(श्री शिवशंकर जी एम. ए.)
हंसती कली सुमन की भावा में बोला करती है, फागुन की बौरें अमराई में मधु रस भरती हैं, प्राची की अरुणाभ प्रभा में उदित उषा हंसती है, सपनों के संल्पों में जय की आशा बसती है,
पर यह किसने कहा कि मरुथल भी उपवन बन जाता!
दिव्य ज्योति संदेश लिये यह कौन उतरता आता!!
कहता हुआ कि जगो आज ही तो जगने की बेला, देखो सम्मुख लगा हुआ हैं जय, जागृति का मेला,
आज खुली नभ की पंखुड़ियां भू पर गंध लगाने, मत शूलों में भटक पान कर मेरे सति दीवाने,
अधरों पर हो नहीं प्रेम की किन्तु नेम की भाषा! इतना मधु पी रहे न कोई फिर जगती में प्यासा!!
गाओ युग के साथ, अश्रु की धार न हो एकाकी, स्वर्ग न माँगो यदि जगती में कहीं वेदना बाकी, अपनी सारी शक्ति ग्लानि के वश हो यों न मिटाओ, बहुजन हित,जन-जन के हित में जीवन प्राण लगाओ,
आत्म त्याग ही दिव्य लोक-मंगल का सच्चा पथ है! यदि क्षण भर भी रुके तुम्हारे वृत भी तुम्हें शपथ है!!
(श्री अनन्त शयनम् आयंगर, अध्यक्ष भारतीय लोकसभा)
मैं गत कुछ वर्षों से गम्भीरता पूर्वक इस विषय पर विचार कर रहा हूँ कि आज की वर्तमान स्थिति में ब्राह्मणों का क्या कर्तव्य होना चाहिए? भारतीय सभ्यता के आधार पर वाह भौतिकत्व त्याग तथा सेवा है। अतः यह उचित ही था कि ब्राह्मणों को प्राचीन समय में उच्च स्थान दिया गया।
सच्चा ब्राह्मण वह है, जो ब्रह्म वेत्ता हो अर्थात् ब्रह्मज्ञान तथा साक्षात बुद्ध को अर्थात् ब्रह्म के ज्ञान को प्राप्त कर लिया हो। पुरातन काल के ब्राह्मण, ब्रह्मविद्या का अध्ययन भी करते थे तथा उसका अध्यापन भी करते थे। उनके विचार में ब्रह्मविद्या सबसे ऊँची विद्या थी तथा अन्य सम्पूर्ण ज्ञान उसके अधीन थे। कठोपनिषद् में एक प्रश्न पूछा गया है कि जब ज्ञान प्राप्त किया गया हो तो शेष सब कुछ मालूम हो जाता है। उन लोगों ने इस रहस्य को समझ लिया था कि सम्पूर्ण विश्व एक है तथा अपरिवर्तनशील भीतरी सत्ता विद्यमान है। यह संपूर्ण विश्व की आत्मा है। शेष सब वस्तुएं उसी के अंग है।
इस ज्ञान प्राप्ति ने ही उन्हें पूर्ण जीवन व्यतीत करने तथा समत्व प्राप्त करने का सामर्थ्य प्रदान किया। इस ज्ञान ने ही मानव कार्यों में उनके आचार-व्यवहार को प्रभावित किया और उन्हें श्रेष्ठ रूप प्रदान किया था। उन्होंने विश्व तथा मानवता को भगवान् और सेवा का रूप समझा तथा उसकी पूजा की
यतः प्रवृत्तिर्भूतानाँ येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्च सिद्धिं विन्दति मानव॥
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को विश्वरूप दिखलाया, जब अर्जुन ने उनसे अपना वास्तविक रूप दिखाने के लिये कहा था। हमें प्रतिदिन के जीवन में प्रत्येक वस्तु में भगवान् की सत्ता स्वीकार करनी चाहिये, तथा सब जीवों को उसी की छाया समझना चाहिये—कहा भी है—
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगो परमो मतः॥
मनुष्यों में कोई बड़ा अथवा छोटा नहीं है। यदि सब जीव भगवान् के एक ही शरीर के अंग हैं तो एक अंग का दूसरे अंग से भेद नहीं किया जा सकता।
प्राचीन काल में छुआछूत की प्रथा का जो भी कारण रहा हो, परन्तु आज इसका व्यवहार अपराध माना जाता है। कानून की दृष्टि से यह ऐसा ही है, किन्तु इसे व्यवहार रूप में (अच्छी प्रकार से) समझ लेना चाहिए।
विद्या-विनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हास्तेनि। शुनि चैव श्वपाके च परिडताः समदर्शिनः॥
सच्चे ज्ञान का वर्णन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है—
सर्वभूतेषु येनैकम् भावमव्ययमीक्षते। अविभक्तं विभक्ते षु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्।
समत्व का व्यवहार करना चाहिये। अब ब्राह्मणों को जहाँ भी वे हैं, यह अपना कर्तव्य समझना चाहिए कि वे देहातों में जायें तथा जनता के हृदय में हरिजनों के प्रति वास्तविक परिवर्तन करें।
ज्ञान तब तक पूर्ण नहीं है, जब तक उस पर अनुष्ठान नहीं किया जाता। गीता में ज्ञान का वर्णन अहिंसा, सत्य, अक्रोध आदि के रूप में किया गया है। केवल व्यक्ति गत पवित्रता मनुष्य को उसकी मुक्ति की ओर नहीं ले जाती । इस पर आचरण भी करना चाहिए तथा इसके साथ सेवा की भावना भी आवश्यक है। गीता के 12 वें अध्याय में कहा है—भगवान् का सच्चा भक्त वह है जो भगवान् में निरन्तर ध्यान रखता है तथा अपनी आत्मा को विश्व-भावना में लगा कर भगवान से प्रेरणा शक्ति प्राप्त करके ऐसे संसार में प्रवेश करता है। जिसमें प्रेम के साथ-साथ सेवा की भावना भी है।
श्रीरामचन्द्र अपने बलिदानों के कारण ही अवतार बन सके। अपने राजतिलक के अवसर पर उन्होंने अपने भाई के पक्ष में अपना राज्य त्याग दिया था।
जातीय एकता समय की माँग है। पहले से ही अनेक मतभेदों (दृष्टान्त रूप में छुआछूत और वर्गगत भेदों की कट्टरता) कारण बहुत से लोग हिन्दुओं से अलग हो गये। यदि यही मनोवृत्ति अब भी जारी रही तो हमारे देश में और बहुत से पाकिस्तान बन जायेंगे।
वर्णों की व्यवस्था का मूल कारण समाज के कार्यों को सुविधा से पूर्ण करने के लिए ही वर्गीकरण किया जाना था, जिससे सहयोगी समाज का निर्माण किया जा सके। प्रतियोगिता ही एकमात्र कानून रह गया था। हमारे पूर्वजों ने अनुभव किया कि प्रतियोगिता के स्थान पर मानव-सम्बन्धों में सहयोग की स्थापना अवश्य की जानी चाहिये।
सम्मिलित कुटुम्ब एक समाजवादी इकाई है तथा एक देहात भी—जो कार्य करने के लिए संगठित किया गया था समाजवादी राज्य की एक बड़ी इकाई थी। किन्तु धीरे-धीरे यह विशेषता जाती रही तथा इसका स्थान उन नई सभ्यताओं ने ले लिया जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया। उन संस्थाओं को बचाने के लिए वर्ण-व्यवस्था की कोमलता ने कठोरता का रूप धारण कर लिया। जीवन में उदरपूर्ति के पुराने ढंग इस समय परिवर्तित हो चुके हैं। संस्कृत के अध्ययन की उपेक्षा होती है तथा ब्राह्मणों ने उदरपूर्ति के लिए अन्य बहुत से उपाय अपना लिये हैं, जिनसे वे अपने शरीर तथा आत्मा को एक स्थान पर केन्द्रित कर सके। बदली हुई परिस्थितियों में ब्राह्मणों का क्या दर्जा है अथवा उनका अपने तथा समाज के प्रति क्या कर्तव्य है? यह तो निश्चित ही है कि वह जीवन में अपनी उदरपूर्ति के लिए कोई भी मार्ग अपनाये, फिर भी वह जाति के लिए निःस्वार्थ सेवा तो कर ही सकता है। वह एक सच्चा पुरोहित बन सकता है, यदि वह अपने जीवन को सरल बना ले बलिदान करने के लिए तत्पर रहे तथा दूसरों की सेवा के लिए अपने आपको प्रवृत्त कर दे। जो भी कार्य वह करे वह सेवा तथा त्याग भाव की भावना से किया जा सकता है। वह सदैव शान्ति के लिए कार्य कर सकता है। समय आ गया है जब प्रत्येक व्यक्ति को सब वर्णों के कार्य करने हैं। प्रत्येक को ज्ञान की प्राप्ति करनी है तथा अध्ययन करना है। सब को क्षत्रिय के रूप में अपने देश के लिए संघर्ष करना है, राष्ट्र के उत्पादन में वृद्धि करनी है तथा आर्थिक विकास में योग देने के साथ-साथ मानवता की सेवा भी करनी है। जब संसार की सब जातियों ने युद्ध में एक दूसरे के साथ लड़ना आरम्भ कर दिया है, तब ऐसी स्थिति में केवल कुछ क्षत्रिय यह कार्य पूर्ण नहीं कर सकते और न केवल कुछ ब्राह्मण ही शिक्षा की समस्या को हल कर सकते हैं।
इसलिये प्रत्येक को सब कार्य आज की आवश्यकतानुसार करने होंगे। अलग रहने की भावना को छोड़ना होगा। पुराने दिनों में ब्राह्मण एक सच्चा पुरोहित होता था। पुरोहित शब्द एक आदर सूचक भावना का शब्द समझा जाता था तथा हमारे पूर्वज पुरोहित होने में गर्व अनुभव करते थे। वह व्यक्ति जो जाति तथा समाज के कल्याण के लिए विचार करता है तथा तदनुसार कार्यवाही करता है, वह पुरोहित है तथा वह उनका सखा, विचारक तथा पथप्रदर्शक बनता है।
इस देश के आर्थिक पुनर्निर्माण की समस्याओं की ओर भी आप सब का ध्यान निरन्तर आकर्षित होना चाहिए। हिन्दू तथा अन्य जातियों का एकमात्र भेद यह है कि हिन्दू अपने सब कार्य भगवान् के प्रति बलिदान की भावना से करता है। आप तब तक आदर प्राप्त नहीं कर सकते, जब तक आप सरल जीवन नहीं व्यतीत करते। आप ज्ञान की प्राप्ति न छोड़िए तथा सदैव सादा जीवन व्यतीत कीजिए। अन्य व्यक्तियों को भी ब्राह्मणों में सम्मिलित करना चाहिए। व्यवसाय इन ऊपर के भेदों का प्रतिरूप मात्र है। बहुत से अन्य व्यक्तियों को ब्राह्मणों में सम्मिलित किया जाना है। यही वह मार्ग है जिसके द्वारा पुराने दिनों में ग्रीक तथा अन्य लोग हिन्दुओं में सम्मिलित किये गये थे। विश्वामित्र क्षत्रिय होते हुए भी तपस्या के कारण ब्राह्मण बने। तथाकथित शूद्र वास्तव में शूद्र नहीं। जो भी भूमि पर कृषि कार्य करता है, वह वैश्य है।
हमारी सभ्यता तथा धर्म से सम्बन्ध रखने वाले सब ग्रन्थ संस्कृत में हैं अतः प्रत्येक हिन्दू को संस्कृत पढ़नी चाहिये, जिससे वह आर्य जीवन व्यतीत कर सके। संस्कारों को वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार अपनाया जाना चाहिए तथा जप-यज्ञ के स्थान पर द्रव्य-यज्ञ को स्थान प्राप्त होना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन में प्रत्येक मनुष्य को पवित्र जीवन व्यतीत करना चाहिए तथा उसे अन्य लोगों के लिए एक दृष्टान्त बनना चाहिए।
हमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए पूजा की समान पद्धति बनानी है तथा सबको गायत्री की शिक्षा देनी है। पुरोहितों के लिए संस्कृत की शिक्षा अपेक्षित है जिससे वे अर्थों को समझाकर पुरोहित का कार्य सम्पन्न कर सकें। प्रसिद्ध विद्वानों को ही मठाधीश का स्थान मिलना चाहिए। मठों को विद्या (ज्ञान) का पीठ (स्थान) बनाना चाहिए।
आध्यात्मिकता को पुनः स्थान प्राप्त होना तथा जीवन की उस आर्य पद्धति की पुनः स्थापना किया जाना जिसका आधार सेवा तथा बलिदान पर हो आवश्यक है सामाजिक मूल्य भी सेवा पर आधारित हो जिससे मनुष्य का भाईचारा (साहचर्य) फिर से स्थापित किया जा सके तथा प्रत्येक व्यक्ति के आचार व्यवहार में उन्नति तथा प्रगति हो सके। तभी संसार में स्थायी शान्ति स्थापित होगी।
(पं॰ जवाहर लाल नेहरू)
संस्कृति है क्या? शब्दकोष उलटने पर इसकी नेक परिभाषाएं मिलती है। एक बड़े लेखक का कहना है कि संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें मानी या गयी हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है। एक दूसरी परिभाषा में यह कहा गया है कि संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्ति यो,प्रशिक्षण,दृढ़ीकरण या विकास अथवा उनसे भिन्न अवस्था है। यह मन, आचार तथा रुचियों परिष्कृति या शुद्धि है। यह सभ्यता का भीतर प्रकाशित हो उठना है। इस अर्थ में संस्कृति कुछ भी चीज का नाम हो जाता है जो बुनियादी और अंतर्राष्ट्रीय या सार्वजनिक हैं।
कुछ लोगों ने हिन्दू संस्कृति मुस्लिम-संस्कृति और ईसाई-संस्कृति, की चर्चा की है। ये नाम मेरी समझ में नहीं आते, यद्यपि यह सब है कि जातियों और राष्ट्रों की संस्कृतियों पर बड़े-बड़े धार्मिक आँदोलनों का असर पड़ा है। भारत की ओर देखने पर मुझे लगता है कि भारतीय जनता की संस्कृति का रूप सामाजिक है और उसका विकास धीरे-धीरे हुआ है। एक ओर तो इस संस्कृति का मूल आर्यों से पूर्व मोह न जोड़ो आदि की सभ्यता तथा द्रविड़ों की महान सभ्यता तक पहुँचाता है दूसरी ओर, इस संस्कृति पर आर्यों की बहुत ही गहरी छाप है जो भारत में मध्य एशिया से आये थे। पीछे चलकर यह संस्कृति उत्तर-पश्चिम से आने वाले तथा फिर समुद्र की राह से पश्चिम से आने वाले लोगों से 05 बार बार प्रभावित हुई। इस प्रकार हमारी राष्ट्रीय संस्कृति ने धीरे-धीरे बढ़कर अपना आकार ग्रहण किया। इस संस्कृति में समन्वय तथा नये उपकरणों को पचाकर आत्मसात करने की अद्भुत योग्यता थी। जब तक इसका यह गुण शेष रहा, यह संस्कृति भी जीवित और गतिशील रही। लेकिन बाद
को आकर इसकी गतिशीलता जाती रही जिससे यह संस्कृति जड़ हो गयी और उसके सारे पहलू कमजोर पड़ गये। भारत के समग्र इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंद्वी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है, जो बाहरी उपकरणों को पचाकर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है और दूसरी वह जो विभाजन को प्रोत्साहन देती है, जो एक बात को दूसरी से अलग करने की प्रवृत्ति को बढ़ाती है। इसी समस्या का, एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी मुकाबला कर रहे हैं। आज भी कितनी ही बलिष्ठ शक्तियाँ हैं जो केवल राजनीतिक ही नहीं साँस्कृतिक एकता के लिए भी प्रयास कर रही हैं। लेकिन, ऐसी ताकतें भी हैं जो जीवन में विच्छेद डालती है, जो मनुष्य मनुष्य के बीच भेद-भाव को बढ़ावा देती हैं।
अतएव आज हमारे सामने जो प्रश्न है वह केवल सैद्धाँतिक नहीं है, उसका सम्बन्ध हमारे जीवन की सारी प्रक्रिया से है और उसके समुचित निदान और समाधान पर ही हमारा भविष्य निर्भर है। साधारणतः ऐसी समस्याओं के सुलझाने में नेतृत्व देने का काम मनीषी करते हैं, किन्तु वे हमारे काम नहीं आये। उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो इस समस्या के स्वरूप को ही नहीं समझते। बाकी लोग हार मान बैठे हैं। वे विफलता बोध से पीड़ित तथा आत्मा के संकट में ग्रस्त हैं और वे यह जानते ही नहीं कि जिन्दगी को किस दिशा की ओर मोड़ना ठीक होगा।
बहुत से मनीषी मार्क्सवाद और उसकी शाखाओं की ओर आकृष्ट हुए और इसमें सन्देह नहीं कि मार्क्सवाद ने ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण उपस्थित करके समस्याओं पर सोचने और उन्हें समझने के काम में हमारी सहायता की, लेकिन आखिर को वह भी संकीर्ण मतवाद बन गया और जीवन की आर्थिक पद्धति के रूप में उनका चाहे जो भी महत्त्व हो, हमारी बुनियादी शंकाओं का समाधान निकालने में वह भी नाकामयाब है। यह मानना तो ठीक है कि आर्थिक उन्नति जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है लेकिन जिन्दगी वही तक खत्म नहीं होती, वह आर्थिक विकास से कहीं ऊंची चीज है। इतिहास के अन्दर हम दो सिद्धाँतों को काम करते देखते हैं। एक तो सातत्य का सिद्धाँत है और दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धाँत परस्पर विरोधी से लगते हैं। लेकिन वे विरोधी हैं नहीं। सातत्य के भीतर भी परिवर्तन का अंश है। इसी प्रकार, परिवर्तन भी अपने भीतर सातत्य का कुछ अंश लिए रहता है। असल में हमारा ध्यान उन्हीं परिवर्तनों पर जाता है। जो हिंसक क्रान्तियों या भूकम्प के रूप में अचानक फट पड़ते हैं। फिर भी प्रत्येक भूगर्भशास्त्री यह जानता है कि धरती को सतह में जो बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं उनकी चाल बहुत धीमी होती है और भूकम्प से होने वाले परिवर्तन उसकी तुलना में अत्यन्त में तुच्छ समझे जाते हैं। इसी तरह क्रान्तियाँ भी धीरे-धीरे होने वाले परिवर्तन और सूक्ष्म रूपांतरण की बहुत लम्बी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण मात्र होती हैं। इस दृष्टि से रखने पर, स्वयं परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो परम्परा के आवरण में लगातार चलती रहती है। बाहर से अचल दिखने वाली परम्परा थी, यदि जड़ता और मृत्यु का पूरा शिकार नहीं बन गयी है, तो धीरे-धीरे वह भी परिवर्तित हो जाती है।
इतिहास में कभी कभी ऐसा भी समय आता है जब परिवर्तन की प्रक्रिया और तेजी कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। लेकिन साधारणतः बाहर से उसकी गति 06 दिखायी नहीं देती। परिवर्तन का बाहरी रूप का प्रायः निस्पंद ही दिखता है। जातियाँ जब अगति की अवस्था में रहती है तब उनकी शक्ति दिनों-दिन छीनती है, उनकी कमजोरियाँ बढ़ती जाती हैं। परिणाम यह होता है कि उनकी रचनात्मक कलाओं और प्रवृत्तियों का क्षय हो जाता है और अक्सर वे राजनीतिक दृष्टि से गुलाम भी हो जाती हैं।
बहुत दिनों तक बाहरी दुनिया से अलग रहने के कारण भारत का स्वभाव भी और देशों से भिन्न हो गया। हम ऐसी जाति बन गये जो अपने आप में घिरी रहती है। हमारे भीतर कुछ ऐसे रिवाजों का चलन हो गया जिन्हें बाहर के लोग न तो जानते हैं और न समझ ही पाते हैं। जाति-प्रथा के असंख्य रूप भारत के इसी विचित्र स्वभाव के उदाहरण हैं। किसी भी दूसरे देश के लोग यह नहीं जानते कि छुआछूत क्या चीज है तथा दूसरों के साथ खाने पीने या विवाह करने में जाति को लेकर किसी को क्या हर्ज होना चाहिए। इन सब बातों को लेकर हमारी दृष्टि संकुचित हो गयी । आज भी भारतवासियों को दूसरे लोगों से खुल कर मिलने में कठिनाई महसूस होती है। यही नहीं, जब भारतवासी भारत से बाहर जाते हैं तब वहाँ भी एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से अलग रहना चाहते हैं। हममें से बहुत लोग इन सारी बातों को स्वयंसिद्ध मानते हैं और हम यह समझ ही नहीं पाते कि इन बातों से दूसरे देश वालों का कितना आश्चर्य होता है, भावना को कैसी ठेस पहुंचती है।
भारत में दोनों बातें एक साथ बढ़ी। एक ओर तो विचारों और सिद्धांतों में हमने अधिक से अधिक उदार और सहिष्णु होने का दावा किया। दूसरी ओर हमारे सामाजिक आचार अत्यन्त संकीर्ण होते गये। यह विभक्त व्यक्ति त्व, सिद्धाँत और आचरण का यह विरोध आज तक हमारे साथ है और ओज भी हम उसके विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि अपनी दृष्टि की संकीर्णता और आदतों और रिवाजों की कमजोरियों को हम यह कह कर नजर अन्दाज कर देना चाहते हैं कि हमारे पूर्वज बड़े लोग थे और उनके बड़े-बड़े विचार हमें विरासत में मिले हैं, लेकिन पूर्वजों से मिले हुए ज्ञान एवं हमारे आचरण में भारी विरोध है और जब तक हम इस विरोध की स्थिति को दूर नहीं करते, हमारा व्यक्ति त्व विभक्त का विभक्त रह जायेगा।
जिन दिनों जीवन अपेक्षाकृत अधिक गतिहीन था, उन दिनों सिद्धाँत और आचरण का यह विरोध उतना उग्र दिखाई नहीं देता था। लेकिन, ज्यों-ज्यों राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों की रफ्तार तेज होती गयी इस विरोध की उग्रता भी अधिक से अधिक प्रत्यक्ष होती आयी है। आज तो हम आणविक युग के दरवाजे पर खड़े है । इस युग की परिस्थितियाँ इतनी प्रबल है कि हमें अपने इस आन्तरिक विरोध का शमन करना ही पड़ेगा और इस काम में कही हम असफलता सारे राष्ट्र की पराजय होगी और हम उन अच्छाइयों को भी खो बैठेंगे जिन पर हम आज तक अभिमान करते आये है।
जैसे हम बड़ी-बड़ी राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का मुकाबला कर रहे हैं, वैसे ही, हमें भारत के इस अध्यात्मिक संकट का भी सामना करना चाहिए। भारत में औद्योगिक क्रान्ति बड़ी तेजी से आ रही है और हम नाना रूपों में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों का यह अनिवार्य परिणाम है कि उनसे सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं, अन्यथा न तो हमारे वैयक्तिक जीवन में समन्वय रह सकता है न राष्ट्रीय जीवन में। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक परिवर्तन और औद्योगिक प्रगति तो हो, किन्तु, हम यह मान कर बैठें रह जायें कि सामाजिक क्षेत्र में हमें परिवर्तन लाने की कोई आवश्यकता नहीं है राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार समाज को परिवर्तित नहीं करने से हम पर जो बोझ पड़ेगा उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे, उसके नीचे हम टूट जायेंगे।
ईसा के जन्म के बाद की पहली शताब्दी और 07 उससे पहले के भारत की जो तस्वीर हमारे सामने आती है वह उस तस्वीर से भिन्न है जो बाद को मिलती है। उन दिनों के भारतवासी बड़े मस्त, बड़े जीवंत, बड़े साहसी और जीवन के प्रति अद्भुत उत्साह से युक्त थे तथा अपना सन्देश वे विदेशों में दूर-दूर तक ले जाते थे। विचारों के क्षेत्र में तो उन्होंने ऊँची से ऊंची चोटियों पर अपने कदम रखे और आकाश को चीर डाला। उन्होंने अत्यन्त गौरवमयी भाषा की रचना की और कला के क्षेत्र में उन्होंने अत्यन्त उच्चकोटि की कारयित्री प्रतिभा का परिचय दिया। उन दिनों का भारतीय जीवन घेरों में बन्द नहीं था और न तत्कालीन समाज में ही जड़ता की गतिहीनता की कोई बात थी। उस समय एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, समग्र भारतवर्ष में साँस्कृतिक उत्साह भी लहरें ले रहा था। इसी समय, दक्षिण भारत के लोग दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर गये और वहाँ उन्होंने अपना उपनिवेश स्थापित किया। दक्षिण से ही बौद्धमत का सन्देश लेकर बोधि-धर्म चीन पहुँचा। इस साहसिक जीवन की अभिव्यक्ति में उत्तर और दक्षिण दोनों एक थे और वे परस्पर एक दूसरे का पोषण भी करते थे।
इसके बाद, पिछली शताब्दियों का समय आता है जब पतन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भाषा में कृत्रिमता और स्थापत्य में सजावट की भरमार इसी पतनशीलता के प्रमाण हैं। यहाँ आकर हमारे विचार पुराने विचारों की आवृत्ति बन जाते हैं और कारयित्री शक्ति दिनों-दिन क्षीण होने लगती है। शरीर और मन, दोनों की साहसिकता से हम भय खाने लगते हैं तथा जाति-प्रथा का और भी विकास होता है एवं समाज के दरवाजे चारों ओर से बन्द हो जाते हैं। पहले की तरह बातें तो हम अब भी ऊँची-ऊँची करते हैं, लेकिन हमारा आचरण हमारे विश्वास से भिन्न हो जाता है।
