(पं. तुलसीराम शर्मा, वृन्दावन)
अलोलजिह्वसमुपस्थितो धृति, निधायचक्षुर्यु गमात्रमेवतत्। मनश्चवाचं च निगृह्य चंचलं भयभिवृत्तोमम भक्त उच्यते॥113॥
( म॰ भा॰ आश्व॰ अ॰ 101)
जिसकी जीभ चपल नहीं अर्थात् व्यर्थ के बकवाद से रहित हैं। भोजन में आसक्त नहीं, धीरज धारण करने वाला है ( विपत्ति सम्पत्ति में एक रस रहता है) चलते समय जो चार हाथ दृष्टि डालकर चलता है (चारों ओर को व्यर्थ नहीं देखता ) चंचल मन वाणी का नियम में रखकर ( मन में बुरे विचार नहीं लाता, वाणी से असत्यादि भाषण नहीं करता) कर्तव्य कर्म पालन करने में निर्भय रहता है, वह मेरा (श्री कृष्णचन्द्र कहते हैं) भक्त कहाता हैं॥113॥
सर्वाभयप्रदानं च सर्वानुग्रहणं तथा। सर्वोपकारकरणं शिवस्यराधनं विदुः॥30॥
( शिव पु॰ उत्तरार्ध वा॰ 7 अ॰ 3 )
सब को अभय दान देना, सब पर कृपा दृष्टि रखना, सब का उपकार करना, इसको शिवजी की आराधना समझनी चाहिये॥30॥
अहिंसा सत्य मस्तेयं दयाभूतेष्वनुग्रहः। यस्येतानिसदा विप्रास्तस्य तुष्यति शंकरः॥16॥
(सौर पु॰ अ॰ 48)
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, दया, कृपादृष्टि ये जिस मनुष्य में है, उस पर शंकर भगवान् प्रसन्न रहते हैं॥ 16॥
चरित्रवान् पुरुष भगवान् के बराबर है। अन्य दुखे नयो दुखीयोऽन्यहर्षेणहर्षितः। स एव जगतामीशोनररुपधरोहरिः॥ 69॥
( नारद पु॰ पूर्वखंड अ॰ 7)
अन्य के दुख से जो दुखी है, अन्य के हर्ष से जो हर्षित है, वह जगत का ईश नर रूपधारी भगवान् है॥ 69॥
पुस्योपदेशी सदयः कैतवैश्चविवर्जितः। पाप मार्ग विरोधी च चत्वारः केशवोपमाः॥17॥
(पद्म पु॰ क्रियायोगसार खंड 7 वा॰ अ॰ 1)
धर्मोपदेशक, दयावान्, छल-कपट से शून्य, पाप मार्ग के विरोधी ये 4 भगवान् के तुल्य है॥17॥
ज्ञानरत्नैश्चरत्नैश्च पर सन्तोष कृन्नरः। सज्ञेयः सुमतिर्नूननररुप धरोहरिः॥
( पद्म पु॰ 7वाँ क्रियायोगसार खंड अ॰ 1)
ज्ञानरूप रत्नों से और द्रव्यादि से जो-जो सत्पुरुषों को संतोष करता है, ऐसे पुरुष को मनुष्य रूपधारी भगवान् समझना चाहिये॥ 19॥
द्वयं यस्यवशेभूयात् स एवस्याज् जनार्दनः॥29॥
(वैशाख माहात्म्य 22)
शिश्न और जिह्वा ये दो जिसके वश में हैं, वह भगवान् है॥ 29 ॥
अनाढ्यामानुपेवित्ते आढय़ावेदेपु ये द्विजाः। तेदुर्द्धर्पादुष्प्रकम्प्या विद्यात्तान ब्रह्मणस्तनुम॥
( म॰ भा॰ उ॰ अ॰ 43/39 )
जो द्विज मानुषी धन (स्त्री-पुत्र सुवर्णादि) के धनी नहीं हैं और वैदिक धन ( अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, शम, दम ) के धनी हैं, वे विवेकियों के मत में ब्रह्म के शरीर हैं, वे बड़े तेजस्वी और दुष्प्रकम्प्य हैं॥ 39 ॥
श्री शंकराचार्य जी ने इस वचन के भाष्य में लिखा है कि—‘वेदेषु वेद प्रतिपाद्य अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य शमादि साधनेषु’ अर्थात् वेद में कहे अहिंसा, सत्य आदि में लगा हुआ पुरुष ब्रह्म का शरीर है।
चरित्रवान् सुखी रहता है।
तत्र कर्म प्रवक्ष्यामि सुखी भवति येनवै। आवर्तमानोजातीषु यथान्योन्या सुसत्तम॥14॥
दानं व्रत ब्रह्मचर्य यथोक्तं ब्रह्म धारणम्। दमः प्रशान्तताचैव भूतानाँ चानुकम्पनम्॥13॥
संयमश्चानृशंस्यञ्च परस्वादानवर्जनम्। व्यलीकानामरणं भूतानाँ मनसामुवि॥16॥
मातापित्रोश्च शुश्रू पा देवतातिथि पूजनम्। गुरु पूजाघणाडडडड शौचं नित्यामिन्द्रिय संयमः॥17॥
( श्री गुलाब )
तुमसे बँधा प्रकाश मृत्यु से जीवन, जड़ता ने गति बाँधी। बंधा इस तरह मैं, भू-नभ के बीचों बीचबंधे ज्यों आँधी। सागर के दोनों कूलों पर मैंने नाव टिकानी चाही— दो दुनिया हैं, मेरे दो हाथों में दोनों आधी आधी ॥
अन्धकार लहरों के तट पर, मैं प्रकाश में ढंका अकेला। मेरे चारों ओर लगा है चञ्चल छायाओं का मेला। मैं इनका हो सका न पर जिनका खुद उनने हंसी उड़ाई— देख दूर से छोड़ न पाते मुझे रत्नमय सागर बेला ॥
मैंने कहा कि स्वप्न मिला है और सत्य भी मुझे न भाया। मैं अम्बर का हो न सका धरती के हित हो गया पराया। मयख्वारों दुनियाँदारों दोनों ने दूर हटाया मुझको — कहा एक ने ढोंगी पागल, समझ दूसरा कुछ मुस्काया॥
कहा जीवितों ने मृत मुझको मृत्यु साँस से डर कर भागी। काया लादे हुए प्रेत-सा फिरा चतुर्दिक् मैं गृह-त्यागी। खड़ी दो युगों के सन्धि-स्थल पर ज्यों किसी महाकवि की कृति। मैं जागा तब दुनिया सोयी, मैं सोया तब दुनिया जागी॥
(आचार्य श्री भद्रसेन जी, अजमेर)
आत्मिक शान्ति और पूर्णानन्द को प्राप्त करने के लिये यह जीव मानव देह में अवतरित हुआ है। यही इसके जीवन का चरम लक्ष्य है। इसीलिये ही यह जीव सुख और शान्ति का खोजी बनकर उसकी प्राप्ति के लिये दर-ब-दर भटकता और ठोकरें खाता फिरता है। इसके जीवन का सारा क्रियाकलाप, सारी उधेड़बुन केवल जीवन का शान्त और सुखमय बनाने के लिये ही है। किन्तु इस जीवन संग्राम में इतनी खटपट और उधेड़बुन करने पर भी जीव उस सच्चे सुख और शान्ति से वञ्चित ही रहता है जिसकी कि उसे अभिलाषा है। इतना ही नहीं, प्रत्युत कभी-कभी तो वह जीवन में सुख और शान्ति के स्थान पर अत्यन्त क्लेश, दुःख और अशान्ति का ही अनुभव करता है। संसार के नाना-प्रकार के सुखप्रद विषयों और वैभवों को भोग करता हुआ भी वह उनमें उस शान्ति और आनन्द का अनुभव नहीं करता, जिसकी उसे चिर अभिलाषा है। ऐसा क्यों? इसका एकमात्र उत्तर यही है कि जिन भौतिक पदार्थों में परमानन्द और परम शान्ति का अभिलाषी बन भटक रहा है, वे पदार्थ स्वयं सुख और शान्ति से रहित हैं। कोसों दूर हैं। भला जिस के पास जो वस्तु है ही नहीं वे दूसरे को क्या दे सकेगा? जो स्वयं भूख व प्यास से तड़प रहा है, वह हमें कैसे स्वादु भोजन तथा मधुर जल का पान करा सकेगा और हमारी भूख और प्यास शान्त कर सकेगा? इसीलिये आत्मा जब इन भौतिक पदार्थों में भटक कर निराश हो जाती है, उसे अपने अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होती। इतना ही नहीं प्रत्युत वह विश्व के विविध विषय-भोग और आमोद-प्रमोद, सुख और शान्ति के स्थान पर उल्टा उसके दुःख और अशान्ति का कारण बन जाते हैं। तो वह निराश हो जाता है। उसकी आत्मा संतप्त और व्याकुल हो उठता है, उसे चारों ओर विषय वासनाओं की जलती हुई प्रचण्ड ज्वालाएँ व्याकुल और अशान्त बना देती हैं। उस समय उसे सुख और शान्ति के परम धाम प्रभु का ध्यान आता है। और वह पश्चात्ताप करता हुआ वेद के शब्दों में प्रभु से पुकार उठता है।
सं मा तपन्त्यमितः सपत्नीरिव पर्शवः।
ऋग्वेद 1 18528॥
हे दीनबन्धु! हे अधमोद्धारक पतित पावन प्रभो, अब तो मुझे ये तृष्णाएँ, ये विश्व की क्षणिक कामनाएँ और विषयों की विषभरी वासनाएँ सपत्नियों के समान सन्तप्त और व्याकुल कर रही है। भगवन्! अब मैं सब ओर से निराश होकर और तेरा भक्त बनकर तेरे द्वार पर आया हूँ। हे दीनबन्धो! क्या इस दीन की पुकार न सुनोगे? क्या अपने इस भक्त को विश्व की क्षणिक वासनाओं और तृष्णाओं से हटाकर अपनी प्रेममयी पावन गोद में नहीं लोगे? उस समय ऋषि दयानन्द के शब्दों में प्रभु उस अति व्याकुल भक्त की करुण पुकार को सुनते हैं, और उसे अपनी सर्व-शक्तिमयी गोद में लेते हैं। प्रभु अपने शरणागत उपासक को निज शरण में ले लेते हैं।
वास्तव में योगीजनों के शब्दों में इस अविद्या आदि पञ्च क्लेशों से संतप्त और परिणाम, ताप, संस्कार आदि दुःखों से दुखी जीव के लिये एकमात्र वह, सच्चिदानन्द प्रभु ही सच्ची शान्ति और परम सुख का सहारा है। इसीलिये वेद कहता है—
न त्वदृते अमृता भादयन्ते।
“हे आनन्दकन्द, सच्चिदानन्द, प्रभो! तेरी शरणागति के बिना तेरा यह अभुत पुत्र पूर्णानन्द को प्राप्त नहीं कर सकते।”
वास्तव में जो मनुष्य अपने जीवन को कदाचारों और कुत्सित संस्कारों से हटाकर उस प्रभु की शरण में आ जाता है, दूसरे शब्दों में वह अपनी अधमावस्था पर पश्चात्ताप करता हुआ उसका परित्याग कर सत्पुरुष अर्थात् सन्मार्गगामी बन जाता है, भगवान अवश्य उसके ऊपर सब प्रकार के सुखों की वर्षा करते हैं। इसीलिये वेद कहता है—
“त्वमग्ने इन्द्रो वृषभः सतामसि।”
—ऋग्वेद 2/1/3॥
हे परमज्योतिर्मय प्रभो! तुम ही तो सत्पुरुषों के लिये अपने अनन्य भक्तों के लिये इन्द्र और वृषभ बन कर उसके ऊपर समग्र ऐश्वर्यों और सकल सुखों की वर्षा करने वाले हो।
‘मा ते भयं जरितारम्’ । अ॰ 1।186।4॥
तेरे प्रेमी भक्त को भय, चिन्ता और दुःख कहाँ? वेद के उपर्युक्त वचनों से सिद्ध होता है कि एकमात्र प्रभु भक्ति ही इस भव-बन्धन में पड़े जीव को सुख, शान्ति और परमानन्द प्रदान करने वाली है।
बिना ईश्वर आराधना के आत्मा को परमशान्ति और परमानन्द की उपलब्धि होना बहुत कठिन ही नहीं, अपितु नितान्त असम्भव है।
अब उस प्रभु भक्ति का क्या स्वरूप है, थोड़ा इस पर विचार करना चाहिये। भक्ति में तीन बातों को जान लेना परमावश्यक है, हम किस की भक्ति करें, कैसे बनकर करें, और क्यों करें? बिना इन तीनों बातों के जाने जो जन भक्ति मार्ग पर चलने लगते हैं, वे सदा अपने चरम लक्ष्य से वंचित ही रहते हैं, उन्हें निज अभीष्ट की प्राप्ति नहीं होती। अतः भक्ति मार्ग के पथिक को उपर्युक्त तीनों बातों का जाना लेना परमावश्यक है।
भक्ति का पहला कर्त्तव्य है कि वह यह विचार करे कि जिसको वह अपना आराध्यदेव बनाने चलता है, जिस सुन्दर स्वरूप को वह अपने हृदय-मन्दिर में बैठाना चाहता है उसका क्या स्वरूप है? उसकी उपासना करने पर मुझे अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति होगी या नहीं? भक्त कैसे आराध्यदेव की आराधना करें? इस सम्बन्ध में अथर्ववेद में एक सुन्दर मंत्र आता है-
तमुष्टुहि यो अन्तः सिन्धुः सूनुः। सत्यस्य युवानभद्रोघवाच सुशेवम्॥
—अथर्व वेद 6।1।1।।
वेद कहता है —हे भक्त ! यदि तू सच्ची शान्ति और परमा आनन्द को प्राप्त करना चाहता है तो [ तम् +उ+स्तुहि ]उस ही प्रभु की उपासना कर [यः अन्तः सिन्धुः ] जो इस संसार में रम रहा है (सत्यस्य+सूनुः) जो सदा सत्य की ओर ही प्रेरणा करता है [ युवानाम् ] जो सर्वदा युवा अर्थात् एक रस रहता है, (सुवेशम्) जो सारे बलों, सुखों और आनन्द का भण्डार है ( अद्रोघवाचम्। जिसकी वाणी में किसी के प्रति असत्य, द्रोह और विश्वासघात नहीं है।
भक्त सोचता है मैं अपने प्रभु को कैसे मिलूँ। मेरा वह प्रियतम मुझे कहाँ मिलेगा, और नानाप्रकार की तृष्णाओं और आसुरी वासनाओं रूपी तरंगों से तरंगित काम, क्रोध, राग, मोह, ईर्ष्या आदि जल-जन्तुओं से पूर्ण इस भव सागर में मेरा कौन सहारा है? इन दोनों आशंकाओं का समाधान वेद एक ही शब्द में करता है (तमु+स्तुहि+यो+अन्तः सिन्धुः) भक्त तू उस प्रेम की स्तुतिः कर जो सर्वव्यापक और सर्वान्तर्यामी है। उस आराध्यदेव की आराधना करने के लिये तुझे अन्यत्र कहीं भटकना नहीं पड़ेगा, क्योंकि वह तेरा अन्तर्यामी तो तेरे रोम-रोम में रम रहा है। फिर तुझे इधर उधर जाने और भटकने की क्या आवश्यकता और इसमें भी कुछ सन्देह नहीं कि यह संसार एक अथाह सागर है, और यह जीव अपनी दुर्वासनाओं और निर्बलताओं के वशीभूत होकर अहर्निश इसमें गोते खा रहा है। परन्तु यह भी ध्रुव सत्य है कि जो भक्त उस करुणामय प्रभु का आश्रय ले लेता है, उसकी प्रेममयी गोद में बैठ जाता है और उसकी शरण में आज जाता है, वह इस भव-सिन्धु से तर कर पार हो जाता है
प्रभु प्राप्ति का लक्ष्य केवल जन्म, जरा, व्याधि और मृत्यु से छुटकारा पाना ही नहीं, प्रत्युत उससे छूटकर उस परमानन्द और परम् शान्ति को प्राप्त करना है, जिसकी खोज में जीव जन्म-जन्मान्तरों से भटक रहा है। अतः भक्त सोच सकता है कि प्रभु की उपासना से मैं जन्म-मरण के बन्धन से तो छूट जाऊँगा किन्तु मेरा अन्तिम लक्ष्य तो परमानन्द की प्राप्ति है। क्या प्रभु-भक्ति द्वारा इसकी भी मुझे प्राप्ति होगी या नहीं? वेद भक्त के इस संदेह को भी दूर करता है, हे प्रिय भक्त ! तू इस सन्देह को भी अपने हृदय-पटल से दूर कर दे, क्योंकि तेरे आराध्यदेव भगवान् तो “सुशेवः” हैं। सारे सुखों के भंडार हैं। परम शान्ति और पूर्णानन्द के धाम हैं। फिर यह कैसे सम्भव हो सकता है कि उस शान्ति और आनंद के परम निकेतन को प्राप्त कर लेने पर तू आनन्द से वंचित रह जाय। सच्चा ईश्वरभक्त उस परम कल्याणमय प्रभु की उपासना द्वारा उसमें तल्लीन हो जाता है और इतना तल्लीन हो जाता है कि अपने को भूलकर भेद के शब्दों में स्वयं कह उठता है:—
यदग्ने स्यामंह त्वं, वाधास्या अहम्। स्युष्टे सत्या इहाशिषः ॥ ऋ॰ 8।44।23॥
हे प्राणधन! अब तो मैं आपकी भवभय हारिणी पावन भक्ति द्वारा तुझमें इतना लवलीन हो गया, इतना तन्मय हो गया कि —मैं तू बन गया और तू मैं हो गया। अब मुझे पता लगा कि अपने अनन्य भक्तों के प्रति तेरे कृपा कटाक्ष और आशीर्वाद कितने अटल ध्रुव और सत्य हैं।
वेद जहाँ भक्त के आराध्य देव भगवान् के सत्य, शिव और सुन्दर स्वरूप को यथार्थ रूप में हमारे सम्मुख रखता है, वहाँ भक्त के स्वरूप और कर्त्तव्यों का भी बड़ा सुन्दर वर्णन करता है। वेद का कथन है कि जो भक्त प्रभु को प्राप्त करना चाहता है, सर्वप्रथम उसके हृदय में प्रभु-भक्ति की तीव्र लगन होनी चाहिए, उत्कट अभिलाषा होनी चाहिए। प्रभु प्रेम के प्रति उसे अपना सब कुछ अर्पण कर देना चाहिए।
प्रभु प्राप्ति के प्रति इतनी तीव्र लगन, इतनी उत्कृष्ट अभिलाषा तभी उत्पन्न होती है, जब भक्त संसार के क्षणिक विषय भोगों को छोड़ कर शुभ कर्मों द्वारा अपने हृदय को शुद्ध पवित्र और निर्मल बना लेता है। दूसरे शब्दों में अपने पुण्य कर्मों को उस यज्ञ रूपी प्रभु की हवि बना कर अपने जीवन को हविष्मान् अर्थात् यज्ञमय बना लेता है। इसीलिये वेद में प्रभु-प्राप्ति की तीव्र आकाँक्षा रखने वाले भक्त -भगवान् से प्रार्थना करते हैं:—
व्यमिन्द्र! त्वायवो हविष्मन्तो जरामहे। उत त्वमस्ययुर्भव ॥ ऋ॰ 3।41।7॥
हे इन्द्र! हम तेरे उपासक हविष्मान् बनकर, अपने जीवन को यज्ञमय बनाकर तेरी साधना करें, जिससे कि तू हमारा और हम तेरे बन जायं। अतः जो भक्त प्रभु को अपना बनाना चाहता है; उसे वेद के कथनानुसार अपने जीवन को यज्ञमय बनाकर प्रभु का बन जाना होगा। वेद न तो प्रभु का नाम ही “यज्ञसाध” रखा है, अर्थात् साधना यज्ञ द्वारा ही हो सकती है। वेद कहता है:—
तभील्ठत प्रथमं यज्ञसाधम्॥ ऋ॰ 1/96/3॥
हे प्रभु प्राप्ति के अभिलाषी जनो! याद रखो वह मंगल मय प्रभु “यज्ञसाध” है। अतः यदि तुम उसे प्राप्त करना चाहते हो तो यज्ञ साधना द्वारा ही उसकी स्तुतिः प्रार्थना और उपासना करो।
वह प्रभु “यज्ञसाध” है इसीलिये ही तो वेद ने कहा—
यज्ञेन वर्धत जातवेदसमग्निम्। यजघ्वं हविषा तना गिरा॥
ऋ. 2/8/1॥
हे मनुष्यों! उस वेद ज्ञान के भण्डार परमात्म-ज्योति को यज्ञ द्वारा ही अपने हृदय मन्दिर में प्रकाशित करो और अपने यज्ञमय कर्मों की हवि द्वारा तथा प्रेमरस भरी उदार वाणी द्वारा उसके पवित्र नाम का स्मरण और उसके पवित्र गुणों का कीर्तन करते हुए उस परम ज्योति को प्रतिदिन अपने हृदय-मन्दिर में बढ़ाते चलो।
( श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज )
मनुष्य-समाज की स्वार्थहीन सेवा कर्मयोग है। यह हृदय को शुद्ध करके अंतःकरण को आत्म-ज्ञान रूपी ज्योति प्राप्त करने योग्य बना देता है। विशेष बात तो यह हैं कि बिना किसी आसक्ति अथवा अहंकार के आपको मानव-जाति की सेवा करनी होगी। कर्मयोग में कर्मयोगी सारे कर्मों और उनके फल को भगवान् के अर्पण कर देता है। ईश्वर में एकता रखते हुए आसक्ति को दूर करके सफलता या निष्फलता में समान रूप से रह कर कर्म करते रहना कर्मयोग है।
कर्म क्या है-जैमिनी ऋषि के मतानुसार अग्निहोत्रादि वैदिक कर्म है। भगवद्गीता के अनुसार निष्काम भाव से किया हुआ कोई भी कार्य कर्म है। भगवान कृष्ण ने कहा है, निरन्तर कर्म करते रहो, आपका धर्म फल की चाहना न रखते हुए कर्म करते रहना ही है। गीता का प्रधान उपदेश कर्म में अनासक्ति है। श्वास लेना; खाना, देखना, सुनना, सोचना आदि सब कर्म हैं।
कर्मयोग के रूप-अपने गुरु या किसी महात्मा की सेवा कर्मयोग का सर्वोच्च रूप है। इससे आपका चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। उनकी सेवा करने से उनके दिव्य तेज का आपके ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ेगा। आपको उनसे दैवी प्रेरणा प्राप्त होगी। शनैः शनैः आप उनके सद्गुणों को ग्रहण कर लोगे।
कर्मयोगी के लक्षण-कर्मयोगी को विशाल हृदय होना चाहिये। उनमें कुटिलता, नीचता, कृपणता और स्वार्थ बिल्कुल नहीं होना चाहिये, उसे लोभ, काम, क्रोध और अभिमान रहित होना चाहिये। यदि इन दोषों के चिन्ह भी दिखाई देवें, तो उन्हें एक एक करके दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए, वह जो कुछ भी खाये, उसमें से पहले नौकरों को देना चाहिये, यदि कोई निर्धन रोगी दूध की चाहना रखकर उसी के घर में आये और घर में इसके लिये दूध नहीं बचा हो तो उसे चाहिए कि अपने हिस्से का दूध उसे फौरन ही देदे और उससे कहे हे नारायण! यह दूध आपके वास्ते हैं, कृपा कर इसे पीलो, आपकी जरूरत मुझसे ज्यादा है। तब ही वह सच्ची उपयोगी सेवा कर सकता है।
कर्मयोगी का स्वभाव प्रेमयुक्त , मिलनसार, समाज सेवी होना चाहिए। उसे जाति, धर्म या वर्ण के विचार बिना हर एक व्यक्ति के साथ मिलना चाहिए, उसमें सहनशीलता, सहानुभूति, विश्व-प्रेम, दया और सब में मिल जाने की सामर्थ्य होनी चाहिए। उसे दूसरों के स्वभाव और रीति से संयोग रखने की क्षमता होनी चाहिए, उसे उपस्थित बुद्धि होनी चाहिए, उसका मन शान्ति और सम होना चाहिए। उसे दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होना चाहिए उसको सारी इन्द्रियों पर पूरा संयम होना चाहिये, उसे अत्यन्त साधारण जीवन बनाना चाहिए, यदि वह विलासी जीवन बिताता है और हर एक वस्तु केवल अपने ही लिये चाहता है तो वह अपनी सम्पत्ति दूसरों को कैसे बाँट सकता है? उसे अपने स्वार्थ को जला डालना चाहिए।
ऐसा ही मनुष्य अच्छा कर्मयोगी बन जाता है और अपने लक्ष्य को जल्दी प्राप्त कर लेता है।
कर्मयोगी का भाव—कर्मयोग, भक्ति योग अथवा ज्ञानयोग के साथ मिला होता है। जिस कर्मयोगी ने भक्ति योग से कर्मयोग को मिलाया है उसका निमित्त भाव होता है। वह अनुभव करता है कि ईश्वर के हाथों में निमित्त मात्र है, इस प्रकार वह धीरे-धीरे कर्मों के बंधन से छूट जाता है, कर्म के द्वारा उसे मोक्ष मिल जाता है। जिस कर्मयोगी ने ज्ञानयोग और कर्मयोग को मिलाया है वह अपने कर्मों में साक्षी भाव रखता है। वह अनुभव करता है कि प्रकृति सब काम करता है और वह मन और इन्द्रियों की इन्द्रियों की क्रियाओं और जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी भाव रखकर कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है।
कर्मयोगी निरन्तर निःस्वार्थ सेवा से अपनी चित्त कर लेता है। वह कर्मफल की आशा न रखता कार्य करता है, वह अहंकारहीन अथवा कर्तापन शूर रहित होकर कार्य करता है, वह हर एक ईश्वर को देखता है, वह अनुभव करता है कि संसार परमात्मा के व्यक्तित्व का विकास है वह जगत् वृन्दावन है। वह कठोर ब्रह्मचर्य व्रत करता है, वह करता हुआ मन से ‘ब्रह्मार्पणम्’ रहता है, अपने सारे कार्य ईश्वर के अर्पण है और सोने के समय कहता है—‘हे प्रभो! मैंने जो कुछ किया है आपके लिये है, आप होकर इसे स्वीकार कीजिये। वह इस प्रकार फल को भस्म कर देता है और कर्मों के में नहीं फँसता, वह कर्म के द्वारा मोक्ष प्राप्त करता है, निष्काम कर्मयोग से उसकी चित्त-शुद्धि और चित्तशुद्धि होने पर आत्मज्ञान प्राप्त हो डडडड देश-सेवा, समाज-सेवा, दरिद्र-सेवा, पितृ-सेवा, गुरु-सेवा यह सब कर्मयोग डडडड कर्मयोगी दास-कर्म और सम्मान पूर्ण कर्म नहीं करता, ऐसा भेद अन्य जन ही किया करते हैं। कुछ साधक अपने साधन के प्रारम्भ में बड़े डडडड नम्र होते हैं, परन्तु जब उन्हें कुछ यश डडडड मिल जाता है तब वे अभिमान के शिकार हैं।
