(श्री चंद्रमुखी रस्तोगी, बी. ए. जयपुर )
प्यार मन बहलाव का साधन नहीं है।
प्यार है वह जो हमें भू से उठादे,
प्यार वह है जो हमें भू से मिलादे।
प्यार है वह जो हमें जीना सीखादे,
प्यार है वह जो सरस जीवन बनादे।
पर बिगड़ता प्यार में जीवन नहीं है- प्यार,
मन बहलाव का साधन नहीं है॥
कौन कहता है किरण नभ की परी है?
थकित-रवि के व्यथित उर की आग है वह।
आँसुओं को तुम रुदन क्यों मानते हो?
विकल-मन का मूक विगलित राग है वह।
जो स्वरों का मानता बन्धन नहीं है-
प्यार मन बहलाव का साधन नहीं है॥
आज भी मेरे हृदय में एक सिहरन,
आज भी मेरे हृदय में एक तड़पन।
मैं वही हूँ तुम वही हो,जग वही है,
आज भी तुम्हारा चिर मधुर मन।
किन्तु, कारण हीन आकर्षण नहीं है- प्यार,
मन बहलाव का साधन नहीं है॥
(महात्मा गाँधी)
संन्यास और योग (निष्काम कर्म)ये दोनों अच्छे हैं ,पर मुझे यदि चुनाव ही करना पड़े, तो मैं योग अर्थात् अनासक्ति कर्म को ज्यादा पसन्द करूंगा। जो मनुष्य किसी वस्तु या मनुष्य से न द्वेष करता है ,न राग रखता है, न कोई इच्छा रखता है, सुख-दुख सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वों से परे रहता है वह संन्यासी ही है। फिर वह कर्म करता हो या न करता हो। ऐसा मनुष्य सहज में बंधन मुक्त हो जाता है। अज्ञानी ही ज्ञान और योग में भेद करता है, ज्ञानी ऐसा नहीं करेगा। उसकी दृष्टि में दोनों का परिणाम एक ही होता है, अर्थात् दोनों से वही दर्जा मिलता है। इसलिए सच्चा जानने वाला वही है जो दोनों को एक समझता है।
शुद्ध ज्ञान वाले के संकल्प भर से कार्य सिद्धि होती है, अर्थात् बाहरी कर्म करने की उसे जरूरत नहीं रहती । जब जनकपुरी जल रही थी तो दूसरों का धर्म था कि जाकर आग बुझायें। महाराज जनक के संकल्प से ही उनका आग बुझाने का कर्तव्य पूरा हो रहा था, क्योंकि उनके सेवक उनके अधीन थे। यदि वह घड़ा भर पानी लेकर दौड़ते तो कुल चौपट कर देते। दूसरे लोग उनकी ओर ताकते रहते और अपना कर्तव्य भूल जाते। और विशेष भलमंसी दिखाते तो हक्के-बक्के होकर सब जनक की रक्षा करने दौड़ते। पर वे सब जनक नहीं बन सकते, क्योंकि जनक की सी मनोवृत्ति बड़ी दुर्लभ है करोड़ों में से किसी को वह अनेक जन्मों की सेवा से प्राप्त हो सकती है। निष्काम कर्म करने वाले मनुष्य का संकल्प बल उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है और बाहरी कर्म कम होते जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को बाहर से देखने पर उसका पता भी नहीं लगता और वह कोई प्रयत्न दिखलाई नहीं देता पर वास्तव में वह सेवा कार्य में डूबा रहता है। उसकी सेवा शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि उसे सेवा से कोई थकान आती नहीं जान पड़ती। इससे अन्त में उसके संकल्प में ही सेवा आ जाती है, वैसे ही जैसे कि बहुत जोर से गति करती हुई वस्तु स्थिर सी लगती है। ऐसा मनुष्य कुछ करता नहीं है, यह कहना प्रत्यक्ष रूप से उपयुक्त है। पर ऐसी स्थिति साधारणतः कल्पना की ही वस्तु है अनुभव में नहीं आती।
इसलिए कर्म योग का महत्व अधिक माना गया है। करोड़ों जीव निष्काम कर्म द्वारा ही संन्यास का फल प्राप्त करते हैं। वे संन्यासी होने जाएं तो इधर या उधर, कहीं के न रहेंगे। संन्यासी होने जाएं तो मिथ्याचारी हो जाने की पूरी संभावना है, और कर्म से तो गये ही, अर्थात् उन्होंने सब कुछ खो डाला। पर जो मनुष्य अनासक्त कर्म करता हुआ शुद्धता को प्राप्त करता है, जिसने अपने मन को जीता है,जिसने अपनी इन्द्रियों को वश में रखा है, जिसने सब जीवों के साथ अपनी एकता साधी है और सबको अपने ही समान मानता है, वह कर्म करते हुए भी उससे अलग रहता है, अर्थात् बन्धन में नहीं पड़ता। ऐसा मनुष्य बोलने-चालने आदि की क्रियाएं करते हुए भी ऐसा लगता है कि इन क्रियाओं को इन्द्रियाँ अपने धर्मानुसार कर रहीं हैं। स्वयं वह कुछ नहीं करता। शरीर से आरोग्य पुरुष की क्रियाएं स्वभाविक होती हैं उनके जठर फेफड़े आदि अपने आप काम करते हैं, इसकी ओर उसे कुछ ध्यान नहीं देना पड़ता। इसी प्रकार जिसकी आत्मा आरोग्य है उसके लिये कहा जा सकता है कि वह शरीर में रहते हुये भी स्वयं लिप्त है, कुछ नहीं करता। इसलिए मनुष्य को चाहिये कि सब (3) कर्म ब्रह्मार्पण ही करे, तब वह कर्म करते हुये भी पाप अथवा पुण्य का उपार्जन नहीं करेगा। पानी में कमल की भाँति कोरा का कोरा ही रहेगा। इसलिये जिसने अनासक्ति का अभ्यास कर लिया है वह व्यक्ति काया से, मन से, बुद्धि से कार्य करते हुये भी मोह रहित होकर, अहंकार जलाकर व्यवहार करता है इससे वह शुद्ध हो जाता है और शान्ति भी पाता है। पर जो इस योग को नहीं जानता, फल की कामना करता रहता है, वह कैदी की भाँति अपनी कामनाओं में बंधा रहता है।
इस नौ दरवाजे वाले देह रूप नगर में सब कर्मों का मन से त्याग करके,स्वयं कुछ न करता हुआ योगी सुखपूर्वक रहता है। संस्कारवान शुद्ध आत्मा न पाप करता है न पुण्य। जिसकी कर्म में आसक्ति नहीं, अहंभाव नष्ट कर दिया , फल का त्याग किया, वह जड़ की भाँति बरतता है, निमित्त मात्र बना रहता है, भला उसे पाप पुण्य कैसे छू सकते हैं? इसके विपरीत जो अज्ञान में फंसा है, वह हिसाब लगाता रहता है-इतना पुण्य किया, इतना पाप किया और इससे वह नित्य ही नीचे गिरता जाता है। और अन्त में उसके पल्ले पाप ही रह जाता है। ज्ञान से अपने अज्ञान का नाश करते जाने वाले के कर्म में नित्य निर्मलता बढ़ती जाती है, संसार की दृष्टि में उसके कर्मों में पूर्णता और पुण्य का भाव होता है, उसके सब कर्म स्वभाविक जान पड़ते हैं। वह समदर्शी होता है। उसकी नजरों में विद्या और विनय वाला ब्रह्मज्ञाता ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता और विवेक-हीन पशु से भी गया बीता मनुष्य सब समान है। आशय यह है कि वह सबकी समान भाव से सेवा करेगा- यह नहीं कि किसी को बड़ा मानकर उसका मान करेगा और दूसरे को तुच्छ समझ कर उसका तिरस्कार करेगा। अनासक्त मनुष्य अपने को सबका देनदार मान कर सबको उनका लहना चुकावेगा और पूरा न्याय करेगा। उसने जीते जी जगत को जीत लिया है, वह ब्रह्ममय है। अपना प्रिय करने वाले पर रीझता नहीं, गाली देने वाले पर खीझता नहीं। आसक्तिवान सुख को बाहर ढूँढ़ता है, अनासक्त निरन्तर भीतर से शान्ति पाता है, क्योंकि बाहर से अपने जीव को समेट लिया है। इन्द्रियजन्य समस्त भोग दुख के कारण हैं। मनुष्य को काम क्रोध से उत्पन्न उपद्रवों का मुकाबला करके उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिये। जो योग अर्थात् समत्व को साधना चाहता है उसका कर्म बिना गुजारा ही नहीं। जिसे समत्व प्राप्त हो गया है, वह शान्त दिखलाई देता है। तात्पर्य उसके विचार मात्र में कर्म का बल आ जाता है। जब मनुष्य इन्द्रिय के विषयों में या कर्म में आसक्त न हो और मन की सारी तरंगों को छोड़ दे तब कहना चाहिये कि उसने योग साधा है अथवा वह योगारुढ़ हुआ है।
आत्मा का उद्धार आत्मा से ही होता है। इसे यों भी कह सकते हैं कि आत्मा ही स्वयं अपना शत्रु बनता है और स्वयं ही मित्र बनता है। जिसने मन को जीता है उसका आत्मा मित्र है, जिसने नहीं जीता है उसका आत्मा शत्रु है।
अनासक्त योगी सब प्राणियों के हित में ही लगा रहता है वह शंकाओं से पीड़ित नहीं होता । ऐसा योगी बाहरी जगत से निराला रहता है वह सदैव स्थिर चित्त रहता है और कामनाओं का अनायास त्याग किये रहता है। उसे जग के खेल अथवा अपने मन में उठने वाली विचारों की लहरें डाँवाडोल नहीं कर सकतीं। प्रकट में वह संसार के कामों लिप्त दिखलाई पड़ता है, तो भी उस पर चारों तरफ के वातावरण का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसा ही अनासक्त कर्मयोगी परमात्मा को जानने और परम शाँति प्राप्त करने में समर्थ होता है।
(श्री अरविंद घोष)
विश्व में दो महान् शक्तियाँ हैं। एक को हम नीरवता कह सकते हैं और दूसरी को वाक् । नीरवता सब प्रकार की तैयारी करती है और वाक् उत्पन्न करने वाली शक्ति है । नीरवता कार्य करती है और वाक् कार्य के लिये प्रेरणा करती है। संसार में जितने महान् कार्य होते हैं वे सब अपने आपको अन्दर ही अन्दर पूर्ण बनाते हैं। समुद्र के ऊपरी तल पर अनगिनत तरंगों की हलचल रहती है। पर उसके नीचे के तल में अथाह अदम्य जलराशि रहती है। मनुष्य तरंगों को देखते हैं, वे लोगों की गपशप और हजारों तरह की सम्मतियों को सुनते हैं, और इन्हीं से वे भविष्य की दिशा का और ईश्वरीय संकल्प के रहस्य का निर्णय कर लेते हैं। परन्तु दस में से नौ अवस्थाओं में वे निर्णय गलत होते हैं। इसीलिए लोग प्रायः यह कहा करते हैं कि इतिहास में सदैव ऐसी घटनाएं होती हैं जिनकी पहले से कोई आशा नहीं होती। पर वे इस बात को नहीं समझते कि इस प्रकार अप्रत्याशित घटना होने का कारण यही है कि लोगों की दृष्टि ऊपरी सतह पर रहती है, और वे अन्दर पैठ कर सारतत्व को देखने में असमर्थ रहते हैं। अगर वे जीवन के शोर को सुनना बन्द कर दें और उसकी जगह नीरवता सुनें तो वे वास्तविकता को भी स्पष्ट रूप में देख सकते हैं।
बड़े-बड़े श्रम के कार्य प्राण को अन्दर रोक कर किये जाते हैं। श्वास लेना जितना अधिक तेज होगा उतना ही अधिक शक्ति का अपव्यय होगा। । जो पुरुष कार्य के समय स्वाभाविकतया, सहजतया श्वास बन्द कर सकता है, वह प्राण का, उस शक्ति का जो सम्पूर्ण विश्व में काम करती है और सर्जन करती है - स्वामी है। सभी योगियों का यह अनुभव है कि जब विचार बन्द होता है, श्वसन (साँस आना जाना) भी बन्द हो जाता है और जब विचार पुनः प्रारम्भ होता है, तो श्वास भी अपनी क्रिया को पुनः प्रारम्भ कर देता है। परंतु जब विचार होते रहने पर भी श्वास -प्रश्वास जारी न हो, तब यह समझा जा सकता है कि हमने प्राण को सच्चे तौर पर जीत लिया । यह प्रकृति का नियम है। जब हम काम करने का प्रयत्न करते हैं तो प्राकृतिक शक्तियाँ हमारे साथ अपनी मनमानी करती हैं, पर जब हम शान्त हो जाते हैं तो उनके कर्ता-धर्ता बन जाते हैं। परन्तु शान्ति भी दो प्रकार की होती है- एक जड़ता की असहाय शान्ति, जो विनाश का चिन्ह है, और दूसरी ईशत्व की शान्ति , जो जीवन को संगीतमय बना देती है। यह ईशत्व की शान्ति ही योगी की स्थिरता है। स्थिरता जितनी पूर्ण होगी उससे उत्पन्न शक्ति भी उतनी ही प्रबल होगी, और कर्मगत तेज भी उतना ही महान् होगा।
इसी स्थिरता में यथार्थ ज्ञान का उदय होता है। मनुष्यों के विचार सच और झूठ के सम्मिश्रण हैं। असत्य का बोध, सत्य बोध को विकृत कर देता है, झूठा निर्णय-सच्चे निर्णय को पंगु बना देता है, झूठी कल्पना सच्ची कल्पना को कुरूप कर देती है, झूठी स्मृति सच्ची स्मृति को धोखे में डाल देती है। मन की क्रिया को बन्द करना होगा, चित्त को पवित्र करना होगा, प्रकृति की चंचलता पर निश्चल नीरवता को छा जाना होगा,तब स्थिरता में-निःशब्द शान्ति में प्रकाश मन में उत्पन्न होता है। यथार्थ ज्ञान यथार्थ कर्म का अचूक स्त्रोत बन जाता है। इसी को कहा गया है- ‘योगः कर्मसु कौशलम्’।
