कामना करो न, किन्तु साधना, करो!

(श्रीमती विद्यावती मिश्र)


कामना करो न, किन्तु साधना, करो (Kavita)

शब्द जाल से सुधार हो न सकेगा, पंख के बिना विहंग उड़ न सकेगा, कर्म करो, सिद्धि की न कल्पना करो! साधना करो!!

नींव के बिना खड़ा हुआ नहीं भवन, शक्ति के बिना न भाव-सिंधु संचरण, स्वत्व भूल कर न व्यर्थ याचना करो! साधना करो!!

भाग्य से न फल परंतु स्वेद से मिला, शूल सह सका तभी प्रसून है खिला, कुंभकार दिव्य सृष्टि सर्जना करो! साधना करो!!


आध्यात्मिक जीवन के अनुभव

(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)

मानव-चेतना सापेक्ष-चेतना है। इसकी सापेक्षता को विनष्ट कर देना ही मारे योगों का एक लक्ष्य है जब मन की उपाधि का तिरोधान हो जाता है तभी चेतना अपनी परमावस्था को प्राप्त करती है; जहाँ किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं रहता वरन् अस्तित्व का ही अस्तित्व रहता है, जहाँ किसी वस्तु विशेष के आस्तित्व का ज्ञान नहीं होता, वरन् परम अस्तित्व का ही परम ज्ञान होता है; और जहाँ विभिन्न वस्तुओं के ज्ञान का आनन्द नहीं होता वरन् परम अस्तित्व के परमार्थिक ज्ञान का परमानन्द प्राप्त होता है। यहाँ सच्चिदानंद स्वरूप का साक्षात्कार है। यही ब्रह्म अथवा सनातन सत्य है। यही मुक्ति अथवा मोक्ष है इसके ज्ञान से ही मनुष्य परम पुरुषार्थ की प्राप्ति कर सकता है।

“तमेय विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय।”

श्वेताश्वतर 3-8

(उसको जान लेने से ही मनुष्य मृत्यु का अतिक्रमण करता है। अन्य कोई दूसरा मार्ग नहीं है।)

इस पारमार्थिक स्थिति को प्राप्त करने के लिये मुमुक्षु मनुष्य नाना मार्गों को ग्रहण करते हैं। हर एक मार्ग को योग कहकर पुकारते हैं। योग वह प्रक्रिया है जिससे जीव अपने अविद्या-जाति उपाधियों से विमुक्त होकर अपने सच्चिदानन्द स्वरूप का ज्ञान कर सके ब्रह्म के तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित करना योग है, चित्त की वृत्तियों का निरोध करना योग है। प्रेम स्वरूप परमात्मा की अवस्थिति का कण कण में भान करना योग है, निमित्त रूप से सहजावस्था में सन्यित होकर अखिल विश्व के कल्याणार्थ ब्रह्मकर्म में संलग्न रहना योग है, तथा साथ ही वे सारी प्रक्रियायें एवं साधनायें भी योग हैं जो इन लक्ष्यों की ओर (यथार्थतः लक्ष्य तो एक ही है परन्तु उसे विभिन्न दृष्टिकोणों से देखने पर विभिन्न प्रकार से हैं) हमें प्रवृत्त करती हैं।

इस प्रकार मुख्यतः चार योग माने जाते हैं– ज्ञान-योग, कर्मयोग, राजयोग तथा भक्तियोग। मनुष्य की संस्कार एवं कर्मगत अपनी अपनी प्रकृति के अनुसार उसके साधना मार्गों में भी बाह्य विभेद नहीं है। ये विभेद व्यक्ति- व्यक्ति की मानसिक विभिन्नता के कारण ही हैं। योगों की इन बाह्य विभिन्नताओं के आधार पर आध्यात्मिक अनुभवों की भी बाह्य विभिन्नता पाई जाती है। परन्तु इस बात पर ध्यान देना अनिवार्य है कि योग की वास्तविक प्रगति सर्वांगीण-प्रगति ही है। किसी एक योग-विशेष में उन्नति होने का अर्थ है योगों में समान रूप से उन्नति को प्राप्त करना, अतः यद्यपि बाह्य अनुभवों की अभिव्यक्ति में विभिन्नतायें रहती हैं। यहाँ इस लेख में उन्हीं अनुभवों का विशेष वर्णन किया जा रहा है, जो आध्यात्मिक उन्नति के लिए अनिवार्य हैं। मनुष्य चाहे जिस योग का अवलम्बी हो उसमें यदि इन सामान्य लक्षणों तथा अनुभवों का अभाव हो तो निश्चय जानिये कि वह आध्यात्मिक मार्ग से अवगत नहीं है।

मुदिता :– आध्यात्मिक साधकों में साधना के साथ-साथ मुदिता भी उत्तरोत्तर बढ़नी चाहिये। यह स्वस्थ मनस्, तथा शुद्ध हृदय का परिचायक है। यह चित्त-प्रसाद है अथवा मन की शान्ति का बोधक। जब तक हृदय शुद्ध नहीं होता मन के विकार क्षीण नहीं होते, विक्षिप्तता दूर नहीं होती तब तक मनुष्य मुदिता की प्राप्ति नहीं कर सकता। मुदिता एक निश्चित लक्षण है जिससे हम जान सकते हैं कि साधक अपनी साधना में सफलता को प्राप्त कर रहा है। बहुत लोग साधु रूप में दृष्टिगत होने के लिये बहुत ही उदासपूर्ण मुखाकृति बनाये दिखते हैं। यह उनका भ्रम है जो मन सुख की रश्मियों से ओत-प्रोत हैं उसी में सत्व का संचार है। सात्विक मन ही योग की गंभीर साधनाओं में सफलता पूर्वक प्रवृत्त हो सकता है, अतः सुन्दर सद्गुण का उपार्जन करिए आत्मा आनन्द है; सदा आनन्द में ही संस्थित रहिये।

सन्तोष :– शान्ति, सत्संग, सन्तोष तथा सद्विचार मोक्ष के चार द्वारपाल हैं सन्तोष से बढ़कर और कोई लाभ नहीं। सन्तोष से परमशान्ति तथा सुख की प्राप्ति होती है, सन्तोष सात्विक गुण है। इससे मनुष्य आलसी नहीं बनता, वरन् और भी सक्रिय बनता है। सन्तोष से वैराग्य, विवेक तथा विचार की अभिवृद्धि होती है। जिसमें सन्तोष है उसी में ईश्वरीय ज्योति का अवतरण होता है। सन्तोष ही सर्वोत्तम धन है। आत्मा स्वयं नित्य तृप्ति है। सन्तोष मनुष्य के आगे सारी ऋद्धियाँ डोलने लगती हैं। वह महापुरुषों तथा तपस्वियों द्वारा भी पूजित होता है।

वैराग्य :– राग ही बन्धन को घनीभूत करता है। वैराग्य से ही विमुक्ति होती है। साधक में जब सत्व का समावेश होता है, तब उसमें सारे विषय पदार्थों के प्रति स्वाभाविक विभक्ति हो जाती है। वैराग्य की दिनानुदिन अभिवृद्धि होती है यह इस स्पष्ट परिचायक है कि साधक आध्यात्मिकता की ओर बढ़ता जा रहा है। यदि वैराग्य की स्थिति का अनुभव मनुष्य में उत्पन्न नहीं हुआ तो वह रञ्चमात्र भी आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता। वैराग्य महती शक्ति है, जिससे साधक सतत् ध्यान के लिए प्रवृत्त होता है और अन्ततः आत्मा—साक्षात्कार करता है। विवेकयुक्त वैराग्य ही लाभदायक है, कारण वैराग्य तो अस्थायी है।

अभय :– यह दैवी सम्पदा है। भय तो अविद्याजात है। शरीर के साथ तादात्म्यता रहने से ही मनुष्य भयभीत होता है। ज्यों-ज्यों मनुष्य में आँतरिक शाँति, सन्तोष तथा वैराग्य की अभिवृद्धि होती जाती है त्यों-त्यों उसमें भय का तिरोधान होता है। अभय की पूर्णावस्था जीवन्मुक्तों में ही पाई जाती है।

समाधान :– मन में पूर्ण शान्ति रहती है। विक्षेप नहीं होता। योगी का मन सदा लक्ष्य की ओर लगा रहता है। समाधान प्राप्त साधक ही सतत् एवं अनवरत ध्यान का अभ्यास कर सकता है। उसमें विचार करने की प्रबल क्षमता होती है।

साधना में सफलता के साथ साथ सारे सद्गुण मनुष्य में आने लगते हैं। शान्ति, पूर्णता, एकाग्रता, निश्चलता, समत्व, धृति, श्रद्धा, इत्यादि सारे गुण उसमें अपना आवास बनाते हैं। चमत्कारों की क्षमता के द्वारा मनुष्य योगी नहीं बनता, वरन् इन सद्गुणों की अभिवृद्धि से ही सच्चा योगी बनता है। जो मनुष्य एक भी सद्गुण में प्रतिष्ठित है, उसके पास अन्य सद्गुण दौड़ कर चले आते हैं।


आप असीम शक्ति के भण्डार हैं-

(श्री राम खेलावन चौधरी, एम. ए.)

क्या आपने ‘अपने आप को’ अच्छी तरह ईमानदारी से तटस्थ होकर देखा है? क्या आप अपने से पूर्ण तथा संतुष्ट हैं? या आप अपनी कठिनाइयों और समस्याओं से इतना पीड़ित रहे हैं कि आप अपनी योग्यताओं और आन्तरिक शक्तियों की ओर कोई ध्यान ही न दे सके? मेरे विचार से साधारण व्यक्ति अपने आप को नहीं पहचान पाता और वह केवल इसी विश्वास के साथ अपना जीवन बिता देता है कि वह अपनी सभी शक्तियों और योग्यताओं का पूर्ण-तथा समुचित प्रयोग कर रहा है। पर वास्तव में ऐसा है नहीं, वह अपने आप को जान नहीं पाता।

हमें प्रत्येक क्षण आत्म निरीक्षण करते रहना चाहिए और तभी हम जान सकेंगे कि हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक शक्ति हममें है। तभी हमारे मन से दीनता की भावना दूर होगी, तभी हम जान सकेंगे कि हमारे अन्तर में अनन्त शक्ति स्रोत प्रवाहित हो रहा है।

सभी धर्म ग्रन्थों में लिखा है—ईश्वर का राज्य हमारे हृदय के भीतर है। इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की अनन्त शक्तियाँ—शाँति, शक्ति, बल तथा अन्य गुण सभी हमारे भीतर वर्तमान हैं। दुर्भाग्य से हम उन्हें पहचान नहीं पाते, उनका विकास नहीं कर पाते और उनका उपभोग नहीं कर पाते।

अपनी शक्तियों को पहचानने के अनेक उपाय हैं। उनमें से एक है आत्म-ज्ञान अर्थात् आत्म-श्रद्धा, आत्म नियन्त्रण और आत्म विकास। इन्हीं के द्वारा जीवनी शक्ति परिपुष्ट होकर विकसित होती है। अपने आप को जानिये- यही ज्ञान के मार्ग में प्रथम चरण है।

ईश्वर से निरन्तर प्रार्थना करो कि वह तुम्हें आत्म ज्ञान दे।

आप जो कुछ होना चाहते हैं, उसका एक स्पष्ट चित्र सा अपने मन में तैयार करिये और उसी चित्र को सदैव अपने सामने बार बार लाने का प्रयत्न करिये।

ईश्वर प्रत्येक क्षण आपके साथ है और आपकी सहायता कर रहा है- इस भाव को हृदय में स्थान दीजिये।

अनुभव कीजिए कि आपके व्यक्तित्व से एक प्रकार का प्रकाश निकल रहा है और वह प्रकाश पुँज दूसरों में प्रविष्ट हो रहा है। इससे आपके व्यक्तित्व की गुरुता बढ़ेगी। इससे आपका गौरव भी बढ़ेगा।

अपने विचारों में अचत विश्वास भरिए। आप अपने को एक साधन समझिए और विश्वास रखिये कि आप संसार को कुछ दे सकते हैं।

आपकी शक्तियों पर एक परदा पड़ा है, जिसके कारण आप उन्हें नहीं देख सकते। यह पर्दा क्या है? ईर्ष्या, घृणा, द्वेष, जलन और क्रोध इन्हीं से वह पर्दा बना है। इन्हीं के चक्कर में पड़कर आप अपने को भूल बैठते हैं। आप अपने मित्रों से ईर्ष्या करते हैं, उनकी उन्नति से जलते हैं, पास-पड़ोसियों को बढ़ते देखकर आप दुःखी होते हैं। इन भावों को दूर करिए और अनुभव करिए कि आप भी प्रगति की दौड़ में सर्वप्रथम आ सकते हैं।

प्रत्येक मनुष्य इस पृथ्वी पर ईश्वर की मूर्तिमान सत्ता के रूप में दिखाई देता है। वह अनन्त शक्ति का भंडार है। यदि आप निर्बल हैं, दुःखी हैं, पराजित हैं और असफल हैं, अपने इस रूप की ओर दृष्टिपात करिये, आपका जीवन इतना चमक उठेगा कि आपने उसकी कभी कल्पना भी न की होगी।


धर्म और विवेक का समन्वय

(श्री डा. भगवानदास एम. ए.)

विचार के विषय में, यह प्रसिद्ध है कि सब प्रकार के आस्तिक-दर्शन और सब प्रकार के नास्तिक-दर्शन इस वेद-वेदाँग रूपी ज्ञान सागर में मग्न हैं। जब यह सिद्धाँत है कि परमात्मा की, परमेश्वर की, चेतना में, उसी की इच्छा में, सब कुछ है, तो इन विविध विचारों को भी उसी ने जगत् में स्थान दिया है, यह भी निश्चय न होगा।

ब्रह्म सर्वमावृत्त्य तिष्ठति। ब्रह्मेव सर्वाणि नामानि सर्वाणि रूपाणि सर्वाणि कर्माणि बिभर्ति। सोऽयमात्मा सर्वानुभूः। (उपनिषत्)

अर्थात् सब पदार्थों को घेर कर, लपेट कर, ब्रह्म बैठा है। सब नाम, सब काम, सब रूप, उसी एक ब्रह्म के, ही “मैं” हैं। वह यह आत्मा “मैं” सब अनुभवों का अनुभव करने वाला है। (मुसलमानों के कुरान में भी ठीक यही बातें कही हैं, ‘अल्लाहो बिकुल्ले शयौन् मुहीत्” “लाहुल् अस्मा उल् हुसना,” “वसेआ रब्बोना कुल्ले शयीन् इल्मा।”)

पुराणों में भी कहा हैं,

स सर्वधीवृत्त्यनुभूतसर्वः। श्रद्धत्स्वाननुभूतोऽर्थो न मनः स्प्रष्टुमर्हति।

(भागवत)

सोऽयमात्मा सर्वविरुद्धधर्माणामाश्रयः। द्वन्द्वमयोऽयं संसारः। इत्यादि।

तो इन विरुद्ध धर्मों और विचारों का समन्वय कैसे हो? इस समन्वय के मूल-सूत्र रूप ये वाक्य हैं—

अधिकारिभेदाद् धर्मभेदः। देशकालनिमित्तानाम् भेदैर्धर्मो विभिद्यते। प्रस्थानभेदाद्दर्शनमेदः।

सः एव धर्मः सोऽधर्मस्तं तं प्रति नरं भवेत्। पात्रकर्मविशेषेण देशकालाववेक्ष्य च॥

(म. भा., शान्ति, अ. 314)

न धर्म परिपाठेन शक्यो भारत वेदितुम्। अन्यो धर्मः समस्थस्य, विषमस्थस्य चापरः

(म. भा. शां. अ. 266)

अस्मिन् देशे काले निमित्ते च यो धर्मोऽनुष्ठीयते।

स एव देशकालनिमिताँतरेष्वधर्मो भवति॥

(शांकर-शारीरिक भाष्य, 3, 1, 25)

अर्थात् अधिकारी के भेद से धर्म में भेद होता है। देश काल, निमित्त के भेद से धर्म में भेद होता है। जिस स्थान पर खड़े होकर देखते हैं, उस स्थान के बदलने से दर्शन, अर्थात् दृश्य का रूप, बदल जाता है। जो ही एक देश, काल, पात्र, निमित्त और कर्म के विशेष से एक आदमी के लिये धर्म है, वही दूसरे आदमी के लिये दूसरे देश, काल, पात्रता, निमित्त और कर्म के विशेष से अधर्म होता है। केवल एक दो ग्रन्थ पढ़ लेने से धर्म का पता नहीं लगता, अच्छी अवस्था का धर्म दूसरा और विषम अवस्था का धर्म दूसरा होता है।

बच्चों को मिट्टी का खिलौना ही अच्छा लगेगा उनको रेखा गणित और बीज गणित पढ़ाने का यत्न करना व्यर्थ है।

यही दशा मतों की, सम्प्रदायों की, पन्थों की है,

“मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना। भिन्नरुचिर्हि लोकः।” इत्यादि।

जब बचपन बीत जायगा, तब मिट्टी के खिलौने आप ही छूट जायेंगे, और दूसरे प्रकार के खिलौनों में मन लग जायगा।

अप्सु देवा मनुष्याणां दिवि देवा मनीषिणाम्, बालानां काष्ठ लोष्ठेषु बुधस्यात्मनि देवता। उत्तमा सहजाऽवस्था, द्वितीया ध्यान धारणा, तृतीया प्रतिमा पूजा, होमयात्रा चतुर्थिका।

अर्थात् बालकों के देवता काठ-पत्थर में, साधारण मनुष्यों के जल में, मनीषी विद्वानों के आकाश में हैं, बुध का- बोध वाले का, ज्ञानवान का देव, आत्मा ही है। सहज अवस्था, अर्थात् सब दृश्य संसार को ही परमात्मा का स्वरूप जानना, यह उत्तम कोटि है, विशेष विशेष ध्यान धारणा करना, यह उससे नीची दूसरी कोटि है, प्रतिमाओं की पूजा तीसरी कोटि है, होम और यात्रा चौथी कोटि है।

बाल-बुद्धि जीव, जिनकी बुद्धि सर्वथा बहिर्मुख है, जो इन्द्रियग्राह्य आकार ही का ग्रहण कर सकते हैं, वे अपने मन का सन्तोष काष्ठ-लोष्ठ की प्रतिमा से ही करे। यह बहिर्मुख माया- रोग मनुष्य का ऐसा बढ़ा हुआ है कि मुसलमान धर्म में भी, यद्यपि वह अपने को बड़ा भारी बुत्शिकन् यानी मूर्ति तोड़ने वाला कहता है, लोग देवालयों को तोड़कर मकबरे और कब्र बनाते और पूजते हैं। किसी उर्दू शायर ने ही कहा है-

“जिन्दगाहें तोड़ करके मुर्दगाहें भर दिया।”

इसी बहिर्मुख माया का वर्णन उपनिषदों ने किया है।

पराँचि खानि व्यतृणत् स्वयंभूः तास्मात् पराड् पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुर मृतत्वमिच्छन् ॥ (कठोपनिषद्)

अर्थात् स्वयंभूने ब्रह्मा (सृष्ट युन्मुख, रजः प्रधान महत्तत्त्व, बुद्धितत्त्व), ने सब इंद्रियों को, छिद्रों को बाहर की ओर खोला, छेद करके निकाला। इसलिये जीव बाहर की वस्तु देखता है, भीतर अपने को नहीं देखता। कोई-कोई धीर, विरक्त जीव, संसार को दौड़ धूप, आवागमन और मृत्यु से थककर विश्राम और अमरत्व को चाहकर, आँख भीतर फेरता है और प्रत्यगात्मा को देखता है।

पर हाँ, उन बालकों के जो रखवारे वृद्ध बुजुर्ग हैं, उनको यह फिक्र रखनी चाहिये कि बीच- बीच में मिट्टी के खिलौनों के खेल के साथ-साथ कुछ अक्षर ज्ञान भी दिलाते जाएँ, कुछ पुस्तकों का शौक पैदा कराने का यत्न भी करते रहें। यह न चाहें कि लड़के सदा खिलौनों में ही खुश रहें, मूर्ख बने रहें, पोथी-पत्रा कभी न छुएँ और हम उनको हमेशा बेवकूफ रखकर अपना गुलाम बनाये रहें।

और भी यदि ये वृद्ध सात्त्विक-बुद्धि वाले और लोक हितैषी हों तो इस खिलौना पूजा को भी बहुत शिक्षाप्रद, उत्तम, सात्त्विक भाव-वर्द्धक, कलावर्द्धक, शिल्पवर्द्धक, शाख-प्रवर्तक बना सकते हैं। सुन्दर मन्दिरों से ग्राम की, नगर की, शोभा सौंदर्य बढ़ा सकते हैं, और उनसे पाठशाला, चिकित्सालय, पुष्प-वाटिका, उद्यान, चित्राशाला, संगीतादि-विविध-कलागृह सार्वजनिक सभा-मण्डप, सम्मेलन-स्थान, व्याख्यानशाला आदि का काम ले सकते हैं। योग-साधनादि में भी ये मन्दिर सीढ़ी का काम दे सकते हैं। क्योंकि-

तच्छ्र यतामनाधारा धारणा नोपपद्यते।

अर्थात् ध्यान-धारणा प्रायः किसी मूर्त विषय के बिना नहीं सधती।

और भी तरह-तरह के उत्तम वैज्ञानिक शास्त्रानुकूल, आधिदैविक-शास्त्रसम्मत, आधिभौतिक-शास्त्र सम्मत काम लिये जा सकते हैं।

“द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे, मूर्त चैवाभूर्त्तं च” (उपनिषत्)

यह याद रखते हुए, और यह समझते हुए कि सारा साकार जगत् ही उस जगदात्मा का रूप है, जनता को क्रमशः इस मूर्त-रूप की ओर ले जाना उचित ही है और मूर्तियों की और मूर्ति-पूजा की आत्यंतिक निन्दा करना अनुचित ही है।

दूसरे दर्जे की बुद्धि के लिये जलमय तीर्थ, सरिता, सरोवर आदि की अनुज्ञा दी गयी। अदृष्ट फल वे हैं, जिनसे सूक्ष्म-शरीर, मनोमय अथवा विज्ञानमय कोष, अर्थात् अंतःकरण, मन, बुद्धि, अहंकार का संस्कार हो। दृष्ट फल वे हैं, जिनका प्रभाव स्थूल-शरीर पर पड़ता है। इन तीर्थों में भ्रमण करने से, देशाटन के जो शिक्षाप्रद, बुद्धि की उदारता बढ़ाने वाले, संकोच हटाने वाले, फल हो सकते हैं, वे होने चाहियें। यदि तीर्थ रक्षक और पुजारी और भिखमंगे लोग कौआरोड़ करके यात्रियों की जान आपत्ति में न डाल दें, और तीर्थों के जलों में फल, फूल, पत्ता, कच्चा और पक्का अन्न डलवा-डलवाकर पानी को सड़ाकर घिन्नाटा न कर डालें। स्वयं पुराणों ने कहा है।

अत्युग्रभूरिकर्माणो नास्तिका रौरवा जनाः। तेऽपि तिष्ठतन्ति तीर्थेषु तीर्थसारस्ततो गतः॥

(भागवत-माहात्म्य)

तीर्थ-स्थानों का और यात्राओं का दृष्ट-फल भी शरीर की स्वच्छता, दृढ़ता, शीतोष्ण सहिष्णुता आदि होने चाहियें। पर जब तीर्थों का पानी इस तरह गंदा किया जाय तो शरीर में सफाई की जगह बीमारी ही आवेगी। हाल में मुझे एक ऐसे स्थान पर जाने का अवसर हुआ। सुन्दर, पुराना मन्दिर और सुहावना तालाब बना था। पर मन्दिर के पुराने, अति सुन्दर, काशीदार पत्थर के छज्जे से नये, अति कुरूप, बेमेल टीन के सायबान लटकाये थे, और पुजारी लोगों ने अपने रहने के सुभीते के लिये मन्दिर की दीवारों के सहारे मिट्टी की दीवारें और खपरैल डालकर मन्दिर को नितान्त नेत्र-पीड़क कर दिया था। तालाब की मछलियाँ पण्डे लोग बेचकर रुपया अपने खर्च में लाते थे, इस वजह से काई भर रही थी और उसमें हर तरह की पानी को खराब करने वाली चीजें भी डाली जाती थीं। पानी बदबू कर रहा था। पण्डे लोग मुझसे जोर से रटने लगे कि “सर्धा हो तो आचमन करो, संकल्प करो।” मैंने कहा “सर्धा बहुत है, पर आप तो यहाँ के पण्डा-पुजारी ही हो, आपको जितनी सर्धा होगी उतनी मुझको कहाँ हो सकती है, सो आप आगे रास्ता दिखाओ, एक लोटा भर आप आचमन करके संकल्प करो मैं भी करूंगा।” फौरन राग बदल गई, “क्या कहें तालाब की मछली लोग बेच डालते हैं, इससे पानी गन्दा रहता है,” इति। सर्वोपरि यह सदा याद रखने और रखवाने की बात है कि—

न द्यम्मयानि तीर्थानि, न देवा मृच्छिलामयाः। ते पुनंत्युरुकालेन, दर्शनादेव साधवः। तेषामेव निवासेन, देशास्तीर्थीभवन्ति वै॥

(भागवत)

अर्थात् जल से तीर्थ नहीं बनते, न देवता मिट्टी और पत्थर से बनते हैं। उनकी उपासना करने से बहुत काल में मन की शुद्धि होती है। पर सच्चे साधुओं के तो दर्शन और सत्संग से ही चित्त सद्यः शुद्ध हो जाता है। तीर्थ-स्थानों में जो सच्चे साधु (साध्नोति शुभाम् कामान् इति साधुः) तपस्वी विद्वान बसते हैं, वे ही तीर्थ के तीर्थंकर हैं, तीर्थों को तीर्थ बनाने वाले हैं। जो शोक के पार तारे वह तीर्थ (तरति शोकं येन सहायेन सः तीर्थः)। सप्त पवित्र पुरी आदि तीर्थ इसी हेतु से तीर्थ थीं, कि वे उत्तम विद्या पीठ का काम देती थीं। वहाँ की हवा में भक्ति, विरक्ति, ज्ञान भरा रहता था, क्योंकि इनके बताने और जगाने वाले साधु, तपस्वी, विद्वान पण्डित, बहुतायत से वहाँ वास करते थे। जैसे आजकल की यूनिवर्सिटियों, किसी एक में एक शास्त्र की किसी दूसरी में दूसरी विद्या की पढ़ाई, चर्चा, हवा अधिक रहती है। किसी शहर में किसी विशेष व्यापार की, किसी में कल-कारखानों की बहुतायत रहती है, और वहाँ जाने से उनके सम्बन्ध की विद्या सहज ही में आ जाती है। इसी तरह “काश्यां मरणान् मुक्तिः” काशी में मरने से मुक्ति होती है, क्योंकि वहाँ आत्म-ज्ञान सहज में साधुओं से मिलना चाहिये, चारों ओर उसकी चर्चा होने से मानो हवा में भर रहा है और “ऋते ज्ञानान् न मुक्तिः,” बिना ज्ञान के छुटकारा नहीं, किसी प्रकार की भी गुलामी और बन्धन से, सामाजिक से, अथवा राजनीतिक से, अथवा साँसारिक से, पर आज की इन पवित्र पुरियों की जो दुर्गति है, वह प्रत्यक्ष है। जो मनुष्य “काश्यां मरणान् मुक्तिः”, के अक्षरों ही को पकड़े रहते हैं, और उसके हेतु को नहीं पकड़ते, और आत्म ज्ञान का संचय नहीं करते, उनके लिये मुक्ति की आशा नहीं है।

