(श्री विद्यावती मिश्र )
मैंने सब देकर सब पाया! अक्षय कोश मिला जब मैंने अपना सारा कोश लुटाया!!
जाने कब से मैं पागल बन, मिट्टी को समझी थी कञ्चन, किन्तु तुम्हारी कृपा किरण ने,
दिया मुझे अनमोल ज्योति कण, जिसके दिव्य प्रकाश−पुञ्ज में, मैंने नूतन पन्थ बनाया!
लक्ष्य प्राप्त करने का यदि प्रण, करो विभव का दूर प्रलोभन, कहीं न स्थिर कर दे पद की गति,
सोने—चाँदी का आकर्षण, छाया वन—वन पथ को रोके मन की मृग तृष्णा की माया!
देव तुम्हारा पूजन—अर्चन, करता है मन प्रतिपल, प्रतिक्षण, रोक नहीं मुझको पायेंगे,
सुख सौरभ के स्वप्न सुहावन, जीवन का सर्वस्व लुटाकर पद−पद्मों में ध्यान लगाया!
(योगराज श्री अरविन्द)
आर्य ज्ञान, आर्य शिक्षा, आर्य आदर्श जड़ज्ञानवादी राजसिक भोगपरायण पाश्चात्य जाति के ज्ञान और आदर्श से एकदम भिन्न हैं। यूरोपीय लोगों के मतानुसार स्वार्थ और सुखान्वेषण के बिना कर्म का आचरण नहीं हो सकता, विद्वेष के बिना विरोध और युद्ध होना असम्भव है। उनकी धारणा यही है किया तो सकाम कर्म किया जा सकता है अन्यथा कामना हीन संन्यासी बनकर बैठा जा सकता है। उनके विज्ञान का मूलमन्त्र यही है कि जीविका के लिए जो संघर्ष होता है उसी से जगत् गठित हुआ है, उसी के द्वारा जगत की क्रमोन्नति साधित हो रही है। जिस दिन आर्यों न उत्तर मेरु से दक्षिण की यात्रा कर पञ्चनद भूमि को अधिकृत किया था उसी दिन से इस सनातन शिक्षा को प्राप्त कर उन्होंने सनातन प्रतिष्ठा भी प्राप्त की है कि यह विश्व आनन्दधाम है, प्रेम, सत्य और शक्ति के विकास के लिए सर्वव्यापी नारायण स्थावर और जंगम में, मनुष्य, पशु, कीट और पतंग में, साधु और पापी में, शत्रु और मित्र में, देव और असुर में प्रकट होकर जगत् भर में क्रीड़ा कर रहे हैं। क्रीड़ा के लिए ही सुख है, क्रीड़ा के लिये ही दुःख है, क्रीड़ा के लिये ही पाप है, क्रीड़ा के लिये पुण्य है, क्रीड़ा के लिए मित्रता है, क्रीड़ा के लिये ही शत्रुता है, क्रीड़ा के लिये ही देवत्व है, क्रीड़ा के लिये ही असुरत्व है। मित्र शत्रु सभी क्रीड़ा के सहचर हैं, दो दलों में विभक्त होकर उन्होंने स्वपक्ष और विपक्ष की सृष्टि की है। आर्य मित्र की रक्षा करते हैं और शत्रु का दमन करते हैं, परन्तु उन्हें आशक्ति नहीं होती। वे सर्वत्र, सब भूतों में, सब वस्तुओं में, सभी कर्मों और सभी फलों में नारायण के दर्शन कर इष्ट−अनिष्ट, शत्रु−मित्र, सुख−दुख, पाप−पुण्य, सिद्धि−असिद्धि के प्रति समभाव रखते हैं परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी परिणाम उन्हें इष्ट होते हैं, सभी लोग उनके मित्र होते हैं, सभी घटनाएँ उन्हें सुख देती हैं, सभी कर्म उनके लिए आचरणीय होते हैं, सभी फल उनके लिए वाँछनीय होते हैं। पूर्णरूपेण योग की प्राप्ति हुए बिना द्वन्द्व का नाश नहीं होता, उस अवस्था को बहुत थोड़े लोग ही प्राप्त कर पाते हैं, परन्तु आर्य शिक्षा साधारण आर्यों की सम्पत्ति है। आर्य इष्ट का साधन और अनिष्ट का वर्जन करने की चेष्टा करते हैं, परन्तु इष्ट की प्राप्ति होने पर विजय−मद से मत्त नहीं हो जाते और न अनिष्ट के घटित होने पर भयभीत ही होते हैं। मित्र की सहायता करना तथा शत्रु को पराजित करना उनके प्रयास का उद्देश्य होता है पर वे शत्रु के प्रति विद्वेष और मित्र के प्रति अन्यायपूर्ण पक्षपात का भाव नहीं रखते, कर्त्तव्य के लिए वे स्वजनों का संहार भी कर सकते हैं, विपक्षियों की प्राण रक्षा के लिए प्राण त्याग भी कर सकते हैं। सुख उन्हें प्रिय होता है, दुख उन्हें अप्रिय होता है, फिर भी वे सुख में न तो चञ्चल होते हैं न दुख में ही उनकी धीरता और प्रसन्नता विचलित होती है। वे पाप का त्याग और पुण्य का संचय करते हैं, किन्तु पुण्य कर्म करने के लिए वे न तो गर्वित होते हैं न पाप में गिर जाने पर दुर्बल बालक की भाँति क्रन्दन करते हैं, बल्कि हँसते हँसते कीचड़ में से निकल कर कीच भरे शरीर को पोंछकर, परिष्कृत और शुद्ध करके पुनः आत्मोन्नति की चेष्टा करते हैं। आर्य कार्य सिद्धि के लिए विपुल प्रयास करते हैं, हजार पराजय होने पर भी पैर पीछे नहीं हटाते, परन्तु असिद्धि से दुःखित होना विषण्णा या असन्तुष्ट होना उनके लिए अधर्म है। अवश्य ही जब कोई मनुष्य योगारुढ़ होकर, गुणातीत की तरह कर्म करने में समर्थ होता है तब उसके लिए द्वन्द्व का अन्त हो जाता है, जगन्माता जो कार्य देती हैं उसे ही वह सहर्ष करता है जो फल देती हैं उसका ही सानन्द उपभोग करता है, जिन्हें माँ उनके पक्ष में निर्दिष्ट कर देती हैं उन्हीं को लेकर वह माँ का कार्य सम्पन्न करता है, जिन्हें माँ विपक्षी के रूप में उसे दिखा देती हैं उन्हीं का आदेशानुसार दमन या संहार करता है। यही शिक्षा आर्य शिक्षा है इस शिक्षा के अन्दर विद्वेष या घृणा का स्थान नहीं। नारायण सर्वत्र हैं, भला किससे विद्वेष करें, किससे घृणा करें? अगर हम पाश्चात्य ढंग का राजनीतिक आन्दोलन करें तो फिर विद्वेष और घृणा आना अनिवार्य है और पाश्चात्य मतानुसार निन्दनीय नहीं है, क्योंकि स्वार्थ का विरोध है, एक ओर उत्थान और दूसरी ओर दमन हो रहा है। परन्तु हमारा उत्थान केवल आर्य समाज जाति का उत्थान नहीं है, प्रत्युत आर्य चरित्र, आर्य शिक्षा, आर्य धर्म का उत्थान है।
राजनीति धर्म का अंग है, परन्तु उसका आचरण आर्य−भाव के साथ, आर्य−धर्मानुमोदित उपाय से करना चाहिये। हम भावी आशास्वरूप युवक दल से यह कहते हैं कि यदि तुम्हारे प्राणों में विद्वेष हो तो उसे शीघ्र ही जड़ से निकाल फेंको। विद्वेष हो तो उसे शीघ्र ही जड़ से निकाल फेंको। विद्वेष की तीव्र उत्तेजना से क्षणिक रजःपूर्ण बल आसानी से जागृत होता है और शीघ्र ही क्षीण होकर दुर्बलता में परिणत हो जाता है। जिन लोगों ने देशोद्धार करने की प्रतिज्ञा की है और उसके लिये अपने प्राण उत्सर्ग कर चुके हैं उनके अन्दर प्रबल भ्रातृभाव, कठोर उद्यमः शीलता, लोहसम, दृढ़ता ओर ज्वलन्त−अग्नितुल्य तेज का संचार करो, उसी शक्ति से तुमको असीम बल प्राप्त होगा और तुम चिरविजयी हो सकोगे।
अब आर्य जाति की सनातन शक्ति का पुनरुद्धार करना होगा। पहले, आर्य चरित्र और आर्य शिक्षा को अयात्त करना होगा, दूसरे, योग शक्ति का पुनर्विकास करना होगा, तीसरे, आर्योचित ज्ञान पिपासा और कर्म शक्ति के द्वारा नवयुवक के लिये आवश्यक सामग्री का संचय करना होगा तथा इन कुछ वर्षों की उन्मादिनी उत्तेजना को सुशृंखलित कर और स्थिर लक्ष्य की ओर मुड़कर मातृ कार्य का सम्पादन करना होगा। आज कल देश भर में जो युवक पथान्वेषण और कर्मान्वेण कर रहे हैं, वे उत्तेजना को अतिक्रम कर कुछ दिनों तक शक्ति संचय करने का पथ ढूंढ़ निकालें। जिस महत कार्य को सम्पन्न करना है वह केवल उत्तेजना के द्वारा नहीं सम्पादित हो सकता उसके लिए शक्ति की आवश्यकता है। ऐ युवकों! तुम लोगों के पूर्व पुरुषों की शिक्षा का अनुकरण करने से जिस शक्ति को प्राप्त किया जाता है वह शक्ति अघटन घटन पटीयसी हैं। वह शक्ति तुम्हारे शरीर में अवतरण करने के लिये उद्यत हो रही है। वह शक्ति ही माँ हैं। उन्हें आत्म समर्पण करने का उपाय सीख लो। माँ तुम लोगों को यन्त्र बना कर इतना शीघ्र, इतने बल के साथ कार्य सम्पन्न करेंगी कि जगत स्तम्भित हो जायगा। उस शक्ति के बिना तुम्हारे सारे प्रयास विफल हो जाएंगे। मातृमूर्ति तुम्हारे हृदय में प्रतिष्ठित हो गयी है, तुमने मातृ पूजा और मातृ सेवा करना सीख लिया है, अब अन्तर्निहित माता को आत्म−समर्पण करो। कार्य सिद्धि का दूसरा कोई पथ नहीं है।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज)
मनुष्य−समाज की स्वार्थहीन सेवा कर्मयोग है। यह हृदय को शुद्ध करके अन्तःकरण को आत्मज्ञान रूपी दिव्य ज्योति प्राप्त करने योग्य बना देता है। विशेष बात तो यह है कि बिना किसी आसक्ति अथवा अहंभाव के आपको मानव−जाति की सेवा करनी होगी। कर्मयोग में कर्मयोगी सारे कर्मों और उनके फल को भगवान के अर्पण कर देता है। ईश्वर में एकता रखते हुए, आसक्ति को दूर करके सफलता व निष्फलता में समान रूप से रह कर कर्म करते रहना कर्म−योग है।
जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म ही कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान् कृष्ण ने कहा है निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना, खाना, देखना, सुनना, सोचना सब कर्म हैं।
अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आप के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।
कर्म योगी का विशाल हृदय होना चाहिये। उसमें कुटिलता, नीचता कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिए, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिए। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाय उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर आये और घर में उसी के लिए दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिये कि अपने हिस्से का दूध फौरन ही उसे देदे और उससे कहे कि ‘हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते है, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है।’ तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।
कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त, मिलनसार, समाज−सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व−प्रेम, दया और सबमें मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिये। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमा होनी चाहिये, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिये, उसका मन शान्त और सम होना चाहिये। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिये, उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिए चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है, उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।
ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन सकता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।
—कर्मयोग, भक्ति योग, अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है, वह अनुभव करता है कि ईश्वर सब कुछ कार्य कर सकता है और वह ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे−धीरे कर्मों के बन्धन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाती है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों से साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करती है और वह मन और इन्द्रियों की क्रियाओं और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रख कर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।
कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपना चित्त शुद्ध कर लेता है। वह कर्म फल की आशा न रखता हुआ कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन के विचार रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक रूप में ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि सारा संसार परमात्मा के व्यक्ति त्व का विकास है और यह जगत वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य−व्रत पालन करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ करता रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण करता है और सोने के समय कहता है—’हे प्रभु! आज मैंने जो कुछ किया है आपके लिए है, आप प्रसन्न होकर इसे स्वीकार कीजिए। वह इस प्रकार कर्मों के फल को भस्म कर देता है और कर्मों के बन्धन में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है, निष्काम कर्मयोग से उसका चित्तशुद्धि होता है और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। देश सेवा, समाज सेवा, दरिद्र सेवा, रोगी सेवा, पितृ सेवा गुरु सेवा यह सब कर्मयोग है। सच्चा कर्मयोगी दास कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म से भेद नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं, कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े विनीत और नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश और नाम मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार बन जाते हैं।
पश्चिम में तथा अमरीका में बहुत से धनी लोग बेशुमार दान करते हैं, वे बड़े बड़े अस्पताल और बड़ी बड़ी संस्थाएँ बनाते हैं। वे यह सब कुछ केवल सहानुभूति और मनुष्य जाति पर दया करने के नाते ही करते हैं, उनके लिए यह सब समाज सेवा है और ईश्वर समाज का आधार है और मनुष्य ईश्वर का व्यक्तित्व प्रकट करता है। वे अभिमान रहित होकर कर्त्तापन की बुद्धि को छोड़ कर और फल की आशा को छोड़कर सेवा नहीं करते, उनके लिए यह सेवायोग (कर्मयोग) नहीं है। उनके वास्ते यह सेवा केवल दान विषयक कर्म है, उनके लिए सेवा केवल मनुष्यता का धर्म है, उनमें किसी दर्जे तक मनुष्य−जाति के लिये सहानुभूति इस सेवा के द्वारा बढ़ जाती है, उनको कर्मयोग के अभ्यास से चित्त शुद्धि करके आत्मज्ञान प्राप्त करने का विचार नहीं आता, उनको जीवन के लक्ष्य (उद्देश्य) का कुछ ज्ञान नहीं होता, उनको ईश्वर की सत्ता में भी दृढ़ विश्वास नहीं होता। जो कर्मयोग के सिद्धान्त को समझकर ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखते हुए कर्म करते हैं वे अपने लक्ष्य को जल्दी पहुँच जावेंगे।
कर्मयोग के अभ्यास के लिए बहुत धन होना आवश्यक नहीं है, आप अपने धन और मन से सेवा कर सकते हैं। यदि किसी निर्धन रोगी को सड़क के किनारे पड़ा हुआ देखो तो उसको थोड़ा जल या दूध पीने को दो, मीठे आश्वासन से उसको प्रसन्न करो, उसको ताँगे में बैठाओ और पास के अस्पताल में ले जाओ, यदि तुम्हारे पास ताँगे का किराया देने के लिये पैसा नहीं है तो रोगी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाओ और उसको अस्पताल में दाखिल कराने का इन्तजाम कर दो। यदि तुम इस प्रकार सेवा करोगे तो तुम्हारा चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। निर्धन, निःसहाय मनुष्यों की इस प्रकार की सेवा से परमात्मा ज्यादा खुश होता है, न कि धनी लोगों की शान−शौकत से की हुई सेवा से।
यदि किसी के शरीर के किसी अंग में घोर पीड़ा हो तो उसके उस अंग को धीरे−धीरे दबाओ और अपने हृदय से प्रार्थना भी करो कि हे भगवान इस मनुष्य का दुःख दूर कर इसको शान्ति में रहने दे और इसका स्वभाव अच्छा हो जावे।
यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर−उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो, यह सच्चा कर्मयोग है। यह आपके हृदय को जाँचने के लिये काँटा है, आपमें से कितनों ने इस प्रकार की सेवा की है, यदि अभी तक आपने ऐसा नहीं किया है तो आज से शुरू कर दो।
जब आपका पड़ौसी या कोई निर्धन आदमी रोगग्रस्त हो तो उसके लिये अस्पताल से दवाई ला दो। सावधानी से उसकी सेवा करो, उसके कपड़े खाने के बर्तन और टट्टी−पेशाब के बर्तन साफ करो, यह अनुभव करो कि उस रोगी मनुष्य के रूप में आप ईश्वर की सेवा कर रहे हो। इस प्रकार आपका मन बहुत ऊँचा उठ जावेगा और दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी, उससे हर्ष−दायक शब्द कहो, उसके पंगग के पास बैठो। उसके स्वस्थ होने के लिए प्रभु से प्रार्थना करो। इस प्रकार के कर्मों से आप में दया और प्रेम की वृद्धि होने में सहायता मिलेगी, इसमें घृणा, द्वेष और शत्रुता का नाश होगा और आप दैवत्व में बदल जाओगे।
जैसा आप चाहते हो कि दूसरे आपके साथ बर्ताव करें वैसा आप भी उनके साथ करो, इस नीतिवाक्य को याद रखो। नित्य के जीवन−व्यवहार में यह आपका आचार−नियम होना चाहिए, समस्त धर्मों का साराँश यही है, आप कोई अनुचित कर्म नहीं करोगे, आपको अमित आनन्द मिलेगा।
जब तुम बाजार में जाओ तो हमेशा अपनी जेब में कुछ पैसे डाले रखो और उन्हें गरीबों को बाँट दो। रेलवे प्लेटफार्म पर गरीब कुलियों से झगड़ा मत करो, उदार बनो उन्हें चार आने या आठ आने दो। अनुभव करो कि सारी देहों में आप ही रम रहे हो, आपका हृदय विशाल हो जावेगा, आप एकत्व का अनुभव करने लगोगे, आप और भी उदार बन जाओगे।
आप दवाइयों की एक पेटी अपने साथ रख सकते हो और गरीब रोगियों की चिकित्सा कर सकते हो, होम्योपैथिक दवाइयों का इलाज कोई हानि नहीं करता है। पुस्तक देख देखकर अप दवाई दे सकते हो। किसी बायोकैमिस्ट से मिलकर अपना सन्देह दूर कर सकते हो। ऐसी सेवा से आपको बहुत आनन्द मिलेगा, इससे चित्त−शुद्धि बहुत होती है।
महात्मा गाँधी की आत्मकथा पढ़िए। वह सम्मानित कार्य और तुच्छ नीच सेवा में भेद नहीं समझते थे। उनके लिये झाडू लगाना और टट्टी साफ करना बहुत बड़ा योग है। उन्होंने स्वयं टट्टियाँ साफ की हैं। अनेक प्रकार की सेवाएँ कर करके, उन्होंने इस मोहकारक ‘मैं’ को बिल्कुल ही नष्ट कर रखा है। बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त सज्जन इनके आश्रम में योग सीखने के लिये आये। वे सोचते थे कि महात्मा गाँधी जी उनको एकान्त कमरे में या परदे के पीछे विचित्र रीति से प्राणायाम, ध्यान, प्रत्याहार, कुण्डलिनी, योगादि की शिक्षा देंगे, परन्तु जब उनसे कहा गया कि सबसे पहले टट्टियाँ साफ करो तो उनको बड़ी निराशा हुई और वे एकदम आश्रम छोड़कर चले गये।
प्रति दिन जितने अधिक सत्कार्य हो सकें करिये, सोते समय अपने दिन भर के कार्यों की परीक्षा कीजिए और नित्य अपनी आध्यात्मिक डायरी नोट कीजिए। सत्कार्य करना ही आध्यात्मिक जीवन का उदय है।
(श्री सालिगराम शर्मा बी. ए.)
