(श्री. सुमित्रा कुमारी सिन्हा)
पथ के भटके पंथी भी तो, अपनी मंजिल पास बुलाते। करते हैं जो खोज स्वप्न की, स्वयं वही सपना बन जाते॥ पूजा रत भक्तों में ही तो, उठकर हैं भगवान समाते। पीड़ा से जो इठते वे ही, लक्ष्यों पर वाणों से गिरते— जीवन वही जगाते हैं जो, जीवन में ही मृत्यु बुलाते॥ पथ के. ॥
शलभों से जलते जो, उनकी शिरा-शिरा दीपक बन जाती। टूटे जी को साँस हवा की, जीवन की धड़कनें सुनाती॥ प्राणों पर जो पत्थर रखते, वे ही हृदयवान कहलाते। सूनेपन के बन्दी ही तो शब्दों का संसार रचाते॥ भोर देखते हैं जो निशि भर प्रतिक्षण अपना दीप जलाते॥ पथ के ॥
तो क्या हुआ कि तुम हो मुझसे दूर, और मधु बेला आई। निज को तुममें मिला आज तो मैंने दूरी निकट बुलाई॥ अब तो मुझको श्वास तुम्हारी अपने में लहराती लगती। आँसू धुली दृष्टि में मेरी, अब तो ज्योति तुम्हारी जगती॥
अब तो हँसते हो विषाद में, गीतों में भी मुझे रुलाते। पथ के भटके पंथी भी तो अपनी मंजिल पास बुलाते॥
(आचार्य विनोबा)
पहले हम मानव की सौम्यतम व पावन मूर्तियों में परमात्मा का दर्शन करना सीखें। उसी तरह इस सृष्टि में जो-जो विशाल व मनोहर रूप हैं उनमें उसके दर्शन पहले करें। उषा को ही लो। सूर्योदय के पहले की वह दिव्य प्रभा। इस उषा-देवता के गान मस्त होकर ऋषि गाने लगते हैं—“उषे, तू परमेश्वर का सन्देश लाने वाली दिव्य दूतिका है, तू हिमकणों से नहाकर आयी है। तू अमृतत्व की पताका है।” ऐसे भव्य हृदयंगम वर्णन ऋषियों ने उषा के किये हैं। वैदिक ऋषि कहते हैं—“तेरा दर्शन करके, जो कि परमेश्वर की संदेशवाहिका है, यदि परमेश्वर का रूप न दिखाई दे, न समझ में आये तो फिर मुझे परमेश्वर का परिचय कौन करायेगा।” इतनी सुन्दरता से सज-धज कर यह उषा सामने खड़ी है, परन्तु हमारी निगाह वहाँ तक जाय तब न?
उसी तरह सूर्य को देखो। उसके दर्शन मानो परमात्मा के ही दर्शन हैं। वह नाना प्रकार के रंग-बिरंगे चित्र आकाश में खींचता है। चित्रकार महीनों कूँची इधर-उधर घुमाकर सूर्योदय के चित्र बनाते और उसमें रंग भरते हैं। परन्तु तुम सुबह उठकर परमेश्वर की कला को देखो तो। उस दिव्य कला के लिये—उस अनन्त सौंदर्य के लिये भला क्या उपमा दी जा सकेगी? परन्तु देखता कौन है? उधर वह सुन्दर भगवान खड़ा है और इधर यह मुँह पर और भी रजाई डालकर नींद में खुर्राटे भरता है। सूर्यदेव कहते हैं—“अरे आलसी, तू तो पड़ा ही रहना चाहता है किन्तु मैं तुझे उठाऊँगा।” और वह अपने जीवन-किरण खिड़कियों में से भेजकर उस आलसी को जगा देता है। सूर्य समस्त स्थावर-जंगम का आत्मा है। चराचर का आधार है, जीवन का आधार है। उसमें परमात्मा के दर्शन करो।
और वह पावन गंगा! जब मैं काशी में था तो गंगा के किनारे जाकर बैठ जाया करता। रात में, एकान्त समय में जाता था। कितना सुन्दर और प्रसन्न उसका प्रवाह था। उसका वह भव्य गम्भीर प्रवाह और उसके उदर में संचित वे आकाश के अनन्त तारे! मैं मूक बन जाता। शंकर के जटाजूट से अर्थात् उस हिमालय से बहकर आने वाली वह गंगा जिसके तीर पर राज-पाट को तृणवत् फेंककर राजा लोग तप करने जाते थे, उस गंगा का दर्शन करके मुझे असीम शान्ति अनुभव होती। उस शान्ति का वर्णन मैं कैसे करूं? वाणी की वहाँ सीमा आ जाती है। यह समझ में आने लगा कि हिन्दू यह क्यों चाहता है कि मरने पर निदान मेरी अस्थि तो गंगा में पड़ जाय। आप हँसिये। आप हँसने से कुछ बिगड़ता नहीं। परन्तु मुझे ये भावनायें बहुत पवित्र और संग्रहणीय मालूम होती हैं। मरते समय गंगाजल के दो बूँद मुँह में डालते हैं। वे दो बूँद क्या हैं; मानो परमेश्वर ही मुँह में उतर आता है उस गंगा को परमात्मा ही समझो। वह परमेश्वर की करुणा बह रही है। तुम्हारा सारा भीतरी-बाहरी कूड़ा-कर्कट वह माता धो रही है, बहा ले जा रही है। गंगा माता में यदि परमेश्वर प्रकटित न दिखाई दे, तो कहाँ दिखाई देगा? सूर्य, नदियाँ, धू-धू करके हिलोरें मारने वाला वह विशाल सागर, ये सब परमेश्वर की ही मूर्तियाँ हैं।
और वह हवा! कहाँ से आती है, कहाँ जाती है, कुछ पता नहीं। यह भगवान का दूत ही है। हिन्दुस्तान में कुछ हवा स्थिर हिमालय पर से आती है; कुछ गम्भीर सागर से। यह पवित्र हवा हमारे हृदय को छूती है, हमें जाग्रत करती है, हमारे कानों में गुनगुनाती है। परन्तु इस हवा का संदेश सुनाता कौन है? जेलरने यदि हमारा चार सतर का खत न दिया, तो हमारा दिल खट्टा हो जाता है। अरे मंदभागी, क्या रखा है उस चिट्ठी में? परमेश्वर का यह प्रेम-संदेश, हवा के साथ हर घड़ी आ रहा है, उसे तू सुन!
और हमारे घर के नित्य काम-काज में आने वाले इन पशुओं को देखो! वह गो माता कितनी वत्सल, कितनी ममता व प्रेम से परिपूर्ण है! दो-दो तीन-तीन मील से, जंगल-झाड़ियों से अपने बछड़ों के लिये कैसी दौड़कर आती हैं! वैदिक ऋषियों को पर्वतों से स्वच्छ जल लेकर कल-कल करती हुई आने वाली नदियाँ देखकर अपने बछड़ों के लिए दूध-भरे स्तनों को लेकर राँभती हुई आने वाली वत्सल गायों की याद हो आती है। वह ऋषि नदी से कहता है—“हे देवि दूध की तरह पवित्र, पावन, मधुर जल लाने वाली तू धेनु जैसी है। जैसे गाय जंगल में नहीं रह सकती, वैसे ही तुम नदियों से भी पर्वतों में नहीं रहा जा सकता। तुम सरपट दौड़ती हुई प्यासे बालकों से मिलने के लिए आती हो।”
वत्सल गाय के रूप में भगवान् ही दरवाजे पर खड़ा है।
ऐसे कितने उदाहरण दूँ? मैं तो सिर्फ खयाल दे रहा हूँ। रामायण का सारा सार इस प्रकार की रमणीय कल्पना में ही है। रामायण में पिता-पुत्र का प्रेम, माँ बेटों का प्रेम, भाई-भाई का प्रेम, पति-पत्नी का प्रेम, यह सब कुछ है। परन्तु मुझे रामायण इसके लिए प्रिय नहीं है। मुझे वह पसंद इसलिए है कि राम की मित्रता वानरों से हुई। आजकल कहते हैं वे वानर तो नाग-जाति के थे। इतिहासज्ञों का काम ही है पुरानी बातों की छानबीन करना। उसके इस कार्य पर मैं आपत्ति नहीं उठाता। लेकिन राम ने यदि असली वानरों से मित्रता की हो तो इसमें असंभव क्या है? राम का रामत्व, रमणीयत्व सचमुच इसी बात में है कि राम और वानर मित्र हो गये। इसी तरह कृष्ण का और गायों का सम्बन्ध। सारी कृष्ण पूजा का आधार यही कल्पना है। श्री कृष्ण के किसी चित्र को लीजिये तो आपको इर्द-गिर्द गायें खड़ी मिलेंगी। गोपाल कृष्ण, गोपाल कृष्ण! यदि कृष्ण से गायों को अलग कर दो तो फिर कृष्ण में बाकी क्या रहा? राम से यदि वानर हटा दिये तो फिर उस राम में क्या बाकी रहा? राम ने वानरों में भी परमात्मा के दर्शन किये व उनके साथ प्रेम और घनिष्ठता का सम्बन्ध स्थापित किया। यह है रामायण की कुँजी! इस कुँजी को आप भूल जायेंगे तो रामायण की मधुरता खो देंगे। पिता-पुत्र का, माँ बेटे का प्रेम तो और जगह भी मिल जायगा, परन्तु नर-वानर की यह अनन्य मधुर मैत्री सिर्फ रामायण में ही मिलेगी और कहीं नहीं। वानर में स्थित भगवान, रामायण ने आत्मसात् किया। वानरों को देखकर ऋषियों को बड़ा कौतुक होता। ठेठ रामटेक से लेकर कृष्णा-तट तक जमीन पर पैर न रखते हुए वे वानर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर कूदते-फांदते और क्रीड़ा करते थे। ऐसे उस सघन वन को और उसमें क्रीड़ा करने वाले वानरों को देखकर उन सहृदय ऋषियों के मन में कवित्व जाग उठता, कौतुक होता। ब्रह्म की आँखें कैसी होती हैं यह बताते हुए उपनिषदों ने बन्दरों की आँखों की उपमा दी है। बन्दर की आँखें बड़ी चंचल, चारों ओर उनकी निगाह। ब्रह्म की आँखें ऐसी ही होनी चाहिए। ईश्वर का काम आँखें स्थिर रखने से न चलेगा। हम आप ध्यानस्थ होकर बैठ सकते हैं। परन्तु यदि ईश्वर ध्यानस्थ हो जाय तो फिर दुनिया का क्या हाल हो। अतः बन्दरों में ऋषियों को सबको चिन्ता रखने वाली ब्रह्म की आँखें दिखाई देती हैं। वानरों में परमात्मा के दर्शन करना सीख लो। संतों के लिए सर्वत्र सुकाल है। परन्तु हम अभागों के लिए सब जगह अकाल है।
और मैं उस कोयल को कैसे बुलाऊँ? किसे पुकारती हैं वह? गर्मियों में नदी नाले सूख गये, परन्तु वृक्षों में नव-पल्लव छिटक रहे हैं। वह यह तो नहीं पूछ रही है कि किसने उन्हें यह वैभव प्रदान किया? कहाँ है वह वैभवदाता? कैसी उत्कट मधुर कूक! हिंदू धर्म में कोयल के व्रत का तो विधान ही मिलता है। स्त्रियाँ व्रत लेती हैं कि कोयल की आवाज सुने बिना वे भोजन नहीं करेंगी। कोयल के रूप में प्रकट परमात्मा का दर्शन करना सिखाने वाला यह व्रत है। वह कोयल कितनी सुंदर कूक लगाती है, मानो उपनिषद् ही गाती है। उसकी कूह-कूह तो कानों को सुनाई देती है परन्तु वह दिखाई नहीं देती। वह अंग्रेजी कवि वर्ड सवर्थ उसके पीछे पागल होकर जंगल-जंगल उसकी खोज में भटकता है। इंग्लैंड का कवि कोयल को खोजता है; परन्तु भारत में घरों की सामान्य स्त्रियाँ कोयल न दिखाई दें तो खाना भी नहीं खातीं। इस कोकिला व्रत की बदौलत भारतीय स्त्रियों ने महान् कवि की पदवी प्राप्त करली है। जो कोयल परम आनन्द की मधुर ध्वनि सुनाती है उसके रूप में सुन्दर परमात्मा ही अभिव्यक्त हुआ है।
कोयल तो सुन्दर और कौवा क्या भद्दा है? कौवे का भी गौरव करो। मुझे तो वह बहुत प्रिय है। उसका वह घना काला रंग, वह तीव्र आवाज। वह आवाज क्या बुरी है? नहीं, वह भी मीठी है। वह पंख फड़फड़ाता हुआ आता है तो कितना सुन्दर लगता है। छोटे बच्चों का चित्त खींच लेता है। नन्हा बच्चा बन्द घर में खाना नहीं खाता। बाहर आँगन में बैठकर उसे जिमाना पड़ता है और कौवे दिखाकर उसे कौर खिलाना पड़ता है। कौवे के प्रति स्नेह रखने वाला वह बच्चा, क्या पागल है? वह पागल नहीं, उसमें ज्ञान भरा हुआ है। कौवे के रूप में व्यक्त परमेश्वर से वह बच्चा फौरन एक रूप हो जाता है। माता चावल पर चाहे दही डाले, दूध डाले या शक्कर डाले; उस बच्चे को उसमें कोई रस नहीं। उसे आनन्द है कौवे के पंख फड़फड़ाने में; उसके मुँह नचाने में। सृष्टि के प्रति छोटे बच्चों को जो इतना कौतुक मालूम होता है उसी पर तो सारी ईसप-नीति रची गई है। ईसप को सर्वत्र ईश्वर दिखाई देता था। अपनी प्रिय पुस्तकों की सूची में, मैं ईसप-नीति का नाम सबसे पहले रखूँगा, भूलूँगा नहीं। ईसप के राज्य में दो हाथों वाला, पाँवों वाला यह मनुष्य प्राणी ही अकेला नहीं है। उसमें कुत्ते, कौवे, हिरन, खरगोश, कछुए, साँप, केंचुए सभी बातचीत करते हैं हंसते हैं। एक प्रचण्ड सम्मेलन ही समझिये न? ईसप से सारी चराचर सृष्टि बातचीत करती है। उसे दिव्यदर्शन प्राप्त हो गया है। रामायण भी इसी तत्व पर, इसी दृष्टि पर रची है। तुलसीदास ने राम की बाल-लीला का वर्णन किया है। राम आँगन में खेल रहे हैं। एक कौवा पास आता है, राम उसे आहिस्ता से पकड़ना चाहते हैं। कौवा पीछे फुदक जाता है, अंत को राम थक जाते हैं। परन्तु उन्हें एक तरकीब सूझती है। मिठाई का एक टुकड़ा लेकर राम कौवे के पास जाते हैं। राम टुकड़ा जरा आगे बढ़ाते हैं, कौवा कुछ नजदीक आता है। इस तरह के वर्णन में तुलसीदास कई पृष्ठ खर्च कर जाते हैं। क्योंकि वह कौवा परमेश्वर है। राम की मूर्ति का अंश ही उस कौवे में भी है। राम और कौवे की पहचान मानो परमात्मा से परमात्मा की पहचान है।
साराँश यह कि इस प्रकार इस सारी सृष्टि में विविध रूपों में—पवित्र नदियों के रूप में, विशाल पर्वतों के रूप में, गंभीर सागर के रूप में, वत्सल गोमाता के रूप में, उम्दा घोड़े के रूप में, दिलेर सिंह के रूप में, मधुर कोयल के रूप में, सुन्दर मोर के रूप में, स्वच्छ व एकाँतप्रिय सर्प के रूप में, पंख फड़फड़ाने वाले कौवे के रूप में, दौड़-धूप करने वाली ज्वालाओं के रूप में, प्रशान्त तारों के रूप में सर्वत्र परमात्मा समाया हुआ है। आँखों को देखने का अभ्यास कराना है। पहले मोटे और सरल अक्षर, फिर बारीक और संयुक्ताक्षर सीखने चाहिए। संयुक्ताक्षर न सीख लेंगे तब तक प्रगति नहीं हो सकती। संयुक्ताक्षर कदम-कदम पर आयेंगे। दुर्जनों में स्थिर परमात्मा को देखना भी सीखना चाहिए। राम समझ में आता है, परन्तु हिरण्यकशिपु भी जंचना चाहिए। वेद में कहा है—
“नमोनमः स्तेनानां पतये नमोनमः नमः पुंजिष्टेभ्यो नमो निषादेभ्यः” “ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मै वेमे कितवाः।”
“उन डाकुओं के सरदारों को नमस्कार! उन क्रूरों को, उन हिंसकों को नमस्कार। ये ठग, ये चोर, ये डाकू सब ब्रह्म ही हैं। इन सबको नमस्कार।”
इसका अर्थ क्या? इसका अर्थ यह है कि सरल अक्षर तो सीख गये अब कठिन अक्षरों को भी सीखो। कार्लाइल ने ‘विभूति-पूजा’ नामक एक पुस्तक लिखी है। उसने उसमें नेपोलियन को भी एक विभूति कहा है। यहाँ शुद्ध परमात्मा नहीं है, मिश्रण है। परन्तु इस परमेश्वर को भी पचा लेना चाहिए। इसीलिए तुलसीदास ने रावण को राम का विरोधी भक्त कहा है। हाँ, इस भक्त के रंग-ढंग जरा भिन्न हैं। आग से जल जाने पर पाँव सूज जाता है, परन्तु सूजन पर सेंक करने से वह ठीक हो जाता है। दोनों जगह तेज एक ही। पर आविर्भाव भिन्न-भिन्न हैं। राम और रावण में आविर्भाव भिन्न-भिन्न दिखाई दिया तो भी वह है एक ही परमेश्वर का।
स्थूल व सूक्ष्म, सरल और मिश्र, सरल अक्षर व संयुक्ताक्षर सब सीखो और अंत में यह अनुभव करो कि परमेश्वर के सिवाय एक भी स्थान नहीं है। अणु-रेणु में भी वही है; चींटी से लेकर सारे ब्रह्माँड तक सर्वत्र परमात्मा ही से व्याप्त है। सबकी एक-सी चिंता रखने वाला कृपालु, ज्ञान-मूर्ति, वत्सल, समर्थ, पावन, सुन्दर, परमात्मा हमारे चारों ओर सर्वत्र खड़ा है।
(श्री डॉ. भगवान दासजी)
“सत्यं वद, धर्म चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। यान्यनवद्यानि कर्माणितानि सेवितव्यानि, नो इतराणि। यान्यस्माकं सुचारितानि तान्येव त्वयोपास्यानि, नो इतरणि। प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव। ये के चास्मच्छ्रेयांसो ब्राह्मणाः अलूक्षाः समर्शिनः, तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम्। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्त चिकित्सा वा स्यात्, ये तत्र ब्राह्मणः धर्मकामाः स्युः, यथा ते तत्र वर्तेरन् तथा तत्र वर्तेशाः। एष आदेशः; एष उपशदेः; एषा वेदोपनिषत्।”
(तेत्तिरीय उपनिषत्)
अन्तिम उपदेश, अन्तिम आदेश यही है—सत्य बोलना धर्म के अनुसार आचरण करना, स्वाध्याय में अर्थात् बुद्धिवर्धक-ज्ञानवर्धक-शास्त्रों के नित्य अवलोकन करने में प्रमाद नहीं करना। पढ़ना समाप्त हुआ, अब हमको पठन-पाठन से क्या काम, ऐसा मत समझना। कुशलता साधने वाले, कौशल के कामों के करने से मत चूकना। भूति, विभूति, विभव सम्पादन करने वाले धर्म युक्त कामों के करने से मत चूकना। देवों और पितरों के ऋण चुकाने वाले कामों से मत चूकना। जो अच्छे काम हैं वही करना। यदि हमने भी कोई अनुचित काम किया है, तो यह विचार के कि, ‘आचार्य ने ऐसा किया है’ उसका अनुकरण नहीं करना। जो हमसे अच्छे काम बन पड़े हैं, उन्हीं का अनुकरण करना, हमारे अनुचित कामों का अनुकरण मत करना। हमसे जो अधिक श्रेष्ठ सच्चरित्र विद्वान मिलें उनकी उपासना करना। अन्धश्रद्धा मत करना; अपनी बुद्धि पर भरोसा करके विवेक से काम करना। अपने मन में सार्वजनिक स्नेह का भाव रखना। प्रजा, सन्तान का उच्छेद मत करना। अपने सुख, चैन की स्वार्थी लालच से गार्हस्थ्य के उत्तम धर्म का बोझ उठाने से जान मत छिपाना।
यथा नदी-नदाः सर्वे समुद्रे यांति संस्थितिं, तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यांति संस्थितिंम्। यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजंतवः, तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमाः॥ यस्मात्त्रयोऽन्याश्रमिणः ज्ञानेनान्नेन चान्वहं। गृहस्थेनैव धार्यन्ते, तस्मात् ज्येष्ठाश्रमो गृही। (मनु)
अर्थात्, जैसे सब नद-नदी, समुद्र ही में आसरा पाते हैं; जैसे सब जीव-जन्तु, वायु के ही सहारे जीते है; वैसे सब आश्रम गृहस्थ के आसरे रहते हैं। अन्य तीन आश्रम वालों को गृहस्थ ही अन्न भी देता है और ज्ञान भी देता है।
हाँ, सब उत्सर्गों के लिये, सब नियमों के लिये, अपवाद होते हैं। विशेष-विशेष अवस्था में नैष्ठिक ब्रह्मचर्यादि हो सकता है। और परार्थ के लिये, परोपकार के लिये, निश्चिंत होकर देश-सेवा के लिये, यदि कोई नैष्ठिक, अथवा परिमित काल के लिये, ब्रह्मचर्य का व्रत बढ़ा दें, तो यह उनके और देश के बड़े सौभाग्य की बात है, और देश को ऐसे ब्रह्मचारी (तथा वानप्रस्थ) स्वयंसेवकों की बड़ी आवश्यकता है। पर साधारण धर्म इसी को जानना, अर्थात् विद्याध्ययन से समावृत्त होकर गार्हस्थ्य करना और अपने त्रिविध ऋण को यत्न पूर्वक चुकाना। माता, पिता, आचार्य रूपी देवताओं ने आपके लिये बड़ा परिश्रम किया है, उनका ऋण आपके ऊपर बहुत है, उसको अपने आगे के पुस्त के लिये वैसा ही परिश्रम करके चुकाना। माता, पिता और आचार्य के लिये नम्रता-भाव, श्रद्धा-भाव, अपने मन में सदा बनाये रहना। इससे आप ही की आगे बहुत रक्षा होगी। मिथ्या-अहंकार-जनित कलह के दुष्फलों से बचिये। हमसे आपसे जो वृद्ध हैं उनका अनादर मत करना। मातृ-भक्ति विशेष कीजियेगा। शरीर को जन्म देने वाली माता की तथा जन्मभूमि-रूपिणी, जिससे पहली माता का भरण पोषण हुआ और होता है, तथा उस जन्म-भूमि की भी माता स्वयं जन्म रहित सर्व जगज्जननी, परमात्मा की स्वभाव-रूपिणी प्रकृति देवी की, परमपुरुष की प्रकृति की, जिसकी सारी सृष्टि ही सन्तान है, हृदय में भक्ति बनाये रहियेगा।
अजामेकांलो हित-कृष्ण-शुक्वां सर्वाः प्रजाः सृजमानां नमामः।
अर्थात् परमात्मा की जन्म रहित अनादि-अनन्त-शक्ति-त्रिकमयी, त्रिगुणात्मिका, तीन रंग वाली, सरस्वती-रूपेण श्वेत, काली रूपेण कृष्ण, और लक्ष्मी-रूपेण रक्त देवी को जो सब असंख्य प्रजाओं की जननी है, हम लोग नमस्कार करते हैं।
माता की सात्त्विक भक्ति और वंदना का यह भाव परम पावन और मनोमलशोधन है इसलिये मनु ने कहा है,
उपाध्यायान दशाचार्यः, शताचार्यां स्तथा पिता, सहस्त्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते। (मनु)
दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता और सहस्र पिताओं से बढ़कर माता की गुरुता है।
वृद्ध पितामह भीष्म ने इसका फल थोड़े में कहा है।
जीवतः पितरौ यस्य, मातुरंकगतो यथा, षष्टिहायनवर्षोऽपि स द्विहायनवच्चरेत्। (शाँतिपर्व)
जिसके माता-पिता वर्तमान हैं वह साठ वर्ष की उमर पाकर भी बैठा निश्चिंत और प्रसन्न रहता है जैसा माँ की गोद में दो वर्ष का बच्चा।
यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।
जिस रहन-सहन आचार-विचार से अभ्युदय और निःश्रेयस दोनों मिले, इस लोक में अभ्युदय भी, और संसार के सुखों में सदा लिपटे हुए दुःखों के बंधनों से मोक्ष भी वही धर्म है। इसलिये धर्म प्रधानता, सभ्यता शालीनता के गुरुकुल का आचार्य अन्तिम उपदेश फिर भी धर्म विषयक ही देता है, कि यदि कभी संदेह हो कि इस विशेष अवस्था में क्या कर्तव्य है, क्या कृत्य है क्या धर्म है, तो जो सत्पुरुष, सच्चे विद्वान्, धार्मिक और तपस्वी जीव जिनका का नाम ब्राह्मण है, वे जैसा उस अवस्था में, उस देश-काल-निमित्त में, आचरण करते हों वैसा ही आप आचरण करना।
एषा वेदोपनिषद्।
यही सर्वत्र वेद अर्थात् ज्ञान का निचोड़ निष्कर्ष, रहस्य, उपनिषत् है।
(पं. श्रीलालजीरामजी शुक्ल, एम. ए.)
