स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम्। आयु प्राणं प्रजां पशुं कीर्ति द्रविणं ब्रह्म वर्चसम्। -अथर्व 19।72।1
ठीक रीति से उपासना करने पर वेदमाता गायत्री आत्मा को पवित्र करती है और आयु, प्राण, पशु, कीर्ति, धन तथा ब्रह्म तेज प्रदान करती है।
सार भूतास्तु वेदानां गह्योपनिषदो मताः। ताम्यः सारस्तु गायत्रीतिस्त्रों व्याहृतयस्तथा। -याज्ञवल्क्य
वेदों का सार उपनिषद् हैं और उपनिषदों का सार व्याहृतियों समेत गायत्री है।
गायत्री वेद जननी गायत्री पापनाशिनी। गायत्र्यास्तु परन्नास्ति दिविचेह च पावनम्। -वशिष्ठ
गायत्री वेदों की जननी है। गायत्री पापों को नाश करने वाली है। गायत्री से बड़ा और कोई पवित्र मंत्र स्वर्ग तथा पृथ्वी नहीं है।
नास्ति गंगा समं तीर्थं न देवाः केशवात्परः। गायत्र्यास्तु परं जप्यं न भूतं न भविष्यति।। -अत्रि
गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से श्रेष्ठ कोई देवता नहीं, गायत्री से बढ़कर कोई जप न आज तक हुआ और न आगे होगा।
गायत्र्या परमं नास्ति दिविचेह न पावनम्। हस्त त्राण प्रदा देवी पततां नरकार्णवे।।
नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़कर बचाने वाली गायत्री के समान और काई शक्ति इस पृथ्वी पर तो क्या स्वर्ग में भी नहीं है।
गायत्री चैव वेदाश्च ब्रह्मणा तोलिता पुरा। वेदेभ्यश्च चतुस्रेभ्यो गायत्र्यति गरीयसी।।
प्राचीन काल में ब्रह्मा जी ने गायत्री को चारों वेदों से तोला, तो चारों वेदों से भी गायत्री का पल्ला भारी रहा।
यथा मधु च पुष्पेभ्यो घृतं दुग्धाद्रसात्पयः एवं हि सर्व वेदानां गायत्री सार मुच्यते। -व्यास
जिस प्रकार पुष्पों का सार मधु, दूध का घृत, रसों का सार दूध है, उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है।
तदित्य च समोनास्ति मंत्रो वेदाचतुष्टये। सर्वे वेदाश्च यज्ञाश्च दानानि च तपांसिच।। समानि कलया प्राहुर्मुनयो नतदित्यृचः। -विश्वामित्र
गायत्री के समान मंत्र चारों वेदों में नहीं हैं। सम्पूर्ण वेद यज्ञ, दान, तप गायत्री की एक कला के समान भी नहीं हैं ऐसा मुनि लोग कहते हैं।
बहुना किमिहोक्तेन यथावत् साधु साधिता। द्विजन्मानामियं विद्या सिद्धिः काम दुधा स्मृता। -शारदा तिलक
अधिक कहने से क्या? ठीक प्रकार उपासना की हुई गायत्री द्विजों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों की सम्पूर्ण मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली ही है।
गायत्री तु परित्यज्य अन्य मंत्रामुपासते। सिद्धान्नं च परित्यज्य भिक्षामटति दर्मति। -विद्यारण्य
जो गायत्री को छोड़कर अन्य मंत्रों की उपासना करता है वह प्रस्तुत पकवान को छोड़कर भिक्षा के लिए घूमने वाले मनुष्य के समान मूर्ख है।
सर्व वेद सारभूता गायत्र्यास्तु समर्चना। ब्रह्मदयोऽपि सन्ध्यायां तां ध्यायन्ति जयन्ति च।। दे. भा. स्कं. अ. 16।15
गायत्री मन्त्र का आराधन समस्त वेदों का सारभूत है। ब्रह्मादि देवता भी सन्ध्याकाल में गायत्री का ध्यान करते हैं और जप करते हैं।
कुर्यादन्यत्र वा कुर्यात् इति प्राह मनुः स्वयं। अक्षय मोक्षमवाप्नोति, गायत्री मात्र जापनात्।। -शौनक
इस प्रकार मनुजी ने स्वयं कहा है कि अन्य देवताओं की उपासना करे या न करे, केवल गायत्री के जप से द्विज अक्षय मोक्ष को प्राप्त होता है।
अगस्त-1955 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-1
गायत्री सनातन एवं अनादि मन्त्र है। पुराणों में कहा गया है कि-”सृष्टि कर्ता ब्रह्मा को आकाशवाणी द्वारा गायत्री मन्त्र,प्राप्त हुआ था,इसी की साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप ही ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेद माता कहते हैं। चारों वेद गायत्री की व्याख्या मात्र है।” गायत्री को जानने वाला,वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।’
गायत्री के 24 अक्षर अत्यंत ही महत्वपूर्ण शिक्षाओं के प्रतीक हैं। वेद,शास्त्र,पुराण,स्मृति उपनिषद् आदि में जो शिक्षाएँ मनुष्य जाति को दी गई है,उन सब का सार इन 24 अक्षरों में मौजूद है। इन्हें अपना कर मनुष्य प्राणी व्यक्तिगत तथा सामाजिक सुख शान्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है।
गायत्री,गीता, गंगा और गौ यह भारतीय संस्कृति की चार आधार शिला हैं, इन सब में गायत्री का स्थान सर्व प्रथम है। जिसने गायत्री के छिपे हुए रहस्यों को जान लिया उसके लिये और कुछ जानना शेष नहीं रहता ।
समस्त धर्मग्रन्थों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। समस्त ऋषि, मुनि मुक्त कण्ठ से गायत्री का गुणगान करते हैं। शास्त्रों में गायत्री की महिमा बताने वाला इतना साहित्य भरा है कि उसका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा ग्रन्थ ही बन सकता है। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है−’गायत्री छन्दसामहम्” अर्थात् ‘गायत्री मन्त्र मैं स्वयं ही हूँ’।
गायत्री उपासना के साथ−साथ अन्य कोई उपासना करते रहने में कोई हानि नहीं। सच तो यह है कि अन्य किसी भी मन्त्र का जप करने में या देवता की उपासना में तभी सफलता मिलती है, जब पहले गायत्री द्वारा उस मन्त्र या देवता को जागृत कर लिया जाय । कहा भी है:-
यस्य कस्यापि मन्त्रस्य पुरश्चरणमारभेत्। व्याहृति त्रय संयुक्त गायत्री चायुतं जपेत्॥ नृसिंहार्क वराहाणाँ कौला तान्त्रिका तथा। बिना जप्त्वातु गायत्री तर्त्संवनिष्फल भवेत्॥
चाहे किसी भी मन्त्र का साधन किया जाये, उस मन्त्र को व्याहृति समेत गायत्री सहित जपना चाहिये। चाहे नृसिंह, सूर्य, वाराह आदि किसी की भी उपासना हो या कौल एवं ताँत्रिक प्रयोग किया जाये, बिना गायत्री को आगे लिए वे सब निष्फल होते हैं। इसीलिये गायत्री उपासना प्रत्येक साधक के लिए आवश्यक हैं।
गायत्री सर्वश्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मन्त्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मन्त्र से हो सकता है,गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल,स्वल्प श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं हैं।
गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों में अनेक ज्ञान विज्ञान छिपे हुए है। अनेक दिव्य अस्त्र,शस्त्र,सोना आदि बहुमूल्य धातुओं का बनाना, अमूल्य औषधियां रसायनें, दिव्य मन्त्र, अनेक ऋद्धि सिद्धियाँ,शाप वरदान के प्रयोग, प्रियजनों के लिये नाना प्रकार के उपचार, परोक्ष विद्या,अन्त दृष्टि, प्राण विद्या, वेधक प्रक्रिया शूल शाल्य, बाम मार्गी तन्त्र विद्या, कुण्डलिनी चक्र, दश महाविद्या महामातृ का, जीवन निर्मोक्ष, रूपांतरण, अज्ञात सेवन, अदृश्य दर्शन,शब्द परव्यूह, सूक्ष्म सम्भाषण आदि अनेक लुप्त प्रायः महान् विद्याओं के रहस्य बीज और संकेत गायत्री में मौजूद हैं। इन विद्याओं के कारण एक समय हम जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक और स्वर्ण सम्पदाओं के स्वामी बन हुए थे। आज इन विद्याओं को भूल कर हम सब प्रकार दीन हीन बने हुए हैं। गायत्री में सन्निहित उन विद्याओं का यदि फिर प्रकटीकरण हो जाय तो हम अपना प्राचीन गौरव प्राप्त कर सकते हैं।
गायत्री की साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं, तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋद्धि−सिद्धियां परिलक्षित होने लगती हैं। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है उसी प्रकार गायत्री साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशवान होकर ईश्वरीय शक्ति यों, गुणों, सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।
आत्मा के कल्याण की अनेक साधनाएँ हैं। सभी का अपना अपना महत्व है और उनके परिणाम भी अलग अलग हैं। ‘स्वाध्याय’ से सन्मार्ग की जानकारी होती है। सत्संग से स्वभाव और संस्कार बनते हैं। कथा सुनने से सद्भावनाएं जागृत होती हैं। ‘तीर्थ यात्रा’ से भावाँकुर पुष्ट होते हैं। ‘कीर्तन’ से तन्मयता का अभ्यास होता है। ‘दान−पुण्य’ से आस्तिकता बढ़ती है। इस प्रकार यह सभी साधन ऋषियों ने बहुत सोच समझ कर प्रचलित किये हैं। पर ‘तप’ का महत्व इन सबसे अधिक है। ‘तप’ की अग्नि में पड़कर ही आत्मा के मल विक्षेप और पाप ताप जलते हैं। तप के द्वारा ही आत्मा में वह प्रचण्ड बल पैदा होता है,जिसके द्वारा साँसारिक तथा आत्मिक जीवन की समस्यायें हल हो सकती है। तप की सामर्थ्य से ही नाना प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। इसी लिये ‘तप’ साधन को सबसे अधिक शक्ति −शाली माना गया है। तप के बिना आत्मा में अन्य किसी भी साधन से तेज,प्रकाश, बल एवं पराक्रम उत्पन्न नहीं होता ।
गायत्री उपासना प्रत्यक्ष तपश्चर्या है। इससे तुरन्त आत्म बल बढ़ता है। गायत्री−साधना एक बहुमूल्य दिव्य सम्पत्ति है। इस सम्पत्ति को इकट्ठी करके साधक उसके बदले में साँसारिक सुख एवं आत्मिक आनन्द भली प्रकार प्राप्त कर सकता है।
गायत्री मन्त्र से आत्मिक कायाकल्प हो जाता है। इस महामंत्र की उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र में एक नई हल−चल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और संयम, नम्रता, पवित्रता, उत्साह, स्फूर्ति, श्रमशीलता,मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, उदारता, प्रेम, सन्तोष, शान्ति, सेवा भाव, आत्मीयता, आदि सद्गुणों की मात्रा दिन दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फल स्वरूप लोग उसके स्वभाव, एवं आचरण से सन्तुष्ट होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता,श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहाँ आत्मसन्तोष की परम शान्तिदायक शीतल निर्झरिणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग सदा स्वर्गीय सुख का आस्वादन करते हैं।
गायत्री −साधना से साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतंभरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुःखों का निवारण हो जाता है। प्रारब्ध, अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्ट साध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में, आती रहती हैं। हानि शोक, वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण विरोध, आघात आदि को विभिन्न परिस्थितियों से जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्यु तुल्य कष्ट पाते हैं वहाँ आत्म बल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक, ज्ञान वैराग्य, साहस, आशा, धैर्य, सन्तोष, संयम और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते हँसते आसानी से काट लेता है। बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी वह अपने आनंद का मार्ग ढूँढ़ निकालता है और मस्ती, प्रसन्नता एवं निराकुलता का जीवन बिताता है।
प्राचीन काल में ऋषियों ने बड़ी−बड़ी तपस्याएँ और योग साधनाएँ करके अणिमा,महिमा आदि चमत्कारी ऋद्धि सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। उनके शाप और वरदान सफल होते थे। तथा वे कितनी ही अद्भुत एवं चमत्कारी सामर्थ्यों से भरे पूरे थे इसका वर्णन इतिहास पुराणों में भरा पड़ा है। वह तपस्याएँ और योग साधनाएँ गायत्री के आधार पर ही होती थीं गायत्री महाविद्या से ही 84 प्रकार की महा योग साधनाओं का उद्भव हुआ है।
गायत्री उपासना एक प्रकार का आध्यात्मिक व्यायाम है जिसका परिणाम जीवन शरीर को पुष्ट बलवान एवं सुव्यवस्थित बनाना है। सकाम कामना के लिए की हुई गायत्री साधना से अभीष्ट परिणाम प्राप्त न भी हो तो भी उसका शुभ परिणाम अन्य मार्ग से अवश्य प्राप्त हो जाता है। कोई बड़ी कुश्ती पछाड़ने के लिए कोई अखाड़े में आया करे तो उसका शरीर दिन दिन अवश्य मजबूत होगा। वह मनोवांछित कुश्ती पछाड़ने में सफल न भी हो तो यह नहीं सोचना चाहिये कि उसका व्यायाम तथा पौष्टिक आहर व्यर्थ चला गया। कुश्ती वह भले ही हार जाय पर निरोगता,स्फूर्ति, जीवन शक्ति, दीर्घजीवन, कमाने की क्षमता, बलवान सन्तान शत्रुओं से निपट लेने की सामर्थ्य आदि अनेकों लाभ प्राप्त होते हैं, जिन्हें पछाड़ने से कम महत्वपूर्ण नहीं समझना चाहिए। इसी प्रकार गायत्री उपासना कभी भी असफल नहीं होती। अटल प्रारम्भ का कोई सुनिश्चय न टाल सके तो भी अन्य अनेकों रीतियों से उपासना साधन के लिए शुभ परिणामों का आयोजन करती है।
वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, आत्रि, विश्वामित्र, पाराशर, भारद्वाज, गौतम, व्यास, शुकदेव, नारद, दधीचि, वाल्मीकि, च्यवन, शंख, लोमस, तैत्तिरेय, जाबालि, शृंगी, उद्दालक, वैशम्पायन, दुर्वासा, परशुराम, पुलस्य, दत्तात्रेय, अगस्त, सनत्कुमार, कण्व, शनिक आदि ऋषियों के जीवन−वृत्तान्त जिन्होंने पढ़े हैं वे जानते हैं कि उनकी महानता,शक्तियाँ एवं सिद्धियाँ जिस आधार− शिला पर अवस्थित थी−वह गायत्री ही है।
प्राचीन काल की भाँति अब भी वही मार्ग है। यद्यपि यवनराज्य के पिछले अज्ञानान्धकर युग में अगणित सम्प्रदाय,मत मतान्तर उपज पडें और उन्होंने अपनी−अपनी सूझ−बूझ के अनुसार नाना प्रकार के साधना पंथ बना लिए फिर भी ऐसी साधना जो पूर्ण सिद्धावस्था तक साधक को पहुँचा सके गायत्री के अतिरिक्त और कोई सिद्ध न हो सकी। जिसने भी पूर्णता एवं परम सिद्धावस्था पाई है, उनने गायत्री माता का आश्रम अवश्य लिया है। मध्यकाल में महाभारत से लेकर अब तक के सभी सिद्ध पुरुष प्रायः इसी राजमार्ग से चले हैं। उनका मत ग्रन्थ तथा विशेष साधन चाहे प्रथक भले ही रहे है पर मूल आश्रय को किसी ने भी नहीं छोड़ा है। वर्तमान काल में भी जिनने आत्मिक दृष्टि से कुछ विकास किया है, उन्हें वेदमाता का पय पान करने का सौभाग्य अवश्य मिला है।
गायत्री भगवान का नारी रूप है। भगवान की माता के रूप में उपासना करने से दर्पण के प्रतिबिम्ब एवं कुएं की आवाज की तरह वे भी हमारे लिये उसी प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं। संसार में सबसे अधिक स्नेहमूर्ति माता होती है। भगवान की माता के रूप में उपासना करने से प्रत्युत्तर में उनका अगर वात्सल्य प्राप्त होता है। मातृ पूजा के नारी जाति के प्रति पवित्रता सदाचार एवं आदर के भाव बढ़ते हैं जिनकी मानव जाति को आज अत्यधिक आवश्यकता है।
गायत्री को भूलोक की कामधेनु कहा गया है क्योंकि यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाएँ शान्त करती है। गायत्री को ‘सुधा’ कहा गया है−क्योंकि जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ा कर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से वह परिपूर्ण है। गायत्री को “पार−समणि” कहा गया है क्योंकि उसके स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अन्तःकरणों का शुद्ध स्वर्ण जैसा महत्व पूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री की ‘कल्पवृक्ष’ कहा गया है क्योंकि इसकी छाया में बैठ कर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिये उचित एवं आवश्यक है।
श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का अञ्चल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणकारक ही होता है। गायत्री को ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया है क्योंकि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती । इसका प्रयोग कभी भी व्यर्थ नहीं होता।