इस द्वितीय विश्व−व्यापी नर संहारकारी महा युद्ध की समाप्ति के पश्चात् इंग्लैंड के प्रसिद्ध विचारक सी. आई. एम. जोड़ ने लन्दन के शिक्षित लोगों की एक सभा में भाषण देते हुए कहा—“पश्चिम के देशों के करने वाले हम लोगों ने मनुष्यों और नगरों को शीघ्रातिशीघ्र नष्ट करने के लिए अनेक प्रकार के आविष्कार किए। हमारी बुद्धि को इसमें बड़ी ही सफलता मिली। हम निरपराध प्राणियों को नष्ट करने के अनेक तरीके जान गये हैं पर अभी तक यह नहीं जान पाये कि जीवित किसी प्रकार रहा जाता है। अगर हम जीवित रहने की इच्छा रखते हैं तो हमें भारतवर्ष की ओर देखना पड़ेगा।” जोड़ साहब के शब्द को पढ़ कर सभी समझदार लोगों के मन में भारतीय सभ्यता के विषय में कुछ जानने की भावना उत्पन्न होती है। अतः ‘भारतीय सभ्यता की विशेषता’ शीर्षक लेख में हम इसी पर कुछ विचार प्रकट करेंगे।
किसी भी देश की सभ्यता, संस्कृति और विचार धारा वहाँ की भौगोलिक स्थिति से सर्वथा प्रभावित रहती है। जिस देश के निवासियों को अहिर्निश रोटी और कपड़े के लिए ही संघर्ष करना पड़ता हो उस देश की सभ्यता कभी महान् नहीं हो सकती। उस देश में उच्च विज्ञान और दर्शन कभी जन्म नहीं पा सकते। इतिहास इस बात का साक्षी है। आइए, अब भारतवर्ष की भौगोलिक अवस्था पर भी थोड़ा सा विचार कीजिये। यहाँ की भूमि उपजाऊ है। खाने पीने की वस्तुओं का कभी अभाव नहीं रहा। जीवन धारण करने के लिए जिन पदार्थों की आवश्यकता होती है वे वस्तुएँ यहाँ के निवासियों को बड़ी ही सुगमता से उपलब्ध हो जाती थीं। जिस समय भारत से बाहर के देशों के लोग जीवन धारण करने के लिए निरन्तर परिश्रम किया करते थे उस समय भारतवासी बड़े ही प्रेम के साथ सुख शान्ति का जीवन व्यतीत करते थे। यहाँ के निवासी इस बात को जानते भी न थे कि संसार युद्ध−क्षेत्र है जिसमें हमें अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए दिन रात संघर्ष करना पड़ता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि जब मनुष्य की भौतिक आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाती हैं तो इस भौतिक जीवन से परे की वस्तुओं पर भी विचार करता है। मनुष्य के अन्दर की अव्यक्त शक्ति उसे जीवन, मृत्यु, सुख दुःख, आत्मा, जगत और परमात्मा के विषय में विचार करने के लिए विवश कर देती है। जो बात एक व्यक्ति के जीवन में सत्य हो सकती है वह एक समाज या राष्ट्र के जीवन में भी सत्य होगी। यही कारण है कि भारत ने एक ऐसी सभ्यता और संस्कृति को जन्म दिया जिस पर यहाँ के निवासियों को बड़ा ही अभिमान है। यहाँ की भूमि ने ऐसे दार्शनिक और वैज्ञानिक उत्पन्न किये कि जिनकी प्रतिमा का लोहा पश्चिम के बड़े बड़े महारथी भी मानते हैं।
आश्रमों ने जिस सभ्यता को जन्म दिया है उसमें आध्यात्मिकता की प्रधानता रही है। यद्यपि भारतवर्ष में भी अनेक ऐसे दार्शनिक हुए हैं जो घोर वस्तुवादी थे। पर ऐसे विचारकों की संख्या नहीं के बराबर है। इसके विपरीत पश्चिम के देशों में प्रकृति वादी दार्शनिकों का ही बोलबाला रहा है। भारतीय नवयुवक पश्चिम के भौतिक वादी दार्शनिकों के ग्रन्थों का अध्ययन करके थोड़ी देर के लिए अपने को चाहे भले ही नास्तिक समझने लगें पर यह अवस्था अधिक समय तक नहीं रहेगी। नास्तिकता तो भारतीय लोगों को रक्त में है ही नहीं। अगर कोई अपने को नास्तिक कहता है तो यह कहना चाहिये कि वह अपने को नहीं समझता। अगर वह कभी गम्भीरता पूर्वक विचार करेगा तो उसे अपनी भूल स्वीकार करनी पड़ेगी।
चूँकि यूरोप और अमेरिका की सभ्यता का जन्म विश्वविद्यालयों में हुआ है इसलिए वहाँ संग्रह का पाठ पढ़ाया गया है। जिस मनुष्य के पास जितनी ही अधिक भौतिक वस्तुएँ हैं वह उतना ही अधिक सभ्य समझा जाता है। भौतिक आवश्यकताओं की तृप्ति के साधन जुटाने में ही पश्चिम ने सभ्यता समझी है। पर भारतवर्ष के साथ ऐसी बात नहीं। यहाँ की सभ्यता तो तपोवनों की देन है। अतः त्याग का ही महत्व दिखलाई पड़ता है। मनुष्य अपनी इच्छाओं को जितनी ही कम करेगा उसका जीवन उतना ही अधिक सुखी होगा। भारतीय लोगों का यह विश्वास बड़ा ही दृढ़ है। त्याग का यह आदर्श उनकी रग रग में समा गया है। जहाँ यूरोप और अमरीका के लोग अपने को किसी लखपती या करोड़पती सेठ का वंशज सिद्ध करके गौरवान्वित मानते हैं वहाँ भारतवर्ष के लोग अपने को उस महात्मा या ऋषि का वंशज सिद्ध करने का यत्न करते हैं जिसने सबसे अधिक त्याग किया हो।
भारतवर्ष ने सर्वदा से क्रियात्मक जीवन पर जोर दिया है। साहित्य दर्शन और विज्ञान के बड़े बड़े ग्रन्थों का अध्ययन करना ही काफी नहीं। जब तक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हम उनके अनुसार आचरण नहीं करते तब तक हमारी शिक्षा अधूरी ही है—निकम्मी ही है। भारतवर्ष के लम्बे चौड़े प्रभावशाली भाषणों और झूठे सच्चे प्रचारों पर कभी भरोसा नहीं रहा। इस देश ने उसी व्यक्ति का सम्मान किया है जोकि भीतर और बाहर दोनों ओर से एक सा है। जो केवल सत्य और ईमानदारी के महत्व पर भाषण ही नहीं देता वरन् स्वयं सत्यवादी और ईमानदार भी है। यहाँ पर कहने का इतना महत्व नहीं जितना करने का। हम महात्मा गाँधी का इतना सम्मान करते हैं तो उसका कारण उनकी विद्वता और भाषण−शैली का प्रभाव नहीं। उसका कारण तो उनका क्रियात्मक जीवन ही है। वे जैसा कहते थे वैसा करते भी थे। पर पश्चिम के देशों में आपको यह बात नहीं दिखाई पड़ेगी। वहाँ अगर कोई व्यक्ति बड़ी बड़ी बातें करता है, ऐसे व्याख्यान देता है जो जनता को मुग्ध करने की शक्ति रखते हैं, तो उनका सम्मान होने लगता है। उसके व्यक्ति गत चरित्र की ओर कोई भी ध्यान नहीं देता।
जब हम भारतीय साहित्य का अध्ययन करते हैं तो हमें उसकी एक विशेषता स्पष्ट दिखाई पड़ती है। यहाँ सभी विद्वानों, दार्शनिकों तथा वैज्ञानिकों को अपने अति प्राचीन साहित्य वेद, उपनिषद् और गीता आदि में पूर्ण श्रद्धा और विश्वास है। जो कुछ भी इन ग्रन्थों में लिखा है वह सत्य है—अक्षरशः सत्य है। वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है और उसका एक एक शब्द त्रिकाल सत्य है। अगर हमें वेद में कोई बात गलत जान पड़ती है तो यह हमारी बुद्धि की कमी है। हम उसे समझ नहीं सके हैं। वेदों की निन्दा आचार्य लोग कभी सहन नहीं कर सकते। राम और कृष्ण जिनको आज हिन्दू लोग ईश्वर का अवतार मानते हैं अगर वे वेदों की निन्दा करते और हमसे उनके विरुद्ध आचरण करने को कहते तो कभी भी उनका इतना सम्मान न होता। भारतवासियों को अपनी प्रत्येक पुरानी वस्तु से प्रेम है। नवीन वस्तु चाहे वह कितनी ही सुन्दर क्यों न हो—जब तक उस पर प्राचीनता की मुहर नहीं लग जाती तब तक हिन्दुओं को स्वीकार नहीं हो सकती। परिवर्तन प्रेमी नवयुवक जो बिना सोचे समझे आँधी के साथ बह जाना पसन्द करते हैं और उसी में उन्नति समझते हैं, इसे अवश्य ही अन्धविश्वास, हठवादिता तथा बुद्धि का दिवालियापन कहेंगे। पर मेरा तो विश्वास यह है कि इसी हठवादिता ने भारतवासियों को अभी तक जीवित रखा है। इसी अन्धविश्वास और श्रद्धा ने यहाँ के लोगों को अनेक प्रचण्ड तथा भयंकर तूफानों से रक्षा की है।
हिन्दुओं को अपनी प्रत्येक प्राचीन वस्तु से प्रेम है। इसका आशय यह नहीं कि उनके विचारों में संकीर्णता है तथा हृदय विशाल नहीं। अगर हम भारत के इतिहास को निष्पक्ष होकर पढ़ें तो पता लगेगा कि यहाँ पर हमेशा से धार्मिक सहिष्णुता रही है। जिस समय इंग्लैंड तथा यूरोप में रोमन कैथोलिक और प्रौस्टेन्ट धर्म के नाम पर एक दूसरे का रक्त बहा रहे थे, ठीक उससे एक हजार वर्ष पहले भी भारतवर्ष गुप्त−सम्राटों के शासनकाल में पूर्ण धार्मिक स्वतन्त्रता का उपभोग कर रहा था। सम्राट वैदिक−धर्मावलम्बी थे और ब्राह्मणों की आज्ञा के अनुसार कार्य करते थे, परन्तु बोद्धधर्म और जैन−धर्म के अनुयायियों के साथ किसी भी प्रकार का अत्याचार नहीं होता था। धर्म के नाम पर भारत में शास्त्रार्थ हुए तो हैं पर खून की नदियाँ नहीं बहाई गयीं। (देश के दुर्भाग्य से अगर हिन्दू और मुसलमान लड़ते हैं तो इसका कारण धर्म नहीं है। कुछ स्वार्थी राजनीतिज्ञों के कहने में आकर ही जनता बिना सोचे समझे लड़ती है।) पश्चिम के देशों ने अपने यहाँ के महापुरुषों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। जिस किसी व्यक्ति ने ऐसी बातें कहीं एवं जिसको उस काल की जनता न समझ सकी तो उसको प्राण दण्ड ही भोगना पड़ा। सुकरात को अपनी सेवा के पुरस्कार स्वरूप विष का प्याला पीना पड़ा। ईसा को सामाजिक बुराइयाँ दूर करने के अपराध में फाँसी का दण्ड भोगना पड़ा। पर भारत में आपको इसका एक भी उदाहरण नहीं मिलेगा। महात्मा गौतम बुद्ध जिन्होंने वेदों की निन्दा की उन्हें भी भारतीय जनता ने ईश्वर का अवतार माना। इस देश में अनेक नास्तिक दार्शनिक हुए पर कभी भी यहाँ के समाज ने वह भूल नहीं की जो पश्चिम में होती आई है।
सर्व भूत में आत्मा, आत्मा में सब भूत। यह गूढार्थ जिन्हें विदित, उनका ज्ञान प्रभूत॥
अचरज को कासों कहैं, विन्दु में सिन्धु समात। रहिमन अपने आपते, हैरन हार हिरात॥
हेरत हेरत हे सखी, रह्यौ कबीर हिराय। बूँद समानी समद में, सो कत हेरी जाय॥
लेत आत्म अनुभूति रस, शूल सबल स्वाधीन। सके न कर कबहूँ कहूँ, आत्मलाभ बलहीन॥
कबीर एक न जानियाँ, बहु जाना क्या होहि। एकहि ते सब होत है, सबते एक न होहि॥
विद्या, धन, बल, रूप, यश, कुल सुत बनिता मान। सभी सुलभ संसार में, दुरलभ आतम ज्ञान॥
(श्री लालजीराम शुक्ल)
आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों से पता चलता है कि हमारी किसी विशेष व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति घृणा का प्रमुख कारण हमारे ही अन्दर रहता है। प्रायः देखा जाता है कि जो व्यक्ति जिस प्रकार के लोगों से घृणा करता है, वह स्वयं भी कुछ काल के अनन्तर उन्हीं व्यक्ति यों के घृणित गुणों को अपना लेता है। हम जिस किसी वस्तु अथवा गुण से घृणा करते हैं, उसकी मूल बुराइयाँ हमारे खुद के ही भीतर रहती हैं। हमारी घृणा की मनोवृत्ति इन बुराइयों का एक आरोपण मात्र होती है। इस प्रकार अपनी बुराइयों का दूसरों पर आरोपण करके हम स्वयं अपने आपमें इनकी उपस्थिति की आत्म स्वीकृति से बचना चाहते हैं। हमारा अचेतन मन बड़ा स्वाभिमानी है। वह किसी भी कमजोरी को जल्दी स्वीकार नहीं करना चाहता। इसी आत्म−स्वीकृति की प्रवंचना से मुक्ति पाने के लिये वह अपनी बुराइयों का घृणा की भावना के रूप में दूसरों में आरोपण कर देता है। अत्यधिक आलोचना की प्रवृत्ति स्वयं की हीनता की द्योतक होती है। यह एक प्रकार से आन्तरिक अवगुणों के बाह्यान्तरीकरण का एक विशेष मार्ग हैं, जिसका अनुकरण हमारा आन्तरिक मन प्रायः किया करता है।
घृणा की मनोवृत्ति किसी विशेष विचार को हमारे मस्तिष्क में बैठा देती है। संवेगों के उत्तेजित होने पर कभी कभी यही बाह्य विचार का रूप धारण कर लेते हैं और जितना ही अधिक हम उनको भूलना चाहते हैं, उतने ही वे हमारे मन को जकड़ते जाते हैं और अन्त में मानसिक रोग का रूप धारण कर लेते हैं। हमारा मन अचेतनावस्था में जिस किसी विचार को मस्तिष्क में स्थान दे देता है, वही विचार कुछ समय के पश्चात् हमारी विशेष प्रकार की मनोवृत्तियों में परिणत हो कार्यरूप में प्रदर्शित हो जाता है। मान लीजिए, कोई आदमी एक कोढ़ी को देखता है और उससे उसके हृदय पर गहरा प्रभाव पड़ता है तो वह उसी के सम्बन्ध में विचार करने लगेगा। ये विचार धीरे धीरे दृढ़तर होते जाते हैं और इन पर ध्यान केन्द्रित न करने की इच्छा रखते हुए भी वह व्यक्ति इनका आना रोकने में अपने आपको असमर्थ पाता है। अगर यही अवस्था काफी दिनों तक रही तो इस बीमारी के चिह्न उसमें भी प्रकट होने लगते हैं और अन्त में वह कोढ़ी बन जाता है। अतएव जब हम किसी ऐसे व्यक्ति को देखें, जिसके कारण हमारे मन में घृणा की भावना और तत्सम्बन्धी बाह्य विचारों से हम बहुत कुछ अंश में मुक्ति पाने में सफल हो सकेंगे। हमको बहुत सी मानसिक और शारीरिक बीमारियाँ केवल इसी कारण होती हैं कि हम उनसे स्वभावतः घृणा करते हैं या उनसे डरते हैं। अगर कोई व्यक्ति किसी कुरूप व्यक्ति को सदा घृणा की दृष्टि से देखता है, तो वह प्रत्यक्ष में तो उससे बचने की चेष्टा करता है, किन्तु कभी कभी जब घृणा की भावना बलवती होती है तो वह स्वप्न में ही उस व्यक्ति को देखने लगता है। यह सब इसलिये होता है कि घृणा का भाव एक प्रकार के आत्मनिर्देश से प्रभावित हो हम घृणित गुणों को अपने आप में ही चरितार्थ करने लग जाते हैं।
अगर हम चाहें तो दूसरे लोगों की शक्तियों को निर्लिप्त भाव से देख सकते हैं। इससे हमारे मन पर कोई भी बुरा प्रभाव नहीं पड़ने पाता, लेकिन जैसे ही हम किसी के दुर्गुणों पर संवेगात्मक रूप से विचार करने लग जाते हैं, हमारे विचार अपना बुरा प्रभाव हमारे मन पर डालना आरम्भ कर देते हैं। साधारणतया किसी व्यक्ति के दुर्गुणों के सम्बन्ध में बार बार सोचने से हमारे विचार संवेगात्मक रूप धारण कर लेते हैं, अतएव इस प्रकार के विचार सदैव हानिकारक होते हैं। इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखते हुए संसार के सभी महापुरुषों ने अपराधी को क्षमा करने को उपदेश किया है। अपराधी को क्षमा प्रदान कर हम अपनी घृणा की भावना का सहानुभूति के द्वारा रेचन कर डालते हैं।
