(श्री. रघुनाथ प्रसाद जी शास्त्री ‘साधक’)
भारत की प्राचीन-सुसंस्कृति! तेरी सदा विजय हो।
धर्म भाव भूतल में छाये, कर्म भाव जनता में आये, निष्कामो जीवन फल पाये, ईश्वर में विश्वास अटल, मन स्वस्थ, नितान्त अभय हो।
सत्य सनातन नित्य प्रचारें, शुभ कृतियों में तथ्य विचारें, निज मानस के दोष सुधारें, वेदों का स्वाध्याय निरन्तर, पाप सभी का क्षय हो।
ऊँच नीच के भाव विसारें, कलुष कामना सकल निवारें, समता भाव समाज प्रसारें, सब का हित हो ध्येय हमारा तेरी सदा विजय हो॥ 3 ॥
सदाचार की शिक्षा पायें, ‘उच्छ-वृत्ति’ की भिक्षा भायें, यज्ञ शेष सब मिलकर खायें, पूर्ण काम हों, पिये सुधा सम प्रति गृह गोरस पथ हो।
भारत की प्राचीन सुसंस्कृति! तेरी सदा विजय हो॥
(चक्रवर्ती श्री राजगोपालाचारी)
कुछ लोग गीता का गलत अर्थ लगाकर उसकी शिक्षा से हिंसामय अपराधी को उचित सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। उनकी एकाग्रता युद्ध के प्रसंग पर होती है। उनका प्यारा अध्याय युद्ध का प्रारंभिक अध्याय है और वे श्रीकृष्ण की शिक्षा से निःसंकोच वध के सिद्धान्त का दोहन करते हैं। इससे बड़ी गलती दूसरी नहीं हो सकती।
गीता महाभारत का एक अध्याय है। उसका आरंभ अर्जुन के उस क्षोभक वर्णन से होता है, जो एक-दूसरे के वध के लिए दोनों ओर खड़े योद्धाओं को देखकर उसके मन में हो उठा था और, इसी दृश्य के अन्दर हिन्दू धर्म का प्रतिपादन सन्निविष्ट किया गया है।
गीता की रचना करने वाले आचार्य द्वारा कल्पित युद्ध की पृष्ठभूमि निःसन्देह और उपयुक्त है, तथापि हमें गीता को हिन्दू धर्म का एक पूर्ण ग्रन्थ मानना चाहिए, कुरुक्षेत्र के युद्ध की एक अवान्तर कथा मात्र नहीं।
गीता को मुख्यतः इन श्लोकों के आधार पर हिंसा-मूलक ग्रंथ बताया जाता है।
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्य ध्यस्व भारत॥ य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्। उमौ तौ न विजानीतो नायं हन्तिः न हन्यते॥
न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूखा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
‘नित्य, अनाशवान और अप्रमेय आत्मा के ये शरीर नाशवान हैं, इसलिए युद्ध कर। जो आत्मा को मारने वाला जानता है और जो उसे मरा हुआ जानता है, वे दोनों ही अज्ञानी हैं। आत्मा न तो मारता है और न मारा जाता है, वह न कभी जन्म लेता है और न मरता ही है। वह होता हुआ, भविष्य में कभी न होने वाले भी नहीं है। वह अजन्मा, नित्य, सनातन है और शरीर के मारे जाने पर मारा नहीं जाता।’ (2)-18,19,20
अब हम जरा कठोपनिषद् को भी देखें, जो अधिक प्राचीन धर्मग्रंथ है। जिस ऋषि ने गीता के बहुत पहले हमें कठोपनिषद् प्रदान किया, उसने नचिकेता के प्रति यम के कथन का उल्लेख इन शब्दों में किया है।
न जायते म्रियते वा विपश्चिन्, नायं क्रुतश्चिन्न बभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
‘तुम न जन्म लेते हो, न मरते हो। तुम किसी दूसरी वस्तु से नहीं हुए, न अपने सिवा किसी अन्य वस्तु से बनाये गये हो। तुम अजन्मा, नित्य और सनातन हो। तुम्हारा अस्तित्व सदैव रहा है। तुम्हारा शरीर मारा जा सकता है, तथापि तुम मारे नहीं जा सकते।” (2)-18
हन्ता चन्मन्यते हन्तुँ हतश्चेन्मन्यते हतम्। उमौ तौ न विजानीतो नार्थ हन्तिर्न हन्यते॥
“यदि तुम मानते हो कि मैं किसी को मारता हूँ या मैं किसी के द्वारा मारा जाऊंगा’ तो तुम दोनों बातें नहीं जानते। आत्मा न मारता है और न मारा जाता है।”
कठोपनिषद् में नचिकेता की अन्तःकरण के विरुद्ध शस्त्र ग्रहण करने की प्रेरणा देने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था। फिर भी, शिक्षा और उसके शब्द ठीक वही हैं जो भगवद्गीता में पाये जाते हैं। यदि कठोपनिषद् में हम उन शब्दों से हिंसा का समर्थन प्राप्त नहीं कर सकते, तो केवल इसलिए कि वे भगवद्गीता में आये हैं, हम उनसे भिन्न अर्थ कैसे निकाल सकते हैं?
भगवद्गीता में जिन दो मुख्य तत्वों पर जोर दिया गया है, वे हैं।
(1) स्वधर्म—अर्थात्, मनुष्य कर्तव्य का निश्चय करने में सापेक्षत का नियम, और
(2) इस प्रकार निश्चित किये हुए कर्तव्य को करने में अनासक्ति। यह निष्काम कर्म का मन्त्र है।
कर्तव्य को निरपेक्ष सिद्ध करने के प्रयत्न सफल नहीं हो सकते। धर्म निरपेक्ष या एक केवल-वस्तु नहीं है, वह संसार की सब दूसरी वस्तुओं के समान सापेक्ष या अवस्था-सम्बद्ध वस्तु है। मनुष्य को क्या करना चाहिये, यह उसकी स्थिति पर निर्भर करता है, कोई हवाई वस्तु नहीं है। यही स्वधर्म का अर्थ है। जाति-प्रथा के भेदों का समर्थन करने वाले सिद्धाँतों के रूप में स्वधर्म का जो अर्थ लगा लिया जाता है, वह सही नहीं है। स्वधर्म इस सत्य का स्वीकरण है कि कर्तव्य परिस्थिति और प्रसंग पर निर्भर करता है। मनुष्य अपनी स्थिति में किसी भी कारण या परिस्थिति से क्यों न पहुँचा हो, वह जिस स्थिति में रहता है उसी से उसके कर्तव्य का निर्धारण होता है। इस संसार की प्रत्येक वस्तु सापेक्षता से प्रभावित होती है और मनुष्य के कर्तव्य का निर्धारण भी इस सार्वलौकिक नियामक पर नहीं है। कर्तव्य सबके लिए एक ही नहीं होता और न वह सब प्रसंगों के लिए ही एक होता है। हम जिस गोल और घूमती हुई पृथ्वी पर रहते हैं उस पर एक सीधी रेखा नहीं खींच सकते। इसी प्रकार कर्तव्य का निर्धारण भी एक समान नहीं हो सकता, उसे प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक परिस्थिति के लिए अलग-अलग निर्धारित करना होगा। इसका अर्थ यह नहीं कि गीता में कोई ऐसा सरल मार्ग प्रस्तुत कर दिया गया है, जिससे मनुष्य अपनी व्यक्तिगत अनुकूलता के अनुसार चल सके। स्वधर्म का मार्ग कठिन और अधिकतर दुस्तर होता है। उसके लिए महान त्याग और साहस की आवश्यकता होती है। गीता धर्म में सापेक्षता का सिद्धाँत प्रस्तुत किया है। जिस प्रकार आइन्स्टाइन ने भौतिक अन्तर और काल की नई कल्पना से विशेषित करने के लिए सापेक्षता का सिद्धाँत प्रदान किया है, ठीक उसी प्रकार गीता बताती है कि मनुष्य का कर्तव्य उसके देश, काल और नियत कर्म पर अवलंबित रहता है।
इसके पश्चात् अलिप्तता का परिष्कारक सिद्धाँत आता है। लौकिक कार्य का दोष-मुक्त होना सम्भव नहीं है। परन्तु यदि हम अपना कार्य उचित रूप से निर्धारित कर्तव्य मानकर और निःस्वार्थ भाव से करें, तो उसके सब दोष दूर हो जाते हैं।
स्वधर्म और अनासक्ति डडडड डडडड डडडड डडडड न करने के अतिरिक्त भगवद्गीता यह भी सिखाती है कि उपासना के सब रूप एक समान अच्छे हैं।
ये यथा माँ प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्य सर्वशः॥
‘मनुष्य जिस प्रकार मेरा आश्रय लेता है, उसी प्रकार मैं उन्हें फल देता हूँ। क्योंकि मनुष्य उपासना का कोई भी मार्ग ग्रहण करें, वे मुझे ही प्राप्त होते हैं।’
(4)—11
यो यो याँ याँ भक्तः श्रद्धयाऽचिंतुमिच्छति। तस्य तस्याचलाँ श्रद्धाँ तामेव विदधाम्यहम्॥
‘जो-जो भक्त जिस-जिस स्वरूप की भक्ति श्रद्धापूर्वक करता है, उस-उस स्वरूप में उसकी श्रद्धा को मैं ही दृढ़ करता हूँ।’ (7)—21
स तया श्रद्धया युक्त स्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्तंयेव विहितान्हितान्॥
‘वह उस श्रद्धा से युक्त होकर उस स्वरूप की आराधना करता है और उसके द्वारा उन कामनाओं को प्राप्त करता है, जिन्हें मैं ही नियत करता हूँ।
(7)—22
भगवद्गीता में एक और भी शिक्षा है, जिसका महत्व बहुत अधिक है। समाज के कल्याण के लिए किये जाने वाले सब प्रकार के काम, समान रूप में उदात्त हैं यदि उन्हें उचित भावना से किया जाये तो वे ईश्वर की उपासना के समान ही होते हैं।
स्वे स्वकर्मण्यभिरतः संसिद्धि लभते नर। स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छूणु॥
‘स्वयं अपने कर्तव्य में रत रहकर मनुष्य संसिद्धि प्राप्त करता है। अपने कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त करता है, सो तू मुझसे सुन।’
(18)—45
श्रेयान्स्वधर्मों विगुणः परवर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वभावनिपतं कर्म कुर्वन्नाष्नोति किल्विषम्।
‘अपना कर्तव्य असम्मानित होने पर भी दूसरे के कर्म से- भले ही वह अच्छी तरह किया हुआ क्यों न हो—अधिक श्रेष्ठ है। जो अपने स्वभाव नियत कर्म करता है उसे पाप नहीं लगता’ (18)—47
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्। सर्वा रम्भहि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥
‘स्वभावतः प्राप्त कर्म सदोष होने पर भी छोड़ना नहीं चाहिये। जिस प्रकार अग्नि के साथ धुएँ का संयोग होता है, उसी प्रकार सब कर्म भी दोषों से आवृत हैं।’ (18)—48
उपनिषद् प्राचीन ऋषियों ने प्रदान किये। श्रीकृष्ण ने एक बार फिर से उन्हें गीता रूप में प्रस्तुत किया। अर्जुन के युद्ध-अश्वों की रास पकड़े हुये श्रीकृष्ण ने तथा उपासना की विधि की शिक्षा दी। स्वयं हमारे युग में गाँधी जी ने भी, महान् राजनीतिक युद्ध की बाग हाथ में लिए हुए, अपने ढंग से कर्म और उपासना की रीति सिखायी। हमारे युग में गाँधीजी के श्रीमुख गीता का पुनर्जन्म हुआ। हमें उस शिक्षा को हृदयंगम करना चाहिए, केवल शब्दों का उच्चारण नहीं। गीता की सच्ची पूजा उसके आशय का प्रतिदिन सचाई के साथ मनन करने में और उसके अनुसार अपने आचार-विचार को ढालने में निहित है।
(श्री स्वामी शिवानन्द जी महाराज)
स्त्री की प्रतिमूर्ति अथवा स्मरण मन को क्षुब्ध करता है। कामवासना शक्तिशाली होती है। यह एक कुसुम-धनुष साथ लेकर चलती है जिसमें मोहन, स्तम्भन, उन्मादन, शोषण और तपन रूपी पाँच बाण सजे होते हैं। विवेक, विचार, भक्ति और ध्यान इस घोर राग का मूलोच्छेद करते हैं। यदि काम पर विजय प्राप्त हुई तो क्रोध, लोभ आदि जो उसके शस्त्र हैं,आप ही कुंठित हो जायेंगे। राग का प्रधान अस्त्र रमणी है। यदि इसे मन से नष्ट किया गया तो इसके अनुवर्ती और परिजन बड़ी आसानी से जीते जायेंगे। यदि सेनापति मारा गया तो सैनिकों को मार डालना आसान हो जायेगा। वासना पर विजय प्राप्त करो। फिर क्रोध को जीत लेना आसान हो जायगा, केवल क्रोध ही वासना का अनुवर्ता है।
सैनिक जैसे ही दुर्ग से बाहर निकलें, उन्हें एक-एक करके मार डालो। अन्त में तुम्हारा दुर्ग पर आधिपत्य हो जायगा। इसी प्रकार प्रत्येक संकल्प को जो मन में उठे, एक-एक करके नष्ट कर दो। अन्त में तुम्हारा मन पर अधिकार हो जायगा।
विचार, शाँति, ध्यान और क्षमा के द्वारा क्रोध पर विजय प्राप्त करो। जो मनुष्य तुम्हारी हानि करता हो उसके ऊपर दया करो और उसे क्षमा कर दो। उलाहने को प्रसाद समझो, उसे आभूषण जानो तथा अमृततुल्य मानो। भर्त्सना को सह लो। सेवा, दया और ब्रह्मभावना के द्वारा विश्वप्रेम का विकास करो। जब क्रोध पर विजय प्राप्त हो जायगी तो धृष्टता, अहंकार और द्वेष स्वयं ही नष्ट हो जायेंगे। प्रार्थना और भजन से भी क्रोध दूर हो जाता है।
सन्तोष, अभेद, विराग तथा दान के द्वारा लोभ का शमन करो। अभिलाषाओं को मत बढ़ाओ। तुम्हें कभी निराश न होना पड़ेगा। सन्तोष मोक्ष के राज्य के चार सन्तरियों में से एक है। इन चार सन्तरियों की सहायता से तुम ब्रह्म ज्ञान, जीवन के चरम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हो।
अनुराग के पीछे-पीछे शोक और दुःख भी लगे रहते हैं। अनुराग शोक से मिश्रित होता है। सुख के पीछे दुःख चलता है; जहाँ सुख है वहाँ दुःख भी है। अनुराग के नाम पर मनुष्य दुःख का विषमय बीज वपन करता है, जिससे शीघ्र ही स्नेह के अंकुर निकल जाते हैं, जिसमें बिजली के समान भयानक दाहकता होती है और इन अंकुरों से अनेक शाखाओं से युक्त दुःख का वृक्ष उत्पन्न होता है, जो ढके हुए घास के ढेर के समान जलते हुए, धीरे-धीरे शरीर को दग्धकर डालता है। बराबर इस संसार की असारता पर विचार करो। राग से मोह उत्पन्न होता है। यह सभी जानते हैं कि जब किसी मनुष्य की पालतू चिड़िया को बिल्ली खा जाती है तो उसे दुःख होता है, परन्तु यदि बिल्ली किसी दूसरे गौरैया या चूहे को खाती है, जिससे उसे कुछ सम्बन्ध नहीं होता, तो वह कुछ भी दुःख नहीं प्रकट करता। अतः तुमको उस अनुराग का मूलोच्छेद करना चाहिए जो व्यर्थ की आसक्ति का कारण होता है। शरीर असंख्यों कीटाणुओं को उत्पन्न करता है, जिसे दूर करने के लिये लोग आतुर होते हैं। परन्तु एक को वह बच्चे के नाम से पुकारते हैं जिसके लिये उनका जीवन क्षीण होता है साँसारिक मोह इस प्रकार का होता है। अनुराग की गाँठ उस महामोह से दृढ़ होती है जो मनुष्य के हृदय को चारों ओर से सूत्र के समान ग्रथित किये हुए हैं। अनुराग से छुटकारा पाने का प्रधान उपाय है यह चिन्तन करना कि यह संसार एक असार वस्तु है। इस महान् जगत् में असंख्य पिता, माता, पति, स्त्री, बच्चे तथा पितामह चले गये हैं। तुम्हें अपनी मित्र-मण्डली का विद्युत की क्षणिक छटा के समान समझना चाहिए और इसका अपने मन में पुनः पुनः चिन्तन करते हुए शान्ति प्राप्त करनी चाहिए।
मन को शून्य कर दो। शोक के महान् आघातों से बचने का यह एकमात्र उपाय है। संकल्प को दबा देना कठिन है। और जब वह एक बार दबा दिया जाता है तो संकल्पों की एक नवीन शृंखला उत्पन्न होती है जो मन को आक्राँत कर देती है। किसी स्थिर वस्तु के ऊपर चित्त को जमाओ। तुम मन को रोकने में सफल होगे। आत्मा में संकल्पों को एकत्र करो, जिस प्रकार ग्रीष्म में मनुष्य पोखरे के शीतल जल में जाकर अपने शरीर को ठण्डा करता है। हरि का सतत् ध्यान करो, जो श्याम रंग के हैं तथा जो गले में बहुमूल्य हार धारण करते हैं, एवं भुजाओं, कानों और सिर को आभूषणों से अलंकृत किये हुए हैं।
जब विषय तुम्हें व्यथित करें, सम्मोहित करें, तब विचार विवेक और सात्विक बुद्धि का सदा प्रयोग करो इन्द्रियों को भ्रमित करने वाला अहंकार जो मन को आच्छादित करता है, जब विवेक द्वारा नष्ट हो जाता है तो मृगमरीचिका के जल के समान वह अन्य भ्रान्ति जनक पदार्थों में आ जाता है। बारम्बार विवेक का आश्रय लो जब तक ज्ञान में तुम्हारी स्थिति न हो जाय वस्तुतः अविद्या की शक्ति महान् है।
जब तुम्हारे संकल्प जो बिखरे हुए हैं, एकत्रित किये जायेंगे और तुम शाँत अवस्था में आओगे तो शाश्वत आनन्दमय आत्मा चमक उठेगा, जैसे सूर्य स्वच्छ जल के ऊपर चमकता है दीख पड़ता है। शान्ति धन, दार या भोग में नहीं रहती। जब मन संकल्पहीन और कामनाहीन हो जाता है तो आत्मा चमक उठती है और शाश्वत आनन्द और शान्ति की वर्षा करता है। फिर तुम बाहरी विषयों में व्यर्थ ही सुख के लिये क्यों भटक रहे हो? अन्दर खोजो, अपने आनन्द के लिये अपने भीतर सत् चित्-आनन्द में अमृत आत्मा में ढूंढ़ो।
जब तुम्हारी दाहिनी बाँह पर एक चींटी चलती रहती है तब तुम्हारी बायीं बाँह अनायास ही उस ओर चींटी के हटाने के लिए मुड़ जाती है। मन उसमें तक नहीं करता। जब कभी तुम अपने पैरों के सामने बिच्छू को देखते हो तो अनायास ही अपने पैरों को हटा लेते हो। इसे स्वाभाविक क्रिया के नाम से पुकारते हैं सड़क पार करते समय किस प्रकार स्वभावतः मोटर से बचने के लिये तुम अपने शरीर को घुमाते हो।
ज्ञान के चार स्रोत होते हैं- स्वाभाविक ज्ञान, अन्तर्ज्ञान और ब्रह्मज्ञान स्वाभाविक ज्ञान पशु-पक्षियों में पाया जाता है पक्षियों में अहंकार स्वतन्त्र दैवी प्रवाह तथा दैवी क्रीड़ा में बाधक नहीं होता। अतः स्वभावतः जो काम पक्षियों द्वारा होता है वह मानव-जीवन की अपेक्षा कहीं अधिक पूर्ण होता है। क्या तुम अद्भुत घोंसले की रचना में पक्षियों के कौशल का नमूना नहीं पाते हो? तार्किक ज्ञान स्वाभाविक ज्ञान से श्रेष्ठ है और वह मनुष्यों में पाया जाता है। यह तथ्य संकल्प करता है, उसका विशदीकरण करता है कारण से कार्य और कार्य से कारण की तर्कना करता है। अनुमापक वाक्यों से परिणाम निकलता है और साध्य से प्रमाण की ओर अग्रसर होता है। यह परिणाम निकलता है, निर्णय करता है और परामर्श प्रदान करता है। यह तुम्हें सावधानी से अन्तःकरण के समीप पहुँचाता है। अन्तर्ज्ञान में तर्क की कुछ आवश्यकता नहीं होती। वहाँ तो वस्तु का प्रयत्न होता है। एक चमक में तुम्हें वस्तु ज्ञान हो जाता है। अन्तर्ज्ञान तर्क से बढ़कर है परन्तु उसकी अपेक्षा नहीं करता। कारण-शरीर की क्रियाओं के द्वारा जो ज्ञान होता है वह आत्मज्ञान है। आत्मज्ञान अंतर्ज्ञान के परे है। यह कारण शरीर का अतिक्रमण करता है। यह ज्ञान की परमावस्था है। यही केवल सत्य है।
ज्ञान के सात क्षेत्र हैं—प्रभाव, प्रत्यक्ष, अंतर्दृष्टि, अंतर्ज्ञान, तप, दिव्य, ज्ञान और परमानन्द-अवस्था।
मन संकल्पात्मक चित्रों के द्वारा सूक्ष्मता को ग्रहण करने की चेष्टा करता है। मन के शुद्ध होने पर शुद्ध मन में उपनिषदों के श्रवण और मनन के द्वारा एक सूक्ष्म चित्र निर्मित होता है। यह सूक्ष्म चित्र गम्भीर निदिध्यासन में पीछे घुल-मिल जाता है। जो कुछ तब रह जाता है वह है चिन्मात्रा अथवा केवल अस्ति।
मनुष्य-समाज में अधिकाँश कुछ मूर्त पदार्थ अपने अवलंब के लिये चाहते हैं, वे कुछ ऐसा पदार्थ चाहते हैं जिसके चतुर्दिक् अपनी भावनाओं को रख सकें, जो उसके मन में सारे संकल्पात्मक चित्रों का केन्द्र बन सके। मन के अवलम्ब के लिए एक मूर्त वस्तु की आवश्यकता है, यह उसका स्वभाव है। अतः मन को जमाने के लिये संकल्प को एक पृष्ठभूमि की आवश्यकता है।
बाह्य वस्तुओं से उत्पन्न सुख क्षणिक, परिवर्तनशील और निःसार है, वह केवल तन्तुओं को उत्तेजित करने वाला और मानसिक सुख है। शरीर शोक और रोग का निवास-स्थान है। धन की प्राप्ति और उसकी रक्षा में भाँति-भाँति की विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। प्रत्येक संपर्क से दुःख उद्भूत होता है। स्त्री दुःख का एक नियत कारण है। शोक है कि मनुष्य इस प्रकार के कष्टों को उस कष्ट की अपेक्षा जो आत्मिक सुख प्रदान करता है विशेष रूप से ग्रहण करते हैं। आत्मज्ञान सम्बन्धी पुस्तकों का अवलोकन करो। सदा सत्संग करो। भावपूर्ण होकर ‘ओम्’ का प्रतिदिन 21600 जाप करो इसमें बहुत थोड़ा समय लगेगा। आत्मा या श्री कृष्ण का ध्यान करो, ब्रह्मानुभव करो। केवल इसी से तुम्हें सारे सांसारिक दुःखों से छुटकारा मिलेगा और तुम्हें शाश्वत शाँति ज्ञान और आनन्द की प्राप्ति होगी।
तुम्हारे मन में भाँति-भाँति के दूषित निश्चय, भद्दे अन्धविश्वास जड़ जमाये हुये हैं, वे हानिकारक हैं। तुम्हें उनकी उन्नत विचार शुद्ध निश्चयों-संकल्पों के द्वारा नष्ट करना होगा। ‘मैं शरीर हूँ’ ‘मैं अमुक पुरुष हूँ’ ‘मैं ब्राह्मण हूँ’ ‘मैं धनी हूँ’ यह सब निश्चय, संस्कार दूषित हैं। अपने मन में साहसपूर्वक निश्चय करले। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ ‘अहं ब्रह्मास्मि’। सतत् प्रयत्न के द्वारा ‘मैं शरीर हूँ’ इसी प्रकार के दूषित निश्चय और संस्कार धीरे-धीरे नष्ट हो जायेंगे।
बीज में सारा वृक्ष अपनी शाखाओं पत्तियों और फलों के साथ सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है। इनके प्रकट होने में समय लगता है। इसी प्रकार कामवासना बचपन से ही मन में लुका-छिपा करती है, अठारह वर्ष की उम्र में प्रकट होती है, पच्चीस वर्ष की अवस्था में सारे शरीर में व्याप्त हो जाती है, पच्चीस से पैंतालीस वर्ष की अवस्था तक बनी रहती है और तब गिरने लगती है। इस बीच में भाँति-भाँति के दुष्कर्म और पाप मनुष्य जीवन में होते हैं। लड़के और लड़की के आचार में कोई विशेष भेद नहीं पाया जाता है, जब तक वह यौवन में रहते हैं। युवावस्था को प्राप्त होने पर वे अपने आचारानुकूल कर्मों को करने लगते हैं।
तृष्णा ही जन्म लेने का प्रधान कारण है, इसी तृष्णा से संकल्प और कर्म उत्पन्न होते हैं। तृष्णा के द्वारा ही संसार चक्र गतिशील रखा जाता है। प्रारम्भ में ही उसे नष्ट कर दो तभी तुम्हारा कुशल है, तुम्हें मोक्ष की प्राप्ति होगी। ब्रह्मभावना, ब्रह्मचिन्तन, ॐ का ध्यान और भक्ति तृष्णा की जमी हुई जड़ को उखाड़ फेंकेगी। तुम्हें उनको जड़ मूल से उखाड़ कर दग्ध कर देना होगा जिससे उनका पुनरुज्जीवन न हो सके। तभी तुम्हें अपने प्रयत्न से निर्विकल्प समाधि की प्राप्ति होगी।
सुख और दुःख के कारण धर्म और अधर्म है। वे दोष कर के भाव हैं जो केवल मन से सम्बन्ध रखते हैं। आत्मा का वास्तविक स्वभाव है मन और शरीर से छुटकारा पाना। और जहाँ धर्म और अधर्म की सम्भावना नहीं होती वहाँ इनका प्रभाव भी कुछ नहीं पड़ता। अतः सुख और दुःख आत्मा को स्पर्श नहीं करते हैं। आत्मा असंग असक्त और निर्लिप्त है। वह मन में उत्पन्न होने वाले दोनों प्रकार के गुणों का धर्म और अधर्म का साक्षी है। मन सुख भोगता है, मन दुःख उठाता है। सुख और दुःख उपाधि धर्म हैं, चिन्दूर्सडडडड हैं आत्मा चुपचाप देखता है; सुख-दुःख से इसे कोई बस्तडडडड नहीं।
(श्री महावीरजी ‘सन्त सेवी’)
आधुनिक वैज्ञानिकों ने वर्तमान युग में भाँति-भाँति के प्रकाशों का आविष्कार कर जगत के समक्ष रखा है। साधारणतया सभी जन नित्य प्रति दीपक, तारे, विद्युत तथा चन्द्र-सूर्यादि की विविध ज्योतियों का अवलोकन भी करते ही हैं। किन्तु इन्हें अखंड-ज्योति कदापि नहीं कह सकते, ये सभी खण्ड ज्योतियाँ हैं, क्योंकि यह प्रत्यक्ष प्रदर्शित हैं। तेलबत्ती के जल जाने से प्रदीप बुझ जाता है और उसका प्रकाश भी मिट जाता है। तारे की टिमटिमी और विद्युत की चापल्यता से कौन अनभिज्ञ है? शशि और सूर्य नित्य प्रति उदय और अस्त होते हैं, इनकी ज्योति को भी लोग अखण्ड रूप में नहीं देखते। सहज यह प्रश्न उदय होता है कि अखण्ड ज्योति क्या है, कहाँ है और इसकी अनुभूति कैसे हो सकती है?
