थके पथिक से

(विद्यावती मिश्र)


थके पथिक से (Kavita)

अभी से रोको नहीं चरण!

अभी दूर हो सका कहाँ है, इस जगती से शोक, अभी कहाँ फैला सर्वोदय का पवित्र आलोक,

चिरंतन ज्योतित ज्ञान किरण! अभी से रोको नहीं चरण!!

अगति नाश है, प्रगति चेतना और कर्म उल्लास, डग अक्षर बन कर लिखते हैं मानव का इतिहास,

यहाँ पर यति का नाम करण! अभी से रोको नहीं चरण!!

कुँभकार अपने हाथों से नव-निर्माण करो, पौरुष के प्रसाद से जीवन जय का कोष भरो,

मनुजता का नवीन प्रकरण! अभी से रोको नहीं चरण!!


धर्म तत्व में समन्वय की आवश्यकता

(श्री. डा. भगवानदास एम. ए.)

संसार के सब मतों का समन्वय विश्व की एकता के लिये अनिवार्य है। संसार में ऐसे प्रयत्न पहले भी हुए हैं। वास्तव में संसार में जो सबसे पुरानी बात है वही सदा नयी है।

नयो नवो भवति जायमानो अन्हां कतुः।

दिवसों के पताकारूप सूर्यदेव, अतिप्राचीन होते हुए भी, नित्य नये होकर प्रतिदिन जन्म लेते हैं। किन्तु संसार का ज्ञान प्राप्त करने के पहले आत्मज्ञान प्राप्त करने की आवश्यकता होती है। ज्ञानकाण्ड के बिना कर्मकाण्ड का साधन नहीं होता। आत्मा ही “मैं” ही सब कुछ है, क्योंकि बिना ‘मैं’ की चेतना के, बिना देखने वाले के यह सब दृश्य कुछ भी नहीं हो सकता—ऐसा जो देखता है, मानता है, जानता है, आत्मा में ही सुख पाता है, आत्मा से ही खेलता है, आत्मा को साथी बनाता है, आत्मा से ही आनन्द पाता है; वही विराट, अपना राजा, आत्मवश, स्वाधीन स्वतंत्र होता है, वह जिस लोक में जाना चाहता है वहाँ मानस कल्पना-शक्ति से जा सकता है। जो इसके विरुद्ध देखते हैं ‘मैं’ के बड़प्पन को नहीं पहचानते, आत्मा से ‘मैं’ से किसी दूसरे को बड़ा समझते हैं, उनके ऊपर दूसरे ही राजा होते हैं; उनके लोक उनकी सामग्री पराधीन और क्षीयमान होती है; किसी लोक में, किसी देश में, इसी भूलोक के विविध खण्डों देशों, द्वीपों, वर्षों में, तथा भुवः स्वः आदि लोकों में, वे मनमाने आदर-से सम्मान से नहीं घूम फिर सकते।

लगभग 1910-11 ई. में एक समाचार पत्र ने यह प्रश्न किया था कि ‘हिन्दू’ किसको कहते हैं, हिन्दुत्व का क्या विशेष व्यावर्तक लक्षण है, किस आचार-विचार वाले मनुष्य को हिन्दू कहना चाहिये। उस पत्र ने इस प्रश्न पर बहुत से जाने-माने लोगों के उत्तर-प्रत्युत्तर प्रकाशित किये। अन्त में यही सिद्ध किया गया कि जो अपने को ‘हिन्दू’ कहे वही हिन्दू है। किन्तु वास्तव में जिसे आज ‘हिन्दू धर्म’ कहते हैं उसका उचित नाम संस्कृत और परिष्कृत अवस्था में ‘मानव-धर्म’ था और अब भी होना चाहिये। जिस प्रकार मनुष्य शरीर में बहुत विभिन्न कर्म, धर्म, रूप, आकार और अवयव हैं; पर जब तक जीव-आत्मा-सूत्र-आत्मा उन सब का संग्रह किये रहता है—उन्हें एक सूत्र में बाँधे रहता है तब तक वे अत्यन्त भिन्न होते हुए भी मिल कर एक शरीर कहलाते हैं; पर जब वह सूत्रात्मा हट जाती है, तब उनके आपस में तरह तरह के विकार और विरोध पैदा हो जाते हैं, शरीर मृत होकर उसकी एकता नष्ट हो जाती है, सब अवयव विच्छिन्न हो जाते हैं, और सड़-गल जाते हैं। जैसे माला के दाने सूत्र से बंधे रहते हैं और शोभा देते हैं, पर उसके टूटने पर बिखर जाते हैं, वैसे ही आत्म सत्ता का, बुद्धिमत्ता का, आत्मज्ञ बुद्धि का, और विधि आचार-विचारों को और विधि आचार-विचारवानों को, अपने साथ, और एक दूसरे के साथ बाँधे रहते हैं, तब तक वे सब, एक एक, अपनी-अपनी हद के अन्दर अपना-अपना कर्म-धर्म करते रहते हैं, और समाज-शरीर की शोभा सौंदर्य-बल आदि की वृद्धि होती रहती है। जब ऐसा नहीं होता, तब वे एक दूसरे से कलह करके मर मिटते हैं।

हिन्दू धर्म में संसार के अन्य धर्मों के साथ सामंजस्य की, उनके मूल तत्वों को ग्रहण करने की शक्ति बीज रूप में निहित है। अधिकारी के भेद से धर्म में भेद होता है। देश, काल निमित्त के भेद से धर्मों में भेद होता है। जिस स्थान पर खड़े होकर हम देखते हैं उस स्थान के बदलने से दर्शन, दृश्य का रूप बदल जाता है। इस देश-काल-मात्र-निमित्त और कर्म की विशेषता से जो एक व्यक्ति के लिए धर्म है वही दूसरे आदमी के लिये दूसरे देश-काल और पात्र निमित्त और कर्म की विशेषता से, अधर्म होता है। केवल एक दो ग्रन्थ पढ़ लेने से धर्म का पता नहीं लगता; न सदा के लिये कभी न बदलने वाले धर्मों की सूची का परिपाठ कर दिया जा सकता है। अच्छी अवस्था का धर्म दूसरा और विषम अवस्था का धर्म दूसरा होता है।

छोटे बच्चों को मिट्टी के खिलौने अच्छे लगेंगे- उन्हें रेखागणित और बीजगणित में उलझाने का प्रयत्न व्यर्थ होगा। यही दशा मतों की, सम्प्रदायों की और पन्थों की है—’मुण्डे-मुण्डे मतिर्भिन्ना।’ और ‘भिन्नरुचिर्हिलोकाः।’ प्रसिद्ध ही है; पर जब बचपन बीत जायगा तो खिलौने अपने आप छूट जायेंगे और दूसरे प्रकार के ऊंचे खिलौनों में मन लग जायगा।

अप्सु देवा मनुष्याणां, दिवि देवा मनीषिणाम्। बालानां काष्ठ लोष्ठेषु, बुधस्यात्मनि देवता। उत्तमा सहजाऽवस्था, द्वितीया ध्यान धारण, तृतीया प्रतिमा पूजा, होमयात्रा चतुर्थिका।

बच्चों के देवता काठ-पत्थर के खिलौनों में, मूर्तियों में, साधारण मनुष्यों के तीर्थ माने हुए सरिता, सरोवरों के जल में, मनीषी विद्वानों के सूर्यचन्द्र आदि आकाश में हैं, बुधका-बोधवान का, ज्ञानवान का देव, सर्वव्यापी अपनी आत्मा ही है।, सहज अवस्था, अर्थात् सब दृश्य संसार को ही परमात्मा का स्वरूप जानना, यह उत्तम कोटि है; विशेष-विशेष ध्यान धारण करना, यह उससे नीची दूसरी कोटि है, प्रतिमाओं-मूर्तियों की पूजा तीसरी कोटि है, और होम तथा यात्रा चौथी है।

इस प्रकार देखें तो हिन्दुओं में भी उपासनाओं के भेद हैं और उनमें अन्ध श्रद्धा का बाहुल्य है। मुसलमान स्वयं मूर्तिभंजक होते हुए भी कब्रों की पूजा करते हैं। मानव स्वभाव उपासना के विभिन्न मार्गों में भी एक अद्भुत सामंजस्य खोज लेता है जो इस बात का प्रमाण है कि मानव जाति में एक स्वभावगत मौलिक एकता है और उसके विचारों में सदैव समन्वय की गुँजाइश रहती है।


चिन्ता और भय की क्या जरूरत?

(श्री स्वामी शिवानंद सरस्वती)

भय, चिन्ता और उद्विग्नता का मूल कारण अविद्या है सुषुप्ति में जब मन ब्रह्म में स्थित है तब ये सब तटस्थ रहते हैं। जब मन शरीर से पृथक् रहता है तब वेदना की अनुभूति नहीं होती। अतएव यह स्वतः सिद्ध है कि ये सारे कार्य कलाप मन द्वारा विनिर्मित हैं। जब इन कुत्सित संस्कारों का जो कि इन आधि-व्याधियों के उत्पादक हैं, विवेक से उन्मूलन कर दें, तो आप आत्मानन्द के अलौकिक सुख को हस्तगत कर सकते हैं। आप अवश्य प्रयत्न करें। आपको घर-बाहर की चिन्ता है वित्त-परिवार की चिन्ता है। बस-बस यही चिन्ताओं का उद्गम है, यही बन्धन है और इसी से मुक्ति का नाम ज्ञान है। यह सम्बन्ध अथवा बन्धन ही चिन्ताओं का आवाहन करता है। यह अभिमान है जो अविद्या जन्य है। शरीर का मोह नष्ट कर, अहंता का उलझन काटकर जब जीवात्मा ब्रह्मत्व की ओर बढ़ता है जब अविद्या, अज्ञान, ममता और माया का पटाक्षेप हो जाता है, तथा अजस्र क्लेश, असीम वेदना, साँसारिक यातना और यंत्रणाओं का पीछा छूट जाता है और वह क्षणभंगुर अस्तित्व की विस्मृति कर सनातन अस्तित्व की उत्कंठा से आपूरित हो जाता है। यह देहाध्यास ही मूलभूत अज्ञान का कारण है। यही परम शत्रु है। आप इसकी ओर से उदासीन रहें। आप इस देह के मलकूप से निकल कर आनन्द मार्ग पर आयें।

आपको अपने सुन्दर मुख के मलीन हो जाने की चिन्ता रहती है। आपको अपने कालर टार्च के धूसरित हो जाने की चिन्ता रहती है। पाउडर और स्नो से जिसकी आप इतनी शुश्रूषा कर रहे हैं, वह कभी मरघट पर असहाय पड़ा रहेगा। यही शरीर श्रृंगालों का आहार मात्र रह जायेगा। इस पुत्र, वित्त, परिवार के लिए आप इतना जान दे रहें हैं वे वास्तव में आपके परम शत्रु हैं। आप जीवन देकर भी क्या इन्हें सुखी कर सकते हैं? कदाचित नहीं। आपको बच्चे के खिलौने पर भी सावधानी रखनी पड़ती है। आपको पत्नी की आवश्यकताओं पर भी तरस है। आप इसके प्रतिशोध में क्या पाते हैं—केवल प्रताड़ना या और कुछ? तात्पर्य, संसार यातना का ही पर्याय है। जिस प्रकार रेशम का कीड़ा और मकड़ी अपने जाल निर्माण अपने नाश के लिए ही करता है उसी प्रकार इन चिन्ताओं का सर्जन आप अपने हाथों से अपने ही नाश के लिए कर रहे हैं। सूर्य अपने ताप से समुद्र के जल को वाष्प बनाता है और वही बादल बनकर पुनः उसी को ढक लेता है। अतएव आपकी चिन्ता जिसके निमित्त है वही आपका क्षतिमूलक है।

एक वणिक को निरन्तर यह चिन्ता बनी ही रहती है कि वह किस प्रकार मिथ्या व्यवहार द्वारा भी लाभान्वित ही रहे। एक छात्र को सतत् परिश्रम के अनन्तर भी सफलता में संशय बना ही रहता है। तदनन्तर ठौर-ठौर ठोकर खाते हुए दासवृत्ति की चिन्ता और इसके उपरान्त विवाह और फिर परिवार की। जीवन का वृत्त चिंताओं से ही आच्छादित है। विद्युद्वत् कदाचित सुख की द्युति दृष्टिगोचर होती है और आप इसी की प्रत्याशा में काल यापन करते रहते हैं। चिंताओं के कारण आपके बाल श्वेत हो गए। आँखें सूज गई मस्तिष्क निष्क्रिय हो गया, अंग-प्रत्यंग शिथिल हो गए हैं। दिन-प्रतिदिन जरा को समक्ष देखकर आप म्लान मुख होते जा रहे हैं। फिर भी जीवन का कौन सा प्रश्न शेष रह गया है जिसका समाधान ढूंढ़ने के लिए आप कूड़े के ढेर पर से नहीं उठते। जीवन मृतक बनकर इन्द्रियों का क्रीतदास बनकर, मूढ़ मन का अनुगमन कर, साँसारिकता का बोझ सिर पर लेकर आप जिस मार्ग पर सफलता की प्रत्याशा में जो रहे हैं वह राह ध्वंस की ओर ले जायगी।

कवि मानस-व्यथा-पूर्ण भाव ही प्रकट करते हैं, साहित्यिकों की लेखनी पृष्ठों को अश्रु से ही सींच देती है, परन्तु क्या योगी और भक्तों के आन्तरिक व्यथा की छाया देखी है? भय और चिंताओं से त्रस्त कौन है जो दुराचारी है, कुकर्मी है, असंभव है कोई सत्पथारुढ़ हो फिर भी वह चिंता रत है। इसका एकमात्र कारण यही है कि जिस प्रकार काजल की कोठरी में कितनी भी सतर्कता से क्यों न प्रवेश करें, काजल की उक्त रेखा आपको छू ही देगी। यह काजल की कोठरी आपका परिवार, आपका वैभव और देहाध्यास है। आप इनमें जब तक आसक्त हैं तब तक आप स्वप्न में भी सुख की आशा न रखें। जिस प्रकार रूप के पीछे छाया तथा बैल के पीछे गाड़ी का पहिया लगा ही रहता है- उसी प्रकार आपके पीछे दुख-दैन्य लगा ही रहेगा। एक पक्षी माँस का टुकड़ा लेकर उड़ता है और उसे छीनने के लिए पीछे हजारों पक्षी पड़ जाते हैं। जब वह टुकड़े को पृथिवी पर छोड़ देता है। तभी चैन की सांस ले पाता है। हां, तो इसी प्रकार आप तब तक चिन्तित रहेंगे ही जब तक आपने परिवार और वित्त को अपना समझ रखा है। यह शारीरिक बन्धन ही नाश का मूल है। पारिवारिक बन्धन इसी का हेतु है। न आप परिवार के हैं, न यह परिवार आपका है, न आप शरीर के हैं और न यह शरीर आपका है। आज ही मल मूत्र के इस कूप से आप अपने स्वरूप को पहचानें। आप अमर आत्मा हैं। सत् चित् और आनन्द हैं, भय चिंता और क्लेश आपके साम्राज्य में कहाँ है? यह शोक और आतुर उच्छ्वास भी आपकी असमर्थता नहीं, बल्कि यह शरीर के प्रारब्ध कर्म का भोग मात्र है। और आप शरीर नहीं। आप असंग विरक्त अकर्ता और अभोक्ता हैं। शुद्ध सनातन और आनन्दमय ब्रह्म हैं। एक ब्रह्म यही ज्ञान है। जरा चित्त देकर सोचें कि गगनचारी कितना आह्लादित है जिसे चिंता छू नहीं पाती। आप उससे भी अधमतर हैं। एक परमहंस संन्यासी को देखें जिसकी मस्ती पर आपको तरस आयेगा। जिसके तन पर एक चिथड़ा नहीं रहता उस एक अवधूत को देखें, क्या उसे हिमालय के हिम कण गला सकते हैं, अथवा उसे अविरल वर्षा की ही परवा है? क्या उसे भूख प्यास भी लगती है? आप नहीं जानते होंगे आप अपनी चिंताओं से कहिए.... नमस्ते, मैं तुमसे कहीं ऊपर हूँ तुम मुझे छू नहीं सकते। मैं हूँ आनन्द, आरोग्य और उल्लास। मैं हूँ नित्य मुक्त, सर्वव्यापक, सर्वसमर्थ आत्मा.... जिसे न अग्नि जला सकती है और न शीत कंपा सकती है, और न मृत्यु ही नष्ट कर सकती।

अनुभव कीजिये और स्मित हास मय आनन रखिये। रोये हुये को भी हास्य का आसव पिलाइये। मानव जीवन रोने के लिए नहीं है। आप निरर्थक रोग-शोक-सन्ताप से मुख मोड़कर आत्मानन्द का उपभोग करें, आत्मा में ध्यान करें, आत्मा में ही रमन करें। क्योंकि आप अमर आत्मा ही हैं। यह साँसारिक उलझन यथा शीघ्र तोड़कर आप ईश्वर साक्षात्कार करें तथा जीवनमुक्त बनें, यह अनर्गल पारिवारिक प्रलाप का विस्मरण कर हर्षोत्फुल्ल होकर गायें....

देहोनाहम् जीवोनाहम् ब्रह्मैवाहम् ब्रह्मोहम्

सोऽहम् सोऽहम् सोऽहम् शिवोऽहम् शुद्ध सच्चिदानंदोऽहम्


आप श्रद्धालु बनिए

(श्री ला. ना. बृहस्पति)

नास्ति श्रद्धा समं पुण्यं नारित श्रद्धा समं सुखम्। नास्ति श्रद्धा समं तीर्थं संसारे प्राणिनां नृप॥

(योगवा.)

हे राजन्! संसार में प्राणियों के लिये श्रद्धा के समान न तो कोई पुण्य है, न श्रद्धा के समान कोई सुख है और न श्रद्धा के समान कोई तीर्थ है! अथवा पुण्य सुख और तीर्थ की संसार में सर्वोपरि स्थिति यदि कोई है तो वह केवल एक मात्र—“श्रद्धा” है! दूसरे शब्दों में- “श्रेय की सिद्धि जिस परम-श्रेष्ठ से प्राप्त होती है, उस परम-श्रेष्ठ के प्रति सरल हृदय की प्रीतियुक्र भावना को “श्रद्धा” कहते हैं।”

वास्तव में किसी के प्रति हृदय में अत्यन्त आदर पूर्वक जो पूज्य-भावना जाग्रत होती है—उसी को श्रद्धा कहते हैं।

इसको दूसरे शब्दों में यों भी कह सकते हैं:—

जिसकी थाह अपनी बुद्धि के द्वारा न मिलती तो उसके प्रति जो सविनय प्रेम-भावना विकसित होती है—उसी को श्रद्धा कहते हैं। गीता में भगवान् योगेश्वर कृष्ण महात्मा अर्जुन को श्रद्धा की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं:—

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा पराँशान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥ (गीता)

श्रद्धावान् पुरुष ज्ञान लाभ कर जितेन्द्रिय होकर तत्क्षण परम-शान्ति को प्राप्त हो जाता है।

और—

अश्रद्धयाहुतं दत्तं तपस्तप्त कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥ (गीता)

हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, तथा दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा जो कुछ भी किया हुआ कर्म है वह समस्त असत् ही समझो। उसका न तो इस जन्म में कुछ फल मिलता है, न परलोक में!

संत-महात्मा, सद्गुरु, वेदशास्त्रादि और तीर्थ देवतादि सभी से तब तक समुचित फल की प्राप्ति नहीं होती, जब तक हृदय में उनके प्रति विशुद्ध श्रद्धा जाग्रत न हो।

सात्विक श्रद्धा की पूर्णता में अंतःकरण पवित्र हो जाता है। नीचातिनीच, अध्मातिअधम पतितों को भी पावन एवं परम-पुण्यशाली बना देने की अतुलनीय क्षमता इसी “श्रद्धा” में निहित है! श्रद्धा के बल से ही मलिन चित्त अशुद्ध चिन्तन का त्याग करके परमात्मा का चिन्तन करता रहता है एवं बुद्धि भी जड़ पदार्थों में ही तन्मय न रहकर परमात्मज्ञान में अधिकाधिक सूक्ष्मदर्शी होकर दिव्य हो जाती है और इसी प्रकार की विशुद्ध-बुद्धि के द्वारा मायाबद्ध अह की परमगति अथवा मुक्ति होती है। ऐसे मुक्त जीवात्मा, परमगति को प्राप्त व्यक्ति ही सार्वभौम-सेवा-साधना में सफलता प्राप्त कर संसार में शुद्धि के स्रोत चिरस्थायी बनाये रखने में सफल हो सके हैं।

अपनी कुत्सित कामनाओं की पूर्ति के लिये जो क्रूर स्वभाव वाली शक्तियों को भजते हैं, वे तमोगुणी श्रद्धा वाले राक्षसी प्रकृति के व्यक्ति हैं।

जो समुचित धर्म और शास्त्र सम्मत मर्यादा पूर्वक साँसारिक सुख ऐश्वर्य-भोग एवं स्वर्ग की प्राप्ति के लिये देव-शक्तियों के उपासक हैं, वे रजोगुणी श्रद्धा वाले व्यक्ति हैं, और—

आत्म-कल्याणार्थ निष्काम भाव से भक्ति, ज्ञान के उदय के लिये केवल परमात्मा के ही जो उपासक होते हैं—वे सतोगुणी श्रद्धा वाले पुरुष हैं।

सात्विकी श्रद्धा वालों का जीवन भक्ति और ज्ञान के सुख से परम शान्तिमय होता है, राजसी श्रद्धा वालों का जीवन विक्षिप्त और भोगलोलुप होने के कारण दुःख युक्त होता है तथा तामसी-श्रद्धा वाले लोगों का जीवन मूढ़ता अथवा जड़ता रूप अज्ञान—अन्धकारमय होता है।

जब तक सात्विक श्रद्धा का उदय नहीं होता तब तक संसार का कोई भी व्यक्ति परम-सुधि-स्वरूप संतसद्गुरु के वास्तविक रहस्यों का ज्ञाता नहीं बन सकता।

वास्तव में सात्विक शुद्ध श्रद्धावान् व्यक्ति के अन्तर में ही सन्त-सद्गुरु स्वयं अपनी महती दया से नित स्वरूप का ज्ञान कराते हैं। सद्-शिष्य की शुद्ध जिज्ञासा एवं सात्विक श्रद्धाभाव के अनुसार व्यापक परमात्मा की ज्ञानमयी शक्ति ही पवित्र अन्तः करण वाले महान् पुरुषों के द्वारा अज्ञान में भटकते हुए शिष्य का सत् पथ-प्रदर्शन करती रहती है।

यह ज्ञानमयी परम शक्ति ही सद्गुरु तत्व है, जिससे जीव का परम कल्याण होता है।

सात्विक शुद्ध श्रद्धा वाले व्यक्ति ही सर्वोत्तम श्रद्धालु हैं। उत्तम श्रद्धालु का पथ-प्रदर्शन सद्गुरु देव ही करते हैं और ये श्रद्धालु भी सर्वभावेन सद्गुरुदेव के ही आश्रित होकर रहते हैं।

इसीलिये श्रद्धालु सदा निर्भय और निश्चिन्त होते हैं। श्रद्धालु के हृदय में सद्गुरुदेव के अतिरिक्त और किसी के लिये स्थान नहीं मिलता। वह सरलता एवं सद्भाव पूर्वक अपना जीवन भार सद्गुरु के कर-कमलों में देकर अपना सब कुछ सुरक्षित और सार्थक समझता है। श्रद्धालु अपने हानि-लाभ, पतन-उत्थान की चिन्ता नहीं करता।

जिसका अन्तःकरण सरल एवं शुद्ध है उसी में सात्विक श्रद्धा प्रकाशित होती है सन्त सद्गुरु के सान्निध्य में रहकर जो उनकी आज्ञानुसार सदाचरण, सद्वर्तन रूपी सेवा करता है, उसी की श्रद्धा सात्विक होती है। वह स्वच्छंद, स्वेच्छाचारी नहीं होता, वह अपने श्रद्धेय की रुचि-विरुद्ध कुछ भी नहीं करता वास्तव में ऐसे ही व्यक्ति के अन्तर में सर्वोत्तम श्रद्धा का वास होता है।

जो अपनी सेवाओं का मूल्य नहीं चाहता, जो फलाशा नहीं रखता, यही उत्तम श्रद्धालु में त्याग होता है। जो अपने श्रद्धेय के संकेतानुसार चलने में कहीं भी आलस्य नहीं करता और कर्त्तव्य-पालन में जो प्रमादी नहीं होता—जो हर्षित रहकर सेवा—धर्म में तत्पर रहता है—यही उत्तम श्रद्धालु का तप है।

इस प्रकार के त्याग और तप से उत्तम श्रद्धालु पवित्रता और शक्ति से सम्पन्न होता है।

उत्तम श्रद्धालु अपनी बुद्धिमता का गर्व नहीं करता, वह सदा अपने श्रद्धेय के सन्मुख अपनी बुद्धि को निष्पक्ष रखता है, विनम्र और दयालु होकर, क्षमावान् और सहनशील होकर सभी प्राणियों पर हित–दृष्टि रखते हुए शुद्ध व्यवहार करता है।

उत्तम श्रद्धालु जगत की वस्तुओं के वास्तविक रूप को जान लेता है अतएव वह मोही नहीं होता। वह स्वार्थ लोलुप भी नहीं होता, इसलिए रागी अथवा द्वेषी नहीं होता किन्तु पूर्ण-प्रेमी होता है और इसी कारण वह तृप्त होता है।

श्रद्धा के द्वारा साधक विवेक दृष्टि प्राप्त करता है और सद्गुरु प्रदत्त ज्ञान के प्रकाश में अपने आराध्य देव के यथार्थ रूप को देखकर परम शांति को प्राप्त हो जाता है।

प्रकृति के जड़त्व में खेलती हुई चेतना श्रद्धा-पथ से ही प्राप्त की जा सकती है! श्रद्धा ही संसार की सर्वोत्कृष्ट शक्ति है जो नित्य उर्ध्वोन्मुख ही रहती है। प्राप्ति ही, सफलता ही श्रद्धा का सर्वोपरि गुण है—जिसको देखते ही सर्वेश्वर रीझ जाते हैं!

