अग्निहोत्र- है क्या?

(ले. श्री हरिदत्त शास्त्री एम.ए . कानपुर)

“अग्निहोत्र” शब्द अग्नि के आह्वान का वाचक है, यह अग्नि यज्ञाग्नि, द्यु लोकाग्नि, भौमाग्नि भेद से तीन प्रकार का है। यज्ञाग्नि में हवि का प्रक्षेप किया जाता है जिसके द्वारा वायु की शुद्धि होती है जल व आकाश में पवित्रता आती है। द्यु लोकाग्नि का कार्य रसों का लेना व देना है। सूर्य या चन्द्र जलों का आकर्षण करते हैं, तथा फिर उसके सहस्रधा बना कर पृथ्वी को ही प्रदान कर देते हैं। इस दिव्य गुण के कारण ही सूर्य, चन्द्र आदि देव कहाते हैं। देवों का कार्य परहित साधन है, यज्ञ शब्द का भी यही अर्थ है। यज्ञ के द्वारा देवताओं की पूजा की जाती है, पूजा का अर्थ रोली या चावल चढ़ाना ही नहीं किन्तु उस पदार्थ का सदुपयोग करना है, जल को मैला करना या जल में मल मूत्र का प्रक्षेप करना या विष आदि हानिकारक, रुधिर वसा आदि घृणास्पद वस्तुओं को जल में मिलाना जल की पूजा नहीं किंतु जल की निन्दा है, इसी प्रकार अग्नि में मल, विष्ठा, केश, नख आदि का जलाना और उसको अपवित्र करना अग्नि की पूजा नहीं किन्तु अग्नि की निन्दा है। भौमाग्नि के द्वारा यन्त्रों का चलाना, भोजन का पकाना, लोहे को मुलायम करना, पिघलाना, सुखाना, जलाना आदि कर्म किये जाते हैं, इन कर्मों का यथावत् उपयोग लेना ही अग्नि की पूजा है। विपरीत उपयोग सब निन्दा है, जैसे आत्म-हत्या अपने शरीर को जल में डुबाना, जहरीली वस्तु खाना, अग्नि में फूँकना आदि क्रियाओं से की जा सकती हैं, तथा जो लोग ऐसा करते हैं वे ‘आत्मघाती’ कहाते हैं इस ही प्रकार जो व्यक्ति आत्मा को बिना पहचाने इस लोक से प्रसून करता है वह भी ‘आत्मघाती’ कहाता है। उपनिषद् में लिखा है कि—“योवाऽविदित्वाऽऽत्मान-मस्माल्लो सत्र् प्रयाप्ति स आत्मा कृपणाः”॥

अर्थात्—जो व्यक्ति मनुष्य जन्म लेकर आत्मा पहिचानने का प्रयत्न नहीं करते वे आत्मघाती कहाते हैं, गीता में भी लिखा है कि—

“आत्मैवह्यात्मनो बन्ध रात्मैवरिपुरात्मनः। उद्वरेदात्मनाऽऽत्मानं आत्मान् सब सादयेत्॥

अर्थात्—मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है और अपने को नीचे गिरा सकता है तथा ऊपर उठा सकता है उन्नति या अवनति करना मनुष्य के अपने हाथ की चीज है, इस आत्मोन्नति के साधनों में ‘यज्ञ’ एक विशेष महत्वपूर्ण साधन है, यज्ञ के तीन लाभ हैं शरीर को पवित्र करना, मन को पवित्र करना तथा आत्मा को पवित्र करना। इन तीनों उद्देश्यों की सिद्धि गार्हपत्य, आह्वनीय और दक्षिणाग्नि नाम की तीन अग्नियों से की जाती है, गार्हपत्य शरीर को पुष्ट करती है क्योंकि यह डडडड को उत्तम-उत्तप्त भोजनों से पुष्ट करता रहता है, आह्वनीय के द्वारा मानसिक सद्गुणों का प्रवेश किया जाता है, इस शरीर या मन को यदि पुष्ट और तंदुरुस्त रखा जाय तो ऐहिक तथा पारलौकिक सुखों की प्राप्ति हो सकती है, अन्य कुछ नहीं, सर्वोत्तम अग्नि दक्षिणाग्नि जो दक्षिणा देना या त्याग करना इस दृष्टि से आत्म सुख का सर्वोत्तम साधन है, अतएव

“दानमेकं कलौयुगे”

अर्थात्—सुख या परमपद की प्राप्ति कलियुग में एक मात्र “दान” से ही हो सकती है, क्योंकि दान देने वाला अपने पापों को दान लेने वालों के प्रत्यर्पण कर देता। यही कारण है कि दान लेने वाले के बड़े तपस्वी और “तितिक्षु” होना आवश्यक था। इन सब साधनों को ‘त्रेताग्नि’ के नाम से भी पुकारते हैं, यह उक्त तीनों अग्नियों का सामुदायिक या collective नाम है। यह महापद्धति बाह्य शुद्धि में परम उपयोगी है अतः शुद्धि के लिये जप की बड़ी आवश्यकता होती है अतएव गीता में “यज्ञानाँ जप डडडडडडऽस्मि ” यह वाक्य मिलता है जिसका स्पष्ट यही आशय है कि मानसिक या आध्यात्मिक पवित्रता के लिए मानसिक पवित्रता अनिवार्य है। केवल बाह्य शुद्धि, मानसिक शुद्धि नहीं हो सकती।

यह आदान प्रदान का लेन देन का सिलसिला चला ही आता है—इस परम्परा को उपस्थित रखने में यह ‘यज्ञ’ परम सहायक है अतएव अग्निहोत्र करना ही चाहिये यह शास्त्रकारों का मत है, यह यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, भूत यज्ञ आदि भेद से पाँच प्रकार का है- जिसके न करने से मनुष्य के प्रत्यवाय या पाप का भागी होता है।


यज्ञों का विस्तृत क्षेत्र

(आचार्य पं. श्री गोपालचन्द्र मिश्र, एम.ए. काशी हिन्दू विश्वविद्यालय)

भारतीय परम्परा के अनुसार प्राणियों के ज्ञान शक्ति विद्या बुद्धि बल आदि की न्यूनाधिकता के कारण अविकारानुरूप प्राणि-कल्याण के अनेक साधन बताये गए हैं। उनमें यज्ञ भी एक प्राणि-कल्याण का उत्कृष्ट साधन है। गीता 3।9 में भगवान् ने सभी कार्यों को बन्धन स्वरूप बतलाया है परन्तु यज्ञ को—यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽय कर्मबन्धनः॥ कहकर बन्धन कारक नहीं बताया है। अतएव उन बुद्धिमानों को भी पवित्र करने वाले (पावनानि डडडडषिणाम्) कार्यों में परिगणित किया है। वेदभाष्यकार आचार्य महीधर ने कार्यों के—प्रशस्त, अप्रशस्त, श्रेष्ठ, श्रेष्ठतम ये चार भेद किये हैं। इनमें यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म बताया है और इस अर्थ को श्रुति का समर्थन भी प्राप्त है।

इस महत्वपूर्ण यज्ञ कार्य के भेद उपभेदों की इयन्ता करना साधारण कार्य नहीं है। गीता के चतुर्थाध्याय के यज्ञनिरूपण प्रकरण में यज्ञ के 15 मुख्य भेद बतलाए हुए हैं। यदि इनकी विभिन्न शाखाओं की गणना की जाय तो यज्ञक्षेत्र को ‘अनन्त’ कह कर ही विश्राम करना पड़ेगा। अतएव हम इन भेदों की ओर न जाकर यज्ञकर्म के मुख्यशास्त्र ‘कल्प’ और उसके विद्वानों की परम्परा की ओर ही ध्यान देकर कुछ उपयोगी विचार उपस्थित करते हैं।

महर्षि वेदव्यास की उत्कृष्ट रचना श्रीमद्भागवत् भगवान् के श्रीमुख का—

‘वैदिकस्तान्त्रिको मिश्र इति में त्रिविधोमखः॥’11।27।7

यह वचन है इसके अनुसार सामान्यतया वैदिक, तान्त्रिक और मिश्र ये तीन यज्ञानुष्ठान की शैलियाँ ज्ञात होती है। यहाँ तान्त्रिक और मिश्र शब्द की व्याख्या में विचारकों के विभिन्न मत दीख पड़ते हैं। कुछ लोग तान्त्रिक शब्द से तन्त्र दर्शन प्रतिपादित योग आदि क्रियाओं का, तथा कई विचारक दक्षिण और वाममार्ग नाम से प्रसिद्ध तन्त्र पद्धति के कार्यों का निर्देश बताते हैं। परन्तु याज्ञिक विचारकों के अनुसार—

‘कर्मणाँ युगपद् भावस्तन्त्रम्’ (1।7।1)

इस कात्यायन महर्षि की परिभाषानुसार एक कार्य में ही विभिन्न शाखाओं में प्रतिपादित अनेकताओं का अविरोधी संकलन करना ‘तन्त्र’ शब्द का अर्थ है। ऐसे ही कार्यों को ‘तान्त्रिक’ शब्द से निर्दिष्ट किया गया है। इस अर्थ के मान लेने पर इस प्रकरण में ही आगे कहे गये भगवदर्चा सम्बन्धी सभी विधान सुसंगत हो जाते हैं। और ऐसी ही तान्त्रिक कार्यों के लिए आजकल स्मार्त शब्द का व्यवहार प्रचलित है। शास्त्रकारों ने स्मार्त शब्द की जो व्याख्या की है उससे भी अनेक शाखाओं तथा अनेक वेदों के कार्यों का एक जगह संमिश्रण माना गया है।

‘मिश्र’ शब्द साधारण मिलाव का अर्थ रखता है। मिश्र शब्द से ऐसे कार्यों का संकेत है जिसमें वेद और तन्त्र का सम्मिश्रण हो। याज्ञिक परम्परा के विचार से यहाँ मिश्र शब्द से पौराणिक कार्यों का संकेत है। उनकी दृष्टि में वेद और तन्त्र का सम्मिश्रण ही पौराणिक विधान है।

उक्त याज्ञिक विचार से मख अर्थात् यज्ञ के श्रौत (=वैदिक) स्मार्त (=तान्त्रिक) और पौराणिक (=मिश्र) ये तीन यज्ञ की मुख्य शैलियाँ हैं।

श्रौतयज्ञ

श्रुति अर्थात् वेद के मन्त्र और ब्राह्मण नाम के दो अंश हैं। इन दोनों में या दोनों में से किसी एक में सांगोपांग रीति से वर्णित यज्ञों को ‘श्रौतयज्ञ’ कहते हैं। श्रौत कल्प में ‘यज्ञ’ और ‘होम’ दो शब्द हैं। जिसमें खड़े होकर ‘वषट्’ शब्द के द्वारा आहुति दी जाती है और याज्या पुरोनुवाक्या नाम के मन्त्र पढ़े जाते हैं। वह कार्य ‘यज्ञ’ माना जाता है जिसमें बैठकर ‘स्वाहा’ शब्द के द्वारा आहुति दी जाती है वह होम कहा जाता है। श्रौतयज्ञ-इष्टियाग, पशुयाग और सोमयाग इन नामों से मुख्यतया तीन भागों में विभक्त है। श्रौतयज्ञों के विधान की एक स्वतन्त्र परम्परा है उस प्रयोग परम्परा का जिस कार्य में पूर्णतया उल्लेख हो उसे ‘प्रकृतियाग‘ कहते हैं। और जिस कार्य में विशेष बातों का उल्लेख और शेष बातें प्रकृतियाग से जानी जायँ उसे ‘विकृतियाग‘ कहते हैं। अतडडडडडडड एवं श्रौतयज्ञों के तीन मुख्य भेदों में क्रमशः दर्शपूर्णमासिष्टि, अग्नीषोभीय पशुयाग, और ज्योतिष्टोम सोमयाग ये प्रकृतियाग हैं। अर्थात् इनमें से किसी दूसरे कर्म से विधि का ग्रहण नहीं होता। इन प्रकृतियागों के जो धर्म ग्राही विकृतियाग व अनेक हैं उनकी इयत्ता का संकलन भिन्न-भिन्न शाखाओं के श्रौतसूत्रों में किया गया है। यहाँ का बिना परिचय के नाम गिनाना अनुपयुक्त और अरोचक होगा। अतः श्रौत यज्ञ का सर्वसामान्य परिचय इस प्रकार समझना चाहिये—

श्रौतयज्ञ—आहवनीय, गार्ह्यत्य, दक्षिणाग्नि इन तीन अग्नियों में होते हैं इसलिए इन्हें ‘त्रेताग्नि यज्ञ’ भी कहते हैं। प्रायः सभी श्रौतयज्ञों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष ढंग से, कम या अधिक रूप से तीनों ही वेदों के मन्त्रों का उच्चारण होता है अतः श्रौतयज्ञ ‘त्रयी’ साध्य हैं। इनमें यजमान स्वयं शारीरिक क्रिया में उतना व्यस्त नहीं रहता जितने अन्य ब्राह्मण जिन्हें ‘ऋत्विज्’ कहते हैं वे कार्य संलग्न रहते हैं। श्रौतयज्ञ का इष्टियाग प्रायः 4 वैदिक विधान कुशल ब्राह्मण विद्वानों के सहयोग से हो सकता है। पशुयाग में 6 ऋत्विज् होना आवश्यक होता है। सोमयाग में 16 ऋत्विज् होते हैं। इष्टियाग में अन्नमय प्रधान रूप से हवि अर्थात् देवताओं के लिए देय द्रव्य है। पशुयाग में प्रधान रूप से ‘पशु’ हवि है। सोमयाग में प्रधान हवि सोम होती है। सोमयाग के महान् यज्ञ सत्र और अहीन नाम से कहलाते हैं। सत्रयाग में ब्राह्मण जाति के 17 से 24 तक आहिताग्नि वैदिक विद्वान ही रहते हैं। ये सभी यजमान होते हैं। और इन्हीं में से 16 व्यक्तियों को ‘ऋत्विज्’ का कार्य करना पड़ता है। इसमें दक्षिणा नहीं दी जाती हैं और यज्ञ का फल सब यजमानों को बराबर पूरा मिलता है। अहीनयाग में एक या अनेक अग्निहोत्री यजमान हो सकते हैं। परन्तु इसमें ‘ऋत्विज्’ अलग होते हैं जिन्हें दक्षिणा दी जाती है। इस अहीनयाग का फल केवल यजमानों को ही मिलता है।

इन श्रौतयज्ञों का प्रचार आजकल भारतवर्ष में नहीं के बराबर है। क्योंकि आजकल का मानव बहुमुखी और बहुधन्धी है। उसे कोई शास्त्रीय बन्धन पसन्द नहीं है। श्रौतयाग करने का वही अधिकारी है जिसने विधिपूर्वक श्रौत अग्नियों का आधान लिया है और प्रतिदिन सायं प्रातः अग्निहोत्र में श्रद्धापूर्वक विधानुकूल समय लगाता है। श्रौताग्निहोत्री को अग्नि की निरन्तर रक्षा करनी पड़ती है। अग्नियों के रखने के लिए एक सुंदर अग्निहोत्र शाला चाहिए। कुछ यज्ञों में दूध, दही चाहिये वह बाजारू नहीं होना चाहिये। अग्निहोत्री स्वयं गौ रख कर आवश्यकता होने पर मन्त्रों द्वारा दूध दुहाता है। और मन्त्रों से ही दही जमाता है। अतएव गौ रक्षा करना भी आवश्यक है। प्रत्येक पन्द्रहवें दिन ‘प्रतिपद्’ तिथि को इष्टियाग करना आवश्यक है जिसमें हवनीय द्रव्य तथा ऋत्विजों की दक्षिणा आदि भी आवश्यक है। इन सब साधनों को कथञ्चित् सुलभ कर लेने पर भी सबसे मुख्य बात जो परम आवश्यक है और जिसका अत्यन्त अभाव है वह है वेद की याज्ञिक परम्परा का प्रायोगिक पूर्णज्ञान। आज इसका लोप होता जा रहा है। जिस प्रकार आज हम वेद के उन अर्थों के सम्बन्ध में अनभिज्ञ हैं जिनसे जल-स्थल-नभ सम्बन्धी चमत्कारी वैज्ञानिक मन्त्र क्रियाओं का ज्ञान हो सकता था वैसे ही वर्तमान परिस्थिति, शिक्षा समाज एवं सरकार की उपेक्षा वृत्ति से 10,15 वर्ष के भीतर याज्ञिक प्रयोग पद्धति से भी सर्वथा अनभिज्ञ हो जायेंगे ऐसा प्रतीत होता है।

स्मार्त यज्ञ

इनको श्रोत सूत्र कारों ने पाक यज्ञ तथा एकाग्नि शब्द से व्यवहार किया है। इनके मुख्यतया– हुत, अहुत, प्रहुत और प्राशित ये चार भेद हैं। जिन कार्यों में अग्नि में किसी विहित द्रव्य का हवन होता हो वह हुत यज्ञ है। जिससे हवन न होता हो केवल किसी क्रिया का करना मात्र हो वह अहुत यज्ञ है। जिसमें हवन और देवताओं के उद्देश्य से द्रव्य का ‘वलि’ संज्ञा से त्याग हो वह प्रहुत यज्ञ है। और जिसमें भोजन मात्र ही हो वह प्राशित यज्ञ है।

(पा. गृ. 1।4।1।)

स्मार्त यज्ञ का आधारभूत अग्नि शास्त्रीय और लौकिक दोनों प्रकार का होता है। शास्त्रीय अर्थात् आधान विधि के द्वारा स्वीकृत अग्नि औपासन, आवसथ्य, गृह्य, स्मार्त आदि शब्दों से कहा जाता है। इस अग्नि में जिसने उसको स्वीकार किया है। उसके सम्बन्ध का ही हवन हो सकता है। साधारण अग्नि लौकिक अग्नि है। इसे संस्कारों द्वारा परिशोधित भूमि में स्थापित करके भी स्मार्त यज्ञ होते हैं। स्मार्त यज्ञों की संख्या श्रौत यज्ञों की भाँति अत्यधिक नहीं है। इन यज्ञों की विधि और इयत्ता बताने वाले ग्रन्थ को ‘गृह्यसूत्र’ या ‘स्मार्त सूत्र’ कहते हैं। पञ्चमहायज्ञ, षोडशसंस्कार और और्ध्वदेहिक (प्रचलित मृत्यु के बाद की क्रिया) प्रधानतया स्मार्त हैं। स्मृति ग्रन्थों में उपदिष्ट कार्य जिनका (विनायक शान्ति आदि का) पूर्ण विधान उपलब्ध गृह्यसूत्रों में नहीं मिलता है वे भी याज्ञिकों की परम्परा में स्मार्त ही कहलाते हैं। स्मार्त यज्ञ में प्रायः अकेला भी व्यक्ति कार्य कर सकता है। हवन वाले कार्यों में एक ब्रह्मा की तथा भोजनादि में अनेक व्यक्तियों की आवश्यकता होती है। गृह्या संग्रहकार ने स्मार्त यज्ञों में यजमान ब्रह्मा और आचार्य (नामभेद) इन तीन की आवश्यकता बताई है।

इस समय शास्त्रीय अग्नि वाले कार्य प्रायः लुप्त से हैं क्योंकि इनमें भी अग्निरक्षा आदि का कार्य आजकल की प्रवृत्ति के अनुकूल नहीं बैठ पाता। जिनमें लौकिक अग्नि का ग्रहण है वे संस्कार, उपाकर्म, अंत्येष्टि, आदि प्रचलित हैं। पर वे भी इन्हीं गिनी संख्या में है। स्मार्त यज्ञों में मानव के नैतिक गुणों के विकास का फल अधिक है। आज इनका प्रचार प्रसार कम हो गया है संभवतः आज की बढ़ती हुई अनैतिकता में हमारे लिए यह भी एक कारण हो।

पौराणिक यज्ञ

श्रुति स्मृति कथित कार्यों के अधिकारी अनधिकारी सभी व्यक्तियों के लिए पौराणिक कार्य उपयोगी है। आज कल इन्हीं का प्रचार और विचार है। पौराणिक कार्यों में यज्ञ शब्द का प्रयोग कल्प सूत्रकारों की याज्ञिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है। परन्तु गीता के व्यापक क्षेत्र से इनके लिए भी ‘यज्ञ’ शब्द का व्यवहार होता है। अतएव पौराणिक यज्ञों को हवन, दान, पुरश्चरण शान्तिक, पौष्टिक, इष्ट, पूर्त्त, व्रत, सेवा, आदि रूप से अनेक श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं। जिन जातियों को वेद के अध्ययन का अधिकार है वे पौराणिक यज्ञों को वेदमन्त्रों सहित करते हैं। और जिन्हें वेद का अधिकार नहीं उनको पौराणिक मन्त्रों से ही करते हैं। हमने भी सभी वर्णों की उपयोगिता की दृष्टि से इनका यह निर्देश किया है।

पौराणिक यज्ञों का विस्तार अधिक है अतएव यहाँ लघुकाय लेख में इनका पृथक् पृथक् विवेचन करना नहीं हो सकता। साधारणतया पौराणिक यज्ञों में गणपति पूजन, पुण्याहवाचन षोडशमातृका पूजन, वसोर्धारा पूजन, नान्दी श्राद्ध इन पाँच स्मार्त अंगों के साथ ग्रहयाग प्रधानपूजन आदि विशेष रूप से होता है। इन यज्ञों में लौकिक अग्नि का विशेष ग्रहण है। इनमें एक से लेकर हजारों तक कार्यक्षम व्यक्ति कार्य के अनुसार ‘ऋत्विज्’ बनाए जा सकते हैं। पौराण यज्ञ में संबद्ध व्यक्तियों की प्रसन्नता अधिक आवश्यक है।

उप संहार

उक्त तीनों ही प्रकार के यज्ञ प्राणि कल्याण के उत्कृष्ट साधन हैं। इसलिए विधि और श्रद्धापूर्वक अधिकारानुसार अनुष्ठान करना आत्मकल्याण और लोक कल्याण का प्रशस्त मार्ग है।


यज्ञ से स्वर्ग की प्राप्ति

(श्री स्वामी ब्रह्मानन्दजी दंडी महाराज एटा)

“स्वर्गकामो यजेत्” दर्शपूर्णमासाभ्याँ स्वर्ग कामो यजेत। मीमाँसा- ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत। शाबर भाष्य-

स्वर्ग की कामना इच्छा वाला पुरुष दर्शपूर्णमास यज्ञ करे।

स्वर्गकाम पुरुष ज्योतिष्टोम यज्ञ करे। यह वाक्य श्री शाबर स्वामी ने मीमाँसा का भाष्य करते हुए।

द्रव्याणाँ कर्मसंयोगे गुसात्वेनाभिसम्बन्धः।

मीमा. अ. 6 पा.1

सू. 1। स्वर्गकामो यजेत् इत्यादि वाक्य लिखा है- शावर भाष्य में यह वाक्य शबर स्वामी ने कहाँ से प्राप्त किया यह प्रश्न है इसका उत्तर है वेद से प्राप्त किया है यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्। तेहनाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वेसाध्याः सन्ति देवाः।

यजु. अ. 31 मन्त्र 16।

अर्थात्- उस पूजनीय परमात्मा को ज्ञान रूप यज्ञ से विद्वान पूजन करते हैं और पूजा रूप धर्म को धारण करते हैं तो दुख से सर्वथा छूट जाते हैं और स्वर्ग को प्राप्त होते हैं, जिस स्वर्ग को साधन सम्पन्न पुरुष पूर्व सृष्टियों में प्राप्त हुए हैं।

सूर्य्याचन्द्रमसौधातायथा पूर्वमकल्पयत्।

ऋ. मं. 10 सू. 190 मं. 3-

जैसी सृष्टि पूर्व कल्प में रची वैसी ही इस कल्प में अर्थात् सृष्टि प्रवाह से अनादि-अनन्त है। अतः वेद में कहा कि साधन सम्पन्न पुरुष यज्ञ से स्वर्ग को अर्थात् सुख विशिष्ट प्राप्त करते रहे।

न कर्मकर्त्तृसाधन वैगुण्यात्।

न्याय-अ. 2 सू. 58

अर्थात्—कर्म-कर्त्ता-और साधन यह तीनों ठीक हो तो यज्ञ से स्वर्ग प्राप्त हो जायेगा।

यही स्वर्ग मीमाँसा शास्त्र का एक मात्र लक्ष्य है इसी के लिये, ज्ञानयज्ञ कर्मयज्ञ द्रव्य यज्ञादि को साधन वर्णन किया गया है। इसी स्वर्ग की सिद्धि के लिये परमात्मा के बृहद् ब्रह्माण्ड में प्रतिदिन वसन्त ऋतु रूप घृत ग्रीष्म ऋतु रूप समिधा, और शरद ऋतु रूप हविः से हवन हो रहा है। जो मनुष्य मात्र को वैदिक यज्ञों की शिक्षा दे रहा है। इसी स्वर्ग के साधन सर्व कर्म मीमाँसा में वर्णन किये गये हैं इसका विस्तार शास्त्र में भले प्रकार से पाया जाता है।

वेदों में यज्ञ का बीज रूप से वर्णन है यज्ञों की विधि ब्राह्मण ग्रन्थों में है यज्ञों के नाम भी “ब्राह्मण” शत पथ में है। अर्थात् प्रधान यज्ञ 3 तीन ही है। दर्शपूर्णमास 1 ज्योतिष्टोम 2 और अश्वमेध 3। यह तीनों प्रकृतियाग कहलाते हैं। दर्शपूर्णमास। घृत-दधि-पय-ओर अन्न साध्य यज्ञ है। यह यज्ञ दर्श=अमावस्या ओर पूर्णमास=चन्द्रमा के पूर्ण होने वाले पर्व में किया जाता है इसीलिये इसका नाम-दर्शपूर्णमास है। और(2) ज्योतिष्टोम यज्ञ-सोमररा औषधियों से साध्य है इसमें ज्योतिः—स्वतः प्रकाश परमात्मा की स्तुति की जाती है इस यज्ञ की सात 7 संस्था है। 1 अग्निष्टोम—2 षोडशी—3 अतिरात्र—4 अत्यग्निष्टोम—5 आप्तार्यामः—6 उकथ्य—7 वाजपेय-अर्थात् ज्योतिष्टोम यज्ञ 7 संस्था—नाम स्तोत्र की समाप्ति का है अर्थात् जिन मन्त्रों से परमात्मा की स्तुति की जाती है उसका नाम स्तोत्र है। याजक इनको संस्था कहते चले आये हैं। (3 तृतीय अश्वमेध यज्ञ में देने योग्य पशुओं का दान किया जाता है। अश्वमेध यज्ञ ही विचारणीय है।

प्रथम वेद ऋग्वेद है द्वितीय यजुर्वेद—तृतीय सामवेद-चौथा अथर्ववेद है। वेदत्रयी ज्ञान-कर्म—उपासना—तीन ही काण्ड वेद में हैं। चौथा विज्ञान काण्ड है ज्ञान अर्थात् गुण गुणी का ज्ञान ऋग्वेद में कर्म का यजुर्वेद में, उपासना का सामवेद में वर्णन है विज्ञान का अथर्ववेद में है किन्तु तीनों वेदों में प्रथम “यज्ञ” शब्द का प्रयोग है। अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजं होतारम्। ऋग्वेद के पहले मन्त्र में यज्ञ शब्द सबसे पूर्व है यज्ञस्य-अग्निम् ईले। शेष सब अग्नि के विशेषण है। अतः यज्ञ शब्द पूर्व, यज्ञ नाम परमेश्वर का है। तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः। इत्यादि यजुर्वेद के मन्त्र में यज्ञ रूप प्रभु से 4 वेद प्राप्त हुए यज्ञों वै विष्णु-शत पथ में भी यज्ञ नाम परमात्मा का है दूसरे वेद में इसे त्वोर्जे त्वावाचवस्थ देवोबः—सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमायकर्मण इत्यादि यजुर्वेद के प्रथम मन्त्र में, श्रेष्ठतम शब्द पहले आया है ‘यज्ञोवै श्रेष्ठतम कर्म” अतः यज्ञ का अर्थ यजुर्वेद में सर्वोत्तम कर्म कर दिया श्रेष्ठतमाय कर्मण आध्यायध्वम्। कस्मै प्रयोजनाय इसे अन्न और विज्ञान की रक्षार्थ यज्ञ कर्म को प्राप्त कराइये। अग्न आ याहि वीतये गृणानो हव्य दातये। निहातासत्सि बर्हिर्षि। सर वेद का प्रथम मन्त्र है इसमें भी बर्हिर्षि (यज्ञे) यज्ञ में देवताओं के लिये हवि अर्थात् उत्तम अन्न जो यज्ञ से उत्पन्न किया है वह हव्यान्न ‘भौतिकाग्नि’ यज्ञ में आहुति देते हैं। अर्थात् तीनों वेदों में यज्ञ शब्द पूर्व आता है।

“रशून् पाहि” अर्थात् गौ-सहिषी-बकरी आदि की यज्ञार्थ रक्षा करो यथा मनु ने लिखा यज्ञार्थ पशवः सृष्टाः, यज्ञ के लिये पशु भगवान ने बनाये हैं गौ आदि के बैलों से (खेती) कृषि का काम और दुग्ध वृत से यज्ञ करो। यज्ञों में हिंसा का नाम नहीं। कल्पना करो, अतिथि यज्ञ है क्या उसमें अतिथि की हिंसा की जाती है नहीं अतिथि की पूजा दूध दही आदि से सत्कार किया जाता है।

राजसूयं वाजपेयमग्निष्टोमस्तदध्वरः। अर्काश्वमेवावुच्छिष्टे जीव बर्हिर्मदिन्तम, अफर्ववेद—

11।9-7।

राजसूय 1। वाजपेय 2। अग्निष्टोम 3 अध्वरः 4 अर्क 5 अश्वमेध 6 जीवबर्हि 7 मन्दितम 8 इत्यादि ईश्वर से ही सम्बन्ध रखने वाले यज्ञ हैं इसमें पशु बलि का नाम नहीं अश्वमेध का अर्थ घोड़ा को छोड़ना सबको विजय करना घोड़े को मार कर हवन करना यह अर्थ को अश्वमेध शब्द का अनर्थ मंत्र है।

अतः हम सब मिल कर दृव्य याग से संसार रोग रहित बनाने का उद्योग करें। द्रव्य यज्ञ ही सब यज्ञों का जनक है ज्ञान जप यज्ञादि बिना इसके नहीं हो सकते। जब द्रव्य यज्ञ करेगा तो उत्तमान्न होगा उत्तमान्न से उत्तम मन (बुद्धि) बनेगा तो ज्ञान (वेद को) पढ़ेगा पुनः उत्तम मन्त्र का जप करेगा तो पुनः आध्यात्मिक तत्व सर्व व्यापक प्रभु का प्राप्त करेगा तो प्रभू का आनन्द प्राप्त करेगा यही मोक्ष में प्राप्त कर “आनन्दं लब्ध्वा आनन्दी भवति”- दृव्य यज्ञ इसी प्रकार अभ्युदय और निःश्रेयस का साधन है (स्वर्गकामो यजेत) सुख की इच्छा हो तो यज्ञ करो देवपूजा अर्थात् चेतन देवता विद्वान् और महादेव प्रभु की पूजा तथा भूमि जलवायु अग्नि आदि 33 देवता को पवित्र बनाओ यही इनकी पूजा है। संगतिकरण सब मिल कर रहो प्रेम से रहो। दान देश-काल पात्र को देख कर दान करो। इत्यादि सब दृव्य यज्ञ में ही निहित है। जो भाई चार प्रकार के दृव्यों से यज्ञ करते हैं, कस्तूरी केसर-अगर तगर चन्दन इलायची जावित्रा जायफल इत्यादि सुगन्धित है। 7 घृत दूध फल यव चावल इत्यादि पुष्टिकारक 2 शंकर गिरी छुआरे किसमिस मेवादि इत्यादि मिष्ट 3 रोगनाशक गिलोय सोमलतादि 4 इन 4 प्रकार के दृव्यों से यज्ञ से सब प्रकार के सुखों की प्राप्ति होती है। इन सुखों में स्वर्ग सुख भी सम्मिलित है।


यज्ञ की महान् महिमा

(श्रीसत्यभूषणजी, आचार्य रोहतक)

परमेश्वर का भक्त बैठा हुआ भगवान् से पूछता है कि पिता—

पृच्छामि त्व परमन्ते पृथिव्याः पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः॥ य. 23-61,

प्रभो! बताओ कि पृथ्वी का अन्त कौनसा है और इस भुवन की नाभि कहाँ है?

