संस्कृति सौष्ठव

(श्री ॐ कार जी मिश्र ‘प्रणव’)


संस्कृति सौष्ठव (Kavita)

प्रभा-प्रतिभा के पुञ्ज प्रधान, ईश के वैदिक वन्द्य विधान। आर्य संस्कृति हे अखिल उदान, विश्व में तेरा जय जय गान॥1।।

‘प्रणव’ के नैगम नव्य निनाद, महामुनि मंगलमय मर्याद। साधना-सुषमा के संवाद, सृष्टि के श्रेयष्कर पन्थान॥ 2 ॥

स्वऋग्-यजु-साम अथर्वाधार, ज्ञान युत कर्मों का विस्तार। उपासन का हो प्रचुर प्रचार, बढ़े वर वेद-विटप विज्ञान ॥ 3 ॥

साँख्य, मीमाँसा, न्याय, नितान्त, योग शुभ वैशेषिक वेदान्त। कर रहें शंकाओं को शान्त, त्रित्व का देकर प्रबल प्रमाण ॥ 4 ॥

समुज्ज्वल सूत्रों का सञ्चार, सुखद शुचि स्मृतियों का अवतार। उपनिषद्वीणा की झंकार, सुनाती ‘श्रेय-प्रेय’ की तान ॥ 5 ॥

उदधि सम ज्ञान राशि गंभीर, हिमालय सी अविचल धीर। गंग सम पावन तारन तीर, भर रही लोकों में कल्याण ॥ 7 ॥

दे रही शान्ति-सौख्य सन्देश, सर्ग के सभी दूर कर क्लेश। विश्व बन्धुत्व वीरता देश—देश को देती है वरदान ॥ 7 ॥

विचरते जहाँ जीव स्वच्छन्द, न होता जगज्जन्य दुःख द्वन्द्व। मुक्ति पथ की वीथिका बुलन्द, बताते स्वयं वेद भगवान् ॥ 8 ॥


वेदों में यज्ञाग्नि की प्रार्थना

शर्मास्यवधूत रक्षोऽवधूताऽरातयोऽदित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु॥ अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुघ्नः प्रति त्वादित्यास्त्वस्तेत्तु ॥ 14 ॥

—यजुर्वेद, प्र.ख, प्र. अ.

अर्थ— हे यज्ञ! तुम सुख कारक एवं आश्रय लेने योग्य हो, तुम से रोग विनष्ट होते हैं तथा रोग के कीटाणु भी ध्वस्त होते हैं, तुम पृथ्वी के लिये त्वचा की भाँति रक्षक हो यानी जिस भाँति त्वचा के अभाव में प्राणी, प्रकृति दत्त गर्मी-सर्दी को सहन करने में असमर्थ है, उसी भाँति यज्ञ के अभाव से धरती के सारे प्राणी अपने को रक्षकविहीन स्थिति में अनुभव करेंगे और होंगे! तू हरीतिमा पूरित वनस्पतियों से आच्छादित पर्वत के सदृश्य सुन्दर, सुहावने और हितकारी हो, तुम इस सुविस्तृत आकाश में जल से लबालब भरे वर्षाभिमुख बादलों के सदृश हो तुम जो पृथ्वी मण्डल की रक्षक त्वचा बन कर विद्यमान हो, उसे वायु देव भी अपने शोधक और रक्षक रूप में स्वीकार करता है यानी यज्ञ के द्वारा ही पवन देव अपने में परिशोधक और जीवनतत्व दायक गुण ग्रहण कर प्राणियों के लिये लाभदायक सिद्ध होते हैं।

धान्यमसि धिनुहि देवाय प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा। दीर्घामनु प्रर्णित— मायुषे धाँ देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वाँ महीनाँ पयोऽसि ॥ 20 ॥

यजु. प्रथम खण्ड, प्र. अ.

अर्थ— हे यज्ञ! तुम देवों का धान्य (भोजन) हो, अतः इस छवि के द्वारा तुम उसे प्रसन्न करो, जिससे वे प्रसन्न होकर यज्ञकर्ता को सुख और कल्याण प्रदान करें। हम तुम्हें प्राण, उदान, व्यान आदि प्राणों में, आयु में तथा जीवन की व्यापक उन्नति करने के लिए धारण करते हैं, आपके अनुग्रह से यह सब वस्तुएं हम प्राप्त करेंगे।

अदित्यै व्युन्दनमसि विष्णो स्तुपोऽस्यूर्ण— म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थाँ देवेभ्यो भुवपतये स्वाहा भुवन पतये स्वाहा भूतानाँ पतये स्वाहा ॥ 2 ॥

—यजु ., प्र. ख., द्वि. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! तू पृथ्वी को सींचने वाला है, अर्थात् पृथ्वी निवासियों को सर्वांगी अभ्युन्नति और कल्याण के अमृत से अभिसिंचित करते हो। हे देवों को सुखद स्थिति देने वाले एवं सभी भाँति रक्षा करने वाले यज्ञ! हम तुम्हें सुविस्तृत और सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बनाना चाहते हैं।

अग्ने वाजजिद्वाजं त्वाँ सरिष्यन्तं वाजजित सम्मार्ज्मि। नमो देवेभ्यो सुधा पितृभ्यः सुयने में भूयास्तम ॥ 7 ॥

—यजु. प्र. ख., दू. अ.

अर्थ हे बलप्रापक और बल के विजेता यज्ञ-अग्नि! मैं मुझे प्रदीप्त करता हूँ। देवों के लिये तुम सत्कार एवं पितरों के लिये शक्ति स्वरूप हो। ये दोनों मुझे संयम में चलाने वाले हों।

अस्कन्नमद्य देवेभ्यऽआज्य स्रंभ्रियासम— िघ्रणा विष्णो मा त्वावक्रमिषं वसुमतीमग्ने तेच्छायामुपस्थेषं विष्णो स्थानम्सीतऽइन्द्रो वीर्य्यमकृणो दूर्घ्वोऽध्वरऽआस्थात् ॥ 8 ॥

—यजु. प्र. ख., धू. अ.

अर्थ— आज मैं दिव्य गुणों के लिये, अविचलित आज्य को गति के साधक अग्नि के द्वारा अच्छे प्रकार धारण करता हूँ। हे यज्ञ! मैं धन-धान्य से युक्त तुम्हारे आश्रय को प्राप्त होऊँ। हे अग्ने! तू यज्ञ का आधार है। इससे वायु पराक्रम करता है, यह आकाशस्थ रहे।

अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती। व्यख्यन महिषो दिवम् ॥ 7 ॥

—यजु. प्र. ख., तृ. अ.

अर्थ—यज्ञाग्नि की दीप्तिप्राण से अगन तक अन्तर में विचरण करती है। यह महान् अग्नि द्यौलोक को प्रकाशित करता है। यह यज्ञ, अपने प्रभाव को भौतिक लाभ देने तक में ही सीमित नहीं करता। इसका प्रभाव यज्ञकर्ता के अन्तर में भी संक्रमित होता है जिससे प्राण और अपान को अलग करने वाले कपाट जल जाते हैं और जहाँ प्राण और अपान एकीभूत हुए कि दिव्यलोक में जाने का पथ और शक्ति एवं प्रकाश एक साथ ही मिल जाता है।

अयमग्निगृर्हपतिर्गार्हपत्यः प्रजाया वसुवित्तम्। अग्ने गृहपतेऽभि द्मुम्नभि सहऽआयच्छस्व ॥39॥

—यजु., प्र. ख., ती. अ.

अर्थ—यह पोषण करने वाली गार्हपत्य अग्नि, प्रजा के लिये अतिशय ऐश्वर्य, यश एवं बल का विस्तार करें।

अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयम्। अपा रेतासि जिन्वति ॥ 12 ॥

—यजु. प्र. ख., तृ. अ.

अर्थ—यह महान् यज्ञाग्नि, पृथ्वी में व्याप्त हो कर इसका पोषक और संचालक बन जाता है, अन्तरिक्ष लोक में यह पर्जन्य से एकीभूत होकर वृष्टि (जल) का रूप धारण कर लेता है और यही यज्ञाग्नि द्यौलोक में व्याप्त और सामंजस्यसित होकर सूर्य रूप को प्राप्त होता है अतः यज्ञ के द्वारा मनुष्य प्रत्येक लोक की ऊँची से ऊँची स्थिति को प्राप्त कर लेता है।

गृहा मा विभीत मा वेपध्वमूर्ज विभ्रतऽएमसि। ऊर्ज विभ्रद्वः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः ॥ 41 ॥

—यजु. , प्र. ख., तृ. अ.

अर्थ—यज्ञ भगवान यज्ञ कर्ताओं को आश्वासन देते हैं—”हे गृहस्थों! डरो मत। घबराओ मत, बल-वीर्य को धारण करने वाले हम तुम्हारे पास आये हैं। ओज को धारण करते हुए हम शुद्ध मन और बुद्धि वाले हम हृदय प्रसन्न होते हुए हम तुम्हें कल्याण के लिए प्राप्त होते हैं।

कुक्कुटोऽसि मधुजिहह्वऽइषमूर्जमावद त्वया वय संघात संघातं जेष्म वर्षवृद्धमसि प्रति त्वा वषं वृद्धं वेत्तु परापूत रक्षः परापूता अरातयोऽपहत रक्षो वायुर्वो विविनक्तु देवो वः सविता हिरण्य पाणिः प्रति - गृभ्णात्वच्छिद्रेण पाणिना ॥ 16 ॥

यजु., प्र. ख. प्र. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! तुम जल के मालिन्य आदि दोष तथा उसमें रहे अभाव की परिपूर्ति करने वाले हो, मधु जिह्वा वाले हो अर्थात् माधुर्य्यतत्व से तुम ओत-प्रोत हो, तुम वृष्टि के वर्द्धक हो, मनुष्यों को यह जानना चाहिये कि यज्ञ, वृष्टि वर्द्धक है। तुम हमारे लिये अन्न और रस को सिद्ध करो, जिससे उसे भक्षण कर हम अन्तर और वाह्य दोनों संग्रामों में विजयशील हो सकें, तुम्हारे द्वारा हमारे बाहरी विघ्न नष्ट हो जायं और हमारी अदानशीलता के भाव विचार भी विनष्ट होवें। तुम आहुति में दिये गये पदार्थों को सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बनाकर उसे परिव्यापक सूर्य किरणों के सहारे सर्वत्र फैला दो।

देव सवितः प्रसुव यज्ञं प्रसुव यज्ञपति भगाय। दिव्यो गर्न्धवः केतपूः केतं नः पुनातु वाचस्पतिर्वाधं नः स्वदतु ॥ 7 ॥

यजु., प्र. ख., एकादश अध्याय

अर्थ—हे सर्वतत्वों के उत्पादक यज्ञ! हमें सुख एवं ऐश्वर्य को देने वाले श्रेष्ठतम कर्म, यज्ञानुष्ठान में प्रवृत्त करो और यज्ञ के अनुष्ठान करने वालों को अपने दिव्य गुणों की उपलब्धि के लिये उत्प्रेरित करो। जिससे हम लोग दिव्य वाणी और दिव्य वाणी के अधिष्ठाता की पवित्रता से अपने ज्ञान और वाणी के साधनों को पवित्रित करें, जिससे हमारा ज्ञान अमृत से और हमारी वाणी आस्वाद से परिपूर्ण हो जाय।

इन्द्रस्य स्यूरसोंद्रस्यध्र वोऽसि ऐन्द्रमसि वैश्वदेवमसि30

—यजु, प्र. ख. पञ्च. अ.

अर्थ—हे यज्ञ! तू ऐश्वर्यवान इन्द्र या परमेश्वर के लिये सुनिश्चित रूप से आकर्षण के साधन हो,क्योंकि तुम्हारे द्वारा आह्वान होने पर परमेश्वर से आये बिना रहा ही नहीं जाता। इन्द्र के इन्द्रत्व और विश्व देव के विश्वदेवत्व सभी तुम पर ही अवलम्बित है-यानी तुम्हारे द्वारा ही इन दिव्य गुणों की अभिप्राप्ति सबों को होती है।

ध्रुवोसि पृथिवीं दृह ध्रुवक्षिदस्यन्तरिक्षम् दृहच्युमक्षिदसि दिवं दृहाग्नेः पुरीपमसि॥

यजु॰ प्र॰ ख॰, पञ्चम अध्याय, श्लोक 1

अर्थ—हे यज्ञ! तू अच्युत स्थान में वास करने वाला है, तू स्वयं ध्रुव है यानी तेरी क्रिया का फल अत्यन्त ही सुनिश्चित है, इसीलिए प्रार्थना है कि तू पृथ्वी लोक को शुभ में दृढ़ करो, अन्तरिक्ष लोक को मंगलमयता में स्थिर करो और द्यु लोक को कल्याण में चिर प्रतिष्ठित करो।

रक्षोहणो वो वलगहनः प्रोक्षामि वैष्णवात्रक्षोहणो वो वलगहनोऽवनयासि वैष्णवात्रक्षोहणो वो वलगहनोऽवस्तृणामि वैष्णावात्रक्षोहणो वाँ वलगहनाऽउपदधामि वैष्णवी रक्षोहणो वाँ वलगहनो पर्युहामि वैष्णवी वैष्णवमसि वैष्णवा स्थ ॥25॥

—यजु. प्र. ख.,पञ्चम अ.

अर्थ—रोग कृमि नाशक तथा विषाक्त रोग-नाशक यज्ञ-प्रयोगों! हम तुम को सिक्त करते हैं। रोग-कृमि नाशक तथा विषाक्त-रोग नाशक यज्ञ-प्रयोगों! हम तुम्हें स्वाधीन करते हैं। हे रोग-कृमि नाशक तथा विषाक्त-रोग नाशक यज्ञ प्रयोगों! हम तुम्हें विस्तृत करते हैं। हे रोग-कृमि नाशक , विषाक्त-रोग नाशक तथा यज्ञ से संगत द्यावा पृथ्वी! हम तुम्हारा आश्रय लेते हैं। हे रोग कृमि नाशक, विषाक्त रोग-नाशक एवं यज्ञ से संगत द्यावा पृथ्वी! तुमको हम यज्ञ प्रयोगों से परिपूरित करते हैं। हे हव्य! तू यज्ञ के योग्य है तथा है ऋत्विजों! तुम यज्ञ को सम्पन्न करने योग्य हो। तुम हमारे रोग-शोकों को निवृत्त करो।

ये रुपाणि प्रतिमुञ्चमानाऽअसुराः सन्तः स्वधया चरन्ति। परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लो-कात्प्रणुदात्यस्मात् ॥30॥

—यजु. प. ख. दू.अ.

अर्थ—जो रूप को बदलने वाले, जो घातक अन्न से आकृष्ट होकर विचरते तथा जो दूरस्थ और निकटस्थ स्थानों में रहते हैं, उनको यज्ञ-अग्नि इस लोक से दूर करें। सूक्ष्म जगत् में सदा ही आसुरी शक्तियाँ चक्कर लगाया करती हैं, जहाँ किसी ने भी शरीर, प्राण और मन से जरा भी घातक अन्नों का सेवन किया कि आसुरी शक्तियाँ उनमें प्रवेश कर जाती हैं और उसे क्रियात्मक असुर बना डालती है। अतः शरीर, प्राण और मन से हमें सावधानता पूर्वक सात्विक तत्व ही ग्रहण करना चाहिये। किंतु यज्ञ की दिव्य और प्रचण्ड शक्ति इन असुरों को जलाये डालती है, इसीलिये यज्ञकर्ताओं पर आसुरी शक्ति यों का कुछ बल नहीं चलता।

अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्। अमीमदन्त पितरो यथा भागमावृषायिषत्॥31॥

यजु.,प्र. ख., दू. अ.

अर्थ—हे यज्ञ के द्वारा आहुत देवताओं और पितरगणो! आप लोग इस यज्ञ में आकर आनन्द और पुष्टि को प्राप्त कीजिये और हमें भी आनन्द और पुष्टि दीजिये। जिस भाँति सवितादेव निष्काम भाव से विश्व को सुख पहुँचाते हैं, उसी भाँति हम सब भी आपके समान ही विश्व सेवा में संलग्न रहें।


सच्चा मार्ग तो कर्मयोग ही है

(श्री स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती)

सत्यता एवं श्रद्धा से सम्पन्न साधन ही दैवी साक्षात्कार का प्रधान साधन है। आत्म-साक्षात्कार से ही अमर शान्ति, शाश्वत-जीवन तथा चिंता, भय एवं मृत्यु से मुक्ति प्राप्ति होती है। मुक्ति की सर्वोच्च स्थिति के लिए साधना अत्यन्त आवश्यक तत्त्व है। सच्ची साधना द्वारा ही मनुष्य मुक्ति एवं ब्रह्मानन्द लाभ कर सकता है। मानव प्रकृति मल, विक्षेप, एवं आसुरी तत्त्व से युक्त है। साधना का अभिप्राय मानव की आसुरी प्रकृति का संस्कार एवं उसे दैवी प्रकाश के योग्य बनाना है। जब आन्तरिक संस्कार हो जाता है, तब आत्मज्ञान एवं ब्रह्मानन्द अन्तःकरण से स्वतः प्रकाशित होते हैं। इस आन्तरिक शुद्धि के अभाव में आत्म-साक्षात्कार के समस्त प्रयत्न उसी प्रकार निष्फल होते हैं। बिना आन्तरिक शुद्धि के यह प्रयत्न ऐसा ही है, जैसे लंगर पड़ी हुई नाव को खेने का प्रयत्न। ऐसी परिस्थिति में प्रगति असंभव है।

जगत के साधारण व्यक्तियों का हृदय स्वार्थ,ईर्ष्या, घृणा, अन्ध विश्वास एवं अभिमान के कारण अत्यन्त संकुचित रहता है। स्वार्थ एवं ईर्ष्या इत्यादि अपनी छाया उनके मन पर सदैव के लिए छोड़ देती हैं, जिनके कारण उनके तथा अन्य व्यक्तियों के मध्य एक ऐसी दीवार खड़ी हों जाती है, जो उसे अन्य व्यक्तियों से पृथक् कर देती है।

कर्मयोग का अभ्यास उस माया-मरीचिका को नष्ट करता है और उस पर्दे को तोड़ कर हृदय को विशाल करने में प्रचुर सहायता प्रदान करता है। इसके द्वारा हृदय का परिष्कार होता है। सच्चा कर्मयोगी दूसरों के प्रति निर्लेप सहानुभूति रखता है और नाना रूपों में उनकी सेवा करता है। जो कुछ उसके पास होता है, उस सभी में वह मुक्त हृदय से दूसरों को साझीदार बनाता है। वृद्ध पथिकों के लिये वह सरिता से जल लाकर देता है; रोगियों की औषधि का प्रबन्ध करता है, उनके नोन, तेत, लकड़ी का भार अपने ऊपर उठाता है। दया के इन छोटे-छोटे कार्यों से उसका हृदय कोमल हो जाता है। उसका सम्पूर्ण जीवन दया से ओत-प्रोत हो उठता है। उनके अतिरिक्त उसके चरित्र में सद्विद्या के लिए आवश्यक गुणों-जैसे सहिष्णुता, धैर्य, विनय इत्यादि का विकास होता है। वह अनिवर्चनीय आनन्द एवं आत्मिक बल का अनुभव करता है। प्राणिमात्र के हृदयों को एक सूत्र में आबद्ध करने वाली प्रेम-भावना उसके हृदय में दृढ़ हो जाती है। सभी उसे प्रेम की दृष्टि से देखते हैं। वह जिन-जिन की सेवा करता है, वे मुक्त कंठ से उसे आशीर्वाद देते हैं। वह उनके सद्संकल्पों एवं आशीर्वादों के फलस्वरूप दीर्घ-जीवन के आनंद लूटता है।

कर्मयोग, वेदान्त अथवा भक्ति योग से अधिक कठिन है। यह यंत्रवत् कार्य करना नहीं है। साधक को कर्मरत होते हुए वेदान्त भाव अथवा भक्ति भाव सम्मुख रखना चाहिये।

कर्मयोगी निरन्तर ब्रह्म की सेवा करता है, संसार के व्यक्तियों में वह ब्रह्म-स्वरूप देखता है और उसी भाव से निःस्वार्थ सेवा के कारण उसे प्रभु का विराट दर्शन लाभ होता है। कर्मयोगी को कभी आवश्यकतायें नहीं सतातीं। वह जब कभी किसी नये प्रदेश में जाता है तो उसे शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के निमित्त यथेष्ट सामग्री उपलब्ध हो जाती है। अनेक व्यक्ति उसे भोजन ग्रहण कराने के लिए आमन्त्रित करते हैं। उसके मुख-मण्डल से एक ऐसा तेज प्रकाशित हुआ करता है जिसके फल-स्वरूप सभी लोग उसकी सेवा करने को प्रस्तुत रहते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति उसकी सेवा करने को तैयार रही है। हर प्रकार के दैवी ऐश्वर्य उसके पास रहते हैं।

उसके विषय में कोई भी यह नहीं कह सकता कि उसके दैनिक कर्त्तव्य उसका सम्पूर्ण समय नष्ट कर देते हैं और उसे साधन के लिए यथेष्ट अवकाश प्राप्त नहीं होता। सत्य भाव से प्रेरित होने के कारण उसका प्रत्येक कार्य पूजा जैसा फल देने वाला होता है। उनका जीवन ही साधना एवं अनुभव है।

आन्तरिक भावना तथा शुद्ध मानसिक संतुलन के करण कर्मयोगी का प्रत्येक कार्य आध्यात्मिक हो जाता है। ‘आत्मभाव’ एक शक्ति शाली परिवर्तनकारी शक्ति है। यह, वह दैवी शक्ति है, जिसके द्वारा साँसारिक वस्तुएं दैवी छटा से परिपूरित हो उठती है और मानवता देवत्व में परिणत हो जाती है। पतिव्रता अनुसूया विशुद्ध आत्म-भाव द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, एवं महेश की सम्मिलित शक्ति यों पर विजय प्राप्त कर सकती थी और उन्हें नन्हें-नन्हें शिशुओं में परिणत कर सकती थी। इस प्रकार अनुसूया अपने आतिथ्य धर्म का पालन कर पाई थी और अपने पातिव्रत को अटल रख सकी थी। इस प्रकार कर्मयोगी भी, अपने आत्म-भाव के विकास द्वारा स्वधर्म का पालन करता है। उस पर वाह्य हलचलों का प्रभाव नहीं पड़ता प्रत्युत वह आध्यात्मिकता की निरन्तर वृद्धि करता है तथा आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है।

उपनिषदों के तत्व उसे बिना श्रुतियों के अध्ययन के ही केवल हृदय की पवित्रता एवं परमात्मा के आशीर्वाद के कारण ही हृदयंगम हो जाते हैं। बिना मनन तथा निदिध्यासन के ही उसे आत्मा का ज्ञान प्राप्त हो जाता है। वह भक्तों की ऊँची श्रेणी में गिना जाता है और दैवी सम्पदाओं का आनन्द प्राप्त करता है।

“आत्मा का ज्ञान न वेदों के अध्ययन से, न बुद्धि की तीव्रता से, न केवल श्रवण मात्र से ही प्राप्त हो सकता है। जिसका आत्मा स्वयं वरण करती है; केवल उसी के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। उसी को आत्मा अपना सच्चा स्वरूप दिखलाती है।”

कठोपनिषद् 1-2-23

‘हे अर्जुन! ऊपर कहे हुए संन्यास और निष्कर्म योग को मूर्ख लोग अलग-अलग फल वाले कहते हैं, न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी अच्छी तरह स्थित हुआ पुरुष दोनों के फलस्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है।”

गीता अध्याय 5 श्लोक 4

“ज्ञान योगियों द्वारा जो परम धाम प्राप्त किया जाता है, निष्काम कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञान योग तथा निष्काम कर्मयोग को फलस्वरूप से एक देखता है वह ही यथार्थ देखता है।”

—गीता अध्याय 5 श्लोक 5

करोड़ों जन्म-जन्मान्तरों में भी, उस शुष्क हृदय वेदाँती के लिए मुक्ति की आशा नहीं, जो बिना कर्मयोग द्वारा आँतरिक शुद्धि के ही केवल उपनिषदों, ब्रह्मसूत्र या वेदाँत के अभ्यास द्वारा मुक्ति प्राप्त करना चाहता है। वह उस मेढ़क की भाँति है, जो बरसात में व्यर्थ प्रलाप किया करते हैं। मेढ़क तो मनुष्य को केवल बरसात में ही परेशान करते हैं किंतु वेदान्ती मेढ़क , जो बिना हृदय की शुद्धि के एक किताबी कीड़ा होता है, व्यर्थ की दलीलों झगड़ों तथा कुतर्क द्वारा सारे संसार की शान्ति भंग करता है। सच्चा वेदान्ती दुनिया के लिए वरदान सदृश है। वह मौन भाषा में हृदय की विशुद्ध भावनाओं द्वारा उपदेश देता है। उसकी सेवायें “आत्म-भाव” से अनुप्राणित होती हैं।


क्रोध को शत्रु से कम मत समझिए

(श्री महात्मा प्रभु आश्रितजी महाराज)

हम सुना करते थे कि माता को, बच्चे को दूध पिलाते समय सदैव सांत्वना रहनी चाहिए और ऐसा भी सुना कि किसी माता ने क्रोध की हालत में अपने बच्चे को दूध पिलाया और बच्चा मर गया। इसी भाँति काम भाव विह्वल होकर यदि माता दूध पिलाती है, तो उसके बच्चे की आँखें दुखने लगती हैं और वह बड़ा होकर बड़ा कामुक हो जाता है-लोभ दशा में पिलाया तो वह शिशु निश्चय ही लोभी और असन्तोषी निकलेगा।

क्रोध आदि के परमाणु एक विशेष रंग लिये होते हैं और उसका विशिष्ट प्रभाव पड़ता है—यह अगले दिन हमने पढ़ा। प्रोफेसर गेट्स ने विभिन्न मानसिक अवस्थाओं में निकलने वाले श्वासों को लेकर, परीक्षण किया। श्वासों द्वारा निकली वायु को लेकर उसे हिम द्वारा शीतल की हुई नलियों में एकत्र किया तो देखा कि जब मनुष्य स्वाभाविक शान्त दशा में होता है तो उसके श्वासों का द्रव पदार्थ कोई रंग धारण नहीं करता। क्रोध दशा में इस द्रव का रंग भूरा होता है, दुःख में खाकी, और पश्चात्ताप काल में गुलाबी रंग का होता है। यह पदार्थ इतना विषैला होता है कि सुअर के बच्चे को इसकी टीका देने से वह बच्चा मर गया। घृणा और क्रोध की अवस्था में एक घण्टे में मनुष्य श्वासों से इतना विषैला द्रव्य निकलता है कि उससे बीस व्यक्ति मर सकते हैं।

इसके विपरीत आनन्द, उत्साह, प्रेम, उल्लास की अवस्था में श्वासों द्वारा जो द्रव निकलता है, वह बड़ी भारी शक्ति और आह्लाद का देने वाला होता है।

काम-क्रोध आदि के परमाणुओं से हमारा अनादिकाल का संग है। दैवी परमाणु भी सदा से हमारे साथ हैं। यह हमारे उपयोग के लिये हैं। काम न होता तो सन्तान कैसे पैदा होते, वंश-परम्परा कैसे चलती? लोभ-मोह न होते तो सन्तानों का पालन-पोषण कैसे होता? क्रोध न होता तो दुष्टों से रक्षा कैसे होती, बुराई का विध्वंस कैसे होता, इत्यादि-इत्यादि। हमने अपनी अज्ञानता के कारण उनका दुरुपयोग कर संसार में दुःखों की मात्रा बढ़ा दी। दुरुपयोग करने से तो दुःख होगा ही।

जब हम में किसी भावों की अति हो जाती हैं तो हमारे श्वासों का रंग तदनुकूल बदलकर आकाश में जाते हैं और वहाँ से वैसे परमाणु खिंच- खिंच कर हम में भरने लगते हैं। यदि हम दैवी स्वभाव वाले हैं, तो दैवी गुण वाले परमाणु ही हमारे पास आयेंगे।

हम में क्रोध की अवस्थिति होने के कारण आकाश से क्रोध के परमाणु आ-आकर हम में भरते रहते हैं, ऐसी दशा में क्रोध को बाहर से दबा देना भी सम्भव नहीं होता, यदि दबा भी देते हैं तो अन्ततः वे उग ही आते हैं। बड़े-बड़े साधक भी इसी कारण से इसे हटाने में असफल हो जाते हैं।

साधारण रूप में क्रोध को दो विचारों से दबाया जाता है। एक दबाया जाता है, इस भावना से कि धर्मात्मा-महात्मा कहलाकर यदि हम क्रोध करेंगे तो लोग हमें क्रोधी समझेंगे, कलंक लगेगा। इस भाव से दबाया हुआ क्रोध अन्ततः चमक ही उठता है। उसे छिपा के नहीं रखा जा सकता। दूसरा दबाना होता है इस भाव से कि इसके कारण हमारा आत्मिक पतन होगा। ऐसी भावना वाले क्रोध को छिपाते नहीं। वे कह देते हैं कि हम में क्रोध उत्पन्न हो गया है, हम उसे हटाने का प्रयत्न करते हैं। इस भाव से संयम करने वाला अन्त में इसे हटाने में सफल हो जाता है।

किसी व्यक्ति में जो भाव सब से अधिक स्थिर है, वही भाव अन्त में प्रगट होता है और वह मनुष्य वैसा ही बन जाता है।

