तुम देख चुके कितने जनों को, धन संपत्ति धाम गवा चुके हैं।
निज कर्म कमाई सुसंचित थी, उससे दुःख और सुख पा चुके हैं॥
अरे जाना अवश्य तुझे भी वहाँ, जग जीव जहाँ सभी जा चुके हैं।
शुभ राह को छोड़ कुराह न जा, प्रभु मार्ग तुझे बतला चुके हैं॥
यह जीवन व्यर्थ ही खोकर के अरे! पाप के पुञ्ज जुटा चुका तू।
इस यौवन रूप खजाने को हा! दिल खोल के खूब लुटा चुका तू॥
फिर धर्म अधर्म के सञ्चित वित्त को, खाकर खूब मुटा चुका तू।
प्रभु-प्रेम का स्वाद चखा ही नहीं, दुनिया के मजे तो उड़ा चुका तू॥
जग के सुख वैभव नश्वर हैं, इस बात को मान ले माने ले तू।
मनुजोचित कार्य करूंगा सदा, इस ठान को ठान ले ठान ले तू॥
सब में वही ईश रमा हुआ है, उसे जाने ले जान ले जान ले तू।
उसके बिना शाँति मिलेगी नहीं, चाहे विश्व को छान ले छान ले तू॥
(श्री प्रभुदयाल वैद्य, माझिया)
(श्री. स्वामी शिवानन्दजी सरस्वती)
नित्य अभ्यास द्वारा जब तक हमारे विचार पूर्ण नष्ट न हो जाय, हमें एक समय एक ही सत्य पर अपने मन को एकाग्र करने का सदा प्रयत्न करना चाहिए। तभी हमारा मन एकाग्रता को प्राप्त करेगा और तत्काल विचार-समूह विचार-समूह नष्ट हो जायगा। पातंजली ने भी अपने योगसूत्र में कहा है—”तत्प्रतिषेधार्थ मेककतत्त्वाभ्यास-”।
मनके संकल्प स्वयं ही दुख हैं। संकल्प का अभाव ही ब्रह्मानन्द है। संकल्प की कालिमा को विवेक और दृढ़ प्रयत्नों द्वारा नष्ट करो एवं दिव्य ज्योति को प्राप्त कर ब्रह्मानन्द के सागर में गोते लगाओ।
प्रत्येक विचार का एक मानसिक मूर्ति-रूप होता है। विचार आदत बन जाते हैं। आदत ही परिस्थिति का रूप ग्रहण करती है। यदि एक बार भी आपने कार्य के विचार का ध्यान किया तो मन उस दिशा में अवश्य सोचना प्रारम्भ कर देगा। धीरे-धीरे वही आदत बन जायगी। आपके मन की सम्पूर्ण शक्ति उसी ओर प्रवाहित होने लगेगी। बार-बार सोचने के लिए आप मजबूर होंगे। अतः नित्य विचार नित्य भावना और नित्य उद्रार को वश में करने की आवश्यकता है।
विचार एक महान् शक्ति है। “जैसा सोचोगे वैसा बनोगे।” सोचो कि आप शक्तिहीन हैं, आप शक्तिहीन हो जाएंगे। अपने को मूर्ख समझो, सचमुच आप मूर्ख हो जाएंगे। ध्यान करो कि आप स्वयं परमात्मा हो, यथार्थ में आप परमात्मा का रूप प्राप्त कर लोगे। प्रतिपक्ष-भावना का अभ्यास करो। क्रोध की हालत में प्रेम की भावना करो। निराशा में आनन्द और उत्साह से मन को भरो।
अंततः दुनिया केवल एक भावना अथवा विचार ही है। मन के संकल्प रहित होने पर दुनिया हवा हो जाती है और मन अवर्णनीय आनन्द में डुबकियाँ लगाता है। वन ने ज्यों-ही विचार किया कि दुनिया तत्काल उसकी आँखों में झूल कर पीड़ा का साम्राज्य शुरू हो जाता है।
कुविचार कैसे दूर किए जा सकते हैं? उन्हें भूल कर। कैसे भूलना चाहिए? उसमें पुनः न डूब कर पुनरावृत्ति को कैसे रोका जा सकता है? अधिक आनन्ददायक दूसरी बात का ध्यान कर। उपेक्षा करो। भूलो। अधिक आनन्ददायक विषय का चिन्तन करो। यह महान् साधना है। गीता के दिव्य विचारों को मन में जमाओ। उपनिषद् और योग वशिष्ठ के उन्नत विचारों का ध्यान करो। आत्मा में अन्दर ही अन्दर बहस करो, ध्यान करो, विचार करो, तर्क करो। साँसारिक विचार, घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, क्रोध काम आदि भावनाएँ तत्काल नष्ट हो जायेंगी।
विचार और विचारक दोनों भिन्न हैं। इस बात का प्रमाण है ‘आप’ और मन पृथक-पृथक हैं। आप तो केवल मनोत्पन्न भावनाओं के मौन प्रेक्षक हैं। आप तो कूटस्थ ब्रह्म हैं। आप प्रत्यगात्मा हैं।
जिस प्रकार गंगोत्री से निकलकर गंगा नित्य गंग सागर की ओर बहती है, उसी प्रकार वासनामय मन गत संस्कारों के उद्गम से निकलकर विचार लहरें भी जागृत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं में नित्य विषयों की और दौड़ती है। पहियों के अधिक गरम होने पर इंजिन को भी इंजिन शेड में भेज देते हैं, पर यह मन रूपी रहस्यमय इंजिन तो सदा विचार चक्र पर चलता ही रहता है। मस्तिष्क आराम चाहता है पर मन नहीं। मन निग्रही योगी सदा जागता है। ध्यान ही में उसे विश्राम मिलता है। मन ही आत्मशक्ति है।
साधारण लोगों को एक ही समय चार-पाँच प्रकार के आ घेरते हैं यथा घर-गृहस्थी, व्यापार-आफिस, शरीर, खान-पान, आशा, धनोपार्जन, प्रतिशोध, आदि के विचार। यदि आप 3-30 बजे ध्यान से किसी पुस्तक को पढ़ रहे हैं तो 4 बजे क्रिकेट मैच देखने का विचार तत्काल आकर आपका चित्त चंचल कर देता है। केवल योगी ही, जिसने अपने मन को एकाग्र कर लिया, एक समय में एक ही विचार को रख सकता है।
मानसिक क्रियाएँ ही सच्ची क्रियाएँ हैं। विचार ही सच्ची क्रिया है। विचार प्रबल शक्ति है। छूत की तरह वह फैलता है क्रोध का विचार आसपास के लोगों में भी क्रोध की भावना जाग्रत करेगा। इसी तरह सहानुभूति आनन्द आदि के विचार दूसरों में भी इन्हीं भावनाओं को जाग्रत करेंगे। अतः विचार सदा दिव्य एवं उच्च रखो। बुरे विचार स्वयं मर जाएंगे। दिव्य विचार, बुरे विचार को रोकने के लिए अचूक औषधि है।
साँसारिक प्राणी सदा काम के विचार तथा तृष्णा, क्रोध एवं प्रतिशोध के विचारों का शिकार होगा। उनका मन इन दोनों में ही फिरता है। इनका वह गुलाम है। उसे नहीं सूझता कि इनसे बचकर किस प्रकार अच्छे विचारों पर मन को केन्द्रित करे। मन की आँतरिक क्रियाओं से वह अनभिज्ञ रहता है। अपने अथाह ऐश्वर्य एवं विश्वविद्यालयों में प्राप्त थोथे ज्ञान के होते हुए भी उसकी दशा अत्यंत शोचनीय है। विवेक से वह दूर रहता है। सन्त,शास्त्र और ईश्वर में उसे श्रद्धा नहीं है। दुर्बल इच्छा-शक्ति के कारण वह बुरी भावना, लालसा एवं आकर्षण के तूफान को रोकने में असमर्थ है। उसके लिए सच्चा उपाय तो सत्संग ही है।
किसी एक भौतिक जीवन की विभिन्न मानसिक मूर्तियों का सारभूत अंश मानसिक धरातल पर तोला जाता है। उसी की आधारशिला पर दूसरे भौतिक जीवन का महल खड़ा है। प्रत्येक जन्म में जिस प्रकार नवीन शरीर बनता है। उसी प्रकार उसमें नवीन बुद्धि और मन का भी निर्माण होता है।
नित्य—उत्तेजित यह मन अनन्त ब्रह्म से उत्पन्न होकर, अपने संकल्प के अनुसार दुनिया का निर्माण करता है। संकल्प ही संसार है, और उसका नाश मोक्ष है। गीता में कहा भी है—“सर्व संकल्प संन्यासी योगा रुढ़स्त दोच्यते।” सारे संकल्पों को छोड़कर ही योग में आरुढ़ हो सकते हो।
विचार एक जीवित बल है—ससारगत सर्वोच्च, गंभीरतम अटूट बल हैं। विचार जीवित पदार्थ हैं, पत्थर की तरह वे ठोस हैं। आप भले मर जायं पर आपके विचार कभी न मरेंगे। उनमें रूप, आकृति, रंग, गुण, तथ्य, शक्ति और वजन है। विचारों के द्वारा हम सृजन शक्ति प्राप्त करते हैं। विचार चल हैं। जड़ जगत् की प्रत्येक वस्तु सर्व प्रथम में उत्पन्न होती है। फिर वह रूप ग्रहण करती है। हर दुर्ग, मूर्ति, चित्र, मशीन, तात्पर्य यह चीज की उत्पत्ति सर्व प्रथम उसके निर्माता के मन में होकर फिर बाह्य अभिव्यक्ति या रूप ग्रहण किया है।
विचारों के शक्ति कण कथित शब्दों के रूप में ही किसी एक दिशा में केन्द्रित होते हैं। मन में आकर्षण शक्ति है। खरबूजे को देखकर खरबूजा रंग पकड़ता है। यह संसार का नियम है। आप स्वयं अपनी ओर नित्य आकर्षित होते रहते हैं। यह आपके खुद के विचारों से मेल रखने वाले अन्य जीवित-तत्वों, विचारों एवं दशाओं के दृश्य दोनों रूपों से होता है।
आपका मनोगत प्रथम विचार ‘अहं’ था। अंतिम विचार जो ब्रह्म पदलीन होने के पूर्व आप में उत्पन्न होगा, वह ब्रह्माकार वृति है जो आपकी इस भावना से कि आप ब्रह्म हैं, पैदा होता है।
संकल्पों की अमर्यादित बढ़ती लाभदायक नहीं है। यह तो दुर्भाग्य की सूचक है। एक क्षण के लिए भी साँसारिक पदार्थों पर ध्यान न दो। इस संकल्प से छुटकारा पाने के लिए अधिक शक्ति-व्यय न करो। सम्पूर्ण विचारों को रोकने पर मन स्वयं नष्ट हो जायगा। फूल को मसलने में भी कुछ प्रयत्न होता है पर संकल्प के नाश के लिए उसकी भी आवश्यकता नहीं है। विचारों के निग्रह से संकल्प से बाह्य संकल्प को और शुद्ध मन से अशुद्ध मन को नष्ट कर आत्मज्ञान में दृढ़ होकर रम जाना चाहिए। मोह, ममता, भ्रम, ईर्ष्या, काम, स्वार्थ एवं क्रोध से रहित मन ही परमात्मा का नित्य स्मरण कर सकता है।
साँसारिक विषयों का चिन्तन मन का साधारण स्वभाव है। ईश-स्मरण के बजाय वह गन्दे विचारों में तत्काल फंस जाता है। नित्य प्रयत्न और त्याग द्वारा ही परमात्मा की ओर उसे मोड़ना चाहिए। स्वभाव के खिलाफ होने पर भी उसे इस ओर शिक्षित करना होगा। सांसारिक दुख-दर्दों से बचने के लिए और कोई दूसरा रास्ता नहीं है।
साधारण जनता गंभीर चिन्तन को नहीं समझती उनकी मानसिक भूतियाँ बिखरी हुई होती हैं। केवल विचारक, दार्शनिक एवं योगियों की मानसिक कल्पनाएँ सुव्यवस्थित एवं स्पष्ट होती हैं। एकाग्रता और ध्यान के अभ्यासियों की भावनाएं दृढ़ एवं सुघड़ होती हैं।
संसार की सहायता के लिए संन्यासियों का प्लेटफार्म पर आना आवश्यक नहीं है। वह तो हिमालय की गुफा में रहता हुआ भी दुनिया की मदद करता है, और उसे अपनी शुद्ध, दृढ़ विचार-लहरों से पवित्र करता है। उसका जीवन स्वयं ही शिक्षा का प्रतीक है। परमात्मा को पाने के इच्छुक लोगों के लिए वह जीवित आशा है। भारतीयों ने भी पश्चिमी प्रचार-वृत्ति को अपनाकर यह कहना शुरू कर दिया है कि हमारे संन्यासियों को बाहर आकर सामाजिक एवं राजनैतिक हलचलों में भाग लेना चाहिए। यह भयंकर भूल है। एक संन्यासी या योगी किसी भी संस्था का प्रधान अथवा किसी भी सामाजिक व राजनैतिक आँदोलन का नेता नहीं हो सकता। संन्यासी का कर्तव्य तो शंकर के अद्वैत वेदान्त का दुनिया में आध्यात्मिक ज्ञान को फैलाना है।
विचारों में तूफान चला रहता है। कभी-2 मन चक्कर खाने लगता है। आपको इन्हें एकाग्र कर एक विशेष स्वरूप देना चाहिए। तभी दार्शनिक विचार भी दृढ़ होंगे। विचार मनन और ध्यान अव्यवस्थित विचारों को दृढ़ आधार पर ला खड़ा करेंगे।
मान लो आपका मन पूर्ण शाँत है उसमें कोई विचार वर्तमान नहीं है। फिर भी ज्यों-ही विचार का उद्भव होने लगता है, वह तत्काल नाम और रूप ग्रहण कर लेता है। प्रत्येक विचार का एक नाम और रूप है। उस मुक्ति की रूप स्थूल और नाम सुन्दर अवस्था है जिसे हम विचार कहते हैं। फिर भी ये दोनों एक ही हैं। एक के होने पर दूसरा अवश्य वर्तमान रहती है। जहाँ नाम है वहाँ रूप और विचार अवश्य मिलेंगे।
विचार चल है। वह मस्तिष्क से निकल यत्र-तत्र घूमता है। वह दूसरों के दिमाग में भी घुसता है। हिमालय पर रहने वाला साधु अमेरिका के कोने में अपने प्रबल विचार को भेज सकता है। जो गुफा में अपने आपको पवित्र करता है वह यथार्थतः संसार को पवित्र कर सम्पूर्ण दुनिया का भला करता है। उसके पवित्र विचारों को कोई नहीं रोक सकता। वे उस तक अवश्य पहुंचेंगे जिनको उनकी जरूरत है। मन आकाश की तरह विभु है। अतः विचार-विनिमय संभव है।
मन के दो विभाग हैं- विचारक एवं अनुवीक्षक। विचारक विभाग को रोकना सरल है पर अनुवीक्षक की क्रिया को रोकना असम्भव है।
(श्री गजेन्द्रलाल जी पूनीवाला एम.एससी.बी. टी.)
मन मथुरा दिल द्वारिका, काया काशी जान। दसद्वारे का देहरा, यामे पीव पछान ॥
—(सन्तवाणी)
दुग्ध से मक्खन निकालने के लिए परिश्रम चाहे जितना करना पड़े परन्तु दुग्ध से मक्खन कभी दूर नहीं है। इसी प्रकार अपने जीवन में जीवनाधार परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करने के लिये प्रयत्न चाहे जितना करना पड़े, लेकिन वह परमानन्द स्वरूप परमतत्व अपने जीवन से कभी भिन्न नहीं है। कोई भी मन को पूर्ण रूपेण स्थिर करके उसे अपने आप में पा सकता है।
वास्तविक ज्ञान न होने के कारण मनुष्य अपनी भावनानुसार भगवान् की उपासना करने के लिये किसी शिल्पकार के द्वारा निर्मित मन्दिर एवं प्रस्तर प्रतिमा का आश्रय लेते हैं और उसी में अपने आराध्य प्रभु की प्रतिष्ठा करके उसी को पूजते हैं लेकिन प्रकृति माता के बनाये हुए देह रूपी मन्दिर में निवास करने वाले सर्वोपरि प्रिय अपने आप रूपी आरूप-रूप में परम प्रभु की प्रतिष्ठा नहीं करते।
इससे अधिक सुन्दर मन्दिर और प्रिय मूर्ति संसार में भला कहाँ मिल सकती है?
जिन विवेकी पुरुषों की समझ में यह सुलभ युक्ति आ गई है वह तो देह रूपी मन्दिर में हृदय रूपी आसन पर परम प्रिय अहं रूपी प्रतीक में अपने परम प्रभु की स्थापना करके अभिन्न भाव द्वारा, अद्वैत ज्ञान की दृष्टि से परम प्रभु के परमानन्द स्वरूप की उपासना करते हुए परम-शान्ति को प्राप्त हो चुके हैं!
सर्वस्यैव जनस्यास्य विष्णुरभ्यन्तरे स्थितः। त परित्यज्य में यान्ति यहिर्विष्णु नराधमाः॥
—(योगवा.)
सब प्राणियों के हृदय में विष्णु निवास करते हैं। अपने भीतर रहने वाले विष्णु को छोड़कर विष्णु की तलाश जो बाहर करते हैं- वह अधम हैं!
अपने से भिन्न वस्तु में महान् की महत्ता को देखते हुए उसी वस्तु के सहारे उस एक महान् तत्व में योगस्थ होना चक्कर का मार्ग है और अपने में ही उस महान् की महानता का अनुभव करते हुए अपने आपके सहारे उसका उपासक होना सीधा सरल मार्ग है!
उस एक परमोत्कृष्ट तत्व की महत्ता से महिमान्वित अनेकों पदार्थों को जो कोई देखते हैं- वह जगत को देखते हैं! और इस जगत की अनेकता के पीछे परमाधार तत्व को जो कोई देखते हैं—वहीं परमोपासनीय, परमगोपनीय, परमोत्कृष्ट जगदीश्वर को देखते हैं!
अपनी-2 योग्यता के अनुसार जो दृश्य-जगत दीख रहा है उसे तो सर्व साधारण प्राणी देखते हैं परन्तु जिसके द्वारा सब कुछ दीख रहा है उसे कोई लाखों में एक देखने की जिज्ञासा रखते हैं और लाखों जिज्ञासा रखने वालों में कोई विरले ही सौभाग्यवान् उसे अनुभव कर पाते हैं।
जब तक उस सर्वाधार महान तत्व की सर्वव्यापी महत्ता का ज्ञान नहीं होता तभी तक मनुष्य संसार के विनाशी पदार्थों को परम सुन्दर एवं महत्वपूर्ण मान कर उन्हीं में मोहित होकर रागी बनता है, और जब वे नष्ट होते हैं तब अत्यन्त दुःख को प्राप्त होता है लेकिन जो विवेकी यथार्थ दर्शी पुरुष है वह अनन्त नामों एवं अनन्त रूपों तथा अनन्त गुणों और चमत्कृतियों के पीछे, एक ही परमोत्कृष्ट तेजोमय सत्ता को देखता है और उसी परमाधार तत्व का उपासक बनता है।
ईश्वरो न महाबुद्धे दूरे न च सुदुर्लभः। महाबोध मयैकात्मा स्वात्मैव परमेश्वरः॥
—(योगवा.)
“ईश्वर न कहीं दूर देश में स्थित है न बहुत दुर्लभ है, अपना बोध युक्त आत्मा ही परमेश्वर है।”
जो अपने जीवन के साथ परमाधार होकर नित्य मिला हुआ दिखलाई दे रहा है, जिसका संग कहीं भी किसी तरह नहीं छोड़ा जा सकता अर्थात् जिससे अटूट सम्बन्ध है वही अपना उपास्य देव परमेश्वर है।
ऐसे तो मनुष्य अपने जीवन में अनेकों सम्बन्धित पदार्थों को अपने निकट देखता है, और अनेकों को अपना मानता है परन्तु उन अपना मानने वाले पदार्थों से एक दिन में ही वह अनेकों बार मिलता और बिछुड़ता है।
जो देह सदा अपने साथ प्रतीत होती है, जिसको निश्चित होकर अपनी कहते हैं, उससे भी हर एक मनुष्य स्वप्नावस्था में अलग होता है और जाग्रतावस्था में फिर मिलता है।
इसके भी आगे जो मन, बुद्धि आदि पदार्थों का संयोग है वह भी सुषुप्ति अवस्था में छुट जाता है।
वास्तव में सबसे परे सबका आधार एक चिन्मय स्वरूप सत्ता ही शेष रहती है, जिसका संग कहीं भी नहीं छूटता, जिसको प्राणी किसी तरह नहीं छोड़ सकता।
अतः जिससे हम कभी अलग नहीं हो सकते वहीं अपना नित्य उपास्यदेव है। उसी का नित्य योगानुभव करना साधक की साधना का एक मात्र सत्य लक्ष्य है।
अविवेक वश मनुष्य अपने आप में ही अपने परमाराध्य को न जानकर अन्यान्य भिन्न पदार्थों को अपना मानता है और उन्हीं में ममत्व बढ़ाकर मोहासक्त हो संयोग-वियोग के झोंकों में झूलता रहता है। लेकिन वास्तव में जो अपना परम-प्रभु है उसके नित्य भोग में वह स्थित नहीं हो पाता।
ऐसी दशा में भ्रमित जीव को अपने उपास्य देव के तत्व-स्वरूप का ज्ञान कराने वाले सन्तसहगुरुदेव ही हैं।
साधक को निराभिमानी होकर उन्हीं का आश्रय लेना चाहिए। साथ ही जिस शास्त्र से, जिस उपदेश से, जिस साधना से, जिस कर्मानुष्ठान से अथवा जिसकी आराधना से अपने आप में आत्मा रूप परमात्मा का बोध हो उसी का आश्रय लेना चाहिये तथा उसी की ओर देखना चाहिये।
अव्यक्त के अभिव्यक्त होने वाले विश्वमय सौन्दर्य का दर्शन करने के लिये इस दृश्य-जगत से आंखें हटा लेनी होंगी जिसके कारण आंखों में अन्धत्व छा रहा है।
उस परमात्मा का पूर्ण योग इस जगत प्रपंच के संयोग वियोग मय भोग से छूट जाने पर ही होगा।
जग से न्यारे ह्वै रहो, लगे रहो हरि ध्यान। पृथिवी पर देही रहे, परमेश्वर में प्रान।।
उपासक संसार में रहता हुआ, सांसारिक कृत्यों को करता हुआ भी उनसे पृथक रहता है और उसका ध्यान सदा भगवान में लगा रहता है, देह पृथिवी पर रहते हुए भी उसके प्राण परमेश्वर में स्थित रहते हैं। उसकी हर एक क्रिया, प्रत्येक भाव, समस्त विचार एक मात्र अपने उपास्य के लिये ही होते हैं!
उसी एक परम तत्व को व्यक्ति की उपाधि में निर्विकार आत्मा रूप से देखते हैं, समष्टि की उपाधि में उसी को परमात्मा रूप से पहचानते हैं और सभी सीमाओं के पार अनन्न, असीम की दृष्टि से उसी को परब्रह्म कहते हैं।
वही चिन्मात्र स्वरूप परब्रह्म परमात्मा ही ज्ञानी का उपास्य देव है। सब कुछ त्याग देने पर जो सबके पीछे शेष रहता है, जिसका त्याग किसी प्रकार हो ही नहीं सकता, जिसमें सब कुछ प्रगट होता है, जिसमें सबकुछ स्थित होता है और जिसमें सबकुछ विलीन हो जाता है- वही ज्ञानी का उपास्य देव है।
उस परमाधार, अचल,अविनाशी, नित्य तत्व को ही आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, प्रेमी, भक्त विविध नामों से पुकारते हैं और विविध रूपों की भावना द्वारा उसी एक को अनेकों प्रकार से भजते हैं।
कस्तूरी कुण्डल बसे, मृग ढूँढै बन माहि। ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखता नाहिं॥
यही आत्मा-तत्व की उपासना का रहस्य है। प्रभु हमें उसका पात्र बनावे!
