(श्री. विद्यावती मिश्र )
क्योंकि ताप के अंतराल में पली यहां पर छाया, टलती निशि के अंधकार ने राग ज्योति का गाया, अगणित बज्रों से निर्मित हिमगिरि की दृढ़ छाती पर— छोटे से पौधे ने अपना है अधिकार जमाया,
माना तुम निर्भय सागर सम, प्रलय वेग से बहते— किन्तु निकट ही तुष्टि दायिनी सरिता भी बहने दो!
वैभव भरे कंठ से कहते हैं प्रासाद कहानी, किन्तु अनसुनी रहे न सूनी कुटियों की भी वाणी, माना सपनों से अनुरंजित तारों की गाथाएं— पर जीवन का कोष छिपाये है धरती अनजानी,
कहने का अधिकार विश्व में सबको एक सदृश है— अपनी बात कहो औरों को भी अपनी कहने दो!
युद्ध, अर्थ-संकट, दलगत संघर्ष स्वार्थ के फल हैं, ऊंच-नीच के भेद भाव से पाती हिंसा बल है, राजनीति मानव-मंगल की चिर-पूजित जननी है— कोई भी अब कह न सकेगा यह विडंबना छल है,
पल भर भी अनन्याय स्वयं पर साथी सहन करो मत— किसी निबल को, किसी सबल का-रोष नहीं सहने दो!
बौद्ध मन्त्र
नम्यो हो रेंगे क्यों।
सत् धम के प्रवर्तक भगवान बुद्ध को नमस्कार करता हूँ। उपनिषत् मन्त्र।
ईशावास्य मिदं सर्य यत्किञ्चिज्जगत्यां जगत्। तेनत्यक्ते नं भुञ्जी य मा गृध्टः कस्यस्विद्धनम्॥
इस जगत में जो कुछ भी जीवन है वह सब ईश्वर का बसाया हुआ है। इसलिए तू ईश्वर के नाम से त्याग करके यथा प्राप्त भोग किया कर, किसी के धन की वासना न कर।
यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवैर्वेदैः सांगषदक्रमोपनिषदैर्गायन्ति यं सामगाः। ध्यानावस्थिततद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो यस्यान्तं न विदुः सुरासुर गण देवाय तस्मै नमः॥
ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र, रुद्र और पवन दिव्यस्तोत्रों से जिनकी स्तुति करते हैं, सामवेद का गान करने वाले मुनि, अंग, पद, क्रम और उपनिषद् सहित वेदों से जिसका स्तवन करते हैं, योगी लोग ध्यानस्थ होकर ब्रह्ममय मन द्वारा जिसका दर्शन करते हैं और सुर तथा असुर जिसकी महिमा का पार नहीं पाते मैं उस परमात्मा को नमस्कार करता हूँ।
गीता, अध्याय 2
अर्जुन उवाच
स्थित प्रज्ञस्य का भाषा समाधिथस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत ब्रजेत किम् ॥ 54 ॥
54—हे केशव! स्थित प्रज्ञ अथवा समाधिस्थ के क्या लक्षण होते हैं? स्थित प्रज्ञ कैसे बोलता, बैठता और चलता है?
श्री भगवानुवाच—
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान्पार्थ मनोगतान। आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थित प्रज्ञस्तदोच्यते ॥ 55 ॥
55—हे पार्थ! जब मनुष्य मन में उठती हुई सभी कामनाओं का त्याग कर देता और आत्मा द्वारा ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है, तब वह स्थित प्रज्ञ कहलाता है।
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतराग भय क्रोधः स्थितघीर्मुनिरुच्यते ॥56॥
56—दुख से जो दुखी न हो, सुख की इच्छा न रखे और राग भय और क्रोध से रहित हों, वह स्थिर-बुद्धि मुनि कहलाता है।
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्। नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥57॥
57—सर्वत्र राग-रहित होकर जो पुरुष शुभ या अशुभ की प्राप्ति में न हर्षित होता है,न शोक करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
यदा संहरते चायं कूर्मोंऽगानीव सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेन्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥58॥
58—कछुआ जैसे सब ओर से अंग समेट लेता है वैसे ही जब यह पुरुष इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हुई कही जाती है।
विषया विनिवर्तंते निराहारस्य देहिनः। रसवर्ज रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते 59॥
59—देहधारी जब निराहार रहता है तब उसके विषयडडडड मन्द पड़ जाते हैं, परन्तु रस नहीं जाता वह रस तो ईश्वर का साक्षत्कार होने से ही शान्त होता है।
डडडड डडडड कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन ॥ 60॥
60—हे कौन्तेय! चतुर पुरुष के उद्योग करते रहते रहने पर भी इन्द्रियाँ ऐसी प्रमथन शील हैं कि वे उसके मन को भी बलात्कार से हर लेती हैं।
तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशेहि यस्येन्द्याणि तस्यप्रज्ञा प्रतिष्टिता ॥ 61॥
61—इन सब इन्द्रियों को वश में रखकर योगी को मुझमें तन्मय हो रहना चाहिये, क्योंकि अपनी इंद्रियाँ जिसके वश में है उसकी बुद्धि स्थिर हैं।
ध्यायते विषयान्पुसः संगस्तेषूप जायते। संगात्संजायते कामः कामक्रोधोऽभि जायते ॥ 62॥
62—विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष को उनमें आसक्ति उत्पन्न होती है, आशक्ति से कामना होती है और कामना से क्रोध उत्पन्न होता है।
क्रोधाद्भवति संमोह, संमोहात्स्मृति विभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ 63॥
63—क्रोध से मूढ़ता उत्पन्न होती है, मूढ़ता से स्मृति भ्रान्त हो जाती है, स्मृति भ्रान्त होने से ज्ञान का नाश हो जाता है, और जिसका ज्ञान नष्ट हो गया वह मृतक तुल्य है।
रागद्वेष वियुल्कैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥64॥
64—परन्तु जिसका मन अपने अधिकार में है और जिसकी इन्द्रियाँ राग-द्वेष रहित होकर उसके वश में रहती हैं, वह मनुष्य इन्द्रियों का व्यापार चलाते हुए भी चित्त की प्रसन्नता प्राप्त करता है।
प्रसादे सर्व दुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्न चेतसोह्यासु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ॥65॥
65—चित्त प्रसन्न रहने से उसके सब दुःख दूर हो जाते हैं। जिसे प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है, उसकी बुद्धि तुरन्त ही स्थिर हो जाती है।
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य नचायुक्तस्य भावना। नचाभावयतः शांतिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥66॥
66—जिसे समत्व नहीं, उसे विवेक नहीं। जिसे विवेक नहीं, उसे भक्ति नहीं और जिसे भक्ति नहीं, उसे शान्ति नहीं हैं। और जहां शान्ति नहीं, वहाँ सुख कहाँ से हो?
इन्द्रियाणां चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ।।67।।
67—विषयों में भटकने वाली इन्द्रियों के पीछे जिसका मन दौड़ता है उसका मन जैसे वायु नौका को जल में खींच ले जाता है, वैसे ही उसकी बुद्धि को जहाँ चाहे वहाँ खींच ले जाता है।
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यः तस्यप्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।।68।।
68—इसलिए हे महाबाहो! जिसकी इन्द्रियाँ चारों ओर से विषयों से निकलकर अपने वश में आ जाती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है।
या निशा सर्व भूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जागृति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनैः ।।69।।
69—जब सब प्राणी सोते रहते हैं, तब संयमी जागता रहता है जब लोग जागते रहते हैं, तब ज्ञानवान् मुनि सोता रहता है।
अपूर्यमाणमचल प्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्। तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्ति माप्नोति न कामकामी ।।70।।
70—नदियों के प्रवेश से भरते रहने पर भी जैसे समुद्र अचल रहता है, वैसे ही जिस मनुष्य में संसार के भोग शान्त हो जाते हैं, वही शान्ति प्राप्त करता, न कि कामना वाला मनुष्य।
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।।71।।
71—सब कामनाओं का त्याग करके जो पुरुष इच्छा, ममता और अहंकार रहित होकर विचरता है, वही शान्ति पाता है।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनांप्राप्यविमुह्यति। स्थित्वा स्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ।।72।।
72—हे पार्थ! ईश्वर को पहचानने वाले की स्थिति ऐसी होती है। उसे पाने पर फिर वह मोह के वश नहीं होता और यदि मृत्यु-काल में भी ऐसी ही स्थिति टिकी रहे तो वह ब्रह्मनिर्वाण पाता है।
एकादश व्रत
अहिंसा सत्यअस्तेय ब्रह्मचर्य असंग्रह। शरीरश्रम अस्वाद सर्वत्र भय वर्जने।।
सर्वधर्मी समानत्व स्वदेशी स्पर्शभावना। ही एकादश सेवावी नम्रत्वे व्रत निश्चयै।।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शारीरिक श्रम, अस्वाद, सब जगह भय का त्याग, सब धर्मों के साथ समान भाव, स्वदेशी धर्म का पालन, स्पर्शास्पर्श भावना का त्याग- इन ग्यारह व्रतों को पालन करने का नम्रतापूर्वक निश्चय करता हूँ।
कुरान की आयत :—
अश्रु जुविल्लाहि प्रिमिनशुशैत्वानिर् रजीम्। बिस्मिल्लाहिर् रहमानिर् रहीम।।
अल्हाल्म्दुलिल्लाहि रब्बिल् आलमील्। अर् रहमानिर् रहीमि मालिकि यौमिद् दीन्। ईथाकनअबुदु व ईयाक नस्त ईन्।।
इह दिनस् सिरा त्वल् मुस्तकीम्। सिरा त्वल् लजीन अन् अम्त अलै हिम्।। गैरिल् मग् द्बूबि अलै हिम् वलद् द्वाल लीन।।
मैं पापात्मा शैतान के हाथों से (अपने को) बचाने के लिए परमात्मा की शरण लेता हूँ। हे प्रभो! तुम्हारे नाम का ही स्मरण करके मैं सारे कामों को आरम्भ करता हूँ। तुम दया के सागर हो, तुम कृपामय हो, तुम अखिल विश्व के पालनहार हो। तुम ही मालिक हो। मैं तुम्हारी ही मदद माँगता हूँ। आखिरी न्याय देने वाले तुम्हीं हो। तुम मुझे सीधा ही रास्ता दिखाओ, उन्हीं का चलने का रास्ता दिखाओ जो तुम्हारी कृपा दृष्टि पाने के काबिल हो गये हैं जो तुम्हारी प्रसन्नता के योग्य ठहरे। जो गलत रास्ते से चले हैं, उनका रास्ता मुझे मत दिखाओ।
ईश्वर एक है, वह सनातन है, वह निरावलम्ब है, वह अज है, अद्वितीय है, सारी सृष्टि को पैदा करता है, उसे किसी ने पैदा नहीं किया।
जरथुश्ती गाथा
मजदा अत मोइबहिश्ता स्रवा ओस्चा श्योचताचा वगोचा! ता—त् वहू मनं घट्टा अशाचा इषु देम स्ततो क्षमाका अथा अहूरा फेरषेम्, वस्ना हहूश्येम् दाओअहूम्
ऐ होरमज्द! सर्वोत्तम धर्म के वचन और कर्म के विषय मुझे बता जिससे में सच्ची राह पर रह सकूँ और तेरी ही महिमा को गा सकूँ। तू अपनी इच्छा के अनुसार मुझे चला। मेरा जीवन चिरनूतन रहे और वह मुझे स्वर्ग-सुख का दान करे।
(श्री देवेन्द्र कुमार जैन, एम. ए.)
संस्कृति मनुष्यों की सामूहिक कृति है, और धर्म व्यक्तिगत। संस्कृति मनुष्य की होती है- पशुओं और देवताओं की नहीं- क्योंकि एक में विवेक नहीं है तो दूसरे में ‘श्रम’। मनुष्य समाज को जन्मकाल से ही विकास के लिए संघर्ष करना पड़ा है और इसी में से उसने सहयोग का मूल्य समझा, शुरू में वह प्रकृति के अधीन था, पर शीघ्र ही इसकी कार्य-कारणता को ठुकरा कर वह भाग्यवादी से प्रयत्नवादी बन गया, फिर उसने शरीर की स्थूल आवश्यकताओं (आहार, निद्रा, भय, मैथुन) की अपेक्षा मानसिक विकास पर जोर दिया, मानव संस्कृति का बीड़ा मनुष्य की इसी विद्रोह वृत्ति में निहित है, भारतीय संस्कृति के इतिहास में भी विकास की यही परम्परा लक्षित की जा सकती है, पर भारतीय संस्कृति और आर्य संस्कृति को एक समझना उसकी परिधि को सीमित कर देना है, जिन आदर्शों के आधार पर भारतीय संस्कृति इतिहास में जीवित रही और जिससे उसने विश्व-मानवता की अनुभूति में योग दिया उन पर भारतीय प्रकृति की छाप स्पष्ट है। यहाँ उल्लेख अप्रासंगिक नहीं होगा।
अनेकता में एकता की अनुभूति बाह्य समागम और आन्तरिक भिन्नता का फल है। भूगोल की दृष्टि से यहाँ की भूमि विषम है, ऋतु पद्धति भी भिन्न है। इस प्राकृतिक भिन्नता के कारण भारतीय जनपदों की चेतना, भाषा और रहन-सहन एक दूसरे से भिन्न हैं। पर यदि हम इस ऊपरी भिन्नता को लाँघ कर कुछ भीतर झाँके तो उनमें गहरी एकता दिखाई देगी। उनकी उपासना जीवन और भाषा में एक ही राष्ट्रीय आत्मा व्याप्त है। विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्त- (ब्रह्मवाद,चेतनवाद, अनात्मवाद) भी इसी अनेकता में एकता की अनुभूति पर जोर देते हैं।
समन्वयशीलता भी विभिन्न दार्शनिक विचारधाराओं और विविध जातियों के निरन्तर निवास के फल स्वरूप उत्पन्न हुई, भारतीय स्वभाव से समन्वयशील रहा है। अशोक ने घोषणा की थी “समवायः एव साधुः”- समन्वय ही अच्छा है। उसकी इस उदार नीति का हर्ष युग तक पालन हुआ। समन्वयशीलता के लिए तीन बातें बहुत आवश्यक हैं, सहिष्णुता, उदारता और संग्रहशीलता। व्यक्ति जब तक दूसरों के प्रति सहनशील नहीं बनता तब तक उसकी दृष्टि उदार नहीं होती, और जो अनुदार है वह दूसरों के प्रति ग्रहणशील न होकर वर्जनशील बनता है, उदाहरण के लिए मध्ययुग में भारतीय समाज दूसरों के प्रति वर्जनशील था, इस प्रकार आदान-प्रदान की धारा सूख जाने से वह पथरा गया। समन्वय का अर्थ दूसरों के साथ लुढ़कना नहीं, किन्तु ले देकर दूसरों को भी साथ ले चलना है। सहिष्णुता से धैर्य आता है, उदारता से जीवन -दृष्टि मिलती है और ग्रहणशीलता से पुष्टि- इन्हीं तीनों की समष्टि का नाम समन्वय है।
आत्मश्रेष्ठता—यह भारतीय संस्कृति की केन्द्रीय भावना है, इसी को आध्यात्मिकता भी कह सकते हैं, पर इसका अर्थ विरक्ति या जीवन से पलायन नहीं है, आत्मश्रेष्ठता का अर्थ है जड़ से आत्मा को ऊँचा समझकर उससे प्रेम करना। पर आत्म-प्रेम के लिए दूसरों से प्रेम करना आवश्यक है। इसी का दूसरा नाम अहिंसा है। आत्मा की उपासना के लिए केवल शरीर-पूजा ही नहीं, किन्तु इन्द्रियनिग्रह संयम और बौद्धिक विराग भी अपेक्षित है। युद्धोन्मुख राष्ट्रीयता के इस युग में यदि विश्व राजनीतिज्ञ विरक्त बुद्धि से समस्याओं पर विचार करना सीख लें तो युद्ध का आतंक बहुत कुछ दूर हो जाय। सामाजिक व्यवस्था तथा अन्य विधि निषेध, इन्हीं आदर्शों को जीवन में उतारने के साधन मात्र हैं, जहाँ तक भारतीय संस्कृति का प्रश्न है, वह दीर्घकालीन साधना और चिंतन की उपज है, मानवता को एक करने की अधिक से अधिक क्षमता उसमें है पर उसके प्रकाश में जब हम समाज का दलित-गलित रूप देखते हैं तो ऐसा लगता है कि कभी इस राष्ट्र के लोक-जीवन में सामूहिक चेतना जग ही नहीं सकती, उसका विगत एक हजार वर्ष का इतिहास पराजय और आपसी घृणा का इतिहास है। वह ऐसी अचल जातों का ढेर है जिनमें न जीवन है और न ही गति। आशा-निराशावाद, हिंसा-अहिंसा और प्रवृत्ति-निवृत्ति की विचारधाराओं से इस साँस्कृतिक पतन का उतना सम्बन्ध नहीं जितना कि सदोष वर्णमूलक समाज व्यवस्था से। इसमें वह विष है जो साझेदारी के भाव को मार देता है और सामूहिक चेतना को कुण्ठित कर देता है। ऊँच-नीच की भावना से एक दूसरे के प्रति घृणा होने लगती है और फिर जातियों में द्वेष की परम्परा चल पड़ती है, जड़-समाज व्यवस्था में ऐहिक दुःख और विषमता से खीज कर, काल्पनिक सुख की खोज में परलोकवाद और मुक्ति की ओर झुकाव स्वाभाविक हो उठता है, मध्ययुग में हमने चारों ओर से अपने को समेट लिया और कछुआ धर्म ही जीवन का आधार बना लिया। हममें से बहुतों को इस बात का सुख और सन्तोष है कि हम जीवित हैं तथा हमारी संस्कृति अमर है, इसमें सन्देह नहीं कि वह अमर है, क्योंकि अमरता मरने के बाद ही मिलती है, हाँ, उसकी स्मृति भारतीय साहित्य और कलाकृतियाँ में अभी भी सुरक्षित है, पर वह जीवित नहीं क्योंकि वह लोक जीवन में नहीं है, भगवान बुद्ध ने अपनी अन्तिम वाणी में कहा था कि ‘संसार की प्रत्येक सत्ता विकासशील है’ (वयधस्मा संखाराः) भारतीय संस्कृति भी इसकी अपवाद नहीं, किसी राष्ट्र के एक बार सुसंस्कृत हो जाने पर भी उसकी सहज वृत्तियों का अभाव नहीं होता, यदि ऐसा हो जाय तो मानव संस्कृति का अंत ही समझिये, जिस प्रकार बार-बार जोते जाने पर भी खेत में तृण उग आते हैं, उसी प्रकार मानव मन में सहज वृत्तियाँ उत्पन्न होती ही रहती हैं, अतएव संस्कृति की साधना निरन्तर चलती रहती है। यह अविराम-गतिशीलता ही उसकी नित्यता और विकासशीलता है, पर भारतीय संस्कृति जितनी महान् और व्यापक है उसकी समाज-व्यवस्था उतनी ही निम्न और संकीर्ण है। हमारी संस्कृति में प्रवाहमान वेगशीलता अब भी है पर समाज व्यवस्था की चट्टान से उसका वेग शतशः रुद्ध है। क्या कभी उसके इस अवरोध का अवरोध सम्भव है?
