प्रति यः शासमिन्वति। ऋग्वेद 1/14/7
जो अनुशासन पालता है- वही शासन करता है।
मागृधः कस्यस्विद्धनम्। यजु. 40/1
धन किसी व्यक्ति का नहीं सम्पूर्ण राष्ट्र का है।
केवलाधो भवति केवलादी। ऋग्. 10/117/6
जो अकेला खाता है- सो चोर है।
ध्वस्मन्वत् पाथः त्वोतु। ऋग्. 12/118
वह अन्न खाओ जो पाप की कमाई न हो।
वयस्कृत तब जामयो वयम्। ऋग्. 1/31/7
एक ही पिता के पुत्र सब मनुष्य भाई-भाई हैं।
भद्रं भवन्ति नः पुरः। अथ. 20/20/6
गुंडागर्दी नहीं सज्जनता अपनाओ।
रमन्ताँ पुण्या लक्ष्मीः।
लक्ष्मी पुण्यात्माओं के यहाँ रहती है।
सत्यं वक्ष्यामि नानृतम्। अथ. 4/9/7
असत्य नहीं, सत्य ही बोला करो।
ते हेलो वरुध नमोमि। ऋग्. 1/24/6/24
क्रोध को नम्रता से परास्त करो।
अन्यो अन्यं अभिहर्षत। अथ. 3/30/1
एक दूसरे को प्यार और प्रसन्नता प्रदान करो।
कद व ऋतं कद व नृतं क्व प्रत्रा। ऋग्. 1/105/6
क्या उचित है क्या अनुचित यह निरंतर विचारो।
सखा सखाय मतरद् विषूचाः। ऋग्. 7/18/3
सच्चा मित्र वह है जो बुराई से बचावे।
शुचिं पावके ध्रुवं। ऋग्. 7/113
केवल उनकी प्रशंसा करो जो धर्म पर दृढ़ हैं।
अवहितं देवा उन्नयथा पुनः। ऋग्.10/137/1
सज्जनों! जो गिर गये हैं उन्हें फिर उठाओ।
अचेतनस्य पथः मा विदुक्षः। ऋग्. 7/4/7
उस मार्ग पर मत चलो जिस पर बेवकूफ चलते हैं।
घृतात स्वादीयो मधुनश्च वोचत। अथ. 20/35/2
घृत सी बलवर्धक और शहद सी मीठी वाणी बोलो।
केवलो नान्यासाँ कीर्तयाश्चन। अथ. 7/38/4
पर नारी का चिन्तन तक मत करो।
मा गताना मा दीधी थाः। अथ. 8/1
जो गुजर गया उसके लिए शोक करना व्यर्थ है।
ईशानः वधं यवय। ऋग्वेद 1/2/6
मनुष्य अपनी परिस्थितियों का निर्माता आप है।
अतप्त तनूर्न तदायो अश्नुते। ऋग्. 9/83/1
सुख उन्हें नहीं मिलता जो कष्ट से डरते हैं।
अन्नं न निन्द्यात्। तद् व्रतम्। तैत्तरीय 3/7
जूठन छोड़कर अन्न देवता का तिरस्कार न करो।
दस्मत कृणोष्यध्वरम्। ऋग्. 1/74/4
सज्जनों, सत्कार्यों में सहायता किया करो।
उतोरपिः पृणतो नोपदस्यति। ऋग्. 10/117/7
दानी की सम्पदा घटती नहीं बढ़ती है।
अशत्र्चिन्दो अभयं नः कृणोतु। अथ. 6/40/2
मत किसी से शत्रुता करो-मत किसी से डरो।
यज्ञाय गृणते सुगं कृधि। ऋग्. 1/94/9
यज्ञ परायण के लिए सब कुछ सुगम है।
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वर्ष-17 संपादक-श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-4
ज्योति-याचना
(श्री सुमित्राकुमारी सिन्हा)
ले गीत-फूल पूजा का थाल सजाया है, पर बिना ज्योति के अन्धियारा यह कौन हरे?
यह अगम तिमर का सिन्धु एक लौ, तृण-सम्बल, पर जीवन यह, आधार बिना कितना निर्बल?
है शक्ति पगों में, किन्तु प्रेरणा कौन भरे? अब बिना ज्योति के अन्धियारा यह कौन हरे?
ले संचित निर्माल्य, अर्चना करने जाती, पर अन्धकार में डूबी, पन्थ नहीं पाती।
इस कलुष-कालिमा से निवृत्ति अब कौन करे? अब बिना ज्योति के अन्धियारा यह कौन हरे?
यत्न-दीप माटी का, अनुभव-आँच पका कर, स्नेह-भावना भर, बाती यह प्राण बनाकर-
मैं व्यथा, ताप से जला रही, पर ज्योति परे। अब बिना दीप के अन्धियारा यह कौन हरे?
दो ज्योति-दान, मैं दीप लिए दिशि-दिशि जाऊँ, तम हर घर के कोने-कोने का धो आऊँ,
इस ज्योति-पर्व पर आज याचना मौन करे। पर बिना दीप के अन्धियारा यह कौन हरे?
(श्री स्वामी रामतीर्थ)
नवीनता, प्रतिष्ठ या लोकप्रियता प्राप्त करने की इच्छा प्रायः लोगों को सत्य के मार्ग से विमुख रखती है। इस प्रकार की इच्छा को छोड़कर कर और मस्तिष्क को साम्य अवस्था में रखकर अर्थात् न उदासी में निराश होकर और न आत्मप्रशंसा के बादलों में उड़ कर यदि हम भारतवर्ष की वर्तमान आवश्यकताओं के प्रश्न पर विचार करते हैं तो भारत की शोचनीय दशा से हमारी मुठभेड़ हो जाती है। इसमें अपने पड़ोसियों के प्रति प्रेम का शोचनीय अभाव है। धार्मिक सम्प्रदायों ने सच्चे मनुष्यत्व को और इस भाव को कि हम सब एक ही राष्ट्र के अंग है, ढ़क दिया है।
हिन्दुस्तान में मुसलमानों को हिन्दुओं के साथ एक ही जगह रहते हुए पीढ़ियों व्यतीत हो गई, परन्तु अपने पड़ोस में रहने वाले हिन्दुओं की अपेक्षा वह दक्षिण यूरोप के तुर्कों के साथ सहानुभूति दिखाते हैं। एक बालक जो हिन्दू माँ-बाप के रक्त माँस से बना है, ज्यों ही ईसाई हो जाता है त्यों ही वह एक गली के कुत्ते से भी ज्यादा अपरिचित बन जाता है। मथुरा का एक कट्टर द्वैतवादी वैष्णव दक्षिण के एक द्वैतवादी वैष्णव के लाभ के लिये अपने ही नगर के एक अद्वैतवादी वेदान्ती का मान भंग करने के लिये क्या नहीं करता? यह सारा दोष किसका है? मत-पन्थों के पक्षपात और खोखले ज्ञान का, जो सब जगह एक सा है। भारत में एक राष्ट्रीयता की कल्पना भी एक अर्थहीन कल्पना हो गयी है। इस का कारण क्या है? इसका स्पष्ट कारण मरे हुए मुर्दों की लकीरों से अंधे होकर फकीर हो जाना और ऊटपटाँग पक्षपातों की, जो धर्म के पवित्र नामों से पुकारे जाते हैं, घोर दासता है या यों कहो कि -”प्रमाण-पालन” चिकना चुपड़ा नाम देकर आध्यात्मिक आत्मघात करना है।
केवल उदार शिक्षा, यथार्थ ज्ञान, सप्रयोग परीक्षण अथवा दार्शनिक विचार-पद्धति के अभ्यास से ही यह असत्य कल्पना दूर हो सकती है, और कोई मार्ग नहीं। आधुनिक शास्त्र शोधन से निकले हुए उत्तम और मनुष्य कर्तव्य सिखाने वाले तत्व जिस पंथ या धर्म में न हों, उन्हें कदापि यह अधिकार नहीं है कि वह अपने भोले भक्तों को अपना शिकार बनावें।
प्राचीन काल के बहुत से धार्मिक तत्व और प्रथायें, केवल उस समय के जाने हुए शास्त्रों के सिद्धान्त और नियम थे। ये तत्व पहले बड़े विरोध के साथ माने गये थे और फिर इस अन्धविश्वास के साथ माने गये थे कि उनकी जन्म देने वाली माता स्वतंत्र विचारकर्ता और निदिध्यासन का गला घोंट दिया गया। धीरे-धीरे यह अंधविश्वास इतना बढ़ गया कि एक बालक “मैं मनुष्य हूँ” यह समझने के पहले ही अपने को हिन्दू, मुसलमान अथवा ईसाई कहने लगे और अज्ञानता के कारण व्यक्ति विशेष तथा ग्रन्थों के प्रमाण के आधार पर धार्मिक और जब स्वयं अभ्यास, मौलिक अन्वेषण, सत्यानुशीलन और ध्यान इत्यादि, जिन से धर्म-संस्थापकों ने आध्यात्मिक और आधि भौतिक प्रकृति तथा उसके नियमों का दक्षता के साथ अध्ययन किया था, लोप होने लगे तब सृष्टि के नियमानुसार धर्म की अवनति आरम्भ हो गयी। शनैःशनैः ईसामसीह के गिरि प्रवचन अथवा वैदिक यज्ञों के असली उद्देश्यों को तिलाञ्जलि दी जाने लगी और उन मत-मतान्तरों के चलाने वालों के नामों की पूजा बड़ी श्रद्धा से होने लगी। केवल इतना ही नहीं हुआ वरन् देह की पूजा के लिये देही का हनन कर दिया गया।
ईसा, मुहम्मद, व्यास, शंकर इत्यादि सत्य निष्ठ और निष्कपट महात्मा थे। उन्होंने प्रकृति रूपी मूल ग्रन्थ अनन्तत्व का अध्ययन कर आँशिक ज्ञान प्राप्त किया और उसके अनुसार धर्म ग्रन्थ लिखे, किन्तु उनके अनुयायी उन्हें पैगम्बर और अवतार का नाम देकर वाणी को ‘आदि सत्य’ ‘युगादि सत्य’ सत्य हो भी सत्य’ मान कर उसकी व्याख्या करते हैं, जो निश्चय ही प्रकृति के मूल ग्रंथ के विरुद्ध (असत्य और अपूर्ण) है और ऐसा करके वे अज्ञानवश अपने गुरु और उनके ग्रन्थों का अपमान करने कराने का कारण होते हैं।
इसका अभिप्राय यह नहीं है कि लोक संग्रह के लिये इन धार्मिक रीतियों का कभी उपयोग ही न था। किसी समय उनका उपयोग आवश्यक था। इन रीति-रिवाजों की आवश्यकता ठीक वैसी ही थी जैसे किसी बीज के जीवन और बाढ़ के लिये यह आवश्यक है कि वह बीज छिलके से कुछ काल तक ढ़का रहे। परन्तु नियमित समय के पश्चात् यानी उस बीज के उग जाने पर अगर वह छिलका नहीं गिरे तो वह बढ़ते हुए दाने के लिये एक कारागार बन जायगा और उसकी बाढ़-विकास को रोकेगा। हमें छिलकों की अपेक्षा दाने पर विशेष ध्यान रहना चाहिए क्योंकि छिलके को, जो दाने की बाढ़ को रोकता है अलग कर देने के लिये अर्थात्- जीर्ण, अनुपयोगी रीति-रिवाजों के पालन करने के विचारों से छुटकारा पाकर प्रकृति के मूल ग्रन्थों को पढ़ने के लिये यह अनुभव करना आवश्यक है कि पैगम्बरों की शक्ति अलौकिक नई है, वह हमारा (प्रत्येक मनुष्य का )जन्म सिद्ध अधिकार है।
कुछ लोग ऐसे हैं, जिनकी समझ में किसी मकान का ढांचा या नक्शा उस समय तक नहीं आता जब तक कि मकान बनकर उनके सामने तैयार न हो जाय। इसी प्रकार के कुछ लोग ऐसे हैं, जिनके ध्यान में वर्तमान काल या भूतकाल से एक परमाणु भी आगे बढ़ने का विचार नहीं आता, पर अब भारतवर्ष में ऐसे लोगों की संख्या बहुत न्यून होती जाती है। वर्धनशील वेदा (श्रद्धा और विश्वास)अशान्ति और चंचलता करके उन्हें उनका स्वाभाविक ऐश्वर्य, एकता विश्वप्रेम का अनुभव कराये तथा अस्वाभाविक मेल कराये। ऐसे वेदान्त की किस देश में आवश्यकता नहीं है? भारत वासियों को तो इस की विशेष आवश्यकता है।
(श्री सी. जिनराजदास)
“यह सब कुछ ब्रह्म ही है” -यह अद्वैतवाद या सर्वेश्वरवाद है। यह सिद्धान्त किसी न किसी रूप में प्रायः सब धर्मों में पाया जाता है। जब हम वस्तु मात्र के मूलतत्व का विचार केवल निराकार निर्गुण रूप से नहीं परन्तु एक साकार सगुण ब्रह्म रूप से करते हैं तब प्रत्येक धर्म में यह तत्व दो रूप से व्यक्त होता है। इन्हें हम प्रभु के सर्वातीत और सर्वव्याप्त रूप के नाम से जानते हैं।
सर्वेश्वरवाद का बिलकुल स्पष्ट रूप हिन्दू धर्म में देखा जाता है। “श्वेताश्वेतर उपनिषद्” के नीचे लिखे मंत्र प्रभु के सर्वव्यापक स्वरूप के सिद्धान्त को स्पष्ट करते हैं। हिन्दू धर्म में यह स्वरूप सगुण ब्रह्म समूर्त ईश्वर की दिव्य सत्यता (रियलिटी)है:-
“यह देव सब दिशाओं में है, वह बहुत पूर्व जन्मा था, वह गर्भ में है, वह जन्म ले चुका है, वह जन्म लेवेगा, सब जन्मे हुओं के पीछे वह खड़ा है। वह सर्वतोमुख है।” (2-16)
“सब के मुँह, शिर और गरदन जिसके हैं, जो सब भूतों (जीवों) के गुहाशय में स्थित है, जो भगवान सर्वव्यापी है। इसलिये वह सर्व स्थित शिव (कल्याणकारी) है। (3-15)
वह ही अग्नि है, वह आदित्य है, वही वायु है, वह ही चन्द्रमा है, वही शुक्र, वही ब्रह्म, वही आप (जल), वही प्रजापति है। (4-2)
तू ही स्त्री, तू ही पुरुष, तू ही कुमार, तू ही कुमारी है। तू ही बूढ़ा होकर लाठी पकड़ कर चलता है और तू ही सब ओर मुख करके जन्म लेता है। (4-3)
नीली तितली, हरा पक्षी, लाल रंग का पशु, बिजली को गर्भ में धारण करने वाला बादल, जन्तु और सब समुद्र इन सब का अनादि रूप तू है। सर्वव्यापी शक्ति में तेरा घर है, जहाँ से सब भुवन और विश्व निकले हैं। (4-4)
इसी श्वेताश्वेतर उपनिषद् में नीचे लिखे श्लोक भी हैं जिनसे प्रकट हो जाता है कि हिन्दू विचारकों ने भगवान के सर्वातीत और सर्वव्यापक स्वरूपों का किस प्रकार समन्वय किया था-
“मैन उस आदित्यवर्ण अन्धकार के परे वाले पुरुष को जाना है, उसे जानकर मनुष्य मृत्यु से तर जाता है। जाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है। (3-8)
“जिससे बड़ा या छोटा कोई और नहीं है, जिस से अधिक सूक्ष्म या स्थूल और कोई नहीं है। जो वृक्ष के समान आकाश में स्तब्ध अकेला खड़ा रहता है, उस पुरुष से सर्वपूर्ण है।” (3-9)
“उसे न ऊपर से, न नीचे से, न बीच से कोई समझ सकता है, न उसकी कोई प्रतिमा है, जिसका नाम महत यश है। उसका रूप नजर के भीतर नहीं आता। कोई उसे आँख से नहीं देख सकता। जो इसे हृदय और मन की सहायता से हृदय में स्थित जानते हैं वे अमर हो जाते हैं।” (4-19, 20)
“वही एक दस भुवन, विश्व के मध्य में आता जाता है। वही अग्नि है, वही जल में भी प्रविष्ट है उसी को जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर सकता। दूसरा कोई मार्ग जाने को है ही नहीं।” (4-21)
बौद्ध धर्म एक प्रकार से निरीश्वरवादी है और इसलिये इसके सामान्य स्वरूप में हिन्दू धर्म का सा स्पष्ट सर्वेश्वरवाद नहीं पाया जाता। तो भी भगवान बुद्ध ने वस्तुमात्र का एक ही आधार माना है। इन्होंने इसे निर्वाण का नाम देकर इस प्रकार वर्णन किया है-
“भिक्षुओं! एक ऐसा स्थान है जहाँ न पृथ्वी है, न जल, न वायु है, न वहाँ आकाश का अनन्त जगत है। न वहाँ बुद्धि का अनन्त जगत है। न वह प्रत्यक्ष ज्ञान या संज्ञा का लोक है, न वहाँ असंज्ञा ही है, न वहाँ यह लोक है, न वहाँ दूसरा ही लोक है, न वहाँ सूर्य है न वहाँ चन्द्रमा है। हे भिक्षुओं! उसे मैं न आना कहता हूँ, न जाना, न खड़े रहना, न जन्म, न मृत्यु। वह बिना आधार का, बिना जन्म का, विचार से परे है। वह सत्य ही दुःख का नाश रूप है। हे भिक्षुओं! वह अजन्मा, अव्यक्त, असृष्ट और अमर्यादित है। यदि वह अजन्मा, अव्यक्त न होता तो इस जगत में जो जन्म लेता है, व्यक्त होता है, सृजा जाता है या मर्यादित होता है, उसका हम को भान भी नहीं होता।”
ईसाई धर्म में सर्वेश्वरवाद को सिद्धान्त रूप से नहीं मानते। इसका यह कारण भी है कि जिन धर्मों में प्रभु के सर्वातीत रूप पर जोर दिया जाता है उनमें उनके सर्वव्यापक रूप को ग्रहण करने में विरोध भाव उत्पन्न होता है। फिर भी ईसाई धर्म में बहुत से भावनोपयोगी सर्वेश्वरवादी हो गये हैं। प्रभु ‘ईसा के महावाक्य, नामक पुस्तक में उनका एक उद्गार इस प्रकार है:-
“पत्थर को उठाओ और वहाँ भी तू मुझे पावेगा। लकड़ी को फाड़ो और वहाँ भी मैं मौजूद हूँ।” आगे चल कर एक स्थान पर फिर कहा है--
“तुम पूछते हो कि वे कौन हैं जो ‘राज्य’ के निकट हमको पहुँचाते हैं, यदि वह राज्य स्वर्ग में है तो ?... वायुमंडल के सब पक्षी और सारे पशु जो पृथ्वी पर या पृथ्वी के भीतर रहते हैं और समुद्र की मछलियाँ ये सब हमें पहुँचाते हैं और स्वर्ग का राज्य तुम्हारे भीतर ही है। जो कोई अपने को पहचानेगा वह उसे पावेगा।”
सर्वेश्वरवाद का एक मनोहर रूप वह है जो सूफी धर्म में पाया जाता है। ईरान का भावना योगी कवि तायी कहता है--
“प्रकृति के प्रत्येक परमाणु को ईश्वर ने ऐसा दर्पण बनाया है जिससे उसके मुख की सुन्दरता झलकती है। गुलाब के फूल से उसकी सुन्दरता प्रकट होती है और बुलबुल पक्षी उस सुन्दरता को देख कर प्रेम से पागल बन जाता है। उसी अग्नि से दीपक की ज्योति में वह प्रकाश आया जो पतंग या परवाने को मोह में डालकर जला देता है। सूर्य पर जब उसका सौंदर्य चमका तो तुरंत ही पानी की लहर में कमल की कली निकल पड़ी।...... सावधान। ऐसा मत कहो कि वह परम सौंदर्य है और हम उसके प्रेमी हैं। तुम तो केवल दर्पण मात्र हो और दर्पण के सामने वही खड़ा है जिसकी छाया दर्पण पर पड़ती है। वही अकेला व्यक्त है और तू तो वास्तव में ढ़का है। वह दर्पण भी है। वह रत्नराशि और तिजोरी दोनों है। इसमें “मैं” और “तू” को स्थान नहीं है। ये तो केवल खाली मिथ्या छाया या आभास मात्र है।”
विज्ञान के आधुनिक काल में भी सर्वेश्वरवाद की गूँज इमर्सन आदि दार्शनिक के लेखों में मिलती है-
“इस मन या विश्वात्मा में प्रत्येक मनुष्य का जीवन समाया हुआ है और वह जीवन दूसरे सब के साथ एकत्व का अनुभव करता है। वही एक सर्वसामान्य हृदय है।......... मनुष्य के भीतर जो पूर्ण विश्वात्मा स्थित है वही प्रज्ञा पूर्ण मौन रूप है विश्व व्यापी सौंदर्य रूप है। प्रत्येक अंश और प्रत्येक कण का उस पूर्ण से पूरा संबंध है। वही सनातन है। इसमें द्रष्ट, दृश्य, दर्शन और चश्मा, अथवा आत्मा अनात्मा सब एक ही है।”
इस विवेचन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भारतीय उपनिषदों ने जिस अद्वैतवाद का प्रचार किया था उसका प्रभाव संसार के सभी धर्मों और देशों पर पड़ा। इससे मनुष्य को इस बात का ज्ञान हुआ कि इस विश्व में जो कुछ है सब ईश्वर के अस्तित्व के विभिन्न रूप ही हैं। इस जगत को ईश्वर ने ही रचा है और ईश्वर उस सब में व्याप्त है, और इस जगत से परे भी स्थित है।
(यह अद्वैत ज्ञान केवल दर्शन शास्त्र की ही बातें नहीं हैं। भक्त कवियों ने और विशेषतः गोस्वामी तुलसीदासजी ने इसको सर्वसाधारण के समझने योग्य विषय भी बना दिया है और सर्वव्यापी राम की भक्ति द्वारा अद्वैत की प्राप्ति का मार्ग दिखला दिया है। यही गीता के कर्म भोग का तात्पर्य है। धर्म के सभी जिज्ञासुओं का कर्तव्य है कि धर्म के इस तत्व को समझें और तदनुकूल आचरण करें। यही सच्चा मुक्ति मार्ग है।)
दो हाथ और दो पैर होने से मनुष्य नहीं होता। मनुष्य वह होता है जो दूसरों के दुःख से दुःखी और सुख से सुखी होता है। घर में जब अभाव होता है तो सब हिस्से अनुसार बाँटकर खाते हैं। सारा संसार एक परिवार है इसमें सबका हिस्सा है। मैं चाहता हूँ कोई भूखा नंगा न रहे कोई दुःखी न रहे। यही ईश्वर का भजन है।
- संत विनोबा भावे
(श्री कृष्णदास जाजू)
इस लेख का शीर्षक कुछ विलक्षण है। ‘सूक्ष्म असत्य’ शब्द मुझे महात्मा गाँधी जी से मिला है। मैं चाहता हूँ कि यह शब्द चल पड़े। एक भाई दूसरों से अपने हाथ-पैर दबवाया करते थे, जो उचित नहीं था। पूछने पर उन्होंने बताया कि मेरी इच्छा न होते हुये भी मेरे हाथ पैर दबाये जाते हैं। महात्मा जी ने कहा कि “इन भाई के ध्यान में यह बात नहीं आई कि यह बात कहते हुये सूक्ष्म असत्य हो रहा है। अगर इच्छा न हो तो रोज-रोज हाथ पैर कैसे दबाये जा सकते हैं? दृढ़ता-पूर्वक एक बार मना करने पर दबाना बन्द हो ही जाता।”
असत्य के पीछे ‘सूक्ष्म’ विशेषण लगने से यह ख्याल होना स्वाभाविक है कि असत्य सूक्ष्म और स्थूल दो प्रकार का हो सकता है। क्या सचमुच असत्य के ऐसे कुछ भेद हैं या वे किये जा सकते है? असत्य व्यवहार करने वाले की दृष्टि से तो कोई भेद नहीं दीखता, फिर भी ऐसे कुछ उदाहरण हो सकते हैं जब कि व्यक्ति को स्वयं पता नहीं चलता कि मैं असत्य कर रहा हूँ या नहीं। मनुष्य में अपूर्णता है, अज्ञान है, कई, बातों में उसका ज्ञान अधूरा है, गलतफहमी भी रहती है, और वह सदा सावधानीपूर्वक सोचता भी नहीं। हर बात में सूक्ष्मता और स्थूलता रहती ही है। विशेष कर मन की प्रक्रियाएँ सूक्ष्म होती हैं। जहाँ तक हमारी दृष्टि स्थूल है, हम मोटे-मोटे दोष ही देख सकते हैं। उतना हो जाने पर बाद में दीखता है कि अन्दर छिपे हुये कितने ही सूक्ष्म दोष पड़े हैं।
सूक्ष्म असत्य की व्याख्या करना बड़ा कठिन है। मोटे तौर पर हम कह सकते हैं कि मैं जिसे सत्य समझता हूँ, हो सकता हैं कि वह असत्य ही हो और जिसे हम असत्य समझते हैं उसे मैं असत्य न समझता होऊँ। किसी बात को मैं तो जानता हूँ कि असत्य है लेकिन दूसरे नहीं जान सकते या दूसरों से छिपाने की कोशिश करता हूँ। कोई बात सचमुच असत्य माना ही नहीं जाता, इसलिये उसमें कोई दोष नहीं दीखता। किसी की विशेष हानि नहीं है, ऐसा समझ कर भी असत्य कह दिया जाता है। जहाँ पैसे-टके का या व्यवहार का सम्बन्ध नहीं आता केवल दिल बहलाव के लिये किया जाता है, या बड़े-बड़े प्रतिष्ठित लोग भी वैसा करते हैं, इस असत्य को भी प्रतिष्ठ मिल जाती है। इस तरह सूक्ष्म असत्य अनेक प्रकार का हो सकता है जिसके कुछ उदाहरण हम यहाँ देते हैं।
1. कई बार हम बिना कारण ही असत्य करते रहते हैं। जिसका शायद हमें भान ही नहीं हो या जिसमें हमें दोष नहीं दीख पड़ता। दूसरों की नजर में हम जैसे हैं उसकी अपेक्षा अधिक अच्छे दिखें, इस निमित्त से हमारी बोल-चाल और अनेक काम ऐसे रहते हैं, जिनमें न्यूनाधिक असत्य और दिखावा रहता है। बहुत बार स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि हमारे व्यवहार में असलियत न रहकर कृत्रिमता आ जाती है। यह बात नहीं कि इसमें कोई विशेष हानि-लाभ है। फिर भी स्वाभाविकता और कृत्रिमता में जो फर्क है, वह तो है ही।
2. खेल-कूद, हँसी मजाक में असत्य को स्थान देने से दोष नहीं माना जाता। इसमें शायद इस बात का आधार मान लिया गया है कि किसी को नुकसान पहुँचाने का इरादा नहीं रहता है या कोई हानि-लाभ नहीं है। मोटे रूप में यह ठीक दीखता है। कानून की मर्यादा भी वहीं तक पहुँचती है। परन्तु कानून तो बाह्य आचरण का ही नियंत्रण कर सकता है। हमें तो अन्तःकरण की शुद्धि तक पहुँचना है। क्या हँसी-मजाक, खेल-कूद पूरी सचाई के साथ नहीं हो सकते? मन को पूरा आह्लाद देने लायक ऊँचे दर्जे का विनोद भी ठीक सचाई के साथ हो सकता है और वह हमारी सभ्यता और सुसंस्कृति की निशानी है।
3. बच्चों के साथ तो हम बहुत कुछ असत्य व्यवहार करते रहते हैं। एक प्रकार से हम ही उनको असत्य सिखाते रहते हैं। कभी-कभी बच्चा किसी चीज या बात का आग्रह कर लेता है। अगर उसे वह चीज न देनी हो या उसकी चाही बात न करनी हो, तो हम साफ-साफ कह सकते हैं कि ऐसा नहीं होगा। थोड़े ही समय में उनका आग्रह शान्त हो जाएगा। परन्तु अक्सर हम उसकी बात टालने के लिये, ‘आगे कभी करेंगे’ आदि कह कर कोई बहाना बना देते हैं। कुछ समय तक बालक हमारी बात पर भरोसा करता है, क्योंकि हम पर उसका पूरा विश्वास होता है। परन्तु धीरे-धीरे बालक जब देखता है कि उसको दिये हुये वचनों का पालन नहीं होता है, तो वह हमारी बात पर विश्वास करना छोड़ कर ज्यादा आग्रह करने लगता है। साथ-साथ वह यह भी सीख लेता है कि जब बुजुर्ग झूठी बात कह कर बहाना कर सकते हैं, तो मैं भी वैसा ही क्यों न करूं?
