करो मत श्रद्धा से व्यापार

(श्री॰ विद्यावती मिश्र)


करो मत श्रद्धा से व्यापार (kavita)

दूर से ही तुम मुझको देख पूछते, ‘क्या लोगी वरदान’? चाहते हट जाये कुछ देर तुम्हारी पूजा पर से ध्यान, विसर्जन के बदले में देख, न देना करुणामय उद्गार! करो मत श्रद्धा से व्यापार! चाहते हो क्या कुछ फल माँग अर्चना को मैं करदूँ भीख, साधना जाये मेरी टूट तुम्हारी कैसी भोली सीख, नहीं रच सकें मिलन का पन्थ, विरह की पलकों के नीहार! करे मत श्रद्धा से व्यापार! माँगने लेने का व्यवसाय परायेपन की है पहचान, तुम्हारे बन जाने का देव युगों से व्याकुल मेरे प्राण, श्वास की सरिता को कर पार, हृदय से आती करुण पुकार! करो मत श्रद्धा से व्यापार!


गायत्री की महान महिमा

गायत्री सनातन एवं अनादि मंत्र है। पुराणों में कहा गया कि—“सृष्टि कर्ता ब्रह्मा को आकाश वाणी द्वारा गायत्री मन्त्र प्राप्त हुआ था, इसी की साधना का तप करके उन्हें सृष्टि निर्माण की शक्ति प्राप्त हुई थी। गायत्री के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप हो ब्रह्माजी ने चार मुखों से चार वेदों का वर्णन किया। गायत्री को वेदमाता कहते हैं। चारों वेद गायत्री की व्याख्या मात्र हैं।” गायत्री को जानने वाला वेदों को जानने का लाभ प्राप्त करता है।

गायत्री के 24 अक्षर अत्यंत ही महत्वपूर्ण शिक्षाओं के प्रतीक हैं। वेद, शास्त्र, पुराण, स्मृति, उपनिषद् आदि में जो शिक्षाएँ मनुष्य जाति को दी गई हैं, उन सबका सार इन 24 अक्षरों में मौजूद है। इन्हें अपनाकर मनुष्य प्राणी व्यक्ति गत तथा सामाजिक सुख शान्ति को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सकता है।

गायत्री,गीता,गंगा और गौ यह भारतीय संस्कृति की चार आधार शिला हैं, इन सब में गायत्री का स्थान सर्व प्रथम हैं। जिसने गायत्री के छिपे हुए रहस्यों को जान लिया उसके लिये और कुछ जानना शेष नहीं रहता।

समस्त धर्म ग्रन्थों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। समस्त ऋषि, मुनि मुक्त कण्ठ से गायत्री का गुणगान करते हैं। शास्त्रों में गायत्री की महिमा बताने वाला इतना साहित्य भरा पड़ा है कि उसका संग्रह किया जाय तो एक बड़ा ग्रन्थ ही बन सकता है। गीता में भगवान ने स्वयं कहा है—‘गायत्री छंदसामहम् अर्थात्—गायत्री मन्त्र में स्वयं ही हूँ।’

गायत्री सर्व श्रेष्ठ एवं सर्वोत्तम मंत्र है। जो कार्य संसार में किसी अन्य मंत्र से हो सकता है, गायत्री से भी अवश्य हो सकता है। इस साधना में कोई भूल रहने पर भी किसी का अनिष्ट नहीं होता, इससे सरल, स्वल्प श्रम साध्य और शीघ्र फलदायिनी साधना दूसरी नहीं है। समस्त धर्म ग्रन्थों में गायत्री की महिमा एक स्वर से कही गई है। अथर्ववेद में गायत्री को आयु विद्या, संतान कीर्ति, धन और ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली कहा गया है।

गायत्री की साधना द्वारा आत्मा पर जमे हुए मल विक्षेप हट जाते हैं, तो आत्मा का शुद्ध स्वरूप प्रकट होता है और अनेक ऋषि−सिद्धियाँ परिलक्षित होने लगती हैं। दर्पण माँज देने पर उसका मैल छूट जाता है। उसी प्रकार गायत्री साधना से आत्मा निर्मल एवं प्रकाशमान होकर ईश्वरीय शक्तियों, गुणों,सामर्थ्यों एवं सिद्धियों से परिपूर्ण बन जाती है।

गायत्री मंत्र से आत्मिक कायाकल्प हो जाता है। इस महामंत्र की उपासना आरम्भ करते ही साधक को ऐसा प्रतीत होता है कि मेरे आन्तरिक क्षेत्र में एक नई हल−चल एवं रद्दोबदल आरम्भ हो गई है। सतोगुणी तत्वों की अभिवृद्धि होने से दुर्गुण, कुविचार, दुःस्वभाव एवं दुर्भाव घटने आरम्भ हो जाते हैं और संयम, नम्रता, उत्साह, स्फूर्ति, श्रम−शीलता,मधुरता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, उदारता,प्रेम, संतोष, शान्ति, सेवा भाव,आत्मीयता आदि सद्गुणों की मात्रा दिन−दिन बड़ी तेजी से बढ़ती जाती है। फलस्वरूप लोग उसके स्वभाव, एवं आचरण से संतुष्ट होकर बदले में प्रशंसा, कृतज्ञता, श्रद्धा एवं सम्मान के भाव रखते हैं और समय−समय पर उसकी अनेक प्रकार से सहायता करते रहते हैं। इसके अतिरिक्त सद्गुण स्वयं इतने मधुर होते हैं कि जिस हृदय में इनका निवास होता है वहाँ आत्मा−संतोष की परम शाँतिदायक शीतल निर्झरिणी सदा बहती रहती है। ऐसे लोग सदा स्वर्गीय सुख का आस्वादन करते रहते हैं।

गायत्री—साधना से साधक के मनःक्षेत्र में असाधारण परिवर्तन हो जाता है। विवेक, दूरदर्शिता, तत्वज्ञान और ऋतम्भरा बुद्धि की अभिवृद्धि हो जाने के कारण अनेक अज्ञान जन्य दुःखों का निवारण हो जाता है। प्रारब्धवश, अनिवार्य कर्म फल के कारण कष्ट साध्य परिस्थितियाँ हर एक के जीवन में आती रहती है। हानि, शोक,वियोग, आपत्ति, रोग, आक्रमण, विरोध, आघात आदि की विभिन्न परिस्थितियों से जहाँ साधारण मनोभूमि के लोग मृत्यु तुल्य कष्ट पात हैं वहाँ आत्म बल सम्पन्न गायत्री साधक अपने विवेक,ज्ञान, वैराग्य, साहस, आशा,धैर्य, संतोष, संयम और ईश्वर विश्वास के आधार पर इन कठिनाइयों को हँसते−हँसते आसानी से काट लेता है। बुरी अथवा साधारण परिस्थितियों में भी वह अपने आनन्द का मार्ग ढूंढ़ निकालता है और मस्ती, प्रसन्नता एवं निराकुलता का जीवन बिताता है।

गायत्री को भूलोक की कामधेनु कहा गया है क्योंकि यह आत्मा की समस्त क्षुधा पिपासाएं शाँत करती है। गायत्री को ‘सुधा’ कहा गया है—क्योंकि जन्म मृत्यु के चक्र से छुड़ा कर सच्चा अमृत प्रदान करने की शक्ति से वह परिपूर्ण है। गायत्री को ‘पारसमणि’ कहा गया है क्योंकि उसके स्पर्श से लोहे के समान कलुषित अंतःकरणों का शुद्ध स्वर्ण जैसा महत्वपूर्ण परिवर्तन हो जाता है। गायत्री को ‘कल्पवृक्ष’ कहा गया हे क्योंकि इसकी छाया में बैठ कर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिये उचित एवं आवश्यक हैं।

श्रद्धापूर्वक गायत्री माता का अञ्चल पकड़ने का परिणाम सदा कल्याणकारक ही होता है। गायत्री को ‘ब्रह्मास्त्र’ कहा गया है क्योंकि कभी किसी की गायत्री साधना निष्फल नहीं जाती। इसका प्रयोग कभी व्यर्थ नहीं होता।

सब से उत्तम यह है कि निष्काम होकर अटूट श्रद्धा और भक्ति भव से गायत्री की उपासना की जाय, कोई कामना पूर्ति की शर्त न लगाई जाय। क्योंकि मनुष्य अपने वास्तविक लाभ या हानि और आवश्यकता को स्वयं उतना नहीं समझता जितना घट−घट वासिनी सर्व शक्ति मान माता समझती है। वह हमारी वास्तविक आवश्यकताओं को स्वयं पूरा करती है। प्रारब्ध वश कोई अटल दुर्भाग्य न भी टल सके तो भी साधना निष्फल नहीं जाती। वह किसी न किसी अन्य मार्ग से साधक को उसके श्रम की अपेक्षा अनेक गुना लाभ अवश्य पहुँचा देती है। सबसे बड़ा लाभ आत्म कल्याण है। जो यदि संसार के समस्त दुःखों को अपने ऊपर लेने से प्राप्त होता हो, तो भी प्राप्त करने ही योग्य है।

गायत्री उपासना से प्रमुखतः आध्यात्मिक उन्नति होती है। वही लाभ पुण्य है। साथ ही कुछ न कुछ साँसारिक लाभ भी होते हैं। इन लाभों का कुछ विवरण गायत्री उपासकों के द्वारा लिखा हुआ इस अंक में उपस्थित किया जा रहा है। आशा है कि इससे उपासना मार्ग के पाठकों को आत्मकल्याण की, सुख शान्ति की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिलेगा।


शारीरिक अस्वस्थता से निवृत्ति

अन्धे को आँखें मिलीं (शीतला प्रसाद जी, आजमगढ़)

मेरी आयु उस समय सोलह वर्ष की थी। मैं हाई स्कूल की उच्च कक्षा में पढ़ता था। अचानक ही मेरे पड़ोस में चेचक की बीमारी फैली। मैं भी उससे आक्रांत हो गया। परीक्षा का समय आ गया था। दुर्भाग्य की भयंकरता बड़ी ही प्रबल थी । मैं तीन महीना चेचक तथा उससे उत्पन्न कष्टों को भोगता रहा। अन्ततः चेचक ने मेरी दोनों आँखें अपहरण कर लीं। मैं बहुत रोया। चलने फिरने में भी दूसरों का सहारा लेते हुए बढ़ी ही पीड़ा होती। एक दिन रात में मैंने अत्यन्त ही हार्दिक विलाप के स्वर में गायत्री माता से प्रार्थना की कि हे माता! इस बेबसी भरे नारकीय जीवन से तो मुझे उठा ही ले, वही अच्छा! क्या यही यन्त्रणा देने के लिये तथा उसकी अनुमति लेने के लिये ही तुमने मुझे इतनी शिक्षा लेने का अवसर दिया था। हाय! माँ! क्या तुम्हारा वात्सल्य जरा भी द्रवित नहीं होता? मैं फूट−फूट कर रोने लगा। मुझे लगता जैसे मां सामने ही खड़ी है और मेरा कण−कण आंसू बनकर मां के दयालु पाद-पद्मों पर चढ़ता जा रहा है।

सहसा ही अन्तर में सान्त्वना का अवतरण हुआ और उसी की शीतल छाया में मैं सो गया। प्रातः अरुण−वेला में उठा, तो देखा कि मुझे अरुणोदय का आभास झलक रहा है। प्रसन्नता और गायत्री माता के प्रति कृतज्ञता के भाव से मेरा सब कुछ भर उठा। 24 दिन में मैं आँखों से,−शरीर से सभी तरह स्वस्थ उल्लसित होकर गायत्री माता के यज्ञ रूपी मुख में आज्याहुति दे रहा था।

क्षय रोग से मुक्ति (श्री देवीसिंह जी, बोहत)

सुना था कि क्षय रोग की निश्चित आराम करने वाली कोई दवा ही नहीं है। मेरे दुर्भाग्य से −पूर्व जन्म के पापों के कारण मुझे क्षय रोग हो गया। फेफड़े से काफी खून गिरने लगा था। मेरे जीवन से सभी निराश हो गये थे।—मैं भी हताश था। “मरता क्या न करता” मैंने करुणा प्रार्थना के भाव में गायत्री उपासना की और आज मैं तपैदिक जैसे रोगराज के कराल कवलों से बचकर माता की कृपा शक्ति प्रदर्शन का एक उपादान वन रहा हूं। मैं विश्वास दिलाता हूँ कि किसी संकट से उबार चाहते हैं, वे माता की शरण अवश्य ग्रहण करें। उधार होकर ही रहेगा।

असाध्य रोग का निवारण (ठा॰ खिलाबन सिंह, दमोह)

आज से तीन वर्ष पहले मेरे पेट में असह्य पीड़ा होती थी। दर्द से सदा ही बेचैन रहता था, जिसके कारण खाना, पीना, सोना सभी से बेबसी हित वंचित रह जाना पड़ता था। भूख लगने पर कदाचित थोड़ा सा दूध भी पी लिया तो पतले दस्त आने लगते।

दमोह में जितने भी प्रसिद्धि पाये हुये वैद्य और डाक्टर हैं, सबसे एक−एक करके इलाज कराया, पर जरा भी आराम न पा सका। यहाँ से निराश हो जबलपुर गया और विक्टोरिया चिकित्सालय में इलाज कराना प्रारम्भ किया। एक्सरे के द्वारा परीक्षण कर डाक्टर ने बताया कि तुम्हारे पेट के नल और पित्ताशय की थैली में छाले हैं। आराम होने के लिये आपरेशन कराना पड़ेगा। फिर इस चिकित्सालय को छोड़ मैं बम्बई किंग एडवर्ड हास्पिटल में दाखिल हुआ, पर यहाँ भी अच्छे−अच्छे सभी डाक्टरों ने आपरेशन कराना ही सर्वोत्तम बताया।

आपरेशन से मैं बेहद डरता था, अतः वहाँ से निराश होकर सीधे घर चला आया। इलाज से आराम होने का विश्वास जरा भी नहीं रहा था, अतः एक मात्र भगवान ही मेरा सहारा था। भगवद् उपासकों की संगति करना और उनके संग भगवद् कृपा की चर्चा हुआ करती।

मेरे एक साथी और भक्त ने कहा−केवल बातें बनाने से नहीं, कुछ करने से भगवद् कृपा की प्राप्ति होती है। तुम अपना सब कुछ गायत्री माता को सौंप दो और नियमित उपासना करो। मुझे उनकी सलाह बड़ी प्यारी लगी। तब तक कुछ प्रेम−भक्ति मेरे हृदय में जग चुकी थी। मैं नियमित गायत्री जप करने लग गया। दो चार दिन के उपराँत ही मेरी बेचैनी और दर्द घटने लगे। मुझे स्फूर्ति का बोध हुआ और आज माता की कृपा से निराशा, आशा बनी और आशा, उत्साह एवं स्वास्थ्य में परिणत हो गयी।

मैं अपने अनुभव के बल से यह दावे के साथ सभी सज्जनों से अनुरोध करता हूँ कि आप सर्वतोभावेन आपको−मातृ चरणों में सौंप दें, निश्चय ही देर−सबेर में आपका मंगल और कल्याण होगा।

पागलपन दूर हुआ

श्री ॐकार पाटिल, खाम गाँव मस्तिष्क की विकृति के रोगी थे। उनके मन के विचार एवं भाव सदा ही अस्त व्यस्त और टूटे−फूटे से रहते। उसमें कोई शृंखला नहीं रहती। लोग उन्हें उन्मत्त और पागल कहते। पैसे की उनके पास कमी नहीं थी, अतः इस रोग को शान्त कराने के लिये विभिन्न चिकित्सकों से भाँति−भाँति के इलाज करवाये, पर, कभी किसी से कोई लाभ न हुआ। एक अयाचित प्रेरणा से उन्होंने अपने कल्याण के लिये गायत्री उपासना प्रारम्भ कर दी। उन्हें अद्भुत शान्ति मिली। विचारों का बिखरना घटने लगा और आज माता की कृपा से उन्हें पागल कहने वाले लोग ही,एक विचारशील व्यक्ति मान कर, उनके विचारों की प्रतिष्ठा करते हैं। यह है माता की वात्सल्य भरी अनुकम्पा। आज उन्होंने एक डूबे हुए मान−वजीवन को उबार लिया।

खामगाँव वासी श्री शुकदेव भावजी की छाती के एक भाग में बहुत वेदना होती थी। इलाज के लिये अधिक पैसे खर्च करने में असमर्थ थे। डाक्टर से पूछने पर उन्होंने बताया कि पहले तुम्हें अपने उस भाग का फोटो खिंचवाना होगा, फिर जाँच करने पर इतने−इतने रुपये इलाज में खर्च करने होंगे। उसने देखा— मैं वैसा इलाज कराने के योग्य नहीं हूँ। अतः सभी सभी ओर की सभी आशा भरोसा छोड़कर उस ने गायत्री माता की शरण लेने का निश्चय किया। जप करने के दूसरे तीसरे दिन ही उसकी वेदना में आश्चर्य पूर्ण कमी आई। फिर तो उसका उत्साह और हौसला बढ़ता ही गया। कुछ ही दिनों में वह सम्पूर्ण वेदनाओं से छुटकारा पा गया और आज माता की कृपा से उन्हीं की याद करते हुए मस्ती से पुरुषार्थ करते हुए वे अपनी जीविका चला रहे हैं।

श्री महादेव चन्द्रकान जी (खामगाँव) की पत्नी दमा से आक्राँत थी। दमा के भयंकर वेग को उन्हें अपनी आँखों से देखने के अवसर जीवन में बारंबार आये। वे कहते हैं, ‘मर जाना बेहतर है किंतु प्राण छूटने की सी दशा में घंटों तड़पते रहना, बहुत ही बड़ा दुर्भाग्य है। किसी नरक का कष्ट इससे अधिक क्या हो सकता है? यह दुस्सह पीड़न अवश्य ही किसी भयंकर पापों का परिणाम ही हो सकता है।”