अखण्ड ज्योति उस महान ज्योति या प्रकाश पुञ्ज को कहते हैं जो सतत् अव्याहत, अप्रतिहत, अविच्छिन्न, एक सर और स्थिर हो। वैज्ञानिकों द्वारा आविष्कृत प्रकाश या परमात्मा प्रदत्त प्राकृतिक किसी भी नक्षत्र, रवि या शशि प्रभृति के प्रकाश में ये गुण प्रदर्शित नहीं होते। वर्णित गुणमय अखण्ड ज्योति बाह्य जगत के स्थूलाकाश में नहीं, अपितु अंतर्जगत के सुक्ष्माकाश में अवश्य अवस्थित है।
हृदाकाशे चिदादित्यः सदा भासति भासति। नास्तमेतिन चोदेति कथं सन्ध्या मुपास्महे’।
मैवेय्युपनिषद्।
अतएव वाह्य जगत में इसकी खोज सर्वथा भ्रम परिपूर्ण है। त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने हनुमान जी को इस अखण्ड ज्योति की शिक्षा देते समय स्पष्ट कहा था कि-व्यर्थ ही बहुत से शास्त्रों की कथाओं के मन्थन से क्या फल? हो वायु सुत! अत्यन्त यत्नवान् होकर अपने अन्तर की ज्योति का अन्वेषण कर।
‘बहु शास्त्र कथा कन्थारों मन्थेन वृथैवकिम्! अन्वष्टव्यं प्रयत्नेन मारुते ज्योतिरान्तरम्॥
मुक्ति को पनिषद् डडडड
द्वापर युग के अन्त में—’महायोगेश्वरो हरि भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता अ. 8 श्लोक 9 में—
कविपुराणमनुशासितारमणोरणोरणीयाँसमनुस्मरेःद्यसर्वस्ट धातारज चिन्त्य रुपमा दित्य वर्ण तमसः परस्तात्’।
कहकर ‘अन्धकार के पार में सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति है, इसकी शिक्षा दी थी वणित सूर्य के समान तेजस्वी ज्योति की उपमा के भ्रमवश वाह्य जगत के स्थूलाकाश स्थित सूर्य-प्रकाश के समान ही उस अखण्ड ज्योति को नहीं समझना चाहिये। उस अखण्ड ज्योति का पटतर बाह्य संसार के करोड़ों सूर्य से भी नहीं दिया जा सकता। इस उपमा को तो जिमि कोटिशत खद्योत सम रवि कहत अति लघुता लहैं, की भाँति ही जानना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने जब अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाया तो उसका वर्णन करते हुए संजय ने धृतराष्ट्र से कहा था—
‘दिवि सूर्य सहस्रस्यभवेद्यु गपदुत्थिता। यदि भाः सदृशीसास्या द्भासस्तस्य महात्यनः’॥
गीता अ. 11 श्लोक 12॥
अर्थात्- आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश हो सकता है, वह भी उस महान तेज के सदृश कदाचित ही होगा।
अन्तः प्रकाश का वर्णन कलियुग के आदि संत भगवान बुद्ध ने ‘धम्म पद’ में इस भाँति किया—‘अन्धकारेन ओनद्धा पदीपंन गबेस्सथ”। अर्थात्- अन्धकार से घिरे तुम प्रदीप की खोज क्यों नहीं करते।
जिस प्रदीप की चर्चा यहाँ की गई है, वह लौकिक नहीं, अलौकिक है। साधक दृष्टियोग क्रिया द्वारा अन्धकार का भेदन करके ज्योति स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार करता है। इसी के लिये ऋषियों ने ईश्वर से प्रार्थना की था। ‘असतोमा सद्गमय। तमसोमाज्योतिर्गमय। मृत्योमाऽमृतंगमयेति’। अर्थात्—असत् से सत् की ओर अन्धकार से प्रकाश की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर ले चल। अन्धकार में रहना असत् और मृत्यु की ओर रहना है तथा प्रकाश की ओर जाना सत्य और अमृतत्व को प्राप्त करना है।
योगाभ्यासी साधक बहिर्मुख से उलटकर जब अन्तर्मुख होता है, तब उसे इस प्रदीप-शिखा की ज्योति-प्रदर्शित होती है। एक बंगाली साधक ने भी कहा है—‘निवात निष्कम दीपेरमतन योगीगनध्याऐं करे दरशन’। और जब साधक की वृति वहाँ से और अग्रसर होती है तब उसे उस प्रकाशपुञ्ज—अखण्ड ज्योति की भी प्रत्यक्षानुभूति होती है। संत गुलाल साहब ने कहा है—
‘उलटि देखो घट में ज्योति पसार’। ‘नैंनहु आगे देखिये, आतम अन्तर सोय। तेजपुञ्ज सब भरि रह्या, झिलमिल झिलमिल होय’।
॥ संत दाऊदयाल जी ॥
और संत कबीर साहब ने भी कहा है—
उलटि समाना आप में, प्रगटि ज्योति अनन्त।
यही अनन्त ज्योति ‘अखण्ड ज्योति है’। किन्तु स्मरण रहे कि इसका दर्शन गुरु कृपापात्र जन ही करने में समर्थ हो सकते हैं। जिसका सर्वस्व धन ‘गुरु कृपा हि केवलम्’ है। उपनिषद् में भी आया है—
‘दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्व दर्शनम्। दुर्लभा सहजावस्थाः सद्गुरोः करुणां बिना॥
॥ महोपनिषद् ॥
उक्त बंगाली साधक ने भी कहा है—
‘ज्ञानचक्षु उन्मिलने गुरु जे दिन कृपा करे सेदिन ताँरे नयन हेरेभासे शान्ति सुख नीरे’॥
जिनको इसकी अनुभूति होती है उन्हें अन्य किन्हीं की साक्षी या प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती और न किसी बात की आशंका ही रहती है। वे गुरु नानक देव की भाँति ही निःशंक और स्पष्टवादी हो जाते हैं- ‘अन्तरि ज्योतिभई गुरु साखी चीने रामकरंमा’। यही अन्तर ज्योति अखण्ड ज्योति है।
( श्री वीरेन्द्र सिंह जी बी. ए. खातौली )
यदि सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जावे तो मालूम पड़ता है कि मनुष्य की साधना का प्रारम्भ विचार से ही होता है। संसार अनन्त है। उसमें अनेकों प्रकार की विचार करने की सामग्री विद्यमान है। किसी भी एक विषय को ले लीजिये यदि हम उस पर विचार करना प्रारम्भ करेंगे तो हमें उसमें नित्य ही कोई न कोई नवीन बात मिलती ही रहेगी। इसी से तो संसार की उपमा दिये जाने के लिए तत्वज्ञों को समुद्र से अधिक उपयुक्त कोई दूसरी वस्तु दिखाई ही नहीं पड़ी। संसार में स्थान-स्थान पर हमारी चित्तवृत्ति को लक्ष्य से भटकाने वाली सामग्री विद्यमान है। यदि मनुष्य थोड़ी भी असावधानी में रह जावे, तथा विचार से काम न ले तो वह देखेगा कि वह अपने लक्ष्य से कहाँ का कहाँ पिछड़ गया है।
साधना का मूल मन्त्र ही विचार है। भगवान् ने हमारे मस्तिष्क को ऐसा बनाया है कि हम उससे विचार की तरंगें उत्पन्न करने के साथ ही साथ दूसरों के द्वारा भेजी गई विचार की तरंगों को भी ग्रहण कर सकते हैं। प्रत्येक मनुष्य साधारणतया विचार की तरंगें क्षण-क्षण में अपने मस्तिष्क से दौड़ता रहता है; लेकिन दूसरों के द्वारा भेजी हुई विचार तरंगों को हर एक व्यक्ति साधारणतया ग्रहण नहीं कर सकता। कारण कि साधारण मनुष्यों का मस्तिष्क इस कोटि तक विकसित नहीं रहता। मस्तिष्क को इस कोटि तक विकसित करना एकमात्र अभ्यास से ही संभव हो सकता है। जिस व्यक्ति का मस्तिष्क काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य आदि विकारों से जितना ही रहित होगा, वह व्यक्ति उतना ही इस शक्ति को ग्रहण कर सकेगा। योगियों को लीजिये। वे सहस्रों मीलों की दूरी पर रहते हुए भी दूसरों को प्रभावान्वित कर सकते हैं। ‘यौट रीडिंग’ तथा ‘टेलीपैथी’ आदि शक्तियों को इसी विचार संयम के द्वारा प्राप्त योग की छोटी-छोटी सिद्धियाँ हैं। इन्हें थोड़ा अभ्यास करके हर व्यक्ति प्राप्त कर सकता है।
जिस व्यक्ति का मस्तिष्क जितना ही शक्तिशाली होता है, उसके विचार में उतनी ही क्रियात्मक शक्ति विद्यमान रहती है। यह शक्ति दोनों प्रकार की होती है—अच्छी तथा बुरी। संसार के इतिहास में जिन दुर्दमनीय नारकी तथा नराधमों की दुष्टता का वर्णन मिलता है, उन्होंने सारे अवगुण एकाएक ही प्राप्त नहीं कर लिये थे। बुरे कर्मों में उनकी चित की वृत्ति धीरे-धीरे रंगती गई तथा एक दिन उसकी परिपक्वावस्था आने पर वे ठीक वैसे ही बन गये।
मनुष्य का चित्त बड़ा कोमल है। वास्तव में हम चित्त को द्रव धातु की भाँति मानलें तो ठीक होगा। एकबार चित्त में जिन संस्कारों की छाया पड़ जाती है बार-बार वे ही भावनायें उदय होकर उन्हीं कर्मों को करने की प्रेरणा देती रहती हैं। यदि ये कर्म शुभ हुए तो मनुष्य निरन्तर शुभ-कर्मों की ओर बढ़ता रहता है; और यदि ये कर्म अशुभ हुए दो एकबार इन कर्मों में चित्त के लिपट जाने पर उधर से वृत्ति को निकाल लेना कोई आसान कार्य नहीं। अनुभव से स्मरण तथा स्मरण की दृढ़ता से पुनः कर्म, यह चक्र निरन्तर चलता रहता है। शुभ कर्मों के विषय में भी यही नियम है। शुभ संस्कार दृढ़ हो जाते हैं तब बुरे संस्कार अपना कुप्रभाव डालने में सर्वथा असफल रहते हैं। जिस परिमाण में ये शुभ विचार बढ़ते जावेंगे, उसी परिणाम में मनुष्य का तेज भी बढ़ता जावेगा। उसके मस्तिष्क से निकली हुई विचार की वे प्रबल तरंगें उसके आस पास वैसा ही वातावरण उत्पन्न करेंगी। धीरे-धीरे उस व्यक्ति के संपर्क में आने वाले लोगों पर भी उसके विचारों का स्थायी प्रभाव पड़ने लगेगा। वे उसके अनुयायी बनने लगेंगे तथा उसके विचारों की प्रधानता उन लोगों के बीच स्थापित हो जावेगी।
प्रभावशाली पुरुषों के प्रभाव का कारण उनके आचरण तथा विचार की दृढ़ता ही होती है। ये लोग विचार दृढ़ता से चाहे जिस व्यक्ति पर अभीप्सित प्रभाव डाल सकते हैं। बड़े-बड़े समुदायों को अपने प्रभाव से दबाये रहकर जिस दिशा में चाहे उनकी प्रगति बदल सकते हैं। संसार में जितने भी धर्माचार्य राजनीतिज्ञ, शूरवीर या अन्य युग परिवर्तनकारी महापुरुष हुए हैं, उनमें यह शक्ति विद्यमान थी। यही कारण था कि उनका एक एक शब्द संसार में हलचल मचा देता था। वे जिस दिशा में मुड़ते थे सारा संसार मन्त्र-मुग्ध की भाँति उनके पद चिन्हों पर चल देता था।
वास्तव में विचार की शक्ति अपरिमेय है विचार ही शक्ति का सर्वोच्च उद्गम है। जब हम इसकी शक्ति को जान लेंगे तब हमारा आधा मार्ग बिना परिश्रम के ही समाप्त हो जावेगा।
( श्री रामकृष्ण स्थापक राकेश, लखनादौन)
दूसरों के दुःख से तो बहुत से लोग दुःखी होते हैं पर कुछ दुष्ट स्वभाव के ऐसे लोग भी हैं जो दूसरों को सुखी देख कर भी दुःखी होते हैं। ऐसे लोगों को ईर्ष्यालु कहते हैं। स्वभाव का यह दुर्गुण विचारों को भी नष्ट करता है और शरीर को भी। ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों को सुखी, सम्पन्न या सफल मनोरथ देखकर मन ही मन जलते हैं और उनकी सम्पन्नता नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। ऐसे मनुष्य व्यर्थ में शत्रुता मोल ले बैठते हैं और शरीर से रोग भी लगा लेते हैं। एक कहानी है कि एक बार कुछ लोग एक बहुत ही दुबले-पतले आदमी को पकड़ कर राजा भोज के पास लाये। राजा ने उससे उसकी इस दशा का कारण पूछा, तो उसने उत्तर दिया कि बाल्यावस्था में, मैं आपका सहपाठी था। आपकी बुद्धिमत्ता और योग्यता आदि के कारण उस समय मैं आपसे ईर्ष्या करता था। आपके राजा होने के उपरान्त मेरी ईर्ष्या और भी बढ़ गई है, आपका वैभव, यश देखकर मेरे शरीर में आग लग जाती है। आपका दान, यश और वैभव आदि को देखकर मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। यही मेरी दुर्दशा का कारण है। तब राजा ने बढ़िया मकान, सेवा के लिए सेवक और धन देकर कहा कि तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करना और जिस चीज की आवश्यकता हो माँग लेना। कुछ दिनों के उपरान्त राजा ने उसे फिर से देखना चाहा तो उस समय भी उसकी दशा पहले जैसी थी। कारण पूछने पर उसने कहा, सब सुख सामग्री मेरे पास है केवल अधिकार नहीं है। राजा ने उसे एक उच्च पद पर नियुक्त करके उसकी यह कामना भी पूरी करदी। पर इससे भी उसकी संतुष्टि नहीं हुई। अन्त में जागीरें तक दी गईं पर वह ज्यों का त्यों रोगी और दुर्बल बना रहा। अन्त में उसने कहा कि मैं आपके सिंहासन पर बैठूँगा। राजा ने समझ लिया कि इस ईर्ष्या के कारण यह अवश्य मर जायेगा, और अन्त में हुआ भी यही वह ईर्ष्या के कारण कुढ़-कुढ़ कर मर गया!
ईर्ष्यालु मनुष्य सदा दूसरों की प्रतिष्ठा या वैभव आदि को नष्ट करने में लगा रहता है। वह दूसरों की बातचीत का गलत अर्थ निकाला करता है और दूसरे के कार्यों का अभिप्राय उसकी समझ में बुरा और दुष्ट होता है। वह दूसरों का अपकार करने का अवसर ढूंढ़ा करता है। ऐसा व्यक्ति कितना भयानक घातक और बुरा होता है बतलाने की आवश्यकता नहीं है। इससे सदा बचना चाहिये। हाँ, ईर्ष्या का एक सात्विक रूप भी होता है उसे स्पर्द्धा कहते हैं और जो बहुत ही श्रेष्ठ और लाभदायक होती है। अपने गुणों के साथ अपने से श्रेष्ठ किसी गुणी के गुणों का मिलान करने और अपने आपको उसके समान गुणी बनाने की इच्छा का नाम स्पर्द्धा है। ईर्ष्या की भाँति इसमें दूसरों के गुणों या वैभव आदि के ह्रास का दुष्टभाव, मन पर नहीं पड़ता, बल्कि साधु उपायों से उनके समकक्ष बनने की सात्विक और प्रशंसनीय कामना होती है। इससे मनुष्य की आत्मा अविकारमय होकर उन्नत होती है। उसके गुणी ओर यशस्वी होने में उत्तेजना मिलती है। ऐसे मनुष्यों का लक्ष्य सदा महान पुरुषों पर ही रहता है और स्वयं उसके महान बनने में अधिक विलम्ब नहीं लगता। उसके उद्देश्य साफ और महत्वपूर्ण होते हैं और संसार में उसके यश, वैभव और प्रतिष्ठा का अच्छा विस्तार होता है।
(श्री लालजी रामजी शुक्ल)
जो व्यक्ति अपने आपको जितना महान समझता है उसके शत्रु भी उतने ही अधिक होते हैं। महानता का भाव एक प्रकार का मानसिक रोग है। जो व्यक्ति अपने आपको महान समझता है वह अंतर्मन से असन्तुष्ट रहता है। उसके मन में भारी अन्तर्द्वन्द्व होता रहता है। वह बड़े-बड़े काम का आयोजन करता है। उसके सभी काम असामान्य होते हैं। वह संसार को ही गलत मार्ग पर चलते हुए देखता है और उसके सुधार करने की धुन में लग जाता है।
महानता के भाव से प्रेरित कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी पर भौतिक विजय प्राप्त करने की चेष्टा करता है और कोई नैतिक। नैतिक विजय में वह अपने शत्रु को मित्र बनाने में भी समर्थ न होता परन्तु संसार में उसको पद पर से गिराने में समर्थ होता है। इस प्रकार जितने लोगों को वह नैतिक दृष्टि से संसार में नीचा सिद्ध करने की चेष्टा करता है, वे सब उसके शत्रु बन जाते हैं। इन शत्रुओं की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती ही जाती है परन्तु शत्रुओं की संख्या बढ़ती हुई देखकर उसे कोई आश्चर्य नहीं होता। वह समझता है कि उसके उच्चादर्श का समाज द्वारा विरोध होना स्वाभाविक ही है। जब तक इन शत्रुओं से लड़ने को वह अपने आप में सामर्थ्य पाता है, वह कुछ न कुछ रचनात्मक काम में लगा रहता है। इस प्रकार वह संसार का कल्याण करने में समर्थ होता है। पर जब अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने की उसकी आशा निराशा में बदल जाती है तो वह विक्षिप्त अथवा निराश पापी मनोवृत्ति का हो जाता है।
व्यक्तित्व की स्थापना
महानता का भाव स्वयं एक आत्महीनता की ग्रन्थि का परिणाम है। जब किसी प्रकार के आचरण से मनुष्य को आत्मग्लानि हो जाती है तो वह उस वासना का दमन करता है, जो आत्मग्लानि का कारण बनती है। दमन होने के कारण मनुष्य में दो प्रकार का व्यक्तित्व स्थापित हो जाता है। एक तरफ वह चेतन मन में महान नैतिक व्यक्ति बन जाता है और दूसरी ओर उसके अचेतन मन में अवरोधित भावनाओं की प्रबलता हो जाती है। जितना ही अनैतिक वासना का दमन होता है वह और भी प्रबल होती है और जितना ही वह प्रबल होती है उतनी नैतिक भावना को प्रबल होना पड़ता है। इस तरह नैतिकता की असाधारण प्रबलता व्यक्ति के अचेतन मन में विरुद्ध भावना की प्रबलता दर्शाती है। जो प्राकृतिक वासना सामान्य रहती है और व्यक्ति के जीवन के विकास के लिये शक्ति प्रदान कर सकती है, वह दलित होने पर विशेष रूप से दुष्ट और हानिकारक बन जाता है। इस प्रकार महत्वाकाँक्षा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको ही अपना शत्रु बना लेता है। यदि वह अकेला छूट जाये तो वह अपना समय आत्म-भर्त्सना में ही व्यतीत करेगा। वह किसी न किसी काम के लिये अपने आपको कोसता रहेगा।
पर इस प्रकार की मनोवृत्ति अधिक स्थायी नहीं होती। इसके स्थायी होने से विक्षिप्तता आ जाती है। अतएव वह अपनी आन्तरिक स्थिति को भूला देता है और अपने शत्रुओं को अपने से बाहर खोज निकालता है, अर्थात् उसके आत्म शत्रुता के भाव बाहरी किसी व्यक्ति के ऊपर आरोपित हो जाते हैं और वह अपने शत्रुओं को अपने भीतर न देखकर अपने बाहर देखने लगता है। इस तरह मनुष्य का मन अपने आपको भुलावा देता है।
जो व्यक्ति जितना ही अपने आप से घृणा करता है, वह अपने आपका शत्रु है। वह बाहर भी घृणा करने के लिये उपयुक्त पात्र लेता है और ठीक शत्रु की खोज कर लेता है। वह उन्हीं दोषों को उनमें पाता है जो स्वयं उसके अचेतन मन में वर्तमान हैं और जिनके कारण वह अपने आप से घृणा करता है। बहुत से लोग किसी व्यक्ति से घृणा नहीं करते वरन् उनके कुछ दोषों से घृणा करते हैं। यदि इन दोषों को देखा जाय तो वे वही निकलेंगे जो स्वयं उसके मन में हैं और जिनको नष्ट करने की वह असफल चेष्टा कर चुका है। जो व्यक्ति अपने आपको जीतने में असफल रहता है वह अपने से बाहर किसी व्यक्ति को अथवा उसकी बुराइयों को जीतने का प्रयत्न करता है। उसकी असाधारणता ही उसकी असफलता का प्रमाण है। जब मनुष्य अपने आप पर विजय प्राप्त कर लेता है तो उसके जीवन में सहज भाव आ जाता है। वह बाहर से साधारण व्यक्ति हो जाता है।
जब तक मनुष्य अपने आपका शत्रु बना हुआ है, वह चाहे जितना ही सब का मित्र बनने का प्रयत्न क्यों न करे अथवा अपने शत्रुओं को विनाश करने की चेष्टा क्यों न करे, शत्रुओं को पा ही लेगा। उसकी इच्छा के प्रतिकूल संसार में लोग उसके शत्रु बन जायेंगे। उसका सारा जीवन इन्हीं शत्रुओं से लड़ने में व्यतीत होगा। उसे बाहरी चिन्ताऐं सताती रहेंगी। जब मानसिक अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति में बाहरी शत्रु नहीं भी रहता तो उसे काल्पनिक शत्रु अथवा उसके विचार से ही उसे भय होने लगता है। कोई भी अवाँछनीय विचार मन में घुस जाता है और फिर निकालने से नहीं निकलता। इतना ही नहीं जितना ही उसे निकालने का प्रयत्न किया जाता है वह और भी प्रबल हो जाता है। ये बाहरी शत्रु अथवा बाध्य-विचार आन्तरिक दलित भावनाओं के, जिन्हें व्यक्ति ने अपना शत्रु बना रखा है, प्रतीक मात्र हैं। इस प्रकार की स्थिति का अन्त करने के लिये आत्म मैत्री का भाव स्थापित करना आवश्यक है।
आत्म-मैत्री की स्थापना
आत्म-मैत्री का भाव स्थापित करने के लिये मनुष्य को पुनः शिक्षा की आवश्यकता होती है। पहले तो अपनी महानता का भाव छोड़ना पड़ता है। समाज में बड़े कहे जाने की इच्छा सरलता से नष्ट नहीं होती। बहुत से व्यक्ति बड़े ही विनीत और नम्र बनते हैं। वे अपने आपको सब की पदधूल कहते हैं। ऐसे व्यक्ति बड़े अभिमानी होते हैं और उनका नम्र बनने का दिखावा ढोंग मात्र होता है। दूसरे को इस प्रकार अपने वश में किया जाता है और उसके ऊपर अपना प्रभुत्व स्थापित किया जाता है। सच्चे मन से महत्वाकाँक्षा का त्याग वही करता है जो सब प्रकार की असाधारणता अपने जीवन से निकाल डालता है। जो व्यक्ति अपने आपको सामान्य व्यक्ति मानने लगता है वह नैतिकता में नीचे दिखाई देने वाले व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति का भाव रखता है। वह उनकी भूलों को क्षम्य समझता है। वह जब बाहरी जगत् में प्रकाशित अनेक भावों को क्षम्य मानने लगता है तो वह अपने दलित भावों को भी उदार दृष्टि से देखने लगता है। दूसरों के दोषों से घृणा का भाव हट जाने से अपने दोषों से भी घृणा का भाव हट जाता है। फिर उसके मन के भीतर के दलित भाव चेतना के समक्ष आने लगते हैं, और जैसे-जैसे उसका बाहरी जगत से साम्य स्थापित होता जाता है, उसके आन्तरिक मन से भी साम्य स्थापित हो जाता है। वह अपने भीतरी मन से मित्रता स्थापित करने में समर्थ होता है।
आंतरिक समता अथवा एकत्व और बाह्य समता एक दूसरे के सापेक्ष हैं, मनुष्य अपने आपको सुधार कर अपना समाज से सम्बन्ध सुधार सकता है और समाज से सम्बन्ध सुधारने से अपने आप से सम्बन्ध सुधार सकता है। वास्तव में वाह्य और आन्तरिक जगत एक ही पदार्थ के दो रूप हैं। मन और संसार एक दूसरे के सापेक्ष हैं। जैसा मनुष्य का मन होता है उसका संसार भी वैसा ही होता है।
हमारी नादानी ही हमें अपना तथा संसार का शत्रु बनाती है और विचार की कुशलता दोनों प्रकार की कहानियों का अन्त कर देती है।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
महात्मा एपिक्टेटस ने जीवन में प्रतिक्षण काम में आने वाली एक महत्त्वपूर्ण बात कही है :—
“यदि तुम चाहते हो कि, तुम्हारी स्त्री, तुम्हारे बच्चे, तुम्हारे मित्र कभी भी तुमसे पृथक न हों, तो तुम मूर्ख हो; क्योंकि तुम ऐसी चीज की चाह कर रहे हो जो तुम्हारे वश की नहीं है और निरन्तर ऐसी अनहोनी इच्छाओं में निमग्न रहने के कारण तुम्हें अतृप्ति का दुःख मिलेगा ही।
इसी प्रकार यदि तुम चाहते हो कि तुम्हारा नौकर या पत्नी, पुत्र, मातहत, या पड़ौसी आदि अन्य व्यक्ति। भूल न करें, तो तुम निरे मूर्ख हो। तुम ऐसी वस्तु चाह रहे हो, जो संभव नहीं है। तुम चाहते हो काला काला न रहे, और कुछ हो जाय। पर ऐसा हो नहीं सकता। अतः तुम दुःखी हो।”
इसी भाव को यदि हम और गहराई तथा व्यापकता से देखें तो विदित होता है कि हम जीवन में अनेक ऐसी बातें चाहते हैं जो संभव नहीं हैं। आप मानसिक, बौद्धिक या अध्यात्मिक दृष्टि से उच्च स्तर पर हैं। स्वच्छता पसन्द करते हैं अथवा आपकी रुचि कलात्मक है। अन्य ऐसे व्यक्तियों या वातावरण आपको ऐसा प्राप्त होता है कि वे व्यक्ति या वह वातावरण आपकी मानसिक ऊँचाई तक उठ कर नहीं आता। बस, आप दुःखी और संतप्त हो उठते हैं।
आप घर में सफाई चाहते हैं, पर वह आपको नहीं मिलती। आप परिवार के सब सदस्यों को सुशिक्षित चाहते हैं किन्तु आपके पूर्ण ध्यान देने पर भी वे पढ़ते-लिखते नहीं हैं। आप घर के आस पास के वातावरण को स्वच्छ चाहते हैं, पर पड़ौसी कूड़ा-करकट बाहर फेंकते हैं, शोर गुल मचाते हैं, दिनभर लड़ते-झगड़ते हैं। गालियाँ भी दे बैठते हैं। बाजार में आप खरीदने जाते हैं तो दुकानदार चुपचाप आपकी दृष्टि बचते ही खराब वस्तु सड़ी-गली तरकारी या गन्दी वस्तु दे देता है। आप अपने अफसर या सातहत से जैसा मधुर एवं शिष्ट व्यवहार चाहते हैं, वैसा आपको प्रायः प्राप्त नहीं होता। ऐसी अवस्था में आप मन ही मन कुढ़ते हैं, मानसिक संतुलन खो बैठते हैं, कभी आवेश में भर जाते हैं। परिस्थिति और वातावरण को कोसते हैं। लेकिन आप भूल कर रहे हैं। यह सब तथा अन्य इसी प्रकार की अनेक साँसारिक बातें, आपके वश की बातें नहीं हैं। दूसरों के मनोभाव, इच्छाएँ, अच्छी बुरी आदतें, रहने और सोचने के ढंग इनमें से एक भी बात आपके वश की नहीं है। इन्हें लेकर दुःखी संतप्त रहना, या कुढ़ना मन को भारी रखना, तुम्हारी मूर्खता और नासमझी ही है।
यदि तुम चाहते हो कि जीवन में तुम्हें असफलता, मजबूरी या कठिनाई न मिले तो यह असम्भव है। तुम्हारे वश की बात नहीं है। जीवन मृदुल भावनाओं की मदुवाटिका है, तो कंटक और शूल, कठोर चट्टानों, पत्थरों की शुष्कता और कठोरताओं से भी भरा है। सभी कुछ आपको चखना है, मधुरता भी, तो कड़वाहट भी।
जिस दुनिया को आप बदल नहीं सकते, उससे झगड़ा करने से क्या लाभ? जिस परिस्थिति से आप बच नहीं सकते, उसे परिवर्तित करने की इच्छा से क्या फायदा? जिन व्यक्तियों का कड़ा, कलहपूर्ण या झगड़ालू स्वभाव है, उनसे अड़ने और क्रोध करने से क्या लाभ? असफलता, हानि, और भूल पर व्यर्थ सोचने से क्या लाभ? ये सभी आपके मनोबल और मानसिक संतुलन को नष्ट करने वाले हैं।
तुम्हारे वश की बात क्या है? तुम्हारा स्वभाव, तुम्हारी अच्छी आदतें, तुम्हारा मानसिक संतुलन, मनःशांति—ऐसी दिव्य बातें हैं, जो तुम्हारे वश की बातें हैं।
इनका सम्बन्ध स्वयं तुम और तुम्हारे निजी व्यक्तित्व से है। क्रमशः अभ्यास द्वारा तुम इनमें से प्रत्येक को प्राप्त कर सकते हो। इनके द्वारा तुम्हारा जीवन सुख और शान्ति से परिपूर्ण हो सकता है।
अतएव यदि संसार में सुख और शान्ति चाहते हो तो जो तुम्हारे वश की बातें हैं, उन्हीं को विकसित करो और जो तुम्हारे वश की बातें नहीं हैं, उन पर व्यर्थ चिन्तन या पश्चाताप छोड़ दो। स्वयं अपने मस्तिष्क के स्वामी बनो। संसार और व्यक्तियों को अपनी राह जाने दो।
(कुमारी भारती)
तुम समझते हो, तुम एक ही बार पैदा होते हो और एक ही बार मरते हो, यह तुम्हारी भूल है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को कहा है—“मेरे और तुम्हारे अनेक जन्म हुए हैं, मैं उन्हें जानता हूँ परन्तु तू उन्हें नहीं जानता।” जब मनुष्य अनेक जन्मों का एक ही शरीर में ज्ञान कर लेता है, तब वह आत्मा से परमात्मा बन जाता है। तुम्हारे विचार से शरीर से वियोग ही मृत्यु है और शरीर संयोग का नाम जीवन है, यह व्याख्या तुम्हें जिसने बताई, वह भूल में है।
जब तुम्हारा संयोग आत्मा से, चेतन अथवा विवेक से होता है, तब तुम्हारा जन्म होता है, इसके विपरीत जब तुम्हारा उक्त चेतन से वियोग होकर जड़ तत्व से संयोग होता है, तब तुम्हारी मृत्यु होती है।
चेतन तत्व से संयोग अथवा वियोग की यह स्थिति बाहरी तराजू में तौलने की वस्तु नहीं, यह भी बौद्धिक सन्तुलन की क्रिया है अर्थात् जब तुम अपने स्वरूप के समीप होते हो, तब तुम्हारा जन्म हुआ, तुम्हारी आयु इसी के अनुसार चलेगी।
संसार के अणु-अणु में एक समान चैतन्य व्याप्त है, इस नाते तुम में और अन्य पशुओं और पक्षियों में ही नहीं, जड़-चेतन सब में तुम्हारे समान परम पिता का अमर राज्य है। तुम उस परमपिता के पुत्र हो, उसकी प्रजा हो। यदि तुम अपने जनक को भूल जाओ और ऐसा समझने लगो कि तुम्हारा जन्म बिना उस पिता के हुआ है, तो यह तुम्हारी भूल है, तुम्हारा वियोग ही तुम्हारे लिए मृत्यु है। तुम पूछोगे, तो क्या अभी तक जन्म नहीं हुआ? हाँ, अभी तक जन्म नहीं हुआ, सत्ता और ज्ञान एक साथ रहते हैं, जो ज्ञान में नहीं वह उतने अंश में है ही नहीं।
आग के पास जाने पर गर्मी प्रतीत होगी ही, प्रभु के पास जाने पर भी तुम्हें प्रकाश और ऊर्ध्वगति का अनुभव अवश्य होगा। परन्तु तुम तो अभी तक क्षुद्र विचारों को नहीं छोड़ रहे, तुम जो कुछ सोचते हो वही तुम हो, तुम उच्च विचार करने लगोगे तभी तुम्हारा यथार्थ जन्म होगा, विचार ही आचार में परिणत होते हैं, जो सोचोगे वही हो जाओगे।
उत्कट भावना से तुम जब एक भाव को छोड़कर जिस नये भाव को धारण करने का दृढ़ संकल्प करोगे वही बनोगे उसे ही प्राप्त करोगे। भगवान् कृष्ण ने कहा है—“अन्तकाल में यदि मेरा स्मरण करोगे तो मुझे प्राप्त करोगे। चाहे जिस भाव को अधिक सोचोगे, जिसे स्मरण करोगे उसे ही प्राप्त करोगे।” यह बात एक शरीर में भी सम्भव है।
शास्त्रों में कहा है- एक जन्म माता पिता से होता है वह भौतिक जन्म है; दूसरा जन्म गुरु के द्वारा होता है यह स्थायी है।
उपनिषदों में गुरु अनेक माने गये हैं, पशु-पक्षी जड़-चेतन बुरे-भले सभी गुरु हो सकते हैं। सबसे बड़ा गुरु मनुष्य का वह स्वयं है।
तुम यह मानते हो कि मनुष्य अपनी हत्या कर सकता है यह तुम्हारा ज्ञान अपूर्ण है, इसकी पूर्णता यह है कि मनुष्य अपने आपको मार भी सकता है और अपने आपको जन्म देकर जीवित भी रख सकता है।
तुम शरीर नहीं शरीर में तुम हो, तुम शरीर के लिये नहीं शरीर तुम्हारे लिये है, इसलिये शरीर का जीवन और तुम्हारा जीवन पृथक वस्तु है।
अकीर्ति, अपमान और पराजय मृत्यु से भी बढ़कर है। कीर्ति के लिये, ऊँचे उद्देश्य के लिए, मृत्यु का भी आलिंगन बोर पुरुष करते हैं। संसार की दृष्टि में यह जन्म है जीवन है।
तुम्हारे सामने प्रतिक्षण जीवन और मरण के लक्षण आते हैं, उनमें तुम जीवन का वरण करो सच्चा जीवन प्राप्त करने का दृढ़ संकल्प करो।
(श्री लालचन्द्र जी, मेरठ)
आपरा की सद्भावना अनिवार्य है। हर परस्पर सन्देह और संशय करके तो भय को ही उत्पन्न करेंगे और एक दूसरे का हास और अन्ततः नाश ही करेंगे। हमें आपस में विचार करना सीखना होगा। विश्वास की भित्ति पवित्रता है और पवित्र हृदयों में ही विश्वास उत्पन्न होता है। पवित्र हृदय और निर्मल बुद्धि में सद्भावना का उदय होता है। सद्भावना परम आवश्यक है। सद्भावना से ही आपस का दृष्टिकोण सम्यक् बनता है। सद्भावना के अभाव में तो एक दूसरे में सन्देह और भय की ही उत्पत्ति है। हम आपस में क्यों एक दूसरे से भय करें।
भय की जाँच की जाय तो इसका छिपा हुआ कारण निजी या सामूहिक स्वार्थ ही होता है, और जब वह स्वार्थ किसी देश और जाति भर में फैल जाता है तो एक दूसरे राष्ट्र पर सन्देह होने लगता है। जब राष्ट्र आपस में एक दूसरे की उन्नति और प्रगति को सन्देह की दृष्टि से देखने लगते हैं तो वास्तव में उनकी सम्यक् दृष्टि रहती ही नहीं, वे रंगी हुई ऐनक से ही देखते हैं और चाहे वह रंग उनका अपना ही चढ़ाया हुआ हो, जब तक वह रंग ऐनक के आइनों पर चढ़ा रहेगा, सभी उसी रंग में रंगे दीखेंगे और जब हम दूसरे राष्ट्र को सन्देह की दृष्टि से देखेंगे तो वह हमें क्यों न सन्देह की दृष्टि से देखे? इस प्रकार संदेह और भय का एक चक्र बन जाता है। क्या आजकल राष्ट्र इस प्रकार एक दूसरे से दूर नहीं होते जा रहे?