परमेश्वर बालक के इस आग्रह पर विवश हो गया। भक्त यज्ञ कर रहा था, तो परमेश्वर ने कहा-

इयं वेदिः चरो अन्तः पृथिव्याः, अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः॥ यजु—23-62

अर्थात् इस संसार का अन्त वेदि है और यह यज्ञ इस ब्रह्माण्ड की नाभि है।

नाभि में रहते हैं विष्णु भगवान्। विष्णु वह है जो सर्व व्यापक और सर्व पालक है अतः शास्त्रकारों ने कहा।

“यज्ञो वै विष्णुः” यज्ञ ही विष्णु है।

हमारी पालना भी नाभि से होती है। यदि नाभि के अन्दर जाकर भोजन का रस और रक्त न बने तो शरीर में उसका कैसे वितरण हो। वेद भगवान ने कहा है—कि यज्ञ से ही समस्त सृष्टि उत्पन्न हुई, देखिए।

तस्मात् यज्ञात्सर्व हुतः सम्भृतं पृपदाज्यम्॥ पशूंस्तांश्चक्रे वायव्या नारव्या ग्राम्याश्चये॥ तस्माद्यज्ञात्सर्व हुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छन्दासि सिज्ञिरे तस्माद्यजुस्तत्सादजायत॥

यजु. 31-6-7॥

अर्थात् उस पूजनीय यज्ञ स्वरूप परमेश्वर ने सब जगत् के हित के लिये दही आदि भोगने योग्य पदार्थ और ग्राम के तथा वन के पशु बनाए हैं और उसी यज्ञ स्वरूप परमेश्वर से ही वेद उत्पन्न हुए अतः उस परमेश्वर की उपासना करो, वेदों को पढ़ो और उसकी आज्ञा के अनुकूल व्यवहार करके सुखी होओ।

वैदिक धर्म यज्ञ प्रधान धर्म है। यज्ञ को निकाल दो तो वैदिक धर्म निष्प्राण हो जायगा। पूर्व मीमाँसा दर्शन वाले तो धर्म का अर्थ यज्ञ करते हैं अर्थात् धर्म और यज्ञ एक पदार्थ हैं। वेद में कुछ ऐसी ही बात कही है।

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्॥ यजु-31-16

विद्वानों ने यज्ञ से यज्ञ पुरुष की पूजा की और वही मुख्य धर्म है।

तो प्रभु की प्रसन्नता का मुख्य धर्म यज्ञ है।

ऐसा न होता तो भगवान् सर्व प्रथम यह आदेश ने करते कि

“इषे त्वोजेत्वा वायवस्थ देवों व; सविता प्रर्पयतु श्रेष्ठ तमाय कर्मणा आप्यायव्वम्.........”

यजु-1-1।

ओ जीव! तुझे संसार के व्यवहार और अपने जीवन के लिये इष=अन्न और ऊर्ज-बल की आवश्यकता है, इसके लिये तुझे अपनी इन्द्रियों को श्रेष्ठतम कर्म (यज्ञ) में लगा।

इष का अभिप्राय अपना इष्ट-प्रभु प्राप्ति और ऊर्जा का अभिप्राय ज्ञान भी है तो आध्यात्मिक में यही अर्थ होगा कि यदि तू ईश्वर का और संसार का ज्ञान प्राप्त करना चाहता और प्रभु को प्राप्त करना है तो इन्द्रियों को जो तुम्हें कर्म करने के साधन मिले हैं, यज्ञ रूपी श्रेष्ठतम कर्म में लगा।

परमेश्वर की प्रसन्नता का साधन भगवान् ने अन्यत्र वेद में ही बतलाया—

अवते हेड़ो वरुण नमोभिरवयज्ञेभिरीम हे हर्विभि;॥ ऋ 1-24-14

अर्थात् परमात्मा की प्रसन्नता दो प्रकार से हो सकती है, यज्ञ से हवि द्वारा अथवा नमस्कार से अहंकार के त्यागने से। तो इससे सिद्ध हुआ कि यज्ञ विश्व कल्याण का साधन है।

वेद भगवान् क्या कहते हैं, यह देखना है—

जनयत्यैत्वा संयौमी दमग्ने रिदमग्नी पोमयोरिषे त्वा धर्मोसि विश्वायुरू प्रया उरु प्रयस्वोरुते यज्ञपतिः प्रथतामग्निष्टे त्वचंमा हिंसीद्धेवस्त्वा सविता श्रपयतु वर्षिष्ठेऽधिनाके॥ यजु-1-22.

अर्थ- हे मनुष्य! जैसे मैं सर्व सुख उत्पन्न करने वाली राज्य लक्ष्मी के लिये उस यज्ञ को अग्नि के बीच मैं पदार्थों को छोड़कर युक्त करता हूँ वैसे ही तुम लोगों को भी अग्नि के संयोग से सिद्ध करना चाहिये। जो हम लोगों का यह संस्कार किया हुआ हवि अग्नि के बीच में छोड़ा जाना है वह विस्तार को प्राप्त होकर अग्नि के बीच में पहुँच कर अन्न आदि पदार्थों को उत्पन्न करने के लिये होता है और जो पूर्ण आयु और बहुत सुख को देने वाला यज्ञ है उसको जैसे मैं अनेक प्रकार से विस्तार करता हूँ वैसे उसको हे पुरुषे! तुम भी विस्तृत करो। इस प्रकार से विस्तार करने वाले तुम्हारे लिये यज्ञ का स्वामी यज्ञ संबन्धी अग्नि अंतर्यामी जगदीश्वर अनेक प्रकार के सुख को बढ़ावे कभी नष्ट न करे तथा परमेश्वर अतिशय करके वृद्धि को प्राप्त हुआ जो अत्युत्तम सुख है उसमें तुम को सुख से युक्त करे!

अग्नि के बीच जिन-जिन पदार्थों का प्रक्षेप अर्थात् हवन किया जाता है सो सूर्य और वायु को प्राप्त होता है वे ही उन अलग पदार्थों की रक्षा करके फिर उन्हें पृथ्वी में छोड़ देते हैं। जिससे कि पृथ्वी में दिव्य औषधि आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, उनसे जीवों को नित्य सुख मिलता है। इस कारण सब मनुष्यों को यज्ञ का सदैव अनुष्ठान करना चाहिए। और यजु-2-5 भावार्थ का अन्तिम भाग उस यज्ञ का अनुष्ठान सब मनुष्यों को सदा करना योग्य है। जिससे पृथ्वी पर बड़ा सुख उत्पन्न होता है उस यज्ञ का अनुष्ठान सब का सदा करने योग्य है।

हवन से सुखों को खरीदते हैं—

पूर्णा दर्वि परायज्ञ सुपूर्णा पुनरापत। वत्नेव विक्रीणावहाऽइषमूर्ज शतक्रतो यजु-2-49

भावार्थ—जब मनुष्य लोग सुगन्ध्यादि पदार्थ अग्नि में हवन करते हैं तब वह ऊपर जाकर वायु वृष्टि जल को शुद्ध करते हुए पृथ्वी को आते हैं जिससे यव आदि औषधि शुद्ध होकर सुख और पराक्रम के देने वाली होती है। जैसे वैश्य लोग रुपया आदि दे लेकर अनेक प्रकार अन्न आदि पदार्थों को खरीदते व बेचते हैं वैसे हम सब लोग भी अग्नि में शुद्ध द्रव्यों को छोड़ वर्षा व अनेक सुखों को खरीदते हैं। खरीद कर फिर वृष्टि और सुखों के लिए अग्नि में हवन करते हैं।

जैसे मैं यज्ञपति को दुख से पार करता हूँ वैसे तू भी (स्वाहा) अच्छे प्रकार हवन आदि कर्मों को सेवन करके, दुःखों से अच्छे प्रकार पार हो।

स यज्ञेन वनयद्देव मर्त्तान्॥ ऋ. 5।3।5॥

वह परमात्य यज्ञ के द्वारा मनुष्यों को निरन्तर भक्ति युक्त कर देता है।

देवेम्यो हि प्रथमं यज्ञियेभ्योऽमृतत्वं सुवसि भागमुत्तमम्॥ ऋग. 4।54।2॥

(यज्ञिय) देवों के लिए सबसे पहला और उत्तम मोक्ष रूप भाग देता है। मुक्ति के अधिकारी यज्ञिय देव है सचमुच यज्ञ के बिना मुक्ति नहीं मिल सकती।

अयं यज्ञो देवया, अयंमियेध्यइमा ब्रह्माण्यमिन्द्र सोमः॥ ऋग. 1।27।4॥

यह यज्ञ देव (परमात्मा) तक ले जाने वाला है, यह पवित्र है और पवित्र करने वाला है।

यज्ञदेव प्राप्ति का साधन है। यज्ञ के अनुष्ठान से अतुल धन धान्य प्राप्त होता है।

नौर्ह वा एषा स्वर्ग्या। यदग्निहोत्रम्॥ शतपथ ब्रा. 2।3।3।15॥

यह जो अग्निहोत्र है निश्चय करके स्वर्ग सुख को प्राप्त कराने वाली नौका है।

नायं लोको ऽस्त्वयज्ञत्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥ गी. 4।31॥

यज्ञ रहित पुरुष के लिए यह लोक भी सुखदायी नहीं फिर परलोक कैसे सुखदायी हो सकता है।

इन सब प्रमाणों से सिद्ध होता है कि यज्ञ ही मनुष्य का मुख्य कर्तव्य है और यज्ञ से ही विश्व कल्याण हो सकता है।


यज्ञकर्ता-ऋणी नहीं रहता

(तपोमूर्ति महात्मा प्रभु आश्रित जी महाराज-रोहतक)

वेद भगवान् की प्रतिज्ञा है कि जो यज्ञ करेगा-उसे ऋणी नहीं रहने दूँगा।

“सुन्वताम् ऋणं न”

इस प्रतिज्ञा के होते हुए भी देखा जाता है कि कई यज्ञ करने वाले भी ऋणी बने रहते हैं। इसका कारण भी आगे चलकर वेद भगवान् ने स्पष्ट कर दिया है।

“न नूनं ब्रह्मणामृणं प्रोशूनामस्ति सुन्वताम् न सोमाअप्रतापये।”

अर्थात्—निश्चय ही यज्ञकर्ता ब्रह्म परायण मनुष्य कभी ऋणी नहीं हो सकते। किन्तु इन्द्र जिनको जाँच कर चला जाता है वह दरिद्र रह जाते हैं।

इन्द्र भगवान् समस्त ऐश्वर्य के देव तो हैं वे सब को सुखी बनाना चाहते हैं पर वे कंजूस और नीच स्वभाव वालों से खिन्न होकर उनके समीप नहीं रुकते और उन्हें बिना कुछ दिये ही लाँघ कर चले जाते हैं। यह बात निम्न मंत्र में स्पष्ट करदी गई है।

अतीहि मन्युषविणं सुपुवाँ समुपारणे। इनं रातं सुतं दिन॥ ऋ. 8।32।21

क्रोध से यज्ञ करने वाले को अन्धा समझ कर इन्द्र भी उसे नहीं देखता। ईर्ष्या से प्रेरित होकर जो यज्ञ करता है उसे बहरा समझ कर इन्द्र भी उसकी पुकार नहीं सुनते। जो यश के लिए यज्ञ करता है उसे धूर्त समझ कर इन्द्र भी उससे धूर्तता करते हैं। जिनके आचरण निकृष्ट हैं उनके साथ इन्द्र भी स्वार्थी बन जाते हैं कटुभाषियों को इन्द्र भी शाप देते हैं। दूसरों का अधिकार मारने वालों की पूजा को इन्द्र भी हजम कर जाते हैं।

इससे प्रकट है कि जो सच्चे यज्ञकर्ता हैं उन्हीं के ऊपर इन्द्र भगवान् सब प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक सुख सम्पदायें बरसाते हैं। भगवान् भावना के वश में है। जिनकी श्रद्धा सच्ची है, जिनका अन्तःकरण पवित्र है, जिनका चरित्र शुद्ध है, जो परमार्थ की दृष्टि से हवन करते हैं उनका थोड़ा सा सामान भी इन्द्र देवता सुदामा के तन्दुलों की भाँति प्रेम पूर्वक ग्रहण करते हैं और उसके बदलें में इतना देते हैं जिससे अग्निहोत्री को किसी प्रकार की कमी नहीं रहती, वह किसी का ऋणी नहीं रहता।

रुपये पैसे का ऋण न रहे सो बात ही नहीं। देवऋण, पितृऋण, ऋषिऋण आदि सामाजिक और आध्यात्मिक ऋणों से छुट्टी पाकर वह बंधन मुक्त होकर मुक्ति पद का सच्चा अधिकारी बनता है।

यज्ञ से तृप्त हुए इन्द्र की प्रसन्नता तीन प्रकार उपलब्ध होती है—(1)कर्मकाण्ड द्वारा आधि भौतिक रूप से भौतिक ऐश्वर्य की धन, वैभव देता है। (2) साधना द्वारा, पुरुषार्थियों को अधिदैविक रूप से राज नेतृत्व-शक्ति और कीर्ति प्रदान करता है (3) योगाभ्यासी, आध्यात्म हवन करने वाले को इन्द्रिय निष्ठा मन का, निरोध का, ब्रह्म का, साक्षात्कार मिलता है।

यज्ञ से सब कुछ मिलता है। ऋण से छुटकारा भी मिलता है पर याजक होना चाहिये सच्चा! क्योंकि सचाई और उदारता में ही इन्द्र भगवान् प्रसन्न होकर कुछ देने को तैयार होते हैं।


यज्ञ द्वारा विविध कामनाओं की पूर्ति

(श्री विश्वम्भर शास्त्री गौड़ काशी)

सहः यज्ञाः प्रजा सृष्टा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेक प्रस विष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥

भ. गी. अ. 3-10

इस गीता के कथन से यह शिक्षा मिलती है कि लोक में जिस प्रकार माता पिता से आज्ञा प्राप्त कर पुत्र कहीं को जाता है, तो माता पिता प्रेम के वशीभूत होकर अपने पुत्र को पाथेय बाँध देते हैं, यह सर्वविदित है, ठीक इसी प्रकार प्रजापति ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित हमको उत्पन्न कर कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होवे, यह यज्ञ तुम लोगों की कामनाओं को पूर्ण करने वाला कामधेनु के समान है, इस यज्ञ के द्वारा तुम लोग देवताओं के साथ में सम्बन्ध को प्राप्त होकर इस लोक में उन्नति करो और देवता लोग भी उन्नति को प्राप्त होवें।

विज्ञान से यह सिद्ध है कि स्थूल का संचालक सूक्ष्म हुआ करता है, जैसे शरीर का मन। इस रीति से हमारे संचालक वे हैं, जिनको हम देवता कहते हैं, जो हमसे सूक्ष्म हैं। देवताओं को भी भोजन न मिल सकता। इसलिए इन दोनों को परस्पर सम्बन्ध होना अत्यन्त आवश्यक है। यह निभ्रांत अंक निश्चित सिद्धान्त है। यह सम्बन्ध हमारा यज्ञ से स्थापित होता है।

मनुष्य जिस समय उत्पन्न होता है, उस समय माता के गर्भ स्थान की अशुद्धि का माता के रजन की अशुद्धि का एवं पिता के वीर्य की अशुद्धि का संसडडडड होने से अपवित्र माना जाता है, ऐसी अवस्था में मनुष्य को संस्कार रूप यज्ञ ही पवित्र करता है। यह वैदिक कर्मों के करने का अधिकारी बनाता है जैसा कि मनुजी ने लिखा है।

गर्भे होमेंर्जात कर्मचौड मौञ्जी निवन्धनैः। वैजिकं गाभिकं चैनो द्विजानामय मृज्यते।

मनु अ. 2-27

अन्नम ब्राह्मा वेद :—

वेद के सिद्धान्तानुकूल अन्न का एक नाम ब्रह्म, और जीवो बृह्मैव ना पर शंकराचार्य:– के कथनानुसार मानव का और अन्न का सम्बन्ध सुतराय सिद्ध है और अन्न के बिना मानव जीवन का चलना असम्भव है उस अन्न की भी उत्पत्ति का साधन एक मात्र यज्ञ ही है।

अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्य मुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते बृष्टिवृष्ठेरन्नं ततःप्रजा॥ मनु अ. 3-76

जो कि इस श्लोक में बताया गया है। यज्ञ के द्वारा अन्न उत्पन्न होता है यही कारण है कि शास्त्र सस्येष्टी का विधान करता है।

सस्यान्ते नवसस्येष्टया तथर्त्वन्ते द्विजोऽध्वरैः। पशुना त्वयनस्यादौ समान्ते सौमिकै र्मखैः॥

म. अ. 4—26

ऐसे शुभ कार्य के लिए अत्यन्त पवित्रतम् स्थान कि आवश्यकता है क्योंकि पवित्रतम् का पवित्रतम् के साथ सम्बन्ध होने पर ही फलोत्पत्ति होती है, इसलिए मनुजी ने यज्ञार्हः देश की व्यवस्था की यथा—

कृष्ण सारस्तु चरति मृगौ यत्र स्वभावतः। स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छ देशस्त्वतः परः॥

म. अ. 2-23—॥

इसी देश के पवित्रतम् होने के कारण यज्ञ का विधान और यज्ञ का चाल हमारे भारतवर्ष में ही है।

इंग्लैंड इत्यादि देश यज्ञ के अनुकूल न होने से यज्ञ से वञ्चित हैं।

जैसा यज्ञ पवित्रतम् है और उस यज्ञ के लिए पवित्रतम् स्थान की व्यवस्था की गई उसी प्रकार कर्ता का भी पवित्रतम् होना अत्यन्त आवश्यक है, इसी प्रकार विज्ञान की भित्ति पर हमारी वर्ण व्यवस्था सुसज्जित है जैसा कि मनुजी के कथन से सारांश स्पष्ट होता है।

लोकानाँ तु विवृद्धयथे मुख वाहू रुपादत्तः। ब्राह्मणं क्षत्रियं वैश्यं शूद्रं च निरवर्तेयत्॥

म. अ. 1—31.

जब सभी पवित्रतम् है तो उसकी विधि को बतलाने वाले और उस यज्ञ के अधिष्ठात्रों के समीप यज्ञ की हवि को वाक्य योजना पूर्वक पहुँचाने वाला भी पवित्रतम् होना चाहिये यही कारण है, कि वेद को पवित्रतम् कहा गया है।

यथा मनुः—

पितृ देव मनुष्याणाँ वेदश्चक्षु सनातनम्। अशक्यं चाप्रमेयं च वेद शास्त्र मितिस्थितिः॥

म. अ. 12-94

इसी विज्ञान की भित्ति पर हमारे यहाँ वेद का अधिकारियों द्वारा पवित्रतम् अवस्था में पवित्रतम् आचार्य के समीप सः स्वर अध्ययन होता है दूसरे देशों में इसी कारण वेदपाठी नहीं मिल सकते भले ही इधर उधर करके अर्थ लगाने का स्वाँग रचें।

‘यज्ञ का नाम “कामधुक्” है, इसलिए इससे सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं, हमें वह दिन याद है कि जिस समय जर्मन देश में टेलीपैथी विज्ञान का आविष्कार हुआ था। परन्तु वे बेचारे 39 मील तक ही सफल हो सके जबकि हम यज्ञ द्वारा चन्द्रमा के ऊपरी भाग में भी मन को प्रतिदिन प्रेषित और आहूत करते हैं।

यथा वेद:—

मनो तु आह्वामहे नाराशसेन— स्तोमेन। पितृणाँ च मन्मभिः॥

शुल्क य. वे. अ. 3-53॥

अर्थ—जिन स्तोत्रों को मनुष्य श्रेष्ठ मानते हैं और पितरों से भी जो स्तोत्र माने गये हैं उनके द्वारा पितृलोक में गये हुए मन को हम शीघ्र बुला रहे हैं।

प्रत्येक कामनाओं में पार्थव्य होने से क्रियाओं का पार्थक्य भी नैसर्गिक है इसी कारण पृथक-पृथक कामनाओं की पूर्ति के लिए पृथक-पृथक यज्ञों का विधान है स्वराज्य के लिए वाजपेय यज्ञ का, स्वर्ग के लिए दर्शपौर्ण मास का, अग्नि साम का, ज्योतिष्टोम का, पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टी का, और शत्रु मारण के लिए श्येन यज्ञ का, विधान है यज्ञ के द्वारा विविध कामनाओं की पूर्ति होती है तभी तो यज्ञ का ‘कामधुक्’ नाम प्रजापति ने रखा है।

हम लेख विस्तार भय से अधिक न लिखकर इतना ही लिखना उचित समझते हैं कि यज्ञ से ही देवता लोग स्वर्ग को प्राप्त हुए, असुरों को दबाया। हम लोग भी यज्ञ के द्वारा देवता बन सकते हैं, अपनी आसुरी प्रवृत्तियों का शमन कर सकते हैं, शत्रुओं को मित्र बना सकते हैं क्योंकि यज्ञ में सब कुछ प्रतिष्ठित है जैसा कि वेद का उल्लेख है।

यज्ञ इति यज्ञेन हि देवा दिवंगता यज्ञेनासुरानपानुदन्त, यज्ञेन द्विषन्तो मित्रा भवन्ति, यज्ञे सर्वे प्रतिष्ठितं तस्माद्यज्ञं परमं वदन्ति॥

तैत्ति. आर. य. प्र पा. पृ. अनु 62॥


कल्याण का श्रेष्ठ मार्ग—यज्ञ

(पं. धर्मदेव विद्यावाचस्पति गुरुकुल काँगड़ी)

वेदों और शास्त्रों में सर्वत्र यज्ञ की महिमा गाई गई है और उसे लोक कल्याण और परमेश्वर की प्राप्ति का एक मुख्य साधन बतलाया गया है। वैदिक धर्म को यदि यज्ञ धर्म के नाम से कहा जाए तो भी अत्युक्ति न होगी क्योंकि वेदों में यज्ञों का विस्तृत अर्थ में (जिसमें आत्मकल्याण और लोक हित के लिये किये गये सब उत्तम कर्मों का समावेश हो जाता है) प्रतिपादन करते हुए स्पष्ट कहा है कि—

‘यज्ञेनयज्ञमयजन्त देवास्तानिधर्माणि प्रथमान्यासन्। तेहनाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः॥ ऋ. 10।90।16 यजु. 31।16

अर्थात् सत्यनिष्ठ विद्वान लोग (सत्य संहिता वै देवाः ऐत. 1।6 सत्य मया उ देवा;। कौषीतकी 2।8 विद्वांसो हि देवा; शतपथ 3।7।3।10 इत्यादि ब्राह्मणग्रन्थोंक्त प्रमाणों के आधार पर देव का यह अर्थ स्पष्ट है) यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ अर्थात् पूजनीय परमेश्वर की (यज्ञोवैविष्णुः) पूजा करते हैं। यज्ञ के अंतर्गत वे धर्म देवपूजा, संगतिकरण और दान प्रथम अथवा प्रथम सर्वोत्कृष्ट हैं। इनका अनुष्ठान करते हुए सत्यनिष्ठ विद्वान् लोक महामहिमा शाली बन कर मोक्ष तक को प्राप्त कर लेते हैं जहाँ सब ज्ञानी पहुंचते हैं।

इस प्रकार के मन्त्रों में यज्ञ के द्वारा परमेश्वर की पूजा का भाव स्पष्ट है। यज्ञ को सर्वोत्तम धर्म कहने का कारण यह है कि इसमें मनुष्य के अपने बड़ों के लगभग समान कोटि के लोगों और अपने से किसी भी अवस्था में छोटों के प्रति कर्तव्यों का देव पूजा संगतिकरण और दान के रूप में समावेश हो जाता है। यज्ञ को अध्वर के नाम से भी वेदों के सैंकड़ों मन्त्रों में कहा गया है जिसका अर्थ निरुक्त कार महर्षि यास्काचार्य के अनुसार ‘अध्वर इति यज्ञ नाम ध्वरतिहिंसा कर्मातत्प्रतिषेधः।

अर्थात्—हिंसा रहित शुभ कर्म है। ऐसे कर्म के सम्बन्ध में यह वैदिक प्रार्थना है कि—

‘भद्रोनो अग्निराहुतो भद्राएतिः सुभग भद्रोनोअध्वरः। भद्रा उत प्रशस्तयः॥ ऋ. 8।19।19 यजु. 15।37 साम 115

अर्थात् (आहुतः अग्निः नः भद्रः) यह अग्नि जिसमें हमने सुगन्धित, रोग नाशक, पुष्टिदाश्क पदार्थों की आहुतियाँ दी हैं हमारे लिये कल्याण तथा बुद्धि की शक्ति बढ़ती है। बहुत बार मैंने देखा है कि जिन गूढ़ मन्त्रों का आशय साधारणतया स्वाध्याय करते हुए स्पष्ट नहीं हो तो हवन यज्ञ करते हुए वायु मण्डल की पवित्रता के कारण बुद्धि तीव्र होने से उनका अर्थ समझ में आने लगता है। अग्निभिन्धानो मनसा धियं सचेत मर्त्यः। अग्निभीधे विवस्वभिः॥ ऋ. 8।102।20 साम म, 19 के अनुसार जब हवन की अग्नि को प्रदीप्त करते हुए उसके साथ मन और बुद्धि को जोड़ दिया जाता है और अपने अन्दर ज्ञान की अग्नि को जलाने का प्रयत्न किया जाता है तो उससे आध्यात्मिक उन्नति में भी बड़ी सहायता मिलती है यह मेरा अनुभव सिद्ध विश्वास है। इस आध्यात्मिक लाभ और चित्त शुद्धि के लिए ही विशेष रूप से वेद मन्त्रों का हवन के समय में उच्चारण किया जाता है।

जब परिवार के सब लोग वेद के आदेशानुसार ‘समन्त्रोअग्निं सपर्यतारा नाभिनिवाभितः॥ अथ. 33।6॥ अग्नि कुण्ड के चारों ओर रथ नाभि के चारों ओर आरों के समान बैठ कर अग्निहोत्र और स्वाध्याय करते हैं तो उनके पारिवारिक के प्रेम की भी वृद्धि होती तथा उन्हें अपने कर्तव्यों का ठीक-2 ज्ञान होता है इसमें सन्देह नहीं।

यज्ञ का एक अर्थ संगतिकरण है अतः यज्ञों और संस्कारों में परिवार के तथा दूर-2 के लोग एकत्र होते हैं जिससे उनमें परस्पर प्रेम, सहयोग और सहानुभूति की वृद्धि होती है। ब्रह्म परायण यज्ञ जैसे वृहदयज्ञ से इस प्रकार का लाभ विशेष रूप से मेरे तथा अन्य विद्वान् मित्रों के अनुभव में आया है।


महाभारत में यज्ञ

(श्री सत्यव्रत शास्त्री एम. ए. देहली)

यज्ञ करने से क्या लाभ हैं इस विषय को लेकर महाभारत के चतुर्दश पर्व आश्वमेविक पर्व में बहुत से सुन्दर श्लोक उपलब्ध होते हैं। महाभारत के युद्ध की समाप्ति पर सन्त युधिष्ठिर की किस प्रकार मन शान्ति मिल सकती है इस प्रसंग में इनका वर्णन आया है। युधिष्ठिर के मन में भयंकर अशान्ति है। कुछ वृद्ध भीष्म पितामह को एवं द्रोण आदि गुरुजनों को मार कर कैसे मेरा निस्तार हो सकता है यह चिन्ता उसे खाये डालती है। वह समझता है कि उसने भयंकर पाप किया है। उस पाप से छुटकारा उसे किस प्रकार मिले इसी उधेड़बुन में उसका मन लगा हुआ है। उसकी इस मानसिक अशान्ति की दूर करने के लिये महर्षि व्यास जी उसे एक मार्ग सुझाते हैं। वे कहते हैं कि हे युधिष्ठिर तुम यदि अपने का पापत्या समझते हो तो उस पाप से छुटकारा पाने के उपाय हैं तपस्या, दान एवं यज्ञ। जो व्यक्ति भयंकर से भयंकर पाप जैसे कार्य भी करता है उसे यज्ञ, दान एवं तपस्या द्वारा छुटकारा मिल जाता है। यह वह नौका है जिसे मनुष्य पाप की मझधार में डूबने से बच जाता है अतः सकुशल समुद्र लाँघ जाता है। अर्थात् यदि वह दान करदे एवं तपस्या भी करे। तो भी मात्र यज्ञ से उसकी पाप शुद्धि हो जाती है। महर्षि व्यास कहते हैं—

असुराश्च सुराश्चैव पुण्य हेतोर्मखक्रियाम्। प्रयतन्ते महात्मान स्तस्मद्यज्ञाः परायणम्॥ यज्ञैरेव महात्मानों बभृबुरधिका सुराः। ततो देवाः क्रियावन्तो दानवानभ्यघर्षयन्॥

1436-7

पुण्य प्राप्त करने के लिये देवता और असुर दोनों ही महात्मा यज्ञ क्रिया की ओर प्रवृत्त होते हैं। इसलिये यज्ञ ही सर्वोत्कृष्ट सहारा होते हैं। यज्ञों से ही शक्तिशाली देवता बढ़ गये। उससे ही नित्य कर्मकाण्ड में तत्पर देवताओं ने असुरों को अभिभूत कर दिया।

उपरिनिर्दिष्ट दोनों श्लोकों से स्पष्ट है कि महाभारत के समय में यज्ञ की महिमा अपूर्व थी। बदिक परम्परा उस समय अक्षुण्ण थी। इसी बात का एक और भी प्रमाण मिलता है। द्रौण पर्व के 82 वें अध्याय में युधिष्ठिर का जो वर्णन किया गया है उससे इसी बात की पुष्टि होती है। युद्ध भूमि में भी महाराज की और फिर यज्ञ शाला में जाकर अग्नि में समिधाएँ डाली और आज्याहुति के साथ वैदिक मन्त्र पढ़कर यज्ञ किया।

समिद्भिश्च पवित्राभिरग्निमाहुतिभिस्तथा। मन्त्रपूताभिरर्चित्वा निश्चकाम ततो गृहात्॥

इस वर्णन से दीख पड़ता है कि स्वयं होम करने की आवश्यकता थी और यह होम सादी समिधा तथा आज्याहुति का होता था। इस काम में बहुत समय न लगता होगा। इसी तरह उद्योग पर्व के 83 वें अध्याय में जब श्रीकृष्णजी हस्तिनापुर को जाने के लिये चले तो वर्णन है—