(श्री लक्ष्मी नारायण जी बृहस्पति बुरहानपुर)
जिस प्रकार प्रेम के द्वारा अनायास ही शान्तिप्रद त्याग सिद्ध हो जाता है उसी प्रकार सेवा के द्वारा अनायास ही पुण्यवर्द्धक तप की सिद्धि और सर्वस्व की प्राप्ति होती है:– वही सेवा का रहस्य है।
अपने सुख के लिये दूसरों से सेवा लेते हुए साँसारिक भोगो के पथ में जितना पतन होता है, उतना ही दूसरों को विनम्र भाव से हितप्रद सुख देते हुए सेवा करने से शीघ्रतया उत्थान होता है।
सेवा करते हुए हमें अपने में किंचित् मात्र भी अभिमान न आने देना चाहिये और न सेवा के बदले में अपनी ख्याति या प्रशंसा की ही इच्छा रखनी चाहिये।
जिसकी सेवा का अवसर प्राप्त हो, उसकी भूलों को देखकर रुष्ट न होना चाहिए और उसके किसी प्रकार के दोषों के कारण उससे घृणा भी न करना चाहिये, क्योंकि किसी की सेवा तो गुण-गृहण करने के लिये की जाती है और किसी की सेवा दोष हरण करने के लिये की जाती है।
सेवा करते हुए सभी प्रकार की प्रतिकूलता को सहन करते हुए शान्त समस्थित रहना, कहीं भी आलस्य को किंचित् मात्र भी स्थान न देना, निरन्तर कर्त्तव्य पालन करने के लिये प्रमाद रहित होकर सावधान रहना—यही परम-पुण्य प्रदायिनी तपश्चर्या से सुसज्जित सेवा है।
जब मनुष्य के पाप क्षीण होने लगते हैं तभी उसके अन्तर में सेवा के भावों का उदय होता है और जब उसके पाप क्षीण हो जाते हैं तब वह मानव रूप में पवित्र देवता हो जाता है। तब वह सार्वभौम सेवा पथ पर आरुढ़ हो जाता है तथा उसके जन्म-जन्मान्तरों के पुण्यों का उदय होकर उसका प्रत्येक श्वाँस सुरभित हो जाता है! वह प्रत्येक प्राणी में अपने प्रभु के दर्शन करता है और उसकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर अपने आप को धन्य समझता है—
सियाराममय सब जग जानी। करहुँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
इसी प्रकार एक अन्य कवि की और उक्ति है—
दर दीवार दरपन भया, जित देखहुँ तित तोहिं। कंकर-पत्थर ठीकरी, भई आरसी मोहि॥
वास्तव में सार्वभौम-सेवा पथ के पथिक की ही विवेक-दृष्टि खुल पाती है और उसी को सच्चिदानन्द-घन परमात्मा के सार्वभौम-स्वरूप को बोध होता है।
कोई जाने या न जाने, माने या न माने ऐसे सार्वभौम-सेवक के अन्तर में ही परम-प्रेमास्पद, परात्पर परमेश्वर के परम तत्व का प्रकाश होता है। जिसके प्रकाश हुए बिना, जिसके बोध हुए बिना किसी को कहीं भी परम-शान्ति नहीं मिल सकती।
जो सद्गुरु कृपा से एक बार सार्वभौम-सेवा-पथ से प्रेम कर लेता है, फिर वह किसी भी वस्तु की, किसी भी सम्बन्धी की—यहाँ तक कि वह अपनी देह तक की परवाह नहीं करता। जिसको वह अपने लक्ष्य-पथ में बाधक देखता है, उसी को वह त्याग कर देता है।
सार्वभौम सेवा के पथ में कोई संन्यासी होकर, कोई उदासी या कोई वैरागी एवं यती, व्रती अथवा तपस्वी होकर, कोई ज्ञानी कोई ध्यानी होकर केवल विनम्र सेवा-भाव से ही सद्गति, परमगति और परमशान्ति को प्राप्त हुए हैं।
भगवान् बुद्ध, राजा भर्तृहरि, जगद्गुरु शंकराचार्य, समर्थगुरु रामदास, महर्षि दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि-आदि अनेकों महान् आत्माओं के दृष्टान्त हमारे सन्मुख है।
सर्वत्र महामहिम प्रभु की महिमा को देखना, उन्हीं की सत्ता का सर्वत्र अनुभव करना कभी न भूलने वाला सुमिरन, चिन्तन और ध्यान है। ऐसे योग लाभ के लिये उत्कंठित, उल्लसित भाव से सतत् सावधान रहते हुए सेवा के लिये उद्यत रहना सेवक का प्रथम-कर्तव्य है।
सबमें विराट् शक्ति की व्याप्ति अनुभव करते हुए उनके विश्व-रूप के प्रति नमनशीलता और पूज्य भावना युक्त व्यवहार करना सार्वभौम-सेवा की सर्वोपरि साधना है।
अपनी समस्त कामनाओं, इच्छाओं और आवश्यकताओं को जगदाधार के चरणों में अर्पण कर देना ही प्रार्थना है!
जिस प्रकार तलवार की तीक्ष्णता रुई का कुछ भी बिगाड़ नहीं पाती, उसी प्रकार सार्वभौम-सेवक की विनम्रता के आगे प्रकृति की कठोरता परास्त हो जाती है।
सहनशीलता, नम्रता, क्षमा और धैर्य के द्वारा ही सेवक के सद्गुणों का प्रकाश हो पाता है। वह प्रत्येक दशा में अपना हित ही समझता है, कभी किसी से उद्विग्न नहीं होता।
सार्वभौम-सेवा पथ का पथिक कभी भी निरर्थक बातों को नहीं सुनता, निरर्थक नहीं देखता, निरर्थक नहीं कहता और निरर्थक कर्मों को नहीं करता, वह संयम-नियम के अभ्यास से विचलित नहीं होता—वही वास्तविक सार्वभौम-सेवा-ब्रती कहा जा सकता है।
सेवा-भावी सज्जनों! आज भी जीवन है, समय है, शक्ति है, सभी तरह के उचित साधन सुलभ हैं! आप अपने समय और शक्ति का सदुपयोग कीजिये तथा विनम्र सेवा-भावी बनकर अपना जीवन सफल बनाइये। सार्वभौम-सेवा का पथ आपकी राह देख रहा है।
(श्री. लावेल फिल्मोर)
स्मरण रखिये कि उत्तम से उत्तम बीज, जब तक आप उसे बोयेंगे नहीं, तब तक आपको कोई फल नहीं दे सकता। यदि आप बीज को हाथ में ही रक्खे रहेंगे तो वह उग नहीं सकता और न उसमें फल ही लग सकते हैं। इसके लिए आपको बीज प्रकृति माता को सौंपना होगा तथा उसकी चमत्कारिक शक्ति एवं चतुराई पर विश्वास करना होगा,जिसके बल पर वह वस्तुओं का निर्माण करती है, जिसे आप नहीं कर सकते अथवा समझ तक नहीं सकते। आप खेत को जोत-जातकर तैयार कर सकते हैं, बीज बो सकते हैं तथा सिंचाई आदि कर सकते हैं, किंतु बीज को अंकुरित तथा धीरे-धीरे विकसित करने वाले तो भगवान ही हैं। वह सार्वभौमिक सिद्धान्त है।
हम अपनी मानुषिक शक्ति के सहारे अनेकों कार्य आरम्भ कर सकते हैं, किंतु हमें उस दैवी-शक्ति पर विश्वास रखना चाहिये क्योंकि सभी कार्य हमसे पूरे नहीं हो सकते। हम भोजन कर सकते हैं किंतु हम यह नहीं जानते कि उस भोजन का रूपांतर रक्त, हड्डी, बाल, स्नायु तथा नसों में किस प्रकार हो जाता है।
भगवान की शक्ति को हम भलीभाँति समझते नहीं, अन्यथा उस श्रेष्ठ शक्ति की सुरक्षा में अपने बीज, धन एवं सामाजिक तथा राजनीतिक मामलों को भी समर्पण कर देने में एक विशेष चमत्कार है अर्थात् अपने सभी मामलों को उनके ऊपर छोड़ देने से विलक्षण सफलता प्राप्त हो सकती है।
अधिकाँश लोग इस बात को जानते हैं कि जो धन संग्रह करके तिजोरी में रख दिया जाता है या गाड़ दिया जाता है तथा किसी भी कार्य में जिसका उपयोग नहीं किया जाता, वह धन न तो बढ़ता ही है और न हमें कुछ सुख-सुविधा देता है; किंतु जो धन व्यय किया जाता है, वह बदले में हमें ऐसी वस्तुएं देता है जिनके उपयोग से हम सुखी एवं प्रसन्न होते हैं।
कंजूसी के साथ वस्तुओं को रख छोड़ने से वस्तुओं की हमें सुख पहुँचाने वाली क्षमता सीमित हो जाती है। हमारे परिवार वाले तथा हमारे मित्र अपने पूर्ण सामर्थ्य भर हमारा हित तभी कर सकते हैं जब हम अपने उत्पीड़क शासन से उन्हें मुक्त कर दें। यदि उन्हें इस बात की स्वतन्त्रता दे दें कि वे अपने स्वाभाविक ढंग से भगवदाज्ञा का पालन करे तो वे और हम संसार से अधिक लाभ उठा सकते हैं।
यद्यपि धरती में बीज फेंक देने के लिए भी कुछ विश्वास की आवश्यकता है; किंतु अपने मित्रों को उनके निजी ढंग से भगवदिच्छा के अनुरूप कार्य करने के लिये स्वतन्त्रता प्रदान करने में अधिक विश्वास की आवश्यकता है। कभी-कभी तो केवल अपने को ही बुद्धिमान समझकर व्यर्थ ही हमें यह भय हो जाता है कि यदि हम अमुक व्यक्ति को अक्षरशः नहीं बताते जाएंगे तो वह कार्य पूरा न कर सकेगा।
बच्चों के लिये यह आवश्यक है कि उन्हें अपने भय से मुक्त कर दिया जाय और वे स्वतन्त्र भावना वाले बनें। हमारा यह तात्पर्य नहीं है कि उच्छृंखल होकर स्वच्छन्दता पूर्वक मनमानी करने के लिये छोड़ दिये जायँ हमारा तात्पर्य तो इतना ही है कि वे इस बात का अनुभव करें कि अपने ढंग पर अपनी बुद्धि का परिचय देने के लिए किसी सीमा तक वे स्वतन्त्र हैं। रचनात्मक एवं उपयोगी कार्य करने में उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। प्रार्थना एवं अपने कार्यों के उदाहरणों द्वारा उनका पथ-प्रदर्शन किया जा सकता है।
यदि आपमें प्रतिभा है तो उसे भय एवं संशयों से मुक्त कीजिये तथा अपनी क्षमता के अनुसार उसका परिचय दीजिये। अपनी प्रतिभा को भगवान् के चरण कमलों में समर्पित कर दीजिये। यह धरती में बीज बोने के समान ही होगा। यदि आपकी प्रतिभा सच्ची है तो वह भगवान् की एक देन है; और जब वह भय, संशयों तथा बाधाओं से मुक्त होकर अपना मूल्य निर्धारित कराने के लिये विकास की ओर जाने दी जायगी तब वह बढ़ेगी और उसका सुन्दर फल प्राप्त होगा।
दान से वस्तु घटती नहीं, वरन् बढ़ती है। यदि आपके पास कोई उत्तम वस्तु है तो आप उसे दूसरों को भी दीजिए, इसके फल स्वरूप आपको वह वस्तु अधिक परिमाण में मिलेगी। यदि आपके मन में कोई अच्छा भाव है तो उसे भी लोगों में वितरित कीजिये; हाँ, बलपूर्वक किसी के गले के नीचे उतारने की आवश्यकता नहीं, किंतु जो प्रसन्नतापूर्वक उस भाव को ग्रहण करना चाहें उन्हें बिना किसी मूल्य के अपने उत्तम भाव का भागीदार बनाइये।
बहुधा प्रफुल्लता उत्पन्न करने वाला एक शब्द, जो दूसरों के लिए कहा गया हो, उनके तथा आपके भी जीवन को चमका सकता है। एक जलती हुई मोमबत्ती से आप हजारों मोमबत्तियाँ जला सकते हैं और फिर भी पहली वाली ज्यों-की-त्यों जलती रहेगी।
मनुष्यों के एक दल में दैवी गुणों का आना सचमुच वैसा ही जैसा कि एक स्त्री द्वारा थोड़े से खमीर को उससे तिगुने भोजन में मिलाना, जो अपनी बढ़ने वाली शक्ति के कारण तब तक बढ़ता रहा जब तक कि पूरे भोजन को उसने अपना जैसा खमीर नहीं बना लिया। वह थोड़ा-सा खमीर उस भोजन में स्वयं विलीन नहीं हो गया, किंतु उस भोजन में प्रवेश करके उसने उसे भी उन्नत अवस्था में पहुँचा दिया और अपने रूप को कई गुना अधिक बढ़ा लिया। इसी प्रकार सत्य का एक शब्द वह उस व्यक्ति के द्वारा चाहे बोला गया हो या आचरण में लाया गया हो, जो दूसरों को प्रदान करने में पर्याप्त विश्वास रखता हो- बहुतों में दैवी गुणों को ला देगा।
निस्संदेह मेरे कुछ पाठकों ने यह अनुभव किया है कि अपने जीवन में आयी हुई कठिन समस्या हो जब उन्होंने भगवान् पर छोड़ दिया है तब उन्हें अच्छा फल मिला है। उस स्थिति में कुछ भी अनुकूलता और अच्छाई थी, उसकी वृद्धि हुई एवं प्रतिकूलता तथा बुराई घटने लगी और शीघ्र ही विलीन हो गयी।
जो अपने समस्त धन को भगवान् को अर्पण कर देता है और दैवी आज्ञा के अनुकूल ही उसे व्यय करता है, उसका धन बढ़ता है तथा उसे अधिक सुख देने वाला होता है। बहुतों ने यह अनुभव किया है कि अपनी आय का दशमाँश भगवत् कार्य में लगाने से उन्हें बहुत अधिक आर्थिक सुरक्षा प्राप्त हुई है।
बहुतों की सफलता में निश्चय रूप से यही बाधा आ पड़ती है कि वे कम हो जाने के डर से अपनी प्राप्त वस्तु में से किसी को कुछ देते ही नहीं। कहावत है ‘धरम किये धन ना घटे जो सहाय रघुवीर’। ऐसी भी कहावत है कि ‘सूम का धन शैतान खाये।’ कहने का तात्पर्य यह कि धर्म के काम में धन लुटाने से वह और बढ़ता है; किंतु जो कंजूसी के साथ उसका संग्रह कर रखता है उसे सदा कमी का ही अनुभव होता है। किंतु खुले हाथ दान देने का अर्थ मूर्खता के साथ धन का लुटाना कभी नहीं है। हम जो भी करें उसमें विश्वास, प्रेम और बुद्धिमानी का उपयोग अवश्य करें। ये तीनों गुण भगवान् के हैं, जो समस्त गुणों के एकमात्र मूल कारण हैं।
जो भगवदाज्ञा के अनुकूल चलेगा, वह कभी असफल नहीं हो सकता। अपनी वस्तु, सहायता करने की क्षमता, दयालुता या जो भी हमारे पास देने को है, उसे हम भय के कारण नहीं देते; अपने ही पास रख छोड़ते हैं। इसका यह परिणाम होता है कि स्वयं हमारे हित के लिये भी इन वस्तुओं के बढ़ने का अवसर नहीं आता; कंजूसी की भावना से किसी वस्तु को अपने ही पास रख छोड़ने का एक सुन्दर दृष्टांत मेरे मस्तिष्क में आया, जिसका अनुभव मेरी समझ से और भी कई फूल उगाने वालों ने किया होगा।
एक बार मेरे पास एक पुष्प विशेष की अनेक जातियाँ थीं। पुष्प-वृक्ष के कई कुञ्जों को मैंने वर्षों तक उसी स्थान में रक्खा। कुछ वर्षों में वे कुँज घने हो गये, किंतु वृक्षों की दशा ठीक नहीं थी। तब मैंने उनमें से कई पौधों को उखाड़कर अपने मित्रों को दे दिया। दूसरे वर्ष जिस कुँज से मैंने पौधे उखाड़े थे, उसके पौधों की दशा बड़ी अच्छी हो गई तथा पहले की अपेक्षा उनमें अधिक एवं उत्तम फूल फूले, साथ ही मेरे मित्रों के पौधे भी खूब बढ़े और फूले।
सफलता के पीछे जो दैवी सिद्धान्त काम करता है उसे यों कह सकते हैं, जितना अधिक आपको मिला हो उतना ही अधिक आप दीजिये। प्रत्येक अच्छी वस्तु को संभवतः जितना उपयोग हम कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक भगवान् ने हम सबको दिया है। हमें अधिक परिमाण में सब वस्तुएँ मिली हैं, इसको सिद्ध करने का सबसे उत्तम मार्ग भगवान् के प्रति कृतज्ञ होना तथा भगवान् के कार्य में उन वस्तुओं का बुद्धिमानी तथा निर्भयता के साथ उपयोग करना है।
सबसे पहले हमें अपने अभावमय संकुचित विश्वास से इन वस्तुओं को मुक्त करना होगा अर्थात् ऐसा सोचना छोड़ना होगा कि अपनी वस्तुओं का उपयोग कर डालेंगे तो ये कम हो जायेंगी और फिर हम अभाव में पड़ जाएंगे। भगवान् की असीमता पर विश्वास उत्पन्न करके ही हम ऐसा विचार ला सकते हैं। हमें विश्वास करना होगा कि प्रत्येक वस्तु प्रत्येक स्थान पर विद्यमान हैं। हमारे विश्वास के बल से वह अच्छी वस्तु हमें प्राप्त हो जायगी जिसे परम पिता ने हमारे लिए बनाया है।
भगवान ने हमें सभी वस्तुएँ दी हैं, किंतु हमें यह सीखना चाहिए कि अपने जीवन में हम इनका किस प्रकार व्यवहार करें जिससे ये हमारे काम आने लायक हो जायँ। भगवान् के दिए हुए बीज को लेकर हम बो देते हैं, किंतु उस बीज की वृद्धि भगवान् ही करते हैं और कुछ बीज के बदले में हमें मनों अनाज का ढेर दे देते हैं।
श्री. कन्हैयालाल माणोकलाल मुन्शी
भारत आज स्वाधीन है; किन्तु अचानक मिली हुई स्वाधीनता अपने साथ समस्याओं के काले बादल भी लाई है। राजनीति के क्षेत्र में हम अल्पज्ञ हैं, शासन-भार सम्भालने की हममें क्षमता नहीं, राष्ट्र की उत्पादन-शक्ति क्षीण है, समुचित यातायात के साधन उपलब्ध नहीं हैं, सत्संग-सदाचार एवं सत्य-निष्ठा का पथ हमें दृष्टि-गत नहीं होता, हम मानवता को तिलाँजलि देकर दानवता के पैर पकड़े हुए हैं- इन आपदाओं से हमारा छुटकारा कैसे हो? यही प्रश्न आज हमारे सामने है। बिना इसे शीघ्र सुलझाए हमारा कल्याण नहीं, हमारे देश का कल्याण नहीं; और इस सुलझाव का सीधा मार्ग है हमारी शिक्षा एवं संस्कृति का पुनरुत्थान- हमारे विश्व-विद्यालयों की क्रियात्मक जागरूकता और प्राचीन आदर्शमय शिक्षा-पद्धतियों का वैज्ञानिक अनुसरण।
हमारी सतत् कामना है कि हमारा नव-जागरण अक्षुण्ण रहे, निरंतर गतिशील रहे; किन्तु इसके लिए आवश्यक है कि हमारे विश्व-विद्यालय विद्यार्थियों को ऐसी शिक्षा दें, उन्हें इस प्रकार आदर्श नागरिकता के साँचे में ढालें कि वे राष्ट्र के नव-जागरण को स्थायी बनाये रखने में समर्थ हों। आज हमें वे विद्वान और कलाकार नहीं चाहिए जो ब्रिटिश सत्तावाद की जड़ के पोषक थे, आज तो हमें ऐसे जीवट के आदमी चाहिए जो राष्ट्र की सूखी नसों में नए रुधिर का संचार कर सकें और कंकाल को पुनः युवक बनाकर राष्ट्र के द्वार पर खड़ा कर दें।
भारत विश्व-भर का महान् पथ-प्रदर्शक रह चुका है। कालाँतर में यदि कुछ दिन के लिए उसने अपना अधिकार खो दिया तो क्या हुआ! वह पुनः शक्तिशाली हो गया है और अपने खोए हुए अधिकार को फिर प्राप्त करेगा।
शिक्षा कला है। हमारे जीवन की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं आध्यात्मिक उन्नति के विभिन्न विषय शिक्षा के अंतर्गत ही आते हैं। इन विषयों का समुचित संगठन और प्रतिपादन ही शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य है। इनकी सम्पूर्णता ही जीवन की सम्पूर्णता है। हमारे प्राचीन आश्रम, गुरुकुल तथा विद्यापीठ इसी सम्पूर्णता की प्राप्ति के लिए अपनी साधना में तत्पर रहते थे। हमारे आज के विश्वविद्यालयों के आश्रमों की शिक्षा पद्धति ही अपनानी चाहिए। आज के आचार्य को केवल शिक्षा ही नहीं देनी है, उसे यह भी देखना है कि उसका विद्यार्थी उसका शिष्य संयमी, साहसी और गौरवशाली बनता है या नहीं? इसी प्रकार आज के विद्यार्थी को अपनी कक्षा में केवल उपस्थित ही नहीं रहना है, केवल परीक्षा ही नहीं पास करनी है, धरने-हड़तालें ही नहीं करनी हैं; बल्कि उसे जीवन निर्माण की शिक्षा में पारंगत होना है, आत्मोन्नति की कला सीखना है और अपने में जिज्ञासा की प्रवृत्ति जाग्रत करनी है।
सभी को विदित है कि पश्चिमी शिक्षा ने भारतीय शिक्षा पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला है। हमें इस विनाशकारी प्रभाव से बचना है। पश्चिमी शिक्षा भौतिकवाद की नींव पर आश्रित है और पश्चिमी लोगों को दिखावे और तड़क-भड़क में ही सच्चे जीवन का आनन्द प्राप्त होता है। उसके लिए गृहस्थाश्रम की पवित्र भावना का कोई मूल्य नहीं। बात-बात पर तलाक की धमकी वह अपनी स्वाधीन प्रवृत्ति का शुभ लक्षण समझता है। नैतिक उच्चता उसके लिए अव्यावहारिक और निरर्थक है। आए दिनों की हत्याएँ, लूटमार, अनाचार आदि उसके लिए साधारण बातें हैं। ऐसी सभ्यता को लेकर क्या भारतवर्ष पनप सकता है? उसे लोकतंत्र में विश्वास है। लोकतंत्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत नागरिक ही उसे अपेक्षित हैं। अतः आज के विद्यार्थी को अपने शिक्षा-काल में ही नागरिकता के समस्त गुणों को आत्मसात् कर लेना चाहिए और इसके लिए आवश्यक है कि उसे नियत समय तक साँस्कृतिक उत्थान-पतन की शिक्षा दी जाय। साथ ही राष्ट्र-निर्माण की दृष्टि से यह भी आवश्यक है कि विश्वविद्यालय शुद्ध वैज्ञानिक और याँत्रिक शिक्षा का भी उत्तम प्रबन्ध करें। राष्ट्रीय उत्थान के लिए ये विषय निताँत आवश्यक हैं। हाँ, इस सम्बन्ध में पश्चिम का अंधानुकरण करना उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकता।
विद्यार्थियों को आरम्भ में सभ्यता और संस्कृति की ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिए जिससे वे जीवन की पूर्णता की प्राप्ति ही अपनी साधना– अपना तप बनालें। ऐसी निर्माण-शिक्षा विद्यार्थी को अपने जीवन-निर्माण में बड़ी सहायक होगी।
आज का विद्यार्थी विश्वविद्यालय से उपाधि लेकर निकलता तो है, पर अपने को अपूर्ण, अयोग्य और दुःखी पाता है। उसे विश्वविद्यालय से यही मिलता है। जीवन में उसके लिए रस नहीं। इसी लिए यह आवश्यक है कि विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को तीन प्रकार की शिक्षा दे–
(1)मन की एकाग्रता, विवेचक शक्ति और संयम का पालन करना।
(2) तमाम निजी शक्तियों और कार्य को परस्पर सहयोगी बनाना और
(3) मनन की हुई सामग्री को व्यक्त करना।
विद्यार्थी इन तीनों गुणों को व्यवहार में ला सकता है, यदि उसे राष्ट्र निर्माताओं का जीवनी-साहित्य पढ़ाया जाए।
यह निर्विवाद है कि विद्यार्थी पर वातावरण का, निजी रुचि का और वंशगत भावनाओं का बड़ा प्रभाव पड़ता है। मातृभूमि का और उसका घनिष्ठ सम्बन्ध रहता है; किन्तु सबसे बड़ा प्रभाव तो उस संस्कृति का पड़ता है, जिसके प्रकाश में विद्यार्थी का लालन-पालन हुआ है। इसीलिए यह आवश्यक हो जाता है कि अपनी संस्कृति का अध्ययन करने, उसे व्यक्त करने और अपने जीवन में उसी का अनुसरण करने का उसका उद्देश्य हो।
यहाँ सभ्यता और संस्कृति का अंतर स्पष्ट कर देना जरूरी है। दोनों में अन्तर है। संस्कृति अक्षुण्ण होती है, सभ्यता में परिवर्तन होता रहता है। सभ्यता जीवन-यापन के मार्ग को सरल और सुखदायक बनाने में सहायक और भौतिकता का पुट लिए होती है, संस्कृति युगाँतरकारी इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठो का सार होती है। हम भगवान् रामचन्द्र से सभ्यता के क्षेत्र में आगे हैं; क्योंकि हम वायुयान द्वारा यात्रा करते हैं, जबकि वे पैदल या नावों द्वारा ही चलते थे। परन्तु क्या हम सत्य बोलने में, आदर्शमय जीवन बिताने में, चरित्र-गठन की पटुता में एवं मानवीय भावनाओं का सुन्दर सामंजस्य करने में उनसे आगे हैं? ऐसा बिरला ही साहसी व्यक्ति होगा जो कहे कि हाँ, हम संस्कृति में रामचन्द्र-युग से आगे बढ़े हैं, हमने प्रगति की है।
प्रख्यात वैज्ञानिक यदि बुरा पति है तो वह शिक्षित नहीं, ख्यातिनामा वकील यदि श्रेष्ठ नागरिक नहीं तो वह सुशिक्षित नहीं और स्वदेश प्रेमी यदि नैतिक पतन के गड्ढे में गिर गया है, तो वह भी शिक्षित नहीं कहा जा सकता। विद्यार्थियों के लिए दो बातें बड़ी आवश्यक हैं। प्रथम तो यह कि वह अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति एवं विचारधारा को पुष्ट बनाए, विचार करे और उसे प्रकाश में लाए तथा उसका लक्ष्य यह हो कि उसी उद्देश्य की पूर्ति में वह अपना जीवन खपा दे। दूसरा यह कि वह ऐसी शिक्षा प्राप्त करे जो उसे स्वयं को आगे बढ़ाने में सहायक हो और जिसकी सहायता से वह अपने जीवन की पूर्णता प्राप्त कर सके।
हमारे विद्यालयों को चाहिए कि वे विद्यार्थी के जीवन की सर्वांगीण उन्नति की ओर तो देखे ही, साथ ही उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियों के एकीकरण की ओर भी उनका ध्यान जाना परमावश्यक है।
[ प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए. ]