श्रद्धा से ही संसार की समस्त-साधनाओं का प्रारम्भ होता है! यदि हम सफलता चाहते हैं तो अपनी साधना का प्रारम्भ श्रद्धा से ही करें।

श्रद्धा से ही साधक श्रद्धेय के अलौकिक गुण, सौंदर्य एवं शक्ति तथा ऐश्वर्य को देख पाते हैं और संसार में सर्वथा सफल होकर सर्वस्व की प्राप्ति कर जीवन सार्थक कर पाते हैं!


भौतिक वाद एवं आध्यात्मिक वाद

(श्री कृपालु जी महाराज)

आज समस्त संसार में जिस दिशा में दृष्टि डालिए अशान्ति तथा क्रान्ति का साम्राज्य छाया हुआ है। प्रत्येक मानव के मस्तिष्क में भयानक— भविष्य मंडरा रहा है। मानव से लेकर विश्व पर्यन्त व्यष्टि एवं समष्टि सभी, शान्ति तथा सुख के हेतु कातर होकर अव्यक्त आकाश की ओर भयभीत की भाँति निहार रहे हैं। सम्पूर्ण संसार के हाहाकार एवं चीत्कार की निवृत्ति के विचार धाराओं के अपार पारावार में डूबते-उतराते हुए भी किनारा नहीं खोज पा रहे हैं। कोई कहता सन् 57 (सत्तावन) आ रहा है, न जाने क्या होगा? कोई कहता है—विश्व-शान्ति— सम्मेलन हो रहे हैं अवश्य शान्ति हो जायेगी। कुछ कहा नहीं जा सकता। बड़े-बड़े बुद्धि के ठेकेदार संशयात्मक समस्या को लिए बैठे हैं। सुलझाने के बजाय उलझता ही हस्तगत सा हो रहा है।

यद्यपि यह कोई नवीन स्थिति तो नहीं। इतिहास में समय-समय यह सदा ही ऐसे अवसर आते रहे हैं। परिवर्तनशील संसार का स्वभाव ही है। तथापि कोई न कोई मार्ग सदा ही उपलब्ध हुआ है। अन्यथा तो यह वर्तमान विश्व ही मूल-विश्व के रूप में लुप्त हो गया होता।

समस्त विश्व के मत दो ही दृष्टिकोणों पर आधारित रहे हैं जिन्हें, हम “भौतिकवाद” आध्यात्मिकवाद’ के नाम से पुकारते आये हैं—इतिहास साक्षी है। अन्य सभी मत इन्हीं दोनों मतों में ही अन्तर्निहित है, यह निर्विवाद-सिद्ध सिद्धाँत है।

भौतिकवाद हम उसे कहते हैं जिसमें इन्द्रिय, मन, बुद्धि के द्वारा ही उन्नति की जाय अर्थात् इन्हीं द्वारा परम—चरम—शाँति का अन्वेषण किया जाय ईश्वर आदि की किंचित भी अपेक्षा न हो।

आध्यात्मिक वाद हम उसे कहते हैं जिसमें मन, इन्द्रिय, बुद्धि के द्वारा किए गये अन्वेषण को मिथ्या एवं दुःखमय माना जाये। केवल ईश्वरीय शक्ति के द्वारा ही परम शाँति की साधना की जाय।

आधुनिक भौतिकवादियों का कहना है कि विश्व के उत्थान सम्बन्धी साधना में ईश्वर का पुट दिया गया तो समस्त विश्व गर्त में चला जायगा। इसकी सिद्धि में उनके पास भी पर्याप्त तर्क एवं ऐतिहासिक-प्रमाण हैं।

आधुनिक आध्यात्मिक वादियों का कहना है कि संसार के सामान मिथ्या है। उनमें प्रवृत्त होना ही मूर्तिमान अशान्ति का आवाहन करना है। इसकी सिद्धी के हेतु उनके पास पर्याप्त तर्क एवं ऐतिहासिक-प्रमाण है।

भावार्थ यह कि प्रकाश एवं अंधकार की भाँति इन दोनों मतों में भी क्रान्ति हो रही है। एक दूसरे की बात सुनना या समझना तक नहीं चाहते, अपनी अपनी डफलो से अपना अपना राग अलाप रहे हैं और कभी वहाँ से अशांत होकर आध्यात्मिक वाद की ओर प्रवृत्ति होती है। पुनः इसी प्रकार भौतिक वाद की ओर अग्रसर होती है। यह कोटि क्रम चला जा रहा है। न आधुनिक भौतिक वादी शांति का प्रत्यक्ष कर पा रहे हैं।

न आधुनिक अध्यात्मिक वादी ही अशान्ति की क्राँति से छुटकारा पा रहे हैं। विचित्र पहेली है। लाल बुझक्कड़ का पता नहीं है जो बुझ सके; फिर बूझे कौन?

भौतिक वाद की ज्वाला से कुछ देश झुलस कर चुपके चुपके अध्यात्म वाद की ओर मुड़ रहे हैं। एवं कुछ आध्यात्मिक वाद के आधुनिक दंभ जगत से भाग कर भौतिक वाद की छाया में क्षण भंगुर छाँह ले रहे हैं। पर वे कल्पना में ही शाँति का स्वरूप देख पा रहे हैं। वस्तु तस्तु भ्राँति में ही है।

भौतिक वादियों का उद्घोष है कि, ईश्वर वादी काहिल, अपाहिज एवं अकर्मण्य हो जाता है। परावलंबी होकर मानवता से भी गिर जाता है। उत्थान की तो पृष्ठभूमि भी नहीं बन पाती।

अध्यात्मवादियों का दुँदुभि घोष है कि, भौतिक वादी छल—कपट युक्त एवं विलासी बन जाता है। उसका लक्ष्य आत्म रंजन न बनकर लोक—रंजन मात्र का ही रह जाता है। वह अपने खयाली पुलाव एवं विचार धाराओं में ही रहता है।

वास्तव में दोनों ही विचार सुनने पर सत्य प्रतीत होते हैं। क्योंकि जब हम भौतिक वादियों की दलीलें सुनते हैं कि, ऐ अध्यात्मवादी भारत वासियों तुम्हारे यहाँ चोरी-जारी-मक्कारी क्यों होती हैं? तुम्हारा यह वर्तमान आध्यात्मवाद उसमें कितनी न्यूनता कर सका है, जबकि अन्य भौतिक वादी देशों में अमुक अपराध कम हो रहे हैं इत्यादि। तो मानना पड़ता है कि अध्यात्मवाद व्यर्थ या निरर्थक सा है। पुनः हम जब अध्यात्मवादियों की दलीलें सुनते हैं कि, ऐ भौतिक वादियों तुम्हारे राज्य में जनता के शारीरिक एवं मानसिक रोग दिन-दिन क्यों बढ़ते जा रहे हैं? तुम क्राँतिकारी आविष्कारों के बना कर क्यों विश्व को नष्ट करते जा रहे हो? तुम स्वार्थ सिद्ध के दास बनकर क्यों दूसरों को ठगने पर तुले हो? तुम्हारी वासनायें प्रतिक्षण क्यों तुम्हारी भौतिक उन्नति के साथ ही बढ़ती जा रही है। इत्यादि तो मानना है कि भौतिकवाद मिथ्या एवं भ्रमास्पद है।

इस प्रकार यह भी मानना पड़ता है, वह भी मानना पड़ता है। इन दोनों के मानने के चक्कर में अन्ततोगत्वा यही मानना पड़ता है कि कुछ नहीं मानना पड़ता है। सब बकवास है। जब तक शान्ति का मूर्तिमान स्वरूप प्रत्यक्ष रूप से समक्ष न आ जाये हमारा मानना सब अनाश्रित सा ही मानना पड़ता है।

अस्तु यह तो ध्रुव सत्य है कि इस विलक्षण-विरोधाभास को बिना हटाये उन शान्ति महादेवी का साक्षात्कार नहीं हो सकता। किन्तु प्रश्न यह है कि इसका विरोध परिहार हो कैसे? इसी भौतिकवाद को एवं आध्यात्मिक वाद के विरोध समन्वय के हेतु ही मैंने यह निश्चय किया कि भारत के समस्त दार्शनिकों (फिलासफर्स) को आमंत्रित किया जाये एवं गम्भीर विचार-विमर्श द्वारा उनके हेतु कोई समन्वयात्मक– क्रियात्मक मार्ग– जनता-जनार्दन के समक्ष स्थापित किया जाये, जिसके परिणाम स्वरूप विश्व शान्ति की समस्या सुलझ सके। मैं न तो भौतिकवादी हूँ, न अध्यात्मवादी हूँ यह सुनकर आप लोगों को आश्चर्य न होना चाहिये, क्योंकि मैं विश्व शान्ति का वादी तो हूँ ही।

यह विश्व-शान्ति जिस वाद से भी हो, मैं उसी वाद का निर्विवाद वादी हूँ। दूसरे शब्दों में जिस वाद की साधना से प्रत्यक्ष रूप से शाँति प्राप्त हो मैं उसी का समर्थक हूँ।

अतएव मेरे विषय में दोनों सिद्धांतानुयायी अपना निश्चयात्मक, एकदेशीय निर्णय न करें। मैं चाहता हूँ कि क्रियात्मक रूप से कोई ऐसा समन्वयात्मक सुमार्ग समुपलब्ध हो, जिस पर अग्रसर होकर सभी सुख-शाँति का अनुभव करें। मैंने गत-वर्ष इसी उद्देश्य को लेकर चित्रकूट में (“अखिल-भारत वर्षीय-भक्ति योग-दार्शनिक-सम्मेलन”) के नाम से एक आध्यात्मिक सम्मेलन कराया था। उसमें जनता की दृष्टि से अद्वितीय सफलता मिलने पर भी मुझे सन्तुष्टि नहीं हुई। अतएव मैंने प्रश्न उपस्थित करते हुए “द्वितीय-अखिल भारत वर्षीय महाधिवेशन” कानपुर में 5 अक्टूबर से 19 अक्टूबर तक किया है। सभी महानुभावों से निवेदन है कि वे इस व्यक्तिगत एवं विश्वजनीन प्रश्न के हल को, समय निकाल कर सुने एवं इसके द्वारा क्रियात्मक साँचे में अपने जीवन को ढाल कर सुख-शान्ति का अनुभव करें।


अपने चित्त को प्रसन्न रखिये

(श्री दौलत राम कटरहा, दमोह)

महाकवि वाल्मीकि ने अयोध्याकाँड के प्रथम सर्ग के प्रारम्भ में भगवान रामचन्द्र के सम्बन्ध में लिखा है कि वे सर्वदा प्रसन्न रहते थे। उनका चित्त शाँत था। कोई कुछ कठोर वचन कह दे तो उसका कुछ उत्तर न देते थे प्रत्युत उससे प्रेमपूर्वक बोलते थे। वे अक्रोधी थे। उनका किसी ने कभी कोई उपकार कर दिया तो उसी से संतुष्ट हो जाते थे, उनका कोई सैकड़ों अपकार करे तो भी वे उधर ध्यान नहीं देते थे, और अपकारी के प्रति क्रोध कर वे बदला लेने के लिये तैयार नहीं हो जाते थे क्योंकि उनका अपने मन डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड पेज छूटा हुआ है। पी.डी.एफ. में नहीं है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड आ सकता है, कि बाहरी चकाचौंध में छिपी हुई सी भारत की अन्तरात्मा ने अपनी पारिवारिक शैली सद्भाव के प्रति अपनी अविरल आस्था का कभी परित्याग नहीं किया, नहीं तो उक्त विषय का सबलता से प्रतिपादन करने वाले इस ग्रन्थ का इतना आदर नहीं हो पाता। यदि आज भी किसी परिवार में गोस्वामी जी द्वारा वर्णित-सुविचारित पारिवारिक शील हो तो वह यहीं प्रत्यक्ष स्वर्ग सुख का अनुभव ले सकेगा। फिर संयुक्त परिवार को तोड़-फाड़ कर एकांगी, संकीर्ण स्वार्थ भरा वैयक्तिक उच्छृंखल जीवन कभी भी किसी में रुचि और खिंचाव पैदा नहीं कर सकेगा।

माता की वात्सल्य भरी त्याग भावना, भाई की भाई के प्रति निश्छल, सेवा भाव पूरित भक्ति और प्रेम, पत्नी की एकात्मता, कष्ट-सहन, सुखद स्थिति का उत्सर्ग, सत्य की रक्षा के लिये प्राणों का मोह छोड़ना, सास का पतोहू को सुखी रखने की उदार हार्दिक चिन्ता और व्यवस्था, पुत्र का माता-पिता के आदेश पालन के लिये, कष्ट सहन, राज्य परित्याग आदि की दिव्य छटा देखते ही बनती है। सुमित्रा, भरत, सीता, दशरथ, कौशल्या, राम सभी इसकी आदर्श प्रतिमा जैसे ही बने हुए हैं।

माता का त्याग भरा वात्सल्य

लक्ष्मण को वनवास नहीं दिया गया था, पर विदाई के लिये माता सुमित्रा के पास आते ही माता स्वयं ही पुत्र को आदेश देती हैं :—

तात तुम्हारी मातु वैदेही। पिता राम सब भांति सनेही॥

अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइ दिवस जहँ भानु प्रकाशू॥

जो पै सीय रामु वन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं॥

जहाँ सौतेले बेटे के लिये माता स्वभावतया ही अपने कुक्षिज पुत्र को राज्य और घर का सुख छोड़कर भाई की सेवा में जाने का आदेश करती है—ममता को अन्दर-अन्दर ही पी जाती है, वहाँ स्वर्ग नहीं तो क्या है?

लक्ष्मण जी सौतेले भाई होते हुए भी बड़े भाई की सेवा में रहने के लिये उतावले हैं और यहाँ तक कह देते हैं—

गुरु पितु मातु न जानऊँ काहू। कहऊँ सुभाव नाथ पतिआहू॥

जहँ लगि जगत सनेह सगाई॥ प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई॥

मोरे सबई एक तम्ह स्वामी। दीन बन्धु उर अन्तरजामी॥

भरत जी, जिसके राज्य-सुख के लिये ही इतने सारे उपद्रव-वैमनस्य और द्वेष अपने ऊपर उसकी माता कैकेयी ने उठा लिये थे, वे अपने सौतेले भाई के वन जाने का कारण जानते ही माता से कह बैठते हैं—

जो पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारेसि मोही॥

भरत जी को यह सोच कर असीम वेदना होती है।

“मैं केवल सब अनरथ हेतु” “मोहिं लगि मे सिय राम दुखारी”

और राज्य भोग की सभी अनुकूलता होने पर भी उसे छोड़ राम को मनाने के लिये जंगल चल पड़ते हैं और अन्त में अपनी जिद और इच्छा को त्याग कर भाई रामचन्द्र जी के आदेश से पादुका को आधार बनाकर अयोध्या लौट आते हैं और तपस्वी तथा सेवक बनकर राम का राज्य संभालने की सेवा करते हैं।

राजा दशरथ जी को पुत्र राम से इतना मोह है कि वे सभी दुःख, अपयश और नरक का दुःख उठा कर भी राम को वनवास का कष्ट देना नहीं चाहते, पर अपने दिये वचन की सत्यता को रखने के लिये प्राण त्याग कर भी मुख से राम को रहने की आज्ञा नहीं देते- वे मन ही मन शिवजी से प्रार्थना करते हैं-

तुम्ह प्रेरक सब के हृदय, सोमति रामहिं देहु। वचनु मोर तजि रहहिं घर, परिहरि शील सनेहु।।

अजसु होउ जग सुजस नसाऊ। नरक परौं वरु सुरपुर जाऊँ।।

सब दुख दुसह सहावहु मोहीं। लोचन ओट राम जनि होहीं।।

माता कौशल्या के हृदय में वात्सल्य और ममत्व के साथ कर्तव्य का उत्पीड़क संघर्ष मच जाता है– उसे विश्वास है कि पिता की आज्ञा होने पर भी माता की आज्ञा के बिना वे जंगल नहीं जा सकते, फिर भी असीम धैर्य धारणा पूर्वक कहती है:—

तात जाउं वलि कीन्हेहु नीका। पितु आयसु सब धरमक टीका॥

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता।।

जौं पितु मातु कहेउ वन जाना। तौ कानन सत अवध समाना॥

अपने सौतेले बेटे भरत के प्रति भी कौशल्या माता का प्रेम कितना अपार और विशाल है, जो चित्रकूट में जनक पत्नी से वार्ता करते हुए प्रगट होती है, वे कहती हैं:—

लखनु रामसिय जाहु वन भल परिणाम न पोचु। गहवरि हियं कह कौशिला मोहि भरत कर सोचु॥

पराये घर की लड़की-पतोहू सीता को सास कौशल्या कितना स्नेह करती थी यह भी वन जाने के समय प्रगट होता है:—

नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउं प्राण जानकि हिं लाई॥

और स्वयं सीता जी भी जो पतोहू का कर्त्तव्य भली भाँति जानती है और उसे पालन करना चाह कर अन्य महान् कर्त्तव्य के सामने विवशता से छोड़ना पड़ता है। वह कहती है-

एहिते अधिक धरम नहीं दूजा। सादर ससु ससुर पद पूजा॥

सेवा समय दैव वन दीन्हा। मोर मनोरथ सफल न कीन्हा॥

वह महान कर्त्तव्य जो प्रत्येक नारियों का है, जिसके लिये सीता जी को सासु-ससुर की सेवा रूपी धर्म को छोड़ना पड़ रहा है- सास के सामने संकोच सहित अपने पति से कह रही हैं:—

जहाँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तिय हिं तरनिं ते ताते॥

जिय बिन देह नदी बिन बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥

राम का शील तो पर्याप्त व्यापक है, माता, पिता, भाई, मित्र-सखा परिजन-प्रजा, सास, ससुर, पत्नी, कुटुम्ब, गुरु, ऋषि, मुनि सभी के साथ उनका व्यवहार उनका शील नित्य-अनुसरणीय है।

यद्यपि विमाता कैकेयी अपने तथा अपने पुत्र के सुख-स्वार्थ के लिये राम को जंगल भेज रही है, फिर भी कैकेयी के मुख से ही यह संवाद सुनकर रामचन्द्र जी कहते हैं:—

सुनु जननी सोइ सुत बड़ भागी। जो पितु मातु वचन अनुरागी॥

तनय मातु पितु तोषनि हारा। दुर्लभ जननी सकल संसारा॥

पुत्र के वियोग की कल्पना से पिता दशरथ व्यथा से मर रहे हैं, उनकी वाणी रुद्ध हो रही है, पर उनका मौन देखकर राम अपने में ही दोष ढूंढ़ने लगते हैं, सोचते हैं शायद मेरे द्वारा हुए किसी दोष से ही पिता जी व्यथित होकर नहीं बोल रहे हैं और माता कैकेयी से कहते हैं-

राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहिं तें कछु बड़ अपराधू॥

जब लक्ष्मण सुमन्त के सामने आविष्ट भाव से पिता के प्रति कुछ कठोर-वाणी कह जाते हैं तो राम इस आघात से पिता को बचाने का प्रयत्न करते हैं। वे सुमन्त से कहते हैं—

सकुचि राम निज शपथ देवाई। लषन सन्देश कहिय जनि जाई॥

इसीलिये ऐसे पुत्र के वियोग में पिता का जीवन धारण करना दूभर हो जाता है और वे—

राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुवर विरह, राउ गयउ सुरधाम॥

चित्रकूत्र में रामचन्द्रजी भरतजी की अपार व्यथा और ग्लानि को धोने के लिये कहते हैं—

उर आनत तुम पर कुटिलाई। जाइ लोक परलोक नसाई॥ कहउँ सुभाउँ सत्य शिव साखी। भरत भूमि रह राउर राखी॥

जब तक भारत में सत् शील भरा साहित्य है और जनता में ऐसे साहित्य को पढ़ने में आस्था, प्रेम और सुरुचि है, तब तक भौतिक सभ्यता की भयंकर आंधियों और तूफानों के बीच भी भारत का पारिवारिक शील सदा सुरक्षित है।


सच्चा धन कहाँ है?