(श्री. अगरचन्द नाहटा)
सुख और दुःख जीवन के दो विशिष्ट पहलू हैं, जिन पर भारतीय मनीषियों ने बहुत गंभीर चिन्तन किया है। विश्व का कोई भी प्राणी दुःख नहीं चाहता, पर वह मिलता अवश्य है। इसी तरह सभी प्राणी सुख चाहते हैं और निरन्तर उसे पाने के लिए प्रयत्नशील नजर आते हैं, फिर भी सच्चे सुख की अनुभूति विरले महा-पुरुषों के अतिरिक्त और किसी को नहीं आती। यह विश्व का सबसे महान् आश्चर्य है। हमारे विचारक महापुरुषों ने इसी पर तलस्पर्शी गवेषणा की कि सुख एवं दुःख हैं क्या बला और उसकी प्राप्ति-अनुभूति का करण क्या है? उन्होंने इसी एक प्रश्न पर जीवन को समर्पित कर दिया कि समस्त दुःखों के विनाश एवं आनन्द की अनुभूति का मार्ग क्या है? उसकी चिंतनधारा में साँसारिक लोग जिन्हें दुःख या सुख समझते हैं, वह मिथ्या-कल्पनाजन्य प्रतीत हुआ और उससे आगे बढ़कर ऐसे-ऐसे मार्ग, खोज निकाले, जिनके द्वारा इन दोनों से अतीत अवस्था का अनुभव किया जा सके। साधारणतया मनुष्य दुःख एवं सुख का कारण बाहरी वस्तुओं के संयोग एवं वियोग मानता है और इसी गलत धारणा के अनुकूल वस्तुओं व परिस्थितियों को उत्पन्न करने व जुटाने में व प्रतिकूल वस्तुओं को दूर करने में ही लगा रहता है। पर विचारकों ने वह देखा कि वस्तु की प्राप्ति से एक को सुख होता है और दूसरे को दुख। इतना ही नहीं, परिस्थिति की भिन्नता हो तो एक ही वस्तु व बात एक समय में सुख कर प्रतीत होती है और अन्य समय में वही दुखकर अनुभूत होती है। इससे वस्तुओं का संयोग-वियोग ही सुख, दुख का प्रधान कारण नहीं कहा जा सकता और इसी के अनुसन्धान में बाहरी दुःखों एवं सुखों में समभाव रखने का महत्त्व दिया गया। भौतिक विचारधारा आध्यात्मिक भावधारा की भिन्नता यहाँ अत्यन्त स्पष्ट हो जाती है। भौतिक दृष्टिवाला व्यक्ति बाहरी निमित्तों पर जोर देगा तब आध्यात्मिक दृष्टिवाला अपनी आत्मनिष्ठा की ओर बढ़ता चला जायगा। उसकी दृष्टि इतनी सतेज हो जायगी कि बाहरी पर्दे के भीतर क्या है, उसे भली-भाँति देख सके और ऐसा होने पर वह मूल को ही पकड़ने का प्रयत्न करेगा। दृष्टाँत के लिए दो व्यक्ति एक स्थान पर पास-पास में ही बैठे हुए हैं। अचानक कहीं से उनके मस्तक पर पत्थर आ गिरे। इससे भ्राँति में पड़कर एक ने तो पत्थर को दोषी मानकर उसे हाथ में लेकर ऐसा पछाड़ा कि उसके खंड-खंड हो गये। दूसरे ने पत्थर पर रोष न कर वह कहाँ से आया, किसने फेंका, क्यों फेंका इत्यादि पर गम्भीरता से विचार करके और मुख्यतः दोष जिसका हो, ज्ञातकर उसके शोधन में प्रगति की। दोनों व्यक्तियों के यद्यपि पत्थर लगने की क्रिया एक-सी हुई पर दृष्टि की गहराई के भेद से भावों में व फल में रात-दिन का अन्तर हो गया। यही बात बाह्य दृष्टि व अन्तर दृष्टि की है। बाह्य दृष्टि बाहरी वस्तुओं पर दुख, सुख की कल्पना करती है, अन्तर दृष्टि अपनी प्रवृत्तियों व भावनाओं को प्रधानता देती है। इसी दृष्टि-भेद के कारण भोगी को जिसमें आनन्द है, योगी को उसमें नहीं। योगी का त्याग में आनन्द है, भोगी के लिए वह कष्टप्रद है। उपयुक्त विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि हमें अपनी दृष्टि को सही बनाना जरूरी है। तभी हम इस द्वंद्व से अतीत हो समभाव का आनन्द लूट सकेंगे।
इधर प्राणियों से मानव में विचारशक्ति की बड़ी भारी विशेषता है। विचारों से ही हम सुखी होते हैं, विचारों से ही दुखी। विचार की धारा को बदल देने से ही दुःख-सुख की कल्पना बदल जायगी। किसी जमाने में कोई बात बहुत अच्छी समझी जाती थी, पर वही आज अच्छी नहीं समझी जाती और वर्तमान में भी एक ही वस्तु के विषय में सबकी राय में एकता नहीं है। इसका प्रधान कारण विचार-भेद ही है। विचार बदला कि सारा ढांचा बदल गया। अधिक गहराई में नहीं भी जा सकें तो दुख सुख में समभाव रखने के लिये हमारे विचारों को बदलने का एक शब्द मंत्र भी है, जिससे सर्वसाधारण सहज में ही लाभ उठा सकता है। उस चमत्कारी शब्द-मन्त्र की एक कहानी मैंने विदुषी आर्या वल्लभ श्री जी के व्याख्यान में सुनी थी। उसे साभार यहाँ उपस्थित कर रहा हूँ :—
एक बड़े भारी सम्राट थे, जिन्हें प्रतिफल विविध परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था। कभी मन दुख की अनुभूति में और कभी सुख की अनुभूति में हर्ष एवं शोक से डोलायमान बना रहता था। सम्राट ने यह सोचकर कि इस भीषण द्वन्द्व के निवारण का कोई उपाय मिल जाय तो अच्छा अपने विचारक सभासदों व मन्त्रियों के सामने अपने विचार रखते हुए कहा कि इसके निवारण का कोई सरल उपाय बतलाइये, जिससे समय-समय पर हर्ष एवं विषाद से मन आन्दोलित होता है, वह रुक जाय। यह रोग केवल सम्राट को ही नहीं, सभी को था, पर इसके निवारण का उपाय कोई भी नहीं बतला सके। आखिर मन्त्री को आदेश दिया गया था कि तुम्हें इसका रास्ता निकालना पड़ेगा, अन्यथा दंडित किये जाओगे। सम्राट की आज्ञा का पालन दुष्कर था, अतः मन्त्री ने 6 महीने की मुद्दत ली और लगा इधर-उधर पर्यटन में; क्योंकि पहुँचे हुए सिद्ध पुरुष के बिना इसका उपाय मिलना सम्भव न था। घूमते-घूमते अन्त में एक उच्च कोटि के योगी से भेंट हुई, जिन्होंने कहा कि सम्राट को एक ऐसी अंगूठी बना के दो, जिसके बीच में या चारों ओर ‘यह भी चला जायगा’ यह मन्त्र लिखा रहे और सम्राट से कह दो कि जब भी दुःख या सुख हो, अँगूठी में लिखे हुये मंत्र का ध्यान से मनन करे तो हर्ष एवं शोक का द्वन्द्व नहीं हो सकेगा क्योंकि यह दोनों अवस्थायें अस्थायी हैं। किसी के जीवन में सदा एक सी दशा नहीं रहती। दुःख के बाद सुख एवं सुख के बाद दुःख आता रहता है। दोनों ही अल्पकालीन—क्षणस्थायी—हैं, अतः इसमें हर्ष एवं शोक करना व्यर्थ है। इस रहस्य को पा लेने पर मन समभाव को पा लेता है।
कहना नहीं होगा कि मंत्री ने इस चमत्कारी मंत्र-लिखित मुद्रिका को सम्राट को समर्पण किया एवं इसके द्वारा दोनों अवस्था में समभाव रख सकने का सहज उपाय प्राप्त कर सम्राट के आनन्द का पार नहीं रहा।
(श्री कृष्ण जी पाठक ‘जिज्ञासु’ शाहजहाँपुर)
सत्संग का अर्थ है “किसी सच्चरित्र का साथ अथवा संत महात्माओं की गोष्ठी में बैठकर मनोयोग से उनकी अमरवाणी से निकले सदुपदेशों का श्रवण पुनः अनुकूल आचरण करना।” इस छोटे से वाक्य में अलौकिक सुख सौंदर्य के अनेकानेक भाव अन्तर्निहित है। ‘सत्संग’ वास्तव में उस अविरल गति से कल कल स्वर करती हुई प्रवाहित दुग्ध धवल पुण्य सलिला भागीरथी की भाँति है जिसमें एकबार एकाकी भाव से मार्जन अथवा स्नान कर लेने से जन्म जन्मान्तरों के पाप पुंजों का विनाश हो जाता है और आत्मा निर्मल होकर आह्लादित हो उठती हैं।
सत्संग ही वह पुनीत एवं गंभीरतम रत्नाकर है जिसके अंतस्तल में मनसा, वाचा और कर्मणा का विशुद्ध रूप गोचर होता है। इसके तरल-सरल तल में मन वांछित पन्ना, नीलम, पुखराज, सदृश्य मोक्ष रूपी बहुमूल्य रत्न प्राप्त किए जा सकते हैं। यह ऋषियों, मुनियों, साधु एवं संतों का वह अक्षय तथा अशून्य पात्र है जिस पर कुबेर का कोष भी न्यौछावर है। यह वह परम मनोहर आभूषण है जिसको धारण करने से मनुष्य का हृदयस्थ ‘सोऽहम्’ माया मोह के आवरण तिरस्कृत कर झिलमिला उठता है।
मनुष्य अपने जीवन भवन की चरम विकास वाली तथा पारलौकिक सुख से हरी भरी छत पर सत्संग की अनन्त सोपान के द्वारा ही पहुँच सकता है। इसके द्वारा होने वाले कल्याण लाभ को संत, महात्माओं ने पूर्णरूप से विवेचन किया है।
आज का सामाजिक जीवन इतना विषम बन गया है जिसमें दरिद्रता, अभाव, उत्पीड़न और करुणा का ताँडव नर्तन हो रहा है। मनुष्य की अवाँछनीय असीमित इच्छाएं तदनुकूल समस्याएँ वटवृक्ष की सुगुम्फित जटाओं की भाँति इतनी जटिल हो गई है जिनका निराकरण मानव शक्ति से परे है। आज के सामाजिक कल्याणी कहलाने वाले मनुष्य कुसंगति में पड़कर कर्तव्य पथ से भ्रष्ट हो रहे हैं। सत्पुरुषों का साथ उन्हें भाता नहीं, साधु संतों के प्रवचन उन्हें कड़वी औषधि की भांति लगते हैं फलस्वरूप चारों ओर कुत्सित एवं कोलाहल पूर्ण वातावरण उपस्थित है। साधुओं और संतों का साथ तो ‘सर्वभूत हिते रतः’ वाली भावना उत्पन्न कराता है तथा दूसरों के कष्टों के निवारणार्थ आत्मबल प्रदान करता है। जैसा कि कबीरदास जी ने कहा भी है।
“कविरा संगति साधु की हरै और की व्याधि। ओछी संगति क्रूर की आठों पहर उपाधि॥”
आत्म सुख और परम शान्ति के लिये साधु महात्माओं, संतों का सत्संग परमावश्यक है। इसके बिना जीवन का कोई आस्वादन नहीं। इस सत्संग के पुण्य लाभ के निमित्त ही नर देही धारण करने के लिये देवगण भी लालायित रहते हैं।
वेद शास्त्रों में ईश्वरीय साक्षात्कार के निमित्त तीन प्रकार के मार्ग बतलाए गए हैं। ज्ञान, कर्म और भक्ति। इनमें ज्ञान का पथ तलवार की धार की भाँति प्रखर और सर्व साधारण की बुद्धि से परे की बात है। कर्म करने वाला पुरुष जब पाप, पुण्य, उचित अनुचित के संगम पर पहुँचता है तो कदाचित किंकर्तकी विमूढ़ सा हो जाता है। अतएव स्वभक्ति ही एकमात्र साधारण जनों का अटूट सहारा रह जाता है परन्तु इस भक्ति के आनन्द और सुख के उपभोग के लिये प्रथम सत्संगति आवश्यक है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भक्ति सरोवर में स्नान करने के इच्छुक जनों से स्पष्ट शब्दों में कहा—
“जो नहाइ चह यह सर भाई। तौ सत्संग करै मन लाई॥”
वस्तुतः ज्ञान और कर्म, सर्वप्रथम सत्संग से ही अनुप्रेरित होते हैं जिसके लिए प्रभु की अनुकम्पा अपेक्षित है। जैसा कहा गया है कि—
“बिनु सत्संग विवेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥”
सत् पुरुषों के साहचर्य से केवल भगवत् भक्ति की ही प्राप्ति नहीं होती, अपितु पुरुष की अमानुषिक प्रवृत्तियों का भी इससे परिष्कार होता है। तुलसीदास जी कहते हैं।
“शठ सुधरहिं सत्संगति पाई। पारस परसि कुधातु सुहाई॥”
सत्संगति तो पारस मणि के तुल्य है। इसके बिना भगवद् भजन, संकीर्तन यजन, ध्यान, पूजन, अर्चन, वंदन असंभव नहीं तो दुस्तर अवश्य है। गुसाँई जी के शब्दों में—
“बिनु सत्संग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गए बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग॥”
प्रभु के चरणाम्बुजों में प्रेम की दृढ़ता के लिए सत्संग अपेक्षित है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने संत समागम के क्षणमात्र से ही अनेक पापों को मिटना बतलाया है। केवल एक घड़ी में ही—
“एक घड़ी आधी घड़ी और आध की आध। तुलसी संगति साधु की कोटिन हरैं व्याधि॥”
सत्संग की महिमा का उल्लेख करते हुए श्री भर्तृहरि जी ने अपने ‘नीतिशतक’ में लिखा है।
‘जाड्य धियो हरति सिञ्चति वाचि सत्यं मानोन्नति दिशति पाप मया करोति
चेता प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति सत्संगति कथम किम न करोति पुसांम।”
अर्थात् बुद्धि से मूर्खता को हरती, वचनों से सत्यता को सींचती, प्रतिष्ठा का बढ़ाती, पाप को दूर करती, चित्त को प्रसन्न करती, और दसों दिशाओं में कीर्ति को फैलाती है। बताओ तो भला यह सत्संगति मनुष्य को क्या-क्या नहीं करा देती?
तुलसीदास जी ने सत्संगति का सब मंगलों का मूल कहा है।
“सत्संगति मुद मंगल मूला। सोइ फल सिधि सब साधन फूला॥”
यज्ञ, तप, दान, जप और पंचाग्नि तपस्या से जो भक्ति कठिनाई से प्राप्त होती है, वह साधु जनों के सत्संग से सरलतापूर्वक और थोड़े समय में ही प्राप्त की जा सकती है। जिस प्रकार गूँगे को मधुर फल का रसास्वादन अन्दर ही अन्दर मिलता है, ठीक उसी प्रकार भक्तजनों को सत्संग से आनन्द प्राप्त होता है। वह आनन्दानुभूति वाणी द्वारा अभिव्यक्त नहीं की जा सकती। पाठकों एवं श्रोतागणो! हृदय की शान्ति और चिंताओं की मुक्ति के लिए आओ आज से संत समागम के प्रारम्भ का व्रत लें।
(पं. श्रीलालजी रामजी शुक्ल)
मनुष्य के व्यक्तित्व को आकर्षक बनाने वाली यदि कोई वस्तु है, तो वह उदारता है। उदारता प्रेम का परिष्कृत रूप है। प्रेम में कभी-कभी स्वार्थ भावना छिपी रहती है। कामातुर मनुष्य अपनी प्रेयसी से प्रेम करता है, पर जब उसकी प्रेम-वासना की तृप्ति हो जाती है, तो वह उसे भुला देता है। जिस स्त्री से कामी पुरुष उसके यौवन-काल और आरोग्य अवस्था में प्रेम करता है, उसी को वृद्धावस्था में अथवा रुग्णावस्था में तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगता है। पिता का पुत्र के प्रति प्रेम, मित्र का मित्र के प्रति प्रेम तथा देश भक्त का अपने देशवासियों के प्रति प्रेम में स्वार्थ-भाव छिपा रहता है। जब पिता का पुत्र से, भाई का भाई से, मित्र का मित्र से तथा देशभक्त का देशवासियों से किसी प्रकार का स्वार्थ-साधन नहीं होता तो वे अपने प्रियजनों से उदासीन हो जाते हैं। पर जिस प्रेम का आधार उदारता होती है, वह इस प्रकार नष्ट नहीं होता। उदार मनुष्य दूसरों से प्रेम अपने स्वार्थ साधन के हेतु नहीं करता, वरन् उनके कल्याण के लिये ही करता है। उदारता में प्रेम सेवा का रूप धारण करता है। प्रेम का इस प्रकार दैवी रूप प्रकाशित होता है।
उदार मनुष्य दूसरे के दुःख से स्वयं दुखी होता है। उसे अपने दुःख-सुख की उतनी चिन्ता नहीं रहती, जितनी दूसरे के दुःख, सुख की रहती है। भगवान् बुद्ध अपने दुःख की निवृत्ति के हेतु संसार का त्याग कर जंगल में नहीं गये थे वरन् संसार के सभी प्राणियों को दुखों से विमुक्त करने के विचार से राजप्रासाद छोड़ जंगल को गये थे; ऐसे व्यक्ति ही नरश्रेष्ठ कहे जाते हैं।
उदारता से मनुष्य की मानसिक शक्तियों का अद्भुत विकास होता है। जो व्यक्ति अपने कमाये धन का जितना अधिक दान करता है, वह अपने अन्दर और धन कमा सकने का उतना ही अधिक आत्मविश्वास पैदा कर लेता है। सच्चे उदार व्यक्ति को अपनी उदारता के लिये कभी अफसोस नहीं करना पड़ता। उदार व्यक्ति की आत्म-भर्त्सना नहीं होती। सेवा-भाव से किया गया कोई भी कार्य मानसिक दृढ़ता ले आता है। इसके कारण सभी प्रकार के वितर्क मन में उथल-पुथल पैदा न करके शान्त हो जाते हैं। अनुदार व्यक्ति अनेक प्रकार का आगा-पीछा सोचता है, उदार व्यक्ति इस प्रकार का आगा-पीछा नहीं सोचता। भलाई का परिणाम भला ही होता है, चाहे वह किसी व्यक्ति के प्रति क्यों न की जाय। इससे एक ओर भले विचारों का सञ्चार उदारता के पात्र के मन में होता है, और दूसरी ओर अपने विचार भी भले बनते हैं।
प्रकृति का यह अटल नियम है कि कोई भी त्याग व्यर्थ नहीं जाता। जान-बूझकर किया गया त्याग सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति के रूप में अपने ही मन में सञ्चित हो जाता है। वह शक्ति एक प्रामिसरी नोट के समान है, जिसे कभी भी भँजाया जा सकता है। सभी लोगों को भविष्य का सदा भय लगा रहता है। वे इसी चिन्ता में डूबे रहते हैं कि जब वे कुछ काम न कर सकेंगे तो अपने बाल-बच्चों को क्या खिलायेंगे अथवा अपनी आजीविका किस प्रकार चलायेंगे कितने ही लोगों को अपनी शान बनाये रखने की चिन्ताऐं सताती रहती हैं। उदार व्यक्ति को इस प्रकार की चिन्ताऐं नहीं सताती। जब वह गरीब भी रहता है, तब भी वह सुखी रहता है। उसे भावी कष्ट का भय रहता ही नहीं। संसार के अनुदार व्यक्ति जितने काल्पनिक दुःखों से दुःखी रहते हैं, उतने वास्तविक दुःखों से दुःखी नहीं होते। प्रसिद्ध अँग्रेजी नाटककार शेक्सपियर का यह कथन मननयोग्य है कि ‘कायर पुरुष मरने के पहले ही अनेक बार मरता है और वीर पुरुष जीवन में एक बार ही मरता है। वीर पुरुष काल्पनिक मौत का शिकार नहीं होता।’ इसी प्रकार उदार पुरुष के मन में वे अशुभ विचार नहीं आते, जो सामान्य लोगों को सदा पीड़ित किया करते हैं।
यदि कोई मनुष्य अपने-आप गरीबी का अनुभव करता है तो इसकी चिन्ता से मुक्त होने का उपाय धन सञ्चय करने लग जाना है। धन सञ्चय के प्रयत्न से धन का सञ्चय तो हो जाता है, पर मनुष्य धन की चिन्ता से मुक्त नहीं होता। वह धनवान होकर भी निर्धन बना रहता है। जब धन सञ्चित हो जाता है तो उसके मन में अनेक प्रकार के अकारण भय होने लगते हैं। उसे भय हो जाता है कि कहीं उसके सम्बन्धी, मित्र, पड़ोसी आदि ही उसके धन को न हड़प लें और उसके बाल बच्चे उसके मरने के बाद भूखों न मरें। वह अपने अनेक कल्पित शत्रु उत्पन्न कर लेता है, जिनसे रक्षा के वह अनेक प्रकार के उपाय सोचता रहता है। धन-सञ्चय में अधिक लगन हो जाने पर उसके स्वास्थ्य का विनाश हो जाता है। उसकी संतान की शिक्षा भली प्रकार से नहीं होती और वह निकम्मी और चरित्रहीन हो जाती है। इस प्रकार उसका धन-सञ्चय का प्रयास एक ओर उसकी मृत्यु को समीप बुला लेता है और दूसरी ओर धन के विनाश के कारण भी उपस्थित कर देता है अतएव धन सञ्चय का प्रयत्न अन्त में सफल न होकर विफल ही होता है।
जो व्यक्ति गरीबी का अनुभव करता है, उसके लिए अपनी गरीबी की मानसिक स्थिति के विनाश का उपाय अपने से अधिक गरीब लोगों की दशा पर चिन्तन करना और उनके प्रति करुणा भाव का अभ्यास करना ही है। अपने से अधिक गरीब लोगों की धन के द्वारा सेवा करने से अपनी गरीबी का भाव नष्ट हो जाता है। फिर मनुष्य अपने अभाव को न कोसकर अपने आपको भाग्यवान मानने लगता है। उसकी भविष्य की व्यर्थ चिन्ताऐं नष्ट हो जाती हैं। उसमें आत्मविश्वास बढ़ जाता है। इस आत्मविश्वास के कारण उसकी मानसिक शक्ति भी बढ़ जाती है। मनुष्य के संकल्प की सफलता उसकी मानसिक शक्ति के ऊपर निर्भर करती है। अतएव जो व्यक्ति उदार विचार रखता है, उसके संकल्प सफल होते हैं। उसका मन प्रसन्न रहता है। वह सभी प्रकार की परिस्थितियों में शान्त बना रहता है। उसका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है; और वह जिस काम को हाथ में लेता है, उसको पूरा करने में समर्थ होता है। उसकी अकारण मृत्यु भी नहीं होती। दीर्घजीवी होने के कारण उसकी संतान दूसरों की आश्रित नहीं बनती।
जिस व्यक्ति के विचार उदार होते हैं और जो सदा अपने आपको दूसरों की सेवा में लगाये रखता है, उसके आस-पास के लोगों के विचार भी उदार हो जाते हैं। स्वार्थी मनुष्य की संतान निकम्मी ही नहीं वरन् क्रूर भी होती है। ऐसी संतान माता-पिता को ही कष्ट देती है। इसके प्रतिकूल उदार मनुष्य की सन्तान सदा माता पिता को प्रसन्न रखने के काम करती है। जब उदारता के विचार मनुष्य के स्वभाव का अंग बन जाते हैं अर्थात् वे उसके चेतन मन को ही नहीं वरन् अचेतन मन को भी प्रभावित कर देते हैं, तो वे अपना प्रभाव छोटे बच्चों और दूसरे संबन्धियों पर ही डालते हैं। इस प्रकार हम अपने आस पास उदारता का वातावरण बना लेते हैं और इससे हमारे मन में अद्भुत मानसिक शक्ति का विकास होता है।
विद्या के विषय में कहा जाता है कि वह जितनी ही अधिक दूसरों को दी जाती है, उतनी ही अधिक बढ़ती है। देने से किसी वस्तु का बढ़ना—यह विद्या के विषय में ही सत्य नहीं है वरन् धन और सम्मान के विषय में भी सत्य है। युधिष्ठिर महाराज के राजसूय यज्ञ में विदाई और दान का भार दुर्योधन को दिया गया था और श्रीकृष्ण ने स्वयं लोगों के स्वागत का भार लिया था। कहा जाता है कि दुर्योधन को यह कार्य इसलिये सौंपा गया था जिससे कि वह मनमाना धन सभी को दे; पर जितना धन वह विदाई से दूसरों को देता था, उससे चौगुना धन तुरन्त युधिष्ठिर के खजाने में आ जाता था। श्रीकृष्ण सभी अतिथियों का स्वागत करते समय उनका चरण पखारते थे। इसके परिणामस्वरूप उन्होंने अपना सम्मान खोया नहीं, वरन् और भी बढ़ा लिया। जब राजसभा हुई तो एक शिशुपाल को छोड़ सभी राजाओं ने श्रीकृष्ण को ही सर्वोच्च आसन के लिये प्रस्तावित किया। जो अपने मन को जितना दूसरों के हित में लगाता है, वह उसे उतना ही अधिक पाता है और जो अपने मान-अपमान की परवाह नहीं करता, वही संसार में सबसे अधिक सम्मानित होता है।