ऐसे व्यक्ति का ज्ञान दूसरे लोगों की तरह कामना और हलचल से परिचालित नहीं होता है, न वह वैज्ञानिक तर्क बुद्धि और व्यवहार कुशलता से ही उत्पन्न होता है, क्योंकि ये दोनों प्रकार के ज्ञान ऊपरी तथ्यों के आधार पर स्थिर होते हैं और अनुभव तथा अनुमान का सहारा लिया करते हैं। पर चित्त को शान्त कर लेने वाला व्यक्ति ईश्वर के काम करने के ढंग को जानता है, और उसे यह पता होता है कि जगत में प्रायः असम्भव घटनाएं ही हुआ करती हैं, और तथ्यों का भरोसा करने वाले व्यक्ति इधर-उधर भटक जाते हैं। वह बुद्धि के तल से उठ कर उस साक्षात ज्ञान के लोक से उठ जाता है जिसे योग शास्त्र में विज्ञान कहा गया है। कामनाओं में फंसे हुये मनुष्यों का मन अच्छे और बुरे की, रुचिकर की, सुख दुःख की उलझन में फंसा रहता है। वह सदा ही अच्छे को, सदा ही रुचिकर को, सदा ही सुख को पाने की कोशिश करता है। सौभाग्यपूर्ण घटनाओं से वह फूल जाता है, और उससे विपरीत घटनाओं के कारण वह व्याकुल, उदास हो जाता है। परन्तु सच्चा ज्ञानी देखता है कि सब कुछ, प्रत्येक घटना भले की ओर ले जाने वाली है, क्योंकि समस्त घटनाओं का कर्ता ईश्वर है और वह सर्वमंगलमय है। वह जानता है कि जो बात प्रकट में बुरी जान पड़ती है, वह प्रायः भलाई तक पहुंचने का सबसे नजदीक का मार्ग होती है, अरुचिकर वस्तु रुचिकर वस्तु को तैयार करने के लिये अनिवार्य होती है और जिसे हम दुर्भाग्य कहते हैं वही विशेष सुख प्राप्त करने का साधन होता है। इस प्रकार सब ज्ञानी की बुद्धि द्वंद्वों की दासता से मुक्त होती है।
यही कारण है कि एक योगी अथवा ज्ञानी का कार्य वैसा नहीं होता जैसा साधारण मनुष्यों का हुआ करता है। वह प्रायः ऐसा दिखाई देगा मानो वह बुराई को खराब नहीं समझता, विपत्ति को हटाने का प्रयत्न नहीं करता, और हिंसा तथा दुष्टता के कार्यों को रोकने में सहयोग नहीं देता। जहाँ क्रिया-शीलता की माँग होती है, वहाँ वह निष्क्रिय रहता है,जहाँ लोग जोर-जोर से बोलने की आशा करते हैं वहाँ वह शान्त रहता और जहाँ तीव्रता की आवश्यकता जान पढ़ती है वहाँ वह अचल बना रहता है। इसलिये लोग उसे जड़ या गतिशून्य समझते हैं और जब वह काम करेगा तो उसका कोई निश्चित फल या प्रयोजन न होगा और वे एक ऐसे उद्देश्य के लिये होंगे जिसका इस संसार से कोई सम्बंध न होगा। यह देख कर उसे ‘उन्मत्त’ या ‘पागल’ कहने लगेंगे। सच बात तो यह है कि वह एक ऐसे प्रकाश का अनुसरण करता है जो दूसरों को प्राप्त नहीं है, और जिसे वे ‘अन्धकार’ कहकर पुकारना पसन्द करते हैं। इस प्रकार जो कुछ उनके लिए स्वप्न है, वह उसके लिये वास्तविकता है- जो उनके लिये रात है, वह उसके लिये दिन है। गीता में भी यही कहा है-
“या निशा सर्वभूतानाम् तस्याँ जागृति संयमी। यस्याँ जागृति भूतानि सा निशा पश्नते मुनेः॥”
निश्चल नीरवता, शान्तता, प्रकाशित निष्क्रियता उन लोगों का लक्षण है जो अमरता के रहस्य को जानते हैं- ‘अमृतत्वाय कल्पते’। इसका अर्थ धीर होना है जो हमारी प्राचीन सभ्यता का आदर्श है और जिसका अर्थ तामसिक, गतिशून्य और पत्थर होना नहीं है। तामसिक मनुष्य की क्रिया-हीनता उसके चारों ओर की शक्तियों के लिये प्रतिबन्धक होती है, इसके विपरीत योगी या ज्ञानी की अक्रियता उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय करती है उसकी सक्रियता महान् प्राकृतिक शक्तियों की संचालन शक्ति से क्रियाशील होती है। परन्तु जिस प्रकार लोग संसार के निरर्थक कोलाहल और अस्थिर घटनाओं में से ईश्वर की कार्यशैली को नहीं समझ पाते, क्योंकि वे कार्यशैलियाँ पर्दे के पीछे छिपी रहती हैं, उसी प्रकार वे एक योगी या ज्ञानी व्यक्ति के कार्यों को समझने में भी असफल रहेंगे, क्योंकि वह अन्तर में वैसा नहीं होता जैसा कि बाहर से दिखाई देता है। कोलाहल और सक्रियता की शक्ति भी निःसन्देह महान् है, क्योंकि उसी में संसार के अनेक बड़े-बड़े कार्य सम्पन्न हो रहे हैं। परन्तु शाँति और नीरवता की शक्ति तो अनंत है और उसी में महान् शक्तियाँ कार्य के लिये तैयारी किया करती हैं।
(आचार्य श्री अक्षय कुमार बन्ध्योपाध्याय एम. ए.)
अथर्व वेद के ऋषि की आशीर्वाणी में हिंदू संस्कृति का आदर्श तथा साम्य-वादियों के साम्य का आदर्श कैसी सुन्दरता के साथ चित्रित किया गया है, वह देखने ही योग्य है।
सहृदयं साँमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः।
अन्यो अन्यमभि हर्यत वत्सं जातमिवाध्न्या ॥1॥
अनुव्रतः पितु; पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः
जाया पत्ये मधुमती वाचं वदतु शान्तिवाम् ॥2॥
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारयुत स्वसा
सम्यच्चः सव्रता भूम्वा वाचं वदत भद्रया ॥3॥
येन देवा न वियन्ति नो च विद्विष मिथः ।
तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे संज्ञानं पुरुषेभ्यः ॥4॥
ज्यायरवंतश्चित्रिनो मा वि यौष्ट संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः। अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सघ्रीभीनान् वः संयम न स्कृणोमि ॥5॥
समानी प्रया सह वोयन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो भुनज्मि। सम्यच्चोयग्निं सपर्यतारा नाभिमिवाभितः ॥6॥
सध्रीचीनान् वः संमनसस्कृणोम्येक श्नुष्टीन्त्संवननेन सर्वान्।
देवा श्वामृतं रक्षमाणाः सायं प्रातः सौमनसो वो अस्तु ॥7॥
मानव समाज की सारी जातियों के, समस्त वर्गों के नर-नारियों को लक्ष्य करके महर्षि कहते हैं कि मैं इस प्रकार परम अग्नि (विश्व देवता) की सेवा करता हूँ, जिससे तुम सबके हृदय में सम्यक् मिलन हो, मनों में सम्यक् मिलन हो और द्वेष-भाव दूर हो जाय। गाय जिस प्रकार अपने नवजात बछड़े के प्रति आकृष्ट होती है, तुम भी उसी प्रकार एक दूसरे के प्रति आनंदपूर्वक आकृष्ट हो जाओ ॥1॥
पुत्र पिता के कल्याण-व्रत का अनुसरण करे, माता के साथ एकमना हो जाय, स्त्री मधुमती वाक् के द्वारा स्वामी के चित्त को शाँतिमय करे ॥2॥
भाई-भाई से द्वेष न करे, बहिन-बहिन से द्वेष न करे, सब के सब एक लक्ष्य साधन में, एक व्रत-पालन में सम्मिलित होकर सुभद्र वाक्य से परस्पर सम्भाषण करें ॥3॥
जिस प्रकार ब्रह्म या ईश्वर- भावना के बल से देवगण परस्पर विच्छिन्न नहीं होते, कोई किसी से विद्वेष नहीं करते, सारे मनुष्यों के लिए उसी प्रकार एक-मति का सम्पादन करने वाले सम्यक् ज्ञान को उत्पन्न करने वाली ब्रह्म भावना की विधि प्रणयन करके मैं तुम्हारे घर-घर में प्रतिष्ठित करता हूँ ॥4॥
एकमना होकर ज्येष्ठ-कनिष्ठ नियम के अनुसार एक लक्ष्य साधन के उद्देश्य से प्रत्येक मनुष्य अपने-अपने कार्य भार को वहन करे। परस्पर विच्छिन्न न होओ, परस्पर प्रिय सम्भाषण करते-करते अग्रसर होओ। मैं तुम लोगों को एक लक्ष्य में निबद्ध दृष्टि तथा एकमना होने के लिए आह्वान करता हूँ ॥5॥
एक ही पौसले में तुम जल पियो, एक ही अन्न सत्र में भाग करके अन्न-भोग करो। मैं तुम सबको एक ही स्नेह-रज्जु में एकत्र सम्बन्धित करता हूँ। एक ही लक्ष्य से आबद्ध होकर तुम सब अग्नि देव (यज्ञ) की परिचर्या करो। रथ-चक्र के अरे जिस प्रकार एक ही धुरी को केन्द्रित करके अपना-अपना कार्य करते, तुम सब भी अपने-अपने व्रतों का सम्पादन करते हुए उनकी सेवा करो ॥6॥
एक ही संवनन अर्थात् साम्य साधक स्त्रोत के द्वारा मैं तुम सबको एक लक्ष्य के साधन एकमना करता हूँ। सब एकत्र भोजी बनो । स्वर्ग के अमृत की रक्षा में जिस प्रकार सारे देवता एकमना होते हैं उसी प्रकार अखण्ड मानवता के आदर्श की रक्षा में तुम सब में रात-दिन निरन्तर ऐकमत्य प्रतिष्ठित रहे ॥7॥
(श्री नीलकण्ठदास)
भारतीय संस्कृति के अनुयायी आर्यों का सदा से यह विश्वास रहा है कि संसार का प्रत्येक कार्य विश्व विधाता की प्रेरणा का परिणाम है। विश्व विधाता के इशारे पर ही सृष्टि का संचालन होता है। मनुष्य के प्राणों में कर्म का प्रवाह भी उन्हीं की कृपा से प्रवाहित हो रहा है। मनुष्य का कर्तव्य इतना ही है कि वह इस विश्व-संचालन की प्रक्रिया का एक अंग बन कर चलता रहे। विश्व-तन्त्र के अन्दर प्रत्येक जीव का एक निर्दिष्ट स्थान है। इस विश्व-तन्त्र को चलाते रहने में ही उसका सबसे बड़ा आत्म-लाभ है। विश्व-नियम और विश्व धर्म में उसे जो आस्था, जो विश्वास है, वही आस्था और विश्वास अपने धर्म, अपने कर्तव्य में भी है। इस तरह वह समस्त विश्व में अपना निजत्व देखता है और अपने भीतर समस्त विश्व से एकता का अनुभव करता है। आर्य का इस विश्व-नियम में विश्वास ही उसकी आध्यात्मिकता का प्रबल प्रमाण है, यही उसके हृदय की विस्तीर्णता को प्रकट करता है।
दूसरे को प्रेम करना मनुष्य का धर्म है यह सब मानते हैं। परन्तु दूसरे के लिए आत्मोत्सर्ग कर देने में विरले महाप्राण व्यक्ति ही समर्थ होते हैं। जीवन के यथार्थ स्वरूप को जो जितना अधिक समझ सका है, उतना ही वह दूसरे के दुःख या सुख को अपने भीतर अनुभव कर सकता है। कोई परिवार के लिए ,कोई समाज के लिए, कोई देश के लिए आत्मोत्सर्ग कर कृतार्थ होते हैं और अपने धर्म का पालन करते हैं किन्तु सच्चे आर्य की धार्मिक-धारणा केवल परिवार, समाज, जाति या देश के लिए नहीं होती । वह केवल मानव-जाति के लिए नहीं होती । वरन् आर्य तो सम्पूर्ण सृष्टि को, विश्व-ब्रह्माण्ड को अपना अंग मानता है और उसके लिए आत्मोत्सर्ग करने को प्रस्तुत रहता है।
आर्य में यह धारणा इतनी दृढ़ होती है कि उसके आधार पर वह मृत्यु को तो कुछ महत्व ही नहीं देता। वह यह नहीं मानता कि किसी उद्देश्य से जीवन दान कर देना कोई विशेष आत्मोत्सर्ग का काम है। आध्यात्मिक विचार वाले एक आर्य के समीप मरना विश्व की एक साधारण घटना मात्र है। मरण में आत्मा का उत्सर्ग नहीं होता। जन्म और मरण के बीच मनुष्यात्मा का प्रवाह समान भाव से जारी रहता है। धर्म पर स्थिर रहते हुए कर्तव्य-पालन में देहोत्सर्ग कर देना उन्नत जीवन का एक मार्ग ही है। उसका विश्वास है कि इस जन्म के बाद दूसरा जन्म चलता ही रहेगा। कर्म-फल को भोगने के लिए मनुष्य, जन्तु, वृक्ष यहाँ तक कि जड़ पदार्थ तक सब को एक जीवन-धारा में चलते रहना अनिवार्य है। कर्म-भोग के लिए आत्मा हर कहीं जन्म ले सकता है। कर्म-फल के लिए मनुष्य कीड़ा-मकोड़ा बन जाता है, शूद्र से ब्राह्मण और ब्राह्मण से म्लेच्छ बन जाता है। चैतन्य से जड़ और जड़ से चैतन्य बन जाता है।
संसार अनन्त है। आत्मा सर्वव्यापी है। इस जगत में अनन्तकाल से देह में रहने वाली आत्मा का फल-भोग जारी है। चार्वाक-वादी या असभ्य जातियों की मान्यता की तरह मृत्यु के बाद आत्मा का विनाश नहीं हो जाता और न ईसाई धर्म के मतानुसार इस क्षणस्थायी भौतिक जीवन के बाद अनन्तकाल व्यापी स्वर्ग-सुख या नर्क यन्त्रणा भोगते रहने का विधान है। आर्य-सिद्धान्त के अनुसार कर्म-फल इस संसार में ही भोगना पड़ता है और स्वर्ग तथा नर्क इसी में मौजूद हैं।