भारतीय संस्कृति में मनुष्य के कल्याण के अनेक विधान हैं। हिन्दू धर्म के ऋषि मुनियों ने मानव जीवन के प्रत्येक पहलू पर गंभीरता से विचार कर शास्त्रों की परम्पराएँ निश्चित की हैं। हमारी संस्कृति अधम से अधम और पतित से पतित के उद्धम और कल्याण की कामना से परिपूर्ण है। चाहे कोई कितना ही क्यों न गिर गया हो, समाज ने उसे कितना ही पतित क्यों न मान लिया हो, उसके लिए भी हिन्दू धर्म नई आशा और नए उत्साह का आह्लादकारी सन्देश लिए हुए है। दया, क्षमा और दंड इन तीनों के उचित उपयोग से ही यह संभव होता है। अतः इनका मर्म ठीक प्रकार समझ लेना चाहिए।
दया आपका मनुष्योचित धर्म है। जो कष्ट में है, सहायता के लिए कराह रहा है, वह आपकी दया का पात्र है। जो तुम से दुर्बल है, कम आयु के हैं, गिरी हुई स्थिति में हैं, उन पर निश्चय ही दया करनी चाहिए। दया आपका कर्त्तव्य है। दूसरों की सेवा करना ही ऊपरी सेवा करना है। पूर्ण मनुष्यत्व केवल साहस और वीरता से ही नहीं बनता, उसमें दया जैसे कोमल भाव की बहुत आवश्यकता है।
दया ही वह दिव्य गुण है, जिसके द्वारा ईश्वर आपसे अपने बन्धुओं की सहायता चाहता है। रोगियों का रोग दूर करने, दरिद्री को दारिद्रय से उबारने, दुखियों का दुःख दूर करने और मानवता की रक्षा के लिए दया एक महत्वपूर्ण सद्गुण है। इसे धारण करने का प्रयत्न करना चाहिए। आपकी दया का दायरा बढ़ते रहना चाहिए। उसमें मनुष्य ही नहीं, पशु पक्षी कीट पतंग इत्यादि भी सम्मिलित रहें।
लेकिन दया की भी एक मर्यादा है। जो व्यक्ति एक बार या दो बार आपकी दया से लाभ उठा कर ऊँचा नहीं उठता या उन्नति नहीं करता, वह मनुष्य नहीं पत्थर है हम आज समाज में देखते हैं कि अनेक भिखारियों ने दया की आड़ में भिक्षावृत्ति को एक पेशा बना लिया है। यह दया का अनुचित उपयोग है। इसी प्रकार के और भी अन्य अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जिनसे बचना होगा।
क्षमा हमारी दया का एक और अंग है। जो हमारे साथ दुर्व्यवहार करता है या अपकार, हानि, कष्ट का साधन बनता है, उसे मन में सच्चा पश्चात्ताप उदय होने पर क्षमा कर देना चाहिए। प्रायः अनेक दुष्ट क्षमा किए जाने पर गलत मार्ग से बच कर उन्नति के मार्ग पर चलने लगते हैं। मानव-जीवन बहुमूल्य है। अतः एक दो बार कसूरवार को भी क्षमा दे कर उसकी उन्नति का साधन उपस्थित करना चाहिए। हमारे समाज में आज अनेक उपेक्षित जातियाँ, दुःखी पिछड़े हुए मानव पड़े हुए हैं, जो हमारी दया चाहते हैं।
समाज मनुष्यों के समूह हैं। इसमें आगे आगे चलने और पिछड़े हुए सभी प्रकार के सदस्य हैं। प्रेम तथा दया का पारस्परिक व्यवहार कायम रहने से ही हमारा समाज ठीक स्तर पर रह सकेगा। सहकार मनुष्य की आत्मा का धर्म है। क्षमा करने से मनुष्य को सुधार का एक नवीन अवसर प्राप्त होता है।
दण्ड हमारी संस्कृति की अंतिम सीमा है। दुष्ट का दमन होना चाहिये। यदि लोक कल्याण के लिए दुष्ट को नीति का साधारण नियम भंग कर भी दण्ड देना पड़े, तब भी वह त्याज्य नहीं है। मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचन्द्र जी को छल से बाली का वध करना पड़ा था। बाली दुष्ट था, उचित अनुचित का विवेक खो बैठा था और वासनाजन्य अत्याचारों से प्रजा काँप उठी थी। सामने आकर उससे युद्ध करने वाला और उसे मार डालने वाला कोई भी न था। सामने आकर युद्ध करने वाले की आधी शक्ति स्वयं बाली में आ जाती थी। इसलिए श्री रामचंद्र जी ने उसके सामने न आकर वृक्षों के पीछे से उसका वध किया था। राष्ट्र हित की दृष्टि से यह उचित था यद्यपि साधारण-युद्ध के नियम भंग करके यह कार्य हुआ था। दुष्ट को दण्ड दिया ही गया, चाहे वह जिस प्रकार हो।
इसी प्रकार कौरव-पाँडव युद्ध में कुलगुरु, द्रोणाचार्य ने पाण्डवों की सेना का बड़ा संहार किया पाँडव यह देखकर बड़े डरे। यदि कौरव जीत जाते, तो भारत में अनीति और अत्याचार का बोलबाला हो जाता, अतः श्री कृष्णजी ने अश्वत्थामा नाम के एक हाथी को मरवा दिया। द्रोणाचार्य के पुत्र का नाम भी अश्वत्थामा था। युद्ध में जब द्रोण ने श्रीकृष्ण के मुख से सुना कि अश्वत्थामा मारा गया, तो वह घबड़ा गया। इसी अवसर पर अर्जुन ने उसे मार डाला। छल से द्रोण न मारे जाते, तो कौरव जीत जाते और अनीति की विजय हो जाती।
बिहार में जरासन्ध नामक एक अत्यधिक अत्याचारी राजा राज्य करता था जिसने छोटे-छोटे 8 राजाओं के राज्यों को छीन रखा था और बहुत से राजाओं की स्त्रियों को हर कर अपने महलों में रखे हुए था। दुष्ट जरासन्ध के पास शक्ति बहुत थी और उससे मुकाबला करने की सामर्थ्य किसी में न थी। इसलिए श्री कृष्ण जी ने अर्जुन और भीम के साथ स्वयं ब्राह्मण वेष बना कर जरासन्ध के अन्तःपुर में पहुँच वहाँ अपने आपको ब्राह्मण कहा और उसी के महलों में भीम से जरासन्ध का मल्ल युद्ध कराकर उसका वध कराया था। इसी प्रकार कर्ण ने छल से अर्जुन के पुत्र को मारा तो श्री कृष्ण ने उसका भी बदला लिया था।
इस प्रकार समय समय पर संसार से अत्याचार और दुष्टता के निवारण, तथा मानव के सत्य, प्रेम, न्याय की रक्षा के लिए भारतीय संस्कृति में दण्ड का विधान रहा है। छल से, कूटनीति से या छुप कर भी दुष्ट को राष्ट्र और धर्म के हित के लिए दण्ड देने में अधर्म नहीं है। अनेक दुष्टों को, अनेक राक्षसों को इसी प्रकार दण्ड (दमन) दिये गए और उसी के फल स्वरूप हमारी संस्कृति आज जीवित है। “शठे शाठयं समाचरेत्” की नीति के पालन के कारण ही हमारी संस्कृति आज के उच्च गौरवशाली पद पर आसीन है।
दया, क्षमा, और दण्ड तीनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही मानव जीवन में प्रयुक्त होना चाहिये प्रयाग में बड़ी बुद्धिमत्ता की आवश्यकता है। जो निर्बल हैं, पीड़ित हैं, आपकी प्रेरणा चाहते हैं, उन्हें दया कर क्षमा कर देना ही धर्म है। जिस प्रकार ईश्वर के नियम और दया सबके लिए हैं, उसी प्रकार आपकी दया और क्षमा मनुष्य मात्र के लिए होनी चाहिए। आपकी क्षमा से हो सकता है वे जीवन को नवीन मार्ग अपनालें और उच्च उद्देश्य पूर्ण जीवन व्यतीत करने लगे। चाहे तुम किसी देश में किसी नगर ग्राम या परिस्थिति में हों, यदि तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है, जो तुम्हारी दया से ऊँचा उठ सकता है, तो उसके पुराने दोषों को क्षमा कीजिए क्षमा भाव स्वयं आपके हृदय में भी शांति और संतुलन उत्पन्न करने वाला है, आनन्द दायक शुभ भाव है, अध्यात्मिक सुख की वृद्धि करने वाला है। जिसे अक्षय सुख चाहिये उसे शत्रुता ईर्ष्या द्वेष भाव से मुक्त रहना चाहिए। क्षमा और दमा आपको इन दुष्ट भावों से मुक्त कर देंगे।
दंड के प्रयोग बहुत सोच समझ कर कीजिये सावधान! व्यक्तिगत द्वेषवश किसी पर अन्याय एक प्रकार की ऐसी दुधारी तलवार हैं, जो निर्बल को तो घायल करती ही है, सबल को भी अछूता नहीं छोड़ती।
आचार्य श्रीराम शर्मा के शब्दों में, “पड़ौसी के छप्पर में आग लगा कर अपना घर बचा लेना मुश्किल है, उसी प्रकार दूसरों पर अन्याय करके स्वयं चैन करना कठिन है। अन्याय एक तेजाब है, जो पहले उसी पर असर करता है, जिसमें वह रखा हुआ है। मनुष्य कागज की पुड़िया के समान है, जो अपने अन्दर अन्याय को धारण करता है अन्यायी बनता है। ऐसा व्यक्ति कुछ समय में अपने आप ही गलकर नष्ट हो जाता है इसलिए आप दंड तो दीजिए पर अन्याय से उसी प्रकार दूर रहिए जैसे सिंह और सर्प से दूर रहते हैं। इन्द्रियों के और मनोविकारों के बहकावे में आकर अपनी आत्मा के साथ अन्याय मत कीजिए। अहंकार से उद्धत होकर एवं लालच से अन्धे होकर दूसरों का अधिकार मत छीनिए, उनके स्वत्वों का हरण मत कीजिए, क्योंकि अनाचार और अत्याचार पारे की तरह है, जो किसी को पच नहीं सकता। उसकी चमक पर मुग्ध होकर लोग पेट में रखने की कोशिश करते हैं परन्तु अन्याय रूपी पारा घमंडी और लालचियों की मूर्खता पर हंसता हुआ उनके रोम रोम को चीर कर बाहर निकलता है। सूक्ष्म दृष्टि से न्याय की विवेचना कीजिए और जिसे बात में अन्याय समझें उसे त्यागते हुए दंड दीजिए।”
(प्रो. लालजीराम शुक्ल)
मनुष्य को हर समय अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जो व्यक्ति सफलतापूर्वक इन समस्याओं का हल कर लेता है, उसका जीवन सुखी रहता है, किन्तु जो सामने की समस्याओं से भागने का प्रयत्न करता है, वह सदा दुःखी रहता है। समस्याओं का हल अपने आपको समझने अपनी शक्ति पहचानने और आत्म-संयम करने का साधन मात्र है। जिस मनुष्य में अपने विचारों पर नियंत्रण रखने और उन्हें सुव्यवस्थित करने की जितनी शक्ति होती है, वह अपनी परिस्थितिजन्य समस्याओं को हल करने में उतना ही समर्थ होता है। अपने विचारों को नियंत्रित न रखने से परिस्थितियाँ प्रतिकूल हो जाती हैं तथा साधारण समस्याएँ भी भयंकर दिखाई देने लगती हैं।
जब मनुष्य में निकम्मापन आता है तो वह अपनी अकर्मण्यता का दोष वातावरण के सिर मढ़ने लगता है। इस प्रकार का मिथ्या आत्म-संतोष प्राप्त करता है पर उससे उसका मानसिक क्लेश नष्ट नहीं होता, अपितु वह और भी बढ़ जाता है। जो लोग जीवन में बड़े ऊँचे आदर्श रखते हैं, वे अपने आदर्श जीवन के अनुसार आचरण न कर सकने के लिये प्रायः अपनी परिस्थितिओं को ही कोसा करते हैं। इस प्रकार का दोषारोपण मनुष्य की दूसरों की सेवा न करने की इच्छा का ही परिणाम है। जब मनुष्य में स्वार्थपरायणता आती है तो उसके मन में भय और चिन्ताएँ आने लगती हैं। ये भय और चिन्ताएँ मानसिक शक्ति को नष्ट कर देती हैं। इस प्रकार मनुष्य में निराशा भर आती है। वह किसी भी काम में सफलता की सम्भावना नहीं देखता। वह अपने शत्रुओं से घिरा पाता है। वह दूसरों की हृदय से सेवा नहीं करना चाहता, पर वह इस बात को स्वीकार न कर वातावरण में अपनी अकर्मण्यता का कारण ढूंढ़ता है। पैसे की कमी, मित्रों की कमी, समाज की पूर्वावस्था आदि बातें शुभ काम के करने में रुकावट डालने लगती है। कभी-कभी कल्पित अथवा वास्तविक डडडडड कथा में डडडड डडडड डडडड हैं
एक दिन मुझे अपना एक पुराना शिष्य मिला, जो अब एक कॉलेज का प्रोफेसर है। हाल ही में उसने विवाह किया है। बड़ा श्रद्धालु है, जब वह आया तो उसने मेरा अभिवादन किया। उसकी स्त्री ने भी अभिवादन किया। मैंने सुझाया कि अब उसे राष्ट्र-सेवा करने की अच्छी सुविधा है। उसकी धर्मपत्नी सुशील, आज्ञाकारिणी और भारतीय संस्कृति के अनुसार पली है। उसे देखकर मुझे प्रसन्नता हुई। मेरी बात सुनकर शिष्य ने कहा कि विवाह झंझट है। विवाह के पश्चात् मनुष्य देश सेवा नहीं कर सकता। उसे आजीविका की ही परेशानी रहती है। फिर वह अपनी विषम समस्याओं और परिस्थितियों की चर्चा करने लगा। उसका कथन था कि अनुकूल परिस्थितियों के बिना कोई व्यक्ति संसार में बड़ा काम नहीं कर सकता। उसने अपने कॉलेज के अधिकारी के प्रतिकूल होने की चर्चा की। उसी प्रकार अपने मित्रों द्वारा ठगे जाने की भी कहानी सुनाई।
इस प्रकार के विचार सामान्य नवयुवकों के होते हैं, जो उन्हें निकम्मा बना देते हैं। ऐसे विचारों के कारण मनुष्य अपने आस-पास प्रतिकूल वातावरण पैदा कर लेता है। वह सोचता है कि वातावरण किसी भी प्रकार के विचारों तथा आचरण का कारण होता है। विचार और आचरण वातावरण में उपस्थित परिस्थितियों के परिणाम-मात्र होते हैं। इस प्रकार की मनोवृत्ति निकम्मे व्यक्ति में होती है। जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से बचना चाहता है, वह उक्त विचार को दृढ़ता से पकड़ लेता है। मानसिक तथा शारीरिक रोगी वातावरण को ही अपने रोग का कारण ठहराते हैं। मनुष्य को रोग नहीं होता तब भी वह रोग की कल्पना कर लेता है, जिससे वह अपने प्रमाद का कोई बहाना बताकर अपनी कर्त्तव्य-बुद्धि को धोखा दे सके। जिस प्रकार हम दूसरों को धोखा देने की चेष्टा करते हैं, उसी प्रकार हम अपने आप को भी धोखा देते हैं। जब तक मनुष्य में धोखा देने की मनोवृत्ति का अन्त नहीं होता, वह अपने आप में भले काम करने की शक्ति नहीं पाता। धोखा देने की मनोवृत्ति से मानसिक शक्ति का उदय न होकर विनाश ही होता है।
जब मनुष्य आध्यात्मिक रूप से विचार करने लगता है तो वह अपने आचरण और सफलता का कारण अपने विचारों को ही पाता है। मनुष्य के विचार उसके जीवन से सम्बन्ध रखने वाली सभी वस्तुओं के कारण होते हैं। जैसे हम होते हैं वैसा ही हमारा संसार होता है। हम संसार के पदार्थों को अपनी बुद्धि के अनुरूप ही पाते हैं। यह मनोविज्ञान का सामान्य सिद्धान्त है। हमारे सामने रक्खा हुआ पदार्थ भी हमारे संस्कारों, कल्पनाओं और विचारों के अनुसार दिखाई देता है। जिस प्रकार की भावनाएं हमारे मन में रहती हैं, बाह्य पदार्थ वैसे ही दिल में दिखाई देने लगता है।
किसी व्यक्ति को भले अथवा बुरे मनुष्य उसके विचारों के अनुसार मिला करते हैं। जो व्यक्ति अपने आप से परेशान है वह परेशान करने वाले व्यक्तियों से स्वयं को घिरा पाता है। भले विचार वाले व्यक्ति को भले मनुष्य मिलते हैं, और बुरे विचार वाले व्यक्ति को बुरे।
उक्त प्रकार के वातावरण की उत्पत्ति दो प्रकार से होती है। पहले तो मनुष्य की दूषित मनोवृत्ति भले मनुष्य में भी उसे बुराई ही दिखलाती है। जब कोई मनुष्य किसी व्यक्ति के विषय में दुर्भावना बना लेता है तो उक्त व्यक्ति की सभी बातों का वह विशेष प्रकार का अर्थ लगाने लगता है। यदि वह उसकी कुशलता पूछने आवे तो वह सोचता है कि वह उसके प्रति षड़यन्त्र कर रहा है। यदि वह उसकी बड़ाई करे तो वह समझता है कि चापलूसी कर रहा है, अथवा उसे धोखे में डाले रखना चाहता है। यदि वह उदासीन रहे तो समझता है वह शत्रुता के कारण नहीं बोलता। छोटी-छोटी बातों के विचित्र प्रकार के अर्थ लगा लिए जाते हैं। इस प्रकार के अर्थ लगाने से वास्तव में वह व्यक्ति बदल जाता है। जब हमारी साधारण बातों का कोई व्यक्ति विचित्र अर्थ लगाता है तो हम उस व्यक्ति के प्रति उसके विचारों के अनुरूप हो जाते हैं। यह परिवर्तन अज्ञात रूप से होता है। एक प्रकार की बीमारी में व्यक्ति सोचता है कि सारा संसार उसके प्रति षड़यन्त्र कर रहा है। इसके पर्याप्त प्रमाण भी उसे मिल जाते हैं। उन प्रमाणों को वह दूसरे से भी नहीं कहता। वह सोचता है कि उसकी बातें सुनने वाला उसके शत्रुओं से कह देगा और उससे वे अनुचित लाभ उठायेंगे।
वातावरण में परिवर्तन आध्यात्मिक आकर्षण के कारण भी होता है। जैसे मनुष्य के विचार होते हैं, उन्हीं के अनुसार दूसरे लोग अथवा परिस्थितियाँ उनके समक्ष आती हैं। कोई भी व्यक्ति हमारे पास इसलिए आता है कि हमारे भीतरी मन में उसके आने की आवश्यकता है। अपने स्वभाव को न जानने के कारण ही मनुष्य दूसरे लोगों के आचरण से परेशान रहता है, अथवा परिस्थितियों की प्रतिकूलता की शिकायत करता है। अपना ही स्वभाव प्रतिकूल परिस्थितियाँ उपस्थित करता है। इस प्रकार की परिस्थितियाँ हमारे आध्यात्मिक विकास के लिए आवश्यक होती हैं। अंग्रेजी में एक कहावत है—समान पंखों के पक्षी एक साथ उड़ते हैं। जो जैसा होता है, उसको वैसा ही व्यक्ति मिल जाता है। हम सदा अपने ही जैसे व्यक्तियों को अज्ञात जगत् में आकर्षित करते हैं और दूर-दूर से हमारे जैसे व्यक्ति संपर्क में आ जाते हैं। सभी व्यक्तियों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर उनके विचार ही ले जाते हैं। विचार के आ जाने पर एक जगह से दूसरी जगह जाने का कारण भी मिल जाता है। विचार की उत्पत्ति आन्तरिक प्रेरणा से होती है।
सभी घटनाओं के दो कारण होते हैं—एक भीतरी और दूसरा बाहरी। हम जिन कारणों को घटना का कारण सोचते हैं वे प्रायः उनके बाहरी कारण मात्र होते हैं। ये कारण घटना के उतने महत्वपूर्ण कारण नहीं होते जितने आन्तरिक कारण हैं। आन्तरिक कारणों पर हमारा विचार प्रायः नहीं जाता। उसके लिए शान्त विचार की आवश्यकता होती है। अपने वैयक्तिक स्वार्थ से ऊपर उठने पर ही मनुष्य को आन्तरिक तथा वास्तविक कारण का पता चलता है। घटना का आन्तरिक कारण सूक्ष्म विचार होता है। जिस मनुष्य को जिस बात का भय होता है उसके जीवन में वह बात घटित हो जाती है, वह चाहे उसके प्रति कितना ही सतर्क क्यों न रहे। उस घटना को उसका विचार ही घटित करता है। इसी प्रकार संदेह-रहित शुभ विचार भी फलित होता है। हम जिस प्रकार के लोगों को चाहते हैं वे अनायास हमारे प्रति आकर्षित होते हैं। हमारा विचार देश और काल के प्रतिबन्ध को नहीं मानता। विचार की कोई सीमा नहीं है और उसकी गति का कोई माप नहीं। एक क्षण में विचार सारी सृष्टि की परिक्रमा कर सकता है। उसकी शक्ति भी अमोघ है। अतएव जिस व्यक्ति को हम चाहते हैं उसके आन्तरिक मन में अज्ञात प्रेरणा हमारी ओर की हो जाती है, पर यहाँ यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि यह चाह ऊपरी चाह न हो, भीतरी मन की चाह हो। भीतरी मन जिन बातों को चाहता है वे ही बातें हमारे जीवन में घटित होती हैं। जब मनुष्य का भीतरी मन साँसारिक सफलता चाहता है तो उसे साँसारिक सफलता मिलती है, जब वह जीवन चाहता है तो उसे जीवन मिलता है, जब उसके मन में मृत्यु की इच्छा होती है तो मृत्यु भी उसे प्राप्त हो जाती है।
जो मनुष्य समाज की सेवा करना चाहता है उसे सभी प्रकार की परिस्थितियाँ अनुकूल दिखाई देती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियाँ भी हमारे अनुकूल हो जाती हैं। जो व्यक्ति परिस्थितियों से नहीं डरता उससे परिस्थितियाँ डरती हैं और उसके अनुकूल हो जाती हैं। समाज की सेवा कोई दूर की वस्तु नहीं है। वह सब जगह हमारे समक्ष रहती है। यदि कोई मनुष्य समाज की अधिक सेवा न कर अपनी स्त्री का मन ही प्रसन्न करके रखता है, अपने बालकों को सुशिक्षित बनाता है तो वह समाज की भारी सेवा करता है। समाज व्यक्तियों का बना है। समाज के एक भी व्यक्ति को प्रसन्नचित्त करना समाज के अन्य व्यक्तियों के प्रति भारी सेवा है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति को देखकर दूसरे लोग भी प्रसन्न हो जाते हैं। स्वास्थ्य और रोग दोनों ही संक्रामक होते हैं। रोते हुए व्यक्ति रोते हुओं की संख्या बढ़ाते हैं। वे अपना रोग दूसरे लोगों में फैलाते हैं। जो अपने आप सुखी है, वह दूसरे व्यक्ति को भी सुखी बनाता है। जो अपने आप दुःखी है, वह दूसरे को भी दुःखी कर देता है। अतएव संसार के एक भी मनुष्य को प्रसन्न बनाना उसकी भारी सेवा है। मन की प्रसन्नता धन की सम्पत्ति वृद्धि से नहीं आती वरन् आशावाद की वृद्धि और स्वार्थपरता के त्याग से आती है। जो व्यक्ति अपने भाई-बंदों में उन गुणों की वृद्धि करता है, वह धन्य है, उसकी समाज-सेवा अमूल्य है।
वास्तव में मनुष्य समाज की सेवा नहीं करना चाहता। वह उसे अपने स्वार्थ का साधन मात्र बनाना चाहता है। जिस सेवा का ढिंढोरा पीटा जाता है; वही उसे अच्छी लगती है। जिसका ढिंढोरा नहीं पीटा जाता; उससे वह भागता है। पर सच्ची समाज सेवा दूसरे व्यक्तियों के विचारों के परिवर्तन की है। इसके लिए सच्चे आचरण की आवश्यकता है। इस प्रकार का आचरण करना बड़ा कठिन है। यदि एक गृहस्थ अपनी पारिवारिक समस्याओं को हल कर लेता है तो वह दूसरे लोगों को भी अपने आचरण से शिक्षा देता है। इस प्रकार वह सुखी परिवारों की संख्या बढ़ाता है। यहाँ दृष्टिकोण के परिवर्तन मात्र की आवश्यकता है। व्यक्ति अपने लिए जी कर सुखी नहीं रह सकता। अपने सभी कामों को समाज अथवा विश्वात्मा के प्रति समर्पित करने से ही सुखी हो सकता है। समाज के प्रति कल्याण का भाव रखना उसकी भारी सेवा है। दूसरों का सदा कल्याण चाहना, उनकी बाहरी सेवा करने से भी अधिक मौलिक कार्य है। पर यह वही व्यक्ति कर सकता है जो सदा अपनी परिस्थितियों से संतुष्ट रहता है और जिसका मन प्रसन्न है। निराशाग्रस्त व्यक्ति संसार में निराशा का ही प्रचार करता है। जिस व्यक्ति में आत्म विश्वास है, वह दूसरों को भी आत्म-विश्वास प्रदान करता है। समाज की सच्ची सेवा उन्हें अपने ऊपर निर्भर बनाने में कही, उन्हें स्वावलम्बी बनाने, उनमें आत्म-विश्वास उत्पन्न करने में है।
(श्री. स्वामी शरणानंद जी)
आत्म-निरीक्षण अर्थात् प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपने दोषों को देखना आत्म-निरीक्षण का वास्तविक अर्थ है अपने पर अपना नेतृत्व करना। अपना निरिक्षण अपने हुए दोषों की निवृत्ति का सबसे पहिला उपाय है। अपने निरीक्षण के बिना निर्दोषता की उपलब्धि सम्भव नहीं है, क्योंकि निज विवेक के प्रकाश में देखे हुए दोष सुगमता से मिटाए जा सकते हैं।
अपना निरीक्षण करने पर असत्य का ज्ञान एवं सत्य से एकता और प्राप्त बल तथा योग्यता का सदुपयोग स्वतः होने लगता है। यदि हम असत्य को नहीं देख पाएँ अथवा सत्य से अभिन्न एवं अपने कर्त्तव्य से परिचित नहीं हुए तो समझना चाहिए कि हमने अपना निरीक्षण नहीं किया। अपना यथेष्ट निरीक्षण करने पर किसी अन्य गुरु या ग्रन्थ की आवश्यकता ही नहीं रहती, कारण कि जिसके प्रकाश में सब कुछ हो रहा है, उसमें अनन्त ज्ञान तथा अनन्त शक्ति विद्यमान है। अपना निरीक्षण करते-करते प्राणी उससे अभिन्न हो जाता है, जो वास्तव में सब का सब कुछ होते हुए भी सबसे अतीत है। अपना निरीक्षण हमें बल के सदुपयोग और विवेक के आदर की प्रेरणा देता है। बल के सदुपयोग से निर्बलताएँ और विवेक के आदर से अविवेक स्वतः मिट जाता है।
प्रत्येक प्राणी अपने से अधिक बलवानों के किसी भी प्रकार के बल का अपने प्रति सदुपयोग की आशा करता है, पर वह स्वयं अपने प्राप्त बल का निर्बलों के प्रति दुरुपयोग करता है। यह प्राप्त विवेक का अनादर नहीं तो क्या है?