हमारे आचरण की तुलना में हमारे विचार और उद्गार उतने ऊँचे हैं कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। बाते तो हम शान्ति और अहिंसा की करते हैं, मगर काम हमारे कुछ और होते हैं। सिद्धाँत तो हम सहिष्णुता का बघारते हैं, लेकिन भाव हमारा यह होता है कि सब लोग वैसे ही सोचें जैसे हम सोचते हैं और जब भी कोई हम से भिन्न प्रकार से सोचता है तब हम उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। घोषणा तो प्रति अनासक्त रहना हमारा आदर्श है, लेकिन, काम हमारे बहुत नीचे के धरातल पर चलते हैं और बढ़ती हुई अनुशासनहीनता हमें व्यक्ति और समाज, दोनों ही रूपों में, नीचे ले जाती हैं।
(श्री॰ लालजीरामजी शुल्क, एम॰ ए॰, बी॰ टी॰)
प्रसन्नता किसको प्यारी नहीं है। कौन ऐसा व्यक्ति होगा, जो प्रसन्न न होना चाहता हो। कौन ऐसा व्यक्ति होगा,जो प्रसन्न मनुष्य के समीप न ठहरना चाहता हो। हम सभी बालक को प्यार करते हैं। क्यों? इसीलिये न कि बालक उस प्रसन्नता में रहता है, जो हमें दुर्लभ है। खिला हुआ फूल सबको प्यारा है और मुरझाये हुए फूल का सभी तिरस्कार करते हैं। रोते हुए मनुष्य से सबका जी ऊब जाता है; हँसते हुए का सभी स्वागत करते हैं। उससे किसी का जी नहीं ऊबता। जिसका मन प्रसन्न नहीं उसके पास कुछ नहीं और जिसका मन प्रसन्न है, उसके पास सब कुछ है।
प्रसन्नता शक्ति की परिचायिका है। जिस मनुष्य के अन्दर आध्यात्मिक शक्ति है, वही प्रसन्न रह सकता है। प्रसन्नता स्वयं उस शक्ति की उत्पादिका भी है। जो मनुष्य जितना प्रसन्न रहता है, वह अपना आध्यात्मिक बल उतना ही बढ़ा लेता है। इतना ही नहीं, वह अपनी शारीरिक शक्ति की भी वृद्धि कर लेता है। मन प्रसन्न रहने पर शरीर की अमृत पैदा करने वाली ग्रन्थियाँ अपना काम भली प्रकार से करती हैं और शरीर में उन पदार्थों का प्रवाह जारी रखती हैं, जिनसे शरीर अक्षय बना रहता है और बढ़ता है। बिरला ही प्रसन्नचित्त मनुष्य रोगी मिलेगा।
प्रसन्नता मानसिक तप से प्राप्त की जाती है। बालक की प्रसन्नता प्रकृति-दत्त है। पर उसकी प्रसन्नता सहज ही भंग भी हो जाती है। प्रौढ़ मनुष्यों की प्रसन्नता पुरुषार्थ से उपलब्ध होती है। यह साधना से आती है यह प्रसन्नता प्रतिकूल परिस्थितियों से नष्ट नहीं होती। प्रौढ़ लोगों की प्रसन्नता ही वास्तविक प्रसन्नता है; क्योंकि वह स्थायी रहती है। इस प्रसन्नता को हम सभी लाभकर सकते हैं। इसके लिये हमें आध्यात्मिक शक्ति बढ़ानी पड़ेगी।
आध्यात्मिक शक्ति की वृद्धि उस शक्ति के बढ़ाने के उपायों को काम में लाने से हो सकती है। जिस प्रकार शरीर की शक्ति स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का पालन करने से बढ़ सकती है, उसी तरह मन की शक्ति भी आध्यात्मिक जीवन सम्बन्धी नियमों के पालन से बढ़ती है। संसार के सभी धर्म ग्रन्थों ने इस आध्यात्मिक शक्ति के बढ़ाने के उपाय बताये हैं। भारतीयों ने तो इस विषय का एक विज्ञान ही निर्माण कर दिया है।
आध्यात्मिक शक्ति के सञ्चय के चार उपाय योगवासिष्ठकार ने बताये हैं। वे ये हैं—शम, सत्संग, सन्तोष और विचार। मन का अनेक प्रकार से नियमन करना ही शम है, सात्त्विक उपवास, इन्द्रियनिग्रह आदि शम के ही अंतर्गत हैं। सत्संग से कुवृत्तियाँ निवृत्त होती है और सुप्रवृत्तियाँ सबल होती हैं तथा अनेक प्रकार के सद्विचार मन में उठते हैं, जो हमारे मन को काबू में लाने में सहायता करते हैं। दूसरे व्यक्तियों का आध्यात्मिक बल हमें अपने आपको सँभालने में गुप्त रूप से सहायता देता है और ज्ञान में हमारी रुचि बढ़ाता है। सन्तोष से हमारी शक्तियों का अपव्यय रुकता है। विचार के द्वारा हम भले-बुरे, सत्-असत् की पहचान करते हैं। मनुष्य विचार के द्वारा अपने आपको ऊँचा उठाकर परमपद को प्राप्त कर लेता है। पशुओं और बालकों में विचार करने की योग्यता नहीं हैं, अतएव वे परमपद की प्राप्ति नहीं कर सकते।
यदि हम एक ही शब्द में आध्यात्मिक उन्नति का उपाय बताना चाहे तो इतना ही कहना पर्याप्त है कि साँसारिक विषयों में मनका जाना रोकने से आध्यात्मिक शक्ति बढ़ती है और साँसारिक विषयों में उसके बेरोकटोक जाने से उसकी शक्ति घटती है। भगवान् श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं—
ध्यायतो विषयान् पुँसः संगस्तेषूपजायते। संगात् संजायते कामःकामात् क्रोधोऽभिजायते॥ क्रोधाद्भवति सम्मोहःसम्मोहात् स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात् प्रणश्यति॥
(गीता 2 । 62-63)
अर्थात् विषयों में रमण करना ही मनुष्य के लिये घातक है। प्रत्येक ऐसे विषय को मन से हटाते रहना चाहिये, जो प्रसन्नता में बाधक हो। अपनी हानि पर देर तक नहीं सोचना चाहिये। हानि की भावना प्रसन्नता का नाश कर देती है। इससे हमारी आध्यात्मिक शक्ति का भी ह्रास होता है। सब प्रकार की घटनाओं के अच्छे पहलू पर विचार करने से मन की प्रसन्नता बनी रहती है। संसार की प्रत्येक घटना के दो पहलू होते हैं। जिस मनुष्य का मन घटना के बुरे पहलू की ओर चला जाता है, वह अपनी प्रसन्नता को अपने ही हाथों नष्ट कर डालता है। इसके विपरीत जिसका मन अच्छे पहलू पर चला जाता है, वह अपने आपको प्रसन्न बनाये रखता है। प्रत्येक प्रकार की हानि से मनुष्य का कुछ न कुछ लाभ होता है और प्रत्येक लाभ से कुछ न कुछ हानि होती ही है। हानिकारक घटनाओं में लाभ को ढूँढ़ निकालना बुद्धिमानी का काम है। यदि कोई लाभ प्रत्यक्ष न दिखायी दे तो हमें यह समझना यह बड़े गौरव की बात है कि उन्होंने आधुनिक विज्ञान के विकासवाद सिद्धाँत को अब से हजारों वर्ष पूर्व समझकर उसके वास्तविक स्वरूप का निरूपण ऐसी सरल रीति से घर दिया था कि वैसा अभी तक आधुनिक विद्वान नहीं कर सके हैं। यह दूसरी बात है कि बाद में उसे जन साधारण के लिए बोधगम्य और मनोरंजक बनाने के लिए कुछ व्यक्तियों ने उसमें अनेक असम्भव या कहानी किस्सों की सौ बातों का समावेश कर दिया।
पुराणों के मतानुसार अवतारों की संख्या दस मानी गई है—मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि। इनमें पिछले पाँच तो मनुष्य शरीर धारी थे और इतिहासज्ञ भी किसी हद तक उनका अस्तित्व स्वीकार करते हैं। पर पहले पाँच ऐसे हैं कि उनके विषय में एक साधारण पाठक को संदेह होता है कि वे केवल कहानी किस्से की तरह हैं या उनके वर्णन में कोई सचाई भी है। आगे चलकर हम इसी विषय पर प्रकाश डालना चाहते हैं।
इसे तो प्रायः सभी विद्वान स्वीकार करते हैं कि यह विश्व पहले एक अव्यक्त पदार्थ के रूप में था जिससे आकाश, की उत्पत्ति और उससे क्रमशः वायु, अग्नि, जल पृथ्वी का रूपांतर होता गया। सभी पुराण ग्रंथों में यही सृष्टिक्रम बतलाया गया है कि “जगद्गुरुपुरुषोत्तम के समीप स्थित हुई प्रकृति जब क्षोभ (चंचलता) को प्राप्त हुई, तो उससे महत्त्व का प्रादुर्भाव हुआ, जिसे समष्टि-बुद्धि भी कहते हैं। फिर उस महत्तत्व से अहंकार उत्पन्न हुआ। अहंकार से सूक्ष्म तन्मात्रायें और एकादश इन्द्रियाँ प्रकट हुई। तत्पश्चात तन्मात्राओं से पञ्च महाभूत प्रकट हुए जो इस स्थूल जगत के कारण हैं। नारदजी! उन भूतों के नाम हैं—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी। ये क्रमशः एक-एक के कारण होते हैं।” आधुनिक पश्चिमी वैज्ञानिक भी सृष्टि के आदि की खोज करते हुए ऐसे ही निष्कर्ष पर पहुँचे हैं।
जब हम उपरोक्त सृष्टि-क्रम पर विचार करते हैं तो ज्ञान होते हैं कि अग्नितत्व तक तो किसी प्रकार के स्थूल शरीरधारी जीवों का प्रश्न उठ ही नहीं सकता। पर जल में प्राणियों की उत्पत्ति सम्भव है। इसलिए विकासवादी विद्वानों ने सबसे पहले मछलियों के उत्पन्न होने की ही कल्पना की है। उनका कहना है कि जब परिवर्तन होते होते हमारी पृथ्वी का वातावरण जीवधारियों के रह सकने लायक स्थिति में आ गया तो जल में एक कोषीय बहुत छोटे जीव पैदा हुए, जो धीरे धीरे मछलियों और फिर बड़ी मछलियों के रूप में बदलते चले गये। इस प्रकार पृथ्वी पर चैतन्य जीवन का सर्वप्रथम प्रादुर्भाव मछली के रूप में हुआ, जिसमें ‘मत्स्यावतार’ की संज्ञा देना सर्वथा तर्क-संगत है। पुराणों में कहा गया है कि आरम्भ में ब्रह्माजी को एक बहुत छोटी सी मछली दिखायी पड़ी। उन्होंने उसे कमण्डल में डाल दिया तो वह कमंडल के बराबर हो गई। तब उन्होंने उसे तालाब में डाल दिया तो वह तालाब के बराबर बन गई। फिर उसे नदी में डाला गया तो उसका आकार नदी के बराबर हो गया। तब उसे समुद्र में डाला गया और वह समुद्र में विशालकाय हो गई। वैज्ञानिकों का भी मत है कि मत्स्य-युग में समस्त संसार मछली मय ही था क्योंकि जल के सिवाय दूसरे तत्व का अस्तित्व ही नहीं था और समयानुसार उन मछलियों का आकार भी बढ़ते बढ़ते पर्वतों के समान हो गया था। आजकल भी ह्वेल आदि मछलियां चार-चार हजार मन की अर्थात् हाथी से बीस पच्चीस गुनी तक भारी पाई जाती है। अतएव उस मत्स्य-युग में अगर सबसे बड़ी मछलियों का आकार लाख दो लाख मन तक भी पहुँच गया हो तो आश्चर्य की बात नहीं।
करोड़ों वर्ष तक परिवर्तन होते होते जल में मिट्टी जमने लगी और पृथ्वी का आविर्भाव होने लगा। उस समय पृथ्वी भाग बहुत नगण्य था, अधिकाँश भाग समुद्र का ही था। इसलिये उस परिस्थिति में ऐसे जीवों का आविर्भाव होने लगा जो मुख्यतः तो जल में ही रहते थे, पर कभी-कभी स्थल पर भी आ 10 सकते थे और खुली हवा में भी साँस ले सकते थे। यही जीव कछुआ या कच्छप जातीय था। जैसे जैसे पृथ्वी का भाग बढ़ता गया और जल से ऊँचा होता गया ऐसे जीवों की संख्या बढ़ती गई। यह जीव शरीर संगठन में मछलियों से उच्चतर था क्योंकि वह जल और स्थल दोनों जगह जीवन धारण करने में समर्थ था। यही कच्छपावतार था।
जब जल में से पृथ्वी का भाग पर्याप्त परिमाण में निकल आया और जल से इतना ऊँचा हो गया कि उस पर समुद्र की लहरों का आना रुक गया तो मिट्टी से तरह-तरह की तीसरी श्रेणी की वनस्पतियाँ उत्पन्न होने लगीं। तब पृथ्वी पर ऐसे जीवों का आविर्भाव हुआ जो वनस्पतियों को खाकर स्थल पर भली प्रकार जीवन निर्वाह कर सकते हैं और जल के भीतर जाने की जिनको कोई आवश्यकता नहीं। आरम्भ में यह जीव शूकर जातीय ही थे क्योंकि समुद्र से दूर हो जाने पर भी जल की अधिकता के प्रभाव से पृथ्वी का ज्यादा भाग दलदल के रूप में था और शूकर ही ऐसा प्राणी है जो स्थल का जीव होते हुये भी दलदल और कीचड़ में भली प्रकार रह सकता है। इस प्रकार जीव-जगत में विभिन्न अंगों से युक्त प्राणियों का आविर्भाव होकर विकास की शृंखला में एक नई कड़ी जोड़ी गई जिसे वराह अवतार की संज्ञा दी जा सकती है।
करोड़ों वर्षों तक स्थल का भाग बढ़ता गया और उसमें पर्वतों तथा जंगलों की वृद्धि होती रही। जब आहार की तरह तरह की सामग्री उत्पन्न हुई तो उसके अनुकूल तरह-तरह के चतुष्पद तथा अन्य प्रकार के जीव जन्तु भी बढ़ने लगे और कुछ समय में उनकी हजारों-लाखों किस्में हो गई। यद्यपि ये जीव एक दूसरे से बहुत भिन्नता रखने वाले थे पर वे थे पशुजगत के प्राणी ही। उनमें आहार, निद्रा, भय, मैथुन की प्रवृत्तियाँ तो काफी विकसित हो गई थीं, पर बुद्धि या ज्ञान का अस्तित्व उनमें न था, जिसके आधार पर ही मनुष्य और पशु का पृथक्करण किया जाता है।
जैसे जैसे पशुओं की संख्या बढ़ती गई उनमें जीवन-संघर्ष बढ़ता गया। शक्ति शाली पशु अपने से निर्बलों को मार कर खाने लगे या सुविधापूर्वक आहार मिल सकने योग्य स्थानों से उनको भगाने लगे। इससे निर्बलों को आत्मरक्षार्थ जीवन निर्वाह के अन्य साधनों की खोज करनी पड़ती थी। इस प्रकार जीवन-संघर्ष के परिणाम स्वरूप में सामान्य बुद्धि का विकास होने लगा और लाखों वर्षों की प्रगति के पश्चात् दुनिया में ऐसे प्राणियों का आविर्भाव हुआ जिनमें बुद्धि का अंश काफी बढ़ गया, पर मनुष्योचित ज्ञान का उनमें अभाव ही था। ऐसे प्राणियों को जो पशु और मनुष्य के बीच में थे हम न तो पशु कह सकते हैं और न मनुष्य। वे आधे पशु और आधे मनुष्य माने जा सकते हैं। आजकल उनके उदाहरण स्वरूप गोरिल्ला, औरंगउटंग आदि बनमानुष जातियाँ बतलाई जा सकती हैं। संसार में ऐसे आधे पशु तथा आधे मानव गुण और आकृति वाले प्राणियों के आविर्भाव को यदि ‘नर-सिंह’ के नाम से पुकारा जाय तो कोई अनुचित बात नहीं है। परिवर्तन और विकास का काल चक्र जीव-जगत को इस चौथी सीढ़ी पर आकर रुक नहीं गया, वरन् परिवर्तन के नियमानुसार बराबर अग्रसर होता गया। पृथ्वी के जलवायु और पैदावार में भी बहुत अन्तर पड़ने लगा और उसी के अनुसार प्राणियों की स्थिति भी बदलती रही। एकबार ज्ञान का अंकुर उग आने पर उसकी वृद्धि भी अनिवार्य थी। धीरे-धीरे वनमानुष की जानकारी बढ़ती गई और कुछ लाख वर्ष बाद ऐसा समय आया, जब कि मनुष्य कहलाने योग्य प्राणियों का जगत में आविर्भाव हो गया। इससे यह आशय निकालना कि मनुष्य बन्दर या वनमानुषों की ‘संतान’ है ठीक न होगा, जैसा कि अनेक मंदबुद्धि मजाक उड़ाने की दृष्टि से कहा करते हैं। वरन् इसका मतलब इतना ही है कि वनमानुषों के पश्चात् जीव जगत की पाँचवीं श्रेणी का आविर्भाव हुआ, वह कहाँ से और कैसे हुआ, इसे ठीक ठीक जान सकने का अब कोई उपाय नहीं है। सब अपने अपने अनुमान से काम लेते हैं।
पर प्रारम्भ में इस जीव की मानवीय शक्तियों बहुत ही सीमित और अप्रस्फुटित दशा में थीं, जैसी कि हम अब भी बहुत पिछड़े हुये जंगली लोगों में पाते हैं। आकर से वे मनुष्य अवश्य दिखलाई पड़ते हैं और शिकार आदि कार्यों में थोड़ी बहुत बुद्धिमत्ता संगठन शक्ति का परिचय भी देती हैं, पर उनमें न तो सामाजिक होती है और न कोई अन्य उच्च श्रेणी का मानवीय गुण ही। इसलिये मानवता तथा बुद्धि की दृष्टि से वे बहुत छोटी श्रेणी के माने जाते हैं और उनको वामन (बौना) कहना अनुपयुक्त नहीं।
इस प्रकार भूमंडल पर प्रथम जीवधारी-मछली से लेकर मनुष्य तक के आविर्भाव की ये घटनायें विकास शृंखला की पाँच स्पष्ट कड़ियाँ हैं। अथवा प्राणी की प्रगति की पाँच सीढ़ियाँ मानी जा सकती हैं। इनमें से प्रत्येक जीव अपने पूर्ववर्ती जीव की अपेक्षा अधिक इन्द्रिय जन्य योग्यता रखने वाला था, और कार्यक्षम था। इन पाँच सीढ़ियों या दर्जों को यदि हम जीवात्मा का एक नये रूप में परिवर्तन या एक नया अवतार कह दें तो हमारी सम्मति में इसमें कोई अत्युक्ति नहीं है।
जैसा हम ऊपर बतला चुके हैं, वामन अवतार एक जी मनुष्य के रूप में तो पहुँच गया पर ज्ञान और संस्कृति की दृष्टि से उसका विकास अभी शेष था। अगले पाँच अवतार-परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि मानवीय सभ्यता के पाँच विभिन्न युगों के परिचायक हैं। इनमें से प्रत्येक को अपने युग का अगुआ भी कह सकते हैं। इस समय ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो हिन्दुओं के पुराणों को लड़कों की कहानियों से बढ़ कर मानने को तैयार नहीं, पर जब वे देखेंगे कि पुराण कारों ने पाँचों अवतारों के तथ्य को कहानी के रूप में लिखते हुए भी जीव-विकास की शृंखला का ठीक उसी क्रम से वर्णन किया है जैसा वैज्ञानिकों ने गत दो सौ वर्ष के भी तर लगाया हैं, तो उनको अपनी भूल अवश्य स्वीकार करनी पड़ेगी।
हम ऊपर कह चुके हैं कि वामन-युग का मनुष्य मानवीय शक्तियों की दृष्टि से बहुत अविकसित था। जैसे-जैसे समय बीतता गया जीवन-संघर्ष तथा अन्य परिवर्तनों के परिणाम स्वरूप वह प्रगति-पथ पर अग्रसर होने लगा पर किसी सामाजिक व्यवस्था के अभाव से वह प्रायः पशुओं के साहचर्य में ही रहने को बाध्य था ओर उसकी दृष्टि में सब से अधिक मूल्य शारीरिक शक्ति का ही था जिसके द्वारा वह पशुओं और अन्य मनुष्यों के आक्रमण से आत्मरक्षा कर सके और दूसरों का मुकाबला करके आहार पा सके। इस दृष्टि से उस समय मनुष्य का सबसे बड़ा काम अपनी शारीरिक शक्ति तथा हथियारों की ताकत बढ़ाना था। इसी उद्देश्य से बाद में मनुष्य छोटे-छोटे समूहों में संगठित होकर भी कार्य करने इस प्रकार मनुष्यों में सदा रक्त पात होता रहता था और किसी का जीवन सुरक्षित न था। ऐसी दशा में किसी सुदृढ़ सामाजिक संगठन और सभ्यता की वृद्धि की आशा करना तो व्यर्थ ही था। उस समय किसी ऐसी विशेष शक्ति की आवश्यकता थी जो केवल पाशविक शक्ति में विश्वास रखने वाले और चाहे जिस पर अकारण ही आक्रमण कर देने वाले युद्ध-प्रिय मनुष्यों को दवा कर समाज में शांति स्थापित करे। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ही परशुराम जी का अवतार हुआ, जिन्होंने रक्त-पिपासु लोगों के विरुद्ध कठिन कुठार उठाया और अनेक बार उनका नाश करके शाँति-प्रिय लोगों को समाज का संचालक बनाया। इस प्रकार परशुराम जी ने समाज में अशान्ति फैलाने वाले तत्वों को निर्मूल करके समाज के संगठित होने का मार्ग प्रशस्त कर दिया जो उस युग की सबसे बड़ी आवश्यकता थी।
समाज में शान्ति स्थापित होने पर इस बात की आवश्यकता हुई कि उसमें हितकारी और उपयोगी नियमों का प्रचार किया जाय, जिससे सब कोई सुख पूर्वक रह सके और उन्नति-मार्ग में अग्रसर हो सकें 12 इस कार्य की पूर्ति मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के द्वारा हुई। उन्होंने देश की सब शक्तियों का एकीकरण करके एक देश व्यापी सुसंगठित शासन व्यवस्था कायम की जिसमें चारों वर्ण के लोग अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करे हुए सभ्यता और संस्कृति की वृद्धि करने लगे। उनका कार्य इतना विशाल ओर महान था कि वह किसी एक क्या सैकड़ों मनुष्यों द्वारा पूरा हो सकना भी सम्भव नहीं जान पड़ता था। सच पूछा जाय तो आज का हिन्दू समाज उन्हीं के दिखाये मार्ग तथा आदर्शों पर चल कर संसार में अपना अस्तित्व सार्थक कर रहा है। यही कारण है कि दश अवतारों में से भी हिन्दू समाज में सबसे अधिक पूजा और मान आज भी भगवान राम को ही प्राप्त है।
इसके बाद श्रीकृष्णावतार का युग आया। उस समय तक भगवान रामचन्द्र द्वारा प्रजा के कल्याण का मुख्य ध्यान रखने वाले लोक-प्रिय राज्य का संगठन छिन्न-भिन्न हो गया था और उसके स्थान में बड़े बड़े साम्राज्य स्थापित हो गये थे जो अपनी स्वार्थसिद्धि और महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिये परस्पर संघर्ष करते रहते थे। इन युद्धों के कारण प्रजा पर करों का भार बेतरह बढ़ता जाता था और सेना द्वारा लूटमार होने से भी उसकी बड़ी दुर्दशा थी। पाँचाल (पंजाब), कुरु (मेरठ); मगध (बिहार); शौरसेन (मथुरा) आदि ऐसे ही साम्राज्य थे, जो अपने राज्य-विस्तार के लिये बड़े-बड़े युद्ध-अभियान किया करते थे। इन साम्राज्य वादियों ने प्रजा की स्वतंत्रता का अपहरण कर लिया था और उसकी दशा दासों या गुलामों की सी होती जाती थी। जो कोई उनके विरुद्ध मुँह खोलने का साहस करता था, उसी के मस्तक पर उनका भयंकर दण्ड-प्रहार होता था। दानवीय प्रकृति के इन नृशंस साम्राज्यवादियों के अत्याचारों से प्रजा जब त्राहि-त्राहि कर उठी तब भगवान कृष्ण का अवतार हुआ।
श्रीकृष्ण ने सबसे पहले तो अपनी ही शक्ति और संगठन विषयक योग्यता से क्रूरकर्मी सम्राट कंस का विध्वंस किया। फिर कूटनीति का आश्रय लेकर उन्होंने इन साम्राज्यों का एक-एक करके विनाश कर दिया और महाभारत के संग्राम में तो उनकी शक्ति को ऐसा छिन्न-भिन्न करा दिया कि बहुत समय के लिये साम्राज्यों का नाम निशान मिट गया और प्रजा शक्ति अभ्युदय का मार्ग खुल गया। इस प्रकार भगवान कृष्ण ने अपनी यह घोषणा पूर्णतया चरितार्थ कर दिखाई:—
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥
कृष्णावतार का दूसरा मुख्य उद्देश्य कला और सौंदर्य का प्रसार भी था। जिसके बिना मनुष्य भली प्रकार से जीवन निर्वाह और लोक व्यवहार करता हुआ भी बिना सींग और पूँछ का पशु, माना जाता है! संभवतः कृष्णजी की मुरली और रास-लीला उनकी कला-प्रियता तथा उसके प्रचारक होने का ही प्रतीक है।
भगवान कृष्ण के बाद गौतम बुद्ध को हिन्दू धर्म में नौवाँ अवतार मान लिया गया है। यह तो सहज ही में अनुमान किया जा सकता है कि हिन्दू-बौद्ध विरोध का समन्वय करने के लिये ‘वेद विरोधी’ कहे जाने वाले बुद्ध भगवान को भी अवतारों में गिन लिया गया है। पर इस का केवल यही एक कारण नहीं हो सकता। सामयिक विरोध के होते हुये भी हिन्दू शास्त्रकारों ने भारतीय संस्कृति के लिये किये गये बुद्ध जी के महान कार्य का सच्चा मूल्याँकन किया। यदि मानवता के विकास की दृष्टि से देखा जाय तो बुद्धदेव ने अहिंसा और करुणा का विश्व व्यापी प्रचार करके मानवीय संस्कृति में एक नई और उच्च सीढ़ी जोड़ी। कला और सौंदर्य-प्रेम मनुष्य का भूषण अवश्य हैं, पर अहिंसा और करुणा दैवी सम्पत्ति हैं और इनसे मनुष्य भौतिक क्षेत्र से निकल कर आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने योग्य बनता है। ये मनुष्य को देवत्व और मुक्ति की 13 ओर ले जाने वाले गुण हैं। जन-समुदाय को इन की व्यापक और व्यवहारिक शिक्षा देने वाला अवतार या जगद्गुरु के सिवा और कौन हो सकता है?