गायत्री उपासना से मनुष्य की अनेक कठिनाइयाँ हल होती हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण मौजूद हैं कि जो लोग आरम्भ में दरिद्रता का अभाव ग्रस्त जीवन व्यतीत करते थे, अपने मामूली गुजारे की भी व्यवस्था जिनके पास न थी, कर्ज के बोझ से दबे हुए थे व्यापार में घाटा जा रहा था, उन्होंने गायत्री की उपासना की और अर्थ संकट को पार करके ऐसी स्थिति पर पहुँच गये कि जिससे अनेकों को ईर्ष्या होती है। कम पढ़े और छोटी नौकरियों पर काम करने वालों को ऊँचे पद पर पहुँचने के उदाहरण मौजूद है। जिनकी बुद्धि बड़ी ही मौड़ी और मन्द थी वे चतुर तीक्ष्णबुद्धि और विद्वान बने हैं। जिनकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने की कोई आशा नहीं करता था, ऐसे विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से पास हुए है। झगड़ालू चिड़चिड़े, क्रोधी, व्यसनी, बुरी आदतों में फँसे हुए, आलसी एवं मूढ़ मति लोगों के स्वभाव में ऐसा परिवर्तन हुआ है कि लोग दाँतों तले उँगली दबाये रह गये।
गायत्री साधना के चमत्कारी लाभ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रकट होते रहते हैं। जिनके दंपत्ति जीवन बड़े कलैश थे, पति−पत्नी में कुत्ता बिल्ला का
सा बैर रहता था, वहाँ प्रेम की निर्झरिणी बहती देखी गई। भाई−भाई जो एक दूसरे के जानी दुश्मन बने हुए थे उनमें भरत मिलाप हुआ। जो कुटुम्ब, परिवार क्लेश और कलह की अग्नि में झुलस रहे थे वहाँ शान्ति की वर्षा हुई। फौजदारी, मुकदमेबाजी, कत्ल, चोरी, डकैती की आशंका से जहाँ हर घड़ी भय रहता था वहाँ निर्भयता का एक छत्र राज हुआ। शत्रुओं के आक्रमण में जो लोग घिरे हुए थे वे इन आपत्तियों से बाल−बाल बच गये।
बीमारी से तो कितने ही साधकों का पिण्ड छूटा है। कई तो तपैदिक की मृत्यु शैया पर पड़े−पड़े यमराज से लड़े हैं और उनी डाढ़ों में से वापिस लौटे हैं। भूतोन्माद, दुःस्वप्न, मूर्च्छा,हृदय की निर्बलता, गर्भाशय का विषैला होना आदि रोगों से कितनों ने ही मुक्ति पाई है। कोढ़ी शुद्ध हुए हैं, असंयत जीवन क्रम और कुविचारों से उत्पन्न होने वाले स्वप्नदोष, प्रमेह आदि रोगों का मनः शुद्धि के साथ 2 तुरन्त ही कम होना आरम्भ हो जाता है। दुर्बल, जीर्ण रोगों से ग्रस्त व्यक्ति यों को वेद माता की गोद में पहुँचकर बड़ी शान्ति मिलती देखी है। सन्निपात शीतला, हैजा, प्लेग, मोतीझरा, निमोनिया, आदि कठिन रोगों में गायत्री ने चक्र सुदर्शन की तरह रक्षा की है।
चिन्ताओं के दबाव से जो मस्तिष्क फटते रहते थे, उन्हें निश्चिन्तता और सन्तोष की साँस लेते हुए देखा गया है। मृत्यु शोक, सम्पत्ति का नाश, ऋण− ग्रस्तता, बात बिगड़ जाने का भय, कन्या विवाह का खर्च, प्रियजनों का बिछोह,जीविका का आश्रय टूट जाना, अपमान असाध्य रोग, दरिद्रता, शत्रुओं का प्रकोप, बुरे भविष्य की आशंका आदि कारणों से जिन्हें हर घड़ी चिन्ता घेरे रहती थी उन्हें माता की कृपा से कोई निश्चिंतता प्राप्त हुई है या उन्हें आकस्मिक सहायता मिली है या भीतरी प्रेरणा से उद्धार का कोई उपाय सूझ पड़ा है या अन्तःकरण में ऐसा विवेक और आत्मबल प्रकट हुआ है जिससे उस अवश्यम्भावी अटल प्रारब्ध को हंसते−हंसते वीरतापूर्वक सहन कर लिया।
पुरुषों की ही भाँति स्त्रियाँ भी प्रसन्नता पूर्वक गायत्री उपासना कर सकती हैं। विधवाएँ आत्म संयम, इन्द्रिय निरोध, मनोनिग्रह एवं सात्विकता की वृद्धि करने में गायत्री की सहायता से सफल होती हैं। वे घर में रह कर इस तपस्या द्वारा आत्मकल्याण प्रभु प्राप्ति एवं जीवन मुक्ति प्राप्त कर सकती हैं। कुमार्र कन्याओं की गायत्री साधन उनको अच्छे घर वर तथा अनन्त सौभाग्य प्राप्त करने में सहायक होती हैं। सधवा गायत्री साधना द्वारा दंपत्ति जीवन में प्रेम, घर में सुख शान्ति एवं समृद्धि, बालकों की कुशल क्षेत्र प्राप्त करती हैं। गर्भवती स्त्रियाँ वेदमाता की उपासना करके स्वस्थ, तेजस्वी बुद्धिमान, दीर्घजीवी एवं भाग्यवान बालक प्राप्त करती है। सब से उत्तम यह है कि निष्काम होकर अटूट श्रद्धा और भक्ति भाव से गायत्री की उपासना की जाय, कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट−घट वासिनी सर्व शक्ति मान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती । वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सब से बड़ा लाभ आत्म कल्याण है। जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।
गृही−विरक्त, स्त्री−पुरुष, बाल−वृद्ध सभी अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार गायत्री माता का आश्रय लेकर अपने भीतर और बाहर फैले हुए अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकते हैं। अविश्वासी व्यक्ति परीक्षा की दृष्टि से कुछ समय गायत्री उपासना करके देखें, तो उनका अविश्वास विश्वास में परिणत होकर रहता है।
गायत्री जप एक आवश्यक नित्य कर्त्तव्य है। इस धर्म कर्त्तव्य की उपेक्षा करने वाले को शास्त्रकारों ने ‘शूद्र’ कहा है। मनुष्य का हाड़ माँस का शरीर माता के गर्भ से उत्पन्न होता है किन्तु आध्यात्मिक जीवन गायत्री माता के द्वारा ही मिलता है। यह दूसरा जन्म होने पर ही कोई व्यक्ति द्विज कहलाता है। जहाँ गायत्री की नियमित साधना होती है वहाँ कल्याण की निरन्तर वर्षा होती रहती है।
अथर्ववेद 19-71-1 में गायत्री की स्तुति की गई है जिसमें उसे आयु, प्राण, शक्ति, कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है।
विश्वामित्र का कथन है-गायत्री के समान चारों वेदों में कोई मन्त्र नहीं है। सम्पूर्ण वेद, यज्ञ, दान, तप, गायत्री मन्त्र की एक कला के समान भी नहीं हैं।
भगवान मनु का कथन है-’ब्रह्माजी ने तीनों वेदों का सार तीन चरण वाला गायत्री मन्त्र निकाला । गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मन्त्र नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से तीन वर्ष तक गायत्री का जप करता है वह ईश्वर को प्राप्त करता है। जो द्विज दोनों सन्ध्याओं में गायत्री जपता है वह वेद पढ़ने के फल को प्राप्त करता है। अन्य कोई साधना करें या न करे केवल गायत्री जप से ही सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है जैसे केंचुली से सर्प छूट जाता है। जो द्विज गायत्री की उपासना नहीं करता वह निन्दा का पात्र है।
योगिराज याज्ञवल्क्य कहते है−’गायत्री और समस्त वेदों को तराजू में तोला गया । एक और षट− अंगों समेत वेद और दूसरी ओर गायत्री को रखा गया। तो गायत्री भारी निकली वेदों का सार उपनिषद् हैं, उपनिषदों का सा व्याहृतियों समेत गायत्री है। गायत्री वेदों को जानना है, पापों का नाश करने वाली है, इससे अधिक पवित्र करने वाला अन्य कोई मन्त्र स्वर्ग और पृथ्वी पर नहीं है। गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, केशव से श्रेष्ठ कोई देव नहीं, गायत्री से श्रेष्ठ मन्त्र न हुआ न आगे होगा। गायत्री जान लेने वाला समस्त विद्याओं का वेत्ता और श्रेष्ठ श्रोत्रिय हो जाता है। जो द्विज गायत्री परायण नहीं वह वेदों का पारंगत होते हुए भी शूद्र के समान है, अन्यत्र किया हुआ उसका श्रम व्यर्थ है। जो गायत्री नहीं जानता ऐसा व्यक्ति ब्राह्मणत्व से च्युत और पापयुक्त हो जाता है।
पाराशर जी कहते हैं−’समस्त जप सूक्तों तथा वेद मन्त्रों में गायत्री मन्त्र परम श्रेष्ठ है। वेद और गायत्री की तुलना में गायत्री का पलड़ा भारी है। भक्ति पूर्वक गायत्री जपने वाला परम मुक्त होकर पवित्र बन जाता है। वेद,शास्त्र,पुराण इतिहास पढ़ लेने पर भी जो गायत्री से हीन है उसे ब्राह्मण न समझना चाहिए।
शंख ऋषि का मत है− ‘नरक रूपी समुद्र में गिरते हुए को हाथ पकड़ कर बचाने वाली गायत्री ही है। उससे उत्तम वस्तु स्वर्ग और पृथ्वी पर कोई नहीं है। गायत्री का ज्ञाता निस्संदेह स्वर्ग को प्राप्त करता है।’
शौनिक ऋषि का मत है− अन्य उपासनाएँ करे चाहे न करे, केवल गायत्री जप से द्विज जीवन मुक्त हो जाता है। साँसारिक और पारलौकिक समस्त सुखों को पाता है। संकट के समय दस हजार जप करने से विपत्ति का निवारण होता है।
अत्रि ऋषि कहते है− गायत्री आत्मा का परम शोधन करने वाली है। उसके प्रभाव से कठिन दोष और दुर्गुणों का परिमार्जन हो जाता है। जो मनुष्य गायत्री तत्व को भली प्रकार समझ लेता है उसके लिए इस संसार में कोई दुख शेष नहीं रह जाता ।
महर्षि व्यास जी कहते हैं−’जिस प्रकार पुष्पों का सारा शहद, दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री काम धेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है, गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है। जो गायत्री छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़ कर भिक्षा माँगने वाले के समान मूर्ख है। काम्य सफलता तथा तप की सिद्धि के लिए गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं हैं ।
भारद्वाज ऋषि कहते हैं− ब्रह्मा आदि देवता भी गायत्री का जप करते हैं वह ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाली है। अनुचित काम करने वालों के दुर्गुण गायत्री के कारण छूट जाते हैं। गायत्री से रहित व्यक्ति शूद्र से भी अपवित्र है।
चरक ऋषि लिखते हैं− जो ब्रह्मचर्य पूर्वक गायत्री की उपासना करता है और आँवले के ताजे
फलों का सेवन करता है वह दीर्घ जीवी होता है।
नारद जी की उक्ति है− गायत्री भक्ति का ही रूप है, जहाँ भक्ति रूपा गायत्री है वहाँ श्री नारायण का निवास होने से कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।
वशिष्ठजी का मत है− मन्दमति, कुमार्गगामी और अस्थिर मति भी गायत्री के प्रभाव से उच्च पद को प्राप्त करते हैं फिर सद्गति होना निश्चित है। जो पवित्रता और स्थिरता पूर्वक गायत्री की उपासना करते हैं वे आत्मलाभ करते हैं।
गौतम ऋषि का मत है कि− योग का मूल आधार गायत्री है। गायत्री से ही सम्पूर्ण योगों की साधना होती है।
महर्षि उद्दालक कहते हैं− गायत्री में परमात्मा का प्रचंड तेज भरा हुआ है। जो इस तेज को धारण करता है उसका वैभव अतुलनीय हो जाता है।
देव गुरु बृहस्पति जी का मत है− देवत्व और अमृतत्व की आदि जननी गायत्री है। इसे प्राप्त करने के पश्चात और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता ।
शृंगी ऋषि की उक्ति है− ज्ञान विज्ञान का आदि स्रोत गायत्री ही है। उससे अधिक संसार में और कुछ नहीं है।
उपरोक्त अभिमतों से मिलते जुलते अभिमत प्रायः सभी ऋषियों के हैं। इससे स्पष्ट है कि कोई भी ऋषि अन्य विषयों में चाहे आपस का मत भेद रखते रहे हों पर गायत्री के बारे में उन सब में समान श्रद्धा थी, और वे सभी अपनी उपासना में उसका प्रथम स्थान रखते थे। शास्त्रों में,धर्मग्रन्थों में स्मृतिय में पुराणों में गायत्री की महिमा तथा साधना पर प्रकाश डालने वाले सहस्रों श्लोक भरे पड़े है। इन सबका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा भारी गायत्री पुराण ही बन सकता है।
वर्तमान शताब्दी के आध्यात्मिक तथा दार्शनिक महापुरुषों ने भी गायत्री के महत्व को उसी प्रकार स्वीकार किया है जैसा कि प्राचीन काल के तत्वदर्शी ऋषियों ने किया था । आज का युग बुद्धि ओर तर्क प्रत्यक्ष वाद का युग है।
महात्मा गान्धी कहते हैं−’गायत्री मन्त्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्ति हृदय से किया हुआ जप आपत्ति काल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।’
लोकमान्य तिलक कहते हैं− ‘जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में भारतीय प्रजा जकड़ी हुई है उसका अन्त राजनीतिक संघर्ष करने मात्र से न हो जायगा। उसके लिए आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना होगा जिससे सत् और असत् का विवेक हो, कुमार्ग को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। गायत्री मन्त्र में यही भावना विद्यमान है।
महामना मदनमोहन मालवीयजी ने कहा था− ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिये हैं उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री ऐसा ही जिससे बुद्धि पवित्र होती है। ईश्वर का प्रकाश आत्मा में आता है। इस प्रकाश से असंख्य आत्माओं को भव बन्धन से त्राण मिला है। गायत्री में ईश्वर परायणता में श्रद्धा उत्पन्न करने की शक्ति है। साथ ही वह भौतिक अभावों को दूर करती है। जो ब्राह्मण गायत्री जप नहीं करता वह अपने कर्तव्य धर्म छोड़ने का अपराधी होता है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर कहते है− भारतवर्ष को जगाने वाला जो मन्त्र है वह इतना सरल है कि एक ही श्वास में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह है−गायत्री मन्त्र। इस पुनीत मन्त्र का अभ्यास करने में किसी प्रकार के तार्किक ऊहापोह, किसी प्रकार के मत भेद अथवा किसी प्रकार के बखेड़े की गुंजाइश नहीं है।
योगी अरविंद घोष ने कई जगह गायत्री जप करने का निर्देश किया है। उन्होंने बताया है कि गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है जो महत्व पूर्ण कार्य कर सकती है। उन्होंने कइयों को साधना के तौर पर गायत्री का जप बताया है।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस का उपदेश है−”मैं लोगों से कहता हूँ कि लम्बे लम्बे साधन करने की उतनी जरूरत नहीं है। इस छोटी सी गायत्री का जप करके देखो । गायत्री का जप करने से बड़ी बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। यह मन्त्र छोटा है पर इसकी शक्ति भारी है।”
स्वामी विवेकानन्द का कथन है −’राजा से वही वस्तु माँगी जानी चाहिए जो उसके गौरव के अनुकूल हो। परमात्मा से माँगने योग्य वस्तु सद्बुद्धि है। जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं उसे सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। सद्बुद्धि से सत् मार्ग पर प्रगति होती है और सत् कर्म से सब प्रकार से सुख मिलते हैं। जो सत् की ओर बढ़ रहा है उसे किसी प्रकार के सुख की कमी नहीं रहती । गायत्री सद्बुद्धि का मन्त्र है। इसलिए उसे मन्त्रों का मुकुटमणि कहा गया है।’
जगद्गुरु शंकराचार्य जी कथन है− ‘गायत्री की महिमा का वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। बुद्धि का शुद्ध होना इतना बड़ा कार्य है जिसकी समता संसार के और किसी काम से नहीं हो सकती । आत्मबल प्राप्त करने की विश्व दृष्टि शुद्ध बुद्धि से प्राप्त होती हे उसका प्रेरक गायत्री मन्त्र है। उसका अवतार दुरितों को नष्ट करने और ऋत के अभिवर्धन के लिए हुआ है।
स्वामी रामतीर्थ ने कहा है−”राम को प्राप्त करना सबसे बड़ा काम। गायत्री का अभिप्राय बुद्धि को काम रुचि से हटा कर राम रुचि में लगा देना है। जिसकी बुद्धि पवित्र होगी वही राम को प्राप्त करने का काम कर सकेगा। गायत्री पुकारती है कि बुद्धि में इतनी पवित्रता होनी चाहिए कि वह काम को राम से बढ़कर न समझे।”
महर्षि रमण के उपदेश के अंतर्गत है मन्त्र विद्या बड़ी प्रबल है, मन्त्रों की शक्ति से अद्भुत सफलताएं मिलती हैं। गायत्री मन्त्र ही है, जिससे आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं।’