हम अपने मन की शक्तियों से भली भाँति परिचित नहीं हैं। हम अपने मन को शरीर के भीतर एक अचेतन पदार्थ मानते हैं। इसलिए हम उसकी शक्ति को भी सीमित मानते हैं। आधुनिक जड़वादी मनोविज्ञान ने हमारे मन को शरीर से सीमित मानने की प्रवृत्ति को और भी प्रबल कर दिया है। जड़वादी मनोविज्ञान मन को जड़ पदार्थ का एक विशेष प्रकार का परिणाम मानता है। हमारे मस्तिष्क में चलने वाली क्रियाओं में ही किसी प्रकार चेतनता उत्पन्न हो जाती है, यही मन है। मनोविश्लेषण-विज्ञान ने मन के स्वरूप के विषय में हमारा ज्ञान बहुत कुछ बढ़ाया किंतु उसने हमारे शरीर से पृथक् चेतन पदार्थ की कल्पना को अवैज्ञानिक माना है। मनोविश्लेषण-विज्ञान ने इतना तो अवश्य किया कि शरीर की दशा को मन की दशा पर निर्भर सिद्ध किया है। जहाँ पहले मनोवैज्ञानिक मन को शरीर पर निर्भर मानते थे वहाँ अब मानसिक व्यापारों तथा रोगों का कारण मन की स्थिति में ढूँढ़ा जाता है। मनोविश्लेषण कर्ता का कथन है कि मन के स्वस्थ रहने पर शरीर स्वस्थ रहता है।
हमारे पूर्वजों ने मन के ऊपर इससे भी अधिक विचार किया है। योग वाशिष्ठ में मन को ही सृष्टि का कारण माना है। मन एक और शरीर का निर्माण करता है और दूसरी ओर उस परिस्थिति का निर्माण करता है जिसमें कि किसी व्यक्ति को रहना है। हमारी मानसिक भावनाओं और बाह्य जगत् में आन्तरिक एकता है। भविष्य में होने वाली घटनाओं की रूपरेखा पहले से ही हमारे मन में वर्तमान रहती है। अपनी मानसिक भावनाओं के बदल देने से होनहार घटनाएं भी बदल जाती हैं। जिस मनुष्य का अपने मन पर अधिकार है वह परिस्थितियों से नहीं डरता। प्रतिकूल परिस्थितियाँ अन्त में अनुकूल हो जाती हैं। जिस व्यक्ति में जितनी ही अधिक मन को एकाग्र करने की शक्ति होती है, वह उतना ही अधिक बाह्य परिस्थितियों का दास न रह कर उनका स्वामी हो जाता है। विचारों की स्थिरता में ही मनुष्य की सफलता का रहस्य है।
हमारा मन शरीर के एक स्थान पर रहने पर भी जहाँ चाहे जा सकता है। देश और काल की सीमा शरीर के लिए है, मन के लिए नहीं है, इस तथ्य पर प्रत्येक मनुष्य को बार-बार भली प्रकार से मनन करना चाहिये। मन की शक्ति अपने निश्चय के अनुसार घटती और बढ़ती है। मनुष्य अपने मन में वैसी ही शक्ति का उदय होते हुए पायेगा जैसी शक्ति का वह निश्चय कर लेगा। अपने साधारण व्यावहारिक जीवन में हम अपनी अद्भुत मानसिक शक्तियों का परिचय पाते हैं। पर विचार न करने के कारण हम उन शक्तियों का भली प्रकार से साक्षात्कार नहीं कर पाते। इसलिए वे शक्तियाँ अपनी थोड़ी सी ही झलक दिखाकर अदृश्य हो जाती हैं। यदि हम अपनी मानसिक शक्तियों के विषय में सदा सचेत रहें, तो हम देखेंगे कि वे दिन-प्रतिदिन बढ़ती जाती हैं।
हम अपने विचारों को साधारणतः बोल कर व्यक्त करते हैं। जब हम किसी दूर रहने वाले व्यक्ति को अपने विचार जताना चाहते हैं तो हम उसे पत्र अथवा तार द्वारा अपने विचार जताते हैं। बिना भौतिक साधन के विचार किसी दूर रहने वाले व्यक्ति तक पहुँच सकते हैं—इस बात पर हमारा कदापि विश्वास नहीं होता, किन्तु हम यदि अपने व्यावहारिक जीवन को सूक्ष्मता से देखें तो हम भौतिक साधनों के बिना ही विचारों को अपने मित्रों तक पहुँचाने के बहुत कुछ प्रमाण पायेंगे। हाल ही की बात है, लेखक अपने एक मित्र के बारे में एक दूसरे व्यक्ति से कुछ बात चीत कर रहा था और उसके प्रेम सम्बन्ध के विषयों में कुछ कह रहा था। उस मित्र से कई दिनों से पत्र-व्यवहार बन्द हो गया था। ठीक उसी समय उस मित्र ने भी लेखक के विषय में सोचा और उसने लेखक को पत्र लिखा। इसी प्रकार जब लेखक एक दूसरे मित्र के विषय में चिन्ता कर रहा था। लेखक का वह मित्र भी उनके विषय में चिन्ता करने लगा। लेखक उसके घर गया और उसने इस अनुभव की सत्यता को जाना।
हमारे विचार उनके न प्रकाशित करने पर भी जिस व्यक्ति के विषय में जैसे होते हैं वे उसको ज्ञात हो जाते हैं। प्रत्येक व्यक्ति यदि अपने मन को एकाग्र करके किसी व्यक्ति की अपने प्रति धारणा के विषय में जानना चाहे तो वह जान सकता है। यदि वह अपने सामने है तो उसकी धारणाएं जानना सरल ही है, पर दूर रहने पर भी उसकी मुखाकृति को अपनी कल्पना में लाकर उसके विषय में चिन्तन करे और जो विचार उसके मन में उस समय उठें उन्हें ध्यान में रक्खे। वह देखेगा कि वे विचार उस व्यक्ति की भावनाओं को व्यक्त करते हैं। जो व्यक्ति हमसे वास्तविक प्रेम करता है उसके विषय में चिन्तन करते ही हमारे हृदय में प्रेमोदगार उदय होता है और जो व्यक्ति हमसे द्वेष करता है उसके विषय में सोचते ही मन में क्षोभ उत्पन्न होता है। इस प्रेमोदगार और क्षोभ को भली प्रकार से समझने से दूसरे व्यक्ति के हृदय की स्थिति तथा उसकी अपने प्रति धारणा का पता चल सकता है।
हम अपने स्थान में रहकर भी दूर रहने वाले व्यक्ति के विचारों को बदल सकते हैं। दूसरे व्यक्ति के विचारों का बदलना अपने चित्त की एकाग्रता पर निर्भर करता है। अपने सामने रहने वाले व्यक्ति के विचारों पर भी जो प्रभाव पड़ता है वह भी चित्त की एकाग्रता पर निर्भर करता है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को यदि कोरे तर्क के द्वारा प्रभावित करना चाहे तो वह देखेगा कि उसका प्रयत्न व्यर्थ गया जब तक तर्क करने वाले व्यक्ति के प्रति किसी व्यक्ति की श्रद्धा नहीं रहती उसकी युक्तियों का सुनने वाले के मन पर कोई भी अनुकूल असर नहीं होता तर्क करने से कभी-कभी प्रतिकूल परिणाम होता है। मनुष्य की बुद्धि उसके हृदय की दासी है। जब तक हम मनुष्य के हृदय पर अधिकार नहीं करते, उसकी बुद्धि को कभी प्रभावित नहीं कर सकते। दूसरे व्यक्ति के हृदय पर अधिकार मन की साधना अर्थात् एकाग्रता से होता है। हृदय के प्रभावित हो जाने से बौद्धिक परिवर्तन सरलता से हो जाते हैं। हृदय का परिवर्तन अपनी सच्ची सद्भावना को दर्शाने से होता है। इसके लिये अधिक बकवाद करने की भी आवश्यकता नहीं। हम किसी व्यक्ति को दो-चार शब्द कह कर भी उसके हृदय का परिवर्तन कर सकते हैं। आवश्यक यह है कि हम उसके प्रति वास्तविक सद्भावना रक्खें। सद्भावना के लिये अपने ही स्थान में रहकर उसके प्रति शुभ चिन्तन करना आवश्यक है।
शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार में सद्भावना के महत्व को भली प्रकार से देखा जा सकता है। रोगी के प्रति सद्भावना प्रकट करने से रोग नष्ट होता है। शारीरिक रोगों के उपचार में जितनी भौतिक औषधि काम करती है उससे कहीं अधिक डॉक्टर की रोगी के प्रति सद्भावना काम करती है। देखा गया है कि पैसे की दृष्टि से वैद्यक का रोजगार करने वाले व्यक्ति की योग्य चिकित्सा करने में असमर्थ रहते हैं। जो वैद्य जितना ही अधिक पैसे का लोभी होता है, वह रोगियों की चिकित्सा में उतना ही अयोग्य सिद्ध होता है। लोभी वैद्य रोगी को स्वस्थ नहीं करना चाहता, क्योंकि इससे उसकी आमदनी का जरिया चला जाता है। वह आन्तरिक मन से रोगी को रोगी ही बनाये रखना चाहता है ताकि वह वैद्य को बार-बार बुलावे और उसे इस प्रकार अपनी दवाइयों के दाम और फीस मिले। अस्तु, उसकी आन्तरिक भावना उसकी दवाइयों की अपेक्षा कहीं अधिक काम करती है और रोगी बीमार ही बना रहता है। देखा गया है कि कुछ वैद्य पहले-पहल सफल चिकित्सक रहकर भी पीछे अपने रोगियों को आरोग्य प्रदान करने की शक्ति को खो देते हैं। इस प्रकार के परिवर्तन का कारण उनके विचारों में दोष उत्पन्न हो जाना ही होता है।
चिकित्सक अपने घर पर रहकर भी रोगी को आरोग्य लाभ करने में सहायता कर सकता है। यदि चिकित्सक सम्पूर्ण निःस्वार्थ होकर किसी रोगी के आरोग्य लाभ करने की भावना एकाग्र मन से सदा करता रहे तो उस रोगी को आरोग्य लाभ करने में अवश्य ही बड़ी भारी सहायता मिलेगी। यहाँ चित्त की एकाग्रता और चिकित्सक की सद्भावना काम करती है। हम चित्त की एकाग्रता करके दूर से ही किसी व्यक्ति के विचारों को बदल सकते हैं। जब किसी रोगी के हृदय की तन्त्री किसी आरोग्यवान् व्यक्ति के हृदय से जुड़ जाती है तो उसे सरलता से आरोग्य लाभ हो जाता है। रोगी के विचार आरोग्यवान् व्यक्ति के विषय में चिन्तन करने से बदल जाते हैं। उसमें आत्मभर्त्सना के भाव नष्ट हो जाते हैं और आशा का संचार हो जाता है। मन के आशातीत होने पर रोग का नष्ट होना अनिवार्य है।
रोगी के विचारों को आशातीत बनाने में चिकित्सक बड़ा काम करता है। स्वयं रोगी के विचारों में किसी प्रकार की स्थिरता नहीं रहती। वह निराशायुक्त रहता है। वह रोग से मुक्त होना चाहता है, पर उसे मुक्त हो सकने में विश्वास नहीं रहता। स्वयं चिकित्सक को ऐसी अवस्था में प्रयत्न करना पड़ता है। उसे मानो एक दलदल के गढ्ढे से हाथ पकड़कर निकालना पड़ता है। इस कार्य में चिकित्सक को रोगी से बातचीत करना उतना लाभदायक नहीं होता, जितना कि उसके विषय में चिन्तन करना और उसकी सेवा करना लाभदायक होता है। निःस्वार्थ सेवा करने से रोगी के हृदय पर चिकित्सक का अधिकार हो जाता है और फिर उसके विचारों को बदल देना सरल हो जाता है।
हम जितनी एकाग्रता के साथ दूसरे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं, वह उतना ही अधिक हमारे विषय में चिन्तित होता है। मरते समय मनुष्य दूर रहने वाले अपने प्रियजन को बड़ी एकाग्रता से स्मरण करता है कि जिस व्यक्ति के बारे में ऐसा व्यक्ति सोचता है, वह उद्विग्न-मन हो जाता है। या तो उसे जाग्रत अवस्था में ही उसका स्मरण आने लगता है, अथवा वह उसके विषय में स्वप्न देखने लगता है। इस प्रकार के कितने ही स्वप्न सत्य होते हुए पाये गये हैं। लेखक के एक छात्र ने एक बार अपने पिता की मृत्यु का रात को स्वप्न देखा और दूसरे दिन उनकी मृत्यु का तार पाया। सत्य होने वाले और साधारण ऐसे स्वप्नों में भेद यह होता है कि स्वप्नावस्था के पूर्व ही मनुष्य उद्विग्न मन रहता है। यदि मनुष्य अपने मन को एकाग्र करके इस उद्विग्नता का कारण जानना चाहें तो वह होने वाली घटना का पता चला सके।
जो मनुष्य अपने भीतर जितना ही अधिक अपने मन को ले जाता है, वह दूर की घटनाएं जानने की उतनी ही अधिक शक्ति प्राप्त कर लेता है। दूसरे मनुष्यों के विचारों को प्रभावित करने की शक्ति तथा अपने संकल्प को सफल बनाने की शक्ति भी अपने भीतर ले जाने से आती है। कई दिनों के सात्विक व्रतोपवासों से इस प्रकार की शक्ति का उदय हो जाता है। संसार के सभी महात्माओं ने अपने विचारों को प्रभावशाली बनाने के लिये अनेक प्रकार की तपस्यायें की हैं। जो व्यक्ति जितनी तपस्या करता है, उसके विचार उतने ही प्रभावशाली होते हैं। सत्य और शक्ति दोनों को ही प्राप्त करने के लिये तपस्या की आवश्यकता है। हमारा आन्तरिक मन कल्पनातीत शक्तियों का केन्द्र है। हम जिस प्रकार की शक्ति का साक्षात्कार करना चाहते हैं, मन की एकाग्रता के द्वारा प्राप्त कर सकते हैं। अपने स्वार्थ का त्याग करने से शक्ति की असीम वृद्धि हो जाती है। जो व्यक्ति अपनी मानसिक शक्ति को अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिये काम में नहीं लगाता, वह उतना ही अधिक उस शक्ति को बलवान् बना लेता है। इस तरह हम देखते हैं कि तप और निःस्वार्थ भाव से काम करना मनुष्य को असीम शक्ति देने वाला होता है।
हमारी मानसिक शक्ति हमारे विश्वास पर निर्भर करती है। अपनी शक्ति के विषय में मनुष्य का जैसा दृढ़ निश्चय होता है; उसके मन में उसी प्रकार की शक्ति का उदय होने लगता है। यह निश्चय की दृढ़ता तप का परिणाम है। तप और योग में मौलिक भेद नहीं। दोनों में ही मन को रोकना पड़ता है। मन की एकाग्रता से ही निश्चय की दृढ़ता अर्थात् आत्म विश्वास आता है। आत्म विश्वास सिद्धि का कारण होता है। मनुष्य जितनी ही अधिक तपस्या करता है, अपनी मानसिक शक्ति को भी वह उतना ही बढ़ा लेता है। पर यह बढ़ी मानसिक शक्ति अपने ही काम में लाने से- स्वार्थ में इसका प्रयोग करने से- नष्ट हो जाती है। इस शक्ति को निष्काम भाव से विशुद्ध लोकोपकार में लगाने पर यह चिरस्थायी होती है और बढ़ती रहती है। शक्ति का उदय तप अर्थात् चित्त की एकाग्रता से होता है और उसका स्थायी रहना तथा बढ़ना उसके सदुपयोग पर निर्भर करता है।
हमारे वैयक्तिक मन के परे समष्टि मन है। यही मन शक्ति और प्रतिभा का केन्द्र है। चित्त की एकाग्रता से मनुष्य अपने आपको समष्टि मन के संपर्क में लाता है। तपस्या का यही परिणाम है। इससे मनुष्य का वैयक्तिक मन शक्तिशाली हो जाता है। जब तक मनुष्य के वैयक्तिक और समष्टि मन में एकता रहती है, मनुष्य शक्तिशाली बना रहता है। जब मनुष्य अपने आप को समष्टि मन से अलग कर लेता है तो उसकी शक्ति का भी ह्रास हो जाता है। शक्ति समष्टि मन अर्थात् विराट् पुरुष से, जो कि हमारा अन्तर्यामी तथा परम आधार है, आती है, जब हम विराट् पुरुष से प्राप्त उस शक्ति को उसी के काम में लगाते हैं तो वह नष्ट नहीं होती। जितना ही अधिक हम लोकोपकार में अपनी शक्ति को खर्च करते हैं, उतनी ही वह बढ़ती जाती है। अपनी स्वार्थ सिद्धि में अथवा उसका बिल्कुल ही उपयोग न करने से भी शक्ति का विनाश हो जाता है।
मानसिक शक्ति का सम्बन्ध मनुष्य की शारीरिक शक्ति से साधारणतः किया जाता है। कहा जाता है कि जैसी मनुष्य की शारीरिक शक्ति भी होती है। वैसी ही उसकी मानसिक शक्ति भी होती है। पर हमारी इस प्रकार की धारणा भ्रमात्मक है। देखा गया है कि मोटे-ताजे व्यक्ति का मानसिक बल प्रायः नहीं के बराबर होता है और दुर्बलकाय व्यक्ति के मानसिक बल से सारा संसार डरा करता है। अनपढ़ और पढ़े-लिखे व्यक्तियों के भी मानसिक बल को देखें तो सुशिक्षित मनुष्य का मानसिक बल अशिक्षित व्यक्ति से सदा अधिक होता है। जितना आत्म-विश्वास शिक्षित व्यक्तियों में पाया जाता है, जितनी उनमें मानसिक दृढ़ता होती है, अशिक्षित व्यक्तियों में न तो उतना मानसिक बल होता है और न उतनी मानसिक दृढ़ता ही; परन्तु यह भी देखा गया है कि अशिक्षितों में भी जहाँ मानसिक श्रद्धा अधिक होती है, वहाँ उनकी दृढ़ता, मानस बल और आत्म विश्वास शिक्षितों से भी बढ़कर होता है। इसका कारण भी चित्त की एकाग्रता ही है। जो व्यक्ति किसी विषय को लेकर चित्त की एकाग्रता का अभ्यास करता है, उसमें उतनी ही अधिक मानसिक दृढ़ता और आत्म विश्वास उत्पन्न होता है।
ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्रं विंरक्षति 19, 5.17
ब्रह्मचर्य के तेज से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है।
ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् 11.5.18
ब्रह्मचर्य से ही कन्या युवा पति को पाती है।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाष्नत 11,5,18
ब्रह्मचर्य के तेज से देवों ने मृत्यु को जीता है।
त्वं ना मेधे प्रथमा 6,108 1
हे बुद्धि! तू हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ वस्तु है।
ऋषियों भद्रां मेधां यां विदुस्तों मय्यावेशयामषि 6. 108.3
बड़े-2 ऋषियों ने जिस बुद्धि को श्रेष्ठ माना है उसे मैं अपने अन्दर प्रविष्ट करता हूँ।
(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम. ए.)
( 1 )
एक व्यक्ति लिखते हैं, “मुझे मिठाई का बड़ा शौक है। जब कभी मैं मिठाई की किसी दुकान के आगे से गुजरता हूँ, और मेरी जेब में पैसे होते हैं, तो मैं जरूर मिठाई खरीदता हूं और जब तक सब पैसे समाप्त नहीं हो जाते, मिठाई खाता ही रहता हूँ। घर पर भी मीठे की ओर मेरा मन दौड़ा करता है। और कुछ नहीं तो शक्कर ही फांकता हूँ। शरबत पीता हूँ। मिठाई की इस लत से मूत्र में शक्कर आने लगा है और अब मैं बीमार भी रहने लगा हूँ। मैं जानता हूँ कि मेरी बीमारी का कारण यही मिठाई की आदत है। इसी ने मुझे बीमार किया है। कौन जाने यही मेरे प्राण भी ले ले; पर अभी तक अवसर पाते ही मैं मिठाई की ओर बुरी तरह झुक जाता हूं। मैं क्या करूं?”
