी प्रति मंगा लेनी चाहिये बहुत दिन बाद अंक न पहुँचने की शिकायत मिलने पर-जब वे अंक समाप्त हो चुकते हैं, दुबारा भेजना कठिन होता है।

(9) उत्तर के लिए जवाबी पत्र भेजना तथा हर पत्र में अपना पूरा पता लिखना उत्तर जल्दी मिलने में बहुत सहायक होता है। आचार्य जी से व्यक्तिगत परामर्श के लिए तो जवाबी पत्र भेजना एक नैतिक कर्तव्य भी हैं।

व्यवस्थापक, ‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा।


प्रभु से प्रार्थना


प्रभु से प्रार्थना (Kavita)

प्रभु जीवन ज्योति जगादे!

घट घट बासी! सभी घटों में, निर्मल गंगाजल हो।

हे बलशाही! तन तन में, प्रतिभापित तेरा बल हो।।

अहे सच्चिदानन्द! बहे आनन्दमयी निर्झरिणी—

नन्दनवन सा शीतल इस जलती जगती का तल हो।।

सत् की सुगन्ध फैलादे।

प्रभु जीवन ज्योति जगादे।।

विश्वे देवा! अखिल विश्व यह देवों का ही घर हो।

पूषन्! इस पृथ्वी के ऊपर असुर न कोई नर हो।।

इन्द्र! इन्द्रियों की गुलाम यह आत्मा नहीं कहावे—

प्रभुका प्यारा मानव, निर्मल, शुद्ध, स्वतन्त्र, अमर हो।।

मन का तम तोम भगादे।

प्रभु जीवन ज्योति जगादे।।

इस जग में सुख शान्ति विराजे, कल्मष कलह नसावें।

दूषित दूषण भस्मसात् हों, पाप ताप मिट जावें।।

सत्य, अहिंसा, प्रेम, पुण्य जन जन के मन मन में हो।

विमल “अखण्ड ज्योति” के नीचे सब सच्चा पथ पावें।।

भूतल पर स्वर्ग वसादे।

प्रभु जीवन ज्योति जगादे।।

(श्री. स्वामी आनन्दतीर्थ जी महाराज)


हमारा यज्ञीय देश

(ले. श्री. नरदेवशास्त्री, वेदतीर्थ एम. एल. ए., ज्वालापुर)

किसी समय हमारे देश में इतने अधिक यज्ञ होते रहे कि हमारा देश ही “यज्ञीय देश” कहलाया गया। समय का फेर हैं, आज वही देश यज्ञ शून्य सा हो रहा है, इसी प्रकार संसार में उलट फेर होते रहते हैं-

तपः परं कृतयुगे। त्रेतायाँ ज्ञानमुच्यते।। द्वापरे यज्ञमित्याहुः। दानमेकं कलौयुगे।।

कृतयुग अर्थात् सतयुग तपः प्रधान रहता है। त्रेता में ज्ञान प्राधान्य होता है। द्वापर में यज्ञों की प्रधानता रहती हैं अर्थात् द्वापरं असली कर्म प्रधानयुग है। कलियुग में केवल दान की बात शेष रहती है।

इस प्रकार युग ह्रास की कहानी सर्वत्र रहती है।

हमारे पूर्वजों के अतिपूर्वज,

यज्ञेन या मयजन्त देवाः,

तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।।

ते हि नाकं महिमानं सचन्तः।

यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः।।

(यजुः)

यज्ञों से यज्ञ (परमात्म-पुरुष) को प्राप्त करते थे, यही उनका मुख्य धर्म था और चले जाते थे सीधे स्वर्लोक को जहाँ पहिले से साध्यदेव रहते हैं।

यजुः 18 अध्याय में यज्ञ की महिमा विस्तृत रूप में वर्णित है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इनका व्याख्यान है उपनिषदें पराविद्या की बात को कहती हैं पर यज्ञों का निषेध नहीं करतीं।

यज्ञ क्या हैं?- जिनसे सभी प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति हो सकती हो।

यो यदिच्छति तस्य तत्

गीता कहती है कि-

अन्न से प्राणी उत्पन्न होते हैं, अन्न होता है, पर्जन्य से, पर्जन्य होता है यज्ञों से यज्ञ होता है कर्मकलाप से कर्मों का वर्णन हैं वेदों में, वेद बने हैं अक्षर ब्रह्म से प्रजापति ने यज्ञ चलाये और प्रजा से कहा इनको करते जाओ, तुम्हारे मनोरथ सिद्ध होंगे। तेतीस देवता अनेक प्रकार से हमको देते रहते हैं, उनको अन्यों तक न पहुँचाकर हम पापी बन जाते हैं इत्यादि। तभी से-

अग्नये स्वाहा। सोमाय स्वाहा। प्रजापतये स्वाह। सूर्याय स्वाहा। इत्यादि चल पड़ा है।

यज्ञ कई प्रकार के है। किन्तु साधारण जनोपयोगी हैं द्रव्यमययज्ञ श्रेयान् द्रव्यमयाद् यज्ञः ज्ञानयज्ञः परन्तप। द्रव्ययज्ञ के ऊपर है ज्ञानयज्ञ

ऐसे ही ऊपर के यज्ञ हैं। पर हम तो आज बात लिख रहे हैं”द्रव्यमय यज्ञ” की जिनके विधि विधान वैदिक काल से चले आते थे किन्तु विदेशी विधर्मी पद्धति के शासन काल में लुप्त हो गये। जब मूल वेद ही नहीं रहे तब उसके आश्रय से चलने वाले यज्ञ के विधि विधान कैसे रहते अथवा चलते। जब यज्ञियकाल था तभी हमारे देश की गो संपत्ति देखने योग्य थी। कोई घर यज्ञ शून्य नहीं था, कोई घर गो शून्य नहीं था। ऐसे ऐसे बड़े यज्ञ होते थे कि जो सौ सौ वर्ष में, सहस्र वर्षों में पूर्ण होते थे- आज साधारण बलिवैश्वदेव भी नहीं हो पाता।

इन यज्ञो द्वारा बड़ा लोक कल्याण होता था क्योंकि इन यज्ञों में परस्पर हित की भावना ओतप्रोत रहती थी-संसार की ऐसी कौन सी वस्तु थी जो यज्ञ द्वारा प्राप्त नहीं हो सकती थी।

आजकल पाश्चात्य देशों के विज्ञानी वर्षा कराने की चेष्टा कर रहे है-किन्तु सफल न हो सके! हमारे पुरातन पूर्वज “कारीरी नामक” यज्ञ से जब चाहे, जितनी चाहे वृष्टि करा लेते थे। घर में पुत्र नहीं तो “पुत्रेष्टि यज्ञ करा कर घर भर लेते थे, घर में अन्न नहीं, अन्न भर लेते थे, सोना चाँदी सब प्राप्त कर लेते थे। पर आज हम कैसे कहें कि ऐसा होता था क्योंकि वह यज्ञ परम्परा ही टूट गयी अथवा छूट गयी। इस हीन दशा में भी हमारे ग्रन्थों में यज्ञ-यागों की रूप-रेखाएं मिलती है। निःस्वार्थ होकर विद्वान् ब्राह्मण यत्न करें तो वे विधि-विधान जग सकते हैं।

मैं ऋग्वेदी ब्राह्मण हूँ। ऐतरेय मेरा ब्राह्मण है। जब मैंने उसको पढ़ा तो मैं दंग रह गया- कैसे मण्डप बनते थे, सोलह ऋत्विजों के क्या क्या काम होते थे, अग्नि प्रणयन कैसे होता था, इत्यादि सविस्तार वर्णन दें-पर उन विधि-विधानों को करे कौन यही प्रश्न है।

अब भी यदि पचास-सौ विद्वान् इन यज्ञपरक “ब्राह्मण ग्रन्थों” की खोज करके अनुसंधान करें तो बहुत कुछ मिल सकता है। साराँश यज्ञों से सभी प्रकार के “एषणाओं” की पूर्ति हो सकती है। केवल इहलोक की एषणाओं की नहीं अपितु पारलौकिक एषणाओं की भी ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु अग्दाता और इनके तीन-तीन सहायकों का कर्तव्य ब्राह्मण ग्रन्थों में भली भाँति प्रतिपादित है-सूत्र रूप में अथवा मूल रूप में वेद भी बतलाता है,

जैसे-

ब्रह्मा त्वो वदति जातविद्याँ यज्ञस्य मात्राँ विमिमीत उत्वः।।

इत्यादि मन्त्रों में गृह शुद्धिकरण के निमित्त यज्ञ-याग। महारोग दूरीकरण निमित्त यज्ञ याग। वृष्टि निमित्त यज्ञ याग। पुत्रेष्टियज्ञ। स्वर्ग प्राप्त्यर्थ यज्ञ। लोकलोकान्तरप्राप्त्यर्थ यज्ञ इस प्रकार छोटे से छोटे और बड़े से बड़े यज्ञ रहते थे। ईश्वर जाने कब इन यागों का उद्धार होगा और कैसे होगा। इन यज्ञों द्वारा वैज्ञानिक चमत्कार भी देखने को मिलते थे। ईश्वर करे हमारा यज्ञीय देश पुनः यज्ञ-यागों से समृद्ध हो-तथास्तु, एवमस्तु,


विश्व-कल्पतरु यज्ञ


यज्ञ-ज्ञान-विषयक विचारधारा

(श्री पं. दीननाथ शर्मा शास्त्री सारस्वत, विद्यावागीश, देहली)

वैदिक काल सृष्टि का आरम्भिक काल माना जाता है। सृष्टि के आदि में हमें भगवान का ज्ञान वेद समाधि समाधिगततकीत्त्व वाले ऋषियों द्वारा प्राप्त हुआ। वेद हमारी जाति का प्राण हैं, हमारे धर्म का शिर है। उसका प्रभाव क्या देश हैं, क्या विदेश सब स्थान छा रहा है। उसी वेद का प्रादुर्भाव यज्ञ के लिए ही हुआ है।

वेदों का विषय यज्ञ

प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ ‘सिद्धान्त शिरोमणि’ में कहा है- ‘वेदास्तावद् यज्ञ कर्मप्रवृत्ताः’ (गणिताध्याय मध्यमाधिकारस्थ काल मानाध्याय, 9 श्लोक) यहाँ पर वेदों की प्रवृत्ति यज्ञकर्मार्थ बताई गई है। यही बात ‘लगघ ज्योतिष’ में भी आई है- वेदाहि यज्ञार्थ ममिप्रवृत्ता’ (7 खण्ड)। वेद का ब्राह्मण भाग भी यही बताता हैं--चत्वारो वै वैदा;, तैर्यज्ञस्तायते’ गोपथया0 1-4-24)। केवल यही नहीं, अन्यत्र भी यही बताया है-‘यज्ञो वैदेषु प्रतिष्ठित;, (गो0 1-1-38)। प्रसिद्ध तार्किक दर्शन न्याय के वात्स्यायन भाष्य में भी यही सूचना मिलती हैं-‘यज्ञ मन्त्रः ब्राह्मणस्य (वेदस्य) विषयः, (4।1 62 प्रसिद्ध स्मृति ‘मनु स्मृति’ भी यही कहती हैं-‘दुदोह यज्ञसिध्यर्थमृग्यजुः सामलक्षणम् (1।23) प्रसिद्ध भगवद्गीता भी यही मानती है ‘एवं बहुविधायज्ञा वितता ब्रह्मणो (वेदस्य) मुखे’ (4।37)।

प्रसिद्ध इतिहास ग्रन्थ महाभारत में भी यही सूचित किया हैं-“देर्यज्ञा समुत्पन्ना’ (वनपर्व 150।28)। प्रसिद्ध ग्रन्थ निरुक्त में भी लिखा है-यज्ञस्य चत्वारि शंका इति वेदा वा एते उक्काः। विधा बद्धः मन्त्र-ब्राह्मणकल्पैः। (13।7।1)। प्रसिद्ध व्याकरण ग्रन्थ पाताँजलि महाभाष्य में कहा हैं-‘न सर्वैलिंगैर्नच सर्वाभिविंभक्तिभिर्वेदं मन्त्रा निगदिताः। ते चावश्यमेव यज्ञगतेन्न पुरुषेण यथायथं विपरिनमयितव्याः’ (पस्पर्शाह्निक) इन सब प्रमाणों से सिद्ध हो रहा है कि वेद का विषय यज्ञ है।

स्वयं वेद का मन्त्र भाग भी यही बनाता हैं-

‘एदमगन्य देवयजनं......... ऋक्सामाभ्याँ ओम संतरन्त यजुर्भिः’ (यजुः वा0 सं0 4।1) ‘ब्रह्म (वेदेः) यज्ञेन कल्ताम्’ (यजुः वा0 सं0 8।29)। अन्य उसकी बड़ी साक्षी यही हैं कि वेद के अधिकार के प्राप्यार्थ यज्ञोपवीत धारण करना पड़ता है, और वह यज्ञोपवीत यज्ञ के वस्त्र होने से ही उस नाम को धारण करता है। इससे स्पष्ट हुआ कि- वेदों का आविर्भाव ही यज्ञ करने कराने के लिए हुआ है। तब वेद की भाँति यज्ञ की भी महत्ता स्वतः सिद्ध हुई।

यज्ञ किसे कहते हैं?

‘यज्ञ शब्द ‘यज्ञयाच्यतविचउप्रच्छरक्षो नड्’ (3।3।90) इस पाणिनिसूत्र से नंड् प्रत्यय करने पर बनता है, और यज धातु का अर्थ ‘देवपूजा, संगतिकरण, दान’ ऐसा पाणिनीय धातुपाठ में आया है। सो देवताओं की पूजा, हवि द्वारा देवताओं की अर्चना का नाम ही यज्ञ हैं। जैसे इस जगत में प्रत्येक राष्ट्र को सुव्यवस्थित करने वाली राजशक्ति विविध रूप में हुआ करती हैं, उससे प्रजा पर आई व आने वाली आपत्ति को दूर किया जाता है, वैसे ही सम्पूर्ण भूमण्डल को आवश्यक पृष्टि आदि द्वारा सुव्यवस्थित करने वाली परमात्मा की विविध शक्तियों का नाम ही देवता हुआ करता है। उससे प्रजा पर आने वाले आपत्ति का दूर किया जाता है वैसे ही सम्पूर्ण भूमण्डल का आवश्यक वृष्टि आदि द्वारा सुव्यवस्थित करने वाली परमात्मा की विविध शक्यों का नाम ही देवता हुआ करता है। जैसे राज शक्ति को अनिवार्य कर टैक देते ठीक ठीक न मिलने से राजशक्ति का ठीक ठीक प्रयत्न न होने से चोरी डाका आदि घटनाओं से प्रजा यदा तदा संत्रस्त रहती हैं, वैसे ही देवशक्ति के समुपबृंहक यज्ञ यज्ञादि न होने से ‘यज्ञे’नष्ट देवनाशः, ततः सर्वे प्रणश्यति’ (60।6) इस वायुपुराण के कथनानुसार जल वायु आदि भूतों पर देवशक्ति के ठीक नियन्त्रण न रहने से अतिवृष्टि अनावृष्टि जलप्लावन आदि प्रजा को संतप्त करने वाली भीषण ईतिया हुआ करती है।

निरुक्त में ‘यज्ञः कस्मात्? प्रख्यातं यजति कर्म इति नैरुक्ता, यजुरन्नो भवतीति वा, यजूंषि एन नयन्तीति वा’ (3।19।6) यह कहकर यजन देवपूजन हवनादि का नाम ‘यज्ञ’ बताया गया हैं। इसमें देवों का संतर्पण होता है, जिससे वे जलशक्ति, वायुशक्ति अग्निशक्ति आदि को नियन्त्रण में रखते हैं-जिससे इनके कारण प्रजा नाश नहीं होती। पर आजकल शासन के धर्म निरपेक्ष होने से उसमें वेदों तथा यज्ञो का वह महत्व नहीं रहा-जिससे हमें आये दिन उक्त दैवी विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा हैं। पर यज्ञ याग आदि दैवी कर्म करने से आधिदैविक विपत्तियाँ न आने से जगत् सुख का श्वास ले सकता है। तब दैवी कर्मों में लगा हुआ पुरुष ‘स्वाध्याय’ नित्ययुक्तः स्याद् दैवेचैवेच कर्मणि युक्तो हि विभर्तीद चराचरम् (3।75) मनु जी के इन शब्दों से सारे संसार का पालन कर रहा होता है-यह कथन केवल अर्थवाद नहीं, किन्तु युक्तियुक्त भी सिद्ध है।

यज्ञ से सम्पूर्ण जगत का पालन कैसे ?

बात यह है कि देवताओं को हमने उनका हव्य देना है। हम हैं स्थूल, पर देवता है सूक्ष्म। हम उन्हें स्थूल हव्य देंगे, तो उन्हें कैसे प्राप्त होगा ? उन्हें तो सूक्ष्म हव्य चाहिए, तभी वे प्रसन्न होंगे। इसका उपाय सोचा गया था ‘यज्ञ’। इसका दृष्टान्त भी समझ लेना चाहिए। हमने अपने आत्मा को भोजन देना है। हम भी स्थूल हैं, हमसे दिया हुआ भोजन भी स्थूल है, पर आत्मा हमारा सूक्ष्म है। उसे यह स्थूल भोजन कैसे मिल सकता है ? उसे चाहिए सूक्ष्म भोजन। उसका उपाय यह सोचा गया था कि-हम उस स्थूल भोजन को मुख के द्वारा अपनी जठराग्नि में होम करें। ऐसा करने से वह जठराग्नि उस स्थूल भोजन को सूक्ष्म कर देती है। वही सूक्ष्म अन्न हमारे आत्मा को प्राप्त हो जाने से वह हमारे शरीर को स्वस्थ रखता है। यदि आत्मा को वह स्थूल अन्न न पहुँचाया जायगा, तो हमारा शरीर, मन, इन्द्रियाँ आदि सभी अस्वस्थ हो जावेंगे। फिर हम न अपना कोई लाभ कर सकेंगे, न दूसरों का उपकार। न कुछ बुद्धि द्वारा दूसरों का न अपना कुछ हित सोच सकेंगे।

यह हुआ मनुष्य के आत्मा के तर्पण का प्रकार। मनुष्य से ऊंचे हैं पितर। वै पितर भूलोक में न रहकर पितृलोक चन्द्रलोक में रहते हैं। उन्हें भी तृप्त करना हमारे कर्तव्यों में आता है। वे भी सूक्ष्म होते हैं। हम स्थूल उन्हें सूक्ष्म अन्न कैसे पहुँचावें ? ऋषि−मुनियों ने उसका उपाय भी सोच लिया था। वह यह था कि-वेद-शास्त्र विद्वान् ब्राह्मण द्वारा उन्हें कव्य दिया जाय। ब्राह्मण को शास्त्रों में अग्निरूप माना गया है। ‘ब्राह्मणोस्य मुखमासीद्’ (यजुः 31/11) ‘मुखादग्निरजायत’ (31/12) ब्राह्मण और मुख दोनों की उत्पत्ति परमात्मा के मुख से बताई गई है। अतः यहाँ दानों की सहोदरता सिद्ध है। इसलिए मीमाँस दर्शन के 1/4/28 सूत्र के शावर भाष्य में ‘आग्नेयो वै ब्राह्मणः’ पर प्रकाश डालते हुए ब्राह्मण तथा अग्नि को प्रश्नोत्तर रूप से एकजातीय बताया गया है।’ (प्र0) अनाग्नेयेषु (ब्राह्मणेषु) आग्नेयदिशद्वाः केन प्रकारेण ? गुणवादेन। (प्र0) को गुणवादः ? (उ0) अग्निसम्बन्धः। (प्र0) कथन् ? (उ0) एकजातीय त्वाद् (अग्निब्राह्मणयेः)। (प्र0) किमेकजातीयत्वं तयः) ? (उ0) ‘प्रजापतिरकामयत-प्रजाः सृज्जेयमितियोः स मुख तस्त्रि वृंत निरमिमीत। तमग्निदेवता अन्वसृज्यत ब्राह्मणो मनुष्याणाँ’ यहाँ पर अग्नि और ब्राह्मण की एक जातीयता स्पष्ट शब्दों में कही है।

अन्यत्र की ब्राह्मण का अग्नि सम्बन्ध आया है-‘ब्राह्मणो ह वा इममग्नि वैश्वानरं वभार’ (गोपथब्राह्मण 1। ।10)। अथर्ववेद संहिता में भी कहा है-‘अग्नि ब्राह्मणविवेश-- (19/5912)। कठोपनिषद् में भी यही कहा है-वैश्वानरः प्रविषति अतिथिब्राह्मणो गृहान’ (1/17) यहाँ स्वामी शंकराचार्य ने स्पष्टता की है- ‘वैश्वानरोअग्निरेव साक्षात् प्रविशति अतिथिसन् ब्राह्मणो गृहान’। भविष्य पुराण में भी कहा है-‘ब्राह्मणा ह्यग्नि-देवास्तु’ ब्राह्म पर्व 13/36)। तब ब्राह्मणस्थ वैश्वानर अग्नि उस कव्य को सूक्ष्म करके, सूक्ष्म महानि के साथ मिलकर पितरों को पहुँचाता। वे सूक्ष्म कव्य से तृप्त हो जाते हैं।

मनुष्य की जठराग्नि द्वारा सूक्ष्मीकृत अन्न से मनुष्य की आत्मा के तृप्त होने से मनुष्य की आत्मा का वैयक्तिक लाभ होता है। मनुष्य से उच्च योनि के पितरों के, पूर्व सामान्याग्नि से उच्च ब्रह्मणाग्नि द्वारा सूक्ष्मीकृत अन्न से तृप्त होने से उनके वंश वाले पुत्र पौत्रादि सबका लाभ हुआ करता है। अब मनुष्य और पितरों में उच्च हैं देवता। देवता भी सूक्ष्म हुआ करते हैं। उन्हें भी हमें सूक्ष्म हवि देनी हैं। उन्हें भी सूक्ष्म हवि कैसे भेजी जावे?। उसके लिए भी ऋषि मुनियों ने उपाय सोच लिया था। वह यह था कि साक्षात् अग्नि देवता के द्वारा उन्हें हव्य दिया जाय। यह भी वही पूर्व जैसा उपाय था। जब हम अग्नि में हव्य डालते हैं तब स्थूल अग्नि उस हवि को जलाकर सूक्ष्म कर देती है और शाँत होकर स्वयं भी सूक्ष्म हो जाती हैं। तब वह सूक्ष्म अग्नि सूक्ष्म महाग्नि के साथ मिलकर उस सूक्ष्म हवि को लेकर अपने मित्र सूक्ष्म वायु की सहायता से आकाशाभिमुख जाती हुई द्युलोक में पहुँचकर देवों को समर्पण करती है। वे देवता उस सूक्ष्म हवि से तृप्त होकर प्रजा के हित के लिए और धान्य आदि की उत्पत्ति के लिए यथोचित वृष्टि कर देते हैं। जैसा कि मनुस्मृति में कहा-हैं “अग्नो प्रास्ताहुतिःसभ्यग् आदित्य-मुपतिष्ठते आदित्यार्ज्जायतेपृष्टिवैष्टरेन्नंततःप्रजा’ 3/76) इसी का बाज वेद में भी मिलता हैं-‘हविस्यान्तमजर’ स्वविदि दिविस्पृशि आहुतं जुष्टमग्नौ’ (ऋ0सं0 10।881) यहाँ भी दुर्गाचार्य ने लिखा हैं--‘हवि पान्तं-देवानाँ च पुरोडशिदि निर्दग्धस्थूल भावमग्निना क्रियते। स्व:-आदित्यः, तं वेत्ति, यथाअसौ वेदितव्य:- इति स्वविद् अग्निः। दिपिर्स्पश-द्यामसौ स्पृशति हविरुपनयन् आदित्यम्’ (निरुक्त 7।25।1)। इससे स्पष्ट सिद्ध हुआ कि जब हम देवताओं को प्रसन्न कर लेंगे, तो वह सम्पूर्ण चराचर स्थावर जंगम पालित रहेगा, क्योंकि सभी का निर्वाह वृष्टि एवं अन्न पर है। उन देवताओं को प्रसन्न करने का उपाय हैं-यज्ञ तो यज्ञ से देवपूजा सिद्ध हुई। अतः यज्ञ का महत्व सिद्ध हुई। अतः यज्ञ का महत्व सिद्ध हुआ, जिसके लिए हमें भगवद् गीता कहती हैं- ‘देवान् भावयतानेन ते देवाः भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ’ (3/11)।

यज्ञ द्वारा वायुशुद्धि तथा वर्षा का विज्ञान

यज्ञ करने से देवशक्ति की बलवत्ता के कारण पृथिवी भी सुरक्षित रहेगी। अग्निशक्ति भी यथा योग्य रहेगी। वायुमण्डल भी शुद्ध रहेगा। वृष्टि हो जाने से सूक्ष्म वायु मंडल में अग्निहोत्र के घृत की सूक्ष्म स्निग्धता आ जाने से उसके दोष दूर हो जावेंगे। जब इस प्रकार देवशक्ति व्यवस्थित हो गई तो पृथ्वी स्थिति जल जो सूर्य से खींचा गया हुआ गगनमंडल स्वरूप समुद्र में अवस्थिति हैं। देवता लोग उसका यथायोग्य वितरण करेंगे-इससे वृष्टि भी यथा योग्य होगी। तब न अनावृष्टि होगी न अति वृष्टि। न सूबा पड़ेगी न बाढ़ें आवेंगी ‘पर शास्त्रोक्त यज्ञ विधि में त्रुटि न चाहिये। यज्ञ वेदमन्त्रों से होते हैं। उसमें कर्म, कर्ता साधन इन तीनों की विगुणता इष्ट मनोरथ की पूर्ति में प्रतिबंधक बन जाती है। इष्टसम्बन्धी कर्म यथावत् होवे। उसमें दक्षिणा आदि की त्रुटि भी न होवे। कर्ता पवित्र आचरण वाला हो, वेदमन्त्रों के स्वर वर्ण आदि का यथावत् ज्ञाता हो, शास्त्रनिषिद्ध अनधिकारियों में न हो। इष्टि का साधन भी त्रुटियुक्त न हो, सामग्री पूर्ण हो और पवित्र हो। इससे जहाँ शुद्ध वातावरण बनेगा, वहाँ जल की वृष्टि तथा मनोरथों की वृष्टि भी यथायोग्य होगी। यज्ञ द्वारा वृष्टि विज्ञान विषय में हम पहले प्रकाश डाल ही चुके है। उससे वायु शुद्धि स्पष्ट ही हैं। इधर हवि के धूम के गन्ध से भी यद्यपि वायु शुद्धि सम्भव है, तदापि मन्त्र के द्वारा वैसे होने से महाभाष्य के कथनानुसार उसमें अभ्युदय हुआ करता है।

मन्त्र शक्ति का सूक्ष्म विज्ञान

यज्ञ में मन्त्र पढ़ना अनिवार्य अंग है यह पूर्व कहा ही जा चुका है अब मन्त्र में क्या शक्ति है— इस पर भी विचार करना आवश्यक होता है। योग दर्शन में कहा है-‘जन्मौषधि मन्त्र तपः समाधिजाः सिद्धयः’ (4।1) यहाँ पर मन्त्र, तप तथा समाधि द्वारा सिद्धि कही गई है। आजकल के व्यक्ति मन्त्र सिद्धि पर विश्वास नहीं करते। उसे वे प्रकृति नियम से विरुद्ध मानते हैं परन्तु मानुष ज्ञान अत्यन्त सीमित होता है। उसके पास प्रकृति नियमों की पूर्ण सूची नहीं है। लोहा पानी में डूबता हैं- यह प्राकृतिक नियम हैं, पर अन्य प्राकृतिक नियमों के आश्रय से लोहे का भारी जहाज पानी पर तैरता है। क्या साधारण लोग उन नियमों को जानते हैं, जिनके अनुसार वायुयान उड़ता है? बिना ही तार के देश विदेशों के साथ संवाद होता है। इस जगत् में निरन्तर शक्ति का संघर्ष हो रहा है। कभी एक शक्ति कभी दूसरी शक्ति दबी रहती हैं। जिसे जितनी शक्तियों का तथा उसके प्रचालन का जितना ज्ञान है, उसमें उतनी ही सिद्धि है। जब तक हम निश्चयपूर्वक न कह सके कि इस शक्ति के आगे किसी शक्ति का अस्तित्व नहीं है तब तक यह कहना कि अमुक सिद्धि असम्भव है यह ठीक नहीं।

दर्शन शास्त्र के अनुसार मनुष्य का प्रकृति संयुक्त आत्मा अनन्त शक्तियों का भंडार है। ज्यों ज्यों चित्त को अन्तर्मुख किया जाय, त्यों त्यों शक्तियों का उद्घाटन होता है। योगदर्शन के शब्दों में वह पुरुष पूर्ण योगी, सर्वज्ञ एवं सर्व शक्तिमान हो जाता है।