कृत्वापौर्वाह्विकं कृत्यं स्नातः शुचिरलंकृतः। उपतस्थे विवस्वन्तं पावकं च जनार्दनः॥

अर्थात् सूर्य और अग्नि की उपासना यानी उपस्थान एवं आहुति दोनों काम भारती युद्ध में प्रत्येक आर्य का करने पड़ते थे। सायंकाल में सूर्य के अस्त होते समय सन्ध्यावन्दन एवं होम करना पड़ता था। महर्षि बाल्मीकि ने भी रामायण में ऐसा ही वर्णन किया है। विश्वामित्र के साथ जाते हुए अथवा वनवास में जाने पर जहाँ जहाँ प्रभात और सन्ध्या हुई वहाँ-वहाँ राम और लक्ष्मण के सन्ध्या का वर्णन आया है।

महाभारत में जहाँ-जहाँ ब्राह्मण व क्षत्रिय के कर्मों का उल्लेख हुआ है वहाँ-वहाँ यज्ञ को प्रमुख स्थान दिया गया। ब्राह्मण के धर्म हैं तपस्या, यज्ञ, विद्या, निशावृत्ति, इन्द्रियसंयम, ध्यान, ज्ञान आदि। एवं क्षत्रिय के धर्म हैं यज्ञ, विद्या, उद्यम, लक्ष्मी के प्रति असन्तोष, दण्ड धारण आदि। ब्राह्मण एवं क्षत्रियों की भाँति महाभारत काल के वैश्य भी प्रातः और सायं होम किया करते थे। इस प्रकार यज्ञ या होम त्रिवर्ण के लिये अनिवार्य था। जब तक वे संन्यासाश्रम में प्रवेश न करें तब तक यज्ञ आदि से वे पृथक् नहीं हो सकते थे। शान्ति पर्व में एक स्थान पर कहा है कि जो दैविक कृत्य करता है और जो विशाल पितृयज्ञ व भूतयज्ञ करता है वही संन्यासाश्रम में प्रवेश करता है। ब्राह्मणों के लिये स्थान-स्थान पर यज्ञ करने का विधान आया है। यही तो उनके जीवन का पाया है। उनके लिये कहा गया है कि उनका मुख्य कर्तव्य है, अध्यापन, प्रध्ययन, यज्ञ कराना एवं यज्ञ करना। ब्राह्मण चूँकि चारों वर्णों के पथ प्रदर्शक थे इसलिये उनके लिये यज्ञ निरत रहना अत्यावश्यक हो जाता है। यदि ब्राह्मण ही अपने कर्म से च्युत हो गये, तो शेष वर्णों का क्या होगा। वे तो ब्राह्मण मुखापेक्षी हैं। इन्हीं से तो उन्हें नेतृत्व मिलना है। जब ब्राह्मण अपने कर्म से विमुख हो जाता है तो समाज दूषित हो जाता है। महाभारत में एक स्थान पर बहुत ही भाव-पूर्ण वचन आये हैं। यह कहा है कि पतित एवं संस्कार च्युत ब्राह्मण ही शूद्र बन जाते हैं। इसलिये यज्ञ का उनके लिये आत्यन्तिक निषेध नहीं है।

महाभारत में अनेकानेक स्थानों में यज्ञ की महिमा का वर्णन मिलता है। जाजलि और तुलाधार के संवाद में तुलाधार जाजलि से कहता है—हे महामुने जो बुद्धिमान् विप्र श्रेष्ठ सदा यज्ञ करते हैं, वे यज्ञ करने से ही देवलोक को प्राप्त होते हैं। 1 अथ च आपद्धर्मपर्व के 151 अध्याय के आठवें श्लोक में भीष्म पितामह यज्ञ को अवश्य कर्तव्य बतलाते हैं और

यानि यज्ञेष्विहेज्यन्ति सदा प्राज्ञा द्विजर्षभाः। तेन ते देवमानेन पथा यान्ति महामुने॥ मोक्षधर्मपर्व (शान्तिपर्व) अध्याय 263 श्लोक 29

चेतावनी देते हैं कि- “न ह्यप्रज्ञा अमुँ लोकं प्रामुवन्ति कथञ्चन” जो यज्ञ नहीं करते वे उस लोक अर्थात् परलोक को प्राप्त नहीं करते। इसलिये मनुष्य को अपना परलोक सिद्ध करने के लिये यज्ञ करना चाहिये। इसी प्रकार के अनेकानेक श्लोक महाभारत में मिलते हैं। केवल इतना ही नहीं। कहीं कहीं तो महाभारत के रचयिता यज्ञ की महिमा का गान करते समय आत्म विभोर हो उठते हैं और एक कविता सी फूट पड़ती है। कविता के प्रत्येक छन्द व प्रत्येक कड़ी में कवि के मुग्ध हृदय की झाँकी पाठक को या श्रोता को मिल जाती है और वह एक बार जी चूम उठता है। यज्ञ की अपूर्व एवं दिव्य महिमा का वर्णन करते हुए कवि कहता है—

स्तेनो वा यदिव पापो यदिवाप पकृत्तमः। यष्टुमिच्छति यज्ञं य साधुमेव वदन्तितम्॥ सर्वथा सर्वदा वर्णेरुष्टव्यमितिनिर्णयः। नहियज्ञस्म किञ्चित् विषुलकिषुविद्यते॥ 2

“कोई भी (व्यक्ति) चाहे वह चोर हो, पापी हो पाप करने वालों में भी सबसे नीच ही यदि वह यज्ञ करना चाहता है तो वह सज्जन ही है। सभी वर्णों को सदा सर्वदा यज्ञ करना चाहिये यही निर्णय है। तीनों लोकों में यज्ञ के समान और कुछ नहीं है।

यह यज्ञ कह पूर्वोक्त महिमा के अनुरूप ही है कि यज्ञ को पाप शोधक माना जाता है। कितना ही बड़ा पाप क्यों न किया हो यदि यज्ञ कर लिया जायगा तो पाप का प्रायश्चित हो जायगा यह महाभारत का पूर्ण विश्वास है। हाँ, जितना बड़ा पाप होगा उतना ही बड़ा प्रायश्चित्त करना पड़ेगा। राजधर्मानुशासन पर्व के प्रारम्भ में जब युधिष्ठिर बन्धुवध के कारण बहुत दुःखी हो रहे थे। और समझ रहे थे उन्होंने ऐसा कर बहुत बड़ा पाप किया है उस समय महर्षि व्यास उन्हें उस पाप पंक से निकलने का एक मार्ग सुझाते हैं। वे कहते हैं—

“अश्वमेधोमहायज्ञः प्रायश्चित्तमुदाहृतम्” अर्थात् राजधर्मानुशासनपर्व, अध्याय 60, श्लोक 52, 53.

अश्वमेध नाम का महायज्ञ इस पाप का प्रायश्चित कहा गया है। हे महाराज आप उसे कीजिये और ऐसा करने पर आप पाप मुक्त हो जायेंगे। शान्तिपर्व के अध्याय 191 में भारद्वाज भृगुसंवाद में भृगु ने भी यज्ञ को पाप का शान्ति करने वाला बताया है। वे कहते हैं- ‘हुतेन शाम्यतेषापम्” अर्थात् हवन यज्ञ करने से पाप शान्त हो जाता है। अथ च अश्वमेधिकपर्व के अध्याय 3 में भगवान् वेद व्यास ने भी यज्ञ को यज्ञ को पाप से उबारने वाला बताया है—

उन्होंने कहा है-

तपोभिः क्रतुभिश्चैव दानेन च युधिष्ठिर। तरन्ति नित्यं पुरुषाः येस्म पापानि कुर्बते॥

हे युधिष्ठिर, जो मनुष्य नित्य पाप करते हैं वे भी तप, यज्ञ एवं दान के कारण पाप से तर जाते हैं।

जहाँ महाभारत में यज्ञ की इतनी महिमा का गान किया गया है वहाँ यज्ञ विज्ञान के सम्बन्ध में कुछ न कहा गया हो यह नहीं हो सकता। इन पंक्तियों के लेखक ने अपने अनुसन्धान कार्य में इसे भी सम्मिलित किया था और जो सामग्री उपलब्ध हुई वह सचमुच आश्चर्यजनक थी। क्योंकि महाभारत तो इतिहास है यह स्मृति सी है पर कर्मकाण्ड का ग्रन्थ नहीं। इसलिये इसमें विस्तारपूर्वक या सविशेष रूप से कर्मकाण्ड की विधि का समावेश आवश्यक न था। पर महाभारत में तो महिमा ही अपूर्व है। यह तो वह खान है जिसमें जो खोजिये वह मिल जाता है। इतना ही नहीं जिसे खोजा जाता है उससे कहीं अधिक उत्कृष्ट वस्तु कभी कभी हाथ लग जाती है। कोयला खोदते खोदते सोने का हाथ लग जाना क्या कम आश्चर्यजनक है। अस्तु ! महाभारत में जिन यज्ञों का उल्लेख है उनके नाम ये हैं- अश्वमेध, राजसूय, पुण्डरीक गवामयन, अतिरात्र, वाजपेय, अग्निजित् एवं बृहस्पतिसब इन यज्ञों में अश्वमेध एवं राजसूय का ही किञ्चिद्विस्तृतै वर्णन मिलता है शेष का केवल नाम भर ही आया है। महाभारत के दो राजसूय प्रसिद्ध हैं। एक तो महाराज युधिष्ठिर ने किया और दूसरा श्रीकृष्ण ने अश्वमेध तो अनेक किये गये जिनका विस्तारपूर्वक उल्लेख महाभारत के पर्वों में बिखरा पड़ा है। अकेले शान्तिपर्व में ही कितने ही धर्मात्मा राजाओं के अनेक अश्वमेध यज्ञों का उल्लेख है। दृष्टान्त के रूप में अविक्षित् के पुत्र का अश्वमेध, दुष्यन्त के पुत्र भरत के एक सहस्र अश्वमेध, दशरथ के पुत्र राम के दस अश्वमेध, भागीरथ के अनेक अश्वमेध, दिलीप के एक सौ अश्वमेध इत्यादि। इन राजाओं और इनके अश्वमेध यज्ञों की संख्या का उल्लेख तो प्रासंगिक रूप में मिलता है। जिस अश्वमेध यज्ञ का प्रमुख रूप से उल्लेख है वह है महाराज युधिष्ठिर का अश्वमेध यज्ञ। महाभारत युद्ध की समाप्ति पर दुःखित हुए युधिष्ठिर की मनःशान्ति के लिये पाप के प्रायश्चित के रूप में अश्वमेध यज्ञ करने का सुझाव महर्षि व्यास ने दिया था। यह सुझाव युधिष्ठिर को पसन्द आया। और उसने अश्वमेध यज्ञ करने का निश्चय कर लिया। इसी अश्वमेध यज्ञ का वर्णन हमें आश्वमेधिक पर्व में मिलता है। वहाँ कहा है कि अश्वमेध यज्ञ में वेद विद्या में पारंगत याजकों ने सब कुछ शास्त्रोक्त विधि के अनुसार किया। उन्होंने कही भी स्खलन नहीं किया कुछ भी कर्म छोड़ा नहीं, कहीं भी क्रतधुत्युम नहीं किया और सभी कुछ ठीक प्रकार से ही किया।

इस प्रकार हम देखते हैं कि यज्ञ योग की महाभारत में महिमा गाई गई है। यज्ञ परम्परा इसमें भगवती भागीरथी के अविच्छिन्न प्रवाह के समान प्रवाहित होती हुई दीख पड़ती है। महाभारतकार ने तो यहाँ तक कह दिया है-

स्वाहा स्वधविषटकारायत्रसम्यगनुष्ठिताः। अजसु चैववर्तन्ते वसेत्तत्राविचारमन्॥ मोक्षधर्मपर्व, अध्याय 287, श्लोक 51.

“जिस राष्ट्र में स्वाहा, स्वधा एवं वषठ्कार का ठीक ठीक तथा सदैव अनुष्ठान किया जाता हो वहाँ मनुष्य को रहना चाहिये। इसमें सोच विचार करने की आवश्यकता ही नहीं।


यज्ञ की भावना

(ले. श्री. सीताराम एडवोकेट, आगरा)

इतिहासकारों के मत के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य वृक्ष की पत्तियों या जानवरों के चमड़े से अपने शरीर को ढकते थे। शीत और धूप से अपनी रक्षा वृक्षों की छाया से करते थे तथा गुफाओं में रहते थे।

एक मनुष्य ने वृक्षों की छाया को शरीर की रक्षा के लिये अपर्याप्त समझकर और गुफाओं के रहने को असुविधाजनक समझकर एक घर बनाने की सोची। उसने समीप की धरती को खोदकर उसकी मिट्टी से एक कोठे की चार दीवारें बनाई। फिर उसके ऊपर छत बनाने के लिये वह वृक्षों की शाखाओं को तोड़ लाया और उनको कोठे की छत के बराबर जमीन पर रखकर वृक्ष की टहनियों व पत्तों से उसे ढक कर तथा बाँध कर उसने एक छप्पर तैयार कर लिया। यह सब कुछ कर लेने पर जब उसने उस छप्पर को कोठे की दीवारों पर रखने के लिये उठाना चाहा तो वह इतना भारी था कि वह उसे उठा न सका। कोई अन्य उपाय न देखकर उसने आस-पास के अपने पड़ौसियों को आवाज दी कि ‘भाइयों आओ, मेरे, इस छप्पर को मेरे कोठे पर रखवा दो,’ पड़ौसी दौड़े। सब ने अपना-अपना हाथ उस छप्पर से लगाया और कुछ ही क्षण में उस छप्पर को उसके कोठे की दीवारों पर रख दिया। यह था सृष्टि का सबसे पहला यज्ञ।

उपरोक्त कथा चाहे काल्पनिक ही क्यों न हो परन्तु यज्ञ के वास्तविक अर्थ व उद्देश्य को समझने के लिये इससे सुन्दर दृष्टान्त मुझे तो अब तक नहीं मिला।

प्रायः हम लोग अग्नि में घृत आदि की आहुतियाँ देकर हवन करने को ही यज्ञ का पूर्ण रूप समझ लेते हैं। हवन तो यज्ञ का केवल प्रतीक मात्र है। वह हम में यज्ञ की भावना उत्पन्न करने में सहायक होता है।

हवन का अर्थ “दान” है। यदि जरा विचार करें तो हम देखेंगे कि हवन में हम अपनी प्रिय से प्रिय वस्तुओं को जैसे घृत, मिष्ठान ,अन्न, मेवे, औषधियाँ तथा सुगन्धित पदार्थों को अग्नि भगवान को अर्पित करते हैं और वह भी अपने लिये नहीं परन्तु सबके कल्याण के लिये और उनको भी अपना कह कर या समझकर नहीं परन्तु “इदन्नमम” की भावना के साथ।

अतः यज्ञ का अर्थ हुआ दूसरों के हित व कल्याण के लिये अपनी प्यारी से प्यारी वस्तु का दान दे देना। अपने में दान की भावना उत्पन्न करना। परोपकार के लिये अपने आपको मिटा देना।

यदि हम अपने में उपरोक्त भावनाएं उत्पन्न नहीं कर सकते, यदि हम अपने मुहल्ले व पड़ौस के बच्चों को अपने बच्चों के बराबर नहीं समझ पाते, यदि हम अपने आस-पास के व्यक्तियों के दुख दर्द को अपना दुख दर्द नहीं समझ पाते तो चाहे हम कितना बड़ा हवन क्यों न कर लें, वह यज्ञ न होगा।

अपना जीवन यज्ञमय बनाने के लिये हमें अपने में दान और प्रेम की भावना को निरन्तर विकसित करना होगा। तभी हम सही अर्थ में याज्ञिक हो सकेंगे।


यज्ञ का वास्तविक स्वरूप

(श्री पं. भूदेवजी शास्त्री, एम. ए. आगरा)

अपने शास्त्रों में यज्ञ की बड़ी महिमा गाई गई है, शतपथ ब्राह्मण ने उसे श्रेष्ठतम कार्य कहा है, श्रीमद्भागवत् गीता में उसे “इष्टकामधुक्” बताया गया है और यह घोषणा की गई है कि जो कर्म यज्ञार्थक नहीं हैं वे सब बन्धन कारक हैं उपनिषदें तो यज्ञ की ही महिमा से भरी पड़ी हैं उनकी दृष्टि में लौकिक एवं पारलौकिक समस्त मनोकामनाओं का एकमात्र पूरक यज्ञ है एक-एक करके नाम ग्रहण कहाँ तक किया जाये वैदिक साहित्य का कोई ग्रन्थ उठाकर देखिये उसमें स्थान-स्थान पर यज्ञ की महिमा गरिमा का वर्णन बिखरा मिलेगा।

इस महिमा को पढ़कर एवं प्रश्न स्वभावतः मन में उठता है और वह यह है कि यज्ञ शब्द का अर्थ क्या है, यज्ञ शब्द भारतीय साहित्य के उन कतिपय शब्द में से है जिसका बिलकुल ठीक पर्यायवाची मिलना असम्भव है, इसलिये पर्यायवाची शब्द देकर इसके अर्थ को समझाया नहीं जा सकता, साहित्य में आये हुये उदाहरणों के आधार पर उसकी व्याख्या अतिरिक्त उसके समझने का अन्य कोई मार्ग नहीं है, यह प्रयत्न कठिन अवश्य है परन्तु क्योंकि ठीक अर्थ निर्णय के बिना यज्ञ के महिमा गान में प्रयुक्त अपने साहित्य का एक बहुत बड़ा अँश का गप्प अथवा अन्धविश्वास प्रेरित जलन सा प्रतीत होता है इस दिशा में प्रयत्न अवश्य करना उचित है।

साधारण जनता तो क्या बड़े बड़े विद्वानों के सम्मुख भी यज्ञ का उच्चारण किया जाता है तो उनके मन पटल पर स्वाच्चारण पूर्वक संकल्प हवन प्रक्रिया का ही चित्र बनता है, यह प्रक्रिया निश्चय ही यज्ञ शब्द का एक अर्थ है। परन्तु यही उसका अर्थ है ऐसा समझना भूल है, इस भूल का परिणाम यह हुआ कि यज्ञ जो स्वयं अपने में एक विज्ञान है अनेक अन्ध विश्वासों का आधार बन गया है, विज्ञान एवं अन्धविश्वास का परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है, इस विज्ञान युग में प्राचीन शास्त्रों के वाक्य उद्धृत कर देने मात्र से यज्ञ में श्रद्धा उत्पन्न कर देना सभाडडडडडडडडडडडडडड नहीं है, यज्ञ के प्रचारकों को इस शब्द का वह अर्थ एवं स्वरूप प्रस्तुत करना होगा जिससे वे व्यक्तियों को भी यज्ञ एक सार्थक एवं उपयोगी प्रक्रिया प्रतीत होने लगे।

प्राचीन शास्त्रों के स्वभाव से एक बात पर हमारी दृष्टि पड़ती है, यज्ञ शब्द का प्रयोग संकुचित एवं व्यापक दोनों अर्थों में हुआ है, स्थान-स्थान पर जीवन एवं सृष्टि से संस्कार प्रत्येक प्रक्रिया को यज्ञ कहा गया है, पञ्च महायज्ञों के प्रकरण में मनु ने संध्या, अग्निहोत्र स्वाध्याय, पितृ-सेवा, अतिथि पूजन तथा बलिवैश्व धर्म सभी को यज्ञ कहा है, श्रीमद्भागवत् गीता में भी द्रव्य यज्ञ तपोयज्ञ, योग-यज्ञ, स्वाध्याय यज्ञ, प्राणायाम यज्ञ तथा ज्ञान यज्ञ की ओर संकेत करके उनके अभ्यासियों को “सर्वेघते यज्ञ विदः” कहा गया है, बृहदारण्यक के पंचांग विद्या प्रकरण में यज्ञ के अर्थ को और अधिक व्यापकता दे दी गई।

जिस मैथुन कर्म को सभी लोग बड़ी कुत्सा की दृष्टि से देखते हैं उसे भी वहाँ एक प्रकार का यज्ञ ही बताया गया है, यजुर्वेद के पुरुष सूक्त में “सन्तोऽस्तासीदार्ज्य ग्रीष्म इध्म शरद् हविः” कर विश्वास सञ्चालन की सम्पूर्ण प्रक्रिया को ही यज्ञ का रूप दे दिया गया है।

इतने व्यापक रूप में यज्ञ शब्द का प्रयोग देखकर मनुष्य यह सोचने लगता है कि यज्ञ किसी कर्म विशेष का अंग है अथवा उसकी आत्मा कोई मानता है यज्ञ शब्द की उत्पत्ति यज्ञ देव पूजा संगतिकरण दानेषु इस धातु से होती है, यज्ञ धातु के इन तीनों अर्थों में संगतिकरण सबसे अधिक व्यापक अर्थ है, देवपूजा एवं दान इन दोनों में संगतिकरण होता है, यदि इस अर्थ को आधार मानकर चला जाये तो कहा जा सकता है कि जिस किसी भी कर्म में व्यक्तियों वस्तुओं एवं शक्तियों में परस्पर संगतिकरण हो वही यज्ञ है, शास्त्रों में जिन-जिन कर्मों को यज्ञ कहा गया है उन सभी में संगतिकरण भी शर्त अवश्य मिलेगी, संगतिकरण यज्ञ के मूर्त स्वरूप का निर्माण करता है, अभी उसकी आत्मा की खोज शेष है।

प्रतिदिन के व्यवहार में हम देखते हैं कि मनुष्य के सभी संगतिकरण प्रयोजनों से चलते हैं। वे प्रयोजन निम्नलिखित हैं- (1) आत्म कल्याण (2)आत्महानि (3)घर कल्याण (4) घर हानि, इनमें से आत्महानि तथा परहानि को प्रायोजन बराबर चलने वाले कर्मों को यज्ञ नहीं कहा जा सकता क्योंकि ऐसे कर्मों को तो कोई श्रेष्ठ भी नहीं कहेगा। उनके “श्रेष्ठतम” कहे जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, आत्म कल्याण एवं परकल्याण करने वाले कर्मों को यज्ञ कहा जा सकता है, इनमें से परकल्याण वाले कर्म तो निश्चित रूप में यज्ञ संज्ञक होते हैं और आत्म कल्याण कारक कर्म तभी यज्ञसंजक होते हैं जबकि यजमान अपनी आत्मा को परकल्याणार्थ ही मानकर व्यवहार करता हो। शुद्ध स्वार्थ की दृष्टि से किया जाने वाला कोई कर्म यज्ञ नहीं कहा जा सकता, यह परकल्याण अर्थात् लोककल्याण यज्ञ की आत्मा है। इसी भावना के साथ किया हुआ संगतिकरण यज्ञ संज्ञा को प्राप्त करता है।

ब्राह्मणो ने विष्णु को यज्ञ कहा है, विष्णु रूप प्रभु का कर्म सचराचर अखिल ब्रह्मांड का भरण-पोषण हैं सम्पूर्ण विश्व में जो विश्व संचालन रूप महायज्ञ चल रहा है उसका प्रयोजन भी जीवों का कल्याण ही है यज्ञ का संक्षिप्तमय रूप दैनिक अग्निहोत्र भी कल्याण रूप ही है, वायु शुद्धि द्वारा नैरोग्य विस्तार तथा भावना शुद्धि द्वारा आत्म विस्तार उसका प्रत्यक्ष प्रयोजन है, थोड़ा सा विश्लेषण करके यज्ञ नाम से कहे हुये किसी भी कर्म में लोक कल्याण भावना प्रेरित संगति करण स्पष्टतः दिखाया जा सकता है, अपने व्यक्तिवादी दृष्टिकोण के कारण पुत्र प्राप्ति आदि जिन फलों को हम कलि परक समझ बैठते हैं वे वस्तुतः लोक कल्याण भृलक परंपराओं के संरक्षणार्थ होने के कारण समाज पर रही है विस्तार से इस स्थल पर हम इस तथ्य की व्याख्या एवं विवेचना से वितरत रहना चाहते हैं।

यदि यज्ञ शब्द को इतने व्यापक अर्थों में समझ लिया जाये तो विश्व की समस्त कलायें एवं विज्ञान इसके अंतर्गत आ जाते हैं, साथ ही यज्ञ के फलस्वरूप जितने भौतिक एवं अतिभौतिक लाभों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है वे अर्थवाद अथवा केवल विश्वास की वस्तु न रह कर इसी जन्म में प्रत्येक व्यक्ति के अनुभव की वस्तु बन जाते हैं, यज्ञ का सबसे बड़ा फल स्वर्ग प्राप्ति है, यदि संसार का प्रत्येक व्यक्ति लोक-कल्याण की भावना को अपने व्यवहार का मान दण्ड बनाले तो मृत्यु के उपरान्त मिलने वाला कोई स्वर्गलोक हो या ना हो यह संसार अवश्य स्वर्ग बन जायेगा। संसार की सभी प्रयोगशालायें एवं निर्माणशालायें वस्तुतः यज्ञ शालायें ही हैं, दुर्भाग्य यह है कि उनमें से सब लोक-कल्याण की भावना से प्रेरित होकर नहीं चल रही हैं इसलिये वे हमें यह फल नहीं दे पा रही है जो यज्ञ से मिलना चाहिये।

जो यज्ञ के प्रेमी हैं आज उनके दो कर्तव्य हैं, प्रथम तो यह है कि वे स्वयं यज्ञ को व्यापक अर्थों में समझें। लोग जीवन भर अग्निहोत्र करते रहते हैं परन्तु वह जिन व्यापक भावनाओं का प्रतीक है उन्हें समझने का प्रयत्न तक नहीं करते जिस प्रकार अग्नि में डाली हुई हवि सूक्ष्म रूप धारण करके लोक व्यापी हो जाती है इसी प्रकार अग्निहोत्र करने वाले व्यक्ति का व्यक्तित्व लोक व्यापी बनते जाना चाहिये, उसके हृदय में धीरे-धीरे वह उदारता विकसित होती जानी चाहिये कि स्वयं ही “सर्वभूतहिते रतः” बन जाये और उस प्रत्येक कार्य यज्ञ रूप हो जाये, जब तक यज्ञ को उस व्यापक अर्थों में न समझा जाये अग्निहोत्र व्यक्ति विकास का साधन नहीं बन सकता यही बात आज नानाविधि यज्ञ रूपों के विषय में कही जा सकती है और जब तक व्यक्तित्व का विकास नहीं होता है तब तक लोक कल्याण की भावना क्रिया रूप में परिणय नहीं हो पाती क्रिया के लिये अनुभूत चाहिये जो संकुचित व्यक्तित्व वाले व्यक्ति में उत्पन्न ही नहीं हो सकती।

स्वयं समझने के उपरान्त प्रचार की बारी आती है, प्रचार का सर्वोत्तम साधन स्वयं व्यवहार है, यज्ञ मार्ग के जीवन तथा दृष्टिकोण में यदि अयज्ञमार्गी की अपेक्षा कुछ अधिक उदारता एवं निःस्वार्थता है तथा स्वयं यज्ञ का प्रचार होता जायेगा। अन्यथा बौद्धिक प्रचार चलता रहेगा परन्तु इसके वास्तविक लाभ से सब वंचित रहेंगे, यज्ञ के बिना न जीवन चल सकता और न विश्व समाज संचालन भी बिना यज्ञ के नहीं हो सकता, जीवन समाज एवं विश्व सभी चल रहे हैं, अतः मानना चाहिये कि यज्ञ भी हो रहा है। यह दूसरी बात है कि लोक कल्याण की भावना के अभाव में उस समस्त कार्य व्यापार को हम यज्ञ न कह पाये यज्ञ के प्रचारक को अपने कार्यों द्वारा उसी भावना को जन्म देना है ज्यों-ज्यों भावना जाग्रत होती जायेगी यज्ञ का लक्ष सिद्ध होता जायेगा।

इन पंक्तियों में जो कुछ लिखा गया है उसका प्रयोजन यज्ञ प्रेमियों के सम्मुख एक दृष्टिकोण उपस्थित करना है, आशा है कि इनसे विचारकों को विचार की कुछ सामग्री मिल सकेगी।


यज्ञ द्वारा विश्व शांति की संभावना

(ले. श्री ज्योतिः स्वरूप जी आचार्य–एटा.)