एक अन्य सज्जन वासना के बारे में लिखते हैं कि वे वासना से बुरी तरह परेशान हैं। अनेक बच्चों के पिता हैं। पत्नी परेशान है। वे स्वयं अपनी मूर्खता जानते हैं, पर वासना के वशीभूत हो कुछ का कुछ कर बैठते हैं। और फिर पछताते हैं। जानते बूझते भी अपने मन की दुर्बलता के कारण संसार के बन्धन में फंसे हुए हैं।
अपने क्रोध के आवेश की बातें करते हुए एक मित्र एक बार कह रहे थे, “क्या बताएं, जब हम देखते हैं कि दूसरा व्यक्ति सरासर गलत बात कह रहा है, बेवकूफी के तर्क दे रहा है, और आगे आने वाली कठिनाई की और ध्यान ही नहीं दे रहा है, तो इनमें उद्विग्नता आ जाती है। हम भी उत्तेजित हो उठते हैं। हम किसी के दबैल नहीं हैं; किसी से माँग कर नहीं खाते हैं। फिर क्यों दबें? पर क्या बताएं क्रोध के आवेश में हम प्रायः ऐसा कह बैठते हैं जिस पर हमें पछताना पड़ता है। मित्रताएं टूट जाती हैं। हम अपने आवेश की कमजोरी जानते है, पर क्या बताएं इस दुर्बलता से छूट नहीं पा रहे हैं।
एक सज्जन चिन्ता की आदत से परेशान हैं। उनके पास स्वास्थ्य है, धन है; मान प्रतिष्ठा भी है पर न जाने कैसे उन्हें यह भ्रम हो गया कि मेरे भविष्य में कुछ न कुछ अनिष्ट होने वाला है, मेरा स्वास्थ्य खराब हो जायगा, मेरे परिवार वाले मुझे धोखा दे देंगे, मेरी जीविका छिन जायेगी। वे इसी प्रकार की नाना छोटी-बड़ी चिन्ताओं में डूबे रहते हैं। उनकी चिन्ता का आधार कुछ नहीं केवल कल्पित भय मात्र है, पर वे उसी तुच्छ सी बात के लिए परेशान रहते हैं। अनहोनी बातों की चिन्ता में बैठकर समय नष्ट करते हैं। नैराश्य पूर्ण विचारों के साथ-साथ उनका मस्तिष्क गुप्त कल्पित भयपूर्ण विचारों की शृंखला में आबद्ध है। वे सदैव कल की चिन्ता ही किया करते हैं। निरन्तर चिन्ता का मानसिक अभ्यास करने से अब उनका मानसिक संस्थान दुःख और भय से परिपूर्ण हो उठा है।
हमारे एक शिष्य की आदत है कि वह स्वप्नों के संसार में रहता है। कोई नई अजीब बात होने वाली है, कुछ न कुछ ऐसा परिवर्तन होगा कि स्थिति मेरे अनुकूल पड़ जायगी और मेरा जीवन पूर्वजों से अधिक सुन्दर, सुखमय तथा शक्तिशाली हो जायगा। यह कवि संसार की वास्तविकता को नहीं जानता। मनुष्य को उन्नति करने में जिस घोर संघर्ष का सामना करना पड़ता है, उससे इसका कोई परिचय नहीं है। न उसे समझना ही चाहता है।
( 2 )
ऊपर अनेक प्रकार के व्यक्तियों के उदाहरण हैं, जो मन की दुर्बलता से नाना रूपों से परेशान हैं। उनका मन उनकी इन्द्रियों का दास बना हुआ है, तथा वे उसके बहकावे में आकर क्षुद्र कार्यों में प्रवृत्त हो जाते हैं। उनके मन ने उन्हें संसार के नाना बन्धनों में बाँध रखा है। मन में जैसा झोंका आता है, वे उधर ही ढुलक पड़ते हैं। अनेक व्यक्ति यह जानते हैं कि वे बुरी व्याधि में फंसे हैं; उनके मन का प्रवाह गलत दिशा में है; पर भ्रान्त हो विवश से उसी ओर प्रवृत्त होते रहते हैं।
उनके मन की दशा उस सरोवर की तरह है, जिसमें भयंकर तूफान उठा हो, और जल अस्त व्यस्त तरंगों में बह रहा हो। उनकी इन्द्रियाँ अनियंत्रित हैं। ये इन्द्रियाँ संसार के क्षुद्र क्षणिक आनन्दों की ओर झपटती हैं। वे विवेकहीन हो उसी ओर अग्रसर हो जाते हैं।
कुछ अपने दोषों को ढाँकने के लिए दूसरों के दोषों का विस्तार से वर्णन करते हैं। उनकी बुरी भली पुरानी बातें खोजकर निकालते हैं। ऐसा कर वे अपने को उनकी अपेक्षा श्रेष्ठ प्रमाणित करना चाहते हैं। पर वास्तव में होता है, इसका ठीक उलटा। दूसरों के दोषों में रमण करने से स्वयं उनके चित्त का मैल बढ़ता है। वे अधिकाधिक नीच, अभागे और पापी होते जाते हैं। मन में क्षुद्र नीच विचारों के रहने से तदनुकूल विषैला वातावरण छाया रहता है और निरुपयोगी कार्यों में ही लगे रहते हैं। दूसरे शब्दों में यों कहिए कि उनका मन निरुपयोगी विषयों और व्यर्थ की थोथी बातों में लगा रहता है। मन की वृत्तियाँ क्षुद्र विषयों में लगी रहती हैं। जिधर को ये वृत्तियाँ लगेंगी, उधर ही को शरीर चलेगा; वैसा ही कार्य शरीर की, इन्द्रियाँ करेंगी। अतः यह कहना सत्य ही है मन ही मनुष्य के बन्धन का कारण होता है। मन जिस से हमें बाँधता है, हमारा शरीर बिना रस्सियों के उसी से बंध जाता है।
मन में जब विकारों का प्राबल्य हो जाता है, जब हमारे काम, क्रोध, लोभ, मोह, चिन्ता, उद्वेग इत्यादि सीमा से बढ़ जाते हैं, तब सन्तुलन नष्ट हो जाता है और मनुष्य की चित्तवृत्ति खिन्न हो जाती है। साधारणतः वह किसी एक वस्तु का ध्यान करता है; फिर एक दूसरी नई समस्या आकर अपना जोर दिखाता है, तत्पश्चात् एक तीसरा प्रलोभन आकर सब अस्त-व्यस्त कर देता है। किसी के विरोध से क्रोध उत्पन्न होता है, ईर्ष्या उससे प्रतिशोध लेने को कहती है; दूसरी ओर से कड़ा विरोध होने पर भय और घबराहट बढ़ती है; फिर असफल होने पर घृणा, उद्वेग, चिन्ता और उदासी अपना मायाजाल बुनती रहती हैं। यह उस दुर्बल मन की अवस्थाएँ हैं, जिनमें विवेक और इच्छाशक्ति की दृढ़ता नहीं है।
मानसिक संस्थान का नियंत्रण ही मन को दुर्बलता पर विजय प्राप्त करने का उपाय है। विवेक जितना जाग्रत होता है, मन में उतनी ही स्थिरता आती है। विवेक के प्रकाश से इन्द्रियाँ संसार के विषयों से दूर हटती हैं और मनुष्य व्यर्थ चिन्तन से छूट कर ऊँचा उठता है।
आप जिस बात को उचित समझते हैं, जो आपकी अन्तरात्मा पुकार-पुकार कर कहती है, उसे ही सत्य समझिए। आपकी शुभ प्रवृत्तियां शाँत समय में जिस ओर चलती हैं, उसी को सद्मार्ग समझिए और व्यर्थ चिन्तन से बचकर उसी ओर चलिए। सद्मार्ग पर चलकर ही मन को शान्त रखा जा सकता है। हो सकता है कि प्रारम्भ में मन उधर एकाग्र न हो, पर आत्मा प्रबल तत्त्व है। अतः धीरे-धीरे वह स्वयं उसमें तन्मय होने लगेगा। दुःख का बोझ हलका होगा और हृदय को शान्ति मिलेगी।
तुम्हारी आत्मा जिस चीज को उचित कहती है, उसी का संकल्प करो। उसी ओर बढ़ने में तुम्हें आत्म-सामर्थ्य प्राप्त होगी। उसी ओर इन्द्रियों को लगाने से शक्तियों की वृद्धि होगी।
तुम्हारी एक दुर्बलता संकल्प की कमजोरी है। तुम अपने निर्णय को मजबूती से नहीं पकड़ते। यह भली भाँति जान रखिए कि निरन्तर एक स्थान से दूसरे स्थान पर लुढ़कने वाले पत्थर पर काई नहीं जमती। एक विषय से दूसरे पर फुदकने वाला मन दुर्बलता की जड़ है। अपने विचारों को अपने उद्देश्यों पर एकाग्र करने का अभ्यास कीजिए।
राग, द्वेष, काम, क्रोध, ईर्ष्या, ये मन की उत्तेजित अवस्थाएँ हैं। यह मनुष्य के मन की अस्त-व्यस्त अवस्थाओं की सूचक हैं। इनमें फँसकर मनुष्य का उच्च ज्ञान-विवेक बुद्धि पंगु हो जाती है। पाप, विकार या दुष्ट विचार सिर ऊँचा करते हैं। इनका जैसे ही आक्रमण हो, किसी रूप में या किसी भी स्थिति में हो, तो तुरन्त सावधान हो जाइये और सुमति युक्त आत्मा की ही प्रेरणा ग्रहण कीजिए।
( 3 )
मन में आत्मा के द्वारा श्रेष्ठ प्रेरणा का प्रवाह भी बहता है। इसी कारण मन को ही मोक्ष का साधन कहा गया है। यदि मन बन्धन का कारण है, तो वही मोक्ष का कारण भी बन सकता है। मन के भद्र निश्चय पर अटल रहकर सन्मति का ग्रहण कर उसी मार्ग पर निरन्तर चलकर जीवन मार्ग को प्रशस्त भी बनाया जा सकता है। आत्मा की निरन्तर प्रेरणा से मन दिव्य मार्गों की ओर चलेगा।
सावधान! सत्य का मार्ग मत छोड़ना, चाहे मन कितना ही क्यों न छटपटाये! इन्द्रियाँ तो व्यर्थ ही इधर-उधर भागने वाली हैं। ये आपको किसी भी खड्डे में गिरा सकती हैं। इन्द्रियों को वश में कर लो तो तुम विजयी कहलाओगे। इन्द्रियाँ चोर की तरह वह अवसर ताकती हैं, जब वे तुम्हें नर्क में पटक दें, पतन करा दें। यदि इन चोरों को अवसर मिलेगा, तो ये सारा संचित धर्म नष्ट कर देंगी। मन के संयम से ही स्वर्ग मिलता है। अनियंत्रित इन्द्रियों का विद्रोह ही नर्क है। उत्तम स्वास्थ्य, दिव्य बुद्धि और सांसारिक सम्पदाएँ उसी को प्राप्त होती है, जिसने अपने मन और इन्द्रियों पर काबू पा लिया है।
जिन व्यक्तियों के हृदय पवित्र हैं, मन काबू में है, वे धन्य हैं, क्योंकि वे पृथ्वी पर ही स्वर्ग का सुख प्राप्त करेंगे।
(श्री दौलतराम कटरहा, दमोह)
जो लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते वे प्रार्थना भी नहीं करते, और उनके अनुसार प्रार्थना में समय बिताना बिल्कुल निष्फल है। कुछ अंशों में उनका कहना ठीक भी है क्योंकि प्रार्थना सर्व शक्तिमान नहीं है। मैं यदि जीभ का चटोरा हूँ तो प्रार्थना करने मात्र से ही कि हे परम पिता, मेरी जीव पर मेरा काबू हो जाए, मुझे अपनी जीभ पर ईशत्व प्राप्त नहीं होगा। पंचेन्द्रियों के विषयों के पीछे यदि मन दौड़ता है और मन यदि उन इन्द्रियों के वश में है तो निश्चय ही प्रार्थना करने मात्र से ही कोई दृष्टिगत लाभ नहीं होगा। अपने मन को काबू में लाने के लिए तो हमें अपनी ही इच्छा शक्ति या संकल्प शक्ति का प्रयोग करना होगा- इसी तथ्य को दृष्टि में रखकर बुद्ध-मतावलंबी प्रार्थना में विश्वास नहीं करते। भगवान बुद्ध का वचन कि-
अत्ता हि अत्तनो नाथो को हि नाथो परो सिया- अर्थात् आत्मा स्वयं ही अपना स्वामी है? उससे बढ़कर दूसरा स्वामी और कौन है अतएव प्रार्थना किसकी करें और क्यों करें?- अतएव जहाँ तक पंचेन्द्रियों को वश में करने का सवाल है वहाँ ईश-प्रार्थना से थोड़ा बहुत आत्मा-बल मिलता भले ही दिखे पर उतना लाभ नहीं होता जितना कि अपनी आत्म-शक्ति पर भरोसा रखकर हर मौके पर अपनी संकल्प-शक्ति का प्रयोग करने से होता है? इतना होने पर भी प्रार्थना की अपनी विशेषता है। उससे वह कार्य हो सकता है जो संकल्प-शक्ति से नहीं हो सकता। प्रार्थना और संकल्प-शक्ति का अलग-अलग कार्य-क्षेत्र है और प्रत्येक अपने-अपने क्षेत्र में अधिक शक्तिशाली है।
प्रार्थना कार्य है हमारी भावनाओं को समुन्नत सुसंस्कृत बनाना। हम अपनी ललित भावनाओं को ईश्वर के सामने निवेदित करते हैं, फिर प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर हमें आप ऐसा-ऐसा बनाइये। हम आपकी कृपा से अनासक्त बनें, निष्काम कार्य कर्त्ता बनें, निर्मम और वैराग्य संपन्न बनें, हमें आप अपनी अनन्य-भक्ति प्रदान कीजिये आदि आदि। तो इस प्रकार की प्रार्थना से हमारे जीवन का लक्ष्य दृढ़ होता है, उस पर हमारी अवस्था बढ़ती जाती है, और हमें दिग्-भ्रम नहीं होने पाता। इस प्रकार की प्रार्थना से निश्चयात्मिका बुद्धि-कार्या कार्य विषयक व्यवसायात्मिका बुद्धि सबल होती है और हमारी प्रज्ञा धीरे-धीरे स्थिर होती जाती है।
समस्त संशयों का धीरे-धीरे समाधान होता जाता है और भावी जीवन का कार्य-क्रम भी अपने ही आप सुस्पष्ट हो जाता है। यह सब जो कुछ होता है प्रार्थना से होता है। संकल्प-शक्ति के क्षेत्र के बाहर की यह बात है।
प्रार्थना का कार्य भावों को प्रेरणा देना है। तो यदि हम अपने अपराधों को क्षमा करने के लिए ईश्वर-प्रार्थना करें तो इससे शायद हीनता की भावना मिटने के अतिरिक्त और कुछ न होगा। प्रत्युत ऐसी अनुचित प्रार्थना से हानि की ही अधिक आशंका है। हमारे शहर में सद्विचारों वाले एक अध्यापक रहते हैं। दैव योग से कुछ वर्ष हुए कि उनका एक सोलह सत्रह वर्ष का लड़का मर गया तब से वे नास्तिक बन गये और ईश्वर पर से उनका विश्वास हट गया। अतएव यदि हम किसी वस्तु को पाने की कामना करते हैं, अपने अपराधों को क्षमा कराने के उद्देश्य से प्रार्थना करते हैं तो इससे लाभ की अपेक्षा हानि की ही अधिक संभावना है। प्रारब्ध कर्म का भोग तो हमें भोगना ही पड़ेगा। प्रार्थना से वह टल नहीं सकता, अतएव उसे माँगने की प्रार्थना बिल्कुल गलत है। इसलिए हमें प्रार्थना के कार्य क्षेत्र से पूर्णतया अवगत होना चाहिये। प्रारब्ध कर्म (प्रारम्भ हो गए कर्म) का भोग टालने की अपेक्षा यदि हम यह प्रार्थना करें कि प्रभो! हमें अपने कर्म के फल को भोगने की शक्ति दे, तो कहीं अधिक अच्छा है।
पंचेन्द्रियों को काबू में लाने के लिए जो प्रार्थना की जाती है उससे उतनी मात्रा में ही लाभ होता है जितनी मात्रा में कि उस प्रार्थना में आत्म-संकेत विद्यमान रहता है और आत्म-संकेत मात्र से भी कोई विशेष लाभ नहीं होता क्योंकि यदि आत्म-संकेत मात्र इतना प्रबल अस्त्र होता तो हम में से हजारों पूर्ण जितेन्द्रिय अति शीघ्र बन जाते। आत्म-संकेत द्वारा जो कुछ भी थोड़ा बहुत लाभ होता है वह आत्मसंकेत में किए गए एकाग्रता के प्रयोग का ही फल है। अतएव पंचेन्द्रियों को काबू में लाने के लिये जो प्रार्थना की जाती है और उससे जो कुछ आत्मबल मिलता हुआ प्रतीत होता है वह वस्तुतः एकाग्रता के प्रयोग से मिलता है- कोरी प्रार्थना से नहीं। अतएव अपनी इन्द्रियों पर काबू पाने के हेतु प्रार्थना करना बेकार है- इस हेतु तो अपनी संकल्प-शक्ति का प्रयोग ही अभीष्ट है॥
जिस प्रकार इन्द्रियों को वश में लाने के हेतु प्रार्थना करना अधिक लाभदायक नहीं है उसी प्रकार मान-अपमान सुख-दुख आदि सहने की शक्ति प्राप्त करने के हेतु भी प्रार्थना करना अधिक लाभदायक नहीं है। हम जब प्रार्थना करते हैं कि दुःसह पुरुष वचन सुनकर भी उसकी अग्नि में हम न जलें, अवज्ञा पूर्ण किए गए कार्यों से हम उद्विग्न न हों, निंदा सुनकर हम दुःखी न हों, हर प्रकार की बाधा, उपद्रव, अपराध और परेशानी को शाँत चित्त से हम सुनें, हम में कभी झुँझलाहट या खीझ पैदा न हो तो इस प्रकार की प्रार्थना से हम एक मनोभावना का निर्माण करते हैं और अपने आपको कुछ आत्म-संकेत भी देते हैं पर इस प्रकार की प्रार्थना से अधिक फल मिलने वाला नहीं है। अभीष्ट फल हमें प्राप्त होगा मन को शाँत और विक्षेपहीन करने के प्रयत्नों द्वारा और यह होगा एकाग्रता का अभ्यास करने से- ध्यान से। अतएव हमें प्रार्थना से क्या फल होगा और क्या फल नहीं होगा यह अच्छी तरह जानकर ही उचित प्रार्थना करना सीखना चाहिये अन्यथा लक्ष्य की शीघ्र प्राप्ति न होगी, हम भटकते ही रहेंगे और हमारी प्रार्थना और प्रयत्न विफल होंगे।
(श्री अरविन्द घोष)
अपने अन्दर की शक्ति को बढ़ाना तथा उसे ऐसे कामों में लगाना जिनमें व्यक्ति को या मनुष्य जाति को लाभ पहुँचे—इसके लिए सबसे पहली और सबसे आवश्यक शर्त है, ब्रह्मचर्य पालन। समस्त मानवीय शक्ति का एक स्थूल आधार है। यूरोपीय जड़वाद में दोष यह है कि वह आधार को ही सब कुछ मानता है और इसे ही उद्गम समझने की भूल करता है। जीवन और शक्ति का उद्गम प्राकृतिक नहीं आध्यात्मिक है, किंतु जिस आधार या नींव पर स्थित होकर जीवन और शक्ति कर्म करती है वह भौतिक है। हिन्दुओं ने उद्गम और आधार के कारण और प्रतिष्ठा के, सत्ता के उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव के इस भेद को स्पष्ट रूप में अनुभव किया था। पृथ्वी या स्थल जड़ तत्व है प्रतिष्ठा, ब्रह्म या आत्मा है। कारण, भौतिक को आध्यात्मिक तक ऊँचा ले जाना ही ब्रह्मचर्य है, कारण, जो शक्ति एक से प्रारंभ करके दूसरे को पैदा करती है वह इन दोनों के मिलन से ही बढ़ती और परिपूर्ण बनती है।
यह दार्शनिक सिद्धाँत है। इसे कार्यान्वित करने के लिये शक्ति के मानवीय आधार की शारीरिक तथा मानसिक गठन का ठीक-ठीक ज्ञान होना आवश्यक है। मूल भौतिक इकाई है रेतस, जिसमें तेज अर्थात् मनुष्य का भीतरी ताप, प्रकाश विद्युत अंतर्लीन और गुप्त है। समस्त शक्ति रेतस् में अन्तर्निहित है। इस शक्ति को हम चाहें तो स्थूल रूप में व्यय कर सकते हैं या हम इसे सुरक्षित रख सकते हैं। समस्त विषय-विकार, वासना, कामना शक्ति को स्थूल रूप में या उदात्तीकृत सूक्ष्मतर रूप में शरीर से बाहर उड़ेलकर नष्ट कर देती है। दुराचार इसे स्थूल रूप में बाहर फेंकता है, दुर्विचार सूक्ष्म रूप में दोनों ही अवस्थाओं में अपव्यय होता है, और मन-वाणी तथा शरीर सभी अपवित्र होते हैं। दूसरी ओर, सब प्रकार का आत्म-संयम रेतस् की शक्ति को सुरक्षित रखता है और संरक्षण से सदा ही शक्ति की वृद्धि होती है। परन्तु स्थूल शरीर की आवश्यकताएं परिमित हैं, अतएव इस प्रचुर शक्ति में से कुछ फालतू बच रहती है जिसे स्थूल से भिन्न किसी और काम में लगाना आवश्यक है। प्राचीन सिद्धाँत के अनुसार रेतस् हैं जल जो प्रकाश, ताप और विद्युत से, एक शब्द में, तेज से पूर्ण है। रेतस् की अतिरिक्त मात्रा पहले ताप या तपस् में बदलती है जो संपूर्ण देह में शक्ति संचारित करता है, और इसी कारण आत्म-संयम और कठोर जीवन-चर्या के सभी रूपों को तप या तपस्या कहा जाता है क्योंकि उनसे ताप या उत्तेजना पैदा होती है जो प्रबल कर्मण्यता और सफलता का मूल स्रोत है, दूसरे, यह परिणत होती है वास्तविक तेज में, प्रकाश और बल में जो ज्ञानमात्र उद्गम है, तीसरे, यह विद्युत के रूप में परिवर्तित होती है जो बौद्धिक या शारीरिक सभी शक्तिशाली कर्मों के मूल में विद्यमान है। और फिर विद्युत में निलीन है ओज या प्राणशक्ति, अर्थात् आकाश से उद्भूत होने वाली आद्या शक्ति। रेतस् तेज और विद्युत में तथा विद्युत् से ओज के रूप में परिष्कृत होता हुआ शरीर को भौतिक शक्ति, स्फूर्ति और बुद्धि से भर देता है और अपने ओज-आत्मक अन्तिम रूप में मस्तिष्क में आरोहण कर उसे आद्या शक्ति से अनुप्राणित करता है। यह आद्या शक्ति जड़ तत्त्व का अत्यन्त परिशुद्ध रूप है और आत्मा के निकटतम है। यह ओज है; यह आध्यात्मिक शक्ति या वीर्य उत्पन्न करता है। इसी से मनुष्य आध्यात्मिक ज्ञान, आध्यात्मिक प्रेम एवं श्रद्धा और आध्यात्मिक बल प्राप्त करता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि जितना ही हम ब्रह्मचर्य से तप, तेज, विद्युत् और ओज का भण्डार बढ़ा सकेंगे उतना ही हम अपने को, देह, अन्तःकरण, मन और आत्मा के कर्मों के लिए, पूर्ण सामर्थ्य से परिप्लुत कर सकेंगे।
(श्री चन्द्रभानु गुप्ता)
स्वास्थ्य के साथ हास्य अथवा मनोरंजन का वही सम्बन्ध है जो फल के साथ पुष्प का। यदि हम मन से प्रफुल्लित न रहें तो चाहे जैसा अच्छा भोजन क्यों न करें, प्रतिदिन शरद् काल के दिनों की तरह सिकुड़ते ही जायेंगे। इसके विपरीत मन में यदि प्रफुल्लता भरी होगी तो भले ही एक-दो समय खाने को न मिला हो तो भी चेहरे से कोई पहचान न सकेगा कि यह दो समय का भूखा है। यह उदाहरण हमने इसलिये दिया है कि बहुधा लोगों को यह ध्यान है कि स्वास्थ्य के लिये सबसे अधिक आवश्यक अच्छा भोजन है। हम इसका खण्डन तो नहीं करते, किंतु यह अनुभव करते हैं कि स्वास्थ्य के लिए भोजन से भी अधिक आवश्यक प्रफुल्ल रहना है। इस लेख में प्राचीन और अर्वाचीन आचार्यों के वचनों से अपने अनुभव को पुष्ट करके पाठकों की सेवा में प्रस्तुत करते हैं। हमारा अनुभव है कि चिन्ता, शोक, ग्लानि और इनसे मिलते-जुलते मनोभावों से मनुष्य का स्वास्थ्य विकसित नहीं होता। हमारी दृष्टि सबसे पहले ऋग्वेद के एक मन्त्र की ओर आकृष्ट होती है—
हहैवस्तं मावियौष्टं विश्वमायुव्यश्नुतम्। कीलन्तौ पुत्रैर्नप्तृभिः।
अर्थात् ‘तुम दोनों इसी लोक में रहो, तुम्हारा कभी वियोग न हो, तुम दोनों पुत्र-पौत्रों से खेलते-कूदते हुए पूर्ण आयु प्राप्त करो।’ इस मन्त्र के अर्थ पर विचार करने से प्रतीत होगा कि पूर्ण आयु प्राप्त करने के लिए प्रसन्न रहने के लिए खेलना-कूदना आवश्यक है।
उपनिषद् की एक अन्य श्रुति इससे भी अधिक महत्व की है। वह श्रुति बताती है कि आनन्द ही प्राणियों के जन्म का उपादान कारण है। इससे तो यह सिद्ध होता है कि आनन्द और जीवन सर्वथा एक ही चीज हैं। श्रुति के शब्दों पर दृष्टि दीजिए—
आनन्दादेव खल्विमानि भूतानि जायते। आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्दमभिप्रयन्त्य-भिसंविशन्ति।
अर्थात्—‘आनन्द से ही सारे प्राणी उत्पन्न होते हैं। आनन्द से ही जीवित रहते हैं। आनन्द की तरफ ही सब दौड़ते हैं, और आनन्द ही में समा जाते हैं।’ यह श्रुति साफ कहती है कि जीवन आनन्द पर ही निर्भर करता है। एक और श्रुति-वाक्य भी इसी अर्थ का समर्थक है—
कोऽन्यात् कः प्राण्यात् यद्येप आकाश आनन्दो नस्वात्।
अर्थात्—‘यदि यह आकाश आनन्द-रूप न होता तो कौन जीवित रह सकता था? यह आनन्द ही का महत्व है जिससे प्राणी जीवित रहता है।’
आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कुतश्चन।
‘जो मनुष्य ब्रह्म आनन्द-रूप है, यह समझ लेता है उसे फिर किससे डर?’ वह किसी से नहीं डरता। उसके भय, शोक आदि अस्वास्थ्य के सभी कारण निवृत्त हो जाते हैं। वह एकमात्र आनन्द में विचरता है। यही तो स्वास्थ्य का सबसे अच्छा लक्षण है। सदा प्रसन्न रहने वाले को स्वस्थ और सदा दुखी रहने वाले को ही बीमार कहते हैं।
यह तो हुई वेद और उपनिषद् की बात। अब आयुर्वेद को देखिए, उसका उक्त विषय में क्या मत है। आयुर्वेद भी उत्पत्ति के विषय में वही बात कहता है जो वेद की श्रुति ने कही है। आयुर्वेद बताता है कि उत्पत्ति का मूल कारण आनन्द है। इसका अर्थ यह है कि गर्भ धारण के समय स्त्री और पुरुष दोनों आनन्द-मग्न होकर यदि गर्भाधान में प्रवृत्त होते हैं तो पुरुष के शुक्र में और स्त्री के शोणित में सजीवता आती है, अन्यथा नहीं। यदि पुरुष किसी कारणवश, गर्भाधान के समय प्रसन्न-मन न होगा तो उसका शुक्र ही प्रवृत्त न होगा। हुआ भी तो उसमें शुक्र-क्रीट, जो गर्भ के कारण होते हैं, न होंगे। इससे यह अनायास सिद्ध हो जाता कि प्राणियों की उत्पत्ति आनन्द अर्थात् प्रसन्नता के ही कारण है।
उधर ऋतुकाल में स्त्री का मुखमण्डल भरा हुआ और प्रसन्न रहता है। उसमें हर्ष और औत्सुक्य की मात्रा खूब बढ़ी रहती है। ऐसी पूर्ण प्रसन्न स्थिति होने पर ही शोणित में सजीवता आती है और शुक्र विकृत न हो तो गर्भ-धारण निश्चित होता है। गर्भ-धारण के अनन्तर गर्भ की पुष्टि ओर पूर्णता के लिए की गर्भिणी की प्रसन्नता परम आवश्यक है। गर्भिणी की प्रसन्नता उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आयुर्वेद में बहुत ही सख्त आदेश मिलता है—सुश्रुत की आज्ञा है—
इन्द्रियार्थास्तु यान् यान् सा भोक्तुमिच्छति गर्भिणी। गर्भाबाधमपात्ताँस्तान् भिषगा हृत्य दापयेत्॥ सा प्राप्तदौर्हृदा पुत्रं जनयेत गुणान्वितम्। अलब्ध दौर्हृदा गर्भे लभेतात्मनिव भथम्॥
अर्थात्—‘खाने-पीने में, देखने-भालने में, सुनने-सुनाने में, घूमने-फिरने में और इनके अतिरिक्त जिस-जिस वस्तु में गर्भिणी की जैसी-जैसी इच्छाऐं उत्पन्न हों, उन सब इच्छाओं की चाहे उचित हो या अनुचित—तृप्ति से गर्भिणी का प्रसन्न रहना अत्यन्त आवश्यक है।’ गर्भिणी की कोई भी इच्छा पूर्ण होने में कसर बाकी रही तो जिन अंगों की वस्तुओं में कमी रहेगी; गर्भ के वे ही अंग नदारद रहेंगे। देखने की इच्छा पूर्ण न होने से गर्भ अन्धा पैदा होगा। चलने की इच्छा अधूरी रहने से लंगड़ा, बोलने की अभिलाषा पूर्ण न होने से गूँगा, ग्रहण करने इच्छा अपूर्ण रहने से लुंजा, इस प्रकार जिस-जिस इन्द्रिय का विषय गर्भिणी को प्राप्त न होगा, गर्भ की उस-उस इन्द्रिय की हानि होकर गर्भ तो विकृत होगा ही साथ ही गर्भिणी के जीवन को खतरा होगा। आशय यह कि गर्भिणी सर्वदा और सर्वथा पूर्ण मनोरथ अर्थात् प्रसन्न रहनी चाहिए।
चरक में जहाँ यक्ष्मा की चिकित्सा लिखी है उस प्रकरण को देखने से तो जीवन में हास्य को बहुत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त होता है। चरक ने लिखा है कि यक्ष्मा के रोगी को प्रसन्न रखना ही उस रोग की चिकित्सा है।
यक्ष्मा के रोगी को प्रसन्न रखने के लिए चरक ने कुछ तरकीबें लिखी हैं। उसे सुगन्धित, स्निग्ध उबटन मलकर सुखदायक जल में स्नान और क्रीड़ा करने देना चाहिए। मित्र मण्डली में हास्य, राग-रंग, गाना बजाना, खाना-पीना आदि करके उसे खूब आनन्दित रखना चाहिए। उसे मन-भावने वस्त्राभरणों से अलंकृत रखना चाहिये। चरकाचार्य कहते हैं कि इससे यक्ष्मा का नाश होता है।
इस प्रकार प्रसन्न रहने से जब यक्ष्मा रोग का नाश होकर मनुष्य स्वस्थ होता है, तब यह बात समझ में आ जाती है कि सदा प्रसन्न रहेंगे तो यक्ष्मा होगा ही क्यों?