(श्री. डेरेक नेविले)

धनी होना एक कला है; और मेरी समझ में इसका रहस्य अकिंचन बनने में है। अकिंचन होने पर ही हम सब कुछ प्राप्त करने के अधिकारी होते हैं।

हमारे जीवन में सबसे अधिक सुखमय और मूल्यवान वही क्षण है, जब हम भौतिक जगत् के माया जाल से अपने-आपको तटस्थ करके आत्मानुभूति में पूर्ण रूप से स्थित हो जाते हैं। इन क्षणों को प्राप्त करने का सौभाग्य तभी प्राप्त होता है, जब हम दिव्य सौंदर्य के सम्मुख होते हैं, अन्यथा नहीं। भौतिक जगत् की संपत्ति इनको नहीं खरीद सकती और न संसार की ऊंची-से-ऊंची अवस्था, अधिकार अथवा शक्ति हो इनको प्राप्त कराने में समर्थ है। क्योंकि ये वही क्षण हैं, जब आत्मा शिशु-सुलभ सरलता से अपने प्रियतम भगवान् की अनुपम सुन्दरता का पूजन करती है।

मनुष्य का सुन्दरतम अर्थात् सर्वोत्तम सुखमय क्षण ही उसका सबसे अर्थात् मूल्यवान समय होता है। मानव-अनुभूति की पराकाष्ठा अपने भाइयों पर शासन करने की अथवा संसार की किसी भी इच्छित मूल्यवान निधि को खरीदने की शक्ति में नहीं है। वास्तविक सम्पत्ति तो आत्मा की अनुभूति से ही प्राप्त होती है। सुख की व्यावहारिक मुद्रा अर्थात् चलतू सिक्का प्रेम है।

सबसे अधिक धनी वही है, जो सबसे अधिक देता है। ऐसा देना साँसारिक धर के रूप में कदापि नहीं हो सकता। रुपया, आना, पाई केवल प्रतीक मात्र हैं, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। कभी तो ये उन बेड़ियों के प्रतीक बन जाते हैं जो हमें संसार में बाँधती हैं, और कभी उस प्रेम के जो हमें जड़वाद से मुक्त करता है, किन्तु जीवन के सच्चे संपन्न अर्थात् सुखद क्षणों में तो अधिकतर इनका प्रवेश ही नहीं होता।

जिस संसार में हम चलते, फिरते और बसते हैं, उसको यथार्थ रूप में समझने की हमें चेष्टा अवश्य करनी चाहिये। साधारण मनुष्य की दृष्टि केवल गलने-सड़ने और नष्ट होने वाली वस्तुओं पर ही निर्णय दे सकती है। परन्तु इस ऊपरी स्थूलता के पीछे बहुमूल्य आध्यात्मिक वस्तुओं का एक अनादि सागर है— अलौकिक सम्पत्ति की एक बाढ़- जिसके सम्बन्ध में हम प्रायः अनभिज्ञ हैं। तथापि यह आध्यात्मिक सम्पत्ति सबके लिये समान रूप से प्राप्य है। इसके लिये धनी दरिद्र की अपेक्षा नहीं। इस संपत्ति पर हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और वास्तव में इसी की प्राप्ति के लिये तो हमारा इस संसार में जन्म हुआ है। यदि हम इस आध्यात्मिक सम्पत्ति के, जो अलौकिक सुन्दरता की खान है। अनुसंधान में तत्पर नहीं होते तो हमारा जीवन नीरस और निरर्थक बन जाता है।

जो मनुष्य साँसारिक समृद्धि से संतुष्ट होने की कल्पना करता है, उसके सम्बन्ध में यदि यह कहा जाय कि गगन के नक्षत्र ही उसके लिये एक-एक करके अदृश्य और निस्सार होते जाते हैं तो अत्युक्ति नहीं होगी। क्रमशः उसके जीवन में एक समय ऐसा भी आता है, जब वह अपने क्षुद्र व्यावहारिक क्षेत्र की सीमा के बाहर कुछ भी नहीं देख सकता। उसकी दृष्टि ऊपरी दृश्यों के अन्तस्तल में प्रवेश ही नहीं करती, इन्द्रियों की अनुभूति के अतिरिक्त वह और कुछ भी जिज्ञासा नहीं करता और वह यह समझ ही नहीं पाता कि आत्मशक्ति के बिना ये इन्द्रियाँ केवल मुर्दा हैं। ऐसे जीवन-व्यापार में वह केवल अपनी आत्मा का ही हनन करता है।

परन्तु जो उस अनुपम दिव्य सौंदर्य को अपने जीवन की सबसे अधिक मूल्यवान निधि समझकर अपनी आत्मा की अनिर्वचनीय मौन प्रेरणा का अनुसरण करता है, वह निश्चय ही एक दिन इस पृथ्वी और इसकी समृद्धि का मालिक हो जाता है। क्योंकि ऐसे ही महानुभावों के सन्मुख जीवन का रहस्य स्वतः पूर्णरूपेण व्यक्त हो जाता है।

यह साधारण रहस्य की बात है, इतनी सरल है कि इसको समझने के लिए हमें विद्वत्ता की कोई आवश्यकता नहीं। जीवन की अमूल्य निधि एक स्रोत के समान स्वतः हमारे भीतर से फूट पड़ती है। सुर्य, चन्द्र और नक्षत्रों का अस्तित्व तो दृष्टा के चर्म-चक्षुओं पर निर्भर करता है। हमारे चर्म-चक्षु जो कुछ इस बाह्य जगत् में सुन्दरता अथवा सम प्रवाहित गति को देखते हैं; ये सब हमारे आभ्यन्तर जीवन के बाहरी प्रमाण है। धनी होने में ऐसी अनुभूति ही सच्ची कला है।

ऐसा समझना मूर्खता होगी कि हमारे सामान्य व्यवहारों का कुछ भी महत्त्व नहीं है। प्रतिदिन हम सैकड़ों काम करते हैं, परन्तु हमारे जीवन में उस काम का सर्वोच्च महत्त्व है, जिसका देखने में न कोई स्वरूप है और न सार ही। हमें यह समझना चाहिए कि सब वस्तुओं और कार्यों में बाहर और भीतर आध्यात्मिक शक्ति का प्रवाह है, जिसके आधार पर विश्व स्थित है।

आत्मनिरीक्षण के अभ्यास से ही हमारे चक्षु खुलते हैं। यदि सामान्य दृष्टि प्रत्येक स्थूल अथवा सूक्ष्म वस्तु को देखने का एकमात्र साधन होती है तो हम सब-के-सब आत्मानुभूति के एक ही स्तर पर होते। किन्तु देखने में आता है कि बहुत से लोग ऐसे हैं, जिनके चर्म-चक्षुओं की ज्योति पूर्ण रूप से ठीक है तथापि विश्व में वे उस दिव्य उज्ज्वल सौंदर्य को नहीं देख सकते। इसका कारण है कि उनको अपने आभ्यन्तर जीवन में स्थूल दृष्टि के स्रोत का अनुभव नहीं हुआ।

आध्यात्मिक व्यापार क्षेत्र की एकमात्र उपयुक्त मुद्रा ‘प्रेम’ है। और इसको बदले में कुछ भी पाने की भावना के बिना प्रदान करना होगा। इसको हम इस प्रकार भी कह सकते हैं कि हमारे जमा-खाते की बढ़ती जितनी खर्च करने पर निर्भर करती है, उतनी जमा करने पर नहीं। यह निश्चय ही साँसारिक व्यवहार के बिल्कुल विपरीत है। क्योंकि आध्यात्मिक सत्यता भौतिक सत्यता के ठीक विपरीत होती है। संसार भौतिक लाभ पर जोर देता है तो आत्मा त्याग पर। संसार समृद्धि को भौतिक शक्ति से नापता है तो आत्मा नम्रता और विनय के अनुपात से।

अन्तर केवल वैसा ही है जैसा कि प्रभेद दिखाने के लिये हम एक प्रयोग के परिणाम की तुलना ठीक उसके विपरीत प्रयोग के परिणाम से करते हैं। क्योंकि साँसारिक मनुष्य कभी भी सुख-शान्ति का अनुभव नहीं कर सकता। उसका सुख और आध्यात्मिक सम्पत्ति तो आत्मा के व्यापार को समझने की सामर्थ्य पर निर्भर करता है।

वर्तमान जगत की बड़ी-बड़ी समस्याएँ उतनी जटिल नहीं जितनी कि देखने में आती हैं। मनुष्य उनको अपनी बुद्धि और स्थूल शक्तियों द्वारा सुलझाने की चेष्टा करता है, परन्तु यह नहीं समझता कि ये सब समस्याएँ उसकी मूर्खता से उत्पन्न हुई हैं। आध्यात्मिक शक्ति के प्रयोग से संसार की बड़ी-से-बड़ी समस्या अति अल्पकाल में ही सुलझ जाती है।

यह कहा जाता है कि इस समय मानव-जाति को अनेक अति आवश्यक वस्तुओं के अभाव का सामना करना पड़ रहा है। परन्तु आध्यात्मिक सम्पत्ति की कमी नहीं, यह प्रचुर मात्रा में उपस्थित है। यदि इसका अनुसंधान करके इसको प्रधानता दी जाय तो छूमंतर की तरह संसार की अनेक समस्याएँ काफूर हो जायँ। फिर सबको सहज ही सदा की भाँति खाद्य पदार्थ प्रचुर मात्रा में प्राप्त हों और सबके हाथ में रोजगार भी आ जाये। यदि प्राणियों के जीवन और कार्य के पीछे सेवा की भावना हो तो मनुष्य मात्र एक नवीन उत्साह से अनुप्राणित हो उठे। आध्यात्मिक सम्पत्ति ही मानव-जाति को सर्वोच्च समृद्धि की प्राप्ति करा सकती है।


आलस्य न करना ही अमृत पद है।

(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)

बुद्ध भगवान ने एक स्थान पर कहा है कि “अप्रमाद ही अमृत पद है।” अप्रमाद अर्थात् आलस्य न करना ही उन्नति के इच्छुक के लिए श्रेष्ठ है। आलस्य करने से बड़े से बड़े शक्तिशाली व्यक्ति, सम्पन्न व्यापारी, समृद्ध देश, समुन्नत जातियाँ विनष्ट हो जाती हैं। कारण, आलस्य से मनुष्य का मन, बुद्धि और शरीर तीनों ही दुर्बल बन जाते हैं और उच्च शक्तियाँ पंगु हो जाती हैं।

कहा भी है, “श्रद्धावान् लभते ज्ञान तत्परः संयतेन्द्रियः” कार्य में तत्पर संयमी एवं श्रद्धालु को ही ज्ञान प्राप्त होता है। जो आलस्य में जीवन व्यतीत नहीं करता और निरन्तर कार्यरत रहता है, उसे दीर्घायु प्राप्त होती है।

आलसी व्यक्ति के लिए किसी भी प्रकार की उत्कृष्टता प्राप्त करना कठिन है। कारण, वह अपनी शक्तियों को आलस्य की केंचुली में ढके रहता है। उद्योग तथा परिश्रम द्वारा उन्हें विकसित नहीं कर पाता। जब तक उद्योग नहीं, परिश्रम में प्रवृत्ति नहीं, तब तक शक्तियों का विकास नहीं हो सकता। आलस्य और उन्नति साथ-साथ नहीं चल सकते।

आलस्य एक प्रकार का अन्धकार है, आत्मा पर, शक्तियों पर और मनुष्य की भावी उन्नति एवं प्रगति पर तुषारापात कर देता है। आलसी पड़ा-पड़ा यही सोचा करता है कि मेरा काम कोई अन्य व्यक्ति कर दे; मेरी तरक्की करा दे। बाजार से मेरे घर की नाना वस्तुएँ ला दे; दफ्तर का काम भी अन्य कोई साथी ही कर दे। आलसी अफसर अपने छोटे मातहतों के वश में रहते हैं। वे जो पत्र या ड्राफ्ट लिख देते हैं, उसी पर हस्ताक्षर कर देते हैं। ठीक है या गलत, उचित है या अनुचित, क्या बातें लिख दी गई हैं, यह भी नहीं देखते। बड़े-बड़े व्यापारियों के दिवाले प्रायः उनके हिसाब किताब आय-व्यय का ठीक ब्योरा न रखने के कारण निकलते हैं। वे उधार पर उधार दिये जाते हैं, पर उसे वसूल करने में आलस्य करते हैं। रकमें उत्तरोत्तर बढ़ती जाती हैं। और अन्त में सारी पूँजी ही उधार वालों में बँट जाती है। आलसी माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उन्नति आदि को नहीं देखते। फलतः बच्चे उतनी उन्नति नहीं कर पाते जितना वस्तुतः उन्हें करना चाहिए। यदि वे अपना आलस्य छोड़कर उन पर एक तीखी दृष्टि रखा करें, स्वयं भी काम में अपना सहयोग देते रहें, तो पर्याप्त प्रगति हो सकती है।

प्रकृति को देखिए, उसका काम कैसा नियमबद्ध होता है। प्रत्येक वस्तु अपना-अपना निर्धारित कार्य निश्चित समय पर करते चलते हैं। आलस्य का नाम निशान तक नहीं। आलसी सदस्यों के प्रति प्रकृति बड़ी निष्ठुर है। आलसी की बड़ी दुर्गति होती है। अन्त में सजा के तौर पर तहाँ मृत्यु दण्ड तक का विधान है। प्रकृति का प्रत्येक सदस्य अन्त तक अपना काम सक्रियता से करता है।

पशु-पक्षियों में भी आलस्य को स्थान नहीं है। मधुमक्खियों के छत्ते में नर मक्खी का कार्य केवल संतानोत्पत्ति मात्र है। वह कोई कार्य नहीं करता। बैठा-बैठा खाता है। आलसी अकर्मण्य पड़ा रहता है। आप जानते हैं, उसे इसकी क्या सजा मिलती है? तिरस्कार, और व्यंग्य, ठोकरें और अन्त में मृत्यु। मादा मक्खियाँ दिन भर जी तोड़ कर परिश्रम करती हैं। कुछ न कुछ मधु संचित करती जाती हैं। फलतः उनके छत्ते में समृद्धि का भंडार बना रहता है। पर्याप्त संग्रह होने पर भी वे आलस्य नहीं करतीं। उनका श्रम उसी रफ्तार से चलता रहता है। अन्य पशुओं में भी आलसी पशु पक्षियों की दुर्गति है।

अब मनुष्यों के समाज की ओर देखिए। उद्योगी और परिश्रमी व्यक्ति ही आपको सुखी और समृद्ध दिखाई देंगे। मनुष्य का जन्म भले ही निर्धन परिवार में हो। उसके पास जाति श्रेष्ठता या घर की जमीन-जायदाद कुछ भी न हो, केवल उद्योग और श्रम की आदतें हों, आलस्य से मुक्त हो, तो वह धनाढ्य और कीर्ति प्राप्त कर सकता है।

कीर्ति और लक्ष्मी श्रम और उद्योग के आधीन हैं। जो आलस्य नामक शिथिल करने वाली और शक्तियों को पंगु बनाने वाली आलसी वृत्ति को छोड़ेगा, वह निश्चय ही यश प्रतिष्ठा और कीर्ति प्राप्त करेगा।

आलस्य एक प्रकार का तमोगुण से उत्पन्न विकार है। बहुत से मनुष्य अनापशनाप भक्ष्य अभक्ष्य अनेक पदार्थ बड़ी तादाद में भक्षण कर लेते हैं। अधिक भोजन से उन्हें निद्रा बहुत सताती है। राक्षसों की तरह पड़े-पड़े सोया करते हैं, अकर्मण्य बन जाते हैं और अपने दैनिक कर्त्तव्यों का भी पूरी तरह पालन नहीं कर पाते। दफ्तर में, दुकान में, अपने वायदों में तमोगुणी व्यक्ति सदा पिछड़ा रहता है। जैसे सर्प केंचुली में लिपट कर निष्क्रिय हो जाता है; एक स्थान पर पड़ा रहता है, वैसे ही आलस्य में फँसकर हमारा मन थोड़ी देर के लिए काम से दूर भागता है। बस पड़े रहें, कुछ न करें, यही तबियत चाहती है। आपने अजगर देखा है। उसका बहुत बड़ा शरीर है। पूरे के पूरे जानवर निगल जाता है और फिर पड़ा-पड़ा सोया करता है। 10-10 दिन सोते हुए व्यतीत हो जाते हैं। सोते हुए उस पर नाना विपत्तियाँ आती रहती हैं। इन्द्रिय सुख, अधिक भोजन, विषय भोग, बलात्कार, व्यभिचार, अहंकार, क्रूरता, निष्ठुरता- इन सब बुरे विकारों का सम्बन्ध आलस्य से है। फालतू पड़ा हुआ दिमाग शैतान का घर है- यह सत्य अंक है। आलसी पड़ा-पड़ा बुरी वृत्तियों का शिकार बनता जाता है। उसकी आसुरी वृत्तियाँ उद्दीप्त हो उठती हैं। भोग की इच्छा ही उसमें निरन्तर बढ़ती जाती है। आलसी इस कर्मक्षेत्र के लिए तो किसी काम का रहता ही नहीं, उच्च जीवन, त्याग, प्रेम तप संयम भी नहीं साध पाता। आलस्य और परमार्थ का बैर है। अतः वह नाली के कीड़े की तरह वासना-सुख को ही जीवन का लक्ष्य मानता रहता है।

संसार के इतिहास को उठा देखिए। वे जातियाँ नष्ट हो गईं, जो आलसी और विलासी बनीं। जिस जाति और समाज में आलस्य भर जाता है, वह यश, प्रतिष्ठा और नेतृत्व तीनों ही दिशाओं में अवनति के मार्ग पर अग्रसर होती जाती है। इन्द्रिय सुख, विलास, और आलस्य उसको जर्जर तथा अशक्त कर देते हैं।

एक विद्वान ने सत्य ही लिखा है, “सर्वतोमुखी उन्नति के लिए यह जरूरी नहीं है कि मनुष्य धनी हो अथवा उसके पास सब प्रकार के साधन मौजूद हों। यदि ऐसा होता, तो संसार उन सब युगों में उन मनुष्यों का ऋणी न होता, जिन्होंने निम्न श्रेणी से उन्नति की है। जो मनुष्य आलस्य और ऐश आराम में अपने दिन बिताते हैं, उनको उद्योग अथवा कठिनाइयों का सामना करने की आदत नहीं पड़ती और न उनको उस शक्ति का ज्ञान होता है, जो जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए परम आवश्यक है। गरीबी को लोग मुसीबत समझते हैं, परन्तु वास्तव में बात यह है कि यदि मनुष्य दृढ़तापूर्वक अपने पैरों पर खड़ा रहे तो वह गरीबी उसके लिए आशीर्वाद हो सकती है। गरीबी मनुष्य को संसार के युद्ध के लिए तैयार करती है जिसमें यद्यपि कुछ लोग नीचता दिखा कर विलास प्रिय हो जाते हैं, परन्तु समझदार और सच्चे हृदय वाले मनुष्य बल और विश्वास पूर्वक लड़ते हैं और सफलता प्राप्त करते हैं।”

आज का मनुष्य समय न मिलने की बड़ी शिकायत किया करता है। अध्ययन, समाचार पत्र पठन पाठन, पूजा पाठ, सद्ग्रन्थावलोकन या प्रातः भ्रमण इसलिए नहीं करते, क्योंकि उनकी राय में उन्हें इन कार्यों के लिए अवकाश ही नहीं मिलता। वास्तव में ये व्यक्ति अपना अधिकाँश समय आलस्य में ही खो देते हैं। फुरसत में अमुक काम करूंगा, अवकाश मिलने पर अमुक से मिलने जाऊँगा; पूजा शुरू करूंगा, जप, प्रार्थना इत्यादि प्रारम्भ करूंगा, अमुक को पत्र लिखूँगा- पर आलसी वृत्ति उन्हें निरन्तर टालती ही रहती है। ठोस काम करने का अवसर ही नहीं आता। टालने से उत्साह मन्द पड़ जाता है और फल यह होता है कि आवश्यक कार्य भी सम्पन्न नहीं हो पाते।

मान लीजिए आप प्रातः छह बजे उठने के आदी हैं। यदि आलस्य त्याग आप किसी प्रकार प्रातः पाँच बजे उठ जाया करें, तो एक घंटा जीवन का और मिल सकता है। महीने में तीस घंटे मिल गए। अब यदि इन तीस घण्टों में कोई नया काम प्रारम्भ किया जाय, तो निश्चय ही आप संसार को कोई नयी वस्तु देकर अपना नाम चिरस्थायी बना सकते हैं।

प्रसिद्ध विचारक श्री अगरचन्द नाहटा ने आलस्य के इस पक्ष पर विचार करते हुए लिखा है- “जो कार्य अभी हो सकता है, उसे घंटों बाद करने की मनोवृत्ति आलस्य की निशानी है। एक कार्य हाथ में लिया और करते चले गए, तो बहुत से कार्य पूर्ण हो सकेंगे। पर बहुत से काम एक साथ लेने से किसे पहले किया जाय, इसी दुविधा में समय बीत जाता है और एक भी कार्य पूरा और ठीक से नहीं हो पाता है। अतः जो कार्य आज और अभी हो सकता है, उसे कल के लिए न छोड़ तत्काल कर डालिये। दूसरी बात ध्यान में रखने की यह है कि एक साथ अधिक कार्य हाथ में न लिए जायं, क्योंकि किसी भी कार्य में पूरा मनोयोग व उत्साह न रखने से सफलता नहीं मिल सकेगी। अतः एक-एक कार्य को हाथ में लिया जाय और क्रमशः सब को कर लिया जाय, अन्यथा सभी कार्य अधूरे रह जायेंगे, और पूर्ण हुए बिना किसी भी काम का फल नहीं मिल सकता। जैन ग्रन्थों में बाधा डालने वाली तेरह बातों में आलस्य पहली है। बहुत बार बना बनाया काम तनिक से आलस्य के कारण बिगड़ जाता है। क्षण मात्र भी प्रमाद न करने का भगवान महावीर ने उपदेश दिया है। अतः पुनः विचार कर प्रमाद का परिहार कर कार्य में उद्यमशील होना परमावश्यक है। जैन-दर्शन में प्रमाद निकम्मेपन के ही अर्थ में नहीं है, परन्तु समस्त पापाचरण के आसेवन के अर्थ में भी है। पापाचरण करके जीवन के बहुमूल्य समय को व्यर्थ न गंवाइये। आत्मा की शक्ति का ठीक तरह उपयोग नहीं होता, तो पापाचारी व्यक्ति उसका दुरुपयोग करता है।”

आलस्य से मुक्त कैसे हों? पहले तो आलस्य के विरोध में मन में दृढ़ संकल्प कीजिए। हम अपने चरित्र में आये हुए आलस्य को अवश्य दूर करेंगे, जब आलस्य आकर हमारे मन और इन्द्रियों को शिथिल करेगा, हम फौरन सचेत हो जायेंगे। समय का उचित उपयोग करेंगे—मन में यह धारणा जम जाने के बाद सक्रियता की आवश्यकता है।

मान लीजिये आपने निश्चय किया है कि आप बड़े तड़के चार बजे ही उठ बैठेंगे। शौचादि व्यायाम स्नान-पूजन-प्रार्थना आदि नित्य कर्म एक घण्टे में समाप्त कीजिये और पाँच बजे ही अपने दैनिक कार्य में पूर्ण मनोयोग से जुट जाइए।

जब आप प्रातःकाल शय्या त्याग करने का प्रयत्न करेंगे, तो मन का शैथिल्य आपको कुछ देर और सोये पड़े रहने के लिए खींचेगा। शरीर कोमल शय्या पर पड़ा रहना चाहेगा। यही आपकी परीक्षा का क्षण है। फौरन उठ पड़िये और आलस्य नामक राक्षस को पछाड़ दीजिये।

जिस कठिन कार्य को करने के लिये तबियत में आलस्य उत्पन्न हो, उसे जरूर किया कीजिये। मान लीजिये आप मन में यह अनुभव करते हैं कि अमुक व्यक्ति से मिलने जाना आवश्यक है, तो मन को मोड़ कर जरूर यह काम कीजिये। जिन-जिन पत्रों का उत्तर लिखना है, अवश्य ही उनका उत्तर लिखिये। लिखने में आलस्य कभी न कीजिए।

संभव है आपको मानसिक श्रम से आलस्य हो? आप कठिन विषयों के अध्ययन में चित्त को एकाग्र न कर पाते हों। दिल बहलाव की कहानियों, पुस्तकों, उपन्यासों या कामुक रुचि बढ़ाने वाले साहित्य में ही दिलचस्पी लेते हों, यदि ऐसा है तो मन को दृढ़ता से इन गम्भीर शुष्क विषयों में दिलचस्पी लेने वाला बनाइये सब ओर से मन हटाकर एक ही विषय पर देरी तक मन को केन्द्रित कीजिये। जो समय आपने उक्त विषय के अध्ययन के लिए निश्चित किया है, उतनी देर अवश्य पढ़िये अन्यथा एकबार शैथिल्य आने से आदत और अनुशासन भंग हो जाएगा और निश्चय बल भी कम हो जायगा।

हमें फासिस्ट शिक्षा-पद्धति की कुछ उपयोगी बातें विशेषतः उनका अनुशासन और किसी समय भी बेकार न बैठने का नियम अवश्य अपने राष्ट्रीय चरित्र में उतारना चाहिये। तभी लोकतन्त्र की रक्षा हो सकेगी। बालकों को अभ्यास कराना चाहिए कि वे अपना-अपना दैनिक कार्य करें, वस्तुओं और विशेषतः कपड़ों को सफाई से तह करके रखें, जूतों को पालिश करें, वस्तुओं को उनके नियत स्थानों पर ही रखा करें।

आलस्य एक प्रकार की बुरी आदत मात्र है। मन शरीर, दिमाग, वाचा- सभी प्रकार का आलस्य हमारी आदतों के परिणाम हैं। यदि माता-पिता आरम्भ से ही बच्चों में अनुशासन रखें और उनका मानसिक व शारीरिक कार्य सतर्कता से कराने की आदतें डालें तो एक पीढ़ी ही सुधर सकती है।