डडडड में तथा अमरीका में बहुत से धनी लोग दान करते हैं, वे बड़े-बड़े अस्पताल और संस्थाएँ बनाते हैं। वे यह सब कुछ केवल मनुष्य-जाति पर दया करने के नाते करते हैं, उनके लिये यह सब समाज-सेवा है, यह विचार नहीं होता कि यह संसार प्रभु की डडडड विस्तार है और ईश्वर समाज का आधार मनुष्य ईश्वर का व्यक्तित्व प्रकट करता है। डडडड रहित होकर कर्तापन की बुद्धि को छोड़ फल की आशा को छोड़कर सेवा नहीं करते, डडडड यह सेवा-योग (कर्मयोग) नहीं है। उनके सेवा केवल दान विषयक कर्म है, उनके लिये सेवा केवल मनुष्यता का धर्म है, उनमें किसी दर्जे तक मनुष्य-जाति के लिये सहानुभूति इस सेवा के द्वारा बढ़ जाती है, उनको कर्मयोग के अभ्यास से चित्तशुद्धि करके आत्मज्ञान प्राप्त करने का विचार नहीं आता, उनको जीवन के लक्ष्य (उद्देश्य)का कुछ ज्ञान नहीं होता, उनको ईश्वर की सत्ता में भी दृढ़ विश्वास नहीं होता। जो कर्मयोग के सिद्धान्त को समझकर ईश्वर की सत्ता में दृढ़ विश्वास रखते हुये कर्म करते हैं वे अपने लक्ष्य को जल्दी पहुँच जावेंगे।
कर्मयोग का अभ्यास—कर्मयोग के अभ्यास के लिये बहुत धन होना आवश्यक नहीं हैं, आप अपने तन और मन से सेवा कर सकते हैं। यदि किसी निर्धन रोगी को सड़क के किनारे पड़ा हुआ देखो तो उसको थोड़ा जल या दूध पीने को दो, मीठे आश्वासन से उसको प्रसन्न करो, उसको ताँगे में बैठाओ और पास के अस्पताल में ले जाओ, यदि तुम्हारे पास ताँगे का किराया देने के लिये पैसा नहीं है तो रोगी को अपनी पीठ पर उठाकर ले जाओ और उस को अस्पताल में दाखिल कराने का इन्तजाम करदो। यदि तुम इस प्रकार सेवा करोगे तो तुम्हारा चित्त जल्दी शुद्ध हो जावेगा। निर्धन, निःसहाय मनुष्यों की इस प्रकार की सेवा से परमात्मा ज्यादा खुश होता है, न कि धनी लोगों की शान-शौकत से की हुई सेवा से।
यदि किसी के शरीर के किसी अँग में घोर पीड़ा हो तो उसके उस अँग का धीरे-धीरे दबाओ और अपने हृदय से प्रार्थना भी करो कि हे भगवान् इस मनुष्य का दुःख दूर कर इसको शान्ति में रहने दे और इसका स्वभाव अच्छा हो जावे।
यदि आप किसी मनुष्य या पशु का खून बहता हुआ देखो तो कपड़े के लिये इधर-उधर मत भागे फिरो, बल्कि अपनी धोती या कमीज में से, कुछ परवा नहीं कितना भी कीमती हो एक टुकड़ा फाड़ कर उसके पट्टी बाँध दो, यदि वह कीमती रेशमी कपड़ा भी है तो भी उसको फाड़ने में शंका मत करो।
अपेतोअन्तुषणयासुग्न देव डडडड अस्थ लो डडडड तावतः द्युमि ह भित्कु डडडड भिर्व्षक्त यमेददात्व डडडड॥
यजु॰ 35/1॥
पदार्थ-जो देवपीयवः) दिव्य गुण सम्पन्न व्यक्ति यों से द्वेष करने वाले, (पणयः) आततायी (असुम्ना) अकारण ही दुःख देने वाले हैं, वे यहाँ से (अपयन्तु) दूर चला जावे (लोकः) देखने योग्य (यमः) सबों को शासन में रखने वाले (द्यभिः) प्रकाशमान (अहोभिः अक्तुभिः दिन और रात्रियों के साथ (अस्य) इस (सुतावतः) वेद की शिक्षा में चलने वाले, वेद विहित प्रशस्त कर्म करने वाले सत्जनों से सम्बन्धित (अस्मै) इस मनुष्य के लिये (व्यक्तम) प्रत्यक्ष (अवसानम) अवसान को दयातु देवे।1॥
भावार्थ—जो लोग दिव्य गुण सम्पन्न ऋषियों से द्वेष करते तथा आततायी बनकर अकारण ही दुःख पहुँचाते हैं, ऐसे मनुष्यों के लिये सभी लोकों और लोगों का नियन्ता परमेश्वर प्रत्यक्ष ही मृत्यु का विधान करे।
इस मन्त्र से स्पष्ट हो जाता है, कि सत्पुरुषों को सताने वाले आततायियों के लिए, सर्व नियन्ता भगवान् स्वयं ही उसके विनाशार्थ, परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देते हैं।
यह दुःख पहुँचाना कई प्रकार से होता है। कोई कटु वाणी से, कोई पद से ठोकर मार कर, कोई हाथ से और कोई मन से ही कष्ट पहुँचाने का प्रयत्न करते हैं। जैसा वह करता है, उसी प्रकार का फल उसे मिलना आरम्भ हो जाता है। जितने ही उच्चकोटि के सन्तों को कोई कष्ट देगा, उतना ही क्रूर परिणाम उसे भुगतान पड़ेगा। अब विलम्ब और शीघ्रता की बात ही क्या। यदि उस मनुष्य के पापों के फल भोगने की बारी आ चुकी है, तो उसको देर न लगेगी। उसके तो परमाणु विवशता से निकले, उन्होंने तुरन्त अपना परिणाम दिखा दिया। यदि उसके पुण्य प्रबल हैं, तो वह परमाणु गुप्तचर की तरह उसके गिर्द फिरते रहेंगे। वह समय समय पर उस व्यक्ति को स्वरूप दिखाते हैं और उसको भय उत्पन्न हो आता है। किसी के साथ मेरा रोष है तो वह परमाणु घूमेंगे और मेरे आकार को उसके सामने लायेंगे और वह भय को सुदृढ़ कर देंगे। जब उसके पुण्य क्षीण होकर पाप भाग का काल आ गया है तो उस समय तुरंत फल भुगतता है।
अतः हमें सदा ऐसे कर्मों से सावधान रहना चाहिए। नित्य-प्रति अपनी जाँच पड़ताल करनी चाहिए। जिसके परमाणु निकलते हैं, वही उसे मार देने को पर्याप्त है। कहा भी है
पापी को मारने में पाप महाबली है।
चाह डडडड कन डडडड चाह दर पेश
जो दूसरों के लिये कुँआ खोदता है वह उसी में आप गिरता है।
किसी ईश्वर भक्त, ब्रह्मनिष्ठ, धर्मनिष्ठ व्यक्ति का तिरस्कार करना— उसे दुःख देना, ब्रह्म हत्या है। इसकी पुष्टि में आगे तीन सच्ची घटनाओं से हमारी आंखें खुल जानी चाहिए—
पहली घटना—
जालन्धर से करतारपुर, जाने वाले एक बस में खिड़की के पास साधु महात्मा बैठे थे। एक नवयुवक कोट, हैट, बूट, पतलून पहने वहाँ आये (उसे भी करतारपुर जाना था ) और टिकट लेकर बस पर चढ़े और जिस सीट पर साधु बैठा था, उसी पर बैठना चाहा। साधु से रोब के स्वर में कहा— आप इधर आकर बैठिये, वहाँ मैं बैठूँगा। साधु मगरुर भी होते हैं साधु ने अनसुनी कर दी। दूसरी बार नवयुवक ने डाँटकर कहा—पर साधु न हिला, उसने उत्तर में कहा—आप जहाँ खड़े हैं वही बैठ जाइये। इस पर नवयुवक को क्रोध आ गया और उसने साधु को दो तमाचे लगाये और कहा—सीट खाली करो, इधर आओ। साधु ने बिना कुछ बोले जगह छोड़ दी और एक तरफ होकर बैठ गया। नौजवान ने गर्व से भर कर कहा-अब होश ठिकाने आ गये। जब तक तमाचे नहीं खाये, सीट नहीं छोड़ा। अपने हठ का मजा चख लिया। साधु मौन रहा। बस करतारपुर पहुँचा।
“जो ममभगत सों बर करत है, सो निज बैरी मेरो।” (सूरदास) कहने वाले भगवान से भक्तों का यह अपमान नहीं सहा गया और वह जिद और शान वाला युवक बस से उतरते ही पागल हो गया।
दूसरी घटना-
श्री सत्यभूषण आचार्य के जामाता के छोटे भाई चेतनदास जी कैम्वलपुर रेलवे पर काँटे वाली की ड्यूटी पर था। एक साधु स्टेशन पर आया काँटे वाले ने साधु से कहा कि स्टेशन पर मत ठहरे। साधु ने न माना। इस पर पावों से ठोकर मार-मार कर साधु को स्टेशन से बाहर निकाल दिया। साधु ने कहा, बड़ा अच्छा। साधु चला गया। चेतन दास को दौरे आने शुरू हो गये जैसे कोई किसी की मरम्मत कर रहा हो। खूब चीखे, पीटे। मैं लाहौर में श्री जगदीश चन्द्र जी के घर ठहरा हुआ था। चेतनदास को यहाँ लाया गया और मुझे इनकी सारी बीती सुनायी गयी। मैंने स्वयं चेतनदास से वृत्ताँत जानना चाहा और उससे कहने के लिए कहा—उसने ज्यों ही वर्णन करना प्रारम्भ किया कि लोट-पोट हो गये, वही चीख पुकार, वही मार पीट। यह जोर का दौरा हुआ, मैंने अपनी आँखों देखा और कहा कि इसे श्री आचार्य जी के पास कमालिया गुरुकुल भेज दो और वहाँ रह कर यह गायत्री अनुष्ठान करे। आचार्य जी की देख-रेख में चेतनदास जी ने गायत्री अनुष्ठान किया और तब से दौरे आना बन्द हो गया।
ब्रह्मनिष्ठ का तिरस्कार भयंकर पाप है और उसका परिणाम भी भयंकर ही होता है।
तीसरी घटना—
इसी अप्रैल मास की घटना है। पूर्णमासी का यज्ञ वैदिक भक्ति साधन आश्रम में हो चुकने के उपरान्त, काठमाण्डू का एक युवक अपनी माता के साथ अपनी स्थिति बताने आया था। मैं अभी सीढ़ियों से उतरा ही था कि युवक ने अपना वृत्तान्त सुनाना आरम्भ किया।
इतने में वह नीचे गिर पड़ा, जैसे बानर ऊपर को उछलते हैं, ऐसे ही मानो किसी शक्ति ने उसको ऊपर उछालकर भूमि पर पटक मारा। एकबार नहीं, अनेकों बार ऊपर उछलता और नीचे गिर पड़ता। मैं शौच जा रहा था। वापस आने पर आचार्य जी ने भी आँखों देखा वृत्तान्त सुनाया। मैंने उसे गायत्री अनुष्ठान का परामर्श दिया। अनुष्ठान करने के बाद से एकबार हल्का सा दौरा आया था।
यह है ब्रह्म हत्या का फल और यह जाता है ब्रह्म निष्ठ के आशीर्वाद से ही।
भाव एवं विचारों को पढ़ें। यजुर्वेद, अध्याय 1 मन्त्र 19 के भाष्य में महर्षि लिखते हैं—
भावार्थ--मनुष्यों को अपने विज्ञान से अच्छी प्रकार की वस्तुओं, पदार्थों को इकट्ठा करके उनसे यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिए, जो कि दृष्टि और बुद्धि को बढ़ाने वाला है, वह अग्नि तथा मन से सिद्ध किया हुआ, सूर्य के प्रकाश को त्वचा के समान सेवन करता है।
यजुर्वेद अध्याय 1 मंत्र 31
तेजोऽसि शुक्र मस्यमृतमति।
(यह यज्ञ) प्रकाश और शुद्धि का हेतु-मोक्ष सुख का देने ( वाला है ) तथा सब अन्नादि पदार्थों की पुष्टि करने तथा जल का हेतु, श्रेष्ठ गुणों से प्रीति कराने और किसी को खण्डन करने योग्य नहीं है।
महर्षि के इन शब्दों को ध्यान से नहीं पढ़ा-इसी से यह भ्रम हुआ कि यज्ञ से केवल वायु और मल की शुद्धि होती है। यह तो उसका आधिभौतिक
फल है, जो प्रत्येक स्थिति में मिलता है, चाहे वह
(यज्ञ) योग-बुद्धि से नहीं भी किया गया हो, तो भी, किन्तु इसका आधिदैविक और आध्यात्मिक फल ओर है, जो योग बुद्धि और भक्ति भाव से किये जाने पर ही मिलता है।
(स्थूल विश्व में) कोई ऐसी वस्तु नहीं सिवाय यज्ञ के, जो हमारे अन्दर से निकले विषैले परमाणुओं का निषेध करदे। यज्ञ से ही ऐसे परमाणु निकलते हैं जो हमारे अन्दर के दुःख, घृणा, ईर्ष्या और क्रोधादि के परमाणुओं को जाकर बदल देते हैं। यज्ञ सबसे सुगम साधन हैं, अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष को सिद्धि कराने वाले हैं।
हम योग-बुद्धि से तथा भक्ति भावना से यज्ञ करके प्रतिदिन अपने अन्दर में देखना चाहिये कि हमारी कौन सी कुवासना बदल रही है, कितनी बदली है और कितनी बाकी है। उसके कारण और शुद्धि क्रम पर विचार करें
वृहद् यज्ञों में यहाँ घी, सोम और मधु-दुग्ध की धारायें चलती हैं, वहाँ ऐसे-ऐसे रंग निकलते हैं, जो हमारी कुवासनों को शुभेच्छाओं में परिणत कर देते हैं। विशेष कर लाल, नीला, इन्द्रधनुष, श्वेत और बरार्क के से जो रंग निकलते हैं, वह मन, अहंकार, चित्त और बुद्धि को पवित्र करते तथा काम क्रोधादि का विनाश करते हैं अतः हे मानव शरीर धारियों! तुम्हारा जीवन अनन्त मूल्यवान है, इसका अधिक से अधिक लाभ उठाओ। यज्ञ को, योग-बुद्धि तथा भक्ति भाव से करने पर, अपने अन्दर सचमुच थोड़े ही दिनों में कायाकल्प होते हुए पाओगे।
प्रभ, सबों पर ऐसी कृपा करे, कि यह विचार, जो अतिनवीन है, सबों को जच जाय और इसे आचरण में उतार कर सभी अपना कल्याण बना लें।
(एक जैन जिज्ञासु)
मनुष्य और पशु-पक्षी आदि अन्य प्राणियों में विवेक का ही प्रधान अन्तर है। वास्तव में विवेक ही मनुष्य की मनुष्यता का माप-दण्ड है। हिताहित व कर्त्तव्य अकर्तव्य का विचार विवेक न करके जब जो चाहे करे, कहे, खाये तो वह मनुष्य के रूप में पशु ही है। विवेक पूर्वक प्रवृत्ति का नाम ही संयम है। हम अपनी प्रत्येक प्रवृत्ति की जाँच करें और स्वच्छन्दता पर नियन्त्रण कर सर्वहितकारी तथा परिमित (अनावश्यक को सर्वथा छोड़ कर जो आवश्यक हो, उसका भी आचरण विवेक पूर्वक) आचरण ही संयम है इसके लिए 5 इन्द्रियाँ, 4 कषाय (कलुषित-प्रवृत्तियां, क्रोध, मान माया, लोभ ) शरीर, मन व आत्मा पर नियन्त्रण होना आवश्यक है। भारतीय आध्यात्मिक साधना में इस पर बड़ा जोर दिया गया हैं। क्योंकि असंयत व विवेक रहित स्वच्छंद जीवन ही मनुष्य के पतन का एक मात्र कारण है।
मनुष्य प्रति पल कुछ न कुछ प्रवृत्ति तो करता ही रहता है। नेत्रों से सुन्दर असुन्दर पदार्थ देखना, कानों से भली-बुरी बातें सुनना, नाक से सुगन्ध-दुर्गन्ध ग्रहण करना, रसना से विविध खाद्यों का रस अनुभव करना, त्वचा से कोमल, कठोर, गर्म, शीतल आदि विविध अनुभूति करना, मन से शुभाशुभ बाते सोचना आदि प्रवृत्तियाँ निरन्तर होती ही रहती हैं। इनमें बहुत सी अनावश्यक एवं अहितकर भी होती हैं। आत्मा की शक्ति इन सब प्रवृत्तियों में व्याप्त और बिखरी हुई रहती हैं। इस बिखरी हुई शक्ति का एकीकरण ही संयमाचरण का प्रधान उद्देश्य होता है। बिजली की शक्ति अनेक बल्बों में बिखरने पर साधारण प्रकाश-रूप लगती है पर वही संचित होने पर अद्भुत कार्य कर दिखलाती है। इसी तरह बिखरी हुई शक्ति का संग्रह व एकीकरण किया जाय तो आत्मा में अतुल शक्ति विकसित होती है, जो योग-सूत्र में वर्णित है। योग सूत्र विभूति पाद में लिखा गया है कि अमुक प्रवृत्ति के संयम से अमुक शक्ति विशेष उत्पन्न होती है। योग का उद्देश्य ही चित्त-वृत्तियों का निरोध है। इन्द्रिय, शरीर का मन पर आत्मा का नियन्त्रण रहता है तो हमारी प्रवृत्तियाँ बाहर से हटकर अन्तर्मुखी होती हैं। उनके नियन्त्रण-स्वरूप संयम के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति यों की वृद्धि होती है।
योगियों की बात एक किनारे रख के भी सोचते हैं, तो असंयत जीवन से व्यक्ति , समाज, देश, राष्ट्र सभी का अकल्याण है। मन की इच्छाएं तो प्रतिक्षण परिवर्तित होती रहती हैं। यदि स्वच्छन्दता से उन इच्छाओं के अनुरूप ही प्रवृत्ति करते रहें तो पग-पग पर कष्ट ही समझिये। कुछ बातें, जिनके विवेक और संयम से आदर्श जीवन बनता है, दृष्टान्त-स्वरूप विचारणीय हैं।
जीवन के सभी क्षेत्रों में संयम की बड़ी आवश्यकता है। भोजन में भी यदि संयम न रखा जाय तो स्वास्थ्य के विरोधी तत्त्वों के हो जाने से शरीर रोगी हो जायगा। रोग की दशा में यदि संयम का पालन न किया गया और कुपथ्य सेवन हुआ तो मरण निश्चित है। विषय-सुख मधुर लगता है, पर उसमें भी संयम का ध्यान न रखने से नाना प्रकार के कष्टों और अनर्थों का सामना करना पड़ता है। बोल-चाल में यदि संयम न रखा जाय तो कलह और मनोमालिन्य की उत्पत्ति सम्भव है। वाणी के असंयम से बात का बतंगड़ बनते देर नहीं लगती और फिर उसका परिणाम तलवार के घाव से भी बढ़कर दारुण देखा-सुना जाता है। वाद्य यन्त्रों के बजाने में भी संयम सर्वथा अपेक्षित है। ताल और स्वर में असंयम आते ही गाने का समस्त आनन्द किरकिरा हो जाता है।
मनुष्य को हर व्यवहार में ‘अति’ से बचना पड़ता है। क्योंकि न्यूनता से काम पूरा नहीं होता और अति से किया कराया बिगड़ जाता है। ‘अति सर्वत्र वर्जयेत’ कहा गया है। कम और अधिक दोनों के बीच के संतुलित व्यवहार से ही कार्य की सिद्धि होती है। यह यथा-योग्य संतुलित व्यवहार, संयम का ही एक प्रकार है। इस प्रकार हम देखते हैं कि संयम के बिना जीवन ठीक से चल नहीं सकता-सिद्धि मिल नहीं सकती।
संयम रूपी ब्रेक की आवश्यकता हर काम में अनुभूत होती है। मोटर; रेल, साइकिल आदि में ब्रेक न हो तो महान अनर्थ हो जाय। जीवन में कभी चलने की आवश्यकता होती है तो कभी बीच-बीच में रुकना भी आवश्यक हो जाता है। आवश्यकता के समय आवेश से बचकर रुकना ही संयम है। इससे शक्ति बढ़ती है।
मकान के सब दरवाजे खुले रहते हैं तो इधर-उधर से धूल-धक्कड़ इकट्ठा हो मकान को अशोभनीय बना देते हैं। अतः कचरा करकट प्रवेश न करने पावे, इसके लिए खिड़की व दरवाजे बन्द रखने आवश्यक होते हैं। तद्नुरूप ही विविध प्रवृत्तियों से जो कर्म-रूप कचरा आत्मा में छा रहा हैं, उससे बचने के लिए मन, वचन, काया को जो परा खुला रखा हुआ है, काबू में लाना होगा। अति कर्म के खुले मार्ग को बन्द करना होगा।
जैनागमों में भी संयम को बड़ा ही महत्व दिया गया है। जैन मुनियों का विशेषण जहाँ भी आता है, उन्हें तप और संयम से आत्मा का भावित करने वाला बतलाया गया है। भगवान् महावीर का जीवन साधना, तप और संयम का अपूर्व उदाहरण है। जैन धर्म के अनुसार संसार में जीव के अनादि काल से परिभ्रमण करते रहने का कारण उसके कर्म ही हैं। आत्मा के साथ कर्म का बन्धन मिथ्यात्व, अविरति, कषाय, मन, वचन, कायारूप भोग्य और प्रमाद से होता है। कर्मों के आने के मार्ग को आश्रव कहा जाता है। कर्म बंध को रोकने को संवर या संयम कहते हैं। पूर्व कर्म का आत्मा से अलग हो जाना निर्जरा कहलाता है और कर्मों से छुटकारा पा जाना ही मुक्ति या मोक्ष कहलाता है। इन चारों तत्वों को ठीक से समझने के लिए सरोवर की उपमा दी जाती है। आत्मा के अनेकों मार्ग होते हैं। इन मार्गों को आश्रव समझिए। आश्रव द्वारा कर्मरूप जलों के आने के मार्ग को रोक देना स्वर कहलाता है। हमें यदि सरोवर को खाली करना है तो सबसे पहले नये आने वाले जल को रोकना पड़ेगा। उसके बाद पहले के आये हुये जल को उलीच कर बाहर निकालना पड़ेगा और धूप, अग्नि की गर्मी से सब सरोवर को सुखाना पड़ेगा। संयम के द्वारा आत्मा में आने वाले नये कर्म रुक जाते हैं। फिर तप और शुभ भावना रूप निर्जरा से क्षय करने से आत्मा का मोक्ष हो जाता है।
संयम सत्रह प्रकार का माना गया है। पाँच इन्द्रियों, मन, वचन, काया, वियोग और चार कषाय पर अंधुश रखना साधक के लिए अत्यावश्यक है। बहिर्मुखता छोड़कर आत्मा में ही निवास करना, स्थिर रहना, रमते रहना संयम है।
निरर्थक प्रवृत्तियों में शक्ति का जो अपव्यय होता है, संयम द्वारा उसके रुकने से ही शक्ति बढ़ती है। उस संचित शक्ति से आत्मा का उत्थान सहज हो जाता है। बिखरी हुई शक्ति किसी भी काम को पूर्ण तथा सफल बनाने में असमर्थ हो जाते हैं। असत् कार्यों में जो शक्ति लगती थी उसके अच्छे कार्यों में लगने से परिणाम शुभ ही होगा।
संयम यथेच्छा प्रवृत्ति करने वालों के लिए कांटों का दुर्गम मार्ग है, पर वैराग्यवान् साधक व्यक्तियों के लिये आगे बढ़ने में वह परम सुगम एवं आवश्यक है। जब मन, वचन, कायारूप बाहर की प्रवृत्तियों से हटकर आत्मा अन्तर्मुखी होती है, तो उसके सारे दुःख सुख-रूप में प्रतीत होने लगते हैं। इसीलिए कहा गया है कि संयमी पुरुष के आगे चक्रवर्ती का सुख भी तुच्छ है, क्योंकि संयम का आनन्द अपरिमित है। बाहरी सुख वास्तव में सुख नहीं, सच्चा सुख तो संयम में है।
साधक के लिये एकान्त का महत्व इसीलिए है कि संसारी आत्मा निमित्त वासी है। भले, बुरे सब प्रकार के संयोग मिलते हैं। मन, वचन, कषायों से प्रभावित हो तद्नुरूप प्रवृत्त हो जाते हैं। अतः निमित्त कारण ही कम मिले तो प्रवृत्ति का कम हो जाना स्वाभाविक है। गुफा, वन जंगल आदि एकान्त स्थानों में चित्तवृत्ति अधिक एकाग्र होती है, क्योंकि यहाँ इन्द्रियों को आकर्षित करने वाले साधन कम होते हैं। मनोबल के बढ़ जाने पर तो जहाँ कहीं भी रहा जाय, वन ही घर है,घर ही वन है। मन अपने हाथ में और वश में है तो कहीं भी जाइये, कैसे भी बुरे संयोग में रहिए, उनका आप पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए.)