आर्य धर्म का अनुयायी एक ही जीवन-सुख या दुःख की चिन्ता नहीं करता। जड़ से चेतन तक, मच्छर से लेकर मनुष्य तक कोई भी योनि उसकी दृष्टि में घृणा की पात्र नहीं है। इसलिए मृत्यु से आर्य को लेशमात्र भी भय नहीं लगता। विश्व-नियंता के राज्य में सब कोई एक परिवार या कुटुम्ब के रूप में है। सब का जीवन अनन्त है। कर्मफल से उसकी उन्नति या पतन होता रहता है। इसलिए एक आर्य-जीवन की क्रिया पर विचार करते समय समस्त विश्व को अपने कर्म में प्रतिबिम्बित देखता है और यह अनुभव करता है कि उसके कार्य से समस्त विश्व पर प्रभाव पड़ता है। इस सृष्टि-व्यवस्था में अपने उचित स्थान को समझना और उसके अनुकूल कर्म करते रहना ही उसका धर्म है। वह अपनी प्रतिकूल क्रिया से विश्व-संचालन की प्रक्रिया में किसी प्रकार की गड़बड़ी पैदा करना नहीं चाहता । उसके लिए विश्व-जनता में कोई छोटा-बड़ा नहीं, कुछ उत्कर्ष-अपकर्ष नहीं, कुछ आदर या घृणा नहीं। सब अपने-अपने स्थान के लिए उपयोगी हैं। हर एक अपना निर्दिष्ट कर्म फल भोग करता है। सर्वत्र एक ही विधान या नीति के अनुसार कार्य चल रहा है, जिसका असली सूत्रधार वही परमात्मा है।
इस प्रकार उदार-प्रकृति आर्य का विश्वास है कि जिस विधान के अनुसार एक मिट्टी का ढेला नीचे गिरता है उसी विधान या उसी न्याय से राजा लोक-पालन का कार्य करता है- ब्राह्मण ज्ञान-चर्या में आत्मोत्सर्ग करता है। क्षत्रिय धर्म-रक्षा के लिए संग्राम करता है। शूद्र सेवा करके कृतार्थ होता है। इस प्रकार हर एक अपने-अपने कर्तव्य में स्थिर रहकर विधाता की मंगलमयी इच्छा को पूरा करता है। सब अपने-अपने धर्म में रहकर जो कार्य करते हैं, वह सृष्टि-संचालन के कार्य का आवश्यक अंग होता है। पर उसी कार्य को यदि स्वतन्त्र मानकर किया जाय तो उसका कोई मूल्य नहीं है। यही आर्य जाति के निष्काम कर्म का स्वरूप है और इसी के लिए भगवद्-गीता में कहा है-
मययर्पित मनो बुद्धिर्यो में भक्तः स में प्रियः।
“जो सब कर्मों में अपना मन और बुद्धि मुझमें अर्पण करता है वही मेरा भक्त है, वही मेरा प्रिय है।”
इसका आशय यह है कि हमारा जो निर्दिष्ट कर्म है वही धर्म है। कर्म सब ही करने होंगे और उनके करने में हमें परमात्मा ने किसी हद तक स्वाधीनता दी है, पर हर समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि वे कर्म विधाता के लिए है। विश्व-परिवार के पिता विधाता, जो आदेश करते हैं, मैं वही कर रहा हूँ। मैं अपना कर्म करता हूँ, कर्म का फल कुछ भी क्यों न हो, उससे मुझे क्या? मेरा यह धर्म है, मेरे ऐसे करने से विधाता की इच्छा पूर्ण होगी और तरह-तरह के धर्म-कर्म ढूंढ़ने की मुझे क्या आवश्यकता, क्योंकि मुझे फल की आकाँक्षा ही नहीं है। भगवान ने कहा भी है-
“कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषुकदाचना”
“मनुष्य को कर्म करने का ही अधिकार है फल का निर्णय करने का नहीं । फल का ख्याल रखकर कर्म करने से स्वधर्म, सत्य धर्म भूल कर अधर्म कर जाने की आशंका रहती है। इस प्रकार की धारणा आर्य का दार्शनिक सिद्धान्त ही नहीं है उसके दैनिक अभ्यास में भी यही देखा जाता है। समस्त विश्व-तन्त्र में वह हमेशा अपने आपको अनुभव करता है और इसी विश्वास से विधाता के लिए कर्म करता है वह सदा अनुभव करता है कि-
“ईशावास्यमिदं सर्वं, यत्किंच जगत्याँ जगत।”
अर्थात् “इस जगत में जो कुछ है सब विधाता, परमात्मा के द्वारा आच्छादित है! मनुष्य, पशु, पक्षी, चर, अचर, सब में वह परमात्मा विराजित रहते हैं।”
आर्य का जगत ईश्वरमय है। यह मानो सदा परमात्मा के आदेश से ही काम करता है, क्योंकि भक्त ईश्वर के आदेश में अपना मंगल देखता है, उसे अहंकार नहीं। वह ईश्वर से भिन्न है, किन्तु किसी भी क्रिया में वह अपनी स्वतन्त्र सत्ता रखने की इच्छा नहीं करता। आर्य का महा कर्तव्य-उसका धर्म और संयम, आत्म-लाभ का मार्ग है- आर्य ऋषि ने स्पष्ट कहा है-
आत्मानं रथि ने बिद्धिः शरीरं रथ मेवतु
बुद्धिं तु सारथि बिद्धि मनः प्रग्रह येच
इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरान्,
आत्मेन्द्रिय मनो युक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः॥
अर्थात् “जैसे रथी, सारथी और अश्व आदि के द्वारा मार्ग पर पहुँचा जाता है, उसी तरह धर्माचरण में आत्मा ही रथी की भाँति है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी है, इन्द्रियाँ अश्व हैं। इनको संयत करके ही मोक्ष अथवा आत्मलाभ किया जा सकता है।”
इस प्रकार आत्म-संयमपूर्वक धर्म करने, कर्तव्य-निष्ठ होने पर आत्म-ज्ञान होता है। इस प्रकार के धर्म-कर्तव्य में प्रतिष्ठित रहकर आर्य विमल स्वाधीनता का उपभोग करता है। चाहे उसमें गुरु के उपदेश या आदेश की लाचारी दिखलाई पड़े लेकिन परिणाम में वह अमृत-समान है।
(श्री बुद्धदेव जी)
भारतीय वर्ण-व्यवस्था की उपयोगिता और श्रेष्ठता को अनेक विद्वान समय-समय पर बड़े स्पष्ट ढंग से बतला चुके हैं। उन्होंने उदाहरणों तथा तर्क द्वारा सिद्ध कर दिया है कि हमारी प्राचीन वर्ण-व्यवस्था उदार वैज्ञानिक सिद्धांतों पर अवलम्बित थी, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को आत्म-विकास का पूरा अवसर मिलता था। वर्णाश्रम के कारण समाज में किसी प्रकार की विषमता फैलने नहीं पाती थी, जैसा कि इस बीसवीं शताब्दी में चारों ओर दिखाई देती है उसके द्वारा भारतीय समाज ने विश्व -भ्रातृत्व का सिद्धांत अपनाया था। क्या अमीर, क्या विद्वान,क्या मूर्ख सबको उसी परम पुरुष का अंग समझा गया था, इसलिए वे सब भाइयों की तरह थे, एक के दुःख या कष्ट में दूसरे के द्वारा सहायता करना स्वभाविक कर्तव्य माना गया था।
पर आजकल वर्ण व्यवस्था के कई अंशों में विकृत हो जाने से अनेक लोग उस पर आक्षेप करने लगे हैं। कुछ तो यही कहते हैं कि अध्यापक (ब्राह्मण), सिपाही (क्षत्रिय), व्यापारी (वैश्य), मजदूर (शूद्र), तो स्वयमेव हर देश में होते हैं ,इनके सम्बन्ध में किसी प्रकार के प्रचार की क्या आवश्यकता है? ऐसे कहने वाले न तो ‘वर्ण’ को समझते हैं न ‘व्यवस्था’ को। उनका कहना ऐसा ही है कि हाथ-पैर तो सबके स्वयं होते हैं फिर व्यायाम तथा उत्तम भोजन द्वारा उनको पुष्ट और सुडौल बनाने की क्या आवश्यकता है? बीज धरती में पड़कर अनाज पैदा करता ही है, फिर कृषि शास्त्र के अध्ययन की क्या आवश्यकता है? यह लोग इस बात को भूल जाते हैं कि हर एक अध्यापक ब्राह्मण नहीं, हर एक सिपाही क्षत्रिय नहीं, हर एक व्यापारी वैश्व नहीं होता । ब्राह्मण केवल उन अध्यापकों को कह सकते हैं जो केवल जीविका के लिए अध्यापक का कार्य नहीं करते, पर जिनने अध्यापक को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया है और वे उसे धन के बड़े से बड़े प्रलोभन के लिए भी नहीं छोड़ सकते।
इसी प्रकार हर एक सिपाही का नाम क्षत्रिय नहीं, वरन् क्षत्रिय नाम उन लोगों का है, जिन्होंने संसार से अन्याय को मिटाने के लिए अपने प्राण अर्पित करने का व्रत लिया है और किसी भी दशा में उसे छोड़ने को तैयार नहीं हो सकते।
हर एक व्यापारी का नाम वैश्य नहीं है, किन्तु वैश्य वही व्यापारी है जो प्रजा की दरिद्रता को मिटाने के लिए धन कमाते हैं और ब्राह्मण तथा क्षत्रियों को विशेष सम्मान पाते हुए देखकर भी अपने व्रत को छोड़ने को तैयार नहीं।
इस प्रकार के अध्यापक, सिपाही अथवा व्यापारी स्वयं नहीं मिल सकते, किन्तु बचपन से व्रत धारण करके और उसके अनुसार वर्षों तक तैयारी करने पर बड़ी कठिनता से प्राप्त होते हैं।
यहाँ तक तो ‘वर्ण’ के रहस्य पर विचार किया गया, अब ‘व्यवस्था’ के अर्थ को समझिये। आवश्यकता इस बात की है कि समाज में सब से ऊंचा स्थान सत्य और ज्ञान के प्रचारकों को दिया जाए , फिर क्षत्रियों और वैश्यों को। किन्तु इस समय सब से ऊंचा स्थान स्वार्थी व्यापारियों को प्राप्त है, जो समाज के धन को अनेक प्रकार की चालाकियों और कभी-कभी बेईमानी से खींचकर अपनी तिजोरी में बंद कर देते हैं और इस प्रकार समाज की व्यवस्था को बिगाड़ते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि इस अव्यवस्था को बदलने के लिए समाज को घोर संघर्ष करना पड़ेगा जिसमें शायद लाखों जीवनों का बलिदान कर देना पड़े ।
वर्ण-व्यवस्था के सम्बन्ध में दूसरा आक्षेप यह किया जाता है कि यदि इन नामों को स्थिर रहने दिया जायेगा तो थोड़े दिनों में फिर वही पुरानी विकृत वर्ण-व्यवस्था का स्थान ग्रहण कर लेगी पर ऐसा विचारना भूल है। जन्म के आधार पर खड़ी होने वाली पुरानी वर्ण-व्यवस्था के प्रति लोगों में विरोध भाव उत्पन्न करने का सबसे अच्छा मार्ग यही है कि सच्ची वर्ण-व्यवस्था को इसके मुकाबले में स्थापित कर दिया जाय। यदि जात-पाँत तोड़कर भी लोग उसी प्रकार सैंकड़ों टुकड़ों में बंटे रहें तो जात-पाँत तोड़ने से लाभ क्या हुआ? नीच जाति में उत्पन्न होकर श्रेष्ठ ब्राह्मण का आदर्श उपस्थित करें एक व्यक्ति झूठी जात-पाँत के विरुद्ध जितनी जोरदार भावना पैदा कर सकता है, वह सैंकड़ों व्याख्यानों से भी नहीं हो सकती। फिर जब लोगों ने जन्म की जात-पाँत की हानियाँ इतनी अच्छी तरह देख ली हैं, तो वे इस गढ़े में फिर नहीं गिर सकते। सच तो यह है कि पुरानी जात-पाँत की रूढ़ियां इसलिए नहीं टूटतीं, क्योंकि पुराने ब्राह्मणों, क्षत्रियों के स्थान पर नये ब्राह्मण और क्षत्रिय नहीं बनाये जाते। उदाहरण के लिए आपके सामने धार्मिक क्रिया कराने वालों के दो वंश हैं। एक में वही पुराने ढर्रे का अनपढ़ पुरोहित जो शुद्ध बोल भी नहीं सकता पुरानी लकीर को पीट रहा है। दूसरी ओर एक सच्चा त्यागी, तपस्वी, विद्वान पुरोहित है (चाहे वह ब्राह्मण कुलोत्पन्न न भी हो ) जो अपनी शक्ति को यजमान के कल्याण में लगा रहा है। तो आपको अपने आप जात-पाँत का झूठा ढोंग करने वाले से विरक्ति हो जायगी। जाली सिक्के का जालीपन पूरी तरह तभी स्पष्ट होगा, जब असली सिक्का सामने रख दिया जाय। इसलिए यह आशंका निर्मूल है कि वर्णों का नाम रहने से पुरानी व जन्म-मूलक वर्ण-व्यवस्था हमको फिर आ घेरेगी।
कुछ लोग यह भी कहते हैं कि किसका कौन वर्ण है, इसका निश्चय कैसे हो, जबकि प्रत्येक आदमी को सुबह से शाम तक अनेक तरह के काम करने पड़ते हैं, जो किसी एक वर्ण के नहीं होते, वरन् चारों वर्णों से सम्बन्ध रखते हैं। इस आक्षेप का उत्तर पहले ही दिया जा चुका है कि वर्ण का निर्णय उस व्रत से होगा जिसे प्रत्येक व्यक्ति बाल्यावस्था में ही ले चुका है। जिसने अपनी रुचि के अनुसार या विशेषज्ञ विद्वानों के निर्णय के अनुसार जिस वर्ण के उपयोगी शिक्षा प्राप्त की है वही निश्चित रूप से उसका वर्ण है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी काम में विशेष कौशल प्राप्त कर लेने का अर्थ यह नहीं, कि वह दूसरे कामों को कभी हाथ ही न लगाये। आपत्तिकाल में या राष्ट्र पर आक्रमण होने से सबको क्षत्रिय के कार्य के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इसी प्रकार दुर्भिक्ष आदि किसी आर्थिक संकट के समय सबको वैश्य-कर्म करना पड़े तो कोई हर्ज नहीं। परन्तु विशेष अभ्यास मनुष्य को एक ही कर्म का हो सकता है और वही उसका वर्ण होगा।