प्रसन्न मनुष्य को सत्यवादी और अहिंसक होने की परम आवश्यकता है; झूठा और हिंसक कभी प्रसन्न नहीं रह सकता। ईश्वर-परायण होना भी अत्यंत आवश्यक है। महात्मा गाँधी के अति प्रिय में ये तीन महाव्रत थे, जिनके प्रताप से वह सदाव्रतों प्रसन्न और अंत समय में भी प्रसन्न रहे।
[आचार्य हरभाई त्रिवेदी]
मनुष्य-मात्र आनन्द प्राप्त करना चाहता है। हर एक मनुष्य की भरसक यह कोशिश होती है कि उसे आनन्द प्राप्त हो। मनुष्य के अनेक-विधि आनन्दों में उसका बालक भी उसके अपने परम आनन्द का साधन होता है। जिसके घर में बालक नहीं, उसके घर में आनन्द नहीं। आनन्द का ऐसा यथेच्छ उपयोग करने के लिए मनुष्य आकाश-पाताल एक रहता है। हमारे समाज में भी बाँझपन अपशकुन और अभाग्य का कारण माना जाता है। बाँझपन का कलंक टालने के लिए स्त्री-पुरुष अपने बस भर कोई बात उठा नहीं रखते। घर में पालना बँध जाने से जो आनन्द प्राप्त हो सकता है, उसकी तुलना दूसरे किसी आनन्द से नहीं की जा सकती है। यह आनन्द देह और देही दोनों का है। इस परम आनन्द ने ही संसार की सततता को बनाये रक्खा है और मनुष्य की शुभ वृत्तियों को हमेशा ऊपर चढ़ाया हैं—ऊर्ध्वगामी बनाया है। बालक मनुष्य के आनन्द का जनक है।
जब ऐसे आध्यात्मिक आनन्द का देने वाला कोई पात्र परिवार में जन्म लेता है तो वह न केवल अपने माता-पिता के, बल्कि सब किसी के आनन्द का साधन बन जाता है। उसे देखकर सब आनन्द मग्न हो जाते हैं, उसे गोद में लेकर सब कोई तृप्ति का अनुभव करते हैं। उसके कारण सारा परिवार आनन्द से परिप्लावित रहता है। बालक के आनन्द में माता-पिता का सच्चा आनन्द समाया हुआ है। जब बालक का आनन्द लुप्त होता है, तो माता-पिता का आनन्द भी बिला जाता है। बालक समूचे कुटुम्ब के आनन्द का केन्द्र बन जाता है। कुटुम्ब के परिचित लोग भी बालक को देखकर खुश होते हैं और एक प्रकार के गहरे आनन्द का अनुभव करते हैं।
किन्तु जैसे-जैसे समय बीतता जाता है, वैसे-वैसे इस आनन्द की कक्षा और इसका प्रवाह बदलता रहता है। सब किसी के आनन्द का कारण बनने वाला बालक धीरे-धीरे सबके आनन्द का स्थूल और स्वार्थी साधन बनने लगता है। माता-पिता और बड़े-बूढ़े समझते नहीं कि बालक का भी अपना आनन्द होता है। जन्म के बाद तुरंत ही जो बालक अपनी रक्षा और अपने पोषण की अपेक्षा रखता है और अपने ढंग से अपना विकास करने लगता है, वह धीरे-धीरे समझदार और सशक्त भी बनता जाता है। बालक के अपने कामों से माता-पिता को जो आनन्द मिलता है उससे बालक को भी खुशी होती है, घर के बड़े-बूढ़ों द्वारा जो काम या आयोजन बच्चों के लिए, बच्चों के आनन्द का पोषण करने की दृष्टि से किए जाते हैं, उनसे उन्हें हमेशा आनन्द मिलता ही है, यह सोचना ठीक नहीं। जब बालक अपने आनन्द में लीन होते हैं, तब माता-पिता और घर के बड़े उनसे यह अपेक्षा रखते हैं कि वे अपने किसी व्यवहार या कार्य द्वारा उन्हें आनंद पहुंचाये। बालक के आनन्द से आनन्दित होने वाले बड़े-बूढ़े अब दूसरी दृष्टि से सोचने लगते हैं। उनके मन में यह विचार प्रमुख बनने लगता है कि बालक भी उन्हें आनन्द पहुँचाने का यत्न करे। जब कोई छोटा बालक अपने खेल में डूबा और उसमें पूरा रस ले रहा होता है, तभी माता-पिता और बड़े-बूढ़े यह चाहते है कि बालक अपना खेल छोड़कर उनके पास आये और उनका मनोरंजन करे। जो माता-पिता और बड़े-बूढ़े बच्चे के साथ खेलकर और उसे अपने मन-बहलाव का साधन बनाकर खुश होना चाहते हैं, वे बच्चे के भय और उसकी अरुचि या उकताहट की परवाह नहीं करते और जब बालक माता-पिता के ऐसे किसी व्यवहार का विरोध करता है तो उन्हें यह पसन्द नहीं आता और बालक की खीझ या चिढ़ की परवाह किये बिना वे अपने आनन्द-उत्सव में मग्न रहते हैं। एक समय था जब बच्चों का और बड़ों का आनन्द अभिन्न था। धीरे-धीरे ऐसा समय भी आता है, जब कभी तो उनका आनन्द अभिन्न होता है और कभी भिन्न भी। यदि ऐसी परिस्थिति में ध्यानपूर्वक और ज्ञानपूर्वक बालक को समझाने की कोशिश न की जाय तो फिर भी एक समय आ जाता है, जब बालक के और बड़ों के आनन्द-क्षेम और आनन्द-कार्य बिलकुल ही भिन्न बन जाते हैं और आनंद-विषयक दोनों की व्याख्याएं बदल जाती है।
हममें से हर एक को यह समझना चाहिये कि छोटा बच्चा एक प्राणवान प्राणी है और उसका अपना एक स्वतन्त्र व्यक्तित्व भी है। ज्यों−ज्यों व्यक्तित्व का विकास होता जाता है, त्यों-त्यों वह अपनी प्रतिभा अनेक प्रकार से प्रकट करता जाता है। ऐसे बालक को उच्च कोटि का आनंद रुचता है और ऐसे आनंद की प्राप्ति के लिए वह उच्च कोटि के कार्य भी पसंद करता है। चूँकि समाज को बालक के चित्त की धाराओं का कोई व्यवस्थित ज्ञान नहीं होता, इसलिए बालक से बड़े प्रायः सभी उसके बारे में गलत ख्याल बना लेते हैं, और यों बालक के साथ अन्याय करते हैं। जिस तरह बड़ी उम्र के लोगों को आनंद रुचता है, और अपनी रुचि का आनंददायी काम अच्छा लगता है, उसी प्रकार बालक भी आनंद-प्रिय है, और उसे भी रुचिकर व आनन्द प्रेरित काम अच्छे लगते हैं। चूँकि हम इस सचाई की तरफ ध्यान नहीं देते, इसलिए अक्सर बच्चों के आनंद-विनोद में और उनकी रुचि के कामों में बड़ेपन के बल पर बाधा डाला करते। जब बालक खेलना-कूदना चाहता है, तो हम उसे चुपचाप बैठने को कहते हैं। जब बालक कुछ करना धरना चाहता है, तो हम उसके उत्साह पर ठण्डा पानी डाल देते हैं। इस प्रकार हम बड़े-बूढ़े, बालकों को रुचिकर लगने वाले हर तरह के आनंददायक कार्यों का जाने-अनजाने विरोध करने लगते हैं। बालक समझ नहीं पाते कि क्यों घर के बड़े-बूढ़े उनके आनंद में बाधक बनते हैं। फलतः वे अपनी शक्ति के अनुसार अपना विरोध प्रदर्शित करते रहते हैं। दुर्भाग्यवश घर के बड़े इस विरोध का उल्टा अर्थ लेते हैं और अपने ढंग से जीने की कोशिश करने वाले को शरारती और जिद्दी समझकर उसके साथ दूसरी तरह का बर्ताव करने लगते हैं। यों, बच्चों और बड़ों के बीच इस तरह की गलतफहमियाँ जिस प्रमाण में बढ़ती हैं, उसी प्रमाण में बालक का आनंद लुटता जाता है और परिवार के आनंद में कमी होती जाती है। फलतः माता-पिता को समूचे परिवार को आनंद प्रदान करने वाला बालक अप्रिय बनने लगता है और सबका आपसी आनंद दुःख और कलह में बदल जाता है। यह सब इसलिए होता है कि माँ-बाप और घर के बड़े-बूढ़ों का बालक के बारे में सही ज्ञान नहीं होता। यदि हम यह समझ जायं कि बालक के आनन्द में सारी दुनिया का आनन्द है और यह समझ कर बालक को आनन्द मग्न रहने दें, तथा उसके आनन्द से स्वयं आनन्दी बने, तो आज की दुखी दुनिया का काया-पलट हो जाय, और वह सुखी बन जाय।
(श्री मोहन लाल वर्मा, बी.ए.,एल.एल.बी.)
( 1 )
धर्म संसार में मनुष्य की बुद्धि, भावना और श्रद्धा का सर्वोत्तम रूप है। ज्ञान और श्रद्धा के प्रकाश में, विशेषतः भक्ति के सुलभ राजमार्ग से जितना भी हो सके अपने स्वधर्मानुसार कर्त्तव्य का पालन करते रहना चाहिए। निष्काम बुद्धि से मरण पर्यंत अपने कर्त्तव्यों का पालन करते चलना ही श्रेष्ठ है। इसी में मनुष्य का साँसारिक और पारलौकिक कल्याण है।
गीता में भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए कहा है कि धर्म ही कर्त्तव्य है और कर्त्तव्य का पालन कर जीवन-पथ पर चलना ही धर्म पर दृढ़ रहना है। कर्तव्य से विमुख होना धर्म से मुख मोड़ना है। मनुष्य का कर्त्तव्य परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होता है। जीवन में भिन्न-भिन्न अच्छी-बुरी परिस्थितियाँ आती रहती हैं। उसका कर्त्तव्य भी इन परिस्थितियों के अनुसार सदैव एक सा नहीं रहता। बहुधा देखा जाता है कि एक परिस्थिति में जो धर्म है, वही दूसरी परिस्थिति में पाप हो जाता है। अपने परिवार या बन्धु-बाँधवों का वध करना पाप है, पर महाभारत-युद्ध की विशेष परिस्थितियों में अत्याचारी बान्धवों का वध कर संसार से पापवृत्ति दूर करना ही कर्त्तव्य था। इसी प्रकार मानव जीवन के प्रत्येक पग, प्रत्येक काल और परिस्थिति में उसका धर्म क्या है, यह निर्णय करना कठिन हो जाता है।
इस सम्बन्ध में साधारणतः यह कहा जा सकता है कि जब मनुष्य संकट में हो, विपद् में हो, तो जीवन धारण के लिए परिस्थितियों के अनुसार धर्म में कुछ परिवर्तन कर लेना चाहिए। धर्म और कर्त्तव्य जीवन की परिस्थितियों के अनुसार बदल लेनी चाहिये। यदि हम अपनी निश्चयात्मिका बुद्धि को जाग्रत कर परिस्थितियों को सोचें, तो यह सहज ही पता चल जाता है कि हम आखिर इन परिस्थितियों में क्या करें? सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक परिस्थितियों के वातावरण में क्या करें? भौतिकता का ही नाश होता है विषम परिस्थितियों में भी हमारी अजर अमर आत्मा ज्यों की त्यों रहती है। धर्म-ध्रुवता का साधन तन है। तन को निर्लिप्त बनाना चाहिए पर, वास्तविक वस्तु हमारा मन और आत्मा हैं। इन्हीं की शुद्धि का ध्यान रखना चाहिए। जो आत्म तत्त्व को समझता है, विषम परिस्थितियों में भी नहीं घबराता, वह अपने ब्रह्म स्वरूप को पहचानता है।
(2)
“धर्मो रक्षति रक्षितः” धर्म रक्षकों की रक्षा स्वयं करता है। आपत्ति काल में जीवन धारण के उपकरण स्वयं उपस्थित कर देता है। कुछ उदाहरण लीजिए—
कुरुदेश में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। अन्न का दाना न दिखाई देता था। अन्न के अभाव में अनेक व्यक्ति मरे। शेष अपनी प्राण रक्षा के लिए इधर-उधर बिखर कर भोजन की तलाश में गए। सबका जीवन संकट में था। भूख से व्याकुल भोजन की तलाश में ऋषि उपस्ति चाक्रायण अपनी पत्नी अटक्री को साथ लेकर इसी प्रकार घूम रहे थे। घूमते-घूमते वे एक ऐसे ग्राम में पहुँचे जहाँ हाथीवान उबले हुए दाने खा रहे थे। ऋषि उपस्ति ने कुछ दाने माँगे। हाथीवानों को दया आ गई और उन्होंने अपने दानों में से कुछ दाने ऋषि और उनकी पत्नी को दे दिये। जीवन धारण करना था और दूसरा कोई उपाय न था, इसलिये ऋषि ने वे जूठे दाने लेकर खा लिए। भोजन खाकर जब ऋषि ने पानी माँगा, तो हाथीवान जूठे लोटे से ही उन्हें पानी देने लगे। उपस्ति ने लेने से इन्कार कर दिया और बोले जूठे पानी के पीने से तो पाप लगेगा। यह सुनकर हाथीवान चकित हो पूछने लगे कि आपने हमारा जूठा अन्न तो खा लिया, जूठे जल को लेने में पाप कैसे लगेगा? इस पर ऋषि बोले, “निषिद्ध कर्म तभी उचित समझा जाता है, जब उसके बिना कोई महान् विपत्ति अथवा मृत्यु न रोकी जा सके, अन्यथा नहीं। अन्न के बिना प्राण संकट में देख कर ही मैंने आपद्-धर्म में जूठा अन्न खाया, किन्तु शुद्ध पानी तो दूसरी जगह मिल सकता है, तब फिर जूठा पानी क्यों पिया जाय?”
ऋषि के शब्द निषिद्ध कर्म तभी उचित समझा जाता है जब उसके बिना कोई महान् विपत्ति अथवा मृत्यु न रोकी जा सके, अन्यथा नहीं।” आपद् धर्म की एक मर्यादा की ओर संकेत करते हैं। आपत्ति काल में धर्म की मर्यादा में अन्तर आ जाता है।
कहते हैं सोमनाथ के प्रसिद्ध भारतीय मंदिर के नाश का कारण यह था कि शत्रु ने सेना के आगे गायों के झुण्ड एकत्रित कर दिये थे और उनकी आड़ में पीछे-पीछे बढ़ते गए। दयालु हिंदू गो पर आक्रमण करना पाप समझते थे। उनकी हत्या न कर सकते थे। शत्रुओं की योजना सफल हुई और सोमनाथ जीत लिया गया।
एक बार जहाँ विश्वामित्र तपस्या कर रहे थे, अकाल पड़ा। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। कुछ दिन वे क्षुधा का रोके रहे पर अन्ततः भोजन की तलाश में निकले। एक स्थान पर उन्हें धुंआ निकलता हुआ दीखा। उन्होंने वहाँ भोजन का अनुमान किया। पहुँचे तो मालूम हुआ कि वह एक चाण्डाल का घर है। उसे भी कई दिनों से भोजन नहीं मिला था। उसने कुत्ते का माँस पकाया था। चाण्डाल बोला, “ऋषिवर! मुझे कुछ भी खाने को नहीं मिला। यह कुत्ते का माँस है। मैं इस अभक्ष पदार्थ को खिलाकर आपका धर्म भ्रष्ट नहीं करना चाहता।” ऋषि ने विचार किया कि धर्म तो देह के साथ है। यदि देह रही तो प्रायश्चित कर फिर शुद्धि कर सकूँगा। अतः इस आपत्ति काल में कुत्ते के माँस का भक्षण कर लेने में कोई पाप नहीं है।” यह सोच कर ऋषि ने उसे ग्रहण कर लिया और आपत्ति काल से अपनी रक्षा की। समय निकल गया, विश्वामित्र, विश्वामित्र ही रहे।
तात्पर्य यह है कि आपद् में धर्म च्युत होने पर हमारे यहाँ प्रायश्चित्त का विधान है। प्रायश्चित्त से शुद्धि होती है। अतः परिस्थिति के अनुसार हमें अपने कर्त्तव्य का निर्धारण करना चाहिए।
(लेखक-डा. मुँशीरामजी शर्मा, एम. ए., पी.एच्. डी.)
द्विपद मानव सप्राण सृष्टि में सर्वश्रेष्ठ है, ऐसा मन्तव्य आज तक के सभी दार्शनिकों का रहा है; परन्तु सापेक्ष एवं तुलनात्मक दृष्टि से समस्त मानव भी एक स्तर के नहीं हैं। उनकी विचार-प्रणाली, विषय-प्रवृत्ति, प्रेरक तत्त्व, कार्य संचालन; बुद्धि-वैभव, शारीरिक सम्पत्ति आदि सभी में विभिन्नता है। सबकी अपनी-अपनी कमाई है जो कभी एक समान नहीं होती। एक-जैसे अवसर मिलने पर भी मानव एक-जैसे नहीं बन पाते। एक ही दंपत्ति की संतति विषम गुणों वाली देखी जाती है। एक ही गुरु से शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों में श्रेणीगत वैषम्य होता है। विश्व की विविधरूपता को सिद्ध करने के लिये प्रमाण एवं तर्क की आवश्यकता नहीं हैं। वह तो स्वयं सिद्ध है। यह विविधरूपता मानव-जगत् में भी ज्यों की त्यों विद्यमान है।
अन्य प्राणियों की अपेक्षा मानव की श्रेष्ठता उसके बुद्धि-वैभव के कारण ही है। अतः बौद्धिक स्तर का उच्चाउच होना ही मानवों के विभिन्न स्तरों का भी प्रधान कारण है। कुछ मनुष्य बुद्धि के रहते हुए भी उससे कार्य नहीं लेते। वे दूसरों की बुद्धि द्वारा यंत्रवत परिचालित होते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति दूसरों के कार्य साधक तो बनते हैं, पर अपना कार्य नहीं कर पाते और इसी कारण उनके अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व का भी विकास नहीं हो पाता। साधन रूप में प्रयुक्त होने पर जो कुछ मिल जाता है, उसी के आधार पर उनका जीवन-यापन होता है। आहार, निद्रा, भय और भोग तक ही उनकी निर्मिति सीमित रहती है। इससे ऊपर उठकर वे स्वतन्त्र नेता के गौरवशाली पद को प्राप्त नहीं कर पाते। आर्य संस्कृति की वर्ण-मर्यादा में ऐसे व्यक्तियों को शूद्र संज्ञा दी गयी है। शारीरिक श्रम- कठोर दैहिक तप- इनकी विशेषता है। वैदिक उक्ति ‘तपसे शूद्रम्’ का यही भाव है।
इस स्तर से ऊपर ऐसे व्यक्तियों का वर्ग है जो शारीरिक श्रम तो करते हैं, पर उसका लक्ष्य उनकी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति होता है। किसान खेती करता है, पशु-पालन करता है, वैश्य वाणिज्य व्यवसाय करता है, तो उसका उद्देश्य उसके अपने लिये है, किसी अन्य के लिये नहीं। इन सभी कार्यों में कठोर तप करना पड़ता है, शीत-उष्ण, सुख-दुःख आदि के द्वन्द्व सहने पड़ते हैं, पर सबका परिणाम अपना हित होता है—यही इस स्तर का पूर्व स्तर से अन्तर है। इस अन्तर में बुद्धि की क्रियाशीलता भी निहित है। बिना बुद्धि का उपयोग किये कोई भी व्यक्ति न खेती से लाभ उठा सकता है, न वाणिज्य व्यवसाय से। और यदि बुद्धि का उपयोग नहीं करता, तो स्वयं दूसरों के साध्य का साधन बन जाता है। ऐसी अवस्था प्रथम स्तर से ऊपर की नहीं कही जा सकती। बुद्धि क्रियाशील होकर ही व्यक्ति को साधन मात्र होने से बचा देती है। यह स्तर वैश्य- वर्ग का है।
मानव का तीसरा स्तर ऐसे व्यक्तियों का है जो वैश्य-वर्ग की अपेक्षा बुद्धि से अधिक काम लेते हैं। इनका कार्य समाज की रक्षा करना है जिसके लिये इन्हें अनेक उपाय सोचने पड़ते हैं। आन्तरिक तथा वाह्य दोनों ही प्रकार के घातकों से सावधान रहना, उनकी कुटिल चालों की जानकारी रखना, उपयुक्त समय पर जागरुक रहते हुए तत्परतापूर्वक रक्षा के साधनों को जुटाना और निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जाना, शारीरिक बल के साथ विविध प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करना, उसके संचालन की विधि से पूर्णतया अभिज्ञ होना आदि ऐसे कार्य हैं जिनमें इस वर्ग को दक्ष होना पड़ता है। शारीरिक श्रम यहाँ भी है, पर पूर्वोक्त दोनों वर्गों की अपेक्षा अधिक बुद्धिपूर्वक। लक्ष्य में यहाँ आकर एक विशिष्ट अन्तर पड़ जाता है। वैश्य वर्ग के कार्यों का लक्ष्य वह वर्ग स्वयं है। जो कुछ उत्पादन उसके द्वारा होता है, उसका उपयोग अधिकाँश में उस वर्ग के लिये ही होता है। पर इस वर्ग के कार्यों का लक्ष्य समग्र समाज की रक्षा है। शूद्र बुद्धि रहित होकर एक व्यक्ति की सेवा करता है, पर यह वर्ग बुद्धिपूर्वक समग्र समाज की सेवा करता है। अतः कई दृष्टियों से यह वर्ग पूर्वोक्त दोनों वर्गों के स्तर से उच्च कोटि का है। यह क्षत्रिय वर्ग है।
चौथे स्तर पर ऐसे व्यक्ति हैं जिनका लक्ष्य बुद्धि के उपयोग द्वारा किसी साँसारिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं, प्रत्युत स्वयं बुद्धि का अधिक-से-अधिक विकास करना है। जीवन-यापन के लिये प्रभु का सहारा तथा बुद्धि सम्बन्धी कोई कार्य जैसे अध्यापन, पौरोहित्य आदि—इसके अनन्तर सारा समय मस्तिष्क को आलोकित करने में लगाना- यही एकमात्र उद्देश्य इस स्तर के व्यक्तियों का होता है। आर्य-संस्कृति में यह स्तर ब्राह्मण-वर्ग का माना गया है।
ऊपर जिन चार वर्गों के सम्बन्ध में जो कुछ लिखा गया है, उनमें से एक-एक वर्ग के अन्दर भी कार्य तथा बुद्धि-स्तर के आधार पर कई विभाग किये जा सकते हैं और किये भी गये हैं। सत् और असत् के आधार पर सभी वर्गों के दो-दो मोटे विभाग हो सकते हैं पुनः इन दो के भी अनेक विभाग हो सकते हैं। यों मानवता की एक श्रेणी है, पर यह एक श्रेणी नानारूपा बनकर कम-से-कम विकास के चार स्तरों में विभाजित की जा सकती है।
अन्तर्मनोदशा तथा भावना की दृष्टि से शूद्र-वर्ग चिन्ता रहित जीवन व्यतीत करना चाहता है। लम्बी आयु, अनेक पुत्र-पौत्रों के बीच मनोरंजन करना, अपने स्वामी से प्राप्त धन के आधार पर, किसी भी जोखिम को उठाये बिना, निश्चिन्त होकर रहना- शूद्र-वर्ग की विशेषताएँ हैं। ऐसा जीवन मानवता के विकास का द्योतक नहीं है। चिन्ता विकास की प्रथम आवश्यक सीढ़ी है। चिन्ता चिन्तन की जननी है। मानव की सार्थकता इसी चिन्तन या मनन द्वारा सिद्ध होती है। जिस व्यक्ति के जीवन में चिन्तन ने प्रवेश नहीं किया, वह तम्थुष की भाँति स्थिर रह सकता है, चरकी तरह गतिशील नहीं बन सकता। जो गतिशील नहीं है वह विकसित भी नहीं है। आर्य-संस्कृति में ‘जन्मना जायते शूद्रः’ का भी यही अर्थ है। निश्चिन्त, मनन रहित सभी बालकों की संज्ञा शूद्र है। संस्कार सम्पन्न होकर ही वे द्विज कहलाने के अधिकारी बनते हैं। संस्कार निश्चित रूप से मन का ही होता है।
वैश्य वर्ग में यह चिन्ता पद-पद पर दिखायी देती है। कृषि के लिये भूमि की जुताई करनी है, उसमें खाद डालना है, बीज बोना है, पानी देना है, अंकुरित दलों की कीड़ों से रक्षा करनी है, फसल के तैयार होने पर पशु-पक्षियों से उसे बचाना है, फिर काटना, गाहना, राशि करना—ऐसी एक नहीं, न जाने कितनी चिन्ताओं से कृषक का जीवन आक्राँत रहता है। वह इन समस्त चिन्ताओं का साम्मुख्य करता है। अल्पवृष्टि, अतिवृष्टि, टिड्डादल आदि अनेक दैवी आपदाएँ आकर उसके जीवन की झकझोरती रहती हैं। वह स्थिर निश्चिन्त जीवन व्यतीत कर ही नहीं पाता और इसी हेतु उसके जीवन का विकास भी होता है। इस वर्ग की विशेष चिन्तन-प्रणाली धन, समृद्धि, वैभव आदि की वृद्धि में अनुभूत होती है। वाणिज्य-व्यवसाय तथा उससे सम्बद्ध अन्य जोखिम से भरे कार्य करने वाले व्यक्तियों की गणना इसी वर्ग में होती है। मनु ने इस वर्ग को सत्यानृत का सम्मिलित वर्ग माना है।
