(श्री नजीर अकबराबादी)
तन सूखा कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर जीन कसो बाबा। अब मौत नकारा बाज चुका, चलने की फिक्र करो बाबा॥
बटमार अजल का आ पहुँचा, टुक इसको देख डरो बाबा। अब अश्क बहाओ आँखों से, और आहें सर्द भरो बाबा॥
दिल हाथ उठा इस जीने से, बेबस मन मार मरो बाबा। तब बाप की खातिर रोते थे, अब अपनी खातिर रो बाबा॥
यह उम्र जिसे तुम समझे हो, यह हरदम तन को चुनती है। जिस लकड़ी के बल बैठे हो, दिन-रात यह लकड़ी घुनती है॥
तुम गठरी बाँधो कपड़े की, और देख अजल सिर धुनती है। अब मौत कफन के कपड़े का, या ताना बाना बुनती है॥
ये ऊंट किराये का यारो, सन्दूक जनाजा अरथी है। जब उस पर हो असवार चले,फिर घोड़ा है ना हस्ती है॥
किस नींद पड़े तुम सोते हो, ये बोझ तुम्हारा भारी है। कुछ देर नहीं अब चलने में, तैयार खड़ी असवारी है॥
तन सूखा कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर जीन कसो बाबा। अब मौत नकारा बाज चुका, चलने की फिक्र करो बाबा॥
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
नित्य अभ्यास द्वारा जब तक हमारे कुविचार पूर्ण नष्ट न हो जायं, हमें एक समय एक ही सत्य पर अपने मन को एकाग्र करने का सदा प्रयत्न करना चाहिए। तभी हमारा मन एकाग्रता को प्राप्त करेगा और तत्काल विचार-समूह नष्ट हो जायगा। पातंजली ने भी अपने योग सूत्र में कहा है—
“तत्प्रतिषेवार्थमेकतत्त्वाभ्यासः”।
मन के संकल्प स्वयं ही दुःख हैं। संकल्प का अभाव ही ब्रह्मानन्द है। संकल्प की कालिमा को विवेक और दृढ़ प्रयत्नों द्वारा नष्ट एवं दिव्य ज्योति को प्राप्त कर ब्रह्मानन्द के सागर में गोते लगाओ।
प्रत्येक विचार का एक मानसिक मूर्त-रूप होता है। विचार आदत बन जाते हैं। आदत ही परिस्थिति का रूप ग्रहण करती है। यदि एक बार भी अपने कार्य के विचार का ध्यान किया तो मन उस दिशा में अवश्य सोचना प्रारम्भ कर देगा। धीरे-धीरे वही आदत बन जायगी। आपके मन की सम्पूर्ण शक्ति उसी ओर प्रवाहित होने लगेगी। बार-बार सोचने के लिये आप मजबूर होंगे, अतः नित्य विचार, नित्य भावना और नित्य उद्गार को वश में करने की आवश्यकता है।
विचार एक महान् शक्ति है। “जैसा सोचोगे, वैसा बनोगे।” सोचो कि आप शक्ति हीन हैं, आप शक्ति हीन हो जाएंगे। अपने को मूर्ख समझो, सचमुच आप मूर्ख हो जाएंगे। ध्यान करो कि आप स्वयं परमात्मा हो, यथार्थ में आप परमात्मा का रूप प्राप्त कर लेंगे। प्रतिपक्ष-भावना का अभ्यास करो। क्रोध की हालत में प्रेम की भावना करो। निराशा में मन को आनन्द और उत्साह से भरो।
अन्ततः दुनिया केवल एक भावना अथवा विचार ही है। मन के संकल्प रहित होने पर दुनिया हवा हो जाती है और मन अवर्णनीय आनन्द में डुबकियाँ लगाता है। मन ने ज्यों ही विचार किया कि दुनिया तत्काल उसकी आँखों में झूल जाती है, और उससे पीड़ा का साम्राज्य शुरू हो जाता है।
कुविचार कैसे दूर किये जा सकते हैं? उन्हें भूल कर। कैसे भूलना चाहिए? उसमें पुनः न डूब कर। पुनरावृत्ति को कैसे रोका जा सकता है? अधिक आनन्ददायक दूसरी बात का ध्यान कर दुःख की उपेक्षा करो, भूलो। अधिक आनन्ददायक विषय का चिन्तन करो। यह महान् साधना है। गीता के दिव्य विचारों को मन में जमाओ। उपनिषद् और योगवाशिष्ठ के उन्नत विचारों का ध्यान करो। आत्मा में उन्मुख बन कर आन्तरिक ध्यान करो, विचार करो, तर्क करो। साँसारिक विचार, घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, क्रोध काम आदि भावनाएँ तत्काल नष्ट हो जायेंगी।
विचार और विचारक दोनों भिन्न हैं। इस बात को सदा याद रखो। यह इस बात का प्रमाण है कि ‘आप’ और मन पृथक् पृथक् हैं। आप तो केवल मनोत्पन्न भावनाओं के मौन प्रेक्षक हैं। आप तो कूटस्थ ब्रह्म हैं। आप प्रत्यागात्मा हैं।
जिस प्रकार गंगोत्री से निकलकर गंगा नित्य सागर की ओर बहती है, उसी प्रकार वासनामय मनोगत संस्कारों के उद्गम से निकल कर विचार-लहरें भी जागृत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में नित्य विषयों की ओर दौड़ती है। पहियों के अधिक गरम होने पर इंजन को भी इंजन शेड में भेज देते हैं, पर यह मन-रूपी रहस्यमय इंजिन तो सदा विचार-चक्र पर चलता ही रहता है। मस्तिष्क आराम चाहता है, पर मन नहीं। मनोनिग्रही योगी सदा जागता है। ध्यान ही में उसे विश्राम मिलता है। मन ही आत्म शक्ति है।
साधारण लोगों को एक ही समय चार-पाँच प्रकार के विचार आ घेरते हैं, यथा घर-गृहस्थी, व्यापार, आफिस, शरीर, खान-पान, आशा, धनोपार्जन, प्रतिशोध आदि के विचार। यदि आप 3-30 बजे ध्यान से किसी पुस्तक को पढ़ रहे हैं तो 4 बजे क्रिकेट मैच देखने का विचार तत्काल आकर आपके चित्त को चंचल कर देता है। केवल योगी ही, जिसने मन को एकाग्र कर लिया है, एक समय में एक ही विचार को रख सकता है।
मानसिक क्रियाएं ही सच्ची क्रियाएं हैं। विचार ही सच्ची क्रिया है। विचार प्रबल शक्ति है। छूत की तरह फैलता है। क्रोध का विचार आसपास के लोगों में भी क्रोध की भावना जाग्रत करेगा। इसी तरह सहानुभूति और आनन्द आदि के विचार दूसरों में भी इन्हीं भावनाओं को जाग्रत करेंगे। अतः विचार सदा दिव्य एवं उच्च रखो। बुरे विचार स्वयँ मर जाएंगे। दिव्य विचार बुरे विचारों को रोकने के लिए अचूक औषधि है।
साँसारिक प्राणी सदा काम के विचार तथा घृणा, क्रोध एवं प्रतिशोध के विचारों का शिकार होगा। उसका मन इन दोनों में ही फिरता है। इनका वह गुलाम है। उसे नहीं सूझता कि इनसे बच कर किस प्रकार अन्य विचारों पर मन केन्द्रित हो। मन की आंतरिक क्रियाओं से वह अनभिज्ञ रहता है। अपने अथाह ऐश्वर्य एवं विश्वविद्यालयों में प्राप्त थोथे ज्ञान के होते हुए भी उसकी दशा अत्यन्त शोचनीय है। विवेक से वह दूर रहता है। सन्त, शास्त्र और ईश्वर में उसे श्रद्धा नहीं है। दुर्बल इच्छा शक्ति के कारण वह बुरी भावना, लालसा एवं मोह के तूफान को रोकने में असमर्थ है। उसका उपाय तो सत्संग ही है।
किसी एक भौतिक जीवन की विभिन्न मानसिक मूर्तियों का सारभूत अंश मानसिक धरातल पर तोला जाता है। उसी की आधार-शिला पर दूसरे भौतिक जीवन का महल खड़ा है। प्रत्येक जन्म में जिस प्रकार नवीन शरीर बनता है, वैसे ही उसमें बुद्धि और मन का भी निर्माण होता है।
नित्य-उत्तेजित यह मन, अनंत ब्रह्म से उत्पन्न होकर अपने संकल्प के अनुसार जगत का निर्माण करता है। संकल्प ही संसार है, और उसका नाश मोक्ष है गीता में कहा भी है—“सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते।” सारे संकल्पों को छोड़ कर ही योग में आरूढ़ हो सकते हो।
विचार एक जीवित बल है- संसार में सर्वोच्च, गंभीरतम अटूट बल है। विचार जीवित पदार्थ हैं। उनमें गुरुत्व है। आप भले मर जायँ, पर आपके विचार कभी न मरेंगे। उनमें रूप, आकृति, रंग गुण, तथ्य, शक्ति और भार है। विचार के द्वारा हम सृजन-शक्ति प्राप्त करते हैं। विचार चंचल होते हैं। जड़ जगत की प्रत्येक वस्तु सर्व प्रथम विचार में उत्पन्न होती है। फिर वह रूप ग्रहण करती है, जैसे दुर्ग, मूर्ति, चित्र, मशीन। तात्पर्य यह कि प्रत्येक चीज की उत्पत्ति सर्वप्रथम उसके निर्याता के मन में होकर फिर बाह्य अभिव्यक्ति या रूप ग्रहण करती है।
विचारों के शक्तिकण कथित शब्दों के रूप में ही किसी एक दिशा में केन्द्रित होते हैं। मन में आकर्षण शक्ति है। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है। यह संसार का नियम है। आप स्वयं अपनी ओर नित्य आकर्षित होते रहते हैं, यह आकर्षण-तत्वों विचारों एवं दशाओं के दृश्य एवं अदृश्य दोनों रूपों से होता है।
आपका मनोगत प्रथम विचार ‘अहं’ था। अंतिम विचार जो ब्रह्म में लीन होने के पूर्व आप में उत्पन्न होगा, वह ब्रह्माकार वृत्ति है, जो आपकी ब्रह्म-भावना से पैदा होता है।
संकल्पों की अमर्यादित निर्झरिणी हितकारक नहीं है। यह तो दुर्भाग्य की धारा है। एक क्षण के लिए भी साँसारिक पदार्थों पर ध्यान न दो। इस संकल्प से छुटकारा पदार्थों पर ध्यान न दो। इस संकल्प से छुटकारा पाने के लिए अधिक शक्ति का व्यय न करो। सम्पूर्ण विचारों को रोकने पर मन स्वयं नष्ट हो जायगा। फूल को मसलने में भी कुछ प्रयत्न करना होता है पर संकल्प के नाश के लिए इसकी भी आवश्यकता नहीं है। विचारों के निग्रह से संकल्प नष्ट हो जाता है। आन्तरिक संकल्प से बाह्य संकल्प को और शुद्ध मन से अशुद्ध मन को नष्ट कर आत्म-ज्ञान में दृढ़ होकर रम जाना चाहिये। मोह, ममता, भ्रम, ईर्ष्या काम, स्वार्थ एवं क्रोध से रहित मन ही परमात्मा का नित्य स्मरण कर सकता है।
साँसारिक विषयों का चिन्तन मन का साधारण स्वभाव है। ईश-स्मरण के बजाय वह गंदे विचारों में तत्काल फँस जाता है। नित्य प्रयत्न और त्याग द्वारा ही परमात्मा की ओर उसे मोड़ना चाहिए। स्वभाव के प्रतिपक्षी होने पर भी उसे इस ओर शिक्षित करना होगा। साँसारिक दुख-दर्दों से बचने के लिए और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
साधारण जनता गंभीर चिन्तन को नहीं समझती। उसकी मानसिक मूर्तियाँ बिखरी हुई होती हैं। केवल विचारक, दार्शनिक एवं योगियों की मानसिक कल्पनाएँ सुव्यवस्थित एवं स्पष्ट होती हैं। एकाग्रता और ध्यान के अभ्यासियों की भावनाएँ दृढ़ एवं सुघड़ होती हैं।
संसार की सहायता के लिए संन्यासियों का प्लेटफार्म पर आना आवश्यक नहीं है। वह तो हिमालय की गुफा में रहता हुआ भी दुनिया की मदद कर सकता है, और उसे अपनी विचार-लहरों से पवित्र करता है। उसका जीवन स्वयं ही शिक्षा का प्रतीक है। परमात्मा को पाने के इच्छुक लोगों के लिए वह जीवित आशा है। भारतीयों ने भी पश्चिमी प्रचार-वृत्ति को अपना कर यह कहना शुरू कर दिया है कि हमारे संन्यासियों को बाहर आकर सामाजिक एवं राजनैतिक हलचलों में भाग लेना चाहिए। यह भयंकर भूल है। एक संन्यासी या योगी किसी संस्था का प्रधान अथवा किसी भी सामाजिक व राजनैतिक आँदोलन का नेता नहीं हो सकता। संन्यासी का कर्तव्य तो शंकर के अद्वैत वेदान्त के आध्यात्मिक ज्ञान को फैलाना है।
विचारों में तूफान चलता रहता है। कभी-2 मन चक्कर खाने लगता है। आपको इन्हें एकाग्र कर एक विशेष स्वरूप देना चाहिए। तभी दार्शनिक विचार भी दृढ़ होंगे। विचार, मनन और ध्यान अव्यवस्थित विचारों को दृढ़ आधार पर ला खड़ा करेंगे।
मान लो कि आपका मन पूर्ण शान्त है, उसमें कोई विचार वर्तमान नहीं है। फिर भी ज्यों ही विचारों का उद्भव होने लगता है, वह तत्काल नाम और रूप ग्रहण कर लेता है। प्रत्येक विचार का एक नाम और रूप है।
वह मस्तिष्क से निकल कर यत्र-तत्र घूमता रहता है। वह दूसरों के दिमाग में भी घुसता है। हिमालय पर रहने वाला साधु अमेरिका के कोने में अपने प्रबल विचारों को भेज सकता है। जो गुफा में अपने आपको पवित्र करता है वह यथार्थतः संसार को पवित्र कर सम्पूर्ण दुनिया का भला करता है। उसके पवित्र विचारों को कोई नहीं रोक सकता। मन आकाश की तरह विभु है। अतः विचार-विनिमय संभव है।
काका कालेलकर
अपने जीवन को शुद्ध और समृद्ध बनाने की साधना जिन्होंने की है, वे अनुभव से कहते आये हैं कि ‘आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः’। इस सूत्र के दो अर्थ हो सकते हैं, क्योंकि सत्व के दो माने हैं—शरीर का संगठन और चारित्र्य। अगर आहार शुद्ध है, याने स्वच्छ है, ताजा है, परिपक्व है, सुपाच्य है, प्रमाणयुक्त है और उसके घटक परम्परानुकूल हैं तो उसके सेवन से शरीर के रक्त, मज्जा, शुक्र आदि सब घटक शुद्ध होते हैं। वात, पित्त, कफ आदि की साम्यावस्था रहती है और सप्तधातु परिपुष्ट होकर शरीर सुदृढ़, कार्यक्षम तथा सब तरह के आघात सहन करने के योग्य बनता है और इस आरोग्य का मन पर भी अच्छा असर होता है। ‘आहारशुद्धौ सत्वशुद्धिः’ का दूसरा और व्यापक अर्थ यह है कि आहार अगर प्रामाणिक है, हिंसाशून्य है, द्रोहशून्य है और यज्ञ, दान, तपका फर्ज अदा करने के बाद प्राप्त किया गया है तो उससे चारित्र्य शुद्धि को पूरी पूरी मदद मिलती है। चारित्र्य शुद्धि का आधार ही इस प्रकार की आहार शुद्धि पर है।
अगर यह बात सही है, आहार का चारित्र्य पर इतना असर है तो विहार का याने लैंगिक शुद्धि का चारित्र्य पर कितना हो सकता है, इसका अनुमान करना कठिन नहीं होना चाहिए।
काम विकार क्या है—
जिसे हम काम-विकार कहते हैं अथवा लैंगिक आकर्षण कहते हैं, वह केवल शारीरिक भावना नहीं है। मनुष्य के सारे के सारे पहलू उसमें उत्तेजित हो जाते हैं, और अपना अपना काम करते हैं। इसलिए जिसमें शरीर मन-हृदय की भावनाएँ और आत्मिक निष्ठा-सब का सहयोग अपरिहार्य है, ऐसी प्रवृत्ति का विचार एकाँगी दृष्टि से नहीं होना चाहिये। जीवन के सार्वभौम और सर्वोत्तम मूल्य से ही उसका विचार करना चाहिए। इस आचरण में शारीरिक प्रेरणा के वश होकर बाकी के सब तत्वों का अपमान किया जाता है, वह आचरण समाज द्रोह तो करता ही है लेकिन उससे भी अधिक अपने व्यक्तित्व का मथन द्रोह करता है।
लोग जिसे वैवाहिक प्रेम कहते हैं, उसके तीन पहलू हैं। एक भोग से सम्बन्ध रखता है, दूसरा प्रजा तन्तु से और तीसरा भावना की उत्कटता से। पहला प्रधानतया शारीरिक है, दूसरा मुख्यतः सामाजिक और व्यापक अर्थ में आध्यात्मिक। यह तीसरा तत्व सब से महत्व का सार्वभौम है और उसी का असर जब पहले दोनों के ऊपर पूरा पूरा पड़ता है, तभी वे दोनों उत्कट, तृप्तिदायक और पवित्र बनते हैं।
इन तीन तत्वों में से पहला तत्व बिल्कुल पार्थिव होने से उसकी स्वाभाविक मर्यादाएँ भी होती हैं, भोग से शरीर क्षीण होता है। अति सेवन से भोग शक्ति भी क्षीण होती है और भोग भी नीरस हो जाते हैं। भोग से संयम का प्रमाण जितना अधिक होगा उतनी ही अधिक उसकी उत्कटता होगी। भोग में संयम का तत्व आने से ही उससे आध्यात्मिकता आ सकती हैं। संयमपूर्ण भोग में ही निष्ठा और परस्पर आकर टिक सकते हैं और संयम और निष्ठा के बिना वैवाहिक जीवन का सामाजिक पहलू कृतार्थ हो ही नहीं सकता। केवल लाभ हानि की दृष्टि से देखा जाय तो वैवाहिक जीवन का परमोत्कर्ष संयम और अन्योन्यनिष्ठा में ही है। भोग-तत्व पार्थिव हैं और इसलिए परमित हैं। भावना तत्व हार्दिक और आत्मिक होने से उसके विकास की कोई मर्यादा ही नहीं है।
आजकल के लोग जब कभी लैंगिक नीति के स्वच्छन्द का पुरस्कार करते हैं, तब वे केवल भाग-प्रधान पार्थिव अंश को ही ध्यान में लेते हैं। जीवन की इतनी क्षुद्र कल्पना वे ले बैठे हैं कि थोड़े ही दिनों में उन्हें अनुभव हो जाता है कि ऐसी स्वतन्त्रता में किसी किस्म की सिद्धि नहीं है और न सच्ची तृप्ति। ऐसे लोगों ने अगर उच्च आदर्श ही छोड़ दिया तो फिर उनमें तारक असंतोष भी नहीं बच पाता। विवाह-सम्बन्ध में केवल भोग के सम्बन्ध का विचार करने वाले लोगों ने भी अपना अनुभव जाहिर किया है—
एतत्कामफल लोके यत् द्वयोः एकचित्तता। अन्य चित्तकृते कामे शवयो इव संगमः॥
यह एकचित्तता यानी हृदय की एकता अथवा स्नेह ग्रन्थि अन्योन्य निष्ठा और अपत्य निष्ठा के बिना टिक ही नहीं सकती। बढ़ने की बात दूर ही रही।
सामाजिक जीवन की बुनियाद—
संयम और निष्ठा ही सामाजिक जीवन की सच्ची बुनियाद है। संयम से जो शक्ति पैदा होती है, वही चारित्र्य का आधार है। जो आदमी कहता है—मैं संयम नहीं कर सकता, यह चारित्र्य की छोटी-मोटी एक भी परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हो सकेगा। इसलिये संयम ही चारित्र्य का मुख्य आधार है।
चारित्र्य का दूसरा आधार है निष्ठा। व्यक्ति के जीवन की कृतार्थता तभी हो सकती है, जब वह स्वतंत्रता-पूर्वक समष्टि में विलीन हो जाता है। व्यक्ति स्वातंत्र्य को सम्हालते हुए अगर समाज-परायणता सिद्ध करनी हो तो वह अन्योन्य निष्ठा के बिना हो नहीं सकती और अखिल समाज के प्रति एक-सी अनन्य निष्ठा तभी सिद्ध होती है, जब आदमी ब्रह्मचर्य का पालन करता है, अथवा कम-से-कम वैवाहिक जीवन में परस्पर दृढ़ निष्ठा से प्रारम्भ करता है। अन्योन्य निष्ठा जब आदर्श कोटि तक पहुँचती है तब वहीं से सच्ची समाज-सेवा शुरू होती है।
संयम और निष्ठा—
इस सब विवेचन का सार यह निकला कि व्यक्ति गत विकास के लिए, कौटुम्बिक समाधान के लिए, सामाजिक कल्याण के लिए और आध्यात्मिक प्रगति के लिए संयम और निष्ठा अत्यन्त आवश्यक हैं और इसलिए सामाजिक जीवन में लैंगिक सदाचार का इतना महत्व है।
अब इस सदाचार का आत्यान्तिक स्वरूप क्या है, कौन-सा तात्विक है और कौन-सा साँकेतिक यह विचार समय-समय पर करना पड़ता है। उसमें चन्द बातों में परिवर्तन भी आवश्यक है, लेकिन इतना समझ ही लेना चाहिये कि लैंगिक सदाचार के बिना समाज-सेवा निष्ठा के साथ हो नहीं सकती। जिनका विकास एकाँगी हुआ है अथवा जिनके जीवन में विकृति आ गयी है, उनसे भी कुछ न कुछ सेवा ली जा सकती है, लेकिन वे समाज के विश्वासपात्र सदस्य नहीं बन सकते। समाज निर्भयता से उसकी सेवा नहीं ले सकता और ऐसे आदमी का विकास अशक्यप्राय होता है। उसकी प्रतिष्ठा नाममात्र की रहती है।
विषय गम्भीर है। उसके पहलू भी असंख्य हैं और इनका शुद्ध विचार करने की पात्रता आ सके अपूर्ण समाज में पूरी पूरी है भी नहीं, तो भी इस विषय को हम छोड़ भी नहीं सकते। लोग-पोती से काम नहीं चलता। केवल रूढ़ि को सम्हाल कर हम समाज को सुरक्षित नहीं रख सकते और अनेक रूढ़ियों को तुलनात्मक अध्ययन किये बिना और उसका सार्वभौम समन्वय किये बिना हम सामाजिक प्रगति भी नहीं कर सकते। इसलिए समय-समय पर मनुष्य-जाति को इस सवाल की चर्चा करनी ही पड़ती है।
(प्रो. कन्हैयालाल सहल, एम.ए.)
