धैर्यवान्—वह है जो सुख, दुख, धन क्षीणता और वृद्धि में सामान्य रहता है।
विचारवान—वह है जो अपने अवगुणों और दूसरे के गुणों को याद रखता है और कोई वचन बिना समझे मुख से नहीं निकालता।
ज्ञानी—वह है जिसके मन में संसार के सुख, दुख से विकार उत्पन्न नहीं होता तथा जो सत् असत् का ज्ञाता हो।
बलवान्—वह है जो इन्द्रियों के प्रबल वेग को रोके।
रूपवान—वह है जो विद्या, नम्रता, लज्जा, सत्य, शीलता और धर्म के सद्गुणों से अलंकृत हो।
बुद्धिमान्—वह है जो समय का रंग देखकर काम करे।
(श्री दीप्ति)
मैंने केवल इतना जाना!
फूल मानते शूलों को जो मार्ग बना काटों में लेते। गति, लक्ष्य मान जो मस्त सदा, वे लक्ष्य सहज ही पा लेते॥ अक्षय विभूति बनती जगकी, पग−धूलि उन्हीं चरणों की प्रिय। जिनका चलना ही इष्ट रहा, जाना, केवल बढ़ते जाना॥ मैंने केवल इतना जाना!
अभिशाप जिन्हें वरदान सदा वरदानों के अधिकारी वे। हलाहल कटु जिनको अमृत अमरत्व सहज पा लेते वे॥ भू−भाल झुका करता सदैव उस अटल व्रती के सम्मुख ही। जिसके व्रत सीख न पाते, प्रिय सिखलाने पर भी नत होना॥ मैंने केवल इतना जाना!
तुम मान रहे गन्तव्य दूर मैं कहती प्रतिपग लक्ष्य यहाँ। भ्रममात्र भूत−भावी साथी बस वर्तमान ही सत्य यहाँ॥ मिटकर बनते, खोकर पाते मैंने केवल इतना जाना। प्रिय, राह स्वयं ही थक जाती, यदि पथिक सुला दे थक जाना॥ मैंने केवल इतना जाना!
(श्री प्रीतम देवी महेन्द्र)
गर्मियों में पूर्ण स्वस्थ रहना सतर्कता, संयम एवं सुनिश्चित दिनचर्या पर निर्भर है। जहाँ सर्दी मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है, वहाँ गर्मी में मनुष्य की प्राणशक्ति का ह्रास होता है, भूख कम लगती है, पाचनक्रिया मंद पड़ जाती है, प्यास अधिक लगती है और कार्य करने को मन नहीं करता। गर्म मुल्कों के निवासी आलसी होते हैं। इसी प्रकार गर्मी आलस्य उत्पन्न करती हैं। इसी प्रकार गर्मी आलस्य उत्पन्न करती है। पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति यों को भी अपना स्वास्थ्य और कार्यशक्ति बनाये रखने के लिए विशेष प्रयत्न करना चाहिये। यह मौसम बीमारियों को निमंत्रण देने वाला है।
अपनी दिनचर्या निश्चित कर लीजिए। किस समय आपको शय्या त्याग करनी है? किस तथा कितने समय तक विश्राम, दैनिक कार्य, मनोरंजन, स्नान करना है? मित्रों से मिलने जाने का क्या समय है? प्रायः देखा जाता है कि सुनिश्चित योजना बनाकर चलने वाले व्यक्ति गर्मियों में भी उतना ही कार्य कर लेते हैं, जितना सर्दियों में कर पाते हैं।
कार्यशक्ति का भण्डार शक्ति है। शक्ति आपके भोजन, पाचन तथा रक्त की शुद्धता पर निर्भर है। गर्मी का प्रभाव पेट पर सीधा पड़ता है। भूख कम हो जाती है, प्यास अधिक प्रतीत होती है। अतः यह ध्यान रखिये कि पाचन−यंत्र कैसा कार्य कर रहा है? आप निरन्तर आठ−आठ घण्टे परिश्रम पर तो चिपके नहीं रहते? कहीं आप मिठाई, पकवान, पूड़ियां, चाट−पकौड़ी के कुचक्र में तो नहीं पड़ गये हैं? आँतों में विकार गरिष्ठ भोजन तथा अधिक खाने से उत्पन्न होता है।
अग्रह्य और असंतुलित भोजन, चाय, सिगरेट, पान इत्यादि, कब्ज उत्पन्न करते हैं। अधिक मिर्च−मसालों, चाय, तम्बाकू तथा बाजार के बने सुस्वादु पदार्थों से पाचन−क्रिया ठीक नहीं हो पाती। खट्टी डकारें, भारी तबियत, सिर दर्द, अपच, आलस्य, हैजा इत्यादि का कारण गलत आहार है। अतः गर्मियों में अपने भोजन के विषय में सावधान रहें। हलका, गर्म भोजन, चपाती, दाल, फल, हरी सब्जी, सलाद इत्यादि लिया करें। तम्बाकू, चाय, मिर्च−मसाले, बाजार की मिठाइयाँ, गले−सड़े फल, बासी भोजन, माँस इत्यादि राजसी आहार त्याग दें। सब्जियों तथा फलों का खूब प्रयोग करें।
गर्मी में जल का बड़ा महत्व है। अधिक गर्मी के कारण शरीर को अपेक्षाकृत अधिक मात्रा से जल की आवश्यकता होती है। कुछ तो जल गुर्दों के द्वारा तथा कुछ पसीने के रूप में बाहर निकल जाता है। जो व्यक्ति गर्मी में कम जल का प्रयोग करते हैं, उन्हें कब्ज की शिकायत रहती है। सारहीन मल पदार्थ बृहद् आँत को अपना कार्य सुचारु−रूप से संचालन करने के लिये यथेष्ट जल नहीं मिल पाता। अतः पर्याप्त जल लिया करें। शौच जाने से पूर्व एक गिलास शीतल पीने से कोष्ठबद्धता दूर होती है। यदि कब्ज जीर्ण हो गया हो, तो गुनगुने जल में एनीमा लेना उत्तम है। रक्त को स्वस्थ सक्रिय और नियन्त्रित रखने के लिए दिन में ढाई सेर से साढ़े तीन सेर तक जल प्रत्येक मनुष्य को पीना चाहिए।
गर्मी का त्वचा के ऊपर बुरा प्रभाव पड़ता है। खुश्क हवा गर्मी के कारण त्वचा की स्वाभाविक स्निग्धता और चमक विलुप्त हो जाती है और हाथ, मुँह, होंठ इत्यादि सूख जाते हैं। रंग काला पड़ जाता है। फोड़ा−फुन्सी त्वचा को सौंदर्य नष्ट कर देते हैं। पसीना न पोंछने के कारण त्वचा के छिद्र बन्द हो जाते हैं। अतः पानी पर्याप्त पिएँ। छाछ, दही, मक्खन, दूध का खूब प्रयोग करें, तो त्वचा की चिकनाहट एवं रंग निखर आता है। रात्रि में मुँह धोकर मक्खन, कोल्ड क्रीम या वैसलीन चुपड़ लेने से लाभ होता है। माथे या गर्दन पर यदि बारीक लाल−लाल दाने निकल आयें, तो कब्ज का इलाज करें और सफेद चन्दन घिस कर इन पर मला करें।
गर्मियों में स्नान का बड़ा महत्व है। थोड़ी−सी कसरत कर स्नान करें। नदी या ताल में तैरकर स्नान करने से व्यायाम और मनोरंजन दोनों ही प्राप्त हो जाते हैं। स्नान के पश्चात् खुरदरे तौलिये से शरीर को रगड़ने से शारीरिक शक्ति और नव−स्फूर्ति प्राप्त होती है। त्वचा के रन्ध्र साफ हो जाते हैं। स्नान के लिये प्रातः या साँय का समय उत्तम माना गया है। भोजन के बाद तुरन्त स्नान न करें।
वह समय जब ब्रह्म−मुहूर्त होता है, प्राणशक्ति प्रदान करने वाला है। अतः सुबह चार−पाँच बजे टहलने, कसरत करने या भागने दौड़ने के लिए रखिए। सायंकाल भी टहलकर आप अपनी शक्ति सौंदर्य बनाये रख सकते हैं। संसार के प्रायः सभी दीर्घजीवी मनुष्य तपस्वी सूर्योदय से पूर्व उठकर घूमने−फिरने के आदी रहे हैं। भैषज्य−सार में लिखा है—”ब्रह्म−मुहूर्त में उठने वाला सौंदर्य, लक्ष्मी, स्वास्थ्य, आयु आदि वस्तुओं को प्राप्त करता है। शरीर कमल−सा सुन्दर हो जाता है।”
(श्री प्रो. लालजीराम शुक्ल)
हमारे मन में दो प्रकार के विचार आते हैं−एक उद्वेग युक्त और दूसरे शान्त। भय, क्रोध, शोक, लोभ आदि मनोवेगों से पूरित विचार उद्वेग युक्त विचार हैं और जिनके विचारों में मानसिक उद्वेगों का अभाव रहता है उन्हें शान्त विचार कहा जाता है। हम साधारणतः विचारों के बल को उससे सम्बन्धित उद्वेगों से ही नापते हैं। जब हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति अवश्य ही कुछ कर दिखावेगा। पर क्रोधातुर व्यक्ति से उतना अधिक डरने का कारण नहीं जितना कि शान्त मन के व्यक्ति से डरने का कारण है। भावावेश में आने वाले व्यक्ति यों के निश्चय सदा डावाँडोल रहते हैं। भावों पर विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति के निश्चय स्थिर रहते हैं। वह जिस काम में लग जाता है उसे पूर्ण करके दिखाता है।
उद्वेग पूर्ण विचार वैयक्तिक होते हैं उनकी मानसिक शक्ति वैयक्तिक होती है, शाँत विचार बृहद् मन के विचार हैं, उनकी शक्ति अपरिमित होती है। मनुष्य जो निश्चय शान्त मन से करता है उसमें परमात्मा का बल रहता है और उसमें अपने आपको फलित होने की शक्ति होती है। अतएव जब कोई व्यक्ति अपने अथवा दूसरे व्यक्ति के कल्याण के लिये कोई निश्चय करता है और अपने निश्चय में अविश्वास नहीं करता तो वह निश्चय अवश्य फलित होता है। शान्त विचार सृजनात्मक और उद्वेगपूर्ण विचार प्रायः विनाशकारी होते हैं। किसी भी प्रकार के विचार में अपने आपको फलित करने की शक्ति होती है। पर यह शक्ति सन्देह के कारण नष्ट हो जाती है। जिन विचारों को हेतु वैयक्तिक होता है उनमें अनेक प्रकार के सन्देह उत्पन्न होते हैं। अतएव उनके विचार की शक्ति नष्ट हो जाती है। जब कोई मनुष्य अपने विचारों में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं लाता तो विचार स्वतः ही फलित हो जाते हैं। सन्देहों को रोकने के लिये अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास होना आवश्यक है।
अपने आपकी ही अनुकूलता ईश्वर और प्रकृति की अनुकूलता के विश्वास के रूप में मनुष्य की भावना के समक्ष आती हैं। ये भावनायें अचेतन मन की अनुभूति के प्रतिभास मात्र हैं। मनुष्य अपनी आन्तरिक अनुभूति के अनुसार अनेक प्रकार की कल्पनाओं को रचता है। इन कल्पनाओं की वास्तविकता उसकी अज्ञात वास्तविक प्रेरणा पर निर्भर करती है। कल्पनायें वैसी ही होती हैं जैसी की आन्तरिक प्रेरणा होती है। मनुष्य की कल्पनायें ही उसे आशावादी ओर निराशावादी बनाती है अर्थात् मन का जैसा रुख होता है उसी प्रकार की कल्पनायें मन करने लगता है। ईश्वरवादी विश्वास में लगता है कि ईश्वर उसे आगे ले जा रहा है और जड़वादी विश्वास करने लगता है कि प्रकृति उसे आगे ले जा रही है। प्रगति और अप्रगति के सभी प्रमाण मनुष्य के रुख पर निर्भर करते हैं।
गम्भीर परिस्थितियों में मन का शाँत रहना इस बात का प्रतीक है कि व्यक्ति को किसी भारी शक्ति का सहारा मिल गया है। शान्त मन रहने से प्रतिकूल परिस्थितियाँ थोड़े ही काल में अनुकूल परिस्थितियों में परिणत हो जाती हैं। शाँत विचारों की शक्ति का दूसरे लोगों के मन पर स्थायी प्रभाव पड़ता है। वास्तव में हमारी ही शक्ति दूसरे की शक्ति के रूप में प्रकाशित होती है। यदि किसी व्यक्ति का निश्चय इतना दृढ़ हो कि चाहे जो परिस्थितियाँ आवें उसका निश्चय नहीं बदलेगा तो वह अवश्य ही दूसरे व्यक्ति यों के विचारों को प्रभावित करने में समर्थ होगा। जितनी ही किसी व्यक्ति की मानसिक दृढ़ता होती है उसके विचार उतने ही शान्त होते हैं। और उसकी दूसरों को प्रभावित करने की शक्ति उतनी ही प्रबल होती है। शान्त विचारों का दूसरों पर और वातावरण पर प्रभाव धीरे−धीरे होता है। उद्वेगपूर्ण विचारों का प्रभाव तुरन्त होता है। हम तुरन्त होने वाले प्रभाव से विस्मित होकर यह सोच बैठते हैं कि शान्त विचार कुछ नहीं करते और उद्वेग पूर्ण विचार ही सब कुछ करते हैं। पर जिस प्रकार किसी बीज को वृक्ष रूप में परिणत होने के लिए शान्त शक्तियों को काम करने की आवश्यकता होती है, इसी प्रकार किसी विचार को फलित होने के लिये शान्त होने की आवश्यकता होती है और दूसरा कार्य दृश्य जगत में होता है।
शान्त विचारों से शरीर में आश्चर्य जनक परिवर्तन हो जाते हैं। लेखक का एक मित्र 20 वर्ष का युवक हो चुका था। इस समय भी वह ऊँचा और मोटाई में एक चौदह वर्षीय बालक के समान लगता था। उसने किसी शुभचिन्तक के सुझाने पर नियमित रूप से व्यायाम करना प्रारम्भ किया। थोड़े ही दिनों में वह चार इंच बढ़ गया और उसका शरीर भी पुष्ट हो गया। उसकी समझ थी कि व्यायाम ने उसे बढ़ा दिया। इसमें कोई सन्देह नहीं कि व्यायाम से उसे लाभ हुआ, पर उससे भी अधिक लाभ उसके निश्चय से हुआ। इस निश्चय के कारण प्रतिदिन के शान्त विचार उसकी भावना को प्रबल करते गये और इस प्रकार उसके शरीर में मौलिक परिवर्तन होते गये।
हम जो कुछ सोचते हैं उसका स्थायी प्रभाव हमारे ऊपर तथा दूसरों के ऊपर पड़ता है। शान्त विचार धीरे−धीरे हमारे मन को ही बदल देते हैं। जैसी हमारे मन की बनावट होती है वैसे ही हमारे कार्य होते हैं और हमारी सफलता भी उसी प्रकार की होती है। हम अनायास ही उन कार्यों में लग जाते हैं जो हमारी प्रकृति के अनुकूल हैं, और उन कामों से डरते रहते हैं जो हमारी प्रकृति के प्रतिकूल हैं। अपने स्वभाव को बदलना हमारे हाथ में है। यह अपने शान्त विचारों के कारण बदला जा सकता है। स्वभाव के बदल जाने पर मनुष्य को किसी विशेष प्रकार का कार्य करना सरल हो जाता है।
जिस काम को मनुष्य अपने आन्तरिक मन से नहीं करना चाहता, पर दिखावे के रूप में उसे करने के लिए बाध्य होता है तो उसे अनेक प्रकार की रुकावटें उसे दर्शाती हैं कि तुम्हारा आन्तरिक मन उक्त काम के प्रतिकूल है। शान्त होकर यदि मनुष्य अपनी किसी प्रकार की भूल अथवा कार्य की विफलता पर विचार करे तो वह इसका कारण अपने आप में ही पावेगा। जो काम अनुद्विग्न मन होकर किया जाता है, उससे आत्म विश्वास रहता है और उसमें सफलता अवश्य मिलती है। शान्त मन द्वारा विचार करने से स्मृति तीक्ष्ण हो जाती है और इन्द्रियाँ स्वस्थ हो जाती हैं।
शान्त विचारों का चेतन मन नहीं होता। शान्त विचार ही आत्मनिर्देश की शक्ति हैं। इन विचारों को प्राप्त करने के लिये वैयक्तिक इच्छाओं का नियंत्रण करना पड़ता है। जिस व्यक्ति की इच्छायें जितनी ही नियंत्रित होती है, जिस मनुष्य में जितनी वैराग्य की अधिकता होती है उसके शान्त विचारों की शक्ति उतना ही अधिक प्रबल होती है। जो मनुष्य अपने भावों के वेगों को रोक लेता है वह उन वेगों की शक्ति को मानसिक शक्ति के रूप में परिणत कर लेता है। इच्छाओं की वृद्धि से इच्छा शक्ति का बल कम होता है और उसके विनाश से उसकी शक्ति बढ़ती है। इच्छाओं की वृद्धि शाँत विचारों का अन्त कर देती है। जिस मनुष्य की इच्छायें जितनी ही अधिक होती हैं उसे भय, चिन्ता, सन्देह और मोह से मनुष्य की आध्यात्मिक शक्ति का ह्रास होता है। अतएव ऐसे व्यक्ति के संकल्प फलित नहीं होते। वह जो काम हाथ में लेता है उसे पूरे मन से नहीं करता। अधूरा काम अथवा आधे मन से किया गया काम कभी सफलता नहीं लाता। आधे मन से किये गये कार्य में मनुष्य का चेतन मन तो कार्य करता है पर अचेतन मन उस की सहायता के लिये अग्रसर नहीं होता। ऐसी अवस्था में मनुष्य के शीघ्रता से थकावट आ जाती है और वह अपने कार्य को अधूरा छोड़ने के लिये बाध्य हो जाता है।