पैसे की कमी के कारण वे अपनी पत्नी का इलाज कराने में असमर्थ थे और उनकी पीड़ा से स्वयं इनके अन्तर में ‘बिच्छू−दंशन’ चलते रहते थे। कोई उपाय नहीं देख कर बेबसी से ही इन्होंने गायत्री उपासना का आश्रय लिया। उपासना के थोड़े ही दिन उपासना का आश्रय लिया। उपासना के थोड़े ही दिन बाद उन्हें कैसे इलाज के लिये पर्याप्त पैसे मिल गये, इसे वे बताना पसन्द नहीं करते। इस इलाज को तथा इलाज के आवरण में दमा रोग की मुक्ति को, वे गायत्री माता का ही प्रसाद मानते हैं।

मृत्यु के मुख में से लौटा (कविराज वासुदेव कृष्ण जोशी, काव्यतीर्थ, चूरू)

करीब एक साल पहले की बात है:—मेरे घर से कुछ ही दूर पर एक काली माता का मन्दिर है। उस मन्दिर के पुजारी जी के युवक पौत्र का विवाह अगले वर्ष ही हुआ था। विवाह के उपराँत उस पर ज्वर का जो आक्रमण हुआ, वह सैकड़ों चिकित्साओं और औषधियों से भी नहीं छूटा। चिकित्सकों की असफलताओं से उस युवक के हृदय में निराशा की भावना बढ़ती गयी। अन्ततः उसे औषधि मात्र से अरुचि और अविश्वास हो गया। वह मृत्यु शय्या की और दिनों दिन बढ़ता जा रहा था, फिर उसने औषध लेना स्वीकार नहीं किया। लगता जैसे वह स्वयं ही मृत्यु की गोद में समा जाना चाहता था। मैं स्वयं चिकित्सक हूँ। उसकी बढ़ती हुई जर्जरता और शीर्णता को देख कर मैंने स्वयं बिना मूल्य उसकी चिकित्सा करने का निश्चय किया और पुजारी जी से इसके सम्बन्ध में कहा—पर लड़का औषधि लेने के लिए तैयार नहीं हुआ। तीन बार इसके लिये मैंने प्रयत्न किया पर वह नहीं ही तैयार हुआ। चौथी बार जबकि मृत्यु शय्या पर ही जा पड़ा था। न कुछ बोलने की शक्ति ही उसमें रह गयी थी। मैं मैट्रिक पास, उस विवाहित युवक को यों मरते देख बड़ा ही करुणातुर हो उठा था। मैंने गुरुदेव का स्मरण कर चौथी बार सलाह दीया—यदि आप तैयार होइये तो बिना दवा के ही आपका पौत्र आरोग्य प्राप्त कर लेगा। पुजारी जी शीघ्रता से प्रसन्नता पूर्वक इसके लिए तैयार हो गये। मैंने गुरुदेव का स्मरण करते हुए कह दिया कि आप 15 दिन तक गायत्री मन्त्र की प्रतिदिन 25 माला जप की जाये और जप पूरा होने पर उसकी परिपूर्ति यथा शक्ति हवन द्वारा कर दीजिये। पुजारी जी ने बड़ी श्रद्धा से संकल्प लिया और जप करने लगे। लगभग सात दिन जप करने के बाद लड़के ने स्वयं कहा—मैं औषधि लूँगा। तदुपरान्त एक वैद्य जी ने औषधि दी और वह रोग मुक्त हो गया। यहाँ तक कि उसी महीने में मन्दिर के सामने वाले विद्यालय में उसे नौकरी भी मिल गयी। पुजारी जी मुझे सारी कहानी सुनाते हुए धन्यवाद देने लगे। मैंने कहा—जिस गायत्री माता ने उसे बचाया है, उसकी उपासना आप लोग कभी नहीं भूलें, यही मेरे लिए सच्चा धन्यवाद है। पुजारी जी ने स्वीकृति जतायी और मैं यह सोचता घर आया—कि गुरुदेव का यह वाक्य अमोध और पूर्ण सत्य है कि “किसी की गायत्री साधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।”

नया जीवन मिला (श्रीमती कान्ता देवी त्यागी, धामपुर)

मैं एक वर्ष से पित्त, वायु रोग से बड़ी दुःखी थी। हर समय जी घबराता था, न नींद आती थी, न भूख लगती थी। हालत दिन प्रति दिन बिगड़ती जा रही थी। अधिक कमजोर हो गई थी। बाँया हाथ बिल्कुल बेकार हो चला था। उसमें जरा भी दर्द होने अथवा ठसका लगने से पसीने में नहा जाती थी और जी घबराने लगता था। अन्दर दम सा घुटता था। डाक्टर वैद्य तरह−तरह के रोग बता कर डराया करते थे। बहुतेरा इलाज कराया,कभी दो दिन को कुछ आराम मिला, पर फिर वही बात। मैं चारपाई से मिल गई थी। चलना फिरना तो दूर रहा खड़े होने तक की शक्ति नहीं रही थी। हर समय प्राणान्त का भय सामने उपस्थित रहता।

माता की कृपा से 1 दिन मेरी ननद बिजनौर से घर आई। बिजनौर में उन्हें किसी यज्ञ में पाँच−पाँच पैसे वाली आठ पुस्तकें भेंट स्वरूप मिली थीं। उन्होंने वह पुस्तकें मुझे दिखाई और मुझे गायत्री जप करने को कहा। पुस्तकें पढ़ने को मेरी इच्छा थी, पर मैं पढ़ने में असमर्थ थी। अन्त को मेरी ननद जी ने ही रात को काम से निपटने के बाद मेरे पास बैठ कर उन पुस्तकों को पढ़कर सुनाना शुरू किया। मुझे सुनते सुनते नींद आ जाती, यहाँ तक कि मुझे यह भी पता न रहता कि बीबी जी अभी पुस्तक पढ़ रही है और लैम्प जल रहा है। जब वह मुझे टोकती तो अचानक नींद आ जाने से मुझे शर्म मालूम पड़ती थी।

दोपहर को मेरा जी चाहता था कि पुस्तकें पढूँ पर उस समय ननद जी काम से थककर सो जाती थीं। मैं उन्हें जगाना उचित न समझती। आखिर एक दिन साहस करके मैंने पुस्तक उठा ली और देवी प्रेरणा वश दो घन्टे में सब पुस्तकें पढ़ ली। उस दिन मैंने अनुभव किया कि मुझे अब दीखने लगा।

शुरू के दिन मैंने बिस्तर पर पड़े पड़े ही जप किया। दूसरे दिन मुँह हाथ धोकर कपड़े बदल कर तथा पृथ्वी पर बैठकर दो मालाएं की। तीसरे दिन शिव रात्रि थी। बहुत दिनों से स्नान भी नहीं किया था। उस दिन स्नान कर के तीन मालाएं की। सन् 1954 की होली से 5 मालाएं जपना प्रारम्भ कर दिया। चैत्र नवरात्रि के आरम्भ से आज तक 11 मालाएं नित्य चल रही हैं, साथ ही 24 मन्त्र भी रोज लिखना आरम्भ कर दिया। साथ में एक पड़ोसी डाक्टर से साधारणतया भी लेती रही। आवश्यकता पड़ने पर अब भी कभी कभी दवा ले लेती हूँ। अब माता की कृपा से मैं स्वस्थ हूँ।

जब मैं बीमार थी, उन्हीं दिनों मेरे पति देव हिन्दू मुस्लिम दंगे के अभियोग में फँस गये, यद्यपि वह घर से निकले भी नहीं थे। विरोधियों ने फँसाने की कोई कसर न छोड़ी, परन्तु माता की कृपा से वह निरपराध सिद्ध हुये। इसके अतिरिक्त हाल में ही मेरी कन्या का विवाह एक सुयोग्य वर के साथ सुसम्पन्न हो चुका है। हम सब परिवार के लोग माता की अनुकम्पा से सुखी जीवन व्यतीत करते हुये माता की अपार दया का अनुभव कर रहे है।

कठिन रोग से छुटकारा (श्री हजारीलाल शर्मा, पाँडोला, श्योपुर−मुरैना)

लगभग डेढ़ साल से मैं मधुमेह से पीड़ित था। शरीर अत्यन्त दुर्बल हो गया था किसी काम में मन नहीं लगता था। हकीम, वैद्य डाक्टर कोई छोड़ा नहीं। दिन पर दिन स्वास्थ्य गिरते जाने से मुझे अत्यधिक चिंता रहने लगी। सौभाग्य से कुछ माह पूर्व मुझे गायत्री तपोभूमि मथुरा में हो रहे विशद् गायत्री महायज्ञ के संबंध में पर्चे मिले। साथ ही एक प्रति “गायत्री ज्ञानांक” की पढ़ने को मिली। मैंने ध्यान से पढ़ा और उससे प्रभावित होकर मैंने पूज्य आचार्य जी को पत्र में अपनी सब व्यथा सुनाई और उससे निवृत्ति पाने का उपाय पूछा। उन्होंने दया करके मुझे गायत्री उपासना व गायत्री हवन करने का उपदेश किया। हकीम,वैद्यों से तो मैं परेशान हो चुका था। मैंने आचार्य जी के बताये मार्ग पर पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास से कार्य करना आरम्भ कर दिया। मैं विशय गायत्री यज्ञ का भागीदार भी बना। माता गायत्री की ऐसी कृपा हुई कि मेरे स्वभाव में बड़ा परिवर्तन हो गया और लगभग अस्सी फीसदी रोग नष्ट हो चुका है। शरीर में बल की वृद्धि हो रही है, काम करने को जी चाहता है, भूख भी खूब लगती है। चित्त सात्त्विकता की और बढ़ रहा है आशा है शीघ्र ही शेष रोग भी अच्छा हो जावेगा। मुझे दृढ़ विश्वास है कि गायत्री उपासना जीवन की हर दिशा में लाभकारी है।

अनेक व्याधियाँ दूर हुईं। (श्री साँवल सिंह जी नमाना, कोटा)

मैंने जीवन का अधिकाँश भाग अँधेरे में बिताया। माता ने कृपा की और सहसा एक दिन खातौली ग्राम जा पहुँचा। वहाँ श्री वीरेन्द्र सिंह जी ने धार्मिक चर्चा चलाई। परम पूज्य आचार्य जी का परिचय देने के बाद श्री वीरेन्द्र सिंह जी ने मुझे गायत्री माता की शरण में आने को बाध्य किया। श्री विरेन्द्र सिंह जी के आदेशानुसार मैंने माता की शरण ग्रहण की, जिससे नये जीवन का संचार हुआ। मैं दुर्भाग्य से कितनी ही प्रकार की व्याधियों में ग्रसित था। मैं कभी कभी अपने जीवन से निराश हो उठता था। किसी काम में मन नहीं लगता था। शरीर दिन दिन निर्बल हो रहा था। माता की असीम कृपा से इन सब व्याधियों से छुटकारा मिला। इस समय सुख के स्वप्न देख रहा हूँ।

श्वेत कुष्ठ में आराम (बंशीलाल लाठी, मालेगाँव)

किसी के निर्मल शरीर में श्वेत−कुष्ठ का कलंकी रोग, व्यक्ति के शरीर को भले ही कष्ट न दे, पर उसके मन प्राण में तीव्र बिच्छू−दंशन भर देता है। मेरे दुर्भाग्य से दाड़ी तथा छाती के ऊपर श्वेत कुष्ठ के चकत्ते निकल आये। अनेक उपचार कराने पर भी कुछ लाभ नहीं हुआ। अंत में इसके घृणित चंगुल से छुटकारा पाने के लिये गायत्री माता की शरण ली। थोड़े दिन के के विधिपूर्वक जप से दाढ़ी पर का दाग छूट गया। छाती के दाग भी अधिकाँश मिट चुके हैं। ऐसी आनंददायिनी माता की याद से किसका दिल प्रफुल्लित न होगा। उनकी कृपा की याद कर लेने से तो रोम−रोम पुलकित होने लगता है।

फोड़ा अच्छा हुआ (लक्ष्मीनारायण शर्मा, पढ़ाना)

कुछ दिन पूर्व अचानक मेरे दोनों नितम्बों में दो गाँठ जैसे फोड़े उठते हुए प्रतीत हुए। मैंने प्रारंभ में तो उस और ध्यान ही नहीं दिया,किन्तु धीरे−धीरे बढ़ कर जब वह प्रस्तर सम और लाल सुर्ख हो गये, साथ ही पीड़ाओं के वेग बढ़ने लगे तो दर्द से व्याकुल हो वैद्यों की शरण में जाना पड़ा। उन्होंने दशाँग लेप दिये, पर कुछ लाभ नहीं हुआ। और अन्य अनुभवी लोगों की औषधियों का प्रयोग हुआ, पर पीड़ा के उद्वेग में जरा भी कमी नहीं आई। मेरे भाग्य से उस निराशा भरी बेबसी के काल में श्री गोवर्द्धन शर्मा जी भी पधारे। उन्होंने कहा—अरे! तुम इस साधारण से रोग में घबड़ा गये। गायत्री माता की कृपा के द्वारा यह एक दिन में ही शान्त हो सकता है। मैंने पूछा—मैं तो जप का विधान जानता नहीं। किस भाँति जप करने से मेरा शुभ होगा, यह बतावें। उन्होंने बताया:—

माता की एक छवि लेकर उसका पञ्चोपचार विधि से पूजन कर घृत का दीपक जला लो। तत्पश्चात् ध्यान करके संयत चित्त से सिर्फ 108 बार जप करो। यही पर्याप्त है।

मैंने ठीक उसी भाँति उक्त संख्या में जप किया। मेरी पीड़ा दूर हो गयी और तीसरे दिन ही वह गाँठ चिन्हावशेष हीन हो गया। इस से बड़ कर और प्रत्यक्ष कृपा क्या हो सकती है।

(श्री चिंरजीलाल ऐरिनपुरा रोड)

मैं जबाई बाँध ऐरिनपुरा रोड पर कार्य कर रहा हूँ। मेरी माता मेरे पास ही हैं। एक समय मेरी माता जी बहुत बीमार हो गई। उन्हें खून के दस्त शुरू हो गये। वैद्य डाक्टरों की दवाएं असफल रही। मैं माता गायत्री पर भरोसा करके जप करने बैठ गया। एक घण्टा तक जप करने पर उन्हें लाभ हुआ और शीघ्र ही वे पूर्ण स्वस्थ हो गई। जब कभी मैं गायत्री हवन भी करता हूँ मेरे पास भस्म रखी थी, उसका भी प्रयोग किया था। एक दिन मेरे एक मित्र की बच्ची को बिच्छू ने काट लिया। मैंने गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर उस भस्म का कटे स्थान पर लेप कर दिया। थोड़ी देर में जहर उतर गया और उसे नींद आ गई।

अम्ल शूल दूर हुआ (श्री प्रतापचंद्र बोस, इन्द्रनगर )

मैं विगत छह वर्षों से अम्लशूल से उत्पीड़ित था। सैकड़ों चिकित्सायें असफल हो गयी। अनेकों चिकित्सकों की ‘धन्वन्तरि’ ‘पियूषपाणि’ ख्यातियों को यह वृत्रासुर की भाँति निगल गया।

गुरुदेव की कृपा से मैंने गायत्री माता का अञ्चल पकड़ा और अन्य सारी आशाओं को एकदम दूर फेंक दिया।

कुछ ही दिन तक नियमित जप करने के उपराँत, मेरे स्वास्थ्य में विस्मयकारी अभिवृद्धि प्रारम्भ हुई और आज मैं सम्पूर्ण तथा रोग मुक्त होकर गुरुदेव एवं माता की कृपा से सुखी−जीवन व्यतीत कर रहा हूँ। उसी कृपा से हमारी गिरी हुई आर्थिक दशा भी सुधर गयी। होमियोपैथी−चिकित्सा में मेरी अच्छी ख्याति हो गयी है और एक शिष्ट मानवोचित भोजनाच्छादन का उपभोग करते हुए, वर्ष में पाँच सौ रुपये बच जाते हैं।

मेरी भाभी भी छह सात वर्ष से दमा रोग से दुस्सह कष्ट सह रही थी। मेरे कहने एवं प्रोत्साहन देने पर वह दो से पाँच माला तक गायत्री मंत्र का जप,आज छः महीने से कह रही है। आज श्वास रोग का पूर्व वेग एवं कष्ट घट कर आधा रह गया है और उसमें भी शीघ्रता से सुधार होता नजर आ रहा है।

हैजे में माता की कृपा से प्राण रक्षा (श्री कपिलदेव झा, वानूछपरा )

आज से ढाई वर्ष पहले हम वोतिया आ रहे थे। रास्ते में एक गाँव में जोरों से महामारी का भयंकर रोग अपना ताण्डव−नाच कर रहा था। वहाँ हमारे सम्बंधी थे। उनके बुलाने पर हम उनके घर गये। वहाँ जाते ही मृत्यु स्वरूपा−विशूचिका ने मुझ पर भी धावा बोल दिया। कितने वमन और दस्त हुए इसका कोई हिसाब नहीं। दो चार घण्टे में मेरी आँखें खन्दक जैसी भयावनी हो गयीं। मैं साक्षात कंकाल बन गया। मुझे कभी−कभी होश आ जाता। डाक्टर आये। औषधि पिलाई गई,(इञ्जेक्शन) सूई भी दी गयी, पर कोई परिवर्तन नहीं। सभी मेरे जीवन की आशा खो बैठे। स्वयं मैं भी मरने की बाट जोह रहा था।

सन्ध्या हो चुकी थी। मेरे जीवन में अन्धकार बढ़ता ही जा रहा था। बेचैनी तीव्र हो रही थी। रात्रि के आठ बजे थे। मेरी साँस क्रमशः सूक्ष्म होती जा रही थी। अब मैं दम तोड़ने ही वाला था कि सहसा मेरे आगे एक सौम्य श्वेत, उज्ज्वल गौर वर्णा दिव्य नारी खड़ी हो गयी। ठीक सरस्वती के समान ही रूप एवं सारी वेष−भूषा थी। मैंने गायत्री उपासक के नाते यही सोचा,गायत्री बुद्धि को प्रेरणा देती है, अतः सरस्वती ही गायत्री है। उन्हें देखते ही मेरे जलन−मेरी बेचैनी, न जाने एक क्षण में ही कहाँ उड़ गयी। उन्होंने मेरे शरीर को स्पष्टतया छूकर मुझे पुनः जीवन दिया और मधुमयी स्वर लहरी में किसी वैदिक मंत्रों का उच्चारण करती हुई आशीर्वाद दिया। मैं स्वस्थता और सचेतनता का अनुभव करने लगा। पुनः उन्होंने कहा—मेरा यह दर्शन, स्पर्श,आशीष एवं वार्ता किसी से नहीं कहना। पुनः वे कहने लगीं−सारी नारी जाति को मातृभाव से देखना , मन ही मन उनके चरणों में प्रणाम करना− इसे निभाने का प्रयत्न करना। इतना कहते ही वे मेरी दृष्टि से सहसा ही अन्तर्ध्यान हो गयीं। आज गुरुदेव के आदेश में−माता का आदेश मानकर ही मैं उसे सब के समक्ष प्रगट कर रहा हूँ।