बल का अर्थ है सभी प्रकार के बल अर्थात् तन-बल, धन-बल, विद्या-बल और पद अथवा प्रभुता बल इत्यादि। धन के दुरुपयोग से ही समाज में निर्धनता, शिक्षा अर्थात् ज्ञान, विज्ञान और कलाओं के दुरुपयोग से समाज में अविवेक की वृद्धि, तन-बल के दुरुपयोग से समाज में हिंसा और चोरी, प्रभुता के दुरुपयोग से विरोधी शासन का जन्म आदि दुर्गुणों की वृद्धि होती है।
प्रत्येक प्राणी को अपनी रक्षा स्वभावतः प्रिय है, फिर भी वह स्वयं अहिंसक न रहकर हिंसा में प्रवृत्त होता है, जिससे हृदय वैर भाव से भर जाता है, जो संघर्ष का मूल है। अतः संघर्ष मिटाने के लिए प्रत्येक भाई-बहिन को अपना हृदय वैर-भाव से रहित करना होगा। वैर-भाव से रहित होने के लिए अहिंसक होना अत्यन्त आवश्यक है। अपनी रक्षा की प्रियता का विवेक हमें अहिंसक होने की प्रेरणा देता है, जो अनादि सत्य है, पर आज तो हम वैज्ञानिक आविष्कारों द्वारा हिंसात्मक प्रयोगों से संघर्ष मिटाने की बात सोच रहे हैं, जो सर्वथा असम्भव है, कारण कि विवेक के अनादर से ही प्राणी के मन में संघर्ष उत्पन्न हुआ है। अतएव जब तक विवेकपूर्वक मन का संघर्ष न मिटेगा, तब तक समाज में होने वाले संघर्ष कभी नहीं मिट सकते, चाहे वे वैयक्तिक हो या कौटुम्बिक अथवा सामाजिक।
प्रत्येक अपराधी अपने प्रति क्षमा की आशा करता है और दूसरों को दण्ड देने की ही व्यवस्था चाहता है। वह अपने प्रति तो दूसरों से अहिंसक निर्वैर, उदार, क्षमाशील, त्यागी, सत्यवादी और विनम्रता आदि दिव्य गुणों से पूर्ण व्यवहार की आशा करता है, किन्तु स्वयं उसी प्रकार का सद्व्यवहार दूसरों के प्रति नहीं कर पाता। अपने प्रति मधुरता युक्त सम्मान की आशा करता है, पर दूसरों के प्रति अपमान एवं कटुतापूर्ण असद्व्यवहार करता है, जो वास्तव में भूल है। इसका परिणाम यह होता है कि प्राणी अपने प्रति रागी और दूसरों के प्रति दोषी हो जाता है, जो सभी दुखों का मूल है।
अपने प्रति होने वाले अन्याय को सहन करते हुए यदि अन्यायकर्त्ता को क्षमा कर दिया जाय तो द्वेष प्रेम में बदल जाता है और अपने द्वारा होने वाले अन्याय से स्वयं पीड़ित होकर जब उससे (जिसके प्रति अन्याय हो गया है) क्षमा माँग ली जाय और इस प्रकार उससे क्षमा माँगते हुए अपने प्रति न्याय कर स्वयं दंड स्वीकार कर लिया जाय तो राग त्याग में बदल जाता है।
जब राग और द्वेष त्याग और प्रेम में बदल जाते हैं; तब मुक्ति और भक्ति की प्राप्ति स्वतः हो जाती है। अथवा यों कहो कि अभिन्नता और असंगता स्वतः आ जाती है। यही वास्तविक आनंद है।
अपना निरीक्षण करने पर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि जब हम राग से प्रेरित होकर इन्द्रियों की ओर गतिशील होते हैं तब इन्द्रिय जन्य ज्ञान के आधार पर हमें अनेक प्रकार की विषमताओं का भास होता है और इन्द्रिय जन्य स्वभाव में प्रवृत्त होने से हम क्रिया जन्य सुख की आसक्ति तथा परतन्त्रता, जड़ता आदि में भी आबद्ध हो जाते हैं। इतना ही नहीं, अन्त में हम शक्ति-हीनता का अनुभव कर स्वाभाविक विश्राम अर्थात् निवृत्ति को अपनाते हैं, जिसके फलस्वरूप शक्ति -हीनता मिटती जाती है और बिना प्रयत्न के ही आवश्यक शक्ति की उपलब्धि होती जाती है।
यदि शक्ति-हीनता, जड़ता, विषमता इत्यादि दुःखों से दुःखी होकर हम निवृत्ति द्वारा संचित शक्ति का व्यय न करके विषयों से विमुख होकर अन्तर्मुख हो जावें, तो भोग योग में, जड़ता चेतना में, विषमता समता में, पराधीनता स्वाधीनता में और अनेकता एकता में बदल जाती है। फिर स्वाभाविक आवश्यकता की पूर्ति एवं अस्वाभाविक इच्छाओं की निवृत्ति स्वतः ही हो जाती है जो मानव की माँग है।
अपनी वर्तमान वस्तुस्थिति का यथेष्ट स्पष्ट परिचय प्राप्त करना ही वास्तविक आत्म-निरीक्षण है। उसके बिना हम अपने को निर्दोष बना ही नहीं सकते। मानव में दोष-दर्शन की दृष्टि स्वतः विद्यमान है, पर प्रमादवश प्राणी उसका उपयोग अपने जीवन पर न करके अन्य पर करने लगता है जिसका परिणाम बड़ा ही भयंकर एवं दुःखद सिद्ध होता है। पराये दोष देखने से सबसे बड़ी हानि यह होती है कि प्राणी अपने दोष देखने से वंचित हो जाता है और मिथ्याभिमान में आबद्ध होकर हृदय में घृणा उत्पन्न कर लेता है यद्यपि हृदय प्रीति का स्थल है, घृणा का नहीं– पर ऐसा तभी सम्भव है जब मानव पराए दोष न देखकर अपने दोष देखने में सतत् प्रयत्नशील बना रहे। अपने तथा पराये दोष देखने में एक बड़ा अन्तर यह है कि पराए दोष देखते समय हम दोषों से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं, जिससे कालान्तर में स्वयं दोषी बन जाते हैं, पर अपना दोष देखते ही हम अपने को दोषों से असंग कर लेते हैं, जिससे स्वतः निर्दोषता आ जाती है जो सभी को प्रिय है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है कि दोष-दर्शन की दृष्टि का उपयोग केवल अपने ही जीवन पर करना है, किसी अन्य पर नहीं।
यद्यपि अनादि सत्य बीज रूप से प्रत्येक मानव में विद्यमान है, पर उसका आदर न करने से प्राणी उस सत्य से विमुख हो गया है और परिवर्तनशील वस्तु, अवस्था एवं परिस्थितियों में आबद्ध होकर उसने अपने को दीन-हीन तथा अभिमानी और परतंत्र बना लिया है। इस दुःखद बंधन से छुटकारा पाने के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि प्राणी प्राप्त विवेक के प्रकाश में (जो चिर सत्य है) अपनी दशा का निरीक्षण करे और वस्तु, अवस्था आदि से असंग होकर दुराचार को सदाचार में परिवर्तित करके अपने को निर्विकार बनाए।
यह प्रत्येक मानव का अनुभव है कि दृश्य का सम्बन्ध सुख-दुःख में आबद्ध करता है और दृश्य से असंग होने पर किसी प्रकार का दुःख शेष नहीं रहता। प्रिय से प्रिय वस्तु तथा व्यक्ति से सम्बन्ध स्वीकार करने पर भी प्राणी अपने को अलग करना चाहता है कारण कि सबसे अलग हुए बिना वह चिर-शान्ति तथा शक्ति नहीं पाता जो उसे स्वभाव से ही प्रिय है। यह निर्विवाद सिद्ध है कि प्राणी प्रिय से प्रिय प्रवृत्ति से थककर गहरी नींद के लिए प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु आदि से अलग होना चाहता है। यद्यपि सुषुप्ति में किसी भी प्रकार का वैषम्य तथा दुःख शेष नहीं रहता, तथापि उससे भी प्राणी स्वयं उपराम हो जाता है और किसी ऐसी अवस्था की खोज करता है जिसमें सुषुप्ति के समान साम्य तथा दुःख रहितता तो हो, किन्तु संज्ञाशून्यता न हो। उस स्थिति के उपलब्ध हो जाने पर जब वह उससे भी उत्थान देखता है, तब उत्थान रहित; अलौकिक, अनन्त, नित्य, चिन्मय जीवन के लिए व्याकुल होता है अर्थात् निर्विकल्प स्थिति से परे निर्विकल्प बोध की लालसा करता है, जो सभी अवस्थाओं से अतीत और स्वतः सिद्ध है। इस स्वतः सिद्ध अनन्त जीवन की रुचि मानव मात्र में स्वभाव से ही विद्यमान है। इसके लिए सभी अवस्थाओं से विमुख होना अनिवार्य है। अवस्थाओं से विमुख होते ही इस अवस्थातीत जीवन का अनुभव हो जाता है।
अपना निरीक्षण ही वास्तविक सत्संग, स्वाध्याय और अध्ययन है कारण कि अपने निरीक्षण के बिना प्राणी किसी ऐसे सत्य तथा तत्त्व एवं ज्ञान की उपलब्धि ही नहीं कर सकता जो उसमें स्वयं न हो। अतः अपने निरीक्षण द्वारा ही हम वास्तविक सत्य तथा तत्त्व एवं ज्ञान को उपलब्ध कर सकते हैं।
अपना निरीक्षण करते ही जिस विवेक से असत्य का दर्शन होता है, वही विवेक उसे सत्य से अभिन्न भी कर सकता है और उसी के द्वारा सत्य से अभिन्न और असत्य से निवृत्त होने का उपाय प्राप्त होता है। आत्म-निरीक्षण के बिना कोई भी सद्ग्रन्थ तथा सद्गुरु से मिला प्रकाश अपने काम नहीं आता। वह केवल मस्तिष्क का संग्रह बन जाता है जो कि नक्शे की नदी के तुल्य है। प्रत्येक नक्शा हमें वास्तविकता तक पहुँचाने का साधन आवश्यक है, परन्तु उसे देखकर संतोष करने से न तो एक बूँद जल मिलेगा न प्यास बुझेगी।
अपने निरीक्षण के साथ-साथ ही हमें सद्ग्रन्थ तथा सत्पुरुषों के प्रकाश का उपयोग करना चाहिए। आत्म-निरीक्षण द्वारा जब हम अपनी सभी प्रियताओं को जान लेते हैं, तब फिर हमारे द्वारा कोई ऐसी चेष्टा नहीं होती जिसमें दूसरों की प्रियता तथा हित निहित न हो।
जब हम प्राप्त विवेक के प्रकाश में अपनी वर्तमान वस्तु-स्थिति का विश्लेषण करते हैं, तब हमें भोगों की इच्छा अर्थात् इन्द्रिय जन्य स्वभाव में प्रवृत्ति तथा वास्तविक स्वाधीनता अर्थात् वस्तु अवस्था एवं परिस्थितियों से अतीत जीवन की अभिलाषा- ये दो बातें दिखाई देती हैं, जिन्हें भोग इच्छा कहते हैं। उनकी उत्पत्ति एक मात्र ‘यह’ को ‘मैं’ स्वीकार करने पर अथवा ‘यह’ को ‘अपना’ मानने पर होती है। यद्यपि ‘यह’ को ‘मैं’ मान लेना निज ज्ञान के विपरीत है फिर भी हम उस ज्ञान का अनादर करके ‘यह’ से तद्रूप होकर अपने को भोग-वासनाओं में आबद्ध कर लेते हैं, जो सभी दुःखों का मूल है। ‘यह’ को ‘मैं’ मान लेने पर ही ‘यह’ की सत्यता दृढ़ होती है और ‘यह’ को ‘अपना’ मान लेने पर ‘यह’ के प्रति प्रियता उत्पन्न होती है जो धीरे-धीरे कालान्तर में आसक्ति का रूप धारण कर लेती है। ‘यह’ सत्यता और प्रियता में आबद्ध प्राणी अपने वास्तविक नित्य जीवन से विमुख हो जाता है। ‘यह’ के न रहने पर भी जो रहता है अथवा जब ‘यह’ नहीं था तब भी जो था एवं जिसके प्रकाश से ‘यह’ प्रकाशित है वही वास्तव में अपना नित्य अनन्त जीवन है उस नित्य जीवन के अनुभव बिना किसी को भी चिर शान्ति एवं स्थायी प्रसन्नता नहीं मिल सकती– यह निर्विवाद सिद्ध है।
यदि प्राणी निज विवेक के प्रकाश में ‘यह’ को ‘मैं’ स्वीकार न करे और न ‘यह’ को ‘अपना’ माने तो स्वाभाविक ही निर्वासना आ जाती है, क्योंकि फिर सीमित अहंभाव शेष नहीं रहता और उससे अभिन्नता हो जाती है, जो भक्तों का भगवान् तत्त्ववेत्ताओं का निज स्वरूप, योगियों का योग तथा सभी का सब कुछ है।
‘यह’ और ‘मैं’ का विभाजन ‘है’ से अभिन्न करने का उपाय है। जिस प्रकार हल्दी और चूना मिलने से लालिमा उत्पन्न होती है और दोनों के विभाजन से लालिमा मिट जाती है, उसी प्रकार ‘यह’ और ‘मैं’ के विभाजन से ‘अहं’ और ‘मम’ रूपी लालिमा सदा के लिए मिट जाती है और केवल अनन्त नित्य जीवन ही शेष रहता है जो वास्तव में मानव की माँग है।
भौतिकवादी ‘मैं’ और ‘वह’ में विलीन कर जड़ता में आबद्ध हो जाते हैं। आस्तिकवादी ‘यह’ और ‘मैं’ को ‘वह’ में विलीन कर दिव्य चिन्मय हो जाते हैं और अध्यात्मवादी ‘यह’ और ‘वह’ को ‘मैं’ में विलीन कर अभिन्न हो जाते हैं।
भौतिकवाद वासनाओं में आबद्ध करता है। आस्तिकवाद केवल प्रेम ही प्रेम शेष रखता है। अध्यात्मवाद अपने में ही सब कुछ पा लेता है।
भौतिकवाद देहाभिमान को पुष्ट करता है और कर्म-जाल में आबद्ध कर प्राणी को सुखी-दुःखी बनाता है। आस्तिकवाद प्राणी को सुख-दुःख से अतीत अखंड अनन्त रस प्रदान करता है और अध्यात्मवाद प्राणी को अखंड एक रस प्रदान करता है।
भौतिकवाद की पराकाष्ठा आस्तिकवाद अथवा अध्यात्मवाद को जन्म देती है।
भौतिकवाद में प्राणी तभी तक आबद्ध है, जब तक ‘यह’ का वास्तविक स्वरूप जान नहीं पाता अथवा यों कहो कि ‘यह’ से अतीत के जीवन पर विश्वास नहीं करता अथवा यों कहो कि ‘यह’ की दी हुई वस्तुएँ ‘यह’ को वापिस नहीं करता अर्थात् ‘यह’ का ऋणी रहता है।
सारी सृष्टि ‘यह’ के अर्थ में आ जाती है। शरीर संसार रूपी सागर का एक बिन्दु मात्र है। अतः शरीर रूपी बिन्दु को संसार रूपी सागर की सेवा में लगा देना ही शरीर का सर्वोत्कृष्ट सदुपयोग है, कारण कि व्यक्तिगत जीवन समाज के अधिकारों का समूह मात्र है और कुछ नहीं। जब प्राणी समाज के अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए अपने अधिकार को भूल जाता है, तब आस्तिकवाद और अध्यात्मवाद में उसका स्वतः प्रवेश हो जाता है और फिर बड़ी सुगमतापूर्वक ‘यह’ और ‘मैं’ का विभाजन हो जाता है। प्राणी अधिकार लोलुपता के कारण ही ‘यह’ में आबद्ध हो गया है। यदि प्राप्त विवेक के प्रकाश में प्राणी उन सभी इच्छाओं का अन्त कर दे जिनमें समाज का हित और प्रसन्नता निहित न हो तो बड़ी सुगमतापूर्वक उसका मन निर्विकल्प हो जाता है। मन के निर्विकल्प होते ही बुद्धि सम हो जाती है। बुद्धि के सम होते ही आवश्यक शक्ति का विकास होता है। फिर प्राणी अपनी स्वाभाविक लालसा को पूरा कर कृत कृत्य हो जाता है। उसका जीवन निर्वासना, निवैरता, निर्भयता, समता, मुदिता आदि गुणों से परिपूर्ण हो जाता है अथवा यों कहो कि वह अपना निर्माण कर लेता है। इस प्रकार व्यक्ति के निर्माण से स्वतः ही सुन्दर समाज का निर्माण होने लगता है। अतः अपने निरीक्षण द्वारा अपने को निर्दोष बनाना परम अनिवार्य है।
अपना निरीक्षण करने पर हमें यह भली-भाँति विदित हो जाता है कि प्राप्त शक्ति का सद्व्यय प्राणियों को स्वभाव से ही प्रिय है, करण कि जब कोई हमारे साथ व्यवहार करता है यदि उसमें किसी प्रकार का दोष हो तब हम उसके उस व्यवहार को उचित नहीं मानते यद्यपि वही व्यवहार प्रमादवश इस स्वयं दूसरों के प्रति कर बैठते हैं।
(श्री. वीरेन्द्र मालवीय)
जगत् की प्रत्येक घटना बुद्धिपूर्वक हो रही है यह भी स्पष्ट दिखलाई पड़ता है। सारी की सारी प्रकृति एक अद्भुत नियमितता से संचलित हो रही है। और यदि हम मानव रुचि का अध्ययन करें तो उसके सर्वतोमुखी होने के साथ ही उस अनन्तता में भी वह किसी विशेष आनन्द की अनुभूति में निमग्न एवं क्रियमाण दीख पड़ेगी। यह सब क्यों? इसलिए कि वास्तव में यह जगत् सत्यमय है। त्याग के उपदेशों की आँधी में उड़ाकर भी त्यागी समुदाय मानव को ‘ग्रहण’ की ओर से विमुख न कर सके। इसका कारण भी यही है, कि संसार में ‘गीता’ का ‘मैं’ हर वस्तु में रस-रूप बनकर बैठा है तथा आनन्द बनकर रमा हुआ है। और इसी लिये मानव, त्याग का रूखा उपदेश नहीं सुनना चाहता। वह अपने रसिक हृदय को इस प्राप्ति की क्रिया में लीन रखेगा; या निष्क्रिय बैठा रहेगा? वह आनन्द के सागर में गोता लगाएगा या रूखी कल्पना एवं बुद्धि की शुष्क उलझन में फंसा रहेगा? जगत् में सत्य और असत्य, प्रकाश और अन्धकार ज्ञान और अज्ञान, प्रेम और अमृत यह सब तत्व कुशलता के साथ मिले हुए हैं, इसी लिये संसार को मथकर उसमें से मक्खन निकालने, और उसका सेवन करके अपनी आत्मतृप्ति करने की क्रिया को परम पुरुषार्थ माना है, और यह परम पुरुषार्थ संसार से घृणा करके दूर भागने से सिद्ध नहीं हो सकता।
स्त्री, पुत्र, समाज और राष्ट्र, तथा जीवन यात्रा को सुगम बनाने वाले समस्त साधनों को मिथ्या मान लेने से भी उक्त कार्य की सफलता सम्भव नहीं। इसीलिये भारतवर्ष के उन्नतमना, अतुलनीय ऋषि−मुनियों ने संसार में बुद्धिपूर्वक गति करने की मंत्रणा मनुष्य को दी है। चारों आश्रमों की व्यवस्था, वर्ण धर्म की मर्यादा, सदाचार, न्यायशीलता, आत्मसाधन समस्त प्राणियों एवं वस्तुओं में ब्रह्म की व्यापकता को स्वीकार करना तथा सब में स्वत्व का दर्शन, एवं अनुराग तथा प्रेम प्रदर्शन करना, कर्मशीलता इत्यादि को आवश्यक बतलाया है। व्यक्तित्व का निर्माण, सात्विक जीवन की साधना, मधुर पारिवारिक जीवन के उत्तरदायित्व का निर्वाह, आदर्श सामाजिक जीवन, विश्वकल्याण की विराट भावना यह सब क्या है? यह है जगत में सत्य तत्व का दर्शन करके उसमें अपनी तद्रूपता का समावेश करना और उसमें रमे हुए महान आध्यात्म रस- आनन्द या ब्रह्मानन्द का ध्यान करना। और यह सब संसार की उपेक्षा या घृणा से सम्भव नहीं है।
इसमें सन्देह नहीं कि एक प्रश्न और भी हमारे सामने है और वह यह कि दुःख क्या है? असन्तोष क्या है? अशान्ति क्या है? और घात एवं मृत्यु क्या है? इन सबके उत्तर में हमें यही कहना है कि सम्यक् दृष्टि के आदर्श से गिरकर, कर्म से भ्रष्ट होकर जब व्यक्ति कष्ट की संकुचित मनोवृत्ति के घेरे में आ जाता है तब वह अपने को अद्भुत-अकेलेपन में या लघुरूप में पाता है और साथ ही उस लघुता का लघु आनन्द भी चाहता है। उस लघुता का आनन्द उसे पर्याप्त सन्तोष नहीं दे पाता, इसलिये उसकी संकुचित मनोवृत्ति उसे और भी अधिक आनन्द की प्राप्ति के लिये बाध्य करती है और समष्टि से भ्रष्ट हुआ अल्पज्ञ मानव वह अपनी संकुचित इच्छा की पूर्ति के लिये, संकुचित स्वेच्छाचारी प्रयत्न का आश्रय लेने के कारण समष्टि के स्वार्थों से टकरा जाता है। इस टक्कर में होने वाले परिणाम को ही वह दुःख, असन्तोष, अशान्ति इत्यादि कहता है और उस संघर्ष में पिस जाने का नाम उसने मृत्यु रखा है। किन्तु जिसने समष्टि हितवाद को और ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ को ही सत्य मान रखा है। वह तो प्रलय का झूला झूलते समय भी अपने को सनातन, अमर पुरुष मानता है और उसके ओठों से सन्तोष एवं सुख की स्मित रेखा छलकती दीखती है, उसके मुखमण्डल पर शान्ति की ज्योति चमकती हुई दिखाई पड़ती है।
अतः ऐसी आशा की ज्योति से चमकते हुए ग्रहण करने योग्य संसार को त्यागकर जिन्होंने अपने को निराशावादी मान लिया है, वे तो वास्तव में अनात्म दृष्टि की दुःख की खाई में पड़े हुए तड़पेंगे ही। अतः यदि वे परम शान्ति चाहते हैं तो उन्हें संसार मन्दिर से दूर भागने की आवश्यकता नहीं। और अलग जाएँगे भी कहाँ? क्या संसार से भी बाहर कोई स्थान है? यह प्रकाश मण्डल में चमकने वाला नक्षत्र, समाज, यह व्योम, यह समुद्र, यह विराट पृथ्वीतल, छोड़े भी जा सकते हैं! इनसे विमुख भी हुआ जा सकता है? नहीं! यहीं तो राधा और माधव अनन्त होकर महान रास खेल रहे हैं। यहीं तो शुद्ध अद्वैत; द्वैत का अभिनय कर रहा है। यहीं तो वह न्यायाधीश न्याय की कचहरी लगाए बैठा है, यहीं तो वह आप, सत्य रमा हुआ है। यहीं तो वह महान प्रेमी प्रेम का आस्वादन कर रहा है, और यहीं तो वह विराट निराकार अपनी विराट साकारता की झाँकी करवा रहा है। इसीलिये तो कबीर ने देखा और कहा—“मुझको तू कहाँ खोजे बन्दे; मैं तो तेरे पास में।” इसीलिये तो नानक ने कहा—“प्रभुजी हम दीपक तुम बाती, जाकी ज्योत बरे दिन राती।” सूरदास, तुलसी इन सबने यहीं सब कुछ देख लिया था। और सबकी सेवा को अपना आदर्श बनाया था। इन समस्त स्त्री-पुरुषों के रूप में, पशु-पक्षी और समस्त जीवों के रूप में तथा प्रत्येक इस विराट उद्यान में खिलने वाले पुष्प में रूप, रस और गन्ध के रूप में; सूर्य में तेज, चन्द्र में अमृत, पृथ्वी में रस, जल में प्राण, वायु में गति, आकाश में व्यापकता और वस्तुओं में तत्व रूप कौन है? औषधियों में गुण रूप से कौन समाया हुआ है? वही! इसलिये उपेक्षा, घृणा; दुःख, असन्तोष अशान्ति की ओर बढ़ना भी दुर्बल एवं दूषित मनोवृत्ति का ही परिचायक है! अज्ञता का ही प्रतिबोधक है।
त्याग करो! इसका यह अर्थ नहीं कि संसार को ही छोड़ दो! आत्महत्या कर लो! बल्कि त्याग का अर्थ संकुचित मनोवृत्ति के घेरे से निकलकर, विराट की रंगभूमि में प्रवेश करना है। संसार दुःखमय नहीं, संसार में बुद्धिपूर्वक मर्यादा का विवेक किये बिना गति करना दुःख का कारण है। स्त्री पाप की जड़ नहीं! भोग दृष्टि में लय हो जाना और स्त्री में ब्रह्म तत्व का न देखना! पतन का कारण है। प्रत्येक वस्तु का दुरुपयोग ही अशान्ति का कारण है! संसार को ग्रहण कीजिए बुद्धिमत्ता के साथ, संसार के भोगों को भोगिये मर्यादा के साथ! तब आपको न दुःख का सामना करना पड़ेगा, न असन्तोष का। रही मृत्यु की बात, तो वह अवश्य जन्म के साथ लगा हुआ जीवन शक्ति का सा नियम है। इससे भी छुटकारा पाया जा सकता है। ऐसी भी क्रियाएँ हैं। और वह क्रियाएँ आज से हजारों वर्षों पूर्व ही आविष्कार में आ चुकी हैं। आज भी वे जानी जा सकती है। जिनमें जानने की सच्ची उत्कण्ठा है, वे जाने बिना नहीं रहते।