छिपी हुई दूषित अथवा विशुद्ध मनोवृत्ति व्यवहार में प्रकट हो जाती है। मनोवृत्ति को छिपा कर ऊपर से शिष्टता का व्यवहार भी बहुत देखने में आ रहा है, पर वास्तविकता छिपाये नहीं छिप सकती। हमें सबको मित्र दृष्टि से देखना चाहिए, मन में किसी प्रकार की मलिनता का स्थान नहीं देना चाहिए, पर साथ ही सचेत और सावधान भी रहना चाहिये कि कहीं हमारी सरलता से ही लाभ न उठाया जाये। सतर्क रहना सावधान रहना चाहिए, पर मनोमालिन्य अच्छा नहीं।
जो व्यवहार हम चाहते हैं कि लोग हमसे करें, वैसा व्यवहार हमें स्वयं भी औरों से करना चाहिए। कोई नहीं चाहता कि उससे छल हो तो वह स्वयं किसी को क्यों छले? प्रायः लोग अपने से तो भला व्यवहार चाहते हैं पर दूसरों से सरल सीधा व्यवहार नहीं करना चाहते। यही कारण आपस के सन्देह का होता है। क्या एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र की राष्ट्रीयता को भंग करके वहाँ के लोगों को पददलित करके अपना स्वार्थ पूरा करे? पर इतिहास साक्षी है कि सबल राष्ट्रों ने ऐसा किया है। लूट-खसोट ही नहीं मानवता के नाते भी भुला दिये गये और विजित देख के लोग दास बनाये गये उनके उद्योग धंधे नष्ट किये गये और उन्हें बुरी तरह दबाया गया और यह सब विजित लोगों के ही हितों के नाम पर किया गया। यह क्यों हो सका? कारण स्पष्ट है विजित देशों में जब सहानुभूति नहीं रहती, सम्वेदना नहीं रहती, तो आपस का सहयोग भी नहीं रहा करता। यह अनुभूति जैसी देशों की जनता के विषय में सत्य हुई वैसी ही व्यक्तियों में भी देखी गई। जिन लोगों में आपस की सद्भावना नहीं रहती उनमें सहानुभूति भी नहीं रहती और वे मिलकर एक उद्देश्य से कार्य भी नहीं कर सकते। इन्हीं दुर्बलताओं को आक्रमणकारी राष्ट्र भांप लेता है और अपनी स्वार्थ पूर्ति करता है। विजित लोगों के हृदय आपस में तो मिले हुए होते ही नहीं उनमें और चौड़ी खाई बनादी जाती है, और विजेता लोगों को हर प्रकार से वृद्धि तथा विजित लोगों का ह्रास आरम्भ हो जाता है। दुःख की अनुभूति भी पुनरुत्थान के लिये मनुष्य को उत्तेजित करने में सहायक होती है और विजित लोग जिन्हें अपनी दासता असह्य हो जाती है वे विजेताओं से उकता कर आपस में मिलकर आपस में एक उद्देश्य के लिए संगठित होकर तत्परता और पूरी लगन से कार्य करना सीख लेते हैं। सहानुभूति का उदय होता है, स्वार्थ नहीं उभरने पाता और आपस के सहयोग तथा विजेताओं से पूर्ण असहयोग करके वे शक्ति संपन्न हो जाते हैं। सहयोग में अनुपम शक्ति है। जो कार्य व्यक्ति से नहीं हो पाता वही कार्य मिलकर करने में सुगम हो जाता है और सहर्ष सम्पन्न होता है। सहयोग से इस प्रकार पुनः चक्र बदलने लगता है और वही जनता जो पहले पददलित और तिरस्कृत थी वश प्राप्त करती है और विश्व में उसकी कीर्ति फैलती है सहयोग महान अद्भुत शक्ति है। भारतीय जनता इसी प्रकार अपना खोया हुआ गौरव पा सकी है और अब हमारा जनतंत्र विश्व भर में आदर पा रहा है। सहयोग से सफलता और कीर्ति निहित है।
सद्भावना से एक दूसरे को ठीक-ठीक जानना और आपस में एका उत्पन्न करना, सहानुभूति से आपस में एक दूसरे के हृदय में प्रवेश करना और हृदयों का समन्वय करना तथा सहयोग से सामर्थ्य प्राप्त करना यह क्रम है महत्वाकांक्षी की पूर्ति का सहयोग ही यज्ञ है। यज्ञ कभी विफल नहीं हुआ। सभी शक्तियों में सहयोग होने से एक अत्यंत महान शक्ति का उदय होता है जिससे सभी में नया उत्साह साहस और वस्तुतः कार्यक्षमता युक्त नवजीवन उदय होता है।
(महात्मा प्रभु आश्रित जी, रोहतक)
क्रोध, चाण्डाल है, यह निम्न सच्ची गाथा से स्पष्ट होगा।
महाराज विक्रमादित्य एक दिन अपने योगी गुरु के पास गये और उनसे पूछा—लोग मुझे महाराजा विक्रमादित्य क्यों कहते हैं? गुरु ने आदेश किया- कल प्रातः उठने के बाद सबसे प्रथम जिससे भेंट हो जाय, उससे पूछ लेना।
विक्रमादित्य को प्रातः सर्व प्रथम भंगिन से भेंट हुई। उसने राज्य और बुद्धि के अभिमान में उससे पूछना व्यर्थ समझा और नहीं पूछा। पुनः गुरु के पास गये। गुरुदेव ने पुनः वही आदेश दिया। दूसरे दिन भी उसी भंगिन से भेंट हुई। राजा ने फिर नहीं पूछा और गुरु के पास गये। गुरुदेव का फिर वही आदेश हुआ। तीसरी बार विक्रमादित्य ने गुरु आदेश स्वीकार किया।
अभिमान उन्नति के मार्ग में बाधक है। जब तक मनुष्य अपने को दूसरे की अपेक्षा बड़ा समझता है, जब तक वह परमात्मा का दर्शन कभी नहीं कर सकता। जो परमात्मा का दर्शन चाहे, उसे, भगवान् को पूर्ण रूपेण अपना सब कुछ—अपने तक को, समर्पण कर देना चाहिए।
राजा को प्रश्न पूछने में संकोच हो रहा था। गुरु आदेश का स्मरण होते ही उन्होंने भंगिन से पूछा- लोग मुझे महाराजा विक्रमादित्य क्यों कहते हैं? भंगिन ने उत्तर दिया यहाँ एक कोश उत्तर दिशा में अमुक डडडड ब्राह्मणी रहती है, उससे जाकर यह प्रश्न पूछो। विक्रमादित्य खोजते हुये ब्राह्मणी के पास पहुँचे और वही प्रश्न पूछा। ब्राह्मणी ने कहा—यहाँ से एक कोश पूर्व दिशा में एक सूखी वाटिका है। वहाँ जाओ। तुम्हारे जाते ही वह वाटिका हरी-भरी हो जायगी। फिर वाटिका का स्वामी उस स्थान का राजा आयेगा। उसे तुम वरदान माँगने पर पुत्र होने का वरदान दे देना। वही पुत्र बोलने योग्य होने पर तुम्हें इसका ठीक ठीक उत्तर देगा। ब्राह्मणी के निर्देशानुसार विक्रमादित्य ने सब काम किया। उसके जाते ही सूखी वाटिका पुष्पित-फलित हो गई। राजा आया। वरदान माँगा। विक्रमादित्य ने वरदान दे दिया। लड़का जब बोलने योग्य हुआ तो पुनः विक्रमादित्य वहाँ पहुँचा और उस लड़के से वही प्रश्न पूछा—बालक ने उत्तर में कहा-
एक अण्यडडडड था। उसमें दो भाई, अपनी माता तथा एक बहिन के साथ निवास करते थे। एक बार सात दिन पर्यन्त उन चारों को कोई भोजन नहीं मिला। सभी भूख से व्याकुल थे। आठवें दिन उन्हें भोजन सामग्री प्राप्त हुई। माता ने रसोई बना कर पत्तलों में परोसा। सभी भोजन करने को उद्यत ही थे कि उसी समय एक समाधि से उठा हुआ क्षीणकाय योगी भूख से बेहाल हो द्वार पर आया और कहा—अतिथि भूखा है, कुछ खिला दो। सुनते ही बड़े भाई ने अतीव प्रसन्नता और उल्लास से भर कर अतिथि को श्रद्धा पूर्वक अपना पत्तल उठा कर दे दिया। पर योगी भूखा ही रहा। दूसरे भाई और बहिन ने भी भोजन नहीं किया, सोचा शायद उससे अतिथि की भूख न मिटी। योगी के माँगने पर दूसरे भाई ने भी अपना पत्तल उठा कर दे दिया। उस पर भी अतिथि की भूख न मिटे। तीसरी बार बहिन अपना पत्तल उठाकर देने जा रही थी कि माँ ने एक लट्ठ उठाकर उस योगी अतिथि से यह कहती हुई मारने दौड़ी कि सात दिन के भूखे मेरे बच्चों का तुम प्राण ही ले लोगे? साधु भागे माँ ने दूर तक पीछा किया। योगी जान बचा कर भाग गया।
बालक बोला—हे महाराज विक्रमादित्य! वह सर्वप्रथम अपना भोजन देने वाले बड़े भाई आप ही थे, इसीलिये सभी आपको महाराजा विक्रमादित्य कहते हैं। दूसरा छोटा भाई मैं हूँ, जो अब राजकुमार बना है। वह ब्राह्मणी बहिन है, जो अपना हिस्सा देने की प्रतीक्षा कर रही थी और देने ही जा रही थी और चौथी वह भंगिन माँ है, जो अतिथि को लट्ठ से मारने दौड़ी थी। क्रोध चाण्डाल है। वह मनुष्य को चाण्डाल ही बना देता है।
अतिथि सेवा न होने से हमारे अन्तःकरण शुद्ध नहीं होते। सच्चे भाव से अतिथि की सेवा, अन्तःकरण की शुद्धि का एक अचूक साधन है।
क्रोध के होने से सारे धर्म विनष्ट होने लगते हैं। इस पर विजय पाने के लिये नौ साधन करने पड़ते हैं, तब अन्त में जाकर इस पर विजय मिलती है वे साधन कौन से हैं, सुनिये:—
मनु महाराज ने कहा है—
घृति क्षमा दमोऽस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः॥ घीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थ—1 धृति, 2 क्षमा, 3 दम, 4 चोरी न करना, 5 शौच, 6 इन्द्रियनिग्रह, 7 घी (बुद्धि), 8 विद्या, 9 सत्य और 10 अक्रोध (क्रोध नहीं करना) यह दसों धर्म-लक्षण हैं।
अक्रोधी बनने अथवा क्रोध पर विजय पाने के लिये सर्व प्रथम धृति-धैर्य की आवश्यकता है। एक बात की गाँठ बाँध लें कि क्रोध की वंशावली में मोह, काम, लोभ और अहंकार रूपी, यह बली सन्तान है। जहाँ धैर्य होगा वहाँ मोह न होगा और जहाँ मोह होगा, वहाँ धैर्य न होगा। अतः क्रोध को समूल नष्ट करने के लिये सर्व प्रथम मोह का नाश कीजिये अर्थात् अपने अन्दर धैर्य का गुण उत्पन्न कीजिये।
दूसरा गुण जिसको प्राप्त करना है, वह है क्षमा। क्षमा के भाव हैं किसी के कटु व्यवहार अथवा वचन को सहन करना, प्रतिकार के भाव अपने अन्दर न लाना। प्रतिकार का भाव आया नहीं कि क्रोध-द्वेष का अंकुर फूटा नहीं। अनुकूल वातावरण बन जाने पर भयंकर रूप धारण कर विनाश का कारण बन जायगा। वेद ने कहा है:—
“ऐ मनुष्यों तुम क्षमा करना सीखो। क्षमा तब करो जब अपराधी पश्चात्ताप करले।” ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्।’
क्षमा वीर पुरुषों का भूषण है। अहंकार के कारण क्षमा नहीं होती। वेद में आया है— मानो वधाय हत्नवे जिहीडानस्य रीरधः। मा हृणानस्य मन्यवे॥ भावार्थ—ईश्वर उपदेश करते हैं कि हे मनुष्यों! जो अल्पबुद्धि वाले अज्ञानी मनुष्य, अपनी अज्ञानता से तुम्हारा अपराध करें और अपराध करके लज्जित हों, अर्थात् तुम से क्षमा करावे तो उस पर क्रोध मत करो-किन्तु, उसका अपराध सहन कर लो और यथावत् दण्ड भी दो।
तीसरा गुण है, दम इन्द्रियों का दमन करना। दमन न करेंगे तो हम समझ न सकेंगे। कामी आदमी दमन नहीं कर सकता।
चौथा गुण है, अस्तेय-चोरी न करना। दूसरे की वस्तु का लोभ करना भी चोरी है। आत्मा का सबसे बड़ा सूक्ष्म यन्त्र संकल्प है। संकल्प से भी चोरी हो सकती है। जैसे किसी की उत्तम वस्तु देखी, संकल्प हुआ कि यह मेरी हो जाय। द्रव्य की चोरी के अलावा विचार-ज्ञान की चोरी भी होती है। चोरी का मूल कारण लोभ है। लोभ के कारण मनुष्य अस्तेय का पालन नहीं कर सकता।
पांचवां गुण है शौच। मन की अपवित्रता का कारण राग-द्वेष है, जहां राग-द्वेष है, वहाँ सत्य की प्राप्ति नहीं हो सकती है। क्रोध के कारण से पवित्रता नहीं आ सकती।
छठा गुण है, इन्द्रियनिग्रह—इन्द्रियों की पड़ताल करना। दम और इन्द्रियनिग्रह में यह भेद है- दम का अर्थ है, पापवृत्ति को दबाना और इन्द्रियनिग्रह का अर्थ है पापवृत्ति को रोकना, आने न देना। इन्द्रियनिग्रह, मानों एक चौकीदार है, जो द्वार पर बैठा हुआ अन्दर प्रवेश करने वाले को अन्दर जाने से रोक देता है।
इन छह गुणों की प्राप्ति पर सातवें गुण धी- बुद्धि की उपलब्धि होती है। तब बुद्धि से विद्या की—आठवाँ गुण है और विद्या के द्वारा सत्य की, जो न गुण है- की प्राप्ति होती है। बस आखिरी मञ्जिल क्रोध पर विजय अर्थात् अक्रोध की प्राप्ति स्वयं सिद्ध हो जायगी।
अब प्रश्न है, इन गुणों को धारण कैसे किया जाय? इन गुणों को धारण करने के लिये सब से प्रथम श्रद्धा चाहिये। श्रद्धा ही बीज है। वेद ने कहा है:—
“श्रद्धया सत्यमाप्यते”-यजु. 19-30॥ श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। इसलिये जहाँ सत्य है, वहाँ हम उसका आदर करें। सत्य वेद में है। ‘वेद तो जड़ है’ यदि इस भावना से हम वेद का आदर न करें, तो हम भी जड़ बन जायेंगे यानी हमारी बुद्धि जड़ बन जायेगी।
सिक्ख लोग ग्रन्थ साहिब को गुरु की देह मानते हैं। वैसी ही श्रद्धा हमें वेदों के प्रति होनी चाहिये।
श्रद्धा तो मिलेगी चेतन में, जड़ में नहीं। चेतनता तो मनुष्यों में है। यह चैतन्य ज्ञानियों के मस्तिष्क में निवास करती है। अतः हमें उन ज्ञानियों का आदर और सम्मान करना चाहिये। परोक्ष-अपरोक्ष एक समान हो। भीतर-बाहर में अनुकूलता हो।
हृदय रूपी खेतों में श्रद्धा को बोओ, जैसे गेहूँ को बोते हो। जिसकी जड़ भूमि में दूर तक—शहौं तक जायगी, वह पेड़ सदा हरा भार रहेगा। कारण कि उस जड़ में सूक्ष्म तन्तु, जो शहौं तक पहुँचती है, वह शहौं से जल खींचकर जड़ में और जड़ के द्वारा मूलाधार में, वहाँ से शाखाओं में, पत्तों में, फूलों आदि में, पेड़ के अँग-अँग में पहुँचता है। इसलिये सूर्य का ताप उस को तपा नहीं सकता। तो भाइयों! इसी प्रकार जिस श्रद्धा रूपी मूलाधार की जड़ नम्रता है और नम्रता की जड़ सूक्ष्म तन्तुयें उदारता और पवित्रता रज्जु बन कर परमात्मा रूपी शहौं (मूल केन्द्रीय सरोवर) तक पहुँच गयी, वह वहाँ से अमृत रस खींचकर, नम्रता में, नम्रता से श्रद्धा में, और श्रद्धा कर्मरूपी पेड़ में और फिर उसके पत्तों (वासनाओं) में और फलों में पहुँचकर आनन्द रस पान करता हुआ सदा हरा भरा रहेगा और संसार के भयंकर से भयंकर ताप भी उसे नहीं तपा सकेंगे। वह सदा शान्त और हरा भरा रहेगा। प्रभु करें कि यह मर्म की बातें हमारे कानों से गुजरती हुई, हमारे हृदयों में जाकर स्थिर हो जायं और वह सदा जीवन का उत्थान एवं कल्याण करता रहे।
(राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद जी का एक भाषण)
मेरा विश्वास है कि कोई भी विचारशील व्यक्ति इस बात से इन्कार नहीं करेगा कि-कोई जाति या राष्ट्र तब तक सफलता से आगे नहीं बढ़ सकता, जब तक उसे अपनी ऐतिहासिक चेतना का, अपनी मानसिक प्रवृत्तियों, शक्ति और साधनों का यथावत् ज्ञान न हो, क्योंकि ऐसी जाति के व्यक्तियों में किसी भी कार्यक्रम के हुए वह मतैक्य और वह उत्साह नहीं हो सकता जो अब होता है, जब जातीय चेतना के मनोनुकूल और कोई कार्यक्रम हाथ में लिया जाता है। जातीय चेतना से सर्वथा अनभिज्ञ जननायक, जन-शक्ति को प्रगति के लिए प्रयोग में लाने में वैसे ही असमर्थ होगा, जैसे कि जलशास्त्र से सर्वथा अपरिचित कोई व्यक्ति नदी को बाँधकर उसे रचनात्मक कार्यों के लिए प्रयोग करने में असमर्थ होता है।
महात्मा गाँधीजी ने इस सत्य को खूब पहचाना था और उन्होंने भारत में राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्रान्ति का जो कार्यक्रम बनाया था, वह हमारी ऐतिहासिक जातीय चेतना के ठीक ठीक ज्ञान पर ही आश्रित था और इसी हेतु उस कार्यक्रम को यहाँ की साधारण जनता का सहज में ही उत्साहप्रद समर्थन और सहयोग मिल गया था। अतः मेरा यह आग्रह है कि भारत के सुन्दर भविष्य के लिए, उसकी आर्थिक और साँस्कृतिक प्रगति के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि हम अपनी जातीय चेतना को पहचानने का यथोचित प्रबन्ध करें। इस प्रबन्ध का एक प्रमुख अँग संस्कृत अध्ययन के लिए प्रबन्ध करना है, क्योंकि संस्कृत में ही तो अधिकतर वह सामग्री है जिसके आधार पर हम अपने जातीय स्वरूप को यथावत् पहचान और जान सकते हैं।
दान की नदी
उन्होंने कहा—मुझे इस बात का खेद है कि इस दिशा में जैसी व्यवस्था होनी चाहिए, जितना धन, समय और शक्ति लगनी चाहिए, वैसी न तो व्यवस्था है और न उतना धन, समय और शक्ति हम लगा रहे हैं। एक समय था जब राज्य और समाज दोनों ही संस्कृत के अध्ययन का पोषण करते थे। राज-दरबार में संस्कृत के पण्डितों और कवियों का बड़ा आदर सम्मान होता था और राजा तथा सामन्तगण उन्हें प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए पर्याप्त धेनु, धन और धान्य देते थे। समाज के कार्य से भी संस्कृत का इतना घनिष्ठ सम्बन्ध था कि वह कोई महत्वपूर्ण कदम उसकी सहायता के बिना उठा ही न सकता था। अतः दान की नदी समाज स्रोत से निकलकर सर्वदा ही संस्कृत पंडितों और आचार्यों का आर्थिक जीवन उर्वर बनाती रहती थी।
उस युग में संस्कृत विद्वानों ने जीवन के हर क्षेत्र में अनिर्वचनीय कार्य किया। विज्ञान, कला, साहित्य इन सबका ही भंडार उन्होंने अपने परिश्रम और प्रज्ञा से भरा। यह कहना अनुचित न होगा कि इन संस्कृत विद्वानों ने भारत को वह ज्ञान और शील-निधि प्रदान की, जो आज भी जगत् भर के लोगों को आश्चर्यचकित कर रही है। किन्तु युग बदला और राज्य का परिश्रय संस्कृत के विद्वानों को न रहा। फिर भी यदि संस्कृत अध्ययन जारी रहा, फिर भी यदि संस्कृत के पंडित भारतीय साहित्य, दर्शन और कला के कोष को समृद्ध करते रहे तो वह इसी बल पर कि समाज से आने वाली दान सरिता तब भी पर्याप्त चौड़ी और गहरी थी और उसके धन-जल से इन पण्डितों का जीवन सिंचता रहता था। किन्तु अभी लगभग दो शताब्दियों पूर्व से समाज की यह दान-सरिता भी कुछ सूखने सी लगी है।
भारत का प्रकाश-स्तम्भ बदला
अँग्रेजी राज्यकाल में शिक्षा की कुछ ऐसी व्यवस्था हुई कि हमारे देश में यह भावना घर करने लगी कि हमारी अपनी ऐतिहासिक परम्पराऐं, संस्कार, रीति रिवाज सब व्यर्थ और हानिकारक हैं और इसलिए उनको छोड़कर विदेशी सभ्यता को अपनाने में ही हमारा कल्याण है। अतः शनैः शनैः संस्कृत विद्वानों और आचार्यों के आर्थिक साधन कम होते गए हैं और वे दरिद्रता के भंवर में डूबते गए हैं। जिस निधि के वे संरक्षक और फैलाने वाले थे, जब उसी के प्रति लोगों के मन में उपेक्षा होने लगी, तो भला यह कैसे हो सकता था कि उन विद्वानों और आचार्यों के प्रति लोगों की आदर-भावना बनी रहे। अतः जो लोग समाज के शिरमौर माने जाते थे, जिन्हें सब लोग पूज्य समझते थे, वे ही समाज में सबसे उपेक्षणीय और परिहास के पात्र समझे जाने लगे। समाज में उन आचार्यों का स्थान लिया अँग्रेजी भाषा और अंग्रेजी संस्कृति के पंडितों ने और भारत का प्रकाश स्तम्भ और सूर्य बन गया इंग्लैंड।