आप हिन्दू है और उस भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता के पुजारी हैं, जिसका वाह्य-पक्ष इतने महत्त्व का नहीं है, जितना आंतरिक पक्ष, कारण भारतीय सभ्यता का मूलाधार आध्यात्मिकता है। संसार की अन्य संस्कृतियाँ वाह्य प्रदर्शन, थोथी टीपटाप, भौतिकवाद राजनैतिक बुद्धिमत्ता तथा कूटनीतिज्ञता में विश्वास करती है; किन्तु हिंदू संस्कृति सरल, शुचि जीवन, निष्पृहता और अहिंसा में विश्वास करती है। हिंदू संस्कृति की गहरी नींव आध्यात्मिकता, त्याग, तपस्या, सत्य और मानव मात्र के कल्याण पर रखी गई हैं।
हम देखते हैं कि पाश्चात्य संस्कृतियाँ जीवन की विलासमय आवश्यकताएँ बढ़ाकर वाह्य रूप से मानव जीवन को अवश्य परिष्कृत कर रही हैं, आराम और भौतिक सुखों में वृद्धि हुई है; किन्तु उनसे मानवता का कल्याण नहीं हुआ है। उन्होंने निरन्तर एक के पश्चात दूसरे युद्ध और संघर्ष के बीज बोये हैं। एक युद्ध निपटने नहीं पाता, दूसरे के प्रारम्भ होने के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। भयंकर तनातनी, गुप्त मंत्रणाएँ गर्हित गुटबन्दियाँ और राष्ट्रों के पारस्परिक संघर्ष चलते रहते हैं। आज यूरोप में जो दूषित वातावरण फैला हुआ है, वह यूरोपीय भौतिक आदर्शों के फलस्वरूप ही हैं। रूस में भी सभ्यता का ऊपरी पहलू निखरा हुआ दीखता है, मानव अपना जीवन सुख से व्यतीत करते हुए प्रतीत होते हैं, किन्तु वास्तव में उनके हृदय में तनिक भी शान्ति, संतोष अथवा चैन नहीं है।
संस्कृतियों का वाह्य-पक्ष इतने महत्त्व का नहीं होता, जितना आन्तरिक पक्ष। जिस जाति की संस्कृति का आन्तरिक पक्ष मजबूत है, उस जाति में बल, वीर्य, तेज, उत्साह दीर्घकाल तक बना रहता है। जिस प्रकार मानव शरीर यदि किसी शरीर का आन्तरिक पक्ष-हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े इत्यादि बलवान हैं, रक्त स्वच्छ होने का कार्य ठीक चलता है, तो शरीर भी दर्द होता है। इसी प्रकार यदि संस्कृति का आन्तरिक पक्ष सुरक्षित है, तो बाह्य-पक्ष सबल बना रहता है। वस्तुतः आन्तरिक पक्ष की विशेष महत्ता है।
हिन्दू संस्कृति का आन्तरिक पक्ष दृढ़ आधारशिलाओं पर रखा गया है। हिन्दू का लक्ष्य मानव-समाज की साँसारिक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए चरम आध्यात्मिक सुख प्रभु से तादात्म्य प्राप्त करना और अन्ततः उसी में अपने आपको विलीन कर देना है। एक सच्चा हिन्दू जीवन के प्रथम भाग में पूर्ण नैतिक जीवन व्यतीत करते हुए ब्रह्मचर्य-धर्म का पालन करता है। उसे सत्य, न्याय, प्रेम, अहिंसा शौर्य बल इत्यादि सब प्रकार की विभूतियाँ प्राप्त हो जाती हैं, जिनसे वह अपना जीवन सहर्ष पूर्ण कर सकता है। विद्या प्राप्ति एवं जीवन की नींव मजबूत करने के लिए ब्रह्मचर्य-आश्रम की योजना प्रशस्त है। जीवन के द्वितीय भाग में वह गृहस्थ-धर्म का पालन करता है। आत्मोन्नति के लिए गृहस्थ-धर्म का पालन करता है। आत्मोन्नति के लिए गृहस्थ-धर्म एक प्राकृतिक, स्वाभाविक, आवश्यक एवं सर्वसुलभ-योग है। परिवार में वृद्धि होने से हिन्दू युवक के आत्मा-भाव की सीमा में विस्तार होता है—एक से दो, दो से तीन, और चार आत्माओं में आत्मीयता बढ़ती है। क्रमशः मर्यादा बढ़ने से मनुष्य के स्वार्थ पर अँकुश लगता है, वह आत्म संयम सीखता है और स्त्री-पुत्र सम्बन्धी परिजनों में आत्मीयता बढ़ती रहती है। वह क्रमशः आत्मोन्नति की ओर बढ़ता चला जाता है। हमारा गृहस्थ-धर्म एक छोटी सी पाठशाला है, जिससे नागरिक की आत्मा विकसित होकर पूर्णता की ओर पहुँचती है। तृतीय अवस्था में आत्म-भाव पूर्ण विकसित हो जाता है। चौथी—अवस्था में वह लौकिक सेवा त्यागकर भगवत् तत्त्व की प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। संयम, त्याग, ब्रह्मविद्या द्वारा वह पूर्ण नैतिक जीवन बनाकर चिरविश्रान्ति प्राप्त करता है। इस प्रकार हिन्दू संस्कृति मनुष्य का पूर्ण नैतिक जीवन निर्माण करती है।
हिन्दू-संस्कृति का आन्तरिक पक्ष मूल रूप से निम्न तत्त्वों पर आधारित है—
शरीर की अपेक्षा आत्मा का अधिक महत्त्व है। मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आपको शरीर नहीं, आत्मा माना करें और आत्मा के महान् गुणों के अनुसार उच्च आचरण करे।
“अह” भाव का त्याग करे, अर्थात् अपने आपको स्वार्थ के क्षुद्र दायरे में ने बाँधे वरन् कर्तव्यनिष्ठा के साथ-साथ समाज-सेवा और हित के लिए प्रयत्न करें। हमारे सब कार्य निष्काम, निःस्वार्थ भावना से हों और वे परमेश्वर को अर्पण किए जायं।
प्रत्येक हिन्दू अपने दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में सदाचार के कार्य ले, सद्गुणों का प्रकाश करें, अपने चरित्र के उच्च उदाहरण द्वारा दूसरों को वैसा ही उच्च जीवन व्यतीत करने के लिए उत्साहित करें।
अर्थ, धर्म, काम मोक्ष आदि का जीवन में उचित रीति से समन्वय किया जाय, जिससे मानव जीवन की सर्वांगीण उन्नति हो सके।
आत्मा अमर है। संसार में केवल शरीर परिवर्तन मात्र चला करता है। इस अमरत्व की भावना से सभी को उत्साहित करें।
मनुष्य से उच्चतर एक परम सत्ता—ईश्वरत्व में हमारा अखण्ड विश्वास हो।
हिन्दू संस्कृति का अन्तिम आधार है, प्रकृति के साथ सीधा संपर्क। प्रारम्भिक तथा अन्तिम जीवन में हिन्दू प्रकृति के साथ सीधा संपर्क रखने में विश्वास करता है। प्रकृति के साहचर्य से उसका अन्तःकरण पवित्र रहता है। हमारे यहाँ चारों धाम की यात्रा का महत्व इसीलिए हैं कि हम प्रकृति के उन्मुक्त वातावरण में खूब टहलें, पवित्र वातावरण में निवास करें और पूर्ण स्वस्थ रहें।
प्रकृति के साथ सीधा संपर्क-इसका आशय विस्तृत है। खान-पान, विहार इत्यादि में सदा-सर्वदा प्रकृति के निकट रहना, भौतिकवाद के माया-मोह से दूर रहना, उच्च आध्यात्मिक विचारों तथा शुद्ध चिंतन में तन्मय रहना—ये सब हमारी संस्कृति के अभिन्न अंश हैं। हिन्दू संस्कृति में वृक्ष-पूजन तथा वृक्षारोपण का बड़ा महत्व है। वृक्ष पर, और पशु घास वृक्ष आदि पर आधारित हैं। अतः हमारी संस्कृति में वृक्षों की देख−रेख, जलदार आदि का महत्व है। तुलसी, अशोक, शमी, पीपल, नीम, गूलर, आँवला आदि उपयोगी वृक्ष बड़ी श्रद्धा से पूजे जाते हैं। गौ सेवा और प्रतीक पूजा भी इसी के अंग हैं। कुछ महा नदियाँ, जैसे गंग, यमुना, नर्मदा, गोदावरी इत्यादि का भी बड़ा महत्त्व हैं। हिन्दू संस्कृति में श्री गंगाजी को विशेष आदर प्रदान किया गया है। विष्णु पदी, जाह्नवी। भागीरथी, त्रिपथगा, स्वर्गंगा आदि विभिन्न आदर सूचक नाम देकर गंगाजी की महिमा का वर्णन किया गया है। गंगाजी का उद्गम स्थान मानसरोवर माना गया है। हमारी धार्मिक यात्राओं का एक महत्त्व यह भी है कि वे हमें प्रकृति से साहचर्य बनाये रखने में सहायता करती हैं। यात्रीगण पैदल पर्वतों के स्वच्छ वायु में घूमते, नाना रासायनिक लवणों से युक्त सरिताओं में स्नान करते, वन पर्वतों की प्राकृतिक सुषमा का रसास्वादन करते हुये जब हिन्दू यात्री आगे बढ़ते हैं, तब उन्हें स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के साथ साथ आन्तरिक पवित्रता भी मिलती है। वे ठंडे बर्फीले जलों में स्नान करते हैं, इससे उनके शरीरों में स्फूर्ति रहती है, भूख खुलकर लगती है, नाना रोग विशेषतः चर्म रोग दूर हो जाते हैं और शरीर, मन, आत्मा तृप्त हो जाते हैं। यही कारण है कि बुद्धि और विचार शीलता में हिन्दू सभी देशों से ऊँचे हैं। हमारे सब देवता भिन्न-भिन्न शक्ति यों, सिद्धियों और पुरुषार्थों के प्रतीक हैं। हम किसी भी देवता की पूजा क्यों न करें, चारों धामों के अर्थात् उत्तर दक्षिण, पूर्व, पश्चिम समस्त भारत के चौरासी तीर्थों के जल से इष्ट देवता का अभिषेक कराये बिना हमारा अभिषेक पूर्ण नहीं होता।
योरोप तथा अमेरिका की सभ्यता एवं संस्कृति बड़े बड़े शहरों, गगनचुंबी अट्टालिकाओं, आमोद-प्रमोद की गन्दी सामग्रियों में प्रकट होती हैं; किन्तु हिन्दू संस्कृति भौतिक आवश्यकताओं की तृप्ति के साधन मात्र को कोई महत्व नहीं देती। हिन्दू संस्कृति तो प्रकृति के अंचल में फलित पुष्पित हुई हैं। इस में त्याग को महत्व दिया गया है। देवी सम्पदाओं में हम विश्वास करते हैं। हिन्दू मानता है कि उसका आत्मिक पक्ष जितना शुद्ध एवं विकसित रहेगा, उतने ही अच्छे कर्म होंगे और उसका उतना ही उच्च जीवन भी होगा। त्याग, संयम, ईश्वर में विश्वास, सन्तोष इत्यादि हिन्दू की रग-रग में समाया हुआ होता है। ऋषि, मुनियों के आश्रमों में संयम और त्याग के चिन्तन में हमारी संस्कृति का जन्म हुआ है। यही कारण है कि आत्मदर्शन हमारा चरम लक्ष्य है।
निष्कर्ष यह है कि हिन्दू संस्कृति मनुष्य के आन्तरिक पक्षों के विकास से प्रारम्भ होती हैं। जब हमारी चेतना का विकास नैतिक वातावरण में होता है, तब हमारी विवेक बुद्धि सत् तत्व की ओर अधिक झुकी रहती है। विवेक बुद्धि के सामयिक विकास से ही एक सच्चे हिन्दू में आत्मदर्शन की शक्ति का अभ्युदय होता है। अपने आन्तरिक पक्ष की दृढ़ता के कारण ही हिन्दू संस्कृति संसार की अन्य संस्कृतियों से श्रेष्ठ है।
(श्रर वीरसेन जी, इन्दौर)
विश्व में जो प्रवाह चल रहा है वह उत्पत्ति से प्रलय की ओर चल रहा है। इसलिये जन्म का अन्त मृत्यु है, यौवन का अन्त जरा और सुख का अन्त दुःख है। योग दर्शन में “परिणामताप” संस्कार दुःख गुणवृत्ति विरोधाच्च दुःखमेव सर्वे विवेकिनः (साधनपाद,सू. 15 इस सूत्र द्वारा सब सुखों का अन्त दुःख ही बताया है। मेघ से वृष्टि नीचे आती है। नदियाँ नीचे की ओर बहती है। खाया पीया सब नीचे की ही ओर जाता है। इस विनाशात्मक प्रवाह के साथ निर्माणात्मक प्रवाह भी चलता है, जो विनाश से निर्माण की ओर, उत्पत्ति से प्रलय की ओर तथा रात्रि से दिन की ओर है। इन्हीं निर्माणात्मक प्रवाहों या क्रमों का नाम ही यज्ञ हैं। ये यज्ञ इस सृष्टि में परमात्मा द्वारा होते रहते हैं। जल का स्वभाव निम्न स्थान में जाने का है, परन्तु सृष्टि में से सूर्य रूपी होता द्वारा वह ऊर्ध्व हो जाता है। उत्पत्ति से प्रलय तक इस विनाशात्मक प्रवाह के अंतर्गत इस प्रकार के निर्माणात्मक प्रवाह सीमित रूप में पृथक् पृथक् रूप से चलते रहते हैं। इसी प्रकार प्रलयावस्था के पश्चात् सृष्टि उत्पत्ति तक निर्माणात्मक प्रवाह प्रधानता से चलता है अर्थात् प्रत्येक कार्य का अन्त निर्माणात्मक प्रवाह के अंतर्गत विनाशात्मक प्रवाह भी सीमित एवं पृथक् पृथक् रूप से चलते रहते हैं। यही परमात्मा को यज्ञ है, जो अणु-अणु में पिण्ड-पिण्ड में, मण्डल-मण्डल में और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हो रहे हैं। इस प्रकार अनेक यज्ञों से एक यज्ञ की पूर्णता और एक यज्ञ से अनेक यज्ञों की पूर्णता होती रहती है।
इस यज्ञ का मुख्य अग्रणी, पुरोहित, संचालक देव अग्नि-परमात्मा ही है, क्योंकि उसी से इस विश्व में रूप हैं, दर्शन है और प्रकाश है। तस्यमासा सर्वमिदं विभाति अर्थात् उसी के आलोक से समस्त विश्व आलोकित है। अतएव ऋग्वेद का प्रथम मंत्र एवं शब्द भी उसी प्रधान अग्रणी देव अग्नि की ही स्तुति से प्रारम्भ होता है तथा वेद की सर्वाधिक ऋचायें इसी अग्नि देव की ही स्तुति में हैं। उसी स्तुत्य, वन्दनीय, ज्ञानस्वरूप प्रकाशक अग्नि अर्थात् अग्रणी प्रभु की उपासना से जीवन पवित्र होता है। आत्मा उन्नति को प्राप्त होती है और अमृतत्व को भी प्राप्त करती है।
भौतिक अग्नि में भी इन गुणों का अनुभव होता है। उसमें निम्नगामी को ऊर्ध्वगामी बनाने का स्वभाव है, क्योंकि वह स्वयं ऊर्ध्व ज्वलनशील है एवं ऊर्ध्वगामी हैं। इसीलिये भौतिक यज्ञों में अग्नि ही प्रधान देवता है। इसी की स्थापना एवं इसी की विधिवत् पूजा, सेवा, विधिवत् प्रयोग-यजन से इस विश्व के कर्म सम्पादित हो रहे हैं। यज्ञ द्वारा अग्नि में द्रव्यों को डालकर ऊर्ध्वगामी बना दिया जाता है अर्थात् उनको पूर्णावस्था में स्थापित कर दिया जाता है। जब यह कार्य सृष्टि के तत्वों तक ही सीमित रहता है या सृष्टि के तत्वों के लिये ही किया जाता है तो ये यज्ञ द्रव्यमय-यज्ञ ही रह जाते हैं और जब इन द्रव्यों के यज्ञ के साथ अपने उन्नयन अर्थात् अपनी उन्नति के लिये कर्म किए जाते हैं, तो उनके साथ हमें अपना संकल्प क्रिया का उद्देश्य एवं अभिप्राय भी खोलना आवश्यक हो जाता है अर्थात् उद्देश्यानुकूल कर्म करना यज्ञ में आवश्यक हो जाता है। उद्देश्य विहीन, असंगत कर्मों का यज्ञों में कोई स्थान नहीं। संगत एवं समुचित यज्ञों के संगत एवं समुचित परिणाम या फल होंगे और असंगत यज्ञों के परिणाम भी असंगत एवं हानिप्रद ही होंगे। इसीलिए महाभारत के डडडड पद के विदुर प्रभाकर अध्याय में विदुर जी धृतराष्ट्र से कहते हैं कि संसार में चार कर्म ऐसे हैं जो अभय करने वाले हैं परन्तु यदि वे असंगत रूप में या विधि हीन किए जावें तो भय-विनाश-उत्पन्न करने वाले हो जाते हैं। इन चार कर्मों में दो कर्म यज्ञ तथा अग्निहोत्र ही हैं। अतः यज्ञों को संगतिपूर्वक करना उन्नति का हेतु है और असंगत रूप में करना अवनति का हेतु है और संगत यज्ञों की ही विधि अनुकूल अर्थात् वेदानुकूल यज्ञ कहा जाता।
प्राचीन समय में शारीरिक, सामाजिक एवं आत्मिक उन्नति के लिये अनेक प्रकार के यज्ञ प्रचलित थे। जिस निमित्त जो यज्ञ होते थे, उनमें उसका चित्रण या रूपक रूप से आभास प्रकट किया जाता था। भौतिक तत्वों में अग्नि देव आयु को विशेष क्रियाशील करके मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते हैं। उसी प्रकार आत्मिक यज्ञों में आत्मारूपी अग्नि प्राणादि शरीरस्थ वायुओं द्वारा स्वर्ग-सुख विशेष का सम्पादक होता है। इसीलिए आर्य जाति में प्राणविद्या जानने का विशेष महत्व है। इसी प्राण विद्या और उसके द्वारा स्वर्ग-सुख विशेष तथा अमृतत्व प्राप्त करने के लिये जो अभ्यास एवं उनका क्रियात्मक प्रदर्शन होता था, वही उस यज्ञ का रूप होता था।
प्राणविद्या के अभ्यासार्थ साधक को सर्व प्रथम यह आवश्यक है कि वह शरीर में नासिका द्वारा निकाले गये एवं ग्रहण किये गये वायु के बारे में ज्ञान प्राप्त करें कि दाहिने और बाँये नासा छिद्रों से जो वायु ग्रहण एवं त्यागी जाती है उनमें बाँये नासाछिद्र की क्रिया इड़ा नाड़ी से और दाहिने नासाछिद्र की क्रिया पिंगला नाड़ी से होती है। इन दोनों नाड़ियों का सम्बन्ध अग्नये एवं सौम्य तत्वों से हैं। इन आग्नेय और सौम्य तत्वों के प्रतिनिधि इस विश्व में सूर्य एवं चन्द्र हैं। अतः इड़ा नाड़ी की चन्द्र संज्ञा हुई और पिंगला की सूर्य संज्ञा हुई। इसी रहस्य को बताने और उसके अभ्यास के लिये दर्श और पौर्णमात्येष्टियों का आयोजन है। जिसने ये इष्टियों नहीं ? यज्ञ का अग्नि को विधिवत् स्थापित रक्षित एवं संबंधित करने के लिये जिससे आगे के यज्ञ सुसम्पादित यथा समय हो सके, इस निमित्त इन यज्ञों का प्रारम्भ में करना आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह था कि साधक को सर्व प्रथम प्राणविद्या के आधारभूत सिद्धान्तों को और कर्त्तव्यों को जानना चाहिये और उन पर अभ्यास करना ही चाहिये। इसी सिद्धान्त के प्रतिपादनार्थ, प्रदर्शनार्थ तथा प्रचारार्थ सर्व प्रथम में ही दोनों दर्श एवं पौर्णमास्य इष्टियाँ हैं। यही पिंगला और इड़ा सूर्य एवं चन्द्र होने से विश्व में अग्नि और सोम रूप से तथा उष्ण एवं शीतरूप से सर्वत्र विद्यमान है।
उपरोक्त दोनों यज्ञों द्वारा प्राणविद्या के व्रत के ले लेने पर पशु बन्ध यज्ञ किया जात था। कारण यह है कि प्राणविद्या के अभ्यास मार्ग में बाधक जो शरीर की पाशविक वृत्तियाँ जब तक उनका बन्ध नहीं होगा। साधक का अभ्यास चलेगा ही नहीं यह पशुबन्ध अपनी आसुरी प्रवृत्तियों अर्थात् पंच ज्ञानेन्द्रिय एवं छठे मन इस प्रकार छः पशुओं का बन्धन नहीं होगा तो पशुत्व भाव अर्थात् जब जहाँ आहार या तृष्णा मिली तुरन्त उसे भक्षण कर लिया और फिर उसी का चर्वण अर्थात् चिन्तन किया, इस प्रवृत्ति से प्राणविद्या की उन्नति ब्रह्मवर्चस्काम, ऊध्व रेतस् स्थिति एवं अमृतत्व प्राप्ति कदापि सम्भव नहीं! इसी विधि का चित्रण पशुबन्ध यज्ञ है।
जब साधक प्राणों की पृथक्-पृथक् स्थिति जान कर एवं उन पर इन्द्रियों के संयम द्वारा आधिपत्य स्थापित कर लेता है तभी वह अग्निष्टोम यज्ञ अर्थात् सूर्य एवं चन्द्र नाड़ी इन दोनों से संयुक्त यज्ञ अग्नि-सोम यज्ञ कर सकेगा। इन्द्रियों के बाह्यरूप से संयम करने के पश्चात साधक को इनकी वासनायें एवं प्रवृत्तियाँ बाधक न बनें अतः उनका पूर्णरूप से बध करना होता था, अग्नि सोम यज्ञ, प्राणापानाहुति यज्ञ है। प्राणापान के समत्व सम्पादन के लिये है, प्राणापान है समत्व में अथवा इड़ा-पिंगला इन दोनों स्वरों के समभाव में चलने पर, सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का संचार होने से और उन्नत स्थिति साधक को प्राप्त होती है, तभी वह सोमयाग और वाजपेय कर पाता है अर्थात् प्राणों में सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग द्वारा ऊर्ध्वगामी करने पर उसके साथ शरीर में बल और ओज को सम्पादन करने वाले वीर्य को प्राणों की ऊष्मा के द्वारा सोम रूप शान्त एवं सूक्ष्म तथा उद्देश्य बनाकर उसको ऊपर उड़ा ले जाना या उनका हरण कर लेना और उसको शरीर के ‘द्य’ स्थान मूधाँ में ले जाकर इस स्थान के देवताओं-इन्द्रियों को उस सोम का पान कराना, बल से सम्पन्न कराना वाजपेय यज्ञ है। बाज का तात्पर्य बल और ओज ही है। इस प्रकार पुनः-पुनः यज्ञ करने से जो शतक्रतु बनकर इन्द्र पद को प्राप्त हो जावे तभी वह स्वयं का राजा हो पाता है। उसी के आधीन सब देव इन्द्रियों हो जाती हैं, क्योंकि वह बार-बार उन्हें तृप्त करता है। यही साधक का राजसूय यज्ञ है। वही अपने शरीररूपी राष्ट्र या विश्व की समृद्धि के लिये अश्वमेध रच पाता है।
इस प्रकार ये आध्यात्मिक-प्राणविद्या—के यज्ञ अपने अलंकार रूप में हैं। इनको समझाने के लिये तथा इनका चित्रण पूर्वक प्रदर्शन करने के लिये कर्मकाण्ड मय यज्ञों को किया जाता है। जिस कर्मकाण्ड के पीछे प्राणविद्या या आध्यात्मिक उन्नति का पाठ नहीं है, वह निष्प्राण, निश्चेष्ट एवं निष्फल यज्ञ है। ऐसा यज्ञ प्राण रहित शरीर के तुल्य है तथा भस्म में आहुति डालने के तुल्य निरर्थक है तथा हेय भी है।
वैदिक श्रोत यज्ञों का आत्मिक उन्नति के लिये यह उत्तम क्रम था, कालान्तर में रूढ़िवाद में पड़ कर ये यज्ञ प्राणविद्या से शून्य हो गये और इन यज्ञों द्वारा उन्नति का क्रम लुप्त हो गया। केवल रूढ़िमय यज्ञों में उद्देश्य को न समझते हुए जो क्रियाकलाप अनुकृति करते हुए किये जाने लगे, वे लक्ष्य से दूर हो गये। साथ ही साथ उनमें अनाचारी लोगों ने तथा तात्पर्यार्थ शून्य, वाह्य शब्दमात्र में ही रमण करने वाले पण्डितों ने अर्थ एवं लक्ष्य को न समझ कर प्रकट रूप में यज्ञ में अश्लील कार्यों, पशुवध, माँसाहार, सुरापान आदि सदृश कर्मों को भी समाविष्ट कर दिया।
वाह्यरुप से प्रचलित किये यज्ञ सब आन्तरिक स्थितियों के परिचायक या रूपक ही होते थे। इन यज्ञों में प्रयुक्त शब्द एवं विनियुक्त कर्म भी गूढार्थ वाचक या विशदार्य युक्त होते थे। सामान्य रूप से इन यज्ञों में कुछ आधार भूत कर्म होते थे। उनमें से कुछ कर्म दक्षिणाग्नि में, कुछ गार्हपत्याग्नि में, कुछ आवहनीयाग्नि में और कुछ उत्तराग्नि में होते थे। आहुति के लिये आज्य-धृत तथा हवि प्रयुक्त होता था। यज्ञशाला में एक स्तम्भ जिसे यूप कहते हैं, गाड़ा जाता था। और उसके साथ यजमान-पत्नी को बांधा जाता था। यजमान को दीक्षा दी जाती थी। उसे व्रत भी करना पड़ता था। उसे पशुओं का बांधना तथा उनका वध भी करना होता था और सोम रसादि पान करना होता था।
यज्ञों में उपरोक्त कर्म आध्यात्मिक उन्नति के चित्रण के लिये ही थे। यजमान की श्रद्धा ही वास्तव में वाह्य यज्ञ में पत्नी रूप से है। ‘पत्युर्नु’ यज्ञ ‘संयोग‘ पाणिनी सूत्र यज्ञ में यजमान के साथ पत्नी होना आवश्यक बताता है। इसके बिना यज्ञ नहीं हो सकता। वास्तव में यही स्थिति है। श्रद्धा का ही रूपक पत्नी रूप से है। इसी आधार पर मनु की श्रद्धा को पत्नी का रूप दिया गया। इसी आधार पर सीता-वनवास काल में राम के अश्वमेध के समय सोने की सीता की प्रतिमा यज्ञ समय में स्थापित करने का कवियों को वर्णन करना पड़ा। तात्पर्य यह है कि जब तक यज्ञ कार्य में श्रद्धा न हो, यजमान यज्ञ करने को उद्यत ही न होगा। बिना पत्नी के यज्ञ सम्भव नहीं, अतः यज्ञ में श्रद्धा की प्रतीक पत्नी की उपस्थिति आवश्यक है। यजमान का लक्ष्य ही यज्ञ का स्तम्भ या यूप रूप में प्रकट किया जाता है। उस यूप से ही यजमान पत्नी को बाँधा जाता है अर्थात् लक्ष्य से श्रद्धा बिल्कुल बन्धी होनी चाहिये जिससे वह श्रद्धा विचलित न हो सके और यज्ञ पूर्ण श्रद्धा से सम्पन्न हो सके।
इन यज्ञों द्वारा शरीर के आन्तरिक स्थानों का चित्रण भी किया जाता था। अनेक कार्यों का चित्रण ही रूपक में संगत प्रकट कर देना यज्ञ की गम्भीर एवं विशद् विचार सरणि का द्योतक है। अतः जब हम यज्ञ में यूप और उससे पत्नी को आबद्ध पाते हैं तो ज्ञात होता है कि इड़ा और पिंगला के विधिवत् होम में मेरुदण्ड का प्रतीक यूप रखा गया है। योगी जन इसी मेरुदंड में सुषुम्ना नाड़ी के अधोभाग में वर्तमान कुण्डलिनी शक्ति को 3॥ लपेटे डाले हुए वर्णित करते हैं। इसी का चित्रण पत्नी को रस्सी से आबद्ध करके यज्ञ के यूप से बाँधने का प्रतीत होता है।
व्रत और दीक्षा यज्ञानुष्ठान कार्य में अनुकूलता सम्पादन करने तथा लक्ष्य प्राप्ति निमित्त आहार-विहार, तथा दिनचर्या के नियमों के आचरण निमित्त होते हैं, जो आवश्यक ही हैं।
यज्ञों में पशुवध कार्य का विकृत एवं वीभत्स कर्म यज्ञों से अश्रद्धा कराने वाला हुआ। पशुवध मीमाँसा बहुत उत्तम है यदि उसके वास्तविक लक्ष्य और कर्म को ज्ञात कर अंगीकार किया जावे। परन्तु जब से इनका तात्पर्य केवल भौतिक अर्थ में लिया जाने लगा और लोग इसके आध्यात्मिक तत्व को भूल गये तो प्राणियों का ही वध करने लग गये। वास्तव में यज्ञों में किन्हीं प्राणियों का वध नहीं होता था अपितु पशुओं का वध होता था। जिनमें प्रधान रूप से ‘अज’ है। यज्ञ के आध्यात्मिक चित्र की भूल से अब अज प्राणी बकरे का वध होने लगा। अज प्राणी और अज पशु इन दोनों में भेद है। अज प्राणी तो बकरा है। और पशु रूप से अज का तात्पर्य काम देव से है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, एवं अहंकार रूपी पशु जब तक हमारे में रहेंगे, हम गिरते ही जावेंगे। बड़े से बड़ा सत्पुरुष एवं विद्वान भी इन पाशविक प्रवृत्तियों के वशीभूत होकर पशुवत् विवेक रहित हो जाते हैं। अर्थात् ये प्रवृत्तियाँ मनुष्य को पशु बना देती हैं। अतः इन पशु प्रवृत्तियों का हनन या वध यज्ञ में कराया जाता था। अर्थात् इन वृत्तियों एवं इनके सूक्ष्म से सूक्ष्म संस्कारों और वासनाओं के समूल नष्ट करने की विधि का अभ्यास कराया जाता था। इन उपरोक्त पशुओं के वध से ही स्वर्ग की प्राप्ति सम्भव है, इन मूक प्राणियों के वध से नहीं।
‘अजैर्यष्टय्यम्’ आदि वाक्यों के वास्तविक अर्थ को न समझने से यज्ञ का सौंदर्य एवं महत्व नष्ट हो गया। पुरुष में जो कामवासना की प्रवृत्ति है उसको संयमादि द्वारा नियंत्रित करना ही अज अर्थात् कामदेव का वध या हनन है। इस अज को जितना अधिक मारा जावेगा अर्थात् जो जितना ही अधिक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेगा और सदाचारी रहेगा वह उतना ही अधिक दीर्घजीवी एवं सुखी होगा। इस प्रकार के यज्ञ से मनुष्य देवत्व को प्राप्त होगा और ऐसे सौ यज्ञ करने से वह दवों के राजा इन्द्र पदवी को भी प्राप्त होगा। वही इन्द्र ब्रह्मचर्य रूपी सोमपान करके मद से मस्त, अत्यंत बलिष्ठ एवं सदा युवा बना रहेगा। क्योंकि ‘ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाध्नत’ के अनुसार वह मृतयुक्षयी हो जावेगा। यही काम मद सब मदों में प्रथम है, अतः इसी का वध प्रधान है तथा अनेक संख्या में हैं।
इसी प्रकार अविपशु का भी वध है। अवि-पशु से अविप्राणी भेड का ग्रहण जब करने लग गये तो इसकी भी हिंसा यज्ञ में होने लगी। वास्तव में अवि का तात्पर्य सूर्य से है। भेड़ के मारने से स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती है अपितु अवि अर्थात् सूर्य मार्ग के भेदन से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। मोक्ष की कामना चाहने वाले “सूर्य द्वारेण ते विरजा प्रयान्ति” सूर्य द्वारा ही जाते हैं। सूर्यद्वार प्राण का ही द्वार है। इसका भेदन ही अवि का वध है। इस प्रकार सूर्य द्वार और चन्द्र द्वार, अर्चिमार्ग और धूममार्ग, शुक्ल और कृष्णगति, अहः एवं रात्रि, उत्तरायण एवं दक्षिणायन देवयान तथा पितृयान इन मार्गों की संज्ञा है। उपनिषदों में अर्चिमार्ग, उत्तरायण एवं देवयान द्वारा ब्रह्मलोक-मोक्ष की प्राप्ति बताई है। बाल ब्रह्मचारी भीष्म ने अपने प्राणों को उत्तरायण सूर्य होने पर त्यागा था। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उत्तरायण सूर्य होने पर जितने भी व्यक्तियों के प्राण निकलते हैं या मृत्यु को प्राप्त होते हैं, वे सब मोक्ष को प्राप्त होते हैं अपितु इसका यही तात्पर्य है कि जो अपने प्राणों को सूर्य नाड़ी द्वारा त्यागता है देवयान गति को प्राप्त होता है। यही प्राणविद्या में उत्तरायण पथ है। यही अर्चिमार्ग है। यही अविभेदन है। यही स्वर्ग-मोक्ष या अमृतत्व पद प्राप्त करता है, न कि भेड़ पशु का वध!