मेरा तो जीवन समाप्त हो चुका था। आज जिन प्राणरक्षिका माता की अनुकम्पा से मैं मानव शरीर में स्थित हूँ—वह भी उन्हीं के चरणों में सदा−सर्वदा के लिए चढ़ाने का प्रयत्न कर रहा हूँ।


गायत्री उपासना से सुख सुविधाओं की वृद्धि

गायत्री द्वारा आश्चर्यकारी लाभ (श्री॰ विश्वनाथ पाण्डेय, दानापुर)

एक बार मैं उद्यान में बैठकर गायत्री जप कर रहा था। सूर्य देव अपनी किरणें समेट कर विदाई का उपक्रम कर रहे थे। अचानक करुण कराहों से भरी हृदय बोधक वाणी मुझे सुनाई पड़ी। उसी समय मेरा जप भी समाप्त हो रहा था। मैं दौड़ा गया और जाकर देखा एक घायल, लाश के समान निस्पंद पड़ा था। उसमें उठ सकने की जरा भी सामर्थ्य नहीं रह गयी थी। मैंने गायत्री मंत्र से जल को अभिमन्त्रित करके आँखों में छींटे मारे तथा मन्त्र पढ़ते हुए उनके शरीर पर हाथ फेरने लगा। सहसा ही वे पूर्ण स्वस्थ की भाँति अपने आप उठकर बैठ गये और मुझे आग्रह और सम्मान के साथ अपने घर ले गये । वहाँ बहुत सी वार्ताएं हुई। उसने पूछा मैंने तो समझ लिया था कि मैं अब मर ही चुका फिर किस उपाय से आपने मुझे बचा लिया? मैंने उत्तर दिया—मैं तो सिवाय गायत्री मन्त्र के और कुछ नहीं जानता फिर उसने पूछा आपने गायत्री उपासना कैसे और क्यों आरम्भ की? उनकी सच्ची जिज्ञासा देखकर मैंने अपने जीवन के पृष्ठ खोलकर उनके सम्मुख रख दिया—

मैंने संसार के आकर्षणों के कारण अनेकों बुरे अभ्यासों को अपना स्वभाव बना लिया था। मेरे समझने और समझाने पर भी ये कुटेवें मेरा पीछा नहीं छोड़ती थी− मैं परेशान था।

हमारे ज्येष्ठ भ्रात श्री भोला नाथ जी गायत्री उपासक हैं, उन्होंने गायत्री उपासना के बल से, जिनों को हमारे घरों से सदा के लिए हटा दिया। ये जिन्न (प्रेत) सदा हमारे घरों में नाना प्रकार की भली बुरी वस्तुयें वर्षाया करते थे। इनके गायत्री अनुष्ठान करते ही सारे उपद्रव सदा के लिए बन्द हो गये। गायत्री मन्त्र का ऐसा प्रत्यक्ष प्रभाव देखकर मेरा भी मन इस और खिंचा और मैंने अपने कुटेवों को दूर करने की भावना से भ्राता जी की देख रेख में 24000 के दो अनुष्ठान किये। मैं विस्मय से भर उठा कि जिन कुभावनाओं को हटाने में मैं वर्षों से परेशान था, मेरे सारे पुरुषार्थ जिसे दूर करने में सदा असफलता की निराशा भरी घूँटे पीते रहे, उसे ये दो ही लघु अनुष्ठानों ने कैसे मुझसे सदा के लिये निकाल कर बाहर कर दिया? इस अनुभव के आधार पर तो लगता है कि मैं दावा पूर्वक कह दूँ कि इतनी शीघ्रता से अन्तर को निर्मल बनाने वाला, संसार भर में कोई मन्त्र नहीं है। कोई श्रद्धा निष्ठा पूर्वक इस मन्त्र की आज़माइश कर ले।

इसके उपरान्त तो कितनी ही छोटी मोटी घटनायें मेरे जीवन में घटी और घटती ही रहती हैं।

हमारे पिता जी , सदा एक न एक रोग सदैव पीड़ित ही रहते थे, किन्तु जब से इन्होंने गायत्री माता का अंचल पकड़ा तब से बराबर आरोग्य स्थिति का लाभ ले रहे हैं।

हमारे पड़ोस की एक स्त्री को सदा ही प्रेत सताया करता था। एक दिन हमारे भ्राता जी को उस पर दया आ गयी। उन्होंने एक दिन प्रेत लगने की हालत में गायत्री अभिमन्त्रित —जल के छींटे उसके शरीर उपरान्त उठी। भाई जी ने वह सदा के लिये प्रेतों से मुक्त हो गयी।

एक बार हमारे आरा निवास सम्बन्धी राम गोपाल जी के छोटे भाई के विवाह की बरात जाने के लिये तैयार हो रही थी। उसी समय उनके पाँच वर्ष के पुत्र श्री अमर कुमार की दशा अचानक ही इतनी खराब हो गयी कि सभी उसके जीवन से निराश हो गये। राम गोपाल जी भी गायत्री उपासना के प्रेमी थे और हमारे भ्राता जी भी संयोग से वहीं उपस्थित थे। यह दशा देख ये दोनों गायत्री माता की आराधना में लग गये। थोड़ी देर जप किया था, कि बालक पूर्ण स्वस्थ होकर उठ खड़ा हुआ और उल्लास से बारात वालों ने अपनी मंगल यात्रा आरम्भ की।

आरा के श्री रामकरण जी ने निमंत्रण पाकर किसी के यहाँ भोजन करने गये। भोजन करने के उपरान्त घर आते ही उनका मस्तिष्क विकृत हो गया। वे पागल होकर यत्र−तत्र फिरने लगे। एक दिन उसने स्वयं अपनी जाँघों को ईंटों से मार−मार कर हाथी चर्म—सदृश बना लिया। उनका मनुष्य−जीवन निरर्थक हो गया। एक दिन कुछ लोगों के परामर्श से उसको पकड़कर रामगोपाल (हमारे संबंधी गायत्री उपासक) कल्याण भावना से चावल को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर उनके शरीर पर छींटे मारे, जिससे वह मूर्छित के समान गिर पड़ा। कुछ देर बाद फिर वे उठे और पीने के लिये जल माँगा। उन्हें फिर गायत्री अभिमंत्रित जल पिलाया गया—इसके उपरांत वे पूर्णतः स्वस्थ हो गये।

हमारे एक पुराने पटना निवासी मित्र श्री शिव दत्त जी, जो दो वर्ष से मैट्रिक परीक्षा में असफल हो रहे थे। उन्होंने गायत्री माता का आश्रय लिया और उस वर्ष मैट्रिक परीक्षा में भली भाँति उत्तीर्ण हो गये। इस प्रकार के अनेक अनुभवों से प्रभा−बिन होकर मैं स्वयं भी निष्ठा पूर्वक गायत्री उपासना में लग गया।

भूखों मरती दशा में माता की सहायता (श्री. विरसुखलाल, सिकन्दराबाद)

हमारे परिवार में केवल पिता जी के कारण ही हमारी जीविका चलती थी। सारा कारोबार देखने और संचालित करने वाला, उनके सिवाय और कोई नहीं था। हमारे दुर्भाग्य से उन्हें पथरी का रोग हो गया। रात दिन दर्द से बेचैन रहते थे। हमारा सारा कारबार बन्द हो गया। पहले की अर्जित सम्पत्ति उनके इलाज और हमारे भोजन एवं अन्य आवश्यकताओं में खर्च किये जा रहे थे। चिकित्सा के बावजूद भी उनकी दशा बिगड़ती ही जा रही थी। हम लोग उनके जीवन से निराश हो कर अपनी भावी जीविका के नष्ट होने की चिंता से भीतर ही भीतर भय से घुलते जा रहे थे।

निराशा ने हमें गायत्री माता की ओर उन्मुख किया। जो जप कर सकते थे सबों ने माता की करुणा पुकार सहित जप करना प्रारम्भ किया। चार महीने बीतते−बीतते पिता जी पूर्ण स्वस्थ हो गये। सबों ने मुग्ध होकर−कृतज्ञ हृदय से माता का धन्यवाद किया, जिन्होंने, पिताजी का प्राण रक्षा के संग हमारी जीविका के साधन भी संजीवित कर दिये।

इस संकट के अवसर पर हमें अपना शिक्षण बंद कर देना पड़ा था, पर शिक्षण छोड़ते ही माता की कृपा से अनायास ही दोनों को उपयुक्त नौकरी मिल गयी। आज हम उनकी कृपा से सब तरह सुनी हैं।

आर्थिक संकट से निवृत्ति (श्री हरिदत्त शर्मा संवासा, बूँदी)

मैं जाति का ब्राह्मण हूँ। यज्ञोपवीत के समय मुझे गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई थी। पर दुर्भाग्य से मैं गायत्री विद्या के रहस्य को नहीं जानता था। अतः मंत्र जाप एवं गायत्री उपासना में कोई रुचि नहीं थी। भगवत् कृपा से बसंत पंचमी सं. 2011 से गायत्री तपोभूमि में “विशद् गायत्री महायज्ञ” प्रारम्भ हुआ। गायत्री महायज्ञ के संबंधित पर्चे व “गायत्री ज्ञानांक” की एक प्रति मुझे एक मित्र द्वारा प्राप्त हुई। उसे मैंने आद्योपान्त पढ़ा और अपने को धन्य माना। गायत्री महिमा से प्रभावित हो मैंने महायज्ञ का भागीदार बनने का निश्चय किया। मैं अपना कुछ नियमित समय गायत्री उपासना में लगाने लगा। मेरे प्रयत्न से कई व्यक्ति इस पथ पर चलने लगे। आर्थिक दृष्टि से मेरी अवस्था दुर्बल है। पिछले कुछ दिनों से मेरे ऊपर कुछ कर्ज चला आ रहा है। बौहरे ने मुझ से अधिक कहा सुनी करके कम से कम सौ रुपया एक निश्चित तारीख पर देने का वायदा करा लिया। यद्यपि मुझे कोई ऐसा रास्ता नहीं सूझ रहा था कि कहीं रुपया पा सकूँ और उस बौहरे को समय पर देकर झूठा बनूँ। परंतु सहसा उसके कहने पर हाँ कर दिया था मुझे समय पर देने का वचन पूरा करना था। हृदय उद्विग्न था। 1 दिन शेष रह गया है। कोई सूरत नहीं! माता के सामने हृदय खोलकर प्रार्थना की। सम्मान जाने का समय निश्चित हो गया। बौहरा आकर सूचना दे गया कि कल आपकी निश्चित तारीख समय चूकने पर सम्मान का ख्याल न रखा जावेगा।

बौहरा चला गया। मैं सब कुछ भूल कर माता के चरणों में पड़ गया। एक घण्टा उपरान्त एक महाशय अचानक ही आकर 100) दे गये मेरी लाज बच गई, माता की असीम अनुकम्पा का अनुभव किया और जाकर रुपया दे आया। माता की कृपा से एक दिन पहले ही सम्मान की रक्षा हो गई। मेरा समय सानन्द व्यतीत हो रहा है। गायत्री उपासना में श्रद्धा एवं विश्वास रखने पर अवश्य लाभ होता है। पाठकगण, अवश्य इस रहस्य को जानकर लाभ उठावेंगे, ऐसी मेरी आनन्दमयी माता से प्रार्थना है। उस दयामयी माता के चरणों में कोटिशः प्रणाम।

गायत्री जप से जीवन में सुख−सुविधा (उपाध्याय नाथूलाल बापूलाल औदीच्य सागबाड़ा,)

माता की अशेष करुणा से मैं पन्द्रह वर्ष की उमर से ही तीन माला प्रतिदिन गायत्री महामंत्र का जप करने लगा था कुछ दिनों के उपरांत मैं ‘अखण्ड ज्योति’ का ग्राहक बना और गायत्री महा विज्ञान तीनों भाग पढ़कर अपना आध्यात्मिक गुरु भी एक प्रगट−गुप्त महापुरुष को चुन लिया। जप की संख्या बढ़ाकर 1000 एक हजार कर दिया।

माता की अपार दया से मैं जहाँ भी जिस काम से जाता हूँ वह किसी भाँति पूरा ही हो जाता है। कभी लगता है, यह काम होना तो मुश्किल है, पर ज्यों ही उस काम में लगता हूँ कि वह काम अपनी कठिनाई त्याग कर सरल होने लगता है।

मेरी पत्नी का स्वास्थ्य बहुत दिनों से खराब था। कभी रोगों में छुट्टी नहीं मिलती। एक न एक रोग सदा उसे घेरे ही रहते। सारी चिकित्सायें उस के रोग को दूर करने में असफल सिद्ध हुई।

आध्यात्मिक गुरु वरण करने के याद उपासना करते हुए उसके सारे रोग क्रमशः कैसे दूर हो गये, यह पता भी नहीं चला।

मेरा अपना मकान नहीं था। माता की कृपा से एक व्यक्ति ने अपना दो हजार रुपये का मकान मुझे 500) में ही दे दिया। उस समय मेरे पास एक भी रुपये नहीं था। एक व्यक्ति ने माँगते ही कर्ज दे दिया और मैंने मकान खरीद लिया। कुछ दिनों में वे कर्ज के रुपये भी चुक गये।

हम लोग अपने परिवार में चार व्यक्ति हैं, पत्नी, एक पुत्र, एक पुत्री और स्वयं मैं। हमारी जीविका का कोई ठोस आधार नहीं है, फिर भी, हम सभी, सदा सुख पूर्वक पूरा भोजन पाते रहते हैं।

हमारे जीवन के इन सुखद स्थितियों का एकमात्र कारण माता का ही वात्सल्य है, क्योंकि हम अपने जीवन में, केवल अपने पुरुषार्थ से चलने वालों को− अनेकों को, भूखों मरते−विभिन्न दुःख और अभाव भोगते हुए प्रतिदिन देखते ही रहते हैं।

आर्थिक समस्या का हल (श्री लक्ष्मीनारायण शर्मा, श्रोत्रिय−बोहत कोटा)

मैं तीन वर्ष से अत्यन्त दुखी था, चिंता एवं महान आपत्ति में ग्रस्त था। हमारे यहाँ भिक्षा वृत्ति के सावत्य अन्य जीविका उपार्जन का माध्यम नहीं है। यहाँ के ब्राह्मण भिक्षा वृत्ति से ही जीवन निर्वाह करते हैं। मुझे यह वृत्ति अशोभनीय मालूम पड़ी अतः शिक्षा विभाग की ओर अग्रसर हुआ। मैंने कई जगह आवेदन पत्र भेजे पर कहीं से संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। राजकीय नौकरी के लिये 25 वर्ष अन्तिम आयु है, जब कि मेरी अवस्था 24 वर्ष 8 माह हो चुकी थी। घर के सब लोग नाराज रहते थे। कोई 2 लोग तो अपमानजनक शब्द कह कर धिक्कार देते थे। इस बीच दो तीन बार आत्महत्या तक करने का विचार मन में आया पर माता की कृपा से धैर्य धारण करके डटा रहा और आपत्ति सहन करता रहा।

पूज्य आचार्य जी के आदेशानुसार मैं श्रद्धापूर्वक माता की उपासना में लगा रहा। आचार्य जी ने गायत्री उपासना चालू रखने व दूसरों को भी इस ओर अग्रसर करने को कहा था क्योंकि ब्राह्मण जीवन का यही सर्वश्रेष्ठ उपयोग है। मैं विशद गायत्री महायज्ञ का भी भागीदार बना। गायत्री माता की दया से मुझे नौकरी प्राप्त हुई। माता की कृपा से मैं घोर अन्धकार में से निकलकर प्रकाश में आ सका हूँ। माता की महान अनुकम्पा एवं आचार्य जी के आशीर्वाद से मेरा जीवन सुख-शान्तिमय बनेगा।

माता की कृपा योग क्षेम की व्यवस्था (श्री चुन्नालाल जे. राजा साणंद)

मैंने गायत्री उपासना सम्बन्धी (गायत्री महाविज्ञान) पुस्तकों में पढ़ा था कि गायत्री उपासना करने से गुरु विहीनों को सद्गुरु की प्राप्ति होती है। मैंने वही पढ़कर आध्यात्मिक पथ पर चलने के लिये सद्गुरु के आवश्यकता समझी और उन्हें पाने के लिये गायत्री उपासना प्रारम्भ की। दस हजार जप पूरा होते ही मुझे श्रीचरणपादुका जूना अखाड़ा में ब्रह्मचारी जी का दर्शन हुआ। उनसे बातें भी की किन्तु मैंने अपने सद्गुरु को पहिचान नहीं पाया। इसके 15 दिन उपरान्त ही स्वप्न में मुझे सद्गुरु का परिचय कराया गया और उस समय वे जहाँ थे उसका पूरा पता भी बताया गया। तदुपरांत मैंने स्वप्न निर्दिष्ट स्थान गीरनार पर्वत की तलहटी में जाकर उनका दर्शन किया। वहाँ गिरनार पर्वत की आनन्द गुहा में चार महीना तक उनके साथ रह कर सत्संग किया।

चार महीने के उपरान्त उन्होंने मुझे एक साँणद ग्राम के श्मशान घाट में रह कर साधना करने का आदेश दिया। वहाँ सिद्धनाथ महादेव का भी एक स्थान है। मुझे चिंता थी कि मेरे भोजन आदि के निर्वाह व्यय की व्यवस्था कैसे होगी?