क्षत्रिय-श्रेणी वैश्य की अपेक्षा कहीं अधिक चिंताकुल दिखायी देती है। उसके प्राण सदैव हथेली पर रक्खे रहते हैं। उसे न शरीर का ध्यान है, न अपने पुत्र-पौत्रों का, न धन का—आवश्यकता पड़ने पर वह इन सबको ठुकरा सकता है। हाँ, उसकी एक कामना है, मन की एक आकांक्षा है—यह है उसकी और उसके समाज की कीर्ति। यही उसकी आन है, विरुद है। यश रहे, प्राण या धन रहे चाहे न रहे। कीर्ति के पिपासु क्षत्रिय, यशो लिप्सा के भूखे वीर एक सत्य की रक्षा के लिये अपने सर्वस्व की आहुति दे देते हैं, अपने प्रण पर मर मिटते हैं, पर वचन को नहीं जाने देते। यह है सत्य की सुरक्षा, पर कभी-कभी क्षत्रिय का असत्, कुत्सित, क्रोधान्ध रूप भी दिखायी देता है। निरीहों की हत्या अपने नाम के लिये सत्य मूर्ति विप्रों की अवमानना, धनिकों का निर्मम शोषण—दूसरे शब्दों में अपने बल का, क्षत्रियत्व का अनुचित एवं गर्हणीय प्रयोग—यह क्षत्रियत्व का उद्योतन नहीं, अवगमन है, उत्थान नहीं, पतन है, विकास नहीं, विनाश है सच्चा क्षत्रिय अपने समाज को घायल होने से बचाता है, सतर्क रहकर अत्याचारियों से उसकी रक्षा करता है, प्राचीन प्रतीकात्मक शब्दों में ‘गो-ब्राह्मण का प्रतिपालक’ होता है। वह सत्यसन्ध है, सत्यपक्षी है, सत्य का संरक्षक है। उसकी चिंता के प्रधान विषय यही हैं।
ब्राह्मण-वर्ग की चिंता न आयु और प्राण हैं, न पशु और प्रजा हैं, न धन और कीर्ति हैं। उसका प्रमुख लक्ष्य ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति है। समष्टि दृष्टि से जो बुद्धितत्त्व द्यो के रूप में सर्वत्र समाया हुआ है, सत् का जो आलोक सर्वव्याप्त है, उसको पहचान लेना और उसके साथ अपने व्यष्टि बुद्धितत्त्व को मिला देना अर्थात् धी-योग को प्राप्य कर लेना उसके ध्यान का चरम बिन्दु है। यह स्थिति चिन्तन और मनन से भी ऊपर की है।
ब्राह्मण चिन्तनशील तो होता ही है, इससे भी ऊपर वह प्रकाश-सम्पन्न बनता है। ब्रह्मतेज से युक्त होकर वह अपनी गतिशील स्थिति से चारों ओर की परिस्थितियों को प्रभावित करता है। उसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति इस प्रकाश का अनुभव करते हैं और उधर चलने के लिये उन्मुख होते हैं। दिव्यता का आविर्भाव और उसका प्रभाव ऐसा ही होता है।
आर्य-संस्कृति में इसे ब्राह्मी वृत्ति का सम्पादन कहा गया है। मनु ने इसकी प्राप्ति के लिए स्वाध्याय, व्रत, होम, त्रयी विद्या, इज्या, सुत, महायज्ञ और यज्ञ रूप साधनों का वर्णन किया है। स्वाध्याय-अप्रमत्त होकर वेद-शास्त्रादि, ज्ञान-विज्ञान के ग्रन्थों के अध्ययन में निरत रहना, व्रत रखना—उपवास आदि द्वारा इन्द्रिय-संयम को उपलब्ध करना, दैनिक अग्निहोत्र करना, ज्ञान-कर्म-उपासना रूप वेदत्रयी का आचरण, दर्श-पौर्णमास आदि यज्ञों का करना, गृहस्थ धर्म का पालन—संतति का प्रसव, महायज्ञ—सर्वहुत तथा पञ्चमहायज्ञों का करना और अन्त में समग्र यज्ञ पूर्ण जीवन को यज्ञमय ही बना देना ब्रह्मणत्व-प्राप्ति के साधन कहे गये हैं। अन्तिम साधन त्याग की पराकाष्ठा को सूचित करता है। ऐसे ब्राह्मण ही संन्यासी की उस प्रतिज्ञा को पूर्णतया चरितार्थ कर सकते हैं जिनमें पुत्र-वित्त-यश सभी आकांक्षाओं के त्याग का प्रतिपादन है।
शूद्र का सत्य अपने स्वामी की सेवा है। वैश्य सत्यानृत है। क्षत्रिय सत्यसन्ध है, परन्तु ब्राह्मण सत्य का उपासक और अपने वास्तविक स्वरूप में सत्य की मूर्ति है।
शूद्र पराश्रित है। वैश्य स्वाश्रित एवं पराश्रित दोनों ही हैं। क्षत्रिय स्वाश्रित अधिक है, पराश्रित कम है। ब्राह्मण सम्पूर्ण रूप से स्व- आत्मा पर ही आश्रित है।
शूद्र स्वामी की सेवा से सदैव भयभीत रहता है। वैश्य विविध प्रकार के विघ्नों से भयभीत रहते हुए भी निर्भयता का आस्वाद ले लेता है। क्षत्रिय निर्भय होते हुए भी भय से आक्रान्त रहता है, परन्तु ब्राह्मण निर्भय है। उसकी निर्भयता को किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं है। भय द्वितीय से होता है। जो किसी को द्वितीय रूप में देखता ही नहीं है, सबको अपना आत्मा ही समझता है, उसे किसी से भी भय नहीं होता ‘प्रजापते न त्वदेतान्यन्यो’ वेद की इस मन्त्र पंक्ति को जीवन में चरितार्थ करने वाला व्यक्ति प्रत्येक अवस्था में निर्भय रहता है।
शूद्र स्थिर है। वैश्य गतिशील है। क्षत्रिय उससे भी अधिक गतिशील है। ब्राह्मण परम गतिशील होते हुए भी स्थिर है।
विकास की दृष्टि से भी मानवता के ऊपर वर्णित चारों स्तरों में एक विशेष क्रम परिलक्षित होता है। शूद्र के निश्चिन्त जीवन में पराश्रित धन प्राप्ति कभी-कभी चोट पैदा कर ही देती है और वह स्वभावतः स्वाश्रित होकर धन के संचय की ओर झुक जाता है। यही उसका वैश्यत्व की ओर प्रयाण है। वैश्य धन तो पैदा करता है, पर उसकी वृद्धि और सुरक्षा की चिन्ता उसे ऐसे साधनों से सम्पन्न बनने की ओर भी प्रेरित करती रहती है जो उसके लिए निर्विघ्न वातावरण का निर्माण कर सकें। यही वैश्यत्व का क्षत्रियत्व में परिणमन है। क्षत्रियत्व या राजनीति अनेक वक्रताओं से संश्लिष्ट है उसमें दाम, दण्ड, भेद सभी का प्रयोग करना पड़ता है। यश का अर्जन साधारणतया सरल कार्य नहीं है। राजनीति में प्रवेश करके उसकी अन्तःअनार्जव अवस्था का दर्शन होता है और अन्त में मानव वक्रता से आकुल होकर सरलता से संयुक्त जीवन की ओर अग्रसर होता है। यही ब्राह्मणत्व की ओर चलना है। ब्राह्मण सरलता की प्रतिमा है, छल-छद्म से कोसों दूर निष्कपट भोलेपन की मूर्ति है। वह सबका है। वह सबका है, सब उसके हैं-फिर किससे कैसा दुराव-छिपाव। वह उन्मुक्त है, गगनवत् खुला हुआ, कुसुमवत् खिला हुआ, चन्द्रिका के समान आह्लाद दायक, सूर्य के समान प्रकाश प्रदायक, ब्रह्मरश्मियों में स्नात घौतमल, विगत कल्मष, शान्त, सौम्य—ऐसा ब्राह्मणत्व किस मूर्ख को प्यारा नहीं है? न हो, तब भी जाने, अनजाने सब उसी ओर चले जा रहे हैं। प्रकृति माता सबको खींच-खींचकर उधर ले जा रही है। जो हठवश, प्रमादपूर्वक उधर नहीं जा रहे, वे अभागे हैं। अन्यथा इस मिट्टी से हट कर उस द्यौ की ओर गमन करना सभी को अभीष्ट है, अन्न से आनन्द की ओर जाना सभी का लक्ष्य है, मृत से अमृत बनना सभी को प्यारा है।
(श्री ल. ना. बृहस्पति )
पौरुधेणा दुरन्तेभ्यः संकटभ्यः सुबुध्यः। समुत्तरन्त्यत्नेन नतु मोथतयाऽनया।।
पुरुषार्थ के प्रताप से ही बुद्धिमान् लोग बड़े-बड़े संकटों में से शीघ्र छूटकर निकल गये हैं, परन्तु हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने वालों को कुछ भी नहीं मिलता।
पुरुषार्थी सबसे पहले अपने अन्तःकरण के चार प्रधान दोषों को निकाल बाहर करता है-
1— मन में सत्य अथवा स्थिर तत्व का योग कर दुर्बलता के कारणभूत चञ्चलता रूपी दोष को निकाल बाहर करता है।
2— चित्त में सत् सम्बन्ध तथा सत् चिन्तन करते हुए मलिनता-खिन्नता रूपी दोष को भगा देता है।
3— ज्ञानी, सन्त-पुरुष, सद्गुण का संग कर बुद्धि के अज्ञान रूपी-मूढ़ता रूपी दोष को दूर कर देता है।
4— श्रद्धा, शरणागति व सर्वस्व अर्पण की भावना रूपी गंगा में स्नान कर अपने अहं में रहने वाले देहादिक-पदार्थों का ममता रूपी दोष जो अशक्ति और जड़ता का कारण है, वह निकाल बाहर करता है।
इस प्रकार वह अपने दोषों को दूर कर दुःखों का अन्त कर देता है। तब उसका अपनी आत्मा के साथ समागम होता है—
सर्वशक्तिमयो ह्यात्मा यद्यथाभाव यत्यलम्। तत्तथा पश्यति तदा स्वसंकल्पविजम्भितम्॥
(योगवा.)
आत्मा सर्वशक्तियों से युक्त है, वह जिस शक्ति की जहाँ भावना करता है, वहीं पर उसे अपने संकल्प द्वारा प्रकट देखता है।
तब उसके लिए असम्भव नाम की कोई वस्तु शेष नहीं रह जाती। सफलता-महारानी सर्वत्र उसका स्वागत करने के लिए सदा तत्पर रहती है।
ये शूरा ये च विक्रान्ता ये प्राज्ञा ये च पण्डिताः। तैस्तैः किमिव लोकेऽस्मिन वद दैवं प्रतोक्ष्यते॥ तस्मात्पौरुषमाश्रित्य सूच्छास्रेः सत्समागमैः॥ प्रज्ञाममलताँ नीत्वा ससार जलधिं तरेत्॥
जो लोग शूर हैं, उन्नति करने वाले हैं, ज्ञानी हैं, पण्डित हैं, बताइये! उनमें से कौन इस संसार में भाग्य की प्रतीक्षा करता है? इसलिए शास्त्रों और सद्गुरु के सत्संग से युक्त पुरुषर्थ का आश्रय लेकर बुद्धि का निर्मल करके संसार-सागर को पार कीजिये।
यह स्पष्टतया समझ लीजिए कि यह समय ही आपका है, इसलिए इसे कभी निरर्थक खोने की भूल न कीजिए! इस समय रूपी जीवन के द्वारा ही ऐसी स्थिति प्राप्त कीजिए जहाँ अभाव न हो, अज्ञान न हो तथा अशक्ति न हो! जहाँ किसी प्रकार का भय न हो, जहाँ अनन्त-शक्ति और प्रेम के सौंदर्य में परमानन्द स्वरूप का नित्य-योग हो!
पुरुषार्थ का वास्तविक अर्थ भी—पुरुष का अर्थ अथवा पुरुष का ज्ञान है तथा जो उस पुरुष के अर्थ का चिन्तन करते हुए उसकी प्राप्ति की दिशा में प्रयत्न करता है वही सच्चा-पुरुषार्थी है।
ऐसे कल्याण-मार्ग के पथिक परमानन्द-स्वरूप परम पुरुषार्थी धन्य हैं! पृथ्वी ऐसे परम-पुरुषार्थी पुरुषों के चरण-कमलों का स्पर्श पाकर धन्य हो जाती है! किन्तु, परोपकार की भावना से ओत-प्रोत सामान्य पुरुषार्थियों का भी कुछ कम महत्व नहीं है साथ ही परोपकारी-पथ को भूले हुए, कल्याण-मार्ग से भटके हुए, स्वार्थ-रत पुरुषार्थी-जन भी कुछ बहुत बुरे नहीं कहे जा सकते।
जो लोग स्वयं कुछ न करे, संसार के लिये बोझ बने फिरते हैं– वास्तव में वे दया के पात्र हैं ऐसे ही व्यक्तियों का प्रदर्शन करने की आज अत्यधिक आवश्यकता है।
जब तक हमारे पड़ोस में एक भी व्यक्ति आलस्य, प्रमाद में पड़ा हुआ अपने भाग्य को कोस रहा है, अज्ञानांधकार में अपना अस्तित्व खो बैठा है, अभावों से जकड़ा हुआ है और अशक्ति से व्याकुल है- तड़फड़ा रहा है- मैं पूछता हूँ क्या आप सुख और शान्ति की नींद सो सकते हैं?
कदापि नहीं, कदापि नहीं। आप जाग्रत हैं; उठिये आगे बढ़िये और सबसे पहले अपने पड़ोसियों को आगे बढ़ने में सहायक हूजिए। सार्वभौम-सेवा का प्रारम्भ अपने अन्तर से, अपने पड़ोसियों से कीजिये। समय आपका स्वागत करने के लिए व्याकुल हो रहा है।
अपनी प्रत्येक क्रिया के द्वारा-दुर्भावों को सद्भावों में, दुर्गुणों को सद्गुणों में बदलते हुए अज्ञान-अन्धकार को सद्गुरु-कृपा रूपी ज्ञान-सूर्य से मिटा दीजिए!
पुरुषार्थ-पथ के पथिक बन कर क्रमशः उन्नति कीजिए तथा अनन्तः सार्वभौम-सेवा के सर्वोपरि परम-पद पर प्रतिष्ठित होकर परमानन्द-धन परात्पर परमेश्वर की प्राप्ति कर वेदमाता के कर-कमलों द्वारा अमृत-पान कर अपने जीवन को सफल करने का सौभाग्य प्राप्त कीजिए।
[श्री. विद्याव्रत जी]
यदि आप एक वाक्य में जानना चाहते हैं तब तो अपने को परमात्म शक्ति में अर्पण करना तथा उसी की प्रेरणानुसार जीवन में विकसित होना सच्ची आध्यात्मिकता है। और इसीलिये आध्यात्मिक व्यक्ति का जीवन सदा आन्तरिक चेतना द्वारा संचालित होता है। फिर व्यक्ति किसी भी अवस्था में, किसी कर्म में लीन हो उसे आन्तरिक आदेश मिलेगा ही। गरीबी; धन-सम्पदा आदि उसके लिये बाधक नहीं होते। सच्चा आध्यात्मिक पुरुष ऐसी किसी अवस्था में लिप्त नहीं होता। इसके विपरीत वह अपनी प्रकृति पर स्वामित्व करता है।
आध्यात्मिकता में साम्प्रदायिक धर्म तथा रूढ़ियों का कोई स्थान नहीं होता। वहाँ तो जो सत्य है वही स्वाभाविक रूप से ग्रहण किया जाना चाहिए। चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय द्वारा उच्चारित किया गया हो। मन के बनाये हुए किन्हीं भी नियमों में उसे बंधा भी नहीं होना चाहिये। लोग कहते हैं कि घर-बार छोड़कर ही भजन हो सकता है। पर अब कहा जा सकता है कि घर छोड़कर जंगल में जाने की आवश्यकता नहीं है, किन्तु वहीं रहते हुए अपनी समस्त मानसिक धारणाओं का त्याग करके स्थिर होकर अन्दर झाँको और अन्दर से जो आदेश मिले उसको पालन करने को कटिबद्ध रहो।
“आध्यात्मिक व्यक्ति के लिये कोई चीज न तो भार-स्वरूप होनी चाहिये न ऐसी ही हो जिसके बिना उसका काम ही न चले।” “प्रायः लोगों का जो आध्यात्मिक जीवन बिताना चाहते हैं, यह प्रथम आवेश होता है कि जो कुछ भी उनके पास है उसे वे फेंक दें किन्तु वे ऐसा इसलिए करना चाहते हैं कि जिससे वे एक बोझ से छुटकारा पा जायं, न कि इसलिये कि वे अपना सब कुछ भगवान् को अर्पित करना चाहते हैं। जिसके पास धन है तथा जिनके इर्द गिर्द अमीरी और भोग की सामग्रियाँ भरी पड़ी हैं, वे जब भगवान् की ओर मुँह करते हैं तो तुरन्त उनकी प्रवृत्ति इन इन सब चीजों से दूर भागने की होती है, अथवा, जैसा कि वे कहते हैं, ‘इनके बन्धन से निकल आने’ की होती है। परन्तु यह प्रवृत्ति गलत है, तुमको यह कभी नहीं सोचना चाहिये कि जो चीजें तुम्हारे पास हैं वे तुम्हारी हैं—वे तो भगवान की हैं यदि भगवान् चाहते हैं कि तुम किसी चीज का भोग करो तो उसका तुम भोग करो, किन्तु दूसरे ही क्षण यदि उसको छोड़ना पड़े तो उसके लिये भी प्रसन्न चित्त से तैयार रहो।”
इस प्रकार सब वस्तुओं को भगवान् की समझते हुए उनमें आसक्ति न रखते हुए भोग करना आध्यात्मिक साधना का मुख्य अंग है। और इस प्रकार के निर्मोही व्यक्ति जन-धन के बीच में रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन बिता सकते हैं और बिता रहे हैं। पाँडिचेरी का आश्रम नामक स्थान इसी तरह का जीवन ढाल रहा है। यहाँ अबाध गति से साधक वृन्द कर्म में लगे हुए उन्नति की ओर अग्रसर हैं। और यह श्री माताजी तथा श्री अरविन्द जैसे महान् योगी की कृपा का फल होगा जब समस्त संसार एक बार फिर से उच्चातिउच्च आध्यात्मिक जीवन में आकर भगवान् का संपर्क प्राप्त करेगा।
हाँ तो कहा जा रहा था, कि आध्यात्मिकता के लिये यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति गरीब ही हो और सबकुछ छोड़ ही बैठे, बैरागी बन जाय। वास्तव में त्याग का अर्थ वैराग्य वा काषाय नहीं है। त्याग का अर्थ प्रत्येक वस्तु को पवित्र बनाना है। प्रत्येक वस्तु से मोह छोड़कर उसे निज की न समझते हुए, उसमें उस परम तत्व का दर्शन करना ही त्याग है।
इसलिये सदा स्मरण रखना चाहिये कि वैरागी जीवन और आध्यात्मिक जीवन में बहुत अन्तर है। जन साधारण की ऐसी धारणा हो गई है कि योगी बनने के लिये सब कुछ लात मारकर संसार से भाग जाना होगा। किन्तु यह मन की गढ़ी हुई धारणा गलत है। इस विषय में श्री माता जी का दृष्टिकोण मातृ वाणी नामक पुस्तक के एक सुन्दर पैरे में इस प्रकार वर्णित है:–
“यदि तुम किसी को योगी अथवा योगिनी कहकर वर्णन करो तो तुरन्त उस व्यक्ति के बारे में लोग यही कल्पना करने लगेंगे कि वह कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो खाता न हो अथवा समस्त दिन एक आसन से अडोल बैठा रहता हो, जो किसी कुटिया में अत्यंत दरिद्रता पूर्वक रहता हो, जिसने अपना सब कुछ दे दिया हो और जो अपने लिये कुछ भी न रखता हो। जब किसी आध्यात्मिक मनुष्य के सम्बन्ध में किसी से कुछ कहा जाता है तो सौ में निन्यानवे आदमियों के मन में उस व्यक्ति के सम्बन्ध में इसी प्रकार का चित्र खिंच जाता है, इनके लिये आध्यात्मिकता का एकमात्र सबूत है दरिद्रता तथा जो कोई भी चीज सुखदायक या आराम देह हो उससे परहेज। यह एक मनोनिर्मित धारणा है और यदि तुम आध्यात्मिक सत्य का साक्षात्कार और अनुसरण करने के लिये स्वतन्त्र हो जाना चाहते हो तो तुम्हें इस प्रकार की कपोल कल्पना को नष्ट कर देना होगा। कारण आध्यात्मिक जीवन में तुम सच्ची अभीप्सा के साथ प्रवेश करते हो और चाहते हो कि तुम अपनी चेतना और जीवन भगवान् में भेंट करो तथा उनका साक्षात्कार करो अब होता यह है कि तुम एक ऐसे स्थान में पहुँचते हो जिसको किसी भी तरह कुटिया नहीं कहा जा सकता और वहाँ तुम्हारी एक ऐसे भागवत पुरुष से भेंट होती है जो सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। सब कुछ खाते हैं, उनके चारों ओर सुन्दर या अमीरी की चीजों का ठाठ लगा हुआ है, जो कुछ उनके पास है उसको वे गरीबों को बाँट नहीं दे रहे हैं, बल्कि लोग जो कुछ उनकी भेंट चढ़ाते हैं उसको स्वीकार करते और उसका उपभोग करते हैं। यह देखकर तुम अपने बंधे हुए मनोनिर्मित नियम के अनुसार तुरन्त घबड़ा जाते और चिल्ला उठते हो कि “क्यों, यह सब क्या है? मैंने तो सोचा था कि मेरी किसी योगी से भेंट होगी, पर यहाँ तो ऐसी कोई बात नहीं है।” इस प्रकार की मिथ्या धारणा को नष्ट कर देना चाहिये, ऐसा करना चाहिये जिससे तुम में इसका अस्तित्व तक न रह जाय। एक बार जहाँ यह चली गई कि तुम्हें कुछ ऐसी चीज प्राप्त होगी जो तुम्हारे वैराग्य के संकीर्ण सिद्धान्त से बहुत ही श्रेष्ठ है, तब तुम्हारा पूर्ण आत्मोद्घाटन हो सकेगा जिसके फलस्वरूप तुम्हारी सत्ता मुक्त रहेगी। यदि कोई चीज तुम को दी जाती है तो उसे तुम्हें स्वीकार करना चाहिये और यदि उसी चीज को तुम्हें छोड़ देना होता है तो तुम्हें उसको उसी तत्परता के साथ छोड़ देना चाहिये। तुम्हारा भाव तो यह होना चाहिये कि अगर कोई चीज आई तो तुमने उसे ग्रहण की, अगर कोई चीज चली गई तो तुमने उसे जाने दिया और इन दोनों ही समय, अर्थात् लेते समय और छोड़ते समय तुम्हारी मुसकान में वही समता बनी रहे।”
अब आपने देखा कि आध्यात्मिक सत्य के जिज्ञासु को किसी मानसिक नियम में बंधा हुआ नहीं होना होगा और व्यक्ति इस प्रकार के मानसिक बन्धनों की आसक्तियों से ऊपर उठ जायेंगे तब ही से उनका आध्यात्मिक जीवन शुरू हो जायेगा। तो सच्ची आध्यात्मिकता का अनिवार्य अंश है समचित्तता जो कि योग है ( समत्वं योग उच्यते ) न कि अमीरी-गरीबी और न उनकी बाह्य प्रकृति। क्योंकि आध्यात्मिक जन तथा सामान्य एक नागरिक की बाह्य प्रकृति में तो आप कोई विशेषता नहीं देख सकेंगे, परन्तु अन्तर वहाँ उनकी मनःस्थिति में होता है और अन्तर होता है उनके लक्ष्य में। जहाँ एक स्थिर चित्त होकर भगवान के लिये कर्म रहा होता है, भगवान को समर्पित होता है, बल्कि भगवान को ही अपने अन्दर कर्ता-धर्ता मानता है वहाँ दूसरा निज में ही आसक्त रहता है, सदा अपनी ही इच्छाओं का दास होता है और अपने सगे-सम्बन्धियों तक ही सीमित रह सोचता विचारता है।
तो आवश्यकता है अन्तर्मुख होकर अपनी सभी चेष्टाओं और विचारों को उसी एक महाशक्ति की तरफ झुकाने की। मन, प्राण से ऊपर उठकर अंतर्मन रूपी स्विच पर पहुँच जाने की। फिर अन्तःस्थिर हो जाने पर प्रकाश होना अवश्यंभावी है। भौतिक रूप में ही देखो जैसे कोई व्यक्ति अन्धेरे कमरे में है और वहाँ बिजली की रोशनी वह करना चाह रहा है तो उसे बस एक ही काम करना चाहिए कि वह अपने कमरे के स्विच बटन पर बिना सन्देह , बिना किसी संकोच के पहुँच जाय। स्विच का स्पर्श करके बटन को दबा दे। फिर रोशनी होने में देर ही कितनी लगती है। और जैसे वह वहाँ रोशनी में स्वयं अपना मार्ग अपना कार्य विदित कर लेता है और कमरे की समस्त वस्तुऐं उसके सामने प्रत्यक्ष होती हैं वैसे ही आन्तरिक प्रकाश को पाने पर जगत् भी इसके लिए हस्तामलकवत् प्रत्यक्ष हो जाता है। उसका दिव्य शक्ति से ऐक्य सम्बन्ध स्थापित हो जाता है।
इसलिए किसी भी दशा में होते हुए तुम अन्तरात्मा के दिव्य प्रभाव में रहने के अभ्यासी बनो। उसके प्रेम समुद्र में बिना हिचकिचाहट के कूद ही पड़ो। पूरे विश्वास के साथ पूरे समर्पण के साथ ( पूरा समर्पण है वही जहाँ जहाँ सन्देह का अपनी इच्छाओं का कोई स्थान नहीं होता ) उसी अमर शक्ति के सेवक बनो। अब वह युग आ गया है जबकि हमें द्विविधा में पड़ा नहीं रहना चाहिए। सब बातें गड़बड़ झाले में कब तक पड़ी रहेंगी? अच्छी बातों को स्वीकार कर, मन के बन्धन से ऊपर उठकर बुराइयों को भी अच्छाइयों में परिणत कर दो। आओ भाइयों, हम सब आज एक स्वर होकर श्री माँ की इस वर्ष की तेजस्विनी दृढ़ प्रार्थना को लक्ष्य बनायें-
“वह समय आ गया है जबकि हमें एक चुनाव कर लेना है, पक्का और निश्चित!