भगवान से कोई पूछे कि वह चाहे जब और चाहे कहीं मृत्यु को जाने की इजाजत क्यों दे देता है? वृद्ध के पास मृत्यु आ जाय तो कोई अनहोनी बात नहीं, और फिर यदि वृद्ध के पास मृत्यु न जाय तो जाय भी कहाँ? किन्तु मृत्यु की एक बात बहुत खटकती है, वह युवकों के पास भी क्यों बिना बुलाये पहुँच जाती है? सच मानिये मुझे मृत्यु का पता ही नहीं था, मृत्यु क्या चीज होती है, किन्तु जब मेरी प्रियतमा संसार को छोड़ कर चल बसी, मृत्यु के भयंकर हाथों ने जब उसको मुझसे छीन लिया तो मैं “का वार्ता” के इस उत्तर का मन ही मन दोहराने लगा—
अस्मिन्महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेस्वनन मासर्तुदर्वो परिघटनेन भूतानिकालः पचतीति वार्ता॥
यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया था कि हे युधिष्ठिर! बतलाओ खबर क्या है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया था संसार रूपी महामोह का कड़ाह है, सूर्य की आँच है रात दिन का ईंधन जल रहा है सब प्राणी इस कड़ाह में पड़े हैं और महीने और ऋतुओं की करछुल से घोंट कर काल उन प्राणियों को पका रहा है, बस यही एक मात्र खबर है।
सब ऋतुयें अपने अपने समय पर आती है किन्तु हे भगवान्! तुम्हारी सृष्टि में यह कैसा नियम है कि इस मृत्यु की कोई ऋतु नहीं, कोई मौसम नहीं इसका कोई समय निर्धारित नहीं, इसका कोई पल निश्चित नहीं—यह चाहे जब आ जाय!
बहुत से मनुष्य तो मृत्यु के नाम मात्र से ही भयभीत हो उठते हैं; मृत्यु की चर्चा को वह एक प्रकार का अपशकुन समझते हैं—वे सोचने लगते हैं कि कहीं अपनी चर्चा से आकृष्ट होकर मृत्यु वहाँ पहुँच न जाय!
मृत्यु क्या सचमुच ऐसी भयंकर चीज है? ऐसे वीर पुरुष इस धरा धाम पर अवतीर्ण हुए हैं जिन्होंने मृत्यु के साथ खिलावड़ किया है। राजस्थान में वीर योद्धा जब देश और धर्म की रक्षा के लिए अपने को न्यौछावर कर देता था तो यहाँ मरण-त्यौहार की कल्पना तो एक दम रोमाँच जान पड़ती है। ‘भारतीय आत्मा’ ने तो ‘मरण त्यौहार’ पर सुन्दर कविता भी लिखी है। अंग्रेजी साहित्य के दार्शनिक कवि ब्राउनिंग ने अपनी स्त्री की मृत्यु के बाद एक कविता लिखी थी जिसमें मृत्यु को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा था हे मृत्यु जब कभी तू आये, मेरे सामने से आना ताकि मैं तुमसे लोहा ले सकूँ, तुम्हारी विभीषिकाओं से खेल सकूँ—मेरा जीवन तो संघर्ष का जीवन रहा है, मृत्यु के रूप में एक संघर्ष और सही!
ऐसे दार्शनिक इस दुनिया में हुए है जो मृत्यु के समय भी विचलित नहीं हुए। महात्मा सुकरात को इस बात का पता था कि दूसरे दिन उसको विष का प्याला दे दिया जायेगा किन्तु फिर भी उसे गहरी नींद में सोते देख कर उसके मित्र क्राइटो के आश्चर्य का ठिकाना न रहा था। ‘अनलहक अनलहक’ की रट लगाने वाला मंसूर खलीफा द्वारा फाँसी पर चढ़ाया गया तो हजारों लोग इस दृश्य को देखने के लिये इकट्ठे हुए। दर्शकों में से किसी ने पूछा—मंसूर, प्रेम क्या है? मंसूर ने उत्तर दिया—। ‘आज देखोगे, कल देखोगे।’ उसका अभिप्राय यह था कि आज मुझे फाँसी पर चढ़ा दिया जाएगा कल मेरा शरीर भस्म कर दिया जायेगा, परसों कोई चिन्ह भी बाकी नहीं रहेगा। कुछ दुष्ट मनुष्यों ने मंसूर की ओर पत्थर भी फेंके, किन्तु फिर भी वह शान्ति धारण किये रहा, क्षुब्ध या उत्तेजित न हुआ। कहा—मेरे भौतिक हाथों का काट डालना सहज है, किन्तु किसमें शक्ति है जो मेरे आध्यात्मिक हाथों को काट सके? जब उसके पैर काटे जाने लगे तो वह बोल उठा—इन पैरों से तो मैंने पृथ्वी पर भ्रमण किया है, किन्तु मेरे आध्यात्मिक पैर भी है जिनके द्वारा मैं स्वर्गलोक में भ्रमण करूंगा। किसी में सामर्थ्य हो तो वह आकर मेरे आध्यात्मिक पैरों को काटे।
जब मंसूर की आँखें निकाल लीं गई तो बहुत से मनुष्यों का हृदय द्रवीभूत हो उठा, हृदय-स्रोत नेत्रों के द्वारा अश्रुओं के रूप में उमड़ पड़ा। जब उसकी जीभ काटी जाने लगी तो मंसूर ने कहा—कुछ क्षणों तक धैर्य धारण करो, मैं दो शब्द निवेदन करना चाहता हूँ। तब अपने मुँह को ऊँचा कर उसने कहा-हे परमेश्वर! इन लोगों ने जितनी यन्त्रणायें मुझे दी हैं, उनके लिये इन्हें दण्ड न देना, इन्हें सुखों से वंचित न करना। इस प्रकार हंसते-हंसते यह सूफी सन्त मृत्यु के प्रेमालिंगन में आबद्ध हो गया था।
बहुत से दार्शनिकों की दृष्टि में तो मृत्यु विभु का वरदान है। जो वस्तु इतनी प्राकृतिक हो, इतनी सार्वभौम और इतनी सार्वजनिक हो वह कभी अनिष्टकारिणी हो ही नहीं सकती। कालीदास कह गये हैं :—‘मरणं प्रकृतिः शरीरिणाँ विकृतिर्जीवन मुच्ते बुधैः’ और फिर इस मृत्यु में समानता भी कितनी है! कहते हैं कि एकबार डाइवोगेनेस नाम का दार्शनिक किसी मृत दास की हड्डियों को बड़े गौर से देख रहा था। सिकन्दर ने पूछा—दार्शनिक इन हड्डियों में तुम क्या ढूंढ़ रहे हो? दार्शनिक ने उत्तर दिया—तुम्हारे पिता की हड्डियों और उसके दासों की हड्डियों में मुझे कोई अन्तर नहीं मिल रहा! उसी की तलाश में था!
कितना महत्व है इस मृत्यु का! प्लेटो की दृष्टि में तो मौत पर मनन करना ही तत्व ज्ञान की परिभाषा है, और शोषनहार ने कहा है कि मृत्यु को देख कर ही मनुष्य के हृदय में पहले पहले तत्वचिन्तन की वृत्ति सजग हुई थी। रवीन्द्र जैसे कवियों ने मृत्यु के दर्शन-शस्त्र पर बहुत कुछ लिखा है, सच कहा जाय तो, रवीन्द्र के मृत्यु सम्बन्धी विचारों से स्वयं मृत्यु भी गौरवान्वित हुई है। मरण जीवन का अन्त नहीं है। वह तो माता के एक स्तन को छोड़ कर दूसरे स्तन के लगने के समान है। मृत्यु को चीर कर भी जीवन का स्त्रोत बहता रहता है। जीवन और जन्म एक ही वस्तु नहीं है, जीवन व्यापक है तो जन्म है व्याप्य। जीवन के शाश्वत प्रवाह में न जाने कितने जन्म-मरण बहते रहते हैं। जन्म-मरण तो वास्तव में जीवन के एक अध्याय का अथ और इति मात्र हैं।
किसी वस्तु दाँया बाँया जैसे एक ही वस्तु के दो पक्ष हैं, उसी प्रकार जन्म और मरण को भी समझना चाहिये मरण जीवन का अन्त नहीं, क्योंकि मरण के बाद तो जीवन नये सिरे से प्रारम्भ होता है। इसलिये मृत्यु किसी भी हालत में डरने की वस्तु नहीं। कल्याण मार्ग का पथिक मौत से भी नहीं डरता, और फिर तात्विक दृष्टि से देखा जाय तो आत्मा अमर है, और अमर मानव मृत्यु से क्या डरे? इसीलिये तो विश्वास के स्वर में कबीर ने कहा था :—
“हम न मरिहै मरिहै संसारा। हमको मिला जिलावन हारा॥”
(दौलतराम कटरहा, दमोह)
शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उपवास का महत्त्व अब सभी लोग समझने लगे हैं किंतु उपवास से कुछ आध्यात्मिक लाभ भी हो सकता है इस बात पर कम ही लोग विश्वास करते हैं। यदि आप उपवास कर रहे हों तो पढ़े लिखे कहे जाने वाले बहुत से लोग समझते हैं कि आपको कोई रोग होगा अथवा रोग होने की कोई संभावना होगी। उनकी समझ में वह बात नहीं आती कि उपवास से किसी प्रकार आत्म शक्ति भी प्राप्त हो सकती है।
मैं समझता हूँ कि उपवास अपने आपको अपनी देह से पृथक् समझने का सदा सुलभ उपाय है। आप यदि अपने आपको यह आत्म संदेश देना चाहें कि आप आत्मा हैं शरीर नहीं चैतन्य है, जड़ नहीं, तो इस भाव को अपने अन्तस्तल में बैठा देने के लिए उपवास उत्तम उपाय है। केवल विचार मात्र का सहारा लेकर केवल “चिदानन्द रुपःशिवोऽहम् शिवोऽहम्” का मनन कर आप ब्रह्म-बिहार करने में कदाचित् ही सफल हों। मन में बार बार ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इस वाक्य चिन्तन करके कदाचित् ही वह भाव आपके अन्तस्तल में पक्की तौर से जमे। अनेक वर्ष से मैं स्वयं इस विचार को अपने हृदय तल में बैठाने का प्रयत्न करता रहा हूँ किन्तु केवल वाचिक प्रयत्न से कोई अधिक सफलता नहीं मिली। जब असली परीक्षा का समय आता है तभी वह विचार चित्त से गायब हो जाता है। अतएव अभी तो कोरा वेदांती हूँ। किन्तु अब विचार करता हूँ कि “मैं शरीर से भिन्न हूँ” इस विचार का क्रियात्मक अनुभव जब तक न करूंगा तब तक यह विचार केवल कल्पना-मात्र ही रहेगा। मुझे जान पड़ता है कि उपवास इस विचार को सफलता पूर्वक चित्त में जमाने का एक उत्तम साधन है।
‘मैं आत्म हूँ, देह नहीं,’ यह भाव केवल त्याग द्वारा ही हृदय में बैठाया जा सकता है। उपवास भी एक प्रकार का त्याग है अतएव उपवास द्वारा इस भाव की संप्राप्ति संभव है। उपवास द्वारा आपका शरीर क्षीण होता है, कार्य करने की कुछ शक्ति भी घटती है, किन्तु फिर भी हृदय में भाव यही रहता है कि मैं क्षीण नहीं हो रहा, क्षीण होता है शरीर। इस प्रकार शरीर से लगाव (देहाध्यास) कम होता जाता है। और उपवास सहित किए गए ये विचार चित्त में फिर दृढ़ता पूर्वक जम जाते हैं। जब आप प्रसन्नता पूर्वक अपनी कही जाने वाली वस्तुओं को घटते हुए देखते हैं, जब आप अपना धन और मान घटा हुआ देखते हैं अपना शरीर क्षीण हुआ देखते हैं, तभी आपके हृदय में यह भाव समाता है कि ‘आत्मा हैं देह नहीं। बिना त्याग के किसी भी प्रकार आप अपने असली स्वरूप को समझने में सफल न होंगे। जब तक आप अपना ऊपरी आवरण नहीं उतार फेंकते तब तक आपका उस आवरण से ही अत्यधिक लगाव बना रहेगा और उसके हानि-लाभ में ही आप दुखी सुखी होते रहेंगे।
उपवास द्वारा आत्म-साक्षात्कार करने का यह मार्ग कोई नया मार्ग नहीं है। उपवास द्वारा पवित्र होकर भगवान बुद्ध उस परम तत्त्व को समझे। भगवान महावीर स्वामी ने भी उपवास और अन्य साधनाओं द्वारा ‘जिन’ पद पाया। और आज भी हम उपवास सहित अनेक साधनाएँ और व्रत सम्पन्न करते ही हैं।
लोग कहते हैं कि “भूखे भजन न होइ गुपाला” पर मैं समझता हूँ कि सच्चा भजन तो भूखे रह कर ही होता है। भरे हुए पेट से किया हुआ भजन उतना फल दायक नहीं होता जितना खाली पेट से किया हुआ भजन। जब पेट भरा हुआ रहता है तब चित्त वृत्ति बहिर्मुखी अधिक रहती है अतएव भरे हुए पेट से की हुई साधना उतनी फलवती नहीं होती जितनी खाली पेट से की हुई साधना। ठंडे लोहे को पीट पीट कर उसे मन चाहे आकार में परिवर्तित करना उतना सरल नहीं है जितना कि गर्म किए हुए लोहे को। ठंडे लोहे की उपमा हम भरे हुए पेट से दे सकते हैं और लाल गर्म लोहे की खाली पेट से। अतएव खाली पेट रहने पर हम अधिक प्रभाव-ग्राही होते हैं उस समय जो कुछ भी हम करते हैं उसका प्रभाव हम पर अपेक्षाकृत अधिक पड़ता है। यदि हम चाहते हैं कि हमारा मन किन्हीं विशेष प्रकार के विचारों में रमने लगे तो हमें वे विचार उपवासी होकर पढ़ने चाहिए, उपवासी रह कर ही उन पर मनन करना चाहिए। ऐसा करने पर शीघ्र ही चित्त में उन विचारों से पूर्ण वातावरण की सृष्टि हो जायगी।
उपयुक्त विवेचन से उपवास की महत्ता स्पष्ट हो जायगी किन्तु इसका कोई यह अर्थ न लगाए कि हम सदा सबदा उपवासी ही बने रहें। इस सम्बन्ध में भी हमें ‘मध्यम मार्ग’ अपनाना होगा। भगवान कृष्ण ने ही कहा है कि योग न तो एक दम अधिक खाने वाले को ही सिद्ध होता है और न एक दम कम खाने व ले ही को। अतएव हमें इस सम्बन्ध में विवेक से काम लेना चाहिए। जैसे कि कोई राहगीर न तो एक दम चलता रह कर ही अपना सफर पूरा कर सकता है और न एक दम एक जगह बैठे रह कर ही, बल्कि उसे समय पर बीच बीच में विश्राम लेते हुए चलना पड़ता है और रास्ता है करना है उसी प्रकार अध्यात्म-पथ के पथिक को भी कभी उपवासी रहकर और कभी भोजन कर अपने मार्ग की अंतिम मंजिल को पहुँचना होगा। उपवास के सम्बन्ध में अतिवादी नहीं होना चाहिए। निरतिवाद अथवा मध्यम मार्ग ही हमारे लिए ग्राह्य प्रतीत होता है। अतएव जब कभी आप उपवास रखना चाहें तो यह भावना करिए और यह स्पष्ट उद्देश्य अपने सामने रखिए कि इस उपवास द्वारा मैं यह अनुभव करना चाहता हूँ कि मैं आत्मा हूँ, चैतन्य स्वरूप हैं, शरीर और मन आदि से पृथक सत्ता हूँ, तो इस संकल्प के द्वारा आप उपवास से प्राप्त होने वाला सर्वश्रेष्ठ लाभ भी उठाएंगे और उपवास की अति से भी बच जाएंगे। आपकी यह भावना और संकल्प आपको अतिवादी होने से बचाएगी अन्यथा आप उपवास-जन्म छोटे मोटे लाभ प्राप्त कर ही रह जावेंगे और उपवास का सर्वश्रेष्ठ फल आपको प्राप्त न हो सकेगा।
