वंदन है उसे सौ बार

(श्री मोहनलाल श्रीवास्तव, बुढार)


वंदन है उसे सौ बार

जो युगों से दे रहा गिरते हुओं को बाँह, वंदन है उसे सौ बार!

आँसुओं के पंक में जिस दिन खिला था फूल,

स्वर्ग के माथे लगी उस दिन धरा की धूल,

राजमहलों को दिया जब-जब मनुष्य ने छोड़-

ले लिया इतिहास ने तब-तब नया ही मोड़।

मनुजता के दीप को जिस ने दिया है स्नेह,

ज्योति में परिणत किया जिसने जगत का दाह वंदन है उसे सौ बार!

एक दिन उमड़ा किसी में शत्रु के प्रति प्यार,

बस, उसी दिन से पराजय भी गई है हार,

बिन हराए भी किसी को, मिल गयी थी जीत- मौत भी खुद गुनगुनाई जिंदगी के गीत।

जो हृदय से हृदय जोड़े, आँसुओं से अश्रु, धन्य,

जो मिटकर बनाता मनुजता की राह- वंदन है उसे सौ बार!

भिक्षु ने जिस दिन कहा था खोल जीवनद्वार- “स्वर्ग का पुल बन

कभी सकती नहीं तलवार” जिंदगी की नयी परिभाषा बनी उस रोज- ‘नहीं ईश्वर की,

मनुज, तू कर मनुज की खोज!’ वृद्ध के हर मरघटों पर आज भी वह देव,

उमड़ता है शाँति, मैत्री की लिए वह छाँह- वंदन है उसे सौ बार!


हमारे धर्म का आदि स्रोत वेद ही है।

(श्री रामदास गौड़)

साधारण बोलचाल की भाषा में ‘श्रुति’ शब्द से समस्त वैदिक-साहित्य का बोध होता है। इसके मुकाबले ‘स्मृति’ शब्द का प्रयोग किया जाता है, जिससे धर्म-शास्त्र का अर्थ समझा जाता है। पर जब ‘वेद’ शब्द का प्रयोग ‘लोक’ के साथ होता है तो वहाँ वेद का तात्पर्य सभी शास्त्र ग्रंथों से होता है, जैसे तुलसीदास जी ने लिखा है- ‘लोकहु वेद न आन उपाऊ।’ वैसे श्रुति शब्द का अर्थ है ‘सुना हुआ’। इसका आशय यह है कि वेद और उससे संबंध रखने वाले ‘ब्राह्मण’ ‘अरण्यक’ ‘उपनिषद्’ आदि जितने ग्रंथ हैं जिनका ठीक-ठीक उच्चारण गुरुमुख से सुनकर ही किया जा सकता है वे सब श्रुति हैं। वेद के पर्यायवाची और भी कई शब्द हैं जैसे आम्नाय, छंदस, ब्रह्म, निगम और प्रवचन। विदेशी विद्वान संहिता (मूल मंत्रभाग, ब्राह्मण और अरण्यक) तीनों को भिन्न-भिन्न ऋषियों की रचना मानते हैं।

वेदों की उत्पत्ति के संबंध में ऋग्वेद के 10वें मंडल के 90वें सूक्त में कहा गया है- “तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे। छंदांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्त मादजायत।” इसका आशय है कि ‘ऋक, यजुः, साम तथा अथर्व- ये चारों वेद परमपुरुष यज्ञ-भगवान से उत्पन्न हुये हैं।’ इस मंत्र के अनुसार वेदों की उत्पत्ति सृष्टि के साथ ही हुई है जिसको अब तक (संवत् 2014 तक) एक अरब 95 करोड़, 58 लाख, 85 हजार 39 सौर वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। पर आधुनिक इतिहासज्ञ वेदों की उत्पत्ति इतनी पुरानी नहीं मानते, क्योंकि वे सृष्टि को तो अरबों वर्ष पुरानी मानते हैं पर उनके मतानुसार पृथ्वी पर मनुष्य का आविर्भाव हुए कुछ ही लाख वर्ष हुए हैं। तो भी वे वेदों को संसार के सबसे पुराने ग्रंथ मानते हैं।

इस प्रकार लगभग दो अरब वर्ष से लेकर सात-आठ हजार वर्ष तक की प्राचीनता का अनुमान वेदों के लिए किया जाता है। समय का यह परिमाण कितना अधिक है इसका अनुमान हम सहज ही नहीं कर सकते। हमको यह समझना चाहिए कि जिन पुस्तकों की नकल की जाती है, अथवा प्रेस में छाप कर जिनके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं उनमें लेखकों की भूल से, छापेखाने वालों की भूल से, विभिन्न प्रकार के पाठकों के मतभेद से कितने ही परिवर्तन हो गये हैं। अभी कुछ ही समय पहले बनी तुलसीदासजी की रामचरितमानस में ही असंख्यों पाठाँतर हो गये हैं और बीसियों प्रकार के ऐसे संस्करण प्रकाशित हो गये हैं जो प्रामाणिक होने का दावा करते हैं। ऐसी व्यवस्था में वेदों के पाठान्तरों और संस्करणों की क्या गिनती की जा सकती है, जो हजारों वर्ष तक लिखे ही नहीं गये, केवल गुरु के मुख से सुनकर याद कर लिये जाते थे। फिर कई हजार वर्षों में भाषा भी इतनी बदल गयी कि उस पुरानी भाषा को, जिसमें वेद आरंभ में रचे गये, समझ कर ठीक-ठीक लिख सकना बड़ा कठिन हो गया। तब लोगों ने मंत्रों के एक-एक पद को अलग-अलग करके रट लेना ही वेदों की सुरक्षा का मार्ग समझा। वेदों के अर्थ में गड़बड़ी न होने देने के लिए ब्राह्मण और अरण्यक ग्रंथों में उनकी टिप्पणी अथवा व्याख्या कर दी गयी। पर काल प्रभाव से आज उनकी भाषा भी बड़ी दुर्बोध और कठिन जान पड़ती है। वेदों के अर्थ को सुबोध बनाने के लिए व्याकरण वालों, मीमाँसकों, कर्मकाण्ड वालों ने बहुत जोर लगाये। पुराणकारों ने भी उपाख्यानों के रूप में वेदों की ही व्याख्या करने की चेष्टा की ‘मत्स्यपुराण’ में सृष्टि के आरंभ में वेदोत्पत्ति का वर्णन करते हुए लिखा है कि “ब्रह्म के चारों मुखों से चारों वेद निकले।” पर आगे चलकर भविष्य का वर्णन करते हुए द्वापर के अंत में वेदों की परंपरा के बिल्कुल अस्त-व्यस्त हो जाने की बात लिखी है। उसके 144 वें अध्याय में कहा गया है-

एकोवेदः चतुष्पादः संहृत्यतु पुनःपुनः। संक्षेपादायुषश्चैक व्यस्यते द्वापरेष्विह॥10॥

वेदश्चैकश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु। ऋषिपुत्रैः पुनर्वेदा, भिद्यन्ते दृष्टि विभ्रमैः।

मंत्रब्राह्मण विन्यासैः स्वरक्रम विपर्य्ययैः। संहृत्य ऋग्यजुस्न्साम्नाँ संहितास्तैर्महर्षिभिः॥ 12॥

द्वापरे संनिवृत्तेते वेदानश्यन्ति वै कलौ।

मत्स्य भगवान ने भविष्य का वर्णन करते हुए बतलाया है कि “सतयुग से द्वापर तक के लाखों वर्ष के समय में भाँति-भाँति की भूलों से चारों वेद मिल कर केवल एक यजुर्वेद रह जाता है जो केवल यज्ञकर्म के अनुकूल होता है। फिर भी वह बारम्बार परिवर्तित होता रहता है जिसका कारण लोगों की अपात्रता तथा अस्वस्थ और अल्पायु जीवन होता है। द्वापर में आकर उसके विविध खण्ड और शाखायें बन जाती हैं। ऋषियों के वंशज दृष्टि, स्मृति आदि में भूलें करते हैं, मंत्रों को अस्त-व्यस्त करते हैं, ब्राह्मणों और कल्पसूत्रों का भी क्रम भंग हो जाता है। स्वर और क्रम में भेद पड़ जाता है। वेदों के ऋषियों को इसलिए ऋग्, यजुः और साम तीनों को बारम्बार फिर-फिर से संकलित करना पड़ता है। यजुर्वेद पहले एक ही रहता है, फिर उसके भी दो पाठ हो जाते हैं। इस तरह द्वापर में ही ऋग्, यजुः, साम तीनों वेदों का अर्थ उलटा-सीधा हो जाता है। कलियुग में तो उनका नाश ही हो जाता है।”

मत्स्यपुराण के अनुशीलन से स्पष्ट हो जाता है कि वेदव्यास द्वारा वेदों का पुनः संकलन और विभाग द्वापर के अंत की बात है। और ऐसा संकलन पहले दो युगों में भी कई बार करना पड़ा था। मत्स्यपुराण के अतिरिक्त महाभारत के शल्य पर्व में भी एक कथा है कि एक बार वर्षा न होने के कारण बारह वर्ष का अकाल पड़ा और सब ऋषि प्राणरक्षार्थ इधर-उधर चले गये और इस बीच में वेदों को भूल गये। तब दधीचि और सारस्वत ऋषियों ने अपने से भी कहीं अधिक बूढ़े ऋषियों को वेद पढ़ाया था। अधिक दूर जाने की आवश्यकता नहीं, आज से पाँच-छह सौ वर्ष पहले सायणाचार्य आदि ने भी वेदोद्धार के लिए प्रयत्न किया था। पर सायण के बाद भी लोगों ने वेदाध्ययन की तरफ ध्यान नहीं दिया। तब अब से अस्सी वर्ष पूर्व स्वामी दयानंद सरस्वती ने वेदों के संकलन और प्रचार का कार्य किया और इसके फल से अब अन्य अनेक विद्वानों ने भी वेदों के पुनरुद्धार में हाथ लगाया है और जनता को वेदों के संबंध में जानकारी प्राप्त करने का मार्ग सुलभ हो गया है।

वेदों के पुरुष सूक्त में सृष्टि का वर्णन है। हमारे साहित्य में सृष्टि की उत्पत्ति कहीं भी इस तरह नहीं बतलाई गयी है कि ईश्वर ने कहा, और समस्त जगत का कार्य इस प्रकार शुरू हो गया जैसे परदा उठने पर नाटक का कोई दृश्य प्रकट हो जाता है। हमारे यहाँ की वैदिक और पौराणिक दोनों ही सृष्टि कथाओं से प्रकट है कि सृष्टि के बनने में करोड़ों वर्ष लगे होंगे और सच पूछा जाय तो आज भी वह काम खत्म नहीं हुआ है। इसी प्रकार विभिन्न ऋषियों द्वारा वेद मंत्रों के प्रकट होने में भी हजारों वर्ष लगे होंगे। विदेशों के अनेक विद्वानों का मत है कि पहले ऋग्वेद का संकलन हुआ, फिर यजुर्वेद का, फिर साम और अंत में अथर्ववेद का। पर हमें ऐसी कोई बात देखने में नहीं आती जिससे एक के पीछे दूसरे की उत्पत्ति प्रकट हो। वेदों में वर्णित विषय में तो चारों की उत्पत्ति साथ ही हुई जान पड़ती है। यदि चारों वेदों की संहिताओं में पाये जाने वाले मंत्रों के प्रकट होने में एक हजार वर्ष का समय भी लगा, तो उसमें चारों वेदों की सामग्री ही सम्मिलित थी, जो समय आने पर भिन्न-भिन्न वेदों में संकलित कर दी गयी। इस बात का अनुमान इन तथ्य से भी होता है कि ऋग्वेद की आधी ऋचाएँ यजुर्वेद में भी हैं। सामवेद में 75 ऋचाओं के सिवाय सभी वही ऋचाएँ हैं जो ऋग्वेद में आई हैं। अथर्ववेद में भी पाँचवाँ भाग ऋचाएँ ऋग्वेद की ही हैं। संभव है महर्षि वेद व्यास ने ऐसा संकलन कर दिया हो, अथवा सनातन काल से ऐसे ही मिले-जुले मंत्र चले आये हों। यजुर्वेदी कहते हैं कि एक यजुर्वेद से ही तोड़कर शेष तीनों वेद बना दिये गये हैं, परंतु सायणाचार्य ने अपने ऋग्वेद्भाष्य की भूमिका में इस कथन की निस्सारता दिखा दी है। इसके सिवा मत्स्यपुराण के उद्धरण से भी इस भ्रम का मूल कारण समझ में आ जाता है।


हिंदू-धर्म लौकिक और पारलौकिक उन्नति का मूल है।

(श्री लक्ष्मण शास्त्री जोशी, तर्कतीर्थ)

हिंदू धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है, यह एक विचारणीय प्रश्न है। यद्यपि साधारण लोगों की धारणा के अनुसार हिंदू धर्म मुख्यतः पारलौकिक समस्याओं से ही संबंध रखता है। पर एक ऐसा दल भी मौजूद है जो हिंदू धर्म को प्रधान रूप से साँसारिकता का समर्थक मानता है। और तीसरा दल भी है जिसका मत है कि हिंदू-धर्म में स्वार्थ और परमार्थ दोनों के साधन पर समान रूप से बल दिया गया है।

पहले पक्ष का कहना है कि वर्ण व्यवस्था, देश, जाति-कुल धर्म, आश्रम-व्यवस्था, नीति-धर्म, व्यवहार-धर्म, राज-धर्म ही हिंदू धर्म की प्रधान बातें हैं। आलौकिक दैवी, आध्यात्मिक शक्तियों की आराधना और पारलौकिक कल्पना हिंदू धर्म का मुख्य भाग नहीं है, वह गौण है। सामान्य लोग सामाजिक और व्यक्तिगत नियमों का उचित रीति से पालन करें इसीलिए अनेक धार्मिक कल्पनाओं का आविर्भाव हुआ है, क्योंकि परलोक का भय और प्रलोभन लोगों को नियम-पालन में प्रवृत्त करता है।

दूसरा पक्ष कहता है कि ‘इह’ अथवा ‘पर’ और साँसारिक और पारलौकिक परमार्थ साधन ही हिंदू धर्म का स्वरूप है। इस जन्म में जीवन-निर्वाह उचित रीति से चलता रहे और मरणोत्तर जीवन में श्रेय प्राप्त हो इसी उद्देश्य से श्रुति, स्मृति और पुराणों में हिंदू धर्म का प्रतिपादन किया गया है। इसी दृष्टि से चतुर्विधि पुरुषार्थ और त्रिवर्ग का उपदेश महाभारत और स्मृतियों में दिया गया है। स्मृतियों में जो धार्मिक-नियम बतलाये गये हैं उनका उद्देश्य अपने अनुयायियों को अभ्युदय और निःश्रेयस अथवा उभयलोक की प्राप्ति करा देना है! उदाहरणार्थ गृहस्थ धर्म से कुटुम्ब का पालन भी होता है और चित्त-शुद्धि होकर स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग भी सुगम होता है।

तीसरे पक्ष का कथन है कि हिंदू-धर्म पूर्ण आध्यात्मिक धर्म है। आत्म-प्राप्ति, निर्वाण, मोक्ष या परमार्थिक कल्याण की ओर ले जाना ही हिंदू धर्म का स्वरूप है। अर्थ, काम, शरीर-संरक्षण, समाज धारण आदि साँसारिक ध्येय हिंदू धर्म के गौण उद्देश्य हैं। वे मूढ़, अविकसित अथवा बाल बुद्धि वाले मंद अधिकारियों के लिए हैं। वस्तुतः जीव मोक्ष-मार्ग का ही प्रवासी है। यह नर जन्म अथवा साँसारिक जीवन तो बीच की काम चलाऊ ठहरने की जगह अथवा सराय की तरह है। मोक्ष-मार्ग की अचूक राह दिखाना ही हिंदू धर्म का कार्य है।

1. इन तीनों पक्षों में से पहले साँसारिक पक्ष का समर्थन करने वाले लोगों की संख्या नगण्य है। अत्यंत प्राचीन काल से लेकर अब तक के हिंदुओं के आचार और विचार में इस पद्धति का धर्म कभी व्यवहार में नहीं आया। कुछ अपवादों को छोड़कर हिंदू धर्म के प्रवर्तक, उपदेशक, ग्रंथ और गुरु उक्त पक्ष के विरुद्ध तत्वों का ही प्रतिपादन करते रहे हैं। वेदों का यज्ञ अथवा कर्मकाण्ड एक तरह से देवताओं की आराधना ही है। उपनिषद् तो ब्रह्म, आत्मा, परलोक मार्ग, अमरत्व, स्वर्गापवर्ग और अदृष्ट कर्म फल का ही उपदेश देते हैं। स्मृतियों और धर्म शास्त्रों में वर्णाश्रम धर्म तथा आचार व्यवहार के प्रायश्चित्तों का आदेश दिया गया है। इसी प्रकार पुराणों में भी परलोक साधन के लिए व्रत, तीर्थयात्रा, उपासना की विधियाँ बतलाई गई हैं।

इस पक्ष के कुछ नेता कहते हैं कि वैदिक धर्म-विशेषतः ऋग्वेद का धर्म, ऐहिकता प्रधान है, इसलिए अब उसी का समर्थन करने का अवसर आ गया है। बल वीर्य, पराक्रम विजय, शत्रुनाश, कीर्ति, कवित्व, विद्वत्ता, मानसिक आरोग्य, दीर्घायुष्य, आनंद, पर्जन्य, पशु, शस्य, सुवर्णादि धन, भार्या, पुत्र आदि साँसारिक विषयों के लिए प्रार्थनाओं और कामनाओं से वैदिक साहित्य भरा हुआ है। उसके देवता भौतिक शक्तियाँ ही हैं। वैदिक धर्म भौतिकवादी धर्म है। हिंदू-समाज को अब आगे भौतिक प्रगति की प्रेरणा वेदों से ही मिलेगी। वेद अभ्युदय के मार्ग दर्शक हैं और वेदाँत निःश्रेयस का मार्ग दर्शक है।

पर यह विचार विशेष प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। साँसारिक ध्येय वाला धर्म पारलौकिक धर्म की अपेक्षा हीन संस्कृति का और अविकसित सामाजिक स्थिति का परिचायक है। मानव-जाति-शास्त्र के ज्ञाताओं ने निश्चय किया है कि साँसारिक ध्येय रखने वाला धर्म समाज की प्राथमिक अथवा आदिम अवस्था में रहता है जब कि पारलौकिक और पारमार्थिक तत्वों की कल्पना पर अधिष्ठित धर्म उसकी अपेक्षा अधिक सुधरे समाज में ही उत्पन्न हुए हैं।

2. उपर्युक्त पक्ष के विपरीत पक्ष वह है जो केवल अध्यात्म-परायणता को ही हिंदू-धर्म का स्वरूप बतलाता है। यद्यपि हिंदू-धर्म के वास्तविक स्वरूप का सम्पूर्ण समावेश इस पक्ष में नहीं होता, फिर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि वह हिंदू-धर्म का एक मुख्य पहलू है। आजकल हिंदुओं के एक बड़े अंश पर और शिक्षित बहुमत पर इसी पक्ष की छाप है।

इस पक्ष की गूढ़ और पारलौकिक कल्पनाओं का निराकरण करना इस समय का एक बहुत बड़ा कर्तव्य है, क्योंकि इसके बिना हिंदू समाज की मौजूदा परिस्थिति अर्थात् भौतिक व मानसिक जीवन पर ध्यान न देने की प्रवृत्ति का सुधार नहीं हो सकता। वर्तमान समय में आध्यात्मिक और पारलौकिक कल्पनाओं के आभास के नीचे वास्तविक जीवन की दुर्गति छुपी रहती है। इस ‘आभास’ के कारण मनुष्य ने अपने आपको और अपनी जाति को बहुत ठगा है। इस आभास में वाणी अथवा लेखनी का प्रभाव रखने वाले विद्वानों की प्रतिभा ऐसे भावुकतापूर्ण तथा मोहक रंगों के अलौकिक चित्र खींच देती है कि उनके प्रभाव से वस्तुस्थिति का गंदा और अमंगलजनक रूप ढक जाता है। गंभीर किंतु पोले तत्वज्ञान की पार्श्वभूमि में उस आभास के रंग-मंदिर खड़े किये जाते हैं। इस प्रकार का परलोकवाद और अध्यात्म वाद भारतीय समाज के अनंत दुखी जीवों के आँसुओं को ढक रखने वाला एक पर्दा है। अज्ञान, दासता और दीनता के गहरे गढ़े में कराहते हुए मनुष्यों के कंटकाकीर्ण जीवन का आच्छादन करने वाली यह कृत्रिम पुष्प राशि है। इस हानिकारक ‘आभास’ को मिटाए बिना सामाजिक दुर्गति को मिटाने वाले कोई प्रयत्न सफल नहीं हो सकते।

3. इहलोक और परलोक, दोनों का साझा करने के लिए हिंदू-धर्म की रचना हुई है-यह सम्पूर्ण वाला पक्ष ही हिंदू धर्म की सबसे ठीक व्याख्या करता है। हिंदू धर्म शास्त्रों में कुछ साधन अदृष्टार्थ कुछ दृष्टार्थ और कुछ उभयार्थ बताये गये हैं जिनमें कुछ प्रत्यक्ष समझ में आते हैं। कृषि, शिल्प, युद्ध, राज व्यवहार आदि कर्म दृष्टार्थ है।

साधनों से अप्रत्यक्ष फल सिद्धि प्राप्त होने वाले साधन अदृष्टार्थ हैं, जैसे देव-पितृ-यज्ञ, जन, व्रत, जप आदि। इन कर्मों में लौकिक और पारलौकिक दोनों फल प्राप्त होते हैं, पर उनका प्रमाण प्रत्यक्ष न होकर शास्त्रों के वचनों द्वारा ही मिलता है।

4. जिस कर्म का साध्य-साधन भाव दृष्ट और अदृष्ट दोनों तरह का है, वह है उभयार्थ, जैसे प्रवाह धर्म। इसमें रति और संतान यह विचार का दृष्ट प्रयोजन है और पितृ-ऋण मुक्ति, देव-पितृ लोक प्राप्ति ये अदृष्ट फल हैं।

यहाँ पर पाप-पुण्य के स्वरूप पर भी विचार करना आवश्यक है जिसके आधार पर मनुष्यों के कर्तव्य स्थिर किये जा सकते हैं। इस संबंध में कुछ विवेकशील व्यक्तियों का मत है कि “जिस आचरण में व्यक्ति का, अथवा उसके समाज का हित स्थायी रूप से होता है, वह आचरण पुण्यकारक माना जा सकता है। इस प्रकार का हिसाब दीर्घकाल तक गहराई से विचार करने और विविध परिस्थितियों की जाँच करने से ही निकाला जा सकता है। अध्ययन शून्य और संकुचित बुद्धि के लोग समीप के इष्ट और अनिष्ट फलों की ही आज़माइश कर सकते हैं, इसलिए शास्त्रों को लिखने का कार्य मननशील और अध्ययनशील साधुओं ने ही किया है। सामान्य और संकुचित बुद्धि वालों की समझ में न आने वाले साधन ही अदृष्टार्थ साधन हैं। जो कर्म तात्कालिक सुख या लाभ के जान पड़ते हैं वे दूर तक विचार करने से बहुधा परिणाम में अनिष्टकारक होते हैं। उन्हें ही शास्त्रकार पापकर्म बतलाते हैं।”

परोपकार, सत्य, अहिंसा आदि नैतिक नियम, पुण्य के और परमार्थ के मूल हैं। महाभारत में कहा है कि जो सब के साथ आत्मवत् दृष्टि से व्यवहार करता है उसे मरणोत्तर शाश्वत सुख प्राप्त होता है। सारी स्मृतियाँ कहती हैं कि हिंसा से, पर-धन हरण से और पर-दारा गमन से मनुष्य पतित होता है। यदि हम सारे जीवन की पर्यालोचन करें, तो यह दिखायी देगा कि उक्त विधि-निषेधों का पालन करने से असंख्य व्यक्तियों का और समूचे समाज का हित होता है, और वैसा न करने से व्यक्ति और समाज को दुर्गति भोगनी पड़ती है। शास्त्र प्रमाणों के साथ ही मनन और अनुभव से भी हम इन बातों की सत्यता का अनुभव कर सकते हैं, और हिंदू धर्म की दृष्टि से ये ही स्वार्थ और परमार्थ को सिद्ध करने वाले साधन हैं।


परमेश्वर को पाने के लिए प्रतीकोपासना आवश्यक है।

(स्वामी विवेकानंद)

केवल कुछ थोड़े से धर्मों को छोड़कर प्रत्येक धर्म में सगुण परमेश्वर की उपासना ने स्थान पा लिया। शायद जैन और बौद्धों को छोड़कर प्रत्येक धर्म ने सगुण परमेश्वर की कल्पना स्वीकार की, बौद्ध भी, यद्यपि वे सगुण परमेश्वर को तो तथापि अपने धर्म संस्थापकों की ठीक करते हैं, जिस प्रकार अन्य धर्मोपासक ईश्वर की। किसी एक ऐसे उन्नततम व्यक्ति और उपासना, जो मनुष्य को उसके प्रेम का बदला दे सके, सर्वत्र दिखायी देती है। विभिन्न धर्मों में यह प्रेम और भक्ति भिन्न-भिन्न रूपों में विभिन्न परिमाण में प्रकट होती आई है। सबसे पहली अवस्था है ‘बाह्य उपचार’। इस अवस्था में सूक्ष्म वस्तु की कल्पना कर सकना प्रायः असंभव होता है। इसलिए उन सूक्ष्म कल्पनाओं को स्थूल रूप में परिणत किया जाता है। फलस्वरूप मनुष्य अनेक प्रकार की मूर्तियाँ मानने लगा और उसके साथ अनेकों प्रतीकों का उदय हुआ। सम्पूर्ण विश्व का इतिहास यही दिखलाता है कि इन मूर्त विचारों तथा प्रतीकों द्वारा ही मनुष्यों ने निर्गुण को ग्रहण करने का प्रयत्न किया है। घण्टे, स्तुति, पोथी, मंत्र-तंत्र, मूर्तियाँ और धर्म के अन्य बाह्य अनुष्ठान, ये सब इसी श्रेणी में गिने जाते हैं। मनुष्य की इंद्रियों द्वारा ग्रहण करने योग्य कोई भी वस्तु तथा निर्गुण की कल्पना सुगमता से करा देने वाली कोई भी स्थूल आकृति इस काल में पूजा का विषय बन जाती है।

