VigyapanSuchana

मथुरा पूर्णाहुति के बाद दूसरा विराट गायत्री सम्मेलन

राजस्थान में अपूर्व गायत्री महायज्ञ

कोटा प्रान्त के रामगंज मन्डह्वी (W. Rly) नगर में

ता॰ 16, 17, 18, 19 अक्टूबर

सन् 56 को 101 कुण्डों की 11 यज्ञशालाओं में 24 लक्ष आहुतियों का विशाल

गायत्री महायज्ञ होगा।

साथ ही राजस्थान प्रान्तीय गायत्री परिवार का विराट्

सम्मेलन होगा। इस अवसर पर साँस्कृतिक पुनरुत्थान की

विशाल योजना का शुभारम्भ किया जायेगा।

सादर निमंत्रण

अ॰ भा॰ गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को, देश भर के गायत्री उपासकों को, धर्म प्रेमियों को इन पंक्तियों द्वारा सादर आमन्त्रित किया जाता है और प्रार्थना की जाती है कि अपना हार्दिक सहयोग देकर इस विशाल आयोजन को सफल बनाने में पूरी-पूरी तत्परता दिखावें। परस्पर सहयोग से ही यज्ञ आन्दोलन को आगे बढ़ाया जा सकता है।

इस अवसर को चूकिये मत

देश भर के गायत्री प्रेमियों का परस्पर प्रेम मिलन, उच्च कोटि के विद्वानों तथा महात्माओं का आगमन, यज्ञ पुण्य का महान फल, इस स्वर्गीय सुअवसर पर अपना आवश्यक काम छोड़कर भी पधारिए। अपनी सहानुभूति, सद्भावना और शुभ कामना “व्यवस्थापक-राजस्थान प्रान्तीय यज्ञ समिति, पो॰ रामगंज मंडी (कोटा) ” के पते पर भेजिए। भोजन और ठहरने की व्यवस्था निःशुल्क।

भाग- सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-8


पथ-गीत

(श्री. शिवदत्त श्री. वास्तव एम. ए.)


पथ-गीत (Kavita)

मैं मुसाफिर हूं मुझे क्या दूर हो या पास मंडर्षे

। 1 ।

देखता हूँ में समुन्दर की लहर में प्यास चंचल। पर रवानी में लहर की जागरित विश्वास संबल॥

घास की चादर लपेटे चल रहा है सिन्धु प्रतिपल औक्षितिज तक साथ बढ़ता जा रहा तट मौन डगमग॥

कुछ नज़र सा आ रहा क्षितिज-रेख के उस पार धूमिल॥ में मुसाफिर हूँ, मुझे क्या दूर हो या पास मंजिल॥

। 2 ।

किस उदासी की अमा में प्राणा कोकिल रो रही है। कौन बुझती सी शमा में आग जल कर सो रही है।

चाँद तारों के बयाबाँ में अकेला फूल सा हूँ। जो ज़मी से उढ़ गगन पर छा गई, वह धूल सा हूँ।

खुद समेटेगा भंवर की नाव अब बेचैन साहिल॥ मैं मुसाफिर हूँ, मुझे क्या दूर हो या पास मँजिल॥

। 3 ।

आज मचला फिर कलेजे में उभर का प्यार किसका। झूमता इन पुतलियों में शत्रु पारावार किसका।

जिन्दगी का कारवाँ हर पैग लेकर भावना की। वायु गति से बढ़ रहा है लक्ष्य पर प्रिय चाहना की॥

ढो रहा हूँ मैं किसी की याद का संसार बोझिल॥ मैं मुसाफिर हूँ, मुझे क्या दूर हो या पास मंजिल॥


चार आर्य-सत्य

(ले. आचार्य चम्मानन्द कोलम्बी)

एक समय भगवान् बुद्ध कौशांबी के सिंसपा वन में विहरण करते थे।

एक दिन भगवान् ने हाथ में कुछ सिंसप-पत्तों को लेकर भिक्षुओं से पूछा, “भिक्षुओं! क्या समझते हो? जो सिंसप-पत्ते मेरे हाथ में हैं सो अधिक हैं या जो पेड़ों पर हैं सो अधिक हैं।

भिक्षुओं ने कहा, “भन्ते! आपके हाथ में थोड़े ही पत्ते हैं; इनकी अपेक्षा पेड़ों के पत्ते अधिक हैं। ”

भगवान्—“इस प्रकार, भिक्षुओं! मेरी कहीं हुई बातें थोड़ी हैं; वैसी बातें अधिक हैं, जिनको कि मैंने जानते हुए भी नहीं कहा। मैंने उनको क्यों नहीं कहा? इसलिए कि वे अर्थयुक्त नहीं और न वे आदि ब्रह्मचर्य, निर्वेद, वैराग्य, निरोध, उपशम, अभिज्ञा, तथा निर्वाण का कारण हो सकती हैं।

“तब फिर, भिक्षुओं! मैंने क्या बताया है? मैंने दुःख को बताया है; मैंने दुःख का कारण बताया है; मैंने दुःख का निरोध बताया है; मैंने दुःख-निरोध का मार्ग बताया है।

भिक्षुओं! मैंने इनको क्यों बताया है? इसलिये कि ये अर्थयुक्त हैं। ये ही आदि ब्रह्मचर्य, निर्वेद, वैराग्य, निरोध, उपशम, अभिज्ञा तथा निर्वाण का कारण हो सकते हैं।

“इसलिये, भिक्षुओं! दुःख, दुःख का कारण, दुःख का निरोध और दुःख-निरोध का मार्ग—इन बातों को जान कर निर्वाण के लिये प्रयत्न करना चाहिए। ”

इस उपदेश को लेकर कुछ पण्डित यह अर्थ लगाते हैं कि भगवान बुद्ध बहुत-सी बाते जानते थे। लेकिन सभी शिष्य उनका अर्थ समझने में असमर्थ थे। इसलिये उन्होंने आम बातों के विषय में साधारण शिष्यों से कहा और गूढ़, गुप्त बातों के बारे में थोड़े से बुद्धिमान् शिष्यों को सिखाया, लेकिन यह धारणा गलत है। अन्य प्रसंग में भगवान् बुद्ध का ही कथन इस प्रकार है:—

“तीन बातें, भिक्षुओं! प्रकट-रूप से नहीं चलती। कौन सी तीन बातें?”

स्त्रियाँ, भिक्षुओं! प्रकट-रूप से नहीं चलती। ब्राह्मणों के मन्त्र, भिक्षुओं! प्रकट-रूप से नहीं चलते। मिथ्या-दृष्टि, भिक्षुओं! प्रकट-रूप से नहीं चलती। ये तीनों बातें, भिक्षुओं! प्रकट-रूप से नहीं चलती।

“भिक्षुओं! तीन, प्रकट-रूप से चमकने वाली बातें हैं। कौन-सी तीन बातें?”

“चन्द्र मण्डल, भिक्षुओं! प्रकट रूप से चमकता है। सूर्य-मण्डल भिक्षुओं! प्रकट-रूप से चमकता है। तथागत (बुद्ध) का उपदेशित धर्म-विनय, भिक्षुओं। प्रकट-रूप से चमकता है।

“ये तीनों बातें भिक्षुओं! प्रकट-रूप से चमकने वाली हैं।

इस सम्बन्ध में एक दूसरी जगह भी भगवान् ने कहा है, “आनंद! भिक्षु-संघ मुझसे क्या प्रतीक्षा करता है? आनन्द! मैंने धर्म को प्रकट-रूप से बताया है, आनन्द! तथागत के धर्म में आचार्य-मुष्टि नहीं है। ”

इसके पढ़ने के बाद यह स्पष्ट होता है कि भगवान् बुद्ध ने किसी को गूढ़ उपदेश नहीं दिया था। जो उपदेश ऊपर दिया गया है उसमें भगवान् इतना ही कहते हैं, ‘मैं इस दुनिया की बहुत सी बातों को जानता हूँ; लेकिन उनकी चर्चा करना निरर्थक है। मैंने जो कुछ तत्व जान लिया है उसका समावेश चार आर्य सत्यों में होता है। इसलिये इसी बात को मैं बार बार दुहराता हूँ। ’

गृहस्थाश्रम में बोधिसत्व ने युद्ध-कला, कृषिविद्या आदि बहुत बातें अवश्य सीखी होंगी। गृह-त्याग करने के बाद श्रमणों और ब्राह्मणों के आत्मवाद, आचरण आदि बातों को बोधिसत्व ने अच्छी तरह समझ लिया था। इन वादों और आचरणों का वर्णन दीर्घ निकाय के ब्रह्मजालादि-सूत्रों में आता है। जो अनेक-विधतपश्चर्या श्रमणों में चालू थीं, उनका भी पूरा पूरा अनुभव बोधिसत्व ने किया था। यह सब करने के बाद उनको मालूम हुआ कि आत्मवाद, तपश्चर्या इत्यादि बातें फिजूल हैं। उन्होंने उन बातों में कुछ तथ्य नहीं पाया। अपने उस अनुभव को भगवान् ने इस उपदेश में कहा है। वे जानते तो थे बहुत कुछ लेकिन आर्य-सत्यों के सिवाय और सब उनको वृथा मालूम हुआ।

आजकल के जमाने में हम लोग भी इसकी पुनरावृत्ति कर सकते हैं। भगवान के जमाने से भी अधिक ज्ञान के साधन आज हमारे पास उपलब्ध हैं। अखबारों को लीजिये। इनसे सारी दुनिया भरी है। एक अमेरिका में लगभग कोई सोलह हजार पत्र पत्रिकाएं-दैनिक, साप्ताहिक, मासिक तथा त्रैमासिक निकलती है। हमारे देश में तो इतने नहीं हैं। फिर भी हम लोग काफी अखबार पढ़ सकते हैं। इसके सिवाय रेडियो तो है ही। छपाई की कला के अवगत होने के बाद छोटी, बड़ी पुस्तकें हजारों की संख्या में निकल रही हैं। लेकिन कहिये तो इन सब साधनों से दुनिया का दुःख कितना कम हो गया है!

जिस विज्ञान के ऊपर मनुष्य-जाति मुग्ध हो गई थी, उसका उपयोग आजकल किस प्रकार हो रहा है। विमान की कला के विषय में हम लोग केवल पुराणों में पढ़ते थे। आज तो कोई भी विमान में बैठकर देशाटन कर सकता है। दूर का शब्द ज्ञान योग-सिद्धि समझी जाती थी। आज कोई भी अमेरिका में दिया हुआ प्रेसिडेन्ट रुजवेल्ट का भाषण उसी समय यहाँ से सुन सकता है। लेकिन इस सब ज्ञान का उपयोग ज्यादा से ज्यादा आत्मनाश के लिए हो रहा है। जिन इमारतों और जहाजों के निर्माण में अनेक वर्ष लगते हैं, वे वैज्ञानिक साधनों द्वारा ही एक क्षण में नष्ट किये जाते हैं। आदमी इसमें बड़ा गर्व मानता है। जर्मन कहते हैं कि हम लोगों ने रूस के बड़े-बड़े शहरों को नष्ट कर दिया और उसके बहुत से जहाजों को डुबा दिया। दूसरे भी बड़े अभिमान के साथ यही बात कहते हैं। रेडियो पर जो प्रचार चल रहा है, उसमें सत्य का अंश कितना है, सब कोई जानते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि वैज्ञानिक उपलब्ध साधन मनुष्य की उन्नति के बदले अवनति का कारण हो गये हैं।

ऐसा क्यों हुआ? मनुष्य ने इन सब साधनों को चार आर्य-सत्यों में लाने का प्रयत्न नहीं किया। सारी दुनिया का दुख एक है। अब तक बहुत थोड़े लोगों ने इस बात को जान पाया है।

एवं चे सत्ता जानेय्युँ, दुक्खाँय जातिसम्भवो। न पाणो पाणिन हन्ते, पाणघाती हि सोचति॥ दुःख को जानता तो एक प्राणी दूसरे की हत्या न करता।

दुःख मनुष्य जाति की तृष्णा से बढ़ता है, यह दूसरा आर्य-सत्य अब तक हमारी समझ में नहीं आया। पहले जमाने में बहुत लोग केवल आत्म हित को देखते थे। वे अपनी तृष्णा बढ़ाकर दूसरों के नाश के लिए प्रवृत्त हो जाते थे। इससे समाज में अव्यवस्था पैदा होने के कारण सारा समाज दुख पाता था। तदनन्तर मनुष्य अपनी जाति और धर्म के लिए लड़ने लगे। एक जाति के लोग दूसरी जाति पर स्वामित्व प्राप्त करने के लिए युद्ध करने लगे। इस प्रकार अपने धर्म के प्रचार के लिए मुसलमान और ईसाई लोग आपस में लड़ने लगे। आजकल व्यक्ति गत तृष्णा कुछ हद तक कानून से रुक गयी। धर्म में उतनी आसक्ति न रहने से धर्म युद्ध की सम्भावना भी नहीं है। लेकिन वह पुरानी तृष्णा अब राष्ट्रीयत्व में अत्यन्त प्रबलता से परिणित हुई है। अपने राष्ट्र के लिए किसी प्रकार का अत्याचार कर्तव्य समझा जाता है। जापानियों का दावा है कि ‘हमारी सन्ततः बढ़ रही है और उसके लिए दुनिया में जगह खोजनी पड़ती है। अतः हम लोग लोग चीन तथा दूसरे देशों पर आक्रमण कर रहे हैं’ लेकिन चीन की भी तो सन्तति बढ़ रही है। इसका विचार जापान नहीं करता। इससे युद्ध का प्रसंग उपस्थित होता है। सारी दुनिया का दुःख एक है, और इसका कारण हमारी व्यक्ति गत, जातिगत अथवा राष्ट्रगत तृष्णा है। तब तो आजकल के युद्धोद्योग से सारी दुनिया दुःख पा रही है। हमें यह बात अच्छी तरह समझनी चाहिए।

दुःख नाश का उपाय युद्ध तो नहीं हो सकता। इसका एक ही उपाय, सारी दुनिया में आत्मबल से शान्ति स्थापित करना है। हमारे वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ तथा लेखक लोग अपना सब प्रयत्न इस दिशा में लगा दें तो यह बात अल्प श्रम से साध्य है। विश्व-शान्ति कोई काल्पनिक बात नहीं; वह प्रयत्न साध्य है और वही तीसरा आर्य-सत्य है।

शान्ति का रास्ता बुद्ध-प्रणीत आर्य- अष्टाँगिक मार्ग ही हो सकता है; दूसरा नहीं। संक्षेप में वह इस प्रकार है:—सम्यक् दृष्टी, सम्यक्-संकल्प, सम्यक्-वचा, सम्यक्-स्मृति तथा सम्यक्-समाधि।

चार आर्य-सत्यों का यथार्थ ज्ञान सम्पादन करना सम्यक् दृष्टि है। यदि आपका विज्ञान मनुष्य-जाति का नाश करने का साधन उत्पन्न करने वाला हो तो यह सम्यक् दृष्टि में नहीं आ सकता। विज्ञान से मनुष्य को सुख देने वाली बहुत सी चीजें पैदा की गई हैं। वैधक-शास्त्र को लीजिए। प्राचीन काल में जिन रोगों का शमन सुगमता से हो रहा है। इससे मनुष्य का दुःख घट रहा है। लेकिन इसी शास्त्र ने हैजा, प्लेग आदि भयानक रोगों के कीटाणुओं को शत्रु के देश में सुगमता से फैलाने का तरीका भी निकाला है। आजकल बम-वर्षा से जितनी हानि होती है, उससे कई गुना इन कीटाणुओं से हो सकती है और मनुष्य-जाति का दुःख अमर्यादित बढ़ सकता है। तब फिर इस तरह का वैज्ञानिक शोध सम्यक् दृष्टि में किस प्रकार आ सकता है? हर एक शास्त्रज्ञ को ख्याल रखना चाहिए कि अपना शोध मनुष्य-जाति का दुःख हटाये, न कि उसको बढ़ावे।

सम्यक् संकल्प आर्य-अष्टाँगिक मार्ग की दूसरी सीढ़ी है। इसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य को यह संकल्प करना चाहिए कि अपनी कामतृष्णा न बढ़े, अन्य जाति या राष्ट्र के प्रति द्वेष-भाव न रहे और उपद्रव न करे।

असत्य भाषण न करना, गाली न देना, चुगली न करना और बकवाद न करना सम्यक् वाचा है। जब कोई व्यक्ति इस चार प्रकार की वाणी का उपयोग करता है तो उसका समाज में मान नहीं रहता। लेकिन जब वह इस प्रकार के वचन का अपने राष्ट्र के प्रचार-कार्य में प्रयोग करता है, तब वह बड़ा नीतिज्ञ समझा जाता है। सबको मालूम है कि हमारे राजनीतिज्ञ सच और झूठ का कैसा मिश्रण करते हैं। हमारे अखबारों द्वारा प्रति-पक्षियों को कैसी गाली दी जाती है! -इसके कहने की जरूरत ही नहीं। जो विज्ञापन अखबारों में निकलते हैं या तो वे झूँठे हैं, या उनमें अधिकाँश बकवाद ही है। आजकल के अखबारों से असत्य, गाली-चुगली और बकवाद हटा दी जाय तो उनका कलेवर संघटित और छोटा होगा। इससे लाखों मन कागज और पाठकों का बहुत सा समय बच जायेगा।

हत्या, व्यभिचार और चोरी न करना सम्यक् कर्मान्त है। ये सब दुष्कर्म लड़ाई में होते हैं। लोग युद्ध में परस्पर की हत्या, स्त्रियों पर जबरदस्ती और लूट पाट करते हैं। जब तक मनुष्य जाति युद्ध का त्याग न करेगी, तब तक वह सम्यक् कर्मान्त का आचरण नहीं कर सकेगी।

अपनी जीविका करने में दूसरे की हानि न करना सम्यक् आजीव है उदाहरणार्थ गृहस्थों के लिए पाँच प्रकार की सौदागिरी मना है, शस्त्र, प्राणी, माँस, मद्य और विष। आज-कल के जमाने में शस्त्रवाणिज्य प्रमुख राष्ट्रों का एक बड़ा रोजगार हो गया है। मद्य से तथा-कथित सभ्य देशों की सरकार बहुत फायदा उठाती है। अतः वह भी राष्ट्र का एक रोजगार हो गया है। जब तक सभ्य राष्ट्र इस प्रकार की मिथ्या जीविका से निवृत्त न होंगे, तब तक दुनिया का दुःख कैसे कम होगा?

सम्यक् व्यायाम चार प्रकार का है 1- अनुत्पन्न अकुशल विचारों का उत्पादन न करना। 2-उत्पन्न अकुशल विचारों का नाश करना। 3- अनुत्पन्न कुशल विचारों का बढ़ाना। यह तो व्यक्ति के लिए बताया गया है, किन्तु जाति अथवा राष्ट्र, व्यक्तियों के समूह से बना है। अतः राष्ट्रों के हित के लिये भी सम्यक् व्यायाम की अत्यन्त आवश्यकता है। जिन छोटे-बड़े राष्ट्रों को युद्ध-प्रियता की नौबत अब तक नहीं आई, उनको चाहिए कि इससे अलिप्त रहने का प्रयत्न करें। जिनमें अपने और दूसरे की उन्नति के विचार न उठे हों, उन्हें उत्पन्न करना चाहिए। सार्वजनिक शिक्षा द्वारा किसी एक राष्ट्र में अभिमान और आक्रमण के विचारों का प्रचार होने लगेगा, तब पड़ोसी राष्ट्रों के सज्जनों का कर्तव्य है कि वहाँ जाकर अपने उन भाइयों को उन आहिकारी विचारों से निवृत्त कर दें। उनको इस प्रकार समझना चाहिए, देखो भाइयों! आप लोग युद्धोद्योग को बढ़ा कर दूसरे देशों पर आक्रमण करना चाहते हैं। क्या हुआ, रोमन साम्राज्य कहाँ से कहाँ चला गया, स्पेन की क्या दशा हुई और फ्रांस पर क्या बीत रही है। इसलिए इस उद्योग से हट जाइए। इस प्रकार की शिक्षा से सारी दुनिया में सम्यक् व्यायाम का प्रचार किया जाय तो मानव जाति का कल्याण होगा, मानवजाति दुःख से मुक्त होगी।

स्मृति का अर्थ है चित्त की जागृति। इस जागृति के बिना कोई मनुष्य न तो अकुशल को हटा सकता है और नहीं कुशल को बढ़ा सकता है। आजकल युद्ध प्रिय राष्ट्रों में शत्रु के प्रहार से बचने और शत्रु पर आक्रमण करने के लिए बड़ी सावधानी हो रही है। यह सम्यक् स्मृति नहीं है। अपने और परराष्ट्र का समान कल्याण करने के लिए तैयार रहना ही सम्यक् स्मृति होगी।

बुद्धघोषाचार्य ने कुशल चित्त की एकाग्रता को समाधि कहा है। इसका तात्पर्य है अपने मन को अकुशल विचारों से हटा कर स्थिर रखना। सिनेमा देखने और निशाना मारने में भी तो एक प्रकार की समाधि लगती है। लेकिन वह सम्यक् समाधि नहीं कही जाती। मनुष्योपयोगी साधनों के शोध करने में जो समाधि लगती है, वही सम्यक्-समाधि है। अमेरिका जैसे देशों के अधिकाँश लोग स्थिरचित्तता से बहुत दूर हैं। सुबह से लेकर शाम तक वे कार्य-व्यस्त रहते हैं। वे चित्त शान्ति का विचार बिल्कुल नहीं करते। प्रोफेसर लानमन कहा करते थे “हमारे देश वाले एक घंटे में अस्सी मील की चाल चलने वाली रेलगाड़ी को पकड़ना चाहते हैं (उस समय हवाई जहाज नहीं थे) । लेकिन बहुत कम लोग यह सोचते हैं कि गन्तव्य स्थान पर पहुँच कर क्या करना है” इस प्रकार की भ्राँचित्तता से व्यक्ति तथा समाज का हित नहीं हो सकता। अतः सम्यक्-समाधि का अभ्यास सार्वजनिक होना चाहिए।

उपर्युक्त कथन से पाठक समझेंगे कि चार आर्य-सत्यों का जो छोटा सा तत्वज्ञान बताया गया है, वह दुनिया के लिए कितना उपयुक्त है। इसलिए भगवान् कहते हैं, “भिक्षुओं! मैंने चार आर्य-सत्यों को क्यों बताया? इसलिए कि वे अर्थयुक्त हैं और वैराग्य, निरोध, उपशम, अभिज्ञा तथा निर्वाण का कारण हो सकते हैं। ”


प्रगतिशील जीवन और आध्यात्मिक चिन्तन

(लेखक—पं. श्रीलालजीराम जी शुक्ल, एम. ए.)

मनुष्य-जीवन की प्रगति दो बातों पर निर्भर करतीं है—एक सदा नये काम करते रहने पर और दूसरे सदा नये आध्यात्मिक विचारों को मन में लाने पर। काम करने से मनुष्य का लौकिक अनुभव बढ़ता है, उसके मानसिक भावों का शोधन होता है और उसे अपने-आपको जानने का अवसर मिलता है। आध्यात्मिक चिन्तन से मनुष्य अपने भीतर रहने वाली अमित शक्ति का ज्ञान प्राप्त करता है, इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ता है। उसके मन में नयी सूझ उत्पन्न होती है, इसके कारण वह अपनी भूलों को सुधार सकता है और अपने काम को नये ढंग से कर सकता है। इंगलिस्तान के प्रसिद्ध साहित्यकार बेकन महाशय ने क्रिया और चिन्तन दोनों को प्रगतिशील जीवन के लिये नितान्त आवश्यक बताया है। अरस्तू महाशय के अनुसार सच्चा सद्गुणी मनुष्य बाहरी सफलता से अपने जीवन की मौलिकता को नहीं मापता, वह किसी कार्य की सफलता इस विचार से देखता है कि उसे कहाँ तक मौलिक ज्ञान प्राप्त हुआ। हमारे पुराने ग्रन्थ योगवासिष्ठ में वसिष्ठ जी ने कर्म और ज्ञान को जीव रूपी पक्षी के दो पंख माने हैं। मनुष्य न तो केवल कर्म से और न केवल ज्ञान से ही अपने जीवन को प्रगतिशील अथवा सफल बना सकता है। अच्छा ज्ञान वह है जो कर्म का सच्चा पथ प्रदर्शक बने, जो मनुष्य की विशुद्ध कार्य क्षमता को बढ़ावे। इसी प्रकार कोई भी भला कर्म मनुष्य में नये आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि करता है। सभी कर्मों का अन्त नये आध्यात्मिक ज्ञान की वृद्धि करना है।

जब मनुष्य के जीवन में कर्म और ज्ञान दोनों का साम्य न होकर किसी एक की अत्यधिक वृद्धि होने लगती है तो मानसिक विषमता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यही स्थिति मानसिक रोग की स्थिति है। जो मनुष्य सदा काम में ही लगे रहते हैं, वे आध्यात्मिक चिन्तन की क्षमता को खो देते हैं। ऐसे मनुष्य अपने जीवन की सफलता को बाहरी परिणामों के द्वारा मापने लगते हैं। जैसे-जैसे उन्हें वाह्य संसार में सफलता मिलती जाती है वे आगे बढ़ते जाते हैं। बाहरी सफलता को अपने जीवन की प्रगति का माप-दण्ड बना लेने पर मनुष्य में अहंकार की वृद्धि हो जाती है। फिर वह अपनी सफलता के आध्यात्मिक कारण को भूल जाता है। ऐसी अवस्था में उसकी सूक्ष्म दृष्टि का ह्रास हो जाता है। इसके कारण उसके द्वारा नाना प्रकार की भूलें होने लगती हैं। इन भूलों के कारण को वह अपने आप में न खोजकर अपने से बाहर खोजने लगता है। वह अपनी असफलता का दोष दूसरों के सिर मढ़ने लगता है और जब उसमें दूसरों के प्रति दोष दृष्टि आ जाती है तो वह अपने मित्रों की संख्या घटा लेता है एवं शत्रुओं की संख्या बढ़ा लेता है। जब मनुष्य की दृष्टि सर्वथा लौकिक हो जाती है तो प्रत्येक नये काम के हाथ में लेते ही उसके मन में अनेक प्रकार के सन्देह होने लगते हैं। इन सन्देहों के कारण वह किसी भी काम को पूरी लगन के साथ नहीं कर सकता। फिर वह अपने चारों ओर निराशावाद का वातावरण देखता है। ऐसा व्यक्ति उत्साहहीन होकर क्रिया ही हो जाता है। यदि उसका पूर्व अभ्यास भला हुआ तो वह क्रिया होने पर अपने आप में ही अपनी असफलता का कारण खोजने की चेष्टा करता है। वह अपने अभिमान को त्याग कर अपने आप को किसी महान तत्व के प्रति समर्पित कर देता है। ऐसा करने पर उसमें नया उत्साह आ जाता है। जिस मनुष्य का पूर्व अभ्यास आध्यात्मिकता के प्रतिकूल होता है वह लौकिक विफलता की उपस्थिति होने पर मृत्यु का आवाहन करने लगता है। फिर जैसा कि उसका आन्तरिक मन चाहता है बाहरी घटना भी उसी प्रकार घटित होती है अर्थात् वह अपने आपका विनाश कर डालता है।

जिस प्रकार केवल कर्म मनुष्य के जीवन को प्रगतिशील नहीं बनाता। कर्म के बिना ज्ञान अनुभवहीन होता है, वह पोथी-पण्डित का ज्ञान हो जाता है। कर्म के द्वारा मानसिक भाव परिष्कृत होते हैं। इसके न होने पर मनुष्य को चिन्तन निराशावादी, नकारात्मक और अन्धकारमय हो जाता है। उसकी बुद्धि उसे किसी एक निश्चय के ऊपर नहीं ले जाती। उसे सभी दृष्टि-बिन्दु दोष पूर्ण दिखाई देने लगते हैं। वह सभी वादों में झूठ ही झूठ को देखता है। किसी भी सिद्धान्त से उसे संतोष नहीं होता। ऐसी अवस्था में उसे बाध्य होकर आध्यात्मिक चिन्तन से उदासीन होना पड़ता है। जिस प्रकार कर्म की अवहेलना करके जो व्यक्ति सर्वदा आध्यात्मिक चिन्तन में लगा रहता है, उसे भी ठोस ज्ञान लाभ नहीं होता। सच्चा आध्यात्मिक ज्ञान वह है जो कि अनुभव की भित्ति पर खड़ा हो। यह अनुभव संसार में अनेक प्रकार की परिस्थितियों में पड़ने से, अनेक प्रकार के लोगों के संपर्क में आने से और अनेक तरह के आचरण-व्यवहार में से चलकर पार होने से आता है। जो मनुष्य जान बूझकर अपने मन को कर्म में नहीं लगाता, उसे बाध्य होकर अपने आपको कर्म में लगाना पड़ता है।