कई बार उपवास करते समय मेरे मन में विचार उठते रहे हैं कि मैं उपवासों के कारण अपने शारीरिक बल को नहीं बढ़ा पाता हूँ, शरीर क्षीण हो जाता है और कार्य क्षमता भी घट जाती है अतएव उपवास छोड़ दूँ। किन्तु ज्यों−ही उपवास छोड़ने का यह प्रलोभन मुझे मिलता है, त्यों−ही हृदय में प्रति पक्षी विचार उठता है कि मैं बल नहीं चाहता, अमरत्व, नहीं चाहता, विद्या नहीं चाहता, तो चित्त की डाँवाडोल स्थिति मिट जाती है और मन दृढ़ बना रहता है।
जब आप उपवास करेंगे तो आपको विचलित करने के लिए आपका ही मन आपके सामने अनेक कारण व तर्कनाएँ उपस्थित करेगा जिससे कि आप उसे छोड़ दें, किन्तु अनेक प्रलोभनों को अस्वीकार कर देने पर ही तथा मन द्वारा प्रदर्शित भयों से भयभीत न होने पर ही आप अपने व्रत पर डटे रह सकेंगे अन्यथा इस मन ने बड़े बड़ों को धमकाया है, डराया है और प्रलोभन दिया है। महात्मा ईसा जिन दिनों उपवास कर रहे थे तो उनके मन ने ही शैतान के रूप में उन्हें राज्य आदि का लोभ दिखाया। भगवान बुद्ध को उनके मन ने ही ‘मार’ के रूप में उपस्थित होकर कठोर तपस्या से विरत होने के लिए डराया। किन्तु संसार के ये मुकुटमणि अडिग रहे और उन्हें अपने जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त हुआ। अतएव उपवास करते समय अपने मन में उठने वाली अनेक कुतर्कनाओं से आप विचलित न होइये बल्कि मन से दृढ़ता पूर्वक कह दीजिए कि मैं बल नहीं चाहता, स्वास्थ्य नहीं चाहता, यश नहीं चाहता बुद्धि नहीं चाहता आदि। जो जो भी प्रलोभन मन दे, उन सबको नकारते जाइये, तभी आपकी जीत होगा, अन्यथा ‘शैतान’ या ‘मार’ आपको डिगा देगा।
मेरे सामने जब प्रलोभन आते हैं तब मुझे नचिकेता, उमा, सीता और हनुमान का स्मरण हो आता है। इन महान आत्माओं को अनेक प्रलोभन दिए गए किन्तु कोई भी प्रलोभन इन्हें लुभा न सका। मैं चाहता हूँ कि हम सब इन दृढ़ व्रतियों का आदर्श अपने सामने रखें और बढ़े चलें। हनुमान जी की दृढ़ता तो देखिए। सीता जी ने उन्हें आशीर्वाद देना चाहा और कहा कि हे तात, तुम बल और शील के निधान होओ, तुम अजर, अमर और गुणों के खजाने होओ। किन्तु सीता जी के इस आशीर्वाद से हनुमान का हृदय-कमल तनिक भी प्रफुल्लित नहीं हुआ। किन्तु जब सीता जी ने कहा कि तुम पर प्रभु कृपा करें, तुम राम-भक्त बनो तो हनुमान जी का हृदय नाच उठा। यद्यपि हनुमान जी बलवान थे किन्तु उनको बल की कामना नहीं थी, बुद्धिमान और शीलवान थे फिर भी बुद्धि और शील की कामना उन्हें नहीं थी। वे भक्ति को ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु मानते थे और वही उन्हें मिली भी। नचिकेता से यमराज ने कहा कि नचिकेता तुम राज्य माँग लो, सौ वर्षों तक जीने वाले पुत्र, पौत्र माँग लो किन्तु मृत्यु का रहस्य, अमरत्व का गूढ़ तत्त्व मत पूछो। किन्तु नचिकेता अचंचल बना रहा और उसने कहा मुझे यह सब कुछ न चाहिए आप मुझे इसी तत्त्व का उपदेश करें। नचिकेता की वह परीक्षा थी। प्रलोभनों पर उसने विजय पाई और यमराज ने उसे उपदेश दिया और उसे वह ज्ञान मिला जिसे पाकर मनुष्य वस्तुतः अमर हो जाता है। इन कथाओं के उल्लेख से मेरा प्रयोजन यह है कि यदि आपका अंतिम लक्ष्य बल प्राप्त करना होगा, अथवा बुद्धिमान और विद्यावान होना होगा तो आप अपने व्रत को निभा नहीं सकेंगे। जहाँ इनका प्रलोभन मिला कि आप फिसल पड़ेंगे। अतएव अपने व्रत का अनुष्ठान करते समय संकल्प कीजिए कि मैं बल, विद्या,बुद्धि, स्वास्थ्य यश, ऐश्वर्य विजय, पराक्रम आदि कुछ नहीं चाहता, वरन् चाहता हूँ कि मैं यह अनुभव करूं कि मैं शुद्ध आनन्द-स्वरूप आत्मा हूँ, देह और इन्द्रिय से पृथक चैतन्य हूँ। तब अन्तिम विजय आपका चरण-चुंबन करेगी और आपका कल्याण होगा।
काम क्रोध मद मान न मोह, लोभ न छोभ न राग द्रोहा जिन्हके कपट दम्भ नहिं माया, तिन्ह के हृदय बसहु रघुराय सबके प्रिय सबके हितकारी, सुखदुख सरिस प्रसंशा गारि कहहिं सत्य प्रियबचन बिचारी, जागत सोवत सरन तुम्हारी
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
जीवन गति है। जीवन-धारा एक सरिता के प्रवाह की भाँति सतत् गतिशील है। जैसे एक ही स्थान पर टिका या रुका हुआ होने के कारण जल दूषित हो जाता है, जीवन प्रवाह में संतोष भी हानिकारक सिद्ध हो सकता है। पूर्ण परिश्रम करने पर जो कुछ प्राप्त हो हमें उससे संतोष करना चाहिए-यह ठीक है किन्तु उतावलापन, सदा आगे बढ़ने और अपनी गति, सामाजिक स्थिति, पद, घर बार सौंदर्य इत्यादि को सदा दूसरों से मिलाना, तुलनात्मक दृष्टि से अपने को नीचा पाना, फिर रात दिन उसी फिक्र में पड़े रहना—प्रतिस्पर्द्धा की यह भावना सीमा का अतिक्रमण करने से घातक दुष्परिणामों को उत्पन्न कर मनुष्य का जीवन अशान्ति से भर देने वाली है।
हमारा अमुक मित्र उन्नति की दौड़ में हमसे आगे निकल गया, अमुक को उच्च पद प्रतिष्ठा, गौरव प्राप्त हो गया, अमुक की पत्नी कितनी सुन्दर है, अमुक का निवास स्थान कितना भव्य है, पुत्र पुत्री कितने सभ्य हैं आदि आदि प्रतिस्पर्द्धा जनक भावनाएँ मानसिक तनाव की सृष्टि कर पाचन शक्ति को निर्बल कर देती हैं। नसों के तने रहने से सुख शान्ति प्राप्त नहीं होते और मनुष्य सदा अपने विरोधी विचारों, दूषित कल्पनाओं, को ही मन में पोसता रहता है।
प्रतिस्पर्द्धा से चिन्ता और ईर्ष्या उत्पन्न होती हैं और पेट में कब्ज अपच तथा अल्सर की बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती हैं, त्वचा की बीमारियाँ फूटती हैं और शरीर का समग्र स्नायु मंडल अनियंत्रित हो जाता है। भूख नहीं लगती और मनुष्य दुबला होता जाता है।
श्री एडवर्ड विगम अपनी पुस्तक “आनन्द प्राप्ति के नए उपाय” में लिखते हैं—
जब आपको जीवन यापन की भौतिक सुविधाएँ प्राप्त हो जायं, भोजन, वस्त्र, मकान अच्छा स्वास्थ्य इत्यादि-तो आपकी प्रसन्नता या दुःख बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि आप किस प्रकार अपने आप को दूसरों से मिलाते या तुलना करते हैं। यदि आप उनसे एक बात में अपने आप को पूरा या ऊँचा उठा हुआ पाते हैं, तो किसी दूसरे तत्त्व में गिरा हुआ, अविश्वासी या निर्धन पाते हैं। आप अपने व्यक्तित्व के इस गिरे हुए पक्ष पर निरन्तर चिन्तन कर मन को चिन्ता और कल्पित वेदना के भार से भर लेते हैं। यदि आप अपने गुण सुविधाओं और समृद्धियों अर्थात् अपने उन्नत पक्ष से दूसरों का मिलान करते रहें और अपने प्रति हितैषी बने रहें, तो आप जीवन के प्रति संतत एक चाव, नई रुचि, उत्साह और उन्नति की ओर लगे रहेंगे। आप की योग्यताएँ उत्तरोत्तर बढ़ती रहेंगी और विवेक परिपक्व हो जायगा।
मनुष्य सर्व प्रथम आत्म-स्थायित्व चाहता है अर्थात् मरना नहीं चाहता। वह अपने शरीर को रोग और मृत्यु से सुरक्षित रखना चाहता है। इसी सिद्धान्त को गहराई से देखें तो हम कह सकते हैं कि हम अपने अहं की रक्षा चाहते हैं, अपने व्यक्तित्व पर आक्रमण करने वालों से बचना चाहते हैं, अपने को अपकीर्ति से बचाना चाहते हैं। दूसरे हमारे विषय में क्या सोचते हैं, यह बात हमारे विषय में उतनी महत्त्वपूर्ण नहीं जितनी यह बात कि स्वयं अपने ही विषय में उनके माध्यम से सोची गई घृणित या गिरी हुई मान्यताएं। इसी बात को यों कहिये कि हम भ्रमवश यों ही सोचने लगते हैं कि अमुक हमें गरीब समझता होगा! अमुक हमें मूर्ख, मंदमति कहता होगा। इनमें से अधिकाँश हमारी झूठी कल्पनाएं ही होती हैं, क्योंकि इस विशाल जन समाज को इतना अवकाश कहाँ कि केवल हमारी ही टीका टिप्पणी करता रहे उसे अन्य बहुत से महत्त्वपूर्ण कार्य हैं।
मनुष्य समस्त कार्यों के मूल में दूसरों द्वारा अपने कार्यों की प्रशंसा प्राप्त करना हैं। जब हम समझते हैं कि कोई हमें नहीं पसन्द कर रहा है, तो हम अपने आपको हीन कमजोर और अरक्षित-सा समझने लगते हैं। जौनडिवि कहते हैं, ‘मानव प्रवृत्ति की सब से उत्कट अभिलाषा महत्त्वपूर्ण पद प्राप्त करना ही है। लोग महत्ता प्राप्त करने के लिए भूखे रहते हैं पर उत्तमोत्तम वस्त्र, आलीशान मकान मोटर बंगला इत्यादि दिखावटी चीजें एकत्रित करते हैं। “तनिक विचार करें केवल वस्त्रों ही पर आप कितना अपव्यय केवल महत्ता प्राप्ति के लिए व्यय कर देते हैं। अच्छे वस्त्र या आभूषण पहिन कर आप प्रतिस्पर्द्धा में मन ही मन ऊँचे उठ जाते हैं और एक मिथ्या दर्प से फूल उठते हैं। ‘मैं इनसे श्रेष्ठ हूँ, ऊँचा हूँ, मेरी बराबरी का कोई नहीं है (चाहे वह वस्त्राभूषण जैसी क्षुद्र बात में ही सही) इस प्रकार का एक भी गुण मिलते ही इस अन्य गुणों में भी अपने आपको दूसरों के समान मान बैठते हैं। इस कल्पित श्रेष्ठता और उच्चता की भावना से हमारे अहं भाव की क्षणिक तृप्ति होती है। स्पर्द्धा द्वारा अपने को श्रेष्ठ या निकृष्ट-ऊँचा उठा हुआ अथवा नीचा गिरा हुआ समझना मानव प्रकृति का एक निगूढ़तम रहस्य है। इसके भले बुरे उपयोग पर हमारे जीवन का सुख या दुःख निर्भर है। यदि हम इस तुलनात्मक वृत्ति का सदुपयोग करें तो सुखी अन्यथा दुःखी बने रहेंगे।
अपने आपको इसलिए मत धिक्कारिये कि आप अपने को हीन पाते हैं। समझदारी से यदि आप अपनी तुलना दूसरों से करें, और सत्यता से परखें, तो आपको सौंदर्य, स्वास्थ्य, धन, प्रतिष्ठा, स्थिति आदि की नीचाई से उत्पन्न ग्लानि उत्पन्न होगी। वास्तव में आ। गलती यह कर बैठते हैं कि अपने व्यक्तित्व की दुर्बलताओं को दूसरों के व्यक्तित्व की अच्छाइयों या विशिष्टताओं से मिलाने लगते हैं। आपमें कुछ कमजोरियाँ हैं, तो स्मरण रखिये जिन्हें आप श्रेष्ठ समझते हैं, उन व्यक्तियों में भी निर्बलताएं हैं। उनकी अच्छाइयाँ देखते हैं तो कृपया अपने व्यक्तित्व को सहानुभूति से परख कर अपनी विशिष्टताएँ भी खोजिये। आपको अवश्य कुछ न कुछ अच्छाइयाँ मिलेंगी जो आपको आगे बढ़ने, सद्गुणों का विकास करने की प्रेरणा देंगी।
आत्म विश्वास स्वयं एक भावना ग्रन्थि है, एक स्वस्थ मानसिक आदत है तो दूसरी ओर आत्महीनता अर्थात् अपने विपक्ष में सोचना और अपने को दूसरों से नीचा समझना एक दूसरी ग्रन्थि हैं, एक अस्वस्थ मानसिक आदत हैं। तुलनात्मक दृष्टि से दूसरी अस्वस्थ आदत के गुलाम बनना दुखी जीवन बिताने की तैयारी करना है। गलत चीजों की तुलना से मनुष्य के जीवन में भारी असन्तोष छा जाता है। या तो आप अपनी अच्छाइयों को दूसरों की अच्छाइयों से मिलाइये अथवा मिलान का प्रश्न की न उठाइये।
अपनी तुलनात्मक दृष्टि का विश्लेषण कीजिए। थोड़ी देर के लिये यह सोचिये कि आखिर वह कौन−सी बातें हैं जिनसे आप अपना दूसरों से मिलान करने बैठे हैं? धन, प्रतिष्ठा, प्रभुता, महत्ता, पत्नी, सौंदर्य, स्वास्थ्य,बुद्धि अवश्य इनमें से कोई भावना आपके मन में विद्रोह मचा रही है। प्रारम्भ में तो यही मानिये कि ईश्वर न उपरोक्त सब गुणों में सब को सब चीजें समान मात्रा में प्रदान नहीं की हैं। किसी में कुछ अधिक हैं तो किसी में दूसरी बढ़ी हुई हैं। एक व्यक्ति बुद्धिमान विद्वान है, तो उसमें शारीरिक सौंदर्य बिल्कुल नहीं हैं, दूसरा रुपये पैसे वाला है तो उसे समाज से आदर और प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं। तीसरे के पास सौंदर्य है, तो चरित्र नहीं है संक्षेप में प्रत्येक का अपना अपना क्षेत्र पृथक पृथक है। जीवन एक दौड़ है। इस दौड़ में हम सब अपने ढंग से दौड़ रहे हैं। कोई आगे, तो कोई पीछे है।
एडवर्ड एल. थौर्नडाइक कहते हैं, “हम सदा किसी न किसी व्यक्ति से आगे निकलते जा रहे हैं। हमारे आगे दो व्यक्ति भाग रहे हैं, तो दस व्यक्ति पीछे भी तो छूटे जा रहे हैं। फिर हम उन पीछे वाले व्यक्तियों को देखकर थोड़ा सा संतोष क्यों न लें और नई प्रेरणा से आगे चलने वाले दो व्यक्तियों को हराने की हिम्मत क्यों न करें।”
वास्तव में हमें चाहिए कि अपनी विद्या बुद्धि धन आदि को समूचे समाज की विद्या बुद्धि धन आदि से तुलना न करें। एक सुन्दर स्त्री को चाहिए कि वह यह सोच कर दुःखी न रहे कि हाय! मैं सब से सुन्दर स्त्री क्यों न हुई। उसे अपने मुहल्ले ग्राम या प्राँत की साधारण सौंदर्य वाली स्त्रियों से मिलान कर ही सुख संतोष करना चाहिए। गलत मिलान करने की प्रवृत्ति प्रायः बचपन में उत्पन्न होती है। माता पिता एवं शिक्षकों का कर्त्तव्य है कि उचित दिशाओं, स्थितियों अच्छाइयों को अच्छाइयों से ही मिलाइये और उत्साह पूर्वक उनकी अभिवृद्धि प्रयत्न कीजिए। यह समझ कर हतोत्साहित न हो जाइये कि यह कठिन या कष्ट साध्य है। गलत चीजों की तुलना करना और अपने को कमजोर पा कर चिन्तित होना हीनत्व की भावना ग्रन्थि उत्पन्न करना है। सावधान!
