यज्ञ—भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है। हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई है उतनी और किसी को नहीं दी गई। हमारा कोई भी शुभ अशुभ धर्म-कृत्य यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। जब बालक का जन्म होता है तो उसकी रक्षार्थ सूतक निवृत्ति घरों में अखंड अग्नि स्थापित रखी जाती है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में भी हवन अवश्य होता है। अन्त में जब शरीर छूटता है तो उसे अग्नि को ही सौंपते हैं। अब लोग मृत्यु के समय चिता जलाकर यों ही लाश को भस्म कर देते हैं पर शास्त्रों में देखा जाय, तो वह भी एक यज्ञ है। इसमें वेद मन्त्रों से विधि पूर्वक आहुतियां चढ़ाई जाती हैं और शरीर को यज्ञ भगवान के अर्पण किया जाता है।

यह भी भारतीय धर्म का मूल है आत्म साक्षात्कार, स्वर्ग, सुख, बन्धन मुक्ति, मनः शुद्धि, पाप प्रायश्चित, आत्म बल वृद्धि और ऋद्धि सिद्धियों के केन्द्र भी यज्ञ ही थे। यज्ञों द्वारा मनुष्य को अनेक आध्यात्मिक एवं भौतिक शुभ परिणाम प्राप्त होते हैं। वेद मन्त्रों के साथ-साथ शास्त्रोक्त हवियों के द्वारा जो विधिवत हवन किया जाता है उससे एक दिव्य वातावरण की उत्पत्ति होती है। उस वातावरण में बैठने मात्र से रोगी मनुष्य निरोग हो सकते हैं। चरक ऋषि ने लिखा है कि “आरोग्य प्राप्त करने की इच्छा करने वालों को विधिवत् हवन करना चाहिए।” बुद्धि शुद्ध करने की यज्ञ में अपूर्व शक्ति है। जिनके मस्तिष्क दुर्बल हैं या बुद्धि मलीन है वे यदि यज्ञ करें तो उनकी अनेकों मानसिक दुर्बलताएं शीघ्र ही दूर हो सकती हैं। यज्ञ से प्रसन्न हुए देवता मनुष्य को धन, सौभाग्य वैभव तथा सुख साधन प्रदान करते हैं। यज्ञ करने वाला कभी दरिद्री नहीं रह सकता। यज्ञ करने वाले स्त्री पुरुषों की सन्तान बलवान, सुन्दर और दीर्घजीवी होती हैं। राजा दशरथ को यज्ञ द्वारा ही चार पुत्र प्राप्त हुए थे। गीता आदि शास्त्रों में यज्ञ को आवश्यक धर्मकृत्य बताया गया है और कहा गया है कि यज्ञ न करने वाले को यह लोक और परलोक कुछ भी प्राप्त नहीं होता। यजुर्वेद में कहा गया है कि जो यज्ञ को त्यागता है उसे परमात्मा त्याग देता है। यज्ञ के द्वारा ही साधारण मनुष्य देव योनि प्राप्त करते हैं और स्वर्ग के अधिकारी बनते हैं। यज्ञ का सर्व कामनापूर्ण करने वाली कामधेनु और स्वर्ग की सीढ़ी कहा गया है। याज्ञिकों की आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश उत्पन्न होता है और इससे स्वल्प प्रयत्न द्वारा ही सद्गति का द्वार खुल जाता है। आत्म साक्षात्कार और ईश्वर प्राप्ति का तो यज्ञ अमोघ साधन है। यज्ञ में अमृतमयी वर्षा होती है उससे अन्न, पशु, वनस्पति, दूध, धातु, खनिज पदार्थ आदि की प्रचुर मात्रा में उत्पत्ति होती है और प्राणियों का पालन होता है। यज्ञ से आकाश में अदृश्य रूप से ऐसा सद्भावनापूर्ण सूक्ष्म वातावरण पैदा होता है जिससे संसार में फैले हुए अनेक प्रकार के रोग, शोक, भय, क्लेश, कलह, द्वेष, अन्याय, अत्याचार नष्ट हो सकते हैं और सब लोग प्रेम और सुख शान्तिपूर्वक रह सकते हैं।

प्राचीन काल में ऋषियों ने यज्ञ के इन लाभों को भली प्रकार समझा था। इसीलिए वे उसे लोक कल्याण का अतीव आवश्यक कार्य समझ कर अपने जीवन का एक तिहाई समय यज्ञों के आयोजनों में ही लगाते थे। स्वयं यज्ञ करना और दूसरों से यज्ञ कराना उनका प्रधान कर्म था। जब घर-घर में यज्ञ की प्रतिष्ठा थी तब यह भारत भूमि स्वर्ण सम्पदाओं की स्वामिनी थी, आज यज्ञ को त्यागने से ही हमारी दुर्गति हो रही है। यों शास्त्रोक्त यज्ञ विद्या का आज लोप सा हो गया है। पर जो कुछ भी ज्ञान और साधन आज मौजूद हैं उनसे भी आशाजनक लाभ उठाया जा सकता है।


दिव्य ज्ञान की बाती!

(श्री शिवशंकर मिश्र)


दिव्य ज्ञान की बाती (Kavita)

जब−जब असद् वृत्ति सद् पर है निज प्रभाव दिखलाती, अशिव प्रबल होता है, शिव की महिमा है घट जाती, अन्धकार, अज्ञान और हिंसा का ताण्डव होता, ज्योति नहीं पन्थ कर पाती, दिव्य ज्ञान की बाती, तब मंगल की दीक्षा के हित यज्ञ किये जाते हैं! सुर, नर, मुनि सब इसमें होता बनने को आते हैं!!

इसी यज्ञ की कल करुणा बन करके गंगा आयी, इसी यज्ञ की धूम्र राशि ने चरम शान्ति निखरायी, इसके प्रति आस्था जीवन में नवल चेतना आती, इसका गन्धहास जड़ चेतन के हित अति सुखदायी, है आत्मा की शक्ति यज्ञ, मानवता की थाती है! कवि की वाणी युग−युग से ही इसका गुण गाती है!!

आमन्त्रण है आज आपका पावन आहुति दाता, शूल और संघर्ष भरे पथ के तुम भाग्य विधाता, यह न समझना इस आहुति का कुछ भी मोल नहीं है, एक ज्योति कण कितनों को ही लक्ष्य पन्थ दिखलाता, यह अतीत का सत्य, भविष्यत् मंगलमय की आशा! बने कर्म ही आज धर्म की मूर्तिमान परिभाषा!!


हिंदू धर्म में यज्ञों का स्थान तथा प्रयोजन

(श्री दीनानाथ शर्मा शास्त्री सारस्वत, देहली)

‘नायं लोकोऽस्त्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम!’

गीता 4।31

[यज्ञहीन को ऐहिक लोक भी नहीं मिलता, परलोक भला क्या मिलेगा।]

सनातन हिन्दू धर्म में यज्ञों का बड़ा महत्व माना गया है। इस धर्म में वेदों का जो महत्व है, वही महत्व यज्ञों को भी प्राप्त है क्योंकि वेदों का प्रधान विषय ही यज्ञ है, जैसे कि देखिये इस पर न्यायदर्शन (4।1।63), मनुस्मृति (1।23), सिद्धान्त शिरोमणि (गणिताध्याय, मध्यमविकारस्थ कालमानाध्याय 9 पद्य) गोपथब्राह्मण (1।4।24), भगवद्गीता (4।32)।

यह याद रखने की बात है कि—अग्नि मानव समाज की एक विशेष विभूति है। प्राणियों में मनुष्य ही केवल अग्नि द्वारा काम लेते हैं। शेष तो अग्नि से दूर रहते हैं। वन में हिंस्र जन्तुओं से अपनी रक्षा का उपाय ही यही है कि−अपने चारों ओर अग्नि जला कर रखी जाय। मनुष्य ही अग्नि द्वारा विविध कृत्यों को पूर्ण करता है। अग्नि द्वारा वह शक्ति उत्पन्न होती है, जिससे रेलगाड़ी चलती है, तार जाते हैं विमान उड़ते हैं। अग्नि द्वारा ही पाकक्रिया सम्पन्न होती है, जिससे मनुष्य जीवन धारण करता है। बहुत कहने से क्या, गर्भाशय की अग्नि द्वारा ही मनुष्य आदि का शरीर पैदा होता है, और पुष्ट होता है। सुवर्ण आदि धातुओं की उत्पत्ति में जिनसे संसार का व्यवहार चलता है कारण भी खान की अग्नि ही है। जैसे कि—ऋग्वेद संहिता में कहा है−‘रत्नाधातमम्’ (1।1।1)

महायुद्धों में जो महान् जन संहार होता है, वह भी अग्नि के ही बल से। उसी के आश्रय से बन्दूक चलती है, तोप चलाई जाती है, सर्व संहारक अस्त्र चलते हैं, गैसें चलती हैं, बम डाले जाते हैं। जिस राजा के पास तेल, कोयला आदि अग्नि का भोजन नहीं होता, वही अन्त में हारता है। इसी कारण आक्रमणकारी राजा दूसरे राष्ट्र के पैट्रोल और कोयले खानें नष्ट करने की चेष्टा करते हैं, जिससे दूसरे की पराजय और अपनी विजय होवे।

अग्नि के उत्पादन और उससे संहार के नवीन प्रकारों का उद्भावन आज की साइन्स ने किया है, परन्तु प्राचीन युग में अग्नि द्वारा दिव्य शक्ति के उत्पादन का अन्य ही प्रकार था। जैसे आजकल विधान विशेष से अग्नि में पैट्रोल और कोयले की आहुति देकर भौतिक शक्ति पैदा की जाती है, वैसे ही पुरा काल में प्राचीन ऋषि−मुनि विधान विशेष एवं मन्त्र विशेष से द्रव्य विशेष की आहुति देकर दिव्य शक्ति को उत्पन्न करके अपने तथा दूसरों के मनोरथ को पूर्ण करते थे। आजकल यद्यपि उसका प्रचार लुप्तप्राय है, तथापि सर्वथा अभाव नहीं हुआ। अर्वाचीन जड़ विज्ञान जिन बाधाओं को हटाने में सर्वथा असमर्थ है, प्राच्यविज्ञान उन बाधाओं को यज्ञ के द्वारा तथा उसके अंगभूत जप−पाठ आदि से हटा सकता है। वेदों में यज्ञ विद्या भरी हुई है, कल्पसूत्र में उनके विनियोग दिखलाये गये हैं, अब चाहिये उसके प्रयोगकर्ता।

फलतः जब तक हमें व्यवहार में रहना है, तब तक हमें अग्निचयन करना ही पड़ेगा, अग्नि ही यज्ञ का देव एवं आधार है—‘यज्ञस्य देवम्’ (ऋ॰ 1।1।1) अग्नि का त्याग और व्यवहार का त्याग समान वस्तु है। सम्भवतः इसी व्यवहार त्याग के कारण संन्यासियों का अग्नि−परित्याग शास्त्रों को इष्ट हो।

वेदों का विषय यज्ञ है−यह बतलाया जा चुका है, वेद में उपास्य देवता हैं, यज्ञ में भी उपास्य देवता हैं−‘यज्ञ देव पूजा संगति करणादानेषु’ ऐसा श्रीपाणिनि के धातु पाठ में कहा है। यज्ञ विविध कामनाओं की पूर्ति के लिए किये जाते हैं, उन कामनाओं की पूर्ति देवता लोग करते हैं। ऋग्वेद संहिता में कहा गया है—‘न मर्डिता विद्यते अन्य एभ्यो, देवेष में अधिकाया अयंसत (10।64।2) अर्थात् देवताओं से भिन्न अन्य कोई सुख प्रदाता नहीं, अतः मेरी कामनाएं भी देवताओं में नियमित होती हैं।

देवता परमात्मा के ही अंग होते हैं, जैसे कि अथर्व वेद संहिता में कहा है—‘यस्य त्रयस्त्रिंशद् देवा अंगे गात्रा विभोजिरे’ (10।7।26) अंगों के बिना अंगों की पूजा हो नहीं सकती। अंश के बिना भला अंशी की पूजा किस प्रकार हो? इस कारण देव पूजन यज्ञ रूप भगवान का आराधन ही है, यह सिद्ध हुआ। यही बात ब्राह्मणभागात्मक वेद में भी लिखी है−‘तद् यद् इदमाहु−अमुंजय अमुंजय, इति एकैकं देवम्, एतस्यैव सा विसृष्टि, एव उह्येव सर्वे देवा;’ (14।4।2।12) अर्थात् देवता परमात्मा की ही सृष्टि है, वह परमात्मा सर्व देवमय है। इस प्रकार मनुस्मृति में भी कहा है—‘आत्मैव देवताः सर्वाः, सर्वमात्मन्यवस्थितम्’ (12।119) यहाँ पर श्रीकुल्लूक भट्ट ने ऐसी ही व्याख्या की है—‘इन्द्राद्याः सर्वदेवताः परमात्मैव सर्वात्मात्वात् परमात्मनः’।

अब यह प्रश्न उठता है—जो देव पूजनात्मक यज्ञ है, वह अग्नि द्वारा ही कैसे होता है? इस पर उत्तर ऋग्वेद संहिता में कहा गया है कि अग्नि के बिना देवता प्रसन्न नहीं होते (ऋ॰ सं॰ 7।11।1) अग्नि में दिया हुआ यज्ञ देवताओं को पहुँचता है−यह भी ऋग्वेद संहिता (1।1।4) में कहा गया है। यही बात ऋ॰ सं. (7।11।5), तथा अथर्ववेद वेद संहिता (5।12।2) में मानी गई है। क्योंकि−अग्नि को देवताओं का मुख कहा गया है (शतपथ 3।7।4।10) यही बात शाङ्खायन ब्राह्मण (3।6) तथा महाभारत आदिपर्व (7।7।10।11) में भी अग्नि के वचन में सूचित की गई है, तब देवताओं की हवि का भी अग्नि में डालना समूल सिद्ध हुआ।

यज्ञ के बहुत से प्रयोजन हुआ करते हैं, उनमें स्वर्ग की प्राप्ति एक पारलौकिक प्रयोजन है, जैसे कि−अथर्व वेद संहिता में कहा है−‘यैरीजानाः स्वर्ग यान्ति लोकम्’ (18।4।2)। इसी प्रकार न्यायदर्शन (5।1।3) ऐतरेय ब्राह्मण (1।2।10) शतपथ ब्राह्मण (12।4।3।7) तथा महाभाष्य (6।1।84) में भी कहा है। यज्ञ में प्रत्येक देवता के नाम से आहुति दी जाती है, यह देवताओं की पूजा होती है। तभी उनकी प्रसन्नता से स्वर्ग की प्राप्ति स्वाभाविक है। तभी भगवद् गीता में कहा है−‘देवान् देवयजो याज्ञि’ (7।23)। देवताओं का निवास होता है स्वर्ग में। जैसे कि वेद में कहा है—‘दिवि देवाः’ (अथर्व 11।7।23), और अथर्ववेद (18।4।3)।

यज्ञ का प्रयोजन केवल स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती, अपितु विविध कामनाओं की पूर्ति भी प्रयोजन हुआ करता है, उसमें भी कारण देर पूजा ही हुआ करती है,क्योंकि—देवता विविध कामनाओं को पूर्ण किया करते हैं। जैसे कि ऋग्वेद संहिता (10।64।2) में कहा है, वह मन्त्र हम पहले लिख चुके हैं। तभी तो ऋग्वेद सं॰ में कहा है—‘यत्कामास्ते जुहुयः, तन्नो अस्तु’ (ऋ॰ 10।121।10) इस मन्त्र में भी हवन से विविध कामनाओं की पूर्ति सूचित की गई है। ‘वयं त्याम पतयो रयीणाम्’ इस उक्त मन्त्र के अन्तिम अंश से यज्ञ से विविध ऐश्वर्यों की प्राप्ति बताई गई है। इस मन्त्र में प्रजापति देवता का वर्णन है, इसीलिए हवन में ‘प्रजापतये स्वाहा’ यह कहा जाता है।

यज्ञों के विविध कामनाओं के पूर्ण करने वाले होने से ही महाभाष्य (1।1।63) में ‘चक्षुष्कामं या जपाञ्चकार’ इस उदाहरण में यज्ञ द्वारा नेत्र शक्ति दान रूप फल भी सूचित किया गया है। न्यायदर्शन के (2।1।68) सूत्र के भाष्य में ‘ग्रामकामा यजेत’ यह वैदिक प्रमाण देकर यज्ञ विशेष का फल ग्रामाधिपति हो जाना भी कहा है। (2।1।57) सूत्र के न्याय दर्शन के भाष्य में ‘ पुकामः पुत्रोष्टया यजेत’ इस वैदिक प्रमाण से यज्ञ विशेष का फल पुत्र प्राप्ति भी सूचित किया गया है। इस प्रकार वृष्टि की कामना से कारीरी इष्टि (यज्ञ ) भी हुआ करती है। इस भाँति शतपथ (13।2।6।3) में अश्वमेध का फल तेज, इन्द्रिय, पशु, ब्रह्महत्या दूर होनी तथा लक्ष्मी की प्राप्ति कही है। राजसूय यज्ञ का फल अकाल मृत्यु निवारण कहा है। यह कामनाएं यदि स्वार्थपूर्ति के लिए न की जाएं, किन्तु प्रजा के लिए वो देश के लिए की जाएँ तब यज्ञ समष्टिगत हो जाने से उसका अतिशयित महत्व हो जाता है।

यज्ञ का प्रयोजन केवल वायु शुद्धि नहीं। केवल वायु शुद्धि ही फल होता तो बहुत महँगे घृत का उपयोग वहाँ पर व्यर्थ था, उससे भी सस्ते उपायों से वायु शुद्धि हो सकती थी, तब तो यज्ञ म्यूनिसिपैलिटी के कूड़े के पात्रों में, पाखानों में, या नालियों के पास ही होना ठीक होता। वहाँ तो वेदमन्त्रों के बिना भी वायु शुद्ध हो जाती।

वस्तुतः यज्ञ देवताओं का पूजन वा तर्पण हुआ करता है−यह पहले कहा ही जा चुका है। देवताओं का भक्ष्य घृत होता है। जैसे कि−स्वर्गलोक से यहाँ आई हुई उर्वशी ने पुरूरवा को कहा था−‘घृतं में वीर! भक्ष्यं स्यात्, (श्रीमद्भागवत् 9।14।22) केवल पुराण में ही नहीं, ब्राह्मणभागात्मक वेद में भी कहा है—‘घृतस्य स्तोकँ सकृद् अह्न आश्नाम, तादेव इदं तातृयाण चरामि’ (शतपथ॰ 11।5।1।10) यहां भी उर्वशी कहने वाली है। केवल ब्राह्मणभागात्मक वेद में ही नहीं, प्रत्युत मन्त्रभागात्मक वेद में भी उर्वशी ने यही कहा है—‘घृतस्य स्तोकं सकृद् अह्न आश्नाम्’ (ऋ॰ 10।95।16) इस मन्त्र में उर्वशी और पुरूरवा ऋषि−देवता हैं। उर्वशी देव−अप्सरा थी, इस कारण घृत उसका भक्ष्य माना गया है।

इसी कारण देव पूजनात्मक यज्ञ में भी घृत अपेक्षित होता है। तभी शतपथ ब्राह्मण में कहा है—एतद् वै देवानाँ प्रियं धाम यद् आज्यम्’ (घृतम्)’ (13।3।6।3) ‘आज्येन जुहोति’ (13।36।2) इसी कारण यज्ञ के अंग हवन में—जिसका उद्देश्य देवताओं का पूजन वा तर्पण है—घृत डाला जाता है। यहाँ मुख्य कारण देवताओं की प्रसन्नता है, केवल वायु शुद्धि नहीं।

इसके अतिरिक्त यज्ञ में वेद मन्त्र भी इसीलिए पढ़े जाते हैं, क्योंकि−यज्ञ वेद का विषय है और यज्ञ होता है देव पूजार्थ, इस कारण उसमें वेद मन्त्रों की आवश्यकता भी पड़ती है, क्योंकि वेद मन्त्रों के उपास्य वा विषय भी देवता ही होते हैं इस कारण यज्ञ के समय के लिए निरुक्त में कहा है−‘यस्यै देवतायै हविर्गृहीतं स्यात्, ताँ मनसा ध्यायेत् (8।22।11) अर्थात् यज्ञ के समय तत्तद् देवता का मन से ध्यान भी करे। इस कारण वेद मन्त्रों का उच्चारण यज्ञ में सफल है।

यज्ञ से वायु शुद्धि अवान्तर उद्देश्य होता है—साक्षात् नहीं, उसका प्रकार गीता एवं मनुस्मृति में कहा है−‘अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद् भवति पर्जायो यज्ञः कर्मसमुद्भवः’ (गीता 3।14) ‘अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्वमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजा’ मनु 37॰) अर्थात् यज्ञ करने पर उसे अग्नि, सूर्य चन्द्र आदि आकृष्ट कर लेंगे, उससे मेघ बनेंगे, जिससे वृष्टि होगी, वृष्टि से अन्न भी होगा, वायु शुद्धि भी होगी। प्रणियों की तृप्ति भी होगी।। वेद में भी कहा है−‘अहं वृष्टिं (वर्षणं, मनोरथवर्षणं) [हविः] दाशुषे मर्त्याथ [अददाम्]’ (ऋ. 4।26।2)।

इस प्रकार में भी स्पष्ट है कि−यज्ञ का मुख्य उद्देश्य वायुशुद्धि नहीं है, किन्तु मुख्य उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना है, उससे सारे जगत की तृप्ति होती है−यही यज्ञ का महत्त्व है। यही बात ‘ मनुस्मृति’ में कही है−‘दैवे कर्मणि युक्तो हि बिभर्तीदं चरारचम्’ (3।75) यज्ञाग्नि में डाला हुआ घृत आदि व्यर्थ नहीं जाता, किन्तु भूमि में बोये हुए बीज की तरह सूक्ष्म होकर अधिक शक्ति सम्पन्न होकर देवताओं के पास जाता है, और अधिक फलप्रद होता है। (भगवद्गीता में यज्ञ को देवताओं की प्रसन्नता के लिए ही माना है जैसे कि—‘सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वं एव वोस्त्विष्टकामधुक्’ (3।10) देवान् भावयतानेन (यज्ञेन) ते देवा भावयन्तु वः। परस्पर भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ (3।11) इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः। तैर्दत्तान् प्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स’ (3।12) इससे स्पष्ट सिद्ध है कि—यज्ञ देव पूजा का पर्यायवाचक तथा उसका अन्यतम साधन है। उससे विविध कामनाओं की पूर्ति होती है। शतपथ ब्राह्मण में भी कहा है—‘सर्वाह वै देवता अध्यंयुं हविर्न्तहीषन्तम् उपतिष्ठन्ते−−मम नाम ग्रहीष्यति, मम नाम ग्रहीष्यतीति ‘(1।1।2।18) इससे देवताओं के नाम से आहुति देना देवताओं के प्रसन्नार्थ है, इससे प्रसन्न होकर देवता आहुतिदाता के मनोरथों की पूर्ति करते हैं। इस कारण यज्ञों का हिंदू धर्म में बहुत महत्व माना गया है।

नारायणोपनिषद् में कहा गया है−‘यज्ञेन द्विषन्तो मित्राभवन्ति, यज्ञे सर्वं प्रतिष्ठितम्, तस्माद् यज्ञं परमं वदन्ति’ (79) यहां पर यज्ञ से शत्रुओं का भी मित्र बनना कहा है। श्रीमद्भागवतपुराण में तो यहाँ तक कहा है कि- जिस देश में यज्ञ पुरुष भगवान् कि पूजा होती है, वहां पर भगवान् प्रसन्न होते हैं। भगवान् प्रसन्न हुए, तो कोई वस्तु अप्राप्य नहीं रहती ‘यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान् यज्ञ पुरुषः। इज्यते स्वेत धर्मेण जनैर्वर्णाश्रमान्वितैः। तस्य राज्ञो महाभाग। भगवान् भूतभानः। परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निजशासने। तास्मिंस्तुष्टे किमप्राप्यं जगत मीश्वरेश्वरे’ (4।14।18-19-20)। पद्मपुराण सृष्ठि खण्ड में भी कहा है- ‘यज्ञेनाप्यायिता देवा वृष्टयुत्यर्गेण मानवाः। अप्यायनं वै कुर्वन्ति यज्ञाः कल्याणहेतवः’ (3।124) इसी कारण अथर्ववेद संहिता में कहा है- ‘यज्ञो विश्वस्य भुवनस्य नाभिः। (9।10।24) यहां यज्ञ को सारे भुवन का केन्द्र कहा है।