हे प्रभु! हमें बल दे कि हम मिथ्यात्व का त्याग करें और तेरे सत्य में उदय हों- विशुद्ध, तेरी विजय के उपयुक्त पात्र।”
(आचार्य श्री धर्मानन्द जी कोसम्बी)
लोगों की समझ है कि, बुद्ध का अवतार, यज्ञ-यागों का निषेध करने के लिये हुआ- “निन्दसि यज्ञविधेरहह श्रुतिजातं, सदयहृदयदर्शितपशुघातं, केशवघृतबुद्धशरीर, जय जगदीश हरे” (गीतगो. लेकिन यह बात ठीक नहीं है। बुद्ध के पहले अनेक श्रमण-संस्थाओं ने हिंसा मय यज्ञ त्याग का निषेध किया था, और उसके फलस्वरूप, बुद्ध काल में सामान्य जन समूह, हिंसामय यज्ञ-यागों से विरत होने लगा था। इसलिये यद्यपि बुद्ध ने इतर श्रमणों की तरह हिंसात्मक यज्ञ-यागों का निषेध किया, तो भी उस पर अधिक जोर नहीं दिया। भगवान् का सारा जोर जाति भेदमूलक वर्णाश्रम-धर्म के प्रतिषेध पर था।
“न जच्चा बसलो होति, न जच्चा होति ब्राणणो, कम्मुना वसलो होति, कम्मुना होति ब्राह्मणो”
कोई भी मनुष्य, जाति से ही वृषल (चण्डाल) अथवा ब्राह्मण नहीं होता, किन्तु कर्म से वृषल वा ब्राह्मण होता है।
यही बात भगवान् ने अनेक सूत्रों में प्रतिपादित की है। और ब्राह्मण लोग उन पर जो अभियोग लगाते थे, वह यह था कि “श्रमण गोतम चारों वर्णों की शुद्धि का प्रतिपादन करते हैं- ‘समणो गोतमो चातुण्णािं सुद्धि पञ्चापेति’ तो भी कोई कोई ब्राह्मण, जातिमूलक वर्णभेद में सन्देह रखते थे। उदाहरण के लिये ‘वासेट्ठ-सुत्त’ में वासेट्ठ ब्राह्मण बोलता है-
“जातिया ब्राह्मणो होति, भारद्वाजो इति भासति; अहं च कम्मुना ब्रमि; एवं जानाहि चक्खुम।”
हे चक्षुष्मन्, बुद्ध भारद्वाज कहता है कि जाति से ब्राह्मण होता है; किन्तु मैं कहता हूँ कि कर्म से होता है।
स्यात् श्रमणों में जातिभेद का जो अत्यन्त अभाव था, उसका प्रभाव कुछ वासिष्ठ ऐसे विवेकशील ब्राह्मणों पर भी पड़ा था। यद्यपि वे बहुत थोड़े थे, तथापि बुद्ध भगवान् के गुण-कर्मानुसार वर्णाश्रम धर्म-प्रचार में उनका बहुत साहाय्य हुआ। यदि सभी ब्राह्मण और क्षत्रिय, जाति से ही वर्णाश्रम मानने का आग्रह धरते, तो भगवान् बुद्ध, गुण-कर्म से वर्णाश्रम-धर्म की व्यवस्था का प्रचार करने में समर्थ नहीं होते।
कुछ भी हो; हमारे पास जैन और बौद्ध वांग्मय, प्राचीन शिला-लेख, आदि जो इतिहास के साधन उपलब्ध हैं, इनसे विदित होता है कि भारतवर्ष में, भगवान् बुद्ध से लेकर गुप्तराजों तक गुण-कर्म से वर्णाश्रम धर्म मानने वाले वरिष्ठ जाति के लोग बहुत थे। अधिकतर ब्राह्मण, उसका विरोध करते ही थे; लेकिन आम जनता पर- विशेषतः राजाओं पर- उसका असर नहीं पड़ा।
‘दिव्यावदान’ में अशोक के ‘यश’ नामक अमात्य की जो कथा आई है, उसे यहाँ सारतः उद्धृत करना अप्रस्तुत न होगा।
अशोक ने अभी बौद्ध धर्म ग्रहण किया था, और वह सब भिक्षु का वन्दन करता था। यह कृत्य ‘यश’ अमात्य को अच्छा नहीं लगा। वह बोला- ‘महाराज, इन शाक्य श्रमणों में सब जाति के लोग हैं; इनके सामने आपका अभिषिक्त शिर नवाना उचित नहीं है।
इसका उत्तर, अशोक ने नहीं दिया, और कुछ समय के बाद बकरे, भेड़ आदि मेध्य प्राणियों के शिर मंगाकर बेचने को लाया गया। ‘यश’ अमात्य को मृत मनुष्य का शिर देकर उसे बेचने के लिये भेजा। बकरे आदि प्राणियों के शिर की कुछ कीमत मिली; लेकिन मनुष्य का शिर किसी ने नहीं खरीदा। तब अशोक ने उसे किसी को मुफ्त दे देने की आज्ञा दी। किन्तु उसे मुफ्त लेने वाला भी कोई नहीं मिला; प्रत्युत सर्वत्र घृणा होने लगी। जब ‘यश’ अमात्य ने अशोक से यह बात निवेदित की, तब उन्होंने पूछा- ‘इसे लोग मुफ्त भी क्यों नहीं लेते हैं?
यश- क्योंकि इस शिर से लोग घृणा करते हैं।
अशोक- इसी शिर से लोग घृणा करते हैं; अथवा सब मनुष्यों के शिर से ये घृणा करेंगे?
यश- महाराज, किसी आदमी का शिर काट कर लोगों के पास लाया जाय, तब ये इसी प्रकार घृणा करेंगे।
अशोक- क्या मेरे शिर का भी ऐसा ही हाल होगा?
इस प्रश्न का उत्तर देने का साहस ‘यश’ को नहीं हुआ। लेकिन अशोक के अभय-वचन देने पर वह बोला- महाराज, आपके शिर से भी लोग ऐसी ही घृणा करेंगे।
अशोक- यदि ऐसा मेरा शिर, भिक्षुओं के सामने झुका तो आपको बुरा क्यों लगा?
इस कथा से विदित होता है कि, अशोक, बौद्ध संघ में जातिवाद को पसन्द नहीं करता था। यश के साथ हुए अशोक के संवाद की कथा के अन्त में, ‘दिव्यावदान’ में जो श्लोक आते हैं, उनमें से एक यह है-
“आवाहकालेऽथ विवाहकाले जातेः परीक्षा; नतु धर्मकाले। धर्मक्रियायां हि गुणा निमित्ता, गुणाश्च जातिं न विचारयन्ति।”
अर्थ- लड़की को लेने और देने में चाहे जाति का विचार करना; किन्तु धार्मिक विधि में जाति विचार करना नहीं चाहिये। क्योंकि धर्म-कर्म में गुण ही कारण हैं, और गुण, जाति पर अवलम्बित नहीं होते।
(श्री भवानी लाल माथुर ‘भारतीय’)
पाँच हजार वर्ष पूर्व ठीक आज की तरह ही भारत के क्षितिज पर भादों की अंधेरी अमा अपनी गहन कालिमा के साथ छा गई थी। तब भी भारत में जन था, धन था, शक्ति थी, साहस था, कला और कौशल क्या नहीं था? सब कुछ था, पर एक अकर्मण्यता भी थी, जिससे सभी कुछ अभिभूत और मोहाच्छन्न थे। महापुरुष अनेक हुए हैं पर लोक नीति अध्यात्म को समन्वय के सूत्र में गूँथ कर ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ का पाँचजन्य फूंकने वाले कृष्ण ही थे।
हम भारतवासियों का यह दुर्भाग्य है कि हम कृष्ण भगवान के चरित्र को समझने में असमर्थ रहे। श्रीमद्भागवत् आदि पुराणों, हिन्दी संस्कृत के कवियों ने जिस कृष्ण का चित्रण किया है, वह हमारी श्रद्धा और भक्ति -भावना का पात्र भले ही हो, अनुकरणीय नहीं हो सकता। हिन्दुओं की इस मनोवृत्ति को क्या कहा जाय? उन्होंने कृष्ण जैसे आदर्श व्यक्ति को परमात्मा का अवतार बता कर पूजा की वस्तु बना दी ‘गोपाल सहस्र नाम’ के लेखक ने तो उन्हें ‘चोर जोर शिखामणि’ ऐसे उपयुक्त (?) सम्बोधनों से सम्बोधित किया।
हमारी यह आदत है कि वे अपने महापुरुषों को अवतार के पद पर बैठा कर सन्तोष कर लेते हैं,परन्तु उनके गुण ग्रहण करने का उद्योग नहीं करते। राम का मर्यादा पालन, कृष्ण का कर्म योग और बुद्ध की अहिंसा तथा करुणा आदि सभी गुणों का हमारे आगे कोई महत्व नहीं। हमें तो बस अक्षत-चन्दन से उनकी पूजा भर कर लेनी और कर्तव्य पूरा हो चुका। अस्तु।
आर्य जीवन का सर्वांगीण विकास हम श्री कृष्ण में पाते हैं। राजनीति और धर्म, अध्यात्म और समाज-विज्ञान सभी क्षेत्रों में श्री कृष्ण को हम एक विशेषज्ञ रूप में देखते हैं। यदि हम राजनीतिज्ञ कृष्ण का दर्शन करना चाहते हैं तो हमें महाभारत के पन्ने टटोलने होंगे। महाभारत आर्य जाति का पतन युग कहा जाता है। उस समय भारतवर्ष में गाँधार (कन्धार) से लेकर प्राग् ज्योतिष (आसाम) तक और काश्मीर से लेकर सह्यादि पर्वत माला तक क्षत्रिय राजाओं के छोटे बड़े स्वतन्त्र राज्य थे। इन छोटे छोटे राज्यों का एक संगठन नहीं था। एक चक्रवर्ती सम्राट् के न होने से कई राजा अत्याचारी और उच्छृंखल हो गये थे। मगध का जरासंध, चेदी देश का शिशुपाल, मथुरा का कंस और हस्तिनापुर के कौरव सभी दुष्ट, विलासी और दुराचारी थे। श्री कृष्ण ने अपने अद्भुत राजनैतिक चातुर्य के द्वारा इन सभी राजाओं का मूलोच्छेद कराया और युधिष्ठिर का एक छत्र साम्राज्य स्थापित किया। यदि कृष्ण स्वयं चाहते तो इतने बड़े राज्य के शासक बन कर संसार सुख उपभोग कर सकते थे, परन्तु उनका यह लक्ष्य नहीं था। समस्त राष्ट्र का कल्याण सोचने वाले कृष्ण ने युधिष्ठिर को चक्रवर्ती सम्राट् के आसन पर अभिषिक्त किया और अपने उद्देश्य को पूरा किया। उनकी इसी उदार भावना के कारण जब राजसूय यज्ञ में अग्र पूजा के लिए किस व्यक्ति को चुना जाय- यह प्रश्न आया तब पितामह ने भगवान का नाम प्रस्तुत किया और सर्वानुमति से उनकी अग्रपूजा की गई। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में कृष्णजी ने अपने लिए सब आगत व्यक्तियों के पाद प्रक्षालन का काम ही चुना था। यह नम्रता की पराकाष्ठा थी।
मानव जाति ने श्री कृष्ण के समान राजनीति निपुण व्यक्ति थोड़े ही पैदा किए हैं। महाभारत के बाद चन्द्रगुप्त मौर्य के पथ प्रदर्शक विष्णुगुप्त चाणक्य में भी हम इसी विलक्षण प्रतिभा का दर्शन करते है।’सूच्यग्रं नैव दास्यामि बिना युद्धेन केशव’ की गर्वोक्ति करने वाले दुर्योधन का नाश करवाना कृष्ण जैसे विचक्षण पुरुष का ही काम था। यदि कृष्ण पाण्डव पक्ष में न होते तो उनकी विजय में संदेह ही किया जा सकता है।
कृष्ण ने न केवल भारत राष्ट्र की अखण्डता की ही रक्षा की, अपितु उन्होंने गिरे हुए भारतीय समाज को भी उद्बोधन दिया उस समय स्त्रियों और शूद्रों की अत्यधिक अवनति हो गई थी। स्त्रियों और शूद्रों का मोक्ष में अधिकार नहीं माना जाता था। वर्ण-व्यवस्था गुण-कर्म की अपेक्षा जन्म से मानी जाने लगी थी। और इसी कारण सूत पुत्र कर्ण को पांडवों के द्वारा अपमानित होना पड़ा था। ब्राह्मणों ने अपनी वृत्ति छोड़ दी थी। द्रोणाचार्य सरीखे विद्वान् भी शस्त्र विद्या सिखा कर जीवन निर्वाह करते थे। लोगों का अत्यधिक नैतिक पतन हो गया था। भीष्म जैसे धर्मात्मा पुरुष भी अपने को दुर्योधन अन्न से पालित समझ कर अन्याय का पक्ष ग्रहण कर लेते थे। उस समय उनकी विद्या, बुद्धि और धर्म भीरुता सब ताक पर धरी रह जाती थी।
जिस समय समाज का इस प्रकार अत्यधिक पतन हो गया था, तब श्रीकृष्ण ने एक नूतन संदेश दिया। गीता द्वारा उन्होंने चारों वर्णों को गुण कर्मानुसार घोषित किया और यह स्पष्ट कर दिया कि इस व्यवस्था की नींव गुण कर्म और स्वभाव पर है- जन्म से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। ‘चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः’ इसी स्पष्टोक्ति की घोषणा है। गीता में ही श्री कृष्ण ने स्त्रियों और शूद्रों को मोक्षाधिकार का विधान किया-
मां हि पार्थ व्यप श्रित्य ये ऽपि स्युः पापयोनयः। स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्ते पियान्ति परां गतिम्।। 9।32
हे पार्थ! अत्यन्त नीच वंश में उत्पन्न मनुष्य हो, स्त्री हो, वैश्य हो और शूद्र हो- जो मेरा आश्रय ग्रहण करते हैं,उनको उत्तम गति मिलती है। उच्च कुल में जन्म लेकर गोप बालों के साथ प्रेम दिखाना और उनके साथ मैत्री भाव रखना कृष्ण की उदारता और सदाशयता का ही सूचक है।
श्री कृष्ण केवल राजनीतिज्ञ और समाज-सुधारक ही नहीं थे एक उच्च कोटि के अध्यात्मवादी योगी भी थे जहाँ उन्होंने धर्म के एक अंग अभ्युदय का सम्पादन किया था, वहाँ उन्होंने निःश्रेयस मार्ग को भी उतना ही महत्व दिया था। आर्य धर्म की सदा से ही यह विशेषता रही है कि इसके अनुयायी इस लोक की सिद्धि के साथ साथ पारलौकिक सुधार की ओर अत्यन्त ध्यान देते हैं। यदि आर्य संस्कृति से अनजान व्यक्ति इसे पलायन मनोवृत्ति कहें तो यह उसकी अनभिज्ञता का ही सूचक है। आर्य जीवन का लक्ष्य सांसारिक उन्नति के साथ साथ निःश्रेयस अथवा मोक्ष प्राप्ति भी माना जाता है। श्रीकृष्ण ने आर्य जीवन का लक्ष्य साँसारिक उन्नति के साथ साथ निःश्रेयस अथवा मोक्ष प्राप्ति भी माना जाता है। श्रीकृष्ण ने आर्य जीवन के इस पहलू पर भी अधिक जोर दिया है। परन्तु जैन या बौद्ध विचारकों की तरह उन्होंने मनुष्य जीवन को दुःख का पर्याय नहीं मान लिया था, इसके विपरीत उन्होंने संसार को सच्ची कर्म भूमि बतलाया है। फल की आशा छोड़ कर निष्काम कर्म करना ही सच्चा योग है। आर्य धर्म का यही निचोड़ है। गीता की यही मुख्य शिक्षा है।
श्री कृष्ण की आध्यात्मिक शिक्षाओं का परिचय हमें गीता द्वारा मिलता है। आत्मा की अमरता और पुनर्जन्म, ज्ञान और कर्म का समन्वय, स्थित प्रज्ञ मनुष्यों के लक्षण, वर्ण व्यवस्था आदि-आदि विषयों पर सांगोपांग विचार यदि हम देखना चाहें तो हमें गीता का अध्ययन करना चाहिये। गीता को यदि भारतीय आर्य धर्म का विश्वकोष कहें, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। गीता में ही श्री कृष्ण का वास्तविक चरित्र प्रस्फुटित हुआ है। गीता के कृष्ण हमारे सामने जगद्गुरु के रूप में आते हैं। ‘नैनं छिन्दान्त शस्त्राणि’ के द्वारा आत्मा की अमरता को बताते हुए कृष्ण हमें कर्म करने को प्रेरित करते हैं।
यदृच्छया चोपपन्नं र्स्वगद्वारमपावृतम्। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ।।2।।
इस श्लोक द्वारा श्रीकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिया है कि क्षत्रिय के लिए धर्म युद्ध ही स्वर्ग प्राप्ति का एक मात्र उपाय है और आततायियों के नाश के लिये शस्त्र उठाना पाप नहीं है। गीता के द्वारा सच्चे कर्मयोग का उपदेश देकर अपने को अमर बना गये।
आवश्यकता है कि कृष्ण चरित्र का आज के युग में अधिक से अधिक पठन और मनन किया जाय। न केवल मनन ही, परन्तु उनकी शिक्षा के अनुसार चलने का भी प्रयत्न करें। कृष्ण की शिक्षा में ही देश का कल्याण निहित है। आज अब आर्य जाति पर चतुर्मुखी आक्रमण हो रहे हैं, श्रीकृष्ण की शिक्षा की अत्यन्त आवश्यकता है। गीता के अन्त में कही गई संजय की निम्न उक्ति में हमें अद्भुत सत्य के दर्शन होते है:–
यत्र योगेश्वरः कृष्णे यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्घ्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।
वलीपलितदेहो वा यौवनेनान्वितोऽपि वा ज्ञात्वा मृत्युमनिस्तीर्यें हरिं शरणमाव्रजेत्।। तत्कीर्तने तच्छ्रवणे वन्दने तस्य पूजते। मतिरवे प्रकर्तव्या नान्यत्र वनितादिषु।। सर्व नश्वरमालोक्य क्षणस्थायि स्रुदुःखदम्।। जन्ममृत्युजातीतं भक्तिवल्लभमच्यृतम्। स हरिर्ज्ञायते साधुलंगमात् पापवर्जितात्। येषां कृपातः पुरुषा भवन्त्यसुखवर्जिताः।। ते आधवः शान्तरागाः कामलोभविवर्जिताः। ब्रुवन्ति यन्महाराज तत् संसारनिवर्तकम्।। तीर्थेषु लभ्यते साधू रामचन्द्रपरायणः। यद्दर्शनं नृणां पापराशिदाहाशुशुक्षणिः।। तस्मात् तीर्थेषु गन्तव्यं नरैः संसारभीरुभिः। पुण्योदकेषु सततं साधुश्रेणिविराजिषु।। (पद्मपुराण, पातालखण्ड 19)
(मनुष्य-जीवन का प्रधान उद्देश्य और एकमात्र परम लाभ है- भगवत्प्राप्ति।) मनुष्य के शरीर में चाहे झुर्रियाँ पड़ गयी हों, सिर के बाल पक गये हों अथवा वह अभी नवयुवक ही हो, आयी हुई मृत्यु को कोई टाल नहीं सकता- यों समझकर (भगवत्प्राप्ति के लिये) भगवान् के शरण जाना चाहिये तथा भगवान् के कीर्तन, श्रवण, वन्दन और पूजन में मन लगाना चाहिये, स्त्रीपुत्रादि अन्य संसारी वस्तुओं में नहीं। यह सारा प्रपञ्च नाशवान्, क्षणभर रहने वाला तथा अत्यन्त दुःख देने वाला है; परन्तु श्रीभगवान् जन्म-मृत्यु और जरासे परे हैं (वे नित्य सत्य हैं) और भक्ति देवी के प्राणवल्लभ तथा अच्युत (सदा अपने सच्चिदानन्द स्वरूप में स्थित) हैं यह विचार-कर भगवान् का भजन करना उचित है।
भगवान का (उनके स्वरूप, तत्त्व, गुण, लीला नाम आदि का) ज्ञान होता है पाप रहित साधु संग से। साधु (वे नहीं है जो केवल नाम धारी हैं और मन से नहीं हैं; साधु वस्तुतः) वे हैं, जिनका लोक-परलोक के विषयों में आसक्ति नहीं रह गयी है, जिनके मन में काम संकल्प नहीं है तथा जो लोभ से रहित हैं अर्थात् जो अनासक्त तथा धन और स्त्री से किसी प्रकार मानसिक संपर्क भी नहीं रखते। ऐसे साधु जो उपदेश देते हैं, उससे संसार का बन्धन छूट जाता है (भगवत्प्राप्ति हो जाती है)। ऐसे भगवान् श्रीराम चन्द्र जी के भजन में लगे हुए साधु मिलते- तीर्थों में। इनका दर्शन मनुष्यों के पाप के ढेर को जला डालने के लिए अग्नि का काम करता है। इसलिये जो लोग संसार से डरे हुये अर्थात् संसार बन्धन से छूटना चाहते हैं, उनको पवित्र जल वाले तीर्थों में, जो सदा साधु-महात्माओं के सहवास से सुशोभित रहते हैं, अवश्य जाना चाहिये।
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चैव सुसंयतम्। विद्या तपश्च कीर्तिश्च स तीर्थफलमश्नुते।।
जिसके हाथ, पैर और मन भली भाँति संयमित हैं अर्थात् जिसके हाथ सेवा में लगे हैं, पैर तीर्थादि भगवत्- स्थानों में जाते हैं और मन भगवान् के चिन्तन में संलग्न है, जिसको अध्यात्मविद्या प्राप्त है, जो धर्म पालन के लिये कष्ट सहता है, जिसकी भगवान् के कृपा पात्र के रूप में कीर्ति है, वह तीर्थ के फल को प्राप्त होता है।
प्रतिग्रहादुपावृत्तः सुतष्टो येन केनचित्। अहंकारविमुक्तश्च स तीर्थफलमश्नुते।।
जो प्रतिग्रह नहीं लेता, जो अनुकूल या प्रतिकूल जो कुछ भी मिल जाये उसी में सन्तुष्ट रहता है तथा जिसमें अहंकार का सर्वथा अभाव है, वह तीर्थ के फल को प्राप्त होता है।
अदम्भको निरारम्भो लघ्वाहारो जिलेन्द्रियः। अमुक्तः सर्वसंगैर्यः स तीर्थफलमश्नुते।।
जो पाखण्ड नहीं करता, नये-नये कामों को आरम्भ नहीं करता, थोड़ा आहार करता है, इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुका है, सब प्रकार की आसक्तियों से छूटा हुआ है, वह तीर्थ के फल को प्राप्त होता है।
अकोपनोऽमलमतिः सत्यवादी दृढव्रतः। आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते।।
जिसमें क्रोध नहीं है, जिसकी बुद्धि निर्मल है, जो सत्य बोलता है, व्रत-पालन में दृढ़ है और सब प्राणियों में अपने आत्मा के समान अनुभव करता है, वह तीर्थ के फल को प्राप्त होता है।
तीर्थन्यनुसरन् धीरः श्रद्दघानः समाहितः। कृतपापो विशुद्धयेत किं पुनः शुद्धकर्मकृत।।
जो तीर्थों का सेवन करने वाला धैर्यवान्, श्रद्धायुक्त और एकाग्रचित्त है, वह पहले का पापाचारी भी हो तो भी शुद्ध हो जाता है, फिर जो शुद्ध कर्म वाला है, उसकी तो बात ही क्या है।
अश्रद्दघानःपापात्मा नास्तिकोऽच्छिन्नसंशयः। हेतुनिष्ठश्च पञ्चैते न तींर्थफलभागिनः।।
(स्कन्दपुराण)
जो अश्रद्धालु पापात्मा ( पाप का पुतला पाप में गौरव बुद्धि रखने वाला ) नास्तिक, संशयात्मा और केवल तर्क में ही डूबा रहता है- ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थ के फल को प्राप्त नहीं करते।
नृणां पापकृतां तीर्थे पापस्य शमनं भवेत्। यथोक्तफलदं तीर्थे भवेच्छुद्धात्मनां णाम्।।
पापी मनुष्यों के तीर्थ में जाने से उनके पाप की शान्ति होती है। जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्यों के लिये तीर्थ यथोक्त फल देने वाला है।
काम क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थमाविशेत्। न तेन किंचिदप्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत्।।
जो काम, क्रोध और लोभ को जीत कर तीर्थ में प्रवेश करता है, उसे तीर्थ यात्रा से कोई वस्तु अलभ्य नहीं रहती।