(कुमारी भारती)
भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है अपना “उद्धार तुम स्वयं करो, अपने आपको हीन न समझो मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र अथवा शत्रु है।
जब मनुष्य अपनी हिंसा स्वयं नहीं करता तभी वह उन्नति कर सकता हैं”
अपने आपको हीन समझना निकृष्टतम हिंसा है। इस बुराई को छोड़ो।
तुम आत्मा हो। मनुष्य हो, सबसे अधिक विकसित प्राणी हो। फिर तुम अपने को हीन क्यों समझते हो।
तुम्हारे पास धन नहीं तो क्या हुआ। संसार के सर्वश्रेष्ठ महापुरुष गाँधी से भी तुम निर्धन हो क्या सम्भव है तुम्हारी हीनत्व भावना ने ही तुम्हें निर्धन बनाया हो। यह बुराई तुम्हारा महान शत्रु है।
तुम सदा सुस्त और निराश दिखाई देते हो। तुम्हें सभी आपसे बड़े और मालिक दिखाई देते हैं तुम बोलते हुए भी डरते हो सदा सबसे पीछे ही चलते हो ऐसा क्यों? इसका कारण हैं तुम अपने आपको छोटा डीन निकम्मा और अनुपयोगी मानते हो। यदि तुम पिछड़ते गये तो तुम्हें कन्धे पर उठा कर कोई आगे न ले चलेगा। यदि तुमने अपने आप को खुद ठोकर मार दी वो स्मरण रखो जो भी आएगा तुम्हें ठोकरें मारता हुआ आगे बढ़ता चलेगा। यह संसार बढ़ते और दौड़ते का साथी है मरे हुए को फूँक कर अथवा मिट्टी में मिला कर शीघ्र ही दुनिया भुला देती है। सब के पास अपने ही अनेक प्रश्न हैं जिनका समाधान वह ढूँढ़ते हैं। तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर तुम्हें स्वयं ही तलाश करना होगा।
जब तुम्हारा सभा अथवा संस्था में कहीं अपमान होता है तब तुम रो कर संतोष कर लेते हो कि तुम्हारा अपमान आश्चर्यजनक नहीं तुम्हारी कीमत तुम स्वयं ही बहुत कम आँकते हो फिर दुनिया को क्या पड़ी है कि तुम्हें कीमती माने।
सम्भव है तुम अपनी हीनत्व भावना को विनय का रूप दो, यह तुम्हारी विचित्र और दयनीय अवस्था है। कृपया इस दल-दल में से अपने आपको निकालो हीनत्व भावना और विनय का कोई भी तो संबन्ध नहीं
विनय और क्षमा स्वाभिमानी तथा समर्थ पुरुष को शोभा देते हैं। क्या हुआ तुम्हारे पास साधन नहीं क्या तुम्हारे पास ऊंचे मकान और तड़प-भड़क का सामान नहीं। अपने आपको इतने से ही हीन न मान लो। यदि तुम चाहो और अध्यवसाय करो तो इन के बिना भी आप महान् हो सकते हो और इनसे भी अच्छे साधन जुटा सकते हो। कभी आपने यह भी सोचा है कि अधिक धन साधन मनुष्य को निष्क्रिय और पतित बना देते हैं। सब से उत्तम धन है उद्यम, सतत् कार्य और सच्चरित्रता। यह धन हाथ से न जाने देना।
तुम्हें अपना अथवा अपने परिवार का पेट भरने के लिए किसी संस्था में अथवा किसी के पास कार्य करना होता है यह कोई अनहोनी बात नहीं। यदि तुम्हारा कार्य कुछ पैसा लिये बिना नहीं चल सकता तो अपने निर्वाह के लिए पैसा लेना तुम्हारे लिए स्वाभाविक है। परन्तु कुछ पैसा लेने भर से तुम उस संस्था अथवा व्यक्ति के क्रीतदास अपने आप को न मानो। अपने मालिक का मानवता के नाते सत्कार करना अथवा अपने बड़े अधिकारी की आज्ञा का पालन करना तुम्हारा कर्त्तव्य है यह सर्वथा उचित है। परन्तु केवल पैसा लेने के कारण तुम किसी के आगे-पीछे घूमते रहो। उसकी हर भली बुरी बात का समर्थन करो, येन-केन प्रकारेण मालिक को सन्तुष्ट करने का प्रयत्न करो तो यह पहले दर्जे की नीचता है इस नीचता की जननी हीनत्व भावना है। यह भावना अनेक बुराइयों की जननी है इसे मार डालो इस में कुछ भी हिंसा नहीं विश्वास करो।
जो तुममें कमियाँ हैं उन्हें दूर करो परन्तु अपने आपको हीन और व्यर्थ न मान लो।
जगत् में स्वाभिमान के साथ जीवित रहने का तुम्हें भी वैसा ही अधिकार है जैसा कि औरों को है।
अपने आप को हीन न समझो। यही उन्नति का रहस्य है।
(श्री लालजीराम जी शुक्ल)
मनुष्य के विचार ही मनुष्य को सुखी और दुःखी बनाते हैं। जिस मनुष्य के विचार उसके नियन्त्रण में हैं, वह सुखी है और जिसके विचार उसके नियन्त्रण में नहीं रहते, वह सदा दुःखी रहता है। दुःखी मनुष्य अपने दुःख का कारण अपने आप को न मानकर किसी बाह्य पदार्थ को मान लेता है। इस प्रकार की क्रिया को आधुनिक मनोविज्ञान में ‘आरोपण की क्रिया’ कहते हैं। इस प्रकार कुछ लोग अपने मित्रों को, शत्रुओं को और कुछ भाग्य को ही। वे अपनी ओर नहीं देखते। आत्म-निरीक्षण करने वाला व्यक्ति शीघ्र ही इस निष्कर्ष पर आ जाता है कि हमारे विचार ही हमारे शत्रु मित्र, सम्बन्धी अथवा भाग्य हैं। जिस मनुष्य के विचार उसके अनुकूल हैं, वह सभी प्रकार के लोगों, परिस्थितियों और भाग्य की अपने अनुकूल पाता है। इसके विपरीत जिस व्यक्ति के विचार प्रतिकूल होते हैं, वह चारों ओर शत्रु ही शत्रु देखता है। विचारों के दूषित होने से वातावरण दूषित हो जाता है और मित्र भी शत्रु बन जाते हैं तथा सफलता भी विफलता में परिणत हो जाती हैं।
विचारें को अनुकूल बनाना ही पुरुषार्थ है। विचार अभ्यास से अनुकूल अथवा प्रतिकूल होते हैं। जो मनुष्य जिस प्रकार के विचारों का अभ्यासी हो जाता है उसके मन में उसी प्रकार के विचार बार-बार आते हैं। साँसारिक विषयों का चिन्तन करने वाले व्यक्ति के मन में साँसारिक विचार आते हैं। उसे इसी प्रकार के विचारों में रस मिलता है। यदि कही ज्ञानचर्चा होती है तो वह उसे रस-हीन समझता है। साँसारिक लोगों को ज्ञान-चर्चा के समय जल्दी से नींद आ जाती हैं। ज्ञान-चर्चा मनुष्य की इच्छाओं के ऊपर नियंत्रण करती है। वह उनकी तृप्ति नहीं करती। अतः इस प्रकार की ज्ञान-चर्चा में आनन्द की अनुभूति करना उसके लिये एक अस्वाभाविक-सी बात होती है।
विचारों पर नियंत्रण धीरे-धीरे आता है। प्रत्येक आवेशात्मक विचार मन को निर्बल बनाता है, निर्बल मन बुरे विचारों के नियंत्रण में असमर्थ रहता है। जब मनुष्य का मन निर्बल हो जाता है तब किसी भी प्रकार के दुःखदायी विचार मन में उठ जाने पर, सब प्रकार के प्रयत्न करने पर भी वे मन से नहीं निकलते कितने ही लोग अपने विचारों से ही परेशान रहते हैं। वे अपने अभद्र विचार मन से निकालना चाहते हैं, पर जैसे-जैसे अभद्र विचार को मन से निकालने की चेष्टा की जाती है, वह और भी प्रबल हो जाता है। ऐसी अवस्था में कभी-कभी मनुष्य को निर्बलता आ जाती है।
इस प्रकार की स्थिति मानसिक निर्बलता का परिणाम होती है। यह मानसिक निर्बलता बार बार आवेशात्मक विचारों को मन में आने देने से उत्पन्न होती है। सब समय विचारों का नियंत्रण करने की चेष्टा से मनुष्य की इच्छा-शक्ति इतनी बलवती हो जाती है कि कोई भी बुरा विचार इच्छा-शक्ति के बिना मन में देर तक नहीं ठहर पाता। जो मनुष्य आवेशात्मक विचार पर जितना ही अधिक नियंत्रण रखता है वह अपनी इच्छा-शक्ति को उतनी ही बलवती बना लेता है। एडवर्ड कारपैन्टर का कथन है—“किसी भी विचार को पहले ही क्षण मार डालो तो फिर उससे जो तुम करना चाहते हो कर सकते हो।” जिस मनुष्य को आवेशों को रोकने की आदत पड़ जाती है उसे किसी प्रकार के बुरे विचार नहीं सताते।
मनुष्य का अभ्यास प्रायः पाशविक प्रवृत्तियों में रमण करने का हो गया है। जिस समय हम कोई समाजोपयोगी काम नहीं करते, पाशविक प्रवृत्तियों की संतुष्टि में लग जाते हैं, तब प्रवृत्तियों के उत्तेजित होने पर अनेक प्रकार के प्रबल बुरे विचार मन में आने लगते हैं। इसलिए सदैव किसी-न-किसी भलाई के काम में अपने को लगाये रखना बुरे विचारों पर नियंत्रण के लिये परम आवश्यक है। जब भी मन स्वच्छन्द या निकम्मा होता है वह स्वभावतः या तो किसी समय काम्य वस्तु की प्राप्ति की योजना बनाने लगता है अथवा वह किसी व्यक्ति के प्रति ईर्ष्या और प्रतिकार की बातें सोचने लगता है।
अवाँछनीय विचारों के नियंत्रण का बहुत सुन्दर उपाय बुद्ध भगवान ने बताया है। यह उपाय ‘उदान’ नामक बौद्ध ग्रंथ में पाया जाता है। यह उपाय यौगिक और मनोवैज्ञानिक है। अतः इस प्रसंग में उल्लेखनीय है।
बुद्ध भगवान एक बार अपने एक शिष्य के साथ ठहरे हुए थे। उस शिष्य के मन में इधर-उधर भ्रमण करने का विचार उठा। उसने भगवान बुद्ध से आज्ञा माँगी। बुद्ध भगवान ने पहले तो आज्ञा न दी, पर उसके बार-बार आग्रह करने पर दे दी। उसने आस-पास जाकर अनेक स्थान देखे। उन स्थानों में उसे एक बड़ा सुन्दर बगीचा दिखाई दिया। उस बगीचे को देख कर उसके मन में आया कि यहाँ बैठकर योगाभ्यास करूं। सो उसने बुद्ध भगवान से उसकी आज्ञा माँगी। विशेष आग्रह देखकर बुद्ध भगवान ने अनुमति दे दी। अब वह शिष्य उक्त स्थान पर योगाभ्यास करने लगा। पर ज्यों ही उसने कार्य आरम्भ किया, उसके मन में अनेक वितर्क उठने लगे।
अन्त में वह भिक्षु भगवान बुद्ध के पास आया और उसने कहा, “महाराज, मैंने ज्यों ही योगाभ्यास प्रारम्भ किया, मेरे मन में काम-वितर्क, व्यापाय-वितर्क और विहिंसा-वितर्क आने लगे। मैं इन वितर्कों को रोक नहीं सका। कृपा कर मुझे इनसे छूटने का उपाय बताइये। भगवान ने कहा कि जिस मनुष्य का मन वैराग्य में दृढ़ नहीं हो चुका है उसे अकेले रहना उचित नहीं है। उसे सदा संघ में रहना चाहिए। संघ में रहने से मनुष्य के विचार विकृत नहीं हो पाते। फिर प्रत्येक साधक निम्नलिखित चार धर्मों का सदा पालन करते रहना चाहिए—(1) अशुभ भावना का अभ्यास, (2) मैत्री भावना का अभ्यास, (3) ‘अनापान-सति’ का अभ्यास, (4) संसार की अनित्यता के विचार का अभ्यास।
मनुष्य का मन सदा राग और द्वेष के बीच घड़ी के पेंडुलम की भाँति इधर-से-उधर डोलता है। इसी कारण मनुष्य को साम्यावस्था प्राप्त नहीं होती। मन के सदा अस्थिर रहने से वह कोई भी काम लगन से नहीं कर पाता। राग मनुष्य के मन में ऐसे अनेक संस्कार पैदा कर देता है जिनसे मानसिक ग्रन्थियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। रागात्मक मनोवृत्ति की पूरक द्वेषात्मक मनोवृत्ति है। जब एक व्यक्ति के प्रति राग होता है तब उसके विरोधी से प्रति हमारे मन में द्वेष-भावना उत्पन्न हो जाती है। जो हमारे स्वार्थ के साधक होते हैं उनके प्रति हमारा प्रेम हो जाता है और जो हमारे स्वार्थ में बाधक होते हैं उनके प्रति द्वेष-भावना होती है।
राग की विनाशक अशुभ-भावना है और द्वेष की विनाशक मैत्री-भावना। प्रत्येक पुरुष को सुन्दर स्त्री के प्रति अनुराग होता है। यह अनुराग उसके अचेतन मन में बैठा रहता है। जब वह बाहरी मन से साधु भी बन जाता है तब भी वह अनुराग उसके मन से नहीं जाता है। सुन्दर रूपवती स्त्री के प्रति सभी पुरुषों की शुभ भावना होती है। पर रूप के दुर्गुण कामातुर पुरुष को दिखाई नहीं देते एवं रूप का बार-बार चिंतन करने से काम भावना और भी प्रबल हो जाती है। इस रागात्मक मनोवृत्ति के विनाश के लिये रूप के दुर्गुणों पर विचार करना आवश्यक है। शरीर की गंदगी पर विचार करने से उसके प्रति अनुराग चला जाता है। मुर्दे की कल्पना करके उस पर चिन्तन करने से शरीर के प्रति अनुराग नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार धन, मान आदि के दुर्गुणों पर नित्य विचार करने से इनके प्रति अनुराग नष्ट हो जाता है। यही अशुभ भावना है।
यहाँ यह बताना आवश्यक है कि राग और द्वेष किसी बात के सोचने मात्र से नष्ट नहीं हो जाते। इसके लिये प्रतिदिन निरन्तर अभ्यास की आवश्यकता होती है। प्रतिदिन का निरन्तर अभ्यास आत्म-निर्देश का रूप धारण कर लेता है। जब तक हमारा कोई विचार चेतन मन के नीचे अचेतन मन को प्रभावित नहीं करता वह हमारे चरित्र का सुधार नहीं करता। विचार-मात्र से इच्छा-शक्ति दृढ़ नहीं होती, इच्छाशक्ति अभ्यास से दृढ़ होती है। कितने ही पंडित अनेक प्रकार का ज्ञान-उपदेश दूसरों को करते हैं, पर वे स्वयं अपने मन को नियंत्रण में नहीं रख पाते। वे स्वयं उन वासनाओं से मुक्त नहीं होते, जिनसे वे दूसरों को मुक्त करने की चेष्टा करते हैं। मनुष्य में सामर्थ्य बुद्धि नहीं, वरन् अभ्यास लाता है। अभ्यास से मनुष्य का स्वभाव ही परिवर्तित हो जाता है।
मैत्री-भावना क्रोध की विनाशक है। जिस प्रकार ‘अशुभ भावना’ से काम-वासना का निराकरण होता है इसी प्रकार मैत्री-भावना से क्रोध का निराकरण होता है। जिस व्यक्ति में अपने क्रोध को रोकने की जितनी अधिक योग्यता होती है, उसका मन उतना ही अधिक शान्त होता है और सामर्थ्य उतनी ही अधिक होती है। जो व्यक्ति सबके प्रति मैत्री भावना का अभ्यास करता है, वह दूसरों, से निर्भीक रहता है। उसकी मानसिक शक्ति व्यर्थ के विचारों में खर्च नहीं होती। अमैत्री-भावना का अभ्यास करने वाला व्यक्ति सदा भय के वातावरण में रहता है। वह सदा अनेक प्रकार के शत्रुओं की कल्पना किया करता है। और उनसे बचने के लिये अनेक प्रकार की योजनाएँ बनाता रहता है। इस प्रकार उसकी अधिकाँश मानसिक शक्ति कल्पित शत्रुओं से लड़ने में नष्ट हो जाती है फिर वह निर्बल-मन हो जाता है। यदि ऐसी अवस्था में उसके मन में कोई अशुभ विचार आ जाये तो वह उस विचार को अपने मन से नहीं निकाल सकता। अमैत्री भावना और कायरता एक दूसरे के पूरक हैं। मैत्री-भावना शान्ति और पौरुष की वर्द्धक है।
