करो नित गायत्री का जाप

(श्री शिवशंकर मिश्र)


करो नित गायत्री का जाप (Kavita)

करो नित गायत्री का जाप!

रहेगा मन में क्लेश न शेष, रहेगा नहीं किसी से द्वेष,

मिलेगा जगती में सम्मान— अलौकिक जीवन का संदेश, यहाँ प्रति अक्षर में वरदान, यहाँ प्रति अक्षर हरता ताप!

करो नित॰------------

मिलेगा तुमको परमानन्द, सत्य की पावन ज्योति अमन्द, दिखेगा पुण्य मुक्ति का पन्थ— टूट जायेंगे सब भव बन्ध, अरे कैसा सम्मोहक मन्त्र कि आशीष-सा बन जाता शाप!

करो नित॰----------

स्वयं होगा कुण्ठा का नाश, त्याग नव होगा, नव-विश्वास, विगत-तम की छाया से दूर बनेगा नव मानव-इतिहास, करो तुम पूर्णाहुति दे क्षार जन्म भर के संचित संताप!

करो नित॰---------


गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति

गायत्री तपोभूमि में विशाल समारोह, गायत्री नगर का निर्माण, देश के कोने-कोने से गायत्री उपासकों का आगमन।

(श्री ‘प्रत्यक्षदर्शी’)

गत 15 महीनों से अखण्ड रूप से चलने वाले विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति की प्रतीक्षा सभी गायत्री उपासक बड़ी उत्सुकतापूर्वक कर रहे थे, वह पावन बेला गायत्री माता की कृपा से 20 अप्रैल को आ गई। उसके पहले ही दो, तीन दिन से गायत्री उपासकों के दल के दल दूरवर्ती प्रान्तों से आकर गायत्री तपोभूमि के निकट ही गायत्री-नगर में टिक गये थे। 19 तारीख की शाम तक तम्बुओं की वह विशाल नगरी मनुष्यों से खचाखच भर गई। चारों तरफ फैली तम्बुओं की लम्बी कतारें, बीच-बीच में चौड़े और स्वच्छ मार्ग तथा विद्युत दीपों की लाइनें एक अपूर्व दृश्य उपस्थित कर रही थीं। 19 तारीख की शाम को इस महोत्सव के सभी विभाग पूर्ण वेग से अपना-अपना कार्य सम्पादित करने लग गये थे और मिनट-मिनट पर स्टेशन से ताँगे और रिक्शों में आने वाले गायत्री उपासकों को यथास्थान ठहराने तथा उनकी सुविधाओं की देख भाल कर रहे थे। 19 तारीख की रात में ही इन आगन्तुकों की संख्या तीन हजार से ऊपर पहुँच गई और यह अनुमान होने लगा कि कल परसों तक अवश्य पाँच छः हजार व्यक्ति समारोह में भाग लेने को एकत्रित हो जायेंगे।

20-4-56

20 ता॰ को सुबह चार बजे से ही गायत्री-नगर में अपूर्व हलचल दिखाई पड़ने लगी। नित्यकर्मों से निवृत्त होकर गायत्री उपासकों के दल तपोभूमि की तरफ चले और 5 बजे से ही 108 हवन कुंडों में हवन प्रारम्भ हो गया। इस समय तपोभूमि का दृश्य देखने ही योग्य था। चारों ओर हवन का सुगन्धित धूम भरा था और वेद मंत्रों का तुमुल घोष सर्वत्र सुनाई पड़ रहा था। हवन करने वाली दूसरी टोली के व्यक्ति पास ही बैठे प्रतीक्षा कर रहे थे। करीब 9॥ बजे तक हवन का कार्य समाप्त हो गया और तपोभूमि के आचार्य जी गायत्री माता की वन्दना करने खड़े हुये। आपका आज का प्रवचन बहुत ही भावपूर्ण तथा प्रभावशाली था जिसका साराँश नीचे दिया जाता है।

आत्म-दान

“माँ, जीवन में 20 वर्ष तक तेरी आराधना और प्रार्थना करने के पश्चात् हमें जो वस्तुयें, जो साँसारिक लाभ जो सफलतायें प्राप्त हुई उनका वर्णन करना अनावश्यक है। हमें गायत्री माता की कृपा से कौन-कौन भौतिक लाभ हुए उनके सम्बन्ध में विशेष कहना भी युक्ति युक्त नहीं जान पड़ता, क्योंकि माता की बच्चे पर ममता स्वाभाविक ही है और उसके पास जो वस्तुयें होती हैं उन्हें वह बच्चे को देती ही रहती है। इस प्रकार माता की कृपा से हमने कभी भौतिक पदार्थों का अभाव अनुभव नहीं किया, किन्तु अब तक हम एक अभाव अवश्य अनुभव करते रहे को निगाह से हम अभी तक अपने को वैश्य कहते रहे, क्योंकि ब्राह्मण का जो मुख्य गुण त्याग है वह हमको आने भीतर दिखाई नहीं पड़ रहा था। ब्राह्मण को परिग्रही नहीं होना चाहिए। जिसके पास जितना परिग्रह होगा उसके पास आत्मबल की उतनी ही न्यूनता होगी। आजकल के व्यक्ति बड़े-बड़े काम करके दिखला रहे हैं, पर ब्राह्मणत्व के दर्शन बहुत कम होते हैं। ब्राह्मण की वाणी निष्फल नहीं जाती, उसके वरदान तथा शाप सदा सफल होते हैं। प्राचीन ब्राह्मणों का सर्वस्व ज्ञान ही था और वे तपस्या, साधना में संलग्न रहते थे। आजकल हम वैसे ब्राह्मण नहीं रहे। यही कारण है कि हम सदैव ब्रह्मभोजों के निमंत्रण को अस्वीकार करते रहे, क्योंकि हमारे पास धन-धान्य था और हम उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्नशील भी रहते थे। ब्रह्मतेज तथा धनतेज दोनों एक साथ नहीं रह सकते। सरस्वती तथा लक्ष्मी का विरोध एक प्रसिद्ध बात है।

बहुत वर्षों से हमारे देश की संस्कृति का पतन हो रहा है और उसका कारण भी यही है कि हमारे यहाँ सच्चे ब्राह्मणों का अभाव हो गया है। पिछले 20 वर्षों से हम निरन्तर यही अनुभव करते आ रहे हैं कि जब तक हम ब्रह्मणत्व को प्राप्त नहीं करेंगे हमारे द्वारा भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान का कार्य कभी सम्पन्न नहीं हो सकता। शंकराचार्य का उदाहरण हमारे सामने है। उन्होंने समाधि नहीं लगाई, उपवास करके शरीर को नहीं सुखाया, आँखें बन्द करके निर्जन वन में भगवान का ध्यान नहीं किया, वरन् 25 वर्ष की आयु में घर से निकलते ही उन्होंने भारतीय संस्कृति की रक्षा का बीड़ा उठाया। उनको भगंदर की बीमारी थी, पर उसकी पीड़ा को नगण्य समझकर वे भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक भारतीय संस्कृति की रक्षा का सन्देश देते भ्रमण करते रहे और आठ वर्ष में ही एक चमत्कार करके दिखा दिया। स्वामी दयानंद ने भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिये अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगादी और अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया।

नरमेध भी ब्राह्मणों की परम्परा का एक रूप है। जिसके द्वारा हम अपना सर्वस्व और जीवन भी समाज और संस्कृति की सेवा के लिए अर्पण कर देते हैं। इस अवसर पर गायत्री तपोभूमि में इसी नर में का आयोजन किया गया है और उसकी पूर्ति के लिये जीवन अर्पण कर रहे हैं। वास्तव में जो कुछ हम जबान से कहते हैं उसे कार्य रूप में परिणत नहीं करते तो उसका कोई मूल्य नहीं है। आज हम देश का नैतिक स्तर गिरा हुआ है और इसी के फल से हम नाना प्रकार के अभावों में ग्रस्त हैं। इसलिये आज हमारा सबसे बड़ा कर्त्तव्य भारतीय संस्कृति का पुनरुत्थान और उसकी रक्षा ही है। हमारी जनता के मार्ग में जो कठिनाइयाँ हैं, उनको दूर करना भी आवश्यक कार्य है। हमारे भीतर जो अनेक प्रकार की बुराइयाँ भरी हैं उनको स्थापना भी कम महत्व की बात नहीं है।

यह भगवान की कृपा ही है कि इतने बड़े यज्ञ का आयोजन गायत्री उपासकों की सहायता से पूर्ण हो गया। फिर भी यज्ञ-भगवान का सन्तुष्ट करने के लिये किसी बड़ी भेंट की आवश्यकता है जिससे हमको अपने आगामी उद्देश्य में सफलता का आशीर्वाद प्राप्त हो सके। इसलिए आज हम अपने समस्त शक्ति यों को और हमारे पास जो कुछ भी भौतिक सामग्री है यज्ञ-भगवान के अर्पण करते हैं। इस प्रकार जिस वस्तु अर्थात् ब्राह्मणत्व को प्राप्त करने के लिए हम बहुत समय से इच्छुक थे वह हमें आज इस त्याग द्वारा प्राप्त हो गया। अब यदि हमको कोई ब्राह्मण कहे तो हमको संकोच नहीं जान पड़ेगा।

माँ, तुमने ही कृपा करके हमको यह त्याग कर और उसके द्वारा ऊँचा उठ सकने का सुयोग दिया है। इन थोड़े से भौतिक पदार्थों जेवर, पुस्तकें, प्रेडडडड जमीन—के सिवाय हमारे पास और कुछ नहीं है तुम इनको स्वीकार करो यही हमारी प्रार्थना है। हम ब्राह्मण बन कर समाज की सेवा करने में समर्थ डडडड आशीर्वाद हमको दो।


समारोह का उद्घाटन

सायंकाल के समय लगभग 7 बजे उद्घाटन समारोह की कार्यवाही आरम्भ हुई। मंगलाचरण और भजन के उपरान्त स्वामी परमानन्द ने परमात्मा की भक्ति के लिये गायत्री माता की शरण लेने पर एक प्रभावशाली भाषण दिया। इसके पश्चात् आचार्य जी ने सब आगंतुकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा-हमने आपको यहाँ एक विशेष उद्देश्य से ही बुलाकर एकत्रित किया है। आप लोग जो अपना काम काज छोड़ कर, किराये आदि में बहुत सा रुपया खर्च करके जो यहाँ तक आये हैं, उसका उद्देश्य कोरा शैर तमाशा नहीं हैं। यह उन गायत्री उपासकों को सम्मेलन है जिनको हमने बारह वर्ष तक एक विशेष प्रकार की शिक्षा ‘अखण्ड ज्योति’ के द्वारा दी है। इन लोगों में अनेकों ऊँची श्रेणी के विद्वान तथा कार्यकुशल लोग सम्मिलित हैं। हमने इतने वर्षों के परिश्रम से जो 10 - 15 हजार योग्य व्यक्ति समस्त देश से संग्रह किये हैं, 5 - 6 हजार व्यक्ति उन्हीं में से इस समारोह में भाग लेने आये हैं। यहाँ बुलाकर केवल इनसे हवन कराना ही हमारा उद्देश्य नहीं है। वह कार्य तो हम आपसे घर में भी करा सकते थे। वास्तव में ऐसे यज्ञ किसी विशेष उद्देश्य से ही किए जाते हैं। जैसे प्राचीनकाल में अश्वमेध यज्ञ राजनैतिक समस्याओं पर विचार करने और उन्हें सुलझाने के लिए किये जाते थे। गोमेध यज्ञों का उद्देश्य कृषि सम्बन्धी समस्याओं पर विचार करना होता था। इसी प्रकार बहुत से यज्ञ या सत्र होते थे, जिनमें किसी एक विचारधारा के लोग इकट्ठे होकर उस विषय पर विचार करते थे। हमारे यज्ञ को यद्यपि कुछ विरोधी लोग ‘फुलका यज्ञ’ का नाम दे रहे हैं क्योंकि इसमें उनको लड्डू, पेड़ा मिष्ठान्न के दर्शन नहीं हो पाते। हमारे इस महायज्ञ का उद्देश्य अपनी वर्तमान साँस्कृतिक अवस्था पर विचार करके उसके पुनरुत्थान का प्रयत्न करना है। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे देश और समाज का नैतिक स्तर बहुत गिर गया है। हम इस बात को भूल गये हैं कि मनुष्य का सच्चा कर्तव्य क्या है? यह बड़े ही दुर्भाग्य का विषय है, क्योंकि किसी देश या राष्ट्र की सब से बड़ी संपत्ति विचारों और नैतिकता की ही संपत्ति होती है। देश की सरकार केवल राजनैतिक क्षेत्र में कार्य कर सकती है। नैतिक क्षेत्र में वह अधिक कार्य नहीं कर सकती। यह कार्य जनता ओर उसके समझदार अग्रगामी व्यक्ति यों का है कि वे अपने भाई-बहिनों के नैतिक और साँस्कृतिक उत्थान के लिये कार्य करें। आज हम ब्राह्मण के रूप में आपसे इन्हीं बातों की भिक्षा माँगते हैं। हमने आपसे कभी धन-धान्य की माँग नहीं की, क्योंकि यह हमको माता गायत्री की कृपा से आवश्यकतानुसार मिल जाता है और फिर इस प्रकार माँगा हुआ बिना श्रद्धा का धन महत्वशून्य होता है। हम आपसे आपके समय, श्रम, सहयोग भावना की माँग करते हैं, जिसके द्वारा नैतिक और साँस्कृतिक उत्थान के महान आयोजन को सफल बनाया जा सके।

अब अन्धकार की रात समाप्त हो रही है और उन्नति का नया प्रभात प्रकट हो रहा है। देश का भविष्य पलट रहा है। विदेशी आक्रमणकारी हमको बहुत सी बुराइयाँ दे गये थे। इनके कारण हमारे धर्म और चरित्र का बड़ा ह्रास हुआ और आजकल अधिकाँश धर्म कार्य भी बिना लक्ष्य और उद्देश्य के हो रहे हैं। हमारे इस आयोजन का उद्देश्य अपने धार्मिक साँस्कृतिक और नैतिक कार्यों को फिर से एक विशेष उद्देश्य और लक्ष्य के अनुसार चलाना है। इस महान कार्य की जिम्मेदारी ब्राह्मणों की है। समाज आप ही का मुँह देख रहा है। इस समय आवश्यकता है कि हम सब अपनी अपनी जिम्मेदारी को समझ कर कार्य करने में संलग्न हो जाय। अभी ऐसा जान पड़ता है कि यह एक स्वप्न है और हम सपनों की दुनिया में रहते हैं। हम आपको भी इस सपनों की दुनिया में आने का निमन्त्रण देते हैं। अगर हम सब कदम मिला कर आगे बढ़ते जायेंगे तो अवश्य अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल होंगे।