तीसरे दर्जे की बुद्धि के लिये, “दिवि देवाः”, सूर्य, चन्द्र, बृहस्पति आदि प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी उपासना, गणित-फलितात्मक, अद्भुत ज्योतिष-शास्त्र की उपासना, “मिटियोरोलोजी”, “आस्ट्रोनोमी” आदि है। इससे जो कुछ काल ज्ञान में, कृषि में, समुद्र यात्रादि में, सहायता मिल सके वह सब इनकी उपासना का दृष्ट-फल है, पर सहायता के स्थान में जो विघ्न ज्योतिष-शास्त्र के कुप्रयोग से हो रहे हैं, वह सबको विदित हैं।

चौथी और अन्तिम कोटि “बुधस्य आत्मनि देवता” जिसको यह विचार उत्पन्न हो गया है कि यह देवता है या नहीं है, यह पुस्तक मानने योग्य है या नहीं है, यह ऋषिवत् या अवतारवत् या रसूलपगम्बरवत् या मसीहवत् गुरुवत् मानने योग्य है या नहीं है, यह धर्म मानने योग्य है या नहीं है, यह छोड़ने योग्य है या ओढ़ने योग्य है, यह शास्त्र है या अशास्त्र है, यह वेद है या अवेद है, इसका अर्थ यह है या दूसरा है, अन्ततोगत्वा कोई ईश्वर है या नहीं है, और है, क्या है उसका स्वरूप क्या है- इस सबका अन्तिम निर्णेता मैं ही हूँ, “मैं” ही है, आत्मा ही है- जिसको यह विचार दृढ़ हो जाता है, उसके लिए “बुधस्य आत्मनि देवता”, अर्थात् बुधका, बुद्धिमान् का, देव स्वयं आत्मा ही है। परम ईश्वर, ईश्वरों का ईश्वर, “मैं” ही है। इस काष्ठा को जो पहुँचा है उसके लिए सुरेश्वराचार्य ने बृहदारण्यक वार्तिक में कहा है- “एतां काष्ठामवष्टभ्य सर्वो ब्राह्मण उच्यते।” जो ही जीव इस काष्ठा को पहुँचा है वह ब्राह्मण है, और वही ब्राह्मण है, अथवा ब्रह्मस्वरूप है।

उसके लिए “काश्यां मरणान् मुक्ति “ की आवश्यकता नहीं, किंतु,

भावना यदि भवेत् फलदात्री मामकं नगरमेव हि काशी। व्यापकोऽपि यदि वा परमात्मा तारकं किमिह नोपदिशेन् नः॥

भावना ही यदि फल देने वाली है, तो जिस स्थान पर मैं हूँ, वही काशी है। यदि परमात्मा व्यापक है, तो यहीं पर तारक मन्त्र का उपदेश कर सकता है। सूफियों का भी यही कहना कि जो कोई हकीकत (=तत्व, सत्य, परमार्थ) इ-मुहम्मदी (=श्लाघनीय प्रशंसनीय, स्तनीय, महनीय) अर्थात् ब्रह्म ज्ञान को पहुँच गया है, वही मुहम्मद (=स्तुत्य, अर्हत्, पूज्य) है, रसीदा (पहुँचा हुआ) है, ऋच्छति, प्राप्नोति, (अंग्रेजी में, “रीच” पहुँचना) इति ऋषि है, वही ब्राह्मण है, पैगम्बर क्या बल्कि पैगम्दिह भी हो सकता है और है, नये वेद (जैसे याज्ञवल्क्य ने) नयी इञ्जील (जैसे ईसा ने) नये कुरान (जैसे मुहम्मद ने) बना सकता है। विशेष अवस्थाओं के लिए विशेष नवीन कायदे-कानूनों, धर्मों की तो बात ही क्या है, और ऐसे ही मनुष्य के लिए याज्ञवल्क्य-स्मृति में कहा कि वह स्वयं नयी आवश्यकता पड़ने पर नया धर्म बना सकता है।

चत्वारो वेदधर्मज्ञाः पर्षत्, त्रैर्विद्य— मेव वा; सा ब्रूते यं स धर्मः स्यादेको वाऽऽध्या— त्मवित्तमः।

अर्थात् वेद पर, ज्ञान-समूह पर, प्रतिष्ठापित जो धर्म उसके जानने वाले चार मनुष्यों की मण्डली, अथवा अंगोपाँग-सहित तीन वेदों को अच्छी तरह जानने वालों की समिति, अथवा एक अध्यात्मवित्तम, ब्रह्मविद्वरिष्ठ, तत्त्वतः ब्रह्माज्ञान के हृदय में प्रविष्ट, ज्ञानी मनुष्य, जो निर्णय कर दे, कि यह धर्म होना चाहिये, वही धर्म माना जाय।


पड़ौसी से प्यार करो

(श्री. अमी इन्नन)

किसी ने पूछा- ‘प्रभो! धर्म की सबसे बड़ी आज्ञा क्या है?’ तब प्रभु ने उनको उत्तर दिया- ‘तुम्हें परमात्मा से, अपने उस परमात्मा से प्रेम करना चाहिये, अपने सम्पूर्ण हृदय से, अपने सम्पूर्ण प्राणों से और अपने सम्पूर्ण भावों से। यही महान् और प्रथम आदेश है। दूसरा आदेश भी इसी तरह है कि तुम अपने ही आत्मा की तरह अपने पड़ोसियों से प्रेम करो। इन्हीं दो आदेशों पर सम्पूर्ण धर्मशास्त्र अवलम्बित है और सारी संत वाणी भी।’

तब मैंने मन-ही-मन कहा कि यह पड़ोसी से प्रेम करने की बात एक तरह से दो अर्थ वाली है। प्रथम यह कि मुझे पहले अन्दर से प्रभु से प्रेम करना चाहिये, तब कहीं मैं उन बाहरी समस्त विघ्न-बाधाओं को हटाने में समर्थ हो सकता हूँ, जो कि मुझे मेरे पड़ोसी के प्रेम से वंचित रखती हैं। मुझे मेरे सूत्र का समाधान मिल गया। प्रभु ने इसे बहुत स्पष्ट कर दिया था। उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा—‘प्रेम करो’ क्योंकि यही वह है, जिसे हम सबको सीखना चाहिये। हमें उसी तरह प्रेम करना चाहिये जैसा कि उन्होंने प्रेम किया—निरन्तर अबाधगति—सब कुछ समझते हुए (विवेक पूर्वक), ताकि हम उत्तेजित न हो सकें। प्रभु का प्रेम उस एक रूप आग की तरह चमका कि जो भी उसके प्रेमिल संपर्क में आया, उसे ही शान्ति मिली और वह उस प्रेम को पाकर कृतकृत्य हो गया।

यह जानते हुए कि हमें अपने लक्ष्यानुसार भला बनने के लिये अपने मानवीय स्वभाव का कितना परिवर्तन करना पड़ेगा। प्रभु ने स्पष्ट समझाया कि ‘हम प्रेम करना कैसे सीख सकते हैं।’

उन्होंने हमें ये दो आदेश दिये—प्रथम यह कि, हम अपने सम्पूर्ण हृदय, प्राण और भाव से ईश्वर से प्रेम करें और दूसरे, अपने पड़ोसी को अपने ही आत्मा की तरह प्यार करें। यदि हम पहले आदेश के अनुसार चलना प्रारम्भ कर दें तो अवश्य ही दूसरे आदेश की सफलता को प्राप्त कर लेंगे, क्योंकि तब तक हम ईश्वर को कभी अपने सम्पूर्ण हृदय, प्राण और मन से प्रेम नहीं कर सकते, जब तक कि हम अपने हृदय का प्रेम उसकी संतान को न दें।

प्रेम एकतानता और एकरसता उत्पन्न करने वाली एक शक्ति है। यदि एक बार भी हमें उसका स्पर्श हो जाय तो फिर हम उसके बिना जीना भी नहीं चाहेंगे, क्योंकि यह जीवन को नित्य नूतन, मधुर और सुन्दर बनाता है। नव प्रसूता माता की नवजात शिशु की ओर टकटकी लगाई हुई आँखों में, प्रेमियों की मुखाकृतियों में हम सबने प्रेम के नित्य नवायमान प्रभाव को देखा है। इसके अतिरिक्त यदि हमने उसको खोजने का और अधिक प्रयास किया है तो हमें उसकी सर्व सहिष्णु सुमधुर मूर्ति का चित्र उन लोगों की मुखाकृतियों में दीखेगा जिन्होंने जीवन भर प्रभु की प्रेम से सेवा की है।

प्रेम हमारे मार्ग को प्रशस्त कर देता है। स्नायु विकार को दूर कर, मनुष्यों से उचित सम्बन्ध स्थापित कराके, उनको उत्साह पूर्वक हमारी ओर आकर्षित कर देता है। प्रेम भय को समाप्त और शान्त कर देता है। यह हमें समता प्रदान करता तथा हमारे लिये विवेक पूर्वक काम करने का पथ तैयार कर देता है। प्रेम हमें उन्नत बनाता है, क्योंकि वह हमें ईमानदारी (निष्ठा), सन्तोष और सफलता पूर्वक सेवा करने का आदेश देता है और जो कुछ भी हमारे द्वारा दिया जाता है, वह सारा-का-सारा कई गुना होकर आशीर्वादात्मक रूप में हमें वापस मिल जाता है।

प्रेम में शान्तिदायिनी एक शक्ति होती है, क्योंकि ईश्वर स्वयं प्रेम-स्वरूप है। हमारे मन, अन्तःकरण और शरीर में प्रेम का जो सूक्ष्मतम अंश है, वह सभी कुछ उस (प्रेम स्वरूप) परमात्मा की अभिव्यक्ति है। प्रेम मन को सन्तोष और शान्ति तथा शरीर को स्वस्थता प्रदान करता है। प्रेम हमारे घर और कार्य को समरस बना देता है। यदि हम अपने मन में प्रभु के आदेशों को पालन करने का निश्चय कर लें तो हमें प्रेम के उस स्वरूप और शक्ति का पता लग जायगा, जो हमारे जीवन और हमारे संपर्क में आने वाले लोगों के जीवन को कृतकृत्य बना डालती है। ज्यों ही हम सचमुच ईश्वर से प्रेम करना आरम्भ करते हैं, त्यों ही हमें पता चलता है हमारा हृदय प्रेम से परिपूर्ण हो गया है और वह (प्रेम) हमारे द्वारा दूसरों को प्यार करने के लिये उन तक पहुँच रहा है। प्रेम कोई प्रयत्न नहीं, यह तो प्रभु के अन्तर की एक आनन्द से परिपूर्ण अभिव्यक्ति है।

हम प्रथम आदेश का पालन करना कैसे प्रारम्भ करें? हमारा जो ईश्वर के प्रति प्रेम है, उसे हम प्रतिदिन दृढ़-से-दृढ़तर करें। यदि हमने ऐसा करना आरम्भ कर दिया तो प्रेम जड़ पकड़ने तथा बढ़ने लगेगा। हम उसी वस्तु को प्यार करते हैं जिसमें हमारी गहरी दिलचस्पी होती है और हमारी दिलचस्पी उसी वस्तु में हो जाती है जो बड़ी देर तक हमारे चित्त को आकर्षित किये रहती है। अतः ईश्वर से प्रेम करने के लिये सर्व प्रथम हमें अपने चित्त को उसे देना होगा। यदि ईश्वर के बारे में हमारी भावना स्पष्ट नहीं है तो भी हम प्रथम प्रयास कर सकते हैं।

ज्यों ज्यों हम प्रातः-सायं प्रार्थना करते, स्वाध्याय करते और सद् ग्रन्थों का अवलोकन करते हैं, ईश्वर से हमारा परिचय होता जाता है। यदि हमें प्रार्थना करना भी नहीं आता तो हमें शास्त्र कथित स्तोत्र देखने चाहिये, जिससे हमें एक आनन्द दायिनी भावना की अनुभूति हो। तदनन्तर तब तक हमें शास्त्र का अध्ययन और चिन्तन करना चाहिये जब तक कि हमें ईश्वरीय सत्ता का कुछ बोध न हो। ईश्वर सर्वत्र समभाव से विराजमान है। इस तरह जब हम उसे पुकारते हैं, तो वह स्वयं हमें अपना परिचय देना प्रारम्भ कर देता है।

ईश्वर मंगलमय है और हमारे जीवन में जो कुछ भी अच्छाई है, वह केवल उस ईश्वर की एक अभिव्यक्ति मात्र है। हमें जो कुछ भी भला प्रतीत होता है, उसके लिये हम उसके कृतज्ञ हों और अच्छाई के उस अदृश्य स्रोत को स्वीकार करें। स्वीकृति और कृतज्ञता से उसका यथार्थ आदर होगा और उस आदर से प्रेम की उपलब्धि होगी। जब हमने प्रातः सायं प्रार्थना करनी शुरू कर दी, तो हमने प्रथम आदेश का पालन प्रारम्भ कर दिया। हमें पता चलेगा कि ईश्वर हमें दूसरे आदेश के पालन में भी सहायता करता है। ईश्वर की नियम पूर्वक उपासना से प्यार करवाने की तथा आनन्दित होने की एक वृत्ति पैदा होती है- ‘हम प्रेम करें’ क्योंकि उसने पहले हमसे प्रेम किया था।’

जब हम ईश्वर के प्रति प्रेम का अन्दर से पता लगाना और व्यक्त करना प्रारम्भ करते हैं, तब हमें कुछ बाहर से भी उन भावनाओं और विचारों को निकालना प्रारम्भ कर देना चाहिये, जो इस प्रेम के मार्ग में बाधक होती हैं। प्रेम के दो सबसे बड़े शत्रु हैं- आलोचना और निन्दा। हम उस आलोचनात्मक शब्द को छोड़कर प्रेम को व्यक्त कर सकते हैं जो हमें और दूसरों को निन्दा करने के लिये प्रेरित करता है। यद्यपि यह केवल शुरुआत है, पर इससे हमें बल मिलेगा और हमारे विचारों में सुशृंखला आयेगी, जिससे प्रेम के साथ एकतानता हो जाय। हमें बुरी आलोचना और निन्दा की जगह कार्य रूप में पूर्णतया सहनशीलता और दया को बैठना होगा।

सत्य के मार्ग की शिक्षा प्राप्त करने के पूर्व मेरे पास एक सूत्र था जो मेरी दृष्टि में बड़े सम्मान की वस्तु थी। परन्तु अब देखता हूँ तो वह बच्चों की-सी चीज लगती है, कम-से-कम कहने के लिये तो अवश्य। मेरा विश्वास था कि यदि मैं अपनी पसन्दगी और पसन्दगी में सच्चा हूँ, तो उनके प्रति मैं न्याय करता हूँ। मेरा विश्वास था कि यदि मैंने किन्हीं मनुष्यों के साथ मित्रता का बहाना नहीं बनाया है, तो मैं उन लोगों के दोष देखने में, जैसे चाहूँ स्वतन्त्र हूँ। पर अब मैं यह स्मरण करते ही काँप उठता हूँ कि वास्तव में मैं उन मनुष्यों के दोषों की चर्चा में रस लेता था। इससे मुझे जो हानि हो रही थी, उसका मुझे तनिक भी पता नहीं था। उससे मेरे मन में नकारात्मक वृत्ति का और अवाञ्छित अवस्थाओं का समावेश हो रहा था। परन्तु अब मैं यह जानता हूँ कि मेरे आचरणों से लोगों को लाभ होता है या नुकसान। मैं जो कुछ भी सोचता या विचारता हूँ, वैसे ही मैं बन जाता हूँ, उससे या तो मेरे जीवन का निर्माण हो जाता है या ध्वंस। जो कुछ भी प्रभु ने सिखाया, उन्होंने क्रिया की अपेक्षा भाव और विचार को अधिक प्रभावित किया। क्योंकि उन्होंने जान लिया था कि यदि हम किसी भी विषय में सही सोचेंगे और सही विचारेंगे तो अवश्य ही उस विषय में हम कार्य भी सही ही करेंगे।

यदि हम अपने सम्बन्धियों और निकटस्थ मित्रों के प्रति अपने में दूसरों की अपेक्षा अधिक प्रेम का अनुभव करते हैं ओर दूसरों के प्रति हमारे मन में घृणा और द्वेष है तथा प्रेम कम है तो यह निश्चय है कि अभी हमारे हृदय में जो ईश्वर के प्रति प्रेम है, उससे कहीं अधिक की हमें आवश्यकता है। यदि सचमुच हमें जीवन में सच्चे सुख और सन्तोष के दर्शन करने हैं तो हमें किसी को भी घृणा की दृष्टि से नहीं देखना होगा, क्योंकि वह एक छोटी-सी घृणा भी हमारे मन की शान्ति को भंग कर सकती है और हमारे जीवन की समरसता को नष्ट कर देती है। अग्नि की एक छोटी-सी चिनगारी जैसे सारे वन प्रदेश को भस्म कर सकती है, उसी तरह घृणा का एक छोटा-सा स्फुल्लिंग, एक व्यक्ति के प्रति होने वाली क्षुद्र-सी घृणा भी हमारी सम्पूर्ण शक्ति का नाश कर सकती है, हमारे सारे स्वास्थ्य को जर्जरीभूत कर सकती है और हमारे हृदय-उद्यान को एक दम उजाड़ दे सकती है।

कुछ समय पूर्व जब मैं इस परिणाम पर पहुँचा तो मैंने अपने हृदय और मन में छिपे हुए सूक्ष्म विचारों और घृणात्मक भावों को ढूँढ़ना शुरू किया। मैंने एक नोटबुक में ऐसे प्रत्येक उस आदमी का नाम लिख लिया, जिसे मैं बचपन से ही घृणा की दृष्टि से देखता था। उस सूची ने मुझे आगे बढ़ने से रोक दिया, क्योंकि मैं सदा से ही अपने को सौंदर्य प्रेमी समझता था। परन्तु मैंने निश्चय कर लिया कि परमात्मा की सहायता से अब मैं उन सबके प्रति प्रेम करूंगा। मैं प्रतिदिन अपनी सूची निकालता और प्रत्येक के लिये मंगलकामना करता। विवेक पूर्वक अपना हृदय ईश्वर के सामने खोल देता और तब मैं ईश्वर को मेरे हृदय द्वारा प्रेम करने के लिये आह्वान करता। देखते-देखते इतनी शीघ्रता से- जिसका कि स्वयं मुझे अनुमान न था, वे सारे नाम एक-एक करके मेरी सूची से गायब हो गये। प्रत्येक बार की इस घटना से मेरे हृदय का एक बहुत बड़ा भार हल्का होता जाता।

अब भी मैं ऐसी छोटी पुस्तिका रखता हूँ, परन्तु अब मुझे यह कहते हुए हर्ष होता है कि अब उसमें बहुत ही थोड़े नाम आये हैं और वे भी अधिक समय तक रहने वाले नहीं हैं। मेरी मूल पुस्तिका का अन्तिम नाम ज्यों ही उस सूची में से गायब हुआ था, त्यों ही मेरे जीवन में एक महान् और श्लाघनीय परिवर्तन हो गया। जीवन की बाह्य अवस्थाओं का परिवर्तन किये बिना हम अपने हृदय और मन के भावों को नहीं बदल सकते।

एक आदमी जो हमारे साथ बिना किसी सम्मान और आदर-भाव के व्यवहार करता है, उसके साथ प्रेम करना सदा सरल नहीं है। परंतु मुझे एक तरीके का पता लगा है जिससे हमारा प्रयत्न सफल हो सकता है। हम मनुष्यों से घृणा नहीं करते, अवश्य ही उन चीजों से घृणा करते हैं जिन्हें वे करते हैं। बहुधा यदि हम उस करण को समझ जाते हैं जिसको लेकर कि वे वैसा करते हैं, तो हम तुरंत ही उन चीजों के लिये क्षमा कर देते हैं और उन्हें भूल जाते हैं, पर साधारणतया वह ‘करण, हमें और ही तरह से दीखने लगता है, इसीलिये कि हम उसकी शक्ल से उसे मापने लगते हैं और लोगों के प्रति अपने अन्दर भीषण द्वेष क्रोध और कभी-2 घृणा तक का सूजन कर डालते हैं।

यदि हमने सचमुच में ईश्वर से प्रेम करना सीख लिया है और विश्वास करने लगे हैं कि संसार में वही एकमात्र सर्वोपरि सत्ता है। यदि हम यह अनुभव करने लगें कि वह सर्वत्र समरूप में विराजमान है तो हम उस मनुष्य में भी, जिसके कार्यों को हमने क्रोध और बुरी आलोचना की दृष्टि से देखा था। उसकी पवित्र सत्ता को स्वीकार कर उससे प्रेम कर जब उसकी सर्वत्र स्थिति स्वीकार करते हैं, तब उसका प्रेम हमारे हृदय को परिपूर्ण करना प्रारम्भ कर देता है। हमें पता चलता है कि हमारा क्रोध गायब हो रहा है और प्रेम की ओर गति हो रही है। हमारे अन्दर की ईश्वर की ज्योति दूसरों के अन्दर की ज्योति के साथ एकीभूत हो जाती है, जिससे हमारे अन्दर एकरसता और शाँति का उदय होता है।

एक बार मैंने एक मिनिस्टर को यह कहते सुना कि हम ईश्वर के उतने ही समीप हैं जितने कि अपने अपने घोर शत्रु के। मुझे विश्वास है कि यह सत्य है। हमें ईश्वर के समीप आना चाहिये जिससे हमारे शत्रु मित्र रूप में बदल जायं।

यदि हमें अपनी उन्नति धीमी दीखे तो हताश नहीं होना चाहिये। न तो हममें एक ही दिन में नकारात्मक आदतें पड़ीं हैं और न शीघ्र ही उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। परंतु हम अपनी यात्रा प्रारंभ कर सकते हैं और काफी हद तक प्रतिदिन हमारा सुधार हो सकता है। जो विशुद्ध संतोष हमें प्रत्येक छोटा विजय पर मिलता है, वह इतना सूक्ष्म होता है कि हम उसे तब तक नहीं जान सकते जब तक कि वह हमारे अपने आध्यात्मिक प्रयासों के फलस्वरूप हमारे सामने न आ जाय। अधिक उन्नति के लिये हमारे बाह्य-जीवन के परिवर्तन की अत्यधिक आवश्यकता है।

जब हम ईश्वर के प्रति अपने प्रेम को उसकी संतान से प्रेम करते हुए व्यक्त करना प्रारंभ करते हैं, तो हम अपने को ईश्वर का प्रेम पात्र, ईश्वर के द्वारा परिपुष्टि और ईश्वर के आशीर्वाद से सौभाग्यवान् अनुभव करते हैं। हमारा जीवन एकरसता और शाँति, स्वास्थ्य तथा वैभव से भर जाता है और हमारा आनन्द पूर्णता को प्राप्त कर लेता है।


दोष नहीं गुण ग्रहण कीजिए

(श्री. अगरचन्द्र नाहटा)

प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि जगत् उसका आदर करे, उसके गुणों का लोग बखान करें, सर्वत्र उसका नाम हो, पर यह आशा तभी सफल हो सकती है कि जब वह उसके लिये योग्यता प्राप्त करले। मनुष्य यह भी जानता है कि आदर गुणों का होता है, व्यक्ति का नहीं। एक ही व्यक्ति जब उसमें गुणों का आधिक्य होता है, विश्व द्वारा आदरणीय और यशोभाजन हो जाता है। उसी व्यक्ति में जब दुर्गुण पनप कर गुणों के ऊपर छा जाते हैं, तो उसकी चिर संचित कीर्ति क्षण भर में ही विलीन हो जाती है। हम देखते हैं कि कोई व्यक्ति जाति और कुल से हीन हो कुरूप हो, आयु में छोटा हो, साधन और संपत्ति से वंचित हो, फिर भी यदि कोई एक गुण भी उल्लेखनीय रूप में उसमें पाया जाता हो तो बहुत सी कमियाँ गौण हो जाती हैं और गुण की मुख्यता से वह आदरणीय बन जाता है। इसके विपरीत उम्र में बड़ा जाति और कुल सम्पन्न, साधन, संपत्ति व बुद्धि इन सब बातों में बढ़ा चढ़ा हो फिर भी उसमें दुर्गुणों की अधिकता होती है तो वह निन्दा का पात्र हुए बिना नहीं रहता। इसीलिये महात्मा भर्तृहरि जी ने कहा है “गुण पूजा स्थान गुणिषु न च लिंगं न च वयः।”

अनेक सद्गुणों का निवास हो उसका तो आदर होना स्वाभाविक ही है, पर उत्कृष्ट मात्रा में यदि एक भी गुण किसी में विकसित हो जाय तो वह व्यक्ति सबकी नजरों में चमक उठता है। बस उस एक ही विशेष गुण से लोग उसके प्रति आकृष्ट होते हैं और छोटे मोटे अन्य दोष दब से जाते हैं। इसी तरह कोई दुर्गुण, मनुष्य में बढ़ जाता है तो उसके छोटे मोटे अनेक गुण दब से जाते हैं। अतः मानव को हर समय अपनी और देखते रहना चाहिये ताकि दोष बढ़ने न पाये और गुण अधिकाधिक पनपते रहें, इसका लक्ष्य रखना आवश्यक है।

जैसा कि ऊपर कहा गया है कि गुणी बनना तो हम सभी चाहते हैं पर संस्कार और संपर्क दोष से हममें दुर्गुण घुस जाते हैं, उन्हें हम दूर नहीं कर पाते और अपनी योग्यता का विकास किये बिना उसके द्वारा होने वाले फल को प्राप्त नहीं किया जा सकता। अतः हमारे मनीषियों ने स्वानुभव से गुणी बनने के लिए एक बहुत सरल, सीधा और सच्चा रास्ता बतलाया है जिसके द्वारा प्रत्येक मानव सहज ही में गुणी बन सकता है और उसके दोष क्रमशः कम एवं दूर किये जा सकते हैं। वह उपाय है मनुष्य गुणी के प्रति अनुराग रख, गुणीजनों के प्रति आदर-सत्कार व भक्ति रखे। जैसे-जैसे मनुष्य का गुणानुराग बढ़ेगा वैसे-वैसे उसका खिंचाव गुणों के प्रति बढ़ कर वह गुणी बनता चला जायगा। यह क्रिया इतनी स्वाभाविक है कि इसमें विचार करने की और श्रम करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती। गुणी से प्रेम और गुणों के प्रति आकर्षण हो’ बस गुणी बनने का मार्ग प्रस्तुत होता चला जायगा।