दसवाँ अवतार कल्कि माना गया है जो शास्त्रकारों के अनुसार दूर भविष्य में होगा। संभव है भौतिक विज्ञान और यंत्रीकरण (मशीनों) की अति होने पर वर्तमान सभ्यता के चकनाचूर होने की जो संभावना प्रकट की जा रही है, उसके बाद मानवता को किसी नई दिशा में ले जाने का कार्य कल्कि अवतार द्वारा ही सम्पन्न हो।
इस प्रकार पाठक देखेंगे कि पुराणकारों ने संसार में जीवों की उत्पत्ति और उनके क्रमशः विकास के विवरण को किस प्रकार मनोरंजक और अनपढ़ जनसमूह के लिये भी कहानी किस्सों की तरह बोधगम्य कथाओं के रूप में प्रकट करके कितना महत्व का काम किया है। पुराणों में और भी इसी तरह के सैकड़ों गूढ़ तत्त्व कथाओं के रूप में वर्णित है, जिनकी व्याख्या हिन्दू धर्म के अनेक विद्वान कर चुके हैं। समय आने पर पाठकों की जानकारी के लिये उन्हें भी इसी प्रकार लेख रूप में प्रकट किया जायगा।
(श्री स्वामी शरणानन्द जी)
माँ-बाप की गोद में बच्चों का वास्तविक विकास सम्भव नहीं है, क्योंकि माँ-बाप से तो प्यार मिलता है, किन्तु न्याय नहीं, और नौकरों के द्वारा भय मिलता है, प्यार नहीं। बालकों का यथेष्ट विकास तभी सम्भव है, जब उसका पालन प्यार और न्याय पूर्वक किया जावे।
जब तुम समाज के बालक बालिकाओं का अपने बच्चे की भाँति पालन करोगे तो तुम उन के ऋण से मुक्त हो जाओगे, जिन्होंने तुम्हारा पालन किया था और तुम्हारी प्रेम और न्याय सहित सेवा से बालकों का विकास भी होगा। इससे तुम्हारा स्वार्थ भाव भी मिटता चला जायगा। इससे जितेंद्रियता प्राप्त होती है। जितेंद्रिय व्यक्ति सत्य की खोज में तत्पर होकर अपना भी विकास करते रहता है। केवल वस्तुओं के आधार पर जीवन व्यतीत करना मनुष्य के रूप में पशु होना है। वस्तुओं से अतीत जो तत्व है, उसके प्राप्त करने पर ही तुम सच्ची स्वतन्त्र व्यक्तियों का निर्माण नहीं हो, उस समाज का विकास एक सीमा तक ही होता है।
यह कार्य कभी राष्ट्र शासक ने नहीं कर पाया, क्योंकि नौकरी वृत्ति रखने के कारण उससे वास्तविक सेवा नहीं हो पाती। जो बेचारा स्वयं उपभोग में ग्रसित है, वह सेवा नहीं कर सकता। सेवा वही कर सकता है, जिसका जीवन भिक्षा के आधार पर निर्भर हो और वह अर्थ एवं काम की वासनाओं से मुक्त हो। न्याय की दृष्टि से संग्रहित-सम्पत्ति पर केवल तीन वर्ग के व्यक्तियों का अधिकार है-1-बालक-2-रोगी तथा 3- विरक्त का। बालक और रोगी अर्थोपार्जन करने में असमर्थ हैं और-विरक्त-सेवा करने वाले को अर्थोपार्जन के लिये समय नहीं है। उपार्जित अर्थ के आधार पर जीवन बिताने वाला उपभोग ग्रसित मनुष्य, समाज से अभिन्न और निरभिमानी नहीं हो पाता है। अभिन्नता के बिना सच्चा समाजवादी और निरभिमानता के बिना छिपी हुई शक्ति का विकास नहीं हो पाता। यह निर्विवाद सिद्ध है।
वर्तमान सुधारवादी तो किसी एक पार्टी का प्रतिनिधि बनकर द्वेष तथा स्वार्थ के आधार पर संगठन बना, पशुबल को उपार्जित कर किसी के विनाश से होगा, भला उसका परिणाम विकास कैसे हो सकेगा? अभी वे बेचारे ऊपर से तो स्वतन्त्र हो गये हैं, किन्तु भीतर से पश्चिमी सभ्यता में आबद्ध हैं, उन्हें कोई मार्ग नहीं दिखाई देता। मस्तिष्क की दासता से वे अभी मुक्त नहीं हैं। वाह्य चमत्कारों से उनकी बुद्धि चकाचौंध में फँस गयी है। पद का अभिमान शुद्ध विचार को उत्पन्न होने नहीं देता।
त्याग और प्रेम के आधार पर स्वार्थ युक्त जन-समाज, संगठित होने में भय करता है, परन्तु प्राकृतिक विधान के अनुसार जो संगठन, त्याग और सेवा के आधार पर नहीं है, वह अवश्य मिट जावेगा। यह परम सत्य है देश के बच्चे, रोगी, संग्रह की हुई सम्पत्ति तथा सेवक—इन चारों का संगठन ही सच्चा संगठन है।
सिक्के से वस्तुओं का, वस्तु से व्यक्ति का, व्यक्ति से विवेक का, और विवेक से, परिवर्तन से अतीत नित्य जीवन का महत्व अधिक है!
सिक्के की दासता ने वस्तुओं का उपार्जन नहीं होने दिया, जिसके कारण भोजन की सामग्री कम हो गयी। स्वास्थ्यवर्द्धकता के अभाव में रोगों की वृद्धि हो रही है। आज वेजीटेबल मिल के लिये तो सम्पत्ति है, किन्तु डेयरी फार्म के लिये नहीं। पूँजी पतियों की इस भूल ने मानव के स्वास्थ्य को खा लिया है। वे ऊपर से अहिंसा के गीत गाते हैं, किन्तु पशुओं को न खाकर मनुष्यों को खा जाते हैं, यदि पूँजीपति धर्मशून्य राजनीतिक नेताओं के अत्याचारों से बचना चाहते हैं, तो उनको संग्रह की हुई सम्पत्ति स्वेच्छापूर्वक बाल मन्दिर और सुश्रूषा-आश्रम के बनाने में लगा देना चाहिये अर्थात् अपनी सम्पत्ति सच्चे सेवकों के हाथ में दे देनी चाहिये। नहीं तो सुधार के गीत गा कर समाज साम्यवादी और समाज तन्त्रवादी डाकुओं की भाँति छीन लेंगे अथवा विधान बदलकर पूँजीवाद मिटा देंगे। इतना ही नहीं, हिन्दू और मुसलमान अपने को मुसलमान न कह सकेगा और न वस्तु से व्यक्ति का मूल्य अधिक होगा क्योंकि पार्टी का प्रतिनिधि बन कर जो कार्य किया जायगा, उससे केवल पार्टी ही सुदृढ़ होगी। व्यक्ति का निर्माण न होगा। व्यक्तियों के निर्माण के बिना सचाई, ईमानदारी और निष्पक्षता का प्रादुर्भाव नहीं होता और न स्वार्थ-भावना मिटती है।
जिस देश के पूँजीपति और विद्वान विषयासक्त हो जाते हैं, उस देश की राष्ट्रीयता दूषित हो जाती है, क्योंकि राष्ट्र का निर्माण और विकास विद्वानों और पूँजीपतियों पर ही निर्भर होता है। जिस प्रकार बुद्धि और प्राण के आधार पर ही शरीर की सारी व्यवस्था चलती है, उसी प्रकार विद्वान और पूँजीपति ही राष्ट्र की व्यवस्था के कर्णधार होते हैं। शरीर में जो स्थान बुद्धि का है, राष्ट्र में वही स्थान विद्वानों का है और शरीर के प्राण की स्थिति में राष्ट्र के पूँजीपति स्थित हैं। दोनों वर्गों के सुधार से ही सारे राष्ट्र का सुधार और उत्थान सम्भव है।
निःस्वार्थ भाव से मानव समाज की सेवा करने वाले विद्वानों के द्वारा ही शासक मंडल का निर्वाचन होना चाहिये। चुने हुए विद्वानों में जो वीतराग पुरुष हो अर्थात् जिनका मोह नष्ट हो गया हो, उन्हीं को विधान बनाने का अधिकार होना चाहिये। क्योंकि मोह युक्त प्राणी प्राकृतिक विधान को समझने में असमर्थ होता है और इस विधान को बिना समझे पक्षपातशून्य विधान नहीं बन सकता राष्ट्र का कर्त्तव्य तो केवल वीतराग पुरुष द्वारा बनाये विधानों का पालन करना है। भारतीय संस्कृति की शिक्षा धर्मात्मा सेवक के द्वारा ही हो सकती है अतः पूँजीपति और विद्वानों को एक मत से संगठित होकर राष्ट्र के साँस्कृतिक उत्थान के लिये काम करना चाहिये, नहीं तो सुधार की आँधी में संग्रह किया हुआ धन भी लुट जावेगा। ऐसा नहीं होने से भारतीय संस्कृति और-पूञ्जी दोनों ही नष्ट भ्रष्ट हो जाएंगी।
आज की निर्वाचन पद्धति में सच्चाई नहीं है। इने-गिने व्यक्ति प्रचार के द्वारा जनता को अपने पक्ष में करके जनता के बहाने अपने मन की बात करते हैं। वास्तव में वे जनता के प्रतिनिधि नहीं होते। “इस्लाम खतरे में” कह कर मुसलमान जनता को भड़का कर, हिन्दू धर्म के गीत गा कर हिन्दू जनता को भड़का कर, किसानों की बात कह कर किसानों को भड़का कर अपने पक्ष में ले लिया की अपने मन की बात और नाम जनता का ले लिया। पर सेवा करने वाला व्यक्ति जनता का स्वाभाविक और सच्चा प्रतिनिधि होता है। उस में न तो पद का लालच होता है, न पक्षपात और न स्वार्थ। ऐसा व्यक्ति उसी का निर्वाचन करेगा जो वास्तव में जनता का सच्चा सेवक और ईमानदार होगा। जिसने स्वयं सेवा नहीं की है, उसे राष्ट्रीय-निर्वाचन का अधिकार देना प्राकृतिक विधान के विरुद्ध है। जब सारी जनता सचाई जानने में समर्थ हो जायगी, तब राष्ट्रीय-निर्वाचन की आवश्यकता ही क्या रहेगी? अतः प्राकृतिक विधान के अनुसार सेवा करने वालों का चुना हुआ राष्ट्र शासक मण्डल हो और-वीतराग पुरुषों का बनाया हुआ राष्ट्रीय-संविधान हो तभी समाज में और-सर्वत्र न्याय और शान्ति की स्थापना हो सकती है।
सामग्रयानुष्ठाननयुणौः सयम्राः शूद्रायतः सन्ति समाद्विजानाम् तस्माद्विशेषो द्विजशूद्रनाम्नो— नाध्यात्मिको बाह्यनिमित्तकोवा-
(41।29) भविष्यपुराण
“सामान्य शूद्र और सामान्य ब्राह्मण, ये दोनों सामग्री और अनुष्ठान समान ही है, इसीलिये ब्राह्मण और शूद्र भी वाध्य या आध्यात्मिक कोई भेद नहीं हैं।”
तस्मान्नच विभेदोऽस्ति न वहिर्मान्तरात्मनि! न सुखादौ न चाश्वैर्ये नाज्ञाया न भयेष्वपि।
न वीर्ये नाकृतौ नाक्षे न व्यापारे न चायुषि। नाँगे पुष्टे न दौर्बल्ये न स्थैर्ये नापि चापले।
न प्रज्ञाया न वैरग्ये न धैर्ये न पराक्रमे॥ न त्रिवर्गे न नैपुण्ये न रुपादौ न भेषजे।
न स्त्रीगर्भे न गमते न दह मलसंप्लवं। नास्थि रंध्रे न च प्रेम्णि न प्रमाणे न लोमसु
(भविष्यपुराण 41।35-38)
“जाति-भेद में और सम्प्रदाय-सम्प्रदाय में कोई भेद नहीं है। भेद न तो बाहर है न भीतर, न सुख में, न ऐश्वर्य में, न आज्ञा में, न भय में, न वीर्य में, न आकृति में, न ज्ञान-दृष्टि में, न व्यापार में, न आयु में, न अंग की पुष्टि में, न दुर्बलता में, न स्थिरता में, न चंचलता में, न बुद्धि में, न वैराग्य में, न रूपादि में, न औषध में, न स्त्रीगर्भ में, न गमन में, न देह के मल-मोचन में, न हड्डी के छेद में, न प्रेम में, न प्रमाण में और न लोभ में।
न योनिर्नापि संस्कारों न श्रुतिर्नच सन्ततिः। कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमिव तु कारणम्। सर्वोऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते। वृत्ते स्थितश्च शूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं चगच्छति। ब्रह्मत्वभावः सुश्रोणि, समः सर्वत्र में मतः। निगुणाँ निमलं ब्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः।
—ब्रह्मपुराण 223।56-58
‘जाति, संस्कार श्रुति और स्मृति से कोई द्विज नहीं होता, केवल चरित्र से ही होता है, इस लोक में चरित्र से ही सबके ब्राह्मणत्व का विधान है, सद्वृत्त में स्थित शूद्र भी ब्राह्मणता को प्राप्त होता है, ब्राह्मण वही है जिसमें निर्मल, निर्गुण ब्रह्मज्ञान हो।
नामागरिष्टय पुत्रौ द्वौ वैश्यौ ब्राह्मणताँ गतो।
हरि॰ 11।658
‘नाभगरिष्ट के दो पुत्र वैश्य से ब्राह्मण हो गये थे।’
पोरवस्य महाराज ब्रह्मर्षीः कौशिकस्यच। सम्बन्धो ह्यास्य वंशेऽस्मिन् ब्रह्मक्षत्रस्य विश्रुतः॥
पुरुपंशीय राजा और ब्रह्मर्षि कौशिक ये दोनों क्षत्रिय ब्राह्मण वंश परस्पर सम्बन्ध है, यह बात लोक प्रसिद्ध है।
ब्राह्मणाक्षत्रिया वैश्याः शूद्रद्रोहिजनस्तिथा। भाविताः पूर्णजा तीषु कर्मभिश्चशुमाशुमैः॥
(वायु॰ 8।134)
‘सृष्टि के आदि काल में कर्मों के शुभाशुमत्व के अनुसार ब्राह्मणादि वर्ण बनाये गये थे।’
स्थितो ब्राह्मण्यमुपजीवति
—(ब्रह्मपुराण 223।14)
‘ब्राह्मण धर्म के आचरण और ब्राह्मण जीविका के अवलम्बन से क्षत्रिय और वैश्य भी ब्राह्मण हो जाते हैं।
रामिस्तु कर्मभिर्देवि शुभेरचारितैस्तथा। शूद्रो ब्राह्मणाताँ गच्छेद्वैश्यः क्षत्रियताँ ब्रजेत॥
—ब्रह्मपुराण 22332
‘शुभ कर्मों के आचरण से शूद्र भी ब्राह्मणत्व को प्राप्त करता है और वैश्य भीक्षत्रियत्व को।’
शूद्रोऽप्यागमसंन्मो द्विजोभवति संस्कृतः
—ब्रह्मपुराण 223।53
‘शूद्र भी यदि आगम सम्पन्न और संस्कृत हो तो अह द्विज हो जाता है।
जन्मना जायतेशूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते। वेद्भ्यासी भवेद्विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः॥
जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं। द्विज कहलाता उनके संस्कारों की वजह से है। यदि वह वेदाध्ययन करने वाला है तो वह विप्र कहलायेगा और जो ब्रह्म को जानता है वह ब्राह्मण कहलाता है।
वर्णेर्त्कषमवाघ्नोति नरः पुण्येन कर्मण। दुर्लभं तमलब्धवा हि हन्यात् पापेन कर्मणा॥
महाभारत शान्ति॰ अ॰ 219
पुण्य कर्म करने से उच्च वर्ण को प्राप्त होता है और पाप कर्म करने से नीचता प्राप्त होती है।
चत्वार एकस्य पितुः सुताश्च तेषाँ सुतानाँ खुल जातिरेका। फल स्यथोदुम्बर वृक्षजातेर्यथाऽगुमध्यान्तभवानियान्ति॥ वर्णाकृतिर्त्पशरसः समानि तथैकतो जातिरति प्रविन्त्या॥
म. महापुराण ब्रा॰ अ 42
यदि एक पिता के चार पुत्र हो तो उन पुत्रों की एक जाति होनी चाहिये। इसी प्रकार सबका पिता एक ही परमेश्वर है अतः मनुष्य समाज में भी जाति भेद बिल्कुल नहीं होना चाहिये। जिस प्रकार एक ही गूलर के वृक्ष के अग्रभाग, मध्यभाग तथा पींड में वर्ण, आकृति, स्पर्श तथा रस इन बातों में एक से फल लगते हैं उसी प्रकार एक विराट् पुरुष परम ब्रह्म परमेश्वर से उत्पन्न हुये मनुष्यों में भी किसी प्रकार का जातिभेद नहीं हो सकता।
समानी प्रण सह वो अन्नभागः समनि योक्त्रे सह वो पुर्नाज्म। सभ्यंचो अग्नि सपर्यत आरानाभि मिवाऽमितः॥ अथर्व॰ 3।30
“ऐ मनुष्यों! तुम लोगों की पानी पीने की तथा भोजन करने की एक ही जगह हों, समान धुरा मैं मैंने तुम सबको समानता से जोत दिया है। जिस प्रकार एक चक्र के बीच आरे जमे रहते हैं उसी प्रकार तुम भी एक जगह एकत्रित होकर अग्नि मैं हवन करो।”
एक वर्णमिद पूर्ण विश्वमासीद युधिष्ठिर। कर्मक्रिया विभेदेन चातुर्वणर्य प्रतिष्ठतम्॥
सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरीषजाः। एकेन्द्रियेन्द्रियार्थाश्च तम्माच्छीलगुरौर्द्विजः॥
शूद्रोऽपि शीलसम्पन्नो गुणवान् ब्रह्मणो भवेत्। ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीनः शूद्रत् प्रत्यवरो भवेत्॥
—महाभारत वनपर्व अ॰ 180
“हे युधिष्ठिर! इस जगत में पहले एक ही वर्ण था। आगे चलकर गुणकर्म के विभाग हो जाने से चार वर्ण हुए। सब मनुष्य योनि से ही उत्पन्न हुए हैं, सब लोगों की उत्पत्ति रज और वीर्य के मिश्रण से ही है। सबकी इन्द्रियाँ समान हैं। इसलिये जन्म से जातिभेद मानना ठीक नहीं। जिस मनुष्य में शील की प्रधानता होती है, वह द्विज कहलाता है। यदि शूद्र शीलवान हो तो उसे द्विज ही समझना चाहिये और यदि ब्राह्मण शीलता से परे हो तो उसे शूद्र से भी नीच समझना चाहिये।
एक एव पुरा षदः प्रणवः सर्ववाड्मयः। देवो नारायणो नान्यः एकोऽग्निर्वर्ण एव च॥
—श्रीमद्भागवत् पु॰ स्क॰ 9।14
प्रारम्भ में एक ही वांग्मय ॐ था, नारायण ही एकमात्र देव थे, दूसरा नहीं और एक ही अग्नि यानी ब्राह्मण वर्ण था।
जो मनुष्य अद्वितीय, अनन्त, शुद्ध, सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा का साक्षात्कार द्वारा अनुभव करता है और जो काम, क्रोध, मोह, लोभ, आदि दोषों से अलग है, उसे ही ब्राह्मण कहना चाहिये। श्रुति, स्मृति, पुराण, इतिहास आदि का भी यही मत है।
न शूद्रा भगवद्भक्त विप्रा भागवताः स्मृताः॥
—भारत॰
‘जो ईश्वर के सच्चे भक्त हैं वे ही ब्राह्मण हैं, उन्हें शूद्र नहीं कहना चाहिये।’
अज्ञमाला वशिष्ठेन संयुक्त धमयोनिजा। शारंगी मंदपलिन जगामार्म्यहणीयताम्॥
रताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन् अपकृष्ट प्रस्तयः। उत्कर्ष योजितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भतृ गुणौः शुभैः।
(मनु॰ 9।23-24)
‘अधम योनिजा कन्या अक्षमाला वशिष्ठ के साथ युक्त होकर और तिर्यक् कन्या शारंगी मंदपाल ऋषी की परिणीता होकर मान्या पदवी को प्राप्त हुई थी इनके सिवा और अनेक नारियाँ निकृष्ट कुल में उत्पन्न होकर भी पति के महद्गुण के कारण उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर गई थीं।
शूद्र ब्राह्मणयोर्भेदो मृग्यमाणोऽपि यत्नतः। नश्चते सर्वधर्मेषु संहतौस्त्रिदशैरपि॥
—भविष्यपुराण 41।36
‘अति यत्नपूर्वक सभी देवता मिलकर भी खोजे तो ब्राह्मण और शूद्र में कोई भेद नहीं पावेंगे।”
न ब्राह्मणाश्चन्द्रमरीचि शुक्ला न क्षत्रियाः किंशुक पुष्पवर्णाः। न चेद वैश्या हरिताल तुल्याः शूद्रान चाँगार समानवर्णाः।
—भविष्यपुराण 41,41
“ब्राह्मण लोग भी चाँदी की किरण के समान शुक्ल वर्ण नहीं हैं। क्षत्रिय लोग भी किंशुक पुष्प से लाल नहीं हैं और शूद्र कोयले के समान काले नहीं हैं।”
पादप्रचारैस्तनुवर्ण, केशैः सुखेन दुःखेन च शोणितेन। त्वं्मासमेदोऽस्थिरसैः समानाश्चतुः प्रभेदारि कथं भवन्ति। 42
वर्णप्रमाणा कृतिगर्भवासग्बुद्धि कर्मेन्द्रिय जीवितेषु। बलत्रिवर्गाभयभेषजेषु न विद्यते जातिकृतो विशेषः।43
चत्वार एकस्यपितुः सुताश्चतेषाँसुतानाँ खुल जातिरेका। एवं प्रजानाँ हि पितेक एव पित्रैकभावान्न च जातिभेदः॥5
(भविष्य पुराण 41 अ॰)
“चलना, फिरना, शरीर, वर्ण केश, सुख दुख रक्त , त्वचा, माँस, मेद, अस्थि रस-इनमें सभी तो समान हैं, फिर चार वर्णों का भेद कहाँ है? वर्ण, प्रमाण आकृति, गर्भवास, वाक्य, बुद्धि कर्म, इन्द्रिय, प्राणशक्ति धर्म,अर्थ,काम,व्याधि, औषधि-इनमें कहीं भी तो जातिगत प्रभेद नहीं है। जिस प्रकार एक ही पिता के चार पुत्रों की जाति एक ही होती है उसी प्रकार सभी प्रजाओं का वह भगवान एकमात्र पिता है। इसीलिये जातिभेद नहीं हैँ।”
(श्री हरिभाऊ उपाध्याय)
मनुष्य जीवन में भावना, ज्ञान और कर्म तीनों घुले-मिले मिलते हैं। जब ज्ञान के अनुसार कर्म सहज स्वाभाविक हो जाता है, तब वह भाव-रूप हो जाता है। यह भाव मनुष्य की स्थायी सम्पत्ति है। हमारे मन में जब किसी भाव की स्फुरणा होती है तो इसका अर्थ यह हुआ कि हमारे पूर्वार्जित ज्ञान व कर्म का यह तकाजा है। यह भाव हमें नवीन लगता है, पर वास्तव में उसकी जड़ें गहरी होती हैं। नवीन भाव फिर हमारी बुद्धि को प्रेरित करता है जिससे नवीन ज्ञान व कर्म की बुनियाद पड़ती हे। इन ज्ञान एवं कर्म की परिसमाप्ति फिर ‘भाव’ हो जाती है। इस तरह जीवन के आरम्भ व अन्त में हम ‘भाव’ की प्रधानता पाते हैं। भाव की सम्पुटि में जीवन पूर्ण होता है।
यह भाव जब किसी एक लक्ष्य की ओर दौड़ता है, उसके प्रति अपने को समर्पित करना चाहता है,तब वह ‘भक्ति’ का रूप धारण करने लगता है। ऐसी भक्ति के बिना न तो किसी कर्म में सफलता मिलती है, न मन को शान्ति, न जीवन का महान् लक्ष्य है, निरापद ही हो सकता है। जीवन का महान् लक्ष्य है, व्यक्ति का समाधि में मिल जाना, या भक्त का भगवान् में मिल जाना, नर का नारायण हो जाना। यह स्थिति सम्पूर्ण आत्मसमर्पण के बिना नहीं मिलती । जब तक थोड़ी भी अटका मन में है तब तक समर्पण ‘सम्पूर्ण’ नहीं होता। शरीर को धारण कर सकने जितनी अहन्ता तो रहेगी, परन्तु कर्तापना का अभिमान न रहना चाहिए। इस अवस्था में भक्त कहता है--
“दिया हमने जो अपनी खुदी को मिटा वह जो परदा था बीच में अब न रहा। रहा परदे में अब न वह परदानशी’ कोई दूसरा उसके सिवा न रहा।”
इसी को दूसरी भाषा में कहें तो सब में भगवान को व भगवान में सब को देखना है। भक्त अपने को भगवान् अपने में सर्वदा देखता है। मानव-मात्र की समता के आधुनिक आदर्श से मानवमात्र की एकता का—नहीं जीवमात्र की—बल्कि भूतमात्र की एकता का—हमारा प्राचीन सिद्धान्त या आदर्श कहीं बढ़कर है। ऐसी अद्वैत अभेद-सिद्धि श्रेष्ठ भक्त का लक्षण है 1 मध्यम भक्त वह है जो भगवान से प्रेम उनके भक्तों से मित्रता, अज्ञानियों पर कृपा,और भगवान् से द्वेष करने वालों की उपेक्षा करता है।
पहले नम्बर का भक्त सब में एक-भाव देखता है। यह दूसरे नम्बर का भक्त भेद-भाव रखने वाला है। भगवान् को, उनके भक्तों को, अज्ञानियों को, भगवान् के द्रोही को --सबको-खुद अपने को भी -अलग अलग देखता है। इसकी दृष्टि में अभी दृष्टि में अभी सबके कर्मों की योग्यता-अयोग्यता का भाव है। जो जिस योग्य है वैसा ही उसके साथ यह व्यवहार करना चाहता है। मुँह देख कर तिलक लगाता है। आत्मत्व, अभेदत्व इसकी कसौटी नहीं है-मूल प्रेरणा नहीं है। जो सब को आत्ममय प्रभुमय, देखता है वह सब के प्रति प्रेम से सराबोर रहता है। जो कुछ करता है, उनके प्रति प्रेम से प्रेरित होकर करता है भले ही वह साधु पुरुष हो, दुष्ट दुरात्मा हो, जगत में उसका शत्रु या विरोधी समझा जाता हो। यह दूसरा, मध्यम भक्त भगवान् के भक्तों का सत्कार करेगा, उनसे नेह लगावेगा,लेकिन जो भगवान को नहीं मानते,या उसकी निंदा करते हैं उनसे असहयोग रखेगा,उनकी उपेक्षा करता रहेगा,यदि उनका अहित नहीं करेगा तो उनके हित में भी प्रवृत्त नहीं होगा। ‘साहब सलामत दूर की अच्छी’ इस तरह रहेगा जो नासमझ हैं अनपढ़ अज्ञानी हैं उन पर वह कृपा जरूर रखेगा।
किन्तु जो भगवान् के अर्थ विग्रह-प्रतिमा आदि की पूजा में ही प्रवृत्त होता है, उनके भक्तों की, अथवा अन्य किसी जीव की पूजा में प्रवृत्त नहीं होता, वह साधारण भक्त है। यह तीसरे नम्बर का-साधारण-भक्त केवल भगवान की मूर्ति आदि की पूजा-अर्चाबाधोपचार-में निमग्न रहता है। यह नौसिखिया है-अभी भक्ति में प्रवेश ही हुआ है। इसका मन अभी बाहरी उपचारों में ही लगता है, अभी भक्ति की स्पिरिट, प्राण-भावना में नहीं घुसा है। प्रतिमा में ही वह भगवान् का निवास मानता है-अतः दूसरे जीवों या मनुष्यों की पूजा में प्रवृत्त नहीं होता। इन में अभी उसकी भगवद्भावना नहीं हुई है। अतः यह प्रारम्भिक भक्त हुआ। मनुष्य को सब से ऊंची मंजिल पर पहुँचना है। व्यक्ति को समाज हित में लीन होना है। भक्त को भगवान हो जाना है। ऐसे व्यक्ति के मन में राग-द्वेष नहीं रहते क्योंकि वह विषय-भोग भले करे उनमें लिप्त नहीं होता, उनसे प्रभावित नहीं होता। अतः उसके मन में उनके या लोगों के प्रति राग-द्वेष नहीं पैदा होता। यह सब ‘भगवान की माया’ या ‘प्रारब्ध का फल ‘है- ऐसा समझ कर वह तटस्थ रहता है। सुख योग पास आते हैं तो इन्कार नहीं करता, नहीं आते या चले जाते हैं तो दुखी नहीं होता इस प्रकार विषय-भोग में चित्त समता या तटस्थता तो रखता ही है वह देहादिक के जन्म मरणादि सांसारिक धर्मों से भी मोहित नहीं होता, इनके प्रभाव से नहीं आता, क्योंकि उसका ध्यान तो ईश्वर से अपने इष्ट से लगा हुआ है। वह उसी में गरकाब हो रहा है। जिसके मन ने महामहिमान्वित अखण्डैर्श्वय-सम्पन्न भगवान को ग्रहण कर लिया है उस पर फिर इन्द्रियों के धर्म अपनी सत्ता कैसे चला सकते है?