घृणा की मनोवृत्ति का मूल कारण हमारे मन में स्थित कोई ग्रन्थि होती है। हमें इस ग्रन्थि को पहचान कर सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए। ग्रन्थि के सुलझते ही हमारी घृणा की मनोवृत्ति भी अपने आप नष्ट हो जावेगी। साधारणतः हम अपनी बुराइयों को स्वीकार नहीं करना चाहते, किन्तु आध्यात्मिक नियम के अनुसार हमें एक न एक दिन अपनी बुराइयों को स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ता है। हमारी प्रकृति धीरे−धीरे हमें आत्म−स्वीकृति की ओर ले जाना आरम्भ करती है। पहले हम अपने इन दुर्गुणों को दूसरों में देखने लगते हैं और धीरे−धीरे उन्हीं पर विचार करते−करते स्वयं उनके शिकार बन जाते हैं। वास्तव में दुर्गुण कहीं बाहर से नहीं आते। वे तो पहले से ही हमारे भीतर मौजूद रहते हैं। हमीं उनकी उपस्थिति स्वीकार नहीं करते, अतएव प्रकृति टेढ़े−मेढ़े रास्ते से उनकी आत्म−स्वीकृति कराती है। अगर प्रारम्भ में ही हम इन दुर्गुणों को मान लें, तो उनसे छुटकारा पा जायें, किन्तु जब प्रकृति जबरदस्ती इन्हें स्वीकार कराती है, तो वे हमें जकड़ लेते हैं। फिर इनसे छुटकारा पाना उतना सरल नहीं होता।
हमारे विचारों का दूसरे पर उसी समय प्रभाव पड़ता है जबकि उसकी मानसिक स्थिति इन विचारों को ग्रहण करने के योग्य होती है। यही बात हमारे स्वयं के विचारों के सम्बन्ध में भी सत्य है। हमारे मन में अच्छे−बुरे जैसे भी विचार उठते हैं, सबकी पृष्ठभूमि हमारे ही अन्दर होती है। किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में बुरे विचारों का कारण भी हमारे ही अन्दर होता है। वास्तव में अज्ञात रूप से वे दुर्गुण हमीं में उपस्थित रहते है, किन्तु प्रकाशन का उचित मार्ग न पा उनका दमन होने लगता है और समय पाकर वे दूसरों की नुक्ताचीनी की आदत के रूप में फूट पड़ते हैं। यही हाल दूसरों के प्रति हमारे श्रद्धा के भाव का भी है। वास्तव में हमारे मन में ही इन श्रद्धा के योग्य गुणों की पृष्ठभूमि रहती है। हमारा मन भी उन्हीं सद्गुणों को ग्रहण करने की योग्यता रखता है, इसलिये वह इन गुणों का सम्मान करने को हमको प्रेरित करता है। उदारचित्त मनुष्य के विचार सदा उदार हैं। इस प्रकार के मनुष्य दूसरों में सदा भलाई ही देखा करते हैं। उसकी नजर किसी की बुराई पर जल्दी नहीं पड़ती।
हमारे मन पर दूसरों के विचारों का गहरा प्रभाव पड़ता है। दूसरे हमारे बारे में जैसा सोचते हैं, वैसा ही हमारा चरित्र भी अज्ञात रूप से बनता जाता है। हमारे आस−पास हमसे प्रेम करने वाले व्यक्ति होते हैं तो हममें भी प्रेम की भावना का उदय होना स्वाभाविक है। जब हम किसी व्यक्ति के गुणों अथवा दुर्गुणों पर बार−बार विचार करते हैं तो हमारे विचार उसके लिए निर्देश बन जाते हैं। इन निर्देशों का गहरा प्रभाव उसके ऊपर पड़ता है। उस व्यक्ति में धीरे धीरे वही गुण अथवा बुराइयां स्थान पा लेती हैं। इस प्रकार दोनों प्रकार से घृणा की भावना घातक होती है। यह एक तरफ घृणा करने वाले व्यक्ति के मन और विचारों को खराब करती है और दूसरी ओर घृणित व्यक्ति में उन बुराइयों को और भी दृढ़ कर देती है। अगर हमारी घृणा कल्पित हुई तो भी उस व्यक्ति में कुछ दिनों के बाद वे बुराइयाँ आ ही जाती हैं।
(राष्ट्रपति बाबू राजेन्द्र प्रसाद जी) (गौ सेवा संघ, वर्धा द्वितीय वार्षिक सम्मेलन में दिये गये भाषण का साराँश)
गौ सेवा का प्रश्न भारतवर्ष में विशेष महत्व रखता है। हम हिन्दुओं का धर्म गौ रक्षा के साथ साथ घनिष्ठता रखता है, मगर मैं सिर्फ धार्मिक दृष्टि से नहीं सोचता। जब हमारे महर्षियों ने देखा होगा कि गो रक्षा के बिना हमारी प्रगति न हो सकेगी, तभी तो उस प्रश्न को इतना महत्व दिया। आज के वैज्ञानिक युग में भी हिन्दुस्तान में गाय का महत्व उतना ही है, जितना कि पुराने जमाने में था। अगर हम गहराई में जाकर सोचें तो हमें मालूम होगा कि जिस रीति नीति से हम आज तक गौ सेवा का काम करते आये हैं, वह बहुत कुछ हद तक ठीक ही है।
यह तो सभी कहते हैं और सुनते हैं कि भारत कृषि प्रधान देश है। आज भी अस्सी फीसदी भारतीय कृषि पर निर्भर रहते हैं। इतने लोगों को खेती के अलावा और कोई आजीविका का साधन हम देना चाहें तो भी नहीं दे सकते। कल कारखानों के जरिये भले ही एक बड़ी तादाद में लोग अपना भरण पोषण कर लें, लेकिन सारे देश के लिये कल−कारखाने काम न दें सकेंगे। उसके लिए तो कृषि की मदद लेनी ही पड़ेगी। यानी आने वाले जमाने में भी हिन्दुस्तान कृषिप्रधान ही रहेगा, और मैं कहता हूँ कि उसे रहना भी चाहिए। क्योंकि हिन्दुस्तान के कृषिप्रधान रहने से किसी भी दूसरे देश का कोई नुकसान होगा नहीं। आज दुनिया जिस रास्ते पर चल रही है, उस रास्ते पर अगर हम चलें तो उन्हीं की तरह हम भी दुनिया के लिये अभिलाषा रूप साबित हो जायेंगे।
हिन्दुस्तान की आबादी चालीस करोड़ है और यहाँ पशुओं की संख्या बीस करोड़ है। तो भी भारतवर्ष में पशुओं की संख्या अधिक समझी जाती है। दुनिया में और कोई देश ऐसा नहीं है, जहाँ इतनी संख्या हो। इसका कारण यही है कि हिन्दुस्तान खेती के लिये पशुओं पर निर्भर है। अमेरिका आदि देशों में नये तरीकों से खेती होने लगी है। वहाँ हजारों एकड़ जमीन पड़ी थी। इसलिए कलपुर्जों से खेती करना उनके लिए जरूरी हो गया। हमारे यहाँ 30 करोड़ एकड़ जमीन है, जोकि कलों से जोती जाने लायक नहीं समझी जा सकती। यहाँ पहले जितनी आबादी थी, अब वह खाली ही होती जा रही है। फिर हमारे यहाँ की जमीन के बहुत छोटे छोटे टुकड़े हो गये हैं और होते जा रहे हैं। बहुत से खेतों को एकत्र करने पर ही यहाँ ट्रैक्टर चलाया जा सकता है। यह काम आसान नहीं है। लोग नाराज न हों और सबको पूरा बदला मिल जाय इस तरह इन्तजाम होना चाहिए, कि तभी पंचायती खेती हो सकती है। लेकिन अभी तो यह मुश्किल मालूम होता है। हमारे सामने एक ही सवाल रह जाता है कि किसान अपना खेत किस तरह आबाद करे। बहुत सोच विचार करने के बाद यह समझ में आ सकता है कि बैलों के सिवाय यह काम नहीं हो सकता। अगर हम बैलों को रखना चाहते हैं तो गायों को भी हमको रखना ही होगा।
गाय केवल बैल ही नहीं देती, बल्कि वह दूध भी देती है। उसका स्थान कोई दूसरी चीज नहीं ले सकती। दूध से होने वाला लाभ किसी ओर पदार्थ से प्राप्त नहीं हो सकता। क्या गाय की संख्या इतनी अधिक है कि उनका पालन हम नहीं कर सकते? दूध की आज हमें इतनी जरूरत है कि उसे देखते हुए आज की गायों की संख्या कम ही कहनी पड़ेगी। गाय के दूध के अभाव में हमारा स्वास्थ्य दिन प्रति दिन गिरता जा रहा है। इतने बैल हमको चाहिये उतने आज हमारे पास नहीं हैं। जमीन को उर्वरा बनाने के लिए बैल की बहुत आवश्यकता है। जमीन की उपज बैलों के अभाव से कम होती जा रही है। आज पशुओं की संख्या इतनी अधिक होने पर भी हमारे लिये दूध कम ही पड़ता है। इसलिए हम अगर इतनी ही संख्या में दूध की मात्रा बढ़ा सकें तो अच्छा होगा, क्योंकि जब गायें दूध कम देती हैं तब बैल मजबूत नहीं होते, और जब बैल मजबूत नहीं होते, जब उनसे जितना काम मिलना चाहिए, उतना नहीं लिया जा सकता। पशुओं का ह्रास होने के कारण क्या हैं, इसके बारे में भी हमें सोचना चाहिए। हमारी संख्या बढ़ती जा रही है। अर्थशास्त्र का सिद्धान्त यह है कि जो ज्यादा हो, उसे नष्ट कर दो। जैसे यूरोपीय देशों में अगर गेहूँ की फसल ज्यादा होती है तो उसे जला देते हैं ताकि बचे हुए गेहूँ की कीमत कम न हो जाय। हमारे यहाँ के अर्थशास्त्रियों पशुओं के बारे में यही सोचा है। हमारे यहाँ पशुओं की संख्या बढ़ती जा रही है, इसलिए हमारे अर्थशास्त्री कहते हैं कि अधिक पशुओं को मार डालो। जब जब मनुष्य और पशु में मुकाबला होता है तब तब पशु को मारना पड़ता है। मगर इसमें पुरुषार्थ नहीं है, बुद्धिमानी भी नहीं है। पिछली लड़ाई में फौज के लिए बहुत पशुओं की हत्या हुई। अगर हमारे अर्थशास्त्री इसी तरह का प्रयोग करना चाहें तो उससे काम न चलेगा। आज हिन्दुस्तान का किसान बैल खरीद नहीं सकता। अगर खरीदें भी तो उस पर कर्ज का बोझ बढ़ जाता है। एक तरफ तो “अधिक अन्न पैदा करो” का आन्दोलन चालू है, दूसरी तरफ उसके साधन—पशुओं का नाश हो रहा है। बैलों से अगर हम ठीक ढंग से काम लें तो वे अपने खाने लायक पैदा कर सकेंगे। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि हिन्दुस्तान के पशुओं से हिन्दुस्तान को सालाना 1 से 2 हजार करोड़ तक की आमदनी—उनके परिश्रम से —(मजदूरों के हिसाब से) होती है। इसमें दूध, खाद वगैरह का भी दाम जोड़ा गया है। अगर पशुओं के भरण पोषण का उचित प्रबन्ध किया जाय और उनसे ठीक ढंग से काम लिया जाय तो इससे कई गुनी आमदनी हो सकती है। आपने देखा है कि यहाँ की जो देहाती गायें पहले 3 सेर दूध देती थीं, वे बेहतर भोजन देने पर आठ−दस सेर तक दूध दे रही हैं। यानी सिर्फ खाने पीने का इन्तजाम अच्छा होने से उनका दूध बढ़ा। उसके लिए नस्ल बढ़ने की या बाहर से बैल लाने की जरूरत नहीं रही। बैलों को अगर अधिक तगड़ा बना दिया जाय तो उनसे मिलने वाला पारिश्रमिक भी बढ़ जायगा। अगर हम इस विषय का अध्ययन शास्त्रीय रूप से करें और केवल पुस्तकीय ज्ञान पर नहीं, बल्कि अपने अनुभवों पर भरोसा करें तो पशुओं की वृद्धि हमारे लिये भार रूप न होगी। आज पशुओं का जिन्दा रखने के बजाय उन्हें मार डालने में अधिक मुनाफा होता है। इसमें सिर्फ माँस का ही सवाल नहीं है, चमड़े और हड्डी का भी बहुत अधिक मूल्य आता है।
हिन्दू और मुसलमानों में गाय के सवाल पर हमेशा झगड़े होते हैं। लेकिन अगर हम मनुष्य के लाभ हानि के खयाल से ही सोचें तो भी सब समझदार लोग इस सवाल के झगड़े का कारण न बनाकर मेल का साधन बनायेंगे।
युद्ध से पहले धार्मिक कारण से बहुत कम गौवध होता था। माँस के लिए भी बहुत कम गायें मारी जाती थीं। उस वक्त सिर्फ चमड़े के लिये ही गौवध होता था। क्योंकि उस वक्त माँस का कोई विशेष मूल्य नहीं रहता था। गौ के पेट में जो बछड़ा रहता है, उसका वध सबसे अधिक मुनाफे का समझा जाता था, और इसलिए गौ से भी उसके पेट के बछड़े की कीमत ज्यादा होती थी। जब मुनाफे का ही विचार प्रधान रहता है, (और ऐसे लोग हमेशा रहेंगे ही।) तब हम इस पर सोचें कि गौवध मुनाफे की चीज कैसे न रहे। इस पर प्रयोग किये जाने चाहिये। अर्थशास्त्रियों की मदद से इसमें हमें सफलता मिल सकती है। हम इस तरह से गौवंश का सुधार करें, जिससे हमें काफी दूध मिले और हमारी गायों और बैलों की रक्षा हो। इसके लिए विदेशों में चलने वाले प्रयोगों से भी लाभ उठाना चाहिए। अगर हम दूध घी के प्रश्न को हल कर लें और गौवंश की रक्षा का भी प्रबन्ध करलें तो हमारी खेती की उन्नति केवल जोत से भी नहीं बल्कि और तरीकों से भी हो सकती है।
खेती, मनुष्य और गौवंश का बहुत निकट का सम्बन्ध है। अगर हम जमीन से सिर्फ लेते ही जायँ तो कुछ ही दिनों में वह कमजोर बन जाती है। उसे अगर हम कुछ वापिस भी करते रहें तो उसका उपजाऊपन कायम रहता है। गौ से हमें खाद मिलती है, जो जमीन के लिये बहुत जरूरी है। वह जमीन की उर्वरता को बहुत बढ़ा देती है। यों देखा जाय तो मालूम होगा कि गाय का हर अंश उपयोगी साबित होता है, मरने पर भी उसके शरीर का उपयोग होता है। हमारे यहाँ की हड्डी ओर तिलहन विदेश में भेजे जाते हैं, इसलिए बहुत सी चीजें जो जमीन को वापिस मिलती हैं, आज नहीं मिल रही हैं। खेत की शक्ति बढ़ने से मनुष्य की शक्ति भी बढ़ जाती है। आज कृत्रिम खाद के बड़े बड़े कारखाने खोलने की योजनाएँ तैयार हो रही हैं। सरकार भी अपनी तरफ से इन कारखानों से तैयार होने वाली खाद को किसानों तक पहुँचाने की भरसक कोशिश करेगी। यह सवाल वैज्ञानिकों का है कि कृत्रिम खाद से जमीन को क्या नुकसान पहुँचता है, इसको लोगों के सामने रखें। गृहस्थ किसानों का तो यह अनुभव है कि कृत्रिम खाद से जमीन जल जाती है। और एक साल के बाद उसका उपजाऊपन घट जाता है। यह चीज नैसर्गिक खाद में नहीं है। या खाद पुराने जमाने से इस्तेमाल होती आयी है। और उससे हमारी जमीन का उपजाऊपन कायम टिका है इस दृष्टि से भी गौपालन होना जरूरी है। हमारे यहाँ जो कचरा है, उसका भी इस्तेमाल ठीक ढंग से कर सकें तो हमारी गरीबी का बहुत हल जरूर निकल सकता है। जिन चीजों से आज हमें कष्ट हो रहे हैं, उनका अगर ठीक ढंग से उपयोग किया जाय तो उन्हीं से हम सुख पैदा कर सकते हैं। गौ पालन में इस बात पर भी विचार होना चाहिये। मैं ऐसे सूबे में रहता हूँ, जहाँ गायें बहुत हैं, लेकिन वहाँ पूजा या बीमारी के अलावा और कभी गाय का घी इस्तेमाल नहीं होता, क्योंकि वहाँ गाय का घी मिलना बहुत मुश्किल ही हैं। इसी कारण मैं गाय के घी का व्रत नहीं ले सका हूँ। पुरुषार्थ तो इसी में है कि गाय का घी मिलने का प्रबन्ध करें, लेकिन हम तो पुरुषार्थहीन रास्ता खोजते हैं। वैसे तो पहले भी हम तेल खाते ही थे, पर अब उसे घी का नाम देकर खाने लगे हैं। इश्तहारों में तो इन वनस्पति घी के गुण बहुत गाये जाते हैं। वे कहाँ तक ठीक हैं, यह तो मैं नहीं जानता। पर आज तो लोग वनस्पति घी खाते हैं, वे कोई खुशी से नहीं, बल्कि मजबूरी से खाते हैं, इतना तो मैं अवश्य जानता हूँ। हमारा ध्यान दूध और घी को बढ़ाने की तरफ जाना चाहिये। उसके लिये गौवंश की उन्नति करना आवश्यक है।
(प्रो. राम चरण महेन्द्र, एम.ए.)