स्वार्थभाव मन में क्षोभ उत्पन्न करता और उदारता का भाव शील उत्पन्न करता है। यदि हम अपने जीवन की सफलता को आन्तरिक मानसिक अनुभूतियों से मापें तो हम उदार व्यक्ति के जीवन को ही सफल पाएंगे। मनुष्य की स्थायी सम्पत्ति धन, रूप अथवा यश नहीं है; ये सभी नश्वर है। उसकी स्थायी सम्पत्ति उसके विचार ही है। जिस व्यक्ति के मन में जितने अधिक शान्ति, सन्तोष और साम्यभाव लाने वाले विचार आते हैं वह उतना ही अधिक धनी है। उदार विचार मनुष्य की वह सम्पत्ति है, जो उसके लिये आपत्तिकाल में सहायक होती है। अपने उदार विचारों के कारण उसके लिये आपत्तिकाल आपत्ति के रूप में आता ही नहीं, वह सभी परिस्थितियों को अपने अनुकूल देखने लगता है।
उदार मनुष्य के मन में भले विचार अपने आप ही उत्पन्न होते हैं। इन भले विचारों के कारण सभी प्रकार की निराशाएँ नष्ट हो जाती हैं और उदार मनुष्य सदा उत्साह पूर्ण रहता है। उदार मनुष्य आशावादी होता है। निराशावाद और अनुदारता का जिस प्रकार सहयोग है, उसी प्रकार उदारता का सहयोग आशावाद और उत्साह से है। जब मनुष्य अपने आप में किसी प्रकार की निराशा की वृद्धि होते देखे तो उसे समझना चाहिये कि कहीं न कहीं उसके विचारों में उदारता की कमी हो गई है; अतएव इसके प्रतिकारस्वरूप उसे उदार विचारों का अभ्यास करना चाहिये। अपने समीप रहने वाले व्यक्तियों से ही इसका प्रारम्भ करे। यह देखेगा कि थोड़े ही काल में उसके आसपास दूसरे ही प्रकार का वातावरण उत्पन्न हो गया है। उसके मन में फिर आशावादी विचार आने लगेंगे। जैसे-जैसे उसका उदारता का अभ्यास बढ़ेगा, उसका उत्साह भी उसी प्रकार बढ़ता जायगा। इससे यह प्रमाणित होता है कि मनुष्य उदारता से कुछ खोता नहीं, कुछ न कुछ प्राप्त ही करता है।
कितने ही लोग कहा करते हैं कि दूसरे लोग हमारी उदारता से लाभ उठाते हैं। वास्तव में वह उदारता उदारता ही नहीं, जिसके पीछे पश्चात्ताप करना पड़े। स्वार्थवश दिखाई गई उदारता के पीछे ही इस प्रकार का पश्चात्ताप होता है। सच्चे हृदय से दिखाई गई उदारता कभी भी पश्चात्ताप का कारण नहीं होती, उसका परिणाम सदा भला ही होता है। यदि कोई व्यक्ति हमारे उदार स्वभाव से लाभ उठाकर हमें ठगता है तो इससे हमारी नहीं उस ठगने वाले की ही हानि है।
(श्रीमती सुनन्दा)
वैदिक युग को सुवर्णयुग कहा जाता है, जो भारतीय संस्कृति का प्राचीनतम समय है। उस समय संसार का कोई मानव समाज भारतीय जनता से सभ्यता में आगे बढ़ा हुआ नहीं था, बल्कि संसार में अभी सुधार, अन्वेषण एवं मानवता का सूर्य उगने को ही था जो भारत में अपनी पूरी दमक दिखा रहा था। भारत को जगद्गुरु की उपाधि सर्व प्रथम इसी युग के बल से प्राप्त हुई।
वैदिक युग में भारत के सर्वांगीण विकास के कारणों का यदि हम पता लगावें तो मालूम होगा कि उस वक्त स्त्रियों की समान उन्नति यह भी एक प्रमुख कारण था। साधारण रूप में स्त्री-पुरुषों की संख्या समाज में एक समान ही रहती आई। अतः स्त्रियों की उन्नति की उपेक्षा का अर्थ आधे समाज की अवहेलना ही हो सकता है। यही नहीं, बल्कि भावी पुरुषों एवं भावी माताओं का लालन-पालन भी स्त्रियों की गोदी में ही हुआ करता, जिससे उनकी अवनति-उन्नति पर समूचे भावी राष्ट्र का बनना-बिगड़ना निर्भर होता है। मतलब यह कि स्त्रियों की उन्नति के सिवा कोई राष्ट्र कभी अपना सर्वांगीण विकास करने में समर्थ नहीं होता। जिस वैदिक सत्ययुग का हम गौरव-गीत गाते नहीं थकते, उस युग के समाज ने इस सिद्धान्त के महत्व को पूरी तरह जानते हुए समस्त भारतीय स्त्रियों की सर्वांगीण उन्नति को अपना परम आवश्यक कर्तव्य समझ लिया था।
वैदिक युगीन स्त्रियों का स्थान-मान समाज में बहुत ऊँचा था। उन्हें समान स्वतन्त्रता, समान विद्या तथा समान सन्धि दी जाती थी। स्त्रियाँ पुरुषों की भोग सामग्री नहीं, अर्धांगिनी समझी जाती थी, जिनके सिवाय पुरुषों का धर्म कार्य भी अधूरा माना जाता। समाज की सभी प्रकार की उन्नति करने में हाथ बटाने का उन्हें पूरा अधिकार तथा सामर्थ्य प्राप्त था। वैदिक संस्कार और ज्ञान प्राप्त करने का भी उन्हें पूर्णाधिकार था, बल्कि उपनयन संस्कारपूर्वक वे वेदाध्ययन तथा अग्निहोत्र की अधिकारिणी बन जाती थी। इतना ही नहीं, उस युग की ब्रह्मवादिनी स्त्रियाँ ऋषियों के समान ही मन्त्रद्रष्टी ऋषिकाएँ थीं, जिन्होंने स्वयं वैदिक सूक्तों की रचना की। अदिति, रोमशा, अपाला, वाग्देवी, शश्चती, जुहू, दक्षिणा, सूर्या विश्ववारा, लोपामुद्रा, इंद्राणी आदि मन्त्रद्रष्टी देवियों की रचनाएँ आज भी वेदों में निहित है।
उपर्युक्त वैदिक महिलाओं में वेद प्रचारिका ‘घोषा’ का स्थान बहुत ऊँचा है। यह कुक्षिवान मुनि की कन्या थी, जो अपने पिता के ही समान विद्वान तथा विख्यात थी। इसके पिता वैदिक ज्ञान के अच्छे प्रचारक थे। यह भी महिलाओं में प्रचार करती थी। घोषा शब्द का अर्थ ही है ब्रह्मचारिणी कन्या, जो वेदाध्ययन कर ईश्वरी ज्ञान की सर्वत्र घोषणा करे, जिधर उधर प्रचार करे।
घोषा को कोढ़ यानी कुष्ठ (महारोग) की बीमारी थी, जिससे उसके साथ कोई विवाह करना नहीं चाहता था। परन्तु कोढ़ की बीमारी कभी अच्छी नहीं हो सकती, ऐसी गलत धारणा वैदिक समाज में नहीं थी। आर्यों के चिकित्सक वैद्यराज अश्विनी कुमार के प्रयत्नों द्वारा उसका रोग दूर हो गया और एक विचारशील गुणाढ्य युवक ने उससे शादी की। उसे विश्वास था कि कोढ़ का दौर निकल जाने पर खून में कोई खराबी नहीं रह सकती, जिससे कोढ़ियों को घृणा या भय की दृष्टि से देखा जाय।
विवाह होने के उपरान्त भी घोषा ने अपना प्रचार-कार्य जारी रखा। प्राचीनतम ऋग्वेद के दशम मण्डल के 36 तथा 40 वें सूक्तों की दृष्टी ऋषिका यही है, जिनमें कुमारी कन्या के वेदाध्ययन के समय से गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते समय तक के समस्त कर्तव्यों का उल्लेख है। घोषा देवी ने जो सामुदायिक वृत्ति से प्रार्थनाएँ लिखी हैं, उनमें उसके ऊँचे विचारों एवं भावनाओं के दर्शन होते हैं। कुछ प्रार्थनाओं का भावार्थ संक्षेप में निम्न प्रकार है।
“हे प्रभो! आपका जो रथ विचारशील और सुगठित है, जो कर्मशील ज्ञान-विज्ञान सम्पन्न लोगों द्वारा आदर करने योग्य है, वह रात दिन हमारे घर में रहे। इसके लिए हम उपासिकाएँ आपकी श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करती हैं। जो नर-नारी पितृ नाम की तरह समयदेव का आदर करती हैं वे सदा खुशी होती हैं। “हे भगवन्! आप हममें मधुर वचन बोलने की प्रेरणा करें। हमारे कार्यों को पूरा करें। हममें विकासशील बुद्धि उत्पन्न करें। हम उपासिकाएँ सत्य वचन सफल कर्म तथा सर्व समर्थ बुद्धि की कामना करती हैं, आप पूर्ण कीजिये।”
“हे गुरुदेव! आप निष्कपट, असहाय और असमर्थ जीवों के ऐश्वर्य हैं। भूखे, दीन, अन्धे, दुबले पुरुषों के आप रक्षक हैं। आप ही नाना प्रकार के क्लेश एवं दुःखों से पीड़ित रोगियों के बैद्य हैं। आपकी कीर्ति गाथा मैं समाज का सुनाती हूँ। हमें ऐसे उपाय सुझाइए कि हमारे शत्रु भी हमारे प्रति श्रद्धा रखें।
“हे सत्यदेव! मैं वेद की घोषणा और वेद का सन्देश पहुँचाने वाली प्रचारिका हूँ। मैं चारों तरफ घूमकर आपकी ही स्तुति गाती हूँ। विद्वानों से आपके विषय में चर्चा करती हूँ। आप रात-दिन अवश्य मेरे पास रहें और मेरे इन इन्द्रियरूपी घोड़ों से जुते हुए शरीररूपी रथ सहित मनोरूप अश्व का आप दमन करें।
हे नाथ! आपकी कृपा से ऐसा हो कि जब कोई ब्रह्मवादिनी प्रचारिका विवाह की इच्छा करे तब उसे गुणवान, सुन्दर और युवा वर प्राप्त हो। वह कैसा हो? उद्योग के द्वारा जिसके घर में, गेहूँ, जौ आदि विविध प्रकार के अन्न उत्पन्न होते हों, जिसके यहाँ दया, परोपकार आदि गुण ऊपर से गिरने वाली नदी की तरह बहते हों, जो रोग, व्यसन आदि से रहित हों और जिसके मकान में स्नेह, माधुर्य सौंदर्य आदि का वास हो।”
ब्रह्मवादिनी घोषा की जीवनी हमारे नारी समाज को अपनी सर्वांगीण उन्नति करने तथा अपने ज्ञान का सर्वत्र प्रचार करने के लिये प्रेरित करे, यही मैं चाहती हूँ। यदि ऐसी स्त्रियाँ भारत में आज आगे बढ़ने लगी तो भारत शीघ्र ही फिर अपने पूर्व वैभव को प्राप्त हुआ समझना चाहिए।
(दौलतराम कटरहा दमोह)
भगवान को दीन-वत्सल या दीन-दयालु कहा जाता है- इससे प्रकट है कि भगवान का अनुग्रह प्राप्त करने के लिये दीन बनना होगा। किंतु दीन बनने का अर्थ दुखी बनना नहीं है। भगवान दुखी-दयालु नहीं हैं। रामायण में लिखा है—
सहे देव बहु-काल विषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा॥
देवता लोग बहुत काल तक दुख भोगते रहे, पर भगवान उनके लिये प्रकट नहीं हुए। प्रह्लाद ही ने उन्हें प्रकट किया। तो दुखी होने मात्र से ही मनुष्य को भगवान का अनुग्रह नहीं मिल जाता। भगवान का कृपा पात्र होने के लिये तो उनका अनन्य आश्रय ग्रहण करना चाहिये। अनन्य माने और अन्य किसी का नहीं। साधारण लोग दुखी तो रहते हैं और मौके मौके पर भगवान का नाम भी लेते रहते हैं पर अन्य आश्रय भी वे ग्रहण करते हैं। किसी को अपने धन का भरोसा रहता है तो किसी को अपनी विद्या का- कहने का प्रयोजन यह है कि ईश्वरीय विधान पर और उसकी इच्छा पर अवलंबित कोई नहीं रहता। अतएव यदि भगवान का अनुग्रह प्राप्त न हो तो कोई आश्चर्य नहीं।
कहते हैं कि जब तक द्रौपदी सामने बैठे अपने पतियों और भीष्म-पितामह आदि गुरुजनों की ओर सहायता के लिये ताकती रही तब तक उसको ईश्वरीय सहायता नहीं मिली, किन्तु जब वह निराश होकर ईश्वर की शरण गई तो उसकी लाज बच गई। गज भी जब तक अपना बल बर्तता रहा, उसे अपने पुत्र पौत्रों का भरोसा रहा, तब तक उसे ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त नहीं हुआ, पर ज्यों ही सब ओर से निराश होकर उसने ईश्वर का स्मरण किया कि भगवान ने तत्काल ही उसे उबार लिया।
जब लगि गज बल अपनो वरत्यो, नेक सरयो नहिं काम। निर्बल ह्वे बल राम पुकारयो आए आधे नाम॥
तो निर्बल होने पर ही भगवान का अनुग्रह प्राप्त होता है।
निर्बल शब्द यहाँ एक विशेष अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। भगवद्भक्ति मनुष्य को निकम्मा, बुजदिल और बुद्धू बनाने वाली नहीं है। गीता के 12 वें अध्याय में भक्त के जो गुण वर्णित किये गये हैं उससे प्रतीत होता है कि भगवद्भक्त तो परम दुर्लभ देवोपम गुणों से संपन्न होता है। अतएव ‘निर्बल’ शब्द का अर्थ केवल यही समझना चाहिये कि जो संसार की ओर से निराधार या निराश्रय है, जो संसार का आश्रय ग्रहण नहीं करता और सच्चे अर्थ में रामाधार रामाधीन, राम आसरे या राम भरोसे है। नानक जी कहते हैं कि—
आसा मनसा सकल त्यागि कै, जगतें रहे निरासा। काम क्रोध जेहि परसै नांही, तेहि घर ब्रह्म निवासा॥
तो इस पद्याँश में “जगतें रहे निरासा” का अर्थ वही है जो कि ऊपर के पद्याँश में ‘निर्बल’ शब्द का है। तुलसीदास जी एक दोहे में उद्बोधन करते हैं।
तुलसी सबमों निर्बल ह्वै, सबल राम सों होहि। भलो सिखावन देत है निशिदिन तुलसी तोहि॥
तो निर्बलता का अर्थ है सब ओर से आशाएं छोड़ देना, और केवल अपनी आत्म-शक्ति पर अथवा जिसका यह आत्मा अंश माना जाता है उस परमात्मा शक्ति का भरोसा करना।
ऊपर के विवेचन से प्रकट है कि जो ईश्वर का अनन्य आश्रय ग्रहण करता है सच्चे मायने में दीन है, निर्बल है, जो ‘राम शरण’ ‘ईश्वर शरण’ या ‘कृष्ण शरण’ है वही परमात्मा का अनुग्रह भी प्राप्त करता है अतएव जो भगवद्भक्ति प्राप्त करना चाहता है उसे सब ओर से अपनी आशाओं को वैसे ही समेट लेना चाहिये जैसे कछुए भय प्राप्त होने पर अपने अंग समेट लेते हैं। दिनों दिन निराधार बनते हुए हम पूर्ण रूपेण निराधार बन जाएं। तभी भगवद्भक्ति का बीजारोपण होगा। सच्चा संन्यासी धन का आश्रय ग्रहण नहीं करता। वह सुवर्ण का संग्रह नहीं करता और न उसे छूता ही है। पैसा न छूने का अर्थ यही है कि जब धन की आशा की डोर टूट जायगी तो मन बरबस ‘हरि हर शरण’ बन जायेगा। ताना जी ने जब सिंहगढ़ किले पर शिवाजी की प्रेरणा से रात को आक्रमण किया तो किले का रक्षक उदय भानु था जो बड़ा बहादुर-वीर था। कमन्द के सहारे तानाजी के सैनिक किले में घुसे थे। उदयभानु के पराक्रम के आगे कमन्द के सहारे तानाजी के सैनिक वापस भागने लगे। तो यह देखकर सूर्याजी ने कमन्द की रस्सी काट दी और विवश होकर भागने का अवसर ढूँढ़ने वालों को भी वहीं जूझना पड़ा। अन्त में विजय मिली ही- यह इतिहास प्रसिद्ध है। ठीक वैसे ही सब आशारूपी डोरों को काट देने में ही कल्याण है। तूफानी भव-सागर में जीवन नौका को निराधार छोड़ना होगा तभी भक्ति मिलेगी- अन्यथा नहीं।
जीवन नौका को निराधार छोड़ देना बड़ा कठिन प्रतीत होता है, पर यदि मन को थोड़ा पक्का करलें तो यह सरल हो जायगा। मन हमारा हमें डराता है कि यदि निराधार हो जाएंगे तो मिट जाएंगे। आप मिटने भर की हिम्मत कर लीजिए तो कार्य सरल हो जायगा। निराधार बनने से आप मिटेंगे नहीं यह निश्चय है। आप पर जो व्यर्थ का बोझ लदा है और जिसे आप आवश्यक मान रहे हैं वह आप पर से अवश्य उतर जायगा। आप भूखों नहीं मर सकते पर यह अवश्य है कि आपकी शान-शौकत का सामान संभवतया छिन जाय और न भी छिने पर कुछ कम अवश्य हो जायगा और यह कमी आपको बर्दाश्त करनी पड़ेगी। जो हरदम मिटने के लिये तैयार है, जो मृत्यु को सर्वदा आलिंगित किए रहता है उसके लिये यह कमी नाचीज है, अत्यन्त तुच्छ है।
कवियों ने हरि का मार्ग अत्यन्त दुर्गम बताया है—
हरि को मारग अगम है, ठहरें विरलें वीर। पल पल में भाला हनें श्वास श्वास में तीर॥
जब तक मन में वासनाएं है, तब तक हरि का मार्ग सचमुच में अगम है पर जहाँ मन को पक्का किया, मन में मिटने का संकल्प किया, कल्पित और अकल्पित कष्ट और मुसीबतों को झेलने के लिए मन को दृढ़ किया कि न तो फिर भाले लगेंगे और न तीर। कबीर ने कहा है कि “जो घर फूंकै आपनो चलै हमारे संग”। मन में कल्पना करली और उसे इतना दृढ़ बना लिया कि घर हमारे सामने जल रहा है, तो भी हम छाती नहीं पीटेंगे- बस इतना ही करना पर्याप्त है सचमुच में घर में आग लगा देना अभीष्ट नहीं है। कबीर का यह प्रयोजन नहीं कि घर में आग लगा दो और फिर हमारे साथ चलो।
जो अपना सर्वस्व प्रभु को अर्पण करते हैं वे मिट नहीं जाते- यह हमें अच्छी तरह ज्ञात है। केवल भोग्य वस्तुएं ही उनकी घट जाती हैं और वे अकेले अकेले वस्तुओं का उपयोग न कर बाँट कर ही खाते हैं सबके साथ वस्तुओं का उपभोग करते हैं। भगवान की शरण में जाने से आपका अधिकाँश बोझ और भोग खत्म हो जायगा और आपको सबके बराबर हो जाना पड़ेगा।
(श्री सत्यभक्त जी सम्पादक सतयुग)
गतमास में महात्मा बुद्ध की 2500 वीं जयन्ती मनाई गई और संसार के समस्त विद्वान तथा सदाचार प्रिय व्यक्तियों ने उनका गुणगान किया और श्रद्धाँजलि दी। यदि विचार पूर्वक देखा जाय तो महात्मा बुद्ध संसार के सभी धर्मोपदेशकों से अधिक व्यवहारिक प्रतीत होते हैं। इसका एक प्रमाण तो यह है कि इतने वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी उनके उपदेश अपने मूल रूप में स्थिर हैं और करोड़ों लोग उनको सत्य मान कर तदनुसार आचरण करने का प्रयत्न करते हैं। अन्य धर्मोपदेशकों के अनुयाइयों की संख्या भी कम नहीं हैं पर उनके उपदेश बहुत शीघ्र विकृत कर दिये गये और उनमें से कितनों के ही अनुयायी तो सर्वथा उल्टा आचरण करते दिखाई पड़ते हैं। उदाहरण के लिये महात्मा ईसा गरीबों के बड़े पक्षपाती थे और उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि “सुई के नाके में होकर चाहे ऊँट निकल जाय, पर कोई धनवान व्यक्ति स्वर्ग के दरवाजे में होकर भीतर प्रवेश नहीं कर सकता।” पर आज हम देखते हैं कि ईसाई राष्ट्र और व्यक्ति कैपिटेलिज्म (पूँजीवाद) के सबसे बड़े प्रचारक और पोषक हो रहे हैं। दूसरा प्रमाण यह है कि महात्मा बुद्ध ने अहिंसा और सब के प्रति मैत्री भाव का जो मुख्य उपदेश दिया वह आज पूर्ण रूप से सत्य प्रतीत हो रहा है और पंडित नेहरू से लेकर संसार के सभी प्रमुख नेता यह कह रहे हैं कि अगर इस समय किसी उपाय से संसार की रक्षा हो सकती है। तो वह उपाय महात्मा बुद्ध के सिद्धान्तों पर आचरण करना ही है।
वैसे तो बुद्ध धर्म का साहित्य बहुत विशाल है और उनके मुख्य शास्त्र भी हजारों पृष्ठों के हैं, पर वे अधिकाँश में बाद के आचार्यों द्वारा रचित हैं। महात्मा बुद्ध ने स्वयं कोई पुस्तक नहीं रची। वे नित्य प्रति अपने अनुयायियों को जो उपदेश दिया करते थे उनका संकलन ‘धम्म पद’ के नाम से किया गया है यह संकलन भी बुद्ध के देहावसान के 236 वर्ष बाद अशोक के शासन काल में किया गया। इसलिये उसे भी बुद्ध के मुँह से निकले ज्यों के ज्यों शब्द नहीं माना जा सकता। तो भी विद्वानों का विचार है कि उसमें बुद्ध के विचारों का साराँश अवश्य पाया जाता है। हम नीचे उसी से महात्मा बुद्ध के उपदेशों की झाँकी पाठकों को कराने का प्रयत्न करेंगे।
वैर से वैर कभी नहीं जाता। वैर के बदले मित्रता करने से वैर नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य दूसरों द्वारा की बुराइयों का चिन्तन करता रहता है उसका हृदय और वैर भाव से पूरित रहता है। इसलिये यदि कोई तुम्हारे साथ बुराई करे भी तो उसे भूल जाओ, क्योंकि वैर का भाव दूसरे का नहीं अपना ही नाश करने वाला है।”
“पाप और पुण्य दोनों मनुष्य के साथ रहते हैं। पापों से कष्ट होता है और पुण्यों से सुख। पाप पापी को इस प्रकार कष्ट देते हैं जैसे बैलगाड़ी का पहिया बैल को। ज्यों-त्यों बैल भागता है त्यों त्यों बैलगाड़ी का पहिया भी उसके पीछे-पीछे दौड़ता है। इस प्रकार जहाँ कहीं पापी जाता है, वहीं पाप भी उसको दुःख देने के लिये उसके साथ रहता है। पुण्य की उपमा छाया से दी गई है। छाया मनुष्य के साथ तो रहती है पर उसे कष्ट नहीं देती। इसी प्रकार पुण्य मनुष्य के साथ तो रहता है पर उससे पुण्यात्मा व्यक्ति को कोई कष्ट नहीं होता। पापी को इस लोक और परलोक दोनों में कष्ट होता है और पुण्यात्मा दोनों लोकों में सुख पाता है।”
‘केवल उसी पुरुष को संन्यासी होना चाहिये जो सार और असार को समझता है, सत्यप्रिय है और दोषरहित है। केवल गेरुये वस्त्र पहनने से कुछ नहीं होता।
“शान्तिप्रद एक बात हजारों बातों से अच्छी। शान्तिदायक एक गीत हजारों गीतों से अच्छा। अनर्थक सैकड़ों श्लोकों से एक ऐसा धर्म पद अच्छा जिसके सुनने से शान्ति मिलती है। सहस्रों को जीतने की अपेक्षा अपने को जीतना अच्छा। हजारों रुपये खर्च करके सैकड़ों वर्ष तक हवन करने से एक दिन आत्मजित् पुरुष का सत्कार करना अच्छा। दुष्ट मनुष्य के सौ वर्ष के जीवन से सदाचारी का एक दिन का जीवन अच्छा। सौ वर्ष के आलसी और हीन वीर्य जीवन की अपेक्षा एक दिन का दृढ़ कर्मण्यता का जीवन अच्छा। अमृत पद (निर्वाण) को न देखने वाले सौ वर्ष के जीवन से अमृत-पद को देखने वाले एक दिन का जीवन अच्छा। उत्तम धर्म को न देखने वाले सौ वर्ष के जीवन से एक दिन का उत्तम धर्म देखने वाला जीवन अच्छा।”
दण्ड से सब काँपते हैं। मौत से सब डरते हैं। अपनी आत्मा के तुल्य सबको समझकर न किसी को मारो न मरवाओ। सबमें तुम्हारी सी ही जान है इसलिये किसी की हत्या मत करो। जो अपने सुख के लिए दूसरे की हत्या करता है, उसे मृत्यु के पीछे सुख नहीं मिलेगा। किसी से कटु वचन न बोलो क्योंकि वे भी तुमसे उसी प्रकार बोलेंगे और इससे झगड़ा उत्पन्न होगा।”
“जो अपने को दमन नहीं कर सकता, वह दूसरों को वश में नहीं रख सकता। मनुष्य को अन्य से सहायता नहीं मिल सकती, अपने ही किये से काम चलता है। मनुष्य को अपना कर्तव्य स्वयं पालना चाहिये। पवित्रता और मलिनता मन की है। कौन किसको शुद्ध कर सकता है?”