सत्संग का महात्म्य और महापुरुषों के नाम स्मरण व गुण कीर्तन का जो बड़ा भारी फल हमारे शास्त्रों में वर्णित है उसका एक मात्र कारण यही है कि जैसे व्यक्तियों के साथ हमारा संपर्क होता है, उसके गुण-दोष का प्रभाव हमारे पर भी पड़े बिना नहीं रहता। महापुरुषों में गुणों की प्रधानता होती है। अतः मनुष्य उनके गुणों को स्मरण करके यही चाहता है कि वह भी वैसा ही गुणी बन जाय। मनुष्य की जैसी इच्छा होती है, उसी के अनुरूप उसकी प्रवृत्ति होती है, और जिस चीज की इच्छा जितनी बलवती होगी, तो प्रयत्न उतने ही सबल होंगे और उसकी पूर्णता भी उतनी ही शीघ्रता से हो सकेगी। इसीलिए कहा गया है, जैसा चाहो बन जाओ। शास्त्रीय दृष्टान्त प्रसिद्ध है कि भृंगी कीट को पकड़ कर अपने बनाये हुए घर में रख छोड़ती है। उसका गुञ्जार सुन कर कीट की यह इच्छा होती है कि मैं भी ऐसा ही भृंगी बन जाऊं। इस इच्छा से ही वह कीट भृंगी बन जाता है। श्रीमान् चिदानन्दजी ने आत्मा परमात्मा कैसे बनती है, इसका दृष्टान्त सहित उपाय बतलाते हुए कहा है—

आत्मा परमात्म पद पावे, जो परमात्मा सुलय लावे।

सुनके शब्द कीट भृंगी का, निज तन मन की शुधि विसरावे॥

देखहु प्रकट ध्यान की महिमा, सोई कीट भृंगी हो जावे।

वास्तव में देखा जाये तो परमात्मा पुरुष सिद्ध व बुद्ध हो चुके हैं। वे किसी का भला-बुरा नहीं करते पर उनके निमित्त से मनुष्य में अच्छी भावनाओं का उदय होता है, गुणों के प्रति आकर्षण बढ़ता है। अपने दोषों, दुर्गुणों व कमियों का उसे ज्ञान होता है तथा दूर करने की भावना होती है। इसी से मनुष्य पतन से बचकर उत्थान की ओर अग्रसर होता है। गुणों का आकर्षण जितना बढ़ेगा, दोषों का संपर्क स्वयं उतना ही घट जायगा। गुणी व्यक्ति के स्मरण, भजन, कीर्तन, ध्यान से गुणों के प्रति आकर्षण बहुत सहज हो जाता है। एवं वही आकर्षण बढ़ते बढ़ते तद्नुरूप बना देता है। एक जैन कवि ने कहा है—

“गुणी पुरुष ने ध्यावतां, गुण आवे निज अंग”।

प्राणि मात्र गुणों एवं दोषों के पुँज हैं। किसी में गुणों की अधिकता है तो किसी में दोषों की। दृष्टि भिन्नता से कभी-कभी किसी के गुण दूसरों को दोष रूप लगने लगते हैं और दोष-गुण। जिसकी दोष-दर्शन की दृष्टि होती है, वह बड़े महापुरुषों में भी कोई न कोई दोष ढूंढ़ निकालता है, जबकि गुण दृष्टि व्यक्ति भयंकर पापी में से भी कोई न कोई गुण पा लेता है। थोड़े बहुत गुण और दोष सभी में भरे हैं। देखने वाला स्वयं जैसा होगा या जिस गुण या दोष को महत्व देगा, उसे दूसरे में वही दिखाई देगा। हमारे में दोष की इतनी प्रचुरता क्यों? एवं गुणों की इतनी कमी क्यों? इस पर जब गम्भीर विचार करते हैं तो विदित होता है कि दृष्टि दूसरों के अवगुण को देखने में लगी रहती है। दोषों की ओर बहुत बार विशेष रूप ध्यान जाने के कारण ही हम में दोषों की प्रबलता और अधिकता हो जाती है। यदि हम अपनी दृष्टि को गुण ग्रहण में लगा दें। जहाँ कहीं भी जिस किसी में छोटा मोटा जो भी गुण देखें, उसे ग्रहण करने का लक्ष्य रक्खें अर्थात् गुणग्राही बनें तो गुणवान बनने में देर नहीं लगेगी। केवल अपनी दृष्टि या वृत्ति में ही परिवर्तन करने भर की देरी है। दोष दृष्टि की जगह गुण दृष्टि को महत्व देना है, फिर हमारा काम सरल और शीघ्र हो जायगा। गुणग्राही व्यक्ति की दृष्टि बहुत उदार और विशाल हो जाती है। सामुदायिक अनुदार व संकुचित भावना नहीं होती। क्योंकि गुण प्रत्येक मनुष्य में पाये जाते हैं। यह किसी देश, जाति, सम्प्रदाय की ही बपौती नहीं। अतः गुणग्राही व्यक्ति को जहाँ भी थोड़ा बहुत गुण दिखाई देगा, उसके प्रति आकृष्ट हुए बिना नहीं रह सकता। संकुचित दृष्टि वाला अपने देश, जाति, सम्प्रदाय वालों के तो गुणों का बखान करेगा, पर उस सीमा के बाहर के व्यक्तियों के गुणों की ओर उसका ध्यान नहीं जायेगा और लक्ष्य में आ जाने पर भी वह उनके गुणों की स्तुति करने में हिचकिचायेगा। जैन परिभाषा में संकुचित वृत्ति को दृष्टि राग की संज्ञा दी गई है। यदि व्यक्ति संकुचितता का आश्रय लेता है तो उसका सम्प्रदाय या व्यक्ति विशेष के प्रति इतना अधिक मोह हो जाता है कि उसे उसके दोष भी गुण रूप दिखाई देने लगते हैं और दूसरों के गुण भी दोष रूप। अतएव हमें सावधानी रखनी आवश्यक है कि हमारी गुण-दृष्टि संकुचित व अनुदार न हो। जहाँ कहीं किसी में भी गुण दिखाई दे, बिना हिचकिचाहट के स्तवना करें व गुणों को अपनाने का प्रयत्न करें। गुणी के बिना गुण रहेगा कहाँ? गुण-गुणी का अविच्छेद्द सम्बन्ध है। अतः गुणी बनना है स्व आत्मगुण जो तिरोभूत हैं, उन्हें प्रकट करना है तो गुणनुरागी व गुण-ग्राही बनो। यही गुण बनने का सबसे सीधा सरल व सच्चा उपाय है।


सदुपदेशों को ध्यानपूर्वक सुनिये।

(श्री प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

“तुम पेट को भोजन देते हो, पर देखो कान को भी भोजन दे देना। पेट भूखा रहेगा तो शरीर क्षीण होगा और कान भूखे रहेंगे, तो बुद्धि मन्द हो जायगी। श्रेष्ठ पुरुषों के अभिवचन सुनने का जब अवसर आये, तो अन्य कार्य छोड़कर भी वहाँ पहुँचो क्योंकि उनके वचन तुम्हें वह वस्तु दे सकते हैं, जो रुपया-पैसा की अपेक्षा हजारों गुनी मूल्यवान होगी। जो लोग जीभ से अच्छा खाना खाने में तो कुशल हैं, पर कानों से सदुपदेश सुनने का आनन्द नहीं जानते, उन्हें बहरा ही कहना चाहिए। ऐसों का जीना और मर जाना एक समान है।” –आचार्य श्रीरामशर्मा

हमारे कानों को सदुपदेश रूपी सुधा निरन्तर प्राप्त होती रहनी चाहिए। मनुष्य का स्वभाव चंचल है, इन्द्रियों की अस्थिरता प्रसिद्ध है। यदि आत्मसुधार में सभी इन्द्रियों को वश में रखा जाय, तो उचित है, क्योंकि अवसर पाते ही इनकी प्रवृत्ति पतन की ओर होने लगती है। सदुपदेश वह अंकुश है, जो मनुष्य को कर्तव्य पथ पर निरन्तर चलते रहने को प्रेरित करता रहता है। सत्पथ से विचलित होते ही, कोई शुभ विचार या स्वर्ण सूत्र पुनः ठीक मार्ग पर ले आता है।

प्रत्येक सदुपदेश एक ठोस प्रेरक विचार है। जैसे कोयले के छोटे से कण में विध्वंसकारी विपुल शक्ति भरी हुई है, उसी प्रकार प्रत्येक सदुपदेश शक्ति का एक जीता जागता ज्योति-पिंड है। उससे आपको नया प्रकाश और नवीन प्रेरणा प्राप्त होती है। महापुरुषों की अमृतमयी वाणी, कबीर, रहीम, गुरुनानक, तुलसी, मीराबाई, सूरदास आदि महापुरुषों के प्रवचन, दोहों और गीतों में वे महान् जीवन सिद्धाँत कूट-कूट कर भरे हुए हैं, जिनका आधार गहरे अनुभव के ऊपर रखा गया है। आज ये अमर तत्त्व-वेत्ता हमारे मध्य नहीं हैं। उनका पार्थिव शरीर विलुप्त हो चुका है। पर अपने सदुपदेश के रूप में वे वह जीवन-सार छोड़ गये हैं, जो हमारे पथ प्रदर्शन में बड़ा सहायक हो सकता है।

आदमी मर जाता है, उसके साज, सामान, महल आदि टूट फूट कर नष्ट हो जाते हैं, परन्तु उसके जीवन का सार-उपदेश और शिक्षाएँ—वह अमर वस्तु है, जो युगों तक जीवित रहती है। इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने व्यक्ति आये और मृत्यु के ग्रास हुए, उनका नाम निशान तक शेष नहीं बचा है, किन्तु जिन विचारकों, तत्व वेत्ताओं और महापुरुषों ने अपने जीवन के अनुभव रखे हैं, वे आज भी मशाल की तरह हमें प्रकाश दे रहे हैं।

मनुष्य का अनुभव धीमी गति से बहुत धीरे धीरे बढ़ता है। जैसे जैसे आयु बढ़ती है, वैसे वैसे कड़ुवे-मीठे घूँट पीकर हम आगे बढ़ते हैं। अब यदि हम केवल अपने ही अनुभवों पर टिके रहें, तो बहुत दिनों में जीवन के सार को पा सकेंगे। इससे अच्छा यही है कि हम विद्वानों के अनुभवों को ध्यानपूर्वक पढ़ें, और उन्हें अपने अनुभवों से परखें, तौलें और जीवन में ढालें। उन्होंने जिन प्रलोभनों का उल्लेख किया है, उनसे बचें, जिन अच्छी आदतों का सराहा है, उन्हें विकसित करें। सदुपदेशों को ग्रहण करना अपने आप को लाभान्वित करने का एक सरल उपाय है। सत्य के शोधक, उन्नति के जिज्ञासु, और कीर्ति के इच्छुक का यह सर्वप्रथम कर्तव्य है कि वह केवल अपने थोड़े से अनुभवों के बल पर न टिक कर, मानवता का प्रशस्त और समुन्नत करने वाले विचारकों के अनुभवों से लाभ उठावे। सदुपदेश हमारे लिए प्रकाश के जीते जागते स्तम्भ हैं। जैसे समुद्र में जहाजों को उचित मार्ग निर्देश करने के लिए “प्रकाश स्तम्भ” बनाये जाते हैं, विद्वानों के ये उपदेश ऐसे ही प्रकाश स्तम्भ हैं। हम यह नहीं कहते कि आप आँख मूँद कर ही इन्हें ग्रहण करें। आप अपनी बुद्धि और तर्क से खूब काम लीजिए लेकिन उपदेशों में व्यक्त आधार तथा को अवश्य ग्रहण कीजिए। आपको विवेकवान बनने में ये प्रचुरता से सहायता देने वाले हैं। सत्य, प्रेम, और न्याय का पथ इनसे स्पष्ट हो जाता है।

आपको कोई दूसरा अच्छी सलाह दे, उसको सुनना आपका कर्तव्य है, परन्तु आपके पास अन्तरात्मा का निर्देश है, आप अपनी आत्मा की सलाह से काम करते रहिए, कभी धोखा नहीं खायेंगे।

जिन्होंने बहुत सदुपदेश सुने हैं, वे देवता रूप हैं। कारण, जब मनुष्य की प्रवृत्ति अच्छाई की ओर होती है, तभी वह सदुपदेशों को पसन्द करता है। तभी सत्संग में बैठता है। तभी मन में और अपने चारों ओर वैसा शुभ सात्त्विक वातावरण विनिर्मित करता है। किसी विचार के सुनने का तात्पर्य चुपचाप अन्तःकरण द्वारा उसमें रस लेना, उसमें रमण करना भी है। जो जैसा सुनता है, कालान्तर में वैसा ही बन भी जाता है। आज आप जिन सदुपदेशों का ध्यानपूर्वक सुनते हो, कल निश्चय ही वैसे बन भी जाओगे। सुनने का तात्पर्य अपनी मानसिक प्रवृत्तियों को देवत्व की ओर मोड़ना है।

एक विद्वान् ने कहा है, “जल जैसी जमीन पर बहता है, उसका गुण वैसा ही बदल जाता है। मनुष्य का स्वभाव भी अच्छे-बुरे विचारों या लोगों की संगति के अनुसार बदल जाता है। इसलिए चतुर मनुष्य बुरे लोगों का साथ करने से डरते हैं, लेकिन मूर्ख व्यक्ति बुरे आदमियों के साथ घुल−मिल जाते हैं और उनके संपर्क से अपने आपको भी दुष्ट ही बना लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि तो मस्तिष्क में रहती है, किन्तु कीर्ति उस स्थान पर निर्भय रहती है, जहाँ वह उठता-बैठता है। आदमी का घर चाहे जहाँ हो, पर वास्तव में उसका निवास स्थान वह है, जहाँ वह उठता बैठता है और जिन लोगों या विचारों की सोहबत उसे पसन्द है। आत्मा की पवित्रता मनुष्य के कार्यों पर निर्भर है और उसके कार्य संगति पर निर्भर हैं। बुरे लोगों के साथ रहने वाला अच्छे लाभ करे, यह बहुत कठिन है। धर्म से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, किन्तु धर्माचरण करने की बुद्धि सत्संग या सदुपदेशों से ही प्राप्त होती है। स्मरण रखिये कुसंग से बढ़कर कोई हानिकर वस्तु नहीं है, तथा सत्संगति से बढ़कर कोई लाभ नहीं है।

जब आप सदुपदेशों की संगति में रहते हैं, तो गुप्त रूप से अच्छाई में बदलते भी रहते हैं। यह सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया स्थूल नेत्रों से दीखती नहीं है, किन्तु इसका प्रभाव तीव्र होता रहता है। अन्ततः मनुष्य उन्हीं के अनुसार बदल जाता है।

बाल्मीकि डाकू थे। लूट मार हत्या और हिंसा से अपना और अपने परिवार का उदर पोषण किया करते थे। एक दिन संयोग से नारद मुनि उधर से आ निकले। बाल्मीकि को उपदेश देने की उनकी इच्छा बलवती हो आई।

वे सामने से निकले, तो डाकू बाल्मीकि की दृष्टि उन पर पड़ी। उसने सोचा अवश्य ही इस मुनि के पास कुछ धन होना चाहिए।

“खड़े रहो!” वह कर्कश स्वर में चीख उठा। नारद मुनि विनीत भाव से खड़े रह गए।

“तुम्हारे पास जो कुछ छिपा हुआ है, अपनी जान चाहते हो, तो सब यहाँ निकाल कर रख दो! देखते हो यह कुल्हाड़ी, अभी गर्दन साफ कर दूँगा।”

नारद जी बोले, “मुझ मुझ मुनि के पास कुछ नहीं है। दया करो मुझे छोड़ दो।” “हैं कैसे नहीं? जरूर तुम मुझसे छिपा रहे हो। यह देखो, तेज कुल्हाड़ी अभी तुम्हारे सर का धड़ से पृथक करता है। मैं अगर इस प्रकार लोगों को दया करता रहूं, तो अपने परिवार का उदर पोषण कैसे करूं!”

नारद जी बोले, “यह तो ठीक है कि तुम यात्रियों की हत्या कर उनका माल लूट कर अपने परिवार का उदर पोषण करते हो, पर इन अनेक हत्याओं का पाप भी। क्या वे बाँट कर आधा ले लेंगे? क्या वे तुम्हारे पाप, हिंसा, नर्क में भी हिस्सा बटाएंगे?”

यह सुन कर बाल्मीकि कुछ सोचने लगा। फिर यकायक बोला, “मैं तुम्हें यहीं वृक्ष से बाँध देता हूँ, और फिर परिवार वालों से पूछ कर आता हूँ कि क्या वे मेरे पाप कर्मों के भी हिस्सेदार होंगे। मैं उन्हीं के निर्वाह के लिए तो यह हत्याएं करता हूँ। थोड़ी देर तक नारद जी रस्सी से बंधे रहे। उन्हें तो अपने ज्ञान का तेज तर्क और बुद्धि का चमत्कार प्रदर्शित कर भ्रांत व्यक्ति को सन्मार्ग पर लाना था।

कुछ काल पश्चात् बाल्मीकि लौटकर आया, और बोला—“उन्होंने तो स्पष्ट नकारात्मक उत्तर दे दिया। वे कहते हैं कि हमारा कार्य तो केवल खाना है। तुम किस प्रकार भोजन लाते हो, इससे हमें कोई सरोकार नहीं। यदि तुम पाप, हत्या या हिंसा से जीविका उपार्जन करते हो, तो इसका पाप तुम्हें ही भुगतना पड़ेगा।

नारद बोले, “तो तुम मिथ्या इस माया जाल में क्यों पड़े हो? जिन व्यक्तियों के लिए तुम इतना पाप-भार उठा रहे हो, वे तो तुमसे दूर हट जाने वाले हैं। अपने पाप की सजा स्वयं तुम्हीं को भुगतनी है। सजा में कोई भी हिस्सा बटाने को प्रस्तुत नहीं है। घर के लोग केवल अपने स्वार्थ की सिद्धि का सत्कार करते हैं। किसी का कोई सम्मान या संस्कार नहीं करता। सर्वत्र स्वार्थ ही स्वार्थ है। तुम अपने अन्तःकरण में स्थित ईश्वर की ध्वनि का संकेत क्यों नहीं पालन करते? जो आदमी अपने अन्तःकरण के दिव्य संकेतों के अनुसार चलते हैं, उनकी विवेक शक्ति अथवा भले बुरे के पहचानने की शक्ति बढ़ती रहती है। तुम्हारे अन्दर देवत्व है। ईश्वरत्व है। उसके संकेतों को पहचान दिव्यता की ओर बढ़ो।”

हत्यारे के मन पर इस उपदेश का गहरा प्रभाव पड़ा। उसने इस पर जितना सोचा, वह उतना ही गहरा उतरता चला गया। ज्ञान, विवेक, बुद्धि, सन्मति धीरे धीरे सभी शक्तियाँ खुलने लगीं। उसका अज्ञान तिमिर नष्ट हुआ और वह पाप से छूट गया। यह है सदुपदेश का प्रत्यक्ष चमत्कार!

गंगा जल से जिस प्रकार शरीर शुद्ध होता है, सदुपदेश से मन, बुद्धि और आत्मा पवित्र होती है। धर्मात्मा मनुष्यों की शिक्षा एक सुदृढ़ लाठी के समान है, तो गिरे हुए पतितों को सहारा देकर ऊँचा उठाती रही है और बुरे अवसरों पर गिरने से बचा लेती है। जो शिक्षित हैं, उनके लिए सैकड़ों एक से एक सुंदर अनुभव पूर्ण ग्रन्थ विद्यमान हैं, कवियों, विचारकों तत्व-दर्शकों की वाणियाँ हैं, दोहे, भजन सूक्तियाँ हैं। इनका मनन और आचरण करना चाहिए। जो अशिक्षित हैं, वे लोग भी धर्मात्माओं के सत्संग से इतनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं, जिससे अपने आप को सम्हाल सकें और विपत्ति के समय अपने पैरों पर खड़े हो सकें। स्वयं भगवान् गीता में कहते हैं-

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥ (4।38)

अर्थात् “ इस संसार में सद्ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कोई भी पदार्थ नहीं है। उस ज्ञान को कितने ही काल से कर्मयोग के द्वारा शुद्धान्तःकरण हुआ मनुष्य अपने आप ही आत्मा में पा लेता है।”

“ये मानवा हरिकथा श्रवणास्तदोषाः कृष्णाङ्घिनपद्मभजने रचतेनाश्च। ते वैपुनन्ति च जर्गान्त शरीर संगात् सम्भाषणादपि ततो हरिरेवे पूज्यः॥

हरि पूजापरा यत्र सद्धान्त नुद्ध बुद्धयः। तत्रैव सकलं भद्र मथा निम्ने जलं द्विज॥”

जो मानव भगवान की कथा श्रवण करके उससे सदुपदेश ग्रहण कर अपने समस्त दोष-दुर्गुण दूर कर चुका है और जिनका चित्त भगवान् श्रीकृष्ण के चरणारविन्दों की आराधना में अनुरक्त है, वे अपने शरीर के संग अथवा सम्भाषण से भी संसार को पवित्र करते हैं। अतः सदा श्री हरि की ही पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मन् जैसे नीची भूनि में इधर-उधर का सारा जल सिमट सिमट कर एकत्र हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ भगवत्पूजा परायण शुद्ध चित्त महापुरुष रहते हैं, वहीं सम्पूर्ण कल्याण का वास होता है।


सामूहिकता की भावना

(स्व. लाला हरदयाल जी)

आप सामाजिक प्राणी हैं, इसलिये समाज के प्रति आपके कर्तव्य हैं और कुछ अधिकार भी यदि ऐसा है तो समाज की सहायता करने में आप अपना हिस्सा बढ़कर लें। कहा गया है कि ‘एक दूसरे को प्रेम करो’, किन्तु इससे भी ऊंचा काम है ‘एक दूसरे की मदद करो।’ जब दूसरों को आपके समय की अथवा धन की आवश्यकता हो तो जो कुछ भी आपका हो, वह दूसरों को समय पर देने में आप पीछे न रहें और सदैव यही भाव बनाये रहें कि आपके मित्रों तथा सुहृदयों को जब भी आपकी आवश्यकता हो तभी आप सहयोग का हाथ बढ़ाकर उसके लिये उपयोगी सिद्ध हों। यदि आपको मालूम हो जाय कि अमुक व्यक्ति को आपकी आवश्यकता है तो बिना उसके कुछ कहे ही आप उसके पास जा पहुँचें और यथाशक्ति उसकी सहायता करें।

पहला काम आपका है वैयविक्त सेवा-भाव लेकर आगे बढ़ना। आप सुशिक्षित हैं तो अनपढ़ को पढ़ाइए क्योंकि आपने हिन्दी शिक्षण-संस्थाओं में शिक्षा पाई है, जिन्हें दूसरों ने सम्पन्न बनाया है। आपका कर्त्तव्य है कि आप विज्ञान, इतिहास, साहित्य, अर्थशास्त्र आदि विभिन्न विषय जनसाधारण को सरल सीधी भाषा में समझावें। उन्हीं के श्रम का फल है कि आप शिक्षित हुए हैं। विद्या-दान से विद्या फलती फूलती है। दूसरों को बताने से आपके ये विषय सदैव ताजा रहेंगे। अज्ञान ही इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप है। अज्ञानी जातियाँ निकम्मी और मूढ़ होती जा रही हैं। अंधविश्वास और धर्मान्धता उन्हें खाये जा रहे हैं। जिस लोकतंत्र में शिक्षण की उचित व्यवस्था नहीं है, वहाँ की शासन-व्यवस्था का अर्थ है मूर्खों पर दुष्टों का राज्य। भयंकर युद्धवादी नीतियों का प्रमुख कारण निरक्षरता ही है। इसलिये आप गांव-गांव शहर-शहर घूमें और जनता को साक्षर बनाने के लिये व्याख्यान दें, लेख लिखें, कहानियाँ सुनायें, सूचना भरे परचे बंटवाऐं तथा शिक्षण-संगठनों की स्थापना करें। इस कर्त्तव्य से बचना एक शिक्षित के लिये अनुचित और अव्यवहारिक है।

सच्चा सामाजिक बनने के लिये आपको दूसरी आवश्यकता सहनशक्ति, धैर्य तथा संतोष की है। आप में भी कमियाँ हैं, आप में भी अभाव और दुर्गुण हैं, इसलिये दूसरों को इस बात का मौका न दीजिये कि जब आप उन्हें सही रास्ता दिखा रहे हों, तभी वे आपको पहले स्वयं सम्हलने का ताना देकर आपके काम में बाधा डालें। आपको धैर्य और नरमी से काम लेना है। आदमी अपने स्वभाव को नहीं छोड़ सकता। उसमें कुछ संस्कार जमे होते हैं कुछ वंशानुगत जन्मभूमिगत भावनाएं होती हैं, कही-सुनी और लिखी पढ़ी बातों का प्रभाव पड़ा होता है। माना कि उन्हें अपनी अच्छाइयों व बुराइयों का भार स्वयं सहन करना है, किन्तु आप यदि किसी को गलत राह पकड़ते देख लें तो आगे बढ़कर उसे सचेत कर देना आपका काम है। आप उसे समझाएँ कि उसे उस प्रकार का बना देने की जिम्मेदारी किस पर है। उसके पिता-माता, चाचा-चाची, स्त्री पुत्र किसके कारण आज यह ऐसा बना? यदि समझाने के बजाय आप रुष्ट होकर बैठे रहे और आप का पारा चढ़ा रहा तो उससे आपकी ही क्षति है। इसमें दिल और दिमाग दोनों थक जायेंगे यदि आपने जनापूर्ण शब्दों से काम लिया तो किया हुआ बुरा काम फिर दुहराया जा सकता है, उससे भी भयंकर कृत्य किया जा सकता है। उत्तेजित व्यक्ति समझता है कि वह अपराधी को अपशब्दों और ताड़ना द्वारा सुधार रह है, किंतु वह नहीं जानता कि ऐसा करके वह स्वयं अपने प्रति अन्याय कर रहा है। अपराधी स्वयं आपकी बात मानने में आपके मत को स्वीकार करने में हिचकिचाएगा, यहाँ डडडडड डडडडडडड डडडडडडडडड डडडडडडडडड एगा-धमकाएगा, लड़ने-झगड़ने पर आमादा हो जाएगा और ऐसे समय यदि आप भी उसी की तरह उन्मत्त हो गये तो आपमें उसमें अन्तर ही क्या रहा? इस अनर्थकारी प्रकृति के कारण दलों में फूट पड़ जाती है, प्रान्त-प्रान्त और राष्ट्र-राष्ट्र एक दूसरे को धिक्कारता और पछाड़ने की कोशिश करता है।