मनुज देह से अशुद्ध वायु, पसीना, मल मूत्र आदि निकलते रहने के कारण वायु मण्डल दूषित होता रहता है, इसके अतिरिक्त मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये नाना प्रकार के पदार्थों तथा धूम्र व भाप आदि के यंत्रों से वायु जल में विकृति उत्पन्न करता रहता है जिससे अनेक रोगों की वृद्धि होती है, वही दूषित जल सूर्य के द्वारा आहरण होकर फिर वर्षा रूप में हमें प्राप्त होता है। यज्ञ करने से वायु हलकी होकर ऊपर उठती है, वायु की गति में तीव्रता आ जाती है, इस कारण पहली अशुद्ध वायु बाहर निकल जाती है और उसके स्थान पर बाहर की शुद्ध वायु प्रवेश करती है। अग्नि में भेदक शक्ति होने के कारण इसमें डाला हुआ घृत तथा अनेक प्रकार की औषध-मिष्ट पदार्थ छिन्न-भिन्न होकर सूक्ष्म रूप में वायु के साथ दूर-दूर पहुँच जाते हैं हमारी नासिका के द्वारा यह यह विज्ञान सदैव प्रत्यक्ष होता रहता है।

महर्षि यास्क ने वेदार्थ प्रक्रिया के अनुपम ग्रन्थ निरुक्त में वेदार्थ की महत्ता सिद्ध करते हुए “अर्थ” वाचः पुष्पफलमाह-याज्ञदैवतेपुष्पफले दैवताध्यात्मे बा” अ. 1 खण्ड 20 । कहकर यज्ञ ज्ञान को वेद का पुष्प प्रतिपादित किया है और निरुक्त में वेद का अर्थ करते हुए यज्ञ की हवि व सोम से इन्द्र को तृप्त करते हुए वर्षा की याचना की है। शतपथ ब्राह्मण में “अग्नेर्वै धूमो जायते धूमाद्भ्रमभ्राद्धष्टिरेताजायन्ते तस्मादाह तपोजाः” 5-6- यज्ञाग्नि से जो धुंआ उत्पन्न होता है, वह वनस्पतियों के रस में मिश्रित होकर उनका शोषण करता हुआ ऊपर जाता है और सूर्य के द्वारा आकर्षित जल में मिलकर ऋतु के अनुकूल वृष्टि होने में निमित्त बनता है। भगवान कृष्ण ने गीता में भी कहा है “यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्म रुमुद्भवः” अर्थात् यज्ञ से मेघ बनते हैं और यज्ञ कर्म से प्रादुर्भूत होता है।

यज्ञ से प्राणिमात्र का जो उपकार होता है उसका प्रतिफल प्राप्त करने की आकाँक्षा याजक को अन्य प्राणियों से नहीं होती है। यह एक ऐसा पक्षपातरहित शत्रु, मित्र के लिए किया जाने वाला दान है जिसका कि समान रूप में विभाग होता है याजक यह किसी को भी उपालम्भ नहीं दे सकता कि मैंने तुम्हारे साथ यह उपकार किया है इसका यह प्रत्युपकार तुम्हें मेरे साथ करना चाहिए-इत्यादि। श्रौत सूत्र-मीमांसा-ब्राह्मणादि ग्रन्थों में अग्नि होत्र से लेकर अश्वमेध पर्यन्त जो यागों का विस्तृत रूपेण निरूपण अनेक क्रियाकलापों के साथ किया गया है उनमें भी ‘र्स्वगकाभो यजेते’ इत्यादि वचन तथा अदृष्ट फल के वर्णन में मूलभूत यही सिद्धाँत है कि यज्ञ करने से अपने कर्तव्य का पालन करते हुए प्राणिमात्र का जो अप्रत्याशित उपकार होता है, उससे स्वर्ग (सुख विशेष) जिसे मीमाँसा के भाष्यकार शबर स्वामी ने विस्तृत शास्त्रार्थ लिखते हुए प्रतिपादित किया है ‘तस्मात्प्रीतिसाधने स्वर्ग शब्दः अ. 6।1)’ की प्राप्ति होती है। मनुष्य ने अपने शरीर तथा अन्यान्य प्रयोगों से जलवायु को दूषित किया अतः उस पाप का प्रायश्चित्त भी तो करना आवश्यक है इसके अतिरिक्त प्रभु ने मानव के लिये इस महत्ती सृष्टि की रचना करके मनुष्य को दूसरों के प्रति उपकार करने का आदेश दिया है जिसके लिए यज्ञ सबसे बड़ा और सरलतम साधन है योगिराज कृष्ण ने यज्ञ का महत्व दर्शाते हुए उपदेश दिया “यज्ञशिष्टशिनः सन्तो भच्यन्ते सर्वकिल्विषैः– भुञ्जनो तेत्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्” गीता अ. 3।13। यज्ञ करने के उपराँत अवशिष्ट पदार्थों का उपयोग करने वाला सब पापों से छूट जाता है वे लोग पाप खाते हैं जो केवल अपना ही पेट भरते हैं।

मानव का मन अतीव चंचल है अतः प्रभु का चिन्तन करते हुए भी इधर-उधर, दौड़ने का प्रयत्न करता है, ऐसे अस्थिर मन को अनेक क्रियाकलापों से युक्त यज्ञकर्म में जो कि अध्यात्म रूपी फल का देने वाला पुष्प है फँसा दिया जाता है, मंत्रोच्चारण से, तदर्थ भावना से व अग्नि की प्रदीप्त ज्वाला से कुछ सोचने विचारने की प्रेरणा मिलती है। यज्ञमय प्रभु की सृष्टि को देख कर कुछ परोपकार करने की सुध आती है, मन को शान्ति मिलती है, हृदय में आनन्द का सञ्चार होता है, स्वार्थ भावना मिटकर परमार्थ में, दीन दुखियों-अनाथों के त्राण में कल्याण प्रतीत होता है। अरोग्य-सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति होती है अथर्ववेद में एक मन्त्र आता है

“ओम् प्रातः प्रातर्गृहपतिर्नोऽग्निः सायं सायं सौमन सस्य दाता वसोर्वसोर्वसुदान एधीकन्धानास्वा। ऋ. शत हमाधेमकाण्ड 19।

अर्थात् प्रातः सायं अग्नि को प्रज्वलित करके यज्ञ करते हुए हम 100 वर्ष तक धनादि पदार्थों को प्राप्त करके पुष्टि शरीर वाले बने रहें।

एक समय था जब भारत के सम्राट घोषणा किया करते थे ‘न में स्तेनोजनपदे न कदर्यो न मद्यपः- नानाहिताग्निर्नाविद्वान् न स्वैरी स्वैरिणी कुतः” छान्दोग्य प्र. अनु. 5 खंड 11 प्रवा. 5। केकय पुत्र महाराज अश्वपति ने ऋषियों को संबोधित करते हुए कहा- हे महा श्रोत्रियो! मेरे राज्य में कोई चोर-कृपण-शराबी विद्यमान नहीं है, ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं जो प्रतिदिन यज्ञ न करता हो मेरे राष्ट्र में कोई भी व्यक्ति व्यभिचारी नहीं है। अहो! वह कैसा स्वर्गमय युग रहा होगा। जब कि घर-घर प्रातःकाल ही मंत्रोच्चारण की ध्वनि से आकाश गुंजायमान हो जाता होगा यज्ञ की सुगन्धि से वायु मण्डल सुवासित होकर प्राणिमात्र को आह्लादित करता होगा फिर भला चोरी-जारी आधि-व्याधियां वहाँ कैसे ठहर सकती होंगी। आज मानव प्रायिक रूपेण चिन्ता चिंताग्रस्त नाना रोग पीड़ित पके आम जैसा पीतवर्ण स्वार्थ भावना परिपूर्ण छल-कपट-ईर्ष्या-द्वेप से दूषित घोर अशान्ति के वातावरण से आवृत न जाने किधर दौड़ा चला जा रहा है। आन-नगर हाट-बाट में बालक-जवान-बूढ़े शिक्षित-अशिक्षित सब हुक्का-बीड़ी-सिगरेट के धुँए से प्रातः सायं ही नहीं, उठते बैठते जागते सोते भी अपने आप व अन्य जनों को भी तृप्त करने में सुख मान रहे हैं, इस धूम्र पान में करोड़ों रुपये का व्यय हो रहा है। हारमोनियम बजाकर नाच गाकर बीड़ी का प्रचार किया जा रहा है मानों आज का यही धर्म प्रचार हो। दूध का स्थान चाय ने ले लिया, घी से अधिक डालडा में शक्ति मानी जाने लगी, सोमरस का आनन्द शराब में आने लगा ऐसा मालूम पड़ता है कि मानों कलियुग में यही हवन आवश्यक हो। जहाँ देखो वैद्यराजों-डाक्टर साहिबों की दुकानों पर हाथों में शीशी थामे प्रातःकाल ही धरना दिये अधिक संख्या में व्यक्ति विराजमान दीखेंगे आज के युग में जिससे पूछो कोई व कोई रोग अवश्य होगा। तपैदिक जैसे संक्रामक रोग से आक्रान्त रोगियों की संख्या बढ़ती चली जा रही है। नये-नये इंजेक्शनों का आविष्कार हो रहा है किन्तु मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की वाली उक्ति चरितार्थ हो रही है। वायु शुद्धि की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है नये-नये आविष्कारों इंजेक्शनों के स्थान पर यदि आविष्कारों के आविष्कार विज्ञान पूर्ण यज्ञ का प्रचार किया जाये स्वास्थ्य विभाग-नगरपालिकाएं आदि संस्थाएं इस कार्य में रुचि दिखलायें तो जनता जनार्दन का कल्याण हो जाये। वेद शास्त्रों को मानने वाले व्यक्ति यज्ञ-हवन को मानते ही हैं मुसलमान भी लोवान जलाते हैं- पारसी अग्निहोत्र में अत्यन्त श्रद्धा रखते हैं, बौद्ध-ईसाई आदि भी धूप जलाने में बुरा नहीं मानते। आवश्यकता इसके प्रचार की है इसमें देश-काल जाति पाँति का भेद नहीं। जो भी प्राणी श्वास लेता है उसे वायु की प्रतिक्षण अपेक्षा है, मानव मात्र को शुद्ध वायु चाहिये। रोगी कोई बनना नहीं चाहता। अतः यदि रोगों से निवृत्त होकर शरीर को पुष्ट बनाना है, ठीक समय पर वृष्टि के द्वारा उदर पूर्ति के लिये शुद्ध अन्नादि पदार्थ प्राप्त करने की अभिलाषा है, स्वार्थ भाव, छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, घूँस-खोरी, चोर बाजारी दूर कर परोपकार करके मानवता का प्रसार करने की उत्कंठा है, आत्मिक-शान्ति प्राप्त कर दुःख दारिद्रय से रहित होकर शाश्वत सुख पाने की आवश्यकता है, तो “न चाहं कामये राज्यं न स्वर्ग नापुनर्भवम्- कामये दुःखतप्तानाम्प्रणिनामार्त्तिनाशनम्” का पाठ करते हुए दुखियों का दुःख दूर करने के लिये इस भौतिकाग्नि में यज्ञ करते हुए अपने जीवन को यज्ञमय बनाना होगा, तब “अयन्तइध्म आत्मा जातवेदस्तेनेध्यस्ववर्धस्व चेद्धवर्धय” यह आत्मा उस परमपिता परमात्मा की प्रदीप्त से तेजोमय होकर संसार का कल्याण करने में रत हो जायगी। परमार्थ ही स्वार्थ बन जायगा, इस प्रकार जब मानव मात्र तेजोमय हो जायगा यज्ञमय भगवान् का आशीर्वाद प्राप्त होगा- लोक का कल्याण हो जायेगा और सब एक स्वर से कह उठेंगे।

यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म। यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म॥


यज्ञ द्वारा देव-शक्तियों से अनुग्रह प्राप्ति

( श्री पं. गोपदेव शर्मा, हैदराबाद )

भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि “यज्ञ से देवों का सत्कार करो, देव तुम्हारा सत्कार करेंगे, इस तरह परस्पर सत्कार से परम श्रेय प्राप्त करो।”

यहाँ पर यज्ञ शब्द से नित्याग्निहोत्र ग्रहण करना अधिक संगत मालूम होता है। मनुष्य नित्याग्निहोत्र करके दैवी शक्तियों का अनुग्रह पा लेता है। उससे मनुष्य का कल्याण हो जाता है। इस प्रसंग में देव क्या है, और नित्य अग्निहोत्र करने से उन देवताओं का सत्कार कैसा होता है तथा देवता उस मानव का जो नित्य यज्ञ करता है- कल्याण कैसे करते हैं, इन बातों का संक्षेप से विचार करना चाहता हूँ।

यास्क महर्षि वैदिक शब्दों का निर्वचन करते हुए देव शब्द के विषय में ऐसा लिखते हैं। “देवः कस्मात्? देवों दानाद् वा दीपनाद् वा द्योतनाद् वा द्युस्थानोभवताति वा” देव क्योंकर देव कहलाता है? देव इसलिए कि वह दान देता है, प्रकाशित करता है, प्रकाशित होता है अथवा द्यु स्थान में रहता है। इस यास्कमहर्षि के निर्वचन से हमें यह स्पष्ट रीति से मालूम हुआ कि दान, द्योतन अर्थात् प्रकाशित होना दीपन- दूसरी वस्तुओं को प्रकाशित करना अथवा आकाश के अन्दर रहना। ये गुण जिसमें पाये जाय वह देव व देवता है। इस लक्षण से देवों को पहचानने में हमें आसानी होगी। परीक्षक लोगों का कहना है कि लोक में किसी वस्तु की सिद्धि करना चाहो तो दो चीजों की आवश्यकता होती है। वह दोनों चीजें कौन हैं? एक है लक्षण,दूसरी है प्रमाण। ‘लक्षण प्रमाणक्ष्या हि वस्तु सिद्धि’ लक्षण और प्रमाण से ही वस्तू की सिद्धि होती है- यह शास्त्रीय वचन है।

उपर्युक्त लक्षण से सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र पृथ्वी, जल, अग्नि,वायु आदि पदार्थ देव शब्द वाच्य है ऐसा सिद्ध होते हैं। क्योंकि इन सब पदार्थों के अन्दर यास्क महर्षि कथित गुण व लक्षण पाये जाते हैं। सूर्य चन्द्र आदि पदार्थ द्यु स्थानिक है अर्थात् आकाश में रहते हैं और स्वयं प्रकाशित होते हैं तथा अन्य पदार्थों को प्रकाशित करते रहते हैं। इसी तरह अग्नि स्वयं प्रकाशित है और अन्यों को प्रकाशित करती है। पृथ्वी के अन्दर दान गुण विद्यमान है। इस पृथ्वी से हम क्या क्या प्राप्त करते हैं। इन्हें मैं क्या वर्णन करूं। हर एक विज्ञ को यह भली भाँति मालूम है कि हम अनेक पदार्थ पृथ्वी में पाते हैं जैसे कि अन्न, वस्त्र, सोना, चाँदी, लोहा, कोयला, रत्न आदि। मनुष्य जीवनोपयोगी वस्तु अनेक इस पृथ्वी से ही उपलब्ध होती हैं। इसी तरह जल और वायु से भी हमें जीवन प्राप्त होता है। इनके बिना पृथ्वी पर कोई प्राणी जिन्दा ही नहीं रह सकता। इस बात को कौन नहीं जानता है। इस तरह पृथिव्यादि पदार्थ देव शब्द वाच्य हैं। इन पदार्थों को शास्त्रों में वसु शब्द से भी व्यवहार किया गया। ‘बसन्ति अस्मिन् इति वसुः’ पृथ्वी आदि पदार्थ इसलिए वसु कहलाते हैं कि इनमें जीव बसते हैं। जीवों के वास योग्य होने के कारण से वसु कहलाते हैं।

अब तक मैंने यह बताया कि देवता का लक्षण क्या है और देवता कौन है। अब यह बताना है कि उपर्युक्त पृथ्वी आदि पदार्थ देव कहलाते हैं इसमें प्रमाण क्या है। यजुर्वेद में चौदहवें अध्याय के अन्दर एक मन्त्र आता है कि उसमें पृथ्वी आदि पदार्थ स्पष्टोक्ति में देवता कहलाते पाते हैं।

अग्निर्देवता, वातो देवता, सूर्योदेवता, चंद्रमादेवता, रुद्रो देवता, आदित्या देवता, मरुतोदेवता, विश्वे देवा देवता, बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता, वरुणो देवता॥

यजु. अ. 14 मं. 20

मन्त्र का अर्थ स्पष्ट है। इसमें कौन कौन पदार्थ देवता पदवाच्य हैं पाठक भली भाँति जान सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्यत्र अथर्व वेद में देवताओं के विषय में लिखा गया है कि-

यस्य त्रयस्त्रिंशद्देवा यदंगेगाभा विभेजिरे तान् वैत्रयस्त्रिंशद्देवाने के ब्रहांविदो विदुः”

अर्थ. 10-33-4-27

ब्राह्मण ग्रन्थों में इस मंत्र की व्याख्या करते हुए देवताओं के विषय में लिखा है कि:–

“कतमे तेत्रयस्त्रिंशदिति-अष्टौवसवःएकादश रुद्रा द्वादश आदित्यास्तएकत्रिंशत इन्द्रश्चैव प्रजापतिश्चत्रयस्त्रिंशत्”

“कतमे वसवइति? अग्निश्चः पृथ्वीच, वायुश्चान्तरिक्षंच, आदित्याश्च, द्यौश्च, चन्द्रमाश्च, नक्षत्राणि चैतेवसवः”

अथर्ववेद के इस मंत्र में- तेतीस देवता हैं, वे शरीर के अन्दर आश्रित हैं, उन्हें ब्रह्मविद् लोग कोई-कोई जानते हैं- ऐसा लिखा हुआ है। इन्हीं देवताओं को स्पष्ट करते हुए ब्राह्मण ग्रन्थ में प्रश्न किया गया है कि वे तेतीस देव कौन हैं? उसके उत्तर में लिखा हुआ है कि आठ वसु. एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, इन्द्र और प्रजापति ये तेतीस देव हैं। फिर प्रश्न किया गया है कि वे कौन हैं? इसके उत्तर में कहा गया है कि अग्नि पृथ्वी, वायु, अन्तरिक्ष, आदित्य द्यो चंद्रमा और नक्षत्र ये वसु हैं।

अब पाठक समक्ष गये होंगे- वसु शब्द से पृथ्वी आदि पदार्थ देव कहलाते हैं। एवं लक्षण और प्रमाण के द्वारा मैंने यह बताया कि पृथ्वी अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र आदि पदार्थ देवता कहलाते हैं।

यज्ञ के द्वारा इन देवताओं का सत्कार करने से मनुष्य को विविध शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं। यह कैसे हमें जान लेना चाहिये।

नित्य अग्निहोत्र को शास्त्रों में दैवयज्ञ कहा गया है दैवयज्ञ का अभिप्राय है कि देवताओं को उद्देश करके किये जानी वाली क्रिया। एक यज्ञकुण्ड के अन्दर अग्नि को आधान करके और उस अग्नि को प्रदीप्त करने के पश्चात् औषधि आदि से सिद्ध किये हुए हव्य पदार्थों की आहुति नित्य दी जाती है। इस तरह करने से देवता प्रसन्न हो जाते हैं अर्थात् शुद्ध हो जाते हैं।

‘अग्नि र्वैदेवानां मुखम्’ अग्नि देवताओं का मुख है। इसलिए अग्नि के अन्दर जो भी कोई पदार्थ डाला जाता है वह सभी देवताओं को प्राप्त हो जाता है। जैसे अपने मुख के अंदर डाली हुई चीज सारे शरीर के अंदर पहुँच जाती है उसी तरह अग्नि के अंदर डाली हुई वस्तु जल, वायु, अन्तरिक्ष आदि देवताओं को आसानी से प्राप्त हो जाती हैं।

जब अग्नि, वायु, पृथ्वी आदि पदार्थ जो देव हैं—यज्ञ से शुद्ध हो जाते हैं। यही उन देवताओं का सत्कार कहलाता है। इसी यज्ञ क्रिया से देवतायें सत्कृत होती हैं—अर्थात् शुद्ध हो जाती हैं। इस तरह प्रसन्न—शुद्ध हुए देवताओं को गृहस्थ प्राणी उपयोग में लाते हैं। उन पदार्थों को सभी प्राणी अपने इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण करते हैं। इससे हमारी इन्द्रिय शक्तियाँ बढ़ जाती हैं। इन्द्रियाँ शुद्ध होती हैं जीवन पवित्र होता है। नीरोग रहता है। शुद्ध और पवित्र अन्न जल के प्रयोग से जो हमारे शरीर के अंग बनते हैं वह भी शुद्ध पवित्र होते हैं। ‘यदन्नं तन्मनः’ जैसा अन्न वैसा ही मन होता है। इन्द्रियों को शक्ति प्राप्त होना, मन शुद्ध और पवित्र बनना क्या शक्ति का मिलना नहीं? इससे बढ़कर शक्ति कौन-सी होती है? मनुष्य शुद्ध मन से न जाने क्या-क्या कार्य साध सकता है।

कहा है कि ‘मनएव मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयोः’ मानव अशुद्ध मन से बन्धन में पड़ा रहता है। वही मन जब शुद्ध हो जाता है तो वह उसको मोक्ष मार्ग पर ले जाता है। इसलिए ‘मानव यज्ञ के द्वारा परम श्रेय प्राप्त कर सकता है’ ऐसा भगवान् का कहना सर्वथा सत्य और युक्ति-मुक्त मालूम होता है।


यज्ञ पुरुष और उसकी महिमा

(श्री पं. भगवद्दत्त जी वेदालंकार एम.ए., रजोडी सहारनपुर)

प्रलयावस्था में चहुँ ओर तम ही तम था। सृष्टि के सर्जनहार भगवान् ने “ईक्षण” किया तो साम्यावस्था में शाँत भाव में पड़ी त्रिगुणात्मक प्रकृति में एक विशिष्ट प्रकार की गति व क्रिया प्रारम्भ हुई। उस समय भगवान् ‘यज्ञ पुरुष’ ¹ नाम से सम्बोधित हुए। इसी यज्ञपुरुष से अन्य अनेक यज्ञों की उत्पत्तियाँ प्रारम्भ हो गईं और कालान्तर में विविध यज्ञों का समूह यह सृष्टि ² यज्ञ परिपूर्ण रूप में सामने आ उपस्थित हुआ। जब भगवान् स्वयं यज्ञ रूप हैं और तदुत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टि भी यज्ञ है तो यज्ञ के अतिरिक्त संसार में कुछ है ही नहीं, यह हम निस्संकोच भाव से कह सकते हैं। वेद भी इस यज्ञ रूप भगवान् से उत्पन्न हुए हैं अतः ये भी ³ यज्ञ रूप हैं और इनमें जो कुछ भी हैं वह यज्ञ के अतिरिक्त कुछ नहीं, और होता भी क्या? यज्ञ से पृथक् कुछ हो तभी तो। जो यज्ञ के क्षेत्र से बाहर हुआ वही विनष्ट हो गया। यज्ञों की विद्यातक जो आसुरी शक्ति कही जाती है, वह तो भगवान् की ⁴ माया है और विश्व यज्ञों की एक आवश्यक लड़ी है।

श्रीमद्भगवद्गीता में आता है कि प्रजापति ने यज्ञों व प्रजाओं को साथ-साथ उत्पन्न कर प्रजाओं को यह आदेश दिया कि अपनी अभीष्ट की प्राप्ति हम इन यज्ञों द्वारा किया करें। अथर्व वेद के उच्छिष्ट सूक्त में प्रायः सब यज्ञों का परिगणन किया गया है। और वहाँ यह भी बता दिया गया है कि भगवान् से ही इनकी उत्पत्ति हुई है। वे यज्ञ दर्शपौर्ण मास, वाजपेय, अश्वमेध, राजसूय आदि नामों से प्रख्यात हैं। इन यज्ञों की उत्पत्ति प्रमुख रूप से मनुष्यों के लिये की गई है। वेद में आता है

ऋषीणां च स्तुतीरूप यज्ञं च मानुषाणाम् ऋ. 1।84।2

अर्थात् वह इन्द्र ऋषिओं की स्तुति में और मनुष्यों के यज्ञो में पहुँचता है।

1—यजु. 31 अध्याय यज्ञो वैभुवनम्। तै. ब्रा 3।3।7।5

2—यजु. 31 अध्याय यज्ञो वैभुवनम्। तै. ब्रा 3।3।7।5

3—यजु. 31।7 सैपात्रयी विद्या यज्ञः। श.प, 1।1।4।3

4—मायेत्सा ते याति युद्धान्याहुर्नाध शत्रुं ननुपुराविवित्से ऋ. 10।55।2

इस मन्त्र से ऋषियों और मनुष्यों में क्या विशेषता है, यह स्पष्ट हो गया है। और भी मन्त्र हैं जहाँ ऋषियों और मनुष्यों का पृथक् रूप से वर्णन मिलता है। इस उपर्युक्त मन्त्र का यह भाव नहीं समझना चाहिये कि ऋषि यज्ञ नहीं करते कराते थे। वे यज्ञ भी करते थे। परन्तु मन्त्र की ध्वनि यह है कि अभीष्ट की सिद्धि में मनुष्यों के पास प्रमुख रूप से यज्ञ ही साधन है। मनुष्य यज्ञ द्वारा जो कुछ प्राप्त कर सकता है वह सब और उससे भी अधिक ऋषि लोग संकल्प व ¹ स्तुति से प्राप्त कर लेते थे। परन्तु ऋषिओं का यह स्तुति बल अग्नि ² पूजा से ही प्रकट हुआ था। ³ त्रेतायुग के प्रारम्भ में वैवस्वत मनु हुए। अतः मानव सृष्टि त्रेतायुग के प्रारम्भ में हुई। यज्ञों का विशेष प्रचलन भी इसी काल में जाकर हुआ। क्योंकि युगह्रास से संकल्प व स्तुति में वह बल नहीं रहा अतः यज्ञों द्वारा ही अभीष्ट की प्राप्ति की जाने लगी। इसी बात को दृष्टि में रख कर ³ मन्त्र ने यज्ञों का मनुष्य के साथ विशेष सम्बन्ध बताया है। कृतयुग देवयुग है। इससे प्राकृतिक यज्ञ सुचारु रूप से यथाकाल चलते रहते हैं, अतः मानव यज्ञों की इस समय विशेष आवश्यकता नहीं। इस समय याज्ञिक विधियों में भी विभिन्नता व बहुलता नहीं होती। पृथिवी पर उस समय देवयुग था। जब देव ही स्वयं पृथिवी पर अवतरित हों तो आहुति किसके लिये? उस समय के ऋषि व देव विश्वयज्ञों के ही कर्ताधर्ता थे।

ये मानव यज्ञ विश्व यज्ञों के समझने के साधन मात्र ही नहीं हैं अपितु विश्व यज्ञों के सहायक नियामक (Controler)भी हैं। पिण्ड यज्ञों को ब्रह्माण्ड यज्ञों के समक्ष बनाने वाले हैं। कल्पना (कल्पनात् कल्पः करने के कारण इन यज्ञों का नाम कल्प नहीं है अपितु दिव्य सामर्थ्य वाले (कप् सामर्थ्ये) होने से ये कल्प कहलाते हैं। विधि के अनुसार यज्ञ करने वाले में वह ब्राह्मी शक्ति पैदा हो जाती है कि वह विश्वयज्ञों पर नियन्त्रण कर सके। उस यज्ञ रूप प्रभु द्वारा रचित इन विश्वयज्ञों में कभी कभी व्याघात हो जाता है यथा अतिवृष्टि, अनावृष्टि अकाल आदि। प्रश्न यह हैं कि क्या ये भगवान् की देन है। नहीं नहीं, यह भगवान् की देन नहीं है। यह तो हमारे कर्मों की उपज है। भगवान् ऐसा निर्दयी नहीं है, कि अकाल, ऋतु विकार, व्याधि आदि आपत्तियों को पैदा कर अपने पुत्रों को कष्ट देवें। उसने तो प्रारम्भिक कृतयुग इन सब व्याधि आदि आपत्तियों से रहित किया था। अतः ये सब विकृत दोष हमारे ही पैदा किए हुए हैं। जब हम अति वृष्टि आदि पैदा कर सकते हैं तो सुवृष्टि, सुकाल व श्रेष्ठ ऋतुओं को भी पैदा कर सकते हैं। एक प्रकार से ऋतु नियन्त्रण व परिवर्तन करने वाले हम ही तो हैं। इस प्रकार विश्वयज्ञों को समय-समय पर नियमित व निश्चित करने के लिये भगवान् ने यज्ञ रूपी नियामक यन्त्र सृष्टि के आदि में ऋषियों को प्रदान कर दिये थे। भगवान् के नित्य

1. त आयजन्त द्रविणां समस्या ऋषियः पूर्वे जरितारो न भूना। यजु. 17। 28

2. येन ऋषियो बलद्योतमन् युजा। अ. 4। 23।5 अग्नि ऋषियः सहस्रासनोति। ऋ. 10। 80।4

3. त्रेतायुगादौ च ततो विवस्वान् भनवे ददौ। महाभारत शांतिपर्व

4. ऋषीणां च स्तुतीरूप यज्ञ च मानुषाणाम्। ऋ. 1। 84।2

5. यजु. 17।28, अथर्व. 6। 133। 5, मनुस्मृति. अ. 1। 41 4 1। 3।

के नियमों द्वारा समय पर वृष्टि का विधान है पर हम देखते यह हैं कि उसमें व्याघात हो जाता है। ऋषि कारीरिष्ठ द्वारा वर्षा ऋतु को पैदा करते हैं। प्राकृतिक घर को, स्थानों व स्थानों व ऋतुओं में उत्पन्न रोगजनक कृमिकीटों को ऋषि भैषज्य यज्ञों द्वारा विनष्ट करते हैं। निःसन्तान दंपत्ति में पुत्रेष्टि यज्ञ द्वारा पुत्रोत्पत्ति की सामर्थ्य पैदा करते हैं। अश्वमेध राजसूय, वाजपेय आदि महायज्ञों द्वारा पिण्डान्तर्गत आँशिक यज्ञों को व उनकी शक्तियों को विश्वयज्ञों के समकक्ष बना देते हैं। अतः हम यह कह सकते हैं। कि ये मानव यज्ञ विश्वयज्ञों को समझने के लिये साधन मात्र ही है, वे उनके नियात्मक सहायक, सुधारक आदि भी हैं। पापों के विनाशक, ऐश्वर्य व दिव्य शक्ति सम्पादक भी हैं।

अग्निहोत्र आदि जो यज्ञ हम करते हैं उसमें प्रदीप्त अग्नि को हमें सामान्य भौतिक अग्नि ही नहीं समझना चाहिये। ¹ वेद कहता है कि इस भौतिक अग्नि में एक और अग्नि प्रविष्ट हुई हैं। उस अग्नि को दिव्य दृष्टि व दिव्य शक्ति सम्पन्न ऋषि लोग ही देख पाते हैं। अथवा यह भी कहा जा सकता है उस भौतिक अग्नि में अपनी शक्ति द्वारा एक और अग्नि पैदा कर देते हैं क्योंकि इस गुहानिहित अंतरग्नि को ऋषियों का पुत्र कहा गया है। वे ऋषि उस अग्नि को किस प्रकार पैदा कर देते हैं। इसका सामान्य उत्तर यह है कि मन्थन द्वारा, रगड़ द्वारा। यह मन्थन दिव्य दृष्टि, दिव्य वाणी व दिव्य विचार का सूक्ष्म मंथन है।

इससे पूर्व के मन्त्रों में ¹ मंत्रों द्वारा अग्नि का मन्थन कहा गया है। विचारणीय यह है कि मन्थन द्वारा उत्पन्न यह दूसरी अग्नि सर्व व्यापक अग्नि रूप भगवान् है या अन्य कोई अग्नि है इस पर विद्वान् लोग विचार करें। परन्तु हमारा कथन इतना ही है कि सामान्य यज्ञाग्नि को भौतिक अग्नि ही न समझा जाये। इसमें अन्तर्निहित अन्य भी अग्नि है जिसकी ओर वेद संकेत कर रहा है। इसी आन्तरिक अग्नि को उद्देश्य करके हमें ¹ मंत्रोच्चारण करना चाहिये। और ³ श्रद्धा से करना चाहिये। यदि श्रद्धा नहीं है तो यज्ञ की सफलता असम्भव है। ⁴ यज्ञ में ही ऐश्वर्य है। यज्ञ की सबका रक्षक है यह से ही सब पापों का विनाश है। यज्ञ से ही अग्नि अद्भुत कर्म करने वाला बनता है। यज्ञ में श्रद्धा रखने वाले व्यक्तियों के समक्ष एक महान् उत्तरदायित्व है और वह यह कि यज्ञों को प्रभाव व शक्ति को सत्य सिद्ध करें। अन्त में वेद सूक्ति सबको चेतावनी दे रही है कि—“अयज्ञियो हतवर्चा भवति। अथर्व, 12। 2। 37

अर्थात् यज्ञ न करने वाले का तेज नष्ट हो जाता है। तेजस्विता की रक्षा के लिये भी यज्ञ आवश्यक हैं।

अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋपीणां पुत्रो अभिशस्तिपावा। स नः स्योनः सुयजा यजेह, देवेस्यो हव्यं समप्रयुच्छन्स्वाहा॥ यजु. 5। 4

1—गायत्रेणत्वा छन्दसा मन्याग्नि त्रैष्टुधेनत्वा छन्दसा मन्थाग्नि॥ यजु. 5। 2

2—उपप्रयन्तो अध्वरम् मन्त्रं वोचेमाग्नये। आरे अत्त्मेच शृण्वते। यजु. 3। 11

3—स यः श्रद्दधानो यजते तस्येष्टं तक्षीयते। कौ— 6। 4

4—यज्ञो बसुः। यज. 1। 2

यज्ञोविदद्वसु। ता. ब्र. 8। 3। 3

यज्ञो वा भवति। ता. ब्रा. 6। 4। 5

भव यज्ञोमिरीमहविभिः। ऋ 1। 24। 14

नांहोमते तशते नप्रदप्तिः। ऋ 6। 3। 5

यज्ञोभिरद्भ तक्रतुं। ऋ. 8। 23। 8


यज्ञ विज्ञान सम्मत है

(पं. तोताराम शर्मा, M.S.C. प्रेम महाविद्यालय, वृंदावन)