“मनुष्य को बिना कुछ पास हुए भी आनन्द से रहना चाहिये। राग के समान कोई आग नहीं है। द्वेष के समान कोई हराने वाला पासा नहीं है। शरीर के समान कोई दुःख नहीं। शान्ति के समान कोई सुख नहीं।”
“आरोग्य परम लाभ है, सन्तोष परम धन है, विश्वासी पुरुष ही परम बन्धु है, निर्वाण ही परम सुख है।”
“धर्मात्मा वही है जो धर्म-अधर्म का निश्चय कर सके। वह पण्डित नहीं जो बहुत बोले। क्षमाशील, वैर रहित और अभय पुरुष ही पण्डित है। बाल पकने से कोई बड़ा नहीं होता। बड़ा वही है जो सत्य, अहिंसा, संयम, दम आदि का अवलंबन करे। सिर मुड़ाने से कोई श्रमण (संन्यासी) नहीं होता, श्रमण वही है जो पाप रहित हो।”
‘आलसी, समय पर न उठने वाले तथा निर्बल संकल्प वाले को प्रज्ञा (ज्ञान) की प्राप्ति कभी नहीं होती। शुद्धि के लिये तीन मार्ग हैं—काया, वाणी और मन की रक्षा करना। ध्यान से ज्ञान होता है, बिना ध्यान के ज्ञान नहीं हो सकता। वासना के वन को काट डालो। एक भी वृक्ष शेष न रहे, तभी निर्वाण होगा।”
“झूँठ बोलने वाला नरक को जाता है। साधुओं के वस्त्र पहिन कर पाप करने वाला नरक को जाता है। राष्ट्र का धन व्यर्थ में खाने से तो आग में तपाया हुआ लोहे का गोला खा लेना अच्छा है। परस्त्रीगामी को चार चीजें प्राप्त होती हैं- अपुण्य लाभ, कष्ट युक्त शय्या, निन्दा और नरक।”
“बुद्धिमान लोग लोहे, लकड़ी या सन के बन्धन को दृढ़ नहीं कहते। पुत्र, स्त्री, तथा धन का मोह सबसे बड़ा बन्धन है। जो बन्धन खिंच जाय, ढीला पड़ जाय, परन्तु टूटे नहीं वही दृढ़ बन्धन है। ज्ञानी को यही बन्धन तोड़ना चाहिये।”
“जटा, गोत्र या जाति से कोई ब्राह्मण नहीं होता, जिसमें सत्य और धर्म है वही ब्राह्मण है। जो शरीर, वाणी और मन से बुरा काम नहीं करता उसको मैं ब्राह्मण कहता हूँ। मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो निर्धन और बन्धनों से मुक्त है। मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जिसने कुछ अपराध नहीं किया फिर भी गाली, हानि तथा दण्ड को शान्ति पूर्वक सह लेता है। जिसमें शाँति का बल है, जो क्रोध रहित कर्तव्य परायण, शीलवन्त, इच्छा रहित, दमन युक्त और जीवनमुक्त है, मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ। मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जिसने डण्डे को उठाकर रख दिया है, जो स्थावर या जंगम किसी प्राणी को हानि नहीं पहुँचाता और न मारता है। मैं उसको ब्राह्मण कहता हूँ जो सुखों में लिप्त नहीं होता, जैसे पानी में कमल।”
बुद्ध का यही शासन अर्थात् उपदेश है कि “सब पापों से बचो, अच्छे विचार रखो और चित्त को शुद्ध करो। शान्ति ही परम तप है, तितिक्षा ही परम निर्वाण है। दूसरों को हानि पहुँचाने वाला साधु नहीं हो सकता, न दूसरों को मारने वाला श्रमण। किसी की निन्दा न करो, किसी को न मारो, इन्द्रियों को वश में रखो, कम खाओ, एकान्तवास करो और विचारों को शुद्ध रखो।”
(श्री लक्ष्मीनारायण जी बृहस्पति, खंडवा)
हमारे धर्म ग्रन्थों में हर एक देवता अथवा देवी का एक विशेष वाहन बतलाया गया है। जैसे- गणेश जी का वाहन मूषक, सरस्वती का हंस, लक्ष्मी का उलूक, दुर्गा का सिंह आदि।
वाहनों के स्वरूप का आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखने पर हमें धर्म का अत्यन्त ही सूक्ष्म, अद्भुत रहस्य दृष्टिगोचर होता है। इन रहस्यों के प्रकाशित हो जाने पर मनुष्य की आन्तरिक स्थिति इतनी सुदृढ़ हो जाती है कि वह प्रबल से प्रबल झंझावात में भी विचलित नहीं हो पाता।
इस स्थिति के आने तक “धर्म” स्थित रहता है किन्तु धर्म में स्थित हो जाने पर यह धर्म रूपी साध्य उसका साधन बन जाता है तथा उसके मानवी जीवन का वास्तविक प्रारम्भ यहीं से होता है और तब वह परम-पद की प्राप्ति की दिशा में निरन्तर प्रगति करता चलता है।
गणेश जी सिद्धियों के देने वाले, विघ्न-बाधाओं का हरण करने वाले और बुद्धि के देवता माने गये हैं।
गणेश जी का वाहन मूषक है। अथर्ववेद के सायण भाष्य में लिखा है—’मुष्णाति अपहस्ति कर्म फलानि इति मूषकः।’
जीव के कर्म फलों का अपहरण करना ही गणेश जी के वाहन मूषक का प्रमुख कर्तव्य है। जीव और शिव के मिलन में कर्म फल ही मुख्य रूप से बाधक बनते हैं। जब तक कर्म फल शेष है जीव का शिव से मिलन क्यों कर हो सकता है?
गणेश जी और उनके वाहन मूषक पर एक कवि की उक्ति है:—
‘मन मूषक पर गज तन भारी।’
गज के समान विशाल मानव शरीर का वाहन सूक्ष्म मन रूपी मूषक ही है। वाहन की स्वच्छन्दता की स्थिति में वाहनारूढ़ का अस्थिर होना स्वाभाविक है, किन्तु नियन्त्रित कर लिये जाने पर, मन की एकाग्रता हो जाने पर संसार के सभी सुखों की प्राप्ति से लेकर भगवद्-प्राप्ति तक की जा सकती है।
“मन एव मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयोः”
‘मन ही मानव प्राणी के बन्धन और मोक्ष का कारण है।’
इस प्रकार मन रूपी मूषक के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाने पर मनुष्य को अपना आत्मिक-ज्ञान होने में विलम्ब नहीं लगता, कम से कम वह आत्मज्ञान का अधिकारी तो अवश्य हो जाता है। मन रूपी मूषक का असली स्वरूप सामने आते ही उसकी चंचलता पलायमान हो जाती है और उसे बाध्य होकर स्थिर हो जाना पड़ता है तथा स्थिर मन ही संसार की समस्त साधनाओं को सफलीभूत करने का सर्वोपरि साधन है।
सरस्वती विद्या एवं वाणी की अधिष्ठात्री देवी है, सरस्वती का वाहन हंस है। ‘हन्’ धातु से हंस बना है।
नीर-क्षीर-विवेक, दूध का दूध और पानी का पानी कर देना हंस की ही विशेषता है। मानसरोवर में उसका निवास माना गया है। मोती चुगना उसका प्राथमिक कर्तव्य है। पक्षी-श्रेष्ठ के रूप में वह सर्व पूज्य है।
सरस्वती का कृपा पात्र भी जहाँ नीर-क्षीर-विवेकी बन जाता है, वहाँ ब्रह्म और माया से ओत-प्रोत, सने हुए इस संसार में माया और ब्रह्म का पृथक्करण करने में समर्थ हो जाता है और माया रूपी जल का परित्याग कर ब्रह्म रूपी दुग्ध पान कर लेता है तथा ब्रह्म पद को प्राप्त हो जाता है।
वागीश्वरी देवी सरस्वती के वाहन का कितना अद्भुत रहस्य है यह? यही नहीं, सरस्वती का कृपापात्र लोक में अप्रचलित अनेकों आध्यात्मिक रहस्यों का ज्ञाता होकर अपना जीवन सफल कर लेता है, उसका जीवन धन्य-धन्य हो जाता है!
लक्ष्मी को सामान्य दृष्टि से धन धान्य, समृद्धि, ऐश्वर्यादि की अधिष्ठात्री देवी माना गया है किन्तु लक्ष्मी का सर्वोपरि रूप शेष-शय्या पर भगवान विष्णु की अर्द्धांगिनी के रूप में माना गया है।
अतः लोक-भावना के अनुरूप लक्ष्मी का वाहन उलूक आध्यात्मिक दृष्टि से दिवान्धता और मूर्खता का प्रतीक है। साँसारिक-लक्ष्मी के अधिपति उलूकधर्मी होकर आत्म ज्ञान रूपी सूर्य को नहीं देख पाता। सूर्य रूपी प्रकाश पुँज उसे अन्धकार का समूह ही दिखाई देता है। ऐसा व्यक्ति आधिभौतिक सुख को ही अपना सर्वस्व मानकर माया में ही बद्ध रहता है। अतः ऋत् मार्ग, हृदय-केन्द्र में होते हुए भी वह अपने आपको माया रूपी मृग-तृष्णा के पीछे भरमाये रखता है।
दूसरी ओर कमलाक्षी, भगवान-विष्णु की अर्धांगिनी के रूप लक्ष्मी का चिन्तन करने वाला व्यक्ति परम-पावन कल्याणकारी लक्ष्मी को प्राप्त कर भुक्ति और मुक्ति का अधिकारी बन जाता है। उसके अन्तर में शेष-भगवान का स्वरूप प्रगट हो जाता है, उसका जीवन कृतार्थ हो जाता है तथा वह लक्ष्मी के परम धाम को प्राप्त होकर धन्य हो जाता है।
दुर्गा को भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाली, भगवान शिव की शाश्वत शक्ति माना गया है। दुर्गा का उपासक एक ओर शक्तिशाली होकर जहाँ मदान्ध हो जाता है, वहाँ दूसरी ओर अपने जीवत्व का नाश कर शिवत्व को प्राप्त हो जाता है।
दुर्गा का वाहन सिंह है। सिंह जहाँ बल और पौरुष का प्रतीक है वहाँ पशुराज, वनराज आदि के रूप में सर्वमान्य भी है।
सिंह हिंसक प्राणी है। अतः दुर्गा के उपासक में भी बल और पौरुष का उदय होना, सिंहत्व आना स्वाभाविक है। सकाम-साधना से मनुष्य जहाँ अपने शत्रुओं का दमन करने में समर्थ होता है वहाँ वह मदान्ध होते भी देखा गया है। सर्वत्र विजय प्राप्त करने वाले व्यक्ति अहं रहित कम ही पाये जाते हैं। इसीलिये शक्तिशाली अधिकतर पतनोन्मुख हो जाते हैं।
किन्तु निष्काम साधक में आने वाला बल और पौरुष, सिंहत्व, हिंसा का भाव उसके अपने जीवत्व की हिंसा का कारण बन जाता है और उसे शिवत्व प्राप्त हो जाता है। वह जीव से शिव बन जाता है।
भगवान शिव का वाहन वृषराज नंदीश्वर है। वृष शब्द से धर्म का बोध होता है। नंदी का वर्ण श्वेत माना गया है। श्वेत सत्वगुण का सूचक है। नंदीश्वर के चार पैर धर्म के चार स्तम्भ-तप, शौच, दया और दान हैं।
भगवान शिव का चरणामृत पाने के लिये वृष रूपी धर्म को जानना अनिवार्य है। चतुष्पाद-धर्म का पालन करते हुए हमें शिव लोक की प्राप्ति होती है तथा भोलाशंकर के कृपा-पात्र बनकर हमारे लिये ब्रह्म-पद की प्राप्ति सुगम हो जाती है।
भगवान विष्णु, लक्ष्मी के स्वामी और सृष्टि की पालन शक्ति के प्रतीक हैं। ये परम चैतन्य-स्वरूप मुक्ति दाता माने गये हैं। कौस्तुभमणि से विभूषित विष्णु का वाहन गरुड़ है :—
“त्रिवृद् वेदः सुषषस्तु यज्ञं वहित पुरुषम्”
गरुड़ ही वेद है और यज्ञ-पुरुष विष्णु को वहन करता है। दीर्घ-दृष्टि के लिये गरुड़ प्रसिद्ध है। साथ ही उसका भक्ष्य सर्प है। आकाश में दूर तक गमन करने का अद्वितीय सामर्थ्य गरुड़ में पाया जाता है।
गरुड़ धर्मी होकर मनुष्य इस असार संसार की आसक्ति रूप कुटिल सर्प का भक्षण करने में समर्थ हो जाता है। दीर्घ-दृष्टि रूपी अंतर्दृष्टि पाकर वह अपने इष्ट का साक्षात्कार का विष्णु-पद की प्राप्ति कर लेता है।
इस प्रकार गरुड़ रूपी वेद के ज्ञान-कर्म रूपी पंखों का आश्रय लेकर सुदूर आकाश में गगन करने की शक्ति मनुष्य अपने में उत्पन्न कर लेता है, तब भगवान विष्णु उसके हृदयासन पर विराजमान होकर उसको धन्य-धन्य कर देते हैं।
(श्री डा. दमयन्ती देवी दफ्तरी, एम. बी. बी. एस. गोरेगाँव)
आज भौतिक विज्ञान के एवं उसकी प्रक्रियाओं से चमत्कृत संसार जड़वादी संस्कृति की ओर खिंचा जा रहा है, जिस संस्कृति का सार प्रत्यक्ष सुख भोग और उसके उपादान मात्र संग्रह करना है। इन्द्रियों की स्वाभाविक वृत्ति बहिर्मुखी होने के कारण विषयों में जिस भाँति पशु स्वभावतया प्रवृत्त होता है, मनुष्य भी उसी प्रकार उच्छृंखल और मनमानी गति से दौड़ने के लिए आतुर है। इस आतुरता के कारण संघर्ष की उत्पत्ति होती रहती है, जिसकी अग्नि से बचने के लिये चालाक और बलशाली वर्गों ने कुछ नियमों की रचना कर डाली है, जिससे वे बुद्धिहीन और कमजोर लोगों की अपेक्षा अधिक सुविधा से इसका उपभोग कर सके। इन्हीं प्रवृत्तियों एवं क्रियाओं की सीमा में ही भौतिक संस्कृतियों की दौड़ धूप है। इन सुखों को नगण्य क्षण स्थायी और नश्वर मान कर उच्चतर आनन्द के लिये इससे विपरीत चलना इस संस्कृति की दृष्टि में काल्पनिक-विलास मात्र है।
भारतीय संस्कृति में प्रारम्भ से ही इसे गौण स्थान मिला है, जिसका प्रमाण वेद, उपनिषद् एवं शास्त्र है। यहाँ के ऋषियों ने अपनी दिव्य दृष्टि से अनन्त आनन्द, ज्ञान, शक्ति और सत्ता की उपलब्धि कर उसे ही मानव जीवन का लक्ष्य स्थिर किया और इसे पाने के लिये ही सारे भौतिक साधनों का उपयोग करने में उसकी सार्थकता मानी। ये सारी उपलब्धियाँ विषय-जन्य सुखों से ऊपर उठकर ही प्राप्त की जा सकती हैं। इसीलिये जहाँ भौतिक संस्कृति मनुष्यों को सुखी बनने के लिये भौतिक भोग साधनों को संग्रह और परिग्रह करने पर जोर देती है वहाँ भारतीय संस्कृति, संन्यास, त्याग, उत्सर्ग एवं अपरिग्रह के द्वारा ही जीवन को आनन्द मय और कल्याणमय होने का निर्देश और प्रेरणा देती है। श्रद्धा, विश्वास तथा प्रेम ही इसका उपादान है। इन उत्कृष्ट भावों की प्रेरणा से होने वाले सारे सत्कर्म सर्व कल्याण के लिए ही होते हैं। इन्हीं कर्मों में अग्निहोत्र भी एक विशेष कर्म है। ऐसे सारे कर्मों को यहाँ यज्ञ शब्दों के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है।
उक्त उत्कृष्ट भावों, विचारों एवं कर्म की प्रेरणाओं को गायत्री मन्त्र द्वारा आरम्भ में शब्द बद्ध किया गया था और अभी तक इस जोड़ का कोई मन्त्र-श्लोक या काव्य नहीं हुआ, जिनमें ऐसे सम्बद्ध-सुष्ठु और क्रमानुबद्ध थोड़े शब्दों द्वारा उन विशाल-विस्तृत तत्वों का अनुगुम्फन हुआ हो। इसीलिये भारतीय संस्कृति में आज भी गायत्री उपासना और यज्ञ, शीर्ष स्थान पर स्थित हैं। वह नित्य नवीन है। हजारों युगों के बाद भी इसमें कोई मलिनता प्रवेश नहीं कर सकी। इस भौतिक प्रधान युग में भी ये दोनों आध्यात्मिक प्रेरणा देते रहते हैं।
इस विषय सुख प्रधान एवं आत्मानन्द प्रधान संस्कृति में आज भयंकर संघर्ष चल रहे हैं, लगता है जैसे दोनों एक दूसरे को मिटा देने पर तुले हुए हैं। द्वन्द्व को घटाने, मिटाने एवं सामञ्जस्य पूर्ण बनाने के लिये अनेकों मनीषियों ने अनेक पथ बताये हैं, उन्हीं अनेकों में पूज्यपाद श्री आचार्य श्री राम शर्मा जी एक विशेष व्यक्ति हैं, जिन्होंने प्रागैतिहासिक काल के ही उन दो अमर दिव्य और नित्य उज्ज्वल सूत्रों- गायत्री और यज्ञ को पकड़ कर भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का बीड़ा उठाया है और पहाड़ जैसी कठिनाइयों-विरोधी परिस्थितियों के रहते हुए भी साहस और वीरता पूर्वक कदम आगे बढ़ाया है।
भारतीय संस्कृति सदा से ही पक्षपात रहित, न्याय पूर्ण और सत्य की परिपोषिका रही है। उसने मानवता के दोनों अनिवार्य अंगों, नारी और पुरुष दोनों को समान और पूर्ण रूप से सुविधा प्रदान कर विकास करने का सुन्दरता पूर्ण अवसर दिया है। उसने जहाँ याज्ञवल्क्य और शुकदेव जैसा ज्ञानी एवं योगी उत्पन्न किया है, वहाँ सुलभा, वाक् और गार्गी जैसी ज्ञान एवं योग निष्णता नारियाँ भी आविर्भूत किया है। जहाँ जनक जैसा राजा और योगी प्रगट किया है; वहाँ मदालसा जैसी रानी और योगीश्वरी का भी उद्भव किया है। पूज्य आचार्य जी के स्वर में वही संस्कृति आज वाणी एवं कर्म रूपा भागीरथी बनकर फूट पड़ी है। यद्यपि यह महान अवसर दोनों वर्गों के उत्थान की पुण्य घड़ी है, पर मैं समझती हूँ कि नारियों के लिये यह स्वर्णिम नहीं हीरक अवसर है, जिसका सदुपयोग कर वह पुनः अपने पूर्व सुपुनीत स्थान में जाकर अमर भाव से प्रतिष्ठित हो सकती है। भौतिक और वासना-पंकिल संस्कृति ने भारत में भारतीय संस्कृति का नकली चोगा पहन कर कमजोर और बुद्धिहीन वर्गों नारी को—सदा के लिये ही गिरी हुई, हीन और पतित अवस्था में रहने के लिये, बाधित कर दिया था। उन जालों को पतित पावन आचार्यदेव अपनी आत्म शक्ति से छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। उनका यह देश व्यापी विशद गायत्री महायज्ञ, इसी पुनर्प्रतिष्ठा की नींव और भूमिका थी। आगे भी उनकी योजनाऐं नारी को उसका प्राचीन मान और स्थान दिलाने की है। इसीलिये अपनी बहिनों से विशेष रूप से जाग्रत और सचेतन होकर इस अनुपम अवसर का लाभ उठाने के लिये मैं इन साँस्कृतिक पुनरुत्थान की योजनाओं में भाग लेने के लिये इन पंक्तियों द्वारा अविरल प्रार्थना कर रही हूँ।
(पं. राम विलास जी, भारद्वाज आयुर्वेद शास्त्री)
उपनयन संस्कार के बाद वेदारम्भ होता है। वेदारम्भ के शुभारंभ में सर्व प्रथम चारों वेदों की जननी वेदमाता गायत्री की शिक्षा-दीक्षा दी जाती है यही गुरु दीक्षा है। गुरु दीक्षा का सुनिश्चित मंत्र गायत्री ही है। जिसका यज्ञोपवीत हुआ है उसका गुरुमंत्र गायत्री ही है। प्राचीनकाल में छात्र जब गुरु के आश्रम में, गुरुकुल में, शिक्षा प्राप्त करने जाता था तो आचार्य उसे पाशविक जीवन से छुटकारा पाकर मानवीय आदर्शों के अनुकूल जीवन बनाने की शपथ दिलाते थे, जो इस शपथ को नहीं लेता था, उसे शिक्षा का अधिकारी नहीं मानते थे यह शपथ ही द्विजत्व है। यज्ञोपवीत इस शपथ का प्रतीक, प्रमाण पत्र एक स्मरण चिन्ह है।
यज्ञोपवीत गायत्री की प्रतिमूर्ति है। जनेऊ के नौ धागे- गायत्री के नौ शब्द हैं, तीन लड़ें गायत्री के तीन पाद हैं, यज्ञोपवीत की चार ग्रन्थियाँ, गायत्री की लगी हुई तीन व्याहृतियों (भूर्भुवः स्वः) एवं प्रणव ॐ की प्रतीक हैं। इस प्रकार यज्ञोपवीत एवं गायत्री में शब्द और रूप का अन्तर होते हुए भी वस्तुतः एक ही तत्व में दो प्रकार है।
गुरु दीक्षा कोई स्वतंत्र संस्कार नहीं है। गायत्री समेत उपनयन धारण करने को ही गुरु दीक्षा कहते हैं। चूँकि गायत्री केवल शिक्षा मंत्र नहीं- शक्ति मंत्र भी है और शक्ति मंत्र सदा प्राण शक्ति के साथ सम्मिश्रित होकर ही फल प्रद होते हैं। पुस्तक में पढ़कर किसी शक्ति मंत्र को याद कर लिया जाय, तो उसका बहुत थोड़ा लाभ होगा। यदि उस शक्ति मंत्र के साधक विशेषज्ञ वा सिद्ध पुरुष की प्राण शक्ति के समावेश के साथ गुरु मुख से उस मंत्र को लिया जाय तो वह प्राणयोग मन्त्र साधक के लिये सफलता प्रदान करने वाला बन जाता है। इसीलिए प्रायः सभी शक्ति मंत्र गुरु मुख से लिये जाते हैं। वह मंत्र पहले से ही याद हो तो भी उसकी साधना में समुचित प्रगति एवं सफलता की संभावना तभी रहती है जब उसकी विधिवत् दीक्षा ली गई है। ‘राम’ यह दो अक्षर का मंत्र सर्व विदित हैं, फिर भी कबीर को इसे सफल बनाने के लिए इस ‘राम’ मंत्र को श्री स्वामी रामानंद जी से गुरु दीक्षा के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता पड़ी थी।
वेदारंभ एवं उपनयन के समय शास्रोक्त परम्परा के आधार पर गुरु मंत्र के रूप में गायत्री को ही दिया जाना चाहिये। पर आजकल अनेक सम्प्रदायों एवं मत मताँतरों का बोल बाला है। सो अपनी-अपनी मन मर्जी के मंत्रों को भी यज्ञोपवीत के समय कई पंडित देते हुए देखे जाते हैं। उसका कोई शास्त्रीय आधार नहीं है।
प्राचीनकाल में उपनयन और वेदारम्भ कराने वाले ही विद्वान होते थे जो वेदों के निष्णात एवं तपस्या के धनी बनने के उपरान्त गुरु मंत्र चलाने के अधिकारी बन जाते थे। कथा आती है कि गायत्री को वशिष्ठ और विश्वामित्र का शाप लगा हुआ है। शाप मोचन किए बिना गायत्री सफल नहीं होती। इस कथन का रहस्य यह है कि इस महामन्त्र के तत्वदर्शी-वशिष्ठ, श्रेणी के-एवं आत्मा को तपोवृत करके स्वार्थ परायणता की सीमा को तोड़ देते हैं और स्वमित्र ही न रहकर विश्वमित्र श्रेणी में प्रतिष्ठित हो जाते हैं ऐसे सत्पुरुष ही गायत्री मंत्र की दीक्षा देने के अधिकारी हैं। उन्हीं में इतना प्राण होता है कि शिष्य की अन्तरात्मा के गहन प्रदेश तक उस मंत्र की शक्ति को प्रतिष्ठित कर सकें। ऐसा अवसर जिन्हें प्राप्त नहीं होता उनकी साधना वैसी सफल नहीं होती जैसी होनी चाहिए और जिन्हें ऐसे संयोग, सुअवसर मिल जाते हैं, उनकी सफलता का मार्ग सरल हो जाता है। वशिष्ठ और विश्वामित्र का शाप लगने और उसका उत्कीलन करने पर मंत्र सिद्ध होने की आख्यायिका का यही अलंकारिक रहस्य है। अन्यथा चारों वेदों की जननी को भला कोई क्यों शाप देगा और शाप देने की हिम्मत भी करेगा तो इतनी प्रचंड शक्ति के समीप जाते जाते उस शाप की वही दुर्गति हो जायगी जो प्रचण्ड दावानल के निकट जाने पर एक तुच्छ तिनके की होती है।