भारतीय संस्कृति में सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यही तो है कि वह हमें उस वस्तु का दर्शन कराती है, जो सृष्टि के आरम्भ में भी थी, आज भी है और भविष्य में भी प्रलय-पर्यन्त रहेगी। इसीलिये उसे सनातन धर्म कहते हैं। यह सनातन धर्म अमर है, शाश्वत है। इसे मारने वाले मर जाते हैं। क्योंकि सनातन पुरुष स्वयं सुदर्शन चक्र हाथ में धारण कर इसकी रक्षा करते हैं। जब अन्धकार अपनी काली घटा के साथ छा जाता है, तब प्रभात में सूर्य की ज्योति चमक कर उसे न जाने कहाँ छिपा लेती है। और सन्ध्या को फिर वही ज्योति न जाने कहाँ चली जाती है। मानो, यहाँ इस रंगभूमि में प्रकाश और अन्धकार, ज्ञान और अज्ञान अथवा सत्य और असत्य आँख-मिचौनी खेल रहे हैं। कभी अंधेरे में सत्य छिप जाता है तब असत्य उसे खोजता है और जब उसे वह नहीं मिलता, तब वह हारकर यह मान लेता है कि अब मैं ही हूँ। अब मेरा ही जगत् में राज्य है। परन्तु ताली बजाकर सत्य उसे चौंका देता है। यही संसार के रूप में संसार पति की सनातन लीला हो रही है। और इस लीला में सत्य क्या है, यह सब स्पष्ट दृष्टिमान हो रहा है। आज जगत का वातावरण इतना विषम क्यों है? एक राष्ट्र की जनशक्ति दूसरे राष्ट्र की जनशक्ति के साथ सहयोग और प्रेम-भावना का प्रयोजन करते हुए जीवन धारण करने की अपेक्षा, संघर्ष की नीति का अवलम्बन क्यों कर रही है? इसका कारण जानने का कभी उद्योग किया है? यदि करें तो मूल में जो भूल मिलेगी, वह विचारवानों की जगत् के प्रति उपेक्षा वृत्ति ही होगी। आत्मसुख एवं मोक्ष के नाम पर भारत के अपरिपक्व आध्यात्म-विचारधारा में बहने वाले वैरागी, त्यागी एवं संन्यासी समुदाय ने, जगत को नियंत्रित रखते हुए गति करने के, अपने कर्त्तव्य को विस्मृत कर दिया था।
शासन-सत्ताओं में जहाँ वे प्राचीन काल में मन्त्रिमण्डलों में योग देकर राष्ट्र संचालन करते थे, वहाँ मध्यकाल के महापुरुषों ने इस योग्यता के उत्तरदायित्व को भुला दिया था। संसार से केवल भोजन मात्र का ही उनका नाता रह गया था। अयोग्य व्यक्ति राष्ट्र एवं समाज का अमर्यादित संचालन करने लगे थे, वासनाएं, तृष्णाएं, लोभ, जीवन में विषमता ला रही है, इस पर उनका ध्यान नहीं जाता था। क्योंकि उन्होंने संसार में सम्मिलित होना, उसके कार्यों में योग देना अपने उच्च पद से गिरना एवं दुःख का कारण मान रखा था। वे संसार के वातावरण से घृणा करते और लोगों में उसके प्रति घृणा का भाव फैलाकर उन्हीं की तरह मोक्षवादी भिक्षुक बनाने का उद्योग करते थे। इस प्रकार उनके इस घृणावाद से संसार का वातावरण दुःख, अशान्ति और असन्तोष से कलुषित हो गया है। संसार को आदर्श की दीक्षा देते हुए, उसका पथ-प्रदर्शन करते रहते तो उसकी यह दशा न होती, और वह दुःखमय न कहलाता। संसार सुखमय है किन्तु पुरुषों ने उसे दुःखमय बना डाला है।
(प्रो. मोहनलाल वर्मा)
सब जातियों, सब धर्मों, तथा मतों से भी ऊँची एक भावभूमि है, एक ऐसा स्तर है, जहाँ आकर हम सब एक समान भूमि पर एक दूसरे के निकट आ जाते हैं, तमाम भेद भाव भूलकर एक हो जाते हैं और प्रत्येक व्यक्ति समान रूप से हमारे साथ उठने बैठने, खाने पीने, बातचीत करने का अधिकारी हो जाता है। यह मानवता की भूमि है।
हम सब मनुष्य हैं। मानव जाति के सदस्य हैं। एक पिता मनु की सन्तान हैं। हमारा मूल एक है। इस मनुष्यता के नाते हम सबको व्यर्थ के भेदभाव त्याग कर प्रेम से भ्रात्रभाव प्रसार करते हुए समभाव से रहने की प्रेरणा प्राप्त होती है। हमारी इंसानियत हमें एक दूसरे भाई से प्रेम, सौजन्य और सहानुभूति की रज्जु में बाँधती है।
अफ्रीका का काला काला बदसूरत हबशी, पाश्चात्य देशों के श्वेत रंग के सुन्दर व्यक्ति , गेहुँवा रंग के हम भारतवासी, छोटी छोटी आँखों वाले चीनी और जापानी, मलाया के जंगली- तथा लाखों अन्य प्रकार के नाना देशों, जलवायु और अच्छी परिस्थितियों में रहने वाले हमारे असंख्य भाई बहिन—सभी एक दूसरे के आत्म-स्वरूप हैं। इंसानियत की दृष्टि से कोई भी आदमी—चाहे वह जैसा हो—हमारा प्रिय बन्धु है। एक ही रक्त, माँस, मज्जा, अस्थि से बना है।
वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूत। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च।
जिस प्रकार इस लोक में प्रविष्ट हुआ वायु प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतों का एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरूप हो रहा है और उनसे बाहर भी है।
सबमें एक ही आत्मा है, जो विभिन्न मानव शरीरों में प्रकट हो रहा है। एक ही ईश्वर सर्वत्र चमक रहा है। न रंग, न रूप, न दर्जा, न देश हमें मानवता से कोई भी पृथक नहीं कर सकता। सुन्दर असुन्दर, काला गोरा, पढ़ा न पढ़ा सब एक ही वृक्ष की शाखाएं हैं—
“कुदरत के सब बन्दे, एक ही नूर से सब जग उपज्या। कौन भले, कौन मन्दे?”
जिस दिन प्रत्येक मनुष्य संकीर्णता और कृत्रिम भेदभाव के इस मायाजाल को त्याग कर सभ्यता के आवरण में पनपने और पलने वाले इस ऊँच नीच, जाति पाँति के भेदभाव को त्यागकर इंसान, वास्तविक मनुष्य होना पसन्द करेगा, मानवता की प्रशस्त भूमिका में उठ सकेगा, इंसान इंसान का भाई है—इस महासत्य को व्यवहार में ला सकेगा, उस दिन हमारे समाज से सब प्रकार की कटुता, क्षुद्रता एवं साम्प्रदायिकता, विषमता की समस्या का हल केवल इसी महौषधि—ऐक्य और पारस्परिक सद्भाव—द्वारा संभव है।
मानव जब साम्प्रदायिक संकीर्णता में फँसकर अपने मानवत्व को ठुकरा देता है, तो दानव हो जाता है, अपनी उच्च स्थिति से गिरकर राक्षस या पशु बन जाता है। वह ऐसे ऐसे कुकृत्य करता है, जिससे सारा घुलोक काँप उठता है। इसके विपरीत जब वह भेदभाव को त्याग जाति पाँति, और ऊँच नीच से ऊँचा उठता है, मानवत्व से भी ऊँचा उठ जाता है, तो वह देवता बन जाता है। ऐसा व्यक्ति जो सबको समरूप देखता है, मानव मात्र का कल्याण करता है और अन्त में भगवान् में लय हो जाता है। कहा भी है—
“ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूत हितेरताः”
अर्थात् सब प्राणियों के कल्याण करने में लगे हुए व्यक्ति ही मुझे (ईश्वर) प्राप्त होते हैं।
प्रत्येक धर्म हमें एक दूसरे के मत, विश्वास, पूजा के प्रति सहिष्णु बनने का उपदेश दे रहा है। प्रत्येक धर्म के नेता हमें संकुचितता त्याग कर उदारता ग्रहण करने की सलाह दे रहा है। वे हमें अपने भेदभाव की क्षुद्रताओं से ऊँचा उठने का आदेश दे रहे हैं। मानवता के स्तर पर सबको एक साथ रहने का उपदेश दे रहे हैं।
जो व्यक्ति साम्प्रदायिकता उत्पन्न कर मनुष्यों में भेदभाव उत्पन्न करते हैं, भाई भाई को परस्पर लड़ाते हैं, वे चाहे किसी धर्म के हों, चाहे कितने ही विद्वान् हों, नास्तिक ही कहलाने के अधिकारी हैं। भेद मनुष्य की बाह्य दृष्टि से ही दीखता है। आन्तरिक दृष्टि से सब में वही दैवी स्फुल्लिंग, वही आत्मा विराजमान है, वही ईश्वर अपने सब गुणों में आसीन हैं। यदि मानव आकृतियों में आपको कुछ अन्तर दीखता है, तो वह केवल नीरसता से बचने के लिए है।
हमें चाहिए कि किसी मनुष्य का केवल बाह्य परिवर्तन, वेश भूसा, जाति वर्ण विचारों, दृष्टिकोण, स्वार्थों को दृष्टि में रखकर उसके हृदय में विराजमान आत्मा को न विस्मृत कर बैठें, इंसानियत को न कुचल डालें। दुर्भाग्यवश देश में जो साम्प्रदायिक झगड़े या हत्याएं हुई हैं, वे मनुष्य की असहिष्णु वृत्ति की द्योतक हैं। जो लोग असहिष्णुता के आधार पर अपनी जाति की कल्याण कामना या उन्नति देख रहे हैं उन्हें कदाचित यह ज्ञात नहीं कि वे एक संकीर्णता में फँसकर अपने सर्वस्व नाश का विधान कर रहे हैं।
संकीर्णता या सीमा बन्धन स्वयं हमने ही अपनी अल्पबुद्धि के कारण उत्पन्न किया है। यह मनुष्य की अधूरी दृष्टि का ही कुपरिणाम है। स्वास्थ्य, स्वच्छता या नैतिकता के कारण कुछ भेदभाव न्यायोचित माना जा सकता है, किन्तु ऐसी अवस्था में हमारा यह कर्तव्य हो जाता है कि अपने बिछड़े हुए भाइयों को ऊँचा उठाने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करें।
निश्चय जानिये, सीमा बन्धन जगतपिता-परमात्मा में लेशमात्र भी नहीं है। प्रभु की इच्छा है उसके सभी पुत्रों को, अपनी मानसिक, बौद्धिक, नैतिक या शारीरिक शक्तियों को विकसित करने का समान रूप से अवसर प्राप्त हो। वे सब विश्व बंधुत्व की पवित्र रज्जु में भाई चारे से रहें और सब के सब पूर्ण समृद्धिशाली बनें।
हम सब महान् पिता के महान् पुत्र हैं। हम सब एक हैं। साम्प्रदायिकता तथा संकीर्णता मनुष्य, जाति तथा राष्ट्र की प्रगति में बाधक हैं। अतः इस बुराई को स्वयं छोड़ देना चाहिए और अन्य व्यक्तियों से भी छुड़ाने के लिए आन्दोलन करना चाहिए। हमारा समाज आज छोटे छोटे अनेक उपजातियों में विपन्न हो कर पंगु बन गया है। उसे एकता से संगठित करने के लिए हमें समता, प्रेम, बंधुत्व की भावना बढ़ानी चाहिए। यही गीता और भारतीय धर्म की उच्च भावना है। ऊँच नीच की भावना, मनुष्य का दूसरे मनुष्य से घृणा, और जातिवाद का गुण कर्म स्वभाव की उपेक्षा करने वाला वर्तमान रूप प्राचीन धर्म के मूल सिद्धान्तों से मेल नहीं खाता। हमारा धर्म हमें हृदय की उदारता सिखाता है। सबको प्रेम से साथ रहने की शिक्षा देता है। हृदय की उदारता के बिना भारत प्रगति नहीं कर सकता। भारत का धर्म हृदय-धर्म है, आत्म-परमात्म धर्म है। हम केवल अपनी उन्नति या लाभ नहीं चाहते, वरन् सबकी, मनुष्य मात्र की उन्नति चाहते हैं। .
(श्री. डाक्टर दीवानचन्द्र)
मलेरिया सम्भवतः मानव जाति के लिये सबसे बड़ा अभिशाप है। इस रोग के प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रभाव से कई लाख व्यक्ति प्रत्येक वर्ष मरते हैं, किन्तु यह तो मलेरिया से होने वाली अल्पतम क्षति है। मलेरिया से मरने वाले प्रत्येक व्यक्ति के कारण बीसों व्यक्ति ऐसे होते हैं जो इस रोग द्वारा शरीर और मस्तिष्क से अशक्त हो जाते हैं और उनका जीवन दुखमय हो जाता है। मलेरिया से वर्तमान खाद्यान्न अभाव के अतिरिक्त हमारे नवयुवकों की उपयुक्त शिक्षा और देश की उन्नति एवं विकास में बहुत बड़ी बाधा उपस्थित है। यह हमारे समाज तथा व्यक्तियों की कार्यक्षमता, शक्ति और क्रियाशीलता को कम कर देता है।
विशेष मौसम में मलेरिया का आक्रमण होने के कारण यह रोग ग्रामवासियों का सबसे घातक शत्रु बन गया है। यह उनके सामाजिक एवं आर्थिक जीवन को बहुत अधिक क्षति पहुँचाता है। हमारे प्रान्त में मलेरिया फैलने का समय 5 जुलाई से 15 नवम्बर तक रहता है। विशेष मौसम में मलेरिया फैलने के कारण ये है:– मलेरिया फैलने वाले कुछ विशेष प्रकार के मच्छरों का होना, एक विशेष अवधि में मच्छरों की उपस्थिति और तापमान तथा नमी। विशेष रूप से वर्षाकाल में तथा उसके बाद के कुछ महीनों में ये मच्छर अधिक पाये जाते हैं। अप्रैल, मई तथा जून में कुछ दिनों तक जब गर्मी अधिक पड़ती है साधारणतया प्रौढ़ मच्छर इतने समय तक जीवित नहीं रहते कि वे रोग फैला सकें। अतएव उनके रहने पर भी मलेरिया नहीं फैलता।
जब एक विशेष प्रकार का मादा मच्छर किसी मलेरिया के रोगी को काटता है और उसके बाद वही मच्छर किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटता है, तो रोग का संक्रमण होता है, किन्तु 10 से 14 दिनों के पूर्व रोग का संक्रमण नहीं हो पाता। इस बीच मच्छर रक्त चूसने और अंडा देने के स्थानों का कई बार चक्कर लगा लेता है और बहुत से अंडे 8 से 10 दिन की अवधि में प्रौढ़ मच्छर का रूप धारण कर लेते हैं मच्छर के एक स्थान से दूसरे स्थान के उड़ान की दूरी इस सम्बन्ध में विशेष महत्त्व रखती है। जिन मच्छरों से हमारे प्रान्त में मलेरिया फैलता है उनके उड़ान की दूरी प्रायः आधे मील से अधिक नहीं होती अतः किसी गाँव के इर्द-गिर्द इस दूरी के अन्दर मच्छरों का अंडा देना खतरनाक समझा जाता है। इस दूरी के बाहर प्रायः इसका कोई महत्त्व नहीं होता। सभी प्रकार के मच्छरों से मलेरिया नहीं फैलता, किन्तु यह निश्चित है कि मच्छरों के ही कारण सब प्रकार के मलेरिया होते हैं। यह जानने योग्य बात है कि जब किसी स्वस्थ व्यक्ति को मलेरिया वाला मच्छर काटता है, तो उस व्यक्ति को 10 से 14 दिनों के पूर्व ज्वर नहीं आता और लगभग 7 दिनों तक यदि उस रोगी को कोई औषधि न दी जाय, तो वह काटने वाले अन्य मच्छरों में इस रोग का संक्रमण कर सकता है।
जो लोग पहले बहुत समय तक इस रोग के आक्रमण से बचे रहे हैं उन पर इसका अधिक प्रभाव पड़ सकता है, चाहे इसका कारण उनकी शैशवावस्था हो अथवा मलेरिया वाले देश में उनका पहले-पहल आना या उस जिले की सामान्य स्वस्थता हो जहाँ वे रहते हों। जिन देशों में मलेरिया का आक्रमण अधिक होता है वहाँ प्रौढ़ निवासियों पर इसका हलका आक्रमण होता है, किंतु मलेरिया की दृष्टि से जो क्षेत्र सामान्यतः स्वस्थ समझे जाते हैं वहाँ यह खतरनाक संक्रामक रोग के रूप में प्रकट होता है और इससे बहुसंख्यक जनता की मृत्यु हो जाती है।
यद्यपि हमारे सामने इस रोग का यह वीभत्स रूप है, फिर भी आधुनिक विज्ञान द्वारा आज हमें जो साधन प्राप्त हैं उनकी सहायता से हम अपने इस पुराने शत्रु मलेरिया पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। इस रोग से हमें जो कष्ट भोगना पड़ता है और क्षति होती है, यह मलेरिया-निरोधक उपायों के संगठन एवं नियोजन की हमारी शक्ति को प्रत्यक्ष चुनौती है। चूँकि मलेरिया-ग्रस्त रोगियों की चिकित्सा पर हमें जो कुछ खर्च करना पड़ता है वह मलेरिया पर नियन्त्रण रखने वाले उपायों पर होने वाले वास्तविक खर्च से कहीं अधिक है। अतः नियन्त्रण सम्बन्धी इस कार्य की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
मानवी युद्धों के ही समान मलेरिया के विरुद्ध युद्ध करने के सम्बन्ध में भी यद्यपि हमारे अस्त्र बदल चुके हैं, किंतु युद्ध करने के सिद्धाँत वही हैं। हमें मच्छर के वंश से अपनी रक्षा करनी चाहिये और कभी-कभी कोई ऐसी चीज खा लेनी चाहिये ताकि हमारे रक्त में मलेरिया के कीटाणुओं की वृद्धि न होने पाये। यदि ये दोनों ही उपाय असफल सिद्ध होते हैं और मलेरिया का आक्रमण होता है, तो औषधि द्वारा इसकी चिकित्सा करनी चाहिये। हमें मच्छरों को मारने का प्रत्येक प्रयत्न करना चाहिये।
मच्छरों के वंश से बचने के लिए ऐसी अनेक औषधियाँ हैं जिन्हें सन्ध्या समय या रात्रि में शरीर के खुले भागों पर छिड़कने से इस रोग से बचाया जा सकता है। किन्तु बचाव का यह ढंग अधिक लाभदायक नहीं है और साथ ही इनका प्रयोग दुष्कर भी है। इस सम्बन्ध में मसहरी बहुत उपयोगी है और इसका प्रयोग न करने का कोई बहाना भी न होना चाहिये। इसे तो जीविकोपार्जन करने वाले व्यक्ति के कुटुम्ब का आवश्यक अंग समझना चाहिये। एक साधारण मसहरी पर उतना खर्च नहीं होता जितना कि केवल एक बार मलेरिया हो जाने से उनकी चिकित्सा कराने में खर्च हो जाता है।
पहले मलेरिया से बचने के लिये कुनैन पर ही हमें निर्भर रहना पड़ता था, किन्तु यह हमें बहरा बना देती थी और इससे हमारे कानों में भनभनाहट की आवाज पैदा हो जाती थी। साथ ही यह ऐसे वृक्षों से प्राप्त होती थी, जो बहुत धीरे-धीरे बढ़ते थे और देश के कुछ ही भागों में पाये जाते थे। तत्पश्चात् एट्रावीन तथा मेपाक्लीन दवाइयों का आविष्कार जिनसे शरीर पीला पड़ जाता था और विशेषकर छोटे छोटे बच्चों वाली माताओं के लिये यह बहुत हानिकर सिद्ध हुई। अब कई वर्षों के अनुसन्धान के बाद एक नयी औषधि ‘पैल्यूड्रीन’ बाजारों में आयी है, जो रासायनिक पदार्थ है। यह किसी तरह की हानि नहीं पहुँचाती और शरीर का रंग भी इससे नहीं बदलता। मलेरिया की रोकथाम के लिये 15 जुलाई से लेकर 15 नवम्बर तक प्रति सप्ताह इसकी तीन टिकियों की एक मात्रा ले लेना चाहिये। इस काल में मलेरिया के मच्छरों द्वारा जो कीटाणु रक्त में प्रवेश कर जाते हैं वे इस औषधि से मर जाते हैं।
मच्छरों को नष्ट करने के लिये डी.डी.टी. नवीन अस्त्र है इसके अतिरिक्त गर्मक्सन भी एक औषधि है, जो इससे भी नयी है तथा जिसे अभी कम लोग जानते हैं। यदि कोई मच्छर इन नये पदार्थों के संपर्क में आता है तो वह तत्काल तो नहीं मरता, किन्तु शीघ्र ही और कोई नुकसान पहुँचाने के पूर्व ही मर जाता है, इस नयी कीटाणु नाशक औषधि के सम्बन्ध में एक आश्चर्यजनक बात यह है कि जब वह दीवालों, पर्दों, कपड़ों तथा तरकारियों हर छिड़की जाती है तो उन पर एक पर्त-सी जम जाती है, जिसका प्रभाव यह होता है कि कई सप्ताहों तक और कभी महीनों तक उन पर बैठने वाले कीटाणु को वह नष्ट करती रहती है।
वह मलेरिया मच्छर को मनुष्य के रक्त की आवश्यकता होती है, तो वह उड़कर हमारे घरों में आता है। वह संध्याकाल में अथवा रात्रि में हमें काटता है और दिन में हमारे घरों या बाड़ों में अथवा उनके समीप आराम करता है। अतएव कुछ सप्ताहों तक यदि हम अपने मकानों तथा बाड़ों में और बाहरी परछतियों तथा आस-पास उगने वाली तरकारियों पर और मच्छरों के छिपने की सभी संभावित जगहों पर डी.डी.टी. का छिड़काव करते रहें, तो मच्छरों के लिए रोग के कीटाणुओं को शरीर में प्रविष्ट करने के निमित्त जीवित रहने का कोई अवसर नहीं मिल सकता, क्योंकि डी.डी.टी. की पर्त के कारण वे उनके संपर्क में आकर जीवित नहीं रह सकते।
जहाँ तक मच्छर के अण्डे देने के स्थानों का सम्बन्ध है यदि उनको भी ध्यान से ढूँढ़ निकाला जाय और वहाँ पर औषधि छिड़क दी जाय, तो दलदल वाले बड़े-बड़े क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य सभी स्थानों के मलेरिया वाले मच्छर नष्ट किये जा सकते हैं। विशेष प्रकार के हवाई जहाजों द्वारा, यदि वे मिल सके, तो दलदल वाले स्थानों पर भी इस औषधि का छिड़काव किया जा सकता है।
सच बात तो यह है कि यदि पाल्यूड्रीन तथा डी.डी.टी. का पूर्ण उपयोग किया जाय, तो निस्संदेह थोड़े ही समय में हमारे प्रान्त का बहुत बड़ा भाग मलेरिया की इस विकट भयंकरता से मुक्त हो सकता है। वास्तव में इसके प्रयोग से क्या सफलता मिली है इसकी पुष्टि उदाहरणों द्वारा की जायगी, ताकि इन नये अस्त्रों की उपयोगिता के सम्बन्ध में कोई सन्देह बाकी न रह जाय। तराई क्षेत्र बहुत अस्वस्थ क्षेत्र समझा जाता था और वहाँ मलेरिया के कारण कोई विकास कार्य अभी तक नहीं हुआ था, किन्तु अब इसी क्षेत्र के नैनीताल जिले में खेती की जा रही है और इसी प्रकार जिला मेरठ के खादर क्षेत्र की भूमि कृषि-योग्य बनायी जा रही है। जल-विद्युत की बड़ी-बड़ी योजनाएँ उन क्षेत्रों में चलायी गयी जहाँ पर मलेरिया हमारा सबसे घातक शत्रु था, जैसे जिला नैनीताल में लौहिया हेड तथा शारदा हाइडेल पावर हाउस कान्ट्रक्सन योजना। इसका भी प्रबन्ध किया जा रहा है कि विशेष ट्रेनिंग प्राप्त कर्मचारियों की देख-रेख में मलेरिया निरोधक विशेष यूनिटों की स्थापना करके प्रान्त के विभिन्न जिलों में मलेरिया पर नियंत्रण रखा जा सके।
(श्री. कन्हैयालाल श्रीवास्तव बी. ए. रसिया)
गीता के बारहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में भगवान ने कहा है “मर्म को न जान कर किये हुये अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है। ज्ञान से मुझ परमेश्वर का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से भी सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है; क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति प्राप्त होती है।”
यही त्याग की परम्परा भारत में अनादि काल से चली आ रही है पश्चिम भारत के ऐतिहासिक महापुरुषों में वीरता, साहस, धैर्य, बुद्धिमत्ता और समय की परख के साथ जब तक त्याग की भावना मिश्रित न हुई, भारतीय जन जीवन में उन्हें श्रेष्ठ स्थान प्राप्त न हो सका। यह परम्परा पश्चिमी देशों के ऐतिहासिक परम्परा से कुछ भिन्न है। वहाँ के लोक नायकों में त्याग की भावना को इतना महत्व नहीं दिया जाता है।
भारत के उत्थान और पतन का इतिहास ही इस भावना से जुड़ा हुआ दिखाई पड़ता है। जब-जब त्यागी पुरुष और नेता पैदा होते गये देश उन्नति करता रहा परन्तु जब इस भावना की गति धीमी पड़ी इतिहास की धारा ही दूसरे ओर मुड़ने लगी।
महाराज हरिश्चंद्र, महर्षि दधीच आदि को त्यागी होने के कारण ही यश और अमरत्व प्राप्त हुआ!