तीसरी बात यह है कि आप ईर्ष्या एवं अपनी अहंमन्यता त्यागकर दूसरों की योग्यता का भी मूल्याँकन करें। केवल उसी से काम न चलेगा कि आपने अपने प्रतिद्वंद्वियों से ईर्ष्या या द्वेष करना छोड़ दिया है और अब भविष्य में इस रोग से बचे रहेंगे। दूसरों की सफलता पर उन्हें साधुवाद दीजिए। उनकी अच्छाइयों की प्रशंसा करके उन्हें और उत्साहित कीजिए। समाज सुधार की राह में ईर्ष्या एक बड़ी दीवार है। प्रसिद्ध कवि मोलियर ने कहा है, “ईर्ष्यालु व्यक्ति मर जाते हैं, किन्तु ईर्ष्या नहीं मरती।” उदाहरणार्थ, यदि आप किसी अपने से बुद्धिमान व्यक्ति से मिलें तो समझ लें कि उसकी बुद्धि समाज की बुद्धि है और केवल उसी की बुद्धि नहीं है। मानवता के बुनियादी ऐक्य के नाते यह आपकी भी है। प्रकृति द्वारा सभी को यथायोग्य गुण-अवगुण मिलते हैं। कुछ गुण आप में हैं, कुछ दूसरों में। इससे स्पष्ट है कि कोई किसी से छोटा नहीं हीन नहीं। वास्तव में ईर्ष्या तो ऐसा निकृष्ट अभिशाप है जो बदले में हानि के सिवा और कुछ नहीं देता।

समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करनी है तो सत्य-भाषण की चौथी योग्यता अपने में होनी आवश्यक है। आपके वचन बड़े चमत्कारी हैं। वे विलग को जोड़ सकते हैं और जोड़े हुए को विलग कर सकते हैं। सुसंयत वचन होंगे तो सौहार्द और सहयोग के अवसर ला उपस्थित करेंगे। कटु वचन होंगे तो वैषम्य पैदा कर देंगे। असत्य भाषण द्वारा आप सामाजिक जीवन को सुमधुर नहीं बना सकते। कोई आपका विश्वास नहीं करेगा और आपको जब किसी की सहायता प्राप्त नहीं होगी तो पास-पड़ोस का वातावरण डडडडडडड डडडड डडडडडडडडड डडडडड पेज न. 18 डडडडडडडड

उन्मुख व्यक्ति ही अनर्थकारी दुर्वचन बोलता है। दुर्वचन किसी दुष्कर्म की ही भूमिका या पटाक्षेप प्रस्तुत करते हैं। निष्पक्ष और स्पष्टवादी होना जीवन का एक विशेष गुण है। किसी को कटु सत्य से क्षणिक पीड़ा पहुँचाना श्लाघनीय है, किन्तु मीठे बोल बोलकर बाद में जड़ काटना परले दर्जे की कृतघ्नता है। छींटे कशी का परिणाम कितना भयंकर होता है, आप जानते होंगे। आपका कर्त्तव्य तो यह है कि किसी से छोटा-मोटा अपराध हो जाय तो उसे झिड़क-झिड़क कर कुरेदना नहीं चाहिए। अपने सहयोगियों अथवा अन्य व्यक्तियों के कार्यों की अनर्गल टीका-टिप्पणी करना आपके लिए बहुत घातक है। आप चाहे उस बात को यह कहकर टाल देना चाहें कि हम तो यो ही चर्चा कर रहे हैं, किन्तु आपके साथी पर क्या असर हुआ, इसका आपको पता नहीं। यदि आपने किसी की अनावश्यक बुराई सुनी है, तो चुपचाप बैठे न रहिए। ऐसा करके आप उस व्यक्ति के प्रति, जिसे आप निर्दोष समझते हैं, घोर अन्याय कर रहे है। आप दृढ़ता से बुराई करने वाले का सामना कीजिए। यदि आपको किसी की वास्तविक बुराई का पता लगा है, तो आप उसकी पीठ पीछे विष न फैलाकर सीधे उसी को जा खटखटाइये और उसे सावधान कर दीजिये। ऐसा करने से वह सावधान हो जायगा और फिर वैसा करने की उसकी हिम्मत शायद न होगी। आपको अविनीत और उद्धत व्यवहार के कुपरिणामों से बचना है। बहुधा आप यह सोचते हैं कि आप अपने से अधिक शिक्षित एवं समृद्ध व्यक्तियों से अशिष्टता पूर्ण व्यवहार करें और यह प्रदर्शित करें कि विद्या-वैभव में हीन होते हुए भी आप उनसे किसी कदर कम नहीं हैं। आज के युग में यह दुर्जयी कीड़ा सभी दिल दिमाग को खोखला करता जा रहा है। अतः व्यवहार में आपको विनीत, मितभाषी और आदर सूचक शब्दों का प्रयोग करना है। चाहिए तो यह कि जो जिस योग्य है, उसे वैसा ही आदर, सम्मान और स्नेह अर्पण किया जाय। किसी की प्रतिष्ठा में कमी करने के असफल प्रयत्न से आपको अपयश के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलने का। दूसरी ओर यदि आपने अपने से किसी छोटे व्यक्ति का अपमान करके उसे उसके छोटेपन का ज्ञान करा दिया तो वह आपसे दूर रहने का प्रयत्न करेगा और बहुत सम्भव है कि आपकी इस जरा-सी बात को गाँठ बाँध ले और जीवन पर्यन्त आपसे पहले की तरह दिल खोलकर न मिल सके या सर्वथा त्याग ही कर दे।

पाँचवाँ गुण जो आपको एक नागरिक के नाते अपने में पनपाना है, वह है सुशीलता। आप जो हैं उससे ऊपर उठ सकते हैं या नीचे गिर सकते हैं। अपना अधिकार अवश्य माँगिए, किंतु उससे अधिक नहीं। समाज आपका जो मूल्य-निर्धारण करता है, उससे अधिक पाने की फलाशा को त्याग दें। यदि आपके गुणों को बढ़ा-चढ़ाकर बखान करने वाले मित्रों की भीड़ आपके साथ है, तो उसके पंजे से बचें अन्यथा वह भटकाकर आपको किसी नुकीली और खुरदरी चट्टान पर ले जाकर पटकेगी और आप फिर न उठ सकेंगे। दम्भोक्तियाँ उसी के मुँह से निकलती हैं, जो भीतर से रीता और ऊपर से लिपा पुता है। सुशीलता और सादगी ही आपको घमण्डी और बनावटी होने से बचाएगी। आपके समाज में अधिकाँश लोग ऐसे हैं, जो दम्भियों और डींगें मारने वालों को कभी पसन्द नहीं करते, उल्टे उनसे रुष्ट रहते हैं।

आप स्वयं अपना प्रचार करने की आदत छोड़ दीजिए। फिर आप अनुभव करेंगे कि आपकी विशेषता को जानने की इच्छा रखने वाले स्वतः आपको जान गए। आज के दूषित वातावरण में कोई अपनी योग्यता या अज्ञानता के दम्भ पूर्ण स्तर से नीचे उतर कर समझौता नहीं करना चाहता, किन्तु यह ध्यान देने योग्य है कि सहयोग की पहली सीढ़ी समझौता है। संसार में एक ही व्यक्ति होता तो कोई बात नहीं थी।

छठी विशेषता जो आपको अपने में उपजानी है, वह है न्यायप्रियता। सभी जानते हैं कि सबल निर्बल को दबा लेता है कि हमारा आज का समाज ऊंच नीच की भावना पर अवलंबित है और हमारी आज की सभ्यता का मूल अन्याय है।

इसलिये आवश्यकता इस बात की है कि आप पहले न्याय-पथ के राही बनें। ऐसा करने से आपकी आवाज में, आपकी चाल में, व्यवहार में और आप के निकटवर्ती में सच्चे ओज, निर्भीकता और दिव्य आभा का पुट मिल जायेगा। आप अपने को अधिक बलवान स्वस्थ और समाज से अक्षय कीर्ति का अधिकारी बना हुआ पाएंगे।

न्याय-प्रिय होने पर आपके मन के लोलुप भाव घुल जाएंगे। आप जानते हैं कि समाज में तीन प्रकार की श्रेणियाँ हैं। उच्च एवं जिसमें जमींदार मिल कारखानों के मालिक, शासकगण, पदाधिकारी आदि हैं मध्यवर्ग जिसमें कमाने वाले खाने वाले सामान्य लोग हैं तथा निम्नवर्ग जिसमें क्लर्क, मजदूर आदि हैं।

आपकी लोलुप वृत्ति उन अग्रगामी आँदोलनों की जड़ पर आघात करेगी जिनके आप संचालक हैं। आप ही की स्वार्थान्धता के कारण बहुतों के जान माल की हानि होगी।

अपने पक्ष को न्यायसंगत सिद्ध करने या अपना मतलब सीधा करने या धर्म के परदे की आढ़ लेकर और अन्तर में लोभ की चिनगारी रखकर न जाने कितनों ने बड़े-बड़े सुधारकों और नेताओं का हनन किया है। इसी अर्थ-पिपासा के कारण प्रत्येक सदी लाखों-करोड़ों व्यक्तियों का बलिदान लेती है। न्याय-प्रियता का गुण आपको ‘छीन और हड़प’ की दुर्नीति से बचाएगा।

आप यदि दूध को दूध और पानी को पानी कहने लगे हैं, तो आशा है कि आप वही धंधा अपने हाथ में लेंगे जो लोक-कल्याण से सम्बन्ध रखता है अथवा जिससे आपके बिगड़ जाने का अंदेशा नहीं है।

सातवां और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गुण जो आपको अपनाना है, वह जीव-जन्तुओं के प्रति प्रेम-भाव और उनके पालक-पोषक बनने की भावना अपने में पैदा करना है। सभ्यता के आदिकाल से लेकर मनुष्य-जाति पशुओं के प्रति बड़ा अन्याय करती रही है। लाखों-करोड़ों का नित्य-प्रति वध किया जाता रहा है।

आपके दैनिक जीवन के जो संगी-साथी हैं, उनकी देखभाल भी रखिये। आप जिस सभ्यता और संस्कृति के कारण इतने ऊँचे माने जाते हैं, उसके निर्माण में इनका भी हाथ है। आपके पूर्वज इनकी मंगलमयी आकृतियों को संस्कृति के प्रतीक मानकर राष्ट्र की कलात्मक वस्तुओं पर उनका अंकन कर गये हैं। इस थाती को आप सुरक्षित और अक्षुण्ण बनाए रखिए।


कर्म और उसके बन्धन

(श्री. लक्ष्मीप्रसाद मिस्त्री ‘रमा’ हटा )

जीवन यात्रा के निर्वाह के लिए संसार में कर्म करने की बड़ी आवश्यकता है और कर्म-साधना ही मोक्ष-पद के पाने में सहायता देती है दुःख को दूर करने के लिए कर्म प्रधान सामग्री है, कर्म के प्रताप से ही त्रिविधताप को मूल-जड़ से नष्ट किया जा सकता है। वर्तमान में जो कर्म किया जाता है उसके साथ भविष्य के फल का निर्दिष्ट और विशेष संबन्ध है, कोई भी बात अकस्मात या अकारण नहीं होती। सबका कुछ न कुछ कारण होता है, जो नियमित रूप से संघटित होता है। एक बीज बोने पर वह अंकुरित होकर एक अंकुर उत्पन्न करता है। उसमें पत्ते लगते हैं, फूल लगते हैं और फिर फल लगते हैं, फल से फिर बीज उत्पन्न होता है और वह बीज से फिर पहिले के समान अंकुर-पत्ते, फूल तथा बीज उत्पन्न होते हैं। जिस वृक्ष का बीज होता है। उस बीज से वही वृक्ष उत्पन्न होता है। जैसे जौ से जौ उत्पन्न होता है, गेहूँ से गेहूँ तथा बबूल से बबूल ही उत्पन्न होता है। कोई बबूल बोकर उससे मधुर दाखें उत्पन्न होने की आशा नहीं कर सकता। यही कर्म का फल या तत्व है, यह जानकर मनुष्य को अभिलाषा के अनुकूल ही बीज बोना चाहिए और कर्म के इस विषय को साधारण रूप से स्मरण रखना चाहिए।

कर्म-तत्व मन में जितना सहज मालूम होता है, उतना सहज नहीं है। यदि मैं किसी से पूछूँ, कि आप बाजार क्यों गये थे। तो वह कहेगा कि मुझको एक जोड़ा खड़ाऊं चाहिए थी, अथवा कहेगा, कि मुझे एक मित्र से मिलना था और मन में आया कि वह वहाँ मिलेगा, इस प्रकार सब ही कार्यों का एक न एक प्रयोजन और मनन वा संकल्प देखने में आता है। क्रिया-मनन और प्रयोजन सदा एक ही सूत्र में गुंथे रहते हैं। इस प्रयोजन का नाम वासना है। पहले वासना उत्पन्न होती है, यह कर्म की प्रथम अवस्था है। फिर संकल्प करते हैं, कि इस वासना की सिद्धि करेंगे यह दूसरी अवस्था है। अन्त में अभीष्ट लाभ के लिये कार्य करते हैं, यह कर्म की तीसरी अवस्था है। कर्म का यही क्रम है। हर एक कार्य के पीछे संकल्प और वासनायें लगी हुई हैं। कर्म-संकल्प और वासना, ये तीन कर्म रज्जु के सूत्र हैं, ये तीनों मिलकर कर्म-रज्जु कहलाते हैं। कर्म के द्वारा हमारे निकट के सम्बन्धी सुखी या दुःखी होते हैं। यदि सुखी हों तो समझना चाहिये कि सुख का बीज बोया था और उसके प्रति फलकर्ता को भी सुख होगा, और यदि दुःख का बीज बोया है तो दुःख होगा। उसी प्रकार निष्ठुरता के काम करते हैं। तो निष्ठुरता का बीज बोया जाता है। उसके फल से हमारे भोग में निष्ठुरता ही प्राप्त होगी। दया का बीज बोने पर दया मिलेगी, इसमें सन्देह नहीं। जैसा बीज बोया जायगा, वैसा ही हमको भोगना पड़ेगा।

हर एक कर्म के पीछे संकल्प लगा हुआ है। जैसे क्रिया से सुख-दुःख रूप फल मिलता है, तैसे ही उस संकल्प के कारण हमारा चरित्र गठित होता है। चरित्र में हमारे मन की प्रकृति का विकास है। हम जिस विषय की बहुत सी चिंता करते हैं। हमारे मन की वैसी ही दशा हो जाती है। केवल दया के व्यापार का विचार करने पर हम निःसंदेह दयालु होंगे। क्रूर कर्म की चिंता करने पर हमारा स्वभाव क्रूरता का ही हो जायगा। रात दिन धोखेबाजी का ध्यान करने पर हम अवश्य ही धोखेबाज हो जायेंगे। श्रेष्ठ चितवन का फल साधु भाव ही है। इस प्रकार संकल्प से ही चरित्र गठित होता है। इस जन्म में हम जैसी चिंता करते हैं, पुनर्जन्म के समय हमारा चरित्र निःसन्देह उसके अनुसार ही गठित होगा। हम अपने स्वभाव के अनुसार ही कार्य करते हैं, इसलिये हमारे वर्तमान जीवन के संकल्प से ही, दूसरे जन्म के चरित्र और घटनाएँ संघटित होती हैं इसमें संदेह नहीं। संकल्प के मूल में ही वासना है। वासना के कारण ही हम अभीष्ट वस्तु पाते हैं। जैसे चुम्बक लोहे को खींचता है, वैसे ही कामना अभीष्ट वस्तु को खींचती है। धन की इच्छा करने पर जन्मान्तर में धनवान होने का सुयोग पाया जाता है, ज्ञान की कामना करने पर जन्मान्तर में ज्ञानवान होने का संयोग होता है। प्रेम की अभिलाषा करने पर जन्माँतर में प्रेमालाप हो सकता है। शक्ति पाने की वासना होने पर जन्मान्तर में शक्तिमान हो सकता है। कर्म फल के विषय में एक बात में यही कहा जा सकता है कि—

“अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्”

जैसा बीज बोया जाता है, फल भी वैसा ही होता है। यहाँ पाठक यह जिज्ञासा कर सकते हैं कि यदि हमारा वर्तमान कर्म पिछले जन्म के संकल्प का फल है और पिछले जन्म के सब संकल्प व्यतीत वासनाओं के फल हैं, तब तो जीव असहाय रूप से बँधा हुआ है, व्यतीत जन्म के संकल्पानुसार ही हम कर्म करने को विवश हैं। पिछले जन्म की वासनाओं के अनुसार हमारे संकल्पों का उदय होगा ही, यह बात ठीक है, परन्तु इसकी भी एक सीमा है, क्योंकि ज्ञान की वृद्धि के साथ साथ हमारा परिवर्तन होता चला जा रहा है। उत्तरोत्तर ज्ञान पाने के साथ ही साथ जीव वासनाओं को बदलता जाता है। इसलिये यह बात कह सकते हैं कि पहले जन्मों में हमने जैसी वासना-संकल्प और कर्म किया था, उससे अन्य भाव की भी वासना, संकल्प और कर्म कर सकते थे। अब भी चेष्टा करके उनकी गति पलटी जा सकती है। ज्ञान के बल से खोटे फल के अस्तित्व को समझकर यत्न पूर्वक उनका पलट देना असंभव नहीं है, क्योंकि अभ्यास की शक्ति बड़ी ही प्रबल है।

मान लो किसी ने समझा, कि मैंने कोई निर्दयपन का काम किया और साथ ही यह भी समझ पड़ा कि वह निर्दय काम किसी अतीत निर्दयपन की चिंता से उत्पन्न हुआ है और वह चिंता विषय की वासना का फल थी। उस वासना की चरितार्थता निर्दयपन के बिना हो ही नहीं सकती। उसने जान लिया कि उस कार्य के फल से ही मैं इस लोक में कष्ट पा रहा हूँ और उसी के कारण लोग मुझसे घृणा करते हैं और मेरा कोई साथी भी नहीं है। दुःख मिला करता है। यह सब विचार कर उसने अपने स्वभाव को पलटने का संकल्प किया। उसने सकल अशान्तियों की मूल जो वासना है, उस वासना को ही दूर करने की चेष्टा की। उस समय वह जीवात्मा अपने आप ही कहने लगता है कि अब मैं इन सब विषयों की वासना नहीं रखूँगा क्योंकि निर्दयता के बिना वह सिद्ध नहीं होगी। इसके फल से मुझको बड़ा ही मानसिक कष्ट उठाना पड़ेगा। इस प्रकार वह संकल्प के द्वारा वासना का नाश करने के यत्न में लगा और वासना से संकल्प का उदय नहीं होने दिया। तब वासना जिसकी रस्सी टूट गई है, ऐसे घोड़े के समान उसको अपनी इच्छानुसार नहीं लेजा सकी। उसने संकल्प को लगाम रूप से काम में लाकर वासना रूपी घोड़े को अपने वश में कर लिया। उस समय वह जिस कार्य के करने से सुख मिलता है उसी कार्य के अनुकूल वासना को चलायेगा।

जो लोग अपने और दूसरे के सुख की वृद्धि चाहते हैं उनको चाहिये कि वासना को अपने वश में करें, दृष्टि डालकर और वस्तु का विचार करके, क्या सुख कारक है और क्या दुःखदायक है, इसका निर्णय करके अपनी समस्त शक्ति के बल से सुखमय विषय की ही वासना करें। किसी विशेष प्रकार से जीवन को बिता देने से जन्म-मरण रूप बन्धन से मुक्ति नहीं होती। कर्म का यही तत्व है।


अनीश्वरवाद विश्व के लिए खतरा

(श्री. स्वराज्यकुमारी रस्तोगी, कानपुर)

विज्ञान ने मनुष्य को तर्कमय और बुद्धिजीवी बनाया है। प्रत्येक कथन को, प्रत्येक वस्तु को वह बुद्धि और तर्क की कसौटी पर कस कर परखता है, और खरा उतरने पर ही उसे ग्रहण करता है। विज्ञान का चरम विकास हो जाने पर भी किसी सीमा तक उसे वह सर्वोच्च और अपराजेय समझता है। पर प्रकृति को ईश्वर मानने के लिए वह फिर भी नहीं सहमत है। इसकी वजह उसका बुद्धिजीवीपन है। इसी प्रवृत्ति ने उसे उद्दण्ड, निरंकुश बना दिया है। इसीलिए शक्तिवान दुर्बल को अपने बड़प्पन, अत्याचार और आतंक से पद दलित करने के लोभ को संवरण नहीं कर सके। जिससे वह सर न उठा सके, उनके घृणित कृत्यों का प्राण रहित विरोध न कर सके। उसकी स्वार्थ साधना अनवरत रूप से चलती रहे। ऐसी उसकी आकाँक्षा है।

पर यही स्वार्थ साधना विश्व के खतरे के लिए खुला आमंत्रण है। उनकी यह विचारधारा मिथ्या और क्षणभंगुर है। दुर्बलों की आहें उन्हें भस्म कर देंगी, क्योंकि पतितपावन तो कोई और है। जिसके करोड़ों ही पैर हैं। यदि ऐसा न हो तो मनुष्य अहंकार वश अपना ही संहार कर डाले। संसार की सभ्य से सभ्य जाति ईश्वर का अस्तित्व मानती है, धर्म से भय खाती है। महान् से महान् व्यक्ति आस्तिक हैं। धर्म के बंधन उन्हें अहम् से बचाते हैं। मनुष्य का विकास हुआ उसकी बनाई हुई सीमाओं और बंधनों के कारण। पर जब यह बंधन हमें इस तरह से जकड़ लेते हैं कि जीना दूभर हो जाता है, तो हमारी प्रगति रुक जाती है। पहले हमें दुर्बलता सताती है, बाद में शनैः शनैः हम निष्प्राण होते जाते हैं। अतएव मानव कल्याण के लिए प्रत्येक मनुष्य को ईश्वर और धर्म पर आस्था रखनी ही पड़ेगी।

ईश्वर पर आस्था रखने से आपस में प्रेम, सौहार्द्र एवं विश्वास का विकास होता है। तीन साधन ऐसे हैं कि जिनसे मनुष्य को किसी प्रकार की व्यवहारिक अड़चन जीवन में नहीं पड़ती। सारे काम सुचारु रूप से होते रहते हैं। मनुष्य एक होकर काम कर सकता है। आपसी विरोध मिट जाते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह दुख-सुख दोनों को समभाव से ग्रहण करने के योग्य बनता है। न सुख उसे बौखला ही सकते हैं, और न दुख की पीड़ाएं उसका बुद्धि संतुलन ही भ्रष्ट करता है। और न अभावों की मरीचिका रूप संकट व्याघ्र ही उसे भयभीत कर पाता है। संतोष और धैर्य उसकी रग-रग में प्रवेश कर जीवन को त्यागमय बना देता है। संसार के सारे प्रपंच, झगड़े-फसाद उससे कोसों दूर भागता। जीवन शाँति के साथ ईश्वर की खोज में ही समाप्त हो जाता है।

विश्वशाँति के लिए आध्यात्मिक विकास जरूरी है। अब तक मनुष्य ने अपने संसार का भौतिक विकास करके अपना नाश किया। यह उसकी अपनी शक्ति का दुरुपयोग है। आध्यात्मिक विकास के यह अर्थ नहीं कि सब कुछ त्याग कर वह कन्दराओं में एकाकी जीवन यापन के लिए जाय। यह तो कायरता हुई। जीवन के प्रति पलायन हुआ। उसकी लंगोटी में माया-मोह लिपटा रहता है। आध्यात्मवादी विकास से तात्पर्य हैं अपनी देवी प्रकृतियों का पूर्ण विकास करना, दया, धर्म और परोपकार का दैनिक जीवन में पालन करना। सत्य की असत्य पर, प्रकाश की अंधकार पर विजय एवं नश्वर शरीर को सुकृत्यों द्वारा अमर बनाना ही ईश्वरवाद का सच्चा समर्थन है।

इस प्रकार जब ईश्वर का सहारा लेकर अर्थ, का मोह, माया पर विजय प्राप्त करता हुआ एक मनुष्य जीवन के प्राँगण में साहस से पग बढ़ाता है, तो दूसरे भी पहले की सफलता देखकर अपने को बनाने का प्रयास करते हैं। एक-एक करके सभी अपने जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास करते हैं।

अनीश्वरवाद को मिटाने के लिए धार्मिक कट्टरता, जाति, रंग भेद, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष का उन्मूलन आवश्यक है। प्रत्येक धर्म के पास दूसरे धर्मों के लिए आदरास्पद स्थान होना चाहिए। धार्मिक कटुता, भेदभाव, युद्ध, हिंसा, विध्वंस के जनक समझे जाते हैं। प्रभाव के लिए हमें विश्व इतिहास के पन्ने उलटने होंगे। रोम, यूनान, इसराइल, मेसोपोटामिया, इंग्लैंड, जर्मनी आदि का पतन धार्मिक कट्टरता भेद-भाव से हुआ। धार्मिक कट्टरता के समर्थकों को पहले, क्रूर और ईर्ष्यालु बनना पड़ेगा। वह दूसरे की धार्मिक उन्नति देख ही नहीं सकता। ये मनोविकारों की चिनगारी अन्दर ही अन्दर सुलगते-सुलगते युद्धों की लपटों में बदल जाती है। दैवी गुणों का लोप होने लगता है। विनय, दया के भाव, उर की स्थायी अनुभूतियाँ अपना प्रभाव समेटने लगती हैं। पाप का घड़ा भरने पर प्राकृतिक कोप, जल-प्लावन, सूखा, भुखमरी, बीमारियाँ बढ़ती जाती हैं। जीवन बोझिल हो जाता है। शोषण-अत्याचार सुरसा की तरह बढ़ते ही जाते हैं। अंत में शिव को अपना तीसरा नेत्र खोलना ही पड़ता है। हरी भरी दुनिया और सब्जबाग जल कर राख हो जाता है।

आज का जगत इन्हीं भयानक परिस्थितियों से होकर गुजर रहा है। यद्यपि रूस और अमेरिका की वेधशालाएं मानव हित और संवृद्धि के लिए हमें नित नये आविष्कारों को दे रही है, फिर भी हृदय की भय और अशाँति से सब व्यग्र हैं, जिसके आगे हमारी अपनी रक्षार्थ बनाई गई दृढ़ प्राचीर स्वतः निर्बल और जर्जर प्रमाणित हो रही है। इन विभीषिकाओं से बचने के लिये मानव अन्तरात्मा में धर्म की ज्योति का प्रज्वलित होना आवश्यक है। यदि लोग अनीश्वर वादी, भौतिक वादी और जिसकी लाठी उसकी भैंस के सिद्धान्त को मानने वाले बनते गये, तो इसका परिणाम समस्त मानव जाति के लिए भयंकर होगा। विज्ञान, सत्ता, शक्ति और धन के मद में चूर थोड़े से व्यक्ति भी समस्त संसार का भयंकर अनिष्ट कर सकते हैं। इस खतरे से बचने के लिए हमें अनीश्वर वादी मान्यताओं को निर्मूल करके ईश्वर और उसके न्याय का, कर्म फल का प्रतिपादन इस तैयारी के साथ करना चाहिए कि आज जो घोर भौतिकवाद के बादल मंडरा रहे हैं, उन्हें हटाया जा सके।