स्वागताध्यक्ष का भाषण

आचार्य जी के प्रवचन के समाप्त होने पर गायत्री महायज्ञ के स्वागताध्यक्ष श्री लक्ष्मीरमण आचार्य ने समवेत सज्जनों को सम्बोधन करते हुए कहा—आचार्यजी हमारे पुराने साथी हैं। उन्होंने इस समय अपना कार्यक्रम पृथक चुना है पर हमारा और उनका उद्देश्य एक ही है। हमने अपने धर्म को बहुत सी रूढ़ियों और कुसंस्कारों से बाँध डाला है जिससे हमारे समाज का बड़ा पतन हुआ है। अब हम एक नये युग में नये मानव का सृजन कर रहे हैं। मानव ने आज न्याय स्वीकार किया है। यह बात भ्रातृत्व की भावना के प्रतिकूल है कि हमारे समाज में एक व्यक्ति बहुत बड़ा और दूसरा बहुत छोटा हो। हमने न्याय को न्याय द्वारा, सत्य को सत्य द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा की है। आपकी आत्मा में इस मन्त्र का फूँकने के लिए ही समवतः आचार्य जी ने इतना बड़ा समारोह किया है।

इसके पश्चात् स्वागताध्यक्ष ने अपना लिखित भाषण पढ़ कर सुनाया जो निम्न प्रकार था:—

गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के इस अवसर पर पुण्यतोया माता यमुना के तट पर मैं आप सभी का हृदय से स्वागत करता हूँ।

मथुरा नगरी ने अपने विपुल इतिहास काल में अगणित उत्थान और पतन के दृश्य देखे हैं। भारत भूमि के ज्ञात इतिहास में सदा से इस महान् नगरी का विवरण आता है। प्रायः साँस्कृतिक उत्थान के प्रत्येक स्थल पर इस नगरी ने अपना स्थान पाया है और इसके अनुरूप अपने को प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। केवल वैदिक युग में ही, नहीं मध्यकालीन बौद्ध युग में भी यह नगरी बौद्ध संस्कृति का विवरण केन्द्र रही है। इस नगरी के चारों और फैले हुए खँडहर, संस्कृतियों के अवशिष्ट चिन्हों के रूप आज तक वर्तमान हैं। नगरी के पश्चिम में कटरा केशवदेव की पुण्य भूमि, उससे थोड़ी दूर डडडड वन, महोली के वन प्रदेश, स्थान-स्थान पर डडडड स्तूपों के अवशिष्ट डडडडीले सभी इस पुण्य भूमि के विशाल ही विशाल वैभव के और उसकी साँस्कृतिक देव स्तम्भ है। नगरी के मध्य में स्थित पुरातत्व संग्रहालय हमारे महान् इतिहास का अनुपम साक्षी इसी के द्वारा जिस साँस्कृतिक का इस देश ने उद्भव किया तथा जिस साँस्कृतिक ओज को इस देश को अपनी धमनियों में स्थान देकर विश्व-मानव की कल्पना की तथा जिस संस्कृति को भगवान् कृष्ण ने इस जन्म स्थान पर बराबर गढ़ा गया उस सभी को प्रमाणित होते देर नहीं लगती। यह सब होते भी यह सही है, कि भागवतकार ने इस भूमि के सम्बन्ध में कहा कि—

जयति तेऽधिकं जन्मना ब्रजः। श्रयत् इन्दिरा शश्वदत्रहि॥

यह भूमि सचमुच भगवान् कृष्ण के जन्म से धन्य हो गई और उन्हीं के जन्म के कारण सदा इति श्री और कल्याण का निवास रहता है। यह तो संभव ही है कि लीलामय भगवान् कृष्ण के जन्म ने, उनमें अपार्थिव लीलाओं ने तथा उनके महान् व्यक्ति त्व से इस भूमि को भारतीय इतिहास पटल पर एक अनुसंधान स्थान प्रदान किया है। भारतीय इतिहास के उस डडडड में जबकि यहाँ की मानवता राजनैतिक दासता के शृंखलाओं में बँध चुकी थी। इस भूमि ने कृष्ण कडडडड के द्वारा समस्त भारत के मानस पर भक्ति , श्रद्धा और प्रेम की एक ऐसी अजस्र धारा बहाई है कि डडडड द्वारा यहाँ के मानव ने चेतना प्राप्त की, प्रेरणा प्राप्त की, और उसकी आत्मा सदा के लिए कुचले जाने से बच गई। इतिहास के पृष्ठों पर न जाने कितना संस्कृतियों का उदय हुआ है कहीं पर मानव ने देवत्व की ओर बढ़ने की चेष्टा की है और वहीं पर विविध संस्कृतियों के द्वारा इसने प्रकाश पाने की चेष्टा की है तथा उन्हीं संस्कृतियों के द्वारा महान् जातियों का उत्थान हुआ किन्तु आज तो वह जातियाँ और वह संस्कृतियाँ कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती! काल के कराल गाल में वह अन्तर्ध्यान हो गई। थोड़े से खंडहरों के कुछ अवशिष्ट चिन्ह प्राप्त होते हैं मिश्र देश में नील नदी के आस-पास पाये जाने वाले कुछ थोड़े से खण्डहर नील नदी के तट पर रहने वालों की एक महान् जाति के गौरवमय इतिहास की ओर इंगित करते हैं किन्तु वह साँस्कृतिक जाति आज समाप्त हो चुकी है और इसी प्रकार शौर्य और ओज से भरी हुई रोमन जाति के भी आज कहीं चिन्ह नहीं मिलते। मोहन जोदड़ो, हड़प्पा, मथुरा या वाराणसी के तट पर रहने वाली जाति आज भी जीवित हैं। उनका राजनैतिक पराभव आज समाप्त हो चुका है। इस देश की महान् जाति के करवट बदल कर आज एक दूसरी गौरवमय यात्रा पर अपना पग बढ़ाया है। आखिर इसका कुछ तो कारण है। इन कारणों में से प्रमुख कारण हमें अपने को समझने और अपने को अवसर पर बदल लेने की और हमारी मान्यताओं में परिवर्तन कर लेने की एक प्रवृत्ति है। गायत्री तपोभूमि के इस प्राँगण में आज उसका व्यवहारिक रूप हम देखते हैं।

ज्ञान त्याग तप शौर्य, बलिदान हमारी महान् साँस्कृतिक मान्यतायें हैं। बहुत देशों और बहुत मनुष्यों के भगवान् के प्रति किये जाने वाली प्रार्थनाओं को हम जानते हैं। आज इन सबके विवरणों को देखकर हमें अपनी स्तुति के अपराध का भागी नहीं होना चाहिए। केवल इतना कहना चाहता हूँ कि गायत्री मन्त्र के द्वारा की जाने वाली प्रार्थना अनुपम है। भगवान् हमारी बुद्धि को तीक्ष्ण करे, यही हम प्रार्थना करते हैं। ‘धियो योनः प्रचोदयात्” के द्वारा इसके अतिरिक्त भगवान् से हम कोई कामना भी नहीं करते। जीवन में यह ज्ञान के अन्त का प्रतीक है। भगवान् के प्रति भी हम किसी नैराश्य, दैन्य या माया के द्वारा उत्पन्न दुःख और सुख की प्राप्ति का बचने की प्रार्थना को कोई स्थान नहीं देते। इसके विपरीत केवल यही माँगते हैं कि हमारी बुद्धि को बल प्राप्त हो। गीता तथा उपनिषद् के द्वारा बौद्धिक निष्काम कर्म जिसमें मनुष्य “पद्मपत्र-मिवाम्भसा” की वृत्ति को स्वीकार करें। संसार में ऐसे रहे जैसे कमल का पत्ता जल में रहता है। दुःख और सुख, मान और अपमान तथा जीवन के विविध छंदों से ऊपर उठकर योगी बनें, श्रद्धा और विश्वास को अपने जीवन में स्थान प्रदान करें और उसके द्वारा ज्ञान को प्राप्त करें।

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयनेन्द्रिय। ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्तिमचिरैणाविगच्छति॥

अर्थात् जितेन्द्र और विद्वान् व्यक्ति ज्ञान को तुरन्त प्राप्त करता है और ज्ञान को प्राप्त करने के बाद मनुष्य प्रेम और स्नेह को प्राप्त होता है।

सज्जन वृन्द! संभवतः यह हमारी संस्कृति का केन्द्र बिन्दु है। ज्ञान के द्वारा हम सभी लोग मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं ऐसा हमारा विश्वास है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए हम भगवान से, नित्यप्राँत प्रार्थना करते हैं कि हमारी बुद्धि निर्मल हो और सुतीक्ष्ण हो, गायत्री तपोभूमि में गायत्री महायज्ञ का सम्भवतः यही रूप है। गायत्री महायज्ञ 125 करोड़ जप 125 लाख आहुति, 1250 ज्ञान पुस्तकालय की स्थापना रुद्र यज्ञ, ब्रह्म-यज्ञ, सरस्वती-यज्ञ महामृत्युञ्जय-यज्ञ, नवग्रह-यज्ञ, पितृ-यज्ञ यजुर्वेद-यज्ञ, ऋग्वेद-यज्ञ, अथर्ववेद-यज्ञ, सामवेद-यज्ञ, तथा अनेकों शृंखलाओं के साथ पिछले पन्द्रह मास से सम्पन्न किया जा रहा है।

हमारी संस्कृति में यज्ञ शब्द त्याग और तप का द्योतक रहा है। प्रारम्भ से हमने अपने जीवन में यज्ञ को एक विशिष्ट स्थान प्रदान किया है। यज्ञ के द्वारा किये गये कर्म को हमने निष्कलुप और निष्काम कर्म माना है तथा ब्रह्मा के सम्बन्ध में भी हमारा यह विश्वास रहा है कि उसने सृष्टि की रचना यज्ञ के द्वारा की। यज्ञ के द्वारा मनुष्य बुद्धि को प्राप्त होता है, ऐसा भी हम लोग विश्वास करते हैं। भगवान कृष्ण ने गीता में कहा है—

सहयज्ञाः प्रजासृष्ट्वापुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यव्वमेपवोऽस्त्विष्टकामधुक्॥

इसके साथ 2 भगवान कृष्ण ने यह भी कहा—

यज्ञार्थर्त्कमणोऽन्यत्रलोकोय कर्मवन्धनः। तदर्थ कर्मकौंतेय मुक्त संगः समाचार॥

अर्थात् यज्ञ के लिए किये गये कर्म के अतिरिक्त और सारे कर्म बन्धन है। इसलिए हे अर्जुन त् आ क्ति से रहित हो कर्म को कर अर्थात् यज्ञ के लिए कर्म कर। इस तरह हमने एक प्रकार से जीवन को अनन्य भाव से यज्ञ से सम्बद्ध किया है।

इतिहास के मध्यकालीन युग में हम सभी इससे गिरे हैं दासता में बंधा हुआ यहाँ का निरीह मानव नित्यप्रति स्वार्थ की ओर अग्रसर होने लगा। यज्ञ की भावना, निष्काम कर्म का गौरवमय रूप, मनुष्य को ऊँचा उठाने वाली प्रवृत्तियों के बन्धन नित्यप्रति शिथिल पड़ते चले गये ज्ञान और प्रकाश का स्थान अन्धकार और कुसंस्कारों ने ग्रहण कर लिया। हमारे विविध यज्ञों में पशुबलि और नरबलि जैसे जघन्य अपराधों को स्थान दिया जाने लगा। सभी यज्ञों पर कुसंस्कारों और अन्धकारों ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया। गायत्री तपोभूमि में यज्ञ का स्वच्छ रूप आपको देखने को मिलेगा। आपको ज्ञात ही होगा कि इस महोत्सव की साँस्कृतिक अर्पित योजना में नरमेध-यज्ञ की व्यवस्था की गई है। पाखण्डों ने युगों तक इस यज्ञ को मानव रक्त से कलुषित किया है और नरमेध का स्थान नरबलि ने वर्षों 2 तक लेकर उन हमारी महान परम्पराओं को बर्बरता की चरम सीमाओं तक पहुँचा दिया है। कुछ नवयुवक इस तपोभूमि में नरमेध यज्ञ के द्वारा अपने आपको इस देश की राजनैतिक साँस्कृतिक और सामाजिक उत्थान के लिए अर्पित करेंगे। यही हमारे नरमेध का साँस्कृतिक रूप है।

सज्जन वृन्द! क्या आज हम अपने साँस्कृतिक उत्तरदायित्व को समझ पा रहे हैं? हमारा राष्ट्र और हमारी संस्कृति भी महान् रही है। मानवता के शिक्षक के रूप में अपने परिपक्व विचार और दर्शन के द्वारा हमने जन जीवन को अमोघ शक्ति प्रदान की है। इतिहास के बीच के पृष्ठों में हमारा राजनैतिक, साँस्कृतिक और सामाजिक पराभव हुआ आज हम फिर आगे आये हैं। हिंसा, घृणा और पशुबल से त्रस्त मानव के सामने कुछ नये दर्शनों की हमने सृष्टि की है। क्रान्ति को एक नया रूप हमने प्रदान किया है । सभी धर्मों ने एक मत से जीवन को सुखी बनाने के लिए मानव की उदात्त भावनाओं को व्यवहारिक रूप प्रदान करने की माँग की है। मनुष्य ने कुछ सुना है कुछ नहीं सुना है तो केवल व्यक्ति गत जीवन में, सामूहिक दुष्परिणाम स्वरूप मानव अपने सारी संस्कृति और सम्पदा की पोटली अपने कन्धे पर लादकर गर्त्त के एक किनारे पर आकर खड़ा हो गया है और वहाँ से निकलने का उसे स्थान नहीं दिखाई देता। युग-युग की संचित हमारी साँस्कृतिक वाणी को मूर्त रूप प्रदान कर राष्ट्र पिता गाँधीजी ने इस मानव को एक नई मोड़ प्रदान करने की चेष्टा की। यह हमारी साँस्कृतिक वाणी सुनी जाये तो आज मनुष्य घृणा, भय और हिंसा से बाहर निकल कर प्रेम सत्य और अहिंसा के मार्ग पर आकर अपने आप को सुखी बना सके। इसके लिए हम प्रयास कर सकें। सम्भवतः यह हमारा आज महानतम उत्तरदायित्व है।