परन्तु जब अध्यात्म विद्या से शून्य मनुष्यों के हाथ में यह कर्मकाण्ड आया, तो वही अविवध से भी प्राणी का ही वध होने लगा। ऐसा कर्मकाण्ड जीवित भी कैसे रह सकता था? अतः वैदिक धर्म के प्रति जनता की अश्रद्धा होना आवश्यक हो गई।
उपरोक्त दोनों प्राणियों के अतिरिक्त यज्ञ में गौ और अश्व के भी वध प्रारम्भ हो गये। माँसाहारियों ने यज्ञों द्वारा माँसाहार का ही प्रचार कर दिया। वे उसके उद्देश्य को ही न समझ सकें। गौ का तात्पर्य वाणी है, वाणी ही कामधेनु है। इसी से संसार के इच्छित कर्म हो रहे हैं। अनुकूल और प्रतिकूल व्यवहार इसी से निष्पन्न हो रहे हैं। वेद में कहा है कि ‘वाचो में विश्वभेषज अर्थात् मेरी वाणी विश्व की औषधि है। औषधि को बनाने के लिये उसे कूटा-पीसा जाता है, तपाया जाता है, भस्म किया जाता है तथा उसमें अनेक रसों का पुट दिया जाता है। एक ही औषधि अनेक रोगों में देने के लिये अनेक रस में से रगड़ी या मारी जाती है। ऐसी दशा में जिसे संसार की महौषधि बनाना हो वह कितनी बार रगड़ी या मारी जायगी? वाणी पर कठोर संयम एवं उसको मृदुभाषी बनाना गौ वध है या गौ मेघ है। तभी जिह्वा में मधुमत्तमा हो सकेगी।
सामवेद के सेतू स्तर साम को ऋषि लोग किसी समय समस्त पृथ्वी पर गाते हुए विचरण करते थे। संसार रूपी सागर को पार करने के 4 सेतु-पुल बताये हैं। जिसने इन सेतुओं पर आरुढ़ होकर भव सागर पार कर लिया बड़े स्वर्ग के द्वार में क्यों न प्रवेश करेगा। वह सुन्दर और मनोहारी साम बताता है कि क्रोध को अक्रोध से अदानशीलता को दानशीलता से, अश्रद्धा को श्रद्धा से और असत्य को सत्य के द्वारा जीतो। ये ही 4 कठिन सेतु हैं। यही गति है। यही अमृत है। यही स्वर्ग है। यही ज्योति है। इस प्रकार इस साम द्वारा भी वेद ने इन्हीं पाशविक प्रवृत्तियों को या जो प्रवृत्तियाँ मनुष्य को मानवता से पतित करती हैं उन्हीं को विजय करने का उपदेश किया है। अतः लक्ष्य प्राप्ति निमित्त ही शब्दार्थ सम्बन्ध चरितार्थ करते हुए कर्म करना चाहिए।
यदि इन अर्थों को त्यागकर गो मेघ से गो पशु का वध करते हैं तो उससे पाप ही नहीं अपितु महापाप होगा और ‘स्वर्ग कामोयजेत’ यह कभी चरितार्थ नहीं होगा और जो ‘जिह्वा में मधुमत्तमा’ के आदर्श पर चलेगा उसे इसी जीवन में स्वर्ग प्राप्ति होगी। समस्त विश्व उसका मित्र ही होगा। उसको भय ही नहीं होगा। भय नहीं तो शारीरिक और मानसिक दुःख भी नहीं। इसी प्रकार राष्ट्र वे अश्व मेघः। अश्व का अर्थ राष्ट्र है। राष्ट्र की प्रजा में से आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करना ही प्रजा में स्वर्ग स्थापित करना है यही अश्वमेध है।
इसी प्रकार सोमरस का भी अलंकार है। वेद में आता है कि ‘अर्थ वे सोमो वृष्णाँ अश्वत्य रेतः’ अर्थात् वर्षणशील सूर्य की ऊष्मा से पृथिवीस्य जल का जो सूक्ष्मरूप होकर अन्तरिक्ष में विचरना है वही सोमबल्ली है। यही सूर्य का रेत है। यही सोमबल्ली का आकशास्थ होना और अदृश्य रहने का तात्पर्य हैं। इसी प्रकार शरीरस्थ प्राणरूपी सूर्य की ऊष्मा से अधोगामी रेत की सूक्ष्म और ऊर्ध्वगामी बना कर उर्ष्वरेता बनना सोमपान है। इस सोमपान के लिए इन्द्र को बुलाना पड़ता है। बिना इन्द्र के सोमपान नहीं हो सकता अर्थात् प्राण रूपी इन्द्र ही इस सोमपान को करके मर्त्य से अमृतत्व को ही प्राप्त करता है। तभी ‘अथ मर्त्योऽमृतो भवति’ सार्थक होता है। आध्यात्मिक यज्ञों में सोमपान का महत्व होने से भौतिक यज्ञों में उसका रूपक औषधियों के रस को ग्रहण करने से लिया गया है। इसके अतिरिक्त यदि यजमान मेधा कामना से या आरोग्य कामना से यज्ञ करे तो उसके अनुकूल रोगादि के अनुसार विधिवत् औषधियों के रस को निष्पन्न कर ग्रहण करने की क्रिया भी इसी रूपक में समाविष्ट हो जाती है।
दक्षिणाग्नि तो देह की जठराग्नि का ही रूपक है। गाद्देपन्याग्नि की स्थापना और उसमें हवि प्रदान हृदयस्थ अग्नि में प्राणदान की आहुति का रुपक है। इन दोनों के द्वारा शरीर रस, रक्त युक्त तथा प्राण से संयुक्त रहता है। आहवनीयाग्नि एवं उत्तराग्नि का सम्बन्ध ज्ञानाग्नि से है जो मूर्धा में है। जिसमें सप्त होता यजन करते हैं। अथवा देव रूपी इन्द्रियाँ अपना अपना व्यापार कर रही हैं, ये ही सप्त ऋषि हैं। इन्हीं तीनों या चारों अग्नियों से जरामर्यसत्र रूपी यज्ञ हो रहा है। इस प्रकार के आध्यात्मिक यज्ञों में आत्मा का परमानन्द स्वरूप परमात्मा में जो बार-बार गोता लगाना है, वही बाह्य यज्ञों में अवभृथ स्नान के रूप में रखा गया है। यज्ञ के अन्त में जो स्नान होता है उसे अवभृथ स्नान कहते हैं क्योंकि परमानन्द प्राप्ति ही अध्यात्म यज्ञों का लाभ होता है। यहीं पर उसकी समाप्ति है। अतः यज्ञाँत को स्नान को यह स्थान प्राप्त हुआ।
इस प्रकार सम्पूर्ण प्राणविद्या का विवरण इन श्रौतयज्ञों में प्रकट हो रहा है। महर्षि दयानन्दजी ने अपने ग्रन्थों में अनेक बार लिखा है कि दर्रीष्टि से लेकर अश्वमेध पर्यन्त यज्ञ सबको करना चाहिए। इस पर बहुत से विद्वान् चक्कर में पड़े हैं कि राजसूय और अश्वमेध यज्ञ राजा ही करता है, उसे सर्व साधारण प्रजा नहीं करतीं है, तो फिर ये दोनों यज्ञ सब करेंगे? परन्तु वे भूलते हैं और नहीं सोचते कि अपने पर अपना प्रभुत्व स्थापित करना भी तो राजसूय के अंतर्गत आ जाता है। आप अपने स्वयं के तो राजा बनें। जब आप अपने स्वयं के राजा नहीं तो दूसरों के राजा कैसे बनेंगे? राष्ट्र की प्रत्येक इकाई यदि राजसूय यज्ञ से अपने स्वयं पर आधिपत्य स्थापित करले अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति यदि अपनी इन्द्रियों का दमन कर ले, तो राष्ट्र को पुलिस तथा न्यायालय की आवश्यकता ही नहीं रहे। राजा अश्वपति का राज्य इसी प्रकार की यज्ञीय प्रजा युक्त था, तभी तो उसने कहा-न में स्तेनो जन॥ पदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नाविद्वान्नस्वैरी स्वैरिणी कुतः॥
अर्थात् मेरे राज्य में कोई चोर नहीं है, न कोई कुत्सित प्रवृत्तियों से धनादि को संचय करके दबाकर रखने वाला है, न कोई मद्यादि का पान करने वाला है, न कोई ऐसा ही व्यक्ति है जो अपठित हो और कोई व्यभिचारी नहीं है। यदि राष्ट्र ऐसा समुन्नत बन आवे तो इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग है। इसी प्रकार का राष्ट्र बनाने की प्रक्रिया ही ये श्रोत यज्ञ हैं।
अश्वमेध यज्ञ को स्थिति में जब योगी होता है तब यह अपने प्राणरूपी अश्व को शरीरस्थ समस्त नाड़ियों में ध्यान की विजय के लिए भेजता है। शरीर रूपी राष्ट्र की नाड़ियाँ ही प्राणरूपी अश्व के विचरण का क्षेत्र है। इसमें यदि कहीं विकार होगा तो प्राणरूपी अश्व का मार्ग अवरुद्ध हो जायगा अथवा इस राष्ट्र में कहीं भी विकार रूपी शत्रु होगा तो वह प्राणरूपी अश्व का निग्रह कर लेगा या बान्ध लेगा तो अश्वमेध कर्त्ता को उसके निवारणार्थ जो प्रयत्न करने पड़ेंगे वे ही इस निमित्त युद्ध हैं। इस युद्ध में यदि प्राणरूपी अश्व विकार रूपी शत्रुओं द्वारा वशीभूत कर लिया जावे तो अश्वमेध की असफलता है और यदि निर्विघ्न प्राणों का संचार समस्त नाड़ियों में हो जावे या इसके मार्ग में आने वाली बाधायें दूर कर दी जावें अथवा अश्व को पकड़ने वाले का वध कर दिया जावे और अपनी प्राण की ऐसी स्थिति शरीर की नस नाड़ियों की पूर्ण शुद्धि प्राण की पूर्णरूपेण स्व वश में करने से ही होगी। यही प्राणों का अपने बिलकुल वश में करना अश्वमेध—यज्ञ है।
जिस प्रकार बिना नक्शे के भवन नहीं बनता है उसी प्रकार बिना आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के कोई यज्ञ नहीं हो सकता है। अश्वमेध की इस आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का चित्रण लौकिक अश्वमेध यज्ञ में दृष्टिगोचर हो रहा है। अश्वमेध यज्ञ का अश्व छोड़ना और जो उसे पकड़े उससे युद्ध करना प्राणविद्या का ही चित्रण है। जो क्रिया व्यक्ति रूपी राष्ट्र में हैं वे ही साँमप्ट राष्ट्र में है। इसीलिये “राष्ट्र वे अश्वमेध” कहा गया है। आपको भी अपनी इन्द्रियों पर और दुष्प्रवृत्तियों पर विजय पाना है, तभी आप अपने स्वयं के राजा हो सकते हैं। पुनः राजा बनने पर अपने शरीर रूपी राष्ट्र की समृद्धि के लिए, उसके प्राणों को क्रियाशील एवं बलवान बनाना होगा। अतः राजसूय एवं अश्वमेधादि यज्ञ करना भी प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य हो जाता है।
इस प्रकार दर्शेष्टि से अश्वमेध पर्यन्त श्रौतयज्ञ जो सबको करने के लिए कहे गये हैं, उनकी उपयोगिता प्रकट हो जाती है। उपलब्ध कर्मकाण्ड के स्वरूप को समझने में तथा उसकी उपादेयता के चिन्तन के लिए रूढ़िवाद में ही फँसे रहने से कोई तात्पर्य न निकलेगा। केवल रूढ़िवाद के ही ग्रहण करने से और उन्हीं में फँसे रहने से हम लक्ष्य से दूर हो जावेंगे तथा गुत्थी कभी सुलझ न पावेगी।
(श्री आनन्द जी)
महापुरुषों का जन्म,पालन-पोषण, शिक्षा-दीक्षा आदि सभी तो मानव समाज के आदि सभी तो मानव समाज के अन्य जनों की भाँति ही होता है, फिर उनमें क्या ऐसा कुछ होता है, जिसके कारण वे तो लोक पूज्य हो जाते हैं और शेष समाज थोड़ी दूर खिंच कर उनके अनुकूल मात्र हो जाते हैं तथा कुछ या अनेक व्यक्ति उसके अत्यन्त निकट पहुँच कर उनकी प्रभा से जाज्वल्यमान अवश्य हो जाते हैं पर महापुरुषत्व तो केवल एक उन्हीं में अवस्थित होता है, दूसरे में नहीं। उनके “जीवन” के आलोड़न और विश्लेषण से शायद हमें उसका कुछ पता चल जाय और उस पावन पद-रज को अपने शीश पर धारण कर हम अपने को कुछ पवित्र बना सकें, इसी आशा के कारण, यह साहसपूर्वक, धृष्टता की जा रही।
भारत में जातियों के अनेकों खण्ड राज्य थे। अंग, मगध, काशी, कोशल, मोजी, चेदी, वन्स्यः, कुरु , पंचाल, मत्स्य, शौरसेन, असमुख, अवन्ती, गान्धार और काम्बोज सुप्रसिद्ध जाति राज्य थे। प्रजातन्त्रीय राज्यों में विदेह, लछवी ये दोनों संयुक्त होकर विज्जी राज्य कहलाते थे। इसी प्रजातन्त्रीय समाज के राजकुलों में बुद्ध भगवान का अवतरण हुआ था। बड़े ही लाड़-प्यार और भोगैश्वर्य्यमय वातावरण में इनका पोषण और शिक्षण हुआ। विवाह के उपरान्त विलास की मादकता के बीच, मृदुलता सहित, जीवन को सरसायित करने के उपकरणों से उसे घेर कर रक्खा गया। सन्तान का जन्म हुआ और बुद्ध ने मोह के सम्पूर्ण रूप को भली-भाँति निरीक्षण किया, और उसी समय इस मोह-मोह-मधुर-जीवन को, सदा के लिये परित्याग कर, उत्सर्ग और कल्याण का उज्ज्वल-पथ परिग्रहण किया।
इसके प्रथम शैशव और बाल्य जीवन में—इनके विस्तृत विशाल हृदय में निरपेक्ष करुणा को असीम सागर लहराते हुए, सूक्ष्म दृष्टि वालों ने देख लिया था, इसीलिये इन्हें, इनके पिता ने सदैव सुखैश्वर्य्यों के बीच रखने का प्रयत्न किया और यथा सम्भव दुःखद स्थिति एवं दर्शन से इन्हें वञ्चित रखा फिर भी भगवान की अदम्य लीला कि एक ही दिन इन्होंने मानव जीवन की तीनों भयंकर यातनायें—बुढ़ापा, रोग और मृत्यु को देख लिया। उसी दिन इनका आंतरिक जीवन बदल गया, जिसने मन्थन द्वारा प्रगट होकर सर्वस्व त्याग का स्वरूप धारण किया।
इन्होंने जिस भाँति सुख, ऐश्वर्य, विलास, भोग का मुक्त अनुभव किया, उसी भाँति, दारिद्रय, भूख, श्वांस, जाड़ा, गरमी, वर्षा आदि भयंकर कष्टों की भी गम्भीरता से अनुभूति ली, साथ ही जिन वासना, भोगों में, इनके मन प्राणों ने सुख का अनुभव किया था, उसी के निरोध-पशु में आई हुई भयंकर कठिनाइयों का भी एक योद्धा का हृदय लेकर सामना किया और विजय पायी।
इतना करने के उपरान्त इन्होंने शान्त, युक्त , परिमित, मध्यम पथ का अवलम्बन किया और इसी भाँति मनन-चिन्तन एवं निदिध्यासन करते हुए एक दिन बुद्धत्व की उपलब्धि की।
चूँकि मनुष्य के पास मन-बुद्धि ही समझने और जानने के सर्वोच्च साधन हैं, अतः हम बुद्ध को जानने के लिये उनके विभिन्न विषय सम्बन्धी उपदेश संग्रह करके उसके आधार पर परखने का प्रयत्न करें।
1-इदं थी पन भिक्खवे दुःखं अरिय सच्चम जातिमि दुक्खा, जरापि दुक्खा, व्याधिपि दुक्खा, मरणपि दुक्खम्।
अर्थ-भिक्षुगण, यही दुःख है-यह आये सत्य है। जन्म भी दुःख, जरा भी दुःख, मृत्यु भी दुःख और व्याधि भी दुःख।
2-दो पराकाष्ठा हैं, प्रथम काम सुख में ही तल्लीन रहना, दूसरा जीवात्मा को क्लान्त करने वाली तपस्या करना, इन दोनों का परित्याग कर ‘मञ्झिमा-परिपदा” मध्यम पथ का अवलम्बन ही श्रेष्ठ पथ है।
3-दीघ निकाय के अंतर्गत राजा विजत के यज्ञ का वर्णन करके बुद्धदेव ने कहा है:—
“हे ब्राह्मण! उस यज्ञ में गौवध नहीं हुआ, छाग वध नहीं हुआ, मेष वध नहीं हुआ, कुक्कुट वध नहीं हुआ, शूकर वध नहीं हुआ, एवं अन्यान्य प्राणियों की हत्या भी नहीं हुई। इसी तरह यूप के लिये वृक्ष का छेदन नहीं हुआ और आसन के लिये कुशोच्छेदन नहीं हुआ। उस स्थान पर भृत्य, किंकर और काम करने वालों को दण्ड द्वारा तर्जन नहीं करना पड़ा। यही क्यों? भय भी नहीं दिखाना पड़ा। वे लोग अश्रु मुख होकर रो-रो कर काम नहीं करते थे। जो उनकी इच्छा हुई किया, जो इच्छा नहीं हुई, नहीं किया। वह यज्ञ, घृत, तैल, नवनीत और दही, गुड़-मधु के द्वारा ही सम्पन्न हुआ था।”
4—मभिझमनिकाय के अस्सलायन सुत्त में लिखा है कि एक विद्वान् ब्राह्मण गौतम से विवाद करने आया और वह गौतम के इस सिद्धान्त पर विवाद करने लगा कि सब जातियाँ समान रूप से पवित्र है।
गौतम जो कि एक उत्तम तार्किक था, उसने उस से पूछा—”ब्राह्मण की स्त्रियों को दूसरी जाति के सदृश प्रसव वेदना होती है या नहीं?”
अस्सलायन ने कहा—“हाँ होती है।”
गौतम ने पूछा—‘क्या बेक्ट्रिया की भाँति आस-पास के देश के लोगों में रंग भेद नहीं होता, फिर भी उन देशों में क्या गुलाम-मालिक नहीं हो सकते?”