पाप एक ऐसी दुष्प्रवृत्ति है, जो नाना रूप आकृति और अवस्थाओं में मनुष्य पर आकर्षण किया करती हैं। कहते हैं, मनुष्य के मन के किसी अज्ञात कोने में शैतान का भी निवास है। जहाँ पुष्पों से सुरभित कानन का सुन्दर स्थल है, वहाँ कांटों से भरे बीहड़ भी हैं। जहाँ ज्ञान का प्रकाश है, वहीं कहीं कहीं घनघोर अन्धकार भी है। यही अन्धकार पाप की ओर प्रवृत्त कर मनुष्य के अधः पतन का कारण बनता है।
पाप की ओर प्रवृत्त करने वाला मनुष्य का अज्ञान है। अज्ञान के अन्धकार में उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, वह वासना के वशीभूत हो उठता है और किसी न किसी रूप में पतन के ढाल मार्ग पर आरुढ़ हो जाता है।
पाप पशुत्व है, मनुष्य के शरीर मन और आत्मा का नारकीय बन्धन है, दुखदायी नर्क में ले जाने वाला दैत्य है। वास्तव में इनका निर्माण इसलिए किया गया है कि मनुष्य की परीक्षा प्रतिपल प्रतिक्षण होती चले।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, स्पृहा, ईर्ष्या और निन्दा— मनुष्य में रहने वाले ये बारह दोष तनिक सा अनुकूल अवसर पाते ही उत्तरोत्तर बढ़ने लगते हैं।
मुनि सनत्सुजात के अनुसार, “जैसे व्याध मृगों को मारने का अवसर देखता हुआ उनकी टोह में लगा रहता है, उसी प्रकार इनमें से एक एक दोष मनुष्यों का छिद्र देखकर उस पर आकर्षण करता है।”
अपनी बहुत बड़ाई करने वाला, लोलुप, अहंकारी, क्रोधी, चञ्चल और आश्रितों की रक्षा न करने वाले—ये छः प्रकार के मनुष्य पापी हैं। महान् संकट में पड़ने पर भी ये निडर होकर इन पाप कर्मों का आचरण करते हैं। सम्भोग में ही मन रखने वाला, विषमता रखने वाला, अत्यन्त भारी दान देकर पश्चाताप करने वाला, कृपण, काम की प्रशंसा करने वाला तथा स्त्रियों के द्वेषी—ये सात और पहले के तेरह प्रकार के मनुष्य नृशंस वर्ग के कहे गए हैं। सावधान रहें!
मनुष्य प्रायः तीन अंगों से पाप में प्रवृत्त होता है 1—शरीर 2—वाणी और 3—मन द्वारा। इनके भी विभिन्न रूप हो सकते हैं, विभिन्न अवस्थाएँ और स्तर हो सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य का अधःपतन करने में समर्थ हैं। तीनों द्वार बन्द रखें, शरीर, मन और वाणी का उपयोग करते हुए बड़े सचेत रहें। कहीं ऐसा न हो कि आत्म संयम की शिथिलता आ जाये और पाप पथ पर चले जायं!
शरीर के पापों में वे समस्त दुष्कृत्य सम्मिलित हैं, जिन्हें रखने से ईश्वर के भव्य मन्दिर रूपी भवसागर से पार कराने वाले पवित्र मानव शरीर को भयंकर हानि पहुँचती है। कञ्चन तुल्य काया में ऐसे विकार उपस्थित हो जाते हैं जिससे जीवितावस्था में ही मनुष्य नर्क की यन्त्रणाएँ प्राप्त करता है।
हिंसा प्रथम कायिक पाप है। आप सशक्त हैं,तो हिंसा द्वारा अशक्त पर अनुचित दबाव डालकर पाप करते हैं। मद, ईर्ष्या द्वेष आदि की उत्तेजना में आकर निर्बलों को दबाना, मारपीट या हत्या करना जीवन को गहन अवसाद से भर लेना है। हिंसक की अन्तरात्मा मर जाती है। उसे उचित अनुचित का विवेक नहीं रहता, उसके मुख मुद्रा से क्रोध, घृणा, द्वेष, की अग्नि निकला करती है।
हिंसक पशु की कोटि का व्यक्ति है। उसमें मानवोचित गुण नहीं रहते। बल के मद में वह अपने स्वार्थ, आराम, वासना पूर्ति के लिए काम करता है। उसे पशु की योनि प्राप्त होती है और जीवन अशान्त बना रहता है।
हिंसा का तात्पर्य यह नहीं कि आप किसी के शरीर को चोट पहुँचाएँ, मारें पीटें ही, दूसरे के हृदय को किसी प्रकार का आघात पहुँचाना, कटु वचन का उच्चारण, गाली गलौज आदि भी हिंसा के ही नाना रूप हैं।
आपका जीवन सदा सबके लिए हितकारी हो, सेवा करें, आस पास के सब व्यक्ति आपसे प्रेरणा और बल प्राप्त करें, आप मृदु वचनों का उच्चारण करें, तो आपके लिए सुखदायिनी मुक्ति दूर नहीं है।
चोरी करना कायिक पाप है। चोरी का अर्थ भी बड़ा व्यापक है। किसी के माल को हड़पना, डकैती रिश्वत, आदि तो स्थूल रूप में चोरी हैं ही, पूरा पैसा पाकर अपना कार्य पूरी दिलचस्पी से न करना, भी चोरी का ही एक रूप है। किसी को धन, सहायता या वस्तु देने का आश्वासन देकर, बाद में सहायता प्रदान न करना भी चोरी का एक रूप है। फलतः अनिष्टकारी एवं त्याज्य है।
व्यभिचार मानवता का सबसे घिनौना निकृष्टतम कायिक पाप है। जो व्यक्ति व्यभिचार जैसे निंद्य पाप−पंक में डूबते हैं, वे मानवता के लिए कलंक स्वरूप हैं। आये दिन समाज में इस पाप की शर्माने वाली गन्दी कहानियाँ और दुर्घटनाएँ सुनने में आती रहती हैं। यह ऐसा पाप है, जिसमें प्रवृत्त होने से हमारी आत्मा को महान दुःख होता है। मनुष्य आत्म ग्लानि का रोगी बन जाता है, जिससे आत्म हत्या तक की दुष्प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। पारिवारिक साँख्य, बाल बच्चों, पत्नी का पवित्र प्रेम, समृद्धि नष्ट हो जाती है। सर्वत्र एक काला अन्धकार मन वाणी और शरीर पर छा जाता है।
शरीर में होने वाले व्यभिचार जनित रोगों की संख्या सर्वाधिक है। अप्राकृतिक तथा अति वीर्यपात सू मूत्र नलिका सम्बन्धी गुप्त रोग उत्पन्न होते हैं, जिन्हें न डाक्टर ठीक कर सकता है, न रुपया पैसा इत्यादि ही सहायक हो सकता है। वेश्यागमन के पास से मानव−शरीर अशक्त हो जाता है और स्थायी रूप से निर्बलता, सिरदर्द, बदहजमी, रीढ़ का दुखना मिर्गी, नेत्रों की कमजोरी, हृदय की धड़कन, बहुमूत्र पक्षाघात, प्रमेह, नपुंसकता, क्षय और पागलपन आदि शारीरिक रोग उत्पन्न होकर जीवितावस्था में ही नर्क के दर्शन करा देते हैं।
व्यभिचार के दोनों−रूप परस्त्री गमन तथा परपुरुष गमन त्याज्य हैं। सावधान! यह मन में चिन्ता, अधैर्य, अविश्वास, ग्लानि का सृष्टा महा राक्षस है। यह पाप समाज से चोरी चोरी किया जाता है अतः मन छल कपट, धूर्तता, मायाचार, प्रपञ्च आदि से भर जाता है। ये कुवासनाएँ कुछ समय लगातार मन में प्रविष्ट होने से अंतर्मन में गहरी मानसिक ग्रन्थियों की सृष्टि कर देती हैं। ऐसे व्यक्ति मौन सम्बन्धी बातों में निरन्तर दिलचस्पी, गन्दे शब्दों का प्रयोग, बात बात में गाली देना, गुह्य अंगों का पुनःपुनः स्पर्श, पराई स्त्रियों को वासनामय कुदृष्टि से देखना, मन में गन्दे विचारों—पापमयी कल्पनाओं के कारण खींचतान अस्थिरता, आकर्षण−निकर्षण आदि मनः संघर्ष निरन्तर चलते रहते हैं। यही कारण है कि विकारी पुरुष प्रायः चोर निर्लज्ज, दुस्साहसी, कायर, झूठे और ठग होते हैं, अपने व्यापार तथा व्यवहार में समय समय पर अपनी इस कुप्रवृत्ति का परिचय देते रहते हैं। लोगों के मन में उनके लिए विश्वास, प्रतिष्ठा, आदर की भावना नहीं रहती, समाज से उन्हें सच्चा सहयोग प्राप्त नहीं होता और फलस्वरूप जीवन−विकास के महत्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाते हैं।
व्यभिचार की मनःस्थिति अशान्त, सलज्ज, दुःख पूर्ण होती है। उसमें द्वन्द्व चलता रहता है, अन्तःकरण कलुषित हो जाता है। मनुष्य की प्रतिष्ठा एवं विश्वस्तता स्वयं अपनी ही नजरों में कम हो जाती है प्रत्येक क्षेत्र में सच्ची मैत्री या सहयोग भावना का अभाव मिलता है। ये सब मानसिक दुःख नर्क की दारुण यातना के समान कष्टकर हैं। व्यभिचारी को निज कुकर्म का दुष्परिणाम रोग−व्याधि सामाजिक बहिष्कार के रूप से इसी जीवन में भुगतना पड़ता है।
मन में पापमय विचार रखना घातक है। आपका मन तो निर्मल शुद्ध देव मन्दिर स्वरूप होना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, असन्तोष, निर्दयता, असूया, अभिमान, शोक, चिन्ता आदि वे दुष्ट मनोभाव हैं, जो मनुष्य का प्रत्यक्ष नाश करने वाले हैं!
महर्षि जैमिनी के अनुसार जो द्विज लोभ से मोहित हो पावन ब्राह्मणत्व का परित्याग कर कुकर्म से जीविका चलाते हैं, वे नर्कगामी होते हैं।
जो नास्तिक हैं, जिन्होंने धर्म की मर्यादा भंग की है, जो काम भोग के लिए उत्कण्ठित, दाम्भिक और कृतघ्न हैं, जो ब्राह्मणों को धन देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देते, चुगली खाते, अभिमान रखते और झूठ बोलते हैं, जिनकी बातें परस्पर विरुद्ध होती हैं, जो दूसरों का धन हड़प लेते हैं, दूसरों पर कलंक लगाने के लिए उत्सुक रहते हैं और पराई सम्पत्ति देखकर जलते हैं, वे नर्क में जाते हैं।
जो मनुष्य सदा प्राणियों के प्राण लेने में लगे रहते हैं, पराई निन्दा के प्रवृत्त होते हैं, कुँए, बगीचे, पोखर आदि को दूषित करते हैं, वे नष्ट हो जाते हैं।
वाणी से कुशब्दों, गाली, अपमान जनक, कटु वचन उच्चारण करना भी पाप है। आपको चाहिए कि शरीर मन वाणी को सहज सात्विक कार्यों में लीन रखें, शुभ सोचें, शुभ उच्चारण करें।
(प्रो. मोहन लाल वर्मा, एम.ए.एल.एल.बी)
मनुष्य के पास जो सबसे मूल्यवान यन्त्र हैं, वह उसके शरीर में हृदय एवं मस्तिष्क हैं। इनमें भी मस्तिष्क हृदय की अपेक्षा शक्ति शाली है, क्योंकि वही हृदय की गतिविधि को संचालित करता है। कितने खेद का विषय है कि हम मस्तिष्क के स्वास्थ्य, उचित विचार संयम, भावनाओं के नियन्त्रण का उचित ध्यान नहीं रखते, अपने स्वभाव या बुरी आदतों को मनमानी करने देते हैं, और अपना मानसिक अथवा भावात्मक संतुलन नष्ट कर लेते हैं।
संसार में किसी क्षेत्र को ले लीजिए, वे ही व्यक्ति सफल मिलेंगे जो स्वयं अपने आपको नियंत्रित या संयमित कर सके हैं, अनुचित प्रवाहों से मन को रोककर एकाग्रता पूर्वक एक ही ओर मानसिक शक्ति यों को लगा सके हैं, जिनकी व्यक्तिगत आदतें उत्तम रहीं और शक्तियाँ समुन्नत होती रहीं।
जब आप संसार की विभिन्न वस्तुओं पर अपना आधिपत्य स्थापित करने चलें, तो पहले स्वयं अपने व्यक्ति त्व, अपनी गुप्त शक्ति यों का स्वामित्व स्वीकार कीजिए अर्थात् प्रारम्भ से यह मान लीजिए कि आप असीम शक्तियाँ और पौरुष लेकर पृथ्वी पर जन्मे हैं, समाज में आपका पद प्रतिष्ठा का है, वही आप पाकर रहेंगे।
जब मनुष्य स्वयं अपने क्रोध, भावावेश, उत्तेजना, वासनामय, मनःस्थितियों, आदतों को अपने वश में नहीं कर पाता, तो भला वह क्योंकर अन्य मनुष्यों या भीड़ इत्यादि को वश में कर पायेगा? वह उस वायुयान की भाँति अस्थिर रहेगा, जो तूफान में यत्र तत्र मारा मारा फिरता है। मन की एक तरंग तेजी से आई तो एक ओर बह गया, जब विपरीत मनोभावना हुई तो दूसरी दिशा में प्रवृत्त हो गया। फिर किसी गुप्त वासना ने जोर मारा तो एक नई दिशा ग्रहण कर ली, क्योंकि ऐसे व्यक्ति यों में सब मनः स्थितियों को नियन्त्रित एवं संचालित करने वाली दृढ़ इच्छा और संकल्प शक्ति यों का अभाव होता है।
हमारे देखने में ऐसे अनेक प्रौढ़ व्यक्ति आये हैं, जो बीड़ी पान सिगरेट अथवा शराब अफीम आदि के लिए बच्चों की तरह अधीर हो उठते हैं, पास पैसे न होने से दूसरों से इन क्षुद्र वस्तुओं की भिक्षा माँगते नहीं लज्जित होते। कुछ वासना में इतने अन्धे होते हैं कि उचित अनुचित का भी ध्यान नहीं देते। कुछ जुआ खेलने के बुरी तरह आदी होते हैं। कुछ खान पान, मिठाई चाय आदि के चटोरे स्वाद के गुलाम होते हैं। खाद्य पदार्थों को देखते ही मुग्ध हो जाते हैं। कुछ निद्रा में सर्वाधिक आनन्द लेते और केवल खान पान में मस्त रहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी अपनी स्वभावगत और व्यक्ति गत दुर्बलताएँ हैं। जो इन आदतों की खराबियों को जान कर भी उन्हीं में लिप्त हैं और दुःख पा रहे हैं, वे सुप्नावस्था में ही समझे जायेंगे। यदि वे अपनी आदतों के कारण आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं, तो यह उनकी आत्म नियन्त्रण की निर्बलता ही कही जायगी।
आत्म संयम विहीन व्यक्ति उस जलयान के अनुरूप हैं, जो विरोधी वायु के झकोरों से निरन्तर इधर उधर झोंके खाता खाता पथ भ्रष्ट हो जाता है। उसका मार्ग सरल सीधा न होकर बल खाता रहता है। वह गन्तव्य स्थान तक कभी नहीं पहुँच पाता। प्रथम श्रेणी की मानसिक शक्तियाँ पाकर भी अनेक व्यक्ति जहाँ के तहाँ पड़े हैं। आत्म संयम की कमी ही उनकी मूल त्रुटि हैं।
इस न्यूनता से कभी हम तनिक सी दुर्घटना हानि, विरोध से उदास हो जाते हैं, तो तनिक से लाभ अथवा प्रशंसा से फूल कर कुप्पा बन जाते हैं। कोई भी भावना उनकी महत्वाकाँक्षा को अन्धकार में डाल देती है। अपने प्रलोभनों, इच्छाओं, आवश्यकताओं को न रोक सकने के कारण न केवल व्यक्ति यों का वरन् बड़े −बड़े राज्यों का अधःपतन हुआ है; क्रान्तियाँ मच गई हैं। सम्पूर्ण जाति डरी हुई भेड़ बकरियों की भाँति युद्ध अथवा दिवालियेपन में प्रवृत्त हो जाती है। आज के प्रजातन्त्र के युग में किसी राष्ट्र के नागरिकों द्वारा पाये जाने वाले आत्म−संयम के अनुपात में ही सफलता और समृद्धि की आशा करनी चाहिए। यदि उस राष्ट्र के नागरिक वासना की क्षणिक तरंगों से उद्वेलित हो उठते हैं, छोटी−छोटी बातों से डरकर सशंकित हो जाते हैं, तो उसका नाश अवश्यम्भावी है। उसका विस्तार उस राष्ट्र की रक्षा नहीं कर सकेगा।