वैज्ञानिक के अनुसंधान से चित्त के चार स्तर जाने गये है। सबसे ऊपर तथा सबसे नीचे का स्तर वह हैं जिसका धर्म चेतना या विज्ञान है। यही संवेदनाओं का आलय है। इससे नीचे गम्भीर स्तर वह है जिसे ‘उपचेतन’ से कह सकते हैं। यह स्मृतियों का आलय है। तीसरा स्तर वह है जिसे ‘उपाऽचेतन’ से कहा जाता है। यह हमारे संस्कार, स्मृति, इच्छा और विचारों का आलय है। सबसे नीचे का स्तर ‘अचेतन’ शब्द से कहा जाता है। वह मनुष्य की सब शक्तियों का आश्रय है, और पूर्व जन्म के संस्कारों का आश्रय होता है। इस स्तर के अध्ययन से मनुष्य शक्तियों का वास्तविक ज्ञान होता है।

आज के मनोवेत्ता मानते हैं कि दो प्रकार के मनुष्य होते हैं पहले वे हैं जिनकी वृति बहिर्मुखी रहती हैं वे चित्त को व्यावहारिक जगत की ग्रन्थियों के उद्घाटन का साधन मानते हैं। दूसरे व्यक्ति व्यावहारिक जगत् से दूर रहते हैं। इनकी वृत्ति अन्तर्मुखी होती हैं। वैसे लोग प्रयत्न से चित्त के ‘अचेतन’ स्तर तक पहुँच सकते हैं। वे उसमें घुसकर जिस किसी भी विषय में अपनी आत्मा को जोड़ती हैं, चित्त की एकाग्रता से उसमें उनका अद्भुत भी ऐन्द्रियक अनुभवों को प्राप्त होता है अर्थात् अनीन्द्रिय ज्ञान को धारण करता है। इस प्रकार वह क्रमशः सिद्ध एवं महासिद्ध हो सकता है।

अब कर्म की सिद्धि के समत्व पर विचार करना चाहिए। जब कि ज्ञान होता है, तब कर्म भी उसके साथ होता है। जिन्हें किसी शक्ति विशेष का ज्ञान हैं,वे उसका उपयोग भी कर सकते हैं। शक्ति के उपयोग का नाम ही कर्म है। जिसे जितना अधिक ज्ञान है, वह उतने ही अल्प साधनों से अपना काम पूरा कर सकता है। उस काम में वह उद्विग्नता नहीं होती, जो एक अल्पज्ञ के कार्य में होती है। इस प्रकार जो सर्वज्ञ है वह सर्व कर्ता भी हो सकता है। उसे ही सिद्ध कहा जाता है।

क्रिश्चियन वैज्ञानिक रोगी की शैय्या के पास कुछ पाठ किया करते हैं। उससे वे बिना ही औषधि के प्रयोग के उसको स्वस्थ कर देते हैं। यह भी एक मान्त्रिक सिद्धि हुआ करती है। प्रत्येक मन्त्र की कई नियत ध्वनियों का समूह होता है। मन्त्र में अर्थ की आवश्यकता नहीं हुआ करती है।नहीं तो मन्त्र की शक्ति नष्ट हो जाती है, इसलिए उसमें शब्द को शुद्ध बोलने की आवश्यकता पड़ा करती है। इसीलिए ही महाभाष्य के पस्पशाह्निक में कहा हैं- ‘याज्ञे’ कर्मणि (प्रयोग) नियमः’ अर्थात् यज्ञ कर्म में अर्थ ज्ञान का नियम नहीं होता, किन्तु उस कर्म के प्रयोग का नियम मात्र होता है। विवाह संस्कार के मन्त्रों से कन्या संस्कृत होती हैं। परन्तु उसके अनुवाद से वह शक्ति कैसे हो सकती है।’

वेद, मन्त्रों के संग्रह है। मन्त्र निरुक्त में नियत आनुपूर्वी वाले तथा नियत पद प्रयोग परिपाटी कह गये हैं। इसीलिए काव्य प्रकाश में वेद को शब्द प्रधान माना गया हैं । कौत्स मुनि वेदमन्त्रों को अनर्थक मानते हैं। अनर्थक का यह भाव है कि मन्त्र का उच्चारण -विशेष में ही सामर्थ्य है। इस प्रकार प्रत्येक मन्त्र विशेष विषय में भी जानना चाहिये। बीज मन्त्र अर्थ हीन ही तो होते हैं । ऐं, ह्रीं, क्लीं आदि बीज मन्त्र कितना प्रभाव रखते हैं-यह जानना चाहते हों तो चिन्तामणिमन्त्र के उपासक श्री हर्ष का नैषधचरित तथा उसका 13वाँ सर्ग देखना चाहिये। अमेरिका के वैज्ञानिक भी बीजमन्त्रों की शक्ति मानते हैं-यह बात श्रीसातवलेकर प्रकाशित सूर्य नमस्कार पुस्तक में लिखी है ।

जब किसी वस्तु में किसी कारण से कम्पन होता है ; तब उस कम्पन के कारण हमारी कर्णेन्द्रिय में विशेष प्रभाव पड़ता है जिसे ध्वनि कहा जाता है। प्रत्येक वस्तु के लिए एक कम्पन की संख्या नियत होती है। यदि वह वस्तु कम्पन को प्राप्त होती है तो स्वर निकलता है। यदि उसके पास वह स्वर प्रतिध्वनित हो तो वह वस्तु भी कम्पित होगी। प्रयोगशालाओं में इनके अनेक प्रयोग होते हैं। इसलिए ध्वनिमापक यन्त्र बनाया जाता है।

एक शीशे का गिलास लिया जाता है; उसका नियत स्वर उसके पास बजाया जाया है उसके परिणाम में गति बद्धता से कम्पन के वेग से वह गिलास दूर जाता है। पर्याप्त गवेषणा से उपयुक्त ध्वनियों के प्रयोग से अर्थात् मन्त्र विशेष के द्वारा बड़े किले का पर्वत गिराये जा सकते। इंग्लैंड में स्टोनहैव्ज में टुइड धर्मों का जो अवशेष है; उसमें पत्थर एक-दूसरे पर इस प्रकार से तुले हुए हैं कि-उनके पास मध्यम स्वर के बजाने से वे काम्पते हैं। कुछ समय तक वैसा करने पर उनके गिरने की शंका भी हो सकती है। इस कारण वहाँ गाना निशिद्ध हैं। इस प्रकार वैज्ञानिक तथ्यों के आधार से कहा जा सकता है कि-ध्वनि समूह के द्वारा बहुत से विचित्र कार्य किये जा सकते हैं। पशुओं और मनुष्यों पर ध्वनिका जो प्रभाव पड़ता है उसे सब जानते हैं। ऋतु विशेष में और समय विशेष में जो ध्वनि समूह कार्य करते हैं वे ही हमारे राग-रागनियों के आधार हैं। रोगियों के ऊपर भी ध्वनियों का प्रभाव अनुभव-सिद्ध है। रोगियों के ऊपर भी ध्वनियों का प्रभाव अनुभव-सिद्ध है। उपयुक्त ध्वनि-राशि शरीर मस्तिष्क और नसों के क्षोभ को शांत करके उसमें पुनः साम्यावस्था ला सकता है जिसका पर्याय शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य हैं। इस प्रकार उपयोगी ध्वनियों की आवृत्ति में अर्थात् उपयोगी मन्त्रों के जपने से मस्तिष्क के उपयोगी केन्द्र प्रकम्पित किये जा सकते हैं। उनके द्वारा चित्त के चौथे स्तर अचेतन नाम के अंश जगाये जा सकते हैं जिनसे योगी सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है।

जबकि आजकल निरर्थक भी मुसलमान आदियो के मन्त्र भी साँप-बिच्छू आदि के दमन में सफल होते हुए दीखते हैं सब जगद्गुरु भारतवर्ष के जगद्गुरु ब्राह्मणों से समाधि दृष्ट मन्त्र-तन्त्र शास्त्रों के मन्त्र भला कैसे असत्य हो सकते हैं? इसलिए महाभाष्य के स्पर्शान्हिक में ज्ञान-कर्मणोर्धर्माधिकरण में कहा है-यथा वेदशब्दा नियमपूर्वकमधीताः फलवन्तो भवन्ति इस से वेदमन्त्रों के नियमित जप से फल प्रदान शक्ति सिद्ध होती है। इसीलिए उनके प्रकम्पन का प्रभाव कारीरी यज्ञ में बादलों पर भी पड़ता है। जिससे वृष्टि आदि भी पड़ जाती है। पुत्रेष्टियज्ञ में स्त्री के गर्भाशय पर भी पड़ता है जिससे सन्तान भी हो जाती हैं। वेद के मन्त्र स्वयम्भू का वचन होने से साक्षात फलशाली होते हे।

कई मन्त्र वेद से भिन्न भी होते हैं। उनमें उन मन्त्रों के आविष्कर्त्ताओं की तपस्या का बल फलदायक होता है। पौराणिक मन्त्रों का आविष्कार श्री वेदव्यास मुनि द्वारा हुआ वहाँ उनकी अपनी तीव्र तपस्या प्रभाव जनक होती है। इस प्रकार तन्त्र व आगम ग्रन्थों के मन्त्र भी विविध देवों की कृपा से प्रसूत होने से फलदायक हुआ करते हैं। इस प्रकार आज के ईसा मुहम्मद गुरुनानक आदि के आविष्कृत मन्त्र भी जो उनके अनुयायियों में सफलता प्राप्ति करते हुए देखें जाते हैं वहाँ पर उनकी तपस्या तथा उनके अनुयायिओं का उन पर पूर्ण विश्वास फलदायक बनता है। वह उनकी तपस्या यावत्कालावस्थायिनी रहेगी उतने तक वे मन्त्र भी सफल होते रहेंगे उसके बाद वे निष्फल होते रहेंगे। पद वेद मन्त्र सदा ही सफल होते हैं। पर उसका पात्र शास्त्रोक्त अधिकारी तथा निष्ठावान होना चाहिये।

इस प्रकार याज्ञिक मन्त्रों द्वारा वशीकृत देवशक्ति हम पर अनुग्रह करती है उच्चयोनि तथा लोकोत्तर बलशालिनी होने से हमें अपने मनोरथ की पूर्ति में सुगम सुझाव देती हैं। उन मन्त्रों का प्रभाव हमारे शरीर पर होने से वे हमारे रोग आदि के परमाणुओं को भी बहिष्कृत करने में समर्थ हो जाते हैं। मानसिक व शारीरिक अस्वास्थ्य दूर हुआ तो लोक कल्याण स्वयं उपस्थित हो जाता है न मर्डिता विद्यते अनयराभ्योदेवेषुमे अधिकामा अयसत (ऋ. सं 10।64।2) यहाँ पर देवताओं को विविध कामना पूर्ण करने वाला कहा है। देव पूजन ही यज्ञ होता है-यह हम पूर्व बता ही चुके है। तब यज्ञ द्वारा विविध कामनाओं की पूर्ति भी सिद्ध हो गई। जब मन्त्र से सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है तब यज्ञ द्वारा विविध शक्तियों की प्राप्ति भी हो गई।

यज्ञशाला में देवपीठों की स्थापना क्यों?

देवपूजा दो प्रकार की होती है-एक हवन तथा दूसरी मूर्ति पूजा। संस्कृत अग्नि मूर्ति द्वारा इन्द्राय स्वाहा वरुणाय स्वाहा इत्यादि रूप से उस-उस देवता को हवि देना यह हवन द्वारा देवपूजा होती है।दोनोँ ही यज्ञ कहे जाते हैं क्योंकि-देवपूजार्थक यज धातु का अर्थ दोनों स्थान देखा गया है। इसलिए शांखायनब्राह्मण में कहा गया है-सएवास्यै यज्ञं ददाति तद् यद् राजा देवता यजति।(412)अर्थात् देवताओं का पूजन ही यज्ञ होता है। यही बात श्रीमद्भागवत् पुराण (11।27।8-9)में भी सूचित की गई है। वही 11 27 15 में मूर्तिपूजा तथा अग्निहोत्र दोनों को ही यज्ञ कहा गया है । अग्नि उस हवि का स्थूल भाग भस्म करके उसका सूक्ष्म भाग देवताओं को देती है पर मंत्र संस्कृत मूर्ति तो मधुमक्षिका से पिए हुए पुरुष की तरह उसके सूक्ष्म अंश को देवताओं को समर्पित करती है। जब ऐसा है तब पाठशाला में देवपीठों की स्थापना भी यज्ञ का ही एक अंग है।

यज्ञों के भेद तथा यज्ञों की महिमा-

यज्ञ हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग है। यज्ञो के कई भेदोपभेद होते हैं। कई तो सहस्रवार्षिक तथा शतवार्षिक यज्ञों का वर्णन भी आता है जिनका महा भाव स्पर्शान्हिक में संकेत आया है और मीमांसा दर्शन में जिनकी व्यवस्था आई है। जप भी यज्ञ माना जाता है। राजसूय वाजपेयम् अग्निष्टोमस्तदध्वरः। अर्काश्वमेधा उच्छिष्टे जीव बर्हिमिदिन्तमः11 9 7 अग्न्याधेयमथो दीक्षा कामगः छनदसा सह ।उत्सना यज्ञाः सत्राणि उच्छिष्टेअधि समातिहा। अग्निहोत्र च श्रद्धा च वष्टकारो व्रतं तप। दक्षिणा इष्ट पूर्त च उच्छिटोधिसमाहिताः एकरात्रो द्विरात्रः सद्यःक्री, प्रक्रीक्थ्यः। ओतं लिहितमुच्छिष्टो यज्ञस्वात्याण्नि विद्यग्रा चतृरात्रः पच्चरात्रः षडरात्रश्रोभयः सह। षोडषी सप्तरावष्च उच्छाष्टाज्जज्ञि सर्वे ये यज्ञा अमृते हिताः प्रतीहारो निधन विश्वजिच्च अभिजिच्च यः साहृातिरात्रौ उच्छिष्टे द्वादषाहोषि तन्मणि अथर्ववेद के इन मन्त्रों में तथा द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तवापरे स्वाथ्यःयज्ञानयज्ञाश्र यतयः संषितव्रताः यज्ञानाँ जपयज्ञोस्मि भगवद्गीता के इन पद्यों में विविध यज्ञों का वर्णन आया हैं। वेद के ब्राह्मण भाग में यज्ञों की स्पष्टता की गई है।

नायं लोकेअस्तययज्ञस्य कुतोन्यः कुरुसतम। भगवद्गीता के इस पद्य में यज्ञहीन पुरुष की इस लोक तथा परलोक से भ्रष्टता कही गई है। एथ वोअत्विवष्ट कामधुक इस पद्य यज्ञ को प्रजा के मनोरथों की पूर्ति करने वाला कहा है। यज्ञार्थात कर्मणोंअन्यत्र लोकोअयं कर्मबन्धन इस पद्य तथा यज्ञायाचरतः कर्म सम्भ्राग प्रविलीयते इस पद्य में याज्ञिक कर्म को बन्धन से दूर रखने वाला माना हैं कर्म की अकर्मता होने पर ही मुक्ति मिलती है-यह नहीं भूलना चाहिये। यह श्रेय यज्ञ को प्राप्त है-यह यहाँ सूचित किया गया हैं। इष्टान भोगान कि वा देवा दास्यन्ते यज्ञीविताः इससे यज्ञ करने पर देवताओं द्वारा इष्ट भोगों की वृष्टि करना बताया है। तैदेत्तान अप्रदायैभ्यो यो भुडके स्तेन एव सः। यहाँ पर विना यज्ञ किये अनादि पदार्थों का उपभोग करना चोरी मानी गई है। तस्मात सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठिम्।यहाँ पर यज्ञ में ब्रह्म की स्थिति मानी गई है। अहंक्रतुरहंयज्ञः स्वधाहभमोषधम।मन्त्रोहमहमेवा-ज्यमहमग्निरहं कृडम्। यहाँ पर यज्ञ तथा यज्ञ को सामग्री-साधनादि को भगवान का रूप कहा है। ‘यज्ञदानतपः कर्म न त्याज्यं कार्य मेवतत्’ (18।5) यहाँ पर यज्ञ कर्म का त्याग निषिद्ध किया गया है। यज्ञोदानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणामः यहाँ पर यज्ञ को पवित्र करने वाला बताया गया है। ‘यज्ञ शिष्टामृतुयजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्’ (4।31) यहाँ पर यज्ञ के शेष अमृत कहा गया है - और यज्ञ शेष का उपयोग करने वाले को सद्गति की प्राप्ति ही गई है। यज्ञों की अखण्ड ज्योति से ही वेदों की रक्षा होगी-हमारे हिंदू धर्म की रक्षा होगी अतः इसका यथायोग्य उपभोग रखना ही चाहिये।


यज्ञ द्वारा वायु-शुद्धि

(पं. रामप्रसाद मिश्र, बरेली)

वैज्ञानिकों का कथन है कि वायु के तीन भाग होते हैं। प्रथम ओषजन द्वितीय नत्रजन तथा तृतीय कार्बनद्विओषद। इनमें ओषजन जीवनदायिनी है। ओषजन के अभाव में जीव सृष्टि नहीं रह सकती उससे हमें प्राणशक्ति प्राप्त होती है अग्नि तीव्र होती तथा रक्त शुद्ध होता है। नत्रजन थोड़ी मात्रा में ओषजन से मिलकर उसे और भी लाभप्रद बना देती है।जिस वायु में कार्बनद्विओषद की मात्रा अधिक होती है वह वायु मनुष्यों को अस्वास्थ्यप्रद हो जाती है हमारे प्रश्वास द्वारा जो वायु बाहर निकलती है वह कार्बन द्विओषद है जिसमें कार्बन तत्व की पर्याप्त मात्रा होती है। यदि हम किसी मैदान वाटिका या पर्वतादिक अधिक जनशून्य स्थानों में रहे तो प्रश्वास द्वारा निकाली कार्बन द्विओषद वायु को अशुद्ध न कर सकेगी क्योंकि उसकी मात्रा कम होगी। परन्तु जब बहुत से मनुष्य एक स्थान पर एकत्रित होते तथा संकुचित मकानों में रहते हैं। तो वहाँ की वायु अशुद्ध हो जाती है तथा स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती है। इस वायु शुद्धि के लिये हवन-यज्ञ एक ऐसा अमोघ साधन है जिसका कोई अन्य साधन समता नहीं कर सकता।

हवन-यज्ञ में घृत, शर्करा मेवा तथा सुगन्धित औषधियाँ इत्यादि जो पदार्थ हवन में डाले जाते हैं। उनके वैज्ञानिक परीक्षण वैज्ञानिकों ने किये है। उनसे ज्ञात हुआ है कि शकर लौंग जायफल केसर आदि के जलाने से जो गैस उत्पन्न होती है उसमें वायुशुद्धि करने तथा रोगों के कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भुत शक्ति होती है। हमारे ही नगर में राजयक्ष्मा चिकित्सा के प्रसिद्ध डाक्टर महोदय रहते हैं जो क्षय टी.बी. जैसे कठिन रोगों की सफल चिकित्सा यज्ञ द्वारा करते हैं। अन्य कठिन रोगों में भी जहाँ औषधि सेवन काम नहीं करता वहाँ वह यज्ञ से ही सफलता प्राप्त करते हैं तथा जब वे सरकारी सेनीटोरियम में अध्यक्ष थे तब भी इसी यज्ञ हवन चिकित्सा विधि से कार्य करते थे जिसका परिणाम 80 प्रतिशत से ऊपर रहा हैं इस विषय पर उन्होंने यज्ञ चिकित्सा नामक पुस्तक लिखी जिसे सेनीटोरियम ने अपने व्यय से प्रकाशित कराया तथा सरकार से उन्हें उस पर पारितोषिक भी मिला। उनके रोगियों ने यवन होते हुये भी इस चिकित्सा -पद्धति को अपनाकर लाभ उठाया। अग्नि जलने से कार्बन गैस भी उत्पन्न होती है। कुछ व्यक्ति इसी आधार पर हवन को हानिकारक बताते हैं पर यह उनका भ्रम मात्र है। हवन से निकली हुई कार्बन वायु से किस प्रकार जगत को लाभ पहुँचता है वह निम्न प्रकार हैं।

पदार्थ विद्या से ज्ञात होता है कि कतिपय पदार्थों में से प्रकाश गुजर सकता है परंतु धर्म नहीं गुजर सकता।बहुत से बगीचों में ऊष्णागृह को पाठकों ने देखा होगा। उनमें ऐसे पौधे लगाये जाते हैं जिन्हें अधिक उष्णता की आवश्यकता है अतः वे वातावरण में से अपेक्षाकृत अधिक ताप ले लेते हैं और उस स्थान पर अन्य स्थानों की अपेक्षा अधिक ठण्ड रहती है। अब शीशा सूर्य की रश्मियों को अपने में से गुजरने देता है परंतु भीतर के धर्म को उससे बाहर नहीं गुजरने देता उसी कारण शीश महलों में गर्मी अधिक रहती है। ज्ञात किया गया है कि कार्बन भी इस विषय में शीशा जैसा पदार्थ है। उसमें सूर्य की रश्मियां प्रवेश कर जाती हैं परन्तु धरती से टकराकर बाहर नहीं जा सकतीं। वायु मंडल के 1000 परिणाम में 3 परिणाम कार्बन है इसका फैलाव भूमि पर एक प्रकार का आवरण बना देता है। क्योंकि यह साधारण वायु से डेढ़ गुना भारी है अतः भूमितल के निकट कार्बनद्विओषद का ही स्तर रहता है। भूमि तथा इस आवरण के मध्य धर्म कैद रहता है। ज्यों ज्यों यह आवरण अधिक त्यों त्यों थोड़ा धर्म निकलकर वायु मंडल में बिखर जायेगा। आक्सीजन तथा नत्रजन में इस प्रकार धर्म रोकने की शक्ति नहीं हैं। इस कारण यदि कार्बनद्विओषद वायुमंडल में कम हो जावे तो धर्म निकल कर इतना सर्दी पड़ने लगेगी कि भूमि किसी जीव को धारण करने के कारण कार्बनद्विओषद वायु पर बड़ा प्रभाव डालती है। उसकी मात्रा में किंचित मात्र भी अन्तर होने से बड़े बड़े परिवर्तन हो जावेंगे ।यदि इस मात्रा का दुगुना कर दिया जावे अर्थात् 1000 परिमाण वायु में 3 के स्थान पर 6 परिमाण कार्बन वायु के कर दिये जावें तो भूमि की सब बर्फ पिघल कर ध्रुवों में भी आद्र (मोतदिल) जलवायु हो जावेगी और कार्बन वायु की मात्रा आधी कर दी जावे ता समस्त पृथ्वी हिमाच्छादित हो जावेंगी।

इसी प्रकार प्रसिद्ध रसायनशास्त्री मोएडालीफ लिखते हैं वायु में कार्बन की मात्रा पर भूमि का ताप आधारित है। भिन्न भिन्न कालों में ताप की भिन्नता का प्रधान कारण कार्बन वायु की मात्रा की भिन्नता थी ।

पाठकों को अब पता लग गया होगा कि यदि कहीं कृत्रिम ढंग से कार्बन गैस उत्पन्न कर वायु मण्डल में छोड़ी जाये ता वहाँ की उष्णता बढ़ जावेगी । यह नियम है कि जहाँ अधिक गर्मी होगी यदि वहाँ जल हो तो वनस्पति की उपज अधिक होगी ।

हवन से कार्बन गैस उत्पन्न कर हम धर्म बढ़ाते हैं। जिससे अन्न फल आदि की अधिक उत्पत्ति होती है। इसके प्रत्यक्ष उदाहरण विद्यमान हैं। ज्वालामुखी पर्वतों से यह वायु निकलती है । उनके आसपास वृक्ष तथा वनस्पति अधिक होती हैं। फ्राँस में युबरीन में एक चश्मे से वह वायु निकली है अतः वृक्ष आदि की वहाँ बहुतायत है । इसके अतिरिक्त यज्ञ-कुण्ड की वेदी के चारों ओर एक नाली सी बनी रहती है जिसमें जल भर दिया जाता है कि कार्बन से उत्पन्न होने वाले शिकार जो कि पृथ्वी पर हो सकते हैं अपने भीतर समष्टि कर लेता है

वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि हवन से जो वायु बनती है उसमें अधिक भाग ओषजन होती है इसका प्रमाण यह है कि हवन की वायु में सुगन्धित वायु अधिक मात्रा में होती है और ओषजन युक्त वायु का ही दूसरा नाम प्राण पद वायु है।

प्रातः उषाकाल में जो वायु चलती है वह सबसे अधिक प्राणप्रद मानी जाती है उसमें भी ओषजन ही अधिक होता है अतः इससे सिद्ध होता है कि हवन यज्ञ वायु को शुद्ध करता है और प्राणप्रद वर्षा भी करता है।


वेद में यज्ञों का वैज्ञानिक स्वरूप


मित्र का अपभ्रंश

‘मित्र’ शब्द ‘मा’ धातु से बना है। जिसका अर्थ है मापना, इसलिए मित्र का अपभ्रंश ‘मीटर’ शब्द भी इसी अर्थ का वाचा है। जैसे- थर्मामीटर (धर्ममित्र) अर्थात् तापमापक यन्त्र वाटोमीटर (भारमित्र) भारमापक यन्त्र, ज्योमीटर(गोमित्र) अर्थात् भूमिति शास्त्र को जानने वाला, ज्योमिट्री गोमित्रीवध इत्यादि।

वेद के कोश निघण्टु में घृत भी जल का नाम है। घृत अर्थात् जल का अंचन अर्थात्, निमार्ण करने वाली।


विज्ञान का आदि पिता यज्ञ

(श्री वाचस्पति शास्त्री विद्याभास्कर, लखनऊ)

मानव के आदिपूर्वजों ने जब कार्यक्षेत्र में पदार्पण किया तो उन्होंने अपने से भी अधिक शक्तिशाली बलवान और तेजस्वी कुछ अन्य प्राणियों को देखा और यह भी देखा कि इन प्राणियों की हिंसक वृत्ति के आगे अपना जीवन भी सुरक्षित नहीं है। इसलिए उन्होंने एक चित्त होकर सबसे पूर्व उस ज्ञान का संकलन किया जो रचना परम्पराओं से सदा से चला आ रहा है जो सज सनातन है जिसे सबने एक दूसरे से कहा और सुना ही है इसीलिए वह श्रुति कहलाता है। जो सृष्टिकर्ता व्यापक चैतन्य का भोक्त चैतन्य के लिये सबसे बड़ा वरदान है। उस श्रुति संकलन से आदि मानवों में संगतिकरण की प्रवृत्ति जागृत हुई। संगतिकरण के शुभ परिणाम ऋचाओं के रूप में प्रकट हुये ऋचा ने मानवों का ध्यान एक ऐसे पदार्थ की और आकृष्टि किया जिससे प्रकृति एक ऐसे रूप में प्रकट हुये ऋचा ने मानवों का ध्यान एक ऐसे पदार्थ की और आकृष्टि किया जिससे प्रकृति के अनन्त भण्डार की कुंजी ही मनुष्य को मिल गई रचना विज्ञान का रहस्य हाथ लग गया और प्रकृति में मन चाहे परिवर्तन करने का साधन प्राप्त हो गया। वह पदार्थ है अग्नि।

जिस दिन से ऋग्वेद की प्रथम ऋचा की कृपा से मनुष्य ने अग्नि प्रज्वलित करना सीख लिया उसी दिन से यह संसार का सबसे प्रभावशाली सत्य बन गया । उसी दिन से बड़े से बड़े हिंसक जीव भी इससे भयभीत होने लगे। जिसके हाथ में प्रकाश और ताप का स्वेच्छा नियंत्रण आ गया उसकी शक्ति का सामना अन्य प्राणी कर भी कैसे सकते थे। संगति करण से उत्पन्न हुये अग्नि को संगतिकरण में ही लगा दिया तब उससे सहस्र गुणित से संवृद्धि प्राप्त होने लगी। जिसे हम संगतिकरण कह रहे है इसी का वैदिक नाम ‘यज्ञ’ है अतः यज्ञ से उत्पन्न हुआ अग्नि यज्ञ के ही कार्यों में नियोजित किया गया। यज्ञाग्नि ने थोड़े ही समय में प्रकृति की मुख्य शक्तियों को जिनको वैदिक भाषा में हम देवता कहते हैं। अपने वश में करके यजमान को सौंप दिया। यजमान अग्नि के माध्यम से समस्त देवताओं की पूजा करके उनको वश में कर सकने में समर्थ हो गया। अग्नि की कृपा से भौतिक विज्ञान का मार्ग खुल गया इससे कोई आधुनिक विज्ञान वेत्ता भी इनकार नहीं कर सकता है।