अस्सलायन—हाँ, हो सकते हैं।
गौतम ने पूछा—तब यदि ब्राह्मण, बालक, चोर, झूठा, लम्पट कलंक लगाने वाला, तुच्छ, लालची, द्रोही और मिथ्या सिद्धान्त का मानने वाला हो, तो क्या वह मर कर दूसरी जाति की तरह दुःख और कष्ट में जन्म नहीं लेता? अस्सलायन—अच्छे और बुरे कर्मों का फल मनुष्य को बिना जाति का विचार किये ही मिलेगा।
गौतम ने कहा—यदि किसी घोड़ी का किसी गधे का साथ संयोग हो जाय तो उसकी सन्तान अवश्य खच्चर होगी, लेकिन क्षत्रिय और ब्राह्मण के संयोग से जो सन्तान उत्पन्न होती है वह अपने माँ-बाप की तरह ही होगा। इसलिये स्पष्ट है कि ब्राह्मण और क्षत्रिय में कोई भेद नहीं।
इसके बाद अस्सलायन कुछ सोचता रहा और सोचकर गौतम का शिष्य हो गया।
बार-बार युद्ध ने बतलाया है—पवित्र उत्साह, पवित्र जीवन और आत्म निरोध से मनुष्य ब्राह्मण हो जाता है। यह संघ से उच्च ब्राह्मण का पद है। मनुष्य अपने गुथे हुए बालों से और अपने वंश अथवा जन्म से ब्राह्मण नहीं हो जाता; परन्तु जिसमें सत्य और पुण्य हो वही ब्राह्मण है और वही धन्य है।
बुद्ध भगवान के उपदेश, वार्ता और विचारों के द्वारा ही हम उनकी महानता की खोज करते हुए पाते हैं कि वे इस संसार में जन्म, मरण, बुढ़ापा, व्याधि रूप दुःख से सभी को आक्रान्त पाते हैं। कोई इन दुःखों से मुक्त नहीं है, अतः इन दुःखों से निस्तार पाने के लिये विषय वासना करने वाली उपासना, तपस्या करना, दोनों में एक भी पथ प्रशस्त नहीं। वरन् विषय से अनासक्त होकर उसका आवश्यक उपयोग तथा कष्टदायी तपस्या के आकर्षण से विरत हो शान्त चित्त से ही, जिसे वे “मध्यम मार्ग” कहते हैं— स्थायी शान्ति प्राप्त हो सकती है।
‘यज्ञ’ से उन्हें विरोध नहीं वरन् प्रसन्नता होती है, जिसमें हिंसा नहीं हो, किसी को सताया नहीं जाता हो, किसी पर दबाव पूर्ण- भय दिखाकर शासन नहीं किया जाता हो।
इसी भाँति वर्णधर्म से भी उन्हें विरोध नहीं है वरन् वे उपनिषदों के सार श्रीमद्भागवत् गीता के निर्देशों को व्यवहारिक रूप देने का प्रयत्न करते हैं।
“चातुर्वर्ण मया सृष्टं गुण कर्म विभागशः”
—गीता,
जिनमें विषय-वासना छोड़ने की प्रवृत्ति और शक्ति नहीं है, ऐसी नीच मनोवृत्ति वाले अपनी विष-लोलुपता, कदाचार और असंयम को जन्मना वर्ण की आड़ में छिपाकर जो पूज्य बने रहने का ढोंग रचते थे, तथा माने हुए कुछ जन्मजात उच्च वर्णों के सम्मान के संरक्षण के लिये दूसरे जनों को अपने गुण-स्वभाव-कर्म से उक्त सम्मान और पूज्य पदों पर जाने से अवरोधन करते थे-ऐसे लोगों के आडम्बर और संकीर्ण-स्वार्थी विचारों का निमर्थन कर वे व्यापक, सत्य और उदार नियमों की स्थापना चाहते थे।
भगवान की “चतुवर्ण” वाली सृष्टि, जिसका गुण-कर्मों के अनुसार स्वतः ही विभाग किया हुआ है, आज भी होती है, पर समाज में जन्गतः ही उच्च अधिकार पाने के लोभी इसे मानने के लिये कदापि तैयार नहीं होते। जिस भाँति एक पूँजीपति का बेटा, पिता की कमाई सम्पत्ति का अधिकारी तो बने रहना चाहते हैं, पर जिस योग्यता और पुरुषार्थ से उनके पिता ने यह सम्पत्ति अर्जित की थी, उन योग्यताओं एवं पुरुषार्थों की कतई परवाह नहीं करते, उसी भाँति पूर्वजों की तपस्या और आध्यात्मिकता के नाम पर ही पूज्य बने रहने की इच्छा वाले लोग, जन्मजात उच्चवर्णता का अधिकार चाहते होते हैं।
भगवान् बुद्ध ने अपने निर्मल, न्यायपूर्ण, विशाल एवं निष्पक्ष दृष्टि से देखा कि विश्व के सारे मानवों में दुःख, सुख की स्थिति एवं गुण-कर्म स्वभाव की उत्पत्ति, समान रूप से ही होती है। वह मनुष्यों का मनुष्य के किसी विशिष्ट समूहों द्वारा बनाये नियमों को आधार मानकर नहीं चलती, वरन् निसर्ग का वह स्वयं ही अपना नियम है। इसके लिये मानव रचित स्वार्थी आधारों पर मानव-मानव में परस्पर ऊँच नीच के नाम पर द्वेष और घृणा का आस्तित्व बनाये रखना कभी कल्याणकारी नहीं, वरन् ईश्वर के पवित्र नैसर्गिक-विधानों का उल्लंघन और अपमान करना ही है।
भारतीय संस्कृति सदा ही अध्यात्म की अनुयायी रही है। यही इसके अमर-श्रोता होने का कारण है। उसके अनुसार जो व्यक्ति ईश्वर को प्राप्त कर लेता है, वह स्वयं ईश्वर रूप ही हो जाता है। वह मनुष्य ही नहीं, प्राणीमात्र को अपने वात्सल्य भाव से परिप्लावित कर उसके कल्याण का विधान करता रहता है। इसी से बुद्धदेव भगवान् का अवतार है।
भगवान् बुद्धदेव के भाव, विचार, वाणी एवं कर्म के एक-एक कण में उसी भगवद्वत्ता को हम डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड ने उसे अपना पिता-गुरु माना और उनके निर्देशों को कल्याणकारी विश्वास कर स्वीकार कर लिया। पर यह केवल बुद्धदेव की ही बात नहीं है, सभी अध्यात्मवेत्ता-ईश्वर प्राप्त महा पुरुषों की वाणी को सारे संसार ने सदा ही इसी भाँति श्रद्धा पूर्वक स्वीकार किया है। चूँकि भारतवर्ष को ही भगवान् ने सारे भूमंडल का आध्यात्मिक केन्द्र बनाया है, इसीलिये यहाँ ऐसे महापुरुष बहुतायत विशालता एवं पक्षपात हीन प्रेम के कारण ही यह देश, विश्व का गुरु बनता ओर कहलाता रहा। इसका यह सिलसिला भंग नहीं हुआ है और न भविष्य में ही होने की आशंका है। प्रत्येक ईश्वर प्राप्त पुरुषों की वाणी, ईश्वरीय वाणी है, चाहे इसका शाद्धिक नाम कुछ भी क्यों न रखा जाय? पर इनके अनुयायियों ने अपनी अविकसितता के कारण ही सदा इसे परिसीमित और संकीर्ण बना कर विकृत कर दिया है। इसी का नाम ‘मत’, ‘वाद’, ‘सम्प्रदाय’, आदि-आदि हो गया है।
तो बुद्ध की महानता को ठीक ठीक जानने और ग्रहण करने के लिए हमें भी अपने हृदय, मस्तिष्क और शरीर को वैसे ही विशाल, निष्पक्ष और ईश्वरीय भावों से परिपूर्ण करके पुनीत होने की आवश्यकता है।
गुण, कर्म, स्वभाव से ही किसी व्यक्ति की लघुता और महानता को नापा जा सकता है। जिस प्रकार कलक्टर का लड़का कलक्टर और चपरासी का लड़का चपरासी होना जरूरी नहीं, इसी प्रकार किसी वंश में उत्पन्न होने वाले सभी व्यक्ति अपने पूर्वजों के समान ही हों, यह कोई आवश्यक नहीं। सर्वत्र कर्म की ही प्रधानता है। जो जैसे कार्य करता है उसकी गणना उसी श्रेणी में होने लगती है। पूर्व काल में चारों वर्णों का निर्धारण इसी आधार पर हुआ था इसके कुछ प्रमाण नीचे उपस्थित किये जाते हैं—
एकवर्णमिदं पूर्व विश्वमालीद्यु धिष्ठिर। कर्मक्रिवा विशेषण चतुर्वर्णं प्रतिष्ठितम्॥
—महाभारत
पहले केवल एक ही वर्ण था। बाद में कर्म-क्रिया विशेष वश चार वर्ण हुये।
एक एव पुरावेदः प्रणवः सर्ववां्मय। देव नारायणोनान्य एकोग्निर्वर्ण एव च॥
—भागवत
पहले सर्वांगमय प्रणव ही एक मात्र वेद था। डडडड डडडड था और कोई नहीं। एक मात्र लौकिक अग्नि ही अग्नि और एक मात्र हंस ही वर्ण था।
आदौ कृतयुगे वर्णों नृणां हंस इति स्मुतम्।
—पुराण
प्रारम्भ में-सत्ययुग में मनुष्य की एक मात्र जाति हंस थी।
अप्रंवृत्ति कृदयुगे कर्मणोः शुभषाषये। वर्णाश्रम व्यवस्थाश्व न तद्सिन न संकरः।
—पुराण
उस सत्ययुग में पाप-पुण्य की सृष्टि नहीं हुई थी, वर्णाश्रम व्यवस्था नहीं थी। इसीलिये उस समय वर्णशंकर भी नहीं था।
चातुर्वर्णस्य वर्णेन यदि वर्णों विभिद्यते सर्वेषा खलु वर्णानाँ दृश्यते वर्णसंकर। कामः क्रोधो भयं लोभः शोकश्चिन्ता क्षुवाश्रमः
सर्वेषा नः प्रभवति करमाद्वर्णो विभिद्यते। चिद्मूत्रपूरीपाणि श्लेष्मा वित्तं सशाणित। तनुः क्षरति सर्वेषाँ कस्याद्वर्णो विभिद्यते॥ जंगमानायसंख्येयाः स्थावराणाँ च जातयः। तेषाँ विविधवर्णानाँ कुतो वर्णविनिश्चयः। —शान्ति॰ 188।5
यदि रंग से ही वर्णभेद समझा जाय तब तो सभी वर्णों में वर्णशंकर देखे जायेंगे। फिर हम सभी लोग काम, क्रोध, मद, लोभ, शोक, चिन्ता और भ्रम से पराभूत होते हैं, इसलिये वर्णभेद होते कैसे हैं? स्वेद, मूत्र, पुरीष, श्लेष्मा, पित्त और शोणित सभी शरीरों में समान भाव से क्षरित हो रहे हैं फिर वर्णों भेद कैसे होता है? फिर अशेष प्रकार के स्थावर और जंगमों के वर्णों की विभिन्नता कैसे निश्चित? होगी!
न विशेषोऽस्ति वर्णानाँ सर्व ब्राह्ममिद्ं जगत। ब्रह्मणा पूर्वसृष्ठम् हि कर्मभिर्वर्णता गतम् ॰॥ क मभोग प्रियास्तीक्ष्णाः क्रोधनाः प्रियसाहसाः। व्यक्तस्वधर्मा रक्त गास्ते द्विजा क्षत्रता गताः॥11॥ गोभ्यो वृत्ति समास्माय पीताः कृष्पुप जीविन। स्वधर्मान्नितिष्ठन्ति ने द्विज वैश्यताँ गताः॥12॥ हिंसानृतप्रिया लुघ्घाः सर्व कर्मोपजीविन। कृष्णाःशौचरिभ्रष्टास्ते द्विजाः शूद्रताँ गताः॥13॥ इत्येतैः कर्मभिर्व्यस्ताः द्विजाः वर्णान्तरंगता धर्मो यज्ञक्रिया तेषाँ नित्यं न प्रतिषिध्यते॥14॥ इत्येते चतुरोवर्णा येषाँ ब्राह्मी सरस्वती। विहिता ब्रह्मणा पूर्व लोभादज्ञानताँ गता॥15॥
—शान्ति पर्व
वर्णों की कोई विशेषता नहीं है। समस्त जगत् को ब्रह्मा ने पहले ब्राह्मणमय ही सृष्ट किया था। बाद में सभी कर्मानुसार नाना वर्ण को प्राप्त हुए। जो ब्राह्मण काम, भोगप्रिय, तीक्ष्ण स्वभाव, क्रोधी, प्रिय साहस और स्वधर्म त्याग करके राजसिक लोहित वर्ण हुये वे क्षत्रिय हो गये। गोरक्ष वृत्ति ग्रहण करके जो कृषि जीवी हुए वे स्वधर्म त्यागी पीतवर्ण वाले ब्राह्मण वैश्य हुये। जो ब्राह्मण हिंसाप्रिय, अनृत प्रिय लोभी और सर्वकर्मोपजीवी हो गये, वे शौच परिभ्रष्ट कृष्णवर्ण ब्राह्मण शूद्र हुये। इन कर्मों से पृथक् पृथक् ब्राह्मण लग ही वर्णान्तर को प्राप्त हुये। इसीलिए उनके लिए यज्ञ किया और धर्म नित्य विहित हैं, निषिद्ध नहीं। इन चारों वर्णों को वेद में अधिकार है, ब्रह्मा का यही पूर्व विधान है। लोभ के कारण ही लोग अज्ञान को प्राप्त हैं।
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद्वाहू राजप्यः कृतः। ऊरु तद्स्य यद्वैश्यः पद्भ्याँ शूद्रो अजापत॥
—10म मण्डल 90 सूक्त 12
उस प्रजापति के मुख ब्राह्मण, बाहु क्षत्रिय, उरु वैश्य थे और पदों से शूद्र उत्पन्न हुये।
प्रत्समदस्य शौनकश्चातुर्षरार्यं प्रवर्तंयिताभूत्।
—विष्णु॰ अंश 4।8।1
विष्णु पुराण के मतसे गृत्समद के पुत्र शौनक ने चातुर्वणर्य व्यवस्था प्रवर्तित की।
भार्गस्य भार्गभूमि अतश्चतुर्वरार्यप्रवृतिः।
—विष्णु, चतुर्थ अंश 8, 91
भार्ग से भार्गभूमि उत्पन्न हुए और उनसे चातुरवर्ण्य प्रवर्तित हुआ।
ब्राह्मणश्च दक्षिणाँगुष्ठ जन्मादक्ष प्रजापतिः।
—विष्णु 4, 1, 5
दक्ष प्रजापति ब्रह्मा के दाहिने अंगुष्ठ से उत्पन्न हुये।
ब्राह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः पञ्चमहर्षयः। मरींचिरपंगिरिसौः पुलस्यः पुलहः क्रतुः। मरीचे कश्यपः पुत्रः कश्यपातु इमाः प्रजाः।
—आदिपर्त्र 65, 10।11
ब्रह्मा के 6 मानसपुत्र है, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतुः। मरीचि के पुत्र हैं कश्यप। उन्हीं से पूजाओं की सृष्टि हुई।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
—गीता 4,13
मैंने गुण कर्म के अनुसार चातुरवर्ण्य की सृष्टि की हैं।
सर्वोऽयम् ब्राह्मणों लोके वृत्तंनेतु ब्रिधीयते। वृत्तं स्थितस्तुशूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं नियच्छति॥
—अनु॰ 143,51
चरित्र से सभी ब्राह्मण हो सकते हैं शूद्र भी यदि सच्चरित्र हो; तो ब्राह्मणत्व प्राप्त करता है।
आर्जवे वर्तमानस्य ब्राह्मरायमभि ज्रायते।
—वन॰ 211,12
जो आर्जव् या सरलतापूर्वक आचरण करता है, उसी को ब्राह्मणत्व प्राप्त होता है।
एभिस्तु कर्मोभिर्देवि शुभराचरितैस्तथा। शूद्रो ब्राह्मणताँ याति वैश्यः क्षत्रियताँ ब्रजेत्॥
‘सदाचार और कर्म से ही शूद्र ब्राह्मण होता है और वैश्य क्षत्रिय होता है।’
एतैः कर्मफलैर्देवि न्यूनजाति कुलोद्भः। शूद्रोऽप्यागमसंपन्नों द्विजो भवति संस्कृतः॥
(अनु॰ 144, 43)
‘सत्कर्म के फल से आगम सम्पन्न शूद्र संस्कृत होकर द्विजत्व प्राप्त करता है।’
ब्राह्मणोवाऽप्यसद्वृत्तः सवसंकरभोजनः। ब्राह्मण्यं स समुत्सृज्य शूद्रो भवति तादृशः॥
(अनु॰ 144, 47)
‘ब्राह्मण भी असत् चरित्र और सर्वसंकर भोजन करने से जाति च्युत होकर शूद्र हो जाता है।’
कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः। शूद्रोऽपि द्विजवत् सेव्य इति ब्रह्माऽव्रवीत् स्वयं॥
(अनु॰ 144, 48)
‘पवित्र कर्म से शुद्धात्मा और विजतेन्द्रिय शूद्र भी द्विजवत् सेवनीय होता है, यह बात स्वयं ब्रह्मा ने कही है।’
पुत्रो गृत्समद्म्यापि शुनको यस्य शौनकाः। ब्राह्मणाः क्षत्रियाञ्चैव वैश्याः शूद्रास्तथैव च॥
(हरिवंश—29 अध्याय 1519-20)
‘गृत्समद् के पुत्र शुनक हुए। शुनक से ही शौनक नाम से परिचित ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र बहुत से पुत्र उत्पन्न हुए।
अक्षराद् ब्राह्मणाः साम्याःक्षणत् क्षत्रियबान्धवाः। वैश्या विकारतञ्चैव शूद्रा धूमविकारतः॥
(हरिवंश—भविष्य पर्व 210, 11816)
‘ अक्षर से ब्राह्मण, क्षर से क्षत्रिय, विकार से वैश्य और धूम-विकार से शूद्रगण उत्पन्न हुए।’
वाक्यसंयमकाले हि तस्य वरप्रद्स्य देवदेवस्य ब्राह्मणः प्रथमं प्रादुर्भूताः। ब्राह्मणेभ्यञ्च शेषा वर्णाः प्रादुर्भूताः।
(महाभारत शाँति॰ 342, 21)
‘देवदेव नारायण के वाक्य संयम के समय उनके मुख से पहले ब्राह्मणों की उत्पत्ति हुई। अन्यान्य वर्णों ब्राह्मणों से उत्पन्न हुए।’
यस्मात् त्रिपु वर्णैषु ब्राह्मणो यज्ञसृष्टा तस्मात्। सर्वेऽपि वर्णा ऋजवः साधव एव यज्ञसंयोगात्॥ (नीलकंठ टीकाकार)
‘चूँकि तीन वर्णों में ब्राह्मण ही यज्ञसृष्टा है, इस लिये उत्पन्न सभी वर्ण ही यज्ञ संयोग वश ऋजु अर्थात् साधु हैं।’
संसर्ज ब्राह्मणनग्रे सृष्टयादौ स चतुर्मुखः। सर्वे वर्णाः पृथक् पश्चात् तेषाँ वंशेषु जज्ञिरे॥
(पद्मपुराण, उत्कलखंड 38,44)
‘चतुर्भुज ब्रह्मा ने सृष्टि के प्रारंभ में पहले ब्राह्मणों का ही सृजन किया। फिर अन्य सभी वर्ण उन्हीं के वंश में पृथक-पृथक उत्पन्न हुए।
येन पूर्णभियाकाशं भवत्यकेन सर्वदा। शून्यं येन जनाकीर्ण तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥
(शान्ति 244, 11)
जिसके अकेले रहते भी आकाश पूर्ण की भाँति ज्ञात होता है और शून्य स्थान जनाकीर्ण सा लगता है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’
न क्रुध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः। सर्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मण विदुः॥
(शान्ति 244-14)
‘सम्मानित होकर भी जो धृष्ट नहीं होता, अपमानित होकर भी रुष्ट नहीं होता, जो सर्वभूत को अभय देने वाला है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’
जीवित यस्य धर्मार्थ धर्मो हर्यर्थमेव च। अहोरात्राश्च पुण्यार्थ तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥
(शान्ति 244, 23)
‘जिसका जीवन धर्म के लिये है, धर्म हरि के लिये है और दिन रात पुण्य के लिये है, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’
निराभिषमनारंभं निर्नमस्कारमस्तुतिम्। निर्मुक्त बंधनैः सर्वेस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः॥
(शान्ति 244, 24)
‘जो निरामिष हैं, जो अनारम्भ हैं, जो स्तुति और नमस्कार से हीन हैं, जो सर्व बन्धन से विमुक्त हैं, उसे ही देवता लोग ब्राह्मण कहते हैं।’
कारणं हि द्विजत्वे च वृत्तमेव न संशयः।
(वन॰ 312, 108)
‘निस्सन्देह चरित्र ही ब्राह्मणत्व का कारण है।’
ब्राह्मणो वा च्युतो धर्माद्यथा शूद्रत्वनाप्नुते।
(अनु॰ 144, 59)
‘धर्म की सहायता से शूद्र भी द्विज होता है और धर्म से विमुख होकर ब्राह्मण भी शूद्र हो जाता है।”
ब्राह्मणस्य सदाकालं शूद्रप्रेषणकारिणः। भूमाचन्नं प्रदातव्यं यथाहि वा तथैव सः।9।35
‘ब्राह्मण शूद्र की नौकरी करके कुत्ते के समान हो जाता है उसे भी कुत्ते की तरह जमीन पर अन्न देना विहित है, क्योंकि जैसा कुत्ता है वैसा ही वह है।’
तं होवाचनैतद् ब्राह्मणोववक्तु मर्हति, समधि सौम्याहरोपमत्वा नैष्येनसत्यादगा इति॥
—छाँदोग्य 4।4।5
जाबाला के पुत्र सत्यकाम के माता की बात को गुरु से ज्यों का त्यों कह देने से गुरु गौतम ने कहा कि—सच्चे ब्राह्मण के सिवा और कोई ऐसी सच्ची बात नहीं कह सकता। जाओ सौम्य, समिध लाओ। मैं तुम्हें उपनीत करूंगा, इसलिये कि तुम सत्य से भ्रष्ट नहीं हुये।’
ततो ब्राह्मणताँ यातो विश्वमित्रों महातयाः। क्षत्रियः सोऽष्यथ तथा ब्रह्मवंशस्य कारकः॥
—शल्य॰ 4।48
‘विश्वामित्र क्षत्रभाव से ब्राह्मण भाव को प्राप्त हुये थे।’
उतासि मैत्रावरु णो वसिष्ठौर्वश्या ब्रह्मनमनसोऽधिजातः।
(ऋग्॰ 7।33।11)
असल में अगर जन्म से ब्राह्मणत्व का विचार किया जाय तो पता चलता है कि विशिष्ठ स्वर्ग की अप्सरा उर्वशी की सन्तान है। मित्रावरुण के औरस से उनका जन्म है। वशिष्ठ के जन्म में कुछ गोलमाल था, इसीलिये ऋग्वेद में कहीं उन्हें उर्वशीपुत्र और तृत्सु-वंशोत्पन्न कहा है। कई जगह उन्हें ब्रह्मा का मानस पुत्र भी कहा है।
किं ब्राह्मणस्य पितरं किमु पृच्छसि मातरं। श्रतुँ चंदस्मिन् वेद्यं स पिता स पितामहः॥
(काठकसंहिता 30।1)
कृष्ण यजुर्वेद कहता है—ब्राह्मण के माता-पिता को क्यों पूछते हो? यदि उसमें श्रतु है, तो वही उस का पिता है, वही पितामाह।
नैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तं यथैकता समता सत्यता च शीलं स्थितिर्दस्भनिवाननमार्जवं ततस्ततश्चोपरमः क्रियाभ्यः।
—शान्ति॰ 175।3-7
‘एकता, सत्यता, समता, अहिंसा, सरलता और कर्म में अनासक्ति इनसे बढ़कर ब्राह्मणों का कोई धन नहीं है।’
तत्रचोद्यमस्ति को या ब्रह्मणोनाम, किं जीवः किं देह किं जातिः, किं ज्ञानम् किं धार्मिकक इति।
‘ब्राह्मण कौन है? जीव या देह या जाति या ज्ञान या कर्म या धर्म से ब्राह्मण नहीं होता, अद्वितीयात्मा का साक्षात्कार होने से ही ब्राह्मण होता है।’
तब प्रथमो जीवो ब्राह्मण इतिचेतन्न। अतीतानागतनिक देहानाँ जीवस्यैकरुपत्वात् एकस्यापि कर्मवशाद नेक देह संभवात् सर्वं शरीराणाँ जीवस्यैकरुपःवाच्च। तस्मान्न जीवो ब्राह्मण इति।
‘पहले विचार किया जाय कि क्या जीव ब्राह्मण है? ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि अतीत और अनागत काल में नाना जातीय देहों में जो जीव चल रहा है, वह एक रूप है, एक ही जीव के कर्म वश अनेक देह पैदा होते हैं, इस प्रकार सर्व शरीर के जीव के एकरूपत्व की बात सोचने से जान पड़ता है कि जीव ब्राह्मण नहीं हो सकता।
(श्री रामकुमार शर्मा, आगरा)
सामाजिक संस्कारों के अनुशीलन के सिलसिले में अनेकों खोजियों ने आश्चर्य के साथ देखा होगा कि सुखी और सम्पन्न घराने के लोगों ने किसी संवेग से प्रेरित हो किसी के साधारण मूल्य की वस्तुयें चुरा लीं। यद्यपि उतने पैसे या उन वस्तुओं का अभाव उन्हें जरा भी नहीं होता, फिर भी चुराने में उसे मजा आता है। और ये आदतें मार-पीट, दबाव और शासन से नहीं छूटती। मनुष्य इन आदतों को छोड़ने की इच्छा करके भी नहीं छोड़ पाते। इन जटिल आदतों को कैसे छुड़ाया जाय, इनके मूल कहाँ हैं, इन सभी बातों के लिये मन का विश्लेषण करना आवश्यक है।
इन आदतों की उत्पत्ति कैसे होती है, इस सम्बंध में प्रथम विचार, इस प्रकार के हैं-बार बार किसी कार्य को करते रहने से, उसके संस्कार कर्त्ता के मन पर क्रमशः जमते जाते हैं और एक दिन वे संस्कार घनीभूत होकर आदत में परिणत हो जाते हैं। जिस प्रकार बारम्बार के संघर्ष से जड़ पदार्थों में एक निश्चित संस्कार उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्यों में भी किसी काम को बारम्बार करते रहने से वह उसकी आदत ही बन जाती है। इसलिये कोमल शिशुओं को किसी काम में बारम्बार लगाने से उसकी आदत निर्मित करने के लिए पर्याप्त हैं और किसी आदत को बदलने के लिए उसके विपरित कार्यों को बारम्बार कराना भी पर्याप्त है।
नवीन मनोवैज्ञानिक विचारधारा कहती है कि प्रत्येक आदत की जड़ किसी संवेग में रहती है और इस संवेग के उत्तेजित होने पर आदत से होने वाले कात किए जाते हैं। संवेग की उत्तेजना, शिथिलता एवं विनाश ही, आदत की क्रिया शीलता, उसकी दिलाई एवं नाश का कारण बनता है। आदत मशीन है, संवेग उसकी चालक विद्युत शक्ति है। अभ्यास की बारम्बारता आदत निर्मित होने का कारण नहीं है। जटिल आदतें, मानसिक जटिलता, पेंचदार संवेगों के कारण ही उत्पन्न होती हैं।
यदि बुरी आदतें छुड़वाने और छोड़ने की जरूरत है तो इसके लिए आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार उन संवेगों के केन्द्र, मानसिक ग्रन्थियों के खोल देने ही से उन संवेगों के नष्ट हो जाने पर ही सम्भव है।
इस सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक चिकित्सा के अनुभवी श्री हेड फील्ड महाशय के कथन उल्लेख किये जाते हैं—
“मानसिक चिकित्सा में देखने में आता है कि जब किसी भावना ग्रन्थि को पूर्णतः नष्ट कर दिया जाता है, तो उससे सम्बन्धित बुरी आदत उसी प्रकार नष्ट हो जाती है, जिस प्रकार बिजली के प्रवाह की धारा तोड़ देने से बिजली का प्रकाश समाप्त हो जाता है। कारण के हटा देने पर कार्य का अन्त अपने आप हो जाता है। यदि आदत मानसिक ग्रन्थि के हटाने पर भी बनो रहे, या हटाने में समय ले रही हो, तो समझना चाहिए कि मानसिक ग्रन्थि अभी तक विद्यमान है।
इसका सबसे सुन्दर प्रत्यक्ष प्रमाण धार्मिक परिवर्तनों में देखा जाता है। बड़े से बड़ा पापी भी एक ही दिन में किसी अपने विशेष अनुभव से पुण्यात्मा बन जाता है। और अकस्मात् अपनी ऐसी आदतों को छोड़ देता है, जो जन्म से ही बनी आ रही थी। मनुष्य के संवेगात्मक जीवन में परिवर्तन होने से, उसकी बुरी आदतें उसे सदा के लिए छोड़ देती हैं। बुरी आदतों को मिटाने के लिए सम्भव है कि मानसिक चिकित्सकों को, उस ग्रन्थि को खोज निकालने में अनेकों सप्ताह अथवा महीने भी लगे, किंतु एक बार उस मानसिक ग्रन्थि को ढूंढ़ लेने पर (जो ग्रन्थि, उस आदत की जड़ है) तथा उसके निराकरण होने पर बुरी आदत अचानक ही नष्ट हो जाती है यह नियम न केवल आचरण की कुछ आदतों के लिए लागू होता है, वरन् शारीरिक अभ्यासों, मानसिक अकारण भयों,दुःखानुभूतियों आदि के लिए भी पूर्ण रूपेण लागू होता है। नैतिक सुधार में ही यह मनोवैज्ञानिक नियम कार्य करता है।
उस सिद्धाँतों का समर्थन ऐसे अनेकों उदाहरणों से किया जाता है। वाल्मीकि,तुलसीदास,सूरदास आदि इसके उदाहरण हैं। संवेग परिवर्तित होते ही इनके विचार ही नहीं,आचरण तक बदल गये। मनोवैज्ञानिक चिकित्सक प्रमाण के लिए ऐसे ही उदाहरण पेश करते हैं, जिसके कुछ नमूने नीचे दिये जा रहे हैं—
एक महाशय को रात के तीन बजे जग जाने की आदत पड़ गयी थी। वह स्वयं इस समय सोना चाहते थे, पर लाख चाहने पर उसे नींद नहीं आ पाती थी। इस आदत की स्वभाव ग्रन्थि की खोज करने पर पता चला कि एक बड़े ही तीव्र वेदना भरे अनुभवों के कारण ही वह जटिल ग्रन्थि बन गयी थी जिसने इस आदत का रूप धारण कर रक्खा था। कई वर्ष पूर्व उन्हें पेचिश की बीमारी हुई थी। इस बीमारी के कारण एक रात के तीन बजे सहसा ही इनकी नींद टूट गयी और उस समय उनके पेट में इतनी दुस्सह पीड़ा हुई कि उन्होंने समझ लिया कि अब मेरे प्राण शरीर से निकलने ही वाले हैं। पश्चात् ये पीड़ा और पेचिश एवं मृत्यु भय की बात उसकी याद में से धुल गयी पर उस मानसिक ग्रन्थि के निर्मित हो जाने के कारण उसे अनचाहे भी तीन बजे जग जाना पड़ता था। संवेगात्मक-अनुभव का संबन्ध तीन बजे रात के जगने से हो गया था, अतः संवेग के उत्तेजित होते ही आदत क्रियामाण हो पड़ता था, और वे नींद से वंचित हो जाते थे।
कभी-कभी मानव के जीवन में यह आश्चर्य भी उपस्थित होता है कि जिस व्यक्ति से हम सद्भाव पूर्वक बरतने का विचार रखते हैं, प्रेम करना चाहते हैं, उसी व्यक्ति को देखते ही कुछ ऐसे भाव भी उद्वन्द्व हो पड़ते हैं जो उस विचार और भाव के बिल्कुल विपरीत पड़ते हैं। वैसा व्यवहार करना हमारे विचार को जरा भी पसन्द नहीं, और न वैसा करना ही चाहते हैं, फिर भी एक संवेग वैसा कर डालने के लिये अनुप्रेरित करता रहता है। इसके भी एक उदाहरण जो मनोवैज्ञानिक जनों की ओर से दिए गए हैं, उसे देखिये और इस मनोवैज्ञानिक जटिलताओं के कारणात्मक सत्य की परख कीजिए—
एक अस्पताल में एक पुरुष “नर्स’ का काम करता था। उसी अस्पताल में एक “नर्स” का काम करने वाली महिला से उसे प्रेम हो गया। उसके प्रति उस (पुरुष) के हृदय में स्नेह के बाढ़ आते, तो उसकी सुन्दर कल्पना में विभोर हो उठता, पर ज्यों ही वह महिला उसके सामने आती तो उसमें एक संवेग उठता कि उसके सुकोमल गालों में जोर से एक घूंसा लगा दूँ। घूंसा मारने से तो प्रेम और विवाह होने की सारी स्थितियाँ बिगड़ ही जाएंगी, यही सोच कर वह अपने को रोक लेता, पर अन्तर से उठते हुए संवेग को रोकने में वह सदा ही असमर्थ रहता। एक दिन वह इसी चिंता में तल्लीन था कि अपनी प्रेमिका के प्रति, प्रतिकूल आचरण करने का संवेग जो मुझे होता है, वह क्यों? सहसा ही उसे याद आयी कि एकबार अस्पताल में नर्स का काम करते हुए उसे एक महिला नर्स ने नौकरी से वञ्चित कर वह स्वयं उस स्थान पर अधिकृत हो गयी थी। उसकी उस गर्हित नीचता से पुरुष को बड़ा क्रोध आया और उसने उस महिला नर्स से कहा--आज यदि मैं भी एक नारी होता तो तुम्हारे सुकोमल से कपोलों को जोर के घूंसे मारकर मरम्मत कर देता, किंतु अफसोस! वह आवेश उसने रोक लिया था और कुछ दिनों के बाद उसे भूल भी गया, पर उसी ने उसके मन में-स्वभाव में एक ग्रन्थि उत्पन्न कर दी थी; जिससे वैसे चेहरे वाली नर्सों के गाल उसके सामने आते ही उसके संवेग उत्तेजित हो उठते और उसे वह बड़ी कठिनाई से संयत कर पाता था।
यह स्मृति में आने के उपरान्त उसकी मानसिक ग्रन्थि खुल गयी और उस अनिच्छित संवेग की भी परिसमाप्ति हो गयी।
अतः आज का मनोविज्ञान चाहता है कि मनुष्यों की बुरी आदतों को छुड़ाने के लिए उसके विरुद्ध अच्छी आदतों का बारम्बार अभ्यास करना असफल प्रयोग है। बुरी आदतें तो तभी छूट सकती हैं जब उसकी आदत की कारण स्वरूपा मान सके ग्रन्थियों को ढूंढ़ कर सुलझायी खोल डाली जाय।
(श्री लक्ष्मीचन्द्रजी बृहस्पति)
किसी कार्य के परिणाम को सफलता पूर्वक प्राप्त कर लेना, यद्यपि सदा-सर्वदा मनुष्य के वश की बात नहीं है,फिर भी प्रधान कारण वह स्वयं ही होता है।
एक एम.ए. का विद्यार्थी अपनी परीक्षा में सर्वोच्च आना चाहता है। इसके लिये वह नियमित रूप से अध्यवसाय पूर्वक पुरुषार्थ (अध्ययन) करना जा रहा है। उसी समय उसका साथी आकर इनसे बातें करता है। इनकी तैयारी देख कर उसी विषय की चर्चा चल पड़ती है। उसका साथी कहता है, आगामी वर्ष अमुक प्रतिभाशाली और परिश्रमशील विद्यार्थी ने ऐसा ही किया था पर सर्वोच्च आने की कौन कहे वह असफल ही हो गया। यहीं पर सफलता और असफलता का वीजवपन-या दिशा निर्धारित होती है। यह सुनने के उपरान्त भी यदि उसका उत्साह, आत्म विश्वास अविचलित रहता है, जरा भी नहीं हिलता, उसकी अव्यवसायी परिश्रमशीलता, अविराम गति से चलती रहती है तो समझिये सफलता, उसके लिए सुनिश्चित हो गयी और यदि उक्त कथानक को सुनने के पश्चात् इसे अपनी शक्ति पर-अपनी सफलता प्राप्ति में सन्देह और संशय हो गया तो, उनके लिए प्रायशः असफलता ही आकारित होने लगती है और समय पर पूरे आकार में प्रकट हो पड़ती है।
किसी वस्तु को प्राप्त करने की इच्छा होने पर यदि उसे पाने की अपनी क्रिया-शक्ति पर जरा भी संशय और सन्देह हुआ तो वह इच्छित परिणाम और यह डडडड हैं और परिणाम को नाश करने में सफल न भी हों तो, उसे विकृत अवश्य कर डालते हैं। केवल इस संशय के कारण ही हमारा बहुत सारा परिश्रम और हमारी परिश्रम शक्ति, व्यर्थ हो जाती है। यह संशय, निश्चय ही विनाश की जननी है; असफलता की उत्पादिका है, यह जानकर भी यदि हम इसका परित्याग नहीं कर सकें, तो दूसरा इसका उत्तरदायी कौन बनेगा? तो प्रश्न यह होता है हमारा आत्म विश्वास, हमारी संकल्पशक्ति , हमारा निश्चय बल, हमारा मनोबल सुदृढ़ और निष्कम्प कैसे हो, जबकि संशयों के बादल इससे टकरा-टकरा कर स्वयं ही नष्ट हो जाते हों ओर इसकी शक्ति घटने के पर स्थान और भी शक्ति शाली और प्रभावशालिनी हो जाती हों?