अन्त में विरोधियों की ओर से यह कहा जाता है कि वर्ण-व्यवस्था किसी समय अच्छी भी रही होगी, पर अब तो वह बिल्कुल निकम्मी और हानिकारक सिद्ध हो रही हैं पर लोगों ने वास्तविक वर्ण-व्यवस्था को भूलकर यदि उसके स्थान पर कोई अन्यायपूर्ण दुर्व्यवस्था को बदनाम करना अनुचित है। यह सच है कि संपत्ति के बहुत अधिक विषमतापूर्ण विभाजन के कारण इस व्यवस्था में कई बड़े दोष पैदा हो गये हैं, किन्तु जितने लम्बे समय तक इस व्यवस्था ने संसार का कल्याण किया है उतना और किसी व्यवस्था ने नहीं किया और अब भी थोड़े से उद्योग से इसे समाज के लिए कल्याणकारी बनाया जा सकता है।
(श्री नरदेव शास्त्री)
भारतवर्ष की छत्तीस करोड़ जनता किस साधन के द्वारा एकता के सूत्र में बाँधी जा सकती है-यह एक बड़े महत्व का प्रश्न है। उनमें चार करोड़ मुसलमान और एक करोड़ ईसाइयों को छोड़ दिया जाय तो शेष 31 करोड़ हिन्दू जनता को, जो हिन्दुत्व के नाते एक हैं, एकता में बाँध रखना राष्ट्रीय हित की दृष्टि से भी आवश्यक ही है। इस इतने विशाल हिन्दू समाज की बागडोर अधिकाँश में प्राचीन रीति-नीति के कट्टर उपासक पण्डितों के, शास्त्रियों और संन्यासियों के हाथों में है। इन लोगों की बड़ी प्राचीन परम्परा है। दूसरी ओर अंग्रेजी राज्य के समय में अंग्रेजी शिक्षा-दीक्षा में लालित-पालित अंग्रेजी विद्वानों की परम्परा है। इस समय राज्य का शासन सूत्र भी इन्हीं अँग्रेजी परम्परा वालों के हाथ में है। ये लोग समाज-सुधार करते समय प्राचीन पंडित शास्त्रियों की भावनाओं का कुछ भी ध्यान नहीं रखते और इनको साथ लिये बिना स्वेच्छानुसार एक दम सुधार करना चाहते हैं। दूसरी ओर पुराना पंडित-समाज इन सुधारकों को तिरस्कार की दृष्टि से देखता है। इनको नई परिस्थिति समझ में नहीं आती, और इसी प्रकार अंग्रेजी विद्वानों में भी इनसे हेल-मेल बढ़ाकर, इनसे संपर्क रख कर काम करने की युक्ति और बुद्धि दिखलाई नहीं पड़ती। इस प्रकार इन दोनों दलों का मेल बैठना अत्यन्त कठिन कार्य हो गया है और इसके परिणामस्वरूप देश की प्रगति में बाधा पड़ रही है।
बहुत से लोग सामाजिक मामलों में शासन द्वारा किसी प्रकार का हस्तक्षेप करना ही पसन्द नहीं करते! पर प्रश्न यह है कि यदि शासन द्वारा हस्तक्षेप न किया जाय तो आवश्यक सुधार कैसे होंगे? क्या इतने बड़े समाज को, यह जिस रूप में चल रहा चलने दिया जाय? क्या इसमें प्रचलित अनेक श्रेष्ठ सदाचारों के साथ-साथ मिश्रित रूप में चलते हुए अनेक अनाचारों अथवा कदाचारों को ऐसे ही चलने दिया जाय? क्या उनमें देश कालानुसार अपेक्षित सुधार न किया जाय? इसका सीधा उत्तर यह है कि सुधार होने चाहिएं, पर इसके लिये समाज-प्रवर्तन आचार्यों, धर्माचार्यों, पंडितों, शास्त्रियों के सम्मुख देश की समग्र स्थिति रखकर उन्हीं से अनुरोध किया जाय कि वर्तमान परिस्थिति में इन-इन सुधारों का आवश्यकता प्रतीत होती है। इसलिये वे धर्म की मुख्य परम्पराओं को सुरक्षित रखते हुये ऐसी व्यवस्थाएं दें जिससे इतने बड़े समाज का भीतरी सुधार होकर जाति तथा राष्ट्र में बल का संचार हो सके।
ऐसा कोई समन्वय हुये बिना प्राचीन धर्म परम्पराओं तथा नवीन शासन प्रणाली का मेल नहीं बैठेगा और अशान्ति तथा कलह बढ़ते ही रहेंगे, नये विचारों के लोग जो प्राचीन परम्पराओं को बैलगाड़ी की उपमा देकर और अपने आपको वायु के उपासक समझ कर जैसा भाव प्रकट करते हैं वह कदापि उचित नहीं है। पर हम उनसे कहना चाहते हैं कि बैलगाड़ी की सभ्यता चाहे कितनी ही मंदी चाल से चल रही है और चाहे कालवश उसमें कितनी ही त्रुटियों का संचार क्यों न हो गया हो,श्रेष्ठ है। जिस बैलगाड़ी के साथ संसार के सर्वश्रेष्ठ, आदि सत्य सनातन चक्षु वेद हैं,शास्त्र हैं, दर्शन हैं, धर्म शास्त्र, पुराण और इतिहास हैं, उसकी अनुचित हंसी क्यों उड़ायी जाय? बैलगाड़ी जहाँ काम देती है, वहाँ वायुयान कौड़ी काम के सिद्ध होते हैं। वायुवान का जहाँ काम है, वह वहीं रहे। हमारे प्राचीन पुरुष सब प्रकार के यानों से काम लेते थे। उनके बैलगाड़ी रथ आदि तो थे ही, पर उनके वायुवान भी तो थे- जिन पर बैठकर देवगण आकाश में चलते थे, ऊपर से युद्ध देखते थे, विजयी दल के ऊपर पुष्पवृष्टि किया करते थे। उनके शस्त्रास्त्र भी थे। सब कुछ था,किन्तु वे उनका दुरुपयोग कभी नहीं करते थे। पर आजकल के विज्ञानवादियों की सभ्यता क्या कर रही है? वह थोड़ा-सा नाम मात्र का भौतिक सुख पहुंचा रही है, पर उसका रुख नाश की ओर ही है।
आर्य-जाति सहस्रों वर्षों के आक्रमण, दासता, पराधीनता आदि संकटों से जो बच सकी है तो उसका कारण यह बैलगाड़ी की सभ्यता ही है। दूसरी ओर इस नवीन-युग वालों की वायुयानों वाली सभ्यता को देखिये। इनका लोभ, इनका स्वार्थ इनकी प्रतिहिंसा, भोगवाद, भौतिकवाद, अनीश्वरवाद-ये सब संसार को नरक बनाने पर तुले हुये हैं। यदि इनके विज्ञान रूपी घोड़े संसार को विनाश की ओर ही ले ही जाएंगे। हमारी बैलगाड़ी की सभ्यता संसार को बतलाती है :-
इहचेदवेदीदथ सत्यमस्ति ।
न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ॥
‘संसार में आकर यदि सत्य स्वरूप परमात्म तत्व को न समझ कर केवल भोगों के पीछे दौड़ोगे तो महती विनष्टि है ही’
इसलिये अंग्रेजी पंथी विद्वान प्राचीन पंथी विद्वानों का उपहास करना छोड़कर उनकी भावनाओं का समादर करें और प्राचीन पंथी विद्वान भी समय की परिस्थिति को समझने की चेष्टा करें तथा धर्म और संस्कृति के विपरीत बातों को छोड़कर अन्य बातों में देश, राष्ट्र, शासन चक्र के सहायक रहें। आज अंग्रेजी पढ़े-लिखों का यह हाल है कि धर्म का नाम सुनते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं। जिनको अंग्रेजी नहीं आती ऐसे लोगों के साथ बैठने, मिलने, बातचीत करने में ये अपनी हतक समझते हैं। ऐसे लोग अपने समाज का सुधार कैसे कर सकते हैं? वस्तुतः ऐसे लोग देश तथा राष्ट्रोद्धार को बातें ही क्यों करते हैं? स्व0 लोकमान्य तिलक ने एक बार ‘केसरी’ में लिखा था :-
“अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में यही एक कमी है। ऐसे लोग क्या तो समाज सुधार करेंगे और क्या देश-कार्य करेंगे। धर्म की रक्षा के लिये कष्ट सहना अथवा प्राण देना-यह धर्म-श्रद्धा का लक्षण है। ईसाई लोग अंग्रेजी विद्या में पारंगत होते हुये भी किसान, मजदूर, माली आदि छोटे-छोटे लोगों से मिलने, उनसे हेल-मेल बढ़ाकर धर्म-प्रचार करने में नहीं हिचकिचाते। हमारे सुधारक लोगों में ऐसे व्यक्ति कहाँ देखने को मिलते हैं? उलटा ऐसा करने में वे अपनी हतक समझते है। अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में जो यह कमी है, वह उनकी शिक्षा-दीक्षा का ही प्रभाव है। जनता की उन्नति के लिए उनमें मिलकर स्वार्थ-त्यागपूर्वक सतत चेष्टा करना और स्वधर्म पर निष्ठा रखकर वैसी बुद्धि बनाये रखना-ये बातें अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों में कहाँ हैं। यह उनका दोष नहीं, यह तो उनकी शिक्षा का ही दोष है। ये लोग पुराने पंडितों , शास्त्रियों को भला-बुरा कहते, उनकी खिल्ली उड़ाते हैं सही; पर शास्त्री-वर्ग भी तो ऐसा ही समझता है। इस प्रकार दोनों ओर जो कानापन आ गया है, उसको ठीक करना, यह सबसे प्रथम सुधार होना चाहिये। जब अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोग अपने इस दृष्टि दोष को दूर करेंगे तभी वे सुधार कर सकेंगे, अन्यथा नहीं।” यह बात सोलह आने सच है और यदि लोकमान्य तिलक के समय में वह लागू होती थी तो अब भी लागू होती है।
इस प्रकार हिन्दू-समाज में दो भेद प्राचीन और अर्वाचीन को लेकर चल पड़े हैं और इसका समन्वय अत्यन्त आवश्यक है कि प्राचीनता में कितनी नवीनता का समावेश होना चाहिये और प्राचीनता का कौन-कौन सा अंश ग्राह्य है और कौन-कौन सा अग्राह्य है। नवीन में भी कितना किस अंश में ग्राहय है, कितना नहीं- इस पर विचार होना चाहिये। यह बात स्पष्ट है कि यह नवीन पद्धति का शासन-चक्र हमारे धर्म और संस्कृति का सीधे सहायक , पोषक या रक्षक नहीं हो सकेगा। यदि यह शासन -चक्र सीधे हमारी पुष्टि करेगा, तो उसको अन्य धर्मों की भी सहायता करनी पड़ेगी- यह शासन-चक्र तो अधिकतर देश की रक्षा का ध्यान रखेगा। यह ध्यान रखेगा कि प्राप्त हुई स्वतन्त्रता चिरकाल नहीं तो,अधिक से अधिक समय तक तो सुरक्षित रहे।
जब यह दशा है तो स्वधर्म और स्वसंस्कृति की रक्षा कौन करेगा? वही प्राचीनताभिमानी पंडित, शास्त्री समाज या कोई और? यवन-काल में भी यह भार इन्हीं पर रहा। अंग्रेजों के काल में भी यह भार इन्हीं पर रहा- और अब स्वराज्य-काल में भी इस बात का उत्तरदायित्व इन्हीं पर है, क्योंकि अंग्रेजी पढ़े-लिखे विद्वान कभी इस धर्म और संस्कृति की रक्षा करेंगे, ऐसी आशा रखनी दुराशा-मात्र है।
इतनी बड़ी विवेचना का अर्थ यही है कि ब्राह्मणों को पुनः त्याग तपस्या का मार्ग लेना पड़ेगा, क्योंकि ये ही सदा से राष्ट्र-पुरोहित रहे हैं और वेद के शब्दों में-
‘राष्ट्रे वयं ‘जागृयाम’ पुरोहितः स्वाह”
(अथर्व वेद)
“हम राष्ट्र के पुरोहित हैं और राष्ट्र-कल्याण के निमित्त जाग रहे हैं।” जब वे ऐसी गर्जना करेंगे तभी भारतीय राष्ट्र का उद्धार संभव होगा।
(श्री सुदर्शन सिंह जी)
आधुनिक युग के विज्ञान वेत्ताओं का मत है कि मनुष्य आरम्भ में जंगली था। वह असभ्य और बर्बर था। उसके पास न लिपि थी, न भाषा, न सभ्यता। ऐसी दशा में वस्त्र और सभ्यता के अन्य पदार्थों के होने की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। धीरे-धीरे मनुष्य की भाषा, सभ्यता और बुद्धि का विकास हुआ तथा उत्तरोत्तर होता जा रहा है। हम अपने पूर्वजों से अधिक सुसभ्य, बुद्धिमान एवं सुसंस्कृत हैं।
साथ ही विज्ञान मानव मस्तिष्क के दो भाग बतलाता है। एक अंतर्मन और दूसरा बहिर्मन। प्रारंभ में मनुष्य के बहिर्मन का अस्तित्व नाम मात्र के लिए ही था। मनुष्य मूलतः पशु-स्वभाव का प्राणी है और पशुयोनि से विकसित हुआ है, अतः उसकी स्वाभाविक प्रवृत्तियाँ पाशविक हैं। जैसे-जैसे मनुष्य सभ्य होता जाता है, उसके सामाजिक और नैतिक बन्धन बढ़ते जाते हैं और उसकी पशु प्रवृत्ति दबती चली जाती है। लज्जा और भय के कारण मनुष्य के पाशविक संस्कार दबे रहते हैं, बहिर्मन सावधानी के साथ उन्हें बाहर आने से रोकता है। पर ये पाशविक संस्कार सर्वथा नष्ट नहीं होते । वे अंतर्मन में बीच-बीच में प्रकट होकर चरितार्थ होने का प्रयत्न करते रहते हैं। जो मनुष्य स्वप्न देखने लगता है तो उसका बहिर्मन सोता रहता है। उस समय अंतर्मन पर नियंत्रण न रहने से वे पाशविक वासनाएं प्रकट होने लगती हैं। जब कभी अंतर्मन के इन पाशविक संस्कारों का दबाव बढ़ जाता है, तो बहिर्मन उनको रोकने में असमर्थ हो जाता है। इसके परिणामस्वरूप उन्माद, पागलपन जैसे रोग होते हैं।