यज्ञों के न होने से देवताओं का कोप होता है, उसी से देश में अकाल, युद्ध-महायुद्ध, उनके कारण महर्धता-पिशाची का अकाण्ड ताण्डव हुआ करता है। देवताओं के कोप से अतिवृष्टि वा अनावृष्टि अतिवायु, अतिग्रीष्म, अतिशीत आदि हुआ करती है, जिनसे अकाल की कराल ज्वालाएं फैलती हैं। देवताओं के कोप का दूसरा चिन्ह होता है हमारी बुद्धि का नाश। महाभारत में कहा है- देवता डण्डा उठाकर पुरुषों की रक्षा नहीं करते। जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसकी बुद्धि बढ़ा देते हैं, जिसे गिराना चाहते हैं, उसकी बुद्धि छीन लिया करते हैं (उद्योग पर्व (34।80।81) कौन नहीं जानता कि−युद्ध−महायुद्ध आदि उसी बुद्धि बुद्धि भ्रंश के परिणाम हैं, जिससे महंगाई फैलती है।

इन्हीं देवताओं के प्रसादनार्थ यज्ञ तथा उसके अंगभूत जपपाठ, देवमूर्ति पूजा आदि आवश्यक सिद्ध होते हैं। उसमें गायत्री के जप से वा यज्ञ से ग्रहों की प्रतिकूलता भी दूर हो जाती है, जैसे कि—महाभारत में कहा—‘ये चास्य दारुणाः केचिद् ग्रहाः सूर्यादयो दिवि। ते चास्यसौम्या जापन्ते शिवाः शिवतराः सदा’। (वनपर्व 200।85)। देवताओं की प्रसन्नता से ही भगवान भी प्रसन्न होते हैं, क्योंकि भगवान् अंगी हैं, देवता अंग हैं। इसी कारण हिंदू धर्म में यज्ञों को स्वीकृत किया गया है। देवगण की सहायता से ही सकल अनर्थकारी अधर्म हटता है, ओर विश्वकल्याणकारी धर्म की स्थापना होती है—‘यज्ञ शिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः। (गीता 3।13)। अधर्म के कारण ही जनपदों का ध्वंस होता है, जैसा कि—सुश्रुतसंहिता के (सूत्र स्थान (6।20) और चरक संहिता ( के विमान स्थान 3।21−22) में भी बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है, उसी को दूर करने के लिए ‘देव−गो−ब्राह्मण, गुरु , वृद्ध, सिद्धाचापनि अर्चयेद्’ अग्निमुचरेत्।(चरकसूत्रस्थान 5।18) ‘जप होमोपहारेज्याञ्जलिनमस्कार तपोनियमदयादानदीक्षाभ्युपगम, देवता ब्राह्मण गुरुपरैर्भवितव्यम्’ (सुश्रुत.सूत्र 6।21) देवपूजनादि कहा है।

यज्ञों में वेदज्ञ ब्राह्मण सम्मिलित होते हैं, तो यज्ञ में जहाँ देवपूजन होता है, उसके साथ ही साथ भू देवों का सत्कार भी हो जाता है, जो वे विविध वृत्तियों को छोड़ कर कर भोग विलासों को दूर करके वेदों की रक्षार्थ कठोर ब्रह्मचर्य कर चुके हैं उन विद्वान् ब्राह्मणों का दर्शन भी हो जाता है। उनकी पूजा से भी देवता प्रसन्न हो जाते हैं। जैसा कि कृष्णयजु−र्वेद तैत्तिरीयारण्याक में कहा है—‘यावतीर्यै देवताः ताः सव वेदविदि ब्राह्मणे वसन्ति। तस्माद् ब्राह्मणेभ्यो वेदविद्भ्यो दिवे दिवे नमस्कुर्याद्, नाश्लीलं कीर्तवेद्, एता देवताः प्रीणति’ (2।15)। तब द्विजों को उचित है कि—देवताओं की कृपाप्रत्यर्थ यज्ञों को करें, जिससे देवताओं के कोप दूर होने से देश में शान्ति रहे, जिससे देशवासी शान्ति का श्वास ले सकें। पुराणों में जो यज्ञों के माहात्म्य कहे गये हैं−उसमें अर्थवाद न समझ कर वास्तविकता ही समझनी चाहिये। सृष्टि के सर्वादिम याज्ञिक काल में ही भारत सुखी एवं समृद्ध था। यह नहीं भूलना चाहिए। इस यज्ञ की ‘अखण्ड ज्योति’ को भारतीय कभी बुझने न दें, कभी बुझने न दें, यह उन्हें हमारी प्रेरणा है।


गीता में यज्ञ की महिमा

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म बन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्त संगः समाचर ॥3।॥

अर्थ—यज्ञ के निमित्त किये गये कर्मों के सिवाय दूसरे कर्मों को करने से यह मनुष्य कर्म बन्धन में बन्धता है, इसलिए हे अर्जुन! मुक्त संग रहकर तदर्थ कर्म को ही भली भाँति आचरण कर।

सहयज्ञाः प्रजा सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वो अस्तिष्ट कामधुक् ॥3।1

अर्थ—कल्प के प्रारम्भ में प्रजापति ने यज्ञ सहित ही प्रजाओं की रचना की और कहा कि इसके (यज्ञ के) द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त करो और यह यज्ञ ही तुम लोगों की इष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाला होवे।

देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ 3।11

अर्थ—इस यज्ञ के द्वारा देवताओं की उन्नति (भावयत) करो और वे देव गण तुम लोगों की उन्नति करें। परस्पर उन्नति करते हुए श्रेय को प्राप्त होओगे।

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञ भाविताः तैर्दत्तान् प्रदायैभ्यो यो मुंक्ते स्तेन एव सः ॥3।12

अर्थ—यज्ञभाविताः देव गण तुम लोगों को इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष इनके लिये बिना दिये ही भोग करता है, वह निश्चय चोर है।

यज्ञ शिष्टाशिनः सन्तोमुच्यन्तेसर्वकिल्बिषैः। भुञ्यजे तेत्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥3।13

अर्थ—यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से छूटते हैं और जो पापी लोग अपने ही शरीर पोषण के लिए पकाते हैं, वे तो पाप को ही खाते हैं।

अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्न सम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म समुद्भवः॥3।14

अर्थ—सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य (वृष्टि) से होती है और वृष्टि यज्ञ से होती है और यज्ञ तो कर्म से ही उत्पन्न होने वाला है।

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षर समुद्भवम्। तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्टितम्॥3।15

अर्थ—कर्म ब्रह्म (वेद) से उत्पन्न हुआ है, ऐसा जानो और ब्रह्म, अक्षर ( अविनाशी तत्व) से उत्पन्न हुआ है, इससे सर्वगतम् (सर्वव्यापी) ब्रह्म नित्य ही यज्ञ में प्रतिष्ठित हैं।

गतसंगस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थित चेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥3।23॥

अर्थ—आसक्ति से रहित, ज्ञानावस्थित चेतसः(चित्त वाले )यज्ञ के लिये ही आचरण करते हुए मुक्त पुरुषों के सम्पूर्ण कर्म प्रविलीन हो जाते हैं।

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म ब्रह्माग्नौ ब्राह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्म कर्म समाधिना ॥4।24॥

अर्थ—अर्पण (श्रुवादिक ) भी ब्रह्म है, हवि भी ब्रह्म है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्म रूप कर्त्ता के द्वारा जो हवन किया गया है तथा ब्रह्म रूप कर्म में समाधिस्थ हुए उस पुरुष के द्वारा जो प्राप्त होने योग्य है, वह भी ब्रह्म ही है।

यज्ञशिष्टामृत भुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम 4।31

अर्थ—हे कुरुश्रेष्ठ! यज्ञों के परिणाम रूप अमृत को भोगने वाले रोगी गण सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ से रहित जो पुरुष हैं, उन्हें तो यह (मनुष्य) लोक भी सुखदायक नहीं हैं, फिर परलोक की ता बात ही क्या?

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहममेवाज्यमहग्निरहं हुतम् 9।16

अर्थ—(भगवान कहते हैं ) श्रौतकर्म मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, आज्य (घृत) मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ, और हवन रूप क्रिया भी मैं ही हूँ।

त्रैविद्या भां सोमपाः पूत पापा, यज्ञैरिष्ट्वा प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देव भोगान 9।20

अर्थ—त्रैविद्याः (तीनों वेदों में विधान किये हुए कर्मों को करने वाले ) एवं सोमरस पीने वाले, पापों से पवित्र हुये पुरुष मुझे यज्ञों द्वारा पूज कर स्वर्ग को चाहते हैं, वे पुण्य इन्द्रलोक को प्राप्त कर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।

अफलाकांङ्क्षभिर्यज्ञो के विधि दृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्विकः 17।11

अर्थ—जो यज्ञ शास्त्रीय विधि से नियत किया हुआ है( विधि दृष्टः) तथा करना ही कर्त्तव्य है, ऐसे मन को समाधान करके फल को न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह यज्ञ सात्विक है।

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सादिति चोच्यते 17।27

अर्थ—यज्ञ, तप तथा दान में जो स्थिति है, वह भी सत् है, ऐसे कही जाती है।

यज्ञ दानतपः कर्म न त्याज्यं कार्यमेवतत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् 18।5

अर्थ—यज्ञ−दान और तप रूप कर्म त्यागने योग्य नहीं वरन् वह कर्म तो करने ही योग्य है—करना कर्त्तव्य ही है। यज्ञ, दान और तप, यह तीनों तो मनीषियों को पवित्र करने वाला है।


उपनिषदों में यज्ञ—रहस्य का वर्णन

कठोपनिषद् प्रथम प्रथम अध्याय प्रथम वल्ली में यम और नचिकेता संवाद में यज्ञों को स्वर्ग प्राप्ति का प्रथम साधन बताया गया है—

नचिकेता ने यमराज से पूछा—

स त्वमग्नि स्वर्गम ध्येषि मृत्यो प्रब्रूहित्व श्रद्दधानाय मह्म। स्वर्ग लोका अमृतत्व भजन्ते एतद्द्वितीयेन वृणे वरेण।।13।।

अर्थ—हे मृत्युदेव! स्वर्ग का प्राप्ति के साधन रूप अग्नि को (यज्ञ प्रक्रिया को) भली भाँति जानते हैं अतः आप उस अग्नि विद्या को मुझ श्रद्धालु को अच्छी तरह समझा कर कहिए, जिसे जानकर लोग स्वर्गलोक में रहकर अमृतत्व को प्राप्त होते हैं। यह मैं आपसे दूसरा वर मांगता हूँ॥12॥

तब यमराज बोले—

प्रते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्निंन नचिकेतः प्रजानन। अनन्त लोकाप्ति मथो प्रतिष्ठां विद्धित्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥14॥

अर्थ—हे नचिकेता! स्वर्गदायिनी अग्नि विद्या (यज्ञ विधि) को भली भाँति जानने वाला मैं तुम्हारे लिये उसे अच्छी तरह बतलाता हूँ। उसे मुझसे भली भाँति जान लो। तुम इस विद्या को अनन्त लोक की प्राप्ति कराने वाली, उसकी आधार स्वरूपा तथा बुद्धि रूपी गुहा में निहित (छिपी हुई) जानो।

अग्नि विद्या यानी यज्ञ प्रकरण की सारी विधियाँ बताने के उपरान्त उस अग्नि विद्या का फल यमराज बताते हैं।

त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य संधि त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू। ब्राह्मजज्ञं देव मीड्यं विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति॥17॥

अर्थ—इस अग्नि का शास्त्रोक्त रीति से तीन बार अनुष्ठान करने वाला पुरुष ऋक्, यजुः साम—तीनों वेदों के साथ सम्बन्ध जोड़ कर, यज्ञ, दान, तप−रूप तीनों कर्मों को करता रहने वाला मनुष्य, जन्म−मृत्यु से उतर जाता है। ब्रह्म से उत्पन्न सृष्टि को जानने वाले स्तवनीय इस अग्नि को भली भाँति जानकर, इसका ठीक रीति से चयन करके उस अनन्त शाँति को प्राप्त कर लेता है, जो मुझको प्राप्त है ॥17॥

प्रश्नोपनिषद् में यज्ञ को देवताओं, पितरों और ऋषियों का जीवन प्राण बताया गया है।

देवानामसि वह्नितमः पितृणां प्रथमा स्वधा। ऋषीणाँ चरितं सत्यमथर्वांगिरसामसि॥

प्रश्नोपनिषद् द्वितीय प्रश्न, 1 श्लोक 8

अर्थ—(हे यज्ञ! तू) देवताओं के लिये उत्तम अग्नि है, पितरों के लिये प्रथम स्वधा है, अथर्वांगिरस आदि ऋषियों द्वारा आचरित सत्य है।

मुण्डकोपनिषद् द्वितीय खण्ड श्लोक 5

एतेषुं यश्चरते भ्राजमानेषु यथाकालं चाहुतयो ह्य ददायन् तं नयन्त्येताः सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवानां परिरेकोऽधिवासः ॥5॥

अर्थ—जो कोई भी अग्निहोत्री इन दैदीप्यमान ज्वालाओं में ठीक समय पर अग्निहोत्र करता है, उस अग्निहोत्री को निश्चय ही अपने साथ लेकर ये आहुतियाँ, सूर्य की किरणें बनकर उस स्वर्ग लोक में पहुँचा देती हैं, जहाँ देवताओं का एक मात्र पति निवास करता है।

एह्येहीति तमाहुतयः सुवर्चसः सूर्यस्य रश्मिभिर्थजमानं वहन्ति। प्रियां वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः ॥6॥

अर्थ—उन प्रदीप्त ज्वाला में दी हुई आहुतियां, आओ, आओ यह तुम्हारे शुभ कर्मों से प्राप्त पवित्र ब्रह्मलोक है, इस प्रकार की प्रिय वाणी बारम्बार कहती, उसका आदर सत्कार करती हुई उस (यज्ञ कर्त्ता) यजमान को सूर्य की रश्मियों द्वारा ब्रह्मलोक में ले जाती हैं।

सरस्वती उपनिषद् 14 में

“यज्ञं बष्टु धिया वसुः” वचन है। जिसका तात्पर्य है—यज्ञ से ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। आगे चल कर मन्त्र 17 में “ यज्ञं ‘ दधे सरस्वती” वचन है। जिससे प्रकट होता है कि यज्ञ में ही सरस्वती प्रसन्न होती है।

छान्दोग्योपनिषद् द्वितीय अध्याय, तृतीय खण्ड के श्लोक 1, और 2 में यज्ञ द्वारा वर्षा कराने की विद्या का संकेत किया गया है।

“वृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना करें। पूर्व वायु हिकार है, मेघ, यह प्रस्ताव है, बरसता है, यह उदगीथ है, चमकता और गर्जन करता है, यह प्रतिहार है, जल ग्रहण करता है, यह निधन है। इस प्रकार जानने वाला पुरुष वृष्टि में पाँच प्रकार के साम की उपासना करता है, उसके लिये वर्षा होती है और वह स्वयं भी वर्षा करा लेता है।”

छाँदोग्योपनिषद् चतुर्थ अध्याय दशम खण्ड। उपकोशल को अग्नियों द्वारा ब्रह्मविद्या का उपदेश देने तथा यज्ञाग्नि की महानता पर प्रकाश डालने वाला बड़ा ही सार गर्भित उपाख्यान है। जो इस प्रकार है—

“उपकोशल नाम से प्रसिद्ध कमल का पुत्र सत्यकाम जावाल के यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्ष तक उस आचार्य के अग्नियों की सेवा की, किन्तु आचार्य ने अन्य ब्रह्मचारियों का तो समापवर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल इसी का नहीं किया। आचार्य से उसकी भार्या ने कहा—‘यह ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अग्नियों की सेवा की है। देखिये, अग्नियाँ आपकी निन्दा न करें। अतः इसे विद्या का उपदेश कर दीजिये।’ किंतु वह उसे उपदेश किये बिना ही बाहर चला गया। उस उपकोशल ने मानसिक खेद से अनशन करने का निश्चय किया। उस आचार्य की पत्नी ने कहा—अरे ब्रह्मचारिन्! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन करता! वह बोला—इस मनुष्य में अनेक ओर जाने वाली कामनाएं रहती हैं। मैं व्याधियों से परिपूर्ण हूँ इसलिये भोजन नहीं करूंगा।

फिर अग्नियों ने एकत्रित होकर कहा—यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका है, इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है। अच्छा, हम इसे उपदेश करेंगे।

गार्हपत्याग्नि ने उपकोशल को अपना स्वरूप बताते हुए कहा—पृथ्वी, अग्नि, अन्न और आदित्य ये मेरे चर शरीर हैं। आदित्य के अंतर्गत जो यह पुरुष दिखाई देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ। वह पुरुष, जो इसे प्रकार जान कर इसकी उपासना करता है, पापकर्मों को नष्ट कर देता है, अग्निलोकवान होता है, पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते। तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, उसका हम इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।

फिर उसे अन्वाहार्यपचन ने शिक्षा दी—‘जल, दिशा, नक्षत्र और चंद्रमा− ये मेरे चार शरीर हैं, यह जो विद्युत में पुरुष दिखाई देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।’ पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागों में विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्म को नष्ट कर देता है, लोकवान होता है, पूर्ण आयु को प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। इसके पीछे होने वाले पुरुष क्षीण नहीं होते, तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करते हैं, हम इसका इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।

त्रयोदश−खण्ड—

तदनंतर उसे आहवनीय−अग्नि ने उपदेश किया− प्राण, आकाश, भूलोक और विद्युत—ये मेरे चार शरीर हैं। यह जो विद्युत में पुरुष दिखाई देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ। वह पुरुष जो इसे इस प्रकार जान कर इसकी उपासना करता है, (वह) पापकर्म को नष्ट कर देता है, लोकवान होता है, पूर्ण आयु को प्राप्त करता है, और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। इसके पश्चात होने वाले पुरुष क्षीण नहीं होते तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोक में भी पालन करते हैं।

इसी प्रकार अग्नियों द्वारा भी उपकोशल को अपना स्वरूप बताया है। अन्यान्य उपनिषदों में भी यज्ञ अग्नि की अनिर्वचनीय महत्ता पर बहुत कुछ प्रकाश डाला है। प्राचीन काल में ऋषिगण इस यज्ञाग्नि को इस लोक का सर्वोपरि तत्व मानते थे और उसके द्वारा समस्त प्रयोजनों को पूर्ण करने में समर्थ होते थे। इस विद्युत का रहस्य जानने वाले के लिए संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।


रामायण में यज्ञ—चर्चा

रामायण में यज्ञ की महत्ता का विशद् रूप से वर्णन है। दशरथ जी के चारों पुत्रों का जन्म पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा होता है। भगवान राम अपने अवतार का श्रेय यज्ञ भगवान को ही देते हैं। यज्ञ ही रामावतार का जनक है। पुत्र की इच्छा से प्रेरित होकर दशरथ जी ने पुत्रेष्टि यज्ञ किया और उन्हें अभीष्ट सत्परिणाम की प्राप्ति हुई इसका वर्णन तुलसी कृत रामायण में इस प्रकार मिलता है—


भूपति मन मांही (Kavita)

एक बार भूपति मन मांही। मै गलानि मोरे सुत नाहीं॥ गुरु गृह गयउ तुरत महिपाला। चरण लागि करि विनय विशाला॥ शृंगी ऋषि हि वशिष्ठ बोलावा। पुत्र काम शुभ यज्ञ करावा॥ भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरु कर लीन्हें॥ यह हवि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई॥ तब हि राय प्रिय नारि बुलाई। कौशल्यादि तहां चलि आई॥ अर्ध भाग कौशल्य हिं दीन्हा। उभय भाग आधे कर लीन्हा॥ कैकेई कहां नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊँ।। कौशल्या कैकेयी हाथ धरि। दीन्ह सुमित्र हिं मन प्रसन्न करि।। एहि बिधि गर्भ सहित सब रानी। भईं हृदय हरषित सुख भारी।।

राक्षस पति रावण को भी यज्ञ-शक्ति पर पूरा विश्वास है। इसे प्रकट करते हुए अपने अनुचरों को आदेश करता है कि जहां कहीं भी यज्ञ होते दिखाई दें, उन्हें नष्ट करने और विघ्न डालने का प्रयत्न करो।


हमरे वैरी विबुध वरुथा (Kavita)

सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे वैरी विबुध वरुथा।। तिन कर मरन एक विधि होई। कहहु बुझाई सुनहु अब सोई।। द्विज भोजन मख होम सराधा। सब कै जाई करहु तुम बाधा।। छुदा छीन बलहीन सुर, सहजेहि मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ, भली भांति अपनाइ।।

रावण पंडित भी था, इसीलिये वह भली-भांति जानता था कि यज्ञादि धर्मानुष्ठान, देव गणों का पोषक है, इसीलिए अन्य राक्षसों की अपेक्षा (रावण में) उसमें ऐसे सत्कार्यों को रोकने की अत्यधिक उतावली थी—जैसा निम्नोक्त छन्द से बोध होता है।


यज्ञ में असुर

जप जोग विरागा, तप मख भागा, श्रवण सुनई दशशीशा। आपुनु उठि घावइ रहै न पावई, धरि सब धालई खीसा।।

यज्ञ में असुर सदा ही विघ्न फैलाते हैं। मित्र और शत्रु के रूप में, पंडित और मूर्ख के रूप में, सहयोगी और विरोधी के रूप में नाना प्रकार के वेष बना कर असुर लोग यज्ञ की प्रक्रिया को नष्ट करने के लिए प्रयत्न करते हैं कारण यह है कि यज्ञ से दैवीतत्व बलवान होते हैं और असुरता दुर्बल होती है। असुरों की अपनी हानि और अपने विरोधी देवताओं की शक्ति का बढ़ाना सहन नहीं होता, इससे वे यज्ञ को नष्ट करने के लिये जो कुछ कर सकते हैं, सो अवश्य करते हैं, विश्वामित्र ऋषि के यज्ञ को नष्ट करने में भी असुर लोग भारी विघ्न कर रहे थे। उनसे रक्षा करने के लिए विश्वामित्र जी, दशरथ के पास गये और रामचन्द्र जी तथा लक्ष्मण जी को माँग कर लाये। वाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग का वर्णन इस प्रकार है—

अहं नियममातिष्ठे विद्धयर्थं पुरुषर्षभः। तस्य विघ्न करो द्वौतु राक्षसौ काम रूपिणौ॥4॥ नृतश्रमो निरुत्साहस्तस्माद्देशादपा क्रमे। व च में क्रोध मुत्स्रष्टुंबुद्धिर्भवति पार्थिव॥7॥

तथाभूतहिसाचर्या ना शापस्तत्र सुच्यते। स्वपुत्रं राजशर्दूल रामं सत्य पराक्रमम्॥8॥ काकपक्षधरं वीरं ज्येठंमेदातुँ मर्हसि ॥9॥

बाल्मीकि रामायण आदिकाण्ड।19। सर्ग

अर्थ—(विश्वामित्र दशरथ से कहते हैं कि हे राजन!) आजकल मैं एक महायज्ञ में दीक्षित हुआ हूँ। काम रूपी दो राक्षस उसकी समाप्ति न होते−होते ही विघ्न कर देते हैं॥4॥ जब हमारे यज्ञ की प्रतिज्ञा, करके भ्रष्ट हो जाती है, तो हमें केवल श्रम, श्रम ही होता है, इस कारण भग्नोत्साह होकर मैं यहाँ चला आया हूँ। हे पार्थिव! मैं उनको शाप दे सकता हूँ, परन्तु इस यज्ञ में क्रोध करना वर्जित है॥5॥ कारण कि ऐसे यज्ञ साधन काल में किसी को शाप नहीं देना चाहिये। हे राजो में सिंह! आप से यह प्रार्थना है कि सत्य पराक्रमी रामचन्द्र को, जो काक पक्ष धारण किये महावीर श्रेष्ठ हैं, उनको मेरे हाथ में सौंप दीजिये। यह मेरे दिव्य तेज के प्रभाव से मुझ से रक्षित किये जाकर, मेरे यज्ञ की रक्षा करने में समर्थ होंगे।

तुलसी कृत रामायण में इसका वर्णन यों मिलता है

जहाँ जप यग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुवाहू हिडर हों॥ देखत जग्य निशाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥ गाधि तनय मन चिन्ता व्यापी। हरि बिनु मरहिं न निशिचर पापी॥ तब मुनिवर मन कीन्ह विचारा। प्रभु अबतरेउ हरन महिं भारा॥ बहुविधि करत मनोरथ, जात लागि नहीं बार। करि मज्ज्न सरऊ जल, गये भूप दरबार॥

स्वागतादिक के उपरान्त राजा ने पूछा—

केहि कारण आगमन तुम्हारा। कहह सा करत न लावउँ वारा।। असुर समूह सतावहि मोही। मैं जांचन आयउँ नृप तोही।। अनुज समेत देहु रघुनाथा। निशिचर वध मैं होब सनाथा।।

दशरथ जी से राम और लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए मांग लाये—