यज्ञोपवीत संस्कार का कर्मकाण्ड और विधान कोई भी पण्डित करा सकता है। वह सरल है। उपयुक्त विश्वामित्र-वशिष्ठ गुण सम्पन्न आचार्य के अभाव में गायत्री मंत्र भी दे सकता है, पर वह वस्तुतः एक चिह्न पूजा है। विद्याध्ययन के लिये काशी गमन और गुरुकुल के लिये भिक्षा माँगने जैसे महान कार्यों का वास्तविक महत्व एवं लाभ उन कार्यों को वास्तविक रूप से ही करने में है पर जब वह सब नहीं बन पड़ता तो उस कल्याणमयी परम्परा का चिह्न पूजा के रूप में स्मरण रखने के लिये यज्ञोपवीत संस्कार के समय काशीगमन, ब्रह्मचर्य धारण, गुरुकुल प्रवेश, भिक्षाटन आदि की लकीर पीट लेते हैं, उसी प्रकार आदर्श मन्त्र निष्णात, विश्वामित्र-वशिष्ठ तत्वों से सुसम्पन्न गुरु न मिलने पर किसी से भी, यज्ञोपवीत कराने वाले पण्डित से भी गायत्री मन्त्र लिया जा सकता है किन्तु जिस प्रकार यज्ञोपवीत के समय गुरुकुल प्रवेश का अवसर न मिलने पर भविष्य में गुरुकुल प्रवेश का सुअवसर आने पर उसे ग्रहण करने का कोई प्रतिबंध नहीं है, उसी प्रकार यज्ञोपवीत के समय उपयुक्त मन्त्र दीक्षा प्राप्त न होने पर फिर कभी वैसा अवसर आवे तो उसका लाभ फिर उठा लेने में कोई प्रतिबंध नहीं है।
एक व्यक्ति के कई गुरु होते हैं और होने चाहिये। शिक्षा क्षेत्र में विभिन्न विषयों एवं विभिन्न कक्षाओं के अनेक अध्यापकों-गुरुओं के द्वारा शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। आध्यात्मिक एवं धार्मिक क्षेत्र में भी एक व्यक्ति के अनेक गुरु होते हैं। राम लक्ष्मण के कुल गुरु वशिष्ठ जी थे पर उन्होंने विश्वामित्र के गुरुकुल में रहकर भी बहुत कुछ पाया था और उन्हें भी गुरु माना था। अनेक मन्त्रों के निष्णात अनेक आचार्यों से उन उन मन्त्रों की आवश्यकता पढ़ने पर उनको गुरु बनाना पड़ता है।
माता पिता और आचार्य इन तीनों की एक श्रेणी है। माता जन्म देती है। पिता भरण पोषण की व्यवस्था करता है और आचार्य ज्ञान देता है। यह तीनों ही कार्य समान रूप से महान होने के कारण इन तीनों को ही देव, गुरु एवं पितर माना गया है। लड़के और लड़की का उसमें भेद नहीं। लड़कों की भाँति लड़की के भी माता, पिता और अध्यापक होते हैं। अध्यात्म क्षेत्र में भी यही बात है। लड़कों को ज्ञान, शिक्षा एवं मन्त्र शक्ति की आवश्यकता है। यह आवश्यकता लड़कियों को न हो ऐसी कोई बात नहीं। नर और नारी का अध्यात्म क्षेत्र में कोई अन्तर नहीं। दोनों ही प्रभु के शरीर की दो भुजायें, दो आँखें हैं। दोनों का दर्जा समान है। कई व्यक्ति कहते हैं नारी का गुरु उसका पति है। दैनिक घरेलू एवं सामाजिक जीवन में यह बात सर्वथा उचित है, पर अध्यात्म क्षेत्र में यह बात लागू नहीं हो सकती। गुरु पिता तुल्य है। पति को पिता कैसे माना जायगा? यदि ऐसा उचित है तो फिर पति को गुरु दीक्षा भी पत्नी दे दिया करे।
एक नियम को सर्वत्र लागू करना उचित नहीं। विरक्ति प्रधान व्यक्ति नारी का शरीर स्पर्श न होने देने को अपनी साधना को पूर्ण करने के लिये स्त्री से शरीर स्पर्श न कराने का नियम बना लेते हैं, पर साधारण गृहस्थ जीवन में यह नियम नहीं चल सकता। सभी व्यक्ति अपनी माता के चरण छूते हैं। उनके लिये नारी जाति के अंतर्गत आने वाली माता के शरीर स्पर्श का कोई प्रतिबन्ध नहीं है। बहिनें अपने भाइयों से भुजा पसार कर प्रेम पूर्वक मिलती-जुलती है। बहुएं अपने सास-ससुर दोनों के चरण स्पर्श करती हैं। गृहस्थ जीवन में गुरुजनों का मान और अभिवादन नर और नारी समान रूप से करते हैं। नर और नारी के बीच जो कलुषित संबन्ध आज बढ़ रहे हैं, उसमें दोनों का क्षेत्र, स्थान और व्यवहार एक दूसरे से पृथक रहे तो अच्छा है, पर इसकी भी मर्यादा है। विरक्त पुरुषों का आदर्श, उनकी स्थिति के लिये नारी से दूर रहना उचित है, किन्तु पारिवारिक जीवन में सामान्य जीवन में कभी बहिन-भाई के भेंट-मिलन के, वधू द्वारा सास, ससुर के चरण स्पर्श करने, वैद्य द्वारा नाड़ी देखने या ऐसे ही अन्य पवित्र स्पर्श जहाँ आवश्यक हों वहाँ विरक्त पुरुषों के उदाहरण देना “सब धान बाईस पसेरी” डालने के समान ही होगा। नारी द्वारा किसी पुरुष का शरीर स्पर्श, चरण स्पर्श न हो यह कोई सामान्य नियम नहीं है, पर साधु विरक्तों की साधना में यह विशेष साधना अवश्य है।
“गम्भीर ध्यान में बाह्यज्ञान शून्य होता है। एक व्याध ने चिड़िया मारने के लिए ऐसी टकटकी बाँध रक्खी थी कि कोई बारात कहीं से जा रही थी, साथ ही कितने लोग, कितने बाजे गाजे, कितनी सवारियाँ और कितने ही घोड़े भी थे, कितनी देर तक उसके ही पास होकर वे चले गये, किन्तु व्याध को कोई होश नहीं, वह नहीं जान सका कि- उसके पास होकर एक बारात चली गई।”
एक व्यक्ति अकेले एक पोखर से मछली पकड़ रहा था। (उसके हाथ में बन्शी थी।) बहुत देर बाद (उसकी बन्शी की, पानी के ऊपर रहने वाली, छोटी) लकड़ी हिलने लगी और जरा-जरा डूबने लगी। वह तब बन्शी को हाथ से भली-भाँति पकड़ (मछली को) मारने के लिये तैयार हुआ। इतने में एक पथिक (राहगीर) ने पास आकर पूछा- ‘महाशय, अमुक बनार्जी का मुकाम कहाँ पर है, आप कह सकते हैं?’ (प्रश्न का) कोई जवाब नहीं मिला। यह व्यक्ति उस समय बन्शी को हाथ में लेकर उसे खींचने को तैयार हो रहा था। पथिक बार-बार जोर से कहने लगे- ‘महाशय, आप कह सकते हैं, अमुक बनार्जी साहब का घर कहाँ पर है?’ उस (मछली पकड़ने वाले) व्यक्ति को होश नहीं था। उसका हाथ काँप रहा था नजर केवल ‘फतना’ (वंशी की लकड़ी) पर थी। तब पथिक विमुख होकर चला गया। पथिक चला गया कि इतने में (बन्शी की) लकड़ी भी डूब गई। उस व्यक्ति ने खींचकर मछली को जमीन पर उठाया। बाद को अंगोछे से मुँह पोंछ कर वह पुकार कर पथिक को बुलाने लगा कि- अहे! सुनो, सुनो। पथिक लौटने को राजी नहीं थे, किन्तु बहुत (बढ़ बढ़ कर) पुकारने से वे लौट आये। आकर उन्होंने पूछा- ‘क्या महाशय, फिर क्यों बुलाते हो?’ तब उस व्यक्ति ने कहा- ‘तुम हमसे क्या कह रहे थे?’ पथिक ने कहा- ‘उस समय कितनी बार पूछा, और अब कह रहे हो कि क्या पूछा था!’ उस व्यक्ति ने कहा- ‘उस समय तो लकड़ी डूब रही थी (और मछली बन्शी में पकड़ाई जा रही थी, इसी कारण मुझे उस समय कुछ भी सुनने में नहीं आया।”
“ध्यान में इस भाँति की एकाग्रता हुआ करती है और कुछ देखा भी नहीं जाता है और सुना भी नहीं जाता। स्पर्श का (छूने का) बोध तक भी नहीं होता है। सर्प शरीर के ऊपर होकर चला जाता है, उसे भी मालूम नहीं होता। जो ध्यान करता हो वह भी नहीं जानता है (कि- एक सर्प अपने शरीर पर से चला गया) और सर्प भी जान नहीं सकता है (कि वह एक मनुष्य के शरीर के ऊपर होकर चला गया)”
गम्भीर ध्यान होने से इन्द्रियों का काम सब बन्द हो जाता है। मन बहिर्मुख नहीं रहता है। (उस समय ऐसा होता है कि) मानो बाहरी दरवाजे सब बन्द हो गये! इन्द्रियों के पाँच विषय रूप रस गन्ध, स्पर्श और शब्द बाहर ही पड़े रहते हैं।”
‘ध्यान के समय पहले-पहले इन्द्रियों के विषय सभी सामने आया करते हैं। गम्भीर ध्यान में वे सब फिर नहीं आते हैं। सब बाहर ही रह जाते हैं।”
अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्बयाऽग्नेहं गृह पतिना भूयाः। अस्थूरिणौ गार्हपत्यानि सन्तु शतं हिमाः सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते ॥27॥
-यजुर्वेद प्र. ख., द्वितीय अध्याय
अर्थ—हे गृहपते यज्ञाग्ने! तुम निश्चयतः पुण्य स्वरूप हो, अतः तुम्हारे साथ रहने से मैं भी अवश्य ही पुण्यवान बनूँगा। इस भाँति हम दोनों साथ-साथ रहते हुए सूर्य के आवर्तन सदृश एक सौ वर्ष तक संयम-नियम पूर्ण जीवन बिताते हुए सविता की भाँति ही निष्काम भाव से लोक-कल्याण करें।
अग्ने वेर्होत्रं वेर्दूत्यमवतां त्वां द्यावा पृथिवी ऽअव त्वं द्यावापृथिवी स्विष्टकृद्देवेभ्य ऽइन्दऽआज्येन हविषा भूत्स्वाहा सं ज्योतिषा ज्योतिः ॥9॥
—यजुर्वेद प्र. ख., द्वितीय अध्याय
अर्थ—हे यज्ञाग्ने! तुम यज्ञ के द्वारा प्राप्त होने वाले, दिव्य गुण, शक्ति , समृद्धि, धन-वैभव आदि के परिवाहक- ले जाने तथा देने वाले दूत के समान हो। द्यौ के निवासी देवगण तथा पृथ्वी निवासी मानव, दोनों को ही तुम्हारी रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि तुम दोनों को ही आवश्यक वस्तु और शक्ति के देने वाले हो। द्यौ और पृथिवी तुम्हारी रक्षा करे और तुम देवलोक एवं मनुष्य लोक की रक्षा करो। सम्यक् ज्योति स्वरूप सूर्यदेव हमारे दिये हव्य और आज्य से सन्तुष्ट होकर, दिव्य सुख और सम्पत्तियाँ हमें प्रदान करें। हमारे तेज, उनके दिव्य तेज से समन्वित हों।
मा भेर्मा संविक्थाऽतमेरुर्यज्ञोऽतमेरुर्यजमानस्य प्रजा भूयात्। त्रिताय त्वा द्विताय त्वैकताय त्वा ॥23
—यजु. प्र. ख., प्र. अ.
अर्थ—हे यज्ञ कर्त्ताओं! भय मत करो। फल मिलने में देर होने से विचलित मत होओ। यज्ञ में ग्लानि की कोई बात ही नहीं। यज्ञ करने से यज्ञ कर्त्ताओं के साथ उसके परिवार और परिजन भी दुःखों से छूट जाएंगे। मैं एक, दो, तीन यानी त्रिचेताग्नि के लिये तेरा अनुष्ठान करता हूँ। इससे यज्ञ कर्त्ता की कामनायें अवश्य ही पूरी होती रहेंगी।
आदित्यै रास्नासि विष्णोर्वेष्योऽस्यूर्जे त्वाऽब्धेन त्वा चक्षुषाव पश्यामि। अग्नेर्जिह्वा सि सुहूर्देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने में भव, यजुषे यजुषे ॥30॥
—यजु., प्र. ख., प्र. अ.
अर्थ—हे यज्ञ क्रिया! तू पृथ्वी निवासियों को कल्याणकारी मर्यादाओं में संचालित करने वाली है। यज्ञ की व्यापक शक्ति का तू साकार रूप है। पापों को जला डालने वाली अग्नि तेरी जिह्वा है। देवताओं को यहाँ बुलाने वाली क्रियाओं में तुम सर्वश्रेष्ठ हो, हमारा घर-घर यज्ञमय हो।
अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीतये त्वा गृहणामि बृहद ग्रावासि वानस्पत्यः सऽइदं देवेभ्यो हवि शमीष्व सुशमि शमीष्व। हविष्कृदेहि ॥15॥
—यजु. प्र. खण्ड, प्र. अ.
अर्थ—हे यज्ञ! तुम अग्निदेव के साक्षात् स्थूल रूप हो। वेदवाणी के प्रयोग स्थान हो—यानी वेदों के मन्त्र, यज्ञ करने से ही मनुष्यों और विश्व मात्र के लिए कल्याणकारी परिणाम उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं। हम दिव्य गुणों की प्राप्ति के लिए तुम्हें ग्रहण करते हैं अर्थात् यज्ञ करते हैं, तुम हमारे लिए वनस्पतियों को संवर्द्धन करने वाले मेघ हो। जिसने हविष्य को ग्रहण कर लिया है, ऐसे हैं यज्ञ! तुम आओ और देवों के लिए दिए इस हवि को संस्कृत करो-भली भाँति संस्कृत करो, जिससे देव इसे ग्रहण कर हमारे लिए कल्याण की वर्षा करें।
अग्निनां रयिमश्नवत्पोषमेव दिवे दिवे। यशसं वीरवत्तमम्॥3॥
-ऋग्वेद 1।1।3
अर्थ- अग्नि के द्वारा यानी अग्नि को आहुति द्वारा प्रसन्न करके मनुष्य, पुष्टि, कीर्ति, वीरत्व, ऐश्वर्य (धन समृद्धि) को प्राप्त करता है।
अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वतः परिभूरसि। स इद्देवेषु गच्छति।
-ऋग्वेद 1।1।4
अर्थ- हे विश्व में परिपूर्ण रूप से (अन्तर्वाह्य सर्वत्र) व्याप्त रहने वाले अग्ने! यज्ञ और अध्वर से मनुष्य निरन्तर इस देव की यानी दिव्यता की ओर जाता रहता है।
धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्वं तं योऽस्मान्धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वाम॥ देवानामसि वहिनतम सस्नितमं पप्रितमं जुएटतमं देवहूतमम् ॥8॥
अर्थ—हे यज्ञाग्नि! तू नाशक है। उस हिंसक का तू नाश कर, जो हमारा (बिना अपराध के) नाश करता है, और उसे भी तू नाश करदे, जिसे (दुष्टता के कारण) मैं नाश करना चाहता हूँ या जिस दुष्ट वृत्ति का मैं नाश करना चाहता हूँ। देवताओं को वहन करने वालों में हे यज्ञाग्नि! तुम ही श्रेष्ठ और बड़े हो, तुम ही सबसे अधिक शुद्धि करने वाले हो, सबसे बड़ा परिपूरक, प्रिय और देवों को यहाँ बुलाने में सबसे अधिक समर्थ हो ॥8॥
गन्धर्वास्त्वा विश्वावसुः परिदधातु विश्वस्यरिष्ट् यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिडऽईडितः। इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणो विश्वस्यरिष्ट् यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिडऽईडितः। इन्द्रावरुणौ त्वोत्तरतः परिधत्तां ध्रुवेणा धर्मणा विश्वस्यारिष्ट् यै यजमानस्य परिधि रस्यग्निरिडऽईडितः।
यजु. 1। 2। 3
अर्थ- संसार को बसाने वाले तथा पृथ्वी को धारण करने वाले सूर्यदेव, विश्व के सुख एवं रक्षा के लिए यज्ञ को सर्वत्र प्रसारित करें। यज्ञ में स्तुति करने योग्य हे अग्निदेव! तुम इन्द्र देवता का दाहिना हाथ और यज्ञकर्ता की रक्षा करने वाले हो, विश्व की भलाई करने में तुम यज्ञकर्ता के सहायक और रक्षक हो।
अग्नेऽदब्धायोऽशीतम पाहि मा दिद्योः पाहि प्रसित्यै पाहि दुरिष्ट् यै पाहि दुरद्मन्याऽअविषं नः पितुं कृणु। सुषदा योनौ स्वाहा वाडग्नये संवेशपतये स्वाहा सरस्वत्यै यशो भगिन्यै स्वाहा ॥20॥
-यजु. 1।2।20
अर्थ- हे अहिंसित यजमान वाले और अत्यन्त व्याप्त यज्ञाग्ने! तुम दैवी गुण वाले बाणों से हमारी रक्षा करो, जिससे हम यज्ञ की साधना करने वाले, किसी आसुरी मोह-ममता के बन्धन में न पड़ें, हमारा यजन (यज्ञ क्रिया) किसी दुष्ट भाव से नहीं हो, हमारा आहार राजसी और तामसी न हो, कदाचित कभी हो भी तो हे यज्ञ! उसे तू हमारे लिए विष रहित बना देना। हम तुम्हारी वेदी में, जो कि सदा ही सुख देने वाली है, बैठकर गार्हपत्य अग्नि में स्वाहा पूर्वक हवन करें। हमें यश और ऐश्वर्य देने वाली वाणी और विद्या की प्राप्ति हो, इसीलिए स्वाहा पूर्वक हम आहुति देते हैं। उक्त यश और ऐश्वर्य को धारण करने वाली वाणी के अनुकूल ही सदा-सर्वदा हमारा आचरण हो, इसीलिए हम आहुति देते हैं।
आतं भज सौश्रवसेष्वग्न ऽ उक्थ ऽ उक्थ आभज शस्यमाने प्रिय सूर्ये प्रियो ऽ अग्ना भवात्युज्जातेन भिनद्दुज्जनित्वैः ॥27॥
-यजु. 2।2।2।27
अर्थ- हे देवताओं! तुम द्रव्य देने वाले पुरुष को ऐसे श्रेष्ठ कार्य में प्रेरित और नियुक्त करो जिससे उसकी उज्ज्वल कीर्ति विस्तार को प्राप्त करे, सूर्य देवता उसे प्रिय पात्र के रूप में वरण करे, वह अग्नि के लिए परम प्यारा बने और वह पुत्र-पौत्रादि की उत्कर्षता को भी प्राप्त करें। यज्ञकर्ता के कुल में श्रेष्ठ सन्ततियों की आविर्भूति होती है।
अस्य प्रत्नामनु द्युत शुक्रं दुर्दहे अर्हयः।
पयः सहस्र सामृषिम् ॥16॥
यजु. 1।3।16
अर्थ- इस प्राचीन प्रकाशमय पथ का अनुसरण कर दिव्य ज्ञान सम्पन्न महर्षि गण, इस यज्ञ रूपी कामधेनु से शुक्र, सात्विकतारूपी सुधा, शक्ति, ज्ञान एवं आनन्द रूप दूध दुहते हैं।
तनूपाऽअग्नेऽसि तन्वं में पाह्यायुर्दाऽअग्नेऽस्यायुर्मे देहि वर्चोदाऽअग्नेऽसि वर्चो में देहि। अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनं तन्मऽआषृणा॥17॥ यजु. 3।1।17
अर्थ- हे यज्ञाग्ने! तू शरीर रक्षक है, अतः हमारे शरीर की रक्षा करो, हे अग्नि! तू आयु प्रदाता है, अतः मुझे पूरी आयु प्रदान कर। हे अग्ने! तू तेज देने वाला है अतः हमें भी तेजस्वी बना ले, हे यज्ञाग्ने हम में जहाँ भी जो कुछ वैषम्य, दोष और त्रुटियाँ हैं, उन्हें बाहर निकाल कर हमें समता, शुद्धता एवं पूर्णता से पूर्ण करो।
(विद्याभास्कर श्री उदयवीर शास्त्री, बीकानेर)
प्राचीन ऋषियों ने यज्ञ को अनन्त विश्व को रूप समझकर उसमें अनन्त भावनाओं व क्रियाओं का समावेश किया है। समस्त विश्व का क्रिया कलाप एक प्रकार से यज्ञ का ही रूप है। यदि वह त्याग की भावना के साथ है, तो उसका और भी महत्व बढ़ जाता है। शास्त्रकारों ने यज्ञ के दो रूप माने हैं- काम्य और नित्य। जो क्रिया कलाप स्वार्थ को लेकर चलता है वह पहला, और जो त्याग-भावना अर्थात् फल की आकाँक्षा से रहित होकर किया जाता है वह दूसरा समझना चाहिये। जब से मानव ने आँखें खोली हैं, तभी से यह क्रियाकलाप चला आता है। गीता में भगवान् कृष्ण ने बताया है-
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्त्वष्ट कामधुक् ॥
आदि सर्गकाल में यज्ञ के साथ प्रजाओं का सृजन करके प्रजापति ने कहा, “इस यज्ञ के द्वारा तुम अपने सर्ग अर्थात् उत्पादन को बढ़ाओ, यह तुम्हारी अभिलषित कामनाओं का देने वाला है।”
इस कथन में गंभीर वैज्ञानिक तत्व अन्तर्निहित हैं, उन्हें यथाशक्ति समझने का यत्न करना चाहिए। यदि हम अपने प्रमाद से उस यज्ञानुष्ठान को पूरा नहीं निभाते, जिसका आदेश आदि सर्ग काल में प्रजापति ने मानव को दिया, तो प्रजापति की रचनायें प्राकृत तत्व किसी न किसी मात्रा में उसको सन्तुलित करने का प्रयत्न बराबर करते रहते हैं- नहीं हो पाती यह जगत्-प्रसव रुद्ध हो जाता, धीरे धीरे नष्ट हो जाता। प्रजापति का यज्ञ तो निरन्तर प्रवाहित रहता है, पर मानव को अपने कर्त्तव्य का मार्ग-दर्शन करने के लिए मनु ने इस रूप में यज्ञ का प्रारम्भ किया, जो हमारे लिए कर्त्तव्य रूप से शास्त्र प्रस्तुत करता है। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है-
मनुर्हवा अग्रे यज्ञे नेजे तद्नुकृत्येथाः प्रजा यजन्ते। (1।5।1।7)
आदिकाल में मनु ने यज्ञ द्वारा यजन किया, उसी का अनुकरण करके ये समस्त प्रजा यज्ञ करती है। यज्ञानुष्ठान की यह प्रक्रिया आदि सर्ग काल से चली आ रही है। इसका महत्त्व इस रूप में नहीं है, कि यह इतने प्राचीन समय से प्रवर्तित है, प्रत्युत यह समझ लेने में है, कि मानव के साथ इसका अस्तित्व अवश्यम्भावी है। इसके बिना मानव-सर्ग, मानव-विस्तार, मानव-विकास सब कुछ सन्देह में पड़ जाता है। न केवल मानव-सर्ग आदि,प्रत्युत समस्त प्राणि-वर्ग का जीवन तब सम्भव न रहेगा।
शास्त्रकारों ने यज्ञ के दोनों प्रकार के फलों का निर्देश किया है- अध्यात्म और भौतिक। काम्य कर्मों के फल- जिस कामना से वह यज्ञ-कर्म किया जाय, वही होते हैं। पुत्रेष्टि का पुत्र प्राप्ति, ग्राम काम यज्ञ को ग्राम प्राप्ति तथा स्वर्ग काम यज्ञ का स्वर्ग प्राप्ति आदि। जो यज्ञ निष्काम भावना अर्थात् त्याग भावना से किये जाते हैं, उनका फल अध्यात्म कहा जा सकता है। ऐसे यज्ञानुष्ठानों से अन्तःकरण शुद्ध होता है, रोग, द्वेष, मद, मात्सर्य आदि कषाय दूर होकर सात्त्विक भावनाओं का उद्रेक होने लगता है, तब अध्यात्म की ओर पुरुष की प्रवृत्ति अग्रसर हो जाती है। इन दोनों ही स्थितियों में लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जा दीर्घ विधिक्रम पार करना पड़ता है, उसका समझ लेना अत्यन्त आवश्यक है। यदि इस रहस्य को हम थोड़ा भी समझ पायें, तो सम्भवतः इस बात की स्पष्टता के लिए हमें कुछ मार्ग मिल सकेगा, कि यज्ञ से वायु-शुद्धि होने का तात्पर्य क्या है?