प्रत्येक धर्म में ऐसे धर्मोपदेशक सदैव जन्म लेते आये हैं जिन्होंने प्रतीकों और बाह्य अनुष्ठानों के विरुद्ध कमर कसी है। किंतु उनकी चेष्टा सफल न हो सकी, क्योंकि मनुष्य जब तक मनुष्य है, अधिकाँश जन-समाज कोई ऐसा ठोस स्थूल प्रतीक अवश्य चाहेगा, जिसका वह आश्रय ले सके, जिसको केन्द्र मानकर अपने मन के विचारों को गूँथ सके।

मुसलमानों और प्रोटेस्टेंट पंथ के ईसाइयों ने बाह्य अनुष्ठानों के हटाने में काफी शक्ति खर्च की है, परंतु इतना होते हुए भी ये बातें उनके पंथों में भी घुस पड़ी हैं। बाह्य-विधियाँ नष्ट नहीं हो सकतीं, बहुत प्रयास के बाद केवल इतना ही हो जाता है कि जन-समाज एक प्रतीक को छोड़कर दूसरा प्रतीक ग्रहण कर लेता है। वही मुसलमान, जो ‘काफिर’ की मूर्ति पूजा को पाप बतलाता है, जब काबे की मस्जिद में जाता है तो इस प्रकार नहीं सोचता और बड़ी श्रद्धा से दीवाल में लगे काले पत्थर को चूमता है। प्रोटेस्टेंट पंथ वाले गिरिजाघर को अन्य सब स्थानों से अधिक पवित्र और पूजनीय मानते हैं और इस प्रकार गिरिजा घर का मकान ही उनके लिए पूजा का प्रतीक बन जाता है। इसी प्रकार वे बाइबिल को भी परम पवित्र मानते हैं, और वह अन्य धर्म के धार्मिक प्रतीकों की तरह ही काम देती है।

इसीलिए मूर्तिपूजा या प्रतीकोपासना के विरुद्ध उपदेश देना व्यर्थ है। मनुष्य उन्हें इसीलिए काम में लाते हैं कि वे कुछ विशिष्ट भावों के संकेत स्वरूप होते हैं। यदि विचार किया जाय तो यह सम्पूर्ण विश्व ही किसी अव्यक्त शक्ति का एक विशाल प्रतीक है। इसीलिए मूर्तियाँ, घंटे, मोमबत्तियाँ, ग्रंथ, गिरजाघर, मंदिर और अन्यान्य पवित्र प्रतीक बड़े अच्छे हैं और अभ्यास रूपी पौधे की बाढ़ के लिए बहुत उपयोगी हैं, लेकिन इनका उपयोग बस यहाँ तक है, इससे अधिक नहीं। अधिकाँश लोगों की सीमा इन प्रतीकों तक ही रहती है जिससे इस पौधे की बाढ़ नहीं हो पाती। ठाकुरद्वारे में जन्म लेना एक बहुत अच्छी बात है, पर मंदिर में ही मर जाना दुर्भाग्य है। अध्यात्मरूपी पौधे की बाढ़ में पहुँचाने वाली इन उपासना विधियों का अभ्यास करना अच्छा है, पर आजन्म उसी उपासना-पद्धति में पड़े रहना और मर जाना यह प्रकट करता है कि उसकी आध्यात्मिक उन्नति नहीं हुई।

इन बाह्य अनुष्ठानों में एक कल्पना मुख्य है जो दूसरी सब कल्पनाओं से श्रेष्ठ है। वह है नाम की उपासना। यह उपासना पद्धति प्रायः सभी धर्मों में पाई जाती है। नाम अत्यंत पवित्र माना जाता है और ईश्वर का नाम सबसे अधिक पवित्र है। ईश्वर के नाम की महिमा अतुलनीय मानी गई है, और ऐसा माना गया है कि यह पवित्र नाम ही परमेश्वर है। और यह सत्य भी है, क्योंकि यह विश्व नाम और रूप के अतिरिक्त और है ही क्या? क्या शब्दों के बिना तुम सोच सकते हो? शब्द और विचार एक दूसरे से अलग नहीं किये जा सकते। जब कभी तुम सोचते हो तो शब्द-आकृतियों द्वारा ही। एक के साथ दूसरा आता ही है, नाम रूप की याद दिलाता है, और रूप से नाम का स्मरण होता है। यह संपूर्ण विश्व मानो परमेश्वर का स्थूल प्रतीक है, और उस के पीछे है उसका महिमान्वित नाम। इसीलिए नाम का इतना माहात्म्य है और दुनिया में वह सब जगह पूजा जाता है-चाहे जान बूझकर और चाहे अनजाने मनुष्य को नाम की महिमा मालूम हो ही गई है।

हम यह भी देखते हैं कि भिन्न-भिन्न धर्मों में पवित्र पुरुषों की पूजा होती आई है। कोई कृष्ण की पूजा करता है, कोई ईसा की और कोई बुद्ध की और कोई अन्य विभूतियों की। इसी तरह लोग संतों की पूजा करते आ रहे हैं और सैकड़ों साधु-संत आज संसार में पूजे जा रहे हैं। और वे क्यों न पूजे जाएं? परमेश्वर सर्वत्र विद्यमान है वह घर-घर में प्रकट हो रहा है, लेकिन मनुष्य को वह मनुष्य में ही दिखलाई पड़ सकता है। जब उसकी ज्योति, उसका अस्तित्व, उसका ईशत्व मानवीय मुखमण्डल पर प्रकट होता है तभी मनुष्य उसे पहचान सकता है। इस तरह मनुष्य सर्वदा मानव रूप में परमेश्वर की पूजा करता आ रहा है और जब तक मनुष्य, मनुष्य रहेगा, वह ऐसा करता ही जायेगा।

इस प्रकार प्रत्येक धर्म में हम तीन मुख्य बातें देखते हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर की पूजा की जाती है। वे हैं-(1) प्रतिमाएँ या प्रतीक (2)नाम और (3) अवतारी पुरुष। प्रत्येक धर्म में ये बातें हैं, फिर भी लोग धर्म के नाम पर एक दूसरे से लड़ते रहते हैं। प्रत्येक दूसरों से कहता है-”यदि संसार में कोई प्रतिमा सच्ची है, तो वह मेरे धर्म की, कोई नाम सच्चा है, तो मेरे धर्म का। तुम्हारी तो केवल पौराणिक कथाएँ हैं।” इस तरह का भाव किसी एक राष्ट्र या जाति में नहीं पाया जाता है। सभी लोग यही सोचते हैं कि वे जो कुछ करते आये हैं वही सच है और अन्य लोगों को भी वैसा ही आचरण करना चाहिए।

पर ये तो उपासना के बाहरी अंग हैं, जिनमें होकर मनुष्यों को गुजरना पड़ता है। ये मंदिर और गिरजा, पोथी और पूजा-ये धर्म के केवल प्राथमिक उपकरण मात्र हैं, जिनसे मानव की अध्यात्म-शक्ति बलवती होती है, जिससे वह आध्यात्मिकता की उच्चतर सीढ़ियों पर पैर रखने में समर्थ होता है। यदि उसकी इच्छा है कि उसकी धर्म में गति हो तो ये पहली सीढ़ियाँ आवश्यक हैं। पर आजकल के मनुष्य धर्म के बारे में केवल बड़ी-बड़ी बातें ही करना चाहते हैं, पर उसे पाना नहीं चाहते और न उसका प्रत्यक्ष अनुभव लेना चाहते हैं। क्या तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि दुनिया के ये लोग परमेश्वर को चाहते हैं पर उसे पा नहीं सकते? असंभव! दुनिया में ऐसी कौन सी इच्छा है जिसकी पूर्ति का साधन मौजूद नहीं है। मनुष्य चाहता है कि साँस ले और वह देखता है कि खाने के पदार्थ उसके सामने मौजूद हैं। इच्छाएँ क्यों उत्पन्न होती हैं? इसीलिए कि उनके विषय बाहर विद्यमान हैं। प्रकाश विद्यमान था, इसलिए आँखों ने जन्म लिया और शब्द विद्यमान था इसलिए कानों का जन्म हुआ। इस तरह मनुष्य की प्रत्येक इच्छा किसी न किसी बाह्य विद्यमान वस्तु के कारण ही उत्पन्न हुई है। तो फिर पूर्ण विकास की इच्छा, अंतिम ध्येय पर पहुँचने की इच्छा तथा प्रकृति से परे जाने की इच्छा, यह स्वयं ही-बिना आधार के ही क्यों कर उत्पन्न हो सकती है? ऐसी कोई वस्तु होनी ही चाहिए जिसने इस इच्छा को मनुष्य के हृदय में उत्पन्न किया है। इसलिए जिस व्यक्ति में यह इच्छा उत्पन्न हुई है वह अवश्य ही अपने ध्येय तक पहुँच जायगा और इसकी आरंभिक सीढ़ी सदैव यही प्रतीकोपासना ही रहेगी।


ज्ञान के नेत्र

(डॉक्टर रामचरण महेन्द्र एम.ए., पी.एच.डी.)

(1) गोस्वामी तुलसीदास अपनी पत्नी को बड़ा प्रेम करते थे। सारे दिन उससे वार्तालाप और साहचर्य करने पर भी उनकी उस नारी के प्रति बड़ी आसक्ति थी। नारी-सुख के अतिरिक्त उन्हें अन्य किसी सुख की इच्छा न थी। वे शरीर को सुख भोगने का ही प्रधान साधन मानते थे। वासना तथा इंद्रियों के माया जाल ने उन्हें बाँध रखा था। जितना ही वे इंद्रिय सुख के इस मार्ग पर बढ़ते गए, उतनी ही उन्हें इसकी आवश्यकता अधिकाधिक प्रतीत होती गई। आसक्ति उनकी प्रधान भावना थी।

एक दिन उसी नारी ने उनके ज्ञान के नेत्र खोल दिये। उसने कहा, “मेरे इस हाड़ माँस के नश्वर शरीर के प्रति जो मोह आपको है, यदि वही कहीं ईश्वर के प्रति होता, तो आपकी मुक्ति हो जाती।”

तुलसीदास देर तक उपर्युक्त कथन को सोचते रहे। चिंतन करते रहे। चिंतन करते-करते वे अंत में इस फल पर पहुँचे कि वास्तव में नारी का कथन सत्य है। आसक्ति से बढ़कर संसार में कोई दूसरा दुःख नहीं है। इंद्रियों के विषयों में फँसे रहने से मनुष्य दुःखी रहता है।

उनके ज्ञान के नेत्र खुल गये। अब दूसरा ही दृश्य था। उन्होंने देखा, संसार भोगों की ओर तीव्रता से दौड़ रहा है। तृष्णा की पीड़ा उनके दुःखों का बड़ा भारी कारण है। वासना मनुष्य को पागल बना रही है। मनुष्य मन से ही संसार से बंधता है।

वे संसार से विरक्त हो गये। नारी के प्रति उनका प्रेम अपने आराध्य राम के प्रति मुड़ गया। अब वे वासना-तृप्ति के पीछे न भाग राम की लीलाएँ कविता में गाने लगे। उन्होंने भक्ति रस की अजस्र धारा संसार में प्रवाहित की और शाँति का संदेश दिया।

(2) भक्त सूरदास का भी कुछ ऐसा ही अनुभव रहा। वे भी रमणी के अनुराग में फँसे रहे। नारी सुँदर थी, अतीव सुँदर और आकर्षक। उससे तिरस्कृत और अपमानित होकर उन्हें प्रतीत हुआ कि संसार के भोगों में वास्तव में स्थायी सुख नहीं, सुखाभास है। मनुष्य इन्हीं के प्रति आसक्त होकर इधर-उधर भागता है। इंद्रियाँ उसे मायाजाल में डालती हैं। सूर को अपने प्रति किये गये अपमान के प्रति बड़ी आत्मग्लानि हुई। उन्होंने उस नारी से दो गर्म गर्म तकुए लाने को कहा। जब वे लाल-लाल तकुए आ गये तो शरीर के नेत्रों में ठूँस दिये। सूर के पार्थिव नेत्र बंद हो गये, पर इस तिरस्कार से ज्ञान के नेत्र खुल गये। उनका अनुभव था “तैः (इंद्रियैः) एव नियतैः सुखी” इंद्रियों को अपने वश में रखने से ही मानव सुखी हो सकता है।

भक्त मीराबाई के ज्ञान के नेत्र इतनी जल्दी खुले थे कि उन्हें अपने विवाह तथा दाम्पत्य जीवन के प्रति कुछ भी मोह न हुआ। उनके सम्मुख नाना प्रकार के प्रलोभन और भयंकर यातनायें आईं, लेकिन वे सभी को ज्ञान के नेत्रों से निरखती रहीं। साँसारिकता के असत्य व्यवहार को त्याग कर उन्होंने वह भक्ति का मार्ग अपनाया जो मुक्ति देने वाला था। उन्हें ज्ञान के नेत्रों से यह दिखायी दिया कि कुविचार और कुकर्म ही दुःख और अतृप्ति का मूल हैं। मानसिक पापों का परित्याग करो। मन की जमी हुई वासना ही दुष्कर्म कराती है। पाप का प्रधान कारण आत्मज्ञान का अभाव ही है।

हम प्रायः मोह और आलस्य की निद्रा में पड़े रहते हैं। आलस्य में पड़े हुए हमें सुख मिलता तो दिखायी देता है, परंतु उसका फल हमेशा दुःख होता है। हमें अपनी कमजोरियों का ज्ञान नहीं होता। जो आदमी गलती करता है, उस अल्पज्ञ को यह ज्ञान नहीं होता कि वह गलत राह पर है। अंधकार ही अंधकार में वह न जाने कहाँ से कहाँ पहुँच जाता है। अंत में किसी कठोर भाव-शिला पर टकराकर उसे अपनी गलती या दुर्बलता का ज्ञान होता है। उसके ज्ञान चक्षु यकायक खुल जाते हैं। यहीं से वास्तविक आत्मिक उन्नति का सुप्रभात प्रारम्भ होता है।

ज्ञान के नेत्र हमें अपनी दुर्बलता से परिचित कराने आते हैं। जब तक इंद्रियों में सुख दीखता है, तब तक आँखों पर पर्दा पड़ा हुआ मानना चाहिए।

जो अपनी दुर्बलता से परिचित हो जाता है उसके लिए सच्चा पश्चाताप कर उसे दूर करने की इच्छा और सतत उद्योग प्रारम्भ करता है, उसकी उन्नति का आधा काम तो बन गया, मानना चाहिए।

दुर्बलता ही पाप का मूल है। इसका कारण अज्ञान है। जब ज्ञान के नेत्र खुलते हैं, तो मनुष्य को अपनी दुर्बलता के दर्शन हो जाते हैं। यजुर्वेद का वचन है-

“अपतस्य हतंतमो व्यावृत्तः स पाप्मना (यजु. 32)”

जिसका अज्ञान दूर होगा वही पाप से छूटेगा। पाप का प्रधान कारण आत्म-ज्ञान का अभाव है।”

इदमहमनतात् सत्यमुपैमि (यजु 1-5)

“असत्य को त्याग कर सत्य ही ग्रहण करना चाहिए। जो सत्य को त्याग कर असत्य अपनाते हैं, उन्हें अपयश ही मिलता है। “

ज्ञान के नेत्रों के प्रकाश में हम उन विचारों को त्याग देते हैं जो आत्मा को कष्ट देने वाले हैं, धर्म के शत्रु हैं, या अशाँति उत्पन्न करने वाले हैं। शक्तियों का मूल स्रोत आत्मा है। दुर्बलता का ज्ञान सच्ची, आत्मग्लानि, फिर उस दुर्बलता को हटाने की सच्ची साधना-यही हमारी उन्नति के सूत्र हैं। जब मन गलत राह से हटकर सन्मार्ग पर आरुढ़ हो जाता है, तभी आध्यात्मिक सिद्धियाँ मिलनी प्रारम्भ हो जाती हैं। वेदों में ऐसे अनेक अमूल्य ज्ञान-कण बिखरे पड़े हैं, जिनमें गलत राह से हटाकर मन को कल्याणकारी मार्ग पर चलने के लिए प्रार्थनाएं की गयी हैं-

न भद्रं नो अपिवातय मनः। (ऋग. 10-28-1)

“हे परमात्मन्! मेरे मन को कल्याण की ओर ले चलो।”

असंतापं में हृदयम् (अथर्व 163/6)

“हे परमात्मन्! मेरा हृदय संताप से हीन होता चले। अर्थात् अपनी दुर्बलताओं के दर्शन कर मेरे मन में जो आत्मग्लानि उत्पन्न हो, वह सत्कर्म और शुभ विचार द्वारा दूर होती चले। “

ति नो राये दुरोवृधि (ऋ. 9/45/3)

“हे प्रभो! ऐश्वर्य के लिए हमारे आँतरिक मनः द्वार खोल दो” (अर्थात् हमें निकृष्ट विचारों से मुक्त कर दो और दैवी एकता, विपुलता, आत्म-कल्याण के विचारों से परिपूर्ण कर दो।)

स्वामी दयानंद जी ने “सत्यार्थ प्रकाश” में एक स्थान पर लिखा है, “सज्जनों और उन्नति करने वालों की यह रीति है कि वे गुणों को ग्रहण कर दोषों का परित्याग सदा करते रहते हैं।”

कद व ऋतं कद नृतं कव प्रज्जा (ऋग. 1/105।5)

“क्या उचित है, या अनुचित, यह निरंतर विचारते रहो। विवेक और आत्मा के आदेश का आश्रय ग्रहण करो।”


जाति-भेद हिंदू समाज का घुन है।

(श्री क्षिति मोहन सेन शास्त्री)

मनुष्य-समाज में ऊँच-नीच का भेद सर्वत्र पाया जाता है, पर हमारे देश के समान जाति-भेद संसार में और कहीं भी नहीं है। दूसरे देशों में सब प्रकार के भेदों के भीतर उनका धर्म एकता का भाव उत्पन्न करता है, पर हमारे देश में जाति-भेद की दीवार धर्म के आधार पर ही खड़ी की गई है। कभी-कभी हम तर्क बुद्धि से इस भेद की कृत्रिमता को समझ जाते हैं, पर उसका संबंध धर्म से होने के कारण हम उससे उत्पन्न होने वाले कुफलों का प्रतिकार नहीं कर सकते।

जब तक जाति-भेद की प्रथा की जड़ खूब दृढ़ भाव से इस देश में नहीं जमी थी, तब तक भारत-वर्ष के बाहर से आने वाले विदेशी भी इस देश की समाज में शामिल कर लिये जाते थे। अब से 2100 वर्ष पूर्व के एक शिला लेख से पता चलता है कि तक्षशिला का यूनानी राजा ‘हेलियो डोरस’ भागवत धर्म का दृढ़ अनुयायी बन गया था और उसने गरुणध्वज की स्थापना की थी, कनिष्क, हुविष्क आदि प्रसिद्ध भारतीय नरेश विदेशी ही थे। ‘काडवाइसिस’ नाम का राजा शिव का परमभक्त हुआ। श्री नगर (काश्मीर) के राजा मिहिर कुल ने मिहिरेश्वर नामक महादेव की स्थापना की थी। इस प्रकार प्राचीन काल में विदेशों से आये शक, हूण, यवन, कोची, मीना आदि वीर जातियों के दल भारत के समाज में मिलते रहे और आज सब हिंदू जाति के अंग माने जा रहे हैं। जिन राजपूतों की वीर गाथाओं के लिए हम इतना गर्व अनुभव करते हैं वे भी एक समय बाहर से आये थे। अन्य जातियों का हिंदू समाज में सम्मिलित होने का कार्य किसी-किसी प्रदेश में अब भी हो रहा है, पर अब इसमें उतनी शक्ति नहीं है जो कुछ शताब्दी पहले थी। कुछ समय पहले नाथपंथी जोगियों का एक स्वतंत्र मत था। वे वर्णाश्रम नहीं मानते थे, मृतक का दाह नहीं करते थे, वरन् पृथ्वी में गाड़ दिया करते थे। पर अब वे धीरे-धीरे हिंदू-समाज में प्रविष्ट हो गये हैं। इन्होंने वर्णाश्रम धर्म भी स्वीकार कर लिया है और वैष्णव बन गये हैं। वे गुरुमंत्र, तीर्थ, पूजा, प्रार्थना आदि भी स्वीकार कर रहे हैं। फिर भी इस को अपनाना नहीं कह सकते। दूसरे धर्म वाले जिस प्रकार उद्योग करके और तरह-तरह के उपायों से अपनी संख्या बढ़ा रहे हैं उसकी तुलना में यह कुछ भी नहीं। वरन् अब भी छोटे-छोटे कारणों से व्यर्थ बहुत से आदमियों को समाज से बाहर निकाल देने की प्रवृत्ति स्पष्ट दिखलायी पड़ती है। इस प्रकार का कार्य हिंदू समाज के लिए आत्म हत्या से कम नहीं है।

बंगाल के त्रिपुरा जिले के ‘माहीमाल’ या ‘माई फरोश’ मुसलमान पहले हिंदू कैवर्त (मल्लाह) थे। सुना जाता है, कि एक बार इनके पास के गाँव में हैजे की बीमारी हुई थी। उस गाँव के रहने वाले मुसलमान थे, जो सभी हैजे से मर गये। केवल एक छोटा शिशु बच गया। कैवर्तों को उस पर दया आ गयी। उनकी एक स्त्री ने उसे अपना दूध पिलाया और बड़ा किया। बाद में किसी ने यह तर्क उठाया कि यह लड़का तो हिंदू नहीं है, उसके पालन करने वाली की जात नष्ट हो गई, और उसके साथ खान-पान करने वाले सभी मुसलमान हो गये। इस प्रकार कई सौ लोगों को हिंदू धर्म से जबरदस्ती बाहर निकाल दिया गया। बहुत दिनों तक वे समाज की प्रतीक्षा में रहे पर समाज के नेताओं का हृदय नहीं पसीजा। अब वे पक्के मुसलमान हैं।

मलकाने मुसलमानों का किस्सा भी इसी प्रकार का है। ये लोग आगरा, मथुरा के आस-पास ही रहते हैं। किसी समय ये देश और गो-ब्राह्मण की रक्षा के नाम पर मुसलमान आक्रमणकारियों से जी तोड़कर लड़ाई कर रहे थे। उसी समय किसी ने झूठमूठ अफवाह फैला दी कि शत्रुओं ने उनके कुएँ में गोमाँस डाल दिया है और वे उसी का पानी काम में ला रहे हैं। यही अफवाह उनको समाज से च्युत करने का कारण बन गई। बहुत दिनों तक वे धर्म को छोड़ने को तैयार नहीं हुये। अब तक भी उनके आचार विचार में अनेक राजपूती रस्में मिलती थीं, पिछले कुछ वर्षों में शुद्धि आँदोलन के फल से उनमें से बहुसंख्यक व्यक्तियों को हिंदू-धर्म में पुनः सम्मिलित किया गया।

इस प्रकार जाति-भेद की विचार शून्य प्रथा के कारण हिंदू-समाज से जबर्दस्ती निकाली गयी आधी हिन्दू और आधी मुसलमान अनेकों जातियाँ अब भी मौजूद हैं। काशी के पास जोगियों की एक जाति के लोग राज भर्थरी का गाना गाते हुए भीख माँगते फिरते हैं। इनका भरण-पोषण हिंदू ही करते हैं, इनसे गण्डे ताबीज भी लेते हैं, पर नाम मात्र के लिए ये मुसलमान हैं और अपने को हिंदू कह सकने के अधिकारी नहीं है। गुजरात और सिंध में मतिया, मोमना, शेख, मौल-इस्लाम, संघर आदि अनेकों जातियाँ हैं, जिनको मर्दुमशुमारी की रिपोर्ट में ऐसे ही कारणों से मुसलमान लिख दिया गया है। मीरासी लोग देवी के भक्त हैं और उसी के गीत गाकर जीविका चलाते हैं, पर इनको मुसलमान मान लिया गया है। गंजाम (उड़ीसा) में आरुवा जाति का आचार-विचार सर्वथा हिंदुओं का है, पर वह विवाह के समय मुल्लों को बुलाने को बाध्य हैं। इसी प्रकार मद्रास के ‘दुदेकुल’ तिलंगाने के ‘काटिक’, यू.पी. और राजपूताना के डफाली, घोसी, राँकी, किंगानी आदि सैंकड़ों जातियाँ ऐसे नौ मुस्लिमों की हैं जो हिंदू समाज की संकीर्णता के कारण समाज से बहिष्कृत कर दिये गये हैं, और जो स्वभाव वश अभी तक अधिकाँश हिंदू आचार-विचारों का पालन कर रहे हैं।

जो ऐसी आधी हिंदू और आधी मुसलमान जातियाँ हैं उनकी अवस्था के अनुसार उचित तो यही था कि कुछ इधर आ जातीं, कुछ उधर चली जातीं। पर हिंदू समाज में तो बाहर से आने का रास्ता बंद है। घर का आदमी भी यदि एक बार बाहर चला गया तो फिर उसका घर में आना असंभव है। अभिमन्यु चक्रव्यूह के भीतर घुस सकते थे, बाहर नहीं निकल सकते थे, पर यहाँ आदमी बाहर तो निकल सकता है, भीतर नहीं आ सकता।

भीतर आने में सबसे बड़ी बाधा जातिभेद की है। जिस जाति से कोई बाहर जाता है वह जाति अपनी शान बनाये रखने के लिए उसे फिर से अपने दल में स्थान नहीं दे सकती। उनका कहना है कि जो बाहर निकलकर अपनी जात-पाँत ठीक नहीं रख सका उसे फिर किस जाति में लिया जाय? बाहर जाने से वर्णाश्रम तो विशुद्ध रह नहीं जाता, तो फिर वह लौटना भी चाहे तो उसे बैठाने का कोठा खोजने पर भी नहीं मिलता, इसका नतीजा पहले जमाने में यह होता था कि वे लोग अपनी एक नई जाति बना लेते थे। यही कारण यहाँ पर एक-एक वर्ण में हजार-हजार और पाँच-पाँच सौ जातियाँ होने का है। इस भूल अथवा विचार शून्यता के कारण हिंदू अपने लाखों भाइयों को पराया बना चुके हैं। यह बात भी निश्चय है कि अपना आदमी जब एक बार पराया हो जाता है, तो वह बड़ा कठोर दुश्मन सिद्ध होता है, और वह बड़ी निर्ममता से चोट करता है। अर्जुन के ऊपर कर्ण ही सबसे अधिक भयंकर आक्रमण करता था। जिसे अपमानित करके जाति बहिष्कृत कर दिया जाता है, वह उस अपमान को कभी नहीं भूलता। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ठीक ही कहा है-”सबसे कठिन जाति अपमाना।”