जिस प्रकार शाँत विचार मनुष्य के स्वभाव को बदल देते हैं और संपर्क में आने वाले व्यक्ति यों को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार दूर रहने वाले व्यक्ति के हृदय को भी प्रभावित करते हैं। एकान्त में हर किसी भी व्यक्ति का चिन्तन करके उसके मन से अपने मन का सम्बन्ध जोड़ सकते हैं। ऐसा करने पर हम उससे वही विचार करवा सकते हैं जो कराना चाहते हैं। किसी व्यक्ति के प्रति नित्य प्रति हमारे हृदय में आने वाले विचार उस व्यक्ति को प्रभावित करते हैं वह हमारे विषय में भी वैसा सोचने लगता है जैसे कि हम उसके विषय में सोचते हैं। जितना ही हम इस सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं कि रेडियो की लहरों की भाँति विचारों की लहरें दूर−दूर के लोगों को प्रभावित करती हैं उतना ही हम प्रत्यक्ष रूप से अपने विचारों द्वारा दूसरे लोगों को प्रभावित करने में समर्थ होते हैं। दूसरों के कल्याण के विचार जितने बली होते हैं उतने अकल्याण के विचार नहीं होते अतएव कल्याण के सभी विचारों से अवश्य लाभ होता है।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज)
हे सौम्य! हे सत्यकाम! “मैं कौन हूँ” यह मालूम कर। अपने भीतर टटोल। इस संसार व शरीर की वास्तविकता को बूझ। जैसे ही तू जाग जाता है तेरा स्वप्न झूँठा हो जाता है। इसी प्रकार जब तुझे आत्म−ज्ञान हो जायगा तब यह संसार असत्य हो जायगा—अदृश्य हो जायगा। संसार केवल मन की उपज है। इसका अस्तित्व केवल सम्बन्ध रखता हुआ, परिवर्तनशील एवं परतंत्र तथा दृष्टिविषय और निर्भर रहने वाला है। यह ब्रह्म से निकलता है, उसी में रहता है तथा अन्त में उसी में मिल जाता है।
हे सत्यकाम! तेरा प्रथम कर्त्तव्य अपनी आत्मा को पहचानना है। यह आत्मा अनन्त है तथा आत्म प्रकाश है। इस तुच्छ ‘अपनेपन’ को नष्ट कर दे और सच्चिदानन्द आत्मा से संपर्क रख। शरीर, स्त्री, सन्तान तथा धन में जो आसक्ति है उसका त्याग कर दे। इच्छाओं, स्वार्थ व ‘अपनेपन’ को तिलाँजलि दे दे तथा उस पूर्ण ज्ञान ‘निर्विकल्प समाधि’ को प्राप्त कर जिसमें न कोई विषय है न उद्देश्य, न प्रसन्नता है न दुःख, न सर्दी है न गर्मी, न भूख है न प्यास। तब तू सर्वश्रेष्ठ आनन्द, अनन्त शाँति, असीम ज्ञान तथा अमर गति का भोग करेगा।
तू अज्ञान के आवरण से कृत्रिम−निद्रा के वशीभूत है। तू आत्म−ज्ञान द्वारा कृत्रिम−निद्रा से जाग और ‘अमर गति’ जान। तू कब तक माया के फन्दे में फंसा रहना चाहता है! बहुत हो चुका अब तू इन बन्धनों को तोड़। अविद्या की जंजीर को तोड़ दे—उन पाँच पर्दों को फाड़ दे और इस हाड़−माँस के पिंजरे से विजयी होकर निकल आ। मेमने की भाँति ‘में में’ न कर, बल्कि ‘ओऽम् ओऽम् की गर्जना कर, ओऽम् ओऽम् का स्मरण कर।—स्वीकार कर, सिद्ध कर और पहचान। अपनी आत्मा को पहचान और इसी क्षण बन्धन से मुक्त हो जा। तू ही सम्राटों का सम्राट है—तू ही सर्वश्रेष्ठ है। उपनिषदों के अन्तिम शब्द ध्यान में ला! ‘तत् त्वं असि’—”तू’ ही “वह” है। मेरे प्रिय सत्य−काम! ‘उसे’ जान−’उसे’ जानना ही ‘वह’ बन जाना है।
अपने भीतर टटोल। अपने को समस्त विचारों से विमुक्त कर ले! विचार शून्य बन जा। सत्य और असत्य की पहचान कर। अनन्त और अदृश्य में भेद कर। इस बहते हुए मन को बार−बार केन्द्रित करने की चेष्टा कर। विपरीत की द्वन्द्वता से ऊपर उठ। ‘नेति नेति’ के पाठ का अध्ययन कर। धोखे के चक्रों का नाश कर दे। अपने को सर्वव्यापक आत्मा से मिला। आत्मज्ञान प्राप्त कर और उस सर्वश्रेष्ठ आनन्द का भोग कर।
धर्म की प्रथम घोषणा यही है कि आत्मा एक है। ‘एक’ ‘अनेक’ नहीं हो सकता। यह कैसे संभव है? एक अनेक के समान प्रतीत अवश्य होता है, जैसे रेगिस्तान में जल का आभास, किसी स्थिति विशेष में मनुष्य, आकाश में नीलिमा, सीप की चाँदी तथा रस्सी का साँप। इसे ‘अभ्यास’ कहते हैं। इस अभ्यास को ब्रह्म−चिन्तन अथवा ज्ञान−अभ्यास द्वारा नष्ट कर दे और ब्रह्मशक्ति द्वारा चमत्कृत हो। ब्रह्म−अवस्था को पुनः प्राप्त करने की चेष्टा करे। अपने सत्−चित आनन्द स्वरूप में रमण कर।
अज्ञान के कारण ही दुःख और क्लेश व्यापते हैं। अपनी वास्तविक प्रकृति को पहचान और अनुभव कर। वास्तव में अस्तित्व, ज्ञान और सुख सम्पूर्ण हैं। तू वास्तव में अमर है तथा सर्वव्यापक आत्मा है। उपनिषद् के इस उपदेश को स्मरण रख “जीव और ब्रह्म एक हैं”। ओऽम् के रहस्य पर विचार कर और अपने स्वरूप में स्थित हो। केवल आत्म−ज्ञान द्वारा ही अज्ञान तथा तीनों क्लेशों का नाश किया जा सकता है। आत्म−ज्ञान ही तुझे अमर गति, अनन्त सुख, चिरस्थायी शान्ति और सुख दे सकेगा।
चारों वेद एक स्वर से कहते हैं कि वास्तव में तू ही अविनाशी आत्मा अथवा अमर ब्रह्म है। शाँति तथा चतुराई से अपने ऊपर के एक−एक आवरण को तथा मन को इन्द्रिय−विषयों से हटा ले। एकान्तवास कर। इन्द्रिय विषयों को विष समझ। दूरदर्शिता एवं अनासक्ति द्वारा अपने मन को वश में कर। विवेक, वैराग्य, शत−सम्पत तथा मुमुक्षत्व को सर्वश्रेष्ठ श्रेणी तक बढ़ा। सर्वदा ध्यानस्थ रह। एक क्षण भी व्यर्थ न जाने दे।
आकाश सौम्य और सर्वव्यापक है, इसलिए ब्रह्म की उपमा आकाश से दी जाती है। प्रारम्भ में तू सौम्य ब्रह्म पर विचार सकता है। पहले आकाश पर विचार कर और फिर धीरे−धीरे ब्रह्म पर। इस प्रकार गूढ़ चिन्तन में लीन हो जा।
‘ओऽम्’ ब्रह्म का चिह्न है अर्थात् परमात्मा का चिन्ह है। ओऽम् पर विचार कर। जब तू ओऽम् का चिन्तन करेगा तब तुझे अवश्य ही ब्रह्म का ध्यान होगा क्योंकि जीवन को जैसा निर्माण करना चाहते हो उससे कुछ आगे का, उत्कृष्ट, सर्वोत्तम आदर्श अपने सम्मुख रखो और फिर सुई की तरह अपने आदर्श में गड़ जाओ।
अनेक व्यक्ति यों में अनेक प्रकार की योग्यताएँ और शक्तियाँ हैं, किन्तु उसका पूर्ण उद्भव एवं प्रकाश करने के लिए धैर्यपूर्वक काम करने की आवश्यकता होती है। जब तक मनुष्य धैर्यपूर्वक निरन्तर परिश्रम द्वारा प्रत्येक वस्तु को निरीक्षण नहीं करता तब तक वह उसके मूल तत्त्वों तक नहीं पहुँच सकता। हमारा शरीर एक बाग है और हमारी इच्छाशक्ति उसमें माली। यदि हम उसमें कुविचार के बबूल बोयेंगे तो काँटे ही उत्पन्न होंगे और यदि सुविचारों के आम बोयेंगे तो स्वादिष्ट फल प्राप्त होंगे। यदि हम अकर्मी एवं सुस्त होंगे तो उस उत्तम भूमि को खराब कर देंगे और यदि परिश्रमी होंगे तो उसमें खाद देकर उसे और उर्वरा बना लेंगे। ये सब बातें हमारी इच्छाशक्ति पर निर्भर हैं। सबसे दयनीय स्थिति तो उस व्यक्ति की है जो दूसरों के विचारों का दास है, जो दूसरों के कहे अनुसार जीवन को निकृष्ट समझता है, जिसने अपने जीवन की बागडोर दूसरों के हाथ में पकड़ा दी है और जो विचार परवशता द्वारा कठपुतली की तरह नृत्य किया करता है।
अपने विचारों को चुपचाप निरीक्षण करो! देखो दिन में कैसे−कैसे विचार तुम्हारे मस्तिष्क में चक्कर लगाते हैं, तुम्हें किस प्रकार घुमाते−फिराते हैं, हृदय में कैसी मनःस्थिति उत्पन्न करते हैं। कौन सा विचार तुम्हारी मनःशान्ति नष्ट करता है और तुम्हें क्षुब्ध बनाता है।
जब कभी तुम्हारे सामने कोई जटिल समस्या उपस्थित हो तो अपनी नीर−क्षीर−विवेक करने वाली शक्ति से प्रश्न करो। सुनो उसका क्या आदेश है? वह तुम्हें किस ओर निर्देश करती है? तुम्हारी आत्मा से बाहर कोई अन्य ऐसी शक्ति नहीं है जो तुम्हारी सहायता कर सकती हो या तुम्हारी हानि करने में समर्थ हो। तुम्हारी निजी इच्छाओं के अतिरिक्त संसार की ऐसी कोई ताकत नहीं जिसका वश तुम्हारे ऊपर चल सकता हो। यदि तुम दुःख देखते हो तो यह तुम्हारी आत्मा का कालुष्य ही है, यदि तुम सुख पाते हो यह वातावरण भी तुम्हारी आत्मा के दिव्य प्रकाश से हुआ है।
क्या तुमने कभी इस प्रश्न पर भी विचार किया है कि तुम्हारी शक्ति का केन्द्र कहाँ है? तुम्हारी आत्मा ही संसार की समग्र शक्तियों को आदि विकास स्थान है और इसी के वश समग्र संसार है। जिस जिज्ञासु को अपनी आत्मा की अद्भुत शक्ति यों का सम्यक् ज्ञान हो जाता है उसके ऊपर अन्य किसी सत्ता का प्रभाव नहीं पड़ सकता। ऐसा व्यक्ति अपने पथ से विचलित नहीं होता, मार्ग की कठिनाइयों को रौंदता चलता रहता है।
दूसरा व्यक्ति वह है जो समझता है कि बाह्य संसार में कोई ऐसी शक्ति है जो उसके जीवन से सम्बन्ध रखती है तथा उसे अस्त−व्यस्त किया करती है। वह यह मानता है कि शक्ति का केन्द्र हमारे बाहर स्थित है और उसी के अधीन होकर हमारा जीवन चलता है। वह नाना प्रकार की व्याधियाँ, यातनाएँ तथा कठिनाइयाँ सहा करता है और अपने का नितान्त असहाय समझता है। उसे ऐसा प्रतीत होता है, जैसे संसार के क्षुद्र पदार्थ ही उसे क्लान्त बनाये हुए हों। जो अविद्याग्रस्त व्यक्ति इस प्रकार की कमजोर मनोवृत्ति के शिकार रहते हैं वे कदापि कुछ नहीं कर पाते। वे स्वयं अपने हाथों अपना भाग्य घट फोड़ते हैं। उनका कल्याण इसी में है कि भौतिक संसार से अपनी वृत्तियाँ हटाकर सर्वशक्ति सम्पन्न आत्मा पर केन्द्रीभूत करें।
कुछ स्त्री पुरुषों में धन विद्या और रूप का गर्व रहता है। यह भी बुखार है। ऊंची जाति और कुल का भी मिथ्याऽहंकार मनुष्य को पतित करता है। हिन्दू जाति आज इस उच्च जाति के मिथ्याऽहंकार के कारण सदियों से पराधीन है और अपने साथ देश को भी पराधीन बनाये हुए है।
इसी अभिमान का ही यह परिणाम है कि आज भारत में करोड़ों मनुष्य अछूत बना दिये गये हैं।
(श्री लालचन्द्रजी)
सत्य का आचरण ही सदाचार है। सदाचार अमृत का अवलंबन है, अनृत की अवहेलना न केवल अवहेलना, अनृत का ध्यान तक भी नहीं। सदाचारी मनुष्य ऋतु और सत्य का मूर्त उदाहरण है।
सदाचार में ऋजुता, सरलता और साधुता का वेश है। सदाचारी ही दक्ष है, उसी का जीवन सुन्दर है। सदाचारी का जीवन यज्ञमय है। यज्ञ−भावना दिव्य है। यज्ञ−भाव सदाचार का मूल भी है और मध्य भी। सदाचार की पराकाष्ठा यज्ञ में हुई है। सत्यकर्म यज्ञ से ही पैदा होता है, यज्ञ ही स्थिर रहता है और यज्ञ में ही उसकी पूर्णता है।
यज्ञीय जीवन निर्माणात्मक होता है। संसार में जब-जब सर्वहित की भावना से, सर्वोन्नति की कामना से क्रान्ति हुई है, तो उसी युग में निर्माण−कार्य भी विपुल हुए हैं। साहित्य, कला आदि सभी पर सार्वजनिक क्रान्ति का प्रभाव हुआ है। मनुष्यों के हृदयों में सर्वहित का संकल्प दृढ़ हो, इसके लिए विशिष्ट आचरण की, ऐसे आचार−व्यवहार की नितान्त आवश्यकता रहती है, जिसमें सब प्रेमसूत्र में ओत−प्रोत हुए, सहयोग करते हुए, आगे बढ़ें। सदाचार पर ही यज्ञक्रिया निर्भर है और यज्ञ भावना से सदाचार उन्नत होता है। बिना ध्येय के कोई भी कार्य लगन से नहीं होता। राष्ट्रोन्नति, सार्वजनिक विकास सब की बढ़ती की महत्वाकाँक्षा मनुष्य के अन्दर उदारता को, परस्पर हित के लिए आत्मत्याग को प्रोत्साहन देती है। उदारता की स्थिरता के लिए आचरण अत्यन्त आवश्यक है। सत्याचरण से परस्पर विश्वास, स्नेह और सौहार्द के भाव उदय होकर दृढ़ होते हैं और मनुष्यों में उद्देश्य पूर्ति के लिए तन, मन, धन लगाने की उत्कट कामना होती है। जो उन्हें अपने ध्येय की पूर्ति के लिये उत्साह से भर देती है। उनका साहस कम नहीं होने देती। इस प्रकार यज्ञ भावना में सदाचार पनपता है और सदाचार में ही यज्ञ भावना की पूर्ति है। यज्ञ भावना में अवश्य ही आपस की सद्भावना बढ़ती है। सद्भावना में निर्माणात्मक शक्ति है। सत है ही निर्माण की क्रिया का भाव। ऋत और सत्य जब भगवन् के संकल्प से प्रेरित हुए, तो सफल सृष्टि की उत्पत्ति आरम्भ हुई। सद्भावना, सत्य−संकल्प, सत्य−विचार, ये सत कर्म के आधार−स्तंभ हैं। सत्कर्म ही प्रशस्त कर्म है। वही यज्ञ है। इसलिए यज्ञ से निर्माण−क्रिया को अवश्य प्रोत्साहन मिलता है। इसमें कुछ भी सन्देह नहीं। संसार का इतिहास स्वयं इस सिद्धान्त का साक्षी हैं।
इसके विपरीत स्वार्थ में आपस में संदेह−वैमनस्य और बैर विरोध ही बढ़ता है। स्वार्थ में कोई किसी दूसरे की उन्नति देख ही नहीं सकता। सदाचारी पवित्र और दृढ़ प्रतिज्ञा, आचारवान और विश्वासी होता है। परस्पर विश्वास में अभ्युदय निहित है। स्वार्थ से विश्वास का ह्रास होता है, संशय बढ़ता हे और सच तो यह है कि यदि स्वार्थ को स्वतन्त्र रूप से मनुष्य स्वयं ही व्यक्ति गत तथा जातीय हितों को दृष्टि में रखकर नियन्त्रित न करे, तो अकेला स्वार्थ ही व्यक्ति यों क्या, जातियों और राष्ट्र तक में कलह विग्रह बढ़ाकर महायुद्ध करवाता है और मनुष्यों के नाश का कारण बनता है। स्वार्थ में विरोध तो अवश्य ही उत्पन्न हो जाता है। स्वार्थ में सहयोग का तो स्वप्न तक नहीं आने पाता। हाँ, विनाश होने पर पछतावा अवश्य होता है।