संसार की अनित्यता का अभ्यास अहंकार का विनाशक है। जिस व्यक्ति का अहंकार जितना अधिक होता है। उसके दुःख भी उतने ही अधिक होते हैं। अहंकार की वृद्धि होता है। वह जिस बात को सच मान बैठता है उसके प्रतिकूल किसी की कुछ भी सुनने को तैयार नहीं रहता और जो उसका विरोध करता है वह उसका घोर शत्रु हो जाता है।
अहंकार का आधार संसार के अनित्य पदार्थों से अपना एकत्व स्थापित करना है। कोई व्यक्ति अपने आप को धन में, कोई पद में, कोई मान और कीर्ति में खोये हुए है। इनकी अनित्यता पर विचार करने के मनुष्य अपने आपको समझने की चेष्टा करता है। वह फिर अपने शत्रुओं की संख्या घटा देता है। जिस व्यक्ति का अहंकार जितना अधिक होता है, उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। अपने अहंकार के कारण ही वह इन शत्रुओं को पैदा करता है और फिर वह इन शत्रुओं के विनाश की इच्छा करता रहता है। आगे चल कर ये विचार उसके आत्म-विनाश के विचारों के रूप धारण कर लेते हैं।
मनोविज्ञान का यह अटल सिद्धान्त है कि दूसरे के विनाश के विचार ही आत्म-विनाश के विचारों में परिणत हो जाते हैं। परघात और आत्मघात की भावनाएँ एक दूसरे की पूरक हैं। जब हमारे चेतन मन में एक प्रकार की भावनाएं प्रबल होती है तब हमारे अचेतन मन में दूसरे प्रकार की भावनाएं प्रबल हो जाती हैं। इस प्रकार दूसरों का विनाश करने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपना ही विनाश कर डालता है।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा)
आप उदास हैं! चेहरा मुरझाया, शरीर थका और तबियत निढाल! जीवन में अनेक बार आप उदास हो जाते हैं, अंग शिथिल, मन भारी, काम में तबियत नहीं लगती। मनहूसियत बरसती है तो उबासियाँ चैन नहीं लेने देती। आप परेशान होकर सोचते हैं कि क्या करें? कही चले जायं? सर में दर्द है। शरीर भारी इन्द्रियों, गिरी-गिरी, आँखों में थकान तो हृदय में जोश उत्फुल्लता और उत्साह का नाम निशान नहीं। जगत् जंजाल लगता है, तो परिवार भार स्वरूप प्रतीत होता है।
उदासी जीवन के ऊपर यकायक आ जाने वाली मृत्यु अंधियारी है। यह हमारी जीवन-शक्ति का ह्रास करती है। शरीर को शिथिल कर देने वाली राक्षसी है। अधिक देर तक मनुष्य में रहने से उदासी स्थायी बन जाती है और “मलनकोलिया” जैसे मानसिक रोग को उत्पन्न करती है। इस रोग का रोगी गंभीर नैराश्य मुद्रा बनाये रहता है। किसी कार्य में दिलचस्पी नहीं लेता, लोगों से मिलने बरतने में सकुचाता है, मनोरंजन संगीत नृत्य, खेल तमाशों में भाग नहीं लेता। छोटे शिशुओं से नहीं खेलता, अपनी पत्नी माता बहिन परिवार आदि से भी खिंचा तना रहता है। शौक की वस्तुओं में मन नहीं लगता।
उदासी जीवन-पुष्प को मुरझा देने वाली भयावह झंझावत है। कोई सुरम्य वाटिका हो, उसमें रंगीन मदभरे, उत्साह से परिपूर्ण छोटे-2 कोमल कमनीय फूल विंहस रहे हों, पर अचानक इधर उधर अग्नि लग जाये और धीरे-2 आकर इन पुष्पों से लदे हुए पौधों को झुलसा दे, तो कैसी दुरावस्था होगी! उदासी आने से हम इसी प्रकार हृदय की लोनी लोनी कमनीय भावनाओं, विहंसती हुई महत्वाकांक्षाओं, सद्भावनाओं, प्रेम सहानुभूति की कलिकाओं को झुलसा देते हैं।
निराशा यदि अग्नि है, तो उदासी उससे उठने वाला विषैला धुंआ है। जैसे काला काला धुंआ सफेदी से पुते हुए श्वेत घर को काला बना देता है, जिसमें बैठाने या ठहरने को मन नहीं करता, उसी प्रकार उदास मनः स्थिति वाले व्यक्ति की दिव्य आनन्दमयी आत्मा क्लान्त, अतृप्त, व्यग्र सी रहती है। आत्मा दिव्य परमात्म तत्व का अंश है। उदास रह कर हम अपने परमात्म तत्त्व का ह्रास करते हैं।
उदासी, कुरूपता, चेहरे का बेढंगापन, और तनाव की सृष्टि करती है। उदासी से मुख मण्डल म्लान पड़ जाता है तथा मानसिक शक्तियाँ निर्बल हो जाती हैं। प्रायः उदासी का एक कारण शारीरिक अथवा मानसिक थकावट होती है। एक ही परिस्थिति अथवा एक ही कार्य करते करते हम थक जाते हैं। अतः उदासी दूर करने के लिए नया कार्य, नई परिस्थितियाँ, नये लोगों का संपर्क स्थापित कीजिये। जिस कार्य से उदासी उत्पन्न हुई हो, उसे परिवर्तित कर नया काम प्रारम्भ कीजिए।
उदासी संपर्क से आती है। आप उदास, गंभीर चिन्तनशील प्रकृति के व्यक्तियों के साथ रह कर उदास बनते हैं। ऐसे व्यक्तियों के साथ रहिये जो पुष्प के समान तरोताजा और खिले हुए रहते हैं, जो चिन्ताओं को चुटकियों में उड़ाते हैं। अपने चारों ओर ऐसे चित्र रखिए जिसमें मनुष्य हंस खेल रहे हों। स्वयं अपने ऐसे चित्र खिंचवाइये जिनमें आप प्रसन्न और आह्लादमयी मुखमुद्रा में हों। इन चित्रों को देखकर स्वयं अपनी उदास सूरत पर आपको लज्जा आयेगी और उदासी दूर हो जायगी।
मुझे जब उदासी आती है, तो मैं अपने बच्चों के साथ खेलता हूँ। मैं अपना दुःख दर्द भूल कर कुछ काल के लिए बालक बन जाता हूँ-सरल चित्त और आह्लादमय, कपट और दुराव से उन्मुक्त पवित्र और निर्द्वन्द्व। समाज में कुछ व्यक्ति मेरे मित्र तो कुछ शत्रु हो सकते हैं, आदर अनादर कर सकते हैं, किन्तु ये सरल आनन्द स्वरूप शिशु तो सदैव ही मित्र हैं, दुःख को दूर करने नया उत्साह भरने वाले हैं। इनके लिए काले गोर, अमीर, गरीब, हरिजन सवर्ण किसी का तुच्छ भेद भाव नहीं, शिष्ट बनने का कृत्रिम दम्भ नहीं, परछिद्रान्वेषण या टीका-टिप्पणी करने की कमजोरी नहीं। वे तो शुद्ध ब्रह्म रूप हैं। उनमें आनन्द मय रूप पर्याप्त विकसित है, सांसारिकता से दब नहीं गया है। आनन्दमय रहने में बालक मेरे गुरु है, पथप्रदर्शक हैं, शान्ति एवं जीवन के प्रति उत्साह दिलाने वाले सच्चे मित्र हैं। उन्हें देख कर उनसे खेल कर उनकी हृदयतंत्री के तारों से झंकृत प्रेम से मैं ईश्वरत्व का अनुभव करता हूँ।
उदासी मन के गलत विकारमय काल्पनिक भयों के कारण उत्पन्न होती है। ऐसा व्यक्ति मन में अपने विपरीत, विरोधी, निराशावादी विचार रखता है। और मन में व्यर्थ के काल्पनिक भय मत रखिये और अपने जीवन के अप्रिय रूप पर गंभीरता से मत विचार कीजिए। अप्रिय भाव मन में इधर उधर चक्कर काटते रहते हैं और हमें मानसिक क्लान्त बना देते हैं। प्रायः मानसिक श्रम करने वाले उदासी से अधिक परेशान रहते हैं। कारण, जब मन उदास है, थका हुआ है, तो सम्पूर्ण शरीर पर उदासी छा जाती है। अतः जब जब मानसिक थकान हो तो श्रम छोड़ कर नया मनोरंजन कार्य कीजिये।
भजन पूजन तथा कीर्तन आदि आनन्दमय प्रभु से सान्निध्य प्राप्त करने और तुच्छ साँसारिकता से उत्पन्न उदासी दूर करने के उपाय हैं। “ॐ आनन्दम्, ॐ आनन्दम्।” का पुनःपुनः उच्चारणः गायत्री जैसे दिव्य मंत्र का जाप, “रघुपतिराघव राजाराम, पतित पावन सीताराम” अथवा भगवान के नाम का स्मरण दिलाने वाले किसी भजन का गायन मन में उत्फुल्लता और शान्ति उत्पन्न करने वाला है। संगीत में कुछ ऐसी उत्फुल्लकारी शक्ति है, जिससे उदासी दूर होकर ताजगी आती है। कोई हर्ज नहीं यदि आप अच्छे गवैया नहीं है। भक्ति रस के कुछ वचन, तुलसी, सूर या मीरा के प्रेम रस पूर्ण भजन गुनगुनाइये, उदासी दूर हो जायेगी।
जब आप निराश हों, तो बाहर स्वास्थ्यप्रद स्वच्छन्द वायु में घूमने निकल जाइये। आजकल का जीवन सभ्यता के बनावटी वातावरण में बुरी तरह बंध गया है। आवश्यकता है कि हम प्रकृति के मनोरम दृश्यों, सरिता तटों, लहलहाते खेतों, उद्यानों की शीतल विमल वायु का आनन्द लें। कल्पना की सहायता से अपने उज्ज्वल भविष्य के चित्र बनायें और आनन्दमम् बने रहें। प्राकृतिक वातावरण में निवास करने से मानसिक यातनाएँ दूर होती हैं चिन्ता के पर्वत चूर चूर होकर उड़ जाते हैं।
मेरे एक मित्र चित्रकार हैं। उनका अधिकाँश समय चित्रकला के अभ्यास में व्यतीत होता है। जब कभी उनके पास फालतू समय होता है तथा बेकार होते हैं, वे चित्रकारी का सामान लेकर प्रसन्नतापूर्ण चित्रों की सृष्टि करने बैठ जाते हैं। आनन्दमय विचारों से अपने मन और हृदय को पूर्णतः परिपूर्ण कर लेते हैं। बाहर भीतर आनन्दमय वातावरण छा जाने से उदासी स्वयं लुप्त हो जाती है।
जब आप उदास होते हैं, तो आप प्रायः खाली निठल्ले भी होते हैं। खाली मन्द विरोधी चिन्तन में लीन होकर मन को उदासी से भर देता है। अतः आप कुछ कीजिए। कोई आनन्ददायी कविता या उपन्यास नाटक या अपनी प्रिय पुस्तक पढ़िये। उदासी के कारण को भूलने के लिए कविता बड़ी उपयोगी है। दो चार ऐसी कविताएं कंठस्थ कर लीजिए जिनको पुनः उच्चारण करने से मन में प्रेरणा उत्पन्न होती है। जैसे श्री जगदम्बा प्रसाद शर्मा ने स्वयं अपना प्रिय गजल अपनी डायरी में इस प्रकार लिख रखा है:—
आदमी वो है, जो मुसीबत में परेशां न हो। कोई मुश्किल नहीं जो आशां न हो।
दुनिया में परेशानी है गर्दिश का चलन, चाँद सूरज पर पड़ जाता है एक रोज ग्रहण मर्द वही है जो मुसीबत में परेशां न हो।
आप भी इसी प्रकार का कोई प्रिय भजन, श्लोक, कविता, पद्य इत्यादि यदि कीजिए।
उदासी का एक कारण शारीरिक या मानसिक थकान है। इसके लिए पर्याप्त विश्राम करना चाहिए। घंटा भर सो लीजिए, निद्रा की मधुरता में उदासी धुल जायगी और नव शक्ति का संचार होगा। स्नान करने से भी मन और शरीर की थकावट दूर होती है। यदि किसी नदी में तैर सकें तो और भी ताजगी आयेगी। अनेक वृद्धों तक ने स्नान या तैर कर ताजगी प्राप्त की है। इंग्लैंड का सुप्रसिद्ध नाट्यकार जार्ज बर्नाडशा अस्सी वर्ष का होने पर भी तैरने का शौकीन था। उसका अनुभव था कि पानी में डुबकी लगाने, या तैरने से बढ़कर शरीर मन आत्मा को ताजगी देने वाला और अच्छा उपाय नहीं।
मित्रो, प्रसन्न रहो, उदासी आपके लिए अप्राकृतिक तथा हानिकर है। गीता में स्वयं भगवान् ने कहा हैं:—
प्रसादे सर्व दुःखाना हानि रस्योपजायते।
प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धिपर्यवतिष्ठते॥
(गी. 2।65)
अर्थात् चित्त प्रसन्न रहने से सब दुःख दूर होते हैं और प्रसन्न चित्त रहने से बुद्धि स्थिर होती है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति को श्रीयोन नागोची की निम्न प्रार्थना करना चाहिए—
“हे प्रभु! जब जिन्दगी के कगारों की हरियाली सूख गई हो, पक्षियों का कलरव बन्द हो गया हो, सूरज पर ग्रहण की छाया गहरी होती जा रही हो, परखे हुए मित्र और आत्मीय जन काँटों के रास्ते पर मुझे अकेला छोड़ कर चले गये हों और आसमान की सारी नाराजी मेरी तकदीर पर बरसने वाली हो,तो हे प्रभु, तुम मुझ पर इतना अनुग्रह करना कि मेरे होठों पर हँसी की एक उजली रेखा रहने देना।”
(केशवदेव उपाध्याय, ‘कमलेश’ मथुरा)
“दूध!.... माता जी! दूध!!” यह कह कर अश्वत्थामा ने करुण दृष्टि से माँ की ओर देखा।
“दूध!.... भैया!”
“हाँ! माता जी! सभी बालक तो पीते हैं।”
बालक की सरल किन्तु सत्य उक्ति पर महाराज द्रोणाचार्य की धर्म के दिव्य ललाट पर चिन्ता की रेखायें उद्भूत हो गई, दूध कहाँ से आयेगा?
पतिदेव की दिनचर्या में दूध की माँग उपस्थित कर विघ्न खड़ा करना उस पति परायणा को इष्ट न था। आटे का दूध बना कर दरिद्र माता ने सरल चित्त बालक को भरपेट पिला दिया। पुत्र की माँग अनायास पूरी होने लगी।
एक दिन जब अश्वत्थामा ने आटे का दूध पीने का पात्र मुख से लगाया, अचानक तपस्वी द्रोणाचार्य आ निकले।
“क्या है अश्वत्थामा?”- उन्होंने स्नेह से पुकारा
“दूध पी रहा हूँ पिताजी!”- अश्वत्थामा ने संतोष भरे शब्दों में कहा।
“दूध!”
“जी हाँ”- कह अश्वत्थामा ने पात्र पिता के सन्मुख कर दिया।
अकारण स्वास्थ्य का दुरुपयोग वह सहन न कर सके। उन्होंने सरोष कहा- “अश्वत्थामा की स्वास्थ्य-रक्षा क्या इसी प्रकार होती है?”
“हाँ महाराज!”- उनकी धर्मपत्नी ने प्रत्युत्तर में कहा।
“क्यों?”
“दूध तो घर में नहीं है!”
“मुझसे क्यों नहीं कहा?”
“आपके एकान्त अध्यापन कार्य में दूध जैसी सामान्य वस्तु को लेकर अन्तराय उपस्थित करना क्या उचित होगा। फिर आप ही क्या करते। पुत्र के हठ पर आपको दूध का प्रबन्ध न कर देने पर और कष्ट होता, और फिर इस थोड़ी सी बात पर व्यर्थ असुविधा खड़ी कर देना क्या कम चिन्ता की बात होती?”