इस स्थान में रह कर गुरु के आदेशानुसार मैं 24 लाख गायत्री का महा पुरश्चरण कर रहा हूँ। माता की कृपा से श्री नाथालाल−चुन्नालाल ने स्वेच्छा से मेरा भोजनादि भारा उठा लिया है। इसमें 35) रु. लगभग प्रतिमास खर्च पढ़ते हैं। एक वर्ष हुआ मैंने अन्नाहार परित्याग कर केवल फलाहार ही करता हूँ। एक और सज्जन प्रति दिन तीन बार मेरे आश्रम में आते हैं और मुझे अपनी आवश्यकता के सम्बन्ध में पूछते हैं। इस भाँति तो शायद ही कोई पुत्र अपने माता पिता की खोज खबर लेता हो।

माता की कृपा से मेरे पुत्र एवं पुत्रियों को भी जीविका सम्बन्धी सारी सुखद स्थितियाँ स्वतः ही प्राप्त हो गई हैं। वे सभी प्रसन्न और सुखी हैं। माता ने उन सबों की ओर से भी निश्चित कर मुझे साधना करने का दुर्लभ अवसर प्रदान किया है ऐसी परम सुखदा गायत्री माता के पावन चरणों में मैं बार बार नमस्कार करता हूँ।

निराशा में आशा का उदय (श्री. जगदेव प्रसाद तिवारी, पूरवटोला)

रोगों को भोगते—भोगते मैं जीवन से निराश

हो चुका था। सारे इलाज व्यर्थ गये। मैं दिन गिना करता था कि कब इस संसार से कूच करूंगा? न जाने कैसे मैं माता की शरण में आ पड़ा। ज्यों—ज्यों जप करता था त्यों—त्यों बिना औषधि के ही शरीर में सुधार होने लगा मुझ में जीने की आशा पुनः ललक उठी। उपासना में उत्साह और रुचि बढ़ गई। मन भी लगने लगा। आश्चर्य! ये वर्षा के रोग, जो दवाइयों से जरा भी टस से मस नहीं हो रहे थे—दिवसों में उठ गये।

आज मेरे मन मन्दिर में मातृ कृपा के अनेकों रत्न सुरक्षित भरे पड़े हैं। हमें उसे निकालने की इच्छा नहीं हो रही है, फिर भी जन हित के लिये एक दो घटनाएं लिख देना चाहता हूँ।

एक बार मेरी इच्छा एक दुकान खोलने की हुई। मेरे पास−बक्से में गिने−गिनाये थोड़े ही रुपये थे। उससे दुकान का कार्यारम्भ नहीं हो सकता था। सवेरे जब बक्स खोला तो आश्चर्य! इतने अधिक रुपये किसने हमारे ताला लगे बक्स में डाल दिये? आप सोच सकते हैं कि माता की कृपा का यह स्थूल प्रत्यक्ष कर कोई उपासक कितना उल्लास और उत्साह से भर उठेगा? रुपये इतने मिल गये जिससे दुकान आसानी से चल गई और अपना निर्वाह क्रम सुविधा पूर्वक चलने लगा।

भगवान करे, सभी उपासना करके माता की महती कृपा के भागीदार बन सकें।

आत्म बल की वृद्धि (श्री. भगवान दास सीतल, मथुरा)

गायत्री मंत्र से तो मैं बहुत पहले से परिचित था, पर उसके महान ज्ञान एवं रहस्य से अनभिज्ञ था। कुछ समय पूर्व से श्री आचार्य जी के संरक्षण में मुझे इसका समुचित ज्ञान लाभ प्राप्त हुआ। मैंने विशेष रूप से गायत्री जाप आरम्भ कर दिया। जब से मैंने विशेष साधना की है तब से अब तक मुझको बहुत सुख और शान्ति प्राप्त हुई है। जिस आर्थिक चिन्ता से हृदय नित्य प्रति दग्ध रहा करता था, उसमें महान शान्ति प्राप्ति है और आत्म बल बहुत उन्नति की ओर बढ़ता जा रहा है। भगवत् कृपा और निर्भयता का आनन्द अनुभव होता जा रहा है। इससे पूर्व भी जब जब मैंने गायत्री जप किया था, मुझे यही गुण और शक्तियाँ प्राप्त हुई थीं अतः मेरा यह अनुभव है कि निर्भयता और महान शान्ति एवं विवेक बुद्धि के लिये यह गायत्री उपासना एवं अद्वितीय महौषधि है।

नौकरी पर बहाल (श्री नाथूराम खरे, धगवाँ)

मेरा पुत्र विजय नारायण लेखपाल (पटवारी) के पद पर कार्य कर रहा था। किसी कारण उनके अफसर नाराज है गये और वह पदच्युत कर दिया गया। मैंने यह सारा संकट मथुरा आचार्य जी को लिखकर भेजा। उन्होंने विशेष रूप से गायत्री उपासना करने को कहा। तथा विजय दोनों ही माता की श्रद्धा पूर्वक उपासना में लग गये। नौकरी की बहाली के लिए अपील कर दी गई। माता की ऐसी कृपा हुई कि विजय पाल बिना किसी चार्ज के अपने पद पर बहाल कर दिया गया। हमारा समस्त परिवार माता की शरण में रहते हुए। आनन्दमय जीवन व्यतीत कर रहा है। हम सब के स्वभाव एवं व्यवहार में भी सात्विकता बढ़ रही है। बुरे विचारों से घृणा होने लगी है। माता की उपासना का ऐसा ही फल है।

गायत्री उपासना से जीविका के साधन मिले (श्री भोला राम जी, बुलढाणा)

भेरून्दा (मारवाड़) निवासी श्री मंगल दास जी का जीविका का कोई साधन नहीं था। आतुर−व्यथा से वे दस−पन्द्रह रुपये में भी नौकरी करने उतावले थे, पर अनेकों प्रयत्नों के यादें भी उन्हें कोई काम नहीं मिल सका। जीविका की तलाश में भटकते हुए एक बार वे बुलढाणा आये। वे मेरे सम्बन्धी थे। मैंने उनकी उपासना करने की सलाह दी, डूबने को तिनके का सहारा भी बहुत होता है। उन्होंने तुरन्त ही मेरी बात मानकर यहीं (बुलढाणा) में नौ दिन में 2400 गायत्री मन्त्र लिखने का संकल्प किया और उसमें निष्ठा पूर्वक जुट गये। लिखना समाप्त कर 240 आहुतियों का हवन किया। इसके उपरान्त अनायास बुलढाणा में ही 100) एक सौ रुपये मासिक, एक औषधि बेचने वाली दुकान में मुनीम का स्थान मिल गया। उन्होंने माता को सहस्रशः प्रणाम कर धन्यवाद दिया और आज भी नौकरी करते हुए माता के परम भक्त बने हुए हैं।

गायत्री द्वारा संकटों का निवारण (श्रीराम, कोलसा, आजमगढ़)

यद्यपि हमने बहुतों से सुना था कि गायत्री बड़ा शक्ति शाली मन्त्र है, पर उसे जीवन में प्रत्यक्ष देखने का अवसर नहीं आया था। पर आगामी वर्षों से एक गायत्री उपासक श्री मन्नू लाल जी के साथ रहकर जो कुछ देखा और अनुभव कर सका, वह इसलिये छापने की इच्छा हुई कि यह पढ़कर यदि एक भी व्यक्ति गायत्री माता की आश्रया ग्रहण कर अपना कल्याण कर लेंगे तो मैं अपने को कृतार्थ समझूँगा।

(1) दानापुर के श्री रामदास धोबी की पत्नी को प्रेत लगता था। एक बार मेरे सामने व्याकुल होते हुए एक आदमी मन्नू लाल जी को बुलाने आया। मैंने उस बुलाने वाले से उस की छटपटी का कारण पूछा—उसने बताया कि वर्षा से रामदास की पत्नी को प्रेत लग रहा है। जब वह आता है तो इसके हाथ पैर ऐंठ से जाते हैं, आँखें उलट जाती हैं तथा शरीर मुर्दे समान स्थिर और ठण्डा हो ताजा है। उत्सुकता वश मैं भी मन्नू लाल जी के साथ गया। इन्होंने जाकर गायत्री माता का ध्यान किया और उपरान्त प्रार्थना की कि हे माता। इस गरीब दुखियारी के कष्ट हर ले। मैं पन्द्रह दिन तक और इसके लिये 10 माला गायत्री महामन्त्र का जप और अन्त में उसका हवन करूंगा। उनकी प्रार्थना मात्र से वह औरत तुरत ही अपनी स्वाभाविक दशा को प्राप्त हो गई और फिर उसे प्रेतावेष नहीं आया।

(2) एक बार हमारे पटना निवासी मित्र के सुपुत्र को रात के एक बजे से अचानक ही धारा वाही वमन और दस्त प्रारम्भ हो गया। डाक्टर पर डाक्टर बुलाये गये पर सारी चिकित्सा व्यर्थ हो गयी। उसी दशा में, चिकित्सा करने पर भी वे पड़े रहे। सहसा किसी ने मन्नू लाल जी को बुलाने की सलाह दी। वे आये, गायत्री माता से प्रार्थना की, कुछ जप—हवन करने का संकल्प किया और एक पात्र में जल गायत्री मन्त्र से अभिमन्त्रित करके पिला दिया। अति आश्चर्यकारी ढंग से उनका दस्त और वमन बन्द हो गया और इसके उपरांत अत्यधिक उल्लास के साथ उनके लिये जप और यज्ञ सम्पन्न हुआ।


गायत्री उपासना से अनेक संकटों की निवृत्ति

भयानक संकटों से प्राण रक्षा (श्री प्रसादीलाल शर्मा, ‘दिनेश” कराहल)

मैं एक नितान्त गरीब ब्राह्मण का बालक हूँ। मेरे बचपन बड़े ही कष्ट से− कभी−कभी कई दिन तक भूखे और कभी अधपेट खाकर बीते हैं। पहले भी मैं अनियमित रूप से गायत्री जप किया करता था, किन्तु जब से किसी पवित्र प्रेरणा द्वारा मैं संयम−नियम सहित गायत्री उपासना करने लगा, तब से हमारे संकट क्रमशः हटते ही गये और आज 150) डेढ़ सौ रुपये मासिक हमारी आय है। पत्नी, सन्तान, भाई आदि सारा परिवार सुखी और स्वस्थ है। सभी शान्ति और प्रेम से जीवन अतिवाहित कर रहे हैं।

मैंने गायत्री महा विज्ञान में पढ़ा था:—

“भगवान की अनेक शक्ति यों में ‘गायत्री भी एक दिव्य शक्ति है, जिसकी उपासना करने से अनेक कठिन से कठिन संकट भी टल जाते हैं और अभीष्ट मनोरथों की प्राप्ति होती है। “आज अपने अनुभव के बल से मैं उपरोक्त वाक्यों की सत्यता की घोषणा करता हूँ कि वे अविकल−सम्पूर्ण सत्य हैं। मैं अभी तक अनेकों गायत्री अनुष्ठान कर चुका हूँ। अन्तर और बाहर के अनेकों अनुभव जीवन में रत्न की भाँति संरक्षित हैं। उनमें से दो−एक अनुभव, उपासकों के विश्वास को स्थिर करने की भावना से लिख रहा हूँ।

विक्रमी सम्वत् 2011 के चैत्र नवरात्रि में, मैं सवा लक्ष का अनुष्ठान सम्पूर्ण करके उठा ही था कि स्वप्न में माता ने मुझे आदेश दिया कि पुनः सवा लक्ष का अनुष्ठान गंगा के पुनीत−तटों पर जाकर करो। माता का आदेश पालन करने के लिये मैं चुपचाप श्रावण मास में, घर में किसी से बिना कुछ कहे ही हरिद्वार चला आया। यहाँ ब्रह्मकुण्ड पर कुछ समय ठहर कर अनुष्ठान प्रारम्भ कर दिया। कुछ दिन जप करने के उपरान्त मेरी इच्छा गंगा−पुलिन पर ही जप करते हुए आगे बढ़ने की हुई और बद्रीनारायण एवं केदारनाथ जप प्रति दिन गंगा किनारे ही पूरी करता था। वर्षा ऋतु थी, अतः वारिस के कारण कभी−कभी गिरिखण्ड, टूट कर लुढ़कते-2 नीचे आ गिरते थे, जिनके नीचे पिच कर अनेकों तीर्थ यात्री स्वर्ग प्रस्थान कर जाते थे। मैंने ऐसे होते हुए कई बार अपनी आँखों देखा, फिर भी माता के भरोसे साहस पूर्वक आगे बढ़ता ही रहा। देव प्रयाग में मुझे बलदेव प्रसाद जी तथा उनकी भगिनी का साथ मिल गया, जिससे मेरे संयम−नियम एवं जप में बड़ी सहायता मिली। केदार नाथ जाते हुए कुण्ड−चट्टी का एक पर्वत−खण्ड टूट कर गिर पड़ा। दोनों ओर के यात्री खड़े होकर यह भयंकर दृश्य देख रहे थे। खंड गिरने के बाद लघु प्रस्तर−खंड लुड़क−पुड़क कर बराबर गिरते जा रहे थे। रास्ता बन्द हो गया। सभी यात्री खड़े थे। मैंने माता के भरोसे गायत्री जप करते हुए पत्थरों के नीचे—टूटे हुए पहाड़ के बगल से चल दिया। सभी यात्री मुझे मना कर रहे, पर मुझे तो माता पर विश्वास था—सुरक्षित उस पार पहुंच गया। वहाँ सामान रख कर पुनः बलदेव जी तथा उनकी बहिन को लेने गया और उन्हें साथ लेकर आगे बढ़ा। वे दोनों भयभीत से मेरे पीछे आ रहे थे। सहसा ही एक बहुत बड़ा पत्थर ठीक मेरे शिर पर गिरा। दोनों ओर के यात्री यह देख कर एक बार ही हाहाकार कर उठे। मैं गायत्री जप करता हुआ निश्चिन्तता से ही चलता रहा। ठीक जिस समय प्रस्तर खंड मेरे शिर पर गिर मुझे चूर−चूर कर देते, उस क्षण मैं एक थोड़े से झुके प्रस्तर−खण्ड के नीचे आ गया। बड़ा पत्थर का टुकड़ा, उसी से आ टकराया और उछल कर गंगा की धारा में जा पड़ा। सारे यात्री हर्षित−विस्मित स्वर में नारायण,नारायण पुकार रहे थे।

इस भाँति सुरक्षा सहित तीनों व्यक्ति केदार नाथ का दर्शन कर वापस लौटे। गणेश चट्टी पर ठहरा हुआ था। प्रातः काल का समय था। काफी वर्षा हुई। सर्वत्र पानी ही पानी नजर आता था। वर्षा बंद होते ही हम तीनों उसी पानी में छप−छप करते हुए चले। कुछ दूर आने पर एक नाला ऊपर से गिरता हुआ मिला। हम लोग उसकी ओर बिना ध्यान दिये ही पूर्ववत् गति से आगे बढ़ते गये। सुभद्रा (बलदेव जी की बहन) इस समय आगे थी। नाला की धारा में पैर रखते ही वह गहरी जलधारा में गिर गयी एवं बहती हुई गंगा की तीव्र−प्रचण्ड धारा की ओर जाने लगी। मैं यह सोच रहा ही था कि उसका जीवन समाप्त हो चुका कि मैं भी एक प्रस्तरखंड से टकराकर उसी तीव्र नाले की धारा में जा गिरा। मेरा एक हाथ उसकी कमर जा पड़ा। मैंने उसकी साड़ी जोर से पकड़ ली। जल में अचानक धँसते ही जिस भाँति सुभद्रा माँ! माँ! कह कर चिल्लायी थी, मैं भी उसी भाँति सहसा माँ! माँ! कह कर पुकार उठा। सहसा ही लगा कि किसी ने हम दोनों को उठा कर, नाला के उस पार, गहरे जल से, छिछले जल में डाल दिया। सुभद्रा का भाई बलदेव जी तथा अन्य यात्री प्रसन्न और स्तम्भित थे। हम दोनों उठे और अगली चट्टी पर आकर ठहरे। उनके भाई एवं अन्य यात्री उस दिन नाले के इस पार आने का साहस नहीं कर सके। फिर दूसरे दिन हम सभी एक साथ मिले।

दूसरी चैत्र नवरात्रि में सरकारी कामों में बझे होने के कारण अनुष्ठान नहीं कर पाया—सोचा, पूर्णाहुति के दिन मैं भी गायत्री तपोभूमि मथुरा जा कर पूर्णाहुति कर आऊँगा। नवरात्रि का छठा दिवस था। उस दिन हम सभी कार्य के सिलसिले में एक धर्मशाला में ठहरे हुए थे। ब्राह्मी मुहूर्त्त की पवित्रता फैल रही थी, उसी समय अचानक ही मेरी नींद टूट गई। आँखें खोलकर देखा तो सामने एक परम स्वच्छ रूपवती कन्या खड़ी है। मेरे नेत्र खोलते ही वह कन्या अति माधुर्य भरी वाणी से कहने लगी—“पहले पुष्कर जाकर मेरे दर्शन कर आओ, तब गायत्री तपोभूमि जाना।” मैं कुछ पूछना ही चाहता था कि कन्या लुप्त हो गई। यह जाग्रत सपना की याद आज भी मेरे अन्तर में हलचल मचा जाता है।

मैंने उसी दिन अपने घर में पुष्कर जाने के लिये तार दिया। मेरी पत्नी तथा तीन मेरे अन्य साथी अपनी−अपनी पत्नी और बच्चों सहित वहीं मोटर पर आ गये। सबों के संग प्रसन्नता से पुष्कर की यात्रा की।

रास्ते में मेरे एक अबोध नाती को चेचक हो गया और एक ही दो दिन में उसने भयंकर रूप धारण कर लिया। यहाँ तक कि हम लोग उसके जीवन से निराश हो गये।

माता की कृपा से एक धर्मशाला में हमें ठहरने का स्थान मिल गया। वहाँ घर से भी अधिक सुविधा का स्थान था। हमने उस बच्चे को उसी दशा में छोड़कर माता के भरोसे वहाँ से पुष्कर क्षेत्र के लिये चल दिया। परिवार के कुछ लोगों को बच्चे के साथ छोड़ आये। नवरात्रि के दिन ही वहाँ जाकर स्नान, दर्शन, जप, हवन किया। रात में स्वप्न में मुझे कहा गया—बच्चे स्वस्थ हो गये, तुम निश्चिंत रहो। पुष्कर राज से लौटने पर मैंने धर्मशाला में आकर आश्चर्य से देखा−कल का मरणासन्न शिशु आज किलकारियाँ भर रहा है।

बोलिये गायत्री माता की जय।

सिंह के चंगुल से बचा [श्री॰ गोविन्द प्रसाद शर्मा शिवपुरी]

मैंने एक बार सवालक्ष तथा दूसरी बार चौबीस हजार के गायत्री अनुष्ठान किये हैं। इससे मुझे जो लाभ, और अनुभव हुए हैं, उसे मैं ठीक उसी प्रकार प्रकट करना नहीं चाहता, जिस प्रकार लोभी व्यक्ति अपना धन छिपाता है।

शिवपुरी के अनेक गायत्री उपासकों के जो लाभ, हमारी जानकारी में आये हैं, उन्हें लोकहित के लिये प्रगट कर रहा हूँ।

पं॰ रामदास शर्मा ( शिवपुरी ) अपने नव दाम्पत्य—जीवन में पारस्परिक−कलह और विग्रह से अत्यन्त ही व्यथित और दुःखी रहते थे। किसी सद्प्रेरणा से उन्होंने इसकी शान्ति के लिये गायत्री उपासना प्रारंभ कर दी। कुछ ही दिनों में दोनों के हृदय में रुका हुआ प्रणय—श्रोत फूट पड़ा और दो सरिताओं के संगम की भाँति वे एक घास बन कर बहने लगे। क्रोध और कलह के स्थान में सद्भावना, प्रेम और सेवा की वृत्ति संस्थापित हो गई। वे सीता राम के दाम्पत्य को आदर्श बना कर चल रहे हैं।

एक दिन वे सरकारी काम से एक गांव जा रहे थे। रास्ते में अचानक ही एक झाड़ी से शेर निकल कर, उनके सामने खड़े हो गये। उन्होंने समझ लिया, अब तो प्राण की रक्षा करना मेरी शक्ति से बाहर की बात है। ऐसा सोच वे उसी स्थान पर खड़े होकर गायत्री-जप, ग्राह-ग्रसित-गज की भावना में करने लगे। शेर भी कुछ देर तक सामने गुर्राता रहा- फिर सहसा ही उसने छलांग मारी और दूर के किसी झाड़ियों की आड़ में चला गया।

ऐसे संकट के अवसर पर‍ सिवाय माता के और कौन अपने पुत्र के प्राण बचा सकती है?