4. बालक बड़ा होकर स्कूल कालेज में पढ़ने के लिये जाता है। ये संस्थाएँ सरस्वती के मन्दिर हैं, उनमें अशुद्ध व्यवहार के लिये स्थान नहीं होना चाहिये। फिर भी वहाँ गड़बड़ी चलती रहती हैं। परीक्षाएँ पास करने की दौड़ में कई लोग अनेक बेजा उपायों का अवलम्बन करते हैं। गैरहाजिरी के चाहे जैसे कारण बताये जा सकते है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध व्यवहारिक सा हो गया है, आध्यात्मिक तो शायद ही पाया जायगा। जहाँ छात्रों को प्रवेश देने की संख्या नियत होती है, वहाँ नाम लिखाने के लिये अनेक प्रकार के असत्य व्यवहार किये जाते हैं।
5. आजकल प्रमाण-पत्र और सिफारिश पत्र का महत्व बहुत बढ़ गया है। व्यवहार में बहुत अपरिचित लोगों से काम लेना पड़ता है। प्रमाण किसी विशेष हेतु से नहीं दिया जाय, वह केवल व्यक्ति के गुण-दोष का निदर्शक होता है। सिफारिश पत्र इस विशेष हेतु से दिया जाता है कि उम्मीदवार को उससे कुछ लाभ मिल सके। स्वयं सिफारिश कुछ दोष है ही, क्योंकि जिस अधिकारी को नियुक्त करना पड़ता है उसके सामने अनेक उम्मीदवार होते हैं। गुण देखकर न्याय पूर्वक नौकरी देना उसका कर्तव्य है। अगर सिफारिश से वह प्रभावित होता है तो किसी न किसी दूसरे के प्रति अन्याय होता है। कुछ लोग तो खुद के परिचय के बिना ही मित्रों के कहने से या उम्मीदवार की याचना सुनकर प्रमाण-पत्र या सिफारिश पत्र दे देते हैं। वे सोचते हैं कि केवल अपने शब्द मात्र से किसी का भला होता हो तो क्यों न होने दिया जाय। इससे व्यवहार में शिथिलता आती है।
6. आलस के कारण भी सत्य का भंग होता है। जो काम जिस समय पर करना चाहिए उस समय न करने से बाद में उसके बारे में राय बदल जाती है। बदली हुई परिस्थिति में वह बात ठीक बैठती तो नहीं, पर बैठानी पड़ती है। कोई काम अधूरा रह जाय तो बाधा नहीं, आगे चलकर पूरा कर लेंगे, इस आशा में हम असावधान सध्य रह जाते हैं। बाद में जब झूठ कहे बिना बात नहीं पड़ सकती, तब बिना कारण और लाचार हम झूँठ कह देते हैं और यह समझ कर सन्तोष मान लेते हैं कि इसमें हमने सचमुच किसी को ठगा नहीं है या किसी को हानि नहीं पहुँचायी। असत्य कहना पड़ा, वह तो नाम मात्र का है।
7. अशुद्धि या सूक्ष्म व्यवहार का बड़ा क्षेत्र व्यवसायिक क्षेत्र है। उसमें भी हानि-लाभ को छोड़कर दूसरी अनेक बातें ऐसी हैं, जिसमें बिना कारण या मोह वश असत्य किया जाता है। हम अपनी होशियारी से चालाकी करते हैं परंतु दूसरा पक्ष वाला भी हमारी चालाकी पहचान सकता है। अपने माल की झूठी तारीफ करना तो क्षम्य ही माना जाता है। कम-ज्यादा मोल-तोल बताना मामूली बात हो गयी है। ग्राहक से भाव तय करने की झंझट में कितना समय बर्बाद होता है, इसका कोई हिसाब नहीं। दुकानदार और ग्राहक दोनों एक दूसरे को ठगने की कोशिश करते हैं। दोपहर के समय भी दुकान के सामने पर्दा डालकर और कृत्रिम अंधेरा बनाकर अंदर बिजली की रोशनी इसलिए की जाती है कि चीजों का रूप रंग अधिक आकर्षक दिखायी दे। झूठी विज्ञापन बाजी तो प्रसिद्ध ही है, अब उसे एक कला का रूप मिल गया है।
धर्म के नाम पर असत्य कम नहीं चल रहा है। धर्म का धंधा करने वालों की तो बात ही छोड़ दें। उनमें दूसरे व्यावहारिक धंधे वालों से असत्य कम नहीं होता। दुःख की बात यह है कि यह सब ईश्वर के नाम पर किया जाता है और भोले लोग खुद विवेक न रखकर अपनी खुशी से ठगी के शिकार बनते हैं।
(श्री मेहेर बाबा, नासिक)
संसार में प्रत्येक प्राणी सुख खोज रहा है। वैसे तो मनुष्य अनेक बातों की अभिलाषा किया करता है, पर उन सब का उद्देश्य सुख की प्राप्ति ही होती है। यदि वह सत्ता या शक्ति प्राप्त करने के लिए उत्कंठित दिखायी देता है तो इसका कारण यही है कि वह सत्ता का उपयोग करके सुख प्राप्त करना चाहता है। यदि धन पैदा करना चाहता है तो इसी विचार से कि धन के द्वारा सुख मिल सकेगा। यदि वह विद्या, स्वास्थ्य, सौंदर्य, विज्ञान, कला या साहित्य की साधना करता है तो इसका कारण यह है कि उसे यह जान पड़ता है कि इनके द्वारा सुख मिल सकेगा। यदि वह साँसारिक सफलता अथवा यश के लिए प्रयत्न करता है तो इसीलिए कि वह समझता है कि इसके द्वारा सुख उपलब्ध हो सकता है। साराँश यह है कि मनुष्य जितने भी उद्यम और उद्योग करता है उनका अंतिम लक्ष्य सुख की प्राप्ति ही होता है।
प्रत्येक व्यक्ति सुखी होना चाहता है किंतु अधिकाँश व्यक्ति किसी न किसी प्रकार के दुख से पीड़ित हैं। यदि उन्हें कभी सुख प्राप्त होता है तो उसमें दुख भी मिला रहता है। मनुष्य को केवल सुख, अमिश्रित सुख, कभी नहीं मिलता। वह सुख और दुख के द्वन्द्व के बीच झूलता रहता है। मानव जीवन जैसा आज कल हो रहा है उसमें सुख के क्षण बहुत कम आते हैं और वे भी इंद्रधनुष के मनोहर रंगों की तरह शीघ्र ही लुप्त हो जाते हैं। यदि ये सुख के क्षण अपना कोई चिह्न छोड़ जाते हैं तो वह उनकी स्मृति होती है, जो उल्टा हमारे दुख की वृद्धि करती है।
मनुष्य दुख नहीं खोजता, किंतु जिस रीति से यह सुख खोजता है उससे उसे अनिवार्य रूप से दुःख भी मिलता है। वह अपनी इच्छाओं की तृप्ति द्वारा सुख प्राप्त करना चाहता है। किंतु इच्छाओं की तृप्ति कोई निश्चय वस्तु नहीं होती। अतः इच्छाओं की पूर्ति का प्रयत्न करने के साथ-साथ मनुष्य को उनकी अतृप्ति के लिए भी तैयार होना पड़ता है। इच्छा रूपी वृक्ष में दो प्रकार के फल लगते हैं। एक प्रकार का फल मीठा होता है जो सुख रूप है और दूसरा फल कड़वा होता है जो दुख रूप है। जो एक प्रकार का फल लेना चाहता है उसे दूसरे प्रकार के फल के लिए भी तैयार होना पड़ता है। मनुष्य अधीरतापूर्वक सुख खोजता है और जब वह उसे प्राप्त हो जाता है तो वह शौक से उसके साथ संलग्न हो जाता है और आगामी दुख को टालने की कोशिश करता है। पर सुख के बाद दुख अनिवार्य रूप से आता ही है और तब उसे बड़ी तीक्ष्ण वेदना सहन करनी पड़ती है।
अनेक प्रकार की इच्छाओं के आवेग से मनुष्य संसार में सुख की खोज करता है। परंतु कुछ समय बाद उसका सुख संबंधी उत्साह बदल जाता है। क्योंकि जब वह सुख से भरे पात्र की तरफ हाथ बढ़ाता है उस समय भी स्वभावतः उसे दुःख की घूँटें पीनी पड़ती हैं। सुखों के साथ भीतर जाने वाले दुःखों से उसका उत्साह फीका पड़ जाता है। वह प्रायः अकस्मात आने वाली मानसिक प्रवृत्तियों का शिकार होता रहता है। एक समय वह अपने को सुखी और गर्वित अनुभव करता है, दूसरे समय वह अत्यंत दुखी और अपमानित जान पड़ने लगता है। इच्छाओं के पूर्ण होने या खंडित होने के अनुसार उसके मन की स्थिति भी बदलती रहती है। किन्हीं-किन्हीं इच्छाओं की पूर्ति से उसे क्षणिक सुख प्राप्त होता है पर उस सुख के पश्चात ही उदासी की प्रतिक्रिया होने लगती है। इस प्रकार उसके मन की स्थिति में चढ़ाव-उतार होते रहते हैं और वह निरंतर विषमता का शिकार बनता है।
इच्छाओं की पूर्ति से इच्छाओं का अंत नहीं होता। इच्छाओं की पूर्ति होने से वे थोड़ी देर के लिए विलीन हो जाती हैं, पर कुछ ही समय बाद और भी प्रचण्ड वेग से प्रकट होने लगती हैं। मनुष्य को जब भूख लगती है तो वह इच्छा को संतुष्ट करने के लिए खाता है, किंतु थोड़ी ही देर बाद वह फिर भूखा हो जाता है। अगर स्वाद या लालच-वश वह अधिक खा लेता है तो अपनी इच्छा के फलस्वरूप उसे अजीर्ण, उदरशूल आदि के रूप में और भी दुःख सहन करना पड़ता है। यह बात संसार की सभी इच्छाओं पर लागू होती है। इससे इन इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त होने वाला सुख कम होने लगता है और अंत में बिल्कुल समाप्त ही हो जाता है।
इच्छा से उत्पन्न दुख का जब मनुष्य अनुभव करता है अथवा पहले से ही दुख का अनुमान कर लेता है तो उसकी इच्छा का दमन होता है। कभी-कभी तीव्र दुःख उसे संसार से विरक्त और अनासक्त बना देता है। किंतु इच्छाओं की बाढ़ साँसारिक वस्तुओं के प्रति उसकी इस अनासक्ति को प्रायः फिर से तोड़कर बहा देती है। ऐसी ही अस्थायी अनासक्ति को “श्मशान वैराग्य” के नाम से पुकारा जाता है।
कभी-कभी मन की यह अनासक्ति की स्थिति अधिक स्थायी होती है और काफी समय तक ठहरती है। अपने प्रियजनों की मृत्यु या धन नाश या यश नाश जैसी बड़ी विपत्तियों के आ जाने से प्रायः इस प्रकार का तीव्र वैराग्य उत्पन्न होता है। उस समय अनासक्ति की लहर के प्रभाव से संसार की सभी वस्तुओं की तरफ से रुचि हटा लेता है। इस प्रकार के तीव्र वैराग्य का एक विशेष आध्यात्मिक महत्व होता है। किंतु कुछ समय पश्चात यह वैराग्य भी लुप्त हो जाता है क्योंकि वह ज्ञान से उत्पन्न नहीं होता वरन् साँसारिक जीवन में प्राप्त होने वाली आपत्तियों से एक प्रतिक्रिया के रूप में उसकी उत्पत्ति होती है।
वैराग्य अथवा अनासक्ति की भावना उसी दशा में स्थायी और सच्ची होती है तब वह दुःख के स्वरूप तथा कारणों का ज्ञान होने से उत्पन्न होती है। अनासक्ति की इस भावना का आधार इस बात का ज्ञान होता है कि संसार की वस्तुएँ क्षणिक तथा नाशवान हैं, इसलिए वास्तविक सुख तभी प्राप्त हो सकता है जब कि मनुष्य के हृदय में वैराग्य अथवा अनासक्ति का भाव दृढ़ रूप से जम जाता है। ऐसा मनुष्य न तो सुख से चंचल होता है और न दुःख से विचलित होता है। जो व्यक्ति प्रिय वस्तुओं से प्रभावित होगा और सुख मानेगा उसका अप्रिय वस्तुओं से भी प्रभावित होना और दुख मानना अनिवार्य है।
(श्री हरिमोहन)
जिस समय गीता की रचना हुई उस समय भारतीय समाज चार वर्णों में विभक्त था। वर्ण व्यवस्था के फलस्वरूप भिन्न-भिन्न जातियों के धर्म या काम जन्मसिद्ध माने जाते थे। समाज में ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य और शूद्र इन चार वर्णों के सिवाय और भी “पाप योनि” जातियाँ थी, कुत्ते खाने वाले श्वपाक (चाण्डाल) भी थे। गीता के अनुसार उस जमाने में जिस जाति के हिस्से में जो काम आया उसी को करना ठीक माना गया था। यही नहीं गीता में यहाँ तक कह दिया गया है कि अपना कर्म छोड़कर दूसरे का धर्म स्वीकार करना बड़े भय की बात है। उससे समाज व्यवस्था को हानि पहुँचने की आशंका है।
विचारणीय विषय यह है कि गीता के समय में समाज की व्यवस्था कैसी भी रही हो, पर क्या उसका आशय यह है कि देश और काल में चाहे जैसा परिवर्तन हो जाय, वह प्राचीन व्यवस्था सदा अटल रहेगी। स्वयं गीता ने ऐसी बात की गारण्टी नहीं दी है। गीता ने उपरोक्त व्यवस्था उस समय के लिए दी थी जबकि चारों वर्णों के व्यक्ति अपने धर्म का वास्तविक रूप में पालन करते थे। इतना ही नहीं उस समय जो वर्ण जितना ऊँचा और सम्मान का पात्र माना जाता था। उसका उत्तरदायित्व भी उतना ही अधिक था। ब्राह्मण अगर अधिक आदर के पात्र माने जाते थे तो इन्द्रिय सुख को भोगने का अधिकार भी उनको सबसे कम था। बाहर और भीतर की इंद्रियों को संयम में रखना उनका कर्तव्य माना गया था। गीता के समय के समाज का जितना वर्णन हमको मिलता है उसमें एक भी ब्राह्मण ऐसा नहीं मिलता जिसने दौलत इकट्ठी की हो या जो ऐश आराम की जिंदगी बिताता हो। क्षत्रिय जाति यद्यपि राजपद की अधिकारी थी पर उसको सदा अपनी जान हथेली पर लेकर रहना पड़ता था। उस समय हार जाने की बदनामी मरने से भी बुरी समझी जाती थी। इसलिए कोई क्षत्री रणभूमि में पीठ नहीं दिखा सकता था। यही कारण है कि गीता में ब्राह्मणों के लिए जहाँ दस कर्तव्य और क्षत्रियों के लिए सात कर्तव्य बतलाये हैं वहाँ वैश्यों के लिए तीन कर्तव्य और शूद्रों के लिए केवल एक ही कर्तव्य का बंधन बतलाया गया है। बंधन और सम्मान में कमी और बेशी इस प्रकार रखी जाती थी कि समाज व्यवस्था में किसी व्यक्ति का पलड़ा भारी नहीं होने पाता था। इसीलिए गीता के विभूति योग अध्याय में प्रत्येक जाति की मुख्य बातों को बतलाते हुए भगवान ने कहीं पर भी यह नहीं कहा कि ‘वर्णानाँ ब्राह्मणों ऽम्यहम’ अर्थात् “चारों वर्ण वालों में से मैं ब्राह्मण हूँ।”
आज उच्च जाति के कहलाने वाले लोग केवल सम्मान चाहते हैं, और उत्तरदायित्व अथवा बंधन से दूर हटते हैं। पर ऐसा किस प्रकार संभव हो सकता है? आज ब्राह्मणों ने अपनी विद्या का, क्षत्रियों ने अपने बल का और वैश्यों ने अपने धन का उपयोग समाज हित के लिए करना छोड़ दिया है। आज सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि वास्तविक रूप से छोटे लोगों को भी समान अधिकार दें। जब तक हम न्याय और समता के सिद्धाँत पर चलने नहीं लगेंगे तब तक उत्तम सामाजिक व्यवस्था की स्थापना हो सकना संभव नहीं।
जब हम वर्तमान समय की अस्वाभाविक असमानता से छुटकारा पाकर प्रकृति के अनुकूल समानता के स्तर पर आ जायेंगे, तब किसी भी व्यक्ति के लिए कर्म का निश्चय केवल इसी बात के आधार पर किया जायगा कि उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति किस ओर है। ऐसा निर्णय प्रथम तो प्रत्येक व्यक्ति अपने लिए स्वयं ही कर सकता है, यदि उसे कठिनाई हो तो अनुभवी गुरुजनों से भी सम्मति मिल सकती है। समाज में समानता की भावना पैदा हो जाने के कारण लोगों के मन में यह धारणा तो रहेगी नहीं कि कौन सा काम श्रेष्ठ है और कौन सा काम घटिया है। इसी प्रकार सबको जीवन निर्वाह तथा सुख पाने की एक सी सुविधायें होने से यह भी विचार मन में न आयेगा कि इस काम में ज्यादा आमदनी होगी और इसमें कम होगी। इस समय केवल एक यही बात विचारणीय रहेगी कि हम कौन सा काम अच्छी तरह से और योग्यतापूर्वक कर सकेंगे। जब हम इस प्रकार अपनी रुचि और प्रकृति के अनुसार काम करने का मौका पायेंगे तो उसमें असफल या फिसड्डी रह जाने का डर भी नहीं रहेगा।
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में संशोधन करके नई व्यवस्था का निर्माण करने से पहले प्रत्येक कार्य को प्रतिष्ठ और आर्थिक समता की स्थिति का लाना अनिवार्य है। यह कार्य कठिन अवश्य है, पर जैसा गीताकार ने कहा है ‘काम एष क्रोध एष रजोगुण समुद्भवः’ के सिद्धाँत को ध्यान में रखकर हम इंद्रियों का संयम करके विषमता की भावना को नष्ट कर सकते हैं। जबकि हमारे पूर्वज हमको स्पष्ट शब्दों में “आत्मवद सर्व भूतेषु” और ‘आत्मौपम्ये सर्वत्र समं पश्यति’ का उपदेश दे गये हैं और स्वयं उस पर चलकर हमको मार्ग दिखला गये हैं, तो कोई कारण नहीं कि हम उसके अनुसार आचरण न कर सकें। अर्जुन के समान चंचल मन के कारण हमको भी इस साम्य योग पर चलने में आरम्भ में कठिनाई जान पड़ेगी, पर अभ्यास, वैराग्य और संयम से इसे सिद्ध करना ही होगा।
(श्री ‘शंकर’)
भारतीय संस्कृति के इतिहास में वेदों का स्थान बहुत गौरव का है। श्रुति (वेद) की दृढ़ नींव के ऊपर ही भारतीय धर्म तथा सभ्यता का भव्य भवन टिका है। हिंदुओं के आचार-विचार, रहन-सहन, धर्म-कर्म को भली-भाँति समझने के लिए वेदों का ज्ञान विशेष आवश्यक है। हमारे महाज्ञानी ऋषियों द्वारा अनुभूत आध्यात्म तत्वों की विशाल राशि का नाम ही वेद है। स्मृति तथा पुराणों में वेद की बड़ी प्रशंसा की गई है। मनु के कथनानुसार जिस प्रकार संसार की वस्तुओं को देखने के लिए आँखों की जरूरत है उसी प्रकार पारलौकिक और आध्यात्मिक तत्वों को जानने के लिए वेद की आवश्यकता है। वेद का विशेष महत्व इस बात से है कि वह बड़े-बड़े कठिन और गुह्य विषयों का रहस्य प्रकट कर देता है। उदाहरणों के लिए “ज्योतिष्टोम” यज्ञ के करने से स्वर्ग मिलता है। इसलिए वह करने योग्य है और ‘कलंज’ भक्षण से हानि होती है, इसलिए वह त्यागने योग्य है। इन विषयों का निर्णय कोई भी विद्वान अपनी विद्या या तर्क के द्वारा नहीं कर सकता। इस प्रकार के अनगिनत प्रश्नों का उत्तर हमको वेद द्वारा ही ज्ञात हो सकता है।
वेद की भारतीय धर्म में इतनी प्रतिष्ठ है कि -कोई विद्वान तर्क द्वारा किसी भी विषय को सिद्ध कर दे, पर यदि वह वेद विरुद्ध जान पड़ेगा तो उनको उसके सामने सर झुकाना पड़ेगा। हमारे अधिकाँश भाई ईश्वर को नहीं मानते उनको ‘आस्तिकता’ से विहीन नहीं कहा जाता, पर जो वेद की प्रामाणिकता को अस्वीकार करते हैं उनको निश्चित रूप में ‘नास्तिक’ की पदवी दे दी जाती है। इस प्रकार वेदों का महत्व हिंदू धर्म में सबसे अधिक है। ‘शतपथ ब्राह्मण’ में स्पष्ट लिखा है कि धन से भरी हुई पृथ्वी के दान से जितना पुण्य होता है, तीन वेदों के अध्ययन करने से उससे अधिक पुण्य मिलता है।
मनु भगवान ने वेद के जानने वाले विद्वान की प्रशंसा करते हुए कहा है कि “वेद शास्त्र तत्व को जानने वाला व्यक्ति किसी भी आश्रम में रहे, वह इसी लोक में रहते हुए ब्रह्म का साक्षात्कार करता है।”
इस विवेचन से ज्ञात होता है कि यदि हम भारतीय धर्म के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं तो हमको वेदों का अनुशीलन करना आवश्यक है। मनु ने वेद का अध्ययन न करने वाले ब्राह्मण की बड़ी निंदा की है और कहा है कि जो ब्राह्मण वेद का अध्ययन किये बिना अन्य शास्त्रों को पढ़ने में परिश्रम करता है वह अपने वंश सहित शूद्र के दर्जे को पहुँच जाता है। द्विज का द्विजत्व तभी सार्थक हो सकता है जब वह गुरु से दीक्षा लेकर वेदों का अध्ययन करे।
इसलिए हम कह सकते हैं कि वेद का अनुशीलन प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है क्योंकि इसके बिना वे अपने धर्म और संस्कृति के असली तत्वों की जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते। परंतु आजकल लोगों ने इसकी पूरी तरह से उपेक्षा कर रखी है। अपना पेट पालने के लिए हमारा शिक्षाकाल तो अधिकाँश में विदेशी भाषा और साहित्य का अध्ययन करने में ही निकल जाता है। जो संस्कृत पढ़ते हैं, वे भी काव्य, नाटक आदि के द्वारा आनन्द प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं, वेदों की तरफ कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता।
क्या यह खेद का विषय नहीं है कि हम काव्य, नाटक आदि के अध्ययन को तो महत्व दें और समस्त भारतीय साहित्य के मूल स्वरूप वेदों की तरफ से उदासीन रहें। साधारण संस्कृत जानने वाले लोगों की बात तो छोड़ दीजिए अष्टध्यायी के जानकार पंडित भी सिवाय सूत्रों को रटने और उन पर वाद-विवाद करने में वेदों के पढ़ने की तरफ रुचि नहीं रखते। जिन विद्वान ब्राह्मणों के ऊपर समाज को मार्ग दिखलाने का उत्तरदायित्व है वे ही संसार के ग्रंथों में शिरोमणि माने जाने वाले इन ग्रंथरत्नों, वेदों से अनभिज्ञ रहें, यह कितनी लज्जा की बात है। काशी, पूना जैसे केन्द्रों में आज भी अनेक वैदिक पण्डित ऐसे मौजूद हैं जिन्होंने ऐसे विपरीत समय में भी घोर परिश्रम करके समस्त वेद मंत्रों को कंठस्थ किया है और वे उनका उच्चारण ठीक उसी भाँति कर सकते हैं जैसा कि वैदिक युग के ऋषि किया करते थे। इन लोगों की वेदभक्ति और सच्ची लगन की जितनी प्रशंसा की जाय कम है। पर उनमें एक बड़ी त्रुटि यह होती है कि वे वेदमंत्रों के अक्षर तो जानते हैं पर अर्थ को नहीं जानते, इसलिए उनका महत्व कम हो जाता है।
भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी वेदों का अध्ययन बड़े महत्व का है और यही कारण है कि विदेशों के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में वेदों की भाषा का अध्ययन किया जाता है। यह सिद्ध हो चुका है कि संसार के सभी प्रमुख भाषाओं का आदि स्रोत वैदिक भाषा ही है। वैदिक संस्कृत के शब्दों से फारसी, अरबी और उनसे ग्रामि, लैटिन, अंग्रेजी आदि के शब्दों की समानता के बहुत से उदाहरण विद्वानों ने दिये हैं। जैसे-पितृ, पिदर, फादर, मातृ-मादर-मदर, दुहिता, दुख्तर, डॉटर। इस प्रकार के सैकड़ों शब्द पाये जाते हैं जिनका मूल वैदिक भाषा में ही मिलता है। इस दृष्टि से दुनिया भर के भाषा-शास्त्र के जानकार वेदों को बड़े सम्मान की निगाह से देखते हैं। वैदिक भाषा और व्याकरण का विशेषज्ञ अन्य भाषाओं का ज्ञान अपेक्षाकृत बहुत शीघ्र प्राप्त कर सकता है क्योंकि वह उनकी बनावट के मूलतत्व को जानता है।
ऐसे विपरीत समय में वेदों के अर्थ को जानकर जो लोग उनमें बतलाये गये धर्म, आचार, व्यवहार तथा आध्यात्म के सिद्धाँतों को समझने तथा अन्य जिज्ञासुओं में उनका प्रचार करने का उद्योग करते हैं वे अवश्य ही श्रद्धा के पात्र हैं।
(श्री आर. के. शर्मा)
संसार में मनुष्य का मुख्य उद्देश्य सुख की प्राप्ति माना गया है। सब कोई इसी के लिए प्रयत्न करते रहते है और तरह-तरह की सामग्रियाँ एकत्रित करते रहते हैं। अधिकाँश मनुष्यों का इस विषय में यही विचार देखने में आता है कि हमारे पास जितनी अधिक सामग्री, जीवन निर्वाह के साधन, धन, सम्पत्ति आदि होगी उतने ही हम सुखी हो सकेंगे। पर हम प्रायः यह देखते हैं कि जिसके पास जितना अधिक माल असबाब होता है वह उतना ही अशाँत और दुनिया की हाय-हाय से व्याकुल होता है।
कारण यह है कि हम जितनी सामग्री और सम्पत्ति एकत्रित करते हैं वह सब हमारे लिए वास्तव में आवश्यक नहीं होती। दूसरों को देखकर या लालसा के कारण हम झूठमूठ अपनी आवश्यकताओं को बढ़ा लेते हैं और उनकी पूर्ति के लिए दिन-रात दौड़−धूप करके उन्हीं की चिंता में अपनी आयु समाप्त कर देते हैं। ऐसे लोग प्रकट में चाहे सुखी भी दिखलायी पड़ें, पर दूसरों के पास अपने से भी ज्यादा सम्पत्ति और सामग्री देखकर और अपने पास की सम्पत्ति की रक्षा के लिए उनको बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है। वे प्रायः यही सोचा करते हैं कि “अमुक वस्तु अथवा पदार्थ तो हमें अवश्य ही चाहिए। इस चीज के बिना तो हमारा कार्य चल ही नहीं सकता। ऐसी चीज न मिल सकी तो व्यवहार में बाधा आ जायेगी।” पहनने के लिए चार कपड़े की आवश्यकता है तो वे सौ पचास संग्रह करके रखना चाहते हैं। रहने के लिए एक मकान मौजूद है, पर मन में दो-चार और बड़े मकान और कोठियाँ बनाने की लालसा लगी रहती है।
यह सच है कि जीवन में समुचित निर्वाह के लिए मनुष्य को कितने ही पदार्थों की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होती है। पर इसमें भी संदेह नहीं कि कितनी ही बातें ऐसी भी हैं जिनकी आवश्यकता हमने जान-बूझकर पैदा कर ली और उनके बिना भी जीवन निर्वाह सुख पूर्वक हो सकता है। इस प्रकार की चीजों का शौक लग जाने से मनुष्य संसार की बाहरी बातों से अधिक प्रेम करने लगता है और उनके मोह जाल में फँस जाता है। पर इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मनुष्य किसी वस्तु की प्राप्ति के लिए उद्योग न करे। और कैसी भी भली बुरी हालत में दिन बिताकर जिंदगी पूरी कर ले। या वह किसी सुँदर वस्तु की इच्छा न करे या किसी उच्च स्थिति तक पहुँचने के लिए उद्योग न करे। यह तो निकम्मे लोगों का सिद्धाँत है जो कहा करते हैं-अजगर करे न चाकरी पंडित करे न काम। हम किसी को ऐसा उद्योग हीन अथवा अभिलाषा शून्य जीवन व्यतीत करने की सलाह नहीं देते। हमारे कहने का आशय इतना ही है कि वस्तुओं का संग्रह आवश्यकतानुसार किया जाय न कि लालच के रूप में और साथ ही यह भी दृष्टिगोचर रखा जाय कि केवल संसार के भौतिक पदार्थ ही आपको आनंद नहीं दे सकते पर वास्तविक आनंद अपने भीतर से ही प्राप्त हो सकता है। अतः केवल साँसारिक वस्तुओं को सुखी होने का साधन मत समझ बैठो।
दुनिया में आप हजारों ऐसे राजा-महाराजा, सेठ, साहूकार देख सकते हैं जिनके पास बड़े-बड़े खजाने, जमीन, जायदाद, सुँदर महल सुख की सभी सामग्रियाँ हैं। जिनको मोटर का वायुयान स्पेशल ट्रेनें आदि आवागमन के साधन प्राप्त हैं। धन, जन ऐश्वर्य सब कुछ है और जिस किसी पदार्थ की इच्छा हो उसे तुरंत प्राप्त कर सकते हैं, फिर भी वे दुःखी असंतुष्ट नजर आते हैं और समय-समय पर अपने दुख का रोना रोया करते हैं। इन्हीं के मुकाबले में अनेक लोग ऐसे भी मौजूद हैं जिनको रहने को घर नहीं, सोने को स्थान नहीं, भोजन का कोई ठिकाना नहीं, धन नहीं, जन नहीं और पग-पग पर आपत्तियों का सामना करना पड़ता है। जगत में उन्हें कोई सुख नहीं मिला। फिर भी वे हमेशा बहुत प्रसन्न, हर्षित और मस्त रहते हैं। उनके चेहरे पर किसी बात की चिंता दुख या ग्लानि का चिह्न दिखलाई नहीं पड़ता। इसका कारण यही होता है कि वे संसार के पदार्थों से ज्यादा मोह नहीं रखते और न अपनी आवश्यकताओं को जानबूझ कर बढ़ाते हैं। इससे वे अनेक तरह की परेशानियों से बचे रहते हैं और किसी वस्तु का अभाव होने पर उनको रोना नहीं पड़ता।
इसलिए अगर आप वास्तव में सुखी होना चाहते हैं तो आज से ही इस विचार को त्याग दें कि अमुक वस्तु की प्राप्ति से ही हमको आनंद प्राप्त होगा अथवा अमुक वस्तु न मिल सकी तो हमको खेद है या दुःख होगा। अमुक वस्तु के न मिलने से चित्त को अशाँति होगी अथवा उनको तृप्ति न होगी। इस प्रकार की धारणाओं में फँसकर मनुष्य अपने जीवन को परतंत्र और दुखी बना लेते हैं। अगर जीवन को सुखपूर्वक व्यतीत करना चाहते हो तो उपरोक्त सिद्धाँत को हृदयंगम करके अपनी आवश्यकताओं को कम करो।
तुम जितना अधिक आवश्यकताओं के पीछे दौड़ते हो उतना ही तुमको दुख और क्लेश मिलता है। क्योंकि वे पदार्थ परिवर्तनशील हैं और इसलिए हमारी आवश्यकताएं भी पूर्ण होने के बजाय बढ़ती चली जाती हैं। इसलिए सुखी होना चाहते हो तो सुख के वास्तविक स्वरूप की खोज करो और झूठी आवश्यकताओं को कभी महत्व मत दो। यूरोप के एक प्रसिद्ध दार्शनिक “कौबेट” ने सत्य कहा है-”मानव अपने साधनों की महानता से नहीं वरन् अपनी इच्छाओं या कामनाओं की लघुता से ही स्वतंत्रता प्राप्त करता है।”
(एक भक्त)
परमपिता परमात्मा की प्रार्थना इस संसार रूपी समुद्र में मनुष्य का सबसे बड़ा आश्रय है। इसके द्वारा हमारे मन में एक महान शक्ति का प्रादुर्भाव होता है और उसके द्वारा हम बड़े-बड़े कठिन जान पड़ने वाले कामों को सहज में पूरा कर डालते हैं।
ईश प्रार्थना की प्रणाली केवल हिंदू धर्म अथवा भारत वर्ष की ही वस्तु नहीं है, वरन् सभी धर्मों और देशों के महापुरुषों ने इसका विधान किया है और इसे कष्टों तथा आपत्तियों से बचने का सर्वप्रधान साधन माना है। ईसाइयों में प्रार्थना का बड़ा महत्व है और कोई धार्मिक ईसाई प्रतिदिन बिना प्रार्थना किये नहीं रहता। मुसलमानों की नमाज भी ईश प्रार्थना के सिवा और कुछ नहीं और उनके ऊँचे दर्जे के फकीर रात-रात भर जागकर प्रार्थना करते रहते हैं। बौद्ध, जैन, पारसी, यहूदी सभी धर्मों में प्रार्थना का महत्व स्वीकार किया गया है। प्रार्थना किस प्रकार करनी अधिक उत्तम है और किस विधि से उसका प्रभाव शीघ्र ज्ञात हो सकता है इस संबंध में भगवत् भक्तों ने बहुत कुछ कहा है, उनमें से कुछ की चर्चा यहाँ की जाती है।
1- भगवान से हम जिस बात की या जिस वस्तु की प्रार्थना करते हैं उसकी तीव्र चाह हमारे मन में हो। यदि उस वस्तु के बिना हमारा काम अन्य किसी वस्तु से चल जाता दीखता हो तो समझना चाहिए कि उसकी तीव्र हमारे मन में नहीं है।
2- प्रार्थना के समय पूर्ण धैर्य की आवश्यकता है। थोड़ी-थोड़ी देर बाद यह ख्याल करते रहना कि अभी फल प्रकट हुआ कि नहीं, अविश्वास का परिचायक है। बीज बोकर जल से सींचकर फिर तुरंत ही उसे उखाड़ कर देखा नहीं जाता कि बीज में अंकुर निकलने लगा या नहीं।
3- प्रार्थना का तार टूटना नहीं चाहिए। फल प्रकट होने तक यथासाध्य अनवरत प्रार्थना चलती रहे।
4- यह पक्का विश्वास मन में बना रहे कि प्रभु यहीं है और वे अवश्य हमारी प्रार्थना स्वीकार करके यह वस्तु हमको देंगे। जो कोई भी उनके सामने किसी वस्तु के लिए उपस्थित होता है उसे वे अवश्य उसकी माँगी वस्तु देते हैं। इसलिए हमें भी अवश्य देंगे।
5- किंतु प्रार्थना के समय प्रभु के सामने उस वस्तु का रोना रोने की आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना का रूप होना चाहिए, प्रभु के हृदय का मिलन, हृदय का एकीकरण प्रभु के रूप में तन्मयता। साराँश यह है कि हम जो वस्तु चाहते हैं उसके अभाव की ओर से मन को हटाकर वह वस्तु जिन प्रभु में वर्तमान है, उनका ध्यान करें। बजाय कि इसके कि हम इस बात का ध्यान करें कि ‘अमुक वस्तु नहीं है’ हम यह विचारते रहें कि हमारी चाही हुई वस्तु पूर्ण रूप से मौजूद है और वह हमको मिलेगी।
6- यह भी विचार करना चाहिए कि हम भी विश्व सृष्टा प्रभु के ही एक अंश हैं। तो वह वस्तु जिस प्रकार प्रभु में वर्तमान है उसी प्रकार हमारे अंदर भी मौजूद है। इसलिए हम भी चिंतन के द्वारा अपने लिए उस वस्तु का निर्माण कर सकते हैं। यह नियम है कि हमारे प्रत्येक विचार मन में उत्पन्न होने पर बाहर भी वैसा ही रूप धारण करते हैं। इसलिए हम प्रार्थना के समय यदि वस्तु के अभाव का अपनी दीनता का विचार करते रहेंगे तो इसका परिणाम आशाजनक नहीं हो सकता। इसके विपरीत प्रार्थना के समय हमको इस प्रकार के भाव रखने चाहिए। “हमें तो सब कुछ प्राप्त है, हमारा सब कुछ सुँदर है नाथ!” तुम्हारी कृपा से मैं बराबर सफल होता जा रहा हूँ। ऐसे विचारों से हमारा प्रभु से संयोग होता जाता है और करुणा सागर भगवान की तरफ से जो कृपा की लहरें हमारी ओर आती रहती हैं उनसे प्रतिकूल परिस्थितियाँ मिटने लगती हैं और हम अपने अभीष्ट के निकट पहुँचने लग जाते हैं।
7- प्रार्थना के पूर्व हमें यह भी विचार कर लेना चाहिए कि जिस वस्तु को हम माँग रहे हैं वह किसी दूसरे व्यक्ति के हित की विरोधी तो नहीं है। मान लो कि यह इच्छा उत्पन्न हुई है कि “हमारे अमुक शत्रु का विनाश हो जाय” और इस इच्छा की पूर्ति के लिए हम भगवान से प्रार्थना करने लगे तो इसकी पूर्ति के लिए भगवान का आश्रय मिल सकना असंभव है। प्रभु में किसी के प्रति शत्रुता अथवा द्वेष की कल्पना ही नहीं की जा सकती। उनकी दृष्टि में कोई भी पराया नहीं है। फिर वे द्वेष किससे करें? इसलिए किसी का अहित चाहने की प्रार्थना पर प्रभु कभी ध्यान नहीं दे सकते। अतः कभी हमारे मन में किसी के प्रति विरोध का भाव उत्पन्न भी हो तो उसको अन्य प्रकार से प्रकट करना चाहिए। हमको भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमारा यह विरोधी तो हमसे शत्रुता रखता है, उसका हृदय विशुद्ध हो जाय और वह हमसे प्रेम करने लगे।” ऐसा करने से उस प्रार्थना का परिणाम शुभ हो सकता है।
8- मन से यह धारणा निकाल देनी चाहिए कि भगवान हमारी प्रार्थना से दबकर (जैसे खुशामद से साँसारिक अधिकारी प्रसन्न हो जाते हैं) हमारा उद्देश्य पूरा कर देंगे। प्रभु का मंगलमय विधान तो निश्चित है। वह अनादिकाल से एक निश्चित क्रम से चल रहा है। वे इससे हेर-फेर नहीं करते। हाँ इतना अवश्य है कि जब वे हम पर कृपालु होते हैं तो हमारी मति को बदलकर सत्य और न्यायानुकूल मार्ग पर ला देते हैं।
9- प्रार्थना से पूर्व कुछ देर तक अपनी इच्छित वस्तु का प्रसन्नता पूर्वक स्मरण करते रहें और अपनी हृदय की भाषा में भगवान से उस संबंध में प्रार्थना करें। किसी के द्वारा सिखाई गयी भाषा में प्रायः कुछ कृत्रिमता आ जाती है, जिससे प्रभु के साथ संयोग होने में देर लगती है। इसलिए अपनी स्वाभाविक भाषा का प्रयोग करना ही उचित है।
10- हमें अपनी इच्छापूर्ति की अवधि और उसके ढंग के संबंध में कुछ न कहना चाहिए। हमारी इच्छित वस्तु कब मिलेगी और किस प्रकार मिलेगी इसे सर्वथा प्रभु की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए।
11- जहाँ तक अधिक से अधिक संभव हो, हम प्रार्थना करते रहें, पर यह बात प्रभु के अतिरिक्त और किसी पर प्रकट होनी उचित नहीं।
अगर हम इस विधि से प्रार्थना करेंगे तो हमको उसका परिणाम शीघ्र ही दिखलाई पड़ने लगेगा। इतना ही नहीं हमारे हृदय, मन, प्राण में प्रभु की दिव्य ज्योति भरने लगेगी। तब हम प्रार्थना के असली स्वरूप भगवत् प्रेम के निकट पहुँच जायेंगे और सब विषयों से मन को हटाकर प्रभु की प्राप्ति के लिए ही प्रार्थना करने लगेंगे।
अमेरिका के भूतपूर्व सर्वोच्च सेनापति जनरल डगलस मैकार्थर की मेज के ठीक सामने सुँदर फ्रेम में मढ़ा हुआ एक सुभाषित सदैव टंगा रहता है, जिसे पढ़कर किसके हृदय में साहस, विश्वास और स्फूर्ति का संचार नहीं होगा।
“यौवन जीवन का कोई नियत समय नहीं अपितु मन की स्थिति है, इच्छा का उद्वेग है, कल्पना की विशिष्टता है, अनुभूतियों का प्राबल्य है, भीरुता पर पराक्रम का प्रभुत्व है, आलस्य के प्रति प्रेम की अपेक्षा साहसिक कार्यों की भूख है।”
“अधिक वर्षों तक जीने से ही कोई वृद्ध नहीं हो जाता। लोगों पर बुढ़ापा तभी आता है जब वे अपनी इच्छा शक्ति का त्याग कर बैठते हैं। आयु शरीर पर झुर्रियाँ डाल देती है। किंतु उत्साहहीनता आत्मा पर झुर्रियाँ डालती है। चिंता, संदेह, आत्म-संशय, भाग्य और निराशा ही वे लम्बे-लम्बे वर्ष हैं जो सिर को झुकाकर विकासोन्मुख आत्मा को मिट्टी में मिला देते हैं।”
“सत्तर का हो अथवा सत्रह का-प्रत्येक के हृदय में रहस्यों के प्रति आश्चर्य तथा नक्षत्रों और नक्षत्रों जैसी वस्तुओं के प्रति मधुर आकर्षण होता है। तभी वह घटनाओं की निर्भीक चुनौती को बच्चों की अतृप्त जिज्ञासा के समान उल्लास और जीवन की क्रीड़ा समझता है।”
“तुम उतने ही जवान हो जितना तुम्हें विश्वास है, और उतने ही बूढ़े हो जितना तुम्हें संदेह है।” “तुम उतने ही जवान हो जितनी तुममें आत्मदृढ़ता है और उतने ही बूढ़े हो जितना तुम्हें भय है।”
“तुम उतने ही जवान हो जितनी तुम्हारी आशा है और उतने ही बूढ़े हो जितनी तुम्हारी निराशा है।” जब तक इस पृथ्वी पर तुम्हारा हृदय, सौंदर्य, उल्लास, साहस, वैभव और शक्ति का संदेश मनुष्य और निस्सीम से प्राप्त करने में समर्थ है तब तक तुम जवान हो।
“जब सारे तंतु ढीले पड़ गये हों और तुम्हारे हृदय का केन्द्र स्थान नैराश्य के शीत और कटुता की बर्फ से ढ़क गया हो तभी तुम्हें अपने को बूढ़ा समझना चाहिए और तब परमात्मा तुम पर अपनी कृपा करें। “
(श्री विष्णु दत्त शर्मा)
धर्म का अर्थ है-धारण करने वाला। जो उपदेश या विचार समाज को आचार और नीति पर चलने का मार्ग बतलाता है और उसे पतित होने से रोकता है वही धर्म है। देवी-देवताओं की पूजा या विश्वास को ही हमारे प्राचीन दार्शनिकों ने धर्म नहीं कहा है। व्यास जी ने धर्म की जो व्याख्या की है वह अधिकाँश बुद्धिमूलक और तर्क सम्मत है। महाभारत के अंत में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि “धर्म ही अर्थ और काम की जड़ है, धर्म ही नित्य है, उसी का आश्रय लेना चाहिए।”
व्यास जी ने महाभारत में जगह-जगह इस बात पर विशेष बल दिया है कि मनुष्य किसी जाति या वर्ण में जन्म लेने से उच्च नीच नहीं बन जाता वरन् आचार और कर्म के आधार पर ही उसके संबंध में निर्णय करना चाहिए। ‘वन पर्व’ में नाग राज और युधिष्ठिर का संवाद इस दृष्टि से बड़ा महत्वपूर्ण है। नाग ने पूछा-
‘हे राजन! ब्राह्मण कौन है?’ युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-हे नागराज! सत्य, दान, क्षमा, शील, सहृदयता, तप, दया जिसमें दिखायी पड़े वही ब्राह्मण है। नाग ने फिर पूछा-’हे युधिष्ठिर! लोक में चातुर्वर्ण्य का प्रमाण माना जाता है। यदि किसी शूद्र में आपके कहे हुए गुण पाये जायें तो क्या उसे ब्राह्मण माना जायेगा?।’
युधिष्ठिर ने उत्तर दिया-”‘भाई, शूद्र में ऐसे लक्षण और सदाचार हों तो वह शूद्र नहीं रहा। ब्राह्मण वही है-जिसका चरित्र श्रेष्ठ है। जिनमें चरित्र का अभाव है वह तो शूद्र ही होते हैं।”
नाग इस विषय में और भी स्पष्ट और अपरिवर्तनीय उत्तर सुनना चाहता है। इसलिए उसने शंका की कि “यदि चरित्र से ही ब्राह्मण होता है तो फिर बिना कर्म या चरित्र के जाति विभाग व्यर्थ ही समझना चाहिए।”
प्रश्न बहुत गंभीर था और सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से उसका महत्व भी असाधारण था। तो भी युधिष्ठिर ने बिना किसी संकोच के कहा-”हे नाग, यहाँ जात-पाँत है ही कहाँ? ऐसी कोई जाति नहीं बतलाई जा सकती जिसमें वर्ण-शंकरता का दोष न हो। वर्णों की आपसी मिलावट को देखते हुए मेरी राय में तो किसी जाति की ठीक पहचान की बात उठाना ही व्यर्थ है। इसलिए तत्वदर्शी विद्वानों ने शील को ही मुख्य माना है। जन्म के बाद अपने-अपने वर्ण के अनुसार जाति-कर्म आदि संस्कार भी किये जायें, परंतु अगर किसी में चरित्र नहीं है तो मैं वर्ण शंकर की स्थिति में ही समझूँगा। इसी विचार से मैंने आरंभ में ही यह कहा था कि जिसमें उत्तम चरित्र है वही ब्राह्मण समझा जाना चाहिए।”
भारत के सर्व प्रधान शास्त्राकार व्यास के ये शब्द भारतीय संस्कृति के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालने वाले हैं। यह कहा जा सकता है कि निजी स्वार्थ का प्रश्न सामने आने पर ब्राह्मण समुदाय के एक बड़े भाग ने इनको कार्य रूप में परिणित नहीं किया पर सिद्धाँत रूप में किसी महापुरुष ने इनके खण्डन में मुँह नहीं खोला। भगवान शंकराचार्य जैसे आत्मतत्व की एकता के प्रचारक भी पहले अपने जन्म स्थान (मलावार प्राँत) के संस्कारों वश व्यवहार में छुआछूत का विचार रखते थे। पर जब वे काशीपुरी में आये और यहाँ किसी मेहतर-महत रानी को देखकर स्वभावतः ‘हटो-बचो’ करने लगे तो काशी के ज्ञानाधिदेवता शिव उसे सहन न कर सके और उन्होंने उसी चाण्डाल के मुख से उनको फटकार बतलाई।
“हे श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने मिट्टी के शरीर से मेरे इस मिट्टी के शरीर को हटाना चाहते हो या अपने आत्मा को मेरे आत्मा से दूर करना चाहते हो? किस नीयत से हटो-बचो करते हो?”
“ज्ञात होता है, तुम्हारा शरीर गंगाजल है उसमें जो सूर्य की परछांई पड़ रही है। वह मुझ चाण्डाल की मड़ैया के जल में पड़ने वाली परछांई से अवश्य भिन्न है?”