यह भक्त यहीं नहीं ठहरता। शरीर धर्मों के प्रभाव से अपने को बचा लेना एक बात है। कामना व कर्मों के सब बीजों को मिटा देना दूसरी बात है। किसी कामना को लेकर ही कर्म होता है, शरीर-धर्म प्रकट होते हैं। तो अब भक्त उन धर्मों या कर्मों के मूल को ही काट देता है—कामना को ही त्याग देता है। स्वतंत्र रूप से अपनी कोई इच्छा नहीं रखता। भगवान की महान इच्छा में उसने अपनी इच्छा मिला दी है। अब तो भगवान इच्छा करते हैं। वह जो कुछ करता है भगवान् की इच्छानुसार करता है। अतः वह कर्तापन के बन्धन से नहीं बंधता, फलभागी नहीं होता। उसके सुख-दुख, हर्ष-शोक से बच जाता है। जब वह इच्छा नहीं करता तो उनका फल-भोग भी नहीं करता। अच्छा फल हुआ तो भगवान् के अर्पण,बुरा हुआ तो भगवान् के अर्पण वह एक मात्र वासुदेव को ही कर्त्ता, भोक्ता, सब कुछ समझता है। आगे चलकर वह अहंभाव मैं हूँ, इस भावना को भी मिटा देता है। ‘यह शरीर मैं हूँ, मैं जन्मा हूँ मैं कुछ डरता हूँ, मैं अमुक वर्णी हूँ, अमुक आश्रमी हूँ,अमुक जाति का हूँ’ऐसा अभिमान या भाव नहीं रखता। वह ‘सबै जाति गोपाल की’ हो जाता है। इन संकुचितताओं, सीमाओं से वह परे और भगवान की सर्व व्यापकता में लीन हो जाता है।
देह और उसके अर्थ-घन डडडडड स्त्री,पुत्र आदि-में ही मनुष्य की प्रधान आसक्ति होती है। आसक्ति से यह स्वार्थ भाव उत्पन्न होता है कि इनका उपभोग मैं ही करूं’। कहीं दूसरा इनका उपयोग या उपभोग न करले, इस भय से उनके प्रति स्वामित्व की भावना उत्पन्न होती है। यही अपना-पराया भेद मानने की जड़ है। भक्त ने जब अपने को भगवान के अर्पण कर दिया व्यक्ति ने जब अपने को किसी उक्त उद्देश्य कार्य के हाथों में सौंप दिया, तब किसी दूसरे विषय में उसे रुचि ही नहीं, तो आसक्ति कहाँ से हो? अपने-पराये का भेद, न स्वामित्व की भावना। सब ओर उसकी समान बल्कि सौम्य दृष्टि है कोई राग द्वेष नहीं, इसलिए किसी प्रकार की चंचलता, विकलता अव्यवस्थितता नहीं। मन में कोई संघर्ष नहीं। सब जगह शान्ति ही शान्तिं का राज्य है।
इससे बढ़कर गति, स्थिति पद या आनन्द मनुष्य को और क्या चाहिये?
(श्री देवेन्द्र कुमार जैन एम0 ए0)
भारतीय संस्कृति के सम्बन्ध में इतने भ्राँत और परस्पर विरोधी विचार प्रचलित हैं कि जनसाधारण उसे समझ नहीं सकता और विद्वान समझना नहीं चाहते। एक के लिए वह समझ के बाहर की बात है और दूसरे के लिए प्रतिगामी विचारों की प्रतीक। भेदवादी, सांप्रदायिकता या प्रान्तीयता के आधार पर उसका बटवारा करते हैं और प्राचीनतावादी उसे ऋषिप्रणीत समझते हैं पर यथार्थ में संस्कृति का इन विचारों से मौलिक विरोध है, क्योंकि वह विरोध नहीं, समन्वय में हैं, जीवन से परे नहीं, जीवन में है, गत युग के संस्कारों का भज्नस्तूप नहीं किन्तु बहता पानी है, शास्त्रोक्त चिंतन की शुष्क भूमि नहीं, प्रत्युत,लोक-साधना की सरस भूमि है।
ऐतिहासिक दृष्टि से भारतीय संस्कृति विश्व या मानव-संस्कृति की ही एक कड़ी है, संस्कृत शब्द अंग्रेजी ‘कल्चर’ का अनुवाद है और कल्चर का ‘एग्रीकल्चरी’ (खेती) से घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। क्योंकि संस्कृति का उदय सबसे पहले वहीं हुआ जहाँ खेती की सुविधा थी। इसलिए-आदिम मानवीय संस्कृति के उद्गम स्थल बड़ी-बड़ी नदियों के उपजाऊ काँटे ही थे। वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह निर्विवाद है कि आजीविका की चिंता से मुक्त होने पर ही मनुष्य ने संस्कृति की बात सोची। धरती की सफाई से उसने मन की सफाई सीखी—उसने अनुभव किया कि धरती की तरह शरीर और मन में भी उपजाने की क्षमता है, ज्ञान की भी कुछ सहज वृत्तियां,सहज धर्म हैं, जैसे धरती में घास-फूस उगना, शरीर में नख केश का बढ़ना, मन में अच्छे-बुरे विचारों का उदय होना—यह उसके लिए मानो प्रकृति की कृति या देन हे जो आरम्भ में इसलिये अनिवार्य थी कि उससे मनुष्य आजीविका चलाता था, पर जब उसने अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा तो प्रकृति के इन सहज धर्मों का संस्कार करना शुरू कर दिया और इस प्रकार प्रकृति की कृति में अपना कृतित्व मिलाकर उसने सभ्यता और संस्कृति का सूत्रपात किया। शरीर-प्रसाधन की कला को सभ्यता कहते हैं और मन साधन कला को संस्कृति। संस्कृति वस्तुतः मन की खेती है। इन्हें हम क्रमश; कृषि सभ्यता और संस्कृति कहते हैं, एक से मनुष्य की शारीरिक आवश्यकताओं दूसरी से सौकर्म की भावना और तीसरी से मानसिक चेतना की संतुष्टि होती है। हीनाधिक रूप से सभी देशों में इस प्रकार के प्रयत्न हुए हैं पर प्राकृतिक सुविधा होने से भारत में साँस्कृतिक प्रयोग कुछ अधिक हुए। अतएव विशेष भौगोलिक परिस्थिति और ऐतिहासिक परम्परा में मानवता के विकास के लिए जो अच्छे प्रयत्न हुए हैं— उनका आकलन ही भारतीय संस्कृति है,ये प्रयत्न जितने अँश में अविरोध भाव मानव-एकता का प्रकाशन करते हैं—उतने ही अंश में भारतीय संस्कृति महान् है। यही उसी सर्वश्रेष्ठता की कसौटी है। गुजराती भाषा में प्रसार करने की स्वीकृति दी है, इसके लिए मैं उनका परम कृतज्ञ हूँ। मैं अपने को बढ़ा भाग्यशाली समझता हूँ कि इनके आशीर्वाद से मुझे ऐसा अमूल्य अवसर प्राप्त हुआ।
आपके ही आशीर्वाद तथा सहायता से मैं इनकी पुस्तकों का दोहन करके गुजराती भाषा में पुस्तकें छपा सका हूँ और भगवान की कृपा से मुझे इन पुस्तकों में भी अच्छी सफलता मिली है। आज तक छोटी-बड़ी सात-आठ पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं, जिनके नाम नीचे दिये जाते हैं:—(1) गायत्री चालीसा, (2) गायत्री परिचय, (3) गायत्री सहस्रनाम, (4) गायत्री स्तोत्र, (5) गायत्री मन्त्र सामर्थ्य, (6) गायत्री की सरल साधनाएं, (7) स्त्रियों को गायत्री अधिकार।
गुजरात भर में गायत्री साहित्य का प्रचार करने का शुभ अवसर मुझे पूज्य श्री आचार्य जी की कृपा से ही मिला है। मेरा पूर्ण विश्वास है कि ‘मा’ इस कार्य को पूरा करेगी। जो धर्म प्रेमी गुजराती भाषा में इस साहित्य का लाभ उठाना चाहें वे मुझसे पत्र व्यवहार कर सकते हैं।
[ ले॰-कुमारी भारती ]
श्रद्धा का शब्दार्थ है सत्य को धारण करना, सचाई को जीवन का अंग बनाना। भगवान कृष्ण ने कहा है कि अज्ञानी श्रद्धालु और संशयात्मक पुरुष का नाश होता है। श्रद्धा मानव के विकास का प्रमुख साधन है। सत्य ज्ञान कठोरता और तत्परता से करें। ज्ञान होने पर उस सत्य को धारण करने का दृढ़ संकल्प करके आगे बढ़ें।
विश्वास करें, आपके आध्यात्मिक और लौकिक विकास में श्रद्धा का प्रधान स्थान है। इसके बिना आप बहुत दूर तक न चल सकेंगे।
परम सत्य प्रभु ही है। वह सदा आपके संग है। वह आपको नहीं छोड़ता। वह तो आपके सोते रहते भी जागता है। आप उसे नहीं जानते, किन्तु वह आपको जानता है। इतना नहीं, प्यार भी करता है। क्या आप उस प्यार को नहीं चाहते? भूल न करें, जीवन का एक -एक क्षण बहुमूल्य है। अनन्त कालचक्र में आपकी आयु के कुछ वर्ष हैं ही कितने? इसलिए इस शरीर और दूसरे साधनों से पूरा-पूरा लाभ उठावें। जीवन का परम लाभ है अनन्त सत्य और प्रेम-रूप प्रभु को समझना और धारण करना।
आप इसे कठिन समझते हैं। वास्तव में वह कठिन नहीं। कभी यह है कि आप इसकी आवश्यकता नहीं समझते।
श्रद्धा के बिना आपका जीवन वैसे ही नीरस होगा, जैसे पानी के बिना नदी और सुगन्ध के बिना पुष्प। आपको श्रद्धा माता की गोद में अनिर्वचनीय आनन्द मिलेगा।
श्रद्धा को अपने हृदय-आसन पर बैठने के लिए बुलावें। प्रातः मध्याह्न, सोते-जागते श्रद्धा का आह्वान करें। श्रद्धा को हाथ से न जाने दें। जब आप अश्रद्धा के गहरे गर्त में पड़कर निराश्रय हो जायेंगे, तब यह श्रद्धा माता ही आपको आशावान् बना सकेगी। श्रद्धा का पाथेय लेकर यदि आप बीहड़ जीवन-जंगल में निकल आवेंगे तब भी आप निर्भय रहेंगे।
श्रद्धा आपको सदा युवा बनाये रखेगी। सब कार्य प्रभु कर रहा है। वह आपके प्रत्येक शुभ कार्य में सहायक है। प्रत्येक कठिनाई को सरल करने वाला वह सर्वत्र सदा विद्यमान है। आप उस पर अटल विश्वास और श्रद्धा रखें। प्राचीन और वर्तमान आप्त पुरुष आपकी भलाई के लिए जो कुछ कहते हैं, उसका आचरण करें। जो सत्य आचरण के बाद ही प्रतीत होगा, उसे बिना आचरण के असत्य कहकर न टालें। पूर्ण यौवन और पूरी शक्तियों और श्रद्धा के साथ इस सत्य को प्राप्त करने का प्रयास करें।
( श्री लक्ष्मीनारायण टंडन ‘प्रेमी’ एम. ए.)
यह सत्य है कि प्रत्येक घटना के पीछे ‘पीछे-कारण’ होता है। यह हो सकता है कि किसी ‘घटना’ के पीछे का ‘कारण’ अत्यन्त सूक्ष्म तथा गुत्थीदार (जटिल) होने के कारण हम उसे समझ न पायें। मानव की बुद्धि, सूझ-बूझ की भी एक सीमा होती है! मानव की बुद्धि प्रत्येक ‘कार्य’ के ‘कारण’ की तह तक पहुँच ही जाय, यह दावा नहीं किया जा सकता। किन्तु ‘कारण’ के आविर्भाव और अंतिम परिणाम के अनुरूप ही ‘ कार्य’ होता है—यह वैज्ञानिक सत्य है और इससे किसी को भी इंकार नहीं हो सकता। कार्य कारण ही गहनता जहाँ मानव-बुद्धि के परे हो जाती है वहीं हम घटित घटना को ‘भाग्य’ का नाम दे देते हैं। अनेक पढ़े लिखें लोग ‘भाग्य’ के नाम से भड़कते हैं। वह ‘भाग्य’ न कह कर ‘इत्तफाक’ या ‘परिस्थिति’ कहते हैं। किन्तु ‘इत्तफाक’ से कुछ नहीं होता—उसके पीछे कार्य-कारण अवश्य होता है—हाँ यह संभव है कि उसकी सूक्ष्मतम बारीकियों को मानव समझने में असमर्थ हो—उनका विश्लेषण तथा व्याख्या मानव शक्ति तथा बुद्धि के परे हो।
किन्तु यह भी सर्व विदित सत्य है कि परिस्थितियों और वातावरण का बहुत गहरा और व्यापक प्रभाव-मानव जीवन पर पड़ता है। प्रायः ‘परिस्थितियाँ’ मनुष्य को मनमाना नाच नचाती हैं। उन पर मनुष्य का बस नहीं। इसी से परिस्थितियों को अनियंत्रित कहा गया है। इन्हीं अनियंत्रित परिस्थितियों को ‘भाग्य’ कहा जाता है। कुछ लोगों का दावा है परिस्थितियाँ मनुष्य को नाच नचाती हैं पर कुछ पुरुष ऐसे भी होते हैं कि परिस्थितियों को नाच नचाते हैं, उनकी दिशा को मोड़ देते हैं। उनका कहना अक्षरशः सत्य नहीं है। भाग्य या परिस्थिति ने साथ दिया और जब तक साथ दिया, तब तक वह अपनी बुद्धि, शक्ति आदि को ही सब कुछ या सर्वोपरि भले ही समझ लें, ‘तदबीर’ को चाहे जितनी महत्ता दे दे पर ‘तदबीर’ का परम महत्व होते हुए भी उसकी एक सीमा भी है।
नियतिवादी या भाग्य में विश्वास करने वालों का कहना है कि जीवन में जो-जो घटनायें घटित होती हैं वे सब पूर्व निर्धारित (ईश्वर द्वारा) होती हैं। इसी को भाग्य का ‘लेखा’ कहते हैं। जैसा भाग्य में लिखा है, होता वही हैं। फलित ज्योतिष की सत्यता, उसके द्वारा भविष्य की बातों या भावी का उल्लेख या उद्घाटन का आधार है ‘भाग्य’ या ‘कर्म-रेखाओं’ पर विश्वास। विषय अत्यन्त गूढ़ तथा गहन तो है ही किन्तु अत्यन्त रोचक भी है। मैं अपने ऊपर घटित एक घटना का उल्लेख करके स्वयं विद्वान पाठकों के ऊपर ‘भाग्य’ के सम्बन्ध में निर्णय करने का भार छोड़ता हूँ।
मुझे फेफड़े का क्षय हुआ। मैं कानपुर के लाला लाजपतराय अस्पताल में भर्ती हुआ और अभी भी क्षय रोगियों के वार्ड में मौजूद हूँ। मेरे फेफड़े में ‘कैविटी’ घाव था। डाक्टर ने कहा थरकोप्लास्टी आपरेशन होगा एक सप्ताह बाद। कुछ ऐसा इत्तफाक हुआ कि कभी डाक्टर आपरेशन वाले दिनों में छुट्टी पर चले गए या दूसरे मरीजों के ‘थरको’ करना आवश्यक हो गया, कभी ‘सिस्टर’ छुट्टी पर चली गई। बहरहाल मेरे आपरेशन की डेट टलती गई। मैंने गुरुवर पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य को भी सूचित कर दिया था कि आपरेशन होगा। उन्होंने मुझे आशीर्वाद लिखा तथा यह भी हम गायत्री-माता से तुम्हारे लिए विशेष प्रार्थना करेंगे। खैर! मेरे पैजामे में न जाने क्यों पीले-पीले दाग पड़ने लगे। पहले तो मैं समझा कि तरकारी का शोखा या दवा गिर गई होगी या इंजेक्शन लगाते समय कुछ लिक्विड (द्रव) बह जाता होगा। डॉक्टर तथा सिस्टर ने भी यही समझा। दूसरा पैजामा बदला तब भी वही पीले-पीले दाग—वह भी केवल बाईं ओर अधिकतर। अतः पहले वाला संदेह निर्मूल निकला। डाक्टर ने कहा ‘समझ में नहीं आता ऐसा क्यों है। तुम्हारा पेशाब टेस्ट (परीक्षा) करायेंगे।’ अस्तु कई बार मेरा पेशाब टेस्ट को गया तो पेशाब में सुगर (शक्कर) मिला। यद्यपि इसके पूर्व भी इसी अस्पताल में पहले पेशाब टेस्ट हुआ था पर शक्कर न था। कभी भी शक्कर पेशाब टेस्ट पर नहीं निकला। मैंने समझा 45 वर्ष का हूँ ही। इस आयु में प्रायः शक्कर आने लगता है पेशाब में अतः आश्चर्य क्या? अब बात ध्यान देने वाली यह है कि यदि पेशाब की जाँच होती ही क्यों यदि पीले-पीले दाग न पड़ने लगते-तब पेशाब में शकर ज्ञात ही न होता और आपरेशन कैसे होता-अतः वह स्थगित कर गया। बराबर पेशाब जाँच को जाती-कभी शक्कर मिलती कभी नहीं। एक बार डाक्टर ने आपरेशन की डेट तय ही कर दी किन्तु कुछ कारणों से वह फिर स्थगित हुआ। अंत में 17 तारीख को आपरेशन-डेट तय हो गई। 12 को रोगी से जो भरवाया जाता है कि ‘मैं बेहोशी सूँघकर आपरेशन कराने को तैयार हूँ अपनी जिम्मेदारी पर।’ आपरेशन के खतरे मुझे समझा दिये गए हैं’ उस पर मैंने हस्ताक्षर भी कर दिये तथा जो तैयारियाँ तथा बैंडेज आदि बाँधा जाता है, वह भी हो गया। 17 को प्रातः मुझे इंजेक्शन दे दिया मैथोटीन का। कुछ टेबलेट खिला दिया गया। मैं आपरेशन-टेबल पर लिटा दिया गया और बाँध दिया गया। ग्लूकोस का इंजेक्शन चालू हो गया। डाक्टर ने आपरेशन के स्थान पीठ पर सुन्न करने की दवा भी लगा दी। मुझे बेहोशी की दवा भी सुँघाई गई। कुछ क्षणों तक तो मेरे लिए ब्रह्माण्ड घूम गया और मैं बेहोश हो गया। उसके बाद मुझे कुछ होश नहीं है। डाक्टर चाकू चलाने ही वाले थे। पर मेरी साँस एक एक रुक सी गई- नब्ज़ तथा दिल की धड़कन धीमी और कम हो गई-मेरा जीवन बिल्कुल खतरे में हो गया-यदि एक आध मिनट की भी देर होती तो मैं आपरेशन-टेबल पर ही समाप्त हो जाता। खैर तुरन्त आक्सीजन दी गई। साँस वापस लौटी, नब्ज़ तथा दिल की धड़कन ‘नार्मल’ (अपनी स्वाभाविक स्थिति पर) हुई। डाक्टर तो फिर भी आपरेशन करने को प्रस्तुत हो गए थे पर ‘सिस्टर’ ने उस दिन उन्हें आपरेशन नहीं करने दिया क्यों कि मैं मृत्यु के द्वार से लौटा था और ठीक एक दिन पहले एक स्त्री का देहान्त पी॰ पी॰ से हो चुका था उसके ही दुर्भाग्य से; अतः सिस्टर भी घबराई थीं, डाक्टर भी दुखी थे। आपरेशन-टेबल पर जैसे ही मैं लिटाया गया था वैसे ही एक विशेष घटना हुई। ग्लूकोस की बोतल गिर कर टूट गई। कम्पाउन्डर ने सिस्टर से कहा था कि ‘दवा की बोतल का टूटना हम बहुत अपशकुन मानते हैं।’ किन्तु सिस्टर ने हँसकर उस बात की अवहेलना की थी, किंतु इस दुर्घटना के बाद उन्हें कम्पाउन्डर की बात माननी पड़ी। संक्षेप में कहने का तात्पर्य यह है कि कारण कुछ भी रहे हों, आपरेशन उस दिन नहीं होना बढ़ा था और नहीं हुआ-ऐसी विघ्न-बाधायें एक के बाद एक आती रहीं। आपरेशन-थियेटर में जाकर भी बिना आपरेशन वापस लौट आना यह इस वार्ड के इतिहास में प्रथम घटना है।
डॉ॰ ओमप्रकाश मीतल ऐसा डाक्टर मैंने अपने जीवन में नहीं देखा। रोगियों के लिए वह साक्षात् देवता-स्वरूप हैं। वह अत्यन्त विनम्र, स्नेहपूर्ण, उत्तरदायित्वपूर्ण तथा परिश्रमी हैं प्रायः बड़े डाक्टरों में ऐसे गुण कम ही पाये जाते हैं। और साथ ही वह इतने अधिक योग्य तथा अपने कार्य में दक्ष हैं कि आज तक उनका एक भी आपरेशन खराब नहीं हुआ (मरा नहीं) इतने भोले, भले और कार्य-कुशल तथा दक्ष डाक्टर की सतत् इच्छा और प्रयत्न के होते भी कि शीघ्र मेरा आपरेशन हो जाय, आपरेशन नहीं हुआ।
उसके बाद डाक्टर ने मुझे ‘ब्लड-सुगर’ परीक्षा के लिए भेजा किन्तु दुर्भाग्य-वश वह मशीन फेल हो गई और ‘फल’ न आ सका। मेरा एक्सरे करवाया गया और डाक्टर ने कहा कि बिना कुछ किये ही केवल दवा, इंजेक्शन तथा विश्राम से इतना अधिक आश्चर्यजनक लाभ तुम्हें हो जायगा यह तो मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था। हम 1- 1॥ मास तुम्हें इसी भाँति रख कर देखेंगे कि और क्या लाभ होता है और तब आपरेशन के बारे में तय करेंगे। तब तक सुगर को भी हम कंट्रोल (बस में) कर लेंगे।’
मैं आपरेशन कराना चाहता था पर सुगर आने से मैं विचलित हो गया था। मेरे मित्रों तथा सम्बन्धियों की भी राय आपरेशन के पक्ष में इस दुर्घटना के बाद नहीं रही। कहने का तात्पर्य यह है कि 1-1॥ मास को स्थगित हो गया आपरेशन। दो ज्योतिषियों ने मुझसे कहा था कि ‘आपरेशन तो तुम्हारा होगा किन्तु अभी नहीं होगा—1-1॥ मास बाद होगा।’
गुरुवार पं॰ श्रीराम शर्मा आचार्य की प्रार्थना शुभेच्छा का प्रभाव है या डाक्टर की योग्यता का प्रभाव है या दवा का असर है या मेरा भाग्य है कि कैविटी भी बहुत कुछ अब दिखाई नहीं देती-क्या है यह ईश्वर जाने। पर मेरा विश्वास है कि सब ही चीजों का सहयोग इसमें है। संक्षेप में कहना यही हैं कि जब तक किसी चीज के होने का समय नहीँ आता तब तक वह चीज नहीं होती। इसे ही अदृष्ट नियति या भाग्य कहते हैं। अवश्य कुछ घटनायें ईश्वर द्वारा पूर्व निर्धारित होती हैं-ऐसा विश्वास मेरे कई घनिष्ठों का हो गया है जो नास्तिक तो नहीं पर नास्तिक से तो कहे ही जा सकते हैं। मेरा भी भाग्य की अनिवार्यता पर विश्वास जमने लगा है।
‘नियतिवादिता’ अकर्मण्यता नहीं सिखाती। कर्म करना तदबीर करना और फल को कृष्णार्पण कर देना, यही बात तो स्पष्ट हमारी गीता हमें सिखाती है। पूर्वजन्म एवं पुनर्जन्म का सिद्धान्त यदि सत्य है, मनुष्य को अपने पूर्व जन्म के कर्मों का अच्छा-बुरा फल भोगना पड़ता है, यदि यह सत्य है तो ‘भाग्यवादी’ सिद्धान्त भी सत्य है, इसमें कोई संदेह नहीं। भाग्यवाद कभी भी अकर्मण्यता को जन्म नहीं देता। जब आलसी अपने आलस्य का समर्थन करते हैं, भाग्य का नाम लेकर उसकी आड़ में जो अपनी अकर्मण्यता का समर्थन करते हैं तो वे न केवल धूर्त हैं वरन् समाज को भारी हानि पहुँचाने वाले हैं। ‘भाग्य’ मनुष्य की विवशता है संचित प्रारब्ध उसका नियंत्रण करता है पर पुरुषार्थ तो उसका आज का कर्त्तव्य है, इस कर्तव्य की उपेक्षा करना एक प्रकार से ईश्वर की उपेक्षा ही है। मेरे भाग्य के अटपटेपन में भी किन पुरुषार्थियों का पुरुषार्थ काम कर रहा हो, इसे कौन जानता है?
