(श्री. विद्यावती मिश्र)
अक्षय कोष मिला जब मैंने अपना सारा कोष लुटाया!
मैंने सब देकर सब पाया!! जाने कब से मैं पागल बन,
मिट्टी को समझी भी कंचन, किन्तु तुम्हारी कृपा किरण ने दिया मुझे अनमोल ज्योति कण,
जिसके दिव्य प्रकाश पुँज से मैंने नूतन पंथ बनाया!
लक्ष्य प्राप्त करने का यदि प्रण करो विभव का दूर प्रलोभन,
कहीं न जड़ करदे पद की गति- सोने चाँदी का आकर्षण,
छाया बन कर पंथ न रोके मन की मृग तृष्णा की माया!
देव तुम्हारा पूजन अर्चन, करता है मन प्रतिपल प्रतिक्षण,
रोक नहीं मुझको पायेंगे सुख सौरभ के स्वप्न सुहावन,
जीवन का सर्वस्व लुटाकर पद-पद्यों में ध्यान लगाया!
मनुष्य व्यक्तिगत रूप से एवं सामूहिक रूप से भौतिक सुख-साधनों और आन्तरिक शान्ति-संतोष का अभिलाषी रहता है। उन्हीं दोनों को प्राप्त करने के लिए अपनी समझ और परिस्थिति के अनुसार नाना प्रकार के विचार और कार्यक्रम बनाता है। और उनके निमित्त अपने आपको लगाये रहता है। लोगों में कार्य और तरीके, भिन्न भिन्न प्रकार के एक दूसरे के विरोधी तक भले ही हों-पर मूलतः इच्छा, अभिलाषा, कामना, प्यास सब की एक ही है। इस एक ही कामना से प्रेरणा से समस्त मानव प्राणी प्रेरित, आन्दोलित, कार्यसंलग्न, सुखी एवं दुखी रहते हैं।
प्राचीन काल में तत्वदर्शी ऋषियों ने बड़े ही सूक्ष्म आधार पर मनुष्य की इस समस्या का अध्ययन किया था। आज के वैज्ञानिक जिस प्रकार अणु-परमाणु प्रभृति, प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों को ढूंढ़ने में जुटे हुए हैं, उससे अनेक गुनी तत्परता के साथ ऋषियों ने यह खोज की थी कि मनुष्य की चिरन्तन अभिलाषा, सुख-शान्ति की उपलब्धि किस आधार को अपनाने से हो सकती है? उन्होंने हजारों लाखों वर्षों के अन्वेषण बाद जो निष्कर्ष निकाला, उसे पूर्ण व्यवस्थित रूप से संसार के सम्मुख रख दिया। उस निष्कर्ष एवं आधार को लाखों वर्ष तक विभिन्न प्रकार से, विभिन्न स्थानों पर आजमाया गया और अन्ततः लोगों को इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा कि यह ऋषि-प्रणीत विचार-पद्धति और कार्य- प्रणाली ही एकमात्र ऐसी पद्धति है, जिसे अपना कर मनुष्य स्वयं सुख-शान्ति से रह सकता है और अपने संपर्क में आने वाले अन्यों की भी सुख शान्ति में वृद्धि कर सकता है। इस (1) जीवन की विभिन्न समस्याओं पर अमुक दृष्टिकोण के अनुसार विचार करने और (2) जीवन की विभिन्न परिस्थितियों में अपनाई जाने योग्य कार्य पद्धतियों को नाम “संस्कृति” रखा गया।
यह तत्वज्ञान समस्त विश्व के लिए था, पर चूँकि इसका आविष्कार भारत में हुआ, इसलिए उसका नाम भारतीय-संस्कृति रखा गया। आज भी अनेक वस्तुएं ऐसी हैं, जो एक देश में पैदा होती या बनती है पर उनका उपयोग सारा संसार करता है। उन वस्तुओं को उस देश के निर्मित कहा या लिखा जाता है, पर इससे किसी अन्य देशवासी को उसके उपयोग में आपत्ति नहीं होती। भारतीय चाय, स्विट्जरलैंड की घड़ियां, वर्जीनिया का तम्बाकू, आदि को सभी देश वैसे ही उपयोग करते हैं जैसे, मानों ये अपनी ही हों। एवरेस्ट नामक एक पर्वतारोही ने हिमालय की सर्वोच्च चोटी खोज की, जो उस चोटी के नाम पर पर्वतारोही के सम्मान में ‘एवरेस्ट’ रख दिया गया। इसी प्रकार भारतीयों ने विश्व को एक परम सुख-शान्ति दायिनी विचार पद्धति, जीवन-यापन-शैली की खोज करदी, इसलिए उस ‘संस्कृति’ का नाम ‘भारतीय’ रख दिया गया। भारतीय-संस्कृति, वस्तुतः किसी जाति, देश सम्प्रदाय आदि तक कदापि सीमित नहीं है, वह तो समस्त मानव जाति के लिए समान रूप से उपयोगी एवं आवश्यक वस्तु है।
भारतीय-संस्कृति में बौद्धिक मानसिक, विचार क्षेत्रीय आधार यह है कि (1) सुख का केन्द्र भौतिक सुख सामग्री को न मानकर आन्तरिक श्रेष्ठता को मानना (2) अपने साथ कड़ाई और दूसरों के साथ उदारता, क्षमा और सहानुभूति पूर्ण का व्यवहार करना (3) अंतरात्मा में छिपे हुए व्यापार और सद्भाव को दूसरों के साथ अधिकाधिक विकसित एवं चरितार्थ करना (4) व्यक्तिगत आवश्यकताओं को घटाना और समय, शक्ति तथा योग्यता अधिकाँश भाग विश्व हित में लगाना (5) आलस्य और प्रमाद से बचते हुए परिश्रम और अनुशासन को मजबूती से पकड़ता तथा शुद्ध कमाई का उपयोग करना (6) अपने को एकाकी नहीं, वरन् विश्व मानव की महान मशीन का एक पुर्जा मास मानना और अपने स्वार्थ को विश्वस्वार्थ (परमार्थ) में घुला देना (7) दूसरों की कठिनाइयों को-परिस्थितियों को समझते हुए विचार भिन्नता, के प्रति असहिष्णु न होना (8) सर्वत्र स्वच्छता रखना और संयम से रहना (9) ईश्वर के सर्वव्यापी और न्यायकारी होने पर पूर्ण विश्वास रखते हुए, उसकी उपासना करते हुए अनीति से बचना। (10) निराशा, चिन्ता, क्रोध, शोक, लोभ, भय, मद, आदि उद्वेगों से बचते हुए मानसिक सन्तुलन को स्थिर तथा चित्त को प्रसन्न रखना। (11) अपने उत्तरदायित्वों और कर्तव्यों को पूरी तरह पालन करना (12) अनीति से लड़ने और धर्म-भावनाओं की रक्षा करने के लिए, कष्ट सहने को भी तैयार रहना। इस प्रकार के और शास्त्रों में विभिन्न रूपों से विस्तार पूर्वक लिये गये है। उनको किस परिस्थिति में? कैसे कौनसा आदर्श? किस प्रकार अपनाया जाय, इसके उदाहरण महाभारत, रामायण आदि कथा-ग्रन्थों में बड़े ही उत्तम रूप से समझाये गये हैं।
जब तक भारतीय-संस्कृति का आदर था, उसे लोग धर्म एवं ईश्वरीय आदर्श मानकर जीवन में व्यवहार करते थे, तब तक समस्त विश्व में परम शान्ति का साम्राज्य था। घर-घर सुख-शाँति विराजती थी। मनुष्य-मनुष्य के बीच में अपार प्रेम था। एक दूसरे के लिए क्या त्याग कर सकता है इसके आदर्श उदाहरण उपस्थित करने के लिए हर एक व्यक्ति प्रतिस्पर्धा करता था, एक दूसरे से आगे बढ़ना चाहता था। ऐसी स्थिति में धन धान्य की कभी भी कदापि नहीं रह सकती, वे सब प्रकार स्वस्थ दीर्घजीवी प्रसन्न, सन्तुष्ट दिखाई देते थे। भारतीय संस्कृति का अनुसरण करने वाले को भौतिक सुख और आन्तरिक शान्ति का होना सुनिश्चित है, इस तथ्य को हर व्यक्ति पर प्रयोग करके ऋषियों ने यह दिखा दिया था कि मानव को चिरन्तन अभिलाषा, सुख-शान्ति को निश्चित रूप से प्राप्त करने का एकमात्र उपाय वही है-जिसे “संस्कृति” कहते हैं। इस “संस्कृति” को पाकर मानवता धन्य हो गई थी। संसार ने भारतीयों की इस महान देने के प्रति परिपूर्ण कृतज्ञता प्रकट करते हुए इसका नाम भारत-निर्मित-विश्व-संस्कृति संक्षेप में भारतीय-संस्कृति, रखा। उसकी विजय दुन्दुभी विश्व को कोने कोने में बजी। इसी आवार पर भारत को चक्रवर्ती एवं जगद्गुरु कहा गया।
समय के कुप्रभाव दे दूसरी विचार धाराओं का उद्भव हुआ, जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ साधन, अपार धन संग्रह, अनियंत्रित काम-क्रीड़ा, लूट खसोट, कृतज्ञता का अभाव, धोखाधड़ी, छल प्रपंच, षड्यंत्र, ईर्ष्या-द्वेष, आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता, कर्तव्यों की उपेक्षा, विलासिता, फिजूलखर्ची, नशेबाजी आदि दुष्ट वृत्तियों का उभार हुआ। जितना जितना मनुष्य इनकी आरे बढ़ा, उतना ही उतना व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन उलझन भरा कंटकाकीर्ण, दुखी और असन्तुष्ट होता गया। आज स्वार्थपरता और अधिक भोग ऐश्वर्य ही मनुष्य का लक्ष बन गया है। एक दूसरे के साथ सहयोग, प्यार उदारता, क्षमा, सहायता सेवा, स्नेह आदि का श्रेष्ठ व्यवहार करने की अपेक्षा दूसरों का बुरे में बुरा अहित करके भी अपना लाभ कमाने में संलग्न है। सर्वत्र दुख और भ्रष्टाचार का बोल बाला है। अपराधों की संख्या दिन दूनी, राज चौगुनी बढ़ रही है। नैतिकता की दीवार, बुरी तरह जर्जर हो रही है। हर आदमी एक दूसरे के प्रति अविश्वासी एवं सन्दिग्ध बना हुआ है, किसी को किसी पर भरोसा नहीं, एक को दूसरे के इरादों में कुटता, विश्वासघात और आक्रमण की गन्ध आती है। परस्पर ये सम्बन्ध बिगड़ने कर मूल कारण, मनुष्यों की व्यक्तिगत स्वार्थपरता एवं भोग ऐश्वर्य की प्रचण्ड कामनाएं आसुरी गुण-कर्म-स्वभावों की कुप्रवृत्तियाँ ही हैं। इन्हीं से सारा वातावरण दूषित कर दिया है। घर-घर में तन-तन मन-मन में क्लेश, कलह, ईर्ष्या-द्वेष, चिन्ता, भय क्रोध, शोक, अभाव, अज्ञान की अग्नि जल रही है। मनुष्य की शारीरिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक अन्तर्राष्ट्रीय, भौतिक, अध्यात्मिक सभी समस्या उलझ गई हैं और वही किंकर्तव्य विमूढ़ होकर आत्म घात करने जैसी स्थिति में जा पहुँचा है। सर्वत्र निराशा और अन्धकार का साम्राज्य छाया हुआ है। इस संकट को उत्पन्न करने वाली विचार पद्धति एवं कार्य शैली को प्राचीर काल में “आसुरी संस्कृति” कहते हैं। दैवी संस्कृति को परास्त करके आज यह आसुरी संस्कृति अपना विजय नृत्य कर ही है। मंत्र मोहित की तरह सारा मानव समाज उसी मायाविनी की ताल में माल लगाकर नाच रहा है। और सर्वनाश के गर्त में गिरने के लिए तेजी से कदम बढ़ाता चला जा रहा है।
क्या यह क्रम इसी प्रकार चलते रहना उचित है? क्या इन सर्वनाश की घड़ियों में हमें कुछ भी नहीं करना है? क्या भारतीय संस्कृति को नष्ट होने दिया जाय? क्या विश्व मानव के पतन और उत्थान में हमारा कुछ भी कर्तव्य नहीं है? इन प्रश्नों पर जब कोई ऐसा व्यक्ति विचार करके, जिसकी अन्तरात्मा का प्रकाश सर्वथा बुझ नहीं गया है-तो उसके भीतर से एक टीस उठती है और लगता है कि सर्वनाश की इन घड़ियों में उसे चुप नहीं बैठना चाहिए वरन् कुछ करना चाहिए। कुछ करने का समय अब आ गया है। ऋषियों की स्वर्गीय आत्माएं हमें पुकार रही हैं। अब यह समय आ गया है जब इन पुकारों को अनसुनी न करके-हमें अपने पवित्र धर्म कर्तव्यों के लिए उठ खड़ा होना है गायत्री महायज्ञ की योजना इस महान साँस्कृतिक पुनरुत्थान का आरम्भिक देव पूजन है। इस मंगलाचरण के बाद हमें वह कार्यक्रम बनाना है जिसके आधार पर मनुष्यों को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाया जा सके और निराश अभाव ग्रस्त, अशान्त अन्तःकरणों में आशा की, समृद्धि की, सुख शान्ति की ज्योति जगाई जा सके। मानवीय आदर्शों, विचारों, उद्देश्यों कर्तव्यों, गुणों, स्वभावों, मर्यादाओं और कार्यक्रमों को हमें हर मस्तिष्क पे, हर हृदय में, हर शरीर में, हर घर में प्रवेश करना होगा ताकि सर्वनाश की ओर दौड़ती जा रही दुनिया को शान्ति की दिशा में मोड़ा जा सके। आइये हम सब मिल कर इसी साधना में संलग्न हों। व्यक्तिगत स्वार्थों को यहाँ तक कि स्वर्ग और मुक्ति को भी इस महान आदर्श के लिए ठुकरा कर हम सच्चे त्याग का परिचय देंगे, तो अपना ही नहीं असंख्यों अन्य आत्माओं का भी कल्याण करने में समर्थ हो सकेंगे। ईश्वरीय इच्छा और प्रेरणा का यह प्रवाह हमें और आपको बलात् इस कार्यक्रम में लगाना चाहता है।
आइए इस ईश्वरीय इच्छा की पूर्ति के लिए भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए मिल जुल कर कुछ कार्य करें। जिनके पास जितना समय और अवकाश हो उन्हें उतना समय साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए लगाना चाहिए। जो सज्जन योग्यता ओर आरोग्य की दृष्टि से राष्ट्र के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हों। और पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके हों वे अपना जीवन पूर्ण रूपेण संस्कृति सेवा के लिए अर्पित कर सकते हैं ऐसे लोगों का आत्मदान स्वीकार करने के लिए गायत्री तपोभूमि आदर पूर्वक प्रतीक्षा करती है।
(1) मथुरा में संस्कृति विश्व विद्यालय को चलाने के लिए उसकी व्यवस्था तथा शिक्षा पद्धति में योग देने के लिए (2) देश व्यापी भ्रमण करके भाषण, संगठन, प्रचार करने के लिए (3) साँस्कृतिक तत्वज्ञान की खोज करने के लिए भारी स्वाध्याय करने एवं साहित्य निर्माण करने के लिए-सुयोग्य व्यक्तियों की हमें भारी आवश्यकता है। जो व्यक्ति लोक सेवा की साधना करते हुए जीवन लक्ष की प्राप्ति में-ईश्वर और मुक्ति के निश्चित रूप से प्राप्त होने में विश्वास रखते हों वे अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन करने के लिए इस संगठित महान कार्यक्रम में अपने आपको सौंप दें। जिनकी भावनाएं ऊँची तथा योग्यताएं कम है उनकी योग्यताएं बढ़ाने के लिए यहाँ पर प्रयत्न हो सकता है। नर और नारी दोनों ही समान रूप से इस कार्य के लिए उपयोगी हैं। जो लोग पूरा समय नहीं दे सकते वे अपना बचा हुआ समय, अपने निकटवर्ती क्षेत्र देकर भी बहुत कुछ कर सकते हैं।
भारतीय-संस्कृति को घर-घर तक पहुँचाने, उसे सुरक्षित रखने और बढ़ाने का कार्य करने के लिये जो लोग अपना और अपने परिवार का पूरा समय देते हैं उन्हें पापा,पंडित, पुरोहित आदि नामों से पुकारा जाता है प्राचीन काल में ये लोग अपनी योग्यता, सेवाबुद्धि, तपस्या बनाने के लिए साधना करते थे और अपना सेवा-क्षेत्र अमुक परिवारों या क्षेत्रों तक सीमित करके पूरी तत्परता के साथ वहाँ कार्य करते रहते थे।महात्मा गाँधी प्रत्येक ग्राम में एक ‘ग्राम सेवक’ द्वारा रचनात्मक कार्य किये जाने पर जोर देते थे, वह योजना साँस्कृतिक आधार पर प्राचीन काल में हमारे दूरदर्शी पूर्वजों द्वारा बहुत ही मजबूती से स्थापित की गई थी। एक पंडित या पुरोहित के जिम्मे अमुक ग्राम या परिवारों के निवासी यजमान किये गये और उन्हें काम सौंपा गया कि उन परिवार के व्यक्तियोँ को सुसंस्कृत बनाने के लिए पूरी तत्परता के साथ संलग्न रहे। व्रत, पर्व, त्यौहार, संस्कार आदि विशेष समयों पर विशेष रूप में और सामान्य समयों पर सामान्य रूप से उन परिवारों से बालकों, पुरुषों और स्त्रियों को उनकी स्थिति के अनुसार मनोबल, शिक्षण, उपदेश एवं वैदिक सहयोग देकर ऊँचा उठाने के लिए विविध आयोजन करते रहते थे। इन आयोजनों को ही कर्म-काण्ड कहा जाता था।
अपने इन परम हितैषी पुरोहितों की आजीविका के लिये ये यजमान भी समय समय एक पर श्रद्धा पूर्वक दान, दक्षिणा, भेंट-पूजा, अन्न, वस्त्र, जौ आदि देकर अपना कर्तव्य पालन करते थे। इस प्रकार यजमान को अपने परम हितैषी परम आवश्यक उपकारी पुरोहित महोदय के प्रति कृतज्ञता एवं प्रत्युपकार स्वरूप दान दक्षिणा देने का पुण्य मिलता था, उधर उन पुरोहित महोदय को आजीविका की उलझने से छुटकारा पाकर पूरा और पूरा समय लगा अपना कर्तव्य पालन करने में सुविधा होती थी। इस प्रकार प्राचीन काल में यजमान और पुरोहित की एक बड़ी ही उपयोगी परम्परा स्थापित की गई थी। गाँधी जी के योगी परम्परा स्थापित की गई थी। गाँधी जी के ‘ग्राम सेवक’ शब्द का ही पर्यायवाची शब्द ‘पुरोहित’ है। पुर माने ग्राम, हित माने हित करने वाले अर्थात् ग्राम का हित करने वाला। जबतक पुरोहित और यजमान की पद्धित अपने स्वस्थ रूप में रहीं तब तक घर घर में भारतीय संस्कृति की स्थापना, सुरक्षा और अभिवृद्धि बहुत ही व्यवस्थित रूप से होती रही।
समय के फेर के साथ-साथ इस यजमानी और पुरोहिती की परम पवित्र शृंखला में विकार आये। पुरोहितों ने अपने स्वार्थ और भोग के लिए लालच में ग्रसित होकर मोटी दक्षिणा मारने के उपाय सोचे और ऐसे कार्यक्रम गढ़े जिनमें यजमान स्वर्ग आदि की बड़ी-बड़ी लालसाएं क्षण मात्र में पूरी कराने के भ्रम-जाल में फंस कर पुरोहितों को प्रचुर धन दे। और वे पुरोहित उस धन से ऐसा आराम का जीवन व्यतीत करें। यह व्यापार खूब पनपा, संत, महंत, पुरोहित बड़ी-बड़ी सम्पत्तियों के स्वामी बन गये। मठ, गद्दी, जागीरें बना करके राजाओं जैसा ऐश्वर्य उपभोग करने लग। भारत का प्रधान मंत्री होते हुए भी चाणक्य और चक्रवर्ती राजा के राज गुरु होते हुए भी वशिष्ठ का व्यक्तिगत जीवन कितना त्यागपूर्ण था, वह परम्परा सर्वथा भुला दी गई। यजमान प्रसन्न हुआ कि आत्मोन्नति के कठिन परिश्रम को त्यागकर कुछ कर्मकाण्ड कर देने और पंडित जी को दक्षिणा देने मात्र से पाप धुलते और स्वर्ग प्राप्ति का लाभ लूट लिया। पुरोहित प्रसन्न हुए कि यजमान को उल्लू बना कर खूब माल उड़ाया। दोनों की चालाकी अन्ततः हमारे संस्कृति पतन का हेतु बनी। आज यजमानी और पुरोहिती की परम्परा, आश्रय, उपेक्षा रूढ़ि, कीचड़ में सनी पड़ी है। वह अन्धविश्वास और धर्मभीरुता पोषण लेकर किसी प्रकार जी ही रही है। अब तक मरने के उसके असाध्य लक्षण स्पष्ट दीख रह है। यजमान इन नामधारी पुरोहितों से अपना पिण्ड छुड़ाना चाहता है, पुरोहित इस पेशे में मनचाही आमदनी न रहने से कोई दूसरा व्यापार ढूंढ़ने में लगे हैं।
वस्तुतः यह पौरोहित्य की परम्परा अपने मूल रूप से निरर्थक नहीं हैं, वरन् अतीव आवश्यक है देश व्यापी संस्कृति संगठन करने, और घर घर में भारतीय तत्व ज्ञान की अखण्ड ज्योति का प्रकाश पहुँचाने के लिए पुरोहित लोग सर्वश्रेष्ठ माध्यम का कार्य कर सकते हैं। कोई नई संस्था खड़ी करने और बड़ी संख्या में नये कार्यकर्ता नियुक्त करके उनके निर्वाह का प्रश्न हल करना साधारण कार्य नहीं है। पर पुरोहितों को तो यजमानों से उनका आवश्यक वेतन दक्षिणा के रूप में अनायास ही मिलता रहता है। दूसरे-साँस्कृतिक कार्यक्रमों की पूर्ति, उनका पैतृक कार्यक्रम भी है। जिस प्रकार नये मन्दिर बनाकर उनके खर्च के लिए नई जायदादें लगाना कठिन है पर पुराने मन्दिरों का जीर्णोद्धार करके उनमें लगी हुई सम्पत्तियों की सुव्यवस्था करना सुविधा जनक है उसी प्रकार देश व्यापी साँस्कृतिक संगठन करने के लिए नई संस्था बनाना, नये कार्यकर्ता लाखों की संख्या में नियुक्त करना कठिन है पर पुराने पुरोहितों को यदि उनके स्वाभाविक कार्यक्रम में लगाया जा सके तो भारतवर्ष के घर घर में भारतीय तत्व ज्ञान का प्रकाश थोड़े ही समय में जगमगाता हुआ दृष्टि गोचर हो सकता है। पुरोहितों को अपनी स्वार्थ परता के निमित्त हर घड़ी दक्षिण के लिए ही यजमान के पीछे ललचाते फिरना छोड़ना होगा और यजमान को अमुक पूजा मात्र से पापनाश और स्वर्ग लाभ का अज्ञान छोड़कर पुरोहितों को इस योग्य बनाने की प्रेरणा देनी होगी कि उनके परिवार के लिए उपयोगी धर्म शिक्षक का वे कार्य कर सकें दोनों ही ओर से लालच छोड़कर कर्त्तव्य पर आरुढ़ हो जाने मात्र की तैयारी में यह यजमान और पुरोहित की पुनीत परम्परा पुनः जागृत हो सकती है और हमारे पिछड़े हुए देश की कुछ ही दिनों में सब प्रकार सुदृढ़ कर सकती है।
इस पुण्य परम्परा को प्राचीन काल के स्तर पर पुनर्जीवित करने के लिए गायत्री तपोभूमि में एक व्यापक कार्य क्रम आरम्भ किया जा रहा है। जिसको अनुसार प्रत्येक यजमान से कहा जायेगा कि वह अपने पुरोहितों को आदर पूर्वक प्रेरणा करे कि- “यजमानों ने उनकी आजीविका की व्यवस्था दान दक्षिणा के रूप में कर रखी है अब उनका कर्त्तव्य है कि अपना सारा समय, अपना आत्मबल, तप, ज्ञान, अनुभव बढ़ाकर यजमानों के उत्कर्ष के लिए लगा देने के अपने पुनीत धर्म का पालन करें।”
इस कार्य क्रम के अनुसार प्रत्येक पण्डित पुरोहित से कहा जायगा कि-“दक्षिणा के रूप में लिया हुआ प्रतिग्रह तक हलाहल विष की तरह आत्मा का गला देने वाला बन जाता है जब उसे लेकर पुरोहित अपने यजमान के कल्याण के लिए कुछ न करें। यजमानों का मानसिक उत्कर्ष करना, उनके परिवार में साँस्कृतिक जीवन की स्थापना करना उनकी जिम्मेदारी है, इस जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए उन्हें दक्षिणा रूपी फीस मिलती है। दवा के दाम और फीस वसूल करके भी कोई डाक्टर अपने मरीज की चिकित्सा न करें और रोगी उपचार के अभाव में मर जाय तो डाक्टर अपराधी होता है। इसी प्रकार जो पुरोहित केवल प्रतिग्रह-दान दक्षिणा लेते हैं और यजमान के मानसिक उत्कर्ष के लिए समुचित श्रम नहीं करते, अपने आपको उस महान जिम्मेदारी के योग्य नहीं बनाते वे वस्तुतः घोर नरक गाम होते हैं। शास्त्रों में ऐसे पुरोहितों की अत्यंत कटु शब्दों में भर्त्सना की गई है। सो उन्हें वैसा ही निंदनीय न बन कर सच्चे अर्थों में पुरोहित बनना चाहिए और अपने कर्तव्यों को सजग प्रहरी की तरह-दक्षिणा के बदले में ही नहीं-ईश्वर के सौंपे हुए उत्तर दायित्व को पूर्ण करने की दृष्टि से भी लोकहित के लिये मृत प्राय भारतीय संस्कृति को घर-घर में पुनःजीवित करने के लिए कमर कस कर खड़ा हो जाना चाहिए।
यदि यजमान और पुरोहित दोनों के कर्तव्य की युग धर्म की इस पुकार को सुना तो निश्चय ही कुछ ही दिनों में लगभग आठ लाख कार्य कर्ताओं की एक विशाल साँस्कृतिक सेना खड़ी हो सकती, और उस सेना द्वारा अज्ञान, अन्धिकार, रूढ़िवाद, कुसंस्कार, निकृष्ट जीवन आदि के शत्रुओं को आसानी से परास्त किया जा सकता है। आसुरी संस्कृति की विजय पताका फहराने में यह सेना बड़ी सफलता पूर्वक समर्थ हो सकती है। पुरोहित परम्परा की जीर्णोद्धार होकर उसकी सुव्यवस्था बन जाना निश्चय ही राष्ट्र के लिये एक महान् वरदान सिद्ध हो सकता है।
प्रत्येक यजमान और प्रत्येक पुरोहित तक-कानों को खड़े कर देने वाले समुल दोष के साथ, इस गुहार को पहुँचाने का हम प्रयत्न कर रहे हैं। साथ ही साथ गायत्री तपोभूमि में पुरोहितों को उनके कार्यों की समुचित शिक्षा देने की व्यवस्था भी आरम्भ करे रहे है। इस शिक्षा में निम्न कार्यक्रम रखा गया है:-
1-पुरोहित के परम-पवित्र कर्तव्य और उनका पालन करने में शास्त्रों के आदेश।
2- पुरोहित का व्यक्तिगत जीवन किन विशेषताओं से परिपूर्ण हो !