अंग्रेज जाति को ही लीजिए। आत्म−संयम के कारण ये विदेश में आकर सफल व्यापारी बन सके, धीरे−धीरे सम्पूर्ण राज्य के अधिकारी बन गए, बड़े−बड़े समुद्र पार किए; युद्धों में सफलता लाभ की। यदि ये नई जगह से डरते, भयभीत होकर पुराने संकीर्ण दायरे में बँधे रहते और साहस एवं पौरुष से आगे न बढ़ते, तो अंग्रेज जाति जहाँ की तहाँ पड़ी रहती। अमेरिका ने अपनी शक्ति को बढ़ाकर स्वतन्त्रता प्राप्त की थी और आज भी अपने सहारे विश्व का सर्वश्रेष्ठ राष्ट्र बना हुआ है। इन देशों में बड़ी−बड़ी सभाएँ होती हैं, सार्वजनिक कार्य होते हैं, तो जनता शान्त हो आत्म−संयम पूर्वक वक्ताओं के भाषण सुनती है। प्रत्येक कार्य क्रम और व्यवस्था से होता है। न भगदड़ है, न छोटे 2 षडयंत्र या क्षुद्र आन्दोलन! साधारण नागरिक अधिक आत्म−संयमी हैं। अपने कार्य में पर्याप्त रुचि लेकर करते हैं। हिंसा जन्य लूटमार कत्ल भी कम हैं; झगड़े बहुत कम हैं, निर्दयता कम है।
प्रत्येक राष्ट्र तथा जाति में सहिष्णुता अपना विशेष स्थान रखती है। उन्नति का एक लक्षण यह है कि हम दूसरे धर्म, वर्ण, देश के व्यक्ति की भावनाओं को कहाँ तक सहन कर सकते हैं। बाह्य देशों में हर जाति और वर्ग के व्यक्ति सहानुभूति, सहिष्णुता और बराबरदारी से रहते तथा अपना−अपना स्थान करते हैं। उनमें धैर्य और आत्म−संयम पूर्वक कार्य करने की अधिक क्षमता है।
प्राचीन युग में भारतीय ऋषि मुनि आत्म−संयम के देदीप्यमान आदर्श थे। हमारा अध्ययन, गुरुकुल−निवास, ब्रह्मचर्य−धारण आदि ऐसे संस्कार थे, जिन्हें प्रारंभ से ही बच्चे के कोमलपन पर धारण करा दिया जाता था। राजपुत्र से लेकर साधारण व्यक्ति के पुत्र तक को गुरुकुल में उन्हीं नैतिक नियमों−सादा जीवन, श्रम और विद्या−अध्ययन का पालन करना पड़ता था।
आत्म−संयम की कला का अध्ययन करने में सर्वप्रथम हमारा ध्यान मस्तिष्क पर जाता है। जो मस्तिष्क अपने नाना कार्यों को योजनाओं में न बाँध सके, एकसूत्रता प्राप्त न कर सके और विभिन्न प्रलोभनों पर नियन्त्रण न कर सके, वह विजय प्राप्ति में सहायक नहीं हो सकता। मस्तिष्क को सुप्तावस्था से जाग्रत करने और सचेत करने की आवश्यकता है। यह संसार से भागने, योगियों जैसा जीवन व्यतीत करने या इन्द्रिय−निग्रह मात्र से प्राप्त नहीं होता। मस्तिष्क का सही दिशा में क्रियाशील बनना हमारी प्रथम आवश्यकता है।
उत्तम मस्तिष्क कौन सा है? जो मस्तिष्क केवल चिन्तन मात्र करता है, वह एकाँगी है, अपूर्ण है। मस्तिष्क नए ज्ञान को ग्रहण करे और फिर नव−निर्माण करे, नई वस्तु नए विचार अथवा योजना प्रदान करे।
मस्तिष्क से कार्य लेने से वह संयमित बनता है। घोड़े को जैसे टहलाने, जोड़ने, जीन कसने से वह ठीक चलने का अभ्यस्त होता है, उसी प्रकार मस्तिष्क कार्य करने से सुचारु रीति से विकसित होता है। निष्क्रियता मस्तिष्क को पंगु कर देती है। नए सृजनात्मक रूप में सोचने−विचारने से, मानसिक शक्तियों के अधिकाधिक प्रयोग से, स्वाध्याय और दूसरों के पढ़े हुए विचारों पर स्वयं स्वतन्त्र चिन्तन से मस्तिष्क की शक्तियाँ बढ़ती हैं।
सच मानिये, इसमें से अधिकाँश व्यक्ति केवल मस्तिष्क से 10 प्रतिशत भाग को ही जाग्रत रख पाते हैं। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि उनके दिमाग का केवल 10 प्रतिशत भाग ही विकसित सक्रिय रहता है। शेष 90 प्रतिशत सुप्तावस्था में ही पड़ा रहता है। वे अपनी गुप्त शक्ति यों का ह्रास कर देते हैं। उन्हें सोये पड़े रहने का रोगी कहना अधिक उपयुक्त होगा। वे स्वयं चलने वाली गाड़ी की तरह बिना सोचे समझे अंधाधुंध बढ़ते रहते हैं। वे एक लीक में पड़े हुए पहिये की तरह हैं। जैसे घड़ी की सुई निरन्तर उसी डायल पर सदा घूमती रहती है, वे भी उसी प्रकार घूमा करते हैं। हो सकता है, ऐसे मानसिक आलसी व्यक्ति ऊँचे पद पर पहुँच जायं, पर हैं वे अर्द्ध सुषुप्त ही।
वे क्या करें? उन्हें अपने मस्तिष्क से काम लेना प्रारम्भ कर देना चाहिए। शैथिल्य छोड़ देना चाहिए। देश और समाज के रंग−मंच पर अभिवीत प्रत्येक दृश्य तथा कार्य के रहस्यों पर विचार करना चाहिए। नई−नई सृजनात्मक विचारों से परिपूर्ण पुस्तकें पढ़नी चाहिए। भाषण सुनने चाहिए। व्यापार में होने वाली नई प्रगति को, बाजार के रुख को समझना चाहिए। स्वयं उसके मन में जो स्वतन्त्र मौलिक विचार आयें, उन पर स्वयं चिन्तन करना चाहिए अर्थात् उन्हें अपने मानसिक संस्थान को कुछ न कुछ नई प्रवृत्ति, नई प्रेरणा, नया रुख देना चाहिए।
आप देखेंगे, कुछ व्यक्ति यकायक सफल हो जाते हैं। क्यों? वे अपनी शक्ति यों, गुप्त सामर्थ्य और पौरुष को पहचान कर उनसे पूरा कार्य लेना प्रारम्भ कर देते हैं। कुछ प्रेरक विचार उनके मन में यह सब आमूल परिवर्तन ला देता है। आप में भी असीम शक्तियाँ सो रही हैं। केवल उन्हें आत्म−संयम से जाग्रत करने भर की देर है।
(श्री रामखेलावन चौधरी, बी.ए. लखनऊ)
मनुष्य ‘स्वर्ग’ तक पहुँचने में क्यों असमर्थ है? इसके उत्तर में केवल यह कहा जा सकता है कि वह अपने और दूसरों के अनुभवों से लाभ नहीं उठाता; इसलिए वह स्वर्ग तक नहीं पहुँच पाता। सुख की प्राप्ति के लिए अनुभवों से लाभ उठाने की शक्ति अपेक्षित है। जो लोग अपने व्यक्तिगत जीवन में अपने अनुभवों से शिक्षा नहीं ग्रहण करते वे सदैव दुखी रहते हैं। जो बात व्यक्ति गत जीवन के लिए सत्य है, वही सामाजिक जीवन के लिए भी सत्य है। मानव जाति ने प्रारम्भ काल से अब तक जो कुछ अनुभव प्राप्त किए हैं, यदि उनसे मनुष्य की वर्तमान पीढ़ी लाभ नहीं उठाती, तो इसे मानव जाति का दुर्भाग्य समझना चाहिए। जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए मनुष्य सतत् प्रयत्न करता रहा है। उन प्रयत्नों और प्रयोगों का परिणाम ‘पारिवारिक जीवन’ है। यदि पारिवारिक जीवन इतना उपयोगी और सुखकर न होता; यदि उससे मनुष्य के व्यक्ति गत जीवन में, कोई लाभ न होता, तो शायद यह पारिवारिक व्यवस्था आज लुप्त हो गई होती। पृथ्वी भर में जितना भी मानव−समाज है, सबमें किसी न किसी रूप में यह व्यवस्था पाई जाती है। आज यह स्थिति अवश्य हो गई है कि परिवार जैसी उत्तम संस्था का ह्रास पाश्चात्य देशों में होने लगा है और भारतीय समाज भी यूरोप के पद चिन्हों पर चलने लगा है। अतीत की ओर से आँख बन्द करके, भविष्य की कल्पना में मस्त वर्तमान मनुष्य इस परिवार जैसी संसार का विनाश करने के लिए सन्नद्ध है। उसके भयंकर परिणामों की ओर उसका ध्यान नहीं है।
परिवार की उपयोगिता को देखते हुए अनेक विद्वान्, इस स्थिति से बड़े चिंतित हो उठे हैं। उनके मन में, कुछ हेर−फेर के साथ, परिवार को जिंदा रखना, मनुष्य के सुख के लिए अत्यन्त आवश्यक है। इस सम्बन्ध में हम कुछ अमरीकी विद्वानों के विचार प्रस्तुत करते हैं।
मशीनों के आविष्कार और औद्योगीकरण ने अमरीका तथा अन्य पाश्चात्य देशों में समाज की काया पलट करदी है। स्त्री शिक्षा और स्त्रियों की आर्थिक स्वतन्त्रता ने इसमें सहायता पहुँचाई है। इस परिवर्तन का सबसे गहरा असर परिवार पर पड़ा है। पहले परिवार एक संगठित इकाई था। एक−एक परिवार में लगभग पाँच से लेकर बीस तक व्यक्ति होते थे। आयु में सबसे बड़ा पुरुष परिवार का कर्णधार होता था। उसकी छाया में छोटे−बड़े आश्रय पाते थे। भोजन, वस्त्र, विवाह, आजीविका का प्रबन्ध और अन्य साँस्कृतिक उत्सव आदि की व्यवस्था समान रूप से, एक ही स्तर पर सबके लिए एक परिवार में की जाती थी। आज यह सब बातें नष्ट हो रही हैं। दो स्त्री−पुरुष विवाह द्वारा सम्बन्ध स्थापित कर लेते हैं; दोनों आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी होते हैं। दिन में अलग−अलग स्थानों पर दोनों काम करते हैं, भोजन की व्यवस्था होटलों में कर ली जाती है, बच्चों का भार शिशु−गृहों और शिक्षालयों को सौंप दिया जाता है। यह है परिवार का दृश्य, जिसमें माता, पिता और बच्चे ही दिखाई देते हैं, अन्य सम्बन्धी जैसे बड़े भाई, भाभी, बहनें, चाचा−चाची आदि का तो कोई स्थान नहीं है। परिवार का क्षेत्र बिल्कुल सिकुड़ गया है और जो कुछ है भी, तो अव्यवस्थित और कच्चे धागे में बँधा हुआ। व्यवस्था अवश्य बदल गई है, परन्तु उससे समाज की जड़ में घुन लग गया है। परिवार के अभाव में उसके कार्यों की पूर्ति कैसे हो? परिवार के कार्य पूर्णरूप से प्राकृतिक हैं अप्राकृतिक साधनों से उनकी पूर्ति संभव नहीं है।
श्री एम. सी. एल्मर ने (उनकी पुस्तक The Sociology of Family इस सम्बन्ध में पठनीय हैं। अपनी खोजों और गवेषणाओं के उपराँत कुछ बड़े ही तथ्यपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं। मनुष्य का सुख विशेष रूप से तीन बातों पर निर्भर करता है। वे हैं− (क) स्वास्थ्य, (ख) विवाह, (ग) जीविका का साधन। इन तीनों क्षेत्रों में परिवार की अमूल्य सेवाओं का अंदाजा लगाना कठिन है।
पहले स्वास्थ्य को लीजिये। यदि मनुष्य शरीर से निर्बल और रोगग्रस्त है, तो उसे किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इससे जन्मकाल से ही स्वास्थ्य की ओर ध्यान देना उचित है। यदि बचपन में ही शरीर का विकास रुक गया, तो सारा जीवन रोते ही बीतता है। बच्चों के पालन−पोषण और स्वास्थ्यवर्धन का भार प्राचीन काल से परिवार की बड़ी−बूढ़ी औरतों और बच्चों की माता पर रहा करता था। उनका स्थान अब सरकार की देख−रेख में चलने वाले जनन−गृहों और अस्पतालों ने ले लिया है। शिशु को जनाने के लिए वहाँ कुशल दाइयों का प्रबन्ध होता है। वे ठीक समय पर दूध पिलाती हैं, रोग से बच्चों की रक्षा करती हैं और उनके शरीर की अच्छी तरह सफाई रखती हैं। जनन−गृहों से निकलने के बाद बच्चों के स्वास्थ्य की देख−रेख शिशुगृहों और बाल−शिक्षा−संस्थाओं में होती है। सभी प्रकार के वैज्ञानिक साधनों से युक्त, साफ स्वच्छ, विशालकाय भवनों की तुलना में पारिवारिक वातावरण बड़ा ही हीन जँचता है। डाक्टरों और विद्वानों ने इस नये प्रबन्ध को जन स्वास्थ्य की गारंटी बताया है। फिर भी जन−स्वास्थ्य में कोई विशेष प्रगति नज़र नहीं आती है। इसका कारण है−यह साधन सम्पन्न भवन, परिवार की झोंपड़ी की एक विशेषता अपने में पैदा करने में असमर्थ हैं। वह विशेषता है ‘स्नेह’ या ‘प्रेम’। अस्पताल का शिक्षित तथा विशेष योग्यता प्राप्त नर्स कभी भी एक अशिक्षित माता के हृदय का वह एक भी अमृततुल्य स्नेहबिंदु नहीं दे सकती, जिसके बिना बच्चों का स्वस्थ रहना असम्भव हो जाता है। घर में दुलार से ही माताओं ने कितने ही वीर सैनिक, मेधावी विद्वान्, योग्य कलाकार और नेता सिखा पढ़ाकर तैयार किये हैं। उतनी प्रेरक शक्ति बाल−शिक्षा−संस्थाओं की योग्य शिक्षिकाओं में नहीं होती; क्योंकि दूसरों के बच्चों के प्रति उनके मन में उतना स्वाभाविक प्रेम हो ही नहीं सकता। माता या पत्नी के अंचल की वायु का सेवन करते हुए रूखी−सूखी रोटी खाकर मनुष्य हाथी का बल प्राप्त कर सकता है, परन्तु होटल में बैठकर मनों मक्खन उड़ा जाने पर भी वह रोगी बना रहता है। कारण, परिवार की सूखी रोटी में मातृ−स्नेह का अमृत मिला होता है और होटल के मक्खन में स्वार्थ और शोषण का विष होता है। इन सब बातों को बहुत कम लोग समझ पाते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान की खोजों ने सिद्ध कर दिया है कि अस्पतालों, शिक्षालयों के निवासों और होटलों के प्रेमशून्य वातावरण में पलने वाला मनुष्य आजीवन अतृप्त रहता है और अतृप्त मनुष्य जीवन में कभी भी सुखी नहीं हो सकता।
मनुष्य के सुख की दूसरी आधार शिला है—सफल विवाहित−जीवन। विवाहित−जीवन, दो स्त्री− पुरुषों के बीच वैध यौन सम्बन्ध का प्रतीक है। उससे मनुष्य की कामवृत्ति संतुष्ट होकर, रचनात्मक कार्यों की ओर अग्रसर होती है। अविवाहित मनुष्य प्रायः असफल रहते हैं और उनकी सृजनात्मक शक्ति अविकसित रह जाती है। मनोवैज्ञानिकों ने खोज की है कि तोड़−फोड़ और विध्वंसात्मक कार्यों को बड़े भाव से करने वालों में अविवाहित मनुष्यों की संख्या अधिक होती है। प्राचीन काल के विद्वानों ने संभव है इस तथ्य को इतने अधिक वैज्ञानिक ढंग से न सोचा हो, परन्तु समाज की स्थिरता बनाये रखने के लिए ही, विवाहित−जीवन को अवश्य ही आवश्यक बताया था। परिवार के बिना सुखी विवाहित जीवन संभव नहीं है। परिवार के बड़े बूढ़ों के पथ−प्रदर्शन में नवयुवकों का विवाहित−जीवन आरम्भ होता है। वे हर प्रकार से जीवन को सुखी बनाने में सहायता देते हैं। अब भी ऐसे परिवारों की संख्या बहुत अधिक है, जिनमें विवाह हो जाने के बाद नव दंपत्ति के भरण−पोषण का भार परिवार के कर्णधार पर रहता है। उन्हें कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ती और वे अपनी व्यक्ति गत उन्नति तथा सामाजिक हित के लिए जितना चाहें समय और शक्ति लगा सकते हैं। रूढ़िग्रस्त परिवारों में कुछ झंझट अवश्य होते हैं, परन्तु उन झंझटों की तुलना में, सुविधायें अधिक मिलती है। एम. ई. वाट्सन का कथन है कि पारिवारिक संरक्षण में, सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति का जितना अधिक सुअवसर प्राप्त होता है, उतना अकेले रहकर मिलना असम्भव है। थोड़े से खर्च में जीवन निर्वाह होता है। सबसे अधिक लाभ स्त्रियों को होता है। भारत जैसे देश में स्त्रियों की शिक्षा अभी अपर्याप्त है; जो कुछ होती भी है, वह दाम्पत्य−जीवन से सम्बन्ध नहीं रखती। दाम्पत्य−जीवन व्यवहारिक होता है, किताबी ज्ञान से कोई सहायता इसमें नहीं मिलती। यही कारण है पढ़े लिखे दंपत्ति सुख से दूर रहते हैं। दांपत्य−जीवन की शिक्षा तो परिवार में ही मिलती है। स्त्रियाँ भोजन बनाना, गृहस्थी का प्रबन्ध करना, बच्चों का लालन−पालन करना और साँस्कृतिक जीवन का निर्माण करना आदि परिवार में रहकर ही सीखती हैं। इन सब बातों पर विचार करने से स्पष्ट हो जायगा कि परिवार द्वारा मनुष्य के सुख का बड़ा सुन्दर आयोजन होता है।
