वृहद्धर्म पुराण, पूर्व खण्ड अ॰ 2
व्यास उवाच−
पितुरण्यधिका माता गर्भधारणपोषणात्।
अतोहि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥1॥
नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति विष्णुसमःप्रभु।
नास्ति शम्भुसमःपूज्यो नास्ति मातृसमो गुरुः॥2॥
नास्ति चैकादशी तुल्यं व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम।
तपो नानशनात्तुल्यं नास्ति मातृसमो गुरुः॥3॥
नास्ति भार्यासमं मित्रं नास्ति पृत्रसमः प्रियः।
नास्ति भगिनी समा मान्या नास्ति मातृसमो गुरुः॥4
न जामातृसमं पात्रं न दानं कन्यया समम।
न भ्रातृसदृशो बन्धुर्न च मातृसमो गुरुः॥5॥
देशो गंगान्तिकः श्रेष्ठो दलेषु तुलसीदलम्।
वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि॥6॥
मातंर पितरं चोमौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्।
प्रणम्य मातरं पश्चात् प्रणमेत पितरं गुरुम्॥7॥
माता धरित्री जननी दयार्द्रहृदया शिवा।
देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा निर्दोषा सर्वदुःखहा ॥8॥
आराधनीय परमा दया शान्तिः क्षमा घृतिः।
स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया॥9॥
दुःखहन्त्रीति नामानि मातुरेवैकविंशतिम्।
शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः सर्वदुःखाद् विमुच्यते॥10॥
दुःखैर्महद्भिर्दूनोऽपि दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्।
यमानन्दं लभेन्मत्यः स किं वाचोपपद्यते॥11॥
इति ते कथितं विप्र मातृस्तोत्रं महागुणम्।
पराशरमुखात्पूर्वमश्रौषं मातृसंस्तवम् ॥12॥
सेवित्वा पितरौ कश्चिद् व्याधः परमधर्मवित्।
लेभ सर्वज्ञताँ या तु साध्यते न तपस्विभिः॥13॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्तिः कार्या तुमातरि।
पितर्यपीति चोक्तं वै पित्रा शक्ति सुतेन मे॥14॥
अर्थ−पुत्र के लिये माता का स्थान पिता से भी बढ़कर है, क्योंकि वह उसे गर्भ में धारण कर चुकी है तथा माता के द्वारा ही उसका पालन−पोषण हुआ है। अतः तीनों लोकों में माता के समान दूसरा कोई गुरु नहीं है॥1॥ गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं है, भगवान् विष्णु के समान कोई प्रभु नहीं है, शिव के समान कोई पूजनीय नहीं है तथा माता के समान कोई गुरु नहीं है॥2॥ एकादशी के समान कोई त्रिभुवन विख्यात व्रत नहीं है, उपवास के समान कोई तपस्या नहीं है तथा माता के समान कोई गुरु नहीं है॥3॥ भार्या के समान कोई मित्र नहीं है, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं है, बहिन के समान मान्य कोई स्त्री नहीं है तथा माता के समान कोई गुरु नहीं है॥4॥ दामाद के समान कोई दान का सुयोग्य पात्र नहीं है, कन्यादान के समान कोई दान नहीं है, भाई के समान बन्धु और माता के समान कोई गुरु नहीं है॥5॥ देश वही श्रेष्ठ है जो गंगा के समीप हो, पत्तों में तुलसी का पत्ता श्रेष्ठ है, वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है तथा गुरुजनों में माता ही सब से श्रेष्ठ है॥6॥ धर्मज्ञ पुत्र माता और पिता दोनों को एक साथ देखने पर पहले माता को प्रणाम करके पीछे पिता रूपी गुरु को प्रणाम करे॥7॥ माता, धरिवी, जननी, दयाद्र हृदया, शिवा, त्रिभुवनश्रेष्ठा, देवी, निर्दोशा, सर्वदुःखहा, परम, अराधनीय, दया, शान्ति, क्षमा, धृति, स्वाहा, स्ववा, गौरी, पदमा, विजया, जया तथा दुःखहन्त्री ये माता के ही इक्कीस नाम हैं। जो मनुष्य इन नामों को सुनता और सुनाता है, वह सब दुःखों से मुक्त हो जाता है। बड़े से बड़े दुःखों से पीड़ित होने पर भी भगवती माता का दर्शन करके मनुष्य को जो आनन्द मिलता है, उसे क्या वाणी द्वारा व्यक्त किया जा सकता है?
ब्रह्मन्! यहाँ मैंने तुम से परम गुणमय मातृ स्तोत्र का वर्णन किया है। वह मातृ स्तोत्र पूर्वकाल में मैंने अपने पिता श्री पराशरजी के मुख से सुना था। किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने केवल माता−पिता की सेवा करके वह सर्वज्ञता प्राप्त करली, जो तपस्वियों को भी सुलभ नहीं है। इसलिए पूर्णदान करके माता और पिता के चरणों में भक्ति करनी चाहिये।
(श्री महीपाल शर्मा, सहन)
जिन्दगी में मैं सदा, हँसता रहा, हँसता रहूँगा!
आपदा आएं निरन्तर किन्तु मैं रुकता नहीं हूँ। शक्तियों के सामने भी मैं कभी झुकता नहीं हूँ॥ यह प्रगति मेरी न कोई, रोक सकता है धरा पर, मैं विजेता की तरह—बढ़ता रहा, बढ़ता रहूँगा॥
पंथ है मुझको अपरिचित किन्तु मैं थकता नहीं हूँ। पग बढ़ाकर अग्रगामी फिर कभी हटता नहीं हूँ। पहुँचता जबतक न मंजिल पर नहीं विश्राम लूंगा, मैं पवन की भाँति यों चलता रहा, चलता रहा॥
तृषित चातक की तरह, मैं प्रीत के ही गीत गाता। और व्याकुल शलभ सा मैं, गुनगुनाता, मुस्कराता॥ प्रेम पारावार में ही− नाव जीवन की चलेगी, मृत्यु लौकिक है इसी में, डूबता तैरता, रहूँगा॥
आप में हर्षित न होता, दुःख में फिर दुखित क्यों हूँ? संघर्ष के जीवन समझता, सफलता पर मुदित क्योँ हूँ? फिर निराशा भी मुझे क्या, मार्ग में उन्मन करेगी? आत्मदानी शुभ सुमन सा मैं खिला, खिलता रहूँगा
जिन्दगी में मैं सदा, हँसता रहा, हँसता रहूँगा!
(पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर)
प्राचीन आर्यों का सम्पूर्ण जीवन ही “यज्ञमय जीवन” था, इस कारण उनका सतत् उत्कर्ष होता रहा था। जबसे जीवन में से यज्ञ चला गया तबसे आर्यराष्ट्र की अवनति हुई ऐसा इतिहास कहता है।
प्राचीन आर्यों का जीवन यज्ञमय था इसका स्वरूप हमें देखना आवश्यक है।
प्रायः आर्य लोग प्रातः 4 बजे शुभ ब्राह्ममुहूर्त में उठते थे। शौच मुखमार्जन स्नान करना आदि से निवृत्त होकर अपनी संध्या करते और इसके पश्चात अपने घर से यज्ञ−हवन−करते थे। घर के अग्नि में हवन करना यह प्रत्येक घर के स्वामी का आवश्यक कृत्य है ऐसा समझा जाता था। पारिवारिक जन इस यज्ञ में शामिल होते थे इस घर के यज्ञ को करके अपने घर के चारों ओर स्वच्छता करके गृह पूजा के रूप में गृहद्वार की पूजा करके घर के द्वार में फूलों की मालायें लटका कर घर की शोभा बढ़ाते थे। घर के बाहर का आधा मार्ग स्वच्छ करके उसकी शोभा बढ़ाने के लिए रंगवल्लियों से सजावट की जाती थी।
इस तरह प्रत्येक घर में यज्ञ होता था और साफ सफाई भी होती थी। इतना घर में करके कई लोग चौरास्तों पर जाते थे और वहाँ विशेष हवन होता था। इसमें ये लोग शामिल होते थे।
चौरास्तों पर स्थायी यज्ञ शाला होती थी। इसमें उस मोहल्ले के लोग आकर यज्ञ करते थे। इस रीति से चतुष्पथ की यज्ञ शाला का हवन होता था।
नगर के मध्य में बड़ी यज्ञ शाला होती थी और उसमें वृहत यज्ञ किया जाता था। यह यज्ञ सार्वजनिक था। राजा के द्वारा इसका नियन्त्रण किया जाता था। चतुष्पथ के हवन के पश्चात लोग नगर के मध्य में जाकर इस वृहद यज्ञ में शामिल होते थे।
देखिए प्रथम हर एक घर में हवन हुआ, पश्चात चौरास्तों पर− चतुष्पथ पर– हवन हुआ। पश्चात नगर के मध्य में वृहद्यज्ञ हुआ। इस रीति से सवेरे के 8 बजे तक संपूर्ण नगर ही यज्ञ की पवित्र हवा से परिपूजित हो जाता था।
ऐसे नगरों में रोग कहाँ से घुसेंगे और अकाल मृत्यु भी कहाँ से आ सकेगी? आज हमारी आयु क्षीण हो रही है। सौ वर्ष का जीवन भी दुर्लभ सा हो रहा है। इसका कारण एक ही है और वह यज्ञ का न होना ही है। पूर्व समय के अनुसार यज्ञ होते रहते तो यह विपत्ति नहीं आती।
इन दैनिक हवनों के साथ साथ पाक्षिक हवन भी वृहद्रूप से होते थे। दर्श और पूर्ण मास के नाम से ये यज्ञ सुप्रसिद्ध है। प्रति पन्द्रह दिनों के पश्चात ये यज्ञ होते थे। ये सार्वजनिक यज्ञ बड़ी यज्ञशाला में होते थे। अतः इनका परिणाम विस्तृत क्षेत्र में होता था।
इनके अतिरिक्त महा यज्ञ होते थे जो चार पाँच दिनों से लेकर पन्द्रह दिनों तक चलते थे और सत्र साल भर तक चलते थे। ये महायज्ञ और सत्र नगर के बाहर पवित्र क्षेत्र में, पवित्र नदी के तट पर पवित्र तालाब के समीप किए जाते थे। इनमें हजारों लोग आते थे। इनमें ज्ञान प्रसार, राष्ट्रीय अभ्युदय के कार्य होते थे और मुख्य मंडप में हवन तथा जप होता था। इस तरह से यज्ञ राष्ट्रीय अभ्युदय के कार्य करते थे।
राजा दशरथ ने अश्वमेध यज्ञ किया। विधि के अनुसार हवनादि कार्य ऋषियों ने वहाँ किये ही थे। परन्तु उस यज्ञ में जो धर्म परिषद हुई थी। उस परिषद में रावण का राक्षसी साम्राज्य तोड़ने की हलचल करने का प्रस्ताव सर्व समति से स्वीकृत हुआ था। इसमें पाठक जान सकते हैं कि यज्ञों के कार्य की मर्यादा कहाँ तक विस्तृत हो सकती है। साम्राज्य तोड़ने का तथा साम्राज्य बढ़ाने का सम्बन्ध यज्ञ से हो सकता था। इतना कार्य क्षेत्र यज्ञ का विस्तृत था। इसीलिये कहा जाता था कि यज्ञ से मानवों की सच्ची उन्नति होती है। मानवों के सम्पूर्ण जीवनों पर यज्ञ का प्रभाव आकर पड़ता था। यज्ञमय जीवन बनाने का उद्देश्य भी यहाँ है। अपने जीवन में यज्ञ को ढालना−जीवन ही यज्ञ से परिपूर्ण बनाना−जीवन को ही एक बड़ा यज्ञ बताना चाहिए। अर्थात् जीवन में कोई कर्म ऐसा न हो कि जो यज्ञ के विरुद्ध हो।
गोपथ ब्राह्मण में कहा है कि−
ऋतुसंधिषु व्याधिर्जायते
ऋतुसैंधिषु यज्ञाःक्रियन्ते
(गोपथ ब्राह्मण)
ऋतुओं के संधिकाल में रोग उत्पन्न होते हैं इसलिये ऋतुसंधियों में नानाप्रकार के यज्ञ किये जाते हैं। अर्थात् जिस रोग का प्रादुर्भाव जिस समय होने की संभावना हो, उसी के प्रतीकार के लिये आवश्यक औषधियों का हवन करने से उस रोग का विष वायु से दूर होकर वायु शुद्ध होता है और रोग नहीं होता इस तरह से यज्ञ ऋतुसंधियों में करने से रोग बीज दूर होते हैं और जनता आरोग्य सम्पन्न होती है। राष्ट्र में बड़े विशाल प्रमाण में यज्ञ करने से ऐसे लाभ होते हैं। ऐसे विशाल यज्ञ प्राचीन आर्य करते थे इस कारण वे नीरोग, दीर्घ जीवी हृष्ट−पुष्ट पुरुषार्थी उत्साही आनन्द प्रसन्न रहते थे। जीवन को उच्च बनाना इस तरह यज्ञ से होता था।
यज्ञ से आरोग्य प्राप्त करने की बात तो दूर कहीं पर कुयज्ञ से−अर्थात् अविधि पूर्वक हवन करने से रोग उत्पन्न भी होते हैं। इस विषय में कहा है।−
मुग्धा देवा उत शुना अयजन्त
उत गोरंगैः पुरुधा अयजन्त॥
अथर्ववेद 7।5।5।
“मूढ़ याजक कुत्ता काटकर उसके माँस का हवन करते हैं और गौ के अंगों को काट कर उसके माँस का हवन करते हैं’ यह तो मूढ़ याजकों का कार्य है। ज्ञानी याजक ऐसा नहीं करते। मूढ़ याजकों के ऐसे अशुची कर्मों से बड़े अनर्थ भी हुए है। देखिए चरक ग्रंथ में कहा है−
आदि कालेषु खलु यज्ञेषु पशवः
समालंभनीया बभूवुःनारंभाय
प्रक्रियन्ते स्म। अतश्च प्रत्श्वर
कालं पृषघ्रण दीर्घ सत्रेण यजमानेन गवाँ आलम्भः प्रावर्तितः। न द्रष्ट वा
व्यथिता भूतगणाः। तेषाँ चौपयोगाते
उपकृतानाँ गवाँ गौरवात् औष्ण्या
असाभ्यात अशस्तोपयोगात चोपहता
ग्नीनाँ उपहतमनसाँ अतीसारपूर्वं
उत्पन्नः।
चरक संहिता 19
आदि काल में गौ आदि पशुओं की पूजा की जाती थी, वध नहीं होता था। पृषध राजा ने गौओं के माँस का यज्ञ करना शुरू किया। इसको देखकर सब को दुख हुआ। इस यज्ञ में गौ गो माँस खाया वह माँस उष्ण, प्रतिकूल और पाचन शक्ति कम करने वाला था, इस कारण इस कारण इस पृषध्र यज्ञ से जो अतिसार उत्पन्न हुआ वह इस समय तक जनता को कष्ट दे रहा है।
इससे विदित हो सकता है कि ऐसे यज्ञों से रोग बढ़ भी जाते हैं। इसीलिये ऐसे यज्ञ शत्रु के राष्ट्र में किये जाते थे। जिससे नाना रोग शत्रु राष्ट्र में बढ़े और वहाँ की जनता मर जाय। इसीलिये अज्ञात याजक को यज्ञ करने की आज्ञा नहीं देनी चाहिये। ऐसे वचन स्मृतियाँ में है।
अर्थात् जैसे यज्ञों से रोग दूर होकर आगे बढ़ाता है, उसी तरह यज्ञों से रोग भी होते हैं। यह एक शास्त्र है इसीलिये विधिपूर्वक यज्ञ करने चाहिए अविधि से किये यज्ञ हानि भी करते हैं।
यज्ञ का अग्नि पवित्र अग्नि है। मर्जी चाहें लकड़ी उसमें जलानी नहीं चाहिए। पलाश शमी पीपल, बड़ गूलर, आम, विल्व आदि की समिधाएं वेदी के प्रमाण के अनुसार छोटी बड़ी करवा लेनी चाहिए ये समिधायें कीड़े से खायी मलीन अशुद्ध स्थान में रखी नहीं होनी चाहिए स्वयं शुष्क न बनी हो। सब प्रकार से अच्छी हों। इनसे अग्नि प्रदीप्त किया जाय।
कस्तूरी, केशर, अगरु, तगर, चन्दन, श्वेत, इलाइची, जायफल, जावित्री आदि सुगन्धित पदार्थ हों। घी दूध, फल, कन्द, अन्न, चावल, गेहूँ, उड़द आदि पुष्ट कारक पदार्थ हों। शक्कर, द्राक्ष, छुहारे आदि मिष्ट पदार्थ हों और सोमलता, गिलोय आदि औषधियाँ हों। इस तरह सामान्यतः सामग्री हवन के लिए लेनी चाहिए।
इस के साथ साथ जो ऋतु हो उसमें जो रोग होने की सम्भावना हो उस रोग का शमन करने की औषधियाँ ली जायँ। ये ऋतु के अनुसार लेनी योग्य हैं।
इस रीति से योजना पूर्वक विधि के अनुसार यज्ञ की हवनीय सामग्री इकट्ठी करनी चाहिए और उसका हवन करना चाहिए। इससे अवश्य सिद्ध मिल सकती है। सिद्धिहीन यज्ञ करने से कुछ से कुछ बन जायगा। इसे कारण माना व्यवहार यज्ञ में नहीं करना चाहिए।
(श्री देवराजजी)
यज्ञ के महत्व को अनेक दृष्टियों से देखा जा सकता है। यहाँ पर हम यज्ञ को समर्पण की दृष्टि से देखेंगे। वेद के पुरुष सूक्त में सृष्टि निर्माण से लिये सर्वहुत यज्ञ का वर्णन आया है। इस सर्वहुत यज्ञ में चेतना सत्ता ने जड़ सत्ता में और जड़ सत्ता ने चेतन सत्ता में अपने आपको पूर्णतया हवन कर दिया है। उभय सत्ताओं से सम्मिश्रण से सृष्टि रचना के विभिन्न रूप प्रकट हुए हैं। इस सम्मिश्रण में उभय सत्ताएँ ओत प्रोत होकर ऐसे रूपों को हमारे सामने प्रकट कर रही हैं कि उनमें एक को दूसरे से पृथक करके पहचानना अति कठिन हुआ है। किसका कितना महत्व है यह सृष्टि को देख कर कहा नहीं जा सकता। जड़ सत्ता का आश्रय लेकर चेतन सत्ता अपने ज्ञान को विविध रूपों में प्रकाशित कर रही है अथवा यों कह सकते हैं कि जड़ सत्ता चेतन सत्ता के ज्ञान को विविध रूपों में दिखलाने के लिये अपने आपको विविध रूपों में प्रकट कर रही है जिस ज्ञान के आधार पर जड़ सत्ता विविध भावों में प्रकट होती है उन भावों में उस ज्ञान का प्रकाश सर्वहुत यज्ञ का बड़ा महत्व प्रकट हो रहा है। कहा है