इस प्रभावशाली अग्नि को प्रारम्भ में कृत्रिम रूप से ऋग्वेद की प्रथम ऋचा की प्रेरणा से ही उत्पन्न किया गया था और उसे उत्पन्न करने में जो प्रयत्न किया गया था उसी का नाम यज्ञ है। ऋग्वेद की ऋचा में अग्नि की स्तुति में पाँच विशेषण दिये है वे पांचों यज्ञ के ही विभिन्न व्यक्तियों से सम्बन्धित है आप उनकी संज्ञा मात्र से ही उनको पहिचान सकते हैं वे इस प्रकार है 1 पुरोहित 2 यज्ञ का देव 3 ऋत्विज् 4 होता 5 रत्नधातम। इन पांचों विशेषणों से पता चलता है कि अग्नि के प्रथम उत्पादकों के सामने अग्नि उत्पन्न करने का लक्ष्य यज्ञ करना ही था और यज्ञ ही के द्वारा संपूर्ण समृद्धियों का पाना था। हमारे आदि पूर्वजों ने यज्ञ के द्वारा ही अनेक विज्ञानों का आविष्कार किया और उससे मानव समाज तथा सभ्यता का विकास हुआ सामूहिक रूप से विश्वात्मा की तृप्ति के लिये प्रयत्न करना अर्थात् विश्व कल्याण के स्तर पर संवृद्धि के लिये प्रयत्न करने का ही नाम यज्ञ है और अग्नि ही ऐसे यज्ञ का देव है। संसार की रचना अनेक तत्वों के मिश्रण से हुई है इस मिश्रण क्रिया को यज्ञ कहते हैं और उन प्राकृतिक शक्तियों को देव कहते हैं। जो इस मिश्रण में उपादान हैं अतः विश्व की उत्पत्ति देवताओं के यज्ञ का ही परिणाम है। अतः जब कभी हम यज्ञ के लिए अग्नि स्थापित करते हैं तो मन्त्र बोलते हैं (तस्यास्ते पृथिवी देव यजनी) अर्थात् देवयजनी पृथ्वी पर यज्ञ के लिये हम अग्नि स्थापन करते हैं। इस प्रकार विश्वात्मा के यज्ञ के अनुसार हम यज्ञ करते हुए संसार में समृद्धि चाहते हैं।

कालविज्ञान

यज्ञ के लिये सर्व प्रथम समय निर्धारण की आवश्यकता हुई अतः यज्ञ करने के लिये अहोरात्र से लेकर सहस्र वर्ष और कल्प पर्यन्त काल का ज्ञान किया गया काल परिचय के यथार्थ साधनों के रूप में ग्रह−नक्षत्रों की गति का ज्ञान संवत्सर ऋतु मास पक्ष तिथि नक्षत्र योग मुहूर्त आदि की गणना से ज्योतिष विद्या का आविष्कार हुआ। दैनिक पाक्षिक मासिक आर्तव सांवसरिक आदि यज्ञों के काल निर्णय के लिये ही ज्योतिष की रचना हुई।

कृषि विज्ञान

विभिन्न समय पर यज्ञ करने के लिए आवश्यकता हुई भिन्न-भिन्न अन्नों की अतः पहिले तो ये अन्यत्र तत्र से एकत्रित किये गये किंतु एकत्रीकरण में कठिनाई देखकर कृषि द्वारा इनको उपजाने की चेष्टा की गई ओर इस प्रकार यज्ञ के लिये ही आदि मानवों ने कृषि विज्ञान को जन्म दिया। यजुर्वेद अ, 18 मन्त्र 12 घ्रीहयश्चमे यवाश्यमे मापाश्चमे विलाश्चमे मुद्गाश्चमे खल्वाश्चने प्रियगंवश्चमे अणवश्चमे श्यामाकाश्चमे नीबाराश्चमे गोधूमाश्चमे मसूराश्चमे यज्ञेनकल्पन्ताम्) इस मन्त्र में 12 अन्न जो भिन्न 2 ऋतुओं में पैदा होने वाले भिन्न प्रकार के अन्न है धान, जौ, उड़द, तिल, मूँग, खल्व, प्रियंग, अणु, समा, नीवार, गेहूं, मसूर। इन सबको यज्ञ के लिए तथा यज्ञ के द्वारा प्राप्त करने के लिए कहा गया है इससे सिद्ध होता है कि कन्दमूल फल आदि से निर्वाह करने वाले आदि मानवों ने यज्ञ ही के लिये कृषि से पकने वाली तथा स्वयं पकने वाली औषधियाँ यज्ञ से प्राप्त हो (ओषध्यः फलपाकान्ता) अर्थात् फल पक जाने पर जिनके पौधे समाप्त हो जावे उनको औषधि कहते हैं।

यज्ञ वेदियों के निर्माण के लिये विभिन्न मिट्टियों का अनुसंधान किया गया और अनुभव हुआ कि अनेक मृत्तिकायें भूगर्भ में बड़ी ही विलक्षण है इन विलक्षण मिट्टियों की वेदी बना कर यज्ञ करने से यज्ञाग्नि के ताप से पिघलकर मानव को धातुओं ने दर्शन दिये।

यजुर्वेद अ. 18 मन्त्र 13 में- अश्माचमे मृत्तिका श्चमे गिरयश्चमे पर्वताश्चमे सिकताश्चमे वनस्पतयश्चमे हिरण्यंश्चमे अयश्चमे श्यामंचमे लोहश्चमे सीसंश्चमे त्रवुचमे यज्ञेनकल्पन्ताम्। यहाँ 6 धातुओं का वर्णन है हिरण्य अयः श्यामलोह शीशा और त्रपु। इनमें सर्व प्रथम हिरण्य अर्थात् सौना ही का नाम है’ है भी स्वाभाविक क्योंकि सर्वप्रथम अधिक चमकीला होने के कारण सोना ही दिखाई दिया होगा फिर अन्य धातुएं भी मिली होंगी पर इनका प्रारम्भ निश्चय ही यज्ञ वेदी से ही हुआ है।

यज्ञ वेदिओं को विभिन्न रूप की बनाने के लिये नाना प्रकार के डिजाइन बनाने पड़े इसलिये रेखा और रेखाओं के गणित का आविष्कार हुआ वेदिध्य को केन्द्र मानकर भाँति भाँति की रेखाओं द्वारा अनेक कोणों से रचनायें की गई। अयं यज्ञोभुवनस्य नाभिः) यह यज्ञ भुवन की नाभि है (अयंवेदिपरो अन्त पृथिव्या) यह वेदी विस्तार का अन्तिम छोर है। इन वेद वाक्यों से यही प्रगट होता है कि नापने की विद्या रेखा गणित यज्ञ वेदी से ही प्रारम्भ हुआ।

यजुर्वेद अ॰ 18 मं0 24 (एकाचमे तिस्रश्चमे) आदि विषम संख्या तथा मं0 25 (चतस्रश्चमेऽष्टौचमे) आदि सम संख्याओं की गणना को यज्ञ के लिये बता रहे है इससे ज्ञात होता है कि गणित शास्त्र का आविष्कार भी यज्ञ ही के लिये हुआ।

पशुशास्त्र

यज्ञ के लिये दूध देने वाले पशुओं की आवश्यकता पड़ी इसीलिये उनका पालन प्रारम्भ हुआ दूधा रूप पशुओं में गौ को सर्वाधिक दूध देने के कारण अधिक महत्ता प्राप्त हुई यजुर्वेद का प्रथम मंत्र स्पष्ट कहता है कि श्रेष्ठतमायकर्मणे यज्ञ करने के लिये (अघ्न्या) गौयें बढ़े। भार ढोने के लिये बैल और सवारी के लिये घोड़ा भी आवश्यक हुआ अतः स्थान स्थान पर वेद मंत्रों में (यजमानस्य पषून पाहि) यजमान के पशुओं की रक्षा पालना कर ह कहा है घृतकानम वेद में ‘आज्ञ’ यज्ञ का साधन है क्योंकि धृत का जन्म यज्ञ के ही लिये हुआ है। यज्ञ के उपभोग में भिन्न भिन्न प्राणियों का आलंबन होता है इसमें विद्वानों के दो मत हैं एक तो यह मानते हैं कि विभिन्न प्राणियों की आहुति यज्ञ में दी जाती है और दूसरे यह मानते हैं कि यज्ञ एक सामूहिक उन्नति का कार्य है उसमें भिन्न भिन्न अवसरों पर सम प्राणियों की उपयोगिता प्रदर्शित की जाती है इसका ही नाम आलम्भन है। क्योंकि यज्ञ तो अध्वर हैं अर्थात् किसी की हिंसा न करने वाला है। अतः आहुति देने वाला पक्ष उचित नहीं दोनों ही मतों से यह तो स्पष्ट ही है कि यज्ञ में विभिन्न प्राणियों का प्रयोग होता है इसीलिये अनेक पशु और पक्षियों की जानकारी प्राप्त करना और उनका पालन यज्ञ की पूर्णता के लिये प्रारम्भ हुआ।

पंच महायज्ञों में बलि वैश्वदेव भी एक यज्ञ है इसमें कृमिकीटों को भी अन्न देने का विधान है अतः बड़े से बड़े सर्पों से लेकर छोटे से छोटे कीटों तक का परिचय और उनके स्वभाव का ज्ञान इस यज्ञ के द्वारा प्राप्त हुआ है। सर्प जैसे घातक सरीसृप को भी अन्न देना दूध पिलाना और इस भाँति उसके रहस्यों को जानकार अपने वश में कर लेना यह एक कौशल की बात है किन्तु यह कौशल बलिवैश्व देव यज्ञ की ही देन है।

सर्व प्रथम यज्ञों में ही अन्नों का उपयोग हुआ या में अन्न कच्चे और साबुत दाने ही डाले गये अग्नि पर पड़ते ही उनमें से एक सोंधी सोंधी गंध उठी जिससे भूनकर अन्न खाने की प्रवृत्ति चली। भुने हुए अन्न की रुक्षता के कारण कुछ समय पश्चात दानों को पीसकर चूर्ण बनाकर उस जल दुग्ध आदि से सानकर घृत लगाकर अग्नि पर पत्थर के टुकड़े रखकर सेक के “पुरोडाश” खाया गया तो बड़ा ही स्वादिष्ट लगा अतः मनुष्यों ने अपने भोजन के लिये भी अन्न सिद्ध करने की इसी प्रक्रिया को अपनाया। आज तो मानव का पाक विज्ञान इतना बढ़ा हुआ है कि एक ही अन्न में से अनेक प्रकार के भोज्य तैयार किये जाते हैं किन्तु दानों को भूनकर उपयोग करना दलकर ‘यवगू’ बनाना पीस कर पुरोडाश बनाना यही क्रम पाक विज्ञान के विकास का है। आज भी यह क्रम यज्ञों में ज्यों का त्यों वर्तमान है। यज्ञ में अन्न सिद्ध करने के साधन सूर्य (सूप या छाज) तितऊ (चलनी) दषद् उपल (सिलबट्टा) उलूखल मुसल (ओखली मूसल आदि का आज भी पूर्ण महत्व है।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि ऋषि प्रणाली के अनुसार यज्ञ में बिना आहुति दिये अग्नि का बिना जिमाये स्वयं भोजन पाना वर्जित है। बिना यज्ञ किये भोजन पाने वाले को केवलाघोभवतिकेवलाही। अकेला खाने वाला केवल पाप का ही भोजन करता है, ऐसा कहा गया है।

मानव की समाज रचना पर यज्ञ का पूरा प्रभाव है अतः परिवार से लेकर चक्रवर्ती राज्य स्थापन तक संपूर्ण प्रगति विभिन्न यज्ञों में बंधी हुई है पुत्रेष्टि राजसूय अश्वमेध राष्ट्रभृत आदि यज्ञ इस बात के प्रमाण है।

सभा की भावना भी यज्ञ ही से उत्पन्न हुई है क्योंकि सबसे पूर्वजन समुदाय का एकीकरण यज्ञ ही के लिये हुआ।

पंचायत का प्रयोग भी यज्ञ के लिये हुआ है पंचायत में चारों वर्ण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र का एक एक प्रतिनिधि और एक जंगल वासी इस प्रकार पाँच प्रतिनिधियों की पंचायत होती है। पंचायत का सर्व प्रथम प्रयोग यज्ञ में निमन्त्रण के लिये ही ऋग्वेद में किया गया है (पंचजना मम होत्रं जुषध्वम्) पाँच जने मेरे हवन में आवें। यज्ञ में व्यक्तियों को यथा स्थान बिठाना अपने अपने विभक्त कार्यों को करना आदि सभा के नियमों का सर्वाधिक ध्यान रक्खा जाता है। यज्ञ में व्यवस्था (विधि) का सबसे अधिक महत्व है विधि हीन यज्ञ निष्फल कहा गया है।

संगीत नृत्य वादित्र और नाट्य कला का भी विकास यज्ञ ही से है यज्ञ में एक विशेष ऋत्विज् का नाम उद्गाता है जो उच्च स्वर से गा सके। भिन्न भिन्न समय पर गायन वह परिपाटी यज्ञ में सामगायन की है इसे उद्गाता करता है। नाट्य शास्त्र की उत्पत्ति यज्ञ से ही है जो व्यक्ति नाट्य कला को पारसियों की देन मानते हैं वह ठीक नहीं है क्योंकि नाटक की भावना यज्ञ से ही उत्पन्न हुई है उसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि नाटक के अभिनेताओं को पात्र करते हैं यह पात्र शब्द यज्ञ पात्रों से ही तो लिया गया है अधिक क्या लिखे मनुष्य की समस्त प्रगतियों का मूल इतिहास आज भी आर्य संस्कृति में यज्ञ के रूप में सुरक्षित हैं अतः यज्ञ कर्म में श्रद्धावान होना जहाँ पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता प्रकाशन है वहाँ चतुर्मुखी उन्नति का बीज मन्. सिद्ध करना भी है।

यज्ञ शिष्टाशिनः सन्तोमुच्यन्तेसर्वकिल्विषैः।

मुंजते ते त्वधं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ।। 3।13।।

अर्थ यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं और जो पापी लोग अपने ही शरीर पोषण के लिये पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः।

यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः।।3।14।।

अर्थ-सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ तो कर्म से ही उत्पन्न होने वाला है।

यज्ञशिष्टामृत भुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।

नायंलोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम 4।31।।

अर्थ- हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञों के परिणाम रूप अमृत को भोगने वाले योगी गण सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ से रहित जो पुरुष हैं, उन्हें तो यह (मनुष्य) लोक भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक की तो बात ही क्या ?

त्रैविद्या माँ सोमपाः पूत पापा, यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देव भोगान् ।।9।2।।

अर्थ- त्रैविद्याः (तीनों वेदों में विधान किये हुये कर्मों को करने वाले) एवं सोमरस पीने वाले, पापों से पवित्र हुये पुरुष मुझे यज्ञों द्वारा पूज कर स्वर्ग को चाहते हैं, वे पुण्य इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।


यज्ञ की वैज्ञानिक शक्ति

(श्री राजबहादुर सिंह “सुमन्त”-प्रयाग)

श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार सभी प्रकार के शुभ कर्म जिससे, ज्ञान, विज्ञान, तपस्या, संयम अन्न, सुख, सम्पत्ति आदि की बुद्धि हो वह सब भिन्न-भिन्न प्रकार के यज्ञ कहलाते हैं। उनमें से हम केवल अग्निहोत्र यज्ञों पर ही विचार करेंगे। सभी प्रकार के यज्ञों की उत्पत्ति ब्रह्म से हुई है। अतः अग्निहोत्र भी सृष्टि के आदि ही से विद्यमान था तथा इसी के द्वारा प्रजा की वृद्धि हुई।

भारतीय दर्शन के अनुसार सबसे सूक्ष्म तथा चरमतत्व जो अनन्त देशकाल में सम्यक् रूप से व्यापक तथा धारक है उसे ब्रह्म कहते हैं। सृष्टि की प्रलपित तथा कल्पित दोनों दशाओं में एक रस, समान भाव से विद्यमान रहता है। जैसे सारे विश्व का संस्थान अनन्त व अखण्ड देशकाल अथात् अनन्त शून्य आकाश, व कल्प, कल्पान्तर, युग युगादि हैं, उसी प्रकार इस अनन्त व अखण्ड देशकाल का भी संस्थान ब्रह्म है।

सारे विश्व का सूक्ष्मातिसूक्ष्म कारण ब्रह्म है, ब्रह्म से यज्ञ की उत्पत्ति हुई तथा फिर यज्ञों द्वारालोक वृद्धि हुई अतः लोक वृद्धि के सूक्ष्म कारण सृष्टि के आदि में यज्ञ ही में विद्यमान थे।

ब्रह्म द्वारा सृष्टि का क्रम इस प्रकार है कि पहले सूक्ष्मतत्व हुये फिर क्रमशः स्थूलतत्व बनते चले आये। यथा ब्रह्म से सर्व प्रथम ॐ शब्द प्रकट हुआ। यह एक ही अक्षर समस्त स्वर व्यंजनों का एक अद्वितीय प्रतिनिधि तथा जनक है। इस ॐ शब्द ने अपना विकास व प्रसार कर सर्व प्रथम आकाश को जन्म दिया यह आकाश सूक्ष्मतम तत्व है तथा इसका गुण शब्द है आकाश में ॐ का घोर गर्जन होता रहा। जिससे शब्द होने के कारण गति प्रकट हुई, उससे वायु बल। वह आकाश की अपेक्षा कम सूक्ष्म हैं, वायु का गुण हुआ शब्द करना तथा स्पर्श करना।

स्पर्श गुण के कारण वायु की धाराओं में घर्षण हुआ जिससे तेज विद्युत अथवा अग्नि प्रकट हुआ शब्द व स्पर्श के साथ इसमें रूप भी प्रकट हुआ अतः यह देखा जाने के कारण स्थूलतत्व माना गया। अग्नि में पिघलाने की शक्ति होने के कारण फिर उससे जल बना। इसमें शब्द स्पर्श, रूप तथा एक नया गुण रस अथवा स्वाद का बनाई। जल में वायु तथा अग्नि की अपेक्षा अधिक स्थिरता होने के कारण। तथा धीरे-2 गाढ़ा पड़ जाने के कारण पृथ्वीतत्व बना। पृथ्वीतत्व में शब्द, स्पर्श, रूप, रस के साथ-साथ एक नया गुण गन्ध का बना। धीरे-2 पृथ्वी के ठोस बन जाने पर इस पर करोड़ों जाति की काई, सेवार, कुकुरमुत्ता, भुइछत्ता, जलचर, कीड़े, मकोड़े, पशु, पक्षी,छुप, पारिजात, लता, गुल्म, झाड़ियाँ छोटे बड़े वृक्ष बहुत प्रकार की धातुएं, गौ, मनुष्यादि प्रकट हुये। इससे यह सिद्ध हुआ कि सृष्टि का क्रम सूक्ष्म से स्थूल की ओर क्रमशः हैं। नवीन विज्ञान में भी पृथ्वियों, लोक-लोकान्तरों, ग्रह नक्षत्रों आदि की उत्पत्ति तेजोमय वाष्पपुंजों रूपी निहारिकाओं से माना गया हैं। द्रव्यों के तीन रूप वाष्प (Gas) द्रव (Liquid) तथा ठोस (Solid) होते हैं। आदिम काल में सभी ठोस तथा द्रव वाष्प रूप में थे। सेर भर तौल का लोह पिण्ड यदि विद्युत की भट्टी में डालकर गलाया जाय, तो पहिले पानी जैसा पतला होकर फिर वाष्प बनकर उड़ जाता है तथा पुनः प्रक्रिया द्वारा ठोस लोह पिण्ड में परिवर्तित किया जा सकता है पाश्चात्य जगत पृथ्वी की उत्पत्ति ऐसे मानता है कि पूर्व में यह सूर्य से टूटकर अलग हुये तथा दहकते हुये द्रव का एक गोला था जो क्रमशः ठण्डा होकर ठोस हो गया फिर इस पर धीरे-2 वनस्पति तथा जीव जन्तुओं का आविर्भाव हुआ। इस प्रकार पाश्चात्य दृष्टिकोण से भी सृष्टिक्रम सूक्ष्म से स्थूल की ओर ही है।

यज्ञ ही सृष्टि की वृद्धि का सूक्ष्म कारण था जो वायुमण्डल में अनेकों प्रकार की सिद्धि, समृद्धि सुख, सम्पत्ति, ज्ञान, जिज्ञासा, संयम, सदाचार आदि क प्राण रूप में विद्यमान था। यही यज्ञ रूपी सूक्ष्म प्राण, अग्नि में होकर जल व पृथ्वी तत्व का रूप धारण करके अभीष्ट फलों में बदल जाता है। इसी प्रकार वह शुद्ध तथा उचित स्थूल द्रव्य जिनमें जल व पृथ्वी के अंश अधिक हैं, उनको अग्नि में पुनः डाल कर वायु, वाष्प या धुयें के रूप में परिवर्तित व विशद करके वायुमण्डल में सुख समृद्धि तथा नाना प्रकार के अभीष्टों के प्राण पुनः बनाए जा सकते हैं।

सृष्टि के आदि में सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्राणियों की सृष्टि हुई जो जन्मना प्रत्येक सिद्धियों से सम्पन्न थे, प्रकट व लोप हो सकते थे, आकाशचारी थे तथा संकल्प मात्र से लोक लोकान्तरों में जा सकते थे। यह ऋषिगण थे इनको श्रुति सिद्धि थी इन को ब्रह्मशब्दों द्वारा अनेकों प्रकार की यज्ञ की विधियाँ ज्ञात थीं। ऋषिसर्ग के पश्चात देवसर्ग, पितृसर्ग, मनुष्यसर्ग तथा अनेकों अन्य सर्ग हुए जो ऋषियों के प्रति ब्रह्म द्वारा कथित यज्ञों का पालन करके अपना नया लोक कल्याण करते चले आए।

सृष्टि के प्रारम्भ में ऋषि सर्ग व देवसर्ग के प्राणी सिद्धि सम्पन्न होने के कारण केवल संकल्प मात्र से अभीष्ट फलों की प्राप्ति कर लेते थे-अर्थात् सूक्ष्म सृष्टि होने के कारण यज्ञों की स्थूल प्रक्रिया न होकर केवल कल्प व संकल्पों द्वारा ही वर्ता जाता था। अर्थात् उनको अग्नि में हवन द्वारा स्थूल द्रव्यों को वाष्प, वायु, अथवा धुयें में परिवर्तित करके वायु मण्डल में अभीष्ट फलों के प्राण, कारण व बीज बनाने की आवश्यकता न थी। परन्तु सतयुग के अन्तिम तथा त्रेतायुग के प्रारम्भ काल में जब कि मनुष्यादि सर्गों का आविर्भाव तथा वृद्धि हो चुकी थी तथा साथ ही साथ, मनुष्यों में इच्छा, आवश्यकता तथा रजोगुण की उत्तरोत्तर वृद्धि हो चली थी तो विविध संकल्पों के साथ उचित तथा शुद्ध व अभीष्ट फल सिद्धि कारक स्थूल द्रव्यों को अग्नि में हवन कर धुयें के रूप में विशद बनाकर वायुमण्डल में अभीष्ट फलों के कारण रूप प्राण बनाकर प्राप्ति व वृद्धि करने लगे। त्रेतायुग के विद्वान व वैज्ञानिक ऋषियों ने इस विद्या में बड़ी उन्नति की। व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र की कोई भी आवश्यकता हो उसके लिए तत्काल ही एक यज्ञ की व्यवस्था कर देते थे। संकल्पों के साथ उचित द्रव्यों को अग्नि में हवन करके अभीष्ट फल की प्राप्ति करने लगे। यहाँ तक उन्नति हुई कि इन्हीं यज्ञों द्वारा विशिष्ट शक्ति सम्पन्न देवता, असुर गंधर्व, राक्षस आदि प्राणियों को प्रकट करना, रथ, विमान, खीर अनेकों प्रकार की औषधियाँ, राजमहल घोड़ा, वृक्ष, गौ, नदी आदि मनचाही वस्तुओं को सद्यः प्राप्त करने के अनेकों उदाहरण हैं जो पुराणों व उपनिषदों में वर्णित है।

त्रेतायुग के ऋषियों ने उन भिन्न-भिन्न द्रव्यों का पता लगाया जिनको संकल्प के साथ अग्नि में हवन करने से भिन्न-भिन्न अभीष्टों की सिद्धि होती है उन्होंने गौ के लिये सर्वथा उपयुक्त पाया। गौ को यज्ञ की जननी कहते हैं, बिना गौ घृत के किसी भी यज्ञ की सिद्धि नहीं होती। यज्ञ के लिये ग्रहीत गौ घृत पूर्ण शुद्ध होना चाहिये इसका सतर्कता से विशेष ध्यान रखना चाहिये कि गोघृत के बदले जमाया हुआ तेल चर्बी आदि का हवन द्वारा सभी प्रकार के बल बुद्धि, आविष्कार शक्ति, ज्ञान दर्शन आदि प्राप्त हो सकते हैं। प्रत्यक्ष में भी तो हम देखते हे कि केवल माँस या शराब पीने वाले देश जैसे टुन्ड्रा, ग्रीनलेन्ड, एलास्का तथा ध्रुव निवासी लोग, आस्ट्रेलिया व अफ्रीका के आखेट जीवी जंगली मनुष्यों में वैज्ञानिक तथा आविष्कारक बुद्धि का अभाव है। इनकी अपेक्षा पाश्चात्य जगत के योरोप व अमेरिका निवासी लोग, माँसादि के साथ कितना मक्खन मलाई खाते हैं जिससे उनके शरीर व मस्तिष्क दोनों पुष्ट होते हैं।

जितने भी हवनीय द्रव्य हैं उनमें गोघृत के हवन द्वारा बने हुए सुगन्धित वायुमंडल का आय-तन सबसे आधिक है, यह प्रत्यक्ष देखा गया हैं। गोघृत के पश्चात् सुगंधित आयतन बनाने का नम्बर शक्कर का है। कपूर, गुग्गुल, पान, सुपारी, नारियल, खजूर, जटामाँसी, गोरेचन, केशर, कस्तूरी, सुगंध वाला, लौंग, इलायची, तेजबल, कपूरकचरी, मखाना, छुहारा, किशमिश, अंगूर सेवादि फल, जौ, तिल, धान्य, आदि को में भी हवन द्वारा वायुमंडल में अधिकाधिक सुगंधित आयतन बनाने का गुण है परन्तु गोघृत इन रूप में मुख्य है। गोघृत के योग-वाही तथा विशद् होने के कारण अन्य द्रव्य भी इसके संयोग से हवन द्वारा प्राण रूप होकर वायुमंडल में विशद् या वृहद् आयतन धारण कर लेते हैं।

इस विषय का एक क्रमबद्ध शास्त्र था कि गोघृत के साथ किन-किन द्रव्यों को कितनी-कितनी मात्राओं में किन-किन संकल्पों द्वारा हवन करने से किन-किन अभीष्ट फलों के वायुमंडल में कारण व बीजरूप प्राण बन जाते हैं, जो समय के फेर से व्यवहार भ्रष्ट हो जाने के कारण अधिकाँश नष्ट हो गया है। थोड़ा बहुत प्राप्य भी हैं तथा खोज द्वारा पुनः बहुत कुछ प्राप्त किया जा सकता है।

यहाँ तक तो सृष्टिक्रम, ब्रह्मा का यज्ञ से सम्बन्ध, त्रेतायुग के ऋषियों द्वारा उनका प्रचार व विस्तार, यज्ञ द्वारा अभीष्ट फलों की प्राप्ति का वैज्ञानिक व व्यवहारिक आधार व प्रमाण, गोघृत का महत्व आदि के विषय में वर्णन हुआ, अय हम यह दर्शाते हैं कि हवन किये हुये द्रव्यों से वायुमंडल में बना हुआ अभीष्ट फलों का कारण व बीज रूप प्राण द्वारा अंकुरित फल, अन्य देशों में न होकर विशेषता उसी देश में कैसे होता है जहाँ कि यज्ञ किया जाता है:-

नव्य विज्ञान में एक सिद्धांत प्रतिक्रियावाद का है। शक्ति का प्रयोग चाहे जिस द्रव्य या पदार्थ पर किया जाय, वह द्रव्य या पदार्थ भी उतने ही वेग के साथ शक्ति को उसके पूर्व स्थानों का लौटा देता है। अब तक यह प्रतिक्रियावाद सैकड़ों उदाहरणों द्वारा सिद्ध किया गया है। इसकी मान्यता के अनुसार यज्ञ द्वारा अभीष्ट फलों की प्राप्ति भी उसी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र अथवा देश को होती है जिसके द्वारा यज्ञ का संकल्प, संयोजन,वर्तन तथा पूर्ण किया जाता है।

एक बात और यह है कि पृथ्वी का विषय गन्ध है। पृथ्वी सदा वायु से गन्धों का शोषण करके वायु का निर्गन्ध किया जाता है। पृथ्वी के विकार रूप पशु, मनुष्य, वृक्षादि स्थिर अथवा चंचल वायु की गन्ध सदा खीचते रहते हैं। सगंध वायु कुछ मीलों तक चलने पर स्वयं निर्गन्ध हो जाती है। गंध से भार होने के कारण यह सदा पृथ्वी के धरातल पर ही बहता है। ऊपर आकाश का सूक्ष्म वायु निर्गन्ध होता है। इस प्रकार यज्ञ में हवन द्वारा बने (अभीष्ट फलों के कारण व बीज रूप वाष्प धुंआ व गंध को यज्ञ प्रदेश वाली पृथ्वी शोषण कर लेती है पुनः अभीष्ट अन्न, फल, दुग्ध, सुख, प्रसाद आदि उत्पन्न कर उस प्रदेश का अर्पण करती है।