कर्तव्य पथ पर आरुढ़ हूजिए

(श्री कन्हैया लाल श्रीवास्तव, बी. ए., रिसिया)

कार्य करते रहना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म है। कर्म विहीन व्यक्ति की अधोगति होती है। प्रकृति का नियम है कि जिन वस्तुओं का उपयोग बन्द कर दिया जाता है वह शीघ्रता से नष्ट होने लगती हैं। इसी प्रकार कार्य न करने से मनुष्य शरीर रोगी और आलसी हो जाता है। उसमें नाना प्रकार की भयंकर व्याधियाँ अपना घर बना लेती हैं। विलास भवनों में निवास करने वाले रईस की तुलना में कर्म करने वाला व्यक्ति अधिक सुख की नींद सोता है जबकि रईस रात भर किसी औषधि द्वारा नींद बुलाने का प्रयत्न करता रहता है।

संसार का इतिहास कर्म योगियों का इतिहास है। महान नेताओं ने अपने जीवन के एक एक पल का सदुपयोग किया है। गाँधी जी ने सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ करने के पूर्व ही से अपने समय का उचित रूप से उपयोग करना शुरू कर दिया था। नेहरू जी अपने 67 वर्ष की अवस्था में भी नित्य 18 घन्टे कार्य करते हैं एक बार काँग्रेस अधिवेशन में भोजन करके लौटते समय एक बूढ़े ने मार्ग में रोक कर नेहरू जी से एक मिनट माँगा। परन्तु नेहरू ने कहा ‘मैं, एक मिनट कहाँ पाऊं सच है कर्म वीर का एक मिनट आलसी व्यक्ति के 100 वर्ष के जीवन से अधिक मूल्यवान होता है।

स्वतन्त्रता का आन्दोलन चलते रहने के समय में जब अँग्रेजी सरकार नेताओं को जेल में बन्द कर देती थी तो वे लोग वहाँ पुस्तकें लिखने लगते थे। गाँधी जी की आत्म कथा, नेहरू जी की आत्म कथा, भारत की खोज, देश रत्न राजेन्द्र बाबू की आत्म कथा तथा अन्य महत्वपूर्ण साहित्यिक एवं ऐतिहासिक पुस्तकें जेल में ही लिखी गईं हैं।

एक कहावत है “ सकल पदारथ हैं जंग माही। कर्महीन नर पावत नाहीं।” संसार में सारे पदार्थ हैं परन्तु कर्म न करने वाला व्यक्ति उन्हें नहीं पा सकता। कर्म हीनता का अर्थ अधिकाँश लोग भाग्य हीनता से लगाने लगते हैं और सोच लेते हैं कि हमारी तकदीर में अमुक वस्तु नहीं लिखी है फिर हम उन्हें कैसे प्राप्त कर सकते हैं। यह मिथ्या भ्रम है। कर्म द्वारा ही भाग्य की भी रचना होती है। ‘वीर भोग्या बसुन्धरा’ पृथ्वी का भोग वीर पुरुष ही करते हैं। भारत के क्षत्रिय लोग जब तक कर्मठ रहे देश के शासक बने रहे, लेकिन जब सुरा और सुन्दरी में अपना मन लटकाने लगे तो पृथ्वी, लक्ष्मी, यश और महानता उनसे विलग हो गई।

लंका विजय के समय जब रामचन्द्रजी ने समुद्र से मार्ग माँगने के लिये आसन लगाया, तो लक्ष्मण को यह नीत न भाई। उन्होंने तुरन्त कहा-

नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।। कादर मन कहँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।

दैव यह देंगे दैव वह करेंगे, ऐसा कहना काहिलों का होता है। बानरों और रीछों के पौरुष से वह महान सेतु बंध गया, जो आज भी आर्य जाति का कर्मशीलता की पताका फहरा रहा है।

सुदूर दक्षिण का वह सेतु आज भी अपनी मूक भाषा में हम भारतीयों को उपदेश दे रहा है, ‘यदि संसार में यश चाहते हो, धन चाहते हो तो कर्म करते रहो।’

उपनिषदों में एक स्तुति आई है जिसका हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है “किसकी आज्ञा से मन अपने विषय पर उतरता है? किसकी आज्ञा से जीवन, जो सबसे पहली चीज है, आगे बढ़ता है? किसकी आज्ञा से मनुष्य चह वचन कहते हैं? किस देवता ने आँख और कान दिये हैं? वायु शान्ति क्यों नहीं रहती? आदमी के मन को चैन क्यों नहीं मिलता? क्यों और किसकी खोज में जल बहता रहता है और एक क्षण नहीं ठहरता?” आदमी बराबर एक साहस पूर्ण यात्रा में लगा हुआ है उसके लिए न कहीं दम लेना है और न उसकी यात्रा का अंत है।

वीर अर्जुन ने हिमालय पर तपश्चर्या करके दिव्यास्त्रों की खोज किया तभी महाभारत में विजय प्राप्त कर सके।

गीता में निष्काम कर्म की बड़ी प्रशंसा है। भगवान ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बिना शास्त्र विहित कर्म के न योग की, न वैराग्य की और न संन्यास की ही सिद्धि हो सकती है। यह सिद्धाँत केवल काल्पनिक नहीं है,

आज देश में विशेषतया हिन्दू समाज में यह परिपाटी चली गई है कि घर के काम में कठिनाई मालूम होने लगी। चट अचला पहना, भस्म लगाया और महात्मा बन गये। शंकर की बूटी भाँग और गाँजा पिया और दूसरों की कमाई पर मौज उड़ाने लगे। ऐसे बिगड़े महात्मा ही समाज में अनेक बुराइयों के मूल हुआ करते हैं। देश का जितना नुकसान विदेशियों ने किया है उससे कहीं अधिक दुर्दशा पथ भ्रष्ट महात्माओं ने किया है। देश के 56 लाख साधुओं में से मुश्किल से चार, पाँच सौ सच्चे साधू होंगे। अपने कार्य से जी चुराना कायरता है।

भारतवर्ष की जन संख्या 35 करोड़ के लगभग है यह जन संख्या चीन को छोड़ कर संसार के सभी देशों से अधिक है। मनुष्य ही नहीं वरन् पशु भी हमारे देश में संख्या में बहुत हैं मगर उपयोगिता में अन्य देशों की तुलना में बहुत कम। यह अवस्था हमारे कार्य शीलता शक्ति के ह्रास का द्योतक है।

जिस इंग्लैंड ने हमारे देश पर डेढ़ सौ वर्षों से भी अधिक काल तक राज किया उसकी जन संख्या हमारे उत्तर प्रदेश के बराबर है। विदेशियों की आलोचना करने मात्र से हमारे देश का कल्याण नहीं हो जायेगा।

यह तभी होगा जब हम उनकी क्रियाशीलता को भी अपनाने का प्रयत्न करें। यूरोप के छोटे- छोटे देशों के अपने पौरुष से ही संसार के सुदूर देशों में अपने उपनिवेश स्थापित किये थे।

पराधीनता काल में अँग्रेजी शासन की यह सबसे बड़ी चाल थी कि भारत के उद्योग धन्धे धीरे-धीरे चौपट करके यहाँ की आर्थिक और व्यवसायिक नीति को लंकाशायर और बर्किघम के आधीन कर दिया जाय और हमारा जीवन उस कैदी के अनुरूप बना दिया जाय, जहाँ ‘कैद में गो लाख हो आराम, फिर भी कैद है।’

इस कूटनीति का भारत पर बड़ा प्रभाव पड़ा। यद्यपि भारत की राजनैतिक बेड़ियां टूट चुकी हैं, मगर मानसिक दासता अभी पूर्ववत् है।

अधिकतर भारतीय परिवारों की यह दशा है कि उनमें यदि एक कमान वाला है, तो चार-पाँच उसके आश्रित रह कर मौज उड़ाने वाले हैं। यदि उन्हें कार्य करने को कहा जाय तो उनका आध्यात्मिक उपदेश ही सुनने को मिलता है। “संसार में सब कुछ अनित्य है”

महान् पूर्वजों ने अथक परिश्रम द्वारा ही यश और अमरत्व प्राप्त किया था। सिकन्दर 33 वर्ष की अवस्था में मकदूनियाँ के एक छोटे राज के राजा की अवस्था से उन्नति करके एशिया में एक विशाल यूनानी साम्राज्य की स्थापना करके दुनिया से चल बसा था।

जगत गुरु शंकराचार्य ने उस समय अपनी अल्पायु में ही सम्पूर्ण भारत में तीन बार परिक्रमा करके वैदिक धर्म की पताका फहराया था और चारों कोनों पर चार धामों की स्थापना भारतीय एकता को पुनर्जीवित करने हेतु किया था। मृत्यु के समय उनकी आयु 33 वर्ष की थी। विचार करने से ज्ञात होता है कि यह कार्य कितने साहस और परिश्रम का था। आज 33 वर्ष वाला व्यक्ति अपने को बालक ही समझता है।

अधिकतर हम लोग यूरोप वालों को भौतिक वादी कहते हैं जिसका अर्थ साधारण भाषा में यह होता है कि उनके सारे उद्योग शारीरिक सुख के लिये होते हैं। दूसरों को बुरा और अपने को अच्छा कहकर हम अपने मन को भले ही बहला सकते हैं, मगर सत्य की छान बीन नहीं कर सकते।

कोलम्बस की अमेरिका खोज, वासकोडी गामा की भारत खोज, साहसी यात्रायें देश और समाज के लिये जितनी लाभदायक सिद्ध हुई हैं, उतना उनके जीवन के लिये नहीं। इन बेचारों को अपने जीवन में कठिनाइयों का ही सामना करना पड़ा, मगर अपने मार्ग से कभी विचलित न हुए। वही व्यक्ति सच्चा धार्मिक है, जो सर्व हिताय कार्यरत रहे।

आज भी यूरोपीय यात्रियों के दल प्रति वर्ष हिमालय की चोटियों पर चढ़ने के लिये आते हैं। वास्तव में इन चढ़ानों से न तो उन्हें वर्तमान में किसी प्रकार का आर्थिक लाभ होता है और न भविष्य में होने की आशा है, मगर इससे इन जातियों की खोज प्रवृत्ति और परिश्रमशीलता का परिचय मिलता है। यह कहावत इन्हीं लोगों में सत्य है कि “बैठे से भली बेगार” यदि अपना कार्य न हो तो पड़ोसी का करो। इससे अपना अभ्यास तो बना रहेगा। मुस्लिम जाति का उत्थान उस समय हुआ, जब हजरत मुहम्मद के समय में उनके अनुयायी उंगलियों पर रखने भर को थे। करबला की लड़ाई के समय हजरत हुसैन के साथियों की संख्या केवल 72 थी। साहस और वीरता से उन्हीं लोगों ने सम्पूर्ण एशिया भर में इस्लाम को पहुँचाया।

भारत स्वतन्त्र हो गया है। स्वतन्त्र देश के नागरिकों पर महान जिम्मेदारियाँ होती हैं। सरकारी योजनाएं जैसे प्रथम तथा द्वितीय पंचवर्षीय योजना, श्रम दान सप्ताह, वन महोत्सव अधिक अन्न उपजाओ आदि हमारी कार्य शक्ति को उत्तेजित करने के लिये समय समय पर बनाई जाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति को यह आवश्यक है कि वह अपनी जिम्मेदारी समझ कर कुछ न कुछ कार्य अवश्य करें।

हमारे अधिकार संविधान द्वारा तभी सुरक्षित रह सकते हैं, जबकि हम अपने कर्त्तव्य पर अधिकार से अधिक जोर दें। अन्यथा यह भी मनुस्मृति की भाँति केवल धार्मिक व्यक्तियों के अध्ययन की सामग्री रह जायेगी

गाँधी जी सदैव अधिकार से अधिक कर्त्तव्य पर जोर देते थे। बिनोवा जी का तो यहाँ तक कथन है कि प्रत्येक मंत्री को दिन में दो घण्टे शारीरिक श्रम अवश्य करना चाहिये।

कर्म करने में शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के श्रम निहित हैं। बुद्धि जीवी और श्रम जीवी दोनों का जीवन एकाँगी होता है। अपने श्रम को सन्तुलित रखने के लिये बुद्धि जीवियों का कर्त्तव्य है कि शारीरिक श्रम यथाशक्ति अवश्य करें, तथा श्रम जीवी लोग भी कुछ लिखने पढ़ने का काम सीखे ताकि कार्य परिवर्तन से थकान भी दूर हो और कार्य का सन्तुलन बना रहे। समय का सच्चा धर्म यही है कि हम यथाशक्ति कुछ न कुछ कार्य नित्य अवश्य करें।


मनुष्य धर्म का वास्तविक स्वरूप

(श्री भागीरथी गुप्त, बहेडी)

इस विश्व में असंख्य प्राणी निवास करते हैं। उन सब प्राणियों का अपना-अपना अलग महत्व है। अर्थात् सभी जीव अपने पूर्व कर्मानुसार जीवन यापन कर रहे हैं।

इन सब प्राणियों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम तो वे प्राणी जो अपने कुकर्मों का फल भोग रहे हैं, जिन्हें भोग योनि कहा जाता है। इस योनि में मनुष्येत्तर सभी प्राणी आ जाते हैं। अब रही दूसरी योनि जिसे मनुष्य योनि कहते हैं। यह मनुष्य योनि कर्म योनि कहलाती है। किन्तु मनुष्य योनि केवल कर्म योनि ही नहीं है, प्रत्युत कर्मक एवं भोग दोनों का मिश्रण है। क्योंकि मनुष्य का शरीर तभी मिलता है, जब पाप एवं पुण्य सम होता है। मनुष्य का वर्तमान कर्म भी यही बतलाता है। क्योंकि वह पाप एवं पुण्य दोनों ही साथ-साथ करता चला आ रहा है।

इसी तथ्य को दृष्टि में रखकर गीता में योगीराज श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि-

ईश्वरःसर्वभूतानां हृद्दंशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया॥

तनेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्, परां शान्तिं स्थानं प्रप्स्यसिशाश्वतम्॥

अर्थात् हे अर्जुन! सब प्राणियों के हृदय-प्रदेश में दैवी गुणों से सम्पन्न ईश्वर निवास करता है और कुशलता से यंत्र पर लगाये हुए चित्रों के समान सब भूतों को नचाता है। इसलिए हे अर्जुन! पूर्ण भक्ति के साथ उस ईश्वर के ही शरण जा, क्योंकि उसी की कृपा से तू श्रेष्ठ शान्ति एवं शाश्वत स्थान प्राप्त करेगा।

मनुष्यत्व से उठ कर देवत्व की ओर जाने के लिए धर्म शास्त्रों में कुछ ऐसे विधि विधान मिलते हैं जिस पर यदि मनुष्य मनोयोग पूर्वक चले तो निःसन्देह वह मनुष्य से देवता बन जायगा। और वह मनुष्य से देव बनने का प्रयत्न नहीं किया तो वह देव न बनकर मानव से दानव बन जायेगा क्योंकि मनुष्य कर्म करने में स्वतंत्र है। इसलिए वह जैसा बनना चाहता है वैसा ही बन भी जाता है। इसलिए मनुष्य को सर्वदा सत् कर्म करना ही चाहिए, जिससे वह मनुष्यत्व से ऊपर उठ कर देवत्व को प्राप्त करे और देवत्व से ऊपर उठकर, परम पद को प्राप्त कर आनन्द स्वरूप हो आवागमन के चक्कर से छूट कर सादि सच्चिदानन्द बन जाय।

देवत्व को प्राप्त करने की पहिले विधि का निर्देश मनु भगवान् निम्न श्लोक में कहते हैं-

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रिय निग्रहः। धीर्विद्या सत्यम क्रधो दशकं धर्म लक्षणम्।।

अर्थात्- धृति = धैर्य, क्षमा, दम = मन का नियन्त्रण, अस्तेय = चोरी न करना, शौच = आन्तरिक वाह्य शारीरिक शुद्धि, इन्द्रियों का नियन्त्रण करना, घी = बुद्धि, (विद्या की प्राप्ति का यत्न,) सत्य बोलना और अक्रोध = क्रोध का न करना, यह धर्म का दस लक्षण है।

इसके पश्चात् योग के आठ अंगों का पालन करना आवश्यक होता है। जिसमें यम-नियम इन दो नियमों का प्रमुख स्थान है। जो निम्न प्रकार हैं—

“अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्या परिग्रहा यमाः”

अर्थात्— अहिंसा = किसी भी जीव को मन, वचन एवं कर्म से न सताना और न जान से मारना, सत्य का पूर्ण रूपेण पालन करना, अस्तेय = चोरी न करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, अपरिग्रह = अपने वर्तमान जीवन में जो भी सुख-दुःख मिले उसका सहर्ष सेवन करना और कभी लालच न करना। यह यम कहलाता है।

अब नियम को देखिये-

“शौच सन्तोष तपः स्वाध्यायेश्वर प्रणिधानानि-नियमाः।” अर्थात् शौच = आन्तरिक एवं बाह्य- शारीरिक शुद्धि, सन्तोष = अपने जीवन को सन्तोष पूर्वक अग्रसर करना। किसी भी प्रकार का लालच न करना। सत् उद्योग द्वारा जो मिल जाय उसी में आनन्दित रहना, तप = दुःख के द्वंद्वों का सहन करना अर्थात् भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी आदि का सहन करना और बिना विचलित हुए अपने व्रत पर दृढ़ प्रतिज्ञ रहना, स्वाध्याय= सत् शास्त्रों का निरन्तर अभ्यास एवं मनन करना, विशेष कर मोक्ष दायक स्थलों का, ईश्वर प्रणिधानानि = अपने आपको उस परम प्रभु के समक्ष मन, वचन एवं कर्म से अर्पण कर देना और प्रत्येक दशा को उसी का प्रसाद समझ आनन्द पूर्वक सहन करना। यह नियम है।

इन यम-नियमों का कुशलता पूर्वक पालन करने से शारीरिक शुद्धि होती है और समस्त इंद्रियां बस में हो जाती हैं। मन बुद्धि के अनुकूल होकर चलने लगता है। पुनः भगवद् भक्ति में रस आने लगता है।

उपरोक्त समस्त कथनों की सिद्धि तभी होगी, जब मनुष्य योग शस्त्र के निम्न सूत्र के अनुसार अपने चित्त को सुधार लेगा- “योगश्चित्त वृत्ति निरोधः।”

चित्त अर्थात् मन की धाराओं का निरोध या एकत्रीकरण एवं अन्तर्लीन कर देना योग कहलाता है। क्योंकि मन बड़ा ही चंचल एवं प्रबल माना गया है। मन को बस में करना बड़ा कठिन काम है। यदि मन बस में हो जाय, तो फिर सारा झगड़ा ही निपट जाय। इसीलिये याग शास्त्र में मन को बस में करने के लिये सबसे पहिले उपदेश दिया गया है।

चित्त वृत्ति निरोध का अर्थ केवल इतना ही नहीं है कि बहुत समय तक एक ही वस्तु का ध्यान करते रहने की मानसिक क्रिया में सफलता मिल जाय, वरन् यह भी है कि चित्त में जो पूर्व जन्मों के कुसंस्कार भरे पड़े हैं और जो बारबार कुमार्ग की ओर मनुष्य को प्रेरित करते हैं उन्हें रोक कर मन को सन्मार्ग की दिशा में प्रवृत्त रखा जाय। वस्तुतः कुमार्ग से, कुविचारों से, कुकर्म से मन को रोककर उसे सन्मार्ग में, सद् विचारों में, सत्कर्मों में लगाये रहना ही सच्चा “चित्त वृत्ति निरोध” है। जिसे यह सफलता मिल गई वही सच्चा प्रेमी है। एक वस्तु पर बहुत समय ध्यान तो मछली का प्रेमी बगुला भी लगा लेता है पर इतने मात्र से वह योगी नहीं कहा जा सकता।

धर्म पूर्वक जीवन यापन करने से मनुष्य के जीवन में एकार से क्रान्ति आ जाती है और वह एक-एक करके अपने समस्त बुराइयों को हमेशा के लिये तिलाँजलि देकर मानव एवं भगवद् सेवी बन जाता है। आज धर्म शब्द की व्याख्या गलत तरीके से की जा रही है। इसीलिये विश्व में नास्तिकता का प्रचार बढ़ता जा रहा है और विश्व में अशान्ति का साम्राज्य प्रबल वेग से घुमड़ता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है। हमें धर्म के वास्तविक एवं तथ्य पूर्ण अर्थ की ही व्याख्या करनी चाहिए और संसार को बताना चाहिए कि साम्प्रदायिक मान्यता से ही धर्म नहीं है वरन् सच्चा धर्म मानवीय कर्तव्यों के पालन में है। अमुक रीति रिवाजों को, प्रथम परंपराओं को पालन करना मात्र धर्म नहीं वरन् धर्म वह विचारधारा एवं कार्य प्रणाली है। जिसे अपनाकर मनुष्य सत्य, प्रेम, न्याय के आदर्शों पर अग्रसर होता है। संसार ऐसे ही धर्म की तरफ आकर्षित होगा, अन्यथा झगड़ालू धर्म के प्रति लोगों की अनास्था बढ़ती ही जायगी।


तृष्णा नहीं भक्ति कीजिए

(श्री रामकृष्ण शुक्ल)

मनुष्य जीवन बड़ा कष्टमय है। तिस पर वासना कामना आदि जीवन को और भी कष्टमय बना देती है। हमारे हृदय सागर में एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी तरंगें उठती और मिटती रहती हैं। ज्यों ही एक इच्छा पूर्ण होती है तुरन्त दूसरी उत्पन्न हो जाती है। वासनाओं के बोझ से हम इतने दबे हुए हैं कि अभिलषित वासना की पूर्ति का सुख हम अनुभव ही नहीं कर पाते। क्योंकि आंखों के सामने एक दूसरी अभिलाषा नर्तन करने लग जाती है जो हमें प्राप्त पदार्थ के उपभोग से सन्तुष्ट नहीं होने देती। प्रथम इच्छित पदार्थ की प्राप्ति के लिये जो हमने चोटी से लेकर एड़ी तक का जोर लगाकर परिश्रम किया वह भी आगे होने वाली इच्छा पूर्ति के अभाव में व्यर्थ जंचता है। दुःख का आदि कारण केवल हमारी वासना ही है। वासना और तृष्णा प्रायः एकार्थवाची से हैं। इस तृष्णा के कारण मनुष्य का चित्त एक स्थान पर स्थिर नहीं रह सकता। ज्यों-ज्यों एक इच्छा पूरी होती जाती है त्यों-त्यों दूसरी वस्तु की अभिलाषा नाचती हुई सामने आ खड़ी होती है। मनुष्य का शरीर दुर्बल हो जाता है खाल में झिल्लियां पड़ जाती हैं। आंखें भी चली जाती हैं मगर तृष्णा शुक्ल पक्ष के चाँद की तरह बढ़ती ही रहती है। इसी पर कविकुल गुरु गोस्वामी तुलसीदास जी कह गये हैं कि :—

“तृष्णा केहि न कीन्ह बौराहा”

तो इन सबके परिहार का भी कोई उपाय है? हाँ है अवश्य लेकिन नया नहीं है। हमारे ऋषि-महर्षियों ने संसार के दुःखों से छुटकारा पाने के लिये केवल एक ही उपाय दर्शाया है और वह है वासना का परित्याग।

कैसा अमोघ उपाय है। जड़ ही नष्ट हो गई तो अंकुर ही कहाँ से, स्रोत ही सुखा दिया जाय तो प्रवाह कैसे। हमारे मन में वासनायें ही न रहेंगी तो दुख क्लेश वगैरह कहाँ से पैदा होंगे। वासना निवृत्ति के साथ ही उनकी प्राप्ति के लिये हमें जो सिरतोड़ प्रयास करने पड़ते थे उन सब का ही अन्त हो जायगा। उसके बाद किसी भी वस्तु-प्राप्ति की इच्छा न रह जायगी।

असार संसार की वस्तुओं का सर्ग-स्थिति-संहार का ताँता तो लगा ही रहता है परन्तु अंतर्जगत की वासनायें मिटीं सो मिटीं, फिर उनकी उत्पत्ति नहीं होती और सर्वदैव स्वप्न मात्र रह जाती हैं अर्थात् जन्म भर के लिये चली जाती हैं।

पर वासनाओं से मन को पृथक करना कोई खेल नहीं है। “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” की तरह कोई भी व्यक्ति अपनी लेखनी द्वारा कागज पर लिख सकता है, आचरण नहीं कर सकता। आचरण करने वाले तो विरले ही होते हैं।

हमारे पूर्वजों ने वासनाओं की निवृत्ति का जो साधन बतलाया है वह केवल मन पर काबू पाना है। मन को वश में करने पर सब कुछ स्वतः उपलब्ध हो जाता है। प्राचीनकाल में जितना अधिक वासनाओं से दूर रहने का उपदेश दिया गया है, उतना ही वर्तमान में वासनाओं में लिप्त रहने का उपदेश दिया जाता है इसी से तो हम देखते हैं कि डडडडडड आज दिन संसार में दुख क्लेश आदि का नग्न नृत्य आंखों के सामने है। जब तक वासना का आयत्यडडडड इस संसार में रहेगा तब तक सुख और चैन की आशा करना आकाश-कुसुम, मरीचिका की प्यास-बुझाना और बन्ध्या से पुत्रोत्पत्ति कीडडडडडआशा के समान है।

यदि वासना से मन को हटाना है तो सबसे सुन्दर उपाय यह होगा कि मन को वासना से हटाकर ऐसे स्थान पर लगाओ जो वासना से बढ़कर रुचिर एवं आकर्षक हो और साथ ही मन का विषय हो। जब हम छोटे बालक के हाथ से कोई चीज छुड़ाना चाहते हैं तो उसके सामने हमें हेय वस्तु को रखना पड़ता है जो उसे उससे भी अधिक प्रिय मालूम होती है। प्रियतम वस्तु के लोभ से बालक प्रिय वस्तु को स्वतः छोड़ देता है। इसी प्रकार मन भी वासना को छोड़ता हुआ कष्ट अनुभव न करेगा। यदि वासना से भी अभीष्टतर पदार्थ उसके सामने लाया जाय। जैसे कि मन का काम है “मनन” करना। अपने को यदि परमात्मा के रूप के ध्यान में, उसके गुणगान में उसकी सामर्थ्य एवं व्यापकता में तथा तद्विषयक प्रेम में लगा दें तो मन को वासना की तरफ दौड़ने का अवसर ही प्राप्त न हो सकेगा। वह इस प्रकार से ईश्वर के प्रेम में फंस जायगा कि उसका सारा समय उसके विचारों के मनन में ही व्यतीत होने लगेगा। बस यही तो सुख और शान्ति है।