जीवन में सुख प्राप्त करने के लिए आर्थिक संपन्नता भी बहुत जरूरी है। निठल्ले, अकर्मण्य और पैसा न पैदा करने वाले व्यक्ति का सब जगह निरादर होता है। इसलिए सुख की इच्छा करने वाले व्यक्ति को किसी ने किसी रोज़गार या नौकरी में लगे रहना चाहिए। इस क्षेत्र में परिवार व्यक्ति की पूरी सहायता करता है। प्राचीन काल में, और भारतवर्ष में अब भी काम-धंधा, रोजगार या नौकरी दिलाने में परिवार का मुख्य हाथ होता है। हमारे देश में यह प्रथा चली आ रही है कि परिवार में कोई न कोई ‘पुश्तैनी रोज़गार’ अर्थात् कई पीढ़ियों से चले आने वाला रोज़गार स्थायी रूप से किया जाता है। उसी के द्वारा परिवार के सभी सदस्य धनार्जन करते हैं। उदाहरण के लिये खेती और दुकानदारी के व्यवसाय वंश परम्परा से परिवारों में चले आते हैं। ऐसे व्यवसायों में परिवार के सभी लोग मिलजुल कर काम कर लेते हैं; बेरोज़गारी और बेकारी की समस्या, जिसे हल करने में साधन−सम्पन्न सरकार भी असमर्थ हो रही है, परिवारों द्वारा बड़ी सरलता से निपटा दी जाती है। वर्तमान काल में सरकार अपना उत्तरदायित्व बढ़ाती जा रही है। नवयुवकों को काम दिलाने के लिए उसने दफ्तर (एम्प्लॉयमेन्ट एक्सचेंज) खोल रखे हैं, परन्तु परिवारों द्वारा आयोजित कार्यक्रम अब भी आदर्श है। भविष्य में घरेलू उद्योग−धन्धों और ग्रामोद्योगों तथा कुटीर उद्योगों का पुनः विकास होने पर पारिवारिक आर्थिक व्यवस्था ही ज्यादा जनप्रिय और लाभदायक सिद्ध होगी। महात्मा गाँधी ने अपनी बुनियादी शिक्षा के कार्यक्रम में, इसे महत्वपूर्ण स्थान देते हुए इसकी बार−बार प्रशंसा की और पाश्चात्य विद्वान् भी इसकी आवश्यकता अनुभव करने लगे हैं। एलमर और वाट्सन, जिनके विचारों का हम पहले भी उल्लेख कर चुके हैं, इस विषय में एकमत हैं। आज के युग में व्यक्ति गत भिन्नता और रुचि के आधार पर मन पसन्द का रोज़गार या नौकरी चुनने को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा है, परन्तु अपरिपक्व बुद्धि और अपनी शक्ति को न पहचान सकने वाले नवयुवक उपयुक्त मन चाहे व्यापार चुन सकने में असमर्थ होते हैं और यदि वे चुन भी लें, तो वह रोज़गार या नौकरी उनको मिल ही कैसी सकती है। मान लीजिये, किसी परिवार में कपड़े की दुकानदारी का काम अच्छे पैमाने पर होता है, सभी लोग मिलजुल कर उसमें काम करते हैं। परिवार का एक शिक्षित नवयुवक साहित्य−सृजन द्वारा धनार्जन करना चाहता है। ठीक है और संभव भी है कि वह इस काम में अधिक सफल हो सके और अपनी योग्यताओं का प्रदर्शन कर सके; परन्तु इस नये काम को जमाने के लिए उसे न जाने कितना संघर्ष करना पड़ेगा और सफलता संदिग्ध रहेगी। इसके विपरीत पारिवारिक व्यवसाय में उसे हर प्रकार की सहायता मिल सकती है; अनुभव प्राप्त करने का भी ज्यादा मौका मिलेगा और सफलता प्राप्त करने में ज्यादा आसानी होगी। अब नौकरी को लीजिये। परिवार द्वारा इसमें भी सहायता मिलती है। कल−कारखानों या दफ्तरों में काम करने वाले व्यक्ति अपने पुत्रों, पौत्रों और सम्बन्धियों को बड़ी सरलता से काम पर लगा लेते हैं। रेलवे और दूसरे सरकारी विभागों में कर्मचारी के पुत्र या भाई को नौकरी देने में अधिक ख्याल रखा जाता है। प्रतिभाशाली और बुद्धिमान व्यक्ति भले ही अपनी क्षमता के बल पर मन चाहे काम में सफल हो जायं और वे हो जाते हैं। उनको परिवार या सरकार की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं होती, परन्तु साधारण व्यक्ति यों के लिये (और इन्हीं की संख्या सबसे अधिक होती है) परिवार की सहायता जरूरी है।
इस प्रकार पारिवारिक जीवन स्वास्थ्य, विवाह और जीविका की समस्या को सरल बनाने और सुख शाँति की वृद्धि में सर्व साधारण के लिए बहुत सहायक होता है। परमार्थ−प्रेमी, लोक−सेवी और कुछ महान् कार्यों के लिए कोई उच्च आदर्श वाले व्यक्ति एकाकी अविवाहित जीवन व्यतीत कर सकते हैं, पर सर्व साधारण के लिए तो पति−पत्नी तक का छोटा परिवार बच्चों की अपेक्षा बड़े परिवार में रहना ही लाभदायक है।
(श्री रामकृष्ण स्थापक राकेश लखनादौन)
जिन्दगी को ठीक प्रकार जीना भी एक कला है। यों तो प्रत्येक मनुष्य जन्म लेता, बढ़ता और बढ़कर मृत्यु को प्राप्त होता है। ऐसी जिन्दगी को सच्ची जिन्दगी नहीं कह सकते। सच्चा जीवन वह है जो पुष्प की तरह खिलता है, अपने सौंदर्य, सुवास एवं महत्व से स्वयं धन्य बनता है और दूसरों के चित्त को प्रसन्नता और प्रफुल्लता से भर देता है। लोग कई तरह की कलाओं को सीखने के लिये बहुत समय, धन, परिश्रम एवं बुद्धि खर्च करते हैं, किन्तु खेद है कि लोग जीवन जीने की कला सीखने के लिये न तो प्रयत्न करते हैं और न उसकी कोई आवश्यकता ही समझते हैं। यही कारण है कि आज हमें अधिकाँश लोगों के जीवन कर्कश, कुरूप, नीरस एवं अस्त−व्यस्त दिखाई पड़ते हैं। कई तो अपने जीवन से ऊबकर आत्म−हत्या तक कर बैठते हैं।
प्रभु ने मानव−जीवन को सर्वांग सुन्दर और आनन्द से परिपूर्ण बनाया है। कमी केवल इस बात की है कि मनुष्य जिन्दगी जीने की कला से अनभिज्ञ है, यदि वह इस दिशा में थोड़ा ध्यान दे और अभ्यास करे तो अनेक कठिनाइयों के रहते हुये भी आनन्दमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
अनेकों बार जन्म लेने और मरने के पश्चात् हमें यह जीवनरूपी वरदान मिला है। यह जीवन सुख, सफलता, समृद्धि सभी एकत्रित गुणों से ओत−प्रोत हैं। इन गुणों पर हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है। एक विद्वान् ने लिखा है—“सकल पदारथ हैं जग माहीं। कर्महीन नर पावत नाहीं॥” हमारे चारों ओर सुख, समृद्धि, यश, विजय, प्रेम, सहानुभूति का समुद्र लहरा रहा है। ये स्वर्ण मुद्राओं और हीरे मोती की तरह हमारे चारों ओर बिखरे हैं। आवश्यकता यह है कि अपने मानसिक चुम्बक द्वारा हम इन्हें अपनी ओर खींच लें। इनके पीछे-2 भागने वाले को ये चीजें प्राप्त होने वाली नहीं हैं। इन्हें अपनी ओर खींचने वाला चुम्बक अपने अन्दर विकसित करना है, किन्तु खेद है कि अनेक व्यक्ति इस आन्तरिक चुम्बक को नहीं जानते हैं।
इस मानवीय चुम्बक के विकास के पहिले यह जानना आवश्यक है कि यह चुम्बक है क्या? तीव्र इच्छा, बलवती इच्छा। स्पष्ट इच्छा−ऐसी इच्छा दृढ़ होती है और जो न बीमारी, प्रतिकूलता एवं रोग−शोक से टूटती है और न लालच−लोभ से, अपना प्रशस्त राजमार्ग छोड़ती है। इस इच्छा की अग्नि जितनी प्रबल होती है, उतना ही तीव्र आकर्षण−शक्ति युक्त आपका मानसिक चुम्बक होता है। इस प्रबल एवं चेतन इच्छा का दमन सम्भव नहीं है। यह मनुष्य को उसके लक्ष्य की ओर इशारा करती है, उसे बढ़ाती है, प्रोत्साहित करती है। आत्मा में नवीन स्फूर्ति, नवीन ओज का संचार करके हमें निश्चयों पर दृढ़ रहने की शिक्षा देती है। वह व्यक्ति धन्य है जिसके निश्चयों में बल, साहस, धैर्य एवं ओज है और जो अपने निश्चयों के लिये पश्चाताप नहीं करता। ऐसे निश्चयवान के लिये दुःख, क्लेश, विपत्ति एवं विघ्न नश्वर है। रुपया, पैसा, प्रसिद्धि तथा लोकप्रियता सदैव उसे प्राप्त होती है। जो व्यक्ति यह निश्चय नहीं कर पाता कि वह क्या चाहता है, वह कुछ भी नहीं कर सकता। आपको किसकी महत्वाकाँक्षा है, पहले स्वयं अपने से पूछिये और तब कुछ निश्चय कीजिये। बिना इच्छित वस्तु का ज्ञान हुये आपका अपना मानसिक चुम्बक सशक्त नहीं हो सकता। अच्छी−अच्छी वस्तुयें इधर−उधर बिखरी रह जाती हैं और मनुष्य बेखबर सोया करते हैं। आप जो कार्य अपने लिए विशेष रूप से चुनेंगे, उससे आपको प्रेम करना होगा। पूरी निष्ठा, सहयोग, दृढ़ता और मनोयोग से उसमें इच्छा−शक्ति को केन्द्रित करना होगा।
अवसर की बात मत सोचिये। योग्यता होगी तो अवसर स्वयं तुम्हारे पास आकर चरण चूमेंगे।
योग्यता ऐसा धन है, जिसका उपयोग कभी न कभी और कहीं न कहीं अवश्य ही होगा। आपकी सफलता आपके बाह्य पदार्थों, व्यक्तियों, वातावरण, रुपये−पैसे, सिफारिश इत्यादि पर निर्भर नहीं है, वरन् वह आपके अन्तःप्रदेश में विद्यमान है। अन्तर से उसे निकालकर बाह्य जगत् में स्थापित करिये, फिर देखिये कि आपको किस प्रकार सफलता मिलती है। आज का युग उत्कृष्टता का है। जो जिस विषय का विशेषज्ञ होता है उसी की पूजा की जाती है। आज के युग में अधूरे, ऊपरी एवं सामान्य ज्ञान वाले बहुत मिलेंगे। इस युग में असाधारण योग्यता वाला व्यक्ति ही सफलता पा सकता है। उत्कृष्टता रुपये, धन दौलत, इज्जत, मान−बड़ाई सबको अपनी ओर खींच लेने की क्षमता रखती है। जो क्षेत्र आपने चुना है बस उसी में उत्कृष्टता प्राप्त कीजिये। यहाँ वहाँ मत भागिये अन्यथा कुछ हाथ न आवेगा। जो कुछ चुनिये, उसमें हर प्रकार अपने आपको ऐसा पटु और कार्यदक्ष बना लीजिये कि कोई कमजोरी शेष न रह जावे।
क्या आप किसी विषय के विशेषज्ञ हैं? क्या आप दूसरों की अपेक्षा कोई बात अधिक जानते हैं? व्यापार, नौकरी, अध्ययन, खेती, लोक−सेवा या अन्य कौन से कार्य के आप विशेषज्ञ हैं। यदि आप सचमुच में किसी बात के विशेषज्ञ हैं तो आपके पास धन−दौलत, मान−मर्यादा सब कुछ अपने आप चला आवेगा। इससे केवल आपको ही लाभ हो सो नहीं, वरन् दूसरों पर भी आपकी उत्कृष्टता का प्रभाव अवश्य पड़ेगा, जिससे पूरा समाज एवं देश गौरवान्वित हो सकेगा।
यों जिन्दगी जीने की कला के अनेक पहलू हैं, पर उनमें अतीव आवश्यक बातें यह हैं कि हम अव्यवस्थित जीवन को व्यवस्थित, नियमबद्ध, अनुशासित और सुसंगठित बनायें। जीवन के विज्ञान को गहराई तक समझें। कर्तव्य पर भली प्रकार दृढ़ रहें। अपने मानसिक चुम्बकत्व को, इच्छा−शक्ति को बलवान् एवं दृढ़ बनावें। योग्यता में दिन−दिन वृद्धि करते हुए जीवन को उत्कृष्ट से उत्कृष्टतर बनाते जावें। यदि इन तथ्यों के आधार पर जीवन की गतिविधि चलाई जाय तो अभीष्ट सफलता का प्राप्त होना सुनिश्चित ही समझना चाहिए।
(कविराज श्री महेन्द्रनाथ शास्त्री, प्रयाग)
शरीर में एक प्रकार का विष इकट्ठा हो जाता है और वही विष रोग का कारण होता है। शरीर स्थित यह विष शरीर की माँसपेशियों, स्नायुओं, शिराओं, धमनियों, सूक्ष्म कोषों, अस्थियों, लसीकाओं और कोशिकाओं तक में प्रविष्ट कर जाता है। सारे शरीर में स्थित विषों को निकाल कर बाहर कर देना ही पक्का और अचूक इलाज है।
और ढंग से तो शरीर का विष बाहर निकलता ही है पर इसके लिए मालिश भी बहुत आवश्यक और उपयोगी किया है। शरीर को निरोग रखने में मालिश का जितना प्रभाव है, रोग को दूर करने में उससे कम नहीं है। प्राचीन काल से ही लोग मालिश के गुणों से परिचित हैं। हमारे देश में मालिश इतनी प्रचलित हो गई है कि शिशुओं को बिना तेल मालिश के माताएँ सुलाती ही नहीं। प्राचीन काल में मालिश एक दैनिक नियमित कार्य समझा जाता था। जिस प्रकार दाँतों को साफ करना, स्नान करना, व्यायाम करना, शौच जाना आदि दैनिक और आवश्यकीय कार्य हैं, उसी प्रकार मालिश को भी आवश्यक समझा जाता था।
शरीर की स्थिरता और दृढ़ता के इच्छुक पहलवान भी हर सातवें दिन नियमित रूप से मालिश करते हैं। उनके शरीर की मालिश अन्य दिनों भी थोड़ी बहुत होती ही रहती है।
गाँधीजी प्रतिदिन प्रायः एक घंटा मालिश कराते थे। यह मालिश बिलकुल वैज्ञानिक ढंग की होती और मालिश कराते−कराते गाँधीजी खर्राटे भरने लगते थे। जब गाँधीजी उपवास करते थे तब भी मालिश कराते थे। लम्बे उपवासों में भी उनकी मालिश का रहस्य छिपा हुआ था।
मालिश की अनेक विधियाँ हैं—(1) हथेली से रगड़ना, (2) अँगुलियों से दबाना, (3) मुक्की लगाना या थपथपाना, (4) कम्पन। पश्चिमी विशेषज्ञों ने भी चार ही भेद माने हैं—(1) स्कीजिंग, निचोड़ना अँगुलियों से, (2) नीडिंग, दबाना, मुट्ठी बाँधकर, अँगुलियों के बल पर, (3) रोलिंग, लुढ़काना और (4) स्ट्रोकिंग, मुक्की या थपकी देना। इन सभी प्रकार की मालिशों का अपना महत्व है और अंगों की आवश्यकतानुसार इनका उपयोग किया जाता है। ये मालिशें शरीरस्थित विष को सीधे रक्त वाहिनी नसों और शिराओं में पहुँचा देती हैं जो सीधे फेफड़ों में चला जाता है और वहाँ ऑक्सीजन के संयोग से शुद्ध हो जाता है। मालिश के कारण रक्त का परिभ्रमण बढ़ जाता है, क्योंकि रक्त के परिभ्रमण में रुकावट डालने वाले पदार्थ पिघल जाते हैं। रक्त का बहाव बाहरी सतह की ओर होने लगता है। त्वचा के मुँह खुल जाते हैं और उनमें जीवनी शक्ति तथा चैतन्यता आ जाती है। साथ ही शरीर की वैद्युतिक−चुम्बक शक्ति प्रबल और चैतन्य हो उठती है, जो रोग−निवारण और स्वास्थ्यवर्द्धन का मूल कारण है। बाल के समान पतली कोशिकाओं में जो विष इकट्ठा हो जाता है, वह मालिश द्वारा ही वहाँ से हटता है, उसके हट जाने से ही उन रुके हुए स्थानों में पुनः सम्यक् प्रकार से रक्त संचालन होने लगता है, त्वचा की चैतन्यता के कारण त्वचा से भी विष बाहर निकलने लगता है। सभी स्नायुओं का मुख त्वचा में ही निहित है। सामान्य हस्त संचालन, कम्पन और चुटकियों द्वारा उनमें चैतन्यता आती है, उनका विष निकलता है और जीवनीय शक्ति बढ़ने के साथ−साथ वे सजग हो उठती हैं। यदि तेल की मालिश की जाय तो इन स्नायुओं को बल मिलता है और उन्हीं के द्वारा शरीर में तेल प्रविष्ट करके अंगों को पुष्ट और सबल बनाता है।