तस्मात् यज्ञात् सर्वहुतः ऋच सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्मात् यजुसतस्मा अजायतः॥
यदि सर्वहुत यज्ञ न होता तो न सृष्टि बनती और न ज्ञान का प्रकाश होता सृष्टि रचना में रचना करने वाले का एक दूसरे के लिए पूर्ण तथा आत्म समर्पण करते हैं। उनके इस आत्म समर्पण समर्पण में एकात्मक भाव के रूप में सन्तान उत्पन्न होती है। गीता में अनेक यज्ञों का वर्णन है।
श्लोक
द्रव्य यज्ञास्तपोयज्ञाः योग यज्ञास्तथा परे। स्वाध्याय ज्ञान यज्ञाश्चयतयः संशित ब्रताः॥
द्रव्य यज्ञ में द्रव्य के साथ जुड़े हुए अपनेपन को छोड़कर लोक कल्याण के लिए अग्नि में समर्पण किया जाता है ज्ञानाग्नि से सम्पन्न गुरु की आत्माग्नि से अपने आत्मा को प्रकाशित करने के लिये शिष्य अपने आपको गुरु के समर्पण करता है। यह स्वाध्याय एवं ज्ञान यज्ञ भी समर्पण के द्वारा यज्ञ के महत्व को सूचित करता है। किसी भी कार्य की सफलता बिना तप के नहीं होती। कार्य सिद्धि के लिए अपने आपको समर्पित करना यह तपो यज्ञ है। आत्मा और परमात्मा के साथ मेल करने के लिये अनात्म भाव का निराकरण योग−यज्ञ है। इसमें भी आत्मा अपने आपको परमात्मा के लिये समर्पण करता है। ऐसा समर्पण वही साधक कर सकते हैं जो अपने लक्ष्य के लिये कटिबद्ध होकर यत्नशील हों और जिन्होंने व्रतों को पालन करने के लिए ऐसा तेज कर डाला है कि किसी भी प्रकार का विघ्न उनके सामने छिन्न भिन्न हो जाता है। उदाहरण के लिए प्रदीप्त हुई अग्नि में डाली गई समिधा का उदाहरण ले सकते हैं। सूखी समिधा को अग्नि, अपने रूप में कर लेती है। समिधा भी यह नहीं सोचती कि उसमें जल जाना है, परन्तु वह तो यह सोचती है कि जैसा अग्नि चमकदार है, वैसा उसे भी चमकदार हो जाना है। यदि उस समिधा में गीलेपन के कारण अपने आपको पृथक रखने के लिए पूर्ण समर्पण का भाव न हो, तो वहाँ धुंआ पैदा हो जावेगा और जब तक अहंकार रूपी समिधा का गीलापन दूर नहीं हो जायगा, तब तक वह समिधा, अग्नि की तेज को धारण नहीं कर सकेगी। प्राचीन परिपाटी में, शिष्य सूखी समिधा हाथ में लेकर किसी महान गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए जाया करता था। सूखी समिधा लेकर गुरु के सामने उपस्थित होना यह समर्पण का भाव है।
वेद में कहा है “यज्ञो वै श्रेष्ठतमम् कर्म” इस वाक्य में यज्ञ को सब कर्मों से अधिक उत्तम कर्म कहा है। यहाँ पर विचारणीय है कि सब कर्मों से अधिक उत्तम कर्म यज्ञ किस प्रकार है? राष्ट्र निर्माण के स्वरूप पर विचार करते हुए प्रतीत होता है कि व्यष्टि अपने आप को समष्टि के लिए अर्पण किये हुए हैं। परिवार का एक−एक व्यक्ति अपने आपको परिवार की समष्टि आत्मा की उन्नति के लिये समर्पण करता है। एक−एक परिवार अपने ग्राम की समष्टि आत्मा की उन्नति के लिए अपने आपको समर्पण करता है। इसी प्रकार एक−एक ग्राम अपने आपको प्रान्त की समष्टि आत्मा कीं उन्नति के लिये समर्पण करता है। इसी प्रकार सब प्रान्त मिलकर अपने आपको राष्ट्र की समष्टि आत्मा की उन्नति के लिये समर्पण किये हुए हैं। इसी प्रकार सब राष्ट्र मिलकर अपने आपको विश्व की समष्टि आत्मा की उन्नति के लिये समर्पण किये हुए हैं। यह अर्पण का भाव, जिससे सारे विश्व की उन्नति होती है, श्रेष्ठतम यज्ञ कर्म है। यह महा समष्टि आत्मा, जिसमें छोटी छोटी सब समष्टियाँ सम्मिलित हैं, गीता में बतलाया गया उत्तम पुरुष वाच्य, अहम् शब्द से कहा गया, श्रीकृष्ण परम तत्व है। इसी परम तत्व को लेकर अर्जुन को कहा है कि जो कुछ तू करता है, खाता पीता है या तप करता है या दान करता है या हवन करता है, वह सब मेरे अर्पण करदे अर्थात् उस समष्टि आत्मा के अर्पण करदे, जिसका तू अंग है। प्रत्येक मनुष्य को कुछ भी ज्ञान एवं कर्म करते हुए यह ध्यान रखना चाहिये कि उसके मन, वचन और शरीर से ऐसा तो कुछ नहीं होता, जिससे, उसके राष्ट्र की एवं समष्टि आत्मा की हानि होती हो। इस प्रकार यज्ञार्थ कर्म करते हुए कर्त्तव्य बुद्धि से अपना कार्य करता है, किसी प्रकार की भावना से बद्ध हुआ कार्य नहीं करता, भावना से बद्ध होकर कार्य करने से संग दोष पैदा हो जाता है, जिसके कारण यज्ञ श्रेष्ठतम कर्म नहीं करता। इसी भाव को गीता में कहा है:—
यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयम् कर्मबंधनः। तदर्थम् कर्म कौन्तेय मुक्त संगत्समाचर॥
इसी श्रेष्ठतम यज्ञ को पवित्र कारक कहा है।
“यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्”
उपरोक्त लेख से स्पष्ट विदित होता है कि यज्ञ का महत्व समर्पण में छिपा है। यज्ञ के महत्व को समझते हुए अहम् भाव से रहित होकर समर्पण बुद्धि के साथ अपना कर्त्तव्य कर्म करने की मनुष्यों को आदत डालनी चाहिये।
यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म।
यज्ञ ही श्रेष्ठ कर्म है। क्योंकि यज्ञों द्वारा मनुष्य ब्रह्म साक्षात्कार की पात्रता प्राप्त कर सकता है और ब्रह्म साक्षात्कार ही तो मनुष्य जीवन का अन्तिम ध्येय है। ‘महायज्ञैः यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः’ यज्ञ की उत्पत्ति ब्रह्म से ही है। आदि पुरुष परमात्मा ने सृष्टि रचना यज्ञ से ही की और उसी से वेदों के ज्ञान को प्रगट किया जो यज्ञ पूर्ति का साधन बना। ‘तस्माद् सर्व हुतः ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छंदासि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्त त्माद जायत।
यजु॰ 1−7
ऐहिक एवं पारलौकिक सब प्रकार के सुखों का साधन एक मात्र यज्ञ ही है। व्यक्ति एवं समष्टि की उन्नति यज्ञ द्वारा ही सम्पन्न हो सकती है। यज्ञ के महात्म्य को हमारे पूर्वजों ने समझा था। उनके यज्ञ मय जीवन की धाक सारे विश्व में थी। वे सच्चे नेता थे, मानव के पथ प्रदर्शक बने, विश्व भर के कौने 2 से मनुष्य आ आकर अपने कर्तव्य का पाठ ले जाते थे। समय का परिवर्तन हुआ, हमने यज्ञ को भुला दिया, अपना बल, वैभव, विद्या, एवं ऐश्वर्य सभी कुछ खो दिया, यहाँ तक कि दासता की जञ्जीरों में जकड़े गये।
संसार का सारा खेल मन के ऊपर निर्भर है। मन की संस्कृत अवस्था से मनुष्य जीवन को सफल बना कर आनन्द का उपभोग कर सकता है और यदि मन विकृत हुआ तो जीवन को अन्धकार मय बना कर नारकीय यातनाओं का घर बना देगा। ‘मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्धमोक्षयोः’
जीवन के इतने उपयोगी साधन मन के संस्कार का एक मात्र उपाय यज्ञ ही है। इसीलिए यज्ञोपदेष्टा ऋषि ने आदेश दिया “मनो यज्ञेन कल्पताम्”
मन के पश्चात् इन्द्रियों का नम्बर आता है। इन्द्रियों के अविकल एवं पुष्ट होने पर ही तो जीवनचर्या सुचारु रूपेण चल सकती है। इन्द्रियाँ जब बल हीन होने लगती हैं तो मनोवांछित कार्यसिद्धि होने में अन्तराय उपस्थित होने लगते हैं। इन्द्रियों के आश्रित शरीर की भी अधोगति हो जाती है। कर्म सभी लुप्त हो जाते हैं, क्योंकि “शरीर माघं खलु धर्म साधनम्” इन्द्रियों की पुष्टि भी यज्ञ से ही सम्भव है। ऋषियों ने अनेक प्रकार के ऐसे यज्ञों का वर्णन किया है जिनके द्वारा इन्द्रियाँ स्वस्थ एवं बलवती बनती हैं “दुघ्नायजेत इन्द्रिय कामः” अर्थात् इन्द्रियों की पुष्टि की कामना वाला मनुष्य दही से यज्ञ करे। आर्षवाक्य इस कथन की पुष्टि करता है । लगभग 35 वर्ष पूर्व आस्ट्रेलिया के निवासियों का स्वास्थ्य जब विकृत होने लगा तो उन्होंने विश्व के चिकित्सा विशेषज्ञों का अपने यहाँ अधिवेशन कराया और बिगड़े हुए स्वास्थ्य का निदान कराया। उन सब ने एक मत हो कर दही के विशेष प्रकार के संस्कार के उपयोग का उन्हें आदेश दिया, परिणामतः वे स्वस्थ बने। यही संस्कार तो यज्ञ में किया जाता है। हम भारतीयों को अब अपने ऋषियों पर आस्था नहीं रही। पाश्चात्यों के वचनों को प्राप्त वाक्य मानने लगे। ऐसी अवस्था का यही कारण है कि हम लोग अब यज्ञ विधि को भूल गये। विनियोग की अज्ञानता से यज्ञ की पूर्णता तो नहीं हो सकती। संसार तो उपयोगिता वादी है चमत्कार के पीछे दौड़ता है। भारतीय याज्ञिकों को अपना उत्तरदायित्व समझना चाहिये।
चिकित्सा का सर्वोत्तम साधन यज्ञ ही है। यज्ञ में औषधियों का संस्कार किया जाता था, जिससे उनमें दिव्यता आती थी। इस प्रकार के यज्ञों को भैषज्य यज्ञ कहते हैं जो आयुर्वेद से सम्बन्ध रखते हैं। शत पथ ब्राह्मण में लिखा है “भैषज्य यज्ञा वा एते ऋतु सन्धिषु व्याधिर्जायते तस्मादृतु संधिषु प्रयुज्यते” अर्थात् भैषज्य यज्ञों का प्रयोग ऋतु सन्धियों में होता है क्योंकि ऋतु सन्धियों में व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। भैषज्य यज्ञों से राज यक्ष्मा जैसे रोग से मुक्ति मिलती है और स्वस्थ व्यक्ति विशेष बलवान बन जाता है। औषधियों के संस्कार के अनेकों उदाहरण वेदों में मिलते हैं।
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धि पुष्टि वर्धनम्।
उर्वा रुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
यजु॰ 3—60—
अर्थात् सुगन्धि और पुष्टि के बढ़ाने वाली तीनों अम्बिकाओं (अम्बा, अम्बिका, अम्बालिका जड़ी विशेष) को हवक करता हूँ जिससे मृत्यु के दुःख से उसी तरह छूट जाऊँ , जिस तरह पका हुआ फल अनायास अपने बंधन से छूट जाता है परन्तु मोक्ष से न छूटूँ
बल बुद्धि के साथ साथ यज्ञों से सुसंतान की प्राप्ति होती है। इतिहास इसका साक्षी है प्राचीन काल में पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा मन चाही संतति मिलती थी। राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा ही चार पुत्र रत्न प्राप्त किये थे। जिनके पुत्री ही होती हों वे पुत्र प्राप्ति के लिये अथर्व वेद में लिखी औषधि का यज्ञ में संस्कार करें।
शमीमश्वत्थ आरूढ़स्तत्र पुंसवनं कृतम्।
तद्वै पुत्रस्य वेदनं तत्स्त्रीष्वा भरा मीस॥
अथर्व 6−11−1
अर्थात्—शमी वृक्ष पर उगे हुये वट वृक्ष की जड़ को लेकर पुँसवन संस्कार के दिन से कुछ दिन गर्भवती स्त्री को पानी में पीस कर पिलावे तो पुत्र उत्पन्न होगा।
राज्य संगठन एवं सार्वभौम राज्य की प्राप्ति का मुख्य साधन यज्ञ ही है। शत पथ ब्राह्मण में लिखा है कि “राष्ट्र वै अश्वमेधः तस्माद्राष्ट्री अश्वमेधेन यजेत अश्वमेधयाजी सर्व दिशो अभिजयन्ति” अर्थात् राष्ट्र ही अश्वमेध है। इसलिये राष्ट्रवादी को अश्वमेध करना करना चाहिये क्योंकि अश्वमेध करने वाला समस्त पृथिवी को जीत लेता है। इसी प्रकार राजसूय यज्ञ से राजा होता है। यह राजगद्दी के समय का यज्ञ है जिससे राज्य की स्थिति पुष्ट हो जाय।
“राज्ञः एव सूर्य कर्म। राजा वै राजसूयेन इष्ट्वा भवति” शतपथ 13−2−2−1
पृथिवी को उर्वरा बनाने नई भूमि तैयार करने के लिये तथा धन सम्पत्ति के निमित्त गोमेध यज्ञ किया जाना चाहिये। दुष्ट शत्रुओं को पराजित करने के लिये श्येन योग का विधान है “श्येनेनाभिचरन्यजेत” वाक्य इस कथन की पुष्टि करता है।
पशुओं की वृद्धि का उपाय भी यज्ञ ही है “उद्भिदा यजेत् पशुकामः” अर्थात् पशुओं की कामना वाले को उद्भिद् यज्ञ करना चाहिये। इसी प्रकार पशुओं की कातना की सिद्धि के लिये अन्य प्रकार के यज्ञों का भी विधान है “चित्रया यजेत पशुकामः” इत्यादि इत्यादि आर्य वाक्य इसमें प्रमाण है।
अवर्षण से दुर्भिक्ष पड़ जाता है उसके हटाने के लिये वर्षा कराने का सफल साधन यज्ञ ही है। “निकामे निकामे पर्जन्यो वर्षतु” वेद वाक्य इस बात को स्पष्ट करता है कि आर्य याज्ञिक जब चाहते थे तभी वर्षा करा लेते थे। राजा जनक ने कारीरी यज्ञ के द्वारा वर्षा कराई थी। इतिहास इसका साक्षी है। पानी बरसाने वाले यज्ञों में उनचास प्रकार के पवनों का अधिक विचार किया जाता है। इसका वर्णन ऋग्वेद के 10 वें मण्डल के शान्तनु सूक्त में विशद रूपेण किया गया है। वेदों में इन्द्र और वृत्र के अलंकारों से यानी सम्बन्ध रखने वाली अनेक सूक्ष्म बातें बतलाई गई हैं।
दिव्य सुखों की प्राप्ति का एक मात्र साधन यज्ञ ही है। “दर्शपूर्णमासाभ्याँ स्वर्गकामो यजेत”
“ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामोयजेत” आदि यज्ञ सम्बन्धी आर्षवाक्यों से सिद्ध होता है कि यज्ञों से स्वर्ग प्राप्ति का अनुपम साधन आर्यों ने भगवत् कृपा से प्राप्त कर लिया था। इससे भी आगे उपासना यज्ञ द्वारा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग भी याज्ञिक जानते थे। पुरुष सूक्त में स्पष्ट ही वर्णित है कि।—
“यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ते हनाकं माहेमानः सचन्त यत्रपूर्वे साध्याः सन्तिदेवाः।
अर्थात् देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ किया, जो प्रथम धर्म था। वे उसी से उस महान् स्वर्ग को गये, जहाँ पूर्व काल के वेदर्षि गये हैं।
ऊपर लिखित सिद्धियों के प्राप्त हो जाने पर मनुष्य अपने जीवन में परम संतुष्ट हो जाता है, कोई कामना शेष नहीं रह जाती और कामना नहीं रहने से तो मोक्ष प्राप्ति होती है।
(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम. ए. एल. टी.)