मान लिया कि किसी देश में लोक कल्याण के निमित्त एक बड़ा यज्ञ किया गया। यज्ञ का प्राणस्वरूप बहुत बड़ा धुंआ उठा वायुमंडल के एक विशाल आयतन को घेर लिया। इतने में जोरों कि आँधी आई और वह पवित्र धुंआ आँधी के झकोरों के साथ एक पड़ोसी शत्रु देश में पहुंच गया तो इसका फल भी बड़ा उत्तम होता है। वह पड़ौसी शत्रु देश धीरे-धीरे आपके देश का मित्र बन जायेगा। आपके देश के सहानुभूति रखने लगेगा। वह आपके देश के साथ भलाई करने लगेगा। उस शत्रु देश के निवासी भी आप ही के से विचार वाले हो जायेंगे तथा प्रति उपकार द्वारा इस पुण्य का फल आपको प्राप्त होगा। इस प्रकार शत्रु मित्र दोनों प्रकार के देशों का इससे कल्याण ही होगा।

हम श्रीमद्भागवत पुराणों के में नगर वर्णन में द्वारिका, मथुरा, अयोध्या, काशी आदि नगरों के विषय में ऐसा पढ़ते हैं कि नगरों पर सदा यज्ञ का धुंआ मंडराया करता था। गलियाँ अगर, कस्तूरी, चन्दन, आदि सुगंधित द्रव्यों की सुगंध से सुवासित रहती थी। शुद्ध, सुगन्धमय प्रसन्नता व प्रीतिदायक वातावरण बना रहता था जो समाधिवर्धक, मन को एकाग्र व भावमय बनाने में सहायक होता था, जन- समुदाय की बुद्धि,स्मृति, बल, प्रसन्नता आदि का कारण होता है। दैहिक, दैविक तथा भौतिक परमाणुओं का शमन होता था।

यज्ञ के महत्व के विषय में हमने अपने जीवन में भी इसे शुद्ध गोघृत द्वारा सम्पन्न करने से इसके सुन्दर फलों की प्रत्यक्षता अनेकों बार देखी है।

प्राचीन काल से भारत के वेदज्ञान, अध्यात्म धर्म, संस्कृति का यज्ञ ही प्रधान कारण रहा है। इसी भारतीय प्राचीन संस्कृति ने अनेक अवतारों, संत महात्माओं, विद्वानों, वैज्ञानिकों, ऋषि, मुनियों तथा धार्मिक राजाओं का जन्म दिया जो इतिहास प्रसिद्ध है तथा इस समय भी संसार में मान है—


यज्ञ द्वारा रोग निवारण

(ले0 डाक्टर कुन्दनलाल अग्निहोत्री भू0पू0 मेडिकल आफीसर-बरेली)

प्रभु की अमृत वाणी वेद की अवहेलना करने तथा आसुरी सभ्यता को अपनाने के कारण आज रोगों का राजा राजयक्ष्मा (टी0बी0) हमारे देश में बराबर बढ़ता चला जा रहा है और आधुनिक वान उसको दूर करने में अब तक असफल रहा है जिसे उच्च कोटि के वैज्ञानिक, डाक्टर, स्वयं स्वीकार करते हैं जैसा कि निम्नलिखित, प्रमाणों से सिद्ध होता है।

1- “राजयक्ष्मा तथा उससे बचने के उपाय” नामी लघु पुस्तक जो लखनऊ मेडिकल कॉलेज को क्षय निवारण समिति द्वारा प्रकाशित हुई है। हमें बताती है कि:-

क- “राजयक्ष्मा यदि एकबार हो जावे तो जान लेकर पीछा छोड़ता है।”

ख- “बढ़े रोग में धन्वंतरि वैद्य भी रोगी को काल के मुख से बचाने का सामर्थ्य नहीं रखते।”

2- डा0 मोलर साय भू0पू0 कमिश्नर “ऑल इंडिया ऐन्टी टयुबरक्लोसिस ऐसोसिएशन देहली, का कहना है- “अभी तक किसी ऐसी औषधि का आविष्कार नहीं हुआ है जो शरीर के भीतर यक्ष्मा-कीटाणुओं शरीर को बिना हानि पहुंचाये मार सके।

3- डा0 यज्ञेश्वर गोपाल भी खंडे बी.एस.सी.बी.बी.एस.एस.डी. (वेल्स) मेडिकल सुपरिंटेंडेंट भुवाली सेनीटोरियम लिखते है-

क- “क्षय रोग की अचूक चिकित्सा करने वाला तो अभी पैदा होना है”। ‘यह ध्यान में रखना चाहिए कि क्षय-रोग को अच्छा करने का कोई भी उपाय अभी तक नहीं निकाला गया है।”

ख- “आधुनिक विज्ञान से रोगी का पूर्ण रूप से आरोग्य होना असम्भव है।”

4- इस रोग में आधुनिक विज्ञान की असमर्थता सबसे बड़ा और प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि उसके द्वारा सरकारी अनेकों उपाय होते हुए भी देश में जहां पहले रोगियों की संख्या हजारों पर थी वहाँ अब लाखों पर पहुँच गई है और ग्रामों तक में रोग पहुँच गया है। जिस क्षय चिकित्सा में आधुनिक विज्ञान इतनी विवशता प्रकट करता है उसी की चिकित्सा का वेद भगवान कितने आशा पूर्ण शब्दों में आदेश देता है यह आगे पढ़ें-

1-मुच्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञात यक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्।

ग्राहि र्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्रभुमुक्त मेनम्।। अथर्व का, सू, 11 मं, 1।।

अर्थ- हे व्याधि ग्रस्त! तुमको सुख के साथ चिरकाल तक जीने के लिए गुप्त यक्ष्मा रोग ओर सम्पूर्ण प्रकट राजयक्ष्मा रोग से आहुति द्वारा छुड़ाता हूँ। जो इस समय में इसी प्राणी को पीड़ा ने या पुराने रोग ने ग्रहण किया है उससे वायु तथा अग्नि देवता इसको अवश्य छुड़ावें।

इससे अगला मंत्र इस प्रकार है:-

यदि क्षितायुर्यंदि वा परे तो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एवं। तमा हरामि निऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनंशतशारदाय ।।

अथर्व का0 3 सूक्त 11 मन्त्र 2।।

अर्थ-यदि रोग के कारण न्यून आयु वाला हो, अथवा इस संसार के सुखों से दूर हो, चाहे मृत्यु के निकट आ चुका हो ऐसे रोगी को भी महारोग के पाश से छुड़ाता हूं। इस रोगी को सौ शरद ऋतुओं तक जीने के लिये प्रबल किया है।

और देखिये:-

विसवैते जायान्य जानं यतो जायान्त जायसे। कथंह तंत्र त्वं हनो यस्य कृणामो हवि र्गृह।।

अथर्व का 7 वर्ग 76 मं0 5 ।।

अर्थ-हे छय-रोग तेरे उत्पन्न होने को विषय में हम निश्चय ऐ जानते हैं कि तू जहाँ से उत्पन्न होता है तू वहाँ किस प्रकार हानि कर सकता है। जिसके घर घर में हम विद्वान नाना औषधियों से या रोग नाशक हवि, या चरु को बना कर उससे अग्नि-होत्र कहते हैं अर्थात् रोग नाशक हवि, चरु या अत्र द्वारा क्षयरोग को निकाल डालने पर सब प्रकार से छय रोग दूर हो जाता है।

तर्क और वैज्ञानिक परीक्षणों से यह वेद वाक्य कैसे पूर्णतया सत्य सिद्ध होता है यह आगे बताया जाता है:-

1—सब विद्वान जानते हैं कि स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म अधिक शक्तिशाली होता है तथा सूक्ष्म स्थूल में प्रवेश कर सकता है। आटे में मिली हुई बूरा के सूक्ष्म परिमाणु पृथक करने को मनुष्य की स्थूल उँगलियाँ असमर्थ हैं पर चींटी का सूक्ष्म मुँह उसे सुगमता से पृथक कर सकता है। सोने का एक छोटा टुकड़ा मनुष्य खा ले तो उस पर कोई प्रभाव न होगा पर उसी टुकड़े को सूक्ष्म करके वर्क बना कर खावें तो कुछ शक्ति आवेगी ओर यदि सूक्ष्म करके अर्थात् भस्म बनाकर खावे तो प्रथम दिन से ही उसकी गर्मी अनुभव होगी ओर कुछ समय में चेहरे पर लाली और शरीर में शक्ति आ जावेगी।

होम्योपैथिक चिकित्सा विधि में इसी नियम के आधार पर औषधियों की पोटेन्सी तैयार की जाती है और औषधि का भाग जितना सूक्ष्म होता जाता है उतनी ही उसकी शक्ति बढ़ती जाती है यहाँ तक कि जो औषधि स्थूल रूप में दिन में बार 2 खाने से साधारण रोग दूर कर सकती है। वही औषधि बहुत सूक्ष्म रूप में केवल एक मात्रा खाने से बड़े बड़े जीर्ण रोगों को दूर कर देती है।

इस नियम पर दृष्टि रखते हुए विचार कीजिये कि क्षय कीटाणु की लम्बाई 1/15000 इंच और चौड़ाई 1/150000 इंच होती है। इतनी सूक्ष्म चीज पर बड़े कारण वाली औषधियों की पहुँच जब न हुई तब वैज्ञानिकों ने उनका सूक्ष्म रूप करने को इन्जेक्शन की प्रथा चलाई पर यह सब जानते हैं कि अग्नि से अधिक पदार्थों को सूक्ष्म और कोई ढंग नहीं कर सकता। हम नित्य ही देखते हैं कि एक लाल मिर्च की जिसे स्थूल रूप में एक आदमी सुगमता से खा सकता है यदि खरल में घोटने लगे तो पास बैठे अनेकों मनुष्यों को खाँसी आने लगेगी अब यदि उसी मिर्च को आग में डाल दे तो उसकी घास का प्रभाव दूर-2 तक बैठे मनुष्यों पर हो जावेगा। इसी प्रकार हवन यज्ञ में डाली औषधियों के परमाणु बहुत बारीक होकर श्वाँस द्वारा सीधे फेफड़ों में जाकर रोग-कृमियों को मारते और छतों में भरते हैं और रोग छिद्रों द्वारा सीधे रक्त में प्रवेश करके रक्त को शुद्ध कर देंगे। इसके वैज्ञानिक परीक्षण किये गये तो ज्ञात हुआ कि लोग, जायफल इत्यादि जलाने पर गैस के तेलों के परमाणु 1/10000 से 1/100000000 तक सेन्टीमीटर व्यास वाले पाये गये। अतः रोग-कृमि से अधिक सूक्ष्म होने के कारण सुगमता से उनके भीतर प्रवेश कर सकते हैं और अपने वैज्ञानिक गुण के कारण उनको मार सकते हैं।

2—यह भी पदार्थ विद्या से सिद्ध हो चुका है कि किसी पदार्थ का नाश नहीं होता केवल रूप बदल जाता है। अतः अग्नि में हवि जलाने से उसके परमाणु भी सूक्ष्म हो जाते हैं उनका नाश नहीं होता। गूगल, घी, कपूर इत्यादि क्षत भरने वाले हैं पर स्थूल रूप में हम उनसे फेफड़ों के क्षत भरने का कार्य नहीं ले सकते पर अग्नि में जलाकर उनके सूक्ष्म परमाणु सुगमता ओर सरलता से फेफड़ों में पहुँचा सकते हैं।

3—यजुर्वेद के 40 वे अध्याय के प्रथम मन्त्र में संसार को ‘जगत्यामि जगन्’ बताकर इस सिद्धाँत का ज्ञान प्रभु ने कराया है कि जगत् का प्रत्येक परमाणु गतिशील है। आज के वैज्ञानिक भी परीक्षण के पश्चात् इस सिद्धान्त को सत्य स्वीकार करते हैं। और साथ ही यह भी बताते हैं कि यह गति ऊटपटांग नहीं किंतु किसी नियम में बँधी हुयी है। प्रत्येक परमाणु की गति एक सही नहीं होती किन्तु किन्हीं की एक दूसरे के विपरीत तथा समान वस्तुएं एक दूसरे को अपनी और खींचती है और दो विरुद्ध वस्तुयें ऐ दूसरे को भगाती है अतः जिन दो वस्तुओं के परमाणु एक सही गति करते हैं उनमें परस्पर आकर्षण होता है और विरुद्ध गति वाले परस्पर एक दूसरे को दूर भगाते हैं।

इस नियम के आधार पर जो लोग शरीर में सड़न उत्पन्न करने वाले पदार्थ, माँस, तम्बाकू इत्यादि प्रयोग करते हैं उनके निकट जब क्षय कीटाणु पहुँचते हैं तो समानता के कारण उनका शरीर अपनी और उन्हें खींच लेता है पर जो लोग गूगल, लौंग, घी इत्यादि क्षयनाशक पदार्थों से हवन यज्ञ करके उनके सूक्ष्म परमाणु अपने शरीर में रखते हैं तो क्षय कीटाणु उनके निकट आते हैं तब विरुद्ध गति होने के कारण वह दूर भाग जाते हैं। इसी कारण नित्यप्रति नियमपूर्वक यज्ञ करने वाले को कभी क्षय रोग नहीं हो सकता।

4—क्षय के सब विशेषज्ञ डाक्टर इस बात को स्वीकार करते हैं की क्षयरोगी को अधिक मात्रा में ओषजन युक्त वायु की आवश्यकता होती है। इसी कारण असाध्य रोगी को भी पहाड़ पर जाने की सम्मति दी जाती है और बहुत से असाध्य दीखने वाले रोगी इस प्राकृतिक ढंग से अच्छे भी हो जाते हैं क्योंकि ओषजन फेफड़ों के ओर आँतों के क्षतों को शीघ्र सुखाने की शक्ति रखता है, साथ ही ओषजन की रगड़ से शरीर में अग्नि उत्पन्न होकर पाचन शक्ति को बढ़ाती है जो क्षय रोगी में न्यून हो जाती है। इस ओषजन का एक और सूक्ष्म भाग ओजोन (OZone) होता है जो बहुत धीमी सुगन्ध से शरीर में प्राणशक्ति का संचार करता है। जिस पहाड़ पर चीड़ के वृक्ष अधिक होते हैं उस पर ओजोन (Ozone) का यह भाग अधिक पाया जाता है। वैज्ञानिक ढंग पर परीक्षण करके देख लिया गया है कि हवन गैस में ओजोन (Ozone) का यह भाग बड़ी मात्रा में पाया जाता है जिनको इस परीक्षण का विस्तृत हाल जानना हो वह हमारी लिखी पुस्तक ‘यज्ञ-चिकित्सा’ अथवा श्री डा0 सत्य प्रकाश जी डी.एस.सी. प्रोफेसर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अंग्रेजी पुस्तक ‘अग्नि-होत्र’ पढ़े जिसमें उन्होंने हवन यज्ञ की वस्तुओं के आधुनिक विज्ञान के द्वारा परीक्षण करके गुण लिखे है।

5—क्षयी का अर्थ है- क्षीण करने वाला रोग बहुत से चिकित्सक रोगी के शरीर का भार घटने बढ़ने से ही अवनति और उन्नति की जाँच करते हैं। हम लोग फुफ्फुस देखने का यन्त्र जब कभी स्वस्थ मनुष्य की छाती पर लगाते हैं तो भीतर जाने वाली श्वांस की लंबाई बाहर निकलने वाली श्वास की अपेक्षा तीन गुना अधिक सुनाई देती है। जिसका मतलब यह है कि आय अधिक और व्यय न्यून होने से शरीर अधिक दिनों तक कायम रहेगा किन्तु क्षय रोगी की श्वास की लंबाई इसके विपरीत होती है अर्थात् भीतर जाने वली श्वास की लम्बाई कम और बाहर निकलने वाली आधिक। इसका मतलब साफ है कि आय कम और व्यय अधिक होने के कारण शीघ्र प्राणों का दिवाला निकलने वाला है। इस प्राण शक्ति को बढ़ाने के लिए डा0 लोग रोगी को खूब खाने और आराम से पड़े रहने की सम्मति देते हैं पर जैसा कि ऊपर बताया गया है मन्दाग्नि के कारण रोगी अधिक और पौष्टिक भोजन पचा नहीं सकता। इसी कारण बहुत से रोगियों को दस्त आकर उनकी मृत्यु हो जाती है। संसार के अनन्त वैज्ञानिकों के पास कोई ऐसी औषधि नहीं है कि जो क्षय रोगी को पौष्टिक पदार्थ अधिक मात्रा में पचा दे पर हवन यज्ञ में हम हलुवा, लड्डू, खीर, मेवा, घी इत्यादि सभी पदार्थ बड़ी से बड़ी मात्रा में जला कर उनके सूक्ष्म परमाणु रोगी के रक्त में पहुंचा सकते हैं जो नाश न होने वाले वैज्ञानिक सिद्धांत से शरीर में पहुंच कर उसकी प्राणशक्ति को बढ़ावेंगे और अग्नि को मन्द करने के स्थान में अपने ओषजन के गुण से और तीव्र करेंगे। अनुभव से देखा गया है जो रात दिन सुस्त पड़े रहकर मौत की प्रतीक्षा करते थे वही यज्ञ चिकित्सा करने पर कुछ दिनों में उत्साह और शक्ति का प्रदर्शन करने लगे।

इसके पक्ष में अनेकों युक्तियां दी जा सकती हैं पर विस्तार में न जाकर अब हम वैज्ञानिकों के कुछ परीक्षण लिखते हैं:-

1- मद्रास के अंग्रेजी काल के सेनीटरी कमिश्नर (Sanitary Commissioner) डा0 कर्नल किंग आर0एम0एस0 ने वहाँ प्लेग फैलने पर कालेज के विद्यार्थियों को उपदेश दिया कि घी, चावल और केसर मिलाकर जलाने से तुम रोग से सुरक्षित रहोगे।

2- फ्राँस के विज्ञानवेत्ता प्रोफेसर टिलवर्ट साहब कहते हैं कि जलती हुई खाँड़ के (शक्कर) धुँये में वायु शुद्ध करने की बड़ी शक्ति है। इससे हैजा, तपेदिक, चेचक इत्यादि का विष शीघ्र नष्ट हो जाता है।

3- डा0 टाटलिट साहब ने मुनक्का, किशमिश इत्यादि सूखे फलों को जलाकर देखा है और मालूम किया है कि इनके धुयें से टाइफ़ाइड ज्वर के कीटाणु केवल आध घंटे में और दूसरे रोगों के कीटाणु घंटे दो घंटे में समाप्त हो जाते हैं।

4- फ्राँस के हेफकिन साहब जिन्होंने चेचक के टीके का आविष्कार किया है, कहते हैं कि घी जलाने से रोगकृमि का नाश हो जाता है।

5- कविराज पं0 सीतारामजी शास्त्री अपनी पुस्तक में लिखते हैं “मैंने कई वर्षों की चिकित्सा के अनुभव से निश्चय किया है कि जो महारोग औषध भक्षण करने से दूर नहीं होते वह वेदोक्त यज्ञों द्वारा (अर्थात् यज्ञ-चिकित्सा से ) दूर हो जाते हैं।

6- लेखक स्वयं प्रथम 25 वर्ष तक खोज और परीक्षण के पश्चात् आय 26 वर्ष से क्षय रोग की चिकित्सा यज्ञ द्वारा सैकड़ों रोगियों की कर चुका है उनमें ऐसे रोगी भी थे जिनके क्षत (Cavity) कई 2 इंच लम्बे थे और वर्षों सेनीटोरियम और पहाड़ा पर रहने पर भी अन्त को डाक्टरों ने असाध्य बता दिया पर वह यज्ञ चिकित्सा से पूर्ण अरोग्य होकर अब वह अपना कारबार कर रहे हैं।

7- 6 अप्रैल, 1955 ई॰ के अंग्रेजी पर लीडर में “New Core for T.B.of Lunsh” शीर्षक समाचार छपा है। जिसका सारांश यह है:-

बम्बई में एक अमेरिकन डा0 ने यह बताया है कि वैज्ञानिक लोग कई शताब्दी से इस बात की खोज में लगे थे कि सूँघने की गैस से फेफड़े की टी0बी0 को अच्छा किया जावे अब हम लोग उस खोज में सफल हो गये हैं और अमरीका में इसका परिणाम सब ही चिकित्साओं की अपेक्षा असाधारण तोर पर अच्छा रहा हैं। गैस सूँघने से धीरे-2 रोगी बिल्कुल अच्छा हो जाता है:- इसका अर्थ यह है कि आज अमरीका भी इस यज्ञ की साइन्स को सब चिकित्सकों से बेहतर मानने लगा है पर अभी उसे यह पता नहीं कि सूँघने में कौन औषधियों और कौन ढंग सबसे उत्तम है। यदि आज भारत सरकार ऋषियों के इस प्राचीन ढंग को विज्ञान की दृष्टि से अपनाये अथवा कोई यज्ञ प्रेमी इस विज्ञान का कोई इस कोटि का चिकित्सालय बनवा दे। जिस पर विदेशियों की दृष्टि जा सके तो वह दिन दूर नहीं कि अमरीका इंग्लैंड इत्यादि में भी वैदिक ढंग से यज्ञ होने लगे।

इस विषय में आयुर्वेद का मत:-

प्रयुक्तया यथा चेष्टया राजयक्ष्मा पुराजिता।

ताँ वेद विहिता मिष्टमारोग्यार्थी प्रयोजयेत् ।।

चरक चि0 स्थान अ॰ श्लोक 12

जिस यज्ञ के प्रयोग से प्राचीन काल में राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था आरोग्यता चाहने वाले मनुष्य को उसी वेद विहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए।

चरक ने क्षय चिकित्सा में खाने की औषधि तथा अवगाहन अर्थात् जल-चिकित्सा इत्यादि के उपाय वर्णन करने के पश्चात् उपरोक्त श्लोक द्वारा यज्ञ का विधान बताकर क्षय-चिकित्सा का विपथ समाप्त किया है। इसका अर्थ यह है कि क्षय रोग के लिए ‘यज्ञ-चिकित्सा’ को ऐसा महत्वपूर्ण उपाय समझा है कि इसके पश्चात् किसी अन्य उपाय की आवश्यकता नहीं रहती। यज्ञ को जहाँ धार्मिक दृष्टिकोण से अन्य ऋषियों ने नित्य कर्म के पंच यज्ञों में माना है वहाँ आयुर्वेद के लगभग सभी प्रामाणिक ग्रंथों ने हवन का नित्य की दिनचर्या में सम्मिलित किया है। इसका वैज्ञानिक प्रभाव क्या और कैसे पड़ता है, यह बताकर इस समय इस लेख को समाप्त करेंगे।

प्राचीन आयुर्वेद प्रभु की अमृत वाणी वेद के आधार पर वेद का ही उपवेद है अतः पूर्णतया प्राकृतिक नियमों पर आधारित हैं। उसका सिद्धान्त यह है कि जिस प्रकार समस्त, विश्व भगवान ने पंचतत्व (अग्नि, जल, वायु, प्रकाश, पृथ्वी) से बनाया। इसी प्रकार मनुष्य का शरीर भी इन पंचतत्वों का सम्मिश्रण है। जिससे वात, पित्त, कफ तीन दोष बनते हैं और जिनकी सम अवस्था में रहने से कोई रोग नहीं होता। त्रिदोष की विकृतावस्था ही रोग का कारण है। यह विकृतावस्था जहाँ खान, पान, व्यायाम, विषय भोग इत्यादि की अनियमितताओं से होती है वहाँ बाहर के वायुमंडल अत्यन्त सर्दी, गर्मी, वर्षा की अनियमितता भी इस पर बड़ा प्रभाव डालती है। गर्मी से पित्त, सर्दी से कफ, सुगन्धि और दुर्गन्धि से वायु विशेष प्रभावित होती है। सूर्य के आदान कर्म अर्थात् पृथ्वी से जल खींचने की शक्ति ओर चन्द्रमा के विसर्ग अर्थात् रसों को पृथ्वी पर छोड़ने के कर्म तथा वायु के विक्षेप कर्म अर्थात् इधर उधर भ्रमण कर्म से संसार स्थित है और इन कर्मों में गड़बड़ होने से वायुमंडल में ऋतु और मनुष्य शरीर में बात, पित्त और कफ बिगड़कर रोग उत्पन्न करते हैं। एक बात और है कि सूर्य प्राणशक्ति का पुंज है। प्राण शक्ति सूर्य से ही वायु ग्रहण करती है। जिस प्रकार हमारे फेफड़े अशुद्ध रक्त को साफ करके शरीर में शुद्ध रक्त का संचार करते हैं उसी प्रकार संसार भर की अशुद्ध और दुर्गन्धि वायु में से नमी को खींच कर सूर्य भगवान शुद्ध करके हमें प्राणशक्ति प्रदान करते हैं और चन्द्रमा को भी सूर्य भगवान ही अमृत प्रदान करते हैं। फेफड़ों को यदि बड़ी मात्रा में ओषजन युक्त वायु मिले तो कम काम करना पड़ता है इससे वह पुष्ट होते हैं पर यदि दुर्गन्धित वायु अधिक पहुँचे तो कार्य भार अधिक होने से वह निर्बल हो जाते हैं, इन सब नियमों को ध्यान में रखते हुये जरा गम्भीरता से विचार करें कि सृष्टि कम के अनुकूल सब पशु पक्षी कुछ दुर्गन्धित वायु में उत्पन्न करते हैं। अतः उसी के प्रतिकार करने को भगवान ने उसी अनुताप से सुगन्धित फूल इत्यादि उत्पन्न कर दिये ताकि सूर्य भगवान को कार्य अधिक न करना पड़े क्योंकि पशु पक्षी अपनी केवल भोग योनी होने के कारण स्वयं कोई सुगन्धि उत्पन्न नहीं कर सकते पर मनुष्य की कर्म ओर भोग दोनों प्रकार की योनि होने के कारण इसे कर्म करने में स्वतंत्र किया है तथा बुद्धि और वेद ज्ञान देकर आज्ञा दी है कि तुम जो दुर्गन्धि उत्पन्न करते हो उसके निवारण तथा अपने जीवनोद्देश्य मुक्ति की प्राप्ति के निमित्त जगत के उपकार के दृष्टि से नित्य प्रति हवन यज्ञ किया करो ताकि तुम देवताओं के ऋणी न रहो। ऐसा करने से सूर्य भगवान को जहाँ मनुष्यों से उत्पन्न हुई दुर्गन्धित की शुद्धि करना पड़ती है वहाँ यज्ञ से उत्पन्न हुई सुगन्धि से वह तृप्त होकर प्राण शक्ति का अधिक संचार करते हैं जिससे हमारा स्वास्थ्य, बल तथा जीवन बढ़ता है जब हम भगवान की इस आज्ञा का पालन नहीं करते तो आजकल की भाँति रोगों की वृद्धि होती है और वर्षा भी नियमानुकूल न होने से अकाल पड़ते हैं और वनस्पतियाँ शक्तिहीन हो जाती है जिससे और भी रोग बढ़ते हैं। इसी बात को गीता में भगवान कृष्ण ने इस प्रकार कहा है:-

प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा, कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ और यज्ञ तुम लोगों को इच्छित कामनाओं का देने वाला होवे तथा-

देवान्भावयतानेन से देवा भावयन्तुवः।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ।।

गी0अ0 3 श्लोक 11

अर्थ- तथा तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो ओर वे देवता लोग तुम लोगों की उन्नति करें इस प्रकार आपस में कर्त्तव्य समझकर उन्नति करते हुये परम कल्याण को प्राप्त होओगे। इत्यादि।

अतः वेद, शास्त्र, युक्ति, प्रणाम, प्राचीन व नवीन सब ही प्रकार के विज्ञान तथा परीक्षण से सिद्ध है कि यज्ञ द्वारा रोग निवारण होता है जिनकी इच्छा हो स्वयं परीक्षण करके देख ले।

प्राकृतिक नियमों के साथ नित्य प्रति नियमपूर्वक हवन करने वाला कदापि रोगी नहीं हो सकता यह हमार दृढ़ मत है। और क्षय रोग तो उसके घर के निकट आने से घबरायेगा क्योंकि श्रुति का आदेश है:-

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैन शपथको अश्नुते।

यं मेषजस्यं गुग्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते।।

विष्वश्चस्तस्माद् यक्ष्मा मृगाद्रश्या द्रवेरते ।। आदि

अथर्व0 का 19 सू0 38 मं0 1.2

अर्थ-जिसके शरीर को रोग नाशक गूगल का उत्तम गन्ध व्यापता है उसको राज-यक्ष्मा की रोग पीड़ा नहीं होती। दूसरे का शपथ भी नहीं लगता। उससे सब प्रकार के यक्ष्मा-रोग शीघ्रगामी हरिणों के सम्मान काँपते हैं, डर कर भागते हैं।


यज्ञ की रोग निवारक शक्ति

(लेखक-श्री रामनाथ वेदालंकार, एम.ए. कागड़ी विश्वविद्यालय)