संसार के साधारण लोग भोगासक्त और कर्मासक्त होते हैं। आध्यात्मिक ज्ञान की ओर वृत्ति बहुत थोड़े लोगों की होती है, अतएव जितनी आवश्यकता ज्ञानासक्त लोगों को कर्म की आवश्यकता बताने की है, उससे कही अधिक आवश्यकता कर्मासक्त लोगों को ज्ञान में अनुराग रखने की आवश्यकता बताने की है। आध्यात्मिक चिन्तन से मनुष्य अपने आप में निहित मूल शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। मनुष्य की कर्म में सफलता उसके अपने आपके विषय में अर्थात् अपनी मानसिक शक्तियों के विषय में समुचित ज्ञान प्राप्त करने पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्तियों के विषय में जितना ही अधिक सोचता है, वह उतना ही अधिक उन शक्तियों के बारे में ज्ञान प्राप्त करता है। विचार की शक्ति कितनी अधिक है, इसका अनुमान लगाना कठिन है। जब मनुष्य अपने विचार की शक्ति को केवल अपनी बाहरी सफलता से मापता है तो वह एक भारी भूल करता है। हम जो कुछ कार्य बाह्य जगत में कर सकते हैं, वह हमारी वास्तविक कार्य करने की योग्यता को क्षुद्र भाग है। मनुष्य में कितनी कार्य करने की शक्ति है, इसका स्वयं उसे ज्ञान नहीं रहता। वह थोड़ी सी सफलता को ही बहुत सी मान लेता है और फिर वह उसे भी खो देता है।

मनुष्य में किसी बात की कार्य क्षमता उसके आत्म विश्वास (अहंकार नहीं) पर निर्भर करती है। यह आत्म विश्वास सच्चे आध्यात्मिक चिन्तन का परिणाम होता है। जो मनुष्य वर्तमानकाल के कर्तव्य पर ही अपने ध्यान को केन्द्रित करता है और बची हुई शक्ति को आध्यात्मिक चिन्तन में लगाता है, उसका आत्म विश्वास कभी विनष्ट नहीं होता। जो व्यक्ति प्रत्येक काम के सम्बन्ध में आगे पीछे की बात बहुत कुछ सोचता रहता है, जो भविष्य के बारे में अत्यधिक चिन्तित रहता है, वह अपनी बहुत सी शक्ति व्यर्थ की चिंता में खो देता है। ऐसे व्यक्ति का आत्म विश्वास नष्ट हो जाता है। फिर उसकी कार्य क्षमता भी जाती रहती है और उससे अनेक प्रकार की भूलें होती रहती हैं। ये भूलें बिगड़े हुए मानसिक साम्य की प्रतीक हैं। ये मनुष्य अत्यधिक अपनी सफलता से फूलकर लंबी-लंबी योजनायें बनाने लगता है तभी वह अपने मानसिक साम्य को खो देता है। उसकी योजनाएँ अनेक प्रकार की चिन्तायें उत्पन्न करती है, उसके मन में अनेक प्रकार के सन्देह लाती है और इस प्रकार उसकी मानसिक शक्ति का व्यर्थ के आगे पीछे के सोचने में खर्च कर देती हैं। इस प्रकार मनुष्य की सफलता भी उसकी विफलता का कारण बन जाती है।

आध्यात्मिक चिन्तन चिन्ताओं के निवारण का सर्वोत्तम उपाय है। जब मनुष्य का मन नित्य तत्व की पहिचान में लग जाता है तो वह अपने जीवन की आने जाने वाली घटनाओं को उतना महत्व नहीं देता जितना कि वह आध्यात्मिक चिन्तन को देता है। इसके कारण ये घटनाएँ उसके मन को उद्विग्न नहीं करतीं। जब मनुष्य शान्त रहता है तो वह मन की अशान्त अवस्था की अपेक्षा कहीं अधिक काम कर सकता है। मनुष्य भावी अप्रिय घटनाओं के चिन्तन करने से जितना अपनी मानसिक शक्ति को खोता है, उतना अपनी मानसिक शक्ति को काम में खर्च करने से नहीं खोता। मनुष्य की अत्यधिक मानसिक शक्ति अपने में भय उसके जीवन में उन्हीं घटनाओं को घटा देते हैं, जिनसे वह डरता रहता है। इन भयों की उत्पत्ति का कारण वर्तमान कर्त्तव्य को छोड़कर भविष्य के विषय में अत्यधिक चिन्ता करना है। आध्यात्मिक चिन्तन से मनुष्य वर्तमान में रहना सीखता है और इस प्रकार वह अकारण भयों से अपने आपको मुक्त कर लेता है।

आध्यात्मिक चिन्तन मनुष्य को नित्य तत्व की ओर ले जाता है। मनुष्य की शक्ति के ह्रास का प्रधान कारण उसका व्यक्तिगत स्वार्थों के विषय में अत्यधिक चिन्ता करना होता है। जब मनुष्य अपने कार्यों का लक्ष्य अपने व्यक्तिगत स्वार्थ की पूर्ति न बनाकर किसी महान् आदर्श की प्राप्ति बना लेता है तो उसका मन डावाँडोल अवस्था से मुक्त हो जाता है। वह क्षणिक सफलता और विफलता से न तो उल्लसित होता है और न उद्विग्न। जिस मनुष्य के कार्यों का लक्ष्य सभी का कल्याण करना होता है, उसकी कार्य क्षमता अपार होती है। परन्तु अपने कार्यों का लक्ष्य मनुष्य सभी का कल्याण तब तक नहीं बना सकता जब तक कि वह अपने आन्तरिक स्वत्व की सर्वव्यापी तत्व से एकता नहीं देखता। जब मनुष्य यह देखने लगता है कि सभी के कल्याण के बारे में सोचने में ही उसका कल्याण है और सबके हित चिन्तन से उसे वास्तविक सुख और शान्ति प्राप्त हो सकती है, तभी वह अपने वैयक्तिक स्वार्थ को छोड़कर अपने मन को दूसरों के कल्याण के कार्य में लगा सकता है। इसके लिये प्रतिदिन आध्यात्मिक चिन्तन करना नितान्त आवश्यक है। जब तक मनुष्य को यह ज्ञान नहीं होता कि दूसरों का लाभ करके न केवल उसे लौकिक लाभ होता है, वरं उसे आन्तरिक पूर्णता भी प्राप्त होती है, तब तक वह पूरे मन से कभी भी दूसरों के कल्याण के कार्य में नहीं लग सकता।

जो लोग आध्यात्मिक चिन्तन से विमुख होकर केवल लोकोपकारी कार्य में लगे रहते हैं, वे अपनी ही सफलता पर अथवा सद्गुणों पर मोहित हो जाते हैं। वे अपने आपको लोक सेवक के रूप में देखने लगते हैं। ऐसी अवस्था में वे आशा करते हैं कि सब लोग उनके कार्यों की प्रशंसा करें और उनका कहा मानें। अपनी बात को सच्ची मानने की प्रवृत्ति ऐसे लोगों में उत्पन्न हो जाती है। फिर उनका बढ़ा हुआ अभिमान उन्हें अनेक लोगों का शत्रु बना देता है। इससे उनकी लोक-सेवा उन्हें वास्तविक लोकसेवक न बनाकर लोक विनाश का रूप धारण कर लेती है। जिस बात को वे भला समझते हैं उसे वे सब प्रकार के विरोध होते हुए भी करते ही चले जाते हैं। उनकी यह हठधर्मी उन्हें विनाश की ओर ले जाती है। आध्यात्मिक चिन्तन के बिना मनुष्य में विनीत भाव नहीं आता और न उसमें अपने आपको सुधारने की क्षमता रह जाती है। वह भूलों-पर-भूल करता चला जाता है और इस प्रकार अपने जीवन को विफल बना लेता है।


राज्य सफल तभी होगा, जब

(डा. भगवान् दासजी)

भारतवासी आर्यों की मूल धर्मस्मृति मनुस्मृति है। उसके अंतिम (12) अध्याय के अंतिम श्लोकों में, सब कुछ कह चुकने के पीछे, यह कहा है,

मानवस्यास्य शास्त्रस्थ रहस्यमुपदिश्यते। अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत्। यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रू युः स धर्मः स्यादशंकितः॥

अर्थात्, जब यह संशय उत्पन्न हो कि इस नयी अवस्था में क्या नया धर्म, क्या कायदा कानून, होना चाहिये, तो शिष्ट ब्रह्मज्ञानी लोग जो कुछ निर्णय कर दें, वही धर्म माना जाय—यही इस समस्त मानव-शास्त्र का, मानवों के हित करने वाले शास्त्र का, मनु के कहे हुए शास्त्र का, परम रहस्य है, सार है, मूलतत्व और अन्तिम सिद्धाँत है।

इस पुराने वाक्य का नये शब्दों में अर्थ खोलने का यत्न आगे किया जाता है।

“डेमाक्रेटिक सेल्फगवर्मेन्ट”, ”लोकतन्त्रात्मक स्वराज”, ”संघराज्य” का सार इतना ही है कि जनता ने स्वयं जिनका नियोजन, निर्वाचन, वरण, किया हो, वे ही सज्जन कानून बनावें, धर्म व्यवस्थापक सभा जनता की नियोजित हो। संवत् 1985 (सन् 1928) में भारतवर्ष की सर्वदल समिति ने जो स्वराज-योजना बनायी, उसका भी हृदय कहिये, सार कहिये, यही है। धर्म-व्यवस्थापक-

सभा, ”लेजिस्लेचर”, वह सभा जो उन कानूनों को बनाती है जिनके अनुसार देश में जनता को अपना जीवन चलाना पड़ता है, वही राष्ट्र की सच्ची शासक, अथवा राजा कहिए, या केन्द्रीय शक्ति कहिये, होती है और जनता के चुने हुए आदमी ही कानून बनावें, यह इच्छा की जाती है, क्योंकि यह विश्वास स्वाभाविक भी है और गहरी दृष्टि से सत्य भी है, कि जनता के चुने और माने हुए आदमी ही जनता की भलाई साधने वाले कानून बनायेंगे।

राष्ट्र की जनसमुदाय की, समाज की, समृद्धि का एक मात्र आश्रय कानूनों की उत्तमता पर है।

धर्म एव हतोर्हति, धर्मों रक्षति रक्षितः।

कानून ही उनके समग्र जीवन का नियमन-नियंत्रण करते हैं। पर अच्छे कानून तभी बन सकते हैं जब बनाने वाले अच्छे, अनुभवी, परार्थी, विवेकी, धीमान्, सुधी, तत्वज्ञ, दानिशमंद, नेकनीयत, दुनिया, दोस्त, मुहक, हो। अतः स्पष्ट है, और सब तरह के राजनीतिक विचार वाले, सभी सज्जन, इस एक बात को निर्विवाद स्वीकार कर लेंगे, कि राज और समाज की सुख-समृद्धि उनके धर्म व्यवस्था पुरोहितों की आर्यता, सद्भद्धिता, विवेकिता, परार्थिता, सज्जनता पर सर्वथा आश्रित है। उक्त सब गुण पुराने दो शब्दों में आ जाते हैं, तपस्वी और विद्वान्।

इस रीति से ‘निर्वाचित व्यवस्थापक”, “इलेक्टेड लेजिस्लेटर”, तथा “लीडर” इत्यादि शब्दों के पर्याय के रूप से प्राचीन उत्तम “पुरोहित” शब्द का प्रयोग किया जाता तो उस पर जो मल जम गया है वह हैट और उसका जौहर खुलै।

राजा प्रजानाँ स्वामी स्यात्. राज्ञः स्वामी पुरोहितः।

यह सिद्धान्त शुक्र नीति का है। इसका अर्थ यही है कि “लेजिस्लेचर” के द्वारा ‘एकसिक्यूटिव” का नियमन नियन्त्रण हो। “प्रणिधि” और “प्रतिनिधि” शब्दों का प्रयोग भी, ऐसे अवसर पर, पुराने ग्रन्थों में मिलता है।

ऐसी अवस्था में, प्रायः सब सज्जन अंगीर्काम् करेंगे कि यह प्रश्न परम गरिमा का है, कि यथासंभव परिपक्व प्रज्ञा और निःस्वार्थ हृदय के अच्छे अनुभवी सज्जनों का वरण, पुरोधान, निर्वाचन, घर सभा के लिये कैसे हो? राजनीति के समग्र शास्त्र और समग्र प्रयोग का, सब नय और सब चार, सब सिद्धान्त और सब व्यवहार, सब थियरी और सब प्रेक्टिस का सार इतना ही है। इस महाप्रश्न के ही उचित रीति से उत्तीर्ण होने पर समाज के सब विभिन्न प्रकृतियों, शक्तियों, रोजगारों, वयःक्रमों, अवस्थाओं, और साम्प्रदायिक धर्मों के मनुष्यों के सुख का आसरा है।

प्रश्न बहुत कठिन है। तो उसके समाधान में, उत्तर में, और भी अधिक जोर लगाना चाहिये। यह तो मूल सींचने की बात है, अन्य सब बातें भारतीय स्वराज-विधान की अथक अन्य सब पृथ्वी मंडल के शासन-विधानों की, केवल शाखा पल्लव धोने की बातें हैं।

पश्चिम देशों ने इस प्रश्न को अब तक पार नहीं कर पाया, तो पूर्व देश को और भी अधिक आवश्यकता है कि इसके उत्तर को अपनी प्राचनीन सूत्रात्मा के, और शास्त्रीय आगमों के, भीतर गहरा गोता लगा कर खोज निकाले।

इस्लामधर्म का इस राजनीतिक प्रश्न पर कहना है कि

खुदातर्स रा बर रअय्यत गुमार। कि मेमारि मुल्कस्त परहेजगार। ।

“खुदा को चाहने वाले, तथा खुदा से डर वाले, (फारसी के तर्स धातु का, जो संस्कृत के तृष, ष्त का ही रूपांतर जान पड़ता है, दोनों ही अर्थ हैं) धर्म-भीरु, विवेकी, त्यागी, निःस्वार्थी मनुष्य को ही प्रजा के कार्य का प्रबन्ध करने के लिये तैनात करो। क्योंकि ऐसा ही मनुष्य राष्ट्र की इमारत को बनाता है, बिगाड़ता नहीं। ”

सनातन धर्म के स्मृति ग्रन्थों में पुनः-पुनः कहा है कि जनता के हितचिन्तक, सदुपदेशक, ऋषिकल्प, तपस्वी और विद्वान्, परमार्थी और धीमान, मनुष्य ही धर्म का परिकल्पना करें। मनु के मत की सूचना ऊपर करदी गयी है। विस्तार से आगे कहा जायगा।

पूर्व देश ही में उत्पन्न जीसस क्राइस्ट के प्रवृत्त किये क्रिश्चियन धर्म के शब्दों में जिस पदार्थ को “पृथ्वी पर र्स्वगराज्य” कहते हैं, वह राजनीति की सीधी सादी सरल भाषा में “तपस्वी, निःस्वार्थी विद्वानों के बनाये धर्मों, कानूनों, के अनुसार राज्य शासन” ही है।

बहन वर्षों के पीछे सौभाग्य का अवसर आया है कि भारतवर्ष अपने स्वराज्य का विधान करने की सन्नद्ध हुआ है। बहुत अप्रमत्त और सचेत रहना चाहिये, कि ऐसा न होने पावे कि स्वराज की नींव ही अशुद्ध पड़ जाय। इसका दृढ़ और निश्चित प्रबन्ध करना चाहिये कि भारत वर्ष का स्वराज, भारत जनता के (अधम “स्व” का राजन नहीं, प्रत्युत) उत्तम “स्व” का शासन, उत्तम-धर्म-परिकल्पना द्वारा हो, पुश्त दर पुश्त भारत के सब से अधिक अनुभवी और सब से अधिक निःस्वार्थी और लोकहितैषी सपूत ही, यहाँ के धर्मों कानूनों का परि-कल्पन, व्यवसान, व्यवस्थापन करें। यदि इस गंभीर विषय के सम्बन्ध में स्वराज की नींव अशुद्ध डाल दी गयी तो फिर पीछे उसका शुद्ध करना बहुत कठिन होगा, और अशुद्ध नींव पर जो भौम (मंजिल) खड़े किये जायेंगे वे सभी अशुद्ध होंगे।

इन हेतुओं से अत्यन्त आवश्यक है कि कठिनता के कारण इस राष्ट्र प्राण-सम्बन्धी प्रश्न से मुँह न मोड़ा जाय, बल्कि इस पर बहुत ध्यान दिया जाय और परिश्रम किया जाय, और जब तक इसका उत्तर न मिले तब तक इसको छोड़ा न जाय। अन्यथा इस समय की अति-त्वरा का फल आगे चलकर अति दुःखमय चिरविलम्ब हमारे राष्ट्र की प्रगति में अवश्य होगा। बड़े खेद का स्थान है कि जितना समय आजकल निर्वाचितों के साम्प्रदायिक धर्मों और संख्याओं की बहस में गँवाया जाता है, उसका दशमाँश समय भी उनकी बुद्धि और हृदय की दिल और दिमाग की, योग्यता पर विचार करने में नहीं लगाया जाता। साम्प्रदायिक प्रणिधान (“काम्यूनल रेप्रेजेटेशन”) पर जोर देना व्यर्थ है, सर्वांगीण, आँगिक, समाज के मुख्य अंगों के, जीविकाओं, वृत्तियों, रोजगारों, व्यापारों के प्रणिधान प्रतिनिधान, (“फिकेशनल, आक्यूपेशनल, वोकेशनल, रेप्रेजेंटेशन) की फिक्र यदि ऐसा किया जाय तो साम्प्रदायिक संख्याओं के झगड़े आपसे आप सब नीरस होकर मिट जायेंगे।

यदि भारतवर्ष ने इस प्रश्न का ठीक उत्तर खोज निकाला तो वह न केवल अपने स्वराज की नींव शुद्ध और गहरी और अटल डालेगा, किंतु राजनीति-शास्त्र का संशोधन और उत्कर्ष करके पृथिवी मंडल भर के मनुष्य समुदाय की सुख वृद्धि में सहायक होगा।

महात्मा गाँधी को जो अंतर्विकास और दैवी प्रेरणा हुई उसका अनुगमन करके भारतवर्ष ने इधर के समय में संसार को राजनीतिक युद्ध के नये शान्तिमय प्रकारों के नमूने दिखाये हैं। चाहिए कि देशबंधु चित्तरंजनदास के अंतर्विकास और दैवी प्रेरणा की सहायता से अब वह संसार के राजनीतिक सिद्धान्तों में, राजनीति के शास्त्र में, एक अति प्राचीन होते हुए भी अति नवीन सिद्धान्त की वृद्धि करे। भारतवर्ष की सूत्रात्मा में जो अहिंसा और तपस्या, परहेज़ और ज़ौहद के निषेधात्मक अंश हैं, उनका विकास और प्रयोग गाँधी जी ने किया। उसी सूत्रात्मा में विद्या और लोकहित और भूतदया के, इल्म और हुब्बुल्-इन्सानी के, जो विध्यात्मक अंश हैं, उन्होंने देशबन्धु को प्रेरित किया। ये अंश साध्य स्थानी हैं, अहिंसा और तपस् साधन स्थानी हैं। अतः इस लेख के समग्र प्रतिपाद्य का मूल सूत्र इतना ही है कि धर्म परिषद् के पार्षद, कानून बनाने वाली मजलिस के मेम्बर, राजनीतिक पुरोहित, में अहिंसा बुद्धि और तपस् भी हो, तथा विद्या और लोकहितैषिता भी हो, इसके उपाय खोजना चाहिए।

भारतवर्ष की स्वराज-योजना में और जो कुछ हो या न हो, निर्वाचन के उम्मीदवारों के वरणाकाँक्षियों के, लिए कुछ विशेष गुणों की योग्यताओं की, शर्तें लगा दी जानी चाहिए।

पच्छिम के देशों में, राजनीतिक के इतिहास में, निर्वाचकों की योग्यता पर तो बहुत विचार किया गया है, पर जहाँ तक मालूम पड़ता है, निर्वाचितों की क्या विशेष योग्यता होनी चाहिए, इस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया गया है। सर्द्धम परिकल्पना का, अच्छे, कानून बनाने का काम बहुत नाजुक, बहुत कठिन, बड़ी जोखिम का है। इस काम के लिए बहुत आगे-पीछे देखने की कार्य-कारक के सम्बन्धों के बहुज्ञान की, बहुदर्शिता और दूरदर्शिता की, बहुत आवश्यकता है, यदि एक भी धर्म, एक भी प्रभूत कानून, दोषवान् बन गया, तो उसके असर से प्रभाव से, उसके कार्यरूप बहुत से दोष दूर-दूर तक पैदा होंगे। इसलिए आवश्यक है कि धर्मसभा में, “लेजिंस्लेचर” में, समाज के सब मुख्य 2 विभागों के विशिष्टतम ज्ञान और अनुभव रखने वाले मनुष्य एकत्र होकर सब विभागों के हितकारी धर्म बनावें। निर्वाचकता के अधिकार को फैलाने के लिए निर्वाचकता के अधिकार की योग्यता यहाँ तक कम की गयी है कि बहुतेरे, अन्य देशों में तथा उक्त सर्वदल समिति की बनायी भारतवर्षीय स्वराज योजना में, केवल इक्कीस वर्ष की उमर ही पर्याप्त मान ली गयी है। पर निर्वाचित की योग्यता की, जिसकी आवश्यकता निर्वाचक की योग्यता की अपेक्षा बहुत अधिक है, कुछ चर्चा ही नहीं की है। जिन कानूनों का प्रभाव दूर 2 समाज के जीवन के अंग-प्रत्यंग पर, सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल बातों में, पड़ने वाला है, उन कानूनों के बनाने वाले का चुनाव प्रायः अनभिज्ञ जनसमूह की समझ पर छोड़ दिया गया है और उस समझ को अच्छा रास्ता दिखाने का, ऐसी सलाह देने का कि जिससे अच्छे आदमी चुनने में उसको सहायता मिले, कुछ भी यत्न नहीं किया गया है। प्रत्युत अच्छी सलाह सद्दिर्ग्दशन, सन्मार्गोपदेश, के स्थान में प्रसिद्ध है कि इस महाजन-समूह को निर्वाचन के दिनों में, दुरुपदेश् दिया जाता है, साम-दान-दण्ड-भेद सभी नीतियों का प्रयोग किया जाता है झूठी बातें बतायी जाती हैं, प्रलोभन और धोखा और धमकी दी जाती है तरह-तरह का धन और शक्ति का अपव्यय और दुरुपयोग करके उनसे अयोग्य व्यक्ति चुनवाये जाते हैं, निर्वाचकों के भी और निर्वाचितों के भी स्वभाव और आचार बिगाड़े जाते है और दोनों में स्वार्थ और अनाचार की वृद्धि होती है, जिससे चिरकाल के लिए परस्पर द्रोह, आपस की दुश्मनियाँ, पैदा हो जाती हे, और वर्ग-वर्ग का घोर विरोध अधिकाधिक बढ़ता है, और दुष्ट धर्मों का नाकिस कानूनों का, परिकल्पन, धर्मसभा में होता है। सर्वदल समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में, इंगलिस्थान के निर्वाचकों के सम्बन्ध में इन महादोषों की चर्चा की है, पर भारतवर्ष में भी उसी प्रकार के निर्वाचन का प्रचार करने का परामर्श देते हुए भी, इन अति हानिकर किल्बिर्षो के प्रतीकार का कोई भी उपाय बताने का यत्न तक नहीं किया है।

इस भयंकर आपत्ति को यथाशक्ति रोकने के लिए, और स्वयं सर्वदल कमेटी के निवेदन पत्र में सूचित घोर आशा भंग से बचने के लिए, स्वराज विधान में कुछ इस प्रकार के नियम रख देना चाहिए, यथा,

1-प्रत्येक निर्वाच्य, वरणीय, पुरोधेय, योग्यता (गुण) होनी चाहिए,

(क) समाज के इन चार मुख्य धर्मों (अंगों, कार्यों) में से किसी एक का वह विशिष्ट अनुभवी हो। (1) ज्ञान-विज्ञान (2) शासन-कर्म (रक्षा और प्रबंध-कर्म), (3) धन-धान्योत्पादन, अर्थात् कृषि, शिल्प (कर्मान्त, यंत्रकर्म, कारुकर्म, उद्योग, धन्धा) वाणिज्य-व्यापारादि, (4) शरीरश्रम (श्रमजीविता, मजदूरी),

(ख) सामाजिक जीवन के किसी विभाग में उसने अच्छा काम किया हो, और सद्बुद्धिता, आर्य-बुद्धिता (ईमानदारी, नेकनीयती), और लोक-हितैषिता (लोक सेवा) का सुयश (नेकनामी) कमाया हो ।

(ग) उसके पास इतना अवकाश (फुर्सत) हो कि धर्मसभा के काम को अच्छी तरह से कर सके, और जीविकासाधन (रोटी कमाने) अथवा धनसंचयन के कार्यों से निवृत्त हो चुका हो, पर ऐसी निवृत्ति अनिवार्य न होगी।

(2) ”केन्वेसंग” वोट माँगना, साक्षात् अथवा परोक्ष रूप से (व्याज से), अयोग्यता का हेतु समझा जायगा (अर्थात् उमेदवारी से खारिज, च्युत, पतित, कर देगा), पर निर्देशकों (नामजद् करने वालों) को अधिकार होगा कि निदिष्ट (निर्वाच्य) के गुणों की घोषणा कर दें।

(3) धर्मसभा के किसी सदस्य को कोई नकदी पुरस्कार या वेतन सभा का काम करने के बदने में न दिया जायगा, उस कार्य के लिए उसका जो कुछ विशेष व्यय हो, यथा सफर-खर्च, मकान का किराया, आदि वह सब उसको सरकारी खजाने से, राष्ट्र -कोष से दिया जायगा, और विशेष सम्मान के चिन्ह भी उसको दिए जायेंगे।

इन शर्तों के हेतु तो प्रायः स्वयं प्रकाश हैं। मानव समाज मात्र के जो मुख्य चार प्राकृतिक अंग हैं। उनमें से प्रत्येक अधिकतम अनुभव रखने वाले और भद्रतम सज्जन धर्म सभा में जायँ और धन के लोभ से, ऐश्वर्य और अधिकार के लोभ से, विनोद और मन बहलाव की आशा से वर्ग प्रशंसिता और अपने ही वर्ग की वृद्धि की इच्छा से, राजनीति को एक रोजगार बना लेने के लिए, अथवा अन्य ऐसी किसी ऐषणा से प्रेरित होकर, न जायँ। किन्तु एक मात्र लोक सेवा भाव से, जनता के सब अंगों का हित साधने की इच्छा से, देश का बोझ उठाने की बुद्धि से, जायँ और इस बड़े कार्य के बदले में, वृद्धोचित विशेष आदर सम्मान, उनके हृदय के तर्पण आध्यायन के लिए, उसको अवश्य दिया जाय। यही उनको गुरु कार्यभार उठाने के लिए प्रलोभन, प्रोत्साहन, आराधन, राजी करने का उपाय है।

इस विषय में भारतवर्ष का प्राचीन विचार, निगम और आगमन, माकूलात व मनकुलात, वेद और समृति, क्या था, इसकी सूचना के लिए आर्य ग्रंथों से कुछ वाक्यों का उद्धरणा इस स्थान पर किया जाता है। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृतविचिकित्सा वा स्यात्, ये तत्र श्रेयाँसो ब्राह्मणाःअलूक्षाःसंमर्शिनः धर्मकामाः स्युः, यथा ते तत्र वर्तेरंस्तथा तत्र वर्तेथाः।

(तैत्तिरीय उननिषत्)