मालिश कई प्रकार की होती है−(1) सूखी मालिश, (2) खड़िया चूर्ण की मालिश, (3) तेल की मालिश, (4) उबटन की मालिश। इन सबमें आजकल प्रचलित साबुन की मालिश में हानि अधिक और लाभ कम है; परन्तु कहा जाता है कि त्वचा के कीटाणु साबुन से मर जाते हैं और त्वचा के मुँह खुल जाते हैं। स्वस्थ त्वचा द्वारा शरीर से विष निकलने में बड़ी सहायता मिलती है। इसलिए मालिश की उपयोगिता और भी बढ़ जाती है।
आरोग्यता लाभ करने के लिए व्यायाम की निताँत आवश्यकता है इसमें दो राय नहीं हो सकती। छोटे बच्चे और खाट पर पड़ा हुआ अस्वस्थ प्राणी क्या व्यायाम करे। यह प्रश्न विचारणीय है। इन लोगों के लिए भी मालिश एक अच्छा व्यायाम है। दूसरे प्रकार के व्यायामों में और मालिश में महान् अन्तर यह है कि जो मालिश कराता है उसे तो कुछ नहीं करना पड़ता, परन्तु उसके शरीर की नसों की माँसपेशियों की और स्नायुओं की तथा आँतों की और आमाशय की अच्छी कसरत हो जाती है। साथ ही उस व्यक्ति की भी कसरत पूरी हो जाती है जो मालिश करता है। इस प्रकार मालिश करने वाला और मालिश कराने वाला दोनों ही बराबर लाभ प्राप्त करते हैं।
नवरात्रि गायत्री उपासना के लिए परम पुनीत समय है। ठीक समय पर हुई वर्षा, समय पर बोई हुई कृषि, जिस प्रकार विशेष फलवती होती है, उसी प्रकार नवरात्रि के समय की हुई साधना भी अन्य समयों की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। जैसे दिन और रात्रि का मिलन काल ‘सन्ध्या समय’ कहलाता है और उस समय अध्यात्मिक पूजा उपासना अधिक उपयुक्त रहती है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतु की मिलन वेला आश्विन तथा चैत्र की नवरात्रि होती है। वैद्य लोग उदर रोग रक्त विकार आदि पुराने रोगों के रोगियों को इन्हीं दिनों वमन विरेचन आदि पञ्च कर्मों द्वारा शरीर की भीतरी सफाई कराते हैं। विशेष रूप से साधना करने के लिए प्रेरणा देते हैं। क्योंकि इन दिनों की हुई साधना भी अन्य समयों में की हुई बहुत बड़ी साधना के समान फलवती होती है। नवरात्रि में किया हुआ 24 हजार का लघु अनुष्ठान अन्य काल में किये हुए सवालक्ष पुरश्चरण के समान प्रभावशाली होता है।
अगली नवरात्रि चैत्र सुदी 1 शुक्रवार से लेकर चैत्र सुदी 10 शनिवार तदनुसार तारीख 25 मार्च से लेकर 2 अप्रैल 55 तक होगा। इन 9 दिनों में साधना मार्ग में रुचि रखने वालों को गायत्री उपासना के लिए कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। जिन्हें इन 9 दिनों प्रतिदिन एक बार सवेरे अथवा सुबह शाम दोनों वक्त, मिलकर 2॥−3 घण्टे का समय मिल सके वे 24 हजार का लघु अनुष्ठान कर लें। एक घण्टे में साधारणतः 10 मालाएँ हो जाती हैं और 9 दिन में 24 हजार जप करने के लिये 26 मालाएँ प्रतिदिन करनी पड़ती हैं जिनमें साधारणतः 3 घण्टे से अधिक समय नहीं लगता। जिन्हें इतना भी समय न मिल सके वे 1 घण्टा प्रतिदिन लगाकर 9 दिन में दस हजार जप करने का प्रयत्न तो अवश्य करें। जो समय इन दिनों साधना में लगाया जायगा वह कदापि निष्फल न जायगा।
साधना के नियम बहुत साधारण हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धता पूर्वक आसन पर बैठना चाहिए। प्रातःकाल पूर्व की ओर तथा सायंकाल पश्चिम की ओर मुख रहे। जप काल में घी का दीपक या धूपबत्ती जलती रहे, जल का पात्र, पास में हो सन्ध्या करके गायत्री और गुरु का पूजन करना चाहिए, तदुपरान्त जप आरम्भ कर दिया जाय। जप समाप्त हो जाने पर पूजा के जल को सूर्य के सम्मुख चढ़ा देना चाहिए।
इन 9 दिनों ब्रह्मचर्य से रहना आवश्यक है। जिनसे बन पड़े वे उपवास भी करें। जिनसे फल दूध लेकर 9 दिन उपवास करना न बन पड़े। वे अपनी सुविधा के अनुसार भोजन सम्बन्ध में जो तपस्या बरत सकें बरतें। इन दिनों नमक छोड़ देना भी एक प्रकार का व्रत ही है। इसके अतिरिक्त भूमि शयन, चमड़े का त्याग, पशुओं की सवारी का त्याग, अपनी शारीरिक सेवाएँ स्वयं करना, अपनी हजामत, कपड़े धोना, भोजन बनाना आदि सेवाएँ किसी और से न लेने आदि के व्रत जिनसे निभ सकें वे उन्हें भी निभाने का प्रयत्न करें। जितनी तपस्या जिनसे बन पड़े उतना ही उत्तम है। जिनसे यह कुछ न बन पड़े वे ब्रह्मचर्य पालन का नियम अवश्य रखें।
मथुरा पधारिये:− जो लोग विशद् गायत्री महायज्ञ में शामिल हैं वे अपनी भागीदारी का शताँश हवन करके इसी पुनीत पर्व पर मथुरा आवें तो बहुत उत्तम है। नवरात्रि में यहाँ रह कर एक 24 हजार का अनुष्ठान और हवन करना अनेक गुना महत्वपूर्ण है। जिन्हें अवकाश एवं सुविधा हो वे घर पर साधना करने की अपेक्षा मथुरा आने का प्रयत्न करें। जिनकी गोदी में बहुत छोटे बच्चे न हों वे स्त्रियाँ भी आ सकती हैं। गत नवरात्रि की भाँति इस चैत्र की नवरात्रि में भी 4 दिन निकटवर्ती तीर्थों की सामूहिक यात्रा का कार्यक्रम रखा जायगा। मथुरा, वृन्दावन, गोकुल, महावन, दाऊजी, नन्दगाँव, बरसाना, गोवर्धन, राधाकुण्ड, जतीपुरा आदि दर्शनीय स्थानों को सुविधा पूर्वक दिखाने की व्यवस्था कर दी जाती है और एक साथ मोटर किराये कर लेने पर 5) से भी कम भाड़ा इन सब स्थानों का पड़ता है। देश के कौने कौने से आने वाले उपासकों के अनुभव सुनने, इस विद्या के ज्ञाता विशेषज्ञों का सत्संग करने एवं महत्व पूर्ण शिक्षा दीक्षा ग्रहण करके शंका समाधान एवं यज्ञोपवीत लेने आदि की दृष्टि से भी नवरात्रि में मथुरा आना बड़ा उपयोगी रहता है। जो आ सकते हों वे अभी से आने की तैयारी करें। तपोभूमि में ठहरने की तथा सात्विक भोजन की समुचित व्यवस्था रहती है। परन्तु आने से पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर लेना आवश्यक है। बिना स्वीकृति के आये हुए व्यक्ति यों के लिए किसी प्रकार की जिम्मेदारी हमारी न होगी।
जो लोग मथुरा न आ सकें वे अपन घर ही अनुष्ठान करें। 24 हजार अनुष्ठान के लिए 240 आहुतियों का हवन आवश्यक है। बिना हवन का अनुष्ठान अधूरा रहता है। जो मथुरा आकर हवन न कर सकें उनकी सूचना आने पर यहाँ विशद् गायत्री महायज्ञ में उनकी ओर से आहुति दी जा सकती हैं। हवन में एक पैसा प्रति आहुति के हिसाब से खर्च पड़ता है। अनुष्ठान करने वाले यदि पूर्व सूचना भेज देंगे तो उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा संरक्षण यहाँ पर किया जाता रहेगा।
नवरात्रि का समय आध्यात्मिक दृष्टि से बड़ा ही अमूल्य है इस समय का सदुपयोग करने में विज्ञ सज्जनों को पीछे नहीं रहना चाहिए। जिन के मन में गायत्री उपासना में स्थिर निष्ठा न हो वे केवल परीक्षा के रूप में भी साधना करके देखें तो उन्हें निश्चित रूप से आगे बढ़ने का प्रोत्साहन मिलेगा। जितना समय इस साधन में लगा है उसकी अपेक्षा कहीं अधिक मूल्य का सत्परिणाम उपलब्ध होने की पूरी आशा की जा सकती है।
जिन्हें पूरा गायत्री मन्त्र याद न हो या समय की कमी हो वे पञ्चाक्षरी गायत्री (ॐ भूर्भुवः स्वः) का 24 हजार अनुष्ठान कर सकते हैं। इसकी 26 मालाएँ प्रायः एक घण्टे में हो जाती हैं। प्रतिदिन 12 पाठ के हिसाब से 9 दिन में 108 गायत्री चालीसा का अनुष्ठान भी हो सकता है।
इस वर्ष गायत्री उपासना से दुहरा लाभ है। साधारण रीति से नवरात्रियों अथवा अन्य समयों में साधना प्रायः सभी श्रद्धालु उपासक करते हैं पर इस बार वह साधना विशद् गायत्री महायज्ञ की भागीदारी में जुड़ जाने से दुहरा लाभ उत्पन्न करती है। यों विशद् गायत्री महायज्ञ में गायत्री परिवार के सभी सदस्य उत्साह पूर्वक भाग ले रहे हैं पर जिन्हें सुविधा एवं अवकाश की कमी हो वे यज्ञ काल के सवा वर्ष में आने वाली तीन नवरात्रियों में तीन अनुष्ठान करके तीन भागीदारी तो बड़ी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। जो अधिक भागीदारी न ले सकते हों उन्हें इन तीन नवरात्रियों में तीन शेयर लेने का प्रयत्न तो अवश्य ही करना चाहिए।
ब्रह्मदान की आवश्यकता:− अनुष्ठान के तीन भाग होते हैं (1) जप (2) हवन (3) दान। तीनों अंगों की पूर्ति होने से ही गायत्री उपासना पूरी मानी जाती है। प्रत्येक शुभ कार्य के अन्त में ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। ब्रह्म परायण व्यक्ति यों को अन्नदान का प्रयोग ही “ब्राह्मण भोजन” कहलाता है। आज कल न तो ऐसे ब्राह्मण ही मिलते हैं जो ब्रह्मपरायण हों, जिन्हें भोजन कराने से वस्तुतः पुण्य फल प्राप्त हो। दूसरे अब लोगों की आर्थिक स्थिति भी दिन दिन दुर्बल होती जा रही है इसलिए जिन कार्यों में खर्च का प्रसंग आता है उनमें अभिरुचि का घटना स्वाभाविक ही है। इसलिये ब्रह्मभोज का एक बहुत ही सरल, साथ ही अत्यंत महत्वपूर्ण तरीका यह है कि जितने ब्राह्मण भोजन कराने हों उतने “गायत्री अंक” अपने आस पास के सत्पुरुषों को−अपने स्वजन सम्बन्धियों को−भेंट कर देने चाहिए। यह यज्ञ का सर्वश्रेष्ठ प्रसाद वितरण है। गायत्री अंक का मूल्य असली लागत से भी बहुत कम केवल दो आना मात्र रखा गया है।
अन्नदान से किसी की केवल कुछ घण्टों तक पेट की भूख ही बुझ सकती है पर इस ज्ञानदान से यदि किसी की आत्मा पर कुछ प्रभाव पड़ गया तो उसका कल्याण ही हो सकता है। उस कल्याण के पुण्य में इस ज्ञानदान का कर्ता भी भागीदार होगा। इसीलिए अन्नदान से ब्रह्मदान का पुण्य शास्त्रकारों ने सौगुना अधिक बताया है। जो सज्जन नवरात्रि में कुछ साधना करें वे ब्रह्मभोज के रूप में कुछ “गायत्री अंक” अवश्य दान करें। जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत बुरी नहीं है वे 5) मूल्य के 40 अंक मँगा लें। जिन्हें इतना खर्च कठिन प्रतीत होता हो वे कम से कम 10 अंक तो अवश्य ही मँगा लें। सवा रुपये में दस ब्राह्मणों को भोजन कराने का श्रेय प्राप्त करना कुछ बहुत बड़ा बोझ नहीं है। इसे हर कोई बड़ी आसानी से कर सकता है। विशद् गायत्री यज्ञ के भागीदारों का जप हवन तो होता ही है उनका ब्राह्मण भोजन यह “गायत्री अंक” का दान ही है। 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन का शताँश सवालाख ब्रह्मभोज भी इस गायत्री अंक द्वारा ही होगा सो प्रत्येक भागीदार को प्रत्येक अनुष्ठान पीछे 24 नहीं तो थोड़े बहुत अंक ब्रह्मभोज की दृष्टि से मँगाने ही चाहिए।
हवन और ब्रह्मभोज में कुछ धन व्यय होने की कठिनाई देखकर किसी को भी नवरात्रि के पुण्य पर्व पर साधना से वञ्चित रहने की आवश्यकता नहीं है। बिना कुछ भेजे भी सूचना मिलने पर हवन यहाँ कर दिया जा सकता है। इसी प्रकार जितने अंकों की आवश्यकता हो पत्र भेजते ही उतने गायत्री अंक भेजे जा सकते हैं। इनका पैसा फिर कभी जब सुविधा हो तब भेजा जा सकता है। महायज्ञ की भागीदारी के लिए इन नवरात्रियों में साधना करना अतीव श्रेयष्कर है। यह अलभ्य अवसर है इस लाभ से वञ्चित रहना उचित नहीं। इसलिए न करने की अपेक्षा हवन तथा ब्रह्मदान के लिए कुछ उधार कर लेना भी बुरा नहीं है।
संस्कृति शिक्षा का आरम्भः−सुसंस्कृत समाज की स्थापना के लिए वेदोक्त विधि से संस्कार डालने की आवश्यकता होती है। प्राचीन काल में जब ठीक प्रकार संस्कार किये जाते थे। तब घर घर में सुसंस्कृत मनुष्य होते थे। आज इन संस्कारों की विधि व्यवस्था के अभाव में घर घर कुसंस्कारी स्त्री पुरुष भरे हुए हैं। अपने देश और जाति को ऊँचा उठाने के लिए हमें ऋषि प्रणीत संस्कार पद्धति का प्रयोग करना होगा। तभी हम अपने घरों में सुसंस्कृत व्यक्ति देख सकेंगे और तभी सच्ची भारतीय संस्कृति के दर्शन हो सकेंगे। शास्त्रोक्त विधि से विवाह यज्ञोपवीत आदि षोडश संस्कार करने वाले, उन संस्कारों में प्रयोग हुए मन्त्रों एवं विधानों का रहस्य समझाने वाले ऐसे निस्वार्थ पण्डितों की आजकल बड़ी कमी है, जो दक्षिणा की प्रधानता न देकर यजमान के हित का ध्यान रखें और जो कुछ मिल जाय उसी में सन्तुष्ट होकर यजमान के परिवार को सुसंस्कृत बनाना अपना कर्त्तव्य समझे। यों पण्डित लोग विवाह आदि संस्कार कराते हैं पर उसमें शास्त्रीय पूर्णता न होने के कारण वह प्रभाव नहीं पड़ता जो पड़ना चाहिए।
इस कमी को पूरा करने के लिए गायत्री तपोभूमि में कर्मकाण्ड की शास्त्रोक्त शिक्षा देने की व्यवस्था की गई है। जन्म से लेकर मृत्यु के अंत्येष्टि संस्कार तक के पूरे विधान तथा रहस्य सिखाने की व्यवस्था की गई है साथ ही अनेक प्रकार के यज्ञों की पद्धतियाँ, महामृत्युञ्जय, निर्वाण गायत्री आदि मन्त्रों के पुरश्चरणों के गुप्त विधान भी सिखाये जावेंगे। जिन्हें सीख कर कोई व्यक्ति अपना और दूसरों का बहुत हित साधन कर सकता है।