स्वामी शिवानन्द जी कहते हैं −ब्राह्ममुहूर्त में गायत्री का जप करने से चित्त शुद्ध होता है और हृदय में निर्मलता आती है। शरीर निरोग रहता है, स्वभाव में नम्रता आती है, बुद्धि सूक्ष्म होने से दूरदर्शिता बढ़ती है और स्मरण शक्ति का विकास होता है। कठिन प्रसंगों में गायत्री द्वारा दैवी सहायता मिलती है। उसके द्वारा आत्म दर्शन हो सकता है।
सर राधाकृष्णन कहते हैं−’यदि हम इस सार्वभौमिक प्रार्थना गायत्री पर विचार करें तो हमें मालूम होगा कि हमें वास्तव में कितना ठोस लाभ देती है। गायत्री हम में फिर से जीवन का स्रोत उत्पन्न करने वाली आकुल प्रार्थना है।’
आर्यसमाज के जन्मदाता श्री स्वामी दयानन्द जी गायत्री के श्रद्धालु उपासक थे। ग्वालियर के राजासाहब से स्वामी जी ने कहा था कि भागवत सप्ताह की अपेक्षा गायत्री पुरश्चरण अधिक श्रेष्ठ हैं। जयपुर के सच्चिदानन्द, हीरालाल रावल घोड़लसिंह आदि को उन्होंने गायत्री जप की विधि सिखाई थी। मुलतान में उपदेश के समय स्वामीजी ने गायत्री मन्त्र का उच्चारण किया और कहा कि− यह मन्त्र सबसे श्रेष्ठ है। चारों वेदों का मूल यहीं गुरु मन्त्र है। आदि काल में सभी ऋषि मुनि इसी का जप किया करते थे। स्वामी जी ने कई स्थानों पर विशाल गायत्री अनुष्ठानों का आयोजन कराया था, जिनमें चालीस तक की संख्या में विद्वान ब्राह्मण बुलाए गये। यह जप पन्द्रह दिन तक चले थे। स्वामी दयानन्द के गुरु प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द जी आँखों से अन्धे होते हुए भी वेद शास्त्रों के उद्भट विद्वान थे। उन्होंने दीर्घकाल तक गंगा तट पर गायत्री उपासना करके ऐसी प्रज्ञा पाई थी ।
गायत्री सद्बुद्धि का मन्त्र है। इस महामन्त्र में कुछ ऐसी विलक्षण शक्ति है कि उपासना करने वाले के मस्तिष्क और हृदय पर बहुत जल्दी आश्चर्यजनक प्रभाव परिलक्षित होता है । मनुष्य के मनः क्षेत्र में समाये हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, चिन्ता, भय, शोक, ईर्ष्या, द्वेष, पाप, कुविचार आदि चाहे कितनी ही गहरी जड़ जमाये बैठे हों, मन में तुरन्त ही हलचल आरम्भ होती है और उनका उखड़ना, घटना तथा मिटना प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगता है।
संसार में समस्त दुःखों की जननी कुबुद्धि ही तो है। जितने भी दुःखी मनुष्य इस विश्व में दीख पड़ते हैं, उनके दुःखों का एकमात्र कारण उनके आज के अथवा भूत काल के कुविचार ही हैं। परमात्मा का युवराज मनुष्य दुःख के निमित्त नहीं अपने पिता के इस पुण्य उपवन संसार में आनन्द की क्रीड़ा करने के लिये आता है। इस ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ धरती माता पर वस्तुतः दुःख का अस्तित्व नहीं है। कष्टों का कारण तो केवल ‘कुबुद्धि ‘ है। यही दुष्टा हमें आनन्द से वंचित करके नाना प्रकार के क्लेशों, भयों, एवं शोक सन्तापों में फँसा देती है। जब तक यह कुबुद्धि मन में रहती है तब तक कितनी ही सुख सामग्री प्राप्त होने पर भी चैन नहीं मिलता। कोई न कोई क्लेश सामने खड़ा ही रहता है। एक चिन्ता दूर नहीं हो पाती कि दूसरी सामने आ खड़ी होती है। इस विषम स्थिति से छुटकारा पाने के लिए कुबुद्धि को हटाकर सद्बुद्धि की स्थापना आवश्यक होती है। इसके बिना शान्ति मिलना किसी भी प्रकार संभव नहीं । सद्बुद्धि की अजल धारा गायत्री माता का पय पान करने से प्राप्त होती है। इसे पाकर मनुष्य आधिदैविक,आधिदैविक, आधिभौतिक त्रितापों से छुटकारा पाकर सच्ची शान्ति का अधिकारी बनता है।
‘विपत्ति निवारिणी गायत्री’ पुस्तक में विस्तार पूर्वक बताया जा चुका है कि गायत्री के चार चरणों से किस प्रकार चार प्रकार की कुबुद्धियाँ दूर होती हैं। (1) “ॐ भूर्भुवः स्वः” इस प्रथम पाद को हृदयंगम कर लेने से मनुष्य को घट 2 कण 2 में समाये हुए परमात्मा की झाँकी होती है, फलस्वरूप वह दुष्कर्म करने का साहस उसी प्रकार नहीं कर पाता जिस प्रकार कोतवाल को सामने खड़ा देख कर चोर को चोरी करने की हिम्मत नहीं पड़ती । सब में परमात्मा का अस्तित्व देखने वाले को स्वभावतः सब के साथ आत्मीयता, उदारता, प्रेम, ईमानदारी, सेवा सद्व्यवहार एवं मधुरता का व्यवहार करने की भावनाएँ उमड़ती है। सर्वत्र ईश्वर का दर्शन करते हुए बुरे कर्मों से बचना और सबके साथ स्नेह पूर्वक सद्व्यवहार करना यह नीति ऐसी है जिससे मनुष्य दुष्कर्मों के दण्डस्वरूप प्राप्त होने वाले राजदण्ड सामाजिक दंड एवं ईश्वरीय दंडों से बचा रहता हे और अपने सद्व्यवहार के कारण प्रत्युत्तर में संसार की ओर से भी सद्भाव, सहयोग, एवं स्नेह पाकर सुख शान्तिमय जीवन व्यतीत करता है।
(2) गायत्री का दूसरा चरण “ तत्सवितुर्वरेण्यं” साधक में विवेक, दूरदर्शिता, तत्व दृष्टि,दिव्यज्ञान, एवं सूक्ष्मावलोकन की क्षमता उत्पन्न करता है। इस तत्व को प्राप्त कर लेने पर सत् असत् का ज्ञान होता है और तुरन्त के हानि लाभ पर विचार न करके दूरवर्ती परिणामों पर सूक्ष्म दृष्टि से देखना आरम्भ कर देता है। फलस्वरूप क्षुद्र प्रलोभनों को ठुकरा कर वह चिरस्थायी सत्कार्यों को अपनाने का मार्ग ग्रहण करता है। क्षणिक इंद्रियां सुख, तात्कालिक लाभ,वासना, मोह, लोभ आदि के अज्ञान में फँसकर लोग पथ−भ्रष्ट होते हैं। गायत्री माता का दूसरा चरण साधक को पथ−भ्रष्ट नहीं होने देता और वह विवेक पूर्ण दूरदर्शिता के साथ सत्मार्ग पर चलता हुआ चिरस्थायी सुखों का अधिकारी बनता है।
(3) गायत्री का तीसरा चरण “भर्गो देवस्य धीमहि” मनुष्य को दैवी संपत्तियाँ प्रदान करता है। गीता के 16 वें अध्याय में जिन 26 सद्गुणों को दैवी संपत्तियां गिनाया गया है वस्तुतः मनुष्य का मूल्य,मान,महत्त्व,ऐश्वर्य, उन्हीं से बढ़ता है। रूप, यौवन, धन, सम्पत्ति आदि तो क्षणिक हैं। आज हैं तो कल इनका पता भी नहीं लगता । आज का अमीर कल दर दर का भिखारी हो सकता है। पर सद्गुणों की दैवी सम्पत्तियाँ ऐसी है कि यह ऐश्वर्य दिन−दिन बढ़ता ही चलता है और महानता के उच्च शिखर पर पहुँचकर पूर्णता के परम लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है। सच्चरित्रता, परिश्रमप्रियता, उत्साह, साहस, प्रसन्नता, मधुरता, नम्रता, शिष्टाचार, नियमितता, संयम, मितव्ययिता, अनुशासन, जिम्मेदारी, वफादारी, जिज्ञासा, धैर्य, स्थिर मति आदि अनेकों सद्गुण उसमें बढ़ते हैं, फल स्वरूप उसका व्यक्ति त्व दिन 2 ऊँचा उठता जाता है और उसे सर्वत्र मान, सहयोग एवं सद्भाव ही प्राप्त होता है। ऐसे मनुष्य ही सच्चे अमीर कहे जाते हैं।
(4) गायत्री का चौथा चरण “धियो यो नः प्रचोदयात्” आत्म निरीक्षण, आत्म निरीक्षण, आत्म शुद्धि, आत्म साक्षात्कार करने की शक्ति उत्पन्न कर देता है। जैसे ही मनुष्य के अन्तः करण में गायत्री माता के चौथे चरण का पदार्पण होता है वैसे ही वह अपनी कठिनाइयों का दोष दूसरों को देना छोड़कर आत्म निरीक्षण आरम्भ कर देता है। अपने अन्दर जो त्रुटियाँ हैं उन्हें ढूंढ़ता है उनके लिये शोक एवं प्रायश्चित करता है। उन्हें हटाता है, आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाता है और संतुलित मस्तिष्क एवं शान्त चित्त से प्रत्येक बात के मूल कारण पर विचार करता हुआ ऐसी गति विधि ग्रहण करता है, जो अपने और दूसरों के कष्ट बढ़ाने में नहीं, उत्कर्ष में सहायक हो। उसका चित्त हर घड़ी प्रसन्न रहता है। उसके समीप रहने वाली भी प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। कोई आपत्ति प्रारब्ध वश सामने आती है तो उसे भोग से निवृत्ति का सुअवसर समझकर धैर्य पूर्वक सहन कर लेता है। आत्मा में अब स्थिति दिन−दिन बढ़ते चलने से वह आत्मसाक्षात्कार करता है और प्रभु की कृपा का सच्चा अधिकारी बन उन्हीं में लीन हो जाता है।
इसी प्रकार मनुष्य के अन्तःकरण में जैसे−जैसे उसे अपने अन्दर दिव्य प्रकाश, दिव्य बल, दिव्य शान्ति एवं दिव्य उत्कर्ष अनुभव होता है। उसका जीवन निकृष्ट कोटि में न रहकर उच्च आध्यात्मिक भूमिका में विकसित होता जाता है । उसका जीवनक्रम बाहर से चाहे साधारण ग्रहस्य, साधारण व्यापारी, कर्मचारी जैसा ही दिखाई पड़ता हो पर भीतर से उसकी स्थिति उच्च कोटि के सन्तों एवं सत्पुरुषों जैसी हो जाती है।
संसार में जितने दुःख हैं कुबुद्धि के कारण हैं। लड़ाई, झगड़ा, आलस्य, दरिद्रता, व्यसन, व्यभिचार, आवारागर्दी, कुसंग, कटु भाषण, चोरी, स्वार्थपरता, ज्वारी, छल, निष्ठुरता, अन्याय, अत्याचार, असंयम आदि के पीछे मनुष्य की कुबुद्धि ही काम करती है। इन्हीं कारणों से रोग, शोक, अभाव, चिन्ता, कलह आदि का प्रादुर्भाव होता है और इन्हीं से नाना प्रकार की पीड़ाएँ, व्यथाएँ, यातनाएँ सहनी पड़ती हैं। कर्म का फल निश्चित है। बुरे कर्म का फल बुरा ही होता है। कुबुद्धि से ही बुरे विचार बनते हैं। इसलिए कुबुद्धि को पापों की जननी कहा गया है । पूर्व जन्मों के प्रारब्ध गत पाप भी पूर्व जन्मों की कुबुद्धि के परिणाम हैं। इसलिये यही मानना पड़ता है कि जो भी कठिनाई हमारे सामने है उसमें वर्तमान काल की व भूतकाल की कुबुद्धि ही मूल कारण है। गायत्री मन्त्र का प्रधान कार्य इस कुबुद्धि को हटाना है। उपासना के फलस्वरूप मस्तिष्क में सद्विचार और हृदय में सद्भाव उत्पन्न हो जाते हैं, जिसके कारण मनुष्य का जीवन क्रम ही बदल जाता है। सद्भावना की वृद्धि के साथ−साथ उसे अनायास ही अनेक प्रकार के सुख सौभाग्य उपलब्ध होते हैं, साथ ही उसके समीप रहने वाले पड़ौसी एवं सम्बन्धी भी उसकी समीपता से सुख तथा सन्तोष लाभ करते हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी रहते हैं वहाँ सुखद वातावरण उत्पन्न करते हैं।
जिनकी स्मरण शक्ति शिथिल है, बुद्धि मन्द है, मस्तिष्क जल्दी थक जाता है उन्हें गायत्री उपासना करके थोड़ी ही समय में इस महाशक्ति के चमत्कार देखने को मिलते हैं। कीमती दवाएँ जो कार्य नहीं कर सकती वह इससे पूरा होता है। ब्राह्मी तेल लगाने और बादाम पाक सेवन से मस्तिष्क को उतना बल नहीं मिल सकता जितना इस उपासना से मिलता है। सिर में दर्द, चक्कर आना, निद्रा में कमी, आये दिन नाना प्रकार के शिरो−रोगों की शिकायतें जिन्हें बनी रहती हैं उन्हें गायत्री उपासना का अवलम्बन लेना चाहिये। इससे मस्तिष्क के सभी कल पुर्जे बलवान सजीव चैतन्य और निरोग बनते हैं। बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी जिनके मनः क्षेत्र में प्रवेश करेंगी उसका मानसिक विकास होना स्वाभाविक है। मस्तिष्क के अंतर्गत जो नाना प्रकार की शक्तियाँ सन्निहित हैं उनका धीरे धीरे विकास होता है और मनुष्य बुद्धिमान, विवेकशील एवं प्रतिभा वान बनता चलता है।
जिनके घर में कुबुद्धि का साम्राज्य छाया रहता है, आपस में द्वेष, असहयोग, मनमुटाव, कलह, दुराव, एवं दुर्भाव रहता है, आये दिन झगड़े रहते हैं, आपाधापी और स्वार्थपरता में प्रवृत्ति रहती हैं, गृह व्यवस्था को ठीक रखने, समय का सदुपयोग करने, योग्यताएँ बढ़ाने, कुसंग से बचने, श्रमपूर्वक आजीविका कमाने, मन लगाकर विद्याध्ययन करने में प्रवृत्ति न होना आदि दुर्गुण कुबुद्धि के प्रतीक हैं। जहाँ तक यह बुराइयाँ भरी रहती हैं वे परिवार कभी भी उन्नति नहीं कर सकते, अपनी प्रतिष्ठा को कायम नहीं रख सकते, इसके विपरीत उनका पतन आरम्भ हो जाता है। बिखरी हुई बुहारी की सींकों की तरह छिन्न भिन्न होने पर वर्तमान स्थिति भी स्थिर नहीं रहती । दरिद्रता, हानि, घाटा, शत्रुओं का प्रकोप, मानसिक अशान्ति की अभिवृद्धि बातें दिन दिन बढ़ती हैं और वे घर कुछ ही समय में अपना सब कुछ खो बैठते हैं। कुबुद्धि ऐसी अग्नि है कि वह जहाँ भी रहती है वहीं की वस्तुओं को जलाने और नष्ट करने का कार्य निरन्तर करती रहती है।
जहाँ उपरोक्त प्रकार की स्थिति हो वहाँ गायत्री उपासना का आरम्भ होना एक अमोघ अस्त्र है। अँगीठी जलाकर रख देने से जिस प्रकार कमरे की सारी हवा गरम हो जाती है और उस में बैठ हुए सभी मनुष्य सर्दी से छूट जाते हैं उसी प्रकार घर के थोड़े से व्यक्ति भी यदि सच्चे मन से माता की शरण लेते हैं तो उन्हें स्वयं तो शान्ति मिलती है, साथ ही उनकी साधना का सूक्ष्म प्रभाव घर भर पर पड़ता है और चिन्ता जनक मनोविकारों का शमन होने तथा सुमति, एकता, प्रेम, अनुशासन तथा सद्भाव की परिवार में बढ़ोतरी होती हुई स्पष्ट रूप से दृष्टि−गोचर होती है। साधना निर्बल हो तो प्रगति धीरे−धीरे होती हैं पर होती अवश्य है।
परिवार ही नहीं, पड़ौसियों, सम्बन्धियों तथा सहकर्मियों तक पर इसका प्रभाव पड़ता है। सुगन्धित इत्र कपड़ों से लगा हो तो जो कोई भी अपने समीप आवेगा उस ही सुगन्धि मिलेगी गायत्री तपस्या की दिव्य सुगन्ध साधक की आत्मा में से सदैव उड़ती रहती है वह जहाँ भी जाता है, जहाँ भी बैठता है वहीं वह सद्बुद्धि की शक्ति तरंगें छोड़ता है और वहाँ की अशान्ति मिट कर शान्ति स्थापित होती है।
कहा गया है कि − भगवान जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। इस पारस मणि को पाकर उसके चारों ओर की लोहे जैसी कलुषित वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ सोने जैसी बहुमूल्य एवं शोभायमान बन जाती हैं। जिन परिस्थितियों के कारण हमें क्लेश एवं असन्तोष रहता है उनका मूल हेतु हमारी नासमझी एवं गलत कार्य पद्धति को अपनाना ही है। जब हम अपने दृष्टिकोण को सुधार लेते हैं, तब अनेकों कठिनाइयाँ तो कठिनाइयाँ दिखाई ही नहीं पड़तीं, वरन् जीवन को शुद्ध, स्वच्छ, निर्मल, हलका, बनाने एवं उपयोगी अनुभवों से परिपूर्ण कर देने वाली अमूल्य शिक्षाएँ एवं परीक्षाएँ दिखाई पड़ती हैं। उन्हें मनुष्य हँस खेल कल काट लेता है। जो थोड़े से अटल प्रारम्भ भोग, बिना भोगे टल नहीं सकते, उन्हें सद्बुद्धि युक्त मनुष्य धैर्य, साहस, विवेक और सन्तोष पूर्वक सहन कर लेता है। अविवेकी व्यक्ति उस थोड़े से कष्ट के लिए जितनी हाय हाय मचाते हैं,उसका सौवाँ भाग भी परेशानी उसे नहीं होती । संसार की नाशवान वस्तुओं एवं बदलती रहने वाली परिस्थितियों का क्रम उसे मालूम होता है । इसलिए अप्रिय घटनाएँ भी उसके लिए एक कौतूहल एवं मानसिक हेर फेर मात्र ही दिखाई पड़ती हैं।
सद्बुद्धि एक शक्ति है जो जीवन क्रम को बदलती है। उस परिवर्तन के साथ−साथ मनुष्य की परिस्थितियाँ भी बदलती हैं। रेडियो की सुई घुमा देने से कोई दूसरा प्रोग्राम सुनाई पड़ने लगता है। कुबुद्धि के मीटर से सद्बुद्धि की ओर सुई घुमाई जाती है तो पहिले गाने बन्द होकर मंगलमय नवीन सन्देश सुनाई पड़ते हैं। गायत्री माता की ओर उन्मुख होने वाला व्यक्ति सद्बुद्धि तथा सुख शान्ति का वरदान प्राप्त करता है।
