इष्टान् भोगान्हिवो देवा दास्यंते यज्ञ भाविताः।
—गीता
यज्ञ से प्रसन्न होकर देवता अभीष्ट सुख प्रदान करते हैं।
सप्रेद्धो अग्निर्जिह्वाभि रुदेतु हृदयादधि।
—अथर्व
जो हवन करते हैं उनके हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है।
यज्ञो वै श्रेष्ठतरं कर्म।
यज्ञ संस्कार का सर्व श्रेष्ठ धर्म कृत्य है।
यो यज्ञे यज्ञ परमैरिज्यते यज्ञ संक्षितः।
परमात्मा यज्ञ मय हैं, यज्ञ रूप है उनका पूजन यज्ञ द्वारा ही होता है।
यज्ञाः कल्याण हेतवः।
यज्ञ से सबका कल्याण होता है।
महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः।
यज्ञ और महायज्ञों द्वारा यह शरीर ‘ब्राह्मण’ बनता है।
कस्मैत्व विमुञ्चति तस्मै स्वं विमुञ्चति।
जो यज्ञ को त्यागता है, उसे परमात्मा त्याग देता है।
यज्ञादिभिर्देवाः शक्ति सुखादीनाम्।
यज्ञ से देवत्व, शक्ति, सुख आदि सम्पत्तियाँ मिलती हैं।
यज्ञोऽयं सर्व कामधुक्।
यज्ञ से सब वासनायें पूर्ण होती हैं।
निष्कामः कुरते यज्ञ स परं ब्रह्म गच्छति।
निष्काम भाव से यज्ञ करने से परमात्मा की प्राप्ति होती है।
यज्ञेन घ्रियते पृथ्वी यज्ञ स्तारयति प्रजाः।
यज्ञ ही पृथ्वी को धारण किए हुए हैं। यज्ञ से ही जनता का निस्तार होता है।
यज्ञैरेव महात्मानो वभू वुरधिकाः सुराः।
यज्ञों द्वारा सत्पुरुष देवता बन जाते हैं।
तां वेद विहितमिष्टिमारोग्लार्थी प्रयोजयेत्।
आरोग्य चाहने वाले को वेदोक्त रीति से हवन करना चाहिए।
नायं लोकोऽस्त्य यज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।
—गीता
यज्ञ न करने वाले को लोक और परलोक कुछ भी प्राप्त नहीं होता।
यज्ञो विश्वश्य भुवनस्य नाभिः।
—अथर्व
यज्ञ ही समस्त विश्व ब्रह्माण्ड का मूल केन्द्र है।
अनाहूतोऽध्वरं ब्रजेत्—
बिना बुलाए भी यज्ञ में सम्मिलित होना चाहिए।
अयज्ञियो हतवर्चा भवति।
—अथर्व
यज्ञ रहित मनुष्य का तेज नष्ट हो जाता है।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।
—गीता
वह सर्व व्यापक परमात्मा सदैव यज्ञ में निवास करता है।
नास्ति यज्ञ समं दानं, नास्तियज्ञ समोविधिः।
—महाभारत
यज्ञ के समान और कोई दान नहीं। यज्ञ के समान और कोई विधान नहीं।
यज्ञेन हि देवा दिवंगता यज्ञेनासुरा नपानुदन्तः।
—नारायणोपनिषद्
यज्ञ से ही देवताओं ने स्वर्ग का अधिकार प्राप्त किया और असुरों को हराया।
यज्ञार्थात्कर्मणोऽ यत्रलोकोऽयं कर्म बन्धनः।
—गीता
यज्ञ के निमित्त किए हुए कर्मों के अतिरिक्त और सब कर्म बन्धन रूप हैं।
यज्ञो वै श्रेष्ठ तरं कर्म
यज्ञ ही संसार का सर्वश्रेष्ठ शुभ कर्म है।
(श्री प्रभु दयाल दीक्षित मझिया)
जीवन की घड़ियाँ अनमोल ये, व्यर्थ में क्योंकर खो रहा मानव, धर्म के भार से भाग रहा,
अध−भार को शीश पै ढो रहा मानव। जागने की जब बेला हुई, तब मृत्यु की नींद में सो रहा मानव,
दानव क्योंकर हो रहा मानव, क्यों विष बीज को बो रहा मानव॥
है इस बात को जान चुका, धन धाम न साथ में जायें तेरे, तू जिन पै सर्वस्व लुटाय रहा,
वे भी काम न आयें तेरे। क्यों प्रभु को अपनाता नहीं, वह ही अधपुंज मिटायें तेरे, पाके उन्हें सुख पायेगा तू,
तब देवता भी गुण गायें तेरे॥ प्रिय एक इसी सुखही के लिए, निज जान की बाजी लगानी पड़ेगी।
मन इन्द्रियों की शठता से सदा, करनी अपनी निगरानी पड़ेगी॥
पथ छोड़ स्वतन्त्र हो भागने से, कड़ी ठोकर कालकी खानी पड़ेगी, रहने के लिये फिर से तुझको,
दुनिया ही नवीन बसानी पड़ेगी॥ सुख चाहता है यदि मानव तू, विषयों से तुझे मुँह मोड़ना होगा,
जो फल चाहता प्रेम का तो, बँधे स्वार्थ का बन्धन तोड़ना होगा॥
त्याग की ठोकरों से जग के, सुख वैभव का घट फोड़ना होगा, छोड़ना होगा सभी कुछ ईशसे, नाता स्नेह का जोड़ना होगा।
(श्री लीला देवी, प्रयाग)
किसी भी पदार्थ के मूल का ज्ञान प्राप्त कर लेना अथवा वास्तविकता को जान लेना ही सत्य है। सत्य अखण्ड और अभेद है। प्रत्येक देश में, जाति में, समाज में सत्य अपने अखण्ड रूप में विद्यमान है। हाँ, मनुष्य की गलत धारणाओं से अवश्य उसमें अन्तर आ जाता है तथा सत्य के अनेक टुकड़े हो जाते हैं। धर्म का स्याद्वाद इसी रहस्य को हमारे सामने रखता है।
वर्तमान युग के धर्मोपदेशकों ने सत्य का मूल साम्प्रदायिकता ही आँका है और इसी के सहारे वे मानव को ऐक्य से वञ्चित रखना चाहते हैं। इसी साम्प्रदायिकता की वजह से हम सत्य के वास्तविक रूप को नहीं समझ रहे हैं। फलतः देशों, जातियों और धर्मों में संघर्ष चल रहा है, एक दूसरे के विरोधी बनते जा रहे हैं। इतने पर भी हम इसी खण्ड सत्य का सत्य का अखण्ड रूप समझते हैं। आज के हिन्दू मुस्लिम संघर्ष और प्राचीन काल के जैन बौद्ध वैदिक संघर्ष इसी के दुष्परिणाम हैं। जब तक नेता और विद्वान व्यक्ति इस मनोवृत्ति रूप का परित्याग नहीं करेंगे तब तक वे सत्य के वास्तविक रूप को नहीं पहचानेंगे तथा समाज राजनीति धर्म आदि किसी में भी ऐक्य की स्थापना नहीं हो सकती।
अब हमें यह देखना है कि हम उस नित्य अखण्ड अनादि सत्य का दर्शन किस भाँति करें। सत्य का दर्शन करने के लिए हमें राग द्वेष इत्यादि का त्याग करना पड़ेगा और मध्यस्थ भाव की स्थापना करनी पड़ेगी। यदि राग द्वेष का त्याग किये बिना ही सडडडड डडडड डडडड करना चाहेंगे तो केवल डडडड डडडड डडडडलोकन कर सकेंगे, केवल डडडड डडडड डडडड कुछ मेरा है वही डडडड डडडड डडडड डडडड इस तरह हम यह नहीं डडडड डडडड डडडड डडडड अपने दृष्टिकोण से डडडड डडडड डडडड डडडड के दृष्टिकोण से सत्य है और यदि वास्तव में देखा जाय तो असत्य कुछ नहीं है केवल हम अपने स्वार्थ वश अपने से परे वस्तु को असत्य समझ लेते हैं। अतः किसी भी धार्मिक परम्पराओं, रीति रिवाजों आदि का अध्ययन करने के लिये अपनेपन का राग और परायेपन का द्वेष त्यागना आवश्यक है। हमें यथार्थ दृष्टि से ही उसका अध्ययन करना चाहिए। तभी हम अनेकता में, खण्डता में उस एक और अखण्ड सत्य का दर्शन कर सकते हैं।
विशुद्ध और उदार दृष्टि से देखने पर हमें मालूम होगा कि सभी साम्प्रदायिक सत्यों का मूल एक ही है। उसके आकार प्रकार में भले ही भिन्नता जान पड़े परन्तु वास्तविकता में कोई अन्तर नहीं है। इसलिए हमारा लक्ष्य वह बाहरी आकार प्रकार नहीं वरन् भीतरी वास्तविकता होनी चाहिए और जब हम सत्य के मूल का समझ लेंगे तो मेरा सो सच्चा की भावना नष्ट हो जायगी। उस समय हम इस सिद्धान्त पर पहुँच सकेंगे कि जो कुछ सत्य है वही मेरा है। इसी के द्वारा युगों से चली आने वाली धार्मिक असहिष्णुता, अनुदारता, संकीर्णता दूर होगी।
सत्य के मूल को समझ कर उसकी उपासना करने वाले व्यक्ति किसी भी धर्म या सिद्धान्त का खण्डन न करके उनके विभिन्न दृष्टिकोणों में समन्वय उत्पन्न करते हैं। वे सभी धर्मों में सत्य का एक ही रूप पाते हैं।
मानव जाति अनेक प्रकार के अत्याचार, दम्भ, छल, द्वेष, घृणा, वैर आदि से परिपूर्ण है। इसका कारण मन, वाणी और शरीर की एकता न होना है। चूँकि एकता न होने के कारण मनुष्य मन से कुछ सोचता है वाणी से कुछ कहता है और शरीर से कुछ करता है। यह कैसी विचित्र विडम्बना है। यह मनुष्य के पतन की पराकाष्ठा है। इसका उपाय केवल सत्य है। सत्य का अनुकरण करने से ही इनसे छुटकारा मिल सकता है। सत्य को अपनाने के पश्चात् हम जो कुछ मन में सोचेंगे उसे ही वाणी से कहेंगे तथा शरीर से करेंगे। इस प्रकार तीनों में एकता उत्पन्न हो जायगी। मन वाणी तथा शरीर की एकता के साथ मानव कर्त्तव्य ही सत्य है।
जैन धर्म के सुप्रसिद्ध आचार शास्त्र “प्रश्न व्याकरण” में भगवान महावीर का एक अमर वाक्य आता है “तं सच्चं खु भाखं” अर्थात् सत्य ही भगवान है, क्या ही सुन्दर भावना है। वास्तव में सत्य का स्थान इतना ही ऊँचा है। यदि मनुष्य सत्य को भगवान समझ कर उसकी आराधना करे तो संसार की कठिन से कठिन समस्याएँ सुलझ सकती हैं। देश कल्याण का मार्ग खोज सकता है। सत्य को भगवान समझ कर पूजना, मनुष्य को भगवान समझ कर पूजने से कहीं अधिक लाभदायक है।
अतएव इस युग में, जो कि मानव जाति के सर्व नाश का युग है, जिसमें कि मिथ्या आहार विहार, मिथ्या आचार विचार ने मानवता पर अमानवता का परदा डाल दिया है। सत्य की उपासना के द्वारा ही विश्व का, राष्ट्र का, धर्म का और मानव समाज का कल्याण हो सकता है इस संकट काल से सत्य ही हमारा पीछा छुड़ा सकता है।
अस्तु विश्व कल्याण की दृष्टि से समाज सुधारकों, धर्म उपदेशकों का कर्त्तव्य है कि वे अखण्ड और वास्तविक सत्य को कार्य रूप में अपनाकर जनसाधारण के समझ उपस्थित करें जिससे कि विभिन्न सम्प्रदायों, दृष्टिकोणों और धर्मों में समन्वय उत्पन्न हो तथा मानव एकता की ओर अग्रसित हों।
(श्री अमर चन्द, नाहटा)
काल का प्रहार अनन्त है। उसका न ओर है न छोर। काल कभी नहीं था, यह कल्पना ही नहीं की जा सकती और न यह कल्पना ही की जा सकती है कि कभी रहेगा ही नहीं, समाप्त हो जायगा। वर्तमान भूत के गर्भ में विलीन हो रहा है तो भविष्य वर्तमान में आ आकार समा रहा है। यह अरघट माला निरन्तर चल रही है। भूत भविष्यत् व वर्तमान तीनों का अटूट सम्बन्ध है। गहरी विचारणा के अभाव में हम अनेक बार भूत भविष्यत् की उपेक्षा कर वर्तमान को ही सब कुछ मान लेते हैं और तदनुसार आगे पीछे की ओर आँखें मूँद मनमानी प्रवृत्ति करने लगते हैं पर जिस प्रकार बालक आँख मिचौनी के खेल में भले ही अपने को छिपा हुआ मान ले पर आँख पर के दिये हुए हाथ के दूर होते ही छिपा हुआ प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार वर्तमान को ही सब कुछ मानकर यथेच्छा प्रवृत्ति करने पर भी भूत भविष्यत् के परिणामों से हम बच नहीं सकते यह निर्विवाद है।
कृतं कर्म क्षयो नास्ति, बलम् कोटि शतैरपि।
विचार करके देखा जाय तो वर्तमान भूत पर आधारित है और भविष्यत् वर्तमान पर। हमने पहले जो कुछ अच्छा बुरा किया उसका परिणाम वर्तमान में अनुभव कर रहे हैं और वर्तमान में जो कुछ कर रहे हैं उसका परिणाम भविष्य में प्राप्त होगा। अच्छे या बुरे किये गये कर्मों का फल तो अवश्य मिलेगा ही, क्रिया निष्फल तो जाती नहीं। यदि भावी परिणाम नहीं सोचें तो वर्तमान तो एक क्षण मात्र ही है। परवर्ती क्षण ही तो भविष्यत् है जो क्षणान्तर में वर्तमान होने वाला है और वर्तमान का क्षण भूत हो जाने वाला है अतः उन दोनों से उदासीन रहा नहीं जा सकता। जैसा भी हम बनना चाहते हैं उसके योग्य प्रवृत्ति इस समय करनी होगी और वर्तमान में जो कुछ कर रहे हैं क्योंकि कार्य के निष्पन्न होने में बहुत सा समय लगता है। अनेक वर्तमान समयों में जो काम करते हैं उसका परिणाम तो भविष्य में ही मिलेगा न। इस तरह समय जो कुछ कर रहे हैं वह तो परवर्ती समय में ही भूतकाल में विलीन हो जायगा और उन भूत कालीन प्रवृत्तियों का फल ही भविष्य में मिलने वाला है।
समय बहुत ही सूक्ष्म है उसकी बात छोड़ भी दें और एक जीवन को ही लें तो उसके लिए भी वही बात लागू होती है। वर्तमान जीवन के निर्माण में बहुत कुछ भूतकालीन कार्यों का− कर्मों का हाथ रहा है और इस जीवन के कर्मों का फल अगले जन्म में मिलने वाला है। इसलिए “यावत जीवेत् सुखी जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्” यह चर्वाक का सिद्धान्त ठीक नहीं है। साधारणजन जो यह कहा करते हैं—“इह भव मीठा तो परभव केणे दीठा”।
अभी तो मौज मजा कर लो परभव किसने देखा है? पर जब इस जन्म में हम पूर्वकालीन प्रवृत्तियों का परिणाम परवर्ती काल में देखते हैं तो इस जन्म के कार्यों का परिणाम अगले जन्म में नहीं मिलेगा यह कल्पना ही नहीं की जा सकती। जो आत्मा को नित्य मानने वाले हैं उनके लिए तो भावी परिणामों पर विचार करते हुए ही वर्तमान में प्रवृत्ति करना होगा। भविष्य उज्ज्वल चाहते हों तो तद्नुरूप ही वर्तमान में चलना होगा। अभी जो चोरी चारी करता है, उसे क्षणिक सुख मिलता है पर उसका परिणाम जब भी मिलेगा दुखद ही होगा। इस एक जीवन में ही अच्छे बुरे कितने काम करते हैं किसी का फल तत्काल किसी का कुछ देर से मिलता है।
भूत काल को चाहे हम प्रत्यक्ष नहीं देखते हों, पर उसका परिणाम तो वर्तमान में अनुभव कर ही रहे हैं। कई बातें जो हम इस जीवन में अनुभव करते हैं उनका वर्तमान से सम्बन्ध प्रतीत नहीं होता। अचानक अनहोनी घटनाएँ घटित हो जाती हैं। उसका कारण भूतकालीन कर्म ही मानने पड़ते हैं। वैसे थोड़े समय पहले के कार्यों का फल तो वर्तमान में अनुभव करते ही हैं वे भूतकालीन ही हैं। अन्तर इतना ही है एक दीर्घकालीन भूत है दूसरा निकट कालीन। निकट कालीन की स्मृति बनी रहती है, दीर्घकालीन की विस्मृति होने से उसका सीधा सम्बन्ध हम जोड़ नहीं पाते।
लिखने का निष्कर्ष यही है कि हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति विचार पूर्ण हो जिससे भविष्य उज्ज्वल हो। वर्तमान में ऐसी प्रवृत्ति नहीं करें जिससे भविष्य बिगड़े, दुःख भोगना पड़े। भविष्य को दूर न समझें वह तो सामने ही खड़ा है। किसी कर्म का थोड़ा जल्दी किसी का कुछ देर से पर उसका फल तो भोगना ही होगा। यह भूलिए नहीं। हाँ भविष्य वर्तमान पर आधारित है अतः वर्तमान में खूब सम्भल के चलें।
मनीषियों ने मानव को चिन्ता से मुक्त करने के लिए यह जरूर कहा है कि गई बातों को न सोचो क्योंकि वे तो जैसी भी होनी थी हो चुकीं अब चिन्ता से लाभ नहीं और भविष्य में क्या होगा इसकी चिन्ता न करो, क्योंकि वर्तमान में शुभ प्रवृत्तियाँ कर रहे हो तो भविष्य अच्छा निश्चित है। अतः भूत भविष्य की चिन्ता में न पड़ वर्तमान को ही अच्छे रूप में बितावें। पर उसका यह आशय कदापि नहीं कि मनमानी प्रवृत्ति कर चित्त बिगड़े। वर्तमान की अशुभ प्रवृत्तियों के प्रति उपेक्षा न करिये यह अवश्य मिलने वाला है, करना सीखो।
(प्रो. लालजीराम शुक्ल)
सभी धर्मों का सार योग है, जो मानसिक शाँति प्राप्त करने का श्रेष्ठ मार्ग है। योग का अर्थ होता है कि व्यक्तिगत जीव में जो आत्म-तत्व व्यापक है, वह समष्टि में समाविष्ट हो जाय। इस क्रिया के उपराँत मनुष्य की स्थिति शून्य हो जाय—यही ईश्वर साक्षात्कार का भी मार्ग है। इच्छाओं के समुच्चय का नाम व्यक्ति है। इस प्रकार हम देखते हैं कि व्यक्ति इच्छाओं को समाप्त कर समृद्धि की ओर प्रेम तत्व की ओर अग्रसर होता है—
मालिक तेरी रजा रहे, और तू ही तू रहे। बाकी न मैं रहूँ न मेरी आरजू रहे॥