इस मत के अनुसार मनुष्य ने आदि युग में बिजली चमकते, आकाश से जल बरसते, वन में दावाग्नि लगते, आँधी चलते तथा ज्वार-भाटा आते देखकर भय और अज्ञान के कारण अज्ञात-शक्तियों की कल्पना कर ली। अज्ञात-शक्तियों की कल्पना कर ली। यही अज्ञात-शक्तियाँ कालांतर में मनुष्य का बुद्धि से विकसित होकर देवता और ईश्वर के रूप में परिणत हो गई। इनको प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना, पूजा, बलिदान आदि जो कुछ आदिम युग के मनुष्य करने लगे थे, वही आगे चलकर ‘धर्म’ बन गया, उसकी विधि और नियम बन गये। इसीलिए इस मत के ‘महापण्डित’ कहलाने वाले लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि “ईश्वर मनुष्य का मानस पुत्र है और धर्म मानवीय दुर्बलताओं का सही भाव है”।
ऐसे मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों का फल यह हुआ कि पढ़ने वाले नवयुवक यह मानने को विवश हो गये कि धर्म के साथ सदाचार, सत्य आदि भी कल्पित हैं। वे आवश्यकताओं के कारण लज्जा और भयवश ही स्वीकार किये जाते हैं। इस प्रकार असदाचरण, असत्य, चोरी, हिंसा, विश्वासघात, परपीड़न से मनुष्य की स्वभाविक घृणा नष्ट हो गई और सदाचार के नियमों को तोड़कर व्यवहार करना मानसिक दृढ़ता तथा निर्भीकता माना जाने लगा। कविता, मूर्ति एवं चित्रकला प्रभृति का आदर्श वासनात्मक अश्लीलता बन गई। कला के आकर्षण का हेतु और उद्देश्य वासना माना जाने लगा।
पर वास्तव में विकासवाद का यह सिद्धांत भ्रममूलक है। उसके आविष्कारक इतना भी नहीं देख सके कि प्रकृति विकारोन्मुखी अथवा अधोगामिनी है, वह विकसित होने का गुण नहीं रखती। यदि मनुष्य का मन मूलतः पाशविक हो तो यह कभी सम्भव नहीं था कि वह स्वप्न में सत्कार्य एवं सद्विचार करे। पर स्वप्न में लोग धर्म का आचरण करते हैं, उपासना करते हैं, कुछ तो स्वप्न में भगवान के दर्शन तक करते हैं। इसका अर्थ यह है कि मन मूलतः पाशविक नहीं है। वह विकृत हो जाता है और प्रयत्न से उसे शुद्ध किया जा सकता है। हमारे शास्त्रों में मन की उत्पत्ति अहंकार के सत्वाँश से मानी गई है। वह सत्व स्वरूप है। सद्गुण, धर्म तथा आस्तिकता उसका स्वभाव है। अधर्म, असदाचार और वासनाएं उसमें संगदोष से विकृत होने के कारण आयी हैं। इसीलिए इनको ‘विकार’ कहा जाता है। प्रकृति भी इसी नियम का साक्षी है। जल पहले शुद्ध रूप में बरसता है और फिर विकृत होता है। निर्मलता, शीतलता, सुस्वादुपन उसके स्वभाव हैं, स्वरूप हैं। मैल, दुर्गन्ध तथा खारापन उसमें दूसरी वस्तुओं के संयोग से विकृत होने के कारण आया है। इसीलिए जल को शुद्ध किया जा सकता है।
हम इतिहास में देखते हैं कि एक समय भारत में घरों में ताले बन्द नहीं होते थे। मनुष्य चोरी, झूठ, विश्वासघात की कल्पना तक नहीं कर पाते थे। असदाचार का अपनाना मनुष्य के लिए एक भयंकर आश्चर्यजनक दुर्घटना थी। आज ढूँढ़ने पर भी कहीं-कहीं हमें सच्चे सदाचारी और सत्यवादी मिलते हैं। संयम , सदाचार का उपदेश देना पड़ता है और उनका पालन करने वाला महापुरुष माना जाता है। आज का मनुष्य अपनी मानसिक और शारीरिक शक्तियों में अपने पूर्वजों से हीन हुआ है और उत्तरोत्तर प्रत्येक पीढ़ी में होता जा रहा है।
इन प्रत्यक्ष सत्यों से नेत्र नहीं बन्द किये जा सकते। ये बताते हैं कि जल ही विकृत नहीं होता, सम्पूर्ण प्रकृति ही बराबर विकृत होने का स्वभाव रखती है प्रकृति स्वभावतः अधोगामिनी है। शास्त्र इसी बात की घोषणा करते हैं। आदि युग सत्य-युग था। उस युग का मानव शरीर से सबल, हृदय से धर्मात्मा, संयमी तथा सदाचारी, मन से दृढ़ निश्चयी, दयालु, परदुख, कातर, निस्वार्थ एवं निर्भीक तथा बुद्धि से प्रबल, प्रतिभाशाली तथा बहुज्ञ था। सम्पूर्ण सभ्यता और संस्कृति थी आदि-मानव में। धीरे-धीरे उसकी सभी शक्तियों का ह्रास हुआ। सत्य-युग से त्रेता, द्वापर होते हुए कलियुग आ गया।
हमें स्मरण रखना चाहिए कि विद्या का साधारण नियम भूलना है, बढ़ना नहीं। यहाँ भी प्रकृति की वही अधोगामिनी गति स्पष्ट होती है। आपने जो कुछ पढ़ा या सीखा है, वह बराबर पढ़ने, सीखने और अभ्यास से ही स्थिर रह सकता है। नवीन अध्ययन और प्रयत्नों के परिणाम उसमें सम्मिलित करते हुए ही आप उसका भण्डार बढ़ा सकते हैं। वैसे अध्ययन जन्य शिक्षा का स्वभाव है भूलना। यह मनुष्य का नित्य का अनुभव है कि वह जितना सीखता है उसमें से अधिकाँश भूल जाता है और बराबर भूलता रहता है। सीखे हुए ज्ञान को स्मृति में रखने के लिए उसे बार-बार दुहराने की आवश्यकता पड़ती है और इतने पर भी कुछ अंश तो भूल ही जाता है।
ये उदाहरण बतलाते हैं कि मनुष्य स्वयं कुछ भी करने में असमर्थ है। उसे सब कुछ दूसरों से सीखना पड़ता है। यह सीखा हुआ ज्ञान भी भूलता ही है, वह विकसित नहीं होता। इसलिए यह प्रश्न होता है कि यदि मनुष्य स्वयं ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता तो वह प्रकृति के संघर्ष में जीवित कैसे रहा? उसने इतना ज्ञान कहाँ से सीखा जो उसे आज विश्व पर तथा कुछ अंशों में प्रकृति पर भी शासन करने में सक्षम बना रहा है। उसे आरम्भ में कौन यह ज्ञान और भाषा सिखाने आया था?
इस बात का उत्तर तो इसी प्रकार पाया जा सकता है कि आज के युग में भी जो बिना पढ़े तथा दूसरों से सीखे कबीर, तुकाराम जैसे अत्यन्त गम्भीर दार्शनिक रहस्यों को प्रकट करने वाले हो गये हैं, उन्होंने यह ज्ञान कहाँ से और कैसे पाया? जिस प्रकार, जिससे उन्हें ज्ञान मिला, आदि-मानव का भी वही शिक्षक और वही शिक्षा पद्धति हो सकती है।
आदि मानव ने ज्ञान कैसे पाया? इससे पूर्व यह समझ लेना आवश्यक है कि ज्ञान आदि-मानव ने किसी स्रोत से पाया अथवा उसका विकास हुआ? सत्य तो यह है कि जो मूल ज्ञान आदि-मानव ने पाया था, मनुष्य जाति उसमें कुछ भी वृद्धि नहीं कर सकी है। उसमें से अधिकाँश हम भूले ही हैं और इसी भूल के कारण हमारा वर्तमान ज्ञान अव्यव-स्थित तथा भ्रमोत्पादक हो गया है।
विकासवाद के भ्रम से पृथक होकर जब हम यह मानने को बाध्य होते हैं कि सर्वांगपूर्ण भाषा और समस्त ज्ञान मनुष्य को आदि में ही प्राप्त हुआ तो हमें मानना ही पड़ेगा कि उसकी प्राप्ति या शिक्षा किसी विशेष ज्ञान-भण्डार से हुई होगी । तब क्या ज्ञान सिखाया हमारे ऋषियों का तो यही कहना है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है और उसे परमात्मा से ही ऋषियों ने प्राप्त किया है वेद का अर्थ ही है ज्ञान।
आरम्भ में मानव-मन विकृत नहीं था। मन का मूल रूप सात्विक है। आदि युग में वह सम्पूर्ण सात्विक था। सभी आध्यात्मशास्त्र एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि सम्पूर्ण निर्मल एवं शुद्ध मन में परमात्मा की ज्योति प्रकट होती है। आदि मानव ने अपने निर्मल तथा शुद्ध हृदय में परमात्मा का साक्षात किया। उस समय उसके हृदय में दिव्य वाणी प्रकट हुई। जिस ऋषि ने समाधि में जिस मन्त्र को उपलब्ध किया, वह उसका द्रष्टा कहा गया है, अर्थात् वह उसे देखने वाला हुआ। उसी दिव्य वाणी पर अपने शुद्ध हृदय में उस ऋषि ने मन को एकाग्र किया और इस एकाग्रता के द्वारा उसके अर्थ को जाना। इस प्रकार वेद वह ईश्वरीय वाणी है जिसे ऋषियों ने समाधि की स्थिति में सुना है।
(भारतीय योगी)
हमारे देश में चमत्कारी घटनायें प्रायः सुनने में आया करती हैं। अनेक बार आकस्मिक आपत्तियों, दुर्घटनाओं, शत्रुओं अथवा आतताइयों द्वारा आक्रमणों से मनुष्य की इस प्रकार रक्षा हो जाती है कि जिसकी कोई आशा या सम्भावना नहीं होती। अन्य घटनाओं की बात छोड़ भी दें, तो ‘अखण्ड ज्योति’ में प्रकाशित “गायत्री-साधना के अनुभवों” में भी पाठकों को ऐसे अनेक उदाहरण मिल सकते हैं, जिनको सिवाय दैवी सहायता के और कुछ नहीं कह सकते।
प्राचीन काल के लोग वायुमंडल और पृथ्वी के पास के अन्य लोकों में रहने वाली आत्माओं में पूर्ण विश्वास रखते थे और उनके द्वारा समय पड़ने पर सहायता भी प्राप्त किया करते थे। पर जब से अर्द्ध दग्ध ज्ञान ने मनुष्य का पल्ला पकड़ा है तब से वह पारलौकिक जीवन में तरह-तरह की शंका करने लगा है। पर इससे उसका कोई लाभ नहीं हुआ, वरन् वह अपने को अगले की अपेक्षा अधिक असहाय पाने लगा है। प्राचीन लोग यक्ष, गंधर्व, किन्नर, अप्सरा अथवा जंगल, पहाड़, नदी आदि के अधिष्ठाता देवों को केवल मनोरंजक कहानियों की चीज ही नहीं समझते थे, वरन् उनका इन अदृश्य-शरीरी शक्तियों की सत्ता में पूरा विश्वास था और समय पड़ने पर वे उनसे आत्मिक बल, श्रद्धा, साहस और समयोचित सूझ-बूझ भी प्राप्त किया करते थे। अब फिर कितने ही विद्वानों का ध्यान इस तरफ गया है और उन्होंने उसे विज्ञान से अनुकूल और स्पष्ट भाषा में तथा व्यवस्थित रीति से बताने का उपक्रम किया है। यद्यपि हमारे देश की साधारण जनता इन बातों पर अविश्वास तो नहीं करती, पर वह प्रत्येक विषय में अलौकिक शक्तियों पर इतना अधिक विश्वास करती है कि वह अन्ध विश्वास की कोटि में जा पहुँचता है। इसलिये आवश्यकता है कि इस विषय का विवेचन तर्क बुद्धि के द्वारा ऐसे विचार-संगत ढंग से किया जाय जिससे पाठक उसकी वास्तविकता को हृदयंगम कर सकें और उससे यथोचित लाभ उठा सकें।
आध्यात्म-जगत की खोज करने वाले विद्वानों का मत है कि मनुष्य-लोक से ऊपर वाले लोकों में कितनी ही श्रेणियों की उच्च और साधारण कोटि की आत्मायें रहती हैं जो पृथ्वी के निवासियों पर परिस्थिति के अनुसार शुभ या अशुभ प्रभाव डाला करती हैं। इनमें कुछ तो बहुत बड़े “महात्मा” हैं, जो व्यक्तिगत बातों की अपेक्षा संसार को नियंत्रित करने वाली शक्तियों का संचालन करते हैं। साधारण आत्माओं में से बहुत-सी मनुष्यों को सहायता दे सकती हैं, पर सर्वप्रथम उनका विचार अपनी अधिक आत्मिक उन्नति करके ईश्वर के किसी रूप में मिल जाना होता है। और वास्तव में आरम्भिक अवस्था में वे मनुष्यों की अधिक सहायता करने में समर्थ भी नहीं होतीं। इसलिये जब वे किसी उच्च श्रेणी को प्राप्त करके विशेष शक्ति-सम्पन्न हो जाते हैं तभी उनके द्वारा मनुष्यों को सहायता प्राप्त हो सकती है।