प्रायः देखा जाता है कि मनुष्य अधिकार बाह्य जगत में प्रेरणा का सहारा ढूंढ़ता रहता है। देवी−देवताओं की मनौती मानता है और एक या अनेक देवी−देवताओं को अपना सहायक बना लेता है। फिर भी काम नहीं होता और बाहर से किसी प्रकार का प्रोत्साहन प्राप्त नहीं होता, तो निराश होकर हिम्मत हार कर बैठ जाता है। यह स्थिति बड़ी ही दुःखद और चिन्ता जनक होती है। परन्तु इस चिन्ता का कारण मनुष्य स्वयं है। यह स्थिति क्षण मात्र में बदल सकती है, यदि हम स्वयं अपने आप अपने अन्दर से प्रेरणा लें।
हमारा आत्म−विश्वास और आत्म बल ही हमारी आन्तरिक प्रेरणा का मूल आधार है। दूसरों को हममें क्या विशेष दिलचस्पी हो सकती है? अतः उनके सहारे ही पड़ा रहना नासमझी तथा मूर्खता है। देवी देवता भी प्रत्यक्ष रूप से किसी की सहायता नहीं करते। वे तो वास्तव में केवल मनुष्य के आत्मा की गाड़ी हाँकते हैं अर्थात् जो आदमी अपना आत्मबल लगाकर उद्योग करता है, वे उसकी शक्ति को उद्दीप्त करते रहते हैं। जो स्वयं अपने रास्ते पर चलता रहता है, वे उसकी आत्मा में धैर्य तथा विश्वास का बल भर देते हैं। बैठे हुए आदमी को कन्धे पर रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचाने का व्यवसाय वे नहीं करते।
हमारा सबसे बड़ा देवता आत्म−बल ही है। हमें चाहिये कि उसी को पुकारें। वह उठता है, तो मनुष्य की सहायता के लिये परमात्मा उठ खड़ा होता है, क्योंकि आत्मा, परमात्मा का ही संक्षिप्त रूप है। “अहं ब्रह्मास्मि” [मैं ही ब्रह्म हूँ] के सिद्धान्त को याद रक्खो। अपने को निर्बल क्यों समझते हो? जो शरीर ईश्वर को धारण करता है, वह निर्बल कैसे हो सकता है? उसमें अपरम्पार बल है, उसको खोज निकालो। अपनी शक्ति और आत्म−बल पर पूर्ण विश्वास रक्खो। नित्य प्रति अपने को आत्म संकेत दिया करें कि “मैं बलवान हूँ, दृढ़ संकल्प हूँ, मुझमें असीम बल है, मुझे अवश्य सफलता मिलेगी।” आत्म बल बढ़ाने में सफलता जादू का प्रभाव रखती है।
एक सफलता से मुझे दूसरी से तीसरी, तीसरी से चौथी के लिए प्रेरणा मिलती है इस प्रकार जीवन में सफलता का क्रम चलता रहता है। छोटे छोटे कामों में सफलता प्राप्त कर हमें धीरे धीरे अधिक बड़े और कष्ट साध्य कामों में सफलता प्राप्त करने के योग्य बन जाते हैं और साथ ही साथ हमारा आत्म बल भी बढ़ता है। यदि कभी जरासी भी निराशा की झलक आये या शिथिलता मालूम पड़े तो हम हताश न होकर अपने किसी इष्ट देव या देवी का सहारा ले सकते हैं। परन्तु पहले अपने ही पुरुषार्थ पर पूर्ण विश्वास कर आगे बढ़ना होगा। फिर इस बात पर विश्वास कर आगे बढ़ना होगा। फिर इस बात पर विश्वास कीजिये कि आप अकेले नहीं बल्कि आपके प्राण के पीछे आपके इष्ट देव देवी भी सहायक हैं। जीवन की गाड़ी के अटकने पर आत्म−बल ही पहला देवता है जो बुलाने पर आकर उसको संकट के दलदल से निकाल सकता है। उस देवता के खड़े होने पर सारी देव सेना सहायता के लिये आ जाती है, क्योंकि सब देवता एक दूसरे के मित्र होते हैं, परस्पर सहायक होते हैं। वास्तव में सब देव शक्तियों की जननी हमारी आत्मा ही है। आत्म−बल ही देव बल। इसे जागृत कर जीवन को सफल बनाइये।
(श्री लालजी राम जी शुक्ल)
मनुष्य की मानसिक शक्तियाँ बिखरी रहती हैं। अतएव उनका साक्षात्कार करना कठिन होता है। इसके परिणाम स्वरूप उसका मन अनेक विषयों में फस जाता है। जब मन बाह्य विषयों में एक बार फस जाता है, तो मनुष्य उनसे मुक्त होने की चेष्टा जितनी ही करता है, मन और भी फँसता जाता है। विषयों का अधिक चिन्तन करने तथा मानसिक अन्तर द्वन्द्व के कारण मन की सारी शक्ति का ह्रास हो जाता है और तब मनुष्य अशान्त रूप हो जाता है।
हमारी आध्यात्मिक शक्तियों का विकास अपने आप को बाह्य विषयों से मुक्त करके अपने आप में ही केन्द्रित करने से होता है। निर्मल मन ही शक्ति शाली होता है। बाह्य विषयों में फँसा मन शक्ति शाली कदापि नहीं हो सकता। जिस व्यक्ति का मन जितना ही उद्विग्न होता है वह उतना ही शक्ति हीन होता है। जो व्यक्ति का साक्षात्कार कर सकता है। आत्मा की शक्ति का साक्षात्कार कर सकता है। आत्मा की शक्ति का साक्षात्कार कर सकता है। आत्मा की शक्ति कर साक्षात्कार करने के लिए पहली आवश्यकता अपनी इन्द्रियों को वश में करने की है। जहाँ जहाँ इंद्रियां जावें अथवा आकर्षित हों वहाँ−वहाँ से मन को रोकना चाहिये। इसके लिये मनुष्य को सदा जागरुक होकर रहना पड़ेगा। विद्वान से विद्वान व्यक्ति का मन इन्द्रियों के द्वारा चलित हो जाती है। इन्द्रियों के विषय सामने रहने पर अपने मन को रोकना बड़ा पुरुषार्थ है। पर इस प्रकार का पुरुषार्थ अभ्यास−द्वारा सिद्ध हो जाता है।
जिस प्रकार इन्द्रियों के विषयों से मन को रोकना आवश्यक है उसी तरह मन को प्रबल संवेगों से रोकना आवश्यक है। प्रत्येक प्रकार का मानसिक विचार मन की−शक्ति का विनाश करता है। यदि हम अपनी शक्ति का संक्षय करना चाहते हैं तो मानसिक विकारों से मुक्त होना अत्यन्त आवश्यक है। शाँत मन में ही शक्ति का उदय होता है।
जब मन शान्त हो जाय तो मनुष्य को उसे स्वरूप के बारे में चिन्तन करने में लगाना चाहिये। शान्त अवस्था में मनुष्य जैसा अपने विषय में विचार करता है वह वैसा ही अपने आप को पाता है। किसी भी प्रकार का निश्चय जब किसी−प्रकार के संशय से दूषित नहीं होता तो फलित होता है। कितने ही लोग किसी विशेष प्रकार की शक्ति की प्राप्ति के लिये मन्त्र, जप अथवा यज्ञ आदि करते हैं। ये सब क्रियाएं अपने निश्चय को दृढ़ करने के लिये आवश्यक हैं। निश्चय की दृढ़ता ही सफलता की कुञ्जी है।
मानसिक शक्ति के विकास के लिए अपने आप को सदा परोपकार में लगाये रहना आवश्यक है। स्वार्थ के कार्यों में लगे हुए व्यक्ति की शक्ति का ह्रास, चिन्ता, भय, संशय आदि मनोवृत्तियों के कारण हो जाता है। परोपकार की भावना इन मनोवृत्तियों का विनाश करती है। जो मनुष्य जितना ही अधिक अपने स्वार्थ से मुक्त रहता है उतना ही अधिक उसमें संकल्प की सफलता लाने की शक्ति का उदय होता है। अपने मन को परोपकार में लगाना स्वयं के बृहत् रूप को पहचानना है। इस बृहत् स्वरूप में सभी संकल्पों की सिद्धि करने की शक्ति है। अपने व्यक्ति गत स्वार्थ के विषय में सोचना ही मानसिक पतन है। मानसिक शक्तियों का विकास प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ने से भी होता है। जो व्यक्ति जितना अधिक किसी सिद्धान्त के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करता है वह उतना ही अधिक अपने मन को दृढ़ बनाता है। मानसिक दृढ़ता आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए परमावश्यक है। जो व्यक्ति प्रतिकूल परिस्थितियों से डर जाता है उसे कहीं चैन नहीं मिलती। बहुत सी−कल्पित होती हैं। इनकी भयानकता मन की दुर्बलता के कारण बढ़ जाती है। डरपोक को छाया भूत के रूप में दिखाई देती है। यदि ऐसा मनुष्य साहस कर उस छाया के पास जाय तो भूत का भय मिट जाता है।
अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को विकसित करने के लिये सच्चा व्यवहार व विचार रखना आवश्यक है। जो व्यक्ति जितना ही अधिक साँसारिक व्यवहारों में कुशल होता है वह उतना ही आध्यात्मिक ज्ञान के लिए अनुपयुक्त होता है। ऐसे व्यक्ति का मन सदा संशययुक्त होता है। वह न किसी दूसरे व्यक्ति की बातों पर विश्वास करता है और न स्वयं पर। यदि ऐसे व्यक्ति के मन में कोई भला विचार आ जाय तो उसके फलित होने में उसे विश्वास नहीं होता। संशययुक्त मन रहने के कारण ऐसा व्यक्ति अपने सभी मित्रों को खो देता है। उसे संसार शत्रुओं से भरा दीख पड़ता है। जैसा वह दूसरे लोगों को धोखा देता है, वैसा ही वह जानता है कि दूसरे लोग भी उसे धोखा देंगे। वह कुचिन्तन में ही अपना समय व्यतीत करता है। इस तरह के कुचिंतन में ही अपना समय व्यतीत करता है। इस तरह के कुचिंतन से उसका आध्यात्मिक बल नष्ट हो जाता है और वह दुःख में डूब जाता है।
मानसिक शक्तियों के विकास के लिए भोले स्वभाव का होना ही श्रेयस्कर है। अंग्रेजी में कहावत है कि शैतान गधा होता है। यह कहावत चतुर लोगों की मूर्खता को प्रदर्शित करती है। जो मनुष्य बाहर—भीतर एक रूप रहता है, वास्तव में वही अपने स्वरूप को पहचानता है। यदि मनुष्य अपने विचार और व्यवहार में सत्यता ले आवे तो उसका आचार अपने आप ही उच्च कोटि का हो जावे। जो व्यक्ति अपने किसी प्रकार के दोष को छिपाने की चेष्टा नहीं करता उसके चरित्र में कोई दोष भी नहीं रहता। पुराने पापों के परिणाम भी सच्चाई की मनोवृत्ति के उदय होने पर नष्ट हो जाते हैं। ढका हुआ पाप लगता है, खुला पाप मनुष्य को नहीं लगता। जो स्वयं को जितना अधिक सोचता है वह उतना ही अधिक अपने आप को पुण्यात्मा बनाता है। ऐसा ही व्यक्ति दूसरी आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करता है।
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
यह ध्यान में रखने की बात है कि भक्ति —साम्राज्य में रूप−रंग−लिंग−वर्ण आदि किसी का भी भेदभाव नहीं होता। महर्षि शाण्डिल्य भी अपने सूत्र से कहते हैं “छोटी जाति के स्त्री−पुरुषों को भी भक्ति का समान अधिकार है।” एक पक्का गिरहकट, सब से बड़ा पापी और दुष्ट नर−संघाती भी व्यक्ति का अभ्यास कर सकता है। किसी को भी भक्ति के लिये निराश होने का मौका नहीं है। भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं—”यदि कोई घोरतम पापी भी मुझे हृदय से प्रेम और श्रद्धा के साथ पूजता है, तो वह भी सच्चे−संकल्प वाला ही है, कारण कि उसने दृढ़ता से सत्य−पथ ग्रहण कर लिया है। शीघ्र ही वह कर्तव्यनिष्ठ होकर आन्तरिक शान्ति प्राप्त कर सकता है। हे कौन्तेय! यह तुम निश्चय जानो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता। हे पार्थ! जो मेरी शरण में आते हैं, चाहे वे कितने ही पापी हों और चाहे वैश्य−शूद्रादि कुछ भी हों, शीघ्र ही सच्चे पथ पर आरुढ़ होते हैं।”
यदि किसी चाण्डाल के हृदय में भक्ति हो तो वह भी प्रभु का सान्निध्य प्राप्त कर सकता है। दक्षिण−भारत के चिदम्बरम् नामक स्थान में एक नन्दन (जो बहुत ही उच्च जाति की शेखी मारने वाले व्यक्तियों की दृष्टि में बहुत अधिक नीच−जाति का था)नायक भक्त हो गया है, जिसे अपने प्रभु भगवान् नटराज के साक्षात् दर्शन हो चुके हैं। अब भी मद्रास प्रान्त के भागवत उक्त भक्तराज की कथा बड़े चाव से कहा करते हैं।
तिरुकुरल नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ का निर्माता तिरुवलवार अत्यन्त नीच जाति का था। सन्त दादू जाति का जुलाहा था। ऐसा ही भक्त कबीर था। अव्वयर (जो एक कुमारी थी और बहुत उच्च श्रेणी की भक्त थी) एक नीच जाति की थी; वह श्रीराम की बड़ी भक्त थी। गुह−निषाद भी तो नीच जाति का था। वह भगवान् श्रीरामचन्द्र जी का बड़ा भक्त था। जब श्रीराम वनवास को पधारे थे तो भक्त गुह−निषाद ने उनका कितने प्रेम से स्वागत किया था? भगवान् श्रीराम ने भी स्वच्छन्द और प्रसन्नचित्त से उसकी आवभगत एवं पूजा स्वीकार की थी। गुह−विषाद तो अपने प्रभु भगवान् श्रीराम का सखा बन गया और उनसे बराबर मित्रता का व्यवहार करने लगा। रविदास, एक प्रसिद्ध भक्त, नीच जाति का था। शबरी, जो भीलनी थी, भगवान् श्रीराम की बड़ी भक्त थी। उसने अपने प्रभु भगवान् श्रीराम को अपने जूठे बेर तक खिलाये थे। साधना, जो कसाई थी, भक्त थी। स्त्रियाँ भी भगवान् का सान्निध्य प्राप्त कर सकती हैं। कारण कि उनका हृदय बड़ा कोमल और स्वभावतः प्रेम पूर्ण होता है। वे पुरुषों से अधिक भगवद्भक्ति कर सकती हैं। उनके चित्त में स्वभाव से ही स्नेह−वृत्ति रहती है।
सुरदर्जि जो भगवान् की बड़ी प्रसिद्ध भक्त थी, एक बार अपने स्वसुर के साथ श्री वृन्दावन के जंगलों में भगवद्दर्शन के लिये गई। वहाँ एक स्थान पर जब वह अपनी समाधि में तल्लीन थी, तब एक मुसलमान आया और उसने अपनी काम−वासनापूर्ण करनी चाही उसी समय उसके प्रभु एक शेर के रूप में वहीं प्रकट हुए और तत्क्षण ही उस दुष्ट मुसलमान का भक्षण कर गये। भगवान् अपने भक्त की सर्वदा रक्षा करते हैं। यदि कोई भक्त सच्चे हृदय से भगवान् को अपना आत्म−समर्पण कर उन्हीं के ध्यान में लगा रहे, तो वे उसके अहिर्निश क्षेम के दायित्व को अपने ऊपर ले लेते हैं। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। अतः प्रत्येक व्यक्ति भगवद्भक्ति द्वारा भगवान् का भक्त हो सकता है।
एक उच्च−श्रेणी का भक्त कहता है−“मैं अपने प्रियतम प्रभु से कुछ नहीं चाहता। मेरी तो यही कामना है कि मेरा मन सर्वदा उनके पावन चरणकमलों में ही लगा रहे। मेरी आत्मा सदैव ही उनके निकट रहे।” यदि एक भक्त एक बार भी भगवत्प्रेम के रस का स्वाद ले लेता है। तो फिर वह भगवान् से और चाहना ही क्या कर सकता है?