इस शिक्षा में 18 वर्ष से अधिक आयु के, कुछ संस्कृत जानने वाले, स्वस्थ, निर्व्यसनी, अनुशासन में रहने वाले सद्गुणी शिक्षार्थी ही लिए जावेंगे। जो छात्र अपना भोजन भार स्वयं न उठा सकेंगे उनके भोजन की व्यवस्था भी यहाँ कर दी जावेगी। शिक्षा काल एक वर्ष होगा। शिक्षा अगले मास से आरम्भ हो जावेगी। जो आना चाहें वे अपना पूरा परिचय भेजकर स्वीकृति प्राप्त करें और तब आवें। अखण्ड ज्योति के पाठकों का कर्त्तव्य है कि वे अपने समीप इस प्रकार की अभिरुचि के जो छात्र देखें उन्हें मथुरा पढ़ने आने के लिए प्रेरणा करें।
विशद् गायत्री महायज्ञ गत बसंतपंचमी से बहुत ही सुव्यवस्थित रीति से, शास्त्रोक्त विधि व्यवस्था के अनुसार आरम्भ हो गया है, देश के सुदूर प्राँतों से अनेक गायत्री उपासक आ आकर इसमें भाग ले रहे हैं साधना तपस्या, यज्ञ, सत्संग आदि के पुण्य आयोजनों के कारण आजकल गायत्री तपोभूमि में प्राचीन काल के ऋषि आश्रमों के स्वर्गीय दृश्य दृष्टिगोचर रहते हैं। सब कार्य अपने ढंग से बहुत शान्ति और व्यवस्था पूर्वक चल रहा है। परन्तु एक ही कमी यहाँ सबको खटकती रहती है वह है महायज्ञ की सुरक्षा−संरक्षण व्यवस्था की कमजोरी।
यज्ञों से सतोगुणी एवं दैवी तत्वों की शक्ति बढ़ती है और असुरता नष्ट होती है। आसुरी तत्व सदा यह प्रयत्न कहते हैं कि वे स्वयं तो बढ़ें और देव तत्व परास्त हों। इसलिए अपनी आत्म रक्षा एवं वृद्धि के लिए असुर सदा ही यज्ञों में नाना प्रकार के विघ्न उपस्थित करते हैं। प्राचीन काल में ऐसे अनेक वृत्तान्त मिलते हैं। जब असुरों ने ऋषियों की केवल इसीलिए हत्याएँ कीं कि वे यज्ञ करते थे। रामायण में वर्णन है कि रामचन्द्रजी जब वनवास में थे तो उन्होंने असुरों द्वारा मारे हुए ऋषियों की हड्डियों के पहाड़ से जमा देखे जिससे उन्हें बड़ा दुख हुआ। ऋषियों को वास देने, मारने और नाना प्रकार के विघ्न उत्पन्न करने का प्रयत्न असुर लोग इसीलिए करते हैं कि यज्ञादि द्वारा देवताओं की वृद्धि और उनकी जो हानि होती है वह न हो। इन उपद्रवों और आक्रमणों से यज्ञ की रक्षा के लिये ‘दृढ़ पुरुषों’ एवं संरक्षकों की नियुक्ति का शास्त्रों में सविस्तार उल्लेख है। विश्वामित्र सरीखे महान् ऋषि तक इन असुरों के विघ्नों से घबरा गये थे और उन्हें यज्ञ संरक्षण के लिए दशरथ के पुत्र माँग कर लाने पड़े थे।
प्राचीन काल में राजा लोग यज्ञों की रक्षा के लिए नाना अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित सेना नियुक्त करते थे। पर अब वैसी व्यवस्था नहीं है। हमने गायत्री उपासकों एवं धर्म परायण आत्माओं की तपश्चर्या और साधना को ही संरक्षक शक्ति वरण किया है। यज्ञ की रक्षार्थ गायत्री मन्त्र की एक एक माला सत्पुरुषों द्वारा किया जाना ही वह आध्यात्मिक तलवारें हैं, जिनसे आसुरी आक्रमणों एवं विघ्नों का निवारण होने की सम्भावना है। विशद् गायत्री महायज्ञ इस युग का असाधारण यज्ञ है। इतना बड़ा संकल्पित आयोजन चिरकाल से नहीं हुआ। 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन, चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र का पारायण यज्ञ, रुद्रयज्ञ, विष्णु यज्ञ, शतचण्डी यज्ञ, महामृत्युञ्जय यज्ञ, गणपति यज्ञ, सरस्वती यज्ञ, अग्निष्टोम, ज्योतिष्टोम आदि अनेक यज्ञों की शृंखला चलाने का आयोजन इस युग का भूतपूर्व संकल्प है। इसके परिणाम भी असाधारण ही होने वाले हैं। इसे सफल न होने देने के लिए असुरता जो कुछ कर सकती होगी उसे करने में किसी प्रकार की कमी न रहने देगी। क्योंकि यह उनकी जीवन रक्षा का प्रश्न है। यज्ञ द्वारा दैवी तत्वों के बढ़ने से असुरता स्वयमेव घटेगी और नष्ट होगी। अपनी हानि और दुर्दशा कोई भी नहीं चाहता फिर असुरता ही क्यों चाहेगी? “मरता सो क्या न करता” वाली कहावत के अनुसार वह जो कुछ भी कर सकती होगी उसे करने में किसी प्रकार की कमी न रहने देगी।
विशद् गायत्री महायज्ञ का संकल्प जिस दिन से हुआ है उसी दिन से एक के बाद एक अनेक प्रकार के आक्रमण हमारे ऊपर हो रहे हैं। कई आक्रमण तो इतने प्रबल हुए हैं कि कोई दूसरा होता तो अब तक विचलित हो गया होता। उनकी विस्तृत चर्चा करके अपने आत्मीय जनों की चिन्ता एवं खिन्नता को नहीं बढ़ाना चाहते पर इतना निश्चित है कि यदि यह प्रहार इसी प्रकार होते रहे तो यज्ञ संचालकों का प्राण भी जा सकता है। इस प्रकार के आक्रमणों से जब विश्वामित्र जैसे ऋषि घबराते थे तो हमारा विचलित हो जाना कुछ भी असंभव नहीं है। कार्य आरम्भ कर दिया है। जिसकी शक्ति प्रेरणा से यह कार्य प्रारम्भ हुआ है उनकी कृपा दृष्टि से नाव पार लगेगी। पर शास्त्रीय व्यवस्था के अनुसार नियत कर्म भी तो करना ही होगा। यज्ञ के अनेक विधि विधानों की भाँति “यज्ञ रक्षार्थ समुचित संरक्षण व्यवस्था करना” भी एक शास्त्रोक्त विधान है। जिस प्रकार अन्य विधि विधानों में त्रुटि रहने से हानि होती है उसी प्रकार यज्ञ संरक्षण की विधि व्यवस्था का न होना भी हानिकारक सिद्ध हो सकता है।
हम संरक्षण के लिए किसके पास जावें? हमारे स्वजन, प्रेमी और कृपालु धर्म−प्रेमी महानुभाव ही हमसे, हमारे आयोजनों से ममता और आत्मीयता रखते हैं। उन्हीं से यह आशा की जा सकती है कि वे जहाँ यज्ञ में भागीदार बनकर आत्म−कल्याण का पुण्य लाभ कर रहे हैं वहाँ आसुरी आक्रमणों से यज्ञ की असफलता एवं यज्ञ−संचालकों के अनिष्ट की संभावना को बचाने के लिए संरक्षण की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेने से भी पीछे न हटेंगे। अब तक की सूचनाओं के अनुसार यज्ञ−संरक्षण के लिए जितनी व्यवस्था की आवश्यकता है, उससे आधा ही प्रबन्ध हो सका है। इस कमी की पूर्ति जितनी जल्दी हो सके, उतना ही अच्छा है। आवश्यकता के समय कार्य की पूर्ति न होने पर पश्चाताप ही हाथ रह जाता है। इसलिए धर्मात्माओं से ही यह प्रार्थना करनी पड़ती है कि इस संरक्षण−व्यवस्था को पूर्ण करने के लिए पूरी तत्परता के साथ लग जायें। संरक्षकों के निम्न कर्त्तव्य रखे गये हैं:—
चैत्र सुदी 9 सं. 2013 तदनुसार तारीख 11 अप्रैल सन् 1956 को यह विशद् महायज्ञ पूर्ण होगा। तब तक एक माला (108 मन्त्र−गायत्री मन्त्र) प्रतिदिन अपनी नियत साधना के अतिरिक्त जप करते रहें और जप के बाद दाहिने हाथ में जल लेकर यह संकल्प करें—“यह जप विशद् गायत्री महायज्ञ की रक्षा के लिए किया गया।” तदुपरान्त जल को पृथ्वी पर छोड़ दें। यह संरक्षण का दैनिक कृत्य है।
यदि किसी दिन यह संरक्षण की एक माला न हो सके तो सप्ताह में जिस दिन अधिक अवकाश हो उस दिन उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिए। ऐसा भी हो सकता है कि सप्ताह में किसी दिन सात मालाएं इकट्ठी कर ली जावें।
आप स्वयं संरक्षक रहें इतना ही पर्याप्त नहीं। वरन् अपने परिचित, समीपवर्ती, धार्मिक प्रवृत्ति के अधिकाधिक लोगों के पास जाकर या उन्हें पत्र आदि लिखकर उनसे संरक्षक बनने के लिए प्रार्थना करें। इस प्रकार जितने अधिक संरक्षक तैयार हो सकें, उनसे संरक्षण−प्रतिज्ञा−पत्र भराकर मथुरा भेज दें। जिससे यह पता चलता रहे कि कौन, कहाँ, किस प्रकार संरक्षण कर रहा है और अब तक कितनी संरक्षण−व्यवस्था हो सकी है। संरक्षकों से आशा भी की जाती है कि वे केवल अपने तक ही संरक्षण भार लेकर शान्त न हो जावें, वरन् और भी नये संरक्षक बढ़ाने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करें साथ ही यह भी देखते रहें कि बनाये हुए संरक्षक अपनी प्रतिज्ञा ठीक प्रकार पूरी करते हैं या नहीं। जो सज्जन इस समय संरक्षण कर रहे हैं, उनसे भी संरक्षण−फार्म भरकर भेज देने की प्रार्थना है।
हम लोग यहाँ महायज्ञ योजना में अधिक कार्य−व्यस्त रहने के कारण संभवतः अपनी ओर से यहाँ के कुछ समाचार न लिख सकें, इसलिए संरक्षकों का कर्तव्य है कि कभी−कभी यहाँ की खोज खबर लेने के लिए पूछताछ करते रहें और महायज्ञ के कार्य−कर्त्ताओं को प्रोत्साहन तथा आशीर्वाद देते रहें।
संरक्षण−प्रतिज्ञा−पत्र साथ में संलग्न है। अधिक की आवश्यकता होने पर मथुरा से मँगालें या सादे कागज पर हाथ से नकल करके ऐसे ही अनेक फार्म स्वयं तैयार करके उनका उपयोग किया जा सकता है।
स्मरण रखिए यह विशद् गायत्री महायज्ञ इस युग का असाधारण यज्ञ है। इसका संरक्षण करने का पुण्य लेना भी असाधारण महत्व का कार्य है। यह पुनीत कार्य आपके करने ही योग्य है। ऐसे आयोजन बार बार नहीं होते किन्हीं विरले ही भाग्यवानों को ऐसे अवसर मिलते हैं। (1) आत्म−कल्याण, (2) महायज्ञ की सफलता तथा (3) यज्ञ−संचालकों की प्राण−रक्षा के पुण्य लाभों को प्राप्त करना, निश्चित रूप से एक सत्यपरिणामदायिनी दूरदर्शिता है।
गायत्री तपोभूमि मथुरा में आयोजित विशद् गायत्री महायज्ञ का महत्व मैंने भली प्रकार समझ लिया है। इतने बड़े भूतपूर्व आयोजन का परिणाम असाधारण ही होगा यह निश्चित है। देवत्व के विकास एवं असुरत्व के विनाश का कार्य ऐसे यज्ञों द्वारा बहुत बड़े परिमाण में होता है। इसलिए उन्हें नष्ट और असफल करने के लिए असुरता जो कुछ प्रहार और आक्रमण कर सकती है सो अवश्य करती है। शास्त्रों में असुरता से यज्ञ की रक्षा के लिए संरक्षण व्यवस्था को आवश्यक माना है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए धर्म प्रेमियों की जो रक्षा−सेना बनाई गई है, मैं उसमें सम्मिलित होना स्वीकार करता हूँ।
मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि चैत्र सुदी 9 सं. 2013 तक यह विशद् गायत्री महायज्ञ चलेगा तब तक मैं प्रतिदिन एक माला गायत्री मंत्र की जपता रहूँगा। किसी दिन छूट हुई तो उसकी पूर्ति आगे चलकर कर लिया करूंगा। महायज्ञ की खोज खबर लेता रहूँगा। यज्ञ रक्षा व्यवस्था अभी बहुत दुर्बल है इसलिए नये संरक्षक बनाने का भी शक्ति भर प्रयत्न करूंगा।
तिथि.......................हस्ताक्षर.......................
पूरा नाम....................................................
पूरा पता....................................................
...............................................................
आयु................... वर्ण..................................
गायत्री तपोभूमि मथुरा में आयोजित विशद् गायत्री महायज्ञ का महत्व मैंने भली प्रकार समझ लिया है। इतने बड़े अभूतपूर्व आयोजन का परिणाम असाधारण ही होगा यह निश्चित है। देवत्व के विकास एवं असुरत्व के विनाश का कार्य ऐसे यज्ञों द्वारा बहुत बड़े परिमाण में होता है। इसलिए उन्हें नष्ट और असफल करने के लिए असुरता जो कुछ प्रहार और आक्रमण कर सकती है सो अवश्य करती है शास्त्रों में असुरता से यज्ञ की रक्षा के लिए संरक्षण व्यवस्था को आवश्यक माना है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए धर्म प्रेमियों की जो रक्षा−सेना बनाई गई है, मैं उसमें सम्मिलित होना स्वीकार करता हूँ।
मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि चैत्र सुदी 9 सं. 2013 तक यह विशद् गायत्री महायज्ञ चलेगा तब तक मैं प्रतिदिन एक माला गायत्री मंत्र की जपता रहूँगा। किसी दिन छूट हुई तो उसकी पूर्ति आगे चलकर कर लिया करूंगा। महायज्ञ की खोज खबर लेता रहूँगा। यह रक्षा व्यवस्था अभी बहुत दुर्बल है इसलिए नये संरक्षक बनाने का भी शक्ति भर प्रयत्न करूंगा।
तिथि.......................हस्ताक्षर.......................
पूरा नाम....................................................
पूरा पता....................................................
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आयु................... वर्ण..................................
खोज में हुआ वृथा हैरान, यहां ही था तू हे भगवान।
जोगी बन सिर जटा बढ़ाया, द्वार द्वार जा अलख जगाया
जंगल में बहु काल बिताया, हुआ न तो भी ज्ञान।
उषा संग मन्दिर में आया, कर पूजा विधि ध्यान लगाया
अस्ताचल में हँस कर थोड़ा, सूरज ने अपना मुख मोड़ा
पर तेरा कुछ पता न पाया, हुआ दिवस अवसान।
विहंगों ने भी मुझ पर छोड़ा, व्यंग-वचन का बाण
विधु ने नभ से किया इशारा, अधोदृष्टि करके ध्रुवतारा
तेरा विश्व रूप रस सारा, करता था नित पान हुआ
प्रकाश तपोमय जग में, मिला मुझे तू तत्क्षण मगमें
तेरा हुआ बोध पग पग में, खुला रहस्य महान।।
दीन हीन के अश्रु नीर में, पतितों का परिताप पीर में
सन्ध्या की चंचल समीर में, करता था तू गान।
सरल स्वभाव कृषक के हल में, पतिव्रता रमणी के बल में
श्रम सीकर से सिंचित धन में, संशय शून्य भिक्षु के मन में
कवि के चिन्तापूर्ण वचन में, तेरा मिला प्रमाण।
वाद-विहीन उदार धर्म में,
समतापूर्ण ममत्व मर्म में युवकों के मधुमय विकास में,
शिशु के स्वप्नोत्पन्न हास में वन्य कुसुम के शुचि सुवास में,
था तब क्रीड़ा स्थान देखा मैंने—यही मुक्ति थी,
यहीं भोग था–यही भुक्ति थी
घर में ही सब योग-युक्ति थी, घर ही था निर्वाण।।
*समाप्त*