ईश्वर से प्रेम करना या ईश्वर में अपने को लगाना ही भक्ति है। ऊपर कहा जा चुका है कि संसार में सर्वत्र अशान्ति का साम्राज्य है। दुःखों का परिवार है। इसलिये मनुष्य निसर्गतः सुख और शान्ति की खोज में लगा रहता है। इसीलिये ऋषि महर्षियों ने ईश्वर-भक्ति का सदा हमें उपदेश दिया है।


पौराणिक कथाओं के रूपकालंकार

(श्री. चन्द्रानन्द जी वानप्रस्ती, अजमेर)

“गणपति” शब्द ईश्वर का एक विशेषण है। गणपति की मूर्ति ओऽम् प्रणव का ही अपभ्रंश है। ओऽम् शब्द ध्यान से देखने पर हाथी का गडंस्थल सूर्य कर्ण सुन्डादण्ड एवं चन्द्रकान्ता से सुशोभित गणपति का मुख ही प्रतीत होता है। शिव और पार्वती पुरुष और प्रकृति के दूसरे रूप हैं। प्रकृति के दो भेद हैं परा और अपरा इसी वास्ते “शंकर” के भी दो पत्नियाँ हैं सती और पार्वती। सती ‘परा’ विद्या की द्योतक है और पार्वती ‘अपरा’ विद्या की द्योतक है। भोला-पार्वती के दो पुत्र हैं स्कन्द और गणेश। स्कन्द को “कार्तिकेय” सेनापति भी कहते हैं। अपरा प्रकृति पार्वती अर्थात् राज हिमालय पुत्री कही गई है। क्योंकि प्रकृति जड़ है और पुरुष चेतन है। जड़ प्रकृति का विकास गजराज और चेतन वंश का अन्तिम परिणाम बुद्धि जीवी मानव है अतः गणपति में मनुष्य और हाथी दोनों का ही सामंजस्य व्यक्ति है। वह गजवदन है, परन्तु उसका शरीर मानव जैसा है। चेतन जीव और जड़ प्रकृति के सम्मेलन से तीसरा पदार्थ मन उत्पन्न हुआ। इस वास्ते गणपति को मन का अवतार बताया गया है क्योंकि उपनिषद् में कहा है जो मन से मनन होता है वही वाणी से बोला जाता है और जो वाणी से बोला जाता है, वह कार्य रूप में किया जाता है। मनोयोग जितना प्रबल होगा उतनी ही कार्य की सिद्धि सरल हो जायगी। साधना के लिये हमें शिरो भाग के विभिन्न अंग चाहिये। गज का मस्तक उसका अर्थ स्थल होता है। इसी कारण सर पर नन्हें से अंकुश से हाथी वश में आ जाता है। इससे हमें यह संकेत लेना चाहिये कि सिद्धि की कामना रखने वाले व्यक्ति को अपना मस्तक व्यर्थ के वितण्डा वादों और संघर्षों से बचाये रखना चाहिये। हाथी की आंखें छोटी होती हैं, इससे हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि हमें हर एक चीज सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिये। गज के नेत्रों में यह विलक्षणता है कि वह अपने सामने दिखने वाली प्रत्येक वस्तु के उसके मूल अकाडडडडडड दिखती है, इससे हमें भी यह शिक्षा लेनी चाहिए कि यदि हमें सिद्धि प्राप्त करनी है तो हमें दूसंख्यात्तिडडडडडडडडडड नीच और हीन समझ कर उसका तिरस्कार अथवा अपमान नहीं करना चाहिये हाथी के बड़े बड़े कान होते हैं। और मुख के आगे लटकता हुआ सूंड़ होता है इससे हमें यह शिक्षा लेनी चाहिये कि हमें सब कुछ बुरी-भली सुनने की क्षमता होनी चाहिये और अपनी वाणी पर नियन्त्रण रखना चाहिये। हाथी की जीभ दांतों से कण्ठ की ओर लपलपाती रहती है, इससे यह शिक्षा लेनी चाहिये कि यदि सिद्धि चाहते हो, तो साधक को दूसरों का आलोचक न बनकर अपना ही समीक्षक बनना चाहिये इसमें ऋषियों ने अद्भुत कल्पना शक्ति और सूझ बूझ का परिचय देकर मूर्ति बनाई है। वे विदेशी मूर्ख हैं जो इस अलंकार का अर्थ न समझ कर हिन्दुओं के देवताओं की हँसी उड़ाते हैं। पश्चिम वाले कहते हैं कि हिन्दू कैसे मूर्ख थे? कि इतने बड़े हाथी को सवारी के लिये चूहा दिया। परन्तु इसमें भी बड़ा रहस्य भरा हुआ है। तर्क और चूहे का एक ही गुण माना गया। चूहा हर बात की काट छाँट करता रहता है वह अच्छी सी वस्तु को भी अपने दाँतों से कुतर कर फेंक देता है। तर्क करने वाले आदमी भी चूहे के समान हर एक की निन्दा, स्तुति करते रहते हैं। और कहीं लोग भी कुतर्क करके सिद्ध वस्तु को खराब रूप में रख देते हैं। सुबुद्धि ही ऐसे कुर्तकियों को दबा सकती है। इस वास्ते सुबुद्धि हाथी को कुर्तक रूपी चूहे को दबाने के लिए सवारी में दिया है। सुबुद्धि जितनी बढ़ती है, उतना कुर्तक घटता है। इसी वास्ते गणपति का वाहन छोटा चूहा रखा है। गणपति को बुद्धि का देवता माना है। क्योंकि हाथी का शरीर स्थूल होता है, और इसकी बुद्धि बड़ी सूक्ष्म होती है। वह सर्कस में समझदार होने के कारण ही इतने हल्के पैर रखकर मनुष्य के शरीर के ऊपर होकर या लकड़ी के छोटे से टुकड़े पर होकर बिना उसके तोड़े या हानि पहुँचाये निकल जाता है। उसको एक दन्त इसी लिये कहते हैं कि परमात्मा का किसी से द्वेष नहीं और लम्बोदर इसलिए कहा है सारा ब्रह्माण्ड भगवान के उदर में माना जाता है। उसे विनायक इसलिये कहते हैं कि वह नेतृत्व कर सकता है। सब सुनना, कम बोलना यह एक नेता के गुण है। इसी वास्ते उसके बड़े कान और लम्बी सूंड़ है और मोटा पेट है, क्योंकि रहस्य की सुनकर उसकी पेट में रक्खे रहना एक राजनैतिक के लिए अत्यन्त आवश्यक है। राजनैतिक नेता को गुप्त मंतृणा करके शत्रु को हराना पड़ता है।

प्रजापति दुहित् की कथा :–

पुराणों में यह कथा इस प्रकार लिखी है कि प्रजा पति के दो पुत्रियाँ थी। ‘सूर्य’ ने उनसे समागम किया समागम से ‘दिवस’ नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ। वास्तव में इस कथा में वेद मन्त्र को रुपकालंकार से समझाया है। प्रजापति सूर्य को कहते हैं। सूर्य से प्रकाश होता है और प्रातःकाल उषा की लाली भी सूर्य की किरणों के कारण होती हैं। इस वास्ते उषा और प्रकाश को सूर्य से उत्पन्न होने के कारण उसकी पुत्रियाँ कहा है। क्योंकि सूर्य की किरणें प्रातःकाल उषा के सम्मुख प्रथम जाकर पड़ती है तो वह वीर्य स्थापन के समान है। अतः सूर्य की किरण के गिरने के कारण उषा विलीन हो जाती है और दिन निकल आता है, इस वास्ते दिन को सूर्य पुत्र कहते हैं। इसी सामान्य तथ्य अलौकिक रूप से यों कह दिया गया कि सूर्य पिता ने अपनी लड़कियों के साथ व्यभिचार करके दिवस रूपी पुत्र उत्पन्न किया। पिता के समान पर्जन्य अर्थात् जल रूप जो मेघ है, उसकी पृथ्वी रूपी कन्या है क्योंकि पृथ्वी की उत्पत्ति जल से है। अतः जब वह उस कन्या में वृष्टि द्वारा जल रूप वीर्य को स्थापित करता है, तब उसमें गर्भ रह कर अनेक औषधियाँ और वनस्पतियाँ रूपी संतान उत्पन्न होते हैं। वास्तव में मूल ऋग्वेद के मन्त्र का अर्थ यह है कि द्वये जो सूर्य का प्रकाश है। जो सब सुखों का हितू होने से पिता के समान है और पृथ्वी बड़ा स्थान होने से माता के तुल्य है। उस पर सूर्य चांदनी के समान तना हुआ है। और पृथ्वी बिछौने के समान है, इसमें योनी अर्थात् गर्भ का स्थान का स्थान पृथ्वी और गर्भ स्थापन करने वाला पति के समान मेघ है। वह अपने बिन्दु रूप वीर्य के स्थापन से उसको गर्भ धारण कराके औषध इत्यादि अनेक सन्तान उत्पन्न करता है, जिससे सब जगत का पालन होता है। जो यह रूपकालंकार की कथा अच्छी प्रकार वेद ब्राह्मण और विरुषत आदि सत्य ग्रन्थों में प्रसिद्ध है।

इन्द्र अहल्या की कथा

एक कथा “इन्द्र अहल्या” की है, और पुराणों में इस कथा का इस प्रकार वर्णन किया है कि देवों के राजा इन्द्र ने ‘गोतम’ ऋषि की स्त्री अहल्या के साथ जार कर्म किया। गोतम ने उनको देख लिया तब उसने इन्द्र को यह श्राप दिया कि हे इन्द्र? तू हजार भग वाला हो जा तथा अहल्या को यह श्राप दिया कि तू पाषाण रूप हो जा। इस पर इन्द्र और अहल्या ने गोतम ऋषि से प्रार्थना की कि हमारे श्राप से बचाव कैसे और कब होगा?

तब ‘गोतम’ ऋषि ने इन्द्र से कहा कि तुम्हारे हजार भग के स्थान में हजार नेत्र हो जायेंगे। और अहल्या को वचन दिया कि जिस समय श्री रामचन्द्रजी अवतार लेकर तेरे पर अपना चरण लगावेंगे उस समय तू अपने स्वरूप में आ जावेगी। योगिक संस्कृत में इन्द्र के अर्थ ‘सूर्य’ के होते हैं। और अहल्या के अर्थ रात्रि के होते हैं। गोतम के अर्थ ‘चन्द्रमा’ के होते हैं। वेद काव्य है, इस वास्ते रूपकालंकारों से यह भरपूर है। इस वास्ते रात्रि और चन्द्रमा को स्त्री और पुरुष के समान मानकर बतलाया है कि चन्द्रमा अपनी स्त्री रात्रि से सब प्राणियों को चाँदनी रात में आनन्दित करता है। सूर्य प्रातः काल उदय होते ही रात्रि अन्तर्ध्यान हो जाती है। अर्थात् ‘सूर्य’ रात्रि के साथ जार कर्म रूपकालंकार से करता है और उसके रूप शृंगार का बिगाड़ने वाला है।

चन्द्रमा का नाम गोतम इसलिये है कि वह अत्यन्त वेग से चलता है और रात्रि को अहल्या इसलिये कहते हैं कि उसमें दिन लय हो जाता है तथा सूर्य रात्रि को निवृत्त कर देता है इसलिये उसका जार कहलाता है।

इन्द्र और वृत्रासुर की कथा

पौराणिकों में एक कथा यह है कि त्वाष्टा के पुत्र वृत्रासुर ने देवों के राजा इन्द्र को निगल लिया तब सब देवता लोग भय युक्त होकर विष्णु के समीप में गये और विष्णु ने उसके मारने का उपाय बतलाया कि में समुद्र के फेन में प्रविष्ट होऊंगा तुम लोग उस फेन को उठा कर वृत्रासुर के मारना वह मर जायगा।

(इन्द्रस्य नु.) यहाँ सूर्य का इन्द्र नाम है उसके पराक्रमों को हम लोग कहते हैं। जो कि परमेश्वर होने का हेतु अर्थात् बड़ा तेज धारी है वह अपनी किरणों से वृत्र अर्थात् मेघ को मारता है जब वह मर के पृथ्वी में गिरता है तब अपने जल रूप शरीर को सब पृथ्वी में फैला देता है। फिर उससे अनेक बड़ी-2 नदी परिपूर्ण होके समुद्र में जा मिलती हैं। कैसी वे नदी हैं कि पर्वत अर्थात् मेघों से उत्पन्न होके जल्दी बहने के लिये होती है, जिस समय इन्द्र मेघ रूप वृत्रासुर को मार के आकाश से पृथ्वी में गिराता है तब वह पृथ्वी में सो जाता है। फिर वही मेघ आकाश में से नीचे गिर के पर्वत अर्थात् मेघ मंडल का पुनः आश्रय लेता है। जिसको सूर्य अपनी किरणों से फिर हनन करता है जैसे कोई लकड़ी को छील के सूक्ष्म कर देता है वैसे ही वह मेघ को भी बिन्दु-2 करके पृथ्वी में गिरा देता है और उसके शरीर रूप जल सिमट सिमट कर नदियों के द्वारा समुद्र को ऐसे प्राप्त होते हैं कि जैसे अपने बछड़ों को गाय दौड़ के मिलती है।

नघण्टु में मेघ का नाम वृत्र है और वृत्र का शत्रु निवारक सूर्य है, सूर्य की किरणों के द्वारा जल कण-कण होकर ऊपर को जाकर वहाँ मिल कर मेघ रूप हो जाते हैं, वृत्र के इस जल रूप शरीर से बड़ी-2 नदियाँ उत्पन्न होकर अगाध समुद्र में जाकर मिलती हैं ओर जितना जल तालाबों, कुओं या बाँधों आदि में रह जाता है, वह मानों पृथ्वी में शयन कर रहा है। इस वास्ते वृत्र अपनी बिजली और गति रूप भय से भी इन्द्र को कभी नहीं जीत सकता। इस प्रकार अलंकार रूप वणन से इन्द्र और वृत्र का परस्पर युद्ध बतलाया गया है। अर्थात् जब बादल बढ़ते हैं- तब सूर्य के प्रकाश को हरा देते हैं और जब सूर्य की किरणें तेजी से बढ़ती है, तब वो बादल को छिन्न भिन्न कर देती है। सूर्य के हनन से मेघ बरसता है। मेघ का जल पर्वतों में पड़ के नदियों के रूप में पृथ्वी को सींचता हुआ समुद्र में जाता है। फिर समुद्र से भाप बन-बन कर जल उड़-उड़ कर आकाश में जाता है फिर वहाँ और बादल की लड़ाई होती है और वो जल बादल से पृथ्वी पर गिरता है और पृथ्वी पर गिर कर नाना प्रकार की औषधियाँ, वनस्पतियाँ, अन्न, कन्द, मूल, फल इत्यादि उत्पन्न करता है। इसी मेघ को वृत्रासुर कहते हैं, वायु और सूर्य को इन्द्र कहते हैं। इसी वृत्रासुर और इन्द्र का आकाश में सदा देवासुर संग्राम चलता है। अन्त में मेघ की पराजय और सूर्य की विजय होती है।

देवासुर संग्राम की कथा

पौराणिकों में देवासुर संग्राम की कथा इस प्रकार है कि एक दैत्यों की सेना थी जिनके शुक्राचार्य पुरोहित थे। एक देवों की सेना थी जिनके राजा इन्द्र थे। और उनके सेनापति अग्नि और पुरोहित बृहस्पति थे। असुर लोगों ने तप करके ब्रह्मा, विष्णु, महादेव से वर माँग लिए, अतः असुरों को मारने के लिये भगवान ने अवतार लिया और देवासुर संग्राम हुआ।

इसका वास्तविक अर्थ यह है कि जो लोग विद्वान् सत्यवादी सत्य कर्म करने वाले हैं वे तो देवता कहलाते हैं, और जो लोग मूर्ख, झूँठ बोलते हैं छली कपटी हैं, वे असुर कहलाते हैं। इनका इस संसार में सदा से विरोध चलता आया है और इसी का नाम देवासुर संग्राम है। हमारे पिण्ड शरीर में भी हमारा मन और ज्ञानेंद्रियां देव कहलाती है और प्राण असुर है और उनका राजा प्राण है और अपान उनकी सेना है। असुर इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ और दस प्राण प्रकाश रहित हैं। पुण्यात्मा देव कहलाते हैं, पापात्मा असुर कहलाते हैं दिन को देव कहते हैं रात्रि को असुर कहते हैं। शुक्ल पक्ष को देव कहते हैं और कृष्ण पक्ष को असुर कहते हैं। उत्तरायण की देव संज्ञा है और दक्षिणायण की असुर संज्ञा है। इन सबों का परस्पर युद्ध हर समय चलता रहता है और यह देवासुर संग्राम रूप का अलंकार है। शरीर में प्राण आदि असुर कहलाते हैं, वे परमात्मा के बड़े पुत्र माने जाते हैं। क्योंकि वे प्रथम उत्पन्न हुए और बाल्यावस्था में सब मनुष्य अविद्वान् होते हैं और सूर्य ज्ञानेन्द्रियाँ छोटे भाई इसलिए माने जाते हैं क्योंकि वो पीछे प्रकाशित होते हैं, जो लोग परोपकारी या दुखभंजन तथा धर्मात्मा हैं, वे देव हैं। अतः देवासुर संग्राम की कथा को इस रूपकालंकार में मान कर लोगों को उनका कर्त्तव्य कर्म समझना चाहिए और इसी प्रकार कश्यप और गया आदि की कथा इस प्रकार है कि मरीचि के पुत्र एक कश्यप ऋषि हुए थे उनको दक्ष प्रजाति ने विवाह विधान से तेरह कन्या दीं कि जिनसे सब संसार की उत्पत्ति हुई अर्थात् ‘दिति’ से ‘दैत्य’। ‘आदित’ से ‘आदित्य’ दनु से दानव ‘करद्र’ से ‘सर्प’ और ‘विनता’ से ‘पक्षी’ तथा ‘और’ से ‘बानर’ ऋच्छ, घास, आदि पदार्थ भी उत्पन्न हुये। इसी प्रकार चन्द्रमा को सत्ताईस कन्या दी। देखिये ये ही कथा सत्य शास्त्रों में किस प्रकार की उत्तम लिखी है। प्रजा को उत्पन्न करने से कर्म तथा अपने ज्ञान से देखने के कारण इस परमेश्वर को कश्यप भी कहते हैं। (कश्यप) यह यह शब्द (पश्यकः) इस शब्द के आध्यान्तर पर्यय से बनता है।

गया के अर्थ बिहार के प्रान्त के फलगु नदी पर बने हुये पाषाण को विष्णुवाद कह दिया है और कहा जाता है कि यहाँ श्राद्ध करने से पितरों की मुक्ति हो जाती है। गया के अर्थ यौगिक संस्कृत में कोई बिहार के फलगू नदी पर बने हुए विष्णुवाद का नाम नहीं है। गया कहते हैं गायत्री मंत्र को। श्रद्धा सहित परमेश्वर की भक्ति करने से जीव सब दुखों से छूट जाता है, इस वास्ते इसका नाम गया है। योगिक संस्कृत में प्राण का नाम भी गया है। प्राणायाम की रीति से प्राणों को रोक के परमेश्वर की भक्ति के प्रताप से पितर अर्थात् ज्ञानी लोग सब दुखों से रहित हो जाते हैं। इस वास्ते इसे गया कहा है गायत्री और प्राणों के अतिरिक्त ‘निघण्टु’ में गया का अर्थ घर, संतान और प्रजा भी बताया है। इनकी सेवा करने से अत्यन्त श्रद्धा उत्पन्न होती है इस वास्ते इसका नाम गया श्राद्ध है। धर्म से प्रजा का पालन, दुष्टों को दण्ड देना यह सब श्रेष्ठ कर्म गया श्राद्ध योगिक संस्कृत में कहलाते हैं, निरुक्तकार ने विष्णु शब्द की व्याख्या इस प्रकार की है कि यह शब्द विपलृ धातु से बना है। इसका अर्थ व्यापक होते हैं, परमात्मा जगत् में व्यापक है, इसलिये वह विष्णु है। ‘गया’ के अर्थ प्राण के होते हैं।

इसी प्रकार गंगादि के अर्थ तीर्थों के इसीलिए पड़े हैं कि उसके जल से पृथ्वी सिंचित होता है और खेतियाँ लहलहाती हैं तीर्थ के मायने दुःखों से उतरने हैं। गंगा आदि शब्द जो वेदों में आये हैं, उनके योगिक अर्थ वर्तमान गंगा नदी है, परन्तु मन्त्र में गंगा आदि नाम ‘इडा’ ‘पिंगला’ ‘सुषुम्ना’ ‘कर्म’ और जठराग्नि की नदियों के हैं उनमें योगाभ्यास से परमेश्वर की उपासना करने से मनुष्य सब दुखों से तर जाते हैं। ‘शित्’ ‘ईडा’ और ‘अशित’ ‘पिंगला’ ये दोनों यहाँ मिलती हैं उनको सुषुम्ना कहते हैं उसमें योगाभ्यास से स्नान करके जीव शुद्ध हो जाता है और फिर शुद्ध रूप परमेश्वर को प्राप्त होके सदा आनन्दमय रहता है इस वास्ते योगाभ्यास को सच्चा तीर्थ मानकर परमात्मा की उपासना करनी चाहिये।


निमाड़ प्रान्त में गायत्री प्रचार

(श्री पं. व्यंकटेश दयाराम शर्मा, खलघाट)

खरगौन (निमाड़) के गायत्री महायज्ञ में भाग लेने के लिये अ. भा. गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्रीराम शर्मा आचार्य 26 अक्टूबर को सायंकाल के समय पधारे। यज्ञ का कार्य इससे एक दिन पूर्व 25 को आरंभ हो चुका था। निमाड़ भरके सभी स्थानों के कई सौ साधकों का समूह उसमें भाग लेने को एकत्रित हुए थे। यज्ञ मंडप बड़ा विशाल और सुसज्जित बनाया गया था जिसके पास ही निवास स्थान और भोजनालय की उत्तम व्यवस्था की गई थी। गुरुदेव के आगमन की लम्बी प्रतीक्षा के बाद रात के नौ बजे आये और उसी समय उन्हें यज्ञ मंडप में लिवा ले गये। उन्होंने यज्ञ की व्यवस्था देखकर प्रसन्नता प्रकट की और संक्षेप में भाषण देकर विश्राम के लिये चले गये।

गुरुदेव के आगमन से प्रत्येक कार्यकर्ता, उपासक और नगर निवासी में एक जागृति की लहर दौड़ गई और उन्होंने बढ़ी मुस्तैदी से कार्य करके निश्चित कार्यक्रम 11 लाख जप और सवा लाख आहुति को निर्धारित समय से पूर्व ही पूर्ण कर दिया। ता. 27 को यज्ञ-कार्य गुरुदेव के नेतृत्त्व में हुआ और सैकड़ों गायत्री उपासकों को गुरुदीक्षा दी गई। मध्याह्न में आगन्तुक उपासकों का आपस में परिचय-मिलन हुआ जिसका दृश्य अत्यन्त आनन्ददायी था।

ता. 28 को पूर्णाहुति का दिन था और आस पास के स्थानों से हजारों दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी। यज्ञशाला, कैम्प व बाहर का मैदान जनता-जनार्दन से परिपूर्ण था, जिधर देखो उधर वेदमाता के उपासक ही दृष्टि गोचर होते थे। 12 बजे पूर्णाहुति यज्ञशाला के समस्त- 9 यज्ञकुण्ड नारियलों से भर गये। आरती, प्रसाद और प्रवचन हुये। इस अवसर पर गाँधी जी के प्रतिष्ठित शिष्य श्री. वी. स. खोड़े भी पधारे। आपने इस आयोजन को देखकर बड़ी प्रसन्नता प्रकट की और गुरुदेव के प्रति अपार श्रद्धा तथा प्रेम प्रकट किया। दो बजे बाद औभृत स्नान कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। समस्त साधक एक कतार में कीर्तन करते जा रहे थे। वेदमाता और गुरुदेव का जुलूस दर्शनीय था। मोटर फूलों के हारों से लदी थी। जनता एवं नगर निवासी जयघोष एवं पुष्प वर्षा से हार्दिक स्वागत कर रहे थे। एक मील लम्बे जनाकीर्ण मार्ग को पार करके मोटर पवित्र कुन्दा नदी के तट पर पहुँची, जहाँ पंडितों ने सबको विधिवत् स्नान कराया। वहाँ से वापस आकर 4 बजे सामूहिक प्रीतिभोज हुआ, जो निमाड़ प्राँत के गरीबों की भोज्य सामग्री थी, गुरुदेव ने उसे बड़े स्वाद से ग्रहण किया।

ता. 29 को प्रातःकाल ही गुरुदेव ने खरगोन के गायत्री परिवार में घर-घर जाकर परिचय प्राप्त किया। प्रत्येक स्थान पर उनका अपार श्रद्धा तथा प्रेम के साथ स्वागत किया गया। 10 बजे बाद गुरुदेव सदल बल निमाड़ के दौरे पर मोटर द्वारा रवाना हुए। चलते समय जनता ने जयघोष के साथ विदाई दी। सर्व प्रथम 11 मील चलने पर ऊन गाँव आये जो एक ऐतिहासिक स्थान तथा जैनियों का प्रसिद्ध तीर्थ है यहाँ श्री पुष्पवहनजी वोरा ने शानदार स्वागत किया। गुरुदेव ने गायत्री परिवार को बढ़ाने का उपदेश दिया और यहीं पर अल्पाहार किया गया। इस समय श्री सरदार सिंह जी सूबेदार भी हमारे साथ थे जिनके कारण यात्रा में किसी प्रकार की असुविधा उपस्थित न हुई। ऊन से चलकर रसगाँव पहुँचे। यहाँ की प्रमुख आबादी किसानों की है। यहाँ के मुख्य कार्यकर्ता श्री गणपति लालजी शुक्ल हैं, जिनके प्रयत्न से इस छोटे से ग्राम में अच्छी जागृति है और सभी नर−नारी गायत्री के उपासक बन गये हैं। यहाँ पहुँचते ही जनता ने जयघोष से स्वागत किया। ग्राम में अनोखी सजावट की गई थी और सभा का पंडाल जनता से खचाखच भरा था। पास ही छोटा-सा एवं बहुत सुन्दर गायत्री मंदिर बना है, गुरुदेव ने उसके दर्शन किये और भेंट चढ़ाई जनता को गायत्री उपासना की ओर अग्रसर होने का उपदेश दिया। सभी नागरिकों ने गुरुदेव का श्रद्धा पूर्वक नमस्कार किया और गदगद हृदय से विदाई दी।