यज्ञ भारतीय संस्कृति के तिधारभूत तत्वों में से एक है, अथवा यह कहना अधिक ठीक है कि यज्ञ भारतीय संस्कृति का प्राण है। आर्य मानव जब माता के गर्भ में होता है तभी वह यज्ञ द्वारा संस्कृत होना प्रारम्भ हो जाता है, यज्ञ के वातावरण में ही वह जन्म लेता है, यज्ञ द्वारा ही पालित-पोषित होता है, यज्ञ में ही अपना समग्र जीवन व्यतीत करता है और अन्त में यज्ञ द्वारा ही अपनी इहलोक लीला को समाप्त करता है। जीवन में उसे दैनिक, अग्निहोत्र, पंचयज्ञ, षोडश संस्कार तथा अन्य कई श्रोत यज्ञ तो करने होते हैं, पर शास्त्रकारों ने यहाँ तक कहा है कि वह अपने सम्पूर्ण जीवन को ही यज्ञ रूप समझे। छांदोग्य उपनिषद् में लिखा है-“पुरुषों वाव यज्ञः।3।16।।”-मनुष्य का जीवन एक यज्ञ हैं। उसकी आयु के जो प्रथम चौबीस वर्ष है व मानों प्रातः सवन हैं, अगले चौबीस वर्ष माध्यन्दिन सवन है, अगले अड़तालीस वर्ष तृतीय सवन हैं इस प्रकार वह 116 वर्ष चलने वाला यज्ञ है। मनुष्य को चाहिए कि इसे मध्य में ही अधिक-आधि व्याधियों से खण्डित न होने दे।

भारतीय विचार धारा के रोम रोम में ओतप्रोत यह यज्ञ दो दृष्टियों से अपनी महत्ता रखता है एक तो भावना की दृष्टि से दूसरे बाह्य लाभों की दृष्टि से। भावना की दृष्टि से यज्ञ मनुष्य के अन्दर, त्याग, समर्पण, परोपकार, ऊर्ध्वगामिता, आन्तरिक शत्रुओं का दमन, तेजस्विता, देवपूजा, शान्ति, संगठन आदि भावनाओं को उद्वुद्ध करता है। वाह्य लाभों की दृष्टि से यह वायुमंडल को शुद्ध करता है और रोगों तथा महामारियों को दूर करता है। हमारे प्राचीन ऋषि−मुनियों ने यज्ञ को ऐसा वैज्ञानिक सूक्ष्म अध्ययन किया था कि वे प्राकृतिक रूप से वर्षा न होने पर दृष्टि यज्ञ द्वारा वर्षा करा लिया करते थे। वे खेतों में खड़ी हुई फसल से कीड़े लग जाने पर उनके विनाश के लिये भी यज्ञ का प्रयोग करते थे, और यज्ञीय धूम दाग पौधों को खाद भी देते थे। किसी स्त्री के सन्तान न होने पर पुत्रेष्टियज्ञ द्वारा वे उसे सन्तान प्राप्त करा सकते थे। ये सब यज्ञ के वाह्य लाभ कहे जा सकते हैं। प्रस्तुत लेख में हम इनमें से केवल एक लाभ ‘यज्ञ द्वारा रोग निवारण’ पर मुख्यतः वैदिक दृष्टि से विचार करेंगे।

रोगोत्पादक कृमियों का विनाश

अथर्ववेद 1 2/31, 32, 4.37, 5/23, 29 में अनेक प्रकार के रोगोत्पादक कृमियों का वर्णन आता है। वहाँ इन्हें यातुधान, क्रब्यात, पिशाच, रक्षः आदि नामों से स्मरण किया गया है। ये श्वासवायु, भोजन, जल आदि द्वारा मनुष्य के शरीर में प्रविष्ट होकर या मनुष्य को काट कर उसके शरीर में रोग उत्पन्न करके उसे यातना पहुँचाते हैं, अतः ये ‘यातुधान’ है। शरीर के माँस को खा जाने के कारण ये ‘क्रव्यात्’ या ‘पिशाच’ कहलाते हैं। इनमें मनुष्य को अपनी रक्षा करना आवश्यक होता है इसलिए ये ‘रक्षः’ या ‘राक्षस’ है। यज्ञ द्वारा अग्नि में कृमि विनाशक औषधियों की आहुति देकर इन रोगकृमियों को विनष्ट कर रोगों से बचाया जा सकता है अथर्व 118 में कहा है-

इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिवावाहत्।

य इदं स्त्री पुमानकः इह स म्तुवताँ जनः ।।1।।

यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गृहा सतामन्त्रिणाँ जातवेदः।

ताँस्त्व ब्राह्मणा वावधानों जह्येषाँ शततर्हमग्ने ।।4।।

“अग्नि में डाली हुई यह हवि रोगकृमियों को उसी प्रकार दूर बहा ले जाती है जिस प्रकार नदी पानी के झागों को। जो कोई स्त्री या पुरुष इस यज्ञ को करे उसे चाहिए कि वह हवि डालने के साथ मन्त्रोच्चारण द्वारा अग्नि का स्तवग्न भी करे। हे प्रकाशक अग्नि! गुप्त से गुप्त स्थानों छिपे बैठे हुये भक्षक रोग कृमियों के जन्मों को तू जानता है। वेदमन्त्रों के साथ बढ़ता हुआ तू उन रोगकृमियों को सैकड़ों वधों का पात्र बना।”

इस वर्णन से स्पष्ट है कि मकान के अन्धकारपूर्ण कोनों में, सन्दूक पीपे आदि सामान के पीछे, दीवार की दरारों में एक गुप्त से गुप्त स्थानों में जो रोगकृमि छिपे बैठे रहते हैं वे कृमिहर औषधियों के यज्ञीय धूम से विनष्ट हो जाते हैं।

अथर्व- 5।29 से इस विषय पर और भी अच्छा प्रकाश पढ़ता है।

अक्ष्यौ निविध्य हृदयं निविध्य जिह्वा वितृन्द्धि प्रदशातो मृणीहि। पिसाचो अस्य यतमो जघास -अग्ने यविष्ठ प्रति तं शृणीहि !!4!!

“हे यज्ञाने! जिस माँस भक्षक रोगकृमि ने इस मनुष्य को अपना ग्रास बनाया है उसे तू विनष्ट करे दे। उसकी आंखें फोड़ दे, हृदय चीर दे, जीभ काट दे, दाँत तोड़ दे।”

आमे सुपक्ते शक्ले विपक्वे यो मा पिशाचो अशने ददम्भ। तदात्मना प्रज्यः पिशाचा, वियातयन्तामगदो ऽ यमस्तु!! क्षीरे मा मन्थे यतमो वदम्भ- अकृष्टपच्ये अशने धान्ये यः0 ।। अपाँ मा पाने यतमो वदम्भ- कृव्याद् यातूनां शवने शयानम्! दिवा मा नक्तं यतमो ददम्भ, कव्याद् यातूनाँ शयने शयानम्! तदात्मना प्रजया पिशाचा, वियातयन्तामगदोऽयमस्तु।। अथर्व. 5।29।6-9

“कच्चे, पक्के, अधपके या तले हुए भोजन में प्रविष्ट होकर जिस माँस भक्षक रोगकृमियों ने इस मनुष्य को हानि पहुँचायी है वे सब रोगकृमि हे यज्ञाग्ने! तेरे द्वारा सन्तति सहित विनष्ट हो जायें, जिससे कि यह नीरोग हो। दूध में, मठे में, बिना खेती के पैदा हुए जंगली धान्य में, कृषिजन्य धान्य में, पानी में, बिस्तर पर सोते हुए दिन में या रात में जिन रोगकृमियों ने इसे हानि पहुंचायी है वे सब है यज्ञाग्ने! तेरे द्वारा सन्तति सहित विनष्ट हो जायें, जिससे कि यह हमारा साथी नीरोग हो।”

इन मन्त्रों से ज्ञात होता है कि जिस प्रकार बाहर गुप्त स्थानों में छिपे हुए रोगकृमि यज्ञ द्वारा विनष्ट हो सकते हैं उसी प्रकार दूध, पानी, अन्न, वायु आदि को माध्यम से शरीर के अन्दर पहुंचे हुए रोग कृमि भी नष्ट हो सकते हैं और शरीर स्वस्थ हो सकता है।

ज्वर चिकित्सा।

यज्ञाग्नि द्वारा ज्वर तथा ज्वर के सहकारी फास, शिर पीड़ा अंगों का टूटना आदि भी दूर हो सकते हैं यह अथर्व0 1/12 तथा 5.22 सूत्रों से ज्ञात होता है।

अंगे अंगे शोचिषा शिश्रियाराम्, नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम। अंकान्त्समंकान् हविषा विधेम, यो अग्रभीत् पर्वास्या ग्रभीता।।

अथर्व0 1/12/2

“हे ज्वर! अंग अंग में ताप के साथ व्याप्त हुए तेरा हम हवि के द्वारा प्रतिकार करते हैं। अंगों को जकड़ने वाले जिस ज्वर ने इस रोगी के अंगों को जकड़ लिया है उसके लिए हवि के द्वारा हम पाशों को तैयार करते हैं।

मुँच शीर्षक्त्या उत कास एवं,

परुष्परुराविवेषा यो अस्य।

यो अग्रजा वातज्ञा यश्च शुष्मो,

वनस्पतीन्त्सवताँ पर्वताँश्च।।

अथर्व0 1/12/3

“हे सूर्य! हवि के साथ मिलकर तू इस रोगी की शिरः पीड़ा से मुक्त कर, जो इसे खाँसी ने सताया हुआ है उससे इसे छुड़ा। जो श्लेष्मजन्य, वातजन्य या पित्तजन्य ज्वर इसके अंग अंग में व्याप्त हो गया है वह शरीर से निकलकर वृक्षों और पर्वतों से टक्कर खाता फिरे।”

अग्निस्तक्मानमपबाधतामितः

सोमो ग्रावा वरुणः पूतदक्षाः।

वेदिर्वहिः समिघः शोशुचाना

अपद्वेषासयमुया भवन्तु।।

अयं यो विश्वान् हरितान्,

अधाहि कक्मन्नरसो हि भूँया,

अघान्यडन्डधराँग वा परेहि।।

अथर्व0 ।22।12

“ यज्ञाग्नि यहाँ से ज्वर को दूर भगा दें। सोमरस यज्ञीय सिल-बट्टे, पवित्र बल को देने वाला सूर्य, वेदि, कुशा, प्रज्ज्वलित समिधाएं ये समस्त यज्ञाँग ज्वर निवारण में सहायक हो। इस विधि से द्वेषकारी सब ज्वरजन्य उपद्रव दूर हो जायें। हे ज्वर! जो तू अपने ताप से तप्त करता हुआ, पीड़ित करता हुआ सबके पीले शरीर वाला कर देता है वह तू यज्ञाग्नि द्वारा निर्वीर्य हो जा, शरीर से बाहर निकल जा।”

यत् त्वं शातोऽथो रुरः सह कासाऽवेपयः।

भीमास्ते तक्मन् हेतयस्ताभिः स्म परिवृडग्घि नः।।

तृतीयकं वितृताँयं सदन्दिमुत शारदन्।

तक्मानं शीतं रुरं ग्रीष्मं नाशय वार्षिकम्।।

अथर्व 5/22/10, 13।

“हे ज्वर! जो तू शीत रूप है या उष्ण रूप है, खाँसी से प्रकम्पित करता है, तेरे ये सब हथियार बड़े भयानक है उनसे तू हमें बचाये रख। हे यज्ञाग्ने! जो तीसरे दिन चढ़ने वाला, चौथे दिन चढ़ने वाला प्रतिदिन चढ़ने वाला, प्रतिदिन चढ़ने वाला, ग्रीष्म में होने वाला, वर्षा में होने वाला शीत या उष्ण ज्वर है उसे तू नष्ट कर”

उन्माद चिकित्सा

अथर्व0 6/111 में यज्ञाग्नि द्वारा उन्माद रोग की चिकित्सा का वर्णन मिलता है।

इगं में अग्ने पुरुषं मुमग्धि- भयं यो बद्वः सुमतो लालपीति। अतोऽधि ते कृरावद् भागधेयं, यदा ऽ नुन्मदितो ऽ सति।।1।।

“हे यज्ञाग्ने! यह जो उन्माद रोग से ग्रस्त पुरुष कर कर वेधा हुआ असंबद्ध प्रलाप कर रहा है उसे तू इस रोग से मुक्त करे दे। जब वह तेरी कृपा से इस रोग से छूट जाये तब भी वह तुझे तेरा हविर्भाग प्रदान करता रहे, जिसके कि फिर कभी उन्मत्त न हो।”

अग्निष्ट निशमयत यदि ते मन उद्युतम्। कृणोमि विद्वान भेषजं यथानुन्यदितोऽसति।।2।।

“ हे मनुष्य! यदि उन्माद के कारण तेरा मन उद्दीप्त हो गया है, तो यज्ञ चिकित्सा को जानने वाला मैं तेरा इलाज करता हूँ, जिससे कि तू उन्माद रहित हो जाये।”

इन मन्त्रों से यह ज्ञात होता है कि यदि कोई मनुष्य उन्मत्त हो जाये उसकी अवस्था ऐसी बिगड़ जाये कि वह असंबद्ध बातें बोलता रहे, काटने-मारने को दौड़ता हो, यहाँ तक कि उसे रस्सी से बाँध कर रखने की आवश्यकता पड़े, तो उस हालत ये’ भी वह यज्ञ चिकित्सा से स्वस्थ हो सकता है, यज्ञाग्नि में डाली हुई औषधियों की सुगन्ध उसके विकृत मस्तिष्क और उत्तेजित मन को ठीक कर सकती है। जो एकबार उन्माद रोग से ग्रस्त हो चुका होता है। उसके लिए आगे भी यह भय रहता है कि कहीं फिर उन्मत्त न हो जायें। पर यहाँ वेद ने यह उपाय बताया है कि ठीक होने के पश्चात यदि वह इस रोग के लिए हितकर औषधियों से नियमपूर्वक यज्ञ करता रहे तो भविष्य में फिर कमी इस रोग से ग्रस्त नहीं होगा।

गण्डमाला चिकित्सा

अथर्व 6/83 में गण्डमाला की चिकित्सा का वर्णन है। वहाँ सूर्य और चन्द्रमा की किरणों के सेवन तथा यज्ञाग्नि की आहुति द्वारा यह रोग दूर हो सकता है ऐसा कहा गया है।

अपचितः म पतत सुपर्णो वसतेरिव। सूर्यः कणोंत भेषजं चन्द्रमा वो ऽ पोच्छतु।। एन्येका श्येनयेका कष्णौका रोहणी द्वे। सर्वासमग्म नाम-भवीरघ्ननीरपेतन।। असूतिका रामायशी अपचित् प्र पतिष्यति। गलैरितः प्र पतिष्यति स गलुन्तो निशिष्यति।। बीहि स्वामाहुस्ति जुबाराणो मनसा स्वाहा मनसा यदिदं जुहोमि।।1-4।।

“हे गण्डमाला की ग्रन्थियों! तुम इस रोगी के शरीर से निकल कर उड़ जाओ, जैसे बाज पक्षी अपने घोंसले से उड़ता है। सूर्य तुम्हारी चिकित्सा करे, चन्द्रमा तुम्हें दूर भगा दे। तुममें से एक कुछ कुछ लाल श्वेत वर्ण वाली है, एक काली है, दो लाल है। एक-एक करके तुम सबका मैं नाम लेता हूँ। इस वीर पुरुष का संहार न करती हुई तुम इसके शरीर से दूर हो जाओ। हे रोगी! तू विश्वास रख, जिससे अभी पूर्णासूख होना आरम्भ नहीं हुआ हे ऐसी तेरी यह गण्डमाला ग्रन्थि निश्चय ही गिर जायेगी। हे रोगी ! तू मनोयोग के साथ इस आहुति का सेवन कर, जिसे में मनोयोग पूर्वक यज्ञाग्नि में डाल रहा हूँ।

इस वर्णन से स्पष्ट है कि गण्डमाला का रोगी यदि गण्डमाला ग्रंथियों पर विशेष औषधियों का यज्ञ धूप ले- तो वे ग्रन्थियाँ नष्ट हो सकती हैं। साथ में सूर्य किरणों और चन्द्र किरणों का सेवन भी सहायक चिकित्सा के रूप में करना चाहिए ।

अथर्व 7/74 में भी गण्डमाला की चिकित्सा का वर्णन करते हुए अन्तिम मन्त्र में यज्ञाग्नि को स्मरण किया है।

व्रतेन त्वं व्रतपते समक्तो, विश्वाहा सुमना दीदिहीह। तं त्वा वयं जातवेदः समिद्वं, प्रआवन्त उपसदेम सर्वे ।।4।।

“हे व्रतपते जात वेदः यज्ञाग्ने! रोगनिवारण आदि व्रतों से युक्त तू प्रति दिन हमारे घरों में प्रज्वलित होता रहा। हम समिधाओं से प्रज्वलित तेरे समीप सब परिजनों सहित बैठा करें।”

क्षयरोग या राजयक्ष्मा की चिकित्सा

अन्य रोगों की तो गणना ही क्या, यज्ञ द्वारा राजयक्ष्मा की भी चिकित्सा हो सकती है, यह वैदिक संदर्भों से प्रकट होता है। सर्वप्रथम हम अथर्व 7/76 का प्रसंग लेते हैं।

यः कीकसाः प्रशणाति तलीद्यमवतिष्ठति। निर्हास्तं सर्व जायान्यं यः कश्च ककुदि श्रितः।।3।। पक्षी जायान्यः पतित स आविशति पूरुषम्। तदक्षितस्य भेषजमुभयोः सुक्षितस्य च।।4।। विगृह वै ते जायन्य जानं यतो जायान्य जाय से। कथं ह तत्र त्वं हनो यस्य कृन्मो हविर्गृहे।।5।।

जो क्षयरोग पसलियों को तोड़ डालता है, फेफड़ों में जाकर बैठ जाता है, पृष्ठ वंश के उपरि भाग में स्थित हो जाता है उस अतिस्त्रीप्रसंग से उत्पन्न होने वाले क्षयरोग को हे यज्ञीय हवि! तू शरीर से बाहर निकाल दें। पक्षी की भाँति उड़ने वाला अर्थात् छूत द्वारा फैलने वाला यह रोग एक से दूसरे पुरुष में प्रविष्ट हो जाता है। चाहे उसने जड़ जमा ली हो, चाहे जड़ न जमायी हो, हवि चिकित्सा दोनों की ही उत्तम चिकित्सा है। हे अतिस्त्रीप्रसंग से उत्पन्न होने वाले क्षय रोग! हम तेरे उत्पादक कारणों को जानते हैं पर जिस पुरुष के घर में हवन करते हैं उसे तू कैसे मार सकता है।

इन मन्त्रों से क्षयरोग के निवारण में यज्ञ-हवन की महत्ता स्पष्ट है। इस विषय पर अथर्ववेद (3/11,20/96) तथा ऋग्वेद (10/161) के कुछ अन्य मन्त्र और भी अच्छा प्रकाश डालते हैं। यज्ञ चिकित्सा करने वाला वैद्य कहता है-

मुंचामित्वा हविषा जीवनाय कम् अज्ञाततक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्। ग्राहिर्जग्राह यदि व तैदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्रमुमुक्तमेनम्।।

“हे रोगी! चाहे तेरे शरीर में क्षयरोग अज्ञात अवस्था में है, चाहे प्रकट अवस्था में है, हवि द्वारा मैं तुझे उसे रोग से मुक्त कर दूँगा जिससे कि तू चिरकाल तक जीवित रहे। हे! वायु और अग्नि! यदि वह रोगी पूरी तरह से क्षयरोग की पकड़ में आ गया है तो भी तुम इसे उससे छुड़ा दो।”

यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव। तमाहरामि निऋतेरुपस्थाद् अस्पार्षमनं शतशारदाय।।

“यदि इसकी आयु क्षीण हो चुकी है, यदि यह निराश हो चुका है, यदि यह मृत्यु की गोद से लौटा लाता हूँ। मैंने इसे सौ वर्ष जीने के लिए बल प्रदान कर दिया है।”

सहस्राक्षेण शनशारदेन शतायुषा हविषाऽऽहार्षमेनम्। शत यथेमं शरदो नयाति इन्द्रो विश्वस्य दुरितस्य पारम्।।

“इन्द्रियों को सहस्रगुणित शक्ति देने वाली, सौ शरद् ऋतुएं निर्विघ्न पार कराने वाली सौ वर्ष की आयु देने वाली हवि के द्वारा मैं इस पुरुष को क्षयरोग के चंगुल से छुड़ा लाया हूँ, जिससे कि आगे भी (हर्विगन्ध से युक्त) वायु सौ वर्षों तक इसे सब रोग कष्टों से पार करता रहे।”

शत जीव शरदो वर्धमान शतं हेमन्तान्छतमुवसन्तान्। शतमिन्दाग्नि सविता वृहस्पतिः्र शयायुषा हविषेमं पुनर्दः।।

“ हे हवि चिकित्सा द्वारा क्षय रोग से आरोग्य लाभ किये हुए मनुष्य! तू दिनोंदिन बढ़ता हुआ सौ शरदों तक, सौ हेमन्तों तक और सौ बसन्तों तक जीवित रहा। वायु, अग्नि सूर्य और बृहस्पति पर्जन्य ने सौ वर्ष की आयु देने वाली हवि की सहायता से पुनः तुझे सौ वर्ष की आयु प्राप्त करा दी है।”

इन मन्त्रों से स्पष्ट है कि क्षयरोग चाहे प्रारम्भिक अवस्था में हो चाहे बहुत बढ़ गया हो, यहाँ तक कि उसके कारण रोगी बिल्कुल मरणासन्न हो गया हो, तो भी हवि चिकित्सा के द्वारा वह ठीक हो सकता है, और रोगी स्वस्थ होकर सौ वर्ष तक जीने योग्य हो सकता है। परन्तु हवि चिकित्सा के साथ साथ शुद्ध वायु सेवन सूर्यकिरणस्नान, शुद्ध जल का प्रयोग आदि हो तभी हवि चिकित्सा लाभदायक होती है यह भी प्रकट है।

गर्भ दोष-निवारण

ऋग्वेद में अगले ही सूक्त (10/162) में यज्ञाग्नि द्वारा गर्भदोषों के निवारण का उल्लेख किया गया है, यह प्रकरण अथर्ववेद (20/96) में भी है।

ब्रह्मणाग्निः संविदानो रक्षोहा बाधतामितः।

अमीवा यस्ते गर्भ दुरार्णामा योनिमाशयं।।

“ हे नारी! जो तेरे गर्भ या योनि के अन्दर बुरे नाम वाला रोग या रोगकृमि प्रविष्ट हो गया हे उसे वेदमन्त्रों से युक्त कृमि विनाशक यज्ञाग्नि वहाँ से निकाल देवे।”

यस्ते गर्भ ममीवा दुर्णामा योनिमाशये। अग्निष्ट ब्रह्मणा सह निष्कव्यादमनीनशत्

“जो तेरे गर्भ या योनि में बुरे नाम वाला रोगकृमि प्रविष्ट हो गया है उस माँस भक्षक कृमि को वेदमन्त्रों के साथ प्रयुक्त यज्ञाग्नि नष्ट कर देवें।”

यस्ते वस्ते जिघाँसति निषत्म्नुँ यः सरीसृपम्। जातं यस्ते जिघाँसति तनित्तों नाशयामसि।।

“जो रोग या रोगकृमि तेरे गर्भाशय में जाते हुए वीर्य की उत्पादक-शक्ति को नष्ट करता है, जो अन्दर स्थित हुए गर्भ की हत्या करता है, जो गर्भाशय से बाहर आते हुए चंचल गर्भ की हत्या करता है, जो पैदा हुए शिशु की हत्या करता है उसे हम यज्ञाग्नि द्वारा विनष्ट कर देते हैं।

इन मन्त्रों से यह द्योतित होता है कि यज्ञ-हवन द्वारा अनेक प्रकार के गर्भदोष भी दूर हो सकते हैं। जिन स्त्रियों में गर्भ ठहरने ही नहीं पाता, या ठहरने के वाद दो -चार महीनों में गिर जाता है, या पूरे नौ-दस महीने की अवधि तक स्थिर रह कर भी प्रसव ठीक नहीं हो पाता, या प्रसव हो भी जाये तो शिशु ऐसा रोगक्रान्त पैदा होता है कि शीघ्र ही मर जाता है, ऐसी स्त्रियाँ हवि चिकित्सा से लाभ प्राप्त कर सकती है ऐसा वेद का आशय है।

प्रसूतकर्म आसानी से हो जाने के लिए भी किन्हीं विशेष औषधियों की यज्ञीय सुगन्ध उपयोगी हो सकती है। यह अथर्व 1/111 के निम्न मन्त्र से प्रकट होता है-

वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतौ-अर्यमा होता कृणेतु वेधाः। सिसुताँ नारी-ऋतप्रजात, वि पर्वाणि जिहताँ सूतवाउ।।

‘हे पोषक गृहपते! इस प्रसव के समय रोग-शत्रुओं का नियमन करने वाला अर्यमा, (अरीन् नियच्छति। निरुक्त 11।33) यज्ञ का विधाता (वेधाः होमनिष्पादक होता तेरे लिए अग्नि में हवि डालता हुआ वषट्कार करे। नारी बाहर की ओर किनछे और अपने अंगों को ढीला छोड़ दे, जिससे कि आसानी से प्रसूति हो जाये।”

अन्य रोगों का निवारण

अब तक हमने ऐसे मन्त्र प्रस्तुत किये है जिनमें यज्ञ द्वारा किन्हीं विशेष रोगों के विनाश होने का वर्णन है। अब कुछ ऐसे मंत्र उद्धृत करेंगे जिनमें किसी विशेष रोग का नाम न लेकर सामान्य रूप से यह कहा गया है कि यज्ञाग्नि से रोग दूर होते हैं।

यथा वृत्र इमा आपस्तस्तम्भ विश्वधा यतीः।

एवा ते अग्निना यक्ष्मं वंश्वानरेण नारये।।

अथर्व0 6।85।3

जिस प्रकार वृत्र मेघत्र चारों ओर जाने वाले जलों की गति को रोक देता है, उसी प्रकार हे रोगी! सर्व जन हितकारी यज्ञाग्नि के द्वारा मैं तेरे रोग को निवारण कर देता हूँ।”

आ ते प्राणं सुवामसि परा यक्ष्म सुवामि ते।

आयुनो विश्वतो दधदयमग्निर्वरेण्य।।

अथर्व 7।53।6

“हे रोगी! तेरे अन्दर हम प्राण को प्रेरित करते हैं, तेरे रोग को दूर कर देते हैं। यह वरणीय और श्रेष्ठ यज्ञाग्नि हम सबको सर्वत्र दीर्घायुष्य प्रदान करें।”

अनाधृष्यो जातवेदा अमर्त्यो

विगडग्ने क्षत्रभृद दीदिहीह।

विश्वा अमीवाः प्रमुंचन् माुनषीभिः

शिवाभिरद्य परिपाहि नो गयम्।।

अथर्व 784।1

“हे यज्ञाग्ने! तू अनाघृष्य अर्थात् रोगादि शत्रुओं से अपराजेय है, तू उत्पन्न पदार्थों का प्रकाशक है, तू अमर, तेजस्वी और बलधारक होता हुआ हमारे घरों में प्रज्वलित हो। सकल रोगों को छुड़ाता हुआ मनुष्य का कल्याण करने वाली रक्षा से हमारे घर की भली प्रकार रक्षा कर।”

कविमग्निमुपस्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे।

देवममीवचातनम्।।

ऋग्वेद 1।12।7

“हे मनुष्य! जो यज्ञाग्नि मेधावी के तुल्य सत्य धर्मों वाला, देदीप्यमान और रोगों को नष्ट करने वाला है उसका तू यज्ञ में स्तवन कर।”

घृतस्य जूतिः समना सदेवा

संवत्सरं हविषा वर्धयन्ता।

श्रोत्र चक्षुः प्राणोऽच्छिन्नो नो अस्तु-

अच्छिन्ना वयमायुषो वर्चम।।

अथर्व0 19।58।1

“मनोयोग के साथ और चक्षु, वाक् आदि इन्द्रिय देवों के व्यापार के साथ अग्नि में डाली हुई घृत की धारा अन्य औषधियों की हवि के साथ वर्ष भर हमें बढ़ाती रहे। हमारे श्रोत्र, चक्षु, प्राण रोगादि से छिन्न न होवें, हम आयु और तेज से छिन्न न होवें।”

स घा यस्ते ददाशति समिधा जातवेद से। सो अग्ने धत्ते सुवीर्यं स पुष्यति।। ऋग्0 3।10।3

हे यज्ञाग्ने! जो मनुष्य तुझपे विभिन्न औषधियों की समिधाओं का आधान करता है उसे बल प्राप्त होता है, वह परिपुष्ट होता है।”

इन तथा इसी प्रकार के अन्य अनेक मन्त्रों से यह स्पष्ट है कि विभिन्न औषधि-वनस्पतियों के समित् पत्र पुष्प-फल-मूल निर्यास आदि की हवि से मनुष्य बल, पोषण, रोग निरोधक शक्ति प्राप्त कर सकता है और प्राप्त तथा अप्राप्त विविध रोगों से बच कर दीर्घायुष्य पा सकता है।