इस परिवर्तन का ज्वलन्त उदाहरण यही है कि इस युग में देश की आँखें काशी की ओर न रह कर कलकत्ते की ओर लग गईं। किन्तु इस उपेक्षा और उपहास के युग में भी संस्कृत बनी रही और संस्कृत के विद्वान बने रहे। यह इसीलिए सम्भव हुआ क्योंकि संस्कृत और संस्कृत के विद्वानों ने कभी लक्ष्मी की दासता स्वीकार न की थी। सहस्राब्दियों पूर्व उनके गुरुओं ने यह परम्परा चला दी थी कि सरस्वती के उपासक का धन-धान्य और सम्मान-आदर का मोह न करना चाहिए। उनका तो यह आग्रह था कि चाहे नीति-चतुर प्रशंसा करें अथवा निन्दा, चाहे धन मिले या जाए, आज ही मृत्यु सिर दबा ले अथवा युगभर की डडडडडडडडडडडडडडडडडड धीर लोग धर्मपथ से विचलित नहीं होते। अतः हर प्रकार की उपेक्षा, हर प्रकार की आर्थिक विपत्ति सहकर भी हमारे पंडितों ने संस्कृत को जीवित रखा और उसके भण्डार को भरते रहे।
स्वतन्त्र भारत में भी भय
किन्तु अपने धर्म-निर्वहन के साथ-साथ उनके मन में यह विश्वास भी था कि कभी-न-कभी जमाना करवट बदलेगा और इस देश के, इसकी जनता के, इसके पंडितों और आचार्यों के भाग्य फिर जगेंगे। मैं नहीं कह सकता कि स्वतंत्र भारत में उन्होंने अपने इस विश्वास, इस स्वप्न, इन आशाओं की पूर्ति की झलक देखी है या नहीं, किन्तु मुझे कभी-कभी यह भय होने लगता है कि संभवतः स्वतंत्र भारत में संस्कृत अध्ययन की यह परम्परा कहीं समाप्त न हो जाये।
आज संस्कृत विद्वानों की जो अवस्था है वह वास्तव में शोचनीय है। अभी राज्य ने संस्कृत अध्ययन को परिश्रय देने का भार अपने सिर पर नहीं लिया है। यह ठीक है कि विद्यालयों में संस्कृत अध्ययन के लिये कुछ प्रबन्ध है, किन्तु वह ऐसा नहीं है, जिसे गिनती में लिया जा सके। संस्कृत की जो पाठशालायें और विद्यालय आज तक चल रहे हैं और जिनके द्वारा ही संस्कृत-अध्ययन की परम्परा अब तक बनी रही है, उनकी अवस्था आजकल शोचनीय होती जा रही है। वहाँ से निकले विद्यार्थियों का हमारे आधुनिक जीवन में लगभग न कुछ के बराबर स्थान है और फल यह है कि आज संस्कृत के आचार्य नौकरी करने को तैयार मिलते हैं और फिर भी उनको नौकरी नहीं मिलती।
अश्रद्धा का प्रमाण
संस्कृत विद्या और संस्कृत पठन-पाठन के प्रति हमारी उदासीनता और तज्जनित आर्थिक कठिनाइयों का और उन लोगों में भी जो आज तक हजार कष्ट सह कर और हमारे प्राचीन अदत्त आदर्शों से प्रभावित होकर संस्कृत अध्ययन-अध्यापन में पीढ़ियों से लगे हुये थे, उनके प्रति अश्रद्धा का दूसरा क्या प्रमाण हो सकता है कि काशी जैसे एक पीठ-स्थान में भी कितने ही आचार्यों के वंशज आज उस पैतृक विद्या का आश्रय छोड़कर आधुनिक शिक्षा ग्रहण करके ऊँची तनख्वाह वाली नौकरियाँ ले रहे हैं।
इसलिये हमें जहाँ एक ओर संस्कृत को जीविकोपयोगी विद्या बनाना है वहाँ इसे भी भूलना नहीं कि उसको आज तक जीवित रखने वाले वही धन्य पुरुष हुए हैं जो इसे केवल अर्थोपार्जन का साधन नहीं मानते थे। समाज को भी अपनी ऐसी भूमिका बनानी है जिसमें मान-मर्यादा, प्रतिष्ठा-संस्कार सभी लक्ष्मी के ही अनुगामी न बनकर सरस्वती के लिये सुरक्षित रहें और लक्ष्मी के लिए धन-जनित शान-शौकत और लाभ कार्य छोड़े रखा जाये।
अतः हम सबको इस बात पर बड़े धैर्य से विचार करना है कि हम क्या उपाय करें, जिनसे संस्कृत का अध्ययन घटने के बजाय देश में और अधिक प्रसृत हो। सर्व-प्रथम तो हमारे सामने यह प्रश्न है कि भविष्य में संस्कृत पाठशालाओं और विद्यालयों के लिए वित्त का कैसे प्रबन्ध हो। अब तक जो इन पाठशालाओं को दानशील रियासतों, जमींदारों और सेठ, साहूकारों से आवश्यक वेत्तिक सहायता मिल जाया करती थी। कुछ तो उनके लिए दान की गई जमींदारियों की आय के सहारे चल रही थीं, किन्तु अब तो जमींदारी व्यवस्था के उन्मूलन का हमने फैसला कर लिया है। अतः इन पाठशालाओं का वह वैत्तिक स्रोत तो शीघ्र ही सूख जायगा। सेठ, साहूकारों से भी मिलने वाली सहायता का भी कुछ ज्यादा दिन के लिये भरोसा नहीं है।
सच तो यह है कि आज राज्य ने इतने अधिक मात्रा में सामाजिक सूत्र अपने हाथ में ले लिये हैं कि यदि राज्य ने संस्कृत अध्ययन के वित्तभार को अपने कन्धे पर न लिया तो वह संभवतः आगे न चल सकेगा। उस दिशा में राज्य सरकारें पहला काम कर सकती हैं। अब समय आ गया है कि वे संस्कृत अध्ययन के लिये आवश्यक वैत्तिक प्रबन्ध करें। जब समाज के सब सम्पत्ति-साधनों को वे अपने हाथों में ले रहीं है तो कोई कारण नहीं है कि वे समाज के उत्तरदायित्वों को अपने सिर पर क्यों न लें। मेरा विचार है कि भारत की राज्य सरकारों का अब यह धर्म है कि वे अपने कोष से संस्कृत अध्ययन के लिये पर्याप्त सहायता देना आरंभ करें।
साथ ही यहाँ उद्योगपतियों को भी अपना यह धर्म मानना चाहिए कि अपने दान का एक अंश विश्व-विद्यालयों में संस्कृत अध्ययन के लिए विशिष्ट पीठियों की स्थापना के लिए लगायें। इंग्लैंड और अमरीका में वहाँ की भाषाओं के प्रमुख कलाकारों और साहित्यिकों की कृतियों और जीवन के अध्ययन के लिए वहाँ के धनिकों ने वहाँ के विश्वविद्यालयों में विशिष्ट पीठियों की स्थापना के लिए पर्याप्त दान दिया है। मैं समझता हूँ कि हमारे यहाँ के धनिक वर्ग को भी ऐसा ही करना चाहिए।
सहस्राब्दियों से संस्कृत का आधार-तल और पृष्ठभूमि वह अध्यात्मवाद रहा है जो भारत की मानवता की देन है। सहस्राब्दियां व्यतीत हो गई जब भारत में प्रथम बार इस विश्वास का जन्म हुआ कि इस जगत् की हर प्रकार की विपत्ति, बाधाओं, कमियों और कठिनाइयों से मानव तब तक मुक्ति नहीं पा सकता जब तक कि उसका जीवन सत्य की उपासना, सेवा का अटल व्रत और न्याय की अविचल निष्ठा नहीं बन जाता।
इन आदर्श को कृष्णार्पण का नाम दिया अर्थात् व्यक्ति जो कुछ भी करे वह उस श्रद्धा से और इच्छा से करे कि वह यह समस्त विश्व और उससे भी परे विश्वात्मा की प्रसन्नता के लिए कर रहा है, केवल अपनी इन्द्रियों के सन्तोष के लिये नहीं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं था कि व्यक्ति अपने साँसारिक कर्तव्यों को परित्याग करके किसी जंगल में जा बैठे। इसका केवल यही अर्थ था कि वह अपना कोई भी साँसारिक काम अपनी स्वार्थ बुद्धि से न करे वरन् इस विचार से करे कि यही विश्वात्मा की इच्छा के अनुकूल है और वैसा ही करके वह अपने अहं की कैद से छूटकर अपने सच्चे विश्व स्वरूप को पहचान सकता है। इसी आदर्श को हमारे कवियों ने अपने काव्यों में बुना है, हमारे साहित्यकारों ने अपनी कृतियों में दर्शाया है। पुराण इसी का गुणगान करते हैं और दर्शन भी इसी से प्रभावित हैं। वास्तव में यह कहना अनुचित न होगा कि यह आदर्श हमारी जातीय अनुभूति के ताने बाने में बुना हुआ है। सम्पूर्ण संस्कृत वांग्मय का प्राण और प्रेरणा यही आदर्श है। संस्कृत नाटक, संस्कृत आख्यान और कथायें संस्कृत महाकाव्य, संस्कृत शास्त्र, संस्कृत विज्ञान सर्वत्र ही इसका साम्राज्य है। अतः यह स्पष्ट है कि संस्कृत साहित्य का विद्यार्थी इस आदर्श से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
मेरा विचार है कि जगत् को हम जो सबसे बड़ी देन दे सकते हैं, वह यही आदर्श है और यह देन हम तब ही दे पायेंगे जब न केवल हमारी भूमि और हमारे औद्योगिक यंत्र विशाल धन धान्य की सरिता के ही स्रोत बन गये होंगे, वरन् उनमें कार्य करने वाले श्रमिक और कृषक भी इसी आदर्श से प्रेरित होंगे। उस स्वर्णिम युग की स्थापना के लिए हमें अनर्थक परिश्रम करना है और अनेक प्रकार के आयोजन करने हैं। किंतु इन सब प्रयासों और आयोजनों की महत्त्वपूर्ण शर्त यह है कि शिल्पिक-शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा की खाई पट जाये। संस्कृत वह सेतु है जो इस खाई को पाटता है और इसी दृष्टि से आधुनिक जगत् में उसकी शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध होना चाहिए।
(श्री आनन्द जी टीकापट्टी)
शक्ति, बल का सूचक है। बल या शक्ति मूलतः एक ही है, किन्तु ‘करण’ भेद से उसके रूप और नाम में भेद और अनेकतायें उत्पन्न हो जाती हैं, जैसे आध्यात्मिक बल, बौद्धिक शक्ति, नैतिक बल, मानसिक बल, शारीरिक बल, प्राणशक्ति आदि-आदि। किन्तु अभी तक मानव का विकास ‘नव-तत्व’ तक ही होने से, यही इसका प्रधानबल कहा जाता है, यद्यपि भारत की विकसित विचारधारा ने आध्यात्मिक बल को ही सर्वोच्च बल स्वीकार किया है और इस बल या सम्पूर्ण बलों का एकमात्र केन्द्र आत्मा या परमात्मा है, यहाँ की संस्कृति एवं ज्ञान को एकमात्र यही निश्चय और निर्णय सन्तुष्टि और सत्याधार प्रदान करता है।
चूँकि साधारणतया मानव-जीवन का प्रधान सञ्चालन मन-बुद्धि के द्वारा ही हम होते देखते हैं, इसीलिये मनोबल पर ही यहाँ विचार किया जा रहा।
मन और बुद्धि में भी थोड़े भेद हैं। संकल्प-विकल्प शक्ति वाला ‘करण’ मन है और उसे निश्चयता-स्थिरता प्रदान करने वाला तत्व ‘बुद्धि’ नाम से अभिहित है। यहाँ मनस्तत्व में मन और बुद्धि को एक साथ ही ले लिया गया है।
अब सोचना है कि ‘मन’ में ये बल कहां से और कैसे आते हैं?
विचारकों का कथन है कि एकाग्रता से मन में शक्ति आती है। विचार करने से लगता है कि मन की एकाग्र दशा में अवश्य ही शक्ति, या शक्तियों का प्रवेश मन में होने लगता है, किन्तु इससे यह पता नहीं लगता कि इसका केन्द्र भी मनः स्तर ही है। मन की एकाग्र स्थिति में होता यही है कि मानसिक चेतना की बिखरी हुई शक्तियाँ एकत्रित और एकीभूत होकर एक बड़ी और विशाल मानसिक शक्ति बन जाती है पर वह चेतना तो मन का निजी स्वत्व नहीं है, जिस पर उसका पूरा-पूरा अधिकार हो। फिर भी यह एक सत्य है कि मन की एकाग्र दशा में उसका बल अवश्य ही बढ़ने लगता है। जितना ही अधिक यह एकाग्र होता है उतना ही अधिक बलशाली होता जाता है, ऐसा अनेकों का अनुभव है। उक्त अनुभव पर हम यह भी जान सकते हैं कि जितना ही यह (मन) बिखरता है—विभिन्न इच्छाओं-विचारों और कामनाओं का संचरण और गति करता है, उतना ही यह निर्बल और क्षीणशक्त वाला होता जाता है। इसीलिये चिन्ता करने वाले, मन को स्थिर और शान्त रखने में असमर्थ व्यक्ति किसी काम को लगन के साथ नहीं कर पाते। वह जो कुछ काम करता है खण्डित मन से करता है। मन की चंचल गति उस कार्य की सफलता पर विश्वास नहीं करने देती। परिणाम होता है कि कार्य की विफलता के साथ ही उसकी शक्ति भी व्यर्थ खर्च हो जाती है और यह असफलता का आधान उसकी अवशिष्ट शक्तियों को भी क्रमशः क्षीण और निरुत्साहित करता रहता है।
एकाग्र मनोदशा में जो मानसिक बलों की अभिवृद्धि होती है, उसका बल का केन्द्र कहाँ है, इसे तो हम साधारण विचार से नहीं देख सकते, पर हम अनुभव तो ले ही सकते हैं, कि मन की एकाग्र और प्रशान्त दशा उसकी बलवृद्धि का कारण है। गीता के छठे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा है कि यद्यपि मन को रोकना, वायु को रोकने के सदृश दुष्कर है, किन्तु ऐसा बिना किये योग में सफलता पाने का भी तो उपाय नहीं है। इसे रोकने के लिये अभ्यास और वैराग्य को वहाँ आवश्यक साधन के तौर पर समुपस्थित किया है।
कुछ वर्तमान मनोवैज्ञानिक विचारकों ने ‘शिथिलीकरण’ के अभ्यास तथा मन को रचनात्मक कामों में लगाने से, मानसिक शक्ति के ह्रास को रोकने का साधन भी माना है। उनका कहना है—
मानसिक शक्ति बढ़ाने के दो उपाय हैं:—एक वर्तमान शक्ति को विनष्ट होने से रोकना और दूसरा नई शक्ति की प्राप्ति की चेष्टा करना। वर्तमान मानसिक शक्ति का विनाश मन को रचनात्मक काम में लगाने और “शैथिलीकरण” (शिथिलीकरण) के अभ्यास से रोका जा सकता है। सम्मेलन से ही अधिक सफलता प्राप्त होती है। जब मनुष्य किसी कार्य में सफल हो जाता है तो उसका आत्म विश्वास बढ़ जाता है। आत्मविश्वास की वृद्धि, चरित्रनिर्माण का केन्द्र है। अपना काम मनुष्य का आत्म विश्वास बढ़ाता है और उसकी ख्याति उसका अभिमान बढ़ाती है। आत्मविश्वास सब प्रकार की सफलता का श्रोत है और ख्याति मनुष्य की विनाशक है। जब मनुष्य में ख्याति से दम्भ आ जाता है तो उसकी ख्याति ही उसे खा जाती है। अतएव मनुष्य को सदा रचनात्मक काम में लगे रहना चाहिये। रचनात्मक कार्य वह है, जिससे किसी प्रकार अपना और दूसरे लोगों का कल्याण हो, जिसके करने के पश्चात् आत्मग्लानि न होकर आत्म प्रसाद की अनुभूति हो।
मानसिक शक्ति की वृद्धि, उसका अपव्यय रोकने से भी होती है। मानसिक शक्ति का अपव्यय सदा संकल्प-विकल्प को चलते रहने देने से होता है। इनको रोकने के लिये शैथिलीकरण का अभ्यास करना आवश्यक है। शैथिलीकरण का अभ्यास शरीर से आरम्भ करके मन की ओर बढ़ाया जा सकता है।
“नई मानसिक शक्ति का उत्पादन अपने आदर्श पर मनन करने से होता है। जो मनुष्य जितना ही अधिक अपने आदर्श के विषय में चिन्तन करता है वह उतना ही अधिक मानसिक शक्ति को बढ़ा लेता है।”
“मनुष्य की शक्ति उसके आदर्श स्वत्व की शक्ति है। यदि मनुष्य का वर्तमान स्वत्व नीचा है, परन्तु यदि उसका आदर्श स्वत्व ऊँचा है तो वह व्यक्ति एक दिन अवश्य महान व्यक्ति हो जावेगा।”
“मनुष्य की सभी शक्ति समष्टि भाव की शक्ति है। जब तक मनुष्य अपने आप को भुलाये रहता है और समष्टि के हित के लिये चिन्तन करता है तब तक वह अपने में असीम शक्ति पाता है, परन्तु जब वह इस शक्ति का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ साधन के लिये करने लगता है तो वह अपना विनाश कर लेता है।......... अपने आपको भुलाने से मनुष्य अपना परमात्मा से ऐक्य कर देता है। तब वह शक्तिवान हो जाता है।”
उपर्युक्त उद्धरणों से मन को शक्तिशाली बनाने के निम्नलिखित साधन जानने में आते हैं।
1—शिथिलीकरण का अभ्यास।
2—रचनात्मक कामों में सदा लगे रहना।
3—आदर्श का चिन्तन और मनन करना।
4—व्यष्टि भाव भुलाकर समष्टि भाव में डूबना।
ये सभी साधन स्वभावतः ही अभ्यास और वैराग्य में आ जाते हैं। बिना इन दोनों का उपयोग किये सफलता और सिद्धि सदा दूर ही रहेगी।
अब एकबार जरा गम्भीरता से सोचें।
शिथिलीकरण:—शिथिलीकरण की सिद्धि एक ऐसी सिद्धि है कि योगीगण कहते हैं—इससे 6-7 घन्टे नीन्द का लाभ छह सात मिनट में लिये जा सकते हैं।
शरीर को चुपचाप छोड़ देना ही शिथिलीकरण नहीं है। मन और प्राण की चञ्चलता, शरीर को सदा तनाव की दशा में रखती है अतः मन और प्राण को बिना शान्त किये शरीर शिथिल हो ही नहीं सकता। मन प्राण एवं शरीर के शान्त होते ही विश्व व्यापिनी प्राणशक्ति उसी भाँति शरीर में प्रविष्ट होने लगती है, जिस भाँति नल खोल देने से जल की धारा अप्रतिहत गति से बहने लगती है। शरीर मन, प्राण सभी शक्ति से परिप्लावित हो जाते हैं।
2—रचनात्मक कामों में सदा लगे रहना।
हम जैसा बनना चाहते हैं शरीर मन बुद्धि से सदा वैसे ही कामों में लगे रहना ही रचनात्मक कार्य में लगे रहना है। इसी बारम्बार के प्रयत्न—अभ्यास द्वारा ही नवीन-उत्कृष्ट स्वभाव वृत्ति और कार्य बनाये जा सकते हैं।
3—आदर्श का निरन्तर चिन्तन और मनन।
वेदान्त में भृंगी और कीट का उदाहरण सवा प्रसिद्ध है। कीट चिन्तन करता-करता अन्त में भृंगी ही बन जाता है। अतः आदर्श के सदैव चिन्तन-मनन से सभी वैसे अवश्य ही हो सकते हैं।
4—व्यष्टि भाव को भूल कर समष्टि भाव में तल्लीन होना।
यह विचार तीसरे विचार का परिपूरक है। कीट यदि अपनी आकृति की ही याद रक्खे तो वह कभी भृंगी नहीं बन सकेगा। अतः हम अपने को अपने आदर्श में विलीन करके ही वैसा बन सकते हैं इसमें कोई सन्देह नहीं है।
तो अपने मानसिक शक्ति की अभिवृद्धि के लिये ये सब अभ्यास उपयोगी हैं, पर अभ्यास के साथ वैराग्य को क्यों परिपूरक स्थान दिया गया है?
हमारा युग-युग का स्वभाव रहता आया है विषयों की ओर खिंचते रहने का। यदि हम इस राग का परित्याग नहीं करें तो सूखा-प्राण विहीन अभ्यास ही केवल नवीन, उन्नत स्वभाव, वृत्ति का निर्माण कदापि नहीं कर सकता। अभ्यास यदि शरीर है तो वैराग्य उसका प्राण। दोनों के समुचित समन्वय से ही मनोबल की प्राप्ति या अन्य उत्कृष्टतर सिद्धियाँ उपलब्ध की जा सकती हैं।
अब अन्त में हम केन्द्रीय-विषय पर विचार कर लें। “यह तो हम जान सके कि मन की एकाग्र या शान्त दशा ही उसके लिये शक्ति संग्रहण की उपयुक्त स्थिति है। पर ये शक्तियाँ आती कहाँ से हैं? क्या मनस्तत्व में ही इसका निवास-केन्द्र भी है?