जब समाज के अत्यधिक लोगों में क्रोधादि दुष्ट भावों की अतिशयता होती है तो यह सम्पूर्ण आकाश को भी ऐसे दुष्ट परमाणुओं से भरपूर कर देते हैं और यही कारण है, कि साँप, बिच्छू, मच्छड़, रोगाणु आदि विषैले कीट-पशुओं की संख्या दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसे परमाणु को घटाये बिना इसकी बाढ़ रोकी नहीं जा सकती। पवित्र और उच्च भाव की साधना ही इसके निवारण के उपाय हैं। इसलिये हमें थोड़ी देर के लिये भी अपने में दुष्ट भावना को नहीं आने देना चाहिये।

साधकों के जीवन में पश्चात्ताप की विशेष आवश्यकता है और यों तो सभी मनुष्यों को ही इसकी आवश्यकता है। पश्चात्ताप से दुष्ट परमाणुओं के रंग फीके होकर गुलाबी रंग में परिणत हो जाता है। इससे भावी कल्याण की सम्भावना उत्पन्न होती है।

भगवान सब कर्मफलों के प्रदाता है और उन्हीं के पास सारे सुखैश्वर्य्य,कल्याण और आनन्द हैं। हमारा जब तक उनसे सीधा सम्बन्ध नहीं हो जाता, तभी तक उन वस्तुओं से हम वञ्चित से होते हैं। सीधा सम्बन्ध होने पर तो फिर इन वस्तुओं की कमी, कभी होती ही नहीं। उनसे सीधा सम्बन्ध जोड़ने के लिये हमें अपने में सब से प्रथम श्रद्धा लानी चाहिये। श्रद्धा को पनपाने के लिये नम्रता चाहिये। नम्रता, श्रद्धा का मूल है। मूल को शहों तक पहुँचाने वाली सूक्ष्म डोरियाँ हुआ करती हैं, जो शहौं से जल खींचकर मूल में पहुँचाती हैं और फिर मूल उसी रस का शाखा, प्रशाखा, पल्लवों और फलों तक पहुँचा देता है, जिससे सम्पूर्ण वृक्ष हरे-भरे वैभवपूर्ण हो जाते हैं। तो आध्यात्मिक नम्रता के वे दोनों रसवाही सूक्ष्म रज्जु पवित्रता तथा उदारता है। पवित्रता तथा उदारता का मूल केन्द्र परमात्मा है। अतः जब मानव के हृदय में श्रद्धा उपजती है, तब उसकी एक तन्तु नीचे जाती है, जो नम्रता कहलाती है और एक ऊपर में सुदृढ़ तना बन कर कर्म नाम धारण करती है। श्रद्धा की नींव की ओर बढ़ने वाले तन्तु नम्रता में दो सूक्ष्मतर तन्तु दांये-बांये फूट पड़ते हैं, जो पवित्रता और उदारता का रूप धारण कर, प्रभु के केन्द्रीय उत्स से प्रेम रस पान करती हुई उसे प्रवाहित करती चलती है और मूल को रस से भर कर पुनः उसके द्वारा वृक्ष के कण-कण में पहुँचा कर उसे सुशोभित कर देती है। यदि क्रोध रूपी कुठार द्वारा ये दोनों तन्तु काट दिये जायं, तो उस वृक्ष का शुष्क होकर नष्ट हो जाना, निश्चित सा है। इसीलिये भक्तगण पवित्रता और उदारता रूपी तन्तुओं को सावधानता पूर्वक अखण्डित रखने का प्रयत्न करें। क्रोध से दूर रहें।


भारतीय संस्कृति की उपयोगिता

आचार और विचार का आपस में घनिष्ठ सम्बन्ध है। जो व्यक्ति जिस परिस्थिति में, जिस वातावरण में, कार्यक्रम में अपना अधिक समय बिताता है, उसके विचार और मनोभाव उसी ढाँचे में ढल जाते हैं। भाषा, भेष, भाव, रहन, सहन, रीति-रिवाज, आचार, व्यवहार के पीछे एक परम्परा,एक विचारा धारा, एक इतिहास, एक दार्शनिकता छिपी होती है। लकड़ी का एक सिरा उठाने से जिस प्रकार दूसरा सिरा भी उठ आता है, उसी प्रकार अमुक प्रकार के आचार से अमुक प्रकार के विचारों का उत्पन्न होना और अमुक प्रकार से विचारों से अमुक प्रकार के विचारों का उद्भव होना भी स्वाभाविक है। आसुरी आहार-विहार, म्लेच्छ भाषा, भेष रखने पर, स्वच्छन्द आचार-व्यवहार रखने वाले व्यक्ति के लिए सुसंस्कृत,धर्म सम्मत विचार रख सकना कठिन है। इसी प्रकार उच्च मनोभूमि के व्यक्ति को कुरुचि पूर्ण जीवन-पद्धति स्वीकार नहीं हो सकती। उच्च अन्तः मनोभूमि के अनुकूल जीवन विधि ही हमारी संस्कृति है। इसे यों भी समझ सकते हैं कि यदि ऋषि प्रणीत दर्शन के अनुसार मनःक्षेत्र रखना हो तो व्यवहार में भी उन परम्पराओं को स्थान देना होगा, जो इस मार्ग के पथिकों के लिए सहायक ही नहीं, आवश्यक भी हैं।

उच्च नैतिक जीवन का निर्माण अपने आप नहीं हो सकता—पशु से मनुष्य बनाने के लिए भारी श्रम करना पड़ता है। कच्ची धातु को मजबूत फौलाद बनाने के लिए उसे अनेक भट्ठियों में होकर गुजरना पड़ता है। साधारण घटापार्चा को महान् रसायन अभ्रक बनाने के लिए उसे अनेक औषधियों की भावनाएं तथा अनेक अग्नि संस्कारों का आयोजन करना होता है। माली जब पौधे का विकास, सौंदर्य पूर्ण करना चाहता है, तो उसे उस पर बार-बार ध्यान देने और गुड़ाई, निराई, काट, छाँट, खाद,पानी आदि की क्रियायें करते रहने की जरूरत पड़ती है। यही बात मनुष्य के बारे में भी है। उसे मिट्टी मिली कच्ची धातु या कुसंस्कारी जीव मात्र कहा जा सकता है, इसका विशेष परिष्कार ही उसे मानव या भूसुर बनाने में समर्थ होता है। इस विशेष परिष्कार को संस्कार और उसकी क्रिया पद्धति को संस्कृति कहते हैं। भारतीय संस्कृति का उद्देश्य मनुष्य की आन्तरिक आस्थाओं और व्यक्ति गत तथा सामाजिक गतिविधियों को उच्च नैतिक आधारों पर विनिर्मित करना है। यह निर्माण कार्य मानव जीवन में इतना महत्व पूर्ण है जितना और कोई कार्य नहीं हो सकता।

संस्कृति का प्रधान उद्देश्य जहाँ नैतिकता का निर्माण है वहाँ राष्ट्रीयता को मजबूत बनाना भी है। एक समान आचार-विचार वाले व्यक्ति स्वभावतः आपस में अधिक प्रेम कर सकते हैं ओर अधिक घनिष्ठ एवं संगठित हो सकते हैं। धर्म और सम्प्रदाय आरम्भ में एक सिद्धाँत मात्र थे पीछे चलकर उनका परिवर्तन एक संगठन के रूप में हो गया। कारण यही है कि एक समान आचार, विचार के लोग आपस में अधिक समीप आते-जाते हैं। अपनी पुण्य परम्पराओं, ऐतिहासिक गाथाओं, रीति-रिवाजों को मनोभूमि में निरन्तर स्थान देते रहने से वे जीवन के अन्तराल में इतनी गहरी प्रवेश कर जाती हैं कि वे पूर्ण सत्य जैसी प्रतीत होती हैं, उनके प्रति असाधारण मोह हो जाता है। उनके चरितार्थ होते देखकर प्रसन्नता और दुर्बल होते देखकर दुख होने लगता है। अपने मजहब के तीर्थों, देवदूतों, ग्रन्थों, रिवाजों, कथाओं पर मनुष्य का एक ममता भरा सम्बन्ध जुड़ जाता है जो तोड़े नहीं टूटता। इस प्रकार संस्कृति, संगठन का वह कार्य करती है, जो वंश परम्परा भी नहीं कर सकती, भारतीय और पाकिस्तानी मुसलमानों में 99 प्रतिशत वे हैं जो मुश्किल से चार छः सौ वर्ष से मुसलमान बने हैं। इससे पूर्व उनकी वंश परम्परा लाखों करोड़ों वर्षों से हिंदू थी। कुछ सौ वर्षों तक एक संस्कृति के संपर्क में रहने से उन्होंने अपनी आस्था अब अपने वंशगत पूर्वजों, बान्धवों, तीर्थों एवं इतिहासों पर से हटा कर अरब देश के साथ सम्बन्धित करली हैं। उनकी भाषा, भेष, भाव एवं निष्ठा अरबी हो चली है। संगठित भी वे उसी आधार पर हो रहे हैं। यों दर्शन की दृष्टि से हिंदू धर्म संसार के अन्य किसी देश के धर्म या दर्शन से घटिया नहीं है पर प्रश्न धर्म, आदर्श, सिद्धाँत आदि की उत्कृष्टता का नहीं है। संगठन का आधार तो संस्कृति होती है जिसे गुणावगुण की परीक्षा करके नहीं वरन् निरन्तर अभ्यास और उपयोग के कारण अपनी प्रिय वस्तु मान लेता है। यह मनोवैज्ञानिक सचाई ही संस्कृतियों को संगठन के रूप में परिवर्तन कर देती है और सुदृढ़ राष्ट्रीयता का निर्माण करती है।

प्राचीन काल में मुसलमान आक्रमणकारियों ने इस बात का पूरा-2 प्रयत्न किया कि भारत के निवासी उनकी संस्कृति को स्वीकार कर लें, जिससे विरोध का आधार नष्ट हो जाय और उनकी स्वाभाविक स्नेह भावना अरब की ओर बह उठे। वे लोग धैर्य और चतुरता पूर्वक इस कार्य को न कर सके अति आतुरता और अति उत्साह से उन्होंने प्रलोभन और दमन को आधार बनाया। अँग्रेज आक्रमणकारियों का भी दृष्टिकोण वही था, उन्होंने बाइबिल को आगे लेकर वही सब चाहा, पर चूँकि वे अधिक चतुर थे, बर्बरता से उत्पन्न प्रतिक्रिया की हानि को वे समझते थे, इसलिए उन्होंने लार्ड मेकाले की योजना के अनुसार शिक्षा के माध्यम से अपनी संस्कृति को इस देश में प्रतिष्ठापित किया। धर्म विस्तार में तो उन्हें कम सफलता मिली, पर साँस्कृतिक दृष्टि से उन्हें आश्चर्यजनक सफलता मिली। अमेरिका आदि देश अपनी संस्कृति के धर्म के लिए भारत में भारी धन व्यय कर रहे है। कारण स्पष्ट है ईसाई संस्कृति को अपनाने वालों की निष्ठा ईसाई राष्ट्रों की ओर होने की आशा उसी प्रकार की जाती है जिस प्रकार मुसलमानी संस्कृति अपना लेने पर पाकिस्तान का उद्भव हो गया, संस्कृति में राष्ट्रीयता उत्पन्न करने की शक्ति है, इस तथ्य को ध्यान में रख कर चीन आदि देशों ने सम्प्रदाय और मजहब से संस्कृति को अलग रखा है। हाँ धर्म परिवर्तन तो कोई भी कर सकता है पर साँस्कृतिक भाषा भेष, भाव, परम्परा आदि न बदलने पाये, इस पर समुचित ध्यान रखा है। अब राष्ट्रीयता और संस्कृति को अलग 2 करने का दोनों के आधार अलग अलग रखने का परीक्षण आरम्भ हुआ है। भारत आदि कुछ देशों में निरपेक्ष धर्म का ऐसा ही परीक्षण हो रहा है। इसके प्रयोग में सफलता मिल जाय तो संस्कृति से राष्ट्रीयता की उत्पत्ति के सिद्धाँत में अन्तर आ सकता है। इन परीक्षणों के सफलता-असफलता के लिए धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा की आवश्यकता है।

संस्कृति को जो लोग ‘कला’ तक सीमित कर देना चाहते हैं, वे उसके महत्व को घटाते हैं। आज लोक नृत्य, चित्रकला, संगीत पद्धति, शिलालेख, सिक्के, पुराने जेवर, खिलौने, ऐतिहासिक खोज वेष विन्यास आदि में संस्कृति को सीमाबद्ध किया जा रहा है। साँस्कृतिक कही जाने वाली पुस्तकों में इन्हीं बातों की चर्चा होती है। कोई साँस्कृतिक प्रदर्शनी, गोष्ठी,संगठन आदि हो रही हो तो वहाँ इन्हीं बातों का ऊहापोह होता दिखाई देता है। निस्संदेह यह बातें भी संस्कृति का एक अंग है, पर इन्हीं तक सारी गतिविधि को सीमित कर देना ऐसा ही है जैसे घोड़ा पालकर उससे सवारी का लाभ उठाने की अपेक्षा केवल घोड़े की पूँछ के कुछ बाल उखाड़ कर उसे टोपी में लटकाये फिरना। ‘पुरातत्व’ का ही दूसरा नामा संस्कृति नहीं है। दोनों में सम्बन्ध और समानता तो है पर कार्य क्षेत्र भिन्न है। पुरातत्व हमारे इतिहास पर प्रकाश डालता है पर संस्कृति का उद्देश्य तो मनुष्य को सुसंस्कृत बनाना—उसके विचार और कार्यों को उच्च नैतिक भूमिका में विकसित करना है। साँस्कृतिक में जो कला है वह केवल ‘कला’ नहीं, वरन् विचार और व्यवहार आध्यात्मिक सौंदर्य निखार की एक महत्व पूर्ण शक्ति तरंग कही जा सकती है।

विचार पद्धति को एक प्रकार के सैद्धान्तिक विज्ञान की शृंखला कही जा सकती है। उसे समझने और हृदयंगम करने के लिए स्थूल उपकरणों की आवश्यकता होती है। साइन्स के विद्यार्थी को केवल पुस्तक या व्याकरण के द्वारा सिद्धाँत समझाये जायं और उन सिद्धाँतों को उपकरणों, यंत्रों एवं वस्तुओं की सहायता से प्रत्यक्ष करके न दिखाया जाय तो समझने वाले को भारी कठिनाई पड़ेगी और समझने वाले तथा समझाने वाले का उद्देश्य पूर्ण न होगा। इसलिए सिद्धांतों के प्रतिपादन के लिए निश्चय ही कुछ प्रयोग प्रत्यक्ष रूप से करने होंगे। ठीक यही बात भारतीय संस्कृति के जीवन की निष्ठा और नीति का निर्धारण करने वाले उच्च आदर्शों के बारे में लागू होती है। उनको कह देना और सुन लेना इतना ही काफी नहीं है वरन् वे अन्तस्तल तक उतर जायं और हृदयंगम होकर जीवन की गतिविधि में प्रकट होने लगें, इस स्थिति को उत्पन्न करने के लिए कुछ प्रत्यक्ष प्रदर्शनात्मक आयोजनों की भी आवश्यकता पड़ती है। ऋषियों ने इस आवश्यकता को भली प्रकार समझ लिया था और उन्होंने उसकी समुचित व्यवस्था भी बना दी है।

इस व्यवस्था का नाम ‘संस्कार’ रखा गया है। हम बराबर सुसंस्कृत बनते चलें, इस उन्नति क्रम में सहायता देने के लिए पग-पग पर ऐसे प्रोत्साहन भरे प्रदर्शनात्मक, उल्लास पूर्ण, विचारोत्तेजक, मनोवैज्ञानिक प्रभाव छोड़ने वाले, मंत्र शक्ति से समन्वित धार्मिक परम्पराओं से ओत-प्रोत सामाजिक उत्सवों का निर्माण किया गया। इन आयोजनों के द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जाता है, जिससे उन भाग लेने वालों को साँस्कृतिक आदर्शों को हृदयंगम करने और आचरण में लाने की भारी प्रेरणा मिले। गरम लोहे की ठोक पीट करने पर उसे मनमर्जी से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। सभा प्रदर्शनों और सामूहिक सामाजिक उत्सवों में मनुष्य की मनोभूमि उल्लसित होती है उस समय में वह कई बार साहसपूर्ण निर्णय कर डालता है, ऐसे अनेक उदाहरण देखे गये हैं। गरम लोहे की तरह जो छाप उस पर उस समय डाली जाती है वह अधिक टिकाऊ होती देखी गई है। इसीलिए संस्कारों का महत्वपूर्ण आयोजन किया गया है।

षोडश संस्कार प्रसिद्ध है। बालक के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु पर्यन्त पुँसवन, सीमन्त, जातकर्म नामकरण, अन्न प्राशन, चूड़ाकर्म, विवाह, अग्न्याधान, अन्त्येष्टि आदि संस्कार समय-समय पर होते रहते हैं, इससे उसे आगामी कार्यक्रम के लिए समुचित शिक्षण बड़े ही उल्लासपूर्ण वातावरण में मिलता रहता है। प्रति मास आने वाले त्यौहार, व्रत और जयन्तियाँ अपने भीतर भारी शिक्षाएं छिपाये हुए है। हर त्यौहार जीवन में इस विशेष सिद्धाँत का, कार्यक्रम का प्रतीक है, उस त्यौहार को उस सिद्धान्त एवं कार्यक्रम को समझने और समझाने का यदि पूर्वकाल की भाँति समुचित व्यवस्था रहे तो हँसी-खेल में जीवन की महान शिक्षा का वह विश्व विद्यालय घर-घर में बड़ी सफलतापूर्वक चलता रहे। व्रत उपवास स्वास्थ्य सुधार एवं आत्मशुद्धि के लिए ही नहीं हैं वरन् इन व्रतों के साथ जो कथा-गाथाएं एवं परंपराएं जुड़ी रहती हैं वे उस दिन के विशेष चिन्तन मनन के कारण अन्तःकरण पर एक अभीष्ट छाप छोड़ती है। महापुरुषों और देवताओं की जन्म जयन्तियाँ उन महान आत्माओं के कार्यों, चरित्रों और उपदेशों को हमारे सम्मुख रखने के लिए सचमुच ही बहुत भारी प्रेरणा अपने अन्दर छिपाये रहती हैं। यदि इन संस्कारों, त्यौहारों, पर्वों, व्रतों, जयन्तियों को लकीर पीटना मात्र न रख कर प्रेरणाप्रद उत्सवों का प्राचीनकाल जैसा रूप दे दिया जाय। प्रभावशाली, चरित्रवान और निस्वार्थ पुरोहित यदि इन कार्यक्रमों को पूरी दिलचस्पी के साथ लोकमानस निर्माण की दृष्टि से कराने लगे तो यह निश्चित है कि जितना कार्य अनेकों सभा सोसाइटियों, अखबार, पर्चे, लाउडस्पीकर, विद्यालय, शिविर नहीं कर सकते वह सब अनायास ही बहुत सुगम रीति से हो सकता है। जीवन के महान आदर्शों की शिक्षा देने के लिए वह संस्कार, त्यौहार आदि के अवसर सर्वोत्तम माध्यम सिद्ध हो सकते हैं।

प्रत्येक जीवित व्यक्ति की जन्मतिथि और कुछ विशेष पूर्वजों की निधन तिथि यदि ठीक प्रकार मनाई जाने लगे तो हर जीवित व्यक्ति को अपने जीवन का मर्म समझने सोचने का अवसर मिलता रहे और पूर्वजों के जीवन से शिक्षा प्राप्त करने एवं उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर मिलता रहे। इन दो व्यक्ति गत त्यौहारों का प्रचलन अब लुप्त होता जा रहा है पर वस्तुतः इनका मनाया जाना बहुत ही शिक्षाप्रद एवं उपयोगी सिद्ध हो सकता है।

अनेकों रीति रिवाज, पूजा उपासना के प्रकार तीर्थयात्रा कथा, कीर्तन, आचार-विचार, रहन-सहन, भाषा-भेष भाव, आदि के पीछे भी उन्हीं आदर्शों की आत्मा झाँकती है जो मानव को महामानव बनाने के लिए बनाये गये हैं। रामायण, भागवत, गीता आदि की कथाएं यद्यपि आज के लोग अमुक उपाख्यान सुन लेने से स्वर्ग का अमुक लाभ प्राप्त होने की तुच्छ बुद्धि के अनुसार पढ़ते-सुनते हैं, पर यदि उन्हें आदर्शों की प्रेरणा के लिए सुना या पढ़ा जाय तो सामान्य सभा-व्याख्यानों की अपेक्षा उनका प्रभाव अनेक गुना हो सकता है। ऐसी कथाएं मरने के बाद स्वर्ग पहुँचाने के लाभों तक ही सीमित न रह कर नैतिक उत्थान में तुरन्त सहायक हो सकती है और भूतल पर स्वर्ग रचना की भूमिका सम्पादन कर सकती हैं। प्राचीनकाल में होता भी ऐसा ही था।

वर्णाश्रम-धर्म एक श्रेष्ठतम समाज रचना है। आज ऊँच-नीच की, भेदभाव की, विशेषाधिकारों की जो विकृतियाँ उसमें घुस पड़ी हैं, उन्हें हटा दिया जाय तो वह वस्तुतः एक अत्यन्त उपयोगी और समाज को सुव्यवस्थित, सुविकसित और सुसंगठित होने में योग दे सकती है।

पंडित, पुरोहित, साधु, संन्यासी, पुजारी आदि का लोक सेवी एवं धर्म प्रचारक वर्ग यदि आज की हरामखोरी को छोड़कर प्राचीनकाल की भाँति जनता के नैतिक शिक्षण के लिए आदर्श प्रहरी की तरह अपने आप को जुटा दे तो करोड़ों रुपया जो इन लोगों के निमित्त आज अपव्यय हो रहा है वह सच्चे अर्थों में सार्थक हो जाय।

जो सिद्धाँत आदर्श और आचार, विचार आज कुछ अटपटे से लगते हैं और जिनकी वास्तविकता में सन्देह होने के कारण लोग उन्हें अपनाने को तैयार नहीं होते, यदि उनको वैज्ञानिक दृष्टि से उपयोगिता, तान्त्रिक दृष्टि से वास्तविकता और व्यवहारिक दृष्टि से आवश्यकता को समझा दिया जाय तो उपहास का कारण न रह कर वे तथ्य जीवन के एक महत्व पूर्ण अंश बनकर हमारे उत्थान में भारी सहायता पहुँचा सकते हैं।

पुरानी होने पर हर वस्तु में कुछ विकार आते हैं, हमारी संस्कृति में भी आये हैं, पर मूल वस्तु शुद्ध हो तो बाहरी विकार जल्दी ही दूर हो जाते हैं।

चाँदी जमीन में गढ़ी रहे तो मैली हो जाती, पर उसे माँजने पर फिर पहला रूप निखर सकता है। भारतीय संस्कृति ने प्राचीन काल में इस देश के कोने-कोने में आदर्शवादी का शुभ्र प्रकाश फैलाया था नररत्न पैदा किये थे और सुख शान्ति की स्वर्गीय परिस्थितियों का इस भूमि पर अवतरण किया था। प्रयत्न करने पर अब फिर भी वैसा हो सकता है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान आज की एक महान आवश्यकता है। उसकी उपेक्षा करने से प्रगति-पथ पर आगे बढ़ नहीं सकते।


बुरे विचारों से सावधान!!

(श्री लालजीराम शुक्ल, एम. ए.)

मनुष्य के मन में चलने वाले विचार बाजार में चलने वाले लोगों के समान अनेक और कई प्रकार के होते हैं। अपनी दुकान पर बैठा हुआ व्यापारी इन अनेक राहगीरों को देखता रहता है। इसी तरह चतुर मनुष्य विचारों के प्रति साक्षी भाव रखता है। विचारों को मन में चलना रोक देना, उस प्रयत्न के समान है, जो बाजार के राहगीरों के रोकने में किया जाता है। हाँ, हमें अपनी दुकान पर हर एक प्रकार के विचार को ठहरने न देना चाहिए। हमें विचारों के प्रति सतर्कता रखनी चाहिए। भले और बुरे सभी प्रकार के विचार हमारी चेतना के समक्ष आते हैं। भले विचारों का स्वागत करना और बुरों को भगा देना, यही मार्ग कल्याण की ओर ले जाता है।

भले और बुरे विचारों की परख कैसे हो? भला विचार वह है, जो हमारे स्वागत करने पर ही हमारे पास आता है और जिसका तनिक भी अनादर होने से हमसे भाग जाता है। बुरा विचार वह है, जो चोरी से आ जाता है अथवा बरबस मन में घुस जाता है और एक बार घुस जाने से निकालने पर भी नहीं निकलता। जो विचार हमें अपने मन में आकर शान्ति दे, वह भला विचार है; पर बुरा विचार कभी-कभी बड़ा प्रिय रूप धारण करके आता है। बुरे विचार की बुराई कुछ काल के बाद ज्ञात होती है। दूसरों के अकल्याण की चिन्ता करना, ईर्ष्या करना, पहले-पहल अच्छे लगते हैं, पर ये विचार मन को इतना निर्बल बना देते हैं कि हम इनको अपने मन से निकालना भी चाहें, तो निकाल नहीं पाते। इन विचारों के बाद अपने ही अकल्याण के विचार मन में आने लगते हैं। मनुष्य अनेक प्रकार के अकारण भयों से डरने लगता है। इस तरह वह वास्तव में अपना विनाश कर लेता है।

जिस तरह मनुष्य साँप-बिच्छू को अपने सिरहाने रख के नहीं सोता उसी तरह उस बुरे विचारों को अपने मन में स्थान न देना चाहिए। जब बुरे विचारों को अनेक बार चेतना में प्रवेश करने से रोक दिया जाता है, तो फिर वे उसमें आने की हिम्मत नहीं करते। प्रतिक्षण इस कार्य में सतर्कता की आवश्यकता है। हम समझते हैं, अपने मन रूपी मन्दिर के हम मालिक हैं, पर बात ऐसी नहीं। मन तो एक प्रकार की सराय है, जिसमें नित्य नये यात्री लोग आया ही करते हैं और हम चौकीदार की तरह हैं। हमें चाहिए कि राहगीरों को मकान का मालिक न बनने दें और न उन्हें उससे कुछ उठाकर ले जाने दें।

जब कोई अवाँछनीय विचार मन में आवे तो उसके प्रतिकूल विचार लाकर उसे हटा देना चाहिए। किसी विचार का दमन कर देने से उस विचार की शक्ति हमें मिल जाती है। जब कोई विचार प्रबलता से मन में उठे,तो थोड़े काल के लिये उस विचार को छोड़ देना, हमारा पहला कर्तव्य है। इस प्रकार उस विचार पर ही हम विजय नहीं पाते; वरन् हम जिस काम को करना चाहते हैं, उसमें भी सफल हो जाते हैं। जब कोई संकल्प मन में उठे और वह संकल्प अपने कल्याण का हो, तो उस संकल्प को धारण कर के कुछ काल के लिये उसके विषय में चिन्तन करना छोड़ देना चाहिये। मानो इस तरह हमने खेत में बीज बो दिया है। बीज बो देने के बाद खेत में पानी खींचने की आवश्यकता है। आशा रूपी-जल, विचार रूपी-बीज को उगने के लिये डाला जाता है। अपने आप से हमें यही कहते रहना चाहिये—कहना चाहिये कि हमारा अमुक संकल्प है, वह अपने आप फलित होगा, जब उसके लिये उपयुक्त समय आ जायगा। कोई भी शुभ कल्पना व्यर्थ नहीं जाती।

संकल्प के फलित होने के लिये उद्विग्न मन होना उचित नहीं है। संकल्प का फलित होना, हमारे प्रयत्न पर ही निर्भर नहीं है, इसके लिये वाह्य वातावरण के अनुकूल होने की आवश्यकता है। वातावरण एकाएक अनुकूल नहीं हो जाता। वातावरण ही हमारे अदृश्य मन का कार्य है। अदृश्य मन वह विश्वकर्मा है, जो समस्त सृष्टि की रचना करता है। अपनी आज्ञा देने और मकान के तैयार होने में देरी अवश्य लगती है। जो संकल्प दृढ़ता से धारण किया जाता है, उसके अनुसार बाह्य परिस्थितियाँ भी बनती जाती हैं।

जिस प्रकार की हम तैयारी चाहते हैं, उसी प्रकार के विचार हमें अपने चेतन मन में ठहरने देना चाहिये। चेतन मन के विचार ही कुछ काल बाद अचेतन मन में चले आते हैं। फिर इस स्वभाव के अनुकूल वाह्य सृष्टि भी बन जाती है; अतएव जो भले जगत में रहना चाहता है, उसका पहला कर्त्तव्य यही है कि चेतन मन में आने वाले विचारों का निरीक्षण करता रहे। उसके मन में सभी भले विचार तो ने आवेंगे; पर बुरे विचारों का आना रोका जा सकता है। इस प्रकार हमारा आन्तरिक जीवन सुखी हो सकता है।


हमें स्वतन्त्र चिन्तन करना चाहिए

(श्री आनन्दजी टीकापट्टी)

जिज्ञासा, किसी दृष्टि या विचार में आये तत्वों को ठीक-ठीक जानने की इच्छा करना मानव का नैसर्गिक स्वभाव है। यह स्वभाव है। यह स्वभाव जिनमें नहीं, वह मनुष्य, मनुष्य ही क्या? दूसरों के सोचे, बताये एवं बनाये पथ पर बिना समझे बूझे ही चलने लगना—बहुताँश में पशु वृत्ति की देन ही समझिये। जिज्ञासा की स्वरूपता ही मानव-जीवन के भविष्य की प्रधान संकेतिका है।