रसगाँव से चलकर सेगाँव आये। वहाँ मोटर के पहुँचते ही जनता दर्शनार्थ उमड़ पड़ी और जयघोष, पुष्पवर्षा एवं हारों से स्वागत किया। यहाँ के श्री पंढरीनाथ जी चतुर्वेदी ने परिचय कराया और गायत्री परिवार की ओर से 25 रु. भेंट किये। फिर जुलूस लालवाई फूलवाई के मंदिर में गया जहाँ गुरुदेव का सारगर्भित उपदेश गायत्री की महिमा के सम्बन्ध में हुआ। कई व्यक्तियों को गुरुदीक्षा दी गई और अल्पाहार हुआ।

सेगाँव से राजपुर पहुँचे, जहाँ जनता पहले से प्रतीक्षा कर रही थी। बैण्ड बाजे द्वारा स्वागत किया गया और नगर के प्रमुख मार्गों में होकर गायत्री मंदिर तक जुलूस निकाला गया। यहाँ के प्रमुख कार्यकर्ता श्री राधेश्याम गुप्ता रामनाथ शर्मा, जिया लाल निगम, सोलंकी आदि के प्रयत्न से यहाँ गायत्री परिवार उत्तरोत्तर उन्नति कर रहा है। गुरुदेव ने उनको 108 उपासक बनाने का उपदेश दिया। गायत्री परिवार की ओर से 11 रु. भेंट किये गये और रेशमी दुपट्टा उढ़ाया गया। राजपुर से बड़वानी जाने का कार्यक्रम था। रास्ते में तर नाम का छोटा सा ग्राम पड़ा। वहाँ की जनता ने मोटर को रोक कर कुछ देर ठहरने के लिए विवश किया। गुरु देव की आरती उतारी गई, प्रसाद वितरण किया गया और कुछ देर उपदेश होने पर विदाई हुई।

उन्हें बड़वानी 4 बजे सायंकाल पहुँचना था, पर मार्ग में जनता के प्रेमपूर्ण आग्रह को न टाल सकने के कारण वहाँ 6॥ बजे पहुँच सके जब गायत्री परिवार प्रतीक्षा करते-करते निराश हो गया था और जनता वापस जाने लग गई थी। पर गोविन्द भाई बड़देव, दामोदर शास्त्री, और दीनानाथ जी के प्रयत्न से पुनः लोग एकत्रित हुये और 8 बजे रणजीत चौक में सभा हुई। जनता की ओर से गुरुदेव को हार पहिनाये गये और गायत्री परिवार की ओर से 101 रु. की थैली गोविन्द भाई के द्वारा भेंट की गई। फिर गुरुदेव का तथा प्रेमानन्द स्वामी का प्रवचन हुआ और 11 बजे सभा समाप्त हुई। प्रातः 5 बजे से ही जनता दर्शनार्थ आने लगी। नित्य कर्म से निश्चित होकर गुरुदेव बड़वानी के गायत्री उपासकों के प्रत्येक घर में गये और सर्वत्र उनका बड़े प्रेम और उत्साह से स्वागत किया गया।

उस दिन का कार्यक्रम बड़वानी से विदा होकर इन्दौर पहुँच जाने का था, पर मार्ग में सेन्धवा ग्राम के गायत्री प्रेमियों ने ठहरने पर इतना अधिक आग्रह किया कि आगे का कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा और एक आदमी भेजकर इन्दौर समय पर न आ सकने की सूचना देनी पड़ी। सेन्धवा में भाई भाटी जी और दुबेजी का प्रयत्न सराहनीय है जिसके फल से पुरुष नहीं महिलायें भी गायत्री उपासक बन गई हैं। यहाँ विद्यालय से भी निमंत्रण आया और वहाँ की सभा में गुरुदेव ने अपने विद्यार्थी जीवन के अनुभव बताकर विद्याभ्यास करते रहने की प्रेरणा की। फिर गायत्री परिवार का परिचय प्राप्त करके खरगोन के लिये विदा हुए।

सब लोग 6॥ बजे सायंकाल खरगोन पहुँचे। रात को सभा का कार्यक्रम था पर गुरु देव अत्यधिक थक गये थे अतः वे वहाँ न आ सके श्री स्वामी प्रमानन्दजी तथा श्री उपाध्याय जी ने सभा में प्रवचन किया। प्रातः काल खरगोन के शेष गायत्री उपासकों के घर गए। श्री नटवरलाल जी राणा ने 5 रु. तथा एक रेशमी दुपट्टा भेंट किया। दस बजे कसराबाद के लिए रवाना हुए। यहाँ पर श्री आनन्दराव जी मंडलोई एवं सन्तोषचन्द्र जी व्यास ने पहले से ही स्वागत की पूर्ण तैयारी कर रखी थी मोटर के नगर में पहुँचते ही सम्पूर्ण जनता दर्शनों को उमड़ पड़ी और तमाम स्कूलों, कचहरी, कोर्ट आदि का काम ठप्प हो गया। पचासों द्वार बनाये गये थे जहाँ पुष्पहारों द्वारा स्वागत किया जाता था। जुलूस मुख्य बाजारों से होता हुआ श्री गौड़ धर्मशाला में पहुँचा जहाँ एक बहुत विशाल सभा में गुरुदेव तथा स्वामी प्रेमानन्द जी के प्रवचन हुए। बाद में आरती हुई, प्रसाद बँटा तथा गुरु दीक्षा हुई। गुरुदेव ने गायत्री प्रेमियों के घर जाकर परिचय प्राप्त किया फिर गदगद वचनों द्वारा विदाई हुई। कसराबाद की जनता का प्रेम हम सब, गुरुदेव तथा साथियों के ऊपर एक अमिट छाप लगा गया।

कसराबाद से चलकर 3 मील पर पुण्य सलिला नर्मदा जी का दर्शन हुआ। स्नान और प्रार्थना के पश्चात् नाव द्वारा उस पार गये और पवित्र नगरी महेश्वर में पहुँचे। यहाँ भी जनता पहले से प्रतीक्षा कर रही थी। बैण्ड बाजे द्वारा स्वागत किया गया और श्री हरिजी दुबे तथा तिवारी जी ने पूजा करके हार पहिनाये। स्वामी नारायण के मन्दिर में सार्वजनिक सभा की गई जिसमें गायत्री परिवार को बढ़ाने और उपासना करने का उपदेश दिया गया। महेश्वर से गाड़ी द्वारा 9 बजे धामनोद को रवाना हुए, जो बम्बई-आगरा सड़क पर मोटरों का एक बड़ा जंक्शन है। यहाँ पर भाई रामेश्वर जी सोहनी ने सब व्यवस्था ठीक कर रखी थी जिससे कोई कठिनाई नहीं हुई। यात्रा की थकावट के कारण आज रात को यहीं विश्राम करने का निश्चय किया गया। प्रातः काल इन्दौर के लिये चले। रास्ते में मानपुर में भाई हरिश्चन्द्र मित्तल ने गाड़ी रुकवाकर शानदार स्वागत किया। 12 बजे दिन को इन्दौर पहुँचे। यहाँ पर हमने पहले तार द्वारा सूचना दे दी थी जिससे नगर के समस्त उपासक स्वागत करने को स्टेशन पर मौजूद थे। सत्यनारायण जी तिवारी वियावानी के निवास स्थान पर जाकर ठहरे और वहीं स्नान, भोजन आदि किया। फिर इन्दौर के गायत्री प्रेमियों के यहाँ जाकर परिचय किया। 3 बजे की गाड़ी से उज्जैन के लिये रवाना हो गये। इन्दौर परिवार विदाई देना नहीं चाहता था। उनका कहना था कि आपने इन्दौर की 5 लाख जनता के लिये एक मिनट का समय भी नहीं दिया। गुरुदेव ने विवशता प्रकट करके क्षमा माँगी और पुनः इन्दौर आने का वचन दिया। इस प्रकार गुरुदेव का निमाड़ का दौरा समाप्त हुआ।


आज की वह सर्वोपरि आवश्यकता जिसे पूरा करने के लिए आपको कटिबद्ध होना है।

विश्व के ऊपर असुरता की काली घटाऐं जो इन दिनों छाई हुई हैं, यदि वे बरस पड़े तो परमाणु बम, उद्विजन बम, आदि सर्वनाशी अस्त्र शस्त्रों से सम्पन्न होने वाला महायुद्ध छिड़ सकता है, जिसमें असंख्य प्राणी मृत्यु के ग्रास बनेंगे और जो शेष रहेंगे वे अर्द्धमृत स्थिति को पहुँच जायेंगे। इस खतरे के अतिरिक्त मानवीय स्वभावों में व्यापक असुरता के प्रभाव पड़ने से ऐसे दुखदायी परिवर्तन हो रहे हैं, जिनके कारण सर्वत्र ईर्ष्या, द्वेष, कलह चिन्ता, भय, आवेश, उद्वेग, छल, कपट, असंयम एवं स्वार्थपरता की अभिवृद्धि हो रही है और उसके फल स्वरूप नाना प्रकार के कुकर्मों, एवं दुर्घटनाओं की बाढ़ आने लगी है। परस्पर असद्व्यवहार से उत्पन्न परिणामों के कारण सभी दुखी हैं। इतना ही नहीं, महामारी, अस्वस्थता एवं नाना प्रकार रोगों की तूफानी अभिवृद्धि, प्रकृति का सन्तुलन बिगड़ जाने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, तूफान आदि उपद्रवों के कारण प्रजा के धन-जन की भारी हानि हो रही है। यदि आकाश में मंडराती हुई असुरता की घटाऐं बरस पड़ें तो जो कठिनाई आज सामने उपस्थित है उनमें भी आगे चल के असंख्य गुनी बढ़ोतरी हो सकता है और मानव जाति की सभ्यता खतरे में पड़ने तक की बात ही नहीं है, वरन् मनुष्य एवं मनुष्येत्तर प्राणियों का जीवन खतरे में पड़ सकता है। धन, धान्य, वनस्पति, पशु आदि की जो हानि होगी, उसकी तो कल्पना मात्र भी कष्टसाध्य है। यह प्रलयंकारी घटाएं यदि अपने विकराल रूप में प्रस्फुटित हों, तो वह सब दृश्य उपस्थित कर सकती हैं उसे खंड प्रलय कहना अत्युक्ति न होगी।

स्थिति निश्चित रूप से भयंकर है। पिछले सन् 1857 में एक साधारण सा विद्रोह हुआ था, उसमें धन-जन की भारी हानि हुई थी और अव्यवस्था फली थी। पिछली बार जैसे राजविद्रोह आदि की तो भारत में आशंका नहीं है, पर अन्य प्रकार से समस्त विश्व के लिए जो इस बार 1957 में भयंकर अवसर उपस्थित है, उसे पिछली शताब्दी की अपेक्षा असंख्य गुना भयंकर और चिन्ताजनक माना जायगा।

सन्तोष की बात केवल इतनी ही है कि अभी परिस्थिति काबू से बाहर नहीं हुई और यदि धर्म प्रेमी लोग सामूहिक धार्मिक उपचारों में संलग्न हो जायं तो स्थिति पर काबू प्राप्त कर सकते हैं। आज इस ओर कदम बढ़ाने की बड़ी आवश्यकता है। ऐसे विषम समय में गायत्री परिवार चुप नहीं बैठ सकता, उसे अपने कर्तव्य का ज्ञान है और तदनुसार वह उस प्रक्रिया के आयोजन में संलग्न हो गया है, जिससे समस्त मानव जाति की सुरक्षा तथा विश्व शान्ति को व्यवस्थित रखा जा सकता है।

सन् 57 में एक वर्ष के लिए अखिल भारतीय गायत्री परिवार की ओर से एक अभूत पूर्व धार्मिक महा अनुष्ठान आरम्भ किया गया है। इस महा गायत्री अभियान के अंतर्गत निम्न धर्म कृत्य इसी पौष कृष्णा 30 सोमवती अमावस्या से आरम्भ होकर एक वर्ष तक चलते रहेंगे।

1—एक वर्ष तक प्रतिदिन 24 लक्ष गायत्री मंत्रों के जप का एक महापुरश्चरण।

2—एक वर्ष तक प्रतिदिन 24 हजार के अनुपात से मंत्र लेखन का आयोजन।

3—एक वर्ष तक प्रतिदिन 24 हजार गायत्री चालीसा के पाठ।

4—एक वर्ष तक प्रतिदिन 24 हजार गायत्री मंत्र के हिसाब से आहुतियाँ।

5—इस योजना में संकल्प लेकर 24 हजार गायत्री उपासना करने वाले साधकों की संलग्नता।

6—भौतिकवादी विचारधारा को शमन करके उसके स्थान पर आध्यात्मिक, धार्मिक, नैतिक और साँस्कृतिक विचार धाराओं को प्रतिष्ठित करने के लिए, सवा लक्ष व्यक्तियों को शिक्षित करने के लिए एक ऐसे साँस्कृतिक विश्व विद्यालय का संचालन, जिसमें सवा लक्ष व्यक्ति एक व्यवस्थित धार्मिक पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा प्राप्त करें।

7—देश भर में एक हजार गायत्री परिवारों की स्थापना। जिनके अंतर्गत कम से कम दस हजार नियमित एवं नैतिक गायत्री उपासक हों। इस संगठित शक्ति को एक विचारात्मक सहस्र चण्डी माना जायगा।

8—गायत्री तपोभूमि में इस एक वर्ष में (अ) एक लाख चण्डी सूक्त पाठों की ‘लक्ष चण्डी’ (ब) 24 लक्ष नवार्ण मन्त्र (स) एक हजार दुर्गा सप्तशती पाठ की साधनात्मक सहस्र चण्डी। इन तीनों संकल्पों के संमिश्रित एक लक्ष चण्डी महा अनुष्ठान की व्यवस्था।

इस अष्ट सूत्री कार्यक्रम की विशालता बहुत भारी है। गत वर्ष गायत्री तपोभूमि द्वारा संकल्पित विशद् गायत्री महायज्ञ की अपेक्षा यह कार्यक्रम प्रायः 240 गुना बड़ा है। इसी हिसाब से इसकी शक्ति एवं परिणाम भी भारी है। इतने बड़े आयुध के बिना अन्तरिक्ष में छाई हुई घटाओं का हटाया जाना भी संभव नहीं था। इसलिए ब्राह्म शक्ति से परिपूर्ण इस महान अध्यात्मिक आयोजन का एक प्रचंड ब्रह्मास्त्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है। गत वर्ष गायत्री परिवार की शक्ति तोल ली गई है। और देख लिया गया है कि अपने परिवार द्वारा कितना बड़ा वजन उठाया जा सकता है। इस संकल्प को पूर्ण करने के लिए जो श्रम करना है, जो बोझ उठाना है एक भुजा नहीं उठा सकतीं उस उठाने के लिए सहस्र भुजायें चाहिए। हमें विश्वास है कि गायत्री परिवार के एक हजार कर्मठ कार्यकर्ता जब कटिबद्ध होंगे, तो वे धर्म की सहस्र भुजाऐं बन कर एक शक्तिशाली सहस्रबाहु के रूप में परिलक्षित होंगे। इतिहास में एक सहस्रबाहु की असुरता में प्रसिद्धि है, पर यह धर्म रक्षा का नित्य सहस्र बाहु, अनिष्ट की घटाओं को रोकने के लिए एक दिव्य प्रचंड शक्ति पुञ्ज इन्द्र-वज्र जैसा दिव्य अस्त्र सिद्ध होगा।

इस अष्ट सूत्री ब्रह्मास्त्र-अनुष्ठान को पूर्ण करने के लिये अखण्ड ज्योति तथा गायत्री परिवार के कर्मठ कार्यकर्ता गण इस एक वर्ष में कम से कम दो घंटा प्रतिदिन इस अनुष्ठान को सफल बनाने के लिये लगावें। इसकी पूर्ति के लिये सबसे अधिक आवश्यकता समय देने की है। यह महा अनुष्ठान सफल होता है, तो इसका श्रेय परिवार के सदस्यों के अपना मूल्यवान समय देने की उदारता को ही होगा यदि यह असफल हुआ, अपूर्ण रहा तो इसका एकमात्र कारण यह होगा कि अपने स्वजन इस पुनीत कार्य में समय देने में संकोच कर गये। धनी मानी और प्रभावशाली लोग श्री सम्पन्न व्यक्तियों से धन एकत्रित करके बड़े-बड़े विशालकाय धार्मिक या अन्य प्रकार के आयोजन कर लेते हैं। गायत्री तपोभूमि की वह कार्यप्रणाली इससे भिन्न है। वह निष्ठावान श्रद्धालु व्यक्तियों के समय को माँगती है और जब सहृदय व्यक्ति, इस सदुद्देश्य के लिये याचना को उदारता पूर्वक पूरी करते हैं तो प्रायः वे सभी संकल्प जो आरम्भ में अति दुस्तर प्रतीत होते हैं अन्त में बड़े सरल बन जाते हैं। इस बार भी वही होना है। हम अपने आत्मीय जनों से समय की, श्रम की, श्रद्धा की, भावना की भिक्षा माँगने इस घड़ी पुनः उपस्थित हुए हैं। हमें आशा है कि वह मिलेगी। स्वजनों ने अब तक कभी हमें विमुख नहीं रखा है, अब भी विमुख रहने की कोई आशंका नहीं है।

जो श्रद्धालु, धर्मप्रेमी नित्यप्रति अपनी गायत्री उपासना करते हैं, उसमें एक माला गायत्री जप की और बढ़ा दें। जो अनियमित रूप से कभी करते हैं, कभी नहीं करते हैं वे इस वर्ष नियमितता की प्रतिज्ञा कर लें। जो अब तक बिलकुल नहीं करते हैं वे भी एक माला गायत्री मन्त्र की कम से कम एक वर्ष के लिये करना अवश्य स्वीकार कर लें। एक माला प्रायः छह से दस मिनट में हो जाती है। इतना समय एक धर्मकार्य के लिये अनिच्छा पूर्वक, असुविधा होते हुए भी दे दिया जाय तो यह कोई बहुत भारी बात नहीं है। छह मिनट नित्य खर्च करने से वर्ष में कुल मिलाकर 36 घण्टे का समय इस कार्य से लगता है। एक वर्ष उपासना करने के बाद ऐसा लगे कि यह हमारा समय व्यर्थ चला गया, तो हम इन पंक्तियों को साक्षी रखकर प्रतिज्ञा करते हैं, कि इस 36 घंटे की सामान्य कीमत हम पैसे के रूप में भी चुकाने को तैयार हैं। कारण एक ही है हमारा विश्वास है कि विश्व शान्ति में एक महत्वपूर्ण योग देने के अतिरिक्त व्यक्तिगत रूप से भी यह गायत्री उपासना आत्मिक और भौतिक दोनों ही रूप से उपासक के लिये परम श्रेयष्कर होती है।

जप के अतिरिक्त गायत्री मंत्र लेखन एवं गायत्री चालीसा का पाठ भी हो सके तो करना चाहिये। जिन्हें माला जपने में सुविधा नहीं, वे एक पाठ गायत्री चालीसा का या 24 मंत्र लेखन करके भी गायत्री परिवार के सदस्य बन सकते हैं। जप, चालीसा, पाठ, मन्त्रलेखन इन तीनों के से एक साधना में भी जो थोड़ा समय लगा सकते हैं वे अ. भा. गायत्री परिवार के छपे हुए संकल्प पत्र भर कर सदस्य बन सकते हैं। सबसे पहला काम जो हम लोगों को करने का है वह यह है, कि अपने घर-परिवार में, स्वजन संबंधियों में, परिचितों में धार्मिक प्रकृति के नर-नारियों का नाम नोट कर और उनके पास जा जाकर सारी स्थिति समझाने और सदस्य बनने के लिये प्रयत्न करें। यह प्रयत्न रोज ही चलता रहे और एक सदस्य बनाने की भी रोज सफलता प्राप्त की जाती रहे तो एक महीने में तीस नहीं तो दस-बीस सदस्य, कोई भी उत्साही कार्यकर्ता बना सकता है। इस प्रकार हम सब जुट पड़ें, तो सवा लाख गायत्री उपासक-गायत्री परिवार के सदस्य बनाने का कार्य कुछ ही महीनों में पूरा हो सकता है। पर यह प्रयत्न इस वर्ष जारी ही रहना चाहिए। इस वर्ष की संकल्पित साधना में वृद्धि करने के लिये हम गायत्री परिवार के वर्तमान कार्यकर्ताओं पर जोर नहीं देते क्योंकि इस वर्ष अन्तरिक्ष में जो विक्षोभ व्याप्त है, उसके कारण किसी का भी मन पूरी तरह एकाग्र नहीं हो सकता। किसी को भी साक्षात्कार एवं सिद्धि जैसी सफलता इस वर्ष मिलना दुर्लभ है। अदृश्य प्रकृति में कई बार ऐसे हेतु एवं तत्व प्रबल होते हैं जो साधना को किसी ऊँची सफलता तक नहीं पहुँचने देते। इस वर्ष ऐसी ही स्थिति है। इस वर्ष तो अदृश्य कोलाहल का प्रत्युत्तर अधिक तम जन शक्ति को इस कार्य में जुटा कर ही देना है। डाकुओं के बड़े समूह से दो चार बलवान व्यक्ति बहुत देर लड़कर भी इतनी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, जितनी सौ-दो-सौ व्यक्ति यदि दस-पाँच मिनट कोलाहल मात्र मचा दें, तो डाकुओं को भगाने में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, आज वैसा ही करने की आवश्यकता पड़ गई है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में जप की अधिक संख्या की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी अनेकों की प्राणशक्ति युक्त थोड़ी-थोड़ी साधना की है। रावण को मारने के लिये एक घड़ा रक्त की जरूरत थी, वह एक दो ऋषियों के शरीर से भी निकाला जा सकता था पर उससे वह परिणाम न होता जो हजारों ऋषियों की एक एक बूंद इकट्ठा करके रक्त का घड़ा भरने और उसे भूमि में गाड़ने पर असुर निकन्दनी सीताजी के अवतरण होने का हुआ। आज भी ठीक वही स्थिति है। आज अधिक साधना नहीं अधिक साधक चाहिये। इस वर्ष हम सब अपनी व्यक्तिगत साधना में भले ही कमी कर लें, पर अधिक साधक बनाने की पुनीत प्रक्रिया में पूर्ण तत्परता से जुटें और इस कार्य में लगाये हुये समय को जप से भी अधिक ऊँची साधना मानें। इस साधना का नये उपासक उत्पन्न करने के लिये घर-घर घूमने का फेरी का फल किसी भी बड़े अनुष्ठान से, तीर्थयात्रा से, परिक्रमा से कम नहीं मानना चाहिये।

गायत्री उपासक बढ़ाने- गायत्री परिवार के सदस्य बनाने पर ही अष्ट सूत्री ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की अधिकाँश सफलता निर्भर है। 1—प्रतिदिन 24 लक्ष अनुष्ठान, 2—प्रतिदिन 24 हजार गायत्री चालीसा के पाठ, 3—प्रतिदिन 24 हजार गायत्री मंत्र लेखन, 4—सवालक्ष गायत्री उपासक बनाना, 5—एक हजार गायत्री परिवारों की स्थापना, 6—सवालक्ष व्यक्तियों को धर्म शिक्षा देना। यह छह कार्य अर्थात् दो तिहाई संकल्प तो अनायास ही पूर्ण हो जाता है। केवल दो सूत्र-तपोभूमि में लक्ष चण्डी महानुष्ठान तथा 24 हजार हवन की प्रतिदिन की बात ही शेष रह जाती है। अप्रत्यक्ष रूप से वह भी इन्हीं छह सूत्रों में जुड़ी हुई है। सदस्य बढ़ने पर उसका पूरा होना भी अति सरल है।

जहाँ कम से कम दस सदस्य बन जावें, वहाँ गायत्री परिवार की एक शाखा स्थापित कर देनी चाहिये और ऐसा प्रयत्न करना चाहिए कि प्रत्येक रविवार को प्रातः सायं या अन्य जो सुविधा का समय हो सब सदस्य एक स्थान पर इकट्ठे होकर, सामूहिक जप, गायत्री चालीसा, कीर्तन, थोड़ा हवन एवं परस्पर विचार-विनिमय करने के लिये सत्संग कर लिया करें। नित्य साधना के अतिरिक्त सदस्यों पर जिस बात के लिये अधिक जोर देना है वह है—साप्ताहिक सत्संग में उपस्थित होना। इससे सामूहिकता की शक्ति, परस्पर प्रेम भावना, संगठन एवं अधिक कार्य करने की प्रेरणा में आशा जनक सफलता मिलती हैं। यदि यह एकत्रित होने वाले लोग थोड़ा थोड़ा भी सहयोग करें, तो साप्ताहिक हवन का खर्च बड़ी आसानी से चलता रह सकता है। यह साप्ताहिक सत्संग बारी बारी सभी सदस्यों के घर किये जायें तो पास पड़ौस के लोगों के वहाँ इकट्ठे होते रहने से घर-घर में गायत्री माता का, यज्ञ पिता का, भारतीय संस्कृति का संदेश पहुँचाने का कार्य अति सरल हो सकता है।

साँस्कृतिक विश्व विद्यालय की योजना के अंतर्गत-धर्म शिक्षा की जो व्यापक योजना है, उसका संचालक भी परिवार के इन शाखा संगठनों के द्वारा ही होगा। इस ब्रह्मास्र अनुष्ठान में सवालक्ष व्यक्तियों के योग की आवश्यकता है, इसी आधार पर ही अन्य सारी योजना अवलम्बित है यदि यह प्रथम कार्य पूरा नहीं होता, तो अन्य सब सूत्र भी अपूर्ण ही रह जाते हैं। इसलिये प्रारम्भ में—अभी से—आज से ही हमें यह प्रयत्न पूरे उत्साह के साथ आरंभ कर देना चाहिये कि अपने क्षेत्र के धार्मिक प्रकृति के नर-नारियों की खोज करें और उनसे मिलने के लिए अकेले ही निकल पड़ें, यदि अपनी जैसी प्रकृति के कई व्यक्ति मिला कर एक डेपूटेशन के रूप में साथ साथ चल कर यह फेरी करें, तब सोने में सुगन्ध ही समझनी चाहिये। जिस प्रकार यह महानुष्ठान सामूहिक है, उसी प्रकार इसको जन्म देने के लिये भी दो-चार व्यक्तियों की एक मंडली खड़ी हो जावे, तो कार्य को पूरा ही समझना चाहिए।