स्मरण रखिये निकम्मेपन और आलस्य में भी एक प्रकार का घृणित आकर्षण है सैकड़ों व्यक्ति आलस्य के गन्दे कूप में पड़े हैं और उसी को श्रेष्ठ समझ रहे हैं। उन्हें अपने जीवन से अधिक से अधिक कार्य लेने के लिये कमर कस कर तैयार हो जाना चाहिये।

“ आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महारिपुः”

अर्थात् मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य ही तो है।


ब्रह्मचर्य और उसके उपाय

(श्री श्याम सुन्दर बाजपेयी, फरुखाबाद)

ब्रह्मचर्य का वास्तविक अर्थ होता है भगवान को प्राप्त करने के लिए वेदों का अध्ययन करना। प्राचीन काल में शिष्य गुरु के पास ब्रह्म प्राप्ति के लिए वेदों का अध्ययन करते हुए सावधानी से वीर्य रक्षा करते थे। अतएव धीरे-धीरे ‘ब्रह्मचर्य’ का अर्थ केवल वीर्य रक्षा ही निकाला जाने लगा और आधुनिक युग में आठों प्रकार के मैथुन- स्मरण, श्रवण, कीर्तन, प्रेक्षण, केलि, शृंगार, गुह्यभाषण और स्पर्श—का त्याग ही ब्रह्मचर्य के नाम से पुकारा जाता है परमपद को प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अति आवश्यक है:—

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदंसंग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ (8।12

वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परमपद को ॐकार नाम से कहते हैं और आसक्ति रहित यत्नशील महात्मा जन जिसमें प्रवेश करते हैं तथा जिस परमपद को चाहने वाले ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं उस परमपद को तेरे लिए मैं कहूँगा।’

कठोपनिषद् में ब्रह्मचर्य को परमात्मा प्राप्ति का साधन इस प्रकार बताया है:—

सर्वे वेदा यत्पदयाभवन्ति तयाँ सि सर्वणि च यद्धदन्ति। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेणा ब्रवीम्योमित्येतत्॥

“सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, संपूर्णतयों को जिसकी प्राप्ति का साधन बतलाते हैं तथा जिसकी इच्छा रखने वाले ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुम से संक्षेप से बताता हूँ; ॐ यही वह पद है।’

उपर्युक्त दानों मन्त्रों से ब्रह्मचर्य की महत्ता पूर्ण रूप से स्पष्ट है। पर अपने पूर्वजों की ओर तो नजर डालिए वे कितनी उम्र प्राप्त करते थे, पर ऐसा क्यों? यदि वह हजारों वर्ष जीवित रहते थे तो क्या हम पूरे 100 साल भी सुख पूर्वक नहीं जी सकते? हम भी उनकी तरह ही दीर्घजीवी हो सकते हैं परन्तु इसके लिए हमको भी उनकी तरह ही अखण्ड ब्रह्मचर्य और तपस्या की आवश्यकता है। इस ब्रह्मचर्य के बल पर ही अकेले हनुमान जी ने हजारों राक्षसों पर विजय प्राप्त की थी और ब्रह्मचर्य की आन पर लक्ष्मण जी इन्द्रजीत का वध कर सके थे। वीरवर भीष्म की जो इतनी महिमा है वह उनके अखंड ब्रह्मचर्य पालन का ही फल है। इसी ब्रह्मचर्य के पालन के कारण उनका नाम भीष्म पड़ा। इसी व्रत के प्रभाव से महाप्रतापी परशुराम भी उन पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ नहीं हुए। और तो और स्वयं भगवान श्री कृष्ण को भी शाँतनुसुत के सामने अपनी प्रतिज्ञा को तोड़कर महाभारत के युद्ध में शस्त्र ग्रहण करने पड़े। धन्य है ऐसा ब्रह्मचर्य। पर कुछ महानुभाव कहेंगे कि वह द्वापर और त्रेता युग था और अब है कलियुग, अब ऐसा कठिन साधन साध्य नहीं। पर हम कहते हैं कि इस कलियुग में भी ब्रह्मचर्य सम्भव है यदि कोई इच्छा करे। इस कलियुग में भी सैकड़ों ऐसे महापुरुष हुए हैं जिन्होंने अपनी सारी आयु ब्रह्मचर्य पालन में ही व्यतीत की।

ब्रह्मचर्य के पालन करने से जहाँ एक ओर शरीर में बल, स्फूर्ति आदि की वृद्धि होती है वहाँ दूसरी और मन में प्रसन्नता रहती है, स्मरण शक्ति बढ़ती है, अंग-अंग से तेज टपकने लगता है, उत्साह सदैव ही सेवक के रूप में विद्यमान रहता है, बुद्धि में तीव्रता उत्पन्न होती है, इच्छा शक्ति बलवान बनती है, कायरता का तो नाम ही बुरा है, कर्त्तव्य शीलता का साम्राज्य रहता है, विपत्ति के समय धैर्य रहता है, वीर भाव उत्पन्न होता है, सात्विक भावों की वृद्धि होती है- क्षमा, दया, शाँति, सहानुभूति, अहिंसा, प्रेम, सत्य आदि सदैव ही पूर्ण रूप से विद्यमान रहते हैं।

इसके विपरीत कामी पुरुष के पास सर्वथा ही निराशा का साम्राज्य रहता है, स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है, प्रत्येक क्षण उसका मन अशाँत रहता है, वह, सदैव ही सशंकित रहता है, बहुत थोड़ी आयु में ही वृद्धावस्था घर दबाती है और थोड़े समय में ही वह यमपुर का मेहमान बन जाता है। वहाँ भी उसे तरह-तरह की यातनायें सहनी पड़ती हैं। इस प्रकार से हम देखते हैं कि ब्रह्मचर्य के नाश से न तो इह-लोक में ही सुख और न परलोक में ही। ऐसी अवस्था में सदैव ही सावधानी के साथ वीर्य की रक्षा करनी हितकर है।

ब्रह्मचर्य पालन में निम्नलिखित नियम सहायक सिद्ध होंगे—

1. सिनेमा का सर्वथा त्याग कर दें। आज-कल भारतवर्ष में जो सिनेमा दिखाये जाते हैं उनमें कामुकता को भड़काने वाला विष भारी मात्रा में भरा पड़ा है।

2. भोजन सदैव ही सात्विक करें, कभी भूल कर भी बासी, सड़ा हुआ अन्न, लाल मिर्च, खटाई, लहसुन, प्याज और तिरस्कार पूर्वक दिए गए अन्न का सेवन न करें। भोजन ताजा और सादा होना चाहिये जिस अन्न को खाया जाय वह ईमानदारी के कमाये गये पैसे से खरीदा गया हो।

3. नित्य आसन, प्राणायाम तथा व्यायाम का कुछ देर अभ्यास करें। खुली शुद्ध वायु का नित्य सवेरे और शाम को सेवन करें।

4. रात्रि में जल्दी सोकर सबेरे ब्राह्ममुहूर्त में निद्रा त्याग करे। सोते समय पेशाब करके और हाथ पैर धोकर सोए। सोते समय एक गिलास जल पीकर सोये और सबेरे जागते ही एक गिलास जल पी लें। सोते समय और सबेरे जागते ही भगवान का स्मरण करें।

5. सदैव लंगोट या कोपीन पहने रहे परन्तु वह हलके कपड़े का हो जिससे दाह न उत्पन्न हो।

6. मलमूत्र की हाजत को कभी न रोके। पेशाब करने और पाखाने के बाद हमेशा इन्द्रिय को शुद्ध जल से धो डाले।

7. स्त्रियों के पास न बैठे न बात करे, न ताश चौपड़ आदि खेले, न हँसी मजाक करे। यद्यपि कुछ लोग कहते हैं कि माँ बहिन का भाव रखे पर तौ भी उनसे अलग रहना ही ठीक है।

8. अधिकतर अपना समय सत्संग में व्यतीत करे, दुष्ट लोगों का संग भूल कर भी न करे।

9. स्वाध्याय करे जिसमें योगवाशिष्ठ रामायण, गीता, महाभारत, उपनिषद् आदि का पठन होना चाहिये।

10. नित्य अग्निहोत्र और संध्या करनी चाहिये।

11. इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि यह शरीर नाशवान है, किसी दिन भी मृत्यु हो सकती है। अतएव अपना समय वेदाँत चर्चा और भगवद्जन में ही व्यतीत होवे भोग विलास में नहीं।

12. प्रत्येक स्त्री और पुरुष को चाहिये कि वह एक दूसरे में ऐसी धारणा करे कि यह शरीर बहुत अपवित्र वस्तुओं से बना है इससे मल, मूत्र, अस्थि, चर्म, रुधिर जैसी वस्तुऐं हैं जो कि सर्वथा अशुद्ध हैं।

13. स्त्री पुरुष में और पुरुष स्त्री में ऐसी भावना करे कि यह संसार इस अनन्त ब्रह्म का है इसमें जितनी प्राणी हैं सब उस दयालु प्रभु की ही सृष्टि हैं और इन सब में प्रभु का अंश है, सब एक हैं।

14. कम से कम चार व्रत एक मास में अवश्य करे....... दो एकादशी, एक पूर्णमासी और एक अमावस्या। यदि सम्भव हो तो अधिक उपवास अधिक हितकर हैं।

15. निरन्तर भगवान को याद रखे, कभी न भूले इसके लिए राम जप श्रेष्ठ साधन है। उसी प्रकार भगवद् भक्ति के उदित होते ही अज्ञान रूपी अन्धकार स्वयं ही नष्ट हो जाता है।

16. उपर्युक्त साधन करने पर भी यदि काम विकार मालूम हो तो फौरन ही टहलने लगे और नाम जप या भगवद् चिंतन करने लगे।

इन सब उपायों को तो काम में लाये ही, साथ ही पूर्ण सन्तोष प्राप्त करने के लिए हनुमान जी का एक अनुष्ठान करे। इस अनुष्ठान के पूर्ण होने पर हनुमान जी की कृपा से कामविकार पूर्ण रूप से नष्ट हो जाता है और साधक कपीश्वर की दया से तत्वज्ञान को प्राप्त करता है। इसकी विधि यह है:—

सर्व प्रथम सात-सात, छह, चार, आठ तथा चार मंत्राक्षरों के द्वारा षडंग-न्यास करके कपीश्वर हनुमान जी का इस प्रकार ध्यान करे:—

‘हनुमान जी का बाँया हाथ घुटने पर रखा हुआ है। दाहिना हाथ ज्ञान मुद्रा में स्थित हो हृदय से लगा है। वे आध्यात्म तत्व का चिंतन करते हुए कदलीवन में बैठे हैं। उनकी कान्ति उदयकाल के कोटि कोटि सूर्यों के समान है।’

इस प्रकार ध्यान करते हुए एक लाख इस मन्त्र का जप करे:— ॐ नमो हनुमते मम मदन क्षोभं संहर संहर आत्मतत्वं प्रकाशय प्रकाश हूँ फट् स्वाहा। इस मन्त्र में साड़े छत्तीस अक्षर हैं इसके वशिष्ठ मुनि अनुष्टुप् छन्द और हनुमान देवता हैं।

अन्त में एक बार फिर यह याद दिलाता हूँ कि ब्रह्मचर्य पालन में ही सुख है और उसके नाश में ही दुख, अतएव प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण रूप से कर्त्तव्य का पालन करे।


उपवास आवश्यक है।

( श्री प्रेमचन्द्र गुप्त, पाली खुर्द)

रहन सहन के अवांछनीय ढंग से जो विजातीय द्रव्य शरीर में एकत्र हो जाते हैं। उसी से सब रोग उत्पन्न होते हैं, अवांछित भोजन, शरीर की उचित रक्षा का अभाव, उत्तेजक पदार्थों का सेवन, तथा नाड़ियों की थकान, विशेष रूप से सुरक्षित जीवन के लिए अहितकर है। नाड़ियों की थकान-चिन्ता-भय, शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न होती है। शरीर से विजातीय द्रव्य निकालना वास्तविक में रोग से मुक्ति प्राप्त करना है। अतः शरीर से विजातीय द्रव्य निकालने के लिये उपवास प्राकृतिक चिकित्सा का एक प्रमुख अंग है वास्तव में निरोग बनाने वाली प्रकृति है न कि मनुष्य। मनुष्य का कार्य तो प्रकृति को ऐसा करने के लिए अनुकूल परिस्थिति ही उत्पन्न कर देना है। हमारे अन्दर की वह शक्ति जो हृदय में धड़कन करती है रुधिर में गति उत्पन्न करती है, यदि उचित अवसर दिया जाए तो शरीर में भी नव जीवन संचार कर सकती है।

मनुष्य को रोग से मुक्ति प्राप्त करने की विधि पर विचार करने से पहले हमें दूसरे जीवों पर दृष्टिपात करना चाहिये और देखना चाहिए कि वह रोगी होने पर क्या करते हैं? सभी पशु, पक्षी अस्वस्थ होने पर अपना भोजन परित्याग कर देते हैं। इस समय वे कभी कभी आवश्यकतानुसार पानी पी लेते हैं। और कुछ कालान्तर में वे इस प्रकार उपवास विधि से प्रायः रोग मुक्त हो जाते हैं। इस प्रकार सिद्ध होता है कि उपवास रोग मुक्ति की एक ऐसी विधि है जिसका आश्रय सभी जीवधारी अस्वस्थ हो जाने पर लेते हैं। परन्तु मनुष्य ने इससे लाभ उठाने से इन्कार कर दिया है। क्योंकि आधुनिक सभ्यता के साथ साथ वह बाहरी उपचारों की ओर अधिक ध्यान देने लगा है और आन्तरिक प्रेरणाओं की अवहेलना करने लगा है।

प्रत्येक मनुष्य को वर्ष भर में दीर्घ काल व्यापी उपवास करना आवश्यक है और साथ ही साथ स्वास्थ्योपयोगी है। इस दीर्घकालीन उपवास को तब तक जारी रखना चाहिये, जब तक जीवन के लिये किसी प्रकार की शंका न हो। ऐसे उपवास करते समय ऋतु का प्रभाव भी देखा जाना चाहिये। अतः इस प्रकार के व्रत बसंत ऋतु में विशेष लाभकारी होते हैं। क्योंकि उस समय शरीर के अन्तर्भाग की परिशुद्धि की विशेष आवश्यकता होती है। और यही कारण है कि अधिकतर वैद्य लोग बसंत ऋतु में “ बसंत वाजीकरण” औषधियों के प्रयोग की सलाह दिया करते हैं। परन्तु इस सबसे अच्छी औषधि है- अल्पकालव्यापी या- दीर्घ कालीन व्रत। उपवास अति भोजन से एकत्रित होने वाले अपद्रव्यों को अन्य औषधियों की अपेक्षा अति शीघ्र बाहर कर देता है। अतः शरीर के अन्तर्भाग की परिशुद्धि के लिये उपवास एकान्त रूप से आवश्यक है। यह आवश्यकता से अधिक संग्रह का व्यय कर देता है और अपद्रव्यों को बाहर निकाल कर शरीर के अन्तर्भाग को अपनी सफाई कर लेने का अवसर प्रदान करता है।

यह स्वाभाविक है कि उपवास की समाप्ति के उपरान्त मनुष्य की क्षुधा अत्यंत तीव्र हो उठती है। कभी कभी तो उसका स्वरूप बड़ा भयंकर हो जाता है और जो कुछ सामने आता है उसी को खाने की इच्छा बार बार बलवती हो उठती है। परन्तु जिस प्रकार उपवास के समय संयम से काम लेना पड़ता है उसी प्रकार उसकी समाप्ति पर भी अपने को रोक लेना चाहिये। तभी वास्तविक लाभ हो सकेगा।

यद्यपि उपवास काल में टहलना और व्यायाम करना भी आवश्यक और लाभप्रद है परन्तु अधिक व्यायाम करना भी उचित नहीं है। उन लोगों के ऊपर जो उपवास रखते समय और समाप्ति के सम्बन्ध में बुद्धि पूर्वक आचरण करेंगे- उसका प्रभाव सदा स्वास्थ्यवर्धक रहेगा।

उन लोगों के लिये जिन्होंने कभी उपवास रखने की परीक्षा नहीं की या असफल प्रयास किया उन्हें अपने सवेरे के जलपान (कलेवा) को परित्याग कर उपवास आरम्भ करने का अभ्यास कर लाभ उठाना चाहिये। जलपान परित्याग से संभव है कुछ लोगों को कुछ कष्ट उठाना पड़े। अतः इसे दूर करने का सरल और स्वास्थ्योपयोगी उपाय यह है कि कभी कभी प्रायः शहद मिला एक प्याला गर्म पानी या दूध पी लेना चाहिये! वास्तव में कलेवा के समय हमें जो भूख लगती है वह हमारे प्रतिदिन के अभ्यास के परिणाम स्वरूप होती है और यह केवल झूठी वुभुक्षा है। इस समय भोजन के लिये उत्कट अभिलाषा नहीं होती है। यदि आप इस समय क्षुधातुर होने पर भी भोजन या जलपान न करें तो, मध्याह्न या रात्रि के भोजन में अत्यंत स्वाद आ जाता है और लाभकारी होता है अतः कलेवा की वुभुक्षा का विनाश ही सर्व श्रेष्ठ उपाय उपवास की प्रथम अवस्था में है।

बहुत से लोग जलपान के समय तो खूब भोजन कर लेते हैं और दोपहर में हल्का या बिलकुल ही भोजन नहीं करते हैं। और इससे ही संतुष्ट रहते हैं वास्तव में वह ऐसा करने से एक बड़ी भूल के शिकार बने हुए हैं। उन्हें इस बात पर अधिक ध्यान देना चाहिये। उपवास के लिये रविवार का दिन- सर्वोत्तम माना गया है। बहुधा हमारे भोजन में अधिकांश ऐसे कुपाच्य पदार्थों का मिश्रण होता है जिनका पाचन उदर के लिये कठिन होता है। अतः अपने उदर को दो दिन का विश्राम देना नितान्त रूप से आवश्यक होता है।

उपवास के उपरान्त जिस भोजन का पाचन होना है। वह शरीर को अधिक जीवन और शक्ति प्रदान करता है। उससे शारीरिक क्रियाओं का कार्य भली भाँति सम्पन्न होता है। उस समय शरीर को पौष्टिक पदार्थों की आवश्यकता होती है और वह उनको ग्रहण करने के लिये तैयार रहता है। अच्छे विशुद्ध रक्त को बनाने का कार्य उस समय शीघ्र गति से होने लगता है। अतः प्रति सप्ताह एक या दो व्रत रखना स्वास्थ्य सुधार के लिये अद्भुत उपाय है। विशेष अवसरों या थोड़े-थोड़े अन्तर के उपरान्त भी व्रत रखना परमावश्यक है।

जब कभी आप अल्पकालीन या दीर्घ काल व्यापी उपवास करेंगे तो सर्व प्रथम आपके स्नायुओं पर विशेष प्रभाव पड़ेगा और संग्रहित मज्जे का ह्रास होगा, निर्बलता की भावना उत्पन्न होगी, जीभ पर मैल जमने लगेगा। तापक्रम गिर जाता है और शरीर के अनावश्यक अम्लादि पदार्थ बाहर निकलने आरम्भ हो जाते हैं। व्रत के कारण हल्का ज्वर आना शरीर की स्वच्छता और दूषित पदार्थों के जलने का सूचक होता है। इस प्रकार उपवास शरीर को सम अवस्था में लाता है। गठिया-मधुमेह-हृदय रोग आदि जीर्ण रोगों में उपवास के साथ-साथ टहलना, धूप, स्नान आदि रोग मुक्ति के साधारण उपाय हैं।

दीर्घ काल व्यापी उपवास में संतरे का रस पानी के साथ दिन में कई बार लेना चाहिये। रोगी को हरे शाकों का रस देना चाहिये, जो पेट को साफ कर खनिज लवणों की वृद्धि कर उनकी कमी को पूरा करते हैं। इससे उन मनुष्यों को तो बहुत लाभ प्राप्त होगा, पूर्ण स्वस्थ अवस्था में व्रत के नियमों का पालन उचित दशा में करेंगे।

उपवास आयु बढ़ाने के लिये अपने ढंग का एक ही उपाय है। इससे हम अपनी आयु बढ़ा सकते हैं। हमारे पूर्वज उपवास का महत्व समझते थे कि आवश्यकतानुसार और समय-समय पर कोई और धार्मिक नियमों पर उपवास करके दीर्घायु को प्राप्त कर लेते थे। हम भी इसी प्रकार उपवास को जीवन में आवश्यक स्थान देकर अपने शरीर और स्वास्थ्य को सुखमय बना सकते हैं।


बच्चों को भी विकसित होने दीजिए

(श्री काशिनाथ त्रिवेदी)

जीवन में सच्ची स्वतंत्रता का अभाव आज भी हमारी सामाजिक जिन्दगी का सबसे बड़ा अभाव है। जहाँ स्वतंत्रता नहीं वहाँ विकास कैसे? विकास का अर्थ है गति, अप्रतिहत गति। जब आदमी किसी एक लक्ष्य की ओर निरन्तर बढ़ता जाता है तो वह विकास के पथ पर होता है। लेकिन जहाँ जीवन का कोई लक्ष्य निश्चित नहीं वहां गति कैसी और विकास कैसा? हमारे औसत परिवारों की आज ऐसी ही स्थिति है। हम सब प्रवाह-पतित की तरह एक दिशा में बहते चले जा रहे हैं। किधर बह रहे हैं और क्यों बह रहे हैं, इसका विचार करने की भी हमें फुरसत नहीं है। इस सम्बन्ध की हमारी चेतना मानों सो गई है। गतानुगतिकता ने हमें मोह लिया है। हम भेड़िया-धसान के चक्कर में फँस गये हैं। स्वतन्त्र रूप से कुछ सोचने-समझने और करने की हमारी शक्ति का दिवाला सा पिट गया है। हम हततेज और हतबुद्धि से हो गये हैं। यही वजह है कि विकास के क्षेत्र में हम सामूहिक रूप से बहुत पिछड़े हुए हैं। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक हमें अपना सारा जीवन दूसरों के इशारों पर बिताना पड़ता है। जीवन में स्वतन्त्र रूप से कुछ करने धरने का हमें अवसर ही नहीं मिलता। घर में भी नहीं, समाज में भी नहीं और राज-दरबार में भी नहीं। हम अपने घर में भी स्वतन्त्र नहीं, वहाँ भी दुनियाभर के बन्धन हमारी स्वतन्त्र चेतना को चारों ओर से जकड़े बैठे हैं और हमारी मनुष्यता का गला घोंट रहे हैं। जब समाज के और घर के कर्ता-धर्ता की यह स्थिति है तो फिर बच्चों की दयनीय स्थिति का तो पूछना ही क्या? उन बेचारों को तो तिहरी गुलामी में रहना पड़ता है ऐसी दशा में उनकी शक्तियों का जो भी विकास हो जाता है, सो गनीमत है।

विकास मनुष्य का स्वभाव धर्म है। विकास सृष्टि का नियम भी है। कुछ विकास सहज होता है, कुछ यत्न पूर्वक किया जाता है। विकास की श्रेणियाँ और अवस्थायें भी भिन्न-भिन्न होती हैं। साधारण मनुष्य विकास का भूखा होता है। अपने जन्म के दिन से वह जाने अनजाने विकास की ओर बढ़ता रहता है। विकास उसके जीवन की सहज गति है। पर विकास का मार्ग निरापद नहीं। वह बाधाओं से भरा पड़ा है। यदि इन बाधाओं से बचकर आगे बढ़ने की चिन्ता न रखी जाय तो विकास का क्रम बिगड़ जाता है, थम जाता है।

आज हमारा राष्ट्र विकास के पथ पर आगे बढ़ रहा है। सदियों बाद वह स्वतंत्र हुआ है। सदियों की गुलामी के बाद आज उसे अपना विकास खुद करने की आजादी मिली है। राष्ट्र का विकास एकाँगी नहीं होता न होना चाहिए। उसे सब दिशाओं में और सब क्षेत्रों में आगे बढ़ने की चिन्ता रखनी होती है। जो राष्ट्र इस मामले में सजग और सावधान होते हैं, वे थोड़े समय में अपने पुरुषार्थ से खूब शक्तिशाली और सम्पन्न बन जाते हैं। प्रमाद में पड़े पथ भूले राष्ट्रों के विकास की गति धीमी और खंडित होती है। उनका लोक-जीवन उतना समतपूर्ण, प्रसन्न और समृद्ध नहीं होता जितना असल में उसे होना चाहिये।