भगवान रामचन्द्र जी के जीवन से यदि पिता की आज्ञा को मानकर राज का त्याग और बन गमन तथा सीता जी को त्याग कर आदर्श लोक हितकारी ‘राज की स्थापना’ का अंश निकाल दिया जाय तो वह एक साधारण शासक की कोटि में आ जाते हैं! यही बात कृष्णजी के जीवन में भी दिखाई पड़ती है उन्होंने कोई भी कार्य निज हित के लिये नहीं किया। कंस को मार कर मथुरा का राज न तो उन्होंने स्वयं लिया और न अपने पिता वासुदेव जी को ही दिया। जरासन्धबध के पश्चात मगध का राज्य उसी के पुत्र को सौंपा। महाभारत के भीषण नर संहार का उत्तरदायित्व बहुत अंशों में कृष्णजी पर आता है। युद्ध के पश्चात स्वयं गाँधारी ने उन्हें इसीलिये आप भी दिया था कि यदि वे (कृष्ण जी) चाहते तो बलपूर्वक युद्ध को रोक सकते थे। यह सारी लीला कृष्ण जी ने अधर्म को मिटकर धर्म राज की स्थापन के लिये किया था। युद्ध के पश्चात् युधिष्ठिर को राज तिलक देकर स्वयं द्वारिका को चले गये।
सिकन्दर के आक्रमण के पश्चात विशाल मौर्य साम्राज्य की स्थापना करने वाला त्यागी चाणक्य था। राज का सारा वैभव चन्द्र गुप्त के लिये था और चाणक्य पहाड़ी पर एक फूस की कुटी में निवास करके सन्तुष्ट रहता था। विद्यार्थियों द्वारा भिक्षा में लाये हुये अन्न से अपना जीवन निर्वाह करता था।
सम्राट अशोक को बौद्ध जगत में जो ख्याति प्राप्त हुई वह उनके त्यागी जीवन का परिणाम था। युद्ध का त्याग कर उन्हें सत्य और अहिंसा का सन्देश घर-घर पहुँचाया। पुत्र और पुत्री को भिक्षु बनाकर तथागत को सन्देश सुनाने लंका भेजा।
यही भावना इसके पश्चात गुप्ता वंश में भी दिखाई पड़ती है प्रसिद्ध गुप्त सम्राट समुद्र गुप्त को अकसर लोग यूरोप का नैपोलियन कहकर सम्बोधित करते हैं। उस समय लोग भूल जाते हैं कि दोनों में जमीन और आसमान का अन्तर था। इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि नैपोलियन यूरोप का ही नहीं वरन् संसार का अद्वितीय वीर था उसने फ्राँस का नाम यूरोप में चमकाया और यूरोप में एक नई क्रान्ति पैदा की परन्तु समुद्र गुप्त से उसकी कोई तुलना नहीं। समुद्र गुप्त ने दक्षिण पथ की विजय करके राजाओं को केवल अपनी करद ही बनाया परन्तु नेपोलियन ने आस्ट्रिया में जोजेफ बोनापार्ट, West phialia में जैराम बोनापार्ट स्पेन में अपने अन्य भाइयों को ही राजा बनाया। बहुत से देशों को फ्राँसीसी साम्राज्य में भी मिला लिया।
वाटर लू के युद्ध में पराजित होने के बाद भी नैपोलियन की स्वार्थी भावना न गई। एक स्वाभिमानी वारी की तरह उसने अपने को न प्रकट किया। कीरसीका द्वीप में अपने अन्तिम समय में वह कारागार में बैठा अपने पुत्रों के लिये विरासत नामा लिख रहा था।
मध्य युग में त्याग वृति की गति मन्द दिखाई पड़ती है। राजपूत राजे निज स्वार्थ के लिये लाखों व्यक्तियों का खून बहा देने में न हिचकते थे। पृथ्वीराज ने प्रेयसी संयोगिता के लिये अपने नामी-नामी सात सौ वीर सरदारों का वध करा दिया परिणाम हमारे सामने है। भारत पर विदेशियों ने अधिकार किया और देश गुलाम बना। यह हमारा पतन काल था।
राजपूताने में स्त्रियाँ राणा प्रताप के गीत इसीलिये गाती हैं कि उस नर सपूत ने विशाल साम्राज्य के सम्राट अकबर के सामने सर न झुकाया और 14 वर्षों तक राज पाट त्याग कर जंगल की खाक छानता रहा। शिवाजी ने अपना राज कई बार समर्थ गुरु रामदास के चरणों में भेंट कर दिया था। वह अपने को केवल राज का प्रबन्धक ही समझते थे।
भारत में अंग्रेजों के आगमन के बाद भी त्याग की गति के दोनों पहलू दिखाई पड़ते हैं। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सन् 1857 के असफलता के अनेक कारणों में से एक प्रमुख कारण यह भी था कि अधिकाँश नेता निजी स्वार्थों को ही ध्यान में रखकर युद्ध का संचालन कर रहे थे। झाँसी की रानी का शौर्य हमारे सामने न प्रगट होता यदि झाँसी राज अंग्रेजी राज्य में न मिला लिया जाता जनहित की भावना से यदि यह संग्राम लड़ा जाता तो अंग्रेज भारत से 110 वर्ष पूर्व ही चले गये होते।
लेकिन काँग्रेस के स्थापना काल से ज्यों-ज्यों त्यागी दयानन्द सरस्वती, राजाराम मोहनराय, ईश्वरचन्द विद्या सागर, लोक मान्य तिलक, गोपालकृष्ण गोखले, फीरोज शाह मेहता, लाला लाजपत राय, गाँधी, जवाहर और पटेल व अन्य ज्ञात अथवा अज्ञात नेता पैदा होते गये, भारत की बेड़िया क्रमशः टूटती गईं। वह पुण्य बेला भी आई जब हम अपने को स्वतन्त्र कह सकें।
क्या यह दिवस राष्ट्र पिता बापू के त्याग का ही परिणाम नहीं है?
त्यागी और भोगी में केवल भावनाओं का ही अन्तर होता है। त्यागी निज हित की परवाह न करके जन हित का चिन्तन करके अपना कार्य करता है और भोगी की सारी क्रियायें निज हित के लिये होती हैं। विश्व का कोई भी व्यक्ति त्यागी बने बिना सच्चे यश का अधिकारी नहीं बन सकता।
(श्री बालकृष्ण)
प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो ने अपनी पुस्तक ‘रिपब्लिक’ में इन चार गुणों का वर्णन किया है—बुद्धिमत्ता, अभय, संयम और न्याय। उसने लिखा है कि जिस पुरुष में जितनी मात्रा में इनमें से जो-जो गुण विद्यमान होते हैं वह उतनी ही मात्रा में नेक अथवा उत्तम होता है। प्लेटो के लिखने के पश्चात् यूरोप के विचारशील विद्वानों ने इन गुणों को अपने विचार की कसौटी पर परखा और अपनाया। इस प्रकार इन गुणों का यूरोप में इतना मान और प्रचार हुआ कि यूरोप की जनता में ये चार गुण चार महान् गुण के नाम से विख्यात हुए। ईसाई धर्म ने इनके विपरीत धर्म और भक्ति के तीन गुण श्रद्धा, आशा और दान को महानता प्रदान की है। लेकिन राजनीतिक क्षेत्र में और साँसारिक प्रगति के उसूलों के अनुसार पश्चिम के विचारकों ने इन तीन ईश्वर-ज्ञान-विषयक गुणों की अपेक्षा उपर्युक्त चार को अधिक महान् माना है।
बुद्धिमत्ता
अब हम सर्वप्रथम बुद्धिमत्ता अथवा बुद्धि चातुर्य के विषय में कुछ लिखते हैं। प्लेटो ने भी अपनी कृति में अन्य गुणों की अपेक्षा सर्वप्रथम इसी का विवेचन किया है। इससे प्रकट होता है कि वह अपने विचार में इस गुण को सबसे विशिष्ट समझते थे। संसार में जिस मनुष्य ने भी महानता प्राप्त की है उसमें अन्य किसी भी विशेषता के साथ यह गुण प्रचुरता से विद्यमान था। प्लेटो ने लिखा है कि शासकों को यह गुण प्रचुरता से विद्यमान था। यह गुण अवश्य प्राप्त करना चाहिए।
प्रश्न यह है कि बुद्धिमत्ता किसे कहते हैं तथा यह कैसे प्राप्त होती है? मनुष्य में अन्य प्राणियों की अपेक्षा यह विशेषता है कि उसमें ईश्वरप्रदत्त बुद्धिशक्ति होती है। इसी बुद्धि के विकास तथा प्रौढ़ता को बुद्धिमत्ता कहते हैं। इस विकास और प्रौढ़ता के प्राप्त होने पर मनुष्य में अपनी आर्थिक, राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं को समझने तथा उनका समाधान सोचने की शक्ति आती है, जीवन के विविध अंगों के विषयों में मन में एक सामंजस्य उत्पन्न होता है, तथा न केवल मनुष्य अपने विपक्षी-दल के षड़यंत्रों से अभिभावित नहीं होता बल्कि दुष्टों को अभिभूत करने की भी शक्ति उसमें उत्पन्न होती है। इसी भाव को लक्ष्य में रखकर हितोपदेशकार ने कहा है- ‘बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निर्बुद्धेस्तु कुतो बलम्’ अर्थात् जिसमें बुद्धिमत्ता होती है उसी में बल होता है, बुद्धिहीन मनुष्य में बल कहाँ से आया।
अब प्रश्न रह जाता है कि यह बुद्धिमत्ता कैसे उत्पन्न होती है? जैसा कि हमने ऊपर निर्देश किया है, यह बुद्धि के विकास और प्रौढ़ता का परिणाम है। अतः हमें यह जानना होगा कि बुद्धि का विकास कैसे होता है और उसमें प्रौढ़ता कैसे उत्पन्न होती है। उत्तर है कि यह स्थिति प्राप्त होती है एक तो संसार की श्रेष्ठ कृतियों के अध्ययन से और दूसरे बुद्धिमान् पुरुषों के संपर्क से। भर्तृहरि ने कहा है—‘सत्संगतिः कथय कि न करीरि पुँसाम्’ अर्थात् कहो कि सत्संगति से मनुष्य क्या लाभ नहीं कर सकता अर्थात् सब कुछ लाभ कर सकता है।
कामनसेंस अर्थात् सामान्य समझ की संसार में बहुत प्रशंसा है। यह मनुष्य में जन्म−जन्मांतर के कर्मों और संस्कारों से फलीभूत होती है, जिसके परिणामस्वरूप मनुष्य का बिना प्रयत्न और विचार किए स्वाभाविक रूप से हितकर और अहितकर का ज्ञान रहता है। इसके विपरीत बुद्धिमत्ता का उद्भव प्रयत्न और बुद्धि के श्रम से होता है, जिससे मनुष्य में अर्थ-अनर्थ, बल-अबल, नय-अनय तथा धर्म-अधर्म का विवेक उत्पन्न होता है। शासक में यदि यह स्वाभाविक समझ तथा प्रयत्नोत्पादित शिक्षित बुद्धिमत्ता विद्यमान हो तो उसे उत्तमोत्तम शासक बनने के लिए किसी गुण के अवलम्बन की इतनी आवश्यकता नहीं रहती।
अभय
अभय नाम के दूसरे गुण की परिभाषा करते हुए प्लेटो ने कहा है कि शिक्षा (काव्य, नाच, गाना, तथा शारीरिक व्यायाम आदि) के द्वारा सिपाहियों तथा नागरिकों के मन में यथार्थ और मिथ्या भय के साधनों के विषय में ऐसा दृष्टिकोण उत्पन्न कर देना चाहिए जो कि सुख, रंज, भय तथा इच्छा से विनष्ट न हो सके। हमारे विचार में इस प्रकार के विवेक से मिथ्या भय तो स्वतः ही लुप्त हो जाता है तथा यथार्थ भय के प्रतीकार के लिए और शिक्षा का आयोजन भी करना चाहिए जिससे कि सिपाही और नागरिक किसी वास्तविक भय के कारण अभिभूत न होकर उसको अभिभूत करना सीख सकें और यदि कभी ऐसी वस्तुस्थिति उपस्थित हो तो निर्भय होकर उसका सफलतापूर्वक प्रतिकार कर सकें। प्लेटो ने सैनिकों के लिए इस गुण की सर्वाधिक महत्ता बताई है। गत स्वातन्त्र्य-युद्ध में महात्मा गाँधी ने भी भारतवासियों में यही भावना अनवरत रूप से परिपूर्ण करने की चेष्टा की थी। उन्होंने कहा था कि अंग्रेजी शासन का भय हृदय से सर्वथा दूर कर हमें अपने कर्तव्य का परिपालन करते हुए और भारत का हित हृदय में रखते हुए विदेशीय शासन के साथ सहयोग बंद कर देना चाहिए तथा भयवश अंग्रेजी शासन की स्वार्थसाधक चेष्टाओं में सम्मिलित नहीं होना चाहिए। भय के कारण मनुष्य प्रायः बहुत अनर्थों का मूल बनता है। मिस्टर चर्चिल ने अपनी एक प्रसिद्ध नामक पुस्तक में लिखा है कि पश्चिम में अभय गुण को सर्व गुणों में विशिष्ट समझा जाता है और यह सबसे महान् गुण है। श्रीमद्भगवद्गीता में भी दैवी सम्पत्ति की व्याख्या करते हुए सर्वप्रथम अभय का ही वर्णन है। अभय के बिना शासक राजनीतिक कर्म में और सिपाही युद्ध में अग्रसर नहीं हो सकते और नहीं नागरिक अपने नागरिकता-सम्बन्धी कर्तव्यों का यथेष्ट पालन कर सकते हैं। अभय के होने से मनुष्य के भयजनित सर्व अनर्थों का नाश हो जाता है। भय से मनुष्य की धार्मिक भावनाएं नष्ट हो जाती है, नैतिक पतन हो जाता है, परतंत्रता आती है, अधिक हानि होती है, बुद्धि नष्ट-भ्रष्ट हो जाती है तथा सुख समाप्त हो जाता है। मैक्यावेकी ने लिखा है कि किसी भी पुरुष को अभिभूत कर उससे अपना स्वार्थ सिद्ध करने का सर्वोत्तम उपाय है उसे अपने से भयभीत कर देना। अतः मनुष्य को अभय गुण प्राप्त कर भय का प्रतीकार करना चाहिए।
संयम
प्लेटो ने तीसरा गुण संयम माना है। इसका अनुवाद मनोनिग्रह अथवा आत्मवश्यता भी हो सकता है परिभाषा करते हुए प्लेटो ने लिखा है कि मनुष्य की आत्मा के दो भाग होते हैं- एक उत्तम तथा दूसरा अधम। जो मनुष्य अपने सुखों और इच्छाओं को संयत करके अपनी आत्मा के अधम भाग को उत्तम भाग के अधीन कर देता है वह मनुष्य संयमी और आत्मवान् कहलाता है तथा जिस मनुष्य में बुरी शिक्षा और कुसंग के कारण मन का उत्तम भाग अधम से अभिभूत होता है उसे अपने मन का गुलाम तथा उसूलरहित कहा जाता है। इससे आगे प्लेटो ने लिखा है कि एक देश के उच्च शिक्षा युक्त तथा अच्छे घरों में उत्पन्न हुए लोगों में यह गुण अधिक मात्रा में होता है तथा बच्चों, स्त्रियों, नौकरों तथा निम्न स्तर के लोगों में कम मात्रा में होता है। संयत पुरुषों की इच्छाएं सरल और थोड़ी होती है और बुद्धि और विचार के अनुसार उदित और विलीन हो सकती हैं। इसके विपरीत असंयत पुरुषों में बहुत सारे उलझे हुए सुख, दुःख और इच्छाएं वर्तमान होते हैं। संयम का गुण देश की समस्त जनता अर्थात् शासक वर्ग, सिपाहियों तथा नागरिकों के लिए समान रूप से आवश्यक है।
अतः उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट है कि संयम नामक गुण का अर्थ है मन को बुद्धि के अधीन कर देना और इस प्रकार की अधीनता से मनुष्य की इन्द्रियाँ स्वतः ही उसके वश में हो जाती हैं। कोटिल ने शासक के लिए आन्वीक्षि की विद्यापरिशीलन का फल प्रायः संयम-लाभ बताया है और इस गुण की महानता का वर्णन करते हुए लिखा है कि जिस मनुष्य की इन्द्रियाँ और मन वश में है वह सारे संसार का राज्य कर सकता है। इसके विपरीत असंयम की हानियाँ पाठकों को अच्छी तरह विदित है। जीवन असंयत होने से मनुष्य का स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, चाल-चलन दूषित समझा जाता है, तथा अंत में धन और राज्य तक नष्ट हो जाते हैं। इतिहास में बहुत से ऐसे शासकों के उदाहरण विद्यमान हैं जो संयम के अभाव के कारण अपने राज्य से वंचित हो गए। महाभारत में महाराज नहुष का उदाहरण इस दृष्टि से शिक्षा लेने योग्य है। इसके विपरीत राजा जनक तथा महाराजा रामचन्द्रजी के उदाहरण संयमित जीवन के मूर्तिमान रूप है।
न्याय
चौथा और अन्तिम गुण न्याय है। प्लेटो ने न्याय की परिभाषा करते हुए केवल मजिस्ट्रेट अथवा जज को न्याय और अन्याय का विधायक नहीं माना है, बल्कि जो पुरुष दंडयोग्य अपराध करता है उसके उस अपराध करने को भी अन्याय माना है। इसके अतिरिक्त जिस किसी आचार अथवा कानून से देश का अहित होता है प्लेटो ने उसे भी अन्याय माना है तथा लिखा है कि यह गुण ऊपर वर्णित शेष तीन गुणों की मूल भित्ति है अर्थात् कहीं पर भी उपयुक्त तीन गुण तभी विद्यमान हो सकते हैं जब कि वहाँ यह चतुर्थ गुण अर्थात् न्याय पहले से विद्यमान हो, लेकिन कहीं पर उपर्युक्त तीन गुण न होने पर भी यह चतुर्थ गुण विद्यमान हो सकता है और अपनी सत्ता से अन्य तीनों के भी उदय का कारण बन सकता है। प्लेटो के मतानुसार यह चतुर्थ गुण किसी भी देश के शासक और शासित अथवा समस्त जनता में समान रूप से वर्तमान होना चाहिए। प्लेटो ने लिखा है कि इस गुण से मनुष्य में उत्तमता और सामाजिकता दोनों विशिष्टताएं आती हैं, क्योंकि यदि मनुष्य अपने समाज के दूसरे मनुष्यों के प्रति न्यायानुकूल संयम युक्त व्यवहार न करे और अपनी शक्ति के अनुसार अपने स्वार्थानुकूल सब कर्म सम्पादन तथा लाभ प्राप्त करने में लग जाए तो कोई भी समाज स्थिर नहीं रह सकता।
(श्री राजेन्द्र शर्मा, सम्पा. ‘समाज’)
तुलसीदास जी का एक दोहा है:—
स्वपच सबर खस जमन जड़, पाँवर कोल किरात। राम कहत पावन परम होत भुवन विख्यात॥
राम नाम का जाप कर अधम भी परम पवित्र हो जाते हैं। यही नहीं राम नाम के प्रभाव से वे भुवन-विख्यात हो जाते हैं। लोकप्रिय हो जाते हैं। पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के संत कवियों के बारे में तुलसी का यह दोहा कितना सत्य है। ऐसे ही एक भुवन-विख्यात संत कवि हैं, बाबा मलूकदास। नाम के प्रभाव और प्रताप को स्वयं मलूकदास जी ने भी स्वीकार किया है:—
राम नाम एक रती, पाप के कोटि पहाड़। ऐसी महिमा नाम की, जारि करै सब छार॥
राम नाम की ऐसी ही महिमा है। जिस प्रकार रुई के विशाल भण्डार को एक ही चिनगारी भस्म कर देती है, उसी प्रकार प्रभु का नाम जन्म-जन्मान्तर के पापों को नष्ट कर देता है। इससे भी बढ़कर बात यह है कि नाम के नशे में जो मस्त हो गया है, उससे तो इन्द्र भी छोटा है। अर्थात् इन्द्र का सुख नाम-जप-सुख से तुच्छ है।
गाँठी सत्त कुपीन में सदा फिरै निःसंक। नाम अमल माता रहै, गिनै इन्द्र को रंक॥
बाबा मलूकदास का जन्म विक्रम संवत् 1931 में इलाहाबाद जिले के कड़ा स्थान पर हुआ था। जाति के यह कक्कड़ खत्री थे। इनके पिता का नाम सुन्दरदास था। भक्ति मार्ग की ओर जाने में इन्हें अपने गुरु श्री विट्ठलदास जी से प्रेरणा मिली। देखिए, इस पद में इन्होंने गाया है:—
अब तेरी सरन आयो राम। जबै सुनिया साध के मुख, पतित-पावन नाम॥ यही जान पुकार कीन्ही, अति सतायो काम। विषय सेती भयो आजिज कह मलूक गुलाम॥
विषय-वासना भगवत्-भक्ति में सबसे बड़ी रुकावट है। विषय छूट जाते हैं, पर अहंकार छूटना उससे भी कठिन है। मलूकदास जी ने अपने पदों में अत्यन्त सरल और चालू भाषा में भक्ति मार्ग का निरूपण किया है। मोह, ममता, अहंकार छोड़कर ही भगवत्-प्राप्ति हो सकती है। काम, क्रोध त्यागना भी आवश्यक है।
आपा मेटि न हरि भजे तेइ नर डूबे। हरि का मर्म न पाइया, कारन कर ऊबे॥1॥
करें भरोसा पुत्र का साहिब बिसराया। डूब गए तरबोर को कहुँ खोज न पाया॥2॥
साधु मंडली बैठि के, मूढ़, जाति बखानी। हम बड़ि हम बड़ि करि मुए, डूबे बिन पानी॥3॥
काम क्रोध सब त्यागि के जो रामै गावै। दास मलूका यूँ कहैं तेहि अलख लखावै॥4॥
मलूकदास जी के पदों में निरभिमानता भी खूब झलकती है। पीड़ितों का दुःख हरना ही सबसे बड़ा धर्म है। “परहित सरिस धर्म नहीं भाई। पर पीड़न सम नहिं अधमाई” की भावना को मलूकदास जी के इन दोहों में देखिए:—
जो दुखिया संसार में, खोवो तिनका दुःख। दलिहर सोंप मलूक को, लोगन दीजै सुक्ख॥
दुखिया जन कोइ दूलिये, दुखिये अति दुख होय। दुखिया रोय, पुकारी है, सब गुड़ माटी होय॥
बाबा मलूकदास के दोहों और पदों में लोकोक्तियां और मुहावरे प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। परहित की भावना से जहाँ उनका काव्य लोकप्रिय हुआ है, वहाँ इस विशेषता से उनकी वाणी बिना पढ़े-लिखे लोगों की जुबान पर भी चढ़ गई। उनका यह दोहा किसने नहीं सुना होगा—
अजगर करै न चाकरी पंछी करै न काम। दास मलूका कह गए, सब के दाता राम॥