जीभ में जो शब्द निकलते हैं उनका उच्चारण कण्ठ, तालु, मूर्धा, ओष्ठ, दन्त, जिव्हा, कण्ठ मूल आदि मुख के विभिन्न अंगों द्वारा होता है । इस उच्चारण काल में मुख के जिन भागों से ध्वनि निकलती हैं, उन अंगों के नाड़ी तन्तु शरीर के विभिन्न भागों तक फैलते हैं, इस फैलाव क्षेत्र में कई सूक्ष्म ग्रन्थियाँ होती हैं जिन पर उस उच्चारण का दबाव पड़ता है। शरीर में अनेकों छोटी बड़ी दृश्य अदृश्य ग्रन्थियाँ होती हैं। योगी लोग जानते हैं कि उन कोषों में कोई विशेष शक्ति भण्डार छिपा रहता है। सुषुम्ना से सम्बद्ध षट्चक्र प्रसिद्ध हैं ऐसी अगणित अनेकों ग्रन्थियाँ शरीर में हैं, विभिन्न शब्दों का उच्चारण इन विविध ग्रन्थियों पर अपना प्रभाव डालता है और उस प्रभाव से उन ग्रन्थियों का शक्ति भण्डार जागृत होता है। मन्त्रों का गठन इसी आधार पर हुआ है। गायत्री मन्त्र में 24 अक्षर हैं। इनका सम्बन्ध शरीर में स्थित ऐसी 24 ग्रन्थियों से है जो जागृत होने पर सद्बुद्धि प्रकाशक शक्ति यों को सतेज करती है। गायत्री मन्त्र के उच्चारण से सूक्ष्म शरीर का सितार 24 स्थानों से झन्कार देता है और उससे एक ऐसी स्वर लहरी उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव अदृश्य जगत के महत्व पूर्ण तत्वों पर पड़ता है। यह प्रभाव ही गायत्री साधना के फलों का प्रधान हेतु है।
जिस प्रकार टाइपराइटर यंत्र की कुञ्जियों पर उंगली रखते ही उससे संबंधित अक्षर की तीली कागज पर जा लगती है और अक्षर छप जाता है। वैसे ही अमुक अक्षर के उच्चारण से मुँह में जो क्रिया उत्पन्न होती है उसके कुछ ऐसी नाड़ियों का संचालन होता है जो शरीर के विभिन्न स्थानों में अवस्थित बड़ी महत्व पूर्ण गुप्त ग्रन्थियों पर चोट करके उन्हें जगाती हैं। इस जागरण से वे ग्रन्थियाँ अपने अन्दर बड़ी ही महत्वपूर्ण ऐसी विशेषताएं उत्पन्न करती है जिन्हें शक्तियाँ या सिद्धियाँ कहते हैं। योगी लोग अन्य योगाभ्यासों द्वारा जिन ग्रन्थियों को जाग्रत करके सिद्धियाँ एवं शक्तियाँ प्राप्त करते हैं वे ही ग्रन्थियाँ गायत्री मंत्र के विधिवत् उच्चारण करते रहने से− जप से स्वयमेव जागृत होती हैं इस प्रकार गायत्री जप एक प्रकार की योग साधना ही सिद्ध होता है। सितार में कई तार होते हैं इनको बजाने के कई क्रम होते हैं। अमुक नम्बर के तार के बाद अमुक नम्बर का, फिर अमुक प्रकार की स्वर लहरी निकलती है। उस क्रम को बदल कर कोई और प्रकार के क्रम से उन तारों को बजाया जाय तो दूसरी स्वर लहरी निकलती है। इसी प्रकार मंत्रों में जो अक्षर हैं उनके उच्चारण का क्रम भी शरीर में विशेष प्रकार की शक्ति यों का संचार करता है। गायत्री मंत्र के अक्षरों का अर्थ तो साधारण है, उसमें भगवान से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है ऐसे मंत्र और भी अनेकों हैं पर गायत्री मंत्र की विशेषता इसलिए अधिक है कि इसके अक्षरों का गुँथन बड़े ही चमत्कारी एवं शक्ति शाली ढंग से बन पड़ा है। एक के बाद एक अक्षर ऐसे क्रम से गुँथा है कि इनके उच्चारण से सितार के तारों की तरह अनायास ही एक अध्यात्मिक संगीत भीतर ही भीतर गूँजता है जिस गुँजन से अध्यात्मिक जगत के अनेकों पर्त अपने आप कमल की पुष्प की तरह खुलते चले जाते हैं और उसका परिणाम जप करने वाले के लिए एक उच्च कोटि के योगाभ्यास की तरह बहुत ही मंगलमय होता है।
दीपक राग गाने से बुझे हुए दीपक जल उठते हैं, मेघ मल्हार गाने से वर्षा होने लगती है, वेणुनाद सुनकर सर्प लहराने लगता है, मृग सुधि बुधि भूल जाते हैं, गौयें अधिक दूध देने लगती हैं। कोयल की बोली सुनकर काम भाव जागृत हो जाते हैं। सैनिकों के कदम मिलाकर चलने की शब्द ध्वनि से लोहे के पुल तक गिर जाते हैं, इसलिए पुलों को पार करते समय सेना को कदम मिलाकर न चलने की हिदायत कर दी जाती है। अमेरिका के डाक्टर हचिंसन ने विविध संगीत ध्वनियों से अनेक असाध्य और कष्ट साध्य रोगियों को अच्छा करने में सफलता और ख्याति प्राप्त की है। भारतवर्ष में ताँत्रिक लोग थाली को घड़े पर रखकर एक विशेष गति से बजाते हैं और उस बाजे से सर्प बिच्छू आदि जहरीले जानवरों के काटे हुए, कन्ठमाला, विषवेल, भूतोन्माद आदि के रोगी बहुत करके अच्छे हो जाते हैं। कारण यह है कि शब्दों के कम्पन सूक्ष्म प्रकृति से अपनी जाति के अन्य परमाणुओं को लेकर ईथर का परिभ्रमण करते हुए अब अपने उद्गम केन्द्र पर कुछ ही क्षणों में लौट आते हैं तो उनमें अपने प्रकार की विशेष विद्युत शक्तियाँ भरी होती हैं और परिस्थिति के अनुसार उपयुक्त क्षेत्र पर उन शक्ति का एक विशिष्ट प्रभाव पड़ता है। मंत्रों द्वारा विलक्षण कार्य होने का भी यही कारण है। गायत्री मन्त्र द्वारा भी इसी प्रकार शक्ति का आविर्भाव होता है। मन्त्रोच्चारण में मुख के जो अंग क्रियाशील होते हैं, उन भागों के नाड़ी तन्तु कुछ विशेष ग्रन्थियों को गुदगुदाते हैं, उनमें स्फुरण होने से एक वैदिक छन्द का क्रम बद्ध योगिक संगीत प्रवाह ‘ईथर’ तत्व में फैलता है और अपनी कुछ क्षणों में पूरी होने वाली विश्व परिक्रमा से वापिस आते−आते एक स्वजातीय तत्वों की सेना वापिस ले जाता है जो अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में बड़ी सहायक होती है। शब्द संगीत के शक्ति मय कम्पनों का पंच भौतिक प्रवाह और आत्म शक्ति की सूक्ष्म प्रकृति की भावना, साधना, आराधना, के आधार पर उत्पन्न किया गया सम्बन्ध, यह दोनों ही कारण गायत्री शक्ति को ऐसी बलवान बनाते हैं जो साधकों के लिए दैवी वरदान सिद्ध होती है।
गायत्री मन्त्र को और भी अधिक सूक्ष्म बनाने वाला कारण है साधक का ‘श्रद्धामय विश्वास’ विश्वास की शक्ति से सभी मनोवैज्ञानिक वेत्ता परिचित हैं। केवल विश्वास के आधार पर लोग केवल भय की वजह से अकारण काल के मुख में चले गये और विश्वास के कारण मृत प्रायः लोगों ने नवजीवन प्राप्त किया । रामायण में तुलसीदास जी ने “ भवानी शंकरौ
बन्दे श्रद्धा विश्वास रुपिणो” गाते हुए श्रद्धा और विश्वास को भवानी शंकर की उपमा दी है। जब साधक श्रद्धा और विश्वास पूर्वक आराधना करता है तो शब्द विज्ञान और आत्म सम्बंध दोनों महत्ताओं से संयुक्त गायत्री का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है और वह एक अद्वितीय शक्ति सिद्ध होती है।
चित्र में दिखाया गया है कि गायत्री के प्रत्येक अक्षर का किस किस स्थान से सम्बन्ध है। उन स्थानों पर योगिक ग्रन्थि चक्र हैं। इनका परिचय इस प्रकार है−
अक्षर ग्रन्थि का नाम उसमें भरी हुई शक्ति
1 तत् तापनी सफलता
2 स सफला पराक्रम
3 वि विश्वा पालन
4 तुः तुष्टि कल्याण
5 व वरदा योग
6 रे रेवती प्रेम
7 णि सूक्ष्मा धन
8 यं ज्ञाना तेज
9 भर भर्गा रक्षा
10 गो गोतमी बुद्धि
11 दे देविका दमन
12 व वराही निष्ठा
13 स्य सिंहनी धारणा
14 घी ध्याना प्राण
15 म मर्यादा संयम
16 हि स्फु टा तप
17 घि मेघा दूरदर्शिता
18 यो योगमाया जागृति
19 यो योगनी उत्पादन
20 नः धरित्री सरसता
21 प ्रप्रभवा आदर्श
22 प्र प्रभवा आदर्श
23 द दृश्या विवेक
24 यात् निरंजना सेवा
गायत्री उपरोक्त 24 शक्ति यों को साधक में जागृत करती है। यह गुण इतने महत्वपूर्ण हैं कि इनके जागरण के साथ साथ अनेक प्रकार की सफलताएँ, सिद्धियाँ और सम्पन्नता प्राप्त होना आरम्भ हो जाता है। कई लोग समझते हैं कि यह लाभ अनायास कोई देवी देवता दे रहा है। कारण यह है कि अपने अन्दर हो रहे सूक्ष्म तत्वों की प्रगति और परिणति को वे देख और समझ नहीं पाते, यदि वे समझ पावें कि उनकी साधना से क्या क्या सूक्ष्म प्रक्रियायें हो रही है तो वह समझने में देर न लगेगी कि यह सब कुछ कहीं से अनायास दान नहीं मिल रहा है वरन् आत्म विद्या की सुव्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया का यह परिणाम है। गायत्री साधना कोई अन्धविश्वास नहीं एक ठोस वैज्ञानिक कृत्य है और उसके द्वारा लाभ भी सुनिश्चित ही होते हैं।
योगी लोग अनेक प्रकार की साधनाओं द्वारा स्थूल और सूक्ष्म शरीर में अवस्थित जिन गुप्त शक्ति यों को जागृत करते हैं वे गायत्री जब से अनायास ही जागृत होने लगती हैं। उस प्रकार यह साधना सरल होते हुए भी अत्यन्त उच्च कोटि की योग साधनाओं जैसी महान फल दायक है। इससे सरल, स्वल्प श्रम साध्य, हानि रहित तथा शीघ्र फलदायिनी साधना कुछ त्रुटि रहने पर भी इससे कभी किसी को, किसी प्रकार की हानि नहीं होती ।
गायत्री प्रत्येक द्विज का एक आवश्यकीय धर्म कृत्य हैं। द्विज वैसे ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य को कहते हैं। जो लोग यज्ञोपवीत धारणा कर सकते हैं। वे द्विज हैं। ऐसे सभी लोगों को गायत्री का अधिकार है द्विज वह है जिसका दूसरा जन्म हुआ हो । एक जन्म माता के पिता के रज वीर्य से सभी का होता है, इस लिए मनुष्य और पशु समान है। दूसरा आध्यात्मिक जन्म गायत्री माता और यज्ञ पिता के संयोग से होता है। गायत्री अर्थात् सद्बुद्धि रूपी माता और यज्ञ अर्थात् परमार्थ रूपी पिता को जिन्होंने अपना अध्यात्मिक माता पिता समझ लिया है। जीवन को खाने पीने मौज उड़ाने की वस्तु न समझ कर, परमार्थ एवं आत्म कल्याण का साधन स्वीकार किया है वस्तुतः वे ही द्विज हैं। गायत्री उपासक इसी श्रेणी के होते हैं जिनका ऐसा दृष्टिकोण होता है वे गायत्री उपासना में संलग्न होते हैं या जो गायत्री उपासना में लगते हैं वे ऐसे हो जाते हैं। इस प्रकार गायत्री और द्विजत्व एक साथ रहते हैं। इसी एकता को संस्कृत में ‘अधिकार’ कहा गया है। जिनमें इस प्रकार की एकता न हो वे अनधिकारी कहे जाते हैं। उच्च भावना और गायत्री का सम्बन्ध बनाये रखने के लिये “अधिकार” की प्रतिष्ठा की गई है।
यज्ञोपवीत को गायत्री की मूर्ति−एक प्रतिमा कहना चाहिए। गायत्री को ही हर बड़ी छाती से लगाये रखना, हृदय पर धारण किये रहना यज्ञोपवीत धारणा का उद्देश्य है। जनेऊ में तीन तार हैं− गायत्री में तीन चरण हैं। उपवीत में नौ लड़ें है−यज्ञोपवीत में नौ शब्द हैं। यज्ञोपवीत में तीन मध्य ग्रंथियाँ और एक ब्रह्म ग्रन्थि होती है− गायत्री में तीन व्याहृतियाँ और एक प्रणव है। अन्य देवताओं की मूर्तियाँ पत्थर धातु आदि की बनाई जाती हैं पर उनके पूजन और ध्यान तो उपासना गृह में ही हो सकता है। किन्तु गायत्री देवता तो मनुष्य का जीवन प्राण ही है उसके पूजन किसी नियत समय पर किसी नियत स्थान पर कर देने से काम नहीं चल सकता । यह देवता तो ऐसा है जिसका सोते जागते, चलते फिरते, खाने नहाते, हर घड़ी साथ रखना है एक क्षण के लिए भी अपने को अलग नहीं होने देना है। इसलिये उसकी प्रतिमा धातु या पत्थर की न बना कर सूत की बनाई गई है। यज्ञोपवीत गायत्री की मूर्तिमान प्रतिमा है। इसको प्राण प्रिय समझ कर हर घड़ी छाती पर, कंधे पर, हृदय पर, धारण किए रहने के लिये यज्ञोपवीत पहना जाता है। गायत्री उपासक के लिए यज्ञोपवीत धारण करना एक उचित कर्तव्य है।
गायत्री मन्त्र के शब्दों के अर्थ इस प्रकार हैं
ॐ (परमात्मा) भूः (प्राण स्वरूप) भुवः (दुःख नाशक) स्वः (सुख स्वरूप) तत् (उस) सवितुः (तेजस्वी) वरेण्यं (श्रेष्ठ) मर्गः (पाप नाशक) देवस्य (दिव्य) धीमहि (धारण करें) धियो (बुद्धि) यः (जो) नः (हमारी) प्रचोदयात् (प्रेरित करें)
अर्थात् − उस प्राण स्वरूप दुख नाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पाप नाशक, देव स्वरूप परमात्मा को अन्तरात्मा में धारण करें । वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सत्मार्ग पर प्रेरित करे।
इस अर्थ में ईश्वर के जिन गुणों का वर्णन किया गया, उनको अपने लिये आवश्यक समझ कर अपने को प्राणवान बनाना, दुखदायी कुकर्मों से बचना,सुखदायी सत्कर्मों पर संलग्न होना, श्रेष्ठ विचारों को अपनाना तेजस्वी बनना, पापों से लड़ना, अपने स्वभाव में देवत्व भरना यह सब प्रयत्न निरन्तर चलते रहने चाहिए, अपनी बुद्धि को सात्विक, सन्मार्ग गामी बनाने के लिए सचेष्ट रहना यह गायत्री मन्त्र की शिक्षा है। इन शिक्षाओं को अपने व्यावहारिक जीवन में समावेश करने के लिए पूरी तत्परता से कार्य करना यही यज्ञोपवीत धारण करने का लक्ष है। यज्ञोपवीत को सूत्र भी कहते हैं। सूत्र ‘डोरे’ को भी कहते हैं और उस ‘शब्द रचना’ को भी कहते हैं जो स्वयं बहुत संक्षिप्त होते हुए भी अपने अन्दर एक विस्तृत अर्थ छिपाये होते हैं। अष्टाध्यायी, षट् दर्शन, गृह्य सूत्र आदि ऐसे ही ग्रंथ है यज्ञोपवीत में लिपि और भाषा का प्रयोग नहीं हुआ है तो भी यह ‘ब्रह्मसूत्र’ ग्रंथ है। इसके एक एक धागे में जीवन को महान् बनाने वाली शिक्षाएं भरी हुई है। इन शिक्षाओं का हर घड़ी ध्यान रखने के लिए ही यज्ञोपवीत पहना जाता है और उसे पहनने पर इतना जोर दिया जाता है।
गायत्री को गुरु मन्त्र कहा गया है। प्राचीन काल में बालक जब गुरु कुल में विद्या पढ़ने जाते थे तो उन्हें वेदारंभ संस्कार के समय गुरु मन्त्र के रूप में गायत्री की ही दीक्षा दी जाती थी, वेद का आरंभ वेदमाता गायत्री से ही होता है। आज के नाम धारी गुरु नाना प्रकार के ऊटपटाँग मन्त्र गढ़ कर गुरु दीक्षा की लकीर पीटते हैं पर प्राचीन काल में गायत्री मन्त्र के अतिरिक्त और दीक्षा मन्त्र न था। भारतीय धर्म में ब्रह्मा विष्णु,महेश के प्रतीक तीन जीवित देवता भी माने गये है, 1 माता, 2 पिता, 3 गुरु । जिस प्रकार किसी व्यक्ति का माता और पिता होना आवश्यक है। उसी प्रकार उसका गुरु भी होना आवश्यक है। कोई व्यक्ति अपनी माता का पता न बता सके तो या अपने पिता के संबंध अपरिचित कहे तो उसकी उत्पत्ति अनैतिक मानी जायेगी। इसी प्रकार कोई कोई व्यक्ति गुरु रहित हो उसे भी असंस्कृत कहा जायेगा। “निगुरा” एक प्रकार की गाली है। जिसका गुरु नहीं उसकी अध्यात्मिक सुव्यवस्था संदिग्ध मानी जाती है। गायत्री दीक्षा या गुरु दीक्षा एक ही बात है।
ऐसा उल्लेख मिलता है कि− “गायत्री मंत्र कीलित है। इसको वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषियों का शाप लगा हुआ है। जो उस शाप का उत्कीलन कर लेता है उसी की साधना सफल होती है।” इस अलंकारिक वर्णन में विधिवत् गायत्री साधना करने, उसकी शास्त्रीय प्रक्रिया को समझने एवं अनुभवी पथ प्रदर्शक के संरक्षण में साधना क्रम को आगे बढ़ाने का आदेश दिया गया है। ‘वशिष्ठ’ कहते हैं−विशेष रूप से श्रेष्ठ का । प्राचीन काल में जो व्यक्ति सवा करोड़ गायत्री जप कर लेते थे उन्हें वशिष्ठ की पदवी दी जाती थी। रघुवंशियों के कुलगुरु सदा ऐसे ही वशिष्ठ पदवी धारी होते थे। रघु, भज, दिलीप, दशरथ, राम, लव− कुश इन छह पीढ़ियों के गुरु एक वशिष्ठ नहीं, अलग अलग ऋषि थे पर उन सभी ने उपासना के आधार पर वशिष्ठ पद पाया था। ‘वशिष्ठ शाप मोचन’ का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार के किसी अनुभवी उपासक से गायत्री साधना की शिक्षा लेना चाहिए उसे अपना पथ प्रदर्शक नियुक्त करना चाहिए । विश्वामित्र का अर्थ है− संसार की भलाई करने वाला परमार्थी, और सच्चरित्र एवं कर्तव्य निष्ठ । गायत्री का शिक्षक केवल वशिष्ठ गुण वाला होना ही पर्याप्त नहीं उसे विश्वामित्र भी होना चाहिए। तपस्वी और परमार्थी दोनों ही गुण जिनमें हों उन्हें वशिष्ठ एवं विश्वामित्र श्रेणी का व्यक्ति कहा जा सकता है। ऐसे ही लोगों से गायत्री की विधिवत शिक्षा दीक्षा लेने पर इस महामंत्र में वह लाभ उठाना संभव होता है। अपने आप मन चाहे तरीके से कुछ न कुछ करने लगाने से अधिक प्राप्त नहीं हो सकता । जिसने उपयुक्त पथ प्रदर्शक प्राप्त कर लिया उसे साधना की आधी मंजिल पार करली, ऐसा समझना चाहिए। यह शाप मोचन एवं उत्कीलन है। गायत्री जैसी विश्व जननी महाशक्ति को कोई भी सत्ता शाप देने में समर्थ नहीं हो सकती । गुरु की महत्ता का प्रतिपादन करने के लिए ही अलंकारिक रूप में शाप लगने की बात कही गई है।