सच्चरित्रता का मूल आधार ईश्वर भक्ति ही है।

(श्री ज्ञानेन्द्र मोहनदास)

मनुष्य जन्म पाकर ज्ञान का प्राप्त करना सबसे प्रधान कर्तव्य माना जाता है। पर ज्ञान का अर्थ केवल बहुत से ग्रंथों को पढ़ लेना अथवा कोरा पंडित बन जाना ही नहीं है। जब तक विद्या बुद्धि के साथ मनुष्य में नैतिक बल और सच्चरित्रता का गुण न होगा तब तक कोई उसका आदर-सम्मान नहीं कर सकता। जब किसी को दुर्व्यसन लग जाता है तब बुद्धि के सहारे उसे पूर्णतः नहीं रोका जा सकता। जिनमें नैतिक बल का अभाव है वे केवल बुद्धि के द्वारा धार्मिक नहीं बन सकते। प्रायः यह देखने में आता है कि जिनमें नैतिकता और सच्चरित्रता का भाव नहीं है उनकी विद्या बुद्धि दूसरों का अनहित करने वाली, असत्य को सत्य सिद्ध करने वाली बन जाती है। इसलिए जो शक्ति नैतिकता में है वह बुद्धिमानी में नहीं है। बुद्धि केवल मार्ग दिखलाने वाली है। यदि पथिक जान बूझकर कुमार्ग पर चला जाय और कष्ट उठाये तो बुद्धि उसका कुछ नहीं कर सकती। पर नैतिकता मनुष्य को सुमार्ग से विचलित नहीं होने देती, इसीलिए मनुष्य को बुद्धि रहते भी नैतिक बल की उपेक्षा नहीं करना चाहिए।

जैसे बुद्धि के साथ नैतिकता का थोड़ा ही संबंध है उसी प्रकार विद्या के साथ भी अधिक संबंध नहीं है। यदि ऐसा न होता तो अनेक प्रसिद्ध विद्वानों, लेखकों और मेधावी व्यक्तियों में अनेक शराबी, फिजूलखर्च और व्यभिचारी क्यों दिखलाई पड़ते? उनकी यह विशाल विद्या, प्रतिभा उनको पाप-चिंता और दुराचार से क्यों नहीं हटाती? अतएव क्या स्त्री और क्या पुरुष, सबके लिए सबसे पहली और सबसे बड़ी शिक्षा यही है कि वे नीति और धर्म के पथ पर चलना सीखें। जो शिक्षा धर्म और नीति से रहित है वह शिक्षा नहीं, वरन् कुशिक्षा है। जिस कर्म में धर्म और नीति का संबंध नहीं वही पाप कर्म है। जिन बालकों को आरंभ में धर्म और नीति की शिक्षा नहीं दी जाती, वे बड़े होने पर प्रायः दुश्चरित्र होकर अपने वंश और देश को कलंकित करते हैं। इसलिये शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को चरित्र हीनता से दूर रखना ही होना चाहिये। दुश्चरित्र विद्वान से तो वह मूर्ख ही अच्छा है जो सच्चरित्र है। सच्चरित्रता के न होने से मनुष्य अपना भला भी नहीं कर सकता, दूसरों का कल्याण तो क्या कर सकेगा। इसलिए व्यक्ति और समाज का हित इसी में है कि प्रत्येक नागरिक को आरंभ से ही नैतिकता की शिक्षा दी जाय, धर्म का रूप समझाया जाय और उनके अनुसार चलने का अभ्यास कराया जाय।

यद्यपि देश, काल, जाति, समाज और संस्कार के भेद से धर्म और उपासना की पद्धतियाँ भिन्न-भिन्न हैं, तो भी धर्म का मूल रूप सर्वत्र एक है, और उन्हीं मूल सिद्धाँतों को आरंभिक अवस्था में हृदयंगम कराना चाहिए। धर्म की शेष क्रियाएँ, उपासना की पृथक-पृथक विधियाँ तो बाद में स्वयं आ जाती हैं। धर्म का मूल आधार तो एक ईश्वर में विश्वास करना है। अगर हम यह समझ लें कि हम सबको एक ईश्वर ने उत्पन्न किया है और वह हमारा वास्तविक पिता है तो फिर हम किसी के साथ कभी भी बुरा या हानिकारक आचरण कैसे कर सकते हैं? ऐसे सर्वशक्तिमान और कल्याणकारी जगदीश्वर में अटल विश्वास और भक्ति करना ही धर्म का प्रथम सोपान है। जिस पर तुम्हारी भक्ति होगी, जिस पर तुम्हारा प्रेम होगा, उसकी प्रसन्नता के काम तुम अवश्य करोगे। इसलिए यदि तुम्हें ईश्वर के प्रति भक्ति का भाव होगा तो नीतिपूर्वक लोकोपकारी काम करने को तुम अपने आप तैयार होगे और अनुचित कामों से तुमको घृणा होगी। श्री कृष्ण भगवान ने गीता में कहा है-

अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्य भाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यगव्यवसितो हि सः॥ क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छन्तिं निगच्छति।

अर्थात् “जो दुराचारी है, किंतु शुद्ध मन से ईश्वर का भजन करता है, वह थोड़े ही दिनों में धर्मात्मा होकर शाँति-सुख पाता है।” इसलिए जो मनुष्य सच्चे हृदय से ईश्वर की भक्ति करेंगे, निष्कपट भाव से उसकी उपासना करेंगे, तो सभी जगह उनका आदर सम्मान होगा। ईश्वर की भक्ति द्वारा जब तुम्हारे हृदय में कर्तव्य बुद्धि जागृत होगी और बुरे कामों से घृणा होगी तो तुम स्वयं ही ईश्वर को प्रसन्न करने वाले कामों को समझ जाओगे और वैसा ही आचरण करने लगोगे।

किसी विद्वान का कथन है कि “कर्तव्य का पालन करना ही धर्म है। जो लोग उचित कर्म का त्याग नहीं करते उनके धर्म की रक्षा अपने आप होती है।” शास्त्रों में भी यही कहा गया है-”धर्मस्त विहितं कर्म्म ह्यधर्मस्तद्विपर्यय।” जीवन की सार्थकता तभी है जब धर्म का पालन होता रहे। धर्महीन जीवन मृत्यु का ही दूसरा नाम है, बल्कि हम तो यहाँ तक कह सकते हैं कि अधार्मिक जीवन से मरण ही श्रेष्ठ है। धर्म में प्रवृत्त होने के लिए मनुष्यत्व का ज्ञान होना आवश्यक है और मनुष्यत्व का ज्ञान तब तक नहीं हो सकता जब तक ईश्वरीय शक्ति में विश्वास और भक्ति न हो। इसीलिए मनुष्य का सबसे पहला कर्तव्य अथवा साधन ईश्वर की भक्ति, प्रेम ही है। जो मनुष्य भक्ति के मार्ग पर चलेगा उसका धर्मप्रेमी अथवा सच्चरित्र होना कठिन नहीं है। ईश्वर में अटल विश्वास और भक्ति मनुष्यत् व लाभ करने का प्रथम सोपान है। जो ईश्वर के भक्त नहीं हैं वे मनुष्य होकर भी मनुष्यता से रहित हैं। इसलिए बालकों को शिक्षा देना प्रारंभ करते ही उनको ईश्वर से प्रेम और भक्ति करना भी सिखाना चाहिए। जिन बालकों को बचपन में धर्म, नीति और भक्ति की शिक्षा नहीं दी जाती वे युवा होने पर अपना चरित्र ठीक नहीं रख सकते। नीतिपूर्वक चलने पर भी जब तक मनुष्य अन्य प्राणियों से प्रेम करना न सीखे तब तक मनुष्य जीवन अधूरा हो रहता है। इस कमी को पूरा करने वाली ईश्वर भक्ति ही है। इसके बिना मनुष्य का हृदय कोमल, शाँत और विशुद्ध नहीं बन सकता, और जब तक ये गुण मनुष्य में न हों अन्य मनुष्य भी उससे प्रेम नहीं कर सकते। संसार में जो मनुष्य दूसरों को प्रेम न करे और दूसरे उसे प्रेम न करें तो उसका जीवन निरर्थक ही है और इस प्रकार का विशाल और सच्चा प्रेम ईश्वर की भक्ति करने से ही मिल सकता है।

यह कहा गया है कि चरित्र से मनुष्यत्व प्राप्त होता है, पर भगवान की भक्ति चरित्रवान को देवत्व प्रदान करने वाली है। वह हमको एक ऐसा अलौकिक आनंद देती है, जिसकी तुलना और किसी आनंद से नहीं की जा सकती। वह मनुष्य के हृदय को अमृत के समान मीठा और नवनीत के समान कोमल बना देती है। तब उस मनुष्य को सर्वत्र आनंद ही आनंद दिखलाई पड़ता है, ईर्ष्या, द्वेष, कलह, शत्रुता के सब भाव लोप हो जाते हैं। क्योंकि जब मनुष्य परमात्मा को ही जगत का सच्चा पालनकर्ता मान लेता है, तब उसके हृदय में स्वभावतः ही सब प्राणियों के लिए आत्मभाव का उदय होता है। वह समझने लगता है कि यदि मैं किसी जीव को कष्ट पहुँचाऊंगा तो परमात्मा अवश्य मुझसे अप्रसन्न होगा। इसी प्रकार किसी प्राणी को दुःख से छुड़ाने या उसका कोई उपकार कर देने से परमात्मा की कृपा भी अवश्य होगी। इस प्रकार ईश्वर की सच्ची भक्ति करने वाला व्यक्ति अपने देश, समाज और आस-पास रहने वालों का सच्चा हितैषी बन जाता है और वही सच्चरित्रवान कहलाने का अधिकारी होता है। जिन लोगों का ख्याल है कि भगवान की भक्ति का अर्थ मंदिर में घंटों आँखें मूँदकर बैठे रहना अथवा ठाकुरजी के आगे विह्वल होकर नाचने गाने लगना ही है, वे कुछ गलती करते हैं। भक्ति की दशा में बहुत प्रगाढ़ हो जाने पर कभी-कभी मनुष्य में ये लक्षण भी उत्पन्न हो जाते हैं, पर इसका यह अर्थ नहीं कि वह अपने जीवन के प्रधान कर्तव्यों से मुँह मोड़ ले। इसके विपरीत हम तो ईश्वर-भक्ति का अर्थ यह समझते हैं कि वह व्यक्ति लोक और परलोक की वास्तविकता को समझ जाता है और जन-साधारण में जन, धन और यश आदि का जो मोह दिखलाई पड़ता है उससे वह छूट जाता है। इस लिए जब कभी अवसर आये वह दूसरों की सेवा, उपकार, उद्धार के लिए अधिक से अधिक त्याग और बलिदान कर सकता है। स्वार्थ और स्वार्थ से उत्पन्न पाप कार्यों की तो भक्त के लिए संभावना ही नहीं करनी चाहिए। इसलिए अपने हृदय में ऐसी सच्ची ईश्वर-भक्ति उत्पन्न करना और उसके द्वारा सत्कर्म करके मानव जीवन सफल बनाना ही हम सब का परम कर्तव्य है।


भोजन की शुद्धता का हमारे चरित्र पर प्रभाव

(श्री सीताराम शरण)

हमारे देश में भोजन की शुद्धता का बड़ा महत्व माना गया है। अन्य देश वाले तो भोजन का संबंध केवल स्वास्थ्य से ही समझते हैं पर आर्य जाति के विद्वानों ने चरित्र और धर्म से भी उसका संबंध माना है। यहाँ पर भोजन के संबंध में केवल इस दृष्टि से ही विचार नहीं किया जाता था कि वह शुद्ध पदार्थों से और शुद्ध तरीके से बनाया गया है, वरन् उसकी सामग्री भले या बुरे कैसे साधनों से प्राप्त की गई है, इसका भी ध्यान रखा जाता था। उदाहरण के लिए किसी प्रकार की बेईमानी या चोरी से प्राप्त धन से जो भोजन तैयार किया जायेगा, वह चाहे ऊपरी दृष्टि से कैसा भी शुद्ध और सफाई के साथ क्यों न बनाया गया हो उसका प्रभाव हमारे मन पर अच्छा नहीं पड़ सकता। वह आध्यात्मिक भावों का पतन करने वाला ही माना जायेगा।

गीता के 17 वें अध्याय में भोजन के संबंध में कुछ श्लोक हैं जिनमें इस विषय की बड़े तात्विक ढंग से विवेचना की गई है। भगवान ने भोजन तीन प्रकार का बताया है-सात्विक, राजस और तामस, आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख एवं प्रीति को बढ़ाने वाले एवं रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले, स्वभाव से ही प्रिय भोजन को सात्विक कहा गया है। कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, आदि गरम तथा तीक्ष्ण, रूखे, दाह कारक, दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले खाद्य पदार्थों को राजस कहा गया है। जो भोजन अधपका, रस रहित, दुर्गंधयुक्त और बासी, झूठा, अपवित्र हो उसे तामस बतलाया गया है।

गीता के उपर्युक्त विवेचन को ध्यान रखकर जब हम वर्तमान समय में अपने भोजन पर विचार करते हैं तो जान पड़ता है कि हमारे आजकल के खाद्य पदार्थ विशेषतः तामस और राजस हो गये हैं। इन दोनों प्रकार के गुणों का प्रभाव गीता के 14 वें अध्याय में इस प्रकार बतलाया गया है-”रजोगुण रागमय होता है और इसकी उत्पत्ति कामना तथा वासना से होती है। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फलों की शृंखला से बाँधता है। तमोगुण देहधारियों को मोह में डालने वाला है और उसकी उत्पत्ति अज्ञान से होती है। वह जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बाँधता है।”

अब हम सहज में समझ सकते हैं कि आजकल स्वार्थ साधन, प्रमाद, आलस्य, निद्रा, रोग और नीचतायुक्त विचारों की जो अधिकता दिखलाई पड़ती है उसका हमारे भोजन से क्या संबंध है? आज कल शहरों के शिक्षित समाज में अण्डा और माँस आदि की प्रवृत्ति बढ़ रही है। जिन घरों में पीढ़ियों से कभी माँस, मदिरा, अण्डे का व्यवहार तो दूर रहा-नाम तक नहीं लिया जाता था, उन उच्च जातियों के शिक्षित नवयुवकों को होटलों में ‘आमलेट’ तथा अण्डों से बनी अन्य वस्तुएँ खाते देख हृदय को घोर कष्ट होता है। वे लोग यह तर्क पेश करते हैं कि विज्ञान के अनुसार अण्डा निरामिष भोजन है। पर उनका यह तर्क कुतर्क मात्र है। विज्ञान के अण्डे को चाहे जो कुछ सिद्ध कर दिया हो पर है तो वह पक्षियों के वीर्य आदि का सम्मिश्रण ही। फिर यह किस प्रकार सिद्ध किया जा सकता है कि प्रत्येक निरामिष पदार्थ भोजन के उपयुक्त ही होता है। उदाहरण के लिए प्याज, लहसुन आदि वनस्पति हैं और अनेक रोगों में लाभजनक भी सिद्ध होते हैं, पर उनका भोजन के रूप में नियमित सेवन उत्तेजनाकारी और तमोगुण की वृद्धि करने वाला होता हैं, इसलिए वे त्याज्य माने गये हैं। इसीलिए भगवान ने गीता में त्याज्य पदार्थों के नाम नहीं गिनाये हैं वरन् उनके लक्षणमात्र दे दिये हैं जिससे लोग अपनी बुद्धि से प्रत्येक पदार्थ के प्रभाव को देखकर उनके गुण दोषों को स्वयं ही जान सकें।

आजकल बड़े शहरों में होटलों का प्रचार बढ़ रहा है। इनमें उत्तम परिवारों के व्यक्ति छोटे-छोटे और पर्दा लगे स्थानों में माँस तथा अण्डे से बनी चीजें और अनेक बार शराब भी उड़ाते देखे जाते हैं। ये होटल प्रायः आधी रात तक चलते रहते हैं, उनकी सभी चीजें तेज मसालेदार और तेज खटाई तथा मिर्च आदि से युक्त होती हैं। अनेक पंजाबी होटलों में तो इन पदार्थों में हलका लाल रंग मिलाकर उन्हें और भी वीभत्स बना दिया जाता है। जो लोग इस प्रकार के घोर तामसी और राजसी पदार्थों का सदैव सेवन करेंगे उनसे धार्मिक वृत्ति और उत्तम साँस्कृतिक स्वभाव की क्या आशा की जा सकती है?

आजकल कृत्रिम और डिब्बों में बंद भोज्य-पदार्थों का प्रचार बढ़ता जा रहा है और उनका उपयोग फैशन का एक अंग माना जाता है। मैदा के बने महीनों पुराने बिस्किट, चाकलेट आदि खाना आजकल सभ्यता की निशानी समझा जाता है। डेनमार्क का दूध, कनाडा का मक्खन, आस्ट्रेलिया आदि के डिब्बों में बंद फल आदि महीनों पुरानी वस्तुएँ अगर न खायें तो अपने ‘सभ्य’ मित्रों की भाषा में पुराणपोथी (आर्थोडाक्स) कहलायेंगे। तात्पर्य यह है कि इस समय खाद्य पदार्थों की आँतरिक शुद्धता तथा सात्विकता की ओर किसी का ध्यान नहीं है। होटल में बढ़िया काँच की टेबल पर चमचमाती चीनी मिट्टी के प्लेटों में सुँदर सजा हुआ भोजन चाहिए, फिर चाहे उसके बनने का स्थान, सामग्री, बर्तन तथा बनाने वाले कैसे भी गंदे क्यों न हों।

लहसुन , प्याज खाने वालों के शरीर, पसीना, मल आदि सबसे बड़ी तीव्र गंध आने लगती है। ये आलस्य और प्रमाद की मात्रा बढ़ाते हैं। यही बात अन्य सब तामसी पदार्थों की है। वास्तव में भोजन करते समय विचार करने की मुख्य बात यही है कि उसकी सामग्री सात्विक गुणों को लिये है या नहीं? देखना यह चाहिए कि उसका हमारे स्थूल और सूक्ष्म शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है। एक विचारक का कथन है कि “माँस खाकर माँस बढ़ाने की अपेक्षा घास खाकर मर जाना अच्छा है। “ इसका आशय यही है कि भोजन करना जीवन का उद्देश्य नहीं माना जा सकता, यह केवल किसी उच्च उद्देश्य की पूर्ति के लिए शरीर को ठीक हालत में बनाये रखने का साधन मात्र है।

इसी प्रकार जूठा भोजन करने में भी अब विशेष संकोच नहीं किया जाता। एक ही थाली या पात्र में साथ-साथ खाना ही जूठा खाना नहीं है, वरन् काँच के गिलासों और चीनी के बर्तनों के व्यवहार से भी यह बुराई पैदा हो जाती है। आधुनिक सभ्यता में इन बर्तनों को मामूली धो लेने से शुद्ध मान लिया जाता है। पर इनको होटलों, शर्बत, लस्सी बेचने वालों आदि के यहाँ किस प्रकार धोया जाता है यह देखने से ही जाना जा सकता है। कितने ही फेरी लगाने वाले तो एक बाल्टी पानी भर कर रख लेते हैं और प्रत्येक जूठे बर्तन को उसी में एक बार डुबा देने से उसे धोया हुआ मान लेते हैं। स्टेशनों और नुमाइशों आदि में आजकल यह नियम भी प्रचलित हो गया है कि एक बर्तन में पोटाश परमनगेटेड (कीटाणु नाशक दवा) घोलकर रख लेते हैं और पानी पीने वालों के जूठे बर्तनों को उसमें डुबा कर दूसरों को पानी पीने के लिए दे देते हैं। चाहे विज्ञान के सिद्धाँतानुसार यह प्रणाली छूत के रोगों से रक्षा करने वाली हो, पर मन तथा आत्मा पर इसका कुप्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। स्कूलों और कालेजों के विद्यार्थी एक ही बर्तन में मिलकर खाते हुए प्रायः देखे जा सकते हैं। सबके लिए रखा हुआ सूखा मेवा, फल आदि भी अनेक बार इस प्रकार खाये जाते हैं कि वे थूक लग कर जूठे हो जाते हैं और फिर अन्य मेवा अथवा फलों के ढेर में मिला दिये जाते है। दुःख तो इस बात का है कि इन सब बातों में आजकल कोई बुराई नहीं मानी जाती वरन् इनको गौरव की वस्तु और प्रगति का चिन्ह माना जाता है। यही कारण है कि ये खराब आदतें घटने के बजाय तेजी से बढ़ती जा रही हैं।

इस परिस्थिति को देखते हुए इस बात की आवश्यकता है कि हम भोजन के संबंध में भगवान के महान उपदेशों पर मनन करें और यह निर्णय करें कि हमारा वर्तमान भोजन अवनति की ओर ले जाने वाला है या उन्नति की ओर? उससे हमारे चरित्र का उत्थान होता है या पतन?


अभ्यास और साधना ही सफलता की कुँजी है।

(महात्मा एपिक्टेटिस)

मनुष्य में जितनी प्रकार की शक्तियाँ और प्रवृत्तियाँ हैं वे सब अभ्यास और साधना द्वारा ही रह सकती हैं और बढ़ सकती हैं। चलने की शक्ति चलने से और दौड़ने से बढ़ सकती है। अगर तुम किसी बात में उन्नति करना चाहते हो तो बार-बार उसका अभ्यास करना होगा। यदि सुँदर अक्षर लिखना चाहते हो तो बार-बार लिखना होगा। यदि तुम एक महीने तक पूरी तरह बोलना बंद कर दो तो बाद में तुमको बोलने में भी कठिनाई जान पड़ेगी। अगर दस दिन तक बिस्तर पर पड़े रहकर बाद में एक दिन दूर तक चलने का प्रयत्न करो तो मालूम होगा कि तुम्हारे पाँव निर्बल हो गये हैं। साराँश यही है कि यदि तुम किसी विषय में दक्षता प्राप्त करना चाहते हो तो उसे व्यवहार में लाओ और जिस काम से दूर रहना है उसे बिल्कुल बंद करो। उसके बदले में और कुछ करो जिससे उसका विचार भी उत्पन्न न हो।

जो नियम साँसारिक कार्यों का है वही आध्यात्मिक विषयों पर भी लागू होता है। यदि तुम एक बार क्रोध करते हो तो समझ लो कि उससे तुम्हारा एक बार ही नुकसान नहीं हुआ-बल्कि तुम्हारा एक अनिष्टकारी प्रवृत्ति की ओर झुकाव हुआ-तुमने आग में घी की आहुति प्रदान की। यदि तुम काम के द्वारा अभिभूत हुए तो यह न समझना कि कामदेव ने तुम्हारे ऊपर एक ही बार विजय प्राप्त की-परंतु इससे तुम्हारी इंद्रियों का संयम बहुत समय के लिए क्षीण हो गया और तुम्हारे भीतर इंद्रियों की विवशता के भाव की वृद्धि हुई। कारण और कार्य के द्वारा ही सब प्रकार की शक्तियाँ-सब प्रकार की वृत्तियाँ विकसित होती हैं, प्रबल होती हैं, व्याप्त होती हैं। इसी प्रकार आत्मा का भी पाप या पुण्य की ओर झुकाव घटता या बढ़ता है। यदि तुम्हें कभी धन का लोभ हो और उसी समय यदि तुम धर्म बुद्धि की शरण लो तो इससे तुम्हारे लोभ का दमन होगा और तुम्हारी धर्म बुद्धि भी बल प्राप्त करके अपने पद पर प्रतिष्ठित रहेगी। किंतु यदि तुम धर्म बुद्धि की शरण न लोगे तो अपनी आत्मा की पहले जैसी निर्मल अवस्था तुमको फिर प्रतीत न होगी। दूसरी बार जब कोई प्रलोभन सामने आयेगा, तो पहले की अपेक्षा और भी शीघ्र तुम्हारी वासना की आग जल उठेगी। जो आदमी एक बार ज्वर-रोग से पीड़ित हुआ है उसका ज्वर छूट जाने पर भी पूर्ण रूप में आरोग्यता प्राप्त किये बिना -वह अपनी पहली जैसे अवस्था को प्राप्त नहीं होता। आत्मा के रोग में भी ऐसा ही हुआ करता है। रोग के दूर होने पर भी आत्मा में जो घाव का निशान रह जाता है, अगर उसे पूरी तरह दूर नहीं किया जायेगा, तो फिर जब कभी उस स्थान पर पाप की आँच लगेगी तो उस समय वह घाव का निशान केवल निशान ही न रहेगा, वरन् पहले से भी अधिक भयंकर घाव बन जायेगा।

उदाहरणार्थ अगर तुम चाहते हो कि “मेरा क्रोधी स्वभाव बदल जाय”-तो ऐसी कोई बात न करो जिससे उसकी प्रवृत्ति का पोषण हो-उसमें आहुति पड़े। पहले से ही शाँत भाव धारण करो और बिना क्रोध के कितने दिन बीते हैं, इसकी गिनती करते रहो-”इस बार मैं एक दिन क्रोधित नहीं हुआ”- “इस बार दो दिन क्रोधित नहीं हुआ”, “इस बार तीन दिन तक क्रोधित नहीं हुआ”-इस प्रकार अभ्यास करते हुए जब तीस दिन तक बिना क्रुद्ध हुए रह सके तो इस सफलता के लिए भगवान की पूजा करना। इसी प्रकार अभ्यास करने से सब प्रकार की हानिकारक प्रवृत्तियाँ धीरे-धीरे घटकर अंत में निर्मूल हो जायेंगी।

इस प्रकार का अभ्यास सफलता पूर्वक करने का मार्ग यह है कि हम अपने हृदय में दृढ़ संकल्प करें कि “हम आत्मोन्नति करेंगे”- “ईश्वर के सामने निष्कलंक रहेंगे।” हमको सच्चे दिल से ऐसी इच्छा करनी चाहिए कि “मैं अपनी अन्तरात्मा के निकट निर्मल रहूँगा।” पर इतने पर भी प्रलोभन में पड़ जाओ तब क्या करोगे? इस संबंध में प्लेटो का उपदेश है-”ऐसा हो तो पुण्य कर्मों का अनुष्ठान करो। दुर्बलों को बल देने वाले देवताओं के मंदिर में जाकर प्रार्थना करो।” साधुजनों की संगति से भी बड़ा लाभ हो सकता है।