अहंकार युक्त स्वत्व की समाप्ति के लिये क्रमशः इच्छाओं की समाप्ति करनी पड़ती है। भारतीय परम्परा में ज्ञान, भक्ति और कर्म तीन योग−पथ प्रदर्शित हैं। ज्ञान योग, इच्छाओं की समाप्ति की ओर ही प्रमुखतया प्रयत्नशील है। इच्छा और दुख एक दूसरे के पूरक तथा आपेक्ष हैं। क्राइस्ट, बुद्ध तथा कृष्ण सभी ने यही कहा है। कर्म योग में निष्काम कर्मशीलता की ओर ध्यान विशेष रखा जाता है। भक्ति योग से भी अपने भगवान के समक्ष अपनी इच्छाओं को समाप्त किया जाता है। इस प्रकार सभी का उद्देश्य सम्पूर्ण तत्व की ओर उन्मुख कराना है। यदि हम शान्ति का ध्यान तथा आवाहन करें तो इच्छाओं की कमी तथा ह्रास होता है। इच्छाओं के ध्यान से शान्ति स्वयं आ जाती है। बौद्ध तथा अद्वैत दर्शन में यही सापेक्षिक अन्तर है।
इच्छाओं का विनाश सीधे करना हानिप्रद नहीं तो क्लिष्ट तथा खतरनाक अवश्य है। हाथ के काम को पूरा करना अत्यन्त ही आवश्यक है। इच्छाओं के अकस्मात् निरोध से एक प्रकार की आत्म−हत्या हो जाती है। मनोविज्ञान आत्मा हत्या नहीं प्रत्युत आत्मा विकास का मार्ग बताता है। ब्रह्मपद−विष्णुपद ये सभी आत्म विकास के प्रतिफल हैं। इच्छाओं की समाप्ति एक जन्म में नहीं प्रत्युत बहुत दिनों में होती है। अतः हमें क्रमिक विकास की ओर ध्यान देना चाहिए। यह जीवन का एक दिन का तो है नहीं अतः शीघ्रता करना मूर्खता है। मनुष्य को पहले छोटी इच्छाओं की समाप्ति करनी चाहिये। आशीर्वाद से मनुष्य के मन में एक दृढ़−निश्चय उत्पन्न हो जाता है—जो जीवन में अनेकों प्रकार का चमत्कार दिखाता है। इस प्रकार के अनेकों उदाहरण मिलते हैं। निष्कामी सत्पुरुष—जिस को स्वतः इच्छा कुछ नहीं होती−उसके आशीर्वाद में सचाई निकलती है। बुद्ध तथा कृष्ण आज भी अपने मार्ग तथा साधकों के लिए चिरनवीन हैं। स्वतः की कोई इच्छा नहीं थी।
बाहरी मन से व्याभिचारी होना उतना घातक नहीं है जितना आन्तरिक व्याभिचारी−मन। बाहरी व्यभिचार समाज के दण्ड से छूट जाते हैं परन्तु आन्तरिक को तो स्वयं मनुष्य ही नहीं जान पाता। ढोंग एक दिन मनुष्य को आत्म हत्या के लिए भी बाध्य कर देता है। इच्छाओं को रखते हुए महात्मापन दिखाने से अपना ही नहीं सारे देश का विनाश होता है। अतः आन्तरिक−मन से इच्छाओं को एक एक करके निकाल देना चाहिए। इच्छाओं को खोज निकालना अत्यन्त ही दुरूह है। इच्छाओं की समाप्ति−भोग−विचार−कल्पना आदि अनेक मार्गों से होती है। जो इच्छा जिस मार्ग से समाप्त होती हो, उसी को अपनाना चाहिये। इसी से सच्चा लाभ होता है।
गुरु और चिकित्सक में अन्तर है। गुरु समस्त रोगों के मूल को निकालता है चिकित्सक एक−दो को। चिकित्सक परावलम्बी बनाता है, परन्तु गुरु स्वावलम्बी। गुरु गुरु नहीं है जो शिष्य को ‘स्व’ का ज्ञान न करादे। भगवान बुद्ध इसीलिए “धर्म” का अर्थ “मार्ग” करते थे। यह “मार्ग” इच्छाओं से मनुष्य का त्राण करता है। जनका गुरु ‘अष्टावक्र’ सभा में उपहासित हुआ—और उसने सभासदों को चमार कहा। उन्होंने कहा कि ये लोग चमड़े का मूल्य करते हैं—ज्ञान तथा आत्मा का नहीं।
भगवान बुद्ध ने योग द्वारा इच्छाओं का ज्ञान प्राप्त किया और उसी के द्वारा उनको समाप्त किया। मनुष्य का परम पुरुषार्थ इच्छाओं को वश में करना है। जानी हुई इच्छाओं को वश करना सरल है—नहीं जानी हुई इच्छाओं को वश में करना ही परम पुरुषार्थ है। अहंकार ग्रस्त व्यक्ति शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता। भगवान बुद्ध ने अहंकार को त्याग कर ही परम−सत्य प्राप्त किया।
योग भव रोग की परम−चिकित्सा है। हम सभी को योगी बनने की आवश्यकता होती है। ओझा लोगों में भी सद्भावना तथा आत्म−संयम होता है—इसलिए उन्हें सर्वांशतः अथवा अल्पाँशतः सफलता मिलती है। सद्भावना तथा आत्म−संयम द्वारा विचारों में दृढ़ता आती है। ऐसे सद्भावी व्यक्ति के दर्शन मात्र से ही शान्ति तथा आत्म−ज्ञान प्राप्त होते हैं।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
अपने हृदय में यह बात अच्छी तरह स्थिर कीजिए कि आप योग्य हैं, प्रतिभाशाली हैं, शक्ति वान हैं। अपने उद्देश्य की ओर वीरता और धैर्य पूर्वक पाँव उठा रहे हैं। परमेश्वर ने कूट कूट कर आपमें अद्भुत योग्यताएँ भरी हैं।
आत्म संकेत दिया करें। शान्त चित्त से मन में पुनः पुनः इस प्रकार के विचारों को प्रचुरता से स्थान दें कि “मैं बलवान हूँ। दृढ़ संकल्प हूँ। सब कुछ करने में समर्थ हूँ। मैं जिन पदार्थों की आशा−अभिलाषा करता हूँ, वह अवश्य प्राप्त करूंगा। मैं दृढ़ता से अपने उद्देश्य की ओर अग्रसर हो रहा हूँ। मुझ में मानसिक धैर्य है। मेरा मानसिक संस्थान आत्म−विश्वास से परिपूर्ण है। मैं धैर्य पूर्वक अपने उद्देश्य की ओर पाँव उठा रहा हूँ। मैं विघ्न बाबाओं से विचलित नहीं होता हूँ।”
शक्तिशाली आत्म संकेत में अद्भुत शक्ति है। जिन विचारों के संपर्क में हम रहते हैं, जिनमें पुनः पुनः रमण करते हैं वैसे ही बन जाते हैं। ये संकेत हमारे मानसिक संस्थान के एक अंग बन जाते हैं। प्रकाशमय विचार धारा से कंटकाकीर्ण और अन्धकारमय पथ भी आलोकित हो उठता है।
जब आप दृढ़ता से कहते हैं, ‘मैं बलवान हूँ, दृढ़ संकल्प हूँ, गौरवशाली हूँ।” तो इन विचारों से हमारा आत्म विश्वास जागृत हो उठता है। हम साहस और पौरुष से भर जाते हैं और आत्म गौरव को समझने लगते हैं। हमारी शक्तियाँ वैसा ही काम करती हैं जैसी हम उन्हें आज्ञा देते हैं।
आत्म विश्वास पाने के लिए सफलता जादू जैसा प्रभाव डालती है। एक सफलता से मनुष्य दूसरी सफलता के लिए प्रेरणा पाता है। आप पहले एक साधारण कार्य चुन लीजिए और दृढ़ता से उसे पूर्ण कीजिए। जब यह पूर्ण हो जाय, तो अधिक बड़ा काम हाथ में लीजिए। इसे पूरा करके ही छोड़िए। तत्पश्चात् अधिक बड़े और दीर्घकालीन अपेक्षाकृत कष्ट साध्य कार्य हाथ में लीजिए और अपनी समस्त शक्ति से उसे पूर्ण कीजिए।
इस प्रकार क्रमानुसार बड़े बड़े कार्य हाथ में लेते जाइए। शर्त यह है कि ये सब काम पूर्ण ही हों, अपूर्ण न छूट जायं। अपूर्ण प्रयत्न आत्म−विश्वास के घातक हैं। अतः आप जो कुछ हाथ में लें उसे पूर्ण करके ही छोड़ें। अधूरा प्रयास न रह जाय। दस सफलताओं के पश्चात् एक असफलता भी आ गई तो वह हमें संशय से भर देती है। क्लेश मात्र भी संशय घातक सिद्ध होगा। एक बार कार्य हाथ में लेकर उसे पूर्ण करने में हर प्रयत्न कर देखें।
आपका मन कर्त्तव्य से, कठोर मेहनत से दूर भागेगा, उस कार्य को बीच में ही छोड़ने की ओर प्रवृत्त होगा। इस पलायन प्रवृत्ति से आपको सावधान रहना होगा। मन से लगातार लड़ना चाहिए और जब यह निश्चित मार्ग से च्युत होना चाहे, तुरन्त सावधानी से कार्य लेना चाहिए। कभी आपको आलस्य आयेगा, अपना कार्य मध्य ही में छोड़ देने को जी करेगा, लालच मार्ग में दिखलाई देंगे लेकिन आप छोटे लाभ के लिए बड़े फायदे को मत छोड़िए। भूल कर भी चञ्चल मन के कहने में मत आइए, प्रत्युत विवेक को जागृत कर उसके संरक्षण में अपने आपको रखिए। जाग्रत समय में मन को निरन्तर कार्य में लगाये रखिए। जब तक जागते हैं किसी उत्तम कार्य में अपने आपको संलग्न रखें, तत्पश्चात् सोयें। सुप्तावस्था में भी आप मन की चञ्चलता से दूर रह सकेंगे। धीरे धीरे धैर्य पूर्वक अभ्यास से मन चंचलता दूर होती है।
गीता में मन को वश में करने के लिये बड़ी सुन्दर तरकीब बताई गई है:—
शनैः शनै रूपरमेद्बुद्धया धृतिगृहीतया।
आत्म संस्थं मन कृत्वा न किञ्चिदपि चिंतयेत्॥
(गीता 6। 15)
“धीरे धीरे अभ्यास करता हुआ उपरामता को प्राप्त हो, धैर्ययुक्त बुद्धि से मन को परमात्मा में स्थिर करके और किसी भी विचार को मन में न आने दे।”
अपने कार्य में समस्त शक्तियाँ लगाएँ। धैर्य पूर्वक निज उद्देश्य की प्राप्ति में मन को एकाग्र किए रहें। स्थिर मन आपकी शक्तियों का भण्डार है।
व्रत, उपवास, स्नान, पूजन, मन को सदैव सत्कार्य में लगाये रखना, सारे कार्य नियम पूर्वक करना, अनिष्टकर चिन्तन से बचना, मन के विपरित कार्य करना—ये अन्य साधन हैं जिनका पालन करने से आत्म विश्वास बढ़ता रहता है। नवरात्रि में नौ दिन का व्रत संयम का एक अच्छा साधन है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय इन सप्त व्रतों के निरन्तर अभ्यास से दृढ़ता आती है।
माता पिता को चाहिए कि बच्चों के शुभ संकल्पों को न तोड़ें। बार बार उन पर अपना गन्तव्य लादने से उनमें पराजयवाद की दुर्बलता आ जाती है। उन्हें निरन्तर अच्छे कार्यों में प्रोत्साहन देना चाहिए। प्रोत्साहन से बच्चों में अपनी शक्तियों के प्रति विश्वास उत्पन्न हो जाता है। किसी बच्चे को प्रताड़ित कर उसकी उमंगों को कुचल डालना बड़ा भारी पाप है।
आत्म विश्वास की एक आन्तरिक प्रेरणा है। प्रायः देखा जाता है कि मनुष्य बाह्य जगत से प्रेरणा का सहारा देखा करता है। जब बाहर से प्रोत्साहन प्राप्त नहीं होता, तो निराश हो जाता है। यह स्थिति बड़ी चिंतनीय है। आप बाहर से प्रेरणा की आशा क्यों करते हैं? स्मरण रखिये किसी दूसरे को आप में दिलचस्पी नहीं है। स्वयं आपको अन्दर से प्रेरणा लेनी होगी। आपका आत्म विश्वास स्वयं आपकी ही विकसित चीज है। आपके संकल्पों और मन्तव्यों की दृढ़ता किसी बाह्य व्यक्ति में आधारित न होकर आन्तरिक प्रेरणा पर टिकनी चाहिए। आत्म विश्वास में भी स्वावलम्बन से काम लें।
पलायन की कुप्रवृत्ति अर्थात् अपने काम को मध्य में ही छोड़ भागना और पूरा न करना आत्म विश्वास—विरोधिनी शक्ति है। पलायन की वृत्ति जैसे ही मन में उत्पन्न हो, तो समझ लीजिए कि काम का कठिन भाग आ गया है। इसी स्थिति में सम्हलने की आवश्यकता है। अतः कठिनता को भूल कर चंचल चित्त को अपने कार्य में स्थिर रखना चाहिए।
कभी कभी अपनी सफलता पर फूल कर मनुष्य लम्बी कष्टसाध्य कठिन योजनाएँ बनाता है। वह ऐसे कार्य उठा लेता है जो उसकी शक्ति−सामर्थ्य के बाहर की बात होती है। इन कार्यों में विफल होकर वह आत्म विश्वास का क्षय करता है। कार्य की अपूर्णता अपनी शक्तियों के प्रति अविश्वास उत्पन्न कर देती है। साधक को चाहिए कि ऐसी योजनाएँ ही हाथ में ले जिसमें वह सफल मनोरथ हो सकता हो और जो उसकी आत्म शक्तियों की पहुँच के भीतर हों। शक्ति−सामर्थ्य से अधिक भार वहन करने वाले की सब सफलता इस प्रकार विफलता में बदल सकती है। अपनी शक्ति का पूरा पूरा ज्ञान रखिए और सामर्थ्य के अनुसार ही भार उठाइए।
शक्ति के अनुसार भार उठाने पर अपनी सम्पूर्ण शक्तियों से उसे पूर्ण करने में संलग्न हो जाइए और भविष्य के बारे में अधिक चिन्ता मत कीजिए। व्यर्थ का शक−शुबा, चिन्ता, उथल पुथल आत्म−विश्वास को क्षय करता है।
प्रायः मनुष्य की गुप्त शक्तियों का विकास यकायक नहीं होता है। कुछ व्यक्ति बड़े होकर अपना विकास कर लेते हैं पर यह बात सर्व सिद्ध है कि साधारण योग्यताओं वाला व्यक्ति भी अभ्यास एवं लगन से केवल आत्म−विश्वास के कारण अपनी कार्य शक्तियाँ कई गुनी बढ़ा सकता है। निरन्तर एक ही विषय था तत्व का अभ्यास करते रहने से उसमें उच्चता प्राप्त हो जाती है। जिसे अपने कार्य की लगन है, उसकी कार्यकारिणी शक्तियाँ किसी न किसी दिन अवश्य जागृत होंगी। प्रायः कुछ व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के विरोधी होने की शिकायत किया करते हैं। “हमें अमुक साधन प्राप्त होते, तो हम भी उन्नति कर लेते”—यह उक्ति उन व्यक्तियों की है जिनमें आत्म विश्वास की न्यूनता है। सफलता की जड़ मनुष्य के मन में हैं। उसके आत्म विश्वास से सिंचित होकर सफलता का पौधा उगता है। जिसके अन्दर कार्यकारिणी शक्ति है, जो अपने आत्म विश्वास से किसी काम में तन, मन, आत्मा से जुटा हुआ है, वह एक न एक दिन अवश्य बाह्य साधन एकत्रित कर लेगा। हमारी बाह्य परिस्थितियाँ आन्तरिक कार्यकारिणी शक्ति का अनुसरण करने वाली हैं। जो शक्तियाँ हमें अन्दर से प्राप्त हुई हैं, वे बाह्य जगत में प्रकट होकर रहेंगी।
स्मरण रखिये, आप मनुष्य हैं। मनुष्य जगत नियन्ता की सर्वोत्कृष्ट शक्तिसम्पन्न कलाकृति है। सबसे उत्तम दैवी शक्तियों द्वारा उसके शरीर, मन और आत्मा का निर्माण किया गया है। सभी के लिए सुख समृद्धि की दैवी योजनाएँ बनी हुई हैं। अपने आलस्य, प्रयत्न की कमी और अकर्मण्यता का दोष परमात्मा पर मढ़ना उचित नहीं है। यदि हम अपनी शक्तियों के प्रति पूर्ण विश्वासी बन कर कार्यरत हो जायं तो निश्चय जानिए हम अपनी गुप्त शक्तियों के भण्डार को खोल सकते हैं। प्रत्येक कलाकार अपनी कृति में अपने की गुणों, आदर्शों एवं दृष्टिकोण को प्रकट करता है। कलाशिरोमणि ईश्वर ने मनुष्य में अपनी सम्पूर्ण योग्यताएं, दैवी गुण, विशेषताएँ प्रकट की हैं। आप अपने चरित्रों में इन्हें क्यों नहीं प्रकट करते? क्यों इनका विकास नहीं होने देते? शरीर के भीतर साक्षात् परमात्मा अपनी सम्पूर्ण शक्तियों में प्रकट हो रहा है और अणु में रम रहा है। उसी परम तत्व को अपने कार्यों में प्रकट करो। अपनी देह, प्राण और हृदय को उसी से संजीवित करो। क्या तुमने वेद का यह अमर सन्देश नहीं सुना है कि—
“एको देवः सर्वभूतेषु गूढः, सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः, साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥”
(अर्थात् वह एक ही परमात्मा हम सब मनुष्यों (तथा अन्य प्राणियों) के अन्तर में छिपा हुआ है। वही सर्वत्र व्याप्त है। वही हम सब जीवों का अन्तरात्मा है। जो कुछ जगत में कार्य हो रहा है, उसका नियन्ता है। सब प्राणियों के भीतर बस रहा है। सब संसार के कार्यों को वह साक्षी रूप में देखता है। उसका कोई जोड़ नहीं। वह सब दोषों से रहित है।)
आत्म विश्वास द्वारा दैनिक जीवन तथा कार्यों में अपने दैवी स्वरूप को प्रकट करते चलिए। पशुत्व की कोटि से ऊँचा उठने के लिये ईश्वरीय शक्ति का साहचर्य हमारे बड़े काम का तत्व है।
इस संसार में आप एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। संसार को आपकी बेहद जरूरत है। परमेश्वर ने आपको देवदूत बना कर स्वयं प्रसन्न और समृद्ध रहने, जगत से अज्ञान दूर करने, सत्य, न्याय और दया का प्रचार करने के लिये भेजा है। अपने इस स्थान को ग्रहण कीजिए। सच मानिए, इस दैवी सन्देश के लिये, मनुष्यों में परस्पर प्रीति सुख शान्ति वृद्धि के हेतु कार्य करने के लिए आपमें पर्याप्त बुद्धि और शक्ति है।
जो साध्वी निर्धन रोगी दुःखी राह चल कर थके हुए भी पति की पुत्र के भाँति वत्सलता से (काम भावना में नहीं) सेवा करती है वह अपने धर्म का पालन करती हैं।
जो स्त्री अपने पति की जितनी चाह रखती है, उतनी काम भोग ऐश्वर्य, और सुख की भी नहीं करती उसे धर्म प्राप्त होता है।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा, बी.ए. एल.एल.बी.)