जीवित मनुष्यों में से भी अनेक व्यक्ति साधना करके ऐसी शक्ति प्राप्त कर लेते हैं जिससे वे स्वयं भी दूसरों के जीवन पर प्रभाव डाल सकते हैं और इन अदृश्य आत्माओं द्वारा भी कार्य करा सकते हैं। भारतीय योगियों के लिये तो यह बात साधारण मानी गयी थी और हमको इस सम्बन्ध में अपने ऋषि-मुनियों के इतने अधिक उदाहरण मिलते हैं कि उन सबको एकाएक असत्य बतला देना अथवा सब पर अविश्वास कर सकना कठिन होता है। ऐसे साधक प्रायः ध्यान की अवस्था में अथवा निद्रा की अवस्था में सूक्ष्म-शरीर द्वारा ऐसे कार्यों को सम्पन्न किया करते हैं। उस समय वे अन्य लोकों में ऐसे विचरण करते हैं और वहाँ के निवासियों से बात-चीत और व्यवहार करते हैं मानो वहीं के स्थायी रहने वाले हों। उस समय वे पृथ्वी पर रहने वाले किसी भी जागृत व्यक्ति पर इच्छानुसार प्रभाव डाल सकते हैं और उसे प्रेरणाएं दे सकते हैं। वे उसके दुखित और अशान्त मन में शान्तिदायक आराम देने वाली धारायें भेज सकते हैं। जिससे वह शाँतिदायिनी निद्रा की गोद में सो सकें। वे उसकी आपत्तियों को हल्का करने वाले विचार उसके मन में उत्पन्न करके उसे बहुत कुछ आश्वासन दे सकते हैं।
अनेक लोक ऐसी सब प्रकार की दैवी सहायताओं को ईश्वर की ओर से प्राप्त ही मानते हैं। एक ईश्वर में ऐसी बातों को मानने से उस पर तरफदारी का दोषारोपण किया जा सकता है। उसके नियम तो सबके लिए एक से रहते हैं। वह एक–सी परिस्थिति में एक की रक्षा करें और दूसरे को छोड़ दें, ऐसा संभव नहीं। इसलिये इस प्रकार की दैवी सहायताएं, जिनसे अनेक समय हमारी बड़ी-बड़ी आपत्तियों से रक्षा हो जाती है, इन महापुरुषों और अन्य लोक निवासी भली आत्माओं (जिनको लोग दैव, पितर या प्रेत आदि के नाम से भी पुकारा करते हैं) द्वारा ही सम्पन्न हुआ करती हैं। नीचे ऐसे कुछ उदाहरण दिये जाते हैं, जिनका खुलासा केवल भौतिक विज्ञान से किसी प्रकार नहीं हो पाता। ये उदाहरण विशेषतः योरोपियन देशों के हैं, क्योंकि वहीं के लोग परलोक की बातों पर अधिक अविश्वास करते हैं और इसलिये वहाँ नियमानुकूल खोज और जाँच-पड़ताल भी की गई है-
कुछ वर्ष पूर्व लन्दन की ‘हालवर्न रोड’ पर भयंकर आग लग गई थी। जिसमें दो घर बिल्कुल भस्म हो गये। आग लगने की सूचना मिलने से पहले ही ज्वाला का इतना विस्तार हो गया था कि आग बुझाने वालों का दल मकानों को तो न बचा सका, पर दो को छोड़कर शेष सब आदमियों को बाहर निकाल लाया। एक बुढ़िया, सहायता पहुँचने के पूर्व ही, धुँए से दम घुटने के कारण मर गयी थी दूसरा एक पाँच वर्ष का बच्चा था जिसका मकान में होना उस समय की जल्दी और घबराहट के मारे लोग भूल गये थे। बात यह हुई कि उस बच्चे की माँ मकान की मालकिन की मित्र थी और उस दिन बच्चे को रात भर के लिये उसी की निगरानी में छोड़कर किसी कार्यवश ‘कालचेस्टर’ नामक स्थान को चली गयी थी। जब सब लोग बचाकर बाहर ले आये गये तो मकान मालकिन को उस बच्चे की याद आई और वह बड़ा शोक करने लगी। बच्चा ऊपर की अटारी में सुलाया हुआ था, और इस समय वहाँ पहुँचना असंभव जान पड़ता था। तो भी एक आग बुझाने वाले ने वीरता के साथ इसके लिए प्रयास करने का निश्चय किया और उस कमरे का ठीक-ठाक पता लेकर वह धुँआ और ज्वाला में जा घुसा।
इस प्रयत्न के फलस्वरूप बालक उसे मिला और वह उसे सकुशल बाहर ले आया, परन्तु अपने साथियों में आकर उसने एक बड़ी विचित्र कथा कही। उसने कहा कि जब मैं कमरे में पहुँचा तो वह जल रहा था और फर्श का बहुत-सा भाग गिर पड़ा था। पर अग्नि कमरे में गुलाई खाकर अस्वाभाविक और समझ में न आने लायक तरीके से जल रही थी और खिड़की की तरफ निकल गई थी। ऐसा उदाहरण उस अग्नि बुझाने वाले ने अपने अनुभव में कभी नहीं देखा था। इसका फल यह हुआ कि वह कोना, जिसमें बच्चा सो रहा था, बिल्कुल बच गया, हालाँकि वे ही पटिये जिन पर उसकी छोटी खाट रखी थी आधे-आधे जल गये थे। बच्चा भयभीत हो गया था, पर उस आग बुझाने वाले ने बार-बार स्पष्ट रीति से वर्णन किया कि जैसे ही बड़ी जोखिम उठाकर बच्चे की तरफ पहुँचा तो वहाँ मैंने एक दिव्य-रूप देखा- जो “बिल्कुल दिव्य, श्वेत और चाँदी सरीखा था और बिस्तर के ऊपर झुककर ओढ़ने के कपड़े की गुड़ी को दूर कर रहा था ये शब्द ठीक उसी के मुँह के हैं। उसका कहना कि मैं इस विषय में भूल नहीं कर सकता, क्योंकि आकाश की चमक से वह दिव्य रूप कुछ क्षण तक दीखता रहा, और जब मैं उससे कुछ फीट पर पहुँचा तो वह अदृश्य हो गया।
इस घटना की दूसरी विचित्र बात बाद को मालूम हुई, जब अगले दिन उस बच्चे की माँ वापस आई। उस रात्रि को उसे निद्रा बिल्कुल न आई, और उसे बार-बार ऐसा अनुभव होता था कि मेरे बच्चे की कुशलता में कुछ बाधा है। इसलिये वह उठकर बड़ी श्रद्धा से यह प्रार्थना करती रही कि मेरा बच्चा उस भय से रक्षित होवे, जिस भय की आशंका उसे अपने अन्तःकरण में बार-बार हो रही है। इससे प्रकट होता है कि उसके प्रेम के प्रगाढ़ प्रवाह से एक ऐसा बल उत्पन्न हुआ जिससे कोई दैवी शक्ति उस बालक की सहायता को वहाँ पहुँच सकी।
उपर्युक्त घटना के कुछ वर्ष पूर्व ‘भेडिनहेठ’ नामक गाँव में टेम्स नदी के किनारे भी एक असाधारण घटना हुई वह आग की न थी, वरन् पानी की थी। तीन छोटे-छोटे बच्चों को, जो संभवतः ‘साटेस ब्रुक’ ग्राम में रहते थे, उनकी दाई हवा खिलाने नदी के किनारे उस रास्ते में ले गई जहाँ से गायों को रस्सी से खींच कर जल में उतारा जाता है। वे बच्चे एक मोड़ के बाद अचानक एक घोड़े के पास पहुँच गये जो नाव खींचे ले जा रहा था, और उस समय की घबड़ाहट में दो बच्चे रस्सी के दूसरी तरफ चले गये और उसका झटका खाकर पानी में गिर पड़े।
नाव वाला यह घटना देख कर उनको बचाने के लिये पानी में कूद पड़ा। उसने देखा कि वे पानी में ऊँचे उठे हुए बिल्कुल गैर मामूली तरीके से तैर रहे हैं और शाँत रीति से किनारे की तरफ जा रहे हैं। उस दाई ने और उस नाविक ने तो केवल इतना ही देखा, परन्तु उन दोनों बालकों ने यह कहा कि “एक सुन्दर दिव्य रूप” पानी में हमारे पास खड़ा था और हमें ऊँचा उठाकर किनारे की तरफ ला रहा था। उनकी इस कथा का पुष्टिकरण उस नाविक की छोटी कन्या ने भी किया जो दाई के चिल्लाने पर नाव की कोठरी से बाहर निकल आयी थी। उसने भी कहा कि एक सुन्दर स्त्री उन दोनों बच्चों को किनारे की तरफ खींच रही थी।
एक और घटना में एक मनुष्य अपने दो बच्चों को लेकर, जिनकी माँ का कुछ ही दिन पहले देहान्त हो गया था, देहात में अपने मित्र से मिलने गया। उसके मित्र का घर बड़े पुराने ढंग का था, जिसके नीचे के भाग में लम्बे-लम्बे अंधेरे रास्ते थे, जिनमें बच्चे मनोविनोद के लिये खेलते फिरते थे। परन्तु कुछ ही देर बाद वे गम्भीर होकर ऊपर चले आये और कहने लगे कि एक अंधेरे रास्ते में हमारी माता हमें मिली और यह कह कर कि ‘ऊपर चले जाओ’ फिर गायब हो गई। जाँच करने से मालूम हुआ कि अगर बच्चे कुछ ही कदम और आगे जाते तो एक गहरे खुले मुँह के कुँए में गिर पड़ते जो ठीक उनके रास्ते में पड़ता था। इससे मालूम होता है कि उनकी माँ प्रेत-लोक से भी अपने बच्चों की प्रेम भरी रखवाली करती थी और इस भय के अवसर पर बच्चों को मरने से बचाने के लिये, उन्हें सूचना देने की प्रचंड इच्छा के कारण उसमें इतनी शक्ति आ गई कि वह अपने को एक क्षण के लिये दृश्यमान और कर्ण गोचर बना सकी। अथवा उसने उन बच्चों के मन पर ऐसा प्रभाव डाला जिससे उन्हें ख्याल हुआ कि हमने अपनी माता को देखा और सुना।
इस प्रकार की घटनायें देश और विदेशों में प्रायः होती रहती हैं। यह भी अनुभव में आया है कि इस प्रकार की घटनायें प्रायः बच्चों और निर्दोष व्यक्तियों की रक्षा के लिये ही हुआ करती हैं और ऐसी दिव्य-आत्मायें दिखलाई तो बच्चों को ही देती हैं। कुछ भी हो इससे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जो लोग अपना चरित्र और हृदय शुद्ध रखते हैं और अन्तःकरण में भगवान का ध्यान किया करते हैं, उनको संकट के समय कुछ न कुछ दैवी-प्रेरणा और सहायता प्रायः मिल जाती है। इसमें ऐसी कोई बात नहीं कि ऐसे प्रत्येक अवसर पर दैवी सहायता अनिवार्य रूप से आवे। बहुत से शोक और संकट ऐसे भी होते हैं, जो ईश्वरीय-विधान के अनुसार ही आते हैं और प्रकट में दुःखदायी जान पड़ने पर भी वास्तव में हमारा हित करने वाले होते हैं। क्योंकि दुख-सुख का भाव तो मनुष्य के नीचे दर्जे के काम-संकल्पयुक्त मन का होता है। पर आत्मिक-सुख काम-संकल्प रहित ऊँचे मन का होता है। इसलिये किसी भी दुःख या संकट के लिये हम यह निश्चित रूप से नहीं कह सकते हैं कि हमारे लिये केवल भयजनक और अनिष्टकारक ही है। इसलिये किसी भी विचार से मनुष्य को सत्पथ और ईश्वरीय मार्ग से टलना नहीं चाहिये और विश्वास रखना चाहिये कि यदि हमारी साधना और उपासना सच्चे मन से होगी तो हमारा हर तरह से कल्याण ही होगा।
(डॉक्टर रामचरण महेन्द्र, पी.एच.डी.)
समय एक प्रवाह है। जैसे नदी की धारा लगातार बहती रहती है, उसी प्रकार समय की धारा भी निरन्तर बहती-बदलती रहती है। कुछ मिट्टी मिली हुई गंदली धारा के बाद फिर स्वच्छ पानी बहने लगता है। पानी साफ हो जाता है। चाँदी जैसी धवलता एक बार पुनः दिखाई देती है। किसी कवि ने ठीक ही कहा है-
सदा न बागी बुलबुल बोले, सदा न बाग बहारै। सदा न राजे राज करिन्दे, सदा न महफिले यारै॥
बाग में सदा बुलबुल नहीं बोलती। अर्थात् मौसम बदलता है, तो बाग में हरियाली के बाद खुश्की आती है। खुश्की के साथ पतझड़ आता है। पतझड़ के बाद फिर वर्षा के साथ चारों ओर हरियाली छा जाती है। बाग की बहार सदा एक-सी नहीं रहती। राजाओं का राज सदा एक-सा नहीं रहता। समय की गति बदलती रहती है। परिवर्तन ही इस जीवन और जगत का नियम है।
समय एक औषधि रूप है। बड़े-बड़े घाव समय की गति से भर जाते हैं।
जब श्री रामचन्द्रजी अयोध्या को छोड़ मय श्री सीताजी और लक्ष्मणजी के जा रहे थे, तब उनकी माताएं कारुणिक विलाप कर रही थीं। राजा दशरथ का बुरा हाल था। अब कैसे जीवन चलेगा? सब प्रजा-जन श्रीराम को बेहद प्रेम करते थे। धीरे-धीरे उनके वन-गमन का समय समीप आया। बल्कल वस्त्र धारण कर वे चले। उनके जाने के वियोग में राजा दशरथ पछाड़ खाकर गिर पड़े। चारों दिशायें चीत्कार कर उठीं। मातायें रोने लगीं, प्रजा-जन भी पागल से प्रभु के साथ-साथ चलने लगे। बहुत दूर तक इसी प्रकार चलते गये। अन्त में बड़ी कठिनता से लौटकर आये। वियोग का आघात बड़ा कठोर था। लेकिन फिर भी समय व्यतीत होता गया। वर्षों बीत गये। समय की गति ने घाव को भर दिया।
गोकुल से जब भगवान श्री कृष्ण मथुरा गये तो गोपियाँ बड़ी दुखी हुईं। उनकी वियोग-व्यथा का वर्णन करते हुए सूर की स्याही आज तक नहीं सूखी है। वह अश्रुधारा आज भी ज्यों की त्यों चल रही है।
लेकिन काल की गति में यह दुख भी बह गया। समय चला जाता है। किसी के लिए नहीं रुकता। रुकना उसके स्वभाव में नहीं है। अच्छा हो, या बुरा, समय की सरिता चलती ही जाती है, अनवरत और अखण्ड।
अथर्व वेद में एक बड़ी उद्बोधक सूक्ति है-
“मा गतानामादीधीथाः” (8-1-8)
अर्थात् गुजरे हुओं के लिए शोक मत करो। संसार की हर वस्तु समय के मुख में है। अवश्यम्भावी के लिए रोना क्या?