“तुम्हारे पास सोने का घर है और मेरे पास मिट्टी की हाँडी ही है। मालूम होता है इनके खोखले भागों में दो भिन्न प्रकार के आकाश हैं।”
“घट-घट में बसने वाला जो आत्मरूप सहजानंद ज्ञान का समुद्र है, उसमें भी तुम्हारा ब्राह्मण चाण्डाल का भेद अभी तक नहीं मिटा।”
“मैं कौन हूँ, यह जानते हो? जागते सोते इस देह में से जिस निर्मल चैतन्य की किरणें फूटती रहती हैं, ब्रह्म से लेकर रेंगने वाली चींटी तक के शरीर में रमता हुआ जो इस जगत की साखी भरता है, वही मैं हूँ। “
“इस प्रकार की स्थिर बुद्धि यदि है तो गुरु बन चाण्डाल अथवा ब्राह्मण भेद की बुद्धि को छोड़ दे।”
इसी प्रकार और भी अनेक संत महात्माओं ने चरित्र की उच्चता को स्वीकार करते हुए मनुष्य मात्र की समानता का अनुमोदन किया है। भक्तिमार्ग वालों ने भी अजामिल, यवन, वेश्या आदि के उपाख्यानों द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से जाति श्रेष्ठता पर कुठाराघात किया है। कृष्ण भक्ति के अनुयाइयों ने रसखान आदि जन्म के मुसलमानों को पूजनीय स्थान देकर इसी भाव की वृद्धि की है।
इधर लगभग एक शताब्दी से जगत में मानवता और राष्ट्रीयता का प्रभाव बढ़ रहा है और जो धर्म उनके प्रतिकूल जान पड़ते हैं उनकी तरफ से जनता में विरक्ति का भाव उत्पन्न हो रहा है। अनेक विचारकों ने धर्म और राष्ट्रीयता को सम्मिलित करके भारत के प्राचीन उद्गम सिद्धाँतों की घोषणा की और स्पष्ट शब्दों में बतलाया कि अछूतपन हिंदू धर्म और समाज के लिए कलंक स्वरूप है। यह भारतीय संस्कृति का अंग नहीं वरन् बाहर से आया हुआ दोष है। अस्पृश्यता विरोधी विद्वानों ने मानव मात्र की समानता का प्रतिपादन पूर्णतया वेदों और शास्त्रों द्वारा किया जिसके फल से शास्त्रों की दुहाई देकर जनता को बहकाने वाले लोगों का जोर बहुत कम पड़ गया। तो भी बहुत थोड़े लोगों को छोड़कर व्यवहारिक रूप से छुआछूत का त्याग जनता न कर सकी। इस कार्य की पूर्ति महात्मा गाँधी के आन्दोलन ने की। उन्होंने कहा कि अस्पृश्यता मनुष्य के लिए कलंक स्वरूप है और हिंदू समाज में कोढ़ की तरह लगी है। यह मानवता की दृष्टि से ही इतना बड़ा पाप है कि इसके खण्डन के लिए किसी शास्त्रीय प्रमाण की जरूरत नहीं। जो समाज का कोढ़ है उसे हटाये बिना समाज स्वस्थ नहीं हो सकता। अस्पृश्यों पर दया करके अस्पृश्यता के रोग को हटाने का प्रश्न नहीं है। अछूतपन को मानकर हिंदू समाज ने जो बहुत बड़ा पाप कमाया है उसका प्रायश्चित तभी होगा जब हिंदू स्वयं पूर्णतया इसे त्याग दें। गाँधी जी ने इस बात पर इतना अधिक जोर दिया और राष्ट्रीय आँदोलन की सफलता के लिए इसे एक ऐसी अमिट शर्त के रूप में पेश किया कि यह आँदोलन शीघ्र ही देशव्यापी हो गया और उसे बड़ा बल प्राप्त हो गया।
व्यास से लेकर महात्मा गाँधी तक सभी भारतीय विचारकों ने मानवीय समानता का समर्थन किया है और यही वास्तव में भारतीय संस्कृति का आदर्श है। बीच में अनेक सामाजिक कारणों से और विशेषतः विदेशी समुदायों के आगमन से जिनमें दास प्रथा का प्रचलन भी था, यहाँ इस कुप्रथा का बीजारोपण हो गया, पर जैसे ही इसके कुफल सम्मुख आने लगे हमारे सामाजिक कर्णधारों ने उसका खंडन कर दिया और समाज को उचित चेतावनी दे दी। संतोष का विषय है कि आज भारतीय समाज उस कलंक से मुक्ति प्राप्त करके पुनः अपने प्राचीन आदर्श पर अग्रसर होने लगा है।
(प्रो. रामचरण एम.ए. महेन्द्र)
सत्य सेवन तथा सदाचार सम्पन्नता के मध्य में सौंदर्योपासना नामक कलात्मक ध्येय का भी स्थान है। सौंदर्योपासना करने का अधिकार बुद्धि और अन्तःकरण दोनों को समान रूप से प्राप्त है। युग की तथा देश की बढ़ती हुई माँग यह है कि सत्य सदाचार के साथ-साथ भारतीय युवक जीवन की अहिंसक पुनर्रचना में सौंदर्योपासना को भी स्थान दें।
सच्चा सौंदर्योपासक कौन है? वह भलाइयों तथा अहिंसा के सात्त्विक सौंदर्य का पारखी होता है। अपने दैनिक तथा व्यावहारिक जीवन में इस सौंदर्य को प्रत्यक्ष करता है। सच्ची सौंदर्य उपासना में सभी कुछ आ जाना चाहिए। शील, चरित्र सुरुचि। जो अश्लील है वह अहितकर है, अवाँछनीय है, अतएव कुरूप है। उसका बहिष्कार होना चाहिए। इसके विपरीत जो शीलयुक्त एवं संयत है, सदाचार तथा चरित्र को उज्ज्वल एवं प्रशस्त करने वाला है, वह श्लाघनीय है अतएव सुँदर है। वह व्यक्ति सुँदर है, जो सदा सर्वदा शुभ्र, हितैषी एवं उत्तमोत्तम विचारों में मग्न रहता है, सात्विक कार्य करता है, पवित्र वाणी का उच्चारण करता है। उत्तम स्थानों में रमण करता है, जिसकी मनोवृत्तियों का प्रवाह सदैव पवित्रता की ओर उन्मुख रहता है। रस्किन कहा करते थे कि मनुष्य के चरित्र की बुनियाद सौंदर्य पर कायम रहनी चाहिए। किंतु यह सौंदर्य बाह्य नहीं आँतरिक होना अनिवार्य है। सौंदर्य अच्छाइयों को स्वभावतः देखता है, शीलगुण का आदर करता है और सात्विक दैवी गुणों में जीवन तत्व का निर्माण करता है।
सौंदर्य का अर्थ शारीरिक बनाव, शृंगार, क्रीम, पाउडर, अश्लील गायन, गंदा नृत्य, व्याभिचार नहीं है। यह तो वासना का प्रदर्शन है। इसी प्रकार के निंद्य प्रदर्शन करना, सिनेमा के कुत्सित चित्रों का अनुकरण कर नाचते गाते फिरना, सौंदर्य का उपहास करना है। यह सौंदर्य के नाम पर दानवता का प्रचार है। सौंदर्य का यह बड़ा गंदा स्वाँग है। जिनके मन में वासना का भयंकर नृत्य है इच्छा की उद्दंडता है, व्यभिचारी प्रवृत्तियों का नरक है। वह बाहर से चिकना, चुपड़ा आकर्षण होते हुए भी असुँदर है। अनंत शृंगार से विभूषित गणिका असुँदर तथा बाह्य कुरूपता लिये हुए है। प्रेम-स्निग्ध पतिव्रता पत्नी सौंदर्यवती है। सौंदर्य उत्तम सात्विक भावना का विषय है।
एक वृत्तांत है कि महापुरुष ईसा अपने कुछ शिष्यों सहित वायु सेवनार्थ जा रहे थे। मार्ग में एक स्थान से घृणित बदबू आई। शिष्यों ने नाक में कपड़ा ठूँस लिया। कुछ दूर चलने के बाद रास्ते में एक मरा हुआ कुत्ता पड़ा दिखायी दिया। उस पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। लहू बह रहा था, पास से निकलते हुए बुरा लगता था। शिष्यगण, घृणासूचक शब्द उच्चारण करते हुए एक ओर को निकलने लगे किंतु महात्मा ईसा रुक गये। उन्होंने बड़ी ममता से मृत कुत्ते को हाथ से उठाया। उनके नेत्रों से दया तथा ममता के कारण प्रेमाश्रु बहने लगे। उन्होंने बड़ी ममता से कुत्ते को सड़क के एक किनारे पर लिटा दिया और बोले-कितने सुँदर हैं इसके दाँत।
हम बुरे स्थान में ही अपने काम की सात्विक वस्तु देखें। ईसा सच्चे अर्थों में सौंदर्योपासक थे। उनकी सूक्ष्म दृष्टि में सौंदर्य ही सदाचार का मूल था।
सूक्ष्म दृष्टि से विचारने पर हमें दो प्रकार का सौंदर्य उपलब्ध होता है। एक बाह्य सौंदर्य तथा दूसरा आँतरिक सौंदर्य। हम बाह्य सौंदर्य को बुरा नहीं कहते। हमें चाहिए कि हम दैनिक जीवन के अधिक से अधिक अंगों में सौंदर्य का उपयोग करें, अपने शरीर को स्वच्छ सुँदर रखे, आकर्षक बनायें। अपना गृह स्वच्छ तथा सुँदर रक्खें, अपनी निजी वस्तुओं-उद्यान, कुण्ड, देवालय, विद्यालय, पुस्तकों सभी को सुँदर रखें। अपनी कलात्मक अभिरुचि का परिचय दें। प्रत्येक स्त्री-पुरुष की यह स्वाभाविक रुचि होती है कि मैं खूब सुँदर लगूँ। राष्ट्रों तथा समाजों में भी यही बात है।
किंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारी सौंदर्य भावना का अंत यही न हो जाय। यह बाह्य प्रदर्शन आँतरिक अनुभूति का प्रदर्शन होना चाहिए। बाह्य सौंदर्य के पश्चात सौंदर्य भावना की दूसरी उत्कृष्ट भूमिका आती है। यह है आँतरिक या आत्मिक सौंदर्य। आत्मिक सौंदर्य ही वास्तविक तथा स्थायी सौंदर्य है। महात्मा गाँधी जी का सहज सौंदर्य आत्मिक सौंदर्य ही है। सच्चे सौंदर्य पारखी को सौंदर्य की विभिन्न स्थितियों को पार कर यहीं आकर रुकना चाहिए।
रस्किन ने सौंदर्योपासना के इस तत्व को स्पष्ट करते हुए लिखा है-”हम देखते हैं कि आजकल के युवक रसिकता की वृद्धि के लिए जितना प्रयत्न करते हैं, उतना शील संवर्धन के लिए नहीं करते।” आजकल के स्त्री-पुरुष चाहते हैं कि हम नाच सकें, गा सकें, अच्छे चित्रों पर अपनी राय दे सकें, कला पर कुछ बोल सकें इत्यादि। उनकी यह चाह योग्य है, किंतु यदि उनमें इतनी ही चाह है, तो मैं कहूँगा कि उनकी चाह अधूरी है। मैं चाहता हूँ कि इन कलाओं की आत्मा जो सदाचार सम्पन्नता है, उसकी ओर तरुण स्त्री-पुरुषों का ध्यान आकर्षित करूं। जब तक मनुष्यों को आँतरिक सौंदर्य की प्रतीति नहीं हो जाती, तब तक यह नहीं कहा जा सकता के उनका मन सच्चे अर्थों में सुसंस्कृत हो गया है।”
वास्तव में बिना सदाचार की नींव रक्खे आत्मिक सौंदर्य मिलना कठिन है और बिना इस आंतरिक सौंदर्य के सौंदर्योपासना करना अग्नि से खिलवाड़ करना है।
(श्री ज्वालाप्रसाद गुप्त, एम.ए., एल.टी., फैजाबाद)
शास्त्रों में कर्म की महिमा अच्छी तरह गाई गई है। दर्शन तथा विज्ञान शास्त्र आदि सभी यही बताते हैं कि यह संसार कर्म मूल है। सभी साँसारिक जीव कर्मरत हैं। क्या जड़ चेतन सभी कर्मपाश में बँधें हैं। इस अपार संसार में आलस्य के लिए कोई स्थान नहीं। सूर्य, चंद्र, तारे, पृथ्वी तथा ग्रहों आदि को देखो, किस प्रकार अपने निरंतर कर्म में अहर्निशि तल्लीन रहते हैं। जिसमें जितनी शक्ति है उसे उसी के अनुसार कार्य करना है। कर्म की अभावावस्था का नाम आलस्य है। वास्तव में कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति कभी आलसी नहीं हो सकता। बिना काम किये उसे चैन ही न पड़ेगा। आलसी वे हैं जो अकर्मण्य अर्थात् कर्तव्य की अवहेलना करने वाले हैं। ऐसे लोगों का मस्तिष्क हमेशा पापों और फिजूल बातों ही से भरा रहता है, अंग्रेजी में एक कहावत है-आलसी लोगों का दिमाग शैतान का घर है। जिन्हें अपना कर्तव्य कर्म नहीं सूझता पिशाच उन्हें कुकर्म, ढूँढ़ लेता है। अकर्मण्य और आलसी लोग दिन-रात अप्रसन्न एवं अस्वस्थ रहा करते हैं। इसके विपरीत काम करने वाले सदा प्रसन्न और स्वस्थ रहते हैं। काम करने से केवल शरीर को ही सुख नहीं मिलता, बल्कि मन को भी यथेष्ट शाँति और सुख प्राप्त होता है। जो लोग यह कहते हैं कि मुझे तो कोई काम ही नहीं, क्या करूं यह उनकी भारी भूल है। राजा प्रजा, संन्यासी, गृहस्थ, अध्यापक, विद्यार्थी, माता-पिता तथा संतान नौकर और मालिक आदि जितने भी व्यक्ति हैं अधिकार भेद तथा शक्ति और अवस्था के अनुसार सब के कर्तव्य की सीमा निर्दिष्ट है। जो अपना काम नहीं करता, दूसरों का सहारा ढूँढ़ता है, वह आलस्य में पड़कर अपने को निकम्मा बनाता है।
किसी पदार्थ के रक्खे-रक्खे नष्ट होने की अपेक्षा उसका किसी काम में लगकर नष्ट होना अच्छा है। इसी प्रकार किसी काम में मन और शरीर को उलझाकर जीवन व्यतीत करना आलस्य में पड़े रहने से कहीं बढ़कर है।
एक प्रसिद्ध विद्वान एर्मसन ने कहा है कि प्रकृति की प्रेरणा मनुष्यों के प्रति यही है कि परिश्रम का मूल्य तुम पाओ चाहे न पाओ, पर कर्म (सत्कर्म) बराबर करते जाओ। तुम जो कर्म करोगे उसका पुरस्कार कभी न कभी तुम्हारे हाथ जरूर आयेगा। तुम हल्का काम करो या भारी, खेती करो या महाकाव्य लिखो, कोई काम क्यों न हो, योग्यता के साथ सम्पन्न करो। प्रथम तो उस काम के सम्यक् सम्पन्न होने से तुम्हारा चित्त प्रसन्न होगा, नयनादि इंद्रियगण तृप्त होंगे। इसी को पुरस्कार समझो। यदि इस काम से तत्काल विशेष लाभ न हो तो इससे अधीर न हो, किसी न किसी दिन तुम्हें अपने कर्म का यथेष्ट फल मिल ही जायेगा। किया हुआ कोई काम कभी निष्फल नहीं होता। किसी अच्छे काम को तुम भली-भाँति पूरा कर सकोगे तो वही तुम्हारे लिए पुरस्कार होगा।
उन कामों को भूलकर भी न करो जो नीति विरुद्ध हो। याद रक्खो, जो काम बुरा है उसका परिणाम कभी अच्छा नहीं हो सकता। बबूल के पेड़ में आम कभी नहीं फल सकता। बुरे काम का अंतिम फल परिताप ही है। अपकर्म करने से शारीरिक और मानसिक अनेक हानियाँ होती हैं। अपकर्मियों का सभ्य समाज में कहीं और कभी भी आदर नहीं होता और उन्हें सब लोग घृणा की दृष्टि से देखते हैं।
कोई भी काम जो शारीरिक या मानसिक परिश्रम से सम्बंध रखता हो और लोकोपकारी अथवा जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक हो कदापि बुरा नहीं कहा जा सकता। यदि वह ईमानदारी व सच्चरित्रता के साथ संपादित किया जाय। इस प्रकार कुली का काम, किसान का काम, शाक भाजी बेचने का काम, क्लर्क का काम, ट्यूशन का काम, बढ़ई, कुम्हार, लोहार आदि का काम कदापि निन्द्य नहीं है। नीचता, निंदा तथा कलंक तो उन्हीं कामों को करने में है जो बुरे और नीति विरुद्ध हों। काम करने की योग्यता और शक्ति रखने पर दूसरे का आश्रित होना नीचता ही है। इस संबंध में एक कहानी उल्लेखनीय है।
एक समय एक बंगाली बाबू इंग्लैंड से लौटकर स्विट्जरलैंड देश देखने गये। वे वहाँ एक बड़े रेलवे स्टेशन पर उतरे और एक कुली को पुकारा। कुली ने आकर उनका सामान उठाया। बंगाली महोदय ने उससे किसी होटल में ले चलने को कहा और वह उनको अपने साथ लेकर चला।
रास्ते में उस कुली ने उनसे पूछा-”महाशय आप किस देश के रहने वाले हैं? आपका स्वरूप देखकर यह नहीं मालूम होता कि आप किस देश के निवासी हैं।”
बाबू-मैं तो भारतवर्ष का निवासी हूँ।
कुली-मैं आपसे कुछ बात और पूछना चाहता हूँ। क्या आप मेरे प्रश्नों का उत्तर देने की कृपा करेंगे।
बाबू-हाँ, हाँ पूछो। मैं यथासाध्य अवश्य उत्तर दूँगा। तब कुली निर्भय होकर उनके साथ वार्तालाप करने लगा। कुली की विद्वतापूर्ण बातें सुनकर बाबूजी ने आश्चर्य से कहा-”तुम पढ़े-लिखे मालूम होते हो, फिर कुली का काम क्यों करते हो?”
कुली ने कहा-कोई काम न मिलने पर दूसरे का आश्रित और कंटक रूप होने की अपेक्षा मैंने कुली का काम करना अच्छा समझा। आज मैं कुली का काम कर रहा हूँ परंतु कोई दिन ऐसा भी आ सकता है कि मैं पार्लमेण्ट का सभापति हो सकूँ।
स्विट्जरलैंड का कुली विद्वान होते हुए भी कोई उपयुक्त काम न मिलने पर गठरी ढोकर जीवन निर्वाह करना अच्छा समझता है। परंतु दूसरे का आश्रित और कंटकरूप होना नहीं चाहता। क्या यह बड़प्पन की बात नहीं है।
संसार की जितनी भी उन्नतिशील जातियाँ हैं, सबने निर्विवाद कर्म का महात्म्य स्वीकार किया। भारतवर्ष की तरह अमेरिका और यूरोप में भीख माँगने की प्रथा नहीं है और वहाँ भीख लेना जैसा लज्जाजनक और हीनतासूचक कार्य समझा जाता है, वैसा ही भिक्षा देना भी आलस्य को सहारा देना कहकर बहुत ही बुरा समझा जाता है। इसलिए उक्त देशों में किसी को भिखारी कहना सख्त गाली समझी जाती है। अमेरिका के बड़े-बड़े कालेजों के कितने ही निर्धन विद्यार्थी गर्मी की छुट्टियों में गाड़ी हाँककर, धर्म मंदिरों में घंटा बजाकर, होटलों में बर्तन साफ कर, नाट्यशाला में भाग लेकर तथा और भी ऐसे कितने काम करके रुपया कमाते और उन रुपयों से कालेज का खर्च चलाते हैं। इसमें वे लोग लज्जा नहीं समझते। परंतु दूसरे का कंटकरूप होना अथवा उपार्जित धन सहायता के रूप में लेना वे अवश्य महान लज्जा का विषय समझते हैं।
खेद है कि हमारे इस आलस्य प्रधान भारत देश के निवासियों में यह भाव जाग्रत नहीं होता, इसलिए वे अकर्मण्यता और आलस्य को घृणित नहीं समझते। याद रहे कि मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु आलस्य ही है। “आलस्यंहि मनुष्याणाँ शरीरस्थो महारिपुः।”
हमें चाहिए कि हम किसी समय भी बेकार न बैठें। संसार का इतिहास कर्म योगियों के इतिहास से भरा है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कर्म की प्रधानता पर अर्जुन को उपदेश दिया है। जनक आदि ने कर्म करके ही सिद्धि पायी है। हमारे महान नेताओं ने अपने जीवन के एक-एक पल का सदुपयोग किया है। हमारे प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू अपने इस 67 वर्ष की अवस्था में भी नित्य 18 घंटे कार्य करते हैं। अतः हमारा सच्चा धर्म यही है कि आलस्य त्याग कर कर्मवीर बनें।
संसार में सभी जीव ईश्वर के बनाये हुए हैं। पर उनमें सर्वश्रेष्ठ मनुष्य योनि है, इसका मुख्य कारण मनुष्यों में ज्ञान है। हमारे धर्म ग्रंथों में लिखा है कि -”आहार निद्रा, भय, मैथुनादि सब जीवों और मनुष्यों में बराबर हैं, परंतु एक ज्ञान ही ऐसा है जो मनुष्यों में अधिक है। अतः ज्ञान शून्य मनुष्य भी पशु है। प्रत्येक जीव को सबसे प्रथम आहार की ही आवश्यकता पड़ती है। अतएव विचारणीय प्रश्न है कि इस संबंध में कैसा ज्ञान होना चाहिए। प्रकृति ने जिन जीवों के लिए जो वस्तु उपयोगी समझी वह उनके शरीर में सृष्टि करते समय ही बना दी।”
मनुष्य के नवजात शिशु के लिए दाँत बनाना अनुचित समझा तो उन्हें बे दाँत पैदा किया और जिनके लिए दाँत दिये जैसे शाकाहारी मनुष्यों के लिए छोटे-छोटे दाँत और माँसाहारी जीवों के लिए बड़े-बड़े दाँत। बिल्लियों की आँख में ऐसी शक्ति दी कि वह रात में अपने भोजन (चूहे) को देख सकें और उसके पाँव में ऐसी शक्ति दी जिसका आहट चूहे न सुन सकें। सिंहादिक प्राणियों की रीति भाँति तथा आकृति और स्वभाव मनुष्यों की रीति भाँति और आकृति से विलक्षण ही है। उनके दाँतों और नखों की रचना मनुष्य के नख और दाँतों से बहुत ही भिन्न है। सिंहादिकों के दाँत ऊँचे और बड़े तीक्ष्ण शस्त्र की तरह होते हैं और वह अपने दाँतों से हड्डी तथा कच्चे माँस को भी चबा डालते हैं। उनकी जठराग्नि ऐसी तीव्र होती है जो कि कच्चे माँस और हड्डी को भी भस्म कर डालती है। यह बातें मनुष्यों में नहीं पायी जातीं। बंदर की रीति भाँति और आकृति कुछ-कुछ मनुष्य से मिलती-जुलती है। वह कितने ही दिनों का भूखा क्यों न हो तब भी माँस कदापि न खायेगा। इसी प्रकार जिस जिले या प्राँत के लिए जो वस्तु लाभकारी समझी उसकी पैदावार वहाँ प्रकृति ने अधिक कर दी। जैसे पंजाब में गेहूँ, मारवाड़ में बाजरा, बिहार, बंगाल में चावल और तेल।
यदि प्रकृति मनुष्यों के लिए माँस अधिक उपयोगी समझती तो मनुष्यों के भी बड़े-बड़े दाँत माँस भक्षण योग्य बना देती। इसलिए मानना पड़ेगा कि सृष्टिकर्ता परमात्मा ने मनुष्यों को माँस भक्षण की आज्ञा नहीं दी है। वास्तव में भिन्न-भिन्न प्रकार के भोजन ही सर्वश्रेष्ठ हैं, जो ताकत चना, गेहूँ, मेवा, शाक, फल और दूध में है वह ताकत माँस और माँस के शोरवे में नहीं है। इसी से हमारे वैद्यक शास्त्र में लिखा है कि गर्भवती स्त्री दूध और घी का सेवन अधिक करे और खट्टी तीखी वस्तुओं को, माँस को छुवे भी नहीं।
बालक पैदा होने के बाद जब तक उसके दाँत न निकल आवें तब तक उसको अन्न कदापि न खिलावें। फिर दाँत निकल आने पर दिन में तीन-चार बार उसको थोड़ा-थोड़ा करके दूध का ही सेवन करावें। माँस का और उसके शोरवे का आहार निषिद्ध है। वैद्यक शास्त्र में जितने गुण, दूध, मक्खन और घृत और अन्न तथा फल और शाकादि के सेवन में लिखा है उतने गुण माँस के सेवन में नहीं लिखा है बल्कि माँस सेवन के बड़े दोष लिखे हैं। इंग्लैण्ड आदि में भी बहुत से लोगों ने माँस खाना छोड़ दिया है। इसी वास्ते उन देशों में बहुत से फलहारी होटल खुल गये हैं। धर्म ग्रंथों में लिखा है कि जो स्त्री पुरुष माँस आदि अभक्ष्य भोजन का सेवन करते हैं वह मर कर राक्षस या पिशाच अथवा भूत योनि में जन्म लेते हैं और उनकी संतान भी क्रूर स्वभाव तथा दुराचारी उत्पन्न होती है। इस वास्ते कभी भी माँस आदि अभक्ष्य भोजन का सेवन नहीं करना चाहिए।