इन सब उपायों का अवलम्बन करने से तुम प्रलोभनों को जीत सकोगे-प्रलोभनों से पराजित न होगे। किंतु पहले से ही प्रलोभन के वेग में न बह जाना, जब ऐसा अवसर आये तो पहले जरा ठहर कर प्रलोभन के स्वरूप और उसके अंतिम परिणाम पर भली प्रकार विचार करना उचित है। यदि तुम ऐसा न करोगे तो प्रलोभन तुम्हारे मन पर अधिकार जमा लेगा और जहाँ चाहेगा वहाँ तुम्हें ले जायगा। और एक काम करो-उस नीच प्रलोभन के मुकाबले में एक श्रेष्ठ प्रलोभन को लाकर खड़ा कर दो। उस उच्च प्रलोभन की सहायता से वह नीच प्रलोभन दूर किया जा सकता है। यदि तुम इस प्रकार का अभ्यास करोगे तो तुम्हारा मन बहुत बलवान बन जायगा और तुम आत्मोन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो सकोगे।

वही सच्चा वीर है जो इन प्रलोभनों के साथ निरन्तर युद्ध करता है। वही युद्ध श्रेष्ठ है, वही व्रत स्वर्गीय है जिसके द्वारा सब पर आधिपत्य प्राप्त होता है, स्वाधीनता मिलती है, चित्त शाँत होता है। ईश्वर का स्मरण करो, उससे सहायता की प्रार्थना करो, उसकी शरण लो। जैसे तूफान के समय नाव का मल्लाह वरुणदेव को पुकारता है, वैसे ही इस प्रलोभन रूपी तूफान में तुम ईश्वर को पुकारो। जिस तूफान में हमारी विवेक बुद्धि विचलित हो जाए, उससे बढ़कर दूसरा तूफान कौन सा हो सकता है? यदि ऐसे अवसर पर हम एक बार प्रलोभनों के पंजे में फँस जायेंगे और फिर कहेंगे कि “इस बार न सही अगली बार मैं विजयी होऊँगा।” और प्रत्येक बार तुम ऐसी ही बात कहते रहे तो यह निश्चय है कि तुम निरन्तर निर्बल होते जाओगे और अन्त में तुम्हारी दशा ऐसी हीन हो जायगी कि तुम्हें यह भी अनुभव न होगा कि तुम कोई पाप-कर्म कर रहे हो। उस समय तुम अपने पाप-कर्म को उचित सिद्ध करने के लिये तरह-तरह के बहाने खोजते फिरोगे।

तब क्या मनुष्य इस प्रकार दृढ़ संकल्प करने से सदैव दोषों से बच सकता है? नहीं, ऐसा होना संभव नहीं है। तो भी मनुष्य इस प्रकार निर्दोषिता की तरफ क्रमशः अग्रसर होता जायगा। अपने प्रयत्न में बराबर लगे रहकर, उसमें तनिक भी शिथिलता न लाकर अगर हम दो-चार दोषों से भी छुटकारा पा जायें तो यह हमारा बड़ा सौभाग्य होगा। तुम जो कहते हो कि ‘कल से मैं सावधान होऊँगा।’ इस बात का अर्थ तो यह है कि “आज मैं निर्लज्जता करूंगा, दुराग्रह करूंगा, नीचता करूंगा, आज मैं क्रोध के वशीभूत होऊँगा, ईर्ष्या के वशीभूत होऊँगा” देखो एक बार की निर्बलता से तुम कितने पापों को बुला रहे हो। इसलिए किसी काम को कल के लिये उठा रखने के बजाय आज ही पूरा कर डालो। ऐसा करने से तुम्हें शक्ति प्राप्त होगी और कल तुम उस काम को और भी अच्छी तरह कर सकोगे।


प्रकृति की ओर लौटो

(प्रोफेसर वीरनारायण दलेला एम.ए., एम.कौम.)

आज मनुष्य अपने को सभ्य बनने की डींग मारता है। प्रत्येक क्षेत्र में उन्नति करता जा रहा है। अनेकों ऐसी वस्तुओं का निर्माण कर दिया है जिनको कभी किसी ने स्वप्न में भी न सोचा था। जल-थल एवं आकाश पर निर्भयता एवं स्वतंत्रता से विचरण करता है। यही मनुष्य- ईश्वर की अनुपम एवं अति उत्तम कृति- रोगों के चंगुल में इतनी बुरी तरह से जकड़ा हुआ है कि उसकी यह धारणा परिपक्व हो गई है कि “शरीरं व्याधि मंदिरम्”-शरीर व्याधि का घर है अर्थात् जब तक संसार में रहना है, रोग होना आवश्यक है। प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य की ऐसी धारणा रखना गलत भी नहीं क्योंकि वह स्वयं प्रति दिन अपने नेत्रों से देखता है, कि राजकीय चिकित्सालयों में, डाक्टरों एवं वैद्यों की दुकानों पर घंटों दीर्घ पंक्तिबद्ध, बोतलें लिए हुए, मुँह लटकाये हुए, एवं चिकित्सक से अपने रोग की कहानी सुनाने के अवसर की प्रतीक्षा में लोगों की भीड़ लगी हुई है। राजनीति आधुनिक युग में अधिकतर चर्चा का विषय है परंतु रोगों की चर्चा भी वार्तालाप का कम महत्वपूर्ण विषय नहीं है। आज का मानव अपने मासिक आय-व्यय में एक अच्छी खासी धन-राशि का चिकित्सा के लिए प्रावधान करता है क्योंकि रोगों की अनिवार्यता उसके मस्तिष्क में है। इस प्रकार अपने पसीने की महीने भर की कमाई का अधिकतम भाग चिकित्सकों को अर्पण कर देता है, परंतु फिर भी रोगों को विदाई नहीं दे पाता। राज्य की ओर से भी इन रोगों से युद्ध करने के लिए दिन ब दिन अनेकों चिकित्सालय खुलते जा रहे हैं, चिकित्सकों की संख्या में भी वृद्धि होती जा रही है, परंतु फिर भी रोगियों की संख्या में कमी नहीं। ऐसा प्रतीत होता है कि चिकित्सालयों एवं रोगों में संख्या वृद्धि की होड़ सी लगी हुई है। यदि ऐसी ही अवस्था चलती रही तो संख्या-वृद्धि की दौड़ में अवश्य ही विजय मुकुट रोगों के शीश पर सुशोभित होगा।

यह शोचनीय दशा है एक ओर उस ‘ज्ञानवान’ कहे जाने वाले पशु की जो अपने बुद्धि बल पर ईश्वर को भी निवृत्ति देने का प्रयत्न कर रहा है। दूसरी ओर उन विचार शक्ति हीन पशुओं एवं पक्षियों की ओर देखिए, कितने सुँदर एवं स्वस्थ दृष्टिगोचर होते हैं। उनके लिए तो चिकित्सालय भी नहीं औषधियाँ भी नहीं। आवश्यकता भी क्या इनको इन वस्तुओं की? रोग इनसे स्वयं दूर भागते हैं। जब तक ये संसार में साँस लेते हैं, केवल या तो मृत्यु के समय ही रोग से पीड़ित होते हैं या अधिक से अधिक दो-चार बार। जीवन काल में मनुष्य की भाँति आये दिन रोग शैय्या पर लेटे हुए ‘शरीर व्याधि मंदिरम’ का संगीत नहीं अलापते। हाँ जिन पक्षियों एवं पशुओं को मनुष्य ने बंदी बना लिया है, वे ही अब रोग के शिकार होने लगे हैं-फिर भी मनुष्य की अपेक्षा कम ही-एवं उनके लिए औषधालयों का आयोजन होने लगा है। क्या हमने कभी अपनी इस दयनीय दशा पर मनन किया है? क्या हमने कभी इस आश्चर्यजनक शरीर-यंत्र-रचना को समझने के लिए अपने मस्तिष्क पर बल दिया है? कारण स्पष्ट है, हमारे जीवन में कृत्रिम आहार-विहार की प्रधानता है, अतः हमारे जीवन में औषधियों की भरमार है, कुछेक तो औषधियों के बलबूते पर ही जीते हैं।

जब तक हमारे जीवन से इस कृत्रिमता को नष्ट नहीं किया जाता, हम अनेक औषधियों एवं अनेक निजी एवं राजकीय चिकित्सालयों के होते हुए भी अपने को स्वस्थ नहीं रख सकते। अतः यदि हम चाहते हैं, अपने परिश्रम द्वारा अर्जित किये हुए धन को अपने पास रखना, यदि हम चाहते हैं चिकित्सकों की दुकान पर समय नष्ट न करना, तो हमें प्रकृति के संपर्क में आना पड़ेगा, प्राकृतिक आहार-विहार अपनाना पड़ेगा। प्रकृति को अपनी माता समझना पड़ेगा, शत्रु नहीं, प्रकृति की पुकार सुननी पड़ेगी एवं उसको अपना सहायक समझना पड़ेगा।

प्रकृति से संपर्क स्थापित करने से या प्राकृतिक जीवन यापन करने से मेरा अभिप्राय यह नहीं है, जैसा कि कुछेक व्यक्ति अनुमान लगायेंगे, पशुओं की तरह नंगे धड़ंगे इधर उधर घूमना, ज्ञान शून्य हो जाना एवं घासपात फल फूल खाकर जीवन व्यतीत करना। हाँ यदि मनुष्य इस प्रकार का जीवन यापन करते हैं तो रोग तो न आवेंगे, परंतु हम ऐसा नहीं कर सकते। और सभ्य एवं बुद्धिमान होने के नाते हमें ऐसा करना भी न चाहिए। अतः हमें मध्यम मार्ग अपनाना चाहिए। हमें अपने जीवन में संतुलन लाना अनिवार्य है अर्थात्-कृत्रिमता के पीछे अधिक न भागते फिरे, सामाजिक अवस्था का ध्यान रखते हुये अधिक से अधिक प्राकृतिक आहार-विहार अपनावें।

हमारे इस शरीर-यंत्र की रचना पंच तत्वों द्वारा अग्नि, वायु, जल, आकाश एवं पृथ्वी- हुई है। अतः इस शरीर को स्वस्थ रखने के लिए केवल इन पंच तत्वों की ही आवश्यकता है तथा इन्हीं तत्वों द्वारा रोग निवारण हो सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा में इन तत्वों द्वारा ही रोग की चिकित्सा की जाती है। इसी कारण से सदैव ही आशातीत सफलता मिलती है। यदि हम अपने आहार-विहार में किसी प्रकार की कृत्रिमता आने से रोगी हो भी जाते हैं तो हमें चाहिए शीघ्र ही इधर-उधर भटकने के स्थान पर, हम प्राकृतिक साधनों द्वारा स्वास्थ्य लाभ कर लें। प्राकृतिक साधनों द्वारा ही रोग निवारण करना प्राकृतिक चिकित्सा का कार्य है। इस प्रकार की चिकित्सा के अंतर्गत रोगों से बचने के उपायों पर एवं रोग होने पर उनके निवारण पर महत्व दिया जाता है। दोनों प्रकार की अवस्थाएं महत्वपूर्ण हैं परंतु प्रथम अवस्था पर इतना बल दिया जाता है कि द्वितीय अवस्था को प्राप्त होने का दुर्भाग्य ही न प्राप्त हो। क्योंकि जैसी अँग्रेजी में कहावत है-’रोगों की चिकित्सा से रोगों से बचना अच्छा है।’

प्राकृतिक चिकित्सा का भारत जैसे एक निर्धन देश के लिए विशेष महत्व है जहाँ कि प्रति व्यक्ति की औसत वार्षिक आय, बर्मा और पाकिस्तान के अतिरिक्त संसार में सबसे कम है। इस प्रकार की चिकित्सा के मूल्य को विदेशों में आँका गया है और इस दिशा में काफी कार्य भी किया गया है। भारत के लिए यह प्रणाली नवीन नहीं है। प्राचीन काल में हमारे ऋषियों एवं योगियों ने इसकी महत्ता पर उचित प्रकाश डाला है एवं इसी के आश्रय से दीर्घ जीवन लाभ किया है। परंतु समय की गति में हमारी अन्य अमूल्य विचारधाराओं, नीतियों एवं प्रणालियों की भाँति इसे भी भुला दिया गया है। अतः जबकि भारत परतंत्रता की श्रृंखलाओं को तोड़ कर स्वतंत्र हो गया है, जनता का कर्तव्य है कि इस अमूल्य चिकित्सा-प्रणाली का उचित मूल्याँकन करें। राज्य का कर्तव्य है कि इसकी महत्ता को उचित मान्यता दे। राज्य एवं प्राकृतिक चिकित्सक प्रचार द्वारा जनता का ध्यान इसकी ओर आकर्षित करें जिससे देश के निवासी हृष्ट पुष्ट रहना सीखें, क्योंकि हृष्ट पुष्ट व्यक्ति ही देश की सबसे बड़ी सम्पत्ति हैं।


जनसंख्या की समस्या

(श्री सत्यभक्त, पूर्व संपादक ‘चाँद’ व ‘सतयुग‘)

कई वर्ष हुए हमने एक साप्ताहिक पत्र के एक अंक में एक विशेष संपादकीय लेख पढ़ा था, जो एक साधारण स्कूल मास्टर की स्मृति में लिखा गया था। इस मास्टर ने आर्थिक कठिनाइयों से तंग आकर एक-दो वर्ष पूर्व आत्महत्या कर ली थी। यह लेख इसी शोकमय घटना की याद दिलाने के लिए लिखा गया था और उसमें माँग की गयी थी कि सरकार ऐसी घटनाओं को आँखें खोलकर देखे तथा उनके प्रतिकार का उपाय करे। उस मास्टर की दुःखस्था का वर्णन करते हुए बतलाया गया था कि उसे लगभग 60 रुपये मिलते थे और उसके ऊपर अपनी स्त्री, चार बच्चे, पिता और एक विधवा बहिन-इस प्रकार आठ आदमियों के भरण-पोषण का भार था, जिनका निर्वाह युद्धकाल की महंगी के युग में 60 रुपये में होना किसी प्रकार संभव न था। अतः अपने परिवार के कष्टों को न देख सकने के कारण उसने अपने जीवन का अंत कर लिया।

यह निस्संदेह एक दुःखजनक घटना थी और मानवता का तकाजा है कि ऐसी परिस्थितियों का प्रतिकार किया जाय। पर उसी समय मेरे चित्त में एक विचार यह उत्पन्न हुआ कि इस विषय में देश पर शासन करने वाली सरकार ही दोषी है या उस मास्टर का भी कुछ कसूर है? हम अपनी आमदनी या अन्य आर्थिक साधनों पर दृष्टि डाले बिना अगर अपने परिवार की संख्या बढ़ाते जायें तो वर्तमान सरकार अथवा कोई भी अन्य शासन संस्था उसकी व्यवस्था कहाँ तक कर सकती है। जब वह मास्टर साहब 60 रुपये पाते थे और उनके ऊपर पिता तथा बहिन का भार था तो उनको विवाह ही न करना था और विवाह करके भी 4-6 वर्ष में चार बच्चे उत्पन्न कर लेना और भी अदूरदर्शिता की बात थी। इस प्रकार अपनी थोड़ी-सी आमदनी का ज्ञान- रखते हुए भी हम अपने आश्रितों की संख्या निरंतर बढ़ाते जायें तो उसका कुपरिणाम हमारे सिवा और कौन भोग सकता है?

जनसंख्या की समस्या वास्तव में बहुत विचारणीय है। एक साधारण बुद्धिवादी मनुष्य भी समझ सकता है कि पृथ्वी का क्षेत्रफल नपा तुला है और मनुष्यों की संख्या बराबर बढ़ती रहती है। इसके फलस्वरूप अनेक ऐसी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं जिनके कारण मानवीय सभ्यता में बड़े गम्भीर परिवर्तन होने लगते हैं। यह कारण यदि बढ़ते जायें और उनका प्रतिकार न किया जा सके तो सभ्यता का नाश ही कर डालते हैं। यही कारण है कि वर्तमान समय के विचारकों ने ही नहीं वरन् प्राचीन काल के विद्वानों ने भी इस समस्या पर विचार किया था। उदाहरण के लिए यूनानी दार्शनिक अफलातून (प्लेटो) और अरस्तू (आरिस्टोटिल)ने जनसंख्या को एक सीमा के भीतर ही रखने का विधान बनाया है जिससे लोग अधिक शक्तिशाली और सामर्थ्यवान रह सकें। हमारे यहाँ ‘योग वशिष्ठ’ के लेखक ने भी यह विचार प्रकट किया है कि “जब किसी देश की जनसंख्या अत्यधिक बढ़ जाती है तो अकाल, युद्ध, महामारी या किसी दैवी उपद्रव के कारण उसका नाश हो जाता है। “ इस संबंध में आज कल के एक विचारक ने जो दलीलें दी हैं उनका साराँश नीचे दिया जाता है :-

1. मनुष्यों में एक ऐसी स्वाभाविक प्रवृत्ति पाई जाती है जिसे यदि यत्नपूर्वक निवारण न किया जाय, तो उसकी प्रेरणा से उनका ध्यान अवश्य ही विवाह करने और बहुत सी संतानें उत्पन्न करने की तरफ आकर्षित होता है।

2. यह भी सत्य है कि यदि किसी देश में खाने-पीने की कमी न हो तो प्रत्येक दम्पत्ति दो से अधिक बच्चे उत्पन्न करके उनको पाल-पोस सकते हैं।

3. साधारण गणित जानने वाला भी यह समझ सकता है कि यदि मनुष्य इसी नियम पर चलते रहें तो प्रत्येक पीढ़ी पिछली पीढ़ी की अपेक्षा संख्या में अधिक होगी।

4. विज्ञान की चाहे जितनी उन्नति क्यों न हो जाय, जमीन की पैदावार एक नियत सीमा के भीतर ही रहेगी। प्रत्येक पौधे की जड़ और पत्तियों को फैलने के लिए जितना स्थान चाहिए उसमें कभी विशेष अंतर नहीं पड़ सकता।

5. यह भी अनुभव सिद्ध बात है कि जमीन की पैदावार को जब कृत्रिम उपायों से बहुत अधिक बढ़ाने की चेष्टा की जाती है तो शीघ्र ही ऐसा अवसर आता है जब परिश्रम के मुकाबले में पैदावार घटने लगती है। इसका कारण यह होता है कि निरंतर जोती-बोई जाने से जमीन सारहीन होती चली जाती है। प्राचीन काल में अनेक जातियों के देश त्याग करने का यह भी एक कारण होता था। और वर्तमान समय में अपने देश के कारखानों में बने माल को अधिक से अधिक विदेशों में बेचने की प्रतिस्पर्धा (कम्पटीशन) का मूल कारण भी यही है।

इन पाँच स्वयंसिद्ध बातों पर ध्यान देने से यह समझ में आता है कि किसी भी देश के लिए अंत में ऐसा समय आता है कि यदि युद्ध या अन्य दैवी उपद्रवों से वहाँ की जनसंख्या नष्ट न हो जाय तो जमीन की पैदावार मनुष्यों की आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती। तब या तो उनको किसी उपाय से अपनी जनसंख्या की वृद्धि को रोकना पड़ता हैं, या कुछ लोगों को बाहर भेजकर उपनिवेश बसाने पड़ते हैं, अथवा अपने उद्योग धंधों की उन्नति करके उनके द्वारा तैयार किये गये माल को बाहर बेचकर वहाँ से भोजन सामग्री मंगानी पड़ती है। अगर इनमें से किसी उपाय का आश्रय नहीं लिया जा सकता तो वहाँ के निवासी दरिद्र होकर भूखे-नंगे फिरने लगते हैं और मृत्यु- संख्या बहुत अधिक बढ़ जाती है।

ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो जनसंख्या की वृद्धि की इस समस्या को झूँठ-मूँठ का हौआ बतलाते हैं। उनकी एक मुख्य दलील तो यह है कि अभी ऐसे कितने ही देश मौजूद हैं जहाँ करोड़ों आदमियों के रह सकने की गुँजाइश है। मनुष्य कोशिश करे तो बड़े-बड़े रेगिस्तानों, जंगलों और बर्फिस्तानों को रहने योग्य बना सकता है। दूसरी दलील यह दी जाती है कि मनुष्य में परिस्थिति का मुकाबला करने की अद्भुत क्षमता है। जब कभी उसे जीवन निर्वाह के संबंध में किसी कठिनाई का सामना करना पड़ा तो उसने उसको किसी न किसी उपाय से हल कर लिया। उदाहरण के लिए जब मनुष्यों की संख्या बहुत कम थी तो वे जंगल में प्राप्त होने वाले फल, कंद, मूल तथा शिकार आदि से अपना पेट भर लेते थे। पर जब इनसे काम चलना कठिन हो गया हो तो मनुष्यों ने खेती करने का तरीका निकाल लिया जिससे पैदावार बहुत बढ़ गयी। आजकल खेती से भी काम न चलते देखकर मनुष्य समुद्र से खाद्य पदार्थ उत्पन्न करने की चेष्टा करने लगे हैं। वैज्ञानिकों ने हवा में से शक्कर और लकड़ी से आटा बनाने की विधियाँ भी निकाली हैं। इस लिए कुछ लोगों का कहना यही है कि जनसंख्या के बढ़ने की चिंता करना व्यर्थ है। जैसे-जैसे आवश्यकता बढ़ती जायेगी लोग अपनी बुद्धि से उसकी पूर्ति के नये-नये साधन भी निकाल लेंगे जिनकी आज हम कल्पना भी नहीं कर सकते।

इन सब दलीलों में कुछ सच्चाई मान लेने पर भी यह स्पष्ट है कि अगर किसी देश की जनसंख्या वहाँ की भूमि के परिमाण से अधिक बढ़ेगी तो वहाँ के निवासियों का जीवन-स्तर अवश्य गिर जायेगा। हमारी आँखों के सामने भारत, चीन, जापान आदि के उदाहरण मौजूद हैं। जनसंख्या के बहुत अधिक बढ़ जाने से भारत और चीन के निवासियों का रहन-सहन ऐसा गिर गया कि गुठली, छाल, साग-पात आदि खाकर भी गुजर करना यहाँ के लोगों के लिए साधारण बात हो गयी है। जापान ने उद्योग धंधों को बढ़ाकर तथा अपनी आबादी को मंचूरिया, हवाई टापू, अमेरिका आदि में भेजकर इस समस्या को हल करने की कोशिश की, पर इसके फलस्वरूप उसका इंग्लैंड, अमरीका आदि देशों से संघर्ष बढ़ गया और उसे पतन के मार्ग पर जाना पड़ा। इस समय भारतवर्ष की अवस्था इस दृष्टि से बड़ी कठिन है। यहाँ की कृषि योग्य जमीन का परिमाण 4 करोड़ एकड़ माना गया था (जिसमें पाकिस्तान के हिस्से में चले गये प्रदेश भी शामिल थे।) एक मनुष्य के निर्वाह के लिए साधारणतः ढाई या कम से कम दो एकड़ भूमि की पैदावार आवश्यक मानी गई है। इस हिसाब से संपूर्ण देश में 20-25 करोड़ व्यक्ति ही सुखपूर्वक रह सकते हैं, जब कि इस समय इस भूभाग की जनसंख्या दुगुने के लगभग है। यह वास्तव में एक विकट समस्या है जिसको अब देश की सरकार भी अनुभव करने लगी है और जनसंख्या को नियंत्रित करने के उपाय सोचे जा रहे हैं। इस विषय पर हम दूसरे लेख में विचार करेंगे।


संस्कृत भाषा का महत्व

(श्री सुदर्शनदेव “व्याकरणाद्याचार्य “ गुरुकुल झज्जर, रोहतक)

विश्व में विद्यमान समस्त भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा है। जो मधुर, सब प्रकार के दोषों से रहित, अति ललित, पवित्र तथा वैज्ञानिक भाषा है। वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत आदि सभी भारतीय संस्कृति के ग्रंथ संस्कृत भाषा में लिखे गये हैं, जो कि मानव जीवन के चरम लक्ष्य (मोक्ष प्राप्ति) के साधक हैं। अतः जिस मनुष्य ने संस्कृत भाषा का अध्ययन नहीं किया अथवा यूँ कहिए कि जिसने भारतीय संस्कृति के मूलभूत वेदादि सत्य शास्त्रों के अध्ययन का सौभाग्य प्राप्त नहीं किया, वह भारतीय, भारतीय कहलाने का पूर्ण अधिकारी नहीं है। प्रत्येक भारतीय को अपनी भारती-संस्कृत भाषा का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।

कुछ एक पाश्चात्य सभ्यता के रंग में रंगे हुए महानुभावों का विचार है कि संस्कृत भाषा एक मृत भाषा है। मृत वस्तु को गले लगाना व्यर्थ भार वहन करना है। उसका तो अपने से पृथक करण ही श्रेयस्कर है। भला उन भोले जनों से पूछना चाहिए कि जन्म से लेकर मरण पर्यन्त संस्कार आदि सभी धार्मिक कृत्य जिस संस्कृत भाषा में ही प्राचीन काल से आज तक होते चले आ रहे हैं, और जो भाषा आज भी लगभग 36 करोड़ (360000000) मनुष्यों के जीवन में ओत-प्रोत हो, और करोड़ों मनुष्य प्रातः सायं दोनों समय अपने इष्ट देवों को जिस भाषा में हृदय से आराधना करते हों, जिसका साहित्य भी अन्य सभ्य मानी जाने वाली भाषाओं से किसी भी दृष्टि से कम न हो, और जो भाषा कभी अपने काल में राष्ट्र भाषा रह चुकी हो भला वह भाषा किस प्रकार मृत भाषा कहला सकती है।

आजकल जन साधारण की यह भी एक मिथ्या धारणा बन हुई है कि संस्कृत भाषा एक अति कठिन भाषा है। बिना रटे उसका ज्ञान प्राप्त करना सर्वथा असंभव है, किंतु यह धारणा सर्वथा मिथ्या है। संसार में कोई भी ऐसी भाषा नहीं जिस भाषा के अध्ययन में सामान्यतः रटने का कार्य विद्यार्थी को न करना पड़ता हो। आजकल संस्कृताध्ययन की कई पद्धतियाँ हमें दृष्टिगोचर होती हैं। किसी पद्धति में “रट्ट प्रधानम् खलु योग्यतायाः” को ही सर्वोच्च स्थान दिया जाता है, जो सर्वथा अवाँछनीय है।