तो हमें खोजना होगा कि हमारे विश्वास को अविचल रखने वाली संकल्प को दृढ़ता देने वाली और उत्साह को निरन्तर प्रज्वलित करने वाली शक्ति का निवास कहाँ है? यदि एकबार हमने उस शक्ति केन्द्र को, अनेकों कठिनाईयाँ झेलकर भी प्राप्त कर लिया, तो फिर हमारे लिये संशय-सन्देह का आक्रमण कभी भयावह सिद्ध न होगा, प्राप्त नहीं कर सकें, निसंशय रूप से जन भी लें तो वह बहुत बड़ा सहायक सिद्ध होगा।
तो क्या वह शक्ति -केन्द्र,हमसे बाहर, कहीं अनन्त दूरी पर, आकाश के किसी सर्वोच्च स्तर पर है,या स्वयं हममें ही उसका निवास है, अन्यत्र और दूर कहीं नहीं?
सच्चा खोजी (अन्वेषक) शीघ्र ही यह जान सकेगा कि वह शक्ति -केन्द्र हममें ही कहीं है, अन्यत्र और दूर आकाश में नहीं।
यह जानने के उपराँत यदि कोई उसे प्राप्त करने के लिये सच्चे भाव से व्याकुल हो उठे तो उन्हें ऋषियों और सन्तों के बताये पथ का अनुसरण करना चाहिए, पर सर्वोत्तम तो उनके चरणों में आश्रित होकर ही उपलब्धि का प्रयत्न करना है।
यदि वैसी तीव्रता नहीं हो तो हम यह जानने वाले लोग अपने आप में स्थित इस शक्ति केन्द्र से प्रार्थना, आह्वान, अभीप्सा आदि के द्वारा शान्त एकाग्र मन से अवश्य ही पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं। ऐसा करने के लिए हमें सदैव सद्मार्ग का ही अनुगमन करना होगा। अपने जानते, किसी बुरी नीयत, बुराई की भावना, अनिष्ट-अमंगल की कामना लेकर हमारा कोई काम नहीं होगा।
जो सदा सत्कर्मों में लगे रहते हैं, बुराई के कामों से जिन्हें अरुचि है, उसके हृदय और मस्तिष्क प्रायः शान्त ही रहेंगे। ऐसी शान्त प्रकृति वाले के अन्तर में यदि कहीं, किसी कारण वश, सन्देह, आशंका, कायरता, भय और अशक्ति का प्रवेश हो भी जाय तो उस भीतर में स्थित होने के लिए कोई मजबूत-शक्ति शाली आधार नहीं मिलेगा। फलतः उसका संघर्ष भी हल्का-फुलका और क्षणस्थायी ही होगा। वह उसकी क्रिया शक्ति और सफलता के विश्वास को संशय और निर्बलता की कालिमा से पोत नहीं सकता। हल्के से अन्धकार तो शीघ्र ही उड़ जाने को बाधित होंगे।
जो मनुष्य दुराचार के पथ पर चलते हैं, वे चाहे बाहर में अपनी कितनी ही अकड़ क्यों न दिखावें, ऊँची डींग मारे शानदार वाणी को प्रयोग में लावें, पर भीतर उनके सदा ही भय से प्रकम्पित, अशान्त निर्बल, आशंका से भरे और चञ्चल होते हैं। उनकी प्रफुल्लता और प्रसन्नता भी दिखावे की होती है। उसमें आनन्द के वास्तविक तत्व नहीं होते। उनके विचार बिखरे से- अस्थिर, कल्पना शक्ति विश्रृंखलित भावनायें धूमिलतायें भरी और बुद्धि भी हानिकर निर्णय करने वाली होती हैं। फलतः अपना लाभ सोचते हुए ही वह अपना विनाश सोचता और कर लेता है। ऐसे व्यक्तियों के कल्याण के लिये एक ही मार्ग है कि वह अपने पापों को सच्चे हृदय से स्वीकार करे-हो सके तो किसी सत्पुरुष सच्चरित्र व्यक्ति के निकट उसे वर्ण न करे, पश्चात्ताप करें, अनुताप पूर्वक उनके सम्मुख पुनः ऐसा नहीं करने के निश्चय की घोषणा करे। ऐसा करने से उसके अन्तर को निर्बल बनाने वाले द्वन्द्व और अशक्ति यों से छुटकारा मिल सकता है और पुनः वह अपने कल्याण की शुद्ध बात सोचकर-उस पर चल कर अपना शुभ निर्माण कर सकता है।
किसी काम को अच्छा और बुरा होने का निर्णय दूसरे का विचार या राय नहीं हो सकती। कभी समाज में भले दीखने वाले कामों के अन्तराल में बहुत ही खोटे भावों की परिपूर्ति की जाती है और कभी समाज की दृष्टि में अच्छा न जँचने वाले कामों में कल्याण के तत्व ही सन्निहित होते हैं। अच्छा काम करने का पुरस्कार अन्तर और बाहर की स्वाभाविक, निर्भीक और परिस्वच्छ प्रसन्नता ही होती हे, जिसे कर्त्ता पुरुष अपने आप में भली भाँति बोध कर सकते हैं। यह स्वच्छ प्रसन्नता स्वयं ही अच्छे, विचारों और कार्यों का जन्म देने वाली उत्पादिका है। ऐसा ख्याल रखने वाले जन अच्छे-बुरे कामों को ठीक-ठीक चयन कर, सत्पथों का ग्रहण और कुपथों का परित्याग कर सकेंगे। यह प्रसन्नता, ऐसी ही सम्भावनाओं की सूचिका है,
एक मनोवैज्ञानिक ने एक प्रत्यक्ष देखी घटना का उल्लेख किया है—
मेरे एक परिचित ने सार्वजनिक सम्पत्ति हड़प ली और उस स्थान से भाग गया। जिस भय ने वह स्थान छोड़ने के लिये विवश किया था, वह आशंकित भय उसे वहाँ भी लगा ही रहा। उसे प्रतीत होता कि पुलिस मेरा पीछा कर रही है। उसका हृदय इस भय से सदा आच्छन्न ही रहता। इस प्रकार कुछ, ही समय में दिल में हौला उठने के कारण वह गिर गया।
यह घटना स्पष्ट करती है कि पाप करने वाले के अन्तर में कभी भी शान्ति का निवास नहीं हो पाता। यह अनुचित क्रिया बारम्बार उसके हृदय को आघात करती ही रहती है।
कुछ भावुक नौजवान,बुरे पथ पर जाते ही, अपने को नष्ट करने वाले विचारों से भी आक्रान्त हो जाते हैं। यदि कही पढ़ लिया या किसी ने बलपूर्वक कह दिया कि कुमार्गगामी एक दिन नपुंसक हो ही जाने हैं तो उनका पाप-प्रकंपित मन,तुरन्त ही इस आशंका का अन्तर में बीज उत्पन्न करता है और एक दिन वे सचमुच ही नपुंसकता का शिकार बन जाते हैं। जो शराबी है, वैश्यागामी और व्यभिचारी हैं, ऐसे जनों के मस्तिष्क और अन्तःकरण प्रायः आशंकाओं का शिकार बनने के लिये तैयार ही होते हैं। उनके निर्बल चित्त,उन विनाशकारी विचारों को शीघ्र ही ग्रहण कर लेते हैं और अन्तर में रहे सहे आत्म विश्वास और शक्ति यों को नष्ट कर देते हैं। पुनः अपने उद्धार की आशा उनमें जरा भी नहीं रह जाती।
ऐसे निराश हृदयों के उद्धार का क्या साधन हो सकता हे? सब से प्रथम तो उसे अन्तरतया अपनी भूलों को स्वीकार कर, उसके प्रतिकूल सत् विचार, सद्भाव, सद्वाणी एवं सदाचार का पालन, निष्ठा नियम और सहित करके अपना उद्धार आप ही करना चाहिये। इस भाँति सत्कर्म करते करते अभ्यास वशतः स्वतः उसे उद्धार का पथ मिल जाता है और पुनः अपना सुधार कर वह आत्म निर्माण की शक्ति और सामर्थ्य पा लेता है। उनका विश्वास बढ़ते-बढ़ते,सुदृढ़ होने लगता है, चित्त और मन, शान्ति की छाया में-और गोद में विश्राम करने लगता है।
जब किसी की अपराधी वृत्ति अन्तर में घनीभूत होकर जम जाती है, तो ऐसे व्यक्ति को अपनी अन्तरात्मा का निर्देश उसकी वाणी ,ठीक-ठीक सुनाई ही जानी चाहिए। सब ब्राह्मणों को धोखा देना चाहतें हैं, पर स्वयं ही उस धोखे का शिकार बनता रहता है। सामाजिक लाञ्छना और दण्ड भुगतने के उपरान्त भी उसमें यह चेतना जाग्रत नहीं होती कि हमारे कुविचार हमें चारों ओर से घेरे रहते हैं, हम में अपने को सिद्ध करने के लिये कोई बल नहीं है और हमारे एक-एक कर्म और गति-विधि हमारी अंतःवृत्ति को उद्घाटित करते रहती है। हमारी आशंका और भय से भरी भावना दूसरे के हृदय में जाकर प्रतिफलित होती है। परिणामतः हम दूसरों को भ्रमित करने जाकर स्वयं ही भ्रम से आच्छन्न होते हैं और उसके प्रतिफल भुगतने हैं। ऐसा व्यक्ति बुराई के पथ से अपने को कदाचित ही हटा पाता है।
त्याग हमें बलवान बनाते हैं और भोग, कम जोर। जिनके शरीर के सभी तत्व परिपुष्ट हैं, उनके मन, प्राण भी वैसे ही हैं। भोग से जिस भाँति शरीर क्षीण होते जाता है, उसी भाँति उसके मस्तिष्क और हृदय भी बलहीन और क्षीण होते जाता है। ऐसे हृदयों और मस्तिष्कों में यदि अन्तरात्मा के निर्देश, जो सदा कल्याणकारी ही होते है-यदि कभी पहुँच भी जाते हैं, तो अधिक देर तक टिक नहीं पाते; क्योंकि उन तत्वों को धारण करने की शक्ति उसने गँवा दिया होता है। परिणामतः भोगीजनों के मन और प्राण में वासना और भोग की कुत्सित भावनाओं का राज्य हो जाता है और वे जिधर चाहते हैं, उस व्यक्ति को घसीट ले जाते हैं। भ्रम वश वे भले ही अपने को स्वतन्त्र कह लें पर,वस्तुतः वे गुलाम ही होते हैं। उसके चंगुलों से छुड़ा लेने की शक्ति उनमें नहीं होती। अतः भोग और शक्ति हीनता एक ही वस्तु के दो नाम मात्र है- उसी भाँति भोग-वासनाओं का त्याग ही शक्ति प्राप्त करने का साधन है-अतः वह स्वयं शक्ति ही है।
जिसका भीतर-बाहर निष्पाप है, जो भोगों का त्यागी है, वही वास्तव में सच्चे आनन्द का अनुभव कर सकते हैं, वही ज्ञानी हो सकते हैं, वही शक्ति शाली हे, सुखी है। सारी सफलतायें उनकी होने के लिये विवश है- खिंची हुई हैं।
(स्वर्गीय—श्री डाक्टर मीरीलालजी, डी.एस.सी.)
अग्निहोत्र अवश्य ही एक विज्ञान है, जिसकी आज भौतिकवादी दुनिया-तर्क प्रधान बुद्धिवादी युग में ऐसी वैज्ञानिक व्याख्या की जरूरत है, जो नर्क संगतता के साथ प्रयोग सिद्ध भी हो।
वैदिककाल में अग्निहोत्र के द्वारा श्रेय और प्रेय, दोनों की प्राप्ति की जाती थी, यही इसका प्रमुख या वास्तविक स्वरूप था, पर पीछे, चलकर स्वार्थी लोगों ने कर्मकाण्ड की आढ़ में इसमें माँस-मदिरा का प्रयोग करके विकृत कर दिया। यज्ञ,धर्म और अध्यात्म के नाम पर वीभत्स हिंसा होते देख कर ही बुद्ध भगवान् को यज्ञ का निषेध करना पड़ा था, सात्विक हिंसा रहित यज्ञ से उन्हें भी विरोध नहीं था। पर, उससे यज्ञ के कल्याणकारी रूप का उद्धार नहीं हो पाया। जब स्वामी दयानन्दजी वैदिक सभ्यता और संस्कृति के पुनरुद्धार के प्रयत्न में यज्ञों के “अहिंसा परमोधर्म” युक्त वैदिक रूप उपस्थित करने में सफल हुए, तभी पुनः सभी धार्मिक वृत्ति वालों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ और पश्चिमीय सभ्यता सम्पन्न निष्पक्ष विद्वानों को भी कहना पड़ा कि अवश्य ही प्राचीन भारत में विज्ञान की महत्वपूर्ण उन्नति हो चुकी थी।
शस्त्रों में हवन करने की विविध रीतियाँ तथा ऋतुओं के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकार के हवन का विधान वर्णित है। ऋतु-सन्धियों में रोगों की उत्पत्ति होती है:—
“ऋतु सन्धिषु रोगाःजायन्ते”
इन रोगों के निवारण के लिये ही “चातुर्मास्य-यज्ञ” किये जाते हैं। इससे पता लगता है, कि ‘अग्निहोत्र की वैज्ञानिकता के लिये पाँच क्रमों पर विचार किया जा सकता है।
1) यज्ञकुण्ड की आकृति की भिन्नता का कारण।
2) समिधाओं का चुनाव और उनका विशेष प्रकार से दहन।
3) मन्त्रों का शुद्ध-शुद्ध उच्चारण।
4) अग्निहोत्र का समय-विचार।
5) सामग्री का गुण-विश्लेषण।
1—विभिन्न आकृतियों एवं परिमाणों की वेदियों में, समिधाओं एवं हवन सामग्री संयुक्त जो ताप, और प्रकाश उत्पन्न होते हैं, इससे परिणाम के रूपों में भी विभिन्न परिवर्तन हो जाते हैं। इसे सूक्ष्म दृष्टि से देखा और प्रयोग सिद्ध किया गया है।
2—काष्ठ (समिधा)के चुनाव के कारण अग्नि के ताप की तीव्रता और गुणों में स्पष्ट ही भेद हो जाता है। उदाहरण के लिये पलाश और कीकर के काष्ठों में ताप और गुण की, मात्रा और विभेद, स्पष्ट किया जा सकता है।
3—मन्त्रों के शुद्ध-शुद्ध एवं संतुलित, नियमित उच्चारण के परिणामों की विभिन्न दिशायें हैं। अग्नि के तापों की तीव्रता को एक निश्चित स्तर पर बनायें रखने के लिये ठीक समय पर ही आहुति देनी पड़ती है, इसके लिये मन्त्रों का ठीक उच्चारण ही माध्यम बनता है।
अक्षरों के अनुक्रम से ठीक-ठीक उच्चरित ध्वनि एक विशेष गति के द्वारा विशिष्ट परिणाम उत्पन्न करती है। ध्वनियों की गति और उसका परिणाम तो भौतिक-विज्ञान द्वारा सिद्ध हो ही चुका है।
मन्त्रों और अर्थों में सन्निहित हमारी भावना और विचार की शक्तियाँ भी आहुतियों के साथ एकीभूत होकर इस जगत में सब यज्ञीय क्रियाओं की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली से काम करती है और कल्याणकारी व्यापक परिणाम उत्पन्न करती है।
4— ऋतु सन्धि तथा दिन-रात की सन्धि यज्ञ करने के लिये सर्वोपयुक्त काल है। सन्धिकाल, संक्रमण काल होता है। इस समय प्रकाश ऋण धन भागों में विभक्त हो जाता है, जो दुष्ट रोग-कीटाणुओं की वृद्धि के लिये बड़ा ही अनुकूल समय होता है और उसकी आक्रामक शक्ति भी इस समय बढ़ जाती है। संख्या और शक्ति बढ़ जाने से ये नीरोग शरीर को भी रोगी बनाने का साहस करने लगते हैं।
5—हवन सामग्री
यह सर्व विदित नियम है कि ताप, पदार्थों में रासायनिक परिवर्तन किया करता है। पदार्थ साधारण घटकों में फट परस्पर मिल कर नयी-नयी रचनाओं को उपस्थित करते हैं। इस प्रकार मूल द्रव्यों के गुण-धर्म भी बदल जाते हैं। द्रव्यों के ज्वलन से नये पदार्थों की उत्पत्ति का यही रहस्य है। भिन्न-भिन्न द्रव्यों के ज्वलन से, भिन्न-भिन्न तापमानों की आवश्यकता होती है।
सामग्री में दो प्रकार के द्रव्य रहा करते हैं। एक वह पदार्थ हैं जो प्रचण्ड से प्रचंड ताप से भी जलते नहीं, यानी उसमें परिवर्तन नहीं होता या उस का प्रभावोत्पादक अंश नष्ट नहीं होता। दूसरा वह द्रव्य है जो उत्तापों से दूसरे नये पदार्थों में बदल जाते हैं और अपना नया गुण-धर्म प्रकट करते हैं।
पदार्थों के रासायनिक गुण-धर्म, उनकी भौतिक अवस्था पर आश्रित है। पदार्थों की स्वाभाविक अवस्था में अनेक पृष्ठ पर रहने वाले मात्रिक घटक, पदार्थों की मात्राओं के परस्पर सम्बन्ध द्वारा रासायनिक प्रभाव उत्पन्न करने की क्रियाओं में भाग लिया करते हैं। पदार्थों की ठोस अवस्था की अपेक्षा सूक्ष्म अवस्था में ये मात्रिक, घटक अत्यधिक संख्या में परस्पर मिलते हे, इसीलिये पदार्थों की वाष्पीय अवस्था में इन घटकों का सम्बन्ध बहुत अधिक बढ़ जाता है।
यदि हम एक धन सेन्टीमीटर को सूक्ष्म कणों में विभक्त करें जिनमें से प्रत्येक कण 1/10000 परिणाम का हो तो उसका क्षेत्रफल छः लाख वर्ग सेन्टीमीटर ही पड़ता हो जाता है, परन्तु एक घन सेन्टीमीटर जल में इतने कण होते हैं, जिनमें प्रत्येक का व्यास 1/108 दस करोड़वाँ भाग सेन्टीमीटर होता है। इसका पृष्ठफल इससे भी अत्यधिक सूक्ष्म परिणाम वाला होता है। इस प्रकार हम उनका पारस्परिक प्रभाव बहुत अधिक बढ़ा सकते हैं। इस भाँति जो पदार्थ अपनी साधारण अवस्था में प्राणवायु से मिल सकने में असमर्थ होते हैं वही अपनी वाष्पीय अवस्था में मिलने के योग्य बन जाते हैं। लोहा, सीसा आदि धातुओं को जब इस प्रकार सूक्ष्मता में परिणत कर वायु में छोड़ दिया जाता है तो बड़ी चमक के साथ जल पड़ते हैं और सुन्दर लाल चिनगारियाँ छूटती हैं। शकर, कोयला आदि जब बड़ी सूक्ष्म अवस्था में वायु से मिलते हैं तो बारूद के समान धड़ाके की आवाज उत्पन्न करते हैं। इस भाँति यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी पदार्थ को सूक्ष्म अवस्था में परिणत कर उसके रासायनिक
गुणों को बहुत अधिक मात्रा में बढ़ाया जा सकता है।
यह ध्यान रखने योग्य है कि सूक्ष्मकणों में वक्रता होती है। यह वक्रता जितनी ही कम होती जाती है,उतना ही उसका रासायनिक प्रभाव बढ़ता जाता है और सूक्ष्मता की परिवृद्धि के संग ही इसकी वक्रता घटती जाती है। ऐसे पदार्थों में जायफल, जावित्री, बड़ी इलायची आदि बड़ी ही उत्तमकोटि और प्रथम श्रेणी की सामग्री है।
हवन सामग्री में जो सुरभित तैल होता है, यह शीघ्र ही ज्वाला को पकड़ लेता है और वाष्पीय रूप में परिणत होकर अत्यधिक विस्तार प्राप्त करता है और तदनुसार उसका प्रभाव भी व्यापक हो जाता है। वाष्प अवस्था में उड्डयनशील उन तैलों के सूक्ष्म कणों का व्यास सेन्टीमीटर के एक लाखवें भाग से 10 करोड़वें भाग तक पाया जाता है। उन हवन सामग्रियों से निकाला हुआ अर्क या तैल उतना प्रभावोत्पादक नहीं होता, जितना अत्यधिक उन्हीं सामग्रियों के हवन करने से होता है। यही यज्ञ या अग्निहोत्र की उपयोगिता और महत्ता है।
अर्क या तैल निकालने पर अवशिष्ट भागों को तो फेंक ही दिया जाता है, पर हवन में तो उसका भी सदुपयोग हो जाता है। उन अवशिष्ट भागों के जलने से जो रासायनिक परिवर्तन होते हैं, वह अत्यन्त ही लाभकारी होते हैं।
हवन सामग्री को जलाने से उसमें अनेक पदार्थ पाये जाते हैं, जैसे कि अल्डीक्लाइड, अमाइन्स, पिलीनोलिक, साइक्लिक, टरपेनिक, श्रेणी के पदार्थ पहचाने जा चुके हैं।
हवन सामग्री में नमकीन पदार्थ नहीं होते, क्योंकि नमक (सोडियम क्लोराइड ) फटकर के क्लोरीन गैस पैदा करता है, जो रोग कीटाणुओं के लिये जैसा हानिकारक है, वैसा ही मनुष्यों के लिये भी है।
हवन में धृत का विशेष परिमाण में उपयोग किया जाता है। इसके दो लाभ हैं प्रथम यह अग्नि को प्रज्वलित करके उसके तापमानों को विविध मात्राओं में परिमित-मर्यादित करता है—यथा 120.0, 200.0, 300.॰ आदि। दूसरा यह(धृत) वाष्प रूप में परिणत होकर सामग्रियों के सूक्ष्मकणों को चारों ओर से घेर लेता हे और उस पर विद्युत शक्ति का ऋणात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है।
हवन का प्रथम लाभ वायु की परिशुद्धि है। अग्नि के उत्ताप से यज्ञ स्थान की वायु गर्म और हलकी होकर ऊपर को उठती है, इससे चारों ओर से शुद्ध वायु अवकाश-रिक्त ता को भरने के लिये खिंची हुई आती है तथा अग्नि के ताप से रोगों के कीटाणु मर जाते हैं।
सूर्य की किरणों में ‘प्रकाशिनीरश्मि’ होती हैं। समुद्र-पृष्ठों पर उन तरंगों की लम्बाई 2960 ए॰ यू॰ होती हैं। प्रत्येक 800 गज की ऊँचाई पर इन रश्मितरंगों की लम्बाई 10 ए॰ यू0 घटती है। 2960 ए0 यू0 से कम लम्बाई की तरंगों वाली रश्मियाँ रोग-कीटाणुओं को नाश करने के लिये विशेष उपयोगी होती हैं। 2950 ए0 यू0 लम्बाई की तरंगों वाली रश्मियाँ, वायु को ऋण-धनात्मक रूप में परिणत कर देती है, इससे वायु में जीवन और स्वास्थ्यप्रद तत्वों की वृद्धि हो जाती है।
सूर्य की किरणों में भिन्न-भिन्न रंगों वाली रश्मियाँ होती हैं और उनकी लम्बाइयाँ भी भिन्न-भिन्न होती हैं तथा रोग-कीटाणुओं पर उसका प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होता है। उसका परीक्षण निम्नलिखित रूप में किया गया है।
बहुत से टीन के कनष्टरों का अन्दर से भिन्न 2 रंगों से रंग दिया गया और उसे एक ऐसे कमरे में रखा गया जहाँ असंख्य मच्छड़ों का निवास था। सुर्योदय के समय सभी कनष्टरों का मुख ढक दिया गया। एक-एक करके ढक्कन हटाकर देखने से पता चला कि नारंगी रंग के कनष्टरों में मच्छड़ों की संख्या सबसे कम थी। अग्नि का रंग भी नारंगी ही है, इस से अग्निहोत्रों की उपयोगिता और उसका प्रभाव स्पष्ट हो जाता है।