यज्ञ द्वारा रोग निवारण की प्रक्रिया

अब हम यह देखेंगे कि यज्ञ द्वारा राग निवारण कैसे होता है। जब हम यज्ञाग्नि में घृत, अन्न, औषधियों आदि की आहुति देते हैं तब उनकी रोग निवारक गन्ध वायुमण्डल में फैल जाती है। उस वायु को श्वास द्वारा हम अपने फेफड़ों में भरते हैं। वहाँ उस वायु का रक्त से सीधा संपर्क होता है। वह वायु अपने विद्यमान रोग निवारक परमाणुओं को रक्त में पहुँचा देती है। उससे रक्त में जो रोगकृमि होते हैं वे मर जाते हैं। रक्त के अनेक दोष वायु में आ जाते हैं और जब हम वायु को बाहर निकालते हैं तब उसके साथ वे दोष भी हमारे शरीर से बाहर निकल जाते हैं। इस प्रकार यज्ञ द्वारा संस्कृत वायु में बार-बार श्वास लेने से शनैः शनैः रोगी स्वस्थ हो जाता है। इसी प्रक्रिया को वेद में निम्न शब्दों में दर्शाया गया है-

द्वाविमौ वातौ वात आ सिन्धोरा परावतः।

दक्षं ते अन्य आ वातु परान्यो वातुँ यद्रपः।।

आ वात वाहि भेषजं वि बात वाहि यद् रपः।

त्वं हि विश्वभेषजो देवानाँ दूत ईयसे।।

-ऋग्0 10।137।2,3 अथर्व0 4।13।2,3

“ ये श्वास-निःश्वास रूपी दो वायु चलती हैं, एक बाहर के वायुमण्डल से फेफड़ों के रक्त समुद्र तक, और दूसरी फेफड़ों से बाहर के वायुमण्डल तक। इनमें से पहली हे रोगी! तुझे रोग निवारक बल प्राप्त कराये, दूसरी रक्त में जो दोष है उसे अपने साथ बाहर ले जाये। हे वायु! तू अपने साथ औषध को ला। हे वायु! तू रक्त में जो मल है उसे बाहर निकाल। तू सब रोगों की दवा है, तू देवों का दूत होकर विचरता है। ”

वात आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नो हृदे। प्रण आयूषि तारिषत्।। उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा। स नो जीवातवे कृधि।। यददो वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः। ततो नो देहि जीवसे।। ऋग्वेद 10।186।1-3

“वायु हमारे शरीर के अन्दर औषध को ले जाये, जो कि हमारे हृदय के लिए शान्तिकर और सुखकर हो। हमारी आयु को बढ़ाये। हे वायु! तू हमारा पितृतुल्य, भ्रातृतुल्य और मित्रतुल्य है, वह तू हमें जीवन प्रदान कर। हे वायु! जो तेरे घर में अमृतमय औषध का भण्डार निहित है, उसमें से कुछ अंश हमें भी प्रदान कर, जिसमें कि हम चिरंजीवी हो।”

आयुर्वेदिक ग्रन्थों का प्रमाण

यज्ञों द्वारा रोग निवारण का वर्णन आयुर्वेद के ग्रन्थों में भी मिलता है। महर्षि चरक क्षयरोग की चिकित्सा के प्रकरण में कहते है-

यया प्रयुक्तया चेष्टया राजयक्ष्मा पुराजितः।

तं वेदविहितामिष्मारठोग्यार्थी प्रयोजयेत्।।

-चरक। चिकित्सास्थान ।8।122

अर्थात् प्राचीन काल में जिन यज्ञों के प्रयोग से राजयक्ष्मा को जीता जाता था, आरोग्य चाहने वाले मनुष्य को चाहिए कि उन वेद विहित यज्ञों का अनुष्ठान करलें।

आयुर्वेद में विभिन्न ग्रंथों में ऐसे अनेक प्रयोग लिखे है जिनमें अग्नि में औषधियाँ डालकर उनकी धूनी लेने से रोगों को दूर करने का वर्णन है। इन्हें भी यज्ञ चिकित्सा का ही रूप समझा जा सकता है। उदाहरण के लिए हम कुछ प्रयोग नीचे देते हैं।

अगुरुघनसारसल्लककररुहनतनीरचनदनैर्युक्तः।

सर्जरसेन समेतो धूपों रुग्दाहकं हन्ति।।

(बृह्मत्रिघण्टु 0)

अगर, कपूर, लोबान, नखी, तगर, सुगन्धबाला, चन्दन और राल इनकी धूप देने से दाह शान्त होता है।

अश्वगन्धोऽय निर्गुन्डी वृहती पिप्पलीफलम्।

धूपोऽयं स्पर्शमात्रेण ह्यर्शसाँ शमने ह्यलम्।।

(वृ0नि0र0)

असगन्ध निर्गुन्डी, बड़ी कटेली, पीपल-इनकी धूप से बवासीर की पीड़ा शान्त होती है।

शिग्रुपल्लवनिर्यासःसुपिष्टस्ताम्रसम्पुटे।

घृतेन धूपितों हन्ति शोथघर्षाश्रु वेदनः।। (वंगसेन)

सहंजने के पत्तों के रस को ताम्रपत्र में डालकर ताँबे की मूसली से घोटे और उसे घी में मिला लें। इसकी धूप देने से आँखों की पीड़ा, अश्रु स्राव, किरकिराहट और शोथ का नाश होता है।

काकुभकुसुमविडंग लाडंगलिभंल्लातक तथोशीरम्। श्रीवेष्टकसर्जरसं चन्दनमथ कुष्ठमष्टमं दद्यात्।। एष सुगन्धो धूपः सकृत् कृमीणा विनाशकः प्रोक्तः। शय्यासु मष्कुणानाँ शिरसि च गात्रेसु यूकानाम्।। (योगरत्नाकर)

अर्जुन के फूल, वायडिग, कलियारी की जड़ मिलावा, खस, धूप सरल, राल, चन्दन और कूठ समान भाग लेकर बारीक कूट लें। इसकी धूप से कृमि नष्ट हो जाते हैं। यदि खाट को इसकी धूप दी जाये तो खटमलों का और शिर तथा अंगों को दी जाये तो जुओं का विनाश होता है।

कामका चीफलैकेन घृतयुक्तेन बुद्धिमान।

धूपयेत् पिल्लरोगार्ते पतन्ति कृमयोऽनिरात्।।

-गदनिग्रह)

मकोय के एक फल को घृत लगाकर उसे आग पर डालकर आँख में उसकी धूनी देने से तुरन्त आँख से कृमि निकल कर पिल्ल रोग नष्ट हो जाता है।

निम्बपत्रं वचा कुष्ठं पथ्या सिद्धार्थकं घृतम्।

विषयज्वरनाशाय गुग्गुलुश्चेति घूपनम्।।

(वृ0नि0 र0)

नीम के पत्ते, बच कूठ, हर्र, सफेद सरसों और गूगल के चूर्ण को घी में मिलाकर उसकी धूप देने से विषम ज्वर नष्ट होता है।

निम्बपत्रवचाहिडंगूसपिर्लवण्सासर्पपैः।

धूपन कृमिरक्षोध्नं ब्रणकण्डुरुजापहम्।।

(वृ0नि0र0)

नीम के पत्ते, बच, हींग, सेंधा नमक और सरसों के संभाग मिश्रित चूर्ण को घी में मिलाकर उसकी धूप देने व्रण के कृमि, खाज और पीव नष्ट होती है।

इस प्रकार के अनेक प्रयोग आयुर्वेद के ग्रन्थों में है। प्राचीन आयुर्वेदिक आचार्यों ने ये परीक्षण किये थे। अनुसन्धान और परीक्षण से हम अन्य भी अनेक प्रयोगों का आविष्कार कर सकते हैं। परन्तु अग्नि में औषधियों के मिश्रण को डालने मात्र से जितना फल सम्भव है उससे शतगुणित फल यज्ञ द्वारा उस विधान को करने से प्राप्त हो सकता है। रोगी श्रद्धा के साथ मन, में पवित्र विचारों को लेकर यज्ञ में बैठता है वह मन से इस विश्वास को धारण किये हाता है कि इस यज्ञीय हवि से मेरा रोग अवश्य दूर होगा। चिकित्सक की भावना और उत्साह रोगी के हृदय में और आशा संचार कर देते हैं। मंत्र पाठ पूर्वक यज्ञ प्रारम्भ होता है। एक एक मंत्र के साथ स्वाहाकार पूर्वक अग्नि में हवि पड़ती है। मन्त्र का एक एक शब्द रोगी के हृदय पर असर करता है। थोड़े थोड़े अन्तर के पश्चात् प्रत्येक स्वाहाकार के साथ अग्नि से हवि र्घूम उठता है और श्वास वायु के साथ रोगी के अन्तस्तल को स्पर्श करता हुआ रोग को दूर भगाता है। यज्ञीय वातावरण की शान्ति और पवित्रता रोग कल्मष को दूर करने में सोने में सुगन्ध का काम करती है। यह सब लाभ यज्ञ विहीन शुष्क क्रिया द्वारा भला कहाँ सम्भव है।

उपसंहार

अस्तु शास्त्रीय प्रमाणों में यह प्रतिपादित करने या यत्न किया है कि यज्ञ द्वारा समस्त रोगों का निवारण सम्भव है। किस रोग में किन पदार्थों की हवि हितकर होगी इसका वैद्यविद्वन्मंडली को अधिकाधिक अनुसन्धान करना चाहिए। अथर्ववेद में गूगल, कुष्ठ, पिप्पली, पृश्निपर्णी, सहदेवी, लाक्षा, अजशृंगी आदि कतिपय औषधियों का माहात्म्य वर्णन मिला है। हवन सामग्री में गूगल का प्रयोग प्रायः किया जाता है। उसके विषय में अथर्व0 19।38 में कहा है-

न तं यक्ष्मा अरुन्धते नैनं शपथो अश्नुते। यं भेषजस्य गुग्गुलोः सुरभिर्गन्धो अश्नुते।।

अर्थात् जिस मनुष्य को गूगल औषध की उत्तम गन्ध प्राप्त होती है उसे रोग पीड़ित नहीं करते और अभिशाप या आक्रोश उसे नहीं घेरता।

यज्ञ द्वारा रोग निवारण शास्त्रकारों की कोरी कल्पना या उड़ान मात्र नहीं है। प्राचीनकाल में रोग फैलने के समयों में बड़े-बड़े यज्ञ किए जाते थे और जनता उनसे आरोग्य लाभ करती थी। इन्हें भैषज्य यज्ञ कहते थे। गोपथ ब्राह्मण में लिखा है-

भैषज्ययज्ञा वा एते यच्चातुर्मास्यानि।

तस्ताद् ऋतुसन्धिषु प्रयुजयन्ते।

ऋतुसन्धिषु वै व्याधिर्जायते।

गो0ब्रा0।उ01।19।

अर्थात् जो चातुर्मास्य यज्ञ है वे भैषज्य यज्ञ कहलाते हैं, क्योंकि रोगों को दूर करने के लिए होते हैं ये ऋतु सन्धियों में किये जाते हैं, क्योंकि ऋतु


अगला अंक भी ‘यज्ञ अंक

अखण्ड ज्योति के इस यज्ञ अंक के लिए अधिकारी विद्वानों के बड़े ही महत्वपूर्ण लेख बड़ी संख्या में आये हैं। पर अपनी नियत मर्यादा में पृष्ठ रखने के कारण उनमें से आधे में भी कम लेख इस अंक में आ सके है। इतने महत्वपूर्ण ज्ञान से पाठकों को वंचित रखना उचित प्रतीत नहीं होता। इसलिए अगला अंक भी जनवरी का अंक भी यज्ञ अंक ही होगा और उसमें लगभग पृष्ठ भी इतने ही होंगे।


यज्ञ द्वारा लोक कल्याण

(ले0-श्री डा0 सूर्यदेव शर्मा, शास्त्री, साहित्यालंकार, अजमेर)

“यज्” धातु से यज्ञ शब्द बनता है। “यज् देव पूजा संगतिकरण दानेषु” में यज्ञ की समीचीन व्याख्या आ जाती है। यज्ञ (1) देवपूजा को कहते हैं (2) संगतिकरण को कहते हैं (3) दान को कहते हैं। यदि इन तीनों अर्थों को सम्यक् रूपेण समझ लिया जाय तो यह स्वतः सिद्ध हो जायेगा कि यज्ञ द्वारा लोक कल्याण किस प्रकार संभव है। किस प्रकार यज्ञ मानवहित-सम्पादन का प्रमुख साधन है।

लोक कल्याण में प्रमुखतया कौन सी उन्नति समभिप्रेत है? यह प्रथम जान लेना आवश्यक है।

(1) मुख्यतः संसार के मानवगण तथा प्राणि मात्र का स्वास्थ्य सम्पादन लोक कल्याण का प्रथम अंग हैं अर्थात् मानवों के शारीरिक विकास तथा उन्नति का साधन यज्ञ है वा नहीं? यह हमें देखना है। इसके लिये हमें शास्त्रों के प्रमाण की आवश्यकता नहीं। हम सब जानते हैं कि होम करने में जो शुद्ध घृत और अनेक औषधि गुणकारी पदार्थ प्रयोग में लाये जाते हे वे किस प्रकार सूक्ष्म रूप धारण करके अग्नि तथा वायु के सहयोग से आकाश में विन्यस्त होते हैं। ऑक्सीजन के साथ मिलकर हमारे लिये श्वास प्रक्रिया के प्राणप्रद बनते हैं। यज्ञ से सुगन्धि समुद्भूत होती है और वह वायु मण्डल को शुद्ध करके अनेक रोग कीटाणुओं का विनाश करती हुई मानवों का स्वास्थ्य सम्पादन करने में बहुविध उपयोगी सिद्ध होती हैं।

(2) लोक कल्याण का द्वितीय अंग मानसिक स्वास्थ्य तथा हार्दिक प्रसन्नता को माना जाता है। या करने वाले महानुभावों को तो यह अनुभव होगा ही-अन्य लोग भी कर सकते हैं कि यज्ञ करते समय-होम करते अथवा परोपकार का कोई कार्य करते हुये मन को कितनी प्रसन्नता अनुभव होती है-हम नहीं जानते क्योंकि? लेकिन मनोविज्ञान वेत्ता यह जानते हैं कि बहूनुमोदित कार्य सम्पादन मानसिक प्रसन्नता वर्धन का कारण होता है और जब यज्ञकर्ता पढ़े-पढ़े उच्चारण करता जाता है ‘इदं देवाय इदंन मन, इदं भूताय इदंन मम।। तब उसकी अन्तरात्मा भी बोल उठती है कि यह यज्ञ मेरे लिये नहीं, लोक कल्याण के लिए है। इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य का सम्पादन यज्ञ का अनिवार्य फल है।

(3) लोक कल्याण का तृतीय अंग भौतिक उन्नति है। लोग कहते हैं कि विज्ञान के आविष्कारों से ही भौतिक उन्नति हुई है। वे भूल जाते हैं कि विज्ञान के आविष्कार जहाँ “निर्माणात्मक पक्ष” में भौतिक उन्नति के साधन हैं, वहाँ वे अपने “विनाशात्मक पक्ष” में परमाणु बम और हाइड्रोजन बम के रूप में कितने प्रलयंकारी सिद्ध होते है-6 अगस्त 1945 में जापान के मुख्य नगर हिरोशिमा पर गिरने वाले बम से आहत वही के निवासियों से पूछिये तब पता लगेगा। दूसरी ओर यज्ञ को लीजिये। आविष्कार क्या है? वे मानों एक प्रकार के यज्ञ ही हैं जिन्हें लैबोरेटरी रूपी यज्ञशाला में बैठे हुये वैज्ञानिक रूपी यजमान होता अपने यन्त्ररूपी कुँड में प्रतिदिन किया करते हैं, लेकिन यह हमारे यज्ञ ‘संगतिकरण” के रूप में-एक पदार्थ को दूसरे से मिलाने के अर्थ में विनाशात्मक और संहारात्मक न होकर कल्याणकारी ही होते हैं क्योंकि यज्ञ का अर्थ ही “दान”, परोपकार, लोक कल्याण ही है। यदि हम यज्ञशद्व का ‘संजतिकरण” के रूप में व्यापक अर्थ लेते हैं तो कलकत्ता विश्वविद्यालय में तथा अमेरिका को म्यूजरानी ओर न्यूयार्क की यूनीवर्सिटियों में हुये कृत्रिम वर्षा के आधुनिक परीक्षण भी तो एक प्रकार के यज्ञ ही है जिनमें (Silver Dioxide) को बर्फ के कणों के साथ “संगतिकरण” करके लोक कल्याण के लिए वर्षा की जाती हैं आज सब इस प्रकार की कृत्रिम वर्षा के आविष्कार ने हमारे सामने प्रत्यक्ष उदाहरण रख दिये है तब तो हमें भगवद्गीता में वर्णित यज्ञ की महिमा में विश्वास करना ही पड़ेगा। इसीलिये तो भगवान कृष्ण ने गीता के तीसरे अध्याय में कहा था:-

यन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः।

अज्ञादी भवतिपर्जन्यो यज्ञःकर्म समुदद्भव।। (गीता)

अर्थात् अन्न से सब प्राणी वर्ग जीवित रहते हैं (अन्नं वै प्राणिनो प्राणः) ओर अन्न बादल की वर्षा से उत्पन्न होता है और बादल यज्ञ से बनता है तथा यह यज्ञ कर्म (Experiments) से सम्पन्न होता है। इस प्रकार विज्ञान के परीक्षण रूपी कर्म से वर्षा और अन्न की उत्पत्ति प्रत्यक्ष है। इसी बात को मनु महाराज ने दूसरे शब्दों में कहा है:-

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्वगादित्यमुपतिष्ठते।

आदित्याज्जायतेवृष्टिः बृष्टेरन्नंरुतः प्रजा।। (मनुस्मृति)

अर्थात् अग्नि में (जिसे ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में ही “यज्ञस्यदेव” कहा गया है) डाली हुई आहुति आदित्य”सूर्य” की किरणों को प्राप्त होती है और फिर उसका रासायनिक प्रभाव समुद्र की जलतरंगों पर होता है। तब वाष्पीकरण क्रिया द्वारा वृष्टि होती है। वृष्टि से अन्न होता है और अन्न से प्रजा सुख सम्पन्न होती है। इस प्रकार यज्ञ हमारी भौतिक समृद्धि का कारण होता है।

(4) लोक कल्याण का चौथा अंग में प्रजावर्द्धन है। गीता में कहा भी है:-

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्य पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वम् एव वोऽस्त्विष्टकामधुक्।। (गीता)

3-10) इससे सिद्ध है कि प्रजापतिः परमात्मा ने यज्ञों के साथ ही प्रजा को उत्पन्न किया और फिर उसी को सब मनः कामना की पूर्ति करने वाला बतलाया

“इष्टान् भोगान् वो देबाः दास्यन्ते यज्ञभाविताः।” यज्ञ से प्रसन्न हुये देवता (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र आदि देवता) तुम को मनोवाँछित फल और इष्ट भोग प्रदान करेंगे। किस प्रकार? यह ऊपर सिद्ध किया जा चुका हैं पद्य पुराण में भी कहा गया है:-“अग्निहोत्रात्परं न्यत्पवित्रमिह विद्यते”। अतः हमें यही कहना चाहिये कि लोक में सबसे बड़ा कल्याणकारी यज्ञ है।

स्वास्थ्य सुखं सम्पत्ति दाता दुःखहारी यज्ञ है।।

भूलोक से ले “सूर्य” तक शुभ परम पावन यज्ञ है।

सर्वभूतो के सभी विध दुखनसावन यज्ञ है।।


पधारने से पूर्व स्वीकृति प्राप्ति कर लीजिए

(1) विशद् गायत्री महायज्ञ इस युग का अभूतपूर्व यज्ञ है। 125 करोड़ गायत्री जप, 125 लाख गायत्री महामन्त्र की आहुतियों के साथ-साथ सरस्वती यज्ञ, रुद्रयज्ञ, विष्णुयज्ञ, महामृत्युँजय यज्ञ, शतचण्डी यज्ञ, लक्ष्मी यज्ञ, नवग्रह यज्ञ, यजुर्वेद यज्ञ, ऋग्वेद यज्ञ, अथर्ववेद यज्ञ, सामवेद यज्ञ, ज्योतिष्टोम, अग्निष्टोम आदि के आयोजनों की शृंखला का चलना, निश्चित रूप से एक असाधारण और अद्वितीय आयोजन है। इस महान् आयोजन के परिणाम भी महान् ही होंगे।

(2) मानव मात्र में प्रेम, सद्भावना, सदाचार, संयम, समाज सेवा, उदारता, सत्य, सन्तोष, न्याय, सहृदयता, आस्तिकता आदि सद्गुणों की-सात्विक तत्वों की-वृद्धि करना इस यज्ञ का प्रथम उद्देश्य है। दूसरा उद्देश्य यह है कि मनुष्य की दुर्बुद्धि और अधार्मिकता के कारण सूक्ष्म जगत में जो आपत्ति, अशान्ति, चिन्ता एवं अनिष्टकारक भय-भावना व्याप्त हो गई है, उसे शान्त करके विश्व शान्ति की रक्षा की जाय। तीसरा उद्देश्य यह भी है कि इस यज्ञ में भाग लेने वाले सत्पुरुष कुछ अधिक तपश्चर्या करके अपने लिए अधिक आध्यात्मिक उन्नति का परम मंगलमय लाभ प्राप्त करें।

(3) सर्व शक्तिमान माता की अपार कृपा और गायत्री उपासकों की सराहनीय सहयोग-भावना ही वह तत्व है, जिनने इतने विशालकाय आयोजन को-जो असंभव सा दीखता था, संभव बना दिया। अब पूर्णाहुति की तैयारियाँ आरम्भ की जा रही है। 108 हवन कुण्डों पर पाँच दिन तक दोनों समय हवन चलता रहेगा। देश विदेश के सुदूर प्रदेशों से दस हजार गायत्री उपासक एकत्रित होंगे, उनके ठहरने की, भोजन की तथा अन्यान्य व्यवस्थाओं की आवश्यकता होगी। वह व्यवस्था भी इतनी भारी है कि अपनी तुच्छ योग्यता और सामर्थ्य को चींटी और कार्यभार को पर्वत कहना कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इसे पूर्ण करने में भी माता की अपार कृपा और उपासकों के नैष्ठिक सहयोग का ही श्रेय रहेगा।

(4) ब्रज की सामूहिक तीर्थयात्रा कराना यज्ञ में विशिष्ट आहुतियाँ दिलाने, विद्वानों के भाषाएं सुनवाने, अत्यन्त उच्चकोटि के सन्तों से संपर्क स्थापित कराने के लिए ही आप सबको आग्रह पूर्वक आमन्त्रित नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि यह कार्य तो अब की अपेक्षा फिर कभी भी हो सकते हैं। जो आवश्यक कार्य ऐसे ही जिनकी पूर्ति के लिए अपने समस्त परिवार को एक साथ इकट्ठा होना आवश्यक है वह यह है कि (1) समस्त गायत्री परिवार को एक दूसरे भली प्रकार परिचित कराना और एक संगठित कुटुम्ब बनाना, (2) साधकों का एक दूसरे से अपने अनुभवों, साधन मार्गों उनके परिवर्तनों, लाभ हानियों को परस्पर कह सुनकर आगे चलने के मार्ग को सरल बनाना, (3) भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए जिस देश व्यापी कार्यक्रम का संचालन करना है इसके लिए इकट्ठे बैठकर विचार विनियम करना, (4) इस महायज्ञ के द्वारा जो शक्ति उत्पन्न होगी इसका एक विशिष्ठ भाग पूर्णाहुति में उपस्थित लोगों को वितरण कर उन्हें विशेष लाभों से लाभान्वित करना इन कारणों से यह सामूहिक एकत्रीकरण का विशाल आयोजन करना पड़ा, अन्यथा हम सदा ही छोटी संख्या में लोगों को इकट्ठा करके शान्तिमय वातावरण में साधना करने के पक्षपाती रहे है। भविष्य में भी वैसे ही छोटे कार्यक्रम रखेंगे। हमारे जीवन का संभवतः यह एक मात्र विशाल आयोजन हैं

(5) पूर्णाहुति के इस पुनीत अवसर पर हम आपके समस्त स्वजन-सम्बन्धियों को एकत्रित देखना चाहते हैं इसलिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों, गायत्री महायज्ञ के भागीदारों, संरक्षकों, साधारण गायत्री उपासकों तथा उनके परिवार को सादर आमन्त्रित करते हैं। जो आना चाहें वे आवश्यक जानकारी के लिए छपी हुई विवरण-पत्रिका मँगा ले और आने की पूर्ण सूचना देकर स्वीकृति प्राप्त करलें, केवल स्वीकृति प्राप्त सज्जनों के ठहरने भोजन आदि की ही व्यवस्था की जायेगी।


यज्ञ में मन्त्र शक्ति का महत्व

(श्री हु.च. राम शास्त्री हुलियार, मैसूर)

भारतीय संस्कृति का प्रतीक व आधार यज्ञ है। यज्ञ की सत्ता मन्त्र में है। मन्त्र यज्ञ का प्राण है, यों भी कहा जा सकता है यज्ञ, दान ओर तप कर्मयोग के प्रधान अंग माने गये है। इन तीनों में भी मन्त्र अपनी सत्ता रखती है। बिना मन्त्र के कोई यज्ञ, दान या तप सत्वशाली नहीं होता। मन्त्र ही भारतवर्ष का, भारतीय संस्कृति का प्राण है। दण्डनीति को भी मन्त्र की आवश्यकता है। यह भी कहा जा सकता है, मन्त्र के बिना जीवन ही नहीं-चाहे वह व्यष्टि का या समष्टि का-चल सकता।

मन्त्र आध्यात्मिक होता है। दर्शनों में कहा जाता है, मन्त्र शब्दात्मक है। कोई कहते हैं शब्द गुण है, और कोई द्रव्य। भारतीय पंचीकरण सिद्धाँत में तो शब्द मूल गुण है। यह पंचभूतों में अनुवर्तमान है। शब्द गुण है, उसका गुणी द्रव्य आकाश है। शब्द को वेद में वाक् भी कहा गया है-

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि, तानि विदुर ब्रह्मणा ये मनीषिणः। गुहा त्रीणि विहिता नेंगयन्ति, तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति।।

वाक् चार प्रकार की होती है-परा, पश्यंती, मध्यमा, तथा वैखरी। मनीषियों को इन चारों ज्ञात होती हैं। अन्तःकरण में पहली तीन वाचाएँ रहती हैं, चौथी मनुष्यों की जीभ पर नाचती रहती है। महावैयाकरणि भर्तृहरि ने इनकी बड़ी तथा सूक्ष्म व्याख्या अपनी कृति, वाक्यपदीप में की है। कुछ उपनिषद् भी इसकी व्याख्या करती हैं।

कम्पन से ध्वनि उत्पन्न होती है। वायु के बिना ध्वनि नहीं कह सकता। निर्वायु पात्र में बजती घंटी को हम नहीं सुन सकते। वह तो घन, द्रव तथा अनिलों में चक्रमण करता है जैसे तरंग करते हैं। शब्द का वेग प्रायः सेकेण्ड में 1100 फुट का हैं शब्द कम्पनों को मृदु वस्तुओं पर अंकित करते हैं। इस तरह के शब्दाँक हमें फिल्म तथा रिकार्डो पर दिखाई देता है। शब्द तो प्रकाश में भी परिवर्तित किया जा सकता है। उस प्रकाश से या शक्ति से शब्द सुनाया जा सकता है यह सब आधुनिक विज्ञान की देन मानी जाती है। इसका यह मतलब है कि शब्द या मन्त्र दूसरे रूपों में परिवर्तित किये जा सकते हैं तथा मध्यवर्ती की सहायता से सफर भी करते हैं।

वह स्थूल भी है सूक्ष्म भी स्थूल कार्य है और सूक्ष्म कारण है। अतः शब्द से कार्यप्रपंच निकलता है। ऋचा कहती है-

देवीं वाचमजनयन्त देवास्ताँ, विश्वरूपाः पशवो बदस्ति। सा नो मंद्रेष्षमूर्ग दुहाना, धेनुर्वागत्यानुपसुष्टुवैतु।।

वाक् देवी है विश्वरूपा भी है। कार्यरूपिणी तो देवों की सन्तान है। पर वाक् ही देवों की जननी है। अतएव देवता मन्त्रात्मक ही है। मीमाँसकों का सिद्धान्त, इसी विज्ञान से प्रतिष्ठित है। इसी धेनु रूपिणी वाक् से हम जीते हैं, उसी को हम बोलते हैं और समझते हैं।

जो शब्द श्रव्य है तथा वाच्य है वह कार्य शब्द है, बैखरी शब्द हैं वह शब्द तो सूक्ष्म है दृश्य भी है, वह पश्यन्ती है, जो ज्ञेय है वही परावाक् कहलाती है। अतः वाक्-शक्ति ही ज्ञान-इच्छा का रूप भी है। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति में वाक् ही ओतप्रोत है। अंतर्दर्शन या तप से हमें सूक्ष्म शब्द की गति मिलती है। जिस उद्देश्य से, जिस श्रद्धा से हम अंतर्दर्शन करते हैं तब उसी के अनुरूपिणी बुद्धि हमें मानसकुहर में मिलती है। यही प्रक्रिया हमें यह मन्त्र कहता है-

पाक्का नः सरस्वती वाजभिर, बाजिनीवती, धीनामविऋयवतु।

वाक् तप से पावन करती है, पुष्टि करती है; बुद्धि की प्रचोदना करती है। तब वह भी-धी का अवन भी-वागात्मक ही होकर मन्त्र दर्शन कहलाता है। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के अंतर्दर्शन से इस गायत्री का लाभ हुआ, जिसका स्थूल रूप हमें मालूम है, जिसे हम जपते हैं। स्थूल सूक्ष्म में तथा सूक्ष्म स्थूल में परिवर्तित किया जा सकता है। तप से मन्त्र दर्शन सूक्ष्म से स्थूल शब्द को पाना है। एवं जप से मंत्र सिद्धि पाना ही स्थूल को सूक्ष्म में परिवर्तन करना है। इस तरह यह जपतपः प्रक्रिया होती है। यही हमारे ऋषि−मुनियों का अनूठा आविष्कार है। उन्होंने यन्त्र साध्य को भी मन्त्रसाध्य बनाया है। और मन्त्र के असाध्य को भी मंत्रसाध्य बनाया है।

वाक् हृदयस्पर्शी होती है वाक् स्पर्शानुभव भी देती है। वह रूपानुभव देती है। मन्त्र का रूपानुभव ही देवता साक्षात्कार है। वह रूपदर्शन के द्वारा रसानुभव, इसके बाद गन्धानुभव भी कराती है। इस तरह एक ही वाक् बहुरूपिणी है विश्वरूपिणी है। अतएव इसके वश में सारे देवता रहते हैं।

देवता मंत्र तथा एक विशिष्ट शक्ति के अभिमानी चेतन ही है। देव मूलतः एक है, वह प्रजापति है। देवमय तो अग्नि, वायु तथा सूर्य है। इन गणों में बाकी देवता आ जाते हैं अग्नि गण भू के देव हैं। वायु गण के भुवः अथवा अन्तरिक्ष देव होते हैं और सूर्य गण के तो स्वः अर्थात् द्यु लोक के देव होते हैं। अतः तीनों गणों के देवों के मंत्राभिमानी होने के कारण ये मंत्र इन तीन लोकों का माध्यम होते हैं इस माध्यम से मंत्रयोगी देवता का दर्शन करते हैं, उससे वार्तालाप करते हैं तथा उसकी सुखानुभूति में स्वयं संमग्न हो जाते हैं। इस मंत्र विज्ञान तथा देवता विज्ञान से वे तीनों लोकों की सहायता कर सकते हैं। ऐसे लोग कर्मयोगी है तीनों लोकों का संग्रह भी कर सकते हैं।

पहले यह कहा गया है कि मंत्र यज्ञ की आत्मा है। अब यज्ञ की महत्ता स्वयं जानी जा सकती है। जो यज्ञ ऐसी विशाल तथा विषद आत्मा रखता है वह क्या फल न दे सकता है? ऐहिक फल ही नहीं आमुष्मिक भी देते हैं यज्ञ इतना ही नहीं आत्मसाक्षात्कार में भी काम करता है। यह कूर्म पुराण में इस तरह कहा गया है-

ब्रह्मण्याध्याय कर्माणि निम्संग कामवर्जितः। प्रसन्नेनैव मनसा कुर्वाणो याति तत्पदम्।। इति यत्कुरुते बुध्द्या ब्रह्मार्पणमिदं परम।। श्रद्धा फलानाँ संन्यासं प्रकुर्यात्परमेश्वरे। कर्मणामेतदप्याहुः ब्रह्मार्पणमिदं परम्।। तस्मात्सर्वप्रयत्नेन त्यक्त्वा कर्माणि तत्फलम्। अविद्वानपि कुर्वीत कर्मणाप्नोति तत्फजम्।।

इस तरह यज्ञ प्रवृत्ति पर भी होता है। निवृत्ति पर भी। साधक जो चाहता है वह पाता है। जो अनन्त का इच्छु है वह अनन्त प्राप्त करता है, और जो निष्काम ही यज्ञ, दान, तथा तप करता है वह अकाम हो जाता है वाक्धेनु का वत्स क्या नहीं पाता?