हमारी सरकार का भी ध्यान इस संस्कृताध्ययन अध्यापन की सुँदर पद्धति की ओर नहीं है, और न वह संस्कृत-अध्ययन को विशेष प्रोत्साहन ही दे रही है, जबकि अन्य विदेशी लोग संस्कृत भाषा को सब भाषाओं की जननी मानते हुए बड़ी रुचि के साथ इसका अध्ययन कर रहे हैं। कुछ समय पूर्व श्री डॉ. लूई रेणु महोदय रूस से भारत पधारे तब उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था कि “मुझे केवल एक ही दुख है कि हम जिस संस्कृत भाषा को अति रुचि से पढ़ते हैं और जिस भाषा को अमर समझते हैं उस भारती (संस्कृत भाषा) को भारतीय मृत भाषा नाम से पुकारते हैं। और भारतीयों के लिए यह भी दुर्भाग्य की बात है कि उनके शिक्षा मंत्री महोदय संस्कृत भाषा से अनभिज्ञ हैं।”

इसी प्रकार अमेरिका भी संस्कृत भाषा पर लट्ट है। अमेरिका के “अमेरिका काँग्रेस पुस्तकालय” में 67 सौ (छह हजार सात सौ) संस्कृत भाषा के हस्त लिखित ग्रंथ आज भी भारत के गौरव का गुणगान कर रहे हैं, और सारे जगत में प्रकाशित होने वाले संस्कृत साहित्य का सूचीपत्र भी आप वहाँ से प्राप्त कर सकते हैं। अभी कोई लगभग तीस वर्ष की बात है कि उत्तरी अमेरिका के दक्षिणी भाग में अन्वेषण किया गया। वहाँ एक मनुष्य जाति मिली जो अपनी ही भाषा में बोलती थी। उनकी उस भाषा का नाम भाषा शास्त्रियों ने ‘ब्रोकिन संस्कृत’ (टूटी-फूटी संस्कृत) रखा। यह घटना भी संस्कृत के महत्व का सिर ऊँचा करती है। केवल इतना ही नहीं अपितु रूस तथा अमेरिका के अतिरिक्त जर्मनी, अफगानिस्तान, थाईलैण्ड, सीलोन, हालैण्ड, मिस्र, इटली, इंग्लैंड, चीन आदि देशों में भी संस्कृत का महत्व कोई कम नहीं है।

संस्कृत भाषा एक विश्वव्यापी भाषा है, पुनरपि भारत सरकार इस ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दे रही, सरकार की ओर से संस्कृत भाषा को अधिक से अधिक प्रोत्साहन मिलना चाहिए। विद्यालयों में भी अनिवार्य रूप से अध्ययन-अध्यापन होना चाहिए। प्रत्येक भारतीय को भी अपनी भारती (संस्कृत भाषा) का अध्ययन अवश्य करना चाहिए और यत्न करना चाहिए कि निकट भविष्य में ही संस्कृत भाषा राष्ट्र भाषा बने तभी हम भारत के भाषा संबंधी प्रान्तीयता आदि के कलह को दूर भगा सकते हैं और तभी हम संसार में सच्ची विश्वशाँति की स्थापना कर सकते हैं।


युग परिवर्तन में नारी का सहयोग

(श्री सविता एम.ए. पिलानी, राजस्थान)

आज नवनिर्माण का युग है और इस नव निर्माण में नारी का सहयोग वाँछनीय है अथवा यों कहें कि आने वाले युग का नेतृत्व नारी करेंगी तो भी अतिशयोक्ति न होगी। नवनिर्माण एवं युग परिवर्तन कहाँ से और कैसे आरंभ होगा व नारी का उसमें क्या योग रहेगा-इस विषय का अध्ययन करने से पूर्व जरा प्रस्तुत विश्व स्थिति पर दृष्टिपात किया जाय। संक्षेप में आज का मानव जीवन जिन भीषण परिस्थितियों से गुजर रहा है उसका अनुमान लगाना भी भयंकर है। आज का वैयक्तिक जीवन, पारिवारिक जीवन, सामाजिक जीवन, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय जीवन इतना अशाँतिमय एवं अभावग्रस्त हो गया है कि मनुष्य को पलभर को चैन नहीं। तृतीय विश्वयुद्ध के कगार पर खड़ी मानवता विज्ञान को कोस रही है और सुरक्षा एवं शाँति के लिए त्राहि-त्राहि कर रही है। भौतिकवाद के नाद में एक देश दूसरे देश को, एक जाति दूसरी जाति को, एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को हड़पने की ताक में बैठा है, युद्धीय अस्त्र शास्त्रों की होड़ ने, तथा विषैले बमों ने विश्व शाँति को खतरे में डाल रखा है। जीवन में जो अनास्था आ गई है उसका कोई अंत नहीं। जीवन के हर क्षेत्र में हम पिछड़ गये हैं और अधःपतन की ओर जा रहे हैं। सामाजिक विश्रृंखलता, नैतिक पतन, राजनैतिक विप्लव, धार्मिक अंधानुकरण व अधार्मिकता, नैष्ठिक पतन आज के जीवन में धुन की भाँति लग गये हैं।

ऐसी पृष्ठभूमि में आज विश्व की माँग है और वह माँग भारत पूरी कर सकता है। वह माँग है, शाँति की, प्रेम की, सुरक्षा की तथा संगठन की। आज के युग की सबसे बड़ी माँग है नवनिर्माण की, प्रस्तुत परिस्थितियों में आमूल परिवर्तन एवं क्राँति की। आज हम युग परिवर्तन के प्रहरी बनकर विश्व को शाँति का दीप दिखायेंगे, फिर से हमें अपने भारतीय ऋषि, मुनियों की परंपरा को जीवित करना होगा, फिर से धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, नैतिक एवं नैष्ठिक पुनरुत्थान की भावना को जन-जन में भर देना होगा। आज हमें भारतीय होने के नाते प्रत्येक नर−नारी को देश के नवनिर्माण में प्राणपण से जुट जाना होगा। इस युग परिवर्तनकारी आँदोलन में और जागरण की स्वर्णिम बेला में भारतीय नारी का प्रथम उत्तरदायित्व है कि वह इस दिशा में कदम उठाये। आज की नारी सजग है, वह स्वतंत्रता, धार्मिकता एवं मर्यादा की प्रहरी है। नारी के प्रति जो अत्याचार आज तक किया गया उसके लिए पुरुष समाज को प्रायश्चित करना होगा, अब कन्याओं को मूक पशु की भाँति बेचा न जा सकेगा। जरा कल्पना करिये उस वैदिक काल की जब घोषा, अपाला, गार्गी, मैत्रेयी जैसी महान रमणियाँ हुईं अनेक वेदमंत्रों का निर्माण करने वाली ऋषिकाएं हुईं, जहाँ देश पर और आन पर प्राण न्यौछावर करने वाली रणदेवियाँ हुईं। आज उन्हीं की जन्मभूमि पर नारी पर किया जाने वाला अत्याचार क्यों? आज के युग में भारतीय नारी की शिक्षा का औसत सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं और आश्चर्य होता है क्या यही उन ब्रह्मवादिनियों की भूमि है? जो-जो अत्याचार आजतक नारी पर अबला समझ कर किये गये, चाहे उससे अंतरिक्ष फट पड़ा हो परंतु पुरुष का हृदय न पसीजा।

किंतु इन सबके कहने के साथ हमारा तात्पर्य है कि अब वह स्थिति नहीं है, आज भारतीय नारी हर क्षेत्र में कार्य कर रही है, वह युग का निर्माण करने के लिए सन्नद्ध है। युग करवट ले रहा है-परिस्थितियों का घटना क्रम तीव्र गति से घूम रहा है-मानवता के अर्ध भाग को छोड़कर कोई देश व समाज उन्नति नहीं कर सकता। अपने कर्तव्यों एवं अधिकारों के पोषण के लिए भारतीय नारी कटिबद्ध होकर कार्य क्षेत्र में उतर रही है। नारी की शिक्षा का प्रतिशत बढ़ाने के साथ-साथ उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को ढालना होगा, दासता की श्रृंखलाओं से मुक्त करना होगा और पुरुष समाज को समझना होगा कि नारी उपभोग एवं वासना की वस्तु नहीं, एक जीती जागती आत्मा है, उसमें भी प्राण है, मान है और है स्वाभिमान की भावना। मनु ने नारा लगाया था ‘यत्र नार्यस्तु, पूज्यंते रमंते तत्र देवता’- और यही कारण था कि जब से नारी की प्रतारणा व अवहेलना आरंभ हुई भारत का भाग्य डोल उठा। नारी आज हर कदम पर नई प्रेरणा देगी, उसकी अगम शक्ति को फिर से प्रतिस्थापित करना होगा। वह ममतामयी माँ है, स्नेहमयी भगिनी है, पतिपरायणा पत्नी है किंतु दूसरी ओर वह चंडी है, दुर्गा है, काली है। नारी ही वीर पुत्रों को जन्म देती है। ध्रुव, प्रह्लाद, अभिमन्यु, शिवाजी, राणाप्रताप को जन्म देने वाली माताएं भारत में ही हुईं। रणचंडी दुर्गा की भाँति मर्यादा और मान के लिए जूझने वाली क्षत्राणियाँ और वीर झाँसी की रानी यहीं हुई- किंतु हम भूल गये उन सतियों के तेज को, उन वीर प्रसविनी जनानियों को, उन कुल ललनाओं को और नारी का तेज आभूषणों की चमक व रेशमी परिधानों में धूमिल पड़ गया। इस चतुर्मुखी निर्माण की बेला में नारी की प्रेरणा लेनी होगी, उसमें फिर से आत्मबल लाना होगा। जो आज की शिक्षित नारियाँ हैं वे आर्थिक स्वतंत्रता एवं पाश्चात्य सभ्यता को अपना कर अपने भारतीय गौरव को कलुषित न करें, वरना वे घर-घर जाकर नारी समाज को उसकी गुप्त शक्तियों का ज्ञान करावें। देश में कन्याओं की शिक्षा पर लड़कों की शिक्षा से अधिक बल दिया जाय। ये भावावेश की बात नहीं, यह एक स्वयंसिद्ध सत्य है, नारियाँ शिक्षित होंगी तो पुरुष समाज तो स्वतः सुधर जायेगा, माताओं और पत्नियों के संस्कार से पुरुष समाज अपने आप सुसंस्कृत होगा। देश की मान-मर्यादा की रक्षा करने वाली नारी जब नवविहान का स्वर गुँजा देगी तो कोई संदेह नहीं हमारे देश में आज फिर हरिश्चंद्र, प्रताप, राम, भीम और अर्जुन पैदा होंगे।

आइये, आज संपूर्ण नारी जाति से प्रार्थना है कि वह घिनौने वातावरण को छोड़कर, परवशता की ग्रंथियाँ काटकर आगे बढ़े और समाज सुधार का, नैतिक उत्थान का, धार्मिक पुनर्जागरण का, संदेश मानवता को दे। पुरुषों से कंधा मिलाकर घर और बाहर दोनों क्षेत्रों में नारी को कार्य करना होगा। आज भारत की माँग है-अध्यात्म एवं वैदिक धर्म का पुनरुत्थान और भारतीय धर्म एवं संस्कृत का पुनर्स्थापन। जब घर-घर में पुनः वेदों की वाणी गूँज उठेगी तब भारत फिर से अपने प्राचीन जगद्गुरु के गौरव को प्राप्त करेगा। हर क्षेत्र में, सामाजिक, आर्थिक , धार्मिक, राजनैतिक, नैतिक, शैक्षणिक एवं नैष्ठिक पुनर्संगठन करते हुए आज की शिक्षित नारी जिस पथ का निर्माण करेगी वह पथ बड़ा सुगम एवं आध्यात्मिक होगा। फिर से भारत में ऋषियों की परंपरा जागृत होगी, फिर से नारी की मातृशक्ति रूप में पूजा होगी, और हम संपूर्ण विश्व को एक मौलिक प्रकाश एवं नवीन संदेश देंगे। नारी ही घर-घर में ऐसा वातावरण उत्पन्न कर सकती है जो भारतीय संस्कृति पर आधारित हो। वह आज सबला बन कर चेतना, प्रेरणा, मुक्ति एवं आध्यात्मिकता की साकार मूर्ति के रूप में अवतरित हो रही है। नारी का सहयोग, परिवार में, समाज में आरंभ होगा- एक ऐसा वातावरण बना देना होगा जहाँ फिर से दधीचि, कर्ण और राम पैदा होंगे। नारी की सबल प्रेरणा पुरुष को नवशक्ति से भर देगी किंतु इसके लिए आवश्यक है कि उसे आत्मबल, चरित्र-बल, तप बल में महान बनाया होगा।

नारी विश्व की चेतना है, माया है, ममता है, मोह और मुक्ति है-किंतु समय-समय पर उसकी अवतारणा भिन्न-भिन्न रूपों में होती है। आज हमें उन क्षत्राणियों की आवश्यकता है जो समय पड़ने पर समराँगण में उतर पड़ें, साथ ही यह न भूलना चाहिए कि उसे पारिवारिक इकाई से विस्तृत क्षेत्र की ओर बढ़ना है। गहनों से लदी रहने वाली भोग-विलासिनियों की आवश्यकता नहीं, आज तो ऐसी कर्मठ महिलाओं की आवश्यकता है जो पुरुष-समाज एवं जाति तथा संपूर्ण देश को भारत की संस्कृति का पावन संदेश देकर देश में, घर-घर में फिर से प्रेम, त्याग, बलिदान, पवित्रता एवं माधुर्य का संदेश दें। अफलातून नामक यूनानी दार्शनिक ने कहा था, नारी स्वर्ग और नरक दोनों का द्वार है- बस आज फिर से नारी जाति कटिबद्ध हो जाये और अपने बल से पृथ्वी पर ही स्वर्ग की अवतारणा करे। टामस एक्वीनास नामक योरोपीय दार्शनिक ने कहा था कि विधाता ने अपना सारा कोमलत्व नारी हृदय को दे दिया, काश पुरुष उस माता के हृदय को समझ पाता। बार-बार नारी को यह बोध कराना होगा कि वह अमित शक्ति का भंडार है, प्यार एवं प्रेरणा का स्रोत है-आवश्यकता है कि वह सद्प्रयत्न में अपनी शक्ति लगाये और उसकी प्यार भरी स्वर्गीय आत्मा का मूल्याँकन किया जाय। पुरुष को उद्बोधन का स्वर सुनाने वाली, कर्तव्य बोध कराने वाली नारी से आज माँग की जाती है कि वह युग परिवर्तन के इस संक्राँतिकाल में अपना उत्तरदायित्व निभावे और संगठित होकर पुनः भारत की सतियों का गौरव प्राप्त करे।


परिव्राजक चाहिए! परिव्राजक चाहिए!!

(श्री विनोबा भावे)

इन सौ वर्षों के अंदर हिंदुस्तान में विश्व विद्यालय बढ़े हैं। लोग समझते हैं हिंदुस्तान में तब से कुछ न कुछ ज्ञान का प्रचार चला। यह बात ठीक है कि हिंदुस्तान के कुछ लोगों को ऊँची तालीम मिली और विश्वविद्यालयों के जरिये दुनिया का कुछ ज्ञान हिंदुस्तान में बढ़ा। परंतु अपनी बहुत बड़ी चीज हमने उनके साथ खोयी। हमारे यहाँ केन्द्रित विश्वविद्यालय नहीं थे, परंतु चलते फिरते विश्वविद्यालय बहुत थे।

वैसे प्राचीनकाल में कुछ केन्द्रित विश्वविद्यालय थे, परंतु देश में ज्ञान-प्रचार का आधार उन विश्वविद्यालयों पर नहीं था, बल्कि ज्ञान-प्रचार का आधार परिव्राजक वर्ग पर था। परिव्राजक- संस्था हिंदुस्तान की बहुत बड़ी संस्था है। शंकराचार्य, रामानुज, बुद्ध, महावीर आदि महापुरुषों ने जो भी ज्ञान प्रचार किया वह परिव्राजक वर्ग खड़ा करके किया, नागरिकों को ज्ञान देने के लिए विद्यालय काम में आते हैं। परंतु कुल देश के कोने-कोने में घर-घर में ज्ञान देने के लिए घूमते परिव्राजकों की जरूरत रहती है। इस भूदान और ग्रामदान आँदोलन में इस कमी का बहुत अनुभव होता है। जो भी थोड़ा प्रचार हुआ है, वह घूमने वालों के जरिये हुआ है।

देश के विभिन्न प्राँतों में कुछ लोग बेशक घूमते हैं, परंतु आवेश में घूमते हैं। वे सतत घूमने वाले नहीं है। इनमें उन लोगों का दोष नहीं। कुछ लोग ऐसे हों जो गृहस्थ धर्म में रहकर समाज के लिए थोड़ा समय दें। परंतु सतत ज्ञान पहुँचाने का काम थोड़े से घूमने वालों से नहीं होगा। वास्तव में वे परिव्राजक नहीं है, प्रचारक हैं। प्रचारक का काम क्षणिक होता है और आवेश भी क्षणिक होता है। लेकिन परिव्राजक ज्ञाननिष्ठ, क्राँतिनिष्ठ, लोकनिष्ठ होते हैं। वे गिनते नहीं कि हम कितने दिन घूमे और घूमने के कितने दिन बाकी रहे। बल्कि लोगों में जाकर ज्ञान पहुँचाना ही उनका जीवन-धर्म रहता है।

भूदान का बुनियादी आँदोलन हिंदुस्तान में चल रहा है। इसके पीछे सर्वोदय का गहन तत्वज्ञान है। यह विचार पहुँचाने वाले निरंतर घूमने वाले ज्ञाननिष्ठ परिव्राजक चाहिएं। इस तरह के परिव्राजक तैयार होंगे, इसमें हमें संशय नहीं है। यह गहरा काम है, इसलिए थोड़े दिन की बातें नहीं करनी हैं। इसका एक हिस्सा पूरा होगा तो दूसरा हिस्सा आरंभ होगा। यह एक हिस्सा है। फिर शाखाएं फूटती हैं, फिर फूल, फिर फल। इस तरह यह बढ़ता चला जायेगा। परिपक्व फल होगा, तभी कार्य पूरा होगा। किसान विश्राँति नहीं लेगा, जब तक वृक्ष पूरा रूप नहीं लेगा। इसलिए हमारी नजर परिव्राजकों की तरफ ज्यादा रहती है। इस देश में 3 सौ जिले हैं और 36 करोड़ लोग हैं। तो 3000 भी परिव्राजक तीन सौ जिले के नहीं। यह क्या भारी माँग है? परंतु आज लोग भोगपरायण हैं। संसार में बहुत सुख है ऐसा नहीं, फिर भी सुखासक्ति है। इस वास्ते वैराग्यशील, क्राँतिनिष्ठ लोग कम हैं। हम तो काम करते चले जा रहे हैं। परंतु हमारा ध्यान उतना विचार-प्रचार की तरफ नहीं, जितना परिव्राजक निर्मित पर है।

लोक जीवन पर तरह-तरह की चीजों का आक्रमण हो रहा है। बीड़ी कितनी बढ़ी है, शौकीनी कितनी करते हैं। पचास साल पहले उतनी नहीं थी। आज जितने देर से लोग उठते हैं, उतने देर से 50 साल पहले नहीं उठते थे। आज जितने तादाद रात में सिनेमा के कारण लोग लोग जागते हैं, उतने पहले नहीं जागते थे। सारा जीवन अस्त-व्यस्त हो रहा है। लोग देर से सोते हैं और देर से उठते हैं, जिससे राष्ट्र दुर्बल बनता है। यह नहीं होता तो बुद्धि पराक्रमी होती। चाय का रिवाज कितनी तादाद में बढ़ गया है। आजकल लोग सिर के बाल रखते हैं। पेट में जितना तेल नहीं जाता होगा, उससे ज्यादा सिर पर डालते हैं। वह भी बाजार का खरीदा हुआ गंदा तेल। परिणाम स्वरूप जवानी में ही बाल पक जाते हैं।

कुछ अच्छी चीजें भी हैं। उसका हम नाम नहीं लेते। परंतु देश के जीवन में कितना परिवर्तन हो रहा है, यह हम बता रहे हैं। जिसमें धर्म संस्था का, व्यक्ति का कोई असर नहीं। भक्ति मंदिर के इर्द-गिर्द है, लोगों के अंदर नहीं। इसी भक्ति के लिए आचार्य देश भर घूमते थे। आज कोई घूमता नहीं। धर्म का लोकजीवन पर असर ही नहीं रहा। बिल्कुल चेतनहीन धर्म बन गया है।

50 साल पहले जितनी समय परायणता थी उतनी आज नहीं है। परंतु दस गुनी घड़ियाँ बढ़ी हैं। अपनी घड़ी देख-देखकर लोग अपना समय आलस में बिताते हैं।

इससे ज्यादा कौन सा अन्याय हो सकता? परन्तु यह बाते लोगों को समझाना चाहिए।

इसलिए परिव्राजक वर्ग चाहिए। जिसमें ज्ञान निष्ठ के साथ-साथ श्रमनिष्ठ भी हो। गाँव-गाँव जायें, लोगों के साथ श्रम भी करें और ज्ञान दें। उत्साही लोग निकल पड़ेंगे तो ग्रामदान क्या है। मालकियत मिटाना क्या है, यह लोगों को समझाने में देर नहीं लगेगी।

सुखप्रिय लोगों से जन प्रचार नहीं होगा। जनता पहचानती है, कौन पोल है और कौन ठोस है। अगर जमीन पर गेंद पटकते हैं तो उसको जमीन फेंक देती है ऊपर, क्योंकि जमीन जानती है कि वह पोल है। लेकिन कुदाल से जमीन पर प्रहार करें तो जमीन उस को अंदर लेती है, फेंकती नहीं। इसी तरह गेंद जैसे कार्यकर्ता हों तो जनता उनको फेंक देगी। क्योंकि वह पोल है न। लोग पूछेंगे जमीन की मालकी हम को मिटाने के लिए कहता है और स्वयं मालकियत रखता है।

आज सही विचार मनुष्यों के पास पहुँचाने के लिए सही मनुष्यों की जरूरत है। यह क्राँति कार्य है। यह समझ लीजिए हम क्राँति के नजदीक आये हैं। ठोस विचार के परिव्राजकों की जरूरत है।


पाप की कमाई से सच्चा सुख नहीं मिलता

(श्री अशर्फीलाल जी वकील, बिजनौर)

पाप से कमाये हुए धन की सभी ने निंदा की है। पाप की कमाई से पले हुए मनुष्य कभी धर्मात्मा नहीं हो सकते। यह सच है कि साधारण संसारी मनुष्य शुद्ध और अशुद्ध कमाई का भेद नहीं जान पाते, परंतु शुद्ध अंतःकरण के महापुरुषों से कुछ छिपा नहीं रहता। बहुत स्पष्ट घटनाओं के दोषों का अनुमान तो साधारण लोग भी कर लेते हैं, पर स्वभाव पड़ जाने से उस ओर ध्यान नहीं देते। कुछ भी हो यह निस्संदेह है कि पाप से कमाया हुआ धन कितना भी हो उससे शाँति अथवा चैन नसीब नहीं हो सकता। इस संबंध में एक दृष्टता नीचे दिया जाता है :-

पंजाब के एक गाँव में एक महात्मा किसी किसान के घर ठहरे थे। दिन भर तो वे पास ही बहने वाली एक नदी के किनारे भजन करते रहते और शाम को आकर किसान की झोंपड़ी में विश्राम करते। उसी किसान के यहाँ भिक्षा करके वे दो रोटी खा लिया करते थे।

एक दिन ग्राम के जमींदार के यहाँ, जो जाति का वैश्य था और बड़ा मालदार था, लड़के का विवाह था। उसकी दावत में बस्ती के समस्त नर-नारी न्यौते गये। उस किसान को भी उस दिन वहीं खाना था। शाम को जब उस किसान की स्त्री महात्माजी के लिए रोटी बना रही थी, वैश्य का लड़का खाने के लिए बुलाने आया। स्त्री को रोटी बनाते देख उसे कुछ आश्चर्य हुआ और पूछा कि- “आज रोटी क्यों बना रही हो?” स्त्री ने कहा कि मैं महात्माजी के लिए दो रोटी बना दूँ उसके बाद तुरंत तुम्हारे यहाँ आती हूँ। इस पर वैश्य पुत्र ने बड़े घमण्ड से कहा-”सारा गाँव तो आज पूरी, कचौड़ी, मिठाइयाँ उड़ायेगा, महात्मा जी आज भी सूखी रोटी ही खायेंगे। महात्मा जी को भी ज्यौनार में ले चलो।” महात्मा जी, जो पास ही बैठे सब सुन रहे थे, बोले-”भैया, हमें तो रोटी ही अच्छी लगती है, पूरी-कचौड़ी तुम्हीं लोग खाना।” इस पर वैश्य पुत्र ने और भी गरुर के शब्दों में कहा-”महात्मा जी, आपके भाग्य में सूखी रोटी ही दीखती है, जो ज्यौनार होते हुए भी इनकार करते हो-चलो आज तो तर माल खाकर आनंद ले लो। “ महात्मा मन ही मन उसकी छोटी बुद्धि पर हँस रहे थे, बोले-”तुम चलो, हम कुछ देर में पहुँच जायेंगे।”

महात्मा वैश्य के मकान पर ज्यौनार में गये। तरह-तरह के भोजन और मिठाइयाँ पत्तलों पर सबके सामने परोसे गये। महात्मा जी के सामने भी एक पत्तल रखी गयी। जब भोजन शुरू हुआ तो महात्मा जी ने अपने पास से दो रोटियाँ निकाल कर खाना आरंभ किया। यह देखकर उस वैश्य को बड़ा बुरा लगा और कहने लगा-”महात्मा तुम्हारे भाग्य तो फूटे हुए ही हैं, तभी तो ऐसे बढ़िया खानों को छोड़कर सूखी रोटी खा रहे हो।” महात्मा ने फिर कहा कि-”भैया हमारे लिए तो इन भोजनों से सूखी रोटी ही अच्छी जान पड़ती है।” वैश्य पुत्र ने तिनक कर कहा-”महाराज, इन रोटियों में क्या विशेषता है, जरा हमें भी बतलाइये।” इस पर महात्मा ने पत्तल पर से एक कचौड़ी उठाई और उसे मुट्ठी में दबाया तो खून कीं बूंदें टपकने लगीं। फिर उन्होंने अपनी रोटी का टुकड़ा दबाया तो उसमें से दूध की धार निकली। महात्मा जी ने कहा-”इस वैश्य का धन लोगों का खून चूस-चूस कर इकट्ठा किया गया है और यह रोटी ईमानदारी की कमाई का फल है। इसी से दोनों में इतना अंतर दिखलाई पड़ रहा है।” इस घटना का सब उपस्थित लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उस वैश्य ने आगे के लिए किसी को न सताने का प्रण कर लिया।

पाप की कमाई घर में आती हुई तो मालूम होती है, पर जाने के लिए भी उसके हजारों पैर लग जाते हैं। उसको उपभोग करने वाले इतने ऐयाश और फिजूलखर्च बन जाते हैं कि उनकी जरूरतें कभी पूरी ही नहीं होतीं। आप कमाते-कमाते थक जाते हैं, पर संतान खर्च करते-करते नहीं थकती। उनको सदा अपनी इच्छा के प्रतिकूल ही खर्च करना पड़ता है, इसलिए वे कभी प्रसन्नता का मुँह नहीं देखते। नेक कमाई में ये दोष नहीं होते, जिससे उसका उपभोग करने से लोक और परलोक दोनों बनते हैं।

खरी चीज में खोटी चीज मिलाकर बेचना, कम तोलना, रिश्वत लेना, किसी का हक मारना, कम काम करके अधिक दाम लेना, नौकरी में पूरी मेहनत से काम न करना, चोरी करना, लोभ से अन्यायी का साथ देना, आतताइयों की सहायता करना, छल, कपट और रागद्वेष का व्यवहार करना आदि पाप कर्म है। जीवन को सुखमय बनाने के लिए इन सब से बचकर रहना अत्यावश्यक है। पाप-कर्म से जो अधिक धन आता है, वह सब की बुद्धि हर लेता है, फल स्वरूप वे पाप कर्म करने लग जाते हैं।

जो पाप कर्म नहीं करते वे ऐसे लोगों को देख कर कभी-कभी यह ख्याल करते हैं कि हम तो घाटे में रह गये, जो कुछ न कमा सके। पाप-कर्म वालों की मोटरें दौड़ रही हैं, और हमको साधारण भोजन मिलना भी कठिन है। अनेक समय ऐसे विचारों के प्रभाव से सज्जन पुरुष भी पाप-कर्मों में लग जाते हैं और पहले से भी ज्यादा मुसीबतों में फँस जाते हैं। पर उनको सोचना चाहिए कि क्या सभी रिश्वत लेने वालों को मोटरें और आराम की सामग्री प्राप्त है? क्या पाप की कमाई न करने वाले सभी तंग हैं, या उनमें से किसी के पास मोटर आदि नहीं हैं?