हवन की अग्नि से उत्पन्न हुई किरणें, भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग-कीटाणुओं पर भिन्न-भिन्न घातक प्रभाव डालती है, इसे भी इसी भाँति सिद्ध किया जा सकेगा।
एक रोगी के कमरे के रोगाणुओं की संख्या प्रथम गिनली गयी और तदुपरान्त उस कमरे को वन्द कर उसमें हवन किया गया। फिर रोग के कीटाणुओं की गिनती की जाने पर उसकी संख्या बहुत ही कम पाई गयी। इससे भी हवन अग्निहोत्र से रोग-कीटाणुओं को नाश करने की शक्ति का स्पष्ट पता लग जाता है।
पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने रोग-कीटाणुओं के नाश करने के लिये दो पदार्थ खोज निकाले हैं। (1) एण्टी सेप्टिक (विष विरोधी) और (2) डिस इवफैकटन्स (छूत के प्रभाव को रोकने वाले) प्रथम श्रेणी के पदार्थ रोग-कीटाणुओं से मनुष्य की रक्षा करते हैं— मारते नहीं। इस श्रेणी में फिनायल, क्रियोजोट, हाइड्रोजन पर ऑक्साइड आदि की गणना की जाती है। दूसरी श्रेणी के पदार्थ रोगाणुओं को सीधे मार देते हैं। कुछ पदार्थों में दोनों गुण उसकी घनता और विरलता की स्थिति के अनुसार पाये जाते हैं। पर इन तत्वों का सही प्रयोग एक कुशल वैज्ञानिक ही कर सकते हैं। साधारण लोग उसकी मात्रा का सही परिमाण नहीं कर सकने के कारण लाभ के स्थान में हानि ही उठा सकते हैं और यह हानि, तीव्र घातक होती है।
हवन गैस, इस दोष से रहित है। कदाचित कुछ विषैला अंश रहे भी तो धृत का वाष्पीय प्रभाव उसे भी नष्ट करके लाभकारी बना देता है। इसमें स्थित क्रियोजोट, एल्डीहाइड, फिनायल और दूसरे उड्डयनशील सुरक्षित पदार्थ वैसा ही लाभ देते हैं। इससे सभी निर्विघ्न रूप से लाभ उठा सकते हैं।
वायु शुद्धि के अतिरिक्त हवन गैस से स्थान, जल आदि अनेकों तत्वों की शुद्धि भी हो जाती है, जिससे पर्जन्य के द्वारा अन्न और औषधियाँ भी निर्मल और परिपुष्ट हो जाती हैं। इससे मानव शरीर, रोगाणु निरोधक और विनाशक अणुओं से भरपूर हो जाता है। फिर उस पर रोगों का आक्रमण हो जाय और कदाचित सफल भी हो जाय तो उसके शरीर में स्थित शक्ति शाली रोग विध्वंसक अणु उसे अधिक समय तक जीवित रहने नहीं देता। उसका शीघ्र ही विनाश कर देता है।
खरगोशों और चूहों पर ये परीक्षण करके हवन गैस की रोग निरोधक और रोग विनाशक शक्तियाँ सिद्ध करली गयी हैं।
परीक्षण के लिये रोग कीटाणुओं का घोल तैयार किया गया है। उसे सबल-स्वस्थ जानवरों के देह में प्रवेश कराने से वह उस रोग से आक्रान्त हो जाता है। उसी को या दूसरे स्वस्थ जानवरों के शरीर में जब उस घोल में हवन गैस मिश्रित कर प्रवेश कराया जाता है, तब वह रोगी नहीं होता। बारम्बार यह प्रयोग सफल सिद्ध हुआ है।
कृषि में भी हवन गैस की लाभदायकता सिद्ध हो चुकी है। मिट्टी में दो तरह के कीटाणु होते हैं एक उर्वरा शक्ति बढ़ाने वाले तथा दूसरा उसे नष्ट करने वाले। पाश्चात्य विज्ञान ने उर्वरा-शक्ति नष्ट करने वाले कीटाणु को नष्ट करने के लिये जो घातक द्रव्य तैयार किया है, उसे मिट्टी में मिला देने से उर्वरा-शक्ति विनाशक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, जिससे पोषक कीटाणुओं की प्रवृद्धि होकर उसकी उर्वरा-शक्ति बढ़ जाती है, पर उसमें दोष यह है कि उसे शीघ्र ही मिट्टी से अलग नहीं करने पर वह उर्वरा-शक्ति वर्द्धक कीटाणुओं का भी विनाश कर डालती है।
हवन गैस को कुछ समय तक मिट्टी पर डालकर देखा गया है कि इससे उसकी उर्वरा-शक्ति बहुत बढ़ जाती है और पोषक अणुओं को बढ़ाने वाले आवश्यक तत्व उसमें भर जाते हैं। इसी तत्वों के कारण यज्ञीय-गैसों से पूरित पर्जन्य-और बादल अन्न और औषधियों को निर्मलता और पुष्टि-प्रदान करते हैं।
आकाश मण्डल में वायु के दो सतह होते हैं। एक तो धरती से छह मील की दूरी तक और दूसरी 625 मील ऊपर की ओर। वर्षा का सम्बन्ध केवल पहली सतह से ही है।
बादलों के निर्माण में निम्न बातें सहायक हैं।
1—वायु में जलकणों की उपस्थिति
2—तापमान
3—वायु का फैलाव
4—धूल कणों की संख्या, उनका अनुपात और आकार
5—धुंए के अणु
बादलों को सात्विक गुणों वाले एवं निर्मल-पुष्ट बनाने में यज्ञ धूम्र के अणुओं का उसमें प्रविष्ट कराना सर्व-श्रेष्ठ है। इसीलिये जिस देश में अधिक अग्निहोत्र और यज्ञ कर्म होते हैं, वहाँ की वृष्टि सत्वगुणों से भरी होने के कारण अन्न और औषधियों में भी वे गुण ओत-प्रोत हो जाते हैं। अन्न का सूक्ष्म अंश ही मन को पुष्ट करता है, अतः यज्ञीय देशों के निवासियों का मन भी सात्विक निर्मलता से अनुप्राणित होता रहता है। वहाँ के निवासियों के जीवन और गति में सात्विक तत्व संचारित होता है।
आज सारे संसार में ही अग्निहोत्र करने की विशेष आवश्यकता है। गत महायुद्ध में भिन्न-भिन्न विषैली गैसों के कारण आकाश, वायु, बादल आदि सभी में वह विष भर रहा है, इसी से सर्वत्र विषैली राजसी-तामसी भावनाओं ने ही, अन्न, वनस्पति सभी प्राणी और मनुष्यों में अपना आधिपत्य जमा रखा है। फलतः सर्वत्र रोग, पीड़ा, अशान्ति और संघर्ष फैला हुआ हैं। इसके निवारण का एक ही हल है। वह है, सभी देशों और स्थानों में शास्त्रीय विधि से किया गया विभिन्न अग्निहोत्र।
अग्निहोत्र से जो वायु मण्डल में घी और हवन सामग्रियों के धुएं के अणु फैलते हैं उसमें निगेटिव चार्ज के विद्युत प्रवेश कर जाते हैं। यह आज के भौतिक विज्ञान द्वारा प्रयोग सिद्ध हो चुका है कि यह निगेटिव चार्ज वाला विद्युत अणु, वायु मण्डलों में से नमी को खींच लेते हैं और धीरे-धीरे इसके आस-पास बादल के खण्ड बन जाते हैं। ये बादल यज्ञीय धूम्र अणुओं से ओत-प्रोत रहते हैं। इसका विषैला अंश विनष्ट हो जाता है। ऐसी वृष्टि से केवल मनुष्य में ही नहीं, सारे प्राणी मात्र, वनस्पति और मिट्टी में भी सात्विक भावों का संचार हो जाता है।
इस भाँति अग्निहोत्र द्वारा देश ही नहीं सम्पूर्ण संसार के व्यक्ति और समाज तथा भावी सन्तति को भी इसके लाभ प्राप्त होते हैं। इस पुण्य कर्म की शृंखला चलते रहने से क्रमशः रज और तम का विषाँश दूर होकर दिनानुदिन सात्विकता बढ़ती ही जाती है और सारा संसार सुख-शाँति का बढ़ता हुआ आनन्द उपलब्ध करता रहता है।
आज गायत्री तपोभूमि (मथुरा) में हो रहा, यह महायज्ञ उसी विश्व कल्याण की प्रारम्भिक भूमिका नींव और बीज है। भूलोक में जिस स्वर्ग को बसाने की हम कल्पना करते हैं, उसी का यह क्रियात्मक स्वरूप है।
हम और आप जो विश्व-शाँति के लिये प्रयत्न करने की बात कहते हैं, वे इस महायज्ञ को सम्पन्न होने और करने में किस भाँति अपना कर्त्तव्य पूरा कर रहे हैं, इसी से उसकी पहचान कर सकते हैं। अभी भी हम उसमें सहयोग करके अपने कर्त्तव्य की त्रुटियों को पूरा कर सकते हैं। स्मरण रहे कि हमारे जीवन में ही नहीं, बल्कि लिखित इतिहास में केवल यही एक अवसर है जबकि ऐसा महान् यज्ञ हो रहा है। अपने जीवन में प्राप्त ऐसे अपूर्व अवसर को कभी हाथ से न गंवाये, वरन् में इसमें यथा शक्ति भाग लेकर पूरा लाभ उठायें।
(श्री ज्वालाप्रसाद गुप्त एम. ए.)
“चार चीजों का सदा सेवन करना चाहिए— सत्संग, सन्तोष, दान और दया।”
“चार अवस्थाओं में आदमी बिगड़ता है। इस लिये इनमें सदा सावधान रहना चाहिये—जवानी, धन, अधिकार और अविवेक।”
“चार गुण ग्रहण करने योग्य हैं-धन में पवित्रता, दान में विनय, वीरता में दया और अधिकार में निरभिमानता।”
“चार चीजों पर भरोसा मत करो—बिना जीता हुआ मन, शत्रु की प्रीति, स्वार्थी की खुशामद और बाजारू ज्योतिषियों की भविष्य-वाणी।”
“चार चीजों पर भरोसा रक्खो-भगवान,सत्य पुरुषार्थ और स्वार्थहीन मित्र।”
“चार बातों को याद रक्खो बड़े, बूढ़ों का आदर करना, छोटों की रक्षा और उन पर स्नेह करना, बुद्धिमानों से सलाह लेना और मूर्खों के साथ कभी न उलझना।”
“चार चीजें पहले दीखती हैं, परन्तु परवाह न करने से बहुत बढ़कर दुःख के गड्ढे में डाल देती हैं—अग्नि, रोग, ऋण और पाप।”
“चार चीजें मनुष्य को बड़े भाग्य से मिलती हैं- भगवान् को याद रखने की लगन, सन्तों की संगति, चरित्र की निर्मलता और उदारता।”
“चार चीजें जाकर फिर नहीं लौटती-मुँह से निकली हुई बात, छूटा हुआ तीर, बीती हुई उम्र और मिटा हुआ अज्ञान।”
चार के संग से बचने की चेष्टा रक्खो नास्तिक, अन्याय का धन, जवान स्त्री, और दूसरे की बुराई।”
(श्री ओऽम् प्रकाश शर्मा बी.ए.एल.टी. मथुरा)
हिन्दू धर्म और आर्य संस्कृति में समस्त ऐतिहासिक और प्रामाणिक महापुरुषों से अधिक भगवान कृष्ण का व्यापक प्रभाव पड़ता है जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भगवान कृष्ण हमारे सम्मुख आदर्श रूप हैं। संगीत, नाटक, नृत्य, शिल्प तथा काव्य से लेकर राजनीति, कूटनीति और दर्शन जैसे शुष्क विषयों में भी श्रीकृष्ण रमे हुये हैं। श्रीकृष्ण को अलग करके किसी विषय की पूर्णता की कल्पना ही नहीं की जा सकती, विशेषतः साँस्कृतिक और धार्मिक क्षेत्र में।
हमारे जीवन में व्याप्त श्रीकृष्ण के दो रूप हमारे समाने आते हैं। पहिला रूप ललित, गुणात्मक, जिसे हमारे भावुक भक्तों, संत कवियों तथा सहृदय कलाकारों ने अपनाया।
इस रूप का मूल स्रोत श्रीमद्भागवत् है।
इसमें भगवान कृष्ण के विभिन्न किन्तु सहज, सरल, तथा सरस ललित गुणों को आख्यानों द्वारा जनता के समक्ष उपस्थित किया गया है। इन्हीं गुणोँ को हमारे संत कवियों ने अपनाया और अपनी कला के चमत्कार से कृष्ण को जन-जन के हृदय में बसा दिया है।
इस रूप में कृष्ण के सौंदर्य और उनकी बाल-लीला को ही विशेष बल दिया गया है लेकिन कोई स्थल ऐसा नहीं जहाँ कृष्ण के शौर्य और वीरता को प्रधानता दी गई हो।
श्री कृष्ण भारतीय जनता के रोम-रोम में बसे हुये हैं इस का कारण यह है कि- हमारे सहृदय भक्त कवियों ने श्री कृष्ण के इस पहलू को इस प्रकार उपस्थित किया, जो जनसाधारण के जीवन के लिये यथार्थ और स्वाभाविक होने साथ-साथ सरसता लिये हुए है। श्री कृष्ण का यह जनप्रिय रूप इस सीमा तक व्यापक हुआ कि हजारों वर्षों से इसी रूप को सम्मुख रखने में न तो कलाकार ही ऊबे और न जनता ही ऊबी। हिन्दी और संस्कृत के सभी कवियों ने श्रीकृष्ण के इसी रूप को ग्रहण किया है। यहीं तक नहीं उनके इस रूप पर विमोहित होकर मुसलमान कवि रहीम, रसखान, ताज, आलम और सागर निजामी तक, इस रूप के दीवाने हैं।
इस जादू का रहस्य यही है कि इसमें मानवमात्र की कोमलतम भावनाओं को विकसित होने का आधार मिलता है, जीवन का व्यापक दृष्टिकोण मिलता है। इसमें मानवमात्र को एकता के सूत्र में बाँधने का प्रयास किया गया है।
जहाँ कृष्ण की ललित और गुणात्मक लीलाओं ने मानव मात्र के हृदय में प्रेम की पवित्र धारा बहाई हैं, वहाँ कृष्ण का दूसरा रूप महाभारत के एक योद्धा, कुशल राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ, राजदूत और योगिराज के रूप में अपने कर्तव्य के लिये कटिबद्ध पाते हैं।
यह रूप विविधता का है। विविध मतावलम्बी, दार्शनिक एवं राजनीतिज्ञ अपने सिद्धान्तों के अनुसार उन्हें विभिन्न रूपों में अपनाते हैं। द्वैत और अद्वैतवादी सगुणोंपासक और निर्गुणोंपासक सभी भगवान कृष्ण को अपने-अपने मतों के प्रतिपालक के रूप में पाते हैं।
महाभारत के कृष्ण तत्कालीन परिस्थितियों के नेता के रूप में पाये जाते हैं। वे कौरवों और पाँडवों के मध्य महाभारत युद्ध के मेरु दण्ड हैं। वे एक दार्शनिक विचारक और राजनीतिज्ञ के रूप में हमारे सम्मुख आते हैं।
श्रीकृष्ण वास्तविकता की कसौटी पर कसकर ही शत्रु और मित्र को देखते हैं। परिस्थितियों का वास्तविक स्वरूप ही उनके सम्मुख आता है। वे कठिन परिस्थितियों के समय भी मन और मस्तिष्क का संतुलन नहीं खोते।
राम हमारे सम्मुख जीवन का आदर्श उपस्थित करते हैं वे अपने जीवन से संसार के सम्मुख आदर्श नियमों का निर्माण करते हैं, जब कि कृष्ण प्रतिकूल समय और परिस्थितियों में उस आदर्श का उल्लंघन कर कठोर सत्य एवं यथार्थता को अपनाते हैं।
इस प्रकार कृष्ण मानव उद्धार के लिये अवतरित हुए हैं। कृष्ण ने न्याय और सत्य के स्थापन के लिये विभिन्न साधनों को अपनाया है। वे शान्ति के स्थापन के लिये, पहिले प्रत्येक योद्धा के पास जाते हैं।
महाभारत के युद्ध में कृष्ण को कोई स्वार्थ न था। महाभारत के युद्ध के पहिले भी कितने ही राजाओं को परास्त किया, लेकिन उन्होंने उनके राज सिंहासन उन्हीं के बन्धु-बान्धवों को दे दिये, यहाँ तक कि भगवान् कृष्ण द्वारिका के भी राजा न बने।
दुर्योधन ने सूचीभेद्य भूमि तक देने से इन्कार कर दिया तो उन्हें पाण्डवों का साथ देना पड़ा।
गीता हमारे राष्ट्र के जीवन में अन्याय के विरुद्ध संघर्ष में बहुत अधिक तीव्र हथियार रही है। अर्जुन ने अपने बन्धु-बान्धवों को युद्ध-स्थल में खड़ा देखा तो उन्होंने अपने हथियार डाल दिये। श्रीकृष्ण ने उस समय उन्हें धर्म और न्यायपूर्ण मार्ग दर्शाया और पलायनवादी प्रवृत्ति को समूल नष्ट कर दिया।
जनता को संगठित करने और उसे अत्याचार के विरुद्ध सक्रिय बनाने के लिये यह आवश्यक है कि जनता के मनोबल और आत्मविश्वास की दृढ़ता में कमी न आये यह श्रीकृष्ण का आत्मविश्वास युगों से जन जीवन में यह अमिट आशा और मनोबल को दृढ़तर करता आ रहा है।
गीता में श्रीकृष्ण भगवान ने रूढ़िवादिता अन्धानुकरण और परिस्थितियों को न पहिचान कर जबरदस्ती लादने वाली प्रवृत्तियों का विरोध किया है।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादाश्च भापसे। गतासूनगतासूँश्च नानुशोचन्ति पंडिताः॥
श्रीकृष्ण का यही यथार्थवादी रूप हमारे जीवन में संजीवन रस भर देता है।
श्रीकृष्ण का यही रूप हमें यथार्थ सत्य एवं न्याय की ओर उन्मुख कराता है और हमें सद्जीवन यापन करने की प्रेरणा देता है। यों ललित कलायुक्त भक्त भावन कृष्ण भक्त जनों के मानस सागर में प्रेम भावनाओं को तरंगित करने में विशेष महत्वपूर्ण हैं।
काम्य-यज्ञ मनुष्य की विविध कामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होते हैं, उसके द्वारा सूक्ष्म जगत में ऐसी प्रतिक्रिया एवं परिस्थितियों का निर्माण होता है जो अभीष्ट सफलताओं को समीप लाती हैं। अनेक बार तो तुरन्त और तत्काल अभीष्ट फल उपस्थित होता है। प्राचीनकाल से अनेक अग्निहोत्री, इस प्रकार के काम्य-यज्ञों के विधानों को भली प्रकार जानते थे और उनके द्वारा भारी संकटों का निवारण एवं महान् सफलताओं का उद्भव करते थे। आज काम्य यज्ञों की विद्याओं का लोप हो गया है, ऐसे कर्मकाण्डी विद्वानों की, मन्थों की विधि-विधानों की खोज नये सिरे से करनी होगी, जो इन विद्याओं का रहस्य प्रगट करके, उन लाभों को प्रत्यक्ष उपस्थित कर सकें।
काम्य-यज्ञों के सम्बन्ध में कुछ संकेत जहाँ-तहाँ मिलते हैं। उनके कुछ संग्रह नीचे उपस्थित कर रहे हैं। यह केवल संकेतमात्र है। इनके परिपूर्ण विधानों को खोजना अभी बाकी है।
लता वर्वसु विविछद्य सोमत्य जुहुयातदिमा। सोपे सूर्पण संयुक्ते प्रयोक्त क्षय शान्तये॥
अर्थ- अमावस्या के दिन साँपलता की डाली से हवन करने से क्षयरोग शान्त हो जाता है।
कुसुमै शंख वृक्षस्य हुत्वा कुष्टं विनाशयेत्। 42 अपस्मार विन शस्तादपामार्गेस्य तण्डुले॥
अर्थ—शंख वृक्ष के पुष्पों से होम करने से कुष्ठ [कोढ़] रोग आराम हो जाता है। अपामार्ग के चीजों से हवन करने से अपस्मार [मृगी, हिस्टीरिया] रोग विनष्ट हो जाता है।
चन्दन द्वय संयुक्तं कर्पूर तण्डुलं पवम्। लवंग सुफलं चाज्यं सिता चाम्रस्य दारु कै॥ अपं न्यून विधिः प्रोक्तो गायत्र्याः प्रीतिकारक।
अर्थ—दोनों चन्दन, (रक्त और श्वेत) कर्पूर, तण्डुल, पत्र, लबंग, नारकेल, घी, मिसरी तथा आम्र की समिधा, इसका हवन गायत्री तत्व के प्रति प्रीति कराने वाली है।
क्षोरोदने तिलान्दूबी क्षोरद्र म सापेद्वरान्। प्रथक सहस्र त्रितपं जुडुयान मन्त्र सिद्धके॥
अर्थ—प्रणव युक्त 2400000 चौबीस लाख गायत्री जप करने के बाद, उसकी सुसिद्धि के लिये दूध, भात, तिल, दूर्वा तथा बरगद, पीपल आदि दूध वाले वृक्षों की समिधाओं से तीन हजार आहुति प्रदान करे।
सूर्य गायत्री मंत्र से जिन वस्तुओं का हवन करने से जो लाभ होता है, उसका वर्णन यों मिलता है।
सप्ररोहाभिराद्राभिर्हुत्वा आयु समाप्नुयात्। सामेद्धि और वृक्षम्यर्हुत्वा पुत्रम वाप्नुयात्॥
अर्थ—पलाश की समिधाओं से हवन करने पर आयु की वृद्धि होती है। क्षीर वृक्षों की समिधा से हवन करने से पुत्र की प्राप्ति होती है।
ब्रीहीणाँ च शतंहुत्वा दीर्घवायु वाप्नुयात्।
अर्थ—यवों की सौ आहुतियाँ प्रतिदिन देने से दीर्घ-जीवन मिलता है।
सुवर्ण कमलं हुत्वा शतमायुरवाप्नुयात्। इर्न्नाभिपयस्य वापि मधुना सर्पिपापिवा॥
शतं शतं सप्ताहमपमृत्यु व्यपोहति। शमी सपिद्भिरन्तेन पयसा वा च सर्पिपा।
अर्थ—स्वर्णिम कमल पुष्पों से हवन करने पर मनुष्य शतजीवी होता है। इर्वा, दूध, मधु की सौ-डडडड डडडड डडडड से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। शमी की समिधाओं से तथा दूध और घृत से हवन करने पर भी-अपमृत्यु का भय जाता रहता है।
सुरभीणि सुपुष्टेश्च कारकाणि सितादिकम्॥ द्रव्यारामादाय जुहुयाच्चातुर्थं रोगनाशकम्॥
अर्थ—सुगन्धित, पुष्टिकारक, मधुर एवं रोगनाशक, चार प्रकार द्रव्यों का हवन करने से नाना प्रकार के रोगों का निवारण होता है।
होमत्तिलघृताद्यैश्च धर्मकामार्थ मोक्षदः। पूजामन्त्रान्पठेद्यस्तु भुक्त भोगोदिवं व्रजेत्॥
—आग्ने॰ पु॰अ॰ 21 श्लो॰ 27
अर्थ—तिल-घृतादि का हवन धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष देने वाला है। अपनी पूजा के मन्त्रों का पठन यानी जप करने वाला इस विश्व के भोग्य पदार्थों का उपभोग कर दिव्य लोकों को जाते हैं।
कदम्ब कलिका होमाद्यक्षिणी सिध्यतिध्रुवम्। बन्दूक किंशुकादीनि वश्याकर्षाय होमयेत्॥ बिल्वं राज्याय लक्ष्म्यर्थं पाटलाँञ्वम्पकानपि। पद्मानि चक्रवर्तित्वे भक्ष्य भोज्यानि सम्पदे॥
दूर्वा व्याधिविनाशाय सर्वसत्व वशी कृतेः। प्रियंग पाटली पुष्पं चूतपत्रं ज्वरान्तकम्॥
मृत्युञ्जयो मृत्यु जितस्याद् वृद्धि स्यात्तिलहोमतः। रु द्रशान्तिः सर्वशान्त्या अथ प्रस्तुत मुच्यते॥
—आग्ने॰ पु.अ.81 श्लोक 46/52
अर्थ—कदम्ब की कलियों के हवन करने से निश्चय पूर्वक यक्षिणी सिद्ध होती है। किसी को वश करने के लिये बन्दूक किंसुकादि का हवन करना चाहिए।