वैसे तो स्वार्थ में सद्भावना का अभाव होने के कारण अन्ततोगत्वा स्वार्थ स्वरूप अपनी ही हानि करता है। प्राकृतिक नियम, जिन्हें ऋत कहते हैं अटल हैं। सच्ची स्थिर उन्नति लक्ष्मी और शोभा तो सत्य में ही निहित है। स्वार्थ में कमी स्थायी अभ्युदय नहीं हुआ। स्वार्थ क्षणिक झलक सी चकाचौंध सी दिखाकर मनुष्य को मोहित करके उससे अनर्थ करवाता है। स्वार्थ को मूल काम है, वह काम, जिसमें विकार आ चुका है, स्वार्थ में परिणत होता है। किन्तु जब कामना शुभ हो और शिव−संकल्प में परिपक्व हो जाय, फिर तो मनुष्य का ध्येय श्रेय हो जाता है। स्वार्थ का, काम का संस्कार करो, उसमें से विकार धो−धोकर निकाल दो, फिर वासना नहीं उत्पन्न होगी। लालसा नहीं बढ़ेगी। फिर उदय होगा वह अदम्य संकल्प, जो निर्माणात्मक क्रिया का मूल रूप है और परम कल्याणप्रद है। संस्कार किये बिना काम हानिकर है। सुसंस्कृत होने पर वही काम परम हितकर है। सुसंस्कृत मानव अवश्य सदाचारी होता है। उसमें शिष्टाचार भी होता है उसी से सर्वहित के कार्य हो सकते हैं। संस्कृति का आधार सदाचार ही है।
सदाचार और क्षत्रिय जीवन एक ही बात है। सदाचार की शक्तियाँ देव हैं, दुराचार की दैत्य आसुरी शक्तियाँ प्रबल होकर व्यक्ति तथा जाति, दोनों का विनाश करती हैं। देवी शक्ति यों पर तो सारा विश्व अवलम्बित है। विश्व का आधार सत्य ही तो है। सत्य, धर्म है, और धर्म सत्य है। सदाचारी ही धर्मशील है और जो धर्मात्मा है, वह अवश्य सदाचारी है। पवित्रता और सत्य से ही, जाति का उत्थान हुआ करता है। धर्म में सत्य, पवित्रता, धैर्य, उत्साह आदि सभी दिव्य गुणों का समावेश है। दिव्य गुणों का मूर्त उदाहरण−धर्मशील सदाचारी मनुष्य है। सत्याचरण से व्यक्ति का अभ्युदय यश, और शोभा होती है और उसका कल्याण होता है।
व्यक्ति के जीवन में जितना सत्य अधिक होगा, उसमें उतना ही वीर्य, बल, साहस, तेज, उत्साह और उल्लास अधिक होगा। सदाचारी मनुष्य अपने कर्त्तव्यों को लगन से पूरी रुचि से करते हैं, वे यत्न करने में कोई कसर नहीं रखते। सारी शक्ति अपने उद्योग में लगा देते हैं। सदाचारी ही सावधानता, एकाग्रता, चेतनता और दक्षता से कार्य में सफल होते हैं।
सदाचारी में आत्म−विश्वास होता है। दुराचारी में अभिमान होता है। सदाचारी में आत्म सम्मान होता है। दुराचारी में घमण्ड होता है सदाचारी में पराक्रम होता है। दुराचारी में उद्दण्ड होता है, सदाचारी दृढ़ होता है। दुराचारी ढीठ होते हैं, सदाचारी निर्भय होता है। दुराचारी निर्लज्ज होते हैं। सदाचारी निर्भय होता है। दुराचारी हठी होता है। सदाचारी में निरन्तर मृदुता है, माधुर्य विनय है, नम्रता है। दुराचारी में स्वार्थ पूर्ति तक ही दंभरूप ऊपर का मिठास है, चापलूसी है, खुशामद है। सदाचारी के जीवन में वास्तविकता दुराचारी के बर्ताव में कपट है, स्वार्थपरता है। सदाचारी का जीवन शुद्ध है, दुराचारी छल के लिए भला−सा बना रहता है। सदाचारी कभी देश और जाति से द्रोह नहीं करता, दुराचारी अपने स्वार्थ के कारण देश हित व जाति हित नहीं करता।
सदाचार में परस्पर विश्वास का विकास है, जिससे संसार का व्यवहार उन्नत होता है। व्यवहार वास्तव में सदाचार पर ही अवलंबित है। जिन लोगों में जितना सत्य बढ़ा हुआ है, उतना ही उनका व्यापार सफल है। जातीय सदाचार सारी जाति उन्नत करता है। कोई ऐसी कला नहीं, कोई व्यवसाय नहीं, जिसमें मनुष्यों को एक दूसरे के सहयोग की आवश्यकता न हो। जहाँ व्यवहार सत्य है, सहयोग की दृढ़ता, सत्य और पवित्रता अवलंबित है। खेती, शिल्प, व्यापार, उद्योग, भवन निर्माण सभी कलाएँ सहयोग चाहती हैं। हमारा जीवन−निर्वाह भी तो सहयोग पर निर्भर है। सहयोग का आधार सदाचार है।
शिक्षा, साहित्य, संगीत, कविता, सभी सहयोग चाहते हैं। मनुष्यों के हृदयों को भावों सहयोग। अक्षरों का सहयोग वाक्यों में वाक्यों सहयोग निबन्धों में, चरित्र चित्रण, इतिहास आदि सभी साहित्य में, वाक्यों तथा स्वरों और छन्दों का सहयोग, काव्य और संगीत में। विश्व में सहयोग की ही लीला है। प्रेम का ही विकास है, जो देखने वाले को स्पष्ट दीखता है। मानवी आदर्शों के सहयोग से ही तो संस्कृति का उद्भव तथा विकास है। सहयोग की भित्ति सत्य है और सत्याचरण ही सदाचार है। यज्ञ भावना तो है ही मूर्तिमान सहयोग। जहाँ सत्य है, पवित्रता है, वहाँ ही सहयोग में स्थिरता रहती है। संदेह, सदा अपवित्रता के कारण होता है और संदेह से वैमनस्य तथा बैर विरोध बढ़कर निरन्तर ह्रास होता जाता है। पवित्रता और सत्य का अटूट सम्बन्ध है। अपवित्र हृदय में सत्य−भावना का उद्गम नहीं होता।
क्षुद्रता बुरी है, इससे मनुष्य का विकास नहीं होने पाता। अपवाद, अपयश और निन्दा करने वाले के भावों में संकीर्णता होती है उससे बैर विरोध बढ़ता है। सदाचारी स्वयं उन्नत होगा और दूसरे की उन्नति से प्रसन्न होगा। सदाचारी चोरी नहीं करेगा। किसी से उधार यथा शक्ति नहीं लेगा और यदि उधार लेना ही पड़े, तो सदाचारी मनुष्य धन्यवाद सहित उसे लौटा देगा। दुराचारी लोग ही पराई वस्तु लेकर नहीं दिया करते। सदाचारी, अपने उद्योग से जो प्राप्त करेगा, उसमें संतुष्ट होगा।
जब जातीय जीवन में पवित्रता तथा सत्य ओत−प्रोत हो जाते हैं, तो व्यवसाय, उद्योग, व्यापार सभी बढ़ते हैं और जाति समृद्धि होती है। जातीय समृद्धि और वैभव, जातीय कीर्ति और यश, सारी जातीय उन्नति सदाचार पर निर्भर है।
(श्री नेमिशरण जी मित्तल)
कर्त्तव्य में से अधिकार का जन्म हुआ है। एक मनुष्य का कर्त्तव्य दूसरे का अधिकार होता है। माता का कर्त्तव्य है कि शिशु को अपना दूध पिलावे, यही शिशु का अधिकार है कि उसे माता का दूध मिले। कर्त्तव्य और अधिकार के निकटतम सम्बन्ध के रहस्य को भली भाँति समझ लेने पर विश्व में शान्ति स्थापना का कार्य सरल हो जाता है।
आज विश्व में जो हिंसा, घृणा, युद्ध और अशान्ति फैली हुई है उसका मूल कारण इस रहस्य से अनभिज्ञता अथवा इस रहस्य के प्रतिकूल आचरण का ही परिणाम है। सम्भव है कि जब मनुष्य आज के जंगली पशुओं की भाँति संसार में स्वतन्त्र विचरता होगा तब उसे अधिकार और कर्त्तव्य की मीमाँसा करने की आवश्यकता प्रतीत न हुई हो लेकिन आज मनुष्य उन्नति करते−करते पूर्ण रूपेण समाज को प्राणी बन चुका है। शिशु जब माँ की कोख से जन्म लेता है तुरन्त एक समाज के बीच में आ जाता है और उसी समय से उसके पालन−पोषण का जिम्मा उसके चारों ओर स्थित परिवार के ऊपर आ जाता है जो कि बृहत्तर समाज की पहली इकाई है। कुछ बड़ा हो जाने पर उसके समाज का दायरा बढ़ता है घर से निकल कर वह पड़ोस के बच्चों के साथ खेलता है और तनिक बढ़ने पर पाठशाला में प्रविष्ट होता है और वहाँ उसे सहपाठियों और शिक्षकों का और भी बड़ा समाज मिलता है। इसी प्रकार धीरे−धीरे उसकी आयु, योग्यता और ज्ञान के बढ़ने के साथ साथ ही उसके समाज का क्षेत्र भी बढ़ता जाता है।
आरंभ से देखने पर पता चलता है कि जन्म होते ही बच्चे को माता−पिता तथा अन्य व्यक्ति यों की सहायता की आवश्यकता पड़ती हैं। माता−पिता भाई बहिन तथा अन्य सभी कुटुम्बी जन बच्चों के स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए चौकन्ने रहते हैं, क्योंकि उन्हें ज्ञात है कि यह अबोध शिशु ईश्वर के यहाँ से उसी तरह आया है जिस तरह एक दिन उन्होंने इस संसार में अबोध दशा में प्रवेश किया था और उनके माता पिता तथा अन्य कुटुम्बी जनों ने उनका पालन−पोषण किया था। वह कर्त्तव्य महसूस करते हैं कि जो उपकार उनके साथ किया गया है उन्हें भी अपने कुटुम्बी शिशु के साथ करना चाहिए। इस प्रकार हमने अनुभव किया कि कल जो अधिकार था आज वह कर्त्तव्य में परिणत हो गया है।
यदि हम समाज में उक्त प्रकार अपने कर्त्तव्यों का पालन करते रहें तो समाज में अविकारों के लिए लड़ने की तनिक भी आवश्यकता न पड़े। गीता में गीताकार ने कहा है कि प्राणी मात्र को अपना कर्त्तव्य करना चाहिए वही तो कर्मयोग है। अपने कर्त्तव्य अर्थात् अपने धर्म से डिगना पाप है। फिर हमें अधिकारों की इतनी चिन्ता क्यों? यदि हम अपने कर्त्तव्यों को पूरा करते जावें तो निश्चय है परमपिता परमात्मा जिसने कि हमें कर्म करने के लिए सृजा है, हमारे कर्मानुसार हमें फल देगा।
गीता में गीतकार ने स्पष्ट कहा है कि “जो जैसा कर्म करेगा वैसा ही फल पावेगा” इसके अनुसार यदि हमने निष्काम रहकर अपने कर्त्तव्य को पूरा पूर्ण किया है तो फिर हमें किसी दूसरी चीज की इच्छा ही नहीं होनी चाहिए, हमारे कर्मों का फल हमें अवश्य मिलेगा और हमारा काम तो केवल करना ही है, हमारी निष्कपट बुद्धि हमें जो मार्ग सुझाये उस पर चलना हमारा काम है यह तो ईश्वर का काम है कि वह हमें न्यायपूर्वक फल दे यह जिम्मेदारी उसी पर छोड़ देनी चाहिये।
इस सिद्धान्त को जीवन के हर एक पहलू पर और समाज के हर एक क्षेत्र में लागू किया जा सकता है। कौटुंबिक नागरिक अंतर्राष्ट्रीय सभी समस्यायें इसके द्वारा हल हो सकती है। यदि कुटुम्ब का प्रत्येक सदस्य कुटुम्ब के प्रति, नगर का प्रत्येक नागरिक नगर के प्रति और प्रत्येक नगर राष्ट्र के प्रति तथा प्रत्येक राष्ट्र विश्व के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करें तो मनुष्य का उच्चतम ध्येय शाँति सहज सुलभ हो सकती है।
कर्त्तव्य−पालन में हिंसा का प्रश्न ही नहीं उठता। कर्त्तव्य पालन स्वयं रचनात्मक कार्य है अतएव अहिंसामय है। यदि समाज का एक भाग कर्त्तव्य निष्ठ और दूसरा कर्त्तव्य भ्रष्ट है तो कर्तव्यशील समाज कर्तव्यभ्रष्ट का मार्ग दर्शन अपना कर्त्तव्य पूरा करते हुए करेगा, वह उत्तेजित नहीं होगा, क्योंकि कर्त्तव्य−भ्रष्ट लोगों को ईश्वर उनके कार्य के अनुरूप फल देगा। और वह ईश्वर के न्यायालय में दण्ड के भागी होंगे। किन्तु कर्तव्यशील यह दलील देकर कि कर्तव्यभ्रष्ट, समाज में अभिशाप स्वरूप वे बोझ मात्र है हिंसा करने पर उतारू होता है तो यह भी कर्तव्यभ्रष्टता ही है। क्योंकि पैदा करने और मारने का काम ईश्वर ही करता है और जो भी कोई काम करता है उसे ही उस काम के करने का अधिकार होता है अतः ईश्वर के अधिकार का मनुष्य द्वारा उपयोग अनाधिकार चेष्टा ही होगी। हमें केवल स्वकर्त्तव्य पूर्ति का ही अधिकार है वही हमारा स्वधर्म भी है।
स्वधर्मे निधने श्रेय, परधर्मो भयावहः
गीताकार के इस वचन का अर्थ यह नहीं कि हिन्दू मुसलमान, ईसाई आदि तथा कथित धर्म में ही रहना चाहिये। गीताकार के यहाँ धर्म का निर्णय पैदाइश से नहीं कर्म से होता है। वहाँ आजकल का नामधारी धर्म नहीं है बल्कि ईश्वर ने तुम्हें जैसे कर्म अर्थात् समाज सेवा के लिए बुद्धि और शक्ति दी है उसकी पूर्ति हो यह कर्त्तव्य ही धर्म है।
समाज में भंगी का काम है सफाई, उसका कर्तव्य है कि वह वैज्ञानिक और कर्त्तव्य−निष्ठा बुद्धि से सोचें कि मुझे सफाई का काम मिला है और उसे वह काम ध्यानपूर्वक और मनोयोग से करना चाहिए। इस प्रकार वह अपने धर्म का पालन करेगा समाज में उसका स्थान भिन्न नहीं रहेगा और वह समाज का डाक्टर बनकर समाज में प्रतिष्ठा पायेगा।
इसी प्रकार वैश्य सोचेगा कि समाज में मेरे हिस्से में व्यापार का कार्य आया है। अतः मुझे समाज के हित में व्यापार−धर्म पालन करता है। तब व्यापार में कैसे गन्दगी आ सकती है, वैश्य तो निष्कपट ही बन जायगा। और और उसका आचरण पवित्र होगा। क्षत्रिय के मन में भावना उदय होगी कि उसे समाज रक्षा करनी चाहिए और यही उसका कर्त्तव्य अथवा धर्म है तब फिर समाज अरक्षित कैसे रह सकता है, इस प्रकार शान्ति होना अवश्यम्भावी है। ब्राह्मण अपने को अधर्म का उत्तरदायी समझेगा और शिक्षा व सदाचार को अपना को अपना कर्त्तव्य मानेगा। अपने कार्य को लेखा उसे ईश्वर के सामने देना है वह धोखा नहीं देगा तो नैतिकता की रक्षा पूरी तरह होगी। इस प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपने कर्त्तव्य और उससे उत्पन्न अपने उत्तरदायित्व को जो समाज और समाज के न्यायाधीश ईश्वर के प्रति है समझेगा और उसे पूरा करेगा तभी सच्चा सुख और शाँति मिल सकते हैं।
आजकल संस्थाओं के सदस्य पदलोलुप हो रहे हैं। यदि इसके विपरीत वह संस्था के प्रति अपने कर्त्तव्यों का पालन करें तो संस्था फूले फले और उनका उद्देश्य इसमें पूर्ण हो। कर्त्तव्यों की तो अपनी नियमावली होती है। संस्था के सदस्यों का संस्था के हित में यह भी कर्त्तव्य है कि अधिकतम कर्तव्यशील व्यक्ति यों को ही उत्तरदायित्व मिले और वह उसे निभा सकें। यह तनिक भी कठिन न होगा कि अधिकतम कर्तव्यशील व्यक्ति का पता लगाया जावे क्योंकि सबका काम सामने रहता है झगड़ा तो वहाँ पड़ता है जहाँ कर्त्तव्य पूर्ति तो कोई भी न करे और वर्ति कहें सब। अतः संस्थाओं की उन्नति भी सदस्यों की लगन और कर्त्तव्य पूर्ति पर ही निर्भर है।
उपरोक्त विवेचन से हम इसी परिणाम पर पहुँचे हैं कि मनुष्य को केवल एक अधिकार है कि वह अपने कर्त्तव्य को पूरा करे।