आज इस देश के नवयुवक इस कार्य को कैसे पूरा करे। वह अपने द्वारा इस कार्य को पूरा करने की तैयारी में सम्भवतः लग चुका है। नरमेध यज्ञ के द्वारा गायत्री महायज्ञ के परायण के द्वारा श्रीराम जी आचार्य ने एक दूसरे मार्ग की ओर हमें बुलाया है ऐसा प्रतीत होता है।

आपको ज्ञात होगा इस देश का साधु-समाज भी इस कार्य के लिए अपनी कमर कस रहा है। वह भी इसके लिए तैयारी कर रहा है। हमारे देश में साधु और संन्यासियों का एक विशाल समुदाय है। यह उन व्यक्ति यों का समुदाय है जो कि प्रतिबिम्ब के जीवन को दृश्य जगत या माया के रूप में मानता है। वैराग्य साधन के द्वारा मुक्ति की ओर अग्रसर होने की चेष्टा करता है। आज यह समुदाय सारे भौतिक सुखों से विमुख होकर केवल भगवान की आराधना में अपने को समर्पित करता है। ऐसा समाज यदि आज इस देश के ऐतिहासिक उत्तरदायित्व को सुनले और देश के साँस्कृतिक सामाजिक, आर्थिक पुनर्निर्माण में लग जाय तो उसमें कुछ अनोखी बात नहीं है।

साधारण व्यक्ति के मन में बहुत सी शंकायें जागती हैं वह विचारता है क्या इन मन्त्रों की ध्वनि से और इन यज्ञों से जिनमें मनों घृत और अन्य यज्ञ सामग्री अग्नि में होमी जाय कोई लाभ होगा? आज विज्ञान के युग में तो सम्भवतः इन शंकाओं के लिए स्थान नहीं रहा है। मुँह से निकली वाणी अखिल ब्रह्माँड में व्याप्त होती है। विज्ञान यन्त्रों के द्वारा इसे पकड़ लेता है और सहस्रों योजन दूर इनको सुन लेता है। यह वाणी ब्रह्माँड में व्याप्त बनी रहती है। गायत्री मन्त्र की वाणी जिसके द्वारा करोड़ों बार बुद्धि को प्रेरणा प्रदान की जाने की प्रार्थना दुहराई गई है व्याप्त होगी तो इसका प्रभाव कैसे निष्फल रह जावेगा और यदि वह प्रभाव पड़ेगा तो यह मनुष्य के मन को निर्मल और सबल ही बनायेगा। यही सम्भवतः इन यज्ञों का रूप हैं।

कुछ नई परम्पराओं को भी इस तपोभूमि में स्थान प्रदान किया गया है। चंदे के द्वारा यहाँ का कार्य सम्पन्न नहीं हुआ दिग्दिगंत से आये यज्ञकर्ताओं ने प्रायः इसको स्वयं ही वहन किया है। एक नये वातावरण की यहाँ सृष्टि की गई। यह वातावरण अधिक से अधिक शुद्ध हो सके और हमारा राष्ट्रीय चिह्न ‘सत्यमेव जयते’ को सिद्ध कर सके उसका यहाँ प्रयास किया गया है। इन सभी प्रेरणाओं के लिए हम उस व्यक्ति के ऋणी हैं जिसने वर्षों पूर्व स्वयं अपने मार्ग से इस उद्देश्य को सफल करने का बीड़ा उठाया, वह हैं आचार्य श्रीरामजी शर्मा जिनके प्रयास से यह सभी सम्पन्न हुआ है।”

स्वागताध्यक्ष महोदय के प्रवचन के बाद श्रीमुकुट बिहारीलाल शुक्ल [आगरा] ने गायत्री-परिवार के निर्माण और उद्देश्यों का परिचय देते हुये आचार्य जी के सर्वस्व दान की महत्ता पर प्रकाश डाला। फिर स्वागत मन्त्री श्री श्यामलाल अग्रवाल ने श्री अनन्त शयमनम् आयंगर [सभापति भारतीय लोक सभा] का परिचय देते हुये उनसे इस यज्ञ समारोह का उद्घाटन करने की प्रार्थना की। श्री आयंगर ने इस अवसर पर हिन्दी में जो प्रभावशाली भाषण दिया उसका साराँश नीचे दिया जाता है।

श्री आयंगर का भाषण

मैं यहाँ गायत्री माता के दर्शन करने आया हूँ। यह महायज्ञ सवा वर्ष से हो रहा है और अब उसकी पूर्णाहुति होने वाली है। हिन्दू धर्म में ही नहीं, समस्त विश्व में सबसे ऊँचा मन्त्र गायत्री ही है और सबको उसे जपना चाहिये। ईसाई भगवान का ध्यान पिता के रूप में करते हैं। बल्लभाचार्य ने भगवान का ध्यान वात्सल्य रूप में करने की विधि बताई। गौरांगनहा-प्रभु ने गोपीभाव से उपासना करने का उपदेश दिया। पर गायत्री मन्त्र में भगवान को तेज रूप मानकर उनसे केवल अपनी ही नहीं वरन् संसार भर की बुद्धि के निर्मल और उज्ज्वल करने की प्रार्थना की गई है। जब अर्जुन ने पूछा कि मैं भगवान का ज्ञान कैसे प्राप्त करूं और कैसे उनका ध्यान करूं तो भगवान कृष्ण ने यही कहा कि तुम जहाँ कहीं प्रकाश देखो वहीं समझलो कि भगवान हैं। अर्जुन ने कहा कि मैं एक ही स्थान पर भगवान का दर्शन करना चाहता हूँ। तब भगवान ने उसे विराट रूप दिखाया। संसार में जितने व्यक्ति हैं उन सबके सिर भगवान के सिर हैं, उनके हाथ भगवान के हाथ हैं, उनके पैर भगवान के पैर हैं। इसका अर्थ यह है कि सब जनता मिल कर ही भगवान का रूप है और उसकी सेवा करना ही भगवान की सच्ची पूजा है। यही हिन्दू धर्म का सार है। कि इस समस्त विश्व प्रपंच में भगवान को देखो और इस प्रपंच की सेवा करना भगवान की सेवा है। समाज की सुचारु रूप से सेवा के लिये भगवान ने उसके चार भाग कर दिये। पर आजकल समय बदल गया है। अब प्रत्येक व्यक्ति को चारों वर्णों को कर्तव्य-पालन करना चाहिये। इसके लिये गायत्री का संदेश सबसे श्रेष्ठ है। गायत्री सबसे अधिक शक्ति वाली प्रार्थना है।

भगवान की पूजा मानवता की सेवा ही है और आचार्यजी गायत्री के प्रचार द्वारा कई वर्षों से प्रशंसनीय समाज सेवा कर रहे हैं। भगवान कहते हैं कि जप ही सबसे बड़ा यज्ञ है। यह यज्ञ और भगवान की पूजा बहुत सहज बात है। आप यह निश्चय कर लीजिये कि ‘आपके चरण कमलों में मैं अपनी आत्मा को अर्पण करता हूँ’ तो भगवान स्वयं ही आपको लक्ष्य तक पहुँचा देंगे। भगवान से प्रार्थना करने का सर्वोत्तम मार्ग गायत्री का जप ही है, क्योंकि वह समस्त वेदों और उपनिषदों का सार है।

भारतवर्ष के निवासी अनेक हिस्सों में बँटे हैं। दक्षिण में हम लोग अपने को द्रविड़ कहते हैं, पश्चिम में ईसाई कहते हैं, उत्तर में सिख कहते हैं और जो थोड़े से व्यक्ति हमसे अलग हो गये हैं वे अपने को पाकिस्तानी कहने लगे हैं। पर इसका अर्थ यह नहीं कि हम वास्तव एक दूसरे से भिन्न हैं या एक दूसरे के विरोधी हैं। अगर एक दाढ़ी रखता है और दूसरा चोटी तो, इसमें लड़ने की क्या बात है? कहीं बालों के विभिन्न फैशनों के कारण भी कोई परस्पर में शत्रुता का भाव रख सकता है! भगवान मन्दिर या मस्जिद में ही नहीं रहता वरन् हर एक मनुष्य के भीतर भगवान मौजूद है। यदि मनुष्य को इस संसार से पार होना है तो वह किसी मनुष्य का हाथ पकड़ कर पार नहीं हो सकता वरन् उसे अपने हृदयस्थ भगवान का हो आश्रय लेना पड़ेगा।

हिन्दू धर्म में बार-बार यह कहा गया है कि पण्डित वही है जो सबको भगवत् स्वरूप देखता है। पर आजकल जमाना उलटा है। हम दरिद्र नारायण से तो विमुख रहते हैं और अमीरों के पैर धोते हैं। मैं यह नहीं कहता कि अमीर से लड़ाई कीजिये पर अमीर का भी उचित है कि वह अपने को अपनी सम्पत्ति का ट्रस्टी मात्र समझे। फिर अमीर तो अपनी सेवा आज कर सकते हैं, आप उन गरीबों की सेवा, सहायता कीजिये जो असहाय हैं। कुछ न कुछ दान देना भी हिन्दू धर्म का एक मूल सिद्धान्त है। जैसा गीता में भगवान ने कहा है, जो अकेला खाता है वह पाप करता है। अगर आपको एक ही रोटी मिले तो उसमें से भी एक टुकड़ा दान कर देना चाहिये। लोग तपस्या का नाम लेते हैं, पर आहार छोड़कर पड़े रहना तपस्या नहीं। भगवान को अर्पण करके खाओ तो वही तपस्या है।

हर एक आदमी को अपना धर्म सोचना चाहिये। हमारे शास्त्रों में कहा गया है—“पितृदेवोभव, मातृदेवोभव।” पर आजकल पश्चिमी सभ्यता के अनुयायी माता-पिता को त्याग कर स्त्री को साथ में ले चल देते हैं। इस प्रकार का कार्य जंगलीपन या पशुत्व का चिन्ह है। इसे धर्म का चिन्ह नहीं कहा जा सकता। गायत्री का उपदेश स्पष्ट शब्दों में यही है कि केवल अपने परिवार के पालन की ही चिन्ता न करो वरन् मनुष्यमात्र के हित का ध्यान रखो। यही सच्चा संन्यस्त है। हमारा मुख्य कर्तव्य यही है कि हम सारे संसार को भगवत् स्वरूप देखें और उसकी सेवा में रत रहें। इस लिये आज ही गायत्री माता के सम्मुख प्रतिज्ञा कीजिये कि आज से मैं सदैव गरीब भाइयों की सेवा करूंगा।

भगवान ने कहा है कि जो भले काम करता है उसे मैं कभी नहीं छोड़ता। और धर्मों के भगवान तो दूर से ही संसार के भले बुरे कामों को देखा करते हैं, पर हमारे भगवान अवतार लेकर हमारे बीच में ही काम करते हैं। अगर कोई व्यक्ति हिन्दू मत छोड़ कर दूसरा मत ग्रहण कर लेता है तो उसका पाप हमारे ही सिर पर है। क्योंकि इससे प्रकट होता है कि हमने उसको धर्म का उपदेश नहीं दिया। गायत्री को कभी न छोड़िये तो वह आपको सदैव सुरक्षित रखेगी। इसके ऋषि विश्वामित्र थे जो इसी को जपकर क्षत्रिय से पूज्य ब्राह्मण बन गये थे। जो कोई अन्तरात्मा से गायत्री का जप करेगा वह अवश्य ब्राह्मण बन जायगा। कहा भी है—

“जन्मनः जायते शूद्रः कर्मणा जायते द्विजः”

कृतज्ञता ज्ञापन

आचार्यजी ने श्री आयंगर के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करते हुये कहा कि हम सबके जीवन का लक्ष्य वही है जैसा कि श्री॰ आयंगर ने अपने भाषण में प्रकट किया है। हम सब भारतीय संस्कृति के प्रचार में प्रयत्नशील हैं। गायत्री सर्वत्र मातृशक्ति की प्रतीक है। हम उनके विचारों को शिरोधार्य करते हैं और उन पर चलेंगे। हमारा गायत्री परिवार देश के कौने-कौने में फैला है और वह देश के साँस्कृतिक उत्थान के लिये कार्य करेगा। हमारी आकाँक्षा है कि अध्यक्ष महोदय इस लक्ष्य की प्राप्ति में हमें प्रेरणा देते रहें हैं।

शान्ति पाठ के पश्चात् आज का अधिवेशन विसर्जित हुआ।

ता॰ 21-4-56

आज के अधिवेशन में भगवान राम और रामचरित्र मानस के सम्बन्ध में विशेष रूप से विद्वानों के प्रवचनों की व्यवस्था की गई थी। सबसे पहले इन्दौर के ब्रह्मचारी श्री विश्वकल्याण हितैषी जी महाराज ने कहा कि “सबसे पहले हमको यह जानना आवश्यक है कि ‘मानव क्या है?’ क्योंकि जब तक हम इस बात को नहीं जान जायेंगे तब तक उसके कल्याण अकल्याण का विचार नहीं किया जा सकता। यह तो सभी जानते हैं कि मनुष्य संसार के सभी जीवों से श्रेष्ठ है, पर केवल मनुष्य की आकृति बना लेने से किसी को मनुष्य नहीं माना जा सकता है। मानव के गुणों से ही उसकी महत्ता है। कोई अभिनेता या अभिनेत्री किसी महान व्यक्ति का अभिनय करने से महान नहीं बन जाते। सच्चा मानव बनने के लिये कुछ विशेषतायें चाहिये। इस समय तो मानव, जो पहले देव था, आजकल दानव बनने के लक्षण प्रकट कर रहा है। इस लिये हमको आत्म-परीक्षा द्वारा इस बात पर विचार करना चाहिये कि हम प्रकृति से मानव हैं या नहीं। इसकी कसौटी यह है कि हम विचार करके देखें कि हम जीने के लिये खाते हैं या खाने के लिये जीते हैं। आज मनुष्यों ने अपना सिद्धान्त बना लिया है कि—’खाओ, पियो, मौज उड़ाओ।’ उन्होंने यह मान रखा है कि बढ़िया पदार्थ मिलने से हम सुखी बन सकेंगे। पर यह उनका भ्रम है। उदाहरण के लिये हम जो उत्तम से उत्तम भोजन बनाते हैं सबसे पहले मक्खी उसे खा लेती है! क्या कोई बढ़िया भोजन के निमित्त मक्खी बनना चाहेगा? इस लिये हम को यह समझ लेना चाहिये कि हमारा जीवन साँसारिक सुखों के वास्ते नहीं वरन् शाश्वत शान्ति के लिये है। इसी सिद्धान्त को भूल जाने से हम आज अनेक दुःख और कष्टों में फँसे हुये हैं।”