अर्थात् कब, क्या करना चाहिये, कैसे बरतना चाहिये, इस अवस्था में क्या धर्म है, ऐसी शंका उत्पन्न हो तो श्रेष्ठ ज्ञानवान् और सच्चरित्रवान् सज्जन, जो अलूक्ष, अरुक्ष, रूखे नहीं, आर्द्र, कोमल, अनुकम्पक हृदय वाले और अ-मर्शी (र्षी) नहीं, समर्शी (र्षी) मर्षणशील, (मर्शनशील), विचार करने वाले और सहन करने वाले, रवादार और गौरपमंद, “टालरंट” और “थाटफल” भी हों, वे जैसा ऐसे मौके पर करने को कहें और करें, वैसा ही करना चाहिये।

शाँतिपर्व के अ॰ 83-85 में विस्तार से वर्णन किया है कि सभासद्, अमात्य, मन्त्री, में कौन-कौन गुण होने चाहियें और कौन-कौन दोष न होने चाहियें।

“श्रेयसो लक्षणं चैतद् विक्रमो यस्य दृश्यते, कीर्तिप्रधानो यश्च स्यात्समये यश्चं तिष्ठति, पौरजनापदा यस्मिन् विश्वासं धर्मतो गताः, थोद्धा नयविपश्चिञ्च, स मन्त्रं श्रोतुमर्हति” इत्यादि

निष्कर्ष यह कि पुरवासी और जनपदवासी जनता में जिसकी सत्-कीर्ति हो, और जिस पर उनका विश्वास हो, और जो कीर्ति का ही विशेष अभिलाषी हो, धन का नहीं, वह मन्त्री, सभासद, होना चाहिये।

शुक्रनीति में भी श्लोक है,

“उत्तमा मानमिच्छति, धनमानौ तु मध्यमाः, अधमा धनमिच्छति, मानो हि महताँ धनम्”

‘धनमातो” के स्थान पर ‘आज्ञाशक्ति “ पढ़े, तो उपनिषदुक्त लोकेषणा, अर्थात् सम्मानेच्छा, ऐश्वर्येषणा जिसमें दारसुतैषणा अंतर्गत है, और वित्तैषणा से इस श्लोक का सामंजस्य हो जाय। संन्यासी के लिये सम्मानैषणा भी उचित नहीं। इसीलिये संन्यासी को धर्मपरिषत् में स्थान भी नहीं। पर जो व्यवहार से सर्वथा पृथक् नहीं हुआ है, उसको “यशसि चाभिरुचि” अनुचित नहीं। और भी, यदि वह स्वयं सम्मान न भी चाहे, तो भी लोग उससे काम लेते हैं, उस पर धर्म विचार का बोझ रखते हैं, उनका तो कर्तव्य है कि उसको सम्मान दें, “अवमंता विनश्यति” और उससे प्रार्थना करें कि आप हम लोगों का काम सम्हालिये। इसी में दोनों की शोभा है। न यह कि उलटे वह उनसे प्रार्थना करे कि हमको काम सौंपिये। यदि ऐसा करे तो अवश्य स्वार्थी है, और काम बिगाड़ेगा, उसकी नीयत छोटी और खराब है।


छह महान् सद्गुण

(स्वर्गीय महामना पं॰ मदन मोहन मालवीय)

सत्येन ब्रह्मचर्येण व्ययामेनाथ विद्यया। देशभक्त्यात्मयागेन समभाईः सदा भव॥

सत्य वचन, ब्रह्मचर्य धारण, व्यायाम, विद्याध्ययन, देशभक्ति और आत्म त्याग के द्वारा सम्मान के योग्य बनो। मैं चाहता हूँ, प्रत्येक छात्र इस श्लोक को अपने इस हृदय पर अंकित करें और उसी के अनुसार आचरण भी रखे। इस श्लोक का भाव भारत नहीं, अपितु समस्त संसार के लिए लाभप्रद है। संसार न सही तो भारतवासी, उनमें भी विशेषतः हिन्दू सन्तान मात्र का अनिवार्य कर्त्तव्य हैं कि वे इस श्लोक में उल्लिखित छः गुणों का पालन करके अपने मानव जन्म को सफल करें।

1—सत्य

सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं, ‘सत्यान्नास्ति परो धर्मः’ ‘सत्यमेव जयते, नानंत’ सत्य की ही विजय होती है, झूठ की नहीं। महाभारत, रामायण और पुराणों के पढ़ने से पता चलता है कि राजा हरिश्चंद्र, रामचन्द्र, युधिष्ठिर आदि अनेक सम्राटों ने सत्य के पीछे नाना प्रकार के सीमातीत कष्ट उठाये, पर सत्य से नहीं डिगे। आर्य जाति की विशेषता को संसार के समस्त ऐतिहासिकों ने श्रद्धा भरे शब्दों में माना है। मैं आशा करता हूँ कि हमारे देश के प्राणरूप हिन्दू बालक अपने पूर्वजों की इस पवित्र और आदर्श धरोहर की रक्षा करेंगे। सच बोलने का अर्थ है अपने जीवन का सबसे बढ़कर कीमती काम करना। प्राचीन काल में आश्रमों में 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्या पढ़कर जब छात्र अपने घरों को चलते थे तो ऋषिगण सबसे पहला उपदेश यही देते थे कि ‘सत्यं वद’ ‘सच’ बोलना। इस गुरु-प्रदत्त उपदेश की अमिट छाप उनके जीवन भर एक दिव्य ज्योति जगाये रखती थी। किसी ने ठीक ही कहा है—

‘साँच बरोबर तप नहीं, झूठ बरोबर पाप। जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।

शास्त्रों में असत्यवादियों को बड़ी-बड़ी दुर्गति लिखी है जिसकी कल्पना से भी रोमाञ्च हो उठता है, भोगना तो बहुत दूर की बात है। सच बोलने वाले का सिर ऊंचा रहता है, चेहरा प्रसन्न और निर्भय रहता है; और झूठ बोलने वाले को लज्जा के मारे सभ्य समाज में मुँह दिखलाना मुश्किल हो जाता है। मेरा वश चले तो मैं भी भारतीयों के लिये ‘नियमित सत्यवादी बनना’ अनिवार्य कर दूँ। फिर भी अपने पूर्वजों के इस आदर्श व्रत को हमें एकदम भूल जाना चाहिये। जिससे जितना भी हो सके इस पथ पर चले।

सताँ वर्त्मानुगन्तब्यं कृत्स्नं यदि न शक्यते, स्वल्पमप्यनुगन्तब्यं मार्गस्यो नावसीदतिं।

सज्जनों के मार्ग पर यदि पूर्णतया न हो सके तो थोड़ा भी चलना चाहियें, क्योंकि पथ पर चलते रहने वाला कभी कष्ट नहीं पाता।

अब भी अन्य देशों की अपेक्षा हमारे देश में सत्य बोलने का महत्व अधिक है। भगवान् वह दिन शीघ्र दिखलावे जब कि दुनिया के लोगों का यह विश्वस्त मत हो जाये कि ‘भारतवासी झूठ बोलना जानते ही नहीं। ’ मेरे देश के भविष्य-कर्ण-धारो! क्या तुम मेरे सुनहले स्वप्न को सत्य करोगे?

2—ब्रह्मचर्य

ब्रह्मचर्य की महिमा को कौन बखान सकता है।

‘ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नत’

देवताओं ने ब्रह्मचर्य के द्वारा मृत्यु को जीत लिया! एक ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य के बल पर अधिक से अधिक समय तक जीवित रह सकता है, असाध्य से असाध्य कार्य को कर सकता है। ‘भीष्म-पितामह’ का दृष्टान्त प्रसिद्ध है उनकी ‘इच्छा मृत्यु’ हुई थी। ब्रह्मचर्य बल, बुद्धि और विद्या का परम सहायक है। चिन्ता और भय, ये ब्रह्मचारी का कुछ बिगाड़ नहीं सकते। हिन्दू जाति के इतिहास का पन्ना-पन्ना ब्रह्मचर्य के ज्वलन्त आदर्शों से भरा पड़ा है। ब्रह्मचर्य के लिए एक स्थान पर कहा गया है।

धन्यं यशस्यामायुष्यं लोकद्वयरसायनम्, अनुमोदामहे ब्रह्मचर्य नित्यकल्मषम्।

अर्थात् ब्रह्मचर्य धन्य, कीर्ति का देने वाला, लोक-परलोक दोनों को बनाने वाला उत्तम रसायन, आयु बढ़ाने में समर्थ और नित्य-निरन्तर पुण्यमय है। आज ब्रह्मचर्य के अभाव से ही हमारे देश की दशा दीन-हीन है। यदि ब्रह्मचर्य के प्रभाव का प्रत्यक्ष फल देखना हो तो महावीर हनुमान का स्मरण करिये। इष्टदेव के समान उनको पूजिये; फिर देखिये उनका प्रभाव। आज भी प्रत्येक पहलवान ‘जय बजरंगबली’ की हुँकार के साथ अपने अन्दर अकूत ताकत का अनुमान करता है। वास्तविक बात तो यह है कि उनके जैसा इन्द्रिविजयी दूसरा है ही नहीं। अखाड़ों की तरह ही स्कूलों, कालेजों, पाठशालाओं, विश्वविद्यालयों या सर्वत्र शिक्षा-संस्थाओं में महावीर जी का चित्र होना चाहिये। इससे बालकों और तरुणों में उत्साह का भाव पुष्ट होगा। ब्रह्मचर्य और सेवाधर्म इन दोनों का अपूर्व संयोग उनमें है। मेरा तो विश्वास यह है—

‘महावीर को इष्ट है ब्रह्मचर्य का नेम, दृढ़ता अपने धर्म में सारे जग से प्रेम। ’

ब्रह्मचर्य, स्वधर्म में दृढ़ता और विश्व-प्रेम इन तीनों का मूलमन्त्र महावीर हनुमान में है। उचितता यह है कि ब्रह्मचर्य की भावना को पूर्ण रूप से व्याप्त करने के लिए भारत के गाँव-गाँव में महावीर दल और अखाड़े स्थापित किये जायं; जिससे अटक से कटक तक तरुणाई का समुद्र उमड़ पड़े। दीन-दुखियों, असहाय अबलाओं, मन्दिरों गौओं, ब्राह्मणों-गरज यह कि हिन्दुत्व की मान-रक्षा हो। बहू-बेटियों पर कोई आँख न उठा सके। हिन्दू जाति के बच्चे और युवक मालिक की तरह चलें; गुलाम की तरह नहीं।

3—व्यायाम

मैं प्रत्येक भारतीय युवक, विशेषकर हिन्दू समाज, से प्रार्थना करता हूँ कि वह व्यायाम की प्रथा को फिर से गाँव-गाँव में चला दे। शरीर में स्वास्थ्यरुपी सोने को चमकाने के लिए व्यायाम एक कसौटी है। व्यायाम करने से शरीर तगड़ा, हृष्ट-पुष्ट होता है और व्यायामी पुरुष अपने उद्देश्यों को दृढ़ संकल्प होकर पूरा-पूरा कर सकता है! व्यायाम के लिए एक स्थान पर कहा गया है—

शरीरयासजननं कर्म व्यायामसंज्ञितम्, तत्कृत्वा ससुखंदेहं विमृद्रीयात्समन्ततः।

शरीर को परिश्रम से थका देना ही व्यायाम है, उसको करके मनुष्य शरीर को सुख पूर्वक माँसल और मजबूत बना सकता है। आजकल कुछ व्यायाम प्रेमी, विदेशी व्यायाम करते हैं, यह ढंग ठीक नहीं। एक तो यह ‘स्वदेशी’ नहीं, दूसरे व्यय-साध्य होने से सब के लिए सुलभ भी नहीं है। हमारे देश के व्यायाम की यह विचित्र खूबी है कि वह सस्ता होने के साथ-साथ सभी हालत में सुविधाजनक भी है इसमें मुग्दर, लाठी बनेठी, गदका से लेकर डण्ड-कसरत, गुल्ली—डण्डा ओल्हा-पाती, चिकई-कबड्डी, दौड़, तक शामिल है। व्यायामी और अव्यायामी सभी को गो-दुग्ध पीने का व्रत लेना चाहिये और भीगे भुने चने के लिए कहना ही नहीं है। मनुष्य के लिए गोदुग्ध से बढ़कर संसार में और कोई चीज इतनी उपयोगी नहीं। गोदुग्ध में ही यह विशेषता है कि उसको पीने वाला मनुष्य अन्य कुछ भी न खाकर जीवित रहते हुए कार्य क्षम रह सकता है। दुग्ध जैसे अमृततुल्य आयु-आरोग्य दायक वस्तु को देने के कारण ही गौ ‘माता’ के समान पूजी जाती है। दूध व्यायाम का परम सहायक मित्र है। मेरा कहना तो यह है—

‘दूध पियो कसरत करो नित्य जपो हरिनाम हिम्मत से कारज करो पूरेंगे सब काम।

दूध पीने और व्यायाम करने से मनुष्य पराक्रमी बनता है, वीर्यशाली बनता है। पराक्रम और वीर्य से हीन पुरुष, सब गुणों से युक्त होकर भी कुछ नहीं कर सकता इस भाव का श्लोक भी है—

‘सर्वेर्गुणेः सुयुक्तोऽपि निवीर्य्यः किं करिष्यति गुणीभूता गुणाः सर्वे तिष्ठन्ति हि पराक्रमे।

यह भी कहा गया है कि नित्य नियम से व्यायाम करने वाले और तलवे में तैल लगाने वाले पुरुष से रोग वैसे ही भागते हैं जैसे सिंह के भय से क्षुद्र मृग। इस भाव का श्लोक यह है—

व्यायाम कुर्वतो नित्यं पद्भ्यामुद्वर्त्तितस्य च। व्याघयो नोपसप्न्ति सिंहात् क्षुद्र मृगा इव।

4—विद्या

विद्या का महत्व भी क्या बतलाना पड़ेगा? लिखा है—

विद्या ददाति विनयं, विनयाद्याति पात्रताम्। पात्रत्वाद् धनमाप्नोति धनार्द्धम, तत सुखम्।

विद्या मनुष्य को विनय देती है, विनय से योग्यता मिलती है, योग्यता के द्वारा धन प्राप्त होता है, धनादि से धर्म और फिर धर्म से सुख मिलता है, यह है विद्या का चमत्कार! विद्या से हीन मनुष्य पशु के तुल्य है; विद्या पढ़ने से पशुता छूट जाती है। ‘यह बुरा है, यह भला है’ की विवेचक बुद्धि हो जाती है। वेदों में विद्वानों को देव स्वरूप कहा गया है। आजकल के शिक्षालयों के विद्यार्थी गरीब माता-पिता के कष्ट पूर्वक भेजे गये रुपयों का व्यय खेल-तमाशा नाटक-सिनेमा आदि चरित्र-नाशक कार्यों में कर डालते हैं, यह बहुत ही दुःखद बात है। हृदय—हीनता का इससे बढ़कर दूसरा उदाहरण क्या हो सकता है। सदैव परिश्रम करके गुरुभक्ति-पूर्वक विद्या पढ़ना चाहिये, ऊँची से ऊँची श्रेणी में परीक्षा पास करना चाहिये। धर्म और चरित्र से हीन कुशिक्षा की ओर दृष्टिपात भी नहीं करना चाहिये। इस सारा जीवन सुखपूर्वक होगा।

5—देशभक्ति

अगर मनुष्य में विश्व के समस्त गुण आ जायं और देश भक्ति न हुई तो कुछ नहीं हुआ। अपने देश के प्रति मान भाव न रखने वाले मनुष्य के लायक नीच से भी उपाधि देना कम है। आदर्श मर्यादा पुरुषोत्तम रामचन्द्र ने जननी-जन्मभूमि को स्वर्ग से बढ़कर बतलाया है। अब कहना क्या शेष रहा?

जो देशभक्ति आ जावै, तब सब स्वारथ भग जावें। ’

देशभक्ति से बढ़कर कोई पुण्य नहीं है। पुराने समय की बात को जाने दीजिये। इधर के इतिहास में भी शिवाजी, गुरुगोविन्द सिंह, राणा प्रताप आदि देशभक्ति ही के कारण अजर-अमर हो गये हैं।

‘स्वारथ तजि जो देश की सेवा करैं उदार, धन्य पुरुष वे रत्न हैं मनुजन के सरदार। ’

भगवान् की कृपा से हम लोगों को तो देश भी ऐसा ही मिला है जहाँ के लिए देवगण तरसते हैं। मीठी-मीठी नदियाँ, गर्जनशील नाले, स्वच्छ पहाड़ी झरने रंग-बिरंगे फूल, अमृततुल्य फल सुहावने जंगल, आकाश के दर्पण के समान समुद्र, सुषमा के निकुंज से गिरि, ये सब दृश्य, पूर्व जन्म के सुकृत के ही फल हैं। आज भी धनबल, जनबल विद्याबल, प्रज्ञाबल, में भारत अद्वितीय है। फिर भी एकमात्र एकता के अभाव से पराधीन रहा। देशोन्नति के काम में आलस्य छोड़कर शीघ्रातिशीघ्र एका कर लेना पड़ेगा। तभी काम चलेगा।

सब मिलि बोलो एक आवाज, अपना देश अपना राज। ’

उठो। देशभक्ति की दीक्षा लो। भगवान् सब मंगल करेंगे।

6—आत्मत्याग

यह अन्तिम छठा गुण है। लेकिन सबसे अधिक महत्व रखता है, कोई भी काम करो, तन-मन-धन से करो, यही आत्म त्याग या आत्मसमर्पण है। निस्वार्थ, निरालस्य और निश्चिन्त होकर देश के, धर्म के और समाज के हित के लिए काम करना मनुष्य की शोभा का बढ़ाता है।

ये ही छः गुण हैं। भारत के प्रत्येक बालक बालिका और तरुण-तरुणी जनों के लिए मेरा सन्देश है कि वे इन गुणों से युक्त होने का व्रत लें। इससे वे अपना ही नहीं अपने देश की काया पलट सकने में सर्वथा समर्थ होंगे; यह मेरा दृढ़ विश्वास है। आजमा कर देखिए। दीन मत बनो। ‘हिन्दू गऊ होते हैं’ इस अपवाद को साबित करो। अब तो साँड़ भाँति बलिष्ठ निर्भीक और साहसी बनो। स्वराज्य का उपभोग करने के लिए तैयार रहो। आततायी के अत्याचार का बदला लेने का सामर्थ्य रखो। हिन्दुओं का भविष्य बहुत अच्छा है। गाँव-गाँव प्रतिदिन रात को 8 बजे सब काम से निपट कर किसी पुराण की कथा या गोस्वामी तुलसीदास के ‘अखण्ड खजाना’ रामायण से कुछ कहो सुनो। मेरा हृदय से आशीर्वाद है कि भगवान तुम्हें सफलता दें।


आत्म कल्याण का एक महान् सूत्र:-’भूल जाओ’

(श्री॰ अगरचन्द नाहटा, बीकानेर)

विश्व विविधताओं का भंडार है जगत के सारे व्यवहार सापेक्ष होते हैं इसलिए बहुत सी बातों के सम्बन्ध में एक ही कार्य के विधि-निषेध के वाक्य शास्त्रों में मिलते हैं। एक दृष्टिकोण से एक कार्य ठीक है तो दूसरे व्यक्ति, परिस्थिति और दृष्टि से वह ठीक नहीं मालूम देता। अपितु उसके ठीक विरोधी कार्य की वहाँ उचिचता होती है। योगी और भोगियों का मार्ग अलग अलग है। देह और आत्मा भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं। भोगी का लक्ष्य बहिर्जगत की ओर होता है तो योगी का अंतर्जगत की ओर। बहुत सी बातें जो बहिर्मुखी प्राणियों के लिए जरूरी होती हैं अंतर्मुखी के लिए वे त्याज्य रहती है। इसलिए प्रत्येक विधि-निषेध के वाक्य को सापेक्ष दृष्टि सं ही विचार कर उसे विवेकपूर्वक जीवन में स्थान देना चाहिए।

मनुष्यों की रुचि, प्रकृति आकृति, भाषा, ध्वनि, परिस्थिति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है अतः सभी बातें सब के लिए एक-सी लागू नहीं की जा सकती। तत्वज्ञों ने इसीलिए धर्म के भिन्न-भिन्न मार्ग प्राणियों की योग्यता, रुचि व परिस्थितियों को देखते हुए बतलाये हैं। जिनको जिस पथावलम्बन से शान्ति, सुख, आनन्द और अभ्युदय प्राप्त हो उनके लिए वही मार्ग प्रशस्त है। बालक अवस्था में जो बातें उसके लिए उचित है वही यौवन और वृद्धावस्था में अनुचित भी हो जाती हैं। सर्दी के मौसम में मोटा कपड़ा पहिनना आवश्यक है पर गर्मी में यह प्रतिकूल हो जाता है।

इसलिए प्रत्येक पथ पर विवेक की आवश्यकता होती है।

साधारणतया लोक व्यवहार को सुव्यवस्थित रूप से चलने के लिए तीव्र स्मरण शक्ति की आवश्यकता होती है। अच्छी और बुरी बातें और घटनाएं दीर्घ काल तक याद रखना आवश्यक हो जाता है। अनुभवों के थपेड़ों से मनुष्य बहुत शिक्षा पाकर आगे बढ़ता है अतः एक दूसरे के सम्बन्ध, व्यवहार, लेन देन आदि की याददास्ती जरूरी होती है। धार्मिक व्यक्तियों को भी शास्त्रों को याद रखना जरूरी होता है। विस्मरणीय मनुष्य अच्छा नहीं समझा जाता पर एक स्थिति जीवन में ऐसी भी आती है, जिसमें सब बातों को “भूल जाना’ ही कल्याणकारी माना जाता है।

पूर्वकालीन घटनाओं की स्मृति और प्राणियों के साथ घटित विविध व्यवहारों से रागद्वेष उत्पन्न होता है। अपने प्रियजन के अनुकूल प्रसंगों की स्मृति से रागभाव बढ़ता है और विरोधी व प्रतिकूल व्यक्ति व घटनाओं की स्मृति से द्वेष भाव जागृत हो जाता है इसलिए वीतराग भाव के इच्छुक पुरुषों के लिए अनुकूल और प्रतिकूल सभी बातें विस्मरण योग्य हो जाती है। जो होना था हो गया, उसे याद कर राग-द्वेष का उदय करना बन्धन का हेतु है। समय-समय पर परिस्थिति वश अनेकों व्यक्तियों से प्रेम और द्वेष हो जाता है पर जब आध्यात्मिकता की ओर कदम बढ़ाया जाता है तो समस्त जगत के साथ स्नेह और द्वेष के बन्धन समाप्त कर देना आवश्यक हो जाता है। शास्त्रों के वाक्य इसलिए याद रखना आवश्यक हो जाते हैं कि जीवन में उनसे सतत् प्रेरणा मिले पर एक स्थिति ऐसी भी होती है जब चित्त’सम’ हो जाता है तो उसे किसी चीज की विचारणा व स्मृति नहीं रह जाती। संकल्प-विकल्प, उहा-मोह, चित्त की चञ्चलता के द्योतक हैं। उससे ऊपर की स्थिति है “निर्विकल्प समाधि”। वहाँ पूर्ण समता और शाँति प्राप्त होकर जीवन मुक्त स्थिति प्राप्त दशा वर्तने लगती है उसके लिए सबको ‘भूल जाओ’ यही सुगम व प्रशस्त पथ है। पहले बुरे को भूले, फिर अच्छे को यदि स्मरण शक्ति श्रेष्ठ गुण है तो ‘भूल जाना’ उससे भी ॐ ची और श्रेष्ठ स्थिति है।

हमारा जीवन भूतकाल की घटनाओं, परिस्थितियों एवं चेष्टाओं से आच्छादित रहता है। उनके संस्कार अंतर्मन में गहराई तक घुसे रहते हैं। यही संस्कार जन्म जन्मान्तरों तक राग और द्वेष के भव-बन्धनों में जकड़े रहते हैं और प्राणी बारबार जन्मता-मरता रहता है। अतीत को विस्मृति के गर्त्त में धकेल कर हम उन संचित स्वभावों और संस्कारों से बहुत हद तक छुटकारा पा सकते हैं और बालक वत् सरल हृदय बनने के महान् आध्यात्मिक लक्ष्य को प्राप्त करने सरलतापूर्वक आगे बढ़ सकते हैं। जैन धर्म ग्रन्थों में इस ‘भूल जाओ’ के आध्यात्मिक तथ्य पर बहुत जोर दिया गया है। पूज्य संत श्री गणेश प्रसाद जी इस ‘भूल जाओ’ की शिक्षा पर बहुधा अधिक बल देते हैं। वस्तुतः आत्मिक प्रगति के लिये यह एक महत्वपूर्ण मार्ग है।


त्याग का असाधारण महत्व

(श्री॰ लक्ष्मी नारायण जी बृहस्पति)

संसार के किसी भी पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कर लेने पर उसका त्याग ही अत्यावश्यक हो जाता है, क्योंकि साँसारिक-पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त न होने के कारण ही उनके प्रति राग रहता है।

इसीलिये रागी, अज्ञानी होता है और त्यागी, ज्ञानी होता है। जिस प्रकार मक्खियाँ मधु से चिपटती रहती हैं, चींटे मिठाई में लिप्त रहते हैं, उसी प्रकार अभागे जीव भी संसार के विविध विषयों में लिप्त रहते हैं। वे जब तक उनका त्याग नहीं करते तब तक सद्विवेक अथवा सद्ज्ञान रूपी अभ्युदय के धनी नहीं होते तथा सद्ज्ञान के अभाव में वास्तविक प्रगति मार्ग के पथिक नहीं बन पाते।

राग का पथ भोग से, भोग रूपी अन्धकार से ओत-प्रोत है जो अहर्निश साँसारिक-बन्धनों में जकड़ने का ही कार्य करता है और त्याग का पथ योग रूपी प्रकाश में होकर जाता है जो परमोत्कृष्ट सत्य की असीम महानता में पहुँचा देता है।

वह सत्य रूपी असीम परम तत्व विश्व का आधार है, उसका पूर्ण ज्ञान मानव-बुद्धि द्वारा हो ही नहीं सकता। वह ऐसा विलक्षण है कि स्वयं तो दिखाई नहीं देता, किन्तु उसी के द्वारा सब कुछ देखा जाता है। वह स्वयं तो सुनाई नहीं देता, परन्तु उसी के द्वारा सब कुछ सुना जाता है। वह स्वयं तो मनन, चिन्तन में आता नहीं है लेकिन उसी के द्वारा सब कुछ मनन, चिन्तन किया जाता है। वह स्वयं तो पहिचानने में आता नहीं प्रत्युत उसी के द्वारा सब कुछ पहिचाना जाता है।

बिना उसके न कोई देखने वाला है, न कोई सुनने वाला है, न कोई सोचने वाला है, न जानने अथवा पहिचानने वाला है। वही सबका अन्तर्यामी परमात्मा है। उसके बिना सब मिथ्या है। वही सूत्रात्मा होकर सबको बाँधे हुए है।

अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी आदि तत्व उसी के सहारे समष्टि रूप से सृष्टि मय और व्यष्टि रूप से शरीर मय होकर एकत्रित हैं। जब यह सूत्र खुलता है तब स्वभावतः सब तत्व अपने-अपने कारण में लीन हो जाते हैं। इसी दशा में सृष्टि का प्रलय और देह की मृत्यु कही जाती है।

यह सृष्टि क्रम हमारी समझ में आये या न आये लेकिन यह सत्य है कि रागी होकर अपने बाँधने और त्यागी होकर (इस गहन तत्व का समझते हुए) अपने आप को छुड़ाने वाले हम स्वयं हैं। यदि अज्ञानी होकर हम स्वयं बँधे हैं तो निश्चय ही ज्ञानी होकर हम स्वयं ही सार्वभौम-सत्ता की सर्वोच्च स्थिति में स्थित होकर स्वयं मुक्त हो सकते हैं और जगत का कल्याण भी कर सकते हैं।

कहा भी है:—

नास्ति विद्या समं चक्ष र्नास्ति सत्य समं तपः। नास्ति राग समं दुःख नास्ति त्याग समं सुखम्॥