श्री माधो प्रसाद जी (शिवपुरी) संग्रहणी रोग से संक्रमित थे। अनेकों चिकित्सकों से अनेकों प्रकार की चिकित्सा करायी, पर रोग मुक्त नहीं हो सके। चिकित्सकों ने यह कह दिया यह असाध्य संग्रहणी है। यह इसके प्राण के संग ही जायगी। यह सुनते ही उनकी स्नेहप्लुता—पत्नी−श्री श्री लाड़ो देवी की आँखें वर्षा की धारा सी बह चली, पर मुख से ‘आह’ तक भी नहीं निकली। पता नहीं किस प्रेरणा से वह मन ही मन गायत्री माता की शरण गयी और उपासना में तल्लीन हो गयीं। सभी ने आश्चर्य से देखा कि—मृत्यु घोषणा के दूसरे ही दिन उसके दस्तों की संख्या में काफी कमी हो गयी। उस दिन से दशा सुधरती ही चली गई। उसके चिकित्सक आज भी पूछते रहते हैं कि किस औषधि से तुम्हारी असाध्य संग्रहणी आराम हो गयी? यह सुनकर उसकी पत्नी की आंखों में, माता के प्रति कृतज्ञता के आँसू उमड़ पड़ते हैं और टप—टप कर पृथ्वी के सूखे रज—कणों को गीली करने लगते हैं।

श्री भँवर सिंह की पत्नी गुलाब बाई (शिवपुरी) को अपने परिवार के अन्य लोगों से सदैव झगड़ा होता ही रहता था, इससे वह अपने जीवन से ही घबड़ा उठी थी। उन्होंने अपने आर्त्त-हृदय से गायत्री माता की प्रार्थना और जप करना शुरू किया, कुछ ही दिनों में वातावरण ऐसा बदल गया कि अब सबों को सबसे मिलकर ही रहने में रस आने लगा था। झगड़ा और कलह में अब किसी को रुचि ही नहीं रह गई।

श्री॰ देवी सिंह की पत्नी श्री॰ सावित्री बाई (शिवपुरी भूत बाधा से− कई वर्षों से कष्ट भोगती आ रही थी। एक दिन संयोग से इस सम्बन्ध में उसने बातें की। मैंने उसे विधिवत् गायत्री उपासना करने कहा। उस त्रस्त— भयभीत नारी ने उपासना प्रारम्भ कर दी और आज वह भूत बाधा से सदा के लिए मुक्त हो गयी हैं।

गायत्री माँ ने काल से बचाया। (श्री॰ बैजनाथ प्रसाद सौनकिया दिगौड़ा)

पूज्य आचार्य जी ने मुझे चैत्र नवरात्रि में गायत्री तपोभूमि मथुरा आने का अनुग्रह प्रसाद दिया था, पर मैं प्रारब्ध वश उत्पन्न परिस्थिति को लाँघ कर वहाँ नहीं जा सका। फिर भी गायत्री माता की अज्ञात प्रेरणा से हम चौदह उपासकों ने मिलकर दिगौड़ा के जगदम्बा मन्दिर में 24000 चौबीस हजार मन्त्र जपने का संकल्प प्रत्येक ने लिया और निष्ठा सहित जप करने लगे। प्रति दिन उस मन्दिर में बैठ कर अपना—अपना जप पूरा कर सभी घर जाने।

31 मार्च [1955] को जप करने के उपरान्त मैं घर आया तो दोपहर हो गयी थी। धूप तीखी हो रही थी। मैंने शीघ्रता के विचार से उस दिन केवल चावल पका लेने का ही निश्चय किया। रसोई घर में बैठ चूल्हा जलाया और चावल सिद्ध होने के बाद मैंने सोवा कि केवल भात [सिद्ध चावल] कैसे खाया जायगा, अतः अन्दर से थोड़ा गुड़ ले आना चाहिये। मेरे बगल में ही लालटेन रखा हुआ था। मैंने लैंप जलाया और उसे लेकर गुड़ लेने चला। उस समय मुझे इसकी जरा भी सुध नहीं थी कि यह दोपहर दिन है और इस समय लैम्प जला कर, पथ देख कर चलना और इसके प्रकार में आवश्यकता की वस्तुएं ढूंढ़ने की कोई जरूरत नहीं है। और आश्चर्य तो यह कि उस घर में जाते और आते समय मैंने अब तक कभी रात में भी प्रकाश का सहारा नहीं लिया और आज मैं अनजाने में ही दिन को लैम्प जला कर, जिस भाँति कोई रात में पय देख कर चलता है, उसी भाँति गुड़ लाने जा रहा था। जब गुड़ वाले घर के देहली पर गया तो देखा कि उसके प्रवेश द्वार पर एक सर्प बैठा हुआ जैसे किसी की प्रतीक्षा कर रहा हो। मैंने जैसे ही सर्प को घर के दरवाजे पर बैठा हुआ देखा कि मुझे अचानक ही दिन को लैम्प जलाना, रात की भाँति पथ देख—देख कर चलना और गायत्री माता की कृपा का एक साथ ही ज्ञान हुआ और सर्प देखकर भागने के स्थान मैं में ठठाकर हँस पड़ा और उल्लास में भर कर ताली पीटने लगा। सर्प महाराज पता नहीं किधर भाग गये।

उस दिन स्थानीय सभी उपासकों ने मिलकर एक सभा की आयोजना की और उस सभा में गायत्री माता का गुण−गान, उनकी महत्ता, उनके द्वारा होने वाले मानव जीवन के कल्याणों की विस्तृत चर्चा—भाषणादि हुए।

मैं भी यह सदैव सोचा करता हूँ कि यदि गायत्री माता की कृपा से मैंने दोपहर दिन में लैम्प जलाने की मूर्खता न की होती तो आज मैं अकाल मृत्यु ग्रस्त होकर किसी अन्य ही लोक का भोग कर रहा होता।

मृत्यु संकट से रक्षा (श्री मदन नरेश राम देव पूना)

मेरे गाँव से तीन कोश की दूरी पर श्री सुन्दरा देवी का स्थान है। यह हमारे प्रान्त का सुप्रसिद्ध स्थान है। मैं इसे गायत्री माता का ही रूप मानता हूँ। एक दिन मैंने दर्शन करने का निश्चय लिया। वर्षा ऋतु थी । जिस दिन प्रातः जाने का विचार निश्चित था उसके रात में ही काफी बारिश हुई थी, अतः हमारे साथ जाने वालों में से सभी ने, पहाड़ की चढ़ाई और फिसलन के भय से आना निश्चय बदल लिया। मैंने उस दिन दर्शन करने का अविचल संकल्प कर लिया था, अतः मैं माताजी जाने की सारी तैयारी करके माता के चरणों में प्रणाम कर गायत्री जपते हुए चल पड़ा। गाँव के अनेकों व्यक्ति यों ने वर्षा के समय जल की धारा में वह जाने तथा पहाड़ से फिसल गिरने का मय, जो कि वास्तविक ही था, मुझे दिखाया पर मैंने अपने मातृ दर्शन का निश्चय बदलना अनुचित समझा और प्रस्थान कर ही दिया। सभी खिसक गये पर मेरे साले (पत्नी के भाई) ने बड़े ही साहस और प्रेम से मेरा साथ दिया। तीन मील चलने से उपरान्त शेष तीन मील पहाड़ की ही चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। पहाड़ पर चढ़ने के प्रथम एक सरिता की धारा को पार करना पड़ता है, यह धारा कभी सूखती नहीं। इस नदी में वर्षा के जल से सहसा ही वेग से बाढ़ आती है और पार होने वालों को बहा ले जाती है। हम दोनों ने भोजनादि सामान, वस्त्र एवं पूजा स्वाध्याय की वस्तु सिर पर रखीं और नदी में उतर पड़े। नदी का लगभग अधिकाँश भाग पार कर चुके कि सहसा ही भयंकर वेग से नदी में बाढ़ आयी। हम दोनों माता का स्मरण करते हुए किसी भाँति किनारे पर आ गये। उलट कर देखा तो चार पुरुष उस भयंकर प्रवाह में बहते हुए जा रहे थे, जिसे अपना प्राण देकर भी बचाने का उपाय नहीं था।

माता की कृपा से इस मृत्यु धारा से हम दोनों ऊपर निकल आये। अब आगे दो पहाड़ों के मध्य से होकर जाने का पथ था। हम लोगों ने आगे चलने के लिये सोचा और पहाड़ के ऊपर दृष्टि दौड़ाई। देखा तुरत ही घनघोर बादलों से घिरकर पहाड़, रात से भी अधिक श्याम बन गया और मूसला धार होकर फिर आकाश स्वच्छ हो गया। कुछ ही देर फिर बादलों के दल, वही घनघोर कालिमा, वारिस और पुनः प्रकाश का आगमन। यह क्रम वहाँ निरन्तर चल रहा था। देख कर एक बार चित्त काँप उठा पर माता की सहायता की याद आते ही फिर साहस से भर उठा और आगे की ओर चल दिया। वारिस के कारण भयंकर आवाज के साथ पहाड़ के शिखरों से अनेकों धारा बहती चली जाती हैं। हमने ऐसी भयावह स्थिति देखने की तो कोई बात ही नहीं, कल्पना भी अपने जीवन में नहीं की थी। माता की कृपा की आशा से ही आगे बढ़ता जा रहा था। कुछ दूर जाने के बाद देखा कि आगे मन्दिर तक जाने के लिये अत्यधिक वर्षा के कारण कोई भी रास्ता नहीं रह गया था। फिर पीछे की ओर देखा तो अब लोटने का भी उपाय नहीं था। तब हम दोनों ने भी निश्चय किया कि यदि हमें मरना ही बदा है तो माता के दर्शनों के लिए चलते हुए ही हम प्रसन्न हृदय से मौत का भी आलिंगन कर लेंगे पर दर्शन किये बिना हर्गिज—हर्गिज नहीं लौटेंगे। गायत्री जप करते हुए हम रास्ते से 50 गज ऊपर पहाड़ पर चढ़ते हुये ही चलने लगे। कभी कभी ऊपर की जल धारा सीधे हमारे शिर पर गिरती थी, उस समय हृदय में माँ की याद लिये साहस पूर्वक पत्थर पकड़ते हुए हम पार कर जाते थे। माता की कृपा से उस समय हमारे हृदयों में इतना उत्साह उमड़ा पड़ता था कि इससे चौगुने संकट का भी हम लोग सामना करने में जरा भी नहीं घबराते—वरन् और भी हमारा साहस एवं उत्साह बढ़ जाता। सचमुच एक भयंकर संकट आकर उपस्थित ही हो गया। आगे लगभग 20 गज ऊपर से जल की मोटी धारा इतनी तेजी से गिरती थी, कि उसे सुरक्षा पूर्वक पार कर लेने में मानव शक्ति शायद ही सफल हो पाती। उसे भी पार करने में हम लोग जैसे बिना बल लगाये ही सुरक्षा सहित सफल हो गये। इसके आगे पुनः एक खतरा आया। एक धारा जिसकी चौड़ाई तो थोड़ी थी पर उसका वेग इतना तेज था कि हमारे पास जो लाठी थी उसे हम अपना सारा बल लगा कर भी, उस जल में स्थिर नहीं कर पाये। अब क्या हो? हम दोनों ने लाठी और सभी सामान खूब जोर से उस पार फेंक दिया और तैर कर सीधे उस पार लग गये। लगा जैसे गुलाब का पुष्प बहकर इस पार से उस पार चला गया हो।

अब एक मील की दूरी रह गयी थी। वारिस भी क्रमशः हल की होती जा रहा थी। कुछ दूर बढ़ने पर देखा कि एक भयंकर पहाड़ी सर्प दौड़ता हुआ हमारी ओर ही आ रहा था। हम लोग कहाँ भागते, खड़े रहे, वह दौड़ता आया हमें कुछ भी बिना क्षति पहुँचाये नजदीक से ही निकल गया। अब हम मन्दिर पहुँच चुके थे। मन्दिर के पुजारी जी ने हम लोगों के इस समय पहुँचने की बात असम्भव मान कर अत्यन्त आश्चर्य किया और हम लोगों को तब आश्चर्य हुआ जब कि हमने मन्दिर पहुँच कर देखा कि सिवाय ऊपरी वस्त्र के, उसमें बन्धी पूजा सामग्री, भोजन सामान (आटा आदि) तथा पुस्तकें, सम्पूर्ण की सम्पूर्ण सूखी ही थीं।

वर्षा छूट जाने के कारण हम निर्विघ्न रूपेण घर वापस लौटे।

स्मरण मात्र से प्राण रक्षा (अम्बादास पन्ढरीसा. भावसार)

शुक्रवार ता॰ 8−4−55 के दोपहर की घटना है। “श्री गायत्री आश्रम, खण्डवा” का साइनबोर्ड फ्रेम निर्माण कर्त्ता की दुकान से लाने जा रहा था। दुकान समीप थी। मैं गायत्री स्मरण में आनन्द मग्न होता सा जा रहा था। वहाँ, एक मदोन्मत्त सांड़, जा बिना अपराध के ही सामने वालों को अपनी झोंक में, सींग से उठा कर फेंक देने का अभ्यासी था, मेरे पीछे जोरों से दौड़ता हुआ आया और मेरी पीठ में सींग लगाया, किन्तु न जाने माँ गायत्री ने उसके अन्तर में कौन सी प्रेरणा दी कि मेरे शरीर का स्पर्श करते ही वह पीछे हट गया और मुझे छोड़, मेरी बगल से आगे आकर एक साइकिल वाले को जोरों से ठोकर दे दिया। उस बेचारे को चोट तो लगी किंतु कोई विशेष खतरा नहीं हुआ।

यह घटना क्षण मात्र में ही हो गयी। मैं सोचता हूँ, यदि उस समय मैं गायत्री का स्मरण नहीं कर रहा होता, तो वह उन्मत्त सांड़, मेरी कचूमर निकाल देता और मैं किसी अन्य ही लोक का वासी हो गया होता।

आज माता के प्रति मेरा हृदय कृतज्ञता से भरा हुआ है, सोचता हूँ मैं अब इस जीवन को गायत्री माता की सेवा में समर्पित कर सकूँ तो मेरे और शायद सबों के लिये बड़ा कल्याणकारी सिद्ध हो।

नास्तिक से आस्तिक बन गया (श्री सदा शिव कृष्ण बोंडखे, खाम गाँव)

मैंने अपने इतने दिन के जीवन में, कभी देवी−देवताओं तथा भगवान का अस्तित्व स्वीकार नहीं किया। मेरे पेट में रोगों ने अपना स्थायी निवास बना लिया था। उसने अपने बाहुबल से अनेकों चिकित्सकों की औषधि सेना का विनाश कर, अपना घर आबाद रक्खा था। मैं इन संघर्षों से ऊब गया था। चुपचाप रोग देव का कटु तीव्र दंशन सह लिया करता। मेरी पत्नी ने बड़े ही स्नेह स्निग्ध−स्वर में कहा—भगवदाराधन करो, तभी तुम्हारे रोग दूर होंगे। मैंने उसे हँसी में उड़ा दिया। साथियों ने समझाया, तो उसका उपहास किया।

एकबार हमारे यहाँ के सेक्रेट्री महोदय श्री गायत्री तपोभूमि मथुरा से हो आये और यहाँ आकर गायत्री मन्त्र की बड़ी 2 महिमा हमें बतायी। मैंने उसका तीव्र प्रतिवाद किया। इस पर उन्होंने कहा—कि तुम इसका प्रयोग करके परीक्षण कर सकते हो। इस वाणी में उनकी सारी श्रद्धा−शक्ति केन्द्रित थी। मैंने भी इस बार, जाँच के तौर पर ही सही, उसे स्वीकार किया और नित्य−नियमित जप करने लगा। मैं स्वयं विस्मित था कि कैसे और क्यों स्वयं ही मेरे पेट के रोग एवं आर्थिक तथा अन्य समस्यायें स्वतः ही सुलझने लगीं थीं, जिन्हें मैं अपना सारी बुद्धि एवं अन्य शक्ति लगा कर भी सुलभ न कर पाया था?