अगर हम इस विषय में भली प्रकार विचार कर के देखें तो यही जान पड़ेगा कि सभी पाप की कमाई करने वाले आराम से नहीं रहते। किसी-किसी को तो उनमें से भी रोटी नसीब नहीं होती और सारी उमर तंगी में गुजरती है। उन लोगों की बाहरी टीमटाम इतनी बढ़ जाती है कि पास में कुछ भी नहीं बचता। जब कोई शादी-ब्याह का खर्च आ पड़ता है तो ऐसे लोगों को कर्ज लेकर ही काम चलाना पड़ता है। और कर्ज भी थोड़ा नहीं , क्योंकि अपनी झूठी शान को बनाये रखने के लिए उनको हजारों रुपये चाहिएं। इस तरह कर्जदार हो जाने से सारी उम्र परेशानी में ही गुजरती है। इसके विपरीत पाप की कमाई से बचने वाले बहुसंख्यक लोग अच्छी हालत में मिलेंगे। इस प्रकार विचार करने से यही नतीजा निकलता है कि न तो पाप से अधिक कमाई करने वाले सब सुखी हैं, और न नेक कमाई पर संतोष करने वाले सब दुखी ही हैं। सुखी और दुखी दीखने वाले दोनों में एक बराबर हैं। पर आत्मसुख जिसे शाँति कहते हैं पाप की कमाई करने वालों में किसी को नसीब नहीं है यह बात डंके की चोट पर कही जा सकती है। आज पाप की कमाई करने वाले किसी बड़े से बड़े व्यक्ति को ले लीजिए और उसे एक मनोविज्ञान के विशेषज्ञ के हवाले कर दीजिए तो पता चलेगा कि उसके मन में इस कदर बेचैनी है कि उतनी बेचैनी एक बड़े मुजरिम के मन में भी न होगी। सब कुछ पास होते हुए भी उसे सुख और शाँति दुर्लभ होगी। फिर ऐसी अधिक कमाई से क्या लाभ हुआ?

आदमी जो कुछ भी कमाता है वह बहुतों के भाग्य का होता है। उसका अपना भाग्य तो उसमें उतना ही है, जितना वह खा, पहिन लेता है। शेष तो जिन-जिन का है उनके पास पहुँच जाता है। कमाने वाले की पोजीशन एक कारिंदा से अधिक नहीं है। जैसे कारिंदा गाँव के किसानों से लगान वसूल करके लाता है और मालिकों को दे देता है, और खुद अपनी गुजर लायक वेतन मालिकों से पाता है। वैसे ही कमाने वाला दूसरों के भाग्य का रुपया लाता है और समझता है कि मैं मालदार बन गया। कितनी बड़ी भूल है! दूसरों की अमानत पर इतना गर्व!! जब सब अपना-अपना भाग ले लेते हैं तो स्वयं खाली रह जाते हैं, और फिर कमाई की धुन सवार होती है। इसी कमाने और बाँटने में उम्र समाप्त हो जाती है और हाथ पल्ले कुछ नहीं पड़ता। जीवन में जो धन बाँटने से बच रहता है उसे वैसे ही पछताते हुए छोड़ कर जाना पड़ता है, जिससे मरते समय भी बड़ा कष्ट उठाना पड़ता है। जोड़े हुए धन को तो वे लोग, जिनका वह भाग्य है आपस में बाँट ही लेंगे, परंतु जिसने कमाने में पाप इकट्ठे किये उसे क्या लाभ हुआ? इसका जवाब देने में उसे हिचकियाँ आने लगेंगी और थोड़ी ही देर में प्राण पखेरू अपने कर्मों का बुरा परिणाम भोगने नर्क की ओर चल देगा।

डाका, चोरी, वकालत, डाक्टरी, अदालत, पुलिस आदि ऐसे ही पेशे हैं जिनमें लेने वाला प्रायः देने वाले की मर्जी के खिलाफ धन लेता है। क्या इनको कोई प्रसन्नतापूर्वक देता है? नहीं इनको सब कोई जबर्दस्ती या मजबूरी से ही देते हैं। ऐसे पाप की कमाई चली भी योंही जाती है। अपनी जिंदगी में ही बहुत दुःख उसे देखने को मिल जाते हैं, अगले जनम में जो बदला मिलेगा उसकी तो कल्पना करना भी दुखदाई है। इसलिए प्रत्येक समझदार आदमी को पाप की कमाई से बचकर धर्म की कमाई पर संतोष करना उचित है।


भय और व्यक्तित्व का विकास

(श्री रघुनंदन प्रसाद जी, एम., एल.एल.बी.)

मनुष्य के जीवन में भय की मनोवृत्ति भी बहुत बड़ा स्थान रखती है। अधिकाँश लोगों का ख्याल है कि यदि किसी प्रकार के दण्ड का भय न रहे तो समाज का काम ही नहीं चल सकता! दण्ड के भय से ही चोर, बदमाश और बुरे स्वभाव के लोग दबे रहते हैं, अन्यथा वे भले आदमियों का जीना असंभव कर दें। इसी विचार के आधार पर हमारे देश में बालक को बहुत छोटी अवस्था से “हौआ” का डर दिखाने लगते हैं। कुछ बड़े होने पर उसे माता-पिता द्वारा मार पड़ने और भगवान की नाराजगी का भय दिखलाया जाता है और अंत में राज्य-सत्ता का भय उसके सामने आ जाता है।

हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि वर्तमान समय में जैसा सामाजिक वातावरण बन गया है उसमें अधिकाँश मनुष्य भय के कारण ही अनीति के मार्ग से बच पाते हैं। परंतु इसे भी सभी बुद्धिमान स्वीकार करेंगे कि भय के आधार पर जो नियंत्रण किया जाता है वह केवल ऊपरी होता है, भीतर उसका प्रभाव बहुत कम पड़ता है। इसलिए अक्सर यह देखा गया है कि जो लोग भय के कारण धर्म और नीति का पालन करने को बाध्य थे, उस भय के उठ जाने पर एकदम निरंकुश होकर घोर अधर्म के मार्ग पर दौड़ने लगते हैं।

हमारे यहाँ अधिकाँश घरों में बालकों की धर्म शिक्षा का श्रीगणेश भय से ही किया जाता है। बालकों के मन में छोटेपन से ही यह भावना भरी जाती है कि ईश्वर प्रत्येक बुरे काम का दण्ड देता है। इससे कुछ लोग तो खाने-पीने, खेलने, लड़ाई-झगड़े प्रत्येक बात में ईश्वर का नाम लेकर ही बालक को डराते हैं। कुछ समय तक तो इन बातों का प्रभाव रहता है और बालक खराब कामों के करने से रुक जाता है। परंतु यह भावना स्थायी नहीं होती। जब वह नित्य प्रति देखता है कि उसके अन्य साथी झूँठ बोलते हैं, पर ईश्वर उनके कान नहीं उमेठता, तो धीरे-धीरे उसके हृदय से वह भय कम हो जाता है। वह अपने चारों ओर देखता है तो उसे मालूम होता है कि जिस ईश्वरीय दण्ड का उसे भय दिखाया जाता है उसकी कोई सत्ता नहीं है। संसार में झूँठ और मक्कार ही मौज करते दिखलाई पड़ते हैं और सत्यवादी अपने सत्य के कारण मारे जाते हैं। जब लड़का पाठ याद करके नहीं लाता और शिक्षक से झूठ-मूठ कह देता है कि ‘कल उसे बुखार आ गया था,’-तो उसको मास्टर छोड़ देते हैं। पर जो साफ-साफ कह देता है कि वह दिन भर गिल्ली-डंडा खेलता रहा तो उस पर बेंतों की मार पड़ती है। यह देखकर उसके हृदय में सत्य के लिए स्वभावतः अश्रद्धा का भाव पैदा हो जाता है और वह झूठ बोलने को ही लाभजनक समझने लगता है। धीरे-धीरे ऐसा समय आता है जब सत्य को पूर्ण रूप से ठुकरा कर असत्य का पक्का पुजारी बन जाता है।

संसार के धर्म प्रचारक यह कहकर ऐसे व्यक्ति की शंका का निवारण करना चाहते हैं कि ईश्वर का दण्ड और पुरस्कार तुरंत प्राप्त नहीं होता। कभी-कभी न्याय होने में काफी देर लग जाती है, परंतु ईश्वरीय दण्ड से बचा नहीं जा सकता। यदि अपराध करने वाला इस लोक में दंड से बच गया तो उसे परलोक में उसका फल अवश्य मिलेगा। पर ऐसी गूढ़ बातों पर उसको हृदय से विश्वास नहीं हो पाता। अनेक बार तो संसार में सर्वत्र अन्याय और अत्याचार का बोलबाला देखकर और दूसरी तरफ ईश्वरीय दंड की बात सुनते-सुनते वह ईश्वर की सत्ता में ही अविश्वास करने लगता है। वह अपने मन में सोचता है कि यदि इस संसार का नियंत्रण करने वाली कोई सर्वशक्तिमान और न्यायकारी सत्ता होती तो वह ऐसे अन्याय और अनाचार को सहन कर सकती।

ईश्वर के भय के बाद समाज, राजसत्ता और गुरुजनों की भर्त्सना का भय है। परंतु जब तक ये भय केवल बाहर से दबाव डालते हैं, तब तक वे पाखण्ड और मिथ्याचार की ही उत्पत्ति करते हैं। ऐसे मनुष्य का ध्येय धर्ममय जीवन व्यतीत करना नहीं होता वरन् धर्म-प्रदर्शन हो जाता है।

इन बातों पर विचार करने से यही भली प्रकार समझा जा सकता है कि भय के आधार पर स्थायी श्रद्धा और विश्वास का निर्माण नहीं किया जा सकता। जहाँ श्रद्धा और विश्वास होता है वहाँ भय के द्वारा मनुष्य की तामसिक वृत्तियों को राजसिक वृत्तियों में परिवर्तित किया जा सकता है। परंतु जहाँ हृदय के भीतर श्रद्धा और विश्वास नहीं है, वहाँ तो भय अंतरात्मा में प्रवेश करके घुन की तरह मनुष्य के व्यक्तित्व को खोखला कर देता है। इस कारण बालकों को धर्म अथवा नीति की शिक्षा भय के आधार पर देना हानिकारक है। इससे उनके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो पाता। बालकों से यह कभी मत कहो कि वे ईश्वर से डरें, किंतु उनसे कहना चाहिए कि वे ईश्वर से प्रेम करें, उसके प्रेम के पात्र बनें। भय के आधार पर बालकों के ऊपरी आचार को नियंत्रण करने से उनका उत्साह और साहस मारा जाता है। कठपुतली की तरह दिखावटी और ऊपरी पवित्रता से आँतरिक आत्मशुद्धि प्राप्त नहीं होती। प्राकृतिक नियम यह है कि मनुष्य बाहर से प्रेरणा पाता है और जब उसको अपने अंतर में संग्रहीत करके स्वभाव में मिला लेता है, तो वह उसके व्यक्तित्व के विकास में सहायक हो पाती है, अन्यथा केवल एक बाहरी दबाव बने रहने पर वह मनुष्य के व्यक्तित्व को दबा लेती है और उसके मन में एक अंतर्द्वंद्व खड़ा कर देती है जो जीवन भर काँटे की तरह खटकता रहता है।

शिक्षक का काम है कि वह अपने शिष्य के हृदय को मजबूत और बलवान बनाये। व्यावहारिक जीवन में मस्तिष्क की उन्नति पर्याप्त नहीं है। वहाँ तो हृदय की उन्नति और विशालता से ही ज्यादा काम चलता है। सदाचार का आश्रय और स्थान हृदय ही है। इसीलिए बालकों को बुरी आदतों से बचाने के लिए उनके हृदय को ही कमजोर कर दिया जाय यह शिक्षा की कोई सराहनीय रीति नहीं मानी जा सकती। माता-पिता और अन्य गुरुजन, जिनके ऊपर बालकों की शिक्षा की जिम्मेदारी है, जितनी जल्दी इसको समाप्त कर दें उतना ही उनके लड़के-लड़कियों और शिष्यों आदि के लिए अच्छा है।

भय का तात्कालिक प्रभाव हृदय पर तथा स्नायु मण्डल पर पड़ता है और जब किसी मनुष्य को किसी प्रकार के स्थायी भय के आधीन रखा जाता है तो उसका स्नायु मण्डल कमजोर पड़ जाता है। स्नायुमण्डल की कमजोरी से उसकी सहन शक्ति में कमी हो जाती है। शिक्षा का उद्देश्य मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास करना है, इस व्यक्तित्व का विकास श्रद्धा और विश्वास के आधार पर किया जा सकता है। भय के द्वारा तो केवल उसका गला घोटा जा सकता है। भय हमारे श्रद्धा और विश्वास के निर्माण में बाधा स्वरूप है। उसके कारण हमारी शारीरिक और मानसिक प्रवृत्तियाँ दो विरोधी धाराओं में बँटी रहती हैं। शिक्षा और नैतिकता का उद्देश्य मनुष्य के हृदय में ऐसा सत्साहस उत्पन्न करना है, जिससे वह अपने को परिस्थितियों से ऊँचा अनुभव करें और परिस्थितियों को अपने अनुकूल बदलने का सदैव प्रयत्न करता रहे। इस भावना को जगाना और उसमें आत्म विश्वास और आत्म नियंत्रण पैदा करना ही सारी नैतिक शिक्षा का ध्येय है।


गायत्री उपासना के अनुभव

ढलती आयु में पुत्र प्राप्ति

श्री गणपति गंगाराम चीचड़ा से लिखते हैं :- लम्बी अवधि बीत गयी थी। जवानी ढल गयी थी। पहले तो बहुत दिन तक संतान ही नहीं हुई। जब हुईं तो केवल लड़कियाँ। हमारे घर में निराशा का साम्राज्य रहता। सोचते कोई लड़का न हुआ तो वंश ही डूब जायेगा। कई बार घर में दूसरी शादी करने की चर्चा होती, कई बार कुछ विचार होता। ऐसी निराशा की घड़ियों में हमें एक सज्जन ने गायत्री मंत्र का सहारा लेने के लिए कहा। मैं और मेरी धर्मपत्नी गायत्री जप करने लगे। माता की कृपा से एक सुँदर पुत्र उत्पन्न हुआ है, घर-घर में प्रसन्नता छाई रहती है। यह चमत्कार देखकर अनेक गायत्री उपासक बने हैं।

एक मास का वेतन माता के अर्पण

श्री सत्यनारायण शर्मा इंदौर से लिखते हैं कि - मैं ऊँची परीक्षा उत्तीर्ण होते हुए भी बहुत कम वेतन पर एक फैक्टरी में विवशता पूर्वक काम कर रहा था। वेतन बहुत कम होने से चित्त दुःखी रहता था। कुछ मास पूर्व आचार्य जी इंदौर पधारे थे तब मैंने उनसे अपनी कष्ट कथा कही। उन्होंने गायत्री उपासना का निर्देश दिया। उनके बताये हुए मार्ग पर चलते हुए मुझे कुछ ही महीने हुए हैं कि सेंट्रल गवर्नमेंट की एक अच्छी तरक्की की संभावना वाली सुविधा जनक नौकरी मिल गयी वेतन भी संतोषजनक है। पहले एक मास की वेतन गायत्री माता के लिए अर्पण कर रहा हूँ, क्योंकि माता की दी हुई सुविधा से प्रथम उनका सत्कार करना किसी सच्चे पुत्र का कर्तव्य है।

नेत्रों की ज्योति फिर लौट आयी

अमर पाटन (सतना) से श्री चमेली देवी सक्सेना माता की अनुकम्पा के संबंध में सूचित करती हैं- मेरी माता लगभग तीन साल से बिल्कुल अंधी हो गयीं। ऐसी विकट परिस्थिति में घर के सभी लोग बहुत चिंतित थे। अनेकों योग्य डाक्टरों द्वारा चिकित्सा कराई गई परंतु कोई लाभ नहीं हुआ। मैं माता जी के घर से 20 मील दूर रहती हूँ। नित्य प्रति माता जी के सभी समाचार प्राप्त होते ही रहते थे। मुझे इस समाचार से बड़ा ही दुःख होता था। अंत में मेरी दृष्टि वेद माता गायत्री की ओर गयी। मैंने उसी दिन से माता जी के कल्याण के लिए, नियमित साधना से अधिक प्रारंभ कर दिया। इसके ठीक 3 माह उपराँत अचानक ही एक डॉक्टर महोदय ग्राम में पहुँचे। उन्होंने तुरंत ही माता जी की आँखों का आपरेशन किया। वेद माता की कृपा से दो दिन में ही दोनों नेत्र ठीक हो गये। मैं उन डॉक्टर महोदय को वेद माता का ही भेजा हुआ विशेष दूत मानती हूँ। मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँची हूँ कि माता सच्ची पुकार पर सभी की सहायता करती हैं।

प्रसूति काल में प्राण रक्षा हुई

माकडोंन (उज्जैन) से श्री कोमल प्रसाद जी लिखते हैं 15 फरवरी सन 57 को मेरी धर्मपत्नी के कन्या उत्पन्न हुई। अचानक शाम को मेरी धर्मपत्नी की दशा बहुत ही खराब हो गयी। ऐसा प्रतीत होने लगा कि वह प्राणहीन ही हो चुकी है। मैं यह सूचना पाकर बहुत ही घबड़ाया परंतु मैंने पूजनीय आचार्य जी की आज्ञानुसार साहस एवं धैर्य से काम लिया। पूज्य आचार्य जी की आज्ञा है कि विपत्ति में सदैव ही मानसिक गायत्री जप प्रारंभ कर दो। मैंने तुरंत ही निकटवर्ती गायत्री उपासकों को एकत्रित कर गायत्री चालीसा का पाठ प्रारंभ करा दिया। थोड़े ही समय के उपराँत धर्मपत्नी के स्वास्थ्य में आशातीत सुधार हुआ और वह पूर्ण स्वस्थ हो गयी। माता का यह चमत्कार देखकर सभी लोग आश्चर्य में पड़ गये।

बुरी आदतें छूट गयीं

देवरीकलाँ (म.प्र.) के श्री रतनसिंह रावत माता के चमत्कार के विषय में वर्णन करते हैं। मैं प्रारंभ से ही अध्ययन में काफी कमजोर था। इसलिए कक्षा में सदैव ही अध्यापकों द्वारा तिरस्कृत किया जाता था। इसके अतिरिक्त अन्य विद्यार्थियों की कापी तथा पुस्तकें चुराने में भी काफी निपुण था। मेरी ऐसी दशा देखकर अध्यापक महोदय को मुझपर बड़ी दया आई और उन्होंने मुझसे एक माला नित्य गायत्री जप करने के लिए कहा। मैंने शीघ्र उनकी आज्ञानुसार जप प्रारंभ कर दिया। इसके कुछ समय उपराँत ही मेरी बुरी आदतें स्वतः ही छूटने लगीं। अब मैं कक्षा में मध्यम श्रेणी का विद्यार्थी हूँ तथा बुरे व्यसन भी समाप्त हो गये हैं। मैं अपने में इस प्रकार का परिवर्तन देखकर माता की विशेष कृपा मानता हूँ।

पशुओं की बीमारी दूर हो गयी

दतौद (निमाड़) से श्री दादूराम तिवारी लिखते हैं-मेरे ग्राम में पशुओं की भारी बीमारी फैली हुई थी। मेरे घर के समीप ही एक गरीब किसान रहता था उसके भी चार पशु मर चुके थे। केवल दो शेष रह गये थे, ऐसी विषम परिस्थिति से वह काफी परेशान था। मैंने उसे साहस बँधाया और कहा कि ‘तुम माता का स्मरण करो।’ शेष दो पशुओं की दशा भी काफी खराब थी, वे दोनों ही अपने जीवन की अंतिम श्वासें ले रहे थे। मैंने तुरंत ही थोड़ा सा जल गायत्री मंत्र द्वारा अभिमंत्रित करके उनके शरीर पर छींटे मारे, थोड़े ही समय में दोनों पशु चेतनावस्था में आ गये तथा एक दिन के उपराँत पूर्ण स्वस्थ हो गये। माता का ऐसा प्रभाव देखकर इस घर के सभी लोग प्रभावित हुए हैं। अब वे सभी नियमित रूप से माता की आराधना करते हैं।

पूर्णाहुति के लिए रुपया मिल गया

तनोड़िया (शाजापुर) से श्री मुन्नालाल जी ‘कनेरियन’ माता की करुणा के विषय में सूचित करते हैं- मैं अपना पुरश्चरण पूर्ण कर रहा था। परंतु साथ ही यह भी चिंता थी कि इसकी पूर्णाहुति किस प्रकार किया जाये। मैं इस परिस्थिति से बड़ा परेशान हो चला था। बहुत कुछ प्रयत्न करने के पश्चात भी किसी सुदृढ़ मार्ग पर नहीं पहुँच सका। एक दिन मैं मंदिर में बैठकर जप कर रहा था कि अचानक ही माता द्वारा प्रेरणा हुई कि अब से एक माह के उपराँत श्रावण आ रहा है। इस समय मंदिर में उपासक तथा अन्य व्यक्ति भी एकत्रित होंगे उनसे अखण्ड दीपक के लिए एक-एक रुपया एकत्रित कर लिया जावे। प्रथम दिन केवल तीस रुपया ही एकत्र हुए। इसके पश्चात क्रमशः कुल योग 278 रुपया तक पहुँच गया। बड़ी धूमधाम के साथ पूर्णाहुति हुई। माता की ऐसी वात्सल्यता देखकर मैं तथा अन्य उपासक बड़े ही आकर्षित हुए। मुझे तो पूर्ण विश्वास है कि माता की शरण में जाकर सभी कठिनाइयाँ सरल हो जाती हैं।

बेटी को सुयोग्य घर वर मिला

कविराज पं. कन्हैयालाल जी वैद्य इंदौर से लिखते हैं- मेरी लड़की कृष्णाकुमारी को गायत्री उपासना में बड़ी श्रद्धा है। उसने करीब 27 हजार मंत्र लिखकर तपोभूमि में भेजे हैं। गत वर्ष पूर्णाहुति में भी हमारा परिवार तपोभूमि में गया था। बेटी कृष्णा को अच्छे घर वर की प्राप्ति के लिए हमें बड़ी चिंता रहती थी सो नाम मात्र के दहेज से ही सब कुछ प्राप्त हो गया। लड़की बहुत ही आनंद के घर में गई है और लड़का सब प्रकार सुयोग्य मिला है, ऐसा सुयोग्य घर वर भारी दहेज देने पर भी मिलना कठिन था पर वह सब माता की कृपा से अनायास ही प्राप्त हो गया।

सरलतापूर्वक सुसंस्कृत वर मिला

श्री पुरुषोत्तम आत्माराम साखरे जासलपुर से लिखते हैं-पुत्री के लिए वर ढूँढ़ते-ढूँढ़ते कई वर्ष हो गये थे। लड़की के अधिक बड़ी हो जाने से घर के सब लोग चिंतित रहते थे। रोज शादी जल्दी करने का प्रश्न ही घर में चर्चा का विषय रहता। पर उपयुक्त लड़का मिलता न था। जहाँ मिलते वहाँ बड़े दहेज की माँग होती। अधिक चिंता में हम लोगों ने चिंताहरणी गायत्री माता की शरण ली। पुत्री वसुँधरा ने भी अनुष्ठान किये। हम लोगों ने भी किये। परिणाम बहुत ही मधुर निकला। एक बहुत ही सुसंस्कृत वर प्राप्त हुआ। लड़का भालेगाँव में खद्दर भण्डार का मैनेजर है। बिना आर्थिक परेशानी के बहुत ही सीधे-साधे ढंग से शादी हो गई। लड़की को अब और अधिक पढ़ने तथा राष्ट्र की रचनात्मक सेवा करने का अवसर मिलेगा।