(स्व॰ लाला हरदयालजी)
जी प्राचीन समय से ही हमारी यह मान्यता रही है कि निरुपाय, असहाय एवं अपाहिज व्यक्ति को यदि कहीं से किसी व्यक्ति द्वारा आर्थिक सहायता मिल जाती है तो वह जीवनपर्यन्त उस परोपकारी व्यक्ति की भूरि-भूरि प्रशंसा करते नहीं थकता। परन्तु यदि इसी प्रकार के असमर्थ व्यक्ति को किसी की निजी सेवा का लाभ प्राप्त होता है तो वह उसके उस सत्कार्य को स्मरण करते समय एक अनिर्वचनीय आनन्द और चैन की साँस लेता है और कह उठता है कि निजी सेवा की भावना और प्रयोग के सामने मर्त्यलोक के सभी साधन सभी सामग्री व्यर्थ हैं। भुक्तभोगी के द्वारा संतोष और सुख का अनुभव करने की यह भावना झोंपड़ियों से लेकर राजप्रासादों तक अपनी अमिट छाप लगा देती है! मित्र द्वारा सेवा पाकर मित्र अपने को धन्य मानता है, राजा द्वारा सेवा पाकर रंक अपने को बड़भागी समझता है, यहाँ तक कि अपने पुत्र की सेवा पाकर माता अपना जीवन और दूध सफल मानती है।
हमारे हाथों की सेवा, हमारा समय, काम-धाम सब उन लोगों के लिए होने चाहिए, जिन्हें इनकी आवश्यकता है ऐसे लोगों की कहीं ढूंढ़ने नहीं जाना है। वे तो प्रत्येक गाँव की गलियों, प्रत्येक नगर के कूचों एवं प्रत्येक आबादी में मिलेंगे। हमें यह नहीं देखना है कि हम किनकी सेवा करें और किनको पड़े रहने और सड़ते रहने दें। हमें जाति पाँति, प्राँतीयता, राष्ट्रीयता या धार्मिकता से ऊपर उठकर अपनी सेवाएँ अर्पण करनी होंगी। जहाँ कष्ट में फँसे लोग होंगे, वहीं सेवा की आवश्यकता पड़ती है और वही उसकी वास्तविक मूल्य आँका जाता है।
इस प्रकार का सेवा-भाव न कानून देखता है न विधान, न संस्थाएं देखती हैं न संघ। यह स्वतंत्र और अबाध है। यह उदार आशय वाले व्यक्तियों से हृदय से निकल कर दीन-दुखियों की झोंपड़ियों तक जा पहुँचता है। यदि हम इस अस्त्र का प्रयोग करं तो हम अपने चारों ओर फैले हुए विषैले वातावरण से, कठिनाइयों तथा अड़चनों से छुटकारा पा सकते हैं।
राजनैतिक और आर्थिक समितियाँ राष्ट्र के निर्माण में प्रशंसनीय भाग लेती हैं, परन्तु उनके उपायों का सुखद परिणाम महीनों अथवा वर्षों बाद देख पड़ता है। आवश्यकता आज है, पर प्रबन्ध होते होने सप्ताह और मास बीत जायेंगे। यह बात व्यक्ति गत सेवा का लाभ पाने वाले और देने वाले के साथ नहीं है। सेवाभाव मन में उठा और तत्काल ही पीड़ित को लाभ पहुँचा। यहाँ घन्टों दिनों और सप्ताहों की आवश्यकता ही नहीं। आप राह चलते-चलते किसी भिखारी को पैसा दे देते हैं और वह इसी प्रकार कई लोगों से एक- एक पैसा पाकर कुछ आने इकट्ठे कर लेता है और पेट भर लेता है। पैसा उसे मिला कि उसका पेट भरा। यदि कोई राजनैतिक संस्था बड़ी प्रगतिशील होने का दम भरे और सभी भिखारियों की रोटी का सवाल हल करने पर तुल जाय तो वर्षों लग जायेंगे। सारा समय योजनाएं बनाने और रद्द करते बीत जायगा और लाभ एक भिखारी का भी न होगा। यदि सभी लोग इस बात का संकल्प कर ले कि वे जिसे भी कष्ट में देखेंगे उसे पहुंचाएंगे तो सारे व्यर्थ के संगठन तितर-बितर हो जाएं और समाज का ढीली चाल वाला छकड़ा रेलगाड़ी की भाँति सुव्यवस्थित रूप से द्रुतगामी हो जाय।
आज की परिस्थितियां सुझाती हैं कि भविष्य में अभी वर्षों तक अशाँति और उपद्रवों का बोलबाला रहेगा। बेजा दबाव, जबरदस्ती और विश्वासघात का ही दबदबा रहेगा। तब ऐसी परिस्थितियों में क्या कानून और राजनीति काम आएगी? अन्धकार के उन दुर्दिनों में प्रेमपूर्ण सेवाभाव ही काम दें सकेगा और यही महौषधि जनसमाज को विनष्ट होने से बचा सकेगी।
जनतंत्र गिरेगा और उठेगा। जनता और वर्गों के सभ्यता और बर्बरता के संघर्षों के बीच उसका बार-बार उत्थान और पतन होगा। अत्याचारी शासन निरंकुश बन जायगा, और मानवता हाय-हाय करती हुई कराह उठेगी। तब असहाय और सताए हुए प्राणियों की रक्षा केवल सेवा-भावी स्त्री-पुरुषों द्वारा ही होगी। उन्हीं द्वारा त्रस्त जनता का कल्याण होगा।
जिस व्यक्ति के जीवन में सेवा भाव का समावेश नहीं हुआ, जिसने दूसरों को पीड़ा से मुक्त नहीं किया, उसका जीवन अपूर्ण कहा जाएगा। चाहे वाह विद्वान हो कलाविद हो अथवा कुशल राजनीतिज्ञ एवं लेखक या कवि हो; यदि उसने निराश, पराश्रित, परमुखापेक्षी और तिरस्कृत प्राणियों को स्वयं सहायता नहीं पहुँचाई तो उसका जीवन खोखला है। वह मानव कहलाने का कदापि अधिकारी नहीं।
पूछा जाता है कि आखिर किया क्या जाय? करने के लिए कामों की कभी कमी नहीं रही है। हाँ कोई न करना चाहे तो दूसरी बात है। देश में अपाहिजों और लुँजों की कमी नहीं है। अंधे, बहरे,गूंगे बहरे आदि जो शारीरिक अभावों से लाचार हैं, उनको आपकी आवश्यकता है- आपके धन की नहीं। आप उस दुख और निराशा का अनुभव तक नहीं लगा सकते, जिसके लाखों प्राणी दया और क्षमा के लिए घिघियाया करते हैं। आप अंधे को ही लीजिए। आप स्वयं प्रातःकालीन अरुणाभा और सायंकालीन नदी-तट का आनन्द लेते हैं। चित्रकारी, वास्तुकला आदि का ज्ञान प्राप्त करते हैं, नन्हें-नन्हें बालकों के निखरे सौंदर्य व चपलता को देखकर उन पर अपना हृदय उड़ेलते हैं और हिमालय की सुषुम्ना और ताज की मनोरमा छटा का लाभ उठाते हैं। यही नहीं, आप एक बार किसी दर्शनीय वस्तु को देख लेते हैं तो जीवन-पर्यन्त उसे भूलते नहीं और मन ही -मन उस अतीत के चित्र का रस लेते रहते हैं। परन्तु अन्धे के लिए इन भव्य प्राकृतिक दर्शनों का, अद्भुत इमारतों का, बाल- सुलभ चपलता आदि का क्या मूल्य? ऐसे- ऐसे व्यक्ति पड़े हैं जिन्होंने अपनी पत्नी और पुत्रादि का मुख नहीं देख पाया और अंधे हो गए। आप यदि परिवार वाले हैं तो उन अभागों के संताप और क्षोभ का अनुभव कर सकते हैं। कहा भी गया है कि “ मृत्यु का आह्वान करना सरल है; परन्तु जीवितावस्था में प्रज्ञा चक्षु बनकर रहना असहनीय है।” तब आपका कर्त्तव्य हो जाता है कि दिन में,सप्ताह में, मास में, कम से कम एक बार किसी अंधे के पास जाकर उसका सुख-दुःख पूछें उसे कुछ समझायें, कुछ पढ़कर सुनायें, उसकी पत्र लिखा दें। केवल इसी बात से संतोष न कर लें कि आप ने अंधाश्रम को कोष में कुछ रकम दी है। उन बेचारों को धन से अधिक आपकी सहानुभूति, आपकी उदारता और सेवा की जरूरत है। एक बार उसे रास्ता पार करा दोगे तो उमर भर याद रखेगा। मैंने एक बार एक दुकान के कुछ अंधों से पूछा कि मैं उनके किस काम आ सकता हूँ? उनका सीधा उत्तर था-” दुकान पर काम करते समय आप हमें कोई मनोरंजक पुस्तक पढ़कर सुनाया करें।”
गूँगों की दशा तो और भी खराब है। बात-चीत करने से, अपने मन का भाव प्रकट करने से, दूसरों के भावों को समझने तथा सामाजिक चहल-पहल से उन्हें दूर रहना पड़ता है। उनके पास जाइए, लिखकर बात कीजिए, ओठों से पढ़ना सिखाइए।
जरा उनकी दशा का ध्यान कीजिए जो हाथों या पैरों से लुँज है अथवा दोनों अभावों से पीड़ित हैं। बिना हाथ वाला कब तक जिन्दा रह सकता है? बिना पैरों वाला कब तक एक स्थान पर बैठे? अपना काम चला सकता है? ऐसे-ऐसे अपाहिजों को केवल दूसरों की सहायता का ही आसरा है। आपकी आवश्यकता उन्हें इसलिए है कि आप उन्हें उठाएं, बैठाएं जीनों पर चढ़ाएं-उतारें, सड़क पार कराएं, कपड़े पहिना दें, अथवा उनका भोजन पका दें। जो कुछ भी आप उनके लिए करेंगे वही थोड़ा है।
जो बहुधा आधि-व्याधियों से पीड़ित होकर चारपाई पकड़ लेते हैं और इतने अशक्त हो जाते हैं कि स्वयं उठकर न पानी पी सकते हैं न डाक्टर के यहाँ जा सकते हैं, न उसे फोन द्वारा ही बुला सकते हैं, उन्हें समय पर पथ्य चाहिए, समय पर दवा चाहिए, बुखार नपवाना है, गरम पानी से स्नान करना है। यहाँ तक कि कभी-कभी उन्हें रात-रात भर उलझन-सी रहती है। न स्वयं सो पाते हैं, न पास बैठे व्यक्ति को सोने देते हैं। इस प्रकार के रोगियों को आपकी सहानुभूति,दिलासा देने की क्षमता, प्रेम और सेवा चाहिए। हो सकता है कि उनकी खातिर आपको रात-भर सोने को न मिले। हो सकता है कि आपके नियमित एवं व्यवस्थित जीवन में व्यतिक्रम उठ खड़े हों। सारा कार्यक्रम ही उलट जाय; पर इस पर भी आपको संतोष होगा कि आप विश्व का एक अमूल्य बचा रहे हैं उसकी रखवाली कर रहे हैं या ऐसा कार्य कर रहें हैं जो सैकड़ों रुपये देकर भी प्राप्त नहीं किया जा सकता।
आप पूछ सकते हैं कि व्यक्तियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाय जो तपैदिक, खुजली, खसरा, हैजा, ताऊन आदि छूत की बीमारियाँ से पीड़ित हैं? इसका उत्तर केवल यह है कि आप सावधानी बरतें और सतर्कता से ऐसे रोगियों की सहायता करें। आप जिस प्रकार अपने प्रियजनों, संबंधियों आदि को इस प्रकार की बीमारियों से बचाने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं वैसे ही दूसरों के लिए भी रहें। ऐसे वातावरण में जाने से आप डरेंगे। पर डर काहे का? मरेंगे दूसरों की सेवा करते हुए इज्जत के साथ; जियेंगे तो दूसरों को प्रसन्न देख कर इज्जत के साथ।
गरीबों की दुनिया के जीव भी कातर दृष्टि से देखते हुए आपके सामने खड़े हैं। कुछ ऐसे हैं जिनके गरीब माँ-बाप उन्हें अकेला- अशिक्षित छोड़कर चल बसे। कुछ ऐसे हैं जिन्हें चार रोटियों के बजाय एक ही रोटी मिलती है। कुछ ऐसे हैं, जिन्हें चौबीस घंटों में एक बार ही भोजन मिलता है। कुछ की यही नहीं मालूम कि ‘भरपेट भोजन’ क्या होता है। किसी का पति मर गया, किसी का युवा पुत्र मर गया। कुछ अकाल-पीड़ित हैं कुछ बाढ़- पीड़ित हैं। वे उजड़ गये हैं- सब कुछ खो बैठे हैं। उन्हें सहारा चाहिए— सुव्यवस्था चाहिए।
आप दयालु हैं अतः आप सेवा के अधिकारियों को अपनी सेवाएँ अर्पण करते हैं; परन्तु न्याय भी आप से कहता है कि विश्व में सम्पत्ति का उचित बटवारा नहीं होता है; उत्पादन में सबका उचित भाग नहीं रखा जाता। आपके पास भी आपकी आवश्यकताओं से अधिक है। परन्तु जितना भाग आपके पास अधिक है, वह उन लोगों की गाढ़ी कमाई है जिन्हें उनका उचित हिस्सा भी नहीं दिया गया। शीघ्र ही उन्हें उनका हिस्सा दे दीजिए अन्यथा आपका चित्त हमेशा आपसे यही कहता रहेगा कि आप डाकू हैं, चोर हैं, उठाईगीर हैं। आप उन्हें केवल धन ही न दें; उन्हें धन की कम, बल्कि भोजन, वस्त्र,ईंधन आदि की नितान्त आवश्यकता होती है।
वे साथ-ही-साथ असभ्य, भीरु, आत्म-सम्मान की भावना से रहित और मानवता से अपरिचित होते हैं। उन्हें ये पाठ भी पढ़ाने हैं। उन्हें समान का कलंक कहा जाता है अथवा बढ़ती हुई आबादी का अनावश्यक भाग कहा जाता है। उन्हें समझाइए कि वे आपके से ही आदर पाने योग्य प्राणी हैं और उन्हें हीन भाव नहीं प्रदर्शित करना चाहिए। साथ ही आप अपने पैसों में से कुछ निश्चित कटौती काटकर अनाथालयों, अस्पतालों आदि को देते रहें और समय मिलने पर स्वयं जाकर पीड़ितों की देखभाल करें।आपको एक काम और करना चाहिए। वह यह कि महापुरुषों तथा त्यागमयी देवियाँ के जीवन-चरित्र पढ़कर अपनी उदार वृत्ति और सहानुभूति जन्य परोपकार की भावना को सतत् जाग्रत रखें। आपके ऐसा करने पर ही समाज की कथित कोढ़ धुलकर अलग हो जायगा और समाज का दमकता हुआ स्वर्ण-शरीर निखर आयेगा और यही होगा आपकी बुद्धि, सम्पत्ति और निजी सेवा का आशातीत प्रसाद जिसे पाकर आप स्वदेश पर गर्व करेंगे और देश आप जैसे सच्चे नागरिकों पर अभिमान करेगा।
भारतीय संस्कृति को एक संजीवन विद्या कहना चाहिए जिसे अपनाने पर मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनने की दिशा में अग्रसर होता है। जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का संचालन जिस अन्तरंग दृष्टिकोण के आधार पर होता है, उस मानसिक मर्मस्थल को भय मार्ग पर लगाने की शक्ति संस्कृति के अतिरिक्त और किसी मार्ग से सम्भव नहीं। मनुष्य की पशुता का शमन करके उसे देवत्व की ओर अग्रसर करने में यद्यपि कई भौतिक साधन उपयुक्त होते हैं, पर देखा गया है कि उन साधनों की व्यवस्था में जितनी शक्ति लगती है, उसकी तुलना में लाभ बहुत ही कम होता है। पुलिस, कचहरी, कानून, सामाजिक बहिष्कार, लोक निन्दा, विरोध संघर्ष आदि कई मार्ग मनुष्य की कुमार्गगामिता पर बन्धन लगाने के लिए मौजूद हैं, पर देखा यह गया है कि इन सबकी परवाह न करके भी, सबक आँखों में धूल झोंककर भी लोग मनमानी करने में सफल होते रहते हैं और यह प्रतिबन्ध उसकी दूषित गतिविधि को रोकने में कुछ विशेष कारगर नहीं होते ।
मनुष्य की व्यक्ति गत तथा सामूहिक सुख- शान्ति सच्चरित्रता, सद्भावना और सहकारिता पर निर्भर है। इन तीनों महान् तत्वों का उद्गम अन्तरात्मा के जिस स्तर में उद्भूत होता है, उस स्थान को प्रभावित करके कुमार्ग से घृणा और सत्मार्ग में प्रेरणा उत्पन्न करने का कार्य जो औजार कर सकता है, उसी का नाम संस्कृति है। दूरदर्शी ऋषियों ने मनुष्य के अन्तस्थल में रहने वाले पाशविक तत्वों पर नियंत्रण करने और दैवी तत्वों को विकसित करने कि लिए हजारों लाखों वर्षों के प्रयोगों परिश्रमों के पश्चात् मनोवैज्ञानिक तथ्यों के सर्वांगीण समावेश के साथ एक महान् प्रक्रिया एवं परिपाटी की रचना की थी, जीवन को शान्तिपूर्ण रीति-नीति के साथ विकसित होते रहने की इस पद्धति को ही संस्कृति नाम दिया गया। चूँकि इसका प्रादुर्भाव विश्व के इतिहास में पहले-पहले भारत में हुआ इसलिए प्रथम आविष्कारक के नाम पर किसी अन्वेषण का नामकरण होने की प्रथा के आधार पर उस संजीवन विद्या का नाम भी “भारतीय” संस्कृति रखा गया। वस्तुतः यह मानव मात्र के लिए एक समान हितकारी विश्व संस्कृति ही है।
आज मनुष्य व्यक्ति गत रूप में अनेक उलझनों, अभावों,कष्टों चिन्ताओं, परेशानियों और आपत्तियों में फँसा हुआ है। विज्ञान, अर्थ-व्यवस्था और राजतन्त्र के विकास ने यद्यपि मनुष्य को अनेकों प्रकार के सुख-सुविधाओं के साधन प्रदान किये हैं, पर देखा यह जा रहा है कि तथा कथित ‘अविकसित’ जमाने की अपेक्षा आज के ‘विकसित’ जमाने का मनुष्य अधिक दुखी और परेशान है। उसकी आर्थिक,शारीरिक, पारिवारिक, मानसिक, सामाजिक सभी गुत्थियाँ बुरी तरह उलझी हुई हैं। आज शान्तिमय सन्तुष्ट जीवन व्यतीत करने वाला व्यक्ति कहीं कोई बिरला ही मिलेगा।
सामूहिक जीवन में भी वही बात लागू होती है जो व्यक्ति गत जीवन में सामाजिक व्यवस्था, राजनीति, धर्म संस्थाओं, शासन तंत्र, सभा सोसाइटियां व्यापार, परस्पर व्यवहार निर्माण, चिकित्सा, शिक्षा आदि सभी क्षेत्रों में भरपूर भ्रष्टाचार पनप रहा है। इनकी आलोचनाएँ खूब होती हैं, एक दूसरे को दोष देने में खूब प्रयत्न करते हैं, इस प्रकार भावना, वाणी और लेखनी के द्वारा वह असन्तोष सर्वत्र प्रकट दीखता है, पर कोई मार्ग निकलता नहीं दीखता, सभी कोई इस वर्तमान स्थिति में दुखी और असन्तुष्ट हैं, यथा सम्भव कुछ उपाय भी करते हैं, पर कोई परिणाम होता दिखाई न पड़ने पर उलटी निराशा ही होती है। आज मनुष्य के व्यक्ति गत विचार और कार्य जिस प्रेरणा तथ्य के आधार पर अनुप्राणित होते हैं, उसके रहते हुए सुधार की कोई बड़ी आशा भी नहीं की जा सकती।
मानव-जीवन की अनेक समस्याओं और आवश्यकताओं को सरल बनाने के लिए अनेक वाह्य प्रयत्नों की आवश्यकता है, प्रसन्नता की बात है कि हमारे राजनैतिक कर्णधारी, अर्थशास्त्री, औद्योगिक, वैज्ञानिक, इंजीनियर, चिकित्सा शास्त्री, शिक्षा विशेषज्ञ, सामाजिक नेता अपने-अपने ढंग से बहुत कुछ कार्य कर रहे हैं, यह सब प्रयत्न प्रसन्नता और प्रगति के सूचक हैं, पर स्मरण रखने की बात है कि यह केवल आँशिक और एकाँगी उपचार हैं। यह सब प्रयत्न मिलकर भी एक बहुत सीमित मात्रा में ही सम्मुख उपस्थित समस्याओं के हल करने में समर्थ हो सकते हैं। कारण स्पष्ट है- मानव-जीवन की अन्तरंग गतिविधि गलत दिशा में चल पड़ने के कारण ही वाह्य जीवन की अनेकों समस्याओं तथा आपत्तियों का उद्भव होता है। वह न बदलें तो जड़ सूखते रहे और पत्ते सींचे जाते रहें जैसी स्थिति ही बनती है।अपराधी को पुलिस एक अपराध में दण्ड दिलाकर निवृत्त नहीं होती कि नई खुराफात करने की योजना बनाकर वह आगे की तैयारी कर लेता है। पुलिस कहाँ तक, कब तक उसे रोकेगी। कुमार्ग से रुकना और सन्मार्ग की ओर अग्रसर होना प्रधानतया इस बात पर निर्भर हैं कि मनुष्य किन भावनाओं, विचारधाराओं, आदर्शों और उद्देश्यों से अपने अन्तरंग में क्षेत्र में अनुप्राणित होता है।
विश्व में सर्वत्र, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुख-शान्ति की स्थापना करने के लिए सर्वोपरि आवश्यकता यदि किसी बात की है तो यह है कि मानवीय अन्तःकरण के मर्म भाग तक उस प्रेरणा शक्ति का प्रवेश कराया जाय, जिसे विश्व संस्कृति, मानवीय संस्कृति या भारतीय संस्कृति आदि नामों से पुकारा जाता है। संसार की इस सर्वोपरि आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्राचीन काल में अनेक तत्ववेत्ता ऋषि अपना जीवन उत्सर्ग करते थे। उनके जीवन का एक ही लक्ष एवं कार्यक्रम रहता था, अपने आपका चरित्र इतना ऊंचा, उज्ज्वल और त्यागमय रखें, जिससे दूसरों को उनके व्यक्ति गत के प्रति समुचित आदर बुद्धि रहे और उस आदर बुद्धि की श्रद्धा की सुईदार पिचकारी में उच्च सांस्कृतिक तत्वज्ञान की दवा भरकर जन साधारण के भीतरी अन्तः प्रदेश में एक प्रकार का मार्मिक ‘इंजेक्शन’ लगाते थे और सामान्य कोटि के नर पशुओं को अपने उस ‘इंजेक्शन’ से काया पलट करके सच्चा मानव, महापुरुष, भू सुर बना देते थे। आज वह परम्परा शिथिल एवं अस्त-व्यस्त ही नहीं लुप्त प्रायः भी हो चली है। देश,धर्म जाति और विश्व की चिन्ता ओर सेवा करने वाले व्यक्ति इस तथ्य की आज उपेक्षा कर रहे हैं। ऋषि-जीवन बनाने और बिताने का कष्टसाध्य मार्ग कौन अपनाये? कीर्ति, प्रशंसा, नामवरी नेतागिरी जिसमें न मिले उस कार्य को कौन करे? दफ्तर में बैठकर योजना बनाने, व्यवस्था यन्त्र को चलाने या धुँआधार लेखनी वाणी की घुड़दौड़ को छोड़कर घर-घर अलख जगाने और दूसरों में अपना व्यक्ति त्व घुला देने का बेढंगा काम कौन स्वीकार करें? इस कठिनाई के कारण सस्ती वाह- वाही छोड़कर गहरे कष्टसाध्य ऋषि तुल्य प्रयत्न करने से जान बचाने की कमजोरी के कारण- वे अनेक प्रयत्न अधूरे, अपूर्ण और एकाकी ही बने हुए हैं जो भौतिक क्षेत्र के अनेक सुयोग्य कार्यकर्त्ताओं द्वारा बहुत श्रम और खर्च करके बड़ी तत्परतापूर्वक चलायें जा रहें हैं।
अब समय आ गया है कि वास्तविकता को समझा जाय और समस्याओं के उद्गम क्षेत्र- मानवीय अन्तरंग-मर्मस्थल में सतोगुणी परिवर्तन करने के लिये सांस्कृतिक सुधा-धारा अभिसिंचन अनुष्ठान का आरम्भ किया जाय। मानव- जीवन को कलंकित होने से बचाने को लिए, दिन-दिन बढ़ती ही चिन्ता, अशान्ति और वेदनाओं से त्राण पाने के लिए ऐसा सांस्कृतिक अभियान व्यापक रूप से आरंभ करना, आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। अन्यथा इसके अभाव में अनैतिकता से अव्यवस्थित मनुष्य प्रगति के सारे भौतिक प्रयत्नों पर पानी फेरकर उलटा उनसे दुख द्वेष की ही मात्रा बढ़ायेगा।