तीर्थानि च यथोक्ते विधिना संचरन्ति ये। सर्वद्वन्द्वसहा धीरास्ते नराः र्स्वगगामिनः।।
जो यथोक्त विधि से तीर्थ यात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वों को सहन करने वाले वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं।
गंगादितीर्थेषु वसन्ति मत्स्या देवालये पक्षिगणाश्च सन्ति। भावोज्झितास्ते न फलं लभन्ते तीर्थाश्च देवायतनाच्च मुख्यात्।। भावं ततो हृत्कमले निधाय तीर्थानि सेवेत् समाहितात्मा।
(नारदपुराण)
गंगा आदि तीर्थों में मछलियाँ निवास करती हैं, देव मन्दिरों में पक्षीगण रहते हैं किन्तु उनके चित्त भक्ति-भाव से रहित होने के कारण उन्हें तीर्थ सेवन और देव मन्दिर में निवास करने से कोई फल नहीं मिलता। अतः हृदय कमल में भाव का संग्रह करके एकाग्रचित्त होकर तीर्थ सेवन करना चाहिये।
सत्यं तीर्थ क्षमा तीर्थ तीर्थमिन्द्रियनियहः। सर्वभूतदया तीर्थ तीर्थमार्जवमेव च।।
सत्य तीर्थ है क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखना भी तीर्थ है, सब प्राणियों पर दया करना तीर्थ है और सरलता भी तीर्थ है।
दानं तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थ मुच्यते। ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं तीर्थं च प्रियवादिता।।
दान तीर्थ है, मनका संयम तीर्थ है, संतोष भी तीर्थ कहा जाता है। ब्रह्मचर्य परम तीर्थ है और प्रिय वचन बोलना भी तीर्थ है।
ज्ञानं तीर्थं घ्टतिस्तीर्थं तपस्तीर्थ मुदाहृतम्। तीर्थानामपि तत्तीर्थं विशुद्धिर्मंनसः परा।।
ज्ञान तीर्थ है, घ्टति तीर्थ है तप भी तीर्थ कहा गया है। तीर्थों में भी सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है अन्तःकरण की आत्यन्तिक विशुद्धि।
न जलाप्लुतदेहस्त स्नानमित्यभिधीयते। प स्नातो यो दमस्नातः शुचिः शुद्धमनोमलः।।
जल में शरीर को डुबो लेना ही स्नान नहीं कहलाता। जिसने दम तीर्थ स्नान किया है- मन-इन्द्रियों को वश में कर रक्खा है, उसी ने वास्तव में स्नान किया है। जिसने मन का मल धो डाला है, वही शुद्ध है।
यो लुब्धः पिशुनः क्रूरो दाम्भिको विषयात्मकः। सर्वतीर्थेष्वपि स्नातः पापो मलिन एव सः।।
जो लोभी है, चुगलखोर है,निर्दय है, दंभी है और विषयासक्त है, वह सब तीर्थों में स्नान करके भी पापी और मलिन ही रह जाता है।
न शरीरमलत्यागान्नरो भवति निर्मलः। मानसे तु मले त्यक्ते भवत्यन्तः सुनिर्मलः।।
केवल शरीर के मैल को उतार देने से ही मनुष्य निर्मल नहीं हो जाता। मानसिक मल का परित्याग करने पर ही वह भीतर से अत्यन्त निर्मल होता है।
जायन्ते च म्रियन्ते च जलेष्वेव जलौकसः। न च गच्छन्ति ते र्स्वगभविशुद्धमनोमलाः।।
जल में निवास करने वाले जीव जल में ही जन्मते और मरते हैं, पर उनका मानसिक मल नहीं धुलता, इससे वे स्वर्ग को नहीं जाते।
विषयेष्वतिसंरागो मानसो मल उच्यते। तेष्वेव हि विरागोऽस्य नैर्मल्यं समुदाहृतम्।।
विषयों के प्रति अत्यन्त आसक्ति को ही मानसिक मल कहा जाता है और उन विषयों में वैराग्य होना ही निर्मलता कहलाती है।
चित्तमन्तर्गतं दुष्टं तीर्थस्नानान्न शुद्धयति। शतशोऽपि जलैर्धौतं सुराभाण्डमिवाशुचिः।।
चित्त के भीतर यदि दोष भरा है तो वह तीर्थ स्नान से शुद्ध नहीं होता। जैसे मदिरा से भरे हुए घड़े को ऊपर से जल द्वारा सैकड़ों बार धोया जाय तो भी वह पवित्र नहीं होता। उसी प्रकार दूषित अन्तःकरण वाला मनुष्य भी तीर्थ स्नान से शुद्ध नहीं होता।
दानमिज्या तपः शौचं तीर्थसेवा श्रुतं तथा। सर्वाण्येतान्यतीर्थानि यदि भावो न निर्मलः।।
भीतर का भाव शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच, तीर्थसेवन, शास्त्रश्रवण और स्वाध्याय- ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।
निगृहीतेन्द्रियग्रामो यत्रैव च वसेन्नरः।
तत्र तस्य कुरुक्षेत्रं नैमिषं पुष्कराणि च।।
जिसने इन्द्रिय समूह को वश में कर लिया है, वह मनुष्य जहाँ भी निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ हैं।
ध्यानपूते ज्ञानजले रागद्वेषमलापहे। यः स्नाति मानसे तीर्थे स याति परमां गतिम्।।
ध्यान के द्वारा पवित्र तथा ज्ञानरूपी जल से भरे हुए,राग-द्वेष रूप मल को, दूर करने वाले मानस-तीर्थ में जो पुरुष स्नान करता है, वह परम गति- मोक्ष को प्राप्त होता है।
(1) भक्त-तीर्थ
भवद्विधा भागवतास्तीर्थभूताः स्वयं विभो। तीर्थो कुवन्ति तीर्थानि स्वान्तःस्थेल गदाभृता।।
(श्रीमद्भागवत 1। 13। 10)
युधिष्ठिर जी भक्त श्रेष्ठ विदुर जी से बोल कि ‘आप-जैसे भक्त भगवान् के प्रिय भक्त स्वयं ही तीर्थ-रूप होते हैं। आप लोग अपने हृदय में विराजित भगवान् के द्वारा तीर्थों को भी महा तीर्थ बनाते हुए विचरण करते हैं।’
(2) गुरु तीर्थ
दिवा प्रकाशकः सूर्यः शशी रात्रौ प्रकाशकी। गृहप्रकाश को दीपस्तमोनाशकरः सदा।। रात्रौ दिवा गृहस्यान्ते गुरुः शिष्यं सदैव हि। अज्ञानाख्यं तमस्तस्य गुरुः सर्व प्रणाशयेत्।। तस्माद् गुरुः परं तीर्थ शिष्याणामवनीपते।
(पद्मपुराण,भूमिखण्ड 85। 12-14)
सूर्य दिन में प्रकाश करते हैं, चन्द्रमा रात्रि में प्रकाशित होते हैं और दीपक घर में उजाला करता है तथा सदा घर के अँधेरे का नाश करता है; परन्तु गुरु अपने शिष्य के हृदय में रात-दिन सदा ही प्रकाश फैलाते रहते हैं। वे शिष्य के सम्पूर्ण अज्ञानमय अन्धकार का नाश कर देते हैं। अतएव राजन्! शिष्यों के लिये गुरु ही परम तीर्थ हैं।
(3) माता तीर्थ (4) पिता तीर्थ
नास्ति मातृसमं तीर्थ पुत्राणां च पितृः समम्। तारणाय हितायैव इहैव च परत्र च।। वेदै रपि च किं विप्र पिता येन च पूजितः। माता न पूजिता येन तस्य वेदा निरर्थकाः।। एष पुत्रस्य वै धर्मस्तथा तीर्थं नरेष्विह। एष पुत्रस्य वै मोक्षस्तथा जन्म फलं शुभम्।।
पद्मपुराण, भूमिखण्ड 63। 14,19,21)
पुत्रों के इस लोक और परलोक के कल्याण के लिये माता-पिता के समान कोई तीर्थ नहीं है। माता-पिता का जिसने पूजन नहीं किया, उसे वेदों से क्या प्रयोजन है? (उसका वेदाध्ययन व्यर्थ है।) पुत्र के लिये माता-पिता का पूजन ही धर्म है, वही तीर्थ है, वही मोक्ष है और वही जन्म-का शुभ फल है।
(5) पति-तीर्थ
सव्यं पादं स्वभर्तुश्च प्रयागं विद्धि सत्तभ। वामं च पुष्करं तस्य या नारी परिकल्पयेत्।। तस्य पादोदकस्नानात् तत्पुण्यं परिजायते। प्रयागपुष्करसमं स्नानं स्त्रीणां न संशयः।। सर्वतीथमयो भर्ता सर्वपुण्यः पतिः।
(पद्मपुराण 41।12- 4)
जो स्त्री अपने पति के दाहिने चरण को प्रयाग और बांये चरण को पुष्कर समझ कर पति के चरणोदक से स्नान करती है, उसे उन तीर्थों के स्नान का पुण्य होता है। ऐसा स्नान प्रयाग तथा पुष्कर स्नान के सदृश है, इसमें कोई संदेह नहीं है। पति सर्वतीर्थ मय और सर्वपुण्य मय है।
(6) पत्नी-तीर्थ
सदाचारपरा भव्या धर्मासाधनतत्परा। पतिव्रतरता नित्यं सर्वदा ज्ञानवत्सला।। एवंगुणा भवेद् भार्या यस्य पुण्या महासती। तस्य गेहे सदा देवास्तिष्टन्ति च महौजसः।। पितरो गेहमध्यस्थाः श्रेयो वञ्छन्ति तस्य च। गंगाद्याः सरितः पुण्याः सागरास्तत्र नान्यथा।। पुण्या सती यस्य गेहे वर्तते सत्यतत्परा। तत्र यज्ञाश्च गावश्चऋषयस्तत्र नान्यथा।। तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यानि विविधानि च। नास्ति भार्यासमं तीर्थ नास्ति भार्यासमं सुखम्। नास्ति भार्यासमं पुण्यं ताराणाय हिताय च।
(पद्मपुराण, भूमिखण्ड 59। 11-15, 24)
जो सब प्रकार से सदाचार का पालन करने वाली, प्रशंसा योग्य आचरण वाली, धर्म-साधन में लगी हई, सदा पातिव्रत्य का पालन करने वाली तथा ज्ञान की नित्य अनुरागिणी है, ऐसी गुणवती पुण्यमयी महासती जिसके घर में पत्नी हो, उसके घर में सदा देवता निवास करते हैं, पितर भी उसके घर में रहकर सदा उसके कल्याण की कामना करते हैं। जिसके घर में ऐसी सत्य परायणा पवित्रहृदया सती रहती है, उस घर में गंगा आदि पवित्र नदियाँ, समुद्र, यज्ञ, गौएँ, ऋषिगण तथा सम्पूर्ण विविध पवित्र तीर्थ रहते हैं। कल्याण तथा उद्धार के लिये भार्या के समान कोई तीर्थ नहीं है, भार्या के समान सुख नहीं है और भार्या के समान पुण्य नहीं है।
श्रृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः 4.35.6
देव मुझ श्रद्धालु की प्रार्थना पूर्ण करें।
ये ऽश्रद्धा धनकाम्या क्रव्यादा समासते 12.2.51
जो श्रद्धा-पूजा को छोड़ कर केवल धन के पीछे पड़े हैं वे मानो चिन्ताग्नि का स्वागत कर रहे हैं।
एवं लोक श्रद्दघानाः सचन्ते 12.3.7
श्रद्धालु जन ही स्वर्ग प्राप्त करते हैं।
स में श्रद्धां च मेघां च जातवेदः प्रच्छतु 19-64-1
प्रभु मुझे श्रद्धा और बुद्धि प्रशान करे।
(डाक्टर के. प्रसाद )
आयु वर्षों पर नहीं, शारीरिक योग्यता पर निर्भर है। बहुधा देखा जाता है कि एक मनुष्य युवावस्था में ही प्रौढ़ मालूम पड़ने लगता है और दूसरी तरफ ऐसे दीर्घायु वाले भी दृष्टिगोचर होते हैं जो बड़ी उम्र के होकर भी युवा से दिखाई पड़ते हैं।
वे सभी साधन जिनसे जीवनी शक्ति बढ़ती है युवावस्था को कायम रखने वाले होते हैं, और जो जीवन-शक्ति का ह्रास करते हैं वे जल्दी ही वृद्धावस्था लाने वाले होते हैं। दिन कार्य करने के लिये होता है और रात्रि सोने के लिए। यदि परिश्रम और विश्राम अनुपात से बराबर साथ-साथ चलते रहें तो आयु की हानि नहीं होती। कारण यह है कि जागृत अवस्था में हम जिस जीवन-शक्ति का व्यय करते हैं उसे निद्रावस्था में पुनः अर्जित करते हैं। इसलिए निद्रा (विश्राम) की हमें निताँत आवश्यकता है। परन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि जितना अधिक हम सोयेंगे उतनी ही हमारी जीवन-शक्ति बढ़ेगी। दिन भर काम करते-करते हमारा शरीर थककर जितनी शक्ति व्यय करता है उतनी शक्ति उसे पूरा आराम करके प्राप्त करनी चाहिये। साधारणतया नौजवान आदमी को आठ घण्टे सोना काफी है लेकिन जो अधिक परिश्रम करते हों उन्हें 8-9 घण्टे विश्राम लेना चाहिये। बच्चों का सोने का समय प्रायः 10 घण्टे होना चाहिये। उपवास करने वाले एवं फलाहारी व्यक्तियों के लिए केवल 6 घण्टे का विश्राम ही काफी है। निद्रा के इस नियम का अवश्य पालन करना चाहिये और जब भी नींद आ रही हो सो जाना चाहिये, चाहे दिन हो या रात और यदि नींद न आती हो तो निद्रा लाने वाली औषधियों का प्रयोग नहीं करना चाहिये। नींद को किसी उपाय द्वारा रोकना बड़ा हानिकारक है। यदि अनिवार्य आवश्यकता वश जागना ही पड़े तो हलका फल, दूध आहार करना चाहिये। ऐसा करने से निद्रा का दबाव अधिक न पड़ेगा। चाय,काफी आदि टानिक पीकर निद्रा का विरोध करना मूर्खता है। जब दिन में कभी थकान, आलस्य या निद्रा का झोंका मालूम पड़े और कार्यवश विश्राम के लिए अवकाश न मिले, ऐसे समय पर एक प्रकार की यौगिक क्रिया [जिसे शव आसन कहते हैं] द्वारा शरीर को पुनः सशक्त किया जा सकता है।
साहस, उत्साह, फुरती, शक्ति और काम शक्ति आदि जवानी के चिन्ह हैं और यदि हम में ये चिन्ह नहीं तो हम जवान होते हुए भी बूढ़े हैं। शरीर में सदा पुराने परमाणु नष्ट होते रहते हैं और उनके स्थान पर नये परमाणु बनते रहते हैं। अगर हम इन नये बनने वाले परमाणुओं को नष्ट होने से बचा सकें और उन्हें स्वस्थ रख सकें तो हम बुढ़ापा दूर रख सकते हैं। योग साधन के अंगों में बार बार उपवास और फलाहार की महिमा गायी है और इसी उपवास फलाहार, प्राणायाम द्वारा योगी हजारों वर्ष जीते थे।
बुढ़ापा क्या है? जिस हालत में शरीर अपने अन्दर इकट्ठे विजातीय द्रव्य को निकालने में असमर्थ हो जाता है उसी हालत को बुढ़ापा दीर्घ रोग कहते हैं और इसी सिद्धाँत के अनुसार अन्य रोगों की भाँति बुढ़ापा भी लगातार विधिपूर्वक कुछ मास के स्वाभाविक भोजन फल, शाक, मेवा, दूध, कंद द्वारा दूर किया जा सकता है। हजारों, लाखों ऋषि मुनि, योगी, तपस्वी बहुत बड़ी आयु वाले हो चुके हैं। सैकड़ों और हजारों वर्ष आयु के प्रमाण हमारे इतिहास में मिलते हैं। सौ वर्ष से अधिक आयु वाले व्यक्ति तो अब भी हमारे देश में वर्तमान है। इतनी बड़ी आयु वाले व्यक्तियों का जीवन रहस्य केवल उपवास और स्वाभाविक भोजन ही था। इसके विपरीत शहरों में रहकर नाना प्रकार के पकवान, मिठाइयाँ, नमकीन पदार्थ, रोटी दाल खाने वाले बहुत कम लोग ऐसे देखे गये हैं जिन्होंने दीर्घायु प्राप्त की हो।
श्रद्धा, धैर्य साहस, विवेक और विश्वास से ही इन पर विजय हो सकेगी।
संसार में जिन अनेक प्रकार के दुखों से प्राणी दुख पाते हैं उन सब का मूल कारण कुबुद्धि, दुर्भावना और दुष्कृति है। मनःक्षेत्र में कुविचार और क्रिया क्षेत्र में कुकर्म कराने वाले इस दुखदायी, अधर्म मूलक तत्व को असुरता कहते हैं। सुख-शांतिदायक दैवी तत्व और दुख दारिद्र उत्पादक आसुरी तत्व दोनों ही सृष्टि में अनादि काल से मौजूद हैं। जब दैवी तत्व प्रकृति के अन्तराल में बढ़े हुए होते हैं तब समस्त मनुष्य जाति– सम्पूर्ण सृष्टि सुख-शान्ति उन्नति और आनन्द का आस्वादन करती है और जब असुरता बढ़ जाती है तो आज की भाँति सब कोई दैविक, दैहिक भौतिक त्रासों के कारण भारी परेशानी और पीड़ा-कष्ट भोगते हैं।
असुरता को नष्ट करने वाली दिव्य प्रक्रियाओं का नाम यज्ञ है। यों सभी लोकहित कर, धर्म पूर्ण कार्य यज्ञ है पर उन सबमें अग्निहोत्र का—हवन का—स्थान सर्वोपरि है। अपना नष्ट होना कोई भी पसन्द नहीं करता, असुरता को भी पसन्द नहीं। वह अपने प्रतिरोधी आयोजनों को असफल बनाने का प्रयत्न करती है। विश्वामित्र ऋषि के यज्ञों को ताड़का, मारीच, सुबाहु आदि असुर ऐसे ही विघ्न उत्पन्न करते थे जिनसे दुखी होकर उन्हें राजा दशरथ के पास उनके पुत्र माँगने जाना पड़ा था।
असुरों का मायावी होना प्रसिद्ध है। माया, छल, प्रपञ्च, चालाकी, कूटनीति, भ्रान्ति षडयंत्र रचना की उनकी नीति प्रमुख है। उसी के आधार पर वे अपने से असंख्य गुने बलवान देवताओं को परास्त कर देते हैं। देवता सीधे, भोले, सरल, सत्यवादी, सौम्य, मर्यादा के अन्दर रहने वाले, अहिंसक और क्षमाशील होते हैं। असुर इन विशेषताओं से अनुचित लाभ उठाकर अपनी रक्षा सहज ही कर लेते हैं और देवताओं के विरुद्ध कोई ऐसा छल, प्रपञ्च, जालसाजी और धूर्तता भरा षड़यन्त्र करते हैं, जिससे बेखबर होने के कारण देवता बेचारे फँस जाते हैं और उनके प्रपंच पाश में बँधकर त्रास सहते हैं। यों अन्त में विजयी सदा देवता ही होते हैं क्योंकि उनका आधार सत्य है। असुर हारते हैं क्योंकि उनकी शक्ति केवल मात्र असत्य, छल, प्रपंच, अनीति और माया पर अवलंबित है। पर पहली बाजी में तत्काल लाभ असुरों को ही मिलता है। माया भरे प्रपञ्च पहली बाजी में बहुधा जीतते हैं। यही कठिनाई ऋषियों और देवताओं की पराजय का कारण बनती है। इन परिस्थितियों से पार पाने में जब सौम्यता असफल रही है तब बहुधा अवतारों के रूप में कोई योद्धा अवतारित होकर काँटे से काँटा निकालने की नीति लेकर असुरता पर विजय प्राप्त करने आगे आया है। राम, कृष्ण, दुर्गा, परशुराम, नृसिंह, कच्छ, मच्छ, वाराह आदि के अवतार इन्हीं प्रयोजनों के लिए हुए हैं।
ताण्डव ब्राह्मण की कथा है कि एक बार असुर चुपचाप अन्न में घुस गये ताकि उन्हें देवता खालें और वे उनके शरीर और मन में प्रवेश करके अपना आधिपत्य जमा लें। इन्द्र ने इस चाल को पकड़ा और असुरों को अन्त में मार भगाया। राजा परीक्षित के मुकुट में चढ़कर उससे लोमश ऋषि के गले में साँप डलवाना, कैकई और मन्थरा की जिह्वा पर बैठ कर उससे कुछ का कुछ कहलवाना, इन्हीं अदृश्य शक्तियों का कार्य था।
गायत्री परिवार का यज्ञ आन्दोलन परम पवित्र सतोगुणी, विश्व कल्याण कारिणी, शास्त्रोक्त एवं इस युग की अत्यन्त उच्च कोटि की आध्यात्मिक शक्तियों की प्रेरणा द्वारा संचालित होने तथा व्यवहारतः किसी व्यक्ति या वर्ग के लिए किसी प्रकार की स्वार्थपरता की गुंजाइश न रहने के कारण इस स्थिति में है कि उस पर उंगली उठाने का दुस्साहस कर सकता कठिन है। इस महा अभियान का सूत्र संचालन करते हुए ऐसे प्रत्येक पहलू को भली प्रकार शुद्ध रखने का प्रबन्ध कर लिया गया है जिन पर उंगली उठा करती हैं। किसी व्यक्ति का व्यक्तिगत स्वार्थ, आर्थिक गड़बड़ी, शास्त्रीय मर्यादाओं का उल्लंघन, कोई राजनैतिक या दलगत स्वार्थ जैसी सम्भावनाओं से इस कार्यक्रम को कोसों दूर रखा गया है। ताकि इस महान् प्रक्रिया की नींव मजबूत रहे और ठोस आधार पर कुछ गम्भीर कार्य किया जा सके।
फिर भी असुरता से सब द्वार बन्द हो जायं और उसे कोई मार्ग न मिले ऐसी बात नहीं है। यज्ञों द्वारा अपने अस्तित्व को खतरे में देखकर क्रुद्ध असुरता कोई हथियार न उठाये ऐसा नहीं हो सकता। ऐसा कभी हुआ भी नहीं है। अब भी नहीं हो रहा है, आगे भी ऐसा न हुआ न होगा। यज्ञ आन्दोलन की युग परिवर्तन कारी इस महान् योजना को चुपचाप चलने दिया जाय, सफल होने दिया जाय और आसुरी शक्तियाँ उसमें कोई विघ्न, प्रतिरोध अड़चन पैदा न करें यह किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। यदि विघ्न न आवें, प्रतिरोध न हो तो समझना चाहिए कि अपना कार्यक्रम निकम्मा है, उससे कोई ऐसी शक्ति उत्पन्न नहीं हो रही है जिसकी असुरता को चिन्ता हो। प्रतिरोध की उत्कटता अपने कार्य की वास्तविकता की एक जीती जागती कसौटी है।
पिछले दिनों भारतवर्ष में 108 यज्ञों का जो संकल्प पूर्ण हुआ है, उसके जो समाचार यहाँ आये हैं उनमें जनता की धार्मिक गहरी आस्था और धर्मप्रेमी व्यक्तियों के प्रचंड उत्साह का परिचय पाकर किसी भी धर्म प्रेमी का हृदय आनंद से उल्लसित हुए बिना न रहेगा। पर साथ ही विरोध, अड़चन; विघ्न, प्रतिरोध आदि के समाचार भी कम नहीं आये हैं जो बताते है कि असुरता किन किन छद्म वेशों से आक्रमण का मोर्चा बना रही है। जिनके मन में कुछ अनुकूल स्थिति पाई उनके मनों में असुरता ने ईर्ष्या, द्वेष, जलन, अहंकार, स्वार्थपरता जैसी वृत्तियों को उभार कर उन्हें खुला तो नहीं पर अप्रत्यक्ष विरोधी, अड़चन पैदा करना वाला कानाफूसी करने वाला, असहयोगी बना दिया। उनने लोगों के मनों में उत्साह सहयोग उत्पन्न करने के स्थान पर असहयोग, अश्रद्धा, अनुत्साह, विरोध, भय, भ्रान्ति आदि की स्थिति पैदा करने में कोई कसर न छोड़ी। इस कार्य में वे पंडित जिन्हें प्रचुर दक्षिणा में, अपनी प्रभु सत्ता में कोई कमी पड़ती दीखी वे सबसे आगे रहे। ईर्ष्यालु, अहंकारी, विघ्न संतोषी, निन्दक, छिद्रान्वेषी, उन खलों की जिनकी गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण के प्रारंभ में ही भूरि भूरि वन्दना की है कहीं कमी नहीं। अपने मन की दुर्गन्धि को वे किसी पवित्र से पवित्र वस्तु पर भी उड़ेल सकते हैं।