भक्त बालक ध्रुव ने जंगल में बैठ कर भगवान श्रीहरि के चिन्तन द्वारा उनका दर्शन प्राप्त करके यह कहा था−”मैं राज्य नहीं चाहता, मेरे पास मेरे परम प्रियतम अब मौजूद हैं। श्रीहरि के साक्षात् दर्शन करके अब मेरी समस्त आकाँक्षायें तृप्त हो गईं। मेरे चित्त में किसी साँसारिक वस्तु की चाह नहीं है।”
(कुमारी भारती)
—यह ठीक है कि तुम बहुत पुस्तकें पढ़ते हो। विद्वान् और प्रतिष्ठित हो यह भी ठीक है। परन्तु चाहे तुमने कितने ही बड़े−बड़े ग्रन्थ पढ़े हों तब भी जब तक तुमने अन्दर की किताब नहीं पढ़ी तब तक अनपढ़ ही हो। इसलिए तुम अन्दर की किताब पढ़ो।
—एक पहुँचे हुए सन्त महात्मा की प्रशंसा सुनकर एक बार कालेज के एक प्रोफेसर महोदय दर्शन के लिये उनके पास पहुँचे। महात्मा आनन्द के साथ अपनी कुटिया में बैठे थे, उनकी मुख−मुद्रा शान्त और प्रसन्न थी जिससे यह स्पष्ट प्रतीत होता था कि यह पहुँचे हुए सन्त हैं। प्रोफेसर जी ने सन्त से पूछा “आपने उपनिषद्, गीता और अन्य ग्रन्थ पढ़े हैं? आपने वेदों का और दर्शनशास्त्रों का अध्ययन किया है?” प्रश्न को सुनकर महात्मा जोर से हँसा और बोला—”बाबा अन्दर की किताब पढ़ो इस उत्तर में स्यष्टोक्ति और सत्य है। प्रोफेसर जी की इच्छा सन्त से आत्मा, परमात्मा और मोक्ष के बारे में शास्त्रार्थ अथवा चर्चा करने की थी परन्तु उसने उत्तर ने प्रोफेसर जी की इच्छा पूरी न होने दी।
—तुम कुछ किताबें बाहरी आँखों से पढ़ लेने भर से अपने आपको इस योग्य मान रहे हो कि तुम्हें ब्रह्म और अध्यात्म के बारे में चर्चा करने का अधिकार है। यह तुम्हारी भूल है।
—अध्यात्म-चर्चा का सबको अधिकार है। इसके साथ ही यह भी सत्य है कि अध्यात्म-चर्चा का वही अधिकारी हो सकता है जिसमें प्रपत्ति अर्थात् ईश्वर शरणागति की भावना जागृत हो गई है। भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश तब सुनाया है, जब उसने अपने आपको भगवान के चरणों में अर्पण कर दिया। “शिष्यस्तेऽहं शाधिमां त्वां प्रपन्नम्।”
—जो मनुष्य अपनी विद्या अथवा पुस्तक−ज्ञान के बल पर अभिमान करता है वह अध्यात्म से बहुत दूर है। इस अभिमान को निर्मूल करने के लिए अन्दर की किताब पढ़ो।
—इस किताब को पढ़ने के लिये तुम्हें बाहर की आँखें बन्द करनी होंगी और साथ ही जागृत रहना होगा। यदि बाहर को आंखें बन्द करने पर तुम सो गये तो तुम्हारा उद्देश्य पूरा न होगा। अन्दर की किताब को पढ़ने के लिए अधिक जागरुकता की आवश्यकता है। अन्दर और बाहर की किताब में एक स्पष्ट अन्तर है, बाहर की किताब पढ़ते−पढ़ते तुम थक जाते हो उसमें न्यूनता की इच्छा और आवश्यकता रहती है। अतः अन्दर की किताब यदि तुमने एक बार पढ़ली तो और सब फीका लगेगा तथा इस किताब से तुम कभी नहीं छोड़ेंगे। इसी किताब को पढ़ते−पढ़ते ईसामसीह खुशी से सूली पर लटक गये। भगवान् बुद्ध ने बोधिवृक्ष के नीचे बैठे−बैठे छह वर्ष, छह क्षण के समान समझ कर बिताये। ऋषि दयानन्द ने विषपान करके मृत्यु के समय ‘ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो’ का जो नारा बुलन्द किया था उसका भी कारण यही था।
—वृद्ध और क्षीणकाय विनोबा आज पैदल एक ग्राम से दूसरे ग्राम में घूम रहा है, वह भी अन्दर की ही किताब को पढ़ रहा है।
—अन्दर की यह किताब अनेक जन्मों में पूरी होती है। भगवान् कृष्ण ने जो “अनेक जन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्” कहा है उसका भी यही अर्थ है।
—जो व्यक्ति इस मार्ग का जिज्ञासु भर है, वह भी बाहरी किताबों के ढेरों पढ़ने वालों से उत्तम है। “जिज्ञासुरपि योगस्य शब्द ब्रह्माऽति वर्वते” गीता।
—जो पुस्तकें तुम्हारे इस कार्य में अर्थात् अन्दर की किताब पढ़ने में सहायक हों उनको भी अपना सहायक समझो। इतना तो निश्चित समझो−तुम्हारी सफलता इसी में है कि मानव शरीर प्राप्त करके तुम अन्दर की किताब को पढ़ो।
संसार के महापुरुष और संत महात्मा तथा शास्त्र, इस सत्य के साक्षी हैं। विश्वास करो। अन्दर की किताब पढ़ो।
(पं. राजकिशोर मिश्र, पटियाली)
यज्ञ की शक्ति अनन्त है। उसके द्वारा कठिन और असम्भव कार्य भी सम्भव हो सकते हैं। राजा त्रिशंकु का वृत्तान्त ऐसा ही है, उसने शरीर समेत स्वर्ग जाने की इच्छा की और यज्ञ शक्ति के प्रभाव से वह कार्य सफल भी हुआ। किन्तु केवल यज्ञ−हवन ही पर्याप्त नहीं है, उसके लिए गुरुजनों का सद्भाव और आशीर्वाद भी आवश्यक है। त्रिशंकु ने वशिष्ठ और उनके पुत्र को रुष्ट करके यही भूल की थी, फलस्वरूप वह अभीष्ट प्रयोजन के पुण्य फल को खो बैठा।
महाभारत में त्रिशंकु का वृत्तान्त इस प्रकार है:—
जब त्रिशंकु ने वशिष्ठ जी से कहा कि हम कोई ऐसा यज्ञ करना चाहते हैं जिससे शरीर सहित देवताओं के रहने योग्य स्वर्ग को चले जायें। इस प्रश्न को सुनकर वशिष्ठ जी बोले।
अशक्यमितिचाप्युक्तो वशिष्ठेन महात्मना॥ प्रत्याख्यातो वशिष्ठेन स ययौ दक्षिण दिशाम्॥
अर्थ—ऐसा नहीं हो सकता−वशिष्ठ जी ने ऐसा उत्तर पाकर त्रिशंकु दक्षिण दिशा को चले गये। वहाँ वशिष्ठ जी के पुत्र दीर्घतपा तप कर रहे थे। उनसे जाकर त्रिशंकु ने कहा कि मैंने यज्ञ की कामना से गुरुदेव वशिष्ठ जी को व्रती करने को कहा था सो उन महात्मा ने जवाब दे दिया, अतएव अब आप अनुग्रह करके यज्ञ कराइये। आप लोग कृपा करके मेरे यज्ञ को सिद्ध कर दीजिए जिससे मैं शरीर सहित स्वर्ग को चला जाऊँ, आपको ऐसा करना चाहिए।
इस प्रकार की बात सुनकर वशिष्ठ जी के पुत्र त्रिशंकु से बोले कि हे राजन्! तुम निर्बोध हो तुम अपनी पुरी को चले जाओ। हे राजन्! यह जानलो कि, हमारे पिता ही तीनों लोकों को या कराने में समर्थ हैं। हम पुत्र होकर किस प्रकार पिता का अनादर करें? उनके इस प्रकार के वाक्य सुनकर त्रिशंकु ने कहा कि आपके पिता जी ने भी हमें जवाब दे दिया और आपने भी, अब मैं और किसी के पास जाकर उनसे यज्ञ कराऊँगा। जब ऋषियों ने ऐसे कठोर वाक्य सुने और—
शेपुःयाम संक्रुद्धाश्चांडालत्वं गमिस्यसि॥ इत्युक्त्वा ते महात्मानोविवुशुः स्वं स्वमाश्रमम्॥
अर्थ—महा क्रोधित हो शाप दिया कि, तू चाण्डाल अवस्था को प्राप्त हो जा। यह शाप देकर वे महात्मा अपने−अपने आश्रम में प्रवेश कर गये।
चाण्डाल हो जाने के बाद वे विश्वामित्र मुनि से मिले और कहा कि आप मेरे अभीष्ट यज्ञ को पूरा कीजिये। इस प्रकार के वाक्यों को सुनकर विश्वामित्र जी ने त्रिशंकु से यज्ञ करवाया और कहा।
पश्य मे तपसो वीर्यं स्वार्जितस्य न नरेश्वरः॥ एषः त्वाँ स्वशरीरेण नयामि स्वर्ग भोजसा॥
अर्थ—मेरा तप बल देखो जो मैंने तपस्या से प्राप्त किया है। मैं अपने तप के प्रभाव से तुम्हें शरीर सहित स्वर्ग को पहुँचाऊँगा।
हे राजन्! यद्यपि शरीर सहित स्वर्ग में जाना सहज नहीं हैं किन्तु मेरी तपस्या के संचित फल के प्रभाव से तुम स्वर्ग को जा सकोगे। जो कुछ मेरी तपस्या का फल है, उसके प्रभाव से तुम स्वर्ग को जाओ।
विश्वामित्र जी के ऐसे कहते ही ऋषियों के देखते देखते त्रिशंकु शरीर सहित स्वर्ग को चले गये। स्वर्ग जाने पर सुरराज ने कहा—हे राजन्! तुमको वशिष्ठ गुरुदेव ने शाप दिया है इसलिये तुम नीचे को मुँह करके गिरो। तब गिरते हुए त्रिशंकु ने विश्वामित्र जी को देखकर ‘त्राहि त्राहि’ शब्द कहा। और विश्वामित्र जी ऐसे आर्तस्वर को सुनकर—
रोषमाहरयत्तीव्रं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत्॥ ऋषि मध्ये स तेजस्वी प्रजापतिरिवापरः॥
अर्थ—ऋषियों के बीच में वह तेजस्वी दूसरे प्रजापति की तरह महा क्रोधकर “कहीं रहो−वहीं रहो” यह वचन बोले और अपने तपोबल से त्रिशंकु को वहीं रोक दिया। तदनन्तर यज्ञ समाप्त होने पर ऋषि गण अपने अपने स्थानों को चले गये।
वशिष्ठ के शाप ने यद्यपि त्रिशंकु को स्वर्ग प्राप्त नहीं होने दिया, फिर भी महा याज्ञिक विश्वामित्र का तप इतना प्रचण्ड था कि उसने त्रिशंकु को अधः पतित होने से रोक लिया।
(श्री स्वामी प्रभु आश्रित जी महाराज)
यदग्ने स्यामहं त्वं, त्वं बाघास्याऽहं। स्युष्टे सत्या इहाशिषः॥ ऋ॰ 8।44।23
शब्दार्थ—(अग्ने) प्रकाश स्वरूप (यत् अहं त्वं स्याम्) जब मैं तू हो जाऊँ (बाघ) या (त्वं अहं स्यामः) तू मैं हो जाय (ते इह आशीषः) तेरे ये सभी आशीषों (सत्यः स्यु) सत्य हो जायें।
भावार्थ—हे प्रकाश रूप मेरे प्रभो! वह समय अब कितनी दूर है, जिस दिन अनन्त अपार प्रेम अम्बुधि में मिलकर मैं, तुम हो जाऊँगा, या तुम ही मैं हो जाओगे। जिस दिन इस सृष्टि में तेरी सारी कल्याणमयी आशीष भावना मानव−जीवन का सत्य बन कर चरितार्थ होगी!
यह भारतीय ऋषियों की दिव्य वाणी है, भक्त हृदय का सर्वोत्कृष्ट उद्गार है। जीवात्मा के अन्तर में अनादि काल से यही वाणी गुञ्जन कर रही है, जो संवेग की विशालता से स्फुटित होकर स्थूल, वेद वाणी धारण कर लेती है।
ईश्वर, आनन्द का केन्द्र है। सृष्टि के हेतु से जीव उनसे बिछुड़कर बहुत दूर नीचे उतर आया है। वह उस आनन्द केन्द्र से बहुत दूर चला आया है, पर अन्तर में उनके की वियोग की वेदना का सागर उत्ताल तरंगें उठाये जा रहा है। वह उस आनन्द केन्द्र से बिछुड़कर दुःखी बन गया है, उस चिदाग्नि से विलग होने के कारण, काला−कोयला बन रहा है। अभी यदि वह, उस सच्चिदानन्द के निकट चला गया तो यह कोयला रूपता, तुरन्त ही अग्नि का प्रचण्ड गोला और स्वयं अग्नि रूप ही बन जायगी। जितने भी साधन हम करते हैं, ये सारे के सारे उस दूरी को हटाने के लिए ही किये जाते हैं। यज्ञ, दान, तप, परोपकार−सत्संग आदि सभी उस दूरी को हटाने और सच्चिदानन्द भगवान को प्राप्त करने के साधन समूह हैं।
सैकड़ों—हजारों लोग कारावास में पड़े हैं और इसी भाँति अनेकों रोगी, चिकित्सालय में कराह रहे हैं। हम भी कैदी और रोगी हैं। वे शरीर के बन्धन में हैं, शारीरिक रोगों से उत्पीड़ित हो रहे हैं और हम,—प्रभु से दूरी हटाने की इच्छा रखने वाले साधक गण, अन्तर से बन्धे और आन्तरिक रोगों से छटपटा रहे हैं। पर, हम लोगों को उस कृपालु प्रभु को धन्यवाद करना चाहिए। हम साधना और सत्संग करने वाले बन्दियों और रोगियों पर, प्रभु की अपार करुणा, धारा वाही रूप में बरस रही है और हम उसे प्राप्त कर रहे हैं। ये सत्संगादि साधन, प्रभु की दया का प्रसाद ही है। सभी इसे कहाँ प्राप्त करते हैं?