विद्या के समान चक्षु नहीं सत्याचरण के समान तप नहीं, राग के समान संसार में और कोई दुःख नहीं और त्याग के समान और कोई सुख नहीं।

वास्तव में अपने सुख के लिए दूसरों से सेवा लेते हुए साँसारिक भोगों के पथ में जितना पतन होता है उतना ही दूसरों को हितप्रद सुख देते हुए सेवा करने से शीघ्रतया उत्थान होता है।

परमार्थ में अपने सत्य लक्ष्य की ओर बढ़ते हुये हम नीची सीढ़ियों में ही नहीं, बल्कि ऊँचे से ऊँचे सोपानों पर चढ़ कर जहाँ अपने परम-लक्ष्य के रागी होंगे, वहीं से हमारी प्रकृति में रुकावट पड़ने लगेगी और जहाँ कहीं त्यागी होंगे, वहीं से प्रगति होने लग जायगी।

यदि हमें अपने जीवन के सत्य-लक्ष्य का ज्ञान हो गया है तो उसके अतिरिक्त कहीं भी संसार में रागासक्त होकर न रहना चाहिये, बल्कि सबसे हर एक दशा में विरक्त होकर संसार की प्रत्येक वस्तु को प्रत्येक सम्बन्धी को, वहीं तक अपने साथ रहने देना चाहिये जहाँ तक वह सद्गुण विकास में सहायक हो और परमार्थ-पथ में बाधक न बने। प्रत्येक मनुष्य के अपने-अपने प्रारब्ध संस्कार के अनुसार जीवन विकास के लिये कहीं विद्या की, कहीं धन की, कहीं स्त्री तथा पुत्र की, कहीं ऐश्वर्य आदि की आवश्यकता है। संसार के किसी भी पदार्थ की आवश्यकता, ज्ञान न होने के कारण ही है, इसीलिये उन आवश्यक प्रतीत होने वाले पदार्थ की प्राप्ति हो जाने पर उसका यथोचित ज्ञान प्राप्त कर लेना विचारवान व्यक्ति का प्रमुख कर्त्तव्य है।

संसार के किसी भी पदार्थ का ज्ञान कर लेने पर उसका त्याग ही अत्यावश्यक हो जाता है, क्योंकि साँसारिक—पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त न होने के कारण ही उनके प्रति राग रहता है।

रागी अज्ञान-वश विषय-सुखों की प्राप्ति के लिये संसार का उपासक अथवा उसमें लिप्त रहता है—संसार का भक्त होता है और त्यागी, परमानन्द की प्राप्ति के लिये एक सत्य परमात्मा का उपासक अथवा भक्त होता है।

रागी अपने स्वार्थ—सुख की सिद्धि के लिये, अपनी प्रसन्नता के लिये यत्नशील रहता है और त्यागी अपने परमार्थ रूपी परमानन्द की प्राप्ति के लिए, परमात्मा की प्रसन्नता ही के लिये सब कुछ करता है।

यदि किसी को सुसंस्कार वश ऐसा सुयोग्य सुलभ हो जाय कि युवावस्था में ही इन्द्रिय निरोध और उन का दमन करते हुये समस्त विषय प्रपंच का त्याग कर सके तो निःसन्देह जो परम लाभ सैकड़ों जन्म बिता देने पर भी नहीं प्राप्त हुआ, वह एक ही जीवन के थोड़े समय में ही प्राप्त हो सकता है। इसीलिये युवावस्था ही त्याग का सर्वोत्तम-समय कहा गया है। विषय-वासनाओं और सुख-भोग की कामनायें अनन्त कर्मों को उत्पन्न करती है, वह युवावस्था में ही अति प्रबल रहती हैं।

यदि युवावस्था से ही इन वासनाओं, कामनाओं का त्याग बन पड़े तो अति शीघ्रता से मनुष्य सार्वभौम सेवा और मोक्ष के कार्य में बढ़ जाता है। ऐसे त्यागी-पुरुष के राग-द्वेष और तज्जनित मोहावरण दूर हो जाते हैं, और ऐसा ज्ञानोदय होता है जिसके द्वारा भीतर छिपी हुई ममता तथा आसक्ति की अनेकों सूक्ष्म बन्धन-ग्रन्थियों को तोड़ने में वह समर्थ हो जाता है।

वास्तव में जन्म जन्मान्तर तक जकड़े रहने वाली इन ग्रन्थियों को तोड़ना—किसी पूर्ण त्यागी का ही कार्य है।

ऐसे त्यागी को सार्वभौम—सत्ता की सर्वोत्कृष्ट सेवा करने का सुयोग्य सुलभ होता है जो सर्वस्व त्याग देने के पश्चात शेष रह जाने वाले चिन्मात्र स्वरूप आत्मा की शरण में स्थिर रहना जान गया है।

जहाँ पूर्ण त्याग है वही जीवन की सर्वोत्कृष्ट-शुद्धि है, वहीं सुन्दर सद्बुद्धि है वही सत-असत् ज्ञान होता है तथा ज्ञान होने पर ही सत्य की महान-महिमा का भान होता है और तभी उस सत्स्वरूप सार्वभौम-सत्ता का सतत् ध्यान होता है। ऐसे ध्यान की ही तन्मयता में त्यागी अहंभाव का भी त्याग कर देता है।

तभी शरणागति, आत्मसमर्पण की भावना उत्पन्न होती है और उससे परात्पर ब्रह्म की प्राप्ति में होती है!

अतः त्याग ही यह राजमार्ग है जिस पर चलते हुए हम सार्वभौम-सेवा-पथ का पथिक बनकर संसार की सर्वोच्च-सत्ता में स्थिर होने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

यही त्याग का रहस्य है!


हमारे बन्धन ढीले कीजिये

(श्रीमती सरला देवी उपाध्याय)

संसार का आधा भाग नारी में और आधा नर में बँटा हुआ है। इन दोनों आधे-आधे भागों का जोड़ ही एक पूर्ण इकाई बनाता है। शरीर में जिस प्रकार दो हाथ, दो पैर, दो नेत्र, दो कान है उसी प्रकार सृष्टि पुरुष के भी दो अंग नर और नारी है। उन दोनों भागों से समान स्वस्थ, और पुष्ट विकास होने से एक ही सृष्टि की एक स्वस्थ इकाई बनती है।

सृष्टि के आरम्भ काल में अन्य सभी जीव-जन्तुओं की भाँति मनुष्य प्राणी के अंतर्गत भी नर और नारी के दोनों भाग आनन्द पूर्वक प्रकृति माता के आँगन में स्वच्छंद किलोल करते थे। एक दूसरे के सान्निध्य में सुख अनुभव करते थे, एक दूसरे के लिए सेवा और सहयोग की तत्परता प्रकट करते थे। किसी का किसी पर कोई बन्धन न था। स्वेच्छा स्नेह एवं कर्त्तव्य धर्म के बन्धनों को छोड़ कर और जितने प्रकार के बन्धन है वे जीवात्मा की मूल प्रकृति के विरुद्ध है इसलिए विवशता में वह सबसे अधिक दुख अनुभव करता है।

जेलखाने में किसी व्यक्ति को घर की अपेक्षा कम काम करना पड़े, भोजन भी अच्छा मिले, चिकित्सा सुरक्षा, वस्त्र मकान आदि की भी वह बन्दी बनना पसन्द न करेगा। शुक आदि पक्षी और सिंह आदि पशु जब पिंजड़े में बन्द हो तो दुख मानते हैं और वहाँ कितनी ही सुख सामग्री होने पर भी उन बन्धनों को दुख मानते हैं। धर्म का तत्व जानने वाले व्यक्ति भव बन्धनों से छुटकारा पाने के लिए घोर तप साधन करते हैं क्योंकि मुक्ति के बिना—स्वाधीनता के सुख नहीं, चैन नहीं, आनन्द नहीं। जीवन मुक्त होकर आत्माएं संसार की अधिक सेवा करती है, बन्धन काल में तो उनका अन्तःकरण रोया करता है। राजनैतिक स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए संसार के विविध भागों में समय-समय पर बहुत त्याग और बलिदान होता रहा है। पराधीनता में सुरक्षा और स्वाधीनता में अरक्षा का खतरा होते हुए भी समाज ने सर्वदा स्वतंत्रता का अनुमोदन किया है क्योंकि पराधीनता वस्तुतः एक अनात्म तत्व है, जिसे कभी कोई प्राणी स्वेच्छा पूर्वक सहन करने को तैयार नहीं होता। मुक्ति की आकाँक्षा आत्मा की शाश्वत आकाँक्षा है, इसे प्राप्त किये बिना बंधन ग्रस्त जीव बाह्य दृष्टि से सुविधा में रहते हुए भी आन्तरिक दृष्टि से खिन्न ही रहता है।

इस महान् तथ्य से भली प्रकार परिचित होने के कारण हमारे पूर्वजों ने समाज की रचना इस प्रकार की कि कोई किसी को पराधीन न बना सके स्नेह और कर्तव्य के बन्धन इतने मजबूत हैं कि मनुष्य एक दूसरे के साथ अपनी सहज प्रकृति के साथ सहज ही बंध जाता है और परस्पर एक दूसरे के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने को तैयार हो जाता है। माता अपने बालक के लिए बड़े से बड़ा त्याग कर सकती है। अपनी जान को भी जोखिम में डाल सकती है पर नौकरानी से वैसी आशा कितना ही लोभ और भय दिखाने पर भी नहीं की जा सकती।

नर और नारी के सहयोग से सृष्टि के आरम्भ काल में परिवार बने और समाज की रचना की व्यवस्था करने वालों ने यह पूरा ध्यान रखा कि यह दोनों ही सहयोगी एक दूसरे के लिए अधिक से अधिक सहायक हों, एक दूसरे को पराधीन बनाने का अनैतिक प्रयत्न न करे। उसी दृष्टिकोण के अनुसार जन समाज की रचना हुई। नर नारी लाखों-करोड़ों वर्षों तक एक दूसरे के सहायक, मित्र और स्वेच्छा सहयोगी बनकर जीवन व्यतीत करते रहे, इससे स्वस्थ समाज का विकास हुआ। उन्नति, प्रगति, प्रसन्नता और सुख शान्ति के उपहार ही इस व्यवस्था ने दिया।

विश्व के विशेषतया भारत के, प्राचीन इतिहास पर दृष्टि पात करने से यह स्पष्ट प्रकट है कि नारी के नर के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर कार्य किया है और जीवन की अनेक समस्याओं को सरल करने में, ज्ञान और विज्ञान की महत्वपूर्ण प्रगति में भारी योग किया है। एक ने दूसरे को अपनी अपेक्षा अधिक सम्माननीय समझा और घनिष्ठता के आत्मीय बन्धनों को दिन-दिन मजबूत बनाते हुए हर लौकिक दृष्टि से एक दूसरे पर कोई पराधीनता लादने का प्रयत्न नहीं किया। स्वस्थ विकास और सच्चे प्रेम भाव का तरीका भी इसके अतिरिक्त और कोई न था। भारतीय इतिहास के पृष्ठों पर नर और नारी, निश्छल शिशुओं की तरह किलकारियाँ मारते हुए परस्पर खेलते कूदते दीखते हैं। विश्व का अधिक विकास इन्हीं मंगलमयी भावनाओं के साथ हुआ है।

देवगण, ऋषि और राजाओं से लेकर साधारण गृहस्थ और दीन-हीनों के जीवन में नर और नारी की एकता और समता ऐसी गुथी पड़ी है कि यह निर्णय करना कठिन पड़ता है कि दोनों पक्षों में से किसे प्रथम माना जाय और किसे गौण कहा जाय। देव वर्ग में लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती आदि को जो स्थान है उसे किसी पुरुष देवता से किसी भी प्रकार कम नहीं कहा जा सकता। देवताओं के साथ भी कम नहीं कहा जा सकता। देवताओं के साथ भी नारी असाधारण रूप से गुथी हुई है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र आदि किसी भी देवता को ले उनकी धर्म पत्नियाँ उनके समकक्ष ही कार्य और उत्तरदायित्व सँभालती दीखती है। सीता, और राधा को राम, कृष्ण के जीवन में से अलग नहीं किया जा सकता। अनुसूया, अरुन्धती गार्गी मैत्रेयी, शतरूपा, अहिल्या मदालसा आदि ऋषिकाओं का महत्व भी उनके पतियों जैसा ही है। गान्धारी, सावित्री, शैव्या, आदि असंख्यों महिलाएं योग्यता और महानता की दृष्टि से अपने पतियों से किसी भी प्रकार पीछे नहीं थीं। वैदिक काल में ऋषियों की भाँति अनेक ऋषिकाओं में उनका समुचित स्थान रहा है। यज्ञ में तो नारी की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है।

नर और नारी समान रूप से अपना विकास करते हुए आगे बढ़ी है। और संसार को आगे बढ़ाया है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि नर ने कदापि कहीं भी यह प्रयत्न नहीं किया है कि नारी को अपने से पिछड़ी हुई, दुर्बल, अविश्वस्त माने और उसके साधनों को शोषण करके, उसे अपंग बनाकर अपनी मनमर्जी पर चलने के लिए विवशता एवं पराधीनता को लादें। यदि ऐसी बात रही होती तो इतिहास के पृष्ठ दूसरी ही तरह लिखे गये होते—जगद्गुरु कहलाने, विश्व का नेतृत्व करने और विश्व में सर्वत्र आशा और प्रकाश की किरणें फैलाने में जो श्रेय भारत को प्राप्त हुआ था वह कदापि न हुआ होता।

आज भारतवर्ष में स्त्री जाति का सामाजिक स्थान बहुत पिछड़ा हुआ है। उसके व्यक्तित्व को इतना अविकसित बना दिया गया है कि वह सब प्रकार परमुखापेक्षी और लुञ्ज पुञ्ज हो गई है। रसोई और प्रजनन इन दो कार्यों को छोड़कर किसी क्षेत्र में उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह गई है। शहरों में अब कन्याओं को लोग थोड़ा सा इसलिये पढ़ाने लगे हैं कि पढ़े लिखे लड़कों के साथ उसकी शादी करने में सुविधा हो। विवाह होते ही वह शिक्षा समाप्त हो जाती है और फिर जीवन भर और आगे की पढ़ाई तो दूर जो कुछ पढ़ा था उसका उपयोग करने का भी अवसर नहीं आता। आर्थिक दृष्टि से नारी सर्वथा परावलम्बी है। जब कोई वैधव्य आदि की दुर्घटना घटित हो जाती है और कोई उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति नहीं होती तो बालकों का पालना कठिन हो जाता है। यदि सन्तान न हुई तो भी उस बेचारी को घर भर का कोप भाजन बनना पड़ता है कई बार तो उसी अपराध में पतिदेव दूसरा विवाह कर लेते है और उसे विधवा जैसा दुख सधवा होते हुए भी सहना पड़ता है। इसी प्रकार घर के पिंजड़े में, बन्द बाह्य क्षेत्रों से सर्वथा अपरिचित होने के कारण उसे इतना भी ज्ञान नहीं होता कि जीवन धारण करने की आवश्यक समस्याओं को सुलझाने में भी समर्थ हो सके। जीवन को सफल या समुन्नत बनाने वाली कोई पुरुषार्थ कर सकना तो उसके लिये असंभव ही है।

यह विपन्न अवस्था आज की नारी के लिए एक दुर्भाग्य ही है कि वह व्यक्ति गत और सामूहिक जीवन के विकास में अपनी शक्ति, सामर्थ्य और प्रतिभा का कोई उपयोग नहीं कर सकती, आपत्ति आने पर अपना और अपने बच्चों के सम्मान पूर्ण जीवन रक्षा भी नहीं कर सकती। एक और भारी लाँछन उस पर यह है कि वह चरित्र की दृष्टि से सर्वथा अविश्वस्त समझी जाती है। उसके ऊपर कम से कम एक पहरेदार हर समय रहना चाहिये। अपनी पुत्रियों, बहिनों और माताओं के प्रति ऐसी अविश्वास की भावना रखना, पुरुषों की अपनी नैतिक दुर्बलता का चिह्न है, ’चोर की दाढ़ी में तिनका’ वाली कहावत के अनुसार वे अपनी चरित्र हीनता का आरोपण नारी में देखते हैं जो कि वस्तुतः पुरुष की अपेक्षा स्वभावतः अनेक गुनी चरित्रवान होती है।

नारी पर नाना प्रकार के बन्धन लगाकर उसे शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थ उपार्जन, सामाजिक ज्ञान, लोक सेवा आदि की योग्यताओं से वंचित रखना, एक ऐसी बुराई है जिससे आधे राष्ट्र को लकवा मार जाने जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। अविकसित पराधीन और अयोग्य नारी का भार पुरुष को वहन करना पड़ता है फलस्वरूप उसकी अपनी उन्नति भी रुद्ध हो जाती है। यदि नारी को सभ्य बनने दिया जाय तो वह पुरुष के ऊपर भार न रहकर उसके स्वास्थ्य, अर्थ व्यवस्था, शिशु विकास से लेकर अनेक अन्य कार्यों में भी सहायक होकर उन्नति के अनेक द्वार खोल सकती है। पर्दे में—पिंजड़े में बन्द रखकर पुरुष यह सोचता है कि इस प्रकार उसे व्यभिचार से रोका जा सकेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि नारी इतनी पतित है कि बन्धन के बिना वह सदाचारिणी रह ही नहीं सकती। यह मान्यता भारतीय नारी का भारी अपमान है और इन आदर्शों एवं भावनाओं के सर्वथा प्रतिकूल है जो अनादिकाल से भारतीय संस्कृति में नारी के प्रति समाहित की गई है।

अनेक नारियाँ ऐसी है जिनके पास पर्याप्त समय है, पर उन्हें अवसर नहीं दिया जाता जिसमें वे अपने जीवन को बन्दी से अधिक कुछ बना सकें। विधवाएं और परित्यक्त ऐं घर वालों के लिये एक भार रहती हैं पर वे उन्हें शिक्षा, उद्योग, लोक सेवा आदि किसी भी क्षेत्र में बढ़ने देने के लिये बन्धन ढीले नहीं करते। यदि इन्हें अवसर दिया जाय तो अपने समय का सदुपयोग करके अपने व्यक्ति गत जीवन में भारी उत्कर्ष करके नारी रत्नों की श्रेणी में पहुँच सकती है और अपनी योग्यता से संसार को वैसा ही लाभ पहुँचा सकती है जैसा अनेक नर रत्न, महापुरुष पहुँचाते हैं।

भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की पुनीत बेला में महिलाओं की न्याय पुकार भी सुनी जानी चाहिये। नारी चाहती है कि उसके बन्धन ढीले किये जायं, उसे बिना पहरेदारों के भी सदाचारिणी रह सकने जितना विश्वासी माना जाय, उसकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय ताकि वह मनुष्यता की जिम्मेदारी को समझ सके, उसे जानकारी प्राप्त करने दी जाय ताकि वह पुरुष की परेशानी को सरल करने और उन्नति की प्रगति में सहायक हो सके, उसे योग्य बनने दिया जाय ताकि वह अपने परिवार की आर्थिक सुस्थिरता में हाथ बँटा सके। बदलते हुए युग में नारी अपने को एक जीवित लाश मात्र की स्थिति में रखे जाने से असंतुष्ट है वह भी आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण और समाज में कुछ योग देना चाहती है। भारतीय संस्कृति में इन सहज आकाँक्षाओं के प्रति समुचित सहानुभूति एवं प्रेरणा का तत्व मौजूद है। वर्तमान के अनेक संस्कारों में से ही एक बुराई नारी की अनावश्यक पराधीनता है। अपने पुत्रों, भाइयों, पतियों और पिताओं से आज की नारी-युग की पुकार के साथ अपनी फरियाद उपस्थित करती है कि उसके बन्धन ढीले किये जायं, उसे किसी योग्य बनने दिया जाय। रसोई और प्रजनन इन दो कार्यों के अलावा भी उसे कुछ और करने दिया जाय।

कोटि-कोटि नारी हृदयों की यह एक फरियाद आज अन्तरिक्ष में गूँज रही है। असंख्य आंखें यह देखने के लिये और असंख्य कान यह सुनने के लिए उत्कंठित हो रहे हैं कि उनकी न्याय पुकार, फरियाद किन्हीं के द्वारा सुनी गई या नहीं?


अनैतिकता का अंत कैसे हो?

(श्री सत्यभक्त जी ‘संपादक’ सतयुग)

प्रत्येक राष्ट्र की उन्नति और अभ्युदय के लिये नैतिकता की शिक्षा और उसका पालन अत्यावश्यक है। जब तक हम पारस्परिक व्यवहारों में न्याय और नीति का ध्यान नहीं रखेंगे किसी भी प्रकार की उन्नति और सुख शान्ति की प्राप्ति संभव नहीं। जिस देश या समाज में एक व्यक्ति को दूसरे पर विश्वास नहीं; जहाँ एक दूसरे को झूँठा, बेईमान, दगाबाज बतलाते हैं, वहाँ संगठित जीवन का कार्य कभी सुचारु रूप से नहीं चल सकता और इसके बिना समाज का अग्रसर हो सकना संभव नहीं। इसके विपरीत पारस्परिक अविश्वास के परिणाम स्वरूप फूट, वैमनस्य, अनैक्य आदि अनेक दुर्गुणों की वृद्धि स्वाभाविक हैं और अन्त में उस समाज का पतन भी अवश्यम्भावी है।

भारतवर्ष में किसी समय नैतिकता का बड़ा मान था। कहा जाता है कि अब से हजार वर्ष पूर्व लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे और लेन-देन की कोई लिखा-पढ़ी नहीं होती थी। किस्से तो यहाँ तक मशहूर हैं कि अमुक सौदागर ने अपनी मूँछ का एक बाल दस बीस हजार रुपया देकर छुड़ा लिया। संभव है यह केवल मनोरंजन के लिये किस्सा ही बना लिया गया हो, पर इसमें संदेह नहीं कि प्राचीन काल में लेन-देन में लिखा-पढ़ी या तो बिल्कुल हो न होती थी या बहुत कम होती थी और फिर भी ऋण चुकाने में बेईमानी करने वाला शायद ही कभी कोई निकलता था।

पर आज कल की स्थिति देखिये। दस-दस बीस-बीस रुपये का सरकारी स्टाम्प लगाकर लिखा पढ़ी की जाती है, अनेकों प्रतिष्ठित, मात वर गवाही कराई जाती हैं, बड़े लेन देन में सरकार में रजिस्ट्री भी कराई जाती है तो भी कुछ ही समय बाद बेईमानी प्रकट होने लगती है, लड़ाई झगड़े हो जाते हैं अन्त में मुकदमेबाजी आरम्भ होकर सैकड़ों हजारों रुपये बर्बाद हो जाते हैं। अनेक बार तो लेन देन के पहले ही लोगों की नीयत खराब होती और ले तरह-तरह के छल

फरेबों से या ठगी का कोई जाल रच कर ही रुपया या कोई अन्य सम्पत्ति प्राप्त कर लेते हैं। वे समझते हैं कि जहाँ एक बार रुपया हाथ में आया फिर वापस लेने वाला कौन है?

खरीद फरोख्त में भी ऐसी ही बुरी दशा है। लोगों को एक दुकान पर माल और भाव देख कर कभी विश्वास नहीं होता और विवश होकर उनको बर्बाद करना पड़ता है। चलते पुर्जा लोग तो इस प्रकार कुछ लाभ उठा भी सकते हैं, पर सीधे सादे व्यक्ति प्रायः मूँडे ही जाते हैं। आज कल प्रश्न केवल मूल्य का ही नहीं रहता वरन् अब सभी चीजें नकली बनने लग गई हैं और दुकानदार अपनी होशियारी इसी में समझता है कि बातों के जोर से असली के बजाय नकली चीज ग्राहक के मत्थे मढ़ दे। इसके फल स्वरूप आजकल लोगों को शुद्ध दूध के बजाया मखनिया दूध अथवा दूध के पाउडर से बनी चीजों, घी से स्थान पर वनस्पति तेल, गेहूँ के आटे के बजाय ज्वार मिला हुआ आटा आदि खाकर अपना स्वास्थ्य खराब करना पड़ता है। और तो क्या बीमारी को दूर करने के उद्देश्य से जो औषधियाँ खरीदी जाती हैं, वे भी प्रायः नकली दे दी जाती हैं और फिर कहा जाता है कि देशी औषधियाँ विदेशी औषधियों की तरह शीघ्र प्रभावशाली सिद्ध नहीं होतीं।

असली नकली से भी बढ़ कर आजकल एक व्याधि चोर बाजारी की चल गई है। जीवन निर्वाह की आवश्यक सामग्री को गुप्त से गोदामों में बन्द करके बाजार में खूब महंगी कर देनी और बाद में सरकार द्वारा नियत भाव से कहीं अधिक मूल्य में छुपे तौर से उसे बेचना। कन्ट्रोल के जमाने में तो यह घृणित तरीका बेहद बढ़ गया था और इसके कारण न जाने कितने लोगों को भूखा नंगा रह कर कष्ट उठाना पड़ा। पर अब भी जहाँ किसी चीज को कुछ कमी नजर आई कि

फौरन उसे ताले के भीतर बन्द करने का विचार कर लिया जाता है। जिससे बाद में लोग कष्ट पाकर उसे दूना ड्यौढ़ा मूल्य देकर खरीदें।

हर एक सरकारी विभाग में घूस खोरी भी इसी अनैतिकता का परिणाम है। हर एक सरकारी नौकर को अपने कार्य के लिए वेतन मिलता है। यह वेतन कम ज्यादा पर वह उससे सन्तुष्ट नहीं होता और सदा इसी फिक्र में रहता है कि ‘ऊपरी’ आमदनी की जाय। जब नीयत खराब हो गई तो इनसाफ की गुंजाइश ही कहाँ रही। जिसने घूस दी उसका काम तुरन्त हो गया और जिसने नहीं दी उसके काम में तरह-तरह के झगड़े लगा दिए। रेल-अदालत, पुलिस आदि में तो रिश्वत इस तरह ली जाती है जैसे वह उनका जन्म सिद्ध अधिकार हो जिसमें न किसी तरह का संकोच है न लज्जा। लोग भी अड़चन से बचने के लिए उनका बंधा हुआ ‘हक’ चुपचाप दे आते हैं। अन्य सब महकमों में भी घूस देने वाले का काम ही पहले होता है इससे गरीबों को, जिनके पास घूस देने के लायक पैसा नहीं है, कितनी हानि और अपमान उठाना पड़ता है यह प्रत्यक्ष है।

यह व्यापार-प्रधान युग है और जनता की आवश्यकता की सब वस्तुयें और साधन व्यापारियों के ही हाथ में रहते हैं। रोटी कपड़े से लगाकर हवाई जहाज के यात्रा तक की बागडोर बड़े मालदारों के हाथ रहती है और उनका मल मन्त्र होता है अधिक से अधिक फायदा उठाना। जनता को इसके कारण कितनी असुविधा उठानी पड़ती है-अनेक बार लाखों व्यक्तियों को प्राण भी गँवाने पड़ते हैं पर इसकी उनको कोई चिन्ता नहीं। गत महायुद्ध के समय बंगाल में पड़ने वाला अकाल घूस का एक बहुत स्पष्ट उदाहरण है। नफा कमाने के लिए बड़े व्यापारियों ने वहाँ के मुख्य खाद्य पदार्थ चावल को गोदामों में बन्द कर दिया जिससे उसका दाम बढ़ते-बढ़ते 2 रु॰ सेर तक पहुँच गया लाखों व्यक्ति भूखों मर गये। पेट की खातिर लोगों ने अपने लड़के-लड़कियों को दस-दस पाँच-पाँच

रुपये में बेच दिया। पर व्यापारियों ने कभी इस बात को स्वीकार नहीं किया कि उन्होंने कोई नीति विरुद्ध कार्य किया था। वे तो इसे ‘व्यापार’ समझते और बतलाते हैं।

इसी प्रकार का दूसरा कुत्सित उदाहरण बुखार की दवा कुनैन के व्यापारियों का देखने में आया। महायुद्ध के समय कुनैन का मूल्य 15-20 रु॰ प्रति पौण्ड से गढ़ कर 400-500 रु॰ पौण्ड तक पहुँच गया था। इस लिए अनेक गरीब व्यक्ति ज्वराक्रान्त होने पर भी असमर्थता के कारण इतनी महंगी औषधि नहीं खरीद सकते थे और रोगवश काल कवलित हो जाते थे। उधर कुनैन की फसल पहले से कहीं अधिक हो रही थी और वह बाजार में सस्ते दामों में बेची जा सकती थी, पर उसके उत्पादक व्यापारी हजारों मन कुनैन के पौधों को खेतों में ही जला कर नष्ट कर देते थे जिससे कुनैन की कमी बनी और उसका भाव नीचे उतरने न पावे। धन की लालसा की पूर्ति के लिए नीति ही नहीं, मनुष्यता को भी ठुकरा देने का कितना जघन्य नमूना है?