आज मैं सबों का उपहास सह कर भी कट्टर आस्तिक हूँ और दुनिया के सभी नास्तिकों को चुनौती देता हूँ कि आप सभी गायत्री महामंत्र का परीक्षण करें।

रोग, किले को छोड़ कर भाग गया है। आज वहाँ गायत्री माता की कृपा रूप स्वास्थ्य देव स्वयं विराजमान हैं।

श्री गणपत विठोवा, खामगाँव के परिवार के एक न एक व्यक्ति सदा किसी न किसी रोग से ग्रसित ही रहते। कितने रुपये खर्च किये गये, कर इस क्रम में कोई अन्तर न आया। यहाँ तक कि आर्थिक दशा भी अब खर्च करने योग्य नहीं रही। इन्होंने भी उसी महामन्त्री की प्रेरणा से गायत्री उपासना प्रारम्भ की और कुछ ही दिनों में पारिवारिक रोगों के साथ आर्थिक कष्टों से भी छुटकारा पा गये।

श्री शुकदेव भाव जी होनाले, खाम गाँव के बाहु की एक पसली में भयंकर चमक, पीड़ित करता रहता था। पुष्कर औषधियों से उसका उपचार तीन चार वर्षं तक होता रहा, पर लाभ नहीं। उक्त उच्च अधिकारी के कहने से इन्होंने भी गायत्री उपासना प्रारम्भ कर दी और आज स्वस्थ होकर गायत्री माता की महत्ता का गुण गान कर रहे हैं।

प्रमेह दूर हुआ (ले.−श्री राम सूचित वर्मा, सिकोहना, बाराबंकी)

मैंने बचपन में कुचाल तथा अनुचित आहार−बिहार से अपनी जवानी की तेजस्विता खो दिया। तरुणाई की मस्ती, शक्तिमत्ता एवं स्वाभाविक उल्लास मेरे लिये कल्पना की वस्तु ही रह गई।

प्रमेह ने असमय ही मेरे शरीर को जीर्ण−शीर्ण कर दिया। मैंने इस महारोग से छुटकारा पाने के लिये अनेकों वैद्यों और डाक्टरों की शरण ली। सभी ने आश्वासन दिया−−विश्वास दिलाया, पर चिकित्सा से रोग घटने के स्थान में बढ़ता ही चला गया। पत्र−पत्रिका के विज्ञापनों को देख उस औषधियों को मंगा कर भी प्रयोग किया, पर कभी लाभ के दर्शन नहीं हुए।

एक दिन हमारे मित्र हरि प्रसाद वर्मा मिले। उन्हें मेरी दशा देख, सुन और जान कर बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। उन्होंने प्रेम पूर्वक मुझे समझाकर 24000 गायत्री उपासना करने के लिये प्रोत्साहित किया। मरता क्या न करता? मैं तो सचमुच अपने जीवन की आशा दिनों−दिन खोता जा रहा था। सारे विधि−विधानों के पालन सहित मैं गायत्री अनुष्ठान में लग गया। कुछ ही दिनों में मेरे अन्तर में अद्भुत साहस और शक्ति का संचार हुआ। लगा कोई दिव्य शक्ति मुझमें वर्षा की सरिता की तरह बढ़ती ही जा रही है। मेरा रोग धीरे−धीरे नष्ट होने लगा। उपासना में आकर्षण भी बढ़ता गया और आज मैं माता की कृपा से पूर्ण आरोग्य लाभ कर जवानी का—का अनुभव करने लगा हूँ। ऐसी कृपा माता के सिवाय और कौन कर सकती है?

मेरा पुत्र, जो अभी तीन वर्ष 6 महीने का है, बचपन से ही रोगी, पिलपिला, कभी पेट फूलना, कभी बुखार आना, लगा ही रहता था। मैंने उसके स्वास्थ्य की कामना से भी गायत्री उपासना की और माता की कृपा उस शिशु के शरीर में निर्मल−सबल स्वास्थ्य बनकर खेल रही है। हम उसे देख माता के करुणा−वात्सल्य की याद कर लिया करते हैं।

भूत बाधा से छुटकारा (श्री शिवशंकर शर्मा, शिवपुरी.)

लगभग दो वर्ष हुए, मुझे अखण्ड ज्योति पढ़ने को मिली। उससे प्रभावित होकर मैं अखण्ड ज्योति का ग्राहक बना। आचार्य जी से अपने जीवन को सफल बनाने का मार्ग पूछा। उन्होंने श्रद्धापूर्वक गायत्री उपासना करने का आदेश दिया। मैंने तदनुसार माता की उपासना आरम्भ कर दी। माता की कृपा से मेरे स्वभाव एवं विचारों में सात्त्विकता का संचार हुआ और मन में अत्यधिक शाँति उत्पन्न हुई छवढ़ा निवासी श्री मेरुलाल जी की पत्नी गंगाबाई भूत बाधा सताया करती थी। उसने मुझसे कहा। मैंने आचार्य जी का नाम ले गायत्री मन्त्र से उसे झाड़ा लगाया और मन्त्र से अभिमन्त्रित जल पिलाया। इस प्रकार गायत्री माता की महान अनुकम्पा से उसको भूत बाधा से छुटकारा मिल गया। एक दिन अचानक श्री कल्यान प्रसाद की धर्म पत्नी फूल कुँवारी को भूत का सामना करना पड़, जिससे वह बेहोश हो गई। मैं पहुँचा और उसको गायत्री मन्त्र− अभिमन्त्रित जल पिलाया एवं उसी से झाड़ा लगाया। कुछ मिनटों के बाद वह पूर्ण स्वस्थ हो गई। माता की उपासना का ऐसा ही फल होता है। मेरा विश्वास दिन पर दिन दृढ़ हो रहा है। आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से भी मेरी उन्नति हुई है। विवेक बुद्धि का विकास हुआ है।


गायत्री द्वारा सुख समृद्धि और सफलता


गायत्री उपासना के आध्यात्मिक अनुभव

चरित्र में भारी परिवर्तन (श्री चिरंजीलाल—ऐरिनपुरा रोड)

मेरी छः माह की उम्र में ही मेरे पूज्य पिता जी का स्वर्गवास हो गया। जब मैं आठ वर्ष का हुआ तो मेरे ताऊजी ने मुझे स्कूल में भर्ती करा दिया। कुसंगति अथवा प्रारब्ध वश मेरा मन पढ़ने में नहीं लगा। ताऊजी ने बहुत प्रयत्न किये पर सब विफल रहे। फिर भी उनके प्रेमपूर्वक कठिन प्रयत्न से मैं पाँच कक्षा हिन्दी तक ही पढ़ सका। कुबुद्धि जाग्रत हुई और मैं घर छोड़ कर भाग गया। इस प्रकार दो तीन बार घर आया और फिर भाग गया। इधर−उधर भटकता फिरा, कई बुरे व्यसन भी लग गये। मेरा जीवन यों ही सब बरबाद हो रहा था। ताऊ जी मेरे कारनामों से बहुत दुखी थे और उन्होंने प्रयत्न किया कि मैं कोई काम ही सीख लूँ, परन्तु मैं तो ठेढ व्यक्ति ठहरा। पन्द्रह वर्ष की अवस्था में मेरा यज्ञोपवीत संस्कार हो गया। हमारे ब्राह्मण कुल के अनुसार नौ वर्ष की अवस्था में ही यज्ञोपवीत हो जाना चाहिये था। यज्ञोपवीत संस्कार के समय मेरे मामा जी ने पवित्र गायत्री मन्त्र की दीक्षा दी थी। मैं उस समय गायत्री मन्त्र की व्याख्या, मंत्र का महत्त्व, मंत्र की शक्ति व जप विधि आदि किसी से परिचित नहीं था। मेरे मामा जी ने इतना अवश्य कहा था कि अब यज्ञोपवीत हो जाने पर कम से कम तीन माला मुझे नित्य जपना चाहिये पर में मूढ़ ऐसा करने में असफल रहा। बिना किसी नियम के एक दो माला कभी कभी जप लेता था, क्योंकि मामा जी ने कहा था कि गायत्री मंत्र ही सबसे बड़ा माना गया है।

जोधपुर में मैं ताऊजी के साथ जिस मकान में रहता था, उसके मालिक जवाई बाँध ऐरिनपुरा रोड पर, कार्य करते थे। माता गायत्री की कृपा हुई। मकान मालिक का ध्यान मेरी ओर आकर्षित हुआ और उनके प्रयत्न से मुझे राजकीय मोटर पर 35) मासिक की नौकरी मिल गई। कुछ दिन बाद मेरी माता जी भी मेरे पास आ गई। दैवयोग वे बीमार पड़ गई, खर्च बढ़ गया और मैं कर्जदार बन गया।

भाग्य का उदय, समय का परिवर्तन, मुझे एक पुरानी “अखण्ड ज्योति” पत्रिका कहीं से प्राप्त हो गई। मैंने उसे प्रेम पूर्वक आद्योपान्त पढ़ा। मैंने परमपूज्य आचार्य जी को अपनी सारी जीवन कथा लिखी और उन्होंने गायत्री उपासना का आदेश दिया। मैंने विशेष रूप से साधना आरम्भ कर दी। इसके फल स्वरूप मैंने माता जी की सेवा करना व पूनम का व्रत भी गायत्री उपासना के साथ साथ आरम्भ कर दिया। कुछ ही समय बाद मुझे 60) मासिक वेतन पर पेंटर की जगह मिल गई। दो माह बाद राजकीय पदाधिकारियों द्वारा ट्रेसर के पद पर नियुक्त कर दिया गया और वेतन में सन्तोषजनक वृद्धि हुई अब वेतन से हमारा खर्च आराम से चलने लगा। और कर्ज भी चुक गया। मेरा जीवन सुख से व्यतीत हो रहा है। मेरा यह दृढ़ विश्वास हो गया है कि गायत्री उपासना किसी भी रूप से की जाये, वह न कोई अनिष्ट करती है और न कभी निष्फल ही जाती है।

माता की कृपा से दो अनुभव

(गत वर्ष से ही में प्रतिदिन 1000 गायत्री मन्त्र जप नियमित रूप से करते रहने का प्रयत्न करता आ रहा हूँ पर ऐसा नहीं कि इस प्रयत्न में कभी त्रुटि नहीं आयी। इसमें कई कई दिन खाड़े (नागा) जरूर होते हैं और उसका पश्चाताप भी जरूर होता है। वर्ष भर में दो हवन हुए हैं, एक चैत्र रामनवमी को और दूसरा आश्विन (दुर्गा पूजन) की नवरात्रि में, दोनों नवरात्रियों दो लघु अनुष्ठान भी किये गये है।

गत वर्ष में गुरुदेव के आज्ञानुसार 28 दिन का “उप पोषण” किया था, जिसमें फलाहार में केवल आधा पाव दूध और दो मुसम्बी रोज लेता था, इसके अलावा और कुछ भी नहीं। इन 28 दिनों में निष्काम भाव से सवालक्ष के अनुष्ठान का भी संकल्प सम्मिलित था। चूँकि यह आयोजन सार्वजनिक था, इसलिये इस के सारे कार्य पूर्ण शास्त्रोक्त नियमों सहित तथा सर्वथा निष्काम होकर ही किया गया था।

चौथे दिन मेरी हालत बड़ी ही दयनीय हो गयी। आगे उपवास करने का साहस और सहन शक्ति दोनों नहीं रहे। अब तो आगे मैं उपवास ही कर सकता था और न उसे छोड़ने की शक्ति ही मुझ में थी। पांचवें दिन मुझ में जरा भी शक्ति बोध नहीं होती थी। ज्यों त्यों कर दिवस कटा। रात में गायत्री माता का स्मरण करता सो गया। ब्राह्ममुहूर्त था। मैं स्वप्न या सत्य ही देख रहा था—पूजन पीठ पर, पुष्पों का हार धारण किये हमारे गुरुदेव ध्यान मग्न से बैठे है, और मुझे आशीर्वाद देते हुए कह रहे हैं, हिम्मत नहीं हारना—मैं सदैव तुम्हारे पीछे हूँ। मैंने अपने को उनके चरणों में समर्पित कर दिया। नींद टूटने पर मैंने अपने में, अत्याधिक स्फूर्ति एवं उपवास जन्य अशक्ति का अभाव पाया। इसके उपरान्त शेष तेईस दिन, उपवास में कैसा कष्ट होता है, इसका जरा सा भान भी मुझे नहीं हुआ, एक सबल स्वस्थ पुरुष की भाँति सारा क्रम निभाता रहा।

उपवास की बीसवीं रात में घनीभूत कालिमा की छोटी छोटी बिन्दी मेरे सामने आकर चारों ओर फिरने लगीं। इक्कीसवें दिन उस में भिन्न−भिन्न रंगों की ज्योतियाँ विकीर्णित होने लगीं और चौबीसवें दिन दो बजे रात में, माता की छवि से पीत रश्मियों की धारा साक्षात् रूप से निकल कर मेरी ओर आने लगीं। मधुरता के आधिक्य से मैंने आंखें बन्द कर लीं, उसके उपरान्त ज्योतिबिन्दु से माता की साक्षात् प्रतिमा को निकलते देखा, जो सम्पूर्णतया चेतना से भरी हुई थी- वे मुझे आशीर्वाद दे रही थीं- मैं अपने शारीरिक मान से ऊपर उठ गया था। वह मेरे जीवन की अपूर्व आनंदमयी अवर्णनीय स्थिति थी।

सत्यनिष्ठा में प्रवृत्ति (श्रीमती फूलवती शर्मा देहरादून)

गायत्री को वेदमाता कहा जाता है। इससे लगता है कि वेदों में वर्णित सारे ज्ञान इसमें अवश्य ही केन्द्रित हैं।

वैदिक काल में हमारे सभी ऋषि यज्ञ परायण थे, इससे बोध होता है यज्ञ प्रक्रिया की सारी विधियां, गायत्री माता की शुभ प्रेरणा का वरदान स्वरूप है। इसी से हमारे वेद शास्त्रों और पुराणों में यज्ञों की महिमा सर्वत्र दर्शन होता है। इसीलिये गायत्री या किसी भी मन्त्रों का अनुष्ठान केवल जप करने से कभी पूरा नहीं होता। यज्ञ ही एकमात्र उस की परिपूर्ति के साधन हैं। यज्ञ द्वारा प्राचीन काल से लेकर आज तक अनेकों ने अपने मनोरथ सफल कर पाये हैं, इसी से यज्ञ का कामधेनुत्व आज भी सुप्रसिद्ध है। मैंने श्री गायत्री अनुष्ठान द्वारा किस भांति अपने हृदय में “सत्य भाषण” को प्रतिष्ठित कर शान्ति पायी है, उसे ही सुनाकर गायत्री माता की स्नेहिल करुणा का परिचय देना चाहती हूं।

अपने अतीत जीवन में, अज्ञानता वश मैं सत्य को छोड़कर असत्य से ही अधिक नाता जोड़ते रही थी। मेरे परिवार में प्रायः सभी, क्रोध पर अपना अधिकार जमाने में असमर्थ थे, इसीलिये जब कभी मुझ से कोई गलती हो जाती, मैं भयभीत सी उसे छिपाने के प्रयत्न में असत्याचरण के द्वारा अपनी रक्षा करती, पर झूठ बोलने के पश्चात् अन्तर में बड़ी पीड़ा होती। माता की कृपा से एक दिन अचानक या बिना किसी प्रयत्न के ही मुझे एक ऐसी पुस्तक मिल गयी जिसमें गायत्री मन्त्रानुष्ठान द्वारा होने वाले लाभों को बड़े विस्तार से वर्णन किया गया था, मैं पढ़कर बड़ी प्रभावित हुई और अपनी समझ के अनुसार मैंने उसका अनुष्ठान करना प्रारम्भ किया। ज्यों ज्यों समय बीतते गये, मेरे अन्तर में सत्य धारण करने की शक्ति भी बढ़ती गयी। अब तो यहाँ तक हो गया है कि सत्य बोलने के कारण मेरे ऊपर कितने भी संकट क्यों न आवे-उसकी बिना परवाह किये मैं सत्य बोलती हूँ। हानि-लाभ की चिन्ता से ऊपर उठ कर सत्य बोलने का जैसे मेरा स्वभाव ही हो गया है।

गायत्री माता की शरण लेने से मुझे जो लाभ हुए हैं, उस अनुभव के आधार पर मैं अखण्ड ज्योति पढ़ने−सुनने वाली तथा अन्य बहनों से बल-पूर्वक प्रार्थना करती हूँ कि आप सभी गायत्री मन्त्र का सहारा लेकर अपने जीवन के असत्यों, दुःख और पीड़ाओं से अपना उद्धार पायें। जिस भाँति प्राण के सहारे ही शरीर के सभी अंग जीवित और क्रियाशील हैं, उसी भाँति गायत्री शक्ति ही मनुष्यों की साधना के अनुसार स्वर्ग और मुक्ति को देने वाली हैं। गायत्री मन्त्र, ईश्वर प्राप्ति का अचूक साधन है, भक्ति प्रदाता और जन−मन निर्मल कर्त्ता है। माताओं को स्वयं इसकी उपासना करने हुए शैशव काल से ही बच्चों को इसमें प्रवृत्त करना चाहिये। मैं तो यहाँ तक कहना चाहती हूँ कि यदि भारत की प्रत्येक नर−नारी इस परमोद्वारक मन्त्र को धारण कर ले, तो देश का उद्धार हो जाय।

दिव्य व्यक्तित्व का क्रम विकास (श्री मु॰ ग॰ पाटील, खाभगाँव)