क्या ऐसा या वायुशुद्धि नहीं करता क्या इस यज्ञ से पर्जन्य की कृपा नहीं बरसता? श्री भगवान का ‘यज्ञाद्भवति पर्जन्यः’ वाक्य क्या अवैज्ञानिक तथा अश्रद्धेय है? अवश्य यज्ञ से पर्जन्य प्राप्त करना वैज्ञानिक ही है। यह सिर्फ मिथ्या प्रतिज्ञा नहीं हो सकती। आधुनिक विज्ञानी लोग कृत्रिम वृष्टि के लिए जो वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे है, सो सब जानते ही है। विमानों द्वारा लवणजल सेंकर या अनुकूल बात का प्रयत्न कर मेघों को आकर्षित करना ही वह साधन है न? अर्थात् विशिष्ट धूम का प्रसार अनुकूल वातावरण का निर्माण करेगा। क्या यह मंत्रपूत इच्छाशक्ति विशिष्ट चर्वाज्य सामिद्ध तथा सुवासित होम धूम वृष्टिकारक नहीं सकता! भला क्यों अतिवृष्टि न रोक सकता? जहाँ आधुनिक प्रयोग विफल हे वहाँ प्राचीन प्रयोग को वैज्ञानिक को अपनाना चाहिये। भारतीय वैज्ञानिकों का कर्त्तव्य है कि‍ वे या तथा मंत्र की विद्या अभ्यास करे और प्राचीन प्रयोगों पर अनुसन्धान और अनुशोधन करें।

विश्वामित्र जी ने जप होम परायणरूप मंत्र योग ही से अवरुद्ध से शस्त्रास्त्रों को पाया ओर सविता से गायत्री पायी। इसी यज्ञ शक्ति से प्रतिसृष्टि करने की ठानी उन्होंने किसी खभौतविज्ञानी के एकत्र लिखा है कि जरूर गायत्री मंत्रदृष्टा महर्षि विश्वामित्र एक बड़े भौतिक विज्ञानी थे। प्रागैतिहासिक यज्ञकर्ता तो अशक्य हो गये हैं। ऐतिहासिक सम्राटों में कइयों नाना यज्ञ किये हैं।

लिपि शब्द नहीं है, वह शब्द का चिन्ह मात्र है। अक्षर तो कर्मगम्य है अक्षर की लिपि तो चक्षुर्गभ्य है कुछ शब्द कुछ वस्तुओं पर अधिकार रखते हैं, प्रणव ब्रह्म पर अधिकार रखता है ‘लेखनी’ शब्द लेखनी पर, ‘राम’ शब्द दशरथ के पुत्र पर एवं “पाठक’ शब्द इन पंक्तियों के कृपया पढ़ने वाले आप पर उसी तरह ‘लेखक’ शब्द इन पंक्तियों के क्षुद्र रचयिता पर गहरा प्रभाव डालता है। अभिधान व अभिधेय तो भिन्न ही होते हैं, सो श्री शंकराचार्यजी ने श्री माण्डूक्यभाष्य के आरंभ में कहा है। अतः कुछ अक्षरों के उच्चारण शरीर के कुछ खास नाडियों पर परिणाम करते हैं। इन उच्चारणों की सक्रमता से नाडी सम्पन्न होती है, और उनकी अक्रमता से विपन्न हो जाती है। इसी के कारण ‘ग्लाण्ड’ या ग्रन्थि पैदा होकर शरीर को दुर्बल बनना पड़ता है। ओज की श्रीवृद्धि भी शब्दोच्चारण से प्राप्त होती है। ओज ही जीव धातु है, जीवाणु है। गुणाणु भी शब्दों से प्रभावित होते हैं अतएव यह सिद्ध होता है कि शब्द या मंत्र से स्वास्थ्य पाया जाता है तथा रोग भी। गायत्री का अनुलोम पाठ पोषक है पर विलोम पाठ नाशक है। उसी के विशिष्ट सम्पुटीकरण से वशीकरण तथा और किसी सम्पुट लगाने से विवशीकरण किया जाता है। यह सब ‘गायत्री महाविज्ञान’ के पाठक भली भाँति जानते ही है।

मंत्र जैसे व्यष्टि में अर्थात् पिण्डाण्ड में प्रभाव करता है उसी तरह ब्रह्माँड या समष्टि में भी समष्टि के सब कुछ व्यष्टि में निहित है सूक्ष्मतया। व्यष्टि का विराट रूप ब्रह्माँड हैं यह तथ्य तो प्रत्येक पुराण से ज्ञात होता है और चिंतन से भी। इससे यह सिद्ध होता है कि विश्व की शाँति या अशान्ति मंत्र से पैदा की जा सकती हैं जहाँ वैदिक मंत्र कैसे विफल या दुर्बल हो जाता है? तस्मात् मंत्र तथा मंत्रात्मा यज्ञ पर विश्वशाँति निर्भर हो सकती है न? यज्ञ शाँतिकारक तथा पुष्टिकारक होता है, सो सब कर्मकाण्डी जानते हैं।

इस तरह मंत्र शक्ति तो अघटित घटनापटीयसी है। ज्ञानी का मंत्र जाप दूसरों पर संवेग तथा अज्ञानी का मंत्ररटन उन पर उद्वेग ही पैदा कर देता है। यह शक्ति अणु शक्ति से कई गुना बढ़ कर है, यह अत्युक्ति या अन्धोक्ति नहीं है। माता श्रुति कहती है-

विष्णुमुखा वे देवाइछन्दोभि रिमान्लोकानन पजप्यमभ्यजपन्।

इन्हीं मंत्रों से दवों ने न हटाये जाने वाले लोकों को जीत लिया। वे देव विष्णुमुख हैं। अतः मन्त्रशक्ति पर शंकित होना तो केवल मानसिक दुर्बलता है अथवा उसकी विजिज्ञासा में रहती हुई अश्रद्धा है। वे अपनी विचार शक्ति की वंचना कर रहे है।

पूर्णाहुति का एक मंत्र कहता है- आज्य तो देवों की जिव्हा है, वह अमृतवाणी है। जो समुद्र से जो लहरें उठती है उन्हें वह अमृत बनाता है। वही घृत भूतल तथा हृदयतल पर अमृत बरसाता है।

मंत्र अक्षरात्मक, पदात्मक तथा वाक्यात्मक होते हैं। वह गद्य भी है पद्य भी है। कुछ तो केवल साँकेतिक रहते हैं। मंत्रों के अक्षरों के बारे में कुछ कहा गया है। पद ओर वाक्यों को तो सब जानते ही है। अक्षर तथा पदों का जो क्रम होता है वह बढ़ी ही महत्ता रखता है। वाक्यरचना भी मंत्र में अपना खास, प्रभाव मिलाती है। पदरूप मंत्र तो छन्दोवद्ध होते हैं। इसी कारण से सारे वेद-खासकर ऋग्वेद-छन्द कहलाते हैं। छन्द में नाद की विशेषता होती है। जहाँ पद, वाक्य प्रभाव न डाल सकते वहाँ केवल नाद ही असर डाल सकता है। यह विचार हर एक संगीताभिमानी भी जानता है। कोई गान या राग किसी काल में विशेष शक्तिशाली होता है, और कोई राग रोगशमन करता है। दूसरा कोई दीप जलाता है तो और एक पानी भी बरसाता है मंत्र या ऋचा से देवता का आवाहन करते हैं। गान या साम से देवता-शक्ति का उपग्रहण किया जाता है। तब यजु से हवि अर्पित किया जाता है। गान संस्कार भी करता है जैसे कि सीमन्तोन्नयन में जो कि गर्भिणी का संस्कार है, वीणा वादन कराया जाता है। वीणा पर मंत्र का गान ही तो बताया जाता है।

छन्द मंत्र का मुख्य अवयव होता है। गायत्री छन्द से ब्राह्मण का जन्म होता है। त्रिष्टुप तो क्षत्र को जन्म देता है, और जगती वैश्व जननी है- यह श्रुति का कहना है। तंत्रों में जो मंत्र है वे प्रायः संकेतात्मक तथा गद्यरूप होते हैं। उनमें भी छन्द है। परमहंसों का मंत्र प्रणव है। प्रणव भी छन्दोवद्ध है। यह मंत्रवेत्ता भली भाँति जानते हैं।

वैदिक धर्म में ही नहीं, दूसरे भारतीय धर्मों में भी छन्द की महत्ता होती है। जैन लोग मन्त्रों से अभिषेक करते हैं, बौद्ध लोग मन्त्रों से अभिषेक करते हैं, बौद्ध लोग भी कुछ मन्त्रों से तारा की उपासना करते हैं। इसी तरह नवाज में भी मंत्र है। मुसलमान कहते हैं कि कुरान की भाषा में जो स्वर हैं वे बड़े महत्वपूर्ण होते हैं गिरजाघरों में भी छन्दोगान सुनाई देता है। इस तरह छंदोवद्ध मंत्र का विज्ञान व उपयोग बड़ा व्यापक है।

सकाम मन्त्र साधना तो विधि विधान के साथ ही की जाती है। इस विधि में यह तो जानना चाहिए कि वह काम सत्य है या असत्य। निष्काम-साधना भी सक्रम ही होनी चाहिये। अक्रम या व्युत्क्रम सकामना से या तो निष्कामना से करे हानि पहुँचाता ही है। कुतूहल के लिए अथवा मन्त्रशक्ति की परीक्षा के लिए साधना नहीं करनी चाहिए कुमारी कुन्ती का कुतूहल तो महाभारत का कारण हुआ। अतः मंत्र साधना में गुरु की प्रधानता होना परमावश्यक है और श्रेयस्कर है गुरु की कृपा से मन्त्र वीर्यवान हो जाता है!

तद्बिष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरय

दिवीव चक्षुराततम्।। ॐ

यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले सभी तत्वों में मन्त्र की शक्ति सर्वोपरि है। इसलिए यज्ञ में मन्त्रों का प्रयोग पूर्ण सावधानी से ही किया जाना उचित है।


यज्ञ की सफलता मंत्र पर निर्भर है।

(श्री सी. रामचन्द्राचार्य विद्यानिधि-मैसूर)

अति प्राचीन काल में नैमिषारण्य क्षेत्र में बैठकर शौनक आदि ऋषियों ने यज्ञ तथा उसके अंग, उपाँग की चर्चा का एक दीर्घ कालीन आयोजन किया। कई ऋषियों ने वैराग्य और कर्म त्याग का प्रतिपादन किया- पर गम्भीर चिंतन और मन्थन के बाद ही निर्धारित हुआ कि यदि यज्ञादि करणीय कर्मों की उपेक्षा की जायेगी तो यज्ञपुरुष विष्णु भगवान् के विधान की अपार हानि होगी और संसार में महाअनिष्ट, अन्धता, जड़ता तथा तमसाच्छन्न अव्यवस्था फैल जायेगी।

यज्ञों में जो शक्ति सन्निहित है उसका प्रमुख आधार मंत्र शक्ति है। मन्त्रों में चार प्रकार की शक्ति होती है। 1-प्रामाण्य शक्ति 2-फल प्रदान शक्ति 3-बहुली करण शक्ति 3-अध्यात्म शक्ति।

महर्षि जैमिनी के पूर्ण मीमाँसा के अनुसार मंत्रों में जो अर्थ, शिक्षा, संबोधन, आदेश सन्निहित है, जिसके आधार पर मनुष्यों को अपने कर्तव्य का ज्ञान होता है और कर्तव्य की प्रेरणा मिलती है वह उनकी प्रामाण्य शक्ति है।

कुशा, हवि, चरु, आज्य, कुण्ड, समिध, पात्र पीठ आदि को अभिमंत्रित करके उनको सूक्ष्म प्राण से प्राणवान करने का विधान, मंत्रोच्चार, ऋत्विजों को न्यसदि से मन्त्रावधारित करना एवं अमुक क्रिया पद्धतियों द्वारा अमुक आयोजन का विधि विधान-मंत्र की फलप्रदायिनी शक्ति से संबंधित है। सकाम यज्ञों में यही प्रक्रिया प्रधान रहती है। विष परिहार, रोग निवारण, शत्रु-नाश, श्रीलाभ, युद्ध जय, दिव्य अस्त्रास्त्र, संतान लाभ आदि नाना प्रकार के काम्य उद्देश्य मन्त्रों को इसी शक्ति के द्वारा प्राप्त होते हैं।

मंत्र की तीसरी शक्ति “बहुलीकरण शक्ति” है। देव पूजन में जरा सा चंदन, अक्षत,पुष्प नैवेद्य आदि चढ़ाये जाते हैं और हवन में दो पोरुवों पर रखकर जरा सी हवि देवता के लिए होमी जाती है। देवताओं का आकार विस्तार इतना बड़ा और यह पूजा पदार्थ इतने स्वल्प? इससे उनकी तृप्ति कैसे होगी ? इस प्रश्न का समाधान वही कर सकते हैं जिन्हें मन्त्र की ‘बहुलीकरण शक्ति’ का ज्ञान है। जिस प्रकार छोटे से परमाणु का विस्फोट अमुक प्रक्रिया के साथ करने पर वहाँ प्रचंड विद्युत शक्ति का परिस्तरण होता है उसी प्रकार अमुक मंत्रों को, अमुक विधान के साथ दी हुई थोड़ी सी वस्तु भी सूक्ष्म जगत में इतनी मधुर, सुस्वाद, तथा विपुल हो जाती है कि उसे देवता अमृत के समान उपभोग करते हुए तृप्तिलाभ करते हैं।

मंत्र की चौथी ‘अयातयामता’ शक्ति वह है जो किसी विशेष व्यक्ति द्वारा, विशेष स्थान पर, विशेष उपकरणों से पैदा होती हैं। विश्वामित्र ऋषि ने गायत्री तत्व की असाधारण तन्मयता के साथ असाधारण उपासना की फलस्वरूप ये गायत्री के मंत्र दृष्टा बने। कोई विशेष साधन जिस भूमि पर रहकर किया जाता है वह भूमि उस यंत्र की शक्ति से असाधारण रूप से प्रभावित हो जाती है, ऐसे स्थान तीर्थ-सिद्ध पीठ, शक्तिपीठ आदि के नाम से पुकारे जाते हैं जिस माला से, जिन पूजा पात्रों से जो मंत्र साधन किया जाता है वह पदार्थ उस तत्व से परिपूर्ण हो जाने के कारण निहित प्रयोजन की सिद्धि में विशेष रूप से सहायक होते हैं।

प्राचीन काल में इस ‘अयातयामता’ शक्ति का बहुत महत्व मानते थे और उसका पूरा-पूरा ध्यान रखते थे। कल्प सूत्र कार्यों की मर्यादा यह है कि निर्धारित कर्मकाण्ड समाप्त हो जाने पर उसका बचा हुआ परिद्रव्य, यातयाम, निर्वीय हो जाता है। कारण यही है कि उन पदार्थों को जिस उद्देश्य से अभिमंत्रित किया गया था वे उस उद्देश्य से भिन्न प्रयोजन के लिये उपयुक्त नहीं रहते। प्रेत कर्म कराने वाले, श्राद्ध विशेषज्ञ कर्मकाण्डी अन्यान्य कर्मकाण्डों को अपने हाथ से नहीं लेते, इसी प्रकार अमुक यज्ञों का विशेषज्ञता जिन आचार्यों से प्राप्त करानी होती है उनके द्वारा ही वह कार्य ठीक प्रकार से सम्पन्न हो पाते हैं। दशरथ के गुरु वशिष्ठ जी उच्च कोटि के वेदज्ञ थे, कोई भी क्रिया कलाप उनसे छिपा न था, पर पुत्रेष्टि यज्ञ के उपर्युक्त शृंगी ऋषि ही थे। दुर्गा, शिव, आदि देवताओं के जहाँ विशेष सिद्धपीठ है वहाँ उन मंत्रों की अयातयामता शक्ति को विकसित होने में बड़ी सहायता मिलती हैं।

मन्त्र विद्या के ज्ञाता सम्पूर्ण मन्त्र संहिता को पढ़ते है-पर विशेष श्रम किसी विशेष यज्ञ भाग पर ही करते हैं। प्राचीनकाल में वंश परम्परा से अमुक मंत्र भाग की साधना चलती थी। पीढ़ी पर पीढ़ी इस विशेषता को कायम रखा जाता था। अब तो एक ही पंडित सम्पूर्ण प्रकार के कृत्य करा देने का साहस करता है, जिन यज्ञ पात्रों से विवाह का हवन करते हैं उन्हीं से अंत्येष्टि भी होती है। परस्पर विरोधी प्रक्रियाओं के कारण विरोधी तत्वों का आविर्भाव होता है और उनके प्रयोग से लाभ होना तो दूर उल्टे निष्फलता एवं प्रत्यवाय की ही आशंका रहती है। मन्त्र की ‘अयातयातमा’ शक्ति से परिचित व्यक्ति सीमित मर्यादा से विशेष शक्ति उत्पादन करते हैं तदनुसार उन्हें ही समुचित सफलता मिलती है।

सूत्रकारों ने मन्त्र में सन्निहित शक्तियों का ध्यान रखते हुए अमुक प्रयोजन में अमुक मन्त्रों का उपयोग करने का विधान किया था। अब कुछ विद्वान ऐसा करने लगे है कि जिस कार्य से जिस मंत्र का अर्थ कुछ संगति खाता हो उसी का उस कार्य में उपयोग कर डाला जाय। यह मनमानी उचित नहीं। शास्त्र मर्यादाओं का उल्लंघन करके मंत्रों की मनमानी घर जानी रीति खिलवाड़ नहीं की जानी चाहिए। जो विद्वान जिस मंत्र भाग के अधिकारी बनें-उन्हें उचित है कि प्रतिदिन निष्ठापूर्वक उन मंत्रों को अपने से जाग्रत रखने के लिये पाठकों-उपासना का क्रम जारी रखें। इसमें तनिक भी प्रमादन होने है।

मान्त्रिकों को इन्द्रिय निग्रही तथा तपस्वी होना चाहिये। इसके लिए ब्रह्मचर्य आवश्यक है। महाभारत में कथा है कि जब अश्वत्थामा पाण्डवों को नष्ट करने के लिये मंत्र चालित ‘संधान अस्त्र’ का प्रयोग करने लगा तब अर्जुन ने उसकी शाँति के लिये अन्य दिव्य अस्त्र छोड़ा। उन दोनों अस्त्रों के प्रज्वलित होने पर सम्पूर्ण विश्व में नष्ट होने की स्थिति उत्पन्न हो गई। तब व्यास जी दोनों अस्त्रों के प्रादुर्भूत हुये और उन्होंने उन अस्त्रों का शमन करने के लिये अर्जुन और अश्वत्थामा को कहा कि अपने-2 अस्त्रों को शाँत करो। अर्जुन ब्रह्मचारी था इसलिये उसने अपने शस्त्र को शाँत कर दिया पर अश्वत्थामा असफल रहा क्योंकि वह दुर्योधन की पत्नी के प्रति अचिन्त्य चिन्तन कर चुका था। समस्त जीवन नहीं तो कम से कम मंत्राराधन के समय तो तपस्वी और इन्द्रिय निग्रही रहना आवश्यक ही है। इसके बिना वह शक्ति उत्पन्न नहीं होती तो अभीष्ट प्रयोजन की सफलता के लिये आवश्यक है।

मन्त्र की शक्ति को समझना उसको रहस्य का साक्षात्कार करना, और विशेष साधना द्वारा उसे सिद्ध करना यही मंत्र साधकों का परमलक्ष होता है। जो इस मार्ग का अवलम्बन करते हैं वे सफल मनोरथ होते हैं। यजुर्वेद में उपाख्यान है कि- “नृमेध और “यरुच्छेप” नामक दो याज्ञिकों में विवाद हुआ कि देखें हममें से कौन सच्चा दृष्टा है। दोनों ने निश्चय किया कि जो गीले काठ में मन्त्र शक्ति से अग्नि उत्पन्न कर दे वही निष्णात माना जाय। नृमेध ने मन्त्र प्रयोग किया तो गीले काठ में से धुँआ मात्र निकला पर यरुच्छेप ने मन्त्रों से गीली लकड़ी प्रज्वलित हो गई अस्तु वही निष्णात माना गया। अपनी सफलता का कारण बनाते हुए यरुच्छेप ने कहा-हे नमेध तू केवल मंत्र के उच्चारण अर्थ और विधान को ही जानता है पर मैंने तो उसके सारे रहस्य को जाना है। यही मेरी सफलता का कारण है।

एक कथा इस प्रकार की भी है कि देवताओं ने यज्ञ का प्राशित्र भाग पूषा को खाने के लिये दिया। उसे खाते ही पूषा के दाँत गिर पड़े आप वह पोपला हो गया। फिर वही प्राशित्र यज्ञ भाग देवताओं ने बृहस्पति को खाने के लिये दिया बृहस्पति पहले तो पुषा के समान अपनी दुर्गति होने के भय से डरे पीछे उन्होंने उस मंत्र का आह्वान किया जो उस समय के लिए आवश्यक था। तदुपराँत वे उस यज्ञ भाग को खा गये और उनको कुछ भी हानि नहीं हुई। पूषा को उस मंत्र रहस्य के अनभिज्ञ होने के कारण ही अपने दाँत खोने पड़े।” कथा का तात्पर्य यह है कि मांत्रिकों को अपने विषय को सर्वांग पूर्ण जानकारी होनी चाहिये अन्यथा वे पूषा के समान हानि भी उठा सकते हैं।

यज्ञ में मंत्र प्रधान है। मंत्र का सदुपयोग यदि हो सके तो यज्ञों की सफलता में तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता।


अखण्ड-अग्नि की आवश्यकता

(श्री. कण्ठ जी विद्वान्, मैसूर)

प्राचीन काल में यज्ञ भगवान् की वेदानुमोदित उपासना करने वाले सभी अग्निहोत्री अपने यहाँ अखण्ड अग्नि की स्थापना रखते थे। जिस प्रकार मन्दिरों में भगवान् की मूर्ति स्थापित करके समय समय पर उसकी पूजा अर्चना की क्रियायें की जाती हैं और प्राण-प्रतिष्ठा के उपराँत उस मूर्ति को मन्दिर में ही स्थापित रखा जाता है उसी प्रकार यज्ञ उपासकों के लिए यज्ञशाला रूपी मन्दिर में अग्निरूपी देव प्रतिमा को निरन्तर स्थापित रखने और उसकी देव अर्चना की भाँति प्रातः, सायं अग्निहोत्रियों के यहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी यह अखण्ड अग्नि सुरक्षित रखी जाती थी। उसे बुझने न देने के लिए अग्निहोत्री परिवार के सभी लोग पूरा-2 ध्यान रखते थे। यह अग्नियाँ जिसके यहाँ जितनी पुरानी होती थी वह अपने को उतना ही साधना धन का धनी समझता है और संसार में अपनी निष्ठा के अनुरूप प्रतिष्ठा प्राप्त करता था।

जिस प्रकार माता परिवार में अन्य कार्य करती हुई भी अपने नन्हें शिशु का सदा ध्यान रखती है और उसे सभी अनिष्टों से बचाती हुई पाल−पोस कर युवा बनाती है उसी प्रकार अग्निहोत्री भी अपनी यज्ञाग्नि की सुरक्षा पर निरन्तर ध्यान रखकर एक प्रकार से प्रभु चिन्तन करने वाले योगी या मन्दिर में पूजा करने वाले सच्चे पुजारी की भाँति अपने मनः क्षेत्र में यज्ञ भगवान की प्रतिष्ठा किए रहता है। निरन्तर नियमित रूप से उपासना की हुई अग्नि की सूक्ष्म आध्यात्मिक विशेषता दिन दिन उसी प्रकार बढ़ती रहती है जैसे पौष्टिक पदार्थों का सेवन करती हुई कलिका दिन-दिन विकसित होती हुई बलवान एवं परिपुष्ट युवती बनती जाती है उसी प्रकार यज्ञ कुँड में विराजमान अग्नि भी प्रतिदिन घी मेवा, मिष्टान्न हविष्यान्न तथा नाना प्रकार का गुणवान औषधियाँ खा-खा कर प्रचण्ड शक्ति सम्पन्न भवानी का साक्षात् आकार ही बन जाती है। उसके प्रभाव से अनेक अनिष्ट रोग, शोक, क्लेश, कलह, पाप, ताप, अनायास ही नष्ट होते हैं।

जिस प्रकार सोने, चाँदी, हीरा, मोती आदि की भस्म अनेक रोगों को दूर करने में समर्थ होती है, उस प्रकार यह ‘यज्ञ भस्म’ भी किसी बढ़िया से बढ़िया औषधि की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण सिद्ध नहीं होती, इसके उपयोग से जहाँ अनेक शारीरिक रोग दूर होते हैं वहाँ उन्माद, मंद बुद्धि, उत्तेजना, आवेश, कुबुद्धि आदि मानसिक रोगों का भी निवारण होता है। अनेक रोगों में भी यह ‘यज्ञ भस्म’ बड़ी उपयोगी सिद्ध होती है। मस्तक पर यज्ञ भस्म का तिलक लगाने से आलोज्ञाचक्र, सहस्र-कमल, ब्रह्मरंध्र, सुषुम्ना संस्थान आदि अनेकों सूक्ष्म आध्यात्मिक केन्द्रों का विकास होता है। हृदय पर यज्ञ को लगाने से सूर्य चक्र जागृत होता है और अन्तः करण चतुष्टय में से तामस तत्व घटते एवं सात्विक तत्व बढ़ते स्पष्ट दृष्टि गोचर होते हैं।