3-पुरोहित के लिए आवश्यक कर्तव्य शिक्षा-जिसे उसको प्राप्त करना ही चाहियें।
4- संस्कृत भाषा की नवीन पद्धति से इतनी शिक्षा जिसके अनुसार संस्कृत भाषा में संभाषण किया जा सके और आवश्यक व्याकरण तथा साहित्य का बोध, प्राप्त करके संस्कृत को समझा जा सके ।
5- संध्या, हवन, वलिद्वैश्व आदि के नित्य कर्म की शिक्षा।
6-सस्वर वेद पाठ करने की पद्धति संबन्धी आवश्यक जानकारी तथा मन्त्र संहिता का एक बड़ा भाग कंठस्थ करना।
7- दैनिक हवन, दार्श पौर्णमास इष्टि, विष्णु यज्ञ, रुद्र यज्ञ, गायत्री यज्ञ आदि विभिन्न प्रकार के छोटे बड़े यज्ञों का शास्त्रीय शिक्षा।
8- नामकरण, मुँडन यज्ञोपवीत, वेदारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह अन्त्येष्टि आदि षोडस संस्कारों का शास्त्रीय ज्ञान तक उन अवसरों पर देने योग्य प्रवचनों की तैयारी।
9- घकृत्व कला, भाषण देने, कथा कहने आदि की रीति-नीति।
10- कर्तव्य शास्त्र, धर्म शास्त्र, जन शिक्षण के योग्य समुचित ज्ञान-जिससे प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्यों की शिक्षा एवं प्रेरणा दी जा सके।
11- रामायण, गीता, भागवत, वेद, उपनिषद्, पुराणों के मार्मिक उपाख्यानों की कथाएं जो जन जागरण युग निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान में भारी सहायक हो सकती हैं ।
12- आरोग्य ज्ञान-माधवनिदान, शांर्गधर संहिता आदि के आधार पर रोग निदान, नाडी परीक्षा चिकित्सा, औषधि निर्माण, परिचर्या, आहारविज्ञान, आसन व्यायाम, लाठी चलाना आदि।
13- संगीत,कथा कीर्तन,भजन आदि के लिए आवश्यक ताल स्वर तथा गायन वाद्य की शिक्षा । जिसके आधार पर रामायण आदि की कथा बाजे पर कही जा सके।
14- पंचांग एवं ग्रह नक्षत्रों सम्बन्धी ज्योतिष शास्त्र की आवश्यक जानकारी ।
15-लोक व्यवहार, शिष्टाचार, संसार की वर्तमान समस्याएं, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान आदि का आवश्यक ज्ञान।
16-हिन्दू धर्म के अनेक व्रत, पर्व, रिवाज, दर्शन, तत्वज्ञान, समाज रचना आदि आधारों की बुद्धि संगत विज्ञान संगत, विवेचन। उनके मनाने के, आधारों, लाभों तथा विज्ञानों का समुचित परिचय
इन आधारों को लेकर ऐसी शिक्षा पद्धति बनाई गई है जिसे प्राप्त करना प्रत्येक पुरोहित के लिए आवश्यक है। शिक्षा क्रम एक वर्ग का है। 16 वर्ष से कम आयु के छात्र न लिये जायेंगे। शिक्षा की कोई फीस नहीं। रहने की तपोभूमि में समुचित व्यवस्था है। साधारणतः यह आशा की जाती है कि छात्र अपना भोजन भार जो लगभग 15 मासिक पड़ेगा, स्वयं उठायें। पर जो इससे असमर्थ हों उनके भोजन आदि की व्यवस्था भी कर दी जायेगी। अभी ऐसा केन्द्रीय विद्यालय मथुरा में ही खोला गया है। पीछे देश भर में ऐसे ही विद्यालय स्थापित किये जावेंगे।
जिनका पेशा पंडिताई पुरोहिताई का है उनके लिए उनके बालकों के लिए तो यह शिक्षा अत्यन्त ही आवश्यक है । इसके अतिरिक्त जिन्हें आजीविका की दृष्टि में नहीं-निस्वार्थ समाज सेवा की, अपना धार्मिक ज्ञान बढ़ाने की दृष्टि से एवं अपने परिवारों में साँस्कृतिक वातावरण पैदा करने की इच्छा है उन सब के लिए भी यह शिक्षा अत्यन्त उपयोगी है। जो भी व्यक्ति भारत में सांस्कृतिक वातावरण पैदा करने में अभिरुचि रखते हैं उनके लिए यह शिक्षा क्रम निश्चित रूप में उपयोगी होगा। 16 वर्ष से अधिक आयु के स्वस्थ, सदाचारी, कठोर अनुशासन में रहने की प्रतिज्ञा करने वाले, सद्गुणी व्यक्ति इस शिक्षा को प्राप्त कर सकते हैं इसका प्रारम्भ इसी दिवाली बाद एकादशी से आरम्भ हो जायेगा। विशेष जानकारी के लिए “साँस्कृतिक शिक्षा की नियमावली” मँगा लेनी चाहिए।
इस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए जो छात्र आवेंगे उनके स्वास्थ्य को सुधारने, दुर्गुणों को छुड़ाने व्यक्तिगत सद्गुणों को बढ़ाने तथा स्वभावों का उत्तम बनाने के लिए विशेष रूप से प्रयत्न किया जायगा। चूँकि पुरोहित का सम्बन्ध जन समाज से रहता है, जिसमें जन समाज से व्यवहार करने योग्य गुण न हों उनके लिए दूसरों को प्रभावित करना कठिन होता है इसलिए मधुर भाषण, शिष्टाचार, दूसरों की स्थिति और भावना को समझ कर तद्नुसार व्यवहार करना आदि की व्यवहारिक शिक्षा पर विशेष ध्यान रखा जावेगा। पौरोहित्य एक प्रकार का धार्मिक नेतृत्व है, धार्मिक वेत्ता में जो गुण होने चाहिए उन सबका पुरोहित में होना भी आवश्यक है। इन गुणों के बिना पुरोहित अधूरा है। उसका संभाषण, आचरण, व्यवहार, क्रिया कलाप नपा तुला होना चाहिए। सच्चे पुरोहित में यह बातें होना आवश्यक है, इसलिए शिक्षा में अन्यान्य बातों के साथ साथ इस दिशा में भी पूरा ध्यान रखा जावेगा। आशा की जाती है कि एक वर्ष की शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त यहाँ से निकले हुए छात्र साँस्कृतिक सेवा के लिए कुछ महत्वपूर्ण सेवा कर सकेंगे।
“अखण्ड ज्योति” के पाठकों से प्रार्थना है कि अपने क्षेत्र के पुरोहितों को इस शिक्षा में आने के लिए प्रेरणा दें। जो इन शिक्षाओं को प्राप्त कर लौटें उनके सहयोग से संस्कृति विकास को आगे बढ़ावें। जिनके पास अवकाश है ऐसे रिटायर लोग, वानप्रस्थी, साधु संन्यासी, पारिवारिक समस्याओं से जिन्हें छुटकारा मिल चुका है, जो कुछ धर्म सेवा, प्रचार आदि कार्य करना चाहते हैं, उन्हें इस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए उत्साह पैदा करें। अब समय आया है कि भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए हम में से प्रत्येक को कुछ न कुछ करना चाहिये। अखण्ड ज्योति और गायत्री परिवार के सदस्यों को हम इनके लिए विशेष रूप से आमन्त्रित करते हैं। यह विद्यालय एक शुभ आरम्भ है इसके लिए कूड़ा करकट नहीं सुयोग्य छात्र जुटाने में सक्रिय सहयोग देना, हम सब का एक आवश्यक कर्तव्य है।
(पं. तुलसी रामजी शर्मा, वृन्दावन)
भारतीय संस्कृति का मूल आधार सदाचार है। मनुष्य का जीवन नीति, धर्म, प्रेम, सेवा संयम एवं परमार्थ परायण होना चाहिए, तभी उसे वर्ग, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति आदि आध्यात्मिक सत्परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। नीचे ऐसे ही शास्त्र वचनों को दिया जाता है:-
चरित्र-शील-इन्द्रिय-निग्रह-वृत सदाचार इत्यादि ये सब एकार्थक हैं। चरित्र की परिभाषा इस प्रकार मिलती है-चरित्रम् पापात्मक क्रियारम्भमात्र त्याग इति बौद्धाः (सर्व लक्षण संग्रह) सर्वथा वद्य योगानाँ त्यागश्चारित्रमुच्यते। (सर्व दर्शन संग्रहः)
अर्थात्-पाप कर्मों का सर्वथा त्याग करना ही चरित्र है। चरित्रवान् की प्रशंसा और चरित्र ही की निन्दा में शास्त्र भरा पड़ा है। पाठकों के सन्तोष कुछ वचन लिखते हैं-
चरित्रवान् ही पण्डित एवं बुद्धिमान् है।
न पण्डितोमतोराम बहु पुस्तक धारणत्।
परलोक भयं यस्य तमाहुःपण्डितं बुधाः।।13।।
(विष्णुधर्मोत्तर पु. ख. 2 अ॰ 51)
हे राम? बहुत पुस्तक पढ़ने से पंडित नहीं माना जाता, जिसको परलोक का भय है, उसको बुद्धिमान् जन पण्डित कहते हैं।।13।।
निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि नसेवते।
अनास्तिकःश्रद्धधान एतत्पण्डितलक्षणम् ।।16।।
(म॰ भा॰ उद्योग॰ अ॰ 33)
जो उत्तम कर्मों का सेवन करता है निन्दित कर्मों से बचता है वह आस्तिक है (यहाँ के किये कर्मों का फल अवश्य परलोक में भोगना पड़ेगा) गुरु एवं शास्त्र में विश्वास है, ऐसा पुरुष पण्डित है।।16।।
स बुद्धिमान् योग करोति पापम् ।।15।।
(गरुड़ पु॰ पूर्व खंड अ॰ 115)
वह पुरुष बुद्धिमान् है जो पाप नहीं करता ।
चरित्र से ही मनुष्य पूज्य माना जाता है।
वृत्तेन भवत्यार्योन धनेनन विद्यया।।53।।
(म0 भा0 उ0 अ0 90)
आचरण से ही मनुष्य श्रेष्ठ माना जात है, धन एवं विद्या से नहीं ।।53।।
वृत्तस्थ मपिचाण्डालं तं देवा ब्राह्मणं विदुः। ।।193।।
(पद्म पु. सृष्टि खण्ड अ. 47)
चरित्रवान् चाण्डाल को देवता ब्राह्मण समझते हैं ।।19।।
शूद्रोऽपि शील सम्पन्नों ब्राह्मणादधिको भवेत्।
ब्राह्मणो विगताचारःशूद्राद्धीनतरो भवेत् ।।31।।
(भविष्य पु॰ अ॰ 44)
सदाचार सम्पन्न शूद्र भी ब्राह्मण से अधिक है।
दुराचारी ब्राह्मण शूद्र से गया हुआ है ।।111।।
(म॰ भा॰ वन॰ अ॰ 313)
चारों वेदों का जानकार ब्राह्मण यदि दुराचारी है, तो वह शूद्र से गया बीता है ।। 111 ।। इसलिये-
वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषतः ।
अक्षीण वृत्तोनक्षीणोवृत्त तस्तु हतोहतः ।। 109 ।।
(म॰ भा॰ वन॰ अ॰ 353)
वृत्त की (अपने चरित्र, चाल चलन) भले प्रकार रक्षा करनी चाहिये अर्थात् कोई काम बदनामी का न करें और ब्राह्मण विशेष रूप से अपने चरित्र को अच्छा बनावे। जो चाल चलन से गिरा नहीं, वह गिरा नहीं और जो व्यवहार में गिर गया (बदनामी के काम करने लगा) वह गिर गया ।। 109 ।।
न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति मेमतिः ।
अन्त्येष्वपिहिजातानाँ वृत्तमेव विशिष्यते ।। 41 ।।
(म॰ भा॰ उ॰ 34)
मेरी समझ में अच्छे कुल में उत्पन्न होने पर भी जो मनुष्य दुराचारी है, वह आदरणीय नहीं। यदि नीच कुल में उत्पन्न हुआ भी सदाचारी है, तो वह मान्य है कारण कि सदाचार ही उत्तमता का हेतु है ।। 41 ।।
कुलानि समुपेतानि गोभिः पुरुषतोर्थतः । कुलसंख्याँनगच्छन्ति यानि हीनानिवृत्ततः ।। 28 ।।
जो कुल, गौ, पुरुष और धन से भरपूर हैं, परन्तु चरित्र ये हीन हैं, वे कुल उत्तम कुलों की गणना में नहीं आ सकते।
(म॰ भा॰ उ॰ अ॰ 36)
वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यापि।
कुलसंख्यांचगच्छंति कर्षन्तिचमद्यशः ।। 29 ।। (म. भा. उ. अ. 36)
जो कुल सदाचार से युक्त और धन से हीन भी हैं, तो भी वे उत्तम कुलों की गणना में आते हैं और बड़ा नाम पाते हैं ।।29।।
यज्ञदान तपांसीह पुरुषस्य न भूतंय। भवन्ति यः सदाचारं समुललंध्य प्रवर्तते ।।7।।
(मार्कण्डेय पु0 अ॰ 31)
जो पुरुष सदाचार को त्याग कर संसार मार्ग में प्रवृत्त होते हैं, उनके किये हुए यज्ञ, दान, तप, मंगल देने वाले नहीं होते ।। 7 ।।
सदाचार से तीनों लोक जीते जाते हैं।
शीलेन हि त्रयोलोकाः शक्याजेनुं न संशयः।
नहि कि चिदसाध्यं वैलोके शीलवताँ भवेत् ।।
(म॰ भा0 शाँ0 124।15)
शील से तीनों लोक जीते जाते हैं इसमें संशय नहीं और संसार में शीलवानों को कुछ भी असाध्य (कठिन कार्य) नहीं ।। 15 ।।
अद्रोह सर्व भूतेषु कर्मणा मनसा गिरा। अनुग्रहश्चदानं चशीलमेतत्प्रशस्यते ।। 65 ।।
मन, वाणी, शरीर से किसी से वैर न करना, सब पर कृपा दृष्टि रखना, दान देना इस प्रकार का बर्ताव यह कहाता है ।। 65 ।।
यदन्येषाँहितं नस्य दात्मनः कर्मपौरुषम् । अपत्रपेत वायेनन तत् कुर्यात् कथंचन।। 66 ।।
अपना कर्म यदि किसी के लिये अहित कर हो या जिस कार्य से समाज में लज्जित होना पड़े, उस कार्य को कभी न करें ।। 66 ।।
तत्तुकर्म तथा कुर्याद्येनश्लाध्येतसंसदि। शीलं समासे नैतत्ते कथितं कुरु सत्तम ।। 67 ।।
ऐसा कर्म करें जिससे समाज में प्रशंसा प्राप्त हो, यह संक्षेप में शील का लक्षण है । 67 ।।
यदयप्यशीला नृपते प्राप्नुवन्ति श्रियं कचित् ।। नमुंजतेचिरं तातस मूलाश्चन संतिते ।। 68 ।।
यद्यपि कभी 2 अशील पुरुष भी सम्पत्ति प्राप्त कर लेते हैं, फिर भी आखिर में जड़ से नष्ट हो जाते हैं।। 68 ।।
(म॰ भा0 शाँ0 अ॰ 124)
सदाचारी ही भगवद् भक्त है।
नहीं दशंसं वननं त्रिषुलोकेषु विद्यते ।
दयामैत्रीय भूतेषुदानं च मधुराचवाक्।।
(म॰ भा0 आदि0)
परमेश्वर का वशीकरण ऐसा तीनों लोकों में नहीं जैसा कि दुखियों पर दया करनी, बराबर चालों से मित्रता, उदारता और मीठी वाणी। नीलकंठ टीका कार ने लिखा है कि ‘संवननं संभजनं परमेश्वर स्या राधनम्’ अर्थात् इस वचन में ‘संवननं’ का अर्थ परमेश्वर की आराधना है।। 12 ।।
ब्रह्म सत्यं दम शौचं धर्मों ह्री श्री घृर्तिःक्षमा। यत्रतंत्र रमे नित्यमहं सत्येन तेशपे ।। 30 ।।
वेद, सत्य व्यवहार, दम (इन्द्रिय निग्रह) पवित्रता धर्म (वर्णाश्रम सम्बन्धी) लज्जा (बुरे कर्मों से बचना) श्रीः (शोभा-कान्ति) धीरज, क्षमा इन बातों का जहाँ निवास है, तेरी शपथ पूर्वक कहता हूँ, (श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है) वहाँ मेरा निवास है।। 30 ।।
नैष ज्ञानवताशक्य तपसा नैवचेज्यया।
सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणाँतु संयमे नैवशक्यते ।। 9 ।।
(म॰ भा0 शाँ0 अ॰ 280)
परमात्मा केवल शास्त्र ज्ञान, तपस्या, एवं यज्ञ से नहीं मिलता, हाँ इन्द्रिय निग्रह (इन्द्रियों को बुरे कर्मों से हटाना) से मिलता है ।। 9 ।।
यदा न कुरुते भावं सर्वभूतेषु पापकम् । कर्मणा मनसावाचा ब्रह्मसम्पद्यते तदा ।। 57 ।।
जब मन वाणी, शरीर से किसी प्राणी के प्रति बुरा भाव नहीं होता, तब ब्रह्म को प्राप्त होता है।
(म॰ भा0 शाँ0 अ॰ 175/57)
तितिक्षया करुणया मैत्र्या चाखिल जन्तुषु।
समत्वेन च सर्वात्मा भगवान् सम्प्रसीदति ।। 13 ।।
(श्री0 भा0 4/11)
सहन शीलता, करुणा, मित्रता और सब प्राणियों में समता का करने भगवान प्रसन्न होते हैं।। 13 ।।
दयया सर्वभूतेषु सन्तुष्टया येन केनवा।
सर्वेद्रियोपशान्त्या चतुष्यत्याशुजनार्दनः।।
(श्री0 भा0 4/31/19)
सब प्राणियों पर दया करने से, अनायास मिली वस्तु से प्रसन्न रहने से और इन्द्रिय निग्रह से भगवान शीघ्र प्रसन्न होते हैं ।।19।।
निरपेक्षं मुनिशान्तं निर्वैरंसम दर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूये येत्यंघ्रिरे
(श्री0 भा0 11/14/16)
जिसको कुछ परवाह नहीं, मननशील, शाँत चित्त, किसी से बैर नहीं, समदृष्टि (किसी से रागद्वेष नहीं) ऐसे पुरुष के मैं (श्री कृष्णचंद्र कहते हैं) पीछे 2 चलता हूँ कि ऐसे की चरण रेणु से मैं पवित्र हो जाऊँ ।। 16 ।।
विप्रान् स्वलाभ सन्तुष्टान् साधूनृभूत सुहृत्तमान्।
निरहंकारिणः शान्तान्भमस्येशिरसाऽसकृत्।।
(श्री0 अ॰ 10/52/30)
अनायास हुए में सन्तोष करने वाले, साधु (पर कार्य को साधने वाले) सब प्राणियों के प्यारे अहंकार रहित, और शाँत चित्त ऐसे ब्राह्मणों के लिये मैं (श्रीकृष्ण कहते हैं) बारंबार प्रणाम करता हूँ ।।30।।
पर पत्नी पर द्रव्य परहिंसासुयोमतिम्।
करोति पुमान् भूपतोष्यते तेन केशवः।।
पर स्त्री, पर द्रव्य और हिंसा से जो बचा है भगवान उस पर प्रसन्न रहते हैं ।।13 ।।
परापवादं पैशुन्यमनृतंचनभाषते।
अन्योद्वेगकरं चापितोष्यते तेन केशवः 14
(विष्णु पु0 3।8)
पराई निन्दा, चुगलखोरी, मिथ्या, दूसरे को दुख दाई वचन इन से जो बचा है, भगवान उस पर प्रसन्न रहते हैं। 14।
तप्यंते लोक तापेन प्रायशः साधवोजनाः।
परमाराधनंतद्धि पुरुषस्याखिलात्मनः।।44।।
(भा0 8/7)
प्रायः करके सज्जन पुरुष लोक ताप से तप जाते हैं अर्थात् मनुष्यों पर विपत्ति देख उसको दूर करने के लिये दुख उठाते हैं और यही (दूसरों का दुख दूर करना) भगवान् की परम आराधना है।।44।।
रागाद्यपेतं हृदयंवाग दुष्टानृतादिभिः। हिंसादिशून्यकायश्चह्येतदीश्वरपूजम्।।
(भविष्य पु0 1/112/3 सूत संहिता ज्ञान योग खण्ड 14/11 दर्शनोपनिषद् 28)
राग आदि से हृदय शून्य हो। मिथ्या, कठोर भाषण, चुगल खोरी आदि से रहित वाणी हो, हिंसा, चोरी, व्यभिचार से रहित शरीर हो, इस प्रकार का बर्ताव ही ईश्वर पूजन है।
अहिंसासत्गमस्तेयं ब्रह्मचर्या परिग्रहौ।
वर्तते यस्यतस्यैवतुष्यतेजगताँपतिः ।।20।।
(नारद पु0 अ॰ 14 )
अहिंसा, सत्य, चोरी का त्याग, ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह (किसी पदार्थ में आसक्ति का न रखना इन के पालन करने वाले पर भगवान प्रसन्न रहते हैं ।।20।।
(अपूर्ण)
जब भारतीय संस्कृति का लोग महत्व समझते थे, उस पर विश्वास करते थे, उसको आचरण में लाते हुए अपना गौरव समझते थे, तब इस देश में घर-घर महापुरुष उत्पन्न होते थे। भौतिक समृद्धि और सामाजिक सुख-शान्ति की कभी न थी। इस संस्कृति के ढाँचे में ढले हुए नररत्न अपने प्रकाश से समस्त संसार में प्रकाश उत्पन्न करते थे और उसी आकर्षण के कारण विश्व की जनता उन्हें जगद्गुरु, चक्रवर्ती शासक एवं भूसुर-पृथ्वी के देवता मानती थी। वह देश, स्वर्ग की अपेक्षा भी श्रेष्ठ समझा जाता था। अतीत का इतिहास, इस तथ्य का मुक्त कंठ से उद्घोष कर रहा है।
भारतीय संस्कृति के प्रभाव से प्रभावित प्रत्येक परिवार में स्वर्गीय शान्ति एवं सद्भावनाओं का निवास रहता था। पिता और पुत्र के बीच कैसे सम्बन्ध थे, इसका उदाहरण देखना हो तो विमाता की आज्ञा से 14 वर्ष के लिए वनवास जाने वाले राम, अन्धे माता पिता को कन्धे पर काँवर में बिठा की तीर्थ यात्रा कराने वाले श्रवण कुमार, पिता के दान करने पर यमपुर खुशी-खुशी प्रस्थान करने वाले नचिकेता, पिता को सँतुष्ट करने के लिए आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेने वाले भीष्म का, चरित्र पढ़ लेना चाहिए। भाई का भाई के प्रति क्या कर्त्तव्य है, इसकी झाँकी राम, लक्ष्मण और भरत का चरित्र पढ़ लेने से सहज ही हो जाती है। कौरवों को जब यक्षों ने बन्दी बना लिया तो युधिष्ठिर ने भ्रातृ प्रेम के वशीभूत होकर उन्हें छुड़वाया। पुष्कर के दुर्व्यवहार को भुला कर नल ने अपने भाई को क्षमा ही कर दिया। ऐसे भ्रातृ प्रेम के उदाहरण पग-पग पर मिलेंगे। सच्चे मित्र कैसे होते हैं, यह कृष्ण ने सुदामा और अर्जुन के साथ अपना कर्त्तव्य पालन करके दिखाया था।