अब हम प्रभु से एकीभूत होने के लिये जो कुछ हमारे पास है, उस पर एक सरसरी दृष्टि डाल लें और देखें कि इनमें कहाँ, क्या शक्तियां हैं।
यह शरीर। इसकी शक्ति बहुत सीमित है। आँखें कितनी भी अच्छी हों, पर एक सीमा तक ही देख सकती हैं। दीवाल के उस पार नहीं देख सकतीं। इसी भाँति, कान, नाक, त्वचा, जीभ सभी को अपनी−अपनी शक्तियों की निर्दिष्ट सीमा है, परन्तु मन पर कोई बन्धन नहीं लगा सकता (स्थूल इन्द्रियों की भाँति)। वह कोटि मीलों की दूरी पर उड़ान कर सकता है। उसकी गति अद्भुत है, इसी लिये मान सरोवर से भी इसकी तुलना की जाती है।
मान सरोवर की यात्रा बड़ी कठिन है। लोग दूर राज पर्वतीय प्रदेशों को, बद्री नारायण, केदार आदि की यात्रा कर आते हैं, किन्तु मान सरोवर की यात्रा, जहाँ हंस निवास करते हैं—कोई विरला ही वास करते और जा पाते हैं। मान−सरोवर की यात्रा भी कोई विरला ही करते और पहुँच पाते हैं। जिस भाँति मान−सरोवर में विविध तरंगें उठती रहती हैं, उसी भाँति मन−सरोवर में लहरें उठती हैं, मान सरोवर की भाँति मन−सरोवर भी अतीव विशाल है।
मान−सरोवर में मेंढक, मीनादि फुदकती हैं और मनः सरोवर में उसी भाँति वासनायें मचलती हैं। अगर अन्तर में कोई वासना जगती है तो वह गोलाकार बन जाती है, इसीलिए उसे वृत्ति कहते हैं। यह वृति, कर्म उत्पन्न करती है और कर्म, फल को, फल, बीज को इस भाँति यह चक्राकार गति में घूमती रहती है। इसकी कोई सीमा नहीं, अतः हमारी वासनाएँ भी अनन्त हैं, जो सदा इसी भाँति जगती रहती हैं।
अमावस्या और पूर्णिमा में समुद्र की भाँति मान सरोवर और मनः सरोवर में भी भाटा−ज्वार आता है, कभी वैराग्य का भाटा और कभी ज्ञान का ज्वार। पूर्णिमा में प्रियतम से मिलने के लिए उस की तरंगें क्रमशः ऊँची से ऊँची ही उठती चली जाती हैं; मानों, ज्ञान के एक एक सोपानों पर चढ़ता हुआ वह सर्वोत्कृष्ट ज्ञान के नजदीक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हो और जब वैराग्य का भाटा आता है तो बाह्य विश्व की विस्तृति और ऊँचाई का परित्याग कर नीचे से नीचे, सूक्ष्मता से सूक्ष्मतरता में डुबकी लगाये चला जाता है और सारे स्थूल एवं सूक्ष्म को छोड़ कर सूक्ष्मतम परमात्मा तक जा पहुँचते हैं, जैसे बुद्धदेव भगवान और स्वामी दयानन्द जी महाराज ने संसार के स्थूल−सूक्ष्म सभी रूपों का परित्याग कर दिया था।
प्राण। एक वह प्राण है, जो हर समय हम श्वास के रूप में ले रहे हैं। दूसरा वह प्राण है, जिससे पंच तत्वों को संयुक्त कर शरीर का निर्माण किया। तीसरा सूक्ष्म प्राण वह है, जो जीवनी शक्ति प्रदान करता और आत्मा के साथ रहता है। यज्ञ, प्राण गति देने वाला है। यह मन को भी गति प्रदान करता तथा आगे−आगे चलता है।
पवन, जो हमें पवित्र बनाये रहता है। प्रातः काल जब हम उठते हैं, उस समय हमारे अन्दर सात्विकता रहती है। भगवान का नाम लें या नहीं लें, पर उस समय स्वाभाविक सात्विकता रहती है। यदि मनुष्य के अन्दर यह सात्विकता न आये, तो वह जी ही नहीं सकता। इस सात्विकता के उदय होने के कारण है, सन्धि काल। उस समय (श्वास के) दोनों स्वर इकट्ठे ही चलते हैं।
स्वर दो हैं; सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर। यह स्वर बारी बारी से चलते रहते हैं। हर घण्टे बाद प्रायः स्वर बदलता रहता है। बदलते समय दोनों स्वर इकट्ठे हो जाते हैं और इन दोनों के मिलते ही सुषुम्ना खुल जाती है। सुषुम्ना का खुलना ही उक्त सात्विकता का कारण है। इस सात्विकता के राज्य काल के लिये शास्त्रकारों ने कहा है:−
1−सन्धिकाल में सोना पाप है।
2−उस समय न जल पीवे, न अन्न ग्रहण करे।
3−उस पुनीत काल में भगवद् स्मरण करे।
4− उस समय मन की साम्य अवस्था होती है, उसमें न रोग होता है, न कोई विकार होता है। इसको शुद्ध करने वाला पवन है।
कोई ऐसा मनुष्य नहीं, जिसके अन्दर यह पवित्र करने वाला पवन न चलता हो−सन्धि काल न आता हो।
हृदय दो भाँति के होते हैं, मृदुल और कठोर। महात्मा बुद्ध सुकोमल हृदय वाले थे, जरा, मृत्यु और रोग को देखते ही घायल हो गये और जब तक भगवान रूपी चिकित्सा मन्दिर जाकर जरा−मृत्यु रोग से ऊपर नहीं उठ गये, तब तक घायल से कराहते रहे और दूसरे हम लोग हैं कठोर हृदय वाले कि रात दिन रोग, बुढ़ापा और मृत्यु को आँख पसार कर देखते हैं पर हमारे हृदय को जरा भी चोट नहीं लगती। हम टस से मस नहीं होते। ऐसे कठोर अथवा वीर हृदय वाले हैं हम।
सुखद स्थिति, जो कि परिस्थिति वश स्वभावतया ही किसी को प्राप्त है उसका मूल्य उसे तब तक मालूम नहीं हो पाता, जब तक वह उससे छिन नहीं जाता। बुद्धिमान को बुद्धि की कीमत तब मालूम होती है, जब भगवान उसे विक्षिप्त—पागल कर देते हैं, इसी भाँति धनवानों को दरिद्र बनने पर, बलवानों को रोगी और अशक्त होने पर, शासक को पदच्युत होने पर उसका वास्तविक महत्व समझ में आता है। उसी भाँति जब जीव को परमात्मा की वियोग स्थिति का सही ज्ञान और अनुभव हो जाता है, तब वह उसे पाने के लिए जल वियोगिनी मछली की भांति लगता है।
यह देखने में लगता है कि शास्त्रों में वर्णित परिणाम के अनुसार कभी−कभी किसी सद्नुष्ठानों का फल प्राप्त नहीं होता, इसका कारण काम, क्रोध, अभिमानादि दैवी विघ्नादि हैं। यदि हम ठीक−ठीक परिशुद्ध भावना के साथ सद्नुष्ठान पूर्ण कर सकें, तब तो शास्त्रवर्णित फलों का मिलना निश्चित ही है, किन्तु बीच में कभी कभी विघ्न आकर उसे बिगाड़ देते हैं, इसलिए परिशुद्ध फल की प्राप्ति नहीं हो पाती है।
क्रोध इन सद्नुष्ठानों के परिणाम को नष्ट करने में बड़ी भयंकर अग्नि है; अतः इस क्रोध के नाश करने के सम्बन्ध में विचारें। क्रोध को, तीन भाँति से मनुष्य दबाते हैं:—
1- आत्मिक पतन से अपने को बचाने के लिये। ऐसा साधक उसे विवेक से बाहर निकालता है, क्रोध आ जाने पर उसे लज्जा वश छिपाता नहीं, स्पष्ट कह देता है।
2- भय और कमजोरी के कारण भीतर ही क्रोध को रोक लेता है और जलता है। ऐसे लोगों को दमा का रोग हो जाता है।
(श्री गायत्रीस्वरूपजी वानप्रस्थी)
गायत्री त्रिपदाँ त्रिबीज सहिताँ त्रिव्याहृतिं त्रैपदाँ त्रिब्रह्म त्रिगुणाँ त्रिकाल नियमाँ वेदवयीं ताँ पराम् साँख्यादिवय रूपिणीं त्रिनयनाँ मातृ त्रयीं तत्पराम् त्रैलोक्य−त्रिदश−त्रिकोटि−सहिताँ संध्यात्रयीं ताँ नमः।1।
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य हम तीनों ही वर्ण द्विज कहलाते हैं। तीनों का कर्त्तव्य है, श्री जगज्जननी वेदमाता गायत्री की उपासना करें। प्राचीन समय में इसी के प्रताप से हमने विश्व में अपने प्रभुत्व का डंका बजाया था, किन्तु आज हमारी उस उपासना के त्यागने से जो दुर्गति हुई है, वह छिपी नहीं, उसे देख कर हम दुःखित तो अवश्य होते हैं, परन्तु करते कुछ नहीं। हम इतने अकर्मण्य हो गये है कि 24 घंटों में 1 घंटा तो दूर रहा, पर कुछ मिनट भी उस पतितपावनी माँ गायत्री की विधिपूर्वक उपासना नहीं करते।
इस गोपनीय मंत्र की साधना के लिये पहले इस मंत्र के रूप, महत्त्व, अर्थ, पुरश्चरण, सिद्धि तथा सिद्धि प्राप्त महापुरुषों के विषय में जानना परमावश्यक है। प्रथम गायत्री का क्या स्वरूप है? गायत्री के स्वरूप के विषय में भगवान् शंकराचार्य जी ने कहा है कि—
इदं सर्व भूतं प्राणिजातंयत्किञ्चित् स्थावरं जंगमंवासर्वं गायत्री एवं ॥
अर्थात् ये जो स्थावर जंगम समस्त सर्वभूतात्मक जगत है, वही गायत्री का स्वरूप है।
इसी प्रकार छाँदोग्य उपनिषद् में लिखा है कि− गायत्री वा इदं सर्व भूतं यदिदं किंचित्, वाग्वै− गायत्री बाग्वा इदं सर्वं भूतं गायति त्रायते च॥
अब स्वरूप के बाद गायत्री का क्या महत्त्व है इसके लिये महर्षि याज्ञवल्क्य जी ने लिखा है कि:−
सारभूततास्तु वेदानाँ गुह्योपनिषदो स्मृताः तेषाँसारस्तुगायत्री तिस्त्रो व्याहृतयस्तथा॥
अर्थात्−वेदों के सारभूत उपनिषद् और उपनिषदों का सार जो है, वह तीन व्याहृति तथा गायत्री है। इस लिये ही इसके जानने से सब जाना जाता है, यथा उक्त ऋषि ने कहा है कि—
एतया ज्ञातया सर्वं वाङ्मयं विदितं भवेत् उपासितंभवेत्तेन विश्वं भुवनसप्तकम्॥
अर्थात्− जिसने इस की उपासना की उसने सब उपासनाएँ करलीं। इसका अर्थ भगवान् वेदव्यास ने इस प्रकार किया है कि:−
गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते ततः॥
बृहदारण्यक उपनिषद् में भी लिखा है कि—
तद्वैतत् सत्यंबलं प्रतिष्ठितं प्राणो वैबलं तत् प्राणो प्रतिष्ठितमित्यादि। साहैपा गयाँ स्तत्वे प्राणावै गयाँस्तान् प्राणास्तत्वै यस्माद् गयाँस्तत्रे तस्माद् गयात्री नाम॥
अर्थात्− जो पवित्र कर शुद्धज्ञान द्वारा जीव के अन्तः करण को प्रकाशित करती है कि जिससे वह स्व सत्स्वरूप को जान कर जीवनमुक्त हो जाते हैं।
पुरश्चरण−उसकी आवश्यकता और उसके प्रकार−मंत्र सिद्धि के लिये पुरश्चरण करना परमावश्यक है। संख्या के लिए गायत्री पंचांग में लिखा है कि—
गायत्री छन्दमंत्रस्य यथासंख्याक्षराणि च तावल्लक्षाणिकर्तव्यं पुरश्चरणक तथा॥
इस वचनानुसार गायत्री मंत्र के 24 अक्षर होने से 24 लक्ष का पुरश्चरण होता है। पुरश्चरण किसका कहते हैं, इसके लिये उक्त शास्त्र में लिखा है कि—
पंचांगानि महादेवि जपो होमश्च तर्पणम् अभिषेकश्चविप्राणा−माराधनमपीश्वरी पूर्वपूर्वं दशाँशेन पुरश्चरणमुच्यते॥
अर्थात् जप, होम, तर्पण, मार्जन और ब्राह्मण भोजन। जप का दशाँश हवन, उसका दशाँश तर्पण, दशाँश मार्जन तथा ब्राह्मण भोजन यह विधिपूर्वक किये हुए कर्म, पुरश्चरण कहलाते हैं। ये अनेक प्रकार की संख्या के हैं यथा सपादकोट्यात्मक, चतुविशतिलक्षात्मक, सपादलक्षात्मक तथा चत्त्वारिंशत् सहस्त्रात्मक इन की विधि गुरुगम्य है। उपासक यदि इसके पूर्णज्ञाता गुरु द्वारा विधि समझकर पुरश्चरणादिक करता है, तो वह अवश्य सफल होता है।
जिन्होंने श्री वसिष्ठ तथा विश्वामित्र ऋषि का इतिहास पढ़ा है उनको यह विदित ही होगा कि श्री वसिष्ठ जी ने इस गायत्री मंत्र की सिद्धि से ही विश्वामित्र के विपुल सैन्य बल को कुँठित कर दिया था और अन्त में विश्वामित्र जीने भी गायत्री मंत्र को ही सर्वश्रेष्ठ जान कर और उसकी उपासना करके नया विश्व बना सके, ऐसी सिद्धि प्राप्त की थी। सिद्धि प्राप्त पुरुषों के नाम कौन गिना सकता है? तथापि मुख्य मुख्य महापुरुष इसी मंत्र के उपासक थे। साक्षात् भगवान् रामचन्द्र जी और श्री कृष्णचंद्र भगवान् भी प्रतिदिन नियमपूर्वक गायत्री की उपासना करते थे जिसके प्रमाण रामायण, भागवतादि ग्रन्थों में उपलब्ध हैं तथा वसिष्ठ, गौतम, अवि, कश्यप, भरद्वाज, जमदग्नि आदि महर्षिगण गायत्री के परमोपासक थे तथा कुछ समय पहले श्री विद्यारण्य मुनि, श्री लोकमणिजी करके सिद्ध पुरुष हो गये हैं और आज भी मुझे विश्वास है कि यह वसुँधरा सिद्धि से खाली नहीं है।
यदि हम अपने मनुष्य जन्म को सार्थक करना चाहते हैं तो वेद−शास्त्रों की सारभूता श्री गायत्री की उपासना में प्रवृत्त हो जाना चाहिये क्योंकि−
अनन्त पारं किल शब्द शास्त्रंस्वल्पंतथायुः बहक्श्च विघ्नाः। सारं ततो ग्राह्य मपास्य फल्गु हंसो यथा क्षीर मिवाम्बुमध्यात्॥
अर्थात्−शास्त्र तो अनंत है, आयुस्वल्प और विघ्न−बाधाओं से छुटकारा कठिन है इसलिये हंस के समान सार वस्तु को ग्रहण करो। अन्त में अब मैं विप्रमण्डली से भी करबद्ध होकर प्रार्थना करता हूँ हे परम तेजस्वी ऋषियों की संतानों! आप अपनी परमोपास्या को क्यों भूल गये हो? देखो। शास्त्रकारों ने ब्राह्मण के लिये गायत्री की उपासना कितनी जरूरी बतलाई है। भारद्वाज ऋषि कहते हैं कि—
संध्याँ तोपास−तेविप्राः कथं ते ब्राह्मणाः स्मृताः यज्ञदानरतो विद्वान्, साँगवेदस्तु पाठकः गायत्री ध्यानपूतस्य कलाँनार्हन्ति षोडशीम्।
सर्व देवताओं का पूजन भी गायत्री की पूजा के सिवाय किसी काम का नहीं, जैसा गायत्री तन्त्र दशम पटल में लिखा है कि—
“शिव पूजा शक्ति पूजा, विष्णुपूजादिका च या सर्वापूजा वृथा भद्रे गायत्री−पूजनं बिना”
अपने प्राचीन गौरव को याद करो, आप उन्हीं की संतान हैं, जिनके समस्त राष्ट्र कृपाकाँक्षी थे फिर क्यों नहीं अपने अतीत गौरव को प्राप्त करके संसार में अपने ब्रह्म बल की विजय दुन्दुभी बजावें? हम यदि भक्ति भावना से महामाया गायत्री की उपासना करेंगे तो सब सिद्धियाँ हमारे सामने करबद्ध होकर उपस्थित रहेंगी। गायत्री के सिवाय जो अन्य मन्त्रों की उपासना करता है वह तो—
“गायत्रींतु परित्वज्य, अन्यमंत्रं उफसते,
सिद्धान्नं च परित्यज्य भिक्षामटति दुर्मतिः”
अर्थात् — जो गायत्री मंत्र को त्याग कर अन्य मन्त्रों की उपासना में लगा रहता है वह पके पकाये सुन्दर भोजन को त्यागकर, दर−दर भीख माँगने की गलती करता है।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा एम. ए, एल. एल. बी)
मुझे निद्रा बहुत आती है,विशेषतः भोजन के उपरान्त। रात्रि में आठ घण्टे के लगभग अवश्य सोता हूँ। स्वतः नेत्र मुँदने लगते हैं और मन कहता है कि थोड़ी देर विश्राम करूं। रात्रि में यदि प्रकृति की माँग के अनुसार मैं विश्राम कर लेता हूँ, तो तबियत हलकी हो जाती है। काम करने को जी चाहता है, शरीर में ताजगी रहती है और हृदय प्रफुल्लित हो जाता है।
भोजन के उपरान्त कुछ देर के लिए लेटे रहने और सो जाने से पाचन क्रिया पर बड़ा अच्छा प्रभाव पड़ता है। कारण, जब हम विश्राम करते हैं, तो रक्त प्रवाह आमाशय की ओर जाना है और पाचन क्रिया में सहायता होती है। यदि खाना खाने के पश्चात् तुरन्त कार्य में लग जायं और विश्राम न लें, तो रक्त प्रवाह आमाशय और अंतड़ियाँ की ओर को न होकर अन्य अवयवों की ओर होता रहेगा और पाचन क्रिया में निरत अंगों को रक्त पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध न होने के कारण भोजन ठीक रीति से न पचेगा।
निद्रा की गोद शान्तिदायिनी है। इससे मस्तिष्क के थके स्नायुओं को भी विश्राम प्राप्त होता है तथा उनकी क्षीण शक्ति पुनः सञ्चारित हो जाती है।
हमारे शरीरों में निरन्तर दो प्रकार की क्रियाएँ चला करती हैं। जो पुट्ठे या माँस पेशियाँ कार्य करती हैं, उनके सेल (Cells) नष्ट हो जाते हैं। इस क्रिया को कैटाबौलिज्म कहते हैं। निद्रा से टूटे हुए सेल पुनः बनते हैं। नवीन कोषों के निर्माण को मेंटम्बौलिज्म कहते हैं। जितना ही कोई अंग अधिक काम में लिया जाता है, उतनी ही अधिक मात्रा में ये दोनों क्रियाएं सञ्चालित होती हैं और इसके परिणाम स्वरूप शरीर का प्रत्येक अंग अधिक बलिष्ठ हो जाता है।