यज्ञोपवीत धारण करना, गुरु दीक्षा लेना, विधिवत् मंत्र ग्रहण करना यह तीनों बातों गायत्री उपासना में सहायक, लाभ दायक आवश्यक एवं मंजिल को पार करने में बड़ी सरलता उत्पन्न कर देने वाली हैं। फिर भी अनिवार्य नहीं है। इन बातों के बिना साधना न हो सकती हो या गायत्री उपासना न की जा सकती हो सो बात नहीं है। ईश्वर की वाणी, वेद ऋचा, भगवती महाशक्ति गायत्री को अपनाने में कोई प्रतिबंध नहीं हैं। शास्त्र विधान के अनुसार ब्राह्मण बालक का 10 वर्ष, क्षत्रिय का 12 वर्ष, वैश्य का 14 वर्ष की आयु में यज्ञोपवीत होना चाहिए । इससे अधिक आयु हो जाने पर जल्दी की दृष्टि से बिना किसी विशेष समारोह के, किसी भी यज्ञ आदि के शुभ अवसर पर साधारण रीति से यज्ञोपवीत धारण किया जा सकता है। पर जिनको ऐसी सुविधा भी न हो उन्हें यज्ञोपवीत के लिए गायत्री उपासना रोकने की आवश्यकता नहीं है। अवसर आने पर वे पीछे भी जनेऊ ले सकते हैं। इसी प्रकार यदि अपने स्थान पर ठीक पथ प्रदर्शक गुरु प्राप्त न हो तो किसी दूरस्थ व्यक्ति से संपर्क स्थापित करके काम चलाया जा सकता है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मिट्टी की मूर्ति को गुरु मान कर अपने ‘निगुरापन’ को दूर कर लिया था। गुरु का दर्जा आध्यात्मिक पिता का है पुरुष और स्त्री दोनों ही के माता पिता होते हैं, इसी प्रकार गुरु भी दोनों के होते हैं। यज्ञोपवीत पुरुष पहनते हैं। स्त्रियाँ उसके स्थान पर कंठी पहन लेती हैं। गायत्री उपासना स्त्रियों और पुरुषों के दोनों के लिए ही आवश्यक है। यदि उसे उचित शिक्षा दीक्षा, एवं विधि व्यवस्था के आधार पर किया जाय तो निश्चित रूप से अधिक सत्परिणाम प्राप्त होते हैं।
पुरुषों की ही भाँति स्त्रियाँ भी गायत्री उपासना से लाभान्वित हो सकती हैं। कई आध्यात्मिक तत्ववेत्ताओं का यह कहना है कि पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को गायत्री उपासना का लाभ अधिक मिलता हे क्योंकि माता को स्वभावतः पुत्र की अपेक्षा कन्या का अधिक ध्यान रहता है, वह अपनी पुत्रियों के लिये अधिक उदारता का परिचय देती हैं।
प्राचीन काल में अनेक महिलाएँ उच्चकोटि की साधिकाएँ हुई हैं। अध्यात्म कार्य में वे पुरुषों से कभी भी पीछे नहीं रही हैं। नारी का तप ही उसकी कुक्षि से महान् आत्माओं को प्रसव करने में समर्थ होता है। तपस्विनी अदिति ने वामन भगवान को जन्म दिया। कौशिल्या की गोदी में राम खेले। देवकी ने कृष्णचन्द्र को जन्म दिया, रोहिणी और यशोदा के आँगन में उन्हें बाल−क्रीड़ा करनी पड़ी । समस्त देवताओं की जननी अदिति माता है! भगवती कात्यायिनी असुरों पर विजय प्राप्त करने में समर्थ हुई। माता शतरूपा के गर्भ से मानव प्राणी का उद्भव हुआ है। ब्रह्मवादिनी घोषा काक्षीवान ऋषि की कन्या थी, उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। तप करके उन्होंने अश्विनीकुमार देवता को प्रसन्न किया और निरोगिता एवं विद्या का विपुल भण्डार प्राप्त किया। महर्षि कर्दम की धर्मपत्नी देवहूति ने तपस्वी जीवन बिताकर भगवान कपिल को जन्म दिया। महर्षि मेघातिथि की कन्या अरुन्धती ने तापसारण्य वन में तप करके वशिष्ठ जैसे योगी को अपने पति रूप में पाया और वे सशरीर अजर−अमर बनीं।
महर्षि अत्रि के वंश में उत्पन्न ब्रह्मवादिनी महाविदुषी विश्ववारा ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के द्वितीये अनुवाद के अट्ठाईसवें षट ऋकों की मन्त्र दृष्टा हैं। उन्होंने अपनी तपस्या के बल से ऋषि पद पाया था। तपस्विनी अपाला पतिगृह में असाध्य रोग में ग्रसित हो गई तो उन्होंने तप करके इन्द्र को प्रसन्न किया और खोया हुआ स्वास्थ्य तथा ब्रह्म−ज्ञान पाया। यह अपाला भी ऋग्वेद के अष्टम मण्डल के 91 वें सूक्त की 1 से 7 तक की ऋचाओं की दृष्टा हैं। सती तपती की आयु बहुत बड़ी हो गई थी, उनका विवाह न हो सका था। तपती की तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं सूर्य नारायण ने उनसे विवाह किया। अभृण ऋषि, की कन्या वाक प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी हुई हैं। ऋग्वेद संहिता के दशम मण्डल के 125 वें देवी सूक्त के आठ मन्त्रों की ऋषि यह वाकदेवी ही हैं। ऋग्वेद के दशम मण्डल के 85 सूक्त की ऋचाओं की ऋषि होने का श्रेय ब्रह्मवादिनी सूर्य को प्राप्त है। बड़े रोमों वाली भावभव्य ऋषि की धर्मपत्नी रोमेशा ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के126 वें सूक्त की सात ऋचाओं की दृष्टा ऋषि हुई है। बृहदारण्यक उपनिषद् में वचक्त ऋषि की पुत्री गार्गी और याज्ञवल्क्य के शास्त्रार्थ का विस्तृत वर्णन है। महातपस्विनी गार्गी ने राजा जनक की सभा में याज्ञवल्क्य के छक्के छुड़ा दिये थे। ब्रह्मज्ञानिनी सुलभा ने राजा जनक जैसे तत्वज्ञानी की अनेक भ्रान्तियों का निवारण किया था। राजा आसंग की पत्नी शाश्वती ऋग्वेद के आठवें मण्डल में प्रथम सूक्त की 34 वीं ऋचा की ऋषि हैं। इसी प्रकार उशिज इसी मण्डल के 116 से 121 वें तक के मन्त्रों की ऋषि हैं। दशम सूत्र की ऋषि ब्रह्मवादिनी ममता है।
जो व्यक्ति कहते हैं कि−” स्त्रियों को गायत्री का अधिकार नहीं, क्योंकि गायत्री वेद मन्त्र है। वेद मन्त्र स्त्रियों को नहीं पढ़ने चाहिए।” ऐसे लोग तनिक विचार करने का कष्ट करें कि यदि स्त्रियों को वेद का अधिकार न होता तो वेद मन्त्रों की दृष्टा, व्याख्याता, विशेषज्ञा, अधिपति यह उपरोक्त स्त्रियाँ किस प्रकार रही होतीं? प्राचीन काल में घोषा, गोधा, विश्ववारा, अपाला उपनिषद्, जुहू, अदिति, इन्द्राणी, सरमा, रामशा, उर्वश, लोपा−मुद्रा, यमी, शाश्वती, सूर्या, सावित्री आदि अनेकों ब्रह्मवादिनी वेद व्याख्याता हुई हैं।
मनु की पुत्री ‘इड़ा’ नामक एक महिला का वर्णन है जो ‘यज्ञान् काशिनी’ उपाधि से विभूषित थी। उसने अपने पिता तक के लिए यज्ञ कराये थे। भारद्वाज की पुत्री श्रतावती, तपस्विनी सिद्धा, शाँडिल्य की पुत्री श्रीमती, वेद विद् शिवा, ब्रह्मवादिनी सुलभा, स्वधा की पुत्रियाँ वद्यना और धारिणी आदि अनेक वेदज्ञ महिलाओं का वर्णन महाभारत में हैं। यदि उन्हें वेदों का अधिकार न होता तो किस प्रकार वे वेदज्ञ होतीं। शंकर दिग्विजय में भारती देवी नामक एक ऐसी महिला का वर्णन है जिसने शास्त्रार्थ में शंकराचार्य के दाँत खट्टे कर दिये थे।
विवाहादि संस्कारों में स्त्री को अपने मुख से अनेक वेद मन्त्र उच्चारण करने पड़ते हैं। यज्ञों में स्त्रियाँ सदा पति के साथ रहती हैं। स्त्री के बिना यज्ञ सफल नहीं होता। रामचन्द्रजी को सोने की सीता बनाकर यज्ञ पूर्ण करना पड़ा था। यज्ञ बिना वेद मन्त्रों के होते नहीं, यदि स्त्रियों को वेद का अधिकार न होता तो उन्हें यज्ञ में सम्मिलित होने का अथवा विवाहादि संस्कारों में मन्त्रोच्चारण का विधान किस प्रकार होता ?
व्योम संहिता में कहा गया है कि− स्त्रियों को वेद का अध्ययन तथा वैदिक कर्मकाण्ड करने का वैसा ही अधिकार है जैसे के उर्वशी, यमी, शची, आदि को प्राप्त था। “ यम स्मृति में लिखा है− “स्त्रियों को वैदिक कर्म−काण्डों की भाँति ब्रह्मविद्या प्राप्त करने का भी अधिकार है। वाल्मीकि रामायण में कौशिल्या, कैकेयी, सीता, तारा आदि नारियों द्वारा स्वयं संध्या, हवन करने तथा स्वस्तिवाचन आदि वेद मन्त्रों का पाठ करने का वर्णन है। वशिष्ठ स्मृति में कहा गया है कि− “यदि स्त्री के मन में पति के प्रति दुर्भाव आये तो उस पाप का पश्चाताप करने के लिए 108 गायत्री मन्त्र जपने से वह पवित्र होती है।”
सनातन धर्म के कर्णधार महामना पं॰ मदनमोहन जी मालवीय ने देश के उच्चकोटि के एक पण्डितों की एक समिति नियुक्त की, जिसका यह कार्य सौंपा गया कि वह शास्त्रों के आधार पर यह खोज करे कि स्त्रियों को वेद मन्त्रों का अधिकार है या नहीं। कमेटी ने लम्बे समय तक भारी खोज की और 22 अगस्त सन् 1946 का उस समिति की रिपोर्ट के आधार पर मालवीयजी ने घोषणा की कि स्त्रियों को भी पुरुषों की ही भाँति वेद पढ़ने का अधिकार है। तब से हिन्दू विश्वविद्यालय में स्त्रियों को भी पुरुषों की भाँति वेद पढ़ाये जाते हैं।
गायत्री ईश्वर की सर्वोत्तम प्रार्थना है। वेद भगवान की अमृतमयी वाणी है। ऐसे उपयोगी तत्व से स्त्रियों का वंचित रखा जाना न्याय के, विवेक के, तथा भारतीय संस्कृति की मूल भूत भावना के प्रतिकूल है। इसलिये इस प्रकार के भ्रमों में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। प्राचीन काल की भाँति आज भी असंख्यों भारतीय महिलायें ऐसी हैं जो गायत्री मन्त्र द्वारा उपासना करती हैं, और उसके महत्व पूर्ण आध्यात्मिक और सांसारिक लाभों को प्राप्त करती हैं।
पतियों का सुधार स्त्रियाँ गायत्री उपासना द्वारा कर सकती हैं। इस तपस्या से अनेकों स्त्रियों ने अपने पतियों के बुरे स्वभाव और बुरे आचरणों को सुधारा हैं। झगड़ालू, रूखे, निष्ठुर स्वभाव को बदल कर मधुर भाषी, सहानुभूति, सद्भाव, एवं स्नेह वाला बनाया है। उनकी कुसंगति छुड़ाने एवं व्यभिचार आदि को बुराइयों से बचने में भी स्त्रियाँ गायत्री उपासना को रामबाण की तरह प्रयोग कर सकती हैं।
गायत्री उपासना करने वाली स्त्रियों के पेट में जो सन्तान होती है उस पर माता के विचारों का बड़ा उत्तम प्रभाव पड़ता है। उसमें विद्या, बुद्धि, विवेक, तेज प्रतिभा, सदाचार आदि गुणों की कमी नहीं रहती । माताएँ बालकों को दूध पिलाते समय यदि मन ही मन गायत्री मन्त्र जपती रहें, तो वह दूध बालक के शरीर और मन को शुद्ध बनाने के लिए अमृत रूप हो जाता है। बच्चों की निरोग, हँसमुख, सुन्दर, तेजस्वी, बुद्धिमान, गुणवान और दीर्घजीवी बनाने में माताएँ गायत्री महामन्त्र से आशा जनक लाभ उठा सकती हैं।
कई बार प्रारब्ध के कठोर विधान बड़े कठिन होते हैं, उनका पूर्ण रूप से हटाना सरल नहीं होता, तो भी उनमें गायत्री उपासना से सुधार अवश्य होता है। प्रायः सभी परिवारों पर समयानुसार बुरे दिनों और अशुभ घड़ियों की कुदशा आती है। ऐसे संकटों एवं अनिष्टों की भयंकरता कम करने के लिये स्त्रियाँ गायत्री माता की शरण ले सकता है। घर का अर्थ संकट, दारिद्र, राजदण्ड का भय, मुकदमा, रोग, शत्रु भय आदि आपत्तियाँ जब सिर पर मंडरा रहीं हों तो इस महामन्त्र की सहायता से बहुत सहारा मिलता है। सन्तान का न होना, होकर मर जाना, केवल कन्याएँ ही होना, गर्भपात होते रहना आदि व्यथाओं में बहुधा पूर्व जन्मों के अशुभ संस्कार कारण होते हैं, तो भी उनका निवारण गायत्री द्वारा होना असम्भव नहीं। जिन घरों में भूत, प्रेत का प्रकोप रहता है, वहाँ यदि गायत्री की पूजा होने लगे, तो किसी प्रेत पिशाच का ठहरना वहाँ नहीं हो सकता । किसी तान्त्रिक, ओझा आदि ने अपने ऊपर या अपने बालकों के ऊपर कोई कुप्रयोग किया हो, तो उसका अनिष्ट भी गायत्री माता की कृपा से शान्त हो जाता है।
विधवाओं के लिए गायत्री साधना का बहुत भारी महत्व है। वे आत्म संयम, सदाचार, विवेक, ब्रह्मचर्य पालन, इन्द्रिय निग्रह एवं मन को वश में करने के लिए गायत्री साधना को ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रयोग कर सकती हैं। जिस दिन से वे यह साधना आरम्भ करती हैं उसी दिन से मन में शान्ति, स्थिरता, सद्बुद्धि और आत्मसंयम की भावना पैदा होती है। वैधव्य उनके लिए तप साधना जैसा शान्ति प्राप्त करती हैं जिसकी तुलना में सधवा रहने का सुख भी नितान्त तुच्छ दिखाई पड़ता है।
कुमारी कन्याएँ अपने विवाहित जीवन में सब प्रकार की सुख शान्ति प्राप्त करने के लिए भगवती की उपासना कर सकती हैं। सधवा बहिनों को अपने पति, पुत्र तथा दोनों कुलों को सुखी समृद्ध, स्वस्थ, सम्पन्न एवं दीर्घजीवी, बनाने के लिए गायत्री उपासना करनी चाहिए। इसी प्रकार अन्य कठिनाइयों के निवारण एवं सुख शान्ति की वृद्धि के लिए भगवती का आश्रय लेना सब प्रकार मंगलमय होता है।
गायत्री माता का आश्रय लेना स्त्रियों के लिए सब प्रकार उत्तम हैं। पिता की अपेक्षा माता अपनी कन्या पर अधिक प्यार करती है। गायत्री माता परम कल्याणमयी हैं, उनका हृदय वात्सल्य से परिपूर्ण हैं। अपनी गोदी हमें चढ़ने वाली किसी पुत्री को वे निराश नहीं करतीं।
गायत्री एक अत्यन्त ही उच्च कोटि का अध्यात्मिक विज्ञान है। इसके द्वारा अपने मानसिक दोष दुर्गुणों को हटाकर अन्तःकरण को निर्मल बनाना हर किसी के लिए बहुत ही सरल है। इसके अतिरिक्त यदि गहरे अध्यात्मिक क्षेत्र में उतरा जाय तो अनेक प्रकार की चमत्कारी ऋद्धि सिद्धियाँ उपलब्ध हो सकती हैं। भौतिक दृष्टि से सकाम कामनाओं के लिए साँसारिक कठिनाइयों का समाधान करने तथा सुख सुविधाओं को प्राप्त करने के लिए भी महत्व पूर्ण सहायता ली जा सकती है। ताँत्रिक विधि से वाममार्गी क्रियाएँ करने पर इससे बड़े रोमाँचकारी परिणाम भी हो सकते हैं।
इस प्रकार की अनेकों साधनाओं में से जो सर्व साधारण के लिए उचित एवं आवश्यक समझी हैं वे गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के तीनों खण्डों में लिख दी हैं। जिनका प्रकट करना सर्व साधारण के लिए उपयुक्त नहीं समझा है, उन्हें बताना किन्हीं विशेष अधिकारी व्यक्ति यों की पात्रता पर निर्भर रहता है। उतनी बारीकियों में न जाया जाय तो साधारणतः इतना ही जान लेने से भी काम चल सकता है कि शरीर को स्नान से शुद्ध करके साधना पर बैठना चाहिए, किसी विवशता ऋतु प्रतिकूल या अस्वस्थता की दशा में हाथ मुँह धोकर या गीले कपड़े से शरीर पोंछ कर भी काम चलाया जा सकता है। आसन बिछा कर पालती मार कर सीधे साधे ढंग से स्थिर चित्त से बैठना चाहिए। माला तुलसी या चंदन की लेनी चाहिए। प्रातः काल सूर्योदय के दो घंटे पूर्व से लेकर सायंकाल सूर्य अस्त होने के एक घंटे बाद तक दिन में कभी भी उपासना की जा सकती है पर प्रातः सायंकाल का समय अधिक उत्तम है। यदि अधिक रात्रि हो जाये या चलते फिरते जप करना हो तो मन ही मन मौन मानसिक जप करना चाहिए। यदि मन्दिर या स्थिर उपासना गृह में नहीं बैठे हैं तो सूर्य को गायत्री का प्रतीक मान कर प्रातःकाल पूर्व को,मध्याह्न उत्तर को, सायंकाल पच्छिम को मुख करके बैठना चाहिए। माला जपते समय सुमेरु (माला के आरंभ का सबसे बड़ा दाना) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए। एक माला पूरी होने पर उसे मस्तक से लगा कर पीछे को ही उलट देना चाहिए। तर्जनी उंगली का जप के समय उपयोग नहीं होता ।
मल मूत्र त्याग अनिवार्य कार्य के लिए बीच में उठना पड़ेगा। हाथ मुँह धोकर तब दुबारा बैठना चाहिए। जप नियमित संख्या में तथा नियत समय पर करना उचित है। यदि कभी बाहर जाने या अन्य कारणों से जप छूट जाय तो आगे थोड़ा थोड़ा करके उस छूटे हुए जप को पूरा कर लेना चाहिए। और एक माला प्रायश्चित स्वरूप अधिक करना चाहिए। जप इस प्रकार करना चाहिए कि कंठ से ध्वनि होते रहे, होंठ हिलते रहें परन्तु पास बैठा हुआ मनुष्य भी स्पष्ट रूप से उसे सुन न सके। साधक का आहार विहार सात्विक रहना चाहिए। पर जिनसे वैसा नहीं बन पड़ता वे भी उपासना कर सकते हैं। क्यों कि उपासना के प्रभाव से तन की बुराइयाँ बहुत जल्दी अपने आप ही सुधरती हैं और साधक स्वयं ही कुछ दिन की अनेक बुराइयों को छोड़ कर शुद्ध सतोगुणी बनने लगता है। जप प्रारम्भ करने से पूर्व पवित्रीकरण, आचमन,शिखा बन्धन प्राणायाम,न्यास करने का नियम है। यह पाँचों कार्य केवल गायत्री मन्त्र में हो सकते हैं। जिनको यह सब न आता हो वे गायत्री माता के चित्र को प्रणाम पूजन करने या मानसिक ध्यान करके जप प्रारंभ कर सकते हैं। जप के समय जल और धूप बत्ती रखनी चाहिए। इस प्रकार जल, और अग्नि को साक्षी रखना उत्तम है। कम से कम 1 माला (108 मन्त्र जपना आवश्यक हैं। अधिक सुविधा हो तो 3, 5, 7, 9, 11 आदि विषय संख्याओं में मालाएं जपनी चाहिए। जप के समय सूर्य के समय तेजस्वी मंडली में गायत्री माता का ॐ का ध्यान करते रहना चाहिये। जप के आदि में आवाहन का प्रणाम और अन्त में विसर्जन का प्रणाम करना चाहिए तथा पूजा के समय रखा हुआ जल सूर्य की ओर चढ़ा देना चाहिए।