वेदोक्त अर्थ जीवन यज्ञमय कहा गया है, और यज्ञ की भावना को नित्य जाग्रत रखने को ही प्रत्येक आर्य के लिए पंच महायज्ञ करने की व्यवस्था की गई है। पञ्च महायज्ञों में वे हमारे नित्य धर्म सम्मिलित हैं जो आर्य जीवन के प्रतीक हैं। यह हमारे लिए विशेष विचारणीय है कि अश्वमेधादि विशेष यज्ञों को वह महत्व नहीं मिला है जो इन पंचमहायज्ञों को दिया गया है, क्योंकि समाज के व्यक्तियों के जीवन का निर्माण उनके दैनिक कार्यों से ही सम्भव है विशेष कार्य तो विशेष अवसरों पर विशेष व्यक्तियों द्वारा ही किये जाते हैं।

इन पञ्च महायज्ञों में ब्रह्मयज्ञ (संध्या और स्वाध्याय द्वारा आत्म निरीक्षण तथा आत्म सुधार करना) देवयज्ञ (अग्निहोत्र द्वारा पञ्चभूतों के विकारों की निवृत्ति)। पितृयज्ञ (अपने को जीवन और शिक्षा देने हारे माता पिता और गुरुजनों की सेवा सत्कार) ऋषियज्ञ (वेदादि सत् शास्त्रों के स्वाध्याय और उनके उपदेशों के प्रचार में यथाशक्ति क्षेम देना) और बलिवैश्वदेव यज्ञ (गाय बैल, अश्व, श्वानादि पशुओं से सेवा लेने के फलस्वरूप जो हमने उन्हें कष्ट पहुँचाया है उसका प्रत्युपकार करने के लिए उनको प्रथम खिलाना) सम्मिलित है। इन पञ्च महायज्ञों में देवयज्ञ का सम्बन्ध हवन यज्ञ में है, और हवन यज्ञ का संबंध हमारे व्यक्तिगत भौतिक जीवन से विशेष है। यद्यपि हवन का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर विशेष पड़ता है, परन्तु परोक्ष रूप से यह हमारे सारे जीवन को प्रभावित करता है। हमारे शारीरिक स्वास्थ्य के इस व्यापक प्रभाव को ध्यान में रखते हुए ही कहा गया है कि ‘शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्’ अर्थात् शरीर ही सब प्रकार के धर्मों की सिद्धि का साधन है। और शरीर को स्वस्थ रखने का साधन हवन यज्ञ है। इस प्रकार हमारे सम जीवन सफलता का मूल साधन परोक्ष रूप से हवन सिद्ध होता है।

शरीर विज्ञान विदों के मतानुसार हमारा शरीर अंतःवाह्य इन्द्रियों के अतिरिक्त सहस्रों मन्त्रों का समुदाय है और शारीरिक स्वास्थ्य इन अंगों के डडडडडड 2 व्यापार निर्भर है। इस शरीर के इन डडडड अंगों द्वारा हम इस विश्व के अनेक पदार्थों का भोग करते हुए उन्हें अनेक प्रकार से विकृत और दूषित करते हैं। हम सुन्दर और सुस्वादु भोजन से दुर्गन्ध मल-मूत्र निकाल कर प्रकृति के पदार्थों को दूषित करते हैं। यद्यपि हमारे मल-मूत्र को पौधे खाद बनाकर हमारे लिए फिर से भोज्य पदार्थ बना देते हैं परन्तु हमारे मलमूत्र का बहुत कुछ सूक्ष्म अंश डडडड जल और पृथ्वी में शेष रह जाता और हमारे स्वास्थ्य पर दूषित प्रभाव करता है। इस दूषित प्रभाव की निवृत्ति के लिए ही हवन यज्ञ की व्यवस्था हमारे जीवन में की गई है।

प्राचीन भारतीय विचार-पद्धति के अनुसार हमारे भौतिक जगत का आधार पंचभूत माने गए हैं, और यही पंचभूत हमारे शरीर के भी आधार हैं। पाँच स्थूल भूत और सूक्ष्म भूत हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर के आधार हैं। इसलिए हमारे शरीर को निर्दोष बनाने के लिए इन पंचभूतों का निर्दोष होना आवश्यक है।

कुछ आधुनिक विचारकों के मत में हवन द्वारा स्वास्थ्य लाभ सम्भव नहीं, क्योंकि हवन द्वारा कार्बनद्विओषित (कार्बनडाइ ऑक्साइड) ही उत्पन्न होती है, और यह कार्बनद्विओषित मनुष्य के लिए अहितकर है। परन्तु इन लोगों का यह विचार गलत है, क्योंकि विधिपूर्वक किये हुये हवन में कार्बनद्विओषित की मात्रा अल्पतम बनती है, और आहुत हव्य का अधिकाँश भाग ऐसे सूक्ष्म भाग में परिणत होता जाता है जो दिग्दिगंत में व्याप्त हो। होमियोपैथी की अतिसूक्ष्म औषधि की नाई हमारे शारीरिक और मानसिक विकारों को दूर करने में समर्थ हो सकता है।

रसायन शस्त्र के ज्ञाता जानते हैं कि काष्ठादि पदार्थों के जलने और गर्म करने से सदा ही कार्बनद्विओषित नहीं बनता। कार्बन के विशुद्ध रूप कोयले को भी ऐसी विधि से आँच पर तपाया जा सकता है कि उससे कार्बनद्विओषित न बनकर अन्य अनेक उपयोगी पदार्थों की उपलब्धि हो। कोयले से कोलगैस बनाते समय जो काला कलूटा और दुर्गन्ध कोलतार मिलता है उसी से रसायनज्ञों ने अनेक प्रकार के रंग और सुगन्धियाँ निर्माण की हैं। वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि कोयले को खुली वायु में अविज्ञजन की पर्याप्त मात्रा के साथ जलाने से जहाँ केवल कार्बनद्विओषित मिलती है, उसी कोयले को किसी वेद पात्र में वायु के नियमित संपर्क के साथ जलाने से अनेक अन्य ऐसे रासायनिक द्रव्य मिलते हैं जो हमारे बड़े काम आते हैं।

हवन करते समय जो सावधानियाँ बरतने का विधान दिया जाता है उनके अनुसार आहुत हव्य पूर्णतया जलकर “कार्बनद्विओषित” नहीं बनाती, वरन् उनका वाष्पी भवन होकर उनमें ऐसे रासायनिक परिवर्तन होते हैं जिनके द्वारा अनेक उपयोगी पदार्थ अत्यन्त सूक्ष्म मात्रा में उत्पन्न हो दिग्दिगंत में व्याप्त हो प्राणियों का उपकार करते हैं। हवन करते समय समिधा को केवल बाहर की ओर लगाने का प्रयोजन यह है कि समिधा के जलने से जो ताप उत्पन्न होता है वह हव्य का केवल ‘वाष्पी भवन’ करे, जलाये नहीं। हवन कुँड का ऊपर से खुला होना और नीचे संकुचित होने का भी यही प्रयोजन है कि हव्य में अविज्ञजन मित मात्रा में पहुँचे। अधजले हव्य को कुरेद कर जलाने का निषेध भी यही प्रमाणित करता है कि हवन में हव्य को पूर्णतया जलने न देकर उसका ‘वाष्पी भवन’ किया जाता है, और उसमें ऐसे पदार्थों को ही डाला जाता है जिनके वाष्पी भवन से उपयोगी द्रव्य वायुमण्डल में फलकर प्राणियों का हित साधन करें।

हवन से वृष्टि सहायता मिलने का उल्लेख पाया जाता है। इसका आशय यह है कि हवन द्वारा वायु में कुछ ऐसे परिवर्तन होना चाहिये जो वृष्टि में सहायक सिद्ध हों। भौतिक विज्ञान ने यह सिद्ध किया है कि किसी स्थान पर वृष्टि हो सकने के लिए अनेक साधनों की आवश्यकता होती है। वायु में पर्याप्त आर्द्रता होना वृष्टि का यद्यपि मुख्य साधन है परन्तु अकेली आर्द्रता से वृष्टि नहीं हो सकती। आर्द्रता के साथ-साथ तापमान का गिरना भी आवश्यक है। आर्द्रता और ठंडक के साथ-साथ एक तीसरा साधन भी आवश्यक है। वायुमण्डल में धूल आदि के ऐसे रेणुओं का होना जिन पर जल वाष्प की बूंदें जम सकें। धूल के रेणुओं के अतिरिक्त वैद्युदाणुओं (आयनो) में यह क्षमता पाई गई है कि वायुमंडल की वाष्प को लघु बूँदों में बदल दे। वैज्ञानिक अन्वेषणों का यह एक उपयोगी विषय होगा कि हम यह जान सकें कि हवन में किन-किन पदार्थों के होमने से किस-किस प्रकार के आयन बनते और वे किस प्रकार वर्षा में सहायक हो सकते हैं।

हवन से उपलब्ध इन सूक्ष्म अंशों और आयनों की उपयोगिता के सम्बन्ध में उन्हीं को सन्देह होगा जिन्हें वर्तमान विज्ञान की उस प्रगति का ठीक-ठीक परिचय नहीं मिला जिसके फलस्वरूप यह सिद्ध है कि स्थूल जगत की स्थूलता का आधार सूक्ष्माति सूक्ष्म वैद्युत अणु या ऐसी तरंगें हैं जिसके स्वरूप की कल्पना करना भी कठिन है। होमियोपैथीक पद्धति से निर्मित औषधियों के चमत्कारपूर्ण प्रभाव को जिसने अपने अनुभव से जाना है उसे भी हवन के रोगनाशक प्रभाव में किञ्चित सन्देह न होगा।

हवन की उपयोगिता में हमारे अविश्वास या सन्देह के दो कारण हैं- एक तो हमारा अति स्थूलदर्शी हो जाना तथा दूसरे विधिवत् प्रयोग द्वारा हवन की इस उपयोगिता को प्रमाणित करने की कोई योजना न होना। वर्तमान चिकित्सा पद्धतियों के विकास का इतिहास इस ओर स्पष्ट संकेत कर रहा है कि हमारे शरीर की रचना इतनी जटिल है कि केवल वैज्ञानिक विधि से ही इसे पूरा नहीं जाना जा सकता है। हमारे शरीर में ऐसे अनेक सूक्ष्म अंग हैं जिन्हें प्रकृति के अत्यंत सूक्ष्म पदार्थ प्रभावित कर देते हैं। इसलिए यह कहना भूल है कि हवन द्वारा हमारे रोगों की निवृत्ति मानना भ्रांति है। यह कहना तो ठीक है कि हवन सम्बंधी हमारा ज्ञान इस समय इतना अपूर्ण है कि इसके द्वारा सभी विशिष्ठ रोगों की चिकित्सा का दावा उस समय तय नहीं किया जा सकता जब उसे प्रयोग से सिद्ध न किया जा सके। प्रसन्नता की बात है कि गायत्री तपोभूमि द्वारा ऐसी खोजें और प्रयोगात्मक परीक्षाओं की व्यवस्था की जा रही है। हवन निःसंदेह एक लोकोपयोगी कार्य है और इसका प्रभाव मानव जीवन के लिये हितकर ही होता है।


यज्ञ का महान तत्व ज्ञान

(श्री अभवदेव, चरथावल)

वैदिक साहित्य में यज्ञ की बड़ी महिमा है। बहुत से लोग ‘वेद में केवल यज्ञ-विषय की ही चर्चा हैं, ऐसा मानते हैं। साधारण याज्ञिक लोग जिसे यज्ञ कहते हैं, उसकी अपेक्षा कहीं विशाल और व्यापक है। स्वयं वेद भी यज्ञ से ही उत्पन्न हुआ है।

तस्माँद् यज्ञार्त्सवहुतः ऋचः सामानिजज्ञिरे। छन्दांसिजज्ञिरे तस्माद् यजुत्त्तस्वादजायत॥

अर्थ—उस सर्वहुत यज्ञ से ऋक्, यजुः, साम और अथर्व, चारों वेद उत्पन्न हुए। ब्राह्मण, उपनिषद् गीता महाभारत) आदि छंदों (शास्त्रों) में हुआ यज्ञ व्याख्यान बतलाता है कि वैदिक धर्म में यज्ञ की महिमा को समझते हुए, हम जानें कि यज्ञ क्या है?

ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद में प्रश्न पूछा है कि, “मैं तुमसे पूछता हूँ कि सम्पूर्ण ब्रह्मांडों को बान्धने वाली वस्तु कौन है? इसका उत्तर दिया है कि यह यज्ञ ही इस विश्व-ब्रह्मांड को बान्धने वाला है।

तो फिर हमें यह जानना चाहिये कि यज्ञ क्या है, जिससे सब संसार बंधा हुआ है।

यहाँ पर यज्ञ का असली अर्थ समझना आवश्यक है। साधारण शब्दों में कहा जाय तो—“मेल, मिलना, जुड़ना, सम्बन्ध रखना, ठीक तरह से जुड़ना, ठीक तरह से सम्बन्ध स्थापित रखना”, इन सारे शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है। इन सारे शब्दों का केंद्रीय अभिप्राय है—सुसंगतिकरण।

प्राचीन साहित्य में यज्ञ के अर्थों के सम्बन्ध में एक सूत्र है; जिसमें उक्त शब्दों के द्वारा ‘यज्ञ’ के अर्थों का स्पष्टीकरण किया गया है। पाँच प्रकार के यज्ञवाच्य अर्थों में यह सूत्र गया हुआ है। वे अर्थ इस प्रकार है

1—परमात्मा यज्ञ है।

2—यह संसार यज्ञ है।

3—सुसंगठित मानव समुदाय यज्ञ है।

4—मानव जीवन, यज्ञ है।

5—मनुष्य का प्रत्येक कल्याणकारी-कर्त्तव्य-कर्म, यज्ञ है

इन पाँचों का स्पष्टीकरण—

1--“यज्ञो यत्र पराक्रान्तः।” यज्ञ की उच्चतम पराकाष्ठा परमात्मा में होती है। अतः परमात्मा को भी पुरुष सूक्त में ‘यज्ञ’ कह कर पुकारा गया है।

2—यह संसार यज्ञ है। इस यज्ञ का कर्त्ता परमात्मा है। यह संसार, खूब अच्छी तरह से ठीक-ठीक जुड़ा हुआ है। इसमें सब कार्य ठीक-ठीक अटल नियमों द्वारा, ठीक स्थान; ठीक समय और ठीक-ठीक सम्बंध में विद्यमान् रहती है। यह संसार इतनी अच्छी तरह बंधा हुआ—सुसम्बद्ध है कि यह सब मिलकर ‘पूर्ण’ है। कहा है—

“पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।”

3—मनुष्य यज्ञ- मानव समुदाय का सुसंगठित स्वरूप ही मनुष्य यज्ञ है। यही हमें-मनुष्य मात्र को विशेष रूप से करना है। सब संगठन, सम्बन्ध संस्था इस यज्ञ में समाविष्ट हैं। कर्म काण्ड के सुप्रसिद्ध, बड़े-बड़े यज्ञ (राजसूय, विश्वजित् आदि) इसी के अंतर्गत है।

4—मनुष्य का “सुव्यवस्थित-जीवन” ही चौथा यज्ञ है। परमात्मा के विशाल विश्व यज्ञ की ही सीमित प्रतिमा ‘मानत-जीवन यज्ञ है। मनुष्य को इसे ठीक रूप से व्यवस्थित और चालू रखना चाहिये।

मनुष्य का प्रत्येक कल्याणकारी- श्रेष्ठ कर्त्तव्य भी यज्ञ है। विश्व-विधान और प्राकृतिक नियम के अनुसार जीवन को चलाने से संसार के साथ उसकी सुसंगति रहती है। उसके प्रतिकूल चलने से संसार बिगड़ता है, ये बुरे कर्म हैं, ये संसार को भी दुःखी बनाते हैं तथा करने वाले को भी क्लेश पहुँचाते हैं। यह अयज्ञ है।

मनुष्य यज्ञ के अनेक रूप होते हैं। समाज की भलाई के लिये चातुर्वर्ण्यं एवं आश्रम-व्यवस्था का संगठन एक महायज्ञ है। राष्ट्र यज्ञ है, स्वराज्य-संगठन यज्ञ है, बुराइयों के विनाश के लिये किया जाने वाला संग्राम भी यज्ञ है, सबों के लाभ का ध्यान रखते हुए किया जाने वाला व्यापार संगठन यज्ञ है। प्राचीन भारतीय-गृहस्थ परिवार का व्यवस्थित गार्हस्थ्य धर्म, संपादन यज्ञ है, इस भाँति छोटे बड़े सभी संगठन, जो कल्याण के लिए होते हैं, यज्ञ हैं।

अशुभ के लिये किया गया संगठन यज्ञ नहीं होता। दूसरों के—गरीब और निर्बलों को सताने के लिये, अशक्तों और बुद्धिहीनों का खून चूसने के लिए बड़े-बड़े संगठन किये जा सकते हैं, पर ये पापों को डडडड करने वाले कर्म, यज्ञ नहीं होते। दुर्लघ्य सामने आते ही संगठन में से यज्ञ के देवता निकल जाते हैं, उस पर असुरों का अधिकार होता है।

यज्ञ एक दिव्य महाशक्ति तथा उसका उत्पादन केंद्र है। इसे आसुरी शक्तियाँ सदा नष्ट कर देने के प्रयत्न में लगी होती हैं, अतः इसकी रक्षा आवश्यक है। शक्ति प्राप्त होने पर उसे सदुपयोग करने की अपेक्षा दुरुपयोग करने का प्रलोभन ही अधिक खींचता है। यही सबसे बड़ा खतरा है, जिससे यज्ञ को प्रतिक्षण बचाना होता है। ऋषिगण यज्ञों की रक्षा करने के लिये सदैव तत्पर रहते थे, उसका यही तात्पर्य था। आज भारतवासियों को उसी प्राचीन यज्ञ (सुसंगठन) कला को पुनर्जीवित करने की सबसे अधिक आवश्यकता है।

अब प्रश्न यह है कि राष्ट्र में—विश्व में देवताओं का राज्य स्थिर करने का उपाय क्या है? सबों को यज्ञ भूमि बना देना, सर्वत्र सोमरस (प्रेस) का सागर लहरा देना, जिसका क्रियात्मक रूप है, आत्मबलिदान, आत्मोत्सर्ग या स्वार्थ-परित्याग। यही यज्ञ का प्रकट या क्रियाशील प्राण है। इसके बिना कदापि जीवन धारण नहीं कर सकता। यह सभी देवों का देव महादेव है। इसके उत्क्राँत होने से श्रद्धा-सेवा आदि सारे देव उत्क्राँत हो जाते हैं और इसकी स्थापना होने से सभी स्थापित हो जाते हैं। इसके बिना यज्ञ मृतवत् है, इसी से कई विद्वान्, यज्ञ का अर्थ बलिदान (अपने सारे स्वार्थों का बलिदान) करते हैं। यह बलिदान की अग्नि मानव जीवन में सदा जलती रहे, इसीलिये बाहर के अग्निहोत्र में सदा ‘स्वाहाः स्वाहाः’ ध्वनियों के साथ ही हवि या बलि दी जाती है। यह ‘स्वाहाः’ ही यज्ञ की जान है। यज्ञ के उत्तमाँग में श्रद्धा और अनुशासन, मध्यमाँग में ‘सुसंगतिकरण’ तथा आधार अंग में वात्सल्य, करुणा और दान इसी बलिदान की बदौलत ही स्थिर और प्रतिष्ठित होता है। यह नहीं होने से उत्तमाँग में, अश्रद्धा, अविश्वास संदेह, शंका, अनुशासनहीनता, स्वेच्छाचारिता रूपी आसुरी शक्तियाँ प्रवेश कर उस अंग को क्षत विक्षत, क्षीण और रोगी बना देते हैं।

इसी भाँति मध्यमाँग में उत्सर्ग या बलिदान की भावना का अभाव होने से उसका सुसंगतिकरण बिखर जाता है और ईर्ष्या, द्वेष और क्रोध असुर प्रवेश कर व्यष्टि लाभ के लिए समष्टि के कल्याण को ठुकराते रहता है और इसी तरह यज्ञ के तीसरे अंग ‘दान’ जो स्वभावतः ही बलिदान रूप है। इसमें छोटों की सहायता के लिए—उनकी कमी पूर्ति करने के लिये जो कुछ हमारे पास है, वह सब कुछ देना होता है। प्रेम ही बलिदान की प्रेरक—शक्ति है, अतः बिना प्रेम के बलिदान जीवित नहीं रह सकता। जहाँ प्रेम से बलिदान होता है, वहाँ बलिदान से प्रेम भी बढ़ता है, जैसे रस से प्राण पुष्ट होता है और प्राण पुष्ट होने से रस भी अधिक बनता है। यहाँ भी अहंकार और स्वार्थ-असुर प्रवेश कर इस अंग को नाश करने का प्रयत्न करने लगता है।

मनुष्य, इस पुरे संसार का एक छोटा सा नमूना है। जैसे मनुष्य में सब देवता निवास करते हैं, उसी प्रकार उसमें पशु भी रहते हैं। स्वार्थ भाव पशु है—‘कामः पशु’। क्रोध, लोभ, द्वेषादि इसी के भेद हैं। इन पशु भावों को एक-एक पशुओं का प्रतीक कहा गया है, जैसे—बाज, घमण्ड का प्रतीक है, गिद्ध लोभ का, कुत्ता चापलूसी का, अज्ञान उल्लू का, मूर्खता गधे का, ऐसे ही अनेकों पशु भावों को प्रतीक रूप में पशु के नामों से ही वर्णन किया गया है। यज्ञ में इन पशुओं का बलिदान करने से (पशु भावापन्न) पशु-मनुष्य, मनुष्य बनता है, और मानव भावों का भी उत्सर्ग कर देने से वह दिव्य भावापन्न—देव बन जाता है। यही यज्ञ में पशुओं के बलिदान का रहस्य है। अज्ञानी--असुर लोग प्रतीक नामधारी पशुओं की ही यज्ञ में वलि देते हैं जो यज्ञ नहीं अयज्ञ और यज्ञ का विरोधी कर्म है।

यज्ञ का घातक शत्रु स्वार्थ-खुदगर्जी है। (पहले मैं, पीछे दूसरे सब) स्वार्थ, प्रेम रूपी इन्द्र का शत्रु वृत्र (वृत्रासुर) है, यह प्रेम सुर्य को सदा ही ढकने की चेष्टा किया करता है। बलिदान दिन है, तो स्वार्थ, रात्रि । जिस भाँति बलिदान, यज्ञ-देवों में महादेव है, उसी तरह इसके विरोधी असुर दलों में सर्व प्रधान स्वार्थ है। अहंकार, मोह, अपनापन ये सब इसी के भिन्न-भिन्न रूप हैं। यज्ञ में जिन-जिन वस्तुओं को छोड़ना पड़ता है, बलिदान करना पड़ता है, उसका एक ही नाम स्वार्थ है। प्राणाग्निहोत्र उपनिषद् में शरीरस्थ यज्ञ का चित्र खींचते हुए लिखा है—“कामः पशुः”। काम अर्थात् पहले अपनी इच्छा। यही यज्ञ (संगठन) में बलिदान करने योग्य पशु है। स्वार्थ के लिये ‘काम’ शब्द का प्रयोग हुआ है। यज्ञ में अपनी अलग इच्छा (स्वार्थ) रखना, उसे भ्रष्ट कर देना है।

सभी यज्ञों में देने-लेने की प्रक्रिया होती रहती है हम अग्निहोत्र में घृत, औषधि, बलवर्धक पवित्र अन्नों की आहुति देते हैं, उसे ही यज्ञ के देव गण ग्रहण कर सन्तुष्ट होते हैं और उसे ही सूक्ष्म—सूक्ष्मातिसूक्ष्म बना कर सारे विश्व ब्रह्मांडों में फैला देते हैं, जिससे पांचों तत्व या अन्य सारे तत्व ही परिशुद्ध निर्मल, आरोग्यमय एवं पुष्ट बन जाते हैं। फिर उन तत्वों को वृष्टि, विद्युत, वायु आकाश आदि के द्वारा हम पुनः प्राप्त कर अधिक पुष्ट, आरोग्य और निर्मल बनते हैं। शास्त्रों में ‘पर्जन्य’ इस शब्द के माध्यम द्वारा हमें उसकी पुनः प्राप्ति, वर्णित है, पर यह वृष्टि केवल जलों की ही वृष्टि नहीं है—यह ‘पर्जन्य’ सा कल्याणकारी तत्वों की वृष्टि का एक प्रतीक है।

यज्ञ में जिन वस्तुओं को बलिदान-उत्सर्ग किया जाता है, उसे हवि कहते हैं। यह हवि अनेकों प्रकार की होती है और भाँति-भाँति के यज्ञों में इसकी वलि दी जाती है। गुरुदेव रूपी यज्ञाग्नि में शिल्प श्रद्धा भक्ति और सेवा की समिधा लेकर हवन करते और उसे अनन्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। व्यक्ति अपना स्वार्थ छोड़कर अपनी सारी उत्पादन और उपार्जन शक्ति समाज-यज्ञ में हवन करता है, फलितार्थ वह समाज द्वारा निर्मित अनेकों वस्तुओं, रसों और सुखों का उपभोग करता है, जिसे वह केवल वैयक्तिक श्रम से कभी पा ही नहीं सकता था। इसी भाँति समाज, जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, प्राँत आदि जब डडडडड लिये अपना सब कुछ स्वाहा कर देता है, तो इस डडडड यज्ञ से उन्हें व्यापक विशालता में सुख, सुविधा ऐश्वर्य संस्सति और ज्ञान के साधनादि प्राप्त होते हैं। यज्ञ के इन्हीं मूल रूपों से भारत के पूज्य ऋषिगणों ने पञ्च महायज्ञ निरूपित कर सबों को यज्ञशिष्ट भोग कर निष्पाप और भगवद् प्राप्ति के योग्य बनने का निर्देश दिया था वे ये हैं:-

1—ब्रह्म यज्ञ

2—देव यज्ञ

3—पितृ यज्ञ

4—नृ यज्ञ

5—भूत वलि (वैश्वदेव यज्ञ)

ब्रह्म यज्ञ:—ऋषियों की भाँति अपना सब कुछ धन-सम्पत्ति-ऐश्वर्य-शरीर-प्राण-मन-बुद्धि-हृदय आदि सभी परमात्मा को अर्पित कर दें और फिर उनके आदेश के अनुसार ही अपने जीवन में इन सबों का उपयोग करें। (सब कुछ वस्तुतः परमात्मा को सौंपते ही उनका निर्देश अन्तर में क्रमशः स्पष्ट होकर प्राप्त होने लगता है।) यह ब्रह्म यज्ञ है।

2—देव यज्ञ- विश्व के कल्याण के लिए प्रत्यक्ष अग्नि में ऐसे आरोग्यमय, पुष्ट और मंगल द्रव्यों की श्रद्धा और भक्ति से आहुति दें, जिसे विश्व में फैले अनन्त देव ग्रहण कर सबों के कल्याण और शुभ के लिये पर्जन्य रूप में विविध वृष्टि कर पुनः विस्तृत रूप में हमें प्रदान करते हैं।

3—पितृ-यज्ञ- जीवन में पोषण, रक्षण एवं विविध कल्याणों की अभिवृद्धि करने-कराने वाले गुरु-पितृ बड़ों की भक्ति और सेवा ही पितृ यज्ञ है। शरीर छोड़ने के उपरान्त भी उनकी आज्ञा मान कर चलना तथा उनके आत्म कल्याण के लिये सत्कर्मों का अनुसरण करना भी पितृ यज्ञ ही है।

4—नृ यज्ञ—अपने स्वार्थ की संकीर्णता को विशाल परार्थताडडडडडडडड में परिणत करने के लिए अपरिचित डडडडयचित अभ्यागतों की, देव और ईश्वर मान कर डडडड-अर्चन-भोजन-शयन-आदर और स्वागत वाणी से डडडडत्कार करना ही नृयज्ञ है।

5—भूत वलि या वैश्वदेव यज्ञ—स्थूल, सूक्ष्म, डडडडव्य जितने भी प्राणी या देव हैं, सबों को तृप्त करने की भावना से भोज्य सामग्री की हवि प्रदान करना ही भूत या वैश्वदेव यज्ञ है। इससे व्यक्ति का हृदय और आत्मा विशाल होकर अखिल विश्व के प्राणियों के साथ एकता सम्मिलन का अनुभव करने में होता है।

यज्ञ कर्त्ता को क्या खाना चाहिये?-इसका भी एक आवश्यक नियम और व्रत है। उसे ‘यज्ञाशिष्ट’ ही ग्रहण करते-भोग करने का विधान है। तो यह ‘यज्ञशिष्ट’ क्या है, जिसे खाने-उपभोग करने वाले ‘सनातन ब्रह्म’ यानी परमात्मा को प्राप्त कर लेते हैं और सर्व किल्विष्यों से मुक्त हो जाते हैं।

यज्ञ शिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्॥ यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्विषैः॥

—गीता

ये भोगे जाने वाले पदार्थ उपभोक्ता को जहाँ और जिससे प्राप्त होते हैं, उसे (उस वस्तु को) उनको बिना अर्पित किये ही जो उसे अपने उपभोग में लाना चाहता- या लाता है, वह चोर है।

तैर्दत्तान प्रदायैभ्यो यो मुक्तेस्तेन एवं सः॥

गीता 3।12

साधारण तौर से व्यक्ति को समाज से, समाज को राष्ट्र से, राष्ट्र को विश्व से और विश्व को यज्ञ पुरुष-परमात्मा से ही उपभोग-सामग्रियों की प्राप्ति होती है, अतः इसे भोगने का विधान है- ‘त्यक्तेन भुञ्जीथा’ ईशो.॥ त्याग कर, उत्सर्ग कर भोग करो।

व्यक्ति अपने प्राप्त सारे उपभोग-वस्तुओं को समाज के लिये उत्सर्ग कर दे, समाज राष्ट्र के लिये, राष्ट्र, विश्व के लिए और विश्व, यज्ञ पुरुष के लिये इसी भाँति हवि प्रदान करे। यह यज्ञ करने के उपरान्त उनके हिस्से में यज्ञ देवों द्वारा जो कुछ दिया जाय, वही ‘यज्ञशिष्ट’ है। इसे ही उपभोग करने वाले निष्पाप-निर्मल होकर (यज्ञपुरुष विष्णु) विश्व व्यापकता को प्राप्त कर लेते हैं। यही शुद्ध और आध्यात्मिक समाजवाद है, जिसे इन यज्ञ प्रक्रियाओं के द्वारा ही स्थापित किया जा सकता है।

वेद में बहुत जगह ‘यज्ञम् विततम्,’ ‘यज्ञम् वर्चयानः,’ ‘यज्ञ वर्धन्’—इस प्रकार के वाक्य या शब्द आते हैं, जिनमें यज्ञ के विस्तार करने—बढ़ाने का वर्णन होता है। यह यज्ञ का विस्तार क्या है? एक दूसरे से मिलने की प्रवृत्ति ही सभी के अन्तर में स्थित यज्ञ बीज हैं। यह बीज ही क्रमशः बढ़ता हुआ सारे विश्व में फैल जाता है, तभी मनुष्य को सर्व व्यापक यज्ञ पुरुष परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। यही यज्ञ विस्तार का तात्पर्य है। मनुष्य सर्व प्रथम अपनी डडडडडअयज्ञता को छोड़कर कुटुम्ब (गार्हपत्य) यज्ञ में संगठित होता है। इससे आगे बढ़ कर वह ग्राम पंचायत (आह्वनीय) बनाता है। ग्राम पञ्चायत क्रमशः विकसित होकर, जनपद, प्राँत और राष्ट्र के रूप में संगठित होता है। दक्षिणाग्नि॥ और अन्त में सब राष्ट्रों की अंतर्राष्ट्रीय सार्वभौम महासभा में मनुष्य-संगठन का यज्ञ परिपूर्ण होता है, परन्तु मनुष्य हृदयस्थ यज्ञ तब पूरा होता है, जब वह ईश्वरीय महा संगठन अपने को संगठित अनुभव करता है। तब वह सर्वमेध यज्ञ को पूरा करता है। यज्ञ विस्तार की यही अवधि या सीमा है।

जब तक भारत वर्ष के जीवन में यज्ञ के द्वारा यज्ञ का यजन नहीं होगा, अर्पण या बलिदान की वृक्षि नहीं जगेगी, तब तक यहाँ की उन्नति का इन आसुरी अयज्ञों द्वारा सदा व्याघात और बाध होता ही रहेगा, और हमारी व्यापक तथा सर्वांगीण उन्नति की कोई सम्भावना नहीं है।

प्राचीन यज्ञ:—

1. राजसूय यज्ञ— जिस सम्मेलन में सुसंगठित होकर राजा का चुनाव किया जाता है, ऐसे संगठन को राजसूय यज्ञ कहते हैं। इसका वर्णन अथर्ववेद के 4।8 सूक्त में देखा जा सकता है।

2. विश्वजित् यज्ञ—इस द्वारा एक राष्ट्र या मानव समुदाय अपनी विशाल हृदयता, प्रेम और शक्ति के प्रभाव से सारे विश्व पर अपना आधिपत्य कायम कर सकता है।

3. अश्वमेध यज्ञ—शतपथ के “राष्ट्रं वा अश्वमेधः” “वीर्यं वा अश्वः” वचनानुसार राष्ट्र और उसकी शक्तियों का भली भाँति संगठन करना ही अश्वमेध यज्ञ है।

4. पुरुषमेध—अपने-अपने वैयक्तिक स्वार्थों को छोड़कर राष्ट्र के ही उत्थान के लिये अपना जीवन अर्पित कर देना पुरुषमेध यज्ञ है। ऐसे लोगों को कभी कभी संग्राम और दुष्टों के दमन करने में प्रत्यक्ष ही जीवन या प्राण का बलिदान कर देना पड़ता है। इसका वर्णन बौद्ध ग्रन्थों में मिलता है।

5. गोमेध—गौ जाति के उपयोग से भूमि को जोतकर तथा खाद्य से उर्वरा बनाकर भूमि को अधिक तय भोज्य सामग्री उत्पन्न करने के योग्य बनाना ही गोमेध है।

सर्वमेध—किसी डडडड यज्ञ के लिए जब निचला यज्ञ (संगठन) सब कुछ बलिदान कर देता है, तो उसे ‘सर्वमेध’ कहा जाता है।

अंत में भारत देश का यज्ञ द्वारा उद्धार करने के लिए प्रेम से प्रार्थना की जाती है:—

यस्यां सदो हविर्धाने यूपो यस्यां निपीयते।

ब्राह्मणो यस्यामर्चन यृग्भिः साम्ना यजुर्विदाः युज्यन्ते यस्यामृत्विजःसोभमिन्द्राय पातवे ॥38॥ यस्यां पूर्व भूतकृत ऋषयो गा उदानृचुः। सप्त सत्त्रेण वेधडडडड यज्ञेनतपसा सह ॥39॥ अथर्व 12।1।38।39

हे यज्ञभूमि! क्या अब फिर तेरा उद्धार होगा यह यज्ञभूमि-भारतभूमि, जिस भूमि पर सभास्था और हविस्थान होते थे, जहाँ यज्ञ स्तम्भ गाड़ा जाता था, जहाँ ब्रह्मा और अध्वर्यु आदि ऋचाओं और डडडडडडडसामों से अर्चन करते थे, जहाँ इन्द्र को सोमरस पिलाने के लिए नित्य यज्ञशील लोग संगठित होते थे, जहाँ भूतडडडड को बनाने वाले पूर्व महर्षिगण संतों-विश डडडडलतर यज्ञों द्वारा सातों गौओं-किरणों-दिव्यडडडड लोकों की पूजा करते थे तथा ब्रह्मा, तपस्या के द्वारा यज्ञ (संगठन) करते थे—क्या वह भारत भूमि डडडड फिर यज्ञभूमि बनेगी?