पद उन्नति तथा पुत्र प्राप्ति

श्री मोहनलाल पाण्डेय खैराबाद से लिखते हैं, जब से माता का आँचल पकड़ा है उन्नति की ओर बढ़ रहा हूँ। डाकखाने में चपरासी की पोस्ट पर काम करते हुए-पोस्ट आफिस की क्लर्कशिप के लिए परीक्षा दी। अच्छी सफलता प्राप्त हुई। बाराँ के लिए क्लर्क पद पर नियुक्ति पत्र भी प्राप्त हो गया। घर में सुख शाँति बढ़ी है, इसी वर्ष पुत्र भी हुआ है।

दूनी तनख्वाह की स्थायी जगह

श्री जाधोराम जी बेतूल से लिखते हैं, मैं ए.ई.एन. आफिस में टेम्परेरी काम करता था। स्थायी जगह प्राप्त करने के लिए बहुत दिनों से प्रयत्नशील था। अनेकों प्रयत्न कर चुका था पर कोई सफलता नहीं मिलती थी। भविष्य अंधकारमय दीखता था। अपनी कोई ऊँची पहुँच या सिफारिश भी न थी। इससे मन सदा उदास रहता था और वर्तमान में टैम्परेरी नौकरी भी छिन जाने की आशंका बनी रहती थी। डूबते को तिनका का सहारा। गायत्री मंत्र हाथ लगा। छोटे साहब के कहने से मैं खूब मन लगाकर गायत्री उपासना करने लगा। आश्चर्य तो देखिए कि मैं जिन जगहों के लिए कोशिश कर रहा था उससे कहीं-बड़ी और लगभग दूनी तनख्वाह की जगह के लिए आर्डर आ गया। अब मैं स्थायी और संतोषजनक तनख्वाह की जगह पाकर संतुष्ट हूँ।


चमत्कार को नमस्कार

(श्री सत्यदेव शर्मा)

गायत्री परिवार उन जागृत, चैतन्य, सक्रिय और भावनाशील आध्यात्मिक व्यक्तियों का संगठन है। जो लकीर के फकीर न होकर विवेक सत्य और तथ्य को प्रधानता देते हैं। इस संगठन द्वारा भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान, मानवता की सेवा चरित्र गठन एवं राष्ट्र निर्माण का जो भारी कार्य हो रहा है उससे कोई भी विचारमान व्यक्ति प्रभावित हुए बिना न रह सकता। इस प्रक्रिया के पीछे उन लोगों का अस्तित्व है जो उज्ज्वल चरित्र एवं सेवा भावना से परिपूर्ण होने के साथ-साथ उच्च आदर्शों से ओतप्रोत हैं।

अखण्ड ज्योति में इस स्तंभ के अंतर्गत परिवार के कुछ आदर्श व्यक्तियों के परिचय हर महीने छापे जाते रहेंगे। कुछ परिचय इस अंक में दिये जा रहे हैं।

डॉ. रामचरण महेन्द्र पी.एच.डी., कोटा

“अखण्ड ज्योति” के जन्म काल के कुछ ही दिन पीछे से लेकर अब तक श्री महेन्द्र जी अपरिमित आत्मीयता के साथ अखण्ड ज्योति की भारी सेवा कर रहे हैं। अब तक उन्होंने लगभग 40 पुस्तकें इस संस्था के लिए लिखी हैं, अखण्ड ज्योति के संपादन में हर महीने बहुत श्रम करते हैं। 17 वर्षों में जो उनने अपने ज्ञान और श्रम द्वारा सेवा की है उसका मूल्य रुपये पैसों में लगाया जाय तो वह कितने ही हजार रुपयों का होता है पर आपने आज तक कभी भी एक पाई इस श्रम के बदले में नहीं ली। सदा सब कुछ पूर्ण निस्वार्थ भाव से करते हैं।

श्री महेन्द्र जी अखण्ड ज्योति परिवार के अत्यंत निकटवर्ती हैं, के प्रायः मथुरा आते रहते हैं और इस मिशन की सचाई, सेवा भावना, उपयोगिता एवं सैद्धान्तिक श्रेष्ठता को अपनी आँखों से देखकर इतने प्रभावित हैं कि जो वे करते हैं उससे भी अनेकों गुना त्याग एवं सहयोग करने की बात सोचते रहते हैं। पीला चश्मा पहने हुए छिद्रान्वेषी जहाँ श्रेष्ठ से श्रेष्ठ वस्तु में भी अपनी नीचता की छाया देखते हैं, वहाँ श्री महेन्द्र जी जैसे उत्कृष्ट मस्तिष्क एवं उज्ज्वल हृदय किसी अच्छी वस्तु की वास्तविकता को भी पहचानने में पीछे नहीं रहते। सत्प्रवृत्तियों में सच्चे मन से सहयोग करना सत्पुरुषों का कर्तव्य होता है। श्री महेन्द्र जी इस कर्तव्य परायणता के उज्ज्वल प्रतीक हैं।

श्री शंभूसिंह होड़ा रामगंज मंडी

101 हवन कुण्डों वाले विशालकाय राजस्थान प्रान्तीय गायत्री महायज्ञ के संयोजक श्री शंभू सिंह जी हाड़ा के नाम से अखंड ज्योति परिवार के सभी सदस्य परिचित हैं। यों वह इतना बड़ा आयोजन जिसमें तीस हजार रुपया व्यय हुआ उस प्रदेश के सैकड़ों गायत्री उपासकों की अनन्य निष्ठ और कई-कई महीनों काम छोड़कर दिन-रात जुटे रहने के फल स्वरूप ही सफल हो सका। पर अपनी दुर्बलताओं को जानते हुए भी उतने विशालकाय कार्य का संकल्प और उत्तरदायित्व लेने का श्रेय शंभू सिंह जी को ही है, इससे उनके असाधारण आत्म विश्वास का पता चलता है।

शंभू सिंह जी की गायत्री माता के प्रति भावनाएं जितनी ऊंची हैं उतनी हैं सक्रिय सेवा भी है। सरकारी नौकरी से छुट्टी पाते ही वे अपने मिशन की सेवा में लग जाते हैं। स्वप्न में भी उन्हें मछली का निशाना साधने वाले अर्जुन की तरह अपना लक्ष्य ही दिखायी पड़ता है। इस मनसा वाचा कर्म की तन्मयता का ही फल है कि जिस प्रदेश में आज से कुछ ही वर्ष पहले गायत्री और यज्ञ एक अजनबी वस्तुएं थीं वहाँ अब गाँव-गाँव इनकी धूम है। 108 गायत्री परिवारों के शाखा संगठन का संकल्प का अधिकाँश भाग तो पूरा हो चुका है।

श्री व्यंकटेश शर्मा खलघाट

स्वार्थ से बढ़कर परमार्थ को महत्व देना यही ब्राह्मणत्व का प्रधान चिन्ह है। जिन्हें अपने भौतिक सुखों की, सुविधाओं की महत्वाकाँक्षाओं की चिंता नहीं, जो सदा लोकहित में, धर्म सेवा में अपने जीवन को तिल-तिल करके खपाने की साध रखते हैं वे ही सच्चे ब्राह्मण हैं। आज निस्संदेह ऐसे सच्चे ब्राह्मणों का दर्शन दुर्लभ हो रहा है यों कहने को बामन बिरादरी बड़ी लम्बी चौड़ी है।

श्री व्यकंटेश जी को सुदामा जैसा सच्चा ब्राह्मण कहा जा सकता है। सुदामा अंत में पत्नी से पराजित होकर लक्ष्मी माँगने चल पड़े थे पर यह सुदामा किसी से भी पराजित नहीं होता। गरीबों को अपने जातीय गौरव की थाती मानकर उसे छाती से चिपकाये हुए दिन-रात गायत्री प्रचार के लिए कार्य करता रहता है। व्यकंटेश जी ने गत पाँच वर्षों में स्वयं भारी तप किया है और उस प्रदेश में दूर-दूर तक अनेकों महत्वपूर्ण यज्ञों का आयोजन तथा परिवार की शाखाओं का सफल संगठन किया है।

अविचलित निष्ठ वाला यह ब्राह्मण जीवन के अंत तक असंख्यकों आत्माओं को सन्मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा देने में सफल होगा ऐसा दीखता है।

श्री विद्या प्रसाद मिश्र, आरंग

ठेकेदार लोग इमारतें, सड़कें और न जाने क्या-क्या बनाने के ठेके लेते हैं और उन चीजों को अपने ज्ञान, अनुभव, श्रम और कुशलता के आधार पर बनाकर तैयार भी कर देते हैं। विद्या प्रसाद जी भी ठेकेदार ही हैं, वे पी.डब्लू.डी. की सरकारी ठेकेदारी नहीं करते, भारतीय संस्कृति की विशाल इमारत को बनाने में भी समान मनोयोग से संलग्न हैं! आरंग (रायपुर) में मिश्र जी ने बहुत बड़ी संख्या में गायत्री उपासक बनाये हैं। साप्ताहिक सत्संग हवन, पाठ, लेखन आदि सभी कार्य नियमित रूप से चलते हैं। समीपवर्ती क्षेत्र में दौरा करके मिश्र जी और भी नई शाखा बनाने के प्रयत्न कर रहे हैं। राष्ट्र निर्माण का महल, और परमार्थ की सड़क बनाने में ऐसे ही कुछ और भी ठेकेदार मिलजुल कर काम करने के लिए तैयार हो जायें तो सचमुच ही मानवता की सेवा और भारतीय संस्कृति के पुनरुत्थान की दिशा में बहुत कुछ हो सकता है।

पं. रामाभिलाषजी त्रिपा. शास्त्री, नवाबगंज

फुरसत न मिलने का बहाना करने का अर्थ है-उस काम से अरुचि। जिस कार्य को करना नहीं होता उसके लिए यह कह दिया जाता है कि हमें इसके लिए फुरसत नहीं मिलती, किसी व्यक्ति को जो कार्य करने की लगन होती है उसके लिए अन्य सब कार्य तो गौण होते हैं वह रुचि वाला कार्य प्रधान हो जाता है। अपने प्रिय विषय के लिए लोग खाना, सोना तक भूल जाते हैं।

श्री शास्त्री जी बड़े कार्य व्यस्त व्यक्ति हैं, अध्ययन, अध्यापन का बहुत कार्य उनके सिर पर लदा रहता है, फिर भी गायत्री प्रचार के लिए वे समय निकाल ही लेते हैं। नवाबगंज (बरेली) के आस-पास के गाँवों में शास्त्री जी ने बहुत सी शाखाएं बनाई हैं तथा सदस्य बढ़ाये हैं। इन शाखाओं की संख्या शीघ्र ही 24 तक पहुँच जाने की संभावना है। विद्वत्रा और क्रियाशीलता का स्वर्ण सुयोग समन्वित सहयोगियों का सहकार गायत्री संस्था का सौभाग्य ही है।

श्री कन्हैयालाल जी वैद्य, इंदौर

आमतौर पर लोग क्षणिक उत्साही होते हैं। कोई नया काम कौतूहल वश आरंभ करते हैं और कुछ ही दिनों में आवेश ठंडा होने पर उस कार्य को छोड़ देते हैं। किसी के द्वारा उत्साह दिलाने या किसी कामना से प्रेरित होकर कुछ दिन लोग पूजा उपासना आरंभ करते हैं। उतावली एवं अधीरता में वे उतने दिन श्रद्धा को स्थिर नहीं रख पाते जितने की समुचित फल प्राप्त करने के लिए आवश्यकता है। पर कुछ नैष्ठिक साधक ऐसे होते हैं जो अपने व्रत को जीवन भर निबाहते है।

इंदौर के सुप्रसिद्ध वैद्य पं. कन्हैयालाल जी नैष्ठिक गायत्री उपासक हैं, उनके परिवार का बच्चा-बच्चा गायत्री उपासक है। इस निष्ठ के फलस्वरूप उस परिवार के सभी सदस्यों को अपने-अपने ढंग पर सत्परिणाम भी प्राप्त हुए हैं। आपका तथा आपके पुत्र सत्यनारायण का अनुभव इसी अंक में छपा है। यह परिवार इंदौर में गायत्री प्रचार के लिए सदा अग्रणी रहा है।

श्री कन्हैयालाल पाण्डेय वैद्य, ‘चचोर’

मनुष्य के अंदर कितनी अपरिमित शक्ति भरी पड़ी है इसका पता तब चलता है जब वह अपनी शक्तियों को केन्द्रित करके पूरी तत्परता के साथ किसी कार्य में संलग्न होता है और अपने सतत प्रयत्न द्वारा ऐसी सफलता उत्पन्न कर देता है जिसे देखकर आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य अपनी शक्तियों को जानता नहीं, भूला रहता है, उन पर विश्वास नहीं करता। पर जब कभी वह अपनी महत्ता का मूल्याँकन करके उन्हें कार्य रूप में परिणत करता है तो पता चलता है किस साधारण दीखने वाला मनुष्य वस्तुतः कितना असाधारण है।

राजस्थान प्राँतीय गायत्री महायज्ञ के अवसर पर ‘चकोर’ (मन्दसोर) के वैद्य श्रीकन्हैयालाल जी पाण्डेय ने अपने यहाँ मालवा प्राँतीय गायत्री महायज्ञ करने का निश्चय किया और उसे सफल बनाकर दिखा गया। 25 कुण्डों का वह महायज्ञ घोर जंगल के बीच भी इतना सफल रहा कि उस क्षेत्र की जनता के लिए वह अभूतपूर्व ही था। उस प्राँत की पीढ़ियाँ उस आनंद को जीवन भर न भूल सकेंगी। वैद्य जी के प्रयत्न से उस प्रदेश में गायत्री उपासना एवं सात्विकी सत्प्रवृत्तियों की बड़े उत्साह पूर्वक अभिवृद्धि हो रही है।

प्रो. अवधूत गोरेगाँव

गोरेगाँव के प्रो. अवधूत, बहुत लम्बे समय से गायत्री की कठिन उपासना में संलग्न हैं। उन्होंने अपने साधना अनुभवों से अनेकों व्यक्तियों की आध्यात्मिक सेवाएं की हैं। अखण्ड ज्योति से प्रकाशित गायत्री संबंधी पुस्तकों का सार लेकर आपने कई पुस्तकें गुजराती भाषा में छापी हैं और गायत्री परिवार के बहुत से सदस्य बनाने का सफल प्रयत्न किया है।

प्रो. अवधूत की साधना में जितनी निष्ठ है उतनी ही लगन गायत्री प्रचार में भी है। दो बार तपोभूमि में आकर उन्होंने असाधारण एवं अत्यधिक कठिन साधनाएं की हैं और उससे कई विशिष्ट शक्तियाँ भी प्राप्त की हैं। इन शक्तियों का सदुपयोग वे जनकल्याण के लिए ही कर रहे हैं। साधना मार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिए वैसी ही सुदृढ़ मनोभूमि की आवश्यकता होती है जैसी प्रोफेसर साहब की है।

श्री मोहनलाल शर्मा, व्यावर

‘धुन के धनी’ लोग ही संसार में कुछ कर गुजरने की क्षमता रखते हैं। जो पग-पग पर लाभ हानि, मानापमान, संकोच, संदेह, आगा पीछा सोचते रहते हैं, वे अपने जीवन में अनेक साधन एवं सुविधाओं के रहते हुए भी कुछ महत्वपूर्ण काम नहीं कर पाते, जब कि धुन के धनी लोग विपन्न परिस्थितियों में रहते हुए भी इतना काम कर लेते हैं जिसे देखकर आश्चर्य होता है।

व्यावर के श्री मोहनलाल शर्मा को गायत्री प्रचार की सच्ची लगन है। सच्ची लगन वालों को अनेक अच्छे सहयोगियों का मिल जाना भी स्वाभाविक है। व्यावर की शाखा का कार्य बड़े ही सुचारु रूप से चलता है। सदस्यों की संख्या बराबर बढ़ रही है। एक बड़ा यज्ञ होने की जोरों से तैयारी हो रही है। मोहनलाल जी तथा उनके साथी उस क्षेत्र में गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए जी जान से जुटे हुए हैं।

श्री नर्मदाशंकर एम. जोशी. खोरासा

संसार में जितने भी परमार्थ हैं उनमें सब से बड़ा पुण्य कार्य दूसरों को कल्याण पथ पर अग्रसर करना है। किसी को अन्न, वस्त्र, धन आदि देकर उसकी थोड़ी सी थोड़े समय की आवश्यकता को पूर्ण किया जा सकता है, पर ज्ञान दान देकर सन्मार्ग पर चलने का प्रकाश देकर तो उसे अक्षय शाँति ही प्राप्त करायी जा सकती है। जो इस तथ्य को समझते हैं वे परिव्राजक, साधु, उपदेशक, ज्ञान प्रचारक का कार्य अपने हाथ में लेते हैं।

श्री नर्मदाशंकर जोशी अपना धन उपार्जन करने का व्यापार छोड़कर-पुण्य परमार्थ कमाने के गायत्री प्रचार रूपी आध्यात्मिक व्यापार में लग गये हैं। गायत्री मंत्र लेखन के लिए घर-घर घूमना और प्रतिदिन सहस्रों गायत्री मंत्र लेखन कराना आज कल उनका प्रमुख कार्य है। अपने जीवन काल में सहस्रों गायत्री उपासक उत्पन्न करने की उनकी साध का पूरा होना, वर्तमान उत्साह को देखते हुए निश्चित सा ही है।

श्री सोमेश्वर जी चतुर्वेदी, पेटलावद

जोते बनाये खेत में बीज बो देना सरल काम है किंतु कटीली झाड़ियों को काटकर जमीन साफ करना और नया खेत खड़ा करके उसे जोतना, बनाना, असाधारण धैर्य, पुरुषार्थ एवं साहस का काम है। अन्य कार्यकर्ताओं के झुण्ड में एक दुर्बल मनोभूमि का व्यक्ति भी लुढ़कता हुआ आगे बढ़ता रहता है, पर जहाँ कोई सहयोगी न हों ऐसे नये और पिछड़े हुए क्षेत्र में नये सिरे से कोई कार्य आरंभ करना और उसे बहुत आगे तक बढ़ा ले जाना ऐसे ही लोगों का काम है जिन्हें पराक्रमी और वीर पुरुष कहते हैं।

श्री सोमेश्वर जी चतुर्वेदी, झाबुआ राज्य के पेटलावद नामक पिछड़े इलाके में अध्यापक हैं। आपने अपने निरंतर प्रयत्न से उस क्षेत्र के गाँव-गाँव में गायत्री माता का संदेश पहुँचाया है और अनेकों गायत्री उपासक बनाये हैं। आपके छोटे भाई शंकरलाल जी चतुर्वेदी का भी इस दिशा में आपके समान ही सदा प्रयत्न चलता रहता है।

श्री रणछोड़दास वेदाँत, जबलपुर

श्री रणछोड़दास जयशंकर वेदाँत बचपने से ही नैष्ठिक गायत्री उपासक हैं और सच्चे मन से यह विश्वास करते हैं कि जितना पुण्य माला फेरने का है उससे असंख्यों गुना पुण्य दूसरों को सन्मार्ग पर लगाने वाले प्रयत्न का है। उनने सदा शक्ति भर गायत्री प्रचार किया है और जीवन के अंतिम क्षण तक इस पुनीत प्रक्रिया को जारी रखने का संकल्प है।

श्री रणछोड़दास जी जब बर्मा में थे तब वहाँ गायत्री मंत्र लेखन का बड़ा प्रचार किया और लाखों की संख्या में मंत्र लिखकर तपोभूमि भेजे। अब वे स्वयं अपनी नैष्ठिक गायत्री उपासना के साथ-साथ दूसरों को भी इस पुण्य पथ का मार्गदर्शन करते रहते हैं, उनकी प्रेरणा से अनेकों को बड़े सत्परिणाम प्राप्त करने का सुअवसर मिला है। गायत्री तपोभूमि को अधिक सुविकसित करने की आपकी बड़ी भावना है।

श्री राधेरमन मिश्र, सतना

विन्ध्य प्रदेश के सतना नगर में श्री राधे रमन मिश्र अपने घर को गायत्री तपोभूमि में परिणत करने में लगे हुए हैं। उनके घर में छोटा सा गायत्री मंदिर स्थापित है। नित्य जप, हवन, कीर्तन, गायत्री चालीसा पाठ का क्रम चलता है। आपने अपनी निष्ठ के द्वारा अपने परिवार को ही नहीं वरन् पड़ोसियों को, दफ्तर के साथियों को तथा अनेक मित्रों को रंग दिया है।

मनुष्य गृहस्थ में रहकर-घरेलू काम काजों को करता हुआ भी, यदि लगन हो तो परमार्थ का बहुत कुछ कार्य कर सकता है, उसका उदाहरण किसी को देखना हो तो मिश्रा जी को देख सकता है। उन्होंने अपने वेतन का एक अंश गायत्री ज्ञान प्रसार के लिए सुरक्षित रखा है जिससे वे कुछ गायत्री साहित्य मँगाकर वितरण करते रहते हैं।

श्री अयोध्याप्रसाद दीक्षित, कानपुर

पति पत्नी दोनों ही एक समान निष्ठ के उपासक हों ऐसा बहुत कम देखने में आता है। श्री शाँतिदेवी तथा श्री अयोध्याप्रसाद जी दीक्षित का जोड़ ऐसा ही है जिस पर अन्य गायत्री उपासक ईर्ष्या सकते हैं। इस परिवार में भोजन से भी अधिक महत्ता एवं प्राथमिकता उपासना को प्राप्त है। एक बार भोजन छूट सकता है पर साधना में व्यतिरेक नहीं पड़ सकता।

उपदेशों की अपेक्षा आचरण का दूसरों पर वास्तविक प्रभाव पड़ता है। दीक्षित जी ने अनेकों गायत्री उपासक बनाये हैं। उनकी निष्ठ इतनी प्रभावशाली है कि जिससे भी वे इस संबंध में चर्चा करते हैं वही प्रभावित हो रहा है। कानपुर में गायत्री परिवार की तीन शाखाएं हैं सभी अपने कार्यों को भली प्रकार चलाती हैं। दीक्षित जी का प्रयत्न इस विस्तार कार्य में बड़ा सहायक रहता है।

श्री रामसेवक त्रिपाठी, बड़गाँव

साधना क्षेत्र में बहुत विद्वान, ज्ञानी, तार्किक, धनी मानी होना आवश्यक नहीं। श्रद्धा और विश्वास ही वह वस्तुएं हैं जिनके आधार पर भौतिक एवं लौकिक दृष्टि से सामान्य दीखने वाला व्यक्ति भी असामान्य आत्मिक उन्नति कर सकता है। जहाँ सच्ची श्रद्धा समुचित मात्रा में मौजूद है वहाँ गृहस्थ जीवन आत्म कल्याण के पथ जरा भी बाधक नहीं होता। यदि निष्ठ का अभाव हो विरक्त का वेष धारण किये हुए घंटों पूजापाठ करने वाला व्यक्ति भी कुछ लाभ नहीं उठा सकता।

बड़गाँव के श्री रामसेवक त्रिपाठी शरीर से रेलवे की नौकरी करते हैं, पर मन में हर घड़ी गायत्री माता विराजती हैं। उन्होंने इस छोटी आयु में अब तक बहुत साधना की है और उसके चमत्कारी परिणाम भी देखे हैं। आपके प्रयत्न से उस क्षेत्र में कई बड़े यज्ञ हुए हैं तथा गायत्री सदस्यों की संख्या बढ़ी है।

श्री सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी, कोटपूतली

आध्यात्मिक जीवन की सफलता के लिए श्रद्धा सबसे आवश्यक एवं सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। आध्यात्मिक लक्ष श्रद्धा के बिना प्राप्त हो नहीं सकता। कितने ही अश्रद्धालु तार्किक बाल की खाल निकालने में अपना बुद्धि कौशल दिखाते रहते हैं,ऐसे लोग व्याख्यान दाता तो हो सकते है पर आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश की ज्योति का साक्षात्कार नहीं कर सकते। उनकी चंचलता एवं वाचालता आत्मिक उन्नति में सहायक तो तनिक भी नहीं होती उलटी बाधा उपस्थित करती है।

श्री सुरेन्द्रनाथ द्विवेदी, कोटपूतली के हाई स्कूल में साइंस अध्यापक हैं। श्रद्धा आपकी मनोभूमि में कूट-कूट कर भरी है। गायत्री उपासना से आपकी अनन्य निष्ठ ने आपके जीवन को सच्चे ब्राह्मणत्व की प्रतिमा बना दिया है। अपनी भावना के प्रकाश से आप उस क्षेत्र में गायत्री माता का संदेश घर-घर पहुँचाने में संलग्न हैं।


धर्म प्रेमियों के सराहनीय प्रयत्न

बड़गाँव (गोंडा) में एक विशद् यज्ञ ता.25 जून से 27 जून तक हुआ जिसमें कस्बे के हजारों स्त्री-पुरुष प्रतिदिन भाग लेते रहे। बाहर से भी बहुत सारे गायत्री प्रेमी पधारे थे। सर्वश्री धर्मचंद जी ए.एम.ई. (गोण्डा), केदारनाथ वैश्य, रामबली सिंह, गौती प्रसाद श्रीवास्तव (बहराइच), बुद्धिलालजी एम.एल.ए. (नानपरा) का सहयोग सराहनीय रहा। बारह-तेरह महात्मा भी बाहर से पधारे थे उनमें से श्री सर्वदानंद जी (चित्रकूट) का भाषण गायत्री-महिमा पर काफी प्रभावशाली हुआ। स्वामी रामानंद जी का व्याख्यान भी बड़ा आकर्षक हुआ। यज्ञ सकुशल समाप्त हो गया।