कुछ विशेष साधनाएं:-
1 उपवास −रविवार का दिन गायत्री के उपवास का दिन है। निराहार केवल जल रहना या दूध, फल, छाछ शाक आदि फलाहारी वस्तुओं पर रहने का निर्णय अपनी शारीरिक स्थिति देखकर करना चाहिए। जो कठिन उपवास नहीं कर सकते वे एक समय बिना नमक का अन्नाहार लेकर रह सकते हैं।
2 मन्त्रलेखन − जप की अपेक्षा, मन्त्र लेखन का पुण्य फल सौ गुना अधिक माना गया है। क्योंकि इसमें श्रम और मनोयोग अधिक लगता है। चित्त की एकाग्रता और मन को वश में करने के लिए भी मन्त्र लेखन बहुत सहायक होता है। स्कूली साइज की कापी में, किसी भी स्याही से, शुद्धता पूर्वक गायत्री मन्त्र लिखे जा सकते हैं। इसके लिए कोई विशेष नियम या प्रतिबन्ध नहीं है। जब 2400 मन्त्र पूरे हो जायँ तो वह कापी ‘गायत्री तपोभूमि मथुरा’ के पते पर भेज देनी चाहिए। यह मन्त्र गायत्री तपोभूमि मथुरा में प्रतिष्ठापित किये जाते हैं और सदैव इनका विधिवत् पूजन होता रहता है। ऐसी मन्त्र लेखन श्रद्धांजलियां गायत्री मन्दिर में माता के सन्मुख उपस्थित करना एक बहुमूल्य भेंट है।
3 हवन −जिन्हें सुविधा हो वे नित्य अथवा रविवार को अथवा अमावस्या पूर्णमासी को अथवा जब सुविधा हो तब गायत्री मन्त्र से हवन कर लिया करें। जप के साथ हवन का संबन्ध है। अनुष्ठानों में तो जप का दशाँश या शताँश हवन करना आवश्यक होता है पर साधारण साधना में वैसा कोई प्रतिबन्ध नहीं है फिर भी यदा कदा हवन करते रहना गायत्री उपासकों का कर्तव्य है। हवन की विस्तृत विधि ‘गायत्री यज्ञ विधान’ ग्रन्थ में है। उसके आधार पर अथवा अन्य किसी हवन पद्धति के आधार पर अग्नि होत्र कर लेना चाहिए। न्यूनतम 24 आहुतियों का हवन होना चाहिए। 108 या 240 आहुतियों का हवन हों सके तो और भी उत्तम है।
4 अभियान −एक वर्ष तक गायत्री की नियमित उपासना का व्रत लेने को ‘अभियान साधना’ कहते हैं। इसका नियम इस प्रकार है −
प्रतिदिन 10 माला का जप, (2) प्रतिदिन रविवार को उपवास (जो फल दूध पर न रह सकें वे एक समय बिना नमक का अन्नाहार लेकर भी अर्ध उपवास कर सकते हैं) (3) पूर्णिमा या महीने के अन्तिम रविवार को 108 या कम से कम 24 आहुतियों का हवन । सामग्री न मिलने पर केवल घी की आहुतियाँ गायत्री मन्त्र के साथ देकर कर सकते हैं, (4) मन्त्र लेखन− प्रतिदिन कम से कम 24 गायत्री मन्त्र एक कापी पर लिखना, (5) स्वाध्याय−गायत्री साहित्य का थोड़ा बहुत स्वाध्याय नित्य करके अपने गायत्री सम्बन्धी ज्ञान को बढ़ाना, (6) ब्रह्म संदीप− दूसरों को गायत्री साहित्य पढ़ने की तथा उपासना करने की प्रेरणा एवं शिक्षा देना। अपनी पुस्तकें दूसरों को पढ़ने को देकर उनका ज्ञान बढ़ाना एवं नये गायत्री उपासक उत्पन्न करना। इन छः नियमों को एक वर्ष नियम पूर्वक पालन किया जाय तो उसका परिणाम बहुत ही कल्याणकारक होता है। वर्ष के अन्त में यथा− शक्ति हवन एवं दान पुण्य करना चाहिये।
5 अनुष्ठान − अनुष्ठान विशेष तपश्चर्या है। इससे विशेष परिणाम प्राप्त होता है। लघु अनुष्ठान 24 हजार जप का,मध्यम अनुष्ठान सवा लक्ष जप कर तथा पूर्ण पुरश्चरण 24 लक्ष जप का होता है। साधारणतः लघु अनुष्ठान 9 दिन में,मध्य अनुष्ठान 40 दिन में और पूर्ण अनुष्ठान लगभग 1॥ वर्ष में पूरा होता है। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियाँ लघु अनुष्ठान करने के लिये अधिक उपयुक्त अवसर हैं। सुविधानुसार अनुष्ठानों को कम या अधिक समय में भी किया जा सकता है। प्रतिदिन हो सकने वाले जप की संख्या और अनुष्ठान की जप संख्या का हिसाब लगाकर अवधि निर्धारित की जा सकती हैं। जप संख्या नित्य समान संख्या में होनी चाहिए। जप का सौवाँ भाग (शताँश) हवन भी होना चाहिए। अनुष्ठान के दिनों में ब्रह्मचर्य उपवास, मौन, भूमि, शयन, अपनी शारीरिक सेवा दूसरों से ने लेना, आदि तपश्चर्याएं अपने से जितनी बन सकें उतनी करने का प्रयत्न करना चाहिए। अनुष्ठान विद्वान वेदपाठी पण्डितों से भी कराये जा सकते हैं।
6 अनुज्ञान − गायत्री उपासना जैसे महान कल्याण कारक साधन को लोग भूल बैठे हैं इसका मूल कारण गायत्री के महत्व, महात्म्य एवं विज्ञान की जानकारी न होना है जानकारी को फैलाने से ही पुनः संसार में गायत्री माता का दिव्य प्रकाश फैलेगा और असंख्यों हीन दशा में पड़ी हुई आत्माएँ महापुरुष बनेंगी । इसलिए गायत्री ज्ञान का फैलाना भी अनुष्ठान की भाँति ही महान् पुण्य कार्य है। इस प्रचार साधना का नाम ‘अनुज्ञान’ है। जैसी यह सस्ती पुस्तक आपके हाथ में है वैसी ही या अन्य किन्हीं गायत्री पुस्तकों को अपनी श्रद्धानुसार 24,108,240,1008,2400 की संख्या में धार्मिक प्रकृति के मनुष्यों को पढ़वाना, दान देना या खरीदवाना “अनुज्ञान” है। मकर संक्रान्ति पर, नवरात्रियों में,गायत्री जयन्ती, गंगा दशहरा,अपना जन्म दिन, पूर्वजों के श्राद्ध,पुत्र जन्म,विवाह, सफलता, उन्नत,व्रत त्यौहार,उत्सव आदि के शुभ अवसरों पर ऐसे “अनुज्ञान”करते रहना एक उच्च कोटि की माता को प्रसन्न करने वाली श्रद्धाञ्जलि है। अन्नदान की अपेक्षा ब्रह्मदान का फल हजार गुना अधिक माना गया है।
7 पर्ण पाठ −गायत्री सहस्रनाम या गायत्री चालीसा के पाठ करना भी फलप्रद है। गायत्री सहस्र नाम के 9 दिन में 108 पाठ और गायत्री चालीसा के 9 दिन में 240 पाठ करने को पूर्ण पाठ कहते हैं। इनके अन्त में भी हवन तथा दान करना चाहिये।
बहुधा आसुरी शक्तियाँ यज्ञों, अनुष्ठानों एवं पाठ को असफल बनाने के लिये बीच−बीच में विघ्न फैलाती हैं। तथा कभी−कभी साधन करने वालों से कोई त्रुटि रहने से भी साधना सफल नहीं हो पाती। इन विघ्नों से बचने के लिए किसी सुयोग्य अनुभवी साधक को अपनी साधनाओं का संरक्षण नियुक्त किया जाता है जो विघ्नों संरक्षण तथा त्रुटियों का दोष परिमार्जन करता रहे जिन्हें ऐसी संरक्षण प्राप्त करने में कठिनाई होवे गायत्री तपोभूमि मथुरा से इस प्रकार की सेवा सहायता प्राप्त कर सकते हैं।
अनेकों प्रयोजनों के लिये अनेक प्रकार की अलग−अलग साधनाएँ की जाती हैं। कठिन से कठिन रोगों के निवारण के लिए, मन्द बुद्धि लोगों की बुद्धि को तीव्र बनाने के लिए सर्प आदि प्राण घातक विषैले जन्तुओं का विष निवारण करने के लिए, राजकीय अदालती कार्यों में सफलता के लिए दरिद्रता नाश के लिए, मनोवांछित सन्तान प्राप्त करने के लिए, शत्रुता का संहार करने के लिए, भूत बाधा की शाँति के लिए, पथ भ्रष्टों को रास्ते पर लिए आवुमण की संभावना−से आत्म रक्षा के लिए विभिन्न रीतियों से अनेक बीज मन्त्र एवं सम्पुट लगा कर गायत्री साधना की जाती है।
गायत्री की उपासना की वृद्धि के साथ साथ आत्मबल बढ़ता है और अपने भीतर शक्ति यों और सिद्धियों का विकास होता हुआ स्पष्ट दिखाई देता है। जिस समय सिद्धियों का उत्पादन एवं विकास हो रहा हो,वह समय बड़ा ही नाजुक और बड़ी ही सावधानी का हैं। जब किशोर अवस्था का अन्त और नवयौवन का आरम्भ होता है उस समय वीर्य का शरीर में नवीन उद्भव होता है इस उद्भव काल में मन बड़ा उत्साहित काम क्रीड़ा का इच्छुक एवं चञ्चल रहता है,यदि उस मनोदशा पर नियन्त्रण न किया जाये तो कच्चे वीर्य का अपव्यय होने लगता है और वह नवयुवक थोड़े ही समय में शक्ति हीन, वीर्यहीन, यौवनहीन होकर सदा के लिए निकम्मा बन जाता है। साधना में भी सिद्धि का प्रारम्भ ऐसी ही अवस्था है जब साधक अपने अन्दर एक नवीन आत्मिक चेतना अनुभव करता है और उत्साहित होकर प्रदर्शनों द्वारा दूसरों पर अपनी महत्ता की छाप बिठाना चाहता है। यह क्रम चल पड़े तो वह कच्चा वीर्य प्रारंभिक सिद्धि तत्व−स्वरूप काल में ही अपव्यय होकर समाप्त हो जाता है और साधक को सदा के लिए छूँछ एवं निकम्मा हो जाना पड़ता है, इसलिए नवीन साधकों को उचित है कि अपनी सिद्धियों को गुप्त रखें, किसी पर प्रकट न करें, किसी के सामने प्रदर्शन न करें। उनका दुरुपयोग न करें। और साथ ही जा दैवी चमत्कार दृष्टिगोचर हों उन्हें विश्वस्त अभिन्न हृदय मित्रों के अतिरिक्त और किसी से न कहें।
गायत्री से व्यक्ति गत उन्नति होती है पर वस्तुतः इस महामंत्र का मूल आधार सामूहिक है। “धियो योनः” पद में जो ‘नः’ शब्द है वह बहुवचन−सामुदायिक अर्थ का बोधक हैं। केवल अपने लिए ही नहीं वरन् हम सब के कल्याण के लिए−विश्व हित के लिए यह साधना की जाती है। वस्तुतः सब के हित में ही अपना हित छिपा हुआ है। परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ है। गायत्री साधना के साथ यज्ञ का, दान का,ब्रह्म भोज का संबंध इसीलिए जोड़ा गया है कि कोई व्यक्ति चुपचाप जप करके एक कोने में न बैठा रहे,वरन्−संसार की वायु शुद्धि एवं शुभ वातावरण के निमित्त हवन भी करें, दान देकर समाज की कुछ भलाई भी करें, सच्चे लोक सेवकों परमार्थ प्रसार के ब्राह्मणों को भोजन आदि से तृप्त करके उन्हें सहयोग दें उनकी सामर्थ्य बढ़ावे। यह सब बातें सामूहिक लाभ के लिए लोकहित के लिए “नः” शब्द का भावना के अनुसार करनी पड़ती हैं, जिससे हम केवल स्वार्थ की बात ही न सोचते रहें दूसरों की भलाई के लिए भी कुछ न कुछ अनिवार्य रूप से करते रहें।
शास्त्रों में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति दूसरों को शुभ या अशुभ कर्मों को प्रेरणा दे तो उन कार्यों के पाप पुण्य में वह प्रेरणा देने वाला व्यक्ति दसवें अंश का भागीदार होता है। जैसे आपकी प्रेरणा से कोई व्यक्ति 10 गौदान करता है तो प्रेरणा देने का यह शुभ प्रयत्न आपके लिए भी 1 गोदान की बराबर पुण्य फलदायक हो जाता है। बीमा कम्पनी के एजेंट जितने बीमे करा देते हैं उसी हिसाब में एक वार्षिक कमीशन चुपचाप उन एजेंटों के घर ही हर साल पहुँचता रहता है। इसी प्रकार दूसरों को सन्मार्ग पर लगा देने,से उनके द्वारा जो जप तप होता है उसका एक दसवां अंश उस प्रेरणा से देने वाले को प्राप्त हो जाता है। यदि आपकी प्रेरणा दश व्यक्ति गायत्री उपासना आदि किसी शुभ कार्य में लग गये है तो एक व्यक्ति की उपासना का पुण्य फल आपको स्वयमेव सदैव बिना कुछ दिये भी प्राप्त होता रहेगा। चूँकि प्रत्येक साधक किसी की प्रेरणा से साधना से प्रवृत्त होता है इसलिए उसकी दशाँश साधना उस प्रेरक के लिए कटती रहती है। उसकी पूर्ति तभी हो सकती है जब वह नये साधक बनाकर अपने लिए उतना पुण्य फल प्राप्त करे। कुछ लोग अपने आड़े वक्त के लिए कुछ जमीन जायदाद खरीद लेते हैं ताकि उसके ब्याज भाड़े से आसानी से खर्च निकलता रहे। अनेक उपासक बना देना एक प्रकार से आध्यात्मिक जायदाद खरीद लेने के समान है जिसका पुण्य फल अपने को सदा ही निरन्तर प्राप्त होता रहता है। इस प्रकार दूसरों को गायत्री उपासना के मार्ग में लगाने, गायत्री का मंत्र का ज्ञानदान देने के शुभ कार्य में जहाँ अनेक आत्माओं का कल्याण,एवं संसार की महान सेवा है वहाँ अपने लिए अत्यन्त पुण्य फल का संचय भी है। गायत्री का ‘नः’ अक्षर हम सब को यह प्रेरणा देता है कि इस महान उपासना में जितने अधिक व्यक्ति यों का लगाना, या प्रेरणा देना संभव है उसके लिए पूरी तत्परता से प्रयत्न करना चाहिये।
इसके लिए कुछ कार्यक्रम नीचे उपस्थित किये जाते हैं−
(1) किसी अवकाश के दिन धार्मिक प्रकृति के अपने मित्रों को इकट्ठे कीजिये। शुद्धता पूर्वक उनसे गायत्री जप कराइए तथा हवन में सबको क्रमशः सम्मिलित कीजिए। सबका मिलाकर एक 24 हजार का या सवालक्ष का अनुष्ठान हो सकता है।
(2)जहाँ अधिक शुद्धता, एवं हवन व्यवस्था न हो सके वहाँ गायत्री चालीसा के सामूहिक पाठ कराने की व्यवस्था करनी चाहिए। गायत्री चित्र पूजन, आरती, कीर्तन,कलश स्थापना, धृत दीप आदि क्रियाएँ ऐसे अवसरों पर आसानी से की जा सकती हैं।
(3)अपने पास पूरा गायत्री साहित्य रखिए। धार्मिक प्रकृति के सज्जनों के नाम तलाश करते रहिए। उनके घरों पर जा जा कर अपनी गायत्री सम्बन्धी पुस्तकें दीजिए और वापिस लाइए। इस प्रकार गश्ती गायत्री पुस्तकालय चलाने की धर्म सेवा में अपना कुछ समय नित्य लगाइए। सम्पन्न व्यक्ति इस कार्य के लिए कोई व्यक्ति नियुक्त भी कर सकता है।
(4)मंत्र लेखन साधना का अपने क्षेत्र में व्यापक प्रचार कीजिए। धार्मिक प्रकृति के पढ़े लिखे लोगों को गायत्री मंत्र लिख लिख कर तपोभूमि भेजते रहने की साधना में लगाइए। कभी चर्खा कतई यज्ञ की तरह गायत्री मंत्र की लिखाई के सामूहिक आयोजन भी किये जा सकते हैं।
(5)जहाँ कुछ मजबूत साधना वाले व्यक्ति मिल सकें वहाँ 10 दिन में या 15 दिन में 24 हजार का लघु अनुष्ठान अपने अपने घरों पर करने को तैयार कीजिए। अन्तिम दिन हवन सबको शामिल कराइए। प्रवचन कीर्तन, भजन आदि का प्रबंध भी कीजिए। इस प्रकार 1। लक्ष या 24 लक्ष के सामूहिक पुरश्चरण कराये जा सकते हैं।
(6)नित्य एक समय पर एकत्रित होकर गायत्री चालीसा के सामूहिक उच्चारण पूर्वक पाठ हो सकते हैं इस प्रकार 240,2400,24000,या 125000 पाठ हो सकते हैं।
(7)जप, हवन, की भाँति ब्रह्मभोज भी गायत्री उपासना का एक अंग है। जप का शताँश हवन, हवन का शतांश ब्रह्मभोज कराया जाता है। सच्चे ब्रह्म कर्म में जीवन लगाये हुए नैष्ठिक ब्राह्मणों को भोजन कराना भी ब्रह्मभोज कहलाता है। पर वस्तुतः ब्रह्म (आत्मा) को भोज (खुराक) देना ही सच्चा ब्रह्म भोज है। गायत्री ज्ञान दान को सही अर्थों में ब्रह्म भोज कहा जा सकता है। अन्नदान से ज्ञान दान का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया है।
अखंड ज्योति का गायत्री ज्ञान अंक,एवं उसी का दूसरा रूप, सर्व शक्ति मान गायत्री असली लागत चार आना की अपेक्षा बहुत घाटा उठाकर प्रचारार्थ दो आने में ही दी जा रही है। आप इस ब्रह्मभोज को व्यापक बनाइए। विवाह,पुत्र जन्म, उन्नति, व्यापार लाभ, अनुष्ठान की पूर्ति,तीर्थयात्रा, पुण्य पर्व आदि के अवसरों पर इस साहित्य को सत्पुरुषों में वितरण कीजिए दूसरों को भी ऐसा ही करने की प्रेरणा दीजिये। थोड़ा थोड़ा अनेक व्यक्ति यों से धन संग्रह करके 108, 140, 1080, की संख्या में इन पुस्तकों के दान का सामूहिक ब्रह्मभोज भी हो सकता है।
यह तो कुछ थोड़े से सुझाव हैं। अपनी परिस्थिति सुविधा एवं अन्तः प्रेरणा के अनुसार और भी ऐसे ही आयोजन किये जा सकते हैं जिससे लोगों को गायत्री की समुचित जानकारी प्रेरणा एवं अभिरुचि प्राप्त हो। महिलाओं को भी इस आयोजनों में अवश्य सम्मिलित करना चाहिये। लुप्तप्राय आदि सनातन वेदोक्त उपासना गायत्री विद्या को पुनः भारत भूमि में प्रतिष्ठापित करने की− आज की परिस्थिति में अत्याधिक आवश्यकता है। यह कार्य सामूहिक आयोजनों से ही हो सकता है। गायत्री विद्या के महत्व को समझने वाले धर्म प्रेमियों को इस दिशा में कुछ सक्रिय कार्य करने की आवश्यकता है।