(श्री प्रो. लालजीराम शुक्ल)
भारतवर्ष की अपनी अनेक विलक्षणता एवं विशेषताएं है जिनके कारण प्राचीन काल से आज तक वह विश्व के आकर्षण को केन्द्र एवं कई बातों में वह उसका शिक्षक बनता जा रहा हैं। उन अनेक बातों में आध्यात्मिक ज्ञान के विस्तारक हेतु गुरु शिष्य परम्परा भी भारत की एक अपनी वस्तु है और वस्तुतः आध्यात्मिक ज्ञान की ज्योति को जलाये रखने का यही मुख्य आधार है।
आध्यात्म ज्ञान के सागर में आज भाटा आ जाने के कारण गुरु की महिमा तिमिराच्छन्न हो गई है। गुरु पूजा एक व्यक्ति की पूजा सी दिखायी पड़ती है और यह परम्परा व्यक्ति वाद के रूप में सामने आ जाती है। किन्तु यह भ्रम है। गुरु शिष्य परम्परा तो सृष्टि के आदि से चली आ रही है और परम आदि गुरु सृष्टिकर्त्ता ने इसी परम्परा के द्वारा ज्ञान संचार सृष्टि में किया है। अतएव यह भी निश्चय है कि सृष्टि के अन्त तक निरन्तर यह चलती रहेगी। क्योंकि यह परम्परा टूट जाने का अर्थ ज्ञान दीपक का एकाएक बुझ जाना ही होगा। प्रत्यक्ष ज्ञान का एक मात्र साधन यही है।
भ्रम का एक कारण गुरु का तात्पर्य ठीक रूप से बोध नहीं होना भी है। गुरु स्थूल नहीं होते, वह तो सूक्ष्म हैं। जिस तरह अंग्रेजी की एक कहावत है कि “राजा मर गया है राजा चिरायु हो” तथा “राजा कभी नहीं मरता” उसी तरह गुरु कोई व्यक्ति नहीं होते, वह तो अध्यात्मज्ञान का अधिष्ठान हुआ करते हैं, जिस तरह राजा कोई व्यक्ति नहीं होता वह तो एक पद हैं जो ताज धारण करता है। कहने का तात्पर्य कदापि नहीं है कि जैसा आजकल एक प्रचलन हो गया है कि गद्दी पर जो बैठा, वही गुरु बन गया। प्रत्युत तात्पर्य यह है कि शास्त्र ज्ञान तो परोक्ष साधन है, ब्रह्म का साक्षात्कार तो किसी के द्वारा प्रत्यक्ष कराया जाने पर ही सुविधा पूर्वक हो सकता है और इस कार्य के लिए संसार में सदैव चिदानन्द स्वरूप योगिगण विद्यमान रहते हैं जो अपने योग बल से किसी जिज्ञासु रूप उपयुक्त पात्र का ढूंढ़कर उसमें ब्रह्म का भान करा देते हैं ओर शिष्य बन कर वह पुनः उस परम्परा को आगे बढ़ाता है। शास्त्रों के पठन, मनन से भी निश्चय बहुतेरे साधक आध्यात्मवाद की चोटी पर जा पहुँचते हैं, परन्तु उसका राजमार्ग वही है।
यहाँ एक शंका विचारणीय है कि गुरु स्थूल नहीं, सूक्ष्म किस तरह हो सकते हैं। एक चलते फिरते ओर जीवन व्यापार चलाने के लिए प्रायः सारे कार्य करने वाले शरीरधारी को सूक्ष्म क्यों और क्यों कर माना जा सकता है? यह ठीक है कि शरीर रूप से गुरु एक स्थूल व्यक्ति हैं, परन्तु गुरु शिष्य परम्परा शरीर का सम्बन्ध नहीं है, आत्मा का सम्बन्ध है। साधक का जीव गुरु के जीव का शिष्य बनता है। इसलिए गुरु के शरीर के त्याग के पश्चात भी उसको उनसे निर्बाध प्रेरणा मिलती रहती है। गुरु आत्मरूप हैं, देह रूप नहीं।
शरीरधारी किसी अदृष्ट को सहज ग्रहण एवं प्राप्त नहीं कर सकता, इसी से शरीर रूपी कोष के भीतर सच्चिदानंद स्वरूप गुरु शिष्य के सामने उपस्थित होते हैं। जिस प्रकार वर्णमाला के अक्षर नाम रूपी हीन एवं नाशरहित हैं, परन्तु स्थूल दृष्टि से बोधगम्य किया जाने के लिए उसकी लिपि तैयार की जाती है जिस में रूप भी है और मिटाया भी जा सकता है। ‘क’ का रूप भिन्न भिन्न भारतीय भाषा में विभिन्न है, परन्तु मूलतः ‘क’ तो श्रुतिगम्य ध्वनि है।
क्या गुरु कहलाने वाले सभी व्यक्ति ब्रह्म पद प्राप्त ही होते हैं? क्या उस नाम पर दम्भ या पाखण्ड नहीं फैलाया जा रहा है?—आदि प्रश्न यहाँ अप्रासंगिक हैं। “जड़ चेतन गुण दोष मय” तो करतार ने किया ही है कभी दोष की मात्रा अधिक होती है तो कभी गुण की। किन्तु अध्यात्मज्ञान की जिसे एक झलक मात्र भी मिल गयी होती है, उसे इस बात का दृढ़ विश्वास हो जाना आवश्यक है कि परमात्मा उसकी देख रेख करने वाले हैं, और जब एक सच्चे गुरु को उसके पास पहुँचा देना वे आवश्यक समझेंगे तो वैसा संयोग आप ही आप उपस्थित हो आवेगा। गुसाईं जी का कथन है—
—बिनुहरिकृपा मिलहिं नहिं सन्ता।......
—बिनु गुरु होहि न ज्ञान.......
—सो कि होइ बिनु हरि भगति।.......
अतएव जैसे भगवद् कृपा से मगरमच्छ से भरे नालों को कोई पार कर जाता है, उसी तरह भक्त साधक पाखण्डी ही गुरुओं से बचता हुआ सच्चे गुरु की शरण में जा पहुँचता है। जो अनुभवगम्य है, शब्दों के विस्तार से उसको हृदयंगम कराना दुरूह है।
इसी भाव से हिन्दू धर्म ग्रन्थों में गुरु की अलौकिक महिमा गायी गयी है। संस्कृत साहित्य से भक्ति काल के हिन्दी कवियों ने अव्यक्त ब्रह्म के पद पर—और किन्हीं ने उनसे श्रेष्ठतर−आसीन कराया है। जैसे:—
गुर्रुब्रह्मा, गुर्रुविष्णुः गुरु र्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः।
ध्यानमूलं गुर्रुमूर्तिम पूजा मूलं गुरुर्पदम्। मन्त्र मूलं गुरुर्वाक्यम् मोक्ष मूलं गुरु कृपा॥
गोस्वामी तुलसीदास जी रामायण का प्रारम्भ मात्र गुरु वन्दना से करते हैं। वन्दना भी गुरुदेव का नहीं, उनके ‘पद पद्म परागा’ का। इतना साहस कहाँ कि गुरुदेव भर की पूजा करें, जब उनके चरण भी नहीं, उसके रज कण में संजीवनी बूटी की महत्ता है, बल्कि जो ‘शम्भु तनु विभूति’ के समान विमल है। ‘मानस’ में उस रज गण के अलौकिक गुणों का अवलोकन किया जा सकता है। वे गुरुजी कैसे हैं!
“कृपा सिन्धु नर रूप हरि।” बल्कि भक्त शिष्य के दृष्टिकोण से उनमें एक विशेषता भी है कि “महा मोह तमपुञ्ज, जासु वचन रविकर निकर।” स्वयं हरि किसी साधक में अज्ञानतम दूर करने की प्रेरणा देते हैं, परन्तु गुरुदेव तो स्वयं सूर्य के समान उसका कारण बन जाते हैं। बल्कि हरि की पहचान करवाने की शक्ति अथवा कला गुरु के पास ही है:—
वन्दे बोधमंय नित्य गुरुं शंकर रुपिणाम्। याम्यां विना न पश्यन्ति योगिनः स्वान्तस्थमीश्वरम्॥
यहाँ गुरु का एवं शंकर की एक पद मर्यादा तथा एक कार्यभार हो गया है। बिना इन दोनों की कृपा के योगी अपने हृदय में स्थित ईश्वर का भी साक्षात्कार नहीं कर सकते। वस्तुस्थिति का कैसा सच्चा वर्णन है।
इसी भाव से ओत प्रोत होकर महात्मा कबीरदासजी ने खुला फैसला करके तर्क के साथ गुरु को गोविन्द से ऊँचा सिद्ध कर दिखाया—
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े काके लागूं पांय। बलिहारी गुरुदेव की, जिन गोविन्द दियो बताय॥
गुरु और गोविन्द यदि किसी अवसर पर एक साथ मिल जायं, तो पहले किनका अभिवादन किया जाय! अपने प्रश्न का आप ही उत्तर देते हैं कि गुरु का जय जयकार हो जिन्होंने गोविन्द को प्रत्यक्ष करा दिया । —जिस गुरु की इतनी मर्यादा है, उनके लक्षण भी बनाये हैं—
हरहि शिष्य धन मोहन हरई। सो गुरु घोर नरक महे परई
मनीषिणी एवं बसेन्द्र के तथा उनके गुरु श्रीमती मैडम ब्लाडीवास्की ने गुरु शिष्य के महत्व पर बहुत कुछ लिखा है। भारतीय संस्कृति से परिचित होकर उनने इस महत्व का समझा था।
हिमाचल, तिब्बत आदि में अन्तर्हित महात्मा महात्मागण मशालची की नाई देखते रहते हैं कि अध्यात्म का मशाल जल तो रहा है। मन्द ज्योति होने की दशा में अपने में निहित आध्यात्म शक्ति से उसमें तेल डालते हैं कि वह अनवरत जलता रहे। इनमें अनेकों की आयु सैकड़ों वर्षों का पार कर जाती है।
(श्री लक्ष्मी प्रसाद मिस्त्री ‘रमा’ हटा)
“कर्म प्रधान विश्व करि राखा।” जो जस करिय सो तस फल चाखा”।
कर्म क्षेत्र में आकर हमारा पहला कर्त्तव्य यही ठीक करना है कि क्या कर्त्तव्य है और क्या अकर्त्तव्य है। कर्त्तव्य का निश्चय बहुत जगहों पर सहज है, बहुत जगहों पर सहज नहीं है और कहीं कहीं पर तो बहुत कठिन है। अगर हर एक आदमी को हर एक बात में अपने कार्य की कर्त्तव्यता का निश्चय करना होता तो जीवन−निर्वाह अथवा संसार यात्रा बहुत ही जटिल और दुरूह हो जाती।
विद्वानों ने कर्त्तव्य−अकर्त्तव्य के बारे में खूब सोच−विचार कर धर्म शास्त्र और नीति शास्त्र लिखकर सर्व साधारण के लिये राह बहुत साफ और सहज कर दी हैं, उन शास्त्रों की बातों को स्मरण में रखने से और उन पर महापुरुषों के दिखाये हुए मार्गों पर चलने से प्रायः लोग अपने कर्त्तव्य का पालन करने में समर्थ हो सकते हैं, कर्म−क्षेत्र इतना विशाल और विचित्र है कि वहाँ केवल पथ−प्रदर्शक के बताने पर ही निर्भर रहने से पथिक का काम नहीं चलता, अतएव पथिक में खुद भी अपनी राह पहचान लेने की क्षमता का रहना आवश्यक है। प्रयोजन के अनुसार किसी बात के अनुकूल प्रतिकूल युक्ति और तर्क विचार कर अपने निज के सिद्धान्त पर पहुँचने के योग्य बनना हमारा कर्त्तव्य है।
किसी भी कार्य की सिद्धि के लिये पाँच साधन होते हैं और वे पाँचों ही जब उस कर्म के अनुकूल होते हैं तभी वह कार्य सिद्ध होता है, उनमें से कोई भी एक साधन जितना ही त्रुटिपूर्ण होगा उस काम की सिद्धि उतनी ही अधूरी रहेगी। शरीर निरोग और बलवान हो, एवं काम करने का स्थान अनुकूल हो, उस काम के लिये अन्तः करण में प्रेरणा हो, बुद्धि में उसके विषय में यथार्थ निर्णय करने की योग्यता हो, मन विक्षिप्त न हो, इन्द्रियों में कोई दोष न हो, उस कर्म के उपयुक्त हों, कर्म करने की चेष्टा में उचित हों तथा क्रियायें सब ठीक हों तथा सूक्ष्म दैवी−शक्ति यों अनुकूल हों अर्थात् सब के साथ अपनी एकता का भाव हो तभी कर्मों में सफलता प्राप्त होती है, इन साधनों में कोई त्रुटि बनी रहे तो कार्य में सफलता नहीं मिलती। मनुष्य दृढ़ता पूर्वक अच्छे काम करने से ही अपना कल्याण कर सकता है और वे ही लोग सब से अधिक सफलता प्राप्त करते हैं। जो दृढ़ बने रहते हैं और सच्चे हृदय से काम करने में लगे रहते हैं, दुर्बल चित्त मनुष्य बाध्य होकर इन सारे अनंत और असीम व्यापारों के द्वारा पीड़ित होकर किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं और दुर्बलता के कारण अपना कर्त्तव्य स्थिर नहीं कर पाते−भगवान श्री कृष्ण ने इस कर्त्तव्य−कर्म के अनुष्ठान पर बहुत ही अधिक जोर दिया है और उन्होंने इसे अपना सबसे अधिक निश्चित तथा निर्दोष सिद्धाँत बतलाया है। अर्जुन को इस बात की चेतावनी दी है, किसी नियत कर्म का संन्यास के नाम पर त्याग नहीं किया जा सकता, तृष्णा−लोभ या काया क्लेश के बहाने कर्त्तव्य से विमुख होना मोक्षार्थी के लिये अनुचित तथा निंदनीय है। जो अनासक्ति , निःस्वार्थभाव एवं कर्त्तव्य बुद्धि से अपने कर्त्तव्य का अनुष्ठान करता है वह आदर्श मनुष्य है, ‘कर्म’ ब्रह्म−स्वरूप सूर्य से उत्पन्न हुआ है, क्योंकि उन्होंने ही जगत की सृष्टि करके आदान−प्रदान रूप कर्म की सृष्टि की है, ब्रह्म नित्य रूप से, कर्म सूत्र में अव्यवस्थित रहता है। इसीलिये ऐ मनुष्य तुझे उचित है कि तू न भूतकाल के लिये पश्चाताप कर और न भविष्य पर ही अधिक विश्वास रख, केवल वर्तमान का सदुपयोग अपना लक्ष्य बना।
आलस्य करने से आवश्यक वस्तुयें प्राप्त नहीं होतीं, जिससे मनुष्य को बहुत दुःख होता है, परन्तु कर्त्तव्य कर्म करने से आनन्द ही आनन्द मिलता है। उद्योगी को किसी बात की कमी नहीं रहती क्योंकि उन्नति और विजय उसी के पीछे−पीछे चलते हैं, जो कभी खाली नहीं बैठता और आलस्य को शत्रु समझता है वही धनवान है, वही अधिकार−सम्पन्न है, वही आदरणीय है। उद्योगी मनुष्य प्रातःकाल उठता है और अधिक रात गये सोता है, वह अपने मन और शरीर को मनन और व्यायाम द्वारा सशक्त बनाए रहता है, परन्तु आलसी मनुष्य संसार की कौन बतावें, स्वयं अपने ही लिये भार−स्वरूप बन जाता है। उसका समय काटे नहीं कटता, वह दर−दर भटकता फिरता है, उसे सूझता ही नहीं कि मुझे क्या करना चाहिये।
प्रसिद्ध विद्वान ‘वालटेर’ का मत है कि प्रतिभाशाली मनुष्यों और साधारण मनुष्यों में बहुत ही थोड़ा अन्तर होता है। “वैकेरिया’ कहा करता था कि सभी मनुष्य वक्त और ‘कवि’ हो सकते हैं। ‘रेनोल्डस’ का कथन है कि प्रत्येक मनुष्य मूर्तिकार और चित्रकार हो सकता है, प्रसिद्ध दार्शनिक ‘लीक’ ‘हेलवीटिअस’ और ‘डिडीरोट’ का मत है कि सब मनुष्यों में प्रतिभाशाली बनने की एक−सी शक्ति मौजूद है, और यदि कुछ मनुष्य अपनी मानसिक शक्ति यों को काम में लाकर किसी कार्य को कर सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि और लोग भी वैसा ही सुयोग ओर साधन पाकर उस कार्य को न कर सकें, यद्यपि यह सच है कि परिश्रम से अद्भुत कार्य हुए हैं, और बड़े प्रतिभाशाली मनुष्यों ने अटूट परिश्रम किया है, तो भी यह स्पष्ट है कि मौलिक मानसिक शक्ति और उत्तम भावों के बिना चाहे वह कितना ही परिश्रम कितने ही उचित रीति से क्यों न किया जाय, उससे तुलसीदास, बराहमिहर वाग्भट्ट अथवा तानसेन का प्रादुर्भाव नहीं हो सकता, संसार के महापुरुषों ने बहुधा यह कहा है कि हमने प्रतिभा से नहीं, किन्तु निरंतर परिश्रम करने से सफलता प्राप्त की है। मेहनत करने की जरूरत को व्यक्ति यों की उन्नति और जातियों की सभ्यता की असली जड़ समझना चाहिए। यदि किसी मनुष्य की जरूरतें बिना हाथ पैर हिलाए ही पूरी हो जाया करें और उसको किसी बात की प्रतीक्षा−आकाँक्षा अथवा उद्योग करने की जरूरत न रहे तो उस मनुष्य के लिए इससे बढ़कर दूसरा पाप क्या हो सकता?