संस्कृति जीवन की सर्वांगीण- विशेष तक मानसिक, भावनात्मक एवं विश्वासों के क्षेत्र में सुव्यवस्था उत्पन्न करने वाली एक वैज्ञानिक पद्धति है। कृषि विद्या के नियमों के आधार पर जिस प्रकार खेती को सफल बनाना और बागवानी विद्या के द्वारा जिस प्रकार पेड़- पौधों को सुविकसित बनाना सम्भव है, उसी प्रकार मनुष्यों में मनुष्यता की फसल उत्पन्न करने के लिए जो पद्धति काम में लाई जाती है, उसे संस्कृति कहते हैं। अँग्रेजी में संस्कृति को ‘कलचर’ कहते हैं। कलचर का अर्थ ‘कृषि’ है, मानवीय अन्तःकरणों को जोत -बोकर सुख शान्ति के उपयुक्त फसल उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त करना ही इस कृषि का उद्देश्य है।
वस्तुतः सांस्कृतिक पुनरुत्थान पर ही हमारा भविष्य निर्भर है। पेट ठीक हो तो ही नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजनों का कुछ मूल्य है, अन्यथा पेट का पाचन यन्त्र बिगड़ जाने पर अच्छा भोजन भी हानिकारक ही सिद्ध होगा। समाज की नैतिकता सुरक्षित रहे तो भौतिक उन्नति से सुख मिल सकता है, अन्यथा अपनी ग्रस्त मनुष्य जितने ही साधन सम्पन्न होंगे उतना ही अनर्थ करने को अधिक सक्षम एवं सफल बनते जावेंगे। नीतिवान गरीब भी आनंदमय जिन्दगी जी सकता है, पर अनीतिग्रस्त व्यक्ति कुबेर सा सम्पन्न होने पर भी अपने लिए तथा दूसरों के लिए केवल अनर्थ ही उत्पन्न कर सकता है।
युग परिवर्तन के इस संक्रान्ति काल में प्रभु प्रेरणा से प्रगति की अनेक प्रक्रियाएं संचरित हो रही हैं उन्हीं में से एक अत्यंत महत्वपूर्ण, सर्वोपरि सर्व प्रधान प्रक्रिया सांस्कृतिक पुनरुत्थान की है। इस चेतना को उत्पन्न करने वाले ऐसे वैज्ञानिकों की आज भारी आवश्यकता अनुभव की जा रही है जो जड़ यन्त्रों को चलाने में नहीं, मानवीय अन्तरात्मा में दिव्य भावनाओं को तरंगित करने में उपयुक्त हो। आज ऋषि तत्व को सजग, सक्षम और सक्रिय बनाने की आवश्यकता है, जिससे अज्ञानान्धकार से आच्छादित अन्तःकरणों में उस दिव्य प्रकाश की झाँकी हो सके, जिसके कारण यह भारतभूमि किसी समय रत्न मणियों जैसे ज्योति शृंखला से सदा जगमगाती रहती थी।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का श्रीगणेश युग बेला की इसी आवश्यकता और पुकार के आधार पर हुआ है। इसका मंगलाचरण शिलान्यास 15 मास से चल रहे विशद् गायत्री महायज्ञ में 125 हजार जप, 125 लाख हवन और 125 हजार ब्रह्मभोज के साथ आरम्भ हुआ है। मंगलाचरण शान्ति और सफलतापूर्वक हो चुका, आइए अब आगे को कदम बढ़ावे।
सांस्कृतिक पुनरुत्थान आज विश्व मानव की सर्वोपरि आवश्यकता है उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए अपने आपको प्रस्तुत करना एक ऐसा महान् कार्य है, जिसे देश और काल की दृष्टि से एक अत्यन्त उत्कर्ष परमार्थ कह सकते हैं। हम चाहते हैं कि अखण्ड ज्योति और गायत्री परिवार के सदस्य इस महान् कार्य में अपने समय और श्रम का समुचित योग दान करें।
महायज्ञ की पूर्णाहुति के अवसर पर अनेक महानुभावों ने अपना पूरा या आँशिक समय इस पुनीत कार्य के लिए देने का वचन दिया है और आत्मदानी, व्रतधारी एवं कर्मयोगी के प्रतिज्ञा- पत्रों पर हस्ताक्षर भी किये थे। ऐसे कार्यकर्ताओं की सचमुच भारी आवश्यकता अनुभव की जा रही है। तीन श्रेणी की अपेक्षा अब दो ही श्रेणी बना दी गई हैं। (1) जिनके ऊपर कमाने का कोई पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है, और समीपवर्ती या दूरवर्ती क्षेत्र में सांस्कृतिक सेवा के लिए कहीं भी जा सकते हैं इनकी ‘आत्मदानी’ श्रेणी होगी। (2) जो पारिवारिक जिम्मेदारियों से बँधे हैं और अपने नियत कार्य करते हुए सांस्कृतिक सेवा के लिए थोड़ा बहुत समय दे सकते हैं, उन्हें ‘व्रतधारी’ कहा जायगा।
सांस्कृतिक सेवा शृंखला
यह संगठन विशुद्ध धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक परिवार है, जिसमें पूरा समय देने वाले आत्मदानी और यथासंभव समय देने वाले व्रतधारी दोनों ही प्रकार के वे परमार्थ प्रेमी व्यक्ति सम्मिलित होंगे जो निर्धारित 12 प्रतिज्ञाओं को व्रत रूप में स्वीकार करेंगे और उन आदर्शों एवं सिद्धान्तों पर स्वयं चलने तथा अपने प्रभाव क्षेत्र में दूसरी को चलाने का प्रयत्न करेंगे। (1) आत्म बल बढ़ाने के लिए ईश्वर उपासना (2) अपने व्यक्ति गत जीवन को दिन-दिन अधिक उत्कृष्ट एवं आदर्श बनाते चलना (3) सांस्कृतिक एवं नैतिक भावनाओं को फैलाने के लिए एक प्रकार के धर्म शिक्षण का कार्य करते रहना। इन तीन कार्यक्रमों के लिए अपनी भावना तथा क्रिया को लगाने के लिए प्रत्येक सदस्य अपनी परिस्थिति के अनुसार अधिकतम प्रयत्न करता रहेगा।
शृंखला के सदस्य अपने आपको एक प्रकार से लोक शिक्षक, धर्म प्रचार के अध्यापक मानेंगे और निरन्तर यह सोचते रहेंगे कि धर्म भावनाओं के फैलाने के लिए हम क्या कर सकते हैं जो करना सम्भव हो सो पूरी तत्परता से करना चाहिए। अध्यापक ही क्यों, एक स्कूल या पुस्तकालय के रूप में अपने आपको बना लेना चाहिये। जब भी समय बचे तभी प्रभाव क्षेत्र के लोगों को समझाने, कथाएं सुनाने, अपने पास अच्छी पुस्तकें संग्रह करके लोगों को पढ़ाते रहने, धार्मिक प्रकृति के लोगों को संगठित करते रहने,कोई सामूहिक यज्ञानुष्ठान आदि आयोजन कराके ऐसे अवसर उत्पन्न करते रहना चाहिए जिससे सांस्कृतिक भावनाओं का अधिक व्यापक क्षेत्र में प्रसार हो सके।
साँस्कृतिक विद्यालय
गायत्री तपोभूमि में साँस्कृतिक विद्यालय की स्थापना इस उद्देश्य से की गई है कि भारतीय संस्कृति के तत्वज्ञान को इस विषय के जिज्ञासु भली प्रकार समझ सकें अपने जीवन में इस शिक्षा को धारण करके स्वयं सुख शान्ति का जीवन व्यतीत कर सकें और दूसरों की अधिक सेवा करने की योग्यता प्राप्त कर सकें।
विद्यालय का पाठ्यक्रम 3 महीने का रखा गया है। आषाढ़ सुदी पूर्णिमा से आश्विन सुदी पूर्णिमा तक प्रथम सत्र, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष दूसरा सत्र, माघ, फाल्गुन, चैत्र तीसरा सत्र, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ चौथा सत्र होगा। समर्थ छात्र भोजन भार जो लगभग 15) मासिक होता है, स्वयं उठाने, असमर्थ छात्रों को इसमें आधी छूट दी जा सकती है, विशेष परिस्थिति में यह पूरा खर्च भी छोड़ा जा सकता है।
तीन मास में निम्न शिक्षाएं दी जाएंगी (1) भारतीय संस्कृति की तात्विक विशेषताओं का परिचय (2) जीवन को सुख शान्तिमय बनाने वाली विचारधारा का दिग्दर्शन (3) भारतीय शिष्टाचार और समाज विज्ञान (4) शारीरिक, मानसिक, सामाजिक समस्याएं और उनका हल (5) शरीर रचना और स्वस्थ रहने की विद्या की समुचित जानकारी (6) रोगों का निदान, परिचर्या और सरल रामबाण औषधियों द्वारा चिकित्सा ज्ञान (7) रामायण की कथा, भजन कीर्तन आदि के योग्य संगीत तथा अनेक वाद्य बजाना (8) लाठी, तलवार आदि कई हथियार चलाना तथा आसन प्राणायाम आदि व्यायाम (9) भाषण देने का अभ्यास (10) शुद्ध यज्ञोपवीत बनाकर अपने गुजारे लायक कमा लेने की शिक्षा।
उपरोक्त दस शिक्षाएं सर्व साधारण के लिए हैं, जिन्हें उपासना, कर्मकाण्ड आदि विषयों में अभिरुचि हो, वे चाहें ते तीन मास में ही पौरोहित्य कोर्स भी पूरा कर सकते हैं, इसमें निम्न विषय होंगे- (1) विवाह प्रयोजनों और कामनाओं को पूर्ण करने वाले 20 प्रकार के यज्ञों की क्रियात्मक, शिक्षा, (2) नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, अंत्येष्टि आदि षोडश संस्कार कराने का क्रियात्मक विधान, (3) शिक्षात्मक वेदमन्त्रों का स्वाध्याय, (4) गायत्री गीता, (5) रामायण, गीता आदि की धार्मिक कथाएँ कहने का रोचक अभ्यास।
16 वर्ष से अधिक आयु के अच्छी हिन्दी जानने वाले, अनुशासन और शिष्टाचार पालन करने वाले, सत्स्वभाव के छात्र इन सत्रों में लिये जावेंगे। अच्छे प्रतिभाशाली और उत्साही छात्र इस विद्यालय के जुटाने रहने के लिए प्रत्येक प्रेमी को प्रयत्न करना चाहिए। इस शिक्षा क्रय को उत्तीर्ण करने वाले छात्रों को साँस्कृतिक प्रचार की कुछ अच्छी आशा की जा सकती है।
रचनात्मक कार्य-
तपोभूमि में तथा देश के कोने-कोने में कुछ रचनात्मक कार्य आरम्भ किये जाते हैं, इनमें मुख्य यह हैं—(1) भारतीय संस्कृति के अंग-प्रत्यंगों पर वैज्ञानिक ऐतिहासिक और तथ्यपूर्ण खोज करके उनकी जानकारी सर्व साधारण को कराने के लिए अत्यन्त सस्ती पुस्तिकाएं प्रकाशित करना,(2) संस्कारों और त्यौहारों को प्रेरणात्मक ढंग से करा सकने की व्यापक व्यवस्था,(3) विभिन्न स्थानों पर साँस्कृतिक शिक्षा-शिविरों का आयोजन,(4) गोष्ठियों सम्मेलन, प्रवचनों और विचार - विनिमय मन्त्रों की स्थान-स्थान पर व्यवस्था, (5) साँस्कृतिक विद्यालय का निर्माण,(6) प्रदर्शिनी, अभिनय, संगीत, कवि-सम्मेलन, प्रतियोगिता, चित्रपट आदि मनोरंजनों द्वारा साँस्कृतिक भावनाओं का प्रचार, (7) देव मंदिरों में पूजा-सेवा के अतिरिक्त देव धन में पुस्तकालय, विद्यालय, प्रवचन व्यवस्था आदि शिक्षात्मक आदि कार्य भी आरम्भ करना,(8) साधु-संन्यासी,पंडा-पुरोहित, पुजारी आदि धर्मजीवी लोगों को सार्व-सेवा कार्यों की ओर झुकाना, (9) लुप्त प्रायः यज्ञ विद्या की खोज, (10) गायत्री में सन्निहित सद्वृद्धि और यज्ञ में ओत-प्रोत त्याग भावनाओं का व्यापक प्रचार।
108 यज्ञ
सांस्कृतिक सेवा शृंखला के संगठन और व्रत- धारी व्यक्तियों के प्रारम्भिक परिश्रम के रूप में आषाढ़ सुदी 15 गुरुपूर्णिमा तद्नुसार ता॰ 22 जुलाई को सर्वत्र सामूहिक गायत्री यज्ञ कराने का एक कार्यक्रम सौंपा गया है। गायत्री महायज्ञ चल रहा था, उसी आधार पर अब से गुरुपूर्णिमा तक तक अपने आस-पास के क्षेत्र में घूम-घूमकर अधिक से अधिक लोगों द्वारा गायत्री जप करायें जायं और अन्त में गुरुपूर्णिमा के दिन उन सब को एकत्रित करके सामूहिक गायत्री हवन कराये जायं। इन जप और हवन करने वालों के जप हवन का हिसाब तथा पूरे पते भेजने से उनकी साधना के प्रमाण-पत्र भेजे जायेंगे और वहाँ गायत्री तपोभूमि की एक शाखा मान ली जायगी।
साधना और तपश्चर्या
गायत्री तपोभूमि में नैष्ठिक साधना, तपश्चर्या, पुरश्चरण आदि करने में अनुभवी संरक्षण तथा सिद्ध भूमि की विशेषता का लाभ भी मिलता है। यह स्थान आत्म-बल की साधना को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए अद्वितीय क्षेत्र है। साधकों के लिए यहाँ समुचित सुविधा रहती है। जो लोग घर से निवृत्त होकर साधन रत जीवन व्यतीत करना चाहते हैं,उनके लिए असाधारण शान्तिदायक स्थान है।
महिला विद्यालय
अभी तो नहीं पर निकट भविष्य में ही आचार्य जी की धर्मपत्नी भगवती देवी शर्मा के ‘संचालकत्व एक महिला विद्या मन्दिर अलग से चलेगा, जिसमें पुरुषों के संस्कृति विद्यालय के समान ही तीन महीने के शिक्षण क्रम रहेंगे। उनमें महिला जीवन की अनेक समस्याओं को हल करने वाले परामर्श एवं शिक्षण की ऐसी अतिरिक्त व्यवस्था भी रहेगी, जिसे प्राप्त करके महिलाएं अपने स्वास्थ्य स्वभाव ज्ञान एवं व्यवहार को अधिक विकसित करके अपने परिवार के लिए अधिक आदारास्पद एवं उपयोगी बन सकें। जो सुनिश्चित महिलाएं इस विद्यालय को चलाने तथा महिला जगत की साँस्कृतिक सेवा के लिए अपना समय और श्रम दे सकेंगी उनका सादर स्वागत किया जायगा।
भारत की अन्तरात्मा जाग रही है। हमारा साँस्कृतिक पुनरुत्थान होना सुनिश्चित है। इस जाग- रण वेला में हम सभी धर्म-प्रेमियों को विशेषतया अपने परिजनों को कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए सादर आमन्त्रित करते हैं! आइए, कुछ करने के लिए आगे बढ़ें। प्रभु-प्रेरणा से सम्पन्न हो रहें, एक महान् कार्य में भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करना हम लोगों के लिए निश्चय ही एक दूरदर्शिता एवं बुद्धिमत्ता की बात होगी।
(डा॰ काशीनाथ झा, दरभंगा)
‘अमृत पत्रिका’ में नरमेध यज्ञ का समाचार प्रकाशित हुआ था। नरमेध का नाम ही चौंकाने वाला था। आज के युग में, नर-बलि कैसे दी जा सकती है? अथवा सरकार इसे कैसे सहन कर सकती है ऐसे अनेक विचार मस्तिष्क में विद्युत तरंगों की भाँति प्रवाहित हो गये। मित्रों में भी, कई दिन चर्चा होती रही। किन्तु कोई निष्कर्ष पर न पहुँच सके। अन्ततः यह निर्णय किया गया कि गायत्री- तपोभूमि के प्रबंधकों तथा इस यज्ञ के संयोजकों से पत्र-व्यवहार किया जाय ओर इस कार्य के लिये सभी मित्रों ने मुझे नियुक्त किया।
पत्र-व्यवहार का ही परिणाम समझिये कि मैंने मथुरा यात्रा का पुरोगत बना लिया। और भी कई सज्जन मथुरा गमन के उत्सुक थे किन्तु विभिन्न कारणों से वे असफल रहे और केवल तीन व्यक्ति मेरा साथ दे सके। इनमें से एक सज्जन तो पटना के ही रिटायर्ड इंजीनियर थे, अन्य थे वकील साहब और सज्जन एम॰ ए॰ (दर्शन) के एक विद्यार्थी थे।
वकील साहब तथा इंजीनियर साहब तो पहिले से ही गायत्री संस्था से सम्बन्धित थे। उन्होंने पहिले थोड़े बहुत पुरश्चरण आदि भी कर रखे थे। अलबत्ता, शेष (हम )दो व्यक्ति इस क्षेत्र में नवागन्तुक ही थे।
डेढ़ दिन की मनोरञ्जक यात्रा के पश्चात् हम लोग मथुरा पहुँचे। स्टेशन पर ही, यज्ञ के स्वयं-सेवक तैनात थे किन्तु हमने उन्हें किसी भाँति का कष्ट न देकर, अपने आप ही यज्ञ-स्थल तक पहुँचने का निश्चय किया।
हमारा ताँगा अभी चला भी न था कि मथुरा के पंडों ने हमें रोक लिया और आग्रह किया। कि हम तपोभूमि न जाएं। वहाँ तो पानी भी प्राप्त नहीं है। हम चक्कर में पड़ गये और वास्तव में हम उनकी बात मानकर, सम्भवः उन्हीं के घर चले गये होते, किन्तु उसी समय बम्बई से आने वाले गायत्री-भक्तों ने हमें बताया कि ये लोग वैसे ही बहकाते हैं। तपोभूमि कोई कष्टकारक स्थान नहीं है।
तपोभूमि का दृश्य, वहाँ का वातावरण, यज्ञ की सुगन्धि से परिपूर्ण अन्तरिक्ष, कुछ इस प्रकार की वास्तव में” मथुरा तीन लोक से न्यारी ही है।” जिधर देखो, देश-विदेश से एकत्रित गृहस्थ-तपस्वियों, नर-नारियों का विशाल जन- समूह हिलोर ले रहा था।
कुछ नैसर्गिक प्रेरणा रही हो, अथवा केवल वातावरण का प्रभाव हमारे साथी वकील साहब तथा इंजीनियर महोदय तो अपनी भक्ति में तल्लीन हो गये। विशाल गायत्री नगर के कैम्पों से एक कैम्प उन्हें मिल गया था। वे तो अपनी माला लेकर गायत्री मंत्र के पुरश्चरण में तल्लीन हो गये। किन्तु विद्यार्थी जी ठहरे पक्के नास्तिक। बोले, “ चलो घूमें हम तो मनोरंजन के लिये आये हैं”
किन्तु मनोरंजन भी कहाँ? उन्हें तो आलोचना करने से ही फुर्सत नहीं मिल पा रही थी। एक ओर तो हजारों नर-नारी, एक दृढ़ लगन के साथ, सैकड़ों हवन-कुँडों में यज्ञ कर रहे थे, स्वाहा की ध्वनियाँ आन्तरिक में व्याप्त हो रही थीं। घी आदि हवन-सामग्रियों की सुगन्धि मस्तिष्क, नेत्रों तथा आत्माओं का मैल धो रही थी और दूसरी ओर विद्यार्थी जी का मन आशंकित ही था। धार्मिक कर्म कांडों के विषय में आज के बुद्धिवादी लोग कुछ अच्छे विचार नहीं रखते वे भी कुछ उसी प्रकार सोचते थे।
इसी सम्बन्ध में, हमने अनेकों आगंतुकों से बातचीत की। उतनी होशियारी के साथ जैसे कि सफाई पक्ष का वकील करता है। आगन्तुकों में, अधिकाँश व्यक्ति मथुरा के बाहर से ही आये हुए थे। गुजरात से, महाराष्ट्र से, राजस्थान से, पूना से,मद्रास से, बिहार-उड़ीसा से , मध्य प्रदेश तथा मध्य भारत से । कुछ तो दक्षिणी अफ्रीका से भी आये थे। वे ने तो पंडे थे, न सभी कर्मकाँडी पंडित या ब्राह्मण थे वरन् अधिकाँश सद्गृहस्थ थे। वे अकेले नहीं आये थे, उनकी धर्मपत्नी, बच्चे , माँ-बाप आदि भी साथ थे।
विहंगम दृष्टि से ही, हमारा निश्चय बदल गया। इन व्यक्तियों को ढोंग व पाखंड-दिखावे से क्या लाभ? अरे वे तो गायत्री माता के सौम्य उपासक मात्र थे। उन्हें कोई दैवी प्रेरणा ही, आज के युग में (कलयुग-मशीनों के युग में) भक्ति मार्ग पर अग्रगामी कर रही थी।
निःसंदेह, हमारे विद्यार्थी जी काफी झेंपे! बोले, मेरे विचार अभी काफी अपरिमार्जित हैं। शंकाओं ने मेरी बुद्धि भ्रमित करदी थी। वरना, ऐसे भले, पुण्यात्मा व्यक्तियों के विषय में, मैं इस भाँति के विचार न रखता।
पर, मैं समझता हूँ यह उनकी गलती नहीं थी। हमने अपने जीवन में इतने अधिक गृहस्थ तपस्वियों को एक स्थान पर एकत्रित व साधनारत नहीं देखा था। कहने को तो प्रयाग में लाखों ही “साधू” आते हैं, तपस्या भर करते हैं। परन्तु यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि ऐसे ही नामधारी साधुओं ने धर्म में ढोंग को आश्रय देकर, नास्तिकता की विचारधारा को फैलाने में सहायता की है।
प्रथम बार, मैं और मेरे विद्यार्थी साथी, इन पवित्र आत्माओं के सम्मुख नतमस्तक हुए।
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भले व्यक्ति प्रत्येक शुभ कार्य के समर्थक होते हैं। परन्तु कुछ महान् आत्माएं इस पृथ्वी पर इसीलिये अवतार लेती हैं कि प्रत्येक शुभ कार्य में विघ्न डालें। जैसे भी हो, कुछ न कुछ गड़बड़ी की जाय। इसी भाँति के कुछ व्यक्तियों ने अफवाह उड़ाई कि जमुना में बाढ़ आ रही है और सभी कैम्प आदि बह जायेंगे। किन्तु न तो कोई बाढ़ आई और न कोई कैम्प बहा। अगले दिन वे सज्जन अचानक ही हमें मिलें। हमने कहा-महाशय! बाढ़ तो आई नहीं; वे तपाक से बोले “अरे! उन सरकारी मिनिस्टरों ने, जो यज्ञ में आकर सम्मिलित हुए थे, बड़े प्रयत्न से रुकवा दी है। पानी नहरों में काट दिया गया है नहीं तो..........”। बस इससे भी अधिक असत्य भाषण वे न कर सके और नौ दो ग्यारह हो गए।
ऐसे ही कुछ विघ्न संतोषी ईर्ष्यालु लोग स्टेशन पर ही हमारे कान से आ लगे थे। उनने आचार्यजी के विषय में बताया कि “ वह कोई बड़े महन्त हैं। यज्ञों से कमाते खाते हैं, फूलकर मोटे कुप्पा हो रहे है। लाखों रुपये व्यय कर रहे हैं तो मुनाफा भी लाखों ही बटोरेंगे।”
किन्तु आचार्यजी के दर्शन मात्र से यह धारणा हमारे मन से स्वतः ही उड़ गई। आचार्यजी ! कितना सरल, सौम्य और निर्विकार व्यक्ति। तपस्याओं से उनकी एक-एक हड्डी पसली गिनी जा सकती थी। मुखाकृति के तेज-तपोबल ही समझिए- दर्शक की दृष्टि उनके सम्मुख स्वतः ही झुक जाती है। जिसने अपनी समस्त सम्पत्ति, धर्मपत्नी के जेवर और बच्चों के जोड़े हुए पैसे तक गायत्री मिशन को सर्वस्व दान देकर निस्पृह ब्राह्मण का जीवन स्वेच्छा से स्वीकार किया ऐसे देव पुरुषों के लिए ऐसी बातें कहना तो दूर सुनना भी पाप प्रतीत हुआ।
आय-व्यय के रजिस्टर सब के लिए खुले पड़े थे। बाहर से आये हुए गायत्री उपासकों में से ही .कुछ व्यक्ति आय- व्यय का हिसाब-किताब रख रहे थे। आय रसीद बहियों के द्वारा हो रही थी, जिन्हें कोई व्यक्ति भली प्रकार देख और जाँच सकता था। हमारे विद्यार्थी जी को इस विषय में बहुत दिलचस्पी थी, उनकी जिज्ञासा निवारण के लिए हम लोगों ने चार पाँच घंटे हिसाब कि कागजात भी उलटने पलटने में लगाये। मालूम हुआ कि कुल मिलाकर लगभग 17 हजार रुपया पूर्णाहुति के अवसर पर आया। खर्च के कुल पर्चे तो हमने नहीं जोड़े पर इतना अनुमान लगा लिया कि छह हजार आगन्तुकों के लगभग एक सप्ताह तक रहने, हवन करने आदि में प्रति व्यक्ति तीन रुपया के हिसाब से हुई आया की अपेक्षा निश्चय ही अधिक व्यय हुआ होगा । ऐसी दशा में इस यज्ञ से ‘लाभ कमाने ‘ की बात सोचना भी मूर्खता ही होगी।