जितने भी पहलवानी सीखने वाले हैं वह सब रात्रि में कच्चे चने को धोकर पानी में भिगो देते हैं। और सवेरे व्यायाम करने के पश्चात उन चनों को चबाकर ऊपर से उसका पानी पी लेते हैं। कच्चा चना और उसका पानी बल को बढ़ाता है। आज तक कोई भी पहलवान कसरत करके माँस खाते नहीं देखा गया है। इससे सिद्ध हुआ कि केवल एक अन्न चने के बराबर भी माँस में गुण नहीं है। जो लोग मछली आदि खाने वाले हैं उनके पसीने से मछली आदि की दुर्गन्ध आती है, शारीरिक बल भी उनमें कम होता है, क्योंकि उनका बदन ढीला रहता है। जिन देशों में मछली और भात ही खाया जाता है, गेहूँ चना इत्यादि नहीं उन देशों के मनुष्य फौज में भरती नहीं किये जाते। इन देशों के मनुष्य जिस प्रकार से शारीरिक उन्नति नहीं कर पाते उसी तरह यह लोग आत्मिक उन्नति भी नहीं कर सकते। क्योंकि इनकी बुद्धि माँस खाने से अति मंद तथा स्थूल हो जाती है।
संसार में सबसे अधिक चित्त को मलिन करने वाली दो वस्तुएं माँस तथा मद्य है। इसलिए उक्त दोनों के सेवन करने वालों का योग और वेदाँत में अधिकार का निषेध है। हम लोगों के आर्य ऋषिगण भी विशेष परीक्षा द्वारा निरामिष भोजन को ही सर्वश्रेष्ठ पाकर सभी धर्म ग्रंथों में विशेष रूप से इसकी व्यवस्था कर गये हैं। और वेद मंत्रों में भी माँस भक्षण का निषेध है-
न हिंस्यात्जर्वाभूतानि। पशून्याहि। (यजु. अ.1)
अर्थात् किसी भी जीव की हिंसा न करो। पशुओं की रक्षा करो।
द्रष्ट हिंसायाम-प्राणि हिंसायाँ सत्याँमद्भोजनं तद्दुष्टम्
(वैशेषिक सूत्र) अर्थात् प्राणियों की हिंसा के होने पर जो भोजन बनता है वह भोजन दुष्ट होता है।
ना कृत्वा प्राणि हिंसा माँस मुम्पद्यते कचित्। न च प्राणि वधः स्वर्ग्यस्तस्मान्माँस विवर्जयेत्॥
मनु. अ. 5॥ 48॥
अर्थात् प्राणियों के मारे बिना कहीं माँस उत्पन्न नहीं होता और प्राणियों का मारना स्वर्ग का कारण नहीं है किंतु नरक ही का कारण है। अतः माँस को छोड़ देवें।
मासिमास्यश्वमेधेनयो यजेतयुधिष्ठिर। न खाद यतियो माँस सम मेतन्मतंमम् ॥ न भक्षयतियो माँस न चहन्यान्न घातयेत । तन्मित्रं सर्वभूतानाँ मनुः स्वायं भुवोऽव्रवीत॥
(महाभारत)
अर्थात् प्रतिमास जो पुरुष अश्वमेध यज्ञ को करता है, हे युधिष्ठिर? और जो पुरुष किसी भी यज्ञ को न करे परंतु माँस को नहीं खावे तो दोनों फल बराबर हैं। जो माँस को नहीं खाता है, और न किसी भी जीव को मारता है न दूसरे को मारने देता है, स्वयं भू मनु कहते हैं, वह सम्पूर्ण भूतों का मित्र है।
मुसलमानी मत में भी जीवों को मारना वर्जित है। जैसा कि कहा गया है-
मैखुरों मसह.फ बसो जो आतश अंदर काबा जनू। साकने बुत खाना वाशी मर्दम आजारी मकुन । 1।
मवाश दूर पर आजार हर चखाई कुन । के दर तरीक तेमाँ जुज अजीं गुनाहे नेस्रा । 2।
इसका साराँश यह है कि -”जो पाप शराब पीने और काबा में आग लगाने आदि में है उससे कई गुना पाप जीवों को मारने में है। अतः किसी जीव को दुःख मत दो। जीवों को एक भी दुःख मत दो और जो चाहो सो करो क्योंकि हमारे तरीके में इससे बढ़कर कोई गुनाह (पाप) नहीं है।” तब भला बताइये कि माँस खाने के लिए जीव हत्या करने में कितना पाप है।
गुरुनानक जी ने भी माँस खाने का निषेध किया है-
जे रक्र लगे कपड़े जामा होय पलीत। ते रक्त खाये मानसा क्यों होवे निर्मल चीत ॥
अर्थात् यदि किसी पशु या पक्षी का जरा सा भी खून किसी वस्त्र में लग जाता है तब वह वस्त्र अपवित्र हो जाता है। उसी खून का ही माँस बनता है, उसी माँस को जो पुरुष खाते हैं उनका चित्त कैसे शुद्ध हो सकता है अर्थात् कदापि नहीं हो सकता।
हमारे धर्म ग्रंथों में तो यहाँ तक लिखा है कि जो गृहस्थाश्रमी प्रतिदिन अनजान में ओखली कूटने, चक्की पीसने, चूल्हे में आग जलाने, झाडू देने तथा जल इत्यादि से जो जीव हत्या करता है उस पाप प्रायश्चित के लिए प्रतिदिन पंच महायज्ञ करना चाहिए। जैसा कि-
कण्डनी मेषणी चुल्ली उदू कुम्मी च मार्जनी। पंच सुना गृहस्थ स्य ताम्यः र्स्वगंन विदन्ति ॥
अतः उपरोक्त पाँच प्रकार से अदृष्ट जीव हिंसा के लिए तो प्रायश्चित लिखा है, और जानकर जीव हिंसा करने वालों का तो सिवाय दूसरे जन्म में बदला देने के कोई प्रायश्चित नहीं है।
सामूहिकता का उपासना क्षेत्र में भी प्रवेश कीजिए।
(पं. श्रीराम शर्मा आचार्य)
गायत्री मंत्र के ‘नः’ शब्द में इस बात का संकेत है कि माता को ‘एकाकीपन’ नहीं सामूहिकता पसंद है। कई व्यक्ति सबसे अलग रहकर अकेले-अकेले धुन-मुन करते रहते हैं। यह प्रवृत्ति चिंतन के लिए थोड़े से क्षणों में तो उपयुक्त हो सकती है पर जीवन के सर्वांगीण विकास में यह अकेलेपन की भावना बड़ी घातक है। यह स्वार्थपरता का ही एक रूप है। पिछले 2-3 हजार वर्षों में यह प्रवृत्ति पनपी और फूट एवं स्वार्थपरता ने बढ़कर राष्ट्र का सत्यानाश कर दिया। ऋषि महर्षियों की घर-घर जाकर धर्म का अलख जगाने परम पुनीत परम्परा का लोप होकर साधु ब्राह्मणों में अकेले अपना भजन करने, दुनिया को स्वप्न व मिथ्या बताकर स्वयं को गुलछर्रे उड़ाने और लोक सेवा के कार्यों से दूर भागने की दुष्ट मनोवृत्ति पनपी फलस्वरूप देश का नैतिक स्तर गिर गया। जनता की धर्म भावनाएँ नष्ट हो गई। क्षत्रिय, आल्हा ऊदल की तरह अपना मान और क्षेत्र बढ़ाने के लिए आपस में लड़ने कटने लगे, फलस्वरूप राजनीतिक विदेशियों की गुलामी गले पड़ी। वैश्यों की कम तौलने, कम नापने, मिलावट करने, खराब घटिया वस्तुएँ देने, ज्यादा मूल्य लेने आदि की कुप्रवृत्ति ने देशी व्यापारियों की ईमानदारी पर से जनता का विश्वास उठा दिया। फलस्वरूप विदेशी व्यापारी मालामाल हो गये। स्वार्थपरता अकेले लाभ उठाने की मनोवृत्ति एक ऐसी नीचता है कि जहाँ भी वह रहेगी वहाँ सत्यानाश उत्पन्न करेगी।
हमेशा बढ़ते वे लोग हैं, जो दूसरों को साथ लेकर चलते है। संगठित रहते हैं, एक-दूसरे को बढ़ाते हैं और मिलजुल कर खाते हैं। सर टामस राने शाहजहाँ की लड़की का इलाज करके बादशाह से मुँह माँगा इनाम यह प्राप्त किया कि मेरे देशवासियों के भाल पर से महसूल उठा लिया जाय। अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को तिलाँजलि देकर अपने समाज को प्रमुखता देने वाले लोग जिस देश में होते हैं वह सर टामस रो के देश इंग्लैंड की भाँति तरक्की कर रहे हैं और जहाँ 56 लाख स्वार्थ परायण साधु संतों के आपस में लड़-कटकर बर्बाद होने वाले आल्हा ऊदल की, रेवड़ी के लिए मस्जिद ढा देने वाले जयचंद मीर जाफरों की, थोड़े से निजी स्वार्थ के लिए उस उद्योग पर से सारी जनता का विश्वास उठा देने वाला वैश्यों की भरमार होती है। वह देश भारतवर्ष की तरह अविद्या, गरीबी, गुलामी, बेबसी, बेकार के नाना विधि त्रास सहता है। इतिहास साक्षी है कि कभी कोई कौम उठी है तो सामूहिकता की प्रवृत्ति को अपना कर बढ़ी है, जिसने अकेलेपन को अपनाया वह चाहे व्यक्ति हो, चाहे राष्ट्र, अवश्य ही बर्बाद होगा।
गायत्री महामंत्र में अनेकों महत्वपूर्ण तत्व भरे हुए हैं। उनमें एक अत्यधिक उच्च कोटि की प्रेरणा सामूहिकता की है। नः शब्द के द्वारा माता बार-बार अपने सच्चे पुत्र को-सच्चे उपासक को एकाकी स्वार्थपरायण न बनाकर सामूहिकतावादी लोकसेवी बनने की प्रेरणा करती है। जो माता की वाणी को सुनते हैं, उस पर ध्यान देते हैं और उसे मानते हैं वे ही सच्ची मातृभक्ति का परिचय देते हैं और वे माता का सच्चा अनुग्रह पाते हैं। घूसखोर दरोगा की तरह कुछ जप अनुष्ठान की रिश्वत जेब में डाल लेने और बदले में अनुचित लाभ दे देने का स्वभाव माता का नहीं है। जो लोग माता के अन्तःकरण को नहीं पहचानते उसकी बात को नहीं सुनते, मानते। अपनी ही स्वार्थपरता की तराजू से माता को भी अपने लिए अनुष्ठान समेटने वाली स्वार्थपरायण सेठानी जैसा मानते हैं वह सच्चे अर्थों में अज्ञानी हैं। उन्हें कितने अंशों में माता का अनुग्रह वात्सल्य मिल सकेगा यह कह सकना कठिन है।
विगत तीस वर्षों से हमने एकनिष्ठ भाव से माता की उपासना की है और अपने ही श्रेणी के अन्य अनन्य उपासना करने वालों की साधना की प्रगति एवं गतिविधियों पर निरंतर बारीकी से ध्यान रखा है। इस लम्बे समय के गंभीर अनुभव का एक मात्र निष्कर्ष एक ही है कि माता किसी साधक की व्यक्तिगत पूजा उपासना से जितनी प्रसन्न होती है उससे अनेकों गुनी प्रसन्नता उसे साधक की परमार्थ परायणता से होती है। इसी के लिए वह अपने सच्चे कृपा पात्रों को प्रेरणा भी करती है और प्रत्यक्ष आदेश देती है। नारद शंकराचार्य, दयानंद, विवेकानंद आदि को एकाँत साधना में से कान पकड़ कर उठाने और लोक सेवा में जुड़ा देने का कार्य उसी महाशक्ति ने किया। जिस पर भी वह प्रसन्न होती है उसे निश्चित रूप से यही प्रेरणा देती है। क्योंकि आत्मशक्ति, पुण्य संचय, विश्वहित, सुख शाँति, स्वर्ग मुक्ति, समृद्धि सम्पत्ति, शक्ति सफलता, कीर्ति प्रतिष्ठ के सभी लाभ परमार्थ परायणता में सन्निहित हैं। स्वार्थी के लिए लाभ बहुत स्वल्प है, जितना श्रम किया उसकी मजदूरी मात्र का वह अधिकारी है। अनेकों का हित साधन करने से तो अपने आप ही वह साधना अनेक गुनी फल दायक हो जाती है। माता अपने सच्चे साधक को यही सच्चा मार्ग दिखाती है।
हमें स्वयं भी यही मार्ग बताया गया है। 24 महाअनुष्ठान पूरा करने के साथ-साथ यही प्रेरणा मिली कि जितना समय भजन में लगे उससे अधिक समय परमार्थ में, लोक सेवा में लगे। जो अपनी साधना इन दिनों होती है उसे अपने निज के लिए संग्रह न करके उसका पुण्य फल प्रायः नित्य ही गायत्री परिवार के आवश्यक ग्रस्त लोगों को बाँट देते हैं, जिससे वे अपनी कठिनाइयों को पार कर सकें। अपने को बिल्कुल खाली हाथ-पुण्य फल से भी खाली रहने और निरंतर धर्म भावनाओं का प्रसार करने में संलग्न रहने का आदेश हुआ है। बिना राई रत्ती विचार संकोच किये हमारी गतिविधि उसी प्रकार चल रही है जिस प्रकार नन्हा सा बालक उधर ही चल देता है जिधर उसकी माता उसे उँगली पकड़कर चलाती है। हम देखते हैं कि हमारी ही जैसी दो प्रेरणाएँ अन्य अनेकों उन लोगों की आत्माओं में भी हो रही हैं जो सचमुच माता के अधिक समीप पहुँच चुके हैं। उन अभागे दुराग्रहियों को माता की कृपा से बहुत दूर ही मानना चाहिए जो अपनी माला जपने में तो लगे रहते हैं पर दूसरों को धर्म प्रेरणा देने से जी चुराते हैं। मानना होगा कि माता ने उनकी अन्तरात्मा का अभी स्पर्श नहीं किया। अन्यथा उन्हें एकाकी न रहने देती। जिनके अन्तःकरण में माता का प्रकाश आ रहा हो उनके लिए यह संभव नहीं कि वे परमार्थ परायणता में अपने को रोक सकें। उन्हें जनता जनार्दन के सेवा के लिए कदम बढ़ाना ही होता है। उन्हें पंगु धर्म को सहारा देने, आगे बढ़ाने के लिए धर्म सेवा के लिए अपना कंधा देना ही होता है। वह केवल जप से संतुष्ट नहीं रह सकता उसे धर्म सेवा के लिए कुछ लोक संग्रह सामूहिक कार्यक्रम अपनाना ही पड़ेगा। हम देखते हैं कि माता के सच्चे अनेकों कृपापात्र अपने अंतःकरण की प्रबल प्रेरणा से इस मार्ग पर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं।
यों धर्म सेवा के अनेक मार्ग हैं। अनेक कार्यक्रम हैं, समय-समय पर उनकी उपयोगिता एवं आवश्यकता भी रही है, और रहती है। परिस्थितियों के अनुसार अनेक कार्यक्रम सामने आते हैं। परिस्थिति बदलने पर दूसरे बदल जाते हैं। इतिहास बदलता रहा है, भूतकाल में अनेकों अवसरों पर ऋषियों में अनेक प्रकार एक-दूसरे सर्वथा भिन्न प्रकार के धर्मानुष्ठानों की व्यवस्था की है। इसमें किसी धर्मानुष्ठान की निंदा, प्रशंसा या लघुता महानता नहीं है। सभी उत्तम है पर जिस अवसर के लिए जो बात उपयुक्त होती है उस समय वही विधान प्रचलित किया जाता है। चतुर वैद्य रोगी की स्थिति, देशकाल पात्र को ध्यान में रखकर ही दवा देता है। यद्यपि उसके दवाखाने में एक से एक बहुमूल्य औषधियाँ भरी होती हैं। प्राचीन काल में उस समय के अनुसार अनेकों प्रकार के यज्ञ, जप, कीर्तन, पूजन, भजन, कथा वार्ता आवश्यक समझे गये और अपने-अपने समय के संदेशवाहक उसका प्रसार करने के लिए जनता का मार्ग दर्शन करने के लिए एक समान उपयुक्त न रहे। यदि सदा एक ही आवश्यकता -एक ही व्यवस्था ठीक होती तो सब ऋषि, संत, अवतार, देवदूत तथा धर्म प्रचारक एक ही बात कहते। पर ऐसा नहीं होता-वे समय की आवश्यकता एवं उपयुक्तता के अनुकूल बात बताने आते हैं। इसलिए मोटी दृष्टि से देखने में इन ऋषियों की बातों में, पद्धतियों में, प्रेरणाओं में योजनाओं में अंतर दिखायी देता है। पर वस्तुतः उनके मूल लक्ष्य में पूर्ण एकता होती है। अंतर केवल देशकाल, पात्र के अनुसार बदली हुई परिस्थितियों में बदले हुए कार्यक्रम को अपनाने मात्र का होता है। विवेकशील लोग इस तथ्य को समझते हैं, तदानुसार वह किसी अमुक काल में अमुक संत द्वारा बताई हुई पद्धति पर सदा अड़े रहने का दुराग्रह नहीं करते वरन् समय की आवश्यकता को उसी प्रकार तुरंत स्वीकार कर लेते हैं जिस प्रकार बुद्धिमान विद्यार्थी क्लास बदलने पर नई पुस्तक स्वीकार करने में मास्टर से-या समझदार रोगी बीमारी बदलने पर दवा बदलने में डॉक्टर से तकरार नहीं करते।
आज की सर्वोपरि आवश्यकता यह है कि -असद् बुद्धि ने-दुर्विचार, कुसंस्कार, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, चिंता, भय, आवेश, उद्वेग, छल, दंभ, कपट, असंयम एवं स्वार्थपरता ने सूक्ष्म आकाश को तमसाच्छन्न करके समस्त विश्व के ऊपर अनेक प्रकार की आपत्तियाँ उपस्थिति कर दी हैं, उन्हें हटाया जाय। परस्पर असद्व्यवहारों से उत्पन्न अनेकों भयंकर दुष्परिणामों के कारण सभी दुखी हैं। महामारी, अस्वस्थता एवं नाना प्रकार के रोगों की तूफानी अभिवृद्धि, प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, तूफान आदि उपद्रवों के कारण प्रजा के धन जन की भारी हानि हो रही है। यदि आकाश में मंडराती हुई असुरता की ये घटाएँ आज सामने उपस्थिति हैं उनमें भी असंख्य गुनी वृद्धि हो सकती है और मानव जाति ही नहीं मानवेत्तर अन्य जीव जंतुओं का भी जीवन खतरे में पड़ सकता है।
इन परिस्थितियों को सुधारने के लिए जहाँ अन्य भौतिक प्रयत्नों की आवश्यकता है वहाँ कुछ आध्यात्मिक उपचार भी करने जरूरी हैं। सभी लोग राजनैतिक व आर्थिक दृष्टिकोण से समस्याओं को सुलझाने में लगे हुए हैं पर जब तक आध्यात्मिक उपचारों का भी उनमें समावेश न होगा तब तक इन साँसारिक प्रयत्नों पर किया हुआ अधिक से अधिक प्रयत्न भी आशाजनक परिणाम उपस्थित न कर सकेगा। अंतरिक्ष में जो दूषित आसुरी तत्व अत्यधिक मात्रा में भरे गये हैं वे दुर्बल मस्तिष्कों पर कब्जा करके उन्हें कुकर्म करने को प्रेरित करते हैं इस प्रकार दिन-दिन मनुष्यों में दुष्प्रवृत्तियाँ बढ़ती जाती हैं और उनके फलस्वरूप विपत्तियाँ भी सुरसा की तरह मुँह फाड़ती जाती हैं। सूक्ष्म आकाश को शुद्ध करने, मनुष्यों में सत्प्रवृत्तियाँ पैदा करने के लिए-विश्व के ऊपर छाई हुई भयंकर घटाओं को शाँत करने के लिए अध्यात्मिक प्रयत्नों में व्यापक गायत्री उपासना की भारी आवश्यकता है। जिस प्रकार अनेकों दुष्टों ने अपनी दुष्प्रवृत्तियों से वातावरण को दूषित किया है उसी प्रकार अनेकों सज्जनों की सत्प्रवृत्तियाँ मिलकर उनका समाधान भी कर सकती हैं। सेना का मुकाबला सेना से किया जाता है। संसार के लिए विपत्तियाँ उत्पन्न करने वाली दुष्प्रवृत्तियों का निवारण भी धर्मात्माओं की धर्मसेना के शक्तिशाली धर्मोपचारों द्वारा ही होगा। ऐसे उपचारों में गायत्री की शक्ति सर्वश्रेष्ठ है। वर्तमान काल में विपन्न परिस्थितियों में व्यक्तिगत सुख शाँति बढ़ाने के लिए एवं संसार की व्यापक वातावरण को शुद्ध करने के लिए सर्वोत्तम उपचार गायत्री के माध्यम से ही हो सकता है। इस समय के रोग को ठीक अचूक एवं रामबाण चिकित्सा-गायत्री के सामूहिक यज्ञानुष्ठान द्वारा ही सुनिश्चित है।
गायत्री तपोभूमि द्वारा गायत्री परिवार का संग बड़ा ही महत्वपूर्ण कदम उठाया गया है। संस्था अपनी सामर्थ्य भर लोगों को प्रेरणा देकर गायत्री उपासना के सामूहिक कार्यक्रमों के स्थान-स्थान पर विविध आयोजन करा रही है। पर इतने से ही काम चलने वाला नहीं है। अब प्रत्येक गायत्री उपासक को स्वयं एक सजीव गायत्री मन्दिर बनना होगा। गायत्री माता की महिमा बढ़ाने के लिए पिछले -अज्ञानान्धकार युग में तमसाच्छन्न की गई इस महाशक्ति को पुनः प्रकाशवान बनाने के लिए हम सब को मिल जुल कर साधारण नहीं,-असाधारण प्रयत्न करना होगा। एकाकी गायत्री उपासना तक सीमित न रह कर इसे धर्मानुष्ठानों का रूप देना होगा ताकि माता को भूले हुए अगणित मनुष्य अपनी जननी को पहचान सकें। उसकी गोद में चढ़कर, आँचल पकड़कर, सच्चा वात्सल्य सुख पा सकें। माता से उसके खोये हुए पुत्रों का मिलाप कराने के लिए किया हुआ सत्प्रयत्न कितनी उच्चकोटि का है यह शब्दों में कहना और अक्षरों में लिखना संभव नहीं। जिन्होंने इस कार्यप्रणाली को अपनाया है वे ही जान सकते हैं कि केवल जप करते रहने की अपेक्षा यह सामूहिक गायत्री आयोजन कितने अधिक आनंद व संतोष प्रदान करने वाले हैं। निस्संदेह सामूहिकता की प्रवृत्ति मानव प्राणी की सर्वोत्कृष्ट विशेषता है। गायत्री उपासना जैसे परम पुनीत कार्यक्रम में इस प्रवृत्ति का जुड़ जाना तो ‘सोना व सुगंध’ का उदाहरण बन जाता है।
गायत्री परिवार के सभी लोग यथासंभव निज की उपासना करते हैं। कितने ही निष्ठावान व्यक्ति नियत संख्या में अपनी मालाएँ पूरी करते हैं, गायत्री चालीसा पाठ, मंत्र लेखन आदि अनुष्ठानों में कितने ही नर नारी लगे हुए हैं, कइयों ने बड़ी कठोर तपश्चर्याओं के साथ साधना का व्रत लिया है। यह सभी निष्ठावान उपासक भूरि-भूरि प्रशंसा के योग्य हैं। आत्म बल की वृद्धि, आँतरिक पवित्रता की स्थापना, प्रभु शरणागति, बड़े ही महत्वपूर्ण तत्व हैं। इन्हें उपासना के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। पर ये आवश्यक हैं। अन्यथा यह सब भी कंजूस सेठ के धन संग्रह करते रहने की तरह एक आध्यात्मिक स्वार्थ परता ही रह जायेगी। प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति के पाठक और गायत्री परिवार के सदस्य इस तथ्य को अधिक दृढ़तापूर्वक समझते जा रहे हैं और धर्म प्रचार को भी तपस्या का, साधना का, एक आवश्यक अंग मानते हैं और उसके लिए भी निरंतर प्रयत्नशील रहते हैं।
गायत्री मंत्र में एक महत्वपूर्ण संदेश सामूहिक धार्मिक आयोजन का है। यज्ञानुष्ठान इसके लिए सर्वश्रेष्ठ कार्यक्रम है। जो धर्म फेरी लगाने को तैयार है। दूसरों के पास जाने में, शुभ कार्य के लिए दूसरों को समझाने में जिन्हें अपनी हेठी, संकोच तथा बेइज्जती नहीं मालूम पड़ती। ऐसे मिलनसार स्वभाव के व्यक्ति बड़ी आसानी से चाहे जहाँ इस प्रकार के छोटे-बड़े आयोजन सम्पन्न कर सकते हैं। यज्ञ भारतीय धर्म का आदि तथ्य है। विगत दो हजार वर्षों में नाना प्रकार के मत मतान्तर एवं संप्रदाय बरसाती घासपात की तरह उपज पड़े और उनने ऋषिधर्म, वेद धर्म के प्रति अनास्था, उपेक्षा उत्पन्न करके अपने चलाये सम्प्रदाय को ही सब कुछ बताया। बेचारी जनता शास्त्रीय तत्वज्ञान से रहित थी, चाहे जिसके बहकावे में आकर हवा द्वारा उड़ाये हुए, पत्तों की तरह बहक गई, गायत्री माता की तरह यज्ञ पिता की भी दुर्गति हुई। पहले तो यज्ञों का प्रचलन ही बंद था। अब थोड़ा आरंभ भी हुआ है तो लोग उन असामयिक यज्ञों को करा रहे हैं जो भूतकाल की किन्हीं परिस्थितियों में उपयोगी रहे होंगे पर आज उनसे परिस्थिति का मेल नहीं खाता। चंडी यज्ञ युद्ध की तैयारी के समय लोगों में जोश उभारने के लिए किये जाते थे, विष्णु यज्ञ भक्ति बढ़ाने के लिए, रुद्र यज्ञ वैराग्य बढ़ाने के लिए होते थे। आज की कुमार्गगामी दुर्बुद्धि ग्रस्त मानव जाति को सन्मार्ग पर चलने, सद्बुद्धि को अपनाने के लिए गायत्री यज्ञों को ही प्रधानतया आवश्यकता है।
सामूहिक गायत्री यज्ञ कैसे हो?