मानसिक सन्तुलित अवस्था मन की स्थिर बुद्धि सम्पन्न शान्तिमय स्थिति है, जिसमें विवेक पूर्णरूप से जाग्रत रहता है। जैसे तराजू के दोनों पलड़े समान रूप से भारी होने के कारण डण्डी को सन्तुलित रखते हैं, वैसे ही मन की पूर्ण सन्तुलित अवस्था में मानसिक उत्तेजना, वितर्क व्यर्थ की उथल−पुथल चिन्ता वासना आदि से मुक्त रहती है। इस अवस्था में मनुष्य अच्छी तरह विवेक को जाग्रत रख कर सोच विचार कर सकता है।
यह पूर्ण आनन्द की स्थिति है। इस अवस्था में मनुष्य अपने भले बुरे को अच्छी तरह समझता है। वह अपने शुभ संकल्पों का निर्माण करता है, कर्त्तव्य बुद्धि से उसे अपने भले बुरे का ज्ञान रहता है। उसका आत्म विश्वास बढ़ जाता है। स्थिरता एवं शान्ति के कारण उसकी मानसिक शक्ति में भी अभिवृद्धि होती है। व्यर्थ चिन्ताएँ नष्ट हो जाती हैं। मिथ्या दुःखों से मुक्ति प्राप्त होती है। हम अनुचित माया−मोह के विकारों से बचे रहते हैं।
पूर्ण सन्तुलित व्यक्ति मानसिक उद्वेगों से मुक्त रहता है। उद्वेग एक प्रकार का उफान है, मन में उठने वाला विद्रोह है। यह मन की असाधारण अशान्त स्थिति है। उद्वेग में मनुष्य का शरीर एक प्रकार की कम्पनों से परिपूर्ण हो उठता है और वह थरथराहट से भरा रहता है। उद्वेग में धैर्य नष्ट हो जाता है, क्रोध ऊँचा उठ आता है और व्यर्थ की शंकाएँ बुद्धि को भ्रष्ट कर देती हैं। भय, चिन्ता, ईर्ष्या, लोभ, वासना के ताण्डव विवेक को अपना कार्य नहीं करने देते। वही मन सन्तुलित हो जाने पर स्थिर बुद्धि ग्रहण करता है, प्रसन्न और उदार बनता है, सन्तुष्ट और शान्त बनता है। उसे भविष्य से बड़ी बड़ी आशाएँ होती हैं।
सन्तुलित मन में एकाग्रता सबसे बड़ी शक्ति है। सन्तुलित व्यक्ति एक−विचार पर की सम्पूर्ण शक्ति केन्द्रित कर पाता है। उसकी विचार शक्ति विकेन्द्रित होकर व्यर्थ ही नष्ट नहीं होती। अकारण ही वह भय तथा काल्पनिक दुःखों से ग्रसित नहीं होता।
मानसिक सन्तुलन पर स्वास्थ्य का बड़ा प्रभाव पड़ता है। जब स्वास्थ्य अच्छा होता है और शरीर रोग मुक्त होता है, तो मानसिक सन्तुलन ठीक रहता है। रोगी शरीर होने पर प्रायः सन्तुलन बिगड़ जाता है। कभी कभी मानसिक सन्तुलन के भंग होने का कारण बुरा स्वास्थ्य होता है। स्वयं अपने मानसिक सन्तुलन का निरीक्षण कीजिए और उसके नष्ट होने के कारण मालूम कीजिए। यदि आपका मानसिक सन्तुलन भंग है, तो उसका दूषित प्रभाव उसके शरीर पर प्रकट हुए बिना नहीं रह सकता। पाचन विकार से शिथिलता, चिड़चिड़ापन, निराशा उत्पन्न होती है। यदि शरीर में कोई कष्ट हो, तो मनुष्य दुःखी, अतृप्त एवं अशान्त बना रहता है। प्रायः देखने में आता है कि जीर्ण रोगियों को क्रोध एवं आवेश अधिक आता है, उनका स्वभाव नैराश्य पूर्ण होता है दुःख पूर्ण मनःस्थिति अधिक रहती है।
भोजन का मानसिक सन्तुलन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। आप जैसा भोजन लेते हैं, वैसा ही सन्तुलन स्थिर रहता है। खराब, दूषित, बासी, या अभक्ष्य पदार्थों के भोजन से मानसिक सन्तुलन भंग हो जाता है। मद्य, तमाकू , पान, सिगरेट से वासना उद्दीप्त होती है। इनका प्रयोग करने वालों में कामोत्तेजना बनी रहती है। माँस के साथ क्रूरता का अटूट सम्बन्ध है। मांस खाने वाले तुनकमिज़ाज, उत्तेजक स्वभाव, क्रुद्ध होने वाले, क्रूर हिंसामय प्रवृत्ति के होते हैं। मिर्च के साथ उत्तेजना का निकट साहचर्य है। राजसी भोजन, अधिक भोजन और अभक्ष पदार्थों के भोजन सन्तुलन को नष्ट करने वाले हैं। इनके विपरीत शाक भाजी दूध इत्यादि के साथ सात्विक भावनाएँ संयुक्त हैं। शाकाहार करने वाले ऋषि मुनि गण सरलता से मानसिक सन्तुलन स्थिर रख सके हैं। सात्विक भोजन सुख शान्ति की अभिवृद्धि करने वाला है।
संगति और वातावरण मानसिक संतुलन को सुधारते बिगाड़ते रहते हैं। जिसकी संगति सदाचारी विद्वान, त्यागी, निस्पृह, उदार व्यक्तियों की हैं, जो अच्छे विचारों वाले व्यक्तियों के संपर्क में रहते हैं, वे व्यक्ति शान्त रहते हैं। प्राचीन ऋषि मुनि संसार के कोलाहल से दूर प्रकृति के उन्मुक्त प्रशान्त वातावरण में कल कल झरते हुए झरनों के किनारे विचार तथा ब्रह्म चिन्तन किया करते हैं। उस स्थिति में उनका सन्तुलन स्थिर रहता था। यदि हम सन्तुलित मनः अवस्था के इच्छुक हैं, तो हमें भोजन, संगति और वातावरण तीनों ओर से आत्म−सुधार करना चाहिये।
सहिष्णुता की वृद्धि करें। सहिष्णुता का तात्पर्य न केवल कष्ट और विरोध सहन शक्ति है, प्रत्युत आने वाले संकट में शान्त और सन्तुलित रहने का गुण भी है। सहिष्णु व्यक्ति गहन गम्भीर समुद्र की तरह है जिसके अनन्त गहराई पर मामूली तूफानों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह अनायास ही आए हुए कष्टों से घबराता या पथ−च्युत नहीं होता। शान्ति से कठिनाइयों को अपने ऊपर झेलता है। खतरे में ठण्डे दिमाग से काम करता है। यह शान्त और नित्य साथ करने वाला गुप्त साहस है।
सहिष्णुता निष्क्रिय साहस और वीरत्व है। ऐसा व्यक्ति अन्तःकरण से एक गुप्त सामर्थ्य पाता रहता है, जिसके कारण वह शत्रुओं के सम्मुख अजेय, स्थिर, साहसपूर्ण हृदय से खड़ा रहता है सहिष्णुता कुछ तो शारीरिक होती है, किन्तु मुख्यतः यह मानसिक दृढ़ता पर निर्भर है। सहिष्णु व्यक्ति मान−अपमान, हानि−लाभ, हर्ष−विषाद में विचलित नहीं होता। वह प्रलोभन, क्षुधा, सर्दी, गर्मी, वासना, उत्तेजना पर काबू पा लेता है।
अपने जीवन में सहिष्णुता का अभ्यास करें। कोई तीखे वचन भी कहे, तो भी अपने आपको सम्भालें, क्रोध को, उत्तेजना को शान्ति से शीतल कर दें। वासना की आँधियों को शान्ति से निकल जाने दें। यदि चरित्र में कोई व्यसन−मद्यपान सिगरेट अपव्यय की आदत−आ गई है तो उसे त्यागने में सहिष्णुता प्रदर्शित करें।
यह संसार कष्ट, अभाव, दुःख, खतरों, चोट, पीड़ा और रोग से मिल कर बना है। हममें से प्रत्येक को इन कड़वी चीजों का हिस्सा मिलना है। कायर डर कर इनसे भाग निकलते हैं, जबकि सहिष्णु साहस से इन पर विजय प्राप्त करते हैं। आप निश्चय ही सहिष्णु हैं। वीरता से कष्टों और अभावों से लड़ सकते हैं। मन में ऐसी धारणा शक्ति बढ़ाइए कि आप आसानी से अस्त व्यस्त न हो सकें। मानसिक सन्तुलन बना रहे।
जब आप मन में ठण्डक और चित्त को शान्त रखते हैं, तो विवेक सर्वोत्कृष्ट रूप में कार्य करता है। हमें नए नए उपयोगी विचार प्राप्त हो जाते हैं। जो जरा जरासी बात में उखड़ता या लड़ता झगड़ता रहता है, क्रोधित होकर मन को उत्तेजित करता है, वह एक प्रकार के पागलपन में पड़ा रहता है। ऐसे उत्तेजक स्वभाव पर विश्वास नहीं किया जा सकता।
सन्तोष वृत्ति मन को सन्तुलित रखने में सहायक दैवी वृत्ति है। लोभ के कारण प्रायः मन का सन्तुलन अस्थिर रहता है। लोभ हृदय में सुलगने वाली एक ऐसी अग्नि है जो मनुष्य का क्षय कर डालती है। लोभ को मारने की दवाई सन्तोषवृत्ति है। लोभ की अग्नि से दग्ध व्यक्ति संतोष गंगा में स्नान कर शीतलता का अनुभव करता है। मोक्ष प्राप्ति के चार उपाय हैं—शान्ति, सन्तोष, सत्संग और विचार। इनमें संतोष सबसे शक्तिशाली दैवी सम्पदा है। यदि किसी प्रकार सन्तोष वृत्ति को धारण करलें तो शान्ति, सत्संग और विचार स्वयं आ सकते हैं।
मन बड़ा चंचल होता है। एक इच्छा पूर्ण हुई तो दूसरी पर कूदता है, फिर तीसरी को पकड़ता है। यह चंचलता−अस्थिरता कम्पन संयम और संतोष से काबू में आ जाते हैं। राजयोग के अंतर्गत संतोष एक महत्वपूर्ण नियम है। सुकरात ने इसका वर्णन बड़े ऊंचे रूप में किया है। संतोष से मन की शान्ति एवं संतुलन स्थिर रहता है।
कुछ व्यक्ति संतोषवृत्ति को आलस्य और भाग्यवादी बनाने की वृत्ति मानकर बड़ा अत्याचार करते हैं। संतोष तो एक सात्विक वृत्ति है। यह हमें कर्त्तव्य पथ पर चलाती है और पश्चात् हमें मानसिक शक्ति एवं शान्ति प्रदान करती है। यह हमारी मनोवृत्तियों को अंतर्मुखी बनाती है और हमें स्वार्थ, लोभ और अन्य साँसारिक वृत्तियों से मुक्त करती है। हमारे सन्त महात्मा फकीर भिक्षुगणों ने अल्प में सन्तोष किया है। आत्म ज्ञान प्राप्त किया है। आत्म सन्तोषी व्यक्ति संसार की आकर्षक किन्तु नश्वर वस्तुओं को घृणा से देखना सिखाती हैं। सन्तोष से वैराग्य, विवेक, और सद्विचार की पद्धति आती है। लोभ जड़ मूल से नष्ट हो जाता है।
“मैं सन्तुष्ट हूँ। तनिक से लोभ से विचलित नहीं होता। क्रोध नहीं करता। अपने आप में पूर्ण हूँ। मुझे कोई आवश्यकता नहीं है। मेरे पास यथेष्ट है”—ऐसे संकेतों को लेने से मनुष्य में आन्तरिक संतुलन आता है। आत्म संतोषी जो कुछ उसके पास है उसी से संतुष्ट रहता और अर्थ के अनर्थ से मुक्त रहता है।
क्रोध, ईर्ष्या और द्वेषभाव संतुलन को भंग करने वाले पाशविक विकार हैं। इनसे मुक्ति के लिए क्षमा महौषधि है। जिसने आपका बुरा भी किया है उसके प्रति भी क्षमा भाव रखना, उसकी अज्ञानता पर करुणा दिखाना मन को संतुलित रखता है। क्षमावान दया प्रेम और सहानुभूति से परिपूर्ण रहता है। यदि आप क्षमा का अभ्यास करें तो आध्यात्मिक दृष्टि से अशक्त बन सकते हैं, अपने क्रोध ईर्ष्या द्वेष के आवेशों को कन्ट्रोल कर सकते हैं। जो शक्ति उत्तेजना में नष्ट होती है वह बच सकती है। जिसे आप क्षमा करें उसकी चर्चा किसी से न करें अन्यथा आपका अहंभाव समझा जायगा।
महर्षि पातंजली ने व्यवहारिक जीवन में सफलता की कुञ्जी दे दी है:—
मैत्रीकरुणामुदितो पेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्य विषयाणां भावनातश्चिप्रसादनम्।
(समाधिपाद 33)
अर्थात्—हमें चाहिए कि दूसरों से मैत्री करुणा मुदिता और उपेक्षा वृत्तियों को काम में लाएँ। सुखी मनुष्यों से प्रेम करें, दुखियों एवं सन्तों के प्रति दया भाव दिखाएँ, पुण्यात्माओं के प्रति प्रसन्नता और पापियों की ओर से उदासीन रहें।
शान्ति धारण करने का अभ्यास करें। आपका मन, इन्द्रियाँ, भावनाएँ शान्त रहें। वातावरण यदि कोलाहल पूर्ण भी हो तो भी अंतःवृत्तियों को शान्त रखने की चेष्टा करें।
शाँति हमारी आत्मा का गुण है। हमारी सब वृत्तियाँ शाँति में आकर संतुष्ट हो जाती हैं। मन में संकल्प विकल्पों का नाश होता है। निस्वार्थता, अनिच्छा, वैराग्य, निर्मोह, अहं से मुक्ति ईश्वर की ओर वृत्ति, इच्छाओं का संयम हमें आन्तरिक शाँति और मन का संतुलन प्रदान करते हैं।
यदि हम अपने परिवार, मुहल्ले, शहर, प्राँत और देश भर में शाँति का अभ्यास करायें, और सभी इसके लिए प्रयत्न करने लगें, तो विश्व भर में शाँति स्थापित हो सकती है। प्रार्थना, जप, कीर्तन, चिन्तन और सद्विचारों को फैलाया जाय, उतना ही लाभ हो सकता है।
शाँति से बोलें, शाँति से चलें, शाँति से कार्य करें। परमेश्वर शाँति का अवतार है। ईश्वरीय तत्वों को मन से निकालें पहले मनुष्य मन में शाँति धारण करे फिर बाह्य परिस्थितियों की शिकायत करे। जितना आप बाह्य पदार्थों से अपना सम्बन्ध तोड़ कर आगे बढ़ेंगे, उतनी ही मनः शान्ति प्राप्त होगी।
तुलसी भूपथ लीन्हें जनित, सब स्वभाव अनुसार। तुलसी सिखवय नाहिं शिशु, भूसक हनत मजार॥ तुलसी जो करता करम, सो भोगत नहिं आन। जो बोवै सो काटिए, देनी लहर निदान॥ रावन रावन को हनेऊ, दोष राम को नाहिं। निजहित अनहित देख किन, तुलसी आपहि माहिं॥
(श्री दौलतराम कटहरा, दमोह)
दूसरों के दोष देखने की आदत बहुत बुरी है। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जब तक मैं अपनी पत्नी के दोष ही देखता रहा, तब तक मेरा गृहस्थ−जीवन कभी शान्तिमय नहीं रहा। दोष देखने की आदत पड़ जाने से सामने वाले व्यक्ति के दोष ही दोष दीखते हैं, उसमें अच्छे अच्छे गुण भी हों पर वे तिल का ताड़ बनाने की इस बुरी आदत के कारण वैसे ही नहीं दीखते जैसे कि तिनके की आड़ में पहाड़ छुप जाता है। दूसरों के दोष देखना, छिद्रान्वेषण करना महान मानस रोग है। इससे मुक्त होना चाहिए।
भगवती पार्वती के दो पुत्र थे। एक के छह मुख और बारह आँखें थीं और दूसरे के हाथी जैसे लम्बी नाक थी। पहला दूसरे की नाक हाथ से नापने लगता और दूसरा पहले की आँखें गिनने लगता। एक, दो, तीन, चार...दस, ग्यारह, बारह। बस फिर लड़ाई ठन जाती और वे आपस में खूब लड़ने लगते। माता पार्वती इनकी लड़ाई से परेशान हो गई। बरजतीं, पर वे न मानते। एक दिन उन्हें पकड़ कर शंकर जी के पास ले गईं और बोली कि महाराज, ये लड़ाके लड़के दिन भर लड़ते रहते हैं। इन्हें किसी तरह समझा दीजिए। ज्ञान−विधान शंकर जी उनके लड़ने का कारण समझ गये और उन्होंने उन्हें बड़े प्रेम से पास बिठाकर दूसरों के ऐब देखने की बुराई समझा दी। लड़कों ने लड़ना बन्द कर दिया। इसीलिए किसी ने कहा है—