एक विशेष बात, आचार्यजी के संभाषण में और थी— कि यद्यपि वे हमसे एकाध ही वाक्य बोल पायें, क्योंकि हजारों व्यक्तियों से अधिक बात करना सम्भव ही न था फिर भी उनका प्रत्येक शब्द शुभ गुणों, भक्ति , निर्विकार जीवन की ओर बढ़ने को प्रेरित करत था। इस विषय में नागपुर के एक परिवार से हमारी बातचीत हुई। उन्होंने बताया कि तीन वर्ष पूर्व, मथुरा यात्रा के दौरान में वे आचार्यजी के संपर्क में आये और तभी से उनके जीवन का क्रम ही बदल गया है। वे स्वयं उनकी पुत्र-वधू (24 वर्ष) भी गायत्री माता कि भक्त थीं, और क्योंकि उनका कैम्प हमारे पड़ौस में ही था, हमने देखा कि वे सभी गायत्री मन्त्र की माला फेरते रहते थे। ऐसी आदर्श आस्तिकता स्तुत्य है।
अन्त में विदाई का दृश्य हमारे नेत्रों में नृत्य कर रहा है। छल,कपट,लूटने,मूर्ख बनने आदि के सभी अभियोग, यज्ञ के भागीदारों के अश्रुकणों में मिलकर बह गये। कितना आत्मीयता द्योतक दृश्य था। विदा होते समय, सभी भक्त लोग और आचार्य जी कुछ ऐसा अनुभव कर रहे थे जैसे कि माँ-बेटी बिछुड़ रही हों।
चार गये थे हम, दो लौटे। वकील साहब और इंजीनियर महोदय ने तो यह निश्चय किया कि 1। लाख गायत्री -मंत्रों का पुरश्चरण, कुछ मन्त्र लेखन यज्ञ आदि पूर्ण करने के पश्चात्, हरिद्वार आदि होते हुए, लगभग दो मास बाद घर लौटेंगे।
स्वयं मुझे भी प्रेरणा मिली है। मैंने भी अपने मन में कुछ निश्चय किया है। विद्यार्थी जी, आस्तिक तो नहीं हुए पर गायत्री-महाविज्ञान के पृष्ठों में खोये से रहते हैं। आचार्य जी का आशीर्वाद, यहाँ भी रोज ही हमारे नेत्रों के सम्मुख रहता है। लिखते समय भी मैं उसे आंखें बन्द करके पढ़ रहा है- “ईश्वर तुम्हें सद्बुद्धि प्रदान करें।”
( प्रो॰ रामचरण महेन्द्र, एम॰ ए॰ )
मनुष्य के ज्ञान की वृद्धि करने और संसार के ज्ञान को बढ़ाने वाली शक्तियों में मनुष्य के मस्तिष्क की स्मरण शक्ति महत्वपूर्ण है। अन्य जीवों की अपेक्षा मनुष्य में स्मरण शक्ति विशेष विकसित रूप में पाई जाती है। ज्ञान भंडार को बढ़ाने में इसका प्रमुख स्थान है। लेखकों, इतिहासकारों, वक्ताओं, ऋषि मुनियों का ज्ञान उनकी स्मृति में संचित रहता है। जब पुस्तकें नहीं थीं, तो अध्यापकों का मस्तिष्क ही पुस्तकें थीं, और उनकी स्मरण शक्ति के कारण ही उनका इतना मूल्य था। जो कुछ वे उच्चारण करते थे, उसे शिष्य को अपनी स्मृति में धारण करना पड़ता था। पुस्तकों के प्रचार से स्मरण शक्ति निर्बल हो गई है फिर भी अनेक शक्तियों में अद्भुत स्मरण- शक्ति पाई गई है और आज भी पाई जाती है।
अंग्रेजी भाषा में लार्ड वायरन, मैकाले अपनी स्मरणशक्ति के कारण बहुत प्रसिद्ध रहे हैं। लार्ड मैकाले के मस्तिष्क की तुलना ब्रिटिश म्यूजम लाइब्रेरी, लंदन के विशाल पुस्तकालय से की गई है। कहते हैं कि जिस विषय पर उसे आवश्यकता होती थी, उसी के सम्बन्ध में असीमित ज्ञान निर्भर उसमें से बह निकलता था। उपन्यास, कहानी, भ्रमण या इतिहास किसी भी विषय पर वे धाराप्रवाह बोल सकते थे। वे जो भी पुस्तक पढ़ते थे, उन्हें शब्द-शब्द स्मरण रह जाता था। मिल्टन “पैराडाइज़ लास्ट” जैसा महाकाव्य उन्होंने एक रात्रि में याद कर डाला था। कवि बायरन के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने जितनी भी कविताएँ लिखी थीं, जीवन के अंतिम क्षणों तक कंठस्थ थीं। लार्ड बेकन की स्मरणशक्ति इतनी तीव्र थी कि अपने लिखे हुए निबन्ध वे शब्द व शब्द बोल देते थे। अमेरिका के प्रसिद्ध वनस्पति विशेषज्ञ असाग्रे की स्मरणशक्ति इतनी तीव्र थी कि उन्हें 25000 वनस्पतियों के नाम स्मरण थे। अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति राजनीतिज्ञ थेडोर रुज़वेल्ट जिससे एक बार मिलते थे, आयु भर उसे नहीं भूलते थे। कहते हैं एक बार जापान में वह एक बैकंद से 15 वर्ष बाद बाजार में अकस्मात् मिले तो देखते ही उनका नाम पुकारा और बातचीत प्रारम्भ कर दीं और आपको आश्चर्य होगा कि वार्त्तालाप का विषय 15 वर्ष पूर्व का विवाद था। दक्षिणी अफ्रीका के भूतपूर्व प्रधान मंत्री जनरल स्मटस को अपने पुस्तकालय की प्रत्येक पुस्तक का प्रत्येक शब्द पृष्ठ और परिच्छेद स्मरण था और यह बता सकते थे कि अमुक पुस्तक अमुक अलमारी में रखी है और अमुक पृष्ठ पर अमुक शब्द लिखे हैं। भारत के क्रान्तिकारी नेता श्री हरदयाल की अद्भुत स्मरण शक्ति के विषय में अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि एक बार एक साथ चार व्यक्तियों की चार अलग अलग भाषाओं की पुस्तकें पढ़ीं। समाप्त होने पर चारों पुस्तकों का एक शब्द सुना दिया।
उपर्युक्त कुछ उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि यदि प्रयत्न, अभ्यास और श्रम किया जाय, तो आज भी हम अपनी स्मरणशक्ति को बढ़ा सकते हैं। अन्य उच्च शक्तियों की तरह प्रत्येक व्यक्ति में स्मरण शक्ति विद्यमान है।
आपने यह गलत धारणा बना ली है कि आपकी याददाश्त निर्बल है। स्मरण रखना एक प्रकार का मानसिक मार्ग है जिसे टहलने, बातचीत करने, भोजन करने, ध्वनि पहचानने ही की भाँति पृथक पृथक स्पष्ट करना पड़ता है। ये सब कार्य आपने बचपन में सीख थे और उपर्युक्त सब क्रियाएँ आप स्वतः पूर्ण कर सकते हैं। आपके चेतन मस्तिष्क को इन क्रियाओं के करने में कोई विशेष श्रम नहीं करना पड़ता। मानस पटल पर स्वतः ही मानस चित्र बनते जाते हैं और अतीत मूर्तिमान होता रहता है। स्मृति एक प्रकार की आदत है और उसके लिए श्रम और अभ्यास की आवश्यकता है। कोई भी चेष्टा करने से अपनी स्मरण शक्ति का विकास कर सकता है।
हम बातें, वस्तुएँ, व्यक्तियों को क्यों भूलते हैं? कारण यह है कि हम नवीन ज्ञान को पुराने संचित ज्ञान से नहीं जोड़ते। अलग अलग पड़े हुए ज्ञान या अनुभव कण एकदम भूल जाते हैं, पर यदि हम नए अनुभवों या ज्ञान को स्मृति कोष में संचित पुराने ज्ञान से संयुक्त कर दें, तो नई बातें अटकी रह जाती हैं और भूलती नहीं। केवल हमें संयुक्तिकरण या पुराने ज्ञान से नया ज्ञान संयुक्त करने की आवश्यकता है।
विलियम जेम्स लिखते हैं, “मानसिक क्षेत्र में जितना भी पुराने ज्ञान से नया ज्ञान मिलाकर, संयुक्त कर, नई बातों को पुरानी बातों से मिलाकर रखा जायगा, उतना ही हम नई बातों को याद रख सकेंगे। प्रत्येक पुरानी बात से संयुक्त होकर नई बात याद रहती है। पुरानी बात एक हुक या कड़ी की तरह है, जिसमें नई बात अटक जाती है। जैसे कटुँवे मछली अटक कर ऊपर आ जाती है, उसी प्रकार पुराने संचित विचारों से बँधी हुई नई जानकारी हमें याद रहती है।”
अतः नई वस्तुओं, विचारों, व्यक्तियों को अपने मस्तिष्क में मौजूद संचित ज्ञान राशि से संयुक्त करते रहिए। आदमी को उसके पेशे या स्थान से मिलाकर याद रख सकते हैं। एक ही प्रकार के विचारों को साथ-साथ संयुक्त कर याद रखा जा सकता है।
जिस वस्तु या विचार को याद रखना है, उसे बढ़ा-चढ़ाकर मन में विकसित दीर्घ मानस-चित्र बनाकर देखिए। बार-बार लम्बे मानस-चित्र चेतना के स्तर पर रखने से वस्तुएँ और विचार याद रहते हैं। मानस चित्रों के निर्माण का अभ्यास निरन्तर करते रहिए।
स्मृति को बढ़ाने का एक तत्त्व क्रिया (एक्शन) है जो वस्तुएँ हिलती रहती हैं, हम उनकी ओर अधिक आकृष्ट हो जाते हैं। थियेटर में जनता हिलने-डुलने या तेजी से क्रियाएँ करने वाले अभिनेता के प्रति अधिक आकृष्ट होती है। यदि आप अपने विचारों को क्रिया का रूप दे डालें, तो बात जल्दी याद रहेगी। यही कारण है कि जो बात बार-बार उच्चारण करने से याद नहीं रहती , वह बार-बार लिखने से याद हो जाती है। कारण, जितनी देर तक हम कोई बात लिखते हैं, उतनी देर तक वही विचार हमारे मानसिक नेत्रों के सन्मुख रहता है। मन में निरन्तर क्रिया चलती रहती है।
कार्य जितना ही तेज या चकित करने वाला होता है, उतना ही अधिक स्मरण रहता है। यदि आपके साथ कोई खूनी घटना हो जाय, तो सदैव याद रहती है। जिस बात में हमारा जितना अधिक ध्यान या रुचि रहती है, उतनी ही वह स्मरण रहती है। अतः जिन कठिन विषयों को आप याद रखना चाहते हैं, उनके प्रति अपनी रुचि वृद्धि कीजिए। दिलचस्पी बढ़ाने से ध्यान (Attention) जमता है और ध्यान से बातें याद रहने लगती हैं। जितना अधिक ध्यान लगेगा, उतनी अच्छी एकाग्रता होगी। अतः धीरे-धीरे मन को एकाग्र करने का सतत् अभ्यास करना चाहिए। जिस बात को वास्तव में हम याद रखना चाहते हैं, एकाग्रता ध्यान और दिलचस्पी लेकर अवश्य ही हम उसे स्मरण रख सकते हैं। हमें अपने स्मृति कोष से यह चुनना चाहिए कि वास्तव में हम क्या याद रखना चाहते हैं। जिन विचारों को आप चुनें, केवल उन्हीं पर मन को एकाग्र करें।
स्मृति भिन्न-भिन्न प्रकार ही होती हैं। कोई व्यक्ति कविता की पंक्तियाँ अधिक याद रख सकता है, तो दूसरा विसाती की दुकान की सैकड़ों छोटी-छोटी वस्तुएँ, तीसरा पंसारी की दुकान के मसाले, दवाइयाँ इत्यादि। आपः एक कागज पर उन वस्तुओं को लिखिए, जिन्हें एक सभ्य संस्कृत विद्वान् को स्मरण रखना चाहिए। यदि आप डाक्टर हैं, तो आप दवाइयों, मानव शरीर के हिस्सों, हड्डियों आदि को स्मरण रखना आपके लिए उत्तम रहेगा? इतिहासकार को व्यक्तियों के नाम, सन्, तिथियाँ आदि याद रखना काम देगा। इसी प्रकार अध्यापक, राजनीतिज्ञ, नेता, बैंकर या सम्पादक को भिन्न-भिन्न बातें याद रखने से लाभ होगा। अतः अपने काम की बातों को याद रखने में ही ध्यान को एकाग्र कीजिए। निरन्तर अभ्यास करने से ये वस्तुएँ स्वतः याद होने लगेंगी।
मान लीजिए, आप विद्यार्थी हैं, तथा आपको कोई लम्बा पाठ या इतिहास की सामग्री स्मरण करनी है। अथवा आप वक्त हैं और आपको भाषण देने के लिए दस बारह बातें याद रखनी हैं। इसमें भी आप संयुक्तिकरण की युक्ति से काम लें, अर्थात् एक-एक बात को पूर्व संचित तत्व से जोड़कर याद करें। पहले एक बात याद करें, फिर उसी से दूसरी जोड़कर धीरे-धीरे दोनों को दुहरावें। फिर तीसरी जोड़कर तीनों को क्रमानुसार दोहराएं। इसी प्रकार धीरे-धीरे एक-एक नई बात और जोड़ते चलें इस प्रकार आप समूची रूपरेखा स्मरण कर लेंगे। प्रति दिन कुछ समय के लिए पुरानी बातें दोहराते जाने से ज्ञान विस्तृत नहीं होता। विचारों को मजबूती से पकड़िये। छिछले विचार के सामने कोई मानसिक मूर्ति स्पष्ट नहीं आती। बीच में बात याद नहीं रहती। अतः गहनता से सोचने की आदत डालिये। रचनात्मक विचार संगठित रूप से विचार करता है और मन में उनकी मूर्ति स्पष्ट बनाता है।
लेखकों को अपनी स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए स्टीवेन्सन नामक अँग्रेजी लेखक की विधि से काम लेना चाहिए। उनका मत था कि विचार मन में आते हैं और यदि उन्हें मजबूती से पकड़ न लिया जाय, तो वे गायब हो जाते हैं। अतः वे हमेशा एक डायरी साथ रखते थे, जिसमें पेंसिल से नये विचार नोट कर लेते थे। नोट कर लेने से विचार विस्मृत न होते थे। कागज पर लिखे हुए नये विचार बढ़ाये जा सकते हैं और हमारी स्मृति को सहायता देते हैं।
स्मरण शक्ति मन की एक शक्ति है। प्रत्येक शक्ति को विकसित करने का यह नियम है कि उससे अधिक से अधिक काम लिया जाये। जिन शक्तियों से काम लिया जायेगा, वे ही बढ़ेंगी। शेष नष्ट हो जायेंगी। कार्य करने से ही शक्तियाँ बनी रहती हैं, अन्यथा पंगु हो जाती हैं। अतः अपने मस्तिष्क से नित्य नियमित कार्य लेते रहिए। रचना, समन्वय, संघटन, प्रेरणा देना और निर्णय करना, नये-नये विचार कल्पनाएं देना-ये सभी श्रेष्ठ कार्य अपने मस्तिष्क से लेते रहिए। इनमें स्मरणशक्ति काम में आती रहेगी और आप एक कुशल व्यक्ति बने रहेंगे।
स्मरण शक्ति को विकसित करने का निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिए। जैसे आप किसी पुस्तक के अंश को या किसी कविता, किसी पंक्ति को पढ़ लीजिए, फिर पुस्तक बन्द कर मन में धीरे-धीरे उन्हीं अंशों को कहिए या उन्हीं अंशों को लिखने का प्रयत्न कीजिए। इस अभ्यास से स्मरण शक्ति विकसित हो जायेगी। जितना अधिक ध्यान आप पुस्तक को पढ़ने लिखने और वस्तुओं को गहराई से देखने में लगावेंगे, उतना ही उत्तम है। मस्तिष्क उतनी ही पूर्णता से विचारों को पकड़ेगा। अतः ध्यानपूर्वक बातों को समझा और गुप्त मन में क्रमानुसार सजाने का प्रयत्न किया कीजिए। क्रम तथा व्यवस्था से अनेक विचार स्मृति कोष में दीर्घ काल तक सजे रहते हैं, जबकि अव्यवस्थित रूप में थोड़े से विचार भी स्मरण नहीं रहते। विचारों को याद रखने में सुव्यवस्था लाभप्रद है।
(ले॰- आचार्य श्री गणेशीलालजी महाराज)
जब तक ड्राइवर को यह ज्ञान नहीं होता कि किस मशीन के संचालन से मोटर चलेगी और किसके द्वारा वह ठहरेगी तथा किसके द्वारा उसकी गति का नियंत्रण होगा, वह कुशलपूर्वक मोटर चला नहीं सकता और यदि उसने चलाई भी तो दुर्घटना में निज को, दूसरों को व मोटर को भी साथ ले डूबेगा। ऐसा ही हाल हमारा भी हो सकता है, जो “अपने आप” को पहिचानते नहीं। आत्मा इस जीवन के द्वारा प्रगति की और उन्मुख होता है, किन्तु उसके वास्तविक स्वरूप के प्रति अनभिज्ञ होने की अवस्था में दुर्घटना का ही अंदेशा रहता है, जिसमें अमूल्य जीवन की विनष्टि के साथ आत्मा भी पतन के मार्ग पर चला जाता है और पतित आत्मा अपने कुप्रभाव से अन्य जीवों को भी अपने साथ ले डूबता है।
आत्मस्वरूप के प्रति अनभिज्ञता का एक प्रधान कारण यह भी है कि हमारे देश का बहुत बड़ा हिस्सा ‘अवतारवाद’ में विश्वास करता है। ‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत’ के सिद्धान्तानुसार संसार को संकटों से उबारने के लिए स्वयं ईश्वर ही भिन्न- भिन्न समय पर भिन्न-भिन्न रूप में अवतरित होते हैं। कभी राक्षसों के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए “नरसिंह” हुए तो कभी “राम” और “कृष्ण” रूप लेकर उन्होंने संसार की गति को सत्पथ की ओर मोड़ा। इसके सिवाय वे लोग यह भी विश्वास रखते हैं कि वही ईश्वर सृष्टि का कर्ता भी है तथा उसकी मर्जी के बिना धरती का एक भी कण और पेड़ का एक भी पत्ता नहीं हिलता। मनोवैज्ञानिक रूप से सोचें तो इस मान्यता के पीछे साधारण जनता में आत्मविस्मृति व अकर्मण्यता का भाव फलता गया। निज की शक्ति के प्रति अविश्वास समाता गया और यह सोचा जाने लगा कि इस विशाल विश्व में उनका अस्तित्व किसी महत्व का धारक नहीं। इस प्रकार की हीन मान्यता की भावना ने जनता में फैलने वाली सजगता व चेतनता का विनाश किया और उसे यह मानने पर मजबूर किया कि परमात्मा ही सब कुछ है; जो उनकी आत्मा-शक्तियों से परे एक अलग विशिष्टतम तथा अनोखी आत्म-शक्ति है। किन्तु आज के वैज्ञानिक युग में इस अन्धवादिता से दूर होने की, और यह समझने की आवश्यकता है कि हमारा अपना अस्तित्व हमारे लिए क्या महत्त्व रखता है और वह किस विकास की तरफ जाने से प्रगमनशीलता के क्षेत्र में पूर्णतया प्रस्फुटित हो सकता है।
जैन दर्शन स्पष्ट कहता आया है कि जीवन का विकास किसी बाह्य शक्ति की प्रेरणा से नहीं, अपितु निज में रही हुई शक्ति को पहचान लेने से होता है। मानव स्वयं अपने जीवन का निर्माता है और उसके उत्थान-पतन का उत्तरदायित्व केवल उसी पर है। जितने भी महापुरुष होते हैं वे कठिन विपदाओं के कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलकर ही महानता को प्राप्त करते हैं और इसीलिए उनका आदर्श समाज के लिए अनुकरणीय व प्रेरणा प्रदायक बन जाता है। अवतार- बाद में इस प्रेरणा का अभाव ही मिलेगा, क्योंकि अवतार का जीवन तो एक अभिनेता के समान होता है, जिसके जीवन में वास्तविकता कुछ नहीं, बल्कि दूसरों के लिए की गई क्रियाओं में कभी प्रेरणा नहीं रहती। अतः यह समझना अनिवार्य है कि प्रत्येक प्राणी ही अपनी समस्याओं को उलझाता और सुलझाता है तथा उनका उचित निराकरण करते हुए आगे बढ़ जाता है , जो आगे बढ़ना उसे मुक्ति की सीमा तक ले जा सकता है। नर से नारायण की रीति जैन-दर्शन मानता है और उसी के द्वारा समाज में प्रगति के प्रति उत्साह, कर्मण्यता के भाव तथा स्वशक्ति की परिचय-प्रेरणा व्याप्त हो सकती है।
इसलिए जैसा कि मैं पहले कह चुका हूँ, मोटर चालक की तरह हमको यह जानना जरूरी है कि आत्मा का सच्चा स्वरूप क्या है और उसका सही संचालन करने के लिए किन साधनों का प्रयोग अति आवश्यक है।
भौतिकवादियों की मान्यता के अनुसार आत्मा कोई ऐसा तत्त्व नहीं जो इस जीवन के साथ ही पैदा होता है और जीवन की समाप्ति के साथ विनष्ट। किन्तु केवल भौतिक द्रव्यों के सम्मिश्रण से समुत्पन्न इस देह में निवास करने वाली सूक्ष्म चेतना की झलक ही आत्म-तत्व के अस्तित्व का प्रमाण है। यह आत्म-तत्व ही नासिका, चक्षु, कर्ण आदि इन्द्रियों का संचालक तथा शरीर के प्रत्येक प्रदेश में व्याप्त होता है। वह इतना सूक्ष्मातिसूक्ष्म है कि चर्म-चक्षु की दृष्टि उसे नहीं देख सकती।
“मैं कौन हूँ” का रहस्य प्रति क्षण उद्भूत होता रहता है। ‘मेरा हाथ, मेरा काम, मेरा शरीर’ ऐसी अंतर्ध्वनि का जो संचालक है वह इन्द्रियाँतिरिक्त है और वही चैतन्य शक्ति है। इनके साथ ही ‘मेरा घर’, ‘मेरी पुस्तक’ जिस प्रकार सम्बन्धित होने पर भी हम से अलग है, इसी तरह शरीर की पौराणिक माया भी आत्म-तत्व से पृथक् है। इसका प्रमाण यह है कि बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का, जो नास्तिक होते हैं, अपने अनुसन्धान आदि में आत्मानुभव नहीं होता। तो यह आत्मानुभव जड़ पदार्थों के संसर्ग में भले हो किन्तु उनके अस्तित्व से पृथक् एक अनुभूति होती है और उसी का नाम आत्मिक अनुभूति है। आचारांग सूत्र में कहा है—
‘तक्का तत्थ न विज्जइ’
अर्थात् तर्क से आत्मिक शक्ति की अनुभूति नहीं हो सकती। उपनिषद् में तर्क करने वालों के लिए ‘नेति नेति’ शब्द का प्रयोग किया गया है। अतः आत्म-स्वरूप को समझने के लिए सच्ची जिज्ञासा वृत्ति ही आवश्यक है।
अनादि काल से आत्मा का देह के साथ सम्बन्ध है, अतः दोनों एक समान ही प्रतिभासित होते हैं, किन्तु वस्तुतः दोनों भिन्न-भिन्न हैं, क्योंकि शरीर जड़ ज्ञान रहित तथा स्वरूप को पहिचानने में अयोग्य होता है। चैतन्य आत्मा के द्वारा ही आत्मा के तथा जड़ के स्वरूप को पहिचाना जा सकता है। घड़ी, मोटर, रेल चलते जरूर हैं, किन्तु वे चैतन्य की प्रेरणा से ही चलते हैं। केवल चलने से उनमें चैतन्य नहीं माना जाता, उसी प्रकार शरीर स्वयं चालित नहीं, बल्कि चैतन्य शक्ति द्वारा चलाया जाता है। किन्तु अज्ञान के विषय में शंकित रहता है। इसके लिए इन प्रश्नों पर रोज चिन्तना की जाय कि ‘मैं कौन हूँ?’ इस ‘मैं’ की अनुभूति का उद्गम कहाँ से होता है? मेरा क्या स्वरूप है? मेरी गति और प्रगति की दिशा क्या है?