श्री राधेश्याम कथावाचक (बरेली)

“आपको यह जानकर कदाचित् आश्चर्य होगा कि जिस राधेश्याम रामायण की आपने इतनी प्रशंसा की है वह मेरी 12 से लेकर 18 साल की आयु ते लिख डाली गई थी। एक 12 साल की आयु का बालक ऐसी रचना कर सके यह असम्भव-सा लगता है। पर वास्तव में मैंने इस ग्रन्थ को नहीं लिखा, किसी शक्ति ने मुझसे लिखाया और मैंने वैसा लिख डाला। इस ग्रन्थ को लिखने के पूर्व मेरे पिताजी ने मुझसे सवालक्ष गायत्री का एक पुरश्चरण करवाया था और मेरा विश्वास है कि उसी के फल से मुझे इस कार्य में सफलता प्राप्त हो सकी। यहाँ आने का एक कारण और भी था और वह यह कि जिन श्रीराम शर्मा के दर्शन करना। मैं तो दोपहर से यहाँ की हालत देखकर फूला नहीं समाता। मैं जानता हूँ कि इस समय देश की हालत क्या है? देश की इस उलझी हुई हालत में अगर कोई विद्वान हमको गायत्री द्वारा सुधार की तरफले जाता है तो यह बड़ी उत्तम बात है। गायत्री का असली अर्थ और साराँश यह है कि हम भगवान से अपनी बुद्धि के सुधार की प्रार्थना करें। बेटा हो जाना, मुकदमा जीत जाना, सम्पत्ति मिल जाना आदि साँसारिक बातें, गायत्री के जप का असली उद्देश्य नहीं हो सकतीं। जिन भगवान का नाम हम लेते हैं उन्होंने भी गायत्री का जप किया था। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी एक बहुत बड़े राज्य के स्वामी थे, पर उनका बचपन कैसा था? जब वे बिलकुल लड़के थे एक साधू (विश्वामित्र) ने उनको यज्ञ की रक्षा के लिये माँग लिया और वे उसी समय महलों को छोड़ कर उस साधू की सेवा करने चल दिये।

गायत्री बुद्धि के सुधारने का मन्त्र है। गायत्री का उपासक सूर्य अथवा भगवान से माँगता है कि हमारी बुद्धि निर्मल और उज्ज्वल हो। क्योंकि बुद्धि में जरा सी खराबी आने से ही देश, समाज और व्यक्ति बिगड़ जाते हैं, और बुद्धि के सुधरने से ये सब बन जाते हैं। बुद्धि निराकार है और परमात्मा भी निराकार है। हमारे और परमात्मा के बीच में निराकार बुद्धि है और उसी की प्राप्ति गायत्री के जप से होती है।

देश को स्वराज्य मिल गया पर परिस्थितियों का चक्कर ऐसा है कि हमारा मुँह देश की तरफ कम है और विदेशों की तरफ अधिक है। हमारी मनोवृत्तियाँ इस समय बेईमानी की हो रही हैं। गवर्नमेंट भी स्वीकार करती है कि हमारे महकमों में भ्रष्टाचार फैल रहा है। इस परिस्थिति का सुधार भी गायत्री द्वारा हो सकेगा। अगर तुम गायत्री माता के परिवार में आते हो तो सब आपस में भाई बन आओगे। फिर भाई के साथ भाई बेईमानी कैसे करेगा। अगर जीना है तो सच्चे होकर जियो बेईमानी से नहीं। गायत्री माता के परिवार में शामिल होकर तुमको यही करना होगा कि भाई के साथ हरगिज बेईमानी न करना ईश्वर का रूप तो सत्य है और सत्य ही ईश्वर है। आज तो बाप-बेटे, भाई-बहिन, पति-पत्नी, के बीच में भी दीवार खड़ी है। लोग कहते हैं कि जीवन में भी दीवार खड़ी है। लोग कहते हैं कि जीवन के स्टेंडर्ड को ऊँचा उठाओ। हमारे भारत में, जब मैं 12 वर्ष का था, जीवन का स्टेंडर्ड ऊँचा न था, पर सब चीजें सस्ती और अच्छी मिलती थी।

रामायण के पढ़ने से यह भी ज्ञात होता है कि गायत्री का जप करने वालों का आचरण कैसा होता था। रामचंद्रजी के विषय में लिखा है:—

प्रातः काल उठ के रघुनाथ। मात पिता गुरु नावहिं माथा॥

संध्यावन्दन करने वाले, गायत्री जपने वाले बालकों का यही लक्षण है। लक्ष्मणजी इसके बहुत बड़े उदाहरण थे। वह बहुत कम सोते थे और वनवास में बराबर रात के समय सीता राम का पहरा देते रहते थे। लंका में सबसे बड़ी ताकत मेघनाद की थी जो यज्ञ करने वाला और एक पत्नी व्रती था। उसे रामचंद्र भी नहीं मार सकते थे। लक्ष्मणजी ने ही उसे मारा। यह सब संध्यावन्दन और गायत्री की शिक्षा का ही प्रभाव था, क्योंकि उनके गुरु ने उनको इसकी शिक्षा दी थी।

डा. सीताराम कपूर पी. एच. डी.

किसी भी सत्संग में, जहाँ रामचरित्र मानस जैसे ग्रंथ पर कुछ कहा जाता है वहाँ से श्रोता को कुछ न कुछ लेकर ही उठना चाहिये। रामचरित्र मानस में जितने भी पात्र हैं सब आर्य सिद्धान्त पर आचरण करने वाले हैं। भगवान कृष्ण ने गीता में जो कुछ कहा है वही बात रामायण और समस्त अन्य शास्त्रों में पाई जाती है। अगर हम इन बातों पर आचरण करें तो भगवत् सान्निध्य में कमी न रह जाय। भगवान सर्व आत्माओं में व्याप्त हैं। अगर उन भगवान का सहज में लाभ उठाना है तो उसका साधन है अनन्यता। गोस्वामी जी ने स्पष्ट कहा है:—

नहिं कलि कर्म न भक्ति विवेकू। राम नाम अवलम्बन एकू॥

यदि राम नाम अनन्यता पूर्वक लिया जाय तो उद्धार में तनिक भी सन्देह नहीं।

धनुष यज्ञ में सीताजी रामचंद्र जी की कोमलता तथा धनुष की कर्कशता को देखकर बहुत घबराई और महेश, भवानी, गणपति आदि समस्त देवताओं को मनाने लगीं। पर जब कहीं से कोई आश्रय मिलता न जान पड़ा तो अन्त में भगवान की शरण ही गई—

तो भगवान सकल उर वासी। करहिं मोहि रघुवर की दासी॥ जाकर जापर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलहिं न कुछ सन्देहू॥

तब रामचंद्र जी ने तुरंत उनकी ओर ध्यान दिया। इस प्रकार भगवत् सान्निध्य प्राप


पूर्णाहुति से प्रेरणा

(श्री सीताराम, एडवोकेट, आगरा)

यों तो गायत्री तपोभूमि में जाने पर सदैव ही आनन्द और शान्ति का अनुभव होता है परन्तु गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के सुअवसर पर तौ ऐसा प्रतीत होता था कि संसार का सारा आनन्द उसी स्थान में इकट्ठा हो गया है। सहस्रों की संख्या में, देश के भिन्न भिन्न भागों से आये हुए, प्रायः पीले वस्त्र धारण किए हुए गायत्री परिवार के पुरुष और महिलाओं का उत्साह, यज्ञ-प्रेम तथा सहयोग देखने योग्य था।

पूर्णाहुति के कार्यक्रम का आनन्द लेते हुये मेरे मन में प्रश्न उठा कि आचार्य जी ने यह सब आयोजन किया क्यों? यज्ञ तथा यात्रियों के भोजन व निवास आदि में सहस्रों रुपये का व्यय, यात्रियों का स्वयं का व्यय तथा कार्य कर्त्ताओं का अथक परिश्रम इस सबसे लाभ क्या हुआ? यदि साधकों ने गायत्री मंत्र का जाप व हवन अपने स्थान पर किया था तो वह उसकी पूर्णाहुति भी अपने स्थान पर कर सकते थे। सबको तपोभूमि में एकत्रित करने की क्या आवश्यकता थी।

सोचते-सोचते उत्तर मिला कि इस आयोजन का भी वही महत्व है जो एक विश्व विद्यालय के दीक्षान्त समारोह का होता है। जैसे दीक्षान्त समारोह में विश्व विद्यालय के समस्त विद्यार्थी जो अपनी शिक्षा का पूर्ण कर चुकते हैं एकत्रित होते हैं और जनता जनार्दन के सम्मुख खड़े होकर कुलपति से उपाधि, दीक्षा तथा आशीर्वाद प्राप्त करके मौन से अपने भावी जीवन को अपनी शिक्षा के अनुसार व्यतीत करने की घोषणा करते हैं ठीक उसी प्रकार से इस उत्सव में समस्त गायत्री साधक जो अपनी साधना को पूर्ण कर चुके हैं अग्नि देव तथा जनता जनार्दन के सामने आचार्य जी से आशीर्वाद प्राप्त करके अपने जीवन को गायत्री की शिक्षा के अनुसार व्यतीत करने की मौन घोषणा कर रहे हैं।

फिर प्रश्न उठा कि क्या गायत्री की भी कोई शिक्षा है? एक विद्यार्थी तो अध्ययन करके, शिक्षा प्राप्त करके दीक्षान्त समारोह में सम्मिलित होता है परन्तु गायत्री साधना में यह बात कैसे घटेगी? इस में तो प्रत्येक साधक ने एक निश्चित समय में अपने अपने संकल्प के अनुसार गायत्री मंत्र का जाप किया है और उस जाप को पूर्ण करके यहाँ पूर्णाहुति देने आया है।

उत्तर मिला कि यदि गायत्री साधना का अभिप्राय आपने केवल मन्त्रों का जाप करना ही समझा है तो आपने गायत्री साधना के वास्तविक स्वरूप को समझा ही नहीं। गायत्री साधना का सच्चा स्वरूप है उसके अर्थ का चिन्तन तथा मनन करना, और जीवन को उसके अनुसार बनाना।

पुनः प्रश्न हुआ कि गायत्री मंत्र द्वारा हम भगवान से केवल बुद्धि विवेक की याचना करते हैं? उत्तर मिला नहीं। गायत्री मन्त्र द्वारा हम भगवान के गुणों का वर्णन करते हुए “धी महि” शब्द द्वारा उन गुणों को अपने में धारण करने की घोषणा भी करते हैं। केवल ‘भूः भवः स्वः” शब्दों को ही ले लीजिये। इनका अर्थ है कि प्रभु, सर्वाधार हैं, दुख नाशक हैं तथा सुख स्वरूप हैं।’ हम हजारों बार प्रभु के इन गुणों को दोहराएं अग्नि के सामने भी इनका उच्चारण करें और इनको अपने में धारण करें। तो इसका स्वाभाविक प्रभाव यह होना चाहिये कि यह गुण हम में भी किसी न किसी अंश में उतरें। हम भी संसार में किसी के आधार बनें, हम भी किसी के दुःख नाशक हों, हम भी किसी के लिये सुख स्वरूप हों। एक उर्दू के कवि के शब्दों में हम भी अपने से यह पूछें—

“कभी इमदाद दी तूने किसी बेकस बेचारे को, सखी बनकर दिया कुछ तूने मुफलिस के गुजारे का, तसल्ली दी कभी तूने किसी आफत के मारे को, कभी तूने सहारा भी दिया है बेसहारे को”

उपरोक्त प्रेरणा के मिलते ही पूर्णाहुति के समारोह की सार्थकता का ज्ञान हुआ और प्रतीत हुआ कि गायत्री महायज्ञ में सम्मिलित होने वाला प्रत्येक साधक अब साधारण मनुष्य नहीं रहा है। उसने गायत्री उपासना की दीक्षा प्राप्त की है। उसने अपने कन्धों पर समाज की सेवा का बहुत बड़ा भार सहर्ष स्वीकार किया है। उसने अग्नि देव तथा जनता जनार्दन को साक्षी करके मानव मात्र के कल्याण का बोझा उठाया है।

वेदमाता सब साधकों को उपरोक्त लक्ष्य की प्राप्ति में सहायता तथा सफलता प्रदान करें

“ओम् शान्ति”


जब स्वर्ग उतर आया-पृथ्वी पर

(श्री रमेश त्रिपाठी, कलकत्ता)

अब से 14 वर्ष पूर्व “अखण्ड ज्योति” में दो पंक्तियाँ प्रकाशित हुई थीं और अभी तक प्रत्येक अंक में, मैं उन पंक्ति यों को विशेष ध्यान पूर्वक पढ़ता रहा हूँ। पंक्तियाँ ये है:—“सन्देश नहीं मैं स्वर्ग लोक का लाई—मैं भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई”। प्रारम्भ में इसमें सार कम, और कविता अधिक जान पड़ती थी। स्वर्ग को पृथ्वी पर उतारने की बात केवल अलंकार अथवा कहावत ही बनकर रह गई थी। किन्तु गायत्री तपोभूमि में, जिस दिन नरमेध-महायज्ञ का आयोजन हुआ उस दिन न केवल लेखक ने, वरन् लाखों व्यक्तियों ने साक्षात स्वर्ग को मथुरा-पुरी में उतरते देखा। सभी की जुबान पर एक ही बात थी “धन्य है ऐसा विशाल रमणीक और आत्मीयता से परिपूर्ण समारोह हमने कभी नहीं देखा।”

ग्रामीण जनता, नगरों से आये हुए विद्वज्जन देश विदेशों से आये हुए पर्यटक-जिसने भी इस अपूर्व समारोह को देखा, स्तम्भित सा खड़ा रह गया। जो स्वयं 108 वेदियों पर आफुढ़ यज्ञ कर रहे थे, अथवा गायत्री तपोभूमि के उस नैसर्गिक वातावरण में अपनी तपस्या को पूर्ण कर रहे थे, उन दिव्य—स्त्री पुरुषों की तो वही जानें। किन्तु उनके मुख का तेज, उनकी मुखाकृति पर दर्शनीय आस्तिकता और गंभीरता, उनकी दृढ़ लगन और एक लक्ष्यता को देख कर, अनायास ही वेदकालीन ऋषि-मुनियों का स्मरण हो उठता था।