अगर है मंजूर तुझको बेहतरी, न देख ऐब दूसरों का तू कभी। कि बद (दोष)−बीनी आदत है शैतान की, इसी में बुराई की जड़ है छिपी॥
महात्मा सूरदास का बहुत सुन्दर भजन है—
हमारे प्रभु अवगुन चित न धरौ। ...इत्यादि।
भगवान से की गई यह प्रार्थना हृदय को चुम्बक जैसे पकड़ लेती है। भगवान हमारे अपराधों को क्षमा करें, हमारे दोष को न देखें, यह भाव हृदय में आते ही विचार आता है कि अपने अपराधों को क्षमा करवाने वालों को दूसरों के अपराधों को स्वयं भी तो क्षमा करना चाहिये। हम जब स्वयं क्षमाशील होंगे तभी हमारे अपराध भी क्षमा हो सकेंगे। बाइबिल का वचन है कि ‘यदि तू चाहता है कि तेरे दोषों पर विचार न किया जाय तो तू दूसरों के दोषों पर विचार मत कर’।
हजरत नूह एक दिन शराब पीकर उन्मत्त से हो गए। उनके कपड़े यहाँ वहाँ बिखर गए और वे नंगे हो गए। उनके लड़के शाम और जेफेथ उलटे पैरों उन तक गए और उन्होंने एक कपड़े से उन्हें ढक दिया। उन्होंने अपने प्रिय पिता का नंगापन नहीं देखा। हमारे हृदय में भी यही भाव होना चाहिए कि अपने प्रिय परिजनों और अन्य लोगों की नग्नता उनकी बुराइयाँ हम व्यर्थ में ही न देखते फिरें। हमारा स्वभाव तो कपास जैसा होना चाहिए। तुलसीदास जी कहते हैं कि—
साधु चरित शुभ सरिस कपासू। सरस विसद गुनमय फल जासू॥ जो सहि दुख परछिद्र दुरावा। वन्दनीय जेहि जग जसु पावा॥
दूसरों के शरीरों की नग्नता और छिद्रों को ढकने के लिए, कपास अपने आपको ओंटवाता है और भी कष्ट स्वयं सहकर दूसरों के शारीरिक दोषों को ढक देता है। साधु को दूसरों के दोषों को स्वयं कष्ट सहकर भी ढकने का प्रयत्न करना चाहिए।
मैंने अनुभव किया है कि दूसरों के दोष देखना भगवान के प्रति कृतघ्न होना है। हम शिकायत करते रहते हैं कि हमारा अमुक सम्बन्धी ऐसा है, वैसा है। पर हम समस्या के दूसरे पहलू पर विचार नहीं करते। हम अपने उस सम्बन्धी के उन विशेष गुणों का ख्याल ही नहीं करते जो अन्य लोगों में नहीं हैं और जिनके कारण हम उन उलझनों से बचे रहते हैं जिनसे कि दूसरे परेशान हैं। हम बहुधा यह भूल जाते हैं कि हमें जो सम्बन्धी मिला है वह दूसरों के सम्बन्धियों की अपेक्षा अनेक बातों में बहुत अच्छा है ओर व्यर्थ में ही हम अपने उस सम्बन्धी के कारण अपने भाग्य को कोसते हैं। इस तरह हम विधाता के प्रति कृतघ्न बनते हैं। इसके अतिरिक्त हम इसलिए भी कृतघ्न हैं कि हम अपने सम्बन्धी की की हुई सेवाओं की सराहना नहीं करते। कृतज्ञता का सबक हमें भगवान राम से सीखना चाहिए। महर्षि वाल्मीकि राम के लिए कहते हैं—
न स्मरत्युपकाराणां शतमप्यात्मवत्तया। कथंचिदुपकारेण कृतेनैकेन तुष्यति॥
वे कौशिल्यानन्दन ऐसे हैं कि किसी के द्वारा अपने प्रति किए गए सैकड़ों अपराधों का भी स्मरण नहीं करते किन्तु यदि कोई किसी भी प्रकार उनका कैसा भी उपकार करदे तो उससे ही उन्हें सन्तोष हो जाता है। महाकवि ने राम के इसी गुण के कारण उन्हें बार बार ‘अनसूय’ कह कर स्मरण किया है। ‘अनसूय’ अर्थात् असूया—दोष रहित। किसी के गुणों में दोष देखना अथवा किसी के गुणों से जलना ही असूया है। भगवान राम न तो किसी के गुणों में दोष देखते थे और न किसी के गुणों से जलते थे। राम−भक्त को भी ऐसा ही होना चाहिए।
पर−दोष−दर्शन के दोष से मुक्ति पाने के लिए हमें पर−गुण−चिन्तन की आदत डालनी चाहिए प्रतिपक्षी के गुणों का विचार करना चाहिए। आइए हम परमेश्वर के पवित्र तेज का ध्यान कर उससे ऐसी सत्प्रेरणा प्राप्त करें कि वह हमें ऐसी सुबुद्धि दे कि हम महात्मा तुलसीदास जैसी ही प्रार्थना करें कि हम दूसरों के गुणों को देखें, दोषों को नहीं।
परुष−वचन अतिदुसह श्रवणसुनि, तेहिपावक न दहोंगो विगत−मान सीतल मन पर गुन नहिं दोष कहौंगो।
(श्री वीरेन्द्रसिंह वर्मा, बी.ए. खातौली)
ज्ञानवृद्धि और आत्मोत्कर्ष के लिए अच्छे साहित्य का अध्ययन करना आवश्यक है पर उनका केवल पढ़ना मात्र काफी नहीं है उस पर मनन तथा विचार भी होना चाहिये। विचार में बड़ी शक्ति है। सद्विचारों का प्रभाव तो मन में सदा ही चलता रहना चाहिए। विचार जब परिपक्व होकर परिपक्वावस्था पर पहुँच जायेगा तभी तो वह आचरण का रूप धारण करेगा। कहा गया है:—
यन्मनसाध्यायति तद्वाचा वदति। यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति। यत्कर्मणा करोति तद्ऽभिसम्पद्यते।
जैसा यह मनुष्य मन से चिन्तन करता है वैसी ही वाणी बोलता है। जैसी वाणी बोलता है वैसा ही कर्म करता है तथा जैसा कर्म करता है अन्त में वैसा ही फल प्राप्त करता है।
क्या कारण है कि हमारी शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है? तनिक विचार कर देखा जाये तो मालूम होगा कि हम ही हैं जिनने अपनी अनन्त शक्तियों को सीमित कर रक्खा है। वास्तव में हमने बुरे विचारों द्वारा अपनी महान शक्तियों का नाश कर दिया है। वास्तव में हम स्वयं अपने वातावरण के निर्माता हैं। प्रत्येक विचार का विश्लेषण करके देखा जाये तो हमें मालूम पड़ेगा कि उसमें गहरी रचनात्मक तथा विनाशात्मक शक्तियाँ मौजूद हैं। यदि तुम दूसरे को दुःखी देखना चाहते हो तो तुम्हारे चिन्तन−मात्र से दुःख पहले तुम्हें ही आकर प्राप्त होगा।
जो मनुष्य जैसा विचार करता है वह ठीक वैसा ही बन जाता है। जिन जिन वस्तुओं का विचार तथा चिन्तन किया जावेगा वे वस्तुएँ निश्चित रूप से हमारे समीप चली आयेंगी। अतः जिसे हम प्राप्त करना चाहते हैं सदा उसी का विचार करें। इन्हीं विचारों में निर्मलता लाने के लिए दो महान गुणों की प्रशंसा हमारे शास्त्रों में भरी पड़ी है। वे हैं दया तथा क्षमा। दया के विचारों से निर्मलता आती है तथा क्षमा से निर्मलता को स्थिरता प्राप्त होती है। बिना दया तथा क्षमा का भाव रक्खे किसी को कभी शान्ति प्राप्त नहीं हो सकती।
सद्विचार तथा सद्भाव ही हमारी सम्पत्ति हैं। जिस दिन तुम्हें विचारों की शक्ति का ठीक ठीक ज्ञान हो जावेगा उसी दिन अनेक शंकाएँ तथा समस्याएँ स्वतः हल हो जावेंगी। अच्छे कार्य करने से भी अच्छे विचारों की संस्कारवर्धक शक्ति अधिक तीव्र होती है। जैसी बातें मनुष्य विचारेगा कुछ समय के पश्चात् वह स्वयं देखेगा कि उसके विचारों के अनुकूल ही उसका वातावरण बनता जा रहा है। जिन जिन परिस्थितियों व वस्तुओं का उसने चिन्तन किया है वे उसके अधिकाधिक समीप आ पहुँचती हैं। मनुष्य अपने विचारों से ही उच्च तथा नीच बनता है। वैसे स्थूल शरीर तो सबका लगभग एक-सा होता ही है। महान पुरुषों की महानता का एक यही कारण है कि वे कठिन से कठिन परिस्थितियों में अपने सद्विचारों का क्षण मात्र के लिए भी परित्याग नहीं करते।
विचार ही कार्य की प्रेरक शक्ति है। मनुष्य जैसा बनना चाहता है वह वैसे विचार करना प्रारम्भ करे। धीरे धीरे वह देखेगा कि उसके विचार ही कार्य रूप धारण करते हुए जा रहे हैं। अध्यात्म शास्त्र तो यह बतलाता ही है कि सूक्ष्म से ही स्थूल बनता है। प्रारम्भ में जो वस्तु सूक्ष्म थी वही आज स्थूल रूप धारण करके स्थूल बनी हुई है। सारा चराचर जगत इसी विचार की शक्ति के आधार पर चल रहा है। घड़े का निर्माण करने से पूर्व उस कुम्हार के मानस−पटल में घड़े का पूरा पूरा स्वरूप आ जाता है। जब उसका विचार दृढ़ हो जाता है तभी वह घड़ा सूक्ष्म से स्थूल रूप धारण करके संसार के समक्ष आ जाता है।
संसार के महान पुरुषों ने अपने अपने जीवन में जिन जिन महान कार्यों को सम्पादन किया है। वे पहले स्वप्न के रूप में ही उनके ध्यान में आये थे। धीरे धीरे वह साधारण सा विचार संकल्प का रूप धारण करता गया तथा एक दिन स्थूल होकर उसने संसार को आश्चर्य में डाल दिया। जिसका जैसा भाव होगा पर संसार उसी भाव के अनुरूप ही उसे दिखलाई देगा। एक अन्त की अमूल्य वाणी मुझे इस समय याद आ रही है।
आपने भाव तें भूलि परयो भ्रम देहस्वरूप भयो अभिमानी। अपने भाव ते चंचलता अति, आपने भाव तें बुद्धि बिरानी। आपने भाव तें आप बिसारत, आपने भाव तें आतम ज्ञानी। “सुन्दर” जैसो ही भाव है आपनो, तैसो ही होइ गयो यह प्राणी।
विचार तथा कर्म का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहाँ विचार काम करेगा वहाँ वह बलात् शरीर को भी अवश्य ले आवेगा। अतः विचारों पर संयम रखने का अर्थ है पूर्ण रूप से नियमित आचरण। केवल इन्द्रियों पर संयम करना ही काफी नहीं है। संयमी वह है जो विचारों पर संयम करना जानता है। विचार शक्ति का महत्व समझ लेना और उस शान्ति का समुचित सदुपयोग करने के लिए प्रयत्नशील रहना यही तो मनुष्य जीवन की सफलता का रहस्य है।
आपुहि मद को पान कर, आपुहि होत अचेत। तुलसी विविध प्रकार को, दुख उत्पत्ति एहि हेत॥ देश, काल, करता, करम, बुधि विद्या गति हीन। ते सुर तरु तर दारिदी, सुरसरि तीर मलीन॥ वर्तमान प्राचीन दोउ, भावी भूत विचार। तुलसी संसय मन न करु, जो है सो निरुवार॥ निशदिन कर तब कर्म करु, जग में कर्म प्रधान। तुलसी ना लखि पाइयौं, किये अमित अनुमान॥
(प्रो. पी. रामेश्वरम्)
मेरे पड़ौस में एक सज्जन हैं जो चिढ़ने और नाराज होने के बड़े ही प्रवीण हैं। जहाँ किसी की कोई छोटी मोटी कभी नजर पड़ जाये, वे उसको खाने को दौड़ते हैं। पत्नी को झिड़कना, बच्चों पर दिन भर चीखना−चिल्लाना, नौकरों को दिन भर श्लेषात्मक पदवियों से विभूषित करना उनका दैनिक कृत्य है। फिर भी उनके पुत्र महाशय सुधरने का नाम ही नहीं लेते, नौकर आज्ञाकारी नहीं हो पाते। वे समझ गये हैं कि इनकी आदत ही कुछ ऐसी पड़ गई है। इसी कारण उनकी बात की वे कोई भी परवाह नहीं करते।
यह सभी मानते हैं कि अपने से छोटों को शिक्षा देनी चाहिए, परन्तु हर समय नहीं। शिक्षा देने तथा ताड़ने का पृथक समय होता है। सभी लोगों को ताड़ना हर समय सह्य नहीं हो सकता। भूल होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है। विशेषतया बच्चों और नवयुवकों से भूल होना और भी सहज है। वे जिस समय भूल करें, उस समय यदि डाँट डपट अथवा मार−पीट से काम न लेकर उन्हें समझाया जावे और भविष्य में अच्छा काम करने का उत्साहित किया जावे तो यह देखा गया है कि इससे अत्यन्त लाभ होता है। बच्चों को बार बार डाटना, अथवा मारना−पीटना उन्हें उद्दण्ड, जिद्दी तथा निर्लज्ज बना देता है और अन्त में उन्हें चिल्लाने−पीटने वालों का भी भय नहीं रहता।
पाश्चात्य विचारक लार्ड चेस्टरफील्ड ने किशारों और नवयुवकों के मनोविज्ञान का सूक्ष्म अध्ययन किया है। उनके कथनानुसार “बच्चों पर मारने पीटने की अपेक्षा उनको समझाने बुझाने और उत्साह देने का बड़ा प्रभाव पड़ता है।” यह बात केवल बच्चों में ही नहीं वरन् बड़ों के भी है। उदाहरणार्थ कल्पना करें कि आप किसी कार्यालय में एकाउन्टेन्ट हैं। आपसे भूल हो गई। यदि आपका अफसर आपको एकान्त में बुलाकर कहे “मिस्टर! ऐसी भूल से हमारी और आपकी दोनों ही की बदनामी है तथा कार्य में भी हानि होती है। हो गया सो हो गया। भविष्य में अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है” तो इसका प्रत्यक्ष परिणाम यह होगा कि ‘अनायास ही आपके मुख से निकल पड़ेगा। जी हाँ! श्रीमन्! मुझे अपनी भूल पर खेद है। भविष्य में ऐसा अवसर दोबारा नहीं आयेगा।” और निस्सन्देह आपका सतत् प्रयास रहेगा कि कोई भूल न हो। किन्तु इसके विपरीत, यदि वह अवसर आपके साथी क्लर्क आदि के सम्मुख ही आपको फटकारे और कहे कि—आपने क्यों ऐसी भूल की? अब मैं तुम्हारी रिपोर्ट करता हूँ।” आदि आदि। तो आपको अपनी भूल पर पश्चाताप करना तो दूर रहा, उल्टे उस अवसर के ही दोष नजर आने लगेंगे। आपका सुधरना तो काफी दूर की बात रही। अतएव स्पष्ट है कि जितना प्रभाव समझाने बुझाने का पड़ता है उतना चीखने चिल्लाने व डाट डपटने का कदापि नहीं पड़ता। डाटना डपटना ही यदि अनिवार्य हो तो एकदम एकान्त में होना चाहिए न कि सबके सामने।
जहाँ तक दूसरों के दोष ढकने का प्रश्न है, इस संसार में कोई भी व्यक्ति निर्दोष नहीं है। वह तो अभी होना है। तब तक हमें दूसरों के दोष ढूंढ़ने की बुरी प्रवृत्ति को दूर करना चाहिये। किसी की भूल को सम्मुख उसे बताकर उसे ठीक कराना असम्भव ही है इसके दो प्रभाव अवश्य पड़ते हैं। एक तो दूसरों को बुरा लगता है और उसका जी दुखता है तथा दूसरे वे बिना बताये ही आपके शत्रु बन जाते हैं।