पति-पत्नी के बीच कैसे सम्बन्ध होने चाहिए, इसके उदाहरण पत्नीव्रती पुरुष और पतिव्रता नारियों के पग पग पर उपस्थित किए हैं। सीता, सावित्री, शैव्या, दमयन्ती, गान्धारी, अनसूया, सुकन्या आदि की कथाएँ घर-घर गाई जाती हैं। पर स्त्री को माता एवं पुत्री समझने वाले भी सभी कोई थे। शिवाजी द्वारा, यवन कन्या को सुरक्षित रूप से सम्मानपूर्वक राजमहल में पहुंचा देना, अर्जुन का उर्वशी को लौटा देना, कच का रूप गर्विता देवयानी का प्रस्ताव अस्वीकार करना, सूर्पणखा का लक्ष्मण द्वारा उपहास करना जैसे प्रसँगों की कमी नहीं है। भीष्म, हनुमान, जैसे अखण्ड ब्रह्मचारी प्रचुर संख्या में परिलक्षित होते थे।
अतिथि-सत्कार के लिए मोरध्वज का अपना पुत्र दे देना, भूखे बहेलिये के लिये कबूतर कबूतरी का अपना शरीर दे देना, दुर्भिक्ष पीड़ित समय में अनेक दिनों से भूखे ब्राह्मण परिवार का अपनी थाली की रोटियाँ चाण्डाल को दे देना आदि अनेकों वृत्तान्त महाभारत में देखे जा सकते हैं। शरणागत कबूतर की रक्षा के लिये राजा शिवि ने अपना माँस काठ-काट कर दे दिया था। कुन्ती ने ब्राह्मण कुमार के बदले अपने पुत्र भीम को राक्षस का आहार बनने के लिये भेजा था।
अपने स्वार्थ, सुख-साधन, धन सम्पदा सँग्रह ऐश आराम को लात मार कर अपनी आत्मा का कल्याण करने के निमित्त लोक सेवा और परमार्थ का जीवन व्यतीत करने में यहाँ के लोग अपने जीवन की सफलता मानते रहे हैं। गौतम बुद्ध अपने राजपाट और सुख सौभाग्य को छोड़ कर हिंसा और अज्ञान में डूबे हुए सँसार को दया और आत्मज्ञान की शिक्षा देने के लिए निकल पड़े। महावीर ने लालची और विषयासक्ति दुनिया को त्याग और संयम का पाठ पढ़ाने के लिए अपना जीवन उत्सर्ग किया। भागीरथ ने राज सुख को छोड़ की दीर्घकाल तक कठोर तप किया और प्यासी पृथ्वी को तृप्त करने के लिए तरण तारिणी गंगा का अवतरण कराने का महान कार्य सम्पादन किया। नारदजी कुछ घड़ी भी एक स्थान पर न ठहर कर आत्म ज्ञान का प्रसार करने के लिए हर घड़ी पर्यटन करते रहते थे, व्यास जी ने संसार को धर्म-ज्ञान देने के लिए अष्टादश पुराणों की रचना की। आदि कवि बाल्मीकि ने रामायण की रचना करके मानव जाति को कर्त्तव्य-पथ पर चलने के लिए अग्रसर किया। चरक, सुश्रुत, बाग भट्ट, धन्वन्तरि, प्रभृत, ऋषियों ने जीवन भर जड़ी बूटियों, धातुओं, विषों आदि का अन्वेषण करके रोग ग्रस्त पीड़ितों का त्राण करने के लिये सर्वांगपूर्ण चिकित्सा शास्त्र का आविर्भाव किया। ज्योतिष विद्या की महान खोज, आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों की गति-विधियों और उनकी मनुष्य जाति पर जो प्रभाव पड़ता है, उसकी खोज करने वाले वे ऋषि ही थे। सूर्य सिद्धान्त, मकरन्द, ग्रहलाघव आदि को देखने से आश्चर्य होता है कि उस समय बिना वैज्ञानिक यन्त्रों के इस प्रकार की शोध करके संसार को महान ज्ञान देने के लिए उन्हें कितना श्रम करना पड़ा होगा।
सदा अपने को तप से तृप्त अपनी महान सेवाएं विश्व मानव के उत्कर्ष में लगाने वाले ऋषियों की जीवनियाँ पढ़ने पर मनुष्य की अन्तरात्मा उनके चरणों पर लोट जाने को करती है। विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, भारद्वाज, कपिल, कणाद, गौतम, जैमिनी, पराशर, याज्ञवल्क्य, शंख, कात्यायन, गोभिल, पिप्पलाद, शुकदेव, शृंगी, लोमश, धौम्य, जयकारु, वैशम्पायन आदि ऋषियों ने अपने को तिल तिल जलाकर संसार के लिये वह प्रकाश उत्पन्न किया जिसकी आभा अभी तक बुझ नहीं सकी है। सूत और शौनक निरन्तर प्राचीर काल के महापुरुषों की गाथाएँ, विरुदावलियाँ धर्मचर्चाएँ सुना सुना कर मानव जति की सुप्त अन्तरात्माओं को जगाया करते वे। दधीचि ने असुरत्व से देवत्व की रक्षा के लिए अपनी हड्डियाँ ही दान कर दीं। धर्म की मर्यादा की रक्षा के लिये वन्दा वैरागी खौलते तेल के कढ़ाह में प्रसन्नतापूर्वक कूद पड़ा। हकीकतराय के कत्ल, गुरु -बालकों के जीवित दीवारों में चुने जाने की कथाएँ आज भी धर्म कर्त्तव्य की उपेक्षा करके धन संग्रह और इंद्रिय भोगों में लगे हुए लोगों पर नालत देती हुई आकाश में विहार कर रही हैं।
आज अधिकाँश पण्डित, पुरोहित, साधू, ब्राह्मण आदि संसार को मिथ्या बताते हुए मुफ्त का माल चरते रहते हैं और आलस्य प्रमाद से चित्त हटाकर संसार का बौद्धिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए कुछ भी श्रम नहीं करते, पर भारतीय संस्कृति की परम्परा इसके सर्वथा भिन्न रही है। साधुता और ब्राह्मणत्व का आदर्श दूसरा ही है। शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, सिख धर्म के दस गुरु, दयानन्द, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, रामदास, चैतन्य कबीर, विवेकानन्द, रामतीर्थ, आदि असंख्यों धर्मगुरु लोक हित के लिये जीवन भर घोर परिश्रम-प्रयत्न और परिभ्रमण करते रहे। उन्होंने लोक सेवा का एकान्त मुक्ति से अधिक महत्व दिया। भगवान बुद्ध जब अपनी जीवन-लीला समाप्त करने लगे तो उनके शिष्यों ने पूछा-“आप तो अब मुक्ति के लिये प्रयाण कर रहे हैं।” बुद्ध ने उत्तर दिया-“जब तक संसार में एक भी प्राणी बन्धन में बँधा हुआ है तब तक मुझे मुक्ति कर कोई कामना नहीं है। मैं मानवता का उत्कर्ष करने के लिए बार-बार जन्म लेता और मरता रहूँगा।” स्वामी दयानन्द सरस्वती भी योग-साधना करने हिमालय में गये थे, पर उन्हें वहाँ ईश्वरीय प्रेरणा हुई कि लोक सेवा ही सर्वोत्तम योग-साधना है।” स्वामी जी तपस्या से लौट आये और अज्ञान-प्रस्त जनता में ज्ञान-प्रसार करने को ही अपनी साधना मानते हुए जीवन समाप्त कर दिया। शंकराचार्य और दयानन्द अपने इस महान त्याग के उपलक्ष में विष-पान करके स्वर्ग सिधारे। गाँधी जी ने जीवन भर ऐसा ही तप करके महात्मा शब्द को सार्थक किया। लोकमान्य तिलक और महामना मालवीय जैसे व्यक्तियों का चरित्र ही ‘पण्डित’ शब्द का वास्तविक प्रमाण है। गुरु कैसे होते हैं यह कामना हो, तो गुरु गोविन्द सिंह आदि सिक्खों के दश गुरुओं का चरित्र पढ़ना चाहिये। शिष्य भी तब ऐसे ही होते थे। एकलव्य अरुणि, उद्दालक, धोम्य, नचिकेता आदि शिष्यों के चरित्र पढ़ने से अपनी संस्कृति पर सहज ही गर्व होने लगता है।
भारतीय संस्कृति में पले हुए राजा कैसे होते थे, इसका उदाहरण राजा जनक के जीवन से मिल सकता है। वे अपने गुजारे के लिये स्वयं खेती करते थे और राजकोष से एक पाई भी अपने लिये न लेकर उसे जनता के निमित्त ही खर्च करते थे। जनक को अपना खेत जोतते समय हल की नोक की उचाट से एक कन्या मिली थी हल की नोंक को संस्कृति में सीता कहते हैं, इसलिए जनक ने अपने खेत में मिली हुई इस कन्या का नाम भी सीता रखा था। महर्षि विश्वामित्र को जब किसी यज्ञीय (लोक हितकारी) कार्य के लिए धन की आवश्यकता पड़ी तो राजा हरिश्चंद्र ने समस्त राज्य कोष ही दान नहीं कर दिया वरन् अपने तथा अपने स्त्री-बच्चों के शरीर को बेच कर भी उसकी पूर्ति की और एक सच्चे राजा का आदर्श उपस्थित किया। छत्रपति शिवाजी का विशाल राज्य था उसे उन्होंने समर्थ गुरु रामदास के चरणों में अर्पित कर दिया था और स्वयं गुरु की आज्ञानुसार एक मुनीम की तरह इसका संचालन करते थे। भरत भी राम की चरण पादुकाओं को शासक मानकर स्वयं एक तुच्छ सेवक की भाँति 14 वर्ष राज्य चलाते रहे। धौलपुर की राजगद्दी के मलिक नृसिंह भगवान और मेवाड़ की राजगद्दी के मालिक भगवान एकलिंग जी माने जाते थे। राजा लोग अपने को उनका संचालक कहते थे। पीछे यद्यपि यह बात दिखावा मात्र रह गई, पर आरम्भ में यह त्याग भी उसी शृंखला का एक प्रतीक अवश्य के लिए वेष बदले प्रजाजनों के बीच घूमता रहता था। राणा प्रताप राज सुख की परवाह न करके जीवन भी स्वाधीनता संग्राम में धर्मयुद्ध लड़ते रहें। महान् राजपुत्र दुर्गादास राठौर को लड़ाई में रोटी भी नसीब नहीं हो पाती थी तो वह घोड़े पर चढ़ा हुआ भाले की नोंक में छेद कर भुट्टे भून खाता था और स्वाधीनता संग्राम लड़ता रहता था। छत्रसाल की गाथा सर्व विदित है। ऐसे होते थे यहाँ के शासक राज्यों के मंत्री प्रधान मन्त्री कैसे होते थे, उसका नमना चाणक्य का जीवन है। यह विश्व का अभूत पूर्व कूटनीतिज्ञ एक फूँस की झोंपड़ी में गरीब लोगों की भाँति रहता था और राज्य कोष से अपने व्यय के लिये कुछ भी नहीं लेता था।
धन सम्पत्ति जिनके पास होती थी वे उसे साम पीढ़ियों के लिये तिजोरी में बन्द नहीं करते थे वरन् तात्कालिक लोक हित के लिये उसे मुक्त हस्त से दान करते रहते थे। राजा कर्ण की दान वीरता प्रसिद्ध है। कहते हैं कि वे सवामन स्वर्ण रोज दान करते थे। कृष्ण ने जब उनकी दान वीरता की परीक्षा कराई है, जो उसने अपनी जान जोखिम में डालकर कवच कुण्डल दिये हैं। मरते समय भी दाँत तोड़कर उसमें लगा हुए स्वर्ण दान करके याचकों को विमुख नहीं लौटने दिया है। मोरध्वज ने अपने पुत्र को दिया है राजा बलि ने तीनों लोक का राज्य ही नहीं अपना शरीर भी उस समय लोक सेवा के प्रतीक समझे जाने वाले ब्राह्मण-वामन को दान दिया है। जरूरतमंदों के लिए लोग अपनी परोसी थाली तक दान कर देते थे। भामा शाह ने अपनी करोड़ों की सम्पत्ति तिनके की तरह राणा प्रताप को दे डाली। राजा महेन्द्र प्रताप अपना राजपाट राष्ट्रीय शिक्षा के लिये अर्पित करके भारतीय स्वाधीनता के लिये विदेश भागे थे। परशुराम ने 21 बार पृथ्वी का राज्य प्राप्त करके उसे दान किया था। सुभाष बोस को वर्मा में भारतीयों ने अपना सर्वस्व स्वाधीनता संग्राम चलाने के लिए दिया था। उससे पूर्व श्री0 बोस भारत की अपनी लाखों रुपये की सम्पत्ति को राष्ट्र के लिए सौंप कर, उसको सार्वजनिक सम्पत्ति घोषित कर गये थे। सी0 आर॰ दास अपनी बैरिस्ट्ररी में हजारों रुपया महीना कमाते थे, वह सारा का सारा, कई बार कर्ज लेकर भी सार्वजनिक आवश्यकताओं को पूर्ण करते थे। जमुनालाल बजाज ने अपने को गाँधी जी का पाँचवाँ दत्तक पुत्र घोषित करके अपनी सारी सम्पत्ति महात्मा गाँधी के चरण में अर्पित करदी थी ।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, राजा राममोहन राय, गोपाल कृष्ण गोखले, महादेव गोविंद राणाडे, गणेश शंकर विद्यार्थी, अद्धानन्द, सर्वदानन्द, दर्शनानन्द, लेखराम, हैडगेवार आदि का जीवन जिस प्रकार से व्यतीत हुआ है उसमें भारतीय संस्कृति की झांकी देखी जा सकती है। भूषण, गंग और चन्दवरदाई आदि ने चारणों में अपनी ओजस्वी वाणी और कविता से अनेकों निष्प्राणों को प्राणवान बनाया। गंग इसी अपराध में हाथी के पैर के नीचे कुचलवाये गये, चन्दबरदाई ने गजनी में जो कष्ट सहा, वह किसी से छिपा नहीं है। सन् 57 लेकर स्वाधीनता के हिंसात्मक संग्राम के क्रान्तिकारी वीर सैनिक और सन् 21 से लेकर सन् 47 तक की अहिंसात्मक राज्य क्रान्ति में अगणित व्यक्तियों ने जो त्याग किये हैं उनकी गाथाएँ पढ़ते सुनते हुए भुजायें फड़कने लगती हैं। पाकिस्तानी बर्बरता के सामने सिर न झुका कर अपने धर्म को अक्षुण्य रखने के लिये पंजाब और बंगाल के लाखों स्त्री- पुरुषों ने जो त्याग किये हैं उनका स्मरण करके चित्तौड़ की रानियों के जौहर और गुरु गोविंद सिंह के कुछ पुत्रों की स्मृति-ताजी हों जाती है।
आस्तिकता की प्रतिष्ठापना के लिये घोर तप करने वाले लोगों की संख्या कम नहीं हैं। ध्रुव, प्रहलाद, सरीखे भक्त प्राचीन काल में हुए हैं और मध्यकाल में सूर, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस, रैदास, कबीर, दादू, रामानन्द, रामानुज, षटकोपाचार्य, तिरुवल्लुवर जैसे संतों की संख्या बहुत बड़ी हैं। अनीति के निवारण के लिये त्रेता में ऋषियों ने अपना खून निकाल निकाल कर एक घड़ा भरा था और वह रक्त घट अन्त में राक्षसों के विध्वंस करने के निमित्त सीता-जन्म का हेतु बना था। इसी मार्ग पर यह आस्तिक सन्त अपनी साधना, भक्ति ,ज्ञान, दीक्षा आदि के द्वारा अनीति निवारण और धर्म विस्तार का कार्य करते रहे हैं।
विश्व मानव की सेवा के लिए भारतीय स्त्रियाँ भी पुरुषों से पीछे नहीं रही हैं। उनका कार्य-क्षेत्र पुरुषों के समान विस्तृत क्षेत्र में न रह कर सीमित क्षेत्र में रहा है इसलिए उन्हें यश उतना ही नहीं मिला हैं। केवल कुछ पतिव्रता स्त्रियों के कौतूहल पूर्ण चरित्रों का ही ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन आया है पर सच बात यह है कि भारतीय नारी ने प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों से अधिक कार्य किया है । उन्हीं की प्रेरणा और छत्रछाया से समर्थ होकर पुरुष जाति कुछ कर सकने में सफल हो सकी । इसीलिये उनका नाम पुरुषों से पहले लिया जाता रहा है। सीताराम, राधेश्याम , गौरीशंकर , लक्ष्मी नारायण, उमामहेश, मायाब्रह्मा, सावित्री सत्यवान् आदि कामों में पहला नाम नारी का और दूसरा नर का है। कोई क्षेत्र ऐसा नहीं रहा है जिनमें भारतीय नारी ने महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन न की हों । वेदों के दृष्टा जिस प्रकार विश्वामित्र आदि ऋषि हुए हैं वैसी ही ऋषिकाएँ - स्त्रियाँ भी हुई हैं । ऋग्वेद 10। 85। 10। 134। 10-36।10-40। 8-91। 10-95। 5-88। 8-91 आदि अनेकों सूत्रों की दृष्टा घोपा, गोधा, विश्ववारा, अपाला, जुहू, अदिति सरमा, रोमशा, लोपामुद्रा, शास्वती, सूर्या, सावित्री आदि ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ ही हैं। मनु की पुत्री इडा बड़ी प्रकाण्ड याज्ञिक थी। मैत्रेयी एक समय की अद्वितीय विद्वान थी। शाण्डिल्य की पुत्री श्रीमती ने अत्यंत कठोर तप किये थे। महाभारत में शान्ति पर्व के अध्याय 30 में सुलभा नामक एक विदुषी का वर्णन है जिसने शास्त्रार्थ में राजा जनक जैसे ब्रह्मज्ञानी के छक्के छुड़ा दिये थे। भागवत में स्वधा की पुत्री वयना और धारिणी का वर्णन है वे विज्ञान विद्या में निष्णात् थी। ब्रह्म वैवर्त पुराण में वर्णित वेदवती को चारों वेद सस्वर कण्ठाग्र थे। भारती देवी नामक महिला ने शंकराचार्य से ऐसा शास्त्रार्थ किया था कि बड़े बड़े विद्वान भी अचंभित रह गये थे। उसके प्रश्नों से निरुत्तर होकर शंकराचार्य को उत्तर देने के लिए कुछ मास की मोहलत माँगनी पड़ी थी।
युद्ध कला- प्रवीण कैकेयी को दशरथ जी लड़ाई में अपने साथ ले गये थे और जब रथ टूटने लगा तो कैकेयी ने ही उसका तात्कालिक उपचार करके पराजय से बचाया था। मदालसा, महामाया के चरित्र भी प्रसिद्ध हैं। चित्तौड़ की रानियाँ बूँदी की रानी दुर्गावती, झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई, चाँदबीबी, आदि के पराक्रम से दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है। द्रौपदी, गान्धारी, कुन्ती आदि की असाधारण योग्यता को सुनते सुनते तृप्ति नहीं होती। मीरा ने लोक लाज छोड़ कर राज परिवार त्याग कर जनता जनार्दन के हृदयों में भक्ति का दिव्य रस ओत प्रोत किया था। समाज सुधार और राजनैतिक क्षेत्रों में प्राण प्रण से संलग्न महिलाएं इस शताब्दी में भी कम नहीं हुई हैं
महापुरुषों और महान् नारियों के दिव्य चरित्र से भारतीय इतिहास का पन्ना पन्ना जगमगा रहा है। यहाँ घर घर में ऐसे नर-रत्न पैदा होते रहें हैं जिनके उज्ज्वल चरित्र प्रकाश स्तम्भ की भाँति आज भी गिरी हुई मनुष्य जाति का पथ प्रदर्शन करने के लिए जाज्वल्वान हो रहे हैं। यह क्रम इस देश के केवल इसलिए चलता रहा है कि यहाँ ऋषि प्रणीत संस्कृति के प्रति लोगों की गम्भीर आस्था रही है। इन धर्म शास्त्रों, ऋषि प्रणालियों, आप्त वचनों का अनुगमन करने के लिए लोग श्रद्धापूर्वक हृदय और मस्तिष्क के द्वार खोल रहे हैं। आज भोगवादी भौतिक संस्कृति ने उस हमारी सनातन परम्परा से जनसाधारण को विमुख कर दिया है। फलस्वरूप सर्वत्र घोर अशान्ति, दारिद्रय, रोग, शोक, भय, उत्पीड़न, तृष्णा और वासना से सभी के हृदय जर्जर हो रहे हैं।
हमारा निश्चित विश्वास है कि भारतीय संस्कृति ऋणि प्रणीत-रीति नीति अपना करके ही मनुष्यता का उत्कर्ष हो सकता है अन्यथा वर्तमान गतिविधि उसे सब प्रकार नष्ट करके ही छोड़ेगी। सत्य अमर है, श्रद्धा अमर है, धर्म अमर है, प्रेम अमर है, न्याय अमर है ये कभी मन्द भले ही हों जावें पर मर नहीं सकते। भारतीय संस्कृति भी अमर है, वह आज तमसाच्छन्न हों रही है पर कल अवश्य ही निर्मल होगी। हमारी अन्तरात्मा कहती है कि वह पुनः सजीव होगी और उसकी विजय दुन्दुभी फिर एकबार विश्व में बजेगी।
हम उस भविष्य की प्रतीक्षा करते हैं जिसमें भारत में घर-घर अपने प्राचीन आदर्शों की भावना एवं मान्यता का विकास होगा। लोग आपस में ऐसे व्यवहार रखेंगे जैसे प्राचीन भारत में रखे जाते थे। माँ बाप, भाई बहिन, भाई भाई, पिता पुत्र सास बहू स्त्री-पुरुष, स्वजन सम्बन्धी, बन्धु बन्धुओं के बीच ऐसे प्रचुर एवं प्रेमपूर्ण सम्बन्ध होंगे जिन्हें देखकर देवता भी ईर्ष्या करें। पुरुष व स्त्रियों के प्रति और स्त्रियाँ पुरुषों के प्रति अत्यन्त ही पवित्र भावनाएँ रखा करेगी। व्यापारी और ग्राहक के बीच उचित मुनाफे पर ठीक वस्तुओं का ईमानदारी के साथ क्रिय-विक्रय होगा। मजदूर पूरा काम करने में और मालिक पूरी मजदूरी देने में कसर न रखेंगे। आलस्य को, काम से जी चुराने को मानवीय अपराध समझा जायगा और हर आदमी पसीना बहाये बिना रोटी खाना पसन्द न करेगा। मनुष्य परस्पर सहिष्णु, सहनशील, एक दूसरे की स्थिति ओर कठिनाई को समझने वाले, तथा उदार व्यवहार करने वाले होंगे। छल, चोरी, व्यभिचार, बेईमानी, दगाबाजी, विश्वासघात, अनीति, अन्याय आदि से लोग वैसी ही घृणा करेंगे जैसे अखाद्य और अभक्ष्य को भूखा रहने पर भी कोई नहीं खता। संयम, नियोग और दीर्घजीवी रहेंगे। सन्तोषी और परिश्रमी होने के कारण उन्हें किसी बात का घाटा न रहेगा। परस्पर स्नेह और सद्भावों के कारण आपसी व्यवहार स्वर्गीय सुख जैसे मधुर हो जावेंगे।