उपनिषद् में कहा है—मन जिसका मनन नहीं कर पाते, पर स्वयं मन ही जिसके द्वारा मनन कर लिया जाता है, वही ब्रह्म है।
यही ब्रह्म सर्व शक्तियों का धाम है। जितना ही शान्त, नीरव, एकाग्र और स्थिर हम अपने मन-प्राण शरीर का रख सकेंगे, उतना ही मात्रा में हम उनसे शक्ति ग्रहण कर सकेंगे। पर सर्वोच्च दशा में तो अपने शरीर-प्राण-मन को उसी में विलीनित कर हम स्वयं सर्वशक्ति धाम परब्रह्म बन जाते हैं।
(श्रीमती डा. विमला माथुर)
आप कितनी भी कठिन परिस्थितियों में क्यों न हों, आप अपनी खिन्नता, अपनी मानसिक दशा परिवर्तित करके दूर कर सकते हैं। मस्तिष्क के एक भाग (Cerebrum) से, जहाँ विचार उत्पन्न होते हैं, मस्तिष्क के दूसरे भाग (Thalamus) में जहाँ प्रसन्नता अथवा अप्रसन्नता का अनुभव करते हैं, दूसरे प्रकार के विचार भेज कर खिन्नता तथा उदासीनता दूर की जा सकती है।
निम्नलिखित नाना प्रकार की मानसिक दशाओं में भिन्न-भिन्न विचारों को अपनाइये—
(1) आप अपनी त्रुटियों एवं अवगुणों के विषय में मनन करना बन्द कर दीजिये। अन्य मनुष्यों के अवगुणों की सूची बना लीजिए और उनमें से किसी मुख्य पर ध्यान दीजिए और मनन कीजिए। अपने गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न करिए। देखिए कि आप किन-किन बातों में दूसरे मनुष्यों से बढ़कर हैं और उन बातों पर विचार कीजिए। अपने विषय में सोचने के स्थान में दूसरों के विषय में सोचिए। किसी भी काली लड़की का अत्यन्त सुन्दर महिलाओं की संगति में अपने आपको हीन अथवा निकृष्ट नहीं समझना चाहिए। उसे संगीतज्ञ और शिक्षित हो जाने का भरसक प्रयत्न करना चाहिए। अपने गुणों को बढ़ाने के विषय में सोचते रहना चाहिए और दूसरी महिलाओं से अपनी समानता करनी छोड़ देनी चाहिए। अन्य क्षेत्रों में भी जहाँ आपने समानता करने में अपने को दूसरों से कम पाया है, इसी प्रकार अपने विचारों को बदल देना चाहिए।
(2) अन्य मनुष्यों के कार्य और क्रियाओं को उनके दृष्टिकोण से भी देखिए। किसी भी विषय पर केवल अपने ही दृष्टिकोण से विचार करने और दूसरों के विचारों की प्रशंसा न कर सकने के कारण ही क्रोध उत्पन्न होता है। दूसरे मनुष्यों को सुधारने अथवा बदलने की चेष्टा मत करिए।
उपस्थित परिस्थितियों के अनुसार अपने कार्यों और योजनाओं को बदलने का संकल्प कर लीजिए। दूसरे मनुष्यों को अपनी इच्छानुसार बदलने की अपेक्षा स्वयं प्रस्तुत परिस्थिति के अनुसार अपनी योजनायें बदल दीजिए।
क्रोध से बचे रहने का मन में दृढ़ संकल्प कर लीजिए। शान्ति और प्रसन्नता अमूल्य वस्तुयें हैं। आप यदि एक बार भूखे भी रह जायं तो उसकी परवाह मत करिये और शान्त रहिए, किन्तु परेशान, एवं दुखी मत होइए।
(3) अपनी बुराई-भलाई के विषय में मत सोचा करिए। मनुष्य यदि अपने ही कष्टों और कठिनाइयों पर सोचता रहे तो वह उदासी से किसी प्रकार भी नहीं बच सकता। अन्य मनुष्यों की इच्छाओं एवं आवश्यकताओं पर सोचिए।
परिचित मनुष्यों के स्वभाव के विषय में लिख लीजिए। उनके अद्भुत आचरण और अवगुणों पर ध्यान दीजिए। यह मन बहलाने का बड़ा ही मनोरंजक ढंग है। यदि आप सच्चे मन से ऐसा करेंगे, तो आप अवश्य प्रफुल्लित दिखाई देंगे।
घर पर अथवा आफिस में अकेले मत बैठिए। दूसरे मनुष्यों से मेल बढ़ाइए और अपने विचार बदलिए। बातें अधिक करिए, और सोचिए कम।
आप पर जैसी भी बीते, उसी को सहर्ष स्वीकार कर लीजिये। अपनी असफलता, पराजय, एवं दुर्भाग्य पर अपना ध्यान मत जमाइये।
मनुष्य जैसा कार्य करता है, वैसे ही उसके मन में भाव उठते हैं। अतः कार्य करते समय अत्यन्त प्रसन्न चित्त दिखाई दीजिये, मुस्कुराइये और प्रफुलित रहिये। यदि आप ऐसा करेंगे तो शीघ्र ही प्रसन्नता का अनुभव करेंगे। इसके विपरीत आप यदि झुककर, लड़खड़ाते हुए, नीचे की ओर आँखें किये, त्यौरियाँ चढ़ाए, उदास भाव से चलेंगे तो आप अवश्य उदास हो जाएंगे। इधर-उधर की छोटी-छोटी सी बातों से असन्तुष्ट होने की अपेक्षा अपने भाग्य को सराहिए और अपने आपको धन्य समझिए। इस सिद्धान्त पर सोचिए कि ‘इससे भी बुरा हो सकता था।’ जो कुछ आपके पास नहीं है, उस पर ध्यान देने की अपेक्षा जो कुछ आपके पास है, उस पर ध्यान दीजिए। आपको अधिकतर यही सोचना चाहिए कि ‘जो कुछ मेरे पास है, उसके लिए भगवान को अनेकों बार धन्यवाद है।’
(4) चिन्ता दूर करने के उपाय हैं—विश्लेषण द्वारा निर्णय कर लेना, संकल्प, मन की शान्ति, जिस विषय से आप चिन्तित हों, उसका भली-भाँति विश्लेषण कीजिए। चिन्ता, भय का ही दूसरा बढ़ा-चढ़ा रूप है। भयभीत मन की दशाएं ही नारकीय पीड़ायें हैं। चिंतित और भयभीत गरीब अत्यन्त दुख का अनुभव करता है। चिन्तित, दुखित और भयभीत होकर कष्ट सहन करने की अपेक्षा कष्टों का सामना कर लेने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। आप को यदि अपने कार्य के छूट जाने का भय है और चिन्ता है तो उस परिस्थिति का कम से कम चिंतित होकर सामना कीजिए। भयभीत रहने और अप्रयत्न-शील बनने की अपेक्षा अपनी योजनाऐं बदल कर नई योजनाऐं बना लीजिये।
मानसिक शान्ति प्राप्त करने के लिये आराम से बिस्तर पर लेट जाइये और सोचिये कि आपका शरीर पूर्णतया स्वस्थ है। स्फूर्ति लाने के लिए कोई शारीरिक कार्य अथवा कोई खेल खेलिये। आप यदि किसी वस्तु को पाने के लिये अथवा अन्य किसी छोटी सी बात पर चिन्तित हैं, तो निद्रा अथवा स्थान परिवर्तन ही उपयुक्त है। यदि यह असंभव है, तो आप आत्मशक्ति द्वारा बुरे विचारों को मन में मत आने दीजिये।
(5) अधिक आशाऐं मत बाँधिये। किसी कार्य को करने के लिए भरसक प्रयत्न करिये किन्तु फल ईश्वर पर छोड़ दीजिये। असफल होने पर हतोत्साह मत होइए। याद रखिये असफलता ही सफलता की नींव है। वे पुरुष, जिन्होंने संसार में महान् कार्य किये हैं, उन्हें भी बार-बार असफल होते रहने के बाद ही सफलतायें मिली हैं।
(6) अन्य मनुष्यों से किसी वस्तु के मिलने की आशा मत रखिये। आप यदि दूसरों से कुछ मिलने की आशा करेंगे, तो वह वस्तु न मिलने पर अवश्य ही आप दुखी होंगे अतः दिल से भी किसी की वस्तु मत माँगिये! दूसरों के स्वभाव को परिवर्तित करने की व्यर्थ चेष्टा मत करिये। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दीजिये। जो मनुष्य ऐसा नहीं करते वे पिता-पुत्र, पति-पत्नी, सम्बन्धी एवं कोई भी हों, स्वभाव के कारण एक दूसरे के व्यवहार से अत्यन्त दुखी रहते हैं।
उपर्युक्त ढंग से बुरे विचारों से पूर्ण मानसिक दशा को परिवर्तित करिए, इस प्रकार आप दुखी होने से बच सकेंगे। बातों पर विचार करिए और प्रसन्नता एवं आनन्द का अनुभव करिए—
(7) किसी भी परिचित मनुष्य की, जिससे आपको कुछ कार्य भी सिद्ध करना है, इच्छाओं, और कठिनाइयों, जिनके कारण वह दुखी है लिख लीजिए। उसकी सहायता करने और उसे प्रसन्न करने की चेष्टा करिये। दूसरे मनुष्यों को सुखी एवं प्रसन्न करने का सच्चा प्रयत्न स्वर्गीय आनन्द प्राप्त करने का मूल मन्त्र है जो वर्णन नहीं, केवल अनुभव ही किया जा सकता है! उस मनुष्य का, जिसे आपने प्रसन्न करने की चेष्टा की है, सन्तोष, हर्ष, उल्लास एवं आनन्द से प्रसन्न मुख देखकर आप स्वयं हर्ष से फूल उठेंगे।
कल के विषय में न सोचने का दृढ़ संकल्प कर लीजिये। उमर खय्याम की भाँति जीवन के प्रति क्षण में आनन्द और सुख का अनुभव कीजिये। न बीते हुए पर दुखी होइए और न भविष्य से डरिए।
(श्री गंगाप्रसाद गौड़ “नाहर”)
साधारण स्नान—यह स्नान हम-आज रोज करते हैं। यदि हो सके तो यह स्नान सुबह-शाम, दोनों वक्त होना चाहिये। यदि जाड़ों में नहीं तो गर्मियों में ऐसा करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिये। इस स्नान का समय, सबेरे, सूर्योदय से प्रथम तथा शाम को, सूर्यास्त के ठीक बाद है। स्नान का पानी ताजा एवं निर्मल होना चाहिये। यह स्नान यदि किसी नदी या तालाब में किया जाय तो शरीर पर नाम मात्र का वस्त्र रख कर और यदि घर के किसी एकाँत स्नान में किया जाय तो बिलकुल निवस्त्र होकर। ऐसा करने से, इस स्नान का पूरा-पूरा लाभ उठाया जा सकता है। स्नान आरम्भ करने के प्रथम, यदि शरीर के अंग-प्रत्यंग की सूखी मालिश कर ली जाय तो अधिक लाभ होगा। तेल की मालिश करके भी यह स्नान किया जा सकता है, पर स्नानोपराँत शरीर पर लगे उस तेल को किसी खुरदुरे तौलिये से खूब रगड़-रगड़ कर पोंछ लेना अत्यन्त आवश्यक है। इस स्नान में विपुल जल का व्यवहार होना चाहिये। लोटे-दो-लोटे जल से यह स्नान नहीं होना चाहिये। स्नान करते समय किसी खुरदुरे वस्त्र या केवल हाथ से ही प्रत्येक अंग, विशेष कर गुह्यांगों को मलकर, उस पर जमे मैल को छुड़ाते जाना भी कम आवश्यक नहीं है। स्नान के समय साबुन का व्यवहार ठीक नहीं। स्नान के समय सर्व प्रथम सिर को धोना चाहिये। तत्पश्चात् पेट, पेड़ू, तथा पैर। ऐसा करने से शरीर की आवश्यक उष्णता सिर से होती हुई पैरों की तरफ से निकल जाती है, और शरीर तरोताजा हो जाता है। स्नान पैरों की तरफ से आरम्भ करने से आँखों पर गर्मी चढ़ जाने का भय रहता है। स्नान कर चुकने पर शरीर को भली-भाँति पोंछकर स्वच्छ वस्त्र धारण करना चाहिये।
शीतल-जल स्नान—इस को अंग्रेजी में The cold plunge bath (कोल्ड पलञ्ज बाथ) कहते हैं। कोमल और शीतल जल का स्नान मनुष्य देह के लिये ईश्वर की एक बड़ी देन है। हृष्ट-पुष्ट व्यक्तियों के लिये यह स्नान, सब स्नानों से उत्तम है। यह स्नान स्वास्थ्यवर्द्धक तो है ही, साथ-ही-साथ, सौंदर्यवर्द्धक भी है। शीतकाल में, बंद कमरों में, गर्म पानी से नहाने वाले स्त्री-पुरुष, अधिक नहीं, केवल एक पखवारा ही किसी खुले जलाशय के शीतल जल में स्नान कर देखें, उन को यह अनुभव कर महान आश्चर्य होगा कि उन के स्वास्थ्य और सौंदर्य में पहले से कहीं अधिक वृद्धि हो गई है। हमारे शास्त्रों में जो शीतकाल में, समय-समय पर गंगा जी आदि पवित्र सरिताओं के शीतल जल में स्नान करने की व्यवस्था है, वह इस प्रयोजन से दी गई है ताकि इस स्नान के असाधारण गुणों से एक भी व्यक्ति वञ्चित न रह जाए और सभी इसे अपने धर्म का एक आवश्यक अंग समझ कर करें।
शीत-जल में नियमित रूप से स्नान करने वाले मनुष्य, काफी बड़ी आयु पाते हैं। और मरते दम तक शक्तिशाली, तेजस्वी, एवं स्वस्थ बने रहते हैं। ठंडे जल के स्नान से शरीर की त्वचा को शक्ति मिलती है और उसके काम में सहूलियत पैदा हो जाती है, जिससे बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य भी आसानी से सुधर जाता है। इस स्नान से शरीर की जीवन-शक्ति बढ़ती है। मोटी बात यह समझ लेनी चाहिये कि स्नान के लिये जल जितना ही ठंडा होगा, शरीर को वह उतना ही अधिक लाभ पहुँचायेगा।
शीत-जल से स्नान करने का ढंग वही है जो साधारण-स्नान करने का अर्थात् स्नान से पहले सारे शरीर की हल्की मालिश कर लेनी चाहिये या थोड़ा हल्का व्यायाम ही कर लेना चाहिये जिससे रक्त की गति थोड़ी तीव्र हो जाय। उसके बाद स्नान सिर की ओर से शुरू कर देना चाहिये। साधारण तौर पर इस स्नान में 5 से 15 मिनट का समय लगाना चाहिये। यदि इस स्नान के करने का कहीं बाहर जलाशय आदि में सुविधा न हो तो घर में ही किसी जगह स्नान-कुण्ड बना लेना चाहिये। यह भी न हो सके तो मामूली नहाने के टब में ही ठंडा जल भरवा कर स्नान कर लेना चाहिये।
उष्णजल-स्नान—यह स्नान जाड़ों में और कभी-कभी करना चाहिये। इस स्नान को नियमित रूप से रोज़-रोज़ करना ठीक नहीं। दिनभर की थकावट के बाद शाम को सोने से पहले गरम पानी से स्नान कर लेना अधिक लाभप्रद होता है जिन लोगों की खाल सूखी-सूखी सी रहती हो, पसीना ठीक से न निकलता हो तथा उस पर मैल अधिक जम गया हो, ऐसे लोगों के लिये गरम जल का स्नान विशेष रूप से लाभदायक है।
स्नान का तरीका यह है। स्नान-कुण्ड या टब गर्म पानी से भर लें। पानी अधिक गरम न होना चाहिये। उसकी गर्मी 98 से 100 डिग्री के अन्दर होनी चाहिये। अब सिर पर ठंडे पानी से भीगा तौलिया लपेट लें और कुण्ड या टब में प्रवेश कर अंग-प्रत्यंग को खुरदरे तौलिये या स्पञ्चादि से रगड़-रगड़ कर धोएं और स्नानोपरान्त बाहर निकल कर समूचे शरीर को तुरन्त ठंडे जल से धो डालें और बदन पोंछ कर स्वच्छ कपड़े पहन लें। इस स्नान में यही एक बात याद रखने की है कि स्नान करते समय गरम जल गले के ऊपर के अंगों को न छूने पावे अन्यथा मस्तिष्क में रक्त अधिक तेजी से दौड़ जाने के कारण हानि हो सकती है। सिर से गरम पानी से स्नान करने से दृष्टि मंद हो जाती है, तथा बाल गिरने और सफेद होने लगते हैं। स्वस्थावस्था में गरम जल का स्नान न करना ही उत्तम है। त्वचा पर गरम जल का बार बार प्रयोग, त्वचा के लिये हानिप्रद है। गरम जल में त्वचा की शक्ति क्षीण हो जाती है। इससे शरीर की जीवनी शक्ति भी मंद पड़ जाती है।
उष्णजल-स्नान जब कभी भी किया जाए तो 5-7 मिनट से अधिक समय उसमें न लगाया जाए, नहीं तो स्नान से लाभ के बदले हानि ही अधिक होगी।
गुनगुने जल से स्नान—गुनगुने पानी से मतलब, शरीर के तापमान के बराबर ताप वाले पानी से है। यह स्नान भी उसी प्रकार किया जाता है जिस प्रकार उष्ण जल-स्नान। अन्तर केवल यही होता है कि इसमें स्नान करने के बाद ठंडे पानी से बदन धोने की आवश्यकता नहीं होती। यह स्नान खासकर शरीर की थकावट दूर करने के लिये किया जाता है।
(श्री ब्रह्यदत्त शर्मा)
हरि को हीरा ही समझकर निरन्तर उसी की उपासना करने वाले रैदास को अभिमान छूकर नहीं गया था। अन्तःकरण में साधु-सन्तों के लिए भरपूर भक्ति थी। उनको देखते ही रैदास आनन्द विभोर हो जाते, उनका मन-मयूर नाच उठता, जो कुछ उस समय पास होता उनके लिए समर्पित हो जाता और साथ ही कर्म-कुशल पुत्र काम छोड़ देता। धन-लोलुप पिता से यह सहा न गया और पुत्र को घर से अलग कर दिया गया। रहने के लिए केवल एक कुटी बनवा दी। यही नहीं, पैतृक सम्पत्ति से भी उसे बहिष्कृत कर दिया। रैदास ने पितृ-कोप को प्रसाद माना, उनके चरणों की वंदना की और परमात्मा में पूर्ण रूप से अपना मन लगाया पर तब से यह नियम कर लिया कि दिन में केवल दो जोड़े जूतियों के बनाया करेंगे। एक किसी साधु को पहनाना और दूसरे से अपना निर्वाह करना। भाग्य से पत्नी अच्छी मिली थी, उसने अपने पति के नियम, व्रत और साधु सेवा में कभी विघ्न उपस्थित नहीं किया, प्रत्युत उनकी पूर्ण सहायता की। कुटी के आगे से कोई साधु समुचित सत्कार पाए बिना निकल नहीं पाता था। यों कहिए रैदास ने साधुओं के स्वरूप में एक परमात्मा का नाना रूपों से दर्शन लाभ ही अपना उद्देश्य बना लिया था। बड़े तड़के वह उठते, भगवान का गुणानुवाद प्रारम्भ होता। उधर पत्नी की चक्की चलती। उदर-निर्वाह और ईश्वर वन्दना साथ-साथ होता।
रैदास का सूर्योदय से कुछ पूर्व अपनी कुटी के सामने झाड़ देने का नियम था। एक दिन उधर से जाते हुए महात्मा रामानन्दजी ने पथिकरुप में उनसे एकाएक पूछा—“तुम कौन हो?” रैदास ने हाथ से झाड़ू छोड़ दी। विस्मित होकर उनके चरणों में लोट गए! सविनय कहा —“मैं एक अधम चमार हूँ।” स्वामीजी ने कहा “तुम्हें साधना करनी होगी”- रैदास गिड़गिड़ाए—प्रभो! मैं अत्यन्त नीच हूँ मेरे लिए क्या यह कभी सम्भव है।” रामानन्दजी ने करुणा भरी दृष्टि से रैदास की ओर देखा। अनन्तर अपने कर-कंज से रैदास का सिर स्पर्श कर स्नेहसिक्त वाणी में कहा—“देखो रैदास, बाहर का मार्ग साफ करने से कुछ काम चलने वाला नहीं है। धर्म का मार्ग आज जितना संकट का है, उतना पहले नहीं था। विघ्नरूपी कूड़ा-करकट जो कि अनेक प्रकार का है, उस पर जम गया है। तुम उसको साधनरूपी झाड़ू से दूर करो। विलंब करने का समय नहीं है। दरबार में तुम्हारी पुकार हो रही है।” फल यह हुआ कि परमवैष्णव रामानन्द के प्रेम की विमल किरणों से रैदास का हृदय कमल विकसित हो गया। वह अब समझे कि नारायण के रूप में स्वामी जी ने मुझे दर्शन देकर कृतार्थ कर दिया है। कोसों तक वह स्वामी जी के पीछे-पीछे गए और जब उनकी आज्ञा से चरणों में प्रणाम कर वह अपनी कुटी पर लौटे, तो उनका हृदय-सागर ब्रह्मानन्द की लहरों द्वारा उमड़ा पड़ता था। उस समय वह अपने को बड़ा भाग्यवान और परमधनी समझ रहे थे।
रैदास ने अब अपने जीवन को सादगी के रूप में अधिक परिवर्तित कर लिया था। ईश्वर का गंभीर चिन्तन और साधु-सेवा, यही दो विमल व्रत सदा के लिए उनके अविच्छेद्य अंग बन गए थे। जीविका जितने कष्ट से चलती उतना ही रैदास का अपार सुख होता। पर रैदास एक दिन भी भूखे रहे हों, इसका प्रमाण अब तक नहीं मिला। हाँ, गरीबी की जलती आग में से रैदास को खरा सोना होकर निकलना अवश्य पड़ा। एक दिन की बात है, एक साधु ने रैदास का आतिथ्य स्वीकार किया। सेवा−शुश्रूषा में रैदास ने कुछ उठा न रखा। सन्तुष्ट साधु ने रैदास को पारसमणि देनी चाही मगर रैदास ने उसे लेना स्वीकार नहीं किया। दोनों में वाद-विवाद चल पड़ा। जब साधु ने अधिक आग्रह किया तो रैदास ने कहा आपकी यही इच्छा है तो इसे छप्पर में खोंस दीजिए। रैदास ने मणि को हाथ में लेने योग्य तक नहीं समझा। वर्षोंपराँत जब वह साधु फिर आया तो उसने देखा दरिद्र-दग्ध रैदास वैसा ही है। साधु के प्रश्न करने पर रैदास ने कहा “मणि को छूने में भी मुझे डर लगता है। वह वहीं रखी है, जहाँ आप रख गए थे। साधु ने समझ लिया कि रैदास को धन की लालसा सर्वथा नहीं है। वह भगवत्परायण है अतएव निर्भय है।
ज्यों-ज्यों रैदास में भगवत्प्रेम बढ़ता गया, त्यों-2 वह अधिक विनम्र होते गए। कुलाभिमानी और जातिगर्वान्ध मनुष्यों द्वारा वह न जाने कितनी बार सताए गए, न जाने कितनी बार कुख्यात किए गए, पर रैदास ने कभी किसी को अपना शत्रु नहीं समझा। काशी नरेश द्वारा जब वह दरबार में बुलाए गए तो उन्होंने अपनी सौम्यता द्वारा उन्हें मोहित कर लिया। जिन लोगों ने उन पर नाना प्रकार के लाञ्छन लगाए थे, उनके प्रति रैदास ने आदर भाव ही प्रकट नहीं किया अपितु उनके गुणों की भूरि-भूरि प्रशंसा की, साथ ही अपने को विश्वब्रह्माण्ड का अकिंचन सेवक बताया।
रैदास का कबीर के साथ प्रायः वाद-विवाद हुआ करता था। हरिभक्त रैदास की कबीर में आदर बुद्धि थी, परन्तु उनकी कटु-उक्तियाँ उन्हें पसन्द न थीं। बलात् साधुओं के प्रसंग में कबीर को, रैदास की विनम्रता देख, उन्हें “साधुओं में साधु रैदास है” कहना पड़ा।
रैदास ने सगुण और निर्गुण उभय ब्रह्म की उपासना की है। भगवान को सर्वव्यापी समझकर, परात्पर की कल्पना करने में भी वह अन्य किसी सन्त से पीछे नहीं हैं। परन्तु अधिकतर वह सत्संगति को प्रधानता देते हैं। एक पद्य देखिए:—
प्रभुजी संगति सरन तिहरी, जगजीवन राम मुरारी। गली गली को जल बहि आयो, सुरसिरि जाय समायो। संगत के परताप महातम, नाम गंगोदक पायो। स्वाति बूँद बरसै फनि ऊपर, सीस विषै हो जाई। वही बूँद के मोती निपजै, संगत की अधिकाई। तुम चन्दन हम रेंड बापुरो, निकट तुम्हारे आसा! संगत के परताप महातम, आवै बास सुबासा। जाति भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा। नीचे से प्रभु ऊंच कियो है, कहै रैदास चमारा।
कितनी निरभिमानता पूर्व संगति का याशोगान है।
रैदास, रामानन्दजी के प्रसिद्ध बारह शिष्यों में गिने जाते हैं। उनका प्रणीत कोई ग्रन्थ अभी तक नहीं मिला। फुटवल पद पाए जाते हैं। चालीस पद तो ‘आदि गुरु ग्रन्थ साहब’ में दिए गए हैं। सन्तोष धनी रैदास का शुभ्र यश ही तब तक उनका नाम अमर करने के लिए पर्याप्त है, ये जब तक अन्य ऐतिहासिक सामग्री उनके सम्बन्ध में नहीं मिलती। पारस्परिक द्वेष-मत्सर-दग्ध अतएव कलुषित हृदय संसार के लिए रैदास जैसे शाँति उपासक और मदमत्सर रहित सन्तों से समन्वयात्मक बुद्धि करने की जो प्रेरणा मिलती है, उसका मूल्य भी कुछ कम नहीं है।
(सं. श्री राजकिशोर मिश्र पहियाली)
महाभारत की लड़ाई के उपराँत युधिष्ठिर शोकाकुल थे। धृतराष्ट्र के समझाने के उपराँत श्रीकृष्ण भगवान उनसे कहते हैं—
एव मुक्तन्तु राज्ञा स धृतराष्ट्रेण धीमता। तूष्णीं वभूव मेधावी तमुवा वाथ केशव ॥ 1 ॥ अतीव मनसा शोकः क्रियमाणो जनाधिप। सन्तापयति चैतस्य पूर्व प्रेतान्पिता महान् ॥ 2 ॥
यजस्व विविधैर्यज्ञै र्वहुभिः स्वाप्तदक्षिणैः। देवांस्तर्पय सोमेन स्वधया च पितृनपि ॥ 3 ॥
—महाभारत, आश्वमेधिक पर्व, दूसरा अ.
अर्थ—धृतराष्ट्र के समझाने पर जब मेधावी युधिष्ठिर चुप हो गये तो भगवान् कृष्ण ने कहा—मन ही मन दुःख करने से मृत पूर्वजों को अनुताप होता है, अतः शोक परित्याग कर आप पूरी दक्षिणा वाले विविध महायज्ञों को करके सोमपान द्वारा देवों को एवं स्वधा द्वारा पितरों को तृप्त कीजिये।
यह कहने के उपराँत युधिष्ठिर जी पूछते हैं—
मैं पितामह कर्ण आदि को मार कर अशान्त हूँ अतः—
कर्मणा तद्विधत्स्वेह येन शुध्यति ये मनः। तमे वंवादिनं पार्थ व्यासः प्रोवाच धर्मवित् ॥
महाभारत, आश्वमे. दूसरा अ.
अर्थ—हे भगवान! जिन कर्मों द्वारा मैं इन सब पापों से छूट जाऊँ और मेरा मन पवित्र हो जाय, वह विधान बताइये। यह प्रश्न सुनकर श्री व्यास भगवान उनसे श्रेष्ठ वचन कहने लगे—
आत्मन्यं मन्यसे चाथ पाप कर्माणमन्ततः। शृणु तत्र यथा पापयकृष्येत भारत ॥ 3 ॥
तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर। तरन्ति नित्यं पुरुषा ये स्मपापानि कुर्वते ॥ 4॥
यज्ञेन तपसा चैव दानेन च नराधिपः। पुयन्ते नरशार्दूल नरा दुष्कृत कारिणः ॥ 5 ॥
—महाभारत, आश्च. तीसरा अ.
अर्थ—हे भारत! यदि तुम अपने को निश्चित रूप से पापी ही मानते हो तो जिस प्रकार पाप से छूट सकते हो उसका साधन सुनो ॥ 3 ॥
हे युधिष्ठिर! तप, यज्ञ और दान के द्वारा सदा ही मनुष्य गण पापों से छूट जाया करते हैं॥ 4॥
हे नराधिप! यज्ञ, दान और तप से दुष्कर्म करने वाले व्यक्तियों की (पाप से) शुद्धि होती है ॥ 4 ॥
व्यास जी युधिष्ठिर को पाप से मुक्त होने के साधन तौर पर यज्ञादि का निर्देश कर रहे हैं—
असुराश्च सुराश्चैव पुण्यहेतोर्मख क्रियाम्। प्रयतन्ते महात्मानस्तस्माद्यज्ञाः परायणम् ॥ 6 ॥
यज्ञैरैव महात्मानो बभूवुरधिकाः सुराः। ततो देवा क्रियावन्तो दानवानभ्यधर्षयन् ॥ 7 ॥
राजसूयाश्वमेधौ च सर्वमेधं च भारत। नरमेधं च नृपते त्वमाहर युधिष्ठिरः ॥ 8 ॥
महाभारत, आश्व. तीसरा अध्याय
अर्थ—असुर और देवता, दोनों ही पापों के विनाश एवं पुण्यों के संचय के लिये समधिक यज्ञानुष्ठान ही करते हैं, इसी से यज्ञ श्रेष्ठ माना गया है। देवता लोग यज्ञों के द्वारा ही असुरों से अधिक प्रभावशाली बने। यज्ञानुष्ठान में अधिक क्रियावान होने से ही देवों ने असुरों को पराजित कर पाया। अतः हे युधिष्ठिर! तुम भी राजसूय, अश्वमेध, सर्वमेध, नरमेध आदि यज्ञों का अनुष्ठान करो।
राजा जन्मेजय वैशभ्यायन जी से कह रहे हैं—
जन्मेजय उवाच —
यज्ञेसक्तानृपतयस्तपः सक्ता महर्षयः। शान्ति व्यवस्थिता विप्राः शमे दम इति प्रभो॥ 1 ॥
तस्मात् यज्ञफलैस्तुल्यं न किञ्चिदिह दृश्यते। इति में वर्तते बुद्धिस्तदा चैतद संशयम् ॥ 2 ॥
यज्ञै रिष्ट्वा तु बहवो राजानो द्विज सत्तमाः। इह कीर्त्ति पराँ प्राप्य प्रेत्य र्स्वगमवाप्नुयुः ॥3॥
देवराजः सहस्राक्षः ऋतुभिर्भूरि दक्षिणैः। देवराज्यं महातेजाः प्राप्तवानखिलं विभु ॥ 4 ॥
—महाभारत, आश्वमेधिकपर्व 91 वाँ अ.
अर्थ—राजा जनमेजय ने कहा—हे ब्रह्मन्! जब राजा लोग यज्ञ, महर्षिगण तप और विप्रगण शम, दस, एवं शान्ति करने में समर्थ है तब मेरी बुद्धि में ऐसा निश्चय होता है कि इस विश्व में यज्ञ फल से श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं है ॥ 1-2 ॥
हे द्विजसत्तम! अनेक राजाओं ने यज्ञ के द्वारा ही इस लोक में परम यश एवं मरणोपराँत स्वर्ग की प्राप्ति की है ॥ 3 ॥
महातेजस्वी देवराज इन्द्र ने भी दक्षिणायुत अनेकों यज्ञ करके ही सम्पूर्ण देव-लोक के राज्य की प्राप्ति की है।
स्वर्गापवर्गौ मानुष्या त्प्राप्नुवन्ति नरामुने। यञ्चाभिस्नचितं स्थानं तद्यान्ति मन जाद्विजः ॥9॥
श्री वि. पु. प्रथम अंश अ. 6
अर्थ—यज्ञ के द्वारा मनुष्य इस मनुष्य शरीर से ही स्वर्ग और अपवर्ग प्राप्त कर सकते हैं, तथा और भी जिस स्थान की उन्हें इच्छा हो उसको जा सकते हैं।
अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानाँ मुनि सत्तम। उपकार करं पुँसाँ क्रियमाणाध शान्तिदम् ॥28॥
श्री वि. पु. प्र. अंश अध्याय 6
अर्थ—नित्यप्रति किया जाने वाला यज्ञानुष्ठान मनुष्यों का परम उपकारक और उनके किये हुए पापों को शान्त करने वाला है।
तामिस्रमन्ध तामिस्रं महारौरवरौरवौ। असिपत्रवनं घोरं कालसूत्रमवीचिकम् ॥ 41 ॥
विनिन्दकानाँ वेदस्य यज्ञ व्याघात कारिणाम्। स्थान मेतत्समाख्यातं स्वधर्मत्यागिनश्च ये । 42।
श्रीवि. पु. प्र. अंश अ. 6
अर्थ—तामिस्र, अन्धतामिस्र, महारौरव, रौरव, असपित्रवन, घोर कालसूत्र और अवीचिक आदि जो नरक हैं, वे वेदों की निन्दा और यज्ञों का उच्छेद करने वाले तथा स्वधर्म विमुख पुरुषों के स्थान कहे गये हैं।
वेद यज्ञमवं रूपमाश्रित्यजगतः स्थितौ
पद्म पुराण 1-30
जगत की संरक्षा के लिए वेद भगवान को यज्ञ रूप धारण करना पड़ा अर्थात् वेद भगवान यज्ञमय हुए।
विष्णुधर्मोत्तरपुराण की कथा है कि इन्द्र वृत्रासुर के मारने से लगी हुई ब्रह्महत्या के भय से भयभीत हुआ जब विषतन्तु में छिप गया तो इन्द्रलोक में अराजकता से दुःखी देवताओं ने प्रभु त्रैलोकनाथ की प्रार्थना की तब भगवान ने कहा-
यजताँ सोऽश्वमेधेन मामेवसुरसत्तमा। अहमेव कारिष्यामि विपाप्मानं विडौजसम्॥
तत्कृता व्रह्म हत्याँ तु चतुर्धा स करिष्याति। अहमशेन याष्यामि भूतलं सुर कारणम्॥
नष्टे च भूतले धर्म स्थापपिष्याम्यहं पुनः। एतत्सर्व यथोदिष्टं देव देवेन शांर्गिणा।
चक्रुः सुरगणाः सर्वे राज्यं चावाप वृत्रहा॥ वि. धर्मोत्तर पु .अ. 24 श्लोक. 25,26,29,30,
अर्थ—हे सुर श्रेष्ठ देवताओं? वह इन्द्र मुझको ही यज्ञ द्वारा यजन करे, मैं ही इन्द्र को ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त करूंगा। उस अश्वमेध यज्ञ के करने से इन्द्र ब्रह्महत्या को चार जगह बाँट देगा।
मैं अंशों सहित देवताओं के कारण पृथिवी पर आऊँगा, और धर्म के नष्ट हो जाने पर मैं फिर धर्म की स्थापना करूंगा।
देवाधिदेव शांर्गपाणि भगवान ने ये सब वृत्ताँत जैसा कहा वैसा देवताओं ने किया, और इन्द्र ने ब्रह्महत्या के पाप से छुटकारा प्राप्त किया।
श्री नारदजी उग्रसेन से यज्ञ का महत्व कह रहे हैं-
द्विजहा विश्वहागोघ्नो वाजिमेधेन शुध्यति। तस्मादूरञ्च यज्ञानाँ हयमेधं वदंति हि॥16॥
निष्कारणं नृपपश्रेष्ठ वाजिमेधं करोति यः। ब्रजेत्सुपर्णकेतोः स सदनं सिद्ध दुर्लभम्॥17॥
—गर्ग. सं. अ. ख. 10 अ.7
अर्थ—द्विज हत्यारा, विश्ववधकर्त्ता एवं गौओं को मारने वाला भी अश्वमेध यज्ञ करने से परिशुद्ध हो जाता है। हे नृपश्रेष्ठ! वह यज्ञ निष्काम भाव से जो करते हैं, वे गरुड़ध्वज विष्णु भगवान का लोक प्राप्त करते हैं, जो सिद्धों के लिये भी दुर्लभ है।
तस्मा आप्यनुभावेन स्वेनैवावप्तराघसे। धर्म एव मतिं दत्त्वा त्रिदशास्ते दिवं ययु॥57॥
—भागवत चौथा स्कन्ध अष्टम अध्याय
अर्थ- दक्ष को निज यज्ञादि कर्मों के प्रभाव से स्वतः सब सिद्धियाँ प्राप्त हो गयी थीं, फिर भी भगवान ने यज्ञ समाप्त होने पर “धर्म में तुम्हारी बुद्धि लगी रहे” यह वरदान देकर, पुनः अपने लोक को चले गये।
जब परशुराम जी ने भूमि को क्षत्री-विहीन कर दिया, तो पाप से मुक्त यर्थ यज्ञ संपादित किया यथा—
अश्वमेध महायज्ञ चकार विधिवद्विजः। प्रदद्दौ विप्रमुख्येभ्यः सप्तद्वीपवती महीम्॥
पा. पु., उ. ख. स. अ. 242।78
अर्थ- ब्राह्मण ने महायज्ञ अश्वमेध किया और मुख्य विप्रों के लिये सप्तद्वीप वाली पृथ्वी का दान किया।
(श्री ज्वालाप्रसाद गुहा, एम. ए. एल. टी.)