चिड़चिड़े स्वभाव के व्यक्ति आसानी से मिल सकते हैं जिनमें सहनशीलता नाममात्र को भी नहीं होती। जहाँ कोई बात अपने मन के विरुद्ध हुई बस बिगड़ पड़ेंगे। ऐसे व्यक्ति को झूठ मूठ ही बहकाकर विनोद किया जा सकता है। वह कभी भी प्रसन्न चित्त दिखाई नहीं पड़ता। कमरे में कहीं गन्दगी पड़ी रह गई तो नौकर पर फटकारों की वर्षा की जा रही है। बच्चे मेज पर रखे हुए कागजात को यदि थोड़ा−बहुत इधर उधर कर गये तो न केवल उनकी, वरन् उनकी माँ तक की खैर नहीं। ऐसे तुनकमिज़ाजी व्यक्ति न स्वयं सुख से रह पाते हैं और न उनके सम्बन्धित तथा संपर्क में आने वाले। सब कुछ होते हुए भी उनके लिए, इस संसार में, कुछ नहीं है।
जरा जरा सी बात में चिढ़ने, नाक भौं सिकोड़ने, डांटने डपटने और गाली गलौज देने की आदत छोड़ ही देनी चाहिए। भूल करने वालों को समझाना बुझाना तथा उत्साह दिलाना चाहिए। किसी के अवगुणों को न देखें वरन् उसके गुणों को देखकर प्रवृत्त रहने का उपदेश देते रहें। अपने घर में अपनी स्त्री तथा बच्चों के साथ प्रेम और सभ्यता का व्यवहार करें। कभी उन्हें अपशब्द न कहें और न उनसे कड़ाई का व्यवहार करें।
आपका घर प्रेम मन्दिर होना चाहिए। घर में जितने भी प्राणी हों प्रेम के उपासक हों। सहनशील हों। परस्पर सबमें प्रीति हो। बहुत से व्यक्ति दोहरी जिन्दगी जीने के अभ्यस्त हो गये हैं। बाहर तो वह बड़े ही सभ्य एवं विचारक और नीतिज्ञ बनते हैं किन्तु घर में घुसते ही उनकी जिह्वा वश में नहीं रहती। छोटी मोटी बातों पर ही बिगड़ पड़ते हैं। गाली बकते हैं, चिल्लाते हैं। ऐसे व्यक्ति न केवल असभ्य हैं, अपितु समाज के शत्रु भी हैं। उनसे कुटुम्ब पर तथा समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनका घर दुखमय बना रहता है। ऐसा जीवन मृत्यु जैसा ही है।
अतएव सुख और शान्ति से जीवन बिताने के लिए मधुर भाषण एवं सद्व्यवहार परमावश्यक हैं। जिस समय आप काम पर से लौटें, तो घर में चरण रखते ही सबमें आनन्द की लहर फैल जावे। मुन्ना और मुन्नी आपको देखते ही आपसे चिपट जाएँ। धर्मपत्नी मधुर मुस्कान से आपका स्वागत करे। नौकर चाकर भी सच्चे हृदय से आपकी सेवा करने को तैयार हो जावें। तब समझ लीजिए कि आप तुनकमिज़ाज नहीं हैं।
(श्री सावित्री देवी, फिल्लौर)
रमणीय सलिल वाहिनी नदियाँ किलोलें करती हुई स्वच्छन्द बहें। बड़े बड़े महासागर इस पृथ्वी पर जल से भरपूर पड़े रहें। किन्तु चातक को इनसे कोई प्रयोजन नहीं। इन भूलोक के जलों में अब उसकी तृष्णा नहीं रही है। उसने तो आकाश की तरफ मुँह फेर लिया है, वहीं से आई हुईं दिव्य धाराएँ अब उसके कण्ठ को शान्ति दे सकती हैं। निःसन्देह यह भूतल जल से प्लावित है, सब कहीं सुगमता से पीने के लिये पानी मिल सकता है, परन्तु उसे तो यहाँ के जलों की, यहाँ के मधुर से मधुर जलों की, शीतल से शीतल जलों की अनुपादेयता का पूरा पूरा ज्ञान हो चुका है यहाँ के सभी जल इसी प्रकार के हैं। मृत्युलोक के अन्य प्राणी इन्हें पियें, भर पेट पियें, उनके लिए यह खुले पड़े हैं। किन्तु चातक इनसे दूर रहेगा। वह इन्हें जानता है। इनमें उसका जरा भी राग नहीं है। प्यासा रहना कोई बड़ी बात नहीं है, किन्तु त्यागे हुए का ग्रहण कदापि न होगा। यदि आवश्यकता होगी तो कभी स्वर्ग से सुधासम सलिल स्वयमेव गिरेगा। वस्तुतः व्रत बड़ा कठिन है। कौन है जो जलों को सामने बहता देखकर प्यासा रह सकता है।
इस महाव्रत को धारण किये पर्याप्त समय हो चुका है धीरे धीरे जाकर कहीं वर्षाऋतु आयी है, और कभी मेघमालाएँ भी दिखलाई देकर कुछ आशा बँधाती हैं, किन्तु अभी तक चातक का कण्ठ सूखा का सूखा पड़ा है। दूर से आती हुई ठण्डी पवन कभी कभी शीतल जल पूर्ण मेघों के शुभागमन का सन्देश लाती है और बदन को हर्षित कर देती है, परन्तु यह सब भी आशा ही आशा रह जाती है और कोई भी मेघ दो बूँदें भी नहीं दे जाता। तथापि महाव्रती चातक सब कुछ त्याग कर दृढ़ विश्वास से चुपचाप ऊपर मुख किये बैठा है पूर्व दिशा से काले मेघ जल भार से अवनत−उतर आते हैं।
किन्तु देखते ही देखते सीधे पश्चिम की ओर चले जाते हैं, पर वैरागी अपना मग्न बैठा है। तब क्या चातक प्यासा ही रह जायेगा? क्या अब उसे प्राण त्यागने होंगे या इस अन्त समय की व्यथा में वैराग्य छोड़कर फिर संसारी बनकर अपनी रक्षा करनी होगी? यह सब आशंकाएँ निरर्थक और निर्मूल हैं। घातक चित्त में असंदिग्ध है, कि वह प्यास के मारे यदि धरणीतल पर मूर्छित हो गिर भी पड़ेगा, तो भी उसे चेतना में लाने के लिये यदि कोई आयेगा तो स्वयं इन्द्र स्वर्गीय जलों को लेकर आयेंगे और चैतन्य प्रदान करेंगे।
घबराओ नहीं, सन्तोष रक्खो, परीक्षा में उत्तीर्ण होओ, जो त्याज्य है उसे त्यागे ही रक्खो, तो सब कुछ मिल ही जायगा, मिलने का नियम तो अटल है। केवल कठिन परीक्षा में दृढ़ निकलने की देर है। भला जिसने साँसारिकता बिलकुल दूर करदी है, उसे दिव्यता कैसे न मिलेगी? आज न मिलेगी तो दो दिन बाद मिलेगी पर मिलेगी। और फिर उसे क्या नहीं मिलेगा। पर त्याग तो सही एक बार तृष्णा को त्यागो, व्यास मुनि पर विश्वास करो।
यच्च काम सुखं लोके, यच्च दिव्यं महत्सुखम्। तृष्णा क्षय सुखस्यैते नार्हतः षोडशी कलाम्॥
इन बिजली भरे वाक्यों से अनुप्राणित होकर एक बार त्याग करके देखो तो।
तुम जरा सा त्यागते हुए व्यथा से व्याकुल हो हाय मैं मरा, हाय मैं गया, किन्तु एक बार अपने को जाने तो दो और देखो तो। अरे नादान तू किस घबराहट के चक्कर में पड़ा है किस मोह में फँसा है? तुझे ज्ञान नहीं कि जिसने तृष्णा को जीत लिया है, उसे प्यास कहाँ सताती है, उसे मूर्छा कहाँ अचेतन कर सकती है? उस अमृत को मारने के लिए मौत कहाँ से आयेगी? अरे त्यागने में भय कहाँ है। केवल तृष्णा को छोड़ो, एक बार सब कुछ अपना अर्पण करदो और वैरागी बन कर अटल विश्वास से बैठ जाओ, तो देखो तुम्हें अपनाने के लिए स्वयं प्रभु अपने सिंहासन से उतरते हैं कि नहीं।
(श्री रामकृष्ण स्थापक “राकेश”)
उत्पात की जड़ :−
इन तीनों को सदैव अपने अधिकार में रखिये—क्रोध, जिह्वा और वासना। ये तीनों ही मनुष्य को सर्वनाश की ओर ले जाते हैं। क्रोध के आवेश में मनुष्य कत्ल करते तक नहीं हिचकता। ऊटपटाँग बक जाता है फिर बाद में हाथ मल−मल कर पछताता है। जीभ के स्वाद के लालच में मनुष्य का भक्ष अभक्ष का विवेक नष्ट हो जाता है। अनेक व्यक्ति चटपटे मसालों, चाट पकौड़ी, माँस, मछली, अण्डे खाकर अपने स्वास्थ्य एवं पाचन−शक्ति को नष्ट कर डालते हैं। सबसे मूर्ख वह हैं जोकि अनियन्त्रित वासना के शिकार हैं। विषय−वासना के वश में मनुष्य का नैतिक, धार्मिक एवं आध्यात्मिक पतन तो निश्चित है ही, साथ ही गृहस्थ सुख, स्वास्थ्य और वीर्य नष्ट होता है। समाज ऐसे भोग−विलासी डडडडड डडडडड डडडडड डडडड की दृष्टि से देखता है।
इन तीनों को झिड़को :−
निर्दयता, गर्व और कृतघ्नता ऐसी प्रवृत्तियां हैं, जिनसे बुद्धि पाप में फँस जाती है। निर्दयी मनुष्य अविवेकी और अदूरदर्शी होता है। वह दया और सहानुभूति का मर्म नहीं समझता। घमण्डी हमेशा एक प्रकार के नशे में चूर रहता है। धन, बल, बुद्धि अपने समान किसी को नहीं समझता। कृतघ्न दूसरों के उपकारों को शीघ्र ही भूल जाता है। वह प्रत्येक कार्य में अपना स्वार्थ देखता है। वस्तुतः उस अविवेकी का हृदय सदैव मलीन और स्वार्थ पंक में कलुषित रहता है। दूसरों के किये हुये उपकारों को मानने एवं उनके प्रति अपनी कृतघ्नता प्रकाशित करने से हमारे आत्मिक गुण−विनम्रता, सहिष्णुता और उदारता प्रगट होते हैं।
इन तीनों को त्याग दीजिये :−
कुढ़ना, बकझक और हँसी मजाक। (1) कुढ़ना एक भयंकर मानसिक विकार है। इससे मनुष्य की शक्ति का ह्रास, चिन्ता और व्यग्रता में वृद्धि होती है। अपने प्रति अविश्वास का भाव उत्पन्न होने से मनुष्य निराश हो जाता है एवं अपने निश्चित लक्ष को चूक जाता है। कुढ़ना हीनत्व की भावना को प्रगट करता है। (2) व्यर्थ की बकझक से मनुष्य का खोखलापन प्रगट होता है। वह केवल बातूनी जमा−खर्च में चतुर होता है। बकझक करने से उसकी शक्ति नष्ट हो जाती है। इसीलिये वह ठोस कार्य से सर्वथा वंचित रहता है। (3) अनियन्त्रित हँसी मजाक आत्मिक, मानसिक और नैतिक दृष्टि से गर्हित होने के कारण त्याज्य है। गन्दा हँसी मजाक कटुता का रूप धारण कर लेता है। इससे मनुष्य की गुप्त−वासना का पर्दाफाश होता है। अतः इन्हें त्यागना ही उचित है।
इन तीन को ग्रहण कीजिये:−
चरित्र के उत्थान एवं आत्मिक शक्तियों के उत्थान के लिये इन तीन सद्गुणों−होशियारी, सज्जनता और सहनशीलता का विकास अनिवार्य है। (1) यदि आप डडडड डडडड डडडडवन एवं व्यवहार में निरन्तर जाग−डडडड डडडड डडडड रहें, छोटी−छोटी बातों का ध्यान डडडड डडडड डडडडतो आप अपने निश्चित ध्येय की डडडड डडडड डडडड अग्रसर हो सकते हैं। सतर्क व्यक्ति हमेशा सावधान रहता है। वह कोई गलती नहीं करता फलस्वरूप उसे कोई दबा नहीं सकता। (2) सज्जनता एक दैवी गुण है जिसका कि मानव समाज में सर्वत्र आदर होता है। सज्जन पुरुष जीवन पर्यन्त वन्दनीय एवं पूजनीय होता है। उसके चरित्र की सफाई, मृदुल व्यवहार एवं पवित्रता उसे उत्तम मार्ग पर चलाती है। (3) सहनशीलता एक दैवी सम्पत्ति है। सहन करना कोई हँसी खेल नहीं है प्रत्युत बड़े साहस और वीरता का काम है। केवल महान आत्मायें ही सहनशील होकर अपने मार्ग पर निरन्तर अग्रसर हो सकती हैं। इनके अतिरिक्त इन तीन पर श्रद्धा रखिये—धैर्य, शान्ति और परोपकार।
इन तीनों को हासिल कीजिये :—
सत्यनिष्ठा, परिश्रम और अनवरतता—(1) सत्यनिष्ठ व्यक्ति की आत्मा विशालतर बनती है। राग−द्वेषहीन, श्रद्धा एवं निष्पक्ष बुद्धि उसमें सदैव जागृत रहती है। वह व्यक्ति वाणी, कर्म एवं धारणा से प्रत्येक स्थान पर परमेश्वर को दृष्टि में रखकर कार्य करता है। हमारे स्वयं के विचार में जो सत्य प्रतीत हो, उसके विवेक पूर्ण आचरण का नाम ही सत्य कर्म है। (2) परिश्रम एक ऐसी पूजा है जिसके द्वारा कर्म पथ के सब पथिक अपने पथ को, जीवन और प्राण को ऊँचा उठा सकते हैं। (3) अनवरतता अर्थात् लगातार अपने उद्योग में लगे रहना मनुष्य को सफलता के द्वार पर लाकर खड़ा कर देता है। पुनः अपने कर्तव्य एवं योजनाओं को परिवर्तित करने वाला कभी सफलता लाभ नहीं कर सकता।
इन तीन का आनन्द प्राप्त करो :—
(1) खुला दिल, (2) स्वतन्त्रता, (3) सौंदर्य—तीनों आपके आनन्द की अभिवृद्धि करने वाले तत्व हैं। खुला दिल सबसे उत्तम वस्तुएँ ग्रहण करने को प्रस्तुत रहता है, संकुचित हृदय वाला व्यक्तिगत वैमनस्य के कारण दूसरों के सद्गुणों को कभी प्राप्त करने की चेष्टा नहीं करता। स्वतन्त्रता का आनन्द वही साधक जानता है जो रूढ़िवादिता, अन्धविश्वास एवं क्षणिक आवेशों से मुक्त है। स्वतन्त्रता का अर्थ अत्यन्त विस्तृत है। सोचने, बोलने, लिखने की स्वतन्त्रता प्राप्त करनी चाहिये। जो व्यक्ति आर्थिक स्वतन्त्रता से मुक्त है, वह अनेक झगड़ों से मुक्त है। सौंदर्य, आर्थिक और चारित्रिक दोनों की ही उन्नति एवं प्रगति करने वाला महान तत्व है। यदि सौंदर्य के साथ कुरुचि और वासना मिश्रित हो गई तो सौंदर्य अपना वास्तविक अभिप्राय नष्ट कर देगा। आपके मन में सौंदर्य के प्रति सुरुचि होना चाहिये। आप यदि सौंदर्य की पूजा करें तो वह आप में शुभ भावनायें प्रेरित करने वाला एवं सद्प्रेरणाओं को उत्पन्न करने वाला हो।
इन तीन के लिये लड़ो :−
मान, देश और मित्र। इनकी प्रतिष्ठा आपकी अपनी इज्जत है। यदि आप में स्वाभिमान है, तो आपको इन तीनों की रक्षा अपनी सम्पूर्ण शक्ति से करनी चाहिये। इन तीन के अतिरिक्त इन तीन को भी हृदय से चाह करो—निर्मलपन, भलापन, आनन्दी स्वभाव। आन्तरिक शान्ति के लिये इन तीन की आवश्यकता है।
इन तीनों को स्मरण रक्खो :—
आरोग्य, सुमित्र और सन्तोष वृत्ति। ये तीनों आड़े समय काम में आने और रक्षा करने वाले हैं, चाहे अन्य बातों में आप पीछे रहें, किन्तु स्वास्थ्य और आरोग्य सम्पदा को प्राप्त करते रहिये। सच्चा मित्र जीवन का सबसे बड़ा हितैषी और सहायक है। सन्तोष−वृत्ति मनः शान्ति को परिपुष्ट करके आन्तरिक समस्वरता को प्रदान करने वाली परमौषधि है।
(श्री अगरचन्दजी, नाहटा)