साधारण मनुष्य, संसार के विषयों को जानने की इच्छा करते हैं, वही सोचते हैं, वैसा ही चिन्तन करते हैं, फलतः उसका उन्हें ज्ञान होता है और उस ज्ञान के अनुसार आचरण कर सुखी या दुःखी बनते हैं—वैसा बनते हैं।

जिस भाँति आलसी, काहिल और विलासी वृत्ति के लोग अपने शरीर से पुरुषार्थ नहीं करना चाहते हैं-उससे कतराते हैं, उसी भाँति अधिकाँश लोग मन और विचार के जगत में सदा परोपजीवी स्वभाव के होते हैं। वे चाहते हैं कि दूसरे हमें चिन्तन और मनन करके विचार-दिशा प्रदान करें और मैं चुपचाप हाकें जाने वाले पशु की भाँति केवल उस पथ का अनुसरण करता चलूँ। उस पथ के अच्छे और बुरे होने का उत्तरदायित्व मेरे ऊपर नहीं हो, कोई इसे बुरा होने का दोष मेरे शिर नहीं डाल सके, पर ऐसा करते समय उसे यह पता नहीं होता, कि आखिर अनेकों पथों में से इसी राह को अपने चलने के लिए चयन कर लेने में तो उसी का ही एकमात्र उत्तरदायित्व हो जाता है। इसीलिए वे सभी भाँति अपने को निर्दोष सिद्ध करने में सफल नहीं हो सकते। फिर भी ऐसों जनों का मानसिक और बौद्धिक आलस्य दूर नहीं हो पाता। ऐसे मनुष्यों की, उन भेड़ों से बहुत कुछ समता की जा सकती है, जो एक भेड़ के पीछे चलने की वृत्ति रख कर कुएँ में भी गिर सकती हैं। इस वृत्ति के मनुष्यों का व्यक्ति त्व कभी निखर नहीं सकता। वह अपने जीवन में महान् कार्य करने के लिये प्रायः अपने जीवन में महान् कार्य करने के लिये प्रायः अयोग्य ही सिद्ध होते हैं।

अध्ययन तो अनेकों व्यक्ति करते हैं, पर सभी विद्वान नहीं हो पाते, इसका कारण क्या है? कितने व्यक्ति हजारों के हजारों पुस्तक पढ़ डालते हैं, कितनी रट भी लेते हैं, फिर भी यदि उनका अपना कुछ निश्चित विचार नहीं है, स्वतन्त्र चिन्तन नहीं है तो वह उतना बड़ा विशाल पठन-अध्ययन भी उसके व्यक्ति त्व का, उसकी सत्ता के महत्व को स्थापित करने में असमर्थ ही रहता है, जब कि एक स्वतन्त्र चिंतन और मननशील व्यक्ति अपने थोड़े से अध्ययन के सहाप्य से भी समाज और राष्ट्र में अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व निर्मित कर लेते हैं।

जिस भाँति शरीर से उत्पन्न शिशुओं को मनुष्य अपना सन्तान मान कर उसे स्नेह और प्यार देते हैं, उसके जीवन को विकसित, उत्कर्ष भरा बनाने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न करते हैं, उसी भाँति यदि हम अपने स्वतन्त्र विचारों को सम्मान और स्नेह दे सकें, तो वे साधारण जैसे प्रतीत होने वाले विचार ही हमारे व्यक्ति त्व को एक ऐसा विशेष रूप में गढ़ डालते हैं, जिस भाँति हम अपने सन्तान को अपना रंग—रूप प्रदान करते हैं।

ऐसा नहीं करके यदि हम केवल दूसरों के विचारों से स्मृति भण्डार को भर कर उसे सदा दूसरों का ही बनाये रखा अन्न की भाँति खा और पचा कर उसे रक्त की भाँति अपने विचार का अंग नहीं बना लिया, उसका उपयोग नहीं किया, व्यवहार में चरितार्थ नहीं किया, तो हमारे वे सारे अध्ययन, हमारे लिये केवल बाँझ ही बनते हैं, हमारी शक्ति को नष्ट ही करते, पुष्ट नहीं करते। इसीलिए यदि हमें केवल भारवाही पशु न बन कर मानव बनने की अभिलाषा है तो, जिस वस्तु की हमें जिज्ञासा हो, उसे दूसरों से सुनकर, जानकर एवं अध्ययन करके ही निश्चिन्त न हो जायं, वरन् वह ज्ञान यदि हमारे अन्तरात्मा को स्वीकार है, तो उसे अपने अंग-अंग में उतर जाने दें, अपने मन, वाणी और व्यवहार को उससे ओत-प्रोत हो जाने दें। इसी का नाम स्वतंत्र चिन्तन और मनन है अन्यथा वह सत्वहीन है—कागज का फूल मात्र है।

जिस भाँति माँ का दूध पीकर, शस्य श्यामला भूमि का अन्न खाकर-जल पीकर, प्रकृति देवी से अन्य खाद्य ग्रहण कर हमारे शरीर परिपुष्ट हो होते और बढ़ते हैं, उसी भाँति प्रत्येक व्यक्ति के मूल गत विचारों की भी दशा है। वह अपने परिपोषण के लिये सभी दिशाओं से पोषकतत्व ग्रहण कर बढ़ता जाता है, पर उन तत्वों में ही अपने को खो नहीं देता। जिसने अपने को उसी में खोया, वह फिर कोई वृक्ष या व्यक्ति नहीं बनता वरन् स्वयं भी खाद्य-खाद बन जाता है और उसे चूसकर-अनुयायी बना कर दूसरे बढ़ते और विकास करते हैं।

अपने विचारों को निश्चित और विशिष्ट स्वरूप देने के लिये उसे वाणी और लेखन के द्वारा प्रगट करते रहना चाहिये। पुनः अभिव्यक्ति वाणी और लेखन का अनुशीलन कर उसे परिमार्जित और परिष्कृत बनाते जाना चाहिए। ऐसा अभ्यास करते-2 यह विचार हमारे आचरण में संक्रमित होने लगते हैं और एक दिन हम स्वयं उस विचार के मूर्त्तिमान स्वरूप बन जाते हैं। यह है सही शुद्ध, चिन्तन-मनन का परिणाम।

यह सृष्टि विविधात्मक रूप में ही अनन्त है। इसीलिए यहाँ की कोई भी रचना, सृष्टि, रूप और आकृति सम्पूर्णतया एक जैसी नहीं होती। इसलिए व्यक्ति त्व निर्माण करने के पहले हमें स्वयं अपना ही चिन्तन और मनन करना चाहिये। हम कैसा बनना चाहते हैं, यह भी गम्भीर चिन्तन और मनन के फल स्वरूप अपने अन्तर से ही उत्पन्न होता है, दूसरा इसे नहीं दे सकता। हाँ सद्गुरु इस चेतना को निर्मल और ग्रहण शक्ति सम्पन्न बना सकते हैं।


बातें नहीं काम कीजिये

(श्री रामकृष्ण स्थापक, ‘राकेश’ लखनादौन)

अनेक व्यक्तियों के मस्तिष्क उत्तम 2 विचारों से परिपूर्ण है और उनकी प्राप्ति के लिए अनेक सुविधायें भी उन्हें उपलब्ध हैं। सफलता की अनेक युक्तियाँ भी उनके पास हैं। किंतु फिर भी क्या कारण हैं कि वे लोग आगे नहीं बढ़ पाते हैं?

इनके व्यक्ति त्व की त्रुटि यह है कि ये कागजी योजनायें तो यथेष्ट बनाते हैं, परन्तु स्वयं के विचारों को कार्यरूप में परिणत नहीं करते। विचार यदि निष्क्रिय हैं तो वे कल्पना के रंगीन महत्व के ही समान है, जिनमें न तो दृढ़ता ही है और न स्थायित्व। बात को सोचना एक चीज है, उसको कार्यरूप में परिणत करके स्वयं वैसा ही बन जाना दूसरी चीज है।

सफल व्यक्ति कार्य को क्रियात्मक रूप से कर देने में विश्वास करते थे। उनके आन्तरिक जीवन तथा बाह्य क्रियात्मक जीवन में पूर्ण साम्य था। कार्य संसार को संचालन करने वाली शक्ति है। जो कार्य को कर डालता है, उसके अंग, मस्तिष्क, स्मृति, अनुभव की वृद्धि होती है। जो केवल सोचता है, वह जहाँ का तहाँ रु का रहता है।

नेपोलियन पढ़ा लिखा नहीं था। अधिक सोचता नहीं था। वह कार्य करने का प्रेमी था। “मुझे बड़ी-बड़ी योजनाएं मत बताओ, जो मैं कर सकूँ, वही मुझे चाहिये।” यही उसका उद्देश्य था।

शिवाजी की शिक्षा कितनी थी? अकबर ने कौन सी डिग्री डिप्लोमा प्राप्त किये थे? महाराज रणजीत को एक नेत्र से कम दीखता था, पर अपनी अद्भुत कार्य करने की शक्ति द्वारा उन्होंने प्रसिद्धि प्राप्त की थी।

अँग्रेजी में एक कहावत है कि “नर्क की सड़क उत्तम योजनाओं से परिपूर्ण है।” अभिप्राय यह है कि जो गरजते हैं, सो बरसते नहीं। रावण के पास अमृत के घड़े रखे रहे किंतु उसको उन्हें पान करने का अवसर ही प्राप्त न हुआ। वह अपने बल में विश्वास रखे, निष्क्रिय जीवन व्यतीत करता रहा।

हैमलेट नामक राजकुमार की कठिनाई का हाल प्रत्येक व्यक्ति ने सुना है। “करूं या न करूं”? इसी दुविधा में वह सदैव फँसा रहा, एक पग भी आगे न बढ़ सका। उसका अधिक सोचना, योजनायें बनाना व्यर्थ रहा।

यही उसकी असफलता का कारण बना। जो हैमलेट की समस्या थी, वही आज के अनेक व्यक्तियों की है।

क्या लाभ है उस विचार से जिस पर काम न किया जाय? यह वैसा ही है, जैसा एक बीज, जो बञ्जर भूमि पर पड़ गया हो और अँकुरित न हो सका हो। यह वह पुण्य है, जो फड़कर फल का उत्पादन नहीं करता। व्यर्थ ही खिलकर अपनी पंखुरियाँ इधर-उधर छितरा देता है।

कार्य न करने वाला व्यक्ति एक प्रकार का शेखचिल्ली है। वह बड़ी योजनाएं बनाता है, बढ़-2 बातें करता है, शब्दों के माया जाल की उसके पास न्यूनता नहीं होती है। वह बात करने में आगे, पर काम में पीछे रहता है, कहेगा मन भर कार्य न करेगा, रत्ती भर। ऐसे व्यक्ति निष्क्रिय, बेकार, कोरे बातूनी जमा खर्च करने वाले होते हैं उनसे महान् कार्य की आशा नहीं की जा सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि आप जो सोचे-विचारे या योजनाएं विनिर्मित करें, वे इस प्रकार की हो, जिन्हें कि आप कार्यरूप में परिणत कर सके। योजनाएं निर्माण करने के पूर्व सोचिये कि क्या आप उन्हें कर सकेंगे, क्या उनमें और आपकी शक्ति यों में अनुपात बराबर हैं, कहीं आप अपने सामर्थ्य से बाहर की बात तो नहीं सोच रहे हैं। जो योजना आपने बनाई हैं उसके लिये आपके पास क्या-2 साधन हैं। कितना धन है? कितने मित्र, बन्धु, बान्धव हैं। आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक, सामाजिक स्थिति कैसी है। इन पर विचार करके ही किसी कार्य में हाथ डालें। कार्य की सफलता के लिये आपकी मानसिक, शारीरिक या क्रियात्मक शक्ति यों का एकीकरण आवश्यक है और इस एकीकरण को कार्य के उद्देश्य की ओर केन्द्रित करिये। मानसिक दृष्टि से सचेष्ट और जागृत रहिये। संकल्प शक्ति का विकास एवं संचालन जरूरी है। इन बातों पर भली भाँति विचार करने के पश्चात् कार्य करने से सफलता अवश्य मिलती है।


भारतीय एकता के सूत्र उसकी संस्कृति में

(आचार्य श्री नरदेव शास्त्री, वेदतीर्थ, ज्वालापुर)

नई ईंटें नये मकान, नया राज्य, नयी बातें-इस वर्तमान पाश्चात्य पद्धति के प्रजातन्त्र में सब कुछ नया ही प्रतीत हो रहा है हम भारतीयों को। प्रतीत क्या हो रहा है, सामने नयी नयी बातें आ रही हैं। इस नये ढंग के शासन काल में हमारे भारतीय नेता इस चिन्ता में हैं कि भूतकाल की बातें भूतकाल में विलीन हो गई “हेयं दुःखमनागतम्” की दृष्टि से ऐसा उपाय किया जाय, जिससे भारतीय जन एक दूसरे से बँधे रहे, उसमें एक प्रकार की सामान्य एकता का कोई आधार हो जिससे प्राप्त स्वतन्त्रता की रक्षा हो सके। जब हमारे देश पर विदेशी और विधर्मियों के आक्रमण होने लगे थे, तब हमारे पास क्या नहीं था? बल? बलशाली पराक्रमी राजे-महाराजे सैकड़ों थे। धन? धन-ऐश्वर्य भी इतना विपुल था कि संसार के राष्ट्र, भारत के लिये लालायित रहते थे। इसके ऐश्वर्य की ख्याति सात समुद्र पार पहुँच चुकी थी। इसीलिए तो मध्य-एशिया से जलालुद्दीन बादशाह ने काश्मीर पर चढ़ाई की थी, इसीलिये अनेक बलादृय़ यवन राजाओं के आक्रमण का ताँता बाँध रक्खा था, यहाँ तक कि हमारी भूलों से, एकता के सूत्रों के टूट जाने से बली पराक्रमी ऐश्वर्य संपन्न हमारे देश के राजे महाराजे परास्त हुए और अन्त में भारत में यवन-साम्राज्य की प्रस्थापना हो ही गई थी। इसी भारत की प्रशंसा सुन कर विदेशी यात्री भारत में आते रहे और वापस जाकर भारत के विषय में लिखते रहे, अपने देशवासियों को प्रोत्साहित करते रहे कि “अरे देखना है तो भूतल के स्वर्ग, भारत को देखो, भारत के धर्म, संस्कृति, सभ्यता, ऐश्वर्य, पराक्रम को देखो। प्राचीन भारतवासी गुरु गण संसार को निमन्त्रण देते थे कि आओ संसार के लोगों और हम से चरित्र-शिक्षा लो।”

इसी भारत की कीर्ति सुनकर ही तो अतुल पराक्रमी सिकन्दर आया था। कतिपय भारतीय राजाओं को परास्त करके और अन्त में मार खाकर स्वदेश लौट गया था। उस समय यदि हमारे राजे-महाराजे सब एक होकर एक साथ आक्रमणकारियों पर टूट पड़ते तो फिर किसी की यह हिम्मत न होती, अथवा पड़ती कि भारत की ओर आँख उठाकर भी देखे।

यहाँ अँगरेज भी ऐसी ही परिस्थिति में आया। पहले व्यापारी रूप में आया, फिर पराक्रमी किन्तु कुट्ठैल राजाओं की दशा देखकर उसने यहाँ की परिस्थिति से पूर्ण लाभ उठाया और अन्त में शासक रूप में भारत का भाग्यविधाता बन बैठा। अन्त में उसकी साम्राज्य लालसा इतनी बढ़ी कि उसको भी अपने पापों का फल भुगतना पड़ा—

लोभः पापस्य कारणम्।

अब पूर्वजों के अवशिष्ट इधर-उधर बिखरे हुए पुण्य-कणों के प्रताप से कहिए अथवा यह कहिए कि हमारे भी दिन फिरने थे इसलिए कहिए, हमारी स्वतन्त्रता पुनः प्राप्त हो गयी। और हमने स्वतन्त्रता प्राप्त करके अपनी नयी शासन पद्धति संभाल ली। अर्थात् भारत में पाश्चात्य ढंग का प्रजातन्त्र स्वीकार किया। हमने अपना संविधान भी बना लिया, और तद्नुसार लोकसभा, राज्य परिषद्, विधानसभा विधान परिषद आदि बनाकर इस लोकतन्त्र की गाड़ी को हाँकना प्रारम्भ किया। पर हमको यही चिन्ता रही, और बराबर रहती है कि प्राचीन समय में एकता के सूत्र जैसे भी रहे हों, इस नये युग में एकता के नये सूत्र होने चाहिए। प्राचीन समय में सब का आधार-धर्म रहता था, इस समय धर्म-कर्म की मीमाँसा ले बैठें तो एकता असम्भव हे क्योंकि नाना धर्म, नाना ग्रन्थ, नाना मति के घनघोर जंगल में एकता की बात करना, नहीं, नहीं, आशा भी करना आकाश पुष्प की आशा करने की भाँति असम्भव है। ये हैं उन लोगों के विचार, जिनके हाथ में आजकल शासनसूत्र है और जिनका कि वे बड़ी सावधानी से संचालन कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने घोषणा कर डाली है कि पाश्चात्य ढंग के समाजवाद की स्थापना ही इस प्रजातन्त्र का उदृश्य है। उनकी समझ में इस प्रकार के समाजवाद के बिना भारत में एकता का रहना असम्भव है और धर्म के नाम पर तो एकता चल ही नहीं सकती, इसीलिए धर्मनिरपेक्ष राज्य की प्रस्थापना की गई है।

यह ऐसा क्यों किया गया?

इसलिए कि अँगरेज ने अपने समय में, अपने शासन के सुभीते के लिए भारत में जो शिक्षा-दीक्षा दी थी, उसी का यह परिणाम है कि उस शिक्षा में पालित-पोषित-संरक्षित-परिवर्द्धित एक एरो समुदाय का निर्माण हुआ जो भारत को स्वतन्त्र करने के लिए संबद्ध हुआ और उन्हीं के प्रयत्नों का फल है कि इस प्रकार की स्वतन्त्रता मिली, और इस प्रकार का स्वराज्य आया। गोरे गुरु गण ने भारत को भी कुछ सिखलाया उसकी विद्या ही उसके सामने आयी और वह भारत छोड़ने पर विवश हुआ। गोरे गुरु गण जाते जाते भी ऐसी जाति बनाकर छोड़ गये कि जिस जाति में देशभक्ति के कीटाणुओं की तो बहुत भरमार है किन्तु जिस जाति के मस्तिष्क में भारतीय धर्म, संस्कृति शिक्षा-दीक्षा के कीटाणुओं का अत्यन्त अभाव है। भारत तो चाहिए, उसके लिए मर मिटने को सदा तैयार, पर भारतीय धर्म और संस्कृति नहीं चाहिए—ऐसी दशा है। इसलिए वे खोज में हैं कि एकता के लिए कोई नये सूत्र ढूँढ़कर निकाले जायं। न जाने ये नये सूत्र भारतीय वातावरण में फिट ( ठीक ) बैठते हैं कि नहीं—न जाने क्या होता है? अभी तो नयी शासन प्रणाली की नयी प्रयोगशाला में नये-नये प्रयोग हो रहे हैं।

हमारा अपना विचार है कि हम भारतीयों के लिए नये एकता के सूत्रों की आवश्यकता नहीं है। हमारे प्राचीन भारत की एकता का सूत्र अब भी विद्यमान है—वह है अपनी संस्कृति! इस संस्कृति का सम्बन्ध हमारे अपने धर्म से है और नाना धर्म, नाना पन्थ के रहते हुए भी हमारे पूर्वज एकता में नानात्व और नानात्व में एकता को देखने का पाठ पढ़ा गये हैं। उन्हीं सूत्रों को दृढ़ करने की आवश्यकता है। संस्कृति कहिए संस्कार कहिए, है एक ही बात। अनेक परम्परागत संस्कारों से ही किसी जाति समुदाय, देश, राष्ट्र की संस्कृति बनती है, हमारे देश में नाना धर्म, नाना पन्थ, नाना विचार रहते हुए भी सब एक सूत्र में बँधे रहे। न बँधे रहते तो एक सहस्र वर्ष की भयंकर दासता, विदेशी विधर्मियों की प्रभुता का सुदीर्घकाल, इनमें यह भारत जीवित ही कैसे रहा—इस पर संसार आश्चर्य करता रह गया। वह संस्कृति के कारण ही जीवित रहा, विपरीत परिस्थितियों में भी सब कुछ सहता रहा और फिर उभर गया है। अब अन्य देश के लोग यह देख रहे हैं कि भारत जिस पाश्चात्य प्रजातंत्र का प्रयोग कर रहा है, इसमें कहाँ तक सफल हो रहा है। इस पाश्चात्य प्रजातन्त्र में भारतीय भूमि में क्या-क्या परिवर्तन होंगे इत्यादि।

उनको आश्चर्य है कि जब से सृष्टि बनी, तब से युद्ध-महायुद्ध भी होते आये हैं। उनमें शस्त्रास्त्रों और मारक अस्त्रों का भी प्रयोग होता चला आया है—हिंसा भी चली आ रही है, इसको कोई रोक न सका। पर भारत भी क्या विचित्र देश है कि उसने स्वतन्त्रता की प्राप्ति के लिए सत्य और अहिंसा ( जो कि भारतीय धर्म के दो प्रमुख अंग हैं ) नामक वस्त्रों का प्रयोग किया और सफल भी हुआ—संसार देखता का देखता रह गया कि आश्चर्य, परमाश्चर्य, यह क्या हुआ—ऐसा तो न कभी सुना, न देखा, न हुआ।

अब भी संसार में मत्स्यन्याय का प्रयोग हो रहा है। जैसे एक मछली दूसरी छोटी मछली को निगल जाती है और दूसरी बड़ी मछली उन दोनों को हड़प जाती है, इसी प्रकार की दशा हो रही है पाश्चात्य राष्ट्रों की। सब अपनी-अपनी कक्षा में स्वतन्त्र हैं, तो भी कोई राष्ट्र सुख-समाधान से नहीं बैठ रहा है, कारण उन राष्ट्रों की राजसी अथवा राक्षसी महत्वाकाँक्षा ही है। बलाढ्य राष्ट्र तो आपस में टकरा कर नष्ट होने को फिर ही रहे हैं, पर छोटे-छोटे राष्ट्रों को भी स्वतन्त्रतापूर्वक जीने नहीं दे रहें हैं—

भारत ने स्वतन्त्र होकर संसार के ईर्ष्यालु राष्ट्रों में परस्पर शान्ति, समृद्धि, सौमनस्य के हेतु एक भारतीय संस्कृत से ओतप्रोत सुन्दर उपाय बतलाया है। वह रामबाण औषधि है पञ्चशील, जिसको संसार सेवन करें तो संसार के राष्ट्रों के समस्त दुःख ही जाते रहेंगे। महाभारत में शान्तिपर्व में आमृशंस्य धर्म के प्रसंग से जो धर्मत्व कहे हैं, उन्हीं का तो अनुवाद है पञ्चशील।

आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्।

जो बात,जो व्यवहार स्वयं अपने आपको नहीं भाता, प्रतिकूल लगता है, उस प्रकार का व्यवहार हम दूसरों से न करें—

यन्येषाँ हितं न स्याद्, आत्मनः कर्म पौरु षम्॥

हमारे जिन कर्म और पौरुष से दूसरों का हित बिगड़ता है उन कर्मों और पौरुषों को प्रयत्न से त्याग देना चाहिए। हमें अपनी स्वतन्त्रता प्यारी है तो हम दूसरों की स्वतन्त्रता पर आघात क्यों करें, हमें परतन्त्रता अच्छी नहीं लगती तो हम दूसरों को परतंत्र बनाने की क्यों चेष्टा करें? हमें कोई त्रास-भय देवे हमें अच्छा नहीं लगता तब हम अन्यों को क्यों भय दिखलायें, त्रास क्यों दें, इसी में “जीओ और जीने दो”—”स्वयं सुखी रहो औरों को सुखी रहने दो”—किसी पर “आक्रमण मत करो” समझौते से काम लो, अहिंसा का पालन करो, बैर से बैर कभी शान्त नहीं होते इत्यादि उच्च तत्व भारतीय उच्च-संस्कृति के ही तो अंग है और सात्विक अंग हैं। आज संसार हमारे पंचशील के गुण गा रहा है। एक-एक राष्ट्र बारी-बारी से घोषणा करता जा रहा है कि “हमको पंचशील मंजूर है।”

संसार में पिछले सहस्रों वर्षों में अनेक जातियाँ, देश, राष्ट्र उठे, नष्ट हुए—ऐसे कि उनका नाम तक मिट गया। पर वाह रे भारत, तू अब भी जीता है, जीता ही नहीं रहा, अपितु उठकर खड़ा हुआ है। यह तेरी परम्परागत संस्कृति का ही प्रभाव है।

इस नये युग में भी हमको अपनी एकता के लिए नये सूत्रों के टटोलने की आवश्यकता नहीं है। हम अपनी संस्कृति को भी संभाले रहेंगे, तो बने रहेंगे। केवल बने ही नहीं रहेंगे अपितु और बिगड़े हुओं को सुधारेंगे।

स्मरण रहे!

हमारी संस्कृति का सम्बन्ध हमारे धर्म से है। और वे सब धर्मतत्व वेदशास्त्र, पुराण, इतिहास आदि में ओतप्रोत हैं और वे सब या तो वेदवाणी में हैं अथवा देववाणी में हैं। देववाणी से अभिप्राय संस्कृत से है। इसलिए हमारा धर्म, हमारी संस्कृति, और हमारी संस्कृत विद्या इनका घनिष्ठ सम्बन्ध है। उसी ने आज तक हमको एकता के सूत्रों में बान्ध रक्खा है। नयी संस्कृति बनाने में न जाने कितने सहस्र वर्ष लगेंगे और इतने वर्ष लगकर वह हमारी पुण्य-पवित्र भारतभूमि के अनुरूप भी रहेगी कि नहीं, पता नहीं—इसलिए अपनी पुरातन संस्कृति की उपासना कीजिए—हमारे धर्म ग्रन्थों में क्या नहीं हैं जो हम दूसरों से उधार लेकर काम चलाने की इच्छा करें?

यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत्कचित्॥

जो हमारी संस्कृति है, उसी का उच्छिष्ट संसार में बिखरा पड़ा है। जो हमारी संस्कृति में नहीं मिलेगी ऐसी कोई सुवस्तु कहीं भी अन्यत्र देखने को नहीं मिलेगी। इसलिए भारत तू तो वह है, केवल अपने स्वरूप को समझने की बात है—

तत् ‘त्वमसि’ भारत,


सच्ची स्वतन्त्रता

(श्री अगरचन्द जी नाहटा, बीकानेर)

हम सब अपने जीवन में प्रतिपल परतन्त्रता का अनुभव करते हैं और उससे दुखी रहते हैं। हम जो करना चाहते हैं, वह कर नहीं पाते, हम जो प्राप्त करना चाहते हैं वह प्राप्त हो नहीं रहा है, इससे हम परतन्त्र हैं, पराधीन हैं, इसमें दो मत हो नहीं सकते। सुखानुभव करने के लिए स्वतन्त्र होना परमावश्यक है। इस बात को भी हम जानते हैं कि कोई भी व्यक्ति पराधीन क्षण भर भी नहीं रहना चाहता। इसीलिए कहा गया है “पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।” मनुष्य तो अधिक विचारशील प्राणी हैं पर पशु भी परतन्त्र रहना नहीं चाहते। कभी परतन्त्रता बन्धन में फँस जाते हैं तो स्वतंत्र होने को तड़पते रहते हैं।

अब हमें देखना यह है कि यह पराधीनता है क्या, एवं क्यों है? इसीलिए सर्वप्रथम ‘स्व’ और ‘पर’ का विवेचन आवश्यक हैं। वास्तव में देखा जाय तो केवल आत्मा ही हमारा ‘स्व’ हैं उसके अतिरिक्त सारे पदार्थ ‘पर’ हैं। धन, कुटुम्ब और परिवार ही नहीं, यह शरीर भी ‘पर’ हैं। इन सब ‘पर’ को ‘स्व’ मान लेने के कारण ही हम पराधीन बने हैं। हम सब मन एवं इन्द्रियों के गुलाम बने हुए हैं। जिन व्यक्तियों से हमें खाद्यादि पदार्थ या आजीविका मिलती हैं, उन कुटुम्बीजनों, सेठ, राजा आदि के दास बने हुए हैं। उनको प्रेरणा एवं कथानुसार हमें प्रवृत्ति करना पड़ रही हैं। इस दासता से छुटकारा पाना ही स्वतन्त्रता है जैसे इन पर पदार्थों ने हमें अपने आधीन बना रखा है वैसे ही हम इनको वश में कर अपने हितानुकूल काम इनसे लेने लगें, तभी हम स्वतंत्र कहे जायेंगे। संक्षेप में इन पर निमित्तों कारणों के वश हमारी आत्मा ही हमारे नियंत्रण में नहीं रही। वह कर्मों के नचाये नाचती हैं, वह अपना आपा, भूल एवं खो चुकी हैं। परतन्त्रता के मूल कारण हम ही हैं, हमारे कर्म ही हैं, दूसरे नहीं।

जहाँ तक आत्म स्वरूप का भान नहीं होता, मनुष्य चाहे कितना ही शक्ति शाली, व धन सम्पन्न हों वह पराधीन ही रहेगा। व्यवहार में ही देखते हैं कि एक व्यक्ति के घर में लाखों व करोड़ों की सम्पत्ति गड़ी हुई है पर जब तक उस व्यक्ति को उसका पता नहीं, वहाँ तक वह दूसरों के पास दीनता से प्रार्थना करता रहता है, आजीविका के लिए इधर-उधर चक्कर काटता रहता है। दूसरा जो भी कहे, चाहे वह बुरा भी हो पर उसी को मानना पड़ता है। जो काम हम करना नहीं चाहते, उसे अनिच्छा से भी करना पड़ता है। पर जब हमें अपने घर की समृद्धि का पता चल जाता है, उसी समय वह पराश्रितता से मुक्त हो जाता है। एक क्षण के लिए भी वह पराधीन नहीं रहना चाहता। उसी तरह आत्मा की अनंत शक्ति व समृद्धियों को हम भूले हुये हैं और सुख बाहर की ओर ढूंढ़ते फिरते हैं। उसे दूसरे पदार्थों और दूसरे व्यक्तियों से प्राप्त होने की चीज समझ रहे हैं। इस भूल को समझना व सुधारना होगा, तभी हमारी परतंत्रता मिट सकेगी।

विश्व के प्रायः समस्त धर्मों ने मन और इन्द्रियों को वश में रखने का उपदेश दिया है, इसके बिना आत्म-दर्शन असम्भव है। क्योंकि इन्द्रियाँ वाह्यमुखी है और मन चंचल है, जब तक बहिर्मुखता नहीं मिटेगी, अन्तरात्मा के दर्शन कैसे संभव हो सकता है? इसी प्रकार मन के संकल्प विकल्प उप सीमित नहीं होंगे, वहाँ तक निर्विकल्प निर्विकार आत्मा का भान नहीं हो सकता। अपनी शक्ति की वास्तविकता नहीं जानने के कारण ही हमने कर्मों को बलवान मान रखा है। हम प्रायः कहते रहते हैं क्या करें? कर्म सता रहें है अमुक शुभ काम करना चाहते हैं, पर कर नहीं पाते, अमुक अशुभ करना नहीं चाहते, पर करना पड़ रहा है, पर वास्तव में कर्म तो हमारे ही निर्मित हैं। हम जो कुछ मन, वचन, काया द्वारा प्रवृत्ति करते हैं उनकी शुभाशुमता पर कर्म में फलदायक शक्ति आती है। हम चाहें तो अपनी प्रवृत्तियों की दशा बदल सकते हैं, पूर्व कृत कर्मों को शुभ व शुद्धानुष्ठान द्वारा बदल सकते हैं, उनकी स्थिति बस में कमी कर सकते हैं यावत् उनको क्षीण भी कर सकते हैं। जो हमारे हाथ की बात हैं उसे व्यर्थ की भ्रामक धारणा वश, बेबस समझ, दुखी हो रहे हैं। कर्मों को हमने अनुचित महत्व दे रखा है।

जैनतीर्थकारों ने ईश्वर की दासता को छुड़ाने के लिए हमें कर्मवाद का सिद्धान्त बतलाया पर खेद है हमने अपनी दासता को चिर अभ्यस्त मनोवृत्ति के कारण एक ही दासता छोड़ी, तो दूसरे कर्मों की दासता स्वीकार कर ली कर्म सिद्धान्त तो हमें स्वतंत्र होने का सन्देश देता है। उसे हम ने समझने की गलती व कमी के कारण परतंत्रता का कारण और वाहन बना दिया है। अतः इस भ्रामक विचारधारा को सबसे पहले निकालना आवश्यक है। बन्द करने वाले हम स्वयं हैं तो उससे मुक्त होने की क्षमता भी हममें हर समय विद्यमान है। जब तक हमने कर्मों को अपने से अधिक शक्तिशाली मान रखा है वहीं तक हम अपने का अशक्त समझ कर्मों के आधीन मान पराश्रित बने हुये हैं। जब हम आत्मा की अनन्त शक्तियों व कर्मों की कमजोरी का अनुभव करने लगेंगे, तो हम स्वतंत्र हो जायेंगे। कर्मों में शक्ति भरने वाले हम ही हैं। हमने ही उन्हें बनाया व उन में शक्ति का आरोपण किया। जब भी हम चाहें आत्मशक्ति की स्फुरता व प्रगटन द्वारा उनको शक्ति रहित कर जो चाहें प्राप्त कर सकते हैं।

अब पाठकों के हाथ में स्वतंत्रता की चाबी आ चुकी होगी। परतन्त्रता स्वरूप की अज्ञानता और स्वशक्ति के अप्रगटन के कारण ही हैं। हमने कर्मों को उनका कारण मान रखा है। तो अब वे कर्म आते किस रास्ते से हैं? विचार कर उसके द्वार पर ताला लगा देना है। कर्मों के बन्धन के 4 कारण माने गये हैं-1.मिथ्यात्व, 2.अविरति, 3.कषाय और 4. योग। अपने स्वरूप का मान होते ही मिथ्यात्व टल जाता है। ‘पर’ पदार्थों में सुख है, इस भ्रम के दूर होते ही ‘पर’ वस्तु के संग्रह या उन पर ममत्व की दिशा पलट जाती है। उनसे मुख मोड़ा कि विरति का (विरक्ति ) भाव आया। उन ‘पर’ पदार्थों में इष्ट निष्ट की कल्पना थी, वह दूर हुई कि कषाय की मन्दता हुई। जब ममत्व नहीं रहेगा तो उसके कारण होने वाले रागद्वेष व क्रोध आदि कषाय कैसे रह सकेंगे? यानी वे उत्पन्न ही नहीं होंगे। कषाय की कमी होने के साथ योगों की प्रवृत्ति स्वयं घट जायगी। जो रहेगी वह बन्धन का कारण नहीं रहेगी। यह मार्ग ज्ञानमार्ग है। इसमें स्वरूप के ज्ञान की प्रधानता है। आगे की प्रवृत्तियाँ तो उसी पर आश्रित हैं। दूसरा मार्ग है, योग मार्ग या कर्मयोग। इसका प्रारंभ होता है, मन वचन, माया एवं इन्द्रियों को वश में करने के प्रयत्न से। पहले इन्द्रियों को अनुकूल बना उनके विषयों के विष को बेकाम बना देना होगा, जिससे काषायों का उदय कम होने लगेगा। कषायों की महत्ता के अनुरूप ही सम्यकत्व, देशविरति, सर्वविरति भाव प्रगट होगा, यह आगमिक मान्यता है। उग्र अनन्तानुबन्धी चार कषायों के क्षय उपसम या क्षययोगसम से मिथ्यात्व दूर होकर सम्यग दर्शन प्रगट होता है अतः सच्ची स्वतन्त्रता आत्मिक शक्ति यों के विकास से मिलेगी और उसके लिए विषयों एवं कषायों से दूर रहना अत्यावश्यक है। इन्द्रियों व मन (मन वचन कायत्रियोग) पर नियन्त्रण लाना होगा। अभी हम इनके वश में हैं फिर ये हमारे वश में आ जायेंगे तो हम समस्त परतन्त्रता, पराधीनता, पराश्रितता व बन्धन से मुक्त होकर स्वतन्त्र हो जायेंगे। बाहरी स्वतन्त्रता तो स्वेच्छाचार और अहंकार की ओर ले जाती है। सच्ची स्वतन्त्रता तो आत्मिक स्वतन्त्रता ही है। इन्द्रियों की गुलामी व परतन्त्रता छोड़ आत्मशक्ति की ओर बढ़ें। हमारी समस्त प्रवृत्तियाँ आत्मा की प्रेरणा से ही स्वभावानुकूल हो। हम पौद्गलिक विषय कषायों को रागद्वेष से दूर हो आत्म स्वरूप में स्थित रहें यही सच्ची स्वतन्त्रता है।


आत्मिक-शाँति कैसे मिले?

हलचल और हाहाकार आत्मा का गुण नहीं है। अनन्त की ओर देखो, वह कितना शाँत है। अनंत की शाँति के गर्भ में कितनी व्यथाएँ- कितनी आहें आतीं और विलीन हो जाती हैं।

मानव-मन उस शाँति से परिचित नहीं और न हो सकता है। मन सीमित है अनंत की शाँति असीम है। सीमित वस्तुओं में असीम का समीकरण नहीं हो सकता। अनंत का अर्थ है मुक्ति , सीमित का अर्थ है प्रसन्नता। मुक्ति अथवा स्वतन्त्रता में ही शाँति है और परतन्त्रता में दुःख। मनोनाश के बिना मुक्त वस्था प्राप्त करना असंभव है।

निशीथ की शाँति, ज्योत्स्ना की शाँति,ऊषा की शाँतिमयी काँत, सागर का शाँत हृदय, झीलों की शाँत मुखड़े, फूलों का शाँत मुसकान, प्रकृति का शाँतिमय हास, सौरभ का शाँतिमय सुवास, नदियों का कल-कल, झरनों का झरझर, समीरों का सन-सन,पक्षियों के कलरव, कोयलों की कूक, गगन की नीलिमा, हिमाच्छादित भूथरों की गंभीर एवं शाँत आकृतियाँ हम देखते हैं। फिर भी हम उस विचित्र गान के रव में अपना आत्मिक रव संबंधित नहीं करते। शाँति के गीत, आत्मा के गान एवं फूलों की मुसकान एक हैं। सबों में एक ही संगीत व्याप्त है। सबों से होकर एक ही शक्ति काम कर रही है। वही ध्वनि ब्रह्म है वही वैज्ञानिकों का स्पन्द जगत है, वही आदि शक्ति माया की क्रीड़ा है, वही आत्मा का अनहत्रव है। वही ओऽम है। उसी से सारी दुनिया की उत्पत्ति हुई है। उसमें सारी दुनिया लय प्राप्त करती है। वही एकमेव सत्य है।

अन्तर की शाँति ही वास्तविक शाँति है समुद्र के ऊपर तूफान उठते हैं, जहाज उलटते हैं, प्रलय का दृश्य उपस्थित होता है, पर उसका हृदय शाँत है। आकाश में घन-घोष होता है। काल मेघों का दृश्य दृष्टिगत होता है, परन्तु अनन्त आकाश की अन्तरात्मा सदा अविचलित तथा दृढ़ रहती है। मानवी स्थिति आत्मिक स्थिति नहीं। वह समुद्र में लहरों के समान और आकाश में बादलों के समान प्रगट होती है। वह असत्य है। उसके साथ अहंता एवं संगदोष के कारण ही सारी अशाँति का जन्म होता है। आत्मा ही सदा सत्य है। आत्मिक स्थिति ही हमारी वास्तविक स्थिति है।

आत्मिक शाँति प्राप्त करो तुम्हारे पास दुनिया की सारी शक्ति चली आवेगी। तुम्हारी इच्छा के अनुकूल पृथ्वी चलेगी और सूरज उगेगा। तुम्हारी इच्छा ईश्वर की इच्छा होगी। तु प्रचण्ड सूर्य के समान ईश्वरीय प्रकाश को जनता में विकीर्ण करोगे। आत्मा का वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रतिष्ठान ही आत्मिक-शाँति का लक्ष्य है, इस लक्ष्य को समझो।

भगवान बुद्ध की शाँति, ऋषियों की शाँति, ब्रह्म-ज्ञानियों की शाँति, अनाहत् की शाँति, समाधि की शाँति, भगवान राम की शाँति, भगवान कृष्ण की शाँति, भगवती की शाँति एवं शाँति की शाँति को प्राप्त करो। वही प्राप्त करने योग्य है। वही सर्वस्व है। मुक्त हो जाओ और अपूर्व आनन्द में विलीन हो जाओ।


वर्तमान समस्याओं का हल-चरित्र निर्माण

(श्री राजीवलोचन चौधरी बी. ए., लखनऊ)

भारत का महत्व अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। कृषि, उद्योग, व्यापार तथा अन्य बातों में भी देश के भीतर बड़ी उन्नति हो रही है। देश में शाँति है, सुव्यवस्था है और हमारे नेता बड़े उत्साह से काम कर रहे हैं। वह दिन दूर नहीं है जब ‘राम-राज्य’ की कल्पना साकार होगी।यह सब पढ़ने और सुनने में बड़ा अच्छा लगता है और इसमें सन्देह भी नहीं कि काफी प्रगति इधर कई वर्षों में हुई है। इतना सब होना आवश्यक था परन्तु इसको ही उन्नति की इति मान लेना घातक होगा। भौतिक साधनों और सुखों की दृष्टि से होने वाली उन्नति पर्याप्त नहीं होती, जब तक मानव-समाज की विचार-परम्परा नहीं बदलती, जब तक सर्व-साधारण की मनोवृत्तियों में अन्तर नहीं आता और जब तक किसी राष्ट्र के बच्चे बच्चे में नैतिकता और चरित्र का उदय नहीं होता। देश की उन्नति को स्थायी बनाने के शिला-आधार तो ये ही बातें हैं। दुर्भाग्य से हम इन्हीं बातों की ओर ध्यान नहीं दे रहें हैं। जाति और राष्ट्र का विकास मानों एक लम्बा रास्ता है। आजादी प्राप्त करने तक हमने केवल मंजिल पार की है और हमारी अन्तिम मञ्जिल होगी हमारे राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण जिसके बिना हम ऊँचे उठते हुए भी त्रिशंक की भाँति अधर में लटके रहेंगे

इस समय हमारी सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता-चरित्र है जिसके बिना राष्ट्र निर्माण का काम अधूरा रहेगा। यह चरित्र’ क्या है? अनेक ग्रन्थों में चरित्र की परिभाषाएँ दी हुई है, जो आसानी से देखी जा सकती है। यदि बौद्धिक-विश्लेषण की दृष्टि से देखा जाय, तो चरित्र अनेक सद्गुणों की समष्टि है। सत्य,ईमानदारी,दया,उदारता,विनय,त्याग,सहनशीलता, कर्त्तव्य पालन,न्याय प्रियता,प्रेम आदि अनेक गुण ऐसे हैं जो चरित्र के अंतर्गत आ जाते हैं। इस प्रकार की बौद्धिक व्याख्या सरल और संक्षिप्त जरूर है परन्तु न तो वह व्यवहारिक है और न व्याख्यात्मक। चरित्र क्या है, इसे तो कुछ उदाहरणों-कुछ प्रसंगों द्वारा ही स्पष्ट किया जा सकता है। पाठकों के लाभार्थ ऐसे प्रसंग और उदाहरण हम नीचे दे रहे हैं।

हमारे परिचित एक सज्जन बड़े धर्मात्मा पुरुष हैं। अपनी राह आते हैं, अनबन नहीं है और न किसी से लेन-देन है। लाखों की संपत्ति उनके पास है। जिस राह से निकलते हैं, लोग आदर से उनको प्रणाम करते हैं। प्रातःकाल और सायं वे माला भी जपते हैं। कई मन्दिरों में उनकी ओर से पूजा होती है। दान-दक्षिणा देने में वे आगे रहते हैं। नगर में उनकी बड़ी है। सैकड़ों नौकर-चाकर हैं। लोग समझते हैं वे बड़े चरित्रवान हैं। पंडितजी के जीवन का एक ऐसा पहलू है, जिसकी ओर किसी की निगाह भी नहीं जाती। उन्होंने यह धन-सम्पत्ति और मान-मर्यादा, कैसे पैदा की, इस पर किसी ने विचार नहीं किया। माल का लदान करने में, प्रतिमास हजारों रुपया अधिकारियों की जेबों में वे डालते हैं। बिक्री कर और आय-कर बचने से उनको लाखों की आमदनी हो जाती है, उनकी हिसाब-किताब की बहियाँ दो प्रकार की हैं, एक में असली हिसाब रहता है और दूसरी में नकली जो आयकर और बिक्री-कर के दफ्तरों में भेजी जाती हैं और चाँदी के बल अफसरों का मुँह बन्द कर दिया जाता है। अब सोचिये, क्या पंडितजी चरित्रवान् हैं? वास्तव में पंडितजी किसी व्यक्ति विशेष को कोई हानि नहीं पहुँचाते, इसी से सभी उन्हें चरित्रवान कहेंगे, परन्तु वे देश और समाज को तो बड़ी हानि पहुँचाते हैं। आय और बिक्री का धन जो जनता के लाभार्थ उनसे लिया जाना चाहिए और जिसे देना ही उनका ‘चरित्र’ गिना जाना चाहिए, वे चुरा लेते हैं। यही नहीं कितने ही अफसरों को प्रलोभन देकर वे उनका चरित्र भ्रष्ट करते हैं।

अब रेलवे या अन्य दफ्तरों के अफसरों की बात लीजिए। पंडितजी को लदान की सुविधाएं देकर या करों की छूट देकर किसी व्यक्ति विशेष को हानि तो नहीं पहुँचाई। पंडितजी का लाभ हुआ और अपना भी साथ में लाभ हुआ फिर क्या वे चरित्रवान् नहीं है? पर सोचिये उन्होंने समाज या सरकार का कितना उपकार किया। सरकार से उन्हें जो वेतन मिलता है, वह इसीलिए कि वे न्यायपूर्वक जनता के लिए व्यापारियों से कर वसूल कर ले, या लदान या माल भेजने में जो आवश्यक समझा जाय, जनता के हित में, उसे पहले भेजें। उन्होंने ऐसा नहीं किया। वेतन में दिया गया जनता का वह धन व्यर्थ गया। उनकी शिक्षा-दीक्षा पर लगाया गया सरकारी धन भी बेकार गया और पंडितजी जैसे व्यापारियों से कर वसूल न करके सरकार की गरीबी बढ़ाई और उस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को नये कर लगाने के लिए प्रेरित किया। इस ओर न तो आप सोचते हैं, न हम, न सरकार और न वे अफसर। वे अफसर उच्च शिक्षा प्राप्त हैं, विनयी हैं, समाज में उनका सम्मान है, उनसे सब डरते हैं, परन्तु यह सब गुण मिल कर भी ‘चरित्र’ की संज्ञा नहीं प्राप्त कर सकते।

हम एक डाक्टर साहब को जानते हैं। उनके घर पर साधु-संतों की भीड़ मची रहती है। सन्ध्या से बारह बजे रात तक अंधाधुन्ध कीर्तन चलता रहता है। सैकड़ों माँ-बहनें भी इकठ्ठा होती हैं। डाक्टर साहब धर्म के प्राण तथा विनय के अवतार हैं। रुपये-पैसे की कमी नहीं कीर्तन में सैकड़ों की प्रसादी बँटती है। इस दृष्टि से डाक्टर साहब चरित्रवान् हैं, उनका चरित्र अनुकरणीय है। अब प्रातः काल का दृश्य देखिये। डाक्टर साहब अपने औषधालय में वर्तमान हैं। पचासों रोगी खड़े, बैठे और पड़े हैं। लाला तथा बाबू लोग, डाक्टर साहब से पहले मिल लेते हैं और उनसे डाक्टर साहब मुस्कुरा कर बातें करते हैं, उन्हें घण्टों देखते और जाते समय नमस्कार भी करते हैं। मैले-कुचैले लोगों का नंबर बारह बजे आता था। उनके करा-डडडड और पीड़ा की ओर से डाक्टर साहब उदासीन है, उन्हें देखते समय डाँटते जाते हैं और नुस्खा लिखने में जल्दी करते हैं। ऐसे रोगी कहते हैं-डाक्टर साहब, पैसा नहीं, दवा सस्ती दीजिए। उत्तर मिलता है- पैसा नहीं तो आये क्यों हो? दवा मुफ्त की नहीं मिलती। उधर डाक्टर साहब अपने कम्पाउंडरों को समझा देते हैं देखो, इन्हें दवा में पानी मिलाकर देना। अमीरों को रोग न होने पर भी साधारण पानी या ग्लूकोस के इन्जेक्शन देना आदि। अब आप बताइये डाक्टर साहब कहाँ तक चरित्रवान हैं? दुर्भाग्य से हमारे समाज में इन अयोग्य व्यवहारों को चरित्रहीनता नहीं माना जाता।

इसी प्रकार जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी चरित्रहीनता व्याप्त हो रही है। उसी का परिणाम है कि न्यायालयों में न्याय की हत्या हो नहीं है, निर्माणकार्य की योजनाओं से जो लाभ होना चाहिए नहीं हो रहा है, सरकारी विभागों से जो जनता को सुविधाएं मिलनी चाहिए, नहीं मिल रहीं है। इसका एकमात्र कारण यह है हम लोग चरित्र के वास्तविक अर्थ को भूल बैठे हैं। दुर्भाग्य से, केवल व्यभिचार, चोरी, डाका और हत्या के कार्य ही चरित्रहीनता के अंतर्गत माने जाते हैं। अब हम पतन की एक ऐसी सीढ़ी पर पहुँच गये हैं, जिसके बाद सर्वनाश निश्चित है। इस दुखद स्थिति से त्राण पाने का एक मात्र उपाय चरित्र है। जिस चरित्र की बात हम कह रहे हैं, उस चरित्र का अर्थ क्या है?

यों तो हम सवेरे से शाम तक अनेक काम करते हैं, परन्तु मुख्य काम वही है, जिसे हम अपना व्यापार, नौकरी या अन्य कोई धंधा कहते हैं, जो हमारी जीविका का आधार है। इस मुख्य कार्य को छोड़कर प्रायः हमारे अन्य कार्य ‘व्यक्ति गत’ ही कहलायेंगे। हमारी नौकरी या व्यापार या धंधा, ‘व्यक्ति गत’ कार्य नहीं कहलाना चाहिए। इसे व्यक्ति गत समझ लेने के कारण ही चरित्र-दीप उत्पन्न होता है। उसे हम अपने स्वार्थ का साधन समझ बैठते हैं, इसीलिये झूँठ बोलते हैं, घूस देते हैं, और घूस लेते हैं। उदाहरण के लिए कार्यालय का एक कर्मचारी, प्रायः यही समझता है कि इस नौकरी द्वारा हमें वेतन मिलता है, इस पद से मुझे जहाँ तक हो धन पैदा कर लेना चाहिए। कोई-कोई क्लर्क या बाबू समझते हैं। कि हमारी नौकरी तो पक्की है, जितना थोड़ा काम हम कर सकते हैं, करें, अधिक परिश्रम करने से हमारा क्या लाभ होगा? ऐसे विचार इसीलिए उत्पन्न होते हैं कि हम अपने धंधे को केवल अपने स्वार्थ का ही साधन समझते हैं। वास्तव में हमारे मन से यह भ्रम दूर होना चाहिए। हमारा धंधा, नौकरी या दुकानदारी या अन्य कोई काम ‘सामाजिक’ है। हम उसी के द्वारा समाज, राष्ट्र और देश को लाभ या हानि पहुँचाते हैं। मान लीजिए आप ठेकेदार हैं, सरकार से ठेका लेकर आप बाँध या पुल बनाते हैं। यदि आपने अपने निजी लाभ के लिए, इञ्जीनियर और दूसरे देख-रेख करने वाले कर्मचारियों को धन का लोभ देकर उस काम को करने में खराब माल-मसाले का प्रयोग कर दिया, तो आपने समाज को हानि पहुँचाई और राष्ट्र का अहित किया। यदि आपने अपना काम करते समय देश की बात सोची तो, आप अवश्य अपना कर्तव्य पालन करेंगे। कभी-कभी यह सोच कर बड़ा दुःख होता है कि अपने मुख्य कारोबार द्वारा हमारे भाई देश और समाज को बड़ी से बड़ी हानि पहुँचाते हैं, परन्तु दिन के घंटे दो घंटे समाज सेवा के लिए अवश्य देते हैं। यदि ध्यानपूर्वक देखा जाय तो इन सब बातों से कोई लाभ नहीं है। हम अपनी दुकान, मकान या कुर्सी पर बैठ कर ही सब से बड़ी समाज सेवा कर सकते हैं। उसी से हमारा चरित्र बनता है।

हम जो भी व्यवसाय आदि करते हैं, उससे हमारे राष्ट्र का हित या अहित होता है- यह सिद्धाँत ही चरित्र-निर्माण की कुञ्जी है। हम जो भी काम कर रहे हों, उसे ध्यान पूर्वक करे, परिश्रम से करें और उसे पूरा करने में अपना उत्तरदायित्व पूरी तरह निबाहें। यह सब कर सकना हमारे ही हाथ में है। इन सब बातों को समझने में देर नहीं लगती और न कुछ खर्च ही होता है। इन्हें व्यवहार में लाने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण हम आप सब मिलकर स्वयं कर सकते हैं और बिना कठिनाई के कर सकते हैं। जब हम सब मिल कर ऐसा करने लगेंगे, तो उससे समाज का वातावरण अपने आप स्वस्थ हो जायगा और जो कुछ दोष आज दिखाई दे रहे हैं, अपने आप दूर हो जायेंगे।


अभिमान हटाइए

(श्री सत्यदेव जी शास्त्री)

नारद जी भक्ति और सदाचार की मूर्ति समझे जाते हैं।

भक्ति-शास्त्र के तो वह प्रवर्तक माने गये हैं। भगवान् कृष्णा ने गीता में नारद को देवर्षियों में प्रमुख स्थान दिया है।

नारद के देवर्षि बनने का रहस्य क्या है? इस बात को सब न जानते होंगे। नीचे की उपनिषद् कथा से यह ज्ञात होगा।

एक बार नारद आध्यात्म-ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के लिये सनत्कुमार जी के पास गये। विनय पूर्वक प्रार्थना की-

“महाराज ! मुझे शिक्षा दीजिये”

‘तुम अब तक क्या पढ़े हो पहले यह बतादो’

‘महाराज! अब तक ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, पितृ विद्या, ज्योतिष, गणित, दैव विद्या, तर्क, न्याय, भूत विद्या, नक्षत्र विद्या सर्प विद्या, आदि सभी शास्त्र और विद्याएं मैं पढ़ चुका हूँ’

‘तो फिर तुम और क्या चाहते हो?’

‘भगवन् ! मैंने मन्त्र ही पढ़े हैं, शब्दों और शास्त्रों का ही ज्ञान है, आत्मा का-अपने का-ज्ञान नहीं हुआ। मैंने आप जैसे आत्म-ज्ञानियों से सुना है कि आत्मा को जान लेने से शोक छूट जाता है। मैं तो भगवन् शोक की नदी को तैर नहीं सका; शोक में डूब रहा हूँ। कृपया मुझे शोक-सागर से उस पार किनारे पर लगा दीजिये” नारद बोले। इस प्रश्न में ही देवर्षि बनने का रहस्य है, जब तक मनुष्य बड़े पोथियों के ज्ञान को और शब्द-ज्ञान को ही महान समझता है, तब तक वह शोक रहित नहीं हो सकता।

आचार्य शंकर ने उक्त उपनिषद् के मंत्र की व्याख्या में लिखा है-

‘यद्यपि नारद सारे विज्ञान और साधन शक्ति से सम्पन्न थे, तब भी उन्हें श्रेय मार्ग न मिल सका। जब वह उत्तम कुल-विद्या आचार, साधन और शक्ति के अभिमान से रहित होकर सनत् कुमार जी के पास विनम्र शिष्य के रूप में गये, तभी उन्हें विद्या का सत्य स्वरूप ज्ञात हुआ।”

मनुष्य अनेक अभिमानों में मस्त रह कर प्रभु से विमुख बनता है अभिमान एक प्रकार का बुखार है। उसे उतारे बिना आध्यात्मिक स्वास्थ्य-लाभ नहीं हो सकता।

देवर्षि नारद की उक्त कथा से यदि हम यह शिक्षा पाकर केवल पोथी ज्ञान को महत्त्व न देकर आचरण की शिक्षा पाकर बड़ा मानें, तथा अक्षर-ज्ञान और जन्म-जाति के मिथ्या-अभिमान को छोड़कर यथार्थ के उपासक बनें, तो हमारा और हमारे देश का महान् कल्याण होगा।


तीर्थ-यात्रा और धार्मिक मेलों का उद्देश्य

(श्री लक्ष्मीनारायण टण्डन ‘प्रेमी’ एम. ए.)