श्रेष्ठ परमार्थ है। सवा लक्ष या चौबीस लक्ष जप का एक महाअनुष्ठान संकल्प करके उसके भागीदार बनाने के लिए सभी धार्मिक अभिरुचि के नर नारियों के पास जाना चाहिए और पूर्णाहुति का जो समय निर्धारित किया हो उतने दिन के लिए नित्य कुछ जप करने के लिए उन्हें तैयार करना चाहिए। जिस प्रकार घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा किया जाता है जिस प्रकार वोट माँगे जाते हैं, उसी प्रकार थोड़े दिन तक कुछ समय गायत्री जप के लिए लगाने को लोगों से कहा जाय तो कुछ न कुछ संख्या में ऐसे सज्जन निकल आते हैं, जिनकी सहायता से उतना जप सुगमता से पूरा हो सकता है।
प्रारंभिक प्रयोग के रूप में 9 दिन में सवा लक्ष सामूहिक यज्ञानुष्ठान का आयोजन किया जा सकता है। प्रतिदिन 140 मालाएं इसमें करनी पड़ती हैं। एक घंटा प्रतिदिन समय देकर 10 माला प्रतिदिन गायत्री जप करने वाले 14 श्रद्धावान नर-नारी तलाश करने चाहिए। संभावित 30 व्यक्तियों की सूची जेब में रखकर किसी अपने जैसे एकाध साथी को संग लेकर निकला जाय। लोगों को यज्ञानुष्ठान का महत्व समझाकर 9 दिन तक एक घंटा रोज गायत्री जप करके भागीदार बनने के लिए कहा जाय, तो 30 में 15-16 अवश्य तैयार हो सकते हैं। इनके नाम कागज में नोट कर लीजिए। दूसरे-तीसरे दिन जा-जाकर तलाश करते रहिए कि वे लोग प्रतिज्ञा पालन कर रहे हैं या नहीं। इनमें से एक दो ऐसे भी निकल सकते हैं जो वचन देकर भी उसे पूरा न करें उसका मार्जन रखने के लिए एक दो व्यक्ति पहले से ही अधिक रखने चाहिए। इस प्रकार सवा लक्ष जप 9 दिन में आसानी से पूरा हो जाता है। यों दो-चार व्यक्ति भी लगकर बैठें तो इतनी संख्या पूरी कर सकते हैं पर इससे अधिक लोगों को सामूहिक सत्कर्म में लगाने का उद्देश्य पूरा न होगा। इसलिए भागीदारों की संख्या अधिक से अधिक बनानी चाहिए। भले ही वे कम समय दें। जहाँ जप करने वाले थोड़े हों वहाँ 9 दिन की अपेक्षा 15 या 21 दिन में सवालक्ष भागीदारों की संख्या से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। वरन् अधिकों की ही तलाश करते रहना चाहिए। निर्धारित संख्या से अधिक जप हो जाय तो इसमें बुराई कुछ नहीं अच्छाई ही है। प्रायः लड़कियाँ और महिलाएँ अधिक सहयोग देती हैं उन्हें पूरा प्रोत्साहन देना चाहिए। 12 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे जो शुद्ध गायत्री मंत्र उच्चारण कर सकें, भाग ले सकते हैं। यज्ञोपवीत धारण किये हों तो उत्तम हैं अन्यथा बिना यज्ञोपवीत वाला जप न करे ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। यों गायत्री माता सभी की है, मनुष्य मात्र ईश्वर के पुत्र हैं। जाति-पाति में ऊँच नीच का विषवृक्ष केवल पिछले तमसाच्छन्न काल में ही पनपा है। वह आज नहीं तो कल-समूल नष्ट तो होना ही है पर जब तक वहाँ की परिस्थिति के अनुसार उन जातियों के लोगों को ही सम्मिलित करना चाहिए जिसमें दूसरों को अधिक आपत्ति न हो। दूसरी बात यह भी ध्यान रखनी चाहिए कि बहुत अधिक रूढ़िवादी-पाखंडियों को पहले से ही सम्मिलित न किया जाय अन्यथा वे कभी ब्राह्मणवाद के नाम पर, कभी जातिवाद के नाम पर, कोई न कोई विघ्न उपस्थित किये बिना न मानेंगे। इन प्रेम आयोजनों में उदार प्रकृति के, विचारशील धर्म प्रेमी ही लिए जायं।
निर्धारित जप संख्या की व्यवस्था होते ही अंतिम दिन सामूहिक हवन की तैयारी में लग जाना चाहिए। हवन के लिए प्रातः या सायंकाल का ऐसा समय रखना चाहिए जो सब की सुविधा का हो। स्थान ऐसा चुना जाय, जो नगर के निकट या बीच में हो, जहाँ पहुँचने से जनता को अड़चन न हो। यज्ञ मंडप एवं वेदी या कुण्ड को सजाने में अपनी कलाकारिता का पूरा-पूरा परिचय देना चाहिए। बाँस, बल्ली, रंगीन कपड़े, चित्र, आदर्श वाक्य, ध्वजा पताका, फूल गुलदस्ते, रंगीन फल, बंदनवार, केले के पत्ते खंभे आदि वस्तुओं की सहायता के कुछ सुरुचिपूर्ण कलाकार समोवृत्ति में लोग मिलकर सजावट करने में एक दो दिन का पूरा-पूरा समय करें। लोगों में उत्साह एवं आकर्षण पैदा करने के लिए यज्ञशाला की सजावट पर पूरा-पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। कुरुचिपूर्ण, मैली कुचैली गंदी फूहड़ चीजों में बनी हुई अस्त व्यस्त यज्ञशाला यज्ञ संयोजकों की अयोग्यता ही साबित नहीं करती वरन् लोगों का उत्साह भी ठंडा कर देती है, इसलिए इस कार्य में उपेक्षा बरतना किसी भी प्रकार उचित न होगा। जिस स्थान पर यज्ञ हो वहाँ की दीवारों को गेरू आदि से सुरुचिपूर्ण आदर्श वाक्य में लिखकर सुसज्जित कर दिया जाय। आगंतुकों के बैठने की समुचित व्यवस्था हो।
समिधाएं सूखी, कुण्ड या वेदी के साइज की, बिना सड़ी धुनी हो। प्रधान वेदी पर एक कलश तो आवश्यक ही है। चारों कोनों पर चार कलशों की स्थापना और भी हो सके तो उत्तम है। कलश रंगे हुए, पंच पल्लव, नारियल कलावा, पुष्पमाला आदि से सजे हुए हों। पंच पात्र, चमची, आसन, हवन, सामग्री की थाली, घृत पात्र, स्रुवा, पूजा की थाली, घृत दीपक आदि सभी वस्तुएं, पहले से ही तैयार रखनी चाहिए। ताकि समय पर उनके लिए भाग दौड़ करने की अड़चन खड़ी न हो। हवन सामग्री, घी, समिधा, सजावट प्रसाद वितरण आदि के लिए कुछ चंदा इन जप करने वाले भागीदारों से या अन्य लोगों से इकट्ठा कर लेना चाहिए। यज्ञ संयोजक यदि गृहस्थ हैं तो उन्हें इसमें अपना भाग दूसरों से अधिक देना चाहिए। हवन सामग्री में सुगंधित द्रव्यों का होना आवश्यक है। विधिपूर्वक उचित अनुपात से शास्त्रोक्त औषधियाँ हवन में उपयोग करने से यज्ञ में सम्मिलित होने वालों के स्वास्थ्य एवं मस्तिष्क पर कीमती दवाओं जैसा काम करती हैं। इसलिए आहुतियों में शुद्ध घी तथा सुगंधित औषधि सामग्री की सुव्यवस्था करना उचित है। पर जहाँ पैसे की बहुत तंगी हो वहाँ शुद्ध दूध की-मेवा शक्कर, घी पड़ी हुई खीर, हलुआ आदि पौष्टिक खाद्य पदार्थों का हवन करना चाहिए। तिल, जौ, चावल, सूखे अन्नों में थोड़ा घी शक्कर मिलाकर भी काम चल सकता है। पर यह सूखे अन्नों का हवन यज्ञ कर्ताओं की कंगाली का ही सूचक है। ऐसा तो वे पण्डित लोग कराते हैं जो यज्ञ में एकत्रित निधि को दक्षिणा में, पुजापे में, अपने लिए हड़पने के लिए आहुतियों का झंझट सस्ते से सस्ते में निपटाना चाहते हैं। तिल, जौ, चावल थोड़ी मात्रा में सम्मिलित हों पर अधिकाँश में सुगंधित औषधियों एवं घी, खीर, हलुआ आदि पौष्टिक चरु शाकल्यों की ही प्रधानता रहे। खीर आदि पतली चीजें चमची से हवन करने में सुविधा रहती है।
स्नान करके, शुद्ध वस्त्र पहन कर हवन करने वाले आवें, पैर धोकर यज्ञशाला में घुसें, कंधे पर पीले दुपट्टे हों, सब होताओं के मस्तक पर चंदन लगाया जाय। जप करने वाले भागीदारों के कुटुम्बी या अन्य सज्जन जो हवन में भाग लेने के इच्छुक हो उन्हें भी अवसर दिया जाय। बहुत छोटे बच्चों को छोड़कर कर शुद्धतापूर्वक आये हुए किसी इच्छुक को हवन में शामिल होने से रोका न जाय। यह सब बातें घर-घर जाकर पहले समझायी जाएं और हवन में भाग लेने के लिए लोगों को आमंत्रित किया जाय तो बहुत लोग आ सकते हैं। यह आध्यात्मिक लाभ अधिकतम लोगों को मिले इस दृष्टि से समीपवर्ती क्षेत्र के समझाने, प्रेरणा देने, सूचना करने बुलाने के लिए कई बार लोगों के घरों पर जाना चाहिए इस भाग दौड़कर लोगों से सत्कर्म करा लेने की धर्म फेरी को संसार का सबसे बड़ा पुण्य कहा जा सकता है। जो यज्ञ संयोजक जितनी धर्मफेरी लगा सकेगा उसका आयोजन उतना ही सफल होगा। जो धर्म फेरी में अपनी तौहीन, बेइज्जती समझेंगे संकोच करेंगे उनका आयोजन फीका व असफल रहेगा। इसलिए यज्ञ संयोजकों में से कुछ की तो ड्यूटी ही धर्म फेरी की लगा देनी चाहिए। इनका कार्य लोगों से बार-बार प्रार्थना करके इस सन्मार्ग में लाना हो, जो इस मार्ग में मिले अपमान को भी भुला सकता है। मेम्बरी के लिए जिस प्रकार वोट माँगी जाती है, ठीक उसी प्रकार गायत्री माता तथा यज्ञ भगवान को मेम्बर बनाने के लिए यज्ञ संयोजक को दर-दर जाकर अलख जगाना चाहिए।
“संक्षिप्त हवन विधि” पुस्तक में गायत्री हवन का पूरा विधान बड़ी सरल रीति से लिखा हुआ है। हवन के लिए जितने आसन बिछाये गये हों उन पर एक-एक पुस्तक भी रखी जाय। ताकि मंत्र बोलने में सभी को सुविधा हो। एक व्यक्ति पथ प्रदर्शक हो, वह आदेश देकर श्रोताओं से सब कृत्य कराता जाय, आदेश देता जाय। मंत्र बुलवाता जाय। कई पण्डित, कई पुस्तकों से कई विधान बनाते हैं, वह ठीक नहीं। अ.भा. गायत्री संस्था की ओर से अत्यंत उच्चकोटि के कर्मकाण्डी याज्ञिकी विद्वानों की सम्मति से एक सुनिश्चित पद्धति बन गयी है, उसे हटाकर अन्य अस्त-व्यस्त रीतियाँ अपनाना ठीक नहीं। जो भी सज्जन हवन कराने वाले हों उन्हें पहले से ही नियत यज्ञ पद्धति की समुचित जानकारी होनी चाहिए। सब के हाथ में पुस्तकें रहने से यथाक्रम निर्धारित विधिविधान के साथ हवन क्रम चलाना चाहिए।
सवालक्ष सामूहिक जप के लिए शतांश आहुतियाँ 1250 दी जाती है। टोली बदल कर सभी को हवन करने का अवसर मिले इस दृष्टि से उपस्थिति व्यक्तियों की संख्या, आहुतियों और यज्ञशाला में बैठने का स्थान को देखते हुए यह निश्चय करना चाहिए कि कितनी आहुतियाँ दे देकर होताओं की कितनी टोलियाँ बदली जाय। मान लीजिए यज्ञकुँड पर आठ व्यक्ति बैठने हैं। कुल व्यक्ति 40 हैं, आहुतियाँ 1250 देनी हैं तो आठ-आठ की 5 टोलियाँ बदलेंगी। प्रत्येक टोली को 250 आहुतियाँ देनी हैं। होता 8 हैं, तो प्रत्येक व्यक्ति को 32 आहुति देने का अवसर मिलेगा। 32-32 आहुतियाँ देकर आठ आदमियों की पाँच टोली बदलें तो 1250 आहुतियाँ हो जाएंगी। इसमें कुल मिलाकर दो ढाई घंटा समय लगेगा। पूर्णाहुति, वसोधारा, साष्टांग प्रणाम, क्षमा याचना, शुभकामना, आरती, घृत अवघ्राण, भस्म धारण परिक्रमा आदि सभी कार्य मिलजुलकर करने से यज्ञ का अंत बड़ा शोभायमान हो जाता है। अंत में कीर्तन, भजन एवं प्रवचन की भी कुछ व्यवस्था अवश्य रखी जाय। प्रसाद बाँटने में मिठाई आदि का बहुत खर्च नहीं बढ़ाना चाहिए। यज्ञ में बना हुआ खीर, हलुआ, पंचामृत, मामूली मिठाई, ठण्डाई आदि वस्तुएं इस कार्य के लिये पर्याप्त हैं ।
यज्ञ के अन्त में ब्रह्मभोज का विधान है। इसके लिये केवल सत्पात्र ही उपयुक्त हो सकते हैं। सच्चे ब्रह्म परायण, निर्लोभी, अपरिग्रही, परम संतोषी, निर्व्यसनी, सदाचारी, लोकसेवी, धर्म प्रचारक ब्राह्मणों का मिलना आज दुर्लभ हो रहा है। भारी खोज करने पर ब्राह्मणत्व की कसौटी पर खरे उतरने वाले सत्पात्र ब्राह्मण कहीं सौभाग्य से ही एक दो ही मिल सकते हैं। जिन भाग्यशालियों को ऐसे कोई ब्राह्मण, साधु संत उपलब्ध हो सकें वे अवश्य उन्हें समुचित सत्कार के साथ भोजन करावें। जहाँ केवल नामधारी गुण कर्म स्वभाव से रहित ब्राह्मण हो वहाँ कुमारी कन्याओं को भोजन करा देना चाहिए और नारी जाति की महानता की प्रतीक, गायत्री माता की प्रतिनिधि इन कन्याओं का समुचित आदर सत्कार, तिलक चंदन, पुष्पमाला, चरण स्पर्श आदि के द्वारा सत्कार भी करना चाहिए।
ब्रह्मदान, ब्रह्मभोज का उत्कृष्ट स्वरूप है। कुछ सस्ता गायत्री साहित्य उपस्थित जनता में अवश्य ही वितरण करना चाहिए। अन्नदान से ज्ञान दान का पुण्य सौ गुणा अधिक माना गया है। पूरी मिठाई खाकर मनुष्य कुछ ही देर में उसे टट्टी के मार्ग से निकाल देता है और फिर भूखा का भूखा हो जाता है। यदि वह खाने वाला कुपात्र हुआ तो उस अन्न से जो शक्ति उसे मिली और उसके द्वारा वह जो अधिक दुष्कर्म करने लगा तो उसको अन्नदान का पुण्य मिलना तो दूर उलटा उस दाता को पाप में सहायक बनने का पाप लगेगा। इसी प्रकार यदि दी हुई दक्षिणा के धन का उपयोग सिगरेट, भाँग, गाँजा, शराब आदि नशेबाजी में हुआ है तो भी वह दानदाता को उलटे नरक में ले जायगा। इन सब दोषों से ब्रह्मदान-ज्ञानदान सर्वथा मुक्त है। अच्छी पुस्तक को जो पढ़ेगा उसे ज्ञान ही मिलेगा। उस ज्ञान से दुष्कर्म नहीं सत्कर्म ही बनना संभव है। फिर वह पुस्तक देर तक रहने वाली भी है, उस व्यक्ति को या उसके घरवालों को जब तक वह बेचारी जीवित रहेगी अच्छी प्रेरणा ही देती रहेगी।
ब्रह्मदान के लिए गायत्री चालीसा बहुत उत्तम है। 240 चालीसा वितरण दिये जाएं और यदि लेने वाले केवल एक बार ही पढ़कर उसे फेंक दें तो भी 240 पाठों का एक अनुष्ठान करा देने का पुण्य उस दाता को मिल जाता है। यदि कहीं उनमें से आधे चौथाई भी रोज पूरे पाँच पाठ नित्य करने लग गये तो नित्य अनुष्ठान होते रहने की एक शृंखला चिरकाल तक चला देने का एक महान पुण्य हो जाता है। इतने बड़े पुण्य फल के लिए 6) जैसी छोटी रकम खर्च करना बहुत ही सरल है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए 15) मूल्य के 240 चालीसा डाक खर्च समेत केवल मात्र 6) में देने को गायत्री तपोभूमि ने विशेष व्यवस्था कर दी है।
उपरोक्त विधि व्यवस्था के आधार पर एक सवा लक्ष का सामूहिक अनुष्ठान बड़ी आसानी से बहुत थोड़े खर्च में हो सकता है। इसमें कार्यकर्ताओं का उत्साह और भागदौड़ में तत्परता ही प्रधान कार्य है। आयोजन जितना महत्वपूर्ण और प्रभावशाली बन जाता है उसे देखते हुए जो खर्च पड़ता है वह नगण्य ही है। साधारणतया इस पूरे कार्यक्रम में 50 से 100 रुपये के भीतर काम चल जाता है। कही-कहीं तो इससे भी कम में व्यवस्था बन जाती है।
पहले हर जगह छोटे 9 दिन के आयोजन कराने चाहिएँ। उसमें अनुभव प्राप्त करके 24 लक्ष का यज्ञानुष्ठान आयोजित करना चाहिए। 24 लक्ष महाअनुष्ठान का जप एक महीने तक एक घंटा रोज जप करने वाले 80 व्यक्ति मिल कर पूरा कर सकते हैं। जप करने वालों की संख्या कम हो तो प्रतिदिन का कुछ समय बढ़ाया जा सकता है या एक महीने की अवधि को दो-तीन महीने का किया जा सकता है। इसमें 24 हजार आहुतियों का हवन होता है, जो 5 कुण्डों की यज्ञशाला बनाकर प्रतिदिन 3-4 घंटे रोज के आयोजन में 3 दिन में पूरा हो जाता है। यों एक कुण्ड में भी सूर्योदय से सूर्यास्त तक आहुतियाँ 8 आदमी देते रहें तो एक दिन में भी 24 हजार हवन हो सकता है। पर ऐसी व्यस्तता की अपेक्षा तीन दिन का प्रेमपूर्वक आयोजन जिसमें भजन, कीर्तन, प्रवचन, चालीसा पाठ आदि कई आयोजन सम्मिलित हों, ठीक है। इनमें 200) से लेकर 500) तक व्यय हो सकता है। अक्सर लोग बड़ी-बड़ी दावतें खिलाने और लम्बी-चौड़ी दक्षिणाएँ देने में हजारों रुपया फूँक देते हैं यह अनावश्यक है। विवाह-शादियों की तरह यज्ञों में दावतें उड़ें, यह धन का अपव्यय है। बाहर से आये हुए अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था उचित है, पर वह भी सीधी-सादी यज्ञीय पवित्रता से मेल रखती हुई सतोगुणी होनी चाहिएं। 9 कुण्डों की यज्ञशाला में 3 दिन में सवालक्ष आहुतियों का हवन हो सकता है। इसमें हवन सामग्री का दो सौ रुपया खर्च अधिक बढ़ेगा।
25 कुण्डों की यज्ञशाला में तीन से पाँच लाख आहुति हो सकती है। इसमें दो हजार के करीब खर्च चाहिए। सौ हवन कुण्डों में तीन दिन में चौबीस लक्ष आहुति होती है। इनमें व्यवस्था बड़ी बन जाती है। इसमें न्यूनतम पाँच हजार और अधिक तक दस हजार खर्च होता है। आइये गायत्री माता के अंतराल में सन्निहित सामूहिकता की भावना को उपासना के क्षेत्र में भी विकसित करें। इसके लिए स्थान-स्थान पर सामूहिक यज्ञानुष्ठानों की आवश्यकता है। एक छोटा-बड़ा आयोजन आप भी कीजिए। ऐसे शुभ संकल्प माता की सहायता से सदा सफल ही होते ह
लकवा ठीक हुआ
श्री मन्नूलाल तिवारी, पिछोर झाँसी से लिखते हैं-मुझ पर सन् 1955 में अचानक एक लकवा जैसे भयंकर रोग का आक्रमण हुआ। मुँह दाँत सभी बंद हो गये। शरीर पत्थर की तरह अकड़ गया। सिविल सर्जन ने जवाब दे दिया। असह्य पीड़ा से छटपटाता हुआ मैं जीवन की अंतिम घड़ियाँ गिन रहा था। पल-पल पर बेहोशी के दौरे आते थे। इसी बीच गायत्री माता का स्मरण किया। आर्त पुकार मचाई। माता ने ग्राह के मुँह में फंसे हुए गज की तरह मुझे बचा लिया। जल मंदिर शिवपुरी की श्री बाई जी महाराज ने मेरी बड़ी सहायता की। धीरे-धीरे अच्छा होने लगा और कुछ ही दिनों में पूर्ण स्वस्थ हो गया। तब से अब तक अनन्य श्रद्धा से गायत्री उपासना में लगा हूँ। 19 अनुष्ठान कर चुका। 5 बार गायत्री तपोभूमि में माता के दर्शन कर आया।
असह्य पीड़ा दूर हुई।
श्री प्रहलाद जोशी अध्यापक, तनौड़िया से लिखते हैं- मैं कई मास से शारीरिक पीड़ा से संत्रस्त था। पैर का खून जम गया था, कष्ट के मारे मृत्यु की इच्छा होती थी। एक दिन गायत्री यज्ञ की अन्तःप्रेरणा हुई। दूसरे दिन यज्ञ कराया तीसरे ही दिन आश्चर्यजनक रूप से पीड़ा घटनी आरंभ हुई और एक हफ्ते के अंदर पैर बिल्कुल ठीक हो गया।
ड्राइवर मर गया पर मैं बच रहा
अतर्रा (बाँदा) से श्री रामसिंहजी लिखते हैं कि मैं मोटर ठेला से इलाहाबाद होते हुआ कानपुर से अतर्रा आ रहा था। दुर्भाग्य से अतर्रा से 28 मील पर हमारा मोटर ठेला उलट गया। ठेले में 170 मन वजन भरा था। मोटर उलटने से ड्राइवर तो 5 मिनट के अंदर मर गया। दूसरे आदमी का पैर टूट गया। मुझे गायत्री माता ने बचाया। सिर में मामूली चोट आयी। एक ही जगह बैठे हुए लोगों में से मेरा इस प्रकार बच जाना माता का अनुग्रह ही है।
पारिवारिक अशाँति दूर हुई
श्री सुँदरलाल नाग, विरमुड़ी (रायपुर) से लिखते हैं-मैं बहुत समय से गृह जंजाल में बड़ा शोकातुर था। गृहणी बड़ी कर्कशा कटुवादिनी, लड़ाकू थी। जब से मैंने गायत्री उपासना आरंभ की है, घर में बड़ी शाँति रहने लगी है। आर्थिक समस्या भी हल हुई है। अभी-अभी डेढ़ हजार रुपये में 5 एकड़ जमीन खरीदी है। नित्य दस माला जपने के अतिरिक्त दोनों नवरात्रियों में अनुष्ठान करता हूँ।
गृहस्थ सुख में वृद्धि
श्री महावीर प्रसाद शर्मा नान्दा (कोटा) से लिखते हैं-एक बार मेरे वाला (नारु) फोड़ा हुआ और पीलिया रोग के चंगुल में फँस गया। इन विपत्तियों को मैंने गायत्री माता की शरण लेकर पार किया। धर्मपत्नी से मनोमालिन्य का जो क्लेश रहता था वह भी शाँत हुआ। माता की कृपा से एक सुँदर पुत्र उत्पन्न हुआ है। आर्थिक स्थिति भी सुधरी है।
परीक्षा में उत्तीर्ण
श्री जगतराम पस्तोरे गनेशगंज (टीकमगढ़) से लिखते है-मेरे जीवन का पिछला समय ऐसे वातावरण में व्यतीत हुआ है जहाँ नास्तिकता की ही प्रधानता थी। पूजापाठ को ढोंग और बेवकूफी माना जाता था। पिछली बार परीक्षा में अनुत्तीर्ण रहा तो मेरे मित्र पं. छेदीलाल शर्मा ने बुद्धि वृद्धि तथा साँसारिक सुख के लिए अचूक उपाय गायत्री मंत्र बताया। विश्वास तो न होता था पर परीक्षा के रूप में नवरात्रि में एक अनुष्ठान, माला के अभाव में 108 कंकड़ गिन-गिन कर पूरा किया। परीक्षा में पास हुआ, उसी वर्ष ट्रेनिंग में भी नाम आ गया। अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होकर आज अच्छे ग्रेड पर अध्यापन कार्य कर रहा हूँ। साथ ही गायत्री उपासना का क्रम भी चलता है।
डाकू कुछ बिगाड़ न सके
श्री कृष्णराम हरिभाऊ धोन्डे, वापी (गुजरात) से लिखते हैं-हम लोग वापी से 30 मील दूर घने जंगल में एक आवश्यक काम के लिए बैलगाड़ी में जा रहे थे। रात अंधेरी थी, जंगल बहुत घना था। इस सुनसान में डाकुओं ने हमें घेरा और गाड़ी रोक ली, हमारे पास कुछ धन भी था। बहुत घबराहट हुई। अंत में माता का नाम लेकर गाड़ी के बैलों को जोर से भगाया, उन कमजोर बैलों में न जाने कहाँ से इतनी ताकत आई कि इशारा देते ही घुड़-दौड़ भागने लगे। डाकू बराबर दो मील तक पीछा करते रहे पर पकड़ न सके। अंत में पुलिस स्टेशन आ गया। वहाँ आकर हम लोगों ने शरण ली और जान बचाई। माता जिसकी रक्षा करती है उसे कौन मार सकता है।
दुश्चरित्रता में सुधार हुआ
श्री रामसिंह जी विछियाँवा (इलाहाबाद) से लिखते हैं-मेरे एक मित्र के आचरण कुसंग के कारण बहुत बिगड़ गये थे। वेश्या गमन, नशेबाजी, जुआ आदि से उसने घर का सब पैसा फूँक दिया, स्त्री के जेवर तक बेच दिये। उसके पिता तथा घर के सब लोग बहुत दुखी थे। चूँकि बचपन से ही मेरी मित्रता थी, इसलिए उसके सुधार का संकल्प लेकर मैंने गायत्री उपासना की। उसका बड़ा अच्छा परिणाम हुआ। थोड़े ही दिन में उसके सब दुर्गुण दूर हो गये। घर के सब लोग संतुष्ट हैं। अब वह मित्र भी गायत्री उपासक बन गया है।
आपत्तियाँ टलीं
श्री सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी कोट पुतली से लिखते हैं। गत वर्ष परीक्षा में फेल हो गया, सारे सर्टिफिकेट तथा सारे सामान और रुपयों समेत बक्स चोरी चला गया। नौकरी के लिए सर्वत्र मारा फिरा पर कहीं सफलता न मिली। इन परेशानियों से घबरा कर मैंने गायत्री अनुष्ठान आरंभ किया। जप पूरा होते ही एक छोटी नौकरी मिल गयी, श्रद्धा बढ़ी, सवालक्ष अनुष्ठान किया। अब मुझे साइन्स अध्यापक की अच्छी जगह मिल गई है। आगे अधिक उन्नति होने की आशा है।
बिजली गिरी किंतु सब बच गये
श्री गंगा प्रसाद सिंह जी बरिया घाट (मिर्जापुर) से लिखते हैं-ता. 9 सितंबर 54 को दिन के तीन बजे वर्षा हो रही थी, घर में सब भाई-भतीजे चारपाई पर बैठे थे। अचानक घर पर आकाश से भयंकर गड़गड़ाहट के साथ बिजली गिरी। औरतें जोर से रोने लगीं। मेरे मुँह से भी गायत्री माता की पुकार निकली। बिजली गिरने से छप्पर की खपरैल टूट गयी। घर में धुआँ भर गया। बारूद की सी तेज गंध आ रही थी। दीवाल व नीचे की जमीन जहाँ लड़के बैठे थे बुरी तरह फट गई। मकान से सटा हुआ नीम का पेड़ जल गया। इतना सब होते हुए भी घर के किसी व्यक्ति को कोई क्षति न पहुँची। जहाँ सब लोग बैठे थे, ठीक उनके नीचे की जमीन का बिजली के भयंकर प्रहार से फटना और किसी का बाल भी बाँका न होना सभी दर्शकों के लिए एक आश्चर्य की बात थी। तब से हम लोगों की गायत्री माता पर अनेक गुना श्रद्धा बढ़ गयी है।
अनेकों आपत्तियाँ टली
श्री दुर्गालाल जी रिटायर्ड मजिस्ट्रेट बूँदी से लिखते हैं-गायत्री उपासना से मेरी अनेकों उलझनें दूर हुई हैं। पेंशन मिलने में बड़ी कठिनाइयाँ थीं वे हल हुईं। ज्येष्ठ पुत्र की आजीविका संबंधी समस्या सुलझी। कन्या के प्रसव काल से जो प्राण घातक संकट उपस्थित था वह टला। पौत्री की अत्यंत भयंकर ज्वर एवं मूर्छा से जीवन रक्षा हुई। इस प्रकार मैंने अपने जीवन में गायत्री मंत्र के प्रयोग द्वारा अनेक चमत्कारी लाभ होते देखे हैं।
छूटी हुई नौकरी फिर मिली
श्री सीताराम काशीनाथ राठी, वोरीबली (बम्बई) से लिखते हैं-सन 54 दिसम्बर में मुझे लकवा मार गया। इलाज की हद कर दी गयी पर लाभ कुछ न हुआ। एक मित्र के परामर्श से मैंने मानसिक गायत्री उपासना की। प्राकृतिक चिकित्सा का सहारा लिया, धीरे-धीरे स्वास्थ्य सुधरने लगा। बम्बई प्लास्टिक लि. में नौकरी करता था। वह भी अस्वस्थता के कारण छूट चुकी थी। स्वास्थ्य सुधरा तो पैसे की तंगी की विपत्ति सामने आई। छूटी नौकरी को पुनः प्राप्त करने की कोशिश की तो मना का, दो टूक जवाब मिल गया। सब ओर से निराश होकर सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान पर बैठा। अनुष्ठान पूरा होने में दो दिन की देर थी कि कम्पनी का घर बैठे बुलावा आया और फिर काम पर लग गया। गुजर होने लगी। पहले मेरी स्त्री और बालक बार-बार बीमार पड़ते थे सो भी अब नहीं पड़ते। माता की दया से अब आनंद ही आनंद है।
सर्प विष उतरा
श्री वेणी प्रसाद जी ट्रालिमैन, चिचौड़ा (वैतृल) गायत्री मंत्र शक्ति के बारे में लिखते हैं-मैं एक दिन निमौटी गाँव जा रहा था। रास्ते में वर्धा नदी के किनारे साँप के डसने से एक गाय छटपटा रही थी। बहुत लोग अनेक उपचार कर रहे थे, पर कोई लाभ नजर नहीं आता था। मैं गायत्री जपता तो था, पर उसका प्रयोग कभी नहीं किया। उस समय अंतर से प्रेरणा पाकर मैंने थोड़ा सा गंगाजल मंगा कर गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित कर गाय को पिला दिया शेष उसके शरीर पर छिड़क दिया। जल छिड़कते ही गाय एक दम उठ कर खड़ी हो गयी फिर अभिमंत्रित जल पिलाने पर वह चरने लग गयी। इस मंत्र शक्ति को देख मेरे सहित सभी लोग चकित हो रहे थे।
रेल से कटने से बचा
अ.ज.भा. गवली, थाना (बम्बई) माता की कृपा का वर्णन करते हैं-नौकरी से घर वापिस आ रहा था। स्टेशन पहुँचकर चलती ट्रेन पकड़ने की कोशिश की। हैंडल पकड़ कर पायदान पर खड़ा ही हुआ था कि मेरे हाथ से हैण्डल छूट गया और मैं गाड़ी के नीचे लुढ़क गया। पर पता नहीं कैसे मेरे गिरते ही गाड़ी सहसा रुक गयी और मैं थोड़ी सी चोट मात्र खाकर बाल-बाल बच गया। लोग मेरे भाग्य की सराहना कर रहे थे और मैं प्राण रक्षिका अपनी इष्ट देवी गायत्री माता की याद में आँसू बहा रहा था।
मरते-मरते बचा
श्रीराम किशन वडाले, मालेगाँव नासिक से लिखते हैं-गणेश उत्सव की तैयारी में मैं सीन बनाने में लगा हुआ था। एक बिजली का तार वहाँ नीचे लगा हुआ था। अचानक मेरे हाथ का पंजा उस तार पर जा पड़ा और चिपक गया। बिजली का करंट मेरे सारे शरीर में फैल गया और मेरे प्राणों को खींचने लगा। मेरे बड़े भाई और मित्रगण भी वहीं थे, पर कुछ नहीं कर सके। मेरा प्राण जाने ही वाला था-मैंने माता को व्याकुलता से याद किया। बोलने की सामर्थ्य थी ही नहीं। याद करते ही जिस होल्डर में से यह वायर आया हुआ था, वह होल्डर टूट कर नीचे गिर पड़ा और मेरे प्राण बच गये। ठीक उसी क्षण में होल्डर का गिर पड़ना माता की साक्षात कृपा नहीं तो क्या है?