विश्व−अशान्ति के दो प्रधान कारण हैं—एक तो अभाव दूसरा तृष्णा। हमें अपने जीवनोपयोगी वस्तुओं के प्राप्त न होने या कम प्राप्त होने के कारण चित्त में अशान्ति का अनुभव होता है। विशेषकर जबकि दूसरों के पास उनकी आवश्यकता से अधिक विद्यमानता देखते हैं तो मन में एक संघर्ष−सा छिड़ जाता है कि हमें भी वैसे ही सुविधाएँ और वस्तुएँ मिलनी चाहिये और जहाँ तक उनका अभाव रहेगा अशान्ति मिट नहीं सकती। उसका सच्चा उपाय तो यही है कि हम अपनी आवश्यकताओं को यथासम्भव कम करें, उनकी पूर्ति स्वयं कर सकें वैसा श्रम करते रहें एवं जो साधन सामग्री प्राप्त हैं उनमें सन्तोष की भावना पनपायें। भारतीय प्राचीन संस्कृति इसी पर जोर देती आ रही है। पर मानव स्वभाव की कमजोरी समझें या संस्कार दोष, हमें प्राप्त वस्तुओं में सन्तोष नहीं होता है। अपितु हमारी तृष्णा बढ़ती ही रहती है। एक दूसरे के अनुकरण में भी हमारी आवश्यकताएँ बढ़ती चली जाती हैं। ऐसी परिस्थिति में शान्ति प्राप्त हो कैसे? यही विचारणीय एक समस्या है।
हमारे प्राचीन मनीषियों ने बहुत प्रकार से अशान्ति का विश्लेषण करके मानव को अंतर्मुखी बनने को आकर्षित किया है। उन्होंने देखा कि वस्तुएं सीमित हैं, तथा अपरिमित हैं एवं यह जीवन क्षणभंगुर है, थोड़े से समय में ही इस देह से नाता छूट जाने वाला है। हम जियेंगे तो पचास−साठ वर्ष और सोचते रहते हैं सैकड़ों वर्ष की बातें! हमारा मन अन्त समय तक संग्रह वृत्ति में ही लगा रहता है। जो भी यहाँ से भौतिक शरीर को छोड़कर जाते हैं। सब कुछ यहीं छोड़ जाते हैं। कोई शरीर एवं धनादि पदार्थ साथ नहीं ले जा सकता। तब इनकी इतनी तृष्णा, भ्रम का चक्कर ही प्रतीत होता है। इसीलिये मनीषियों ने भोग को छोड़कर त्याग को स्वीकार कर उसे ही शान्ति का मार्ग बतलाया।
विश्व के सारे पदार्थ परिवर्तनशील हैं। कोई भी पदार्थ सदा एक−सा नहीं रहता। इसीलिये हमें बोध ग्रहण करना चाहिये। हमारे विचारकों ने ऐसा ही किया था, जिसके सैकड़ों दृष्टान्त भारतीय साहित्य में भरे पड़े हैं। हम उस परम सत्य की उपेक्षा कर इधर−उधर, बाहर ही बाहर भूले भटक रहे हैं। इससे शान्ति मिलने की नहीं। यह सही है कि सभी व्यक्ति इस भावना वाले नहीं बन सकते, पर जितने अधिक परिमाण में हमारी आध्यात्मिक संस्कृति का प्रचार होगा शान्ति उतनी ही अधिक सुलभ होगी। तात्पर्य यह है कि शान्ति का सच्चा उपाय सन्तोष है वह जो नहीं रख सकते हैं उनके लिये उपाय है श्रम द्वारा अधिक उत्पादन एवं विद्यमान वस्तुओं का सदुपयोग करना सीखना।
बहुत से व्यक्तियों का कहना है कि वस्तु की कमी है तब संघर्ष कैसे रुक सकता है? पर वास्तव में वस्तुओं की कमी उतनी नहीं, हमने अभी वस्तुओं के उपयोग की कला सीखी नहीं इससे हमें ऐसा लगता है। हम प्रतिदिन देखते हैं घरों में या सड़कों पर कूड़े करकट का ढेर पड़ा रहता है। जीवन में उपयोगी कितनी वस्तुएँ निकम्मी समझकर रद्दी में डाल दी जाती हैं। दफ्तरों में न मालूम नित्य कितने ही कागज रद्दी की टोकरी में डाल दिये जाते हैं, जबकि उन्हीं को संग्रह कर उपयोग किया जाय तो बहुत काम में आ सकते हैं। उन्हें पंसारियों, हलवाइयों, खोमचेवालों आदि को बेचा जाय तो पैसे मिल सकते हैं। महात्मा गाँधी का इन छोटी−छोटी बातों पर बड़ा ध्यान था। जहाँ तक जिस वस्तु का उपयोग हो सकता है वे उसे व्यर्थ नहीं गँवाते थे। ये जो भी लिफाफे आते या जो कागज काम के लायक होते, उन्हें उलटकर लिफाफा बनाकर काम में लेते थे। पर हमें तो वस्तुओं को व्यर्थ बरबाद करने की आदत पड़ गयी है। अतः इस ओर हम तनिक भी ध्यान नहीं देते। कोई चीज हमारे काम की न हो, पर वह हमारे अन्य भाई के काम की हो सकती है तो हमें उसे दे देनी चाहिये, ताकि उसकी आवश्यकता की पूर्ति हो जाय। अपनी उपभोग्य वस्तुओं में से थोड़ी−थोड़ी बचत की जाय तो बहुत वस्तुएं बच जाएंगी।
घरों में देखते हैं, कोई कपड़ा थोड़ा−सा फट गया था मैला हो गया तो उसे व्यवहार में अनुपयुक्त समझ फाड़कर झाड़न आदि में उसको काम में लेकर फेंक देते हैं। यदि हम विवेक रखें जो काम किसी दूसरी साधारण वस्तु से हो जाय, उसके लिए वस्त्र को न गँवाकर उस वस्त्र को किसी गरीब भाई के उपयोग के लिए दिया जा सकता है। वह व्यक्ति उससे अपनी सर्दी−गर्मी और लज्जा का बचाव कर सुखी हो सकता है।
विद्यार्थी ज्यों−ज्यों आगे की कक्षा में जाता है पहिले की पाठ्यपुस्तकें बेकार हो जाती हैं और उन्हें योंही बरबाद किया जाता है। यदि उन्हें उस कक्षा के किसी गरीब विद्यार्थी को दे दिया जाय तो कितना सुन्दर हो। विदेशों में जहाँ अशुचि और कूड़े−करकट को भी खाद बनाने आदि के काम में ले लेते हैं। वहाँ हमारे यहाँ काम में आने योग्य वस्तु को भी व्यर्थ ही बरबाद करते रहते हैं। यह बहुत ही दुःख की बात है। वस्तुओं के उपयोग की कला सीखना आज भारतवासियों के लिए परमावश्यक है।
हमारे यहाँ गाय, भैंस आदि ढोर रहते हैं। उन्हें घास−फूस आदि डालने में असावधानी रखने से इधर−उधर कितना ही घास और दाना जमीन में पड़कर व्यर्थ जाता है। ढोर चरते समय दाना इधर−उधर फैला देते हैं। वह पैरों के नीचे या भीगे स्थानों में योंही नष्ट हो जाता है तथा गन्दगी और बीमारी फैलाता है जबकि ध्यान देकर उसे तत्काल ही उठा दिया जाय तो बेचारे कितने ही भूखे ढोरों का इससे पेट भर सकता है।
हम खाने बैठते हैं तो कोई वस्तु अधिक ले लेते हैं या भाती नहीं है तो योंही जूठन में छोड़ उसकी बरबादी करते हैं। यदि खाद्य−पदार्थ लेते समय ध्यान रक्खा जाय जिससे जूठन न निकले तो रोज कितना ही खाद्य−पदार्थ बचा सकते हैं और भूखों के पेट भर सकते हैं। इसी प्रकार जलादि का प्रयोग भी हम ठीक तरह से नहीं करते और कितना ही जल व्यर्थ इधर−उधर बरबाद होता रहता है, जिसे पौधों में डाला जाय तो सूखते हुए पौधे ताजे हरे हो सकते हैं। ऐसे अनेक दृष्टान्त दिये जा सकते हैं। वास्तव में हम रात−दिन ऐसी अनेक बातें देखते रहते हैं पर इन पर विचार नहीं करते। यदि कोई विचार करते भी हैं तो उसे कार्य रूप में परिणत नहीं करते।
प्राचीन समय की बात जाने दें तो भी कुछ समय पूर्व तक और किसी अंश में अब भी हमारे ग्रामों में निरुपयोगी मानी जाने वाली वस्तुओं का उपयोग होता नजर आता है। गाँव वाले फटे वस्त्रों के बिछौने बना लेते हैं। पुराने जमाने में रद्दी कागजों को कूट कर अनेक उपयोगी वस्तुएँ बना लेते थे। ऐसे कूटे हुये कागज के डब्बे, सिंहासन, कलमदान आदि हमारे कलाभवन हैं जिनकी मजबूती और सुन्दरता देखते ही बनती है। खाताबही के रद्दी कागजों के एक ओर के खाली पृष्ठ पर अनेक कलापूर्ण चित्र बनाये हुए हमारे संग्रह में हैं। इसी प्रकार ठाठे के सिंहासन दर्शनीय हैं।
वस्तुओं की व्यर्थ बरबादी से जितना नुकसान होता है, उससे कहीं अधिक समय की बरबादी से होता है जो समय चला गया है वह पुनः मिलने की सम्भावना नहीं। अतः जीवन के पल पल का सदुपयोग सीखें। क्षण मात्र भी व्यर्थ न खोवें। जीवन की अवनति होने वाले कार्यों से बच उसके उत्कर्ष के कार्यों में लगे रहें।
मन, वचन, काया की शक्ति का अपव्यय करने से हमारा सारा जीवन बरबाद हो रहा है। अतः हमें चारों ओर, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होने वाली इस बरबादी से बच कर, विवेक पूर्वक सदुपयोग करने की कला का प्रतिदिन अभ्यास बढ़ाते रहना चाहिए। यही जीवन का सबसे अच्छा सद्व्यवहार है।
मन हमें प्राप्त हुआ है सुविचार के लिये, वाक् शक्ति प्राप्त हुई है सत्य, हित, मित भाषण के लिये, प्रभु भजन व सदुपदेश देने के लिये, शरीर प्राप्त हुआ है आत्मोन्नति की साधना एवं सेवा के लिए, यह ध्यान में रखें भूलें नहीं। इनके द्वारा कोई बुराई नहीं हो भलाई ही हो, इसके विषय में सतर्क रहें धन प्राप्त हुआ है भोग के साथ साथ परोपकार के लिए। इन्द्रियाँ प्राप्त हुई हैं ज्ञान सम्पादन व सदाचरण के लिये, उन्हें अच्छे अच्छे कार्यों में लगाये रखें। प्राप्त सभी साधनों का सदुपयोग करिये, कम से कम दुरुपयोग तो नहीं ही कीजिए।
आवश्यकताओं को कम करना, तृष्णाओं को घटाना, प्राप्त सामग्री का सदुपयोग करना यही मानव जीवन का सार है।
(श्री॰ छत्रपाल जोशी, सीकर)
सबसे पहले मानव जीवन प्राप्त करने वाला प्राणी अपने पूर्व जन्म के कर्मानुसार अपनी माँ के गर्भ से संसार में आता है। प्रारम्भ से प्राप्त माँ बाप के सहयोग से बाल्यावस्था का प्रथम चरण व्यतीत करके द्वितीय चरण में शिक्षकों के सहयोग में भेजा जाता है और वहीं से उसका जीवन निर्माण शुरू होता है। शिक्षा के साथ साथ वह वहाँ शासन में रहना तथा शासन करना भी सीखता है और शिक्षकों के अनुकूल आचरणों का समावेश भी उसमें पूर्ण रूप से हो जाता है। यही कारण है कि आज का भारत उत्थान की तरफ न जाकर पतनोन्मुख हो रहा है। क्योंकि प्रायः आज का शिक्षकवर्ग भारतीय संस्कृति के विपरीत है। कुम्भकार अवा में पकाने से पहले घड़े जैसी मीनाकारी करता है वही अन्त तक रहती है। इसी तरह बाल्यावस्था में जैसी शिक्षा दीक्षा में बालक रहता है वैसा ही जीवन का निर्माण होता है।
इसलिये बालकों के अभिभावकों को विशेष तौर से सोचना चाहिये कि आधुनिक शिक्षकों के ऊपर ही सारा भार बालकों को सौंपकर निश्चिन्त न हो जावें—अपितु उनके अलावा रहन सहन सदाचार आदि के विषय में—पूर्ण रूप से सतर्क रहें क्योंकि महापुरुषों की यथार्थ उक्ति है कि जिसका प्रातः नष्ट हो गया, उसका सम्पूर्ण दिन खत्म हो गया और जिसकी बाल्यावस्था बिगड़ गई उसका जीवन समाप्त हो गया। जिसका आचरण चला गया उसका सर्वस्व नष्ट हो गया। यह प्रायः देखा गया है कि जिन लोगों के पूर्व संस्कार कमजोर हैं, उन्हीं पर सहवास और संगति का प्रबल प्रभाव पड़ता है। हमारे प्रातः स्मरणीय स्वामी विवेकानन्द और स्वामी रामतीर्थ ने पाश्चात्य संस्कृति से संतप्त शिक्षणालयों में शिक्षा प्राप्त करके भी अपने वास्तविक अध्यात्म प्रकाश से सारे जगत को प्रकाशित किया।
इस प्रकार अच्छे अभिभावक तथा शिक्षकों के सहवास में रहकर संसार संग्राम में विजयी होने के अनुकूल गुणों को ग्रहण करके गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने अथवा नैष्ठिक ब्रह्मचारी रहकर सन्त विनोबा की भाँति लोक सेवा में संलग्न हो जावें। समय की प्रति मिनट को अमूल्य समझकर स्वास्थ्य के नियमों का पूर्ण रूप से पालन करते हुए और ईश्वर की उपासना के बल पर विघ्नों को पराजित कर वर्तमान को सुधारते हुए भूत−भविष्यत् का पूरा ध्यान रखते हुए—सच्ची जनसेवा में जुट जावें, अपने संकट कालीन तथा सफल जनक अनुभव संसार को बताते हुए आगे बढ़ें और शास्त्र की मर्यादानुकूल गृहस्थ जीवन में प्रविष्ट होने वाले लोग तो सबसे पहले सात्विक गुरु की खोज करें।
इस समय में वास्तविक सन्तों का अभाव सा है किन्तु सच्ची लगन वालों को अवश्य निधि मिलती है। प्रयत्न करने पर भी यदि सफलता न मिले तो सच्छात्रों के वचनानुसार अपने जीवन को बनावें। ब्रह्मचर्य का पालन करता हुआ लोकोपकार के लिये जीवन निर्मित करे। फैशनपरस्ती की मूर्खता से दूर रहकर वास्तविक सौंदर्य की कुञ्जी ब्रह्मचर्य तथा सदाचार का पालन करे। अपने जीवन से लोगों को शिक्षा देता हुआ, समय के सच्चे रहस्य को समझकर चलना शुरू करे। नवयुवक विद्यार्थी अपना निर्माण इस तरह करके लोगों को सत्प्रेरणा देना शुरू करें तो थोड़े ही समय में भारत का भाग्य चमकने लगे।
(श्री लक्ष्मीनारायण टण्डन ‘प्रेमी’)
शरीर की माँस पेशियों को दबाने तथा मथने का नाम ही मालिश है। थपथपाकर, मुक्के मार मारकर सहलाकर, रगड़कर, कम्पन द्वारा, जोर से कड़े हाथ से तथा हलके मुलायम हाथ से अनेक प्रकार से मालिश होती है। इन विभिन्न उपायों से हम विभिन्न उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। थकावट होने पर पैरों में मुक्के मारे जाते हैं। दर्द होने पर हाथ, पीठ या छाती की त्वचा रगड़ते हुए हाथ आगे बढ़ाते हुए मालिश करते हैं, पैरों के तलुओं को सहलाने से नींद बुलाते हैं, सर−दर्द में माथे पर हाथ फेरते हैं, सर के बालों को थपथपाते या मन्थन करते, चुटकी बजाते हुए हम तेल मलते हैं। गठिया, लकवा, वात रोग, स्नायुओं में दर्द, शोथ, गाँठों में दर्द या सूजन आदि में घर्षण से लाभ होता है। दलन या मरोड़ से चर्बी की अधिकता, पक्षाघात, गठिया, स्नायु, दौर्बल्य या दर्द, कोष्ठबद्धता शरीर के अंगों में सूजन आदि में लाभ होता है। कम्पन द्वारा पेट की अफरन स्नायु−शूल आदि में लाभ होता है। थपकी द्वारा उन स्थानों की मालिश अच्छी होती है। जहाँ माँस अधिक होता है—उदाहरणार्थ जाँघ, नितंब या पीठ आदि में। अजीर्ण, कोष्ठ बद्धता, मूत्राशय सम्बन्धी रोगों, स्त्रियों के मासिक धर्म रुकने, पेट सम्बन्धी रोगों, पीलिया आदि में इससे लाभ पहुँचता है। इसमें मुक्के मारकर मालिश होती है। ग्रंथि−संचालन से गाठों तथा जोड़ों में शक्ति बढ़ती है। चूँकि इसमें शरीर तथा जोड़ों को खींचना, चटकाना या टेढ़ा मेढ़ा करना पड़ता है अतः कमजोर रोगियों को प्रारम्भ में कम देर तथा हल्के तरीके से संचालन करना चाहिए। फिर ज्यों−ज्यों शक्ति आती जाय हम समय तथा मात्रा में परिवर्तन कर सकते हैं। इस मालिश का सम्बन्ध चूँकि गाँठों से है अतः गठिया, वातरोग, गाँठों में दर्द, जोड़ों की कमजोरी, ब्लड−प्रेशर तथा हृदय रोग में इससे लाभ होता है।