राज्य प्राप्ति के लिये विल्ब-फलों का हवन करना चाहिए।
लक्ष्मी प्राप्ति के लिये पाटल और चम्पक का हवन करना चाहिए।
भक्ष्यभोज्य, सम्पत्ति और चक्रवर्ती राज्य के लिये कमलों का हवन करना चाहिए।
व्याधि-नाश के लिये दूब का, सब जीवों को वश करने के लिये पाटल पुष्पों का, ज्वर दूर करने के लिये आम के पत्तों का अकालमृत्यु से बचने के लिये मृत्युञ्जय मन्त्र से हवन, वृद्धि के लिये तिलों का हवन करना चाहिए। रुद्र की शान्ति करने से सब की शान्ति हो जाती है।
सर्वदाहोम जष्याथैः पाठाद्यैश्च रणेजयः। अष्टा विंशभुजाध्येया असिखेटकवत्करौ॥
—आग्ने. पु अध्याय 134 श्लोक
अर्थ—हमेशा हवन, जप और पाठ आदि से युद्ध में जय होती है। यज्ञ करते समय, हाथों में खंग और खेटक धारण किये अट्ठाइस भुजाओं वाली दुर्गा देवी का ध्यान करना चाहिए।
श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रह यज्ञं समारभेत्। वृष्टयायुः पुष्ठिकामो वा तथैवाभिचरन्पुनः॥
-आ॰ पु अ॰ 168 श्लोक॰ 1
अर्थ—लक्ष्मी की कामना करने वाला अथवा शान्ति की कामना करने वाला, ग्रहों का हवन करें। वृष्टि, आयु, अथवा वृष्टि की कामना करने वाला उसी प्रकार नवग्रहों का हवन करें।
श्रीगेहे विष्णु गेहे वा श्रियं पूज्यं धनं लभेत्। आज्याक्तै स्तण्डुले लक्षि जुहुयात्खदिरानले॥
राजावश्यो भवेद्वृद्धिः श्रीञ्चस्यादुत्तरोत्तरम्। सर्पपाम्भोऽभिपेकेण नश्यते सकला ग्रहाः॥
—आ॰पु॰अ॰307 श्लोक॰ 3,4
अर्थ—लक्ष्मी के मन्दिर में अथवा विष्णु के मन्दिर में लक्ष्मी जी की यज्ञ से पूजा करके धन को प्राप्त करे। घी से मिले हुए चावलों से खैर की अग्नि में एक लाख हवन करने से राजा वश में होता है और उत्तरोत्तर लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
सरसों और पानी के अभिषेक करने से सब ग्रह नष्ट हो जाते हैं।
संसाध्येशानमन्त्रेण तिलहोमो वशीकरः। जयःपद्मैस्तु दूर्वाभिः शान्तिकामःपलाशजैः॥
पुष्टिस्यात्काक पक्षेण मृतिर्द्वेपादिकं भवेत्। महक्षुद्रभयापर्ति जर्वमेव मनुर्भवेत्॥
—आग्ने॰ पु॰ अ॰ 386श्लोक॰ 20,21
अर्थ—सिद्ध किये हुए ईशान मन्त्र से तिलों का हवन करने से सब वश में होते हैं। कमलों के हवन से जय की प्राप्ति होती है। शान्ति की कामना वाला दूब का हवन करें। पलाश के फूलों का हवन करने से पुष्टि होती है। काक पक्ष से सब दोषादि को का अन्त होता है। क्षुद्रग्रह, भय, आपत्ति, मानो सब ही नष्ट हो जाती है।
पुष्पं क्षिपाययेच्छिश्य मानयेदग्नि कुण्डकम्।यवैद्धान्यैस्तिलै राज्यै मूलविद्या शतं हुनेत्।स्थावरत्वं पुरा होमं सरीसृपमतः परम।पक्षिमृग पशुत्वं च मानुष ब्राह्ममेव च॥विष्णुत्वञ्चेव रु द्रत्वमन्ते पूर्णाहुतिर्भवेत्। एकयाचैवह्याहुत्या शिष्यस्याद्दीक्षितो भवेत्॥मोक्षं यतिपरं स्थानं यद्गत्वा न निवर्त्तते।यथा जले जलं क्षिप्तं जलंदेही शिवस्तथा॥ अर्थ—पुष्पों का क्षेपण करावे शिष्य से अग्नि मंगावे, यव, धान्य, तिल, घी इत्यादि के द्वारा मूल मन्त्र से सौ आहुति दे।
पहिले स्थावरो के लिये हवन करे, फिर सरीसृपों में के लिये, फिर पक्षी, मृग, पशुओं के लिये, मनुष्यों के लिये और ब्रह्म के लिये हवन करे, विष्णु के लिये रुद्र के लिये हवन करे, अन्त में पूर्णाहुति दे।
एक ही आहुति से शिष्य दीक्षित हो जाता है। इस प्रकार पर स्थान जो मोक्ष है, उसको प्राप्त होता है, जहाँ जाकर प्राणी लौटता नहीं। जिस प्रकार जल में जल को डालने से अलग नहीं होता, उसी प्रकार यह देही जल है और शिव भी जल रूप है देही रूपी जल शिव रूपी जल में मिलकर पुनः नहीं लौटता।
शतचण्डी विधि में कुछ हवनों का वर्णन इस प्रकार है:—
ॐ भूर्भुवः स्वः महाज्वालाय विद्महे। अग्नि देवाय धीमहि। तन्नः अग्नि प्रचोदयात्॥
इस अग्नि गायत्री के साथ विभिन्न हव्य पदार्थों के साथ होम करने से, उनके जो परिणाम होते हैं, उनका विवरण यह है।
पलाशीभिरवाप्रोति समदर्भिब्रह्म वर्चसम। पलाश कुसुमैर्हुत्वाँ सर्वमिष्टेमवाप्नुयात्॥
पलास की समिधाओं से हवन करने पर ब्रह्मतेज की अभिवृद्धि होती है और पलाश के कुसुमों से हवन करने पर सभी इष्टों की सिद्धि होती है।
यवानाँ लक्ष होमेन घृतकार्ये हुताशने। सर्वकाम समृद्धात्मा पराँ सिद्धिमवाप्नुयात्॥
यवों में घी मिलाकर एक लाख बार अग्नि में आहुति देने से सब कर्मों की सिद्धि होती है तथा परा सिद्धि प्राप्त होती है।
ब्रह्म वर्चस कामास्तु पयस्त जुहुयात्तथा। घृत प्लुतैस्तिलैर्ब्रींहं जुहुयात्सु समाहित॥
ब्रह्म तेज की कामना करने वाला व्यक्ति सावधानी के साथ, घृत युक्त तिलों से और घी से हवन करे।
गायव्युत होमाञ्च सर्वपापैः प्रमुच्यते। पापात्मा लक्ष होमेन पातेकभ्यः प्रमुच्यते॥
एक लाख आहुतियों से गायत्री द्वारा हवन करने से पापी मनुष्य भी बड़े से बड़े पापों से छूट जाता है।
विधिपूर्वक स्थापित हुई अग्नि में, तीन बार मधु से भिगोये हुए हविष्य, दाक्षा, केला, मातुलिग, ईख, नारियल, तिल, जातीफल, आम तथा अन्य मधुर द्रव्यों से दस आवृत्ति सप्तशती के प्रत्येक मन्त्र से हवन करें और एक सहस्र नवार्ण मन्त्र से भी हवन करे। फिर आवरण देवताओं के लिये, उनके नाम मन्त्रों द्वारा हवन करके यथोचित रूप से पूर्णाहुति दे। तत्पश्चात् ब्राह्मणवृन्द देवताओं सहित अग्नि का विसर्जन करे। यजमान को कलश के जल से अभिषिक्त करे। इस प्रकार करने से पर जगत् अपने वश में होता है और सभी उपद्रव नष्ट हो जाते हैं।
इस प्रकार के अगणित प्रयोग शास्त्रों में भरे पड़े हैं। यदि इनका पूरा विधान उपलब्ध हो सके, खोजा जा सके तो भारत भूमि पुनः प्राचीन काल की तरह स्वर्ण भूमि बन सकती है। इस शोध कार्य के वैज्ञानिक अनुसंधान-प्रणालियों के लिए अपने जीवन को खपा देने वाले सच्ची लगन के निष्ठावान् व्यक्ति यों की आज भारी आवश्यकता है।
1 - अप्रैल मास में अखण्ड-ज्योति प्रेस के सभी कार्यकर्ता गायत्री महायज्ञ की व्यवस्था में व्यस्त रहेंगे, इसलिए अखण्ड-ज्योति का अगला अंक 1 मई को न निकल कर 15 मई का निकलेगा। पूर्णाहुति के विस्तृत समाचार एवं चित्र भी उसमें रहेंगे।
2 - विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति तारीख 20 से 24 अप्रैल ते 5 दिन हैं। इसमें भाग लेने वालों को तारीख 19 की शाम तक मथुरा पहुँच जाना चाहिए। ताकि 20 से आरम्भ होने वाले कार्यक्रमों में प्रातःकाल से ही भाग लेना संभव हो सके। स्टेशनों पर तपोभूमि के स्वयं सेवक उपस्थित रहेंगे जो नियत स्थान तक पहुँचाने में सहायता देंगे।
3 - जिन्होंने स्वीकृति प्राप्त करली है किंतु आना संभव नहीं, उन्हें अपने न आने की सूचना तुरन्त ही देनी चाहिए। ताकि उनके लक्ष से की हुई भोजन, ठहरने आदि की व्यवस्था बर्बाद न जाये। नियत संख्या में ही स्वीकृतियाँ दी गई हैं इसलिए सूचना न देने पर किसी आने वाले का अधिकार भी मारा जाता है। इसीलिए स्वीकृति प्राप्त सज्जनों को न आने की सूचना देना आवश्यक है। इसी प्रकार जिनके साथ स्वीकृति प्राप्त सज्जनों के अतिरिक्त और कोई भी आना चाहे वे भी इसकी सूचना दे दें, ताकि उनके लिए ठहरने आदि की व्यवस्था करने में असुविधा न हो।
4—स्वीकृति पत्रों के साथ यज्ञ में पालन करने योग्य नियमों का छपा पर्चा भेजा जा चुका है, उसे एकबार पुनः पढ़लें ताकि उन नियमों का यहाँ आकर पालन करने में अड़चन न पड़े।
5—जो गायत्री उपासक मथुरा न आ सकें, उन्हें ता॰ 24 अप्रैल का अपने यहाँ एक सामूहिक हवन करने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिसमें गायत्री मन्त्र से आहुतियाँ दी जायं। इस प्रकार गायत्री महायज्ञ से सम्बन्धित सभी व्यक्ति यों को उस दिन हवन करना चाहिए। उस दिन कितनी आहुतियाँ दीं, इसकी सूचना मथुरा भेज देनी चाहिए। पूर्णाहुति में नारियल चढ़ाने का विधान है;सो जो मथुरा न आने वाले गायत्री उपासक हमें सूचित कर देंगे, उनका यह नारियल, घृत भर कर यहाँ पूर्णाहुति में होम दिया जायगा।
6—सभी के लिए तम्बू, रावटियों में ठहरने एवं रोटी, चावल आदि कच्चे भोजन की व्यवस्था की गई है। जिनको असुविधा जनक हो वह अपनी स्वतन्त्र व्यवस्था कर सकते हैं। ठहरने के लिए मथुरा शहर में भी कुछ धर्मशालाओं का प्रबन्ध किया जा रहा है।
7—जिनको यज्ञोपवीत एवं विधिवत् गायत्री मंत्र लेने हों, वे उसकी सूचना इस मास फिर एक बार दे दें, ताकि उनके लिए विधान का सामान जुटा रखा जाय।
8—जिन्हें वृन्दावन, गोवर्धन, गोकुल आदि की यात्रा करना अभीष्ट हो, उनकी सूचना भी पहिले ही दे देनी चाहिए। उन दिनों विवाह, शादी के सालग होने के कारण सवारी का प्रबन्ध पहले ही करना पड़ेगा, ताकि सवारी न मिलने या महंगी मिलने की अड़चन से बचा जा सके।
9—जो माताएं अपने छोटे बालकों की परवश में समुचित व्यवस्था नहीं कर पातीं, उन्हें स्वयं को, बालकों को, तथा पास वालों को बड़ी असुविधा होती है। इसलिये छोटे बालकों वाली केवल वे ही माताएं आवें, जो अपने बालकों की समुचित व्यवस्था कर सकें।
10—संस्कृति शिक्षा शिविर, पूर्णाहुति समाप्त होते ही आरम्भ हो जायेगा। जिन्हें उसमें ठहरना हो, वे एक मास और ठहरने का अवकाश लेकर आवें एवं अपने निश्चय की पूर्व सूचना दे दें।
11—अगले वर्ष देश के विभिन्न स्थानों पर 108 गायत्री महायज्ञ एवं साँस्कृतिक सम्मेलन कराने का विचार है, जिन्हें अपने यहाँ ऐसे आयोजन कराने की इच्छा हो, उन्हें अपने निकटवर्ती लोगों का उत्साह मालूम करके आना चाहिए, ताकि उस आधार पर वहीं के कार्यक्रम बनाये जा सके।
12—जिन सज्जनों पर गायत्री ज्ञानांकों का, पुस्तकों का, हिसाब उधार चला आता है उनमें प्रार्थना है कि वह पैसा पूर्णाहुति से पूर्व ही भेज देने की कृपा करें, ताकि इन दिनों भारी आवश्यकता के समय वह पैसा काम आ सके।
13—साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का विधिवत् श्रीगणेश-गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के साथ आरम्भ किया जायगा। इसके लिये प्रकाशवान् आत्माओं को सक्रिय रूप से कुछ करना होगा। योजना गत अंक में प्रकाशित की जा चुकी है। हम में से कौन व्यक्ति अपने जिम्मे क्या कार्य लेंगे और अपने क्षेत्र में क्या कार्य आरम्भ करेगा, यह विचार करने में लगना चाहिए और उसकी एक क्रमबद्ध योजना बना कर साथ लाना चाहिए ताकि उस पर विचार-विनिमय हो सकेगा। सब लोग अपने-अपने क्षेत्र में कार्य आरम्भ करें, इसी प्रकार देश व्यापी आयोजन हो सकेंगे।
14—व्रतधारी, कर्मयोगी और बलिदानी आत्माएं का अपना लिखित और मौखिक संकल्प पूर्णाहुति के समय विधि-विधान पूर्वक सुव्यवस्थित संस्कारों के साथ होंगे। गतमास के अंक में पृष्ठ 32 पर छपे लेख को ध्यान पूर्वक पढ़ें और अपनी स्थिति जिस श्रेणी के उपयुक्त समझें, उसमें सम्मिलित होने की तैयारी करके आवें।
15—पूर्णाहुति के समय देश भर के सुप्रसिद्ध विद्वानों नेताओं एवं सुप्रसिद्ध तपस्वियों को बड़ी संख्या में पधारना होगा। भारती पार्लियामेंट (लोक सभा) के अध्यक्ष भी अनन्त शयनं। ता॰ 20 अप्रैल को उद्घाटन करेंगे। ता॰ 24 को मा. श्री गोविन्दवल्लम् पन्त पूर्णाहुति करेंगे।
19—जो सज्जन इस पूर्णाहुति उत्सव में नहीं आ सकेंगे, उनको भी समुचित जानकारी मिल सके इस दृष्टि से 1 मई की जगह 15 मई को निकलने वाली अखण्ड-ज्योति का पाँचवाँ दिन के कार्यक्रम का विवरण आगामी योजनाओं का कार्यक्रम तथा विभिन्न घटनाओं के अनेकों चित्र छपेंगे। सिनेमा में दिखाई जा सकने वाली फिल्म भी इस अवसर पर तैयार की जायगी, जिसमें चिरकाल तक इन पुनीत दृश्यों को देख सकने का आनन्द लिया जा सके।
17—असुरता ने महायज्ञ के पन्द्रह महीनों में इस महान् अभियान को नष्ट करने के लिए इतने आक्रमण किये हैं, जिनका विस्तृत वर्णन यदि कभी पाठकों का सुनने का मिला तो उनके रोमाञ्च खड़े हो जाएंगे। ऐसे महान् यज्ञों के द्वारा असुरता के अस्तित्व का आघात पहुँचता है। मरता क्या न करता। विश्वामित्र आदि के यज्ञों पर इसलिए ताड़का, मरीच आदि असुर आक्रमण करते थे और उन्हें नष्ट कर डालने के लिए कोई भी माया उठा न रखते थे। इस यज्ञ में भी ऐसा ही होता रहा है। अब पूर्णाहुति बड़ा मोर्चा है, इस अवसर पर असुरता अपने अनेकों अस्त्र-शस्त्रों के साथ सुसज्जित हो रही है। देवताओं के हारने और असुरों के जीतने के अनेकों उदाहरण मौजूद हैं। इस अवसर पर भी ऐसा हो सकता है। इसलिए देव-सेवा के प्रत्येक सैनिक को समुचित जागरुक रहने की आवश्यकता है। जो मथुरा इस अवसर पर न आवें, वे इन पाँच दिनों पूर्णाहुति की सुरक्षा के लिए कुछ जप, तप, हवन, पुण्य इसी प्रकार करें, जिस प्रकार ग्रहण काल में सूर्य, चन्द्र की सहायता के लिए धार्मिक लोग करते हैं। ता॰20 से 24 तक पाँच दिनों प्रत्येक परिजन को यज्ञ की, यज्ञ संचालकों की, पूर्णाहुति की सुरक्षा के लिए कुछ विशेष तपस्या करने के लिए विशेष अनुरोध पूर्वक करबद्ध प्रार्थना है।
जिसको ब्रह्मज्ञान हुआ हो, वह जीवनमुक्त है। वह ठीक समझता है कि—आत्मा अलहदा है और देह अलहदा। भगवान् का दर्शन (आत्म-ज्ञान) होने पर देहात्मबुद्धि-देह में अहंभाव नहीं रहता। जैसे नारियल का जल सूख जाने से भीतरी गिरी और गुठली अलहदा पृथक् हो जाती है; वैसे ही विषय आदि में अहंभाव चले जाने पर आत्मज्ञान होता है। तब आत्मा अलहदा और देह अलहदा का बोध होता है।
जो माँ इस भाँति कहती हो (कि आत्मोन्नति के लिए प्रयत्न मत करो) वह माँ, माँ नहीं है। वह अविद्यारूपिणी है। जो ईश्वर लाभ के मार्ग में विघ्न डालती हो, ऐसी माँ की बात न सुनने से कोई भी दोष नहीं है। ईश्वर के लिए गुरु जनों के वाक्य का जप करने में कोई दोष नहीं होता। भरत ने रामचंद्र के लिए कैकेयी की बात नहीं सुनी। गोपियों ने कृष्ण के दर्शन करने के लिए अपने पतियों का अटकाव नहीं माना। प्रह्लाद ने ईश्वर के लिए अपने बाप की बातें नहीं सुनी। बलि राजा ने भगवान् की प्रीति के लिए गुरु शुक्राचार्य की बातें नहीं मानी। विभीषण ने राम को पाने के लिए बड़े भाई रावण की बात नहीं मानी थी। किन्तु इस बात को छोड़कर कि-”भगवान् की ओर मत जाओ,” और उनकी सब बातें अवश्य सुननी चाहिए।
गम्भीर ध्यान में बाह्य ज्ञान शून्य होता है। एक व्याध ने चिड़िया मारने के लिए ऐसी टकटकी बाँध रक्खी थी कि-कोई बारात कहीं से जा रही थी, साथ ही कितने लोग, कितने बाजे गाजे, कितनी सवारियाँ और कितने ही घोड़े भी थे, कितने देर तक अपने ही पास होकर वे चले गये, किन्तु व्याध को कोई होश नहीं; वह नहीं जान सका कि-उसके पास होकर एक बारात चली गई।
आगामी नवरात्रि चैत्र सुदी 1 गुरु वार से प्रारम्भ होकर चैत्र सुदी 10 शुक्रवार तदनुसार ता॰ 12 अप्रैल से प्रारम्भ होकर 20 अप्रैल को पूरी होती है। इस नवरात्रि के दिव्य संक्रमण काल पर अपना आध्यात्मिक उत्थान चाहने वालों को अवश्य ही पूरी पवित्रता और एकाग्रता से साधना में दत्तचित्त हो जाना चाहिये। संख्या पूरी करने की हड़बड़ी छोड़कर प्रेम और एकाग्रता को अपनाना चाहिये। कम से कम दोनों काल (प्रातः सायं) में तीन घंटा समय निकाल कर 26 माला प्रति दिन नियमित समय पर जपना चाहिए। 10 माला जपने में साधारणतया एक घंटे का समय लगता है। इस भाँति 24000 का लघु अनुष्ठान पूरा करना चाहिये। जो इतना भी अपनी विविध व्यस्तताओं के कारण नहीं कर सकें , उन्हें कम से कम प्रति दिन दोनों सन्ध्या में 10 माला तो अवश्य ही जप कर लेना चाहिये। जो समय नवरात्रि की साधना में लगेगा, वह कदापि निष्फल न होगा।
साधना के नियम साधारण ही हैं। शौच स्नान से निवृत्त होकर शुद्धतापूर्वक प्रातःकालीन उपासना पूर्व मुख एवं सन्ध्या काल की पश्चिम मुख होकर करनी चाहिये। जप के समय घी का दीप या कम से कम धूपबत्ती जलती रहे। जल का पात्र निकट में रहे। नित्य सन्ध्या कर लेने के उपरान्त गायत्री माता और गुरु का पूजन करके जप प्रारम्भ कर देना चाहिये। नियमित जप समाप्त कर सूर्य के सम्मुख जल चढ़ा देना चाहिये।
जिस भाँति उपयुक्त नक्षत्र, तिथि एवं दिवसों में बोये बीज, अनुकूल वृष्टि, सिंचाई एवं खाद प्राप्त कर एक विशेष रूप में पुष्ट और उन्नत फल प्रदान करते हैं, उसी प्रकार नवरात्रि की उपासना अन्य समयों में की गई उपासना की अपेक्षा अधिक बलशालिनी और फलवती होती है। जैसे दिन-रात्रि का मिलन काल-सन्ध्या, आध्यात्मिक उपासना करने के लिये अधिक उपयुक्त होती है, उसी प्रकार शीत और शीत की मिलन-वेला आश्विन नवरात्रि होती है। इस संक्रमण काल में जिस भाँति भौतिक प्रकृति अपने विशाल क्षेत्र में एक अवस्था से दूसरी में प्रवेश करती है, उसी भाँति सूक्ष्म प्रकृति के क्षेत्रों में भी उस समय संक्रमण काल उपस्थित होता है। ऐसे समय में जो साधक सावधान और एकाग्र चेतना से उपासना करता है, उसे सहसा ही अपना निचला स्तर छोड़कर ऊर्ध्व के स्तर में जाने की सर्वव्यापिनी शक्ति द्वारा बल, सहायता और गति प्रदान की जाती है। जिसे अन्य समय में वह अपनी वैयक्तिक उपासना के बल पर पाने में असमर्थ था, वह अनायास ही उपलब्ध हो जाता है। इस भाँति नवरात्रि उपासना का विशाल परिणाम निष्ठावान एवं सच्चे उपासकों को मिलता रहता है।
नवरात्रि उपासना में ब्रह्मचर्य पालन अत्यावश्यक है। जो कर सकें, वे उपवास भी करें, परिमित फल और दूध लेना भी उपवासवत् ही है। जिनसे ऐसा नहीं बन पड़े, वे भी सात्विक-परिमित भोजन करें। स्वाद के लिये न खायें, अतः यथासम्भव नमक और मीठा (चीनी मिष्ठानादि) छोड़ दें। यह भी श्रेष्ठ व्रत ही है। इसके अतिरिक्त, पूरा या नियमित समय तक मौन, भूमि-शयन, चमड़े की बनी वस्तु का त्याग, पशुओं की सवारी का त्याग, अपनी शारीरिक सेवायें स्वयं करना, अपनी हजामत, वस्त्र धोना, भोजन बनाना आदि सेवायें दूसरे से न लेने का व्रत भी निभाने का प्रयत्न करें। अपनी सुख-सुविधाओं को यथासम्भव त्याग कर उपासना में लीन होना ही तप है।
जो साधक पूर्णाहुति में आ रहे हों, उन्हें घर में ही अपना जप समाप्त कर पंथ में मानसिक जप करते रहना चाहिये। यदि किसी कारणवश ऐसा न हो सके तो उन्हें कुछ पूर्व ही तपोभूमि आकर अपना जप पूरा करना चाहिये। रास्ते में मानसिक जप करते रहना उत्तम है।
*समाप्त*