विधिक्रम से हमारा अभिप्राय यज्ञानुष्ठान के उन क्रम विधानों या रीतियों से नहीं है, जो यज्ञ-सम्पादन के समय पालन करनी आवश्यक हैं, हमारा संकेत उस ओर है, जब हम कोई यज्ञ पूर्णरूप से सम्पादन कर चुकते हैं, और कालान्तर में उसके फल को प्राप्त करते हैं, उन दोनों के अन्तराल काल में जो क्रिया-प्रतिक्रिया हुआ करती हैं, जिनके परिणामस्वरूप यज्ञकर्ता फल प्राप्ति पर्यन्त पहुँच पाता है। इस स्थिति को अधिक स्पष्ट रूप में समझने के लिए एक उदाहरण लीजिए- चिकित्सक एक व्यक्ति को कहता है, उपयुक्त भोजन करने से आपका स्वास्थ्य ठीक हो जायगा, पर भोजन करने के तत्काल अनन्तर स्वास्थ्य ठीक नहीं हो जाता। उस प्रकार का भोजन करने और स्वास्थ्य प्राप्ति के अंतराल में भोजन रूप अनुष्ठान की अनेक क्रिया, प्रतिक्रिया होती रहती हैं, जो भोजन के अनन्तर हमारे लक्ष्य स्वास्थ्य प्राप्ति तक हमें पहुँचाती हैं। इसी आशय को लेकर शास्त्रों में ऐसा लेख है, कि ये आहुतियाँ यजमान को स्वर्गलोक में ले जाती हैं। वस्तुतः आहुतियाँ तो अपने दृश्य अथवा व्यवहार रूप से अग्नि में हुत होकर समाप्त हो जाती हैं। तब आहुतियाँ यजमान को स्वर्ग ले जाती हैं, अथवा आहुतियों पर सवार होकर यजमान स्वर्ग की ओर वहन किया जाता है। इसका क्या अभिप्राय है? आइये इसके रहस्य को समझने का यत्न करें।
शास्त्रों की यह घोषणा है कि यज्ञ देवों को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है, विचारिये, ये देव कौन हैं? इनका हमसे क्या सम्बन्ध है? हम यज्ञ में इनकी उपेक्षा नहीं कर सकते और हमारे प्रति उनका भी कुछ कर्त्तव्य हैं। श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है-
देवान् भावयताऽनेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
प्रजापति ने कहा- इस यज्ञ के द्वारा देवों को भावित करो- तृप्त करो, तृप्त हुए देव तुमको तृप्त करें। परस्पर तृप्त करते हुए आप सब परम कल्याण को प्राप्त करोगे। विचारना चाहिए- वे कौन से देव हैं, जिनको प्रजा यज्ञ के द्वारा तृप्त करती है, और वे उसके बदले में सुख की अथवा अनुकूल स्थितियों की वर्षा से प्रजा को तृप्त कर देते हैं।
इसकी खोज में जब हम निकलते हैं, हमें अग्नि, इन्द्र, वायु, आपस्, चन्द्र, पृथ्वी, सूर्य, औषधि, वनस्पति आदि नामों से व्यवहृत देवों का पता लगता है। यज्ञ से इनकी तृप्ति कैसे होती है, यह भी विचार करना आवश्यक है। इसका एक स्थूल रूप मनु के श्लोक द्वारा स्पष्ट किया जाता है-
अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिवृर्ष्टरेन्नं ततः प्रजाः॥
अग्नि में डाली हुई आहुति सूर्य किरणों में उपस्थित होती है। उनके संसर्ग से अन्तरिक्ष में इस प्रकार का वातावरण निर्मित हो जाता है, जिससे मेघों का संग्रह होने लगता है, वे समय पाकर पृथ्वी पर बरसते हैं, उस वृष्टि से यहाँ औषधि, वनस्पति, लता, फल, फूल आदि विविध खाद्य पदार्थ न केवल मानव के, अपितु प्राणिमात्र के लिए उत्पन्न हो जाते हैं। औषधि, वनस्पति, लता, फल, फूल आदि खाद्यों में विविध प्रकार की जीवनी शक्तियाँ (खाद्योज) रहती हैं, जो फलादि का उपभोग करने से प्राणियों को जीवन प्रदान करती हैं। वे जीवनी शक्तियाँ इनमें अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, जल आदि के प्रभाव से ही उत्पन्न हो पाती हैं। यदि हम यज्ञादि अनुष्ठान करके आज्य एवं अन्य विविध सामग्री को अग्नि के द्वारा उन देवों तक पहुँचाते रहते हैं, तो वे उन जीवनी शक्तियों को अधिक और उत्तम रूप से उत्पन्न करने में समर्थ रहते हैं। यही यज्ञ के द्वारा देवों की तृप्ति का स्वरूप है। यदि हम यज्ञ नहीं करते, तो यह विराट् रूप से प्रजापति का जो यज्ञ हो रहा है- सूर्य-चन्द्र किरणों के द्वारा रस वर्षा करते हैं, ताप पहुँचाते हैं, वायु प्राण संचार करता है, जल अनुकूल रसों का प्रदान करता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म कीटाणुओं के रूप में अनन्त राक्षस या असुर जो हमारे जीवन को चाट जाने के लिए हमारे चारों ओर मंडराते हैं, ये सब देव मिलकर उनका ध्वंस करने के लिए बराबर प्रयत्न करते रहते हैं, पर हमारे द्वारा यज्ञादि रूप में उन्हें सहयोग न मिलने पर और हमारे दूसरे मलिनता आदि का प्रसार करने वाले कार्यों से असुरों की संख्या में कल्पनातीत वृद्धि हो जाती है, जिससे प्रजा में रोग आदि महामारी के रूप में फैल जाते हैं। प्रजा नष्ट होने लगती है, पर वह इसके आधार भूत कारणों को नहीं समझ पाती और कष्ट उठाती है।
यदि हम यज्ञ का बराबर अनुष्ठान करते हैं, तो देवों को उससे पुष्ट बनने में पूरा सहयोग प्राप्त होता है। यज्ञ से वायु की शुद्धि का यही अभिप्राय है, केवल वायु पद तो उपलक्षण मात्र है, उसका तात्पर्य सभी देवों की शुद्धि अर्थात् पुष्टि होने से है। समस्त वातावरण की शुद्धि ही यहाँ अपेक्षित है। इस प्रकार पुष्ट व तृप्त होकर समस्त देव उन असुरों को विनाश करने में पूर्ण समर्थ होते हैं, जिससे हमको दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। यह शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि यज्ञ देवों की खुराक है। शतपथ ब्राह्मण के वाक्य हैं—
प्रजापतिर्देवानब्रवीत् - यज्ञो वोऽन्नम्। ..........यज्ञ उ देवानामन्नम्।
प्रजापति ने देवों को बताया- यज्ञ आपका अन्न है, खाद्य है, यज्ञ ही देवों का अन्न है। अब यदि हम यज्ञ न करके देवों को भूखा मरने देंगे तो निश्चित ही असुर बढ़ जायेंगे। मानव रोगी और क्षीण आयु होगा, जो आज सन्मुख स्पष्ट दीख रहा है।
यह निश्चित बात है कि देव यज्ञ के द्वारा ही अपने कार्य सम्पादन करने के लिए शक्ति प्राप्त करते हैं। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है—
यदुह किञ्च देवाः कुर्वते स्तोमेनैव तत्कुर्वते यज्ञो वै स्तोमो यज्ञे नैव तत्कुर्वते।
देव अपना जो कुछ कार्य करते हैं, वे स्तोम रूप साधन के द्वारा ही करते हैं। स्तोम यज्ञ का नाम है, इसलिये यज्ञ के द्वारा ही वे अपना कार्य करने में समर्थ होते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति इसका स्पष्ट अनुभव कर सकता है, कि यज्ञ के द्वारा चारों ओर के वातावरण में कुछ अनुकूल प्रभाव पड़ता है या नहीं। जब अग्नि में आज्य अथवा अन्य उपयोगी शाकल्य द्रव्य आहुत किये जाते हैं, उनके दग्ध होने पर दूर अवस्थित व्यक्ति को विशेष प्रकार की सुगन्धि का स्पष्ट अनुभव होता है। आहुत द्रव्यों की जीवनोपयोगी शक्तियाँ अग्नि के द्वारा अति सूक्ष्म अवस्था में परिवर्तित होकर वायु, आपस्, पृथ्वी, सूर्य-रश्मि आदि देवों में निहित उन जीवनी शक्तियों में अनुपम स्फूर्ति प्रदान करती हैं, जो खाद्य के रूप में आकर प्राणिमात्र को जीवन प्रदान करने वाली हैं।
बहुत लोग कह दिया करते हैं कि यज्ञ में जो घृत आदि दग्ध कर दिया जाता है, यदि उसे किसी व्यक्ति को दे दिया जाय और वह उसका उपयोग करले, तो उसका भला हो जाय, उसे व्यर्थ जला देने से क्या लाभ? वस्तुतः ऐसा विचार रखने वाले लोग जान बूझकर अज्ञानी बनते हैं। एक व्यक्ति के द्वारा उपयुक्त किया हुआ घृत आदि केवल उसी व्यक्ति को थोड़ा बहुत लाभ पहुँचायेगा, पर उतने ही घृत का यज्ञाग्नि द्वारा यदि प्रयोग किया जाय, तो वह सहस्रों व्यक्तियों के लिए लाभप्रद होगा। इसीलिए तो यज्ञ त्यागमय व परोपकारमय है, इसमें प्रत्येक व्यक्ति की सेवा की भावना निहित रहती है। यज्ञाग्नि में प्रदत्त एक आहुति सूक्ष्म होकर देवों में अनन्त जीवनी शक्तियों को स्फूर्ति प्रदान करती है, जिसका लाभ सहस्राधिक व्यक्तियों को पहुँचने वाला होता है। यज्ञ सम्बन्धी इन भावनाओं को लेकर शतपथ ब्राह्मण में कुछ संदर्भ लिखे गये हैं, जो इन अर्थों पर सुन्दर प्रकाश डालते हैं-
ततोऽसुरा उभयीरोषधीर्याश्च मनुष्या उपजीवन्ति याश्च पशवः कृत्ययेव त्वत् विषेणेव त्वत् प्रतिलिलिपुः उतैवं चिद्देवानभि- भवेमेति, ततो न मनुष्या आशुर्न पशव आलिलिशिरे ता हेमाः प्रजा अनाशकेन नोत्पराबभूवुः।......... ते देवा होचुर्हन्तेद मासामपजिघांसामेति, केनेति? यज्ञे नैवेति
(2।4।3।2-3)।
असुरों ने उन समस्त औषधियों को मारक तत्त्व अथवा विष से मानों लिप्त कर दिया, जिनका उपयोग कर समस्त मानव व पशु अपना जीवन निर्वाह करते हैं, ऐसा करके उन्होंने यह सोचा, कि इस प्रकार हम देवों को परास्त कर लेंगे, पर उन औषधियों को उस अवस्था में न मनुष्यों ने खाया और न पशुओं ने चुगा, उनका उपयोग न करने से समस्त प्रजा असुरों के द्वारा पराजित न की जा सकी।
इस ब्राह्मण वर्णन में यह ध्यान देने योग्य है कि औषधियों में जब स्वास्थ्य नाशक असुर रूप कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं, उस समय उनका उपयोग न करना ही श्रेयस्कर है। इस प्रकार अन्नादि औषधियों में प्रादुर्भूत असुर उनके उपयोग से प्राणियों के स्वास्थ्य को नष्ट कर देवों के कार्यक्रम को विध्वस्त कर देना चाहते हैं। यह ठीक है, कि ऐसी अवस्था में उन अन्नों का उपयोग न करना चाहिए, पर उपयोग न करने से भी तो कार्य नहीं चलता। बिना अशनपान के प्राणी कब तक जीवित रह सकता है? फिर असुर भी वे ऐसे कपटी व धूर्त्त हैं, कि वे अपने आपको इतने स्पष्ट रूप में कब आने देते हैं, कि उन्हें कोई भी जान पहचान सके, और उनकी मार से अपने आपको बचा सके। इसीलिए असुरों को सदा प्रायः छद्मवेशी कहा गया है, ये लुक-छिप कर आते हैं और देवों को चक्कर में डालकर परेशान करते हैं। इसलिए उनसे सुरक्षित रहने के लिए उपर्युक्त ब्राह्मण संदर्भ की अंतिम पंक्तियों में बताया गया है, कि असुरों के इस आक्रमण को देखकर देवों ने आपस में सलाह की कि हमें इन औषधियों में अन्तर्निविष्ट असुरों का हनन करना चाहिए। किसी ने पूछा, कि वह किस उपाय से किया जा सकता है? उत्तर मिला, वह यज्ञ से ही किया जा सकता है। इस प्रसंग से यह स्पष्ट है, कि अन्नादि औषधियों में अन्तःप्रादुर्भूत स्वास्थ्य नाशक तत्त्वों का यज्ञ के द्वारा ही अपवारण किया जा सकता है। जहाँ पर नियमित रूप से यज्ञों का अनुष्ठान होता है, वहाँ के विस्तृत वातावरण में उत्पन्न अन्नादि औषधियों में स्वास्थ्य नाशक तत्वों के प्रादुर्भाव की संभावना ही नहीं रहती।
शतपथ ब्राह्मण में इस प्रसंग का उपसंहार करते हुए आगे लिखा है-
एतेन वै यज्ञेनेष्ट्वोभयीनामोषधीनां याश्च मनुष्या उपजीवन्ति याश्च पशवः कृत्यामिव त्वत् विषमिव त्वत् अपजघ्नुः तत आश्नन् मनुष्या आलिशन्त पशवः।
इस यज्ञ के द्वारा ही उन समस्त औषधियों के स्वास्थ्य नाशक विष-प्रभाव को नष्ट कर दिया गया, जिनका उपयोग मनुष्य अथवा पशु करते हैं, परिणामस्वरूप मनुष्य उन अन्नादि औषधियों का उपयोग करने लगे और पशु भी चुगने लगे। यज्ञ के द्वारा वायु अथवा वातावरण की शुद्धि के लिये इससे अधिक और किस प्रमाण की आवश्यकता है। ब्राह्मण ग्रन्थों में इस प्रकार के प्रसंग अनेक स्थलों में हैं। इसके लिये आप गोपथ ब्राह्मण के उत्तर भाग [1/19] और कौषीतकि ब्राह्मण [5/1] को देख सकते हैं।
संक्षेप में चाहे हम काम्य यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं अथवा नित्य यज्ञ का और उसका चाहे कोई दूसरा भौतिक फल हो अथवा आध्यात्मिक, पर उन समस्त प्रकार के यज्ञों के वातावरण की शुद्धि रूप-फल का निराकरण तो किया ही नहीं जा सकता। यज्ञों का अनुष्ठान किये जाने पर उनके इस परिणाम से बचकर हम निकल नहीं सकते। यह यज्ञों का अनिवार्य और अनिर्बाध फल है। यज्ञ के किसी भी दूसरे लक्ष्य पर पहुँचने के लिये हमें इस मार्ग से जाना ही होगा। यह देव और मानवों का अटूट सम्बन्ध है। इस रूप में मानव-समाज की समृद्धि का यह मूल आधार है।
यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्यानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।
मानव-यज्ञ के द्वारा ही देव अपने यज्ञ का अनुष्ठान यथावत् कर पाते हैं। ये सर्वश्रेष्ठ धर्म है। ये अद्वितीय है; उत्तम हैं, इनकी तुलना अन्य किसी से नहीं की जा सकती।
(ले.- श्री लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए.)
अनुभवी विद्वानों ने कहा है- “जीने के लिए खाओ, न कि खाने के लिए जियो।” किन्तु आज कितने आदमी इस आदर्श, उपयुक्त और लाभप्रद सिद्धान्त को मानते हैं। आज कल तो अधिकतर जनता का सिद्धान्त है ‘खाओ, पियो, मस्त रहो।’ अशिक्षितों बेचारों को तो जाने दीजिए, वह तो एक प्रकार से क्षम्य ही हैं अपनी अज्ञानता के कारण, किन्तु पढ़े-लिखे विद्वान् और सभ्य-समाज के सदस्य भी खाने के ही लिए जीते हैं। यूरोपीय-सभ्यता की वृद्धि के साथ होटलों,रेस्टोरेन्टों तथा काफी हाउसों की संख्या बढ़ती ही जाती है। विद्यार्थी-समाज तथा हमारे वयोवृद्ध नेतागण सभी होटलों तथा रेस्टोरेन्टों पर न्यौछावर हैं। आजकल रेस्टोरेन्टों में जाना एक बड़प्पन की निशानी मानी जाती है, एक फैशन है। आजकल तो किसी बड़े अवसर पर भले ही वह राष्ट्रीय पर्व हो या धार्मिक या किसी संभ्रान्त महापुरुष के आगमन पर उसके सम्मानार्थ होटलों में दावत देना एक नियम सा हो गया है। अब तो ब्याह आदि अवसरों पर भी बड़े आदमी होटलों की ओर से दावतों आदि का प्रबन्ध करते हैं, यों तो पहले भी हलवाइयों की दुकानें अपनी आकर्षक रंग−बिरंगी मिठाइयों से हमारे चित्त को मोहने को थीं ही। सुबह से रात तक गली-गली में चाट तथा खोमचे वालों की आवाजें आपको सुनाई देंगी। मलाई की बरफ, क्रीम, चाकलेट, कचालू-मटर,चाय-बिस्कुट आदि बेचने वाले स्टेशन, बाजार, मन्दिर के पास, नदी-तट पर संक्षेप में सदा ब्रह्म की माया की भाँति सर्वत्र फैले दिखाई देंगे। छोटे बच्चे ही मक्खियों की भाँति इन पर टूटते हों, ऐसा नहीं है। जवान, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी चटोरे हैं। सभी का जीवन-सिद्धान्त है ‘चार दिन की जिन्दगी है, खा-पी लो।’ वह यह सोच ही नहीं सकते गम्भीरता से कि ‘चार दिन की जिन्दगी है। जीवन एक अमूल्य वस्तु है। इसका सदुपयोग करना चाहिए भले कामों में, न कि चटोरेपन में।’ ब्रह्मानन्द और भोजनानन्द में साधु-संन्यासी भी भोजनानन्द को अधिक महत्व देते हैं। यह सत्य बात है। ऐसी सोचनीय अवस्था है। प्रश्न यह होता है कि ऐसा क्यों है? उत्तर सरल है कि हम आहार-विज्ञान के विषय में बिल्कुल नहीं जानते हैं। भारतीय आहार विज्ञान क्या है, इसे यदि हम जान जायं तो बहुत कुछ हम अपना और देश तथा विश्व का भला करें।
अँग्रेजी में एक कहावत है कि अपने दाँतों से अपनी कब्र मत खोदो। इसका भी यही अर्थ है। हमारा दिन-रात मुँह बकरी की तरह चला करता है। यही कारण है कि आज देश का स्वास्थ्य इतना अधिक गिर गया है, भयानक रोगों की तीव्र बाढ़ आ गई है तथा मृत्यु संख्या इतनी अधिक और वह भी कम आयु में होती है। यह सत्य है कि आहार-विहार की अव्यवस्था तथा तत्सम्बन्धी नियमों की अवहेलना का फल हम रोग, अस्वास्थ्य तथा मृत्यु के रूप में पाते हैं। किन्तु आहार-विज्ञान की अज्ञानता ही एक मात्र कारण हमारे कष्टों का नहीं है, यह बात सत्य है। गरीबी भी एक प्रमुख कारण है। कह देना तो सरल है कि मौसमी फल और तरकारी सभी खा सकते हैं, किन्तु यह वही कहते हैं, जो सचमुच गरीब या पूर्णरूप से अभावग्रस्त नहीं हैं। जिन लोगों को दाल और रोटी ठीक से नहीं मिलती वह फल और शाक-तरकारी क्या खायेंगे? पर जो खा सकते हैं, वह भी तो नहीं खाते। आहार-विज्ञान की अज्ञानता ही के कारण नहीं, इसके विषय में जानते हुए भी- जीभ तथा स्वादेन्द्रिय के गुलाम होने के कारण। खान-पान में संयम तो जीवन भर की वस्तु है। यह कोई बीमारी में बताया गया वैद्य-डाक्टर द्वारा परहेज तो है नहीं कि जब तक रोग न जाय, तब तक फलाँ-फलाँ वस्तु खाना वर्जित है। कुछ समय तक के लिए तो जीभ को बस में करना सरल है, किन्तु सिद्धान्त रूप से सदा-सर्वदा को चटोरेपन को नमस्कार कर देना बहुत कठिन काम है। गाँधी जी का कहना था कि कामेन्द्रिय से अधिक सशक्त स्वादेन्द्रिय होती है।
भोजन इसलिए किया जाता है ताकि परिश्रम करने के कारण जो शक्ति का क्षय होता है तथा टूट-फूट होती है, उसकी पूर्ति हो सके। अतः हमें आदर्श और संतुलित भोजन करना चाहिए। उपयुक्त गुणों का भोजन हमें करना चाहिए। फिर भोजन उचित परिमाण में करना चाहिए। न इतना कम कि शरीर की पुष्टि न हो सके और न इतना ठूंस-ठूंस कर कि बेचारे पेट को साँस लेना भी दूभर हो जाय। एक घोड़ा जो दो मन बोझ लाद सकता है, उस पर यदि आज 10 मन लाद दें और वह भी एक दिन नहीं नित्य ही तो वह मरेगा ही। हम अपने पेट को ‘अपना’ न समझकर ‘पराया’ समझते हैं तभी तो बेचारे के साथ इतना अत्याचार करते हैं। प्रत्येक कर्मचारी को चाहे वह चपरासी हो चाहे बड़ा अफसर, इतवार को छुट्टी मिलती है, पर बेचारे पेट को कभी इतवार नसीब नहीं होता। हमारे महर्षियों ने उपवास और व्रत का इसी से महात्म्य रखा था। सोमवार, रविवार, प्रदोष, एकादशी, पूर्णिमा, रामनवमी, शिवरात्रि, जन्माष्टमी आदि व्रत ही व्रत रखा है। स्त्रियाँ और पुराने लोग अब भी लकीर को पीटते हैं पर व्रत का उद्देश्य समाप्त है। रामदाने के लड्डू, शकरकन्द का हलुवा, कूटू-सिंघाड़े की पकौड़ियाँ तथा घी में तली पूड़ियाँ, रबड़ी, मलाई, खोये की बर्फी-पेड़ा आदि विविध स्वादिष्ट भोजनों की एकादशी के दिन बन आती है यदि व्रत के दिन इतने बढ़िया स्वादिष्ट पेट नहीं, गले भर भोजन मिलें तो मैं तो कम से कम रोज एकादशी मनाने को तैयार हूँ। आहार-विज्ञान में उपवास का महत्व है। कभी-कभी उपवास किया करें।
गलत तरीके से खाना-पीना, जरूरत से ज्यादा खाना, बेमेल चीजों का एक साथ खाना हानिप्रद है। उचित परिमाण में खायें। सही मेल का खाना खायें। सही मेल का खाना खायें। अनुचित भोजन के अतिरिक्त घोर दरिद्रता, सार्वजनिक अशिक्षा, बाल-विवाह और स्वास्थ्य के विषय में अज्ञान हमारे अस्वास्थ्य का कारण है।
भोजन का पाचन ठीक से हो जाय। पाचक-यंत्र समुचित शोषण भोजन के रसों का कर सकें। व्यर्थ तथा निस्सार कचरा पैखाने-पेशाब के रूप में ठीक से निकल जाय। स्वच्छ वायु, पूरी साँस, शरीर की बाह्य और आन्तरिक सफाई भी आदर्श भोजन के साथ चले तभी हमारा स्वास्थ्य ठीक रहेगा। श्वाँस मार्ग, रोम-कूप, मूत्र-मार्ग, मल-मार्ग द्वारा कचरे की सफाई होती है। इनका कार्य ठीक से होता रहे इसलिए हमें प्रकृति के सहायक बनना चाहिए। याद रहे सब कचरे का शरीर से निकल सकना और उसके इकट्ठे होने के नतीजे से शरीर में बुरे लक्षण प्रकट होना ही रोग है।
हमें कुछ स्वास्थ्य-सम्बन्धी (भोजन-सम्बन्धी) सूत्र याद कर लेने चाहिए- (1) भोजन करते समय प्रसन्न चित्त रहें। शोक, क्रोध से दूर रहें। (2) 30-40 मिनट में कम से कम खूब चबाकर धीरे-धीरे भोजन करें। इससे भोजन-पदार्थ में छिपे प्राण-कण अलग-2 हो जाते हैं। साथ ही मुँह की लार भोजन में खूब मिल जाने से कार्बोहाइड्रेट, सुगर में परिवर्तित हो जाता है और इसी सुगर में रक्त-शुद्धि होती है। याद रखो पेट के दाँत नहीं होते। साथ ही यह भी याद रखो कि पेट में पहुँचने के बाद पेट से निकलने वाले किसी रस में कार्बोहाइड्रेट को सुगर में परिवर्तित करने की शक्ति नहीं है। (3) पेट में बोझ न मालूम पड़े- न खाते समय न भोजन के बाद। (4) अम्लोत्पादक (कार्बोज, प्रोटीन, फैट) रोग से बचाने वाले खाद्य (तरकारी, फल आदि) कम से कम तिगुने खाओ। (5) पर्याप्त जल पियो। 24 घंटे में 2-3 सेर पियो। (6)तली-भुनी चीजें, चाय, तम्बाकू, अफीम तथा शराब, भाँग आदि नशे वाली चीजों का पूर्ण बहिष्कार। (7) अंगरेजी की एक कहावत है ‘दिन के भोजन के बाद कुछ समय तक विश्राम करो तथा रात्रि के भोजन के पश्चात् एक मील टहलो। मानसिक तथा बौद्धिक परिश्रम लगभग 1 घंटे तक मत करो। जल्दी जल्दी खाना खाया और आफिस या स्कूल भागे, इससे तो हानि होगी ही। (8) कच्चा शाक, तरकारी, फल आदि प्रति भोजन के साथ करो। (9) नियमित व्यायाम, नियमित जीवन, साफ पाखाना, इन चीजों को न भूलो। (10)आधा पेट खाने से भरो, एक चौथाई पानी के लिए तथा एक चौथाई हवा के लिए खाली रखो। पेट सिकुड़ तथा फैलकर कसरत करके भोजन को पचाता है। बेचारे पेट को ऐसा करने का अवसर तभी मिलेगा जब वह ठसाठस न भरा होगा। (11) जितना भोजन उससे दुगुना पानी पेट में जाय, तिगुनी कसरत शरीर से लो और चौगुना हंसो, प्रसन्न रहो। (12) गहरी साँस, स्वच्छ वायु, प्राणायाम, सूर्य-नमस्कार, टहलना, दौड़ना, नियमित स्नान, मालिश, शरीर की रगड़, धूप और वायु स्नान, पैखाना पेशाब न मारना, सोने के पूर्व तथा प्रातः सोकर उठने के बाद जल पीना, 24 घंटे से अधिक पाखाना के रूप में पेट में किये भोजन का कचरा न रहने पाये और सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात सप्ताह या 15 दिन में 24 घंटे का उपवास या कम से कम आध उपवास 12 घंटे का ही सही।
(श्री घनश्यामदास बल्दवा एम.ए., एम.काम.)