यह बातें आज की स्थिति तुलना में करते हुए असंभव सी दीखती हैं पर वस्तुतः ये कुछ भी कठिन नहीं हैं। भारतीय संस्कृति के यह सहज फलितार्थ है। इस देश में लाखों करोड़ों वर्षों तक लगातार ऐसा ही वातावरण स्थिर रहा है। हमारी यह विशेषताएं हैं। यदि हम अनार्य संस्कृति की कीचड़ में से अपने पैर निकाल लें ओर आय-संस्कृति की ओर कदम बढ़ावें, तो उस प्राचीन इतिहास की पुनरावृत्ति होना बिलकुल सहज और स्वाभाविक ह। इस भूमि में वह विशेषताएं हैं कि वे सहज विकास करती रहें, जो घर-घर में राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, भीम अर्जुन, गान्धी, जवाहर पैदा हो सकते हैं और सब प्रकार की सुख सुविधाओं से परिपूर्ण होते हुए हम भटके हुए संसार को सही रास्ते पर ला सकते हैं। आइए, अपने उसी प्राचीन गौरव को वापिस लाने के लिए हम सब मिल कर भागीरथ प्रयत्न करें।
हम देखते हैं कि भारतीय संस्कृति तेजी से दुर्बल हो रही है। उसका विकास शोचनीय रूप अवरुद्ध हो रहा है। लोग आत्म शान्ति की, धर्म संचय की कर्तव्य पालन की बात नहीं सोचते, उनके मस्तिष्कों में इस दैवी संस्कृति के लिए बहुत थोड़ा स्थान रह गया है। इन बातों को जीभ के अग्रभाग से, दूसरों की दृष्टि में अपनी महत्ता बढ़ाने के लिए तो लोग कहते हैं पर उनका विचार इन तथ्यों को स्वयं अपनाने का, अपने जीवन में उतारने का नहीं होता। तप, त्याग, संयम, सत्य, प्रेम, न्याय, सेवा, प्रभृति सत प्रवृत्तियों में अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले कोई विरले ही दीखते हैं। इस प्रकार लगाता है कि भारतीय संस्कृति दैवी सभ्यता नष्ट होती हुई चली जा रही है।
दूसरी ओर आसुरी संस्कृति का विकास प्रौढ़ अवस्था में पहुंचता जा रहा है। विलासिता, दिखावट, शेखीखोरी, ठाटबाट, ऐंठ, अकड़, अहंकार इन्द्रिय लिप्सा, असंयम, उच्छृंखलता, असहिष्णुता, स्वार्थ परता, अनैतिकता, कृतघ्नता, छल, कपट, विश्वासघात मस्तिष्कों में मजबूती से अपने घोंसले बना रहे हैं। अब लोगों का दृष्टि कोण यह हो रहा है कि उन्हें अधिक से अधिक धन प्राप्त होना चाहिए। विलासिता के अधिकतम साधन उनके पास हों, अहंकार प्रदर्शन की अधिक ऊँची सुविधा उन्हें प्राप्त हो। न्याय अन्याय के झंझट में न पड़कर लोग ‘किसी भी प्रकार’ ज्यादा से ज्यादा पैसा बटोरने की धुन में मस्त हैं- मनोवांछित मात्रा में धनी तो कोई विरला ही वन पाता है पर दौड़ सभी की इसी दिशा में है। नर-नारी के बीच जो पुत्री-भगिनी और माता के पवित्र सम्बन्ध रहने चाहिए सो दीवार तेजी से टूट रही है। एक दूसरे को कामुकता की दृष्टि से देखकर अपनी नीच वृत्तियों को तृप्त करके प्रसन्न होना चाहते हैं। युवा नारियों के अधनंगे चित्र, घर-घर में लटकते दीखते हैं, सिनेमा में यही सब देखने लोग जाते हैं, साधारण जीवन में भी लोगों की आँखें नारी को दूषित दृष्टि से देखने में ही अधिक रस लेती हैं। धन संग्रह के लिए मनुष्य नीच से नीच, घृणित से घृणित, कुकर्म करने में नहीं चूकते। चोरी, छल, लूट, डकैती, हत्या, विश्वासघात, रिश्वत, रस में विष की मिलावट, आदि कोई भी दुष्कर्म ऐसा नहीं जिसे करने में लोग हिचकिचायें। इस प्रकार काम और लोभ का सूक्ष्म साम्राज्य तेजी से बाढ़ के पानी की तरह बढ़ता चला आ रहा है।
क्रोध का कुछ ठिकाना नहीं। उदारता, क्षरा सहिष्णुता समन्वय, धैर्य, प्रतीक्षा, गम खाना के तथ्यों को भुलाया सा जा रहा है। जरा - जरा सी बात पर लोग आग बबूला हो जाते हैं और छोटे से मतभेद को शत्रुता में परिणत करके जान के ग्राहक तक बन जाते हैं नृशंस हत्याओं और रोमाँचकारी आत्म हत्याओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। आज जो लोग मित्र बने फिरते हैं, कल ही उनका जानी दुश्मन बन जाना कुछ भी असम्भव नहीं । अपने मन से भिन्न विचार रखने वाले या भिन्न कार्य करने वालों को लोग शत्रु से कम नहीं मानते । अध्यापकों, गुरुजनों, माता-पिताओं, पथ-प्रदर्शकों तक के प्रति उनके त्याग के लिए कृतज्ञता रखने की अपेक्षा अवज्ञा, उच्छृंखलता प्रतिशोध, एवं कृतघ्नता के दुष्ट व्यवहारों का नमूना हर जगह देखा जा सकता है । जन साधारण में उस जरासी बात पर गाली-गलौज , हाथापाई, फौजदारी , खून-खराबी, शत्रुता की प्रवृत्ति का बढ़ना यह बनाता है कि हवा का रुख किधर है। आसुरी सभ्यता में क्रोध का महत्वपूर्ण स्थान है।
अहंकार या क्या ठिकाना है? बुद्धि में, योग्यता में, हर आदमी अपने आपको दूसरों से असंख्य गुना बढ़कर मानता है नम्रता है। नम्रता, शिष्टाचार, विनय, उदारता, स्नेह-सौजन्य, सौहाद्रादि भरा व्यवहार दूसरों से करके उनका हृदय जीतने को कौन तैयार होता है । ऐंठ, अकड़, उपेक्षा, अनुदारता का अपने बड़े आदमी होने का अपने वैभव, अधिकार बल पद आदि का प्रदर्शन करके अपने बड़प्पन का आतंक एक दूसरों पर जमाना चाहते हैं । सरकारी अफसरों, अमीरों, स्वाधीशों, विद्वानों, अभिचारियों एवं तथा कथित बड़े आदमियों में यह अहंकारी की प्रवृत्ति कहीं भी आसानी से देखी जा सकती है। दूसरों के मुकाबले अपनी हेठी कराने को कोई तैयार नहीं, हर आदमी गुणों में नहीं, अहंकारों में दूसरों से बढ़कर रहना चाहता है। इस प्रकार अहंकार की प्रवृत्ति भी किसी से पीछे नहीं हैं। इस प्रवृत्ति के पोषण के लिए लोग विवाह-शादियों में मृत-भोजों में तथा ऐसे ही अन्य प्रदर्शनात्मक अवसरों पर, शेखीखोरी भरा अपव्यय करके पीछे दुख पाते देखे जाते हैं। अहंकार के बाद मोह का नम्बर हैं। मेरे पन का, ममता का, संकीर्ण और स्वार्थ पूर्ण भाव, लोगों में दिन-दिन बढ़ता जाता है। प्राचीन काल में अपने परिवार की सेवा एवं जिम्मेदारी से निवृत्त होकर लोग संसार-सेवा के लिए थे। आज बुड्ढा-घर में गालियाँ खाता है हुआ भी नाता-पोतों के मोह में ऐसा जकड़ा रहता है जैसे खजाने की रखवाली के लिए सर्प कुण्डली भर कर बैठता है। अपने पास आवश्यकता से अधिक वस्तु है तो उसे अधिक उपयोगी कार्यों के लिए देने की कोई इच्छा नहीं करता, वरन् अपने अधिकार की स्वामित्व की चीतों को दिन-दिन बढ़ाने की ही इच्छा करता रहता है। यदि किसी व्यक्ति को सन्तान नहीं है तो वह अपने बाद अपनी सम्पत्ति को किसी लोकहित के कार्य में लगा देने की बात नहीं सोचता वरन् अपने धन दौलत के अतिरिक्त एक मुफ्त का लड़का और गोद घर कर अपने जायदाद में एक लड़के की वृद्धि करना चाहता है मोह जनित तृष्णाओं का कोई वारापार नहीं लोगों की बहुमूल्य शक्तियाँ, योग्यताएं और संपदाएं-इस मोह ममता के जेल खाने में पड़ी-पड़ी सड़ती रहती हैं उनका लाभ न वे स्वयं उठा पाते हैं और न दूसरों का उठाने देते हैं मोह का जाल ऐसा ही विकट है।
काम , क्रोध, मोह , लोभ, मद, मत्सर प्रभूति आसुरी सम्पत्तियाँ संसार में जब बढ़ती है ता उसके फलस्वरूप अशान्ति-क्लेश, कलह, संघर्ष, ईर्ष्या, द्वेष रोग, शोक अभाव, कष्ट, चिन्ता भय आदि नाना प्रकार के कष्टों का प्रादुर्भाव होता है। जिस प्रकार सर्दी से पानी जमकर बर्फ हो जाता है और गर्मी से गरम होकर खौलने लगता है उसी प्रकार दैवी संस्कृति बढ़ने से संसार की समस्त परिस्थितियाँ सुख-शान्ति मय, आनन्द और उल्लास भरी, सम्पत्ति और समृद्धि से परिपूर्ण बन जाती है और आसुरी सभ्यता बढ़ते ही संसार का सारा वातावरण विक्षुब्ध होकर सभी के लिए घोर कष्ट कारक बन जाता है। हमारे सामूहिक दुष्कर्म वर्षा, बाढ़, युद्ध भूकम्प, महामारी आदि दैवी प्रकोपों के रूप में सर्वत्र देखे जा सकते हैं। लोग कुछ धन, विलास साधन, अधिकार एवं वाहवाही प्राप्त तो कर लेते हैं पर उससे लाभ तनिक भी नहीं उठा पाते, उलटे यह प्राप्त हुई वस्तुएं ही उनके लिए एक जंजाल बन जाती है। मिट्टी के तेल के बर्तन में दूध दुहने पर वह दूध पीने लायक नहीं रहता, इसी प्रकार बुरे साधनों से प्राप्त की हुई सुख सामग्री देखने दिखाने तक के लिए ही आनंद दायक होती है, उसका स्वामी वस्तुतः उससे सच्चा सुख कदापि प्राप्त नहीं कर सकता। कहीं से भगाई हुई स्त्री को जबरदस्ती कर में डाल कर दुराचारी उससे काम सेवन कर सकता है पर विवाहित धर्मपत्नी के समान दाम्पत्य सुख की प्राप्ति उससे नहीं हो सकती। यही बात अनीति उपार्जित सुख-साधनों के सम्बन्ध में हैं।
आज चारों ओर “उन्नति” की घुड़-दौड़ लगी हुई है। धन में, विज्ञान में, वैभव में, शिक्षा में, विस्तार में, कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता। यह “उन्नति” हो भी रही है पर इससे सुख शान्ति में रत्ती भर भी वृद्धि नहीं हो रही है। वरन् इस भौतिक सुख साधनों की उन्नति के साथ-साथ उसी मात्रा में क्लेश, कलह, रोग, शोक, भय, चिन्ता, द्वेप आदि की वृद्धि भी हो रही है। प्राचीन काल में आज की अपेक्षा लोग गरीब थे, पर वे अब के लोगों की अपेक्षा बहुत अधिक सुखी थे। कारण यह है कि सुख शान्ति का केवल भौतिक सामग्री से जितना सम्बन्ध है, उसकी अपेक्षा कहीं अधिक संबंध मानसिक स्थिति से हैं। जिसका मन, पाप, द्वेष, दुर्भाव, दुर्गुण, दुःस्वभाव, दुर्भावना का शिकार हो रहा है उसे बड़ी से बड़ी सम्पदा भी सुखी नहीं बना सकती-वह सदा दुःखी ही रहेगा, इसके विपरीत जिसकी मानसिक पृष्ठभूमि सद्गुणों, सद्भावों, सद्विचारों, सत्कार्यों में निमग्न रहती है वह गरीब रहते हुए भी आनन्दमय जीवन व्यतीत कर सकता है।
सुख शान्ति के मूल स्रोत को हमारे दूरदर्शी पूर्वजों ने बड़ी खोज करके प्राप्त किया था उन महान वैज्ञानिकों ने पता लगा था कि मन की स्थिति ही मानव जीवन की सुख शांति का मूल आधार है। इसलिए उन्होंने सबसे अधिक इस बात पर ध्यान किया कि जीवन यापन की एक ऐसी पद्धति बनाई जाय जिसके साँचे में ढल कर इंसान-सच्चा इंसान बन सके। पग पग पर ऐसे नियम, विधान, कार्यक्रम , आयोजन, प्रतिबन्ध, उत्सव, कर्मकाण्ड, विचार, दृष्टिकोण, प्रदर्शन, प्रण, व्रत, पर्व, उपस्थित किये, जिन की प्रेरणा बार-बार मनुष्य को मिलती रहे और वह मनोभूमि को दिव्यता की ओर झुकाये रह सके। यही भारतीय संस्कृति है। भारतीय संस्कृति के आचार, विचार, दर्शन, दृष्टिकोण, शास्त्र, व्रत, उत्सव, पर्व, त्यौहार, रीति, रिवाज, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सोलह संस्कार, पूजा, पाठ, तीर्थ, कथा, कीर्तन, कर्म-काण्ड, आहार, विहार, वेष-भूषा, भाव, रहन, सहन सब कुछ इसी तथ्य के पोषण के लिए हैं कि-‘मनुष्य अपने तईं कठोर और दूसरों के तईं उदार बने। सुख की खोज विलासिता में नहीं वरन् आन्तरिक महानता में करें।”
इन थोड़ी पंक्तियों में तो सम्भव नहीं है पर अगले अंकों में हम पाठकों को यह बतायेंगे कि हिन्दू धर्म के इतने विशाल ढाँचे की एक एक ईंट से रचना किस उद्देश्य से किस प्रकार, किस योजना के आधार पर की गई है। भारतीय संस्कृति-विशुद्ध रूप से दैवी संस्कृति आदर्श ऐसा है जिससे प्रभावित जन-समाज विश्व मानवता का एक श्रेष्ठ नागरिक ही सिद्ध हो सकता है। एक एक त्यौहार में एक एक संस्कार में, एक एक रीति रिवाज में, एक एक कर्म काण्ड में मनोविज्ञान, पदार्थ विज्ञान, समाज विज्ञान के अत्यन्त ही महत्व पूर्ण सिद्धान्तों का समावेश हुआ है और उन्हें इसीलिये बनाया गया है कि मनुष्य सच्चा मनुष्य बनकर व्यक्तिगत और सार्वजनिक सुख शाँति की रक्षा तथा वृद्धि करे।
इस प्रकार की लेख माला अखण्ड ज्योति में आरम्भ की जायगी और भारतीय संस्कृति की महानता का रहस्य उपस्थित किया जायगा।
जब संसार में भारतीय संस्कृति-दैवी सभ्यता-फैली हुई थी तब विश्व में सर्वत्र सुख शांति का साम्राज्य था। संसार भर में उसे बड़े आदर पूर्वक अपनाया गया था ओर इस संस्कृति के आविष्कार में हमारे पूर्वजों को चक्रवर्ती शासक जगत गुरु तैंतीस कोटि देवों के रूप में स्वीकार किया था। उस महान् संस्कृति की उद्गम भूमि को देव भूमि कहा गया था। सचमुच में हमारा यह देश स्वर्गलोक बना हुआ था, यहाँ के तैंतीस कोटि निवास देवता ही माने जाते थे और उनकी सर्वत्र पूजा होती थी। आज उस संस्कृति का परित्याग कर देने पर, हम देवता नहीं रहे। तैंतीस कोटि से बढ़कर जन संख्या तो छत्तीस सैंतीस करोड़ हो गई है तैंतीस कोटि देवताओं की चिन्ह पूजा भी होती है, पर वस्तुतः देवत्व गायब हो गया। अब तो आसुरी संस्कृति की मदिरा को पीकर मदोन्मत्त असुर ही चारों ओर नाचते दीखते हैं।
दैवी सम्पत्ति को परास्त करके आसुरी सम्पत्ति तेजी से बढ़ती चली आ रही हैं। उसकी साम्राज्य ध्वजाएं बढ़ती आ रही हैं, विजय दुन्दुभी बज रही है। फल स्वरूप, घर घर में, मन मन में, महाभारत की सी स्थिति उत्पन्न हो रही है। अमेरिका और रूस जिन दाव पेंचों से लड़ रहे हैं, छोटे छोटे रूप में भाई भाई में, पड़ौसी पड़ौसी में, घर घर में वे ही दाव-पेंच चल रहे हैं और सर्वत्र भय आशंका अविश्वास, द्वेष और तृष्णा का दावानल जल रहा है। यह दावानल यदि इसी रूप में बढ़ता रहा तो मनुष्य को सिंह, भेड़िया, सर्प, बिच्छू आदि की श्रेणी में जा खड़ा करेगा और 56 कोटि यादवों की भाँति आपस में ही लड़ मर सब नष्ट हे जायेंगे। सामूहिक आत्मघात के लिये जो उद्विजन बम बन रहें हैं उनका प्रयोग होकर ही रहेगा यदि यह आसुरी संस्कृति इसी प्रकार पनपती रही तो होकर ही रहेगा।
खतरा बढ़ रहा है। संकट की घड़ी दूर नहीं है। मानव सभ्यता का दीवारें गिरना ही चाहती यदि यह क्रम चलता रहा तो नैतिकता के आदर्श नष्ट हो जायेंगे और मनुष्य एक दूसरे को फाड़ खाने वाले भेड़िये मात्र रह जायेंगे। जिन्हें देवतत्व के प्रति मानवीय सहायता के प्रति कुछ आस्था, श्रद्धा और ममता है उनके लिए अब परीक्षा की निर्णायक घड़ी आ पहुँची है। वे निरपेक्ष दर्शक की तरह एक किनारे पर खड़े दैवी संस्कृति का अधः पतन और आसुरी संस्कृति का विजय-घोष देख सुन न सकेंगे। उन्हें कुछ करना होगा। ईश्वर ने उपयुक्त अवसरों पर उपयोग करने के लिए हमें जो बल, साहस, विवेक और पुरुषार्थ दिया है उसका सर्वोत्तम उपयोग करने का यही समय है। राजा की दी हुई बन्दूक को जो सिपाही ठीक अवसर पर नहीं चलाता वह कर्तव्य घात का अपराधी होता है। नैतिक पुनरुत्थान की नींव को मजबूत करने के लिए, मानवता के आदर्शों की हिलती हुई दीवारों को पुनः जमा देने के लिए हम में से अनेकों को ईंट चूना बनना पड़ेगा। ऋषियों की आत्माएं स्वर्ग लोक से निहार रही हैं और देख रही है कि उनकी लाखों वर्षों की कमाई की रक्षा करने के लिए उसकी सन्तान में कुछ दम रह गया है या नहीं! सत्यानाशी आसुरी संस्कृति को रोकने के चट्टान की तरह हम अड़ जावें, मुरझाती हुई दैवी संस्कृति को सींचने के लिए हम अपना पसीना ही रस रक्त भी निचोड़ दें यह समय की, सभ्यता की प्रकार है-आइये इस चुनौती को स्वीकार करें।
आचार ओर विचार का आपस में अत्यन्त ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। जो व्यक्ति जिस परिस्थिति में, वातावरण में कार्यक्रम में, अपना अधिक समय बिताता है उसके विचार और मनोभाव उसी ढाँचे में ढल जाते हैं। संस्कृतियों का यही रहस्य है। जिस संस्कृति के भाषा, वेष, भाव, रहन-सहन, रीति-रिवाज आचार व्यवहार को हम अपनाते हैं, विचार धारा भी निश्चित रूप में उसी प्रकार की बनती जाती है। अंग्रेजियत की नींव बहुत गहरी पहुँचा दी जायं इस आकाँक्षा से प्रेरित अंग्रेजों ने सब से अधिक जोर इस बात पर दिया कि अंग्रेजों की संस्कृति को भारतीय अपना लें। उन्होंने सरकारी नौकरियों में स्कूलों में इस बात का पूरा-पूरा प्रयत्न किया कि लोगों का रहन-सहन, खान-पान, आचार-विचार भाषा भेष, अंग्रेजों जैसा ही बने। वे इस दिशा में डेढ़ दो-सौ वर्षों में जितने सफल हुए, उतनी ही उनकी नींव गहरी हो गई। आज अंग्रेजी हुकूमत भले ही चली गई हो, पर उनकी संस्कृति दिन दूनी रात चौगुनी फल फूल रही है। राजनैतिक दृष्टि से हम स्वतन्त्र हो गये पर साँस्कृतिक दृष्टि से गुलामी के बन्धनों में हम तेजी से बँधते जा रहे हैं। अमेरिका जितना खर्च कर रहा है। कारण यह है कि समान संस्कृति के लोग आपस में मानसिक दृष्टि से अधिक संबद्ध हो जाते हैं चाहें वे राजनैतिक या भौगोलिक दृष्टि से दूर ही क्यों न हों।
मुसलमानी हुकूमत के जमाने में भी यही सब होता रहा। लोगों को नृशंस यातनाएं और भारी प्रलोभन भरी सुविधाएं केवल इसी दृष्टि से दी जाती रही कि वे भय या लोभ से प्रेरित होकर मुसलमानी संस्कृति अपनालें। उनका विचार ठीक ही था वस्तुतः ऐसा ही सिद्ध भी हुआ । जिन लोगों ने हिन्दू धर्म छोड़ा और इस्लाम स्वीकार किया, उन्होंने भारतीय भी छोड़ दी और मध्य पूर्व को-मक्का मदीना को अपना उद्गम केन्द्र मान लिया। भारतीय मुसलमानों द्वारा परिस्थान प्राप्त करने के लिए क्या क्या किया गया? और अब वे अपने लाखों वर्षों के रक्त सम्बन्धी हिन्दुओं के प्रति कैसे मनोभव रखते हैं और मुसलमानी राष्ट्र जिनसे उनके रक्त का कोई सम्बन्ध नहीं-किस प्रकार का सम्बन्ध रख रहे हैं इस तथ्य को हर कोई आँखों वाला देख समझा सकता है।