मेरे विचार बुरे थे−सपने भी इतने बुरे आते थे कि जिसकी हद नहीं। किसी प्रेरणा ने गायत्री उपासना में प्रवृत्त किया। फिर देखा वे सारे बुरे सपने क्रमशः लुप्त होते गये और उसके स्थान पर ज्योतिर्मय स्वप्न अवतरित होने लगे।

ध्यानावस्था में, प्रकाशपुञ्ज के मध्य दिव्य आलोक पूर्ण ॐ का आविर्भाव हुआ और मैं न जाने कितनी देर तक मुग्ध भाव से, सुस्पष्ट रूपेण देखता रहा। उसी दिन से मेरे अन्तर हृदय में असीम शान्ति का अवतरण हुआ, जो कि आज भी क्रमशः बढ़ती ही जा रही है।

कई बार मैं अपने को स्वप्न में एक दिव्य देवी, की उपासना करते हुए पाता हूँ। कभी गायत्री माता, दिव्य सूर्य बनकर, जिसकी किरणें अत्यन्त सौम्य, सुखद स्पर्श वाली हैं—सपने में मेरे सामने आ जाती हैं और अपने मधुस्रावी रश्मिधारा से मेरे शरीर और प्राण के कण−कण को सींच देती है, मैं भीग उठता हूँ और मेरे शरीर से भी किरणें विकीर्णित होने लगती हैं। शरीर शिथिल हो जाते हैं एवं अवर्णनीय आनन्द की अनुभूति होती हैं। इस आनन्द का प्रभाव ऐसा चिरन्तन है कि, किसी दुःखद स्थिति में पड़ने पर भी मुझे आनन्द का वेग ऊपर ही उठाये रखता है। दुःख की पीड़ा जरा भी अनुभूत नहीं होती।

भौतिक दृष्टि से भी मेरी अभ्युन्नति हुई। साम्पत्तिक दुरवस्था का प्रवेश मेरे जीवन में कभी नहीं हो पाया।

मुझे जटिल खाँसी रोग था। मैंने कितने ही डाक्टरों से इसके अनेक इलाज किये, किन्तु इससे पिण्ड न छूटा। खाँसी क्रानिक एवं दुःसाध्य हो गयी। डाक्टरों ने असाध्य रोग घोषित कर पराजय स्वीकार कर लिया। माता की कृपा से यह रोग कैसे मूल से ही नष्ट हो गया−इसका मुझे भी पता नहीं चला। आज मैं पूर्ण स्वस्थ हूँ।

पहले मेरी बात की ओर कोई ध्यान नहीं देता था, पर आज जैसे मैं चुम्बक बनता जा रहा हूँ। सभी मेरी बात ध्यान से सुनते हैं, उसे सम्मान देते हैं, मुझ से मिलकर प्रसन्नता लाभ करते हैं−पुनः मिलने की उत्कण्ठा अनुभव करते हैं। मानसिक विश्वास और शारीरिक ओज दिनानुदिन बढ़ता सा अनुभव होता है। मुझ में व्यक्तिमत्व का परिविकास हो रहा है। सभी माता की कृपा से ही साधित हो रहे हैं।

जीविका का स्थिर आधार मिला

श्री सदाशिव किसन बोडखे खामगाँव घोर नास्तिक थे। जप−उपासना को, मानव−बुद्धि की अन्धता और मूढ़ता समझते थे। जब उनके ऊपर जीविका समाधान का भार आया तो वे भटकने लगे एक काम आता, फिर हाथ से निकल जाता। उनके सारे पुरुषार्थ और बुद्धिवादिता उसे स्थिर कर पाने में सदा असफल रहतीं। बार−बार असफल होकर वे निराशा के अन्धकार में हतोत्साह होकर पड़ा रहने लगे।

किसी अज्ञात प्रेरणा ने उनके अन्तर को उकसाया “क्यों नहीं एकबार आध्यात्मिक पथ का भी अवलम्बन करके उसकी सचाई−झुठाई अपने निजी अनुभव से जान लें” और वे गायत्री उपासना में लग गये। उपासना करते ही उनमें एकाएक श्रद्धा उमड़ पड़ी; जैसे बहुत दिन का जल से भरा पूरा बाँध अचानक ही टूट पड़ा हो।

बहुत दिनों से बिना रोजगार धन्धे के बेकार फिर रहे हैं। ऐसा बेकार और आजीविका विहीन व्यक्ति कितना परेशान होता है, इसे भुक्त भोगी ही जानते हैं। गायत्री उपासना के फलस्वरूप बेकारी दूर हुई उन्हें स्थायी नौकरी मिल गयी है। निराशा के बादल कब नष्ट हो गये या उड़ गये, पता नहीं। आज उनमें अद्भुत उत्साह है, अपार प्रसन्नता। माता की कृपा से सर्वत्र सुविधा−ही सुविधा दीख पड़ती है।

योगीराज द्वारा स्वप्नादेश (पुरुषोत्तम आत्मारामजी साखरे, जासलपुर)

1955 की गुरुपूर्णिमा की सुपुनीत रात्रि। ब्राह्ममुहूर्त का आरम्भ हो चला था और मैं स्वप्न देख रहा था—एक योगीराज एक हाथ से स्वादेंद्रिय (जिह्वा) और दूसरे हाथ से शिश्नेन्द्रिय पकड़े मेरे सामने खड़े हैं और मुझसे पूछते हैं—क्या इसका अर्थ तुम समझते हो? उत्तर देने के प्रथम ही मेरी नीन्द टूट गयी।

प्रातः ही सौभाग्य से उस योगीराज का दर्शन मिला। उन्होंने बिना पूछे ही मुझसे कहा—वत्स! जब तक तुम स्वप्न निर्देशित दोनों प्रधान इन्द्रिय पर काबू नहीं पा लेते तब तक इष्ट की प्राप्ति असम्भव है। एक और अपेक्षा कृत सूक्ष्म चाहना है—मान−प्रतिष्ठा। इस चाहना को भी छोड़ना अनिवार्य है।

एक दिन वे मधुर स्वर लहरी में गायत्री हवन कर रहे थे। मैं भी सौभाग्य वश उपस्थिति हुआ यज्ञ से उठते ही उन्होंने मुझे गायत्री उपासना विधि बताई और कहा इससे तुम्हारे सारे संकट दूर हो जायेंगे।

आज हमारे जीवन में गायत्री उपासना के लाभ नित प्रति प्रत्यक्ष हो रहे हैं।

गायत्री उपासना के कुछ अनुभव (दिव्य ज्याति ए॰ जोशी, मालद)

मेरी आर्थिक दशा बड़ी खराब थी। कोई उपाय नजर नहीं आता था। लाचार होकर मैंने गायत्री माता से प्रार्थना की और अचानक एक दिन ऐसा हुआ कि एक सज्जन व्यक्ति आग्रह पूर्वक मुझे बुला कर ले गये और मेरी रुचि के अनुकूल अपने काम पर नियुक्त कर दिया। वेतन भी इतना मिलता है, कि मैं परिवार सहित भली भाँति निर्वाह कर कुछ बचा भी लेता हूँ। ऐसी दयामयी माता की जय हो।

श्रीकनुभाई, त्रिभुवनदास, एक वर्ष से बेकार बैठे समय गँवा रहे थे। गायत्री उपासना से उन्हें भी एक अच्छी और स्थायी नौकरी मिल गयी।

श्री हीरालाल लोहाण ने गायत्री उपासना के द्वारा ही नौकरी प्राप्त कर अपनी जीविका का भार सम्भाल पाया है।

श्री रसिकलालजी का लड़का बड़ा दुराचारी था। उसके पिता ने उसकी प्रवृत्ति बदलने की कामना से गायत्री साधना आरम्भ की। फलतः कुछ दिनों के उपरान्त लड़के ने स्वतः ही आकर पिता से माफी माँगी और अब पिता के साथ मिलकर सदाचार सहित अपनी जीविका का उपार्जन करता है।

श्री सविता बहन के आधे अंग में लकवा (अर्द्धांग-बात) हो गया था। चिकित्सा से लाभ नहीं होते देख, उसने गायत्री उपासना प्रारम्भ करदी, कुछ दिन उपासना के उपरान्त अब उस अंग से काम करने लग गयी हैं। धीरे−धीरे वह अंग अपनी पूर्व दशा में आता जा रहा है।

मेरे पड़ोस के एक व्यक्ति की पत्नी उससे असन्तुष्ट होकर अपने मायके में ही रहती थी। ये कई बार, आदर−ग्रह सहित उसे लिवाने गये, पर वह नहीं आयी। मेरे परामर्श से उसने खुशामद करना छोड़ कर गायत्री माता की उपासना प्रारम्भ कर दी और एक दिन गायत्री माता की सद् प्रेरणा से वह स्वतः ही नैहर छोड़कर चली आयी और यहाँ आकर सुस्थिर हो गयी। अब उनका दाम्पत्य−जीवन बड़ा ही मधुर और आनन्दमय हो गया है। दोनों परस्पर एक दूसरे को सुखी बनाने के लिये आतुर रहते हैं। माता की कृपा के सिवाय इस कलहपूर्ण दाम्पत्य−जीवन को सुधार कर रसमय बनाने की शक्ति और किसमें है?

निराश माता−पिता को सान्त्वना (डा॰ जी॰ के शर्मा, करेंजा)

मेरे जीवन में सबसे प्रथम, ‘अखण्ड−ज्योति’ रूपी गुरुदेव ने आकर्षित कर मुझे गायत्री उपासना में प्रवृत्त कर दिया पर इसे सींचकर पुष्ट करने में जिस प्रत्यक्ष चमत्कार का हाथ है, आज मैं उसे ही वर्णन करना चाहता हूँ।

उपासना को स्वीकार करने के कुछ ही दिन बाद मुझे दक्षिण भारत का भ्रमण करने का अवसर प्राप्त हुआ, और इस पुण्य यात्रा में श्री गायत्री स्वरूपजी महाराज के दर्शन का सौभाग्य मुझे गायत्री माता ने प्रदान किया। मैंने पाया कि अपनी उत्कृष्ट कल्पना के सहारे जिस ऋषित्व को अंतर्जगत में सुचित्रित कर रक्खा था, वह जैसे साक्षात्कार हो गया हो। मैंने श्रद्धावनत हो अपने को उन पावन पद−पद्मों में डाल दिया।

उस दिन एक गुजराती समाज में विवाहोत्सव था। उसका पुत्र, जो कई दिनों से बीमार था, उसकी हालत उस दिन बेहद खराब हो गयी। डाक्टर आये। सभी ने एक स्वर से कहा कि इसे बचने की कोई आशा नहीं है। परिवार में हाहाकार पड़ गया। रुदन−ध्वनि से आकाश भी प्रकम्पित हो रहा।

उनके किसी हित−चिन्तक ने श्री गायत्री स्वरूपजी महाराज को बुला लाया। उनके आते ही बालक के माता पिता दोनों हाहाकार करते हुए चरणों में आ गिरे और लोटने लगे। उनके करुण विलाप से महात्माजी के परम दयालु हृदय की वाणी फूट पड़ी-सहसा ही उनके मुख से निकला—तुम्हारे पुत्र का बाल−बाँका भी न होगा। सहसा ही आश्वासन का वातावरण छा गया। सभी के रुदन, एक वरगी ही रुक गये उन्होंने पवित्र−जल मंगाकर गायत्री से अभिमन्त्रित कर बालक को पिला दिया। घण्टों से बेहोश बालक नीन्द टूटने की भाँति उठ बैठे। चिकित्सक−गण विस्मित और निस्तब्ध से देखते रहे।

उसके उपरान्त विवाहोत्सव किसी भाँति पूरा कर लिया गया। बालक का ज्वर छूटा नहीं था। फिर एक दिन वेग आया और बालक मुमुर्ष−अवस्था में पहुँच गया। आज तो आशा ही नहीं रह गयी थी। आज भी महात्माजी को बुलाया गया। मैं भी साथ था। महात्माजी भी उसकी मरणासन्न दशा से कुछ चिंतित दीख पड़े। सहसा ही वे बोले—आज या तो हम दोनों ही इस विश्व में रहेंगे या बालक और हम दोनों ही कूच कर जायेंगे। ऐसा कह कर पुनः उन्होंने गायत्री अभिमन्त्रित जल बालक को पिलाया और गायत्री यज्ञ का भस्म, जो वे अपने साथ लिये आये थे, रोगी के सारे शरीर पर लगाना प्रारम्भ कर दिया। अब बालक सम्पूर्ण होश में था और हम लोग विस्मित−नेत्रों से यह आश्चर्य−लीला देख रहे थे। फिर उन्होंने और जल मंगवाया तथा उसे भी गायत्री से अभिमन्त्रित करके बोले—इसे प्रति दिन पिलाते रहना, मैं अभी कार्यवश बम्बई जा रहा हूँ।

गायत्री के प्रति अनजाने ही मेरी श्रद्धा गहरी होती जा रही थी।

बम्बई से कुछ दिनों के उपरान्त स्वामी जी लौटे। बालक स्वस्थ था। उसने चरणों से साष्टाँग प्रणाम किया और कहा—गुरुदेव! आज मुझसे आप गुरु दक्षिणा लीजिये। उन्होंने कहा—गुरु दक्षिणा? क्या सचमुच ही तुम देने को तैयार हो?

बालक ने स्वीकृति जतायी, इस पर स्वामी जी बोले—मैं तुम्हें गुरुमन्त्र देता हूँ, तुम विधिपूर्वक जीवन भर इसकी नियमित उपासना करते रहना। यही मेरी गुरु दक्षिणा है।

इस घटना से प्रभावित होकर मैं मुग्ध होकर दंड की भाँति उनके चरणों में गिर पड़ा। वे मेरे शिर पर अपना कल्याण−वरद−हस्त फेर रहे थे।

मैंने अपना अध्यात्मिक गुरु वरण लिया है, और उनके निर्देश का अनुसरण करते हुए जो कुछ मैं अनुभव कर रहा हूँ, वह अवर्णनीय है।

दूरवर्ती घटनाओं का आभास (मातादीन शर्मा, दोहद)

मैं अपने जन्म भूमि से छः सौ मील की दूरी पर रह रहा हूँ। अपंगू हूँ। गायत्री ही मेरा सब सार−सम्भाल करने वाली माता है। मेरी एकमात्र यही उपासना है। एक दिन मैं जप कर रहा था, सहसा देखता हूँ कि “मेरा एक भाई क्षय रोग से मर गया है और हमारे मकान को नष्ट कर चचेरे भाइयों ने उस स्थान को अन्याय−पूर्वक कब्जा कर लिया है।” इसके दूसरे दिन ही पत्र आया, उसमें ध्यान में देखी सभी बातें ठीक ठीक अंकित थी। यह माता की कृपा का ही प्रसाद था कि 600 मील की घटना को मैंने प्रत्यक्ष की भाँति देखा। गायत्री उपासना के फल स्वरूप ऐसी दिव्य दृष्टि का खुलना एक चमत्कार ही है।

नवजीवन की प्राप्ति (श्री गशेश जी, इन्द्रनगर, सिंहभूमि)

मैं सारे उपाय करके हार गया था। पिता जी के बचने की कोई आशा न थी। जब मनुष्य को चारों ओर से सहारा नहीं मिलता तो स्वभावतया ही उनकी दृष्टि ईश्वर की ओर उठ जाती है। मैं प्रथम से ही गायत्री उपासक था। पिता जी के प्राण रक्षा की भावना लिये मैंने जप संख्या में वृद्धि की और रक्षा के लिये प्रार्थना किया करता। दूसरे दिन ही पिता जी के अन्तर में शान्ति का बोध हुआ और मैंने तीसरे−चौथे दिन उनकी दशा में स्पष्ट सुधार पाया। माता की कृपा का साक्षात कराने के लिये, अभी भी हमारे पिता स्वस्थ जीवन यापन कर रहे हैं।

आर्थिक−दुश्चिंता सदा मुझे घेरे रहती। कितनी भी कोशिश करता, न तो बाहर की हालत सुधरती और न मेरा सन्ताप ही दूर होता। सोचा—अब माता से ही प्रार्थना करूं। यह सफलता मेरी शक्ति से बाहर है। उस दिन जप कर रहा था—सहसा ही अन्तर में अधीर मत होओ, बाहर में कोई तुम्हारी सहायता नहीं करेगा। मैं ही तुम्हें निभाये ले चलूँगी।” यह सुनते ही मुझमें आत्म−शक्ति और धैर्य का संचार हुआ। आज भी मेरी बाहरी जीविका का साधन पूर्ववत् है, पर उस दिन के उपरान्त कोई ऐसा अभाव रहा ही नहीं, जिसकी पूर्ति नहीं हुई। कल्याणमयी माता की जय हो।

दिव्य ज्योति के प्रत्यक्ष दर्शन (श्री महावीर प्रसाद गुप्त, शाहजहाँपुर)

दो वर्ष बीत गये। वायु मंडल स्वच्छ था। शीतल सुगन्धित वायु बह रही थी। मैं पद्मासन लगाये माता के ध्यान में तल्लीन था। माला पास में नहीं थी। मैं बड़े ही आर्तभाव से माता की आराधना कर रहा था।

समय भी काफी हो चुका था। उस समय इतना अच्छा ध्यान लगा हुआ कि था वैसा आनंद ध्यान में आज तक नहीं आया। हृदय से एकदम ऐसा प्रकाश पुंज निकला जो सारे शरीर में प्रविष्ट हो गया। ऐसा मालूम होता कि मेरे शरीर के साथ-साथ सारी पृथ्वी काँप रही है। ऐसा बहुत देर तक अनुभव हुआ। सामने हंसारूढ़ माता का वरद्हस्त था। माता कह रही थीं- पुत्र प्रसन्न हूँ!! यह शब्द कई बार हुआ। मुझे माता का वरद्हस्त उसी मूर्ति में सोते जागते चलते फिरते हर समय लगभग दो सप्ताह तक निरन्तर मालूम होता रहा। उस समय मेरे नेत्रों में आँसू बह रहे थे। जब आसन छोड़ा तो माता से प्रणाम करके यही प्रार्थना की कि “जन्मान्तर तक आपके चरणों में ध्यान रहे।”