कहावत प्रसिद्ध है कि ‘भारतवर्ष में दूध की नदियाँ बहती थीं।’ कहने का तात्पर्य यह है कि भारतवर्ष में दूध की इतनी इफरात थी कि मनुष्य उसको पानी की तरह समझते थे। लेकिन यह बात आधुनिक भारत में कहाँ? यह तो प्राचीन समय की बातें हैं। कोई भी अतिथि आता तो उसका सत्कार दूध के लोटे से किया जाता था, जब कि अब यह चाय के प्याले तक ही सीमित रह गया है। गीता के अनुसार “कृषिगौरक्षावाणिज्यं वैश्य-कर्म स्वभावजन्म्”। लेकिन शहरों की तो कौन कहे, आज कल तो गाँवों में भी गोपालन नहीं होता। उस काल में दूध मनुष्यों के भोजन का एक मुख्य अंग था। दही, मक्खन, घी तथा दूध से बनी हुई दूसरी वस्तुएँ प्रचुरता से उपलब्ध थीं और बहुत सस्ती थीं। वे इतनी सस्ती थीं कि आधुनिक समय में तो उनको केवल कल्पना बताया जाता है, जबकि ये भाव सब सत्य थे। कौटिल्य (ईसा से 4 शताब्दी पूर्व) के समय में घी का भाव ।।।) मन था और दूध एक आने मन था। मुसलमानी काल में गायों के मारे जाने के कारण घी का भाव 1।=) मन था और दूध का भाव दो आने मन था। अकबर के समय में दूध का भाव।=) मन हो गया। भारत में विदेशी सरकार के आते ही ये सब भाव हवा हो गए और दूध का भाव चढ़कर 1॥) से 2) मन हो गया, लेकिन आज लिखते लेखनी काँपती है- दूध॥=) और ।।।) सेर भी मिल नहीं रहा है। अब कैसे भारतवासी अपनी स्वास्थ्य बनावें और बलशाली बनें?
दुधारू पशुओं में गाय और भैंस मुख्य हैं। वैसे तो बकरी का दूध भी मनुष्याहार के काम में लिया जाता है और कहीं-कहीं तो भेड़ ओर ऊँटनी का भी, परन्तु गो-दुग्ध की उत्तमता को कोई नहीं पहुँच सकता। आयुर्वेद ने गो-दुग्ध की बहुत प्रशंसा की है। इस दूध में जीवन तत्त्व, तन्तुकर तत्त्व, क्षार, स्नेह पदार्थ, शर्करा, पाचक रस आदि पूर्ण मात्रा में विद्यमान हैं।
भारत में मुसलमानी राज्य के होने के साथ ही गोवंश का ह्रास होना शुरू हो गया। मुस्लिम और अँग्रेजी सभ्यता केवल निरामिष भोजन को ही प्राकृतिक भोजन नहीं मानती हैं और इसीलिए आमिष भोज्य की दृष्टि से गायें और दूसरे पशु काटे जाते हैं। भारत में अंग्रेजी फौजों की वृद्धि के साथ-साथ यह कार्य भी बढ़ता गया, यहाँ तक कि गत विश्व-युद्ध के समय तो यह चरम सीमा को पहुँच गया। गोवंश के ह्रास के कारणों को हम संक्षेप में इस प्रकार बाँट सकते हैं-
कसाईखाने (2) कसाई (3) गोचर भूमि का अभाव (4) अकाल (5) चिकित्सा का अभाव (6) अच्छे साँड़ो का अभाव (7) वनस्पति घी के कारखाने (8) चमड़े का निर्यात (9) किसानों की गरीबी (10) गन्दगी और अव्यवस्था (11) पशुओं का निर्यात (12) पिंजरा पोल और गौशालाओं की अव्यवस्था (13) दुर्बल गौ।
कसाईखाने और कसाइयों के लिए तो क्या कहें? वे तो क्षणिक लाभ के लिए भारत का एक बहुत बड़ा अहित कर रहे हैं। स्वतन्त्र भारत की सरकार का यह प्रथम कर्तव्य होना चाहिए कि इन कसाईखानों में दुधारू और काम में आने वाले पशुओं का वध बिलकुल रुकवा दे, अन्यथा भारत से दूध का अभाव नहीं हट सकता। इस देश में गोचरभूमि का भी बहुत अभाव है। प्राचीनकाल में गोचरभूमि के लिए पर्याप्त क्षेत्र छोड़ा जाता और किसी भी हालत में वह खेती से काम में नहीं लिया जाता था। आबादी के बढ़ने के साथ जब अधिक अन्न की आवश्यकता हुई, तो खेती की उन्नति के बजाय गोचरभूमि को लेकर अधिक क्षेत्रफल से काम निकाला जाने लगा और इस प्रकार गोचरभूमि का अभाव बढ़ता गया। गौ आदि पशुओं की वृद्धि के लिए अब गोचरभूमि की अधिक आवश्यकता है और भारत-सरकार को सब ग्रामों और जिलों में इसका उचित प्रबन्ध करना होगा। गोचरभूमि की अवस्था निम्न तालिका से स्पष्ट हो जाती है।
संसार के देशों में गोचरभूमि-कुलभूमि के अनुमान से (देश) (प्रतिशत) इंग्लैंड – 31% न्यूजीलैंड – 40% डेनमार्क – 33% अमेरिका – 16% भारत – 1/2%
समय-2 पर होने वाले अकालों ने हमारे पशुधन का बहुत ह्रास किया है। उस वक्त पशु की तो कौन कहे मनुष्यों का भोजन भी दुर्लभ हो जाता है, इसलिए उस वक्त बेचारे पशु बेमौत भूख की वजह से मारे जाते हैं। चारे के खलिहान और उचित व्यवस्था ही आने वाले अकालों का मुकाबला कर सकते हैं और इस ओर ही पूर्ण ध्यान देना है। पशुओं की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली तो मध्यकाल में भूल ही गये और उसके बाद पशुओं की उचित चिकित्सा न होने से बहुत से पशु निरर्थक मरने लगे। हर्ष की बात है कि अब भारतीय और प्रान्तीय सरकारों का ध्यान इस ओर आकर्षित हो रहा है, लेकिन फिर भी इसमें बहुत सुधार की गुंजाइश है। अच्छे साँड़ों के अभाव से गोवंश की नस्ल पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। नस्ल सुधार की ओर तो भारतीय बिलकुल ध्यान ही नहीं देते। जब तक अच्छे साँड़ों द्वारा नस्ल सुधार नहीं होगा, तब तक अच्छी और अधिक दूध देने वाली गायों का अभाव ही रहेगा। वनस्पति घी के कारखानों ने असली घी की उपयोगिता पर कुठाराघात किया है और इस प्रकार गोपालन में शिथिलता सी ही है। वनस्पति घी, घी नहीं है, वह तो तेल ही है और हानिकारक भी है। वनस्पति घी पर बहुत कड़े प्रतिबन्ध की आवश्यकता है। चमड़े के निर्यात ने भारतीय पशुओं का बहुत वध कराया है। विदेशी लोग जब चमड़े के ऊँचे दाम देने लगे हैं, तो हमारे यहाँ के स्वार्थी लोगों ने मृत पशुओं के चमड़े के बजाय जीवित पशुओं को चमड़े के लिए मारकर उनका चमड़ा भेजना प्रारम्भ कर दिया। चमड़े के लिए जीवित पशुओं को मारना कानून द्वारा बन्द होना चाहिए। किसानों की गरीबी ने पशु ह्रास पर बड़ा प्रभाव डाला है। बहुत से किसान गरीबी से तंग आकर अपने पशुधन को बेच देते हैं और खरीदने वाले होते हैं ये कसाई लोग ही। गरीबी के कारण न वे पशुओं को पूरा भोजन दे सकते हैं और न पूरी देखभाल कर सकते हैं और इस प्रकार पशुधन का ह्रास होता जा रहा है। गन्दगी और अव्यवस्था से भी बहुत से पशु मर जाते हैं। पशुओं का निर्यात तो कतई बन्द हो जाना चाहिए। भारत में पशुओं की विशेषकर दुधारू पशुओं की तो इतनी बहुलता है ही कहाँ कि हम पशुओं का निर्यात कर सकें। पिंजरापोल और गौशालाएँ भी उचित प्रकार से नहीं चलाई जा रही हैं। उनका उचित प्रबन्ध होना बहुत आवश्यक है क्योंकि ये संस्थायें तो जनता के सामने आदर्श रूप होनी चाहिये।
दूध देने वाले पशुओं की वर्तमान दशा तो अत्यन्त शोचनीय है ही। दूध की नदियों वाला देश भगवान् कृष्ण की जन्मभूमि और गोपालन के लिए संसार-प्रसिद्ध देश आज दुधारू पशुओं के मामले में बिलकुल पिछड़ा हुआ है। जहाँ कि देशों में गायें एक दिन में 30 सेर से 60 सेर तक दूध देती हैं, वहाँ यहाँ की गायें अधिक से अधिक 7-8 सेर प्रतिदिन ही दे सकती हैं। कोई-कोई गाय तो सेर दो सेर पर ही बस कर जाती है। बताइए, हम सच्चे गोपालक हैं या जर्मनी और डेनमार्क वाले, जहाँ की गाय, भैंसें इतना अधिक दूध देती हैं। इस मामले में भारत की शोचनीय दशा का अन्दाजा इस तालिका से लगाया जा सकता है-
[ देश ] [ दूध प्रति गाय (वार्षिक) ] हालैण्ड 89 मन डेनमार्क 85 मन न्यूजीलैण्ड 60 मन अमेरिका 40 मन बेल्जियम 78 मन जापान 70 मन रूस 28 मन भारत 6½ मन
भारत में दूध की बहुत कमी है। पाठकों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के हर एक प्राणी को औसतन 6 औंस दूध प्रति दिवस प्राप्त होता है, जबकि संसार के दूसरे देशों के निवासी इससे कहीं बहुत अधिक दूध इस्तेमाल करते हैं-
संसार के विभिन्न देशों में प्रति दिन प्रति मनुष्य दूध की खपत
1 फिनलैण्ड 63 औंस 2 स्वीडन 61 ,, 3 न्यूजीलैंड 56 ,, 4 आस्ट्रेलिया 45 ,, 5 नार्वे 43 ,, 6 डेनमार्क 40 ,, 7 इंग्लैंड 39 ,, 8 कनाडा 35 ,, 9 अमेरिका 35 ,, 10 हालैण्ड 35 ,, 11 जर्मनी 35 ,, 12 बेल्जियम 15 ,, 13 फ्रांस 30 ,, 14 पोलैंड 22 ,, 15 भारत 6 ,,
दूध की उत्तमता और उसके चमत्कारी गुणों के बारे में तो किसी को सन्देह नहीं हो सकता है। यह दूध की ही कमी है कि हमारे बालक और युवागण निस्तेज और बलहीन पाये जाते हैं। बड़े-बड़े शहरों में तो दूध इतना महंगा हो गया है कि मध्यम श्रेणी के मनुष्यों को तो यह उपलब्ध ही नहीं होता। महंगी के अतिरिक्त असली दूध भी प्रायः प्राप्त नहीं होता। सच पूछा जाय तो दूध आजकल पथ्य सम हो गया है और अस्वस्थता के समय ही इसका उपयोग काफी समझा जाता है। लेकिन भारतवर्ष के लिए जो कि आज स्वतंत्रता के द्वार पर खड़ा है और अपने देश की पूर्ण जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार है- यह स्थिति अत्यन्त भयावनी है। इसका शीघ्र ही इलाज होना चाहिए, अन्यथा भारतीय जनपद निस्तेज, शक्ति हीन, रोगी और अकर्मण्य हो जायगा।
भारतवर्ष में दहेज एक ऐसा असुर है, जिसकी क्रूरता से अगणित कन्याऐं अपना प्राण त्याग चुकीं, अनेकों वैधव्य का दुख भोग रही हैं, अनेकों परित्यक्ता बनकर त्रास पा रही हैं। कन्याओं के माता-पिता का तो यह असुर रक्त पान करके किसी योग्य ही नहीं रहने देता। कसाई और उसकी छुरी से बकरी जिस प्रकार डरती रहती है, उसी प्रकार दहेज कर भय कन्याओं के जीवन तथा उनके माता-पिताओं के साथ प्राणों पर बीतने वाली दिल्लगी किया करता है।
जिस साधारण आर्थिक स्थिति के व्यक्ति को कन्या का पिता बनने का दुर्भाग्य प्राप्त हो चुका है वह भुक्त-भोगी भली प्रकार जानता है कि किसी खाते-पीते घर का पढ़ा-लिखा लड़का पटाने में उसे कितनी दीनता, कितनी जलालत, कितनी गले न उतरने वाली कठोर शर्तें स्वीकार करने को विवश होना पड़ता है। इस कठिनाई ने कन्या और पुत्र के समान दर्जे की स्थिति ही बदल दी है, अब तो पुत्र का जन्म सौभाग्य का और कन्या का जन्म दुर्भाग्य का चिन्ह माना जाता है। पुत्र जन्म पर बाजे बजते हैं तो कन्या के जन्मते ही घर-घर में उदासी छा जाती है।
बालक-बालक के बीच माता-पिता की दृष्टि में भी ऐसे अन्तर उत्पन्न करने का हेतु प्रधानतया यह ‘दहेज’ का असुर ही है, जिसकी कल्पना जन्म के दिन ही कर ली जाती है और एक के साथ कुछ पाने की और दूसरे के साथ कुछ गवाने की दृष्टि उत्पन्न होने से स्नेह भाव में अन्तर आ जाता है। बच्चों के प्रति माँ-बाप की दृष्टि में ऐसी भेद बुद्धि उत्पन्न करा देना भी इस दहेज के असुर की ही माया है।
हर गृहस्थ में पुत्रों की भाँति कन्याऐं भी होती हैं, इसलिए कन्या की बारी आने पर उसे भी दहेज के बोझ से पिसना पड़ता है, इस प्रकार यह कटु अनुभव प्रायः सभी गृहस्थों को होता है, सभी दुखी और परेशान हैं और हर किसी को कन्या के अभिभावकों के रूप में दहेज की निन्दा करते देखा और सुना जा सकता है, किन्तु वही व्यक्ति जब पुत्र का पिता या वर पक्ष की स्थिति में आता है तो तुरन्त गिरगिट की तरह रंग बदल जाता है और दहेज को अपना अधिकार एवं प्रतिष्ठा का माध्यम और धन कमाने का एक स्वर्ण सुयोग मानकर उस अवसर से भरपूर लाभ उठाना चाहता है। मनुष्य का यह दोगला रूप देखकर आश्चर्य होता है कि थोड़ी सी देर में ही वह अपने अनुभव को भूल जाता है। यदि वर पक्ष के रूप में वह दहेज का समर्थक था तो अब कन्या पक्ष का बनने की स्थिति में अपना घर कुर्क कराने में क्यों झिझकता है। यदि कन्या पक्ष के रूप में दहेज को बुरा मानता है तो लड़के की शादी के अवसर पर बेचारे कन्या पक्ष वालों को अपनी जैसी कठिनाई में ग्रस्त मानकर उनके साथ सहानुभूति का बर्ताव क्यों नहीं करता। यह दुरंगी चाल दहेज के असुर को जीवित रहने में सहायक होती है और वचन तथा कार्य में भिन्नता बरतने वाले समाज-सुधारकों के लैक्चर तथा लेखों को एक कौतूहल मात्र समझे जाने की स्थिति से आगे नहीं बढ़ने देती।
हमें अपने विचार और कार्यों में एकता लानी होगी, यदि दहेज बुरा है तो लड़के के पिता के रूप में उसे समझाने को तैयार रहना होगा। यदि दहेज अच्छा है तो कन्या के पिता के रूप में भी उसे बिना शिकायत और रंज माने देना होगा। दुटप्पी चालें चलना हमारे नैतिक अधःपतन का चिन्ह है। पतित व्यक्ति चाहे वे धनी, विद्वान्, चौधरी, पंच कोई भी हों, कोई प्रभावशाली प्रेरणा देकर समाज का पथ-प्रदर्शन करने की क्षमता नहीं रखते। दहेज का विरोध जहाँ-तहाँ सुनाई पड़ता है पर उसके पीछे कोई बल नहीं होता क्योंकि वे विरोध करने वाले व्यक्ति ही कहनी और कथनी में अन्तर रखकर अपनी स्थिति उपहासास्पद बना लेते हैं। उनकी आवाज के पीछे कोई बल न होने के कारण यह सुधार आन्दोलन नपुँसक ही रहता है।
अब चौधरी, पंच और जातीय कर्णधारों द्वारा आयोजित सभा सम्मेलनों के प्रस्तावों पर निर्भर रहने से काम न चलेगा। इस विडम्बना की बहुत देर से परीक्षा होती चली आ रही है। अब कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। अन्यथा इस गिरती हुई आर्थिक स्थिति के जमाने में एक ऐसा सामाजिक संकट उत्पन्न हो जायगा जिसमें “जीवित रहते हुए आत्म-हत्या” करने जैसे कष्ट से कम त्रासदायक अनुभव न किया जायगा।
इस दिशा में लड़के और लड़कियाँ पहल कर सकते हैं। चालीस-पचास वर्ष से ऊपर की आयु के माता-पिता प्रायः अपना साहस खो बैठते हैं। लड़के का पिता लोभ नहीं छोड़ना चाहता और लड़की का पिता यह नहीं सोच सकता कि किसी निर्धन घर में कन्या को दे दूँ तथा जब तक सुयोग्य लड़का न मिले तब तक सयानी कन्या को अनिश्चित काल के लिए अविवाहित रहने दूँ। इन वयोवृद्धों को लाठी की तरह सहारा देकर लड़के और लड़कियाँ उन्हें रास्ता बता सकते हैं। भावनाशील लड़कों को प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि अपनी अपेक्षा निर्धन घर की कन्या से बिना प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दहेज के शादी करूंगा। अभिभावकों से उन आदर्शवादी युवकों को स्पष्ट शब्दों में कहना पड़ेगा कि प्रत्यक्ष ही नहीं, अप्रत्यक्ष दहेज की बात चलाई जायगी तो वह उस विवाह को करने के लिए कदापि तैयार न होंगे।
इसी प्रकार मनस्वी कन्याएँ अपना साहस बटोर कर अपने घर वालों को बता दें कि वे दहेज माँगने वाले सामाजिक कोढ़ी अमीरों के यहाँ जाने की अपेक्षा निर्धन और घटिया स्थिति के घरों में जाने के लिए तैयार हैं पर दहेज के साथ सम्पन्न घरों में तथा कथित ‘सुशिक्षित’ लड़कों के साथ विवाह करना पसंद न करेंगी। अनुकूल स्थिति न आने पर कन्याओं को आजीवन कुमारी रहने का व्रत लेना चाहिए और अपने त्याग से एक दूषित वातावरण को तोड़ने का आदर्श उपस्थित करना चाहिए। माता-पिता को आर्थिक संकट में डालने से बचाने के लिए कई कन्याऐं आत्म हत्याएँ कर चुकीं हैं, पर उससे अच्छा मार्ग यह आत्म-त्याग का है। कन्याओं के ऐसे आत्म-त्याग भी दहेज के लोभी रक्त पिपासुओं की आँखें खोलने में कुछ कारगर हो सकते हैं।
अर्थ-लोलुप वर पक्ष वालों को दहेज की बुराई की जड़ माना जाता है। बहुत अंशों में यह ठीक भी है, पर कन्या पक्ष वालों को भी उस सम्बन्ध में सर्वथा निर्दोष नहीं माना जाता। वे आर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से लड़के ढूँढ़ते हैं। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है, उन्हीं पर सैकड़ों लड़की वाले टूटते हैं, फलस्वरूप उन लड़के वालों का दिमाग खराब हो जाता है और लड़के को नीलाम की बोली पर चढ़ा देते हैं। यदि लड़की वाले अपेक्षाकृत निर्धन घर के और कम “सुशिक्षित” लड़के ढूँढ़कर सामान्य स्थिति के सम्बन्ध से काम चलाते तो अधिक अमीर और खूबसूरत लड़कों पर जो भीड़ टूटती है वह न टूटे और दहेज का प्रश्न बहुत अंशों तक हल हो जाय। दहेज न देने के साथ-साथ लड़की वालों को इसके लिए भी तैयार रहना चाहिए कि ऊँची कीमत जेवर कपड़े की न तो माँग की जाय और न उनका प्रदर्शन कराया जाय। अच्छा तो यह जो कि ‘भार्गव’ समाज में प्रचलित रिवाज की भाँति कन्या का पिता ही जो कुछ जेवर कपड़ा स्वेच्छापूर्वक दे सकता हो, वह देकर कन्या को विदा कर दे। विवाहोत्सव की भारी खर्चीली रिवाजें बन्द करके कम से कम व्यक्तियों की उपस्थिति में यह एक साधारण पारिवारिक आयोजन मात्र बना लिया जाय। दहेज का जितना धन इन प्रदर्शनों और तूमाल बाँधने की विडम्बना में खर्च हो जाता है, इसे बन्द करना भी दहेज बन्द करने के समान आवश्यक है।
अब स्थिति ऐसी आ गई है कि हमारे बच्चों को प्राण संकट में डालने वाले इस दहेज रूपी असुर का विनाश करने को किन्हीं ठोस आधारों पर कदम उठाया जाना चाहिए। यद्यपि व्यापक अर्थ लोलुपता से उत्पन्न अनेक अनैतिकताओं की भाँति यह भी एक सामाजिक अनैतिकता है, जिसके लिए केवल वर के पिता को ही दोषी मान लेना और केवल उसी के सुधरने से सब कुछ ठीक हो जाने की आशा नहीं की जा सकती। कन्या वाले भी अमीर घर इसलिए ढूँढ़ते हैं कि इनकी कन्या को उत्तराधिकार के विपुल धन की स्वामिनी तथा बहुमूल्य आभूषणों से सुशोभित बनने का अवसर मिले। उन्हें भी अपना यह दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा। विवाह योग्य लड़के और लड़की यदि साहस से कार्य लें तो भी इस सत्यानाशी प्रथा को बदलने तथा गलत तरीके से सोचने वाले माँ-बापों को सही तरीके से सोचने के लिए विवश करने में महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं।
समय की माँग है अब दहेज बन्द होना चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि हमारी ही भाँति अनेक बुद्धिमान व्यक्ति सोच रहे हैं और दहेज के विरुद्ध तगड़ा मोर्चा लगाने की तैयारी में संलग्न हैं। आगरा-नौबस्ता निवासी पं. मुकुटबिहारीलाल शुक्ल बी. ए. एल-एल. बी. अपनी कन्या का विवाह बिना दहेज दिये बड़े आदर्श के साथ करने में सफल हो चुके हैं। बरेली के सुप्रसिद्ध कथा वाचक तथा ‘राधेश्याम रामायण’ के निर्माता पं. राधेश्यामजी सुप्रसिद्ध धनीमानियों में हैं, उनने भी अपनी सुशिक्षित विवाह योग्य नाती-नातनियों का विवाह बिना दहेज के ही करने का निश्चय किया है। जिन्हें आवश्यकता है- “पं. राधेश्याम शर्मा कथावाचक बरेली” इस पते पर उनसे अधिक जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हम चाहते हैं कि अखंड-ज्योति तथा गायत्री परिवार के मनस्वी लड़के-लड़कियाँ तथा वर-कन्याओं के अभिभावक उपरोक्त भावनाओं के अनुसार दहेज के असुर का दमन करने के लिए कुछ वास्तविक एवं ठोस आदर्श उपस्थित करने के लिए कदम उठावें।
विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के समय देश भर में 108 यज्ञों के आयोजन का संकल्प किया गया था, प्रसन्नता की बात है वह आगामी गुरु पूर्णिमा-आषाढ़ सुदी 15 को पूर्ण होने जा रहा है। धार्मिक भावनाओं की लहरें बढ़ रही हैं और शुभ कर्मों के लिए लोगों में उत्साह पैदा हो रहा है। विभिन्न स्थानों के गायत्री प्रेमी अपने-अपने यहाँ मथुरा के यज्ञ के आधार पर अनेक व्यक्तियों को भागीदार बनाने के प्रयत्न में लगे हुए हैं और उनके द्वारा बड़ी संख्या में गायत्री जप का आयोजन हो रहा है। आषाढ़ पूर्णिमा के दिन स्थान-स्थान पर सामूहिक हवन होंगे। 24 करोड़ जप और 24 लक्ष आहुतियों का अनुमान किया गया था- पर अब ऐसा लगता है कि इससे कहीं अधिक होगा।
प्रायः सभी यज्ञों में हमें आमन्त्रित किया गया है, परन्तु चूँकि उन दिनों इन सभी 108 यज्ञों का संरक्षण और रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन का बहुत भारी उत्तरदायित्व होने के कारण हमारा मथुरा एक स्थान पर ही रहना आवश्यक है। इसलिए इस अवसर पर कहीं भी जा सकना सम्भव नहीं। इस विवशता के लिए सभी से क्षमा प्राप्त हो जाने की आशा है। जिनके निमन्त्रण हैं उनके यहाँ इसी वर्ष किसी अन्य अवसर पर आने का प्रयत्न करेंगे। गायत्री परिवार के सदस्यों के घर परिवार को देख लेने, उस क्षेत्र के धर्म-प्रेमियों में गायत्री उपासना के लिए उत्साह पैदा करने तथा साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को व्यापक बनाने के उद्देश्य से एक देश व्यापी दौरा करने का विचार अवश्य है। हर महीने इसके लिए एक सप्ताह निकालते रहने का विचार है। जहाँ के परिजनों का अधिक उत्साह एवं आग्रह होगा वहाँ के प्रोग्राम को प्राथमिकता दी जायगी।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर होने वाले यज्ञों में ‘ब्रह्म-भोज’ के रूप में ज्ञानदान के ब्रह्मदान की प्रधानता रहनी चाहिए। जितना व्यय भोजन कराने में करना हो उतने पैसे का सस्ता गायत्री साहित्य मँगाकर वितरण करने या आधे-चौथाई मूल्य में बेचने का आयोजन करना चाहिए। इस प्रकार किया हुआ ज्ञान दान का ब्रह्म-भोज किसी को एक समय पूड़ी-पकौड़ी खिला देने से अधिक महत्वपूर्ण है। प्रत्येक यज्ञ में इस प्रकार का ‘ब्रह्म-दान’ आवश्यक है।
शुभ कार्यों में सहयोग देना, सत्पुरुषों की सद्भावनाओं का सम्मान करना, उन्हें उत्साह देना, अभिनन्दन करना तथा कृतज्ञता प्रकट करना हमारा परम पुनीत कर्तव्य है। विशद् गायत्री महायज्ञ में संरक्षक तथा भागीदार बनने वाले, पूर्णाहुति में पधारने वाले, आर्थिक शारीरिक या भावनात्मक सहयोग देकर उस महान् आयोजन को सफल बनाने वालों के लिए गत अंक में कृतज्ञता प्रकट कर चुके हैं। अब विशद् गायत्री महायज्ञ के उन सब सहयोगियों तथा आगामी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विभिन्न स्थानों पर होने वाले 108 यज्ञों में भाग लेने वाले सज्जनों को कृतज्ञतापूर्ण अभिनन्दन करने के लिए सुन्दर ‘अभिनन्दन-पत्र’ छपवाये गये हैं। पर उन्हें डाक से अलग-अलग भेज सकना कठिन एवं बहुत व्यय साध्य है। इसलिए उत्साही परिजनों से प्रार्थना है कि अपने क्षेत्र के इन सहयोगी सज्जनों के नाम एवं संख्या भेजकर उसके लिए इकट्ठे ही अभिनन्दन-पत्र यहाँ से मँगालें और सहयोगी सज्जनों तक पहुँचाने का कार्य स्वयं करें।
पाँच पैसे वाली आठ अत्यन्त सस्ती पुस्तकों का सैट इस कार्य के लिए सर्वथा उपयुक्त है। गायत्री ज्ञान अंक अब समाप्त हो गया है। इसलिए यज्ञों के ब्रह्म-भोज के रूप में इन सस्ती पुस्तकों का वितरण उचित है, जो हवन न कर सकें वे भी गुरु पूर्णिमा के पुनीत पर्व पर ब्रह्मदान एवं ब्रह्म-भोज के लिए यह पुस्तकें मँगा सकते हैं। स्मरण रहे 6) से कम मूल्य की पुस्तकों पर डाक व्यय भी देना होता है इसलिए उससे अधिक की ही पुस्तकें मँगानी चाहिए।
गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ सुदी 15) को जहाँ-जहाँ सामूहिक हवन होंगे वहाँ की प्रारम्भिक सूचनायें अभी हमें प्राप्त हो रही हैं। पर संभव है उनमें कोई परिवर्तन हो जाय इसलिए सभी यज्ञ संयोजकों को चाहिए कि अपने आयोजन की निश्चित सूचना आषाढ़ बदी अमावस्या को यज्ञ से 15 दिन पूर्व फिर दे दें, ताकि यज्ञ में रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा विघ्नों से रक्षा के लिए संरक्षण यहाँ होता रहे। सामूहिक यज्ञ समाप्त होते ही उनका पूरा विवरण, आहुतियों की संख्या तथा उसमें भाग लेने वालों तथा सहयोग देने वालों के नाम, पते भेज देने चाहिए ताकि उनके लिए धन्यवाद तथा अभिनन्दन के सुन्दर प्रमाण-पत्र यहाँ से भेजे जा सकें। उसी सूची के साथ-साथ गत विशद् गायत्री महायज्ञ के अपने निकटवर्ती भागीदारों तथा संरक्षकों के नाम की लिस्ट भेजकर उनके लिए भी धन्यवाद-पत्र यहाँ से मँगा लेने चाहिए।
हर्ष की बात है कि विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद देश के कोने-कोने में गायत्री महायज्ञों के सामूहिक आयोजन एवं साँस्कृतिक सम्मेलनों की शृंखला तेजी से फैल रही है। गत मास झालरा पाटन में सवा लक्ष आहुतियों का एक विशाल यज्ञ हुआ था। इस मास गायत्री जयन्ती के अवसर पर सुकेत, कनवास, आंवा, जुल्मी, सुसनेर, जोधपुर आदि अनेकों स्थानों पर यज्ञ हुए, इनमें से पाँच स्थानों में तो हमारा स्वयं का पहुँचना भी संभव हो सका। अब गुरु पूर्णिमा पर छोटे और बड़े 108 से भी अधिक यज्ञ एक ही दिन में पूरे हो जाएंगे। गत वर्ष विशद् गायत्री महायज्ञ के अंतर्गत जिस प्रकार 125 करोड़ जप और 125 लाख आहुतियों का हवन हुआ था, उसी प्रकार मथुरा में तो नहीं, पर देशव्यापी गायत्री परिवार के विभिन्न क्षेत्रों में कुल मिलाकर इतना ही हवन और इतना ही जप हो जाने की आशा है। रामगंज मंडी में 24 लक्ष आहुतियों का हवन 101 हवन कुण्डों में होने वाला है। 11 कुण्डों में 10 दिन तक हवन चलाकर 24 लक्ष आहुतियाँ करने का झालावाड़ निवासियों ने भी निश्चय किया है। इन दो यज्ञों का हवन ही 48 लाख हो जाता है। 125 लाख पूरा होने में ऐसे ही केवल तीन बड़े यज्ञ और हो जाने की आवश्यकता है, सो प्राप्त सूचनाओं के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि रामगंज मंडी वालों ने राजस्थान प्रान्तीय गायत्री महायज्ञ का आयोजन करके जो पथ प्रदर्शन किया है उसके अनुसार उत्तर भारत के प्रायः सभी प्रान्त इस सम्बन्ध में एक दूसरे से पीछे न रहने का प्रयत्न करेंगे और 125 लाख ही नहीं 240 लाख आहुतियों तक की संख्या पहुँचा देंगे। राजस्थान ने जो साहस किया है उसे अन्य प्रान्त वालों ने एक चुनौती माना है और कोई भी अपनी हेटी कराने तथा पीछे रहने को तैयार नहीं है। सभी प्रान्तों में 101 कुण्डों के बड़े यज्ञों की हलचलें तथा तैयारियाँ आरम्भ हो रही हैं।
गायत्री तपोभूमि में अखण्ड गायत्री जप, घृत दीप की अखण्ड ज्योति, अखण्ड जलधारा का गायत्री अभिषेक भी चालू करने का प्रबन्ध किया जा रहा है। जेष्ठ सुदी 10 को गायत्री जयन्ती के दिन तपोभूमि में समारोहपूर्वक उत्सव मनाया गया तथा यह तीनों ही कार्य-क्रम चलाये गये। गुरु पूर्णिमा तक यह प्रयोग परीक्षात्मक चलेगा। इसके बाद इन तीनों आयोजनों को स्थायी कर देने का विचार है। नैष्ठिक गायत्री उपासक जो स्थिर चित्त से इन तीनों साधनाओं को संभालने का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले सकें इस योजना के लिए आवश्यक हैं, जो महिलायें तथा पुरुष इन अखंड साधनाओं में तन्मय होकर अपनी आत्मा में अखंड प्रकाश का अनुभव करना चाहें, उनका तपोभूमि स्वागत करेगी उनके भोजन आदि की सुविधा भी यहाँ मौजूद है।
गायत्री तपोभूमि में जो साँस्कृतिक शिक्षण शिविर पूर्णाहुति के बाद आरम्भ हुआ था वह गायत्री जयंती के दिन को आनन्दपूर्वक समाप्त हुआ। 40 छात्रों ने यज्ञादि की शास्त्रीय शिक्षा सफलतापूर्वक पूर्ण की।
सस्ती, सुन्दर, उपयोगी एवं अनुभवपूर्ण अपने ढंग की अनोखी पुस्तकें।
यह बाजारू किताबें नहीं हैं इनकी एक-एक पंक्ति गहरे अनुभव और अनुसंधान के आधार पर लिखी गई हैं। इन पुस्तकों की उपयोगिता, सुन्दरता और सस्तेपन की सर्वत्र भूरि भूरि प्रशंसा की जा रही है। आप भी इन पुस्तकों को मँगाइये और पढ़कर लाभान्वित हूजिये।
बिगड़े हुए स्वास्थ्य को बनाने वाली पुस्तकें
1. सूर्य चिकित्सा विज्ञान।=)
2. प्राण चिकित्सा विज्ञान।=)
3. स्वस्थ बनने की विद्या।=)
4. भोग में योग।=)
5.बुद्धि बढ़ाने के उपाय।=)
6. आसन और प्राणायाम।=)
7. तुलसी के अमृतोपम गुण।=)
8. महान जागरण।=)
9. तुम महान हो।=)
10. घरेलू चिकित्सा।=)
11. बिना औषधि के कायाकल्प।=)
12. पंचतत्वों द्वारा सम्पूर्ण रोगों का निवारण।=)
13. दीर्घ जीवन के रहस्य।=)
14. नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा।=)
15. स्वप्नदोष की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा।=)
16. दूध की आश्चर्यजनक शक्ति।=)
17. उन्नति का मूल मन्त्र ब्रह्मचर्य।=)
18. स्त्री रोग चिकित्सा।=)
19. बालरोग चिकित्सा।=)
20. निरोग जीवन का राजमार्ग।=)
21. कब्ज की सरल चिकित्सा।=)
22. चिरस्थाई यौवन।=)
23. सौंदर्य बढ़ाने के ठोस उपाय।=)
जीवन को आनन्द से भर देने वाली पुस्तकें
1. मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार।=)
2. धनवान बनने के गुप्त रहस्य।=)
3. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि।=)
4. मरने के बाद हमारा क्या होता है?।=)
5. मित्र भाव बढ़ाने की कला।=)
6. आकृति देखकर मनुष्य की पहचान।=)
7. संजीवनी विद्या।=)
8. अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति?।=)
9. हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?।=)
10. विचार करने की कला।=)
11. हम वक्ता कैसे बन सकते हैं।=)
12. लेखन कला।=)
13. सफलता के तीन साधन।=)
14. शिखा और सूत्र की रहस्यमय विवेचना।=)
15. जिन्दगी कैसे जिएँ?।=)
16. कुछ धार्मिक प्रश्नों का उचित समाधान।=)
17. अमृत कण।=)
18. प्रसिद्धि और समृद्धि।=)
19. हमारी पारिवारिक समस्यायें।=)
20. जीवन संगीत।=)
21. मनचाही सन्तान।=)
22. दाम्पत्ति जीवन का स्वर्ग।=)
उलझनों को सुलझाने वाली दार्शनिक पुस्तकें
1.ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?।=)
2. क्या धर्म? क्या अधर्म?।=)
3. गहना कर्मणोगति।=)
4. जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर तात्विक प्रकाश।=)
5. शास्त्र मन्थन का नवनीत।=)
6. शक्ति संचय के पथ पर।=)
7. आत्म गौरव की साधना।=)
8. प्रतिष्ठा का उच्च सोपान।=)
9. आन्तरिक उल्लास का विकास।=)
10. आगे बढ़ने की तैयारी।=)
11. आध्यात्मिक धर्म का अवलम्बन।=)
12. ब्रह्मविद्या का रहस्योद्घाटन।=)
13. ईश्वर और स्वर्ग प्राप्ति का सच्चा मार्ग।=)
14. विवेक सतसई।=)
15. आध्यात्मिक विद्या का प्रवेश द्वार।=)
16. भारतीय संस्कृति का बीजमन्त्र यज्ञोपवीत।=)
17. यज्ञोपवीत द्वारा धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति।=)
18. दैनिक जीवन में मनोवैज्ञानिक प्रयोग।=)
19. हमारे आन्तरिक शत्रु।=)
20. हँसी खुशी का जीवन।=)
21. क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?।=)
गृहस्थ को सिद्धयोगी बनाने वाली पुस्तकें!
1.मैं क्या हूँ?।=)
2. परकाया प्रवेश।=)
3. स्वर योग से दिव्य ज्ञान।=)
4. जीव जन्तुओं की मूक भाषा।=)
5. वशीकरण की सच्ची सिद्धि।=)
6. ज्ञान योग, कर्म योग, भक्ति योग।=)
7. यम नियम।=)
8. प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।=)
9. मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा।=)
10. हस्तरेखा विज्ञान।=)
11. गृहस्थ योग।=)
12. प्रार्थना के प्रत्यक्ष चमत्कार।=)
13. विचार संचालन विद्या।=)
14. सुखी वृद्धावस्था।=)
15. आत्मोन्नति का मनोवैज्ञानिक मार्ग।=)
16. प्रत्यक्ष फलदायिनी साधनायें।=)
17. योग के नाम पर मायाचार।=)
18. जादूगरी या छल।=)
19. चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग।=)
20. मधुर सम्बन्धों का रहस्य।=)
21. हमारी सभ्यता के कलंक।=)
गायत्री विद्या के अनुपम ग्रन्थ रत्न।
1.गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग)3॥)
2. गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग)3॥)
3. गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग)3॥)
4. गायत्री यज्ञ विज्ञान 3॥)
5. गायत्री के प्रत्यक्ष चमत्कार 3॥)
6. सचित्र गायत्री शिक्षा 2)
7. गायत्री चित्रावली 1॥)
8. गायत्री का मन्त्रार्थ 1॥)
9.गायत्री सहस्रनाम।=)
10. गायत्री का वैज्ञानिक आधार।=)
12. वेद-शास्त्रों का निचोड़ गायत्री।=)
13. गायत्री की सुलभ साधना।=)
14. गायत्री के चौदह रत्न (प्रथम भाग)।=)
15.गायत्री के चौदह रत्न (द्वितीय भाग)।=)
16. अनादि गुरु मन्त्र गायत्री।=)
17. विपत्ति निवारिणी गायत्री।=)
18. स्त्रियों को गायत्री अधिकार।=)
19. सचित्र गायत्री।=)
20. संक्षिप्त गायत्री हवन।=)
अत्यन्त सस्ती एवं सुन्दर वितरण योग्य पुस्तकें
1.गायत्री की गुप्त शक्ति —)।
2. सुख शान्ति दायिनी गायत्री —)।
3. गायत्री से बुद्धि विकास —)।
4. गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ —)।
5. गायत्री का अर्थ सन्देश —)।
6. स्त्रियों की गायत्री साधना —)।
7. गायत्री उपासना कैसे करें? —)।
8. गायत्री से यज्ञ का सम्बन्ध —)।
9. गायत्री चालीसा —)
10. गायत्री का तिरंगा चित्र —)
पुस्तक मँगाने के नियम
1- छह रुपये से कम मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च मँगाने वाले के जिम्मे होगा। जो इस प्रकार है- 1) से लेकर 3) तक की पुस्तकों पर।।।=), 3) से 5।।।= ) तक की पुस्तकों पर 1।।)
2- छः रुपये या इससे अधिक की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च हम अपना लगा देते हैं। इसलिए मँगाने वाले का लाभ इसी में है कि वे कम से कम छह रुपये की पुस्तकें मंगाये।
3- तीन रुपये से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती। यदि 3) से कम की पुस्तकें लेनी हों तो पुस्तकों का मूल्य और डाक खर्च।।।—) मिलाकर मनीआर्डर से पेशगी भेजना चाहिये।
4- हमारी पुस्तकें इतनी सस्ती हैं कि इन पर ग्राहकों को कोई कमीशन नहीं दिया जा सकता। कमीशन या कम मूल्य पर पुस्तकें लेने के लिए लिखा पढ़ी करना बिल्कुल व्यर्थ है।
पलाशीभिरवाप्नोति समदभिर्ब्रह्म वचंसम। पलाश कुसुमैर्हुत्वा सर्वमिष्टेमवाप्नुयात्॥
पलाश की समिधाओं से हवन करने पर ब्रह्म तेज की अभिवृद्धि होती है और पलाश के कुसुमों से हवन करने पर सभी इष्टों की सिद्धि होती है।
यवानां लक्ष होमेन घृतात्तायें हुताशने। सर्व काम समृद्धात्मा परां सिद्धिमवाप्नुयात्॥
यवों में घी मिलाकर एक लाख बार अग्नि में आहुति देने से सब कर्मों की सिद्धि होती है तथा परा सिद्धि प्राप्त होती है।
सर्वदा होम जप्याद्यैः पाठाद्यैश्च रणे जयः। अष्टाविंशभुजा ध्येया असिखेटकवत्करौ॥
अग्नि. पु. अध्याय 134 श्लो. 2
हमेशा हवन, जप और पाठ आदि से युद्ध में जय होती है। यज्ञ करते समय, हाथों में खंग और खेटक धारण किये अट्ठाइस भुजाओं वाली दुर्गा देवी का ध्यान करना चाहिये।
श्रीकामः शान्तिकामो वा ग्रह यज्ञं समारभेत्। वृष्टयायुः पुष्टिकामो वा तथैवाभिचरन्पुनः॥
आ. पु. अ. 164 श्लो. 1
लक्ष्मी की कामना करने वाला अथवा शान्ति की कामना करने वाला, ग्रहों का हवन करे। वृष्टि, आयु अथवा पुष्टि की कामना करने वाला उसी प्रकार नवग्रहों का हवन करें।
संसाध्येशानमन्त्रेण तिल होमो बशीकरः। जयः पद्मैस्तु दूर्वाभिः शान्तिकामः पलाशजैः॥ पुष्टिःस्यात्काकपक्षेण मृतिर्द्वेषादिकं भवेत्।
ग्रहक्षुद्र भयापत्तिं सर्वमेव मनुर्भवेत्॥
अग्नि. पु. अ. 307 श्लोक 20, 21
सिद्ध किये हुए ईशान मन्त्र में तिलों का हवन करने से सब वश में होते हैं। कमलों के हवन से जय की प्राप्ति होती है। शक्ति की कामना वाला दूव का हवन करें। पलाश के फूलों का हवन करने से पुष्टि होती है। काक पक्ष से सब दोषादिकों का अन्त होता है। क्षुद्र ग्रह, भय, आपत्ति, मानो सब ही नष्ट हो जाती हैं।
श्रीगेहे विष्णुगेहे वा श्रियं पूजां धनं लभेत्। आध्याक्तैस्तण्डुलैर्लक्षं जुहुयात्खदिरानले॥ राजा वश्योभवेद्वृद्धिः श्रीञ्चस्यादुत्तरोत्तरम्। सर्षपाम्भोऽभिषेकेण नश्यते सकला ग्रहाः॥
अ. पु. अ. 307 श्लोक 3, 4
लक्ष्मी के मन्दिर में अथवा विष्णु के मन्दिर में लक्ष्मी जी के यज्ञ से पूजा करके धन को प्राप्त करें। घी से मिले हुए आँवलों से खैर की अग्नि में एक लाख हवन करने से राजा वश में होता है और उत्तरोत्तर लक्ष्मी की वृद्धि होती है।
सरसों और पानी के अभिषेक करने से सब ग्रह दोष नष्ट हो जाते हैं।
ब्रह्म वर्चस कामास्तु पयसा जुहुयात्तथा। घृत प्लुतैस्तिलैर्ब्रहिं जुहुयात्सु समाहितः॥
ब्रह्म तेज की कामना करने वाला व्यक्ति सावधानी के साथ घृतयुक्त तिलों से और घी में हवन करे।
गायत्र्युत होमाञ्च सर्वपापै प्रमुच्यते। पापात्मा शक्ष होमेन पातेकभ्यः प्रमुच्यते॥
एक लाख आहुतियों से गायत्री द्वारा हवन करने से पापी मनुष्य भी पापों से छूट जाता है।
इसी प्रकार के अगणित प्रयोग शास्त्रों में भरे पड़े हैं। यदि इनका पूरा विधान उपलब्ध हो सके, खोजा जा सके तो भारत-भूमि पुनः प्राचीन काल की तरह स्वर्ण भूमि बन सकती है। इस शोध कार्य की वैज्ञानिक अनुसन्धान प्रणाली के लिए अपने जीवन को खपा देने वाले सच्ची लगन के निष्ठावान् व्यक्तियों की आज भारी आवश्यकता है।
*समाप्त*