लाठी चलाने वाले लोग अपनी लाठी को तेल में डुबो-डुबोकर उसको मजबूत बनाते हैं। कहते हैं जो लाठी जितना तेल पी जाती है वह उतनी ही मजबूत हो जाती है। घी, दूध में काम आने वाले मिट्टी के बर्तन जितनी चिकनाई पी जाते हैं उतने ही उपयोगी बन जाते हैं। यज्ञ की अग्नि भी जितना घी पी लेती है उतनी ही बलवान बन जाती है। इसलिए यह विधान मिलता है कि किसी को अग्निहोत्र करना हो उसे किसी के यहाँ से चिर उपस्थित अग्नि लाकर उससे अपना हवन करना चाहिए।

नहीं बालक और अधेड़ आयु के पुरुष में जो अन्तर होता है वही अन्तर तुरन्त उत्पन्न की गई और चिरसेवित अग्नि में भी रहता है। बालक को दिया हुआ दान उतना फलप्रद नहीं होता जितना वयोवृद्ध को, क्योंकि बच्चे की अपेक्षा वयोवृद्ध मनुष्य निश्चय ही दान के सदुपयोग की जिम्मेदारी को अधिक अच्छी तरह समझता है और वह उस दानदाता का अधिक उपकार करने में भी समर्थ होता है। यही कारण है कि नित्य का साधारण अग्निहोत्र ही नित्य प्रज्वलित की हुई अग्नि में कर लिया जाता है पर किन्हीं महान् आयोजनों के लिए चिरसेवत अखण्ड अग्नियों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसी अग्नि की अपेक्षा सत्परिणाम उपस्थित करने में समर्थ होती है।

अब लोग आलस्य और अश्रद्धा के कारण अखण्ड अग्नि का महत्व भूल गये हैं और फास्फोरस, गन्धक आदि दुर्गन्धित अशुद्ध पदार्थों से बनी हुई दियासलाई से जलाई हुई अग्नि से हवन कर लेते हैं, प्राचीन काल में यज्ञ प्रेमी लोग अरणि मंथन, सूर्यकाँत मणि आदि के द्वारा अग्नि प्रज्वलित करते थे। अखंड अग्नि की उपासना सनातन धर्म के अनुसार तो आवश्यक है ही। आर्य-समाज के संस्थापक महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती भी उसकी उपयोगिता को मानते थे उन्हें प्रेरणा देकर शाहपुर नरेश से अखंड अग्नि स्थापित कराई थी जो अब तक विधिवत् संपूजित हो रही है। देश में अभी अखंड अग्नि रखने वाले अग्निहोत्रियों का सर्वथा अभाव नहीं हुआ है। कुछ नैष्ठिक उसे विधिवत् रखते हैं पर इनकी संख्या उँगलियों गिनने लायक है।

अखंड अग्नि की भाँति अखंड दीपक की भी महानता असाधारण है। शुद्ध घी से अखंड दीपक जलता रखने से एक प्रकार का घृत हवन निरन्तर अपने आप होता रहता है। ऐसा दीपक जिस स्थान पर प्रकाश करता है। वह स्थान एक नित्य अदृश्य प्रकाश ज्योति से प्रदीप्त रहता है, उसके निकट बैठकर की हुई उपासना विशेष फलवती होती हैं। यों तो सामान्य अनुष्ठानों के समय भी घृत का दीपक जलता रखा जाता है पर विशेष अनुष्ठानों में तो उसे रखने की ही प्रतिष्ठा है। यह भी एक प्रकार से अखंड अग्नि की स्थापना ही है। वरन् उससे भी कुछ अधिक है। क्यों कि अखंड अग्नि तो केवल हवन के समय ही प्रज्वलित की जाती है पर दीपक तो निरंतर प्रकाशवान रहकर उस वातावरण में दिव्य प्रकाश को भरता है। अग्नि में दो ही वार हवन होता है। पर दीपक में अहिर्निश हवन होता रहता है। अग्नि की अखंडता में झंझट, खर्च और देखभाल साज-सम्भाल कम है, दीपक को अखंड रखने में यह सभी बातें अधिक करनी पड़ती हैं- साथ ही उसी झंझट एवं खर्च के अनुपात से उसका महत्व भी अधिक है।

जन्म सूतक के समय आने वाली अनिष्ट कर आशंकाओं की निवृत्ति, एवं सुरक्षा प्रर्सूतिग्रह में 10 दिन अखंड अग्नि रखने से हो जाती है पर किसी की मृत्यु हो जाने पर उस मृत्यु स्थल पर अखंड दीपक ही जालना पड़ता है क्योंकि मृत्यु के समय उस मृत शरीर में से निकले हुये शारीरिक रोग कीटाणु तथा मन की वेदना, पीड़ा, छटपटाहट, करुणा, मोह, शोक आदि के प्रभाव को नष्ट करने में अखंड दीपक की विशेष शक्ति की ही आवश्यकता पड़ती है। उसके बिना वह मृत सूतक का स्थान शुद्ध नहीं हो पाता, ऐसी अशुद्धि वाले घरों में ही प्रायः भूत बाधा, भय, दुःस्वप्न, मृगी उन्माद, अपस्मार आदि रोगों से बने रहते हैं। और उस घर में रहने वालों का शारीरिक एवं मानसिक उद्वेग आक्रमण करते हैं। पितृ शाँति कर्मों में दीपक अनिवार्य होता है। यज्ञ, कीर्ति, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज की पाकशाला आदि में घृत दीपक जलाये जाते हैं। आरती में दीपक आवश्यक है। गड्ढा आदि नदियों के तट पर लोग दीपक जलाते हैं। दिवाली तो दीपकों का त्यौहार है। व्यापक रूप से अखंड दीप का त्यौहार मना कर हम दरिद्रता की व्यापक शक्ति को घटाने एवं लक्ष्मी शक्ति का बल बढ़ाने का पुनीत आयोजन करते हैं। यह उद्देश्य मोमबत्ती या बिजली जलाकर प्राप्त नहीं कर सकते। पारसी लोगों की अखंड अग्नि की महत्ता को भली प्रकार समझा है उनके धर्म में “अखंड अग्नियों, को देवमूर्ति की तरह स्थापित किया जाता है और बड़ी श्रद्धा एवं योजना के साथ स्थिर रखा जाता है।

अखंड अग्नि और अखंड दीपक के लाभ अपरिमित हैं। उन्हें कोई भी व्यक्ति परीक्षा करके अनुभव कर सकता है। यज्ञ प्रेमियों के लिये यह तो आवश्यक प्रक्रिया है। जो लोग अपने यहाँ अखंड अग्नि या अखंड दीपक रखना चाहें वे उसकी सुरक्षा एवं पूजा की विधि मथुरा आकर क्रियात्मक रूप में सीख सकते हैं। क्योंकि गायत्री तपोभूमि जिस दिन से स्थापित हुई है उसी दिन से अखंड अग्नि वहाँ रहती है और “अखंड ज्योति” प्रेस में अखंड दीपक सदैव जलता रहता है।


यज्ञ करने वाले इन बातों का ध्यान रखें।

(श्री आनन्द जी, टीकापट्टी)

यज्ञ की सफलता के लिये यह आवश्यक है कि उसके सब कार्य व्यवस्था पूर्ण हों आग तापने या होली जलाने जैसा कौतूहल करने के लिये हवन करना व्यर्थ ही नहीं हानिकारक भी है। कहा भी है-“नास्ति यज्ञ समं रिपु” अविधि पूर्वक किया हुआ हवन शत्रु के समान हानिकारक भी होता है, जबकि विधिपूर्वक किया हुआ हवन कामधेनु गौ एवं कल्पवृक्ष के समान हमारे सभी अभावों को दूर करने वाला सिद्ध हो सकता है।

यज्ञ एक प्रकार की वैज्ञानिक प्रक्रिया है। जो वैज्ञानिक प्रक्रिया जितनी शक्तिशाली होती है, उसमें उतनी ही सावधानी बरतनी पड़ती है। बढ़िया बारूद बनाने के कारखाने में यदि रासायनिक पदार्थों के सम्मिश्रण में लापरवाही होने लगे तो वहाँ रद्दी बारूद बनेगी, और जब उसका बन्दूक में उपयोग किया जायेगा तो लक्ष्य वेद में सफलता न मिलेगी इसलिए उस बारूद के कारखाने के व्यवस्थापक पूरी सावधानी से यह देख भाल करते रहते हैं कि कारखाने पर हर कार्य पूर्ण रूपेण नियम पूर्वक हो। यदि बारूद पीसने वाले या कारतूस भरने वाले कर्मचारी ढील पोल की नीति से काम करें लापरवाही बरतें बीड़ी पीकर चिनगारी बखेर दें तो सारे कारखाने का ही स्वाहा कर सकते हैं। घटिया कार्यों में लापरवाही चल सकती है पर जो कार्य जिम्मेदारी के हैं उनमें पूर्ण जागरुकता एवं पूर्ण व्यवस्था की ही आवश्यकता रहती है। यज्ञ में ऐसी ही विधि व्यवस्था बरती जानी चाहिये।

ब्रह्मा, अध्वर्यु, उद्गाता, ऋत्विक्, आचार्य आदि कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ पहले से ही बाँट दी गई है कि वे अपने विभाग की सुव्यवस्था रखें और करवायें। यों हवन का काम मामूली सा है। एक सुपरवाइजर बड़े-बड़े मिलों का इंतजाम कर सकता है तो छोटे से हवन के लिए भी एक मैनेजर काफी होना चाहिए। पर वस्तुतः, यज्ञ बहुत गंभीर बात है, उनकी प्रत्येक गतिविधि परपूर्ण मनोयोग के साथ ध्यान रखना सामान्य मस्तिष्क के एक आदमी का काम नहीं है, इसलिए यज्ञ के प्रत्येक कार्य में पूरी सावधानी रखने के लिए कई कार्यकर्ता विभागाध्यक्ष नियुक्त करते हैं। आचार्यादिवरण की यही प्रक्रिया है। यह लोग पूरे जिम्मेदार, पूर्ण श्रद्धालु और अपनी जिम्मेदारी को निबाहने के लिये भरपूर परिश्रम करने वाले होने चाहिए। देखा जाता है कि दक्षिण लोभी किन्तु भीतर से श्रद्धालु पंडित, आचार्यादि तो वन जाते हैं पर समय काटने और बला टालने की नीति बरतते हुये अपनी जिम्मेदारी की उपेक्षा करते रहते हैं, कार्य अविधि पूर्वक होता रहता है, यह अनुचित है। उपयुक्त कार्यकर्ताओं की व्यवस्था पहले होनी चाहिए। हवन कुण्ड या ठेखे की रचनायें निर्धारित नाप तोल का, यथोचित आहुति बढ़ाने का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। गोला वारा करने से जो महत्व तोप या बन्दूक की नाल का वही महत्व हवन कुण्ड की रचना का है। हवन कुण्ड रूपी तोप में आहुति रूप कारतूस डाल कर अन्तरिक्ष में अवस्थित, रोग, अनिष्ट, आलाप, पाप, असुर आदि शत्रुओं पर गोलाबारी की जाती है, इसलिये नाल का सुख ठीक प्रकार से ही बना हुआ होना चाहिए। कम दूर, चक्कर से घूमती हुई गोलियाँ छोड़ने के लिए अलग-अलग विधान से बन्दूकों की नालें बनाई जाती हैं, हवन कुण्डों का निर्माण का आधार भी वही है। चाहे जैसे मनमाना गड्ढा खोदकर हवन सामग्री की भट्टी जलाते रहना बुद्धिमत्ता नहीं है।

आवश्यक समान पहले से ही संग्रह कर लेना चाहिए ताकि आवश्यकता पड़ने पर बीच बीच में काम बन्द न करना पड़े पूजा के सभी उपकरण एकत्रित हो गये हैं नहीं वह एक दृष्टि से पहले ही देख लेना उचित है। सभी वस्तुओं की शुद्धता पर पूरा ध्यान रखा जाए।

सड़ी गली, नकली, गन्दी, सस्ती चीजें प्रायः पंसारी लोग हवन पूजा आदि के लिए सुरक्षित रख लेते हैं। खरीदने वाले भी सोचते हैं, यह चीजें हमें कोई खानी थोड़े ही है, सस्ती चीजें लेकर काम क्यों नहीं चला लें। यह उपेक्षा बुरी है। जब हम अपने साधारण मित्र, अतिथि या रिश्तेदार को अपने उपयोग की अपेक्षा कुछ अच्छी चीजें प्रस्तुत करते हैं तो देवताओं को, पितरों को यज्ञ भगवान को, सड़ी गली चीजें भेंट करना किस प्रकार उचित हो सकता है?

दवात कलम, कागज, स्याही आदि ठीक न हों तो अच्छा लेख लिख सकना इसी प्रकार यज्ञीय उपकरणों को ठीक होना आवश्यक है। स्रुवा, स्रुचि, प्रणीता, प्रोक्षणी, स्थल, चरुस्थाली, आज्यस्थाली आदि यज्ञ पात्र, निर्धारित वृक्षों की लकड़ियों से निर्धारित नाप तोल से बने होने चाहिए। इस पात्र रचना में वैज्ञानिक तथ्य भरे हुए है। ताँबे के बर्तन में रखा हुआ दूध थोड़े ही समय में विषैला हो जाता है दूध पीने के लिए मिट्टी या चाँदी का पात्र उपर्युक्त माना गया है, गीली खटाई भी किसी धातु के वर्तन में बहुत जल्दी खराब हो जाती है किन्तु अमुक प्रकार के पात्रों में नहीं बिगड़ती। इसी प्रकार यज्ञ सामग्री, हवि, चरु, आज्य, जल आदि के लिए जिन काष्ठों के जिस आकार के पात्रों का निर्धारण किया गया है वह परम्परा सूक्ष्म विद्वान पर अवलंबित है। उसकी उपेक्षा न की जानी चाहिए।

समिधायें सब वृक्षों की काम में नहीं ली जा सकती है। जिनमें काष्ठों में उपयोगी सूक्ष्म शक्ति मिली है उनको यज्ञ में ग्राह्य माना गया है। बड़, पीपल, गूलर, आम, शमी, ढाक, छोंकर आदि की समिधाएं प्रयोजनीय है। इमली, नीम, बबूल आदि निषिद्ध ठहराये गये हैं। समिधाएं उस वृक्ष की लेनी चाहिए जो मरघट, कसाई खाना, पखाना आदि परिणत स्थानों पर अवस्थित न होकर पूजा उपासना के क्षेत्र से समीप हो। दक्षिण दिशा की और झुकी हुई गिद्ध चील आदि की विष्टा से सनी हुई शाखाएं हवन के लिए उपर्युक्त नहीं। सड़ी, धुनी, नीली, आधार से अधिक मोटी या पतली समिधाएं ठीक नहीं। समिधाओं को धोकर धूप में सुखा देना चाहिए, शुद्ध समिधाएं ही प्रयोजनीय हैं।

हवन सामग्री का विषय अत्यन्त ही महत्वपूर्ण सूक्ष्म विचारणीय एवं सावधानी रखने योग्य है। हवन में जौ, चावल, तिल आदि हविष्यान्न प्रयुक्त होते हैं। खीर, हलुवा, मोदक आदि का चरु बनाया जाता है, किशमिश, मुनक्का, छुहारा, शकर, मधु आदि मिष्ट पदार्थ होमे जाते हैं, चन्दन, देवदारु-अगर, तगर, छारछवीला, गूगल आदि सुगन्धि फैलाने वाले पदार्थ काम में लाये जाते हैं। दालचीनी बच, ब्राह्मी, शतावर, जावित्री आदि औषधियाँ हवन की जाती है। घृत इन सब का अनुपान है। घृत इनमें से प्रत्येक वर्ग के साथ रहता है। ताँत्रिक उपचारों में जहाँ गोल मिर्च, अपामार्ग, आक, नख, लाम आदि का हवन करते हैं वहाँ भेड़, गधी, ऊँट आदि के दूध का धी या सरसों सत्यानाशी आदि का तेल प्रयुक्त होता है।

किस संकल्प के साथ, किस उद्देश्य से, किस सामर्थ्य का मनुष्य, कैसा हवन कर रहा है, उसे भली प्रकार समझ लेने के बाद ही हवन सामग्रियों का निर्धारण करना उचित है। आयुर्वेद शास्त्र के निघण्टु भाग में प्रत्येक औषधि के गुणों का वर्णन है। यदि अरोग्य के लिए हवन किया गया है तो सामने उपस्थित बीमारी के उपयुक्त हवन सामग्रियों का चुनाव होना चाहिए। यों साधारण हवन में-सभी सामग्रियां लगभग समान भाग से मिला लेने से काम चल जाता है पर विशेष परिस्थिति में उनकी मात्रा में न्यूनाधिकता करनी ही पड़ेगी। रोगी के शरीर में बात, पित्त, कफ किस की प्रधानता है। कौनसा दोष मंद और कौन-सा रोग प्रबल है। ज्वर, खाँसी, अतिसार आदि कई रोगों का संमिश्रण हो तो उनमें से कौन अधिक और कौन मंद हैं इसका अनुपात देखते हुए उन रोगों की औषधियों के नाम तथा मात्रा निर्धारित करनी होगी। पुत्रेष्टि यज्ञ करना हो तो देखना होगा कि कि पुरुष में क्या और स्त्री में क्या दोष हैं, एवं अभाव है। उसके उपयुक्त चिकित्सा का हव नहीं सफलता प्रदान करेगा। अरोग्य वर्धक हवनों के आचार्य को आयुर्वेद का गम्भीर ज्ञान होना आवश्यक है।

मानसिक संस्कार के लिए किये गये हवनों की सामग्री का चयन करके समय अमुक पदार्थों के अन्दर छिपे हुए चेतना तत्वों का ज्ञान होना चाहिए। जैसे तुलसी और करंज में आयुर्वेद की दृष्टि से कृमि नाशक गुण लगभग समान है। फिर भी “चेतना विज्ञान” की दृष्टि से तुलसी में सात्विकता और करंज में तमोगुण की प्रधानता स्पष्ट अनुभव की जा सकती है। प्याज और लहसुन में अरोग्य की दृष्टि से कोई बुराई नहीं है पर “चेतना-विज्ञान” उनमें तमोगुण की प्रधानता बताता है। इस के सेवन से स्वास्थ्य चाहे सुधरें पर सेवन करने वाले के मनन क्षेत्र में तमोगुण अवश्य बढ़ेगा। इसी प्रकार प्रत्येक हविष्यान्न, चरु, हवि, आज्य, औषधि में कुछ विशेष चेतना तत्व छिपे होते हैं, वे अपना प्रभाव बौद्धिक जगत में उत्पन्न करते हैं। व्यक्तिगत रूप से काम, क्रोध, लोभ, आवेश, चिन्ता, शोक, भय, उन्माद आदि की निवृत्ति के लिए तथा समष्टि रूप में व्यापक वायुमण्डल में फैले हुए पदार्थ परता, युद्धोन्माद आदि को शांत करने के लिए ऐसी हवियों को चुनना पड़ेगा जिनकी सूक्ष्म चेतना शक्ति अभीष्ट प्रयोजन के लिए उपर्युक्त हो। धन प्राप्ति, अरोग्य लाभ, शत्रुता निवारण, अरोग्य बुद्धि, सुसंतति, बुद्धि वृद्धि अनिष्ट शांति आदि काम्य प्रयोजनों के लिए जिस प्रकार आहुतियों के मंत्र अलग अलग हैं, उसी प्रकार हवनीय सामग्रियां और उनकी मात्रा भी अलग अलग होती है। उनका चुनाव करना आवश्यक है। पदार्थों की सूक्ष्म शक्ति को जानना आयुर्वेद शास्त्र के ऊपर की विद्या है। प्राचीन काल में इस विद्या को, अध्यात्म तत्व ज्ञान के आचार्य भली प्रकार जानते थे। अब इस विद्या के ज्ञाता दृष्टिगोचर नहीं होते फिर भी प्रयत्न करने पर उस विज्ञान को ढूंढ़ निकालना कठिन नहीं।

प्राचीन काल में हवनीय सम्पूर्ण पदार्थों का संस्कार करके उनमें वह सूक्ष्म शक्तियाँ पैदा की जाती थीं जो अभीष्ट उद्देश्य के लिए आवश्यक होती थी। हवन में काम आने वाली औषधियाँ अमुक प्रकार के क्षेत्र में, अमुक नक्षत्र में, अमुक मंत्रों के साथ बोई जाती थीं उन्हें अमुक प्रकार के जल से सींचा जाता था और उनमें अमुक खाद दिये जाते थे। अमुक मुहूर्त में उन्हें तोड़ा जाता था और अमुक मन्त्रों से संस्कार करके उन्हें हवन के योग्य बनाया जाता था। जिन गौओं का घृत उपयोग में लेना होता था उन्हें अमुक प्रकार की घास, अमुक अन्न, अमुक प्रकार का जल दिया जाता था, उनके अमुक मन्त्रों से अभिषिक्त और पूजित किया जाता है। उनका दूध अमुक प्रकार के पात्र में दुह कर अमुक लकड़ी की रई से बिलोकर घृत निकाला जाता था। उसी प्रकार समिधाएं, चरु, राज्य, आदि को संस्कारित करते थे। यज्ञ के आचार्य आदि को तथा यजमान को अमुक प्रकार के रहन सहन एवं नियमों का पालन करना होता था, इस प्रकार संस्कार करने से उन सब में अमुक प्रकार की सूक्ष्म चेतना उत्पन्न होती थी और उस चेतनामय वातावरण को हवन द्वारा उत्तेजित करके, आकाश को अभीष्ट तत्वों से परिपूर्ण कर दिया जाता था। यह परिपूर्णता ही भौतिक या आध्यात्मिक मनोकामनाओं को पूर्ण करने का हेतु बनती थीं।


यज्ञ पिता के लिए अब यह किया जाना चाहिए

‘यज्ञ’ भारतीय विज्ञानवाद का प्रधान आधार है उसमें अपार आत्मोन्नति, स्वर्ग मुक्ति आदि परमार्थिक लक्षों की प्राप्ति, अनेक ऋद्धि सिद्धियों का करतल गत होना, बल-वृद्धि, रोग-निवारण, श्री समृद्धि और सम्पत्ति, सुसंतति, अभीष्ट वर्षा, जीवनीशक्ति, पूर्ण अन्न तथा वनस्पतियों की उत्पत्ति, आत्म-शुद्धि, कुविचारों और दुर्गुणों की निवृत्ति, शाप-वरदान की शक्ति, दीर्घ जीवन मन्त्र चलित अभिचारात्मक दिव्य अस्त्र-शस्त्र, आत्मा-बल की प्रचंडता, व्यापक जन-मन में अभीष्ट परिवर्तन, अदृश्य जगत पर आधिपत्य आदि नाना प्रकार की सुविधाएं और शक्तियाँ प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने यज्ञ विज्ञान के माध्यम से प्राप्त की थी। आत्म-कल्याण के अनन्य लाभों से लेकर भौतिक सुविधाओं की अभिवृद्धि तक में यज्ञ एक सच्चे मित्र की तरह सहायक होता था।

आज यह यज्ञ विद्या लुप्त प्रायः हो रही है। जहाँ तहाँ उसके ध्वंसावशेष मात्र परिलक्षित होते हैं, इनसे प्राचीन काल की स्मृति तो संजीव हो जाती है पर पूर्वजों जैसे लाभ प्राप्त नहीं होते। कारण एक ही है कि उस महाविज्ञान का वह विधान अव्यवस्थित हो गया है, जिसे सुव्यवस्थित रूप से जान कर किसी समय हमारे पूर्वज ‘बहुत कुछ’ ही नहीं ‘सब कुछ’ के अधिपति थे। संसार के विभिन्न प्रकार की शोधों के लिए बहुत कुछ प्रयत्न हो रहा है, हमें भी पूर्वजों के इस महान रत्न भण्डार की शोध के लिए कुछ करना ही चाहिए।

गत 30 वर्षों से गायत्री विद्या के अध्ययन, अन्वेषण, साधन, प्रयोग और परीक्षण के लिए हम प्राचीन हजारों ग्रन्थों का अनुशीलन विचलित कर देने वाली कष्टसाध्य साधनाएं, गायत्री तत्वज्ञों की खोज में यात्राएँ आदि जो कुछ बन पड़ा है सो एकाग्र निष्ठा के साथ करते रहे। ‘कुछ’ सफलता भी मिली है। अब गायत्री माता की तरह यज्ञ पिता की भी कुछ उपासना आवश्यक प्रतीत होती है सो उस कार्य को विशद् गायत्री महायज्ञ के साथ आरम्भ किया गया है। चैत्र में होने वाली पूर्णाहुति उस शोध कार्य का श्रीगणेश शिलान्यास एवं उद्घाटन मात्र है। यहाँ से उस कार्य की पूर्ण तत्परता पूर्वक शोध आरम्भ करने का विचार है ताकि ऋषियों के इस रत्न भण्डार का कुछ पता चल सके।

(1) अनेक यज्ञों के विधानों की पद्धतियों को व्यवस्थित करना (2) प्रयोग करके यज्ञों के लाभों को प्रत्यक्ष करने की स्थिति तक पहुँचाना (3) यज्ञों के सभी अभीष्ट उपकरण जुटाना (4) यज्ञ सामग्रियों की कृषि कराके उपयुक्त गुण वाली वनस्पतियाँ उत्पन्न करना। (5) यज्ञ संबंधी व्यापक साहित्य का एक विशद् पुस्तकालय स्थापित करना, जिससे इस विषय की ‘रिसर्च’ में सहायता मिले, (6) यज्ञ विद्याओं के ज्ञाताओं का सम्मेलन बुलाते रहना तथा उनके परस्पर विचार विनिमय की व्यवस्था बनाना (7) यज्ञ चिकित्सालय खोलकर रोग निवारण के सर्वोत्तम उपाय खोजना। (8) ऐसे अन्वेषकों को तैयार करना जो यज्ञ विद्या की शोध के लिए अपना जीवन खपाने को तैयार हों। (9) केन्द्रीय प्रयोगशाला में नानाप्रकार के यज्ञों का परीक्षण करना और उसके परिणाम दूसरों को बताना। (10) यज्ञ विद्या का एक सुव्यवस्थित विद्यालय स्थापित करना।

दूसरा प्रचारात्मक कार्यक्रम-जनता को यज्ञ विज्ञान की महत्ता को बताने के लिए भी चलाना आवश्यक है, (1) आचार्य बिनोवा की भूदान यात्रा की तरह यज्ञ प्रचार के लिये भी प्रचार टोलियों की यात्रायें देश भर में भ्रमण करें, (2) यज्ञ परिचय का सस्ता साहित्य प्रचारित किया जाय, (3) यज्ञ सभाएं संगठित हों जा अपने-अपने क्षेत्रों में यज्ञों का आयोजन करती रहे, (4) यज्ञ सम्मेलन करके साँस्कृतिक शिक्षा के कार्यक्रम रखे जाएं, (5) यज्ञ की त्याग भावना को जन साधारण के हृदयों में अंकित कराके उनका मानसिक स्तर ऊँचा उठाया जाए।

प्रयोगात्मक और प्रचारात्मक इन दोनों ही कार्यक्रमों को चलाने और आगे बढ़ाने की आज भारी आवश्यकता है। सो इन्हें आरम्भ कर रहे है। जिनके मन में हमारी ही भाँति अन्तः प्रेरणा उठे उन्हें इन कार्यों को आगे बढ़ाने में सहयोग करने के लिए हम सादर आमन्त्रित करते हैं।


-यज्ञाग्नि-

(श्री सुमित्रानन्दन पन्त)


यज्ञाग्नि (Kavita)

दीप्त अभीप्से, मुझको तू ले जा सत्पथ पर, यज्ञ कुण्ड हो मेरा हृदय, अग्नि हे भास्वर।

प्राण-बुद्धि मन की प्रदीप्त घृत आहुति पाकर, मेरी ईप्सा को पहुँचा दे परम व्योम पर।

तू भवनों में व्याप्त, निखिल देवों की ज्ञाता, यज्ञ अंश के भागी वे, तू इनकी त्राता।

निशिदिन बुद्धि कर्म की हवि दे भूरि कर नमन, आते हम तेरे समीप है अग्नि, प्रतिक्षण।

निज यज्ञों में मरण-शील हम करते पूजन, इस अमर्त्य का जो सब के अन्तर में गोपन।

यदि तू मैं, मैं तू बन जाऊँ, शिखे ज्योतिमय, तो तेरे आशीष सत्य हो, जीवन सुखमय,

मन से, ज्ञान रश्मियों से कर तुझे प्रज्वलित, हम सद्बुद्धि, तेज, सत्कर्मों को पाते नित।

जिन जिन देवों का हम करते अहर्निश यजन, वे शाश्वत विस्तृत हवि तुझको अग्नि समर्पण।

ज्योति प्रचेता, निहित अकवियों में तू कति बन, मर्त्यों में तू अमृत, वरुण के हरती बन्धन।

कैसे मुझे प्रसन्न करें हम, करें दीप्त मन, ज्ञान नहीं पथ, प्राप्त तप, बल या साधन।

कौन मनीषा यज्ञ भेंट दे कौन हवि स्तवन, जिससे अग्नि, शिखा तेरी कर सके मन वहन।

*समाप्त*