जब तक मनुष्य जीवित रहता है प्रकृति और मनुष्यों की शक्ति यों से उसका संघर्ष जारी रहता है जब तक वह उस संघर्ष में विजयी होता रहता है, तब तक वह जीवित रहता है परन्तु जिस समय वह उस संघर्ष में खड़ा होने योग्य नहीं रहता या हार जाता है तब वह मर जाता है। यह बतलाने की आवश्यकता नहीं कि उसमें जीत किसकी होती है, इसका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि जो अधिक बलवान और कर्तव्यशील है वह विजयी होगा और जो निर्बल तथा कर्तव्यहीन है वह हार जायगा। संग्राम भूमि में उतरे हुए सब लड़ाकों में से अंत में वही मैदान का मालिक रहेगा जो सब में बलवान और योग्यतम होगा। जब कोई संक्रामक बीमारी फैलती है तब भी यही देखने में आता है। जिनके शरीर में रोग का सामना करने की शक्ति है वे रोग से बचे रहते हैं या उसके आक्रमण से बच निकलते हैं परन्तु निर्बल और शक्ति हीन मनुष्य रोग के शिकार हुए बिना नहीं रहते शारीरिक रोगों की तरह आर्थिक रोगों के शिकार भी वे ही लोग होते हैं जो कमजोर और कर्तव्यहीन हैं।
लोग समझते हैं कि बड़े आदमी बड़ी बड़ी बातों पर ही ध्यान देते हैं, परन्तु असली बात यह है कि वे अत्यन्त साधारण और प्रतिदिन के व्यवहार में आने वाली चीजों की भी छान बीन किया करते हैं। उनमें बड़ापन यही है कि वे बुद्धिमानी के साथ हर बात का समझ लेते हैं। इसलिए हर काम करने से पहले यह निश्चय करना चाहिये कि वह काम उचित है या नहीं। यदि वह करने योग्य हो तो उसमें दृढ़ता के साथ लग जावे। फिर कैसा ही संकट आवे परन्तु अपने निश्चित ध्येय को कभी न छोड़े।
एक अंग्रेज विद्वान ने लिखा है, कि धनवान उसे ही कहना चाहिये जो उद्योगी है। उद्योगी मनुष्य प्रत्येक पल का अपना समझता है। समय प्रकृति का खजाना है, इस खजाने का कर्मशील ही अधिकार में रखते हैं, काल के हाथ में काँच की रेत से भरी हुई शीशी है, उद्योगी वीर उसमें के एक−एक क्षण का गगन का चमकता हुआ ‘तारा’ या अमूल्य ‘हीरा’ समझकर लगातार परिश्रम पूर्वक उसका संग्रह करता रहता है—
(श्री प्रो. रामचरन ‘महेन्द्र’ एम. ए.)
दैनिक, साप्ताहिक या मासिक डायरी या दिन भर के कार्यों का लेखा जोखा लिखना महापुरुषों का एक महत्वपूर्ण कार्य रहा है। रात्रि में सोने से पूर्व वे प्रतिदिन दिन भर के कार्यों का ब्योरा, मन में आये हुए शुभ संकल्प, भविष्य के लिए मंगलकारी योजनाएँ अपनी डायरी में लिखा करते थे। अनेक डायरियाँ साहित्य के अंतर्गत स्थान पा चुकी हैं।
दिन में हम अनेक शुभ अशुभ कार्य करते हैं। जहाँ दूसरों की भलाई, परोपकार के कार्य करते हैं, वहाँ अनेक गलतियाँ, झूठ, कपट, मिथ्याचार, असत्य भाषण, क्रोध, काम इत्यादि दुष्ट मनोविकारों के वशीभूत होकर अपवित्र आचरण भी किया करते हैं। हमारे सद्गुण और दुर्गुण मन के विभिन्न कोनों में छिपे रहते हैं। मन के ये विचार बढ़ जाने से हमें भ्रष्ट करते हैं। तनिक सा प्रोत्साहन पाकर ये उभर उठते हैं। छिपकर विकसित होने की प्रतीक्षा किया करते हैं। यदि हम इनका दमन न करें, तो हमें सदा यह भय रहता है कि न मालूम कब किन परिस्थितियों में विकसित होकर हमें पतित कर देंगे। इन्हें बार बार मारने, चाबुक से पीटने, नियंत्रित करने और सत्पथ पर अग्रसर करने के हेतु डायरी अमूल्य साधन है। इसके द्वारा हमारे दुष्ट मनोविकारों का क्षय और सद्गुणों का विकास होता है। डायरी हमारे समय, विचारों, मानसिक संघर्ष, और कार्यों की आलोचना है, अच्छे बुरे का विवेचन है। बुरे पर पश्चाताप और अच्छे पर संतोष की अभिव्यंजना है।
हमारे मन में कौन सा विचार अच्छा या बुरा आया? क्यों आया? नहीं आना चाहिए था? आगे हम निश्चय बल से उसे न आने देंगे? आदि प्रश्नों का उत्तर हमें दैनिक डायरी में प्रतिदिन दर्ज करना पड़ता है। भविष्य की योजनाएँ लिखनी पड़ती हैं।
हम स्वयं अपने दोषों को परखने वाले, गलतियों पर अपने को ताड़ने वाले और सद्गुणों का विकास करने वाले होते हैं। हम दोषों को दूसरों से कहते हैं, अथवा लिखते हैं, तो हमें उनसे वचन की प्रवृत्ति दृढ़ होती है। हम अपनी लेखनी से उनसे बचने की प्रवृत्ति प्रकट करते हैं। दोषों से मुक्त होकर उच्चतर जीवन की अभिलाषा प्रकट करते हैं। गलतियों के लिए हार्दिक पश्चाताप करते हैं। स्वयं अपने आप ही अपने से सान्त्वना और मनः शान्ति प्राप्त करते हैं।
दैनिक डायरी लिखने से विचारों में स्पष्टता आती है। यदि सब दोषों की सूची हमारे सामने रहे, तो उन्हें दूर करने में मन लगा रहता है। कहते हैं बैंजामिन फ्रेंकलिन ने आत्मसुधार का यही साधन अपनाया था। प्रतिदिन वे जो कुछ उत्तम अथवा निकृष्ट कार्य करते थे, रात्रि में उसे अपनी डायरी में दर्ज करते थे। निकृष्ट कार्य पर विक्षोभ प्रकट करते थे और भविष्य में पुनरावृत्ति न करने का प्रतिज्ञा और दृढ़ संकल्प करते थे। वे अपने आलस्य प्रमोद, क्रोध, वासना आदि के लिए आत्मग्लानि प्रकट करते तथा आगे इन दुर्गुणों में न पड़ने का सद् संकल्प किया करते थे। सन्मार्ग का अवलम्बन तथा निकृष्ट से सम्बन्ध विच्छेद करते करते अन्ततः उन्होंने आत्मसुधार में अच्छी प्रगति की थी। वे अपने मन का अध्ययन और चंचलता दूर कर सके थे। अन्य पुरुषों ने भी डायरी लिखना सदा जारी रखा है। महात्मा गाँधी जी डायरी के सदा पक्षपाती रहे हैं। जेम्स ऐलन की डायरी आध्यात्म वृत्ति के जिज्ञासुओं के लिए खजाना है।
डायरी कैसे लिखें :—
एक साधारण सी डायरी खरीद लीजिए जिसमें प्रतिदिन के लिए एक पृष्ठ दिया हुआ हो। यदि काफी लम्बा न हो तो एक साधारण कापी से ही काम चलाया जा सकता है। इसमें प्रति रात्रि में अपने दिन भर के अच्छे बुरे कार्यों का सिंहावलोकन कीजिए। आपने जो अपशब्द कहे हों, या दूसरों से दुर्व्यवहार किया हो उसके प्रति दुख प्रकट कीजिए, सद्गुणों का प्रदर्शन किया हो तो, सेवा, दान, सहायता, या मधुर शब्द कहा हो तो उसे भी लिखिए और उसके प्रति अपना हार्दिक संतोष प्रकट कीजिये।
समय का ब्योरा दर्ज कीजिए। कितना समय सोने, नित्यकर्म, गपशप, आलस्य, व्यर्थ, बकवास, मनोरंजन आदि में व्यय किया है? दिन भर में भोजन के पश्चात कितनी देर विश्राम किया? कितने समय तक ठोस मन लगाकर कार्य किया, यह भी लिखिए। अपने आचार−व्यवहार की तीखी आलोचना कीजिए और गलतियों पर दुःख प्रकट कीजिए। कितनी बार झूठे बोले और उसके लिए आपने कैसी ली है। उपवास, मौन इत्यादि कितनी देर किया?
आध्यात्मिक उन्नति का ब्योरा भी दर्ज कीजिए। आप सांसारिकता से कितना छूट गये हैं? माया मोह ममता आपको दुनिया में कितना बाँधे हुए हैं? अपने इष्टदेव का ध्यान, भजन, पूजन, कीर्तन, सद्ग्रन्थावलोकन आप कितनी देर करते हैं? सत्संग कितनी देर करते हैं, स्वाध्याय कितना होता है? निष्काम सेवा में कितना समय देते हैं? गीता के कितने श्लोक पढ़ते तथा उन पर कैसा आचरण करते है? जब ध्यान हवन इत्यादि की ओर कैसी प्रगति है? भोग विलास में कितना संयम हो चुका है? आदि आदि प्रश्नों के विस्तृत उत्तर लिखा कीजिये।
(श्री लालजी पाठक, लामटा)
श्रीमद्भगवद्गीता में श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं :—
यद्ददाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
न मे प्रार्थस्य कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि।
श्रेष्ठ पुरुष जिस रास्ते से चले जाते हैं सब ही निम्न श्रेणी के मनुष्य उसी मार्ग पर चलने लगते हैं। मुझे कोई काम करना शेष नहीं है तथापि मैं इसी हेतु कार्य करता रहता हूँ।
भगवान राम और कृष्ण के अवतारों का एक प्रमुख प्रयोजन लोक शिक्षा भी था। जहाँ उन्होंने अपनी अमृतवाणी बहुमूल्य उपदेश एवं सन्देश दिये हैं, वहाँ अपने आचरण द्वारा ऐसे उदाहरण भी उपस्थित किये हैं जिनको अपना कर मनुष्य जाति सुख शान्तिमय जीवन यापन कर सकती है तथा अपनी अनेकों उलझनों को सुलझा सकती हैं।
श्री रामचन्द्रजी के अनेकों आदर्श गुणों में एक गुण यह भी था कि वे अपने परिवार का समुचित रखते थे, उनकी कठिनाइयों को सरल बनाने, सन्न रखने तथा सुख दुख में साथ रहने में किसी प्रकार की कमी नहीं रखते थे। जिनमें यह गुण होता है उन्हीं का परिवार उनके पीछे चलता है और प्रेम पूर्वक संगठित रहता है। आजकल घरों के पारिवारिक मुखिया तथा किन्हीं संगठनों के संचालक प्राप्त गुण को अपनाने की कमी करत हैं। इसी से उनके आश्रित या अनुयायी असंतुष्ट रहते हैं और आये दिन कलह मचा रहता है।
श्री रामजी की मुखियागीरी से उनका परिवार ही नहीं प्रजाजन भी संतुष्ट थे। यहीं तक नहीं वन पर्वतों के निवासी भील, कोल, रीछ, बानर आदि के साथ भी उनका व्यवहार आत्मीयता का होने के कारण वे दूरवर्ती होते हुए भी कुटुम्ब की सी स्थिति अनुभव करते थे। रामायण में इसका वर्णन इस प्रकार है:−
प्रभु तरु तर कपि डार पर किये ते आप समान। तुलसी कहूँ न राम से साहब सील निवान॥
श्री रघुनाथ जी ने भीलों के प्रति चित्रकूट में क्या बर्ताव किया। जब भी कोई खबर मिली कि रामचन्द्र जी इस पर्वत पर हैं।
यह सुधि कोल किरतान पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई॥ कंदमूल फल भरि भरि दोना। चले रक जनु लूटन सोना॥ करहि जुहार भेट धरि आगे। प्रभुहि विलोकहि अति अनुरागे॥ राम स्नेह मगन सब जाने। कहि प्रिय वचन तबहि सन्माने॥ प्रभुहिं जोहार बहोरि बहोरी। वचन विनीत कहहिं कर जोरी॥ हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाध बराई॥ हम सेवक परिवार समेता। नाथ ने सकुचव आयसु देता॥
वेद वचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुणा ऐन। वचन किरातन के सुनत, जिमि पितु बालक बैन॥
राम सकल वनवर परितोषे। कहि प्रिय वचन प्रेम परिपोषे॥
अब रीछ बानरों पर प्रभु का कितना प्रेम था वह नीचे की चौपाइयों से विदित होगा।
तुम्हरे बल मैं रावण मारयो। तिलक विभीषण कहं पुनि सारयो॥ निज निज गृह अब तुम सब जाहू। सुमिरहु मोहिं डरहु जनि काहू॥ परम प्रीति समीप बैठारे। भगत सुखद मृदु वचन उचारे॥ तुम अति कीन्ह मोरि सेवकाई। मुख पर केहि विधि करहुँ बड़ाई॥ ताते तुम्ह मोहि अति प्रिय लाग। मम हित लागि भवन सुख त्यागे॥ अनुज राज संपति वैदेही। देह गेह परिवार सनेही॥ सब मम प्रिय नहिं तुमहिं समाना। मृषा न कहों मोर यह बाना॥
इन नीचे की दो चौपाइयों में रामचन्द्रजी ने रीछ वानरों को ही सबसे प्यारे कहा देखिये कितना महान आदर्श है। रघुनाथ जी ने चित्रकूट से वापिस होते समय भरत जी को थोड़े से में अपनी प्रजा पालनादि का भार सौंपते हुए कहा।
मुखिया मुख सो चाहिये, खान पान को एक पाले पोपे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक॥
यहाँ पर मुख को मुखिया की उपमा दी है जैसे नाना प्रकार के भोजनों को खाकर मुख अपने अन्दर एक कणिका भी नहीं रखता। इसी प्रकार मुखिया को अपने परिवार के प्रति बर्ताव करना चाहिये। दूसरी बात मुख और शरीर के संबंध की यह है कि जब शरीर के किसी अंग में कोई दर्द होता है तब वह अंग अपनी पीड़ा बिना मुँह के नहीं बता सकता। पर मुँह रोता है कराहता चिल्लाता है और जब तक उस अंग की पीड़ा शाँत नहीं हो जाती, रोता कराहता ही रहता है। इसी तरह मुखिया को अपने परिवार के किसी भी मनुष्य को चाहे वह छोटा हो, बड़ा हो, तरुण हो, वृद्ध हो, ज्ञानी हो, मूर्ख हो, समानता का बर्ताव रखते हुए उसकी तकलीफ में हाथ बंटाना चाहिये।