सफल विवाहित जीवन मनुष्य के सुख की एक आधार शिला है। यदि सच्चा दाम्पत्य प्रेम हुआ तो वह दोनों की अन्तरात्मा का केवल विकास ही नहीं करता, वरन् उसमें निहित उस अमूल्य भावना की सिद्धि का कारण होता है जो पुरुष नारी के प्रति तथा नारी, पुरुष के प्रति अनुभव करती है। वास्तव में सच्चे दाम्पत्य प्रेम का आधार ही सुखी वैवाहिक जीवन है। अब हमें देखना है कि इस सुखी वैवाहिक जीवन के मूल तत्व क्या हैं। सच तो यह है कि वैवाहिक आनन्द का कोई निश्चित मापदण्ड नहीं है और न कोई ऐसा निरपेक्ष नियम ही है जिसके अनुसार इस अत्यन्त कलापूर्ण क्षेत्र में मानवीय सम्बन्धों का नियन्त्रण होता हो। अनेक स्त्री और पुरुष ऐसे ही जीवन में सुखी हैं जो अन्य स्त्री पुरुषों के दुःख और निरुत्साह का कारण बन जाता है। कई दंपत्ति सन्तान के अभाव में दुःखी हैं, तो कई बिना सन्तान के ही पूर्ण सुखी हैं। कई अपनी गरीबी में सुखी हैं तो कइयों की आर्थिक अवस्था ही उनके दुःख की जड़ है। शारीरिक प्रतिकूलता जहाँ एक दंपत्ति के दुःख का कारण है, वहीं दूसरे के सुन्दर सहयोग का आधार है। अनेक ऐसी बातें हैं, जिनको वैवाहिक जीवन के आरम्भ में कोई महत्व नहीं दिया जाता, परन्तु समय बीतने पर वे सुख या दुःख का कारण बन जाती हैं। अनेक दंपत्ति जो आरंभ में सब प्रकार से सुखी होते हैं, बाद को दुःखी रहने लगते हैं, क्योंकि मनुष्यों का मानसिक और आध्यात्मिक विकास विभिन्न गतियों से होता है।
उपरोक्त बातों के होते हुये भी सुखी वैवाहिक जीवन की कुछ मौलिक आवश्यकताएँ हैं और वे इस प्रकार हैं—वैवाहिक बन्धन में बँधने वाले दोनों साथियों में एक दूसरे के आत्म सम्मान की ठोस बुद्धि, मानसिक परिपक्वता, शारीरिक स्वास्थ्य, दृष्टिकोण में मनोवैज्ञानिक स्वतन्त्रता, प्रेमकला तथा लैंगिक ज्ञान, पारिवारिक उत्तरदायित्व की परिपक्व भावना, वस्तु स्थिति के अनुकूल आचरण करने की योग्यता, काल्पनिक आदर्श से मुक्ति, विस्तृत एवं उदार मानवीय प्रवृत्ति तथा सहयोग के आधार पर आगे बढ़ने, कष्ट उठाने और जीवन के सुख-दुःख में भाग लेने की क्षमता आदि। ये ही दिन-प्रतिदिन की वैवाहिक समस्याओं को सफलतापूर्वक सुलझाने के मूल मन्त्र हैं। अपने वैवाहिक साथी की परिस्थिति से पूर्ण आत्मीयता तथा उसे निरन्तर उत्साहित करते रहने की तत्परता, दाम्पत्य जीवन की साधारण बाधाओं को सहज ही में दूर कर देती है। साथ ही यदि दोनों समान रूप से शिक्षित हुए और दोनों की समाज के लिये उपयोगी काम धन्धों में भी समानता हुई, तो सोने में सुगन्ध आ जाती है। अन्त में थोड़ी बहुत आर्थिक स्वतन्त्रता और धार्मिक तथा सामाजिक साम्यता यदि उपलब्ध हो, तो वह वैवाहिक जीवन को सुखद बनाने में बड़े ही सहायक होते हैं।
परन्तु बहुत कम ऐसे व्यक्ति हैं, जो उपरोक्त आदर्श साधनों के साथ विवाह सम्बन्ध में प्रवेश करते हैं। यही कारण है कि जीवन में हमें अनेक बेजोड़ गठबन्धन जैसे किसी निर्दयी पुरुष और अबला स्त्री में, किसी जबरदस्त मर्दानी औरत और स्त्रैणा पुरुष में, किसी स्वतन्त्र एवं साहसी पुरुष तथा कायर एवं मूर्ख स्त्री में, किसी स्वस्थ और मोटी स्त्री और सूखे हुये किताबी कीड़े पुरुष में किसी बालिका और वृद्ध में, किसी अशिक्षित तथा गंवार स्त्री और शिक्षित पुरुष में, किसी सुन्दर युवक और कुरूप स्त्री या सुन्दर स्त्री और कुरूप पुरुष में देखने को मिलते हैं।
अब यदि हम वैवाहिक असफलता के कारणों पर किंचित दृष्टिपात करें तो देखेंगे कि बेजोड़ विवाह न होने पर भी लैंगिक विज्ञान और प्रेमकला की अनभिज्ञता वैवाहिक असफलता का एक प्रधान कारण है। जीवन के आरम्भ से ही हमें चलने, बोलने, अभिवादन करने तथा कायदे से कपड़े पहनने आदि की शिक्षा दी जाती है हमारी पढ़ाई-लिखाई के साथ साथ हमें खेलने-कूदने, लोगों से मिलने-जुलने तथा अन्य सामाजिक शिष्टाचारों की शिक्षा दी जाती है। जीविकोपार्जन करके हम अपना निर्वाह कर सकें, इसके लिये कुछ उद्योगों की भी शिक्षा हमें दी जाती है, परन्तु शायद ही कोई ऐसा पुरुष या स्त्री हो, जिसे किसी कुशल शिक्षक द्वारा इस बात की शिक्षा दी गई हो कि एक सफल प्रेमी, आदर्श पति अथवा पत्नी कैसे बना जा सकता है।
हमारे आधुनिक जीवन का अभिशाप यह है कि अश्लील आख्यानों से भरे हुए उपन्यासों, कामोद्दीपक चित्रों और लेखों से पूर्ण समाचार पत्रों, तथा लम्पटतापूर्ण दृश्यों से भरे हुए नाटकों और चलचित्रों की प्रबल धारा में बहाकर हम अपने नौजवानों का दिमाग अनेक गलत धारणाओं से भर ही नहीं देते, वरन् उनकी स्वाभाविक एवं सामान्य काम-वृत्ति को बुरी तरह उत्तेजित और विकृत भी बना देते हैं। जहाँ एक तरफ हम अपने ही हाथों इतने विक्त वातावरण की सृष्टि करते हैं, वहाँ दूसरी तरफ लैंगिक-ज्ञान (सैक्स) के ऊपर एक गुप्त और अपवित्रता का झूठा पर्दा डालकर अपने बच्चों को जीवन की इस अमूल्य जानकारी से वंचित रखते हैं। जिस समय लड़की को यह विश्वास कराया जाता है कि उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य विवाह को सफल बनाना तथा एक सुन्दर घर बसाना है, कामवृत्ति और गर्भाधान आदि सम्बन्धी अत्यन्त उपयोगी जानकारी उससे छिपा कर रखी जाती है। वैवाहिक जीवन को सफल बनाने के लिए इस अज्ञान को दूर करना आवश्यक है। कुशल शिक्षक तथा डाक्टर और लेडी डाक्टर भावी दाम्पत्य के इस विषय की शिक्षा के लिए उपयुक्त व्यक्ति होंगे।
वैवाहिक नैराश्य का दूसरा प्रधान कारण स्त्री और पुरुष के बीच प्रभुता और शान के लिए प्रतिद्वन्द्विता है। इस प्रतिद्वन्द्विता को आज हम बड़े स्पष्ट रूप में विशेषकर शिक्षित दाम्पत्यों में देख सकते हैं। कुछ अंशों में हम इसे उस आन्दोलन की ही एक शाखा कह सकते हैं जो आधुनिक शिक्षित नारी आज के शक्तिशाली पुरुष की निरंकुशता के विरुद्ध चला रही है। व्यक्तिवादी समाज के व्यापारिक कार्यों में एक जीवनदायिनी शक्ति के रूप में प्रतिद्वन्द्विता को चाहे हम जो भी महत्त्व दें, परन्तु प्रेम और वैवाहिक जीवन के लिए तो प्रतिद्वन्द्विता मृत्यु के समान है अथवा वह छिपी हुई चट्टान है, जिससे टकराकर अनेक विवाह विचूर्ण हो चुके हैं।
लोग इसे एक मनोवैज्ञानिक आदेश की भाँति ग्रहण करें कि जिस भी व्यक्ति ने अपने स्त्री या पुरुष साथी पर प्रभुत्व जमाना चाहा या उसकी निन्दा की तथा उसके आत्म सम्मान को ठोस पहुँचाई, उसने सदा के लिए अपने वैवाहिक आनन्द पर कुठाराघात कर लिया।
वैवाहिक नैराश्य का तीसरा प्रधान कारण काल्पनिक आदर्शवाद है। वह लड़की जो अपने को स्वर्ग की परी समझकर आशा करती है कि सारी दुनिया उसके ऊपर निछावर होगी तथा वह लड़का जो अपने को एक विशिष्ट व्यक्ति और सुन्दर सलोना युवक मानकर प्रत्येक नारी की आराधना को अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और जिसे जीवन संगिनी बनाने के लिए जल्दी कोई लड़की ही पसन्द नहीं आती, शायद ही कल्पना के इस माया जाल से निकल कर धरती पर पाँव रख सको, इनका उपचार तो तभी हो सकता है, जब एक नये सिरे से इनका मनोवैज्ञानिक कायाकल्प किया जाय, अन्यथा ऐसे लोगों का वैवाहिक जीवन बड़ा ही दुःखद होता है।
वास्तव में लोगों का वैवाहिक जीवन अधिक सफल होता यदि दाम्पत्य बाह्य आकर्षण और सुन्दरता पर आधारित प्रेम की बात कम सोचते तथा अपनी आर्थिक परिस्थिति, सन्तान पालन के सिद्धान्त, खाली समय का पारस्परिक सदुपयोग, एक दूसरे की भावनाओं का समुचित ध्यान, साथ मिलकर जिम्मेदारी उठाने की योग्यता आदि आवश्यक विषयों पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर अपनी जीवन नौका को कुशलता के साथ खेते। कितनी विचित्र बात है कि यदि कोई आदमी किसी व्यापार या साझेदारी में केवल इसलिए शामिल होने को लालायित हो उठता है कि उस व्यवसाय विशेष के दफ्तर की कुर्सी और मेज उसे बहुत पसंद है तो लोग उसे बेवकूफ बनाते हैं, परन्तु यदि वही आदमी एक लड़की से केवल इसलिये शादी करले कि वह देखने में सुन्दर है, नाच अच्छा करती है तथा पार्टियों में जाने की शौकीन है तो उसके मित्र उसे बधाई देते नहीं थकते। ऐसे गुणों तथा बाह्य सुंदरता और आकर्षण पर आधारित प्रेम बिल्कुल अस्थाई रहता है। अवस्था के साथ-2 यौवन ढलने पर ऐसा प्रेम प्रायः हवा हो जाता है। प्रेम का सच्चा बंधन ता आन्तरिक सुन्दरता पर अवलम्बित है। प्रत्येक व्यक्ति में कोई न कोई गुण अवश्य होता है। दाम्पत्य को एक दूसरे की आन्तरिक सुन्दरता और विशिष्ट गुणों की खोज कर प्रेम पूर्वक जीवन निर्वाह करना चाहिए। हाँ विवाह बंधन में फंसने के पूर्व इस बात का ध्यान रहे कि स्त्री और पुरुष दोनों में प्रत्येक दृष्टिकोण से अधिक से अधिक साम्य रहे। शुरू की जरा-सी भी जल्दबाजी और असावधानी सारे वैवाहिक जीवन को दुःखद बना सकती है।
अन्त में यह बात ध्यान रखना आवश्यक है कि विवाहित जीवन को सुखमय बनाने का सबसे सुन्दर नियम वास्तव में यह है कि विवाह करने के पहले अपने साथी को भली भाँति समझ लीजिये तथा विवाह के बाद उसे वही समझिये जो वह वास्तव में है और आदर्श कल्पना को त्याग कर उसी का सन्तोष पूर्वक प्रसन्नता के साथ उत्तम से उत्तम उपयोग कीजिये।
(श्री जनार्दन प्रसाद जी)
जिस तरह उपवास, जल-चिकित्सा, मिट्टी-चिकित्सा, आन्तरिक स्नान (एनीमा), सूर्यकिरण-चिकित्सा आदि प्राकृतिक चिकित्सा के प्रधान अंग है, उसी प्रकार मालिश भी एक प्रधान अंग है, क्योंकि यह भी दवा रहित चिकित्सा की ही एक पद्धति है। प्रचलित यूरोपीय चिकित्सा-पद्धति के प्रवर्तक हिपोक्रेटीस ने भी इसकी व्यवस्था दी है हालाँकि ऐसे बहुत से प्रमाण मिलते हैं, जिनसे पता चलता है कि ईसा को कई सौ वर्ष पूर्व भी ग्रीस, रूस और मिस्र आदि देशों में स्वास्थ्य-लाभ के लिए इसका प्रयोग किया जाता था।
मालिश को वैज्ञानिक चिकित्सा-पद्धति न मान कर भी लोग आदिकाल-से इसकी उपयोगिता देखते आय हैं और आज भी किसी न किसी प्रकार इसे अपनाते हैं। इसकी उपयोगिता आप एक साधारण सी बात से समझ सकते हैं। छोटे-बड़े सभी घरों में नवशिशु के जन्म-दिवस से लेकर काफी बड़े होने तक प्रतिदिन उसकी तेल की मालिश होती है, जिससे रक्त-संचार के ओषजन की प्राप्ति विशेष रूप से होती रहे। स्त्रियों के उदर-संबन्धी रोगों में मालिश का विशेष रूप से प्रयोग होता है। सिर-दर्द इत्यादि में आमतौर से मालिश का ही सहारा लिया जाता है। शैशवावस्था में बच्चे अक्सर चारपाई या पालने से गिर जाते हैं। कोमल शरीर होने के कारण जब चोट ज्यादा लगती है, तो हम किसी डाक्टर की तलाश नहीं करते, बल्कि नैसर्गिक बुद्धि प्रेरित होकर हम शीघ्र ही बच्चे को गोद में लेकर चोट खाये हुए स्थान को थपथपा कर सहलाने लगते हैं। अत्यन्त शारीरिक परिश्रम के फलस्वरूप जब हम थकान अनुभव करते हैं, तो कोई दवा या लोशन नहीं लगाते, मालिश द्वारा ही आराम पाते हैं।
मालिश कराने से छोटी तथा बड़ी आँतें, जिगर, गुर्दे, फेफड़े तथा हृदय आदि अंगों पर विशेष प्रभाव पड़ता है। वे अपना कार्य सुचारु रूप से करने लगते हैं, जिससे मल निष्कासन भली प्रकार होता है। न तो आँतों में पड़ा-पड़ा मल सड़ता है, जिससे अन्तर्विष की उत्तेजना हो और न यूरिक एसिड आदि विष ही शरीर में रह पाते हैं। श्वास-प्रश्वास की क्रिया गहरी हो जाती है जिससे फेफड़ों को काफी मात्रा में ओपजन मिलता है। दिल और फेफड़े मजबूत होते हैं और शरीर में शुद्ध रक्त का संचार होने लगता है। हृदय और नाड़ियाँ सबल हो जाती हैं। शरीर का स्वस्थ दशा में रहना बहुत-कुछ त्वचा की दशा पर निर्भर है। इसके लिए आवश्यक है कि उसकी नमी बनी रहे और वे अपना कार्य सुचारु रूप से करें। मालिश से खून का दौराव त्वचा की ऊपरी सतह तक आ जाता है। हाथों की रगड़ से त्वचा को गर्मी भी मिलती है जिससे त्वचा स्वस्थ रहती है।
मालिश करने के लिए किसी हथियार या औजार की आवश्यकता नहीं। आराम से लेटने लायक एक मेज थोड़ी अनुत्तेजक तैल और विषय के विशेष ज्ञान के साथ इस काम में सिद्धहस्त व्यक्ति ।
चूँकि दीर्घश्वास की क्रिया मालिश का एक आवश्यक अंग है इसके लिए गर्म और हवादार कमरा ही उपयुक्त है। तैल की भाँति स्निग्ध पदार्थों की आवश्यकता होती है; पर यह भी आवश्यक है कि वे दवा मिश्रित न हों। त्वचा की ऊपरी सतह पर दवा मालिश कर शरीर में प्रविष्ट कराने की एक अलग चिकित्सा प्रणाली है। जैतून तिल के तेल के समान ही कोई अनुत्तेजक सात्विक पदार्थ मालिश के लिए उपयोगी है। सरसों का तेल जैसा थोड़ा उत्तेजक कफ प्रकृति वाले व्यक्तियों या सर्दी तथा शोथरोग से पीड़ित रोगियों के लिए लाभदायक हैं। जिन्हें पसीना शीघ्र या अधिक मात्रा में आता है उन्हें भीगे तौलिये से शरीर को अच्छी तरह रगड़ना लाभदायक है इस प्रकार के तेज घर्षण से शरीर खूब गर्म हो जाता है अतएव मालिश के बाद ठंडे जल का स्नान बहुत लाभदायक है। पर शरीर की गर्मी को बनाये रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि स्नान के बाद शरीर को रगड़कर धूप में बैठकर फिर से गर्म कर लिया जाय। इस स्नान के बाद जो गर्मी लाने के लिए शरीर को रगड़ने की जरूरत होती है, उसके लिए किसी मालिश करने वाले व्यक्ति की आवश्यकता नहीं। सिर्फ अपनी हथेलियों से ही रगड़ लेना लाभदायक होगा। पर साधारणतया मालिश का उपयुक्त समय स्नान के बाद ही होता है; क्योंकि स्वास्थ्यार्थी का शरीर ठंडा होने के कारण मालिश करने वाले के शरीर से विशेष गर्मी प्राप्त करता है।
मालिश करने के स्थान और विधियों से मालिश करने वाले का स्थान कम महत्व का नहीं है। सभी तरह के व्यक्ति मालिश करने के लायक नहीं होते। जिनके हाथ-पैर ठंडे रहते हैं या पसीजते हों या जिनमें स्वार्थ या कुत्सित विचार हों, वे चिकित्सक के लिए उपयुक्त नहीं। रोगी व्यक्ति से मालिश कराने से लाभ के बदले हानि ही होती है। बहुत से रोगों के लक्षण स्वास्थ्यार्थी में धीरे-धीरे प्रकट होने लगते हैं। मालिश करने वाले में तीन विशेष गुणों का होना अति आवश्यक है। उन्हें स्वस्थ, उदार और सच्चरित्र होना चाहिए। उनका जीवनबल भरपूर हो, हथेलियाँ कोमल, सूखी और साधारण गर्मी लिये हों। एक सबसे प्रधान गुण जो चाहिए वह यह है कि उनके हृदय में रोगियों की सेवा-भावना हो।
मालिश करते समय शरीर को बिल्कुल ढीला छोड़ देना चाहिए। इससे मालिश करने वाले को विशेष सुविधा और मालिश कराने वाले को आराम और लाभ होता है। किसी भी विशेष अंग के मालिश में दस-पन्द्रह मिनट से ज्यादा समय की आवश्यकता नहीं होती। बच्चों के लिए तो इससे भी थोड़ा समय पर्याप्त है, क्योंकि उनके शरीर शीघ्र ही गर्म हो जाते हैं। हाँ, पूरे शरीर की मालिश में आधा घंटा या कुछ अधिक समय लग जाता है।
हिन्दू संस्कृति के स्वास्थ्य-नियमों में तेल मालिश और स्नान को नित्यकर्म का एक प्रधान अंग माना गया है इसे किसी रोग-विशेष की चिकित्सा समझ कर नहीं, बल्कि स्वास्थ्य कायम रखने के लिए किया जाता है। पर साधारण सूखे और तेल मालिश में बहुत अन्तर है। तेल मालिश करने से तेल का कुछ अंश रोमकूपों द्वारा शरीर में प्रविष्ट हो जाता है। शारीरिक शक्ति का जहाँ तक प्रश्न है वहाँ तेल, घी से ज्यादा शरीर को बलिष्ठ करता है। तेल खाने से उतना लाभ नहीं होता जितना मालिश करके तेल को रोमकूपों द्वारा शरीर में प्रविष्ट कराने से, यहाँ तक कि मंदाग्नि के रोग भी जिनके लिए घी-तेल बहुत ही हानिप्रद है, तेल मालिश कर इसका लाभ उठा सकते हैं। उदाहरणार्थ मालिश की एक प्रक्रिया है जो तीन प्रकार से कार्यान्वित की जा सकती है:—
सूखे हाथों से साधारण मालिश। किसी कमरे के अन्दर तेल मालिश।
साधारणतया धूप में तेल मालिश, इन तीनों विधियों में लाभदायक हैं। यहाँ सिर्फ विटामिन ‘डी’ के सम्बन्ध में पाठकों का ध्यान आकृष्ट कर देना मैं आवश्यक समझता हूँ चूँकि इसका सूर्य-किरणों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। विटामिन ‘डी’ की कमी बालक और युवा में दो भिन्न-भिन्न लक्षण प्रकट करती है। बच्चों में इसकी कमी से हड्डी की विकृति, रक्तहीनता और सूखा रोग प्रकट होते हैं। युवा में अन्तर्विष की उत्तेजना से मधुमेह, रुमेटिज्म, निउराईटीस और ब्राइटस रोग प्रकट होते हैं। तेल की मालिश के साथ धूप सेवन करने से विटामिन ‘डी’ रक्त द्वारा शोधित किया जाता है। लगभग 20 मिनट में इसकी न्यूनतम दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती है। इस प्रकार इन रोगों की संख्या बहुत ही कम कर दी जा सकती है। यह प्रयोग बच्चों के सूखा रोग के लिए तो अद्वितीय है। हर साल लाखों बच्चे जो इस रोग से अकाल ही काल के गाल में चले जाते हैं, उनमें अधिकाँश युक्त आहार के सेवन के साथ इसका प्रयोग कर बचाये जा सकते हैं। इससे बढ़कर विटामिन ‘डी’ की प्राप्ति का कोई दूसरा साधन और इस रोग की दूसरी चिकित्सा-विधि का आविष्कार नहीं हुआ है।
रोगों से निवृत्ति या बचाव के लिये आन्तरिक स्वच्छता की विशेष आवश्यकता है। मालिश से मल निष्कासन अंगों को बल मिलता है और वे शरीर की गन्दगी भली प्रकार दूर कर देते हैं। मालिश से जिस प्रकार रोग दूर होकर उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है, उसी प्रकार रोग के प्रतिरोध को क्षमता भी बढ़ती है। नस-नाड़ियाँ स्वच्छ दशा में रहती हैं। अवयव कोमल रहते हैं और रक्त में लालकणों की संख्या अधिक होती है, जो उत्तम स्वास्थ्य का प्रतीक है। ऐसी दशा में मानसिक स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। स्वस्थ मन में ही सात्विक विचारों का समावेश होता है, भावनाओं की ताजगी होती है। उसे निर्भयता और साहस प्राप्त होता है और मनुष्य हर समय आशावान् रहता है।
(श्री लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए. लखनऊ)
कौन नहीं चाहता कि उसे सब चाहें, उसे सब पसन्द करें, किन्तु कितने ऐसे सौभाग्यशाली हैं, जिनसे प्रायः सभी प्रसन्न रहते हों! यों तो एक कहावत है कि संसार में सभी को खुश रखना असम्भव है और यह बात एक सीमा तक सत्य भी है। किन्तु साधारणतया हमसे लोग खुश रह सकते हैं, बशर्ते हम स्वयं ही सच्चे हृदय से यह बात चाहें। आप कहेंगे कि भला कौन यह नहीं चाहता? किन्तु जहाँ सच्ची चाहना होती है, वहाँ उसके लिए सच्चा प्रयत्न होता है। बिना प्रयत्न किए, बिना उपाय किए, बिना कुछ कष्ट उठाए ही यदि हम कोई फल प्राप्त करना चाहेंगे, तो हमें असफलता अवश्यम्भावी है, जैसी प्रायः 99 प्रतिशत लोगों को मिलती है। अपनी अज्ञानता तथा स्वभाव की कमजोरी या बुराई के कारण ही लोग हमसे असन्तुष्ट रहते हैं। लोग कहते तो अवश्य हैं कि ‘भाई! हम तो दूसरे के लिए चाहे अपना सर भी काट कर रख देंगे, पर हमें यश नहीं मिलेगा, हमसे कोई सन्तुष्ट नहीं होगा। हमारा भाग्य ही ऐसा है।’ ऐसे लोग भाग्य पर दोष डालना तो जानते हैं, पर शान्ति तथा गंभीरता से उन कारणों को खोजने का प्रयत्न नहीं करते, जिनके कारण लोग असन्तुष्ट या नाखुश रहते हैं और न उन उपायों को सोचने-समझने का प्रयत्न करते हैं, जिनके अपनाने से हम अभीष्ट की सिद्धि प्राप्त कर सकते हैं। अमरीका के प्रसिद्ध लेखक डेल कारनीगी ने छह उन उपायों को बताया है, जिनको अपनाने से लोग आपको पसन्द करने लगेंगे।
प्रथम बात तो उन्होंने यह कही है कि आप दूसरों की परिस्थितियों, उनकी समस्याओं, उनकी परेशानियों में सच्चे हृदय से अपनी रुचि दिखावें। देखिए इस संसार में प्रत्येक के सर पर अपनी निजी ही इतनी कठिनाइयाँ, परेशानियाँ तथा आवश्यकतायें है कि वह उन्हीं से उबर नहीं पाता, तब उसे दूसरे की परेशानियों को सुनने और दूर करने का कहाँ से अवकाश मिलेगा तथा रुचि होगी आप यदि अपना रोना किसी के सामने रोने न बैठ जायं, वरन् उसकी राम कहानी को ध्यान से सुनें, उसके प्रति अपनी सहानुभूति का प्रदर्शन करें, तो वह आपके प्रति आकर्षित होगा, आपका मित्र हो जायगा और तब वह केवल आपको पसन्द ही न करेगा वरन् कल फिर बड़ी प्रसन्नता से आपकी राम-कहानी सुनने को तैयार हो जायगा। पर हम तो पहले ‘अपने’ ही को सोचते हैं, अपने ‘स्वार्थ’ को ही सर्वोपरि रखते हैं। इससे न हमारा ही स्वार्थ पूरा होता है और न परमार्थ ही हो पाता है।
दूसरी बात उन्होंने यह बताई है कि सदा मुस्कुराते रहो। मोरहमी चेहरे से सभी घबराते हैं। नीरस, कर्कश तथा मुर्दनी सूरत और स्वभाव वाले के पास कोई नहीं फटकता। हँसमुख मनुष्य, दुखियों के भी आँसू सुखाने में समर्थ होता है। वह जहाँ बैठेगा, एक नया जीवन, स्फूर्ति तथा ताजगी वातावरण में आ जायगी। जो रोते हुए को भी हँसाने का गुण रखता है वह सबका प्रिय होता है।
तीसरी बात उन्होंने यह बताई है कि मनुष्य को सबसे अधिक प्रिय और मीठा अपना नाम लगता है। आप सम्मान सूचक शब्दों को किसी के पहले लगाकर उच्चारित कीजिए। अपने नाम से आत्मीयता होती है, अतः अपना नाम बार बार सुनने से प्रसन्नता होती है। कुछ लोगों में यह गुण होता है कि वे दूसरों का नाम नहीं भूलते, भले ही बरसों के बाद मिलें। अब मान लीजिये किसी से बरसों बाद आपकी भेंट हुई और आपका नाम वह भूला नहीं है। आपके हृदय में तुरंत यह विचार उठेगा कि यह मनुष्य अपने हृदय में मेरा स्थान रखता है, तभी तो मेरा नाम इतने दिनों के बाद भी इसे याद है। फल यह होगा कि आप ऐसे आदमी को बहुत पसन्द करेंगे।