आवश्यकता की पूर्ति
श्री शिवशंकर मिश्र, कामठी, माता की छिपी सी कृपा का वर्णन करते हैं-मेरी लड़की की सगाई स्थिर हो गयी थी पर उसके खर्च का उपाय नहीं हो रहा था। कर्ज माँगने पर कर्ज भी नहीं मिल सका। मैं व्याकुल भाव से माता की प्रार्थना करता रहता। आठ ही दिन विवाह में शेष थे। मेरी व्याकुल प्रार्थना भी बढ़ रही थी। अन्तः प्रेरणा से पुनः महाजन से कर्ज माँगने गया। इस बार उसने बिना हिचक के सात सौ रुपये का सामान और तीन सौ रुपये नगद दे दिया। जब दो दिन शेष रहे तो अनायास ही 18 सौ रुपये का प्रबंध हो गया। मैंने माता को धन्यवाद देते हुए विवाह सम्पन्न किया।
बालक कुचल जाने से बचा
श्री भागीरथ जी हरदिया, कसरावद अपने अनुभव की घटना लिखते हैं-मेरे यहाँ भाई एवं बहन की शादी थी। मैंने अपने दो साथियों के संग पानी की कोठी भरने के लिए कुएँ पर जा रहा था। साथ में मेरी बुआ का आठ वर्ष का लड़का भी था। एक पत्थर पर गाड़ी के चढ़ जाने के कारण वह 7-8 मन भारी कोठी उस बालक पर गिर पड़ी और बालक गिर कर चक्के के नीचे आ गया। उसके पेट पर से चक्का निकल गया। लड़के को वमन होने लगा और छटपटा कर कराहने लगा। मैं व्याकुल होकर माता की प्रार्थना कर रहा था। तुरंत बालक को डॉक्टर के यहाँ लेकर गया। डॉक्टर ने भली-भाँति जाँच कर कहा-लड़का अब पूरा स्वस्थ है। सभी आश्चर्य में थे कि इतनी भारी गाड़ी का भार सहकर वह कैसे पूरा स्वस्थ रह सका। मैं विवाह अवसर पर इस महाविघ्न से बचा लेने के लिए माता को धन्यवाद दे रहा था।
बारूद विस्फोट में भी सुरक्षा
श्री नंदकिशोर तिवारी, धवाली सागर लिखते हैं- तपोभूमि के महायज्ञ की पूर्णाहुति करके घर लौटा जा रहा था। मेरे गुरुवर गायत्री के परम उपासक श्री परमानंद मिश्र जी साथ ही थे। वीना स्टेशन पर उतरकर वे प्लेटफार्म पर बैठकर संध्या करने लगे। मैं उसी जगह खड़ा रहा। उसी समय एक ठेला पर चार बारूद की पेटी ट्रेन से उतारकर कुली लिए आ रहा था। सहसा एक पेटी फूट गयी और स्टेशन पर आग लग गयी। गुरुदेव के बिल्कुल निकट ही छह व्यक्ति अत्यधिक जल गये जिन में तीन अस्पताल जाकर मर गये। मेरा सारा वस्त्र और शिखा तक जल गये। शरीर में दो जगह थोड़े-थोड़े जलने के निशान बन गये, पर मेरे गुरुदेव को जरा सी आँच भी न आयी। उनके निकट के अन्य सभी काफी जल गये। मैं खड़ा होकर माता की संरक्षण लीला आंखें फाड़कर देख रहा था।
माता ने जान बचा ली
श्री भगवान सिंह (एकलवारा) मनावर, धार, अपना अनुभव लिखते हैं-मैंने अब तक करीब साढ़े पन्द्रह लाख गायत्री मंत्र का जप किया है। इसमें मैं दानव से मानव, दरिद्रता तथा डायजेक्शन की बीमारी से मुक्त हुआ हूँ। 30 अक्टूबर 1956 को मैं अपने मकान की ऊपरी छत पर बैठ कर भोजन कर रहा था। अचानक मकान के नीचे का खम्भा टूट जाने से सारा मकान ही गिर गया। मैं भी उसके साथ ही ऊपर से नीचे गिरा। दीवारें गिरीं, चाँदनी के पतरे गिरे, पाट-खपड़े आदि सब ही मेरे ऊपर गिरे, पर न तो मुझे कुछ चोट आई, और न कुछ लगा ही। गाँव के लोग दौड़े आये और सुरक्षित देखकर सभी गायत्री माता की जय-जयकार करने लगे।
सुहाग की रक्षा
श्री फूलवती शर्मा देहरादून से लिखती हैं-मेरे मन में अनायास ही गायत्री उपासना के प्रति प्रेम उत्पन्न हुआ था और नित्य प्रेम से माता की आराधना किया करती थी। एक बार मेरे पतिदेव एक ऊँचे पहाड़ पर गये थे चढ़ने का रास्ता संकीर्ण और खतरों से भरा था। संभल-संभल कर पग रखना पड़ता था, पर पता नहीं क्या होनहार था। सारी सावधानी के बर्तते हुए भी आखिर इनके पैर फिसल ही गये। मीलों की ऊँचाई थी। शरीर को चकनाचूर हो जाने के सिवाय और कोई बात नहीं हो सकती थी। पर माता को अपनी बेटी का सौभाग्य सिंदूर जो बचाना था। थोड़ी दूर तक गिरने पर वे बीच में ही अटक गये, जैसे किसी ने उन्हें अपनी गोद में ले लिया हो। केवल हाथ में थोड़ी चोट आयी, सुरक्षित होकर आकर मुझ से मिले। उस माता के चरणों में हजार-हजार न्यौछावर हूँ।
रक्तपित्त -रोग अच्छा हुआ
श्री नन्हकू मिश्र वीहट मुँगेर से गायत्री उपासना से हुए लाभ के बारे में लिखते हैं-एक बार रात को मेरी छाती में जोरों से दर्द पैदा हुआ। मैं छटपट करने लगा। दवा खाने से जरा भी पीड़ा कम न हुई। कुछ देर बाद खून की कै हुई और मैं बेहोश हो गया। फिर विविध औषधि उपचार होने लगे। समय बीतता गया और प्रतिदिन दर्द तथा रक्त वमन की मात्रा बढ़ती ही गयी। मैं जीवन से निराश होकर मन ही मन गायत्री जपने लगा। रात में माता का स्वप्न में दर्शन हुआ। प्रातः गायत्री जप का संकल्प लेकर स्वयं भी पड़े-पड़े जप करता रहता। अब मैं दिनों दिन रोग की घटती एवं सुधार की अवस्था बढ़ती हुई देखने लगा। दो मास में मैं स्वस्थ हो गया। अब कृतज्ञ भाव से यथासाध्य नित्य जप किया करता हूँ।
दुष्ट रोग से छुटकारा
श्रीराम राज पाण्डेय, जमशेदपुर (सिंहभूमि) माता की कृपा का वर्णन करते हुए लिखते हैं-मैं धातु रोग से जर्जर हो गया था। सब तरह का इलाज कर हार चुका था। एक हितैषी मित्र ने मुझे गायत्री माता का अंचल पकड़ने की सलाह दी। उपासना विधि गुरुदेव से शिक्षा ग्रहण कर प्रारंभ की। काफी सुधार हुआ। फिर टायफैड हुआ। उससे भी रक्षा हुई। अंतिम कर्म भोग रूप में सारे शरीर में भयंकर दर्द शुरू हुआ। रात दिन मेरी चीख से आकाश फटता रहता। एक दिन रात में दर्द इतना बढ़ गया कि मैंने समझ लिया कि आज मेरे जीवन की अंतिम रात्रि है। भोर में थोड़ी देर नींद आयी। स्वप्न में गुरुदेव आश्वासन दे रहे थे-अच्छे हो जाओगे। सूर्योदय होते समय पर नींद खुली। रात्रि की भाँति दर्द ने भी शरीर से बिदा ले ली।
चोर हानि न कर सका
श्री कपिलदेव पाण्डेय, मिर्जापुर लिखते है- मरे पड़ोस के श्री सदानंद जी सपत्नीय गायत्री उपासना करते हैं। एक दिन रात में उसके घर में चोर घुसा। उसके वस्त्रादि उठा ले गया। खड़खड़ सुनकर उसकी पत्नी की नींद टूट गयी और उसने पति को जगाया। आवाज सुन चोर भी शीघ्रता से भाग गया। उन लोगों ने देखा-वस्त्र गायब थे। पुनः वे लोग सो गये। उनकी पत्नी को स्वप्न हुआ। तुम्हारा वस्त्र चोर नहीं ले जा सका है। तुरंत लैम्प जलाकर खोजने से घर के पीछे सभी वस्त्र मिल गये।
पत्थरों की वर्षा से रक्षा
श्रीगोकुलचंद शर्मा, मोडक (कोटा) सपरिवार प्राण रक्षा की कृपा के बारे में लिखते हैं-कृष्णाष्टमी की दूसरी रात में हम लोग पति-पत्नी एवं बच्चों सहित एक कत्तलपोश तिवारी के नीचे सो रहे थे। अचानक दरवाजे का पत्थर टूट जाने से वह पत्थर और उसके ऊपर का कत्तल सभी एक साथ ही नीचे गिर पड़े। जिस पलंग और खाट पर हम लोग सोये थे वह चूर-चूर हो गये। हमारे ऊपर कत्तलों के ढेर थे, परंतु हम लोग बाल-बाल सुरक्षित थे। सभी लोग गायत्री माता की आश्चर्य भरी रक्षा व सराहना कर रहे थे। हम लोग बाहर निकल व कृतज्ञता के आँसुओं से भर रहे थे।
बुरे दिन पलट गये
पं. राम प्रसाद मिश्रा वेदौलिया (बस्ती ) अपना अनुभव लिखते हैं-पिताजी के पास एक हजार बीघा जमीन थी। काफी सम्पन्न थे, पर समय का कुचक्र वह सब कुछ चला गया। घर भी फूट गया। झोंपड़ी में रहने लगे। पेट को भोजन तक नसीब न होता आखिर 16) मासिक की नौकरी की। वह भी बीमारी के कारण छूट गयी। फिर सरयू तट पर गन्ने के खेत में रखवाली के लिए दिन रात वहाँ रहना पड़ा। जहाँ से तीन-तीन मील कोई गाँव न था तथा पास श्मशान घाट था। रात को अकेले रहने में बहुत डर लगता। कपड़ों के अभाव में लकड़ी जलाकर रात काटनी पड़ती। विपत्ति जो करावे सो कम है। एक रात को उस सुनसान जंगल में एक गेरुए वस्त्रधारी बाबा आ निकले। रात को उसी झोंपड़ी में ठहर गये। उनके पास एक पाव कोदों का चावल था जो मिट्टी की हाँडी में पकाया गया वही हम दोनों ने खाया। सबेरे चलते समय उनने मुझे गायत्री मंत्र सिखाया और कहा बेटा यह मंत्र सब सुख संपत्ति का दाता है। तू इसका जाप कर तेरे सब कष्ट मिटेंगे। मैंने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की। उसी रोज से दिन फिर गये। खेती में लाभ हुआ। बैल खरीदे। गिरवी रखी हुई जमीन छूटी। कर्ज चुकाया। मेरा विवाह हुआ। अच्छी नौकरी लगी। सब प्रकार की सुख शाँति से घर भर गया। जहाँ रहता हूँ गायत्री का प्रचार करता हूँ।
मोटर का पहिया फिरने पर भी जीवन रक्षा
श्री पूरनमल जी गौतम, कोटा से लिखते हैं-मैं मोटर ड्राइवर हूँ। गत मास साँगोद जाते समय धानाहेड़ा गाँव के पास एक दुर्घटना हुई। तीन औरतें आपस में ठिठोली करती हुई सड़क पर चली आ रही थीं। जैसे ही मोटर बराबर आई की एक औरत ने दूसरी को धक्का मारा जो मोटर के पहिए के बिल्कुल आगे आ गयी। मैंने बहुत बचाया मगर उसके मडगार्ड की ठोकर लग ही गयी और वह पहिए के नीचे आ ही गयी। मैंने सोचा एक पहिए के नीचे कुचली तो भी यदि पीछे के पहिए से बच जावे तो शायद इसकी जान बच जाये। माता का नाम लेकर गाड़ी तेजी से घुमाई। लारी बबूल के पेड़ से टकराई। मैं बुरी तरह घबरा रहा था कि औरत भी मरी गाड़ी भी टूटी। जब नीचे उतरा तो देखा कि वह औरत मोटर के नीचे से खुद ही निकलकर बाहर आ रही है। औरत के हाथ पैर के जिन जेवरों पर होकर पहिया गुजरा था वे तो टूट गये पर उसको जरा भी चोट न आई। लारी में ठसाठस भरी हुई सवारियों में से किसी का बाल भी बाँका न हुआ। माता की इस कृपा को जितना भी धन्यवाद किया जाय कम है।
माता की कृपा के अनेक अनुभव
श्री भगवती प्रसाद तिवारी, बीना से लिखते हैं-गायत्री उपासना के बड़े प्रभावशाली अनुभव मुझे हुए हैं। कितने ही व्यक्तियों को इस महामंत्र की उपासना की प्रेरणा मैंने दी है और उनको आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त करते देखा है। कई वर्ष पूर्व मुझे लकवा हुआ था। बड़ी भयंकर स्थिति थी वह भी मानसिक जप से बिल्कुल अच्छा हो गया। अब इस वृद्धावस्था में माता ने एक पुत्र दिया है। इसका संकेत कुछ दिन पूर्व माता ने मुझे दिया था और लड़के क्या नाम रखा जाय यह भी मुझे नोट करा दिया था। माता की महानता पर मेरा अटूट विश्वास है।
प्रेतात्मा को शाँति
श्री रतन सिंह गोहेल मिठापुर (सौराष्ट्र) से लिखते हैं- गतवर्ष मेरे एक मित्र की मृत्यु मोटर दुर्घटना से हो गई थी। मुझे अनुभव हुआ कि उनकी आत्मा अशाँत है और गायत्री उपासना का पुण्य फल चाहती है। मैंने उस आत्मा की शाँति और सद्गति के लिए जप आरंभ किया। बहुत दिन बाद फिर उस आत्मा का प्रत्यक्ष हुआ तो उसने बताया कि उस गायत्री जप से उसे पूर्ण शान्ति मिली है उसकी एक कामना वासना जो और शेष थी उसे पूर्ण करने का भी प्रयत्न कर रहा हूँ। गायत्री माता जीवित और मृत सभी को शाँति देती है।
क्षय का घाव भर गया
श्री रामकुमार फरक्या रामपुरा से लिखते हैं-मुझे भयंकर क्षय हुआ था सेनेटोरियम में एक मित्र से अखण्ड ज्योति प्राप्त हुई। उससे प्रेरणा लेकर मानसिक गायत्री उपासना आरंभ की। फल यह हुआ कि एक पैसे बराबर गोलाई की कैविटी जो अकसर दो-दो वर्ष में भी बंद नहीं होती तीन मास में ही ठीक हो गयी। डॉक्टर आश्चर्यचकित रह गये।
मणिनगर (अहमदाबाद) में चैत्र की नवरात्रि आयोजन के लिए उत्साहपूर्वक तैयारियाँ हो रही हैं। अखण्ड कीर्तन, अखण्ड दीपक, रामायण के नौ परायण, यज्ञ, प्रवचन आदि का कार्यक्रम बनाया गया है। -मिश्रीलाल कन्हैयालाल जोशी
गोविंदपुर (भागलपुर) में पं. द्वारिका प्रसाद जी गोस्वामी के यहाँ एक बड़ा गायत्री यज्ञ हुआ। पं. मोतीलाल जी गोस्वामी जगेली निवासी का प्रभावशाली भाषण हुआ। बकिया, कुमुदपुर, नया टोला, पका, परभेली आदि गाँवों में भी शाखाएँ स्थापित की गई हैं।
गरोठ में शिवरात्रि के अवसर पर मा. कमला प्रसाद जी के प्रयत्न से सामूहिक यज्ञ हुआ। श्रद्धालु उपासक पर्याप्त संख्या में उपस्थित थे। यज्ञोपवीत संस्कार भी कराये गये। -हरीराम वैद्य
घासीपुरा (मुजफ्फरनगर) चौ. छोटासिंह के यहाँ सवा लक्ष मंत्रों से यज्ञानुष्ठान हुआ। गायत्री परिवार के सभी सदस्यों ने उसमें भाग लिया। -बनारसी दत्त शर्मा
मुरादपुर माती (शाहजहाँपुर) में जप तथा यज्ञों का कार्यक्रम भली भाँति चल रहा है। तारीख 24 फरवरी को श्री. प्यारे सिंह वर्मा वैद्य ककरौआ के यहाँ यज्ञ हुआ। दूसरा पियरा में श्री चंद्रिकाप्रसाद जी के यहाँ हुआ। -राम सहाय वर्मा
हथगाँव (फतेहपुर) में प्रतिदिन एक माला का हवन नियमित रूप से चल रहा है। मंत्र लेखन कार्यक्रम में प्रगति हो रही है। -जगमोहन लाल निगम
अमलार (सुजालपुर) में शिवरात्रि के अवसर पर गायत्री यज्ञ तथा रामायण परायण हुआ। पं. श्री नारायण प्रसाद शर्मा आदि सज्जनों का सहयोग सराहनीय था। -राधा किशन तिवारी
भगौनापुर (फतेहपुर) में श्री सरयूप्रसाद जी के यहाँ यज्ञानुष्ठान पूर्ण हुआ। बड़ा आनंद रहा। होली पर 24 हजार आहुतियों का हवन तथा अनेक व्यक्तियों के सामूहिक यज्ञोपवीत होने का आयोजन रखा गया है। -मोहनलाल वर्मा
मऊरानीपुर (झाँसी) में शिवरात्रि के अवसर पर सामूहिक गायत्री यज्ञ हुआ। नित्य यज्ञ का क्रम चल रहा है। यहाँ करीब 125 महिलाएँ नियमित रूप से गायत्री चालीसा पाठ करती हैं। -सालिगराम पाण्डेय
नाँदेमऊ (फरुखाबाद) में यदुनाथसिंह के यहाँ बड़े समारोह से पं. सिद्ध गोपाल जी द्वारा सम्पन्न कराया गया। -विश्वनाथ सिंह
करसरा में एक लाख आहुतियों का यज्ञ बहुत ही आनंदपूर्वक हुआ। आरंभ में जो भारी बाधाएं दिखायी पड़ रही थीं वे समय पर स्वयमेव शाँत हो गई। -देवराज भट्ट
तनौडिया (शाजापुर) में 27 फरवरी को देव प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठ कर्मकाण्डी पंडित जी द्वारा हुई। 48 हजार जप, तीन हजार आहुतियों का हवन, रात्रि जागरण, चालीसा पाठ, भजन-कीर्तन ब्रह्मभोज आदि के बड़े प्रभावशाली आयोजन सम्पन्न हुए।
-नंदकिशोर कर्मयोगी
झाँसी में गायत्री यज्ञों की शृंखलाबद्ध योजना चालू है। प्रति रविवार को एक हजार आहुतियों के भिन्न-भिन्न स्थानों पर गायत्री यज्ञ होते हैं। नये सदस्य बनाये जाते हैं। शिवरात्रि को गायत्री यज्ञ बड़े ही उत्साह के साथ सम्पन्न हुआ। श्री पं. शिवकुमार शास्त्री का यज्ञ के उपराँत बड़ा मार्मिक भाषण हुआ। उपस्थित जन समुदाय ने गायत्री यज्ञ तथा मंत्र के महत्व को समझा तथा सदस्य बने। -गिरिजा शंकर खरे
एग्रीको (जमशेदपुर) में एक 24 लक्ष जप, 24 हजार आहुतियों का सामूहिक अनुष्ठान पूर्ण हो चुका है। साप्ताहिक सत्संग बारी-बारी सदस्यों के यहाँ बड़े उत्साहपूर्वक होते है। -ज्ञान चंद्र
जुल्मी (राजस्थान) के पं. रामकिशन शर्मा बड़े परिश्रम-पूर्वक उस क्षेत्र में भ्रमण करके गायत्री उपासकों में उत्साह भर रहे हैं। बदरवान, रुद्धा खेड़ा, चेचट, आलोद, राजपुरा आदि शाखाओं का कार्य बड़े आनंदपूर्वक चल रहा है। आलोद तथा राजपुरा में बड़े-बड़े यज्ञों की योजना चल रही है। -रामकुमार शर्मा
बुलंद शहर जिले में कसेर कला निवासी महात्मा ब्रह्म स्वरूप जी महाराज गायत्री प्रचार तथा शाखाओं की स्थापना में संलग्न हैं। इस मास उनके प्रयत्न से अनूपपुर, डिबाई, चरौरा, सम्भल, कसेर आदि स्थानों में गायत्री परिवारों की स्थापना हुई है।
-ज्वाला प्रसाद शर्मा
खोरासा (गीर) सौराष्ट्र में ब्रह्मचारी श्री नर्मदाशंकर जोशी के प्रयत्न से गायत्री उपासना का बड़ा प्रचार हो रहा है। मंत्र लेखन महायज्ञ के लिए वे बड़ी तत्परतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। उपासकों का सच्चा सहयोग मिल रहा है। -एक उपासक
गुलाबनगर बरेली के श्री गौरीशंकर मंदिर में प्रत्येक रविवार को हवन तथा सत्संग का कार्यक्रम बड़े सुचारु रूप से चलता है। चैत्र की नवरात्रि में 24 हजार आहुतियों का हवन होगा। -यशोदानंदन मुनीम
व्यावर में प्रति रविवार को दो हजार आहुतियों का हवन होता है। सन् 57 तक यह हवन क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। श्री मुकुँद दास राठी ने गायत्री पुस्तकालय के लिए पूरे दो सौ मँगाकर दान दिये हैं। सेठ दुर्गाप्रसाद जी ने एक हजार चालीसा वितरण किये हैं। एक विशाल यज्ञ करने की योजना चल रही है।
-मोहनलाल शर्मा
गुरुकुल बकानी (राजस्थान) में चैत्र सुदी 13, 14, 15 को एक बड़ा गायत्री यज्ञ होगा। श्री स्वामी जी महाराज इसकी तैयारी में संलग्न हैं। -भँवर लाल शर्मा
तारापुर श्री जगन्नाथ मंदिर में सामूहिक गायत्री अनुष्ठान बड़े आनंदपूर्वक सम्पन्न हुआ। श्रीमती उज्ज्वल देवी, अमृत देवी, सुकाँती देवी का उत्साह देखने ही योग्य था। -गोकुल प्रसाद पंडा
मालेगाँव (नासिक) में स्वर्गाश्रम हरिद्वार के तपस्वी श्री गायत्री जी स्वरूप महाराज पधारे। उनके सत्संग तथा प्रवचनों से स्थानीय जनता में गायत्री माता के प्रति अभिरुचि और भी बढ़ी है। -जगन्नाथ बद्रीनारायण झँवर
सुसनेर (शाजापुर) में बैशाख में एक बड़े यज्ञ की तैयारी हो रही है। आर्वी से पं. कृष्ण प्रसाद जी आयुर्वेदाचार्य इसमें पधारेंगे। गुदराबन के पं. दामोदर जी इस अवसर पर अपना नरमेध (सर्वस्व दान) करेंगे।
-नंदकिशोर शर्मा
ई.एस.डी. मंदिर काँकीनारा (बंगाल) में गायत्री उपासना के लिए बड़ा उत्साह पैदा हुआ है। जप, हवन, स्वाध्याय, सत्संग कार्यों में सदस्यगण बड़े चाव से भाग लेते हैं। -राम प्रसाद मिश्र
कुल्हार (बिदिया) में 11 फरवरी को सूर्योदय से सूर्य-अस्त तक अखण्ड गायत्री यज्ञ हुआ जिसमें सहस्रों ग्रामवासियों ने बड़े उत्साहपूर्वक भाग लिया। खर्चा करीब 300) पड़ा। जो अकेले लक्ष्मण प्रसाद जी ने ही दे दिया। पं. शिवकुमार जी शास्त्री का बड़ा प्रभावशाली प्रवचन हुआ। इस आयोजन को सफल बनाने में पं. राम सहाय जी तिवारी ने अधिक परिश्रम किया। -बाल कृष्ण अग्रवाल
मझोला (नैनीताल) में होली की पूर्णिमा को एक सामूहिक गायत्री यज्ञ होगा। तैयारियाँ जोरों से हो रही हैं। -लक्ष्मण सिंह मनरील