“गुरुओं के लिए शिष्य भिक्षा माँग कर लावें” यह पुनीत परम्परा यज्ञोपवीत धारण करते समय प्रत्येक धर्म प्रेमी को सिखाई जाती है। आज लोग उसमें संकोच करते हैं। इस योजना से उसी परम्परा को पालन करने की आवश्यकता है। अखण्ड ज्योति तथा गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य से आज यह याचना की जा रही है कि अपना समय, श्रम एवं उत्साह गायत्री उपासक बढ़ाने के लिए दान दें और घर-घर भिक्षुक की तरह घूम घूमकर प्रत्येक-धर्म प्रेमी से छह-छह मिनट गायत्री उपासना के लिए समय देने की याचना करें। यज्ञोपवीत संस्कार भिक्षा माँगने की परम्परा पूरी किये बिना पूरा नहीं होता, यह “ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान” भी जन सहयोगी की भिक्षा के बिना पूरा न होगा। अपने सम्पूर्ण स्वजन के अन्तः करण में जितना ब्रह्मतेज है, उसे उद्बोधन करके इस संकल्प की सफलता में जुट पड़ने के लिए हम आह्वान करते हैं। परिजनों में से एक भी व्यक्ति हम ऐसा नहीं देखना चाहते, जो इस भयंकर समय की अत्यन्त प्रबल आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कुछ समय देने में आनाकानी करें। जिस कार्य को मनुष्य ‘आवश्यक’ समझता है उसके लिये उसे ‘फुरसत नहीं’ का बहाना नहीं करना पड़ता। हम लोग इस विकट समय में किसी के पास जाने में संकोच, झिझक, हेठी, अपमान समझने की मानसिक कमजोरी को त्यागें, थोड़ा समय देने के लिए सच्चे मन से तत्पर हों, फुरसत का बहाना न करें, तभी इतने बड़े संकल्प का पहाड़ उठेगा। आइए—इस कार्य में लगें, इसे पूरा करें—और विश्व कल्याण के परम पुनीत, परम आवश्यक सत्कार्य करने का श्रेय प्राप्त करें।


गायत्री परिवार समाचार

नये गायत्री परिवारों की स्थापना

नवम्बर अंक में मुद्रित हुए गायत्री परिवारों के संगठन के बाद देश में साँस्कृतिक जागरण की लहर फैल गयी है और क्रमशः परिवार संगठन के साथ ही आध्यात्मिक-धार्मिक भावनाओं की वृद्धि एवं प्रसार हो रहा है। इस मास में स्थापित नये परिवार शाखाओं के संक्षिप्त परिचय दिये जा रहे हैं:–

पिलखना [इटावा], विजौली [फतेहपुर), अतरौली [अलीगढ़], डिबाई [बुलन्दशहर], सेरसा [झाँसी], मोंढ़क [कोटा], गोविन्दपुर [भागलपुर], कोटा, लसुडिया अमरा [उज्जैन), गोड़ाल [काला हाँडी], मूड़ा [कानपुर], तारा नगर [चूरू], तारापुर (काला हाँडी], अमाँपुर (एटा), खूँटी (राँची], अख्त्यारपुर [बुलन्दशहर], सनेता सफीपुर [बुलन्दशहर], गुना, नाहर [अलीगढ़], बड़ेसरा (अलीगढ़) पठानन पुरवा [खीरी], पढुआ (खीरी], राजमऊ [अलीगढ़], पीपलू टोंक] चौरसिया (फतेहगढ़], हथौड़ा (शाहजहाँपुर) मऊरावाँपुर (झाँसी), बड़गाँव (गोंड़ा), लखनऊ, गोरखपुर, मिश्रिखतीर्थ (सीतापुर), रमिया बेहड [खीरी], मिर्जापुर (कोटा], ऐशबाग (लखनऊ) बरेली, मंझनार (फर्रुखाबाद), खिनमिनी (फर्रुखाबाद), शमसाबाद (फर्रुखाबाद) जरिगवाँ (सीतापुर), सागोन भाड़ी (काला हाँडी), हरदोई (अलीगढ़), सिद्धेश्वर बड़ामठ (कोटा), पाडल्या (निमाड़), धारसीखेड़ा (धार), बमनी बाजार (बिलासपुर), जयपुर (राजस्थान) गरोठ (मन्दसौर), कोंच [जालौन], कीरतपुर [अलीगढ़] डंगर (मिर्जापुर], जहाँनगीराबाद (सीतापुर), हस्वा (फतेहपुर) गीघासाड (रायगढ़), सागर (म. भा.), खैरापलरी, (होशंगाबाद), बीना (सागर), करड़ाबद (झाबुआ), खामगाँव (बुलढाना) न्योरी जलालपुर (फतेहपुर), सेमली (बुलन्दशहर), श्रीरामपुर (अहमदनगर), काँकेर (बस्तर), काशीपुर (बदायूँ), सुन्दण (खेड़ा), खलघाट (म. प्र.) अस्करीपुर (बिजनौर), मलेहटा (हमीरपुर), रानी मुण्डा (काला हाँडी), घिवरा (बिलासपुर), घरौला (राजापुर) खिलचीपुर (राजगढ़)।

बिजौली (फतेहपुर) में सामूहिक यज्ञानुष्ठान व्रतोपवास पूर्वक सम्पन्न कर गायत्री ज्ञानाँक महात्माओं में वितरण किये गये।

—रामसनेही वर्मा, मन्त्री

अख्तियारपुर (बुलन्दशहर), में नौ दिन तक अखण्ड-ज्योति, अखण्ड जलधार, अखण्ड जप सहित गायत्री यज्ञ के साथ, विष्णु, लक्ष्मी, गणपति, सरस्वती एवं नवग्रह यज्ञ सोत्साह सम्पन्न हुए। पूर्णाहुति के उपरान्त ब्रह्म एवं कुमारिका भोज, एवं ग्राम के उपस्थित सभी शिशुओं को भोजन कराया गया। फिर गायत्री साहित्य वितरण कर हजारों के जन समूह में साँस्कृतिक उत्थान पर विद्वान् एवं उपासकों के संभाषण हुए।

—स्वामी योगानन्द

(लक्ष्मीपुरी) अलीगढ़ में पं. श्री नारायण हरिवाज्ञिष्ठ के निवास स्थान पर सामूहिक अनुष्ठान फलाहार तथा नमक रहित सात्विक भोजन के सहित पूरा कर हवन हुआ। श्री होतीलाल शर्मा जी के संरक्षण में प्रति रविवार भैरव जी के मन्दिर में सामूहिक हवन एवं संकीर्तन के कार्यक्रम नियमित रूप से चल रहे हैं।

—श्रीराम पाण्डेय

खरियार (काला हाँडी) में अखंड दीप प्रज्ज्वलन सहित सामूहिक रूप से हविष्यान्न भोजन करके नव दिन तक गायत्री जप, श्रीमद्भागवत् गीता पाठ, गायत्री चालीसा पाठ, सहस्र नाम पाठ सम्पन्न करके हवन किया गया। दरिद्र, नारायण एवं ब्राह्मणों को अन्न दान दिया गया।

—प्रतापचन्द्र प्रधान

धरणगाँव (पूर्व खानदेश) में प्रति रविवार को गायत्री परिवार की ओर से सत्संग होता है, जिसमें जैन आदि सभी धर्मावलम्बी सम्मिलित होकर साधना एवं धर्मोत्थान सम्बन्धी चर्चायें करते हैं।

—कृष्ण दास

सेमरी (खीरी) में वर्षा होते रहने की स्थिति में भी जनता के प्रेम और सहयोग से सामूहिक हवन यज्ञ मण्डप बना कर सम्पन्न हुआ।

—गया प्रसाद शुक्ल,

एलिचपुर कैम्प (बरार) में उत्साह पूर्वक 500 जन समूह की उपस्थिति में वृहद् यज्ञ विश्व शान्ति के लिए किया गया। 63000 आहुति प्रदान कर यज्ञ पूर्ण करके ब्रह्म भोज सम्पन्न हुआ।

—गोविन्द नारायण मिश्र

सटई (छतरपुर) सामूहिक गायत्री महायज्ञ रामचरित मानस पाठ एवं गीता पाठ सहित सानन्द सम्पन्न हुआ।

—छेदीलाल शर्मा

(बिजनौर) में नर-नारियों ने उत्साह पूर्वक सामूहिक यज्ञ में सम्मिलित होकर 50000 आहुतियाँ प्रदान की।

—विद्यावती देवी

सिद्धेश्वर बड़ामठ (कोटा) में गायत्री जप के साथ गायत्री चालीसा, रामचरित मानस एवं वाल्मीकि रामायण पाठ हुआ। अन्त में सारे गाँव की जनता की प्रेम भरी उपस्थिति में यज्ञ सम्पन्न करके ब्रह्मभोज किया गया।

—रामपुरी गोस्वामी

गंगीरी (अलीगढ़) में सारे गाँव की सद्भावना के बीच पाँच यज्ञ कुण्डों में यज्ञ को विधिवत संपन्न किया गया।

—रामजी वल्लभ पाराशर

कोंच (जालौन)। यहाँ सम्पूर्ण गायत्री परिवार की सुव्यवस्था के द्वारा प्रत्येक पूर्णिमा के अवसर पर भिन्न-भिन्न परिजनों के निवास स्थान पर सामूहिक यज्ञ होता है, इसमें निकटवर्ती जनता अति उत्साह और प्रेम से सहयोग करती है।

—बलराम द्विवेदी

कसराबद (निमाड़) में गायत्री परिवार के सदस्यों ने मिलकर सफलता पूर्वक यज्ञ सम्पन्न किया।

—गिरिजा शंकर

बरुर (निमाड़) में सामूहिक रूप से अनुष्ठान सम्पन्न कर यज्ञोपरान्त गायत्री साहित्य वितरण किये गये।

—माँगीलाल चु. पटेल

मणीनगर (अहमदाबाद) में अखण्ड रामायण पारायण सहित गायत्री अनुष्ठान करके सानन्दसोत्साह यज्ञ सम्पन्न हुआ।

—मिश्रीलाल जोशी

बम्हनी बाजार-(विलासपुर) में प्रत्येक ग्रामवासी ने अपने-अपने घर से साकल्य प्रदान कर यज्ञ को सुसम्पन्न होने में सहायता पहुँचायी। यज्ञ के सात्विक प्रभाव के कारण गायत्री परिवार ने पशु बलि रोकने में सफलता प्राप्त की और जनता ने यज्ञ का महत्व भली भाँति श्रवण किया।

जासलपुर (होशंगाबाद) में सारे ग्राम वासियों की सद्भावना और सहयोग से सामूहिक यज्ञ सम्पन्न हुआ।

—पुरुषोत्तम आत्माराम साखरे

ताजगंज (आगरा) 13 से 14 दिसम्बर तक खूब उत्साह और धूमधाम से गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया गया।

—गिरिधारी लाल

आरंग (रायपुर) शाखा के सभी परिजनों ने नित्य गायत्री जप और श्री सूक्त का नियमित पाठ करते हुए कार्तिक कृष्ण प्रतिपदा से प्रारम्भ करके कार्तिक पूर्णिमा को विधिवत् गायत्री यज्ञ के साथ महालक्ष्मी यज्ञ को भी सुसम्पन्न किया। जनता ने बड़े उत्साह से पूर्णाहुति में सहयोग दिया।

विद्या प्रसाद मिश्रा

रतलाई (कोटा) में प्रति रविवार को गायत्री परिजनों के द्वारा सामूहिक रूप से हवन प्रक्रिया सम्पन्न हो रही है।

—भँवरलाल शर्मा

बड़गाँव कालोनी (गोण्डा) में श्री कृष्णार्जुन रथ सहित लक्ष्मी जी की सुन्दरतम प्रतिमा निर्मित कर खूब समारोह से गीता प्रवचन एवं लक्ष्मी पूजन किया गया, तदुपरान्त 24000 गायत्री मन्त्रों से विधि पूर्वक हवन हुआ। उसी दिन चौबीस घंटे तक गीता पाठ भी होता रहा। यज्ञ की सम्पन्नता के बाद श्री पथिक जी, महात्मा श्यामदास जी, महात्मा मदन मोहन दास जी चैतन्य महाप्रभु गौरियाभट्ट तथा अयोध्या धाम के अनेक महात्माओं के संभाषण हुए। जनता के बीच 300 रु. के प्रसाद वितरण कर ब्रह्मभोज कराया गया।

सेनता सफीपुर (बुलन्द शहर) में प्रतिदिन सत्संग हो रहा है। धर्म विषयक विविध बातों पर स्वामी जी प्रवचन किया करते हैं। दीपावली के अवसर पर यहाँ एक सामूहिक यज्ञ सम्पन्न किया गया।

—दुर्जन सिंह

तलवाड़ा बुजुर्ग (म. प्र.) में सामूहिक रूप से अनुष्ठान-हवन की आयोजना हुई। नित्यप्रति गायत्री चालीसा पाठ एवं मन्त्र लेखन भी सामूहिक रूप से किया गया। संध्या में पूजा आरती के उपरान्त आचार्य की अनुपस्थिति के कारण उनकी लिखी पुस्तकों से आवश्यक स्थलों से पढ़कर सुनाया गया जिसे जनता तल्लीन होकर सुना करती थी। पूर्णाहुति सम्पन्न करके प्रसाद वितरण हुआ। इसके बाद होताओं सहित 1500 संख्या में ब्रह्मभोज कराने के बाद काफी संख्या में गायत्री साहित्य का प्रचार एवं वितरण किया गया।

—गायत्री परिवार तलवाड़ा बुजुर्ग

कानपुर में गायत्री परिवार की ओर से पाँच सामूहिक यज्ञ अत्यन्त उत्साह एवं विधि पूर्वक सम्पन्न कर प्रसादादि वितरण किया गया एवं विविध विद्वानों के यज्ञ-धर्म-उपासना-संस्कृति आदि विषयों पर संभाषण हुए। प्रथम यज्ञ कोपरगंज में श्री सुकृति लाल गुप्ताजी के निवास स्थान पर, दूसरा श्री नारायण दत्त जी बाजपेयी जी के संरक्षण में श्री तपेश्वरी देवी में, तीसरा पुराने कानपुर के गंगा किनारे रानी घाट पर, चौथा गान्धीनगर के श्री गिरिजादत्त वाजपेयी की वास भूमि में तथा पाँचवाँ श्री हजारी लाल जी वर्मा जी के स्थान परमट पर सानन्द-सोत्साह सफलता पूर्वक सम्पन्न हुआ।

—अयोध्या प्रसाद दीक्षित

जूनीधान मंडी-जोधपुर में कार्तिक शुक्ल एकादशी से पूर्णिमा तक चौबीस हजार-आहुति का एक विशाल यज्ञ खूब धूमधाम एवं विधि पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस यज्ञ की सफलता का प्रधान श्रेय श्री चरणदास जी महाराज का है, जो छह वर्ष से फलाहार करते हुए अखण्ड रूप से खड़े रहने की तपस्या कर रहे हैं।

—गोपालदास

चचोर (मंदसोर) में मालवा प्रान्तीय गायत्री महायज्ञ, कम से कम चौबीस कुँडों एवं तीन मंडपों में करने के लिये गायत्री परिवार वालों ने ता. 14-15-16 जनवरी पौष शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक करने का सत्संकल्प कर लिया है जनता से प्रेम सहयोग पाकर उसे बढ़ाकर 101 कुँड एवं अधिक मण्डपों में करने के लिये भी विचार किया जा रहा है वर्तमान विश्व में उपस्थित संकटों को देखते हुए सभी धर्म प्रेमी आत्माओं को इसमें सहयोग करना चाहिये।

—कन्हैयालाल शर्मा वैद्य

उदईपुर चपुन्ना (इटावा) में सारे इटावा मंडल के गायत्री परिवारों के सम्मिलित प्रयत्नों से जिले भर में पूर्व संकल्पित चौबीस यज्ञों की सम्मिलित पूर्णाहुति मार्गशीर्ष शुक्ला त्रयोदशी से पूर्णिमा- ता. 15 से 17 दिसम्बर तक होने जा रही है। इस मण्डलीय-महायज्ञ की सर्वांग सफलता के लिये विश्व का कल्याण चाहने वाली सद्आत्मायें पूरा सहयोग करें।

—विश्वेश्वर दयालु द्विवेदी

रामगंज (कोटा) में वर्तमान विश्व की विभीषिकाओं की शान्ति तथा प्रेम और बन्धुत्व के संचार के लिये राजस्थान प्रान्तीय महायज्ञ 101 हवन कुण्डों में 10, 11, 12 एवं 13 दिसम्बर को होने जा रहा है। उत्सर्ग करना जिनका स्वभाव ही है, ऐसी राजस्थान की वीर आत्मायें इसे सफल बनाने में अपनी सारी शक्ति लगा रही हैं। —माँगीलाल वर्मा

वे यज्ञ जहाँ आचार्य जी भी पहुँचे।

इस मास कई स्थानों पर बड़े महत्वपूर्ण गायत्री यज्ञ हुए। जप अनुष्ठान के साथ साथ शताँश आहुतियों का प्रायः आयोजन किया जाता है। ऐसे 24-24 लाख जप तथा 24-24 हजार आहुतियों के पञ्च कुण्डी हवन इस मास 1 सतना, 2 अटरू, 3 नियाना में बड़े समारोह पूर्वक हुए। गायत्री परिवार के सदस्य दूर दूर से इनमें सम्मिलित होने आये। मथुरा से आचार्य जी भी इन तीनों यज्ञों में पहुँचे।

सतना में श्री. राधारमन मिश्रा के क्वार्टर पर पञ्च कुण्डी यज्ञ हुआ। नगर के अनेक प्रतिष्ठित एवं गन्यमान्य व्यक्ति इसमें सम्मिलित हुए। कार्यकर्ता नर नारी तथा लड़कियों का परिश्रम तथा उत्साह देखते ही बनता था। सतना से लौटते हुए आचार्य जी कटनी, बीना तथा झाँसी के उपासकों से भी थोड़ी थोड़ी देर के लिये मिलते आये। आगामी वर्ष 24 लक्ष जप प्रतिदिन होने का जो संकल्प है उसकी पूर्ति के लिये नये गायत्री उपासक बढ़ाने के लिए आचार्य जी के सभी परिजनों सन्मुख प्रेरणा तथा प्रार्थना उपस्थित की। गायत्री उपासकों की संख्या बढ़ाने, गायत्री परिवारों का संगठन मजबूत करने में परिश्रम करने का सभी कार्यकर्ताओं ने सच्चे मन से आश्वासन किया।

अटरू की यज्ञशाला दर्शनीय थी। यह आदि से अन्त तक वन वृक्षों तथा लता गुल्मों से ही बनाई गई थी। यह हरा बंगला अपनी प्राकृतिक शोभा से दर्शकों का मन मुग्ध कर लेता था। श्री मोहन चन्द पारीख, श्री मदनलाल जी आदि अनेक अटरू निवासियों तथा आरोन आदि आस पास गाँवों के गायत्री उपासकों से इसे सफल बनाने में दिन रात एक कर दिया। यज्ञ बड़ा सफल रहा। 101 महिलाओं की मंगल जल कलशों की जल यात्रा का जुलूस देखने ही योग्य था।

नियाना के पटेल लोगों का उत्साह बड़ा सराहनीय रहा। उनके 22 मन खाँड गलाकर बड़े परिणाम में यज्ञ प्रसाद बनाया था, प्रसाद प्राप्त करने दूर दूर के हजारों व्यक्ति आये थे। पं. श्रीकृष्ण शर्मा की दौड़ धूप सराहनीय थी। अटरू और नियाना के यज्ञों की पूर्णाहुति पं. रामकिशन शर्मा ने शास्त्रोक्त रीति से कराई। खड़खड़ा वाले ताँत्रिक नरमेधी लाल बाबा भी इन यज्ञों में पहुँचे थे। आचार्य जी के प्रति इस यात्रा में धार्मिक जनता की असाधारण प्रेम भावना का समुद्र सा उमड़ता प्रतीत होता था।

भाव नगर में श्री जादव जी शिवजी ठक्कर के परिवार ने गत 4 मास में 24 लक्ष महापुश्चरण तथा 9 लक्ष आहुतियों का हवन किया। तीन वर्ष में 24 लक्ष हवन यह लोग अपने घर में ही पूरा करेंगे। छोटे छोटे बच्चों से लेकर महिलाओं तथा पुरुषों की गायत्री भक्ति असाधारण है। छोटे छोटे बालक भी तीन माला गायत्री जपे बिना जल नहीं पीते। इनके अनुष्ठान की पूर्णाहुति 23 दिसम्बर को हुई। भाव नगर की सैकड़ों प्रमुख प्रतिष्ठित व्यक्ति पूर्णाहुति में सम्मिलित हुए और प्रीतिभोज में प्रसाद ग्रहण करने आये। श्री बिशन जी राम जी ठक्कर ने भी इसी उपलक्ष में एक दिन कई सौ व्यक्तियों का प्रीतिभोज कराया, आचार्य जी भी इस पूर्णाहुति में सम्मिलित होने पहुँचे। तीन दिन तक भजन, कीर्तन, तथा प्रवचन, की सुन्दर व्यवस्था रही। रात को तीन-तीन बजे तक श्रोताओं की भारी भीड़ लगी रहती थी। जगह कम होने के कारण सैकड़ों व्यक्ति सड़क पर बैठ कर हरि चर्चा सुनते थे। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड..........................................................................45

(पृष्ठ 2 का शेषाँश)

के गर्त में फेंक देना एक प्रकार से इस परिवार का बहिष्कार करके उससे नाता तोड़ लेने के बराबर ही है। कारण कि जो लोग अखंड ज्योति नहीं मँगाते उनके पास तक हमें अपने विचार, सन्देश, कार्यक्रम, प्रेरणा, पथ-प्रदर्शन, प्रकाश पहुँचाने तथा सहयोग प्राप्त करने का कोई मार्ग नहीं बचता। इसलिए एक पाठक टूटने को घर का एक कुटुम्बी घटना, धर्म सेना का एक सैनिक छूटना एवं प्रेम शृंखला की एक कड़ी टूटना मानते हैं और ऐसी घटना का दुःख होना भी स्वाभाविक ही है।

युग-निर्माण की इस पुनीत बेला में साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए हम लोगों को बहुत कार्य करना है। उस कार्य की प्रारंभिक पृष्ठ भूमि अखंड ज्योति की सदस्य संख्या है। यदि यह आवाज बन्द या मंद हो जाय तो निर्धारित कार्य-योजना भी उसी अनुपात से बन्द या मन्द हो जायगी। अखंड ज्योति परिवार के सभी स्वजनों का एक बार इस नव वर्ष के उपलक्ष में हार्दिक अभिनन्दन करते हुए एक महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहयोग शृंखला को अधिक मजबूत करने का अनुरोध करते हैं। इस दिशा में स्वयं सदस्य बने रहना और नये सदस्य बढ़ाने का एक ऐसा कार्य है जिसकी उपेक्षा न की जानी चाहिए।

अन्य आवश्यक सूचनाऐं

(1) इस अंक के साथ अधिकाँश ग्राहकों का चंदा समाप्त हो जाता है। सो अगले वर्ष का चंदा तीन रुपया मनीआर्डर से यथासंभव शीघ्र ही भेज देना चाहिए। देरी करने से पिछले अंक समाप्त हो जाते हैं और पाठकों की फाइल अधूरी रह जाती है।

(2) अखण्ड ज्योति की वी. पी. भेजने में बिलकुल व्यर्थ के कुछ पैसे अधिक देने पड़ते हैं। वी. पी. पोस्टेज के अतिरिक्त खर्च समेत सवा तीन रु. की वी. पी. पहुँचती है। इसलिए मनीआर्डर से ही चन्दा भेजने में लाभ है। आग्रह-पत्र आये बिना वी. पी. नहीं भेजी जाती।

(3) जिन पाठकों को अगले वर्ष ग्राहक न रहना हो वे एक कार्ड भेजकर इसकी सूचना दे देने की कृपा करें ताकि अगले वर्ष उतने अंक कम छपाये जायं। मनीआर्डर कूपन पर अपना पूरा नाम पता तथा ग्राहक नम्बर स्पष्ट अक्षरों में लिखना चाहिए। नये सदस्य “नये ग्राहक” शब्द का उल्लेख कर दें।

(4) जिनका चन्दा वर्ष के बीच में किसी मास समाप्त होता है उनसे प्रार्थना है कि सन् 57 के शेष महीनों का चन्दा चार आना प्रति अंक के हिसाब से भेज कर पूरे वर्ष का अपना हिसाब चुकता कर लें। अधूरे वर्ष का हिसाब रखने में दोनों ही ओर बड़ी असुविधा रहती है।

(5) यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर ठीक समय पर अखण्ड ज्योति भेजी जाती है। 1-पता अधूरा या अस्पष्ट लिखना। 2-डाक की गड़बड़ी। 3-पता बदलने पर भी उसकी सूचना न देना प्रायः यही कारण अंक न पहुँचने के होते हैं। यदि किसी मास अंक न पहुँचे तो उसी मास ता. 15 के लगभग सूचना देकर दूसरी प्रति मँगा लेनी चाहिए।

(6) व्यक्तिगत परामर्श के पत्र-व्यवहार के समय हर पत्र में अपना पूरा पता लिखते रहने तथा जवाबी पत्र भेजने की प्रार्थना है।

(7) अगले वर्ष अखंड ज्योति में भारतीय संस्कृति की विशेषताओं पर प्रकाश डालने वाली महत्वपूर्ण पाठ्य सामग्री रखने के लिए अभी से विशेष तैयारी की जा रही है। हर महीने गायत्री-उपासना के अनुभव भी रहा करेंगे। गायत्री-उपासकों को अपनी उपासना में जो अध्यात्मिक एवं भौतिक विशेष अनुभव हुए हों उन्हें अखण्ड ज्योति में प्रकाशनार्थ भेजते रहें।


विजय-गीत


विजय गीत (Kavita)

तुम न घबराओ न आँसू ही बहाओ अब,

और कोई हो न हो पर मैं तुम्हारा हूँ। मैं खुशी के गीत गा - गा कर सुनाऊँगा।।

मानता हूँ, ठोकरें तुमने सदा खाई, जिन्दगी के दाँव में हारें सदा पाई,

बिजलियाँ दुख की, निराशा की, सदा टूटीं, मन गगन पर वेदना की बदलियाँ छाईं,

पोंछ दूँगा मैं तुम्हारे अश्रु गीतों से, तुम सरीखे बेसहारों का सहारा हूँ।

मैं तुम्हारे घाव धो मरहम लगाऊँगा। मैं विजय के गीता गा - गा कर सुनाऊँगा।।

खा गई इन्सानियत को भूख यह भूखी, स्नेह ममता को गई पी प्यास यह सूखी,

जानवर भी पेट का साधन जुटाते हैं, ‘जिन्दगी का हक’ नहीं है रोटियाँ रूखी,

और कुछ माँगो, हँसी माँगो, खुशी माँगो, खो गये हो, दे रहा तुमको इशारा हूँ।

आज जीने की कला तुमको सिखाऊँगा। जिन्दगी के गीत गा - गा कर सुनाऊँगा।।

-अज्ञात