इस घटना के बाद से मुझे अपने में काफी परिवर्तन मालूम हुआ और जितना कष्ट मुझे आर्थिक एवं मानसिक था, वह सब दूर हो गया। उसी समय से माता के चरणों में मुझे दृढ़ विश्वास है।

माता का साक्षात्कार (श्री गोविन्दलाल - नृसिंह शाह, रामगंज)

मेरा सवालक्ष का अनुष्ठान चल रहा था। अरुणोदय की पुनीतारुण आभा, दिव्य जागरण के सन्देश से हृदय में घुसे जा रहे थे। मैं खुली आँखों जप करता हुआ तल्लीन हो रहा था। सहसा अरुण रंग के मध्य से श्वेतोपम-आलोक का उदय हुआ और वह गायत्री माता की साक्षात प्रतिमा बन गयी। मैंने प्रणाम किया एवं अपनी भूल-चूक के लिये क्षमा याचना की। माता की आँखों से वात्सल्य विकीर्णित होकर मुझे स्पर्श करने से प्रतीत होते। धीरे-2 तिरोधान का क्रम उपस्थित हुआ। प्रेमोद्रेक से मेरी आंखें भर आयी थी और उसी क्षण माता का रूप मेरी दृष्टि से-न जाने कब तक के लिये तिरोहित हो गया। आज भी उस पुनीत-क्षण की याद, मुझे भावविभोर कर देती है।

गायत्री जप से अन्तः करण की शुद्धि ( चन्द्रिका प्रसाद दीक्षित, मझिया)

मैं गायत्री उपासना से यह प्रत्यक्षवत् अनुभव करता हूं, कि उससे मेरा अन्तःकरण वस्त्र की भाँति स्वच्छ हो गया है। मैं प्रत्येक उपासकों को जोर देकर इसकी आजमाइस करने की प्रार्थना करता हूँ।

गायत्री जप से शाँति (श्री चन्दन लाल शर्मा, फतेहपुर-विश्नोई )

मैं बड़ा ही घमण्डी था। मन चारों ओर नाचते ही रहता। कुछ विचार कर स्थिर नहीं कर पाता था। भीतर अशान्त था। गायत्री उपासना करके मैं अपने अनुभव से कहता हूँ कि इससे घमण्ड क्रमशः नष्ट होता जाता है, मन की चंचलता घटती जाती है, शाँति का अनुभव होने लगता है और विचार में नवीन ज्ञान का प्रकाश निरन्तर बढ़ता ही चला जाता है।

माता के साक्षात्कार का मार्ग (श्री सीताराम श्री अग्रवाल एडवोकेट, आगरा)

इसी बसन्त पंचमी की बात है:- हमने उस दिन श्री गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति दी थी। यज्ञ सानंद सम्पन्न होने से सम्पूर्ण वातावरण हर्ष से तरंगित हो रहा था।

यह समाप्ति के उपरान्त “गायत्री के साक्षात् दर्शन” की सम्भावना में विभिन्न भाँति के तर्क-विचार विमर्श एवं भावना-श्रद्धा के प्रश्न उपस्थित हुए, जिसका यथा सम्भव समाधान कारक उत्तर मेरे द्वारा दिया गया। पर मेरे उत्तर से कदाचित लोगों के आन्तर की भूख तृप्त नहीं होती थी। सभी बुद्धिवादी तर्क प्रवण लोग चाहते थे कि हम यह जानें कि गायत्री माता का साक्षात् दर्शन होता भी है या नहीं और कैसे होता है?

आन्तर-बाह्य सारे वातावरण का प्रभाव मेरे विचार-जगत को ज्ञात-अज्ञात रूपेण संक्रमित कर रहे थे। सायंकाल को नित्य की भाँति अपने एकान्त उपासना-कक्ष में प्रवेश किया। वहाँ एक लकड़ी की चौकी पर शीशे के फ्रेम में जड़ा “अखण्ड-ज्योति “ प्रेस मथुरा से प्राप्त गायत्री की एक वात्सल्यमयी छवि अपनी ममता बिखेरती रहती है। सम्मुख में वृत का अखण्ड दीप जलता रहता है।

आसन पर बैठते ही आज मेरी बुद्धि के सामने वे सारे के सारे प्रश्न एक एक कर उपस्थित होने लगे। मैं स्वयं उन प्रश्नों के सम्यक समाधान के लिये अपने में तीव्र उत्कण्ठा का अनुभव करने लगा।

उस समय सिवाय कण-कण परिव्यापिनी माता को छोड़ और कोई नहीं था जो समाधान करे। मैं ने उस पुनीत चित्र को ही साक्षात् माता मान कर अपने सारे प्रश्नों को उनके सामने रखना प्रारम्भ किया। मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि उस समय अन्तर या बाहर में मैंने माता का कोई स्वरूप नहीं देखा पर जैसे ही मैं काई प्रश्न करता, वैसे ही मेरे मानस−सागर में ठीक बुलबुले की भाँति उत्तर, उत्तर आते। पश्चिमीय विचारधारा ने इस प्रकार की सभी क्रियाओं को नाम “औटो सजेशन्स” रखा है, पर हम इसे माता के साक्षात् प्रसाद रूप में अनुभव करते हैं और माता के आदेशानुसार ही इस प्रसाद को सभी उपासकों में वितरण कर रहे है:−मैंने प्रश्न किया−माँ! क्या इन नेत्रों तुम्हारे दर्शन भी हो सकते हैं?

उत्तर −क्यों नहीं।

प्रश्न−तो इसका सब से सरल साधन क्या है?

उत्तर −दृष्टि योग। यह ऐसा साधन है कि इसे ठीक ठीक कर सकने पर जिस इष्ट देव का दर्शन करना चाहो, कर सकते हो। चाहे मेरा साक्षात्कार कर लो, चाहे भगवान राम, कृष्ण, विष्णु, शंकर आदि किसी भी इष्टदेव का कर लो। इस साधन को एक उर्दू कवि ने अच्छी तरह अभिव्यक्त किया है−

कौन जा है जहाँ जल्वए माशूक नहीं; शौके दीदार अगर है तो नजर पैदा कर।

अर्थात् ऐसा कौन सा स्थान है, जहाँ प्रियतम नहीं है। यदि उसके दर्शन की इच्छा है, तो अपने में दृष्टि पैदा करो।

प्रश्न− तो माँ! यह दृष्टि कैसे पैदा करें और यह दृष्टि किस प्रकार देखती है? क्या इसके लिये इन चर्म चक्षुओं को अपने स्थान से हटाना पड़ता है?

उत्तर − इसे दिव्य दृष्टि कहते हैं। इसके लिये चर्म दृष्टि को हटाने की जरूरत नहीं, वरन् उसके अनुकूल करने का प्रयत्न करना होगा। जिस प्रकार दूर की वस्तु देखने के लिये दूरबीन को आंखों के आगे नियत दूरी और केन्द्र बिन्दु पर रखने की आवश्यकता होती है, उसी भाँति इस चर्म दृष्टि को, दिव्य दृष्टि के अनुकूल बनाने के लिये इसे भी दिव्य दृष्टि के लक्ष्य पर केन्द्रित करना पड़ेगा। अपने दृष्टि कोण−नुक्ते नजर−ऐंगिल ऑफ विजन को बदलना पड़ेगा।

अब “दिव्य दृष्टि “ को बुद्धि के द्वारा समझने का प्रयत्न करो। इसे समझने के उपरान्त ही तुम अपनी बाह्य दृष्टि को इसके अनुकूल करने का प्रयत्न कर सकोगे।

इन चक्षुओं से दूसरों के अवगुण ने देखकर गुण ही गण देखो। गुण दृष्टि के प्राप्त करते ही तुम्हारे चर्म चक्षु दिव्य चक्षुओं द्वारा देखने के योग्य बन जायेंगे। देखो, संसार में कोई भी व्यक्ति या वस्तु ऐसी नहीं है कि जिसमें कोई अवगुण न हो और इसी प्रकार कोई भी व्यक्ति या वस्तु ऐसी नहीं है कि जिस में कोई गुण न हो। तुम अवगुणों को न देखकर केवल गुण ही गुण देखने की आदत डालो। अवगुण देखो केवल अपने। देखो परमात्मा ने मनुष्य को जो दर्शन की शक्ति दी है वह दी है केवल अपने दोष देखने के लिये परन्तु मनुष्य करता इसका उल्टा है अर्थात् अपने दोष न देखकर देखने लगता है दूसरों के दोष।

परन्तु माँ, यदि हम किसी व्यक्ति को उसके दोष न बतलायेंगे तो उसका सुधार कैसे होगा?

प्रश्न हल करना चाहते हो मेरे साक्षात्कार का, प्रभु दर्शन का और बनना चाहते हो सुधारक सुधार करने का काम तो छोड़ दो, गुरु, महात्माओं और साधु सन्तों के लिये। हाँ जिन व्यक्ति यों के पतन ये अवनति की उत्तरदायित्व तुम्हारे ऊपर है उनके दोष जरूर देखो और उनके हित के लिये उन दोषों को उनको बतलाओ भी और उनके दूर करने का प्रयत्न भी करो।

माँ। चीज़ तो आपने बड़ी सुन्दर बताई परी गुण दृष्टि पैदा करने की आदत कैसे पड़ेगी।

उसका भी बड़ा सरल उपाय है। गोस्वामी तुलसीदास ने मानस के बालकाँड में इस विषय का बड़ा सुन्दर विवेचन किया है। बस उनकी निम्न चौपाइयों का मनन व चिंतन करते रहो। कुछ समय में अवश्य ही गुण दृष्टि उत्पन्न हो जायेगी:−

कहहिं वेद इतिहास पुराना। विधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥ दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥ दानव देव ऊंच अरु नीचू। अमिअ सजीवनु माहुरु मीचू॥ माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥ कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरू माख महिदेव गवासा॥ सरग नरक अनुराग विरागा। निगमागम गुन दोष विभागा॥

दो.—जड़ चेतन गुन दोषमय, विस्व कीन्ह करतार॥ संत हंस गुन गहंहिं पय, परिहरि बारि बिकार॥6॥ अस विवेक जब देइ विधाता। तब तजि दोष गुनहि मनु राता॥

परन्तु माँ। इन चौपाइयों के अनुसार तो गण दृष्टि का उत्पन्न होना विधाता के विवेक देने पर निर्भर हो गया?

क्या बुराई है। माँगो विवेक विधाता से, वह मना थोड़े ही करते हैं।

पर माँगें कैसे?

विधाता से माँगने का एक ही सर्वान्तक तरीका है− ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्। की उपासना।

माता की इस अन्तः प्रेरणा से मेरा समाधान हो गया। माता के दर्शन का प्रयत्न करता हूँ। जितने ही कदम बढ़ते जाते हैं उतना ही धुँधलापन दूर होकर स्पष्ट साक्षात्कार होता जाता है। दूसरे लोग भी जो इस मार्ग एवं दृष्टि कोण को अपनायेंगे वह भी मेरी ही भाँति साक्षात्कार का अनुभव कर सकेंगे।

गायत्री माता के आश्रय में (प्रेमचन्द्र, अग्रवाल. महोवा)

“गायत्री मन्त्र का थोड़ा सा ज


अश्विन की नवरात्रि साधना

नवरात्रि साधना के लिए सर्वोत्तम समय है। जिस प्रकार प्रातः सायं की मिलन-बेला-संध्या--को पूजा के लिए उत्तम काल माना जाता है, उसी प्रकार शीत ग्रीष्म ऋतुओं की मिलन-बेला में अश्विन और चैत्र की नवरात्रि आती है। जिस प्रकार गर्भाधान के लिए एक विशेष ऋतुकाल आता है, जिस प्रकार खेत बोने को एक विशेष समय आता है और उस समय का कार्य अन्य समयों की अपेक्षा अत्याधिक प्रभावशाली होता है इसी प्रकार नवरात्रि में की हुई उपासना वर्ष के अन्य सभी साधारण समयों की अपेक्षा कहीं अधिक फलदायक होती है।

इस बार आश्विन की नवरात्रि ता. 16 अक्टूबर रविवार से आरम्भ होकर ता. 28 अक्टूबर सोमवार को पूर्ण होगी। पूर्णाहुति ता. 28 को होनी चाहिए। इन 6 दिनों में जिनसे बने पड़े, उन्हें 28 हजार जप का लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करना चाहिए। प्रतिदिन 2॥-3 घंटा लगा कर 26 माला कर लें। इतना अनुष्ठान आसानी से पूरा हो सकता है। प्रातः काल और सायंकाल दोनों समय मिलाकर भी इतना जप पूरा किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य से रहना आवश्यक है। उपवास, भूमि शयन, अपने शरीर की सेवा स्वयं करने आदि तपश्चर्याऐं जिनसे जितनी बन पड़ें, वह उतनी अवश्य करें। 28 हजार अनुष्ठान के लिए 280 आहुतियों का हवन किया जाना चाहिए। ब्रह्मभोज के लिए गायत्री अंकों का या पाँच-पाँच पैसे वाले छोटे ट्रैक्टों का सज्जनों में वितरण करना सबसे सस्ता और सबसे सीधा तरीका है। जप, हवन और ब्रह्मभोज तीनों से मिलकर ही अनुष्ठान पूर्ण होता है।

छोटे बच्चे, कन्याएँ, बीमार, असमर्थ,बूढ़े 9 दिन में गायत्री चालीसा के 108 पाठ करने का अनुष्ठान कर सकते हैं। प्रतिदिन 12 पाठ एक घंटे से बड़ी आसानी से हो जाते हैं, अन्त में 28 या 108 गा. चा. दान करें।

जिनके लिए नवरात्रि में मथुरा आना सम्भव हो, वे यहाँ आकर अनुष्ठान करें। घर के कुंए पर स्नान करने और गंगाजी पर जाकर वहाँ स्नान करने में जो अन्तर होता है, वही घर के झंझट पूर्ण वातावरण में साधना करने तथा तपोभूमि में आकर साधना करने में होता है। जो लाग विधिवत हवन घर पर न कर सकते हो, उनका हवन यहाँ पर कर दिया जायगा। जो साधक अपने नवरात्रि अनुष्ठान की पूर्व सूचना हम दे देंगे, उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा सुरक्षा का संरक्षण हम करते रहेंगे।

अखण्ड-ज्योति के पाठकों को सूचना:−

(1) अखण्ड-ज्योति के इस अनुभव अंक के लिए बहुत बड़ी संख्या में अनुभव आये थे, पर पृष्ठ- संख्या सीमित रहने के कारण उनमें से थोड़े ही छापे जा सके। शेष अनुभवों का क्रमशः अगले अंकों में निकालने का प्रयत्न करेंगे।

(2)दिसम्बर का अंक “यज्ञ विज्ञान अंक” होगा। इसमें देश भर के प्रमुख यज्ञ विद्या शास्त्रियों के बड़े ही महत्वपूर्ण लेख रहेंगे। अगले वर्ष यज्ञ विधान अंक निकालने का प्रयत्न करेंगे।

(3) सन् 56 से अखण्ड ज्योति की पृष्ठ संख्या अब की अधिक ड्यौढ़ी करदी जायगी। इस हिसाब से चन्दा भी 2॥) का ड्यौढ़ी 3।।।) होना चाहिए था, पर उतना न बढ़ा कर केवल ॥) ही बढ़ाये जायेंगे अर्थात् 2॥) की अपेक्षा 3) कर दिये जावेंगे। जो सज्जन सन् 56 का चन्दा भेजें, वे 3) ही भेजे।


VigyapanSuchana

परिश्रमी महिलाओं की आवश्यकता

तपोभूमि में आये हुए तपस्वियों के लिए भोजन बनाने का कार्य आचार्यजी की धर्मपत्नी तथा माताजी करती है। कार्य-भार बढ़ जाने से उन्हें अब एक दे परिश्रमशील ऐसी महिलाओं की सहायता की आवश्यकता है, जो भोजन बनाने आदि कार्यों में उत्साहपूर्वक जुटी रहें । उन्हें भोजन के अतिरिक्त पारिश्रमिक भी दिया जावेगा। जो आ सकें, पत्र-व्यवहार कर लें।


जगदम्बा के प्रति

(श्री विद्याव्रत जी)


जगदम्बा के प्रति (kavita)

हे जगदम्बा! हे शारदा माँ! भू को तूने धन्य किया। त्रिपुर सुन्दरी प्रेममयी का तूने अभिनव रूप लिया।

जिससे तेरे चरणों में हम पहुँचे सीधे हो गतमार। सोम रूपिणी! स्वर्ण! कान्ति हे! अमर कीर्ति की ज्योतिधार।

विश्ववन्द्य हरि के उज्ज्वलतम अन्तरतम में तेरा स्थान। नियमित होती सृष्टि वहीं से कारा चुना क्षेम पर जान।

पृथ्वीतल यह डारागृह सा बना हुआ बन्धन कारी। मुक्त कराती आती तू जग, मंगलकारी! अविकारी।

छद्मवेष में, माया से मानव तन श्वीकार किया। लीला−लीला ही में तूने माँ! जग का उद्धार किया।

अरुण राग रंजित सुन्दर आनन पर कान्ति विराज रही। दिव्य छटा पावन तेरे सुख−मण्डल ऊपर साज रही।

तू बसन्त की ओस बिन्दू सी जीवन−डाली छू जाती। सौम्य मनोहर पूर्ण इन्दु बन अन्धकार हर ले जाती।

शुभ्र मल्लिका की सी तू मुस्कान लिये ऊपर आती। हृदय−गगन को आलोकित कर तू उसमें ही रम जाती।

दिग्-दिगन्त में यह नीला सा विस्तृत सागर लहराता। इसकी चंचल लहरों में भी तेरा रूप निरख आता।

झरते झरनों में से जैसे झर-झर की ध्वनि सुन पड़ती। हत्-कम्पन में तू वैसी ही अविरल ताल भरा करती।

सुमन-सुवास सरी खी चहुंदिशि व्याप रही सत्ता तेरी। नीरवता को गुंजा रही है अनुपम नीरवता तेरी।

हृदय हारिणी ऊषा सी चू इस जग में अवतीर्ण हुई। घोर-घन-घटा जिससे तम की जीर्ण-शीर्ण विदीर्ण हुई।

*समाप्त*