यह कह कर पतिप्राण रमणी ने भयभीत हरिणी की भाँति आचार्य को देखा।
उनका क्रोध उस दृष्टि में समूल विलीन हो गया और उसके स्थान में अपनी दरिद्रता का नीरव दृश्य क्षण-भर के लिये महर्षि की आँखों में प्रादुर्भूत हो गया।
उन्होंने कहा- “मेरी असुविधाओं का ध्यान करते करते तुमने इस सुन्दर शरीर को सुखा डाला है और जीवन-भर इस निर्धर ब्राह्मण की पर्णकुटरि में तुम्हें इन आपदाओं के सिवाय मिल ही क्या सकता था? अस्तु वह तो सब तुम्हारी रुचि के अनुकूल है। उस प्रकार रहने से शायद तुम्हें कुछ सुख मिलता है, किन्तु इस लाड़िले पुत्र के प्रति जो तुम्हारी यह भावना होगी प्रतिदिन दूध की जगह आटे का जल देने में जो तुम्हें आन्तरिक पीड़ा होती होगी उसे कब तक छिपा कर रख सकोगी?”
यह कह कर आचार्य ने भावपूर्ण दृष्टि से ब्राह्मणी की तरह देखा।
पुत्र का वात्सल्य अपनी असमर्थता से अधीर होकर माता के विशाल नयनों से स्नेह बरस पड़ा।
[2]
“द्वारपाल!”
“महाराज! साष्टांग अबनत हो।” द्वारपाल ने कहा।
“अपने महाराज से कहो, द्रोणाचार्य नाम का एक ब्राह्मण तुमसे मिलना चाहता है।”
महाराज द्रुपद की राजसभा बैठी थी। रत्न जटिल स्वर्ण सिंहासन पर महाराज अपने प्रमुख अधिकारियों के साथ मनोरंजन कर रहे थे। एक बड़ी बारहदरी में लोकोत्तर ऐश्वर्य के लाडिले राज पुरुष अपने योग्य राजा को वीर-गाथायें सुना रहे थे, उसी समय द्वारपाल ने सूचना दी—
महाराज द्रुपद चिंता में पड़ गये, उनका राज्य शासन में व्यस्त मस्तिष्क किसी प्रकार भी इस समय द्रोण की अभ्यर्थना के लिये तैयार नहीं था। गुरु परशुराम की धनुर्विद्या, जो द्रोणाचार्य ने बड़ी कठिनता से उनके गले में उतार दी थी, किन्तु वीरता से उनके गले में उतार दी थी, किंतु वीरता से उन्होंने उसे विस्मृति-मन्दिर के सुदूर एकान्त कोण में ढकेल कर अपना पिण्ड छुड़ाना चाहा।
द्वारपाल ने महाराज को चिन्तित देकर कहा— महाराज क्या ब्राह्मण को लौटा दूँ?
महाराज का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने अन्यमनस्कता से कहा—आने दो।
द्वारपाल चला गया और क्षणभर बाद द्रोणाचार्य को साथ लेकर उपस्थित हुआ।
महाराज एक अनजान ब्राह्मण अतिथि के उपयुक्त सम्मान के लिये उठ खड़े हुये।
निर्दिष्ट आसन पर बैठते हुए आचार्य ने द्रुपद का अन्तर देख लिया। अपमानजन्य क्रोध से उनके होठ दाँतों में दब गये।
कुछ देर बाद द्रुपद ने लोक नीति के अनुसार प्रश्न किया—“तपस्वी विप्र! किस उद्देश्य से यहाँ पधारे?”
व्यवस्थित होकर आचार्य ने कहा—“द्रुपद! क्या तुम मुझे भूल गये!”
“महाराज मुझे ध्यान नहीं आता, आज से पहले कभी आपको देखा हो।” आचार्य अधीर हो गये। उन्होंने कहा—
“क्या कभी तुमने गुरु परशुराम के आश्रम में द्रोण नामक किसी विद्यार्थी को देखा था?”
बड़ी देर तक स्मृति-सागर को उथल-पुथल कर द्रुपद ने कहा—“सम्भव है, किन्तु वह तो कुछ ध्यान रखने लायक बात न थी।”
इस अपमान पर क्रुद्ध आचार्य ने कहा—“कृतघ्न द्रुपद! यह सारा बल यह सारी विद्या क्या उसी के द्वारा उपार्जित नहीं हुई जिसे आज तुम जान कर भी भूल रहे हो?”
द्रुपद का अन्तःकरण भीतर-ही-भीतर कृतघ्नता के पाप से आन्दोलित होने लगा। उसे घुमा कर उसने कहा—“गुरुजी के आश्रम में द्रोण एक साधारण विद्यार्थी था। वह स्वयं कुछ विशेष उपार्जन न कर सका। ब्राह्मण भी वीर-विद्या में पारंगत हो सकते हैं! यह वचन तो केवल गुरु परशुराम को लेकर अपवाद हुआ है।”
आचार्य ने कहा—
“अच्छा वीर राजर्षि! क्या कभी तुम्हें उस साधारण द्रोण विद्यार्थी से यह कहने का अवसर मिला था कि राज्याभिषेक होने के अनन्तर आधा राज्य उन्हें दे दूंगा?”
द्रुपद ने कहा—“हम क्षत्रिय, ब्राह्मण की रक्षार्थ अपनी उदारता से आधा राज्य ही क्यों, समस्त राज्य भी प्रदान कर देते पर मुझे ऐसा अवसर उपस्थित नहीं हुआ।”
क्रोधी आचार्य अब न सह सके—“कृतघ्न द्रुपद! मैं वही द्रोण हूं। मुझे राज्य की लालसा नहीं थी, केवल एक दूर देने वाली गाय की अभिलाषा से ही तेरे निकट आया था। तूने गुरु का अपमान कर धनुर्विद्या का ही अपमान किया। नराधम! शीघ्र ही तेरा राज्य-मद इस ब्राह्मण के द्वारा चूर्ण होगा” आचार्य चले गये। द्रुपद ज्यों-का-त्यों बैठा रहा।
[3]
द्रुपद के व्यवहार से आचार्य का मन खिन्न हो गया था, क्षत्रिय जाति पर उन्हें क्रोध और घृणा होने लगी। आवश्यकता होने पर भी भीष्म के निकट जाने की उनकी इच्छा जाती रही। राह में एक विशाल कूप पर बैठ कर वह चिंतामग्न हो गये।
कुछ देर बाद कुछ राजकुमार खेलते हुए उधर आ निकले। शैशव की चंचलता उन्हें तेज हवा की भाँति झकझोर रही थी। खेलते-खेलते ज्यों ही वे कूप के निकट आये त्यों ही उनकी गेंद उछल कर कूप में जा गिरी।
सभी ने यथा शक्ति उसे बाहर निकालने के उपाय किये, किन्तु वह निर्मोही गेंद बालकों के मन की बात न जान सकी। स्निग्ध सरस शीतल जल को क्षणिक मिलन विरह में बदल देने के लिए उसका हृदय तैयार न हुआ।
आचार्य सब देख रहे थे, कोमल हृदय बालकों की बेचैनी उनसे छिपी नहीं। आचार्य का क्षुब्ध तपस्वी मन बालकों की सौम्य सरल दृष्टि में क्षण भर के लिये आनन्द मग्न हो गया, उन्होंने एक बाण से उसका हृदय बींध कर ऊपर निकाल दिया।
राजकुमार आश्चर्यचकित हो कहने लगे—
“महाराज! आप हमारे दादा के पास चलिये, वह आप-जैसे बाण विशारदों को देख कर अत्यन्त प्रसन्न होते हैं।”
“वह कौन हैं!” आचार्य ने कहा—
“भीष्म-पितामह!”
“आह! वह मेरे गुरुभाई हैं, सहाध्यायी।”
“तो चलिये न ।”
मैं नहीं जा सकेगा, तुम उनसे जा कर कह दो एक द्रोणाचार्य नाम के ब्राह्मण तुमसे मिलन चाहते हैं।”
राजकुमार लौट गये और कुछ देर बाद भीष्म पितामह आचार्य के स्वागत के लिये प्रमुख राज पुरुषों के साथ द्रोण के निकट उपस्थित हुए।
स्वागत के अनन्तर भीष्म-पितामह ने कहा—
“आचार्य! ये राजकुमार आपकी धनुर्विद्या से प्रभावान्वित हो गये हैं, इन्हें शिक्षा देकर वीर बनाइये। यह राज्य और राजकुमार सभी प्रकार आपकी सेवा के लिये प्रस्तुत रहेंगे।”
आचार्य का ब्राह्मण हृदय इस विनय पूर्ण आग्रह से गदगद हो गया। वह सपत्नीक हस्तिनापुर आकर रहने लगे।
[4]
आचार्य की विलक्षण शिक्षा-शैली ने कुरु और पाण्डु-वेश में धनुर्विद्या का अपूर्ण चमत्कार खड़ा कर दिया।
राजकुमार अव साधारण राजकुमार न रह गये थे। उनका धनुर्ज्ञान दिव्य हो उठा था, वीरता दूर-दूर तक विख्यात हो गई थी। अश्वत्थामा भी राजकुमारों के संग अद्भुत प्रतिभाशाली वीर बन गया। अब उसे दूध की जिद न थी। माँगने का अवसर ही न मिलता था। बिना माँगे ही राज्यलक्ष्मी हाथ बाँधे आचार्य के कुटी द्वार पर खड़ी रहती थीं।
भीष्म पितामह की इच्छा से राजकुमारों की परीक्षा के लिये राज सभा बैठी। कुरु और पाण्डु वंश के सम्मिलित राज पुरुषों में दूर-दूर के निमन्त्रित राजे-महाराजे भी उपस्थित थे।
नियत समय राजकुमार पधारे। परीक्षा प्रारम्भ हुई। दुर्योधन, दुशासन, भीम आदि ने अपनी कुशलता से सब को चकित कर दिया। बारी-बारी से सभी ने अपना कौशल दिखाया। योग्य स्नातकों को देख कर भीष्म आचार्य के सद्गुणों पर अधिक रीझ उठे। सब से अन्त में अर्जुन उठा। वह आचार्य का सबसे अधिक प्रिय शिष्य था। आचार्य ने आज्ञा दी, पार्थ ने धनुष उठाया। उसके विलक्षण शर-सन्धान को देख कर सब भयभीत हो गये। अर्जुन पलभर में दिव्यास्त्रों का आवाहन कर एक अभूतपूर्व बाण-चातुरी से विकट संहार का दिग्दर्शन करने लगा।
समागत राजपुरुषों का मन इस अद्भुत बलशाली वीर के पराक्रम से चिंतित हो गया। भविष्य की आशंकाओं ने क्षण-भर के लिये उनके अन्तर में घोर हाहाकार मचा दिया।
आचार्य ने अर्जुन को आशीर्वाद देकर शाँत कर दिया—“परीक्षा समाप्त हो गई।”
[5]
भीष्म की आज्ञा से राजकुमार गुरु दक्षिणा के लिये आगे बढ़े। आचार्य क्षण भर मौन रह कर बोल उठे—
“अर्जुन! तुम सभी अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार धनुर्विद्या के पारंगत पण्डित हो गये। अब उसी के प्रत्युपकार स्वरूप गुरु-दक्षिण की आज्ञा सुनना चाहते हो!”
राजकुमारों ने अवनत होकर कह—“हाँ गुरुदेव! जो कुछ आज्ञा होगी, वह प्राणों की बाजी लगा कर भी अवश्य पूरी की जायगी।”
“अच्छा तो सुनो, इसी समय द्रुपद को बाँध कर मेरे सामने उपस्थित करो और उसके समस्त राज्य में राजा की जगह मेरा नाम घोषित कर दो यही मेरी उपयुक्त गुरु-दक्षिण है।”
[6]
आचार्य के आदेश के अनुसार द्रुपद बाँध कर लाया गया। अर्जुन ने आगे बढ़ कर कहा—“देव! द्रुपद उपस्थित है।”
आचार्य ने सरोष एक नजर द्रुपद को देखकर मुख फेर लिया। अपराधी द्रुपद आचार्य की इस उपेक्षा से अधीर हो रहा था।
क्षण-भर बाद अर्जुन ने फिर कहा—“आचार्य, बन्दी के लिये क्या आज्ञा होती है?”
एक अन्तर्भेदी दृष्टि डाल कर आचार्य ने कहा—“अभिमानी द्रुपद ! कृतघ्न द्रुपद! मुझे पहचानते हो, मैं कौन हूँ?”
भयभीत द्रुपद ने श्रद्धांजलि होकर—“आचार्य! आप तो राज गुरु द्रोणाचार्य हैं।”
“जिस समय तुम्हारे द्वार पर गया उस समय कौन था?”
द्रुपद पृथ्वी पर आँखें गड़ाकर रह गया।
आचार्य ने कहा—“ब्राह्मण का अपमान, गुरु के प्रति-कृतघ्नता, प्रतिज्ञा भंग और मिथ्याचार—एक साथ चार अपराध हैं ऐसे दुर्विनीत मनुष्यों को राज्य शासन करने देना द्रुपद, प्रजा के साथ घोर कृतघ्नता है। अर्जुन! अर्जुन इसको मेरी कुटिया के द्वारा पर आजीवन बन्दी बन कर रहना होगा और राज्य मेरा है, उसका शासन प्रबन्ध तुम करना और राज्य की आय प्रजा के हितों में व्यय कर देना।”
द्रुपद का रंग बिगड़ गया, ऐसी कठोर दण्डाज्ञा सुन कर उसके प्राण रो उठे। वह आचार्य के चरणों में गिर गया। रोते-रोते उसने कहा—“गुरुदेव! आचार्य!! मुझे क्षमा करो, अपने पाप कर्मों के प्रति मुझे क्षमा करो, मैं पापी हूँ, जान-बूझ-कर मैंने आपका अपमान किया था, मुझे घोर कष्ट हो रहा है।”
क्षण-भर में आचार्य का ब्राह्मण हृदय द्रवित हो गया। उन्होंने कहा—“यदि पश्चाताप हुआ है तो मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ, किन्तु भविष्य में राज्यमद से भूल कर किसी की अवज्ञा न करना, मिथ्या न बोलना।”
द्रुपद ने आचार्य के चरण स्पर्श कर कहा—“गुरु-देव! फिर ऐसा कदापि न होगा।”
सन्तुष्ट मना आचार्य ने कहा-अर्जुन! मेरी ओर से द्रुपद को राज्य-तिलक कर दो—गुरु-दक्षिणा में पाया हुआ राज्य मैं अपने अपराधी शिष्य को फिर सहर्ष प्रदान करता हूँ।
(श्री. आत्मदेव तिवारी)
वर्तमान समाज का रूप बहुत कुछ वैसा ही है जैसा कि मध्ययुग में रहा है। सैकड़ों वर्षों से हमारे समाज में धन की प्रधानता रही है। विवाह का आधार भी धन ही रहा है और अब भी है। विवाह के अनेक नियमोपनियामों के बावजूद धन के आगे सभी को झुकना पड़ा। धन के बल पर ही तो योजनागंधा ऐसी सुन्दरी को शान्तनु जैसे बूढ़े प्राप्त कर सके। धन के प्रभाववश ही तो राजा-महाराजा आवश्यकता से अधिक स्त्रियों को अपने यहाँ रख लेते थे। मुसलिम शासन में तो जितना ही धनी होता था वह उतनी ही अधिक स्त्रियाँ और रखेलियाँ रखता था। आजकल भी प्रायः यही दृश्य दिखाई देता है। यद्यपि मनु आदि स्मृतिकारों ने विवाह के सम्बन्ध में अनेक प्रतिबन्ध लगा रखे हैं, परन्तु धन के सम्मुख वे सभी ढीले पड़ जाते हैं। धन के बल पर नीच जाति का पुरुष ऊँची जाति की कन्या से विवाह कर सकता है। यहीं नहीं, कुरूप तथा अंगहीन होने पर भी धनी व्यक्ति किसी सुन्दरी से विवाह कर सकता है। एक पत्नी के मर जाने पर अथवा जीवित रहने पर भी धनवान् व्यक्ति किसी अन्य कुमारी से विवाह कर सकता है। इसके अगणित उदाहरण हमें वर्तमान समाज में देखने को मिलेंगे।
हम मानते हैं कि हमारे समाज में ऐसे माता-पिता भी हैं जो धन के इस व्यापक प्रभाव से मुक्त हैं। ऐसे लोगों ने व्यक्ति गत योग्यता के आधार पर ही अपनी कन्याओं का विवाह किया है। परन्तु एक बड़ी संख्या ऐसे अभिभावकों की है जो किसी धनी से नाता जोड़ने के हेतु चिन्तित रहते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि अयोग्य अथवा साधारण योग्यता के लोग अपने धन के बल पर दो-दो तीन तीन शादियाँ कर लेते हैं और बहुत से सुशिक्षित युवकों को अच्छी पत्नी नहीं मिलती।
विवाह के इस दूषित आधार से सम्बद्ध एक दूसरी समस्या दहेज की है। संसार से जिस प्रकार दुःख-दारिद्रय दूर करने के अनेक विफल प्रयत्न किये गये। उसी प्रकार दहेज को मिटाने के भी अनेक प्रयास हुए हैं परन्तु दहेज की प्रथा अब भी पूर्ववत् बनी है। कहा जाता है कि दहेज के कारण कितनी ही निर्दोष कन्याओं के प्राण गये और कितने ही माँ बाप कंगाल हो गये। फिर भी क्या कारण है कि यह समस्या ज्यों की त्यों है। एक कहावत है कि धन की तीन गति हैं- दान, भोग और नाश। बस धनी वर्ग ने संचित धन के उपयोग (अथवा दुरुपयोग) का यह भी एक उपाय निकाल रखा है। कन्या के साथ-साथ वे वर पक्ष बालों को रत्न सुवर्ण तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ देते हैं। इस प्रकार के आदान-प्रदान में वे गर्व का अनुभव करते हैं।