स्वार्थ प्रधान, इस युग में जहाँ कि “अपनी अपनी हाय” में विश्व जला जा रहा है—वहाँ इतिहास में प्रथम बार इतने अधिक तपस्वी-गृहस्थ सज्जन, एक स्थान पर एकत्रित हुए थे। प्रयाग विश्व-विद्यालय के मेरे एक मित्र जो इस यज्ञ में सम्मिलित होने आये थे बोले “वास्तविक संगम तो यहाँ तपोभूमि में दिखाई दिया है वास्तव में प्रत्येक आगंतुक सज्जन यमुना जी भाँति निर्मल तथा गंगा की भाँति पवित्र है।” मैंने उन्हीं के स्वर मिलाते हुए कहा “और इन सबके संगम स्वरूप—यह यज्ञ देव’ सरस्वती हैं—क्यों हैं न डडडड डडडड पर वे हंस पड़े। बड़ी सात्विक हँसी जो यज्ञ के “स्वाह” स्वर में चुपके से विलीन हो गई। तपोभूमि के तीन दिवस-निवास का प्रत्येक जाग्रत क्षण कुछ-कुछ इसी प्रकार के नैसर्गिक वातावरण में व्यतीत हुआ।

इस सबके अतिरिक्त ,एक प्रमुख आकर्षण केन्द्र थे आचार्य जी। आचार्यजी के विषय में बिना लिखे रहा नहीं जाता और क्या लिखें समझ में नहीं आता। उन्होंने हजारों आगन्तुक में से लगभग प्रत्येक से वार्तालाप किया और उन्हें प्रेरणा दी, उत्साह बढ़ाया। दूसरों का जो लोग उत्साह बढ़ाते रहते हैं। वे संसार का बड़ा उपकार करते हैं। कारण यह है कि मनुष्य का उत्साह बढ़ाने से उसमें दुगुना और तिगुना बल आ जाता है और वह शक्ति भर परिश्रम करने लगता है। रणभूमि में सेनापति के मुख से उत्साह-वर्धक शब्दों को सुन सुनकर, सिपाही गिरते गिरते भी सँभल जाते है, और हारते हारते भी, जी तोड़ कर एक बार फिर शत्रु पर धावा करते हैं। बिल्कुल उसी भाँति आचार्य जी के उत्साह वर्धक शब्द कितनों की जीवन गति मोड़ने में समर्थ हुए हैं।

स्वर्ग में महान आत्माओं तथा सात्विक वृति वाले देवजनों के ही तो दर्शन होते हैं। वह सब गायत्री तपोभूमि में विद्यमान था। वहाँ उदारता, प्रेम, परोपकार आदि सद्गुणों का अपूर्व सम्मेलन था उदार व्यक्ति यों का व्यवहार सर्वत्र ही, एक मनोरम दृश्य उपस्थित कर दिया करता है। फिर वहाँ तो आचार्य जी जैसे उदार-हृदय स्वयं उपस्थित थे। उनके जीवन का उद्देश्य ही बन गया है—उपकार। सभी साधक उन्हें अपना रक्षक और शुभचिन्तक मानते हैं और उनके प्रति प्रेम और आदर का भाव रखते हैं। उन्हें देखकर निराश निर्बल तथा आपद् ग्रस्त मनुष्य भी अपने में कुछ बल का आगमन महसूस करने लगता है। उसका सारा शोक कपूर की भाँति उड़ जाता है। और उसका हृदय आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है। अधिकतर, साधक यह महसूस करने लगते हैं जैसे कि आचार्य जी रूप में साक्षात ईश्वर ही उनकी रक्षार्थ द्वार पर आ गया है— और अब उन्हें कोई भय नहीं है।

आत्मीयता और प्रेम पूर्वक सम्बन्धों का जो अनवरत स्रोत आचार्यजी के मधुर व्यक्तित्व से प्रवाहित हो रहा था, उससे प्रत्येक व्यक्ति प्रभावित देखा। कोई उन्हें, अपना रक्षक, मानते थे कोई गुरु , कोई परमहितैषी बन्धुवर। उनके विषय में गोस्वामी जी की चौपाई “जाकी रही भावना जैसी-प्रभु मूरति देखी तिन तैसी” चरितार्थ हो रही थी।

मेरे साथ, कुछ बड़े बड़े सरकारी अफसर भी गये हुए थे। उनमें से एक सज्जन जो लगभग 15 वर्ष विदेशों में अध्ययन कर चुके हैं, पक्के नास्तिक बन चुके थे। उनका कहना था “चलिये! मनोरंजन रहेगा। वरन् यज्ञ, व ईश्वर में मुझे कोई रुचि नहीं। उनका कहना था कि ईश्वर एवं धर्म केवल ढोंग है। मथुरा पहुँचकर, भी पहिले दिन तो उनमें कोई परिवर्तन नहीं आया। किन्तु उन्होंने देखा कि हजारों नर-नारी बिना किसी ढोंग, पाखंड के अपनी साधना में रता थे। उन्होंने पूछा कि “यज्ञ के बाद ये याज्ञिक लोग कुछ आर्थिक लाभ (दान पुण्य आदि प्राप्त करने के रूप में) प्राप्त करेंगे!” तो उन्हें बताया गया कि ये लोग कर्मकाँडी पंडित, चौबे अथवा पंडे नहीं हैं। न ये वैसे “साधु बाबा” हैं जो लकड़ी के ढेर में आग लगाकर तपने का ढोंग करके सीधे साधे देहातियों को लूटते—ठगते हैं। दूसरी ओर इनमें से अधिकाँश, गृहस्थ हैं जो कि सैकड़ों रुपये मार्ग व्यय, भाड़ा आदि वहन करके अपनी पूरी वर्ष की तपस्या को पूर्ण करने आये हैं। ढोंग या पाखंड की न इन्हें आवश्यकता है और न गायत्री तपोभूमि को। तप करने के स्थान में सभी कुछ सत्यं शिवं सुन्दरं मिलेगा।

और हमने पाया कि उपर्युक्त सज्जन तीसरे दिन सूट को फेंक कर, धोती कुर्ते में, तपोभूमि के एक कोने में गायत्री मन्त्र का जप कर रहे हैं। अब उनका कहना है कि तपोभूमि के वातावरण ने नरमेध यज्ञ की रक्ताभ ज्वाला ने उनके नास्तिक हृदय में आस्तिकता, उनकी स्वार्थ प्रधान विचार धारा में, उदारता के बीज बो दिये हैं। नरमेध वाले दिन, हमारे साथ के एक फारसी के प्रोफेसर, तो बारबार फिरदौस के उसी शैर को दुहराते रहे कि “अगर स्वर्ग कहीं धरती पर ही है तो वह यहीं है, वह यहीं है, वह यहीं है।”

भाषणों का रस

तपोभूमि में भाषण तथा प्रवचनों का जो क्रम था वह भी साधारण समारोहों से आधारभूत विभिन्न था। वहाँ जोशीले, भड़काने वाले धुंआधार भाषणों का दौर नहीं था। परखे हुए, विद्वानों, गृहस्थी साधकों तथा अन्य महाशयों के निजी अनुभवों का दिग्दर्शन मात्र था। कोई सीखे, कोई सिखाये एक के अनुभवों से दूसरा लाभ उठा रहा है। यही तो सम्मेलन की वास्तविक आधार शिला है।

कथावस्तु के अन्तर के अनुसार, श्रोताओं पर भाषण का प्रभाव भी दर्शनीय था। कितने करुण और कितने आनन्द प्रदायक थे वे क्षण जब कि आचार्य जी के भाषण के मध्य, आनन्दातिरेक से न केवल उपस्थित हजारों साधक एवं श्रोता वरन् स्वयं आचार्य जी के नेत्रों से भी मोतियों की धारा छुट पड़ी थी। सारा पंडाल रोमाँचित हो उठा था। उस समय का वर्णन, साक्षात स्वर्ग का ही वर्णन करना होगा।

सात्विक भोजन

तपोभूमि में भोजन व्यवस्था यद्यपि एकदम आडम्बर विहीन थीं। उत्तेजक मसालों, गरिष्ठ पकवानों अथवा स्वास्थ्य नाशक मिष्ठानों के दर्शन दुर्लभ हो गये थे। निस्सन्देह पूड़ी साग आदि की व्यवस्था, कम खर्चीली तथा अधिक सरल होती परन्तु, साधकों को वैसा तामसी भोजन कैसे दिया जा सकता था। साधारण रोटी, दाल, शाक तथा चावल आदि का भोजन, वहाँ 36 व्यञ्जनों से भी अधिक स्वादिष्ट था। उस पर पारस्परिक सहयोग विशाल हृदयता तथा बड़े पैमाने पर विस्तारित आत्मीयता ने भोजन व्यवस्था को अत्यन्त मनोहर बना दिया था। हजारों तपस्वियों और गृहस्थों के एक साथ भोजन करने में कितना आनन्द आता है। यह केवल भाग लेकर ही पता चल सकता है।

मथुरा तीन लोकों से न्यारी कही जाती थी। सम्भवतः इसमें सचाई इतनी ही थी कि यह ‘कहावत’ मात्र बन गई थी। किन्तु तपोभूमि में, यज्ञीय वातावरण ने, यथार्थ रूपेण ही उसे तीन लोकों से न्यारी बना दिया था।


गायत्री तपोभूमि की मधुर स्मृति

(डा. रूपलाल बतरा देहली)

यज्ञ, दान और तप ही भारतीय संस्कृति की उज्ज्वल आधार शिला हैं। यद्यपि आज के युग में आध्यात्मिक विज्ञान के स्थान पर आधिभौतिक विज्ञान का राज्य है, किन्तु आज का विज्ञान शान्ति को नहीं अपितु क्रान्ति को एवरेस्ट के शिखर पर पहुँचाने जा रहा है। यदि ‘मनु’ की सन्तान वस्तुतः शान्ति चाहती है तो उसे अपने अतीत के आध्यात्मिक विज्ञान का सम्बल प्राप्त करना ही होगा। गायत्री तपोभूमि की इस अनुपम पाठशाला में हमारे परम पूज्य आचार्य जी समस्त प्राणिमात्र के कल्याणार्थ अपनी खोई हुई ‘निधियों’ को और चिरकाल से बिछुड़ी हुई शान्ति सहचरी को पुनः प्राप्त करने की शिक्षा दे रहे हैं। इस तपोभूमि में समस्त मानव के त्रिविध तापोद्धार के लिये ‘भागीरथ’ की तरह हमारे प्राचार्य जी ने गायत्री की निर्मल गंगा बहा दी है। विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के मंगलमय अवसर पर पहुँच कर अज्ञानान्ध सहस्रों नर−नारियों ने वस्तुतः एक दिव्य ज्योति प्राप्त की है, जिसे ‘अखण्ड ज्योति’ में सविस्तार व्यक्त करना मेरे लिये कठिन ही नहीं अपितु असम्भव है।

इस स्वर्ण अवसर पर ‘तपोभूमि’ के देदीप्यमान हवनकुण्डों में गायत्री महा-मन्त्र के द्वारा जिन्होंने आहुतियाँ दी हैं उन्होंने तो मानो ज्ञानाग्निकुण्ड में अपने चिरसञ्चित अज्ञान की ही आहुतियाँ ही हैं।

एक अकिञ्चन का इतना बड़ा आयोजन सूर्य देव की प्रचण्ड किरणों के समक्ष कितनी शान्ति और रीति से सम्पन्न हुआ, यह सोचकर आश्चर्य भी आश्चर्य से मुग्ध हो जाता है। ‘गायत्री तपोभूमि’ और ‘गायत्री नगर’ दोनों स्थानों पर ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग की त्रिवेणी बह रही थी। श्री गायत्री माता एवं पूज्य ‘आचार्य जी के प्रति अटूट श्रद्धा एवं विश्वास की झलक प्रत्येक व्यक्ति के मुख मण्डल पर विराजमान थी। आबाल वृद्ध पुरुष या स्त्री सभी भ्रातृत्व के स्नेह सूत्र में बँधे थे। ‘गायत्री नगर’ का एक-एक शिविर वस्तुतः ‘तपोवन’ बना हुआ था। सभी मनसा-वाचा-कर्मणा एक रंग में रंगे थे। क्षमा, नम्रता, सहिष्णुता, दया, कर्म परायणता आदि सभी अलौकिक गुणों से सब युक्त थे।

प्रतिदिन भारत की सच्ची संस्कृति और सभ्यता के विषय में वेद उपनिषद् स्मृति, पुराण आदि भारतीय सर्वोत्कृष्ट ग्रन्थों के आधार पर जो हमें पूज्य आचार्य देव मधुर पाठ पढ़ाया करते थे, उन पाठों को खोई हुई निधि के समान प्राप्त कर मैं बड़े यत्न और स्नेह से अपने अन्तःकरण में छुपा लिया करता था और रात को सोते समय जब तक उन पाठों का अच्छी तरह मनन नहीं कर पाता था, नींद नहीं आती थी। वे दिन अब भी इन आँखों के सामने नाच रहे हैं। पूज्य आचार्य जी की वह सरल एवं वात्सल्य से ओतप्रोत मुखाकृति अनुक्षण सन्मार्ग पर मुझे अग्रसर कर रही है। मेरे पूज्य आचार्य जी 6 सहस्र नर नारियों को अपने पुत्र और पुत्रियों के रूप में देखा करते थे। आचार्य जी का यह हार्दिक वात्सल्य अन्तिम दिन रात को व्याख्यान के समय अच्छी तरह व्यक्त हो गया था। अपने आमन्त्रित बच्चों को विदा करते समय उनका कोमल हृदय पिघल गया था। गला रुंध गया था। आँखें डबडबा आई थीं। यही हाल उनके बच्चों का भी था। आज भी उन दिनों की स्मृतियाँ स्नेह सागर की ऊंची-ऊंची लहरें बन जाती हैं। प्रिय पाठक एक गूँगा व्यक्ति गुड़ की मिठास कैसे व्यक्त करे?