आपके जीवन में ऐसे-ऐसे संकट आयेंगे, ऐसे-ऐसे कष्ट पड़ेंगे जब आप समझेंगे कि अब तो अन्त समय आ गया है। बचने का कोई रास्ता नहीं सूझता। हमारे ऊपर जो कष्ट आ पड़ा है, उसका आक्रमण हम कैसे सह सकेंगे! चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखाई देता है! प्रकाश की एक छोटी किरण भी कहीं नहीं दीखती।
फिर भी आप निराश न हों। हिम्मत न हारें। समय वह मृदु मरहम है, जो आपके जख्मों पर दवा लगाकर आपको एक बार फिर स्वस्थ कर देगा। आप अपने पुराने रंज और गम को भूल जायेंगे। आपत्तियाँ दूर हो जायेंगी। हृदय के घाव भर जायेंगे। कंटकाकीर्ण मार्ग से काँटे खुद दूर हो जायेंगे।
दवाओं में सब से बड़ी दवा यह समय ही है। समय के बीतने के साथ-साथ आप अपने कष्टों और विपत्तियों को भी भूल जायेंगे। कठोर क्षण, परिवार की मृत्यु, व्यापार में हानि, परीक्षा में फेल होना, पुत्र-पुत्री वियोग, परमात्मा के अनुग्रह से यह समय भुला देता है। समय सर्वोपरि है। वह हमें ऐसी शक्तियाँ दे देता है, जिससे हमारे मन का भार हल्का हो जाता है। अन्दर के सब दुर्भाव खुद दूर हो जाते हैं।
फारस में एक राजा-राज्य करता था जिसने अपने हस्ताक्षर की अँगूठी पर एक ऐसा स्वर्णिम सूत्र खुदवा रखा था, जो अँगूठी के सामने आते ही उसे एक दृष्टि में शिक्षा दिया करता था। यह सिद्धान्त वाक्य हर प्रकार के परिवर्तन और समय के अनुकूल था। साधारण से शब्दों में यह लिखा गया था। वे अमूल्य शब्द थे- “यह स्थिति भी नहीं रहेगी” अर्थात् इसमें भी परिवर्तन अवश्यम्भावी है।
समय निरन्तर बदलता जाता है। सदा एक-सा नहीं रहता। गति ही जीवन का लक्षण है।
हम न किसी विषम स्थिति में चिन्तित हों न तनिक-सा लाभ होने से फूलकर प्रमाद में नील हो जाएं। अच्छी या बुरी जैसी भी हमारी स्थिति हो, हम उसी को सम्हालें। विषम से विषम स्थिति, आनन्द से आनन्दमय स्थिति में बदलेगी।
“भविष्यद्धा इदमुपजीवामः श्वः श्वः श्रेयान् भवति”
“हम भविष्यत् को ही सामने रखकर जीवन को धारण करते हैं। आगे आने वाला प्रत्येक दिन हमारे लिए एक दूसरे से बढ़-चढ़कर हो।”
मैत्रायणी संहिता (1-5-12) में एक बड़ी महत्वपूर्ण बात कही गई है-
“अहोरात्राणि वावाधं मर्षयन्ति”
“दिन और रात शोकरूपी पाप को दूर करते हैं।”
बुद्धिमानों! मन को दुखी नहीं करना चाहिये। दुःख एक तीव्र विष है। समय स्वयं आपके दुःखों को दूर कर देगा। आपके कष्ट का समय स्वयं बीत जायेगा। जीवन भर जो काले-काले बादल छाये हुए हैं, वे स्वतः हट जायेंगे। चारों ओर आनन्द ही आनन्द छा जायेगा। भविष्य उज्ज्वल है।
हे मानव! छीनता को मत अपना। तेरे भीतर जो धैर्य नामक गुण है, उसे धारण कर।
“दुःखान्तप्रभवं सुखम्” (शा.प. 25-25)
“स्मरण रखिए, दुःख के बाद सुख आया ही करता है।”
इसलिए-
“सुखं वा यदि वा दुःख प्रियं वा यदि वाप्रियम्। प्राप्तं प्राप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः॥”
“सुख हो या दुःख, प्रिय हो या अप्रिय, जब-जब आये, तब-तब अपराजित हृदय से ही उसको भोगिये।”
(श्री श्री निवासदास पोद्दार)
भारत वर्ष में प्राचीन काल में गाय को सबसे बड़ा धन माना जाता था। बाल्मीकि रामायण में लिखा है कि भगवान रामचन्द्रजी ने अनेकों बार करोड़ों गौएं ब्राह्मणों को दान दी थीं। पाँचों पाण्डवों के पास दस हजार गौ-वर्ग थे, जिनमें से प्रत्येक वर्ग 8 लाख गायों का बतलाया जाता है। जन साधारण में भी असंख्य गायें पाली जाती थीं। गर्ग संहिता में लिखा है कि नौ लाख गाय वाला नन्द, दस लाख वाला वृषभानु और एक करोड़ वाला नन्दराज कहलाता था। सिकन्दर यहाँ से एक लाख बढ़िया किस्म की गायें यूनान ले गया था। ये वर्णन इस बात की साक्षी देते हैं कि भारत में असंख्य गोधन था। परन्तु जैसे-जैसे वर्ण और आश्रम की शिक्षा की प्रणाली विकृत होती गई वैसे ही गोवंश का भी ह्रास होने लगा और उसी के साथ हमारे देश की अवस्था भी हीन होती गयी।
यहाँ के साधारण ग्रामीणों को भी गो-पालन सम्बन्धी इतना ज्ञान था, जो आजकल कृषि विद्यालयों में ‘डेयरी-विज्ञान’ की शिक्षा पाने वालों को भी प्राप्त नहीं होता। उस समय इस विषय की स्वतंत्र पुस्तकों या साहित्य की कोई आवश्यकता न थी। वेद, पुराण, आयुर्वेद आदि के महान् ज्ञान को लोगों ने अपने जीवन में उतार रखा था।
हमारे भारतीय ज्ञान-भण्डार में सूक्ष्म से सूक्ष्म बातों की खोज करके उनका वर्णन सूत्र-वाक्यों में किया गया था, जिससे लोग बिना पुस्तकों का भार लादे हुए समय पर तुरन्त उनका प्रयोग कर सकें। इसी ज्ञान के आधार पर यहाँ गो-वंश की अभूतपूर्व उन्नति हुई थी, जिसके तत्व को विदेशी विद्वान अभी तक नहीं जान सके हैं। गौ की चरण-धूलि से और गौ के बैठने से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ती है, इस बात का अनुभव अमरीका वाले अब कर रहे हैं। परन्तु गोधूलि-बेला को शुभ कार्यों के लिए क्यों पवित्र माना जाता है, इस बात का रहस्य वे अब नहीं जान सकते हैं, क्योंकि इसका निर्णय निरे भौतिकवाद से नहीं हो सकता, उसके लिये आध्यात्मिक ज्ञान की भी आवश्यकता है। इसका सम्बन्ध त्रिगुणात्मक प्रकृति से है। अगर शास्त्रीय वाक्यों के आधार पर भौतिक विज्ञान वाले गौतत्व की खोज करें तो उससे अनेक चमत्कार युक्त बातें अब भी जानी जा सकती हैं।
भारत में उस समय अरबों गाएं थीं। इस देश में उस समय सोने, चाँदी, हीरा, मोती के भी भण्डार थे, परन्तु अपनी त्याग वृत्ति के कारण भारतीय इनको सर्वोपरि महत्व नहीं देते थे। भारत की अतिथि सेवा देखकर विश्व चकित रह जाता था। ये सब गुण कहाँ से आते थे? गम्भीर विचार करने से इसका यही उत्तर मिलता है कि जब विश्व माता, सत्वगुण की भंडार हमारी गौएं परम सुखी थीं, जब उनके प्रेमपूर्वक किये गये हुँकार से ऊँकार का उच्चारण होता था, तो उसके फल से इस देश की प्रकृति भी सत्वगुण-प्रधान बन जाती थी और उससे समस्त भौतिक कार्यों, पदार्थों और मानव बुद्धि में भी सात्विक गुण का समावेश हो जाता था। यज्ञों में तरह-तरह की प्रभावशाली औषधियों, विभिन्न अन्न और गोघृत की वेद मन्त्रों से युक्त आहुतियाँ दी जाने के कारण समस्त वातावरण पवित्र होता था, दैवी शक्तियाँ संतुष्ट और परिपुष्ट होती थीं। फलस्वरूप सहज ही अनिष्ट का विनाश होकर विश्वकल्याण हुआ करता था। तब से यह ज्ञान हमारी दृष्टि से ओझल हो गया, यज्ञों में हवन सामग्री और गोघृत की आहुति देना अंधविश्वास समझा जाने लगा तब से विनाश लीला आरम्भ हो गई। यज्ञ के अन्य भी कई अंग हैं, पर मुख्यतः विराट् रूप गौ भगवती ही सत्त्वगुण की भंडार हैं। इसीलिये शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है- “यतो गावस्ततो वयम्-यद् गृहे दुःखिता गावः स याति नरकं नरः”। आज के भौतिक विज्ञान वाले यदि श्रद्धा के साथ हमारे शास्त्रों के सूत्र वाक्यों का अपनी पद्धति से अनुसंधान करके देखें तो वे गौ के सत्वगुणी और तमोगुणी परमाणुओं का ज्ञान किसी हद तक प्राप्त कर सकते हैं। गौ का पृथ्वी से, सूर्य रश्मियों से, पंचभूतों से, त्रिगुणात्मिका प्रकृति से निकट सम्बन्ध है, इसी से भारत आध्यात्म-ज्ञान के लिये सदा से विश्व का गुरु रहा है और आगे भी रहेगा।
भारत में जब असंख्य गौएँ थीं, तब गौ-पालन का उत्कृष्ट ज्ञान भी छोटे-बड़े सबको बिना पढ़े-लिखे ही प्राप्त था। पुस्तक ज्ञान की अपेक्षा कहीं अधिक ज्ञान कार्यरूप से प्राप्त होता है। परन्तु भौतिक विज्ञान की सदोष उन्नति से आज के मनुष्य आध्यात्म ज्ञान से मुख मोड़कर वासनाओं के दास बन गये हैं। वे कल कारखानों में काम करते हुये स्वयं जड़, कलपुर्जों की तरह बन गये हैं। जैसा भ्रमर-कीट के उदाहरण से सिद्ध होता है, वैसे ही मनुष्य चौबीस घंटे जिस विचारधारा में बहता है, वैसा ही बन जाता है। आज यही बात हमारे सामने प्रत्यक्ष मौजूद है। भोग्य वस्तुओं की बाढ़ ने हमारी वासनाओं को बढ़ा दिया। हम गौ को भूल गये। गौ के तात्त्विक रहस्य हमारी निगाह से ओझल हो गये। इससे कृषि दूषित हो गयी। पशु, पौधे और भूमि के मेल से जो विशेषताएं उत्पन्न होती हैं वे लुप्त हो गई। विचार किया जाय तो मनुष्य का स्वास्थ्य तथा पशु-पौधे और मिट्टी का स्वास्थ्य अलग-अलग नहीं है। इसके लिये प्राकृतिक नियम यह है कि प्रत्येक जीव या पदार्थ को उसकी ‘मृत्यु’ के बाद बेकार न समझकर मिट्टी में ही लौटा दिया जाय, जिससे वह फिर सजीव हो जाय। यह जीवन का पहला नियम है जो उसे पूर्णता और स्वस्थता प्रदान करता है। यही उपनिषदों का शाश्वत ज्ञान है, जिसे आज भारत भूल-सा गया है और जिसके सिद्धान्तों का कुछ अंशों में अनुकरण करके अनेकों विदेशी सम्पन्न हो रहे हैं।
अब आवश्यकता है कि भारतवासी शास्त्र पद्धति से खेती, गौपालन तथा गौ चिकित्सा आरम्भ कर दें। साथ ही गौ-साहित्य संग्रह करके उसके प्रकाशन और प्रचार का सफल प्रयत्न करें। गौ-विज्ञान के महत्व का पुनः विचार हो, लोगों को भूला हुआ मार्ग पुनः दिखाया जावे। लोग समझ सकें कि गौ विश्वमाता है। गौ के विश्वरूप वर्णन में वेदों ने गौ के अंग-प्रत्यंग में विभिन्न देवताओं का निवास क्यों माना है- चौरासी लक्ष योनियों में से एक-मात्र गौ के शरीर में ही इस प्रकार की महत्ता क्यों बतलायी गयी है? इसी तरह गोबर और गौमूत्र को परम पावन क्यों माना है? गोबर तथा गौमूत्र को देव पूजन, श्राद्ध, हवन आदि धार्मिक कृत्यों में भी पवित्रता के लिये अनिवार्य बतलाया गया है। ये सब रहस्य गौ-पालन का कार्य वास्तविक रूप में करने से ही समझे जा सकेंगे।
कलियुग के प्रभाव से गौ आज दुखी है। गोरक्षा के परमाणुओं ने उसके श्वासों में आकर समस्त प्रकृति को ही आज दानवी बना दिया है। कलकत्ता हाईकोर्ट के भूतपूर्व चीफ जज श्री उडरफ ने अपने तन्त्र सम्बन्धी ग्रंथ ‘प्रिंसपल्स ऑफ तन्त्राज्’ के पृष्ठ 188 पर लिखा है कि “भारत में गोरक्त गिरे तो तन्त्र-मन्त्र कैसे सफल हो सकते हैं।” श्री उडरफ साहब विदेशी गोमाँसाहारी जाति में उत्पन्न हुये थे। परन्तु पूर्व-जन्म के संस्कार के कारण उन्होंने भारतीय तन्त्र-मन्त्र शास्त्र का गम्भीर अध्ययन किया। उनको प्रतीत हुआ कि मंत्र विश्व-कल्याण करने वाले हैं, परन्तु गोरक्त गिरना, गौ का दुखी होना उनकी क्रियाओं में परम बाधक है। इसका उनको दृढ़ निश्चय हो सका तभी वे ऐसा लिख सके। अतः गौ को सुखी करने से ही भारत के आध्यात्म-शास्त्र की रक्षा होगी, वैदिक कर्म-उपासना का ज्ञान पनपेगा, जिससे विश्व को सच्चा संरक्षण और शान्ति प्राप्त हो सकेगी।
(श्री जगतनारायण)
स्वर्ग और नर्क का विश्वास केवल हमारे देश में नहीं पाया जाता, वरन् संसार की सभी सभ्य जातियाँ उसे जानती और मानती हैं। ईसाई और मुसलमान भी स्वर्ग और नर्क के अस्तित्व में पूरा विश्वास रखते हैं। पर इस विषय में लोगों के विचारों में बड़ी भिन्नता देखने में आती है। कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो इन सब बातों को झूँठी या बनावटी बतलाते हैं। पर जिन लोगों ने इस सम्बन्ध में गहरा विचार किया है और कुछ साधन या अभ्यास करने को प्रस्तुत हैं, वे इनकी सत्यता स्वीकार करते हैं।
पर जो लोग स्वर्ग और नर्क को मानते हैं वे भी अज्ञानता अथवा अन्धविश्वास के कारण मनमानी कल्पनाओं में फँसे रहते हैं। कोई कहता है कि स्वर्ग किसी पहाड़ की चोटी पर या अत्यन्त ऊँचाई पर कोई स्थान है जहाँ मृत्यु के पश्चात् वे ही जीव जाते हैं जिन्होंने संसार में रहकर पुण्य-कार्य किये। इसी प्रकार नर्क पृथ्वी के भीतर नीचे की तहों में कोई अत्यन्त भयंकर स्थान है जहाँ मृत्यु के पश्चात् पापियों को यम के दूत पकड़कर ले जाते हैं और अग्नि तथा पीव आदि के कुण्डों में गिराकर उन्हें घोर यातनायें देते हैं।
यह सच है कि हमारे विश्व में स्वर्ग-नर्क का अस्तित्व सत्य है, पर उनका स्थान तथा स्वरूप कुछ और ही है। वास्तव में ये लोक हमारे पृथ्वी मण्डल में ही पड़े हुए भाग हैं। जिस प्रकार पृथ्वी का वायुमण्डल भूमि की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण कुछ सौ मील की दूरी तक अधिक फैला हुआ है उसी प्रकार स्वर्ग (स्वर्लोक) और नर्क (भुवर्लोक) और भी सूक्ष्म होने के कारण पृथ्वी से कई लाख मील के अन्तर तक फैले हैं। जिस प्रकार वायु-मण्डल ने समस्त भूमि और जल को आवृत्त कर रखा उसी प्रकार भुवर्लोक ने पृथ्वी और वायु-मण्डल को आवृत्त किया हुआ है और स्वर्लोक ने भुवर्लोक को भी आवृत्त कर रखा है, क्योंकि वह इससे भी अधिक सूक्ष्म है।
अब पहले भुवर्लोक का संक्षेप में हाल सुनिये। मनुष्य के सम्बन्ध में इस लोक के तत्वों का विशेष गुण, भावना, इच्छा अथवा कामना के रूप में प्रकट होता है। इसलिये इसे काम-लोक भी कहते हैं। यहाँ के तत्व या द्रव्यों के ही जरिये इच्छाओं अथवा भिन्न-भिन्न प्रकार के मनोभावों का निर्माण और संचार इस विश्व में होता है।