वैज्ञानिकों का मत है कि नवीन रक्त कोषों का निर्माण कार्य निद्रित अवस्था में अधिक सुचारु रूप में होता है। क्योंकि इस दशा में थके हुए अंगों को पूर्ण विश्राम प्राप्त हो जाता है और उसमें मैटाबौलिज्म निर्विघ्न चल सकता है। यही कारण है कि थक कर गहरी निद्रा आती है और जागृत होने पर शक्ति स्फूर्ति तथा ताजगी का अनुभव होता है। शरीर और मन प्रफुल्ल हो जाते हैं।
निद्रा मानसिक समस्या को दूर करने का एक प्राकृतिक साधन है। यह तनाव मानसिक ग्रन्थियों के कारण होता है, जो हमारे तीव्र तथा अत्यन्त कटु साँसारिक अनुभवों के कारण मन में पड़ जाती है। यह अनुभव जाग्रत मन से बहुत दूर गहराई में दब जाते हैं कि हम अपनी जाग्रतावस्था में इनको बिल्कुल नहीं जान सकते, क्योंकि सामाजिक भय और नियंत्रण किसी अन्य प्रबल मानसिक वेदना के कारण जाग्रत मन, उन्हें चेतना के ऊपरी स्तर पर नहीं आने देता।
यह अन्तर्मन में दबी हुई कटु अनुभूतियाँ, चेतन मन से तिरस्कृत निद्रित अवस्था में स्वप्नों के रूप में पुनः बाहर निकलने का सहज स्वाभाविक अवसर पाती हैं। दबी हुई इच्छाओं से स्वप्नों में हमारी दलित या छिपी हुई अनुभूतियों की पूर्ति होती है इससे मानसिक तनाव कुछ कम होता है।
प्रकृति स्वयं चाहती है कि थकने के पश्चात् हम पर्याप्त विश्राम करे। नवजात शिशुओं को शान्तिदायिनी निद्रा की अधिक आवश्यकता होती है। छोटा बच्चा प्रायः भूखा या निद्रित होकर तृप्ति के लिए चिल्लाता है और सोकर ताजे पुष्प के समान सुन्दर प्रतीत होता है। जैसे−जैसे हम बड़े होते हैं, शक्ति आती है, वैसे विश्राम की सहज स्वाभाविक आवश्यकता कम होती जाती है, हम उतना ही अधिक समय जाग्रत अवस्था में व्यतीत करते हैं।
नवयुवकों को प्रौढ़ों की अपेक्षा निद्रा अधिक सताती है; परन्तु कम से कम आठ घण्टे सोने की आवश्यकता तो सर्व साधारण सभी की होती है; परन्तु यह आवश्यकता श्रम और भोजन की मात्रा और किस्म के अनुसार घटती बढ़ती रहती है। स्थूल, तामसिक भोजन, निद्रा की मात्रा में अभिवृद्धि करने वाला है; तथा सूक्ष्म सात्विक आहार और निर्मल विचार कम निद्रा लाते हैं। प्रायः अज्ञान वश हम मिर्च मसाले आदि द्वारा भोजन को सुस्वादु बनाकर उसकी मात्रा अनावश्यक बढ़ाकर खा लेते हैं तथा गरिष्ठ भोजन को पचाने में आमाशय आदि पाचन अवयवों को अधिक श्रम करना पड़ता है। अतः इनका प्रयोग करने वाले व्यक्तियों को अपेक्षा कृत अधिक निद्रा आती है।
शारीरिक तथा मानसिक कार्य में निरत रहने से भी निद्रा का निग्रह होता है। अध्यापकों को जब शरद् ऋतु में भी अध्यापन कार्य से अवकाश प्राप्त हो जाता है; तो कुछ देर के लिए सोने की इच्छा प्रबल होती है जब कि अध्यापन काल में वे 11 बजे प्रातः से 5—6 बजे साँय तक कार्य में संलग्न रहते हैं और सोने की स्मृति भी नहीं आती। गर्मी के दिनों में जब स्कूल का समय 7 बजे प्रातः से 12 बजे तक होता है; तो देखा गया है कि अधिकाँश अध्यापक दोपहर में कुछ देर के लिये विश्राम करते हैं।
निद्रा का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी है। जब अवकाश होता है और कुछ विशेष कार्य करना नहीं होता तो प्रायः निद्रा आ दबाती है। कार्य में संलग्न रहने से और मन को शुभ चिन्तन में लगाये रखने से अनावश्यक निद्रा से प्रायः मुक्ति मिल जाती है।
कहना न होगा कि यद्यपि निद्रा एक निश्चित समय तथा मात्रा में हमारे लिए आवश्यक है तथा उत्तम स्वास्थ्य का लक्षण है तथापि इसे मात्रा से अधिक बढ़ाया या घटाया जा सकता है। अतिवृद्धि से यह हमारे कार्य में अनुचित हस्तक्षेप भी करने लगती है तथा कम होने पर स्वास्थ्य नष्ट होने लगता है। अतः 7−8 घन्टे से बढ़ने न देना चाहिए। निद्रा से समय बचा कर शेष समय का सद् प्रयोग करना चाहिए।
निद्रा में रहने वाले प्रहरी को मृत्यु को मृत्यु दंड तक दिया जा सकता है, तो निद्रा न आने वाले व्यक्ति को पागल समझा पाता है। निद्रा हमारे लिए वरदान तभी हो सकती है जब हम शरीर की शक्ति और भय के अनुसार उसे ग्रहण करें।
निद्रा का अभाव अनिद्रा या इनेसौमनिया रोग उत्पन्न करता है। ऐसा रोगी मन ही मन अनेक काल्पनिक भयों से परिपूर्ण अस्त व्यस्त रहता है। सर में दर्द, जी भारी, कार्य से अरुचि, चिन्ता, पाचन शक्ति का ह्रास, आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। कभी−कभी रात्रि या अन्य किसी समय रोगी चेतना हीन होता है; आँख लग जाती है,परन्तु इसका विश्वास नहीं होता। निद्रा अभाव की ही धारणा बनी रहती है, जिसके कारण विशेष चिन्ता और बेचैनी हर समय बनी रहती है।
शेक्सपियर ने लिखा है, ‘ओ निद्रा! ओ नम्र निद्रा—प्रकृति की सुशील धात्रि! तू मुझसे कैसे विमुख हो गई! अब तू क्यों मेरी पलकों को भारी नहीं करती और मेरी ज्ञानेन्द्रियों को विस्मृत में क्यों निमग्न नहीं करती। ओ पक्षपात युक्त निद्रा! जब कि तू तूफानों से भरे हुए भयानक समय में आराम दे सकती है, तो तू रात्रि को परम शक्ति और निस्तब्धता में हर प्रकार की उपयोगी सामग्री उपलब्ध होते हुए भी एक राजा को दुष्प्राप्य है। अच्छा भाग्यशाली दरिद्रो विश्राम करों! [हेनरी चतुर्थ से]
स्वर्गमयी निद्रा! तुम हमारे धर्म चक्षुओं का मधुर चुम्बन करो। मन्द मुस्कान युक्त तुम जाग्रत हो!
ये बन्धन रहित चरित्र वाले सुन्दर व्यक्तियों! रोओ नहीं; सो जाओ! मैं तुम्हें लोरियाँ दूँगी। मैं [निद्रा] तुम्हारी स्नेहमयी माता के समान हूँ। लोरियों के पालने में झुलाऊँगी!
(श्री राम खिलावन चौधरी)
सुखी परिवार संगठित समाज का मेरुदंड है। परिवार से ही समाज को सच्चे नागरिक और समाज सेवक प्राप्त होते हैं। बालक की उत्पत्ति परिवार में होती है और उसके चरित्र का निर्माण यहीं से प्रारंभ होता है। उसकी प्रारंभिक शिक्षा भी परिवार में ही सम्पन्न होती है। बड़े होने पर मनुष्य का व्यक्ति गत जीवन परिवार में ही व्यतीत होता है और मनुष्य के भावों की दुनिया ही है। संसार के कर्मयुद्ध से विरत हो कर मनुष्य परिवार में ही विश्राम पाता है और अन्त में परिवार के बीच में अपनी इहलीला समाप्त करता है। इस प्रकार मनुष्य का सारा जीवन परिवार की छाया में पलता है। मनोवैज्ञानिक अध्ययन से पता−चलता है कि ‘वैज्ञानिक’, ‘कवि’, ‘सैनिक’, ‘समाज सुधारक’ या ‘चोर’ और ‘डाकू’ प्रत्येक के व्यक्ति त्व का निर्माण परिवार में ही होता है। इस दृष्टि से परिवार के संगठन और सुधार की ओर ध्यान देने की निताँत आवश्यकता है। नीचे कुछ ऐसे सुझाव दिये जाते हैं, जिनसे उपर्युक्त आवश्यकता की पूर्ति में बहुत कुछ सहायता मिल सकती है।
सर्व प्रथम, परिवार का पुनस्संगठन एक नये प्रजाताँत्रिक आधार पर होना चाहिए। प्राचीन काल में एक बड़े−बूढ़े के हाथ में परिवार की बागडोर होती थी। उसकी इच्छानुसार ही सारे कार्य किये जाते थे। इस व्यवस्था की मूल में प्राचीन आर्थिक व्यवस्था थी। सारे परिवार का एक ही व्यवसाय होता था, जिसमें सब लोग जुटे रहते थे। अव वह व्यवस्था बदल चुकी है। एक ही परिवार में सारे नहीं लग पाते। कभी कभी तो एक परिवार का हर एक सदस्य भिन्न व्यवसाय में लगा देखा जाता है। स्पष्ट है कि आज के परिवार के सदस्य अन्योन्याश्रित नहीं है, इसीलिए परिवार छिन्न भिन्न हो जाता है। ‘नौकरी’ और ‘मजदूरी’ का अधिकाधिक प्रचलन होने से यह स्थिति उत्पन्न हो गई है। अतः एक व्यवसाय के आधार पर परिवार का संगठन असम्भव है। उसके लिए दूसरा आधार चाहिए। वह आधार है परिवार के सदस्यों की सर्वनिष्ठ आवश्यकताएँ, जैसे भोजन, वस्त्र, गृह, विवाह, शिक्षा और मनोरंजन। इन प्रमुख आवश्यकताओं की पूर्ति के बिना कोई नहीं रह सकता। अतः परिवार का उद्देश्य इन आवश्यकताओं को सरलता और मितव्ययिता पूर्वक पूरा कराने में सहायता देना रक्खा जाय। यदि इनकी पूर्ति परिवार के केन्द्रीय शासन के संरक्षण में हो, तो समय और धन दोनों की बचत होगी। यह ऐसी आवश्यकताएं हैं, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार पूरा ही करता है और अलग अलग पूरा करने में खर्च अधिक बैठता है।
उपर्युक्त आवश्यकताओं की पूर्ति को पारिवारिक संगठन का आधार बनाने के लिये पूर्व योजना की आवश्यकता है और वह योजना भी व्यावहारिक होनी चाहिये। साथ ही उस योजना का संचालन परिवार के योग्यतम सदस्य के हाथ में होना चाहिये, जिसमें स्नेह, उदारता, परिश्रम, त्याग और नेतृत्व के गुण अवश्य हों। ऐसे व्यक्ति के चुनाव के लिये तटस्थ भाव से सोचना होगा। शोभा तो इसी में है कि संचालन का भार किसी न किसी वयोवृद्ध व्यक्ति के हाथ में हो परन्तु वयोवृद्ध होने से ही नेतृत्व के गुण किसी व्यक्ति में नहीं आ जाते। वे गुण सहज और प्राकृतिक हैं। बहुत से अयोग्य व्यक्तियों को वृद्धावस्था में यह शासन भार मिल जाता है और परिवार नष्ट हो जाता है। अतः शासन भार को सम्भालने वाले योग्यतम व्यक्ति का चुनाव प्रजाताँत्रिक शैली से होना चाहिए। इस सम्बन्ध में वयोवृद्ध जनों का हठ बड़ा हानिकारक होता है। कोरी भावुकता और परम्परा−प्रेम का त्याग आवश्यक है।
परिवार के सदस्यों को आवश्यकताओं की समान रूप से भली भाँति पूर्ति न होने के कारण ही वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष, फूट और शारीरिक तथा मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं और प्रत्येक सदस्य निराशा, हतोत्साह, और चिन्ता से पीड़ित रहता है। सबकी आवश्यकताओं के समान रूप से पूरे न होने का कारण है पूर्व−योजना का अभाव। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि सदस्यों की क्या व्यक्ति गत आवश्यकताएं हैं, इसे कोई जानता भी नहीं। यदि यह ज्ञात भी हो जाय, तो उन्हें पूरा करने का साधन−धन पर्याप्त मात्रा में नहीं मिलता। भारतीय परिवारों का धनाभाव प्रसिद्ध है। शायद ही एक आधा परिवार ऐसा मिलेगा, जिसमें धनाभाव की समस्या न उत्पन्न हो। कारण यह है कि दुर्भाग्य से परिवार में दुलार’ और ‘लाड़ प्यार’ के नाम पर निठल्ले और निकम्मे व्यक्तियों को वही सुविधाएँ माँगने का अवसर मिलता है जिन्हें कर्तव्य परायण और परिश्रमी सदस्य भोगते हैं। निर्बल और कम प्रतिभाशाली सदस्यों की सहायता करना धर्म है परन्तु उन्हें अकर्मण्य और आत्म निर्भरता शून्य बने रहने ना अनुचित है। कुछ न कमाने वाले, परिश्रम से अपने आपको चुराने वाले और फैशन परस्त सदस्यों का तुरंत बहिष्कार कर देना चाहिये क्योंकि वे छूत की बीमारी समान हैं। यदि कर्तव्य न पालन करने पर भी, उन्हें सब सुविधायें मिलती हैं, तो दूसरे सदस्य भी कर्मण्य बन जाएंगे और कर्तव्य परायण व्यक्ति परिवार की समस्याओं में रुचि न लेकर उदासीन हो जाएंगे। हाँ यदि कोई सदस्य दुर्भाग्य से रोग ग्रसित और पंगु है, तो उसका भार सहन करना परिवार का कर्तव्य है।
वही परिवार सुखी और संगठित रह सकता है, जो उसके सदस्य आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी हों और कर्तव्य परायण हों। ऐसे सदस्यों से ही पूर्व योजना निर्माण हो सकता है। वर्ष में कम से कम एक या दो बार पूर्व योजना तैयार कर लेना आवश्यक है। सब सदस्यों को एक साथ मिलकर प्रमुख आवश्यकताओं के सम्बन्ध में विचार विमर्श कर लेना चाहिये और उन्हें पूरा करने के लिए जितने धन की आवश्यकता हो उसका अनुमान कर लेना चाहिए। प्रत्येक सदस्य को यह स्पष्ट बता देना आवश्यक है कि व्यक्ति गत रूप से उन आवश्यकताओं की पूर्ति में अधिक धन, समय और श्रम की जरूरत होगी। इसलिए मिलकर काम करने में लाभ है। यह बात उनकी समझ में आ जाने पर, वे प्रसन्न चित्त से अपने हिस्से का धन देने को तैयार हो जाएंगे। वर्ष भर में जितने धन की आवश्यकता हो, उसे जमा करने का भार प्रत्येक सदस्य को बाँट देना चाहिये। योजना के अनुसार धन जमा हो जाने पर सब आवश्यक सामग्री प्रतिमास खरीद ली जानी चाहिये और उसका उपकार कर लेना चाहिये। एक बात यह अवश्य याद रखनी चाहिये कि व्यय का पूरा विवरण सभी सदस्यों के सामने प्रस्तुत कर दिया जाय, अन्यथा सभी सदस्यों के मन में सन्देह बना रहेगा। सन्देह सभी मनुष्य का स्वभाव है और उसे दूर करना आवश्यक है। परिवार में आय और व्यय का लेखा जोखा पाने की उत्सुकता प्रत्येक सदस्य को होती है प्रत्येक परिवार के सञ्चालक से पूछने में संकोच होता है। अतः यह उचित होगा कि किसी एकान्त स्थान पर उसका विवरण लिखकर टाँग दिया जाय और जो सदस्य चाहे अपनी सुविधा के अनुसार उसे देख ले।
परिवार की आर्थिक समस्याओं और प्रश्नों के निपटाने में यदि सभी सदस्य समान रूप से भाग लेने लगें, तो पारस्परिक प्रेम और सहानुभूति में वृद्धि होगी। सच्चे प्रेम का उदय एक साथ मिलकर कठिनाइयों के हल करने में ही होता है। इसके द्वारा सब को आपस में मिलकर बैठने, विचारों के आदान प्रदान, और आत्मीयता प्रकट करने का अवसर मिलता है। यह ठीक है कि भाई−भाई और पिता पुत्र के सम्बन्धों में सहज स्नेह होता है। परन्तु उस स्नेह को अधिकाधिक उपयोगी बनाने की आवश्यकता है। स्नेह की उपयोगिता इसी में है कि एक दूसरे की आवश्कताओं को पूरा करने में प्रत्येक सदस्य सहायता दे। आज के युग में आर्थिक कठिनाइयाँ ही सर्वोपरि हैं। अतः पारिवारिक व्यवस्था में इन्हें ही प्रमुख स्थान मिलना चाहिए। प्रायः कहा जाता है कि रुपये पैसे का प्रश्न उठाना स्वार्थपरता है। स्वार्थपरता मनुष्य की निर्बलता भले ही हो परन्तु मानव प्रकृति की वह एक कठोर वास्तविकता है। उसकी ओर से आँख बन्द करके बैठे रहने में हानि ही होती है।
(प्रो. श्रीरामचरणजी महेन्द्र, एम. ए.)
प्रलोभन एक ऐसा आकर्षक मोहचक्र है, जिसका कोई स्वरूप, आकार, स्थिति, अवस्था नियत नहीं है, पदच्युत कर पथभ्रष्ट कर देने के लिये आता है! जीवन में आने वाले बहुत−से मायावी प्रलोभन इतने मनमोहक, लुभावने और मादक होते हैं कि क्षणभर के लिये विवेकशून्य हो अदूरदर्शी बन हम विक्षिप्त से हो उठते हैं। हमारी चिन्तनशील सत् प्रवृत्तियाँ पंगु हो उठती हैं तथा हम विषयवासना, आर्थिक लोभ, स्वार्थ, संकुचिततावश प्रलोभन के शिकार बन जाते हैं। अन्ततः उनसे उत्पन्न होने वाली हानियों, कष्टों, त्रुटियों, अपमान तथा अप्रतिष्ठा से दुग्ध होते रहते हैं। प्रलोभन जीवन की मृगतृष्णा है, तो बुद्धि का भ्रम मोह का मधुर रूप!