एक नारी की दृष्टि में महायज्ञ की पूर्णाहुति

(श्रीमती चन्द्रमुखी देवी रस्तोगी बी. ए ., जयपुर)

इस बात को अब सब शिक्षित लोगों ने मान लिया है कि वैदिक युग में स्त्रियों का स्थान किसी प्रकार पुरुषों से कम नहीं था। केवल यही नहीं कि घर के कार्यों में वे दोनों दंपत्ति रूप से घर का प्रबन्ध व शासन करते थे किन्तु सब सामाजिक कार्यों में भी स्त्रियों का स्थान सब प्रकार पुरुषों के समान था। वैदिक समय में बड़े सामाजिक कार्य यज्ञ और महायज्ञ ही माने जाते थे और विद्या विवेचन सभायें भी होती थीं जिनका उपनिषदों में वर्णन है। इन सब में स्त्रियों का समान अधिकार होता था।

यह दुख की बात है कि महाभारत के पीछे जब भारत का पतन हुआ तो स्त्रियों की स्थिति बहुत शोचनीय हो गई। बड़े यज्ञों का तो प्रचार ही नहीं रहा। घर के दैनिक यज्ञों में भी केवल पुरुष यज्ञ का अधिकारी समझा गया, उसकी अर्धांगिनी यज्ञ में भाग नहीं ले सकती थी। नारी को पूर्णतया यज्ञ में भाग लेने तथा वेद मन्त्रों के उच्चारण के अधिकार से वंचित कर दिया गया। ऐसी स्थिति में आज से सवा वर्ष पहले भारतीय नारी ने एक करुणा पुकार सुनी। वह चौंकी, परन्तु कुछ समझ न सकी। आवाज तीव्रतर होती गई। नारी विस्मय, कुतूहल और आश्चर्य से चारों ओर देखने लगी कि आज के भौतिक युग में उसका आह्वान कौन कर रहा है। उसने पूज्य आचार्यजी को महामानव के रूप में अपने सामने खड़ा देखा, समझा और पहचाना। नारी ने फौरन अपने को संभाला और बोली—मानव, घबराओ मत, तुम्हारे संकल्प की पूर्ति के लिये नारी जाति कोई कसर बाकी नहीं रखेगी। और अपने इसी वचन के अनुसार नारी वर्ग ने महायज्ञ की सफलता के लिए पूरा प्रयत्न किया है। जिन लोगों को महायज्ञ की पूर्णाहुति देखने का सौभाग्य मिला है उन्होंने नारी की क्रियाशीलता को अपनी आँखों से देखा है। जप, तप, अनुष्ठान तथा अन्य सभी प्रकार के कार्यों में नारियों ने अपना पूरा सहयोग दिया है। उपस्थिति की दृष्टि से भी स्त्रियाँ पुरुषों से कम नहीं थीं। “आज उसे यज्ञ में बैठने का पूरा अधिकार है” यह विचार स्त्रियों में नवीन उत्साह का संचार कर रहा था। अपने प्रत्येक कार्य से नारी यह दिखा रही थी कि हम सब कुछ कर सकती हैं। नारी जाति सोई हुई थी, ऐसी बात नहीं है बल्कि यों कहना चाहिए कि समाज की पाशविक वृत्ति के आगे उसने अपने को छिपाकर रखना ही उचित समझा। अब जब देश और समाज को उसकी आवश्यकता हुई उसने पुरुषों से कन्धे से कन्धा भिड़ा कर कार्य किया है। वह किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रहीं और आज भी उपयुक्त समय जान कर अपनी संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए उसका मातृत्व सजग हो गया है, वह कमर कस कर खड़ी हो गई है।

महायज्ञ की पूर्णाहुति के अपूर्व आनन्द के बारे में लिखने की किसकी सामर्थ्य है। जिसने देखा वह वर्णन नहीं कर सका। पूर्णाहुति पर सभी धर्म सम्प्रदाय तथा मत के लोग सम्मिलित हुए थे। देश के कौने 2 से गायत्री परिवार मथुरा की ओर बढ़ा चला आ रहा था। सब हर्ष से विह्वल हो रहे थे। सभी को एक ही ही धुन थी, एक ही लगन थी सब का गन्तव्य स्थान एक था। 5 दिन तक निरन्तर चलने वाली पूर्णाहुति में सब लोग आनन्द विभोर हो रहे थे। चारों ओर सुख-शान्ति का साम्राज्य छाया हुआ था। सच्चे शब्दों में कहा जाये तो तपोभूमि के स्वर्गीय वातावरण में सब स्वर्ग के सुख का अनुभव का रहे थे। यज्ञ की व्यवस्था कितनी सुन्दर थी उसका वर्णन नहीं हो सकता। जो स्त्रियाँ और पुरुष यज्ञ विधि से पूर्णतया अनभिज्ञ थे उन्हें समझने के लिए पूर्ण व्यवस्था थी। गायत्री माता की छत्रछाया में सब एक अपूर्व आनन्द का रस ले रहे थे। भोजन की व्यवस्था भी बहुत अच्छी थी। हजारों व्यक्ति यों को एक साथ बैठ कर खाना और किसी भी प्रकार का शोरगुल व लड़ाई झगड़ा न होना एक आश्चर्य की बात थी। किसी भी प्रकार की कोई दुर्घटना नहीं हुई सारी व्यवस्था मानो अपने आप ही चल रही थी। परन्तु इस सब के पीछे जिसका त्याग, तपस्या और बल काम कर रहा था उनके चरणों में भी हम थोड़े श्रद्धा के पुष्प चढ़ालें। पूज्य आचार्य जी की अनेक वर्षों की कठोर तपस्या, त्याग और उच्चतम विचारों का ही यह प्रभाव है कि हम दूर 2 से गायत्री माता के चरणों में खिंचे चले आए। मनुष्य ईश्वर का प्रतिरूप है उसके अन्दर अपार बल शौर्य और विवेक है यह सब जानते हैं परन्तु किस प्रकार वह अपनी छिपी हुई शक्ति यों का विकास करके देवत्व के पर को पहुँच सकता है उसका प्रत्यक्ष प्रमाण पू॰ आचार्य जी हैं और हमें यह कहना ही होगा कि वे मनुष्य नहीं भगवान हैं। पू॰ आचार्य जी के साथ उनकी धर्मपत्नी भी उनके किसी कार्य में पीछे नहीं हैं। विश्व एकता तथा संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए उनका सभी कुछ तो लग चुका है। परन्तु हम केवल उनकी प्रशंसा में कुछ शब्द कह लें या उनके चरणों में नमन करले, इससे काम नहीं चलेगा। हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि मन, वचन, कर्म से उनके कार्यों में पूर्ण सहयोग दें। उनका समस्त जीवन हमीं लोगों के लिए तो है अतः पूर्णाहुति की निर्विघ्न पूर्णता पर हमें सच्ची लगन से पू॰ आचार्य जी के मिशन की पूर्ति में लग जाना चाहिए। यह हमारा परम सौभाग्य है कि उन्होंने हमें अन्धकार में से निकालकर प्रकाश में लाकर खड़ा कर दिया है।


गायत्री उपासना से ही वास्तविक कल्याण

(श्री ब्रह्मचारी स्वामी रामकल्याणनन्द जी, बडोरा)

इस लेख के लेखक ने गत 24 अप्रैल को गायत्री तपोभूमि में होने वाले नरमेध यज्ञ में आत्मदान किया था। इस लेख में उन्होंने अपने जीवन के असाधारण अनुभव लिखकर गायत्री उपासना की महत्ता पर प्रकाश ढाला है। —सम्पादक

तीन मास ग्यारह दिन की जिस दिन मेरी आयु हुई, मैं श्री बालक नाथजी खरखडा—कोटा निवासी के चरणों में अर्पित कर दिया गया। माँ बाप के नैसर्गिक वात्सल्य से वञ्चित होकर वहीं मेरा पालन-पोषण हुआ। तेरह वर्ष की उमर में गौ चारण का कार्यभार दिया गया, इससे मुझे काफी प्रसन्नता मिली। गुरु जी महाराज की हमारे ऊपर बड़ी कृपा थी, जिससे चार गुरुभाइयों के साथ हमें भी अपनी कैलास यात्रा में साथ लिये गये। वहाँ कुछ ऐसे कन्द खाने को मिले, जिससे मस्तिष्क का सन्तुलन भंग हो गया। कुछ उन्मत्त के समान रहने लगा। उसी समय ड़ड़ड़डो़त विद्या की शिक्षा मुझे मिली, पर इससे मेरे अंतःकरण को शान्ति नहीं मिली। फिर तो मैंने इस शान्ति की खोज में नानक, कबीर, दादू, अलखनामी, दसनामी, प्रणामी, विश्वासी एवं इस्लामी थीं के दरवाजे खटखटाये पर योग्य पुरुषों के अभाव में सर्वत्र ही मंत्र सिद्धि की भरमार देखी और मैंने से भी सीखा, पर कहीं भी शान्ति की प्राप्ति नहीं हुई। अन्त में भैंरूं वटुक को सिद्ध कर मैं इस कलियुग में पूजित होने लगा। मेरा प्रभाव काफी बढ़ गया। चमत्कार दिखाकर लोगों को ठगना ही हमारा व्यापार हो गया, पर प्रत्यक्ष जीवन में किसी का उपकार और कल्याण नहीं कर सका। चेलों की संख्या भी बढ़ती चली गयी। हम जादूगरी बाबा के नाम से प्रसिद्ध हो गये। इस भाँति मेरे जीवन के सत्तावन वर्ष बीत गये।

एक बार भगवान की कृपा से मेरे मन में एक कूप बनवाने की शुभेच्छा का उदय हुआ। कूप खनने पर नीचे में पत्थर निकल आया। मैंने दस पन्द्रह मजदूरों को वह पत्थर तोड़ने के लिये भेज दिया और कहा मैं भी थोड़ी देरी के बाद आता हूँ। आते ही मैंने देखा कि कूप के निकट एक वृद्धा नारी गायत्री प्रतिमा का पूजन-अर्चन कर रही है। मुझे देखते ही बड़ा गुस्सा आया और डाँट कर बोला-तुम मुझे जानती नहीं, मैं सुप्रसिद्ध जादूगरी बाबा हूँ। मेरा भैरवनाथ जी प्रत्यक्ष है। जल्दी यहाँ से भागो, नहीं तो पागल बना दूँगा। मेरे बारबार डाँटने और फटकारने पर भी वह वृद्धा नारी जरा विचलित नहीं हुई और स्नेह करुणा स्वर में बोली-अब केवल एक माला जप करके मैं चली जाऊंगी। उसकी निर्भीकता मुझ से सही नहीं गयी। मैंने क्रोध से अधीर होकर जैसे उसकी गायत्री प्रतिमा को मारने के लिये लात उठायी कि सहसा मैं कुँए में जैसे किसी के द्वारा उठाकर फेंक दिया गया। कुआँ तीस हाथ के लगभग गहरा था, पर इतने गहरे में गिरने पर भी मुझे विशेष चोट न आयी केवल बाँये हाथ में थोड़ी सी चोट आयी थी। भयाक्रान्त होकर मैं मूर्च्छित हो गया था। जब कुछ देर बाद मुझे होश आया तो मैंने कुँए में भी उसी वृद्धा माता को खड़ी पाया। मैंने लोगों से खाट रस्सी से बाँध कर नीचे गिराकर उसी के द्वारा शीघ्र मुझे बाहर निकालने के लिये कहा तथा बोला उस वृद्धा पुजारिनी को भी कहीं जाने न देना। मैं शीघ्र बाहर आया पर उस उपासिका को कहीं नहीं देखा। चारों ओर मेरे आदेश से लोगों ने घोड़े दौड़ाये पर कहीं भी उसका पता न लगा।

वहाँ से मुझे अस्पताल लाया गया। डाक्टर ने जाँच कर बताया, इन्हें संघातिक चोट लगी है- शायद ही प्राण की रक्षा हो सके। रात में सोने पर स्वप्न में मुझे गायत्री उपासक श्री बालकृष्ण जी आये, उन्होंने कहाँ- डाक्टर ने तो एकदम निराशा ही प्रकट की है, अतः आप यदि यह मन्त्र प्रपञ्च छोड़ कर आज से गायत्री उपासना का सुदृढ़ संकल्प करें तो अवश्य आप के जीवन की रक्षा हो जायगी। पहले तो मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, पर जब कई दिनों के इलाज से कोई लाभ न हुआ और मेरी जहाँ तक प्रसिद्धि थी, सर्वत्र यह खबर फैल गयी कि जादूगरी बाबा नहीं बचेंगे, तब मैंने अपने को मरा हुआ मान कर ही गायत्री माता की शरण ग्रहण करली और उसी दिन से आश्चर्य पूर्ण तीव्र गति मेरे स्वास्थ्य का सुधार होने लगा। स्वस्थ होते ही मैंने गुरु देव आचार्य श्रीराम शर्मा का आश्रय लिया और तत्परता से गायत्री उपासना में संलग्न हो गया गायत्री उपासना के द्वारा हमने जितने लोगों को विविध कष्टों एवं आपत्तियों से छुटकारा पाते हुए देखा और स्वयं किया, उसे लिखने से एक मोटी पुस्तक ही बन जायगी। तो भी एक विशेष घटना मैं लिखना चाहता हूँ।

एक बार एक सर्प से काटे व्यक्ति का औषधि तथा मन्त्र के द्वारा सभी उपचार किये जाने पर भी कोई लाभ न हुआ। वह मुमुर्षु दशा को प्राप्त हो गया। अचानक मैं भी वहाँ पहुँच गया और गायत्री मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित कर उस पर छींटा मारा। वह बेहोश और मृतक प्रायः व्यक्ति आधे घंटे में उठकर बैठ गया और बिल्कुल स्वस्थ हो गया।

जो गायत्री उपासक हैं, उस पर जादूगर मन्त्रविद लोग अनिष्टकारी प्रयोग करते हैं तो उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते, उल्टे प्रयोगकर्ता के जीवन में ही वह अनिष्ट प्रतिफलित हो जाता है ऐसे अनेकों उदाहरण मैंने प्रत्यक्ष देखे हैं।

आज उसी की कृपा से गायत्री महायज्ञ में मुझे भी नरमेध करने का सौभाग्य मिला और गुरु देव एवं माता की अभव छत्रछाया मैंने संकल्प लिया है कि आज से सारी मानव जाति को माता की कृपा सुधा पिलाना ही मेरा ही एकमात्र व्रत है। ऐसी माता और गुरु देव की सदा जय हो।


अपने परिजनों से

1—सवा वर्ष से चल रहे विशद् गायत्री महायज्ञ का इतना विशाल कार्यक्रम जिसकी कल्पना मात्र से मस्तिष्क चकराता था, परम शांतिपूर्ण रीति से सम्पन्न हुआ इस सफलता में उस सर्वशक्ति मान माता की प्रेरणा एवं सहायता दो प्रधान है ही, पर आप सज्जनों का सहयोग श्रम एवं उत्साह भी कम महत्व का नहीं है। आप लोगों ने इस आयोजन को सफल बनाने में जिस सच्ची भावना और श्रद्धा पूर्वक सहयोग दिया उसके लिए यज्ञ संचालक आत्माएं आपकी हृदय से कृतज्ञ हैं और सच्चे मन से आपका अभिनंदन करते हुए कल्याण कारक शुभ कामनाएं करती हैं। इस पुनीत आयोजन में लगा हुआ सहयोग, श्रम एवं तप आपके लिये निश्चित रूप से कल्याण कारक होगा।