परिवार के अर्थ घर कुटुम्ब के मनुष्यों के समूह से लेकर और भी कई तरह के समूह हैं। जिन्हें परिवार कहते हैं यथा:—
प्रजा−राजा, सेना−सेनापति, जमात−महंत, विद्यार्थी−अध्यापक, शिष्य−गुरु इत्यादि कई प्रकार के परिवार और मुखिया हैं, और हर प्रकार के मुखिया के वास्ते अपने परिवार के प्रति ऐसी ही भाव रखने का नियम है।
मुखिया को अपने लिए अपने परिवार से बहुत अधिक सुविधा सामग्री प्राप्त करने की चेष्टा न करनी चाहिए। नहीं तो परिजन उससे असंतुष्ट रहने लगेंगे। घर के संचालक का कर्त्तव्य है कि वह अपने भोजन, वस्त्र, शौक, मौज में उतना खर्च न करे जो अपने आश्रितों एवं अनुयायियों के लिए न जुटा सके । अपने परिजनों की अपेक्षा जो स्वयं अधिक शौक, मौज करता है वह गृहपति कभी सफल गृह संचालक नहीं बन सकता।
यों थोड़ी बहुत बुराई सभी परिवारों में होती है। अनुयायी या परिजन भी सर्वथा निर्दोष या सद्गुणी नहीं होते। पर उनमें थोड़ी बुराई रहते हुए भी परिवार का संगठन चलता रह सकता है यदि संचालक में आदर्शवाद की समुचित मात्रा हो। इसके विपरीत संचालक का दोष भी अच्छे परिवार को छिन्न−भिन्न कर देने का कारण बन सकता है। ऐसे अनेकों आधुनिक तथा प्राचीन अनुभव उपलब्ध हो सकते हैं। रामायण में रावण, भागवत में कंस, महाभारत में कौरवों का नाश, कौटुम्बिक विरोध, और मुखिया की त्रुटियों के कारण ही हुआ स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। दैनिक जीवन में भी ऐसे उदाहरण सर्वत्र दीखते हैं।
जिन मुखियाओं को अपना संगठन या परिवार प्रिय है उन्हें रामायण से−श्री रघुनाथ जी के चरित्र से शिक्षा गृहण करनी चाहिए और अपने आश्रितों के साथ समुचित स्नेह, सहानुभूति, उदारता, सहृदयता एवं त्याग का उदाहरण उपस्थित करना चाहिए तब वह संगठन स्थिर रह सकना संभव हो सकेगा।
मनुष्य अनेक अभिमानों में मस्त रह कर प्रभु से विमुख बनता है। अभिमान एक प्रकार का बुखार है उसे उतारे बिना आध्यात्मिक स्वास्थ्य लाभ नहीं हो सकता।
(श्री प्रो. पी. रामेश्वरम)
जब आप अपना अध्यापन समाप्त करके कक्षा से बाहर निकल आते हैं तो विद्यार्थी चैन की साँस लेते हैं। आपके नौकर चाकर आपके सम्मुख आने से कतराते हैं। पता नहीं किस बात पर और कब आप बिगड़ खड़े हों। मित्रों और परिचितों को आम शिकायत है कि आप अपनी धाँय−धाय के सम्मुख किसी अन्य को बोलने का अवसर ही नहीं देते। पड़ौसी सभी इस बात पर एक मत हैं कि यह प्रोफेसर सदा सर्वदा अपने ही अपने मतलब की बात कहते हैं, और किसी पर क्या गुजरती है इसका कोई भी ध्यान नहीं रखते। मुस्कराहट आपके मुख पर आने से डरती है। वैसे भी बातचीत करते समय मुस्कराना आप ‘बेअवसर की बात’ मानते हैं। घर में चरण कमल रखते ही आपके बच्चों इधर उधर छिपने लगते हैं। पत्नी भयातुर हरिणी की भाँति मन ही मन परमात्मा से प्रार्थना करती हैं ‘अब की राखि लेहु भगवान’। न जाने किस बात पर बरस पड़े ये पति महाशय! क्या घर क्या बाहर, क्या दुकान पर, क्या मित्र मंडली में आपसे मन ही मन घृणा करने वालों की बाढ़ सी आ गई है। आखिर यह सब कैसे हो गया? और फिर कैसे इस घृणा को प्रेम व प्रशंसा में बदला जा सकता है? आइये विचारें।
दूसरों में अरुचि:—
आपको अपनी चिन्ताओं और समस्याओं से अवकाश ही नहीं मिलता, अतः आप दूसरों में आवश्यक रुचि का प्रदर्शन नहीं कर पाते। बदले में अन्य व्यक्ति यों की रुचि आपकी ओर नहीं होती। दूसरों के लाभ, एवं हित में अपनी रुचि दिखाना उसके हृदय को जीतने की पहली शर्त है। उदाहरण के लिये कुत्ता पर ध्यान दीजिये। उससे हमें क्या मिलता है। अरे मुर्गी अण्डे देती है तब उसे चुगा दिया जाता है, भैंस अथवा गाय दूध देती हैं और इसीलिए उन्हें चारा देते हैं पालते हैं मगर−सोचने की बात है। क्या कुत्ता भी कुछ देता है अथवा करता है अपनी रोटी कमाने के लिये? जी नहीं! वास्तव में कुत्ता अकेला जानवर है जिसे अपनी रोटी कमाने के लिये कोई भी काम नहीं करना पड़ता। वह अपना प्रेम, अपनी रुचि आपके प्रति सफलतापूर्वक प्रकट करता है। दूर से ही देखकर उल्लास प्रकट करेगा, आगे पीछे घूमेगा, पूँछ हिलाएगा। मानो उसे आपको देखकर अतीव प्रसन्नता हुई और बस। मनोविज्ञान का सिद्धान्त है कि दूसरों में अपनी वास्तविक रुचि प्रकट करने से, उनके हृदयों में अपने प्रति प्रेम और आकर्षण उत्पन्न किया जा सकता है। दूसरे व्यक्ति हमारी ओर तभी आकर्षित होंगे जबकि पहले हम अपनी रुचि उनमें, उनके लाभ व कल्याण में प्रदर्शित करें। प्रत्येक मनुष्य को ‘अहम्’ (मैं) प्यारा होता है, ‘तुम नहीं’। फोटोग्राफ के ग्रुप में सर्वप्रथम दृष्टि अपने ही चित्र पर पड़ती है न कि किसी अन्य पर। मैं और मेरा, मनुष्य को सदैव सर्वोपरि रहा है। इस भाँति अपना नाम प्रत्येक व्यक्ति को संसार भर के सभी शब्दों से अधिक प्यारा होता है। बातचीत करते समय यह तथ्य हमारे मस्तिष्क में विद्यमान रहना चाहिये।
मुँह लटकाए:—
किसी से भी मिलने पर, आपको मुँह लटकाकर माथे पर सिकुड़न डाल कर बातचीत करने का अभ्यास पड़ चुका है। कोई आपकी ओर तभी आकर्षित होगा जबकि आप के हाव भाव से उसे यह मालूम पड़े कि आप कहना चाह रहे हैं “कि मुझे आप से मिलकर अतीव हर्ष हो रहा है। मुझे आप बहुत प्रिय हैं”। अस्पष्ट शब्दों से, हाव भाव से यह बातें अवश्य प्रकट होनी चाहिये बस घृणा का अन्धकार फट जायेगा और प्रेम व प्रशंसा की उषा मुस्कराती दृष्टिगोचर होने लगेगी। इस अप्रयत्न में मुस्कान को जादू आपकी सहायता करेगा। बातचीत प्रारम्भ करते समय, अथवा यथास्थान अनुकूल परिस्थिति देखकर, थोड़ा सा मुस्करा दीजिये। मुस्कान बदले में मुस्कराहट अवश्य लायेगी। अपने पारस्परिक सम्बन्धों पर मुस्कान का प्रत्यक्ष प्रभाव देखिये।
सुनेंगे नहीं:—
वार्त्तालाप करने में, दूसरों को बोलने का अवसर देना आप भूल ही चुके हैं। केवल अपना राग अलापेगें, दूसरे की नहीं सुनेंगे। “मैंने यह किया, यह करूंगा। मैं चाहता हूँ.....” दूसरा व्यक्ति कुछ कहना चाहता है, कुछ कह भी रहा है। मगर कौन प्रतीक्षा करे पूरा सुनने की? काट दी बात और लगे अपनी जड़ने। भला दूसरों की (हित की?) बात सुनने में कौन अपना समय नष्ट करें?
विद्वानों को मत इसके विरुद्ध है। वे कहते हैं “दूसरों को अपनी बात खुलकर कहने का अवसर दीजिये वरन् उन्हें छोटे प्रश्न करके और अधिक बोलने की प्रेरणा दीजिये”। डा. जौन्सन का मत है− एक प्रिय वक्त बनने के लिये आवश्यक है कि अच्छा श्रोता बना जाये। यदि आप दूसरों की बात ध्यान से सुनेंगे तो अपने आप आपसे प्रेम करने लगेंगे और घृणा का भाव कपूर की भाँति उड़ जायेगा।
कौन श्रेष्ठ है?
अपनी महानता व श्रेष्ठता की छाप अन्य व्यक्ति −यों पर थोपना आपकी आदत बन चुकी है। दूसरों की आलोचना करना, उनकी कमियों को प्रकाश में लाना आपको पसन्द हो चला है। आप सही बात (!) कहते हैं, चाहे दूसरों को बुरी ही लगे। काने का काना अवश्य कहेंगे। अलबत्ता उसके गुणों को भूल जाएंगे।
सुप्रसिद्ध विचारक एमर्सन का मत है कि “बातचीत करने में इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि आपकी बातचीत से श्रोता अपने को महत्वपूर्ण व महान समझे” डेल कार्नेगी का कहना है कि श्रोता की आलोचना न करे। उसके अवगुणों को नहीं, प्रत्युत गुणों को प्रकाश में लावे। उसमें अगर कोई विशेष बात है, तो उसकी सत्य−प्रशंसा करे”। पत्नी के सुघड़ कार्यों की, उत्तम भोजन की, आकर्षक मुखाकृति की, तथा लम्बे केशों की प्रशंसा में कहे गये दो शब्द आपके प्रति आकर्षण बढ़ाने में प्रभावपूर्ण सिद्ध होंगे। मित्रों, प्रियजनों, परिचितों, नौकरों तथा अन्य संपर्क में आने वाले व्यक्ति यों में कोई तो गुण होगा ही। उसी को लेकर, सावधानी के साथ उनकी सत्य−प्रशंसा करके, यदि उनके गौरव को जागृत करेंगे, तो आपके प्रति उनके घृणा के भाव प्रेम में बदल जायेंगे, और आप अपने चारों ओर इसी भूतल पर स्वर्ग की स्थापना करने में समर्थ होंगे।
(कुमारी भारती)
तुम समझते हो खाने−पीने के साथ अध्यात्म का कोई सम्बन्ध नहीं। वास्तव में अध्यात्म का श्रीगणेश भोजन से ही होता है। अध्यात्म भी एक प्रकार का भोजन है। आध्यात्मिक भोजन की शुद्धता और उपयोगिता तुम्हारे उस आहार पर निर्भर है, जो तुम सुबह−शाम खाते हो। सदा अपने भोजन की पवित्रता का ध्यान रखो।
तुम्हारे शरीर और मन में असुर के प्रवेश का द्वार तुम्हारी जिह्वा ही है। रस लेने के लिए तुम जो आवश्यक भोजन करते हो, इसी में असुर अन्दर प्रविष्ट होता है। सदा इस द्वार पर सावधान रहो।
भोजन की पवित्रता के लिए प्रथम आवश्यकता यह है कि जो कुछ तुम खाने के लिए लो, वह निर्मल, साफ तथा गुणकारी हो। इसके साथ यह भी आवश्यक है कि भोजन के पात्र, स्थान और निर्माता सब स्वस्थ और साफ हो। मन की पवित्रता भी आवश्यक है, इसके बिना भोजन हानिकर हो सकता है।
उपनिषद् के ऋषि के अन्न पर निर्भर है। बनाया है। सारा प्राणि−जगत अन्न पर निर्भर है। मानव−समाज का समूचा ढांचा, अन्न पर ही बना है, इसलिए अन्न बृहत् है−महान है। उस अन्न की पूजा करो। पूजा करने का अर्थ फूल चढ़ाना और आरती उतारना नहीं है। पूजा का सही अर्थ तो यही है कि पूज्य पदार्थ का यथोचित प्रयोग किया जाय। अन्न व्यर्थ न जाय, उसका उचित मात्रा में विधिवत् व्यवहार किया जाय, यही अन्न की सच्ची पूजा है। जो खेत खाली पड़े हैं, उनमें अन्न पैदा करना, आज के युग की अन्न ब्रह्म पूजा ही है। वास्तव में आज के अन्न संकट−काल में, अन्न ब्रह्म ही है, एक−एक दाना अन्न का सही उपयोग करना सीखो।
खाना ही अन्न का पूरा उपयोग नहीं। अन्न का पूरा उपयोग तभी होगा, जब तुम कम से कम खाकर उससे पूरा पूरा लाभ उठाना सीखोगे। कम खाना भी एक शिक्षण का विषय है। कम खाओ।
आज तुम्हारा भोजन केवल जिव्हा के रस और पेट भरने के लिए होता है, इसीलिए तुम पके हुए स्थूल अन्न के साथ, आर्द्र शाक−दाल आदि का प्रयोग करते हो, जिससे तुम अधिक से अधिक खा सको। इतना ही नहीं, मिर्च−मसाले, चटनी, आचार आदि से जिव्हा पर सदा इंजेक्शन करके तुम उससे अधिक से अधिक खाने को प्रेरित करते हो। इस प्रकार तुम भोजन के द्वारा अपनी आयु कम कर रहे हो, जबकि तुम्हारी आयु को बढ़ाने का साधन हो सकता है, और है। यदि तुम जीवित रहने के लिए भोजन लो और उसे चबा−चबा कर खाओ, तो निःसन्देह तुम्हारा भोजन आज से आधा हो सकता है, अधिक पौष्टिक हो सकता है और तुम्हारे शरीर को अधिक सक्रिय बना सकता है। तुम्हारा यह भ्रम है कि अधिक खाने से अधिक बल आता है। अधिक खाने की भी एक आदत बन जाती है। जीवित रहने के लिए भोजन जितनी मात्रा में चाहिए वही आवश्यक है। इसके लिए कम खाने का अभ्यास करो।
जब देश में तुम्हारे सामने लाखों स्त्री−बच्चों के भूखे मरने की समस्या है, तब तुम्हें पेट भर कर खाने का क्या अधिकार है?