लुप्तप्राय गायत्री विद्या के रत्न भंडार को पुनः प्रकाशवान् करने के लिए दैवी शक्ति के द्वारा कुछ विशेष कार्य हो रहे हैं। उन्हीं, कार्यों में से एक गायत्री तपोभूमि का निर्माण भी है। जिन प्रक्रियाओं के साथ इस तीर्थ की स्थापना हुई है वे आश्चर्यजनक एवं अविश्वासियों में भी विश्वास उत्पन्न करने वाली हैं। घोर आर्थिक अभावों के बीच उसका निर्माण कार्य आरंभ हुआ। फिर भी मथुरा वृन्दावन के प्रमुख दर्शनीय स्थानों में गणना होने योग्य यह अत्यन्त ही मनोरम स्थान बन गया है। अभी भी इसका निर्माण कार्य चल रहा है।
मथुरा से एक मील दूर वृन्दावन रोड पर बिलकुल सड़क के किनारे गायत्री तपोभूमि अवस्थित है−इसके पीछे ही पुण्य सलिला यमुना कल−कल निनाद करती हुई प्रवाहित होती है। यह भूमि ऐसी है जहाँ प्राचीन काल में अनेक तपस्वियों ने प्रचंड तप करके अलौकिक सिद्धियाँ पाई हैं। उनकी तपस्या का पर्याप्त प्रभाव अभी भी इस भूमि में मौजूद है। भगवान कृष्ण की यह पुनीत क्रीड़ास्थली अपने भीतर एक दिव्य विशेषता धारण किये हुए हैं।
गायत्री मंदिर के भव्य कक्ष में भगवती वेदमाता गायत्री की बड़ी ही मनोरम, नयनाभिराम,एवं शास्त्रोक्त विधि से बनाई हुई तथा विशिष्ट प्राण प्रतिष्ठा के साथ स्थापित की हुई दिव्य प्रतिमा है। जिसका दर्शन करते करते आँखें तृप्त नहीं होती । वाम कक्ष के कमरे में भारत वर्ष के समस्त प्रधान तीर्थों के, पवित्र नदी सरोवरों के जल सुसज्जित रूप से संग्रहित हैं। दक्षिण कक्ष के कमरे में हजारों गायत्री उपासकों द्वारा लिखे हुए लगभग 83 करोड़ मंत्र स्थापित करने का संकल्प है जिसमें से 42 करोड़ मन्त्र और संग्रह किये जा रहे हैं। मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा के समय 24 दिन का केवल गंगाजल लेकर उपवास इसलिए किया था कि यह तीर्थ वस्तुतः आध्यात्मिक शक्ति से सुसम्पन्न हो जाय ।
तपोभूमि के प्राँगण में तुलसी के पवित्र पौधों से घिरी हुई यज्ञशाला है। जहाँ निरन्तर अखण्ड अग्नि स्थापित रहती है। प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदय के समय यज्ञ होता है। मन्दिर के बरामदे में गायत्री का महत्व बताने वाले शास्त्र वचन लिखे हुए हैं। यज्ञशाला में यज्ञ का महत्व बताने वाले मंत्र लिखे हैं और दीवारों पर शिक्षाप्रद स्फूर्तिदायक, वेदमन्त्रों की सूक्तियाँ अर्थ समेत लिखी हुई हैं। सत्संग भवन में लगभग 100 व्यक्ति यों के बैठने की जगह है, इसी से संलग्न पुस्तकालय में सन्मार्ग की और अग्रसर करने वाली चुनी हुई पुस्तकों की अलमारियाँ है। औषधालय में सबको बिना मूल्य औषधियाँ दी जाती है। इन औषधियों में गर्म पोषक रसायन बड़ी ही चमत्कारी औषधि है। गर्भवती स्त्रियों के गर्भ को पुष्ट करने, दीर्घजीवी, सुन्दर बुद्धिमानी, सद्गुण बनाने एवं कष्ट रहित प्रसव होने का इसमें विशेष गुण हैं। चारों ओर हरे भरे पौधे बड़े ही सुहावने दीखते हैं। कुएं का पानी बड़ा हलका,शीतल एवं मधुर है। 14 छोटे−छोटे कमरे साधकों को ठहरने के लिए बने हुए हैं। मंदिर के चारों ओर उपवन जैसे प्राकृतिक दृश्य बड़े ही सुन्दर हैं।
तपोभूमि में पति वर्ष में तीन विशेष समारोह होते हैं। (1) जून की गर्मी की छुट्टियों में ज्येष्ठ सुदी 1 से ज्येष्ठ सुदी 10 गंगा दशहरा तक विद्यार्थियों के बुद्धि विकास एवं चारित्रिक शिक्षा के लिए 10 दिन का सरस्वती यज्ञ होता है। (2)आश्विन की नवरात्रि में। (3)चैत्र की नवरात्रि में 10 10 दिन के 24 लक्ष गायत्री महा पुरश्चरण होते हैं। इन में दूर दूर से गायत्री साधक आकर अपने 24−24 हजार के अनुष्ठान करते हैं। घर की अपेक्षा इस पुनीत तीर्थ में आकर साधना करने से साधकों को अनेक गुनी सफलता मिलती है। कइयों के यहाँ साक्षत्कार हुए हैं। यहाँ विशेष अनुष्ठान साधन और यज्ञ होते रहने से इस तीर्थ की गुप्त शक्ति में भारी वृद्धि होती रहती है। जिस प्रकार बर्फ खाने में घुसते ही ठंडक और आग की भट्टी के पास जाते ही गर्मी लगती है, उसी प्रकार इस तपोभूमि में प्रवेश करते ही मनुष्य एक आध्यात्मिक पवित्रता एवं शान्ति अनुभव करता है।
साँस्कृतिक धार्मिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा के लिए तपोभूमि में सुदृढ़ आधार पर एक विद्यालय की व्यवस्था का आयोजन हो रहा है। वह प्रबन्ध जब तक न हो जाय तब तक समय समय पर स्वल्प कालीन शिक्षण शिविरों द्वारा तरह तरह की उपयोगी शिक्षाएँ दी जाती रहती हैं। गत जून 54 में छात्रों और अध्यापकों के लिए चरित्र निर्माण की व्यवहारिक शिक्षा देने के लिए एक बहुत ही सफल साँस्कृतिक शिविर हुआ था। अब चैत्र वदी 5 सं॰ 2011 से तीन मास का एक ऐसा शिविर हो रहा है जिसमें अनेक प्रकार के श्रौत, स्मार्त यज्ञों का शास्त्रोक्त विधि विधान,षोडश संस्कारों की क्रियात्मक पद्धति आदि की शिक्षाएँ दी जाएंगी।
गायत्री तपोभूमि भारत वर्ष के असंख्यों गायत्री उपासकों की एक केन्द्रीय क्रीड़ास्थली है। जहाँ साधारण जिज्ञासुओं, साधकों, शिक्षार्थियों, चिंतितों, अभाव ग्रस्तों से लेकर पूर्णता प्राप्त सिद्ध पुरुषों तक सभी श्रेणी के गायत्री उपासकों का आना यहाँ होता रहता है। गायत्री सम्बन्धी जिज्ञासाओं,शंकाओं के समाधान के लिए देश के कौने कौने से ढेरों पत्र यहाँ आते रहे हैं और उत्तर के लिए टिकट या कार्ड भेजने वालों को तुरन्त ही उपयोगी पथ प्रदर्शन किया जाता है। गायत्री विषयक अनेकों पुस्तकें भी प्रकाशित की जा चुकी हैं।
आप जब कभी मथुरा पधारें तब इस सच्चे अर्थों में तीर्थ कहला सकने योग्य परम पवित्र स्थान को देखना न भूलें। इसे देखे बिना आपकी ब्रजयात्रा अधूरी ही रहेगी ।
यज्ञ की महत्ता अपार है। प्राचीन काल में भारत के भौतिक और आध्यात्मिक विज्ञान का मध्यबिन्दु यज्ञ ही रहा है। जिस प्रकार आजकल विविध प्रयोजनों के लिए विज्ञान वेत्ता अनेक प्रकार के यज्ञों के प्रयोग करते हैं। इसी प्रकार प्राचीन काल में यन्त्रों का कार्य मन्त्रों से लिया जाता था। जो कार्य आज भाप, तेल, पैट्रोल, बिजली आदि से शक्ति उत्पन्न करके किये जाते हैं वे काम उस समय यज्ञ कुण्डों में विविध समिधाओं,के द्वारा उत्पन्न सूक्ष्म शक्ति से पूरे कर लिये जाते थे। यज्ञों द्वारा स्वास्थ्य, धन, अन्न, सन्तान, बल, यश, बुद्धि वाणी, दिव्य अस्त्र आदि भौतिक साधना ही नहीं अदृश्य वातावरण को बदले देने, अभीष्ट परिस्थितियाँ आश्चर्यजनक रूप से उत्पन्न कर देने, मनः क्षेत्रों और मस्तिष्कों की गति विधि बदल देने जैसी चैतन्य प्रक्रियाएं भी सम्पन्न की जाती थीं। स्वर्ग, मुक्ति, आत्म साक्षात्कार और ऋद्धि सिद्धियों के केन्द्र भी यज्ञ ही थे। ऋषियों ने यज्ञ का महत्व समझा था और वे यज्ञ को समाज का अतीव उपयोगी एवं आवश्यक कार्य समझ कर उनके विशाल आयोजन समय समय पर करते कराते रहते थे। ब्राह्मण के छह कर्मों में (1) यज्ञ करना और (2) यज्ञ कराना यह दो आवश्यक कर्म हैं। अर्थात् उसके जीवन की एक तिहाई भाग यज्ञ के निमित्त लगाना आवश्यक माना गया है। हिन्दू बालक का शरीर प्रसूति गृह में अखण्ड अग्नि स्थापना के साथ आरम्भ होता है और अन्त में अन्त्येष्टि यज्ञ की चित्ता में ही यह शरीर होम दिया जाता है। हमारा कोई भी व्रत, पर्व, त्यौहार, उत्सव,संस्कार, धर्म, कर्म, बिना यज्ञ के पूर्ण नहीं हो सकता। यज्ञ की महत्ता को समझने वाले दूरदर्शी ऋषियों ने हमारे जीवन में यज्ञ को ओत प्रोत कर दिया है।
खेद है कि आज गायत्री विद्या की भाँति यज्ञ विद्या का भी लोप सा हो गया है। इसके रहस्य मय विज्ञान की साँगोपांग गहरी खोज होने पर ही पूर्वकाल जैसे लाभ मिलने संभव हैं। फिर भी जो कुछ ज्ञान इस समय उपलब्ध है उसका ठीक प्रकार उपयोग किया जा सके तो वह भी इतना महान, है कि उससे आशा जनक सत्परिणाम उपलब्ध हो सकते हैं। गायत्री और यज्ञ का अनन्य सम्बन्ध है। गायत्री को द्विजत्व की माता और यज्ञ को पिता कहा गया है। आध्यात्मिक क्षेत्र में पदार्पण करते हुए हमें इन दोनों का साहाय्य ग्रहण करना पड़ेगा।
आज मनुष्य जाति की व्यक्ति गत तथा सामूहिक रूप से जो विपन्न स्थिति हो रही है उससे सभी दुखी हैं। इस स्थिति में आवश्यक परिवर्तन एवं सुधार उत्पन्न करने के लिए शक्ति शाली यज्ञों की आवश्यकता अनुभव हुई है। तदनुसार दैवी प्रेरणा के आधार पर गायत्री तपोभूमि में एक ऐसे विशालकाय गायत्री महायज्ञ का संकल्प किया गया है जितना बड़ा महाभारत से लेकर अब तक नहीं हुआ। 125 करोड़ गायत्री महामंत्र का जप और 125 लाख आहुतियों का यज्ञ माघ सुदी 5 (वसन्त पंचमी) सं॰ 2011 तद्नुसार 28 जनवरी 54 से आरम्भ हो रहा है । यज्ञ की विशालता का हिसाब फैलाने पर मस्तिष्क चकरा जाता है। पर निराश होने का कोई कारण नहीं, जिस शक्ति के द्वारा संसार का सब कार्य चल रहा है उसके संकेत पर आरम्भ हुआ कोई कार्य असफल एवं अपूर्ण नहीं रह सकता।
इस यज्ञ के प्रमुख उद्देश्य यह हैं कि−(1) संसार में फैली हुई अशान्ति, अनैतिकता तथा अव्यवस्था को दूर करके सतोगुणी वातावरण उत्पन्न करना−विश्व शान्ति की स्थापना। (2) आगामी सन् 1957 की कठिन संभावनाओं को अभीष्ट दिशा में मोड़ना। (3) जिस स्थान पर यज्ञ होगा उस गायत्री तपोभूमि को प्रचंड आध्यात्मिक शक्ति से सुसम्पन्न बनाना। (4) इस यज्ञ के भागीदारों एवं कार्यकर्ताओं को सुविधा पूर्वक का महान पुण्य उपलब्ध कराना । इस यज्ञ की पूर्णता पर जो सत्परिणाम होने वाले है इनकी विस्तृत चर्चा करना अभीष्ट समय से पहले की बात होगी पर यह निश्चित है कि इसके द्वारा जो होगा वह बहुत कुछ होगा−असाधारण होगा।
24−24 करोड़ जप और 24−24 लक्ष यज्ञ के पाँच भागों में इसे बाँटा गया है। पूर्णाहुति का छटा आयोजन 5 करोड़ जप तथा 5 लक्ष यज्ञ का अन्त में होगा। इस प्रकार विराम लेते हुए −एक एक मंजिल पूर्ण करते हुए इस विशालकाय महायज्ञ की पूर्णता की जायगी। इसके अंतर्गत बीच−बीच में (1) चारों वेदों के सम्पूर्ण मंत्रों का पारायणयज्ञ (2) रुद्र यज्ञ (3) विष्णु यज्ञ (4) शतचण्डी यज्ञ (5) महामृत्युञ्जय यज्ञ (6) गणपति यज्ञ (7) सरस्वती यज्ञ (8) अग्निष्टोम (9) ज्योतिष्टोम आदि अनेकों यज्ञ होते रहेंगे।
इस यज्ञ का यजमान, संयोजक, पूर्णफल प्राप्त कर्ता कोई एक व्यक्ति नहीं है। यह संकल्प समस्त गायत्री उपासकों की ओर से किया गया है। इसलिए इसका श्रेय उन सभी को प्राप्त होगा जो इसमें जितने अंश के भागीदार बनेंगे। जिस प्रकार किसी लिमिटेड कम्पनी के अनेक शेयर होते हैं उसी प्रकार इस यज्ञ के भी दस हजार भागीदार होंगे।
24 हजार का जप तथा 240 आहुतियों के हवन का लघु अनुष्ठान ही इस यज्ञ का एक शेयर है। जिस प्रकार कोई व्यक्ति अनेकों शेयर खरीद सकता है उसी प्रकार कोई साधक इस यज्ञ के चाहे जितने भाग प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार नवरात्रि में 9 दिन का अनुष्ठान होता है उसी प्रकार उन्हीं नियमों में यह भी होंगे, दो नियम ढीले कर दिये गये है। (1) उपवास अनिवार्य नहीं है जो कर सकें करें न कर सकें न करें (2) जिन्हें अवकाश कम हो वे नौ दिन की अपेक्षा 15 दिन में 16 माला प्रतिदिन के हिसाब से या 24 दिन में 10 माला प्रतिदिन से भी कर सकेंगे।
भागीदार अपने निर्धारित जप को अपने अपने घरों पर कर सकेंगे पर उसका हवन गायत्री तपोभूमि की निर्धारित वेदी पर ही होना चाहिए। मथुरा के निकटवर्ती लोग अनुष्ठान के दिनों में ही एक दिन या दो दिन में 240 आहुतियों का हवन कर लिया करेंगे। बाहर के सज्जन अपने अनुष्ठान अपने स्थान पर करते रहें और एक वर्ष के भीतर जब भी अवसर मिले मथुरा आकर अपने कई अनुष्ठानों का हवन एक साथ भी कर सकते हैं 24 आहुतियों में 3 मासे प्रति आहुति के हिसाब से 12 छटाँक सामग्री, 1॥ मासे प्रति आहुति के हिसाब से 6 छटांक घी, 1 तोले की आहुति के हिसाब से 3 सेर समिधाएं (लकड़ी) लगती हैं। जिन अनुष्ठान कर्ताओं की इच्छा तथा सामर्थ्य हो वे अपना यह सामान देदें, जिनको कुछ कठिनाई हो, उनके लिए इस सब सामान की भी पूर्ति कर दी जायेगी। इस महान आयोजन के आरम्भ का शुभ मुहूर्त माघ सुदी 5 (बसंत पंचमी) सं॰ 2011 तदनुसार 28 जनवरी हैं।
यह आयोजन अत्यन्त ही विशद है। दस हजार अनुष्ठानकर्ता ढूंढ़ने के लिए लाखों व्यक्ति यों तक इसका संदेश पहुंचाना होगा। इस कार्य को हम अकेले नहीं कर सकते। इसके लिए बड़ी संख्या में सहयोगियों,स्वयं सेवकों एवं प्रचारकों की आवश्यकता होगी । जो घर घर जाकर इस यज्ञ का सन्देश पहुँचावें और भागीदार अनुष्ठान कर्त्ता तैयार करें । हमारी सभी गायत्री उपासकों से प्रार्थना है कि अपने अपने क्षेत्र में इस प्रकार का नियमित प्रयत्न करें। दो−दो चार−चार की टोली बना कर नित्य कुछ समय या छुट्टी का अधिक समय घर घर प्रचार करने में जाने के लिए लगावें। यह अनेकों धर्म कार्यों से अधिक पुण्य है। दूसरों की आत्मा को कल्याण मार्ग पर लगाने से बढ़कर और कोई पुण्य परमार्थ इस संसार में नहीं है। शुभ कार्यों में प्रेरणा देने वाले को उस कार्य का दशाँश पुण्य मिलना शास्त्रों में लिखा है। कम्पनियों के शेयर बेचने वालों तथा बीमा कम्पनी के एजेंटों को भी कमीशन मिलता है। गायत्री प्रचार की पुनीत सेवा एवं यज्ञ को पूर्ण करने के लिए की हुई प्रयत्न शीलता भी ऐसी साधना है जो जप, हवन, प्राणायाम आदि में समय लगाने से कहीं अधिक श्रेयष्कर सिद्ध होगी।
मथुरा गायत्री तपोभूमि में ऐसे स्वयंसेवकों की भी बड़ी आवश्यकता है जो स्थानीय व्यवस्था, यज्ञ का सहयोग करने के अतिरिक्त प्रचार करने की भी क्षमता रखते हों। किसी को वेतन दे सकना कठिन है पर भोजन, ठहरने आदि की समुचित व्यवस्था यहाँ रहेगा। तीन तीन महीने समय देने के लिए भी ऐसे सेवाभावी सज्जन आते रहें तो यहाँ का सब प्रबन्ध ठीक प्रकार चलता रह सकता है। प्रारम्भिक व्यवस्था में हमें भी विशेष अड़चन तथा आवश्यकता रहेगी। इसलिए यज्ञ के प्रारम्भिक काल में मथुरा आने के लिए ऐसे सत्पुरुषों को हम अनुरोध पूर्वक आमन्त्रित करते हैं।
यह यज्ञ असाधारण है। इससे असाधारण ही शक्ति उत्पन्न होगी इसके भागीदार भी ऐसे आधार अनुभव प्राप्त करेंगे जो साधारण साधनाओं से संभव नहीं। यह संकल्प अधिक महान संभावनाओं से ओत प्रोत है इसे पूर्ण करने में सच्चा सहयोग करने में सभी गायत्री प्रेमियों सभी धार्मिक प्रकृति के पुरुषों से हमारी हार्दिक प्रार्थना है।
जो सज्जन पारिवारिक जिम्मेदारियों से छुटकारा पा चुके हैं, नौकरी से रिटायर्ड हो चुके हैं,जिन के पास समय तथा सुविधा है वे अपना समय इस यज्ञ में भागीदार बनने में लगावें। तपोभूमि में आकर रहें, दो वर्ष तक इस महान यज्ञ में भागीदार रहें और यज्ञीय वातावरण से अपनी अन्तरात्मा को, अन्तःकरण मनोभूमि को परिष्कृत, पवित्र एवं विकसित करने सुयोग प्राप्त करें। यह दो वर्ष का तप अन्यत्र किये हुए दो सौ वर्ष के साधन के समान फलदायक होगा। जिन्हें कम अवकाश है वे छुट्टी या फुरसत के दिनों में थोड़े दिनों के लिए आकर सक्रिय भागीदार बन सकते हैं। सच्ची भावना से आये हुए साधकों में जो इतने निर्धन होंगे कि अपने भोजन का व्यय स्वयं न कर सकते होंगे उनके लिए तपोभूमि की ओर से व्यवस्था कर दी जायेगी। बाहर से आने वालों को अपना पूरा परिचय भेजकर पूर्व स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति के आने वालों के लिए किसी प्रकार की व्यवस्था करने का उत्तर दायित्व हमारा न होगा। केवल ऐसे ही लोगों को तपोभूमि में स्थान मिलेगा जिनमें मधुर भाषण, स्वच्छता, श्रमशीलन, अनुशासन, कष्ट सहिष्णुता, उदारता अन्य सद्गुण संतोषजनक मात्रा में होंगे।