यों अभी कोई महत्वपूर्ण विरोधात्मक घटना नहीं घटी पर उनकी संभावना अवश्य है। जैसे जैसे देवताओं की यज्ञ शक्ति बढ़ेगी वैसे-वैसे असुरता भी सक्रिय होगी। बढ़ती हुई विरोधी भीड़ को जब पुलिस हटाना चाहती है तो पहले अश्रुगैस छोड़कर डराती है, फिर भी स्थिति काबू में न आई तो लाठी चार्ज करके घायल करती है और अन्त में कोई उपाय शेष नहीं रहता तो गोली चलाती है। यज्ञ अभियान के क्रमिक विकास में भी यह स्थिति सामने आनी हैं। प्रारंभिक स्थिति में यज्ञ को खाद्य पदार्थ जलाने की बेवकूफी बताने, आयोजन कर्ताओं का कोई स्वार्थ ढूंढ़ने, उन पर झूठे मनगढ़ंत अभियोग लांछन लगा कर अविश्वास, असन्तोष, अनुत्साह, अश्रद्धा, असहयोग पैदा करने, शास्त्र के अनजानों द्वारा शास्त्रीय विरोध की मीनमेख निकालना जैसी बातें सामने आयेंगी। यह अश्रु गैस का प्रयोग है। आन्दोलन की दूसरी विकसित स्थिति में अनेक सम्प्रदाय हमें अपना प्रभाव क्षीण करने वाला शत्रु मानेंगे, नास्तिक इसे आस्तिकता का पुनः बोलबाला होने का खतरा समझेंगे, समाज द्रोही कुकर्मी लोग अपने विरुद्ध एक भारी संकट अनुभव करेंगे, इस प्रकार चारों और से अधिक कटु-कठोर आदि चोट पहुंचाने वाले आक्रमण संगठित हो सकते हैं। गाली गलौज, हाथापाई, तिरस्कार, नोटिसबाजी, चोरी आगाजनी, मारपीट, बदनामी करने वाले मन गढ़ंत आरोप, आदि अनेक प्रकार के षडयंत्र हो सकते हैं। यह एक प्रकार का लाठीचार्ज है। अन्तिम स्थिति में इस महान अभियान के संयोजकों के सामने वैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है जैसी से डर कर विश्वामित्र भाग खड़े हुए थे और ईसामसीह, सुकरात, दयानंद, हरिश्चंद्र, चैतन्य मीरा, विक्रमादित्य, पाण्डव, हरिश्चन्द्र प्रहलाद आदि को बहुत कुछ सहन करना पड़ा था।
इन प्रतिरोधों की संभावना से क्या हम डर जायं? क्या इस आज की स्थिति में संसार की सुख शांति को बचा सकने वाले एक महान कर्तव्य को छोड़ बैठे? नहीं ऐसा करना तो एक निकृष्ट कोटि की कायरता होगी। जंगल में अकेली घिरी हुई गाय के ऊपर जब भेड़ियों का झुण्ड आक्रमण कर रहा हो वीर पुरुष दया द्रवित होकर अपने शौर्य की जागृति करते हैं और गाय को बचाने में संभावित खतरे का मुकाबला करते हैं। इसी प्रकार की सार्वभौम स्थिति आज है। असुरता ने मानवता को डस लिया है। ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, अनीति, कृतघ्नता, आलस्य, प्रमाद, असत्य, हिंसा मलीनता, अनैतिकता, उच्छृंखलता, नास्तिकता आदि दुवृत्तियों ने मानवता को सब प्रकार पददलित करके मनुष्य जाति को दुख, दारिद्रय केश, चिन्ता, भय, शोक आदि से संत्रस्त कर रखा है। इस स्थिति से उद्धार पाने के लिए जिन शुभ कर्मों का, दिव्य आयोजनों का करना आज आवश्यक है उनमें यज्ञ अभियान की उपयोगिता सर्वोपरि है। केवल इस कारण कि कुछ विरोध, नुकसान, अपमान, लाँछन या आक्रमण सहना पड़ेगा चुप हो बैठना किसी भी प्रकार धर्म प्रिय जागृत आत्माओं के लिए उचित न होगा। हमें किसी भी दबाव से अनुचित को सहन करने के लिए तैयार नहीं होना चाहिए।
आज की प्रचण्ड असुरता का समाधान करने के लिए सद्बुद्धि रूपिणी गायत्री माता और त्याग मय प्रेम के प्रतीक यज्ञ पिता का दसों दशाओं में तुमुल घोष करना आवश्यक, अनिवार्य और अवश्यंभावी है। यह हो रहा है, होने वाला है ओर होगा, गायत्री परिवार के ऊपर यह श्रेय भार अनायास ही अप्रत्याशित रूप से आ पड़ा है। जो प्रभु प्रेरणा दे उसे रोका भी कैसे जाय, रुके भी कैसे? हम लोग यह सब कर रहें हैं। करेंगे, और करना पड़ेगा। जब यह सब होना ही रहा तो इसकी गतिविधि को जन्म ही लेना चाहिये। हमें पूर्ण दृढ़ता और श्रद्धा से आत्म निर्माण, चरित्र गठन नैतिकता, सद्बुद्धि, त्यागमय प्रेम, आस्तिकता- मानवता कर्तव्य पालन, विश्व बन्धुत्व सत्य, न्याय, प्रेम से परिपूर्ण इस महान साँस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्यक्रम को आगे बढ़ना साथ ही किन किन कठिनाइयों और प्रतिरोध पूर्ण परिस्थिओं में होकर गुजरना पड़ेगा यह जान लेना आवश्यक है। इस से डरने और विचलित होने की किसी को भी आवश्यकता नहीं है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के अंतर्गत यज्ञ आयोजनों में अनेक प्रकार के लाँछनों, उपहासों, विरोधों एवं कठिनाइयों के लिए हर कार्यकर्ता को पहले से ही तैयार रहना चाहिए और अवसर आने पर उनका हँसते हुए स्वागत करना चाहिये।
हमारी मंजिल बहुत बड़ी है, रास्ता कठिन है। उत्तरदायित्व महान है। इस बोझ को हम संगठित होकर मानसिक संतुलन कायम रखकर धैर्य, साहस, विवेक को मजबूती से पकड़े रहकर ही पूरा कर सकते हैं। गायत्री परिवार के प्रत्येक सदस्य को इन संभावनाओं को भली प्रकार समझ लेने और पूर्ण आस्था तथा विश्वास के साथ लोक सेवा एवं आत्मकल्याण के इस अलौकिक मार्ग पर अग्रसर होने के लिए सादर आमन्त्रित करते हैं।
(1) मैं सद्बुद्धि की प्रतिनिधि गायत्री और त्यागमय प्रेम के प्रतिनिधि यज्ञ को अपना आध्यात्मिक माता-पिता स्वीकार करता हूँ। इनके प्रति सदा गम्भीर आस्था रखूँगा।
(2) प्रतिदिन कम से कम 108 गायत्री मंत्र अपने और उसके अर्थ का चिन्तन करने का व्रत लेता हूँ। बीच में कमी छूट होगी तो उसकी पूर्ति आगे कर लिया करूंगा। नवरात्रियों में सामूहिक जप तथा हवन का भी प्रयत्न करूंगा।
(3) भारतीय संस्कृति के अनुरूप अपने तथा अपने निकटवर्ती लोगों के जीवनों को ढालने का प्रयत्न करूंगा।
(4) अपने प्रभाव-क्षेत्र में सद्विचारों और सत्कर्मों को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ न कुछ समय अवश्य लगाता रहूँगा।
(5) वर्ष में एक बार--गायत्री जयन्ती (ज्येष्ठ शुल्का 10) अवसर पर अपनी साल भर की साधना का विवरण तथा आत्मिक उन्नति-अवनति का परिचय अपनी मातृ-संस्था गायत्री तपोभूमि, मथुरा के लिए भेजता रहूँगा।
(1) मैं सद्बुद्धि की प्रतिनिधि गायत्री और त्यागमय प्रेम के प्रतिनिधि यज्ञ को अपना आध्यात्मिक माता-पिता स्वीकार करता हूँ। इनके प्रति सदा गम्भीर आस्था रखूँगा।
(2) प्रतिदिन कम से कम 108 गायत्री मंत्र अपने और उसके अर्थ का चिन्तन करने का व्रत लेता हूँ। बीच में कमी छूट होगी तो उसकी पूर्ति आगे कर लिया करूंगा। नवरात्रियों में सामूहिक जप तथा हवन का भी प्रयत्न करूंगा।
(3) भारतीय संस्कृति के अनुरूप अपने तथा अपने निकटवर्ती लोगों के जीवनों को ढालने का प्रयत्न करूंगा।
(4) अपने प्रभाव-क्षेत्र में सद्विचारों और सत्कर्मों को प्रोत्साहित करने के लिए कुछ न कुछ समय अवश्य लगाता रहूँगा।
(5) वर्ष में एक बार--गायत्री जयन्ती (ज्येष्ठ शुल्का 10) अवसर पर अपनी साल भर की साधना का विवरण तथा आत्मिक उन्नति-अवनति का परिचय अपनी मातृ-संस्था गायत्री तपोभूमि, मथुरा के लिए भेजता रहूँगा।
सदस्यता का प्रतिज्ञा-पत्र
शाखा .............................................
मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अ. भा. गायत्री परिवार की सदस्यता को पांचों प्रतिज्ञाओं को पूरी श्रद्धा के साथ पालन करने का शक्ति भर प्रयत्न करता रहूँगा।
पूरा नाम .............................................
पूरा पता ............................................. ......................................................... .........................................................
आयु ............. वर्ण ............. शिक्षा .............
व्यवसाय ............. विशेष परिचय .............
गायत्री तपोभूमि के माध्यम से गत वर्षों में सम्पूर्ण भारत में गायत्री महाशक्ति के लुप्त प्रायः महाविज्ञान का जो प्रसार हुआ है, उसे उत्साहवर्द्धक कहा जा सकता है। इस देश में किसी समय गायत्री रहित व्यक्ति के हाथ का जल ग्रहण करना तक निषिद्ध बताकर प्रत्येक व्यक्ति के लिए इस परम कल्याणकारी उपासना को एक अनिवार्य दैनिक कृत्य नियत किया गया था। किन्तु समय का कुचक्र हमें इस स्थिति तक ले आया कि गायत्री को भूत भगाने का मंत्र या कानोंकान रखने, किसी को न बताने की जादूगरी जैसी चीज माना जाने लगा। भारतीय संस्कृति की अनादि जननी गायत्री में वह शक्ति, प्रेरणा, शिक्षा, स्फूर्ति एवं प्रक्रिया सन्निहित है, जिसके द्वारा प्राचीन काल में हमने उन्नति के उच्चतम सोपान तक पहुँचने में सफलता प्राप्त की थी और अब यदि फिर उस अवलम्बन को ग्रहण करें तो उस प्राचीन काल के महान् गौरव को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। यह दुर्भाग्य की ही बात है कि इस गायत्री रूपी अमूल्य निधि को हम बहुत काल तक भूले रहे। प्रभु की दिव्य प्रेरणा अब उस विस्मरण को हटाकर चेतना का नव-सन्देश प्रदान कर रही है। गायत्री माता की महा महिमा का शंखनाद अब पुनः हो रहा है और भारतीय संस्कृति के भाग्योदय का ब्राह्ममुहूर्त स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है।
प्रभु की प्रेरणा और उसके निर्धारित निमित्त उपकरणों द्वारा गायत्री का ज्ञान अनेक अन्तःकरणों में पुनः आविर्भूत हो रहा है। किसी अज्ञात प्रेरणा से असंख्यों नर-नारी इस अनादि गुरु-मंत्र का आश्रय लेकर आत्म-कल्याण, आत्म-उद्धार, आत्म-निर्माण और आत्म-शान्ति के पथ पर अग्रसर हो रहे हैं। इस प्रकार की सन्मार्ग गामिनी आत्माओं में से अनेकों को मथुरा के केन्द्र से प्रेरणा मिलती रहती है। इस प्रकार वे इस मातृ संस्था में सम्बद्ध होकर एक आत्मीयता भरे आध्यात्मिक परिवार के रूप में विकसित होते चलते हैं, ऐसी आत्माएँ अनायास ही एक पारिवारिक प्रेम-बन्धन में बँधती चली जा रही हैं। यद्यपि इनका कोई नियमित संगठन नहीं हुआ है, फिर भी उन्हें एक महान् परिवार के रूप में देखा जा सकता है। इस धर्म उद्देश्य के पथ पर चलने वाले पथिकों की प्रेम शृंखला को हम गायत्री परिवार कहते हैं। इसके सक्रिय कार्यकर्ताओं को गत विशद् गायत्री महायज्ञ पर ‘साँस्कृतिक सेवा शृंखला’ के कर्मयोगी, व्रतधारी और आत्म-त्यागी की श्रेणियों में संगठित किया गया था। उन्हें कुछ काम भी सौंपे गये थे, प्रसन्नता की बात है कि कर्मठ कार्य-कर्ताओं की वह शक्तिवाहिनी भली प्रकार विकसित हो रही है।
अब ऐसी आवश्यकता अनुभव हुई है कि जहाँ कुछ गायत्री उपासक हैं वहाँ स्थानीय संगठन बना दिये जायं। जिससे वहाँ सामूहिकता की भावना विकसित हो और सामूहिक, स्वाध्याय, सत्संग, यज्ञ, अनुष्ठान, उपासना आदि कार्यों के अतिरिक्त उनमें परस्पर मिलते-जुलते रहने के कारण प्रेम-भाव, संगठन और सहयोग का भी विकास हो, एक दूसरे के अपने अनुभव सुनायें, कठिनाइयों को सुलझाएं और आगे बढ़ने के लिए एक दूसरे से प्रेरणा प्राप्त करें। सुख-दुख के साथी बढ़ावें, जिससे एकाकीपन का भारी, अनिश्चित और चिन्तित जीवन अपेक्षाकृत सरल हो सके। ऐसे संगठन मिलजुल कर अपने निकटवर्ती प्रभाव क्षेत्रों में नये गायत्री उपासक बढ़ाने, गायत्री संगठन बनाने का भी कार्य कर सकते हैं यह सब यदि बिलकुल भी न हो तब भी शुभ उद्देश्य वाले, एक भावना और एक मान्यता के लोगों का परस्पर मिलते-जुलते रहने और प्रेम-सूत्र में सम्बद्ध रहना भी कुछ कम लाभ की बात नहीं है। इन सब बातों पर विचार करते हुए यह निश्चय किया गया है कि जहाँ भी सम्भव हो वहाँ गायत्री प्रेमियों के संगठन स्थापित कर दिये जायं और उनका नाम “गायत्री परिवार” रख दिया जाय। सभा सुसाइटियों के झगड़ालू तरीकों से यह संगठन सर्वथा भिन्न रहे।
कोई विशेष नियमोपनियम इसके नहीं बनाये गये हैं, संगठन की रूपरेखा बहुत मोटी रखी गई है। इन पंक्ति द्वारा प्रत्येक उत्साही गायत्री उपासक को यह कार्य सौंप रहे हैं कि वह अपने यहाँ के सभी उपासकों से पाँच प्रतिज्ञा वाले सदस्यता-पत्र भरवा कर कम से कम 10 सदस्य अपने यहाँ बनावें। उन सदस्यों की सहमति से एक उत्साही व्यक्ति ‘मंत्री’ नियुक्त कर दें जिसके द्वारा मथुरा से पत्र-व्यवहार तथा स्थानीय कार्य-क्रमों का व्यवस्था आयोजन होता रहे। थोड़े सदस्यता-पत्र भेजे जा रहे हैं। कम पड़ें तो मथुरा से और मंगा लेने चाहिए या हाथ से नकल करके वैसे ही और बना लेने चाहिए। यह सदस्यता पत्र भरवा कर मथुरा भेज दिये जायं, इसके बदले में सदस्यों के सदस्यता प्रमाण-पत्र तपोभूमि से भेजे जावेंगे। शाखा स्थापना का प्रमाण-पत्र भी मंत्री के पास भेज दिया जायगा।
एक नगर में एक ही शाखा संगठन स्थापित करना उचित है, पर बड़े नगरों में जहाँ बहुत दूरी का फासला पड़ता हो एक से अधिक संगठन बनाये जा सकते हैं। यह सामूहिक संगठन जिनमें अधिक से अधिक लोग सम्मिलित हों महत्वपूर्ण है परन्तु जहाँ बहुत थोड़े उपासक हैं और जहाँ के उपासकों का स्वभाव दूसरों से मिलने-जुलने का नहीं है वे अपनी प्रकृति के कुटुम्बी, पड़ौसी, मित्र, सहकर्मी लोगों के साथ कम से कम पाँच सदस्य बनाकर व्यक्तिगत शाखा का संगठन भी स्थापित कर सकते हैं। महिलाओं के लिए, अब किसी स्थान में नये पहुँचे हुए, वहाँ के लोगों से अपरिचित, या ऐसी ही किन्हीं अन्य परिस्थितियों वाले सज्जनों के लिए यह व्यक्तिगत शाखा संगठन ठीक रह सकते हैं जिससे वे समय-समय पर उस छोटे दायरे से ही कुछ सामूहिक आयोजन कर सकें। इनके अतिरिक्त स्वतन्त्र सदस्य तो कहीं एक भी हो सकता है। व्यक्तिगत संगठन में कम से कम 5 और सामूहिक संगठन में कम से कम 10 सदस्य आवश्यक हैं। यह संख्या निरन्तर बढ़ती रहे ऐसा प्रयत्न होना चाहिए।
यह संगठन क्या करें? यह सब वहाँ की परिस्थिति पर निर्भर है। अपनी स्थानीय सुविधा और शक्ति के अनुसार कार्य-क्रम बनाकर स्वाध्याय, सत्संग, जप, हवन की आध्यात्मिक तथा देश, धर्म, समाज, संस्कृति, चरित्र, शिक्षा, संगठन आदि परमार्थिक सार्वजनिक लोक सेवा की सद्भावनाओं, सत् प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाना, उनमें समय और सहयोग देना इन संगठनों का कार्य-क्रम होना चाहिए। समय-समय पर इनके सम्बन्ध में विचार विनिमय होता रह सकता है। प्रारम्भ में संगठन आवश्यक है। सो करने में अब हम सबको लग जाना चाहिये।
इस संगठन को सुव्यवस्थित रखने और मार्ग दर्शन करने के लिए अगले मास से “गायत्री परिवार पत्रिका” अलग से निकाली जा रही है। अखण्ड ज्योति विशुद्ध साँस्कृतिक एवं विचार प्रधान पत्रिका रहेगी। अब तक गायत्री परिवार के समाचार अखण्ड ज्योति में ही छपते थे। पर वह लेखों की विचार प्रधान पत्रिका है इसलिए उसमें गायत्री विज्ञान, साधन विधान, अनुभव, पथ-प्रदर्शन, शंका समाधान, गायत्री समाचार परिचय, आदेश आदि के लिए नाम मात्र का स्थान मिल पाता था। गत मास 108 यज्ञ समाचारों में हर यज्ञ के लिए दो-दो चार-चार लाइनें भी नहीं दी सकीं। देर से आए हुए बीसों समाचार छपने से रह गये। फिर भी सात पृष्ठ घिर गये। अब इन सब बातों को विस्तारपूर्वक उपस्थित करने के लिए परिवार पत्रिका स्वतंत्र रूप से निकाली जा रही है, इसका वार्षिक चन्दा 1॥) रहेगा। शाखा संगठनों के लिए, इसे मँगाकर अपने सदस्यों को पढ़वाते रहना आवश्यक कर्तव्य होगा। अन्य उपासक भी उसके सदस्य बन सकते हैं।
यह संगठनात्मक कार्य-क्रम बहुत महत्वपूर्ण है। इस आधार पर व्यवस्थित रूप से सुसम्बद्ध होकर हम लोग अपने निर्धारित लक्ष आत्म-कल्याण और साँस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में आशाजनक प्रगति कर सकते हैं। आइए, इस प्रगति-पथ पर हम लोग यह संगठनात्मक कदम उत्साह पूर्वक बढ़ायें और वह कार्य करें जो सच्चे अर्थों में जीवित, प्राणवान और प्रकाशवान आत्माऐं कर सकती हैं।
तपोभूमि समाचार
गायत्री तपोभूमि में इस श्रावण मास में रुद्रयज्ञ आनन्द पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस भाद्रपद मास में यजुर्वेद यज्ञ चल रहा है, जिसकी पूर्णाहुति भाद्रपद सुदी पूर्णिमा को होगी। अश्विन में पितृ यज्ञ और शतचण्डी यज्ञ होंगे। यज्ञ-विधान आदि कर्मकांडों की व्यवहारिक शिक्षा तथा संगीत अध्यापक द्वारा विविध प्रकार के वाद्य सिखाये जा रहे हैं। औषधालय का फर्नीचर बन चुका है, भाद्रपद मास में औषधि-निर्माण का कार्य चलेगा। एक मास में चिकित्सालय तथा चिकित्सा शिक्षा की व्यवस्था पूरी हो जाने की सम्भावना है।
गत मास से संस्कृत विद्यालय का जो शुभारम्भ हुआ उसका सर्वत्र स्वागत हुआ है। ‘अखंड-ज्योति’ प्रेस की मशीनें, टाइप आदि समस्त सामान गायत्री तपोभूमि में भेजा जा रहा है। एक महीने के भीतर यहाँ प्रेस के चालू हो जाने की आशा है। इसका नाम ‘गायत्री प्रेस’ कर दिया गया है। अब अखंड-ज्योति पत्रिका तो अन्यत्र ही छपा करेगी। गायत्री प्रेस का उपयोग गायत्री प्रचार सम्बन्धी पत्रक आदि छापने और संस्कृति विद्यालय के छात्रों को प्रेस का कम्पोज, छपाई आदि कार्य सिखाने में किया जायगा। चार-पाँच हजार की पूँजी लगाकर प्रेस खोलकर सम्मान पूर्वक आजीविका चलाई जा सकती है या पूँजी के अभाव में प्रेसों की नौकरी करके आसानी से 50-100 रुपये मासिक कमाया जा सकता है। प्रेस के साथ ही रबड़ की मुहरें बनाने तथा पुस्तकों की घटिया-बढ़िया सब प्रकार की जिल्दें बनाने का शिल्प भी सिखाया जायेगा। इन कार्यों में भी काफी लाभ है, यह दो शिक्षायें इसी मास से चालू की जा रही हैं। कुछ और भी उद्योग धन्धों की शिक्षा देने की बात सोची जा रही है, जिससे भारतीय संस्कृति का अध्ययन करने के साथ-साथ कोई उद्योग धन्धा सीखकर स्वावलम्बी जीवन व्यतीत कर सकें। यों चिकित्सा, संगीत, कर्मकाँड, कथा प्रवचन, यज्ञोपवीत बनाना आदि कार्य जो पहले से ही संस्कृति विद्यालय के अंग हैं, किसी हद तक जीविका उपार्जन में सहायक हो ही सकते हैं। अब इस पहलू पर और भी अधिक ध्यान दिया जा रहा है। आयुर्वेदिक रीति से वैद्यक की तथा होम्योपैथिक पद्धति से डाक्टरी शिक्षा देने के लिए विशेष रूप से आयोजन किया जा रहा है।
रामगंज मंडी चलिए:—
ता. 16,17,18,19 अक्टूबर 56 को रामगंज मंडी (कोटा) में राजस्थान प्रान्तीय गायत्री सम्मेलन तथा 101 हवन कुण्डों की 11 यज्ञशालाओं में 24 लक्ष आहुतियों का गायत्री महायज्ञ होगा। अखंड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस पुण्य पर्व में सम्मिलित होने तथा सहयोग करने के लिए इन पंक्तियों द्वारा ही आमंत्रित किया जा रहा है, व्यक्तिगत आमंत्रणों की प्रतीक्षा न करके इन पंक्तियों को ही निमंत्रण-पत्र एवं अनुरोध मान लिया जाय।
रामगंज मंडी स्टेशन वेर्स्टन रेलवे देहली, बम्बई लाइन पर कोटा से 50 मील है। मोटर रोड भी है, नगर और स्टेशन में कुछ भी फासला नहीं हैं। स्टेशन पर स्वयं-सेवक रहेंगे। भोजन व ठहरने का प्रबन्ध है। आने वाले पूर्व सूचना अवश्य देदें ताकि प्रबन्ध में सुविधा हो।
*समाप्त*