2— आपके क्षेत्र में अनेक सज्जन महायज्ञ में भागीदार तथा संरक्षक रहे हैं, उन सबके लिये अलग अलग कृतज्ञता ज्ञापन कर सकना कठिन है, इसलिये आपको यह कार्य सौंप रहे हैं कि हमारे प्रतिनिधि के रूप से इन पंक्ति यों के पाठक सभी भागीदारों और संरक्षकों एवं प्रेमियों की सेवा में उपस्थित होकर हमारी कृतज्ञता तथा शुभ कामना तथा अभिनन्दन पहुँचा दें।

3— पूर्णाहुति के दिनों में कार्य की अत्यधिक व्यस्तता होने के कारण कितने ही पत्रों का ठीक समय पर उत्तर न दिया जा सका तथा उस अवसर पर मथुरा पधारने वाले महानुभावों से भी जी भर कर बातें करने का अवसर न मिल सका, अपनी इस विवशता का हमें खेद है। साथ ही विश्वास भी है कि ‘आत्मा की एकता’ के वैज्ञानिक आधार पर हम लोग एक दूसरे तक बिना वाणी और बिना लेखनी के भी बहुत कुछ कह सुन सकते हैं। इस अवसर पर विशेष रूप से इस प्रक्रिया को काम में लिया गया है। तदनुसार स्वजनों को विचार विनिमय में कुछ अड़चन न रही होगी ऐसी आशा है।

4— पन्द्रह मास पूर्व किन्हीं विशेष शक्ति यों एवं आत्माओं की प्रेरणा से यह यज्ञ आरम्भ किया गया था। इस समय संसार का वातावरण अनेक दृष्टियाँ से अत्यन्त क्षुब्ध था, विश्व को- मानव समाज को नष्ट करने वाली अनेक विभीषिकायें मुँह बाये खड़ी थी। तत्वदर्शी लोगों ने उस व्यापक अनिष्ट को शाँत करने के लिये कुछ उपाय किये, उन्हीं में एक उपाय विशद् गायत्री महायज्ञ भी था। इसकी पूर्णता से जो परिणाम हुआ है उससे मानव जाति की अन्तरात्मा बहुत समय तक सन्तोष की साँस ले सकती है। यज्ञ से पूर्ण करने वाले आप सब सहयोगियों का कार्य निश्चित रूप से इतना महान है कि उसकी प्रशंसा करना उसका महत्व घटाने जैसा होगा। ऐसी परमार्थमयी प्रवृत्तियाँ ही विश्व कल्याण का सच्चा हेतु होती हैं।

5— संकल्पित संख्या का जप, हवन ब्रह्मभोज आदि पूर्ण हो गया, साथ ही अनिष्ट शान्ति का एक बड़ा कार्य भी बहुत हदतक सम्पन्न हो गया। पर अपना उद्देश्य इससे भी बहुत अधिक है। इस मानव जाति में सतोगुणी तत्वों की अधिक मात्रा में अभिवृद्धि चाहते हैं जिससे दुष्टता, स्वार्थपरता, बेईमानी, वासना अनीति एवं अशान्ति की प्रवृत्तियाँ घटे और उनके स्थान पर मनुष्य के अन्तः करण में सत्य, प्रेम, न्याय, उदारता, सेवा, संयम, कर्त्तव्य पालन जैसी सद्भावनाओं की तीव्रगति से वृद्धि हो। ऐसा परिवर्तन होने पर ही विश्व शान्ति का उद्देश्यपूर्ण होगा। अदृश्य जगत में ऐसा धार्मिक एवं सतोगुणी वातावरण पैदा करना विश्व शान्ति का दूसरा कार्यक्रम है। अब इस दशा में काम करने की आवश्यकता है। अनिष्ट शाँति से तो आधा ही उद्देश्य पूरा हुआ अभी शेष आधा पूरा करने के लिये मानव अन्तरात्मा में सतोगुण एवं धार्मिकता के तत्व भरने के लिये अभी और भी कठिन प्रयत्न करने की आवश्यकता है। अब हम और शाँति में न बैठेंगे, उद्देश्य को पूरा करने के लिये आगे भी वैसी ही निष्ठा से कार्य करेंगे जैसा गत 15 महीनों में किया है।

6— हमारे आगामी कार्यक्रम के दो अंग है 1-साधनात्मक 2-शिक्षात्मक। साधनात्मक कार्य से जप, जप, यज्ञ आदि आध्यात्मिक प्रक्रियाएं रहेंगी। शिक्षात्मक कार्यों में वाणी से लेखनी से, दृश्यों से या अन्य प्रकार से जन मानस की दिशा मोड़ने का कार्य किया जाएगा, इसे प्रचारात्मक या रचनात्मक कार्य कह सकते हैं। हमें तथा आपको कंधे कंधा मिलाकर कार्य करना है। इन दोनों ही कार्यों की पूर्णता के लिये इस छोटे से जीवन का अधिकाँश भाग खपा देने का व्रत लेकर हम लोग परमार्थ का पुण्य साधन और जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बनाने का स्वार्थ साधन भी कर सकेंगे। इन दोनों ही प्रकार के साधनात्मक और शिक्षात्मक मार्गों द्वारा विश्व मानव की सेवा करने के लिये आपकी अन्तरात्मा को तीव्र संवेदना के साथ आह्वान करते हैं। क्योंकि इतने विशाल पैमाने पर कार्य करने के लिए, आप जैसी मनस्वी आत्माओं की बड़ी संख्या में आवश्यकता है।

7—आप अपने आजीविका सम्बन्धी एवं अन्य आवश्यक कार्यों में से कुछ समय नियमित रूप से उपरोक्त कार्यक्रमों के लिये निकालने का प्रयत्न करें। जो लोग “समय और श्रम का चंदा” चाहे वह कितना ही कम क्यों न हों दे सकेंगे तथा विश्व मानव की सेवा के लिये साधनात्मक एवं शिक्षात्मक कार्यक्रमों में तत्परता प्रकट करेंगे उन्हें ‘व्रतधारी” माना जायगा। पिछले अंकों में कर्मयोगी व्रतधारी तथा आत्मदानी की तीन श्रेणियाँ बनाई गई थीं। पूर्णाहुति के अवसर पर आने वाले सज्जनों से भी तीन प्रकार के फार्म भराये गये थे, वह योजना रद्द करके अब सब के लिये एक ही श्रेणी व्रतधारी रखी गई है। क्योंकि भावना तीनों की एक है। परिस्थितियों के कारण ही समय देने में थोड़ी न्यूनाधिकता करनी पड़ती है। कार्य भावना द्वारा ही होता है। इसलिये तत्व एक ही प्रधान रहने से अब एक ही श्रेणी रखी जा रही है। प्रतिज्ञापत्र साथ में है। आप स्वयं व्रतधारी बनें, जो परखे हुये व्यक्ति अपने वहाँ हैं उन्हें व्रतधारी बनावें तथा और भी नये व्यक्ति यों को जल्दी में नहीं वरन् धीरे-2 पकाकर व्रतधारी बनने के लिये तत्पर करें। साँस्कृतिक सेवा शृंखला को बढ़ाना और मजबूत करना है, साथ में नया फार्म भेज रहे हैं। इसके एक-एक अक्षर की नकल अपने हाथ से करके व्रतधारी को प्रतिज्ञापत्र भरना चाहिये। छपा हुआ फार्म केवल नकल करने के लिये नमूना स्वरूप है। आपके प्रयत्न से अनेक व्रतधारी बनेंगे ऐसी आशा है।

8—साधनात्मक कार्यक्रम में 108 यज्ञों का एक संकल्प पूर्णाहुति के समय पर मथुरा में किया था। उसकी आवश्यकता जन मानस में धार्मिक एवं सात्विक प्रवृत्तियाँ उत्पन्न करने की दृष्टि से अत्याधिक है। उस सामूहिक संकल्प की पूर्णाहुति गुरु पूर्णिमा (आषाढ़ सुदी 15 ता॰जुलाई 56 के दिन करने का) निश्चय किया गया है। इस संकल्प को पूर्ण करने के लिये हमारे प्रत्येक परिजन को लग जाना चाहिये। जहाँ-जहाँ गायत्री महायज्ञ के भागीदार या संरक्षक हैं वहाँ-वहाँ छोटे या बड़े रूप में एक यज्ञ गुरुपूर्णिमा के दिन उस क्षेत्र में अवश्य होना चाहिये। मथुरा में जिस आधार पर 15 महीने का विशद् गायत्री महायज्ञ हुआ था उसी आधार पर छोटे, बड़े यज्ञ प्रत्येक स्थान पर हों। इसके लिये यहां यत्न किया जाय:—

9—गुरुपूर्णिमा के दिन अपने क्षेत्र में एक सामूहिक यज्ञ कराने के लिये उत्साही गायत्री उपासक कटिबद्ध हो, इन संयोजकों में उत्साह और परिश्रम की समुचित मात्रा होनी चाहिये। जहाँ दो, तीन व्यक्ति भी ऐसे स्वभाव के तथा एक मन के मिल जायं वहाँ सब कार्य पूरा हुआ ही समझना चाहिये। ऐसे दो तीन संयोजकों का संगठित होकर यज्ञ कराने का संकल्प कर लेना यज्ञ की सफलता की तीन, चौथाई समस्या का हल हो जाना है। जहाँ ढीले स्वभाव के, आधे मन से काम करने वाले, संकोची, निराश प्रवृत्ति के कार्यकर्ता हों वहाँ सफलता भी संदिग्ध रहती है। आप प्रयत्न करें कि आपके सहायक कुछ अच्छे कार्यकर्ता मिल जावें, यदि ऐसा हुआ तो 108 यज्ञों में से एक यज्ञ आपके यहाँ भी निश्चित रूप से हो सकता है।

10—यह यज्ञ संयोजक संगठन बैसाख सुदी 15 से अपना कार्य आरम्भ करदें, और दो महीने (जेष्ठ आषाढ़) अपने निकटवर्ती क्षेत्र में घर घर जाकर धर्म कार्य के लिए लोगों से समय की भिक्षा माँगे। जो जितना समय दे सके उसको उतने समय में गुरु पूर्णिमा तक गायत्री जप करने, और गायत्री मन्त्र लिखने का कार्य सौंपे। इन सब के जपों का हिसाब रखने की भी व्यवस्था करनी चाहिए। जिस प्रकार यहाँ से भागीदार के छपे फार्म भेजे जाते थे। वैसे ही हाथ के बने यदि फार्मों पर सब भागीदारों का हिसाब तथा पूरे नाम पते लिखने चाहिए।

11—जप प्रारम्भ कराने की योजना बैसाख सुदी 15 से आरम्भ करके गुरु पूर्णिमा तक बराबर जारी रखना चाहिए। समय बीतते जाने पर नये उपासक संभव है 10-20 दिन ही जप कर सकें तो भी हानि कुछ नहीं, जितना कुछ हो जाय उतना ही सही, जिसको जितना समय मिले वह उतना जप करे। चूँकि यह सामान्य जप है, अनुष्ठान नहीं, इसलिए इसमें ब्रह्मचर्य उपवास आदि की कोई शर्त नहीं है।

12—आषाढ़ सुदी 15 (गुरु पूर्णिमा) ता॰ 22 जुलाई को इस आयोजन का हवन रखना चाहिए। स्थानीय परिस्थिति के अनुसार छोटा या बड़ा—कम या अधिक आहुतियों का-एक दिन या लगातार कई दिन का हवन रखा जा सकता है। हवन में प्रतिदिन अधिक से अधिक नर नारियों को भाग लेने का अवसर देना चाहिए। समय कम और जनसंख्या अधिक होने की दशा में 24-24 आहुतियों की कई पारी बदली जा सकती हैं। हवन सामग्री, वितरण करने का प्रसाद, यज्ञ मण्डप का निर्माण आदि कार्यों के खर्च को एक व्यक्ति करे इसकी अपेक्षा यह उत्तम है कि अधिक व्यक्ति यों का थोड़ा थोड़ा सहयोग सामान, श्रम और समय के रूप में लिया जाय। जो कमी पड़े उसकी पूर्ति कुछ साधन सम्पन्न व्यक्ति कर सकते हैं। हवन व्यय के लिए नकदी के रूप में कुछ न लेकर सामान या श्रम माँगा जाय जो उत्तम है।

13—कुछ थोड़े व्यक्ति यों को भोजन करा देने की अपेक्षा ब्रह्मभोज का यह तरीका अधिक उत्तम है कि प्रसाद रूप में खीर हलुआ आदि कोई वस्तु बड़े परिमाण में बनाकर, यज्ञ में उपस्थित लोगों को तथा न आ सकने वाले लोगों के घरों पर थोड़ा थोड़ा प्रसाद पहुँचाने का आयोजन किया जाय। इस अवसर पर सस्ती वाली पुस्तकों का वितरण भी ज्ञानमय प्रसाद के रूप में उपयुक्त होगा। दस-पाँच रुपये का गायत्री साहित्य भी प्रत्येक यज्ञ के अवसर पर अवश्य वितरण किया जाय।

14—उपरोक्त योजना के अंतर्गत जहाँ छोटे या बड़े यज्ञ हो सकेंगे वहाँ गायत्री केन्द्र’ मान लिया जायगा। गायत्री तपोभूमि की शाखा के रूप में उन से भविष्य में भी धार्मिक आयोजनों की आशा की जाती रहेगी। एक व्यक्ति उस केन्द्र का प्रधान सेवक रहेगा, उसे सूचना आदि देने से लेकर अन्य व्यवस्थाओं तक में अधिक कार्य भार सौंपा जायगा। इन यज्ञों में जिन जिन सज्जनों ने जितना जप, हवन आदि में सहयोग दिया हो उनका पूरा पता तथा सहयोग का पूरा विवरण मथुरा भेजना चाहिए। इस सहयोग के आधार पर ही उन्हें गायत्री परिवार का सदस्य माना जायगा तथा यहाँ से उनकी सदस्यता एवं सहयोग कार्यों के अभिवंदन का एक सुन्दर प्रमाण-पत्र भेजा जायगा।