यज्ञ के प्रत्यक्ष अनुभव

(श्री पं. जय देव शर्मा मीमांसातीर्थ वनस्थली-विद्यापीठ)

यज्ञ को वेद में श्रेष्ठतम कर्म कहा है। यज्ञ से संसार के सब पदार्थों को लभ्य कहा है। यज्ञ प्रजापति का स्वरूप कहा है। प्रजाओं को परमेश्वर ने उत्पन्न करके साथ ही यज्ञ को कामधेनु के रूप में उत्पन्न किया और आदेश दिया कि इससे तुम अपने सब इष्ट पदार्थ प्राप्त करो ऐसा गीता में बतलाया है। तब यज्ञ कोई पदार्थ घर कर रख लेने के लिये नहीं है। वह तो करने की वस्तु है।

यज्ञ ऐसी कामधेनु नहीं है कि उसे गाय के समान घर के आँगन में बाँध ले जब जरूरत हुई उसी समय वस्तु माँग लाये। और न यह ऐसा कल्पवृक्ष है कि जब चाहा उसका फल तोड़ लिया। यज्ञ तो एक अध्यात्म क्षेत्र का गम्भीर कार्यकरण रूप भावनामय गौ है। कर्ममय कल्पतरु है जिसके यथावत् सम्पादन करने से काल में फल फलता है। और वैगुण्य होने से नहीं भी फलता है या अल्प फलता है।

विगुणता कहाँ रहती है यह समझना कुछ सूक्ष्म दर्शिता का काम है जो सर्व साधारण से हो नहीं सकता। उनको तो स्थूल वस्तु चाहिये। उनको सूक्ष्म तर्क नहीं चाहिये। उनको रोग है तो दवा चाहिये जिसे वे अल्प आयास से खा लें और उनका रोग टूट जाय, उनको वह नरक की त्रिदोष चिकित्सा की विवेचना नहीं चाहिये कि जिसे वे समझ न सके इसलिये ऋषियों ने यज्ञ का क्रियात्मक धर्म के रूप में उसका स्थूल रूप नियत किया है, ऐसा करो, इस अनुक्रम से करो यह दूर्तिकर्त्तयताडडडडड डडडडयता करो। जिस तर्क की सूक्ष्मता में तुम जाना नहीं चाहते उसे पुनः मत उठाओ, चाहे दूसरे शब्दों में आप आँख मीचकर करो, ऐसा भी कह सकते हैं, शब्दान्तर में डडडडडसे भक्ति, श्रद्धा विश्वास तर्क रहितता रूप में करो ऐसा ही कहना चाहिये।

प्रश्न—तो फिर क्या यज्ञ-सिद्धान्त अन्ध विश्वास सिद्धान्त है। उत्तर- नहीं, और हाँ।

जिसे रोग निवृत्ति चाहिये उसे वैद्य से तर्क नहीं चाहिये प्रत्युत वैद्य वचन में विश्वास चाहिये। जिसे वैद्य से तर्क करना अभीष्ट है उसे रोग से मुक्ति नहीं चाहिये, उसे वैद्य की कटु भेष से बचने का बहाना चाहिये। इस दृष्टि से तो यज्ञ सिद्धान्त अन्ध विश्वास का सिद्धान्त है। और जो कर्म-क्रिया-उपचार-प्रयोग करने की वस्तु है वह तर्क से होने वाली नहीं, उसे कर लेने के बाद ही उस का तथ्य-अतथ्य विदित होता है तब वह एक प्रकार से ‘इन्डक्टिव लॉजिक’ क्रियासिद्ध तर्क का विषय हो जाता है, जिसके आधार पर विज्ञान की डडडडसम्पना सिद्ध होती है। इस प्रकार यज्ञ भी एक विज्ञान सिद्ध परमार्थ है। आप अधिक इस शुष्क विवेचना में न जाकर हम पाठकों के अपने यज्ञ के अनुभव बतलाना चाहते हैं। (1) जिस यज्ञ को हम अपने चित्त में रखकर प्रयोजन बतलाना चाहते हैं वह है अग्नि में सुगन्ध द्रव्यों की आहुति करना अन्य उसकी पृष्ठभूमि में लोक कल्याण भावना और स्वहित भावना भी निहित है।

1915 ई. के दिवाली के दिन थे। मैं उन दिनों जयपुर राज्य के ठिकाने जोवनेर में कर्णगढ़ हाईस्कूल का मुख्याध्यापक था। एक कार्यवश मुझे एक आर्य सज्जन द्वारका प्रसाद सेवकजी के पास इन्दौर जाने का आवश्यक कार्य हुआ। इस निमित्त मैं इन्दौर पहुँचा।

स्टेशन पहुँचते ही सुना कि शहर में भारी प्लेग फैली है। ताँगे वाले भी सब मोहल्ले में नहीं जाते क्योंकि कुछ मोहल्ले भारी प्लेग के आतंक से खाली हो गये थे, वहाँ उनको जाते डर लगता था। खैर मुझे तो पारसी मोहल्ले जाना था। ज्यों ही मैंने पारसी मोहल्ले का नाम लिया ताँगे वाले ने साफ इन्कार कर दिया। कोई ताँगे वाला भी उस मोहल्ले जाने के लिये तैयार न हुआ।

मैंने कुछ अधिक किराये का प्रलोभन दिया एक ने हिम्मत की और मैं चल पड़ा। रास्ते भर में प्लेग के अद्भुत आतंक की बातें सुनता आया। ताँगे वाले ने बतलाया कि पारसी मोहल्ले में से पारसियों के घरों में से जब उनके घरों के ताले खोल-खोल कर सफाई की गई तो बोरियां भर-भर कर मरे हुए चूहे निकाले गये। भय तो मुझे भी लगता रहा कि कहीं यह प्लेग मुझे जाते ही न पकड़ ले। परन्तु मैं भी हिम्मत न हारा। लक्ष्य तक पहुँचा। वहाँ अपने मित्र द्वारकादास सेवक के घर पहुँचा, वे बड़े आनन्द में थे।

प्रातः 7-8 बजे मैं पहुँच गया था। जाकर स्नानादि किया। और सन्ध्या के पश्चात् यज्ञ करके प्रातराश किया, तब मार्ग की सब चर्चा चली। मैंने देखा कि घर में जीती जागती चुहिया इधर उधर उछल रहीं हैं। मैंने फिर ताँगे वाले की कही बात कही कि—सुना था पारसियों के घर में तो मनो चूहे मरे हुए निकले। आपके यहाँ तो सब चूहे जी रहे हैं। बात क्या है।

द्वारकाप्रसाद बोले—भगवान् की कृपा है। दोनों समय अग्निहोत्र करता हूँ। मेरे घर में एक भी चूहा नहीं मरा। और सब भाग गये। निर्दय माता पिता- तड़पते लड़के लड़कियों को घर में छोड़कर ताले डालकर चले गये। उनको जब पानी तक देने वाला कोई न मिला तो मुहल्ले भर में चीखें उठ रही थी हमने ताले तोड़े, उन रोगियों की सेवा की, पानी भोजन का प्रबन्ध किया, उनको स्थानान्तरित किया। ये सब नरक के दृश्य नरक पाने योग्य काम करने वाले निर्दय लोगों के घर में न दीखें तो कहाँ दीखें।

मेरे घर में यज्ञ होता है इसलिये मेरे यहाँ स्वर्ग है, यहाँ चुहिया भी अप्सरा की सी खुशी से नाचे तो क्या विस्मय है। मेरे तो सब घर के सुखी और प्रसन्न हैं। इन नारकियों की सेवा करते हुए भी हमें नरक का स्पर्श नहीं होता। और तो और, यहाँ के नरेश के राज्य सिंहासन तक पर मरे चूहे पाये गये।

ये सब वृत्तांत सुनकर मेरा ध्यान गया कि अहो यह दैनन्दिन अग्निहोत्र क्यों घर घर में प्रत्येक स्त्री पुरुष के लिये आवश्यक ठहराया है, इसका यह रहस्य है, जनपदों ध्वंस करने वाली महामारी जैसी नारकीय बीमारियाँ प्रजा के सामूहिक पाप और राजा के अधार्मिक होने से उत्पन्न होती है। और जब फैलती है तो उनके पापों का प्रत्यक्ष फल उनको घर बैठे मिलता है। और उसी समय नित्य धर्माचरण करने वालों को वह पाप इसी प्रकार नहीं छूता जैसे कमल पत्र को जल। स्वर्ग और नरक को देखने के लिये भूतल से दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। स्वर्ग और नरक के सुफल और कुफल साथ-साथ देखने को मिल सकते हैं। केवल विवेक से देखने की शक्ति चाहिये।

वर्तमान में मैं वनस्थली विद्या पीठ में 10 वर्ष से रहता हूँ। यहाँ कोई नित्य यज्ञ क्या कदाचित् सन्ध्या अर्चन या देवता दर्शन भी नियम से नहीं करता होगा। मेरे गृह में नित्य कर्म के रूप में अग्निहोत्र होता है आस पास के कुछ व्यक्ति जब कभी भी दिन में एक आध बार मेरे क्वार्टर पर आते हैं, वे यश के गन्ध बहुत प्रसन्न होते हैं। कुछ ने तो नियम बाँध रखा है वे दो चार मिनट बैठकर उस सुगन्ध का वैयक्तिक सुख लेते हैं।

मैं सोचता हूँ कि यदि मुहल्ले भर में मैं अपने 10 मिनट के इस यज्ञ से इतने व्यक्तियों के अनायास सुख का कारण बनता हूँ तो इस धर्म का पालन करने पर हम सभी एक बड़ा भारी अनायास सुख का विशाल वातावरण उत्पन्न कर सकते हैं। परन्तु इसके लिये सामूहिक व्यापक उद्योग अपेक्षित है।

ये तो यज्ञ के प्रत्यक्ष सुखानुभव हैं। इसके साथ जो अध्यात्म लाभ करने वाले को होते हैं वे डडडडडडडप्रत्यगात्म वेदनीय हैं जो करने पर स्वयं ही अनुभव किये जा सकते हैं, उनको लेखनी से लिखकर बतला नहीं जा सकता।


श्रवण कुमार की अन्तर्वेदना

श्रवण कुमार के माता पिता जब बहुत वृद्ध हो गये, उनकी आँखों की ज्योति भी चली गई तो वे बहुत दुखी रहने लगे। उनकी इच्छा थी कि सभी तीर्थों की यात्रा करें, पर परिस्थितियों से मजबूर थे। वृद्धावस्था और अन्धता ने उनके शरीर को अशक्त कर रखा था, तीर्थयात्रा की अभिलाषा कैसे पूरी करते? मन ही मन वे अन्ध दम्पत्ति रोया करते, कभी-कभी उनकी वेदना आँखों और उसासों में होकर फूट भी पड़ती ।

माता पिता के चरणों के समीप पितृभक्त बालक सोया हुआ था। रात को अचानक उसकी आँख खुली तो उसने चुपचाप पड़े पड़े देखा सुना कि माता पिता की आँखें बरस रही हैं, वेदना सम्मिश्रित उनमें चल रही है। बालक कुछ देर इस दृश्य को देखता रहा, पर अधिक देर न देख सका, उठ बैठा। माता के चरणों को धीरे धीरे दबाने लगा और खिसक कर उसकी गोदी से सट गया। माता पिता को पता लग गया कि बच्चा जग गया है हमारी वेदना का परिचय पाकर बालक खिन्न न हो जाय यह सोचकर उन्होंने, अपने आपको संभाल लिया। आँखों से नीचे बहने के लिए आने वाले आँसू उन्होंने रोके और कठ में घूँट के साथ नीचे उतार लिए, साँसें जो वेदना के आताप से गरम हो रही थीं, किसी प्रकार ठंडी की और ऐसा उपक्रम बनाया कि बालक को कुछ पता न चले। बालक उन्हें प्राण प्रिय था, उसके कोमल हृदय पर किसी प्रकार की चोट पहुँचे यह उन्हें अभीष्ट न था।

बालक को जगे हुए बहुत देर हो गई थी वह सब कुछ देख सुन रहा था। पूछने पर भी जब माता पिता कारण न बताने लगे, हँसने हँसाने का उपक्रम करते हुए बात को टालने का उपक्रम करने लगे, ते बालक की अंतर्वेदना उमड़ पड़ी। वह सोचने लगा—मेरी अपात्रता ही इसका कारण हो सकती है कि माता पिता जो मुझे प्राण प्रिय स्नेह करते हैं, अपनी पीड़ा को मुझ से डडडडना उचित न समझें—छिपावें। आत्म ग्लानि में—अपनी अयोग्यता और अपात्रता की अनुभूति से बालक के नस नस में सहस्र बिच्छुओं के कारण पीड़ा होने लगी, यह पछतावा उसके रोम रोम में क्रंदन करने लगा कि— कदाचित् में माता पिता के कष्टों को निवारण करने में समर्थ न सही—उनकी व्यथा को समझने का भी अधिकारी अभी तक न बन सका। मातृ पितृ भक्ति का प्रथम सोपान भी में पार न कर सका, जल विहीन मछली की तरह वह छटपटाता हुआ धरती पर लोटने लगा।

माता पिता अन्धे अशक्त अवश्य थे पर वस्तुस्थिति को समझने की क्षमता उनमें जरा भी कम नहीं हुई थी। बालक के स्वभाव से परिचित थे, वह जाग चुका था, जगकर उनकी स्थिति को समझ चुका है, इसीलिए पूरी बात बताये बिना अब छुटकारा नहीं। न बताने में बालक को दुहरा दुख होगा इसीलिए उन्होंने धरती पर लोट-पोट करते और पैर पीटते हुए बालक को छाती से लगा लिया। धीरे धीरे उन्होंने अपने मन की व्यथा कहना शुरू करदी। आँखों की अन्धता, शरीर की अशक्तता, तीर्थयात्रा करने की अभिलाषा की विसंगतियों को उन्होंने बताया और कहा बेटा यह देव-दुर्विपाक ही है। तुम भी तो अभी बालक ही हो—खेलने खाने का ही यह तुम्हारा समय है तुम्हारा विकास उतना नहीं हो पाया है कि इन कठिन बातों में कुछ योग दे सको, इसी से हम लोग तुम्हें यह सब नहीं कहते थे। कोई अन्यथा बात न समझो। चलो—चुपचाप से जाओ अभी रात बहुत बाकी है।

फूँस की टूटी सी कुटिया के एक कौने में वे वृद्ध-पुरुष अपने शरीर को चिथड़ों से ढक कर सोने का उपक्रम करते हुए लुढ़क गये, बगल में बालक को सुला लिया तीनों ही सोने का बहाना बनाये पड़े थे ताकि एक दूसरे को उनके जगने की बात का पता न चले। पर भीतर ही भीतर तीनों के आँधी तूफान उड़ रहे थे। माता पिता सोचते, हमारा बच्चा यदि कुछ समर्थ हुआ होता—खेलने खाने की स्थिति को पार कर चुका होता तो हमारे कुछ काम आता बालक सोच रहा था मैं मानसिक दृष्टि से इतना छोटा न हुआ होता तो माता पिता को सन्तुष्ट करके अपने जीवन को धन्य बनाता शारीरिक अपूर्णता मेरी उतनी नहीं है, जिससे उनकी अभिलाषा पूरी न हो सके क्योंकि आर्य जाति के नन्हें नन्हें बालक अभिमन्यु, लवकुश, दुष्यन्त पुत्र भरत, ध्रुव, प्रहलाद आर्य के समान भारी भारी पराक्रम करते रहे हैं। अयोग्यता-अपात्रता मेरी मानसिक ही है जिसके अनुसार खेलने खाने में ही मेरा मन डोलता रहता है। बालक अपने को घृणापूर्वक धिक्कारता और तिलमिला कर ऐसा सोचता कि इस मन को अपना सिर तोड़कर अलग निकाल फेंकूँ और वैसा मन वहाँ बिठाऊँ जो खेलने खाने की तुच्छता से बहुत ऊँचा हो, कर्तव्य पालन का अधिकारी हो ।

सोच विचार में रात बीत गई किसी की भी आँख न लगी। प्रातःकाल हुआ। उठते ही रात की अधूरी बात पर फिर चर्चा होने लगी। माता पिता चाहते थे बालक रात की बात को भूल जाय। बालक चाहता था मातृ-पितृ भक्ति का उज्ज्वल उदाहरण पैदा करने के लिए उसके शरीर को- सर्वस्व को खप जाना चाहिए। नाना तर्क वितर्क की, नीच ऊँच समझने समझाने की, आग्रह आवेश की झड़ी लग गई। यह विवाद चला, बढ़ा, विकसित हुआ और कई दिन के निरन्तर मन्मथ के बाद एक निष्कर्ष निकला। बालक पूर्णतया कटिबद्ध हो गया कि वह खेलने खाने की स्थिति से ऊँचा उठकर माता पिता के दिये हुए शरीर का उन्हीं के निमित्त उपयोग करेगा। पिता की अन्धी आंखों में स्वर्णिम आभा नाचने लगी। आर्य जाति के बालक के ऐसे ही होते थे—हमारा बालक संसार के सामने एक अनुकरणीय आदर्श का उदाहरण बनेगा। अपने बच्चे की इतनी बड़ी महानता देखने का अवसर किन्हीं बड़भागी माता पिता को ही मिलता है। तीर्थयात्रा की इच्छा पूर्ति एक तुच्छ बात थी— इस बात की तुलना में कि श्रवण कुमार संसार का एक आदर्श हीरो बनने जा रहा है। तीर्थ यात्रा की तैयारी होने लगी।

झोंपड़ी का द्वार बन्द कर दिया गया। दोनों वयोवृद्ध अंधों को लाठी पकड़े-उनके गठरी पोटली सिर पर रखे श्रवणकुमार आगे आगे चलने लगा। यात्रा का श्रीगणेश आरम्भ हुआ। भिक्षा द्वारा भोजन प्राप्त करना बोझा लेकर चलना लाठी पकड़कर रास्ता बताते चलना उन्हें शौच स्नान शयन आदि कराना आदि सम्पूर्ण व्यवस्थाओं का बोझ श्रवणकुमार ने अपने कन्धे पर खुशी-खुशी ले लिया। उसे लगता मानों माता पिता का पूरा-पूरा उत्तरदायित्व उसी के कन्धे पर लदा है। माता पिता भी सब प्रकार की ऐसी सुविधा अनुभव करते मानो श्रवणकुमार के कन्धों पर ही बैठकर चल रहे हों। यात्रा बढ़ चली। एक-एक कदम करके सम्पूर्ण नदी, सरोवर, तीर्थधाम, पुरी पार होने लगी, तपोभूमियों का कोना-कोना उन्होंने पार कर लिया। कोई तीर्थ उनसे बचा नहीं। इस प्रकार तीर्थ यात्रा कराते-कराते श्रवणकुमार भी दशरथ के तीर विग्रह में मर खप गया—माता पिता तो तीर्थ रूप ही थे। वे तो सद्गति की साक्षात् प्रतिमा थे श्रवणकुमार का बलिदान परोक्ष रूप में रामराज्य का—प्रकारान्तर से असुरों के संहार और विश्वशान्ति का कारण बना। इस प्रकार उस नन्हे मुन्ने श्रवणकुमार बालक की छोटी सी कहानी का हजारों लाखों वर्ष पूर्ण पटाक्षेप हो गया। अब तो वह अतीत के एक स्मृति मात्र दी गई जिसकी झाँकी इतिहास के पृष्ठों पर और जनमन के एक विस्मृत गर्त में पड़ी हुई जब तक देख सकते हैं।

वह पुराना समय था—जब साधारण माता को ऐसे बालकों का सौभाग्य मिलाता था। आज तो स्थिति ही दूसरी है “खाने खेलने की स्थिति से कोई जरा भी ऊँचा उठना नहीं चाहता। माता पिता से अधिक लाभ- उचित अनुचित लाभ उठाने के अतिरिक्त उनके प्रति और भी कुछ कर्त्तव्य है यह कोई नहीं सोचता।

यज्ञ पिता और गायत्री माता भारतीय संस्कृति परिवार के जनक जननी हैं। वे आज बूढ़े हो गये हैं। समय के प्रभाव ने उनको उपेक्षा के गर्त में पटक दिया है। उनके नेत्रों की ज्योति क्षीण हो गई है। पर तीर्थ यात्रा करना चाहते हैं तेतीस कोटि देवों के डडडडड प्रत्येक भारतीय का निवास स्थान प्राचीन काल में एक तीर्थ होता था। इन तीर्थों में यज्ञ भगवान और गायत्री माता की प्रतिष्ठा होती थी। आज के तीर्थ श्मशानों में बदल गये हैं। आसुरी तत्वों के भूत पिशाच उन पर अट्टहास करते हुए नाचते रहते हैं। इन श्मशानों को पुनः देवालयों में तीर्थों में बदलने के लिए- यज्ञ भगवान और गायत्री माता की व्यापक तीर्थ यात्रा होनी चाहिये। पर अब ऐसे श्रवण कुमार कहाँ है? जो इन वृद्ध मात-पिताओं को कन्धे पर बिठा कर दूर दूर की धूलि छानने को तैयार हों। विनोबा के भूदान की तरह- यज्ञ प्रकार की पैदल यात्राओं की आवश्यकता आज सर्वोदय है। घर घर त्याग और ज्ञान- यज्ञ और गायत्री का सन्देश पहुँचाया जाए तो भारतीय संस्कृति का मरुस्थल पुनः हरा भरा हो सकता है।

यज्ञ प्रकार की पैदल यात्रा से गाँव गाँव में यज्ञ सम्मेलन करके गायत्री उपासना और यज्ञ अनुष्ठान के आध्यात्मिक नित्य कर्मों के अतिरिक्त- मानव जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत लोक शिक्षण हो सकता है और जन साधारण की मनोभूमि को ज्ञान और त्याग के साथ सुसंबद्ध बनाया जा सकता है। लम्बी चौड़ी योजनाऐं बनाना व्यर्थ है। सब कार्यों के लिए कर्म निष्ठ, पुरुषार्थी परिश्रमी सच्चे और धुन के पक्के कार्यकर्ताओं की आवश्यकता होती है ऐसे कार्यकर्ता हों तो उनका प्रत्येक कदम एक कार्यक्रम बन सकता है, अनुभव के आधार पर उन कार्यक्रमों में हेर फेर होता रह सकता है। मूल आवश्यकता अपने को तुच्छ स्वार्थों से ऊंचा उठाकर इस सांस्कृतिक आवश्यकता के लिए अधिक से अधिक मात्रा में अपना समय, मन, वचन, धन, साधन, योग्यता, चातुर्य, आदि लगा देने के लिए उत्सुक त्याग भावना की है।

श्रवण कुमार की युग कथा आज पुनरावृत्ति कर रही है। यज्ञ पिता और गायत्री माता का महत्व और सर्वथा क्षीणकाय हो चला है- मरणासन्न उपेक्षा की वृद्धता से जकड़े हुए शक्तिहीन हो रहे हैं। उनके नेत्र अन्धकारमय भविष्य देखकर ज्योति हीन हो रहे है। वे भारतीय के घरों को देवालय का तीर्थ रूप देखने के लिए व्यापक तीर्थ-यात्रा करना चाहते हैं पर कोई साधन नहीं दीखता। उनका बालक-भारतीय समाज-जन मानस-खेलने खाने में-स्वार्थ और भोग में-लिप्त हैं। इससे अधिक और कुछ नहीं करना चाहता, अन्धे, बूढ़े, अशक्त , क्षीणकाय माता पिता से वह नाना प्रकार के खेल खिलौने, पैसे, लड्डू, बताशे तो माँगता रहता है पर उसके मन में क्या कला है इसे कोई नहीं सुनना चाहता। अपने कन्धे पर उनका बोझ उठाने के लिए कोई तैयार नहीं होता।

श्रवण कुमार की आत्मा स्वर्ग में फुट-फूट कर रोती है- अब उसकी पुनीत परम्परा लुप्त होने जा रही है। यज्ञ पिता और गायत्री माता की पालकी कन्धे पर रखकर उनका बोझ उठाने के लिए कौन तैयार होता है? छप्पन लाख भिखमंगों की—साधु, पंडितों की सेवा अपनी पूजा प्रतिष्ठा कल्पित मुक्ति लूटने को सपने संजोये बैठी है। साधारण मनुष्य केवल माँगना जानते हैं देना नहीं सीखना चाहते। फिर श्रवण कुमार कौन बने?