दहेज के सम्बन्ध में एक और मत है। बहुत से गरीब माँ-बाप ऐसे है जो येन-केन उपायों द्वारा धनिक वर्ग से सम्बन्ध स्थापित करने को लालायित रहते हैं। ऐसे लोगों की बाढ़ रोकने के लिए दहेज प्रतिबन्ध स्वरूप है। जहाँ तक धनिकों की बात है, दहेज कोई समस्या नहीं है। इसे रोकने अथवा निर्मूल करने की कोई आवश्यकता नहीं। कुछ समय पूर्व युक्त-प्रान्तीय असेम्बली में श्री जयराम वर्मा ने दहेज प्रथा विरोधी कानून बनाने का प्रस्ताव किया था। परन्तु उन्हें यह प्रस्ताव वापिस लेना पड़ा। उनसे कहा गया कि इस प्रकार के विधान को कार्यान्वित करने में अनेक कठिनाइयाँ पड़ेंगी। कोई भी अभिभावक अपने नये सम्बन्धी को अदालत द्वारा दण्ड दिलाना नहीं चाहेगा। सच्ची बात तो यह है कि दहेज के सभी विरोधी नहीं। जब गरीब माँ बाप किसी धनिक के लड़के से अपनी कन्या ब्याहना चाहते हैं उस समय दहेज की लम्बी रकम चुकाने में उन्हें कठिनाई जान पड़ती है और वह प्रथा उनके लिए समस्या का रूप धारण कर लेता है। ऐसी स्थिति में बहुत-सी निरीह कन्याओं को अपना बलिदान करना पड़ता है और समाज में लोक नारे लगाने लगते हैं कि दहेज प्रथा बुरी है और उसे मिटाना आवश्यक है।
कुछ वर्ष पहले प्रयाग के एक प्रसिद्ध सज्जन ने दहेज-प्रथा की बुराइयों की चर्चा करते हुए लिखा था कि जिन कन्याओं को दहेज की प्रथा के फलस्वरूप दुख भोगना पड़ता है उनके अभिभावकों का ‘माथा ऊँचा’ रहता है। तात्पर्य यह है कि ऐसे अभिभावक स्वयं निर्धन होते हुए धनिकों के घर ही अपनी कन्याओं का विवाह करना चाहते हैं। यदि वे अपने ही समान आर्थिक स्थिति के लोगों से सम्बन्ध स्थापित करें तो दहेज समस्या के रूप में उनके समक्ष उपस्थित ही न हो। हमें धनिक बग की अन्धभक्ति से अपने को विरत करना होगा। अपनी पूँजीवादी मनोवृत्ति को सुधार कर जनतन्त्रीय भावनाओं को अपनाना होगा।
एक पुरानी कहावत है कि वैर, ब्याह और प्रीति’ समान में ही करना चाहिये। यह कथन बड़ा ही सारगर्भ एवं महत्वपूर्ण है। जब विवाह आर्थिक साम्य के अनुकूल होंगे तो पुनर्विवाह, बहु-विवाह आदि स्वयं ही निर्मूल हो जाएंगे। तब यह दृश्य देखने में नहीं आयेगा कि विधुर एवं प्रौढ़ लोग तो अनेक विवाह, सो भी कुमारियों से, कर लें और बहुत से युवकों को योग्य पत्नियाँ ही न मिलें। विवाह का आधार प्रेम होना चाहिये। वास्तविक प्रेम आर्थिक दृष्टि से विषम लोगों में नहीं हो सकता। होगा भी तो वह कृत्रिम प्रेम ही होगा। समान लोगों में विवाह का आधार धन न हो कर व्यक्ति गत योग्यता मानी जायगी।
इस सम्बन्ध में हम अपने देश के प्रबुद्ध नारी समाज तथा अपनी प्रगतिशील बहिनों से अपील करेंगे कि उन्हें स्वयं इस दिशा में अग्रसर होना चाहिये। साधारण स्थिति की बहिनों से हम कहेंगे कि धनिक की दासी बनने का स्वप्न देखते उन्हें बहुत दिन हो गये। अब समय बहुत कुछ बदल गया है। यह समाजवाद का युग है। हमें चाहिये कि समान लोगों में विवाह सम्बन्ध होंगे तो दहेज की समस्या आपसे आप लुप्त हो जायगी। उसके लिये कानून बनाने की आवश्यकता न पड़ेगी। अब हम स्वतन्त्र देश के नागरिक हैं। हमारा आदर्श समाजवादी जनतन्त्र की स्थापना है। अतएव हमें पूँजीवादी मनोवृत्ति का त्याग कर समाजवादी मनोवृत्ति को अपनाना होगा, तभी हमारा कल्याण है।
(श्री हीरालाल)
दमा एक प्रकार का श्वाँस रोग है जिसके सम्बन्ध में जनसाधारण की धारणा है कि वह दम के साथ ही जाता है। वस्तुतः ऐसी बात नहीं है। उचित ढंग पर चिकित्सा द्वारा इसका निर्मूलन हो सकता है। पर अभी तक इस रोग की जो चिकित्साएँ प्रचलित हैं उन में रोग के कारण पर उचित ध्यान नहीं दिया जाता। रोग के कारण पर विचार करके उसका सुगमता से निवारण किया जा सकता है।
आयुर्वेद वाले इस रोग के मुख्यतः दो कारण बताते हैं—1−प्रत्यक्ष 2−अप्रत्यक्ष।
प्रत्यक्ष—ऐसा भोजन करना जो दाह पैदा करे,अजीर्ण पैदा करे, जो गर्मी या सर्दी पैदा करे, एकदम ठण्डा जल या भोजन।
अप्रत्यक्ष—व्यायाम, अधिक भार ढोना, मलमूत्र की हाजत रोज भोजन करते समय तृप्त न होना।
तात्कालिक प्रत्यक्ष साधारण धुएँ या धूल में रहना है। एलोपैथ इसे स्नायविक रोग कहते हैं। उनका कहना है कि दमा श्वांस पर रोगी के हृदय और फेफड़े में कोई दोष नहीं पाया जाता। इसी आधार पर सुइयाँ तथा अन्य दवाइयाँ उन्होंने ईजाद की हैं।
प्राकृतिक चिकित्सा का मत—
प्राकृतिक चिकित्सा में सब रोगों की जड़ एक ही मानते हैं ‘गलत आहार व्यवहार’ और उसे ठीक कर लेना ही सब रोगों की दवा है। उनका कहना है कि प्राकृतिक जीवन बिताने मात्र से अन्य रोगों की तरह दमा भी जड़ से ठीक हो सकता है। अन्य रोगों में तो इतनी गुंजाइश होती है कि एकाध बार गलती हो जाने पर भी संभल जाता है लेकिन इसमें तो जरा भी रियायत नहीं होती दमा रोग के रोगी को आजीवन प्राकृतिक जीवन बिताने का व्रत लेना चाहिये।
पोषण के लिए शरीर में दो प्रधान कार्य होते हैं। 1—समीकरण 2—बहिष्करण। इन दोनों क्रियाओं के सहयोग से ही जीवन−क्रिया पूर्ण होती है। समीकरण अवयवों में जीर्णमण्डल का प्रमुख स्थान है। फेफड़े के साथ−साथ हृदय भी समीकरण अवयव कहा जाता है। जीर्णमण्डल के अन्दर ठोस और द्रव पदार्थ की पाचन क्रिया होती है। हृदय प्राण वायु ग्रहण करता है और हृदय ही शरीर के प्रत्येक भाग में रक्त पहुँचाता है। रक्त पहले दिमाग में, तब बाजू में और सीने में और अन्त में शरीर के निचले भाग में आता है। इस प्रकार सारे शरीर को भोजन मिलता है।
बहिष्करण—इस क्रिया द्वारा शरीर में पैदा हुआ कचरा बाहर निकलता है। इसके निम्नलिखित मार्ग हैं 1—मलाशय, मूत्राशय, त्वचा, श्वाँसनली। इन क्रियाओं में खराबी पैदा होने पर रोग का जन्म होता है। जब पेट ठीक−ठीक साफ नहीं होता तो नीचे की पसलियाँ पूरी तरह काम नहीं करतीं। नतीजा यह होता है कि हमें साँस लेने में कठिनाई का अनुभव होता है और अन्दर−ही अन्दर गन्दगी सड़ान पैदा करती है। उस समय गन्दगी के निकालने का सारा काम त्वचा पर आ पड़ता है और अन्त में अधिक काम करते−करते त्वचा मन्द होकर अपने कार्य में शिथिल हो जाता है।
धुंआ या धूल साँस के साथ जाने से उसमें जो छोटे−छोटे कण होते हैं वे श्वाँस नली में जम जाते हैं जिससे साँस लेने में कठिनाई होती है। नम हवा में साँस लेने से श्वाँसनली सिकुड़ जाती है और साँस लेना दुश्वार हो जाता है। ठंडी हवा लगने के बाद शरीर में गरमी न पैदा होने से रोम−कूप सिकुड़ जाते हैं जिससे दूषित पदार्थ शरीर से बाहर न निकल रक्त में मिल जाता है और गुरदे के द्वारा बाहर निकलने की कोशिश करता हे लेकिन गुरदे के ऊपर अधिक कार्य का बोझ पड़ जाने से वह भी खराब हो जाता है। इस प्रकार किसी एक के शिथिल पड़ जाने से उसका बोझ बाकी तीनों भागों पर पड़ता है। नतीजा यह होता है कि अन्त चारों मार्ग निष्क्रिय हो जाते हैं।
हमारे भोजन में जब सब तत्व−श्वेतसार, प्रोटीन, वसा, विटामिन, प्राकृतिक लवण और फुजला−उचित मात्रा में नहीं होते हैं तब अनेक अभाव जन्य रोगों के साथ कब्ज शुरू हो जाता है, जो सब रोगों का जन्मदाता कहा जाता है।
भोजन में आधिक माँस, मछली, दाल, अंडे आदि अम्ल खाद्य रहने से अधिक मात्रा में यूरिक एसिड पैदा होता है। यूरिक एसिड पैदा हो जाने से रक्त गाढ़ा होकर संचालन शिथिल पड़ जाता है और मूत्रेन्द्रिय उसे निकालने में असमर्थ हो जाती है। इस अम्ल के कारण ही दमा का जन्म होता है।
प्राकृतिक उपचार—
रोग के इन कारणों को प्राकृतिक उपचारों द्वारा सुगमता से दूर किया जा सकता है और प्राकृतिक नियमों का पालन कर स्वास्थ्य लाभ किया जा सकता है। अस्तु, जब कभी रोग का उभार हो उस समय—1—जब तक उमाड़ रहे केवल गरम पानी में नीबू कागजी या कोई भी निचोड़ दिन भर में दो तीन सेर पानी 10−12 बार में पाव−पाव भर की मात्रा में पीना चाहिये।
2—गुनगुने पानी का सुबह शाम एनिमा लेना चाहिये।
3—सीने और पीठ पर गरम सेंक दिया जाय।
4—यदि सुविधा हो तो दोनों बगल में गरम पानी की बाल्टी रख कर उसमें 15 मिनट तक दोनों हाथ डालें। पाठक प्रश्न कर सकते हैं कि हाथ और श्वास नली का क्या संबंध है? हाथ और श्वास नली का सब से निकट संबन्ध है।
5—पैरों को गरम पानी में 20−30 मिनट तक रखना और ऊपर से कम्बल ओढ़ लेना। पसीना निकल आने पर बदन ठण्डे तौलिये से रगड़ लेना चाहिये।
6—यदि प्रबन्ध हो तो आदम−कद टब में 67−100 डिग्री गरम पानी में आधे घण्टे से एक घण्टे तक लेटना।
7—पूरे शरीर की गीली पट्टी। किसी महीन कपड़े को ठण्डे पानी में भिगोकर निचोड़ लेना चाहिये। उसे शरीर में लपेट कर ऊपर से दो तीन कम्बल लपेट देना चाहिये। सुलाने के पहले एक गिलास गरम पानी पिला देना चाहिये। यदि पसीना न हो तो बीच−बीच में भी गरम पानी पिलाते रहना चाहिये।
स्थायी रोग में एनिमा, पेडू तथा मेहन नहान, उचित आहार−विहार, सूर्य स्नान, उचित व्यायाम आदि नियमपूर्वक चलना चाहिये।
भोजन—
भोजन ऐसा होना चाहिये कि जिसमें शरीर के लिये आवश्यक सभी तत्व मिल जायें और साथ ही अधिक क्षारमय हो। भोजन इस प्रकार रखें।
40 प्रतिशत फल—सेब, केला, नीबू, सन्तरा, नाशपाती, किशमिश, मुनक्का, अंगूर, शहतूत, अनानास, खरबूजा, तरबूजा,बेर, रसभरी, सरदा, गुलाब जामुन आदि। लेकिन खाते समय यह स्मरण रहे कि केले अथवा खजूर को रोटी की ही जगह पर खाना चाहिए और साथ में अलग से चोकर भी। फलों का मीठा और रसदार दोनों का होना आवश्यक है।
मेवा—किशमिश, अंजीर, मुनक्का आदि। इन मेवों को खाने के बारह घण्टे पहले पानी में भिगो देना चाहिये और खाते समय पानी पीकर उसे खा लेना चाहिये।
40 प्रतिशत तरकारी—पात गोभी, चुकन्दर, गाजर, शलजम फूलगोभी, ककड़ी, खीरा, प्याज, मूली, टमाटर, लहसुन, पालक, हरी अजवाइन, हरी धनिया, शलजम की पत्ती, करमकल्ला, हरी मटर, लौकी, करेला, कुँभड़ा, परवल, नेनुआ, तोरई, चिंचिड़ी, टिंडा, सहजन, इनमें जिनका मौसम हो उसे पकाकर खाना चाहिये लेकिन यह ख्याल रहे कि कोई न कोई पत्तीदार सब्जी भोजन में जरूर होनी चाहिये।
सलाद की पत्ती, हरी अजवाइन, टमाटर, खीरा, ककड़ी, पातगोभी, करमकल्ला आदि प्रत्येक पत्तीदार साग का इस्तेमाल सलाद में हो सकता है। सलाद के स्वाद को बढ़ाने के लिये उसमें हरी गरी के बारीक लच्छे, किशमिश अथवा मकोय आदि कोई भी चीज मिला सकते हैं प्याज थोड़ी मात्रा में होनी चाहिये। प्याज और लहसुन स्वादिष्ट बनाने हैं।
10 प्रतिशत गेहूँ, चावल, ज्वार, बाजरा, मकई या कोई भी अन्न। लेकिन उनका कन और चोकर अलग नहीं करना चाहिये।
10 प्रतिशत दूध और दूध जनित पदार्थ तथा गरी, खजूर आदि काष्ठज फल।
ऊपर के अनुपात को ध्यान में रख कर भोजन इस प्रकार रखना चाहिये—
नाश्ता—कोई भी रसदार फल—टमाटर, मकोय,संतरा,मौसमी। यदि इन फलों का अभाव हो तो अमरूद या किशमिश को भिगोकर खाना चाहिये। अच्छा होगा यदि नाश्ता न किया जाय।
दोपहर—चोकर समेत आटे−की रोटी या करण समेत चावल का भात, मिली हरी सब्जी कुछ कच्ची और कुछ पकी।
शाम को हो सके तो फल और दूध नहीं तो दोपहर का ही भोजन करना चाहिये।
भोजन खूब चबा चबाकर खाना चाहिये। खाते समय पानी नहीं पीना चाहिये। सोने के एक घण्टे पहले और दो तीन घण्टे बाद पानी पीना चाहिये।
स्नान—
पेडू नहान—टब में पानी इतना भरना चाहिए कि उसमें बैठने पर नाभि के नीचे तक रहे। नहान लेते समय पैर बाहर रखना चाहिए। इसके लिए जाड़े के दिनों में तो कुएँ अथवा नल का ताजा पानी, लेकिन गर्मी के दिन में शाम को मिट्टी के घड़े में पानी को भरकर बालू पर रख दिया जाय और उसे सुबह इस्तेमाल किया जाय। इसी प्रकार सुबह के भरे हुए पानी को शाम को इस्तेमाल किया जाय।
पानी में बैठकर गफ तौलिये से पुट्ठे पेडू को दांये सिरे से बांये सिरे तक−पानी में रहने वाले अंग−रगड़कर फिर हथेली से सुखा लेना चाहिए। यह नहान शक्ति के अनुसार 10−15 मिनट तक लेनी चाहिये। यदि रोगी बहुत ही कमजोर हो तो केवल 3−4 मिनट के नहान से ही शुरू करना चाहिये और फिर धीरे−धीरे बढ़ाना चाहिए।
मेहन नहान—टब में एक चौकी रख कर उसमें चौकी से 1−1॥ इंच ऊपर पानी भरें और चौकी पर बैठ कर और पैर बाहर रखकर नहान लेना चाहिए।
जननेन्द्रिय के घूँघट को बांये हाथ के पहले तीन अँगुलियों से पकड़कर दूसरे हाथ में कपड़ा लेकर हलके रगड़ना चाहिए। इसी प्रकार स्त्रियों को भी जननेन्द्रिय के चारों ओर हलके हाथों रगड़ना चाहिए। पेडू नहान की तरह इस नहान का समय भी धीरे−धीरे बढ़ाकर बीस मिनट तक बढ़ाया जा सकता है।
स्नान लेने के पहले सारे शरीर को हथेली से रगड़ना चाहिए और बाद में भी। नहान लेकर शक्ति के अनुसार नित्य 5−6 मील तेजी से गहरी साँस लेते हुए टहलना चाहिए। यदि टहल न सकें तो स्त्रियों को चक्की चलानी चाहिए और पुरुषों को खुले मैदान में अन्य कोई श्रम−कार्य चुनना चाहिए।
सूर्य स्नान—सुबह टहलकर आने के बाद नित्य 15−20 मिनट तक धूप में रहने के बाद तुरंत ठण्डे जल से रगड़−रगड़कर नहाना चाहिए।
उपवास—प्रत्येक रविवार या सप्ताह में किसी एक दिन केवल पानी में नीबू मिलाकर पीकर रहना चाहिए। दूसरे दिन गुनगुने पानी का एनीमा लेना चाहिए। उपवास के दिन एक पतली चद्दर ओढ़ कर धूप में एक गिलास गरम पानी पीकर सो जाना चाहिए।
जो भाई टब का इन्तजाम करने में असमर्थ हों उन्हें मिट्टी की पट्टी पेडू पर लेनी चाहिए। मिट्टी को 5−6 घण्टे भिगो देना चाहिए। फिर दस इंच लम्बी 5 इंच चौड़ी और 1 इंच मोटी पट्टी दिन में दो बार—सुबह शाम रखनी चाहिए।
सीना पट्टी—किसी महीन कपड़े को पानी में भिगो कर निचोड़ लेना चाहिए। सीने के चारों तरफ तीन चार बार लपेट कर ऊपर कोई ऊनी कपड़ा लपेटना चाहिए। इस पट्टी को आधे घण्टे से 1 घण्टे तक रखना चाहिए।
इन नियमों पर चलकर अमीर−गरीब सभी लोग लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
(पं. तुलसीराम शर्मा, वृन्दावन)
चरित्रवान पुरुष भगवान के बराबर है।
अन्य दुखेनयोदुखीयोऽन्यहर्षेणहर्षितः।
स एव जगतामीशोनररूपवरो हरिः॥ 69॥
(नाद पु. पूर्वखंड अ.)