गुदरावन (शाजापुर) में चैत्र सुदी 11 से पूर्णिमा तक पाँच कुण्डों की यज्ञशाला में सवालक्ष आहुतियों का यज्ञ होगा। 24 लक्ष जप भी उस समय तक पूर्ण हो जायेगा। लगभग एक हजार रुपया एकत्रित हो चुका है। -बाबूलाल शर्मा
कुरावड़ (उदयपुर) में फाल्गुनी पूर्णिमा को सामूहिक अनुष्ठान होने जा रहा है। तननुन्तर चैत्र की नवरात्रि में भी एक अच्छा आयोजन होगा। सफल बनाने में कई उपासक भी श्रद्धापूर्वक संलग्न हैं।
- जगन्नाथ प्रसाद शर्मा
झाँसी में 20 मार्च से 9 अप्रैल तक पाठ-परायण आयोजन श्री मंदिर हनुमान जी, रेलवे क्वाटर वर्कशॉप रोड, टेक्नीकल स्कूल के सामने होगा। श्री बाबा राघवदास जी इसका आयोजन कर रहे हैं।
-राम सहाय तिवारी
बीना (सागर) में 24 लक्ष गायत्री अनुष्ठान की पूर्णाहुति तथा 24 हजार आहुतियों का आयोजन ता. 9 से 14 फरवरी को श्री नरसिंह जी के मंदिर में हुआ। लगभग 400 व्यक्तियों का ब्रह्मभोज हुआ। अनेक धर्मप्रेमियों ने तन, मन, धन से सहयोग किया।
-शालिगराम दूबे
सापन-सावली बरार में महावीर जी के स्थान पर सवा लक्ष आहुतियों का गायत्री यज्ञ राम नवमी से लेकर चैत्र सुदी 15 तक सम्पन्न होगा। बाला जी के श्री स्वामी शंकरानंद जी की कृपा से एक हजार रुपया इकट्ठा हो चुका है। तैयारी जोरों से चल रही है।
-गोविंद नारायण मिश्र
दिगौड़ा (टीकमगढ़) में शिवरात्रि को अखण्ड व्रत, जप, हवन, पूजन-कीर्तन, रात्रि जागरण आदि कार्यक्रमों के साथ उत्सव श्री मारकण्डेश्वर एवं श्री प्रतापेश्वर स्थानों पर बड़े उत्साहपूर्वक मनाया गया।
-बैजनाथ सोनकिया
अण्डा (जालौन) में सवालक्ष आहुतियों का हवन तथा 108 चालीसा पाठ एवं सामूहिक अनुष्ठान का कार्यक्रम सानंदपूर्ण हुआ। 30) को प्रसाद वितरण हुआ। कन्याओं को भोजन कराया गया।
-राम खिलावन द्विवेदी
तनोडिया (शाजापुर) में 10 मार्च को दस हजार आहुतियों का हवन हुआ। पूर्णाहुति में उपस्थित सज्जनों ने अपने-अपने कई दोष छोड़ने की प्रतिज्ञा की। श्री सोनार सिंह का उत्साह सराहनीय रहा।
-मुन्नालाल कनेरियन कर्मयोगी
विक्रमपुर (बरेली) के निकट मलूकपुर के टोले पर निवास करने वाले गायत्री के परमोपासक महात्मा जी तथा चतुर्भुज जी गंगवार के सहयोग से इस क्षेत्र में गायत्री परिवार की कई शाखाएं स्थापित हुई हैं। जनता में बड़ा उत्साह है। -प्र. भा. प्रताप शुक्ल
आकेली (मेडता) में शिवरात्रि के अवसर पर गायत्री मंत्रों की सवालक्ष आहुतियों का हवन, गायत्री सहस्रनाम के एक हजार पाठ, श्री ब्रह्मचारी देवेन्द्र कुमार जी की कृपा से पूर्ण सफलतापूर्वक पूर्ण हुए। चैत्र कृष्ण 4 को फिर ऐसा ही एक उत्सव होगा।
-भँवरलाल दाधीच
अकलेरा (झालावाड) शाखा में अब तक 81 सदस्य बन चुके हैं। सत्संग एवं हवन का कार्यक्रम बड़े आनंद से चलता है। गत बसंत पंचमी पर यहाँ एक 24 हजार यज्ञ हो कर चुका है। अब हरनवाड़ा शाह जी में एक 24 हजार यज्ञ होने की तैयारी है।
-मोहनचंद पारीख
पटेलाबद (झाबुआ) में श्री नीलकण्ठेश्वर मंदिर पर श्री रघुनाथ सिंह गेहलोत ने कलश चढ़ाया। बाजारों में भव्य जुलूस निकला। श्री दामोदर जी नागर के सहयोग से 10) के गायत्री चालीसा वितरण हो रहे हैं। -सोमेश्वर चतुर्वेदी
काशीपुर (बदायूँ) में 14-3 को पं. ओम प्रकाश शर्मा के संरक्षता में एक सामूहिक गायत्री हवन हुआ जिसमें समस्त गायत्री उपासकों ने बड़ी लगन से सहयोग दिया। दर्शनों की अपार भीड़ थी।
-ॐ प्रकाश मित्तल
नवाबगंज (बरेली) शाखा के अब तक 93 सदस्य बन चुके हैं। इस मास 1616 माला जप, 2908 चालीसा पाठ, 21784 मंत्रलेखन हुए। अखण्ड जप पाठ, लेखन, दीपक हवन का आयोजन बड़ा ही उत्साहवर्धक रहा। -प्रभा प्रताप शुक्ल
डुमरिया (भागलपुर) में 3 मार्च को सामूहिक गायत्री यज्ञ हुआ। सदस्यों की संख्या दिन-दिन बढ़ रही है। -पद्माकर झाँ
पुसावली (बदायूँ) में गत पूर्णिमा को सामूहिक हवन, कीर्तन एवं सत्संग का बड़ा सुन्दर आयोजन हुआ। भविष्य में यह काम और भी उत्साह के साथ चलेगा। -गायत्री प्रसाद गुप्ता
मऊ रानीपुर झाँसी में शिवरात्रि को 1500 आहुतियों का यज्ञ हुआ। सदस्यों की संख्या 85 हो चुकी है। - सालिगराम पाण्डेय
भगौनापुर (फतेहपुर) में चौबीस हजार आहुतियों का यज्ञ तेरह मार्च को बड़े समारोहपूर्वक सम्पन्न हुआ। श्री पृथ्वीनाथ जी, हीरालाल जी, मेवालाल जी के उपनयन संस्कार हुए। सठिगवाँ, पारादान, बिजोली पतारी, सैठी, बवुरिहापुर आदि गाँवों के अनेक सज्जन पधारे थे। यज्ञ के अंत में पं. बद्री प्रसाद जी त्रिपाठी तथा श्री दयाशंकर वर्मा के विद्वतापूर्ण भाषण हुए। -मोहनलाल वर्मा
कानपुर में इस मास में दो यज्ञ हुए। पहला श्री बाबूराम अग्निहोत्री के यहाँ गोविंदनगर में, दूसरा शिवरात्रि पर स्टेट बैंक में। सदस्य संख्या बढ़ रही है।
-अयोध्या प्रसाद दीक्षित
शोप (टोंक) में गायत्री आश्रम के उद्घाटन तथा व्यापक गायत्री प्रचार की तैयारी हो रही है। बालून्दा का गायत्री साधक सम्मेलन पूर्ण सफल रहा। यज्ञ, प्रवचन, गायत्री चालीसा तथा सहस्र नाम पाठ आदि कार्यक्रमों का उपस्थित व्यक्तियों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। -शिवराम सिंह, अध्यापक
गीधासाँड (रायगढ़) में इस मास गायत्री पुस्तकालय की स्थापना हुई। सौ रुपये की पुस्तकें, कुर्सी, घड़ी आदि की व्यवस्था हो गयी। आगे और भी उन्नति होगी। - विश्वनाथ मिश्र
पनसूरपुर (मुजफ्फरपुर) शाखा के 90 सदस्यों द्वारा 16708 माला जप हुआ। हवन भी बराबर होते रहते हैं। कई साधकों के विधिपूर्वक अनुष्ठान चल रहे हैं। -बनारसी दास शर्मा
चपुन्ना (फर्रुखाबाद) में 4 हवन गायत्री आश्रम पर और पाँच अन्य गाँवों में कराये गये। गायत्री मंदिर तथा आश्रम का सुँदर फाटक बनाने का प्रबंध हो रहा है। -पातीराम त्रिपाठी
मझरिया मठ (चम्पारन) में गत पूर्णिमा को 2600 आहुतियों का हवन हुआ। उपस्थिति काफी थी। यहाँ से लगभग 50 मील पैदल चलकर मार्ग में प्रचार करती हुई एक टोली गायत्री परिवार सम्मेलन में मथुरा पहुँचने की तैयारी कर रही है।
-नित्यानंद शर्मा
मझिया (हरदोई) में गत मास सामूहिक अनुष्ठान तथा 11 मालाओं का हवन हुआ।
-शिवराम दीक्षित
जोधपुर शाखा द्वारा इस मास आठ आयोजन हुए जिसमें सत्संग, प्रवचन, कीर्तन, ग्रंथ, पाठ, जप, हवन आदि के कार्यक्रम रहे। सरदारपुरा में एक देवी जी का गायत्री महापुरश्चरण चल रहा है जिसकी पूर्णाहुति बड़े समारोहपूर्वक होगी। -कन्हैयालाल मिश्रा
महलवाला (मेरठ) में फागुन वदी 5 से यज्ञ चालू है जिसमें अब तक 868 मालाओं की आहुतियाँ हो चुकी हैं। श्री स्वामी गंगानंद जी तथा स्वामी योगानंद जी, स्वामी कैलाश गिरि जी तथा पं. ब्रह्मदत्त जी आदि सज्जन बड़ी निष्ठापूर्वक यज्ञ को सफल बनाने में संलग्न हैं।
आरंग (रायपुर) शाखा में 70 सदस्यों द्वारा इस मास 8295 माला का जप, 9568 गायत्री चालीसा पाठ, 26648 मंत्र लेख तथा 802 माला हवन सम्पन्न हुआ। सत्संगों का क्रम बड़े उत्साहपूर्वक चलता रहा।
-विद्या प्रसाद मिश्र
अलीगढ़ (लक्ष्मीपुरी) शाखा के 40 सदस्य बड़ी श्रद्धा पूर्वक साधना में संलग्न हैं। चैत्र की नवरात्रि में श्री राम प्रकाश जी पलतानी के यहाँ हवन कुण्डों में 24 हजार आहुतियों का हवन निश्चय हुआ है। -श्रीराम पाण्डेय
मोरवी (सौराष्ट्र) में प्रतिमास छेला रविवार को गायत्री हवन, जप, सत्संग, ब्रह्मभोज आदि का कार्यक्रम श्री करुणाशंकर जगजीवन जानी के यहाँ होता है। श्री जीवन लाल हरिशंकर भट्ठ, दुर्गाशंकर दवे, गायत्रीलाल, मदनलाल जोशी आदि सज्जनों के यहाँ भी हवन हो रहे हैं। -करुणाशंकर जगजीवनजानी
करसरा (सतना) में अहीर क्षत्रियों के विशेष सहयोग से गंगा, गीता, गौ, गायत्री पूजन के साथ-साथ सवालक्ष आहुतियों का हवन पाँच कुण्डों की यज्ञशाला में सम्पन्न हुआ। बड़ा आनंद रहा।
-जगदीश प्रसाद भट्ट
उज्जैन में कुँभ के अवसर पर श्री 108 ब्रह्मचारी विश्वकल्याण हितैषी के तत्वविधान में एक मई से तेरह मई तक गायत्री महायज्ञ तथा धर्म प्रचार की विशाल व्यवस्था रहेगी। तैयारी जोरों से हो रही है।
-गुरुप्रसाद वर्मा
खतोली (राजस्थान) के निकटवर्ती जोरापुरा तथा गोपालगंज में दो गायत्री यज्ञ बड़े ही उत्साहवर्धक वातावरण में 24-24 हजार आहुतियों के सम्पन्न हुए। दो हजार आदमियों का ब्रह्मभोज हुआ। निमसरा निवासी श्री बजरंग लाल जी का प्रयत्न बड़ा सराहनीय था। गोठडा में श्री लड्ड लाल जी के द्वारा 24 लाख आहुतियों का यज्ञ तथा एक हजार ब्राह्मण भोज हुआ।
-गोस्वामी रामपुरी
तारापुर (उड़ीसा) में 12 मार्च को सामूहिक गायत्री यज्ञानुष्ठान बड़े आनंद से हुआ जिसमें 20 पुरुष और तीन महिलाओं ने भाग लिया।
-गोकुल प्रसाद पंडा
काली बावड़ी (धार) में ब्रह्मचारी श्री सुरेशानंद जी की प्रेरणा से ढाई लाख आहुतियों का यज्ञ संपन्न हुआ। श्री ब्रह्मचारी जी के प्रयत्न से गायत्री उपासक यहाँ एक गायत्री मंदिर बनवा रहे हैं। जिसके लिए मूर्ति खरीद ली गयी है। प्राण प्रतिष्ठ जेष्ठ में होगी। उसी समय 24 लक्ष का यज्ञानुष्ठान होगा।
-गंगाप्रसाद शुक्ल
मोडक (राजस्थान) में 15 मार्च को यज्ञ हुआ जिसमें आस-पास के साधक आये थे। इसमें साधकों तथा 20 साधिकाओं ने भाग लिया। 10 का साहित्य माता शाँतिदेवी की ओर से वितरित हुआ। श्री शंभूसिंह जी का भाषण हुआ। -माँगीलाल
अमापुर, एटा में 18 मार्च को एक विशाल यज्ञ का आयोजन हुआ। रात्रि को सत्संग हुआ जिसमें पं. शिवनारायण जी पालीवाल के प्रवचन हुए।
-हरिओम गोपा
महबूबा वाद (मानकोटा) में गायत्री परिवार के सदस्य विशेष निष्ठापूर्वक साधना में संलग्न हैं। गत मास चार सामूहिक हवन हुए। साप्ताहिक सत्संग का बड़ा उत्साह रहता है। - बिलासी राम लोहिया
खूँटी (राँची) में श्री बनवारी लाल जी के यहाँ फागुन सुदी 14 को एक हजार आहुतियों का हवन हुआ। अनेकों गायत्री उपासक सम्मिलित हुए।
-देवेन्द्रनाथ
गणेश गंज (टीकमगढ़) में 6 मार्च को एक सामूहिक यज्ञ आयोजन हुआ। श्री गिरजा सहाय जी खरे ने झाँसी से पधार कर महत्वपूर्ण प्रवचन दिया।
-जगतराम पस्तो
माकडौन (उज्जैन) में वैशाख वदी 11, से अमावस तक 25 कुण्डों की यज्ञशाला में 24 लक्ष आहुतियों का विशाल यज्ञ होने की तैयारियाँ हो रही हैं। सभी गायत्री उपासकों को सादर आमंत्रण है।
-ताराचंद पालीवाल
झाँसी में आगामी 17, 18, 19 मई को 21 कुण्डों की यज्ञशाला में बृहद् गायत्री महायज्ञ तथा सवा करोड़ जप होगा। बुन्देलखण्ड गायत्री परिवार सम्मेलन का आयोजन किया गया है। प्राँत भर की गायत्री संस्थाओं को आमंत्रण भेजे जा रहे हैं।
-बालकृष्ण अग्रवाल
निवार नदी तट पर आश्चर्यजनक यज्ञ
कटनी से 10 मील दूर निवार नदी के किनारे महात्मा रघुनाथदास जी घोर जंगल में गायत्री तप करते हैं। उनकी कुटी पर अक्सर सिंह आते हैं और रात-रात भर बैठे रहते हैं। यह महात्मा जी एक बार गायत्री तपोभूमि गये थे और आचार्य जी से मिले थे। उसी समय से वे इतने प्रभावित हुए कि अपने आश्रम पर एक बड़ा गायत्री यज्ञ कराने और आचार्य जी को बुलाने का निश्चय कर लिया। यह उनका संकल्प 27, 28 फरवरी व 1, 2, 3 मार्च को पूर्ण हो गया। उसी घनघोर जंगल में 11 कुण्डों की विशाल यज्ञशाला में सवालक्ष आहुतियों का यज्ञ बड़ी ही सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। आचार्य जी उस समय मथुरा में आवश्यक कारण कार्यवश उपस्थित होने में असमर्थ थे। महात्मा जी ने निश्चय किया कि जब तक आचार्य जी न आ जावेंगे तब तक यह यज्ञ बंद न होगा और वे अन्न ग्रहण नहीं करेंगे। इस निश्चय की सूचना तार से आचार्य जी तक दी गई और यज्ञ की तिथि बढ़ा दी गयी। सूचना पाते ही आचार्य जी आये, उत्सव बड़ा सफल रहा। जंगल में ऐसा मंगल देखकर लोगों के हृदय श्रद्धा से गदगद हो रहे थे। प्रबंध तथा आर्थिक व्यवस्था में कटनी, घनश्याम भण्डार के श्री बैजनाथ जी बहरे का सहयोग अतीव सराहनीय रहा।
इस यज्ञ में स्वामी रघुनाथदासजी के तप प्रताप के कई चमत्कार जिन्हें देखकर आश्चर्य से दंग रह जाना पड़ा, दर्शकों ने प्रत्यक्ष देखे। जैसे-जिस समय घी के भण्डार में कमी पड़ गयी इस समय बाबा ने कहा-जरा भी चिंता न करो पाँच मिनट में घी आ रहा है। सचमुच एक सर्वथा अपरिचित व्यक्ति घी के टीन लाकर यज्ञशाला में रख गया। दूसरा ब्राह्मण लोग जातिभेद का अड़ंगा लगाकर इस सार्वजनिक यज्ञ का बहिष्कार कर लौट चले। बाबा ने क्रोध होकर शंख बजाया। तत्काल लाखों मधुमक्खियाँ न जाने कहाँ से आकर उन लौटने वाले ब्राह्मणों को चिपट गई। वे व्याकुल होकर बाबा के पास वापिस लौटे, क्षमा माँगी और यज्ञ में शामिल हुए। तीसरी पूर्णाहुति होते ही बाबा ने सबको कहा अब तुरंत सब लोग यहाँ से चले जाओ। दो घंटे बाद भारी वर्षा होगी। लोगों को विश्वास न होता था। पर जाना ही पड़ा। सचमुच ठीक दो घंटे बाद भारी वर्षा हुई। ऐसी ही और भी अनेकों अन्य छोटी-बड़ी आश्चर्यजनक घटनाएँ घटीं। - रामकृष्ण डेंगरे
महात्मा जी का आदर्श उत्साह
सरायतरीन (मुरादाबाद) क्षेत्र में महात्मा ब्रह्मस्वरूप जी महाराज गायत्री प्रचार में प्राण प्रण के साथ संलग्न हैं। उनके प्रयत्न से इधर कई महत्वपूर्ण कार्यक्रम सम्पन्न हो चुके हैं। यथा-
1. 10 मार्च को सरायतरीन में श्रीमती भगवती देवी के यहाँ यज्ञ-सम्मेलन तथा ब्रह्मभोज हुआ। सर्वश्री शिवनारायण रस्तोगी, राजेन्द्र जी रोहतगी इंद्र, पं. शंकरलालजी, श्रीमती मगन मूर्ति देवी के प्रवचन हुए। महिला गायत्री परिवार की मंत्री श्रीमती मगनमूर्ति देवी नियुक्त हुइ।
2. ता. 11 को हयात नगर संभल में शाखा स्थापित हुई। सदस्य बने। श्री दुर्गादेवी के भवन पर हवन तथा प्रवचन कार्यक्रम हुआ।
3. ता.12 को श्री राजेन्द्र जी रोहतगी के यहाँ यज्ञ हुआ, जिसमें 150 पुरुषों तथा 50 स्त्रियों ने आहुतियों में भाग लिया। धर्मफेरी के लिए एक टोली निकली जिसने कई मील का दौरा करके 25 सदस्य बनाये एवं एक शाखा स्थापित की।
अब श्री स्वामी ब्रह्मस्वरूपजी महाराज पं. हरिशंकर जी, श्रीमती दुर्गादेवी गौड़, गीता देवी गौड़, अशोक कुमार जी का एक डेपूटेशन गायत्री प्रचार के लिए जिले भर में भ्रमण करने निकला है। जिस समय यह टोली यहाँ से बिदा हुई तो जनता की अपार भीड़ ने उस पर भारी पुष्प वर्षा की। गायत्री माता के जय-जयकार से सारा नगर गूँज रहा था। -इच्छापूर्ण गौड़
इस बार तपोभूमि में नवरात्रि आयोजन केवल आश्रम वासियों द्वारा सम्पन्न होगा। बाहर के उपासकों को अपने-अपने यहाँ सामूहिक आयोजन करने के आदेश दिए जाते हैं।
जेष्ठ में एक मास तक ता. 14 मई से 14 जून तक साँस्कृतिक शिक्षा शिविर होगा। जिसको केवल 50 शिक्षार्थी लिए जावेंगे। 32 प्रार्थना पत्र आ चुके केवल 18 और लिए जावेंगे। जिन्हें आना हो शीघ्र आवेदन पत्र भेजकर स्वीकृति प्रदान कर लें। गायत्री परिवार सम्मेलन ता. 7 से 12 जून तक है। इसमें सम्मिलित होने को गायत्री परिवार के सभी सक्रिय कार्यकर्त्ताओं को सादर आमन्त्रण है। जो आवें वे शीघ्र ही सूचना देकर स्वीकृति प्राप्त कर लें।
बिजनौर के आत्मदानी वकील श्री अशर्फीलाल जी अपनी वकालत को लात मार कर स्थायी रूप से तपोभूमि में आ गये हैं। उनने साँस्कृतिक विद्यालय के प्रिंसिपल का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ले लिया है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए धर्म प्रचारक तैयार करने का अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य अब उनके द्वारा सुव्यवस्थित रूप से चलेगा।
गायत्री परिवार की कुछ शाखाएं अपनी मासिक रिपोर्ट नियमित रूप से नहीं भेजतीं। यह ठीक नहीं। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत कहाँ कितना जप, पाठ, लेखन, हवन आदि चल रहा है इसकी संख्या का ठीक पता चलता रहे और अनुष्ठान की कितनी पूर्ति हुई इसका हिसाब लगता रहे इसके लिए मासिक रिपोर्ट का भेजा जाना आवश्यक है। प्रत्येक शाखा को ता.10 तक अपने यहाँ की रिपोर्ट अवश्य भेज देनी चाहिए।
मैं त्रिशूल लेकर चलता हूँ, मेरे डमरू में विनाश है!
पर है चन्द्र भाल पर मेरे, वहाँ सुधा है, नव-प्रकाश है!
मेरा एक और लोचन है, जिस में सर्वनाश सोता है!
वह तो भी खुला करता है, जब मन अति विचलित होता है!
मैंने जग में बहा रखी है, अपने सर से सुरसरि धारा!
जिस में करके ॥न बहाया, करता पाप जगत् है सारा!
यश की होड़ लगी है, ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदिक सब भागे।
मैं तो इस कैलाश शिखर पर बैठा, रहा सभी से आगे।
मैंने नहीं छिपाई भूलें, मैं रहता हूँ खुल कर नंगा।
गौरी की तो बात कहूँ क्या, कभी नहीं शरमाई गंगा।
साथ पिशाचों के रहता हूँ, जो लाशों का लोहू पीते।
मेरी प्रिया चंडिका बनती, जिस से कभी न दानव जीते।
जिस दिन सिंधु मथा देवों ने, पाकर गरल सभी घबराए।
किस में इतनी शक्ति, गरल को पीले और पचाने पाए?
जिसे न जीने की इच्छा है, उसे अमृत की चाह रहे क्यों?
जो आवे पी डाले हँसकर, अपने मुँह से ‘नहीं’ कहे क्यों?
जो थे लड़े अमृत की खातिर, वे थे देव, और थे दानव।
जो औरों का विष पी लेता, मैं हूँ महादेव- मैं मानव।
मैं चलता हूँ बैठ वृषभ पर, जिसके सर पर जुआ जगत् का।
जिसकी प्रिया दूध देती है, घटा रहा जो मान अमृत का।
मुझ को सब के शिशु प्यारे हैं, गया नंद के घर भिक्षुक बन।
मुझे ईश के दर्शन मिलते, मानव के सुत के कर दर्शन।
मुझे लोग ईश्वर भी कहते, पर मैं उसका एक पुजारी।
है बर्फीली गहन गुफा में, बैठ साधना मेरी जारी।
परशुराम हो, या कि राम हो, या रावण हो, सब मेरे हैं।
मैं तो उनका हूँ जो मुझ से, आकर कहते हम तेरे हैं।
मेरे बसुँधरा से उर में, दोनों ही हैं आग व पानी।
मेरी आँखों में दोनों हैं, पानी और तड़ित दीवानी।
मैं जग को वैभव देता हूँ, स्वयं दिगंबर रहने वाला।
मैं फूलों की नहीं पहनता, कभी-कभी मुँडों की माला।
(श्री हरिकृष्ण ‘प्रेमी’)
*समाप्त*