कौन बने? कौन बने? कौन बने? यह प्रश्न अन्तरिक्ष में आज सर्वत्र गूँज रहा है। पर उत्तर किधर से भी नहीं आता। सर्वत्र सुनसान मरघट जैसा सन्नाटा साँय साँय कर रहा है। कौन बने? कौन बने? का अरण्य रोदन श्रवण कुमार और उसके माता-पिता स्वर्ग बैठे-बैठे सुनते हैं- और बिलख बिलख कर रोते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता भी इसी अन्तर्वेदना में पड़े एक कौने में सिसक रहे हैं- पर श्रवण कुमार की छाया तो किधर के भी आती दिखाई नहीं पड़ती।


श्रौत-यज्ञों का संक्षिप्त परिचय

(श्री पं. वेणीराम शर्मा गौड़, वेदाचार्य काशी)

1- विवाहोपरान्त विधिपूर्वक अग्नि की स्थापन करके, सायं-प्रातः नित्य हवन आदि कृत्य किये जाते हैं, उसे स्मार्ताग्नि (आवश्थ्याग्नि, औपासथ्याग्नि)कहते हैं। इस अग्नि में किये जाने वाले कर्मों को स्मार्त कर्म कहते हैं। स्मार्ताग्नि में सिद्ध किया भोजन ही ग्रहण करने योग्य है।

2- गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि के विधि पूर्वक स्थापन को “श्रौताधान” कहते हैं। इन अग्नियों में किये जाने वाले यज्ञों का नाम “श्रौतकर्म” है। (गार्हपत्य में हवि आदि का संस्कार आहवनीय में हवन और दक्षिणाग्नि में पितृ सम्बन्धी कार्य होते हैं)

3- दर्शपूर्ण मास याग:- अमावस्या और पूर्णिमा को होने वाले यज्ञ को क्रमशः दर्श और पौर्णमास कहते हैं।

4- चातुर्पास्य-यज्ञ:- चार चार महीने पर होने वाले इस यज्ञ को चातुर्मास्य यज्ञ कहते हैं। इस याग के चार पर्व होते हैं। प्रथम- फाल्गुणी पूर्णिमा में वैश्वदेव पर्व, द्वितीय आषाढ़ी पूर्णिमा का वरुणप्रधान पर्व, तृतीय कार्तिकी पूर्णिमा को साकमेघ पर्व और चतुर्थ- फाल्गुण शुक्ल प्रतिपदा को शुनासीरीय पर्व होते हैं।

(क) जिस पर्व के विश्व देवा देवता हों, उसे वैश्वदेव पर्व कहते हैं।

(ख) जिस पर्व में वरुण के लिये प्रधास अर्थात् हवि दी जाती है, उसे “ वरुणप्रधास पर्व” कहते हैं।

(ग) जिस पर्व में हवि प्राप्त कर, देवगण समान भाव से वृद्धि को प्राप्त होते हैं, उसे “साकमेध पर्व” कहते हैं।

(घ) जिस पर्व के देवता, आदित्य और वायु हो, उसे “शुनासीरीय पर्व” कहते हैं।

5- प्रतिवर्ष, वर्षाऋतु में अथवा उत्तरायण और दक्षिणायण में संक्रान्ति के दिन एकबार जो यज्ञ किया जाता है, उसे ‘निरूढ़-पशु’ कहते हैं।

6- आग्रयण यज्ञ:- प्रति वर्ष बसन्त और शरद ऋतु में, नवीन यव और चावल से जो यज्ञ किया जाता है, उसे आग्रयण या नवान्न यज्ञ कहते हैं। यह यज्ञ करने के बाद ही नवीन अन्न खाना हितकारी है।

7- सौत्रामणि यज्ञ:- इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ किया जाता है, उसे सौत्रामणि यज्ञ कहते हैं। वह दो प्रकार का होता है- प्रथम स्वतन्त्र और द्वितीय अंगभूत। स्वतन्त्र भूत केवल ब्राह्मणों के लिये विधेय है और अँगभूत, क्षत्रिय और वैश्यों के लिये।

8- सोमयाग- सोमलता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है, उसे सोमयाग कहते हैं। इसके सोलह ऋत्विक् होते हैं। (दक्षिणा लेकर यज्ञ करने वाले ऋत्विक् कहलाते हैं)

सोम याग के सोलह ऋत्विकों के भी चार प्रकार हैं:- 1. अध्वर्यु गण 2. ब्रह्मगण 3. होतृगण तथा 4. उग्दातगण।

इन प्रत्येक गणों के चार-चार विभिन्न ऋत्विक् होते हैं, जिनके नाम भी भिन्न भिन्न हैं।

1- अध्वयुर्गण:- (1) अध्वर्यु (2) प्रतिप्रस्थाता (3) नेष्टा और (4)उन्नेता।

2- ब्रह्मगण:- (1) ब्रह्मा (2) ब्राह्मणाच्छसी (3) आग्रीघ्र और (4) पोत्रा।

3- होतृगण:- (1) होता (2) मैत्रावरुण (प्रशास्ता) 3 आच्छावक और (4) प्रावस्तुत।

4- उद्गातृगण:- (1) उद्गाता (2) प्रसडडडडड (3) प्रतिहर्ता और सुब्रह्मणयडडडडड।

सोमयाग के सात भेद है-

(1)- अग्निष्टोम:- अग्निष्टोम साम में जिस यज्ञ की समाप्ति हो, और उसके बाद अन्य साम न पड़ा जाय, उसे अग्निष्टोम कहते हैं।

इसी प्रकार 2 उकथ्य साम, 3 षोडशी साम, 4 वाजपेय साम, 5 अतिरात्र साम और 6 अप्तोर्याम नामक साम पढ़ कर जिन यज्ञों की समाप्ति होती है वे यज्ञ क्रम से उकथ्य आदि नामों से पुकारे जाते हैं।

अग्निष्टोम साम के अनन्तर षोडशी साम जिस यज्ञ में पढ़ा जाता है, वह ‘अत्यग्निष्टोम’ कहा जाता है।

(9) द्वादशाह यज्ञ:- यह सच और अहीन भेद से दो प्रकार का होता है, जिनमें सोलहों ऋत्विक्, आहिताग्नि, ब्राह्मण और बिना दक्षिणा वाले हों, ऐसे सोम योग को “सत्र” कहते हैं। ‘सत्र’ में 12 से लेकर 1000 तक सुत्या होती है। सोमलता के रस को विधि पूर्वक निकाल कर प्रातःकाल, मध्याह्न काल और सायंकाल, इन तीनों समय में हवन करने को एक सुत्या कहते हैं।

दो सुत्या लेकर ग्यारह सुत्या, जिस यज्ञ में हो, और आदि-अन्त में जिसके ‘अतिरात्र’ नामक यज्ञ हो तथा अनेक यजमान, कर्त्ता हो, ऐसे सोमयाग को ‘अहीन’ कहते हैं।

10- गवानयन सत्र:- यह सत्र 385 दिनों में होता है। इसमें 12 दीक्षा, 12 उपसद तथा 361 सुत्या होती है।

11- वाजपेय यज्ञ:- इस यज्ञ के आदि और अन्त में बृहस्पति सब नामक सोमयाग या अग्निष्टोम यज्ञ होता है। अथवा वाजपेय यज्ञ के प्रथम और पश्चात्, बारह-बारह शुक्ल पक्षों में बारह-बारह-बारह अग्निष्टोम आदि यज्ञ होते हैं। इसमें सत्रह-सत्रह हाथ के सत्रह यूप होते हैं। यह चालीस दिन में सम्पन्न होता है।

12- राजसूय यज्ञ:- इसमें अनुमती आदि बहुत सी दृष्टि और पवित्र आदि बहुत से यज्ञ होते हैं। यह यज्ञ 33 महीने में पूरा होता है। इस यज्ञ का अधिकार केवल अभिषिक्त क्षत्रिय राजा को है।

13- चयन याग (अग्नि-चयन):- जिस यज्ञ में ईंटों के द्वारा वेदी का निर्माण हो इसे चयन या अग्नि चयन यज्ञ कहते हैं। वह वेदी 10 हाथ लम्बी और चौड़ी होती है जिसको अत्मा कहते हैं। इसके दक्षिण और उत्तर की ओर छह-छह हाथ का चबूतरा बनता है, जिसको दक्षिण पक्ष और उत्तर पक्ष कहते हैं। पश्चिम की ओर साढ़े पाँच हाथ का चबूतरा बनता है, जिसको पुच्छ कहते हैं। इसकी ऊँचाई पाँच हाथ की होती है, अतः इसको पञ्च चितिक स्थण्डिल। इसे बनाने में चौदह तरह की ईंटें लगती हैं, जिसकी लम्बाई, चौड़ाई तथा मोटाई भिन्न-भिन्न माप की होती हैं।

चयन याग के चबूतरे में समस्त इष्टिकायें 11170 होती हैं।

14- अश्वमेध यज्ञ:- इस यज्ञ को करने का अधिकार सार्वभौम, चक्रवर्ती राजा को ही है। इस यज्ञ में दिग्विजय के लिये घोड़ा छोड़ा जाता है। इसका आरम्भ फाल्गुन शुक्ल अष्टमी नवमी या ग्रीष्म ऋतु में होता है। इसमें 21 हाथ के यूप होते हैं। यह दो वर्ष से ऊपर समाप्त होता है।

15- पुरुषमेध यज्ञ:- इस यज्ञ में पुरुष आदि यूप में बाँधकर छोड़ दिये जाते हैं। इसमें 11 यूप होते हैं और 40 दिन में समाप्त होता है। यह यज्ञ करने के बाद वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया जा सकता है।

16- सर्वमेध यज्ञ:- इस यज्ञ में सभी प्रकार के वनस्पतियों और अन्नों का हवन होता है। यह यज्ञ 34 दिन में समाप्त होता है।

17- पितृमेध यज्ञ:- इस यज्ञ में डडडडभृत्पित्रादि का अस्थिदाह होता है। इसमें ऋत्विक् केवल अध्वर्यु होता है। द्विजमात्र को इसे करने का अधिकार प्राप्त है।

18- एकाह यज्ञ:- एक दिन साध्य यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते हैं। जिन यज्ञों में एक सुत्या होता है, ऐसे सोमयाग विश्वजित् सर्वजित् भूष्टोम आदि शताधिक यज्ञ तत्तत्सूत्रों में विहित है। इस यज्ञ में एक यजमान और 16 ऋत्विक् होते हैं।

19- अहीन यज्ञ:- दो सूत्या से लेकर ग्यारह सूत्या को अहीन यज्ञ कहते हैं। ये भी विभिन्न नामों में शताधिक तत्तत्सूत्रों में विहित हैं।

20- बारह से लेकर सोलह तक, अट्ठारह से लेकर तेतीस, पैंतीस से चालीस, उनचास, एकशत तीन सौ साठ, और 100 एक हजार सुत्या वाले जो अनेकों सोमयाग हैं, उन्हें ‘सत्र’ कहते हैं।

श्रौतयज्ञ में सोलह ऋत्विक् होते हैं, जिन के नाम और परिचय ये हैं:-

1. ब्रह्म-यज्ञ कर्म में ऋत्विक् और यजमान के समस्त कार्यों का जो सावधानी से निरीक्षण करता है और प्रायश्चित्तादि का उपदेश करता है; उसे ब्रह्म-यज्ञ कहते हैं।

2. उद्गाता- साम मन्त्र पढ़ कर स्तुति करने वाले को ‘उद्गाता’ कहते हैं।

3. होता- देवताओं को बुलाने वाले को ‘होता’ कहते हैं। (यह ऋग्वेदी होता है।)

4. अध्वर्यु- प्रारम्भ से अन्त तक यज्ञ करने वाले को ‘अध्वर्यु’ कहते हैं। (यह यजुर्वेदी होता है।)

5. ब्राह्मणाच्छंसी- ब्रह्म के सहायक ऋत्विक् को ‘ब्राह्मणाच्छंसी’ कहते हैं।

6. प्रस्तोता:- प्रत्येक सामगान के पाँच भाग होते हैं। उसके प्रथम भाग को ‘प्रस्ताव’ कहते हैं। हम प्रस्ताव को पढ़ने वाले उद्गाता के सहायक ऋत्विक् को ‘प्रस्तोता’ कहते हैं।

7. मैत्रीवरुण (प्रशास्ता):- मित्र वरुण देवता वाले मन्त्रों को पढ़ने वाले होता के सहायक ऋत्विक् को, ‘मैत्रीवरुण’ कहते हैं।

8. प्रतिप्रस्थाता विशेष का यजमान की पत्नी से सम्बन्ध रखने वाले कार्यों के करने वाले अध्वर्यु के सहायक को ‘प्रतिप्रस्थाता’ कहते हैं।

9. पोत:- सोम रस को वस्त्रादि से छानकर पवित्र करने वाले ब्रह्मा के सहायक ऋत्विक् को ‘पोता’ कहते हैं।

10. प्रतिहर्त्ता:- साम के तृतीय भाग के पढ़ने वाले उद्गाता के सहायक ऋत्विक् को ‘प्रतिहर्त्ता’ कहते हैं।

11. अच्छवाक्:- होता के सहायक ऋत्विक् को ‘अच्छवाक्’ कहते हैं।

12. नेष्टा:- ‘अध्वर्यु’ के सहायक ऋत्विक् को ‘नेष्टा’ कहते हैं।

13. अग्नात्:- अग्नि के प्रदीप्त करने वाले ब्रह्म एवं अध्वर्यु के सहायक को ‘अग्नात्’ कहते हैं।

14. सुब्रह्मण्य:- सुब्रह्मण्य नामक ऋषि से इन्द्र देवता की स्तुति करने वाले उद्गाता के सहायक को ‘सुब्रह्मण्य’ कहते हैं।

ग्रावस्तुत्:- होता के सहायक को ‘ग्रावस्तुत’ कहते हैं।

उन्नेता:- यज्ञ पात्रों में सामरस को भरने वाले को उन्नेता कहते हैं।


कुण्डों की रचना एवं भिन्नता का उद्देश्य

(श्री पं. रुद्रदेव त्रिपाठी साहित्याचार्य, बम्बई)

शास्त्रों में यंत्र-तंत्र आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःख की निवृत्ति के लिये अनेक उपाय बतलाये हैं। उनमें प्रधानतया यज्ञ का निर्देश अधिक प्राप्त होता है। ये यज्ञ कई प्रकार के होते हैं। जिनके विषय में अन्यत्र लिखा जा चुका है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि यज्ञ जो हवनात्मक होता है वह कैसे कहाँ किया जाय? तदर्थ शास्त्रों की आज्ञा है कि चतुर डडडडआदि कुण्डों में देवों की प्रसन्नता के निमित्त यज्ञ करना चाहिये। अतएव यहाँ कुण्डों के बारे में सामान्य विवेचन किया जाता है।

“कुण्ड” शब्द पाणिनीय व्याकरण के अनुसार रक्षणार्थक कुडि अथवा मानार्थक कुण धातु से सिद्ध होता है। तथा कोपकार कुण्ड शब्द का अर्थ व्युत्पत्ति और लक्षण से- रक्षा-स्थान, मान-नाप की वस्तु, अभिमुखकारी, दानादि—द्वारा पोषणकर्ता, हवन की अग्नि का निवास स्थान तथा जल का पात्र आदि करते हैं। इनमें से हमें ‘हवन की अग्नि का निवास-स्थान’ अर्थ यहाँ अभिप्रेत है। इस प्रकार कुण्ड में अग्नि के माध्यम से देवता के निकट हवि पहुँचाने की प्रक्रिया को विद्वज्जन यज्ञ करते हैं।

किसी भी कार्य के आरम्भ में वह सविधि सानन्द सम्पन्न हो, इस विचार से उसकी पूर्व भूमिका तैयार की जाती है। और तत्सम्बन्धी सम्पूर्ण सामग्री सुव्यवस्थित की जाती है। इसी प्रकार यज्ञ आरम्भ करने से पूर्व मण्डप-निर्माण होता है। वह कितना लम्बा-चौड़ा हो? इसका निर्णय भी विद्वानों ने ग्रन्थों द्वारा बतला दिया है। जैसे सभागृह में आगन्तुकों के अनुमान से लम्बाई-चौड़ाई का निर्णय होता है, वैसे ही यहाँ आहुति के आधार पर मण्डप की लघुता-दीर्घता का निर्णय होता है। कुण्ड भी मण्डप का अन्योन्याश्रय से अंग है ही। अतः उसका भी निर्माण आहुति के आधार पर अवलम्बित है। तदर्थ—“कुण्डसिद्धि” कार का कथन है कि—

शतर्धेडरत्निः स्याच्छतपरिमितेडरत्नि-विततं, सहस्रे हस्तं स्यादयुतहवने हस्तयुगलम्। चतुर्हस्तं लक्षे प्रयुतहवने पट्करमितं, ककुद्भिर्वा कोटौ नृपकरमपि प्राहुरपरे॥34॥

“पचास अथवा सौ आहुति देनी हो तो कुहनी से कनिष्ठिका तक के माप का कुण्ड बनाने; एक हजार आहुति में एक हस्त प्रमाण का, दस हजार आहुति में दो हस्त प्रमाण का, एक लक्ष आहुति में चार हाथ का, दस लक्ष आहुति में छह हाथ का तथा कोटि आहुति में 8 हाथ का अथवा सोलह हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये।” भविष्योत्तर पुराण में पचास आहुति के लिये मुष्टिमात्र का भी निर्देश है। तथा इस विषय में “शारदातिलक, स्कन्दपुराण आदि का सामान्य मतभेद भी प्राप्त होता है। इसी तरह कुण्डसिद्धिकार ने कुछ विद्वानों के विचार को मान देते हुए यह लिखा है कि—

लक्षैकवृद्धया दशलक्षकान्तं, करैकवृद्धया दशहस्तकंच। कोट्यर्घदिग्विंशतिलक्षलक्ष—दले मुनीष्वर्तुकृशानुहस्तम्॥32॥

“एक लक्ष से दस लक्ष आहुति तक क्रमशः एक हाथ से दस हाथ तक का कुण्ड बनाना चाहिये। अथवा पचास लाख, दस लाख, बीस लाख, एक लाख या पचास हजार आहुति में क्रमशः 7, 5, 6, 3, (1) हाथ का कुण्ड बनाना चाहिये।”

साथ ही विशेष स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि—

वेदाक्षीणि युगाग्नयः शशियुगान्यष्टाब्धयस्त्रीपवोऽष्टाक्षावह्निरसा रसांगकमिता नेर्त्रषयोऽक्षस्वराः।

अडगुल्पोऽथ यवाः खमभ्रमिपवः ख पञ्चषट्सागराः, सप्त भ्रंमुनयस्त्वमीः निगदिता वेदास्रके बाहवः॥36॥

3—कुण्डसिद्धि

एक हस्त के कुण्ड का आयाम-विस्तार 24 अँगुल का, दो हस्त का हो तो 34 अँगुल का, तीन हस्त का हो तो 41 अँगुल और 5 यव का, चार हस्त का हो तो 48 अँगुल का, पाँच हाथ का कुण्ड हो, तो 56 अँगुल और 5 यव, छह हाथ का कुण्ड हो, तो 59 अँगुल और 6 यव, सात हाथ का कुण्ड हो, तो 63 अँगुल और 4 यव, आठ हाथ का कुण्ड हो, तो 66 अँगुल और 7 यव, नव हाथ का कुण्ड हो, तो 72 अँगुल तथा दस हाथ का कुण्ड हो, तो 76 अँगुल और 7 यव के प्रमाण से आयाम विस्तार होना चाहिये। ये चतुरस्र कुण्ड के भुज कहे हैं।

मण्डप के निर्माण में चारों ओर के स्तम्भ, उन के ऊपर छत तथा द्वार, तोरण और ध्वजा आदि के सम्बन्ध में भी शास्त्राज्ञा माननीय है। इसी प्रकार कुण्ड के निर्माण में अंगभूत खात, कंठ, मेखला तथा नाभि का प्रमाण भी आहुति एवं कुण्ड की आकृति के आधार से निश्चित किये जाते हैं। इस कार्य में न्यूनाधिक होने से राग शोक आदि विघ्न आते हैं। अतः केवल सुन्दरता पर ही दृष्टि न रख कर शिल्पी के साथ पूर्ण परिश्रम से शास्त्रानुसार कुण्ड तैयार करवाना चाहिये।

आधुनिक प्रचलित क्रियाओं में निम्नलिखित कुण्डों का उपयोग दृष्टिगोचर होता है:—

इन नौ कुण्डों की आकृतियाँ पीछे देखिये। 4

चतुष्कोण, अर्धचन्द्र, त्रिकोण, वृक्ष, विषमषडस्र, विषम आष्टास्र, पद्म, समषडस्र, सम अष्टास्र और योनिकुण्ड। इनके अतिरिक्त सप्तास्र, पञ्चास्र, धनुर्ज्याकृति, विषमभुज-मृदंगाकार, श्रिदेंल-पद्म, चतुर्दल पद्मकुण्ड के नाम भी प्राप्त होते हैं।

देखो ‘वाचस्पत्य-कोष’ कुण्ड शब्द के अर्थ वाला भाग।

नवग्रह की जो आकृतियाँ शास्त्रों में वर्णित हैं। नवग्रह की आकृतियाँ पीछे देखिये।

उनके अनुसार भी ‘नवग्रह-मख’ करते समय कुण्ड बनाये जा सकते हैं।

तारा भक्ति सुधार्णव के टीका कराने उपर्युक्त चतुरस्रादि कुण्डों की स्थापना का क्रम इस प्रकार बतलाया है—

प्राक् प्रोक्ते मण्डपे विद्वान्, वेदिकाया बहिस्त्रधा।

क्षेत्रं विभज्य मध्याँशे, पूर्वादि परिकल्पयेत्॥ अष्टास्वाशासु कुण्डानि, रम्याकाराण्यनुक्रमात्। चतुरस्र योनिमर्धचन्द्रं त्र्यस्रं सुवर्तुलम्॥ षडसाँ पंकजाकारमष्टास्रं तानि नामतः। आचार्यकुण्डं मध्ये स्याद् गौरीपतिमहेन्द्रयोः॥

आहुति के मान से मण्डप- निर्णय होने के पश्चात वेदिका के बाहर तीन प्रकार से क्षेत्र का विभाग करके मध्यभाग में पूर्व आदि दिशाओं की कल्पना करे। फिर आठों दिशाओं में—

आठ दिशाओं के नाम इस प्रकार हैं—पूर्व अग्नि, दक्षिण, निऋति, पश्चिम, वायव्य, उत्तर तथा ईशन क्रमशः चतुरस्र, योनि, अर्धचन्द्र, त्र्यस्र, वर्तुल, षडस्र, पंकज और अष्टास्रकुण्ड की स्थापना सुचारु रूप से करे। तथा मध्य में आचार्य कुण्ड वृत्ताकार अथवा चतुरस्र बनाये। यह नवकुंडी याग की प्रक्रिया से सम्बद्ध है।

पूर्वापरायतं सूत्रं, हस्तमानं प्रसार्य च। तम्याग्रयोर्मत्स्ययुग्मं, कुर्यात् स्पष्ट यथा भवेत्॥ द्विभागं कृत्य तत्सूत्रं पातयेद् दक्षिणोत्तरम। तदग्रयोर्मत्स्युग्मंकुर्यात् स्पष्टं यथा भवेत्॥ चतुर्दिक्षु चतुसूत्रं, पातयेत् तत्प्रमाणतः चतुरस्रं चतुःकोष्ठ, भवेदति मनोहरग्॥ कोणसूत्रद्वयं दद्यात् प्रमाणं तेन लक्षयेत्। चतुरस्रं भवेत् कुन्डं, सर्व लक्षण लक्षितम्॥

गौतमीयतन्त्र में चतुरस्रकुन्ड निर्माण की विधि स्पष्ट करते हुए लिखा है कि—पहले एक सूत्र एक हाथ-24 अंगुल का लेकर पूर्व से पश्चिम की ओर फैलाकर दो निशान स्पष्ट बनाये। फिर उसी सूत्र के दो भाग करके दक्षिण और उत्तर की ओर फैलाये तथा उसका निशान बनाये। तदनन्तर चारों दिशाओं में सूत्र को नापते हुए प्रमाण युक्त निशान करे जिस से मनोहर चतुरस्र कुण्ड का निर्माण होगा। कोनों में सूत्र का नाप करके प्रमाण ज्ञान करले। जिससे न्यूनाधिक न हो। इस प्रकार सर्व लक्षण चतुरस्रकुण्ड होता है।

इसी तरह 10-कुण्ड की गहराई के लिये शास्त्रकारों का आदेश है कि जितना कुण्ड का विस्तार और आयाम हो उतना गहरा प्रथम मेखला तक करना चाहिये। तथा गहराई चौबीसवें भाग में कुण्ड का निर्माण होना श्रेष्ठ है। 11-मेखला के बारे में विद्वानों का अभिप्राय है कि एक मेखलावाला कुण्ड अधम, दो मेखलावाला मध्यम और तीन मेखला वाला उत्तम होता है। कुछ विद्वान् पाँच 12-मेखला वाले को उत्तम मानते हैं।

सोमशम्भु नामक विद्वान् का मत है कि एक मेखलावाला कुण्ड वैश्य के लिये हितकर है दो वाला क्षत्रिय के लिये सुखद है और तीन मेखलावाला ब्राह्मणों के लिए लाभप्रद है।

इन मेखलाओं में सत्त्व, रजस् और तमस् की भावना से तीनों रंग भरे जाते हैं तथा पांच हो वहाँ पञ्चतत्त्व की भावना से रंग देने का सम्प्रदाय है। इनके निर्माण का गणित भी अविस्मरणीय है।

नाभि-कुण्ड के आकार से बारह अंश ऊपर तथा छः अंश के विस्तार वाली जैसा कुण्ड हो उसके अनुरूप कमल के आकार वाली बनानी चाहिये। 13

योनि- के लिये त्रैलोक्यसार में लिखा है कि—

14- बारह अंगुल चौड़ी, विस्तार से तीन अंश छोटी, मध्यभाग में एक अंगुल ऊपर उठी हुई, कुण्ड में झुकी हुई, अश्वत्थ के पत्र की तरह छिद्र और नाल में युक्त, ऊपर कुछ संकोच वाली तथा मेखला के मध्य में पश्चिम की ओर अथवा दक्षिण में, एक अंगुष्ठ-प्रमाण की मेखला से युक्त, घृत धारण करने में समर्थ ऐसी योनि बनानी चाहिये। योनि कुण्ड में योनि नहीं बनायी जाती है। x15

10-11—देखो—कुण्ड सिधि, शारदातिलक।

12-देखो—क्रियासार, लक्षणसंग्रह।

13—पद्मकुण्ड में नाभि नहीं होती है।

14-दीर्घा सूर्यांगु योनिसत्र्यंशोना विस्तरेण तु। एकांगु लोच्छिता सातु, प्रविष्टाऽभ्यन्तरे तथा॥ कुम्भद्गयार्धसंयुक्ता, चाश्वत्थदलवन्मता। अंगुष्ठमेखला युक्ता, मध्ये त्वाज्यवृतिक्षमा॥

इत्यादि।

x15—वैदिकों को कुंड में योनि गत्तोदि अभिमत है।

सर्वसाधारण कार्यों में प्रायः चतुरस्र अथवा वृत्तकुँड का निर्माण करके कार्य चलाने की पद्धति है। क्योंकि ‘सर्वसिद्धिकर’ कुँड चतुरस्रमुदाहृतम्-चतुरस्र-कुँड सर्व सिद्धि करने वाला है। इसी प्रकार वृत्त कुँड भी शान्ति-पुष्टिकारक है।

कुँड निर्माण का विषय ज्यामिति, मूमिति, क्षेत्रमिति और वातुशास्त्र से अधिक सम्बन्ध रखता है। अतः जिन्हें अधिक इससे रस हो, उन्हें कुँडसिद्धि, भविष्य पुराण, वायु पुराण, अनुष्ठान प्रकाश, पञ्चसार, क्रियासार समुच्चय, शारदातिलक आदि ग्रंथों का पूर्णतया अवलोकन करना चाहिये। एवं कर्मकाँड करते समय साम्प्रदायिक परिपाटी में क्रियाभेद न हो, तदर्थ गुरु के साथ यज्ञादि के समय उपस्थित रहकर प्रत्यक्ष-शिक्षण प्राप्त करना चाहिए। जिससे स्वपर का कल्याण हो, तथा शास्त्रों के प्रति नवीन मस्तिष्क के लोगों की अभिरुचि बढ़े।

कुण्डों की रचना में भिन्नता का उद्देश्य यह है कि काम्यकर्मों की प्रधानता के अनुसार पृथक्-पृथक् आकार वाले भिन्न-भिन्न दिशाओं में कुण्ड बनाने से फलसिद्धि शीघ्र होती है। तदर्थ बहवृच परिशिष्टादि ग्रन्थों की उक्ति है कि—15 भुक्ति, मुक्ति, पुष्टि, जीर्णोद्धार, नित्य हवन तथा शान्ति के लिए पश्चिम दिशा में वृत्ताकार कुँड का निर्माण करना चाहिए। इसी प्रकार दिशाभेद का विशेष स्पष्टीकरण करते हुए अन्य ग्रन्थकारों ने लिखा है कि—

16- स्तम्भन करने के लिये पूर्व दिशा में चतुरस्र, भोगप्राप्ति के लिए अग्निकोण में योनि के आकारवाला मारण के लिए दक्षिण दिशा में अर्धचन्द्र अथवा नैऋत्यकोण में त्रिकोण, शान्ति के लिए पश्चिम में वृत्त, उच्चाटन के लिए वायव्यकोण में षडस्र पौष्टिक कर्म के लिए उत्तर में पद्मकृति और मुक्ति के लिये ईशान में अष्टास्र कुँड हितावह है। इनमें कुछ विशिष्ट कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होते हैं। यथा—

17—पुत्र प्राप्ति के लिए योनिकुँड, भूत प्रेत और ग्रहबाधा-विनाश के लिए पंचास्र अथवा धनुर्ज्यावृति, अभिचारदोष का शमन करने के लिए सप्तास्र इत्यादि।

सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर ऊपर कुँड और यन्त्र का साम्य भी कुछ झलकता है जैसे यंत्र देवता का शरीर भाग जाता है वैसे ही कुँड भी देवता का शरीर ही है ऐसा मान लें तो कोई आपत्ति नहीं।

प्रत्येक कर्म में यथाशक्ति यज्ञ करना ही चाहिये। पर उसमें कुँड ही बनाया जाय, यह आवश्यक नहीं। तदर्थ शास्त्रकारों की आज्ञा है कि—(18) यदि कुँड करने का सामर्थ्य न हो, तो सामान्य हवनादि में विद्वान् चार अंगुल ऊँचा, अथवा एक अँगुल ऊँचा एक हाथ लम्बा चौड़ा सुवर्णाकार-पीली मिट्टी अथवा बालू रेती का सुन्दर स्थण्डिल बनाये।

नित्यं नैमित्तिकं होमं स्थण्डिले वासमाचरेत्”

शारदा तिलक मत से नित्य-नैमित्तिक हवन स्थन्डिल में करना चाहिये।

स्थण्डिल का स्थान

“कुण्डमेव विधंनस्यात् स्थण्डिले वा समाचरेत”

स्थानापन्न स्थंडिल का वही स्थान है, जो कुँड का है।

“तत्स्थानापन्नस्तद्धर्म लभते स्थान धर्माणाँ स्थानान्यति देशः।,’ कुँड स्थापन स्थंडिल भी कुँड स्थान में ही होता है; स्थानान्तर में नहीं।

इसके अतिरिक्त ताम्र के और पीतल के भी यथेच्छ कुँड बाजार मैं प्राप्त होते हैं। उनमें प्रायः ऊपर मुख चौड़ा होता है और नीचे क्रमशः छोटा

15-भुक्तौ मुक्तौ तथा पुष्टौ, जीर्णोद्धारे विशेषतः। सदाँ हौमे तथा शान्तौ, वृत्तं वरुणादिग्गतम्॥

16-ऐन्द्रयाँ स्तम्भे चतुष्कोणमग्नौ भोगे भगाकृति। चन्द्रार्धं मारणे याम्ये, नैऋते हि त्रिकोणकम्॥

वारुण्याँ शान्तिके वृत्तं, षडस्त्युच्चाटनेऽनिले। उदीष्ठयाँ पौष्टिके पद्म, रौद्रयामष्टास्रमुक्तिदम्॥

17-देखो—वाचस्पत्यकोप कुँड शब्द।

18-अथवाऽपि मृदा सुवर्णभासा करमानं चसुरंग लोच्चमल्पे। हवनेविदधीत वांग लोच्चं: विबुध स्थण्डिलमेव वेदकोणम्॥ ॥कुँड सिद्धि॥

होता है। वह भी शास्त्र की दृष्टि से ग्राह्य है। नित्य हवन-बलिवैश्व-देव आदि के लिए अनेक विद्वान इन्हें उपयोग में लेते हैं।

इसका उलटा प्रकार जो मंडल के रूप में कहा जा सकता है। जिसमें नीचे से चौड़ा और ऊपर तक छोटा आकार वाला भी मृत्तिकादि से बनाते हैं। उसमें पाँच या सात मेखला रहती है।

यह सामान्य दिग्दर्शन है।


हवन का व्यक्तिगत अनुभव

(श्रीमती सुशीला देवी मुद्गल, मथुरा।)

अपनी जन्म भूमि पेशावर के आनन्द भरे वातावरण में मेरा बचपन बीता। माँ बाप के दुलार भरे अञ्चल में बालकपन को बिताते हुए और युवावस्था में प्रवेश करते हुए कभी ऐसी कल्पना तक न आई थी कि जीवन के मध्याह्न काल में आपत्तियों के ऐसे पहाड़ टूटेंगे, जिससे जिंदगी का आनन्द तो दूर उसे जीते रहना भी बुरा मालूम पड़े। ईश्वर की लीला और प्रारब्ध का विधान विचित्र है।

देश का बटवारा हुआ। पाकिस्तान अलग हो गया। मेरे आनंदमय जीवन के भी दो टुकड़े हो गये। एक टुकड़ा न जाने कहाँ चला गया। दूसरा टुकड़ा जो दर्द, कराह, बेबसी और बर्बादी से भरा हुआ था वही हमारे हिस्से में आया। भाग्य ने जीवन के खटमिट्ठे अनुभवों को छीन लिया और वह दे दिया जो आज तक चैन नहीं लेने देता। देश के बटवारे ने मेरे जीवन का बटवारा कर दिया। जो मिला सो बहुत ही कडुआ है। उससे सुनने वाले का भी जी दुखता है।