दृढ़ ईश्वर-निष्ठा की कैसी सुन्दर अभिव्यक्ति है। ऐसी अटूट श्रद्धा से ही तो ‘उसका’ ज्ञान प्राप्त होता है। मलूकदास जी की ऐसी लोकप्रियता होते हुए भी, यह कैसे आश्चर्य की बात है कि और संत-कवियों की भाँति, उनके नाम पर कोई ‘पंथ’ नहीं चला। मलूकदास जी ने अपने जीवन-काल के 108 वर्षों में सम्प्रदायवाद की कड़ी भर्त्सना की।
ना वह रीझै जप तप कीन्हें-ना श्रातस को जारे। ना वह रीझै धोती टाँगै, ना काया के पखारे॥
दाया करै, धरम मन राखै घर में रहै उदासी। अपना सा दुख सबका जानै ताहि मिलै अविनाशी॥
किसी मत-सम्प्रदाय से प्रभु प्रसन्न नहीं होते। उन दया-धाम को दया से ही पा सकते हैं या फिर दिल में ढूँढ़ने से ‘वह’ मिलेगा।
मक्का मदीना द्वारिका, बदरी और केदार। बिना दया सब झूठ हैं, कहै मकूल बिचार॥
उसकी उपलब्धि हृदय में होगी:—
तौजी और निमाज न जानूँ, ना जानूँ धरि रोजा। बाँग जिकर तबही से बिसरी, जब से यह दिल खोजा॥
कहैं मलूक अब कजा न करिहौं दिल ही सौं दिल लाया। मक्का हज हिये में देखा, पूरा मुरसिद पाया॥
राम-भक्ति की महिमा जन-जन को बताते हुए, मलूकदास जी ने उपाँशु जप को ही सर्वश्रेष्ठ बताया है:—
जो तेरे घट प्रेम है तो कहि कहि न सुनाय। अन्तरजामी जानि हैं, अन्तरगत के भाय॥
और:—
सुमिरन ऐसा कीजिए, दूजा लखै न कोय। होंठ न फरकत देखिये, प्रेम राखिये गोय॥
इस प्रेम की महिमा ही ऐसी है। अनन्य भाव को प्राप्त होकर मलूकदास जी कहते है:—
माला जपौं, न कर जपौं, जिह्वा जपौं न राम। सुमिरन मेरा हरि करै, मैं पाया विश्राम॥
वे भगवान् कितने दयालु हैं कि स्वयं भक्त का स्मरण करते हैं:—
परमदयाल राया राय परसोत्तम जी, ऐसो प्रभु छाँड़ि और कौन के कहाइये।
सीतल सुभाव जाके तामस को लेस नहीं, मधुर बचन कहि राखै समझाइये॥
भक्त बछल गुन सागर कला निधान, जाको जस पाँत नित वेदन में गाइये।
कहत मलूक बल जाउँ ऐसे दरस की, अधम उधार जाके देखे सुख पाइये॥
तुलसीदास जी ने कहा है—भूति भनिति कीरति भलि सोई। सुरसरि सम परहित जेहिं होई॥ कविता ऐश्वर्य तथा यश वही अच्छा होता है, जो गंगा के समान परहित कारी हो। मलूकदास जी ने भी भगवद्भक्ति की पराकाष्ठा से अपनी वाणी को लोक-कल्याणकारी बनाकर पवित्र किया है। मानवता के इस गायक ने आत्मिक विकास के लिए सबका उत्साह बढ़ाया है। साधू सन पूसौं चिम लाई। जिनके दरसन हिया जुड़ाई। भाव भक्ति करते निष्काम। निसदिन सुमिरैं केवलराम॥
साहिब मिल साहिब भये, कछु रही न तमाई। कहैं मलूक तिस घर गये, जहूँ पवन न जाई॥
(श्री तुलसीराम जी, वृन्दावन)
निवृत्तिः कर्मणः पापात्सततं पुण्यशीलता। सद्वृत्ति समुदाचारः श्रेयएतदनुत्तमम्॥
(नारद पु. 60।44 म. भा. शां. 287।16)
पाप कर्म से निवृत्त होना, पुण्य कर्म में लगना, सुन्दर व्यवहार- सुन्दर आचरण, यह कल्याण का सर्वोत्तम साधन है।
देवासुराणं सर्वेषां मानुष्यंचातिदुर्लभम्। तत्सम्प्राप्य तथा कुर्यान् न गच्छेन्नर कंयथा॥
(शिव पु. पंचमी उमासंहिता 20।31 स्कंद पु. कुमारिका खंड 2।50)
देव असुर आदि योगियों में मनुष्य जन्म कठिनता से प्राप्त होता है उस मनुष्य योनि को प्राप्त करके वह काम करे जिससे नरक न जाना पड़े। अर्थात् पापकर्म से बचे।
यावज्जीवेन तत्कुर्याद्येन प्रेत्यसुखंवसेत्।
(म. आ. उ. 35।67)
जीवन भर वह काम करे जिससे परलोक में सुख मिले अर्थात् पुण्य कर्म करे।
इति ज्ञात्वानरः पुण्यंकुर्यात् पापं विवर्जयेत्। पुण्येनयाति देवत्वमपुन्यो नरकं व्रजेत्॥
(शि. पु. पंचमी उमा. सं. 20।46)
इस प्रकार समझ कर पाप कर्म त्यागकर पुण्य-कर्म करे कारण कि पुण्य से देवयोनि प्राप्त होती है पाप कर्म से नरक मिलता है। पाप को अधर्म और पुण्य को धर्म कहते हैं।
धर्माधर्म की परिभाषा इस प्रकार है—
धर्म:—कायवाङ् मनोभि सुचरितम्।
(सुश्रुति शारीर. 1।18 डल्हणाचार्य कृति टीका)
अधर्म:—कायावाङ्मनसांदुष्ट् चरितम्।
(सुश्रुत सूत्र. अ. 6।19 निबन्ध संग्रह व्याख्या
अर्थात् मन वाणी शरीर का जो सुन्दर व्यवहार है वह धर्म है और मन वाणी शरीर का जो दुर्व्यवहार है वह अधर्म है।
अब इस पुण्य पाप (धर्माधर्म) को और स्पष्ट करते हैं—
पर द्रव्येष्वभिध्यानं मनसा निसृ चिन्तनम्। वितथामि निवेशश्च त्रिविधंकर्ममानसम्॥
(मनु. 12।5)
पर धन के लेने की इच्छा, मन में किसी का अनिष्ट चिन्तन करना, नास्तिकता यह तीन मानसिक पाप हैं॥ 5॥
पारुष्य मनृतं चैव पैशुन्यंचाजि सर्वशः। असम्बघ प्रलापश्चवाङ् मयंस्याच्चतुर्विधम्॥6॥
कठोर वचन, मिथ्या भाषण, चुगलखोरी, निष्प्रयोजन बकवाद यह चार प्रकार के वाणी के पाप हैं ॥6॥
अदत्तानामुपादा नंहिसा चेवा भिधानतः परदारोपसेवाच शारीरं त्रिविधंस्मृतम् ॥7॥
चोरी (अन्याय से दूसरे का द्रव्य लेना) हिंसा, पर स्त्री गमन, यह शरीर के तीन पाप हैं ॥7॥
इसी के अनुकूल म. भा. अनु. 13।1-5 में है दश प्रकार के पुण्य—
शरीरेण दानं परित्राणं ब्रह्मचर्य च। वाचा सत्यं प्रियंहितं स्वाध्यायं चेति। मनसा दयामस्पृहा श्रद्धाञ्चेति॥
(न्ययदर्शनवात्सायनभाष्य 1।1।2)
दान देना, दूसरे की रक्षा करना, ब्रह्मचर्य से शरीर के पुण्यकर्म हैं।
सत्य, प्रिय, हित, स्वाध्याय ये चार प्रकार के वाणी के पुण्यकर्म हैं।
दया (दूसरे के दुख दूर करने की वासना) अस्पृहा (किसी के द्रव्य व स्त्री पर मन न डुलाना) श्रद्धा (गुरु, शास्त्र के वचनों में श्रद्धा, परलोक में विश्वास) ये तीन मानसिक पुण्य हैं। (अ. 17।14।16)
गीता में तीन प्रकार के तप गिनाये हैं वे यहाँ मेल खाते हैं।
युद्ध में विजय पाने के बाद कुछ खिन्न हुए युधिष्ठिर को देवस्थान नाम के एक तपस्वी ने उपदेश दिया है— डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड यहां पर पेज छूटा हुआ है। यहां पर पेज छूटा हुआ है। यहां पर पेज छूटा हुआ है। यहां पर पेज छूटा हुआ है। यहां पर पेज छूटा हुआ है। यहां पर पेज छूटा हुआ है। डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडड
गायत्री तपोभूमि में गायत्री यज्ञ तो नियमित रूप से चलता ही है विशेष यज्ञों की शृंखला के अंतर्गत श्रावण में रुद्रयज्ञ हो चुका है भाद्रपद मास में यजुर्वेद यज्ञ सानन्द सम्पन्न हुआ। इन दिनों आश्विन के कृष्ण पक्ष में पितरों की आत्माओं को शाँति देने वाला पितृयज्ञ चल रहा है। सदा की भाँति नवरात्रि में 9 दिन का सामूहिक अनुष्ठान होगा। जिन्हें सुविधा एवं अवकाश हो वे मथुरा आकर अपनी नवरात्रि की साधना करें। घर की अपेक्षा ऐसे सिद्धपीठ स्थानों में साधना करने से उनकी सफलता की संभावना अधिक रहती है। घर गृहस्थी के अनेक कार्यों में मन लगा रहने के कारण प्रायः मनोयोग पूर्वक साधना नहीं हो पाती। इसलिये जिनकी परिस्थिति अनुकूल हैं उनके लिये तपोभूमि में आकर नवरात्रि की उपासना करना तीर्थयात्रा, समुचित पथ डडडडड न, परामर्श, सिद्धपीठ एवं अनुकूल वातावरण का डडडडड व आदि अनेक कारणों से यहाँ अधिक सुविधा रहती है। ठहरने, भोजन आदि की यहाँ समुचित व्यवस्था रहती ही है।
नवरात्रि में शतचण्डी एवं सहस्र लक्ष्मी का पाठ एवं हवन भी होता है। इस प्रकार आश्विन शुक्ल पक्ष में तीनों महाशक्तियों का- गायत्री, लक्ष्मी, दुर्गा की संसार को सद्बुद्धि, समृद्धि देने एवं आपत्ति निवारण के लिये विधिवत् उपासना की जाती है। कार्तिक कृष्ण पक्ष में श्रीसूक्त से लक्ष्मी यज्ञ होगा जिसकी पूर्णाहुति दिवाली के दिन होगी। कार्तिक शुक्ल पक्ष में 15 दिन पुरुषसूक्त से विष्णु यज्ञ होगा।
अखण्ड ज्योति प्रेस की दोनों मशीनें टाइप केस आदि सभी सामान तपोभूमि में पहुँच गया है। यह लगभग छह, सात हजार रुपये का सामान अब तपोभूमि की ही सम्पत्ति है इस पर अब गायत्री परिवार का प्रचारात्मक साहित्य शाखा शृंखलाओं के लेटर पेपर, विज्ञापन, पर्चे, पोस्टर आदि बाजार भाव की अपेक्षा लगभग आधे मूल्य की लागत पर छाप कर भेजे जाया करेंगे। गायत्री परिवार की शाखाऐं अपने उत्सवों के विज्ञापन एवं धर्म प्रचार के व्याख्यानात्मक पत्र यहाँ बहुत सस्ती लागत पर छपा कर अपने क्षेत्रों में ज्ञान प्रचार का महत्वपूर्ण कार्य कर सकेंगी, यह प्रेस इन्हीं कार्यों के लिये सीमित रहेगा। अखण्ड ज्योति अन्यत्र छपा करेगी। प्रेस खोलने के इच्छुक, एवं प्रेस शिल्प सीख कर आजीविका कमाने वाले व्यक्ति इस कला का व्यवहारिक शिक्षण यहाँ प्राप्त कर सकेंगे। मन्दिर के पीछे के दो कमरों में कम्पोज एवं मशीनें रखी गई हैं। यह स्थान बहुत छोटा पड़ रहा है, इन कमरों के आगे बरामदे निकालना अत्यन्त आवश्यक प्रतीत होता है, वर्तमान कोठरियों में काम चल सकना कठिन है। यह कमी इन दिनों में प्रेस कार्य के ठीक प्रकार चलाने में बाधक हो रही है।
साँस्कृतिक विद्यालय का शिक्षाक्रम शान्तिपूर्ण एवं व्यवस्थित ढंग से चल रहा है। धर्म प्रचार का उद्देश्य रखने वाले, ऊँची नीची सभी प्रकार की योग्यता वाले व्यक्ति यहाँ शिक्षा प्राप्त करने आते हैं, उनकी स्थिति और सुविधानुसार शिक्षा की व्यवस्था करदी जाती है। सरल पद्धति में देव भाषा संस्कृत की शिक्षा, कीर्तन, भजन, रामायण आदि की योग्यता जितना संगीत, 40 प्रकार के श्रौत और स्मार्त यज्ञों की प्रक्रिया, षोडश संस्कार एवं कर्मकाण्ड का शिक्षण इन दिनों नियुक्त अध्यापकों द्वारा पूर्ण व्यवस्थित रीति से किया जा रहा है। कथा प्रवचनों का सैद्धान्तिक एवं व्याख्यानात्मक शिक्षण नवरात्रि के बाद आरम्भ होगा। चिकित्सा की ओर छात्रों की अधिक रुचि देखकर इस विभाग की ओर अधिक ध्यान दिया जा रहा है और कुछ बड़ी व्यवस्था की जा रही है। पहले यह विचार था घर गृहस्थी, पास पड़ौस के छोटे मोटे रोगों का उपचार करने योग्य साधारण ज्ञान करा देना पर्याप्त है। पर छात्र इससे अधिक का आग्रह कर रहे हैं इसलिये शरीर विज्ञान स्वास्थ्य रक्षा रोग निदान, औषधि निर्माण, जड़ी बूटी परीक्षा रस, भस्में, आसव अरिष्ट आदि का बनाना, परिचर्या, व्रण, चोट, हड्डी टूटना, आग से जलना आदि की मरहम पट्टी जैसे विषयों का अधिक विस्तार के साथ व्यवस्था की जा रही है। छात्रों को व्यवहारिक ज्ञान देने एवं रोगियों की सेवा के लिये औषधालय की सामग्री तेजी से इकट्ठी की जा रही है। शिक्षा ग्रंथ मंगाये जा रहे हैं। मौजूदा छात्रों को शरीर विज्ञान स्वास्थ्य रक्षा जैसे विषय पढ़ाने आरम्भ कर दिये गये हैं।
होम्योपैथी के शिक्षा साधन जुटाये जा रहे हैं। यह सब कार्य भी नवरात्रि तक पूरे हो जाने की आशा है। कथा प्रवचनों की सैद्धान्तिक एवं व्याख्यानात्मक शिक्षा जाड़े के दिनों में आरम्भ की जायगी। सूर्य नमस्कार, आसन, लाठी चलाना, व्यायाम कक्षा में अभी इन तीनों बातों ही का क्रम चल रहा है। आगे तलवार, छुरा, भाला, धनुषबाण आदि शस्त्रों का शिक्षण चलेगा यह शिक्षण भी स्वास्थ्य सुधार, साहस वृद्धि एवं आत्म रक्षा के लिये आवश्यक है।
विद्यालय में निर्धारित शिक्षा क्रमों की अच्छी योग्यता रखने वाले सेवा भावी सज्जन यहाँ पधार कर हमारा हाथ बटावें इसकी आवश्यकता है। जिनकी ऐसी स्थिति एवं योग्यता है वे उन्हें सादर आमंत्रित करते हैं। शिक्षार्थी भी ऐसे चाहिए जो व्यक्तिगत आजीविका की दृष्टि से ही नहीं मुख्यतः लोक सेवा की दृष्टि से यह सब सीखें। ऐसी अभिरुचि एवं परिस्थिति के व्यक्तियों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर तपोभूमि में इस शिक्षा के लिए भिजवाना अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का कर्तव्य है। यह विद्यालय धर्म प्रचारक उत्पन्न करने की दृष्टि से ही आरंभ किया गया है। वैसी रुचि और स्थिति के छात्र न मिलें, व्यक्तिगत लाभ एवं योग्यता बढ़ाने के लिए ही लोग सीखें तो इससे तपोभूमि के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। इसलिए उपयुक्त शिक्षार्थियों का प्राप्त होना भी एक समस्या है यह तभी हल हो सकती है जब सभी परिजन इस प्रकार की ढूंढ़ खोज करते रहें। अपने-अपने पंडितों पुरोहितों को उनके बालकों को जो धर्म प्रचार से ही जीविका चलाते हैं, इस शिक्षा के लिए आग्रह पूर्वक प्रेरित करना सभी पाठकों का कर्तव्य है।
यों गायत्री उपासना के लिए सभी समय उत्तम हैं। पर नवरात्रि का समय सबसे श्रेष्ठ है। जिस प्रकार प्रातः सायंकाल की संध्या अन्य कालों की अपेक्षा अधिक फलप्रद होती है उसी प्रकार शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन की संध्या आश्विन और चैत्र की नवरात्रि हैं। इन 9-9 दिनों में की हुई थोड़ी गायत्री उपासना भी- अन्य समयों में बहुत दिन तक, बड़ी मात्रा में की हुई साधना के समान फलप्रद होती है।
सदा की भाँति इस बार भी आश्विन की नवरात्रि में हम सब को इस पुनीत पर्व काल में अपनी साधारण उपासना की अपेक्षा कुछ अधिक मात्रा में साधना एवं तपश्चर्या करनी चाहिए। 9 दिन में 24 हजार का अनुष्ठान कुछ बहुत कठिन नहीं है। प्रतिदिन 27 माला के हिसाब से 9 दिन में अनुष्ठान पूर्ण हो जाता है। इसके लिए 3 घंटा प्रतिदिन समय लगता है, जो जल्दी 4 बजे उठकर 7 बजे तक पूरा हो सकता है। जिन्हें एक साल इतना समय लगाने में असुविधा हो वे प्रातः सायं दोनों समय मिलाकर इसे पूरा कर सकते हैं।
24 हजार अनुष्ठान के लिए 240 आहुतियों का हवन भी होना चाहिए। प्रतिदिन 27 आहुतियों के हिसाब से अन्तिम दिन पूरी आहुतियों का एक साथ हवन अपनी सुविधानुसार किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य आवश्यक है। उपवास जिनके लिए जितना संभव हो वे उतना करें। फल दूध पर रहना या एक समय बिना नमक का भोजन लेकर रहना अपनी परिस्थिति पर निर्भर है। बालक, वृद्ध या दुर्बल प्रकृति के व्यक्ति दोनों समय फलाहार या बिना नमक का भोजन ले सकते हैं। चमड़े का उपयोग इन दिनों त्याग देना चाहिए। आज कल 99 प्रतिशत जो बिन काटे हुए पशुओं का चमड़ा ही उपलब्ध होता है। उनकी हत्या में चमड़े का उपयोग करने वाला भागीदार होता है साथ ही उस समय की चमड़े के साथ चिपकी हुई मार्मिक पीड़ा के संस्कार भी साधना के समय चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। नवरात्रि में लकड़ी, रबड़, कपड़े आदि के जूते चप्पल पहने जा सकते हैं। हजामत इन दिनों बनानी हो तो अपने हाथ से ही बनानी चाहिए। अपने शरीर के लिए दूसरों से सेवा जहाँ तक कम ली जा सके वहाँ तक उत्तम है।
इस बार आश्विन की नवरात्रि ता. 5 अक्टूबर से आरम्भ होकर ता. 13 शनिवार तक चलेगी। 24 हजार जप के अनुष्ठानों के अतिरिक्त इन दिनों 108 पाठ गायत्री चालीसा (प्रतिदिन 12 पाठ) का भी अनुष्ठान होता है। अनुष्ठान के अन्त में ब्रह्म भोज के स्थान पर सस्ते मूल्य का गायत्री साहित्य मँगाकर सत्पात्रों में प्रसाद स्वरूप वितरण कर देना चाहिए। अन्नदान की अपेक्षा ब्रह्मदान का- ज्ञान दान का- पुण्य सौगुना अधिक माना गया है।
आध्यात्मिक साधनाओं से बहुधा आसुरी तत्व विज्न फैलाते हैं तथा साधना में त्रुटियाँ रह जाने का भी भय रहता है। इन दोनों कठिनाइयों को पार करने के लिए नवरात्रि अनुष्ठान साधना करने वालों को अपनी साधना की नवरात्रि में कुछ पूर्व ही हमें सूचना दे देनी चाहिए ताकि उन दिनों उनके अनुष्ठानों का संरक्षण तथा दोष परिमार्जन यहाँ होता रहे। अनुष्ठान सानंद पूर्ण होने की सूचना भी देनी चाहिए। इस प्रकार नवरात्रि के आदि और अन्त में गायत्री परिवार के अनुष्ठान कर्ता अपनी सूचना अवश्य देदें।
इस युग में संघ शक्ति का प्राधान्य है। अन्य युगों में सत्ता बल, शरीर बल, मनोबल, शस्त्र बल, विद्या बल, धन बल आदि से आवश्यक उद्देश्यों की पूर्ति हो जाती थी पर इस युग में संघ शक्ति ही वह प्रधान साधन है जिसके द्वारा सामूहिक उद्देश्यों को पूर्ण किया जाना संभव है। जन शक्ति की चण्डी अन्य सभी देवताओं की अपेक्षा सामर्थ्यवान् है। शतचंडी सहस्र चंडी और लक्ष चंडी का पाठ पूजन किसी समय में जो कार्य कर सकता था अब वह कार्य संघ शक्ति की संगठनाओं से ही संभव है। व्यापक असुरता से लोहा लेने के लिए इसी महाशक्ति का महा अनुष्ठान आवश्यक है। इस लक्ष को सम्मुख रखकर इस बार संगठनात्मक ‘सहस्र चंडी’ का आयोजन किया गया है। गतवर्ष विशद् गायत्री महायज्ञ, के ब्रह्म शस्त्र का आयोजन विश्वव्यापी संकटों को कम करने के लिए हुआ था। अब इस वर्ष अन्तरिक्ष में छाई हुई प्रलयंकारी घटाओं को हटाने के लिए दूसरा जो आध्यात्मिक आयुध तैयार किया जा रहा है वह यही संगठनात्मक ‘सहस्र चंडी’ है। गायत्री परिवार की एक हजार शाखाऐं स्थापित करना इस बार हमारा संकल्प है।
गतवर्ष सर्वथा असंभव दीखने वाला इस युग का अभूत पूर्व एवं अद्वितीय 125 करोड़ जप, 125 लाख हवन, 125 हजार ब्रह्म भोज का संकल्प जिससे सर्व शक्तिवान शक्ति की प्रेरणा से पूर्ण हुआ उसी शक्ति का दूसरा विनियोग यह आगामी कार्यक्रम है। पूर्व काल में देवताओं के असुरों से परास्त होने पर ब्रह्मा जी ने सब देवताओं की थोड़ी थोड़ी शक्ति एकत्रित करके ‘महाचण्डी’ को उत्पन्न किया था उसी ने असुरों का संहार किया था। रावण काल की असुरता का शमन करने के लिए भी ऋषियों ने अपने-अपने रक्त को एक घट में एकत्रित किया था। और उस एकत्रित रक्त से ही असुर निकंदिनी ‘महा सीता’ की उत्पत्ति हुई थी। आज भी विश्व व्यापी असुरता इतनी प्रबल है कि देवताओं के साधारण प्रयत्न उसके आगे असफल ही होते हैं। इन असफलता एवं पराजयों की सामर्थ्य जिस चण्डी में—जन शक्ति में संघ शक्ति में है, उसका आह्वान करना आज आवश्यक हो गया है। गत गुरु पूर्णिमा पर 108 हवनों का संकल्प जिस दिन पूर्ण हुआ, उसी दिन उस दिव्य प्रेरणा का आगामी आदेश ‘सहस्र चण्डी’ के लिये हुआ। तद्नुसार कार्य आरम्भ कर दिया गया है। अखण्ड ज्योति के पिछले अंक में गायत्री परिवार के संगठन की सदस्यता की अपील छापी गई थी।