भारतवर्ष धर्म प्रधान देश है। यहाँ की पृथ्वी का कण-कण महत्त्वपूर्ण है। यों तो संसार के देशों में अनेक तीर्थ-स्थान हैं, पर भारतवर्ष में तीर्थ-स्थानों की भरमार है। तीर्थ-स्थान से तात्पर्य ही है पवित्र स्थान और भारत की भूमि अपने महापुरुषों के महान कृत्यों के कारण अपने को कृत-कृत्य कर चुकी हैं। भारत के हिन्दू हमें जितनी तीर्थयात्रा करते दिखाई देते हैं उतने और कहीं के भी नहीं। यों तो ईसाइयों और मुसलमानों के भी जेरुसलाम, वेंरकन सिटी, मक्का और मदीना आदि तीर्थ हैं। भारतवर्ष में अजमेर शरीफ जैसे अनेक स्थान तथा दरगाहें हैं, जो मुसलमानों के पवित्र स्थान हैं।

हमारे ‘धर्म’ के अर्थ बहुत व्यापक है, और ‘तीर्थ’ के भी। भारतवर्ष ने सदा ही आध्यात्मिक विकास तथा आत्मिक उन्नति को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाया है। अतः अतीत काल से हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी तपस्या, त्याग और परोपकार से अपनी जन्म-भूमि तथा निवास-स्थान को सार्थक ‘तीर्थ’ नाम दिलवाया है। मैंने कहा है कि भारतवर्ष में अनेक तीर्थ हैं परन्तु उत्तर प्रदेश में तो तीर्थों की भरमार है, जहाँ भारत के कोने-कोने से यात्री आते रहते हैं। राम की जन्मभूमि अयोध्या तथा कृष्णा की जन्म तथा लीलाभूति 4 कोस के घेरे की ब्रजभूमि है। जिस के अंतर्गत मथुरा, वृंदावन, गोकुल डडड, डडडड घाट, बड़े दाऊजी, रावल, गोवर्धन, राधाकुण्ड, गिरिराज, जतीपुरा, डीग, कामवन, नंदगांव, प्रेम-सरोवर बरसाना, मधुवन आदि हैं। भगवान बुद्ध से सम्बन्ध रखने वाले स्थान बोध-गया, सारनाथ, राजगृह, कालसी आदि भी तीर्थ-स्थान ही हैं। आबू पर्वत आदि जैनियों की तीर्थभूति है अमृतसर आदि सिक्खों के तीर्थ हैं।

साधारण परदेशी यात्रियों की बहुत कुछ स्थानीय पण्डों पर निर्भर होना पड़ता है, और जो कुछ वे दिखा देते या स्थान की महत्ता बता देते हैं, उन्हें उसी पर विश्वास और सन्तोष करना पड़ता है। यदि यात्री जिज्ञासु हुआ तो कुछ पूछ पाछ कर और थोड़ा देख या जान लेता है- बहुत कुछ छूट भी जाता है। बेचारा इसी में अपने को धन्य समझता है-पुण्य का भीगी तो वह हो ही गया तीर्थ-यात्रा करने से आजकल न वैसे श्रद्धालु यात्री रहे हैं और न वैसे सात्त्विक भावनाओं वाले पण्डे। पहले पण्डे ‘ गाइड’ का काम करते थे। वे सन्तोषी-तपस्वी ब्राह्मण जो भी सहर्ष श्रद्धालु यात्री दे देता था, उसी से सन्तुष्ट होकर अपना कुटुम्ब पालते थे, किन्तु आजकल पण्डों का उद्देश्य ही प्रायः हो गया है यात्रियों की धोती तक उतरवा लेने का प्रयत्न। यह भारतवर्ष का दुर्भाग्य है। पहले विद्वान् पंडों यात्रियों को स्थान की धार्मिक महत्ता तथा इतिहास बताते और दिखाते थे और आज केवल धर्म, जो कुछ और जैसे भी हो यात्री से कुछ लेना मात्र रह गया है। पण्डों को ही क्यों दोष दिया जाय? समाज के प्रत्येक क्षेत्र में यही पाखण्ड और छिछोरपन रह गया है। आत्मा का लोप हो चुका है, बाहरी ढाँचा मात्र अवशेष है।

हमारे पुरखों ने बहुत सोच-समझ कर तीर्थयात्रा करने का आदेश दिया है। वे जानते थे यदि ‘यात्रा के लाभ’ के नाम पर देश वासियों को घूमने को कहा जायगा, तो बहुत कम लोग ‘यात्रा का लाभ’ उठायेंगे रुपये-पैसे की दिक्कत, साँसारिक झञ्झटों तथा अस्वास्थ आदि न जाने कितने बहाने निकल आयेंगे, परन्तु प्रकृति से ही धर्म-भीरु हिन्दू ‘धर्म’ के नाम पर अपना परलोक बनाने के लिए-सारी कुपरिस्थितियों की अवहेलना करते हुए धर्म लाभ के हेतु अवश्य यात्रा करेंगे, और अप्रत्यक्ष रूप में यात्रा के सब लाभों को भोग सकेंगे। तीर्थयात्रा करने से अनेक लाभ हैं। स्थान-स्थान की वेषभूषा, रहन-सहन, आचार-विचार, रंग-रूप, भाषा, वनस्पति, पैदावार आदि भिन्न-भिन्न होती है, अतः तीर्थयात्री का ज्ञान और अनुभव विस्तृत होता है। धार्मिक-ऐतिहासिक, भौगोलिक, कलात्मक, सामाजिक, आर्थिक तथा सामयिक ज्ञान तो होता ही है-मन्दिर और मूर्ति के सामने जाकर, श्रद्धा से नतमस्तक हो अपने कालुष्य का विसर्जन कर कुछ समय तक यात्री आत्मविस्मृति करके इस लोक से उस लोक को पहुँच जाता है। निश्चय रूप से स्थायी तथा सात्त्विक प्रभाव उसके हृदय और आत्मा पर पड़ता है। उसके हृदय में संसार की अनित्यता और विलास तथा वैभव के क्षणिक एवं मिथ्या अस्तित्व का ज्ञान उदय होता है, और अपने भविष्य के संशोधित जीवन तथा इस लोक और परलोक पर वह सोचने लगता है। परमात्मा के प्रति सच्ची भक्ति , सद्भावनाओं, सद्विचारों सत्कर्मों, परोपकार तथा दान-पुण्य आदि के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होती है, और वह वहीं उनका श्रीगणेश भी कर देता है। अपने पुरखों तथा प्राचीन इतिहास की महत्ता का सच्चा आभास उसे मिलता है। इसके अतिरिक्त जलवायु का परिवर्तन और नाना प्रकार के रंग-बिरंगी प्राकृतिक दृश्य-झरने, पर्वत, कंदरा, जंगल, पशु-पक्षी आदि-उनके स्वास्थ्य तथा मन पर अपना अमिट प्रभाव डालते हैं। ईश्वर की महत्ता एवं अपनी लघुता का भी अनुभव वह करता है, तथा अपने और विराट प्रकृति के अटूट सम्बन्ध को समझकर ‘ब्रह्मास्मि’, ‘शिवोऽहम्’ महामंत्र का अर्थ समझ पाता है। ईश्वर की दी हुई आंखों का फल वह ईश्वर की कारीगरी और उसकी विचित्र लीला देख कर पाता है। उसकी निरीक्षण-शक्ति , प्रकृति के ज्ञान तथा विज्ञान की उपयोगिता की भावना में वृद्धि होती है। आजकल प्रदर्शनियों का फैशन सा है। प्रदर्शिनी के टीपटाप, अनेक उपायों तथा धन-खर्च से जो उद्देश्य सिद्ध होता है, वह अनायास ही तीर्थ-स्थान तथा मेलों से होता है।

भारतवर्ष के चार प्रसिद्ध धार्मिक हैं। पूर्व में समुद्र-तट पर जगन्नाथ पुरी दक्षिण में समुद्र-तट पर रामेश्वरम्, पश्चिम में समुद्र-तट पर द्वारिकापुरी तथा उत्तर में हिमालय की गोद में बदरीनाथपुरी। धर्म-ग्रन्थों में कहा गया है कि प्रत्येक हिन्दू का धर्म है कि वह चारों धाम की यात्रा करे। बिना ऐसा किए उसे मोक्ष नहीं मिलेगा। राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने का कितना अमोघ उपाय है। यात्री अनुभव करेगा कि मेरा राष्ट्र सम्पूर्ण भारतवर्ष है। वह कितना विस्तृत और विशाल है। प्राकृतिक सौंदर्य, धन-धान्य से पूर्ण, वनस्पतियाँ तथा खनिज पदार्थों का भंडार यह मेरा भारतवर्ष कितना भव्य है। यात्री के हृदय में स्वतः स्वदेश-प्रेम की पूत-भावना यात्रा से जागृत होगी। समुद्र-तट का जीवन और दृश्य तथा पर्वतीय दृश्य और जीवन एकबार निकट से देख लेने पर क्या भूला जा सकता है?

भारतवर्ष की सात पवित्र पुरियाँ हैं। 1. अयोध्या 2. मथुरा, 3. हरिद्वार, 4.काशी, 5.काँचीवरम्, 6.उज्जैन तथा 7.द्वारका। किसी की भारतवर्ष के मध्य भाग में, किसी की दक्षिण भाग तथा पश्चिम भाग में इनकी स्थिति है। वैसे ही भारतवर्ष के प्रसिद्ध द्वादश ज्योतिर्लिंग निम्नलिखित हैं- 1. सोमनाथ 2.वयम्बकेश्वर 3.ओंकारेश्वर 4.महाबलेश्वर 5.केदारनाथ 6.विश्वनाथ 7. वैद्यनाथ 8. रामेश्वर 9. मल्लिकार्जुन 10. नागनाथ 11.घृषणेश्वर 12. भीमा शंकर। वैसे ही विभिन्न देवी पीठ विभिन्न स्थानों में हैं।

अब तो समस्त तीर्थों की यात्रा करेगा, वह स्वाभाविक ही है कि प्रायः समस्त भारतवर्ष घूम लेगा और उससे परिचित हो जायगा। व्यापार तथा वाणिज्य के दृष्टिकोण से भी यह ज्ञान उसके लिए लाभप्रद सिद्ध होगा।

हमारे तीर्थ-स्थान प्रायः प्रकृति की केलि-भूमि में स्थापित किए गए हैं। मनुष्य कूप-मण्डूक नहीं रह जाता । एक सुन्दर वस्तु सदा के लिए हर्ष का कारण होती है कि व्यापकता को अनुभव-प्राप्त यात्री समझ पाता है। हमारे धर्म-ग्रन्थों में तो प्रत्येक हिंदू के लिए तीर्थ-यात्रा करने का आदेश है। तीर्थ-यात्रा के बिना जीवन नीरस, व्यर्थ, धर्म-रहित माना जाता है। तीर्थ-यात्रा मनुष्य का एक कर्त्तव्य है, जिसका पालन कभी न कभी मनुष्य को अपने जीवन में करना पड़ता है। किन्तु जैसे प्रायः हर बात में सच्चे अर्थ को न समझ कर हमने उसके अर्थ को बिगाड़ा तथा घसीटा-घसीटा है, वही बात तीर्थ-स्थान के विषय में भी है। जैसे तीर्थ-स्थान अब धर्म-भीरु बूढ़ों और अशिक्षित तथा अर्ध-शिक्षित अधेड़ स्त्री-पुरुषों के ही हिस्से में हो। एक मनोवैज्ञानिक सत्य हम न भूलें ! वृद्धावस्था में इन्द्रियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। नई बातों के प्रति उत्साह की कमी हो जाती है। अतः तीर्थ-यात्रा तो बचपन और जवानी में ही करनी चाहिए, आधिक रस तभी आता है। पर अवकाश-प्राप्त-जीवन तो वृद्धों को प्राप्त होता है, अतः वह सरलता से तीर्थ-यात्रा के लिए समय दे सकते हैं। तीर्थ-यात्रा उनके मनोरंजन का विशेष साधन भी है। जब उनका अन्त समय निकट आता है, तब वे अपना परलोक बनाने की चिन्ता में लगते हैं। तो प्रायः वृद्ध-वृद्धा ही क्यों तीर्थ-यात्रा करते हैं-युतक युवतियाँ और बालक-बालिकाएँ क्यों नहीं? इसका भी कारण है। कारण स्पष्ट है- प्राचीन समय में यात्रा -मार्ग ठीक न थे, यात्रा के साधनों की कमी थी, चोर-डाकुओं तथा मार्ग के अन्य कष्टों का भी भय था। इसी से वृद्धजन जब यात्रा आरम्भ करते थे, तो यही समझ कर करते थे कि ईश्वर जाने अब लौटने की नौबत आए या न आए। यदि न भी लौटे, तो परलोक बनेगा। अंतिम समय तो है ही। परन्तु अब रेल, मोटर, लारी, हवाई जहाज, घोड़ा गाड़ी आदि सभी साधन पर्याप्त और सुलभ है-मार्ग में भी भय और कष्ट की आशंका नहीं -पक्की सड़कें, धर्मशालाएँ तथा अन्य सुविधाएँ हैं-ऐसी दशा में अब छोटे - बड़े सब आयु के स्त्री-पुरुष आराम से यात्रा कर सकते हैं। किन्तु हिंदू लकीर के फकीर होते ही हैं। पुरानी बातों में यदि बुराइयाँ भी हैं, तो भी उन्हें छोड़ना पसंद नहीं करते, चाहे अज्ञान के कारण ही वे ऐसा क्यों न करने हों।

काश हम यह समझ लें कि यात्रा से फेफड़े स्वस्थ होते हैं, पर ठीक होता है तथा स्वास्थ्य बनता है। पैर ठीक करने का तो अमोघ उपाय ही पैदल चलना है और यात्रा का वास्तविक आनन्द तो पैदल ही चलने में आता है। उन यात्रा-प्रेमी भुक्त भोगियों से उनके यात्रा के आनन्द तथा अनुभव को पूछिए तो आपको पता चलेगा कि यात्रा में तीर्थ-स्थानों में जाने में कितना रस, कितना आनन्द है? कठिन मानसिक परिश्रम के बाद विशन्ति प्राप्त करने तथा मन-बहलाव के लिए यह यात्राएँ उपयोगी हैं। किन्तु जिन्हें समयाभाव है तथा जिन्हें पैदल चलने की इच्छा, शक्ति या अभ्यास नहीं है और जो धनाढ्य हैं, वे पैदल न भी यात्रा करे तौ भी उन्हें अन्य अनेक लाभ तो होंगे ही।

परन्तु अब तो तीर्थ यात्रा बनाम ‘सैर’ धीरे-धीरे सभी करने लगे हैं। विदेशी सभ्यता की विषैली वायु से प्रभावित हम भारतीय अपने पुरखों की मखौल उड़ाने में अपनी मर्दानगी खूब समझने लगे हैं। दूसरे, एक बात और भी है अनुभव-प्राप्त-यात्रा जानते हैं कि तीर्थ-स्थानों में कितना धर्म के नाम पर अधर्म और सत्यता के स्थान पर ढोंग होता है-कितने पाप, अनाचार और व्यभिचार के अड्डे तीर्थ बन गए हैं। सीधे और धर्म-भीरु-यात्री कैसे उल्टी छुरी से मूड़े जाते हैं। न जाने कितनी बार हमने पत्र-पत्रिकाओं में पंडों के अन्यायों को पढ़ा तथा यात्रियों की जबानी सुना है। प्रायः धन और कभी-कभी तो हज्जत पर भी बन आई है। पंडे भूखे गिद्ध की तरह यात्रियों पर टूट पड़ते हैं। और किस प्रकार अशाँति को प्राप्त होकर, तीर्थ-स्थानों की लूट-फूट से काँप कर वहाँ न जाने के लिए वे कान पकड़ते हैं। उन्हें वास्तव में ऐसे स्थानों से घृणा हो जाती है। विशेष कर नव-युवकों में प्रतिक्रिया के भाव पैदा होना- तीर्थों के लिए- अस्वाभाविक नहीं है।

मैं स्वयं इस बात का साक्षी और भुक्त भोगी हूँ। विद्वानों, नेताओं और सरकार का ध्यान इस ओर गया है और उन्होंने बहुत कुछ सुधार भी किए हैं। किन्तु जब तक हमारा अज्ञान और अन्ध-विश्वास दूर न होगा, तब तक बहुत अधिक आशा इस क्षेत्र में नहीं की जा सकती।

एक विशेष बात हम यह देखेंगे कि प्रायः सभी तीर्थ-स्थान नदियों के किनारे हैं। प्राचीन काल में सबसे सुविधाजनक मार्ग नदी ही था। इसी के द्वारा व्यापार तथा आना-जाना रहता था। ऋषि-मुनि भी शान्ति और सुविधा के विचार से नदी-तटों पर ही अपनी कुटिया बनाते थे। नदी से जितने लाभ हो सकते हैं, वे सब नदी-तट पर बसने वाले ही उपयोग कर सकते हैं। इन्हीं नदी-तटों पर एक निश्चित अवधि के बाद महापुरुषों के सम्मेलन होते रहते थे और उसी अवसर पर व्यापारी एकत्र हो कर उन पर्वों को ‘मेला’ का रूप दे देते थे तथा साधारण जनता भी इनसे प्रत्येक प्रकार का लाभ उठाने के लिए एकत्र होती थी। इन महा-सम्मेलनों का ही आधुनिक रूप सभायें और अधिवेशन हैं। आधुनिक प्रदर्शनियों का काम यह मेले करते थे। एक ही स्थान पर महान ऋषियों, साधुओं, विद्वानों तथा जनसाधारण का एकत्रीकरण निवृत्ति और प्रवृत्ति का जैसे सुन्दर समन्वय हो। साधारण जनता को न केवल बड़े-बड़े महापुरुषों को एक साथ देखने तथा सत्संग का अवसर मिलता था, वरन् दूर-दूर के अपने सम्बन्धियों तथा मित्रों से भी इसी बहाने भेंट हो जाती है। इन धार्मिक मेलों का यही उद्देश्य था। कुंभ, अर्धकुम्भ, पूर्णमासी, अमावस्या को नदी- स्नान, प्रयाग का माघ-मेला आदि कितने मनोवैज्ञानिक तथा वैज्ञानिक आधार पर चालू किए गए हैं। इन महा-सम्मेलनों की सुचारु तथा सुव्यवस्थित रूप से निरन्तरता कायम रखने के लिए हमारे महर्षियों ने धर्म के नाम पर बड़ा सुन्दर उपाय निकाला। कुम्भ कभी कार्तिक पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्य ग्रहणादि और अनेक पर्वों पर नदी-स्नान तथा तीर्थ-दर्शन का आदर्श एवं महत्त्व रखा। और इसी बहाने से लाखों यात्री साधु-महात्मा और व्यापारी एकत्र होते और विचार-विनिमय तथा धर्म-चर्चा के सुयोग से लाभ उठाते थे। क्या ही अच्छा हो यदि तीर्थ-यात्रा तथा धार्मिक मेलों की सच्ची उपादेयता हम समझ जायं।

प्रत्येक तीर्थ की स्थापना का कुछ उद्देश्य-विशेष दृष्टि में रख कर ही हमारे पूर्वजों ने अपनी ज्ञान-बुद्धि का परिचय दिया है। तत्कालीन परिस्थितियों तथा वातावरण के वे ज्ञाता थे। जैसे बदरीनाथ की पर्वत-श्रेणियाँ भूगर्भ-शास्त्र का ज्ञान कराती हैं। हिम, घाटी, जड़ी-बूटी, चट्टान, प्रपात, जलवायु तथा पर्वतादि का ज्ञान हमें होता है। द्वारका में जलयान द्वारा यात्रा, समुद्र, टापू आदि का ज्ञान, जगन्नाथ पुरी में समुद्र, समुद्र-भर की वनस्पति आदि तथा विभिन्न वस्तु-कला के नमूनों का ज्ञान, रामेश्वरम् में ईश्वरीय प्रकृति की अलौकिकता और मनुष्य की बुद्धि की पराकाष्ठा का ज्ञान ‘आदम का पुल’ आदि देख कर होता है। भारतवर्ष के प्रति श्रद्धा, भक्ति तथा बन्धुत्व का भाव यात्रियों के हृदय में भरते हैं। विद्यार्थियों को सैर-सपाटे से कार्यात्मक ज्ञान होता है। प्राचीन समय में पैदल, नाव, बैलगाड़ी, घोड़ा, ऊँट आदि पर ही यात्रा होती थी, जिसमें वस्तुओं को देखने समझने का काफी समय और अवकाश मिलता था। अब तो मोटर, हवाई जहाज और रेल से हम एक स्थान से अन्य नियत स्थान पर फुर्र से पहुँच जाते हैं- मार्ग के ज्ञान तथा दृश्यों का तो प्रश्न ही नहीं उठता। परन्तु पहले तीर्थ-यात्री को कष्ट सहिष्णुता तथा घटनात्मक बातों की शिक्षा मिलती थी।


साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए आप यह कीजिए

गत अंकों में देशव्यापी साँस्कृतिक पुनरुत्थान आयोजन के लिये जागृत आत्माओं से समय और सहयोग की याचना की जाती रही है। कारण यह कि यदि संस्कृति का अधःपतन हो गया तो हमें अपने नैतिक मेरुदण्ड को सीधा रखना कठिन हो जायगा और फिर कितनी ही उन्नतिशील योजनाएं एवं व्यवस्थाएं बनाई जायं, व्यक्ति -गत अनैतिकता के छेदों से होकर वह सभी प्रयत्न निष्फल हो जाएंगे। राष्ट्र को ऊँचा उठाना है तो नैतिक बल की रक्षा और वृद्धि करनी होगी, इसके लिए संस्कृति ही सर्वश्रेष्ठ माध्यम है। अतएव साँस्कृतिक पुनरुत्थान पर हम अत्यधिक जोर देते हैं। यह निश्चित है कि यह कार्यक्रम लेखनी और वाणी से नहीं हो सकते, इसके लिए प्राणवान आत्माओं का सक्रिय प्रयत्न अनिवार्य है। इसी दृष्टि से जन सहयोग के लिए गत अंकों में हम ‘आत्म दान’ की याचना करते रहे हैं। हमें आपका समय चाहिए।

प्रसन्नता की बात है कि गत अंकों में की गई अपील निष्फल नहीं गई। यों आज आमतौर से हर आदमी अपनी व्यक्ति गत स्वार्थ परता की बात सोचता है। धन, इन्द्रिय भोग, मान बड़ाई की साँसारिक ऐषणाओं से लेकर स्वर्गमुक्ति की सुख सुविधा एवं ऋद्धि−सिद्धि में व्यक्ति गत लाभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं सोचता। युग प्रभाव की इस व्यापक स्वार्थपरता के अज्ञानान्धकार में भी अभी अनादि प्रकाश जीवित है, ऋषि परम्परा की चिनगारियाँ अभी सर्वथा बुझ नहीं गई हैं, दधीचि की परम्परा का अभी सर्वथा लोप नहीं हुआ है। डूबती हुई ऋषि सम्पदा को बचाने के लिए अभी भी कुछ आत्माएं त्याग करने के लिए तत्पर हो रहीं हैं।

हमारे पास अनेकों पत्र इस सम्बन्ध में आये हैं। जिन्हें पढ़ कर हमें भारी उत्साह होता है और लगता है कि प्रभु की इच्छा पूर्ण होकर रहेगी। वे अनेक आत्माओं के अन्त करण में उत्साह, प्रकाश त्याग और धर्म प्रेम की भावनाओं को जागृत करके इस दिशा में प्रेरणा दे रहे हैं। लगता है कि एक विशाल सेना देश के साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए कटिबद्ध होकर घोर श्रमदान के साथ महा अभियान करने के लिए तैयार हो रही है। नर और नारी दोनों ही समान रूप से इस दिशा में कदम बढ़ाने के लिए कटिबद्ध हो रहे हैं।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के महान् अभियान में सम्मिलित होने वाली आत्माओं के संगठन को ‘साँस्कृतिक सेवा शृंखला’ नाम दिया जा रहा है। जैसे जंजीर की एक कड़ी दूसरे से जुड़ी होती है उसी प्रकार साँस्कृतिक सेवा के उद्देश्य के लिए यह लोग आपस में जुड़े रहेंगे और अपनी चेन बढ़ाने के लिए अपने जैसे और भी व्यक्ति पैदा करते रहेंगे। इस शृंखला में वे सभी वयस्क व्यक्ति प्रवेश कर सकेंगे। जो निर्धारित इस सिद्धान्तों को स्वीकार करेंगे और उन्हें अपने जीवन में चरितार्थ करने का व्रत लेंगे। कोई चन्दा, फीस, शुल्क आदि इसका नहीं है, पर धारण किए हुए व्रत को पालन करने की आशा उनसे रखी जायगी और अपने कदम मजबूत रखने की जिम्मेदारी उन पर छोड़ी जायगी।

साँस्कृतिक सेवा शृंखला के प्रत्येक सदस्य के लिए तीन कार्य आवश्यक हैं:-

आत्म बल प्राप्त करने के लिए नित्य कुछ पूजा उपासना करना।

अपने सम्प्रदाय या पूजा में अपनी पूर्ण निर्धारित मान्यता के अनुसार चलने में हर सदस्य स्वतन्त्र है, पर गायत्री उपासना को भी उसमें सम्मिलित रखना आवश्यक है। क्योंकि एक तो ऋषियों ने इस गायत्री को आवश्यक नित्यकर्म माना है, दूसरे इस महामन्त्र में सन्निहित शिक्षाओं के आधार पर ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान का सारा कार्यक्रम चलाना है। (1) सद् ज्ञान की निरन्तर अभिवृद्धि (2) त्यागमय प्रेम से परिपूर्ण व्यवहार, इन दो कार्यक्रमों के प्रतीक ही गायत्री सद्ज्ञान) यज्ञ (त्यागमय प्रेम) हैं। इन दोनों प्रतीकों को हमारी नित्य उपासना में स्थान रहना है। चाहे 24 गायत्री मन्त्र जपने और 5 मिनट सुगन्धित धूपबत्ती या घृत दीप जलाने जितनी छोटी सी ही छोटी उपासना क्यों न हो, पर गायत्री एवं यज्ञ की परम्परा को दैनिक जीवन में प्रत्येक सदस्य को स्थान देना आवश्यक है।

(2) मनोबल प्राप्त करने के लिए अपने विचारों और कार्यों को अधिक श्रेष्ठ बनाने के लिए नित्य प्रयत्न करना।

जन्म-जन्मान्तरों से सञ्चित कुसंस्कार नित्य ही टाँग पकड़कर पीछे घसीटते हैं और आत्म उत्थान के मार्ग में बाधा पहुँचाते हैं। इनसे प्रतिदिन डरने या निराश होने की नहीं, वरन् जीवन भर इनके विरुद्ध युद्ध करते रहने का व्रत लेने की आवश्यकता है। प्रातः उठते समय पिछले दिन की त्रुटियों को आज न करने के आधार पर आज का कार्यक्रम बनाना और रात को सोते समय दिन भर कार्यों की अच्छाई बुराई का लेखा जोखा लेना। इस क्रम से दिन-दिन अपने गुण, कर्म, स्वभाव, ज्ञान, स्वास्थ्य, मैत्री, आदि में अभिवृद्धि करते चलना। यह प्रगति मंद हो तो भी निराश न होकर उठने और बढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए।

(3) धर्मबल प्राप्त करने के लिए साँस्कृतिक सेवा के लिए कुछ त्याग करना।

दूसरों को सुसंस्कृत बनाने के लिए अपने निकटवर्ती क्षेत्र में साँस्कृतिक विचार धारा का निरन्तर प्रचार करते रहना। अपने पास अच्छे साहित्य का संग्रह बढ़ाते चलना और उसे पढ़ने के लिए दूसरों को उत्साहित करना, अवसर मिलने पर उन्हें समझाने का प्रयत्न करना। छोटे बड़े साँस्कृतिक आयोजनों के द्वारा लोगों को एकत्रित करके उनमें सद्भावना के बीज बोना, अन्य प्रकार से दूसरों की सेवा करके अपने प्रेम एवं उपकार द्वारा उन्हें सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रस्तुत करना, साँस्कृतिक व्यापक आन्दोलन के केन्द्रीय कार्यक्रम मजबूत बनाने के लिए सहयोग देना आदि अनेकों मार्ग इसके हो सकते हैं।

हर व्यक्ति की योग्यता, परिस्थिति, शक्ति एवं सामर्थ्य, भिन्न होती है। सबके लिए एक समान कार्यक्रम नहीं बन सकते हैं। उपरोक्त तीन कार्यक्रमों को कौन व्यक्ति किस प्रकार चरितार्थ करे, यह उसे स्वयं ही सोचना पड़ेगा और बदलने वाली परिस्थितियों के अनुसार उनमें हेर फेर भी करते रहना होगा। मनोभूमि और परिस्थितियों के आधार पर शृंखला के सदस्यों की तीन श्रेणियाँ रहेंगी। (1) व्रतधारी (2) कर्मयोगी (3) आत्म दानी।

(1) व्रतधारी —जिनके जीवन में अभी निश्चिंतता नहीं आई है, जो बौद्धिक आर्थिक या शारीरिक दृष्टि से परावलम्बी हैं, ऐसे बालक, विद्यार्थी, महिलाएं, वयोवृद्ध आदि व्यक्ति अपना आत्मनिर्माण एवं उपासना तो सुविधा पूर्वक कर सकते हैं, पर लोक सेवा के लिए समय, अवसर एवं क्षेत्र कम ही प्राप्त होता है। ऐसे लोग व्रतधारी कहलावेंगे।

(2) कर्मयोगी —जिनका गृहस्थ, व्यवसाय कार्य का जीवन क्रम सुनिश्चित हो चुका है, जो स्वावलम्बी हैं वे अपने शरीर, मन, समय, शक्ति, सामर्थ्य एवं सम्पत्ति को ईश्वर की धरोहर और अपने को प्रभु द्वारा इन वस्तुओं के लिए नियुक्त किये प्रतिनिधि एवं ट्रस्टी मान कर भरत एवं जनक के समान सामने उपस्थित जिम्मेदारियाँ को पूरा करते रहेंगे और बचे हुए समय एवं सामर्थ्य का अधिकाधिक उपयोग विश्व की साँस्कृतिक सेवा के लिये करेंगे। गृही वानप्रस्थ की तरह वे घर को तपोवन में परिणत करने का प्रयत्न करेंगे।

(3) आत्मदानी —जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं हैं तथा चरित्र में आवश्यक दृढ़ता, स्वभाव में पर्याप्त सौजन्य तथा परमार्थ में कष्ट सहने एवं श्रम करने के लिये समुचित उत्साह है, वे फल पुष्पों से लदा हुआ विशाल वृक्ष उत्पन्न करने के लिए सहने जलने के लिए प्रत्युत बीज की तरह अपना सर्वस्व संस्कृति सेवा के लिए उत्सर्ग करेंगे। यह एक प्रकार का संन्यास हैं। व्रतधारी और कर्मयोगी तो अपने-अपने घर एवं क्षेत्र में कर्म करते रहेंगे पर आत्मत्यागी सदस्य सम्पूर्ण विश्व को अपना घर मानकर व्यापक क्षेत्र में कार्य करने के लिए निकल पड़ेंगे। सामान्यतः वे गायत्री तपोभूमि को अपना घर समझेंगे।

साँस्कृतिक शृंखला का प्रत्येक सदस्य अपनी मनोभूमि और कार्य प्रणाली का निर्माण निम्न-भावनाओं के आधार पर करेगा:—

परमात्मा सर्वव्यापी और न्यायकारी है। उत्थान और पतन के समस्त हेतु हमारे भीतर छिपे हुए हैं। मानसिक सन्तुलन को स्थिर रखना, कर्तव्य कर्म में प्रवृत्त रहना, ईश्वर की सच्ची भक्ति है।