अब प्रश्न यह है कि इस बढ़ती हुई अनैतिकता की प्रवृत्ति का प्रतिकार कैसे किया जाय? यहाँ तो व्यापारियों और सरकारी नौकरों में ही नहीं सौ में से निन्यानवे व्यक्तियों में यह प्रवृत्ति घर कर गई है कि “दूल्हा मरे चाहे दुल्हन, पंडित जी को अपने टके से काम। ” नकली खाद्य सामग्रियों के कारण जनता का स्वास्थ्य चौपट हो रहा है, नये-नये रोग फैलते जाते हैं शारीरिक शक्ति का ह्रास हो, रहा है पर व्यवसाइयों को इससे कोई मतलब नहीं। घूसखोरी के कारण जनता में सरकार की बदनामी हो रही है और शासन-तन्त्र निर्बल और निकम्मा बनता जाता है जो राष्ट्र-रक्षा की दृष्टि से घोर विपत्ति सूचक है, पर कोई इस कुप्रवृत्ति को स्वयं छोड़ने को राजी नहीं। ऐसी अवस्था के कारण चोर और डाकू भी बढ़ते जाते हैं और जहाँ पहले जमाने में डकैती एक बहुत भारी आकस्मिक घटना समझी जाती थी, आज वह प्रतिदिन की बात हो गई है। लोगों के जान माल की सुरक्षा का भाव दिन पर दिन नष्ट हो रहा है और समाज पतन की तरफ असर होता जाता है।

इस अनैतिकता पूर्ण घोर अव्यवस्था को रोकने का सीधा सादा उपाय तो कठोर शासन बतलाया जाता हैं। अन्याय के शिकार होने वाले व्यक्तियों की तो यही माँग होती है कि मिलावट करने वालों को सरे बाजार कोड़े लगाये जायें और चोर बाजारी करने वाले फांसी पर लटका दिये जायं। घूस लेने वाले कर्मचारियों को काला मुँह करके देश निकाला दे दिया जाय। लोगों की ऐसी मनोवृत्ति अस्वाभाविक नहीं है। जिन गरीबों के पुत्र, भाई अथवा अन्य प्रिय सम्बन्धी ऐसे अन्यायों अथवा भ्रष्टाचार के कारण प्राणान्त रोग अथवा सरकारी कर्मचारियों की क्रूरता का शिकार बनकर सदा के लिए बिछुड़ गये हैं, वे भाई मन में बदले की ऐसी भावना का पोषण करते हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। उनकी ही क्या बात प्रधान मंत्री श्री नेहरू ने एकाध बार इन लोगों के कारनामों को सुनकर कह डाला था कि—मेरा वश चले तो चोर बाजारी करने वालों को फांसी पर लटका दूँ।

जो लोग अपने स्वार्थ—साधन के लिए दूसरों का अनहित करने में संकोच नहीं करते और अपने थोड़े से लाभ के लिए सैकड़ों-हजारों व्यक्तियों का सर्वनाश करने में किसी प्रकार की ग्लानि या मनो वेदना का अनुभव नहीं करते, वे निश्चय ही मनुष्य रूप में पशु हैं अथवा दानव हैं। ऐसे लोगों को समाज में रहने का अधिकार कदापि नहीं और सरकार ही नहीं जनता का भी कर्तव्य और अधिकार है कि वह संगठित होकर ऐसे नर पशुओं या दानवों का संहार कर दे। जो मनुष्य साँप और भेड़िये की तरह स्वभाव से ही अन्य निर्दोष व्यक्तियों को हानि पहुँचाने वाले बन गए हैं उनके सुधार का निष्फल प्रयत्न करने के बजाय उनको मृत्यु की गोद में सुला देना ही सबके हित की दृष्टि से उचित है।

पर हम यह भी जानते हैं यह उपाय थोड़ी देर के लिए मन का समाधान करने वाला होने पर भी वास्तविक रूप से कारगर नहीं है। यह व्याधि का ऊपरी उपचार मात्र है, जब कि उसका मूल कारण दूषित तत्व नीचे दबा पड़ा रह जाता है और कुछ समय बाद फिर उमड़ कर कष्ट पहुँचाने लगता है। एक समय था कि इंग्लैंड में सौ से अधिक अपराधों के लिए मृत्यु का दण्ड दिया जाता था और वह भी बराबर अपराध होते थे और अपराधियों को जनता के सम्मुख प्रदर्शन करके तड़पा-तड़पा कर मार डालने का भी कोई खास असर नहीं होता था, इसके विपरीत अब इंग्लैंड में दो—चार प्रकार के अपराधों पर ही मृत्यु दण्ड दिया जाता है, पर अब वैसे अपराध बहुत कम होते हैं और मृत्यु दण्ड पाने वालों की संख्या पहले की अपेक्षा नाम मात्र को ही रह गई है। कारण यही है कि वहाँ की सरकार और जनता ने मिलकर देश और समाज में ऐसे सुधार कर दिये हैं जिससे अपराधों की दुनिया का वातावरण ही बदल गया है।

इसलिए अगर हम अपने यहाँ से अनैतिकता से होने वाले चोर बाजारी, घूस खोरी, मिलावटी पदार्थों की बिक्री, असत्य व्यवहार, चोरी, दगाबाजी, ठगी आदि दोषों को दूर करना चाहते हैं तो हमको उनके वास्तविक कारणों को ही मिटाना होगा, और वह कारण है अनुचित अर्थ—लोभ। आजकल जितने दुष्कर्म होते दिखलाई पड़ते हैं उनमें 100 में से 90 का कारण धन का लालच ही होता है। व्यापार सम्बन्धी अनैतिकता और घूस खोरी तो स्पष्ट रूप से रुपये के लिए ही की जाती है। अन्य दुर्गुणों में भी लोभ या लालच का ही ज्यादातर हाथ रहता है। इसलिये अगर हमको इन दोषों का निराकरण करना है उसके लिए लोगों की धन-लिप्सा को रोकने या घटाने का ही कोई उपाय करना होगा।

इसके लिए एक प्राचीन उदाहरण देना अप्रासंगिक न होगा। यूनान के स्पार्टा राज्य में अब से ढाई तीन हजार वर्ष पूर्व घूस खोरी और भ्रष्टाचार की ऐसी ही बाढ़ आ गई थी जैसी कि आज हम अपने देश में देख रहे हैं। सभी सरकारी कर्मचारी और बड़े लोग अनैतिकता की कमाई करते थे और इसके फल से जन साधारण की अकथनीय दुर्दशा हो गई थी। तब वहाँ ‘लाइकगरस’ नामक शासक हुआ उसने इस दुरवस्था को सुधारने का निश्चय किया और इसका उपाय ढूंढ़ने के लिए वह कई वर्षों तक विदेशों की यात्रा करके वहाँ की अवस्था और नियमों का अध्ययन करता रहा। अन्त में उसने अपने देश में लौट कर कुछ नये शासन सुधार किए। उनमें मुख्य यह था कि स्पार्टा में सोने-चाँदी के सिक्कों का चलना एक दम बन्द कर दिया गया और उनके स्थान में लोहे के बने पैसे चलाये गये। इन पैसों के सिवाय उस राज्य में कोई सिक्का नहीं चल सकता था। इसका परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में वहाँ से चोरी, घूस खोरी और धन को जमा करके रखने की प्रवृत्ति जाती रही और अन्य दोषों का अन्त हो गया। क्योंकि जब एक रुपये के मूल्य में लगभग एक सेर पैसे आते थे तो चोर कहाँ तक उनको उठा कर ले जाते और रिश्वत देने वाले भी किस प्रकार छुपा कर उन पैसों की गठरी घूस खाने वाले को दे सकते थे। फिर अगर कोई अधिक वैसा जमा भी कर लेता तो ज्यादा समय बीतने पर जंग लग कर उनके नष्ट होने का भी भय था। वे तो बराबर चलने रहने से ही ठीक रहते थे। लाइक गरस ने दूसरा नियम यह बनाया कि विलास और सजावट की सब चीजों का निर्माण बन्द करके आज्ञा दी कि अगर अपने कमरों को सजाना है तो हथियारों और कुल्हाड़ी, आरा, बसूला औजारों से सजाओ जो समय पड़ने पर काम भी दे सकते हैं। इस प्रकार के नियमों से कुछ समय में स्पार्टा की काया पलट हो गई और वहाँ के निवासी ऐसे देश भक्त, सत्य व्यवहार वादी और वीर बन गये कि बड़े बड़े देश भी उन पर आक्रमण करने का साहस नहीं कर सकते थे।

कोई ऐसा उपाय ही हमारे देश की व्याधि को दूर कर सकता है। हम जानते हैं कि तीन हजार वर्ष पूर्व और आज के देश—काल में पृथ्वी-आकाश का सा अन्तर है और अब सब सिक्कों को मिटा कर लोहे का पैसा जारी कर सकना किसी प्रकार सम्भव नहीं। तो भी ऐसे कई उपाय हो सकते हैं जिनसे इन दोषों का बहुत कुछ प्रतिकार हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर यह नियम बना दिया जाय कि जो नोट देश में चलते हैं वे केवल एक वर्ष के लिए होंगे और प्रत्येक वर्ष नये नोट निकाले जाये करेंगे, जिन लोगों के पास पुराने वर्ष के नोट बच रहें वे उनको व्यर्थ समाप्त हो जाने पर एक महीने के भीतर नये नोटों से बदल लें। ऐसे नियम चोर बाजारी और घूस लेने वालों का अनेक अंशों में भण्डाफोड़ कर देगा। क्योंकि जब वे अपनी सामान्य दिखलाई पड़ने वाली आमदनी से कहीं अधिक तादाद में नोट बदलने लायेंगे तो स्वभावतः यह प्रश्न होगा कि यह रकम कहाँ से आयी? सम्भव है कि एकाध वर्ष झूठे सच्चे बहाने बनाकर कोई काम निकाल ले पर जब प्रति वर्ष यही समस्या सामने आयेगी तो लोगों की बेईमानी, अनीति से रुपया प्राप्त करने की प्रवृत्ति पर एक बड़ा अंकुश अवश्य लग जायगा।

दूसरा उपाय यह भी आवश्यक है कि लोगों में से विलासिता और फिजूल खर्ची की प्रवृत्ति को मिटाया जाय और विलासिता के साधनों को जहाँ तक संभव हो घटाया जाय, क्योंकि विलासिता नैतिकता की विरोधी है और विलास प्रिय व्यक्ति से नैतिक आचरण की विशेष आशा नहीं रखी जा सकती। विलासिता और फिजूल खर्ची के साधनों की पूर्ति के लिए ही अनेक भ्रष्टाचार में फंस जाते हैं और अपना नैतिक पतन कर लेते हैं।


इस दीनता को त्यागिए

( दौलतराम कटरहा, दमोह )

शास्त्रकारों और साहित्य कारों ने ‘दीन’ शब्द का प्रयोग दो भिन्न-दृष्टि कोणों से किया है। एक दृष्टि कोणों से किया है। एक दृष्टि से दीन बने बिना भक्ति सुलभ नहीं है और मुक्ति सम्भव नहीं है और दूसरी दृष्टि से दीनता भक्ति —विरोधी है और जीव को गिराने वाली है। एक ओर महात्माओं ने भगवान को ‘गरीब-निवाज’ और ‘दीन-दयालु’ कहा है तो दूसरी ओर ‘दीन न होना’ भक्ति का लक्षण बताया है; यथा रामचन्द्र जी ने शबरी के प्रति जिस नवधा—भक्ति का वर्णन किया है उसमें दीन न होना नवमी प्रकार की भक्ति है।

नवम सरल सब सन छल हीना, मम भरोस हिय हरष न दीना।

वेदों में भी जो प्रार्थना है उसमें “अदीनाः स्याम् शरदःशतम्” अर्थात् हम सौ वर्ष तक अदीनाः रहते हुए जीवन धारण करें आदि वाक्य आये हैं। वाल्मीकि रामायण में भी रामचन्द्र जी के लिए “अदीनः सत्यवागृजुः आदि शब्दों का प्रयोग किया गया है। अर्जुन के लिए भी कहा गया है कि उनका व्रत था कि न तो दैन्य प्रदर्शित करेंगे और नहीं युद्ध क्षेत्र से भागेंगे। “अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वेन देन्यं न पलायनम्”। कहने का प्रयोजन यह कि दीनता एक अर्थ में वरणीय है और दूसरे अर्थ में त्याज्य है। संसार का अवलम्ब छोड़ कर ईश्वर का अवलम्ब ग्रहण करने के अर्थ में दीनता वरणीय है और कठिन समय में भी शास्त्र, कुल, धर्म तथा आत्म-सम्मान के विरुद्ध कार्य करने के अर्थ में दीनता त्याज्य है। धन, विद्या गुण, आयु, बल

की दृष्टि से दूसरों को अपने से श्रेष्ठ पाकर और उनसे आक्रान्त होकर अपने को छोटा मानना, अपने को हीन-वीर्य मानना, अपने को दीन मानना, बुरा है और इस अर्थ में दीनता त्याज्य हैं। भौतिक समृद्धियों के कारण अपने को अल्प मानना बुरा है। प्रयोजन यह है कि यदि हम लौकिक पदार्थों को मनुष्य के माप का पैमाना मानकर उससे दूसरों और अपने को नापें और कदाचित् अपने को छोटा पावें अथवा कदाचित् लौकिक पदार्थों के कारण दूसरों से पराजित हो जावें तो हमें अपने आपको हीन न मानना चाहिए। हमें साँसारिक पदार्थों को मनुष्य को नापने का माप-दण्ड न बनाना चाहिए बल्कि अपनी दृष्टि को ऊँचा उठाना चाहिए। यहाँ पर लक्ष्य को ऊंचा रखने की ओर संकेत है। हम यदि धन को अपने जीवन का लक्ष्य बनायेंगे तो धन-हीनता के कारण निश्चय ही अपने आपको दीन व दुःखी समझेंगे, धन-हीनता के कारण दीन न होने का अर्थ है, धन को जीवन का लक्ष्य न बनाना। उसी तरह विद्या, गुण, शारीरिक बल आदि के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए। कहने का प्रयोजन यह है कि हम इन्हें अपने जीवन का लक्ष्य न बनावें प्रत्युत हमारी दृष्टि और भी अधिक ऊंची हो पार-गामी हो, इनको भेद जावे, और इनको भेद कर आत्मा की निर्विकल्प स्थिति की ओर ही हमारा लक्ष्य हो।

धन विद्या, गुन, आयु, बल यह न बड़प्पन देत। नारायण सोई बड़ा, जाको हरि सों हेत॥

दीनता त्यागने का अर्थ है आत्म-हीनता (इन-फीरियाँरिटी काम्प्लेक्स) का विसर्जन करना और अपने पुरुषार्थ को जाग्रत करना। वही व्यक्ति कभी दीन न होगा, न अपने को दीन-हीन समझेगा, जो यह मानेगा कि मैं शुद्ध आत्म-चैतन्य हूँ। जो आत्मौपम्य दृष्टि रखेगा, जो सम बुद्धि होगा। अतएव दीन न होने का लक्ष्यार्थ है आत्म-भावस्थ होना, साम्यबुद्धि योग प्राप्त करना और ब्रह्म-निष्ठ होना। अपने आपको निर्मल, नित्य, स्वप्रकाश, निश्चल निर्द्वन्द्व, निरंजन, परिपूर्ण और सच्चिदानन्द स्वरूप जाने बिना दीन न होना सम्भव नहीं, अतएव हमें, ब्रह्म में ही रमी हुई बुद्धि वाला, ब्रह्म में ही प्रवेशित आत्मा वाला, ब्रह्म को ही परम आधार, परम स्थिति, परम गति, परम निवास, परम शरण मानने वाला, ब्रह्मपरायण बनना है। ऐसों के लिये ही भगवान् कृष्ण ‘गच्छन्त्यपुनरावृति ज्ञान—निर्धूत कल्षाः, कहते हैं अर्थात् ऐसे ही निष्पाप, ज्ञान—पूत पुरुष आवागमन-हीन स्थिति को प्राप्त करते हैं। विद्या-परायण, धन-परायण, गुण-परायण और बल-परायण न होकर हमें आत्म-परायण, कृष्ण-परायण या ब्रह्म-परायण बनना है। दीन न होने का वाच्यार्थ यदि यह नहीं है तो लक्ष्यार्थ अवश्य ही यही है। अतएव भगवान् के वचनों को हम सदा हृदय में रख दीन न होने का ब्रत लें।

मर्त्कमकृन्मत्परमो मद्भक्तः संगवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाँडव॥

गीता 11। 55

जब तक हम यह न समझेंगे कि जैसा मैं हूँ वैसा दूसरा भी है अर्थात् जब तक हम में आत्मौपम्य दृष्टि न होगी, हमारी बुद्धि में समता न आएगी तब तक हमारी बुद्धि की दीनता न जायगी, हमारे हृदय का दीन-भाव दूर न होगा। जब तक साँसारिक वस्तुओं द्वारा लुभाये हुए चित्त वाले हम लोग, लोभ से उपरत नहीं होयेंगे, लाभ रूपी चश्मे को आँखों पर से नहीं हटायेंगे तब तक हम दर-दर दीन बने डोलते ही रहेंगे। हमारे लिए दूसरे के द्वारे दीनता प्रकट करना उचित नहीं अतएव अपने अन्तिम लक्ष्य (आत्मा की निष्पाप अन्तिम अवस्था) पर ही दृष्टि जमाये रहने पर ही दीनता दूर होना सम्भव है। अन्तिम लक्ष्य पर दृष्टि रखने का अर्थ है, (परमात्मा-परायण या आत्म-परायण होना। एतदर्थ भगवान कृष्ण ने भी कहा है कि तू सर्वात्मा मेरी शरण में आ मुझमें ही अचल मन व बुद्धि वाला बन, मुझे ही भजने वाला व मुझे ही पूजने वाला बन;

मन्मना भव मद्भक्तो, मद्याजी माँ नमस्कुरु। मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥

गीता 9। 34


अहो मैं क्या था, क्या हो गया!

( श्री॰ पं॰ रामनाथ वेदालंकर, एम॰ए॰, गुरुकुल काँगड़ी)

प्रायः व्यक्तियों, जातियों और देशों के जीवनों के इतिहास में उत्थान और पतन का चक्र परिवर्तन होता रहता है। जो आज शिखरारूढ़ है वही कल नीचे भूमि पर कुंठित होता हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपने उज्ज्वल भूत को स्मरण कर वर्तमान को भी उज्ज्वल बनाने का प्रयत्न करे। इसी भावना को जागृत करने वाला एक वैदिक वर्णन पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। नीचे जो उद्गार प्रकट किये गये हैं ये संसार के चक्र में फँसे एक जीवात्मा की ओर से समझना चाहिये—

मित्रो! आओ, आज मैं तुम्हें अपने अतीत और वर्तमान की कथा सुनाऊँ। मैं किस प्रकार एक उन्मुक्त पक्षी की भाँति स्वच्छन्द गगन में विहार किया करता था और अब पर-कटे पक्षी के समान नीचे गिरा पड़ा हूँ, वह सब कहानी तुम्हें कहूँ।

प्र मा युयुज्रे प्रयुजो जनानाँ, वहामि स्म पूषणमन्तरेण। विश्वे देवासो अध मामरक्षन् दुःशासुरागादिति घोष आसीत्॥

ऋ ग॰ 10। 33। 1

( जनानाँ प्रयुजः) मनुष्यों को प्रयत्न में प्रेरित करने वाली भावनाओं ने (प्रयुयुज्रे) मुझे प्रयत्न में प्रेरित किया हुआ था। मैं (अन्तरेण) अपने अन्दर (पूषणं वहामि स्म) परिपुष्ट सूर्य को धारण किये रहता था, या ‘पूषा’ प्रभु को धारण किये रहता था। अध) और (विश्वे देवासः सब दिव्य गुण, सब देवजन तथा

सब दिव्य प्राकृतिक पदार्थ (मामअरक्षन्) मेरी रक्षा करते थे। जहाँ कहीं मैं जाता था वहाँ (दुःशासुः आगात्) । ‘यह दुर्जेय पुरुष आ गया है’ (इति घोषः आसीत्) यह आवाज उठती थी।

एक दिन था जब कि मैं कटिबद्ध होकर कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण था। मेरे अन्दर अपार उत्साह था, असीम क्रियाशक्ति थी। प्रयत्न, प्रयत्न, पुनः प्रयत्न, बिना लक्ष्य पर पहुँचे दम न तेड़ना-यही मेरे जीवन-मार्ग का पाथेय था। जो भावनाएं मनुष्य को प्रयत्न में प्रेरित करती हैं वे मेरे अन्दर उमड़-उमड़ कर उठती थीं। मैं अपनी वर्तमान अवस्था से ऊँचा उठूँ, यही भावना मेरे अन्दर हिलोरें लेती थीं। मैं सोचता था कि भूमि से मैं अन्तरिक्ष में उड़ जाऊँ अन्तरिक्ष से द्युलोक में पहुँच जाऊँ और द्युलोक में भी अपनी उड़ान को विराम न देकर उससे भी आगे स्वर्लोक की यात्रा में संलग्न हो जाऊँ। मैं सोचता था कि मैं अहर्निश आगे बढ़ता रहूँ; जो मुझसे आगे हैं उन्हें भा पीछे छोड़ दूँ। मैं चाहता था कि विद्या में सर्वोपरि हो जाऊँ, धन में सर्वोपरि हो जाऊँ, राजनीति में सर्वोपरि हो जाऊं, अध्यात्म ज्ञान में सर्वोपरि हो जाऊं, अध्यात्म ज्ञान में राजनीति में सर्वोपरि हो जाऊं’, अध्यात्म ज्ञान में सर्वोपरि हो जाऊं’। इस प्रकार की मनुष्य को उच्चता की ओर प्रेरित करने वाली महत्वकाँक्षाओं से मैं प्रेरित था।

इसी का परिणाम था कि मैं अपने अन्दर ‘पूषा’ को धारण किये था। मेरे हृदयाकाश में मानो सदा परिपुष्ट सूर्य उदित रहता था। मेरे अन्तस्तल का एक-एक कोना परिपुष्ट सूर्य की रश्मियों से उद्भासित रहता था। कहीं भी अज्ञान, अविवेक, मोह, तामसिकता, ईर्ष्या, द्वेष, भय आदि के अन्धकार की सत्ता नहीं थी। साथ ही ‘पूषा’ नाम से स्मरण किये जाने वाले सर्वात्मा परिपुष्ट तथा सर्व पोषक अजर-अमर-अक्षय भगवान् को भी मैं सदा अपने हृदय में बसाये रखता था। प्रतिपल, प्रति कार्य में उन ‘पूषा’ प्रभु को मैं स्मरण रखता था।

उन दिनों मैं कभी अपने आपको असुरक्षित अनुभव नहीं करता था। सब दिव्य गुण, सब देवजन और सब प्राकृतिक दिव्य पदार्थ (विश्वे देवासः) मेरे रक्षक बने हुए थे। मेरे अन्दर विद्यमान अहिंसा सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान प्रभृति दिव्य गुण पाप, अनाचार, अनैतिकता आदि के बड़े से बड़े आँधी-तूफानों से मेरी रक्षा करते थे। साथ ही देश में रहने वाले सब मनुष्य देवजन भी मेरी रक्षा के लिए उद्यत थे। मुझे अपनी रक्षा की चिन्ता स्वयं नहीं करनी पड़ती थी, किन्तु मुझे अपना महान् नेता मान कर देशवासी ही मेरी रक्षा के लिए चिन्तित रहते थे। मुझे किंचितमात्र सिर दर्द होने पर देश के बड़े-बड़े चिकित्सक अपनी सेवाएं देने के लिए मेरे पास दौड़े चले आते थे। मुझे किंचितमात्र धन की आवश्यकता होने पर देश के बड़े-बड़े धनपति अपनी समस्त पूँजी मेरे चरणों में न्यौछावर करने के लिए लालायित रहते थे। मुझे किंचितमात्र शत्रु भय होने पर बड़े-बड़े वीर योद्धा मेरे लिए प्राण अर्पित करने को तैयार रहते थे, ऐसा गौरवमय मेरा जीवन था। इसके अतिरिक्त प्राकृतिक पदार्थ रूपी जो तीसरी श्रेणी के देव हैं वे भी मेरे रक्षक बने हुए थे। सूर्य, वायु, अग्नि, पर्वत, नदी, समुद्र, पर्जन्य आदि किसी भी पदार्थ की शक्ति नहीं थी कि मुझसे विद्रोह करे। ऐसा महान् मेरा व्यक्तित्व था कि ये सब मानो मेरे अनुचर बने हुए थे।

इस प्रकार के महान् गुणों से अलंकृत मैं जहाँ भी जाता था वहीं मेरा स्वागत-सत्कार होता था। लोग मेरा जय जयकार करते थे। ‘दुःशासुः आगात्’, ‘दुःशासुः आगात्’—“स्वागत हो इस दुर्जेय का, स्वागत हो दुर्जेय का” यही नारा सबके मुखों से सुनाई देता था और जहाँ मैं पहुँचता था वहाँ के दुर्जनों के चेहरों पर भय के चिन्ह लक्षित होने लगते थे, तथा उनके मुखोंसे भी ‘दुःशासुः आगात्’ ‘दुःशासुः आगात्’—“ अरे, यह दुर्जेय आ पहुँचा, अरे यह दुर्जेय आ पहुँचा’ ऐसे भय मूल शब्द निकलने लगते थे। मैं दुर्जनों को विसदलित करता हुआ, सज्जनों को हर्षित करता हुआ अपनी ऊर्ध्वारोहण की यात्रा में प्रवृत्त रहता था।

यह है मेरे अतीत जीवन की एक झाँकी। पर अब? अब तो यह सब कहानी, एक कहानी ही रह गई है।

सं मा तपन्त्यभितः सपत्नीरिव पर्शवः। निबाधते अमतिर्निग्नता जसुर्वेर्न वेवीयते मतिः॥2॥

(पर्शवः) कुएँ की इटे—संसारकूप के पार्श्वस्थ (सपत्नीः इव) एक पति वाली स्त्रियों के समान (मासंतपन्ति) मुझे सता रहे हैं। (अमतिः) मति-हीनता, (नग्नता) नंगापन, (जसुः) क्षीणता-निर्धनता निर्बलता (निबाधते) पीड़ित कर रही है। (वेर्न) पक्षी के समान (मतिःवेवीयते) मेरी मति काँप रही है—फड़फड़ा रही है।

अब तो मेरी ऐसी अवस्था है मानो मैं किसी विस्तीर्ण सरोवर से निकल कर एक सीमित कुएँ के अंदर जा पड़ा हूँ। सरोवर में मैं स्वतन्त्रतापूर्वक विहार कर सकता था, वहाँ कोई रुकावट नहीं थी। किन्तु इस कुएँ में तो चारों ओर ईंटों की पक्की दीवार हैं। ये ईंटें मुझे बुरी तरह संतप्त कर रहीं हैं। जिस प्रदेश में मैं निवास कर रहा हूँ वह प्रदेश ही कुआँ है, और चारों ओर स्थित विविध जड़-चेतन पदार्थ उस कुएं की ईंटें हैं। ये मेरे चारों ओर स्थित पदार्थ मुझे उसी तरह संतप्त करते हैं जैसे अनेक पत्नियों वाले पुरुष को वे पत्नियाँ सताती हैं। जैसे अनेक पत्नियाँ पुरुष को अपनी- अपनी ओर आकृष्ट करना चाहती हैं, पर पुरुष को उनसे सुन नहीं मिलता, वैसे ही चारों ओर स्थिर ये विविध पदार्थ भी अपनी-अपनी ओर आकृष्ट करके मुझे सुख से वंचित रखते हैं। कभी मैं जिह्वा से स्वादिष्ट पदार्थों की ओर आकृष्ट होता हूँ, कभी आँख से सुन्दर वस्तुओं की ओर आकृष्ट होता हूँ। इस प्रकार संसार के विविध विषय मेरी इंद्रियों को अपनी-अपनी ओर खींचते हैं और उसका परिणाम होता है संताप विषयों की ओर खिंचा हुआ मैं निरन्तर संतप्त हो रहा हूं।

विषयों में पड़ कर मेरी बुद्धि भी भ्रष्ट हो गई है। जहाँ पहले मेरी बुद्धि का सिक्का सब कोई मानते थे और मैं अपनी बुद्धि के बल से लोगों की जटिल से जटिल समस्याओं का सुलझा कर उन्हें चमत्कृत कर देता था, वहाँ आज मैं मतिहीनता से पीड़ित हो रहा हूँ। यदि मैं किसी को अपनी बात सुनाना चाहता हूँ तो संसार मुझे मूर्ख कह कर मेरी उपेक्षा कर देता है।

नग्नता भी मुझे व्याकुल कर रही है। पहले मैं भूखों को भोजन देता था, नंगा हूँ। मैं आज निर्धन हूँ, निर्बल हूँ, क्षीण हूँ। आज मेरी मति कंपायमान हो रही है, जैसे बात कि आगे चिड़िया भय से फड़फड़ाने लगती है, वैसे ही संकट और विपत्तियों को सामने देख कर मेरी मति भी भय से फड़फड़ा रही है।

अब मैं क्या करूं, कहाँ जाऊँ, अपनी दीन दशा किसके आगे निवेदन करूं?