पेट की मालिश करते समय यह ध्यान रहे कि भोजन को किए हुए कम से कम तीन घण्टे हो गये हों तथा पेशाब कर चुका हो। हाथ घुमा घुमा कर पेट की मालिश करना चाहिये। शरीर के विभिन्न स्थानों की मालिश विभिन्न ढंगों से होती है।
पेट की मालिश कुछ दशाओं में वर्जित है। स्त्रियों के गर्भ होने नर, मासिकधर्म की दशा में, पेट में गाँठ या ट्यूमर होने पर, हार्निया रोग में, एपेंजीसाउटिस, दस्त आने पर, आँख आने पर, पेट में किसी प्रकार का घाव होने पर आदि दशाओं में पेट की मालिश वर्जित हैं। यकृत की मालिश भी पेट की मालिश से ही हो जाती है। साधारणतया सारे शरीर की मालिश करना चाहिये। हाँ यदि अंग विशेष में कष्ट हो तो केवल उसी भाग पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिये।
मालिश करने वाला यदि स्वयं रोगी होगा तो मालिश कराने वाले को उसका रोग आ सकता है। अतः मालिश स्वस्थ मनुष्य से करायें। जिसके हाथ में पसीना बहुत आता हो उससे भी मालिश न करावे। मालिश उसी से करावें जिसका हाथ कोमल तथा सूखा हो। मालिश करते समय अत्यधिक जोर नहीं लगाना चाहिये। फिर इतनी देर मालिश न की जाय कि शरीर का चमड़ा कुपित हो जाय। बच्चों तथा बूढ़ों का चमड़ा तो शीघ्र ही गरम हो जाता है अतः उन्हें तो थोड़ी देर तक ही मालिश करना चाहिये। पेट की मालिश के लिए 10−15 मिनट तथा सारे शरीर की मालिश के लिए आध घण्टे से एक घण्टा तक पर्याप्त है। मालिश कराने वाले को अपने शरीर को मालिश कराते समय बिल्कुल ढीला छोड़ देना चाहिये। यों तो मालिश से सभी को लाभ है, पर बच्चों तथा दुबले पतले व्यक्तियों को इससे अत्यन्त तथा अति शीघ्र लाभ होता है।
मालिश प्रायः कडुवे तेल से की जाती है। सरसों, तिल तथा जैतून के तेल के अतिरिक्त घी से भी मालिश कुछ रोगों में की जाती है। जैतून का तेल सर्वोत्तम होता है। मालिश सदा बन्द स्थान पर होना चाहिये। पर कमरे में हवा आने के लिए खिड़की आदि खुली रहें। इस बात का ध्यान रहे कि सीधी हवा का झोंका रोगी के शरीर पर न पड़े। गर्मियों में खुले में मालिश करा सकता है। पहलवान मालिश बहुत कराते हैं। मालिश के बाद स्नान कर लेने से न शरीर से चिपचिपापन दूर हो जाता है, वरन् लाभ भी होता है। परन्तु स्नान करके कपड़े आदि पहन ले जिससे शरीर गर्म हो जाये।
मालिश से स्वस्थ व्यक्ति का स्वास्थ्य और भी ठीक होता है तथा रोगी का रोग भी दूर होता है। अजीर्ण, कोष्ठबद्धता, आँतों की कमजोरी, बवासीर, अनिद्रा रोग में, स्नायु−दौर्बल्य, दर्द, लकवा आदि में तो राम−बाण है। मालिश से रक्त−सञ्चार तथा परि−भ्रमण में तीव्रता आता है। स्थूलता को कम करने, मलेरिया, मधुमेह तथा क्षय आदि रोगों में भी मालिश लाभ करती है।
चर्म रोग पर मालिश कमी न करे, अन्यथा रोग बढ़ेगा। ट्यूमर होने पर मालिश न करे अन्यथा वह कैंसर का रूप ले सकता है। बुखार की दशा में मालिश हानिकर है। क्षय तथा प्लूरेसी में भी मालिश तभी लाभ करेगी जब ज्वर न हो, अन्यथा हानि करेगा। फोड़ा, फुन्सी, चोट आदि होने पर उन स्थानों को बचाकर सावधानी से मालिश करना चाहिये।
संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मालिश, मर्म−चिकित्सा का एक अंग है।
(सन्त टी. एल. वास्वानी)
प्राचीन फारस के ऋषि जरथुस्र कहते थे—“पवित्रता ही आत्म−ज्ञान का केन्द्र है, इसलिये चन्द्र के समान पवित्र बनो।” क्या आपने कभी सोचा है कि भारतवर्ष का अर्थ क्या है? भारत शब्द का उच्चारण तुम बार−बार करते हो, किन्तु उसका असली शब्दार्थ क्या है? ‘इण्डिया’ शब्द ग्रीस−वासियों ने प्रचलित किया। इसका अर्थ है इन्द्र का देश, चन्द्रमा का देश, पवित्रता का देश। भारतवर्ष पवित्रता का देश है। जरथुस्र कहते हैं—‘चन्द्र के समान पवित्र बनो।’ मैं कहता हूँ—’तुम पूर्ण रूप से भारतीय बनो। भाषा, वेश और भोजन में, विचार और आकाँक्षाओं में, अंग−अंग में और नस−नस में भारतीय बनो। अपने व्यक्तित्व की रग−रग और इंच−इंच में भारतीय बनो।” जब मैं कहता हूँ, ‘भारतीय बनो’ तब मेरा मतलब है ‘पवित्र बनो,’ क्योंकि भारत का अर्थ है ‘पवित्रता का देश। किन्तु शोक! आज भारतीय पवित्रता के पथ का परित्याग कर रहे हैं। देश में छुआ−छूत का भूत प्रबल है।
प्राचीन भारत के तीन महापुरुष हैं, श्रीराम, श्रीकृष्ण और भगवान् बुद्ध। इन सभी के जीवन और शिक्षाओं का साराँश है—“पवित्र बनो, आत्म−संयमी बनो।” तीनों ने तपस्या के जीवन के आनन्द का अनुभव किया था। ब्रह्मचारी या तपस्वी के हृदय में आनन्द निवास करता है। श्रीराम तपस्या का महत्व समझते थे, इसीलिये वे वनवासी हुए। ब्रह्मचर्य या तपस्या का जीवन संन्यासी का शुष्क जीवन नहीं है, किन्तु अत्यन्त सौंदर्य का जीवन है।
श्री कृष्ण ने भी तपस्वी जीवन का महत्व समझा था। जो लोग उनके सन्देश और उनके चरित्र के विषय में उल्टे सीधे अर्थ लगाते हैं, वे बड़े भ्रम में हैं। वे योगी थे, योगीश्वर थे। उन्होंने संसार को गीता सरीखा ज्ञान प्रदान किया। उन्होंने उच्चतर जीवन की महत्ता बतलाई, उच्च पवित्रता तथा उच्च प्रेम की एकता प्रतिपादन की। गीता में एक बड़ा सुन्दर प्रसंग है, जिसमें भगवान् कहते हैं—
“यदा संहरते चाऽयं कूर्मोंऽडंगानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः तस्य प्रजा प्रतिष्ठिता।।
जब मनुष्य कामनाओं, वस्तुओं, कर्मों, इंद्रियों और इन्द्रियार्थों सभी से अपने मन को खींच लेता है तभी वह योगी होता है।
भारत को नवीन राष्ट्र न बना सकने का दोष हमारे ही सिर है। जितना ही अधिक मैं सोचता हूँ, मुझे समझ पड़ता है कि हमने उचित रीति का अनुकरण नहीं किया। वह नियम, जो राष्ट्रों को उन्नति पथ पर चलाने की नीति का नियन्त्रण करता है, आत्म− संयम ही है। फ्रान्सिस गेल्टन ने, जो समाज−शास्त्र का एक प्राचीन विद्वान् हो गया है, प्राचीन ग्रीस की अधोगति और पतन के कारणों का विवेचन किया है। एक समय था, जब ग्रीस संस्कृति का क्रीड़ा−क्षेत्र था, कला का मन्दिर था, वह यूरोपीय सभ्यता का उद्गम स्थान था। उसका पतन क्यों हुआ? गेल्टन बतलाता है कि ग्रीस का पतन ‘सामाजिक सदाचार के अभाव के कारण हुआ। ग्रीस से आत्म−संयम की शक्ति चली गई। अपनी समृद्धि के समय में ग्रीस आरामतलबी के गड्ढे में गिर पड़ा। विलासिता राष्ट्रीय शक्ति−धारा का शोषण कर लेती है। युवकों से मैं कहता हूँ—“विलासिता का त्याग करो। कर्मयोग के मार्ग की ओर मुँह फेरो, क्योंकि आरामतलबी माता के प्रति महापाप है, मातृभूमि को बलवान सन्तानों की आवश्यकता है। शक्तिशाली सुतों की जरूरत है।”
एक समय वह था, जब रोम का झण्डा दूर−दूर के देशों पर फहराता था। एक समय रोम-साम्राज्य बहुत विशाल था, जैसा कि आज इंग्लैंड का है, किन्तु रोम की शक्ति भीतर−ही−भीतर खोखली हो गई। उसकी जड़ों को अन्दर के कीड़े खा गये, उसकी शक्ति को विलासिता चाट गई। फलतः जब हूण और गौल लोगों ने आक्रमण किए तो रोम उनके सामने खड़ा न हो सका। हुण और गौल जंगली लोग थे, रोम वालों की तरह ‘सभ्य’ नहीं थे, किन्तु उनकी तरह वे नाजुक भी नहीं थे। वे शक्ति, बल और वीरता के उपासक थे, शक्ति की सन्तान थे। उनमें चरित्रबल की दृढ़ता अधिक थी, अतः उन्होंने नाजुक रोमनों पर विजय पाई।
अक्सर कहा जाता है कि भारत की अधोगति और पतन इस कारण हुआ कि उसमें एकता नहीं थी, किन्तु मेरी समझ में उसके पतन का एक गूढ़तर कारण है। भारत का पतन तभी हुआ जब उसका चरित्र−बल जा चुका था। वह अपने प्राचीन ऋषियों के उच्चादर्शों के प्रति विश्वासघात कर चुका था। मानवी बातों को नियन्त्रण करने वाला एक महान् नियम है। इतिहास का एक नियम, जोकि सभी जगह लागू है, वह यह है कि कोई राष्ट्र उसी परिमाण में अधोगति का पहुँचता है, जिस परिमाण में उसकी शक्ति का क्षय होता है, और शक्ति उसी परिमाण में घटती है, जिस परिमाण में उस राष्ट्र के मनुष्य आत्म−संयम की शक्ति को छोड़ते ओर आराम−तलबी तथा विलासिता के मार्ग का अवलम्बन करते हैं। राष्ट्र का तेज उसके आत्मसंयम और चरित्र बल की वृद्धि के साथ ही साथ बढ़ता है। प्रत्येक राष्ट्र में तत्व होता है जिसे उसकी ‘जीवन शक्ति ‘ कह सकता हूँ, और उसकी अभिव्यक्ति कला−संस्कृति और तत्वज्ञान के रूप में होती है। जब वह जीवन शक्ति अपव्यय और दुर्बलता से क्षीण होने लगती है, तब वह राष्ट्र अधःपतन के गढ़े में गिर पड़ता है।
(श्री. भरतसिंह उपाध्याय)
कुछ समालोचकों ने बौद्ध धर्म को सदाचार की स्मृति कहा है। उनका यह कहना इस अर्थ में ठीक है कि बौद्ध धर्म प्रधानतया आत्म−शुद्धि का एक मार्ग है और उसके साधनों की खोज वह जीवन की जाग्रत अवस्थाओं से लेकर अन्तः संज्ञा के सूक्ष्म क्षेत्रों तक बड़े साहस के साथ करता है। कामनाओं के लोक से प्रारम्भ कर वह चित्त को लोकोत्तर भूमि में ले डालता है जहाँ राग, द्वेष, मोह से उसका छुटकारा हो जाता है और उस अत्यन्त परिशुद्ध, सर्वमलरहित, विशुद्ध का अनुभव करता है जिसकी संज्ञा निर्वाण है। इस विशुद्ध का मार्ग ही बौद्ध धर्म है। किन्तु यदि उपर्युक्त कथन का यह अर्थ लिया जाय (जिस अर्थ में ईसाई लेखकों ने इसे प्रायः प्रयुक्त किया है) कि बौद्ध धर्म नैतिक नियमों का एक संग्रह और विश्लेषण मात्र है, और उसमें उस रागात्मक तत्व का अभाव है जो कर्म प्रवृत्ति के लिए आवश्यक है, तो यह गलत है। बौद्ध धर्म कोरे उपदेशों का संग्रह नहीं है। उसमें ठोस जीवन है। शास्ता का शासन न केवल धर्म (सत्य) है और न केवल विनय। वह धर्म और विनय दोनों (धर्मविनय) है। भगवान बुद्ध का अनन्त सौंदर्य और अनन्त शील−समन्वित रूप जिसकी तुलना में उषा की निष्पाप कान्ति और पवित्रता भी फीकी है, मनुष्य−हृदय को वह प्रेरणा देता है जिससे मनुष्यत्व की उच्चतम भूमि का आसानी से साक्षात्कार किया जा सकता है। यह साधना कहाँ तक जा सकती है, इसका एक चित्र स्थविर वक्कुल के जीवन में देखिए।
वक्कुल स्थविर भगवान बुद्ध के उन इने-गिने शिष्यों में से थे जिनकी साधना बहुत बढ़ी−चढ़ी थी। उनका कठिन तप और उग्र साधना महाकाश्यप के समान ही थी, किन्तु सारिपुत्र के समान धर्म प्रवचन करने में उनकी रुचि नहीं थी। यही कारण है कि उनके अधिक उपदेश हमें त्रिपिटक में उपलब्ध नहीं होते। वक्कुल एक ऐसे साधक के रूप में चित्रित किये गए हैं जिसका अवधूत व्रतों का पालन बड़ा परिपूर्ण है किन्तु जो दूसरों के लिए उनका उपदेश या अनुशासन नहीं करता। इसीलिए उनके विषय में कहा गया हैं—“तीयदं आयुष्मा वक्कुलो धुतो न धुतवादोति” अर्थात् यह आयुष्मान् वक्कुल स्वयं अवधूत तो है, किन्तु अवधूत−व्रतों के उपदेशक नहीं। इससे मालूम पड़ता है कि इस विचित्र साधक में लोक−संग्रह का भाव कम था। इन्हें हमारे पौराणिक साहित्य के जड़ भरत के साथ भली प्रकार रखा जा सकता है। सारिपुत्र के जीवन की सी वह परिपूर्णता यहाँ दिखाई नहीं देती जिसमें स्वयं आचरण के साथ दूसरों के लिए उसका उपदेश अर्थात् समाज में व्यापक प्रचार भी उतना ही आवश्यक था। फिर भी स्थविर वक्कुल के जीवन का हमारे लिए आकर्षण है।
एक दिन वक्कुल स्थविर राजगृह के समीप निवास कर रहे हैं। वहाँ उनसे अपने एक पुराने मित्र अचेल (नग्न) काश्यप की भेंट हो जाती है। दोनों में एक दूसरे की साधना पर संलाप होने लगता है। वक्कुल से उनके अनुभवों पर बातचीत करते हुए अचेल काश्यप उनसे पूछता है—
“मित्र वक्कुल! आज संन्यासी हुए आपको कितना समय हुआ?”
“मित्र! मुझे अस्सी वर्ष हो गये!”
“इन अस्सी वर्षा में मित्र! आपने कितनी बार मैथुन सेवन किया?”