क्षणिक सुख की अपेक्षा स्थिर लाभ को महत्व देना, वस्तुएं संग्रह करने की अपेक्षा शक्ति बढ़ाना एवं स्वार्थ को परमार्थ में घुला देना ही सच्ची बुद्धिमानी है।

स्वच्छता, नम्रता एवं उदारता के सद्व्यवहार पर ही हमारी सुख-शान्ति निर्भर है।

विवेक को सर्वोपरि मानना, शक्तियों का सदुपयोग, और ऊँचा उठने की सत्प्रवृत्ति में ही मनुष्य की महानता सन्निहित है।

यह चारों संकल्प गायत्री के (1) ॐ भूर्भुवः स्वः (2) तत्सवितुर्वरेण्यं (3) भर्गो देवस्य धीमहि (4) धियो योनः प्रचोदयात् इन चार चरणों की व्याख्या है। इन भावनाओं को स्वीकार करना, नित्यप्रति इनका चिन्तन और मनन करना चाहिए। इन्हें कार्य रूप में परिणत करना चाहिए। उपरोक्त चारों संकल्पों में सन्निहित 13 तथ्य तथा 1 इन्हें कार्य रूप में परिणत करने की जिम्मेदारी, इस प्रकार कुल 14 रत्न अध्यात्म समुद्र- मंथन से निकलने वाले यह 14 रत्न हैं। इन्हें ही 9 लड़े 4 गांठें 1 ब्रह्मग्रन्थि इस प्रकार के यज्ञोपवीत के 4 भाग माने गये हैं। स्त्रियाँ अनन्त चतुर्दशी को 14 गाँठ का अनन्त धारण करती हैं, यह भी एक प्रकार का यज्ञोपवीत ही है। व्यक्ति गत तथा समस्त विश्व को सुखी बनाने के लिए यह 14 रत्न अत्यन्त ही मूल्यवान हैं। इन आदर्शों, शिक्षाओं, मान्यताओं, एवं भावनाओं को अपने तथा दूसरों के मनः क्षेत्र में अधिकतम व्यापक बनाना साँस्कृतिक सेवा शृंखला के प्रत्येक सदस्य का आवश्यक कर्तव्य है।

कार्यक्षेत्र में उपरोक्त मान्यताओं को चरितार्थ करने के लिए ऋषियों ने साँस्कृतिक परम्पराओं, प्रथाओं,रीति-रिवाजों,मान्यताओं, व्रत, पर्व, त्यौहार, संस्कार,आहार-विहार,आचार-विचार, हन-सहन,भाषा, भेष, भाव, पूजा-उपासना, कथा कीर्तन, यज्ञ हवन, तीर्थ यात्रा, ग्रन्थ,शास्त्र, आदि का निर्माण किया है। आयोजनों का-परम्पराओं का विधिवत् पालन करने से ही उपरोक्त चार संकल्पों में सन्निहित तत्वज्ञान को जनसाधारण की मनोभूमि में स्थापित करना तथा स्थिर रखना सम्भव है। इसलिए तात्विक

सिद्धान्तों की भाँति ही इन प्रक्रियाओं के आयोजन में भी साँस्कृतिक सेवा-शृंखला के सदस्य उत्साहपूर्वक कटिबद्ध रहेंगे।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का यह मानसिक और व्यवहारिक कार्यक्रम बहुत ही विशाल है, इसे हर कर्म प्रेमी अपनी सुविधा, योग्यता और परिस्थिति के अनुसार कार्यान्वित कर सकता है। हमें सेवा शृंखला में सम्मिलित होकर दोनों ही प्रकार के

कार्यक्रमों को व्यापक बनाना है, ऋषि-ऋण चुकाने के लिए बहुत कुछ प्रयत्न करना है। आइए, आगे बढ़े, कुछ करें।


रुपये की शक्ति


रुपये की शक्ति (Kavita)

रुपये से ‘भोजन’ मिलता है; पर ‘भूख’ नहीं। रुपये से ‘सुख’ मिलता है; पर ‘आनन्द’ नहीं। रुपये से ‘जेवर’ मिलता है; पर ‘सौंदर्य’ नहीं। रुपये से ‘चश्मा’ मिलता है;पर ‘दृष्टि’ नहीं। रुपये से ‘दवा’ मिलती है; पर तन्दुरुस्ती नहीं।

रुपये से ‘विद्या’ मिलती है; पर ‘विवेक’ नहीं। रुपये से ‘कोमल शय्या’ मिलती है; पर ‘निद्रा’ नहीं। रुपये से ‘नौकर’ मिलता है; पर ‘सच्चे सेवक’ नहीं। रुपये से ‘संगी-साथी’ मिलते हैं; पर ‘सच्चे मित्र’ नहीं। रुपये से ‘ठकुरसुहाती’ मिलती है, पर ‘प्रेम’ नहीं।


साँस्कृतिक सेवा के लिए तपोभूमि यह करेगी

भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए व्यक्ति गत तथा सामाजिक जीवन में सुसंस्कृत विचारधारा एवं सुव्यवस्थित कार्य प्रणाली का होना आवश्यक है। इस गतिविधि को आगे बढ़ाने के लिए ‘साँस्कृतिक सेवा-शृंखला का संगठन किया जा रहा है और यह आशा की जा रही है कि दस से सौ में सौ से हजार में, हजार से लाख में, करोड़ में, इस प्रकार घर-घर में और तन-मन में यह प्रवाह एवं प्रकाश पहुँचेगा और भारतभूमि में सर्वत्र प्राचीनकाल के समान स्वर्गीय वातावरण प्रादुर्भूत होगा।

एक दूसरा आवश्यक कार्य यह भी किया जाना है कि आज भारतीय धर्म, दर्शन, तत्वज्ञान,कर्मकाँड एवं आचार-विचार का जो रूप सामने उपस्थित है वह लम्बे अज्ञानान्धकार में गुजरने के कारण बड़ा ही विकृत,अव्यवस्थित और अनुपयोगी हो गया है। आज की स्थिति में तो वह लाभदायक एवं प्रेरणाप्रद न होकर हानिकारक एवं प्रतिगामी बन गया है। इस स्थिति में सुधार हुए बिना काम न चलेगा। हमें अपनी प्राचीन संस्कृति के वास्तविक एवं विशुद्ध रूप को सर्वसाधारण के सम्मुख उपस्थित करना होगा और बताना होगा कि यह रूढ़िवाद,प्रतिगामिता,भ्रमजाल संकीर्णता एवं सांप्रदायिकता नहीं वरन् एक अत्यन्त ही उपयोगी बुद्धिसंगत, विज्ञान सम्मत, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, समाज व्यवस्था एवं मानवता की दृष्टि से वह सर्वोत्कृष्ट-प्रक्रिया हैं। तभी हम आज के बुद्धिवादी युग में भारतीय संस्कृति के महत्व को स्वीकार करने एवं उसे आचरण में लाने के लिए किसी को सहमत कर सकेंगे।

गायत्री तपोभूमि बहुत समय से इस दिशा में काम कर रही है। अब उसने पूरी तत्परता पूर्वक इस दिशा में प्रबल प्रयत्न करने का संकल्प किया है। गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति वस्तुतः साँस्कृतिक महाअभियान का मंगलाचरण, श्रीगणेश एवं शिलान्यास है। प्रातः स्मरणीय महामना मालवीय जी ने ‘हिन्दू विश्व विद्यालय’ की स्थापना के आरम्भ में उस भूमि पर 24 लक्ष का गायत्री महापुरश्चरण कराया था ताकि उस अभीष्ट उद्देश्य के सम्पादन के लिए आवश्यक दिव्य बल प्राप्त हो। साँस्कृतिक (गायत्री) और त्यागमय प्रेम (यज्ञ) का देवालय बना देना है। ऊन-जन के मन-मानस को विद्यालय,देवालय बना देने की प्रक्रिया वस्तुतः असाधारण है। उसे प्रारम्भ करते हुए दश महायज्ञों की शृंखला समेत 105 करोड़ जप, 125 लाख हवन, का आयोजन उचित ही है। 108 कुण्डों में होने वाली पूर्णाहुति किसी योजना की समाप्ति नहीं वरन् केवल मंगलाचरण की पूर्णाहुति है। वास्तविक कार्य तो सुव्यवस्थित रूप में अब आरम्भ होना है।

आगे के हमारे कुछ कार्यक्रम इस प्रकार हैं:—

(1) साँस्कृतिक शोध-कार्य

भारतीय संस्कृति मानव-जीवन को महान बनाने की एक चिर परीक्षित एवं वैज्ञानिक पद्धति है। आज समय के प्रभाव और भौतिकवाद के प्रसार के कारण उसकी भारी दुर्दशा हो रही है। प्राचीन युग की सुख-शान्ति को वापिस लाने के लिए भारतीय संस्कृति का सुसंस्कृत रूप से पुनरुत्थान करना होगा। उसके लिए निम्नलिखित कार्यक्रम सामने है—

1— भारतीय धर्म का आज जो रूप है उसमें कितना ही अंश प्राचीन मूल संस्कृति के अनुकूल और उपयोगी है और कितना ही अवाँछनीय अंश समय की विकृतियों के साथ उसमें मिला है। जिस प्रकार सोना और पीतल की मिलावट को चतुर सुनार शोध कर अलग 2 कर देता है उसी प्रकार सनातन भारतीय संस्कृति की शुद्धता और विदेशी आक्रमणों, स्वार्थी तत्वों तथा समय की विकृतियों के कारण समावेश हुई रूढ़ियों की अशुद्धता को अलग-अलग छाँट दिया जाय।

2— हिन्दू परम्पराओं के अनुसार प्रचलित रीति रिवाजों पर अनेक दृष्टिकोण से विचार किया जाय और उनकी उपयोगिता अनुपयोगिता को स्पष्ट किया जाय।

3—शास्त्रों में जो परस्पर विरोधी सिद्धान्त तथा आदर्श पाये जाते हैं उनको ऐसे सुव्यवस्थित रूप में रखा जाय कि वे एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक प्रतीत हों। दार्शनिक और धार्मिक मतभेदों के कारणों को बताते हुए उनका समन्वय किया जाय।

4— पौराणिक अलंकार गाथाएं जो कहीं-कहीं असम्भव और अनैतिक सी दीखती है। इन रहस्यों के—गूढार्थ को प्रकट करके जनता में फैले हुए उन भ्रमों को दूर किया जाय जिसके कारण धार्मिक अविश्वास और सन्देह बढ़ता है।

5—देवी,देवताओं के अस्तित्व,विभिन्न रूप, उनके विचित्र इतिहास ऐसे हैं जिनके रहस्यों को साधारण व्यक्ति आज समझने में असमर्थ हैं। इसलिये इन बातों को संदिग्ध समझा जाता है। विद्वानों का काम है कि देववाद का वैज्ञानिक रूप सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत करें।

6—भारतीय पुनर्जन्मवाद, परलोकवाद, अद्वैत, द्वैत और त्रैतवाद, वर्णाश्रम धर्म, स्पर्शास्पर्श, कर्म विपाक, आदि दार्शनिक विषयों का सरल रूप से सर्व साधारण जनता के समझने योग्य रीति से उपस्थित किया जाय।

7—भारतीय आचार-विचार,रहन सहन, भाषा,भेष भाव एवं परम्पराओं की उपयोगिता एवं आवश्यकता को इस रूप में उपस्थित किया जाय कि जनता उनको अपनाना, अपने लाभ की बात समझले।

8—षोडश संस्कारों को परिष्कृत रूप में उपस्थित किया जाय! बहुत लम्बा समय और धन व्यय कराने वाले विधानों को सरल बना कर संस्कारों को ऐसे ढंग से कराया जाय कि सर्व साधारण को उनमें रुचि एवं आकर्षण हो ।

पुँसवन सीमन्त संस्कार के समय गर्भस्थ बालक के प्रति गर्भिणी के तथा गर्भिणी के प्रति घर वालों के कर्त्तव्यों का उपदेश विस्तार पूर्वक किया जाय। नाम करण के समय बालक के सुविकसित करने के लिए घर वालों को समुचित उपदेश दिया जाय। यज्ञोपवीत के समय बालक को द्विजत्व को,आदर्शमय जीवन की शिक्षा दी जाय। विवाह के समय पति-पत्नी को उनके कर्त्तव्य भली प्रकार समझाये जायं और उन कर्तव्यों के पालन की—चिन्ह पूजा के रूप में नहीं— वरन् विधिवत् प्रतिज्ञा कराई जाय। अंत्येष्टि संस्कार के समय जीवन की नश्वरता, सत्कर्मों की श्रेष्ठता आदि का विस्तृत विवेचन किया जाय। इस प्रकार प्रत्येक संस्कार कर्तव्य भावनाओं को गहराई तक मजबूत करने वाला बनाया जाय। साथ ही उन्हें इतना सरल बनाया जाय कि गरीब आदमी भी उन्हें हँसी खुशी करा सके।ऐसी सरल संस्कार पद्धति बनाई जाय जिसका उपयोग साधारण व्यक्ति भी कर सकें।

9— पर्वों और त्यौहारोँ को मनाने की ऐसी रीति बनाई जायं, जिससे हर एक त्यौहार कुछ शिक्षा तथा प्रेरणा दे सके। त्यौहारों के उत्सव सामूहिक रूप से मनाये जायं और उसमें छिपे हुए संदेशों को समझाया जाय और उनसे प्रकाश ग्रहण किया जाय।

11—साँस्कृतिक शोध कार्यों के लिए एक विशालकाय केन्द्रीय पुस्तकालय की आवश्यकता है जिसमें अभीष्ट विषयों पर पर्याप्त साहित्य विद्यमान हो। यों तो तपोभूमि के पुस्तकालय में अब भी कई हजार अच्छी पुस्तकें मौजूद हैं, पर इनमें काम चलने का नहीं। जिनके पास ऐसी पुस्तकों का संग्रह है उनसे उधार या दान में माँग कर अथवा खरीद कर इस साहित्य भण्डार को भरना है ताकि शोध कार्य में रुकावट न हो।

उपरोक्त शोध-कार्य के परिणामों को जन साधारण तक पहुँचाने के लिए निम्न कार्य किये जाएंगे

1—भारतीय संस्कृति का सुव्यवस्थित रूप में उपस्थित करने तथा उसे सर्व साधारण तक पहुँचाने के लिए एक मजबूत प्रकाशन तन्त्र की आवश्यकता है। जिससे अभीष्ट विषयों पर अनेक ग्रन्थ,ट्रैक्ट, पर्चे,पोस्टर, फोटो, चित्र, पत्र पत्रिकाएं आदि प्रकाशित हों। भारत की विभिन्न भाषाओं में उनका अनुवाद हो। केवल मथुरा का केन्द्रीय प्रकाशन ही नहीं विभिन्न स्थानों पर ऐसे मुद्रण, लेखन,प्रचार एवं विक्रय के केन्द्र भी खोले जावें।

2—स्थान-स्थान पर ऐसे स्थिर और चलते फिरते पुस्तकालय खोलने की आवश्यकता है जो साँस्कृतिक साहित्य से परिपूर्ण हों। उनके द्वारा घर 2 पुस्तकें पढ़वाने की अच्छी व्यवस्था अवश्य हो। कोई लगन वाले व्यक्ति इस कार्य के लिए थोड़ा समय नियमित रूप से देते रहने का व्रत लें, तभी ऐसे पुस्तकालय चल सकते हैं। पुस्तकालय खुलवाने और उन्हें प्रेरणा देने के लिए संगठित और व्यवस्थित रूप से प्रयत्न किया जाय।

3—गीता प्रेस की रामायण,गीता परीक्षा तथा ईसाइयों के बाइबिल कोर्स की तरह साँस्कृतिक शिक्षाओं का एक पाठ्यक्रम बनाया जाय,उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण पत्र पदक,पुरस्कार,उपहार दिये जायं। इसी शिक्षाओं के लिए समय 2 पर शिक्षण शिविरों, रात्रि विद्यालयों एवं व्यवस्थित विद्यालयों की व्यवस्था की जाय।

(2) रचनात्मक सांस्कृतिक आयोजन

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए स्थान 2 पर अनेक संगठन बनाने तथा अनेक सम्मेलन,आयोजन करते रहने की आवश्यकता है ताकि जनसाधारण की मनोभूमि पर साँस्कृतिक छाप गहराई तक डालने में प्रगति हो। इसके लिए निम्नलिखित कार्यक्रम उपयोगी हो सकते है:—

1—साँस्कृतिक शिक्षा के लिए समय 2 पर शिक्षण शिविर किये जायं। जिनमें एक व्याख्यान माला द्वारा भारतीय संस्कृति का वास्तविक स्वरूप समझाया जाय।

2— छोटे बड़े अनेक साँस्कृतिक उत्सव बराबर होते रहें। ग्राम मुहल्लों में पर्व त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाया जाय तथा वर्ष में एक बार कोई बड़ा आयोजन हो। साधारण सभा सम्मेलनोँ की अपेक्षा ऐसे वृहद् यज्ञ करना आधिक प्रभावोत्पादक हो सकते हैं जिनमें साँस्कृतिक शिक्षा, धर्म प्रचार, तथा परस्पर विचार-विनिमय की समुचित व्यवस्था हो।

3—उत्तम योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए विचार शील एवं कार्य संलग्न व्यक्तियों की विशेष गोष्ठियां सामयिक योजनाओं पर विचार करने के लिए होती रहें।

4—स्थान स्थान पर साँस्कृतिक सभाओं और गोष्ठियों का संगठन किया जाय।

5—प्रदर्शनी, अभिनय, संगीत, कवि-सम्मेलन, प्रतियोगिता, चित्र पद आदि मनोरंजनों और साँस्कृतिक भावनाओं का प्रचार।

6—संगीत,कला कौशल,साहित्य,धर्म,उद्योग आदि के ऐसे विद्यालयों की स्थापना की जाय जिनमें शिक्षार्थियों की साँस्कृतिक उन्नति पर पूरा ध्यान दिया जाय।

7—ऐसे स्मारकों,केन्द्रों तथा संस्थानों का निर्माण जहाँ से साँस्कृतिक प्रेरणायें प्राप्त होती रहें।

8—महिलाओं और बच्चों के साँस्कृतिक शिक्षण के लिए विशेष आयोजन।

9—साँस्कृतिक विकास के कार्यों पर अधिक ध्यान देने एवं अधिक सुविधाएं देने के लिए सरकार को तैयार करना।

(3) साँस्कृतिक विद्यालय

भारतीय संस्कृति को घर-घर पहुँचाने,उसे सुरक्षित रखने और बढ़ाने का कार्य करने को जो लोग अपना पूरा समय तथा मन लगाते थे उन्हें पाघा, पण्डित, पुरोहित आदि नामों से पुकारा जाता था। प्राचीनकाल में यह लोग अपनी योग्यता, सेवा-बुद्धि एवं तपस्या बढ़ाने के लिए कठोर साधना और अपने सेवा क्षेत्र के यजमानों की विविध विधि साँस्कृतिक सेवा करने में संलग्न रहते थे। यजमान भी समय 2 पर श्रद्धापूर्वक दान दक्षिण देकर उनके जीवन निर्वाह की व्यवस्था करते थे। गान्धीजी प्रत्येक ग्राम में एक ‘ग्रामसेवक” द्वारा रचनात्मक कार्य किए जाने पर जोर देते थे। लगभग वैसी ही साँस्कृतिक योजना के आधार पर प्राचीनकाल में हमारे दूरदर्शी पूर्वजों ने यजमान और पुरोहित की परम पुनीत परम्परा प्रचलित की थी।

आज उस प्रथा का रूप विकृत हो गया है उसे शुद्ध करने की आवश्यकता है जहाँ संभव हों वहाँ पुराने पुरोहितों को नियत कार्य पर लगाने के लिए प्रयत्न करना है, साथ ही नई पीढ़ी के नये उपाध्याय इसी आदर्श के अनुसार तैयार करने हैं। इस प्रकार साँस्कृतिक कार्यों के लिए पूरा समय देने वाले लगभग पाँच लाख व्यक्तियों की सेना सहज ही तैयार हो सकती है। यह सेना अज्ञान, अन्धकार, कुसंस्कार, निकृष्ट जीवन असुरता एवं भौतिकवाद के शत्रुओं को परास्त करके भारतीय संस्कृति की विजय-पताका फहराने में सफलतापूर्वक समर्थ हो सकती है।

गायत्री तपोभूमि में ऐसे ही कर्मनिष्ठ उपाध्याय तैयार करने के लिए एक साँस्कृतिक विद्यालय स्थापित किया गया है उसमें शिक्षा का निम्न कार्यक्रम रखा गया है:-

उपाध्याय के परमपवित्र कर्तव्य और उनका पालन करने में शास्त्रों के आदेश।

उपाध्याय का व्यक्ति गत जीवन किन विशेषताओं से परिपूर्ण हो।

उपाध्याय के लिए आवश्यक कर्त्तव्य शिक्षा- जिसे उसको प्राप्त करना ही चाहिये।

संस्कृत भाषा की नवीन पद्धति से इतनी शिक्षा जिसके अनुसार संस्कृत भाषा में संभाषण किया जा सके और आवश्यक व्याकरण तथा साहित्य का बोध प्राप्त करके संस्कृत ग्रन्थों को समझा जा सके।

संध्या, हवन, पंचयज्ञ आदि के नित्य कर्मों की शिक्षा।

सस्वर वेद पाठ करने की पद्धति सम्बन्धी आवश्यक जानकारी तथा मन्त्र-संहिता का एक बड़ा भाग कंठस्थ करना।

दैनिक हवन, दार्शपौर्णमाश इष्टि, विष्णुयज्ञ रुद्रयज्ञ, गायत्री यज्ञ आदि विभिन्न प्रकार के छोटे-बड़े यज्ञों को शास्त्रीय शिक्षा।

नामकरण, मुँडन, यज्ञोपवीत, वेदारंभ, यज्ञोपवीत, विवाह, अन्त्येष्टि आदि षोडश संस्कारों का शास्त्रीय ज्ञान तथा उन अवसरों पर देने योग्य प्रवचनों की तैयारी।

वकृत्व कला, भाषण देने, कथा कहने आदि की रीति-नीति।

कर्तव्य-शस्त्र, धर्म-शस्त्र, जन शिक्षण के योग्य समुचित ज्ञान-जिससे प्रत्येक व्यक्ति को उसके कर्तव्यों को शिक्षा एवं प्रेरणा दी जा सके।

रामायण, गीता, भागवत, वेद, उपनिषद्, पुराणों के धार्मिक उपाख्यानों की कथाएं जो जनजागरण, युग-निर्माण एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान में भारी सहायक हो सकती हो।

आरोग्य ज्ञान, आयुर्वेद के आधार पर रोगों आधार पर निदान, नाड़ी आहारविज्ञान, आसन-व्यायाम, लाठी आदि की साधारण शिक्षा।

संगीत, कथा कीर्तन, भजन आदि के लिए आवश्यक ताल स्वर तथा गायन वाद्य की शिक्षा। जिसके आधार पर रामायण आदि की कथा बाजे पर भी कही जा सके।

लोक व्यवहार, शिष्टाचार, संसार की वर्तमान समस्याएं, समाज शास्त्र, मनोविज्ञान आदि का आवश्यक ज्ञान।

हिन्दू धर्म के अनेक व्रत, पर्व, रिवाज, दर्शन, समाज रचना आदि आधारों की बुद्धि संगत विज्ञान सम्मत, विवेचन। उनके मनाने के आधारों, लाभों तथा विधानों का समुचित ज्ञान। इस विद्यालय में साँस्कृतिक जीवन बिताने एवं इसका आचार व्यवहार भारतीय परम्परा के अनुरूप निर्मित करने की छात्र को क्रियात्मक शिक्षा भी दी जायगी।

(4) देव सम्पदा का सदुपयोग

देवपूजा कार्यों के लिए भारत में लगभग 56 लाख व्यक्ति अपना पूरा समय लगाये हुए हैं। साधु सन्त, पण्डे, पुजारी, पण्डित, पुरोहित आदि वर्ग के लोग इतनी बड़ी संख्या में देवपूजा कार्य के आधार पर अपनी जीविका चलाते हैं। देव कार्यों के बने हुए मन्दिरों, भवनों, इमारतों एवं इनसे सम्बन्धित चल अचल सम्पत्तियों का मूल्य लगभग तेईस अरब 23000000000) आँका जाता है। 56 लाख की यह विशाल जनसेना और 23 अरब रुपयों की विपुल सम्पत्ति इतनी बड़ी शक्ति है कि इससे साँस्कृतिक पुनरुत्थान तो क्या-एक विश्व युद्ध जीता जा सकता है।

यह धन जन की प्रचंड शक्ति आज निरर्थक पड़ी हैं। इतनी ही नहीं अधिकाँश तो इसका दुरुपयोग होता है। चंद व्यक्तियों की स्वार्थ सिद्धि के अतिरिक्त वह उद्देश्यपूर्ण नहीं होता जो इस शक्ति के द्वारा होना चाहिए। देवतत्वों को जन-मानस में स्थापित करके ही वस्तुतः इस देव-सेना का परम्परागत उद्देश्य है जो वस्तु जिस कार्य के लिए है, जो व्यक्ति जिस कार्य के लिए जनता से आजीविका प्राप्त करते है- उस उद्देश्य के लिए सर्वथा भुला न दिया जाय इसके लिए कुछ प्रयत्न किया जाना आवश्यक है।

मन्दिरों देवालयों को सांस्कृतिक तत्व ज्ञान एवं आयोजनों का केन्द्र बनाने और दान-दक्षिण से जीविका चलाने वालों को साँस्कृतिक सेवा करने के लिए तैयार करने के लिए भारी प्रयत्न करने की आवश्यकता है। दान देने वालों, देव सम्पत्ति के स्वामी एवं संरक्षकों से भी उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। दान देने वाले और दान लेने दोनों को ही उनकी जिम्मेदारी बताने और उसे पूरा करने के लिए कुछ करने की प्रेरणा दी जानी चाहिए।

(5) गायत्री माता की उपासना

गायत्री महामंत्र को चारों वेदों तथा भारतीय संस्कृति का उद्गम कहा गया है। उसके 24 अक्षरों में इतनी महत्वपूर्ण शिक्षाएं भरी हैं कि उन्हें समस्त ग्रन्थों का सार एवं संसार का सब से छोटा किन्तु सबसे सार गर्भित धर्मशास्त्र कह सकते हैं। गायत्री उपासना अन्य समस्त उपासनाओं की अपेक्षा अधिक सरल, स्वल्प-श्रमसाध्य एवं अत्यधिक फलदायिनी है। प्राचीनकाल में ऋषि−मुनि इसी महामन्त्र के आधार पर तपस्याएं करके परम सिद्धि प्राप्त करते थे। सर्व साधारण के लिए गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री को एक आवश्यक नित्यकर्म माना गया है। गायत्री हीन की कटुशब्दों में शास्त्रकारों ने भर्त्सना की है। अध्यात्मिक उन्नति ओर साँसारिक कठिनाइयों को सरल बनाने में सद्बुद्धि का यह महामन्त्र एक अत्यन्त महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है।

भारतीय धर्म की सर्वोत्कृष्ट ईश्वर उपासना-गायत्री का महत्व समझाने, किसी न किसी रूप में प्रतिदिन गायत्री उपासना, करने गायत्री की शिक्षाओं के आधार पर अपने विचारों एवं कार्यों को बनाने के लिए व्यापक प्रचार किया जाय और मुसलमानों के ‘कलमे’ की तरह आध्यात्मिक प्रकाश के रूप में प्रतिष्ठित कराया जाय।

कुछ अधिकारी साधक गायत्री की विशेष उपासनाएं करके उन शक्ति यों की खोज करें जो प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों को इस महामंत्र की साधना से प्राप्त होती थी।

सामूहिक गायत्री उपासना, सामूहिक गायत्री यज्ञ अनुष्ठान आदि के आयोजनों की व्यवस्था करके जनमानस में गायत्री उपासना के लिए उत्साह पैदा किया जाय। तथा बताया जाय कि सद्बुद्धि की स्थापना के लिए बौद्धिक क्रान्ति-मानवता की पूजा एवं नारी की पद-दलित महानता का समुचित उत्कर्ष करने का आन्दोलन भी गायत्री आन्दोलन में सन्निहित हैं।

(6) यज्ञ पिता की आराधना

यज्ञ भारतीय सूक्ष्म विज्ञान का प्रधान आधार है। उसमें आत्मोन्नति, स्वर्ग, मुक्ति आदि परमार्थिक लक्षों की प्राप्ति, बलवृद्धि, रोग निवारण, श्री समृद्धि, सुसन्तति, अभीष्ट वर्षा, कुसंस्कारों की निवृत्ति, दिव्य अस्त्र-शस्त्र, व्यापक वातावरण में परिवर्तन, सूक्ष्म जगत् पर अधिकार, आपत्तियों का निवारण एवं सुख-शान्ति वृद्धि की अपार संभावनाएं सन्निहित हैं, आज यह यज्ञ विद्या लुप्त प्रायः हो रही है। संसार में विभिन्न प्रकार की वैज्ञानिक शोधें को रही हैं। हमें भी पूर्वजों के इस महान् रत्न भंडार यज्ञ की शोध के लिये कुछ करना ही चाहिये। गायत्री-तपोभूमि द्वारा यज्ञ विद्या का तात्विक अन्वेषण करने के लिये यह बारह सूत्री कार्यक्रम चलाया जा रहा है-