मूषों न शिश्ना व्यदन्ति माध्यः स्तोतारं ते शमक्रतो। सकृत्सु नो मघवन्निन्द्र मृडयाधा पितेव नो भव॥3॥

(शतक्रतो) हे सैंकड़ों कर्मों को करने वाले प्रभोः (ते स्तोतारं) तरे स्तोता मुझको (आध्य—व्यदन्ति) चिन्ताएं खाये जा रही हैं (मूषः न शिश्ना) जैसे चुहिया आटे से पान कराये गए सूत को खा जाती हैं। (मधवन् इन्द्र) हे ऐश्वर्यों के राजा प्रभो! सकृत् नः सुमृड) एक बार तो मुझे सुखी कर दे। (अध नः पिता इव भव) और मेरे लिए पितृ तुल्य हो जा।

हे इन्द्र! हे प्रभो! सब स्थानों पर भटक कर अन्त में मैं तुम्हारी ही शरण आया हूँ।


शरीर मालिश का महत्व

(डा॰ हरिकृष्णदास एम॰ ए॰)

मालिश मानव की शरीर-सम्पत्ति को सुरक्षित और आरोग्य को स्थिर रखने तथा गत्तोरभ्य को पुनः प्राप्त करने का एक विधान है। नियमित मालिश द्वारा चिरन्तन स्वास्थ्य, दीर्घ—जीवन, सम्पूर्ण सौंदर्य और अनुपम मानसिक बल की उपलब्धि होती है। मालिश एक प्रकार की चेतनाहीन व्यायाम है। कठोर अर्थात् सक्रिय व्यायाम सब लोग कर नहीं सकते। इस प्रकार के व्यायाम से हृदय, ज्ञान तन्तु और स्नायविक व्यवस्था पर एक प्रकार का बोझ पड़ता है। मन को इस प्रकार के व्यायाम के लिए तैयार करना पड़ता है। वृद्ध, निर्बल और बीमार व्यक्ति के लिए कठोर व्यायाम निरर्थक ही नहीं, अपितु हानिप्रद भी है। मालिश का व्यायाम का प्रभाव कठोर व्यायाम की उपेक्षा भिन्न होता है। ज्ञान तन्तुओं पर दबाव डाले बिना और हृदय की धड़कनों को बढ़ाये बिना शरीर में निरर्थक गरमी या प्रस्वेद उत्पन्न किए बिना मालिश शरीर के व्यायाम करने के सभी लाभों से पुरस्कृत करती है। प्रयोग- परीक्षाओं से सिद्ध कर दिया गया गया है कि मालिश से शरीर में श्वेत कण, लाल कण और हेमोग्लोबिन तत्व का सम्वर्धन होता है, रक्त-शुद्धि तीव्रगति से होती है फलतः शरीर में रोग- प्रतिरोधक शक्ति का संचय होता है शरीर की रक्त-संचालन-प्रक्रिया संयोजित होने से विजातीय पदार्थों (संचित मन) का निष्कासन सरलता से होता रहता है। विजातीय पदार्थ-निष्कासन-कार्य तत्पर अवय- फेफड़े, चर्म, मूत्र पिण्ड और आंतरिक जाल का स्वास्थ्य सुधरता है। मालिश से शरीर के अंग-प्रत्यंग, माँसपेशियाँ सुदृढ़ और शक्ति शाली बन जाती हैं। शरीर सुसंगठित, सुडौल और दर्शनीय बनता है। मालिश सौंदर्य- वर्धक है मालिश करने वाले का शरीर का कान्तिमय, सुन्दर और आकर्षक बन जाता है

मालिश पाचन-व्यवस्था के लिए अत्यन्त लाभ दायक है। सभी पाचन— अंगों— जैसे कि आँतें, यकृत, आमाशय आदि को एक प्रकार की गति और शक्ति मिलने से उनकी कार्यक्षमता और उनके आरोग्य में अभिवृद्धि होती है। मालिश से त्वचा की सिकुड़न और फटन दूर होती है और वह कोमल, चिकनी, तेजस्वी और मनोहर बनती है।

भारतीय भाषा में मालिश शब्द की उत्पत्ति ‘मसाज’ शब्द से हुई है। ‘मसाज’ शब्द ग्रीक भाषा का है, जिसका अर्थ है ‘दबाना’ ग्रीक लोग मालिश की कला में अत्यन्त पटु थे। रोमनों ने ग्रीक संस्कृति और समृद्धि का विशाल उत्तराधिकार हस्तगत कर लिया है रोमन लोगों के लिए मालिश आमोद-प्रमोद का साधन थी अतिशय उड़ाऊ खाऊ मनोवृत्ति और उन्मत्त आवेश का प्रभाव मिटाने के लिए रोमन लोग मालिश कराते थे रोमनों की वैभव- वृत्ति रोमन साम्राज्य विस्तार के साथ—साथ समग्र यूरोप में फैल गई। मालिश का विज्ञान ग्रीस से भी पहले भारत में विकसित हुआ था। मिश्र और भारत में धर्माचार्यगण व्याधिग्रस्त अंग को दबाकर या थपथपा कर स्वस्थ बना देते थे। वेद काल से आर्य इस कला में पूर्णतया निपुण थे। आयुर्वेद ने मालिश (तैंलाभ्यंग) को चिकित्सा- क्षेत्र में स्थान दिया है। आयुर्वेद में लकवा, ज्ञान तन्तु के रोग इत्यादि रोगों में शास्त्रीय तेलों द्वारा मालिश-क्रिया का समावेश किया गया है। मलवार में आज भी आयुर्वेदोक्त पद्धति के अनुसार संचालित मालिश-गृह भारतीय मालिश- पद्धति के विकास का दर्शन कराते हैं। गुजरात में मालिश का प्रचार बहुत कम है। मद्रास, बंगाल और उत्तर प्रदेश आदि प्रान्तों में बाल-वृद्ध को मालिश का शौक है। इन प्रान्तों के लोगों की त्वचा चमकीली और तेजस्वी होती है।

अतिशय गर्म या शीतल कमरे में मालिश न करनी चाहिये। अति गर्म कमरे में मालिश करने से पसीना आता है। पसीने का पानी मालिश के आनन्द को मार देता है। शीतल या जहाँ हवा के झोंके आते हों, ऐसा कमरा शरीर को बारंबार शीतल कर रक्त संचालन-क्रिया में बाधा डालता रहता है। स्वच्छ कमरे में चटाई पर बैठ कर मालिश करना चाहिये। सूर्य की कोमल किरणों में मालिश करने अथवा मालिश के बाद सूर्य का कोमल किरणों में बैठने से स्वास्थ्य सुधरता है। मालिश का अच्छा समय सुबह या शाम का है। बहुतेरे लोग रात में मालिश करके सो जाते हैं, यह पद्धति अच्छी नहीं। भोजन के बाद तुरन्त मालिश करनी न चाहिये। मालिश और भोजन के बीच कम से कम दो घन्टे का अन्तर रखना आवश्यक है। मालिश की पद्धति का ज्ञान होना जरूरी है। अधिकाँश लोग बलपूर्वक तेल घिसने की क्रिया को मालिश समझते हैं। बाजारू लोगों से मालिश कराना सचमुच हानिप्रद है। मालिश एक व्यवस्थित विज्ञान है; विकसित चिकित्सा-पद्धति है और आरोग्य-प्राप्त की सुन्दर कला है। शरीर विज्ञान की अज्ञानता, स्वास्थ्य-नियमों की अनभिज्ञता और मालिश पद्धति की अनुभव हीनता मालिश के लिए सर्वथा अनुपयोगी है। जिस मनुष्य की मालिश करनी हो, उसे स्वच्छ, चद्दर पर लिटा देना चाहिये। दांये या बांये पैर की उंगलियों से मालिश शुरू कर पैर के पंजे, पिंडली, घुटने और जंघा की ओर मालिश करते हुए क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। संक्षेप में बाल की विरुद्ध दिशा में हृदय की ओर मालिश के हाथ घुमाना उचित है। भूल से रक्त भ्रमण की दिशा में मालिश की न जाये। दोनों पैरों की मालिश हो जाने पर कमर की मालिश की जाये और हाथ की मालिश करनी चाहिए। हाथ की मालिश भी उंगलियों से शुरू कर कन्धे की ओर की जाये। तत्पश्चात् पीठ, क्रोड़-रज्जु, गर्दन, मुख के स्नायु और छाती की मालिश करनी चाहिये। सबसे अन्त में अधिक सावधानी और ध्यानपूर्वक पेट की मालिश करनी चाहिए। नाभि की दाहिनी ओर 4-6 अंगुल दूर छोटी और बड़ी आँत का सन्धि स्थान है। इस स्थान से ऊपर जाने वाली आँत से मालिश शुरू कर बाई तरफ हाथ लाकर नीचे लाया जाये अर्थात् नाभि के आस-पास गोलाकर दाहिनी ओर से शुरू कर पेट की मालिश करनी चाहिए। मालिश के समय पैर के तलुवों और सिर में अच्छी तरह तेल पचाया जाये।

मालिश कैसे तेल से की जाये? सामान्य नियम यह है कि शीतकाल में सरसों, ग्रीष्म-ऋतु में नारियल और वर्षा ऋतु में तिल के तेल का उपयोग किया जाये। तिल के तेल की मालिश बारहों मास की जा सकती है।

मालिश के पश्चात स्नान कब करना चाहिए? मालिश के एक दो घन्टे बाद काली मिट्टी या बेसन से शरीर का उबटन कर स्नान करना चाहिए।

मालिश किसे न करनी चाहिए? चर्म-रोग जैसे खाज, खुजली, सूजन, चट्ठे आदि हो जाने पर लम्बी बीमारी के बाद और उग्र रोगों में, मालिश न करनी चाहिए। जिन रोगों में आराम की जरूरत है, उनमें मालिश करना उचित नहीं, क्योंकि यह एक प्रकार का व्यायाम है।

मालिश स्वयं करनी चाहिए या किसी से करानी चाहिए? स्वयं मालिश करने से स्वेच्छानुसार और उत्तम ढंग से मालिश होने के अतिरिक्त परमोत्तर व्यायाम हाथों, कन्धों, छाती आदि अंगों को उपलब्ध होता है। निर्बल और विशेष प्रकार के रोगी को अच्छे मालिश कर्ता से मालिश करानी चाहिए। मालिश कर्ता स्वस्थ, स्वच्छ और सुदृढ़ शरीर का होना चाहिए। चर्म या अन्य किसी रोग से पीड़ित मानव से मालिश न करानी चाहिए और सावधानी रखनी चाहिए कि मालिश करते समय मालिश कर्ता का पसीना रोगी के शरीर पर न गिरे।

5— मालिश कसरत से पहले या पश्चात? मालिश करने के बाद कसरत या अन्य शारीरिक श्रम करने से तेल और पसीना मिलकर चर्मरोग-खुजली, दाद आदि उत्पन्न कर देते हैं। शरीर में तेल का समुचित शोषण नहीं हो पाता। व्यायाम या शारीरिक श्रम से शरीर, में विशेष परिणाम में तोड़-फोड़ होती है। विजातीय पदार्थों जैसे कि लोकाटिक एसिड, यूरिया और अग्नि वायु- का परिणाम बढ़ जाता है। थकावट भी बढ़ जाती है और कार्यक्षमता कम हो जाती है। अंग- प्रत्येक जड़ शुष्क और चेतनाशून्य हो जाते हैं। अतः कसरत करने के पश्चात् शरीर शीतल और पसीना बन्द हो जाने के बाद शरीर का अच्छी तरह पोंछ कर मालिश करना लाभदायक होगा। मालिश से स्नायु-जाल उत्तम सुसंग-चित बन जाता है। व्यायाम से कभी कभी स्नायु पर जब अघटित दबाव पड़ता है, तब वे टूट जाते हैं अथवा खिंच जाते हैं। मालिश इन स्नायुओं को सुयोजित कर चमकदार बना देती है।

6— पाउडर या बिजली के यन्त्र से मालिश करना उचित है? मालिश आज कल वैभव की वस्तु बन बैठी है। विद्युत यंत्र से की जाने वाली मालिश अप्राकृतिक है और उससे कोई लाभ नहीं। विद्युत से एक ही प्रकार की मालिश— कम्पन मालिश सम्भव बनती हे। रक्त- संचालन- क्रिया को सतेज बनाने के अतिरिक्त इसका अन्य कोई लाभ न होने से यह सर्वथा त्याज्य है। मालिश का मूल उद्देश्य शरीर में तेल को पचाने का है। कथित सुधरे हुए लोग तेल को पसन्द न कर सुगन्धित पाउडर पसन्द करते हैं पाउडर हस्त—संचालन की क्रिया को सरत और व्यवस्थित होने नहीं देता। अतः पाउडर या विद्युत-यन्त्र से मालिश करने की अपेक्षा न करना ही अच्छा है।

चिकित्सा— क्षेत्र में मालिश का महत्व समस्त जगत में बढ़त जा रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा में मालिश पद्धति का बहुत उपयोग किया जाता है और इसके द्वारा अनेक रोगों में जिस रोगी की जीवनी शक्ति अल्प होती है; ऐसी घटनाओं में, जीर्ण, अशक्त और शारीरिक रूप से क्षीण रोगियों के रोगों की अचूक चिकित्सा विज्ञान सिद्ध मालिश ही है।

मानव का शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक विकास का केन्द्र— बिन्दु है। मानव ने आहार-विषयक भूलों से पेट को कबगस्तान बना दिया है। कब्जियत मन्दाग्नि, अपच आदि आदि रोग आजकल सर्व-व्यापक हैं। मालिश आंतों की आकुँचन क्रिया को बढ़ाती है। शिथिल और रोगग्रस्त पाचन-क्रिया को तेजवान बनाकर उदर- रोगों को दूर करती है। यकृत आमाशय और प्लीहा की पीड़ा और रोग में मालिश उपयोगी है।

दिन- प्रतिदिन जीवन-संघर्ष विकट बनता जा रहा है। चिन्ता, व्यग्रता, जातीय उत्तेजना, भ्रष्ट अम्ल प्रधान आहार से ज्ञान तन्तु रोगी होते जा रहे हैं। अनिद्रा शिर दर्द, थकावट, मानसिक उत्तेजना तथा मानसिक शिथिलता में वृद्धि हो रही है। ज्ञान-तन्तु के रोगी को पैर के तलुओं, मस्तक तथा क्रोड़-रज्जु की मालिश करानी चाहिये। यह मालिश बादाम के तेल की होनी चाहिये।

इस प्रक्रिया के अंतर्गत हृदय की निर्बलता, धड़कन और अन्य रोगों में मालिश एक अच्छे सेवक का काम करती है, मालिश से हृदय को पूर्ण—विश्राम मिलता है। रक्त भिसरण की अव्यवस्था के कारण उत्पन्न रोग दूर होते हैं। रक्त का संचालन उचित रूप में होते रहने से अपोषण से पीड़ित रोगी के लिए मालिश आशीर्वाद के समान है माँसपेशियों को खुराक मिलती है। वजन बढ़ता है। शरीर की अनावश्यक चरबी का प्रशमन होता है।

शरीर अम्लता बढ़ जाने से अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। लकवा इत्यादि को आयुर्वेद में बात-व्याधियों के अंतर्गत माना गया है। इस प्रकार के रोगों में आयुर्वेद- प्रणीत विषगर्भ तेल या नारायण तेल की मालिश करनी चाहिये। बाललकवे की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। बालक को आरम्भ से उचित रूप से मालिश की जाये, तो लकवा-रोग नहीं होता और यदि हो भी जाये, तो लाभ होता है।

मुख की त्वचा निस्तेल, फटी हुई या दाग वाली हो, तो चाहे जैसा सुव्यवस्थित रूप वाला मुख भी आकर्षक प्रतीत नहीं होता। हमारी गृह—देवियों— विशेषतया नागरिक जीवन में— निष्क्रिय बनती जा रही हैं, अतः शरीर में चरबी बढ़ती जाती है। गले और हड़पची को निम्न-भाग लटक पड़ता है। मालिश मुख की चरबी को बरफ की तरह गलाकर मुख को नवीन आकर्षण’ चमक और ताजगी प्रदान करती है। मुख पर मुंहासे दाग हों, तो दूध की मलाई घी में हाथ से मुख पर मलने से जादू का असर होता है। मुख सौंदर्य के लिए मलाई की मालिश आज से ही शुरू कर दें। इसके अतिरिक्त अस्थिभंग शारीरिक विकृति आदि में मालिश की परमोपयोगिता अनुभव सिद्ध है।

संक्षेप में शारीरिक अवयवों की कार्य— शक्ति के अभाव या स्वयं अवयवगत व्याधि में मालिश अति लाभ दायक है मालिश शरीर में चार प्रकार का काम करती है— (1) निमार्ण, (2) विनाश, (3) उत्तेजना और (4) आराम का काम करती है। नये तन्तु उत्पन्न कर शरीर को पोषण प्रदान करती तथा चयापचय की क्रिया को बल देती है। शरीर की अतिरिक्त चरबी विजातीय पदार्थ, टूटे हुए और निरर्थक तंतुओं को दूर कर शरीर के, साँघातिक तत्वों को नष्ट करती है। मालिश ज्ञान-तन्तुओं की उत्तेजनाजन्य शिथिलता अनिद्रा और शारीरिक निर्बलता दूर कर स्फूर्ति और चेतना प्रदान करती है। मानसिक थकावट मिटा कर शरीर की पीड़ा कम कर शरीर के किसी विशेष अवयव में एकत्र रक्त को वितरित कर मालिश शान्ति और विश्राम देती है। मालिश करते-करते कभी-कभी नींद आ जाती है।

सामान्य और स्थानीय इस प्रकार मालिश के दो भाग हैं। किसी विशेष अंग की मालिश कहा जाता है। समस्त शरीर की मालिश सामान्य कहलाती है। रोगग्रस्त अंग पर 20 से 30 और समग्र शरीर पर 40 से 50 मिनट तक मालिश करनी चाहिये। बहुत अधिक समय तक मालिश करना हानिकारक है।

मालिश बहुत जल्दी- जल्दी करने की आदत अच्छी नहीं। मालिश करते समय शरीर के सभी अंग ढील और आराम की स्थिति में होने चाहिये। मन को भी स्वस्थ रखना चाहिये। मालिश के समय मन को सभी ओर से हटाकर उन अंगों पर केन्द्रित कर अरोग्य का विचार करना चाहिये, जिनकी मालिश की जा रही हो। तेल को शरीर में रगड़ने की अपेक्षा थोड़ा-थोड़ा तेल शरीर में पचाने की आवश्यकता है।

सभी अंगों की समुचित और समान मालिश करनी चाहिये। एक अंग पर विशेष ध्यान देकर दूसरे की अपेक्षा करनी न चाहिये नियम समग्र शरीर के मालिश के लिए है। आरोग्याकांक्षियों को चाहिये कि वे 8-10 दिन में मालिश किया करें। रोगोपचार के लिए नित्य और आवश्यक होने पर दिन में दो बार भी मालिश करनी चाहिए।


साँस्कृतिक विद्यालय का नियमिल शुभारंभ

गायत्री तपोभूमि में धार्मिक शिक्षा की अपूर्व व्यवस्था भारतीय संस्कृति की सुस्थिता और अभिवृद्धि के लिए या आवश्यक है कि धर्म का तत्व समझने वाले, आध्यात्मिक शक्ति से सम्पन्न, तपस्वी, और सुयोग्य कर्मनिष्ठ धर्म सेवियों की संख्या बढ़े। प्राचीन काल में इस मार्ग में अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले व्यक्ति ही धर्म गुय होते थे, पर आज तो वह कार्य भी एक व्यवसाय बन गया है। अब ऐसे निस्वार्थ धर्म सेवियों की अति आवश्यकता है जो अपने आत्म कल्याण के लिए, अपने परिवार को सुसंस्कृत बनाने के लिए तथा अवसर हो तो दूरवर्ती जनता की आध्यात्मिक सेवा करने के लिए अपना पूरा या थोड़ा समय लगा सकें। ऐसे लोगों के लिए गायत्री तपोभूमि में बहुत दिनों से एक साँस्कृतिक विद्यालय की योजना चल रही थी, प्रसन्नता की बात है कि अब उसकी तैयारी पूरी हो गई और गुरु पूर्णिमा से व्यवस्थित रीति से वह कार्य क्रम आरंभ हे गया है इस शिक्षा में सम्मिलित होने के लिए हम सभी धर्म प्रेमियों को विशेष तथा धर्म प्रचार और पौरोत्यि धार्मिक नेतृत्व करने के इच्छुकों को सादर आमंत्रित करते हैं। 16 वर्ष से अधिक आयु के सदाचारी एवं शिक्षित व्यक्ति इस में सम्मिलित हो सकते हैं। पाठ्य क्रम संक्षेप में इस प्रकार है:—

1) यज्ञों की शिक्षा

यज्ञ भारतीय विज्ञान की प्रचंड शक्ति है इस शक्ति से समुचित लाभ उठाने के लिए यज्ञों की विस्तृत एवं शास्त्रोक्त विधि व्यवस्थाओं का, पद्धतियों का जानना आवश्यक है। तपोभूमि में पौराणिक और वैदिक यज्ञों के सांगोपांग विधान समझने और उन्हें क्रियात्मक से रूप से सिखाने समझने की पूरी व्यवस्था कर ली गई है।

अब तपोभूमि में प्रति वर्ष 14 यज्ञ करते रहने का निश्चय किया गया है। जिससे संसार का हित, तपोभूमि के वातावरण का शक्ति शाली होना तथा या कर्त्ताओं को यज्ञ धूम्र से असाधारण लाभ प्राप्त होना संभव हो सके। जो व्यक्ति एक वर्ष यहाँ रहेंगे वे इन चौदहों यज्ञों को अपने हाथों करने के आध्यात्मिक लाभों को प्राप्त करने के अतिरिक्त उनके विधानों को भी सीख सकेंगे। वार्षिक कार्य क्रम इस प्रकार बनाया गया है।

1— रुद्रयज्ञ- पूरे श्रावण मास में

2—यजुर्वेद या- पूरे भाद्रपद मास में

3— पितृ या- आश्विन कृष्ण पक्ष, 15 दिन में

4—शतचंडी यज्ञ-आश्विन शुक्र पक्ष, 15 दिन

5—लक्ष्मी यज्ञ-कार्तिक कृष्णपक्ष, 15 दिन में

6—विष्णु यज्ञ- कार्तिक शुक्ल पक्ष, 15 दिन में

7—अथर्ववेद यज्ञ- मार्गशीर्ष, पौष, 2 मास में

8—ब्रह्म या-माघ कृष्ण पक्ष, 15 दिन में

9—नवग्रह यज्ञ- माघ शुक्ल पक्ष 15 दिन में

10—ऋग्वेद यज्ञ- फाल्गुन चैत्र तथा बैसाख वदी 30 तक 2॥ मास में

11— महामृत्युञ्जय यज्ञ-वैशाख शुक्लपक्ष, 15 दिन में

12— शान्ति यज्ञ- जेष्ठ कृष्ण पक्ष, 15 दिन में

13—सरस्वती यज्ञ- जेष्ठ शुक्ल पक्ष, 15 दिन में

14— सामवेद यज्ञ- पूरे आषाढ़ मास में। गायत्री यज्ञ तो नित्य यथावत् चलता ही रहेगा

2- वैदिक मंत्र-विद्या

40 प्रकार विभिन्न प्रयोजनों के लिए वैदिक सूक्तों का संग्रह “ सूक्त संहिता” नाम से छापा गया है। इसमें शक्ति शाली वेद मन्त्रों के द्वारा धन, सन्तान, स्वास्थ्य, बुद्धि सफलता, विजय मैत्री अनुग्रह आदि लाभों एवं आत्मबल की प्रचंड शक्ति को प्राप्त करने तथा अनेक आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक आपत्तियों एवं कठिनाइयों को सरल करने के लिए साधन विधान बताये गये हैं। इन सूक्तों का पाठ, हवन आदि करने कि विधि व्यवस्था बताई गई है। जिस मन्त्र विद्या को लोग किसी को मरण पर्यन्त नहीं बताते उसके इस प्रकार सार्वजनिक शिक्षण का यह अपने ढंग का अपूर्व प्रयत्न है।

3— संस्कार-विज्ञान

विभिन्न आयु एवं स्थिति के व्यक्तियों पर समय समय पर अनेक शक्ति शाली संस्कार वेद मंत्रों की शक्ति से डालर उनकी मनोभूमि में महत्व पूर्ण परिवर्तन प्राचीन काल में किये जाते थे। साधारण शिक्षा-उपदेशों की अपेक्षा संस्कार पद्धति के वैज्ञानिक विधान के अनुसार मनुष्यों के जीवन में भारी हेर फेर किया जाना संभव है। इस संभावना को परीक्षणों द्वारा निश्चयात्मक रूप देकर ऋषियों ने सीमंत, जात कर्म, नामकरण, यज्ञोपवीत, आदि संस्कारों की परम्परा प्रचलित की थी। इस पद्धति को विधिवत् और वैज्ञानिक रीति से सिखा देने की तपोभूमि के सांस्कृतिक विद्यालय में व्यवस्था की गई है। इस शिक्षा को प्राप्त कर अपने परिवार को अन्य निकटवर्ती लोगों के परिवार को सुसंस्कृत बनाया जा सकता है।

5—सरल-चिकित्सा पद्धति

आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार रोगों का निदान, नाड़ी-परीक्षा, शरीर-विज्ञान, जड़ी-बूटी-परीक्षा, औषधि निर्माण, चिकित्सा, पथ्य, परिचर्या, हड्डी टूटना, चोट, विषोपचार आदि की तात्कालिक चिकित्सा आदि विषयों को सरल पद्धति से सिखाने की व्यवस्था की गई है जिसके आधार पर कोई भी व्यक्ति सफल चिकित्सा बनकर रोग पीड़ित व्यक्तियों की बड़ी सेवा कर सकता है।

5— शस्त्र-शिक्षा

लाठी, तलवार, छुरी, भाला, धनुषबाण आदि अस्त्र-शस्त्रों को चलाना सीख कर आत्म रक्षा की तैयारी, साहस की वृद्धि, आरोग्य आदि कि लाभ प्राप्त करना तथा सूर्य नमस्कार, आसन प्राणायाम, खेल- व्यायाम आदि के द्वारा स्वास्थ्य को सुधारना।