दुनिया के सभी देशों में बालक की महिमा गायी गई है। आज भी गायी जाती है। बालक राष्ट्र की अनमोल निधि है। राष्ट्र की नींव में बालक बैठा है। जो राष्ट्र अपने बालकों की सही-सही सार-सँभाल रखता है, उसे अपने जीवन में कभी पछताना नहीं पड़ता क्योंकि आज का बालक ही कल का नागरिक बनता है और राष्ट्र की बागडोर सम्भालता है। जैसा बालक होगा, वैसा ही राष्ट्र बनेगा। दुनिया में सर्वत्र यही हो रहा है। हिन्दुस्तान में भी आज हम इसी सत्य के दर्शन कर रहे हैं।

हमने अपने देश में अपने बालकों की कम-से-कम चिन्ता की है। उनके विकास के लिए कम-से-कम पुरुषार्थ किया है। उनके सर्वांगीण विकास के साधनों को जुटाने की तरफ हमारा ध्यान नहीं के बराबर हो गया है। हमने अपने घरों में, विद्यालयों में, समाज में और राज-दरबार में ऐसा कोई वातावरण भी नहीं बनाया कि जिसके बीच जीकर हमारा बालक सहज भाव से सुसंस्कृत और सुविकसित बन सके। विकृति के अनेक क्षेत्र हमने अपने बीच बढ़ाकर और फैलाकर रक्खे हैं। संस्कृति के सुन्दर केन्द्रों का व्यापक विकास करने की तरफ हमारा ध्यान आग्रह के साथ जाना चाहिए, पर जा नहीं रहा है। इसी कारण आज हमारे बालकों का जीवन चारों तरफ से रुँधा पड़ा है और उन्हें ऊपर उठने के इने गिने अवसर ही मिल रहे हैं। आज हमारे समाज में बालक जितने दलित और उत्पीड़ित हैं, उतने और कोई शायद नहीं है। पर हमें अपनी इस स्थिति का न तो पूरा भान है, और न इससे ऊपर उठने की चिन्ता ही है। आज यही हमारे समाज के विचारशील लोगों की सबसे बड़ी चिन्ता का विषय हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं।

जिन घरों में बालक खा-पीकर और पहन-ओढ़कर सुखी हैं, वहाँ भी वह एक दूसरी दृष्टि से भूखा, प्यासा और बेआसरा पड़ा हुआ है; क्योंकि मनुष्य का जीवन पशु-जीवन से भिन्न है। मनुष्य भाव का भूखा होता है। मनुष्य स्वाभिमान को प्राणों से भी अधिक मूल्यवान समझने वाला प्राणी है। मनुष्य अपनों से और गैरों से भी आदर, सत्कार, स्नेह और सराहना की चाह रखता है। मनुष्य स्वयं अपने हाथों कुछ करने की इच्छा रखता है और करके सुखी होता है। मनुष्य को पराधीनता प्यारी नहीं लगती। मनुष्य अपने बल-बूते जीकर अधिक शक्तिशाली बन सकता है, बनना चाहता है। उसे बन्धन पसंद नहीं होते, वह खुला और स्वतन्त्र जीवन बिताने का इच्छुक होता है। दूसरों के बन्धन में बँधने की अपेक्षा अपनी इच्छा से अपनाये हुए बन्धन उसके लिए अधिक लाभकर होते हैं और उनके द्वारा वह अपनी सच्ची उन्नति और मानवता की सही उपासना करता है। यह स्वस्थ और संस्कारी मनुष्य का अपना वैभव है।

आज हमारा बालक घरों में, मदरसों में और समाज के बीच इस वैभव से वंचित है। जैसे-तैसे जी रहा है। हमने उसे जीवन का कोई स्वस्थ और मनोवैज्ञानिक क्रम अभी निश्चित नहीं किया है। वह भगवान् का भेजा हमारे बीच आता है और भगवान् के भरोसे ही जीने व बढ़ने लगता है। उसके सम्मान का हमारा ज्ञान तो बहुत ही अल्प और अपर्याप्त है। हम न उसके शरीर की आवश्यकताओं को ठीक से जानते हैं, न उसके मन और मस्तिष्क की आवश्यकताओं की सही-सही जानकारी रखते हैं, फिर हमें उसकी आत्मा की भूख का तो भान ही क्यों होने लगा अमीर-से-अमीर और गरीब-से-गरीब घरों में जीने और पलने वाले हमारे बालकों का यह घोर दारिद्रय हमारी वर्तमान अवनति के और लड़खड़ाती चाल से बढ़ने वाली प्रगति के लिए जिम्मेदार है।

जन्म से सात साल की उम्र तक के बच्चों के सर्वतोमुखी विकास के लिए हम व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से बहुत ही कम चिन्ता करते हैं। बच्चों के जीवन का अत्यन्त कीमती समय हमारे इस घोरतम प्रमाद के कारण व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है। मनोविज्ञान के ज्ञाता और शिक्षा-शास्त्र के विशेषज्ञों का कथन है कि सात साल से पहले की उमर ही बच्चों के जीवन का सच्चा और सही नियम निर्माण करने वाली उमर होती है। यदि इस उमर में पूरी सतर्कता से काम लेकर बालकों के विकास की पर्याप्त चेष्टा न की गई तो बाद में उन पर किया जाने वाला सारा खर्च और परिश्रम बेकार हो जाता है। यह एक ऐसी सचाई है जिस पर दो रायें हो नहीं सकतीं। काश, हम अपने बालकों के बारे में इस नई दृष्टि से सोचें, नये बाल-मनोविज्ञान और बाल-शिक्षा-शास्त्र का गहरा अध्ययन करें और नई भावना से युक्त होकर घरों तथा विद्यालयों में अपने बाल-गोपाल के लालन-पालन का और उनकी वास्तविक शिक्षा-दीक्षा का समुचित प्रबन्ध करने में पूरी श्रद्धा से जुट जायँ।

बाल-विकास के बिना राष्ट्र का विकास असम्भव है।


संस्था के कार्यकर्ता की जिम्मेदारी

(राष्ट्र सन्त श्री तुकड़ो जी महाराज)

परमार्थ की लम्बी बातें हाँकना छोड़ दो और पहले अपनी ओर देखो। मेरा ख्याल है कि परमार्थ भी मनुष्य के व्यवहार को सुव्यवस्थित बनाने के उद्देश्य से ही कहा गया है। अगर व्यवहार ठीक नहीं बनता है तो उसमें कोई अर्थ नहीं। ऊँची-ऊँची बातों का जिक्र करने से पहले हमको अपने जीवन को पवित्र बनाना चाहिये। मनुष्य में जो शैतानी है- जो आसुरी गुण है, जिनके कारण वह खुद अपने तथा समाज बल्कि विश्व के जीवन में आग लगा देता है, उन दुर्गुणों पर काबू पाना सबके लिये सब तरह लाभदायी है। समाज की स्थिरता कायम रखते हुए ऊँची राह पर आगे बढ़ने के लिए हम सबको पहले अपने दैनंदिन व्यवहार को सुधारना होगा। खाना-पीना पवित्र रखना होगा। सच बोलने और सीधे चलने की आदत डालनी होगी। छल-कपट को छोड़ सबके हित का सोचना होगा। पीछे किसी की टीका-टिप्पणी न करते हुए, सामने बोलने की तैयारी करनी होगी। उसमें भी तारतम्य रखना होगा। जो कुछ बोलना हो वह मीठे लब्जों में, कोई गलत परिणाम न निकले यह सोचते हुए बोलना होगा।

ख्याल रहे कि, जीवन का ऐसा सुधार अकेला-अकेला व्यक्ति भी कर सकता है, केवल निश्चय की जरूरत है। परन्तु हम कुछ लोग मिल जुलकर एक ही रास्ते पर चलने का अगर तय करें, तो रास्ता बिलकुल आसान होगा इसमें सन्देह नहीं। अपने आसुरी गुणों को अकेला आदमी विपरीत परिस्थिति में आसानी से नहीं हटा सकता। परिस्थिति को अनुकूल बना लेना हो तो कुछ लोगों के संगठन की आवश्यकता होती है। एक ध्येय से प्रेरित हुए लोग इकट्ठा होकर परिस्थिति में उचित परिवर्तन ला सकते हैं और प्रगति करना उनके लिये सुगम हो जाता है। संस्था, आश्रम, संप्रदाय आदि बनाने का यही तो उद्देश्य होता है।

लेकिन अक्सर हम देखते हैं कि बड़े लोगों के सामने तो सब ठीक चलता है किन्तु उनके पीछे शिथिलता छा जाती है। अपने नेता को ही नहीं, बल्कि अपने देवता को भी लोग फँसाते हैं। मनुष्य में आलस्य आ जाना स्वाभाविक है। उसके लिये संगठन के चालक को बारबार सोचकर अपने कार्य में नयी जान लाने की कोशिश करनी चाहिये। उसी कार्यक्रम को कुछ दूसरे ढंग से ढालकर सामने रखना चाहिये, जिससे नवीनता की भावना पैदा हो। लोगों में उमंग बनी रहने के लिये यह जरूरी है। साथ ही हर नियम या कार्यक्रम के पीछे जो तत्त्वज्ञान है उसे हर एक को मालूम कर लेना चाहिये। जिसे उसका ज्ञान नहीं वह उसका महत्त्व नहीं समझ सकता और फिर उसका आकर्षण कायम रहना मुश्किल हो जाता है। हम चिल्ला-चिल्लाकर जो बातें करते हैं, उसका कारण, हमारा विश्वास उन बातों पर जम चुका है, लेकिन जो लोग फिर भी उस पर डटे नहीं रह सकते इनका विश्वास अभी नहीं जमने पाया, यही इसका कारण हो सकता है। ऐसी हालत में हमारा फर्ज होता है कि हम उन्हें बारीकी से समझावें।

केवल किसी व्यक्ति के रहने से वे कार्यक्रम में सम्मिलित हों, यह ठीक नहीं। केवल नियम—पालन की दृष्टि या जबरदस्ती कार्यक्रमों में सम्मिलित होना भी कोई स्पृहणीय नहीं कहा जा सकता। स्वयं उनकी धारणा उन्हें सम्मिलित होने के लिये खींच लावे, तभी उनका विकास हो सकता है। इसके लिये उनके दिल को हमें निश्चयात्मक रूप देना होगा, वैसे संस्कार उन पर करने होंगे। निश्चय टिकाने के लिये बार-बार सहानुभूतिपूर्वक समझाना होगा। झाड लगाया लेकिन पानी न डाला तो वह सूख जाता है, विचारों या सद्भावनाओं के अंकुरों की भी यही हालत होती है। इसलिये बार-बार हमें सोचकर विचारों द्वारा उन्हें सींचते रहना चाहिये। स्वयं उनके विचारों को विकसित करने के लिये क्या किया जाय, इसको खोजते रहना चाहिये। हर काम में संशोधन की जरूरत होती है। बहुत ही सूक्ष्मता से कारणों को ढूंढ़ निकालना पड़ता है, व्यवहार में भी और परमार्थ में भी!

लेकिन हम कई जगह देखते हैं कि संगठन के जिम्मेदार लोग अपने इस कर्तव्य को भुला देते और एक हुकूमत का रास्ता अख़्तियार कर लेते। ठाँट-फटकार से काम लेना चाहते। यह कोई ठीक तरीका नहीं है। बच्चा आज क्यों रोया? बिना रोटी खाये ही क्यों सोया? घर को चलाने वाला गृहस्थ इस बात को गौर से सोचता है और जो इस प्रकार सहृदयता से सोचता है वही घर को ठीक चला सकता है। किसी संस्था का व्यक्ति झूठ क्यों बोला, क्यों वह अपने काम को नहीं कर सका, क्या कारण है कि उसका दिल टूटता चला जा रहा है, इन बातों को जिम्मेदार लोग जब सूक्ष्मता से सोचेंगे तो कोई कारण नहीं कि उस संगठन में बिगाड़ पैदा हो।

सम्भव है कि संगठन में सभी एक भूमिका के नहीं रह सकते। किसी का कदम फिसल भी सकता है, किसी के हाथों गलती भी हो सकती है। उसको बिना सोचे टीका का शस्त्र उठाना कहाँ तक ठीक है? मैं भी तो पूरा आदर्श मानव नहीं हूँ, कुछ अवगुण मुझमें भी हैं या नहीं?” इसको न सोचने वाला मुखिया लोक संग्रह करने का अधिकारी कभी नहीं हो सकता। इसका मतलब यह नहीं कि वह गलतियों को न निकाले। उन्हें तो अवश्य निकालना चाहिये, नहीं तो सारी संस्था का सत्यानाश होने में देर नहीं लगती। लेकिन गलती निकालने के समय विशाल हृदय और शान्त बुद्धि की आवश्यकता होती है। साथ ही, बारह महीनों के बाद किसी की गलती निकालना यह मूर्खता है। बागवान की तरह रोज के रोज सूखी पत्ती, टूटी डंगाल, कीड़ा-जाली आदि किस झाड़ पर है इसे खोजते हुए संस्था की बाग को सुरक्षित रखना चाहिये। जितनी जिम्मेदारी जो संभाल सकता हो उतनी ही जवाबदारी उसकी ओर सौंप देनी चाहिये, अन्यथा उसकी गलती के भागी हम भी हो जाते हैं।

सबको हमें ऊपर उठाना है। लोग खुद से नहीं आ सकते तो उनको भी हमें प्रेम से खींच लाना है। फिर जो हमारे पास आ चुके, उन्हें हम किस मकसद पर गमा सकते हैं? लोक संग्रह का मतलब, काम में तैयार हुए लोगों को गमाना तो हरगिज नहीं हो सकता। उनकी जिम्मेदारी हम पर है, जो हम संस्था के चालक कहलाते हैं। गलती उनकी भी हो सकती है, लेकिन सूक्ष्मता से उसे ढूंढ़ निकालते हुए हमें कोई मार्ग निकालना होगा। साथ ही यह भी सोचना होगा कि, जब कोई झाड़ फूलों से लद जाता है, उस पर रंग चढ़ जाता है, दो इंसान भी देखने के लिये बेताब होते हैं, मधुमक्खियाँ तो उसपर टूट ही पड़ती हैं। परन्तु क्या बात है कि निकट वाले लोग भी हमसे छूटे जा रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर जिम्मेदार व्यक्ति को अपने दिल में खोजते रहना चाहिये और बागवान की तरह अपनी बाग को सजाने-सँवारने में अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिये।

जिम्मेदार व्यक्ति को सबके साथ सलाहमशविरा करते हुए कार्य करना चाहिये, केवल अपनी ही इच्छा को प्रमाण समझकर नहीं। साथ ही, अन्य संस्थाओं में जो बुराइयाँ हैं उनकी अपेक्षा हमारी गलतियाँ कम हैं ऐसा समझकर सन्तोष नहीं कर लेना चाहिये, बल्कि औरों में जो अच्छाई है उससे भी हम आगे कैसे बढ़ें, इस बात पर दृष्टि केन्द्रीभूत करनी चाहिये। बूढ़ा आदमी मना करने पर भी—काम करता ही रहता है और यदि न करे तो बीमार पड़ता है, उसी प्रकार हमारे शरीर को परिश्रम और सेवा की आदत सी लग जानी चाहिये। इस प्रकार हम मिलजुलकर, अपनी जिम्मेदारी सावधानी से संभालते हुए अगर संस्था चला सकते हैं तो उसमें सबके साथ हमारा भी महान कल्याण होना स्वाभाविक है। देश में इन गुणों की आज चारों ओर जरूरत है। मैं आशा करता हूँ कि संस्था के जिम्मेदार लोग ये सभी ख्याल में रखते हुए आगे कदम बढ़ाते रहेंगे।


क्या धर्म और विज्ञान में विरोध है?

(श्री रामलखन चौधरी, एम.ए.)

आज चारों ओर इस बात की बड़े जोरों से चर्चा हो रही है कि धर्म का युग समाप्त हो गया और वर्तमान युग विज्ञान का है। ऐसा प्रतीत होता है कि धर्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे की विरोधी शक्तियाँ हैं। यह ठीक भी है कि धर्म और विज्ञान के तत्वों में थोड़ा सा अन्तर है—और वह अन्तर यह है कि धर्म-भावमूलक है और विज्ञान बुद्धिगत है अर्थात् धर्म की उत्पत्ति मनुष्य की भावना से हुई है और विज्ञान की बुद्धि से यह अन्तर केवल समझने की बात है। वास्तव में धर्म में बुद्धि का कुछ अंश रहता ही है और विज्ञान में भावना का अभाव नहीं होता। अस्तु अन्तर है और अवश्य है परन्तु इस अन्तर को इतना चौड़ी खाई बना देने का श्रेय वर्तमान राजनीतिज्ञों को है जिन्होंने अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए दूसरों की शक्ति घटाने में उचित-अनुचित सभी प्रकार के साधनों का प्रयोग किया। उन्होंने धर्म को व्यक्तिगत है अर्थात् धर्म को संकुचित-रूढ़िगत और न जाने क्या-क्या कहा है। धर्म को व्यक्तिगत बताने का अर्थ है, धर्म को संकुचित अर्थ में लेना। उनके मन में धर्म से तात्पर्य है किसी विशेष देवता की पूजा करना; मन्दिर, मस्जिद या गिरजे में पूजा करना सवेरे या पाँच वार पूजा करना; आदि। धर्म के सामाजिक पहलू की ओर ध्यान देकर, उसे प्रगति का विरोधी और प्रतिक्रिया वादी ठहराया है। यहाँ तक कह दिया गया है कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राज्य है मानों हमारे देश में धर्म का कोई महत्व नहीं है। धर्म को एक सड़ी-गली और त्याज्य चीज मान लिया गया है। धर्म मानो देश और समाज उन्नति से कोई सम्बन्ध ही नहीं रखता।

विज्ञान और धर्म में यह विरोध मान कुछ ऐतिहासिक कारणों से भी उत्पन्न हो गया है। यूरोप और हमारे देश में, कुछ समय ऐसा भी रहा है जब धर्म के कारण अनेक लड़ाई-झगड़े हुए हैं, अन्धविश्वास और निरक्षरता की प्रबलता रही है परन्तु वास्तव में उसे सच्चा धर्म नहीं कहना चाहिए। ऐसी शोचनीय अवस्था तभी उत्पन्न हुई जब तक लोग धर्म के सच्चे स्वरूप को भूल बैठे जब धर्म की बागडोर अच्छे विद्वान, उन्नतमना व्यक्तियों के हाथ में होती है तो वह एक अपूर्व शक्ति का स्रोत बन जाता है, वैदिक युग में सर्वांगीण उन्नति का कारण धर्म ही था। बौद्धकालीन भारत में अशोक और हर्ष प्रभृति राजाओं ने धर्म का आशय लेकर जो कुछ काम किए, उन पर आधुनिक काल में संसार गर्व करता है। अतः यह कहना निरर्थक है कि धर्म अनावश्यक और झगड़े का कारण है। धर्म, विज्ञान से किसी प्रकार हीन नहीं है। आज हम प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं कि विज्ञान द्वारा भी तो मानव-समाज का अहित हो रहा है। विज्ञान ने हमें चिन्तन शक्ति की ओर बुद्धि को क्रियाशील बनाया और हमें शक्ति दी परन्तु उसका परिणाम तो यही हुआ कि हम अधिक स्वार्थी, दम्भी और अत्याचारी बन गए। विज्ञान ने हमारे मन का परिष्कार नहीं किया। कल कारखानों के बनने से जीवनोपयोगी वस्तुओं का उत्पादन कई गुना बढ़ा परन्तु संसार पहले से कहीं अधिक अभावग्रस्त है। वैज्ञानिक अस्त्रों के आविष्कार ने हर प्रकार से मानव जाति को विनाश के संकट में डाल रक्खा है। फिर तो विज्ञान भी बुरा है और धर्म तो बुरा था ही।

तनिक ध्यान से देखने पर प्रतीत होता है, न धर्म ही बुरा है और न विज्ञान। संसार की कोई वस्तु बुरी तभी होती है, जब हम उसका जान बूझ कर दुरुपयोग करते हैं। विष भी बुरा नहीं, वरन् यह रोग दूर करता है; वह घातक तभी बनता है, जब अधिक मात्रा में उसे खाया जाता है। धर्म और विज्ञान तभी हानिकारक बन जाते हैं, जब उनका प्रयोग गलत ढंग से किया जाता है। अब देखिए, धर्म और विज्ञान दोनों ही बहुत कुछ समान हैं। धर्म के अंतर्गत अनेक विश्वास आ जाते हैं, जैसे एक ऐसी शक्ति पर विश्वास जो सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है, प्रकृति की अनेक शक्तियाँ जिन्हें देवताओं के रूप में ग्रहण किया गया है, इन शक्तियों को प्रसन्न करने के अनेक साधन, जैसे पूजा, भजन, ध्यान, यज्ञ, तथा अन्य कर्म काँड आदि। इन सब बातों से क्या प्रकट होता है? हजारों वर्षों पहले मनुष्य के मन में इस अद्भुत सृष्टि को देखकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई और उसने उसकी व्याख्या करनी चाही। उसी व्याख्या ने प्राचीन दर्शन, धर्म और साहित्य का रूप धारण कर लिया। मनुष्य की शक्ति उस समय सीमित थी और प्रकृति की शक्ति अनन्त इसलिए उसने उसे, शक्ति के रूप में पूज्य मानकर प्रसन्न करने की चेष्टाएँ की वैदिक मन्त्रादि इसके प्रमाण है। यह कह सकना कठिन है कि इन शक्तियों को उन उपायों द्वारा प्रसन्न करके अपने वश में कर लेना संभव है या नहीं? फिर भी कभी देखा जाता है कि मन्त्र आदि में बड़ी चमत्कारपूर्ण शक्ति होती है और उनकी सहायता से प्राकृतिक शक्तियों पर नियंत्रण किया जा सकता है। आधुनिक मनोविज्ञान ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य अनन्त शक्ति का भण्डार है। विचारों और भावों में जितनी शक्ति है, उतनी तोप तलवार में नहीं होती। धर्म का आधार यही विचार और भाव हैं।

धर्म द्वारा मनुष्य ने प्रकृति के नियमों को एक युग और देश के अनुसार समझने की चेष्टा की। उनमें बहुत सी बातें सत्य और बहुत सी असत्य हैं। तथा अनिर्भरशील बातों के आधार पर अनेक शाश्वत सत्यों का तिरस्कार करना अनुचित है। विज्ञान के सम्बन्ध में भी यही बात घटित होती है। विज्ञान प्राकृतिक नियमों की एक व्याख्या है। विज्ञान की विशेषता यह है कि उसके द्वारा प्रस्तुत की गयी व्याख्या को प्रयोगों द्वारा दिखलाया भी जा सकता है। इसलिए आँखों से देखकर मनुष्य का उन पर सहज ही विश्वास हो जाता है। इसके विपरीत धर्म के तत्व बड़े ही सूक्ष्म हैं उन्हें तुरन्त घटित करके दिखाना कठिन है, इसलिए साधारण जन धर्म को विश्वसनीय नहीं मानते। ज्यों-ज्यों विज्ञान की उन्नति होती जा रही है, वैज्ञानिकों के आगे वही कठिनाइयाँ पैदा होती जा रही हैं, जो धर्म वेत्ताओं के आगे आयी थीं। जैसे मनुष्य का ज्ञान बढ़ता है पुराने नियमों में भूलें दिखाई पड़ने लगती हैं, उनमें संशोधन की आवश्यकता प्रतीत होती है। धर्म यह संशोधन नहीं कर सका। उदाहरण के लिए पहले यह धार्मिक विश्वास प्रचलित था कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य उदयाचल पर्वत से निकल कर आकाश की परिक्रमा करता हुआ रात्रि में अस्ताचल पर विश्राम करता है या पृथ्वी शेषनाग के फण पर ठहरी है। मनुष्य के भौगोलिक और खगोल विद्या के ज्ञान ने इस विश्वास को असत्य सिद्ध कर दिया। 15 वीं शताब्दी में कोपरनिकस और गैलीलियो ने इनके स्थान पर नवीन सिद्धाँत स्थिर किए। ऐसे समय में धर्म वेत्ताओं का कर्तव्य था कि अपने धार्मिक विश्वासों में थोड़ा सा परिवर्तन करके सुधार कर लेते। उससे धर्म की हानि न होती जो आज हो रही है। अब भी बदले हुए समय और परिस्थिति के अनुसार धार्मिक विश्वासों में थोड़ा हेर-फेर करके धर्म को हृदयग्राही बनाने की आवश्यकता है। ऐसा धर्म वैज्ञानिक धर्म होगा और उसका पालन करने में किसी को हिचक न होगी।