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय यग्य करहु तुम जाई।। होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख की रखवारी।। सुनि मारीच निशाचर कोही। लै सहाय धावा मुनि द्रोही।। बिनु फर वाण राम तेहि सारा। शत जोजन गै सागर पारा।। पावक सर सुवाहु पुनि जारा। अनज निशाचर कटकु संहारा।

विश्वामित्र जी का यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात राम लक्ष्मण, राजा जनक जी के यज्ञ में विश्वामित्र के संग पधारे। जनक जी ने पुरोहित और ऋषियों को साथ लेकर विश्वामित्र का अर्चन और पूजन किया। उपरान्त जनक जी बोले।

यत्तोषदनंब्रह्मन्प्राप्तोऽसिमुनिभिः सह। द्वादशाहं तु ब्रह्मर्षे दीक्षामाहुर्मनीषिणः॥

वाल्मीकि रा. आ. का. 15।50

अर्थ—हे ब्रह्मर्षे! आप जो ऋषियों समेत मेरे यज्ञ में पधारे, यह मेरा बड़ा भाग्य है। हे महर्षे! पण्डित गणों ने बारह दिन दीक्षा काल के नियत किये हैं।

ततो भागथिनो देवा देवानद्रष्ट मर्हसिकौशिक। इन्युक्त्वामुनिशार्दूल प्रहृष्ट वदनज्ञस्तदा॥16॥

अर्थ—हे कौशिक! आप तभी यज्ञ भागार्थी देवताओं को देखेंगे।

जनक के शिव यज्ञ में देवता साक्षात रूप से पधारेंगे ऐसा योगी वर जनक को विश्वास है। सीता जी का विवाह जैसा महान कार्य सम्पन्न करने के लिए राजा जनक ने स्वयंवर यज्ञ करना ही उचित समझा था। सीता जी का विवाह अन्ततः एक विशाल यज्ञ द्वारा ही सम्पन्न हुआ। राम का जन्म और सीता का विवाह या दोनों ही महान कार्य यज्ञ की महत्ता द्वारा प्रतिपादित हुए हैं।

रावण को जब अपनी पराजय होती दीखती है तो वह चिन्तित और दुखी होकर अन्तिम ब्रह्मास्त्र यज्ञ का ही सहारा लेता है। अपने पुत्र मेघनाथ को एक बड़ा ताँत्रिक यज्ञ करके ऐसी शक्ति प्राप्त करने के लिए आदेश करता है जिससे व अजेय हो जाय ओर राम को सेना समेत परास्त कर सके। मेघनाथ निकुम्भिला नामक स्थान में जाकर अपने पिता रावण के बनाये हुए विधान के अनुसार ताँत्रिक होम करने लगा। वाल्मीकि रामायण में इसका वर्णन इस प्रकार है—

तन्तुहुत भोक्तारं हुत भुवसदृशप्रभः।


तेजस्वी इंद्रजीत

जुहुवे राक्षस श्रेष्ठो विधिवन्मन्त्र सत्तमैः।18। सहविर्लाज सत्कारै र्माल्य गन्व पुरस्कृतैः।

जुहवं पावकंतत्र राक्षसेन्द्रः प्रतापवान्।19।

शास्त्राणि शर पत्राणि समिघोथ विभीतकाः। लोहिता निचवासांसिस्त्रुवं कार्ष्णायसंतथा।20।

अर्थ—इस स्थान का नाम निकुम्भिला था, अग्नि तुल्य तेजस्वी इंद्रजीत यहाँ पर विधि पूर्वक अग्नि में होम करने लगा।18। उस प्रतापशाली राक्षसों में श्रेष्ठ इन्द्रजीत ने प्रथम अग्नि में माला और सुगन्धित द्रव्य चढ़ाकर उसके बाद खीर एवं अक्षत से उसका संस्कार पूरा करके हवन कर्म को आरम्भ किया।18। उस हवन कुण्ड के चारों ओर जहाँ शरपत बिछाना चाहिये, वहाँ उसने सव शस्त्र बिछाये व बहेड़े की लकड़ी को इन्धन बनाया, समस्त लाल ही वस्त्र धारण किया और लोहे का श्रुवा बनाया, मारण में यही पदार्थ काम आते हैं।

तस्मिन्नाहूयमानेस्त्रे हूयमाने च पावके। सार्कग्रहेन्दुनक्षत्रं वितत्रास नमः स्थलम्।25।

सपावकंपावकं दीप्ततेजा हुत्वा महेन्द्रमतिकप्रभाव। सचापवाणसिरथाश्व शूलः खेतर्द धेत्मानमचिन्त्यवीर्यः।26।

अर्थ—जब उस वीर मेघनाद ने अग्नि में आहुति दी और सब अस्त्रों को ब्रह्म मन्त्र से अभिमन्त्रित किया उस समय चन्द्र सूर्य आदि ग्रह, नक्षत्र गणों के सहित समस्त आकाश मण्डल त्रासित हो गया।25। इन्द्र के समान प्रभावशाली और अग्नि के समान प्रदीप्त वह अप्रमेय वीर्य वाला इन्द्रजीत इस प्रकार से अग्नि में आहुति दे धनुष, बाण, शूल, अश्व और रथ के सहित आकाश में जाकर अन्तर्धान हो गया। वह नाना प्रकार की मायावी शक्तियां प्राप्त करके रामदल को भ्रम में डालने लगा उसने माया मंत्र से एक नकली सीता बनाई और उसका वध करके राम तथा उनकी सेना को शोक तथा चिन्ता में डाल कर अपना काम बना लेना चाहा। इस सब मायाचार का भण्डा फोड़ करते हुए विभीषण ने रामचन्द्र जी को कहा—

चैत्यं निकुंभिलाभद्यप्राप्यं होमं करिष्यति। हुतवानुपयातोहिदैवेरपिसतसवैः।14। दुराधर्षोभवत्येषसंग्रामेरावणत्मजः। तेन मोह्यतानूनमेषा माया प्रयोजिता। विघ्न मन्विच्छातातत्रवानराणं पराक्रमे।15।

वाल्मी. युद्ध. 85 सर्ग

अर्थ—आज निकुम्भिला में जाकर मेघनाद होम करेगा। इन्द्रजीत देवताओं सहित अग्निदेव वह पहुँचे हैं। जब कि वह यज्ञ में होम करके अग्नि को प्रसन्न कर लेगा, तब देवताओं सहित इन्द्र को भी संग्राम में मेघनाद दुर्द्धर्ष हो जायगा, हम निश्चय कहते हैं कि अपनी अभिलाषा सिद्ध करने के लिये और वानरों का पराक्रम नष्ट करने के लिये ही उसने ऐसी माया प्रगट की है।

ससैन्यास्तत्रगच्छामोयावतन्न समाप्यते। त्यजैनंनरशादूर्ल मिथ्यांसंतापमागत।16।

अर्थ—जब तक उसका यज्ञ समाप्त न हो जाय, तब तक हम सेना सहित उस ताँत्रिक यज्ञ को विध्वंस करने के लिए वहाँ पहुँच जायं।

विभीषण जी सेना सहित लक्ष्मण का साथ लेकर मेघनाद का यज्ञ विध्वंस करने गये हैं। वह स्थान सेना से घिरा हुआ है। विभीषण जी लक्ष्मण से कहते हैं−

सत्वमिन्द्राशनिप्रख्यैः शरैरय किरन्परान्।

अभिद्रवाशुयाद्वै नैतर्त्कम समाप्यते॥4॥

वाल्मीकि रा.युद्ध का. सर्ग 86

अर्थ—जब तक यह अभिचारिक होम पूरा नहीं होता, तब तक इन्द्र बज्र सदृश बाणों से आप राक्षसों की सेना को पीड़ा देते रहिये।

ऐसा ही किया उपरान्त—

स्वमनीकंविषएण्णाँतु श्रुत्वा शत्रुभिरर्दितम्। उदतिष्ठत दुर्धषः सकर्मण्यननुष्टिते॥14॥

अर्थ—इस ओर अजेय रावण पुत्र अपनी सेना को शत्रु दलों से मर्दित और व्याकुल देख अपने यज्ञ को बिना पूरा किये ही उठ बैठा।

इस प्रकार उस यज्ञ के असफल हो जाने पर असुरों को वह शक्ति प्राप्त न हो सकी जिससे वे राम सेना को नष्ट करने और स्वयं अजेय बनने में समर्थ होते।

तुलसी कृत रामायण से इस प्रसंग का वर्णन इस प्रकार है—

रावण भी इस युद्ध में विजय पाने के लिये यज्ञ का ही आश्रय ग्रहण करता है।

जहाँ दशानन जागि करि, करै लाग कछु जग्य।

राम विरोध विजय चह, शठ हठ वश अति अग्य॥

इहाँ विभीषण सब सुधि पाई। सपदि जाइ−रघुपतिहि सुनई॥ नाथ करहिं रावण एक जागा। सिद्ध भये नहिं मरहि अभागा॥ पठवहु नाथ बेगि भट बन्दर। करहिं विधंस आव दशकन्धर॥ प्राप्त होत प्रभु सुमट पठाये। हनुमदादि अंगद सब धाये॥ जग्य करत जब ही सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध विशेखा॥ रण ते निलज भागि घर आवा। इहाँ आइ शठ ध्यान लगावा॥ अस कहि अंगद मारी लाता। चितव न शठ स्वारथ मन राता॥

छन्द

नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन्ह लातन्ह काटहीं। धरि केश नारि निकारि बाहेर तेऽति दीन पुकार हीं।। तब उठे क्रुद्ध कृतान्त सम गहि चरन बानर डारई। इहि बीच कापन्ह विधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई।।

रावण ही नहीं, उसके पुत्र मेघनाद को भी यज्ञ के द्वारा शक्ति प्राप्त करने का अपना अनुभव है:—

मेघनाद कै मुरछा जागी। पिताहि विलोकि लाज अति लागी। तुरत गयउ गिरिवर कन्दरा। करौ अजय मख अस मन धरा।। इहां विभीषण मन्त्र विचारा। सुनहु नाथ बल अतुल अपारा।। मेघनाद मख करइ अपावन। खल मायावी देव सतावन। जौं प्रभु सिद्ध होइ सा पाइहि। नाथ वेगि पुनि जीति न जाइहि।।

विभीषण के विश्वास का राम समर्थन करते हैं और तुरत कहते हैं—

लक्ष्मण संग जाहु सब भाई। करहु विधंस यज्ञ कर जाई॥ जाइ कपिन्ह सो देखा वैसा। आहुति देत रुधिर अरु भैंसा॥ कीन्ह कपिन्ह जब यज्ञ विधंसा। जब न उठहिं तब करहिं प्रशसा। तदपि न उठइ घरेन्हि कच जाई। लातन्हि हनि हनि चले पराई ॥ लै त्रिशूल धावा कपि भागे। आये रामानुज के आगे॥

वनवास से वापिस लौटने पर भी रामचन्द्र जी को उस कार्य के करने की इच्छा हुई जो समस्त प्रजाः के लिये, समस्त संसार के लिये, समस्त प्राणी मात्र के लिए एक अतीव उपयोगी आयोजन है। रामचन्द्र जी के पूर्वज भी बड़े बड़े यज्ञ करते रहे थे। श्रेष्ठ क्षत्री और श्रेष्ठ ब्राह्मण सदा ही विश्व कल्याण के लिये यज्ञों के विशद् आयोजन करने का प्रयत्न करते थे। राज्य शासन हाथ में लेने के बाद, वैसा आयोजन करने का राम का विचार उचित, आवश्यक और स्वाभाविक ही था। वाल्मीकि रामायण उत्तर काण्ड 83 वाँ सर्ग में इस प्रसंग का वर्णन यों है—


प्रेम भाव

श्री रामचन्द्र जी ने भरत एवं लक्ष्मण जी को बुलाया और प्रेम भाव सहित पूछने लगे—

कृतं मयायथातथ्यं द्वित कार्य मनुत्तमम्। धर्मसेतुमथो भूयः कुर्तुमिच्छामि राघवौ॥3॥ अक्षयश्चाव्ययश्चैवधर्मसेतुर्मतोमम्। धर्म प्रवचनंचैव सर्व पाप प्रणशनम्॥4॥

अर्थ—मैंने द्विज का सम्पूर्ण कार्य किया परन्तु अब एक (राजसूयादि यज्ञ) धर्मसेतु करने की इच्छा है। मेरे मन में धर्मसेतु, अक्षय−अव्यय धर्म का बढ़ाने वाला और पापों का नाश करने वाला है ।3.4।

युवाभ्यामात्माभूताम्यां राजसूयं मनुत्तमम्। सहितो यष्टुमिच्छामि तत्रधर्मस्तु शाश्वतः॥5॥ इष्ट्वा तु राजसूयेन मिश्रः शत्रुनिबर्हणः। सुहुतेन सु यज्ञेन वरुणत्वमुपगत॥6॥ सोमश्च राजसूयेज इष्ट्वाधर्मेण धर्मवित्। प्राप्तश्च सर्व लोकेषु कीर्त्तिस्थान शाश्वतम्॥7॥

अर्थ—तुम दोनों अपने भाइयों की सहायता से मैं यज्ञ श्रेष्ठ राजसूय का अनुष्ठान करना चाहता हूँ, इसके करने से अक्षय धर्म होता है॥5॥ शुत्रतापन मित्र जी सम्यक् प्रकार से राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान करके वरुण की पदवी को उपलब्ध करने में समर्थ हुए हैं। धर्मात्मा सोम भी धर्म पूर्वक राजसूय यज्ञ करके अत्यन्त कीर्ति और अक्षय स्थान को प्राप्त हुए हैं॥7॥

भरत तथा राम में विचार होने के उपरान्त में श्री लक्ष्मण जी यज्ञ के सम्बन्ध में विचार देते हैं।

अश्वमेधो महायज्ञः पावनः सर्व पावनाम्।

पावनस्तव दुर्धर्षो रोचताँ रघुनन्दन ॥2॥

शूयतेहि पुरावृत्तं वासवेसु महात्मनि।

ब्रह्महत्यावृत्तो शक्रो हयमेधेन पावितः॥3॥

वाल्मीकि रामायण 84 वाँ सर्ग उत्तर काण्ड

अर्थ—हे रघुनाथ! सम्पूर्ण पापों से पवित्र करने वाला अश्वमेध यज्ञ है। हे दुर्धर्ष! यदि आपकी इच्छा हो तो वही यज्ञ कीजिए॥2॥ ऐसा सुना है कि पूर्व काल में महात्मा इन्द्र को ब्रह्महत्या लगी थी, वह इसी अश्वमेध यज्ञ के करने से पवित्र हुए थे॥3॥

रामचन्द्र के पूछने पर लक्ष्मण जी ने, वृत्रासुर को तपस्या करते समय निरपराध मारने के कारण इन्द्र को जो ब्रह्महत्या लगी थी, वह कथा कह सुनाई। उसके उपरान्त अग्नि आदि सभी देवता विष्णु भगवान से इन्द्र की ब्रह्महत्या रूपी पाप निवारण का उपाय पूछते हैं—

हतश्चायंत्वयावूत्रो ब्रह्महत्या च वासव। बाधते सुर शार्दूल मोक्ष तस्य विनिदर्श॥19॥ तेषाँ तद्व वनं श्रुत्वा देवानां विष्णुरब्रवीत। सामेव यजतां शक्रः पावयिष्यामि बज्रिणाम्।10॥

अर्थ—हे देवताओं में श्रेष्ठ (विष्णु भगवान!) वृत्रासुर मारा गया परन्तु इन्द्र को ब्रह्महत्या बाधा करती है। उसके छुटकारे का कोई उपाय बताइये।19/॥

उन देव के वचनों को श्रवण कर विष्णु जी बोले—हे देवताओं! इन्द्र हमारा यज्ञ करे, हम उन्हें पवित्र कर देंगे॥20।।

पुण्येनहयमेधेनमामिष्ट्वा पाक शासनः। पुनरेष्यति देवानामिन्द्रत्वमकुतोभय॥21॥

अर्थ—हे इंद्र! पुण्यमय अश्वमेध यज्ञ से मेरा यजन करके, पुनः देवपति की पदवी को प्राप्त करेंगे।

विष्णु भगवान के निर्देशानुसार देवताओं ने यज्ञानुष्ठान की सारी तैयारी की—

ते तु दृष्ट्वा सहस्राक्षमावृतब्रह्महत्यया।

तं पुरस्कृत्यदेवेशमश्वमेधं प्रचक्रिणा॥8॥

ततोश्वमेघः सुकहान्महेन्द्रस्य महात्मनः।

ववृते ब्रह्महत्याया पावनार्थं नरेश्वरः॥9॥

ततो यज्ञे समाप्ते तु ब्रह्महत्या महात्मनः।

अभिगम्याब्रवीद्वाक्यंक्वमेस्थानं विधानस्यथ।10।

वाल्मीकि रामा. उत्तर काण्ड सर्ग 86

अर्थ—इन देवताओं ने इन्द्र को ब्रह्महत्या से मुक्त देख इन्हें दीक्षा में बैठाकर यज्ञ करना आरम्भ किया ॥8॥ हे राजन्! तब महात्मा इंद्र को महा ब्रह्महत्या से मुक्त करने के लिए अश्वमेध यज्ञ होने लगा ॥9॥ जब यज्ञ पूर्ण हुआ तब वह ब्रह्महत्या इन्द्र के शरीर से निकल गई।

प्रशान्तं च जगत्सर्वं सहस्राक्षे प्रतिष्ठिते। यज्ञंचाद्भुत संकाशं तदाशक्रोभ्यपूजयत्॥19॥

ईदृशोहयश्वमेधस्य प्रसादो रघुनन्दन। यजस्य सु महाभाग हयमेधेनपर्थिव ॥20॥

अर्थ—जब इन्द्र अपने स्थान पर आकर विराजे, तब सब जगत शान्त हो गया और फिर इन्द्र ने बड़े अद्भुत यज्ञ का यजन और पूजन किया ॥19॥ हे रघुनाथ जी! अश्वमेध यज्ञ की ऐसी महिमा है। हे महा भाग भगवन्! इस कारण आप भी अश्वमेध यज्ञ कीजिए॥20॥

एतदाख्याकाकुत्सथो भ्रातृभ्याममितप्रभः। लक्षमणं पुनरेवाहधर्मयुक्तमिदं वचः॥10

वशिष्ठं वामदेवं च जाबालि कथ कश्यपम्। द्वितांश्च सर्वप्रवरानश्वमेघ पुरस्कृतान्॥2॥

वा.रामा. उत्तर काण्ड 91 सर्ग

अर्थ—अमित पराक्रमी रामचन्द्र अपने भ्राताओं से ऐसा कह, फिर लक्ष्मण जी से धर्म पूर्वक यह वचन बोले॥1॥ कि अश्वमेध यज्ञ कराने वाले, वशिष्ठ, वामदेव, जाबालि−कश्यप इन श्रेष्ठ ब्राह्मणों को बुलाओ।

सबों के आने के बाद रामचन्द्र जी ने अश्वमेध यज्ञ करने के सम्बन्ध में चर्चा की।

तेपिरामस्य तच्छरुत्वा नमस्कृत्वा वृषध्वज। अश्वमेधं द्विजाः सर्वे पूजयन्तिस्मसवशः॥7॥

अर्थ—वे ऋषि राजचंद्रजी की वाणी श्रवण कर शिवजी को प्रणाम कर सब (ब्रह्मवादी ऋषि) अश्वमेध यज्ञ की प्रशंसा करने लगे।

इस यज्ञ में अविरत दान चलता रहा। सीता जी ने आकर पृथ्वी की गोद ग्रहण की और रामचंद्र यज्ञ को सम्पूर्ण धर्मकार्य समझ कर प्रतिवर्ष करते रहे।

नसीतायां पराभाय्र्यां वव्रेस रघुनंदनः।

यज्ञे यज्ञे चपल्यर्थं जानकी काँचनीभवत॥7॥

दशवर्ष सहस्राणि वाजमेधानथा करोत्।

वाजपेयांदशगुरगुणांस्तथा बहु स्वर्णकान्॥8॥

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यांगोसर्वैश्च महाधनैः।

ईजेक्रतु भिरन्यैश्च श्रीमानाप्त दक्षिणैः॥

वाल्मीकि रामा. उत्तर काण्ड 99 सर्ग

अर्थ—जानकी के बिना रघुनाथ जी ने और कोई भार्या नहीं की किंतु जब, जब यज्ञ करते, सोने की सीता से यज्ञ कार्य पूर्ण किया जाता॥7॥ इस प्रकार से प्रतिवर्ष अश्वमेध यज्ञ, दश सहस्र वर्ष के पीछे उससे दस गुना फलदायक वाजपेय यज्ञ जिसमें बहुत सा स्वर्णदान किया जाता है, किये॥8॥ अग्निष्टोम, अतिरात्र,गोमेधादि यज्ञ तथा और भी अनेक यज्ञ महा दक्षिणा और दान देकर किये।

तुलसी कृत रामायण में अनेक स्थानों पर अनेक प्रसंगों में यज्ञों की महत्ता का प्रतिपादन है। देखिए:—

श्रद्धा−भक्ति के संग यज्ञ करने से देवता तुरत ही साक्षात होते हैं। जैसा सीताराम के विवाह में—

होम समय तनु धरि अनल, अति सुख आहुति लेहिं। विप्र वेष धरि वेद सब, कहि विवाह विधि देहिं॥

देवताओं को यज्ञ में सम्मिलित होने का आकर्षण है। वे दक्ष के यज्ञ में प्रसन्नता पूर्वक जाते हैं:—

दच्छ लिये मुनि बोलि सब, करन लगे बड़याग। नेवते सादर सकल सुर, जे पावत मख भाग॥27॥ किन्नर नाग सिद्ध गंधर्वा। वधुन्ह समेत चले सुर सर्वा

सर्व शक्ति, सुख−सम्पन्न चक्रवर्ती राजा भी अपने प्रेय और श्रेय की चिरंतनता के लिए यज्ञ करते ही रहते हैं।

जहाँ लगि कहे पुरान श्रुति, एक एक सब जाग।

बार सहस्र सहस्र नृप, किये सहित अनुराग॥

तुलसीदास ( रामायण लंका काण्ड )

राक्षस राज रावण ने यज्ञ में अपने शिर काटकर आहुति दी थी, यह यज्ञ की निश्चित फलदायकता का प्रमाण है।

सूर कवन रावण सरिस, स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥

राजा प्रतापभानु के दुश्मन कपटी मुनि को भी विश्वास है।

करहिं विप्र होम मख सेवा। तेहि प्रसंग सहजेहि वश देवा॥

अर्थ—विप्र लोग हवन, यज्ञ और सेवा करते हैं, इसीलिए स्वभावतया ही देवगण उनके वश में रहते हैं।

कैकेय (वर्तमान काश्मीर) देश के राज प्रताप भानु जब तक निष्काम भाव से यज्ञादि सदनुष्ठान करते रहे तब तक उसका प्रताप भी भानु सदृश ही रहा।

जहाँ लगि रहे पुरान श्रुति, एक एक सब जाग। बार सहस्र सहस्र नृप, किये सहित अनुराग॥

स्वयं भगवान राम भी राज्य ग्रहण करने के बाद यज्ञ करना आवश्यक समझते हैं—

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हें। दान अने द्विजन्ह कहँ दीन्हें॥


वेदों में यज्ञाग्नि की प्रार्थना

पूर्ण दर्वि पर पत सुपूर्ण पूनरापत।

वस्नेन विक्रीणावहाऽइषभूर्जदँ शतक्रतो॥49॥

—याजु., प्र.ख., तृ.अ.

अर्थ—हे दर्वि! तू होतव्य द्रव्य से परिपूर्ण होकर ऊपर जाओ और वहाँ से भली−भाँति पूर्ण होकर पुनः हमारे पास लौट आओ। हे सूर्य! जैसे कोई मूल्य के माध्यम से कोई वस्तु खरीदते और बेचते हैं, उसी भाँति हम लोग इस यज्ञ कर्म में, आहुति क्रिया द्वारा, अन्न और रस, भोजन और पुष्टि, शक्ति और आनन्द का विनिमय—आदान−प्रदान किया करते हैं।

एष ते रुद्र भागः सह स्वस्नाम्बिकया तं

जुषस्व स्वाहैष ते रुद्र भागऽआखुस्ते पशुः ॥5॥

—यजु., प्र. खण्ड, तृ. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! यह तेरा भाग है। तू इस आहुति देने के कारण अपनी सर्वतग रोगनाशक शक्ति से हमें प्राप्त हो। हे यज्ञ! यह (हवि) तेरा भाग है। तेरी सोम आदि हवि रोगों को भूल से ही विनाश करने वाली है।

अव रुद्रमदी मह्यव देवं त्र्यम्बकम्।

यथा नो वस्यसस्करद्यथा नः श्रेयस्करद्यथा नो व्यवसाययात् ॥58॥

—यजु., प्र. ख., तीसरा अ.