कुछ ही दिन पूर्व दिल्ली में एक पादरी ने ईसाई धर्म छोड़कर हिन्दू धर्म में प्रवेश किया था। वह सज्जन जन्मतः भारतीय हैं, पर बहुत लम्बे समय से ईसाई धर्म का प्रचार कर रहे थे। उन्होंने इस धर्म परिवर्तन का कारण बताते हुए एक बड़े ही महत्व की बात कही, जो हम सब को बहुत गम्भीरता से समझ लेने की है-उन्होंने कहा-“मैंने अपने लम्बे अनुभव काल में यह भली प्रकार देख लिया कि ईसाई होने के बाद मनुष्य की मनोभावना किसी अन्य देश के साथ जुड़ जाती है और वह उसी रंग में रंग जाता है।” वस्तुतः किसी भी राष्ट्र की राष्ट्रीयता उसकी प्राचीन संस्कृति के साथ जुड़ी रहती है। लगभग एक हजार वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बाद भी भारत-भारत ही बना रहा इसका कारण यहाँ के लोगों की गहरी साँस्कृतिक निष्ठा ही थी। इतिहास साक्षी है कि जिन देशों की अपनी कोई दूसरी संगठित संस्कृतियों से प्रभावित होकर उसी धर्म में दीक्षित हो गये। मुसलमान और ईसाई धर्मों का जन्म हुए डेढ़ दो हजार वर्ष भी नहीं हुए हैं कि इन दो धर्मों में संसार की तीन चौथाई जनता दीक्षित हो गई। राजनैतिक और आर्थिक सहयोग में भी यह साँस्कृतिक एकता कितना भारी काम करती है। इसे विश्व को वर्तमान गति-विधियों से परिचित व्यक्ति भली प्रकार जानते हैं। राजनैतिक उपनिवेश बाद अस्थायी वस्तु है, उसे जागृत-जनता उखाड़ फेंकती हैं, पर साँस्कृतिक-साम्राज्य ऐसा जहर होता है कि उसके बन्धनों में लोग जान बूझ-कर, हँसते-हँसते बँधते हैं, उस बन्धन में कुछ अच्छाई अनुभव करते हैं ओर उससे छूटने की अपेक्षा, अपने प्रभाव के और लोगों को भी उसमें शामिल करने का प्रयत्न करते हैं। साँस्कृतिक साम्राज्य की यही विशेषता है। यह साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद अनोखे ढंग का है। राजनैतिक साम्राज्य से इसका महत्व असंख्य गुना अधिक है। ईसाई देश पहले बाइबिल लेकर किसी देश में घुसते हैं पीछे बन्दूकें भी वहाँ पहुँच जाती है। कम्युनिस्टों का बौद्धिक साम्राज्य भी पहले विचारों के पुस्तकों के रूप में ही प्रवेश करता है पीछे वह एक राजनैतिक शक्ति बन जाता है।
भारतीय संस्कृति की रक्षा इस दृष्टि से भी आवश्यक है कि हमारी जातीयता ओर राष्ट्रीयता इतनी सबल बनी रहे कि हम दूसरे बौद्धिक साम्राज्य में जकड़े जाकर अपने आपको पाकिस्तान आदि के लोगों की भाँति किन्हीं अन्य जातियों या राष्ट्रों के प्रति आत्म समर्पण न करदें। प्राचीन काल में भारतीयों का विश्व पर जो चक्रवर्ती राज्य था वह साँस्कृतिक साम्राज्य ही था। सुदूर देशों में हमारी संस्कृति के चिन्ह जहाँ-तहाँ अय भी उपलब्ध हो सकते हैं। जावा, सुमात्रा, चीन, जापान आदि के पुरातत्व विभागों की साक्षी यह बताती है कि यहाँ किसी समय भारतीयता की पूर्ण प्रतिष्ठा रही है। अन्य धर्म वाले आत राजनैतिक और आर्थिक स्वार्थों से प्रेरित होकर अपनी संस्कृतियों का विश्व भर में भारी प्रचार करने का प्रयत्न कर रहे हैं, पर हमारे पूर्वजों का ऐसा कोई स्वार्थ न था। वे मनुष्यों को सच्चा मनुष्य बनाने-उसे अनेक दोष दुर्गुणों से उत्पन्न होने वाले नारकीय जीवन से बचाकर, सच्चे शास्त्र का पथ-प्रदर्शन करने की पुनीत भावना से प्रेरित हो कर ही अपनी देवी संस्कृति का प्रचार करते थे। उन के पुनीत उद्देश्यों से परिचित विश्व उन्हें जगद्गुरु मानता था।
आज हमारी संस्कृति का भारी ह्रास हो रहा है। विदेशों में जो इस संस्कृति की मान्यता रखने वाले थे, उनकी संख्या दिन-दिन घटती जा रही है। अपने घर में भी उसका भारी तिरस्कार है आज का नवयुवक भारतीय आचार विचार, भाषा-भेष, रहन-सहन, रीति-रिवाज नापसन्द करता है, उसे अंग्रेजी ढंग पसन्द है। वह उन्हें दिन दिन अधिक प्रसन्नता पूर्वक अपनाता जाता है। भारतीय संस्कृति का परिवर्तन अंग्रेजी संस्कृति के रूप में तेजी से होता चला जा रहा है। यदि यह गतिविधि इसी क्रम से चलती रही तो कुछ ही शताब्दी में हमारा मानसिक और सामाजिक ढाँचा दूसरी ही प्रकार का बन जावेगा। साथ ही दैवी संस्कृति का वह दीपक जो संसार को शान्तिमय प्रकाश की ओर ले जा सकने में समर्थ है, भी अस्त हो जायगा। फिर हमारी करोड़ों वर्ष की चली आ रही महान परंपराएं किसी रूप में जीवित भी रहेंगी या नहीं, इसे कौन कह सकता है? आज भी पढ़े-लिखें लोगों में से चोटी जनेऊ गायब होता चला जा रहा है, धोती कुर्ते की दुर्गति है, पूजा अर्चना ढोंग मात्र समझे जाने लगे हैं, रीति रिवाजों में, कानूनों में पाश्चात्य पद्धति का तेजी से समावेश हो रहा है। कुछ ही दिन में इसका क्या रूप बन जायगा, यह कल्पना आज कष्ट कर प्रतीत होती है।
जिनके मन में भारतीयता के प्रति आदर है, वे निश्चय ही यह पसन्द नहीं करेंगे कि भारतीय संस्कृति इस प्रकार आत्मघात करती हुई विश्व के पर्दे पर से अपना अस्तित्व समेटने में लग जाये। हम में से ही विचारशील व्यक्ति यह अनुभव करेगा कि भारत को राजनैतिक, सामाजिक आर्थिक और नैतिक दृष्टि से एक सुदृढ़ राष्ट्र बनाने के लिए भारतीय संस्कृति की जड़े मजबूत की जानी चाहिये। यह तो एक छोटी बात रही सच्ची बात यह है कि विश्व में देवी सम्पत्ति की, मानवता की, सत्य प्रेम और न्याय की रक्षा के लिए इस दिव्य संस्कृति को जीवित रखना ही नहीं वरन् सुविकसित करना भी आवश्यक है।
हमारी यह-विश्व की सर्वश्रेष्ठ संस्कृति इस दुर्दशा को क्यों पहुँची? इसके कारणों पर विचार करते हुए हमें दो हो कारण दृष्टि गोचर होते हैं-
(1) भारतीय संस्कृति की रूप रेखा वर्तमान समय में विकृत हो रही है। जिस रूप में आज वह तर्क बुद्धि और उपयोगिता की दृष्टि से अनुपयोगी प्रतीत होता है। इस लिए लोग उसे रूढ़िवाद, अन्ध विश्वास, ढोंग अविवेक पूर्ण समय से पीछे की चीज साम्प्रदायिकता आदि उपेक्षित वस्तु मान लेते हैं।
(2) भारतीय संस्कृति का जो मूलभूत दार्शज रूप है। जिसके आधार पर समय समय पर अनेक रीति रिवाजों का परिवर्तन परिवर्तन होता रहता-उन आधार मूल तथ्यों की जानकारी लोगों को नहीं रही। फल स्वरूप लोग यह समझने में समर्थ नहीं रहे कि यह मनुष्य जाति के लिए कितनी कल्याणमयी महान् उपयोगिता है।
भारतीय तत्व ज्ञान की वास्तविक आधार शिला का मूल रूप यदि साधारण जनता की समझ में आ जाय तो निश्चय ही हर बुद्धिमान आदमी यह अनुभव कर सकता कि यह तत्व ज्ञान-आधुनिक सभी तत्व ज्ञानों से ऊँचा है। कम्युनिज्म आदि जो दर्शन अपने आपको वर्तमान समय के लिए सर्वोपयोगी एवं व्यवहारिक सिद्ध करते हैं, उनसे भारतीय तत्वज्ञान किसी भी प्रकार पीछे नहीं हैं, हमारी प्राचीन विचार धाराएं और परंपराएं यदि ठीक रूप से समझा जायं तो वे मनुष्य की समस्त समस्याओं को सुलझाने में अधिक आधुनिक और अधिक व्यवहारिक रूप से समर्थ हो सकते हैं। हमारा दर्शन, पूर्ण रूप से मनोविज्ञान, पदार्थ विज्ञान, तर्क, प्रमाण, अनुभव आदि के ठोस आधारों पर आधारित है। इसी प्रकार रीति रिवाजों, त्यौहारों, व्रत, उत्सवों, संस्कार, भाषा-भेष, भाव, आचार, व्यवहार आदि का महत्व समझ में आ जाये और समय के कुप्रभाव से आ विकृतियों का संशोधन तथा समय की प्रगति की पूर्ति के लिए आवश्यक परिवर्तन कर दिया जाय तो हमारी साँस्कृतिक महानता और उपयोगिता हर किसी की समझ में आ सकती है। तब उसकी उपेक्षा, अवहेलना और निन्दा करना उचित प्रतीत न होगा।
संस्कृति पुनरुत्थान के लिए हमें सबसे बड़ा और सबसे आरम्भिक कार्य यह करना है कि उसके विशुद्ध रूप की-जो आज तमसाच्छन्न हो रहा है-लोगों के सन्मुख परिष्कृत रूप में उपस्थित करें और यह बतावें कि इस महानता को अपनाना हमारे लिए सभी दृष्टियों से कितना अधिक लाभ दायक हो सकता है। संस्कृति सेवा का-पुनरुत्थान का सर्व प्रथम कार्य यही हो सकता है कि हम जनता के सामने सर्व साधारण के सामने अपना दर्शन शास्त्र, तत्व ज्ञान तथा आचार विचार का व्यवहारिक रूप उपस्थित करें, जिससे उसकी उपेक्षा करने वालों को पुनः विचार करने का और थोड़ी आस्था रखने वालों को प्रोत्साहन का अवसर मिले। आइये हम लोग बड़े पैमाने पर सुसंगठित रूप से इस निर्माण कार्य में संलग्न हों।
दैवी संस्कृति-देवतुल्य आचार विचारों की पद्धति का ही दूसरा नाम भारतीय संस्कृति है। इस पद्धति के अनुसार जीवन का निर्माण करने का अर्थ निश्चित रूप से यह है कि मनुष्य भौतिक सुख सम्पदाओं की अपेक्षा सद् आध्यात्मिक सद् गुणों, सद् विचारों, सत्कार्यों को अधिक महत्व दे और वह स्वार्थ की संकीर्णता से बढ़ कर परमार्थ की महानता में पदार्पण करें। इस राजमार्ग पर चलने में ही मनुष्य का व्यक्तिगत लाभ और संसार का सामूहिक कल्याण का तत्व छिपा हुआ ह। भारतीय संस्कृति की सुरक्षा प्रतिष्ठा और अभिवृद्धि एक प्रकार से विश्वमानव की सर्वश्रेष्ठ सेवा, और परमात्मा की सर्वोत्तम उपासना है।
अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में हम क्रमशः यह बताते चलेंगे कि हिन्दू धर्म की एक एक कड़ी किस प्रकार अत्यन्त ही बुद्धि संगत, उपयोगी एवं विज्ञान सम्पन्न आधारों पर विनिर्मित हुई है और उसको कितने गम्भीर परिणामों की संभावना सन्निहित है। यहाँ इन पंक्तियों में तो आज हमें यह विचार करना है कि भारतीय तत्वज्ञान को घर-घर में, मन-मन में पहुँचाने के लिए हमें क्या करना चाहिए। राजनैतिक और आर्थिक पंचवर्षीय योजनाएं सामने आती रहती है, पर उनसे भी महत्वपूर्ण-साँस्कृतिक योजनाएं हैं, जिनके बिना मनुष्य का मानसिक और आत्मिक विकास अवरुद्ध ही रह जाता है।
राजनैतिक नेताओं का कार्यक्षेत्र राजनैतिक और आर्थिक है। वे उसी क्षेत्र में अपनी योजना और कार्य क्षमता का उपयोग कर सकते हैं। साँस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक योजनाओं का आगे बढ़ाना उनके लिए कठिन है, क्योंकि जो लोग मनुष्य की नैतिक श्रद्धा के गहन अन्तस्तल का अपने आदर्श जीवन के द्वारा स्पर्श कर सकते हैं वे ही किन्हीं से नैतिक विचारों को बनाने और बदलने में सफल हो सकते हैं। इसलिए यह कार्य नेताओं का नहीं, त्यागी और तपस्वी धर्म सेवियों का है। हमारा यह कर्तव्य है कि संस्कृति विकास की योजनाएं बनावें और जनता जनार्दन के अन्तस्तल में छिपे हुए श्रद्धा तत्वों का आह्वान करके जन मानस को उचित दिशा में अग्रसर करें। नीचे कुछ ऐसे ही कार्य क्रम उपस्थित किये जाते हैं।
(1) भारतीय तत्वज्ञान के उच्चकोटि के विद्वान मिल कर निम्न बातों की शोध करें।
(अ) भारतीय धर्म का आज जो रूप है उसमें कितना अंश प्राचीन मूल संस्कृति के अनुकूल और उपयोगी है। और कितना अवाँछनीय अंश समय की विकृतियों के साथ उसमें मिला है। जिस प्रकार सोना और पीतल की मिलावट को चतुर सुनार शोध कर अलग अलग कर देता है उसी प्रकार सनातन आर्य संस्कृति की शुद्धता और विदेशी आक्रमणों, स्वार्थी तत्वों तथा समय की विकृतियों के कारण समावेश हुई रूढ़ियों को अशुद्धता को अलग अलग छाँट दिया जाय।
(ब) हिन्दू परम्पराओं के अनुसार प्रचलित रीति रिवाजों पर अनेक दृष्टिकोण से विचार किया जाय और उनकी उपयोगिता अनुपयोगिता को स्पष्ट किया जायं
(स) व्रत, पर्व, और त्यौहारों के मूल उद्देश्य ढूंढ़े जायं और उनके मनाने का वास्तविक उद्देश्य तथा कार्यक्रम तलाश किए जायं। आज की परिस्थिति में इन्हें किन सुधारों के साथ मनाना उचित है इस प्रश्न पर गहराई से विचार किया जाय।
(द) शास्त्रों में जो परस्पर विरोधी, सिद्धाँत तथा आदर्श पाये जाते हैं उनको एक सुव्यवस्थित रूप से जनता के सामने इसे रूप में रखा जाय कि वे एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक प्रतीत हों। दार्शनिक और धार्मिक मतभेदों के कारणों को बताते हुए उनका समन्वय किया जाय।
(य) पौराणिक अलंकारिक गाथाएं जो कहीं कहीं असंभव और अनैतिक सी दीखती हैं। उनमें पहेलियों की बुझौअल की तरह कुछ रहस्य छिपे हुये हैं। इन रहस्यों के - गूढाथ को प्रगट करके जनता में फैले हुए उन भ्रमों को दूर किया जाय जिनके कारण जनता में धार्मिक अविश्वास और सन्देह बढ़ता है।
(फ) देवी, देवताओं के अस्तित्व,विभिन्न रूप, उनके विचित्र वाहन ,तथा विचित्र इतिहास ऐसे हैं जिन के रहस्यों को साधारण व्यक्ति आज समझने में असमर्थ है। इसलिए इन बातों को संदिग्ध समझा जाता है। विद्वानों का काम है कि देववाद का वैज्ञानिक रूप सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत करें।
(ग) भारतीय पुनर्जन्मवाद, परलोकवाद, अद्वैत द्वैत और चैत्र वाद, वर्णाश्रम धर्म, स्पर्शास्पर्श, कर्मविपाक, आदि दार्शनिक विषयों का सरल रूप सर्व साधारण जनता के समझने योग्य रीति से उपस्थित किये जाय।
(ह) भारतीय आचार विचार रहन सहन, भाषा, सेवा भाव एवं परम्पराओं की उपयोगिता एवं आवश्यकता को इस रूप में उपस्थित किया जाय कि जनता उनको अपनाना अपने लाभ की बात समझालें।
(2) षोडश संस्कारों को परिष्कृत रूप में उपस्थित किया जाय। बहुत लम्बा समय और धन व्यय कराने वाले विधानों को सरल बना कर संस्कारों को ऐसे ढंग से कराया जाय कि सर्व साधारण को उनमें रुचि एवं आकर्षण हो।
पुँसवन सीमान्त संस्कार के मय गर्भस्थ बालक के प्रति गर्भिणी के तथा गर्भिणी के प्रति घर वालों के कर्तव्यों का उपदेश विस्तार पूर्वक किया जाय। नाम कारण के समय बालक के सुविकसित करने के लिए घर वालों को समुचित ज्ञान दिया जाय। यज्ञोपवीत के समय बालक को द्विजत्व की आदर्शमय जीवन की शिक्षा दी जाय। विवाह के समय पति-पत्नी को उनको उनके कर्तव्य भली प्रकार समझाये जायं और उनकी कर्तव्यों के पालन की-चिन्ह पूजा के रूप में नहीं वरन् विधिवत् प्रतिज्ञा कराई जायं। अंत्येष्टि संस्कार के समय जीवन की नश्वरता, सत्कर्मों की श्रेष्ठता आदि का विस्तृत विवेचन किया जाय। इस प्रकार प्रत्येक संस्कार कर्तव्य भावनाओं को गहराई तक मजबूत करने वाला बनाया जाय। साथ ही उन्हें इतना सरल बनाया जाय कि गरीब आदमी भी उन्हें हँसी खुशी करा सकें। ऐसी सरल संस्कार पद्धति बनाई जाय जिसका उपयोग साधारण व्यक्ति भी कर सकें।
(3) त्यौहारों को मनाने की ऐसी रीति बनाई जायँ, जिससे हर एक त्यौहार कुछ शिक्षा, तथा प्रेरणा दे सके। त्यौहारों के उत्सव सामूहिक रूप से मनाये जायं और उसमें छिपे छुए संदेशों का समझा जाय और उनसे प्रकाश ग्रहण किया जाय।
(4) भारतीय महापुरुषों के उन प्राचीन चरित्रों को अधिक प्रकाश में लाया जाय जो जन साधारण को उपयोगी प्रेरणा दे सकते हैं। रामायण, महाभारत, भागवत आदि कथा ग्रन्थों में से युग निर्माण करने वाली कथायें चुनी जायं ओर उनकी छाप, उत्तम रीति से जनता के मन पर बिछाने के लिए प्रवचन, कविता, गायन, अभिनय आदि द्वारा जन मन पर इस ढंग से अंकित की जाय जिससे उन आदर्शों की अपने जीवन में चरितार्थ करके लोग महानता की ओर अग्रसर हों।
(5) वेद शास्त्रों की पुस्तकें तथा शिक्षाएं सर्व साधारण के लाए सरल बनाई जायं।
(6) संस्कृत भाषा का प्रचार किया जाय।
(7) उपासना में गायत्री उपासना को सर्वप्रथम स्थान दिलाये जाय तैसे मुसलमानों में ‘कलमा’ को प्राप्त है।
(8) यज्ञ भारतीय अध्यात्म विज्ञान का मूल आधार है। इस विद्या के ज्ञाता लोग इसकी प्रामाणिक खोज करें कि यज्ञ द्वारा रोग निवारण, मनोभावों की शुद्धि, वर्षा, प्राण शक्ति की वृद्धि, धर्म बुद्धि, मस्तिष्क विकास, सकाम प्रयोजनों की सिद्धि आदि भौतिक लाभ किस प्रकार होते हैं और इससे आध्यात्मिक लाभों का कारण क्या है ? इन तथ्यों की जिस प्रकार विज्ञान के विभिन्न वस्तुओं पर खोज होती है उसी प्रकार इस विज्ञान पर गहरी एवं प्रामाणिक खोज की जाये।
(9) तीर्थों को चंद पण्डे पुजारियों की जीविका का माध्यम और मुफ्त में स्वर्ग लूटने के लिये आतुर अन्ध विश्वास का केन्द्र न रहने दिया जाये, वरन् वहाँ जो धन व्यय होता है उसका ऐसा सदुपयोग हो जिससे लोगों को धार्मिक शिक्षा एवं प्रेरणा प्राप्त होती रहे।
(10) जिन लोगों की जीविका दान दक्षिणा से चलती हैं उनको जनता की धार्मिक सेवा में लगाया जाये।
(11) गोवंश की रक्षा और वृद्धि के लिये ठोस कार्यक्रम बनाये जाये।
(12) साँस्कृतिक सेवा के लिये अपना समय देने वाले कार्य कर्ता बड़ी संख्या में तैयार किये जाये और उनको कार्य करने की शिक्षा देने के लिये स्थान पर शिक्षण शिविर या विद्यालय चलाये जाये।
(13) छोटे बड़े अनेक साँस्कृतिक सम्मेलन एवं उत्सव बराबर होते रहें। इनका नाम प्राचीन काल की तरह यज्ञ-आयोजन भी हो। साधारण सभा सम्मेलन करने की अपेक्षा ऐसे बृहद् यज्ञ करना अधिक प्रभावोत्माद हो सकता है जिनमें साँस्कृतिक शिक्षा तथा प्रेरणा के लिये वचनों की प्रचार की तथा परस्पर विचार विनिमयों की समुचित व्यवस्था हो।
(14) प्रत्येक मन्दिर को साँस्कृतिक शिक्षा प्रचार की एक संस्था बना दिया जाये जैसा कि प्राचीन काल में वस्तुतः वे होते थे। पुजारी का कार्य मूर्ति पूजा के बाद साँस्कृतिक संगठन एवं उस मन्दिर संस्था से संबन्धित अनेक धार्मिक कार्यक्रमों का संचालन ही है। हर मन्दिर में इस प्रकार की लगन वाले ही पुजारी रहें।