अब विज्ञान की बात देखिए। विज्ञान के क्षेत्र में ज्ञात नियमों में उसी प्रकार परिवर्तन करने की आवश्यकता प्रतीत हो रही है जैसे धर्म में है। न्यूटन ने जो नियम खोज निकाले थे, उन्हें इस शताब्दी में डा. आइन्स्टीन ने असत्य सिद्ध कर दिया है। पुराने जमाने के वैज्ञानिक पदार्थ और शक्ति को अलग-अलग मानते थे और अब दोनों केवल एक ही वस्तु के दो निष्क्रिय एवं सक्रिय रूप माने जाते हैं। इसी प्रकार थामस एडिंगटन और सरजेम्सजीन्स आदि पाश्चात्य विद्वानों ने सिद्ध कर दिया है कि आज का विज्ञान कुछ वर्षों बाद निरर्थक और असत्य सिद्ध होगा। यह विश्व अनन्त है और उसका विकास इतनी तेजी से हो रहा है कि गणित तथा विज्ञान द्वारा नियमों को समझाना प्रायः असम्भव सा है। अतः जिस प्रकार धर्म ने इस विश्व को रहस्यमय माना था उसी प्रकार विज्ञान भी मानता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि धर्म और विज्ञान में विरोध नहीं है।

अब धर्म और विज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को लीजिये। धर्म हमें देश, समाज और व्यक्ति के साथ संबंध स्थापित करना सिखाता है, विज्ञान हमें केवल वस्तुओं के साथ सम्बन्ध करना बताता है। विज्ञान शक्ति है और धर्म उस शक्ति का उपयोग और नियमन है। सरल भाषा में, विज्ञान ने हमें भाप, बिजली, पेट्रोल और अणु की शक्तियाँ प्रदान की हैं, उसने हमें यंत्र दिये हैं और उनसे नयी नयी उपयोगी वस्तुओं को तैयार करने की क्षमता दी है— बस। इसके आगे अभी तक विज्ञान की प्रगति नहीं हुई है। इस बात को अनेक वैज्ञानिक मुक्त कंठ से स्वीकार करते हैं। शक्तियाँ, और यन्त्र पा जाने से ही मनुष्य का भला नहीं हो जाता। यदि इनका वह दुरुपयोग करे तो वह दानव हो जायगा जैसा कि गत पच्चीस वर्षों से देखने में आ रहा है। कहा गया है— विद्या विवादाय, धन मदाय, शक्तिः परेषां परिपीड़नाय, खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय।

खल अर्थात् दुष्ट अग्नि शक्ति का दुरुपयोग समाज को पीड़ित करने में करता है, साधु उसका उपयोग सबकी रक्षा में। ‘शठतायुक्त सबलता उत्पाता’ होती है। खल को साधु में बदलने के लिए धर्म की आवश्यकता है। प्रयोजन वादियों के अनुसार सत्य वही है जो समाजोपयोगी है। यदि विज्ञान द्वारा खोजे गये सत्य समाज संहारक बन जायं, तो स्वयं विज्ञान सत्य से कोसों दूर सिद्ध होता है। धर्म विज्ञान को उपयोगी बनाता है। अतः धर्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। विज्ञान विहीन धर्म कोरा अंध विश्वास है। विज्ञान द्वारा संशोधित नियमों का अतिक्रमण करने वाला धर्म जीवित नहीं रह सकता। धर्म को प्रगतिशील होना चाहिए। प्रचलित परम्पराओं और विश्वासों को केवल इसलिए जीवित नहीं रहने देना चाहिए कि वे प्राचीन काल से चले आ रहे हैं। सड़ी-गली चीजों को इकट्ठा रखने से शोभा नहीं बढ़ती, वरन् कुरूपता आती है। सच्चा धर्म वही है जो विज्ञान सम्मत हो अर्थात् जो देश और काल की चाल के साथ चल रहा हो।


जीवन का आदर्श क्या है?

(श्री यशपाल जैन)

आदर्श जीवन के बारे में कुछ कहना आसान नहीं है, कारण कि इस पृथ्वी पर सभी तरह के लोग बसते हैं, जिनकी रुचियाँ, संस्कार अलग-अलग हैं और जिनके आदर्श और जीवन के मान दंड एक समान नहीं हैं। कुछ का विश्वास है कि यह देह बार-बार नहीं मिलती। खूब भोग भोगो, खाओ-पीओ और मौज करो। ऐसे व्यक्तियों के जीवन में कोई उच्च ध्येय नहीं होता और वे साँसारिक भोगों में लिप्त रहकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देते हैं। लेकिन कुछ लोगों की मान्यता है कि यह शरीर भगवान् की देन है, पवित्र हैं। इसलिए इसे परमपिता की धरोहर मानकर संयम-पूर्वक उसका उपयोग करो। फिर कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें शहर की तड़क-भड़क पसन्द है। वे कहते हैं कि जीवन का सच्चा आनन्द कहीं है तो शहर में। आराम और मनोरंजन के सब साधन वहां हैं और आदमी को कूपमंडूक नहीं बनना है तो शहर में रहना ही होगा। इसके विपरीत कुछ लोग गाँव के रहन-सहन को पसन्द करते हैं। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने मानो कोटि-कोटि भारतीयों के स्वरों में कहा हो।

“अहा ग्राम्य जीवन भी क्या है क्यों न इसे सबका मन चाहे।”

आदर्श जीवन के बारे में विचार करते समय कुछ ऐसी ही उलझनें सामने आ जाती है। गहराई से देखें तो आज दुनिया में दो विचार-धाराएं स्पष्ट दीख पड़ती हैं– एक है भौतिक विचार-धारा, जो हमारी नहीं है, यह पश्चिम की देन है। उसमें मानव अपने जीवन की चरम सिद्धि साँसारिक वस्तुओं की उन्नति और उपलब्धि में मानता है। उसकी दृष्टि में जितनी अधिक इच्छाएं होंगी उतनी ही अधिक उन्नति होगी। दूसरी विचार-धारा है आध्यात्मिक। उसके मानने वाले कहते हैं कि सृष्टि के लेकर अब तक अनेक आविष्कार हुए हैं सो ठीक, दुनिया का नक्शा ही बदल गया है, लेकिन आदमी-आदमी के बीच वह भाईचारा अब कहाँ है जो पहले था? मशीनों की ईजाद में आदमी स्वयं एक मशीन बन गया है। आदमी के जीवन का उद्देश्य क्या है? क्या यह कि वह रातदिन आपाधापी करे और एक दिन आवे कि वह असमय में ही मृत्यु की गोद में सो जावे? नहीं, जीवन का ध्येय, जीवन का आदर्श यह कदापि नहीं हो सकता, नहीं होना चाहिये। जीवन का उद्देश्य है मनुष्य का सामूहिक कल्याण, अर्थात् मानव-जाति को दासता, मोह, कुसंस्कार, परमुखापेक्षिता, क्षुद्र स्वार्थ और अहमन्यता से बचाकर सत्य, न्याय, आत्म-निर्भरता और औदार्य के राजमार्ग पर ले जाना और समाज-व्यवस्था को कुछ ऐसे ढाँचे में ढालना जिससे आदमी के द्वारा आदमी का शोषण न हो, उनके बीच में सहयोग की भावना हो। जो जितना अधिक परिग्रह करेगा और उसमें आसक्ति रखेगा वह उतना ही अधिक अशाँत और दुःखी होगा। “बहुत खायगा चूपड़ी तो बहुत करेगा पाप”—यह बात सोलहों आने सत्य है। सच्चा सुख भोग में नहीं, त्याग में है। ऐसा न होता तो महावीर या बुद्ध क्यों अपने-अपने वैभवशाली राज्यों को त्यागते? अपनी इच्छाओं को नियन्त्रण में रखो और निर्वाह के लिए जितना परम आवश्यक हो उतना ही लेकर शाँति और संतोष की जिंदगी व्यतीत करो। भारत धर्म-परायण देश रहा है और हमारे मनीषियों ने सदा इस बात पर जोर दिया है कि जीवन सीधा-सादा हो, विचार उच्च हों। इसी का अनुसरण करके हम अपने वैयक्तिक और सामाजिक जीवन को शांत और सुखी बना सकते हैं।

इन दोनों ही विचारधाराओं में अपनी-अपनी दृष्टि से सचाई है। विज्ञान की कृपा से आज ऐसी-ऐसी वस्तुएं हमारे सामने आ गई हैं कि उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। अपने प्राचीन ग्रन्थों में विमानों की बात हम पढ़ा करते थे। आज आकाश में उड़ते हुए वायुयानों को स्वयं अपनी आंखों से देखते हैं। तार-रेडियो के द्वारा आज हमारी बात जरा सी देर में दुनिया के एक छोर से दूसरे छोर पर पहुंच जाती है। पहले एक जगह से दूसरी जगह आने जाने में महीनों लग जाते थे। आज दिनों और महीनों का रास्ता सेकेंडों में पार हो जाता है। इन सबका हमारे जीवन में इतना समावेश हो गया है कि हम सहज ही उनकी उपेक्षा नहीं कर सकते, उनसे इन्कार नहीं कर सकते। लेकिन दूसरी ओर देखते हैं तो हमें लगता है कि जैसे इन सब ईजादों के बीच आदमी खो गया है। आज उसके पास इतना भी अवकाश नहीं कि अपने बाल-बच्चों तक से घड़ी भर हंसकर बात कर लें। वह भागता है और उसे लगता है कि समय और भी तेजी से दौड़ रहा है। समय की गति के साथ चलता है तो उसे अपने कदम और तेज करने होंगे। अन्त में उसका वही हाल होता है जो टॉलस्टाय ने अपनी विख्यात कहानी “आदमी के लिए कितनी जमीन की आवश्यकता है?” में दिखाया है। मीलों जमीन हथियाने के लालच में बेचारा आदमी दौड़ता है और उसी प्रयत्न में जब उसके प्राण छूूट जाते हैं तो केवल छह फुट धरती उसके काम आती है।

सच यह है कि आज की अधिकांश दुनिया की दृष्टि बहिर्मुखी हो गई है अन्तर्मुखी नहीं रही। बाहर की चीजें तो हमें दिखाई देती हैं, अपने भीतर की नहीं। बाहरी चीजों में ही मानों आज दुनिया सीमित हो गई। बाह्य संघर्ष में हम जूझते हैं, लेकिन अपने भीतर सुर-असुर के बीच अहिर्निश चलते संघर्ष की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। अपनी संस्कृति, अपनी निष्ठा और जीवन के मूलभूत सिद्धाँतों को जैसे हम भूल गये हैं; सत्य और ईमानदारी सदाचार और कर्तव्यपालन के प्रति हम उदासीन हो गए हैं। गाँधीजी ने इस बुराई को देखा और उसे दूर करने की कोशिश की। शाँत और दृढ़ स्वर में उन्होंने कहा- रुको, जिस राह तुम इतनी तेजी से बढ़े जा रहे हो, वह हमारी नहीं। सत्य, और प्रेम के मार्ग पर चलकर ही हम अपना और दुनिया का भला कर सकते हैं। सत्य-निष्ठ आदमी की इच्छा पुण्य होती है और फलती है। उन्होंने मानवीय गुणों के विकास पर जोर दिया और ईश्वर के प्रति मानव की डिगती आस्था को सम्भालने के लिए प्रार्थना का दैनिक चर्या में समावेश किया। उन्होंने कहा कि आदमी अपने को सुधार ले तो समाज ही सुधर जायगा। जिन्होंने गाँधी जी के जीवन को निकट से देखा है, उनके साहित्य का अध्ययन किया है, वे जानते हैं कि उस महापुरुष ने भारतीय संस्कृति के प्रति मानव के खोए हुए विश्वास को पुनः स्थापित कराने के लिए कितना भगीरथ प्रयत्न किया। यद्यपि हम उनके बताए हुए मार्ग पर अभी तक नहीं चल पाये हैं, तथापि विनाश की ओर तेजी से बढ़ते हमारे कदम रुक गये हैं। आत्म-शोध के लिए गाँधी जी ने हमें अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शरीरश्रम, अस्वाद; अभय, सब धर्मों की समानता, स्वदेशी और अस्पृश्यता-निवारण, ग्यारह व्रत दिए और दैनिक जीवन में विनम्रता-पूर्वक उनका नियमित पालन करने का आदेश दिया। इसमें समग्र जीवन का शोध आ जाता है।

आदर्श जीवन को लेकर पश्चिमी और पूर्वी विचारधारा में बड़ा अन्तर है। पश्चिमी विचारधारा परिग्रह-प्रधान है, जबकि पूर्वी विचारधारा अपरिग्रह पर जोर देती है। हमारी मान्यता है कि आदर्श जीवन वही है जो इन दोनों के बीच समन्वय स्थापित करता है। निरा भौतिकवादी आध्यात्मिक दृष्टि से बौना रह जाता है और कोरा आध्यात्मिक पुरुष भी पूर्ण नहीं माना जा सकता। आपाधापी का जीवन बहुत दिन तक नहीं चल सकता। इसी प्रकार संसार से विरक्त होकर, सब इच्छाओं को त्याग, एकान्त साधना में कम ही लोग लग पाते हैं। मानव सामाजिक प्राणी है, समाज के और मानव-जाति के प्रति उसका कर्त्तव्य है। तभी तो गीताँजलि के अमर गायक रवीन्द्र नाथ ठाकुर ने कहा था- ओ मन्दिर के एकान्त कोने में बैठकर पूजा करने वाले, उठ, हाथ की माला का जाप छोड़ दे और वहाँ चल, जहाँ किसान हल जोत रहा है और पसीने से लथपथ मजदूर पत्थर फोड़ रहा है।

आदर्श जीवन यह नहीं कि हम एक लँगोटी लगा लें जबकि हमारे अन्दर बढ़िया-बढ़िया कपड़ों की चाह हो, अथवा हम एक झोंपड़ी में रहें जबकि हमारा मन महलों में रहने के लिए निरन्तर भटकता हो। आदर्श जीवन तो वह है, जिसमें त्याग आदमी के भीतर से उपजे और बाहर के थोड़े से भी परिग्रह में आदमी की आसक्ति न रहे। आज की दुनिया में यह बहुत मुश्किल है। हमारे चारों ओर मोह-जाल बिछा है और काजल की कोठरी में कैसा भी सयाना क्यों न जाय, थोड़ी बहुत कालिख उसके लगे बिना रह नहीं सकती। हमारी निगाह आज अपनी ओर नहीं है और हम जीवन में सचाई, ईमानदारी, निस्स्वार्थता आदि गुणों को भूल गये हैं। अपने लाभ की बात हम सोचते हैं, भले ही उसमें दूसरे का अहित क्यों न होता हो। आज हमारे मानवी गुणों को नहीं, हमारी दुर्बलताओं को विकास का अवसर मिल रहा है। अपने ही देश में नहीं, सारी दुनिया में यही दुर्भाग्य-पूर्ण स्थिति है। मनुष्य जैसे सीमित होकर स्वार्थ के एक छोटे से बिन्दु पर केन्द्रित हो गया है और यह जो सामने चीजों का विस्तार दीख पड़ता है वह इसलिए है कि यदि कोई उससे बाहर होना चाहे तो स्वर्ण नगरी का मोह और आकर्षण उसे फँसाये रक्खे। वह उसी में तड़पता रहे। निस्संदेह आज हम बड़े स्वार्थपरायण हो गये हैं। यह स्थिति कल्याणकारी नहीं है। यह हमें विनाश की ओर ही ले जा सकती है। कहते हैं, आदमी भगवान की सर्वोत्तम कृति है। इस विश्व में ऊंचे-ऊंचे विशालकाय पर्वत हैं, अथाह सागर हैं, दूर-दूर तक फैले सघन वन-भ्रान्तर हैं, पर कहा जाता है कि मनुष्य उन सबसे ऊँचा है, महान् है। इस संसार को स्वर्ग और नर्क बनाना उसी की बात है। आज वह नर्क के निर्माण में लगा है। उसके संकीर्ण स्वभाव के कारण आज दुनिया छोटे-छोटे दलों में विभक्त हो गई है, जिनके बीच खींचतान है।

आदर्श जीवन में इन सब बुराइयों के लिए स्थान नहीं है। उसमें सत्य की प्रतिष्ठा है और जीवन का प्रत्येक कार्य भगवान् को समर्पित है। उसमें स्वार्थ, दम्भ और अहंकार जैसी घृणित और निन्दनीय वस्तुएं नहीं हैं और व्यष्टि की कल्याण-भावना की नाप-तौल समष्टि की कल्याण-भावना से होती है। उसमें आदमी के कषायों को नहीं, गुणों को विकास की सुविधा है।

हमारे प्राचीन तपोवनों का जीवन आदर्श जीवन माना जाता था जहाँ कुछ साधक मिलकर मानव जाति के कल्याण की कामना करते थे और उसी के अनुरूप दुनिया के प्रति उनका आचरण होता था। तब दुनिया छोटी थी और उसमें इतनी भीड़-भाड़ नहीं थी। आज तपोवनों की बात स्वप्न जैसी लगती है। आज तो धरती का कण-कण साधना का नहीं, मानव के स्वार्थ का उपादान बना हुआ है। आदर्श जीवन की बात इससे आज बड़ी अटपटी लगती है। लोग हँसकर कहते हैं कि हमारा आदर्श तो पैसा है जिसके बिना इस आज की दुनिया में जीना ही सम्भव नहीं है। बात सही है। जहाँ प्रेम का स्थान पैसा ले लेता है, वहाँ जीना सम्भव हो कैसे सकता है? आदमी सोचता है कि वह पैसे के द्वारा खाता है, पर सच यह है कि पैसा आदमी को खा जाता है। जैसे सावन के अंधे को हर तरफ हरा-ही-हरा दिखाई देता है वैसे ही पैसे के पीछे पागल होकर दौड़ने वाले व्यक्ति की निगाह हर जगह पैसे पर ही जाती है।

आज यह विषम परिस्थिति है, पर हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है। प्रकाश की महत्ता अन्धकार में ही होती है। मानव की शक्ति और सद्गुणों के प्रति हमें अपने विश्वास को नहीं खोना चाहिये। मेघमालाएं आती हैं और कभी-कभी सूर्य को ढ़क लेती हैं, लेकिन उनके हट जाने पर सूर्य का तेज कहीं अधिक प्रखर हो उठता है। मानव आज रात्रि के उस प्रहर में है जब कि रात बेहद गाढ़ी होती है। हम याद रक्खें कि शीघ्र ही उषा का उदय होगा। गुरुदेव के कलापूर्ण शब्दों में कह सकते हैं- “यह जो लुहार की दुकान की खटपट और धूल-धकड़ है, उससे घबराने की जरूरत नहीं है। यहाँ वीणा के तार तैयार हो रहे हैं। जब ये तार बन जायेंगे तो एक दिन उनकी मधुर संगीत-ध्वनि से निश्चय ही मन और प्राण तृप्त हो जायेंगे।”


दीपावली की पृष्ठभूमि

(प्रो. श्री रामनिवास अग्रवाल, एम. ए.)

प्रत्येक राष्ट्र एवं जाति अपने बीते युग की स्मृति सुरक्षित रखने का प्रयास करती है क्योंकि वर्तमान का भवन निर्माण अतीत की नींव पर ही किया जाता है यही कारण है कि संसार के राष्ट्रीय पर्वों की आधार शिक्षा मनुष्य की उस प्रकृति पर निर्भर करती है जिसे वह अतीत की साँस्कृतिक स्मृतियों के संचय एवं संरक्षण में दत्तचित्त रखता है।

भारत के सम्बन्ध में यह तथ्य अत्यधिक सत्य है। पुरातन काल से ही भारत साँस्कृतिक पर्वों का स्थान रहा है जिनका आज राष्ट्रीय महत्व और भी बढ़ गया है। भारत के ये साँस्कृतिक पर्व धार्मिक वातावरण में पगे हैं क्योंकि भारतीय संस्कृति की मुख्य प्रेरणा धर्म रही है।

साँस्कृतिक पर्वों के साथ धार्मिक भावना और धार्मिक भावना के साथ लौकिक गाथाओं का सम्बन्ध भारत की अपनी विशेषता है। अतः भारतीय त्यौहारों की वह बहुत बड़ी विशेषता रही है कि चाहे वह छोटा हो अथवा बड़ा, जनता के हृदय में भारतीय संस्कृति के सारगर्भित मूल सिद्धान्तों को सुलभ रूप में समयानुसार जगाते रहे हैं इन पर्वों की अक्षुण्णता उसी तरह बनी रही है, जिस तरह अनेक प्रहारों एवं विदेशी आक्रमणों का सामना करते हुए भारतीय एकता भले ही परतन्त्रता जनित नवपोषित संस्कृति के झकोरों से इन त्यौहारों की दीपशिखा प्रकम्पित हुई हो परन्तु वह बाह्य संस्कृति के किसी झोंके से बुझी नहीं।

दीपावली के पीछे भी यह भावना लिपिबद्ध है। दीपावली का उत्सव प्रति वर्ष बड़ी सजधज और उत्साह के साथ सम्पूर्ण भारत में मनाया जाता है। इस ज्योतिमाला के द्वारा उपनिषदों का ‘तमसोमा-ज्योतिर्गमय’ का वालोकपूर्ण एवं आनन्दमय सन्देश पिछले सहस्रों वर्षों से हमें मिलता आया है। हो सकता है कि इस शृंखलाबद्ध दीपमाला के पीछे भी भारतीय ऋषियों की वही भावना कार्य कर रही हो जो उनके सामाजिक जीवन के विकास क्रम का बाह्य एवं आन्तरिक प्रतीक बन, इतिहास के तमसावृत्त पृष्ठों को फाड़ कर जीवन की प्रगति का निर्वाह करती हुई, आज तक हमारे राष्ट्रीय जीवन को प्रेरणा, शक्ति एवं आलोक प्रदान करती आई है। ऐसा मालूम पड़ता है कि भारतीय ऋषियों ने चार महीने की वर्षात के कारण जो गन्दगी होती होगी उसी को साफ करने के लिए तथा अमावस्या के अन्धेरे को भुलाने के लिए गन्दगी के स्थान पर शरद के रूप में आई हुई स्वच्छता की देवी, लक्ष्मी के आवाहन हेतु अमावस्या के अन्धेरे में दीपकों के आलोक से प्रकाश मय बनाने की धार्मिक भावना जोड़ दी हो, जो बाद में दीपावली कहलाई।

प्राचीन ब्राह्मण साहित्य में वात्सायन का काम-सूत्र भी दीपावली पर्व पर कुछ प्रकाश डालता है। कामसूत्र में उल्लेख मिलता है कि कार्तिकी अमावस्या को एक उत्सव मनाया जाता था, जिसे यक्षरात्रि उत्सव कहा जाता था।

ब्राह्मण साहित्य के अतिरिक्त प्राचीन भारत के बौद्ध और जैन साहित्य में भी दीपावली या उसी के अनुरूप पर्वों का वर्णन है।

बौद्धों के ‘पुष्फरत्त जातक’ में एक ऐसे त्यौहार का प्रसंग मिलता है जो कि कार्तिकी महीनों में मनाया जाता था और जिसका सम्बन्ध बुद्ध के ज्ञान प्राप्त के समय से जोड़ा जाता है। पर इस ऐतिहासिक प्रमाण के मिलने पर भी बौद्ध इतिहास में इस पर्व का कोई स्थान नहीं। अशोक बौद्ध धर्म का महान प्रचारक था उसने बुद्ध के जीवन सम्बन्धित घटनाओं को मूर्त रूप देने का प्रयत्न किया परन्तु उसके जीवन से सम्बन्धित ऐसी कोई घटना नहीं जिसमें दीपावली का उल्लेख हो।