चौथी बात उन्होंने यह बतायी है कि आप बहुत अच्छे श्रोता हो। यहाँ पर तो ‘अपनी अपनी सब कहते हैं, सुनता कौन बिरानी!’ और जब आप शाँत, धैर्य और प्रेम के साथ ‘बिरानी’ सुनने को तैयार हो जायेंगे तो आप वक्ता के हृदय को जीत लेंगे। आप किसी को यह कहने का अवसर न दें कि यह शख्स अपनी ही गाये चला जाता है दूसरे को नहीं सुनता।’ भला ऐसे आदमी को लोग क्यों पसन्द करने लगे।
पाँचवी और अत्यन्त महत्वपूर्ण बात उन्होंने यह बताई है कि दूसरों की रुचि के बारे में ही बातचीत करो। मान लीजिये आपको घोड़ों से बहुत शौक है, प्रेम है। आप हर समय घोड़ों के बारे में ही दूसरों से बात करना चाहते हैं। यह सत्य है कि वैसा करने से आपको अवश्य मानसिक सुख तथा शान्ति मिलेगी, पर वह श्रोता जिसे घोड़ा सम्बन्धी विषय में न रुचि है न विशेष जानकारी, वह तो आपकी बात सुनकर ऊब जायगा। मान लीजिये उसे डाक के टिकट जमा करने का शौक है और आप उसकी रुचि को जानते हैं, तो आप बस टिकटों की ही बात कीजिये। वह आपका गुलाम हो जायगा। वह आपको बहुत पसन्द करेगा। मन में वह कहेगा, ‘बस मैं ऐसा ही आदमी चाहता था’ और जैसा मैं ऊपर कह चुका हूँ एक बार वह आपकी ओर आकर्षित हो भर जाय, अर्थात् आप पहले उसकी रुचि को बस करलें और फिर तो बदले में वह प्रसन्नता से आपकी रुचि की बात सुनेगा।
छठवीं बात उन्होंने यह बताई है कि तुम जिससे मिलो उसे महत्ता दो। प्रत्येक मनुष्य में अहंभाव होता है और वह इस अहंभाव की पूर्ति करना चाहता है और करता है। आप प्रायः लोगों को यह कहते हुए सुनेंगे कि ‘मुझे ऐसा-वैसा न समझ लेना, मैं यह हूँ।’ अस्तु जब मनुष्य अपनी महत्ता का प्रदर्शन चाहता ही है तो आप अवश्य ही प्रथम उसकी महत्ता का वर्णन करें, बस वह आपको चाहने लगेगा। डिसरैले ने सत्य कहा है कि किसी मनुष्य से तुम उसके ही बारे में बातचीत करो और तुम देखोगे कि वह घंटों तुम्हारी बात सुनेगा।
अतः यदि हम ऊपर कहे हुए छह नियमों पर मनन करेंगे और उन्हें अपनायेंगे तो सतत् अभ्यास के बाद वह हमारे स्वभाव का अंग बन जायेंगे और हम वशीकरण मंत्र के ज्ञाता हो जायेंगे। तब हम देखेंगे कि हमें सभी पसन्द करते हैं, सभी हमसे संतुष्ट हैं।
(श्री पंडित विद्याधर शास्त्री एम. ए., बीकानेर)
यज्ञविज्ञान एक ऐसा विषय है, जिसकी व्यापकता का कोई अन्त नहीं। इसमें आधिभौतिक आधिदैविक एवं आध्यात्मिक तीनों तरह की विश्वगतियों का समन्वय एवं पारस्परिक आदान प्रदान होता है। इसको समझने के लिये प्रकृति विकृति की समस्त गतियों और आत्म संबंधी समस्त विवर्तों के ज्ञान की परमावश्यकता है।
जो लोग आधुनिक विज्ञान के साथ यज्ञविज्ञान की तुलना करने हैं अथवा जो व्यक्ति केवल आजकल की वैज्ञानिक प्रक्रिया के आधार पर ही यज्ञविज्ञान को समझना चाहते हैं वे यज्ञविज्ञान के श्री गणेश को भी समझ सकेंगे या नहीं मुझे इसमें भी सन्देह ही है। आधुनिक विज्ञान पार्थिव-परिवर्तनों अथवा तत्वपदार्थों के पृथ्वी पर दृश्यमान प्रभावों के विश्लेषण में ही अपनी गवेषणा की इति श्री कर देता है। यह यदि और भी आगे बढ़ता है तो दूर वीक्षणों की सहायता से ग्रहणों के समय होने वाले सूर्यादि के धब्बों का भी परीक्षण करता है परन्तु जब इसके सामने यह प्रश्न आता है कि हमारे मन और अन्न में कैसा सम्बन्ध है अथवा अन्न की उत्पत्ति में सोम की कैसी प्रधानता है तब यह सर्वथा मौन हो जाता है। यह सवितृमण्डल के साथ हमारी बुद्धि के सम्बन्ध को स्थापित नहीं कर सकता।
मेरा विश्वास है कि यज्ञविज्ञान एक ऐसा विषय है जिसका वास्तविक ज्ञान ब्राह्मण ग्रंथों के आविर्भाव काल में भी लुप्त हो चुका था। जिन यज्ञों के लिये स्वयं वेद भगवान्—
‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमा-न्यासन्’ की घोषणा के द्वारा उनकी परमप्राचीन प्राथमिकता को उद्घोषित करते हैं उन यज्ञों का विकास केवल ब्राह्मण जाति प्रधान किसी ब्राह्मणकाल में हो रहा था, मैं आधुनिक ऐतिहासिकों के इस सिद्धान्त को नहीं मानता। मेरी दृष्टि में शतपथादि में जिस रूप से यज्ञ सम्बंधी प्रश्नों का समाधान किया गया है वह समाधान इस बात को सिद्ध करता है कि ब्राह्मण ग्रंथ यज्ञ सिद्धान्तों के निर्धारक होने की अपेक्षा उसका अनुसंधान कर रहे थे। उपनिषत् काल के बाद यह यज्ञविज्ञान का अनुसंधान बीच में ही अवरुद्ध हो गया। दूसरी ओर यदि यह मान भी लिया जाय कि ब्राह्मणकाल में यज्ञ-सम्बंधी समस्त विज्ञान का पूर्ण ज्ञान हो चुका था, तो मैं पूर्णता के पक्षपाती इन सज्जनों से भी यही निवेदन करूंगा कि विज्ञान में सदा ही नये-नए परीक्षणों के लिये अवकाश रहता है। विज्ञान की गवेषणा किसी समय भी किसी एक ही सिद्धाँत पर स्थिर नहीं रहती। विज्ञान प्रतिक्षण नई-नई संभावनाओं से परिपूर्ण रहता है।
यज्ञ विज्ञान के विषय में मेरी यह मान्यता और भी अधिक स्पष्ट और प्रबल है। इस समय हम यज्ञविज्ञान को सर्वथा विस्मृत कर चुके हैं। यदि हम चाहते हैं कि हमारे यज्ञ-यज्ञविज्ञान का पुनरुद्धार हो तो इसके लिए प्राचीन एवं अर्वाचीन समस्त वैज्ञानिक सिद्धांतों का पूर्ण विवेचन कर नये नये प्रयोगों के द्वारा प्रकृति के गुप्त रहस्यों को समझने का एक महान् प्रयत्न करना होगा।
यज्ञ में अग्नितत्व प्रधान है परन्तु यज्ञाग्नि के स्वरूप को समझने के लिये जिस विज्ञान शाला की आवश्यकता है वह विज्ञानशाला विश्व की समस्त वर्तमान विज्ञानशालाओं से विलक्षण और व्यापक साधनों से सम्पन्न होगी।
यह केवल भारतीय राष्ट्र का ही नहीं अपितु समस्त विश्व का दुर्भाग्य है कि अभी उसका ध्यान भारत के प्राचीन लुप्त विज्ञान की ओर आकृष्ट नहीं हुआ। यज्ञाग्नि तत्व के ज्ञान के साथ-साथ हमको अपने आप शब्दाग्नि का ज्ञान भी होगा। यज्ञों की यह विशेषता थी कि उनमें— अग्निशक्ति, शब्दशक्ति और काल विशेष की शक्ति तीनों का एक अभूतपूर्व सम्मिश्रण होता था। वर्तमान वैज्ञानिक संसार शब्दशक्ति और काल परिवर्तन की गति के ज्ञान से सर्वथा शून्य है। मन्त्र शक्ति में शब्दशक्ति का रहस्य अन्तर्हित है। प्रहगतियों के परिवर्तनानुसार नाना नक्षत्रों से यज्ञों का जो सम्बन्ध था, वर्तमान वैज्ञानिक उस कालज्ञान की ओर एक क्षण के लिये भी कभी नहीं विचारते।
धूम के प्रभाव का भी सबसे अधिक विश्लेषण करना होगा। एटम-धूम के विषैले प्रभाव ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि धूम हजारों कोसों तक फैलता है। यज्ञ धूम भी विषैले धूम की अपेक्षा अपने सुगन्धित धूम से न जाने कितने व्यापक वातावरण पर अपने व्यापक प्रभाव को करता था। जो यज्ञविषयक अनुसंधान करना चाहते हैं, वे नाना प्रकार के पदार्थों की आहुतियों से उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के धूम प्रभावों का परीक्षण करेंगे।
वर्तमान विश्व का समस्त वायु-मण्डल लाखों कारखानों की चिमनियों के दुर्गन्धमय धूम से परिपूर्ण हो रहा है। अपनी भौतिक आवश्यकता की लोलुपता में आज का कोई भी व्यक्ति इस बात का परीक्षण नहीं कर रहा है कि इस धूम का हमारी वर्षा-हमारे अन्न और हमारे मस्तिष्क पर कैसा प्रभाव हो रहा है। यज्ञानुसंधान करने वाले विद्वानों का कर्तव्य है कि वे इस विषय पर पूरी तरह से मनन कर विश्व को यह दिखा दें कि विश्व के लिये यदि कोई कल्याणकारी धूम हो सकता है तो वह केवल यज्ञ धूम ही है। यज्ञ धूम से यदि विश्वव्याप्त होगा तो इसकी मस्तिष्क शक्ति स्वयमेव विकसित होगी एवं इस धूम से सम्पन्न समस्त वर्षा पृथ्वी के प्रत्येक पदार्थ में एक विशेष गुण की अधायक होगी।
यज्ञानुसंधान सम्बन्धी इन सब कामों का पूर्ण परीक्षण केवल याज्ञिक विद्वानों के द्वारा ही नहीं किया जा सकता। इसके लिये प्राचीन एवं अर्वाचीन दोनों प्रकार के वैज्ञानिकों के पारस्परिक सहयोग की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
यज्ञानुसंधान-शाला की एक योजना—
इसलिये यज्ञानुसंधान शाला के सम्बन्ध में मेरी सबसे पहली योजना यह है कि—यह अनुसंधान-शाला एक ऐसे विशाल प्रदेश में स्थापित हो जहाँ प्राचीन रीति के नाना कुण्ड-मण्डपों एवं आधुनिक रीति की नाना प्रयोग परीक्षण शालाओं की एक साथ स्थापना हो सके। इस अनुसंधान शाला में अनुसंधान करने वाले विद्वानों का कर्तव्य होगा कि वे पहले से ही अपने किसी विषय विशेष की परीक्षा का कार्यक्रम तैयार कर तद्नुसार अपने परीक्षणों को नियत रूप से किया करें।
“उदिते जुड़ोति”, “अनुदिते जुहोति, आदि विवाद ग्रस्त विषयों का सबसे सुन्दर निर्णय उस समय होगा जब सूर्य के उदित होने पर और उसके उदय से पूर्व किये हुए यज्ञों के धूमादि की गति के अन्तर का ज्ञान हमको यन्त्रों की सहायता से होगा।
हवन कुण्डों और आधुनिक यन्त्र शालाओं के साथ यज्ञानुसंधान-शाला में—एक ज्योतिष का विभाग होगा, जो Wather raport ऋतु परीक्षण के अनुसार भिन्न प्रकार की कालगतियों का परीक्षण करता हुआ किस काल में कौनसा यज्ञ और कौन-सी सामग्री विशेष फलदायक होगी- इस बात का निर्णय किया करेगा। हमारे यहाँ अनेक ऐसे मार्ग हैं जिनमें कभी तो हमारी गति ब्रह्मांड के उच्च से उच्चस्तर में होती जाती है और कभी उच्चस्तर से भी हम नीचे स्तर में आ जाते हैं। आधुनिक वैज्ञानिकों के लिये ग्रह गति के अनुसार होने वाले नाना परिवर्तन परम परीक्षणीय हैं।
मैं यह मानता हूँ कि यज्ञ द्वारा जिस अपूर्व की उत्पत्ति का सिद्धान्त स्थिर किया गया है वह परम महान् है परन्तु श्रद्धा एवं विश्वास से शून्य एवं आध्यात्मिक व्यापकता से शून्य वर्तमान युग उस सिद्धान्त की त्रैकालिक परिस्थिति का ज्ञान नहीं कर सकता। अपूर्व को समझने के लिये यह परमावश्यक है कि हम काल की त्रैकालावाध्य परिस्थिति को समझकर इस क्षण में किये हुए कर्म का फल भविष्य में प्राप्त करने के लिये तैयार रहें। जब तक लोग केवल भौतिक दृष्टि से ही किसी बात का समझना चाहते हैं, तब तक हमको भौतिक परिवर्तनों के द्वारा ही हमारे सिद्धान्तों की विशेषता को उनके समक्ष स्पष्ट करना होगा।
हमारे प्राचीन यज्ञों में मन्त्रों के अशुद्ध उच्चारण एवं कुण्ड-मण्डपादि के निर्माण में प्रमाद होने से अनेक बार विपरीत फलों की प्राप्ति के उदाहरण मिलते हैं, एक-एक अक्षर के उच्चारण से पृथक्-पृथक् भौतिक परिवर्तन होते हैं—आजकल के वैज्ञानिक जिस रूप में संगीत लहरी के नाना प्रभावों का परीक्षण कर रहे हैं, उस रूप में हमको भी उदात्तादि स्वरों की तत्तद विशेषताओं का परीक्षण करना होगा। कुण्ड-मण्डपादि लक्ष्य के साधन हैं। इनका मापदण्ड यदि किंचित् मात्र भी इधर-उधर हो, तो लक्ष्य भ्रष्ट हो सकता है। इस मापदण्ड को केवल शुष्क शास्त्रीय विषय न मानकर हमारा कर्तव्य है कि हम इनके तार-तम्य से उत्पन्न होने वाले नाना तारतम्यों का ज्ञान भी प्राप्त अवश्य करें।
यदि कोई यह कहें कि इनमें वैज्ञानिकता की अपेक्षा केवल हवन सामग्री की अधिकता अथवा न्यूनता पर ही इनके परिमाणों का निर्धारण किया गया है, तो मेरा उन से यही नम्र निवेदन है कि यदि प्राचीन याज्ञिकों के सम्मुख यह वैज्ञानिक प्रश्न नहीं था, तो हमारा कर्तव्य है कि हम इन बातों की वैज्ञानिक परीक्षा अवश्य करें। यह आवश्यक नहीं कि समस्त विज्ञान प्राचीनकाल में ही उद्भूत हुआ था और आज हम उसमें किसी नवीन वैज्ञानिक विकास के दर्शन नहीं कर सकते। मेरा तो अनुमान है कि नाना प्रकार के पदार्थों द्वारा जो आहुति दी जाती थी उन पदार्थों के पारस्परिक सम्मेलन में किसी न किसी तरह की अपनी निजी विशेषता अवश्य रहती थी। अनेक स्थानों पर अनेक प्रकार के भिन्न-भिन्न विल्वादि पदार्थों के हवन का विधान है। पशुयाग में भी नाना प्रकार के पशुओं का वर्णन है। जो यज्ञों की हिंसा से भयभीत हों, वे उससे सर्वथा दूर रहें परन्तु उनका भी यह कर्तव्य अवश्य है कि अपनी ओर से भी नाना प्रकार के पदार्थों का सम्मिश्रण कर उनकी आहुति से उत्पन्न होने वाले नाना प्रकार के भौतिक प्रभावों का परीक्षण करें।
इन समस्त सूक्ष्म परीक्षणों के साधनों से सम्पन्न यज्ञानुसंधान-शाला यह निश्चित है कि बहुव्यय साध्य है, परन्तु इस अनुसंधान-शाला में जिन सूक्ष्म विषयों का अनुसंधान होगा, उनका प्रभाव समस्त पार्थिव लोक के लिये परम कल्याणकारी होगा। यदि हम वर्षा यज्ञ के विज्ञान को ही पूरी तरह से समझ लें, तो हमारी अन्नादि की सब समस्यायें सहज ही में सुलझ सकती हैं।
यज्ञों पर श्रद्धा रखने वाले सज्जनों से मेरी यही प्रार्थना है कि वे शास्त्रीय आज्ञानुसार यज्ञों के समस्त प्राचीन विधानों की रक्षा करते हुए नवनवीन यज्ञ सम्बन्धी परीक्षणों के लिये भी तैयार अवश्य रहें। अणुबमों के यन्त्रालयों के समान इनमें परम सावधानी से काम करना होगा, परन्तु वेदों की रक्षा के लिये जैसे समस्त वेदांग सुसज्जित रहते हैं, वैसे यज्ञों की प्रगति के लिये यज्ञ से सम्बन्ध रखने वाले समस्त कालज्ञान, स्वर ज्ञान, सामग्री विज्ञान, देवोपासना आदि ज्ञानों और साधनों को भी प्रतिक्षण सहायता के लिये सुसज्जित रहना होगा।
संस्कृत के समस्त विद्वानों का कर्तव्य है कि वे इस अनुसंधानशाला की आवश्यकता से समस्त भारतीय जनता को प्रतिबोधित करें। प्रति बुद्ध भारत इस अनुसन्धान-शाला को भी एक न एक दिन अवश्य खोलेगा।
भारतीय संस्कृति की आत्म शिक्षा, प्रेरणा, एवं विधि व्यवस्था ऐसी है जिसे मनुष्य जितनी ही गम्भीरता से समझे और उसमें सम्मिलित तथ्यों को जीवन में उतारे तो वह निस्संदेह महान् बन सकता है। प्राचीनकाल में भारत महान् इसलिए था कि यहाँ के प्रत्येक नागरिक के मन, वचन और कर्म का संचालन भारतीय संस्कृति के द्वारा होता था। तब घर-घर में नर रत्न उत्पन्न होते थे और इस देश की आध्यात्मिक, नैतिक, शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक शक्ति का कोई वारापार न था।
आज अनेक दिशा में अनेक प्रकार की उन्नतियाँ करने में मनुष्य उन पूर्वजों से कहीं आगे बढ़ गया है पर धर्म और संस्कृति की दृष्टि से काफी पिछड़ गया है। इस एक ही कमी ने अन्य समस्त उन्नतियों पर पानी फेर दिया है। सुख साधनों की निरन्तर वृद्धि होते जाने पर भी लोग दिन-दिन अधिक दुखी, अधिक दुर्बल, अधिक विपन्न होते चले जाते हैं। यदि नैतिक उन्नति की ओर ध्यान न दिया गया तो सुखी बनने के सारे ही उपक्रम व्यर्थ चले जावेंगे। अनीति-ग्रस्त मनुष्य कुबेर की सम्पदा और इन्द्र के वैभव के स्वामी बनने पर भी दुखी ही रहेंगे।
मनुष्य के नैतिक स्वास्थ्य और उससे उत्पन्न होने वाले शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक स्वास्थ्य का एकमात्र आधार वह महान परम्परा एवं विश्वासों की पृष्ठभूमि ही है, जिसको हम संस्कृति कहते हैं, यही वह संजीवनी शक्ति है जिसकी प्रेरणा से आदमी की शकल में साँस लेने वाले पुतले वस्तुतः मनुष्य कहलाने के अधिकारी बन सकते हैं वे मनुष्य ही नहीं, देव और परमात्मा का पद भी प्राप्त कर सकते हैं। स्वर्गलोक प्राप्त करने का अर्थ मनुष्य का देवत्व की भूमिका में जागृत होना और परमात्मा को प्राप्त करने का अर्थ- आदमी की मनोभूमि का ‘विश्व मानव की अन्तरात्मा’ के रूप में परिणत हो जाना ही है। इस प्रक्रिया को पूर्ण करने की सामर्थ्य-स्वर्ग और मुक्ति दिलाने की शक्ति—तत्वज्ञान की उस महान परम्परा में ही सन्निहित है जिसे संस्कृति के नाम से पुकारते हैं। यों विश्व संस्कृति की आत्मा एक है, पर जिस प्रकार विभिन्न देशों की, विभिन्न परिस्थितियों के कारण विभिन्न भाषाओं, आहार-विहार और परम्पराओं का अन्तर रहता है उसी प्रकार इस देश के लिए जिस ‘जीवन दृष्टि’ की आवश्यकता समझ उसे ऋषियों ने भारतीय संस्कृति नाम दिया।
कहा जाता है कि आज उन्नति की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं, यह बात तभी ठीक मानी जा सकती है, जब उसमें साँस्कृतिक विकास के लिए भी समुचित स्थान हो। यह कार्य ऐसा नहीं है जिसे उपेक्षित छोड़ा जा सके। यदि वस्तुतः हम मनुष्य को सुखी और समृद्ध देखना चाहते हैं तो इसके लिए आध्यात्मिक इंजीनियरों को “साँस्कृतिक योजना आयोगों का काम भी हाथ में लेना पड़ेगा। हीराकुण्ड और नाँगल बाँध केवल नदी नालों के पानी पर काबू पा सकते हैं, पर मनुष्य के अन्तःकरणों में छिपी हुई अपार बुद्धि और क्रियाशक्ति की प्रचण्ड-धारा का नाशकारी बाढ़ के रूप में परिणत न होने देने के लिए ऐसे पुल और बाँध बनाने पड़ेंगे जो उस शक्ति से सिंचाई, बिजली आदि जैसी लाभकारी दिशा में लगा सकें।
पंचवर्षीय योजनाओं को सफल बनाने में कुशल वैज्ञानिकों, अनुभवी इंजीनियरों, सूक्ष्मदर्शी योजनाकारों और परिश्रमी श्रम-जीवियों की भारी आवश्यकता होती है। यह पर्याप्त न हों तो कोई भी योजना सफल नहीं हो सकती। राष्ट्र को सच्चे अर्थों में समृद्ध बना सकने वाली साँस्कृतिक-पुनरुत्थान की महान योजना को क्रियान्वित करने के लिए भी ऐसे ही उच्चकोटि के कार्यशील व्यक्तियों की आवश्यकता है। यह कार्य सरकार के उच्च वेतन भोगी नौकर नहीं कर सकते, धनियों के द्वारा आर्थिक आधार पर भी इन कार्यों को सफल नहीं बनाया जा सकता। यह कार्य तो ऐसे त्यागी, तपस्वी, धर्मात्मा, परमार्थ प्रिय एवं आत्मिक दृष्टि से महान और सुयोग्य व्यक्तियों का है जो अपनी श्रेष्ठता के कारण दूसरों के अन्तःकरणों पर कुछ प्रभावशाली छाप छोड़ सकें वाचाल बकवादी व्याख्यानदाता, कागज काले करने के अभ्यासी प्रेस वाले, गायक, नर्तक, तथाकथित संत महन्त एवं नामधारी लीडर इन कार्यों का प्रदर्शन तो कर सकते हैं पर कुछ ठोस कार्य तो उन्हीं के द्वारा होगा जो व्यक्तिगत रूप से महान होंगे। साँस्कृतिक पुनरुत्थान, जिसकी आज पीड़ित मानवता की रक्षा करने के लिए अत्यधिक आवश्यकता है- केवल उन व्यक्तियों के द्वारा पूर्ण होगा जो विद्या, धन, चातुर्य, स्वास्थ्य पद आदि की दृष्टि से नहीं आन्तरिक दृष्टि से महान होंगे, क्योंकि जन-साधारण की अन्तरात्मा को प्रेरित, प्रभावित एवं प्रकाशित करना सदा से ऐसे ही लोगों के हाथ में रहता आया है और आगे भी रहेगा।
गायत्री तपोभूमि की बाह्य सामर्थ्य नगण्य है, उसके व्यापक साँस्कृतिक पुनरुत्थान करने के विशाल कार्य को, साधनों के अभाव में भी हाथ में लेने के कार्य को, बौने के आकाश छूने के प्रयत्न के समान आज उपहासास्पद कहा जा सकता है, पर ऐसा लगता है कि कोई महान-शक्ति इस देश की साँस्कृतिक कमी को पूरा करने के लिए भारी करवट बदल रही है और उसके लिए जो भी ईंट पत्थर उसके आगे आ रहे हैं, उन्हें अपना हथियार बना रही है। हमारी सामर्थ्य अत्यन्त तुच्छ है, पर जिस प्रकार किसी बलवान हाथ के द्वारा खींच कर मारा हुआ छोटा सा ईंट का टुकड़ा लक्ष को मर्माहित कर सकता है, उसी प्रकार इस योजना की सफलता की आशा करना भी कुछ अनुचित न होगा।
“जन-जन की अन्तरात्मा में भारतीय संस्कृति के तत्वज्ञान की इतनी गहराई तक प्रतिष्ठापना करना जिससे उसके दृष्टिकोण और जीवनक्रम का संचालन नैतिक आधार पर होने लगे” यह आज की प्रधान आवश्यकता है इस एक ही उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्यक्रम असंख्य प्रकार के बन सकते हैं। यह सब कार्यकर्त्ताओं की संख्या और योग्यता पर निर्भर रहेगा। पिछले अंकों में साँस्कृतिक शोध, साँस्कृतिक विद्यालय, साँस्कृतिक पुस्तकालय, स्थान-स्थान पर साँस्कृतिक शिक्षण शिविर करने वाले साँस्कृतिक मिशन, साँस्कृतिक अत्यन्त सस्ते साहित्य का प्रकाशन आदि योजनाओं का विस्तृत वर्णन किया जा चुका है। उन कार्यों की पूर्ति के लिए प्रधान आवश्यकता उन मनुष्यों की है, जो इनके लिए उपयुक्त है। यों आज हर कार्य के लिए नौकर बहुतायत से मिल सकते हैं, पर यह कार्य उनके बलबूते का नहीं, इसे तो केवल वे आत्म त्यागी व्यक्ति कर सकते हैं, जो भाषणों से ही नहीं, अपने उदाहरण उपस्थित करके दूसरों को अनुकरण की प्रेरणा प्रदान कर सकें। अपने आपको “खरा” सिद्ध करना ऐसे लोगों की प्रथम कसौटी है। ऐसे लोग नौकरी के लोभ से नहीं पकड़े जा सकते, अन्तरात्मा की प्रबल प्रेरणा से ही उनका कटिबद्ध होना सम्भव है।
विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के लिए ‘नरमेध’ का आयोजन किया गया है। जिनके पीछे पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं—ऐसे सच्चे एवं सुयोग्य व्यक्ति ही इसके अधिकारी हैं। यह एक प्रकार का संन्यास है, जो गायत्री (ज्ञान) यज्ञ (त्याग) की शक्ति बढ़ाने के लिए अपनी आहुति के रूप में कार्यान्वित होगा। यों साधू-बाबाजी, सन्त-महन्त, लाल-पीले कपड़े पहनने वाले 56 लाख व्यक्ति इधर-उधर मटरगश्ती करते देखे जाते हैं। इनमें से अधिकाँश वे हैं जो जीवन की समस्याओं को सुलझाने और जिम्मेदारियों का बोझ उठाने में असमर्थ होने के कारण भाग खड़े हुए हैं और भीख-टूक माँग कर अपना दिन काटते और पेट पालते हैं। कुछ ऐसे हैं जो लालची बनिये की तरह चौबीस घन्टे अपने मतलब में ही चौकस रह कर केवल अपनी स्वर्ग मुक्ति की बात सोचते रहते हैं, अब तक जो समाज का ऋण ले चुके हैं, तथा अब भी भोजन वस्त्र आदि के रूप ये जो ऋण निरन्तर ले रहें है, उसे मार लेने और हजम कर जाने का पक्का इरादा किये बैठे हैं। ऐसे लोग माला तो जपते हैं, पर अपने ऊपर चढ़े हुए ऋणों को उतारने एवं लोक सेवा को परमार्थ पथ पर कदम बढ़ाने के लिए बिलकुल तैयार नहीं होते। इन्हें स्वर्ग, मुक्ति आदि कुछ मिलेगी या नहीं यह तो वे ही जानेंगे पर उनकी मानसिक स्वार्थपरता को देखते हुए उनसे भी कुछ आशा नहीं की जा सकती, सच्चे साधु-विरक्त साधु- जो तत्वज्ञान की दृष्टि से संन्यासी हैं, मिलने मुश्किल हैं, उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक होगी।