लालच के रूप अनेक हैं। कभी आप सोचते हैं, ‘मैं धनवान् बनूँ, ऊँचा रहूँ, मेरे ऊपर लक्ष्मी की कृपा रहे।’ इस उद्देश्य−सिद्धि के हेतु आप रिश्वत, काला बाजार, झूठ, फरेब, कपट, हिंसा करके रुपये हड़पते हैं। ठेकेदार, ओवरसीयर, इंजीनियर तक रिश्वत में हिस्सा लेते हैं। रेलवे, पुलिस, चुँगी इत्यादि विभागों में भ्रष्टाचार इसी स्वार्थ और संकुचितता के कारण फैले हुए हैं। डाक्टर और वकील रोगी और मुवक्किलों से अधिकाधिक ऐंठना चाहते हैं। बाजार में खराब माल देकर अथवा निम्नकोटि की वस्तुओं का सम्मिश्रण कर व्यापारी खूब लाभ कमाना चाहते हैं। सिक्कों ने जैसे मानवीयता का शोषण कर लिया हो। प्रलोभन के अनेक रूप हैं—
‘अमुक व्यक्ति की पत्नी मेरी पत्नी की अपेक्षा सुन्दर है। मुझे भी सुन्दर पत्नी प्राप्त होनी चाहिये। मैं तो अमुक अभिनेत्री−जैसी स्त्री से विवाह करूंगा।’
अमुक व्यक्ति का मकान सुन्दर है। अमुक के पास आलीशान कोठी, मोटर, नौकर−चाकर, सुन्दर वस्त्र, फर्नीचर इत्यादि हैं। मैं भी किसी प्रकार उचित−अनुचित कैसे ही उपायों से ये वस्तुएँ—सुविधाएँ प्राप्त करूं। अमुक मुझसे ऊँचे पद पर आसीन हो गया, मैं भी छल−बल कौशल से या रुपया दे दिलाकर यही पद प्राप्त करूं।
अमुक व्यक्ति बड़ा सुस्वादु भोजन खाता है; मिठाई, पूड़ी, पकवान, मेवे, दूध, रबड़ी आदि बढ़िया−से बढ़िया वस्तुएँ नित्य चखता है। मैं भी किसी अच्छे−बुरे उपाय से ये चीजें प्राप्त करूं। ऐसा सोचते सोचते जैसे ही कोई तनिक−सा प्रलोभन आपको देता है कि आप बिना सोचे−समझे उसके घुटने टेक देते हैं। रुपया, कमीशन, डाली, फल, मुफ्त सेवा, नाना उपहार ले लेना— सब प्रलोभन के ही स्वरूप हैं। इनका कोई आदि−अन्त नहीं। समुद्र की तरंगों की भाँति आते ही रहते हैं वे।
नैतिक दृष्टि से कमजोर चरित्र वाले व्यक्ति आसानी से प्रलोभन के शिकार बनते हैं। जिनकी आवश्यकताएँ, विलासी इच्छाएँ, चटोरापन, अनुचित माँगें, नशे बढ़े हुए हैं, वे प्रायः प्रलोभनों के सामने झुकते हुए देखे गये हैं। जिन्हें दान−दहेज, यात्राएँ, भौतिकता, टीपटाप का शौक है, वे लालच में फँसते हैं। कभी−कभी सहज सात्त्विक बुद्धि वाले भी दूषित वातावरण के प्रभाव से प्रलोभनों के चक्कर में आ जाते हैं।
विषयों में रमणीयता का भास बुद्धि के विपर्यय से होता है। बुद्धि के विपर्यय में अज्ञान-सम्भूत अविद्या प्रधान कारण है। इस अविद्या, क्षणिक भावावेश, अदूरदर्शिता के ही कारण हमें प्रलोभन में रमणीयता का मिथ्या बोध होता है। प्रलोभन से तृप्ति एक प्रकार की मृग तृष्णा मात्र है।
प्रलोभन में मुख्यतः दो तत्व कार्य करते हैं— उत्सुकता एवं दूरी। ईसाइयों के मतानुसार आदि पुरुष एडम (आदम) का स्वर्ग से पतन ज्ञान-वृक्ष के फल को चखने की उत्सुकता के ही कारण हुआ था। उन्हें आदेश मिला था कि वे अन्य सभी प्रकार के फलों को चख सकते हैं, केवल उसी वृक्ष से बचते रहें। जिस बात के लिये हमें रोका जाता है, अप्रत्यक्ष रूप से उसके प्रति हम अधिकाधिक आकृष्ट होते हैं। अतः एडम को वर्जित फल के प्रति उत्सुकता उत्पन्न हो गयी। औत्सुक्य से प्रभावित होने के कारण उस फल में रमणीयता का भास हुआ। उन्होंने चुपचाप प्रलोभन के प्रति आत्मसमर्पण कर दिया। पर ईश्वर ने उन्हें इसकी बड़ी कड़ी सजा दी थी।
जो पदार्थ, इन्द्रियों को तृप्त करने के नाना साधन, हमसे दूर रहते हैं, जिन्हें हम दैनिक जीवन में नहीं पाते, जिनका स्वाद हमने नहीं उठाया है, वे ही दूरी (Distance) के कारण हमें आकर्षक प्रतीत होते हैं। वास्तव में रमणीयता किसी बाह्य जगत की वस्तु में नहीं है। वह तो हमारी कल्पना तथा उत्सुकता की भावनाओं की प्रतिच्छाया (Reflection) मात्र है। वस्तु को आकर्षक बनाने वाला हमारा मन है जो क्षण−क्षण नाना वस्तुओं पर मचल−मचल कर जाता है। नयी वस्तु की ओर हमें बरबस खींचकर ले जाता है। कभी वह जिह्वा को उत्तेजित कर हमें सुस्वादु वस्तुओं की ओर आकृष्ट करता ह, कहीं कानों को मधुर संगीत सुनने के लिए खींचता है। कहीं हमारी वासना को उद्दीप्त कर मादक वृत्तियों को उत्तेजित कर देता है। मन की कोई भी गुप्त अतृप्त इच्छा प्रलोभन का रूप धारण कर लेती है। विवेक का नियन्त्रण ढीला पड़ते ही मन हमें स्थान-स्थान पर बहकाता फिरता है। अथवा विवेक पर आवरण (पर्दा, तमोवृत्ति, इन्द्रिय−दोष बीमारी, प्रमाद) पड़ा रहने से बुद्धि तिरोहित हो जाती है। फलतः हम पतन की ओर जाते हैं, हमारा वातावरण गन्दा हो जाता है, हम दूसरों को धोखा देते हैं, झूठ बोलते, ठगते हैं। विवेक पर पर्दा पड़ा रहने से ही दुष्ट पुरुष विद्या को विवाद में, धन को अहंकार और विलास में, बल को पर पीड़ा में लगाते हैं, निर्बलों को सताते हैं। अतः मन पर सतर्कता से अन्तर दृष्टि रखनी चाहिये।
जैसे युद्ध करते समय जागरुक सन्तरी को यह ध्यान रखना पड़ता है कि न जाने शत्रु का कब आक्रमण हो जाय, कब किस रूप में शत्रु प्रकट हो जाय, उसी प्रकार मन रूपी चंचल शत्रु पर तीव्र दृष्टि और विवेक को जागरूक रखने की अतीव आवश्यकता है। जहां मन आपको किसी इन्द्रिय-सम्बन्धी प्रलोभन की ओर खींचे, वहीं उसके विपरीत कार्य कर उसकी दुष्टता को रोक देना चाहिए।
मन बड़ा बलवान शत्रु है। वासना और कुविचार का जादू इस पर बड़ी शीघ्रता से होता है। बड़े-बड़े संयमी व्यक्ति वासना के चक्र में आकर मन को न रोक सकने के कारण पथ भ्रष्ट हो जाते हैं। मन को शुद्ध करना अत्यन्त दुष्कर कृत्य है। इससे युद्ध-काल में एक विचित्रता है। यदि युद्ध करने वाला दृढ़ता से युद्ध में संलग्न रहे, निज इच्छा शक्ति को मन के व्यापारों में लगाये रहे,तो युद्ध में संलग्न सैनिक की शक्ति अधिकाधिक बढ़ती है और एक दिन वह इस पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता है। यदि तनिक भी इसकी चञ्चलता में बहक गये, तो यह मनुष्य के चरित्र, आदर्श, संयम, नैतिक दृढ़ता, धर्म को तोड़−फोड़ कर, सब कुछ नष्ट−भ्रष्ट कर डालता है।
मन को दृढ़ निश्चय पर स्थिर रखने और उसी पर एकाग्र ध्यान रखने से मुमुक्ष की इच्छाशक्ति प्रबल बनती है। मन का स्वभाव मनुष्य की इच्छा के अनुकूल बन जाने का है। इसे जिन विषयों की ओर दृढ़ता से एकाग्र कीजिये, वही कार्य करने लगेगा। वह व्यर्थ निश्चेष्ट निष्क्रिय नहीं बैठना चाहता। अच्छाई या बुराई—वह किसी न किसी ओर निश्चय आकृष्ट होगा। यदि आप शुभ रचनात्मक समुन्नत कार्यों में उसे न लगायेंगे, तो वह बुराई की ओर चलेगा। यदि आप उसे पुष्प−पुष्प विचरण करने वाली मधु−लोभी तितली बना देंगे।—जो रूप, रस और गन्ध पर मँडराये—तो वह अवश्य आपको किसी भयंकर स्थिति में डाल देगा। यदि आप उसे उद्दण्ड रखेंगे तो वह दिन−रात असंख्य स्थानों पर भ्रान्तिमति रहेगा। यदि आप शुभ इष्टपदार्थों के सुविचारों में उसे स्थिर रखेंगे, तो वह आपका सबसे बड़ा मित्र बन जायगा।
जब जब अपने अन्तःकरण में विषय−वासना का प्रबल संघर्ष उत्पन्न हो, तब तब, नीर−क्षीर−विवेकी निश्चयात्मिका बुद्धि को जाग्रत् कीजिये! मन से थोड़ी देर पृथक रह कर इसके कार्य−व्यापारों पर तीव्र दृष्टि रखिये। वह, कुविचार, कुत्सित चिन्तन, वासना का ताण्डव कुकल्पना−चक्र टूट जायगा और आप मन के साथ चलायमान न होंगे। मन के व्यापार के साथ निज आत्मा की समस्वरता न होने दें। इसी अभ्यास द्वारा वह आज्ञा देने वाला न रह कर सीधा−सादा आज्ञाकारी अनुचर बन जायगा—
मन लोभी, मन लालची, मन चंचल मन चौर। मन के मत चलिये नहीं, पलक−पलक मन और॥
प्रमाद में फँसी इन्द्रियों के सुख में स्थिरता नहीं है। इन्द्रिय सुख दुःख रूप है। यह अस्थिर और क्षणिक है। यह आनन्द का आवरण मात्र है। इन्द्रिय सुख के लिये मनुष्य को अनेक कुचक्रों−कुटिल रीतियों का अवलम्ब लेना पड़ता है। एक सुख की लालसा में मनुष्य अधिकाधिक उलझता ही जाता है। एक इन्द्रिय को तृप्त करते करते मनुष्य दूसरी तीसरी अधिकाधिक साँसारिकता में लिप्त होता ही जाता है। अन्ततः पाप योनि को प्राप्त होता है। जब तक मन और इन्द्रियों पर पूरा नियन्त्रण नहीं होता, तब तक सुख की आशा रखना व्यर्थ है। मन पर निरन्तर कड़ी दृष्टि रखिये—स्वयं भगवान् श्री कृष्णजी ने गीता में हमें मन पर तीखी निगाह रखने की ओर निर्देश किया है—
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति में मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुमायताः॥
(6। 36)
मन को संयमित न करने वाले पुरुष के द्वारा योग दुष्प्राप्य है। स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा ही योग प्राप्त होता है। इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है।’
अभ्यास और वैराग्य से मन को वश में करने में बहुत सहायता मिलती है। गीता में मन को भगवान में एकाग्र करने का अभ्यास करने का अमूल्य उपदेश है-
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥
(6। 26 )
‘यह अस्थिर और चंचल मन जिस−जिस कारण से संसार में जाय, उस-उससे हटा कर इसे बार−बार आ मा में लगावे।
सुख रूप भासने वाले विषय−वासना के प्रलोभन में कदापि न फंसिये। मन के विपरीत चलिये। परमात्मा का जो रूप आपको विशेष आकर्षक प्रतीत होता हो, उसी में मन बुद्धि को एकाग्र करने का सतत् अभ्यास करते रहिये। वैराग्य और शुभचिन्तन के अभ्यास से प्रलोभन से मुक्ति मिल सकती है।
भारतीय संस्कृति में प्रलोभन से बचे रहने के लिए दान और त्याग का विधान है। भारतीय, यदि वह सच्चे अर्थों में भारतीय संस्कृति का पुजारी है, तो वस्तुओं, धन, ज्ञान, श्रम−शक्ति इत्यादि को एकत्र न कर सबके भले के लिये अधिक−से−अधिक व्यक्तियों में उसे वितरित करने का प्रयत्न करता है। जिस प्रकार सूर्य और चन्द्र अपनी किरणों को संसार के कौने−कौने में फैला कर प्रकाश करते हैं; सच्चा भारतीय अधिक से अधिक दान देता है—शक्ति का, सेवा का, अपने श्रम−सामर्थ्य और सम्पत्ति का त्याग करने से उसका आत्म संयम बढ़ता है। शरीर और मन पर काबू होता है, वासनाएँ शान्त रहती हैं, आत्मा भौतिक−पदार्थों के चिन्तन से मुक्त होकर अन्तर्मुखी बनती है। क्षुद्र बाह्य पदार्थों तथा रूपों से आसक्ति हटते ही उसे आत्मानुभव होने लगता है। वह जान लेता है कि मैं हाड़, माँस, वासना, तृष्णा मोह नहीं हूँ, मैं तो सत्−चित् आनन्द स्वरूप, विशुद्ध आत्मा परमात्मा हूँ।
(लालबहादुर लाल श्री वास्तव)
भोजन ही शक्ति है और शक्ति ही जीवन है। अतएव भोजन की समस्या और विशेषकर इस समय, अपनी विशेषता रखती है। दक्षिण−पूर्व एशिया में, और विशेषकर भारत पर दुर्भिक्ष दानव की भयंकर छाया फैल रही है। यह अभी−अभी समाप्त हुए विश्व−युद्ध की देन है। हम देख चुके हैं कि युद्धकाल में अकेले बंगाल को प्रायः 35 लाख नर−बलि देकर इस दुर्भिक्ष दानव से पिण्ड छुड़ाना पड़ा है। अब वही राक्षस मुँह बाये समस्त भारत पर अपने हाथ−पाँव फैलाता हुआ दिखलाई देता है। अतएव हम सबका कर्त्तव्य है कि हम दुर्भिक्ष का सामना करने के लिये सजग हो जायँ।
भोजन विज्ञान के अनुसार विशेष−विशेष परिस्थितियों में काम करने वाले मनुष्यों को भिन्न−भिन्न परिमाण और प्रकार की भोजन सामग्री की आवश्यकता होती है। उदाहरणार्थ, एक फावड़ा चलाने वाले को अपने समवयस्क एक कपड़ा सीने वाले से कहीं अधिक और पौष्टिक भोज्य पदार्थों−की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार एक शारीरिक परिश्रम करने वाले और उसी वयके एक मानसिक परिश्रम करने वाले के लिए भोजन पदार्थों के परिमाणों और प्रकारों में अन्तर होना चाहिये। इन सब बातों पर विचार करना यहाँ उपयुक्त नहीं। यहाँ तो प्रश्न जीवन और मरण का आ उपस्थित हुआ है। हमें तो करोड़ों प्राणियों की प्राण रक्षा पर विचार करना है। हमें तो देखना है कि हम कम से कम कितना भोजन करें कि हम स्वस्थ रह सकें और अपना काम−काज सुचारु रूप से चलाते रहें। एक पुरानी कहावत है कि कम खाना और गम खाना−दोनों ही बहुत लाभप्रद बातें हैं। वास्तव में कम खाने से उतने लोग नहीं मरते, जितने अधिक भोजन करने से मरते हैं। पेट की अनेकानेक बीमारियों तथा उसकी खराबी से उत्पन्न हुए अनेक रोगों का मुख्य कारण पेट को ठूंस ठूंस भरते रहना होता है। विचारे पेट को आराम करने का अवकाश ही नहीं मिलता। यह पेट के साथ हमारा घोर अन्याय है। इसीलिए कभी−कभी जब हमारा अन्याय उसे असह्य हो जाता है तो हमारे साथ खुला विद्रोह कर बैठता है और हम बीमार पड़ जाते हैं, और संग्रहणी, अतिसार आदि बीमारियों के शिकार बन बैठते हैं। कहने का तात्पर्य है कि यह पेट हमें कड़ी से कड़ी चेतावनी देता है और इस पर भी यदि हम नहीं चेतते या संभलते तो वह स्वयं हराकिरी (आत्महत्या) कर डालता है। फलतः हम अपने जीवन से भी हाथ धो बैठते हैं।