अर्थ—हे तीन उत्पत्ति स्थान वाले अग्ने! हम लोग तुझ देव को आहुतियों से तृप्त करते हैं, जिससे हमें, सम्पत्ति, श्रेय और उद्योगशीलता की प्राप्ति हो।

शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्तेऽअस्तु मा मा हिं दँ सीः। निवर्त्तयाम्यायुषेऽन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजासत्वाय सु वीर्याय॥63॥

—यजु., प्र.ख., तृ. अध्याय

अर्थ—हे यज्ञ! तू निश्चय से कल्याणकारी है। स्वयम्भू परमेश्वर तेरा पिता है। तेरे लिये नमस्कार है। तु हमारी रक्षा कर। दीर्घ आयु, उत्तम अन्न, प्रजनन शक्ति, ऐश्वर्य समृद्धि, श्रेष्ठ सन्तति एवं मंगलोन्मुखी बल पराक्रम के लिये हम श्रद्धा विश्वासपूर्वक तेरा सेवन करते हैं।

त्वामग्ने यजमानाऽअनु द्यून विश्वावसु दधिरे वार्याणि त्वया सह द्रविणमिच्छमाना व्रजं गोमंत्र मुशिजो विवव्नुः॥28॥

—यजु., प्र.ख. द्वादश अ.

अर्थ—हे देव अग्ने! जो सदा यज्ञ करते रहते हैं, ऐसे सद्गृहस्थ सदा ही श्रेष्ठ सम्पत्तियों के स्वामी होते हैं, उन्हें इस यज्ञ के पुण्य प्रभाव से सदैव ज्ञानियों की सत्संगति के साथ ही धन की प्राप्ति भी होती रहती है।

पुनस्त्वादित्या रुद्रा वसवः समिंधतां पुनब्राह्मणो वसुनीथ यज्ञैः। घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः॥44॥

—यजु.,प्र.ख., द्वा. अ.

अर्थ—हे ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाले यज्ञाग्ने! तुझे ये यज्ञकर्ता आदित्य यज्ञ, वसु यज्ञ एवं रुद्र यज्ञ के द्वारा बारम्बार प्रदीप्त करें। इन यज्ञों से तुम अपने तेजों की अभिवृद्धि करके यज्ञ कर्ताओं की कामना पूर्ण करो या पूर्ण करने में समर्थ होओ।

जयमग्नि पुरीष्यो रयिमान् पुष्टि वर्धनः।

अग्ने पुरीष्यामि द्युम्नमभि सहऽआयच्छस्व॥40॥

—यजु. प्रथम. ती.ख. अध्याय।

अर्थ—यह यज्ञाग्नि, वृष्टि कराने वाली,धन देने वाली तथा पुष्टि और शक्ति को बढ़ाने वाली है। हे पुष्रीय अग्नि तू हमारे सब ओर बल और यश का विस्तार करो।

त्रँशद्भाम विराजति वाक् पतंगाय धीयते। प्रति वस्तोरह द्युभिः॥8॥

—यजु., प्र. ख., ती. अ.

अर्थ—यह यज्ञ जो प्रतिदिन किया जाता है, वह अपनी प्रदीप्त ज्वालाओं से युक्त निरन्तर यज्ञकर्ता के अन्तर में विराजता रहता है, फिर ऐसी दशा में किसी अन्धकार असुर, अज्ञान को ठहराने का (यहाँ) अवकाश ही कैसे हो सकता है। इसीलिये सच्चे यज्ञकर्ता एक दिन सम्पूर्ण अंधकार और अज्ञान से मुक्त होकर दिव्य परमात्मा के चरणों में पहुँच जाते हैं।


यज्ञ द्वारा देव शक्तियों की तुष्टि−पुष्टि

सृष्टि सञ्चालन करने वाली ईश्वर की शक्तियों का नाम देवता है। यह अनेक शक्तियाँ अनेक देवताओं के नाम से कही जाती हैं। इसका समस्त संसार की विभिन्न समस्याओं से तथा मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन की सुख समृद्धि, उन्नति अवनति हानि लाभ, रोग, शोक आदि से अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। इन देव शक्तियों की अनुकूलता प्राप्त करके मनुष्य बड़ी सरलता पूर्वक अपनी उन्नति का द्वार खोल सकता है। और यदि ये देव प्रतिकूल हों तो मनुष्य का कठोर परिश्रम भी निष्फल चला जाता है। देव शक्तियों को अनुकूल बनाने के लिए जितने भी साधन आदि याज्ञिक क्षेत्र में गिनाये गये हैं इनमें यज्ञ सर्वश्रेष्ठ है। यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं और अभीष्ट परिणाम प्रदान करते हैं, इसके अनेक प्रमाण उपलब्ध होते हैं। उनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं:—

मत्स्य उवाच:—

प्रीयतां पुण्डरीकाक्षः सर्वयज्ञेश्वरो हरिः

तस्मिंस्तुष्टे जगत् तुष्टं प्रीणिते प्रीणितं भवेत्॥38॥

—अध्याय 239 श्लो. 38

अर्थ—कमल नयन भगवान विष्णु यज्ञ से प्रसन्न होते हैं, उनके संतोष में जगत् संतुष्ट है उनकी प्रसन्नता में जगत् प्रसन्न होता है।

दैत्यराज बलि के यज्ञ में स्वयं वामन रूप धारण कर भगवान जनार्दन को आना पड़ा। अतिथि रूप में नहीं अपितु अभ्यागत रूप में।

व्रतोपवासैर्विविधैः प्रतिसंग्राह्यते हरिः

स चेद्वच्यति देहीनि गोविन्द किमतोऽधिकम्॥20॥

(अध्याय 246 श्लोक 20)

जो प्रभु नाना प्रकार के व्रत उपवास करने पर दुर्लभता से प्राप्त होता है। वही गोविन्द यदि दान देवे के लिये कहे, इससे अधिक और क्या हो सकता है। यह सब बलि के यज्ञ का ही प्रभाव है।

किन कर्मों से किन फलों की प्राप्ति होती है, ऐसा ऋषियों के पूछने पर हंस ने कहा।

श्लोक :—

यज्ञेनलोकानाप्नोति पाप नाशं हुतेन च।

जप्येनकामानाप्नोतिसत्येनचपराँ गतिम्॥

—विष्णु धर्मोत्तर पुराण, अध्याय 137 श्लो. 3

अर्थ:—“मनुष्य” यज्ञ करने से विष्णु इत्यादि लोकों को प्राप्त करते हैं, हवन करने से पापों का नाश होता है, जप करने से कामादि भोगों को प्राप्त करते हैं और सत्य बोलने से परमपद की प्राप्ति होती है।

हंस यज्ञ की प्रशंसा वर्णन कर रहे हैं।

श्लोक:—

यज्ञेनदेवा जीवन्ति यतेन पितरस्तथा। देवाधीनाःप्रजासर्वा यज्ञधीनाश्चदेवताः॥10॥

यज्ञोहि भगवान्विष्णुर्यत्र सर्व प्रतिष्ठिम्।

यज्ञार्थ पशवःस्रष्टा देवास्त्वौषधयस्तथा॥2॥

यज्ञार्थ पुरुषाःस्रष्टा स्वयमेवस्वय भुवा।

यज्ञश्च भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञ परो भवेत्॥3॥

यज्ञाशिष्टाशिनःसन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः।

धनंयद्यज्ञशीलानांदेवस्वं तंविदुवुधाः॥4॥

यज्ञेन सम्यक्पुरुषस्तु नाके

सम्पूज्यमानस्त्रिदशै र्महात्मा।

प्राप्नोति सौख्यानि महानुभावा−

स्त स्मात्प्रत्नेन यजेत यज्ञैः॥7॥

—विष्णु धर्मोत्तर पुराण, अध्याय 162

अर्थ:—यज्ञ देवता जीते हैं तथा पितृ जीते हैं, देवताओं के आधीन सब प्रजा हैं और यज्ञ के आधीन सब देवता हैं। यज्ञ ही भगवान् विष्णु हैं, जिन विष्णु भगवान् में सब प्रतिष्ठित हैं, यज्ञ के लिये देवता तथा औषधियों की सृष्टि की गई है।

स्वयम्भू जी ने यज्ञ के लिये ही मनुष्यों की सृष्टि की, और कहा—यज्ञ सब का कल्याणकारी है इसलिये यज्ञ में तत्पर रहो। यज्ञावशिष्ट का भोजन करने वाले सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, यज्ञशीलों के धन को पण्डितों ने देवस्य, दिव्य माना है।

यज्ञ के द्वारा महात्मा पुरुष स्वर्ग में जाकर देवताओं द्वारा अच्छी तरह पूजित होते हैं “हंस ऋषियों से कह रहे हैं” हे महानुभाव ऋषियों! यज्ञकर्ता महात्मापुरुष स्वर्ग में जाकर अनेक सौख्यों को प्राप्त करते हैं, इसीलिये प्रयत्न पूर्वक यज्ञों द्वारा भगवान् का यजन करे।

हंस जी हवन विधि का ऋषियों से वर्णन कर रहे हैं।

श्लोक:—

अग्निर्मुख देवतानाँ सर्वभूत परायणम्।

तस्यशुश्रूणादेव सर्वान्कामान्समश्नुते ॥

सा मुर्तिपरमाविष्णो स्तदत्तं प्राप्नुते रविः।

सूर्याद् बृष्टिस्तत स्त्वन्नात्प्रभवेत जगत्॥

अधःप्रवषिंणोदेवा भौमास्तूध्वं प्रवर्षिणः।

ऊर्ध्व प्रवर्षिणं मुख्यं भौमंदत्तं हुताशने॥

वह्निदत्तेन हविषा तृप्ति मायन्ति देवताः।

तास्तृप्ता स्तर्पयन्त्येनं नरंकामसमृद्धिभिः॥

होमेन पापं पुरुषो जहाति,

होमेन नाकं च तथा प्रयाति।

होमस्तु लोके दुरित समग्रं−

विनाश यत्वेव न संशयोऽत्र ॥

—विष्णु धर्मोत्तर पुराण अध्याय 287 श्लोक−3,4,5,7,15

अर्थ:—सर्वभूतपरायण देवताओं का मुख अग्नि है, देवताओं की शुश्रूषा करने से ही सब कामों की प्राप्ति होती है। यज्ञाग्नि ही विष्णु की परम मूर्ति है, उसी अग्नि में आहुति देने से सर्व हव्य को सूर्य प्राप्त करता है। सूर्य से वृष्टि होती है वृष्टि से अन्न और अन्न से जगत की उत्पत्ति होती है।

देवता नीचे की तरफ वर्षा करते हैं और मनुष्य लोग ऊपर की तरफ वर्षा करते हैं, अग्नि में “भूमि से उत्पन्न” हव्यों का हवन करना मुख्य ऊर्ध्व प्रवर्षण है।

अग्नि में हवि का हवन करने से देवताओं का तृप्ति होती है। वे देवता तृप्त होकर उस मनुष्य को इच्छित समृद्धि के द्वारा सन्तुष्ट करते हैं।

यज्ञ करने से आत्मा का मल दूर होता है, और यज्ञ करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है यज्ञ से लोक के समस्त दुष्कर्म नाश होते हैं, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। दैवेकर्मणियुक्तोहि बिभर्त्तीदं चराचरम॥75॥ अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्य मुपतिष्ठते। आदित्याज्रायते वृष्टिबृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥76॥

—मनुस्मृति तीसरा अध्याय

अर्थात् जो देव−होम कर्म में युक्त है, वह चराचर का पोषण करता है। क्योंकि अग्नि में डाली आहुति आदित्य को पहुँचती है और सूर्य से वृष्टि होती है और वृष्टि से अन्न, अन्न से प्रजा होती है। इसलिए जो यज्ञ करता है, वह सम्पूर्ण प्रजा का पालन करता है।

यज्ञैराप्यापिता देवा वृष्टयुत्सर्गेणवैप्रजाः। आप्याययन्तेधर्मज्ञयज्ञाःकल्याण हेतवः।।8।।

श्री विष्णु पुराण प्र. अंश अध्याय 6

अर्थ—हे धर्मराज! यज्ञ से तृप्त होकर देवगण जल बरसाकर प्रजा को तृप्त करते हैं। यज्ञ सर्वथा कल्याण का हेतु है।

भरद्वाज उवाच—

या यज्ञैरिज्यते देवो वासुदेवः सनातनः।

स सर्वे दैवत तनुः पूज्यते परमेश्वर॥

—कुर्म पुराण पूर्वार्ध अ. 20 श्लो.40

भावार्थ:—जो यज्ञों में सनातन वासुदेव का भजन करते हैं, वह सब देवों के शरीर रूप परमेश्वर का पूजन करते हैं अर्थात् सनातन वासुदेव का यज्ञों में यजन करने से सर्व देवताओं का यजन हो जाता है।

ब्रह्माजी ऋषियों को भगवान शिव के प्रसन्न करने का साधन बताते हैं—

तस्मादीश प्रसादार्थ यूय गत्वा भुव द्विजाः

दीर्घसत्र समाकृध्व यूय वर्ष सहस्रकम्॥1॥

शिवपुराण वि. स. 1 अ. 4

अर्थ−(यज्ञ ही शिव को प्रसन्न करने का श्रेष्ठ साधन है।) इसीलिये हे ऋषिगणों! तुम सभी पृथ्वी पर जाकर एक सहस्र वर्ष तक दीर्घकालीन विशाल यज्ञ करो।

श्रीनारदीयमहापुराण से ये वाक्य लिये गये हैं—

ये विष्णुभक्ता निष्कामा यंजंति परमेश्वरम।

त्रिसप्ताकुला संयुक्तास्ते यांति हरिमंदिरम्॥

बृहद् नारदपुराण अ. 39 श्लो. 61

इसका भाव प्रायशः ऐसा है−

जो निष्काम भाव से यज्ञ के द्वारा परमात्मा का पूजन करता है, वह अपने इक्कीस पीढ़ियों को हरि मन्दिर पहुँचाता है।

1 ये यणांति स्पृहा शून्य हरि भक्तान् हरिं तथा त एवं भुवनं सर्व पुनंति स्वांध्रिपांशुना

पृ. वा. पु. अ. 39 श्लो. 64

सूत जी ऋषियों से कहते हैं—

जो ममता के बिना ईश्वर तथा ईश्वर भक्तों को यज्ञ के द्वारा पूजते हैं, वही अपने चरण रज से सारे संसार को पवित्र बनाते हैं।

श्लोक:—

देव देव पतिः साक्षा द्विष्णुर्वामनरूप धृक् तुष्टाव यज्ञं बहि चयजमानमथर्त्विजः ॥

यज्ञं कर्माधिकार स्थान्सदस्यान्द्रयसंपदः॥

वामन पुराण (37।46)

अर्थ—देवाधि देव साक्षात विष्णु भगवान वामन रूपधारी ने यज्ञ तथा अग्निदेव को सन्तुष्ट किया, जैसे ऋत्विज् यजमान को करता है।

शिवजी कहते हैं—

इज्यया चैव मन्त्रेण मामेव हि यजंति ये।

न तेषां भयमस्तीति भवं रुद्रं यजन्ति यत्॥43॥

मत्स्य पुराण अध्याय 183।1 ला. 43

अर्थ:—यज्ञ व मन्त्र से जो मेरा ही पूजन करते हैं, जो रुद्र का यजन करते हैं वे भय रहित हो जाते हैं।

अविमुक्ते यजन्ते तु मद्भक्ताः कृतनिश्चयाः तेषां पुनरावृत्तिः कल्प कोटिशतैरपि ॥24॥

अर्थ—दृढ़ निश्चययुक्त मेरे भक्त मुक्ति के लिये यदि यज्ञ से मेरा यजन करे तो सैकड़ों, करोड़ों कल्पों तक उनकी संसार में पुनरावृत्ति नहीं होती।

यज्ञाद्देवाः प्रजाश्चैव यज्ञादन्नान्नि योगिनः॥

सर्वयज्ञात्सदाभाविस सर्वयज्ञममज्ज्गत्॥॥140॥

कालिका पुराण अध्याय 3।

यज्ञ से देवता व प्रजा सन्तुष्ट होते हैं। यज्ञ से अन्न की उत्पत्ति होती है। यज्ञ करने से ही संसार हमेशा शोभा पाता है। यह सारा संसार यज्ञ रूप ही है।

यज्ञेषु देवास्तुष्यन्ति यज्ञे सर्वम्प्रतिष्ठित्तम्॥

यज्ञेन ध्रियते पृथ्वीयज्ञस्तारयति प्रजा॥7॥

(अध्याय 32)

यज्ञों से देवता सन्तुष्ट होते हैं यज्ञों में सारा संसार प्रतिष्ठित है। पृथ्वीमाता यज्ञ से धारण की हुई हैं यज्ञ ही प्रजा को तारती है।

कालिका पुराण (अध्याय 32)

भोक्ता स सर्व यज्ञानाँ शंकरः परमार्थतः॥

सौर पुराण अ. 7 श्लो. 14

भगवान शंकर यज्ञ के भोक्ता हैं। अर्थात् भगवान शंकर यज्ञ से प्रसन्न होते हैं।

इज्यते सर्व यज्ञेषु

(सौ. पु. 7।36)

यज्ञ से भगवान शंकर की पूजा होती है।

यज्ञैश्चान्येयजन्त्येवतर्पयन्ति जनार्दनम् ॥ तेनचान्नेनदेवेशतृप्तिंगच्छान्ति देवता॥38॥

पद्म पुराण 5 वाँ खण्ड

सत्पुरुष यज्ञ द्वारा भगवान का पूजन करते हैं जिसके द्वारा देवता तृप्त होते हैं।

यज्ञ के द्वारा उत्पन्न हुई शक्ति देवताओं को सबल बनाती है और उसी से परिपुष्ट होकर वे सृष्टि रचना से लेकर विश्व कल्याण के समस्त कर्मों का आयोजन करते हैं।

श्री पराशर उवाच−मैत्रेयजी की ब्रह्माजी की सृष्टि एवं वर्ण, गुण, कर्म सम्बन्धी जिज्ञासा के उत्तर में पराशरजी कह रहे हैं।

यज्ञ निष्पत्तये सर्वमेतद् ब्रह्मा चकार वै।

चातुर्वर्ण्य महाभाग यज्ञ साधन मुत्तमम्॥7॥

अर्थः−हे महाभाग! ब्रह्मा जी ने यज्ञानुष्ठान के लिये ही यज्ञ के उत्तम साधन रूप इस सम्पूर्ण चातुर्वण्य की रचना की थी।

भगवान ने यज्ञ को मानव का साक्षात धर्म बतलाया है क्योंकि यज्ञ ने सारा संसार धारण किया है इसका प्रतिपादन यजुर्वेद में किया है:—

तस्माद्य ज्ञात्सर्वहुतः सम्मृत पृषदाज्यम्।

पशू स्तांश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्चये॥

तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽऋचः सामनि जज्ञिरे।

छन्दसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायम॥

(यजु. 11−6−7॥)

अर्थ—परमात्मा ने यज्ञ से संसार के सब पशुओं को और ऋचाओं अर्थात् वेद ज्ञान ऋग, यजु, साम, अथर्व से ही रचा और प्रकट किया और यज्ञ से ही इनको धारण कर रक्खा है।

यज्ञ द्वारा देवताओं का जब उनका भाग प्राप्त नहीं होता, वे दुर्बल हो जाते हैं, फल स्वरूप संसार पर नाना प्रकार की आपत्तियाँ आती हैं। यथा:—

कालिका पुराण

मार्कण्डेयउवाच:—

यज्ञाभावातु देवनामन्नं सर्वक्षयंगतम्॥ पर्जन्याश्च ततोनष्टा स्ततोनष्टास्ततो वृष्टिर्न्नवाभवत् ॥112॥

वृष्टयेभावेतु लोकानामाहाराः क्षीणतांगता॥ दुर्भिक्ष व्यसनोपेते सर्व लोके द्विजोत्तमा॥।13॥

कालिका पुराण अध्याय 20

अर्थ:—मार्कण्डेयजी कहते हैं कि यज्ञ के अभाव से देवों के अन्न का क्षय होता है। फिर बादलों के नष्ट होने से वर्षा का होना बन्द हो जाता है। वृष्टि के अभाव होने से मनुष्यों को भोजन की कमी हो जाती है और सब लोक अकाल−दुर्भिक्ष से ग्रस्त हो जाते हैं।

यज्ञे विनष्टे सकलाः प्रजाः क्षुद्भयकातराः॥

वृष्टयभावान्महद्दु खम्वाप्येष्टाश्चाम्बन ॥16॥

(कालिका पुराण अध्याय 20)

यज्ञों के बन्द होने पर सारी प्रजा भय से दुखी हो जाती है। और वर्षा के अभाव से प्रजा बहुत कष्ट पाकर नष्ट हो जाती है।

नयज्ञा सम्प्रवर्त्तन्तेनतपस्यान्ति तापसाः॥ आहार दुःखानि श्री काः प्रजाः क्षीणाभयातुराः॥19

यज्ञों और तपस्या के न करने से प्रजा आहार की कमी से उत्पन्न दुख से, धन की कमी से तथा भय से व्याकुल हो जाती है।

यज्ञ की महिमा अपार है। उसको विश्व क्षेत्र में विचरण करने वाला एक निर्द्वन्द साँड़ कहा गया है। इसकी शक्ति की सर्वत्र विजय घोष हो रहा है। यह यज्ञ रूपी साँड़ अपनी दहाड़ से संसार को कम्पायमान करता रहता है:—

चत्वारि श्रंगा त्रमो अस्म पादा द्वे शीर्ष सप्तहस्ता सो अस्म।

त्रिधा बद्धो बृषभो रोरवीति महोदेवो मर्त्या अविशेषे॥

(गो. ब्रा.3।7)

अर्थ—ऋग् यजुः, साम एवं अथर्व चारों वेद इसके चार सींग हैं। प्रातः मध्याह्न और सायं-सवन ये तीन सवन इसके तीन पैर हैं। व्रह्मादन प्रवर्ग्य दो मस्तक हैं। मन्त्र, कल्प, ब्राह्मण इन तीनों से यह मर्यादित है। इसके सात हाथ गायत्री आदि सातों छन्द हैं। ऐसा यज्ञ−वृषभ संसार में रोर कर रहा है।


पुराणों में यज्ञ महात्म्य के कुछ प्रसंग

प्राचीन काल में भारत भूमि में घर घर यज्ञ होते थे। नित्य यज्ञ के अतिरिक्त कुछ उत्सव, पर्व, त्यौहार आदि विभिन्न अवसरों पर बड़े बड़े यज्ञ होते थे। इसके अतिरिक्त किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अथवा किसी बड़ी विपत्ति को निवारण करने के लिए अनेक विधि विधानों से सुसम्बद्ध यज्ञ किये जाते थे। इस प्रकार के यज्ञों तथा उनके सत्परिमाणों से भारतीय इतिहास पुराणों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। उनमें से कुछ वृत्तांत यहां लिखे जा रहे हैं—

ततः कालेन बलिवैंरोचनिः सर्वगम् यज्ञैर्यज्ञेश्वरं विष्णुमर्च्चयामास सर्वगम्।।46।। ब्राह्मणान् पूजयामास दत्वा बहुतरं धनम् ब्रह्मर्षयः समाजग्मुर्यज्ञवाहं महात्मनः।।47।। विज्ञाय विष्णुर्भगवान् भरद्वाजप्रचेदितः आस्थाय वामनं रूपं यज्ञदेशमथागमत्।।48।।

कूर्म पुराण पूर्वार्ध अ. 17

भावार्थ—स्वयं दैत्यराज बलि ने यज्ञ से यज्ञरूप विष्णु की पूजा की। पुष्कल धनादि से ब्राह्मण पूजन किया व अनेक ब्रह्मर्षि महात्मादि यज्ञ में गये। स्वयं भगवान विष्णु भारद्वाज के कहने से वामन रूप धारण कर यज्ञ देश गये। इस प्रकार यज्ञ की महिमा अकथनीय है जिसके कारण जगतपिता विष्णु को भी अभ्यागत रूप में दैत्यराज बलि के द्वार पर जाना पड़ा।

त्रिपुरासुर तथा उसकी सन्तान, शिवजी की अर्चना करके उनकी कृपा से देवों के लिये अजय हो गये। उन असुरों न यज्ञ की हवि भी देवों से छीन स्वयं भोग करना प्रारम्भ किया। दुःखी, पराजित देवताओं ने शिवजी से कष्ट विनाश के लिए प्रार्थना की। शिव ने कहा−कि त्रिपुरासुर की सन्तति तो मेरी भक्त है, मैं अपने भक्त जनों का विनाश कैसे कर सकता हूँ? शिवजी ने देवगणों को विष्णु के पास भेज दिया। विष्णु भगवान ने देवगणों का आर्त विनय सुनकर कहा—

विष्णुरुवाच:—

अनेनैव समादेवा यजध्वं परमेश्वरम्।

पुरत्रय विनाशाय जगत्त्रय विभूतये॥25॥

शिव महा पुराण, द्वितीय रुद्र संहिता, युद्ध खंड द्वि. अ.