15—विशद् गायत्री महायज्ञ मथुरा में पूर्ण हुआ। ऐसी ही जिम्मेदारी हर जगह के गायत्री उपासकों पर डालकर उन्हें संगठित एवं कार्य क्षेत्र में अवतीर्ण होने के लिए यह गुरु पूर्णिमा के यज्ञों की योजना बनाई है। जहाँ इस आयोजना में परिजनों के श्रम, साहस, उत्साह एवं निष्ठा की परीक्षा है वहाँ लोकहित का महान् प्रयोजन भी छिपा हुआ है। 24 लक्ष आहुतियों का हवन 24 करोड़ जप गुरु पूर्णिमा तक पूरा होने की आशा है। यह संकल्प विश्व में धार्मिक एवं सात्विक भावनाओं की अभिवृद्धि के लिए है। परमार्थिक उद्देश्यों की पूर्ति के यह आयोजन अतीव फलप्रद सिद्ध होगा।

16—जहाँ सामूहिक बड़े यज्ञ न हो सकें वहाँ पारिवारिक छोटे हवन भी गुरु पूर्णिमा के दिन जा सकते हैं। इस प्रकार छोटे बड़े मिलाकर एक हजार यज्ञों तथा 24 करोड़ गायत्री जप हो जाने की आशा की जाती है। यज्ञों के अन्त में प्रवचनों की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। जहाँ अच्छे विद्वान वक्त न हों वहाँ अखण्ड ज्योति के कोई लेख सुनाये जा सकते हैं। इस प्रकार साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम का मंगलाचरण प्रत्येक स्थान पर होने के उपरान्त स्थान स्थान पर धार्मिक शिक्षा का कार्यक्रम किया जाना है, जिसकी रूपरेखा मार्च 56 की अखण्ड ज्योति में विस्तार पूर्वक छापी जा चुकी है।

17—ता॰ 1 जून से 15 जून तक नैतिक शिक्षा के लिए 15 दिन को तपोभूमि में शिक्षण शिविर होगा। यों शिक्षाएँ सभी के लिए उपयोगी हैं पर विशेषतया विद्यार्थियों को गर्मियों की छुट्टियों के दिनों में गुरु-कुल पद्धति की उत्तम शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले इस दृष्टि से यह आयोजन किया गया है। विद्यार्थी लोग या जिनकी भी इच्छा हो प्रसन्नता पूर्वक इस शिक्षासत्र में आ सकते हैं।

18—गायत्री तपोभूमि में “साँस्कृतिक विद्यालय” की नियमित कक्षाएं आरम्भ हो गई हैं। 20 प्रकार के विविध प्रयोजनों को पूर्ण करने वाले यज्ञों की क्रियात्मक शिक्षा, वेदपाठ, गायत्री गीता, 16 संस्कारों का विधान, भारतीय संस्कृति की तात्विक विशेषताओं का परिचय, कथा कीर्तन के उपयोगी संगीत, व्यवहारिक शिष्टाचार, लाठी चलाना आसन आदि व्यायाम शिक्षाएं, प्रवचन करने की शैली, यज्ञोपवीत बनाकर अपने गुजारे लायक कमा लेने की शिक्षा, साधारण चिकित्सा ज्ञान एवं औषधि निर्माण आदि जीवन को समुचित बनाने वाली एवं लोक सेवा के लिए उपयोगी सिद्ध होने वाली शिक्षाएं सुव्यवस्थित रीति से दी जा रही है। शिक्षा की कोई फीस नहीं है। जिन्हें अवकाश कम है वे तीन महीने में भी उपरोक्त शिक्षा पूरी कर सकते हैं। जिन्हें अवकाश हो उन्हें एक वर्ष उपरोक्त शिक्षा की पूर्णता के लिए ठहरना चाहिए। छात्रों को अपना भोजन भार स्वयं उठाना चाहिए। असमर्थों के लिए तपोभूमि की ओर से भी भोजन व्यवस्था की जा सकती है। शिक्षा की नियमावली अलग से माँग कर विद्यार्थी आवेदन पत्र भेजें।

19—तपोभूमि की भोजन व्यवस्था आजकल हमारी धर्मपत्नी सँभालती हैं, उसकी सहायता के लिए एक दो देवियों की और आवश्यकता है। परिश्रमी, स्वस्थ साधु स्वभाव की एवं पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त महिलाएं जो इस कार्य में हाथ बँटाना चाहें अपना पूरा परिचय लिखें। उनके निर्वाह की आवश्यक सुविधा यहाँ रहेगी।

20—अखण्ड ज्योति का यह मई का अंक पूर्व सूचनानुसार 15 दिन लेट छप रहा है। यज्ञ की व्यस्तता के कारण तथा अपना प्रेस इन दिनों बन्द होने के कारण यह अंक समय पर न निकल सका। जल्दी में पृष्ठ भी कम छापे जा रहे हैं। इस अंक के लिए अनेक महत्व पूर्ण लेख आये थे, उन्हें छापने में पूरा एक महीना लग जाता। जो फोटो यज्ञ के समय लिये गये व उनके ब्लाक भी समय पर तैयार न हो सके। सभी लेख और चित्र एक अंक में छपने में काफी देर हो जाती और मई जून का संयुक्तांक निकालना पड़ता पहले कुछ ऐसा ही विचार भी हुआ था पर पीछे उसे बदल दिया। जून का अंक 5-6 तारीख तक यहाँ से निकल जायगा उसमें यज्ञ के समय लिये गये अनेक चित्र भी होंगे! बचे हुए लेख भी छपेंगे।

21—यज्ञ कार्य में आय से बहुत अधिक खर्च हुआ। उसकी पूर्ति में अखण्ड ज्योति के ग्राहकों का एक वर्ष के लिए जमा किया गया चन्दा भी खर्च हो गया है। अगले महीनों के अंक निकालने में कठिनाई पड़ेगी। पाठक यदि कुछ नये ग्राहक बढ़ाने की कृपा कर सकें तो उस चन्दे की आय से अगले अंकों के ठीक प्रकार छपते रहने की व्यवस्था में सुविधा होगी यों पत्रिका तो चालू ही रहेगी, पर इस वर्ष एक तो पृष्ठ अधिक बढ़े, मूल्य उसके मुकाबले में केवल आठ आना ही बढ़ा, इस दृष्टि से वैसे भी घाटा चल रहा था, दूसरे जमा चन्दा यज्ञ की मदद में खर्च हो जाने से यह अड़चन और बढ़ गई है। इस वर्ष पत्रिका चलाने में जो कठिनाई आ रही है, उसे यदि पाठक चाहें तो कुछ नये ग्राहक बढ़ाने का प्रयत्न करके आसानी से दूर कर सकते हैं। इस पुनीत प्रयत्न में अनेक आत्माओं तक सद्ज्ञान का प्रकाश पहुँचाने एवं अपना कार्य क्षेत्र विस्तृत करने का पुण्य लाभ तो स्पष्ट ही है। जिनके लिए संभव हो वे इस दिशा में प्रयत्न अवश्य करें।

22—साँस्कृतिक पुनरुत्थान कार्यक्रम को देशव्यापी बनाने के लिए ऐसे आत्म दानियों की बड़ी आवश्यकता है, जिनके लिए पीछे पारिवारिक जिम्मेदारी न हो और योग्यता,उत्साह, स्वास्थ्य एवं सेवा भावना की प्रचुरता हो। ऐसे नर नारियों को समुचित शिक्षा देकर देश के कोने कोने में बिखेरने की आवश्यकता है। ऐसी आत्माओं की तृष्णा और वासना के चंगुल में से निकलकर संस्कृति की धर्म की सेवा तथा आत्म कल्याण की साधना में लगने के लिए गायत्री तपोभूमि सादर आमन्त्रित करती है।

23—पूर्णाहुति के समय ऐसा विचार किया गया था कि विभिन्न स्थानों पर बड़े यज्ञ हों और उनके साथ बड़े साँस्कृतिक सम्मेलन भी हों। ऐसे आयोजनों में हमने स्वयं भी जाने की इच्छा प्रकट की थी। पर अब उस रूपरेखा में कुछ परिवर्तन किया गया है। 108 यज्ञों का संकल्प गुरु पूर्णिमा के दिन पूर्ण करने का निश्चय किया गया है। यह कार्यभार प्रत्येक स्थान के गायत्री उपासकों पर छोड़ दिया गया है। इन छोटे यज्ञों में जो गायत्री उपासक एवं धर्म प्रेमी एकत्रित होंगे, इन्हें साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के सम्बन्ध में विस्तृत विचार दिये जायेंगे, जो अखंड ज्योति के अगले अंक में छपेंगे। अलग पुस्तिकाएं उसकी छापी जायेंगी। यह विचार उन यज्ञों के अन्त में हमारे सन्देश एवं अनुरोध के रूप में सुनाये जायं। इस प्रकार सब जगह हमारे पहुँचने एवं यज्ञों का आयोजन संक्षिप्त रूप से इसी बार एक साथ पूरा हो जायगा।

24—गायत्री ज्ञान प्रसार तथा साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना को व्यापक रूप से फैलाने तथा गायत्री परिवार के सदस्यों से व्यक्ति गत विचार विनिमय करने की दृष्टि से क्षेत्रीय सम्मेलन के रूप में ज्ञानयज्ञ करने का विचार किया है। एक विस्तृत क्षेत्र के परिजन एक स्थान पर दो दिन तक एकत्रित हों, और परस्पर विचार विनिमय,परिचय,प्रश्नोत्तर,एवं आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा बनाने में दो दिन लगाये जायँ। हवन आयोजनों में जो बहुत सा समय लगता है उसमें इस प्रकार के परस्पर आत्मीय मिलन की गुञ्जाइश कम थी। इसलिए ज्ञान यज्ञों में हमने अपने जाते रहने का प्रोग्राम बनाया है। केंद्रीय स्थानों पर जहाँ उस क्षेत्र के लोग आसानी से पहुँच सकें तथा रेल आदि की समुचित सुविधा हो वहाँ ‘गायत्री ज्ञान यज्ञ’ रखे जायं। इन यज्ञों का कार्यक्रम गुरु पूर्णिमा के बाद आरम्भ होगा।

25—गुरु पूर्णिमा के अवसर पर होने वाले यज्ञों के लिए यदि कहीं हवन सामग्री बनाने की ठीक व्यवस्था न हो सके तो शुद्ध और शास्त्रोक्त विधि से बनाई हवन सामग्री लागत मूल्य पर तपोभूमि से मंगाई जा सकती है।


Quotation

बद्ध जीव जब तीर्थ में जाता है, तो उसे वहाँ भी ईश्वर चिन्तन का समय नहीं मिलता, परिवार वालों की ही मोटरी ढोते ढोते जान जाती है। मंदिर में भी जाकर केवल लड़के को ही प्रणाम कराने और चरणामृत पिलाने में लगा रहता है। ऊँट काँटे खाता है काँटे उसके मुँह में चुभते हैं, और उसे कष्ट देते हैं, लेकिन वह काँटे खाना नहीं छोड़ता। इसी प्रकार बद्ध जीव संसार यातनाएँ सहकर भी संसार में लिप्त रहता है। स्त्री मर जाती है तो फिर विवाह करते हैं, पुत्र के मरने के दुःख से व्याकुल हो उठते हैं, किंतु फिर भी साँसारिक जाल में ही रत होते हैं।


साँस्कृतिक सेवा-शृंखला की प्रतिज्ञाएं

1—मैं आस्तिक बनने की प्रतिज्ञा करता हूँ। सर्वव्यापी, न्यायकारी परमात्मा के आदेशानुसार मैं सब मनुष्यों को अपना आत्मीय समझ कर उनके साथ प्रेमयुक्त बर्ताव करूंगा।

2— मैं गायत्री का अपनी आध्यात्मिक माता मानता हूँ और सद्बुद्धि, विवेकशीलता, श्रद्धा, मानवता, पवित्रता एवं मातृ जाति की उत्कृष्टता को गायत्री का स्वरूप मानता हूँ। मैं इस स्वरूप की उपासना करते हुए इस मान्यता के अनुकूल ही आचरण करूंगा।

3—मैं यज्ञ को अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वीकार करता हूँ। त्यागमय प्रेम-भावना, आत्म-संयम, कर्तव्य निष्ठा एवं उदारता को यज्ञ का संदेश मानता हूँ। मैं यज्ञ के इस रूप की उपासना करके सदा अपनी आत्मोन्नति के साथ देश और समाज-सेवा में संलग्न रहूँगा।

4—मैं आत्मनिष्ठ बनने की प्रतिज्ञा करता हूँ। अपनी त्रुटियों को दूर करने, अपने को अधिक सामर्थ्यवान बनाने, आत्मबल बढ़ाने एवं भली बुरी परिस्थितियों में भी मानसिक संतुलन स्थिर रखने का प्रयत्न करूंगा।

5—मैं पवित्रता पर आस्था रखूँगा। भीतर और बाहर सर्वत्र स्वच्छता एवं पवित्रता को बढ़ाऊँगा। गन्दगी और अव्यवस्था से बचता रहूँगा।

6—भारतीय संस्कृति पर मेरी अटूट निष्ठा रहेगी। सादा जीवन और उच्च विचार मेरी जीवन-नीति रहेगी। मैं दूसरों की सेवा में कुछ समय अवश्य लगाऊँगा और इस प्रकार उन तक भारतीय संस्कृति का संदेश पहुँचाऊँगा।

7—मैं व्रत लेता हूँ कि अपने को विश्वमानव का—समष्टि-जगत का—एक अभिन्न अंग मानूंगा। अपने लाभ से पहले समाज के लाभ से पहले समाज के लाभ को ध्यान में रखकर सार्वजनिक उन्नति के किसी न किसी आयोजन में अवश्य भाग लूँगा।

8—मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मानव-मात्र के अधिकारों में वर्ण, वंश एवं लिंग के आधार पर कोई भेद-भाव न मानूँगा।

9—मैं अपनी शक्ति , सामर्थ्य, सम्पत्ति, विद्या, बुद्धि और स्थिति को ईश्वर की अमानत मानूँगा। उसका न्यूनतम लाभ अपने लिये लेते हुए शेष का उपयोग परोपकार के लिए करूंगा।

10—मैं श्रम की प्रतिष्ठा करता हूँ, समय की बहुमूल्यता को स्वीकार करता हूँ। स्वयं रचनात्मक श्रम करूंगा और श्रम करने वालों का सम्मान करूंगा।

11—मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अपने अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर अधिक ध्यान दूँगा। अपने से दुर्बलों के पक्ष में अपने अधिकारों को छोड़ूंगा किन्तु अन्यायी बलवान के आगे झुकूँगा नहीं।

12—मैं संयम की साधना करूंगा, इन्द्रियों पर काबू रखूँगा, व्यसन और व्यभिचार, से बचूँगा।

*समाप्त*