अनेक व्यक्तियों के पास तत्सम्बन्धी आवश्यक परिपत्र फार्म आदि भी भेजे गये थे। प्रसन्नता की बात है कि उससे धर्म प्रेमी कर्मयोगियों में उत्साह की लहर फैल गई है और अनेक सत्पुरुषों ने तत्सम्बन्धी कार्यारंभ कर दिया है। सच्ची श्रद्धा की एक मात्र कसौटी यही है कि कोई व्यक्ति निर्धारित लक्ष के लिये कुछ कष्ट उठाने, श्रम करने त्याग करने के लिए उद्यत है या नहीं। जो लोग अध्यात्मवाद की महत्ता स्वीकार करते हैं, धर्म स्थापना की आवश्यकता अनुभव करते हैं, साँस्कृतिक पुनरुत्थान का महत्व मानते हैं, संघ शक्ति की महानता को समझते हैं, गायत्री माता और यज्ञ पिता का गौरव बढ़ा हुआ देखना चाहते हैं, उनके लिये यह सम्भव हो नहीं सकता कि अभीष्ट उद्देश्य के लिये मुख खोलने, हाथ पैर चलाने एवं प्रयत्न करने में संकोच, उपेक्षा एवं शिथिलता को प्रकट करें। सच्ची निष्ठा में वह प्रेरणा निश्चित रूप से है कि वह नैष्ठिक व्यक्ति की भीतरी अग्नि को क्रियाशीलता के रूप में बाहर प्रकट किये बिना रुक नहीं सकती। किसी की परिस्थितियाँ अनुकूल न हों तो भी उससे बहुत कुछ करा लेती हैं। समय, सुविधा, परिस्थिति, फुरसत, कठिनाई, चिन्ता आदि की आड़ लेकर कर्तव्य की उपेक्षा करने वाले लोग केवल ‘बहाने बाज’ ही होते हैं। अपनी दुर्बल श्रद्धा की कमजोरी को वे कोई बहाना ढूँढ़कर छिपाने की आत्म वंचना करते रहते हैं। जिस कार्य को मनुष्य ‘आवश्यक’ समझता है उसके लिए अनेक अड़चनों के बीच भी समय निकाल लेता है, निकाल सकता है। हर्ष की बात है कि अखण्ड ज्योति परिवार के अधिकाँश सदस्य निष्ठा और श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय वाले कर्तव्य परायण व्रतधारी हैं। वे बहाने बाजी नहीं वरन् धर्म कर्तव्यों के लिये श्रम करने का आदर्श सदा ही आगे रखते रहे हैं।
देश व्यापी गायत्री उपासकों, साधकों, प्रेमियों एवं सिद्ध पुरुषों को एक सूत्र शृंखला में आबद्ध कर देने से माला की मणियों के समान उन संबद्ध व्यक्तियों का व्यक्तिगत रूप से अनुपम लाभ तो है ही, साथ ही विश्व व्यापी असुरता को संहार करने वाली दिव्य संघ शक्ति को जन्म देने संसार में सुख शान्ति की सत्य, प्रेम, न्याय की धर्म गंगा अवतीर्ण करने के महान पुण्य का परमार्थ श्रेय भी प्राप्त होना निश्चित है। थोड़ा प्रयत्न करने और समय लगाने के लिए हम सब तैयार हो जायं तो वर्तमान उपासकों को ढूंढ़कर, नये उपासकों को पैदाकर उनके संगठन की एक हजार शाखाऐं बना देना तनिक भी कठिन नहीं है। विशद् गायत्री महायज्ञ की भाँति यह संगठनात्मक सहस्र चंडी भी सरल ही है, कठिन नहीं।
इस महान सहस्र चंडी के लिए उन ऋत्विजों और महा-ऋत्विजों की आवश्यकता है जो गायत्री प्रसार के नीरस काम के लिए भ्रमता, प्रचार, परिश्रम एवं संगठन के कठिन भार को अपने कंधे पर उठाने के लिए तैयार हों। तीन या तीन से अधिक स्थानों में शाखाऐं स्थापित करने में सफल होने वाले कर्म योगियों को महा ऋत्विज् माना जायगा। ऐसे भी कई व्यक्ति हमारी दृष्टि में हैं जो 10 या 24 शाखाओं का मण्डल स्थापित करने में भी सफल होंगे। कुछ आत्माऐं नारद, शंकराचार्य, बुद्ध, महावीर, दयानन्द, विनोबा आदि की तरह लक्ष के लिये आत्मोत्सर्ग करके घर-घर अलख जगाने, गायत्री माता का सन्देश पहुँचाने एवं संगठनों की स्थापना के लिए अपना सारा समय ही लगा दें इस बात की आज भारी आवश्यकता है।
माता को तलाश करने वाले, उससे कुछ प्राप्त करने के लोभी भिक्षुक असंख्यों हैं, पर माता ऐसे व्यक्तियों की तलाश में है जो अपने लिये कुछ माँगने की अपेक्षा उसके निमित्त कुछ कर सकने को, मर मिटने को तैयार हों। इस सहस्र चण्डी के होता, अध्वर्यु, उद्गाता, आचार्य, ब्रह्मा, पुरोहित ऐसे ही कर्मठ वीर होंगे।
गतवर्ष के विशद् गायत्री महायज्ञ में सहस्रों संरक्षक तथा भागीदार थे। अब वह कार्य पूर्ण हो जाने पर उन सबको शिथिल नहीं हो जाना है वरन् इस वर्ष उन्हें एक परिवार के रूप में सुदृढ़ संगठन बना कर उन आदर्शों और उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संलग्न होना है जो गायत्री और यज्ञ के अन्तराल में तात्विक दृष्टि से सन्निहित हैं। यह संगठन का कार्य तथा उसका व्यवस्थित संचालन एक स्थान में एक व्यक्ति द्वारा होना सम्भव नहीं। इसलिये गतवर्ष के विशद् गायत्री महायज्ञ में केन्द्री भूत हुए गायत्री उपासकों को शाखा संगठनों के रूप में विकेन्द्रित कर देना है। इसी से उद्देश्य की पूर्ति में सुविधा, व्यवस्था तथा प्रगति रहेगी।
अखण्ड ज्योति के पाठक अधिकतर गायत्री उपासक हैं। उन्हीं के प्रयत्न से गतवर्ष महायज्ञ के निमित्त नये गायत्री उपासकों को बढ़ाया गया, तथा पुरानों को ढूँढ़ा गया था। अब परिवार संगठन का कार्य भी उन्हें ही सौंपते हैं। 1– अपने-अपने समीपवर्ती क्षेत्र के संरक्षकों, भागीदारों, प्रेमियों के पास जाकर उन्हें सदस्य बनाना। 2– शाखा स्थापित करना। 3– शाखा के कार्यक्रम को नियमित व्यवस्थित और प्रेमपूर्वक चलाना। 4– नये सदस्य और शाखाऐं बढ़ाने के लिये प्रयत्न करना। 5– अपनी गतिविधियों की सूचना केन्द्रीय संगठन-तपोभूमि को भेजते रहना। 6– “अखण्ड ज्योति” को स्वयं पढ़कर तथा दूसरों को पढ़वाकर निर्धारित लक्ष की ओर अग्रसर होने का प्रकाश प्राप्त करना, यह छह कार्य हम अखण्ड ज्योति परिवार के सक्रिय कर्मठ और उत्साही कर्मयोगियों पर छोड़ देते हैं। गत अंक में जो सदस्यता फार्म गया था वह जिनने अभी तक भर कर न भेजा हो वे अपना फार्म भर कर भेजने के साथ ही समीपवर्ती क्षेत्र के अन्य गायत्री उपासकों को संगठित करने उन्हें सदस्य बनाने का कार्य भी आरम्भ कर दें। सदस्यता के फार्म, शाखा स्थापना सम्बन्धी फार्म, आवश्यक ज्ञातव्य आदि की जितनी संख्या में आवश्यकता हो मथुरा से मंगालें और उनके आधार पर तुरन्त संगठन कार्य आरम्भ कर दें। जहाँ 10 सदस्य हैं या हो सकते हैं वहाँ “सार्वजनिक शाखाऐं” मानी जाएंगी। जो व्यक्ति जन संपर्क में नहीं रहते विशेषतया महिलाऐं वे अपने परिवार या पड़ौस के अपने समान निष्ठा वाले कम से कम 5 उपासकों को संगठित करके 5 उपासकों की ‘पारिवारिक शाखा’ स्थापित कर सकते हैं। यों कहीं एक दो सज्जन हों और अन्य सदस्य बढ़ने की आशा न हो तो बिना शाखा स्थापित किये भी वह सज्जन सीधे मथुरा से सम्बन्ध रखने वाले सदस्य बन सकते हैं।
आशा की जाती है कि सभी परिजन इस मास इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए कटिबद्ध होंगे और उपेक्षा एवं शिथिलता का नहीं, उत्साह और कर्तव्य निष्ठा का परिचय देंगे। यह संगठनात्मक दिव्य सहस्र चण्डी का आयोजन अत्यन्त महान है। इसे पूर्ण करने में सहयोग देने से एक भी परिजन को वंचित रहना चाहिये।
उपरोक्त संगठनात्मक यज्ञ के साथ साथ विश्वव्यापी युद्ध, दुविक्ष, महामारी, दैवी प्रकोप, द्वेष, अनिष्ट आदि संकटों से टक्कर लेने और उन्हें परास्त करने के लिए शान्ति स्थापना के लिए उपासनात्मक लक्ष चण्डी सूक्त यज्ञ का महा अनुष्ठान भी तपोभूमि में इस आश्विन की नवरात्रि से आरम्भ किया जा रहा है। इस अनुष्ठान में वेदोक्त चण्डी सूक्त के एक लाख पाठ, नवार्ण मन्त्र का 24 लक्ष जप तथा दुर्गा सप्तशती के एक सहस्र पाठ होंगे। इस प्रकार वैदिक लक्ष चण्डी, पौराणिक सहस्र चंडी तथा नवार्ण मंत्र का 24 लक्ष चण्डी महापुरश्चरण इन तीनों का समावेश होने से यह महा अनुष्ठान साधारण एकाकी लक्ष चण्डी, सहस्र चण्डी, नवार्ण पुरश्चरण की अपेक्षा तीन गुनी शक्ति से सम्पन्न होगा। यह प्रचंड चंडी महा पुरश्चरण एक ऐसी शक्ति उत्पन्न करेगा जो असाधारण रूप से असुरता को परास्त करने और खेत्व को परिपुष्ट करने में समर्थ होगी। अगले वर्ष सन् 57 के विशेष अशुभ होने की संभावना को देखते हुए इस समय यह और भी अधिक आवश्यक है। साधारणतया भी शत्रुओं, संकटों और अशुभ अनिष्टों को शमन करने के लिए चण्डी की उपासना की जानी है। फिर आज की विपन्न परिस्थिति में तो इसकी आवश्यक व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक सुरक्षा के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण है जो लोग इसमें भाग लेना चाहें वे मथुरा आकर इसमें भाग ले सकते हैं या अपनी ओर से इच्छित संख्या में जप हवन आदि करा सकते हैं। संकल्प पूर्ण हो जाने पर निर्धारित पाठ एवं जप का दशांश हवन होगा। जितनी संख्या में पंडित अभी बिठाये जा रहे हैं उतने से एक वर्ष में यह संकल्प पूर्ण होगा, और पूर्णाहुति आश्विन में ही होगा। यदि अधिक साधक बिठा दिये जायं तो 8 महीने में जेष्ठ की गायत्री जयन्ती तक भी यह सब कार्य पूरा हो सकता है। इसका अन्तिम निश्चय समयानुसार होगा। कार्य बड़ा है इसकी पूर्णता एवं परिणित भी महत्वपूर्ण ही होगी।
अखिल भारतीय गायत्री परिवार संगठन को बल देने और उसके समाचारों को विस्तृत रूप से छापने के लिए यह विचार किया गया था कि अखंड-ज्योति को विशुद्ध विचारात्मक पत्र रखा जाय और समाचारों के लिए एक अलग पत्र निकाला जाय जिसका नाम गायत्री परिवार पत्रिका हो। इस विचार में अनुसार गत मास एक विज्ञप्ति अखंड-ज्योति में छापी गई थी और संगठनात्मक परि पत्रों के साथ इसकी सूचना भी भेजी गई थी। उसके उत्तर में जो पत्र आये हैं उनमें से 85 प्रतिशत की सम्मति यह है कि समाचार आदेश, परिपत्र आदि को अखंड-ज्योति में ही छापा जाय, भले ही वे संक्षिप्त हों। दो पत्रिकाओं के ग्राहक रहने में अधिकाँश पाठकों ने अनेक कठिनाइयाँ बताई हैं।
किसी कार्य को अपनी मन मर्जी से ही कर डालने और परिजनों की सलाह को महत्व न देने की बात हमें ठीक नहीं लगती। यद्यपि अभी भी हम अलग पत्रिका से अधिक कार्य होने की बात सोचते हैं, पर परिजनों की इच्छा के विरुद्ध कोई निर्णय उन पर थोपना नहीं चाहते। इसलिए फिलहाल पाठकों के इसी सुझाव का परीक्षण कर रहे हैं कि “अखंड ज्योति में ही कुछ अधिक पृष्ठ इसके लिए निश्चित कर दिये जायं।” इस अंक से आठ पृष्ठ ‘गायत्री परिवार पत्रिका’ के रूप में सुरक्षित रहेंगे। लेखों की विचारात्मक पाठ्य सामग्री कम करने के पक्ष में हम नहीं, परिवार पत्रिका के पन्ने बढ़ने से अखंड ज्योति का कलेवर बढ़ेगा। लागत बढ़ेगी, घाटा बढ़ेगा। जो हो, इस समय पाठकों की इच्छानुसार ही व्यवस्था कर रहे हैं। जिन 20-25 सज्जनों का चन्दा 1॥) पत्रिका के लिए आ गया है वह अखंड ज्योति के उनके सन् 57 के हिसाब में जमा कर दिया जायगा। अब आगे से अखंड ज्योति में शंकाओं का समाधान, उपासकों के व्यक्तिगत अनुभव, सामूहिक आयोजनों के समाचार, साँस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्यक्रम भावी योजनाऐं, मायावी असुरता के कुचक्र और उपद्रवों का परिचय आदि विषयों की पाठ्य सामग्री के लिए 8 पृष्ठ सुरक्षित रहा करेंगे।
आत्म कल्याण की सर्वोत्तम साधना एवं सूक्ष्म जगत को शुद्ध करके संसार के ऊपर छाई हुई संकट की घटाओं को शान्त करने की महान सेवा के रूप में गायत्री उपासना की व्यापक प्रक्रिया आज अतीक आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए अधिकाधिक परिमाण में गायत्री उपासना तथा यज्ञ आयोजनों का महत्वपूर्ण कार्यक्रम गायत्री तपोभूमि द्वारा चलाया जा रहा है। प्रसन्नता की बात है कि उसकी उपयोगिता विचारवान धर्म प्रेमी आत्माओं ने समझी है और वे उसमें उत्साहपूर्वक योग दे रही हैं। विशद् गायत्री महायज्ञ की पूर्णाहुति के बाद विभिन्न स्थानों में सामूहिक यज्ञों की एक लहर चल पड़ी है। गत गुरु पूर्णिमा पर 108 यज्ञों में 24 लक्ष से कहीं अधिक आहुतियाँ हो चुकी हैं। श्रावण भाद्रपद में भी कई जगह अच्छे यज्ञ हुए हैं।
भीकनापुर (मेरठ) में श्री. अमनसिंह जी के यहाँ पाँच दिन तक हवन हुआ। भाद्रपद वदी 5 को कोटा में श्री. घनश्याम लाल शर्मा के प्रयत्न से बड़ा उत्साह वर्धक यज्ञ हुआ। यज्ञ मंडप और वेदी इतनी सुन्दर सजाई गई थी कि देखने वाले उसे देखते-देखते हटते न थे। श्री. मनोहरसिंह मा. नारायण लाल मनोहरसिंह, चन्दालाल, कालूलाल, गोपीलाल, किशनचन्द, वंशीलाल, मदनलाल गोसाई, गोविंद लाल जी आदि का सहयोग सराहनीय है। पूर्णाहुति के उपरान्त लगभग 300 स्त्री पुरुषों का एक जुलूस निकाला गया। तारा नगर में श्रावण सुदी 15 को अखंड कीर्तन तथा सामूहिक हवन हुआ। श्री. राधाकिशन गुप्त बजरंग लाल साखोलिया, ओंकार मल कंदोई, पं. भागचंद आदि सज्जनों ने बड़े उत्साह से सर्व व्यवस्था की। कामठी नागपुर के पं. शंकरलाल मिश्र ने आठ हजार आहुतियों का हवन पूर्ण किया। नगला महासिंह (आगरा) में पं. बोध शर्मा के प्रयत्न से श्रावण पूर्णिमा को 56000 आहुतियों का सामूहिक हवन हुआ। आरंग (रायपुर) में पं. शियाप्रसाद मिश्र ने श्रावण पूर्णिमा को संस्कृत पाठशाला में सामूहिक हवन परिपूर्ण कराया, नवरात्रि में 24-24 हजार के 24 अनुष्ठान कराने तथा 5 कुण्डों की यज्ञशाला में नवमी दशमी को हवन होगा। बड़ेसरा (अलीगढ़) से पं. धुन्धीसिंह चौ. अमरसिंह आदि सज्जनों ने रक्षा बन्धन के दिन अच्छा हवन कराया।
खलघाट में 25 उपासकों द्वारा प्रतिमास 2400 आहुतियों का हवन क्रम चल रहा है। पं. व्यंकटेश दयाराम शर्मा खलघाट में तथा अन्य आस पास के स्थानों में सामूहिक यज्ञानुष्ठानों का बड़ा प्रयत्न कर रहे हैं। खरगान की-जम्बु धर्मशाला में श्रावण सुदी 13 को बड़ा सुन्दर यज्ञ हुआ। पं. व्यंकटेश शर्मा ने यज्ञ की विधि सम्पन्न कराई। आर्थिक बोझ श्री. शंकर राव खोड़े ने उठाया। सर्व श्री. बाबूराव कानूनगा पुष्पदन्त राणा, गिरधारी लाल जोशी रामेश्वर जी बड़ोले, पुष्प बदन ओरा, नारायण राव मंडलोई, बद्रीप्रसाद वर्वे, नटवरलाल त्रिवेदी का सहयोग सराहनीय रहा। ता. 16 सितम्बर को ऊन (खरगोन) में अच्छा सामूहिक हवन हुआ। ग्राम बडोरा (कोटा) में महादेव जी के मन्दिर पर हवन हो रहा है। 26-75 आहुतियाँ हुई। 67 उपासक बन गये हैं। ग्राम नरावली सोनाखोड़ी में पं. जगन्नाथ जी द्वारा हवन चालू कराया गया है।
लखना दौन (छिन्दवाड़ा) में 10 हजार आहुतियों का हवन ता. 4 सितम्बर को हुआ। 5 लाख जप हो चुका है। 50 हजार मंत्र लिखाये जा चुके हैं। पं. महादेव प्रसाद तिवारी बड़े उत्साह से कार्य कर रहे हैं। वापी (गुजरात) में कृष्ण राव हिगजी घोण्डे के प्रयत्न से 16 सितम्बर को यज्ञ की पूर्णाहुति हुई, आगर (मालवा) से तीन मील दूर बैजनाथ महादेव के मन्दिर पर 40 दिन तक विशेष अनुष्ठान हुआ। अखंड दीपक, 11 रुद्राभिषेक अखंड रामायण पाठ, गायत्री जप, शिवमन्त्र जप, शतचंडी जप, भागवत पाठ, कीर्तन भजन, रात्रि जागरण आदि कार्यक्रम चलते रहे। पाँच कुँडों में 281535 आहुतियाँ हुई। हजारों नर-नारी दर्शन को आये थे। शाजापुर जिले में यह उत्सव अद्वितीय रहा। 1781 रु. खर्च हुए। श्री. मुन्नालाल कनेरियन कर्मयोगी तथा अन्य धर्म प्रेमियों का सहयोग बड़ा सराहनीय रहा। कोकला (कोटा) में श्रावणी पूर्णिमा को 5000 मन्त्रों का बड़े समारोह पूर्वक हवन हुआ। देवझरी स्थान पर श्रावणी कर्म बड़ी श्रद्धा पूर्वक हुआ कार्तिक वदी अमावस्या को फिर यहाँ एक बड़ा यज्ञ होगा। सर्व श्री. रामप्रताप जी ग्रामगुरु, भैरवलाल जी, शिवनारायण जी, रामकरण दाधीक, शान्तीलाल विद्यार्थी, श्रीकृष्ण जी गालव, पं. सरदार मल गौतम आदि का उत्साह सराहनीय था। मालेगाव (नासिक) में जन्माष्टमी के दिन बड़े उल्लास और आनन्द के वातावरण में पाँच हजार आहुतियों का हवन हुआ।
आश्विन मास में कम से कम 108 अच्छे सामूहिक यज्ञों की आशा है। झालावाड़ में तैयारियाँ हो रही हैं। अटरू (कोटा में तैयारी चल रही हैं। गणेश मंदिर पर एक बड़ा यज्ञ होगा। नियाना, वपावर सागौद में कार्तिक में ही बड़े बड़े यज्ञ होने जा रहे हैं। सतना (विन्ध्य प्रदेश) में श्री. आर. आर. मिश्र के प्रयत्न से ता. 13-14 नवम्बर को दूसरे सामूहिक यज्ञ होने जा रहा है। उदई पुर चपुन्ना (इटावा) में पं. विश्वेश्वर दयाल द्विवेदी आदि सज्जनों ने आस पास के 24 गाँवों में यज्ञ करने का जो संकल्प किया था वह पूरा होने पर 15,16,17 दिसम्बर को उन सबको सामूहिक यज्ञ होने जा रहा है। बरेली में श्री. चमनलाल सूरी आदि सज्जनों ने ता. 29-30 नवम्बर तथा 1-2 दिसम्बर का सामूहिक यज्ञ रखा है। रसगाँव (खरगोंन) में 24 लक्ष आहुतियों के हवन की पूर्णाहुति माघ में बसन्त पंचमी को होगी।
गायत्री परिवार के सदस्य बनाने तथा शाखाऐं स्थापित करने का कार्य करने में सभा परिजन आपस में होड़ लगाये हुए हैं। शाहजहाँपुर में 44, मनसूरपुर में 7, संधवा में 12, झाँसी में 18, दिगोंडा में 11, हापुड़ में 9, अकलेरा में 11, कल्याणपुर में 5, धरण गांव में 10, कपडवंज में 11, पेटलावड में 15, जासलपुर में 10, घुरसेना में 7, कानपुर में 27, लखनदोन में 14, रोहीशाला में 5, फर्कखाबाद में 18, सुसनेर में 22, अन्ता में 11, बीकानेर में 7, बरेली में 15, व्यावर में 20, मौडल गढ़ में 19, जोधपुर में 10, मोधरापुर में 10, गोहाड़ में 20, मुर्रा में 15, घुरट 13, धामपुर 65 धगवाँ 17, कनोद 10, जालोन 11, बारावंकी में 11, कसरावाद 1, बसेता 15, केन्द्रीय शाखा में 24 सदस्य बने हैं। यह पंक्तियाँ ता. 15 सितम्बर को लिखी जा रही है। जब तक यह अंक पहुँचेगा तब तक शाखाओं तथा सदस्यों की संख्या कम से कम इतनी ही और बढ़ चुकी होगी। नवरात्रि में इस दिशा में परिजन अधिक प्रयत्न करेंगे ऐसी आशा है। कई सज्जनों ने 240 सदस्य बनाने की कई ने घूम-घूमकर 24 शाखाऐं स्थापित करने की प्रतिज्ञा की है। परिवार का संगठन बन जाने पर इस सब का विस्तृत विवरण छापा जायगा। आशा की जाती है कि सुसंगठित गायत्री परिवार भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान एवं सूक्ष्म वातावरण में सुख शान्ति की धाराऐं प्रवाहित करने में महत्वपूर्ण भाग लेगा।
*समाप्त*