(15) साधारण संगीत शिक्षा के ऐसे छोटे-छोटे केन्द्र हो, जहाँ उत्कृष्ट भावनाओं को जगाने वाले गीतों का गाना तथा उन्हें बाजों पर बजाना सिखाया जाये।
(16) प्रदर्शनी, अभिनय, संगीत, कवि सम्मेलन प्रतियोगिता, गोष्ठी, चित्र पर आदि द्वारा साँस्कृतिक भावनाओं का प्रचार।
(17) सस्ते ट्रैक्ट तथा पत्र पलिकाओं द्वारा एवं परचे, पोस्टर आदि के मध्यम से लोगों की प्रवृत्तियों को धर्म मार्ग की ओर मोड़ना।
(18) गीता प्रेस की रामायण गीता परीक्षा आर्य समाज की आर्य कुमार दल की धार्मिक परीक्षा ईसाइयों के बाइबिल कोर्स की भाँति पत्र व्यवहार शिक्षा एवं प्रमाण पत्र देने वाली ऐसी परीक्षाओं का आयोजन किया जाये जिनके आकर्षण से लोग अधिक धर्म-ज्ञान प्राप्त करें।
(19) महिलाओं का मानसिक विकास करने के लिये महिला कार्यकर्ताओं के दल तैयार हों।
(20) सरकार पर साँस्कृतिक विकास के लिये अधिक सुविधाएं देने के लिए दबाव डालना।
इस प्रकार के और भी जो समय सूझ पड़े। अनेक कार्यक्रम हो सकते हैं कार्यक्रम बनाना सहज है। समयानुसार, आवश्यकतानुसार वे बन भी जाते हैं, आवश्यकता उन कार्य-कर्ताओं की है जो जन मन में भारतीय तत्वज्ञान की प्रतिष्ठापना करने के लिए तत्पर हों। भागीरथ ने घोर तप करे स्वर्ग निवासिनी गंगा को धरती पर उतारा था। आज ऐसे भागीरथों की भारी आवश्यकता है जो हमारे मुरझाये हुए मनः क्षेत्रों को सींचने के लिए साँस्कृतिक गंगा को अवतारित कर सकें। भारत-भूमि वीर विहीन नहीं रही है, उसने तपस्वी भागीरथों को जन्म देना बन्द नहीं कर दिया है- यह बात इन परीक्षा की घड़ियों में सिद्ध होकर रहे, ऐसी भगवान से प्रार्थना है।
गायत्री महामन्त्र से लाभ उठाने के लिये यह आवश्यक है कि गायत्री विद्या का पूरा परिचय एवं विधान भली प्रकार सीख लिया जाय। अधूरी जानकारी का परिणाम अधूरा ही होता है। साइन्स, डाक्टरी, इंजीनियरिंग, कानून, रसायन, शिल्प आदि की भांति गायत्री भी एक महत्वपूर्ण विद्या है, जिसकी पूरी जानकारी प्राप्त करके ही पूरा लाभ उठाया जाना सम्भव है।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों एवं सिद्ध पुरुषों के सहयोग तथा दीर्घ कालीन अनुभवों के आधार पर जो ज्ञान एकत्रित किया गया है, उसको पुस्तक रूप में प्रकाशित कर दिया है। इनमें उन सभी प्रश्नों का उत्तर, शंकाओं का समाधान तथा विभिन्न प्रयोजनों के लिए गायत्री प्रयोगों का पूरा वर्णन है। इन्हें पढ़ने के बाद कोई बात पूछनी हो तो जवाबी पत्र देकर प्रसन्नता पूर्वक पूछी जा सकती है। स्मरण रहे- साधारण पत्र की 10-10 पंक्तियों में किन्हीं साधनाओं का पूरा विधान या विज्ञान बताया जाना सम्भव नहीं। संक्षिप्त और अधूरे उत्तरों से जिज्ञासुओं का ठीक प्रकार समाधान नहीं होता। इसलिए कोई पूछ ताछ करने से पहले गायत्री महाविज्ञान आदि ग्रन्थों को पढ़ना आवश्यक है। जो सज्जन इन पुस्तकों को मंगा लेते हैं वे गायत्री परिवार के सदस्य माने जाते हैं और उनकी उन्नति के लिए समय पर अनेक आवश्यक बातें एवं सूचनाएं इधर से ही भेजी जाती रहती हैं।
(1) गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) मू. 3।।)
विषय- गायत्री विद्या का वैज्ञानिक परिचय, तथ्य तथा मूल आधार, साधना द्वारा गुप्त 24 शक्तियों का जागरण, अनेक शक्तियों का आविर्भाव, वेद शास्त्रों तथा महापुरुषों द्वारा गायत्री का गुणगान अनेकों के अनुभव, गायत्री का शाप मोचन और उत्कीलन, यज्ञोपवीत और गायत्री का सम्बन्ध, निष्काम और सकाम साधना, गायत्री साधना के नौ रत्न, अत्यन्त आवश्यक नियम, गायत्री द्वारा सन्ध्या वंदन, प्राणायाम ध्यान, अनुष्ठान, हवन तथा तपश्चर्या की विस्तृत विधियां, अनेक प्रयोजनों के लिए गायक के अनेक प्रयोग, स्त्रियों की पृथक साधनाएं, मन्त्र का अथ, माता का साक्षात्कार, साधन में प्रकट होने वाली दस विशेषताएं गायत्री द्वारा, वाममार्गी भयंकर तांत्रिक साधनाएं, कुण्डलिनी जागरण का विस्तृत विधान आदि।
(2) गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भग) मू. 3।।)
विषय- गायत्री विद्या सम्बन्धी छोटे-छोटे किन्तु बड़े ही महत्वपूर्ण रत्नों का संस्कृत श्लोक और हिन्दी अर्थों समेत संग्रह है। गायत्री महात्म्य, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री उपनिषद्, गायत्री तन्त्र, गायत्री अभिचार, 24 गायत्री, गायत्री पुरश्चरण, गायत्री सहस्रनाम, गायत्री स्तोत्र, गायत्री लहरी आदि के इस संग्रह को गागर में सागर कहा जा सकता है।
(3) गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) मू. 3।।)
विषय- गायत्री द्वारा 24 प्रकार की महत्वपूर्ण एवं चमत्कारी योग-साधना का विस्तृत वर्णन है। गायत्री के पांच मुख तथा दस भुजाओं का रहस्य, स्थूल सूक्ष्म कारण शरीरों का परिचय, अन्नमय, मनोमय, विज्ञानमय आदि पंच कोषों की साधना, हठ योग, राजयोग, लययोग, नादयोग, ऋजु योग, प्राण योग, शब्द योग, स्वर योग की विधियां। बन्ध, मुद्रा, पंच तन्मात्रा ग्रन्थिभेदन, पंचीकरण, भूत शुद्धि, समाधि, तुरीयावस्था, आत्म दर्शन सोऽह का अजपा जाप, तन्त्र तथा वाममार्ग, मनोनिग्रह मैस्मरेजम की वेधक दृष्टि, गायत्री द्वारा अनेक सिद्धियों की साधना का विधिवत् विधान इस पुस्तक में है। इसे योग विद्या का अद्वितीय ग्रन्थ ही समझना चाहिये।
(4) गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार मू. 3।।)
विषय- अनेकों साधकों को, अपनी-अपनी साधना में हुए अनुभवों का उन्हीं की लेखनी से वर्णन इस पुस्तक में है। किन व्यक्तियों को किस-किस गायत्री साधना से किस प्रकार क्या अद्भुत लाभ प्राप्त हुए निराशा एवं असफलता के अन्धकारपूर्ण वातावरण को पलटकर किस प्रकार आशा और सफलता के प्रकाश उपलब्ध हुए इसके सैकड़ों सचित्र उदाहरण इस पुस्तक में छपे हैं।
(5) गायत्री यज्ञ विधान-मू. 3)
यज्ञ का रहस्य, विज्ञान, विधान, विवेचन, कारण, हेतु, महत्व आदि को पूरे विस्तार एवं प्रमाणों के साथ समझाया गया है। गायत्री के छोटे होम, बड़े यज्ञ, विशेष विधियों और विवेचनाओं एवं मन्त्रों के साथ विस्तारपूर्वक समझाये गये हैं। इस पुस्तक के आधार का पूर्ण शास्त्रोक्त विधि-विधान का यज्ञ कोई भी व्यक्ति बड़ी आसानी से कर सकता है और देव शक्तियों द्वारा अनेक सहायताएँ प्राप्त कर सकता है।
(6) गायत्री शिक्षा-मु0 2)
विषय-गायत्री के 24 अक्षरों में 24 महान सिद्धाँत छिपे हुए हैं। उनको समझाने के लिये 24 श्लोक, 24 लेख, 24 भावपूर्ण कविताएँ तथा 26 आर्ट पेपर पर छपे हुए कलात्मक तिरंगे चित्र हैं। पुस्तक बड़ी ही शिक्षाप्रद तथा प्रभावोत्पादक है।
(7) गायत्री चित्रावली- मू. 1)
विषय- विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री के विविध विधानों के लिए आर्ट पेपर पर छपे हुए 24 तिरंगे चित्र तथा उनका परा परिचय।
(8) गायत्री का मन्त्रार्थ-मू. 1)
विषय-गायत्री के एक-एक अक्षर की विस्तृत शास्त्रियों द्वारा व्याख्या तथा अनेक ऋषियों के अनेक सार से किये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षस-राज रावण गायत्री-व्यवस्था भी इसमें है।
‘अखण्ड-ज्योति’-यह गायत्री संस्था की पत्रिका है। यह गत 24 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित रही है। ग्राहक-संख्या की दृष्टि में कल्याण के बाद धार्मिक पत्रों में ‘अखण्ड-ज्योति’ का दूसरा नम्बर है। उसकी उपयोगिता तथा सस्तेपन की सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा हो रही है। इसमें हर महीने गायत्री सम्बन्धी लेख रंगीन चित्र तथा समय-समय पर गायत्री उपासना सम्बन्धी आवश्यक सूचनाएँ, विज्ञप्तियाँ तथा जानकारियां प्रकाशित होती रहती है।,
समाज-विज्ञान, नीति, धर्म, स्वास्थ्य, मनोविज्ञान, दर्शन-शास्त्र, साधना, अध्यात्म, संस्कृति, शिक्षा आदि अनेक समस्याओं पर परिमार्जित दृष्टिकोण से लिखे हुए उच्चकोटि के लेख हर महीने इस पत्रिका में छपते हैं, जिन्हें पढ़कर घर बैठे उच्चकोटि के आध्यात्मिक सत्संग का लाभ उठाया जा सकता है।
आचार्य जी से, अखण्ड-ज्योति परिवार के अनेक अनुभवी विज्ञ पुरुषों से तथा गायत्री संस्था आध्यात्मिक केन्द्र से जिनकी किसी प्रकार का सम्बन्ध रखने की इच्छा है, उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ का पाठक रहना आवश्यक है। यही सम्बन्ध सूत्र हैं, जो पाठकों को इस आध्यात्मिक केन्द्र से जोड़े रहता है, पथ -प्रदर्शन और प्रकाश देता है। यदि यह सम्बन्ध-सूत्र टूटा रहे, अखण्ड ज्योति द्वारा प्रकाशित प्रकाश एवं सन्देश प्राप्त न होते रहें, तो फिर लाभ को उठा सकने की कोई सम्भावना नहीं रहती , जो इस परिवार के सदस्य रहने पर मिलना सम्भव है।
यदि आप अब तक ‘अखण्ड-ज्योति’ के ग्राहक नहीं बने है, तो आज ही 2।।) भेज कर ग्राहक बन जाइये। यदि आप ग्राहक हैं तो और नये सदस्य बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये।
छोटा सैट उपरोक्त पुस्तकों के कुछ स्थलों का संक्षिप्त सारांश लेकर यह पुस्तकें भी छापी है
(1) गायत्री ही कामधेनु है।
(2) गायत्री का वैज्ञानिक आधार
(3) वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री
(4) गायत्री की सर्व सुलभ साधनाएँ
(5) अनादि गुरुमंत्र गायत्री
(6) सचित्र गायत्री
(7) गायत्री के 14 रत्न (प्रथम भाग)
(8) गायत्री के 14 रत्न (द्वितीय भाग)
(9) विपत्ति निवारिणी गायत्री
(10)स्त्रियों का गायत्री अधिकार
(11) गायत्री सहस्रनाम पाठ
(12) गायत्री हवन विधि
(13) गायत्री चालीसा
(14) गायत्री का तिरंगा चित्र
मूल्य में कमी के लिये लिखना बिलकुल व्यर्थ है। हाँ 6) से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च अपना लगा दिया जाता है। 3) से कम मूल्य करें वी0पी0 नहीं भेजी जाती । 3) की पुस्तकों पर करीब) पोस्टेज लगता है।
पता-‘अखण्ड ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
बन्दूक की गोली नहीं छूटी (श्री. शिव शंकर शर्मा, कामठी)
माता की कृपा की अनेकों घटनायें मेरे जीवन में अवश्य घटीं, पर सबसे आश्चर्यकारी चमत्कारी यही घटना है जिसमें मेरे प्राण बचा लिये गये हैं। सर्प दंशन से बच जाना, वृक्ष गिरते समय उसे से बच निकलना और-इंजन से कटते-कटते बच जाना ये भी तो हमारे जीवन में आश्चर्य और माता की साक्षात करुणा इसी में दीख पड़ती है।
उस दिन बंगले से लौटा आ रहा था, सहसा ही पथ में जोरों का तूफान आया। घोर अन्धकार छा गया। मैं साइकिल लेकर आगे बढ़ता ही गया। रास्ते में पल्टनों की छावनी पड़ती थी, मैं सन्तरी की ओर बढ़ता जा रहा था। उसने कई बार आवाजें भी दी पर मैं सुन न सका। कुछ निकट जाने पर देखा सन्तरी मेरी ओर बन्दूक सीधा किये खड़ा है। मैं देखते ही हठात् रुका और कहा मैं तो यहीं का ठेकेदार हूँ। सन्तरी ने कहा कि अब तो हमने भी तुम्हें पहचान लिया है, पर जिस समय उस तूफान में कई बार आवाज देने पर भी तुम नहीं रुके, उस समय मैंने सरकारी अनुशासन के अनुसार दो बार तुम्हारे ऊपर बन्दूक चलायी पर आश्चर्य कि दोनों बार घोड़ा दबाने पर भी बन्दूक न छूटी। तुम्हारे सौभाग्य ने तुम्हारा प्राण बचा लिया। माता की याद करते ही मेरा हृदय गदगद हो उठा और वहाँ से अश्रु-पुष्प मातृ चरणों पर चढ़ता हुआ घर आया।
(श्री. नन्द कुमार शर्मा, कोटा)
मुझे प्रसन्नता है कि मेरे जीवन में ‘अखण्ड ज्योति’ का पथ-प्रदर्शन मिला। आज पाँच वर्ष से पिताजी की प्रेरणा से प्रतिदिन पाँच माला गायत्री जप तथा उसका हवन करते आ रहा हूँ। उनकी आयु 70 साल है। चैत्र नवरात्रि में मैंने पूज्य गुरुदेव से आदेश प्राप्त कर पिताजी के आत्म-कल्याण के लिये सवा लख तथा महायज्ञ के लिये 24000 का अनुष्ठान किया था।
श्रावण मास में पिताजी बीमार पड़े। वृद्ध थे ही और बुखार ने झकझोर डाला। चिकित्सा की गयी, पर हालत दिनों दिन गिरती ही गयी। सभी के विचार से इस वृद्धावस्था में उनका शरीर त्याग ही भला और सुन्दर-जँचता था, पर मेरे हृदय की ममता उन से बिछुड़ना जरा भी पसन्द नहीं करती। उनके महा प्रस्थान का दिवस था। उनकी दशा से सभी को यह अवगत ही था। मैं जप कर रहा था। अचानक ही सभी एक साथ रो पड़े। मैंने समझ लिये कि पिताजी इस नश्वर शरीर का त्याग कर रहे है। ममता की अधिकता से मैं भी फूट कर रो पड़ा। सामने गायत्री माता की प्रतिमा थी। मैंने दीन और करुण स्वर में प्रार्थना की माँ। और कुछ दिन मेरे पिता को जीने दे। सहसा ही विद्युत सा चमक उठा और मैं बेसुध सा हो गया। उसी समय मेरी अन्तर चेतना में किसी ने कहा- यदि महायज्ञ के लिये किया गया 24000 के अनुष्ठान को शीघ्रता से पिता को संकल्प कर दो तो ऐसा हो सकता है। मैं उपासना छोड़कर आतुर भाव से दौड़ता हुआ पिताजी के निकट गया। उनका सार शरीर हाथ-पाँव सभी ठण्डे हो चुके थे। नाक भी शीतल और टेढ़ी हो चुकी थी। सभी उन्हें खाट से उतार कर नीचे सुला रहे थे। मैं देखते ही निराश हो गया फिर भी उसी दशा में मैंने उन्हें बैठाकर 24000 जप का तुलसीदल, गंगाजल लेकर संकल्प किया और वह उनके मुख में डाल दिया। तुरन्त ही उनकी प्राण चेतना लौट आयी और स्वयं ही नीचे से उठ कर खाट पर बैठ गये। सभी आश्चर्य से अवाक् होकर इस चमत्कार की मौन व्याख्या कर रहे थे और मैं माता के चरणों में पड़ कर भाव-विभोर होकर सिसक रहा था।
मेरे पिता अब पूरे स्वस्थ एवं इतने सरल हैं कि इस वृद्धावस्था में भी अपना सब काम स्वयं ही कर लेते हैं।
पुत्र प्राप्ति तथा विग्रह की शान्ति (श्री मूलजी उद्धवजी वेदान्त, कोटजी)
मेरी पुत्री चन्द्रलता की सास बड़ी ही दुष्ट प्रकृति की थी। एक बार उसने चन्द्रलता को बेतरह मारा। यह सुन कर मुझे बड़ी वेदना हुई। चैत्र नवरात्रि का अवसर था। मैंने उसके इस संकट निवृत्ति की भावना से गायत्री का अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया। अनुष्ठान समाप्ति के कुछ ही दिन बाद चन्द्रलता ने अपने हाथ से लिख अपने जीवन में अयाचित शाँति आने का प्रसन्न-संवाद दिया और कुछ दिन उपरान्त उन लोगों ने प्रसन्नता पूर्वक उसे यहाँ पहुंचा दिया। उसका स्वस्थ प्रसन्न मुख देखकर मैं भी पुलक से भर उठा। उसने बताया-भगवान की कृपा से मेरे सास का स्वभाव बदल गया। अब वह मारने के स्थान पर मुझे प्यार करती है। मैंने मन ही मन गायत्री माता को धन्यवाद दिया। कृतज्ञता से अन्तर भर रहा था।
इस प्रसाद से मेरे उत्साह और विश्वास बढ़ा। मुझे पुत्र प्राप्ति की तीव्र इच्छा थी। सारा उपाय करके हार गया था। अतः मैंने पुत्र प्राप्ति के लिये भी गायत्री अनुष्ठान करने का निश्चय किया। आश्विन नवरात्रि आते ही विधि-पूर्वक गायत्री अनुष्ठान सम्पन्न किया। ब्रह्मचर्य, सात्विक-मौन धारण सहित भोजन, आसन संयम-नियम, सदाचार सभी को शक्ति भर निवाहा माता का दयालु हृदय द्रवित हो गया और आषाढ़ मास के प्रथम पक्ष में ही मुझे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो गयी ऐसी करुणामयी माता की, कहिये कौन अभागा उपासना नहीं करेगा?
वंश रक्षा और पद-बुद्धि (श्री. बिहारीलाल जी दुबे, वैकुण्ठपुर)
गायत्री माता की कृपा पाने का प्रथम और अनिवार्य साधन या द्वार है- गुरु कृपा। यही मेरा अनुभव है। गुरुदेव ने ही मुझे माता का आँचल पकड़ने के लिये प्रेरित किया और माता की कृपा ने प्राइमरी विद्यालय के अध्यापक पद से मुझे सात महीने में ही मिडिल स्कूल के अध्यापक पद पर पहुँचा दिया। मैंने इसके लिये अपनी ओर से विशेष रूप में कोई चेष्टा नहीं की।
मैं टहलने जा रहा था। रास्ते में एक वकील साहब मिले। मैंने शिष्टता के विचार से उन्हें प्रणाम किया। उन्होंने नमस्कार का उत्तर देने के बाद पूछा- आज कल क्या करते हो ? मैंने कहा- “मैं प्राइमरी स्कूल का शिक्षक हूँ। उन्होंने बताया कि विलासपुर के नॉर्मल स्कूल में एक शिक्षक का स्थान खाली, तुम दरखास्त दो तो मैं तुम्हें वह स्थान दिला दूँ। उनकी बात स्वीकार कर मैंने उस पद के लिये दरखास्त दे दिया और बिना किसी चेष्टा के 15 दिन उपरान्त ही वह पद मुझे मिल गया। मुझे कभी स्वप्न में भी यह कल्पना नहीं आयी थी कि मैं केवल सात महीने ही प्राइमरी विद्यालय में शिक्षण करके मिडिल स्कूल का शिक्षक हो जाऊँगा। सो गायत्री माता की कृपा से प्रसाद रूप में ही मुझे यह प्राप्त हुआ।
बी.ए. की परीक्षा देने के पथ में भी कई एक विघ्न बाधाएं थी, जो माता की कृपा से ही सुविधा पूर्वक हटती गयी और काम पूरा होता गया।
दरखास्त करने वालों में सब से जूनियर मैं ही था, अतः विद्यालय के प्रधान से मुझे परीक्षा के लिये अनुमति मिलने की कोई उम्मीद नहीं थी, पर माता की कृपा से मुझ जूनियर को ही सर्व प्रथम सम्मति प्राप्त हुई।
अंग्रेजी तो मेरी बेहद कमजोर थी, अतः परीक्षा देने का न तो साहस ही होता था और न हृदय में उत्साह ही था। गुरुदेव का प्रोत्साहन पाकर अन्तिम दिनों में थोड़े से चुने हुये प्रश्नों का उत्तर जहाँ-तहाँ पढ़ गया था और आश्चर्य यही कि मैंने जो पढ़ा, वही प्रश्न भी आया और मैंने उसे यथा सम्भव लिख भी डाला, पर इतने पर भी पास होने की मैं आशा नहीं कर पा रहा था।
माता और गुरु की कृपा से मैं बी.ए. भी पास हो गया और आज उस पद से भी उन्नति प्राप्त कर हाई-स्कूल का शिक्षक बन गया हूँ। क्या माता की अहैतुकी कृपा का इससे भी अधिक कुछ उदाहरण मिल सकता है?