कुछ लोगों ने इस त्यौहार की पृष्ठभूमि में जैन तीर्थ कर महावीर स्वामी का निर्वाण और उनके प्रिय शिष्य इन्द्रभूति गौतम को ज्ञान-लक्ष्मी की प्राप्ति बताया है जैन लोगों का कहना है कि दीपावली महावीर निर्वाण की स्मृति में ही मनाई जाती है। आज से करीब ढाई हजार वर्ष पूर्व कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की रात्रि में पाबा नगरी में भगवान महावीर का निर्वाण हुआ। निर्वाण की खबर सुनते ही सुर, असुर, मनुष्य, नाग गंधर्व आदि बड़ी संख्या में पाबा में एकत्र हो गये। रात अंधेरी थी अतः देवों ने रत्नों के दीपकों का प्रकाश कर निर्वाण उत्सव मनाया और उसी दिन कार्तिकी अमावस्या के प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उनके प्रधान शिष्य इन्द्राभूति गौतम का ज्ञान-लक्ष्मी की प्राप्ति हुई थी। तब से प्रतिवर्ष उक्त तिथि को दीपावली का आयोजन होने लगा।

परन्तु सन्देह निवारण नहीं होता क्योंकि आज जिस रूप में दीपावली मनाई जाती है उससे ज्ञान प्राप्ति की भावना का सन्देश नहीं मिलता। आज तो दीपावली के दिन लक्ष्मी पूजा का विधान है जो कि धन की सूचिका, वाहिका, एवं देवी है साथ ही यदि महावीर के जीवन से सम्बन्धित घटना होती तो भारत के जीवन में व्याप्त न रह कर केवल जैन धर्मावलम्बियों के जीवन तक ही सीमित होती। यह भी नहीं कहा जा सकता कि दीपावली महावीर के समय से ही प्रचलित हुई क्योंकि ब्राह्मण युग में और उससे पूर्व भी इसकी विधि प्रचलित थी।

ऐतिहासिक प्रमाणों के इन अभावों में हमें प्रचलित विश्वासों का भी आश्रय लेना पड़ेगा। प्रचलित विश्वास के अनुसार दीपावली का श्रीगणेश राम के लंका विजय के बाद अयोध्या लौटने के कारण माना जाता है। श्रीराम का रावण को मार कर अयोध्या लौट आना अयोध्यावासियों के लिए एक आनन्द सूचना थी। आनन्द से विभोर हो उन्होंने श्रीराम के सकुशल आगमन हेतु दीप जलाए और सम्पूर्ण अयोध्या नगरी को प्रकाशाभिभूत कर दिया। तभी से आज तक यह परम्परा चली आई है। परन्तु न तो वाल्मीकीय रामायण में और न अन्यत्र ही इस आशय का उल्लेख हमें मिलता है। यदि विजय उपलक्ष्य ही दीपावली पर्व का एक मात्र ध्येय रहा होता तो क्यों न प्राचीन भारत के राजाओं ने अपनी विजय कीर्तियों को चिर स्थायी बनाने के लिए दीप-स्तम्भ बनवाये। हो सकता है, सामग्री के अभाव में और वैज्ञानिक ज्ञान की कमी के कारण ऐसा सम्भव न हो सका हो।

परन्तु त्रेता में जिस प्रकार अयोध्या में दीपावली मनाई गई होगी उसका रोचक वर्णन गोस्वामी तुलसीदास कृत गीतावली में मिलता है—

साँझ समय रघुवीर पुरी की शोभा आज बनी। ललित दीप मालिका विलोकहिं हितकर अवध धनी॥

घर घर मंगल चार एक रस हरखित रक धनी। ‘तुलसीदास’ कल कीरति गावहि जो कलिमल समनी।

कुछ भी हो भगवान राम के जीवन से इस घटना को जोड़कर प्राचीन महर्षियों ने उस भावना को जीवित रखने का प्रयत्न किया जब के आर्यों ने अनार्यों पर विजय प्राप्त की और पुरातन संस्कृति को कायम रखा।

प्रारम्भ में दीपावली का जो भारतीय साँस्कृतिक रूप रहा होगा उसकी कल्पना की जा सकती है। आज जिस धन-लक्ष्मी की पूजा इस पर्व पर होती है उसका भी ऐतिहासिक महत्व जान पड़ता है। इस पर्व का प्रयोजन एवं सर्वप्रियता हमें बाणभट्ट की रचना से प्राप्त होती है।

‘यह रण रूपी उपवन में भ्रमण करने वाली भ्रमरी लक्ष्मी जिस समय समुद्र मन्थन से निकली उसके साथ अन्य अनेकों वस्तुऐं भी निकलीं। उन प्रत्येक वस्तुओं के दोषों का समावेश लक्ष्मी में है। परित्रास पल्लव से इसने राग लिया। चन्द्रमा से टेढ़ापन, उच्चैश्रवा घोड़े से चंचलता, कालकूट से मोहन शक्ति, मदिरा से मद और कौस्तुभ मणि से अत्यन्त निष्ठुरता।”

सम्भवतः इन दोषों का परिहार करने के लिए ही भारतीय ऋषियों ने दीपावली का यह त्यौहार प्रारम्भ किया हो ताकि लक्ष्मी की शुद्धि करके उसका प्रयोग किया जा सके।


तपोभूमि-समाचार

गायत्री तपोभूमि में नवरात्रि साधना सदा की भाँति बड़े आनन्द से सम्पन्न हुई। यों साधकों की यही इच्छा रहती है कि तपोभूमि के परम पवित्र वातावरण में ही नवरात्रि उपासना करें। पर इससे यह हानि होती है कि प्रभावशाली उपासकों के मथुरा चले आने से उनके स्थानों पर कोई सामूहिक कार्यक्रम नहीं हो पाता। अतएव इस बार जहाँ कोई और साधक नहीं है, गायत्री परिवारों का संगठन नहीं है वहाँ के साधकों को ही मथुरा आने की स्वीकृति दी गई और जहाँ अन्य उपासक भी हैं वहाँ के लोगों को यह प्रेरणा की गई कि वे अपने यहाँ ही जप हवन प्रवचन सामूहिक आयोजन करें। आगे भी नवरात्रि के संबंध में यही नीति रहेगी। समस्त गायत्री परिवार का वार्षिक सम्मेलन गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 पर हुआ करेगा उन दिनों गर्मी तो अवश्य कुछ अधिक पड़ती है पर व्यापारी किसान, अध्यापक, छात्र, सरकारी कर्मचारी सभी को छुट्टी एवं फुरसत का समय रहता है।

उपरोक्त नीति के कारण इस नवरात्रि में गतवर्ष जैसी तिल रखने लायक जगह न बचने देने वाली भीड़ नहीं थी। एक सौ के भीतर ही साधक यहाँ रहे और जप, हवन, प्रवचन आदि के कार्यक्रम शान्तिपूर्वक हुए। शतचण्डी और सहस्रलक्ष्मी का आयोजन भी विधिवत् हुआ।

संस्कृति विद्यालय का कार्यक्रम ठीक प्रकार चल रहा है। कार्तिक कृष्ण पक्ष में भी श्री सूक्त से लक्ष्मी यज्ञ हो रहा है, जिसकी पूर्णाहुति दिवाली को होगी। कार्तिक शुक्ल पक्ष में पुरुषसूक्त से विष्णु यज्ञ पन्द्रह दिन चलेगा जिसकी पूर्णाहुति पूर्णिमा के दिन होगी।

इस बार यमुना में भयंकर बाढ़ आ जाने से तपोभूमि के चारों ओर इतना पानी आ गया कि फटक के आगे सड़क पर नावें चलने लगी। पिछली ओर के सात कमरों में पानी भर गया। जमीन में से पानी उबल पड़ने के कारण तहखाने में भी पानी आ गया। चार दिन इस प्रकार का प्रकोप रहने के बाद पानी उतरा और रास्ता साफ हुआ। इस जल प्रकोप से तपोभूमि की इमारत को प्रत्यक्षतः कोई बड़ी हानि तो प्रतीत नहीं हो रही है।

गत मास छात्रों द्वारा धर्म प्रेमियों के लिए दो घंटा अनुष्ठान करके स्वावलम्बन पूर्वक अपना भोजन उपार्जित कर लेने की जो योजना प्रकाशित की गई थी उसके अंतर्गत अब तक नौ छात्रों के लिए दो दो घन्टे जप की व्यवस्था बन गई है। 24 छात्र रखने की इच्छा है। 15 छात्रों के लिए इसी प्रकार की व्यवस्था और हो जाय तो विद्यालय की एक बड़ी समस्या हल हो जाय। छात्रों में बिना घी दूध के भोजन में 12 रु. मासिक और घी समेत भोजन में 15 रु. मासिक खर्च पड़ता है। गायत्री मंत्र, चण्डी सूक्त , नवार्ण मंत्र, मृत्युञ्जय जप या और कोई उपासना कराने वाली सज्जन यदि 6 मासिक दें तो एक विद्यार्थी एक घंटा प्रतिदिन उनके लिए वह उपासना ठीक रीति से ठीक पथ प्रदर्शन, शास्त्रोक्त विधि और कड़े नियंत्रण में करता रह सकता है। दो ढाई घन्टे का यह परिश्रय मिल जाने से छात्र अपना भोजन परिश्रमपूर्वक कमाते हुए संस्कृति विद्यालय की महत्वपूर्ण शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। छात्र वृत्ति, ब्राह्मण भोजन, संस्कृति सेवा, आत्म कल्याण इन चारों ही दृष्टियों से इस प्रकार की सहायता करना एक ऊंचे दर्जे का पुण्य फलदायक दान है। जिनकी श्रद्धा तथा सामर्थ्य हो वे इस योजना के अंतर्गत अपनी ओर से जप, आदि कराने की कृपा करें।

लक्ष चण्डी सूक्त पाठ यज्ञ के संकल्प के अनुसार पाठ आरंभ हो गये हैं। नवार्ण जप तथा सहस्र चण्डी आयोजन के अंतर्गत जप तथा पाठ प्रारम्भ किये जा रहे हैं। इस संकल्प के एक वर्ष में पूरा होने की संभावना है।

गायत्री परिवारों का संगठन

देश भर में गायत्री परिवारों के संगठन और शाखा स्थापना का कार्य उत्साह पूर्वक हो रहा है। पिछले अंकों में अखंड ज्योति के परिजनों से अनुरोध किया गया था कि अपने क्षेत्र के गायत्री उपासकों से पत्र सदस्यता भरवाने और स्थान स्थान पर शाखाऐं स्थापित करने का प्रयत्न करें। प्रसन्नता की बात है कि उस प्रार्थना को उपेक्षा की दृष्टि नहीं परन्तु एक सामयिक आवश्यकता समझकर सभी धर्म प्रेमियों ने ध्यान दिया और अपने यहाँ की नहीं दूर-दूर जाकर गायत्री परिवार के सदस्य बनाने तथा शाखाऐं स्थापित करने का कार्य उत्साह पूर्वक किया है। गत अंक में जिन स्थानों में शाखा संगठनों का उल्लेख हो चुका है उनके अतिरिक्त इस मास इन स्थानों में गायत्री परिवार की शाखाऐं और भी स्थापित हुई हैं-

फलोदी [राजस्थान] वकानी [झालावाड़] धुधडका [मन्दसोर] खोरासा [सौराष्ट्र]। लक्ष्मीपुरी [अलीगढ़]। भैरोंपुर [होशंगाबाद]। जोबट [झाबुआ] कुलाला [देवास] करंगामाल [कालाहाँडी] कटनीं (जबलपुर) धामन्दा (राजगढ़)। पारादान (फतेहपुर) रूरा (कानपुर)। मानपुर [इन्दौर]। धरडानाखुर्द [झूँझनु] बैकुँठपुर (सरगुजा)। सतना (विध्य प्रदेश)। वसडाहाँ (आरा)। मालेगाँव (नासिक) दतौद (विलासपुर)। गंगोरी [अलीगढ़]। अरुआ खास [आगरा]। खेड़ी (बुलढ़ाना)। श्रीपुरा [कोटा]। कोलुआगाढ़ा [उन्नाव]। बिलासपुर [म. प्र.]। रिनोक [ससिकम]। हरनावाड़ा [मुजफ्फरपुर] कोयला कोटा। औरंगाबाद [सीतापुर]। कराहल (मुरेंना)। गदड़ा स्वामीं नारायण (सौराष्ट्र)। ड्वरा (म. भा.)। रूरा (कानपुर) पाँडातराई (विलासपुर)। नवाबगंज (बरेली)। मोरवी (सौराष्ट्र)। भुसावल (पूर्व खानदेश)। चिचौंड़ा (बेतूल)। दुगारी (बूँदी)। इन्द्रगढ़ (कोटा)। चाँदपुर (बिजनौर)। वलोला (झाबुआ)। खरगोंन (निभाड़) ऊन (निमाड़) चेचट (कोटा)। दानातुर (पटना)। पचम्बा (हजारीबाग)। आरंग (रायपुर)। मेहसाना [गुजरात]। साकरवाड़ी [अहमदनगर]। इटारसी (होशंगाबाद)। भिण्ड (ग्वालियर) जमशेदपुर (सिंडभूमि)। जहाँगीराबाद (बुलन्दशहर)। वापी (सूरत)। गीजगढ़ (जयपुर)। मोलनाकित्ता (दुमका) मोतिया (संथाल परगना)। पचोरी [विलासपुर]। असनावर [झालावाड़]। कालीबावड़ी [धार]। शिवपुरी [म.भा.]। बेवर [उन्नाव]। रठि [हमीरपुर] कौंड़ [फतेहपुर]। महोवा [हमीरपुर] जिरौली [अलीगढ़]। प्यूलरिय [बरेली]। बरुड़ [निमाड़]। भुम्भली [सौराष्ट्र]। विसनगर [गुजरात]। धनीरामपुर [कानपुर] खूड़ [सीकर]। उमरिया (शहडोल) डेरापुर (कानपुर]। कनवार [इलाहाबाद]। समेली [पुनिया] कोटा [सहारनपुर] स. ई(छतरपुर) बरडिया [राजस्थान] नागपुर [म. प्र.]। कसरावाद [निमाड़]। बड़ेरासुपान (गिर्द)। बाराँ [कोटा] बानपुर [झाँसी]। नियाना [कोटा]। माथनी [कोटा]। महुड़िया [मन्दसौर]। भिडारी [सागर]। ढोंडवाड़ा [बेतूल]। लखनऊ [म.प्र.]। रीझौन [झालावाड़]। मझरिया (चम्पारन) कुरावली (मैंनपुरी)। खरगोंन [निमाड़]। ढकियारघा [शाहजहाँपुर]। माकडोंन [उज्जैन] कुर्रा [हमीरपुर]। आगर [शाजापुर]। बुलन्दशहर (उ.प्र.]। चुरहा [हमीरपुर]। भद्रपुर [फतेहपुर]। सिरपुर-कागजनगर [हैदराबाद]। टीकापट्टी [पुर्णियाँ)।

अभी अनेक स्थानों में कार्य होना बाकी है। जहाँ पहले से ही बहुत गायत्री उपासक हैं वहाँ से अभी सदस्यता फार्म भरके नहीं आये हैं। कितने ही ऐसे सज्जन हैं जिनने अपने क्षेत्र में 10-10 किन्हीं ने 24-24 शाखाऐं स्थापित कराने का संकल्प किया है। उनका कार्य भी सामने आने ही वाला है। एक हजार शाखाऐं स्थापित हो जाने से एक गायत्री सहस्रचण्डी का आवर्भाव होगा इनके द्वारा प्रतिदिन 24 लक्ष जप और 24 सहस्र आहुतियों का हवन बड़ी आसानी से होते रहने की आशा है। इतना आयोजन बन जाने पर विश्वव्यापी अनेक कठिनाइयों के सरल होने में भारी सहायता मिलेगी। जिन उपासकों ने अभी अपने सदस्यता पत्र नहीं भेजे हैं उनसे अब भेजने की प्रार्थना है।

शाखायें क्या करें?

जहाँ-जहाँ शाखाऐं स्थापित हो गई हैं वहाँ उनके संचालकों तथा सदस्यों को चाहिए कि साप्ताहिक पारिवारिक सत्संगों की व्यवस्था करें। प्रत्येक रविवार को एक-एक सदस्य के घर पर क्रमशः साप्ताहिक सत्संग होते रहें। सामूहिक गायत्री जप, हवन, कीर्तन के अतिरिक्त व्याख्यानों की, किन्हीं सद्ग्रंथों की अथवा गायत्री साहित्य या अखण्ड ज्योति के लेखों का वाचन करने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसमें खर्च कम से कम हो ताकि निर्धन सदस्यों को भी अपने घर सत्संग कराने में भार न पड़े। अभी इस एक बात पर ही सबसे अधिक ध्यान देना चाहिए। संगठन बन जाने, सदस्यों की संख्या बढ़ने, उपासना में उत्साह उत्पन्न होने, सदस्यों में परस्पर प्रेम भाव विकसित होने पर अनेक धार्मिक और साँस्कृतिक सत्कार्यों की व्यवस्था सहज ही बन सकती है। एक साथ बहुत से कार्यक्रम बना लेने से किसी की भी पूर्ति नहीं होती। अभी अपनी शाखाऐं मजबूत करने, सदस्य बढ़ाने नई शाखाऐं स्थापित करने, तथा पारिवारिक साप्ताहिक सत्संगों का आयोजन करने का कार्यक्रम ही सामने रहना चाहिए और पूरे उत्साह से इसमें लगना चाहिए।

शाखाऐं दो कार्य और भी आरम्भ करें, एक कार्य मंत्र लेखन का दूसरा गायत्री चालीसा पाठ का। गायत्री तपोभूमि में 124 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्र स्थापित करने का संकल्प था। इसमें से करीब 90 करोड़ संग्रह हुआ है। लगभग 5 करोड़ अभी शेष हैं। यह इस वर्ष गायत्री जयन्ती तक पूरा हो जाना चाहिए। जेष्ठ सुदी 10 को गायत्री परिवार सम्मेलन जब मथुरा में होगा तब सभी शाखा संचालक अपने सदस्यों द्वारा किये हुए मन्त्र लेखन की श्रमदान भरी श्रद्धाञ्जलियाँ अपने साथ लेकर आवें। मन्त्र लेखन में स्नान, समय आदि का प्रतिबन्ध न होने के कारण किसी भी फुरसत के समय करने लगना साधकों के लिए सुगम भी पड़ता है। प्रतिदिन 24 मन्त्र भी लिखने लगें तो 100 दिन में 2400 मन्त्रों की एक श्रद्धाञ्जलि हो जाती है। एक भी सदस्य ऐसा न बचे जिसने कम से कम एक श्रद्धाँजलि गायत्री तपोभूमि को भेंट न की हो। अधिक श्रद्धाँजलियाँ जो दे सकते हों वे और भी अधिक दें। ऐसी 24 श्रद्धाँजलियों का एक परिपूर्ण पुरश्चरण कहा जा सकता है।

स्त्रियों, बच्चे, वृद्धों, रोगियों के लिये गायत्री चालीसा का पाठ सुगम तथा सुबोध है। हाथ, पैर, मुँह धोकर यह पाठ कभी भी किया जा सकता है। उसके पाठ में गायत्री भक्ति उत्पन्न करने वाले भाव रहने के कारण माता के प्रति भक्ति भावना उत्पन्न होती है जो आगे चलकर साधना की श्रद्धा भरी लीक ही बन जाती है। इस दृष्टि से आरंभिक साधकों में गायत्री चालीसा का अधिकाधिक प्रचार होना चाहिए उसके समय-समय पर सामूहिक जप, पाठ कीर्तन भी हों। गायत्री चालीसा का मूल्य –) है। पर प्रचारार्थ वितरण करने के उद्देश्य से मँगाने वाली शाखाओं को यदि वे कम से कम पाँच सौ मँगालें तो लागत में भी घाटा सहकर उन्हें 2 रु. सै. अर्थात् 540 दस रुपये में दिये जावेंगे। इसका रेल भाड़ा जो करीब 1-1॥ रुपया लगेगा मँगाने वालों को ही देना होगा। डाक से मँगाने पर पाँच सौ पर डाक खर्च 7) के करीब बैठेगा। स्मरण रहे अन्य पुस्तकों के साथ या अलग से मँगाने, किसी भी प्रकार इस रियायती मूल्य में चालीसा का पोस्टेज फ्री न किया जा सकेगा। क्योंकि वह तो करीब-करीब मूल्य के बराबर हो जाता है। कई शाखाऐं मिलकर अधिक संख्या में एक रेल पार्सल मँगावें तो लाभ है सदस्यगण चालीसाओं का मूल्य आपस में इकट्ठा करके अधिक संख्या में मँगावें और वितरण करने का प्रयत्न करें यह गायत्री प्रचार का एक सरल उपाय है।

साँस्कृतिक विद्यालय की पूरी नियमावली छप गई है। हर शाखा को एक-एक प्रति भेजी जा रही है। इस अपनी शाखा के सभी सदस्यों को तथा उन सज्जनों को जिनकी अभिरुचि इस शिक्षा की ओर होने की संभावना हो इसे पढ़ाना चाहिये। हर शाखा को यह प्रयत्न करना चाहिये कि उसके आस पास के कुछ छात्र तपोभूमि में शिक्षा प्राप्त करने अवश्य जावें ताकि वे शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त साँस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्य को उस क्षेत्र में बढ़ा सकें, यों छात्र यहाँ आते ही रहते हैं पर ऐसे प्रतिभाशाली शिक्षार्थियों का महत्व अधिक है जो आलसी, मन्दबुद्धि निकम्मे न होकर उत्साही; परिश्रमी, भावनाशील, सेवाभावी एवं सद्गुणी होने के साथ-साथ देश धर्म के लिये कुछ काम करने का अरमान रखते हों। ऐसे छात्र ढूंढ़ निकालना और उन्हें मथुरा भिजवाना भी साँस्कृतिक सेवा का एक महत्वपूर्ण कार्य है।

संस्कृति विश्वविद्यालय

तपोभूमि मथुरा में 24 छात्रों का एक संस्कृति विद्यालय चल रहा है जिसमें अधिकतम 24 छात्र एक समय में रखे जाने की व्यवस्था है। यह भारतीय संस्कृति की सेवा, प्रशस्ति और विस्तृति करने वाले सेवा भावी कार्यकर्ताओं का एक शिक्षण शिविर पात्र हैं। इसके द्वारा कुछ उपयोगी कार्य सम्पन्न होने की आशा की जाती है इतने से ही काम चलने वाला नहीं है साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के अंतर्गत भारतीय संस्कृति के तत्वज्ञान, आदर्श, लक्ष, दृष्टिकोण, आचार, विचार, व्यवहार, शिष्टाचार आदि अंग प्रत्यंगों के संदेश एवं प्रकाश को घर घर में, जन जन के मन मन में, पहुँचाना पड़ेगा। विचार भूमिका के पश्चात् उस प्रकाश को अन्तःकरणों इतनी गहराई तक प्रवेश कराना पड़ेगा कि ये आदर्श मनुष्यों के जीवन व्यवहार में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगें।

इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए भारतीय संस्कृति के वास्तविक स्वरूप के बड़े पैमाने पर व्यापक शिक्षण की व्यवस्था करनी पड़ेगी। गायत्री तपोभूमि इस तैयारी में लग गई है और गायत्री परिवारों के संगठन के उपरान्त संभवतः 1 जनवरी से उस योजना का कार्य रूप में परिणत कर दिया जायगा। इस शिक्षण का कार्य आरम्भ में गायत्री परिवार से शुरू किया जायगा। प्रति सप्ताह एक लम्बा पत्र परिवार के हर सदस्य के नाम लिखा जाया करेगा। सुविधा की दृष्टि से इसे छपा लिया जाया करेगा। यह “आचार्य जी की चिट्ठी” शाखा संचालकों की मारफत प्रत्येक सदस्य के पास पहुँचा करेगी वे उसे ध्यान पूर्वक पढ़ेंगे और रविवार के सत्संगों में उस पत्र के आधार पर पारस्परिक विचार विनिमय चला करेगा। इस प्रकार प्रत्येक सदस्य के पास 52 सप्ताहों में 52 पत्र पहुँचेंगे। जिनकी पृष्ठ संख्या यदि पुस्तक साइज में रही तो 220 के करीब होगी। इन्हें सुरक्षित रखने के लिए एक सुन्दर फाइल भी उसी साइज की यहीं से भेजी जायगी। इस प्रकार प्रति वर्ष भारतीय तत्वज्ञान की प्रेरणा से परिपूर्ण 220 पृष्ठ का सजिल्द ग्रन्थ हर सदस्य के पास बिना मूल्य पहुँचता रहेगा।