-रामसेवक त्रिपाठी

सुसनेर (म.प्र.) में गायत्री मंदिर स्थापित करने का कार्य द्रुतगति से चल रहा है। मंदिर की व्यवस्था होते ही उसमें पुस्तकालय भी खोला जायेगा। ता. तीस जून को श्री कन्हैयालाल दुबे के घर पर गायत्री यज्ञ बड़ी श्रद्धा के साथ किया गया। ज्यों−ही हवन की पूर्णाहुति होकर कार्यक्रम समाप्त हुआ कि श्री दुबेजी की पत्नी की माध्यमिक परीक्षा में उत्तीर्ण होने की सूचना प्राप्त हुई। दुबे जी ने प्रतिज्ञा की कि बिना 24 गायत्री जप किये भोजन न करेंगे। इनकी पत्नी ने गायत्री चालीसा का पाठ करने की प्रतिज्ञा की।

-कैलाश नारायण

कस्बा डिवाई (बुलंदशहर) में स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी की प्रेरणा से सवालक्ष आहुतियों का यज्ञ ता. 27, 28 जून व 1-2 जुलाई को 9 कुँडों की यज्ञशाला में श्री ओम प्रकाश जी गुप्ता द्वारा विधि पूर्वक संपन्न हुआ। इस अवसर पर बरेली से श्री चिम्मनलाल सूरी व उनकी पत्नी श्रीमती सुलोचना सूरी भी पधारे थे और उन्होंने बहुत परिश्रम करके यज्ञ को सफल बनाया। गायत्री परिवार के मंत्री की धर्मपत्नी शाँतिदेवी और श्रीमती सुलोचना ने घर-घर जाकर माताओं को यज्ञ का महत्व बतलाया और उसमें भाग लेने को प्रोत्साहित किया। इनका प्रयत्न सराहनीय रहा। इसी प्रकार श्री चिम्मनलाल जी सूरी, श्री ज्वाला प्रसाद जी शर्मा, श्री राम चंद्र जी बजाज पंजाबी (डिबाई निवासी), श्री कृष्णालाल जी बजाज पंजाबी, श्रीराम प्रकाश जी ने कड़कड़ाती दोपहरी में डिबाई की दुकान-दुकान व घर-घर जाकर पुरुषों को प्रोत्साहित किया। इस आयोजन को सफल बनाने में श्री मेघराज जी, श्री जिंदल तथा कुबेर काटन के मैनेजर आदि का सहयोग भी सराहनीय रहा। गायत्री तपोभूमि मथुरा से आये हुए आचार्यों ने बिना कुछ व्यय लिये समस्त काम विधि पूर्वक सम्पन्न कराया और इस प्रकार यह सामूहिक आयोजन बड़ी सुँदरता से पूरा हो सका।

-हरीशंकर गौड़

गालिबपुर (बुलंदशहर) में ता.9, 10, 11 जुलाई को 5 कुँडों की यज्ञशाला में स्वामी ब्रह्मस्वरूपजी (नगला मेवा जिला अलीगढ़) की व्यवस्था से यज्ञ कराया गया, जिसमें गायत्री तपोभूमि का धार्मिक दिखाया गया और 40 नवीन गायत्री उपासक बनाये गये। यह यज्ञ भी पं. ज्वाला प्रसाद के आचार्यत्व में संपन्न हुआ।

-हरीशंकर गौड़

व्यावर का गायत्री पुस्तकालय उन्नति कर रहा है। शीघ्र ही उसमें अधिक पुस्तकें मँगाकर रखने की व्यवस्था की जा रही है। इसके द्वारा पूरे अजमेर प्राँत में प्रचार किया जायेगा। गुरु पूर्णिमा को विशेष धूमधाम से उत्सव मनाया गया जिसमें अनेक विद्वानों के महत्वपूर्ण भाषण हुए। शीघ्र ही यहाँ महिला मंडल की भी स्थापना की जा रही है।

-मोहनलाल शर्मा

छिबरामऊ (फर्रुखाबाद) में ता. 9 से 11 तक एक सामूहिक यज्ञ बड़ी धूमधाम से किया गया। यह एक ऐसी भूमि थी जहाँ इस प्रकार का धर्म प्रचार का कार्य सफल होना अत्यंत कठिन जान पड़ता था। पर गायत्री माता की कृपा से सब कार्य बड़ी सुँदरता से संपन्न हो गये। बाहर से भी कई सज्जन पधारे थे।

-कृष्णा कुमारी

सिवनी मालवा (होशंगाबाद) की शाखा की तरफ से एक सामूहिक यज्ञ 27 से 29 मई तक नर्मदा नदी के किनारे आँवली घाट पर हुआ। इस कार्य में स्कूल इंस्पेक्टर पं. बैजनाथ शर्मा, कृपारामजी आर्य, राम गोपाल जी तिवारी, प्रेमदास जी आदि भक्त पुरुषों ने सराहनीय सहयोग दिया। यज्ञ में लगभग एक सहस्र रु. व्यय हुआ और पूर्णाहुतियों के समय 1500 जनता ने भाग लिया। इस कार्यक्रम में चतरखेड़ा, खरिया, पगढाल, भैरोंपुर और भिलाडिया की शाखाओं ने भी भाग लिया था।

-पं. गोवर्धन भट्ट

खूँटी(राँची) में गायत्री सामूहिक यज्ञ आषाढ़ कृष्ण 11 को किया गया जिसमें खूँटी व परंडा के सभी गायत्री उपासकों ने भाग लिया।

-छेदी भगत

तूँगा (जयपुर) में गायत्री जयंती (गंगा दशहरा) के अवसर पर 22 ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य बालकों का सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार किया गया, उसका समाचार गत मास की पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है। इस कार्य में हमको अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, क्योंकि पुराने ढंग के पंडित इस प्रकार के कार्य में अपनी आजीविका की हानि समझते हैं। हमने यद्यपि इस आयोजन के संबंध में आचार्य जी के अतिरिक्त ‘सनातन धर्म संस्कृत विद्यापीठ के अधिष्ठाताओं तथा कल्याण (गोरखपुर) से भी सलाह ले ली थी, तो भी एकाध स्थानीय पंडित जी ने हमारे कार्य का यथाशक्ति घोर विरोध किया। पर हमारे सहयोगी अपने विचार पर डटे रहे और अंत में कार्य ऐसी सफलता से पूरा हुआ कि गाँव वालों पर बड़ा प्रभाव पड़ा और वे गायत्री तपोभूमि के कार्यक्रम के महत्व को समझ गये। इस अवसर पर तपोभूमि की तरफ से श्री कृपा शंकर जी त्रिपाठी ने आकर धार्मिक सिनेमा का प्रदर्शन भी किया जिसका प्रभाव जनता पर बहुत अच्छा पड़ा।

-मदन मोहन सारस्वत

केराबदर(कालाहाँडी) में ता. 17 जून को सामूहिक जप, हवन, व चालीसा पाठ का कार्यक्रम सफलता पूर्वक हुआ। इसकी सारी व्यवस्था श्री सुबल प्रसाद शर्मा ने की।

-मंत्री, शाखा सभा

भद्रपुर (फतेहपुर) प्रमुख गायत्री उपासक श्री सीताराम जी यादव के यहाँ एक विशाल गायत्री हवन सम्पन्न हुआ। अखण्ड गायत्री चालीसा पाठ व अखण्ड रामायण पाठ भी किया गया। बस्ती के अन्यान्य व्यक्तियों ने भी बड़ी श्रद्धा से इसमें भाग लिया और अपने-अपने घरों से समिधा लाये। इस आयोजन में सर्व श्री रामावतार वर्मा, देवी दयाल वर्मा, गुरु प्रसाद वर्मा, सीताराम यादव, राजाराम, मदनचंद्र यादव, शिवलाल व रामकिशोर वर्मा ने दिन−रात परिश्रम करके इसे सफल बनाया।

-रामाश्रय वर्मा, एम.ए.

नारदीपुर (गुजरात) में 24 हजार आहुति का सामूहिक यज्ञ बड़ी धूमधाम से सम्पन्न हो गया। श्री लंबे नारायण स्वामी, श्री हरिप्रकाश नंद तीर्थ तथा शाँतिलाल सरढब आदि की उपस्थिति में पूर्णाहुति बड़े उत्साह से की गयी। यज्ञ में लगभग 4200 रुपये का व्यय हुआ जिसकी व्यवस्था गाँव के पटेल तथा अपने मित्रों द्वारा की गयी।

-मोहनलाल नीनदास

ग्राम बाबड़ी जिला टोंक (राजस्थान) में तीस मई को सवालक्ष जप व चौबीस हजार आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया गया। इसमें श्री जमनालाल जी गौड़, श्री रामकिशोर जी आचार्य, पं. प्रभु नारायण जी शास्त्री आदि विद्वानों ने भाग लिया। पूर्णाहुति पर विशाल ब्रह्मभोज दिया गया, पंडितों को पुरस्कार बाँटा गया। ग्राम बाबड़ी की जनता ने इस यज्ञ में सराहनीय कार्य किया।

-जगदीश प्रसाद शर्मा

कनगेटी (मंदसोर) में गायत्री जयंती का उत्सव निर्जला एकादशी व पूर्णिमा को बड़ी धूमधाम से मनाया गया। सदस्यों में गायत्री उपासना का अच्छा उत्साह है। उत्सव श्री नंदराम दास जी वैरागी व कन्हैयालाल जी वोहरा के स्थान पर हुआ था।

-वैद्य गेंदालाल समाधिया

मऊरानीपुर (झाँसी) में 60 हजार आहुतियों का सामूहिक गायत्री महायज्ञ ता. 11 जून से 17 तक संपन्न हुआ। स्थानीय जनता ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। ब्रह्मभोज हुआ और 450 गायत्री चालीसा बाँटे गये।

-सालिगराम पाण्डे

गुरुकुल बकानी (झालाबाड़) में श्री महाबीर प्रसाद शर्मा अध्यापक ने 25 दिन तक दूध दही पर रहकर अनुष्ठान किया। साथ में कमला देवी, जानकी देवी, गिरजा देवी, सूरज बाई, राम प्यारी बाई आदि ने भी छोटे अनुष्ठान किये। जेष्ठ शु. 8 को 2600 आहुतियों का हवन करके पूर्णाहुति की गई जिसमें ब्रह्मभोज तथा चालीसा वितरण किया गया।

-रामप्रसाद शर्मा

कोत्तागुड़ा (द. भारत) में गायत्री जयंती के अवसर पर जप व यज्ञ का कार्यक्रम उत्साह पूर्वक संपन्न किया गया। -मदनलाल

मझोला (पीलीभीत) में कई सदस्यों ने सवालक्ष और चौबीस हजार अनुष्ठान किये। पूर्णाहुति विधिवत की गई।

-लक्ष्मण सिंह मनराल

सेरसा (झाँसी) के सब सदस्यों ने मिलकर सवालक्ष का सामूहिक अनुष्ठान ता. 27 जून से 3 जुलाई तक किया। इसकी पूर्णाहुति विधिवत की गयी और धर्म फेरी भी लगाई गयी।

-सरयूप्रसाद तिवारी

गरोठ (जिला मंदसौर, मध्यप्रदेश) में गायत्री जयंती के उपलक्ष में ता. 7 जून से 12 तक विभिन्न स्थानों पर गायत्री यज्ञ और कथा आदि का प्रोग्राम रखा गया। कुल मिलाकर 27 हजार आहुतियाँ दी गयीं। महिलाओं में विशेष उत्साह रहा और उन्होंने बहुत ही बड़ी संख्या में सम्मिलित होकर कार्यक्रम को सफल बनाया।

-शंकरलाल चौधरी

रानीमुडा (उड़ीसा) में ता. दो जुलाई को एक सामूहिक गायत्री जप व हवन, सत्संग, चालीसा पाठ आदि का आयोजन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। प्रसाद भी बाँटा गया।

-पं. हरिकृष्ण सुपकार शर्मा

सुसनेर (जिला शाजापुर) में मई 57 से अब तक 54 हवन हो चुके है। आयुर्वेदाचार्य रामचंद्र जी शर्मा के यहाँ 500 आहुतियों का हवन हुआ और श्री रामलाल जी डोंगरगाँव वाले के यहाँ गुरुपूर्णिमा को 1300 आहुतियों का हवन हुआ।

-नंदकिशोर शर्मा

अजीतगढ़ (सीकर, राजस्थान) में गुरुपूर्णिमा को जानकी नाथ जी के मंदिर में समस्त गायत्री उपासकों का सामूहिक यज्ञ किया गया। सैकड़ों आदमियों ने भाग लिया और आहुतियाँ अनगिनती दी गयीं। हरिकीर्तन, सत्यनारायण की कथा, प्रसाद वितरण, गायत्री चालीसा वितरण आदि सभी कार्य उत्साह पूर्वक मनाये गये।

-पं. जगदीश नारायण मिश्र, भारद्वाज

मँझिया (हरदोई) में 10 से 13 मई तक 9 यज्ञ कुण्डों में बड़ी धूमधाम से यज्ञ हुआ। बहुसंख्यक लोग गायत्री चालीसा का पाठ भी करते रहते थे। यज्ञ बड़ा ही प्रभावशाली था और सब पण्डितों ने अपने ढोंग को इस अवसर पर अलग रख दिया था। एक दुर्घटना जो क्षत्रियों में आपसी संघर्ष की इसी दिन होने वाली थी और जिसमें न जाने कितनी जानें जातीं, आपस में सुलह होकर शाँत हो गई। इस से गाँव में और भी खुशी छा गई और सब ने यज्ञ कार्य में पूरे उत्साह से भाग लिया।

-शिवराम दीक्षित

बेसड़ी (फतेहपुर) में गुरु पूर्णिमा को गायत्री परिवार द्वारा 2 हजार आहुतियों का यज्ञ किया। सर्वश्री श्रीराम तिवारी, महावीर प्रसाद तिवारी, रामस्वरूप शुक्ल, बालकृष्ण, गणेश प्रसाद तथा शिरोमणि प्रसाद ‘ननकुल’ ने सक्रिय योगदान प्रदान किया।

-सत्यव्रत विद्यारत्न

कुर्रा (हमीरपुर) में संपूर्ण गायत्री उपासकों ने मिलकर हनुमानजी के आश्रम पर 24 हजार का गायत्री यज्ञ आषाढ़ सुदी 11 को किया। बस्ती के सभी स्त्री-पुरुषों ने बड़ी श्रद्धा-भक्ति से आहुतियाँ दीं। मझगवाँ निवासी दीवान बजरंग, बल्लभसिंह जी, धनवाँ निवासी मुँशी नाथूराम खरे, तथा पं. परसाम जी मिश्र, कैंघी (राठ) से पं. दुर्गाप्रसाद जी , श्री रघुदयालजी आदि अनेक महानुभावों ने इस महायज्ञ में भाग लिया। कन्या भोजन और चालीसा वितरण भी हुआ।

-पं. भवानी दीन शर्मा

गणेशगंज व टीकमगढ़ (बुँदेलखंड) में गायत्री उपासकों के उद्योग से गुरु पूर्णिमा को एक सामूहिक जन व हवन का आयोजन समारोह पूर्वक संपन्न हुआ। आस-पास के गाँवों की जनता ने भी श्रद्धा पूर्वक भाग लिया।

-जगतराम पस्तोर

साँगोद (कोटा) में गुरु पूर्णिमा को भूतेश्वर बगीची में सामूहिक यज्ञ किया गया और श्रावण मास में दैनिक अग्निहोत्र का संकल्प किया गया।

-बद्रीलाल पंचोली

मनमाड (नासिक) में हवन का कार्यक्रम चालू है। गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष में 360 आहुतियों का विशाल हवन किया गया।

-शिवचन्द्र

दिगौड़ा (टीकमगढ़) में गुरुपूर्णिमा के अवसर पर सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, चालीसा पाठ का आयोजन किया गया। कन्या-भोजन भी कराया गया। जतरा तहसील के गाँव-गाँव में गायत्री-चालीसा वितरण कराये गये।

-बैजनाथ प्रसाद शर्मा

महिदपुर (उज्जैन) में धूर्जटेश्वर महादेव पर 5 दिन तक यज्ञ किया गया। ब्रह्मभोज हुआ व प्रभात फेरी भी लगाई गयी।

-मंत्री ‘झारडा’ शाखा

झूमकी (झालावाड़) में गुरुपूर्णिमा के उपलक्ष में एक हवन किया गया और प्रसाद बाँटा गया।

-राम प्रसाद गुप्ता

फरीदपुर (फतेहपुर) में गुरुपूर्णिमा का हवन शारदा मंदिर में श्री प्यारेलाल जी व श्री गयादीनजी की अध्यक्षता में पूर्ण हुआ। शाखा की तरफ से रामायण का अखण्ड सम्पुट पाठ हुआ। कन्या भोजन व प्रसाद वितरण हुआ।

-मोतीलाल वर्मा

दोनापुर (जालौन) में 12 ग्रामों में धर्मफेरी करके गुरुपूर्णिमा को यज्ञ किया गया और दो-ढाई सौ व्यक्तियों का भोजन किया गया। इसमें श्री राम सिंह कुशवाहा से काफी मदद मिली।

-मनीराम

भिण्ड (ग्वालियर) में गुरुपूर्णिमा पर गायत्री महायज्ञ अत्यंत उत्साहपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। 32 सौ आहुतियाँ दी गयीं। श्री सत्यदेव जी शास्त्री ने यज्ञ का संचालन बड़े सुचारु रूप से किया और वकील साहब का गायत्री पर विवेचनात्मक भाषण हुआ।

-केदारनाथ गुप्ता

कराहल परगना (ग्वालियर) के बाढ़, खिरखिरी सेमरा, चक रामपुर आदि ग्रामों में गायत्री परिवारों ने सामूहिक रूप से आषाढ़ से क्वार तक, सवा करोड़ जप अधिकतम नये उपासकों के द्वारा कराने का निश्चय किया है। जिसकी पूर्णाहुति क्वार सुदी मंगलवार को होगी।

- मंत्री, शाखा सभा

हरनावदाशाहजी (कोटा) में एक मास में सवा लक्ष जप व एक हजार गायत्री चालीसा पाठ के संकल्प लिया गया। भगवती की कृपा से नियत समय तक 20 हजार जप व 37 पाठ विशेष हुए। गुरु पूर्णिमा पर दशाँश हवन का कार्यक्रम रखा गया। जिसमें सब सज्जनों ने भाग लिया। भगवती के चित्र बैण्ड बाजे के साथ जुलूस निकाला गया। एक-दो सज्जनों के व्यर्थ के विरोध करने पर भी यज्ञ बड़ी शान और सफलता से संपन्न हुआ। गेंदीलाल जी शर्मा, बंशीधर, मोहनलाल, रामगोपाल गुप्ता, शालिग्राम, मूलचंद आदि उपासकों ने उल्लेखनीय भाग लिया।

-मंत्री, गायत्री परिवार

खेर्डा (बंबई प्राँत) में गुरुपूर्णिमा का जप व हवन समारोह पूर्वक किया गया।

-किशन जाणूजीवा घमारे

राधनपुर (गुजरात) में गायत्री परिवार की तरफ से एक विशाल यज्ञ आसोज मास में करने का संकल्प किया गया है, जिसके लिए गायत्री प्रेमी चुनीलाल भाई सोमाभाई ने 5 हजार रुपये चंदा दिया है।

-मंत्री, यज्ञ समिति

पहाड़पुर (बदायूँ) में श्री ज्वाला सहायजी सक्सेना के नये भवन पर यज्ञ और चालीसा पाठ श्री पवनजीत द्वारा हुआ। इसके बाद श्री दुर्गादेवी के भवन, शिवमंदिर, भजनलालजी शर्मा अध्यापक, राजेन्द्र सिंह जी यादव, मंगलीप्रसाद जी कोरी ,हरप्रसादजी यादव आदि के स्थानों पर पृथक-पृथक यज्ञ किये गये जिनमें पवनजीत कुमार और अशोक कुमार ने उत्तम व्यवस्था की। ज्वाला सहाय के कई प्रभावशाली प्रवचन भी हुए। इस प्रकार यहाँ यज्ञ और कीर्तन की धूम मचा दी गई है और आशा है आगे चलकर यह शाखा उत्तम कार्य कर सकेगी।

-इच्छापूर्ण गौड

कोटा में राजस्थान के सक्रिय कार्य-कर्ताओं के प्राँतीय सम्मेलन की योजना की गयी है, जिसमें कोटा, बूँदी, झालावाड़ टोंक तथा म.प्र. के शाजापुर व मंदसोर जिले की शाखाओं ने भाग लेना निश्चय किया है। सम्मेलन का कार्यक्रम तय किया जा रहा है।

-शंभू सिंह हाड़ा

आरंग (रायपुर) में गुरु पूर्णिमा उत्सव बड़े ही उल्लास व उत्साह के वातावरण में मनाया गया। बड़ी संख्या में गायत्री जप, पाठ, लेखन, हवन और प्रवचन का कार्यक्रम संपन्न हुआ। सभी सदस्यों ने गायत्री तपोभूमि के लिए गुरु पूर्णिमा की श्रद्धाँजलि के साथ थोड़ा-थोड़ा धन भी अर्पण किया।

-विद्या प्रसाद मिश्र

जमशेदपुर बिहार में आषाढ़ पंचमी से 9 दिन सवा लाख का अनुष्ठान हुआ। गुरु पूर्णिमा को 38 सौ के लगभग आहुतियों का हवन हुआ। सर्वश्री सुदामा, शीतलाशंकर,कमला ने इस कार्य में विशेष योगदान दिया।

-मंत्री

लखनादौन (म.प्र.) में गुरुपूर्णिमा को दिन के तीन बजे तक श्री रमेश कुमार जी नैपाली के घर पर गायत्री हवन तथा हरि कीर्तन का आयोजन किया गया। सदस्यों ने उत्साह से भाग लिया। पुस्तकालय खोलने का प्रस्ताव किया गया।

-श्री कृष्ण कौशल

व्यावर में गुरुपूर्णिमा को गायत्री पाठ व चालीसा पाठ का कार्यक्रम हुआ। रात्रि को केशव स्वरूप जी, वैद्यराज चतुर्भुज शर्मा, राजजी आर्य आदि के भाषण हुये।

हस्वा (फतेहपुर) में श्री बृजबिहारी शुक्ल के स्थान पर सामूहिक आयोजन किया गया जिसमें अखण्ड रामायण पाठ व कीर्तन आदि भी किया गया।

-रामावतार शर्मा

माकडोन (उज्जैन) में गुरु पूर्णिमा को प्रातःकाल प्रभातफेरी लगाई गयी। श्री सीताबाई के मकान पर 21 महिलाओं ने 2100 आहुतियों का हवन किया। इसी प्रकार बापू शिवाजी व सीताराम जी बड़िया के यहाँ सामूहिक हवन किये गये। सुनार सेरी में गुरुजी के चित्र का पूजन किया गया।

-नंद किशोर

पिलसना (इटावा) में गायत्री परिवार की ओर से गुरु पूर्णिमा पर दो यज्ञों का आयोजन किया गया जो सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए। संपूर्ण ग्रामवासियों ने श्रद्धापूर्वक भाग लिया। एक यज्ञ श्री राजाराम जी ने निज व्यय से संपन्न कराया।

-कृष्ण लाल द्विवेदी

बमनी बाजार (बस्ती) में गुरु पूर्णिमा को गायत्री माता, यज्ञ भगवान व गुरुजी के चित्रों का डोला बनाकर जुलूस निकाला गया जिसके साथ बहुत से गाजे-बाजे थे। हवन भी किया गया।

-कन्हाईदासजी वैष्णव

जूना बिलासपुर (म.प्र.) में गुरु पूर्णिमा पर गायत्री परिवार ने बड़े उत्साह से गुरु पूजन, मंत्र लेखन और सामूहिक यज्ञ किया। प्रत्येक सदस्य द्वारा गुरु चरणों में दक्षिणा भी अर्पित की गयी जो एकत्रित करके भेजी जायेगी।

-चीनाराम पोद्दार

नर्रा (रायपुर) में गुरु पूर्णिमा को 5000 आहुतियों का सामूहिक हवन तथा गुरु पूजन किया गया। गायत्री चित्र व गायत्री चालीसा बाँटे गये।

-गुरु प्रसाद निगम

धारोला (शाजापुर) में एक पंचकुँडी सामूहिक यज्ञ सानंद समाप्त हो चुका है।

-पं. सुँदरलाल त्रिवेदी

बड़वाह (नेमाड़) में सामूहिक यज्ञ किया गया। माता का जुलूस भी पूरे नगर में निकाला गया। माताओं और बहिनों ने बहुत बड़ी संख्या में भाग लिया।

-राजेन्द प्र. पाठक

पिछोर (झाँसी) में गुरु पूर्णिमा पर 45 सदस्यों ने जप व हवन का कार्यक्रम पूरा किया।

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नम्र निवेदन!

(श्री. मोहन ‘अंबर’)


नम्र निवेदन (Kavita)

जीने और जिलाने को यदि पीकर जहर मरो तुम!

तो यह गलती एक बार क्या सौ-सौ बार करो तुम!!

जाओ, तुम सागर की मस्ती बादल बन कर लाओ,

ला-ला कर धरती के प्यासे आँगन पर बरसाओ,

जैसे भी हो सुख-दुख को अब हिस्सों में बँटवा कर-

कोई फूल उदास न हो ऐसी बगिया सजवाओ,

यह मेरा उपदेश नहीं, पर नम्र निवेदन तुमसे,

इसी तरह यदि इस दुनिया के दुख का बोझ हरो तुम!

तो यह गलती एक बार क्या सौ-सौ बार करो तुम!!

धूप सताये भी तुमको तो, मात न उससे खाओ,

रूप अगर रोके पथ में सप्रोत उसे समझाओ,

चाँद मिले यदि चौदस का तो उसको धैर्य बँधाकर-

युग के पथ का तिमिर मिटाओ, अंतर दीप जलाओ,

यह मेरा उपदेश नहीं, पर नम्र निवेदन तुमसे,

इसी तरह यदि कठिन डगर पर गतिमय चरण धरो तुम!

तो यह गलती एक बार क्या सौ-सौ बार करो तुम!!

तुलसी की करतालों से धुन लेकर राम जगाओ,

सूरा के एकतारे की तन्मयता मत बिसराओ,

और कबीरा मीरा की स्मृति को जीवित रखने को-

सीधी-सी भाषा में जीवन को छंदों में गाओ,

यह मेरा उपदेश नहीं पर नम्र निवेदन तुमसे,

इसी तरह यदि गाँव-गली तम अमृत गूँज भरो तुम!

तो यह गलती एक बार क्या सौ-सौ बार करो तुम!!

तो यह गलती एक बार क्या सौ-सौ बार करो तुम!!

*समाप्त*