इस महान शक्ति शाली आत्म-तत्व को पहचानना और उस व्यापक शक्ति को पूर्ण प्रकाशित करना ही हमारे जीवन का पुनीत लक्ष्य होना चाहिये। इसी शक्ति में पूर्णत्व के चरम विकास या मुक्ति का आवास रहा हुआ है। भगवान् महावीर की अमर वाणी यही सन्देश सुनाती है—
एवं भव संसारे संसरई सुहासुहेहिं कम्मेहिं। जीवो पमाय बहुलो, समयं गोयम! मा पमायए॥
उत्तराध्ययन सत्र अ॰ 10 गा॰ 15।
अर्थात् प्रमाद बहुल जीव अपने शुभाशुभ कर्मों व आत्म-स्वरूप को न पहिचानने के कारण इस प्रकार अनन्त भवचक्र में इधर से उधर पर्यटन करते हैं। अतः हे गौतम, तू समय मात्र का भी प्रमाद न कर और आत्म-स्वरूप को समझते हुए उस शक्ति को प्रकाशित करने में पराक्रम फोड़! उपनिषद् से भी ऐसे ही भाव झलकते हैं-
आत्मैव वा अरे श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्या सितव्यो नान्यतोऽस्ति विजानतः।
अर्थात् आत्मा के सम्बन्ध में श्रवण, मनन और चिन्तन करना ही हमारी जिज्ञासा का चरम बिन्दु है। यही ज्ञान की पराकाष्ठा है। आत्मा को पहचानना ही परमात्मपन को उपलब्ध करना है, जहाँ से संसार के बदलते हुए भावों को अवलोकन किया जा सके। आत्म-स्वरूप को न पहिचानने के कारण ही आज संसार में इतना अज्ञानान्धकार व दुख छाया हुआ है।
यह निश्चय है कि जब तक मनुष्य को ‘मैं हूँ’ की आध्यात्मिक एकता प्राप्त नहीं होगी, तब तक वह इच्छा, वासना और परस्पर विरोधी मनोविकारों का शिकार होता ही जायगा और इनका गुलाम बना ही रहेगा। मनुष्य बार-बार यह सोचता रहता है कि वह स्वयं को तो जानता है, किन्तु अन्य पदार्थों के विषय में ही सन्देह है। परन्तु बाह्य शरीर का ज्ञान आत्मा का ज्ञान नहीं है और इसीलिए आप अनबूझ रहकर औरों को भला कैसे भली प्रकार से बुझा सकते हैं?
जीवन में नित्य परिवर्तन होते रहते हैं और विचार एवं भावनाओं में नई क्रान्तियाँ हो जाती हैं, किन्तु यदि हम आत्म-तत्व को गम्भीरतापूर्वक समझने का प्रयास करेंगे तो ज्ञात होगा कि मूलतः जीवन में एक ऐसा स्थल है, जो शाश्वत स्थिर और शान्त है और जिसे विशाल प्रभंजन, महान् भूकंप, प्रचंड ज्वालामुखी तथा इस भौतिक युग में संहारक शस्त्र और बम भी स्पर्श तक नहीं कर सकते। अशान्ति का ताण्डव नर्तन भी आत्म-शक्ति को बाधित नहीं कर सकता।
आत्म-शक्ति का अंतर्दर्शन ही व्यक्ति विकास की कुँजी है। आत्मिक शक्ति को प्रकाशित करने का अपूर्व साधन है- आध्यात्मिक-ज्ञान। आज के जड़वादी युग ने इस ज्ञान को लुप्त करने के प्रयास किये हैं, किन्तु भारतीय-संस्कृति पटल से इसे मिटाया नहीं जा सकता और जिस दिन यह पुनीत स्थिति पूर्णरूप से हमारे हृदयों से लुप्त हो जायगी, उस दिन एक साँस्कृतिक प्रलय आयेगा, जो मानवता को क्रूर बर्बरता में परिणित कर देगा। अतः सच्चे विकास के लिए हमें आत्म-स्वरूप को यथार्थ अर्थ से समझ लेने के बाद आध्यात्मिक ज्ञान द्वार में प्रगति की पावन मंजिल तक आत्मा को पहुँचाना है।
अन्त में मैं यही कहना चाहूँगा कि प्रत्येक आत्मा अपना विकास करने के लिए स्वतन्त्र है। उसके विकास को अवरुद्ध करने वाली दुनिया में कोई शक्ति नहीं और यह विकास भी पूर्ण विकास जहाँ उसमें और परमात्मा में कोई अन्तर नहीं रहता। भगवान् महावीर गौतम स्वामी के एक प्रश्न का उत्तर देते हुए भगवती सन्न में फरमाते हैं—
हे गौतम! अस्तित्व रूप भावना और नास्तित्व रूप भावना क्रमशः अस्तित्व और नास्तित्व रूप में जिस प्रकार मेरे अन्दर परिणित हो जाती है, उसी प्रकार तुम्हारे अन्दर और सम्पूर्ण लोक की आत्माओं के अन्दर परिणित होती है। उनकी, तुम्हारी और मेरी आत्मा चेतना में आत्म-शक्ति में कोई भेद नहीं है।
अतः मनुष्य को अपने स्वरूप को समझकर विवेक रखने की आवश्यकता है। संसार में रहते हुए भी आध्यात्मिक ज्ञान संसार से भागना नहीं सिखाता। वह तो मानव को अनासक्ति योग की शिक्षा देता है। आत्म-ज्ञान भी खाते-पीते व सब कुछ करते हैं, किन्तु उनमें आसक्ति का रंच मात्र भी भाव नहीं होता है और यही कारण है कि वे दुखों में घबराते नहीं और सुखों में लुब्ध नहीं होते। सम्पत्ति और विपत्ति की अनुभूति से उनका मानस परे हो जाता है।
अध्यात्म-ज्ञानी ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धान्त को केवल समझता ही नहीं, अपितु अपने जीवन में उसका पूर्ण आचरण करता है। वह समझता हे कि वह जैसा व्यवहार दूसरों के प्रति करेगा यदि वैसा ही व्यवहार उसके प्रति भी किया जाय तो उसकी अनुभूति कैसी होगी तथा उसी विचारणा के अनुसार वह अपनी सारी प्रवृत्तियाँ निर्धारित करता है।
इस प्रकार ‘सोऽहम्’ का स्पष्ट ज्ञान ही हमको मुक्ति के द्वार तक पहुँचा सकेगा और हमारे जीवन को तेजोमय व प्रकाशमय बना सके गा।
( ले॰-पं॰ जगन्नाथ जी शास्त्री)
बौद्ध धर्म और वैदिक धर्म के सिद्धान्तों में बहुत कुछ समता पाई जाती है। कुछ मतभेदों को छोड़कर भगवान बुद्ध, वेद धर्म के ही अनुयायी रहे हैं। इस तथ्य को प्रमाणित करने वाले अनेकों प्रमाणों में से कुछ को नीचे उपस्थित करते हैं-
सिद्धान्त उडूम्बर बौद्ध ग्रन्थ के अध्याय 12 में “बुद्ध-गायत्री” का इस प्रकार उल्लेख मिलता है:-
“ॐ सिद्धदेवः धर्मोंवरेण्यमस्य धीमहि, भर्ग देवो धीयो यो नः सर्द्धम प्रचोदयात्।”
अर्थात् जो सिद्ध देव हैं, जिसने धर्म को सिद्ध किया है, जो श्रेष्ठ है और पापों के छुड़ाने वाला है; उस को हम धारण करते हैं, वह ज्योर्तिमय प्रभु हमारी बुद्धियों को सत्य-धर्म में प्रेरित करें।
इसी प्रकार बौद्ध ग्रन्थ के ‘सुत्तनिपात, 7-21’ में उल्लेख है:-
“अग्नि हुत्तमुखाञ्चा, सावित्री छन्दसो मुखम्। नक्खत्तानम् मुखंचन्द्रो आदिच्योतपतं मुखम् ॥
अर्थात् यज्ञों में मुख्य अग्निहोत्र है, छन्दों में मुख्य सावित्री-गायत्री गुरुमन्त्र है, नक्षत्रों में मुख्य चन्द्रमा है और तपने वालों में मुख्य आदित्य
भारतभूमि में यज्ञीय वातावरण का एक नया अध्याय आरम्भ
इस व्यापक स्वार्थपरता के युग में हर व्यक्ति अपने व्यक्ति गत स्वार्थ को बड़ी संकुचित दृष्टि से सोचता है। संसार के अनेक क्षेत्रों के विविध व्यक्ति जिस प्रकार अपने लाभ की बात के लिए दूसरों के लाभ या परमार्थ को तिलाञ्जलि देते रहते हैं; वैसी ही भावना आज अध्यात्म क्षेत्र में भी व्यापक रूप से फैली हुई है। वैसे तो आत्म-कल्याण की साधना की दिशा में कदम ही कोई बिरला उठाता है पर जो उठाते हैं, वे भी बड़े संकीर्ण दायरे तक सीमित रह जाते हैं। अन्य परिश्रमों की भाँति इस श्रम का फल भी उन्हें मिलता ही हैं, पर वह शाश्वत सत्य उन्हें नहीं मिल पाता, जो संसारी संकीर्ण दृष्टि रखने वालों को नहीं-परमार्थ बुद्धि, विश्व-सेवा, जनहित और सर्वात्मा परमात्मा के प्रति अपना अपनत्व समर्पण कर देने वालों को होता है। गीता में ऐसी ही दृष्टि रखकर ईश्वर-उपासना करने वालों को सच्चा भक्त , योगी, ज्ञानी, संन्यासी कहा गया है और बताया गया है कि ब्रह्म निर्माण, शाश्वत शान्ति, परम समाधि एवं जीवन मुक्ति का अक्षय पुण्य ऐसी ही आध्यात्मिक स्थिति वालों को मिलना सम्भव है।
गायत्री माता की साक्षात् कृपा-सद्बुद्धि जिसे प्राप्त होती है, वह अनायास ही इस परम मंगलमय राज-मार्ग पर चलने के लिए तत्पर हो जाता है और अपना ही नहीं असंख्यों आत्माओं का कल्याण करता है, स्वयं तरता है और अपने साथ असंख्यों को तारता है, उसके सब कार्य संकीर्ण क्षेत्र की सीमा से बाहर निकलकर जन साधारण की आत्माओं को प्रकाश देने वाले बन जाते हैं, ऐसी परमार्थ बुद्धि जिन्हें प्राप्त होने लगे, उन्हें गायत्री माता का, भगवान की प्रत्यक्ष कृपा का स्पष्ट आभास मिल रहा है, ऐसा समझना चाहिए।
बड़े हर्ष की बात है कि जिस दिव्य प्रेरणा के प्रकाश में गायत्री तपोभूमि का निर्माण हुआ है वही ज्योतिर्मयी प्रेरणा भारत के अन्य प्रदेशों में भी दूर-दूर जगमगाने लगी है और अनेक साधक अपनी व्यक्ति गत साधना के साथ-साथ अन्य असंख्य आत्माओं को प्रकाश देने के लिए युग पुरुषों की भाँति कुछ कार्य करने के लिए कटिबद्ध हो रहे हैं। यों तो अपनी-अपनी शक्ति, सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार सभी साधक गायत्री माता और यज्ञ पिता का सन्देश व्यापक क्षेत्र में फैलाने के लिए कुछ न कुछ कर ही रहे हैं, पर इन दिनों राजस्थान के कुछ क्षेत्रों में जो असाधारण उत्साह दृष्टिगोचर हो रहा है, उससे धर्म की अभिवृद्धि और अधर्म के नाश का कार्य तीव्र गति से होता दीखता है।
पाँच वर्ष पूर्व उधर गिने चुने साधक थे। करवाड़ के शम्भूसिंह हाड़ा नामक एवं साधारण अध्यापक की अन्तरात्मा में माता ने जन-जन के मन-मन में प्रकाश उत्पन्न करने की प्रेरणा दी, वे अपनी सीमित शक्ति और क्षमता से साधनों को अन्तरात्मा की पूरी सचाई के साथ प्रयुक्त करते रहे, फल यह हुआ कि कोटा प्रदेश में उन्होंने गायत्री उपासकों की एक बड़ी संख्या उत्पन्न करने में सफलता प्राप्त करली। लगभग दो हजार नये साधक उस क्षेत्र में नियमित साधना करने कि लिए कटिबद्ध हो गये हैं। कितने ही साधक और कार्यकर्ता अब इस क्षेत्र में शम्भूसिंहजी से भी आगे बढ़ चले हैं, इन सब के मिलजुल कर परम निष्ठा और श्रद्धा से परिपूर्ण अत्यन्त प्रेम भावना के साथ कार्य करने का फल है कि उस क्षेत्र में सराहनीय आध्यात्मिक वातावरण तैयार हो रहा है। इन साधकों और कार्यकर्त्ताओं का विस्तृत परिचय चित्रों समेत किसी अगले अंक में प्रस्तुत करेंगे।
विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति में उस क्षेत्र से बड़ी संख्या में साधक आये थे। उनमें से अनेक संकल्प करके गये कि तपोभूमि के द्वारा संकल्पित 108 यज्ञों में से एक-एक यज्ञ वे अपने अपने गाँव में करेंगे। झालरापाटन गाँव के श्री घनश्याम शर्मा नामक सज्जन की भावना तो इतनी प्रबल हुई कि पूर्णाहुति के समय ही उन्होंने प्रथम यज्ञ-का मुहूर्त निकाल लिया और केवल 15 दिन की तैयारी में सवालक्ष आहुतियों का गायत्री यज्ञ 9 कुण्डों की यज्ञशाला बनाकर अत्यन्त ही सफलतापूर्वक गत 22,23,24 मई को सम्पन्न कर दिया। सच्चे संकल्प और अन्तरात्मा से निकलने वाले उत्साह से अनेक जागृत आत्माएं अपने अन्तःकरण की प्रेरणा से सहायता करने खड़ी हो जाती हैं। झालरापाटन के यज्ञ में भी सर्वश्री चन्दालाल जी, गोकुल-प्रसाद जी, कृष्णगोपाल जी, हनुमान जी आदि कितने ही सज्जन कार्य करने में जुट गये और फिर सहयोगियों की कमी नहीं रही। उस क्षेत्र के लगभग 300 गायत्री उपासक नर-नारी दूर-दूर नगरों से आकर तीन दिन तक यज्ञ को सब प्रकार सफल बनाने के लिए वहीं निवास करते रहे। तीनों दिन के कार्यक्रम को पूर्ण सफल कहा जा सकता है, हजारों की संख्या में नर नारियों की विशाल भीड़ यज्ञ में सम्मिलित होने, परम श्रद्धापूर्वक आहुतियाँ देने के लिए आती रही। पुण्य सलिला चन्द्र भागा नदी के तट पर यज्ञ का यह एकान्त स्थान नगर में यद्यपि कुछ दूर था, फिर भी जलती दुपहरी में विशाल जन समुदाय को वहाँ आते-जाते देखकर यह सहज ही अनुमान होता था कि संसार में भौतिकवाद की पाश्चात्य हवाएं यद्यपि आँधी तूफान की तरह पूरे वेग से चल रही हैं फिर भी भारतीय जनता के रक्त में लाखों करोड़ों वर्षों से जमे हुए धार्मिक संस्कारों को नष्ट करने में वह तूफान अभी तक सफल नहीं हो पाया है और आशा की जा सकती है कि भारतीय संस्कृति बहुत देर तक इस युग के भोगवाद एवं भौतिकवाद से डटकर टक्कर लेने में समर्थ रहेगी।
झालरापाटन के यज्ञ में आचार्य जी भी गये थे। रामगंज मंडी, सुकेत, पाटन और बाँरा में भी उनके प्रवचन हुए। इन नगरों के निवासियों की विशाल जनसंख्या ने स्टेशनों पर, अपने नगर में, घरों में जैसा प्रेम-विभोर असाधारण स्वागत किया, उसे देखकर कोई भी दर्शक यह सहज अनुमान लग सकता था कि यद्यपि धूर्तों की करतूतों ने जनता के मन को धार्मिक कृत्यों के प्रति काफी उदास कर दिया है फिर भी सच्चे, त्यागी, धर्म-सेवी और तपस्वियों के लिए लोगों के मनों में भी अभी भी अपार श्रद्धा मौजूद है। इन चारों ही जगह आचार्य जी के महत्वपूर्ण प्रवचन हुए, जिनमें सद्बुद्धि रूपी गायत्री माता और त्यागपूर्ण प्रेम रूपी यज्ञ पिता को जीवन में चरितार्थ करके भारतीय संस्कृति की महान् परम्परा को जीवित जागृत रखने की उन्होंने प्रेरणा दी।
भावना और उत्साह से ओत-प्रोत उपस्थित साधकों में से प्रत्येक का यह आग्रह था कि इसी मास उसके ग्राम में भी एक यज्ञ रखा जाय। सब का आग्रह यह था कि आचार्य जी वहाँ अवश्य आवें। पर एक साथ इतने यज्ञ होना और आचार्य जी का उन सब में पहुँचना व्यवस्था की दृष्टि से सम्भव न था। इसलिए गायत्री जयन्ती के अवसर पर अगले मास सुकेत, वनवास, जुल्मी, चेचट आदि गाँवों में यज्ञों का कार्यक्रम बनाया जा सका। बाँराँ के गायत्री उपासकों का वार्षिक उत्सव इस बार गत वर्षों की अपेक्षा अधिक बड़े यज्ञ आयोजन के साथ सम्पन्न होगा ऐसी आशा की जाती है।
एक सब से बड़ा महत्वपूर्ण निश्चय जो इस दौरे के समय हुआ वह इतना महान् है कि देश भर के गायत्री उपासकों में उसे अत्यन्त ही प्रसन्नता के साथ सुना जायगा। वह निश्चय यह है कि कोटा से 30 मील दूर रामगंज मंडी नामक नगर में राजस्थान प्रान्तीय गायत्री उपासकों का एक विशाल साँस्कृतिक सम्मेलन संभवतः आश्विन सुदी 15 को होगा और 101 यज्ञ कुण्डों की विशाल यज्ञशाला में 24 लक्ष आहुतियों का हवन तथा 24 करोड़ जप होगा।
कार्य निस्सन्देह भारी है। आर्थिक तथा व्यवस्था की दृष्टि से यह बोझ हँसी खेल नहीं है। राजस्थान प्रदेश के, कोटा डिवीजन के विशेषतया रामगंज मंडी निवासियों को इसके लिए बहुत कुछ त्याग करना पड़ेगा, मनोयोग देना पड़ेगा और पसीना बहाना पड़ेगा। यह आशा तो की ही जा सकती है, जो शक्ति ऐसी उत्साहपूर्ण प्रेरणा देती है, वही शक्ति इसका बोझ उठाने वालों में समुचित बल भी देती है। अन्यथा राज-दंड, चोर दंड, दुर्भिक्ष दंड, भाग्य दंड, द्वेष दंड, वासना दंड आदि अनेक दंडों का भारी त्रास सहने वाला दुर्बल मानव-प्राणी धर्म दंड का जरा सा बोझ आते ही घबड़ा जाता है, ऐसे कार्यों को सम्पन्न बनाने के लिए असाधारण आत्म-बल की आवश्यकता पड़ती है, इसलिए जिनसे कुछ बड़ा कार्य दैवी शक्ति कराती है, उन्हें उसके समुचित आत्म-बल देने में भी वह दिव्य शक्ति कंजूसी नहीं करती। रामगंज मंडी में होने वाला वह 101 हवन कुण्डों का विशाल गायत्री यज्ञ भी अनेक कार्यकर्त्ताओं के अन्तःकरण में भावना, श्रद्धा, त्याग, श्रम और उत्साह की समुचित मात्रा देकर माता द्वारा सुसम्पन्न करा लिया जावेगा ऐसा निश्चित है। यज्ञ की निश्चित तिथियाँ अगले अंक में दे दी जावेंगी, पर अभी से इन पंक्तियों द्वारा देश भर के गायत्री उपासकों को विशेषतया राजस्थान के गायत्री उपासकों को निमंत्रण दिया जाता है कि उस अवसर पर पधारने और इस भारी कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए तत्परता प्रदर्शित करें।
यह आशा करनी चाहिए कि प्रान्तीय सम्मेलन करने का 101 हवन कुण्डों के विशाल यज्ञ जैसे बड़े आयोजन का श्रेय केवल रामगंज मंडी को ही नहीं-अन्य प्रान्त वासियों को भी मिलेगा। माता जिन्हें श्रेय देना चाहेंगी उनकी आत्माओं में प्रेरणा का उभार पैदा करेंगी, जहाँ अन्तः प्रेरणा होगी, वहाँ तीव्र इच्छा होती है वहाँ सहायकों, समर्थकों और सहयोगियों की कमी नहीं रहती, जहाँ थोड़े से भी सच्चे एवं प्रभावशाली सहयोगी मिल जावें वहाँ बड़े-बड़े साधन सहज ही इकट्ठे हो जाते हैं और साधन जुटने पर कोई कार्य पड़ा नहीं रहता। छोटे व्यक्ति महान् कार्य कर डालने में अनेकों बार आश्चर्यजनक रीति से सफल होते हैं, उनके पीछे यही ईश्वरीय नियम-शृंखला काम करती है। श्रद्धा, लगन और अन्तः प्रेरणा के अभाव में कोई कुबेर सा धनी व्यक्ति भी तृण समान परमार्थ नहीं कर सकता, क्योंकि शुभ कार्यों में आसुरी शक्तियाँ अनायास ही बहुत उदासीनता और विघ्न बाधाओं का वातावरण उपस्थित किये रहती हैं।
108 यज्ञों का संकल्प तपोभूमि में पूर्णाहुति के समय किया गया था। वह उत्साही गायत्री उपासकों द्वारा गुरुपूर्णिमा के पुनीत पर्व पर गुरु दक्षिणा के रूप में पूरा हो जायगा, यह अब तक आई हुई सूचनाओं से सुनिश्चित है, पर आगे इस देश में त्यागमय प्रेम की यज्ञीय भावना पैदा करने के लिए, सद्बुद्धि रूपी गायत्री का प्रकाश जन-जन की अन्तरात्मा में पहुँचाने के लिए, भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान करके पददलित मानवता को पुनः उसके स्वर्ण सिंहासन पर बिठाने के लिए विशाल गायत्री महायज्ञों की आवश्यकता है। आत्मा की व्यक्तिगत सुख-शान्ति, सत्य प्रेम, न्याय, संयम सेवा और कर्तव्य निष्ठा उत्पन्न करने के लिए, दुखी मानव जाति के अनेकों उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने के लिए—वस्तुतः विशालकाय यज्ञों का संस्कृति सम्मेलनों का-आयोजन एक बड़ा ही अमोघ अस्त्र है। आज की स्थिति में इस महान् उपकार की इतनी अधिक आवश्यकता है, जितनी चिरकाल से कभी नहीं रही। समय पर हुई वर्षा का जो मूल्य है वही महत्व आज अनैतिकता उत्पन्न करने के लिए यज्ञीय परम्पराओं को पुनर्जीवित करने का है।
रामगंज मंडी का निश्चय सराहनीय है, प्रेरणा और प्रकाश देने वाला है। देश में अन्यत्र कहाँ से इनका अनुकरण करने का उत्साह उठता है, यह देखना है। कई स्थानों से 101 कुण्डों वाले यज्ञों की आशा है। 24 हजार और सवालक्ष के यज्ञ तो अतीव सरल हैं, इनमें झालरापाटन के घनश्यामजी जैसे साधारण स्थिति के व्यक्ति भी आश्चर्यजनक रीति से सफल हो सकते हैं। माता अपना उद्देश्य पूर्ण कराने के लिए अनेक व्यक्तियों और अनेक स्थानों को अमर बनाने वाला श्रेय देने जा रही है, देखना यही है कि ऐसे बड़भागी बनने का श्रेय किन स्थानों और व्यक्तियों को प्राप्त होता है।
*समाप्त*