6—संगीत-गान-वाद्य-शिक्षण

अपने निज के मनः प्रमोद-स्वान्तः सुखाय गान वाद्य करके अन्तरात्मा को प्रमुदित करने के अतिरिक्त संगीत द्वारा जन साधारण की भावनाओं को सन्मार्ग की ओर अग्रसर किया जा सकता है। संगीत एवं वाद्य बड़ा ही प्रभावशाली साधन है जिसके द्वारा मनोभूमियों में बहुत कुछ बोया और उगाया जा सकता है। अच्छे शिक्षा प्रद, भजन-कीर्तनों द्वारा जन-मन में धर्म भावनायें विकसित करने के लिए संगीत गान वाद्य द्वारा की शिक्षा व्यवस्था की गई है। हारमोनियम, तबला, ढोलक, वेंजो खड़ताल, इकतारा, तम्बूरा, मजीरा, चिमटा आदि बाजे इस विभाग में कई कई जोड़ी आ गये हैं और संगीत अध्यापक नियमित रूप से आकर गाने तथा इन बाजों को बजाने की शिक्षा देते हैं। तुलसी कृत रामायण, राधेश्याम रामायण, कीर्तन, सन्तों के भजन आदि को प्रधानता दी जाती है। फिल्मी ध्वनि पर भी अनेक अच्छे धार्मिक गीत सिखाने की व्यवस्था की गई है।

7— गायत्री गीता और धर्म प्रवचन

गायत्री गीता में थोड़े से श्लोक है पर उनमें धर्म का समस्त तत्व ज्ञान सम्मिलित है। इस गायत्री गीता के धर्म को समझना साथ ही तुलसीकृत रामायण, बाल्मीकि रामायण, भागवत, महाभारत, शास्त्र उपनिषद् एवं अनेक पुस्तकों की शिक्षा प्रद कथाओं तथा उपयोगी प्रसंगों के साथ इस प्रकार कथा कहना सिखाया जाता है कि गहन धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों को भी साधारण जनता इस ओर आकर्षण पूर्वक समझ सके। भाषण देना, शंक्ता समाधान, शिक्षा, उपदेश इस कला को भली भाँति सिखाकर कर छात्रों को अच्छा वक्त बनाने का प्रयत्न किया जाता है।

देव भाषा संस्कृत का जानना, प्रत्येक भारतीय संस्कृति से प्रेम रखने वाले के लिए आवश्यक है। परन्तु संस्कृत साहित्य और व्याकरण पठन-पाठन प्राचीन पद्धति से बहुत कष्ट साध्य होने के कारण साधारण लोग उससे चकराते हैं जो कुछ साहस भी करते हैं वे थोड़े ही दिनों में याद करने की कठिनाई के कारण निरुत्साहित हो जाते हैं। इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए संस्कृत पढ़ाने की ऐसी सरल विधि व्यवस्था बनाई गई है जिसके आधार पर एक वर्ष में ही व्यर्थ समझने और परस्पर संभाषण कर सकने योग्य संस्कृत आ जाय। जो एक वर्ष संस्कृत और वैद्यक की नियमित शिक्षा प्राप्त करेंगे वे दानों विषयों में प्रथमा परीक्षा उत्तीर्ण करने कि स्थिति में भी पहुँच जावेंगे । इन विषयों का परीक्षा केन्द्र तपोभूमि है।

उपरोक्त आठों का विषयों का भली प्रकार अध्ययन कर लेने पर सफल छात्रों को साँस्कृतिक विद्यापीठ का अत्यन्त सुन्दर तिरंगा बड़े साइज का प्रमाण पत्र भी दिया जाता है।

9— यज्ञोपवीत बनाना

शुद्ध यज्ञोपवीत बनाने की विधि जान कर जहाँ मनुष्य शास्त्रोक्त जनेऊ पहनने और पहनाने का लाभ प्राप्त कर सकता है वहाँ इस कार्य को गृह उद्योग के में लेकर एक दो रुपये रोज की आजीविका भी कर सकता है।

10— स्वाध्याय और सत्संग

गायत्री तपोभूमि के पुस्तकालय द्वारा उत्तमोत्तम सद्विचार वर्धक साहित्य का पढ़ना और आचार्यजी तथा देश भर से समय-समय पर आते रहने वाले विद्वानों के प्रवचन से दार्शनिक नैतिक, धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक समस्याओं पर महत्वपूर्ण विचारधारा प्राप्त करने का यहाँ बड़ा ही सुयोग रहता है।

व्रज यात्रा, जमुना स्नान, तीर्थ भूमि का फल, आश्रम वास का व्यवस्थित जीवन, सधी हुई दिनचर्या प्राकृतिक उपवन के निवास की ऋषि जीवन जैसी सुविधा यह सब लाभ मिलकर इतने हैं जिन्हें प्राप्त करना जीवन का एक सौभाग्य ही समझा जाना चाहिये।

साँस्कृतिक विद्यालय में जो शिक्षाएं दी जाती हैं वे स्वान्तः सुखाय तो सब प्रकार श्रेयस्कर होती ही है, भविष्य निर्माण में जीवन की गतिविधि योजना में भी वे बड़ी सहायक होती हैं। साथ ही इन शिक्षाओं को प्राप्त करे कोई व्यक्ति धर्म प्रचार के लिए उद्यत हो तो निश्चय ही वह चिकित्सा, कथा, प्रवचन, यज्ञोपवीत निर्माण आदि कार्यों के द्वारा निर्वाह के के लायक आर्थिक साधनों से रहित भी नहीं रहेगा, जिनके यहाँ पौरोहित्य वृत्ति होती है उनके लिए तो यह शिक्षा क्रम कर्त्तव्य और आजीविका की दानों ही दृष्टियों से बड़ी उपयोगी हैं।

जिन लोगों को पारिवारिक जिम्मेदारियों से छुटकारा मिल चुका है, जिनके ऊपर कमाने का बोझ नहीं है तथा जीवन को शान्तिमय बनाने के लिए परमार्थ पूर्ण वातावरण में रहना चाहते हैं। उनके लिए गायत्री तपोभूमि के समान चैतन्य तीर्थ क्षेत्र भारतवर्ष में और दूसरा नहीं मिल सकता ।

शिक्षा, साधना ओर सेवा का यह अद्भुत समन्वय जीवन को सफल बनाने के लिए परम मंगलमय हैं। जिनको अवसर तथा सुविधा हो वे यहाँ रहकर अपने समय का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करने के लिए तपोभूमि में अधिक से अधिक समय निवास करने का सौभाग्य प्राप्त करें। शिक्षा के नियम

1—शिक्षार्थी की आयु डडडड वर्ष से अधिक होनी चाहिए। उसकी योग्यता कम से कम हिन्दी मिडिल के बराबर अवश्य होनी चाहिए।

2—दूसरों पर प्रभाव डालने वाले रोगी, कर्कश, कटुभाषी, अनुशासन न मानने वाले, अशिष्ट, गन्दे, आलसी, व्यसनी, दुर्गुणी व्यक्ति भर्ती न किये जायेंगे। ऐसे किये जाने पर भी उन्हें तपोभूमि से पृथक कर दिया जायगा।

3— नर और नारी दोनों ही बिना किसी भेदभाव के इस शिक्षा क्रम का लाभ समान रूप से उठा सकते हैं।

4— अपना पूरा परिचय, नाम, पता, आयु, शिक्षा, व्यवसाय, जाति, अब तक का जीवन वृत्तान्त, भविष्य की आकाँक्षा, कोटुम्बिक विवरण यदि पूरे एक वर्ष से कम समय रहना है तो कितने दिन रहेंगे और क्या क्या सीखना चाहेंगे आदि पूरी बातें लिख कर पहले स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए, तब मथुरा आना चाहिए।

5— शिक्षा की कोई फीस नहीं, ठहरने के लिए तपोभूमि में स्थान मौजूद है। भोजन व्यय शिक्षार्थी को स्वयं ही उठाना चाहियें जो लगभग 12 ) मासिक पड़ता है।

6— पूरा पाठ्यक्रम एक वर्ष का है इतने विषयों को सीखने के लिए कम से कम इतना समय तो चाहिए ही। यह वर्ष गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ सुदी 15, ) से प्रतिवर्ष आरंभ हुआ करेगा। पर अधिक कार्य व्यस्त व्यक्तियों के लिए जो थोड़े ही समय यहाँ रहने के लिए निकाल सकते हैं, उनके लिए उनकी रुचि के अनुकूल जैसी विशेष व्यवस्था की जा सकती है।

7— भारतीय संस्कृति के अनुकूल आश्रम जीवन ही यहाँ व्यतीत करना पड़ेगा। निर्धारित दिनचर्या, अनुशासन तथा शिष्टाचार का पालन करने के लिए पूरी तरह तैयार होकर यहाँ किसी को आना चाहिए।

8— आने वाले अपने लिए पहनने, ओढ़ने तथा बिछाने के वस्त्र, थाली, कटोरा आदि पात्र तथा अन्य आवश्यक सामान साथ लेकर आवें।

9— पूरे शिक्षा क्रम में लगभग 10 ) की पुस्तकों का आवश्यकता पड़ती है। जो व्यक्ति अपनी पुस्तकें न खरीदना चाहें व 10) सुरक्षा धन जमा करदें और तपोभूमि के पुस्तकालय से पुस्तकें पढ़ने को लेते रहें। जाते समय अपना धन वापस ले जावें, संगीत सीखने वाले अपने निज के वाद्य खरीद सकें तो उन्हें सीखने में अधिक सुविधा रहेगी।

10-छात्रों की वेषभूषा साधारणतः सबकी एक सी रहेगी, धोती, कुर्ता, कंधों पर पीला दुपट्टा। स्त्रियों के लिए धोती, पोलका। पाजामा, पतलून आदि का उपयोग यहाँ नहीं होता। नेकर काम काज के समय नहीं केवल शस्त्र कक्षा में या सोते समय उपयोग हो सकते हैं।

प्रेमी परिजनों से:-

यह साँस्कृतिक शिक्षा व्यक्ति गत जीवन सुधार और धर्म सेवा की दृष्टि से अत्यन्त ही महत्व पूर्ण है। पर चिकित्सा, संगीत, प्रवचन, यज्ञोपवीत निर्माण, पौरोहित्य से किन्हीं-किन्हीं के लिए कुछ लाभ की सम्भावना के अतिरिक्त इसमें कोई बड़े आर्थिक लाभ की गुंजाइश नहीं है। इसलिए साधारणतः इसके लिए निर्लोभ शिक्षार्थी कम ही मिलेंगे। प्रेमी परिजन अपने क्षेत्रों में इस मनोवृत्ति के लोगों को तलाश करें कि और उन्हें प्रेरणा, उत्साह एवं सहयोग देकर शिक्षा के लिये मथुरा भिजवाने का प्रयत्न करें इस विद्यालय से निकले हुए छात्र अपनी आत्मा की तथा संसार की महत्व पूर्ण धर्म सेवा कर सकेंगे इसलिए अच्छे छात्र जुटाने का प्रयत्न करना भी परोक्ष रूप से आम्र वृक्षों का बगीचा लगाने के समान एक भारी परमार्थ है।


धर्म का श्रेष्ठ स्वरूप

(पं0 तुलसीराम शर्मा, वृन्दावन। )

इन्द्रियाणि प्रमाथीनिबुद्धया संयम्ययत्नतः। सर्वतो निष्ठतिष्णूनि पितावाला निवात्मजान्॥

-महाभारत श0 प्र0 2450। 3

जैसे पिता अपने नादान बच्चों को काबू में रखते हैं उसी प्रकार मनुष्य को बुद्धि के बल से अपनी प्रमथनशील इन्द्रियों को बलपूर्वक संयम करना चाहिये।

मनसश्चेन्द्रियाणाँ चाप्यैकाग्रं परमं तपः। तज्जायः सर्व धर्मेयम्यः सधर्मः परउच्यते ॥4॥

मन और इन्द्रियों को असनमार्ग से हटा कर उन्हें उचित मार्ग पर लाना ही परम तपस्या है। यही सब धर्मों से बड़ा और समस्त धर्मों से श्रेष्ठ है ॥4॥

दमं निःश्रेय संप्राहुवृद्धा निश्चित दर्शिनः। ब्राह्मणस्य विशेषेण दमोधर्मः सनातनः॥7॥

—म॰ भा0, शाँ0अ॰ 160

धर्म निर्णयकार वृद्ध पुरुष इन्द्रिय निग्रह को ही कल्याण का कारण कहा करते हैं। विशेष करके ब्राह्मण के विषय में इन्द्रिय निग्रह ही सनातन धर्म है॥7॥

दमात्तस्य क्रिया सिद्धिर्यथावदुपलभ्यते। दमोदनं तथा यज्ञानधीतंचाति वर्तते ॥8॥

दम का सेवन करने वाले ब्राह्मण की समस्त क्रियायें यथार्थ रूप से सफल होती हैं। दान, यज्ञ और वेदाध्ययन से भी बढ़कर उत्तम दम माना गया है ॥8। ।

दमेन सदृशं धर्मं नान्यं लोकेषु शुश्रुम। दमोहि परमोलोके प्रशस्तः सर्वधर्मिणाम्॥10॥

लोक में इन्द्रिय निग्रह के समान दूसरा धर्म और कुछ भी नहीं है। लोक में सब कर्मों के बीच इन्द्रिय निग्रह ही परम श्रेष्ठ है॥10॥

अदान्तः पुरु षः क्लेशम भीक्ष्णंप्रतिपद्यते। अनर्था् श्चबहूनन्यान् प्रसृजत्यात्म दोषजान्। ॥13॥

इन्द्रिय निग्रह हीन पुरुष सदा क्लेश भोग करते हुए अपने दोष के कारण से ही बहुत से अनर्थों में फंसते हैं॥13॥

आश्रमेषुचतुर्ष्वाहुर्दमवोत्तमंव्रतम् ॥14॥

चारों आश्रमों के बीच दम (इंद्रियां निग्रह) ही उत्तम व्रत है॥14॥

नैषज्ञान वताशक्यस्तपसा नैवचेज्यया। सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणन्तु संयमें नैवशक्यते॥9॥

—म॰ भा0, शाँ0 अ॰ 280

यह परमात्मा केवल शास्त्र ज्ञान से नहीं मिलता न तपस्या से, न यज्ञ से, हाँ, इन्द्रियों को संयम में (अनुचित विषयों से हटाना) रखने से मिल सकता है॥9॥

आपदाँ कथितः पन्था इन्द्रियाणमसयंयमः। तजजयः सम्पदाँ मार्गो ये नेष्टंतेन गम्यताम्॥

—सुभाषित रत्न भाणडागार

इन्द्रियों को काबू में न रखना विपत्ति को मार्ग है। काबू में रखना सम्पत्ति का स्थान है जो अच्छा लगे उसी रास्ते से चलिये।

नैषज्ञानवता शाक्यस्तपसानैवचेज्यया। सम्प्राप्तुमिन्द्रियाणान्तु संयमेनैवशक्यते॥9॥

—मा0 भा0, र्शा0 280

यह परमात्मा केवल शास्त्र ज्ञान से नहीं मिलता न तपस्या से, न यज्ञ से, हाँ इन्द्रियों को संयम में (अनुचित विषयों से हटाना ) रखने से मिल सकता है॥9॥


सम्पूर्ण भारत में यज्ञों के लिए अपूर्व उत्साहयह भारत भूमि पुनः “यज्ञ भूमि” बनकर रहेगी

विशद गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के समय 108 यज्ञ गुरु पूर्णाहुति तक करने का संकल्प किया गया था यह उस महायज्ञ एवं पूर्णाहुति का उत्तरार्ध था, जैसे तीर्थ यात्रा से लौटने पर लोग अपने घरों पर ब्राह्मणा भोजन, हवन, कथा आदि करते हैं वैसे ही मथुरा महायज्ञ की पूर्णाहुति से प्रेरणा लेकर गायत्री उपासकों को अपने अपने क्षेत्र में छोटे बड़े यज्ञ करने का उत्साह होना स्वाभाविक ही था। उस उत्साह को सुसंगठित करके तीन माह में 24 करोड़ जप और 24 लक्ष आहुतियों का आयोजन गायत्री परिवार द्वारा विभिन्न स्थानों पर कराना निश्चय हुआ था। प्रसन्नता की बात है कि विशद गायत्री महायज्ञ के संरक्षक और भागीदार उस संकल्प को पूरा करने के लिए अपने अपने प्रभाव क्षेत्रों में बड़े उत्साह पूर्वक जुट गये और वह संकल्प आनंद पूर्वक पूर्ण हो गया।

पूर्णाहुति से 30 दिन के भीतर ही झालरापाटन के उत्साही उपासकों ने सवालक्ष आहुतियों का यज्ञ 9 कुण्डों की मनोरम यज्ञ शाला बना कर डाला। चन्द्रभागा नहीं के पुनीत तट पर एकत्रित हजारों नर नारियों ने दिन तक जिस श्रद्धा पूर्वक यज्ञ भगवान का भजन किया उसे देखकर सतयुग के ऋषि आश्रमों का स्मरण हो आता था। उसी समय एकत्रित धर्म प्रेमियों में से अनेकों ने अपने अपने यहाँ 24 हजार आहुतियों के यज्ञों का आयोजन करने की अभिलाषा प्रकट की, जिसमें से सुकेत, कनवास, जुल्मी, चेचट इन चार ग्रामों में यज्ञों के मुहूर्त छँट गये। गायत्री जयन्ती से एक दो दिन आगे पीछे इन चारों ही स्थानों पर बड़े उत्साह पूर्वक यज्ञ हुए। यज्ञों का इस प्रकार सार्वजनिक आयोजन जिसमें सभी नर नारी भाग ले सकें सनातन धर्मावलम्बी जनता के लिए एक नई बात थी। प्रातः काल से ही सहस्रों नर नारी स्नान करके वस्त्र शुद्ध वस्त्र पहिन कर यज्ञभूमि में पहुंचकर जप और हवन करते दिखाई पड़ते थे। इन पाँचों ही यज्ञों में आचार्य जी पहुँचे थे। भावनाओं का बाँध टूटा पड़ता था।

इसके बाद विभिन्न स्थानों पर यज्ञों के प्रयोजन आरंभ हो गए और गुरु पूर्णिमा तक सभी की पूर्णाहुति हो गई। हरनबाड़ा के श्री छोटलाल र्स्वणकर ने ठा0 परमालसिंह, कैलाशचन्द्र ला0 श्री राम ला0 चतरसेन ठा0 कन्हैयाला जी आदि के सहयोग से जप तथा हवन का कार्यक्रम सम्पन्न किया। वैकुँठपुर में श्री व्रजेन्द्रलाल गुप्त के प्रयत्न से बड़ा सफल यज्ञ हुआ। श्री विश्वकर्मा जी महोदय के सहयोग से वातावरण में ओर भी उत्साह भर गया। भागीदारों ने इच्छा प्रकठ की कि ऐसे कार्यक्रम पूर्णिमा या छुट्टी के दिन होने चाहिए। मालेगाँव के गायत्री परिवार ने 24 हजार आहुतियों का यज्ञ तथा ब्रह्मभोज बड़े आनंद पूर्वक पूर्ण किया। मानक चौक इन्दौर में श्री दामोदर जी फतेहलाल दुबे, विनायक राव दामोदर जी दुबे श्रीनाथप्रसाद आदि के प्रयत्न से यज्ञानुष्ठान सम्पन्न हुआ। श्री विनायकराव ने 24 लक्ष अनुष्ठान करने का भी संकल्प किया ।

भिण्ड (मध्यभारत) में मेवालाल केदारनाथ गुप्त गौरीप्रसाद मिश्र आदि धर्मप्रेमी सज्जनों के उत्साह से 24 हजार आहुतियों का यज्ञ समारोह पूर्वक पूरा हुआ। जिले भर के विद्वान पंडित और आचार्य आये थे कीर्तन आदि का प्रोग्राम अच्छी तरह सफल रहा। वकानी में 24 हजार मंत्रों द्वारा यज्ञ कार्यक्रम 5 हवन कुण्डों में सम्पन्न हुआ। पूर्णाहुति का दृश्य देखने ही योग्य था, ग्राम के सभी स्त्री पुरुषों ने पूर्ण सहयोग देकर कार्य को सफल बनाया। इकलेरा के यज्ञ में भी 5 कुण्डों की सुन्दर यज्ञशाला बनी थी। वर्षा होते हुए भी भारी संख्या में जनता ने भाग लिया। रात को डाक बँगला के मैदान में प्रवचन होते थे। श्री स्वामी कौशल किशोर जी श्री मोहन वेद पारीख आदि अनेक उत्साही सज्जनों की लगन देखते ही बनती थी। आचार्य जी भी इस यज्ञ में वहीं थे। झाँसी में चिम्दे लुटेरे कि बगिया के सुन्दर उद्यान में 9 कुण्डों की सुसज्जित यज्ञशाला बनाई गई थी। 24 हजार आहुतियों का संकल्प था पर सम्मिलित होने के इच्छुक श्रद्धालुओं के आशा से अधिक आ जाने के कारण दूनी से भी अधिक आहुतियाँ हो गई। घन घोर वर्षा के बीच भीगते हुए उपासकों का यज्ञ तथा प्रवचनों में अविचल भाव से बैठे रहना उनकी निष्ठा को प्रकट करता था। अधिकाँश रेलवे विभाग के कार्यकर्ताओं के उत्साह से यह सब कार्य सम्पन्न हुआ। मथुरा से स्वामी प्रेमानंद, पं॰ गोरखनाथ तथा आचार्य जी भी इस यज्ञ में पधारे थे। उनके प्रवचन सरस्वती इंटर कालेज में भी हुए। लक्ष्मी व्यायाम मन्दिर तथा उसके संचालक श्री अन्नासाहब की गति विधियों को देखकर आचार्य जी विशेष प्रभावित हुए।

बिजनौर का गायत्री यज्ञ 6 दिन तक चला, वेद पाठ, प्रवचन, श्रीमद्भागवत की कथा, कीर्तन का कार्यक्रम बड़ा ही हृदय ग्राही रहा, 620 होताओं द्वारा 24 हजार के स्थान पर 40 हजार आहुतियाँ हुई। माता विद्यावती देवी, मगनीदेवी, सन्नोदेवी ने अथक परिश्रम से इस यज्ञ की सफलता में चार चाँद लगा दिये। गंगीरी निवासी श्री रामजी वल्लभ पारासर के सराहनीय उद्योग से मुदफ्फर में बड़े उत्साह पूर्वक यज्ञ हुआ जिसमें स्थानीय तथा नगला सुमेर निनामई राजमऊ आदि के भी प्रतिष्ठित सज्जनों ने भाग लिया, लश्कर में सेन्ट्रल जेल के जेलर श्री जनार्दन माधव देशमुख महोदय के स्थान पर यज्ञ सम्पन्न हुआ। जेल कम्पाउण्ड में रहने वाले तथा अन्य धर्म प्रेमियों ने उसमें भाग लिया। मुन्डीपार में पं॰ तीर्थानंद शर्मा द्वारा हवन का आयोजन हुआ जिसमें वहाँ के सभी गायत्री उपासक भाग लेने आये। शिकारपुर (बुलन्दशहर) के पं॰ रघुनाथ प्रसाद जी ने प्रयत्न करके 67 उपासक बनाये और उन सब का सहयोग लेकर गुरु पूर्णिमा के दिन बड़े आनंद और उल्लास पूर्वक हवन किया। इन उपासकों का जप आगे भी जारी रहेगा।

दिगोड़ा (टीकमगढ़) के यज्ञ में जनता के उत्साह का ठिकाना न था। 24 हजार के स्थान पर 40 हजार आहुतियाँ हुई, 51 कन्याओं का भोजन होना था पर वह संख्या 90 के करीब पहुँची। ता॰ 21 को अखण्ड कीर्तन हुआ। टीकमगढ़ तक से गायत्री उपासक इसमें शामिल होने आये थे। व्यावर में पं॰ मोहनलाल शर्मा उत्साही गायत्री उपासक हैं उनके प्रयत्न से 3240 आहुतियों का हवन हुआ श्री मुकन्दलाल जी राठी के हाथों पूर्णाहुति हुई। कानपुर में सर्व श्री गिरजाप्रसाद वाजपेयी, हजारी लाल वर्मा, कौशलकिशोर त्रिपाठी, अयोध्याप्रसाद दीक्षित आदि सज्जनों के प्रयत्न से गोविंद नगर में यज्ञ हुआ। गायत्री परिवार के सभी व्यक्तियों के पास छपवाकर निमंत्रण-पत्र भेजे गये थे। इस सामूहिक आयोजन में बड़ा आनंद रहा, प्रसाद में छोटी गायत्री पुस्तिकाएं बाँटी गई। कुडेगाँव (भंडार के श्री महादेव जी रावत ने उत्साह पूर्वक यज्ञ की व्यवस्था की जिसमें कितने ही धर्म प्रेमी सम्मिलित हुए।

करडावद (झबुआ) में श्री सोमेश्वर चतुर्वेदी, शंकर भाई, उनके पिताजी तथा अन्य लोगों ने मिल कर हवन किया। चाँदपुर के शिव मन्दिर पर बड़े आनन्द पूर्वक सामूहिक यज्ञ हुआ। पं॰ विश्वम्भर दयालजी आदि कई अच्छे पंडितों ने क्रियात्मक भाग लिया। 13) का प्रसाद—खीलों पर खाँड़ चढ़ाकर बाँटा गया। खूँटी (राँची) के श्री देवेन्द्रनाथ साहु ने यज्ञ आयोजन किया, जिसमें स्थानीय साधकों न उत्साह पूर्वक भाग लिया। जासलपुर (होशंगावाद) के श्री पुरुषोत्तम आत्मा राम साखरे ने उस क्षेत्र में अनेक संरक्षक और भागीदार बनाकर गायत्री उपासना का प्रचार किया है। उन सबने मिलकर गुरु पूर्णिमा के दिन हवन किया। महबूबाबाद (हैदराबाद) में श्री विलासीराम लोहिया तथा अन्य धर्म-प्रेमियों के प्रयत्न से यज्ञ हुआ। मोतिया (बिहार) में सर्व श्री कुमु- दानन्द, अवधेश झा, शंभूनाथ ठाकुर, सुधाकर झा, देवव्रत झा, पंचानन झा, गजेन्द्र झा आदि सज्जनों ने बड़े उत्साह से हवन को पूर्ण कराया।

जोधपुर में गायत्री जयन्ती से लेकर ज्येष्ठ पूर्णिमा तक 7 दिन एक बड़ा यज्ञ श्री उम्मेद हाईस्कूल में हुआ था, जिसमें मथुरा से आचार्य जी भी गये थे। इसमें सभी गायत्री उपासकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया और प्रतिदिन महत्वपूर्ण प्रवचन होते रहे। अब वहाँ साप्ताहिक हवन क्रम जारी है। पं॰ श्यामकरण जी की माताजी के मन्दिर में प्रत्येक अष्टमी को हवन चालू कर दिया है। गुरु पूर्णिमा को भी चौबीस सौ आहुतियों का हवन बड़ी सफलतापूर्वक हुआ, जिसमें ऋषीकेश के श्री अखंडानन्दजी का गायत्री पर सारगर्भित प्रवचन हुआ। अजीतगढ़ (सीकर) में पं॰ जगदीशनारायणजी वैद्य के उत्साहपूर्ण प्रयत्न से बड़ा सफल यज्ञ हुआ, लगभग 20 व्यक्तियों का उत्साह और सहयोग देखने ही योग्य था। रिसिया (वहरायच) में गुरु पूर्णिमा के दिन बड़े आनन्दपूर्वक हवन हुआ। 51 व्यक्तियों ने विशेष सहयोग देकर उसे सफल बनाया। श्री नौरंगराय और कन्हैयालाल श्रीवास्तव काफी दौड़-धूप करते रहे। लाउडस्पीकर पर भजन संगीतों के अतिरिक्त श्री अशर्फीलालजी का ‘गायत्री का मन्त्रार्थ’ विषय पा भाषण भी हुआ। 20 सेर नुकती प्रसाद में बाँटी गई 20 व्यक्तियों का भोजन भी हुआ।