उनकी कृपा से पत्नी भी मनोनुकूल मिली, पर उसे एक ऐसा रोग था जिससे वंशावरोध का भय था। इसी रोग के निवारण में हमारे एक शिक्षक-बन्धु को (1200) बारह सौ रुपये खर्च करने पड़े थे। माता की कृपा से 25)रुपये में ही वह रोग नष्ट हो गया और चार महीने उपरान्त एक नवीन कुल-दीपक भी उद्धृत होने जा रहा है।
मनोनुकूल-विवाह (श्री युगेशनन्दन सहाय, पटना)
गायत्री माता की कृपा उपासकों को कब, किस रूप में प्राप्त होता है, यह पहले कदापि पता नहीं लगता। मेरे मित्र अशोक कुमार ने मेरे कथन पर ही गायत्री उपासना प्रारम्भ की थी। महायज्ञ का संरक्षण-जप स्वीकार किया था। इस समय वे पटना के बी.एन. ट्रेनिंग स्कूल में पढ़ते थे। उसी में रंजना देवी भी पढ़ रही थी। वह सुन्दरी और सुसंस्कृत थीं दोनों में प्रेम का बीज अंकुरित हुआ और परस्पर विवाह करने का निश्चय किया, पर अशोक कुमार के पिता बिना तिलक-दहेज लिये शादी करना पसन्द नहीं करते थे, रंजना की पारिवारिक स्थिति साधारण थी। यहाँ से रुपया और सम्पत्ति मिलने की सम्भावना नहीं देख उन्होंने एक धनी परिवार की लड़की से अशोक कुमार के विवाह की बातें तय कर ली और लड़के को धमकाया यदि तुम मेरी बात नहीं मानोगे तो पढ़ने का खर्च बन्द कर ही दूँगा, साथ ही हमारी संपत्ति से भी तुम हाथ धो बैठोगे।
चिन्ता ने अशोक कुमार को बिछौने पर सुला दिया। ऐसे संकट पर माता की पुकार करना स्वाभाविक होता है। माता ने पुकार सुन ली। अशोक कुमार का हृदय उत्साह से भर उठा, उसने उद्घोषित किया- मैं सब कुछ खोकर भी रंजना से विवाह करूंगा। रंजना के माता-पिता तो चाहते ही थे। छात्र बराती बने और आनन्द उल्लास के बीच रंजना अशोक कुमार की जीवन धारा मिल कर एक सरिता की भाँति उल्लासिता सी चल पड़ी। सास ससुर ने अपनी अनिश्चित पतोहू का मुख देखा और उनका आवेश-उनकी कठोरता पिघल कर वात्सल्य की निर्झरिणी बन गयी। कौशल्या माता के समान सास ने, पतोहू को आँचल के नीचे ढाप लिया और आंखों में प्यार छलछलाने लगे।
प्रारम्भ में गायत्री-उपासना करने में मेरे मन जरा भी नहीं लगता था, पर गुरुदेव के आदेशानुसार करते ही रहने से आज ऐसा हो गया है, कि यदि मुझे केवल वही काम रहे, तो मैं करता ही रहूँ, कभी न थकूँ। पता नहीं इसमें किधर से अद्भुत रस उत्पन्न होता है।
गायत्री उपासना के पहले पढ़ने में मेरा मन भार सा बोध करता था, पर अब उसमें भी रुचि बढ़ गयी है। और कुछ भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ, जो मुझे हुए हैं, उसे में उल्लेख करना नहीं चाहता।
मेरे जीवन के चार क्षण (श्री रामपाल सिंह, राठौर)
उपासना सभी करते हैं, पर गुरु कृपा से इसमें जितनी जल्दी सफलता मिलती है, उतनी शीघ्रता से सफलता देने वाला शायद ही कोई साधन हो। मेरा तो अपने अनुभव के आधार पर यही विश्वास है।
मैंने गुरुदेव के चरणों में अपने को सौंपते हुए, उनकी बताई सारी विधियों का ठीक-ठीक पालन करते हुए इसी ऋषि पंचमी से गायत्री-उपासना प्रारम्भ की। उस दिन अंग्रेजी ता. 21.09.55 था। मैं ब्राह्मी मुहूर्त से ही साधना में संलग्न हो जाता था। दूसरे दिन 22.09.55 को मैं जप कर रहा था। आंखें खुली थी। सहसा ही मेरे आगे एक त्रिमुखी देवी प्रगट हुई। उनके अंगों से सुनहले रंग का प्रकाश निकलकर टार्च के प्रकाश की भाँति मेरे अंगों को पवित्र कर रहे थे। आनन्द के आधिक्य से मेरे रोम-रोम प्रफुल्लित हो उठे। मैं अनुपम शाँति से ओतप्रोत था। आंखों से प्रेम के आँसू भर रहे थे।
पांचवें ही क्षण वह सारा दृश्य न जाने कैसे छिप गया। मुझे बराबर उस ‘चार-क्षण’ की याद आती है, और उसे फिर से पाने के लिये मेरा अन्तर विह्वल होने लगता है। गुरुदेव ! अनन्त मातृ-स्नेह से भरे मेरे प्रभो ! एक बार पुनः वह पावन दर्शन देकर सदा के लिये मुझे अपना लो।
मेरे पवित्र अनुभव (श्री सुमन्त कुमार मिश्र बी. ए.)
यज्ञोपवीत संस्कार के समय मेरे पुरोहित जी ने बेगार की भाँति गायत्री मंत्र की दीक्षा दी थी। आज की भौतिकवादी विचार धारा का व्यक्ति भला उसका क्या प्रभाव ग्रहण करता ? मैं सब भूल-भाल गया।
एक दिन मेरे परम मित्र श्री जीवनभर दीवानजी ने (जिनका मैं चिरकृतज्ञ हूँ और रहूँगा) मुझे गायत्री उपासना की चर्चा के संग श्रीराम शर्मा आचार्य और “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका की चर्चा सुनाई और उसी रात में मैंने स्वप्न देखा कि गायत्री मन्त्र के पवित्र उच्चारण सहित मैं महायज्ञ में आहुति दे रहा हूँ। उस समय मुझे अनिर्वचनीय आनन्द मिल रहा था। जागने पर भी मेरे अंगों में उस आनन्द का संचरण होता रहा। मैं भाव-मुग्ध हो रहा । उसी दिन अपने स्वप्न की चर्चा सहित सारी बातें लिख भेजी। उनका उत्तर जो कुछ मिला- वही मेरे आध्यात्म-जीवन के प्रवेश की अमूल्य और श्रेष्ठ थाती है। मेरी आत्मा को उद्बोधन मिला और मैं गायत्री उपासना मैं संलग्न हो गया।
मेरा छोटा भाई बीमार था। उस दिन उसे बहुत कष्ट था। नीन्द नहीं- केवल छटपटी। घर वाले भी उसकी यह बेचैनी देख बेचैन हो रहे थे। मैं उसके सिरहाने बैठकर उसके ललाट पर हाथ फेरने लगा। तन्मय दशा में स्वतः ही गायत्री मन्त्र उच्चरित हो रहा था। धीरे-धीरे उसकी बेचैनी कम होने लगी और नीन्द आ गयी। मेरी आँखों में कृतज्ञता के आँसू उमड़ रहे थे।
जब कभी मेरे जीवन में कष्ट और संकट उपस्थित होते हैं, तो मैं माता का आह्वान करता हूँ और देखते ही देखते वे कष्ट और संकट विलुप्त होने लगते हैं और मुझे उनसे छुटकारा मिल जाता है। आने वाली शुभाशुभ घटनाओं की छाया मेरे मानस-पटल पर पहले ही अंकित हो जाती है। अपनी बुद्धि में प्रकाश और मनोबल नित्य बढ़ता हुआ अनुभव करता हूँ।
पिछले वर्ष बी.ए. की परीक्षा में मैं कुछ भी नहीं पढ़ सका था। मेरे दो छोटे भाई की मृत्यु के कारण व्यथा से भी भर रहा था, भला पढ़ना कैसे सुहाता ? मैंने आचार्य जी को लिखा। मुझे आश्वासन मिला। फिर तो मैंने माता के नाम पर गलत-सही पर्चे लिख ही दिया। जहाँ अपने ज्ञान के अनुसार मुझे अनुत्तीर्ण होने की सम्भावना थी, वहाँ आश्चर्य के साथ मैं द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण हो गया। सभी मुझे बधाई दे रहे थे, पर मैं ही जानता था कि इस बधाई का वास्तविक पात्र कौन है ?
आज तो भौतिक विज्ञान ने भी शब्दों के सत्वर ताल-मात्रा युक्त उच्चारण करने की क्रियात्मक शक्ति को मान लिया है, फिर उसमें श्रद्धा-विश्वास के संयोग से वह क्यों न और भी महान शक्ति धारण करने में समर्थ हो जाये? लाखों वर्षों से करोड़ों व्यक्तियों ने गायत्री मन्त्र के शब्दों में अपने आत्मविश्वास की अनन्त शक्तियों को भरपूर कर दिया है। प्रत्येक कल्याण कामी को इस मन्त्र से लाभ उठाना चाहिये।
द्वेष करने वाले का ही स्थानान्तर हो गया श्री दतात्रेय पुरुषोत्तम हरदास, ए.एम.आई.टी. (इटारसी)
उपनयन संस्कार के थोड़े ही दिन बाद मैंने उपासना को व्यर्थ की भावुकता तथा अनर्थक-पुरुषार्थ समझकर त्याग दिया कुछ दिन उपरान्त मैंने “प्राचीन भरत में शिक्षा की प्रणाली” एक अँग्रेजी पुस्तक पढ़ी और उसने मुझे गायत्री उपासना में प्रवृत्त कर दिया। फिर प॰ आचार्य राम शर्मा लिखित गायत्री विज्ञानादि ग्रन्थ पढ़ कर तो मैं इसका अनुरक्त बन गया। ज्यों-ज्यों उपासना करता, त्यों-त्यों बोध करता, मेरी बुद्धि रही है, उस का प्रकाश बढ़ता जा रहा है। साथ ही समाज में भी स्वतः मेरा सम्मान बढ़ता जा रहा था। यह देख मेरे निकटस्थ साथियों को ही मुझसे ईर्ष्या होने लगी।
मैं सरकारी कर्मचारी हूँ। मेरे इन ईर्ष्यालु-साथियों ने मुझे स्थान-च्युत या स्थानान्तरित करने के लिये षडयन्त्र रचा। हमारे उच्चाधिकारियों के पास मेरी झूठ-मूठ की बनी-बनायी अनेकों शिकायतें लिख भेजी। उसी समय मेरी पारिवारिक स्थिति भी संकट पूर्ण हो गयी। वारिस के दिन के। बच्चे सभी मोतीझरा से आक्रान्त थे। मुझे जरा भी चैन नहीं था। चिन्ता से जर्जर हो रहा था। एक दिन अत्यन्त पीड़ित होकर माता से विनय किया- माँ ! मुझे इन संकटों से अब उबार ले। उसी रात स्वप्न में एक दिव्य स्त्री के रूप में माता का दर्शन हुआ, मुझे कहा- “तुम्हारा स्थानान्तर रुक जायेगा, चिंता छोड़ दो।”
आश्विन-नवरात्रि का अवसर आया। मैं अनुष्ठान में संलग्न हो गया। उसी बीच सहसा उच्च अधिकारी का आदेश पत्र मिला- जिसमें मेरा स्थानान्तर लिखा था, मैं हतप्रभ हो गया। सोचने लगा- ‘क्या वे स्वप्न मेरी कल्पना थी ?
पुनः उसी रात में दिव्य तेजोमयी माता ने स्वप्न में आश्वासन दिया घबराओ नहीं, बदली तुम्हारी नहीं, तेरे विद्वेषियों की ही होगी।
एक सप्ताह के बाद ही मेरे सारे ईर्ष्यालु मित्र, वहाँ से स्थानान्तरित कर दिये गये और मैं आज भी उसी स्थान पर काम करता हुआ दिनानुदिन प्रकाश और आनन्द का बढ़ता हुआ स्वरूप अपने में पा रहा हूँ। इसे किसी को कहने की मेरी इच्छा नहीं होती।
बिना विशेष अध्ययन के ही पास हो गया। (श्री दिवाकर राव चिपड़े, विलासपुर)
इस वर्ष बिना किसी विशेष तैयारी के ही बी.ए. की परीक्षा देने के आग्रह को टाल न सका। इस समय पढ़ना भी सम्भव नहीं था इसीलिए, अध्ययन के बदले गायत्री-उपासना ही करता। परीक्षा दी। किसी तरह-परचे पूरे कर दिये। मुझे तो अपने किये परचे के आधार पर उत्तीर्ण होने की कोई भी आशा न थी। केवल मन ही मन माता की रट लगाये रहता। गंगा दशहरा में भी यही रट लेकर लघु अनुष्ठान किया। अन्तिम दिन लगातार उपासना करता रहा। घी के दीप जल रहे थे।
पूजा समाप्त कर ज्यों ही नीचे आया कि हमारी शाला के दो शिक्षक आये, कहा- ‘बधाई’ आपको। आप बी.ए. पास हो गये। मैंने उसे उपहास समझा और संकोच से झुक गया। मेरे मनोभाव को देखकर फिर दृढ़-गंभीरता से उन्होंने विश्वास दिलाया विश्वास होते ही मेरा रोम-रोम प्रसन्नता से उत्फुल्ल हो उठा। शिक्षक का सम्मान कर उन्हें विदाई दी और उपासना गृह में आ कर माता के निकट घंटों रोता रहा। यह रुदन माता की करुणा के प्रति श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता का उद्रेक था।
माता की इस प्रत्यक्ष कृपा ने हमारी सारे परिवार का हृदय मुग्ध कर दिया। आज हमारे परिवार में सभी गायत्री उपासक हो गये।
आगे तो परिवार की सारी आवश्यकता जैसे अनायास पूरी होती दिख रही है। मेरी छोटी बहिन का विवाह एक सम्पन्न परिवार में एक सुन्दर, तरुण बी.ए. पास के साथ हो गया। उन लोगों ने विवाह में एक पैसा भी रीति-रिवाज, तिलक-दहेज का नहीं लिया।
मेरे एक मित्र बिहारी लाल जी का भी इसी वर्ष बी.ए का पेपर एक दम बिगड़ गया था। उसने अपने को अनुत्तीर्ण मान लिया था, फिर भी माता का भरोसा लेकर वे गायत्री तपोभूमि मथुरा गये और लघु अधिष्ठान किया। माता की कृपा से अनुष्ठान समाप्त होते ही उन्हें भी अपनी आश्चर्यकारी सफलता की सूचना तपोभूमि में ही मिल गयी।
हमें तो विश्वास है कि गायत्री माता शीघ्र ही द्रवित होती हैं और अपने शरणागतों का सदा ही संरक्षण करती रहती हैं।
माता ने प्राण रक्षा की। (श्री कृष्णलाल ‘आनन्द’ एम.ए. दिल्ली)
पाकिस्तान बनने के दिनों हिंदू, मुसलिम दंगों की क्रिया का नंगा नृत्य हो रहा था। 11 अगस्त 1947 ईसवी। मैं कराची में था और मेरा आतंकित परिवार लाहौर छावनी अस्त-व्यस्त था। पाकिस्तान बनने की घोषणा हो चुकी थी। सीमा पर गुण्डों की दुष्टता, क्रूरता का कोई पारावार न था।
गायत्री माता को हृदय और मन में धारण कर कराची से चल पड़ा। भीतर काँप रहा था। लाहौर छावनी स्टेशन आया। वहाँ गाड़ी तीन घण्टे तक रुकी रही। पूछने पर ज्ञात हुआ कि आगे लाहौर स्टेशन पर पहुँचने के पूर्व ही गुण्डे, हिन्दुओं को चुन-चुन कर गाड़ी से बाहर निकाल कर मनमानी अनाचार और अत्याचार करते हैं। छुरे और गोलियों से शरीर को छलनी बना देते हैं। इन समाचारों को जान कर मेरे प्राण भयाकुल हो उठे, पर क्या परिवार को उस प्रलयंकर आतंकों के बीच ही छोड़ दूँ ? फिर माता को तीव्रता से धारण किया । और अपनी सारी शक्ति और वेग से गायत्री जपते हुये चल पड़ा। मुझे यह भी खबर मिल चुकी थी, कि जिस छावनी में मेरे परिवार ने आश्रय लिया था, उसे लोगों-गुण्डों ने जला दिया। अन्तर में वेदना और दर्द से त्राहि-त्राहि मच रही थी और मैं जा रहा था। कुछ दूर ही गाड़ी आयी थी कि ईंट, पत्थरों की वर्षा से उसका स्वागत करना प्रारम्भ हो गया। ज्यों-ज्यों गाड़ी आगे बढ़ती, हमारे सामने मृत्यु और नृशंस हत्या की भयंकरता सम्मुख आती। अधिक स्पष्ट दिखती जाती थी। झुण्ड के झुण्ड खड़ी भीड़ पैशाचिक नारे लगा रही थी, पर माता की कृपा सिग्नल की अवहेलना करती हुई गाड़ी ने स्टेशन पर जाकर ही विराम लिया।
स्टेशन पर सभी आंखें भय कातर हो चारों ओर निहार रही थी। हम लोग उतरे। सभी डर से मृतक-शाँति धारण किये हुये थे। विश्राम गृह पठानों से भरा था। मैं अपना सामान चौकीदार के हवाले कर के स्टेशन से बाहर, शरणार्थी-कैम्प पहुँचा। वहाँ हिंदू सेवा समिति वाले यथाशक्य शरणार्थियों को सुरक्षित स्थान में पहुँचाने का प्रयत्न कर रहे थे, पर राक्षसी शक्ति को उद्दंडता इतनी बढ़ रही थी कि वे लोग भी सुरक्षा की निश्चिन्तता देने में असमर्थ थे।
ज्यों-त्यों प्रातः हुआ। शौच-स्नान से निपट कर माता की उपासना की। अर्चना में पुष्प के बदले आंखों ने मोती-बूंदों की वर्षा की। इस के उपरान्त “मींयामीर छावनी” जहाँ हमारा परिवार विवश और निःसहाय पड़ा था, जाने की सोचने लगा। स्टेशन से बाहर गया। वहाँ सहसा ही एक मुसलमान ताँगे वाले ने आकर कहा- मैं तुम्हें उस छावनी में पहुँचा सकता हूँ। उस समय वहाँ तक पहुँचाने का ताँगा का भाड़ा 20) बीस रुपये साधारण सी बात थी। मैंने पूछ लिया- कितने रुपये लोगे ? उसने बड़े प्रेम से कहा- ढाई रुपये। मैंने माता का स्मरण किया और सामान लेकर ताँगे पर चढ़ गया। कुछ ही दूर आगे देखा गुण्डों का एक दल छुरा, तलवार और लाठी लिये खड़ा है। उसे देखते ही मैंने समझ लिया, माता को इन्हीं दुष्टों के हाथों मुझे मरवाना था। मृत्यु को प्रत्यक्ष सामने देखकर मैं स्तब्ध हो रहा। ज्यों-ज्यों ताँगा गुंडों के निकट पहुँचाने जा रहा था, ज्यों-ज्यों मृत्यु की विभीषिका मेरे सामने स्पष्ट से स्पष्ट होती जा रही थी, पर आश्चर्य! महाआश्चर्य!! निकट पहुँचने ही उन गुण्डों ने बिना कुछ पूछे- जाँचे ही ताँगे रास्ता छोड़ दिया। कैसा चमत्कार! अब तो सारे भयों को बिसार कर मेरा अन्तर-हृदय, माता की करुणा के मद से प्रमत्त हो रहा था। पथ में उसी भाँति दो तीन और भी गुण्डों के दल मिले, पर सभी ने ताँगा देखते ही रास्ता खाली कर दिया और मैं सुरक्षा और प्रसन्नता सहित अपने आतंकित-निःसहाय परिवार से जा मिला।
माता ने मुझे मृत्यु के द्वार से बाहर निकाल लाया है। उनको करुणा की यह सुरभि दिग्दिगन्त में व्याप्त हो उठे, इसलिये मैंने उन्हीं की ‘करुणा-गाथा’ अपने हाथों लिख डाली है।
आत्म बल की प्राप्ति (श्री जयमंगल जी हजारी बाग)
गायत्री-उपासना करने के बाद से मैं अपना आत्मबल पर्याप्त बढ़ा हुआ अनुभव करता हूँ। कैसी भी चिन्ता भरी परिस्थिति में, मेरे चित्त जरा भी क्षुब्ध और उद्विग्न नहीं होता। भयानक से भयानक परिस्थितियाँ जीवन में उपस्थित होकर अनायास ही उसका शमन भी हो जाता है।
मन और शरीर में स्फूर्ति, बढ़ती हुई अनुभव करता हूँ।
परीक्षा में उत्तीर्ण होता गया। (श्री सुदर्शन गुप्त, कोटा)
मैंने जब से गायत्री माता का आँचल पकड़ा, तब से बराबर ही मुझे संकट के अवसर पर सहायता मिलती गयी है। बुद्धि भी पहले की अपेक्षा अधिक तीव्र हो गयी हैं। मेरे कुविचार क्रमशः दूर होकर विनष्ट हो गये है। जब नहीं कक्षा में अनुत्तीर्ण होकर घर में सभी की उपेक्षा का पात्र बना तो मेरा उत्साह टूट गया। आगे पढ़ने की हिम्मत नहीं होती थी, पर गायत्री-उपासना करते ही मुझ में उत्साह की बाढ़ आ गयी और पढ़कर परीक्षा दी। अच्छे नंबरों से पास हुआ परीक्षा के प्रथम मैं विशेष रूप से उपासना में संलग्न रहा था। इसी भाँति माता की कृपा के बल से दसवीं-ग्यारहवीं कक्षा भी पास कर आज बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा हूँ। प्रत्येक बार अच्छी तरह पास होते रहने के कारण अब घर में भी मेरा सम्मान बढ़ गया है। माता की कृपा से पढ़ना भी मेरे लिये सुन्दर और सरस हो गया है। चारों ओर मुझे माता की सहायता के हाथ दिखाई देते हैं।
माता का साक्षात् दर्शन (श्री चन्द्रपाल सिंह, अलीगढ़)
करुणामयी माता। उपासना को छोड़ते ही प्रेतों के उपद्रव खड़े हो गये। आधा भाद्रपद तक मेरी पत्नी को पर्याप्त कष्ट पहुँचाया गया। बन्धु दलवीर सिंह जी की प्रेरणा से पुनः गायत्री- उपासना प्रारम्भ किया। दो तीन दिन के उपरान्त ही आश्चर्य पूर्ण दृश्य देखा। मैं जिस छत पर सोता था, उस पर रात में कभी-कभी मनुष्य की साक्षात् मूर्ति मुझे दिखाई देती। मैं उसे बुलाता तो उत्तर में वह कहता- अब में नहीं आ सकता।
एक दिन रात में मैं अपनी पत्नी को छत पर अकेली सोयी छोड़कर किसी कार्यवश नीचे उतरा, मुझे वापस आने में कुछ देरी हुई। इतने में उसने स्पष्ट सुना, देखो, तुम्हें अकेली छोड़कर चला गया है। उसने आंखें खोली तो देखा- सिरहाने की ओर एक दिव्य मातृ मूर्ति-खड़ी है। उसके एक हाथ में शंख है और दूसरे में कमण्डल उज्ज्वल गौर अंग से जैसे ज्योति निकल रही हो। प्रेत की कल्पना से वह भयाकुल हो उठी। उसी समय माता ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा- बेटी ! कोई भय नहीं, अब तो मैं तुम्हारी रक्षिका हूँ। कोई तुम्हें अब नहीं सता सकता। उसी समय मैं आ रहा था। माँ तिरोहित हो गयी। अब मेरी पत्नी भी मुग्धभाव से नित्य पंचाक्षरी गायत्री का जप करती है। भूत प्रेत कभी नहीं दिख पड़ता है। हम दंपत्ति नित्य माता के चरणों में फूलों से पूजा करते हैं।
शारीरिक आर्थिक एवं आत्मिक लाभ (श्री होतीलाल शर्मा, अलीगढ़)
आज माता की कृपा का बखान करने की इच्छा से, मेरे सामने जीवन के वे सारे शारीरिक आर्थिक एवं मानसिक कष्टों के अतीत-दारुण चित्र सामने में प्रत्यक्षवत् प्रतीत हो रहे हैं। मेरे जीवन के विकास काल में ही मुझे प्यार करने वाले ताऊजी एवं पिताजी की एक-एक कर मृत्यु हो गयी। मेरा एक छोटा भाई था, वह भी काल कवलित हो गया। केवल मैं एक छोटा भाई और मेरी माता अनाथ बनकर दुख भोगने के लिये रह गयी। सबों ने स्वर से कहा- इसका सुन्दर परिवार एकबारगी ही नष्ट हो गया।
यज्ञोपवीत संस्कार के समय ही मेरे ताऊजी ने कहा था “गायत्री माता की शरण लेने के मनुष्य साँसारिक जीवन को सुख पूर्वक बिताकर अन्त में भी शाँति प्राप्त करते हैं।” यह पुनीत वाणी शैशव के कोमल-हृदय में अमर भाव से बस गयी थी, और तभी से मैं गायत्री उपासना करने लगा था। पिता-ताऊ एवं भाई की मृत्यु की सूचना मुझे पूर्व ही माता ने खड़ी होकर मुझे सुना दी थी, साथ ही कष्ट दूर होने का आश्वासन भी दिया था। इसके उपरान्त छोटे भाई की मृत्यु हो गयी। जीविका की कोई सुस्थिर-अवस्था नहीं रहने के लिये भोजन भी भार स्वरूप हो गया। शरीर भी शीर्ण हो गया, पर उपासना करते ही रहा। आज माता के प्रसाद से अनायास ही हम सभी भाँति सुखी-स्वस्थ, और प्रसन्न है।
गायत्री उपासना से बेकारी दूर हुई (श्री महावीर प्रसाद शर्मा, पिड़ावा, झालावाड़)
मैं मैट्रिक में प्रथम तथा इण्टर में द्वितीय श्रेणी में पास हुआ, पर गायत्री मन्त्र का शुद्ध उच्चारण करने में असमर्थ रहा। विद्यालय के वातावरण में रह कर मैं नास्तिक बन रहा था, शायद इसी पाप से मेरी ऐसी दशा थी। इंटर के आगे पढ़ने की आर्थिक स्थिति नहीं थी, अतः विवशता पूर्वक पढ़ना छोड़ दिया। चार पाँच महीने तक बेकार बन कर भटकता सा रहा। माता की कृपा से ही इस बीच मुझे एक ऐसे साथी मिले, जो गायत्री उपासक थे। उनके सत्संग के प्रभाव से न जाने कब मेरा नास्तिकपना दूर हो गया और मैं भी गायत्री माता की उपासना करने लगा। झालावाड़ में अध्यापक पद के लिये “इन्टरव्यू” हुआ। मैं भी गया। कुछ दिन उपरान्त उसका परिणाम निकला ! सभी मिडिल पास वालों को अध्यापकपद की नियुक्ति के पत्र आ गये और मुझ इंटर पास वाले का कहीं पता नहीं। इसी बीच कुवार की नवरात्रि का अवसर आया और मैंने अनुष्ठान व्रत लिया। भक्तिपूर्वक लघु-अनुष्ठान पूर्ण किया। इसके कुछ ही दिन बाद, मेरा मनचाहा मैट्रिक ग्रेड तथा पिड़ावा मिडिल स्कूल का अध्यापक होने का नियुक्ति पत्र आ गया।
मेरे प्रारम्भ के संकट काल अभी शेष नहीं हुए थे। सहसा ही मुझे ऐसे पत्र अधिकारियों की ओर से मिले, जिसमें मेरी नौकरी समाप्त होने की सूचना थी। ग्रीष्मावकाश सामने था। मैं निराशा सहित घर आया और अवकाशोपरान्त धड़कते दिल से पुनः विद्यालय आकर पढ़ाना प्रारम्भ किया। सिवाय गायत्री माता के और किसी से प्रार्थना नहीं की और आश्चर्य कि स्वभावतः ही सरकार ने मेरी नौकरी भी सुस्थिर कर दी और ग्रीष्मावकाश का वेतन भी भेज दिया। ऐसी ममता सिवाय माता के और कौन कर सकती है?