ऐसी स्थिति में नरमेध का संन्यास ही उपयुक्त है। इनकी कसौटी और प्रतिज्ञायें ऐसी हैं, जिनके आधार पर अपने जप तप करने के साथ-2 लोक सेवा साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये परिश्रम करने की शपथ लेना आवश्यक होगा। ऐसे संन्यासी थोड़े से भी हों तो बहुत काम हो सकता है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ या संन्यासी तीनों ही क्षेत्रों के व्यक्ति इसमें आ सकते हैं। गृहस्थ केवल वे होंगे, जिनकी पत्नी चाहे तो साथ रहें पर और कोई पारिवारिक जिम्मेदारी ऊपर न हो, ऐसे व्यक्तियों को विद्या, बुद्धि, श्रम, स्वास्थ ज्ञान आदि की उतनी योग्यता होनी भी आवश्यक है जिसके अनुसार वे अपने भोजन, वस्त्र के खर्च की अपेक्षा कहीं अधिक मूल्य का लाभ जनता को पहुँचा सकें, सद्गुणी, उत्साही, चरित्रवान्, श्रमशील, अनुशासन प्रिय तो उनका होना आवश्यक ही है। प्रसन्नता की बात है कि ऐसे कई व्यक्ति नरमेध की प्रथम आहुति के रूप में चैत्र की पूर्णाहुति के समय अपना बलिदान करने को तैयार हो रहे हैं। बूढ़े, बीमार, अपंग, अशिक्षित, आलसी, सब ओर से तिरस्कृत, अयोग्य व्यक्तियों के बहुत से पत्र इसके लिए आते रहते हैं। भोजन, वस्त्र और स्थान की समस्या हल करने का उन्हें यह एक सरल तरीका प्रतीत होता है, ऐसे लोगों को मना ही करना पड़ता है, क्योंकि हमें तो केवल कुछ कार्य करने के लिए सहयोग एवं परिश्रमी कार्यकर्त्ताओं की आवश्यकता है। अन्धे-अपंगों के लिए सदावर्त मिलने का नाम नरमेध नहीं है। जिनकी अन्तरात्मा में अपने आपको इसके लिए उपयुक्तता प्रतीत हो वे प्रसन्नता पूर्वक हमारे कंधे से कंधा मिलाकर काम करने के लिए कटिबद्ध हो सकते हैं। उनके जीवनयापन की आवश्यक व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी तपोभूमि लेने को तैयार है। उनका कार्यक्षेत्र मथुरा भी और देश, विदेश में कहीं भी निर्धारित किया जा सकता है।
दूसरी श्रेणी के व्यक्ति ‘आत्मदानी’ कहलायेंगे। इनके संकल्प भी पूर्णाहुति के समय विधिवत् होंगे। यह गृहस्थ होंगे। अपने परिवार की जिम्मेदारियों को उठाने के लिए अपने घर पर ही सामान्य काम काज करते रहेंगे, पर अपनी मनोभूमि को साँस्कृतिक विषय के लिए समर्पित किया हुआ ही समझते रहेंगे। तदनुसार वे ट्रस्टी के रूप में घर की अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने के अतिरिक्त अपना शेष समय और मन अपने लक्ष में ही लगायेंगे। ऐसे लोग अपने क्षेत्र में ही साँस्कृतिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए जो कुछ कर सकते होंगे, उनके लिए अधिकतम प्रयत्न करते रहेंगे।
यह श्रेणी उन लोगों की है जिनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों बहुत थोड़ी शेष रही हैं और जो आवश्यक जिम्मेदारियाँ को निबटाकर नरमेध के लिए अपने आपको तैयार कर रहे हैं। यह एक प्रकार का वानप्रस्थ कहा जा सकता है।
तीसरी श्रेणी साँस्कृतिक सेवा के स्वयं सेवकों की होगी। यह अपनी सामान्य परिस्थिति में काम करते हुए कुछ न कुछ समय और कुछ न कुछ मनोयोग इन कार्यों के लिए अवश्य देते रहेंगे। आवश्यकता पड़ने पर अधिक समय की भी उनसे आशा की जा सकती है।
इस श्रेणी में प्रायः युवक कार्यकर्ता रहेंगे। जिन्होंने व्यवहारिक जीवन में अभी ही प्रवेश किया है।
साँस्कृतिक पुनरुत्थान का कार्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है। भारत की अन्तरात्मा करवट ले रही है। यह निश्चित है कि हमारी संस्कृति का महानतम विकास होगा। कोई शक्ति इस कार्य को करने में लगी हुई है। उसके हाथ का निमित्त, उपकरण बन जाने से मनुष्य का श्रेय लाभ होता है। गंगा का अवतरण होने ही वाला था, भागीरथ उस श्रेय का भागीदार बना। संस्कृति की ज्ञानगंगा का अमृत सींचने का श्रेय लेने वाले भागीरथों की आज पुकार हो रही है। जिनकी आत्मा में उस अज्ञात वाणी को सुनने और आह्वान के संकेतों को देखने की क्षमता होगी, ये इस दिशा में बढ़ेंगे और स्व पर कल्याण का एक महान् अनुष्ठान पूर्ण करेंगे, यह सुनिश्चित है। इन दोनों प्रकार के आत्म दानों के लिए इन पंक्तियों द्वारा याचना की जा रही है, जिनके पास कुछ हो, वे देने की कृपा करें।
यह आत्मबलि की याचना केवल साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के लिए ही नहीं है, यह तो उसका बाह्य रूप है। आध्यात्मिक दृष्टि से यह एक महान् तप-साधन एवं योगाभ्यास है। नरमेध करने वाला व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं, कामनाओं, वासनाओं, महत्वाकाँक्षाओं, सुविधाओं का यज्ञ में होम करेगा और अपने आपको एक विशुद्ध सचेतन यंत्र मात्र समझकर शरीर और मन को निर्धारित लक्ष में लगाये रहेगा। यह कार्य योगी अरविन्द द्वारा बहु प्रशंसित- गीता में भगवान द्वारा निर्देशित “आत्म समर्पण” की स्थिति है। इसमें निष्ठा हो जाने पर सभी भव बन्धनों से छुटकारा सुनिश्चित है। आत्म समर्पण की मनोभूमि तैयार होते ही आत्मा का परमात्मा से ऐक्य हो जाता है। व्यक्तिगत अहंता के जो बंधन जीव को बाँधे हुए हैं, उन्हीं का हवन नरमेध में आत्मबलि देने वाले को करना पड़ता है। एकाकी किये हुए संकल्प दुर्बल और असफल होते रहते हैं, पर देवताओं को, यज्ञ भगवान को, विशाल जनता जनार्दन को साक्षी देकर जो व्रत लिया जाता है, उसके पीछे काफी मजबूती रहती है। यों दो स्त्री-पुरुष मिलकर अकेले में भी बिना किसी उपकरण के विवाह कर सकते हैं, पर वह मजबूत नहीं होता। विधिवत् संस्कार के कारण अनेकों प्रकार से उसमें मजबूती आ जाती है और विवाह की स्थिरता की सम्भावना अनेक गुनी बढ़ जाती है। यही बात विश्व-मानव को, समष्टि आत्मा-परमात्मा को, जनता-जनार्दन को अपनी आत्मा का समर्पण करने के विशाल उत्सव के द्वारा होती है। ऐसा विधिवत किया हुआ ‘आत्म-त्याग’ साधारण एकान्त आत्म अर्पण की अपेक्षा निश्चय ही अधिक सफल होता है। नरमेध में आत्मबलि देने वाले के शरीर और मन पर उसके व्यक्तिगत संबंधियों का कोई अधिकार नहीं रह जाता, इस प्रकार वह एक प्रकार का संन्यास है। यह साधारण संन्यास से असंख्य गुना महान् भी है।
आत्मदान की दूसरी श्रेणी विरक्ति की वानप्रस्थी साधना है। परिस्थिति वश- भरत को राम का राज चलाने के लिए एक ट्रस्टी का काम करना पड़ा था, पर भरत का मन कभी भी राज में लिप्त न हुआ, वरन् शरीर से उस काम का चलाते हुए भी मन को सदा भगवान के चरणों में लगाये रखा। ठीक यही स्थिति आत्मदानी की होगी। अपने पदार्थों को, सम्पत्ति को, सम्बन्धियों को अपना न मानकर केवल उनकी सेवा के लिए नियुक्त एक जिम्मेदार माली के समान अपनी स्थिति अनुभव करते रहना, यह गीता में बताया हुआ अनासक्त कर्मयोग है। संकल्पपूर्वक ‘आत्मदान’ की घोषणा समारोह-पूर्वक करने से अनासक्त कर्मयोगी की मनोभूमि की सृष्टि होती है और ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करना अधिक सरल हो जाता है। ऐसी मनोभूमि बन जाने पर कोई मनुष्य माया ग्रस्त, जंजाली जीव नहीं रह सकता, वह दैवी प्रतिनिधि के रूप में जो भी कार्य करता है —चाहे वह परिवार संचालन ही क्यों न हो—विशुद्ध परमार्थ बन जाते हैं। उसका मन हर घड़ी उच्च-भूमिका में ही जागृत रहने के कारण शुभ संकल्प करता रहता है और तीव्र गति से लक्ष की ओर बढ़ता है।
साँस्कृतिक सेना के सैनिकों पर आत्मबलि देने वाले एवं आत्मदान करने वालों के समान कोई आध्यात्मिक बंधन तो नहीं है, पर वह भी लोक-सेवा की सर्वोत्तम कक्षा साँस्कृतिक सेवा—का महान व्रत है। इस व्रत के व्रती अपने संकट की पूर्ति के लिए जब भी जितना भी समय मिले तब अधिकतम अवसर निकालने का ध्यान रखना- एक ऐसा कार्यक्रम है जिसके अनुसार मनुष्य निरन्तर अधिक शुभ कार्यों के लिए- पुरुष संचय के लिए अग्रसर होता रहता है। उन शुभ कार्यों के फलस्वरूप उसे अत्यधिक आत्मशाँति मिलने तथा पुण्य फल के द्वारा सुख सौभाग्य बढ़ने की पूरी-पूरी सम्भावना रहती है। व्रतधारी सेवा सैनिक अपने निर्धारित पथ पर मार्च करते हुए निरन्तर उच्च भूमिका में विकसित होने के लिए अग्रसर होते हैं। इस प्रकार यह भी एक महान् आध्यात्मिक अनुष्ठान ही माना जायगा।
1. आत्मबलि देने वाले, 2. आत्मदान करने वाले, 3. व्रतधारी सेवा सैनिक, यह तीनों ही श्रेणियाँ भारतीय अन्तरात्मा के करवट बदलने के इस महत्वपूर्ण समय में बड़ी आवश्यक हैं। इनके कार्यों का परिणाम असाधारण होगा। युग परिवर्तन की इस पुण्य बेला में इन तीनों का ही विशेष महत्व है। महायज्ञ की पूर्णाहुति के समय बलिदान की इन तीनों ही श्रेणी की आत्माओं के संकल्प बड़े समारोह पूर्वक ऐसे सुन्दर प्रदर्शन के साथ कराये जावेंगे, जिससे हमारी प्राचीन बलिदानी परम्परा को प्रोत्साहन मिले और जोश में आकर शिर काटने के लिए नहीं, तिलतिल करके अपने जीवन को जलाते रहने के लिए और अनेक बलिदानी वीर उत्पन्न हो सके, जिन्हें इस दिशा में कदम उठाने की इच्छा हो, वे पत्र-व्यवहार करके आवश्यक विचार विनिमय करलें।
विशद् गायत्री महायज्ञ अपनी सुव्यवस्थित योजना के अनुसार चल रहा है। आसुरी शक्तियों का आक्रमण बराबर होता रहता है। अनेक प्रकार के विघ्न-विक्षेप इसलिए उपस्थित होते रहते हैं कि इतने बड़े अनुष्ठान के कारण जो दैवी शक्ति उत्पन्न होने वाली है, वह न हो सके। आसुरी माया प्रबल है, वह अनेक रूपों में प्रकट होती हैं। इससे विश्वामित्रजी को भी घबरा कर दूसरों के पास सहायता के लिए दौड़ना पड़ा था, फिर हमारा तो अस्तित्व ही क्या है। प्रेमी परिजनों के प्रयत्न से संरक्षण व्यवस्था बहुत कुछ हो गई है, पर अभी वह बहुत दुर्बल है। पूर्णाहुति के विशालकाय आयोजन के लिए सुरक्षा व्यवस्था की अधिक आवश्यकता है, अन्यथा आसुरी प्रकोपों से इसमें कोई भारी विघ्न आ सकता है। कुछ दिन पूर्व दिल्ली में एक शत कुण्डी-कोटि होम हुआ था, उसमें अग्निकाण्ड के द्वारा लाखों रुपये की हानि हुई थी। ऐसे कोई उपद्रव यहाँ भी खड़े न हो जायं, उसके लिए सुरक्षा व्यवस्था की और अधिक मजबूती की आवश्यकता है। जो सज्जन संरक्षण की एक-एक माला जपते हैं, वे दो-दो जपना आरम्भ कर दें तथा प्रत्येक संरक्षक को चाहिए कि वह एक-एक दो-दो और नये संरक्षक बनादे। यदि दूने संरक्षक हो जाये तो अगले तीन महीनों में प्रतिदिन 24 लक्ष का एक महापुरश्चरण होता चले और पूर्णाहुति की सुरक्षा पूर्ण निश्चित हो जावे। प्रत्येक भागीदार तथा संरक्षक इस दिशा में अधिक से अधिक ध्यान देने की हमारी करबद्ध प्रार्थना है। आपकी थोड़ी प्रयत्नशीलता से यज्ञ सफल हो सकता है और इस दिशा में लापरवाही एवं उपेक्षा बरतने से इतना सब ‘करा-धरा’ बर्बाद हो सकता है। इन तीन महीनों में संरक्षकों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। हममें से हर व्यक्ति इसके लिए प्रयत्न करे।
तपोभूमि में प्रातःकाल नियमित रूप से गायत्री यज्ञ होता है। सायंकाल इस मास ऋग्वेद यज्ञ चल रहा है। अगले मास से अथर्व वेद यज्ञ आरम्भ हो जायगा। गत मास यजुर्वेद यज्ञ तो पूरा हो ही चुका है।
पूर्णाहुति की तैयारियाँ आरम्भ हो गई हैं। हवन सामग्री, घी, खाद्य सामग्री समिधाएं आदि रखने के लिए स्थान न था। इसके लिए पाँच कमरे तथा तीन छोटी कोठरियाँ बननी आरम्भ हो गई हैं। तीन नये जीने छतों पर जाने के लिए निकाले जा रहे हैं। यह एक महीने में बनकर तैयार हो जावेंगे। यह स्थान अभी गोदाम का और पीछे साधकों को ठहरने के काम में आवेगा। हवन कुण्डों के लिये मन्दिर के तीनों तरफ जो खाली जमीन थी, उसी का उपयोग किया जा रहा है। डेढ़ फुट ऊँची मिट्टी ढ़लवाकर तथा ईंटों से चिनवाकर उस सब जमीन पर पक्का प्लेटफार्म बनाया जा रहा है। इसी पर 108 कुण्डों की इस हिसाब से रचना की जा रही है कि प्रत्येक कुण्ड पर आठ-आठ व्यक्ति बैठ सकें। बिजली लगाने की सरकारी स्वीकृति आ गई है। अब फिटिंग चालू हो गया है। सभी कक्षों में बिजली लगाई जा रही है। पूर्णाहुति के समय शोभायमान विद्युद्दीप जलाने तथा लाउडस्पीकरों का उपयोग करने में इस बिजली से बड़ी सहायता मिलेगी। पुस्तकालय के लिए आठ नई अलमारियाँ बनवाई गई हैं। मंत्र-लेखन की कापियों को सुरक्षित रखने में स्थान की कमी पड़ गई थी, सो उसी कमरे में ऊपर टांड़ लगाकर शीशेदार अलमारी लगादी गई है। अब प्रत्येक कापी की पूर्ण सुरक्षा का प्रबंध बन गया।
पूर्णाहुति के दिनों तपोभूमि में एक टेलीफोन रहना तो निश्चित हो गया है, पर प्रयत्न यह किया जा रहा है कि चार अलग-अलग क्षेत्रों में जहाँ भोजन आदि के अलग-अलग व्यवस्था केन्द्र रहेंगे, उन सभी में टेलीफोन रहें ताकि एक केन्द्र दूसरे केन्द्र का आपस में विचार विनिमय करना सरल हो जाय। वृन्दावन के लिए उन दिनों स्पेशल ट्रेनें छोड़ने के लिए रेलवे अधिकारियों से पत्र-व्यवहार का अभी कोई सन्तोषजनक उत्तर नहीं आया है, इसलिए एक डेपूटेशन बड़े अधिकारियों से मिलने के लिए भेजा जा रहा है। सरकारी बसें तथा प्राइवेट लारियाँ अधिक से अधिक संख्या में उन दिनों गोकुल, महावन, गोवर्धन, नन्दगाँव, बरसाना आदि की यात्रा के लिए मिल सकें, इसके लिए दौड़-धूप हो रही है।
पहले यह विचार था कि ठहरने के लिए सामूहिक बड़े शामयाने खड़े किये जायं और थोड़ी रावटियाँ-तम्बू रहें। अब यह विचार बदल दिया है। 6 से लेकर 10 आदमियों तक को ठहरने वाली छोटी-बड़ी रावटियाँ ही लगाई जावेगी। खर्च अवश्य कुछ अधिक पड़ेगा, पर सुविधा अच्छी रहेगी बीस-पच्चीस आदमियों को ठहराने वाले तम्बू भी न रखने का विचार है। रोशनी के लिए बिजली और गैसबत्ती दोनों का मुकाबला किया जा रहा है, जिसमें किफायत और सुविधा रहेगी, उसे रखा जायगा। जमुना-किनारे गड्ढेदार चटाई और टाट के पर्दे लगाकर लकड़ी के पाखाने खड़े करने का निश्चय किया गया है। पानी के लिए म्युनिसपैलिटी से पानी की मोटरें माँगी गई हैं, यदि वह प्रबन्ध न हुआ तो कुएं में मोटर पम्प बिठाकर उससे पानी सप्लाई करने की व्यवस्था करनी पड़ेगी। यों यमुना भी तपोभूमि से आधी फर्लांग ही है।
अनेक व्यक्तियों के यह सुझाव हैं कि इस पूर्णाहुति में बड़े-बड़े राजनैतिक नेताओं को भी बुलाया जाय, पर चूँकि यह कोई राजनैतिक सम्मेलन नहीं है, इसलिए ऊंचे-ऊंचे आध्यात्मिक साधकों एवं तपस्वियों की ही प्रधानता रखने की बात अधिक उपयुक्त जँचती है। पाठक अपने विचार हमें लिखें। यदि बड़े नेताओं को बुलाने की बात हो, तो वह सब प्रबन्ध आसानी से हो सकता है। इस अवसर पर एक सर्व सम्प्रदाय-सम्मेलन करने का भी विचार है, जिसमें हिन्दू-धर्म के अंतर्गत सभी सम्प्रदायों के प्रतिनिधि इकट्ठे होकर “अनेकता में एकता” का प्रतिपादन कर सकें ।
पूर्णाहुति के समय भारतवर्ष के अधिकाँश गायत्री उपासकों के आने की संभावना है। ऐसा अवसर फिर कभी शायद ही आवे, इसलिए इन तीर्थ स्वरूप गायत्री-उपासकों की स्मृति को सदैव ताजा रखने के लिए एक फिल्म-चित्रपट बनाया जायगा, यह कार्य श्रीडूँगर शी भाई के सुपुर्द कर दिया गया है। वे सभी दृश्यों और सभी व्यक्तियों की रंगीन फिल्म लेने के लिए अपना फिल्म कैमरा तथा आवश्यक सामान तैयार कर रहे हैं। जो लोग इस पुनीत अवसर पर मथुरा न आ सकेंगे। उनके लिए भी इस फिल्म द्वारा पूर्णाहुति के सारे दृश्य देख सकना सरल हो सकेगा।
यज्ञीय वनस्पतियों-हवन सामग्रियों को लगाने के लिए एक बड़ा खेत करने का विचार है, पर अभी वह व्यवस्था बन नहीं पा रही है इसलिए फिलहाल लगभग पाँच सौ गमलों में दूर-दूर से वे जड़ी बूटियाँ मंगाकर लगाई जा रही हैं। इनकी पौध बढ़ती रहेगी जो अवसर आने पर खेतों में लगाई जा सकेंगी।
विशद् गायत्री महायज्ञ की विशाल पूर्णाहुति के लिए तपोभूमि में व्यस्त कार्यक्रम चल रहा है। कमरे बन रहे हैं, कुण्ड तैयार किये जा रहे हैं, बिजली भी फिटिंग हो रही है, हवन सामग्रियाँ, भोजन बनाने, खाद्य पदार्थ एकत्रित करने आदि की व्यवस्था की जा रही है। तम्बू, रोशनी, पानी, स्पेशल ट्रेनें, बसें, टेलीफोन, पूर्णाहुति का फिल्म चित्र, विद्वानों को निमंत्रण, मुक्ति-सेना के आत्म-त्यागी, आत्म-दानी और व्रतधारी सैनिकों का संगठन, नरमेध की तैयारी, औषधि पौधों की नर्सरी, दैनिक यज्ञ व्यवस्था, सर्व सांप्रदायिक सम्मेलन आदि नाना प्रकार के कार्यक्रमों की हलचलें यहाँ चल रही हैं। कार्य बहुत भारी है, समय थोड़ा है, इसलिए यह सब दौड़-धूप आवश्यक भी है, अन्यथा समय पर सब कार्य कैसे पूरे हो सकेंगे? खर्च बहुत और धन याचना न करने की अपनी परम्परा, इन दोनों का समन्वय करना भी उलझन भरा है। तपोभूमि इन गुत्थियों को सुलझाने में लगी हुई हैं। कार्यभार तो निश्चित रूप से अपनी सामर्थ्य से बहुत भारी है, पर चिन्ता और परेशानी की कोई बात नहीं है। माता की शक्ति और सामर्थ्य से पर्वत भी राई हो सकता है। हमें तो अपने कर्तव्यों का ध्यान रखना ही पर्याप्त है।
हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति और गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपना कुछ काम बाँट दें और उनके जिम्मे भी कुछ जिम्मेदारी सौंपे। हमारा एक भी परिजन ऐसा न होना चाहिए जो इस आड़े वक्त में ‘फुरसत न होने’ आदि का बहाना करके हाथ बँटाने से जी चुराये। इस परीक्षा के समय में हममें से हर एक को कुछ करने के लिए अपनी शक्ति और भावना का एक अंश देना ही चाहिए।
इस मास एक कार्य अपने सभी परिजनों को सौंप रहे हैं। वह यह कि अपने समीपवर्ती गायत्री उपासकों तथा धर्म-प्रेमियों तक पूर्णाहुति का सन्देश तथा आमंत्रण पहुंचाने में हमारे व्यक्तिगत प्रतिनिधि का कार्य करने के लिए कुछ समय निकालें। सभी गायत्री-प्रेमियों तक निमन्त्रण पहुँचाने लायक डाक व्यय, क्लर्क, लिफाफे आदि की व्यवस्था हमारे पास नहीं है, फिर परिचय भी अपना थोड़ा ही है, प्राचीन काल में जब डाकखाने नहीं थे, तब अपने प्रतिनिधि-नाई, पुरोहित आदि के द्वारा ही निमन्त्रण भेजे जाते थे। इस यज्ञ में भी वही करने का विचार है। पाण्डवों के यज्ञ में श्री कृष्णजी को यह कार्य सौंपा गया था कि वे आगन्तुकों के चरण धोया करें, हम अपने स्वजनों को इस मास सन्देश वाहक बनने की ड्यूटी सौंप रहे हैं। यह कार्य आप सभी को करना चाहिए। अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जितने गायत्री उपासक एवं धर्म प्रेमी हों, उनकी संख्या गिन लें। फिर उतने ही निमन्त्रण-पत्र तपोभूमि से मँगालें और उन्हें स्वयं जाकर या डाक के द्वारा उन सत्पुरुषों तक पहुँचाने में हमारे प्रतिनिधि का काम करें। यह कार्य देखने में हलका है, पर हमारी दृष्टि में इसका भारी मूल्य है।
स्वयं अपनी उपासना में वृद्धि, दुर्बल संरक्षण बढ़ाने के लिए अधिक गायत्री उपासकों की वृद्धि, मन्त्र-लेखन, गायत्री पुस्तकालयों की स्थापना, आत्मदान की तैयारी, कुछ दिन पहले मथुरा आने का प्रयत्न,आर्थिक सहयोग, अखण्ड-ज्योति के सदस्य बढ़ाना, आवश्यक परामर्श देते रहना, आदि अनेक कार्य ऐसे हैं, जिनमें हाथ बँटाने के लिए कदम बढ़ाया जा सकता है, पर आज जो काम ‘ड्यूटी’ के रूप में सौंप रहे हैं, वह सन्देशवाहक का कार्य है। इस मास हम अपने प्रत्येक प्रेमी के नाम पर ध्यान रखेंगे कि किसने हाथ बँटाया, कौन चुप बैठा रहा, हमें आप सभी से इस सम्बन्ध में सहयोग की आशा है।
(श्री नीरज)
दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा, धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ।़
बहुत बार आई-गई यह दिवाली मगर तम जहाँ था वहीं पर खड़ा है, बहुत बार लौ जल बुझी पर अभी तक कफन रात का हर चमन पर पड़ा है, न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे, उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ! दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा, धरा को उठाओ, गगन को बुझाओ!
सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी कि हर द्वार पर रोशनी, गीत गाए, तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा कि जब प्यार तलवार से जीत जाए, घृणा बढ़ रही है मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ! दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा, धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बड़े बेगमय पंख हैं रोशनी के न वह बन्द रहती किसी के भवन में, किया कैद जिसने उसे शक्ति छल से स्वयं उड़ गया वह धुँआ बन पवन में, न मेरा तुम्हारा, सभी का प्रहर यह, इसे भी बुलाओ उसे भी बुलाओ! दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा, धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
मगर चाहते तुम कि सारा उजाला रहे दास बनकर सदा को तुम्हारा, नहीं जानते फस के गेह में पर बुलाता सुबह किस तरह से अंगारा, न फिर अग्नि कोई रचे रास इससे, सभी रो रहे आँसुओं को हंसाओ! दिए से मिटेगा न मन का अँधेरा, धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
*समाप्त*