इन पत्रों में कोई व्यक्तिगत बात न होगी वरन् भारतीय संस्कृति के आदर्श और संदेशों की महानता वैज्ञानिकता एवं उपयोगिता को समझाते हुए उन्हें जीवन में ढालने के व्यवहारिक, बुद्धि संगत एवं सरल उपायों को सुझाया जायगा और आशा की जायगी कि सदस्य गण उन्हें पढ़ कर मनोरंजन मात्र न करेंगे वरन् जिस प्रकार अपने कुलपति का आदर करते हैं उनकी सलाह को उपयोगी मानते हैं उसी प्रकार इन पत्रों में सन्निहित प्रेरणा को भी अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न करेंगे।

यह पत्र छपे विज्ञापन मात्र न होंगे वरन् कोई विशेष व्यक्ति इन पत्रों को अमुक सदस्यों तक पहुँचाने के साथ साथ उन्हें उस विषय को समझाने एवं उपस्थित उलझनों को सरल करने में भी सहायता करने के लिए नियुक्त किये जायेंगे। इन विशेष व्यक्तियों को “उपाध्याय” कहा जायगा। संस्कृति विश्व विद्यालय का रूप फिलहाल पत्र व्यवहार द्वारा भारतीय संस्कृति की शिक्षा देना होगा। पाठ्य पुस्तक का कार्य साप्ताहिक रूप से पहुँचने वाली “आचार्य जी की चिट्ठी” होंगी। पर उसे पढ़ाने वाले तो “उपाध्याय” लोग ही होंगे। परिवार के सदस्यों में से ही ऐसे उत्साही, प्रभावशाली, चरित्रवान, सुशिक्षित व्यक्ति उपाध्याय नियुक्त कर दिये जायेंगे। यह सभी अवैतनिक होंगे। प्रत्येक उपाध्याय के पास साधारणतः 10 छात्र (सदस्य) रहेंगे। विशेष परिस्थिति में यह संख्या न्यूनाधिक भी हो सकती है। साधारणतः शाखा मंत्री ही उपाध्याय होंगे जहाँ सदस्य संख्या अधिक होगी वहाँ शाखा मन्त्री अन्य उपाध्यायों की भी नियुक्ति करेंगे। उपाध्यायों को सुन्दर नियुक्ति पत्र (प्रमाण पत्र) तपोभूमि से भेजे जावेंगे और वे अपने शिक्षण कार्य की प्रगति की मासिक रिपोर्ट भेजते रहेंगे। प्रति वर्ष छात्रों की वार्षिक परीक्षा के रूप में तपोभूमि से सांस्कृतिक विश्व विद्यालय के प्रश्न पत्र भेजे जावेंगे। शाखाओं में नियमित परीक्षा हुआ करेगी। हर वर्ष एक, कक्षा उत्तीर्ण करते चलने का अवसर रहेगा और अन्ततः 12 कक्षाऐं इस विश्व विद्यालय की 12 वर्ष में पूर्ण हो जावेगी। हर वर्ष उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण पत्र उस प्रान्त के प्रान्तीय संस्कृति सम्मेलन के समय दिये जाया करेंगे।

10 शाखाओं के संयोजक, निरीक्षक एवं पथ प्रदर्शक महोपाध्याय, कहलायेंगे, उपाध्यायों और महोपाध्यायों को शिक्षण विधि की आवश्यक ट्रेनिंग एक भिन्न पुस्तिका के द्वारा तथा गायत्री जयन्ती पर हर वर्ष होने वाले अ. भा. गायत्री परिवार सम्मेलन से मौखिक रूप से हुआ करेगा। एक बार सभी कार्यकर्ता आपस में मिल लिया करें इसके लिए, अखिल भारतीय, प्रान्तीय एवं क्षेत्रीय गायत्री सम्मेलनों के आयोजन किये जाते रहेंगे।

इस योजना के अंतर्गत कार्य करने के लिए सभी शाखा संचालकों को अभी से तैयार हो जाना चाहिए अब बातों का नहीं काम का समय है। हर गायत्री परिवार के सदस्य की पाँच प्रतिज्ञाओं में एक चौथी प्रतिज्ञा यह है कि वह कुछ समय परमार्थ के लिए संस्कृति सेवा के लिए लगाया करेगा। वह प्रतिज्ञा पूरी कराने के लिए यह कार्यक्रम अभी प्रारम्भ किया जा रहा है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का साँस्कृतिक विश्व विद्यालय में के लिए प्रत्येक छात्र का यह कर्त्तव्य होगा कि वह स्वयं उस पाठ्य क्रम को पढ़कर संतुष्ट न बैठ जाय वरन् चौथी प्रतिज्ञा के अनुसार उस पाठ्यक्रम को ‘आचार्य जी की चिट्ठी को अधिक से अधिक लोगों को पढ़ाकर स्वयं भी उपाध्याय बनने का प्रयत्न करें। इस प्रकार यह शृंखला बढ़ते हुए भारतवर्ष के घर घर में पहुँच सकती है और साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना का महान लक्ष पूरा करने के लिए कुछ कहने योग्य कार्य हो सकता है। विचारों के फैलने के पश्चात वैसे कार्यक्रम भी स्वयं प्रस्फुटित होंगे और व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवनों में साँस्कृतिक पुनरुत्थान का प्रकाश प्रत्यक्ष परिलक्षित होगा।

इस महान योजना में सहयोग के लिए कटिबद्ध हो जाने को हम प्रत्येक अपने परिजन से परिपूर्ण आग्रह के साथ आमंत्रित करते हैं। इन दो महीनों में हमें परिवारों का संगठन व्यवस्थित करना है और तदुपरान्त साँस्कृतिक विश्व विद्यालय की घर घर पहुँचने वाली योजना को सफल बनाने के लिए कमर कसकर जुट जाना है। अब आलस्य उपेक्षा का समय नहीं, धर्म और संस्कृति की पुकार पर हमें कुछ करने के लिए उठ खड़ा होना होगा। आइए, उठें, चलें, और आदर्श के लिए करें-मरें।

प्रकृति का विक्षोभ

इन दिनों दैवी प्रकोपों के कारण चारों ओर हाहाकार सा मचा हुआ है। अतिवृष्टि, बाढ़, भूकम्प दुर्घटना आदि का ताँता लगा हुआ है उनके कारण अपार धन जन की क्षति हो रही है। रोगों की बाढ़ पूरे जोर पर है। सरकारी आँकड़े बताते हैं कि 25 लाख व्यक्ति इन दिनों केवल क्षय रोग से ग्रसित हैं, ऐसी ही अन्य प्राणघातक रोगों से ग्रसित लोगों की संख्या मिलकर करोड़ों तक पहुँचती है। जितनी आयुवृद्धि के लिए समृद्धि, उन्नति, सुख शान्ति के लिये मानवीय प्रयत्न होते हैं उससे कहीं अधिक क्षति प्रकृति के प्रकोपों द्वारा हो जाती है, इस प्रकार मानवीय भौतिक प्रयत्नों के बावजूद, सुखी बनने की दिशा में कुछ प्रगति नहीं हो पा रही वरन् कष्ट ही बढ़ते जा रहे हैं। आगामी वर्षों में तो इन कष्टों के और भी अधिक बढ़ने की सम्भावना है। इसके तीन कारण हैं।

1- परमाणु आयुधों के परीक्षण के द्वारा आकाश तत्व को विषाक्त करने का कुकृत्य महोन्मत्त राष्ट्रों द्वारा हो रहा है वह उसका एक कारण है, संसार भर के वैज्ञानिक यह बता रहे हैं कि अणु-आयुधों के परीक्षण की इस आपाधापी का परिणाम समस्त विश्व के लिए अतीव भयंकर होने वाला है। उसके फलस्वरूप कुछ ही वर्षों में मनुष्यों को भारी पीड़ा देने वाले, अल्पायु, विकलाँग बनाने वाले अस्थि क्षय, प्रजनन व्याघात, रक्त चाप, हृदयरोग, सरीखे रोग उठ खड़े होंगे और जिस विज्ञान पर गर्व किया जा रहा है, वही कल गले की फांसी बन जायगा।

2- वर्तमान काल में भौतिकवादी विचार धारायें बढ़ने से मनुष्य बड़ा स्वार्थी, वासनाग्रस्त, लोलुप,तृष्णा मग्न हो रहा है। अपने लाभ के लिये, बुरे से बुरा दुष्कृत्य करने में उन्हें संकोच नहीं होता। इस प्रवृत्ति की विचारधारा तथा क्रियाओं की व्यापक तरंगों से आकाश के सूक्ष्म अन्तराल में एक प्रकार की पापमयी घटाऐं जम गई हैं वे जब भी बरसती हैं तब उसके परिणाम विक्षोभ, शोक, युद्ध, द्वेष, अकालमृत्यु, महामारी, दुर्भिक्ष, अतिवृष्टि अनावृष्टि जैसे होते हैं। आज ऐसी ही स्थिति सर्वत्र देखने को मिल रही है।

3- गत दो महायुद्धों से लाखों मनुष्यों और करोड़ों पशुओं का वध हुआ है उनके चीत्कारों, वारूदों, विषैली गैसों से वायु मंडल व्याप्त हो रहा है।

जिस प्रकार समुद्र, तालाब, घर, वस्त्र, शरीर आदि की गन्दगी को साफ करके स्वच्छता के लिए झाडू, लाल दवा, साबुन, जल आदि की आवश्यकता होती है वैसे ही आकाश में मनुष्यों की दुष्प्रवृत्तियों, युद्धजन्य हाहाकारों, विषाक्त गैसों से दूषित हुए वातावरण की शुद्धि के लिए यज्ञों की आवश्यकता होती है। प्राचीनकाल के ऐसे अनेकों उदाहरण हैं कि जब प्रजा दैवी प्रकोपों से बहुत संत्रस्त हुई और मनुष्य के प्रयत्न उन्हें रोकने में असमर्थ रहे तो तत्व-दर्शियों ने दैवी प्रकोप के मूल कारण ‘आकाश अशुद्धि’ की निवृत्ति के लिए बड़े-बड़े यज्ञों के आयोजन कराये तब उन दैवी प्रकोपों का समाधान हुआ। रामायण और महाभारत में बड़े युद्धों के बाद विजेताओं ने भारी भारी यज्ञ कराये थे पूर्वकाल में दुवृत्तियां युद्ध, अणु संघात आदि बहुत कम होते थे तो भी यज्ञों की आवश्यकता रहती थी आज तो इन दूषणों के बढ़ जाने के कारण पहले की अपेक्षा बहुत बड़े परिमाण में यज्ञों की आवश्यकता है। पर खेद है कि बहुत समय से यह मानव जीवन की अत्यन्त उपयोगी प्रक्रिया सर्वथा बन्द नहीं तो मन्द अवश्य हो गई है। फलस्वरूप बाढ़, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, महामारी आदि के उपद्रव बढ़ रहे हैं। रक्त और मस्तिष्कों में वह आकाशीय दर्पण धुलता जा रहा है जिससे जन साधारण में विशेषतया नई पीढ़ी में, असहिष्णुता, आवेश, क्रोध, द्वेष एवं अनीति की भावनाऐं बढ़ रही हैं और शारीरिक रोगों की भारी बढ़ोत्तरी होती जाती है।

मनुष्यकृत उपायों द्वारा इन उपद्रवों को रोकने के लिए करोड़ों रुपया हर साल खर्च करने पर भी संतोष जनक परिणाम नहीं निकलता। यदि हम इसका उपाय पूर्व कालीन इतिहास में ढूंढ़े तो यज्ञ ही एक श्रेष्ठ समाधान मिलता है। इसकी आधुनिक समस्याओं के हल के लिए भारी आवश्यकता है। यज्ञ ‘घी और सामग्री को फूँकना’ नहीं यह मानव जीवन की महान् आवश्यकता है। यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म इसीलिए माना गया है कि इतने कम श्रम और व्यय में इतना व्यापक और महान लाभ संसार की अन्य किसी क्रिया से नहीं हो सकता। यज्ञ कर्ता का व्यक्तिगत तथा विश्वव्यापी परमार्थ का महान लाभ दोनों का इसमें महत्व पूर्ण समन्वय है। गायत्री तपोभूमि का यज्ञ आन्दोलन समय की एक भारी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए है। धर्म प्रेमियों को इन आयोजनों में उत्साह पूर्वक तत्परता के साथ कटिबद्ध होना चाहिए। इस प्रयत्न से दैवी प्रकोपों से पीड़ित प्रजा का भारी उपकार हो सकता है। जिस प्रकार बाढ़ पीड़ितों, आपत्ति ग्रस्तों के लिए तात्कालिक अन्न वस्त्र आदि की पूर्ति करना एक आवश्यक कर्तव्य है उसी प्रकार प्रकृति के विक्षोभ को शान्त करने के लिए बड़े-बड़े यज्ञों की भी आवश्यकता है। छोटे प्रयोजन के लिए छोटे हथियारों की और बड़े प्रयोजन के लिए बड़े अस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार आकाश में व्याप्त विकृतियों को शान्त करके, दैवी प्रकोपों से प्रजा को बचाने के लिए यज्ञों की आवश्यकता है। इस सामयिक आवश्यकता की पूर्ति की ओर धर्म प्रेमियों को समुचित ध्यान देना चाहिए।

नवरात्रि का पुनीत पर्व

नवरात्रि का पुनीत पर्व आध्यात्मिक साधनाओं के लिए सर्वोत्तम समय है। इस आश्विन की नवरात्रि में गायत्री परिवार द्वारा सर्वत्र बड़े उत्साह से सामूहिक साधनाऐं की गईं। “तपोभूमि आकर साधना करने की अपेक्षा नवरात्रि में सब लोग अपने अपने यहाँ ही आयोजन करें इस प्रेरणा से अब की बार सर्वत्र बड़े पैमाने पर और अधिक उत्साह से नवरात्रि के सामूहिक आयोजन हुए। एक ने दूसरे का उत्साह बढ़ाया और पुराने तथा नये साधकों ने ब्रह्मचर्य, उपवास, नियम, संयमों के साथ 24 हजार के अनुष्ठान किये। अधिकाँश स्थानों पर ऐसा हुआ कि लोग अलग-2 अपनी-2 कोठरियों में इकट्ठे होने की अपेक्षा किसी एक स्थान पर जमा होकर साथ साथ पूजन, जप अनुष्ठान करते रहे और अन्त में हवन भी सब ही किया। अलग अलग रहने की, अलग अलग काम करने की अपेक्षा साथ साथ सामूहिकता, सहकारिता, सामाजिकता की भावना सब दृष्टियों से प्रशंसनीय है। प्राचीन काल में त्यौहार, पर्व तीर्थ सत्संग, कथा, हवन आदि के आधारों पर एक समय अधिक इकट्ठे होकर धार्मिक कृत्य करने की प्रथा को अधिक महत्व दिया जाता था। इससे प्रेम भाव बढ़ता है और अधिक उत्साह रहता है। आज तो चारों ओर व्यक्तिवाद की स्वार्थ पूर्ण अलगाव की जो हवा चल रही है उसको ध्यान रखते हुए सामूहिकता पर और भी अधिक जोर दिया जाना चाहिए। हमें भारी प्रसन्नता है कि साधना और उपासना के क्षेत्र के कर्मवीर अब गायत्री माता की प्रेरणा “धियोयोनः” में “नः” – “हम सब” के तत्वज्ञान को समझने का प्रयत्न कर रहे हैं और एकान्त सेवी अलगाव की प्रकृति को बदल कर सहयोग की प्रेम गंगा का अवतरण कर रहे हैं।

प्राप्त सूचनाओं से प्रतीत होता है कि कई सौ स्थानों पर नवरात्रि के सामूहिक आयोजन हुए जहाँ सामूहिक संगठन नहीं थे वहाँ साधकों ने विशेषतया महिलाओं ने अपने अपने घरों में अलग अलग ही साधनाऐं की ऐसी सूचना हजारों की है। इन सामूहिक एवं व्यक्तिगत साधनाओं और आयोजनों का उत्साहवर्धक विवरण छपना उचित प्रतीत होता है पर उनका दो-दो चार-चार लाइनों में भी परिचय कराया जाय तो पूरी एक अखंड ज्योति ही उससे भर जायेगी। इसलिए उन शुभ प्रयत्न कर्ताओं को हार्दिक धन्यवाद देते हुए सर्व शक्तिमान माता से साधकों की भावनाओं को और अधिक विकसित करने के लिए प्रार्थना करते हैं।

जहाँ अलग-अलग छुट पुट साधनाऐं हुई हैं उनका उल्लेख न करते हुए जहाँ सामूहिक अनुष्ठान और यज्ञ हुए हैं उन स्थानों के नाम तारीख 20 तक प्राप्त सूचनाओं के आधार पर नीचे दे रहे हैं:—

खामगाँव (बरार) अतरौली (अलीगढ़) घरौला (शाजापुर) सुसनेर (म. भा.) तारानगर (राजस्थान) मदीसा (नरबर) भिण्ड (ग्वालियर) दिगौड़ा (टीकमगढ़) सुकेत (कोटा) पाड़ा तराई, सेन्धवा (निमाड) वरिगँवा (फतेहपुर) झालावाड़ (राजस्थान) आरंग (रायपुर) शाहजहाँपुर (उ. प्र.) हटा (सागर) महोवा (हमीरपुर) टीकर (खीरी) कानपुर (उ. प्र.) बालकवाड़ा, बडोवा, अचराँवा, लखनऊ, बड़ौदा, (गुजरात) बडोरा, करंगामाल (कालाहाँडी) बुलन्दशहर, आगरा (मालवा) लखनदौन (छिन्दवाड़ा) इटैलिया, उमरिया (विन्ध्य प्रदेश) गनेशगंज (टीकमगढ़) कसरावाद( निमाडे) जोधपुर (मारवाड़) बरुर (खंडवा) नवाबगंज (बरेली) भिलाड़िया कलाँ (होशंगाबाद) डबरा (ग्वालियर) एरिया (मन्दसौर) खलाई (म.भा.) टबलाई (धार) खलघाट (धार) बाराँ (कोटा) सतना (विंध्य प्रदेश) बैकुँठपुर (सरगुजा) वापी (सूरत) पिछोर (झाँसी) औरंगाबाद (सीतापुर) झाँसी (उ. प्र.) ढोडबाड़ा (बेतूल) बसेली (सीतापुर) मन्सूरपुर (मुजफ्फरनगर) पहुआ (खीरी) खरगौन (म. भा.) लखनी (नीमच) सटई (छतरपुर) नागपुर, सदर बाजार (देहली) बिसनगर (उत्तर गुजरात) भुसावल (खानदेश) कोटा (राजस्थान) काली बावड़ी (धार) अजीतगढ़ (तोरावाटी) बडैरा सुपान (गिर्द) मानपुर (इन्दौर) बहादुर गंज (पुर्नियाँ) करंगामाल, पाँडातराई, चाँदपुर (बिजनौर) छवड़ा (कोटा) हरनवाड़ा (मुजफ्फर नगर) कराहल (ग्वालियर) बरडिया (मन्दसौर) करडावाद (झावुओं) जोबट (मध्य भारत) इकलेरा (कोटा) सटकेश्वर (खलघाट) लक्ष्मीपुरी (अलीगढ़) अलावलपुर (बुलन्दशहर) कुलाला मालेगाँव (नासिक ) जबलपुर [म. प्र.] व्यावर [अजमेर] अम्बिकापुर [सरगुजा] कटनी [जबलपुर] कसहीवहरा [रायपुर] भावनगर [सौराष्ट्र] मोरबी [सौराष्ट्र] पारादान [फतेहपुर] बिजनौर, पिपरोंदा [वलिया] रायपुर [उ. प्र.] पटना, सलकिया [हवड़ा] अमरावती [बरार] गोबिंन्दगढ़ [म. भा] नाथद्वारा [मेवाड़] वेगमगंज [बाराबंकी] नवाबगंज [गोंड़ा] जलपाई गुडी [बंगाल] जलगाँव, हैदराबाद, करनाल [पंजाब] गंगापुर [जयपुर] झुझंनू [बीकानेर] गोंड़ल, समस्तीपुर [दरभंगा] चिखलदा [म. भा.] अमृतसर, मण्डी [हिमाचल] छपरा [बिहार] आरा [बिहार] टाटानगर [सिंहभूमि] गढ़मुक्तेश्वर [उ. प्र.] बाँसडीह [बिहार] राजीवपुर [वस्ती] बहराइच [उ. प्र.] हरद्वार [उ. प्र.] नलगोड़ा [द. भा.] घाटकोपर [बम्बई] इटारसी [हाँशंगाबाद] मालपुरा [टोंक] भीलवाड़ा, वारमेड़ [जोधपुर ] जालोर [राजस्थान] सालुम्वर [उदयपुर] रींर्गस [सींकर] मोठ [झाँसी] पट्टी [प्रतापगढ़] लालगंज [मिर्जापुर] लेंसडोन [गढ़वाल] रंभापुर [झावुआ] खरियार [छत्तीसगढ़] पेन्ड्रा [बिलासपुर] परासिया [छिन्दवाड़ी] मान्धाता [निमाड़] चान्दा, पुसद [यबतमाल] शाहगढ़ [सागर] जमुई [मुँगेर] मोतीपुर [मुजफ्फरपुर] डेहरी [शाहाबाद] खंजूरी [पलामू] झरिया [मानभूमि] भेलागंज [पुर्णियाँ] बैरागनियाँ [चम्पारन] यशपुर [म. प्र.] वाँकुरा [बंगाल] अजीतगढ़ [मुर्शिदाबाद] मेदनीपुर [बंगाल] डुमरी [हजारीबाग] लोहरबाग [राँची] खूँटी [राँची] मचेल (काश्मीर) चम्बा [पंजाब] सूरतगढ़ (गंगानगर) कुमाना (बीकानेर) दुहरोह (जैसलमेर) हरदोई (उ. प्र.) काँदला (कच्छ) वधवन (गुजरात) सिरोंज (भोपाल) दतिया (म. भा.) रीवा (विन्ध्य) सैलाना (म. भा.) फुलेरा (जयपुर) खुर्जा (बुलन्दशहर) महेन्द्रगढ़ (पटियाला) डूँगरपुर (उदयपुर) पाली (मारवाड़) फजिलका (पंजाब) बसेडी (धौलपुर) आनन्द (गुजरात) दमोह (सागर) पिहानीं (हरदोई) डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड यहां पेज छूटा होने की सम्भावना है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड

राजस्थान प्रान्तीय यज्ञ

गत आश्विन सुदी 15 को राजस्थान प्रान्तीय यज्ञ की 101 हवन कुण्ड में 24 लक्ष आहुतियों के हवन की पूर्णाहुति रामगंज मंडी में होने वाली थी। पर उसी समय अचानक भयंकर अतिवृष्टि का प्रकोप हुआ। दो दिन में लगभग 12 इंच पानी बरस पड़ा जिससे जल-थल एक हो गये। 101 हवन कुण्डों की यज्ञशालाएं तथा निर्धारित यज्ञ-भूमि भी जलमग्न हो गये। निदान उस समय यज्ञ स्थगित करने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहा। जहाँ तक बन पड़ा तार तथा चिट्ठियों से आने वाले सज्जनों को सूचना देकर उस अवसर पर आने से रोका गया, फिर भी सूचना न मिलने के कारण गुजरात, मध्य-प्रदेश आदि से कितने ही सज्जन पधारे। उनको जो कष्ट हुआ उसके लिए रामगंज मंडी के यज्ञ