ब्रजधाम निवास की प्राप्ति (श्री नगीनदास ठाकुरदास शाह बुरहानपुर)
मेरे मन में बहुत दिनों से लालसा थी, कि जिस भूमि को भगवान ने अपनी साक्षात् उपस्थिति से, अपनी पावन लीला से पवित्र किया है, उसका दर्शन करूं और सौभाग्य हो तो वहाँ कुछ दिन निवास भी करूं, पर इसकी पूर्ति का हमारे पास कोई भी उपाय नहीं था।
अचानक एक दिन गुजराती भाषा में डॉ. गणपति सिंह जी लिखित ‘गायत्री महिमा’ नामक पुस्तक पढ़ी। फिर इस मंत्र की अधिक महिमा जानने के लिये व्यग्रता हुई और “अखण्ड-ज्योति” मथुरा का पता लगा। वहाँ से पत्रिका मंगायी-पुनः गायत्री साहित्य मंगाकर अध्ययन किया। इससे गायत्री उपासना पर मेरी श्रद्धा दृढ़ हो गयी और नित्य गायत्री जप करने लगा।
सहसा ही गायत्री माता की कृपा से मेरे जीवन में ऐसा अवसर उपस्थित हुआ, मुझे मथुरा आना पड़ा। मैं प्रसन्नता से फूला नहीं समाता था। मथुरा स्टेशन पर उतरा और गायत्री तपोभूमि आकर मातृ मूर्ति एवं गुरुदेव का दर्शन किया। दो दिन तक वहीं निवास किया। प्रातः ही यमुना जी में स्नान कर उसी पवित्र किनारे पर जप कर लिया करता। फिर गुरुदेव के आदेशानुसार वृंदावन आया और सभी मन्दिरों में घूम-घूम कर पावन प्रतिमा का दर्शन किया। फिर वहीं एक धनी सेठ के यहाँ अनायास मुझे नौकरी भी लग गयी, फिर छः महीने तक वृंदावन-धाम में रह कर, नित्य यमुना स्नान कर माधूरी-मूर्ति की उपासना करता रहा।
आषाढ़ मास की पूर्णिमा में गोवर्द्धन परिक्रमा की। इसी भाँति ब्रजधाम की सारी लीला-शोभा देखी। फिर गायत्री-तपोभूमि आकर दो दिन ठहरा सारी ब्रजभूमि को भली भाँति देख भाल कर गुरु देव के आदेश से घर चला आया। आज घर में रह कर ही गायत्री-उपासना करता हूँ और जीवन में चारों ओर सुख-शाँति ही मुझे नजर आती है।
असाध्य सूजन तीन घन्टे में आराम (ठा. महेन्द्रसिंह सरवन)
मेरी पुत्री चि. चितरंजन कुमारी अहीमा गाँव के राजकुमार से ब्याही है। उसके एक दो साल का पुत्र है। एक दिन अकस्मात ही उस बालक के सारे शरीर में फोड़े निकल आये। वे निकलते तथा कुछ समय बाद पानी के बुलबुले की भाँति क्षण में फूट जाते, ऐसी स्थिति प्रायः 15 दिन रही और एक दिन अचानक एक पाँव खूब सूज गया। सूजन धीरे-2 पेट की ओर बढ़ने लगा। विशेष शोध तथा कमजोरी के कारण, ज्वर भी पराकाष्ठा को पहुँच चुका था।
वर्षा ऋतु थी। पानी खूब पड़ रहा था। गाँव में वैद्य या डाक्टर का कोई प्रबन्धन होने से गाँव के कुछ अनुभवी व्यक्तियों का बताया हुआ उपचार किया गया, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। पुत्री की सास ने तो साफ कह दिया कि यह “रतवा” है- असाध्य रोग है। बच्चा किसी भी भाँति बच नहीं सकता। उनके भी दो बच्चे इसी रोग से मर चुके है। यानी कहने का अभिप्रायः यह था कि उपचार करना वृथा है, अब केवल भगवान के भरोसे रहना ठीक है। पुत्री ने पहले तो मुझे बुलाने को सोच लिया था, किन्तु अपनी सास के शब्दों से, मेरा विचार छोड़, माँ गायत्री की शरण ली। अनेकों प्रकार से प्रार्थना आरम्भ कर दी, साथ ही साथ गायत्री मंत्र का जप करती गई और उस शोथ वाले हिस्से पर हाथ ऊपर से नीचे की ओर फिराती रही। भला, ऐसी आर्त्त-पुकार पर ‘माँ-गायत्री’ कैसे विद्रवित न होती? शीघ्र आ पहुँची और अपने बृहद् द्वारा केवल दो तीन घन्टे में सारी सूजन उतार दी। बुखार, कमजोरी, पाँव का कंपन तथा असह्य दर्द उसी क्षण दूर हो गया। आँखों में प्रेमाश्रु भरे जो पत्र मुझे पुत्री ने लिखा था, उसमें गायत्री माता की करुणा के सागर में, कृतज्ञता की अनन्त उर्म्मियाँ लहरा रही थी।
इस
सस्ती, सुन्दर, उपयोगी एवं अनुभवपूर्ण ढंग की अनोखी पुस्तकें।
यह बाजारू किताबें नहीं हैं, इनकी एक-एक पंक्ति गहरे अनुभव और अनुसंधान के आधार पर लिखी गई हैं। इन पुस्तकों की उपयोगिता, सुन्दरता और सस्तेपन की भूरि-भूरि प्रशंसा की जा रही है। आज भी इन पुस्तकों को मंगाइये और पढ़कर लाभान्वित होइए।
बिगड़े हुये स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें-
(1)सूर्य चिकित्सा विज्ञान
(2)प्राण चिकित्सा विज्ञान
(3)स्वस्थ बनने की विद्या
(4)भोग में योग
(5)बुद्धि बढ़ाने के उपाय
(6)आसन और प्राणायाम
(7)तुलसी के अमृतमय गुण
(8)महान आचरण
(9)तुम महान हो
(10)घरेलू चिकित्सा
(11)बिना औषधि के कायाकल्प
(12)पंचतत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण
(13)दीर्घजीवन के रहस्य
(14)नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा
(15)स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा
(16)दूध की आश्चर्यजनक शक्ति
(17)उन्नति का मूलमन्त्र ब्रह्मचर्य
(18)उपवास के चमत्कार
(19)स्त्री रोग चिकित्सा
(20)बालरोग चिकित्सा
(21)निरोग जीवन का राजमार्ग
(22) कब्ज की सरल चिकित्सा
(23)चिरस्थाई यौवन
(24)सौंदर्य बढ़ाने के ठोस उपाय
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें
(1) मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार
(2) धनवान बनने के गुप्त रहस्य
(3) पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि
(4) मरने के बाद हमारा क्या होगा
(5) मित्र भाव बढ़ाने की कला
(6) आकृति देखकर मनुष्य की पहचान
(7) संजीवनी विद्या
(8) अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति
(9) हमें स्वप्न क्यों दिखते हैं?
(10) विचार करने की कला
(11) हम वक्ता कैसे बन सकते हैं।
(12) लेखन कला
(13) सफलता के तीन साधन
(14) शिखा और सूत्र की रहस्यमयी विवेचना
(15) जिन्दगी कैसे जियें?
(16) कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान
(17) सौभाग्य बढ़ाने की कला
(18) अमृतकण
(19) प्रसिद्धि और समृद्धि
(20) हमारी पारिवारिक समस्यायें
(21) जीवन संगीत
(22) मनचाही सन्तान
(23) दाम्पत्य जीवन का स्वर्ग
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तक
(1) ईश्वर कौन है ?
(2) क्या धर्म है, क्या है? कसा है?
(3) गहना कर्मणोगति
(4) जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश
(5) शान्त मंथन का नवनीत
(6) शक्ति संचय के पथ पर
(7) आत्मगौरव की साधना
(8) प्रतिष्ठा का उच्च सोपान
(9) आन्तरिक उल्लास का विकास
(10) आगे बढ़ने की तैयारी
(11) अध्यात्मिक धर्म का अवलंबन
(12) ब्रह्मविद्या का रहस्योद्घाटन
(13) ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग
(14) विवेक सतसई
(15) आध्यात्मिक विद्या का प्रवेश द्वार
(16) प्रेम का रहस्य
(17) भारतीय संस्कृति का बीजमन्त्र यज्ञोपवीत
(18) यज्ञोपवीत धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति
(19) दैनिक जीवन में मनोवैज्ञानिक प्रयोग
(20) हमारे आन्तरिक शत्रु
(21) हँसी-खुशी का जीवन
(22) क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें
1- मैं क्या कहूँ
2- परकाया प्रवेश 3- स्वर योग से दिव्य ज्ञान 4- जीव-जन्तुओं की मूक भाषा 5- वशीकरण की सच्ची सिद्धि 6- ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग 7- यम-नियम 8- प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि 9- मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा 10- हस्तरेखा विज्ञान 11- गृहस्थ योग 12- प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार 13- विचार संचालन-विद्या 14- सुखी वृद्धावस्था 15- आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग 16- प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनाएं 17- योग के नाम पर मायाचार 18- जादूगरी या छल 19- चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग 20- मधुर सम्बन्धों का रहस्य 21- हमारी सभ्यता के कलंक
गायत्री विद्या के अनुपम ग्रन्थरत्न
1- गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग)
2- गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग)
3- गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग)
4- गायत्री यज्ञ-विधान
5- गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार
6- सचित्र गायत्री शिक्षा
7- गायत्री चित्रावली
8- गायत्री का मन्त्रार्थ
9- गायत्री सहस्रनाम
10- गायत्री का वैज्ञानिक आधार
11- गायत्री ही कामधेनु है।
12- वेद शास्त्रों का निचोड़ गायत्री
13- गायत्री की सुलभ साधना
14- गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग)
15- गायत्री के चौदह रत्न (द्वितीय भाग)
16- अनादि गुरु मन्त्र गायत्री
17- विपत्ति निवारिणी गायत्री
18- स्त्रियों को गायत्री-अधिकार
19- सचित्र गायत्री
20- गायत्री हवन विधि
21- संक्षिप्त गायत्री हवन
22- गायत्री चा0 / गायत्री का तिरंगा चित्र
पुस्तक मंगाने के नियम
1- छः रुपये से कम मूल्य वाली पुस्तकें लेने पर डाकखर्च मंगाने वाले के जिम्मे होगा। जो इस प्रकार है--1) रु. से लेकर 3) रु. तक की पुस्तकों पर ।।।), 3) से 4।।।) तक की पुस्तकों पर 1)
2- छः रुपये या इससे अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखर्च हम अपना लगा देते हैं। इसलिये मँगाने वाले का लाभ इसी में है कि वे कम से कम छः रुपये की पुस्तकें मंगाये।
3- तीन रुपये से कम की वी0पी0 नहीं भेजी जाती। यदि 3) से कम की पुस्तकें लेना हों तो पुस्तकों का मूल्य और डाकखर्च ।।।) मिलाकर मनीआर्डर से पेशगी भेजना चाहिये।
4- हमारी पुस्तकें इतनी सस्ती हैं कि इन पर ग्राहकों को कोई कमीशन नहीं दिया जा सकता। कमीशन या कम मूल्य पर पुस्तकें लेने के लिये लिखा-पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है।
पता- ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रेस, मथुरा।
अब विशद गायत्री महायज्ञ को आरम्भ हुए दसवाँ महीना चल रहा है। चैत्र सुदी 11, 12, 13, 14, 15 इन पाँच दिनों पूर्णाहुति होगी। इसका समय अब अधिक नहीं रहा है। विशेष यज्ञों में सरस्वती यज्ञ, रुद्र यज्ञ, विष्णु यज्ञ, महामृत्युँजय यज्ञ, पितृ यज्ञ, शतचण्डी यज्ञ पूर्ण हो चुके। लक्ष्मी यज्ञ इन दिनों चल रहा है जिसके पूर्णाहुति में नवग्रह यज्ञ पूर्ण हो जायेगा। मार्गशीर्ष से चारों वेदों का पारायण यज्ञ आरम्भ हो जायेगा, जो पूर्णाहुति तक चलता रहेगा। इस प्रकार सभी कार्यक्रम बड़े ही आनन्द पूर्वक, इस युग का यह अभूतपूर्ण यज्ञ सम्पन्न होना। हम लोगों की शक्ति, श्रद्धा, सामर्थ्य, योग्यता बहुत ही सीमित है पर उस अनन्त शक्तिशाली माता की सामर्थ्य का कहना ही क्या है? आरम्भ में ऐसा लगता था कि इतना विशाल आयोजन जिसे कोई राजा महाराजा या धन कुबेर ही पूरा कर सकता है, इतनी स्वल्प सामर्थ्य से कैसे पूरा होगा? पर माता की कृपा कोर से वह यथावत् चलता आया है और शेष मंजिल भी वैसे ही पूरी होगी, जैसे अब तक पूरी होती आई है। इस महायज्ञ से जो शक्ति उत्पन्न होगी उसका सत्परिणाम हम लोग यथा समय अपनी आंखों देखेंगे।
अब पूर्णाहुति की तैयारी में लगना है। नये संरक्षक और भागीदार बढ़ने में तनिक भी शिथिलता नहीं आनी चाहिये। पाँच महीनों में संरक्षण की एक माला जपते रहने के लिये प्रयत्न करने पर कुछ न कुछ नये उपासक हम लोग चाहें तो अवश्य तैयार कर सकते हैं। भागीदार भी बढ़ाये जाने चाहिये। जो भागीदार हैं उन्हें और अधिक भागीदारी लेनी चाहिये। अपने परिवार के जो लोग अभी तक इस दिशा में शिथिल रहे उन्हें इन अन्तिम दिनों में इसके लिये अवश्य ही प्रयत्न करना चाहिये ताकि यह अलभ्य अवसर यों ही हाथ से न निकल जाये। गायत्री अंक वितरण करने में अभी लोगों ने उतनी उदारता और दान वृत्ति नहीं दिखाई जितनी ब्रह्मभोज के अभाव को पूर्ण करने के लिये आवश्यक है। जप, हवन के समान ही ब्रह्मभोज भी अनुष्ठान का एक अंग है। जो लोग केवल जप करके ही निश्चित हो जाते हैं, वे उतना सत्परिणाम नहीं उठा सकते, जितना सर्वांगपूर्ण साधना का होना चाहिये। जिन्होंने अभी तक गायत्री अंक वितरण नहीं किये हैं उन्हें 40 अंक मंगा लेने चाहिये। अनुष्ठान की सफलता के लिये 5) खर्च करना कोई बहुत बड़ी बात नहीं है। जो लोग सामर्थ्यवान हैं वे 40 तक ही सीमित न रहकर 108, 240, 1080 अंक मँगाकर अपने प्रदेश में दूर-दूर तक उन्हें वितरण करें और ब्रह्मभोज का पुण्य लाभ करें।
नवरात्रि समारोह
आश्विन की नवरात्रि में गायत्री तपोभूमि में बहुत ही मनोरम कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। भारत के कोने-कोने से बड़ी संख्या में गायत्री उपासक आये थे। सबने आनन्द पूर्वक अपना-अपना गायत्री अनुष्ठान तथा हवन का कार्यक्रम पूरा किया। वृंदावन, मथुरा, गोकुल, महावन, दाऊजी, गोवर्द्धन, जतीपुरा, राधाकुण्ड, नन्दगाँव, बरसाना आदि की यात्रा बड़े ही आनन्द पूर्वक हुई। तपोभूमि से बस में जाने और वहाँ वापिस आकर उतरने की व्यवस्था बड़ी ही सुविधाजनक रही। इतनी लम्बी यात्रा का कुल किराया चार रुपये से भी कम पड़ा। नवरात्रि में शतचण्डी पीठ पूरा हुआ दुर्गा सप्तशदी से चण्डी यज्ञ कराया गया। सहस्र लक्ष्मी पाठ पूरे हुये और लक्ष्मी यज्ञ भी हुआ। सायंकाल नित्य दीपदान होता था, जिसमें तपोभूमि की शोभा देखते ही बनती थी। तीसरे पहर आचार्य जी के तथा अन्य विद्वानों के प्रवचन होते रहते थे। नवमी के तर्पण, मार्जन आदि कृत्यों के साथ लोगों ने अपने अनुष्ठान पूरे किये और पूर्णाहुति की। यों तो तपोभूमि में इस वर्ष नित्य ही 30-40 गायत्री उपासक रहने से बड़ा दृश्य बड़ा ही अनुपम बन जाता है। जप, पाठ, हवन आदि करते हुये तपस्वियों का दृश्य ऐसा प्रतीत होता था मानों इस भूमि पर सतयुग उतर आया हो। रविवार के दिन बाहर से आये हुये साधकों के फोटो खींचे गये जो अगले अंक में छपेंगे।
(श्री विद्यावती मिश्रा)
चलते-चलते चरण थके पर लक्ष्य न अब भी पास है! समझ नहीं पाती क्यों फिर भी यह मन नहीं निराश है!
जीवन-सन्ध्या पर सूनापन घिरता चारों ओर से, बन्दी पथ होता जाता है घने तिमिर की डोर से, भीड़ मौन हो गये, विश्व का कोलाहल निस्पंद है, सब कुछ सुप्तप्राय पर केवल नीरवता स्वच्छंद है, अर्ध खुले यह मेरे लोचन भय से त्रस्त निहारते,
पर तुम मेरे साथ अभी भी मुझको यह विश्वास है! पग के साथ- साथ में चलती गीतों की झंकार है, और गीत से बंधा टेक-सा किसी पथिक का प्यार है, संभल-संभल कर चलना कोई सुन न सके पद-चाक को, जिसने देखी छांह ने देखे वह जीवन के ताप को, वैसे सदा अतृप्ति मनुज के मन में, मरुथल में रही,
पर करुणा-जल देख उमड़ती भूले मृग की प्यास है! इसका भय है नहीं कि हिमगिरि अड़ा हुआ है राह में, नौका खे न सकेंगे लघु कर सागर के उत्साह में, गिरि से टकरा संघर्षों का बादल बना पुनीत है, और किनारा पा लेने की मौन विसर्जन रीति है, किरण-डोर से अमृत भरता पुलकित हो आकाश जब,
लहर-लहर पर महल बनाती तब यह चलती श्वास है! नभ पर चढ़ा निशीथ कह रहा तेरा साहस व्यर्थ है, मुरझायी कौमुदी कह रही सम्भव बहुत अनर्थ है, ढलता चांद इशारा करता तू पद-गति को मोड़ दे, और तीसरा प्रहर मनाने लगा कि तू हठ छोड़ दे, पर मैं तो वह कोकिल जिसका पतझर हो आधार है,
श्वास स्वयं उड़ाना, अकेला नीड़ बना आकाश है! जहां कि अन्तिम चरण पड़ेगा, रुक जायेगी साधना, शीश झुकेगा, हो जायेगी शान्त युगों की भावना, बन जायेगी अमिट, अधूरी रह कर मन की कामना, पत्थर बन कर मूर्तिमान हो जायेगी आराधना, मैं, मेरे पूजित का मन्दिर, मौन नियति की चेतना,
साधन दुर्लभ, किन्तु का सिद्धि का मिला मुझे आभास है!
*समाप्त*