तुम यह कहते हो। कि आज भी तुम्हें भर−पेट खाना नहीं मिलता। तुम तो खाने के लिए दुनिया में आये मालूम होते हो। जीवित रहने के लिए खाने का आदर्श सामने रखो। कम खाने का अभ्यास करो, इससे तुम्हें आत्म−सन्तोष मिलेगा।
जिस प्रकार शरीर के लिए कम खाने का अभ्यास करो उसी प्रकार आत्मा के लिए भी कम खाने के अभ्यासी बनो। तुम आत्मा को भोजन देने के लिए कितने ग्रन्थ पढ़ते हो, कितने उपदेश सुनते हो, परन्तु कभी इससे कुछ को पचाने का भी अभ्यास किया है तुमने? ध्यान रखो, आत्मिक भोजन भी कम से कम लो और उसे खूब हजम करने का प्रयत्न करो। कम खाओ।
(पं. राजकिशोर मिश्र, पटियाली)
विशद् गायत्री महायज्ञ का महान् कार्यक्रम अपनी सुनिश्चित गति विधि के साथ ठीक प्रकार चलता जा रहा है। गत चैत्र की नवरात्रि में भारतवर्ष के प्रायः उसी प्रांतों से गायत्री उपासक तपोभूमि में आये और शास्त्रीय विधि व्यवस्था के साथ आचार्य जी के संरक्षण एवं पथ−प्रदर्शन में सबने अपने अनुष्ठान पूर्ण किये। प्रातःकाल 3॥ बजे उठने की घण्टी बज जाती थी। नित्य कर्म से निवृत्त होकर लोग 4॥ बजे जप पर बैठ जाते थे। तीनों यज्ञ शालाओं में सूर्योदय के समय यज्ञ प्रारम्भ हो जाते थे। यह जप और हवन का कार्यक्रम प्रायः 10॥ बजे समाप्त होता था। तीनों यज्ञ शालाओं पर विद्वान्, वेदपाठी आचार्यों द्वारा सब कार्य शास्त्रोक्त पद्धति से संचालित होता था। बारी−बारी से सभी साधक हवन करते थे। प्रायः सभी साधकों को प्रतिदिन हवन करने का अवसर मिलता था।
मध्याह्न का भोजन विश्राम के बाद 2॥ से 6॥ बजे तक प्रवचन होते थे। गायत्री के तपस्वी उपासक श्री. प्रभु आश्रित जी महाराज, दर्शनशास्त्र एवं अध्यात्म तत्वज्ञान के मर्मज्ञ प्रो. त्रिलोकचन्दजी, श्री स्वामी प्रेमानन्द जी महाराज, श्री गोस्वामी कृष्ण बल्लभ जी व्याख्यानवाचस्पति आदि अनुभवी सत्पुरुषों के आध्यात्मिक विषयों पर बड़े ही मार्मिक प्रवचन हुए। आचार्य जी का प्रवचन भी नित्य ही होता था। इन अनुभव पूर्ण शिक्षकों ने श्रोताओं को बहुत प्रभावित किया।
सायंकाल को 6॥ बजे गायत्री मंदिर की पूजा उपासना में तथा शेष रहे हुए जप को पूर्ण करने में साधक लग जाते थे। भोजन करने के बाद भगवत् स्मरण करते हुए सब लोग शयन करते थे। तीन दिन सामूहिक तीर्थ यात्रा का कार्यक्रम रखा गया था। एक दिन रेल से सब लोग वृन्दावन गये। एक दिन मोटर द्वारा गोवर्द्धन, जतीपुरा, राधाकुँड, नन्दगाँव, बरसाना की यात्रा हुई। एक दिन मोटर से गोकुल, महावन, ब्रह्मांड घाट, दाऊजी के दर्शन किये गये। सामूहिक तीर्थ यात्रा का आनन्द बड़ा ही सरस तथा आनन्द दायक रहता था। अन्तिम दिन सबने अपने अपने अनुष्ठानों का तर्पण, मार्जन किया और पूर्णाहुति की। जिन्हें यज्ञोपवीत तथा मंत्र दीक्षा लेनी थी उनके लिए वह संस्कार विधिवत् कराया गया। विदाई का हृदय को गद्-गद् कर देने वाला दीक्षान्त भाषण देते हुए आचार्य जी ने भागीदारी के प्रमाण−पत्र, यज्ञ भस्म, माता का चित्र, प्रसाद आदि देते हुए आगन्तुकों को आशीर्वाद के साथ विदा किया।
तपोभूमि में सुविधापूर्वक 50−60 व्यक्ति यों के ठहरने का स्थान है। पर नवरात्रि में लगभग 200 साधक ठहरे हुए थे। स्थान संकोच होते हुए भी परस्पर का प्रेम, सहयोग तथा सेवा भाव इतना अधिक था कि किसी को कुछ असुविधा प्रतीत होना तो दूर रहा सभी इस स्वर्गीय वातावरण में रहने के अपने सौभाग्य की सराहना करते थे। विदा होते समय अधिकाँश की आँखों से आँसू छलकते थे, यहाँ से जाने की इच्छा न होते हुए भी साँसारिक कर्त्तव्यों की विवशता के कारण जाना पड़ रहा था, इससे सभी के चित्त बड़े खिन्न दीखते थे। साधक आपस में गले मिलते और फिर आकर आपस में मिलने की प्रतिज्ञा करते थे। गायत्री परिवार वस्तुतः एक परिवार है इसका प्रत्यक्ष दृश्य इन नवरात्रि के दिनों में आंखों के आगे से प्रत्यक्ष घूम जाता था। निराहार केवल जल लेकर नौ दिन उपवास करते हुए भी आचार्य जी सब साधकों का जितना ध्यान रखते थे उससे उनका वात्सल्य और स्नेह सर्वत्र फैला फिरता दीखता था। उन दिनों पृथ्वी पर स्वर्ग के दृश्य आंखों के सामने यहाँ घूमते हुए दृष्टिगोचर होते थे। इस प्रकार नवरात्रि को आयोजन बड़े ही आनन्दमय वातावरण में समाप्त हुआ।
आगरा निवासी श्री भगवती प्रसाद गुप्त ने इसी पुनीत अवसर पर विधिवत् वानप्रस्थ लेकर अपना जीवन गायत्री माता के चरणों में अर्पण कर दिया। अब वे गायत्री तपोभूमि की सेवा साधना में ही सर्वतोभावेन लगेंगे। संस्कृत के उद्भट विद्वान प. जय नारायण जी ब्रह्मचारी ने गायत्री तपोभूमि में रह कर संस्कृति विद्यालय चलाने का व्रत लिया। खण्डवा के पं. नन्दकिशोर जी उपाध्याय जो सार्वजनिक सेवा एवं स्वाध्याय में ही अपना जीवन लगाते रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि गायत्री ज्ञान प्रसार में अपना जीवन लगाने को संकल्प करते हैं और अगले वर्ष इसी चैत्र में होने वाले नरमेध यज्ञ में अपना जीवन विधिवत् होने देंगे। सिद्ध श्री स्वामी सन्तोषानन्द जी महाराज यहाँ की वस्तुस्थिति को देखकर इतने प्रभावित हुए हैं कि उन्होंने अपने अन्यत्र के कार्यक्रमों को स्थगित करके यहीं निवास करने का निश्चय किया है। पं. भरतराम अवस्थी भी ऐसा ही निर्णय करने की बात सोच रहे हैं। पं. तारकेश्वर जी का झा तो गतवर्ष से ही अपना सब कुछ होम कर तपोभूमि में अनन्य सेवा कर रहे हैं। आत्मदान करके गायत्री माता की महा महिमा का पुनीत संदेश घर घर पहुँचाने के लिए अनेक और भी आत्माएं तैयारी कर रही हैं। अपने पारिवारिक कार्यों को करते हुए, अधिक से अधिक समय बचा कर अपने क्षेत्र में कार्य करते रहने वाली जागृत आत्माएं तो अनेक हैं जो अपने अपने क्षेत्र में अपने आपको दीपक की तरह जलाकर प्रकाश फैला रही हैं। इस गतिविधि को देखते हुए यह सोचने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि लुप्त प्रायः गायत्री विद्या का संदेश घर घर पहुँचेगा और उसके फलस्वरूप भारतीय संस्कृति की इस देश में शीघ्र ही पुनः प्रतिष्ठापना होगी।
गायत्री परिवार के सभी सदस्यों को क्रमशः एक दूसरे से परिचित करा देने और पूरे परिवार का एक स्थिर सम्मेलन स्थायी रीति से दृश्य रूप में उपस्थित कर देने की दृष्टि से ऐसा विचार किया गया है कि तपोभूमि के विशेष आयोजनों में आते रहने वाले साधकों के सामूहिक चित्र अखण्ड ज्योति में छपते रहें। इस प्रकार कुछ ही समय में प्रायः सभी गायत्री उपासकों को अन्य उपासकों के नाम और चित्रों से परिचय हो जायगा। इस योजना के अनुसार गत चैत्र की नवरात्रि में मथुरा आये हुए साधकों के कुछ चित्र इस मास की अखण्ड ज्योति में छापे जा रहे हैं। जो चित्र इस मास नहीं छप सके हैं वे अगले अंकों में छपेंगे। अब अगला सरस्वती यज्ञ जेष्ठ सुदी 1 से लेकर जेष्ठ सुदी 10 तक होगा। इसमें आने वालों के फोटो भी इसी प्रकार छपेंगे जिससे जो लोग मथुरा न आ सकें उन्हें घर बैठे यहाँ आने वालों का परिचय प्राप्त हो सके। यह चित्र समूह आगे चल कर एक बड़ी पुस्तक चित्रावली के रूप में भी छाप दिया जायगा। जिसमें सभी गायत्री उपासक परस्पर भेंट करने का आनन्द घर बैठे ले सकें।
चैत्र नवरात्रि के सामूहिक अनुष्ठान में बहुत ही आनन्द रहा। इस आनन्द का लाभ करने के लिए लोग अपना मूल्यवान समय और दूर दूर से आने का कि राया भाड़ा खर्च करते हैं, इसके बदले में जो कुछ उन्हें प्राप्त होता है वह कहीं अधिक मूल्य का होता है। इस प्रकार इन उत्सवों में भाग लेने वाला प्रत्येक उपासक प्रसन्नता, आशा, आनन्द, उत्साह और सफलता की मुख मुद्रा के साथ विदा होता है। थोड़े दिनों यहाँ रह लेने पर ऐसा लगता है मानों यहीं हमारा स्थायी घर है, इसे छोड़ते समय प्रायः सभी की आँखें भर आती हैं। तपोभूमि जिन उद्देश्यों एवं आदर्शों को लेकर बनी है उसकी मूर्तिमान स्वर्गीय झाँकी ऐसे अवसरों पर आसानी से सभी की आँखों के सामने उपस्थित हो जाती है।
जेष्ठ सुदी 1 से लेकर 10 दिन तक सरस्वती यज्ञ का अब दूसरा आयोजन है। इसमें विद्यार्थियों को जीवनोपयोगी शिक्षाओं की ठोसे शिक्षा व्यवस्था अनुभवी विद्वानों द्वारा कराई जायगी साथ ही पुष्टिवर्धक औषधियों के हवन से छात्रों का मानसिक धरातल विकसित किया जायगा। इसमें भाग लेने के इच्छुक अभी से स्वीकृति प्राप्त कर लें क्योंकि सीमित संख्या में ही छात्र लिये जावेंगे।
वर्ष के अन्य महीनों की अपेक्षा ग्रीष्म में किसान व्यापारी, विद्यार्थी, अध्यापक आदि अधिकाँश वर्गों के लोगों को फुरसत रहती है। कुछ लोग ऐसे हैं जो इस फुरसत को आराम, आलस्य या मनोरंजन में व्यतीत करते हैं पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवन के बहुमूल्य क्षणों में से एक को भी व्यर्थ नहीं जाने देते और इस फुरसत के समय का कड़कड़ाती गर्मी में भी सदुपयोग कर लेते हैं। वस्तुतः यह तपश्चर्या का समय है। इन दिनों सूर्य तपता है, पृथ्वी तपती है, वायु, जल, आकाश सभी तपते हैं, तपस्वियों की तपश्चर्या का भी यह श्रेष्ठ समय है। आलस्य और आराम में नहीं इन क्षणों को किसी महान् कार्य में लगाया जाना चाहिए।
इस फुरसत के समय को गायत्री माता के लिए अर्पण करके विश्व व्यापी दैवी तत्वों की वृद्धि और पुष्टि का महत्वपूर्ण कार्य किया जा सकता है। गायत्री ज्ञान प्रसार एक ऐसा महान कार्य है जिसकी तुलना साधारण जप तप से नहीं की जा सकती। यदि लुप्त प्रायः गायत्री ज्ञान की पुनः प्रतिष्ठापना भारत के घर घर में हो जाय तो हमारा सब प्रकार काया−कल्प के कारण ही घर घर में सद्बुद्धि विराजमान थी और उसी के फलस्वरूप सर्वत्र सुख, शान्ति, सम्पत्ति, समृद्धि, सहृदयता, सेवा और सद्भावना बिखरी पड़ी रहती थी। इसी सद्बुद्धि की विशेषता के कारण भारत जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक और स्वर्गीय सम्पदाओं का स्वामी बना हुआ था। आज सर्वत्र कुबुद्धि फैली हुई है फलस्वरूप घर घर में दुख, दारिद्र, रोग, शोक, चिन्ता, क्लेश की बाढ़ सी आई हुई है। व्यक्ति गत और सामूहिक सुख शान्ति का एकमात्र कारण सद्बुद्धि है और उस सद्बुद्धि को लाने के लिये भौतिक उपाय तो किये ही जाते हैं पर उसका अत्यन्त ही प्रभावशाली, अचूक रामायण, आध्यात्मिक उपाय गायत्री उपासना है। यदि गायत्री विज्ञान की समुचित प्रतिष्ठापना हो जाय तो सद्बुद्धि की कमी न रहे, जहाँ सद्बुद्धि समुचित मात्रा में होगी वहाँ किसी भी वस्तु की कमी न रहेगी।
इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री माता की सर्वोत्तम पूजा यह दीखती है कि इस महान् ज्ञान के प्रकाश से अधिक से अधिक अन्तःकरणों को प्रकाशवान बनाया जाय। यों जप, ध्यान, हवन आदि सभी आवश्यक हैं पर इस लुप्तप्राय महा ज्ञान को प्रकाश में लाने के लिए प्रयत्न करना भी−एक ऐसी भागीरथी की गंगा को पृथ्वी पर लाने जैसी साधना है−जिसकी महत्ता का वर्णन नहीं किया जा सकता। राजा को अपना यश गान करने वाले चारण तथा सेवा सुश्रूषा करने वाले सेवकों की अपेक्षा वे मंत्री तथा सेनापति अधिक प्रिय होते हैं जो उसके राज्य की रक्षा, व्यवस्था, एवं वृद्धि के लिए जी जान से जुटे रहते हैं। गायत्री माता के लिए जो लोग ऐसा तप करते हैं वे साधारण पूजा उपासना करने वालों की अपेक्षा किसी भी प्रकार घाटे में नहीं रहते।
ग्रीष्म ऋतु के अगले दो महीनों में एक जेष्ठ सुदी 10 गंगा दशहरा गायत्री जयन्ती का, तथा दूसरा अषाढ़ सुदी 15 गुरु पूर्णिमा का पुनीत पर्व है। इन दो पर्वों में गायत्री माता तथा गुरु पिता के लिए कुछ सक्रिय कार्य करने की आवश्यकता है। देवता से कुछ प्राप्त करने से पूर्व निश्चय ही पूजा की श्रद्धाञ्जलि अर्पण करनी पड़ती है यही सनातन सत्य है। कुछ त्याग किये बिना तो साँसारिक व्यक्ति भी−मित्र कुटुम्बी स्वजन संबन्धी भी−प्रसन्न नहीं होते फिर पातृत्व की परीक्षा के लिये देवता भी आराधकों से त्याग और तप की अपेक्षा करें तो इसमें आश्चर्य की कुछ बात नहीं। गीता में भगवान ने भी यही कहा है कि “तुम देवताओं का उपकार करो−देवता तुम्हारा उपकार करेंगे, इस प्रकार परस्पर की सहायता से ही परम श्रेय प्राप्त होगा।”
सत्य को चरितार्थ करने के लिये अपनी डडडडडड की परीक्षा देने के लिये ग्रीष्म ऋतु का यह अवकाश काल एक उत्तम अवसर है। इन 60 दिनों में से 40, 24, 9 या जितने भी दिन निकाल सकें “गायत्री ज्ञान प्रचार अनुष्ठान” के लिए निकालने चाहिये। चारों धाम, सप्तपुरी आदि की तीर्थ यात्रा के लिए जिस प्रकार घर से निकलते हैं उसी प्रकार गायत्री माता का घर घर अलख जगाने के लिये भ्रमण करने में यह समय लगाना चाहिए। उपासना में किसी व्यक्ति को स्थिर बुद्धि से तभी लगाया जा सकता है जब उसे उस विषय की समुचित जानकारी करा दी जाय। इस प्रचार यात्रा का एक मात्र उद्देश्य अनेकों व्यक्ति यों को “गायत्री ज्ञान की समुचित जानकारी कराना” होना चाहिए। विशद् गायत्री महायज्ञ में जहाँ 125 करोड़ जप, 1 5 लाख आहुतियों का संकल्प है, वहाँ इसी काल में 125 हजार ( सवा लक्ष) मनुष्यों को गायत्री ज्ञान की समुचित जानकारी कराने का “ब्रह्म भोज” करना भी एक कार्यक्रम है। यज्ञ को पूर्ण करने के लिये जप हवन का क्रम यथावत् चल रहा है पर इस ब्रह्म भोज का कार्य अभी बहुत शिथिल है। भागीदारों ने जप हवन तो किये हैं पर ब्रह्मभोज की ओर बहुत ही कम ध्यान दिया है। इस ग्रीष्म ऋतु के दो महीनों में इसी दिशा में सब से अधिक प्रयत्न किये जाने की आवश्यकता है।
गायत्री ज्ञान प्रसार एवं ब्रह्म भोज की आवश्यकता पूर्ण करने के लिए अखंड ज्योति का जनवरी अंक ‘गायत्री ज्ञान अंक’ छापा गया है। इसका मूल्य असली लागत की अपेक्षा लगभग आधा (दो आना मात्र) रखा गया है। यह व्यवस्था इसलिए की गई है कि गायत्री संबन्धी जितनी शिक्षा, प्रवचन, उपदेश एक व्यक्ति कठिनाई से ही दे सकता है उतना वह अंक आसानी से दे सकता है और फिर अनेक आदमी बहुत कुछ पीछे तक भी इस पुस्तक से गायत्री ज्ञान लाभ करते रह सकते हैं। अन्न खिलाकर थोड़ी देर के लिए पेट की भूख बुझाने की अपेक्षा ज्ञान पिला कर आत्मा को पुष्ट करना सो गुना अधिक पुण्य माना गया है। आज की दृष्टि में यही सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण भोजन या ब्रह्म भोज हो सकता है। ग्रीष्म ऋतु में यह ब्रह्म भोज बड़े परिमाण में होना चाहिए। घर घर में गायत्री माता का सद्ज्ञान पहुँचा कर परम कल्याणकारिणी सद्बुद्धि की स्थापना करना अत्यन्त उच्च कोटि का पुण्य परमार्थ है।