हमारा भोजन उतना होना चाहिए जितना हम आसानी से पचा सकें। भोजन का कोई सार्थक भाग उस पर पाचन क्रिया न हो सकने के कारण निरर्थक बनकर हमारे शरीर से बाहर मल के साथ व्यर्थ नष्ट न हुआ करे। ध्यान रहे हमारे अधिक किये हुए भोजन के जिस भाग को पेट नहीं पचा पाता उसे वह मल के साथ शरीर से बाहर कर दिया करता है और कभी−कभी तो वह इतना चिढ़ उठता है कि मूत्र और मल−दोनों द्वारों से उसे बाहर निकालने लगता है, और तब हम घबराए हुए किसी वैद्य डाक्टर या हकीम की शरण लेते हैं कि बचाओ। बात यह है कि हममें से बहुतेरे इस सिद्धान्त के अनुयायी दिखलाई देते हैं कि ‘खाने के लिए जियो, न कि जीने के लिए खाओ वास्तव में हमें जीने के लिये खाना चाहिए न कि खाने के लिए जीना चाहिए। इसमें अधिक यदि हम खाते हैं तो अन्याय और अत्याचार करते हैं, और शारीरिक क्षति के साथ साथ राष्ट्रीय जीवन की क्षति उत्पन्न करने का कारण बनते हैं, क्योंकि हमारे ऐसा करने से कितनों को भोजन प्राप्त नहीं हो पाता।
हम देखते हैं कि आम भोजन और भूख अपने नैसर्गिक रूप में नहीं हैं। हम अपने नैसर्गिक रूप में नहीं हैं। हम अपने भोजन को नमक−मिर्च तथा अन्य अनेक प्रकारों से स्वादिष्ट और आकर्षक बनाते हैं जिससे हमारी भूख भी बढ़ जाती है और हमारी जिह्वा स्वाद के पीछे पागल हो जाती है, और हमें ज्ञान नहीं रहता कि हम आवश्यकता से कितना अधिक भोजन कर जाते हैं। पेट (आमाशय) में अधिकाधिक भोजन भरने से वह दिन प्रति दिन फैलता जाता है और अन्त में लम्बोदर बन जाता है और अन्त में लम्बोदर बन जाता है। हमारे देश में ऐसे लम्बोदरों की कमी नहीं। प्रायः धनी समाज ही इसमें अग्रगण्य हैं; कारण उनके पास धन की प्रचुरता है, और धन से सभी पदार्थ प्राप्त किये जा सकते हैं। फिर दिन भर तरह−तरह के स्वादिष्ट भोजनों से पेट को भरते रहना उनके लिए कौन सा कठिन काम है। आज दिन भी जब भोज्य पदार्थों का इतना अभाव है उनके ऊपर इसका कोई विशेष प्रभाव नहीं दिखलाई देता। ये भोजनभट्ट अपनी उदर पूर्ति उचित अथवा अनुचित उपायों से किया ही करते हैं।
खाद्यपदार्थों के इस असन्तुलित विभाजन के साथ ही साथ हम जो उन्हें विकृत करके काम में लाते हैं, उससे एक दूसरे रूप में खाद्य पदार्थों की क्षति करते हैं। अन्न के सम्बन्ध में भोजन−वैज्ञानिकों का मत है कि अग्नि से पकाये हुए अन्न की अपेक्षा प्राकृतिक रूप से पके हुए अन्नादि भोजन किये जायँ और उन्हें पचा लिया जाय तो वे पकाये जाने की अवस्था में से कई गुना अधिक लाभकारी व पुष्टिकर होते हैं; क्योंकि अन्न, भाजी या शाक आग पर पकाये केवल इसलिये जाते हैं कि वे अधिक स्वादिष्ट और सरल पाचनशील बन जायें। वैज्ञानिकों का मत है कि इससे उन पदार्थों के कई एक आवश्यकीय प्राकृतिक वा भौतिक गुणा नष्ट हो जाते हैं। अतः हम देखते हैं कि भोजन में स्वाद उत्पन्न करने व उसे शीघ्र पाचनशील बनाने के लिए हमें उक्त भोजन का एक आवश्यक अंग खो देना पड़ता है। यदि हम अन्नों को यथासाध्य उनके प्राकृतिक रूप में ही ग्रहण करें तो समय पाकर हम देखेंगे कि हमें उनसे यथार्थ स्वाद व मधुरता प्राप्त हो रही है। साथ ही साथ हम थोड़े ही अन्न के परिमाण से अपने शरीर की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं। हरे शाक और पके फल हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक पदार्थ हैं। यदि हम अपने भोजन में अन्न के साथ शाक भाजी और फल अधिक परिमाण में रखा करें तो अधिक लाभ उठाने के अतिरिक्त अन्न की बचत भी कर सकते हैं। इसके लिये हमें शाक−भाजी और फल अधिकाधिक उत्पन्न करने में जुट जाना पड़ेगा। थोड़े−थोड़े स्थानों में भी एक−एक कुटुम्ब के लिये सदा हरे व ताजे शाक, भाजी तथा फल उत्पन्न किये जा सकते हैं। प्रत्येक कुटुम्ब को जिसके घर के पास थोड़ा भी खुला मैदान हो—चाहे वह नगर का निवासी हो अथवा ग्राम का—पर्याप्त शाक−भाजी व फल अन्न तो एक जमीन से वर्ष में एक ही बार उत्पन्न किये जा सकते हैं, किन्तु शाक−भाजी की तो कोई फसल सदा और सब मौसम में तैयार की जा सकती है।
अब रह गयी एक तीसरी बात, और वह है उपवास। उपवास का महत्व हमारे हिन्दू समाज में विशेष रहा है। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में उपवास (व्रत) रखने का चलन विशेष रहा है, क्यों कि हमारे दूरदर्शी ऋषियों ने इसे धर्म का अम्बर (जामा) पहिना दिया है, क्यों कि वे जानते थे कि स्वास्थ्य विज्ञान ने अनभिज्ञ जनता उपवास के महत्त्व को भूल कर उसकी नितान्त अपेक्षा वा अवहेलना कर बैठेगी। इसी लिए उन्होंने उपवासों की तिथियाँ, समय और ऋतु के अनुसार, विचार कर भिन्न−भिन्न व्रतों के नाम से रख दिया है, जिसे स्त्री समाज ने अपनी विशेष धार्मिक भावुकता के कारण अब तक प्रचलित रखा है। किन्तु पुरुष समाज का ध्यान इस ओर बहुत ही कम है। आज के नव शिक्षित युवक तो उपवास व व्रत की बातों का उपहास करते देखे जाते हैं। सन्तोष है कि आधुनिक युग के ऋषि महात्मा गाँधी ने उपवास की उपयोगिता की और देश के नर−नारियों का ध्यान अपने कर्मठ जीवन द्वारा पुनः आकृष्ट किया है। अब लोग समझने लगे हैं कि उपवास हमारे स्वस्थ जीवन का एक विशेष अंग है। यदि हम सप्ताह में एक दिन, जैसे की हम अपने कार्यों से प्रायः अवकाश लिया करते हैं अपने आमाशय (पेट) को भी अवकाश व छुट्टी दिया करें, तो हमारा शरीर स्वस्थ बना रहेगा और हमारे कार्य करने की शक्ति संतुलित रहेगी। हम जानते हैं कि जिस मशीन निर्जीव से हम बराबर काम लेते हैं और उसे बीच बीच में अवकाश नहीं देते वह भी बहुत शीघ्र खराब हो जाया करती है। आपको सुन कर आश्चर्य होगा कि आपके शरीर के अन्दर आपकी अन्न प्रणाली रूपी सजीव मशीन की आपके द्वारा दुर्दशा हो रही है। आप अपने आमाशय व अन्न प्रणाली के कार्य को सदा अपूर्ण और असमाप्त बनाये रखते हैं, कारण, एक समय का जरूरत से अधिक किया हुआ भोजन अभी पूर्ण रूप से पचने भी नहीं पाता कि आप फिर भोजन से भर देते हैं। विचारे आमाशय के आराम करने का अवकाश कब और कैसे मिले? इसलिये आवश्यक है कि आपकी असावधानी के कारण उक्त मशीन की खराबियों को दूर करने के लिये उसे सप्ताह में एक दिन विश्राम दिया जाया करे अर्थात् एक दिन उपवास रखा जाय। इससे हमारी इस अन्तरंग मशीन का जीवन और कार्य क्षमता बढ़ेगी।
हमें अपने पेट की भीतरी मशीन को अवकाश देने का थोड़ा−थोड़ा करके अभ्यास करना चाहिए। पहले सप्ताह से एक दिन एक समय का भोजन बन्द करने का अभ्यास किया जाय। शनैःशनैः पूरे एक दिन का उपवास रक्खा जाय। इससे उपवास रखने वाले को कोई कष्ट न होगा।
इस उपवास क्रम से हम अपने शरीर के विकारों को दूर कर मन और शरीर को शुद्ध कर सकेंगे। साथ ही साथ हम देखेंगे कि इससे लेशमात्र भी कष्ट न होगा, वरन् एक प्रकार से हमारे शरीर और मन में नव−शक्ति का संचार होगा और यदि सभी कुटुंब के प्राणी— छोटे बच्चों को छोड़ कर सप्ताह में एक दिन उपवास करें तो प्रति सप्ताह खर्च का प्रायः सातवाँ भाग अन्न बचा लें। इस प्रकार वर्ष भर के प्रायः डेढ़ मास के अन्न खर्च से मुक्ति पा जायँ ऐसे काल में जब अन्न की समस्या इतनी जटिल हो रही है यदि जनता इस ओर अपना समुचित ध्यान दे, और इसके अनुसार कार्य करना प्रारम्भ करदे तो यह सुझाव बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
गायत्री तपोभूमि में इन दिनों विशद् गायत्री महायज्ञ का कार्यक्रम बड़े ही शान्त एवं भावनापूर्ण वातावरण में चल रहा है। बहुधा 30 से लेकर 40 तक साधकों का निवास तपोभूमि में रहता है प्रातः काल सूर्य उदय होते ही गायत्री महायज्ञ आरम्भ हो जाता है। तीसरे पहर से विशेष यज्ञों की शृंखला वाला कार्यक्रम चलता है। श्रावण मास में रुद्र यज्ञ बड़े आनन्द पूर्वक शास्त्रोक्त विधि से पूर्ण हो गया। प्रथम भाद्रपद में विष्णु यज्ञ चल रहा है। दूसरे भाद्रपद में विष्णु यज्ञ चलेगा। आश्विन के प्रथम पक्ष में पितृ यज्ञ का और द्वितीय पक्ष में शतचण्डी का आयोजन रखा गया है। पितृ गणों की शांति और सद्गति में पितृ सूक्त के वेद मन्त्रों से हवन तर्षण आदि की प्रक्रिया बड़ी ही सहायक होती है। शतचण्डी अनेक अनिष्टों के निवारण में विशेष साधन अनुष्ठान आदि करने के लिए अनेकों साधक तपोभूमि में आते हैं, उनकी यहाँ आने की तैयारी अभी से आरंभ हो रही होगी। यह दशा के अनिष्टों से पीड़ितों के लिए कार्तिक मास में होने वाला नवग्रह यज्ञ बहुत ही श्रेयष्कर है। इन यज्ञों में भाग लेकर आत्म−कल्याण एवं विश्व शान्ति का महान् पुण्य संचय करने के लिए जो लोग तपोभूमि में आना चाहते हैं, उन सत्पात्रों के लिए यहाँ सब प्रकार की सुविधाजनक व्यवस्था है। मार्गशीर्ष से लेकर फाल्गुन तक यजुर्वेद, ऋग्वेद, अथर्ववेद, सामवेद के यज्ञ भी भली प्रकार पूरे हो जावेंगे। प्रतिदिन 7−8 घंटा हवन होते रहने की सामग्री, घी, समिधा आदि का खर्च, आश्रमवासियों का भोजन व्यय, भागीदार और संरक्षकों का पत्र व्यवहार फार्म आदि का खर्च कुल मिलाकर इतना अधिक बैठता है, जो लोगों की सहायता से कई गुना अधिक होता है। इसकी पूर्ति उसी प्रेरक शक्ति पर निर्भर है जिसकी प्रेरणा से यह असाधारण कार्यक्रम आरम्भ हुआ है।
अखण्ड−ज्योति के अगले अंक
अखण्ड−ज्योति का ‘जुलाई अगस्त’ का अंक यज्ञ महत्व अंक था। मथुरा के प्रेसों की आम हड़ताल के कारण गत अंक कई प्रेसों में थोड़े−थोड़े पृष्ठ छपाने पड़े जिससे अशुद्धियाँ भी बहुत रहीं और लेट भी बहुत निकला, इससे निश्चय ही पाठकों को बड़ी असुविधा हुई, फिर भी इस अंक की खोजपूर्ण सामग्री को सर्वत्र बहुत ही पसन्द किया गया। अब इसी वर्ष छोटे−छोटे दो विशेषांक और निकाले जा रहे हैं। अगला−अक्टूबर का अंक−अनुभव अंक होगा। इसमें गायत्री उपासना तथा यज्ञ सम्बंधी अनुभव प्रकाशित होंगे। इसके बाद नवम्बर या दिसम्बर का अंक “यज्ञ विज्ञान अंक” होगा। जिसमें यज्ञ संबंधी साइंस तथा सूक्ष्म प्रक्रियाओं का समुचित विवेचन रहेगा। इसके कुछ ही समय बाद ‘यज्ञ विधान अंक’ निकालने की तैयारी की जायगी। जिसमें अनेक प्रकार के यज्ञों की पद्धतियों का विधान भली प्रकार समझाया जायगा। अगले वर्ष हर महीने भारतीय संस्कृति, सिद्धान्तों, आदर्शों, कार्यक्रमों, कर्मकाण्डों, व्रतों, त्यौहारों, रीति−रिवाजों, भाषा, वेष, भाव आदि की विवेचना की विशेष तैयारी के साथ चर्चा रहा करेगी। ताकि हर भारतीय अपने धर्म विज्ञान के रहस्यों से ठोस आधार पर अवगत हो सके। अगले वर्ष अखण्ड−ज्योति की पृष्ठ संख्या लगभग ड्यौढ़ी कर देने का विचार हे− यदि ऐसा हुआ तो मूल्य ड्यौढ़ा तो नहीं किया जायगा पर उसमें कम से कम आठ आने तो जरूर बढ़ाने पड़ेंगे।
देश भर में प्रचार तथा प्रकाश
प्रसन्नता की बात है गायत्री तपोभूमि में आयोजित कार्यक्रमों द्वारा अनेक स्थानों पर सामूहिक रूप से छोटे बड़े गायत्री सम्मेलन, गायत्री मन्त्र, गायत्री पुरश्चरण तथा गायत्री यज्ञ हो रहे हैं, रोहतक के महात्मा प्रभु आश्रितजी, आचार्य नित्यभूषणजी, तपोवन देहरादून के महात्मा आनन्द स्वामी, कनखल के तपोनिष्ठ गायत्री स्वरूपजी वानप्रस्थी आदि मनुष्य तो अपना पूरा समय और मन ही गायत्री माता के लिए उत्सर्ग किये हुए है और घर−घर इस महान् ज्ञान की अलख जगा रहे हैं। आशा है और भी आत्माएं इस दिशा में अग्रगामी होंगी।
[श्री पथिक]
हे समर्थ, हे परम हितैषी, तुम से ही कल्याण हमारा।। तुम्हें न पाकर व्यर्थ चला जाता मानव का जीवन सारा।।
परम बन्धु युग युग के योगी, महाबुद्ध, हे अमर महात्मन। चूम सके तो चरण तुम्हारे उसका सफल हुआ मानव तन। देव तुम्हारे दर्शन करके लग जाता तुम में जिसका मन। तुम्हें छोड़ फिर कहीं न जाता तुम्हीं दीखते हो प्रियतम धन। कितनों ने ही सीख लिया मर कर जीने का मन्त्र तुम्हारा ।।1।।
जाने कितने मुरझाये मुख खिलते देखे तुमको पाकर।। सदा पीड़ितों की पुकार पर रहे दौड़ते कष्ट उठाकर। जो न कहीं सुख देख मिला, वह देखा श्री चरणों में आकर। जो न कभी हो सका वही, हो गया तुम्हारा ध्यान लगाकर। शरण ले लिया उसको जिसने कभी हृदय से तुम्हें पुकारा ।।2।।
तुमको हमने दीनों दलितों की कुटिया में जाते देखा। अपने योग शक्ति से उनके तुमको दुख मिटाते देखा। कहीं अश्रु से गीली पलकें स्वामिन! तुम्हें सुखाते देखा। जो कि तुम्हें करना था उसको कभी न देर लगाते देखा। तुमने उसकी सुनी दयामय, जिसको सबने ही दुतकारा ।।3।।
निज तन मन का ध्यान न रखकर तुमने पर उपकार किया है। तुमने सदा बिना कुछ चाहे प्राणि मात्र से प्यार किया है। हे संघर्षातीत! तुम्ही ने षट रिपु का संहार किया है। शरणागत डूबते हये को जब देखा तब तार दिया है। भव सागर में पड़े जीव को नाथ तुम्हीं से मिला किनारा।
हे अभेद दृष्टा! मंगलमय, शोक विनाशक, हे विज्ञानी। जन मन रंजन, भक्त पाल, हे बाल सखा, श्रद्धेय अमानी। अतुलित प्राण शक्ति के सागर गुण गुण आगर है अनुपम दानी। तुमसे ज्ञान ज्योति पाते हैं जग के चिर-तमवेष्ठित प्रानी। सदा अशक्त बद्ध पीड़ित को, दिया तुम्हीं ने शक्ति सहारा ।।5।।
वीत राग, हे परम तपस्वी, नित्य समाहित चित्त, धीर तुम। शिव सुन्दर-सत्य के समिश्रण, हरते भव की विषम पीर तुम। पावन तप के ओज तेज से दीप्त मान निर्दोष वीर तुम। हे संदर्शक परम तत्व के, चलते तम का हृदय चीर तुम। पथिक हृदय को तुमसे मिलती दिव्य प्रेम की अविरल धारा ।।6।। हे समर्थ! हे परम हितैषी! तुमसे ही कल्याण हमारा।।
*समाप्त*