उन दिनों इंसान हैवान बने हुए थे। लगता था अब इंसानियत दुनिया से उठ गई। बेकसूर और बेबस लोग भी गाजर मूली की तरह काटे जा रहे थे। मैं अपनी बच्ची और बच्चे के साथ जान बचाने के लिए अपने साथियों के साथ रावलपिण्डी के रक्षा कैंप में जा रही थी कि रास्ते में कहर टूट पड़ा। गोलियाँ बरसीं। मेरा ढाई वर्ष का मासूम बच्चा गोलियों का निशाना बना, पंख फड़फड़ाते हुए कबूतर की तरह बालक कुछ देर तड़फड़ाया खून के फव्वारों से उससे हमें नहलाया और शाँत हो गया। उस दृश्य की आज भी जब याद आ जाती है तो ऐसा लगता है कि कलेजा कट कट कर मुँह की ओर बाहर को निकलने की कोशिश कर रहा है। अपने इतने प्यारे बच्चों की ऐसी दुर्गति हमने देखी, जैसे किन्हीं अभागों को देखने को मिलती है। जिस समय बालक का प्राण निकला उस समय अन्तर्चीत्कार से मेरा रोम रोम फटा जा रहा है, हजार-हजार बिच्छू नस नस में काट रहे थे, मैं ऐसे समय में मृत्यु से अच्छा वरदान तो क्या माँगती। “हे प्रभु यह नहीं देखा जाता, मुझे उठालो।” यही शब्द मुख से निकल रहे थे।

दयालु प्रभु सच्ची कामना को पूर्ण करने में देर नहीं करते, यह बात सत्य हो गई। दूसरी गोली कड़कड़ाती हुई मेरे सीने में लगी। गोली और छर्रे छाती और पेट के विभिन्न मार्गों में बिखर गये और लगा मानों सिंह अपने बीसियों नाखून से पेट को नोंच कर फाड़ रहा हो। कुछ ही देर में बच्चे का शोक और अपना दर्द शाँत हो गया और बेहोशी ने अपने दामन से मुझे छिपा कर इस तड़पन से बचा दिया।

रावलपिण्डी के अस्पताल में आपरेशन हुआ। गोलियाँ निकाल ली गईं। मौत भी मेरे साथ रहम न कर सकी—दुत्कार कर भाग गई। मैं जिंदा बच गई। रावलपिण्डी से दिल्ली अस्पताल आई। अविन अस्पताल अमेरिकन अस्पताल वर्षों तक भाग्य के साथ बँधा रहा। गोलियों ने शरीर के इतने पुर्जे खराब कर दिये थे कि “आधा मुर्दा” कहा जा सकता था। शरीर का दाहिना भाग बिलकुल काम न करता था। हाथ, पैर, धड़ बेकार था। चारपाई पर ही सारी जीवनचर्या पूरी होती, गुर्दे का दर्द, पेशाब बन्द हो जाना, आँखों की रोशनी कम हो जाना, खून की कमी, नसों की कमजोरी, बेहोशी के दौरे, हड्डी टेड़ी जुड़ जाना, और भी न जाने क्या क्या बलायें पीछे पड़ी थीं, आप्रेशनों और इन्जेक्शनों का ताँता लगा रहता। दिल्ली, आगरा, शिमला, अलीगढ़, मथुरा, वृन्दावन आदि के अस्पतालों में पाँच वर्ष का लम्बा समय से ही व्यतीत हो गया।

तबियत कुछ सुधारी, शरीर काम चलाऊ सहारा देने लगा, अस्पताल छोड़ कर घर आई। फिर भी चैन कहाँ? अनेक रोग पीछे पड़े हुये थे। बेहोशी के दौरे, पेशाब बंद हो जाना, गुर्दे का दर्द, नसों की कमजोरी आदि मुसीबतें पीछे पड़ी हुई थी। इलाज बहुत हो चुका था फिर भी मन न मानता। जिन्दगी बच ही गई तो रोज की तकलीफों से राहत मिले ऐसी चाहत का होना कुछ बेजा नहीं है। मैं भी कुछ रास्ता ढूंढ़ती रहती। दवा दारु के इलाज चलते रहते। साथ ही मेरा मन पूजा पाठ की ओर भी झुका, डाक्टरों की अपेक्षा ईश्वर की ओर देखने की प्रवृत्ति बढ़ने लगी। कहीं अच्छे संत महात्माओं की बात सुनती तो वहाँ किसी प्रकार पहुँचने की कोशिश करती, शायद उनकी दुआ से कुछ फायदा हो।

एक दिन मुझसे शायद किसी पञ्जाबी ने ही कहा कि—“गायत्री तपोभूमि में रोज यज्ञ होता है। तुम वहाँ जाया करो। हवन से बीमारी दूर होती हैं। एक तपेदिक का मरीज वहाँ से अभी ही अच्छा हो कर गया है।” मैं तपोभूमि गई, वहाँ का व्यवहार और कार्यक्रम मुझे बहुत ही भला मालूम हुआ। जब तब हवन में शामिल होने के लिये जाने लगी। पर मेरा ऐसा भरोसा न था कि हवन से कोई बहुत बड़ा लाभ हो सकता है। जेठ के महीने में तपोभूमि में एक बड़ा हवन हुआ। बाहर के भी बहुत आदमी आये। कोटा रियासत में कोई कनवास जगह है वहाँ की एक पागल लड़की अपने पिता के साथ आई। यज्ञ से उसे भारी लाभ हुआ और उसका हालत ठीक हो गई, यह मैंने अपनी आँखों देखा। इसी तरह भाव-नगर (सौराष्ट्र) की एक स्त्री तपोभूमि में ऐसी आई जिसे सात वर्ष से मृगी आती थी और दो औरतें उसे सहारा देकर खड़ी करतीं, चलती। वह भी एक महीना यज्ञ में शामिल रह कर ठीक हो गई। आचार्य जी यज्ञ द्वारा अनेकों दुखियों को बहुत लाभ पहुँचाते हैं- यह बात मैंने सुनी तो अनेकों के मुँह से थी पर यह दो घटनाएं जब मैंने अपने सामने देखीं तो स्वयं भी हवन का लाभ लेने का निश्चय किया।

आचार्य जी से मैंने पूछा—क्या मेरा रोग भी उस कनवास वाली और सौराष्ट वाली स्त्री की तरह दूर हो सकता है उसने उत्तर दिया—कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता क्योंकि यज्ञों की पूर्ण विद्या लुप्त हो गई है। थोड़ी सी जानकारी हमें है उससे किसी लाभ की पक्की गारंटी नहीं की जा सकती पर इतना अवश्य है कि हवन की वायु से शरीर की निरोगता मन की पवित्रता से वृद्धि अवश्य होती है। इस उत्तर से मुझे सन्तोष तो नहीं हुआ फिर भी आजमाने का इरादा कर लिया। तीन महीने तक दोनों समय हवन पर बैठती रही और आचार्य जी के बताये अनुसार जप; अनुष्ठान तथा उपवास करती रही। इन तीन महीनों में मुझे इतना लाभ हुआ है जितने पिछले पाँच वर्षों में अस्पतालों में भी नहीं हुआ था। यों पूर्ण निरोग तो नहीं हूँ पर अस्सी फीसदी लाभ अवश्य हुआ है। बेहोशी के दौरे, पेशाब बन्द होना आदि उपद्रव तो एक दिन भी नहीं हुए। ऐसा दीखता है कि बाकी बीमारी भी जल्दी ही दूर होगी। हवन से इतना लाभ होता है यह देखकर मुझे आश्चर्य होता है।

पिछले जमाने में लोग हवन के जरिए सब रोग दूर कर लेते थे और सब कामनायें पूरी होती थीं यह बात बिलकुल सच मालूम देती है। मैं, मेरे पति और लड़की हम तीनों ही गायत्री तपोभूमि में यज्ञ में शामिल होते रहते हैं और यह कल्पना करके बड़े प्रसन्न होते रहते हैं कि आचार्य जी जब अस्पताल की विधिवत् व्यवस्था कर देंगे तो हमारे जैसे रोग, शोक चिन्ता और दुःख ग्रस्त मनुष्यों का कितना हित होगा। माता वह दिन जल्दी ही लावें।


गायत्री पुस्तकालय स्थापित कीजिए

गायत्री ज्ञान की महाशक्ति है। इस महामंत्र में सद्ज्ञान की सद्बुद्धि की भावना की गई है। गायत्री माता जब प्रसन्न होती हैं तब साधक को ऐसा ज्ञान देती हैं जिससे उसे बड़ी से बड़ी कठिनाइयाँ पार करने का तथा आनन्दमय सफल जीवन व्यतीत करने का मार्ग मिल जाता है। यह मार्ग अन्तःप्रेरणा-सद्बुद्धि-सामयिक सूझ बूझ के द्वारा ही मिलता है। ज्ञान ही गायत्री का वरदान है।

गायत्री उपासना में जहाँ पूजा, उपासना, ध्यान, हवन, अनुष्ठान आदि की आवश्यकता है वहाँ गायत्री महाविद्या की समुचित जानकारी प्राप्त करके उसमें छिपे हुए अत्यन्त महत्वपूर्ण रत्न भंडार को समझ लेना भी आवश्यक है। ज्ञान और कर्म अध्यात्म रस के दो पहिये हैं। दोनों से बिना यह गाड़ी ठीक प्रकार नहीं चल सकती। गायत्री माता का ध्यान करना उनका पूजन करना जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार गायत्री ज्ञान की पुस्तकें पढ़ना तथा उनका स्वाध्याय मनन चिन्तन करना भी आवश्यक है। गायत्री उपासना में गायत्री ज्ञान का, साहित्य का भी प्रमुख स्थान है।

जितना पुण्य ‘गायत्री देवालय को बनाने का है उतना ही पुण्य ‘गायत्री पुस्तकालय’ स्थापित करने का है। गायत्री माता की मूर्ति को देखकर उन्हें प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकता है उसी प्रकार गायत्री साहित्य को पढ़ने से आत्मा में सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा उत्पन्न होती है। गायत्री देवालय बनाना सब के लिए सरल नहीं उसमें हजारों रुपया खर्च करने को तथा पीछे पूजा उपासना के लिए स्थायी खर्च का प्रबन्ध करने की जरूरत पड़ती है। पर गायत्री पुस्तकालय बीस तीस रुपये की छोटी पूँजी से स्थापित हो जाता है। अखंड ज्योति पत्रिका इस पुस्तकालय में सदा आती रहे तो यह 31 वार्षिक का चार आना मासिक पूजा खर्च की इतना है जिसकी व्यवस्था कोई गरीब भी आसानी से कर सकता है।

विशद् गायत्री महायज्ञ के अंतर्गत 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन, 125 हजार ब्रह्मभोज का संकल्प है। साथ ही 1250 गायत्री पुस्तकालय स्थापित करने का भी कार्य किया जाय तो अतीव उत्तम है। जिन गायत्री उपासकों ने इतनी श्रद्धा और निष्ठा पूर्वक इतनी बड़ी साधना पूरी की है वे चाहें तो 1250 गायत्री पुस्तकालय स्थापित करने—जिसका महत्व इतने ही गायत्री देवालय बनवाने से किसी भी प्रकार कम नहीं है—का कार्य भी आसानी से पूरा कर सकते हैं। अधिकाँश गायत्री उपासकों के पास पहले से ही गायत्री साहित्य की बहुत-सी पुस्तकें मौजूद हैं जो कम हों उन्हें अब मंगा कर अपना गायत्री पुस्तकालय पूरा कर सकते हैं। जहाँ ऐसी स्थिति हो कि एक व्यक्ति सब पुस्तकें न मँगा सके वहाँ चार पाँच व्यक्ति मिलकर उन्हें मंगा सकते हैं और मिलजुल कर एक पुस्तकालय चला सकते हैं। जहाँ पूरे पैसों का अभी प्रबन्ध न हो सके वहाँ से आधे पैसे अभी भेज देने पर शेष आधे पैसे की उधार पुस्तकें भी भेजी जा सकती हैं। यह शेष पैसा पूर्णाहुति के समय आने जाने वाले किसी व्यक्ति के हाथों भेजा जा सकता है।

जिस प्रकार घर घर में गायत्री माता के चित्रों की-मूर्तियों की पूजा होने की, जप और हवन होने की आवश्यकता है वैसे ही पुस्तकालयों की स्थापना भी जरूरी है। घर घर, मुहल्ले मुहल्ले, गाँव गाँव गायत्री पुस्तकालय होने चाहिए जिससे उस घर के सभी व्यक्ति, स्त्री पुरुष, बच्चों, रिश्तेदार, कुटुम्बी, मित्र, अतिथि, आगन्तुक आदि संबंधित व्यक्ति अब तथा आगे बीसियों वर्षों तक लाभ उठाते रहें। दूसरे से माँगकर पुस्तकें पढ़लें उससे तत्काल कुछ काम तो चल सकता है पर कई कई बार इन ग्रन्थों के पढ़ने से जो लाभ मिलता है तथा घर में यह सब साहित्य रहने से अनेक व्यक्ति आगे भी लाभ उठाते रह सकते हैं वह बात माँग जाँच कर पुस्तक पढ़ लेने से नहीं हो सकती।

गायत्री पुस्तकालय की स्थापना एक बटडडडडडडडडडडड डडडड के समान श्रेष्ठ कार्य है। इस पुनीत स्थापना को गायत्री देवालय बनवाने से कम महत्व का किसी भी प्रकार नहीं समझना चाहिए। इस प्रयत्न से जिन पढ़ने वालों को प्रेरणा मिलेगी जो साधनारत होंगे—उनका दशाँश पुण्य, इन पुस्तकालयों की स्थापना का प्रयत्न करने वालों को सदैव मिलता रहेगा। क्योंकि शुभ-अशुभ कार्यों में प्रेरणा करने वाले को भी दशाँश पाप पुण्य का भाग मिलता है। इन पुस्तकों से कुछ थोड़ा सा लाभ बचता है वह गायत्री तपोभूमि का खर्च चलने में ही काम आता है। इस प्रकार इन पुस्तकालयों की स्थापना एक प्रकार से गायत्री महायज्ञ की आर्थिक सहायता करना भी है। इस प्रकार सद्ज्ञान प्रसार और तपोभूमि की सहायता का दुहरा पुण्य इस पुनीत प्रयत्न में छिपा हुआ है। 3॥) वाली 5 पुस्तकें 1॥), वाली 2 पुस्तकें 2) वाली 11।=) वाली 12,-)। वाली 8,-) वाले दो तिरंगे चित्र तथा चालीसा इस प्रकार कुल 30 पुस्तकें तथा 2 पूजा उपासना के उपयुक्त चित्र सब मिला कर 27॥=) का होता है। थोड़ी सामर्थ्यवान् व्यक्ति भी अपने घर में यह देवालय स्थापित कर सकते हैं। जिनके पास कई पुस्तकें मौजूद हैं उनके लिए शेष पुस्तकें मंगा लेना कोई बहुत भारी काम नहीं है। कई व्यक्ति मिलकर तो ऐसा पुस्तकालय बड़ी आसानी से स्थापित कर सकते हैं। आधा मूल्य उधार कर सकने की सुविधा से तो आर्थिक कठिनाई वाले प्रसंगों में भी काफी सरलता हो सकती है।

थोड़ा उत्साह हो तो आप थोड़े बहुत ऐसे गायत्री देवालय (पुस्तकालय) स्थापित करने में अवश्य सफल हो सकते हैं। इस दिशा में कुछ प्रयत्न करके गायत्री प्रचार के पुण्य कार्य को अधिक सुदृढ़ बनाने में सहयोग करने के लिए तपोभूमि अपने सभी शुभ चिन्तकों तथा सहयोगियों से आशा करती है।


श्रौत और स्मार्त यज्ञों यज्ञ-पात्र

(श्री पं. दौलत राम जी गौड़, वेदाचार्य, बनारस)

श्रौत-स्मार्त यज्ञों में विविध प्रयोजनों के लिये विभिन्न यज्ञ पात्रों की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार कुँड मंडप आदि को विधि पूर्वक निर्धारित माप के अनुसार बनाया जाता है, उसी प्रकार इन यज्ञ पात्रों को निश्चित वृक्षों के काष्ठ से, निर्धारित माप एवं आकार का बनाया जाता है। विधि पूर्वक बने यज्ञ पात्रों का होना यज्ञ की सफलता के लिये आवश्यक है। नीचे कुछ यज्ञ पात्रों का परिचय दिया जा रहा है। इनका उपयोग विभिन्न यज्ञों में, विभिन्न शाखाओं एवं सूत्र-ग्रन्थों के आधार पर दिया जाता है।

1.अन्तर्धान कहडडडड:—वारण काष्ठ का आध अंगुल मोटा, बारह अंगुल का अर्थ चन्द्राकार पात्र। गार्हपत्य कुँड के ऊपर पत्नी संयाज के समय देव पत्नियों को आढ़ करने के लिए इसका उपयोग होता है।

2. पशु-रशना:—तीन मुख वाली बारह हाथ की पशु बाँधने की रस्सी।

3. मयूख:—गूलर का एक अँगुज मोटा, बारह अँगुल का वत्स-बन्धन के लिये शकु मयूख होता है।

4. वसा हवनी:—पाक भाण्ड स्थित स्नेह-वसा हवन करने का जूहू सदृश घाऊ का स्रुक।

5. वेद:—दर्शपूर्णमासादि में 50 कुशाओं से रचित वेणी सदृश कुशमुष्टि।

6. कर्पूर:—चातुर्मास्यादि यज्ञ में बड़े गर्त्तवाला धान भूँजने का पात्र।

7. अनुष्टुव्धि:—जूहू सदृश पीपल का स्रुक।

8. विष्टुति:—उद्गाता द्वारा साम मन्त्रों की गिनती के लिये, नीचे चतुरस्र ऊपर गोल, दश अँगुल की शलाका।

9. पूर्ण पात्र:—दर्शादि इष्टि में यजमान के मुख धोने के लिये जल रखने की स्मार्त प्रोक्षणी।

10. शराव:—पायस रखने के लिए मृत्तिका का बड़े मुख एवं छोटे गर्त्त वाला पात्र।

11. उशकट:—सोम को रखने के लिए वारण काष्ठ का ढाई हाथ लम्बा त्रिकोण, डेढ़ हाथ चौड़ा दो हाथ ऊँचा शकट, जिसमें एक हाथ ऊँचे दो चक्र हों।

12. परिप्लवा:—कलश से सोमरस निकालने वाला काष्ठ का बना स्रुक, दस अँगुल लंबा हंसमुख सदृश नालीदार पाँच अँगुल गोलाई में बना हुआ।

13. पशुकुम्भी:—पशु श्रवण के लिये तैजस पात्र।

14. मुसंल:—खैर काष्ठ का बना, मध्य में कुछ मोटा दस अँगुल का मूसल।

15. ऋतुग्रह पात्र:—काष्मरी या पीपल का बना प्रोक्षणी पात्र जिसमें हँसमुख सदृश नलिका होती हैं।

16. आज्यरथाली:—घृत गर्म करने का मृण्मय पात्र

17. उपवेष:—अँगारों को दूर करने के लिये वारण काष्ठ का बना हाथ के सदृश पाँच अँगुल बना हुआ दण्ड।

18. स्थली:—सोमरन रब्जे की सरामयी थाली।

19. इडावात्री:— ब्रह्मा, द्दोता, अध्वर्यु, अग्नीत् और यजमान के भाग रखा जाने वाला पात्र।

20. मेक्षण:—चरू इष्टि में इससे चरू का ग्रहण और होम होता है।

21. पृषदाज्य ग्रहणी:—पीपल का स्रुक, जिससे दधि मिश्रित थी ग्रहण किया जाता है।

22. प्रचरणी:—सोम यान में वैकंगत काष्ठ का बना जुहू सदृश स्रुक जिसका होम करने में उपयोग होता है।

23. परशु:—खदिर काष्ठ का बना हुआ परशु।

24. अग्निहोत्र हवणी:—श्रौत अग्निहोत्र में वंककतडडडड काष्ठ का बना, जुहू के सदृश बाहुमात्र लंबा स्रुक।

25. अभ्रि:—वारण काष्ठ की बनी नुकीली अभ्रि का वेदी खनन में उपयोग होता है।

26. दोहन पात्र:—वैकंकत का प्रणाली रहित सदंड प्रोक्षणी पात्र सदृश आकार होता है।

27. दर्वी:—दंड सहित कलछी ही दर्वी है।

28. अधिषवण-फलक:—वारण काष्ठ के बने सोमलता कूटने का एक हाथ लम्बा, बारह अँगुल चौड़ा दो काष्ठ फलक होते हैं।

29. असिद:—कुशा काटने के लिये खैर का छुरा।

30. अन्वाहार्य पात्र:—दर्शपूर्ण-मास में, ब्रह्मा, होता, अध्वर्यु और अग्नीघ्र को दक्षिणा में दिया जाने वाला ओदन जिस पात्र में पकाया जाता है।

31—ग्रावा:- पत्थर का बना सोलह अँगुल का मूसल, जिससे सोम लता कूटी जाती है।

32—उपभृत:- पीपल की जुहू सदृश स्रुक उपभृत होती है।

33—उत्पवन पात्र:- प्रोक्षणी पात्र सदृश होता है।

34—उपाँश सवन:- उपाँश नामक सोमलता को जिस पाषाण से कूटा जाता है।

35—उलूखल:- पलास,खैर, धारण का जानु प्रमाण ऊखल।

36—एक धन:- सोमरस को बढ़ाने वाले जल।

37—मूरशल:- वारण, पलास, खैर का दश अँगुल का मूरशल।

38—जुहू:- श्रौत कर्म में जिस स्रुक से हवन किया जाता है।

39—चमस:- चौकोर प्रणीता पात्र सदृश सोमरस को रखने, होम करने, और पानी के लिये चमस होते हैं। से दस भाँति के होते हैं।

40—यजमानाभिषेका सब्दी:- वाजपेय यज्ञ में यजमान को बैठने के लिये मूञ्ज की बिनी हुई एक हाथ लम्बी चौड़ी चतुष्कोण:- लघु खाट।

41—यूपरशना:- आठ हाथ लम्बी दूनी कुश की रस्सी, यूप में लपेटने के लिये यूपरशना होती है।

42—शृतावदान:- पितृ यज्ञ में पक्व पुरोडाश तोड़ने के लिये विकंकत-काष्ठ का होता है।

43—वूते भृत:- सोम रस धारण करने वाले स्वर्ण या मृण्मय-कलश।

44—पुरोडाश पात्री:- वारण काष्ठ की पुरोडाश के स्थान में प्रयुक्त होने वाली पात्री।

45—पिन्वन:- वारण का स्रुक मुख सदृश बना बिना दंड का पात्र।

46—पान्तेजन कलश:- पशु अंगों को प्रक्षालन करने का जल जिस कलश में रखा जाता है।

47—परिशास:- कलछी मुख के सदृश महावीर पात्र को पकड़ने लायक गूलर के बने पात्र।

48—सन्नहन:- इध्म और वर्हि बाँधने के लिये कुशा की वेण्याकार गूँथी रस्सी।

49—होतृ सदन:- वरना काष्ठ की बनी होता के बैठने की पीठ।

50—सोमा सन्दी:- गूलरकी बनी चार पाँवों वाली मुञ्ज की रस्सी से बीनी हुई सोम रखने के लिए बनी आसन्दी

51—सोम पर्याणहन:- वस्त्र से बन्धे सोम को ढाँकने का वस्त्र।

52—संभरणी:- वारण काष्ठ का बना सोम रखने का कटोरा।

53—शंकु:- गूलर का दश अँगुल लम्बा अग्निष्टोमादि यज्ञ में दीक्षिता पत्नी के कन्डूवनादि में उपयुक्त होने वाला।

54—उदत्रवन:- सोम याग में अम्भृण पात्रों से जल निकालने के लिये मिट्टी का पात्र (पुरवा)

55—उपयमनी:- उदुन्वर की दो हाथ लम्बी, स्रुकी के मुख से दूने मुख की, जुहू सदृश स्रुक।

56—इध्म:- पलाश की एक हाथ लम्बी, सीधी, सुन्दर त्वचा सहित,एक शाखा वाली समिधा।

57—वर्हि:- असंस्कृत तथा असंख्यात कुशा।

58—सम्भरण पात्र:- वाजपेय यज्ञ में हवन किये जाने वाले सत्रह प्रकार के अन्नों को जिस पात्र में रखा जाता है।

59—वाजिन भ्राण्ड:- फटे दूध के द्रव भाग (वाजिन) को जिस भाण्ड में रखा जाता है।

60—उपसर्जनी पात्र:- यजमान के लिये गार्हपत्य अग्नि में जल को इस पात्र में गर्म किया जाता है।

61—रौहिणपाल:- मृत्तिका का वता पकाया पात्र जो रौहिणक पुरोडाश पकाने के लिये बनाया जाता है।

62—योक्त्र:- दर्शपूर्ण मासादि यज्ञ में यजमान पत्नी के कटि प्रदेश में बाँधने के लिये तीन लड़ी, मुञ्ज की बनी वेणी सदृश रस्सी।

63—उद्गात्रासन्दी:- गवामयन यज्ञ में उद्गाता बैठने के एक हाथ लम्बी चौड़ी मुञ्ज से बिनी भीढ।

64—विघन:- पीपल का एक हाथ का शंक।

65—विकंकत शकल:- विकंकत काष्ठ की दश अँगुल समिधा।

66—दंड:- सोमयाग में यजमान तथा मैत्रावरुण के लिये मुख तक लम्बाई का गूलर का बना दंड।

67—दधि धर्म:- प्रर्ग्वयमें दस अंगुल का दधि को ग्रहण तथा हवन के लिये गूलर का बना पात्र।

68—दारुपात्री:- कात्यायनों की इड़ापात्री।

69—धवित्:- मृगचर्म से बना पंखा।

70—धृष्टि—अंगार-भस्मादि हटाने के लिये विकेकत काष्ठ का बना पात्र।

71—कृष्ण विषाणा-कृष्ण मृग का शृंग।

72—वाजिनचभस-फटे दूध के द्रव भाग को रखने का प्रणीता सदृश पात्र।

73—गलप्राही ताँबा या पीतल की एक हाथ की संड़सी।

74—स्रुक-विकंकत काष्ठ का बना बाहु प्रमाण लंबा हवन करने का हंसमुख सदृश चोंचदार पात्र।

75—यूप-खैर का बना लंबा शंकु। इसकी लंबाई भिन्न भिन्न यज्ञों में भिन्न भिन्न रखी जाती है।

76—ग्रह-विकंकत काष्ठ का बना उलूखल सदृश सोमरस तथा होमोपयोगी वस्तु रखने का पात्र।

77—स्फ्य-अग्रवेदी को खोदने रेखा करने के लिये एक हाथ लंबा चार अँगुल चौड़ा खैर काष्ठ का वज्र-दंड।

78—स्रुक—होम करने के लिये खैर काण्ड का बना गोल छिद्र संयुक्त एक हाथ लंबा पात्र।

79—ऋतु पात्र ग्रह कार्ष्मय:—पीपल के प्रोक्षपी पात्र सदृश दोनों तरफ हंसमुख सदृश सोमरस ग्रहण करने का पात्र।

80—प्रोक्षणधानी:- जुहू के सदृश बना स्रुक।

81—शूल—वारण काष्ठ का बना, अभ्रि सदृश शूल होता है।

82—प्राशिब्रहरण:- ब्रह्मा को हुत शेव, इस चार अँगुल लम्बे चौड़े वारण काष्ठ से बने चौकोर पात्र द्वारा दिया जाता है।

83—निश्रेणी:- वाजपेय यज्ञ में सत्रह हाथ यूव से ऊपर जाने के लिये धारण काष्ठ से बनी सीढ़ी।

84—नेत्र:- सन और गौपुच्छ के बालों से बनाई गयी चार हाथ की तीन लड़ वाली गूँथी हुई वेणी।

85—निदान:—सोमयाग में गौ तथा बछड़े को बाँधने के लिये बनी रस्सी।

86—चात्र उपमन्थ:- अरणि मन्थन के लिये आठ अँगुल का बना काष्ठ शंकु।

87—वषाल:- सोमयाग में पलास का दश अँगुल लम्बा एक अँगुल गोल-आर पार छिद्र वाला पात्र विशेष।

88—शभ्या:- दर्शपूर्ण मासादि में सिल लोटी के कुट्टन आदि में प्रयुक्त होने वाला पात्र विशेष।

89—षडवत्तपात्र:- अग्नीघ्र ऋत्विक् को भाग देने के लिये वारण काष्ठ का बना एक विशेष प्रकार का पात्र।

90—सगर्त्तपुरोडाशपात्री:- सर्वहुत पुरोडाश के स्थापन और होमादि में प्रयुक्त होने वाला पात्र।

91—स्वरु:- पशुलला स्पर्श एवं होमादि में प्रयुक्त होने वाला दश अँगुल का खड्गाकार पात्र।

92—स्थूण:- गौ बाँधने के लिये बनी खूँटी।

93—सोमोपनहन:- सोमलता बाँधे जाने वाले दौहरे चौहरे वस्त्र।

94—दृपत उपला:- पुरोडाश के पोषण में प्रयुक्त होने वाले दश अँगुल लम्बे आठ अँगुल चौड़े पाषाण।

95—करम्भ पात्री:- दक्षणाग्नि में पक्व सत्तु तथा दधि रखने का छोटे छोटे गोल पात्र।

96—पञ्चविलापात्री:- कृष्ण यजुर्वेदियों के काम आने वाला पात्र विशेष।

97—पिशीलक:- चातुर्मासान्तर्गत गृहमेधि में उपयोग होने वाला पायस रखने का धातु का बड़े मुख वाला पात्र।

98—परिवेचन घट:- आपस्तम्ब के लिये आधवनीय सदृश कलश।

99—त्रिविला पात्री:- वारण काष्ठ से बना एक विशिष्ट भाँति का बना पात्र।

100—दशा पवित्र:- जीवित भेड़ के ऊनों से बना सोमरस छानने के लिये बना हुआ छन्ना।

101—कूर्च:- सायं-प्रातः अग्निहोत्र के समय स्रुक रखने का वारण काष्ठ से बना पात्र विशेष।

102—ओबिली:- मन्थन दन्ड को दबाने के लिये खैर काष्ठ का बना उपमन्थ।

103-समित्:—पलासादि की दश अँगुल लम्बी सुन्दर अविशाखा लकड़ी।

104-महावीर:—सोमयाग में दीपक रखने के लिये मृत्तिका से बना एक विशिष्ट पात्र।

105—मेखला-यजमान के कटि प्रदेश में बाँधने के लिये चार हाथ की मुञ्ज से वेणी सदृश गुँथी रस्सी।

106—तानूनस्र चमस:- इष्टि के अनन्तर सोलहों ऋत्विक् जिस घृत का स्पर्श कर परस्पर अद्रोह की शपथ लेते हैं उस घी को रखने का पात्र।

107—धर्मासन्दी:- धर्म सम्बन्धी सभी पात्रों को रखने के लिये तीन हाथ ऊँचा गूलर का बना आसन विशेष।

108-ध्रवा—करण काष्ठ का बना जुहू के सदृश बाहुप्रमाण स्रुक, जो यज्ञ के अन्त तक रखी जाती है।

*समाप्त*