अन्य के दुख से जो दुखी है, अन्य के हर्ष से जो हर्षित है वह जगत का ईश नर रूप धारी भगवान है।
पुण्योपदेशीसदयः कैतवैश्चविवर्जितः। पाप मार्गविरोधी च चत्वारः केशवोपमाः॥17॥
(पद्म पु. क्रिया योगासार खंड 7 वाँ आ. 117)
धर्मोपदेश, दयावान, छल कपट से शून्य, पाप मार्ग के विरोधी ये 4 भगवान के तुल्य हैं।
ज्ञान रत्नैश्च रत्नैश्च पर सन्तोषकृन्नरः।
सज्ञेयः सुमतिर्नूनं नर रूप धरोहरिः॥19॥
(पद्म पु. 7 वाँ क्रिया योगसार खंड अ.1)
ज्ञान रूप रत्नों से, और द्रव्यादि से जो सत्पुरुषों को संतोष करता है ऐसे पुरुष को मनुष्य रूपधारी भगवान् समझना चाहिए।
द्वचं यस्यवशे भूयात् स एवस्पाज्जनार्दनः॥29॥
(वैशाख माहात्म्य 22)
शिश्न और जिह्वा ये दो जिसके वश में हैं वह भगवान् है।
अनाढ्यामानुषेवित्ते आढ्यावेदेषुयेद्विजाः। तेदुर्द्धर्षादुष्प्रकम्प्या विद्यात्तान् ब्रह्मणात्स्तनुम॥
(म॰ भा.उ अ. 43।39)
जो द्विज मानुषी धन (स्त्री पुत्र सुवर्णादि) के धनी नहीं हैं और वैदिक धन (हिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, शाम, दम) के धनी है वे विवेकियों के मत में ब्रह्म के शरीर हैं वे बड़े तेजस्वी और दुष्प्रकम्प्य हैं।
श्री शंकराचार्य जी ने इस वचन के भाष्य में लिखा है कि—‘वेदेषवेद प्रतिपाद्य अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य शमादि साधनेषु’ अर्थात् वेद में कहे अहिंसा, सत्य आदि में लगा हुआ पुरुष ब्रह्म का शरीर है।
चरित्रवान् ही पंडित व बुद्धिमान् है।
न पण्डितोमतो राम बहु पुस्तक धारणात्।
परलोक भयं यस्य तमाहुःपण्डितं बुधाः॥13॥
(विष्णुधर्मोत्तर पु. खं. 2 अ. 51)
हे! राम बहुत पुस्तक पढ़ने से पण्डित नहीं माना जाता, जिसको परलोक का भय है उसको बुद्धिमान् जन पण्डित कहते हैं॥13॥
निषेवतेप्रशस्तानिनिन्दितानिन सेवते।
अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डित लक्षणम्॥16॥
(स. भा.उद्योग. अ. 33)
जो उत्तम कर्मों का सेवन करता है निन्दित कर्मों से बचता है आस्तिक है (यहाँ के किये कर्मों का फल अवश्य परलोक में भोगना पड़ेगा) गुरु व शास्त्र में विश्वास है ऐसा पुरुष पण्डित है॥
वृत्तस्थमविचाराडालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥193॥
(पद्म पु. सृष्टि खण्ड अ. 47)
चरित्रवान् चाण्डाल को देवता ब्राह्मण समझते हैं।
शूद्रोऽपिशील सम्पन्नो ब्राह्मणादधिको भवेत्।
ब्राह्मणो विगताचारः शूद्राद्धीनतरोभवेत् ॥31॥
(भविष्य पु. अ. 44)
सदाचार सम्पन्न शूद्र भी ब्राह्मण से अधिक है दुराचारी ब्राह्मण शूद्र से गया हुआ है।
चतुर्वेदोपि दुर्वृतः सशूद्रादतिरिच्यते॥111॥
(म. भा.वन.अ.313)
चारों वेदों का जानकार ब्राह्मण यदि दुराचारी है तो वह शूद्र से गया बीता है।
नकुलंवृत्तहीनस्य प्रमाण मिति मे मतिः।
अन्त्येष्वपिहिजातानां वृत्तमेव विशिष्यते॥14॥
(म. भा. 3034)
मेरी समझ में अच्छे कुल में उत्पन्न होने पर भी जो मनुष्य दुराचारी है वह आदरणीय नहीं। यदि नीच कुल में उत्पन्न हुआ भी सदाचारी है तो वह मान्य है कारण कि सदाचारी ही उत्तमता का हेतु है।
गायत्री तपोभूमि में गत बसन्त पञ्चमी से विशेष गायत्री महायज्ञ चल रहा है। अब उसका विशेष यज्ञों का आयोजन अगले मास में प्रारम्भ हो रहा है। वशद गायत्री महायज्ञ में 125 लाख आहुतियों के द्वारा जो महान मंगलमय वातावरण उत्पन्न होने जा रहा है उसमें इन विशेष यज्ञों से और भी अधिक सहायता मिलेगी।
इन विशेष यज्ञों का महत्व और महात्म्य अत्यन्त ही महान है। मनुष्य की साँसारिक और आध्यात्मिक कठिनाइयों के समाधान में इनके द्वारा भारी सहायता मिलता है। श्रावण में होने वाला रुद्र यज्ञ—एवं रुद्राभिषेक भगवान शंकर के अनुग्रह को विशेष रूप से उपलब्ध कराने में समर्थ होता है। शिव शक्ति की कृपा होने पर जो लाभ जीव को प्राप्त होने सम्भव हैं उन्हें उपलब्ध कराने में रुद्रयज्ञ एक असाधारण उपकरण है।
प्रथम भद्र पद में होने वाला महा मृत्युञ्जय यज्ञ मनुष्यों में संजीवनी शक्ति का प्रादुर्भाव करता है। महामृत्युञ्जय यज्ञ के द्वारा मरे हुए मृत प्रायः मृत्यु के मुख में अटके हुए प्राणी भी पुनर्जीवित होते, जीवनी शक्ति प्राप्त करते देखे गये हैं। जिनका शरीर और मन निर्जीव, निष्प्राय, दुर्बल, जर्जरी भूत हो रहा हो उन्हें महामृत्युञ्जय शक्ति एक प्रकार से संजीवनी जीवनमृरि ही है।
दूसरे भाद्रपद में पुरुषोत्तम मास में यजुर्वेदीय पुरुष सूक्त से विष्णु यज्ञ होगा। यह सुख, सम्पत्ति, श्री, कीर्ति, लक्ष्मी, संतान आदि आनन्ददायक परिस्थितियों को उत्पन्न करने वाला माना गया है। लक्ष्मीपति विष्णु की यज्ञीय उपासना साँसारिक समाज और दारिद्र को मिटाने में बड़ी सहायक होती है।
आश्विन में होने वाला शत चंडी यज्ञ दुर्गा की प्रचण्ड दुर्धर शक्ति का आह्वान है। विद्युत की तरह यह आपत्तियों संकटों कठिनाइयों के पहाड़ पर वज्र की तरह गिरनी है और उन्हें चूर चूर कर डालती है। शत्रुता, द्वेष, बन्धन, विरोध, क्लेश आदि के असुरों का उदर विदीर्ण करने के लिये चण्डी महा शक्ति व प्रहार तीक्ष्ण तलवार की तरह होता है।
कार्तिक में होने वाला नवग्रह यज्ञ ग्रह दशा का जो प्रभाव किसी मनुष्य, प्रदेश, जाति अथवा राष्ट्र पर पड़ता है उसके अशुभ प्रभाव को हटाने और शुभ प्रभाव को बढ़ाने में चमत्कारिक रूप से उपयोग सिद्ध होता है। शनि राहु आदि अशुभ ग्रहों के अनिष्ट कर प्रभाव से पीड़ितों के लिए नवग्रह यज्ञ जितना हितकारक है उतना ही शुभ ग्रहों के मन्द फल को तीव्र करके लाभ और कल्याण की अधिक आनन्दमयी परिस्थिति भी उत्पन्न करता है।
चारों वेदों के मन्त्र मार्गशीर्ष से प्रारम्भ होंगे। यजुर्वेद में उन शक्तियों का विशेष रूप से समावेश है जो आनन्ददायक, प्रिय, रुचिकर, सुखदायी, पदार्थों को उत्पन्न करती है। यजुर्वेद के मन्त्रों से भरी हुई सूक्ष्म शक्तियों का प्रकाश जिन्हें प्राप्त हो जाता है उन्हें किन्हीं वस्तुओं पदार्थों एवं उपकरणों का अभाव नहीं रहता है।
ऋग्वेद का यज्ञ पौष में होगा जो आत्मा को परमात्मा से मिला देने के महान अध्यात्म विज्ञान से सब प्रकार परिपूर्ण हैं। दुष्ट मनोविकारों, संचित दुष्कर्मों, पाप तापों, को जला डालने में ऋग्वेदीय मन्त्र अग्निबाण के सदृश्य है। वे आत्मा को परमात्मा तक पहुँचाने वाली दूरवर्ती मात्रा को शीघ्र पूरा कर देने में पुष्पक विमान के समान सिद्ध होते हैं।
सामवेद का उपयोग बुद्धि, भावना, स्नेह, सदाचार अन्तःकरण चतुष्टय की शुद्धि, कुण्डलिनी आदि शक्तियों के जागरण, षट्चक्र वेधन, ऋद्धि सिद्धियों की उपलब्धि के लिए है। यह यज्ञ माघ में होगा।
अथर्ववेद का यज्ञ फाल्गुन में प्रारम्भ होगा जो शरीर अन्य रोगों एवं अपूर्णताओं को हटाने में रामबाण के समान माना गया है। सन्तान सुख, दीर्घ जीवन, आरोग्य वृद्धि आदि प्रयोजनों के लिए सदा अथर्ववेदीय यज्ञ उपासना की जाती है।
चैत्र में ज्योतिष्टोम, अग्निष्टोम आदि श्रौत यज्ञ होंगे। और चैत्र की नवरात्रि के अन्त में पूर्णाहुति के समय नरमेध यज्ञ किया जायगा। जो व्यक्ति अपने जीवन को गायत्री माता और यज्ञ पिता को सर्वतोभावेन सौंपने का संकल्प लेंगे, उनका व्यक्तित्व संकीर्ण स्वार्थपरता अहंभाव की चरुस्थाली से उठाकर भगवान बैश्वानर के अग्निकुण्ड में होम कर—विश्व मानव का, समष्टि पुरुष का एक अंग बना दिया जायगा। ऐसी आत्माएँ जो नरमेध में अपनी आहुति देगी, अभी से अपनी तैयारी में लगेंगी।
अत्यन्त ही विशद गायत्री यज्ञ के साथ साथ इतने यज्ञों की एक साथ क्रमबद्ध सांगोपांग शास्त्रोक्त पद्धति पर आधारित आयोजन अब तक शायद ही कभी हुआ हो। ऐसे अवसर भविष्य में भी कदाचित ही किन्हीं सौभाग्यशाली व्यक्तियों को प्राप्त होंगे। इन यज्ञों के द्वारा विश्व शान्ति, समस्त संसार का कल्याण, बढ़ी अनीति और आपत्तियों का निवारण, शान्तिमय वातावरण की उत्पत्ति आदि व्यापक लाभ तो होगा ही—इनमें भाग लेने वाले याज्ञिक व्यक्तिगत रूप में भी समुचित आध्यात्मिक और साँसारिक लाभ प्राप्त करेंगे।
जागृत आत्माएँ इस आलस्य अवसर को हाथ से ना जाने दे इसी में उनकी दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता है। एक आध लोग यों ही असफल प्रयोगों में लगा देते हैं, यदि 10−15 महीनों का आगामी समय के हम महान आध्यात्मिक प्रयोग के लिये लगा दें तो निश्चित रूप से यह उनके लिए एक सफल आध्यात्मिक एवं नैतिक व्यापार सिद्ध हो सकता है। शिक्षित,निरोग धार्मिक प्रकृति, श्रद्धालु और परिश्रम शील स्त्री−पुरुष ही इसमें भाग ले सकेंगे और तपोभूमि में ठहर सकेंगे। व्यसनी, स्वार्थी, झगड़ालू, आलसी, रोगी, कामचोर स्वभाव के एवं अशिक्षित व्यक्ति इस कार्य के अनुपयुक्त रहेंगे। जिन्हें इन यज्ञों में भाग लेने के लिए मथुरा आना हो वे पत्र व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त और करलें और यथा सम्भव जल्दी ही तपोभूमि पहुंचने का प्रयत्न करें ताकि इन यज्ञों में भाग लेने की पूर्व तैयारी एवं आवश्यक शिक्षा प्राप्त करने का पहले ही अवसर मिल जाये। भोजन एवं ठहरने की व्यवस्था तपोभूमि में रहेगी। महिलाओं के ठहरने की समुचित व्यवस्था की गई है। यज्ञों सम्बन्धी शास्त्रीय शिक्षा प्राप्त करने वालों के लिए तो यह एक स्वर्ग सुयोग ही है।
जिसके पास समय है ऐसे अपने परिवार को अगले 10 महीने, या जितने दिन सम्भव हो मथुरा आने और यज्ञ में भाग लेकर जीवन को सच्चा लाभ प्राप्त करने के लिए हम सादर आमन्त्रित करते हैं।
सरस्वती यज्ञ:—
ज्येष्ठ सुदी 1 से ज्येष्ठ सुदी 10(गायत्री जयन्ती) तक का सरस्वती यज्ञ इन दिनों आनन्द और उत्साहमय वातावरण में चल रहा है। भारतवर्ष के सुदूर प्रांतों से अनेकों व्यक्ति ज्ञान वृद्धि, विकास, साँस्कृतिक शिक्षा एवं तपश्चर्या के उद्देश्य से तपोभूमि में एकत्रित हुए है। ब्राह्मी, बच, शतावरी गोरखमुण्डी, आदि वृद्धि के औषधियों के द्वारा सरस्वती मंत्र से, प्रातःकाल 5 बजे से यज्ञ प्रारम्भ हो जाता है, और तीनों यज्ञशालाओं पर बड़े ही व्यवस्थित रूप में 9॥ बजे तक यज्ञ होता रहता है। तीसरे पहर से लेकर सायंकाल तक प्रवचन चलते रहते हैं। अनुभवी और अधिकारी वक्ताओं के द्वारा आगन्तुकों को अमृतमय उपदेश दिये जाते हैं। तीर्थ यात्रा का भी कार्यक्रम रखा गया है। ता. 26 मई को कितने ही व्यक्तियों को यज्ञोपवीत संस्कार पूर्ण शास्त्रोक्त विधि से कर्मकाण्डी विद्वान पंडितों द्वारा संपन्न कराया गया जिसका दृश्य बहुत ही हृदय ग्राही था। यह अंक जब तक पाठकों के हाथों में पहुंचेगा तब तक सरस्वती यज्ञ कर सब कार्य भली प्रकार पूर्ण हो चुका होगा।
यज्ञ महत्व विशेषांक:—
‘अखण्ड ज्योति’ का अगला (जुलाई 55 का) अंक ‘यज्ञ महत्व विशेषांक’ होगा। इसमें यज्ञ की महत्ता, उपयोगिता, शक्ति एवं वैज्ञानिक विशेषता पर समुचित प्रकाश डाला जायेगा। इस अंक से पाठकों का यज्ञ सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होगी।
[ सीताराम ‘शिव’ ]
खण्ड−खण्ड करते धरती का करो खण्ड अम्बर तो जाने!
सूरज कैसे बाँट सकोगे? राशि को कैसे काट सकोगे? नभ की इस विस्तृत डलिया से, तारे कैसे छाँट सकोगे?
धर्म−कर्म में भेद बताते, करो खंड ईश्वर तो जाने! लाल रक्त के सभी बने हैं, जाल स्नेह से सभी बँधे हैं।
आँसू सबके होते खारे, हँसते हैं जब हँसते प्यारे। हम है, यह है मेरा कहते, करो खंड नश्वर तो जाने!
होती सभी अनुभूति हमारी, हृदय पिघलता पीड़ा होती, हम हो जाते बाग−बाग, जब बच्चों की मधु क्रीड़ा होती।
करते फिर व्यवधान मनुज में, करो खंड अन्तर तो जाने! सौरभ-प्लावित, चिर नवीन है, यह शिव−सुन्दर यह है मेरा,
यह कुलटा, कुटेव छोटा सा, यह खराब है, इससे तेरा, रचते जाल विषमता छूटे, जन्म जरा संसृति तो जाने!
कैसे बांटोगे सागर को? क्या मानेगा पवन रोकना ? धर्म अनल का जलन-जलाना, क्या मानेगा दमन, टोकना?
दम्भ-दृष्टि है जो कुछ बाँटो; खण्ड करो वह मन तो जाने। एक ब्रह्म है, एक भाव है, एक जीव औ एक जगत है,
तम आवृत क्यों उज्ज्वल बंधन? घृणा द्वेष की क्यों अभिनन्दन? एक धरा के हम सब प्राणी, रचो नया जग, तो हम जानें।
*समाप्त*