इन गर्मियों में आप अपना कुछ समय केवल गायत्री ज्ञान प्रसार कार्य के लिए निकालिए। यदि कुछ दिन पूरे निकल सकें तो पहले अपने, फिर आस पास के, ग्राम नगरों में भ्रमण का प्रोग्राम बनाइए। दो चार प्रतिष्ठित तथा प्रभावशाली व्यक्ति यों को साथ में लेने का प्रयत्न कीजिए। गायत्री अंक अधिक संख्या में मँगा लीजिए। यह आपको उधार भी मिल सकते हैं। अपने जत्थे समेत सत्पात्रों के दुकान दुकान और घर घर जाइए तथा दो दो आने का यह अंक कड़ुई कुनैन की गोली की भाँति उन्हें दीजिए। अपने तथा अपने साथियों के प्रभाव से गायत्री अंक का मूल्य दो आना उनकी जेबों से निकलवा ही लीजिए। प्रभावशाली व्यक्ति अपने प्रभाव बल से शुभ कार्यों के लिए विपुल धन राशि जमा कर लेते हैं। तो क्या चार आना मूल्य की पुस्तक को दो आने में देने का कार्य सफल नहीं हो सकता। निश्चय ही कार्य बहुत सरल है। थोड़ी सी झिझक और मिथ्या संकोच छोड़कर यदि गायत्री प्रेमी सज्जन चींटी और दीमकों की तरह निकल पड़ें तो घर घर में गायत्री रूपी सद्बुद्धि की प्रतिष्ठापना हो सकती है। प्राचीन काल में गुरु के लिए शिष्य लोग भिक्षा माँग कर लाते थे। इस कार्य को भी वैसी ही बात मानकर गुरु दक्षिणा के रूप में यह श्रमदान सम्पादन किया जा सकता है। यदि आप एक दो प्रभावशाली व्यक्ति यों को अपने साथ रहने को तैयार कर लें और उस पाँच दिन का समय भी दे सकें तो निश्चय समझिये आपके द्वारा सैकड़ों की संख्या में ब्रह्म भोज हो सकता है। सैकड़ों घरों में सैकड़ों व्यक्ति यों के हाथों में गायत्री अंक पहुँचाया जा सकता है। सौ दो सौ दुअन्नियाँ इस प्रकार इकट्ठी कर लेना दुर्बल व्यक्ति त्व के मनुष्य के लिए भी कुछ कठिन नहीं है। केवल इच्छा, संकल्प और श्रद्धा की कमी ही इसमें बाधक हो सकती है। अन्यथा इस सरल योजना में सफलता तो शत प्रतिशत निश्चित ही है। 1080 या 240 या 108 या 40 गायत्री अंक बेचकर दुअन्नियाँ इस प्रकार इकट्ठा करने का संकल्प करके कोई भी प्रतिभावान व्यक्ति उसे बड़ी आसानी से पूरा कर सकता है।
जिन्हें पूरे दिनों का समय न मिलता हो वे कुछ घंटे प्रतिदिन इस कार्य में लगाने का निश्चय कर सकते हैं। जिन्हें बिलकुल भी फुरसत न मिलती हो वे समय दान के स्थान पर कुछ धन खर्च करके उतने मूल्य के अंक अपने स्वजन संबन्धी एवं परिचितों को पास भेंट स्वरूप भेज सकते हैं। जन्मदिन, विवाह, पुत्र जन्म, धन लाभ, आरोग्य लाभ, सफलता, पदवृद्धि, तीर्थयात्रा, पर्व, उत्सव आदि शुभ अवसरों पर गायत्री अंकों को उपहार स्वरूप अपने समाज में वितरण किया जा सकता है। पत्र व्यवहार द्वारा भी गायत्री संबन्धी शिक्षा प्रेरणा दूसरों को दी जा सकती है।
इस प्रचार यात्रा के साथ साथ तीन प्रकार के व्यक्ति यों को भी खोजते रहिए। (1) जो पारिवारिक जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं और अपना भोजन भार स्वयं उठाकर एक वर्ष तक महायज्ञ में सम्मिलित रहने तथा गायत्री तप करने के लिये मथुरा आ सकें। (2) जो कुछ संस्कृत जानते हों और अनेक यज्ञों, सोलह संस्कारों, तथा शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करके साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कार्य करना चाहें। ऐसे लोगों को भोजन प्रबन्ध भी हो सकता है। इस प्रकार के जो व्यक्ति मिलें उन्हें मथुरा जाने के स्वीकृति प्राप्त करने को कहना चाहिए। (3) जेष्ठ सुदी 1 से दस दिन तक सरस्वती यज्ञ में सम्मिलित होकर जो व्यक्ति अपनी बुद्धि वृद्धि करना चाहें उन्हें भी मथुरा आने की प्रेरणा देनी चाहिए। छात्रों के लिए सरस्वती यज्ञ में सम्मिलित होना बुद्धि विकास, चरित्र निर्माण एवं ज्ञानवृद्धि की दृष्टि से अतीव उपयोगी है। इस यज्ञ में आने वाले छात्रों को भोजन, ठहरना, रोशनी, सफाई, हवन, पूजा सामग्री आदि का कुल खर्च (12) मात्र रखा गया हैं। जबकि वास्तविक खर्च इससे कहीं अधिक पड़ेगा।
यों अखण्ड ज्योति एवं गायत्री परिवार के अधिकाँश परिजन महायज्ञ में भागीदार एवं संरक्षक बनते हैं तथा महायज्ञ का सफल बनाने के लिए अपने अपने ढंग से प्रयत्न कर रहे हैं। पर कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने अभी तक इस दिशा में सद्भावना रखने की अतिरिक्त प्रत्यक्ष रूप में कुछ कार्य नहीं किया है। ऐसे लोगों विशेष रूप से यह प्रार्थना है कि वे इन गर्मियों में कुछ न कुछ अवश्य करें। वे इतना तो कर ही सकते हैं कि इन 60 दिनों में 4 माला प्रतिदिन के हिसाब से महायज्ञ की एक भागीदारी का 24000 जप पूर्ण कर दें। गायत्री प्रचार के ब्रह्म भोज के लिए लोगों में बेचने या सत्पात्रों को दान करने के लिए 40 न हो तो कम से कम 10 गायत्री अंक अवश्य मंगालें। दो महीने तक प्रतिदिन आधा घंटा जप करने के लिये समय निकालने तथा ब्रह्मभोज के लिए सवा रुपये के 10 अंक मँगा लेने को बोझ इतना भारी नहीं है जिसे उठाने पर भी प्रतिकूल परिस्थिति में भी कठिन हो। हम चाहते हैं कि अखंड ज्योति परिवार का एक भी सदस्य ऐसा न रहे जो इन गर्मियों में “कुछ भी न करने” की निराशाजनक बात कहे। जो लोग अब तक जप, हवन, ब्रह्मभोज आदि का बहुत कार्य कर चुके हैं उन्हें भी इन दिनों ये शुभ कार्य और भी उत्साह के साथ करने चाहिये।
गायत्री महायज्ञ के भागीदार तथा संरक्षक बढ़ाना आवश्यक है जिससे यह महान् आयोजन अधूरा न रह जाय। जहाँ 40 से अधिक गायत्री उपासक ही वहाँ अगले वर्ष हम स्वयं आने का प्रयत्न करेंगे। जहाँ अधिक गायत्री उपासक होंगे वहाँ एक संगठन बनने तथा यज्ञ आदि का आयोजन होने की भी व्यवस्था हो सकती है। इन सबकी नींव गायत्री अंक का अधिकाधिक प्रचार ही हो सकता है।
स्मरण रहे किसी को पाप या पुण्य की प्रेरणा देने से जो कार्य होते हैं उनके भले बुरे फल की दशांश भाग उस प्रेरणा देने वाले को भी मिलता है। आपके द्वारा जो गायत्री प्रचार होगा उससे अनेक आत्माओं को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलेगी और संसार व्यक्ति आपकी प्रेरणा से सन्मार्गगामी न हो, उनके में पुण्य की वृद्धि होगी। इस सत्परिणाम में आप इसके अंश के भागीदार होते हैं। आपकी प्रेरणा से यदि 100 व्यक्ति गायत्री उपासना में लगे तो 10 व्यक्ति यों की उपासना के बराबर पुण्य आपको सदैव अनायास ही प्राप्त होता रहेगा। इस प्रकार यह प्रचार साधना अतीव उपयोगी, अधिक फलदायिनी और बहुत सरल सिद्ध हो सकती है। कदाचित किसी के शुभ संस्कार जागृत न भी हों, तो भी आपने जो प्रयत्न और परिश्रम किया है उसका मूल्य और महत्व अन्तर्यामी प्रभु से छिपा न होगा और वह उसका समुचित प्रतिफल देगा। ग्रीष्म ऋतु को पुनीत काल आरंभ हो गया। इन दिनों सूर्य तपता है। पृथ्वी तपती है, नदी, समुद्र, तपते हैं आप भी कुछ तप कीजिए। सद्बुद्धि रूपी गायत्री ज्ञान गंगा को घर घर में प्रवाहित करने के लिए भागीरथी की तरह तप करने के लिए आप भी कटिबद्ध हो जाइए।
—श्रीराम शर्मा आचार्य
(श्री सत्यप्रकाश जी शर्मा)
गायत्री तपोभूमि का आरंभ आत्मत्याग की आधारशिला पर हुआ है। इसकी नींव में ईंट ईंट में आत्म−त्याग एवं महान उद्देश्यों का सम्पुट लगा हुआ है। माता की कृपा से वह परंपराएं आगे ही बढ़ती चली जा रही हैं। अनेक गायत्री उपासक गायत्री मंत्र लेखन आदि अनेक प्रवृत्तियों के द्वारा अपना श्रम, समय और श्रद्धा इकट्ठी कर करके इस तपोभूमि को उसी प्रकार तेजस्वी बना रहे हैं जिस प्रकार त्रेता में असुरता से देवत्व की रक्षा करने के लिए ऋषियों ने थोड़ा थोड़ा रक्त इकट्ठा करके एक घड़ा भरा था और उस घड़े से जगत तारिणी सीता माता उत्पन्न हुई थीं। तपोभूमि को भी एक प्रकार से त्रेता जैसा रक्त घट ही बनाया जा रहा है। उसके निर्माण, पोषण, संचालन, सुव्यवस्था, आदि के लिए अनेकों उच्चकोटि की आत्माएं जिस गम्भीर श्रद्धा भावना एवं अनन्य तत्परता के साथ संलग्न हैं उसे देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है कि आज ब्रह्म दृष्टि से छोटा सा दीखने वाला यह आश्रम, कल सचमुच ही एक वास्तविक एवं चैतन्य तीर्थ बनकर रहेगा। अब तक अगणित घटनाएं इसके साथ ऐसी ही आत्मत्याग से भरी हुई जुड़ चुकी हैं। उस शृंखला में एक सुनहरी कड़ी अभी इस चैत्र की नवरात्रि के समय और भी जुड़ी है।
प्रो. त्रिलोकचन्द्र जी हिन्दू विश्व विद्यालय में लम्बी अवधि तक दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। उन्होंने दर्शन विज्ञान का सक्रिय जीवन में चरितार्थ करने के लिए उस पद से निवृत्ति ले ली और पिछले तीस वर्षों से धर्म, अध्यात्म, तत्वज्ञान एवं दर्शन की वैज्ञानिक शोध एवं साधना में अनन्य भाव से संलग्न हैं। उनका व्यक्ति गत जीवन इतना उत्कृष्ट है कि उसे देखने और विचारने से अनायास ही बड़ी प्रेरणा प्राप्त होती है। प्रोफेसर साहब की धर्मपत्नी श्रीमती सुशीला देवी उतनी विद्वान तो नहीं हैं, पर साधना, श्रद्धा, तपश्चर्या एवं आदर्शवादिता में अपने पतिदेव से किसी प्रकार पीछे नहीं है। इन थोड़ी सी पंक्ति यों में इन ऋषि दम्पत्ति का परिचय करा सकना कठिन है। यहाँ तो उनकी अनेकों महान् प्रक्रियाओं में से एक का उल्लेख किया जा रहा है जो तपोभूमि के साथ अभी हाल में जुड़ी है।
प्रोफेसर साहब आज से 1॥ वर्ष पूर्व भी तपोभूमि में कुछ दिनों के लिए पधारे थे। आचार्य जी के व्यक्ति गत संपर्क तथा तपोभूमि के वातावरण में उन्हें परम सन्तोष हुआ। इस बार वे दोनों चैत्र की नवरात्रि में अपनी एक विशिष्ट साधना को पूर्ण करने के लिए एक महीने के लिए फिर पधारे। इन महाभाग की अंतर्दृष्टि बहुत ही पैनी है। उन्हें आर से पार देखने में कुछ भी कठिनाई नहीं होती। गायत्री महायज्ञ का अत्यन्त महान कार्यक्रम, उसमें सहयोग करने की लोगों की कंजूसी, आचार्य जी का अपने आपको सर्वमेध के लिए समर्पण, उनके ऊपर पड़ी हई जिम्मेदारियों का भारी बोझ आदि की विचित्र परिस्थितियों को देख कर इस ऋषि दम्पत्ति की अन्तरात्मा में एक कोलाहल उठ खड़ा हुआ और वे सोचने लगे कि क्या हम लोग आध्यात्मिक सहयोग के अतिरिक्त इस महान आयोजन में कुछ भौतिक सहयोग नहीं कर सकते? अन्ततः उन्होंने एक उपाय सोच निकाला। प्रोफेसर साहब की धर्मपत्नी श्रीमती शुशीला देवी के पास बीस वर्षों से अनेक आग्रहों और अनुरोधों के बाद सौभाग्य चिन्ह स्वरूप बनवाई हुई सोने की चूड़ियां थीं। देवीजी ने अपने पतिदेव से आग्रह किया कि ऐसे पुनीत कार्य से बढ़ कर और कोई सौभाग्य चिह्न चूड़ियां इस महा यज्ञ का सामग्री खर्च चलाने के लिए आचार्य जी को सौंप देनी चाहिए। देवीजी का यह प्रस्ताव उनके पतिदेव को भी उचित लगा और दूसरे दिन दोनों ने वह एक मात्र जेवर आचार्यजी के सामने लाकर रख दिया।
यह प्रस्ताव सामने आने पर आचार्यजी सन्न रह गये। इतने उत्कृष्ट सन्तों का, इतनी महान भावना के साथ किया हुआ, ऐसा दान उन्हें आजतक अपने जीवन में कभी भी नहीं मिला था। उनके हाथ पैर कांपने लगे और इस अनोखे प्रस्ताव के पीछे काम करने वाली भावनाओं को देख कर उनकी आंखों से आंसू बरस पड़े। एकान्त कोठरी में इन तीनों की ही आंखें बरस रही हैं। भाव और दृष्टिकोण भिन्न भिन्न थे, तीनों ही तीन बातें अपने अपने दृष्टिकोण से सोच रहे थे पर अन्तरात्माओं में इतना सात्विक प्रवाह उफन रहा था कि किसी की आंखें बहना बन्द नहीं करती थीं।
आचार्यजी ने इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया। इतना बड़ा दान लेने का उनमें साहस नहीं हो रहा था। देने वालों का आग्रह अत्यधिक था। तीन दिन तक यह कलह दोनों पक्षों में बराबर चलता रहा। अन्त में विजय देने वालों की हुई, लेने वाला हार गया। चूड़ियां ले ली गईं, पर इस घोषणा के साथ कि इन्हें न तो बेचा जायगा और न हवन आदि में लगाया जायगा वरन् वे अपने पीछे छिपी हुई भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती हुई एक स्मारक के रूप में यहां रहेंगी और यहां की अन्य दर्शनीय वस्तुओं की भांति इन्हें भी सदा सुरक्षित रखा जायगा। चूड़ियों का मूल्य रुपये पैसे की दृष्टि से नहीं इनके पीछे छिपी हुई भावनाओं की दृष्टि से आंका जायगा। इस प्रकार यह दान रुपयों की दृष्टि से साधारण होते हुए भी भावनाओं की दृष्टि से महान है। इस दान ने गायत्री तपोभूमि की ईंट-ईंट में सम्पुटित आत्मत्याग की भावनाओं की शृंखला में एक महत्वपूर्ण कड़ी और जोड़ दी है। इससे तपोभूमि की अन्तःशक्ति में वृद्धि ही हुई है। यों सभी उपासक अपने अपने ढंग से महायज्ञ को सफल बनाने के लिए त्याग और सहयोग करते हैं उनकी जितनी प्रशंसा की जाय वह कम है, पर भावना की दृष्टि से यह तो एक अनोखी ही आहुति है।
[ श्री विद्यावती मिश्र ]
जीवन में विष भी अमृत भी, जिसको जो मिल जाये।
मानस में अंगार, अधर पर हास, नयन में पानी, मिल कर रचते हैं मानस की अक्षर अमर कहानी, यहाँ शूल हैं बहुत, यहाँ पर नहीं सुमन भी कम हैं, विश्वासों पर यहाँ टिके दुर्बल मानस के भ्रम हैं, नहीं जानता कवि वह किसके गीत मनोरम गाये! जीवन में विष भी अमृत भी, जिसको जो मिल जाये!
मरुथल को भी मिटा न पायी है गंगा की धारा, रोक विसर्जन को न सका है कोई सुदृढ़ किनारा, माली के भय से रुका न है कलियों का मुस्काना, पतझर बांध न पाया कोकिल का मद भरा तराना, कुछ ऐसा है क्रम कि प्रकृति ने सुख-दुख साथ बनाये! जीवन में विष भी अमृत भी, जिसको जो मिल जाये!
जिसको विष मिलता अमृत की है उसको अभिलाषा, अमृत पीने वाला भी है विष पीने का प्यासा, है दोनों के बिना तुष्टि का प्रिय वरदान न मिलता, दोनों को लेकर जीवन का कुसुम मनोहर खिलता, क्यों फिर कोई अमृत मांगे या विष को ठुकराये! जीवन में विष भी, अमृत भी जिसको जो मिल जाये!
*समाप्त*