अर्थ—विष्णु भगवान ने कहा−

ऐसे अवसर पर सदा ही देवों ने यज्ञ द्वारा परमेश्वर की आराधना की है, बिना यज्ञ किये त्रलोक्य की विभूति स्वरूप त्रिपुरासुर के तीनों पुरों का विनाश नहीं हो सकता।

सनत्कुमार उवाचः−

अच्युतस्य वचः श्रुत्वा देव देवस्य धीमतः। प्रेम्णां ते प्रणतिं कृत्वा यज्ञेशं तेऽस्तु वन्सुराः॥26॥

एवं स्तुत्वा ततो देवा अयजन्यज्ञपूरुषम्॥ यज्ञोक्तेन विधानेन सम्पूर्ण विधयो मुने॥27॥

ततस्तस्माद्यज्ञकुण्डात्समुत्पेतुस्सहस्रशः॥ भूतसंघा महाकायाः शूलशक्ति गदा युधा॥28॥

ददृशुस्ते सुरास्तान वै भूत संघान सहस्रशः॥ शूलशक्ति गदा हस्तान्दण्डचाप शिला युवान्॥29॥

नानाप्रहरणो पेतान् नाना वेष धरांस्तया॥ कालाग्नि रुद्र सदृशान् कालसूर्योपमांस्तदा॥30॥

दृष्ट्वातानब्रवद्विष्णुः प्रणिपत्य पुरः स्थितान्॥ भूतान्यज्ञपतिः श्रीमात्रुद्राक्षाप्रतिपालकः॥31॥

विष्णु उवाच:—

भूता शृणत मद्वाक्य देव कारयार्थमुद्यता॥

गच्छन्तु त्रिपुर सद्यर्स्वे हि बलवत्तराः॥32॥

गत्वा दग्ध्वा च भित्वा च भंत्वा दैत्यपुरत्रयम॥

पुनर्यया गता भूता गंतुमर्हथ भूतये॥

शिवमहापुराण द्वितीय रुद्र संहिता छठा खण्ड दू. अ.

अर्थ—यज्ञ पुरुष भगवान विष्णु की बात सुनकर बुद्धिमान देव एवं देवेन्द्र ने उनको प्रणाम करके कहा कि हे यज्ञेश्वर! हम ऐसा ही करेंगे। ऐसी स्तुति करके सभी देवों ने यज्ञ के द्वारा यज्ञ पुरुष का यजन किया यज्ञ कि जो−जो विधान हैं सभी को साँगोपाँग सम्पन्न किया ॥26−27॥

इसके उपरान्त यज्ञ कुण्ड से बड़ा भयंकर, विशाल शरीर धारण किये हजारों भूत के संघ उत्पन्न हो गये, जिनके हाथ, युद्ध करने के लिये शूल, शक्ति , गदा आदि अस्त्र शस्त्र धारण किये हुए थे॥28॥

देवताओं ने देखा कि यज्ञ कुण्ड से हजारों भूतों के समूह हाथ में शूल, शक्ति, गदा, चाप, शिला आदि प्रहार करने वाले विभिन्न अस्त्र धारण कर विभिन्न रंग, रूप वेष धारण किये, कोई कालाग्नि रुद्र के समान, कोई सूर्य के समान यज्ञपति विष्णु भगवान को प्रणिपात (नमस्कार) करते हुए खड़े हैं, उन्हें देखकर विष्णु भगवान बोले—हे देव—कर्य्य करने के लिये उद्यत तैयार) भूतगणों! मेरी बात सुनो—तुम लोग शीघ्र ही त्रिपुर जाओ और वहाँ जाकर दैत्यों के तीनों पुरों को जला कर, विध्वंस कर, तोड़ फोड़ कर, फिर तुम लोग जहाँ से आये थे, वहीं चले जाओ।

वासुदेवं स्वमात्मानमश्वमेधैरथायजत्॥

सर्वदानानिसददौ पालयामास स प्रजाः॥

पुत्रवद्धर्म कामादीन्दुष्ट निप्रहणे रतः॥

सर्वधर्मपरोलोकः सर्वसस्याचमेदिनी॥

नाकाल मरणश्चासी द्रामे राज्य प्रसासति ॥

आग्नेय, पु. अध्या.10 श्लो. 33, 34

अर्थ—राज्याभिषेक होने के बाद भगवान राजा रामचन्द्र जी ने अपने आत्मा स्वरूप वासुदेव भगवान का अश्वमेध यज्ञों द्वारा यजन किया।

रामचन्द्र जी ने सर्व प्रकार के दान दिये, प्रजा का पुत्र के समान पालन किया, दुष्टों का निग्रहण किया।

इससे भगवान् राम के राज्य में सब लोग धर्म में तत्पर रहते थे।

पृथ्वी सम्पूर्ण शस्यों से युक्त रहती थी। न किसी की अकाल मृत्यु होती थी।

बलि ने संग्राम में इन्द्रादि देवताओं को जीत लिया।

उसके उपरान्त−

श्लोक—

वुभुजे व्याहतैश्वर्य प्रबृद्व श्रीर्महावलः।

इयाज चाश्वमेघैः स प्रीणन तत्परः ॥

नारद पु. अ. 10 श्लोक 31

विश्वजित् यज्ञ करके “बलि ने इन्द्र के राज्य को जीत कर” अव्याहत ऐश्वर्य बढ़ी हुई लक्ष्मी और महान बल से सम्पन्न हो त्रिभुवन का राज्य भोगने लगे। फिर उन्होंने भगवान् की प्रीति के लिये तत्पर होकर अनेक अश्वमेध−यज्ञ किये।

महाराज बाहु ने सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किये। उन्होंने चोर डाकुओं को यथेष्ट दण्ड देकर शासन में रक्खा और दूसरों का सन्ताप दूर करके अपने को कृतार्थ माना। उसके राज्य काल में यज्ञों की महिमा से पृथ्वी पर बिना जाते बोये अन्न पैदा होता था और वह फल फूलों से भरी रहती थी। देवराज इन्द्र उनके राज्य की भूमि पर समयानुसार वर्षा करते थे और पापाचारियों का अन्त हो जाने के कारण, वहाँ की प्रजा धर्म से सुरक्षित रहती थी।

च्यवन ऋषि ने आश्विनी कुमारों का यज्ञ किया जिसके प्रभाव से उन्होंने देवलोक में सुर दुर्लभ ऐश्वर्य प्राप्त किया, इसका वर्णन भविष्य पुराण में इस प्रकार मिलता है:—

यज्ञभागे प्रवर्त्तेतु शास्त्रोक्ते तु विघानतः।

आगतावश्विनौतत्र आहूतौ च्यवनेनतु॥

भवि. पु. ब्रा. पं. अ. 19 श्लोक 66

अर्थ:—शास्त्रोक्त विधि विधान से यज्ञ में भाग देने पर, च्यवन ऋषि के द्वारा बुलाये गये अश्विनी कुमार, अपना यज्ञ भाग लेने के लिये, वहाँ यज्ञ स्थली में आये।

जब च्यवन ऋषि का यज्ञ पूर्ण हो गया; देवता अपना अपना भाग ग्रहण कर स्वर्ग चले गये। तदनन्तर च्यवन ऋषि को स्वर्ग में अनन्त सुख−साधन प्राप्त हुए।

अथपश्यद्विमानाभं भवनं देव निर्मितम्।

शैय्यासनवरैर्जुष्टं सर्व काम समृद्धिमत्॥

उद्यानवापिभिर्जुष्टं देवेन्द्रेण समाहृतम्।

गोखण्ड सान्निभंरेजे गृहं तद्भुवि दुर्लभम्॥

दृष्ट्वा तत्सर्वमखिलं सहपत्न्या महामुनिः।

सुदंपरमिकांलेभे इन्द्रञ्च प्रशशंसह॥

भवि. पु. ब्रा. प. अ. 19 श्लोक 80,81,83

अर्थ:—“यज्ञ के पूर्ण होने पर” च्यवन ऋषि ने शय्यासनों से युक्त, सब समृद्धियों से विराजमान, देवताओं से निर्मित विमान के समान शोभा वाले भवन को देखा। बाग वापी इत्यादि से युक्त, इन्द्र के द्वारा लाये गये, गोखण्ड के समान आभा से रञ्जित भवन को देखा, जो पृथ्वी पर दुर्लभ है।

पत्नी के सहित सब दृश्यों को देखकर मुनि च्यवन ने परम आनन्द पाया और इन्द्र की प्रशंसा की।

महादानी बलि

शुक्राचार्य ने बलि से यज्ञ कराना आरम्भ किया। उस विश्वजित् यज्ञ के सम्पूर्ण होने पर, सन्तुष्ट हुए अग्नि ने प्रगट होकर ‘बलि को घोड़ों से जुता हुआ रथ’ दिव्य धनुष, त्रोण एवं अमेद्य कवच प्रदान किये। आचार्य की आज्ञा से उनको प्रणाम करके बलि उस रथ पर सवार हुए और उन्होंने स्वर्ग पर चढ़ाई कर दी। इस बार उनका तेज असह्य था। देवगुरु बृहस्पति के आदेश से देवता बिना युद्ध किये ही स्वर्ग छोड़ कर भाग गये।

—कल्याण चरितांक पृष्ठ 249

सूत जी वानर वंश का वर्णन करते हुए कहते हैं—

बाली यज्ञ सहस्राणां यज्वा परम दुर्जयः।

—ब्र. पुराण उपा. पा. 3 अ. 7

अर्थ—बाली ने सहस्रों यज्ञों का यजन किया ,इससे वह परम दुर्जेय बन गया।

सूत जी ऋषियों से कथा कहते जा रहे हैं :—

नहुषस्य महत्मानः पितरं यं प्रचक्षते।

प तेष्ववभृथेप्वेव धर्मशीलो महीपतिः॥24॥

आयुरायभवायाग्र य मस्मिन् सत्रे नरोत्तमः।

शान्तयित्वा तु राजानं तदा ब्रह्मविदस्तथा॥25॥

सत्रमारेमिरे कर्त्तुपृथ्वीवत्सात्ममूर्त्तयाः॥

वभूव सत्रे तेषां तु ब्रह्मचर्य्य महात्मनाम॥26॥

ब्रह्माण्ड पु. पू. भा. प्र. पा. 1 अ.2

अर्थ:—राजा नहुष ने अपने पूर्वजों का अनुसरण कर अनेकों यज्ञ करके अवभृथ (यज्ञान्त) स्नान किया यज्ञ करने से राजा में श्रेष्ठ नहुष, शान्त और ब्रह्मविद हो गया। उनकी आयु भी बढ़ गयी। ब्रह्मचर्य पालन सहित किये हुए उनके यज्ञों से, पृथ्वी वैसी ही वात्सल्यमयी बन गयी जैसे बच्चों के लिये माता होती हैं।

मारकंडेय पुराण में यज्ञों सम्बन्धी अनेक विवरण और वर्णन प्राप्त होते हैं। राजा इन्द्रद्युम्न के पास इन्द्र नीलमणि द्वारा निर्मित एक बड़ी ही मूल्यवान प्रतिमा थी। इसके खो जाने पर राजा को बड़ा दुख हुआ। दुखी होकर वह मृत्यु की गोद में जाने लगा तो विद्वानों ने इस दुख से निवृत्ति पाने के लिये एक बड़ा यज्ञ करने की सलाह दी। यज्ञ के फल स्वरूप राजा को वह खोई हुई मणि अनायास ही प्राप्त हो गई।

एक समय असुर प्रबल हो गए। पूर्ण विश्व को जीत कर स्वर्ग पर भी उन्होंने अपना अधिकार जमा लिया। दैत्यराज ने अपना राज्य स्थायी रखने की इच्छा की और इस हेतु वह इन्द्र के पास गया तथा पूछा ‘हमारा राज्य स्थिर कैसे रहे?’ इन्द्र ने सरल भाव से उन्हें यज्ञ करने का आदेश दिया। असुर यज्ञ परायण हो गए। वे यज्ञ करके शक्ति के अधिकारी बन बैठे और अजेय हो गए। विश्व में असुरों का ही राज्य दिखाई देने लगा देवता लोग निर्बल पड़ गए। स्वर्ग का राज्य उनसे छीन लिया गया।

देवों ने भगवान से प्रार्थना की। भगवान ने असुरों के पास ऐसे ऐसे दूत भेजे जो असुरों को यज्ञ न करने की सलाह दें। उन छद्म दूतों ने बड़ा प्रभावशाली वेश बनाकर असुरों से कहा ‘हरे हरे तुम यह पाप क्यों करते हो। यज्ञ में हिंसा होती है। दैत्यों को यह मत उचित लगा और उन्होंने अपना जीवन अयज्ञ मय बना लिया जिससे वे तेजहीन हो गए। देवों ने उन यज्ञहीन दैत्यों को पराजित करके स्वर्ग का राज्य वापिस ले लिया।

स्वायम्भुव मन्वन्तर कल्प के प्रथम मन्वन्तर में देवता अनाहार से क्षीण हो रहे थे। देवों के दुर्बल होने से जगत भी नष्ट होने लगा। तीनलोक−चौदह भुवन इस अवस्था में व्याकुलता को प्राप्त हो रहे थे।

देवों ने कृपासिन्धु से पुकार की। भगवान तो सदैव से दीनों की पुकार सुनने वाले हैं। महर्षि रुचि की पत्नी आकूति से वे प्रकट हुए। उन्होंने अग्निहोत्र की स्थापना की। उन्हीं के नाम से अग्निहोत्र यज्ञ कहा जाने लगा। यज्ञ से देवों को भोजन प्राप्त हुआ। उन्हें शक्ति प्राप्त हुई और वे विजय प्राप्त करके संसार का कल्याण करने में समर्थ हो गये।

तृणावर्त्त राक्षस के निधन के उपरान्त उसके शरीर के संग श्रीकृष्ण भी मूर्च्छित पड़े थे। उसे लाकर नन्द यशोदा शिशु के प्राण रक्षार्थ यज्ञ करना आवश्यक मानकर यज्ञकर्ता को बुला लाते हैं—वे आकर आश्वासन देते हैं—

माशोकं कुरु हे नन्द हे यशोदे व्रजेश्वरी।

करिष्यामि शिशो रक्षांचिर जीवी भवेदयम्॥50॥

—गर्ग संहिता गो. ख. 1 अ.14 श्लोक 50

अर्थ—हे नन्द! हे व्रजेश्वरी यशोदे! शोक मत करें, मैं शिशु की रक्षा (यज्ञ द्वारा) करूंगा, ये चिरंजीवी होंगे।

इत्युक्त्वाद्विजमुख्यास्ते कुशाग्रैर्नपल्लवैः॥

पवित्रकलशैस्तोयैस्ऋग्यजुः सामाजैःस्तवैः॥51॥

परेःस्वस्त्ययनैर्यज्ञं कारयित्वा विधानतः॥

अग्निसंपूज्यविधिवद्रक्षां विदधिरेशिशोः॥52॥

—गर्ग. संहिता गो. ख. 141 श्लोक 51−52

अर्थ− ऐसा कह कर द्विज श्रेष्ठ ने कुश, नव पल्लव, पवित्र जल सहित कलशादि यज्ञ पूजन सामग्री मंगाई और ऋक्, यजुः एवं साम के मन्त्रों से हवन किया, स्वास्ति वाचन किया, इसके उपरान्त विधिपूर्वक यज्ञ कर्म सम्पन्न करके शिशु का प्राण रक्षण किया। 51−52

बहुलाश्व के पूछने पर नारद जी सूर्यवंश के परि विख्यात राजा मरुत के सुप्रसिद्ध यज्ञ का वर्णन करते हुए कहते हैं—

ब्रह्मरुद्रादयोदेवाः सगणास्तत्रागता।

ऋषयो मुनयः सर्वेतस्य यज्ञं समाययु॥13॥

गर्ग. सं. वि. ख. अ. 1

अर्थ—ब्रह्म, रुद्रादि देवता गण समेत उस यज्ञ में पधारे थे, ऋषि मुनि सभी उस यज्ञ में आये थे।

केपिजीवास्त्रिर्क्या तु न बभूवुर्बुभुक्षिताः॥ सर्वे देवास्तु सोमेनह्यजीर्णमुपागता॥18॥

अर्थ—मरुत के उस महायज्ञ में तीनों लोक के कोई भी प्राणी भूखे नहीं रहे। देवगणों को तो सोमरस पीते−पीते अजीर्ण हो गया।

उग्रसेन जी के पूछने पर व्यास मुनि बताते हैं कि किस कर्म के करने से क्या गति मिलती है।

यज्ञ कर्त्ता शक्रलोके वसते शाश्वतीः समाः॥

दानी चान्द्रमसं लोकं व्रती सौरंव्रजत्यलम॥10॥

गर्ग संहिता वि. ख. 9 अ. 1 श्लोक 10

अर्थ—यज्ञ करने वाला इन्द्रलोक में शाश्वत काल तक निवास करता है, दानी चन्द्रलोक और व्रती सूर्यलोक को जाता है।

अश्वमेध यज्ञ की प्रशंसा सुनकर उग्रसेनजी श्री कृष्ण भगवान के निकट जाकर कहते हैं—

देवदेव जगन्नाथ जगदीश जगन्मय॥

वासुदेव त्रिलोकेश शृणुश्य वचनं मम॥20॥

मत्युत्रेणच कंसेनबालकाश्च सहस्रशः॥

विनापराधेनहरेमारिताश्चमहासुरैः॥21॥

तस्यमुक्तश्च गोबिन्द कथं भवति पापिनः॥

कस्मिंल्लोके गतःकंसो बालघाती बदस्वमाम्॥22॥

तस्यपापेनाहमपि मीतोऽस्मिजगदीश्वर॥

पुत्रस्य पापेनपिता नरके पतति ध्रुवम्॥23॥

कथितंनारदेनाद्यतच्छृणुप्व जगत्पते॥

विप्रहाविश्वहामोध्नो हयमेधेन शुध्यति॥25॥

—गर्ग संहिता अश्व. ख. 10 अ. 7

अर्थ—उग्रसेन ने श्री कृष्णजी से कहा—हे देवों के देव! हे जगन्नाथ! हे जगदीश! हे जगन्मय! हे त्रिलोकेश! हे वासुदेव! मेरी बात सुनिये॥20॥ मेरे पुत्र महासुर कंस ने हजारों बालकों की बिना अपराध के ही हत्या की है, हे गोविंद! उसकी मुक्ति कैसे होगी, यह मुझे कहिये और अभी बालघाती कंस मर कर किस लोक में गया है॥21-22॥ हे जगदीश्वर! उसके पापों से मैं बड़ा भयभीत हूँ, क्योंकि पुत्र के पाप से पिता को अवश्य नरक की यातना भुगतनी पड़ती है॥23॥ हे जगत्पते! नारद ने जो मुझ से कहा है सो सुनिये—उन्होंने कहा है, कि अश्वमेध यज्ञ करने से विप्र हत्यारा गौहत्यारा तथा विश्व को वध करने वाला भी शुद्ध हो जाता है।

कृष्ण के आदेश से राजा उग्रसेन ने महा यज्ञ किया।

यदा यजति यज्ञैश्च तदा शून्या वसुन्धरा।

सर्वा भवति राजानं तदा गच्छतिवै जनः॥

यश्च याति जन स्तस्य यज्ञे राज्ञो महात्मनः॥

किमिच्छकै स्तदा राज्ञा सर्वःसम्पूज्यते तदा॥

वि. ध. पु. अ. 137 श्लोक 1,2,3,4,14,15

अर्थ—जब गंधर्वों ने उपदेश दिया, तब राजा पुरूरवा, अपने नगर में जाकर, अग्नि उपासना में तत्पर हुए। धर्म के द्वारा प्रजा का पालन करते हुए बहुत यज्ञों द्वारा यजन किया।

सैकड़ों अश्वमेध, हजारों वाजपेय अतिरात्रि, द्वादशाह यज्ञों द्वारा बार बार यजन करके सप्तद्वीप समुद्रों वाली पृथ्वी का चक्रवर्ती राजा हुआ, आमानुसिक बल से उसने सम्पूर्ण महीतल को जीता।

दुर्भिक्ष, अकाल मरण, व्याधि ये राजा पुरूरवा के राज्य में कहीं भी किसी को नहीं हुआ, उनके राज्य में सभी अपने धर्म में तत्पर रहते थे सभी मनुष्य सुखी रहते थे।

जब राजा पुरूरवा यज्ञ करते, तभी शून्य वसुन्धरा सब शस्यों से युक्त हो जाती थी। और जो मनुष्य राजा के पास यज्ञ में जाते थे उनकी इच्छा को पूछकर उसे पूर्ण किया जाता था।

गंगा जी के जाह्नवी कहलाने की कथा बड़ी मनोरंजक है। पूर्व काल में कोशिनी के गर्भ में उत्पन्न सुहोत्र पुत्र ‘जह्नु’ ने सर्वमेध नामक महायज्ञ का आयोजन किया। अपना सर्वस्व उन्होंने यज्ञ में होम किया। इस महायज्ञ के पुण्य प्रताप को देखकर सभी देवता बड़े प्रभावित हुए। गंगाजी तो उन्हें पति रूप में वरण करने के लिए अधीर हो गई। ‘जह्नु’ ने गंगाजी का प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। इस पर जह्नु और गंगा जी में मनोमालिन्य पैदा हो गया। देवताओं ने इस मनोमालिन्य को अशोभनीय समझ कर दोनों में यह समझौता करा दिया कि गंगाजी जह्नु के घर में पुत्री के रूप में जन्म लें। ऐसा ही हुआ। तभी से जह्नु पुत्री होने के कारण गंगा जी का नाम जाह्नवी पड़ा।

जिस प्रकार सीता जी की प्राप्ति जनक द्वारा यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हुई थी, उसी प्रकार वृषभानु की भी राधिका पुत्री की प्राप्ति, यज्ञ के लिए भूमि शोधन करते समय हुई। यह कथा पद्म पुराण में आती है।

वृषभानोर्यज्ञभूमौजातासाराधिकादिवा॥

यज्ञार्थशोधितायांचदृष्टासादिव्यरूपिणी॥ —पद्मपुराण चतुर्थ खंड 41

यज्ञ के लिए शोध की हुई भूमि से वृषभानु को राधिका की प्राप्ति हुई।

बलि ने जब शुक्राचार्य जी से पूछा कि इन्द्र को किस प्रकार जीता जाय।

तेनोक्तं बलये राजञ्जय स्पनन्दन लब्धये।

महायज्ञं कुरुष्वाद्य तेन ते विजयो भवेत्॥

स्क. पु. माहे. खं. अ. 17 श्लोक 280

अर्थ—तो शुक्राचार्य जी ने बलि से कहा, विजयी रथ की प्राप्ति के लिए आज महायज्ञ करो। उस महायज्ञ के करने से तुम्हारी विजय होगी।

इन्द्रद्युम्न ने सहस्र यज्ञ किये और वह इन यज्ञों के साथ−साथ परम पुनीत दिव्यता को प्राप्त करता गया।

श्लोक:—ततः साहस्रिके यज्ञे वाजिमेधे महीपतिः॥

दिने दिने दिव्य गतिवभूव नृपतिस्तदा॥

स्क. पु. वै. खं. 2 ,प्र. म. 2 अ. 17 श्लो. 101

जब राजा का अन्तिम सहस्रवाँ यज्ञ पूर्ण हुआ तो राजा इंद्रद्युम्न दिन−दिन दिव्यावस्था को प्राप्त होने लगे।

पराशर मुनि ध्रुव भक्त की कथा कहते जा रहे हैं, उसी क्रम में पुलह मुनि ध्रुव को उपदेश करते हैं।

यो यज्ञ पुरुषो यज्ञो योगेशः परमः पुमान्। तस्मिन्तुष्टे यदप्राप्यं किं तदस्ति जनार्दने॥48॥

अर्थ− जो परमपुरुष यज्ञपुरुष, यज्ञ और यज्ञेश्वर हैं, उन जनार्दन के सन्तुष्ट होने पर ऐसा कौन वस्तु है, जो प्राप्त न हो सकती हो।

ऋषिगण राजा वेणु को यज्ञ करने के लिए समझा रहे हैं। उसने अहंकारवश अपने को ही यज्ञ पुरुष घोषित कर यज्ञादि कर्म बन्द करा दिया है।

दीर्घ सत्रेण देवेश सर्व यज्ञेश्वरं हरिम्।

पूजयिष्यामभद्रन्ते तस्यांशस्ते भविष्यति॥17॥

वि.पु.प्र.अश अध्याय 13

अर्थ—तुम्हारा कल्याण हो, देखो, हम बड़े बड़े, यज्ञों द्वारा जो सर्वयज्ञेश्वर देवाधिपति भगवान् हरि का पूजन करेंगे उसके फल में से तुमको भी (छठा) भाग मिलेगा।