अनेक यज्ञ विधानों की पद्धतियों को व्यवस्थित करना।

प्रयोग करके यज्ञ के लाभों को प्रत्यक्ष करने की स्थिति तक पहुँचाना।

यज्ञ सामग्रियों की कृषि कराके उपयुक्त गुण वाली वनस्पतियाँ उत्पन्न करना।

यज्ञों के सभी अभीष्ट यन्त्र एवं उपकरण जुटाना।

यज्ञ सम्बन्धी विस्तृत साहित्य का एक विशद् पुस्तकालय स्थापित करना, जिससे इस विषय की ‘रिसर्च’ में सहायता मिले।

यज्ञ विद्याओं के ज्ञाताओं का सम्मेलन बुलाते रहना तथा उनके परस्पर विचार विनिमय की व्यवस्था करना।

यज्ञ चिकित्सालय खोलकर रोग निवारण के सर्वोच्च उपाय खोजना।

केन्द्रीय प्रयोगशाला में नाना प्रकार के यज्ञ सम्बन्धी अनुसंधान करके उनके परिणाम दूसरों को बताना।

ऐसे अन्वेषकों की निर्वाह व्यवस्था करना, जो यज्ञ विद्या की शोध के लिये अपना जीवन खपाना चाहें।

यज्ञ विद्या का एक सुव्यवस्थित विद्यालय स्थापित करना।

आचार्य विनोबा की भूदान यात्रा की तरह यज्ञ प्रचार की टोलियाँ देश व्यापी भ्रमण करके जनता को यज्ञ का महत्व बतावें, यज्ञ आयोजन करें तथा यज्ञ सम्मेलनों में साँस्कृतिक धर्म-शिक्षा का प्रचार करें।

यज्ञ में सन्निहित त्याग भावना को जनसाधारण के हृदयों में स्थापित कराके उनका मानसिक स्तर ऊँचा उठाना।

यह कार्यक्रम अभी साधनों के अभाव में तपोभूमि द्वारा अव्यवस्थित रूप से चल रहा है, परन्तु आशा की जाती है कि प्रभु साधन जुटायेंगे और इस अन्वेषण कार्य का महत्वपूर्ण परिणाम होगा।

अगले वर्ष देश भर में 108 बड़े गायत्री यज्ञ कराने का विचार है जिसमें मानव मात्र के मन में सद्बुद्धि एवं त्यागमय प्रेम की भावनाएं उत्पन्न हों, तथा आज जो बुराइयाँ तथा विकृतियाँ संसार के सूक्ष्म वातावरण में व्याप्त हो गई हैं, उनकी शान्ति हो कम से कम 24 हजार और अधिक से अधिक सवालक्ष गायत्री मन्त्रों की आहुतियों के यह यज्ञ होंगे। इनमें सम्मिलित होने वालों की अन्तः शुद्धि होने के महान् लाभ के अतिरिक्त उसके साथ-साथ होने वाले साँस्कृतिक प्रचार आयोजन का भी कार्यक्रम रहेगा। इस प्रकार यह अध्यात्मिक प्रचंड प्रयोग एवं धर्म सम्मेलनों का सम्मिलित कार्यक्रम संसार के विक्षुब्ध वातावरण को शान्त करने और भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान में भारी सहायक सिद्ध होंगे।

इन दिनों भारी दक्षिण माँगने वाले पंडितों ने तथा अन्य आडंबरों ने यज्ञों को बड़ा दुर्लभ, कष्ट साध्य और महंगा बना दिया है। हमारा विचार इन कठिनाइयों को सरल बनाकर यज्ञ आयोजन को सर्वत्र- सुगम बनाने का है। इसके लिए यह मार्ग उचित है-

(1) यज्ञों की शास्त्रोक्त विधियों को थोड़े समय में सिखाने के लिए गायत्री तपोभूमि में व्यवस्था रहेगी। जिससे लोग यहाँ आकर सब विधान जान सकें और खुद ही मिलजुलकर यज्ञ व्यवस्था कर सकें।

(2) जहाँ शुद्ध हवन सामग्री बनाने या मँगाने की व्यवहारिक या आर्थिक कठिनाई हो वहाँ “चरु हवन” किये जायं खीर, मोहनभोग, तिल जौ चावल आदि हतिष्यान्न एवं उसी क्षेत्र में पैदा होने वाली सुविधापूर्वक प्राप्त होने वाली जड़ी बूटियों से ही हवन कराये जायं।

(3) यज्ञ के नाम पर बहुधा लोग बहुत धन संग्रह करके खा जाते हैं। इसलिए आवश्यक कार्य के लिए अनिवार्य रुपयों के अतिरिक्त सर्व साधारण से हवन में काम आने वाली वस्तुएं ही प्रधानतया इकट्ठी की जायं। सभी घरों से थोड़ी-थोड़ी हवनीय वस्तुएं संग्रह करके तथा सभी का श्रम सहयोग लेकर हवन को सामूहिक आत्मकल्याण का माध्यम बनाया जाय। इस माध्यम से सामाजिकता एवं सहकारिता की भावना पैदा की जाय।

(7) साँस्कृतिक शिक्षण शिविर

उपरोक्त कार्यक्रमों में जिन्हें अभिरुचि है, उनकी समुचित शिक्षा के लिए तपोभूमि में स्थायी विद्यालय है। पर ऐसे लोग जो कार्यव्यस्त हैं, अधिक लम्बा समय शिक्षा के लिए नहीं दे सकते किन्तु आत्म-कल्याण तथा लोक सेवा के लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए लगभग दो मास के शिक्षण शिविर लगाये जायं। अभी ऐसे शिविरों की व्यवस्था मथुरा में ही की जा रही है, आगे सुविधानुसार स्थान-स्थान पर उनकी व्यवस्था की जायगी ताकि समीपवर्ती शिक्षार्थी सुविधापूर्वक वह लाभ उठा सकें।

चैत्र सुदी 15 को महायज्ञ की पूर्णाहुति होते ही पहला साँस्कृतिक शिक्षण शिविर तपोभूमि में आरंभ हो जायगा, यह ज्येष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती तक 55 दिन में समाप्त होगा। इसमें साँस्कृतिक पुनरुत्थान से सम्बन्धित प्रायः सभी विषयों की शिक्षा दी जायेगी। साँस्कृतिक विद्यालय में जो पाठ्यक्रम एक वर्ष में पूरा कराया जाता है इसका सामान्य ज्ञान इन थोड़े दिनों में कराने का प्रयत्न किया जायेगा।

इस शिविर में जो शिक्षाएं दी जायेंगी उनकी रूप रेखा इस प्रकार है:-

सैद्धान्तिक:-(1) भारतीय संस्कृति का तत्त्वज्ञान,(2) साँस्कृतिक आधार पर व्यक्ति गत तथा सामूहिक जीवन में सुख-शान्ति की संभावना, (3) नीति और सदाचार की उपयोगिता एवं आवश्यकता (4)जीवन को सुखी, संतुष्ट सम्पन्न एवं समुन्नत बनाने का मार्ग (5) कर्तव्य और उत्तरदायित्व समझना (6)ईश्वर और धर्म का जीवन में उचित स्थान, (7) प्राचीनता और आधुनिकता का समन्वय (8) धर्म-ग्रन्थों को समझने का सही दृष्टिकोण (9) साम्प्रदायिकता और धार्मिकता का अन्तर (10) विचार और कार्यों के सही या गलत होने की कसौटी।

साँस्कृतिक-(1) भारतीय संस्कृति का स्वरूप (2) व्रत, पर्व और त्यौहारों में सामूहिक चरित्र-निर्माण की शिक्षा (3) षोडश संस्कारों का आवश्यकता और विधि व्यवस्था (3) शिखा यज्ञोपवीत, तिलक, रीति-रिवाज, प्रथा परम्परा आदि के पीछे छिपे हुए रहस्य, (4) देवताओं के स्वरूप, देव पूजा का विज्ञान, देव उपासना से लाभ, (5) तीर्थों एवं देवालयों का वास्तविक रहस्य, (6) वर्णाश्रम-धर्म और आज की स्थिति का समन्वय (7) भाषा, भेष, भाव की एकता का महत्व (8) भारतीय शिष्टाचार और सदाचार(9) युग धर्म की आवश्यकता (10) जीवन का लक्ष पूर्ण करने वाली दार्शनिक दृष्टि।

व्यवहारिक-(1)ईश्वर की भावना पूर्ण प्रार्थना उपासना (2) शिक्षा प्रद वेद मन्त्रों को कंठस्थ करना (3) अनेक प्रकार के यज्ञों का विज्ञान और विधान (4)सोलह संस्कारों की शिक्षायें तथा कराने की सरल पद्धतियाँ (5) भाषण देने एवं कथा कहने का अभ्यास (6) कथा कीर्तन तथा शिक्षा प्रद भजनों के योग्य आवश्यक ताल स्वर, तथा गायन वाद्य की संगीत शिक्षा (7) गीता,रामायण,भागवत् सत्यनारायण आदि धर्म ग्रन्थों की अत्यन्त हृदय ग्राही तथा शिक्षाप्रद कथा कहने की नवीन पद्धति (8) आरोग्य शास्त्र का अपनी स्वस्थता एवं दूसरों की सेवा के योग्य ज्ञान (9) श्रम शीलता शिष्टाचार, दिनचर्या एवं कर्तव्य परायण की व्यवहारिक शिक्षा (10) शिक्षार्थी के व्यक्ति गत जीवन की समस्याओं पर आवश्यक सलाह।

शिविर में सैद्धान्तिक, साँस्कृतिक एवं व्यवहारिक तीनों ही प्रकार की शिक्षाएं अधिकारी विद्वानों द्वारा दी जावेंगी। यह शिक्षायें निश्चित रूप से शिक्षार्थी के जीवन को ऊँचा उठाने वाली सिद्ध होंगी जो छात्र उन शिक्षाओं को प्राप्त करना चाहें वे अपना पूर्ण परिचय लिखकर पूर्व स्वीकृति प्राप्त करलें और पूर्णाहुति के समय दो महीने ठहरने की तैयारी करके आवश्यक वस्त्र, बिस्तर आदि लेकर आवें। साधारणतः छात्रों को भोजन व्यय जो लगभग 15 मासिक पड़ता है अपना खर्च स्वयं ही करना चाहिये। जो इसमें असमर्थ हों, उनको भोजन की व्यवस्था ‘अखंड ज्योति कार्यालय में आचार्य जी के चौके में हो जायगी। तपोभूमि में इस वर्ष लगातार कई ऐसे शिविर करने का विचार है।

इस आयोजन को सफल बनाने के लिये सभी के विशेषतया आपके सहयोग की भारी आवश्यकता है और वह सहयोग इस प्रकार हो सकता है:-

1.उपरोक्त योजना को ध्यान पूर्वक दो तीन बार पढ़िये और अपनी सलाह दीजिए कि उसमें कहाँ-कहाँ त्रुटि है और क्या आवश्यक बातें इसमें छूट गई हैं?

2.इन कार्यक्रमों को सफल बनाने के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए और किस प्रकार इस योजना को व्यापक बनाया जाना सम्भव है, यह बताइये।

3.अपने बारे में सोचिए कि आप इस योजना के बताये हुये कार्यों में से क्या-क्या कर सकते हैं?

4.अपने को व्रतधारी या कर्मयोगी श्रेणी में रखकर आत्म निर्माण एवं समीप वर्ती क्षेत्रों में कुछ कार्य कर सकना क्या आपके लिए शक्य है? यदि है तो साँस्कृतिक सेवा शृंखला में संबद्ध होने में जो अड़चन है उसे हल कीजिये।

5.आपके समीपवर्ती क्षेत्र में जो प्रतिभा-शाली चरित्रवान एवं लोक सेवा की भावन वाले व्यक्ति हों, उन्हें नरमेध में सम्मिलित होकर धर्म सेवा का कार्य करने में लग जाने के लिए प्रेरणा कीजिये।

6. साँस्कृतिक शिक्षण शिविर में शिक्षा प्राप्त करने आना आपके लिए शक्य न हो तो दूसरों को भिजवाइए जो आपके क्षेत्र में इस कार्य को आगे बढ़ा सकें। समीपवर्ती पण्डितों, पुरोहितों एवं उनके बालकों को इस शिक्षा के लिए भिजवाने का विशेष प्रयत्न कीजिए।

7. पूर्णाहुति के समय मथुरा आने का प्रयत्न कीजिये और इस महान् आयोजन को सफल बनाने में परामर्श एवं विचार विनिमय का अवसर दीजिये।

8. इन कार्यों में अभिरुचि रखने वाले उस क्षेत्र के सत्पुरुषों को यह योजना दिखाइए, और इसके लिए उनका सहयोग, परामर्श पथ प्रदर्शन एवं आदर्शवाद माँगिए।

9.अपने क्षेत्र के धार्मिक व्यक्तियों का एक संग- बनाइये और अगले वर्ष एक बड़ा यज्ञ करके सत्पुरुषों का इकट्ठा कीजिये और इन साँस्कृतिक कार्यों के उस क्षेत्र में फैलाने की योजन बनाइये।

10. तपोभूमि में तपस्वियों का शरीर निर्वाह, प्रचार, पत्र व्यवहार, दैनिक यज्ञ, विद्यालय योजना सञ्चालन आदि का खर्च दिन-दिन बढ़ने की सम्भावना है आय का कोई स्थायित्व नहीं, इन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर यदि कुछ आर्थिक सहयोग सम्भव हो तो वह कीजिये।

भारत की अन्तरात्मा जाग रही है। हमारा साँस्कृतिक पुनरुत्थान होना सुनिश्चित है, आइए कुछ करने के लिये आगे बढ़े। प्रभु प्रेरणा से सम्पन्न हो रहे एक महान् कार्य के भागीदार बनाने का श्रेष्ठ प्राप्त करना हमारे लिये दूर दर्शिता एवं बुद्धिमता की ही बात होगी।


संतोषामृत पिया करें

(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए. )

को वा दरिद्रो? हि विशाल तृष्णाः। श्री माँस्तु को? यस्यु समस्त तोषः॥

अर्थात् गरीब कौन है? जिसकी तृष्णा बड़ी है। अमीर कौन है? जो सदा सन्तुष्ट रहता है। भगवान के दिये धन से जो संतोष नहीं होता, वह मन का गरीब है और यही सच्ची गरीबी है।

टॉलस्टाय की एक कहानी है। एक लोभी व्यक्ति एक ऐसे राज्य में पहुँचा, वहाँ कुछ रुपया देकर व्यक्ति यथेष्ट भूमि प्राप्त कर सकता था। प्रातःकाल से हल बैल लेकर उसे एक स्थान से प्रारम्भ कर भूमि का चक्कर लगाना पड़ता था। सायंकाल तक वह जितना बड़ा चक्र बना पाता था, भूमि का वही घेरा उसे दे दिया जाता था। फीस सबके लिये एक ही थी। यह व्यक्ति वहाँ पहुँचा और फीस देकर भूमि का घेरा नापना प्रारम्भ किया। वह घेरा बनाने के लोभ में वह चलता रहा। सायंकाल होते-होते व इतना तेज चला कि घेरा पूर्ण करने से पहिले ही गिरा और तुरन्त मर गया। इस कहानी का शीर्षक है। ‘मनुष्य को कितनी भूमि की आवश्यकता है?’ अन्ततः वह व्यक्ति जितनी भूमि में गाढ़ा गया, उतनी ही भूमि उसे मिल सकी। वह बड़ा भूमि का घेरा व्यर्थ गया। कहानी का तात्पर्य यह है कि मनुष्य वृथा ही इतनी वस्तुओं की तृष्णा करता है। अन्ततः वही उसकी मृत्यु का कारण बनाती हैं। विधि का बनाया हुआ एक निश्चित क्रम है धन, भूमि, मकान, संपत्ति तथा नाना वस्तुओं की देन की एक सीमा है। भगवान प्रत्येक व्यक्ति का ध्यान रख उसके निर्वाह और सुख के लिये पर्याप्त सुख सुविधाएं प्रदान करते हैं, किसी को कभी नहीं भूलते, निरन्तर देते रहते हैं, पर भगवान के दिये धन,सुख, सुविधाओं से जिसे सन्तोष नहीं होता, उसकी बड़ी दुर्दशा होती है।

ईश्वर के संसार में कभी भी मर्यादा के भीतर रह कर खाने पीने, पहनने ओढ़ने, शरीर की नाना प्राकृतिक इच्छाओं की पूर्ति के सभी साधन प्रचुरता से हैं। किसी को किसी वस्तु की कमी नहीं है। जीवन की आधार भूत चीजें विपुलता से बिखरी पड़ी हैं।जितना जिस 2 के हिस्से में है, जितना जिस के भाग्य में लिखा गया है। वह उसे देर सवेर अवश्य प्राप्त होकर रहता है।कोई किसी के भाग्य के धन, सन्तान, सम्पत्ति, भूमि, ऐश्वर्य, मान, समृद्धि को उससे नहीं छीन सकता। शर्त यही है कि हम अपना कर्म करते रहें, परिश्रम में लापरवाही न करें,आलसी न बनें, मुक्त का धन लूटने की चेष्टा न करें। कर्तव्य मानकर समान को जो काम हमें सौंपा गया है, कठिन परिश्रम और सहयोग से उसे पूरा करते रहें। अपना पेट भर लेने के पश्चात् बचा हुआ धन या वस्तुएं ईश्वर की हैं हमारी व्यक्ति गत पूंजी नहीं है,उसे समाज के अन्य जरूरतमंद व्यक्तियों को दे देने (दान करने) में ही कल्याण है! आवश्यकता से अधिक धन इत्यादि रखकर दूसरों का शोषण करने वाले मोक्ष का सुख प्राप्त नहीं करते। तृष्णा के मायाजाल में अशांत पड़े रहते हैं।

संसार के विषय वासना में लिप्त व्यक्ति के दुखों का अन्त नहीं होता। एक आवश्यकता पूर्ति के बाद दूसरी, फिर तीसरी चौथी अनन्त तृष्णाएं, हजारों छोटी बड़ी अच्छी बुरी इच्छाएं उसकी शान्ति सुख और सन्तुलन को भंग करती रहती हैं। इन्द्रियों को कभी सन्तोष नहीं मिलता। वासना कभी तृप्त नहीँ होती। आसक्ति ही दुःख का मूल है।

संग्रह से त्याग ही श्रेष्ठ है। संग्रह से आसक्ति बढ़ती है। जीव संसार के माया मोह में और भी जटिलता से बंधता जाता है। पद्मपुराण में एक स्थान पर कहा गया है:—

‘तपः संचय ऐवेह, विशिष्ठो धन संचयात्। त्यजतः संचयात् सर्वान, यान्तिगाशमुपद्रवाः॥

न हि सचातात् कश्चित्, सुखी भवति मानवः। यथा यथा न गृह्वभती,ब्राह्यणः सम्प्रतिग्रहम्॥

तथा तथा हि संतोषाद्, ब्रह्यतेजो विवर्धते। अकिंचवत्व राज्यं च, तुलया समतोलयन्। अकिंचन्त्वमधिकं, राज्यादपि जितात्मनः॥

अर्थात्-- इस लोक में धन संचय की अपेक्षा तपस्या का संचय ही श्रेष्ठ है। जो व्यक्ति सब प्रकार के लौकिक संग्रहों का परित्याग कर देता है, उसके सारे उपद्रव शान्त हो जाते हैं। संग्रह करने वाला कोई भी मनुष्य सुखी नहीं रह सकता। ब्राह्मण जैसे जैसे परिग्रह का त्याग कर देता है, वैसे ही वैसे सन्तोष के कारण उसके ब्रह्मतेज की वृद्धि होती है। एक ओर अकिंचनता और दूसरी ओर राज्य को तराजू में रखकर तोला गया, तो राज्य की अपेक्षा जितात्मा पुरुष की अकिंचनता का पलड़ा भारी होता है।

सबसे अधिक लोभ मनुष्य को धन का होता है जितना धन प्राप्त होता है। उतनी ही तृष्णा बढ़ती जाती है। सैंकड़ों से हजारों, हजार से दस हजार, लाख दस लाख निरन्तर धन की इच्छा अधिकाधिक बढ़ती जाती है। मनुष्य यह भूल जाता है कि धन एक साधन है स्वयं साध्य नहीं है। धन से मनुष्य की सात्त्विक आधार भूमि आवश्यकताएं पूर्ण होनी चाहिये। बचे हुये धन को दान द्वारा दूसरे जरूरतमंद व्यक्तियों में फैलना चाहिये। यदि मर्यादा से बाहर जाकर कोई कृपण केवल धन का संग्रह ही कर्तव्य ही मान बैठता है, तो वह बड़ी भारी मूर्खता करता है। स्कंदपुराण में कृपण धनी को पानी में डुबा देने का उल्लेख इस प्रकार है:-

धनवः तमदातारं, दरिद्र चातपस्विनम्। उभातन्भसि मोक्तयौ, गले बध्वा महाशिलाम्॥

अर्थात्-जो धनवान होकर दान नहीं करता और दारिद्र होकर कष्ट सहन रूप तप से दूर भागता है, इन दोनों को गले में बड़ा भारी पत्थर बाँध कर जल में छोड़ देना चाहिए।

ऋषिकुमार नचिकेता ने सत्य ही कहा है कि मनुष्य धन से कभी भी तृप्त नहीं किया जा सकता यदि हमने प्रभु के दर्शन पा लिए हैं, आत्म साक्षात् कार कर लिया है, तो धन तो हम पा ही लेंगे। माँग ने योग्य वर तो आत्मज्ञान है।

पहले तो धन के पैदा करने में कष्ट होता है। फिर पैदा किए धन की रखवाली में क्लेश उठाना पड़ता है। इसके बाद यदि वह कहीं नष्ट हो जाय, तो दुःख और खर्च हो जाय, तो फिर दुःख होता है। धन अधिक होने पर तृष्णा और मोह तथा कम होने पर हृदय में जलन उत्पन्न करता है। अन्त में धन के त्यागने में भी दुःख ही हाथ लगता है। आप ही सोचिये? धन में सुख कहाँ है?

महर्षि कश्यप का वचन है कि यदि ब्राह्मण के पास धन का बड़ा संग्रह हो गया, तो यह उसके लिए अनर्थ का हेतु है। धन-ऐश्वर्य से मोहित ब्राह्मण कल्याण से भ्रष्ट हो जाता है। धन सम्पत्ति मोह में डालने वाली होती है। मोह नरक में गिराता है। इसलिए कल्याण चाहने वाले पुरुष को अनर्थ के साधन भूत अर्थ का दूर से ही परित्याग कर देना चाहिए। जिसके लिए धर्म के लिए भी धन-संग्रह की इच्छा होती है, उसके लिए उस इच्छा का त्याग ही श्रेष्ठ है; क्योंकि कीचड़ में लगाकर धोने की अपेक्षा उसका दूर से स्पर्श न करना ही अच्छा है। धन के द्वारा जिस धर्म का साधन किया जाता है, वह क्षयशील माना गया है। दूसरे के लिए जो धन का परित्याग है, वही अक्षय धर्म है। वही मोक्ष प्राप्त कराने वाला है।

धन की तरह विषय वासना की इच्छा भी विषैली है। वासनाएँ निरन्तर बढ़ती हैं। कभी तृप्त नहीं होती। भोग वासना आजकल की पाश्चात्य सभ्यता की कलंक कालिमा है। जो कामी हैं, उनका विवेक नष्ट हो जाता है। जहाँ धन और बढ़ती हुई वासनाएँ हैं, वहाँ बुद्धि पंगु हो जाती है। वासना, भोग,विलास-प्रिय व्यक्ति के पास यदि रुपया हो तो वह लोक का नाश करने वाला होता है जैसे वायु अग्नि 43 की ज्वाला को बढ़ाने में सहायक होता है और जैसे दूध साँप के विष को बढ़ाने में कारक होता है, वैसे ही दुष्ट का धन उसकी दुष्टता को बढ़ा देता है। वासना के मद में अन्धा हुआ व्यक्ति देखता हुआ भी अन्धा ही रहता है। विषय वासना की बढ़ती हुई इच्छाएँ प्रत्यक्ष विष के समान हैं।

इसी प्रकार सम्पत्ति एकत्रित करने की इच्छा भी उत्तरोत्तर बढ़ती है। एक मकान के पश्चात् दूसरा, फिर तीसरा चौथा, यहाँ तक की नई इच्छाओं के दास होते हैं। सम्पत्ति को बढ़ाने की इच्छा का कभी अन्त नहीं होता। इसी प्रकार संतान की इच्छा भी कभी पूर्ण नहीं होती। इच्छाओं का बड़ी संख्या में उत्पन्न होना ही मनुष्य के दुःख का कारण है; हमारी अपूर्णता का सूचक है। उच्चतम स्थिति पर पहुँचने के लिए हमें इच्छाओं का दमन करते रहना चाहिए। उनमें आशक्ति कम करने से कृति अन्तर्मुखी होती है।

हमें यह भली-भाँति स्मरण रखना चाहिए कि संसार में कभी किसी को इच्छाएँ पूर्ण नहीं हुई हैं। तृष्णा बढ़ती ही रही हैं। ईश्वर ने अपने परिश्रम की जो रोटियाँ हमें दी हैं, वे ही हम ईमानदारी से लेते रहें, सदा अपनी मेहनत की कमाई पर निर्भर रहें यही श्रेष्ठ सुख शान्ति का साधन है। आशक्ति का त्याग करके, क्रोध को जीत कर, स्वल्पाहारी और जितेन्द्रिय होकर बुद्धि से इन्द्रियों को रोक कर ही हम आनन्द प्राप्त कर सकते हैं।

जीर्यन्ति जीर्यतः केशा, दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः। जीविताशा धनाशा च, जीर्यतोऽपि न जीर्यति॥ चक्षुः श्रोत्राणि जीर्यन्ति, तृर्ष्णंका तरुणायते।

अर्थात् जब मनुष्य का शरीर जीर्ण होता है, तब उसके बाल पक जाते हैं और दाँत उखड़ जाते हैं पर यह तृष्णा ऐसी दुष्ट है कि सदैव तरुणी रहती है।

जो कुछ ईश्वर की देन के रूप में आपके पास है, उसे मर्यादा के भीतर रह कर भोगें और संतोषामृत पान करते रहें।


हमारे जीवन में वनों का महत्त्व

(श्री कन्हैयालाल माणेकलाल मुंशी)

वृक्षों की नीली छटा के लिए हमारे पूर्वजों में जो प्रेम था, वह हममें भी होना चाहिए। हमें अपनी वन-प्रधान संस्कृति की ओर अभिमुख होना चाहिए। वनों की छाया में जन्म लिया। वृक्षों के पत्तों पर प्रभातकालीन-जलकण का जलपान किया। समीर में डोलती हुई पत्रावलियों में से आते हुए चन्द्रकिरण के साथ नृत्य कला के प्रथम पाठ पढ़े। इस संस्कृति के मौलिक सिद्धान्तों को अर्वाचीन जीवन में हम ला सकते हैं। हर एक युग में अपनी संस्कृति की प्रेरणा से हमने अपने संस्कारों की मूलभूत भावनाओं को सुदृढ़ बनाया है। इतना ही नहीं, विभिन्न युगों में जो विषमताएँ उपस्थित हुई, भारतवासियों ने उन्हें भेदने के लिए इन मूल्यों को शक्ति और व्यापकता प्रदान की।

एक समय ऐसा भी था, जब हमारी संस्कृति सर्वांग जीवन को समरस बनाती थी। आर्थिक जीवन पर भी उसका प्रभाव पड़ता था। लेकिन आज हमने इन प्रश्नों को एक दूसरे से बिलकुल पृथक् कर दिया है। सच तो यह है कि समस्त जीवन एक है, अभेद्य है। यह सत्य देखने की कला हमारे हाथों से निकल गई है। लेकिन मुझे तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि जब तक समस्त जीवन को एक रूप में देखने की कला हम फिर से नहीं सीखेंगे तब तक हममें न राष्ट्रीय आत्मविश्वास आयेगा और न इस भयंकर परिस्थिति से पार उतरने की शक्ति आयेगी।

आज तो बहुत बड़ा प्रश्न हमारे सामने है, उस को लीजिये। भारत में कभी भी अन्न की कमी नहीं थी। भूतकाल में भारत धान्य और धन से समृद्ध था। आज अन्न न्यूनता हमारे सामने ताँडव कर रही है। जो माता अभी तक ‘सजलाँ सफलाँ शस्य श्यामला’ था, वह क्षीण हो गई है। अपनी संतानों को भी वह खिला नहीं सकती। क्यों? क्योंकि जो हमारी साँस्कारिक प्रणाली है, उसको नवीन दृष्टि से देखने की शक्ति इसमें नहीं रही। किन्तु यह बात निश्चय समझिये कि इस शक्ति के बिना हम अर्वाचीन जीवन में टिक नहीं सकते।

थोड़े दिन पहले बम्बई में मैंने कहा था, “वृक्ष ही जल हैं, जल रोटी है और रोटी ही जीवन है।” यह वाक्य नग्न सत्य है। आज सभी भारतीय हृदयों में असन्तोष भरा है। क्योंकि हमारे खाने को अन्न नहीं। हमारे पास अन्न नहीं है; क्योंकि पानी संग्रह करने की पुरानी पद्धति हम हस्तगत नहीं कर सके। हमारे पास पानी नहीं है, वर्षा अनिश्चित है; क्योंकि हम तरु-महिमा भूल गये हैं। हजारों वर्षा तक हम जीवित रहे; क्योंकि हम वन-विहारी लोग थे, लेकिन आज हमारी दृष्टि संकुचित हो गई। हम नये-से बन गये। तरु-महिमा की हमको परवाह नहीं रह। वृक्षों को हम काटने लगे। वृक्षारोपण आज एक फैशन बन गया है, परन्तु उसमें जो धार्मिक श्रद्धा का तत्त्व था, वह चला गया।