यज्ञ में हवन सामग्री, घृत, समिधा आदि वस्तुओं सहयोग देकर उतनी आहुतियों के यज्ञ के पुण्य फल को प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार यहाँ रहने वालों के लिए भोजन व्यय में कुछ देकर भी इतनी मात्रा में ब्रह्म भोजन का पुण्य प्राप्त किया जा सकता है।
ऐतरेय ब्राह्मण में गायत्री शब्द का अर्थ कहते कहा गया है−
‘गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री।’
अर्थात् जो गय (प्राणों की) रक्षा करती है, गायत्री है।
प्राण कहते हैं चैतन्यता एवं सजीवता को । हमारे अन्दर जो गति, क्रिया, विचार शक्ति, विवेक एवं ध्यान धारण करने वाला तत्व है वह प्राण कहलाता है । इस प्राण के कारण हम जीवित हैं, जब प्राण निकल गया तो जीवन का अन्त ही समझिये, निष्फल देह से कुछ प्रयोजन नहीं सधता। उसे तो नष्ट करना ही हित कर समझा जाता है इसलिये उसे गाढ़ जला देते हैं। प्राण होने के कारण ही जीव प्राणी कहते हैं, बिना प्राण का पदार्थ तो जड़ होता है जब किसी प्राणी का प्राण निर्बल पड़ जाता है तो उसका वाह्य शरीर ठीक दिखाई देते हुए भी वह भीतर ही भीतर खोखला हो जाता है।
प्राणशक्ति के अभाव में मन का भी बुरा हाल हो जाता है,भय या अनिष्ट की आशंकायें अकारण मन में उठती रहती हैं,भीरुता एवं निराशा उसे घेरे रहती हैं। दुःस्वप्न, घबरा जाना, चिन्तातुर रहना धैर्य खो देना निराशा जनक भविष्य की कल्पनायें कर करते रहना नास्तिक सा बन जाना आदि बातें प्राण शक्ति की न्यूनता से होती हैं। निष्प्राण तो उसे कहते हैं जो पूरी तरह प्राण रहित हो जाता है,जड़ बन जाता है, पर न्यून प्राण उसे कहते हैं जो भीतर और बाहरी दृष्टि से निर्बल हो गया है और उन निर्बलताओं का दुख प्रतिक्षण भुगतता रहता है। क्योंकि न्यून प्राण की थोड़ी सी मात्र−भोजन पचाना निद्रा, रक्त भिसरण, श्वास प्रश्वास आदि में ही खर्च हो जाती है।
गायत्री महामन्त्र से लाभ उठाने के लिये यह आवश्यक है कि गायत्री विद्या का पूरा परिचय, एवं विधान भली प्रकार सीख लिया जाय। अधूरी जानकारी का परिणाम अधूरा ही होता है। साइन्स,डाक्टरी, इंजीनियरिंग, कानून,रसायन, शिल्प,आदि की भाँति गायत्री भी एक महत्वपूर्ण विद्या है जिसकी पूरी जानकारी प्राप्त करके ही पूरा लाभ उठाया जाना सम्भव है।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों एवं सिद्ध पुरुषों के सहयोग तथा दीर्घ कालीन अनुभवों के आधार पर, जो ज्ञान एकत्रित किया गया है उसको पुस्तक रूप में प्रकाशित कर दिया है। इनमें उन सभी प्रश्नों का उत्तर,शंकाओं का समाधान तथा विभिन्न प्रयोजनों के लिए गायत्री प्रयोगों का पूरा वर्णन है। इन्हें पढ़ने के बाद कोई बात पूछने लायक नहीं बचती । फिर भी कोई बात पूछनी हो तो जवाबी पत्र भेज कर प्रसन्नता पूर्वक पूछी जा सकती है। स्मरण− रहे साधारण पत्र की 10−20 पंक्ति यों में किन्हीं साधनाओं का पूरा विधान या विज्ञान बताया जाना सम्भव नहीं । संक्षिप्त और अधूरे उत्तरों से जिज्ञासुओं का ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। इसलिए कोई पूछ ताछ करने से पहले गायत्री महाविज्ञान आदि ग्रन्थों को पढ़ना आवश्यक है। जो सज्जन इन पुस्तकों को मँगा लेते हैं वे गायत्री परिवार के सदस्य माने जाते हैं और उनकी उन्नति के लिए समय समय पर अनेक आवश्यक बातें एवं सूचनाएँ इधर से ही भेजी जाती रहती हैं।
गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) मू॰ 3॥)
विषय− गायत्री विद्या का वैज्ञानिक परिचय, तथ्य तथा मूल आधार, साधना द्वारा गुप्त 24 शक्ति यों का जागरण, अनेक शक्ति यों का आविर्भाव, वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान,अनेकों अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन, यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध, निष्काम और सकाम साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वन्दन, प्राणायाम, ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियाँ,अनेक प्रयोजनों के लिए गायत्री के अनेक प्रयोग,स्त्रियों की पृथक साधनाएँ मन्त्र का अर्थ, माता का साक्षात्कार, साधक में प्रकट होने वाली दस विशेषताएँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी भयंकर तान्त्रिक साधनाएँ, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
(2)गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग) मू॰ 3॥)
विषय−गायत्री विद्या सम्बन्धी छोटे छोटे किंतु बड़े ही महत्वपूर्ण रत्नों का संस्कृत श्लोक और हिन्दी अर्थों समेत संग्रह है। गायत्री महात्म्य,गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री पञ्जर, गायत्री संहिता, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, 24 गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री सहस्रनाम, गायत्री स्तोत्र, गायत्री लहरी आदि के इस संग्रह को गागर में सागर कहा जा सकता है।
(3)गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) मू॰ 3॥)
विषय−गायत्री द्वारा 24 प्रकार की महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी योग साधना का विस्तृत वर्णन है। गायत्री के पाँच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य स्थूल,सूक्ष्म, कारण शरीरों का परिचय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय, आदि पंचकोशों की साधना, हठ−योग,राजयोग, लययोग नादयोग, ऋजुयोग, प्राण योग, शब्द योग, स्वरयोग की विधियाँ। बन्ध, मुद्रा, पञ्च तन्मात्रा, ग्रन्थिभेदन, पञ्जीकरण,भूत शुद्धि,समाधि, तुरीयावस्था,आत्म दर्शन सोऽहं का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग, मनोनिग्रह, मैस्मरेजम की बेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत विधान इस पुस्तक में है इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
(4)गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार मू॰ 3॥)
विषय− अनेकों साधकों को, अपनी अपनी साधना में हुए अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन इस पुस्तक में है। किन व्यक्ति यों को किस किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए निराशा एवं असफलता के अन्धकार पूर्ण वातावरण को पलट कर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए, इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
(5)गायत्री यज्ञ विधान−मू॰ 3॥)
यज्ञ का रहस्य, विज्ञान, विधान, विवेचन, कारण,हेतु, महत्व आदि को पूरे विस्तार एवं प्रमाणों के साथ समझाया गया है। गायत्री के छोटे होम बड़े यज्ञ,विशेष विधियों और विवेचनाओं एवं मन्त्रों के साथ विस्तार पूर्वक समझाये गये हैं। इस पुस्तक के आधार पर पूर्ण शास्त्रोक्त विधि विधान का यज्ञ कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से कर सकता है और देव शक्ति यों द्वारा अनेक सहायताएँ प्राप्त कर सकता है।
(6)गायत्री शिक्षा मूल्य 2)
विषय−गायत्री के 24 अक्षरों में 24 महान सिद्धान्त छिपे हुए हैं। उनको समझने के लिये 24 श्लोक,24 लेख, 24 भावपूर्ण कविताएँ तथा 26 आर्ट पेपर पर छपे हुए कलात्मक, तिरंगे चित्र हैं। पुस्तक बड़ी ही शिक्षाप्रद तथा प्रभावोत्पादक है।
(7)गायत्री चित्रावली −मू॰ 1॥)
विषय− विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री के विविध ध्यानों के लिए आर्ट पेपर पर छपे हुए 24 तिरंगे चित्र तथा उनका पूरा परिचय।
(8)गायत्री का मंत्रार्थ−मू॰ 1॥)
विषय− गायत्री के एक एक अक्षर की विस्तृत शास्त्रीयों व्याख्या तथा अनेक ऋषियों के अनेक प्रकार से किये हुए अर्थों का संग्रह । राक्षस राज रावण की गायत्री व्याख्या भी इसमें है।
‘अखण्ड ज्योति’−यह गायत्री संख्या की मुख्य पत्रिका है। यह गत 14 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित हो रही है। ग्राहक संख्या की दृष्टि में कल्याण के बाद धार्मिक पत्रों में अखण्ड ज्योति का दूसरा नम्बर है। इसकी उपयोगिता तथा सस्ते पन की सर्वत्र भूरि भूरि प्रशंसा हो रही है। इसमें हर महीने गायत्री सम्बन्धी लेख,रंगीन चित्र तथा समय समय पर गायत्री उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियाँ प्रकाशित होती रहती हैं। जुलाई में हर साल एक ‘गायत्री अंक’ निकलता है। गायत्री संस्था से सम्बन्ध रखने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ का ग्राहक रहना आवश्यक है। वार्षिक मूल्य 2॥ ) मात्र ।
छोटा सेट −उपरोक्त पुस्तकों के कुछ स्थलों का संक्षिप्त साराँश लेकर यह पुस्तकें भी छापी गई हैं।
(1)गायत्री ही कामधेनु है..।=)
(2)गायत्री का वैज्ञानिक आधार ...।=)
(3)वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री।=)
(4)गायत्री की सर्वसुलभ साधनाएँ।=)
(5)अनादि गुरु मन्त्र गायत्री...।=)
(6)सचित्र गायत्री ... .... ।=)
(7)गायत्री के 14 रत्न (प्रथम भाग)।=)
(8)गायत्री के 14 रत्न (द्वितीय भाग)।=)
(9) विपत्ति निवारिणी गायत्री .... ...।=)
(10)स्त्रियों का गायत्री अधिकार ।=)
(11) गायत्री सहस्रनाम पाठ ।=)
(12) गायत्री हवन विधि। =)
(13) संक्षिप्त गायत्री हवन ।=)
अत्यंत सस्ती एवं सुन्दर वितरण योग्य पुस्तकें
(1)गायत्री की गुप्त शक्ति।-)
(2) सुख शान्ति दायिनी गायत्री ।-)
(3)गायत्री ये बुद्धि विकास ।-)
(4)गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ ।-)
(5)गायत्री का अर्थ सन्देश ।-)
(6)स्त्रियों की गायत्री साधना ।-)
(7)गायत्री उपासना कैसे करें ।-)
(8)गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध ।-)
(9)गायत्री चालीसा ।-)
(10)गायत्री का तिरंगा चित्र ।-)
मूल्य में कमी के लिए लिखना बिलकुल व्यर्थ है। हाँ, 6)से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च अपना लगा दिया जाता है। 3) से कम मूल्य की वी. पी. नहीं भेजी जाती । 3) की पुस्तकों पर करीब ॥।) पोस्टेज लगता है।
पत्र व्यवहार का पता −
“अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।
फिर अन्य उन्नति करने वाले तथा रक्षा करने वाले कार्यों के लिये शक्ति नहीं बच पाती है, फलस्वरूप उनकी व्यवस्था ठीक तरह नहीं चल पाती और वह हर दिशा में असफलता का शिकार होता रहता है।
प्राणवान की स्थिति इससे भिन्न होती है । उसकी नस नस में उत्साह होता है, मन में हर घड़ी नई तरंगें उठती है, हृदय में दृढ़ता, साहस, धैर्य, आशा एवं स्फूर्ति की भावनाएँ गूँजती रहती हैं। वह प्रत्यक्षतः चाहे दुबला पतला दिखाई पड़ता हो, कम पढ़ा लिखा हो, पिछड़ी हुई परिस्थितियों में रहता हो,तो भी वह अपने प्राण बल के आधार पर ऐसे ऐसे अवसर प्राप्त करता है, ऐसे ऐसे कार्य कर दिखाता है जिसे देख कर अधिक साधन सामर्थ्य रखने वाले व्यक्ति यों को भी आश्चर्य से दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है। मनुष्य में जो भी शक्ति है वह हाड़, माँस, रस, रक्त की नहीं, प्राण की शक्ति है। मरने के बाद हाड़ मास तो सब मौजूद रहते हैं पर केवल प्राण निकल जाते हैं। इस प्राण के हटते ही वे शरीर के सारे कल पुर्जे निरर्थक सिद्ध होते हैं।
जीवन का सार प्राण है, क्योंकि सभी प्रकार की भौतिक शक्तियाँ प्राण के अंतर्गत रहती हैं। जिसका प्राण जितना ही सबल है, अधिक है, सुरक्षित है वह उतना ही पुरुषार्थी एवं शक्ति शाली है और अपने प्रयत्न में वह सब बातें प्राप्त करेगा जिनके द्वारा आन्तरिक ओर बाह्य सुख शान्ति को प्राप्त किये जा सकता है।
गायत्री की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह हमारे प्राण तत्व की रक्षा करती है, उसे बढ़ाती एवं परिपुष्ट करती है। गायत्री उपासक का शरीर चाहे साधारण ही रहे पर उसमें आत्मबल, प्राणतत्व पर्याप्त मात्रा में भरता और बढ़ता है। फलस्वरूप वह तुच्छ मनुष्य न रह कर महामानव बन जाता है।
श्री शंकराचार्य ने गायत्री का भाष्य करते हुए कहा है− “गीयते तत्व मनया गायत्रीति” अर्थात्− जिसमें “तत्व ज्ञान” प्राप्त हो वह गायत्री है। जिस विवेक बुद्धि से, ऋतम्भरा प्रज्ञा से −तत्व− सत्य−जाना जाता है वही गायत्री है। यों मनुष्य के मस्तिष्क में बुद्धि के अनेक भाग होते हैं और उन विभिन्न भागों के विकास में मनुष्य में चतुरता आदि गुण आते हैं पर कर्तव्य का,सत् असत् का, हित अनहित का दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय केवल वहीं बुद्धि करती है जिसे ऋतम्भरा प्रज्ञा या गायत्री कहते हैं।
तमसाच्छन्न बुद्धि में कितनी ही चतुरता− तीक्ष्णता−सूझबूझ−भले ही हो, वह कितनी ही कमाऊ हो, पर उससे आत्मिक सुख शांति के दर्शन भी नहीं हो सकते। भोग विलास के थोड़े से उपादान वह जरूर जमा कर सकती है पर उन उपादानों के कारण चिन्ता, भय, आशंका, तृष्णा, मोह, मद आदि की मात्रा इतनी बढ़ जाती है कि उनका भार आत्मा के लिए असाधारण रूप से कष्ट दायक सिद्ध होता है। इसके विपरीत सतोगुणी ऋतम्भरा विवेक बुद्धि हमारे शारीरिक आहार विहारों को सात्विक रखती है जिससे दीर्घायुष्य एवं आरोग्य प्राप्त होता है । मन में धार्मिक, सतोगुणी, परमार्थ पूर्ण भावनाएँ रहती हैं जिससे अन्तरात्मा में सदा प्रफुल्लता एवं शान्ति रहती है। इस प्रकार शरीर और मन दोनों की सुरक्षा एवं उन्नति के कारण प्राण शक्ति दिन दिन बढ़ती ही रहती है और मनुष्य लोक एवं परलोक की सच्ची सुख शान्ति प्राप्त करता है। गायत्री रूपी सद्बुद्धि हमारी प्राण रक्षा का हेतु बनती हुई इस प्रकार अपने नाम के अर्थ को सार्थक करती है।
ऐसे अन्य प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे प्रकट होता है कि गायत्री नाम इसलिए पड़ा है कि वह प्राणों की रक्षा करती है।
प्राणा गया इति प्रोक्त स्त्रायते तानथापिवा।
−भारद्वाज
अर्थात्− गय प्राणों को कहते हैं। जो प्राणों की रक्षा करती है वह गायत्री है।
तद्यत्प्राणं त्रायते तस्माद् गायत्री।
जिससे प्राणों की रक्षा होती है वह गायत्री है।
जयति जय गायत्री माता । जयति जय गायत्री माता॥
आदि शक्ति तुम अलख निरंजन जग पालन कर्त्री ।
दुख शोक भय क्लेश कलह दारिद्र दैन्य हर्त्री ॥
ब्रह्म रूपिणी, प्रणति पालिनी, जगदघातृ अम्बे ।
भव भय हारी, जन हितकारी, सुखदा जगदम्बे॥
भय हारणि, भव तारणि, अनघे, अज अनन्द राशी।
अविकारी, अघहारी, अविचलित, अमले, अविनाशी॥
कामधेनु सम चित् आनन्दा जय गंगा गीता।
सविता की शाश्वती शक्ति तुम सावित्री सीता ॥
ऋग् यजु साम अथर्व प्रणयिनी प्रणव महा महिमे।
कुण्डलिनी सहास्रार सुषुम्ना शोभा गुण गरिमे॥
स्वाहा, स्वधा, शची, ब्रह्माणी, गधा रुद्राणी।
जय सत रूपा वाणी विद्या कमला कल्याण॥
जननी हम है दीन हीन दुख दारिद के घेरे।
यदपि कुटिल कपटी कपूत तऊ बालक हैं तेरे॥
स्नेह सनी करुणामय माता चरण शरण दीजै।
विलख रहे हम शिशु सुत तेरे दया दृष्टि कीजै॥
काम, क्रोध, मद, लोभ, दम्भ, दुर्भाव, द्वेप हरिये।
शुद्धि बुद्धि निष्पाप हृदय, मन को पवित्र करिये॥
तुम समर्थ सब भाँति तारिणी तुष्टि, पुष्टि, त्राता।
सत मारग पर हमें चलाओ, जो है सुख दाता॥
जयति जय गायत्री माता। जयति जय गायत्री माता॥
*समाप्त*