यज्ञेन यज्ञग्रुषो विष्णुः संप्रीणितो नृप।

अस्माभिर्भवतः कामान्सर्वानेवप्रदास्यति॥18॥

श्री वि.पु.प्र.अं.13

अर्थ—हे नृप? इस प्रकार यज्ञों के द्वारा यज्ञ पुरुष भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर हम लोगों के साथ तुम्हारी भी सकल कामनायें पूर्ण करेंगे।

यज्ञैर्यज्ञेश्वरो येषाँ राष्ट्रे सपूज्यते हरिः।

तेषा सर्वोप्सतावाप्तिं ददाति नृप भू भृताम्॥18॥

श्री वि.पु.अ.13

अर्थ—हे राजन जिन राजाओं के राज्य में यज्ञेश्वर भगवान् हरि का यज्ञों द्वारा पूजन किया जाता है, वे उनकी सभी कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं।

ऋषियों ने राजा वेन से कहा

देह्यनुज्ञां महाराज माधर्मोयातु संक्षयम्।

हविषाँ परिणामोऽयं यदेतदखिलं जगत्॥25॥

श्री वि.पु.प्र.अं.अ. 13

अर्थ—हे महाराज! आप ऐसी आज्ञा दीजिए, जिससे धर्म का क्षय न हो। देखिये, यह सारा जगत हवि (यज्ञो में हवन की हुई सामग्री) का ही परिणाम है।

पराशर जी मैत्रेय से कथा कहते जा रहे हैं।

प्राचीनबर्हिर्भगवान्महानासीत्प्रजापतिः।

हविधानाव्महामान येन खंबर्धिताः प्रजाः॥3॥

श्री वि.पु.प्र.अं.अ. 14

अर्थ—हे महभाग! हविर्धन से उत्पन्न हुए भगवान् प्राचीनवर्हि एक महान प्रजापति थे, जिन्होंने यज्ञ के द्वारा अपनी प्रजा की बहुत वृद्धि की।

राजा सगर ने और्वमुनि से विष्णु भगवान की उपासना का उपाय और−फल पूछा था, उत्तर में और्व मुनि कहते हैं।

॥और्व उवाच॥

यजन्यज्ञान्यजत्येनं जपत्येन जपन्नृप।

निघ्नन्नन्यान्दिनस्त्येनं सर्वमूतोयतोहरिः॥10॥

श्री वि.पु.तृ.अं. अ. 8॥

अर्थ—हे नृप यज्ञों का यजन करने वाला पुरुष उन (विष्णु) ही का यजन करता है, जप करने वाला उन्हीं का जप करता है और (दूसरों की हिंसा करने वाला उन्हीं की हिंसा करता है क्योंकि भगवान हरि सर्वभूतमय हैं।

इन्द्र पूजा की तैयारी होते देख कृष्ण भगवान अपने बड़े बूढ़ों से पूछते हैं, उत्तर में नन्द जी कहते हैं।

भौममेतत्पयो दुग्धं गोभिः सूर्यस्य वारिदैः।

पर्जन्यस्सर्व लोकस्योद्भवाय भुवि वर्षति॥23॥

तस्मात्प्रावृष राजानस्सर्वे शक्रं मुदायुताः।

मखैस्सुरेश मचीन्ति वयमन्ये च मानवाः॥24॥

श्री वि.पु.पं. अं. अ.10

अर्थ—यह पर्जन्यदेव (इन्द्र) पृथिवी के जल को सूर्य किरणों द्वारा खींच कर सम्पूर्ण प्राणियों की वृद्धि के लिये उसे मेघों द्वारा पृथिवी पर बरसाते हैं।

इसलिए वर्षा ऋतु में समस्त राजा लोग, हम और अन्य मनुष्यगण देवराज इन्द्र की यज्ञों द्वारा प्रसन्नता पूर्वक पूजा किया करते हैं।

पराशर जी केशिध्वज और खाण्डिक्य की कथा कहते जा रहे हैं उसी क्रम में—

इयाजसोऽपि सुवहून्यज्ञाञ्ज्ञान व्यपाश्रयः।

ब्रह्मविद्या मघिष्ठान तर्तुं मृत्यु मविद्यया॥12॥

श्री वि.पु.षष्ठ अं.षष्ठ अ.

अर्थ—केशिध्वज ज्ञाननिष्ठ था, तो भी अविद्या (कर्म) द्वारा मृत्यु को पार करने के लिये ज्ञान दृष्टि रखते हुए उसने अनेकों यज्ञों का अनुष्ठान किया।

स्कन्द पुराण में यज्ञ भगवान के अवतार का वर्णन है। जिस प्रकार भगवान ने राम, नृसिंह, वाराह, कच्छ, मच्छ आदि के अवतार लिये हैं, उसी प्रकार एक अवतार ‘यज्ञ पुरुष’ का भी लिया है। स्वायम्भुव मन्वन्तर में जब देवताओं की शक्ति क्षीण हो गई और संसार में सर्वत्र घोर अव्यवस्था फैल गई उस अव्यवस्था के फलस्वरूप, सब लोग नाना प्रकार के कष्ट पाने लगे। इस विपन्नता को दूर करने के लिए भगवान ने यज्ञ पुरुष के रूप में अवतार लेने का निश्चय किया क्योंकि देवताओं की शक्ति वृद्धि करने के लिए यज्ञ के अतिरिक्त और कोई उपाय या मार्ग नहीं है।

महर्षि रुचि की पत्नी आकूति के गर्भ से यज्ञ भगवान ने जन्म लिया और उन्होंने संसार भर में अग्नि होत्र की लुप्त प्रायः प्रथा को पुनर्जीवित किया। सर्वत्र यज्ञ होने लगे। फलस्वरूप देवताओं की शक्ति बढ़ी और संसार का समस्त संकट निवारण हो गया।

आज भी ऐसे ही अवतार की आवश्यकता प्रतीत होती है जिससे विश्व आकाश पर छाये हुए घोर अशांति की घोर अन्धियारी को हटाकर पुनः धर्म सूर्य का सुख शान्ति दायक प्रकाश उत्पन्न हो सके।


यज्ञ द्वारा अनन्त सुख शान्ति

यज्ञ में वेद मन्त्रों का उच्चारण, विशेष प्रकार की समिधाएं विशिष्ट हवि शाकल्य, चरु, पुरोडास, भावनाओं का प्रवाह आदि अनेकों सूक्ष्म प्रक्रियाओं से एक प्रचण्ड अदृष्ट−अदृश्य वातावरण बनता है। उसकी शक्ति से यज्ञ कर्ताओं को ही नहीं समस्त संसार को अनेक प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभ होते हैं। अन्तःकरण की पवित्रता, मल विक्षेप और कुसंस्कारों का निवारण होने से आत्मबल की वृद्धि होती है और आत्मा का साक्षात्कार होकर, स्वर्ग, मुक्ति , ब्रह्म निर्वाण एवं परम पद की प्राप्ति होती है। साथ ही भौतिक अभाव एवं त्रास भी−कष्ट भी दूर होते हैं। सच्चा याज्ञिक जीवनोपयोगी आवश्यकताओं से वञ्चित नहीं रहता। अग्नि की उपासना करने वाले दीन दुखी नहीं रहते इसके अनेक प्रमाण शास्त्रों में उपलब्ध हैं:—

यज्ञ करने से मन, वाणी एवं बुद्धि की उन्नति होती है इसका प्रतिपादन यज्ञ भगवान स्वयं करते हैं—

देव सविता प्रसुव यज्ञं प्रसुवयज्ञपति भगाय। दिव्योगर्न्धवः केतपूःकेतनः पुनातु वाचस्पतिर्वांच नः स्वदतु॥

यजु. 30−1॥

अर्थ:—मन, वाणी, बुद्धि की उन्नति तब होगी जब यज्ञ एवं यज्ञ पति की उपासना की जाय।

ऋषयो मुनयश्चैव ब्राह्मणः क्षत्रियादयः।

स्वाहं मन्त्रमुच्चार्थ हविर्ददति नित्यशः॥

स्वाहायुक्तं च मन्त्रं च मो गृह्णातिप्रशस्तकम्॥

सर्वसिद्धिर्भवेतस्य ब्रह्मग्रहणमात्रतः।।

—ब्रह्म वैवर्त पुराण, ब्रह्म खण्ड

अर्थ:—श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऋषि, मुनि, ब्राह्मण क्षत्री आदि मन्त्र के अन्तः में ‘स्वाहा’ शब्द बोलकर नित्य हविष्य देते हैं। जो स्वाहा युक्त मंत्र को ग्रहण करता है, अर्थात् हवन करता है, उस ब्राह्मण को सब सिद्धियाँ मिलती हैं।

अग्निहोत्रात्परंनान्यत्पवित्रमिहपठयते॥

सुकृतेनाग्निहोत्रेणशुद्धयंतिभुवि द्विजाः॥83॥

पंथानोदेवलोकस्यब्राह्मणैर्दर्शितास्त्वमी॥

एकोऽग्निःसर्वदाधार्योगृहस्थेनद्विजन्मना॥84॥

—पद्म पुराण

अग्निहोत्र से बढ़कर कोई पवित्र कर्म नहीं। अच्छी प्रकार से किये गये अग्निहोत्रों के द्वारा द्विजों का अन्तःकरण पवित्र हो जाता है।

ब्राह्मणों ने विश्व को यज्ञ करने की प्रक्रिया बताकर सबों के लिए स्वर्ग को पाने का निश्चित पथ बता दिया है अतः हे गृहस्थो! यज्ञ को प्रतिदिन करते रहना ही गृहस्थों का धर्म है। बिना हवन किये गृहस्थ धर्म की प्राप्ति नहीं होती।

अहन्यहन्यनुष्ठानंयज्ञानांपार्थिवोत्तम॥

उपकारकरंपुंसांक्रियमाणंफलार्थिनाम्॥152॥

—पद्म पुराण भूमिखण्ड

अर्थ—हे राजन! सुख पाने की इच्छा वाले मनुष्यों को प्रतिदिन अवश्य ही होम करना चाहिये, इससे होम कर्ता का निश्चित रूप से कल्याण होता है।

‘पक्तिदूषकः’ का पौराणिक अर्थ दृष्टव्य है

महायज्ञविहीनश्च ब्राह्मणः पंक्ति दूषकः॥45॥

—कूर्म पुराण उत्तरार्ध अ. 21 श्लोक 42

अर्थ—महायज्ञ नहीं करने से ब्राह्मणों की पंक्ति में स्थान पाने योग्य नहीं होता। गृहस्थाश्रम वासी तीनों वर्णों का धर्मः

नास्तिक्यादथवालस्याद्योऽग्नीन्नाधातुमिच्छति।

यजेत वा न यज्ञेन स याति नरकान बहून्॥7॥

कूर्म पुराण, उत्तरार्ध अ. 24−श्लोक 7

भावार्थ:—नास्तिकता से अथवा आलस्य से जो अग्नि को धारण नहीं करना चाहता अथवा यज्ञ से जो परमात्मा का भजन नहीं करता वह अनेकों नरकों को प्राप्त करता है।

अग्निहोत्रात् परो धर्मो द्विजानां नेह विद्यते।

तस्मादाराधयेन्नित्यमग्निहोत्रेण शाश्वतम्॥

—कूर्म पुराण उत्तरार्ध अ. 24। श्लोक 8

अर्थ—इस लोक में द्विजों के लिये अग्नि होत्र से महान् कोई धर्म नहीं है इसलिए सनातन परमात्मा की नित्य ही अग्नि होत्र से आराधना करनी चाहिये।

व्यास उवाच:—

मातापित्रोर्हिते युक्तो गो ब्राह्मण हिते रतः।

दान्तो यज्वा देवभक्तो ब्रह्मलोके महीयते॥

—कूर्मपुराण उत्तरार्ध अ. 15। श्लोक 24

भावार्थ:—माता पिता के हित में ‘रत’ गो ब्राह्मणों का हित करता हुआ देवभक्त और दाता, ये सभी, यज्ञ करने से ब्रह्म लोक में प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।

सायंसायं गृहपतिर्नो अग्निः

प्रातः प्रातः सौमनसस्य दाता॥1॥

प्रातः प्रातर्गृहपतिर्नो अग्निः सायं

सायं सौमनसस्य दाता॥2॥

अ. कां 19। अनु. 7 मं. 3।4॥

अर्थ—जो गृहपति संध्याकाल में हवन करता है, उसे, वह यज्ञाग्नि, देव रूप से प्रातः काल तक सौमनस्य देने वाला होता है, अर्थात् उस गृहपति के मन, बुद्धि, शरीर एवं प्राण को शुद्ध करता रहता है, इसी भाँति प्रातः कालीन आहुति, उस दिन भर तक, उस गृहपति के सर्वांगीण कल्याण और सुख वृद्धि में सहायक होता है—सौमनस्य का देने वाला होता है।

दिवि विष्णु व्यक्तित्व जागतेन छंदसा

ततो निर्भयोक्ता योऽस्मान द्वेष्टि यंच वचं द्विष्मः।

अन्तरिक्षे विष्णुव्यक्रंस्त त्रैष्टुते छंदसा।

सतो निर्भक्तो.।

पृथिव्यां विष्णुर्ञ्येक्रस्तं गायत्रेण छंदसा।

सतो निर्भक्तो.।

अस्यादन्नात्। अस्ये प्रतिष्ठान्यै। अगन्य स्वः। संज्योतिषाभूम।

यजु. 2−25।

भावार्थ—अर्थात् अग्नि में प्रक्षिप्त जो रोग−नाशक पुष्टि प्रदायक और जलादिसंशोधक हवन सामग्री है वह भस्म होकर वायु द्वारा बहुत दूर तक पहुँचती है और वहाँ पहुँचकर रोगादिजनक वस्तु को नष्ट कर देती है। इस हेतु वेद में कहा जाता है, जो वस्तु हम लोगों से द्वेष करती है एवं जिससे हम लोग द्वेष करते हैं वह वस्तु यज्ञ के द्वारा नष्ट हो जाती है। आगे भी यही भाव समझाना चाहिए। अर्थात् यज्ञ से इहलौकिक और पारलौकिक दोनों कार्य सम्पन्न होते हैं।

विष्णोः क्रमोऽसि सपत्नता गायत्रं छंद आरोह पृथिर्वामतु विक्रमस्व। विष्णोः क्रमोऽस्य मिमातिव्य त्रैष्टुभं छंद अरोहान्तरिक्षयनु विक्रमस्व। विष्णोः क्रमोऽस्यरातयितो हन्ता जागते छंद आरोह दिवमनु विक्रमस्व। विष्णोः क्रमोऽसि शत्रूयतो हन्तानुष्टुभं छंद आरोह दिशोऽनु विक्रमस्व।

यजु. । 12−5 ।

अर्थ—यहाँ यज्ञ के फैलने का वर्णन है। यज्ञ का जो क्रम अर्थात् यज्ञ की सामग्री का जो चारों तरफ गमन है उसको संबोधन करके कहते हैं। आप यज्ञ के क्रम हैं, इसी हेतु सफल अर्थात् जीव के आरोग्य के नाश करने वाले जो शत्रु हैं उनको भी आप नष्ट करने वाले हैं। हे यज्ञ क्रम! प्रथम आप गायत्री छन्द को प्राप्त करें। पश्चात् पृथ्वी पर फैलें। आप घातक पाप को नष्ट करने वाले हैं। त्रिष्टुभ छन्द को प्राप्त करें। पश्चात् अन्तरिक्ष लोक में व्याप्त होवे। पुनः आप शत्रु के हननकर्ता हैं। जगती छन्द को प्राप्त करें। पश्चात् द्युर्लाक तक फैल जाय। इसी प्रकार अनुष्टभ छन्द को प्राप्त कर सब दिशाओं में फैल जायं

अग्नि पूजा परानित्यं गुरुपूजारतास्तथा।

ब्राह्मणां तृप्तिकरोः सर्वे सवर्गस्य भागिनः॥

शिवपुराण वि. सं. 1।अध्या. 14।1 श्लोक 13

अर्थ—जो प्रति दिन यज्ञ करते, गुरुपूजा एवं ब्रह्मभोज करते हैं, वे सभी स्वर्ग प्राप्त करने योग्य हैं।

मनुश्चसगरोराजामरुत्तोनहुषात्मजः।

एतेतेपूर्वजाः सर्वेयज्ञं कृत्वापदंगताः॥

पाद्म महापुराण पाताल खण्ड

अ. 8 श्लोक−35

अर्थ—शेषजी कहते हैं हे राम!—राजा मनु, सगर, नहुष के आत्मज मरुत, ये सब आपके पूर्वज, यज्ञ करने से ही परमपद को प्राप्त हुए हैं।

शतक्रतुः शतंकृत्वाक्रतूनाँ पुरुषर्षभः।

पदमापानरक्त्यां देवदैत्य सुसेवितम्॥

पाद्ममहापुराण पाताल खण्ड अ. 8−श्लोक−34

अर्थ—इन्द्र ने एक सौ महायज्ञ करके ही, उसी के फल स्वरूप, देव−दैत्य जिसका सेवन करते और करना चाहते हैं, उस सुख सौंदर्यमय स्वर्ग की प्राप्ति की।

सपृतन्तुर्महीभर्त्तात्वया साध्योमनीषिणा।

महासमृद्धियुक्तेन महाबल सुशालिना॥

पाद्मे महापुराण पाताल खण्ड अ. 8 श्लोक−32

अर्थ—शेष भगवान् श्री रामचन्द्र जी से कहते हैं कि अश्वमेध करने से आप सप्त लोकों का शासन करेंगे। तथा महा समृद्धि युक्त होकर महाबली तथा पवित्र आचरण करने वाले होंगे॥22॥

युधिष्ठिर ने शान्ति, पुष्टि को बढ़ाने वाले तथा सब कर्मों को सिद्ध करने वाले कृत्य को श्रीकृष्ण भगवान् से पूछा। श्रीकृष्ण जी बोले—

श्लोक:—

श्रीकामःशान्तिकामोवाग्रह यज्ञं समारभेत्।

दृष्टयायु पुष्टि कामो वा तथैवाभिचरन्पुनः॥

ग्रहयज्ञस्त्रिधाप्रोक्तः पुराण श्रतिकोविदैः।

प्रथमोऽयुत होमः स्याल्लक्षहोमस्ततः परम्।।

तृतीयःकोटिहोमस्तु सर्वकामफलप्रदः।

अयुतेनाहुतीनां च नवग्रह मख स्मृतः॥

होमं समारभेत्सर्पि यव व्रीहितिला दिना।

अर्कःपलाश खदिरौह्यपामार्गोऽथ पिप्पलः॥

उदुम्बर शमीदूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात्।

एकैकस्य चाष्टशतमष्टाविंशति वा पुनः॥

दक्षिणाभिःप्रयत्ने बहुन्वा बहु वित्तवान्।

लक्षहोमस्तु कर्त्तव्यो यदिवित्तं गृहे गृहे॥

यतः सर्वानवाप्नोति कुर्वन्कामान्विधानतः।

पूज्येतशिव लोके च वस्वादित्य मरुद्गणैः॥

यावत्कल्प शतान्यष्टावथ मोक्षमवाप्नुयात्।

सकामोयस्त्विमं कुर्याल्लक्ष होमं यथा विधिः॥

सतंकाममवाप्नोति पदं चानन्त्यमश्नुते।

पुत्रार्थीलभते पुत्रं धनार्थी लभतेधनम्॥

भार्यार्थी शोभनाँभार्यां कुमारी च शुभ पतिम्।

भ्रष्टराज्यस्तथाराज्यं श्रीकामश्रियमाप्नुयात्॥

यं यं कामयेतकामं तंतं प्राप्नोति पुष्कलम्।

निष्कामःकुरुतेयस्तु परं ब्रह्म सगच्छति॥

—अग्नि पुराण अ. 141 उ.प. 4 श्लोक 2,5,6,30,32,116,117,118,119,120,121

अर्थ:—लक्ष्मी की इच्छा करने वाला अथवा शांति चाहने वाला नवग्रह यज्ञ करे। उसी प्रकार दृष्टि, आयुः की पुष्टि चाहने वाले को भी ग्रह यज्ञ करना चाहिए। ग्रह यज्ञ तीन प्रकार कहा गया है, पुराणवेत्ता, श्रुतिवेत्ताओं के द्वारा।

पहला अयुतहोम दूसरा लक्षहोम तीसरा कोटिहोम सम्पूर्ण कामनाओं के फल को देने वाले हैं। अयुत (दस हजार) आहुतियों के देने से वह नवग्रह यज्ञ कहा गया है।

अर्क पलाश, खदिर अपामार्ग, पिप्पल, उदुम्बर शमी, (छोंकर) दूब और कुशा इन समिधाओं के क्रम से घी, जौ, व्रीहितिलादि से एक एक ग्रह को एक सौ आठ अथवा अट्ठाईस आहुतियों से हवन करें।

बहुत धन वालों को प्रयत्न पूर्वक बहुत से लक्ष होम करना चाहिये। यदि घर घर में धन हो तो विधि विधान से लक्ष होम को करने से सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति होती है और आठ सौ कल्प तक वसु आदित्य, मरुद्गणों आदि के द्वारा शिव लोक में पूजित होता है, इसके बाद मोक्ष पद को प्राप्त करता है।

जो मनुष्य सकाम भावना से इस लक्ष होम को विधि विधान से करता है उसको इच्छित काम की प्राप्ति होती है ओर अन्त समय परम पद को प्राप्त करता है।

पुत्रार्थी, पुत्र को प्राप्त करते हैं, धनार्थी, धन को प्राप्त करते हैं, भार्यार्थी, सुन्दर स्त्री को प्राप्त करते हैं और कन्या, शुभ पति को प्राप्त करती है। राज्य से च्युत राजा, राज्य को प्राप्त करता है लक्ष्मी की कामना वाला, लक्ष्मी को प्राप्त करता है।

जो पुरुष जिस जिस कामना की इच्छा करता है, उसी−उसी कामना को अधिक मात्रा में प्राप्त करता है जो निष्काम भाव से लक्ष हवन करता है वह परब्रह्म को प्राप्त करता है।

सूत जी यथा विधि कृत योगफल का वर्णन कर रहे हैं।

श्लोक:—लक्षहोमस्तुकर्तव्योयदा वित्तं भवेत्तदा। यतः सर्वमवाप्नोतिकुर्यात्कामाविधानतः॥ पूज्यतेशिवलोके च वस्वादित्य मरुद्गणैः। यावत्कल्पशतान्यष्टावन्तेमोक्षमवाप्नु यात्॥ अकामोयस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथविधि। शतकाममवाप्नोति पदं चानन्त्यमश्नुते॥ पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभतेधनम्। भार्यार्थीलभतेभार्या कुमारी च शुभपतिम्॥ भ्रष्टसज्यस्तथा राज्यं श्रीकामः श्रियमाप्नु यात्। यंयं कामयते काम सर्वंप्राप्नोति पुष्कलम्॥ निष्कामः कुरुतेयस्तु परंब्रह्माधिगच्छति। तस्माच्छत गुणः प्रोक्तः कोटिहोमः स्वयं भुवा॥

भविष्य पु.म.प. 2 अ. 20 श्लोक 34,35,36,37,38,39

अर्थ:—यदि धन हो तो लक्ष आहुतियों का होम करना चाहिये, क्योंकि लक्ष होम के विधि विधान से करने पर सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति होती है और आठ सौ कल्प तक शिव लोक में वसु, आदित्य, मरुद्गणों के द्वारा पूजित होता है। अन्त समय मोक्षपद को प्राप्त करता है।

जो पुरुष अकाम भाव से यथा विधि यज्ञ करे, वह सैकड़ों इच्छित पदार्थों को प्राप्त करता है और अनन्त पद को प्राप्त करता है।

पुत्र की इच्छा से यज्ञ करने वाले को, पुत्र की प्राप्ति होती है, धन की इच्छा वाले को, धन की प्राप्ति होती है−भार्यार्थी, भार्या को प्राप्त करता है और कुमारी, शुभ पति को प्राप्त करती है।

राज्य से च्युत, राज्य प्राप्त करता है।

अनेन विधिना यस्तु कोटि होमं समाचरेत।

सर्वान् कामानवाप्नोति ततो विष्णु पदं व्रजेत्॥

मत्स्यपुराण अ. 93।136 श्लोक

अर्थ—विधि पूर्वक जो करोड़ आहुति हवन करता है, उसकी सब कामनाओं की पूर्ति होती है और विष्णु पद को प्राप्त होता है।

सकामो यस्त्विमं कुर्याल्लक्षहोमं यथाविधि।

स तं काममवाप्नोति पदमानंत्यमश्रुते॥116॥

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् धनार्थी लभते धनम्।

भार्यार्थी शोभनाँ भार्यां कुमारी च शुभम्पतिम्। ॥117॥

भ्रष्ट राज्यस्तथा राज्यं श्री कामः श्रियमाप्नुयात्।

यं यं प्रार्थयते कामं सवै भवति पुष्कलः। निष्कामः कुरुते यस्तु स परं ब्रह्म गच्छति॥118॥