हमारी सारी संस्कृति वन-प्रधान है। ऋग्वेद, जो हमारी सनातन शक्ति का मूल है, वन-देवियों की अर्चना करता है। मनुस्मृति में वृक्ष-विच्छेदक को बड़ा पापी माना गया है। उसके लिए दण्ड का विधान किया है। मत्स्यपुराण में कहा गया है- “जो आदमी वृक्षों को नष्ट करता है, उसे दण्ड दिया जाय।” तालाबों,सड़कों या सीमा के पास वृक्षों को काटना बड़ा गम्भीर अपराध था। उसके लिए दण्ड भी बड़ा कड़ा रहता था। उसमें कहा गया है कि जो वृक्षारोपण करता है, वह तीस हजार पितरों का उद्धार करता है। वृक्षों का रोपण स्नेहपूर्वक और उनका परिपालन पुत्रवत् करना चाहिये।

पुत्र और तरु में भी भेद है, क्योंकि पुत्र को हम स्वार्थ के कारण जन्म देते हैं, परन्तु तरु पुत्र को तो हम परमार्थ के लिए ही बनाते हैं। ऋषि-मुनियों की तरह वृक्षों की पूजा करनी चाहिए, क्योंकि वृक्ष तो द्वेष-वर्जित है। जो छेदन करते हैं, उन्हें भी वृक्ष छाया, पुष्प और फल देते हैं।

इसलिये जो विद्वान् पुरुष हैं, उनको वृक्षों का रोपण करना चाहिए और उन्हें जल से सींचना चाहिए।

हम स्वर्ग की बात क्यों करें? हम वृक्षारोपण करके यहाँ ही स्वर्ग क्यों न बनावें? समस्त इतिहास में महान् सम्राट अशोक ने ही कहा है- “रास्ते पर मैंने वटवृक्ष रोप दिये हैं, जिनमें मानवों, पशुओं को छाया मिल सकती है। आम वृक्षों के समूह भी लगा दिये हैं।” आज प्रभुत्व सम्पन्न भारत ने इस महाराजर्षि के राज्य-चिन्ह ले लिये हैं। जैसे 23 सौ वर्ष पूर्व उन्होंने देश में एकता स्थापित की थी, वैसी ही हमने भी प्राप्त कर ली है। क्या हम इस सन्देश को नहीं सुनेंगे? हम इस सन्देश को सुनकर निश्चय ही ऐसा प्रबन्ध करेंगे, जिससे भारत के भावी प्रजा-जन कह सकें, कि हमने भी हर रास्ते पर वृक्ष उगाये थे, जो मानवों और पशुओं को छाया देते हैं।

मेरा जन्म शहर में हुआ और शहर में ही प्रायः मैं रहा, किन्तु तरुओं के प्रति मेरा प्रेम सदा ही रहा। मथिरान की वृक्षावलियों की छाया में ही मैंने जीवन की सुन्दरता और प्रेरणा पाई है। अपने जीवन के महासंकल्प भी मैंने वहाँ ही किये। काश्मीर में पहल ग्राम के ऊपर बैंसस के देवदारु-वृक्षों की छाया में मुझे आत्मसिद्धि का किञ्चित स्पर्श हुआ। जंगल के पथ पर जाते ही वन देवियों ने मुझे कल्पना विकास की शिक्षा दी थी और अपना उपन्यास ‘भगवान् कौटिल्य’ लिखते समय नैमिषारण्य के काल्पनिक दर्शन करते हुए ही अपनी सनातन संस्कृति की अमर आत्मा का मुझे साक्षात्कार हुआ।

हमारी संस्कृति में जो सुन्दरतम और सर्वश्रेष्ठता है, उसका उद्भव सरस्वती के तट के वनों में हुआ। आर्यावर्त के एक श्रेष्ठ द्रष्टा ने ऋग्वेद में कहा है- “वरुण, अग्नि, पानी और औषधि आप सब तृप्त हों। मरुतों के आलिंगन से हमें सुख मिले और इन सब देवताओं के आशीर्वाद से हमारा रक्षण हो। नैमिषारण्य के वन में शौनक मुनि ने हमको महाभारत की कथा सुनाई-महाभारत, जो भारतीय आत्मशक्ति का स्रोत है। हमारे अनेक तपोवनों में ही ऋषि-मुनि वास करते थे, आजीवन अपने संस्कार, आत्मसंयम और भावनाओं को सुदृढ़ बनाते थे। भारतीय स्मरण भण्डार नन्दनवन के सौंदर्य से भरा हुआ है। महिलाओं में श्रेष्ठ सीताजी के भव्य आत्म समर्पण की निश्वास पूर्ण करुणा अशोक-वन से सम्बन्ध रखती है। हमारे जीवन का उल्लास वृन्दावन के साथ लिपटा हुआ है। वृन्दावन को हम कैसे भूल सकते हैं? वहीं कृष्ण भगवान् ने यमुना-तट पर नर्तन करते हुए डालियों और पुष्पों की ताल साथ अपनी वेणु बजाई। उसकी ध्वनि आज भी हमारे कानों में सुनाई देती है और भगवान् ने ही कहा था- “अश्वत्थः सर्व वृक्षाणाँ” अर्थात् मैं वृक्षों में अश्वत्थ हूँ।

हमको पूर्वजों की ज्वलन्त संस्कृति मिली है, परन्तु हम उसके योग्य नहीं रहे। हम अपने वनों को काट डालते हैं। हम वृक्षों का आरोपण करना भूल गये। वृक्ष-पूजा का हमारे जीवन में स्थान नहीं रहा। हमारी स्त्रियों में से शकुन्तला की आत्मा चली गई है। शकुन्तला वृक्षों को पानी दिये बिना आप पानी ग्रहण नहीं करती थी। आभूषण-प्रिय होती हुई भी वह यह सोचकर पल्लवों को नहीं चुनती थी कि इससे वृक्षों को दुःख होगा। जब वृक्षों में फल आते तो वह बहुत ही आनन्द अनुभव करती थी।

पार्वती ने देवदारु को पुत्र के समान समझ कर माँ के दूध के समान पानी पिलाकर बढ़ाया।

मंजरित वृक्षों का सौंदर्य हम नहीं भूल सकते। हम नहीं भूल सकते भव्य वृक्षों का अद्भुत गौरव और वृद्ध ऋषियों के समान जगत् के कल्याण में ही जीवन साफल्य समझने वाले वनों को। यदि प्रत्येक पुरुष और स्त्री वृक्षों के महत्व को समझे और पुत्रवत् उनका परिपालन करे तो भारत का हर नगर, हर गाँव जीवनोल्लास से ओत-प्रोत हो जायगा। यह सुगम और सीधा-सा तथ्य भी हम कैसे भूल सकते हैं।

हमारे पूर्वज वृक्षों को कितनी श्रद्धा एवं सम्मान की दृष्टि से देखते थे, इसके कितने ही प्रमाण भारतीय साहित्य में मिलते हैं और कई वृक्षों करने की प्रथा तो अब भी प्रचलित है। अब प्रति वर्ष वन-महोत्सव मनाने के आयोजन का उद्देश्य लोगों को फिर से वृक्षों के महत्त्व को समझना है।

प्राचीन भारत में वृक्षों का धार्मिक महत्त्व विशेष था। प्राचीन साहित्य में अरण्यों एवं वनों के प्रसंग बहुत आते हैं और मूर्तिकला और चित्रकला में तो वृक्षों और पुष्पों का विशेष स्थान रहा है।

सिन्धु घाटी-सभ्यता के अवशेषों से पता चलता है कि उस युग के लोगों को वृक्ष कितने प्रिय थे। उनके मिट्टी के बरतनों पर पीपल के पत्तों के चित्र मिलते हैं। उनके राज्य-चिन्हों में तो झुकी हुई डालों वाला वृक्ष अंकित है और दूसरे में एक ऊँचे वृक्ष पर बैठा हुआ एक मनुष्य तथा उसके नीचे एक क्षुधातुर व्याघ्र अंकित मिलता है।

वेदों में पर्वतों और नदियों, मेघों के गर्जन और बिजली की कड़क, भयानक प्रचण्ड वायु, प्रभात सुषमा, शीतल झरने, वृक्ष और वनों का वर्णन आता है। वनदेवी की स्तुति में लिखी गई ऋग्वेद की एक ऋचा में प्रकृति का शब्द चित्र खींचा गया है। अश्वत्थ और न्याग्रोध की लकड़ी से बने हलों और रथों का प्राचीन ग्रन्थों में प्रायः वर्णन आया है। आरण्यकों के विषय में तो कहा गया है कि उनका अध्ययन वन के शीतल और एकाँत स्थान में करना चाहिए।

रामायण और महाभारत के घटनास्थल बहुधा वनों में ही हैं। महाभारत में खाण्डव वन के जलने का उल्लेख है और रामायण में पंचवटी वन की रमणीयता का वर्णन वर्णन किया गया है। पुराणों में वृक्षों के महात्म्य, वृक्षारोपण के पुण्य और वृक्ष काटने के पाप के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा गया है।

अग्निपुराण में गृह निर्माता से कहा गया है—

“घर के उत्तर में पलाश, पूर्व में बड़, दक्षिण में शाम और पश्चिम में अश्वत्थ के वृक्ष लगाने चाहिए। दक्षिणावर्ती सीमा पर काँटेदार झाड़ी लगानी चाहिए, घर के पास ही फूलों का एक बगीचा लगाना चाहिए। जिसमें फूलों के पौधे और शीशम के वृक्ष लगाये जायं।”

इसी पुराण में वृक्षों की पूजा का महात्म्य बताया गया है—”जो मनुष्य लोगों के हित के लिये वृक्ष लगाता है, वह मोक्षपद प्राप्त करता है। वृक्ष लगाने वाला मनुष्य अपने 30,000 भूत और भावी पितरों को मोक्ष दिलाने में सहायक होता है।” मत्स्यपुराण में कहा गया है—”10 कुएँ बनवाना एक ताल बनवाने के समान है। 10 तालों का निर्माण एक झील के निर्माण के बराबर है। 10 झील बनवाना एक सुपुत्र प्राप्त करने के समान पुण्यकारक है। किंतु दस पुत्रों का पुण्य केवल एक वृक्ष लगाने से प्राप्त हो जाता है।”

बुद्ध भगवान् को वटवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। बौद्ध कला और साहित्य में इसका निरंतर उल्लेख आता है। सिकन्दर और यूनानियों ने भारत के विशाल वट-वृक्षों को देखकर आश्चर्य किया था।

हमारी संस्कृति जो सुन्दरतम और श्रेष्ठतम है, उसका उद्भव आश्रमों और तपोवनों में हुआ था। हमारे संस्कारों पर नन्दनवन के सौंदर्य और सती सीता के कारण अशोक वन के करुणापूर्ण वातावरण की छाप लगी हुई है और वृन्दावन को भी हम कैसे भूल सकते हैं, जहाँ कृष्णा भगवान् ने अपना महान् सन्देश हमें सुनाया था?”

दिल्ली प्रान्तीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, द्वारा आयोजित गोष्ठी में दिया गया भाषण।


अमृत वचन


अमृत वचन (Kavita)

श्रद्धया सत्य माप्यते। —यजु

श्रद्धा से ही सत्य (ईश्वर) प्राप्त होता है।

उच्चा दिवि दक्षिणावन्तो अम्थु। —ऋग्वेद

देने वाले की उन्नति होती है।

अकर्मा दस्युः। —ऋग्वेद

जो मेहनत नहीं करता सो चोर है।

यज्ञों वै श्रेष्ठतमं कर्म। —गोपथ 2।13

यज्ञ संसार का सर्वश्रेष्ठ कर्म है।

सर्वेषाँ वै एष भूतानाँ सर्वेषा देवानाँ आत्मा यद यज्ञः। शतपथ 14।3।2।1

निश्चय ही यह यज्ञ सब प्राणियों और सब देवताओं का जीवन है।

येत्राऽवष्टाम्भा शरीरस्य आहारःस्व प्रोब्रह्मचर्यम्—चरक

शरीर के तीन आधार हैं। 1. आहार 2,विश्राम 3.ब्रह्मचर्य।

त्रियो धर्मस्कन्धाः यज्ञाध्ययन दानमिति। —शतपथ

धर्म के तीन आधार है। 1. यज्ञ, 2. अध्ययन 3.दान।

ब्रह्मर्येचरण तपसा देवा मृत्युपुपाघ्रत। —अथर्व 11।5।49

ब्रह्मचर्य और तप के द्वारा देवताओं ने मृत्यु पर विजय प्राप्त की।

त्वं तप परित्तयाजयःस्वः। —ऋग्वेद 18।16।7।1

तपस्वी तपोबल से स्वर्ग पाता है।

अमूल्ये स्वपनम्। —यजु. 38।17

आलस्य दरिद्रता की जड़ है।


अधिक बच्चे पैदा मत कीजिए

(श्री रामकुमार शर्मा, मथुरा)

भारत में जनसंख्या के हिसाब से शश्यों की—अन्न की कमी है। इस अभाव को दूर करने के लिये, जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने के लिये, बंग दुर्भिक्ष-काण्ड की पुनरावृत्ति को रोकने के लिये, आज देश में शान्ति युद्ध चल रहा है। देश में विकास योजनाओं की सेना खड़ी कर दी गयी है। भारत के विशाल जनसमूह ने सरिताओं की तीव्र धाराओं को तोड़कर, बंजरों को सींचकर, टीलों को तोड़कर, लहलहाते हुए खेतों में परिणत कर दिया है। यहाँ अविश्रान्त परिश्रम द्वारा राष्ट्र के उत्पादन को बढ़ाने का एक महत् आयोजन पूरा किया गया। इस उत्थान कार्य में, शासक मण्डलों ने भी सक्रिय रूप से देश को समृद्धिशाली बनाने में सहयोग किया।

पर विश्व प्रसिद्ध शस्यश्यामला भारत भूमि में यह अभाव और दारिद्रय का वीभत्स ताण्डव, उपस्थित ही क्यों हुआ? क्या कारण है, इसके? इसकी खोज करने पर हमारे सामने दो भाँति की समस्यायें उपस्थित होती हैं। प्रथम तो जनसंख्या के अनुपात से हमारे देश की उत्पादन शक्ति पूरी नहीं पड़ती और दूसरी चिन्ता भरा विषय है, कीड़े-मकोड़े की भाँति बढ़ती हुई भारत की जनसंख्या। यदि यह का उत्पादन अधिक होता तो, इस विषय की चर्चा भी व्यर्थ सी होती, पर दुर्भाग्यवश अनेक कठिनाइयों और दैवी-प्रकोपों के कारण हम राष्ट्र का उत्पादन-विशेषकर खाद्य का उत्पादन उतनी शीघ्रता से नहीं बढ़ा सके जितनी शीघ्रता से हमने यहाँ की जनसंख्या को बढ़ाया। समस्या के इन दोनों रूपों को देखते हुए हमारे सामने वही समाधान उपस्थित होता है कि इन दोनों के बीच सन्तुलन की स्थापना हो। इस सन्तुलन की चर्चा करते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस, जिसने अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में घोषणा की थी “प्रत्येक राष्ट्र की जनसंख्या का उत्पादन उस मात्रा में बढ़ नहीं पाता” पर ध्यान जाता है। माल्थस का सिद्धान्त, व्यवहार की कसौटी पर सत्य उतरता है, या नहीं, यह तो विवादास्पद है, पर इसके द्वारा समस्या समाधान-पथ के किसी सत्य पर हमारी दृष्टि अवश्य पड़ जाती है।

इन समस्याओं पर विचार करते हुए कितने ही विद्वानों यह घोषणा की है—”जब तक भारत जनसंख्या वृद्धि रोकेगा नहीं, तब तक कृषि उत्पादन बढ़ाने के प्रयत्नों से सुनिश्चित या पूरा लाभ नहीं हो सकता, जो कुछ वृद्धि हो भी तो वह संख्या वृद्धि के अँशों में ही खप जायगी; कभी पूरी नहीं पड़ेगी।” इन विद्वानों के दिये गये निर्णयों पर, भारत को इसे अपनी एक महत्वपूर्ण समस्या मान कर, इसके लिये कुछ करना आवश्यक हो नहीं अनिवार्य होना चाहिये, नहीं तो प्रकृति द्वारा उत्पन्न अकाल, महामारी, रोग युद्ध-हिंसा इसके समाधान के लिये अनिवार्यता आयेगी ही। वह किसी के रोके रु कने वाली नहीं।

पण्डित जवाहरलाल नेहरू कहते हैं, कि भारत का एक 2 व्यक्ति हमारे लिये एक समस्या है और आज भारत की प्रतिवर्ष पचास लाख जनसंख्या की वृद्धि इस समस्या का कितनी गम्भीर और भयावनी बनाते जा रही है, यह हमारे लिये एक घोर चिन्ता का विषय है।

भारत के खण्डीकरण के पूर्व सन् 1941 ईस्वी में यहाँ की जनसंख्या 389 करोड़ के लगभग थी, जिसमें 31.9 करोड़ हिन्दुस्तानी भारत में और 7.॰ करोड़ पाकिस्तानी भारत की थी। सन् 1872 से 1901 ई॰ तक अखण्ड भारत में केवल 54 प्रतिशत की वृद्धि हुई और 1901 से 1954 तक में संघीय भारत में 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

भारत जैसे विशाल देश की जनसंख्या में 15 प्रतिशत की वृद्धि होना, पाँच करोड़ जनसंख्या का बढ़ना है। यह बढ़ी हुई जनसंख्या,ब्रिटेन, फ्रांस और वेल्स की जनसंख्या के बराबर है और आस्ट्रेलिया की जनसंख्या से तिगुनी है। इस प्रकार कुल जोड़ बहुत अधिक है। इस विचार क्रम में हमें यह भी याद रखना चाहिये कि चीन को छोड़कर विश्व के अन्य सभी देशों से भारत की जनसंख्या अधिक है और समस्त संसार की आबादी का पांचवां अंश है। प्रोफेसर हिल, जो यह हिसाब लगाने में बड़े दक्ष हैं, का कहना है कि 1970 में भारत की जनसंख्या (यही वृद्धि क्रम बनी रहने की दशा में) 65 पैंसठ करोड़ की हो जायगी।

किसी देश की जनसंख्या वृद्धि दो कारणों से होती हैं:—(1)मृत्यु की गति की अपेक्षा उत्पन्न होने की गति की अधिकता और (2) देश से जनसंख्या की निकासी की अपेक्षा प्रवेश का आधिक्य।

भारत में जनसंख्या वृद्धि के उपर्युक्त दोनों कारण हो सकते हैं, किन्तु फिर भी निश्चित कारण अधिक सन्तानोत्पत्ति ही है। आज भारत में प्रति दस मिनट पर औसतन 80 बच्चे पैदा हो रहे हैं और दूसरी ओर प्रति दस मिनट पर औसतन मृत्यु संख्या, प्रति वर्ष घटती ही जा रही है, इसके

फलस्वरूप अतिजीवन की मात्रा बढ़ती ही जा रही है।

आज के विचारकों की वाणी में मृत्यु संख्या की अधिकता उस देश की असभ्यता का परिचारक है। शायद, असंयमित और अव्यवस्थित जीवन क्रम के आधार पर ही इन शब्दों की सृष्टि हुई हो। इस विचार की संगतता में भारत सबसे अधिक असभ्य देश माना जायगा। वर्तमान काल में मृत्यु संख्या का क्रम यों बताया जाता है—

1. अमेरिका—10-6 प्रति हजार

2. जर्मनी—12-3 “ “

3. ब्रिटेन—12-2 “ “

4. फ्रांस—15-3 “ “

5. जापान—17-6 “ “

6. भारत—26-6 “ “

इस मृत्यु संख्या वाली सभ्यता के हिसाब से भारत इस समय सर्वाधिक असभ्य देश हैं, किन्तु मृत्यु संख्या का क्रम प्रतिवर्ष घटता जा रहा है, इससे यह माना जाना चाहिये कि सभ्यता में हमारी (भारत की )प्रगति हो रही है।

भारत के शासक मण्डल ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुधारने की ओर समुचित ध्यान दिया है। पञ्चवर्षीय योजना में औषधि, सफाई, मलेरिया निरोधक योजना, प्रसूति गृह, सन्तान नियमन, चिकित्सालय आदि के लिये करोड़ों रुपये खर्च किये जाने की स्वीकृति दी गयी एवं तदनुसार कार्य भी किये जा रहे हैं, इस से क्रमशः मृत्यु संख्या घटने में गति बढ़ती जाती है, पर इससे खाद्यान्नों की समस्याओं का समाधान तो नहीं हो पाता है। देश के किसी न किसी भाग में बाढ़,

भूकम्प,अतिवृद्धि अनावृष्टि आदि का संकट बना ही रहता है अतः यहाँ की जनसंख्या और खाद्यान्न का उत्पादन भी बढ़ा दिया जाय और स्वास्थ्य की रक्षा के सारे सम्भव उपायों से काम लेकर,

अनुकूल स्थिति भी बनाली जाय, पर इससे जनसंख्या की अतिवृद्धि तो रुक नहीं सकता।

सन्तति निरोध की समस्या का समुचित समाधान क्या है? क्या कानून और विधान का

कठोर नियन्त्रण इसकी सफलता में सक्षम हो सकता है? कदापि नहीं। तो इस स्थिति से बाहर

निकलने का उपाय क्या होगा?

शिक्षा और सदाचार मय जीवन का प्रचार और प्रसार ही इसके प्रधान उपायों में से एक है। यह प्रचार और प्रसार (ही इसके प्रधान उपायों में से एक है यह प्रचार और प्रसार) वारणी के साथ मनोभावों एवं आचरणों तक में उतारना होगा, जिससे हम सभी राष्ट्र के उत्तरदायित्व के साथ उत्पन्न किये सन्तानों के विकास और उन्नति का उत्तरदायित्व भी अपने हृदय में धारण कर सदाचारमय जीवन बिताने की निष्ठा में रहें और चलें।


तपोभूमि—समाचार

1—गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति की तैयारियाँ पूरी तत्परता से चल रही हैं। अनेक कार्य निपटाये जा चुके हैं, अनेक कार्य हाथ में हैं, जो कार्य अभी तक किन्हीं कठिनाइयों के कारण आरम्भ नहीं किये गये उन्हें शीघ्र ही आरम्भ करने का विचार है। नियत समय तक सब कार्य पूरे हो जाने की आशा की जा रही है।

2-चैत्र की नवरात्रि ता.12 अप्रैल से आरम्भ की जायगी। जिन्हें अवकाश है तथा जो पूर्णाहुति के कार्यों में हाथ बटावेंगे वे नवरात्रि से एक दो दिन पहले ही आ जावें। उन दिनों 28 हजार का एक अनुष्ठान कराना, यज्ञ में भाग लेना तथा व्यवस्था सम्बन्धी कार्यों में हाथ बटाना उनके लिये संभव होगा। जो परिजन पूर्णाहुति से पूर्व आना चाहते हैं वह अपने आने की पूर्व सूचना देंगे, ताकि कार्यकर्ताओं की संख्या का पूर्व आभास हो सके।

3—चैत्र सुदी 15 को पूर्णाहुति समाप्त होते ही, सांस्कृतिक शिक्षा शिविर प्रारम्भ हो जायगा, जिसका विस्तृत विवरण पिछले पृष्ठों पर छपा है। यह शिविर सप्ताह चलकर जेष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती को समाप्त होगा। आवश्यक विषयों का शिक्षण पूरे परिश्रम पूर्वक होगा। शिविर में भाषण देने के लिए बाहर के विद्वान भी आमंत्रित किये जावेंगे। जो व्यक्ति इस शिक्षा शिविर में 7 सप्ताह ठहरना चाहें वे भी अपने निश्चय की पूर्व सूचना दे दें। ताकि उनके ठहरने, भोजन आदि की व्यवस्था का नियन्त्रण किया जाय।

4—अगले वर्ष बड़े साँस्कृतिक सम्मेलनों के साथ स्थान-स्थान पर 108 गायत्री महायज्ञ कराने की योजना की जाय। जहाँ के उपासकों में उत्साह हो वे अपने यहाँ के लोगों से परामर्श करके आवें और पूर्णाहुति के समय मथुरा में अपने निश्चय की सूचना दे दें। यहाँ से उनके कार्य को सफल बनाने के लिए कुछ सुविधाओं का प्रबन्ध किया जायगा।

5. अनेक व्यक्ति घर से ‘रिटायर’ होकर तीर्थवास तथा तप, भजन का विचार किया करते हैं। ऐसे अनेक व्यक्ति तथा उनके पत्र यहाँ आते रहते थे। अब तक स्थान सम्बन्धी असुविधा होने के कारण किसी को स्वीकृति नहीं दी जा रही थी, अब नये 7 कमरे बन जाने से वह कठिनाई हल हो गई है। गुण,कर्म स्वभाव को देखकर अब इस प्रकार की इच्छा करने वाले व्यक्तियों को तपोभूमि में रहने की स्वीकृति दी जा सकेगी। इतना जप,तप यज्ञ हो चुकने के कारण तथा प्राचीन काल से ऋषियों की तपोभूमि रहने के कारण इस स्थान में तप भजन में अभीष्ट सफलता की पूरी संभावना है। साधन में पथ प्रदर्शन,नित्य यज्ञ में सम्मिलित होने का लाभ, धर्म ग्रन्थों के स्वाध्याय के लिए विशाल पुस्तकालय, सत्संग,साँस्कृतिक शिक्षा आदि के अनेक लाभ ऐसे हैं जो अन्यत्र कठिनाई से ही मिल सकते हैं। जो यहाँ निवास करना चाहें वे पत्र व्यवहार एवं परामर्श कर लें।

6—साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम को देश व्यापी बनाने के लिए हर धर्मप्रेमी का श्रम तथा समय लगना चाहिए। अखंड ज्योति के पाठकों से प्रार्थना है कि कुछ समय इन कार्यों के लिए भी निकालें ! नैतिक सुस्थिरता का वातावरण तैयार करने के लिए सच्चा मन और सच्चा श्रम ही ईंट चूने की तरह काम दे सकता है। साँस्कृतिक सेवा शृंखला की तीन श्रेणियों में से किसी न किसी में हम में से हर एक को सम्मिलित होना चाहिए।

7—पूर्णाहुति के अवसर पर गायत्री तपोभूमि में विधिवत् यज्ञोपवीत एवं गायत्री मन्त्र लेने वालों के लिए 20 अप्रैल निश्चित की गई है। इस प्रयोजन के लिए एक दिन पूर्व ता. 19 को मथुरा पहुँच जाना आवश्यक है।

8—प्रत्येक प्रेमी से प्रार्थना है कि इसी अंक में पृष्ठ 35 पर छपे हुए साँस्कृतिक कार्यक्रम को दो बार ध्यान पूर्वक पढ़े और उस सफल बनाने के लिए अपने विचार एवं सुझाव हमें लिखें।


नरमेध का आह्वान


नरमेध का आह्वान (Kavita)

युग परिवर्तन की बेला में उठ चलो बढ़ो रे चलो, चलो।।

ऊषा के ऊपर आच्छादित, हट रहा सघन तम का वितान। प्राची से बोला शंखचूड़, रे सोने वालो सावधान।।

गत हुई निशा, उग रही उषा, निद्रा तोड़ो-तन्द्रा छोड़ो। जगने की बेला आ पहुँची, आलस प्रमाद से मुख मोड़ो।।

बढ़ रहे पथिक चलने वाले कब से अब तुम भी बढ़ो-चलो।। युग।।

मैं बढूँ, मजा लूँ मौज करूं, मेरा हित, स्वार्थ सधे मेरा। अपना सुख, अपनी खुदगर्जी, चाहे कुछ, अनहित हो तेरा।।

इस तरह न सोचो रे पगलो! इस तरह सोचना बन्द करो।। सबके हित में अपना हित है, सब साथ बढ़ो, सब साथ चलो।।

बर्बादी का युग चला गया, गिर लिये जहाँ तक गिरना था। अब और कहाँ तक लौटोगे, फिर लिये जहाँ तक फिरना था।।

हो चुकी धर्म की ग्लानि विपुल, अब इस अधर्म का नाश करो। अवतरित नये युग का प्रकाश, अगवानी करने बढ़ो चलो।। युग.।।

वह पावन संस्कृति फिर पनपे, जिसमें मानवता है प्रधान। जिसका सत्, प्रेम, दया, मैत्री, तप, त्याग, सदाशयता विधान।।

वह अपनी संस्कृति फिर पनपे, नैतिकता जिसमें ओत-प्रोत। जिस से झरते समता, ममता, सेवा, संयम के दिव्य स्रोत।।

तपसी भागीरथ! इस गंगा को भू पर लाने बढ़ो-चलो ।।युग.।।

अस्थियाँ दान करने वाले, देखो दधीचि कुछ माँग रहे। लो सुनो-सुनो अर्हन्त बुद्ध, चुप-चुप कुछ तुम से माँग रहे।।

शिवि, हरिचन्द्र, बलि, भरत, कर्ण, कच रोहिताश्व से बड़ भागी। कंजूसों! इन्हें निराश न लौटाओ, कुछ देने बढ़ो, चलो ।। युग.।।

युग ने ली अँगड़ाई है, आत्मा भारत की जाग चली। सुन गुडाकेश का पाँचजन्य, भीरुता-दासता भाग चली।।

दे रहा चुनौती यौवन को, कर अट्टहास मरघट-मसान। “नरमेध” ढूँढ़ता मुर्दों में, क्या है रे कोई प्राणवान।। बलिदान करो बलिदान करो, मत रुको-डरो मत, बढ़ो चलो।।युग.।।

*समाप्त*