टाटा नगर (जमशेदपुर) में 24 हजार आहुतियों का हवन 9 वेदियों पर हुआ। 24 लक्ष जप यथा समय पूरा हो गया था। केवल 4 मन भोजन बनाया गया था, पर आश्चर्य है कि इसमें लगभग 1॥ हजार व्यक्तियों ने भोजन किया और प्रसाद भी बँटा। यहाँ के गायत्री उपासकों में कुछ शिथिलता आ गई थी, वह इस यज्ञ से दूर हो गई। घुरसेना (द्रुग) में श्री सुमन्तकुमार मिश्र ने यज्ञ कराया। सठिगँवा (फतेहदुर) में नियमित अनुष्ठान और हवन हुआ। पं॰ रामभरोसे त्रिपाठी, पं॰ चन्द्रमौलि अवस्थी, स्वामी शिवसहाय मुनि ने मिलकर यज्ञ कार्य विधिवत् कराया। महुली (बस्ती) के यज्ञ को पूर्ण करने में सर्वश्री राजदेव पाण्डेय, रामचेतजी, भगवानदत्त जी, जगधर जी, बुद्धिसागर जी, केदारनाथ जी, राममूर्ति जी आदि का सहयोग सराहनीय रहा। वासन (गुजरात) में सर्वश्री साँकलेश्वर जी, प्रभाशंकर, डाह्यालाल, जगदीश, तखु जी, शंकरजी, सकरचन्द, हरिप्रसाद, कमलावेन ने गायत्री जयंती तथा आषाढ़ सुदी 11 को दो हवनों को परिपूर्ण कराया। अमावाँ दोस्तपुर (रायबरेली) में गायत्री उपासक श्रावणी पूर्णिमा को एक बड़ा सामूहिक यज्ञ करने जा रहे हैं। 60 से अधिक अनुष्ठान कर्ता अपने-अपने जप उत्साहपूर्वक पूर्ण कर रहे हैं। यह संख्या 108 तक पहुँचने की आशा है।

शाहजहाँपुर के यज्ञ में लगभग 80 व्यक्तियों ने जप पूर्ण किये। पूर्णाहुति के समय पाँच छह हजार नर-नारी यज्ञ मंडप की परिक्रमा कर रहे थे, यह दृश्य देखते ही बनता था। श्री विशनचन्दजी सेठ का अत्यन्त ही मार्मिक भाषण हुआ, उनने 500 छोटे गायत्री सैट दान देने का वचन किया। करीब 400) इकट्ठे हुए जिसमें 41) बचे हैं। गायत्री यज्ञ मंडल की स्थापना स्थायी रूप से कर दी गई है। मल्लेश्वरम् (बँगलोर) में श्री दयाराम हरजीवन मेहता ने यज्ञ आयोजन में बहुत उत्साह दिखाया। डबरा (गवालियर) श्री जमुनाप्रसाद बडैरिया के प्रयत्न से बड़ी श्रद्धापूर्वक हवन हुआ, जिसमें सर्वश्री नारायणदास पुजारी, शालिगराम गुप्ता, नाथूराम गुप्ता, द्वारकाप्रसाद बडैरिया आदि का उत्साह सराहनीय रहा, यहाँ जप और मन्त्र लेखन यज्ञ का कार्यक्रम भी कितने ही व्यक्ति चला रहे हैं।

आगरा में गायत्री उपासकों ने बड़े ही उत्साह पूर्वक 24 हजार आहुतियों का कार्यक्रम दाऊजी मन्दिर छीपी टोला में पूर्ण किया। नगर के सम्भ्रान्त सज्जन बड़ी संख्या में इस यज्ञ में आग लेने आते रहे और तीनों दिन उच्चकोटि के भाषण होते रहे। साथ ही महिला सम्मेलन भी हुआ। डिवाई (बुलन्दशहर) में श्री बाँकेलाल गुप्त ने यज्ञ की प्रशंसनीय व्यवस्था की। वरह कुम्बा (पुर्निया) निवासी श्री खुशीनाथ जी के प्रयत्न से पलासी ग्राम में 24 हजार आहुतियों का तीन दिन हवन हुआ। घनघोर वर्षा होते हुए भी ग्रामीणों का अपूर्व उत्साह देखने ही योग्य था। श्री सिंहेश्वर जी ठाकुर ने अपूर्व उत्साह दिखाया। हंसूपुरा (बिजनौर) के हवन में ग्रामवासियों का उल्लास देखते ही बनता था तीनों दिन बड़े आनन्द से कार्यक्रम चलता रहा। रात्रि के 10 बजे तक सारा समय जप, हवन, सत्संग और भगवत्-चर्चा में ही बीतता था। बिजनौर से आत्मबलिदानी वकील अशर्फीलालजी के आजाने से बड़ा ही उत्साह रहा। पं॰ छोटेलालजी, पं॰ पीताम्बरदत्त, पं॰ मदनगोपाल आदि सभी सज्जनों ने बड़ा ही परिश्रम करके यज्ञ को सफल बनाया। सुसनेर (मध्यभारत) में पं॰ नन्दकिशोर शर्मा के प्रयत्न से बड़ा ही सफल यज्ञ हुआ। गायत्री माता की सवारी बड़े समारोह के साथ निकाली गई। बम्हनी बंजर (विलासपुर) का गायत्री जयन्ती समारोह दर्शनीय था। प्रभात फेरी में जनसंख्या पर्याप्त थी। भजन कीर्तनों का बड़ा प्रभाव पड़ा। पं॰ रामनारायण द्विवेदी श्री गणेशप्रसाद अवस्थी, श्री कन्हैयालाल वैष्णव, बा॰ शंकरलाल सिंहानिया, श्री मोहनलाल गुप्त आदि ने बहुत उत्साह दिखाया।

आरंग (रायपुर) की संस्कृत पाठशाला में सामूहिक यज्ञ हुआ। बरसते पानी में भी सभी नर-नारी आनन्दपूर्वक भाग लेते रहे। दर्शकों की संख्या भी काफी थी। यहाँ के लिए सामूहिक यज्ञ एक नई बात थी, फिर भी सब कार्य भली प्रकार हो गया। खरियार (उड़ीसा) 35 भागीदारों ने जप पूर्ण किया और गुरु पूर्णिमा के दिन सामूहिक हवन दधिवामन मन्दिर में हुआ। अनेक संभ्रान्त व्यक्ति उपस्थित थे। श्रीमान् राजा साहब के हाथों याज्ञिकों को अभिनन्दन-पत्र वितरण कराये गये। सर्वश्री प्रतापचन्द प्रधान, विद्याभूषण महाअती, चन्द्रशेखर विमी अपने परिवार समेत गायत्री तपोभूमि गए थे, इन लोगों ने ही यह उत्साह यहाँ उत्पन्न किया था। सरढव (उत्तर गुजरात) के श्री शान्तवन जी उस क्षेत्र में 24 यज्ञ कराने के लिए संकल्प लेकर अपने व्रत में जुट गए हैं। सरढव में 6 दिन का यज्ञ जेष्ठ सुदी 15 को तपस्वी महात्मा दयालुजी के संरक्षण में बड़े आनन्दपूर्वक हो चुका है। 23 यज्ञों की तैयारी हो रही हैं। धारती खेड़ा (धार) में भुवनेश्वरी देवी के रमणीय स्थल पर अवस्थित महात्मा श्यामचरणदास जी के आश्रम पर आनन्दपूर्वक यज्ञ हुआ। श्री रामचन्द दुर्गाशंकर परसाई साँस्कृतिक सेवाशृंखला का व्रतधारी संकल्प निष्ठा पूर्वक पूरा कर रहे हैं।

कुर्रा (हपीरपुर) में 24 हजार आहुतियों का हवन पं॰ जगन्नाथप्रसाद जी शास्त्री के आचार्यत्व में हुआ। प्रातः प्रभातफेरी निकली फिर 8 से 4 बजे तक हवन होता रहा। 20-20 होताओं की टोलियाँ हवन पर बैठती रहीं। एक मन हलुआ बना था, जो प्रसाद स्वरूप बस्ती के प्रत्येक घर में बाँटा गया। अनेकों के यज्ञोपवीत हुए। पूरे प्रेम ने सच्चे मन से श्रद्धापूर्वक सहयोग दिया। छगवाँ (राठ) में श्री लेखराय खरे के स्थान पर 24 हजार आहुतियों का हवन 3 वेदियों पर लगभग 300 नर-नारियों के द्वारा सम्पन्न हुआ। कई प्रभावशाली भाषण हुए। दूसरे दिन सम्पूर्ण ग्राम की कन्याओं को भोजन कराया। खोरासा [सौराष्ट्र]में ब्रह्मचारी नर्मदाशंकर जोशी के प्रयत्न से 5 दिन हवन चलता रहा। पूर्णिमा के दिन रात्रि को 2 बजे तक कार्यक्रम चलता रहा। बड़ा आनन्द रहा। कल्याण (बम्बई) में श्री मोरेश्वर वामन ढोसर के प्रयत्न से सामूहिक जप तथा हवन का कार्यक्रम सुव्यवस्थित रीति से हुआ। कई सज्जनों ने 24 लक्ष अनुष्ठान के संकल्प किये।

हापुड़ के लक्ष्मीनारायण मन्दिर में तीन दिन तक यज्ञ हुआ। 2 मन सामग्री लगी। 30 ब्राह्मणों को भोजन कराया। पं॰ लालमणि शर्मा पं॰ ओउम्प्रकाश शास्त्री, ब्रह्मचारी जगदीश शर्मा ने यज्ञ कार्य विधिपूर्वक कराया। नगर के अनेक सत्पुरुषों ने इसमें प्रेमपूर्वक सहयोग दिया, काली बावड़ी (धार) में गायत्री उपासकों की संख्या तीव्र गति से बढ़ रही है, मन्त्र लेखन चालू है। गुरु पूर्णिमा को सामूहिक हवन बड़े प्रेमपूर्वक हुआ। पं॰ गंगाराम शर्मा प्रधानाध्यापक द्वारा लोगों को बड़ी प्रेरणा मिल रही है। सतना (विन्ध्य प्रदेश) गैंग क्वाटर्स एरिया में श्री आर॰ आर॰ मिश्रा के प्रयत्न से बड़ा सफल यज्ञ हुआ। नगर के उच्चकोटि के व्यक्ति उसमें श्रद्धापूर्वक सम्मिलित हुए। पिछोर (झाँसी) गायत्री उपासकों ने श्रद्धापूर्वक हवन किया, श्री लक्ष्मण शास्त्री का प्रवचन हुआ। श्री रामचरण जी पटवारी तथा श्री गंगाप्रसादजी चौधरी द्वारा ब्राह्मण भोजनादि की व्यवस्था सम्पादित हुई। टीकर पुरवा (खीरी) में श्री भगवतीप्रसाद वर्मा के प्रयत्न से यज्ञ कार्य निर्विघ्न पूर्ण हुआ।

रस गाँव (खरगौन) के पं॰ गणपतिलाल जी एक सुन्दर गायत्री मन्दिर निर्माण कर चुके हैं। उसमें अखंड दीपक तथा अखंड अग्नि स्थापित है। गुरु पूर्णिमा पर सवालक्ष आहुतियों का हवन बड़े ही आनन्दपूर्वक सम्पन्न हुआ। यहाँ आगामी माघ मास में एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन हो रहा है। गणपतिलाल जी का परिवार एक प्रकार से गायत्री माता में तन्मय हो रहा है। सोरसन (कोटा) में प्रधानाध्यापक नन्दकृष्ण शर्मा अपने क्षेत्र में बड़ी लगन के साथ गायत्री प्रचार कर रहे हैं। आस-पास के गायत्री उपासकों को एकत्रित करके उनसे यज्ञ कराया। इचाक [हजारी बाग] में श्री बद्रीनाथ तिवारी, श्री शिवटहल मोदी आदि के प्रयत्न से यज्ञ पूर्ण हुआ, टोडा कल्याणपुर (मुजफ्फरनगर) में पं॰ हरिप्रसाद शर्मा ने यज्ञ व्यवस्थित रूप से कराया।

बरेली में श्री चिम्मनलाल सूरी के प्रयत्न से गायत्री उपासकों की संख्या दिन-दिन बढ़ रही है। साप्ताहिक हवन बड़े उत्साह से होते हैं। गत दो मास में दो लाख से अधिक आहुतियों का हवन हो चुका है। गुरु पूर्णिमा के दिन सवालक्ष आहुतियों का यज्ञ हुआ। 130 व्यक्ति नियमित जप करने वाले भागीदार बन चुके हैं। इसी वर्ष सवालक्ष आहुतियों का एक और बड़ा सामूहिक यज्ञ करने का इन लोगों का विचार है। सूरीजी की धर्मपत्नी श्री॰ सुलोचना कुमारी भी अपने पतिदेव जैसी ही निष्ठावान हैं, इनकी एक मार्मिक पुस्तक ‘गायत्री से समाज-सुधार’ प्रकाशित हुई है। कालीबाड़ी में श्री सेवाराम याज्ञिक द्वारा श्री गायत्री सत्संग मंडल चलाया जा रहा है। इसमें बालक बड़ी संख्या में जप हवन करने आते हैं।

गोंडा में 24 लक्ष का जप और 24 हजार आहुतियों का हवन 5 कुण्डों में बड़े आनन्दपूर्वक हुआ। रेलवे विभाग के अनेक कार्यकर्ता इसे सफल बनाने में बड़े उत्साह से जुटे रहे। बड़ी संख्या में नर-नारी एकत्रित हुए। नरमेधी पं॰ भरतलाल जी अवस्थी भी पधारे। 2 अगस्त को नबाव गंज में भी यज्ञ की तैयारी है। दिल्ली नगर के गायत्री उपासकों ने अपने-अपने सामूहिक यज्ञ किये। सर्वश्री पं॰ मनोहरलाल जी मँडाहर, श्री आनन्द जी, मास्टर रामलालजी, मा॰ जगन्नाथजी, श्री विद्यारत्नजी, श्री सीतारामजी, डा॰ रुपलालजी द्विवेदी आदि के यहाँ अनेक स्थानों पर यज्ञ हुए। वाराँ (कोटा) में गायत्री जयन्ती पर बड़े विशाल रूप में गायत्री महायज्ञ हुआ हजारों व्यक्ति सम्मिलित हुए। नौ सौ आदमियों का ब्रह्म-भोज हुआ। लोग दाँतों तले उँगली दबाते हुए कहते थे कि बाराँ में ऐसा यज्ञ आज तक नहीं हुआ। पं॰ श्री कृष्णजी, श्री भँवरलालजी आदि अनेक व्यक्तियों का भारी योग इसे सफल बनाने में रहा। गुरु पूर्णिमा को भी यहाँ पर 5 कुण्डों में 50-60 व्यक्तियों द्वारा यज्ञ सम्पन्न हुआ।

कसही वहरा (रायपुर) में श्री रामगरीबजी के यहाँ यज्ञ हुआ। आवाँ में गायत्री जयन्ती पर 24 हजार आहुतियों का यज्ञ हुआ। एक महीने बाद ही गुरु पूर्णिमा पर फिर वहाँ 24 हजार आहुतियों का यह दूसरा यज्ञ था। सावन भादवा (कोटा) में भी 24 हजार आहुतियों का हवन हुआ। वानुछपरा (बिहार) में श्री उमाकान्त झा मुख्तार के प्रयत्न से घनघोर वर्षा के बावजूद बड़ा सफल यज्ञ हुआ। पचम्बा (बिहार) में श्री बजरंगराम भदानी के मकान पर बड़ी सजी हुई यज्ञशाला में यज्ञ हुआ, 1 हजार से अधिक दर्शक उपस्थित थे। पं॰ प्रयाग मिश्र, श्री बच्चूलाल जी कथावाचक तथा अभयनंदन जी आर्य के प्रवचन हुए। बाँसवाड़ा में पं॰ शंकरलाल जी औदीच्य के घर पर हवन हुआ। विलासपुर में गायत्री विज्ञान मंडल के 23 सदस्य यज्ञ में भागीदार बने और भी अनेक अनेक धर्म-प्रेमी यज्ञ में शामिल रहे। 108 भागीदार बनाने का प्रयत्न चल रहा है। राजपुर (बड़वानी) में काछीपंच की धर्मशाला में तीन दिन तक यज्ञ हुआ जिसमें नगर के सभी व्यक्तियों ने तथा आस-पास के ग्रामीण बन्धुओं ने तन, मन, धन से सच्च् सहयोग दिया। जल यात्रा का जुलूस चार फर्लांग लम्बा था। श्री रमाकान्त शास्त्री के प्रवचन हुए। सभापति रामनाथ शर्मा थे।

खरगौन में निमाड़ गायत्री परिवार की स्थापना हुई और दर्शनीय सामूहिक यज्ञ हुआ। श्री ओंकारलालजी की ओर से उपासकों तथा आगन्तुकों को भोजन कराया गया। चपुन्ना (फर्रुखाबाद) के गायत्री उपासकों ने समीपवर्ती ग्रामों में 24 यज्ञ कराने का संकल्प किया है। जिसमें से गुरु पूर्णिमा तक 13 स्थानों पर हवन हो चुके, जनता का उत्साह देखते हुए शीघ्र ही 24 से भी अधिक यज्ञ होने की आशा है। पिलखना, चपुन्ना, उदईपुर, गुलरिया के यज्ञ विशेष उत्साहवर्द्धक रहे, जिनमें सर्वश्री पातीराम त्रिपाठी, कृष्णलाल द्विवेदी, केशोराम ब्रह्मभट्ट, विश्बेश्वरदयाल त्रिपाठी, छोटेलाल मिश्र आदि सज्जनों ने विशेष श्रम किया। कसरावद [मध्यभारत] में मालवीय धर्मशाला में पं॰ रामेश्वर जी उपाध्याय द्वारा यज्ञ सम्पन्न कराया गया। नागरिकों और छात्रों का सहयोग सराहनीय था। जबलपुर में गायत्री प्रचारक मंडल की ओर से अच्छा सामूहिक यज्ञ हुआ। हर रविवार को यहाँ साप्ताहिक हवन भी होता है।

मेहगाँव [मध्यभारत] में दाऊजी के मन्दिर पर 24 हजार आहुतियों का हवन बड़े उत्साहपूर्वक पूर्ण हुआ। बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपासक इस यज्ञ में भागीदार बने। मारुति भवन नुनहड़ के संचालक श्री रामनारायणजी ‘हृदयस्थ’ ने इस यज्ञ को सफल बनाने में बड़ा प्रयत्न किया। बम्हनी बाजार (विलासपुर) में जनता की ओर से हवन हुआ। यज्ञ कार्य पं॰ रामनरायनजी दुवे ने कराया। ग्राम की कीर्तन मंडली के कार्यक्रम से जनता में बड़ा आनन्द रहा।

लिलुआ (कलकत्ता) में श्री हनुमानप्रसाद वच्छ के प्रयत्न से गायत्री नवयुवक मंडल की स्थापना हुई और गुरु पूर्णिमा के दिन सामूहिक हवन किया गया। खेडी (बुलढाना) के गायत्री उपासकों ने मिलकर सामूहिक जप तथा यज्ञ किया। गरोठ में शिवजी के मन्दिर पर सामूहिक हवन हुआ। हरिराम जी वैद्य ने उस क्षेत्र में बहुत प्रचार कार्य किया है। नर्रा (खरियार रोड) में श्री गुरु प्रसादजी निगम के प्रयत्न से हवन हुआ। नगला महासिंह (आगरा) के पं॰ बोध शर्मा ने सामूहिक हवन की व्यवस्था की। बुलन्दशहर के श्री रामचन्द्र शर्मा मुख्तार के प्रयत्न से हवन सम्पन्न हुआ। बालून्दा में शिवराजसिंह द्वारा यज्ञ का प्रबन्ध किया। पयागपुर (वहरायच) में देशराज पाठक आदि सज्जनों द्वारा हवन आयोजन की व्यवस्था की गई। झुसावल में मानिकचन्द जी मिश्र ने यज्ञ कार्य कराया। राजापुर (बान्दा) के पोस्ट मास्टर श्री नारायणप्रसाद जी निगम ने यज्ञ आयोजन किया। तारा नगर (चूरु) में श्री राधाकिशन भगत और पं॰ मामचन्द मिश्र के प्रयत्न में हवन हुआ, श्रावणी पूर्णिमा के लिए भी कार्यक्रम बनाया गया है।

आरा (बिहार) के गायत्री उपासकों ने मिलकर प्रेमपूर्वक हवन किया। लखना (इटवा) में पं॰ अजन्तसिंह मिश्र द्वारा यज्ञ और अनुष्ठान हुआ। पाड़ा तराई (विलासपुर) के रेञ्ज आफीसर श्री आर॰ एस॰ चौबे के प्रयत्न से अनेक व्यक्तियों ने जप करने का संकल्प लिया और हवन में सम्मिलित हुए। हथगाँव (फतेहपुर) में श्री जगमोहन निगम द्वारा अखंड सामूहिक जप तथा हवन का आयोजन किया गया। धामपुर (बिजनौर) में श्रीमती कान्तीदेवी त्यागी तथा अन्य उत्साही गायत्री उपासिकाओं की मंडली द्वारा बड़े आनन्दपूर्वक यज्ञ कार्य सम्पादित किया गया। लखनऊ में श्रीराजेश्वर-कुमार के मकान पर हवन में अनेक गायत्री उपासकों ने बड़ी श्रद्धापूर्वक भाग लिया।

लक्ष्मीपुरी (अलीगढ़) में पं॰ पाण्डेय के स्थान पर अच्छा यज्ञ हुआ। पं॰ चन्द्रपाल शास्त्री आचार्य थे। पहासू के पं॰ ऋषिमान शास्त्री भी पधारे। बड़ी श्रद्धापूर्वक सब कार्य हुआ। करंगामाल (उड़ीसा) में जगन्नाथ जी के मन्दिर पर सामूहिक यज्ञ हुआ, जिसमें 15-20 गाँवों के व्यक्ति कीर्तन मंडलिया बनाकर पूर्णाहुति में आये। 33 भागीदारों ने नियमित अनुष्ठान में भाग लिया। ललोडी में श्री शंकरलालजी के प्रयत्न से हवन कार्य पूर्ण हुआ। सीकर में श्रीमती मणिदेवी के यहाँ हवन हुआ।

सेंधवा (निमाड़) रामकृष्ण आश्रम देवझिरी पर हवन कार्य निर्विघ्न सम्पन्न हुआ। दयानन्द जी ठाकुर यहाँ एक गायत्री समिती बनाने में प्रयत्नशील हैं। लोटरा (गुजरात) के यज्ञ में श्री नगीनदास जेठाभाई का उत्साह सराहनीय रहा। नलखेड़ा के यज्ञ को सफल बनाने में श्री कस्तूरचन्दजी तथा गुरदावन के पं॰ दामोदर जी आर्दा ने सच्चे मन से कार्य किया। जगेली (पूर्निया) में ग्राम देवता के मन्दिर पर यज्ञ हुआ। कीर्तन में बड़ा आनन्द आया। करीब 200 व्यक्ति सम्मिलित हुए। मोतीलाल जी गोस्वामी ने विशेष प्रयत्न किया।

राजपुर (बडवानी) में गायत्री यज्ञ समिति के प्रबन्ध से बड़े उत्साह और समारोह पूर्वक यज्ञ हुआ, यज्ञ में भाग लेने वालों का उत्साह देखने ही योग्य था। खानपुर (कोटा) के गायत्री उपासकों ने चतुर्दशी और पूर्णमासी को अखंड जप, पाठ, ज्योति, अभिषेक, यज्ञ, कीर्तन, प्रवचन आदि का अच्छा आयोजन किया। श्री नाथूलाल जी गौतम का कठिन तपश्चर्या पूर्वक 24 लक्ष पुरश्चरण चल रहा है। श्योपुर कलाँ (मध्यभारत) में श्री देवीशंकर वशिष्ठ आदि कई गायत्री उपासकों ने मिलकर सफलतापूर्वक यज्ञानुष्ठान पूर्ण किया। नगर के धर्म-प्रेमी नर-नारियों ने बड़ी संख्या में भाग लिया।

लसुडिया अमरा (उज्जैन) में श्री सेवादास गोविन्दराम वैरागी के प्रयत्न से डभोला (मेहसाना) के पिछड़े आदिवासी क्षेत्र में भी हरिप्रसादराव जानी द्वारा, कोटा (राजस्थान) में ड्राइवर पूर्णमल के यहाँ अच्छे यज्ञ सम्पन्न हुए। पारादान (फतेहपुर) में श्री दयाशंकर वर्मा ने, खजुहा में पं॰ प्रेमनारायण शुक्ल ने, मुडरेवा (गोंडा) में श्री गिरजाप्रसाद ने यज्ञ का प्रबंध कराया। खिलचीपुर में गुरु पूर्णिमा के हवन में हर महीने 5 हजार आहुतियाँ करते रहने का भी निश्चय हुआ। अचलगंज (उन्नाव) में श्रावणी पूर्णिमा को यज्ञ होगा। आगरा (मालवा) में 40 दिन का अखण्ड गायत्री आयोजन चल रहा है।

जिनकी सूचनाएं ता॰ 30 तक मथुरा नहीं आ सकीं ऐसे भी अनेकों यज्ञ गायत्री तपोभूमि की अपील पर देश भर में हुए हैं। 108 स्थानों में 24 करोड़ जप, 24 लक्ष आहुतियों का संकल्प था उससे बहुत अधिक का आयोजन हुआ। अब आगे इस यज्ञीय प्रक्रिया का और भी उत्साहपूर्वक आगे बढ़ाना है। आश्विन सुदी में झालावाड़ का 24 कुण्डों वाला और रामगंज मंडी में 101 हवन कुण्डों वाला यज्ञ है। कार्तिक सुदी 13 से 4 दिन तक 9 कुँडों की यज्ञशाला में नियाना (कोटा) में यज्ञ होगा। यह शृंखला देश भर में बड़े उत्साहपूर्वक चलेगी, इन सब में आचार्य जी भी प्रसन्नतापूर्वक पहुँचेंगे। यह सर्व विदित है कि आचार्य जी कहीं जाने में दक्षिणा तो दूर रेल भाड़ा भी बहुत आग्रह पर ही लेते हैं।


भरत की अन्तर्भावना

(श्री आनन्द जी टीकापट्टी)


भरत की अन्तर्भावना (Kavita)

ऐश्वर्य, विभव, राज्याधिकार। तुझमें शाबित सारे विकार॥

प्रभुता-मद से भर जाता मन, भाई-भाई होता दुश्मन। पति-प्राण ही जीवन हरती, खो देती सारा प्रेम प्यार॥ ऐश्वर्य॰॥

वात्सल्य सुधा की धारा ही, विष-अर्णव बनती सारा ही। हित सुन उपहार लुटाती जो, उनका खो जाता है दुलार॥ ऐश्वर्य॰॥

वदनाम्बुज लख हर्षाती है, राजा हों राम मनाती है। वेंसी माता ही घोर विपिन में, भेज रही हर्षित अपार॥ ऐ॰॥

जिसने तुझको ठुकराया है, तेरे हित क्षोभ न माया है। उनकी पावन पादुका आज, तेरे शिर पर शोभित उदार॥ ऐ॰॥

उनका ही छोटा भाई हूँ, प्रण पालक का अनुयायी हूँ। उस पर ही मोहावरण डाल, क्या चाह रहे हो विजय-हार॥ ऐश्वर्य॰॥

यह अलक जाल भी जटाजूट, शय्या कुश की साँथरी पूत। वल्कल को धारण करता हूँ, राज्याभूषण देता उतार॥ ऐश्वर्य॰॥

षट्रत्न व्यञ्जन का सरस स्वाद, उस की भी होगी नहीं याद। बिन स्वाद लिये ही खा लूँगा, फल-फूल-कंद बस एकबार॥ ऐ॰॥

नारी के संग तपस्या सह, चाहे हो काम वेग अहरह। जीवन को परिपावन रखकर-प्रिय को सुमिरुंगा बार-बार॥ ऐ॰॥

सियाराम वियोग ज्वलित तन मन, माता, गुरु देव, सखा-परिजन। उन की सेवा में रत रह कर कर लूँगा चौदह वर्ष पार॥ ऐश्वर्य॰॥

उनका है राज्य इसी कारण, लग जायेगा जीवन का क्षण। पर पद्म-पत्र ज्यों करते हैं, पंकिल जल में भी नित विहार॥ ऐश्वर्य॰॥

शुभ, विमल पादुका साया से, मुझको भय लोभ न माया से। मद-काम-क्रोध, ईर्ष्या अनोक, चाहे करले कितना प्रसार॥ ऐ॰॥

*समाप्त*