मत्स्य पुराण; अध्याय 93

अर्थ:—कामना सहित किया हुआ लक्ष होम, कामनाओं को पूर्ण करता है तथा अनन्त पद की प्राप्ति होती है।

पुत्रार्थी को, पुत्र की प्राप्ति, धनेच्छु को, धन प्राप्ति, भार्यार्थी को, सुन्दर पत्नी व कुमारी को, सुन्दर पति की प्राप्ति होती है।

जिसका राज्य नष्ट हो गया हो, उसे वह पुनः मिलता है, लक्ष्मी को चाहने वाला, लक्ष्मी प्राप्त करता है, जिस−जिस काम के लिए प्रार्थना की जाती है, उनकी पुष्कल रूप से प्राप्ति होती है।

जो निष्काम भाव से यज्ञ करता है, वह परब्रह्म की प्राप्ति करता है।

राजा, राज्य को प्राप्त करता है, लक्ष्मी की इच्छा करने वाला, लक्ष्मी को प्राप्त करता है। जो, जिस−जिस कामना से यह यज्ञ करता है, उसकी वे सभी कामनायें पूरी हो जाती हैं।

निष्काम भाव से हवन करने वाले को निश्चय ही परब्रह्म परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है।

ऋषि गणों ने सूतजी से संसार बन्धन छूटने का उपाय पूछा। उत्तर श्री सूतजी देते हैं:—

सर्वबाधा निवृत्यर्थं सर्वान् देवान यजेत् बुधः॥

ज्वरादि ग्रन्थि रोगाश्च बाधाह्यात्मिकी मता॥100॥

पिशाच जम्बुकादीनां बाल्मीकाद्युद्भवे तथा॥

अकस्मादेव गोधादि जन्तूमां पतनेऽपिच॥101॥

गृहे कच्छप सर्प स्त्री दुर्जना दर्शनेऽपिच॥

वृक्ष नारी गवादीनां प्रसूति विषयेऽपिच॥102॥

भावि दुखं समायाति तस्मात्ते भौतिका मताः॥

अमेध्या शनि पातश्च महामारी तथैव च॥103॥

ज्वरमारी विषूचिश्च गोमारी च मसूरिका।।

जन्मर्क्ष ग्रह संक्राति ग्रहयोगाःस्वराशि के।।204।।

दुःस्वप्न दर्शनाद्याश्च मता वै ह्याधिदैविका॥

शव चाण्डाल पतित स्पर्शा दंतर्गृहे गते॥105॥

एतादृशे समुत्पन्ने भावि दुःखस्य सूचके॥

शान्ति यज्ञ तु मतिमान्कुर्यात्तद्दोष शान्तये॥106॥

—शिव महापुराण, अ. 18

अर्थ:—सभी बाधाओं की निवृत्ति के लिये, बुद्धिमान पुरुषों को, सभी देवताओं का यज्ञ—हवन के द्वारा पूजा करनी चाहिए। ज्वर आदि ग्रन्थि रोग, आध्यात्मिक बाधा, पिशाच एवं शृंगालों के उपद्रव, दीमक की उत्पत्ति, अकस्मात् यदि गोधा (गोह) का पतन हो जाय, घर में कच्छप साँप का निवास होने से, दुराचारी स्त्री−पुरुष के दर्शन से, वृक्षों के फलने तथा गौ तथा नारी के प्रसव काल में कोई संकट उपस्थित होने से, भावी भौतिक दुखों का विनाश करने के लिये, अपवित्र वस्तु का स्पर्श होने पर शनि आदि ग्रहों के प्रकोप होने पर, महामारी, विसूचिका, गौमारी, आदि आधिदैविक संकट, जन्म, नक्षत्र, ग्रह, संक्राति, योग, राशि आदि के कारण उपस्थित विपत्तियाँ, दुःस्वप्न−दर्शन, शव, चाण्डाल एवं पतितों के स्पर्श से यदि अन्तः पुर का भवन अशुद्ध हो जाय, किसी भावी संकटों की सम्भावना हो, तो शान्ति यज्ञ करके बुद्धिमान पुरुष, उन दोषों को शान्त कर देते हैं।

अग्नि यज्ञ, देव यज्ञ आदि के सम्बन्ध में जिज्ञासा करने पर सूतजी कहते है:—

सम्पतकरी तथा ज्ञेया सायमग्न्याहुतीर्द्विजाः॥

आयुष्यकरीति विज्ञेया प्रातः सूर्य्याहुतिस्तथा॥7॥

—शिवपुराण

अर्थ—सन्ध्या काल में अग्नि में आहुति देने से वह सम्पत्ति देने वाली है और सूर्योदय के समय की आहुति, आयु को बढ़ाने वाली होती है।

हवन—यज्ञ करने वाले मनुष्य को माया नहीं सता पाती। वह माया के कुचक्र में नहीं बँधता और बन्धन मुक्त होकर, परम शान्ति को प्राप्त करता है। ब्रह्माजी ने महामाया को आदेश दिया है कि वह अपना कुचक्र, यज्ञ करने वाले पर न चलावें।

महायज्ञ परान्विपान्दूरतः परिवर्ज्जय।

ये यजन्ति जपैर्होमैर्देवदेवं महेश्वरम्॥

कूर्म पुराण 2।16

अर्थ:—श्री ब्रह्माजी, महामाया से कहते हैं कि हे देवि! जो कोई यज्ञ के द्वारा महेश्वर की अर्चना करते हैं, उन्हें तुम दूर से ही त्याग दो। ऐसे व्यक्ति पर तुम अपना प्रभाव मत डालो।

आयुष्यञ्चापि भक्तानां त्रयाणाँ विधि पूर्वकम्।

यजेत जुहुयाग्नौ जपद्यद्याज्जितेन्द्रिय॥109॥

—कूर्म पुराण, अध्याय 3

अर्थ—जो भक्त जितेन्द्रिय रह कर जप और यज्ञ करते हैं, उनकी आयु बढ़ती है।


यज्ञ से सुसन्तति की प्राप्ति

यज्ञों का आश्चर्यजनक प्रभाव, जहाँ मनुष्य की आत्मा, बुद्धि एवं निरोगता पर पड़ता है वहाँ प्रजनन प्रणाली की भी शुद्धि होती है। याज्ञिकों को सुसंतति प्राप्त होती है। रज वीर्य में जो दोष होते हैं उनका निवारण होता है। साधारण और औषधियों का सेवन केवल शरीर के ऊपरी भागों तक ही प्रभाव दिखाता है पर यज्ञ द्वारा सूक्ष्म की हुई औषधियाँ याज्ञिक स्त्री पुरुषों के श्वाँस तथा रोम कूपों द्वारा शरीर के सूक्ष्म तम भागों तक पहुँच जाती हैं और उन्हें शुद्ध करती हैं। गर्भाशय एवं वीर्य कोषों की शुद्धि में यज्ञ विशेष रूप से सहायक होता है।

जिन्हें संतति नहीं होतीं, गर्भ पात हो जाते हैं, कन्या ही होती है, बालक अल्प जीवी होकर मर जाते हैं वे यज्ञ भगवान की उपासना करें तो उन्हें अभीष्ट संतान सुख मिल सकता है। कई बार कठोर प्रारब्ध संतान न होने का प्रधान कारण होता है, वैसी दशा में भी यज्ञ द्वारा उन पूर्ण संचित प्रारब्ध का शमन हो सकता है।

गर्भवती स्त्रियों को पेट से बच्चा आने से लेकर जन्म होने तक चार बार यज्ञ संस्कारित करने का विधान है ताकि उदरस्थ बालक के गुण, कर्म, स्वभाव स्वास्थ्य रंग रूप आदि उत्तम हो। गर्भाधान, पुँसवन, सीमन्त, जातक यह चार संस्कार यज्ञ द्वारा होते हैं जिनके कारण बालक पर उतनी छाप पहुँचती है जितनी जीवन भर की शिक्षा दीक्षा में नहीं पड़ती। ऋषियों ने षोडश संस्कार पद्धति का आविष्कार इसी दृष्टि से किया था। उस प्रणाली को जब इस देश में अपनाया जाता था तब घर घर सुसंस्कृत बालक पैदा होता था। आज उस प्रणाली को परित्याग करने का ही परिणाम है कि सर्वत्र अवज्ञाकारी, कुसंस्कारी संतान उत्पन्न होकर माता पिता तथा परिवार के सब लोगों को दुख देती है।

सन्तान उत्पादन के कार्य में यज्ञ का अत्यन्त ही महत्वपूर्ण स्थान है। जिनके सन्तान होती है, वे अपने भावी बालकों को यज्ञ भगवान के अनुग्रह से सुसंस्कारी, स्वस्थ, बुद्धिमान, सुन्दर और कुल की कीर्ति बढ़ाने वाले बना सकते हैं। जिन्हें सन्तान नहीं होती है वे उन बाधाओं को हटा सकते हैं जिनके कारण वे सन्तान सुख से वञ्चित हैं। प्राचीन काल में अनेक सन्तान हीनों को, सन्तान प्राप्त होने के उदाहरण उपलब्ध होते हैं, जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं।

अयोध्या नरेश श्री दशरथ जी अपने यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों से कहते हैं, जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं:—

धर्मार्थ सहितं युक्तं श्लक्ष्णं वचनमब्रवीत्।

ममता तप्यमानस्य पुत्रार्थं नास्ति वैसुखम्॥8॥

—बाल्मीकि रामायण, आ. ख., द्वादश सर्ग

अर्थ—हे विप्रगणो! मैं पुत्र प्राप्ति की कामना से बहुत ही सन्तप्त और व्याकुल हूँ। मुझे कहीं जरा भी सुख नहीं मिल रहा है। मैंने पुत्र की प्राप्ति के लिये यज्ञ करने का विचार किया है।

ऋषि पुत्र प्रभावेण कामान्प्राष्स्यामि चाप्यहम्॥10॥

तद्यथा विधि पूर्व मे क्रतुरेष समाप्यते।

तथा विधानं क्रियतां समर्थाः करणेष्विह॥19॥

अर्थ—ऋषिपुत्र शृंगी ऋषि के यज्ञ क्रिया की निपुणता के प्रभाव से अवश्य ही हमारी पुत्र−कमाना पूरी होगी। अतः आप विधि पूर्वक यज्ञ करने−कराने में समर्थ द्विज गण सावधान हो कर यज्ञ करावें जिससे यह साँगोपाँग, विधि पूर्वक पूर्ण हो जाय।

विधि पूर्वक पुत्रेष्टि यज्ञ समाप्त हो जाने पर श्री विष्णु भगवान सभी देवताओं सहित यज्ञ स्थल में पधारे। वहाँ सभी देवों ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की—

विष्णोपुत्रत्वमाच्छ कृत्वात्वमानं चतुर्विंधम्।

तत्र त्वं मानुषो भूत्वा प्रवृद्धम लोक कण्टकम्॥

—वा. रा. 15 वां सर्ग 1 श्लोक 21

अर्थ—हे भगवन्! आप पुत्र भाव को प्राप्त होइये। आप अंश सहित चारों भागों में विभक्त होकर उनका (दशरथ जी का) पुत्र होना स्वीकार कीजिये और मनुष्य शरीर धारण कर बढ़े हुए लोक कण्टक (रावण) का नाश कीजिये।

भगवान् ने देवों की प्रार्थना स्वीकार की और—

पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृप॥8॥

वा. रा., 16 सर्ग

अर्थ—राजा दशरथ को पिता भाव में स्वीकार कर, इसे देवों को जता दिया।

सचाप्य पुत्रो नृपतिस्तस्मिन्काले महाद्युतिः।

अयजत्पुत्रियामिष्टिं पत्रेप्सुररिसुदनः॥9॥

सकृत्वा निश्चयंविष्णु रामन्त्रय च पितामहम्॥10॥

वा. रा. 16 वाँ सर्ग

अर्थ—जिस समय महा कान्ति वाले राजा दशरथ जी पुत्रेष्टि यज्ञ करने लगे, उसी समय विष्णु भगवान ने पुत्र बनकर उनके यहाँ अवतार लेने का सुस्थिर निश्चय किया।

कुलस्य वर्धनं तत्तु कर्तुमर्हसि सुव्रत।

तथेतिचसराजान मुवाच द्विज सत्तम॥59॥

—वाल्मीकि रामायण आदि काण्ड 14 सर्ग

अर्थ—हे सुव्रत! जिससे मेरे वंश की रक्षा हो, आप उसका ही अनुष्ठान कीजिए। ऋष्य शृंग ने तथास्तु कह कर−कहा−॥59॥

भविष्यन्ति सुता राजं श्चत्वारस्ते कुलोद्वहाः॥60॥

अर्थ—हे राजन्! तुम्हारे चार पुत्र वंश बढ़ाने वाले होंगे॥60॥

मेधावीतुततोध्यात्वा स किंचिदिदमुत्तरम्।

लब्ध संज्ञास्तस्तं तु वेदज्ञो नृपमऽब्रवीत्॥1॥

इष्टिं तेहं करिष्यामि पुत्रीयां पुत्र कारणात्॥

अथर्व शिरसि प्रौक्तैर्मन्त्रै सिद्धां विधानतः॥2॥

वा. रामायण 65 सर्ग

अर्थ—तदनन्तर मेधावी−वेदज्ञ महर्षि कुछ देर तक चिन्ता कर के बोले॥1॥ हे राजन्! मैं आपको पुत्र उत्पन्न होने के लिए अथर्वण में कहे हुए मन्त्रों से सिद्धि देने वाला पुत्रेष्टि यज्ञ कराऊँगा।

राजा अंग को पुत्र नहीं था। उपाय पूछने पर राजा के सभासद कहते हैं:—

नरदेवेह भवतो नाघं तानन्मनाक्स्थितम्॥ अस्त्येकं प्रोक्तमनघं यदि हे दृक्त्वम् प्रजेः॥31॥ तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सुप्रजं नृप॥ इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥32॥

अर्थ—सभासदों ने कहा—हे नरोत्तम! इस जन्म में तो आपने कोई पाप नहीं किया है, परन्तु अवश्य ही कोई पूर्व जन्म का पाप है, जिससे आप पुत्र हीन हैं। इसलिए आप पुत्र पाने की साधना करें। आप यही कामना लेकर यज्ञ भोक्ता भगवान का यज्ञ द्वारा यजन करें, जिससे वे आपको पुत्र प्रदान करेंगे।31−32। पुत्र कामी राजा अंग को ऋषिगण कह रहे हैं:—

तथा स्व भागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौ कसः॥

तथा ष्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः।

यद्यज्ञ पुरुषः साक्षादपत्याय हरिवृर्तः॥33॥

ताँस्तान्कामान्हरिर्दद्यान्यान्कामयते जनः।

आराधितो यथैवैषां तथा पुंसां फलोदयः॥34॥

इति व्यवसिता विप्रास्तस्य राज्ञः प्रजातये।

पुरोडाशं निरवपञ्छिवि विष्टाय विष्णवे॥35॥

तस्मात् पुरुष उत्तस्यो हेममाल्य मलांवरः।

हिरण्यमयेन पात्रेण सिद्धमादाय पायसम्॥36॥

—भागवत्, च. स्क. 13 अ.

अर्थ—तदुपरान्त देवता भी अपना अपना भाग ग्रहण करेंगे, क्योंकि पुत्र प्राप्ति की कामना से जब आप यज्ञ पुरुष का यजन करेंगे, तो उस यज्ञ में, यज्ञ पुरुष के साथ देवगण भी स्वतः ही आयेंगे॥33॥

पुरुष, जिस मनोरथ के लिये यज्ञ द्वारा भगवान् यज्ञ पुरुष का यजन करते हैं, भगवान उनकी वही आशा पूरी करते हैं, क्योंकि भगवान भावना के अनुसार ही फल प्रदान करते हैं॥34॥

विप्नों के द्वारा ऐसा सुनिश्चित विचार प्राप्त कर राजा ने यज्ञ भगवान के प्रसन्नार्थ पुरोडाश का हवन किया।।35।।

जब पुरोडाश का हवन विष्णु भगवान को मिला, तो उसी कुँड से, पहने हुए स्वर्ण हार तथा श्वेत वस्त्र धारण किये, हाथ में स्वर्ण थाल में खीर लिये एक दिव्य पुरुष प्रकट हुआ, जिसका सबों ने दर्शन किया॥36॥

स विप्रानुमतो राजा गृहीत्वाञ्जलिनौदनम्।

अवघ्राय मुदायक्तं प्रदात्पत्न्या उदारधीः॥37॥

सा तत्पुंसवनं राज्ञी प्राश्यर्तौ पत्युराधते।

गर्भ काल उपावृत्ते कुमारं सुषुवेऽप्रजा॥38॥

—भागवत

अर्थ—विप्रों की अनुमति से राजा ने उस पुरुष के हाथ से खीर लेकर प्रसन्नता से सूँघा और अपनी पत्नी को खाने के लिये दे दिया॥37॥

रानी ने खीर खाकर पति के गर्भ को धारण किया और समय पूरा होने पर पुत्र उत्पन्न किया॥38॥

श्री शुक्रदेव जी कहते हैं:—

इत्यर्थितं स भगवान् कृपालु ब्राह्मणः सुतः।

श्रपयित्वा चरुं त्वाष्ट्रं त्वष्टारम यज्ञद्विजम्॥27॥

ज्येष्ठा श्रेष्ठा च या राज्ञो महिषीणाँ च भारत।

नाम्ना कृतद्यु तिस्तस्तस्यै यज्ञोच्छिष्ट मदाद्विज॥28॥

—भागवत पुराण, छ. स्क., 14 अ.

अर्थ—जब राजा चित्रकेतु ने अंगिरा ऋषि की प्रार्थना की, तो ब्रह्मा के पुत्र परम दयालु अंगिरा ऋषि ने उसी समय त्वाष्ट्र चरु लेकर उसे सिद्ध क्रर त्वष्टा की पूजा करवाई और यज्ञ किया ॥27॥

हे भारत! (परीक्षित!) यज्ञ समाप्त होने पर, राजा की अनेकों रानियों में जो सब से श्रेष्ठ और बड़ी कृताद्युति थी, ब्रह्मर्षि अंगिरा ने उसे यज्ञ का शेष अन्न (यज्ञोच्छिष्ट) दिया।

सापि तत्प्रशनादेव चित्रकेतोरधारयत्। गर्भ कृतद्यु तिर्देवी कृतिकाऽग्नेरिवात्मज॥30॥ अथकाल उपावृत्ते कुमारः समजायत। जनयञ्छूर सेनानां शृण्वतां परमांमुदम्॥32॥ दृष्टो राजा कुमारस्य स्नातः शुचि रलंकृतः। वाचयित्वाऽऽशिषो विप्रैः कारयामासजातकम्॥33॥

अर्थ—यज्ञ शेष (चरु) भोजन करके चित्रकेतु की रानी कृतद्युति ने—जिस भाँति कृत्तिका ने अग्नि की आत्मा को धारण किया था, उसी भाँति धारण किया॥30॥

इसके पीछे जब गर्भ मास पूर्ण हो गये, तब राजकुमार उत्पन्न हुआ। पुत्र का जन्म सुनकर शूरसेन देश निवासियों को अपार आनन्द प्राप्त हुआ॥32॥

राजा चित्रकेतु पुत्र का जन्म श्रवण कर, आनन्द सागर में निमग्न हो गया। शान्त चित्त से स्नान−ध्यान कर, पवित्र हो स्वच्छ वस्त्र धारण किया और विध पूर्वक ब्राह्मणों से आशीर्वाद प्राप्त कर, अपने पुत्र का जातकर्म संस्कार सविधि सम्पन्न किया॥33॥

श्री शुकदेव मुनि, मनु की वंश−परम्परा का वर्णन करते हुए कहते हैं—

तस्याविक्षित यस्य मरुतश्चक्रवर्त्य भूत।

संवर्त्तो ययाजद्यं वै महायोग्यं गिरिस्सुतः॥26॥

मरुतस्य यथायज्ञो न तथा अन्यश्च कश्चन।

सर्वं हिरण्यं त्वासीद्यत्किञ्चिच्चास्य शोभनम्॥27॥

अमाद्यादिन्दुः सोमेन दक्षिणाभि द्विजातयः।

मरुतः परिवेष्टारो विश्वेदेवा सभासद॥28॥

—भागवत., नवाँ स्क., दू. अ.

अर्थ—करन्धम के पुत्र अवीक्षित, अवीक्षित के मरुत, जो चक्रवर्ती राजा मुए; जिनको, अंगिरा के पुत्र महायोगी संवर्त्त ने यज्ञ कराया था॥26॥

इस मरुत के यज्ञ के समान किसी का यज्ञ प्रसिद्ध नहीं है। उनके यज्ञ में सभी पात्र स्वर्ण के थे। इनके यज्ञ में सोमपन करके सुरेन्द्र बहुत प्रसन्न हुए। अधिकतम दक्षिणा पाकर ब्राह्मण हर्षित हो रहे थे। इस महायज्ञ में मरुद्गण परोसने वाले और विश्वेदेव गण सभासद हुए थे॥27।25॥

कृश्वाश्वात् सोमदत्तोऽभूद्योऽश्वमेघैरिऽपतिम्।

इष्ट्वा पुरुषा मापाग्रया गतिं योगेश्वराश्रितः॥35॥

—भाग., नवम् स्कन्ध, दूसरा अध्याय

अर्थ—उनमें (मनुवंश में) कृशाश्व का पुत्र सोमदत्त हुआ, जिसने अनेकों अश्वमेध यज्ञ करके यज्ञपति भगवान की पूजा की और फल स्वरूप उन्होंने योगीश्वरों को प्राप्त होने वाली उत्तम गति की प्राप्ति की।

श्री शुकदेव जी मनुवंश परम्परा का वर्णन करते हैं:—

अप्रजस्य मनोःपूर्वं वशिष्ठो भगवान्किल। मित्रावरुणस्याष्टिं प्रजार्थमकरोत्प्रभु॥13॥ तत्र श्रद्धा मनोः पत्नी होतारं समयाचत। दुहितर्थमुपागम्य प्राणिपत्य पयोव्रता॥14॥ भा., न. स्क. - प्र. अ.

अर्थ—इक्ष्वाकु आदि पुत्रों के पहिले मनु जी निःसन्तान थे, इसलिये महर्षि वशिष्ठ जी ने उनसे मित्रावरुण का यज्ञ कराया॥13॥

मनु की भार्या श्रद्धा ने, जो उस यज्ञ में पयोव्रत धारण किये हुई थीं—जो विधिपूर्वक केवल दूध पीकर ही यज्ञ संलग्न थीं, वह होताओं के निकट गयी और उन्हें प्रणाम करके प्रार्थना की कि आप ऐसा होम करें, जिससे मुझे कन्या उत्पन्न हो॥14॥

प्रेषिणो उर्ध्वयुणा होता यत्तया सुसमाहितः।

हविषि व्यचरेत् तेन वषट्कारं गृणन्द्विजः॥15॥

होतुस्तद्वयभिचारेण कन्येला नाम साऽभवत्।

ताँ विलोक्य मनुः प्राह नाति हृष्टमना गुरुम्॥16॥

भगवन् किमिदं जातं कर्म वो ब्रह्मवादियाम्।

विपर्य्ययमहो कष्टं मैवं स्याद् ब्रह्मविक्रिया॥17॥

—भागवत्, न. स्क., प्र. प्र.

अर्थ—श्रद्धा की प्रार्थना से “अहै यज्ञकर” इस प्रकार अध्वर्यु ने प्रेरित हो, होता ने हवि के ग्रहण हो जाने पर, मन में इस प्रकार का ध्यान और मुख से ‘वषट्’ शब्द उच्चारण करके मनु पत्नी की प्रार्थना को पूर्ण किया॥15॥

होता के ऐसा आचरण करने के कारण मनु को ‘इला’ नामिका कन्या की प्राप्ति हुई। पुत्र प्राप्ति की चाहना पूरी नहीं होने के कारण मनु ने असन्तुष्ट भाव से महर्षि वशिष्ठ से कहा:—॥16॥ हे भगवन्! आप ब्रह्मवादी हैं, आप लोगों द्वारा किये यज्ञ का फल विपरीत कैसे हो गया? इस भाँति मन्त्र और यज्ञ के उल्टे परिणाम होने से आह! मुझे कितना कष्ट है? ऐसा तो नहीं होना चाहिये॥17॥

यूयं मन्त्रविदो युक्रास्तपसा दग्ध किल्विषा।

कुतः संकल्प वैषस्यमनृतं विबुधेष्विव॥18॥

त्तन्निशम्य वचस्तस्य भगवान् प्रपितामह।

होतुर्व्यतिक्रमं ज्ञात्वा वभाषे रविनन्दनम्॥19॥

—भागवत्, न. स्क. प्र. प्र.