‘मित्र काश्यप! मुझसे इस तरह प्रश्न नहीं पूछना चाहिये। मुझसे इस तरह पूछना चाहिये—इस अस्सी वर्ष के समय में तुम्हें कितनी बार विषय−वासना सम्बन्धी खयाल उत्पन्न हुआ। मित्र! इन अस्सी वर्षों में मैं एक बार भी अपने अन्दर काम सम्बन्धी विचार का उत्पन्न होना नहीं जानता।”
अचेल काश्यप रोमाञ्चित हो उठा। वक्कुल स्थविर ने आगे अपने अनुभवों को बतलाते हुए कहा—’अस्सी वर्ष के समय में, मैं एक बार भी,
“द्वेप−सम्बन्धी विचार का उत्पन्न होना अपने चित्त में नहीं जानता।”
“हिंसा−सम्बन्धी विचार का उत्पन्न होना नहीं जानता।”
“द्रोह सम्बन्धी विचार का उत्पन्न होना नहीं जानता।”
गृहस्थों का दिया वस्त्र पहनना नहीं जानता।”
कैंची आदि से कतरे वस्त्रों को पहनना नहीं जानता।”
“सुई से सिये वस्त्र को पहनना नहीं जानता।”
सब्रह्मचारियों के वस्त्र बनाना नहीं जानता।”
“निमन्त्रण खाना नहीं जानता।”
“गृहस्थ के घर में बैठना कैसा होता है, नहीं जानता।”
“गृहस्थ के घर में बैठकर भोजन करना नहीं जानता।”
“स्त्रियों के आकार−प्रकार को खयाल में लाना नहीं जानता।”
“स्त्रियों को चार पद की गाथा तक उपदेश करना नहीं जानता।”
“भिक्षुणियों को भी कभी धर्म उपदेश किया हो, यह भी नहीं जानता।”
“किसी को भी कभी प्रव्रज्या दी हो, नहीं जानता।”
“स्नानगृह में नहाना कैसा होता है, नहीं जानता।”
“लेप से नहाना नहीं जानता।”
“सब्रह्मचारियों (गुरुभाइयों) से देह मलबाना नहीं जानता।”
“क्षण भर के लिए भी किसी से देह मलबाई हो, नहीं जानता।”
“क्षण भर के लिए भी कोई बीमारी उत्पन्न हुई हो, नहीं जानता।”
“हर्र के टुकड़े के बराबर भी कभी औषध खाना नहीं जानता।”
“खाट बिछाकर सोना नहीं जानता।”
“शैया पर लेटना नहीं जानता।”
“वर्षा में भी गाँव के भीतर रहना नहीं जानता।”
इस प्रकार की लोकोत्तर साधना स्थविर वक्कुल की थी। बुद्ध−उपदेश सुनने के सातवें दिन ही उन्हें ज्ञान प्राप्त हो गया। जैसा कि उन्होंने कहा भी है—”सप्ताह भर ही मैंने चित्त−मल युक्त हो राष्ट्र का अन्न खाया। आठवें दिन शुद्ध अर्हत्व−ज्ञान उत्पन्न हुआ।” आश्चर्य नहीं कि अपने स्वस्थ, खिलते हुए चेहरे वाले भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए, भगवान ने एक दिन उद्घोषित किया, “भिक्षुओं! मेरे स्वस्थ, निरोग शिष्य भिक्षुओं में यही सबसे आगे है, यही वक्कुल।” 160 वर्ष की आयु में स्थविर वक्कुल ने शरीर छोड़ा।
गरल वृक्ष संसार में, दोइ फल उत्तम सार। स्वाध्याय रस पान पुनि, सत संगति ही सार ॥1॥ ब्रह्मचर्य आश्रम सुखद, श्रम सहि करो सप्रीति। बढ़े बाल और बालिका, यही सनातन रीति ॥2॥ विद्या धन आधार है, विद्या बल आधार। यह मत जो धारण करे, वह सब गुण आधार ॥3॥ कर्त्तव्याकर्त्तव्य गुनि, गहै प्रशस्त विचार। रहें सदा सुविवेक रत, साँचो शिक्षा सार ॥4॥ पड़ी न आई काम पै, चित्रग्रीव की उक्ति। अपनी अपनी क्यों करौ, सबतें सबकी युक्ति ॥5॥ निर्बल, निरुघर, निर्घनी, नास्तिक, निपट, निरास। जड़ कायर करिदेत हैं, नरहि अन्ध विश्वास ॥6॥ बिना ग्यान कौं करम कहुँ, तारि सके संसार। कहा काट करिहै जु कर, धार बिना तरवार ॥7॥ जनमत ही पावै नहीं, भली बुरी कोउ बात। बूझत बूझत पाइये, ज्यों ज्यों समझत जात ॥8॥ भलौ ज्ञान, अज्ञान नहिं है अज्ञान न ज्ञान। भानु उदे तो तम नहीं, है तम उदे न भान ॥9॥ सरसुति के भण्डार की, बड़ी अपूरव बात। ज्यों खरचे त्यों−त्यों बढै, बिन खरचे घटि जात ॥10॥ देखा देखी करत सब, नाहिन तत्व विचार। यह निश्चय ही जानिए, भेड़ चाल संसार ॥11॥ ज्यों ज्यों छुटे अयान पन, त्यों त्यों प्रेम प्रकास। जैसे कैरी आम की, पकरत पके मिठास॥12॥ गहत तत्व ज्ञानी पुरुष, बात विचार विचार। मथनि हारितजि छाछ कों, माखन लेत निकार ॥13॥ या लच्छन ते जानिये, उर अज्ञान निवास। अरुचि होय सत्संग में, रुचे हास परिहास ॥14॥ ग्रन्थ कीट बनि व्यर्थ क्यों, करत सुबुद्धि विनाश। खोलहु द्वार दिमाग के, पावहु पुण्य प्रकाश ॥15॥ केवल ग्रन्थन के पढ़े, आवागमन न जाय। षट् रत भोजन लखें ते, बिन खाये न अघाव ॥16॥ होय कछू समुझे कछु, जाकी मति विपरीत। कमलवाय रोगी लखै, श्याम सेत को पीत ॥17॥ कोउ बिन देखे बिन सुने, कैसे सकै विचार। कूप भेख जाने कहा, सागर का विस्तार ॥18॥ साँचा झूठ निरनय करे, नीति निपुन जो होय। राज हंस बिन को करे, नीर छीर कौ दोय ॥19॥ फल विचार कारज करौ, करहु न व्यर्थ अमेल। ज्यों तिलबाय पेरिए, नाहिन निकसै तेल ॥20॥ पीछे कारज कीजिये, पहले पहुँच विचार। कैसे पावत उच्च फल, बावन बांह पसार ॥21॥ फिर पीछे पछताइए, जो न करे मति सूध। बदन जीभ हिय जरत है, पीवत तातौ दूध ॥22॥
कीर्ति, विद्या, धन स्त्री, पुत्र स्वास्थ आदि सुख सुविधाएँ, साँसारिक सम्पदाएँ मनुष्य को स्वभावतः प्रिय हैं। अपनी कठिनाइयों को निवारण करने एवं सुख सामग्रियों को बढ़ाने के लिए उसका प्रयत्न जीवन भर चलता रहता है। पर यह वस्तुएँ किसको कितनी मात्रा में मिल पाती हैं यह बात उसके प्रारब्ध पर निर्भर रहती है। पूर्वकृत शुभ कर्म ही प्रारब्ध बने होते हैं जिनके कारण प्रिय परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं। जिनका पिछला शुभ कर्म संचय नहीं है, वे उद्योग करते हुए भी अभीष्ट सफलताओं से वंचित रह जाते हैं। शुभ प्रारब्ध के बिना जब छोटी छोटी मौलिक संपदाएं भी नहीं मिल पातीं जो आत्म−कल्याण, ईश्वर प्राप्ति, स्वर्ग मुक्ति जैसी महान् सफलताओं का मिलना तो और भी कठिन रहता है। जिस प्रकार शुभ कर्म के संक्षय को भौतिक जगत में प्रारब्ध कहते हैं उसी प्रकार आध्यात्मिक जगत में इन्हीं शुभ कर्मों के संचित प्रारब्ध को ‘ईश्वर की विशेष कृपा’ कहते हैं। दैवी अनुग्रह भी हमारे सुकृत का ही परिणाम होता है। अतएव ऋषियों ने सर्वत्र यही कहा है कि साँसारिक एवं आध्यात्मिक सुख शान्ति का एक मात्र माध्यम सुकृत ही हैं। जो जितने शुभ कर्म संचित कर लेगा वह आज या कल उतना ही सुख शान्ति का अधिकारी बनेगा। शास्त्रों में पग पग पर एक ही बात कही गई है कि सुख का मूल धर्म है। धर्म संचय बिना कोई सुखी नहीं बन सकता। इसलिये जिस प्रकार मनुष्य अपने जीवन की अनेक समस्याओं पर विचार करता है, अनेक वस्तुओं एवं प्रयोजनों को जुटाने में लगा रहता है, उसी प्रकार उसे शुभ कर्मों के संचय में भी प्रयत्नशील रहना चाहिये।
शुभ कर्मों के लिये इच्छा, श्रद्धा एवं अन्तः प्रेरणा होना सौभाग्य का एक संकेत ही समझना चाहिये। जब भी शुभ कर्मों के अवसर आवें तो मन की कमजोरी को परास्त करके उस अवसर से लाभ उठाने का प्रयत्न करना चाहिये। यही मानव दृष्टि की सर्वोत्तम दूरदर्शिता है। जो आलस्य, प्रमाद, संकोच एवं दैनिक जीवन की छोटी मोटी कठिनाइयों के कारण ऐसे अवसरों को खो देते हैं, वे प्रत्यक्षतः समय बचाने आदि का लाभ सोच सकते हैं पर वस्तुतः अन्त में यह उनकी अबुद्धिमत्ता ही सिद्ध होती है। यों सदा ही शुभ कर्मों के अवसर निर्माण करने एवं ढूँढ़ने के लिए स्वयं प्रयत्नशील रहना चाहिये पर यदि अनायास ही कोई ऐसा अवसर सामने आ जाय तब से उसकी उपेक्षा की ही न जानी चाहिये। ऐसे अवसर वस्तुतः मानव की अन्तरात्मा में विराजमान ऋतम्भरा प्रज्ञा को एक चुनौती होते हैं। जो उस चुनौती को स्वीकार करते हैं वे ही जागृत आत्मा कहलाते हैं।
इसी बसन्त पञ्चमी से गायत्री तपोभूमि में आयोजित विशद् गायत्री महायज्ञ एक ऐसा ही असाधारण महत्व का शुभ अवसर है। ऐसे अवसर हर रोज नहीं—कहीं मुद्दतों में आते हैं और उनमें भाग लेने की अन्तःप्रेरणा एवं सुविधा किन्हीं विरले ही भाग्यवानों को होती है। जिन भाग्यवानों को अपने भीतर इसमें भागीदार बनने की कुछ भावना उठ रही हो उन्हें संकोच, आलस्य, फुरसत की कमी आदि मानसिक दुर्बलताओं को छोड़कर इसमें भाग लेने के लिए साहसपूर्वक कटिबद्ध हो ही जाना चाहिये। यह साहस निस्सन्देह प्रबल पुरुषार्थ सिद्ध होगा और जितना समय इस भाग लेने में लगेगा इसकी समुचित सत्परिणाम उन्हें उपलब्ध होगा।
विशद् गायत्री महायज्ञ में भागीदारी का विधान बहुत ही सरल है। प्रतिदिन अपने घर पर रहकर नियमित रूप से गायत्री जप करते रहिये। जब 24 हजार पूर्ण हो जाय तब उसे एक अनुष्ठान या गायत्री महायज्ञ की भागीदारी का एक शेयर मान लीजिये। इस प्रकार चैत्र सुदी 9 संवत् 2013 तक अगले 15 महीनों में आप कितने ही भाग इस यज्ञ के प्राप्त कर सकेंगे। इस जप का हिसाब रखने के लिए जो फार्म है उसे भर कर मथुरा भेजते रहना चाहिए और भागीदारी का प्रमाणपत्र प्राप्त करते रहना चाहिए। इस जप का शताँश हवन मथुरा में ही करना होगा। इस सवा वर्ष में जब कभी आपका मथुरा आना हो तब शताँश हवन अपने हाथों करलें। या कई भागीदारों की ओर से कोई एक प्रतिनिधि आकर यहाँ हवन कर जावे। यदि यह दोनों की बातें सम्भव न हों तो एक पैसा प्रति आहुति के हिसाब से खर्च भेज कर यहाँ ही उस हवन की व्यवस्था कर दी जा सकती है।
हवन में कुछ खर्च होगा इस संकोच से किसी को भी भागीदारी का लाभ नहीं छोड़ना चाहिये। एक पैसे प्रति आहुति का पूरा खर्च करना जिनके लिए कठिन हो वे आधा चौथाई दे सकते हैं। जो उतना भी न कर सकेंगे उनका भी हवन यहाँ पूरा करा दिया जायगा। पैसे के अभाव में किसी का हवन या भागीदारी की कोई बात अधूरी न रहने दी जायगी। इस भागीदारी में नवरात्रि के अनुष्ठानों की भाँति कोई विशेष नियम, बन्धन, तप, साधना आदि प्रतिबन्ध नहीं रखे गये हैं। जिससे अधिक लोगों को इसमें भाग लेने की सुविधा है।
महायज्ञ प्रारम्भ हो चुका है। इसमें भाग लेने की- भागीदार बनने की अपने परिवार के सभी सदस्यों से हमारी विशेष प्रार्थना है। यह अलभ्य अवसर हाथ से जाने न दिया जाना चाहिए। जिनके पास अवकाश हो वे तपोभूमि में रहकर इस महायज्ञ में भाग लें। पर ऐसे लोगों को पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर लेना आवश्यक है। यहाँ आने वाले जो साधक डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड लिये डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड दस डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड इसलिये डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड वह स्वयं डडडड डडडड डडडड डडडड गोदार ढूँढ़ डडडड डडडड डडडड डडडड सफल बनाने डडडड डडडड डडडड की संख्या पूरी करने डडडड डडडड डडडड आवश्यकता है इसी डडडड डडडड डडडड प्रियजनों से प्रार्थना तथा डडडड डडडड डडडड चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र का डडडड डडडड यज्ञ, रुद्र यज्ञ, महामृत्युञ्जय डडडड डडडड यज्ञ, गणपति यज्ञ, सरस्वती यज्ञ, डडडड डडडड ज्योतिष्टोम आदि अनेकों यज्ञों की डडडड गायत्री महायज्ञ के साथ साथ चलती रहेगी, डडडड में भाग लेने की जिनकी इच्छा हो, वे मथुरा आकर इनमें भी भाग लें।
आप इस महायज्ञ में भाग लेने का अवसर न चूकिए। यह भागीदारी अन्ततः आपके लिए परम मंगलमय सिद्ध होगी। शुभ कर्मों के संचय का यह अलभ्य अवसर है। ऐसे ही सत्कर्म ही मनुष्य को शुभ प्रारब्ध तथा दैवी अनुग्रह उपलब्ध कराने में सहायक होते हैं।
महायज्ञ की सफलता के लिए :—
भागीदारों की संख्या बढ़ाना प्रधान कार्य है। इस कार्य को सफल बनाने का एक महत्वपूर्ण उपाय यह है कि आप जनवरी की अखण्ड ज्योति के ‘गायत्री अंक’ धार्मिक प्रकृति के अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने का प्रयत्न करें। लगान से भी कम−दो आना मूल्य−इस अंक का इसी उद्देश्य से रखा गया है। थोड़े अंक सादा बुक पोस्ट से मंगाने में उनके रास्ते में खो जाने का डर रहता है, इसलिए इनकी कम से कम 50 प्रतियाँ मंगानी चाहिये। इस पर रजिस्ट्री सेवा खर्च भी हम अपना लगा देंगे। इन अंकों का मूल्य तुरन्त ही देने में कोई कठिनाई है तो सुविधा के अनुसार पीछे भी भेज सकते हैं। गायत्री ज्ञान दान तथा इस ज्ञान के द्वारा महायज्ञ में भागीदारों की वृद्धि यह एक उच्चकोटि का पुण्य परमार्थ है। महायज्ञ में जहां अनेक यज्ञों का आयोजन है वह ‘गायत्री प्रसार ज्ञान यज्ञ’ भी उसका एक भाग है। थोड़ा प्रयत्न करने से ज्ञान यज्ञ को सफल बनाया जा सकता है।
महायज्ञ का यज्ञ संरक्षण :—
यज्ञों से सतोगुणी एवं दैवीतत्वों की शक्ति बढ़ती है और असुरता नष्ट होती है। आसुरी तत्व सदा यह प्रयत्न करते हैं कि वे बढ़ें और देव तत्व परास्त हों, इसलिये अपनी आत्मरक्षा तथा वृद्धि के लिए असुर सदा ही यज्ञों में नाना प्रकार के विघ्न उपस्थित करते हैं। प्राचीन काल में विश्वामित्र सरीखे ऋषि तक इन असुरों के विघ्नों से घबरा गये थे और उन्हें यज्ञ संरक्षण के लिए दशरथ से उनके पुत्र माँगने जाना पड़ा था। यह विशद् गायत्री महायज्ञ भी इस युग का महान यज्ञ है। इसे सफल न होने देने के लिए भी असुरता जो कुछ कर सकती होगी उसे करने में किसी प्रकार की कमी न रहने देगी। असुरता के यह आक्रमण नाना प्रकार के रूप, वेष धारण करके अनेकानेक तरह से हो रहे हैं और होंगे। इनसे रक्षा न हो तो विश्वामित्र जैसे ऋषि जब घबराते थे तो हमारा विचलित हो जाना कुछ असम्भव नहीं। इसलिये इस यज्ञ की संरक्षण व्यवस्था होनी आवश्यक है। प्रत्येक गायत्री उपासक से हमारी प्रार्थना है कि वह अपनी भागीदारों के अतिरिक्त प्रतिदिन गायत्री मन्त्र की एक माला इस यज्ञ की रक्षा के निमित्त, असुरता के आक्रमणों को परास्त करने के निमित्त अवश्य करते रहें। जो सज्जन इस संरक्षण की एक माला यज्ञ के अन्त तक करते रहने का भार अपने ऊपर लेने को तैयार हों कि अपने इस संकल्प की पूर्ण सूचना हमें अवश्य देदें। ताकि हमें पता रहे कि संरक्षण के लिए आवश्यक शक्ति तैयार हुई या नहीं।
विशद गायत्री महायज्ञ का प्रारम्भ:—
बसन्त पञ्चमी ता. 28 जनवरी 55 से विशद् गायत्री महायज्ञ पूर्ण शास्त्रोक्त विधि से वेदपाठी पण्डितों के तत्वावधान में प्रारम्भ हो गया है। आरम्भ होने का पुण्य दृश्य देखने ही योग्य था। यज्ञ में भागीदार बनने के लिए दूर दूर से सत्पुरुष आये हुए हैं। विस्तृत विवरण अगले अंक में छपेगा।
(पं. शिवशंकर मिश्र, एम.ए.)
[ 1 ]
मुक्त गगन है, मुक्त पवन है, मुक्त शीत की राहें, कौन सका है भला बाँध, स्वर्णिम किरणों की बाँहें,
है किसका प्रतिबन्ध मानता, वह फूलों का राजा, किससे पूछ मधुर मधु कृत ने रूप अनूठा साजा,
नहीं प्रकृति की देन कभी भी सीमा में रुक पाती। सबके लिए समान रूप से परम ब्रह्म की थाती॥
[ 2 ]
इस अज्ञान भवन में कैसे सत्य ज्योति आ पाये, तुमने पूर्व धारणाओं के दृढ़तर द्वार लगाये,
है माया की नीव, अहं की ईंट, ज्ञान का गारा, भ्रम की दीवारें, कृत्रिमता छत, मानवता कारा,
युग की कूटनीति की इसमें प्रतिमा पूजी जाती। और धर्म की सीढ़ी प्रभु का रूप भूमि पर लाती॥
[ 3 ]
यह सब कुछ विडंबना इसमें हमने निज को खोया, भावों में है अजब विषमता—बीज स्वयं ही बोया,
निकला वह विष-वृक्ष कि जिसके फलको जिसने खाया, उस उस पर ही गयी फैलती दानवता की छाया,
इसीलिए तो मनुज आज का पशु से किस विधि कम है। खाना पीना मौज उड़ाना ही जिसका संयम है॥
[4]
मुक्त करो पट, बाहर आकर देखो ज्योति किरण को, ऊषा-उदय, चेतना-जय के शुचि साकार वरण को,
वातावरण तुम्हारे प्रभु के बीच रखे हैं अन्तर, दूर करो उसको, लो सुनलो उतर रहा अनहद स्वर,
मानव वह जो निज कर्मों से ऐसा लोक बसाये। जिसमें रह कर स्वर्ग-प्राप्ति की इच्छा ही मिट जाये॥
*समाप्त*