अर्थ—आप मन्त्र ज्ञाता हैं। तप से आप के सभी पाप नष्ट हो गये हैं, देव लोगों के बीच अमृत के समान जो आपका संकल्प है, उसकी सब लोगों के बीच यह विषमता कैसे हुई? मनु की बात सुनकर महर्षि वशिष्ठ जी ने होता के व्यभिचार को जान लिया और मनु से बोले:—॥18।19॥

एतत् संकल्प वैषम्यं होतुस्ते व्यभिचारतः।

तथाऽपि साधयिष्येते सुप्रजस्त्वं स्वतेजसा॥20॥

—भागवत, नवम स्कन्ध प्र. अ.

अर्थ—हे वत्स! यह संकल्प का वैषम्य तुम्हारे होताओं के व्यभिचार के कारण हुआ है, किंतु (यज्ञफल की अव्यर्थता के लिये) फिर भी मैं तुम्हें पुत्र ही दूँगा।

मनु पुत्र सुद्युम्न, शिव−विहार वन में जाने के कारण, एक महीना पुरुष तथा एक महीना नारी बनकर रहने लगे। अतः वैवस्वत् मनु ने पुनः अन्य पुत्र की कामना की और—

ततोयजन्मनुर्देवमपत्यार्थं हरिं प्रभुम्।

इक्ष्वाकु पूर्वजान् पुत्रान् लेभे स्वसद्दशान्॥2॥

भागवत्, नवम स्क., दू. अ.

अर्थ—मनु ने भगवान वासुदेव का यज्ञ, सन्तान की कामना से किया। इस यज्ञ को करने से उन्हें दश पुत्रों की प्राप्ति हुई, जिनमें इक्ष्वाकु सबसे बड़े थे।

राजा दिलीप को सन्तान नहीं होती थी। सन्तान के हेतु वे पत्नी सहित (महर्षि) वशिष्ठ गुरु के आश्रम में रहे। वहाँ वे गुरु की गायें चराते थे और आश्रम के यज्ञीय वातावरण में रह कर निरन्तर औषधि सेवन करते रहते−वैसा यज्ञ धूम्र शरीर में प्रवेश करने के स्वर्णिम अवसर प्राप्त करते थे। इस साधना से दिलीप को बड़ा ही प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ।

युवनाश्व के पुत्र नहीं था—

भार्य्या शतेन निर्विगण ऋषयोऽस्य कृपालवः।

इष्टिं स्म वर्तयाँचक्रु रैन्द्री ते सु समाहितः॥26॥

राजा तदज्ञ सदनं प्रविष्टो निशि तर्षितः।

दृष्ट्वा शयानाम् विप्रा स्तान् पपौ मन्त्र जल स्वयम्॥27॥

उत्थितास्ते विशम्याथ वयुदकं कलशं प्रभो।

प्रपच्छु कस्य कर्मेयं पीतं पुँसवनं जलम्॥28॥

राज्ञा पीतं विदित्वाथ ईश्वर प्रहितेन ते।

ईश्वराय नमस्चक्रु रहो दैव बलं बलं॥29॥

—भाग., भ., स्क., प्र. अ.

अर्थ—युवनाश्व को सौ पत्नियाँ थीं, किन्तु संतान के अभाव में वे शोकाकुल ही रहते थे। वनवासी ऋषियों को राजा पर दया आ गयी। वे सावधानता पूर्वक राजा से ‘इन्द्रदैवत्य’ यज्ञ कराने लगे। हे राजन्! अब आश्चर्य की बात सुनो। जब यज्ञ हो ही रहा था, तभी एक रात में राजा युवनाश्व प्यास से आकुल हो यज्ञशाला गया। उस समय यज्ञ कराने वाले सभी सो रहे थे। प्यास की तीव्रता में राजा ने उठा कर वह जल पी लिया, जो जल, राजा की पत्नी के पीने के लिए रक्खा गया था। जब ऋत्विज् गण जागे तो देखा कि कलश में जल नहीं है। विस्मित हो पूछा:—यह कर्म किसका है? किसने पुत्र उत्पन्न करने वाला जल पी लिया? जब ज्ञात हुआ कि ईश्वर प्रेरित हो राजा ने ही वह जल पी लिया है, तब सभी भगवान् को प्रणाम करते हुए कहने लगे कि—

भाग्य बड़ा बली है, पुरुष का बल उसके सामने तुच्छ है।

ततःकाल उपाबृते कुक्षिं निर्भिद्य दक्षिणम्।

युवनाश्वस्य तनयश्चक्रवर्ती जनान ह॥30॥

—भा. न. प., प्र. अ.

अर्थ—समय पूरा होने पर युवनाश्व की दक्षिण कुक्षि फाड़कर चक्रवर्ती के लक्षणों से युक्त पुत्र (मान्धाता) उत्पन्न हुआ।

कोशल देश के देवदत्त नामक ब्राह्मण ने तमसा नदी के किनारे बड़े−बड़े ऋषियों को एकत्रित कर पुत्रेष्टि यज्ञ को विधि पूर्वक संपन्न किया। यज्ञ पूर्ण होने पर उसे पुत्र की प्राप्ति हुई।

पराशर मुनि कहते है:—

ततोऽस्य बितथे पुत्र जन्मनि पुत्रार्यिनो मरुत्सोम याजिनो दीर्घ तपसः पाष्यर्य पास्ताद बृहस्पति वीर्यादुतथ्य पत्नयां ममतायां समुत्पन्नो भरद्वाजख्यः मरुद्भिर्दत्तः॥16॥

—विष्णु पुराण, च. अं., अ. 19

पुत्र जन्म के विफल हो जाने से भरत ने पुत्र की कामना से मरुत्सोम नामक यज्ञ किया। उन यज्ञ के अन्त में मरुद्गण ने उन्हें भरद्वाज नामक पुत्र दिया, जिसकी उत्पत्ति बृहस्पति के वीर्य और ममता के गर्भ से हुआ था।

राजा उग्रसेन तथा उसकी पत्नी ने अपने मरे हुए पुत्र प्राप्ति की इच्छा की, यह सुनकर श्री कृष्ण भगवान ने कहा:—

अश्वमेधं क्रतुवरं कुरु धैर्य्येण भूपते।

दर्शयिष्याम्यहं सर्वान्यज्ञास्यां ते च सुतान॥36॥

—गर्ग संहिता, अ. ख., अ. 13

अर्थ—है भूपते! आप यज्ञश्रेष्ठ अश्वमेध का अनुष्ठान कीजिये। इस यज्ञ के प्रभाव से मैं तुम्हारे सभी मरे हुए पुत्रों का दर्शन करा दूंगा।

सर्व समर्थ भगवान भी ऐसा कराके यज्ञ का निश्चित महत्ता का संस्थापन ही करते हैं।

जिनकी सन्तान स्वर्गवासी हो चुकी है, पर जिन्हें अपने स्वर्गीय बालकों से अधिक मोह है, वे यज्ञ के प्रभाव से अपनी सन्तान का स्वप्न आदि में दर्शन और सम्भाषण का अवसर प्राप्त कर सकते हैं तथा अपनी या परिवार की किसी अन्य स्त्री की कुक्षि से उस बालक की आत्मा को पुनः अवतरित कर सकते हैं।


शत्रु संहार में यज्ञ का उपयोग

यज्ञों द्वारा सदा सात्विक शक्ति तो उत्पन्न होती ही है। डडडड का कल्याण और उत्कर्ष करने वाला सतोमुखी वातावरण तो बनता ही है, साथ ही ऐसे तत्व भी यज्ञ द्वारा उत्पन्न होते हैं, जो शत्रुता, संकट और विरोध का सामना करने में पर्याप्त रूप से समर्थ होते हैं। विपत्ति में पड़ा हुआ मनुष्य, विपत्ति निवारण के लिए उग्र, प्रचण्ड एवं महाघोर शक्ति को भी उत्पन्न कर सकता है। इसके कुछ उदाहरण नीचे देखिये:—

परीक्षित को जब तक्षक नाग ने (डस) दंशन कर स्वर्गवासी बना दिया तो उसके पुत्र जन्मेजय ने सर्प (नाग) यज्ञ करके समस्त सर्पों को नष्ट कराने—प्रतिशोध लेने की ठानी। यज्ञीय मन्त्रों में वह शक्ति है, जो किसी बलवान से बलवान को भी खींच ला सकती है। सर्प यज्ञ का उद्देश्य यही था कि मन्त्रों द्वारा खींच खींच कर, सर्पों को यज्ञ कुण्ड की अग्नि में भस्म कर दिया जाय।

इस यज्ञ का वर्णन महाभारत आदि पर्व में इस प्रकार आता है:—

प्रावृत्य कृष्ण वासाँसि धूम्र संरक्त लोचनाः।

जुहुवुमन्त्रवच्चैव समिद्धं जातवेदसम्॥2॥

कम्पयन्तश्च सर्वेषामुरगाणाम् मनांसि च।

सर्पाना जुहुवुस्तत्र सर्वानग्नि मुखै तदा॥3॥

—महाभारत, आ. प., 52 वाँ अ.

अर्थ—वे ऋत्विक् काले वस्त्र पहन कर और धूम से लाल−लाल आंखें वाले हो कर, प्रज्वलित अग्नि में मन्त्रों के साथ हवन करने लगे। इस घोर यज्ञ क्रिया से सब सर्पों के मनों को कम्पायमान करते हुए ऋत्विक् गण, उनका अग्नि में आवाहन करने लगे।

क्रोश योजन मात्राहि गोकर्णस्य प्रमाणतः। पतन्तयजस्रं वेगेन बह्माग्निमतांवर॥7॥ एवं शत सहस्राणि प्रयुतान्यर्बुदानि च। अबशानि विनिष्ट्रानि पन्नगानां तु तत्र वै॥8॥

अर्थ—कोई कोस भर के, कोई चार कोस के तथा कोई गोकर्ण के सदृश आकार वाले सर्प आ−आकर, लगातार उस अग्नि में वेग से गिरने लगे। इस भांति, शत, सहस्र, दश सहस्र, लाख, अरब संख्या में सर्प गण अबश हो कर उस प्रचंड यज्ञाग्नि में नष्ट हो गये।

तक्षस्तु स नागेन्द्रः पुरन्दर निवेशनम्। गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जन्तेजयम्॥14॥

महाभा, आदि पर्व, 53 वाँ अ.

अर्थ—तक्षक ने ज्यों ही सुना कि राजा जन्मेजय सर्प यज्ञ में दीक्षित हुए हैं, त्यों ही वह शीघ्रता पूर्वक भाग कर इन्द्र के लोक में चला गया।

इन्द्र ने उसे अपनी शरण में रख लिया।

जन्मेजय उवाच:—

यथा चेदं कर्म समाप्यते में तथा च वै तक्षक इति शीघ्रम्। तथा भवन्तुः प्रियतन्तु सर्वे परं शक्त्या स हि में विद्विषाणः॥4॥ ऋत्विज् ऊचु:—

यथा शास्त्राणि नः प्राहुर्यथा शंसति पावकः। इन्द्रस्य भवने राजंस्तक्षको भय पीडितः॥5॥

पुराण मागम्ब ततो व्रवीम्यहं दत्तं तस्मै वरमिन्द्रेण राजन्। वसेह त्वं मत्सकाशे सुगुप्तो न पावकस्त्वां प्रदहिष्यतीति॥7॥

अर्थ—जन्मेजय ऋत्विजों से कहने लगे:—

जिस प्रकार मेरा यज्ञ सिद्धि के साथ समाप्त हो और तक्षक आकर शीघ्र भस्म हो जाय, आप लोग सभी यही घनीभूत प्रयत्न करें क्योंकि मेरा परम शक्ति शाली शत्रु तो तक्षक ही है।

ऋत्विजों ने उत्तर दिया:—

है राजन्! जो यह अग्नि सूचित कर रहे हैं, वही हमारे शास्त्र भी कह रहे हैं कि भयभीत तक्षक इन्द्र के भवन में जा कर छिप गया हैं।

हे राजन्! मैं पुराण का गम्भीरता से मनन कर आप से कहता हूँ कि इन्द्र ने उसे यह वरदान भी दे दिया है कि इन्द्र ने उसे यह वरदान भी दे दिया है कि तू मेरे पास में निवास कर, अग्नि तुझे जला न सकेगा।

एतच्छुत्वा दीक्षितस्यतप्यमान आस्ते होतारं चोद यर्त्कम काले। होता च यत्तो स्याऽऽजुहावाऽथ मन्त्रै रथो। महेन्द्रः स्वयमाजगाम॥8॥ विमानमारुह्यं महानुभावः सर्वैर्देवैः परिसंस्तूयमानः। बलाहकैश्चाप्यनुगम्यमानो विद्याधरैरपसस्यां गणैश्च॥9॥

—महाभारत, आदि पर्व, 56 वाँ अध्याय

अर्थ—यह सुन कर यज्ञ दीक्षा में स्थित राजा तापित होकर होताओं को तक्षक के आवाहन के लिये प्रेरणा करने लगे। होता गण भी बड़ी सावधानता और प्रयत्न के साथ मन्त्रों से हवन करने लगे, जिस से मेघ, विद्याधर और अप्सराओं से अनुगम्यमान स्वयं इन्द्र विमान पर बैठ कर, यज्ञ कुण्ड में गिरने के लिये आकाश में आ खड़ा हुआ।

जन्मेजय उवाच:—

इनद्रस्य भवने विप्रा यदि नागः स तक्षकः। तमिनद्रेणैव सहितं पातयध्वं विभावसौ॥11॥ सौतिरुवाच:— जन्मेजयेन राज्ञा तु नोदिस्तक्षकं प्रति। होता जुहाव तत्रस्थं तक्षकं पन्नगं तथा॥12॥ हूयमाने तथा चैव तक्षकः सपुरन्दरः। आकाशे ददृशे चैव क्षणेन व्यवस्थितस्तदा॥13॥

—महाभारत, आ. प., अ. 56

अर्थ—जन्मेजय बोला कि हे ब्राह्मणो! यदि इन्द्र की शरण में भी तक्षक पहुँच गया है, तो इन्द्र के साथ−साथ इस यज्ञ की अग्नि में उसकी आहुति दे डालो॥11॥

सूतपुत्र बोले:—जब राजा जन्मेजय ने तक्षक के उद्देश्य से होता को प्रेरित किया तो ऋत्विज् गणों ने आकाश में स्थित इन्द्र सहित तक्षक को हवन करने के लिये मन्त्रों से आवाहन किया ॥12॥ जिस क्षण इन्द्र सहित तक्षक के नाम मन्त्र पढ़ कर अग्नि में आहुति दी गयी, उसी क्षण इन्द्र सहित तक्षक व्याकुल हुआ आकाश में दिखाई देने लगा॥13॥

इस विपन्न अवस्था के बीच ऋषिकुमार आस्तीक न बहुत ही महत्वपूर्ण काम किया। उसने जन्मेजय को प्रसन्न कर सर्प यज्ञ बन्द करने का वरदान लिया। इससे यज्ञ और यज्ञीय−मन्त्रों की शक्ति की प्रत्यक्ष बलवत्ता के दर्शन के संग इन्द्र तथा अवशिष्ट सर्पों सहित तक्षक के प्राणों की भी रक्षा हो गयी।

मैत्रेय जी के जिज्ञासा करने पर श्री पराशर मुनि कहते हैं:—

श्वामित्र प्रयुक्तेन रक्षसा भक्षितः पुरा। श्रु तस्तातस्ततः क्रोधो मैत्रेया भन्ममातुल॥13॥ ततोऽहं रक्षसा सत्रं विनाशाय समारभम्। भस्मी भूताञ्च शतशस्तास्मिन्सत्रे निशाचराः॥14॥

अर्थ—हे मैत्रेय! जब मैंने सुना कि विश्वामित्र की प्रेरणा से मेरे पिता को राक्षसों ने खा लिया हे, तो मुझे असीम क्रोध हुआ और तब राक्षसों को ध्वंस करने के लिये मैंने सत्र (यज्ञ) आरम्भ किया। उस उग्र यज्ञ में अनगिनत राक्षस जलकर भस्म हो गये।

इन्द्र ने सन्देह करके त्वष्टा के पुत्र विश्व रूप को मार डाला। इसके बाद पुत्र की मृत्यु से दुखी त्वष्टा ने इन्द्र से बदला लेने के लिये “उसका ऐसा शत्रु उत्पन्न हो” संकल्प करके अभिचार−यज्ञ किया। उस यज्ञ से अत्यन्त भयंकर वृत्रासुर का जन्म हुआ।

पुरा सुमेरु शिखरे काञ्चने रत्न पर्वते।

स्वर्गंगायास्तटे ब्रह्मा यज्ञं यजात भाव

तस्मिनयज्ञे स ददृशे विघ्नं खे लोहं दानवम्।

विघ्नस्य शमनं तस्य चिन्तयामास तत्ववित्॥

तदा चिन्तयतस्तस्य पुरुषः पावका द्बभौ।

नीलोत्पल दल श्यामः स्वरुचा वाञ्चितेक्षण॥

अभ्यनन्दन्त जातेन येनदेवास्समासबाः।

तस्मात्स नन्दको नामः खड्गरत्नम् भूत्तदा॥

तं दृष्ट्वा भगवान् ब्रह्मा केशवम् वाक्यमबव्रवीत।

खंग गृह्णीष्व गोप्तारं धर्मस्य जगताँ पते॥

यज्ञ विध्नकरं हत्वा खंगेनानेन केशव।

निपातय महाबाहो बलिनं लोह दानवम्॥

खंगेन तस्य गात्रणि चिच्छेद मधुहारणे।

खंगच्छिन्नानि गात्राणि नाना देशेषु भूतले॥

निपेतुस्तस्य धर्मज्ञ शतशोऽथ सहस्रशः।

नन्दकस्य तु संस्पर्शात्तानि गाबाणि भार्गव॥

—विष्णु धर्मोत्तर पुराण अ, 17 श्लोक 1,2,3,5,6,7,14,15

अर्थ—प्रथम कञ्चनमय सुमेरु पर्वत के शिखर पर, स्वर्गंगा के किनारे ब्रह्मा जी ने यज्ञ किया। उस यज्ञ में ब्रह्मा जी ने विघ्न करने वाले लोह नामक राक्षस को आकाश में देखा। तब ब्रह्मा जी विघ्न शान्त करने का उपाय सोचने लगे। ब्रह्मा जी के चिन्ता करते ही उस यज्ञाग्नि से नील कमल सदृश श्याम शरीर वाला एक पुरुष उत्पन्न हुआ। प्रकट होने वाले पुरुष ने देवताओं सहित ब्रह्मा जी की वन्दना की तब नन्दक नामक खंग प्रकट हुआ। खंग को देखकर ब्रह्मा जी ने केशव भगवान् से कहा—हे जगत्पते। आप धर्म की रक्षा करने वाले खंग को ग्रहण कीजिये, हे केशव! इस खंग से यज्ञ के विघ्न करने वाले बलवान लोह दानव को मार गिराओ, इतना कहने पर भगवान् मधुसूदन ने युद्ध में खंग से उस लोह दानव के अंगों को काट डाला। खंग से कटे लोह दानव के अंग सैकड़ों हजारों टुकड़े होकर विभिन्न देशों में गिरे।

असुरों से परास्त होने पर, देवताओं की आत्म रक्षा करने के जब जब प्रसंग आये हैं, तब तब यज्ञ रूपी ब्रह्मास्त्र का ही सहारा लेना पड़ा है। देवताओं की विपत्ति निवारण करने में सदा यज्ञ ही सहायक हुआ है।


यज्ञ द्वारा पापों का प्रायश्चित

मनुष्य बहुधा अनेक भूल और त्रुटियाँ जान एवं अनजान में करता ही रहता है। अनेक बार उससे भयंकर पाप भी बन पड़ते हैं। पापों के फल स्वरूप निश्चित रूप से मनुष्य को नाना प्रकार की नारकीय पीड़ायें चिरकाल तक सहनी पड़ती हैं। पातकी मनुष्य की भूलों का सुधार और प्रायश्चित भी उसी प्रकार सम्भव है, जिस प्रकार स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों के तोड़ने पर रोग हो जाता है, और उससे दुःख होता है, तो थोड़ी चिकित्सा आदि से उस रोग का निवारण भी किया जा सकता है। पाप का प्रायश्चित्त करने पर उसके दुष्परिणामों के भार में कमी हो जाती है और कई बार तो पूर्णतः निवृत्ति भी हो जाती है। पाप के प्रायश्चितों में यज्ञ को सर्वोत्तम प्रायश्चित्त शास्त्रकारों ने कहा है:—

गार्भैर्होमैर्जातकर्म चौड मौञ्ची निबन्धनैः।

वैजिकं गार्भिकं चैनो द्विजानामपमृज्यते॥27॥

—मनुस्मृति, दूसरा अध्याय।

अर्थ—गर्भाधान, जातकर्म, चूड़ाकर्म और मौंजी-बन्धन संस्कार करने, के समय हवन करने से वीर्य और गर्भ की त्रुटियों और दोषों की परिशुद्धि हो जाती है।

महायज्ञैश्च यज्ञैश्व ब्राह्मीयं क्रियते तनुः॥28॥

—मनुस्मृति, दूसरा अध्याय

अर्थ—महायज्ञ और यज्ञ करने से ही यह शरीर ब्राह्मी या ब्राह्मण बनता है।

शेष जी, भगवान् रामचन्द्र से कहते हैं:—

सर्वं सपापंतरतियोऽश्वमेधंयजेतवै।

तस्मात्त्त्रं यजविश्वात्मन्वाजिमेधेन शोभिना॥

पद्म महा पु., पा. ख.8, श्लोक 31

अर्थ—शेष भगवान श्री रामचन्द्र जी से कहते हैं कि सब पापों में रत व्यक्ति भी यज्ञ करने से पाप मुक्त हो जाता है। अतः हे राम! आप भी सुन्दर मेध करें।

सवाजिमेधो विप्राणां हत्यायाः पापनोदनः।

कृतवान्यं महाराजो दिलीपस्तव पूर्वजः॥

पा॰ महा पु., पा खं.8, श्लोक 33

अर्थ—शेष जी कहते हैं कि हे राम! ब्रह्म हत्या जैसे पापों को नष्ट करने वाला महायज्ञ कीजिये, जिसे आपके पूर्वज महाराज दिलीप कर चुके हैं।

हयमेधं चरित्वा से लोकान्वैपावयिष्यति!

यन्नामब्रह्महत्यायाः प्रायश्चिते प्रदिश्यते॥

पा. महा पु., पा. खं.,अ.23, श्लोक 58

अर्थ—सुमति कहती है कि महायज्ञ करने से लोक पवित्र हो जाते हैं, यह ब्रह्महत्या का प्रायश्चित है। इससे ब्रह्महत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है।

ब्रह्महत्या सहस्राणि भ्रूणहत्या अर्बुदानि च।

कोटि होमेन नश्यन्ति यथावच्छिव भाषितम्।।

मत्स्य पु., अ., श्लोक 139।।

शिवजी का वचन है कि सहस्रों ब्रह्महत्यायें, अरबों भ्रूण इत्यादि पाप, कोटि आहुतियों का हवन करने से नष्ट हो जाते हैं।

कलि मागत माज्ञाय कृतमानसैः॥

आदि पुराण 2।22

अर्थ—कलि के दुर्गुणों से बचने के लिए यज्ञ की अभिलाषा की गई।

जब महाभारत समाप्त हो गया तो, पाण्डवों को व्यास जी ने यज्ञ करके अपने पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए प्रेरणा दी:—

तपोभिः क्रतुमिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर।

तरन्ति नित्यं पुरुपाये स्म पापानि कुर्वते॥

यज्ञेन तपसा चैव दानेर च नराधिप।

पूयन्ते नरशार्दूल नरादुष्कृति कारिणः॥

असुराश्व सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मखक्रियाम्।

प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद्यज्ञाः परायणाम्॥

यज्ञैरेव महात्मानो बभूवु रधिकाः सुराः।

ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन्।

राजसूयाश्वमेधौ च सर्व मेधं च भारत।

नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिर॥

महा. अ.3

अर्थ—हे युधिष्ठिर! मनुष्यगण सदैव बहुत से पाप कर्म कर, यज्ञ, तप, दान आदि के द्वारा उन पापों से छूट जाया करते हैं।

हे महाराज! पापियों की शुद्धि, यज्ञादि से हो जाती है।

यज्ञ के द्वारा ही देवता असुरों से अधिक प्रभावशाली बने। क्या देवता क्या असुर सभी, यज्ञ अपने-अपने पुण्य प्राप्ति और पाप निवृत्ति के लिए करते हैं।

अतः उपरोक्त कारणों से हे कौन्तेय! तुम भी दशरथ नन्दन भगवान् श्री रामचन्द्र जी के समान राजसूय, अश्वमेधादि यज्ञ करो।

*समाप्त*