भूलोक की तरह भुवर्लोक के भी सात उपलोक होते हैं और वे एक दूसरे से उसी प्रकार भिन्न जान पड़ते हैं जैसे हमारी पृथ्वी की तरल वस्तुएं अथवा तरल और वायवीय वस्तुएं एक दूसरे से भिन्न प्रकार की जान पड़ती हैं। अन्तिम दो उपलोक अत्यन्त भद्दी, भयंकर और कुत्सित वासनाओं के स्थान हैं, उनके ऊपर वाले तीन लोक सामान्य वासनाओं के स्थान हैं और सबसे ऊपर वाले दो उपलोक उच्चकोटि की वासनाओं के स्थान हैं।
यहाँ रहने वाले निवासी अपनी- अपनी वासनानुसार भिन्न-भिन्न उपलोकों में स्थान पाते हैं। भूत, प्रेत, पिशाच इसी लोक और भूलोक में केवल एक ही दर्जे का अन्तर है, इसलिए इन दोनों लोकों के प्राणियों में सम्बन्ध आसानी से स्थापित किया जा सकता है।
भुवर्लोक के विषय में योगी लोग बतलाते हैं जब पहले पहल इस लोक का अनुभव प्राप्त होता है तो वहाँ के उज्ज्वल प्रकाश को देखकर मनुष्य चकाचौंध में पड़ जाता है। कारण यह है कि वहाँ का साधारण प्रकाश इतना तेज है कि उसके सामने भूलोक का प्रकाश अन्धेरा-सा प्रतीत होने लगता है। इसीलिये इस लोक का अन्वेषण करते समय लोगों ने इसका नाम दिव्य लोक रख दिया है। पर यह विशेषता केवल इसी लोक की नहीं है। बल्कि जैसे-जैसे ऊपर स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक आदि की तरफ बढ़ा जायगा वहाँ की सामान्य ज्योति के आगे नीचे का लोक अन्धेरा-सा प्रतीत होगा। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। द्रव्य जैसे-जैसे सूक्ष्म होता जायेगा उसमें प्रकाश का परिणाम बढ़ना, अवश्यम्भावी है। भुवर्लोक तो हमारे इतना पास है कि थोड़े ही अभ्यास से मनुष्य वहाँ की ज्योति आदि का अनुभव ले सकता है। हठयोग की कुछ ऐसी विधियाँ हैं जिनसे यह अनुभव बहुत सुगमता से प्राप्त हो जाता है और भोले-भाले सीधे लोग इसी को देखकर मुग्ध हो जाते हैं तथा समझते हैं कि उन्होंने भगवान को पा लिया। वास्तव में यह ऊपर के लोकों की ओर जाने वाले को भलाने का अथवा उनकी परीक्षा लेने का एक प्रलोभन मात्र है।
अब स्वर्ग का कुछ हाल सुनिये। जिस प्रकार भुवर्लोक का उपादान (द्रव्य) ‘वासना’ या ‘कामना’ है उसी प्रकार स्वर्ग का उपादान उससे कहीं अधिक सूक्ष्म तत्व ‘विचार’ है। अर्थात् इसी द्रव्य से विचार बनते हैं और उनका प्रसार होता है। इसी सूक्ष्म द्रव्य से स्वर्ग की समस्त वस्तुओं और प्राणियों का बाहरी स्वरूप निर्मित होता है। इस लोक के प्रकाश और सौंदर्य का वर्णन करना या समझ सकना पृथ्वी के निवासियों के लिए सर्वथा असम्भव है। केवल तुलना के लिये यह कह सकते हैं कि इसके सामने भुवर्लोक की ज्योति अन्धेरी है। रूपों की बनावट, सजावट, मेल तथा सौंदर्य का भी यही हाल है।
इस लोक की यह विशेषता है कि यहाँ के प्राणी शब्दों द्वारा एक दूसरे से बातचीत नहीं करते, बल्कि जो कुछ विचार उनका होता है वह एक विशेष रंग का विशेष रूप धारण कर लेता है। इसे रंगों की भाषा कह सकते हैं। यहाँ के रंगों और रूपों की सुन्दरता का वर्णन नहीं किया जा सकता है। सम्भव है कि इस लोक की इसी प्रधान विशेषता के कारण हमारे पूर्वजों ने इसका मूल तत्व ‘रूप’ बतलाया था। यहाँ के निवासी देवगण इस प्रकार के रंगों की भाषा में ही बातचीत करते हैं।
इस लोक के भिन्न-भिन्न उपलोकों के निवासी भी अनेक श्रेणियों के हैं। अनेक प्रकार के देवगण दैव सहायक महात्माओं के शिष्य आदि इसके साधारण निवासी हैं। मनुष्य भी जीवित और मृत्यु का वास्तविक स्थान स्वर्लोक का अरूप विभाग है। वहीं से वह नीचे के लोकों का अनुभव प्राप्त करने के निमित्त उतरता है और अनुभव प्राप्त करके फिर वापिस चला जाता है। यह प्रक्रिया ठीक वैसे ही होती है जैसे कोई पथिक यात्रा को जाता है और वहाँ अपना कार्य समाप्त करके पुनः घर वापिस आ जाता है। अन्ततः सिर्फ इतना ही है कि पथिक को साधारणतः इस बात का स्मरण रहता है कि असली निवास-स्थान कहाँ है, पर मनुष्य नीचे उतरने पर अपने असली निवास स्थान को, अपने स्वरूप को भूल जाता है और अपनी यात्रा की भिन्न-भिन्न मंजिलों को ही अपना निवास स्थान समझने लगता है। यदि मनुष्य केवल इस तथ्य को समझ ले तो उसकी जीवन-यात्रा अत्यन्त सुगम और सत्य मार्गानुयायी हो जाय।
प्राचीन समय के लोग भिन्न-भिन्न लोकों और उनके प्राणियों को भली प्रकार जानते थे। उन्हें यह भी मालूम था कि किस प्रकार भिन्न-भिन्न लोकों से सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है। इसलिये प्राचीन पौराणिक कथाओं में ऐसे वार्तालाप भरे पड़े हैं, जिनमें भिन्न-भिन्न लोकों के प्राणी ठीक उसी प्रकार आपस में मिलते- जुलते, बातचीत करते तथा एक दूसरे के साथ मिलकर कार्य करते पाये जाते हैं, जैसे हम इस पृथ्वी पर एक दूसरे के साथ करते हैं। आज भी जो इस रहस्य के जानने वाले हैं वे ऐसा ही कर रहे हैं और पारलौकिक सहायता से इस लोक के अनेक दुखी तथा आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों को सहायता पहुँचाते रहते हैं। इस प्रकार की शक्ति प्रात करने का मार्ग योग के सिवा जप-तप, देवाराधना आदि भी हैं और इनके द्वारा मनुष्य अलौकिक शक्तियों की कृपा प्राप्त करके तरह-तरह के लाभ उठा सकते हैं।
(श्री चन्द्रशेखरजी शास्त्री)
किसी विद्वान की उक्ति है कि “मूर्ख व्यक्ति बुद्धिमानों या चतुरों का भोजन हैं।” आज यह कहावत भारतीय-समाज में, विशेषतः हिन्दुओं में पूर्ण रूप से चरितार्थ हो रही है। तरह-तरह के ऐसे उपाय निकाले जा रहे हैं, जिनसे जनता का धन सहज में हरण किया जा सके। बड़े-बड़े परोपकारी निकल आये हैं। कोई कुबेर की सम्पत्ति दिला देने का दम भरता है और कोई परलोक में स्वर्ग-सुख प्राप्त करने का वचन देता है।
कोई भी वस्तु स्वभाव से न तो नितान्त भली ही होती है और न बुरी ही। प्रत्येक वस्तु का एक खास गुण होता है जो हितकारी भी हो सकता है और अहितकारी भी। इसका आधार उपयोग करने वाले पर रहता है। आग में गरमी होती है, उससे भोजन पकाया जाता है और किसी का घर भी जलाया जा सकता। अन्न को खाकर हम जीवित रहते हैं, पर कितने ही पेटू लोग आवश्यकता से अधिक खाकर बीमार भी पड़ जाते हैं। धर्म भी उपयोगी चीज है। उससे लोक और परलोक का हित-साधन होता है। पर आजकल अनेक धूर्तों ने उसको जघन्य श्रेणी के स्वार्थ-साधन का उपाय भी बना लिया है।
भारतवर्ष धार्मिक देश कहा जाता है। भारतवासी धर्म से प्रेम करते हैं। जो धर्माचरण करता है उसका सम्मान करते हैं, उसको दान देना, उसकी सेवा-सुश्रूषा करना अपना कर्तव्य समझते हैं। यह देखकर अनेकों धूर्त उन्हें ठगने को तैयार हो गये हैं। कोई संन्यासी बना, कोई वैरागी, कोई शैव बना, कोई वैष्णव, किसी ने राख पोती, किसी ने चन्दन, किसी ने मस्तक घुटाया, किसी ने जटायें बढ़ाई, कोई आग के बीच में बैठा, कोई जल में खड़ा हुआ। यह सब इसलिये किया गया कि हम लोग उसे धर्मात्मा समझें, महात्मा मानें। उन्हें अपने आत्म-कल्याण की कोई चिन्ता नहीं, धर्म या धार्मिक क्रियाओं पर उनको विश्वास नहीं। उनका एकमात्र उद्देश्य होता है जनता में धर्मात्मा के नाम से प्रसिद्ध होना और उसके द्वारा अपना प्रभाव जमाकर जनता का धन हरण करना।
इस श्रेणी के स्वार्थी व्यक्तियों ने हमारे धार्मिक विश्वास से अनुचित लाभ उठाया है। वे स्वयं भी डूबे और हमको भी डुबाया। देश और विदेशों में भी धूर्त हमारी धार्मिकता सुनकर दौड़ पड़े और हमें भी सिखाने लगे। कोई अवतार बनकर आया और किसी ने महायोगी होने का दावा किया, किसी ने आत्म-सत्कार करने का प्रलोभन दिखाया और किसी ने जीवनमुक्त होने का नुस्खा बताया। हम लोगों ने अपने सरल स्वभाव के कारण ज्यादा छान-बीन न की और सभी चमकीली चीजों को असली सा समझ लिया। इसका फल यह हुआ कि आज हम मूर्ख बन गये। हमारा वैज्ञानिक धर्म हमारे लिए उपहास की सामग्री बन गया है। वह हमारी उन्नति में बाधक सिद्ध हो रहा है। हमारे धर्म-भाव से लाभ उठाते हैं हमारी उन्नति के विरोधी।
दुःख है कि हमारे समाज में ऐसे ठगी का जाल फैलाने वालों की संख्या बढ़ रही है। उनको बिना रुपये-पैसे के धन पैदा करने का नुस्खा मिल गया। लोग समझते हैं कि बिना पैसे के हमारा काम चल गया, कैसी बुद्धिमानी की हमने। उनकी निगाह में ईमान का कोई मूल्य ही नहीं? यदि वे इस बात को समझते होते, तो इस महंगे सौदे के फेर में न पड़ते कुछ रुपयों के लिये, साधारण सुख के लिये, ईमान बेचा जाय, तो एक साधारण समझ वाला मनुष्य इसे महंगा ही समझेगा। धर्म, समाज और ईश्वर से डरने वाला ऐसे सौदे की बात भी नहीं करेगा। कुछ साहसी लोग ईमान भी बेच रहे हैं। पेट के लिए, पूरी और मलाई के लिए, पलंग और गद्दे के लिए वे विश्वासी हृदयों के विश्वास के कोमल पौधे को जड़-मूल से उखाड़कर फेंक देते हैं। इससे बढ़कर समाज का दुर्भाग्य क्या होगा?
समाज तो रहेगा, उजड़ कर भी रहेगा और फिर इसके दिन भी पलटेंगे, आज नहीं तो कुछ दिन बाद। सभी व्यक्ति बहुत दिन तक भूल नहीं कर सकते। एक दिन परिस्थिति उनको आँखें खोलने तथा अपनी दशा सुधारने को मजबूर करेगी ही। इसलिये विचार यह करना चाहिये कि उस समय उनकी क्या दशा होगी जो धर्म और ईमान को बेचकर इतना महंगा सौदा खरीद रहे हैं।
आलसी और निकम्मे आदमियों की इन्द्रियाँ प्रबल होती हैं। उनकी लालसा इतनी बढ़ी होती है कि वे उसे रोक नहीं सकते। फिर वे क्या करें? पैसे आवें कहाँ से। नौकरी तो वैसे निकम्मों से होती नहीं और उनको नौकरी देता भी कौन है? व्यापार के लिए पूँजी चाहिये, साख चाहिये। यदि व्यापार के लिए कुछ पूँजी इकट्ठी भी की जाय तो उसमें लाभ ही होगा, इसका कोई निश्चय नहीं। ऐसी दशा में वैसी प्रकृति वालों के लिए दो ही उपाय रह जाते हैं। एक तो यह कि वे अपनी आदत सुधारें, मेहनत-मजदूरी करके जो कुछ रूखा-सूखा मिले उसी में सन्तोष करें। दूसरा उपाय यह है कि किसी भी प्रकार पैसे का प्रबन्ध करें। ऐसे लोग पहले घर की चीजें बेचते हैं, जमीन, जायदाद, मकान आदि बेचकर अपनी इच्छाएं पूर्ण करते हैं। फिर स्त्रियों के गहने बाजार ले जाते हैं। अन्त में ईमान की बारी आती है। कुछ लोग ऐसे भी इस श्रेणी में देखे गये हैं जो ईमान से ही शुरू करते हैं। ये ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते, धर्माधर्म का ज्ञान भी इनको नाममात्र को ही होता है। पर होते हैं साहसी, दिल के पक्के। अतएव ईमान बेचकर, धर्म की दलाली करके, लोगों के साथ विश्वासघात करके ही अपना पेट पालते हैं, चैन से रहना ही अपना एक मात्र उद्देश्य रखते हैं।
ऐसे लोगों में बहुत से विरक्त बनकर दुनिया को धोखे में डालते हैं। ये रहते हैं कुटी में- चाहे वह बढ़िया कोठी ही क्यों न हो- पर उसका नाम कुटी ही होता है। उसमें सुख के सभी सामान होते हैं, श्रद्धालु लोग तो उनके किसी आचरण पर सन्देह नहीं करते। पर कुतर्की भी कभी पहुँच जाते हैं और पूछ बैठते है- “महाराज! आप तो त्यागी हैं, फिर इन वस्तुओं का संग्रह आपने क्यों किया, ये चीजें तो विलास की हैं।” कोई भला आदमी अगर ऐसा काम करता है और उसे टोक दिया जाता है तो वह लज्जित हो जाता है। पर ये महात्मा तो घुटे हुए होते हैं। वे ऐसे प्रश्नों के लिये पहले से ही बहुत तरह के उत्तर तैयार रखते हैं। जैसा मौका देखा वैसा ही दे दिया। कभी कहते हैं “शिष्यों की इच्छा! हमारी तो कोई इच्छा है ही नहीं! हमारे लिये जैसे बढ़िया पोशाक पहिनना वैसा ही नंगा रहना।” कभी मुस्करा कर चुप रह जाते हैं, कभी आँखें तरेर कर देख भर लेते हैं, कभी कहते हैं- “अँग्रेजी पढ़ते हो न भैया? तुम ये सब बातें क्या जानो? किसी साधु का सत्संग किया होता हो जानते।” कभी कभी कह देते हैं- “यह तो प्रचण्ड नास्तिक है, निकालो इसको। आश्रम अपवित्र कर रहा है।” इसी तरह की चालों से वे अनेक विरोधियों का मुँह बन्द कर देते हैं। अगर सब तरह से हार गये तो कह देते हैं कि “शास्त्रों के बन्धन जीवन्मुक्तों के लिए लागू नहीं होते।” फिर कोई कुछ नहीं बोल सकता क्योंकि यह कहना कि आप तो जीवन्मुक्त नहीं है- शिष्टाचार के विरुद्ध समझा जाता है। इसी तरह की विद्या के सहारे ये लोग भोली जनता को धोखे में डालकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया करते हैं। इस प्रकार इनका तो काम चल जाता है पर धर्म और समाज को जो गहरी क्षति उठानी पड़ती है उस पर कोई दृष्टिपात नहीं करता। आवश्यकता है कि हम केवल वेष के चक्कर में न पड़कर गुण की पूजा करना सीखें।
(श्री जी. श्रीकण्ठ, मैसूर)
वर्तमान समय में संसार में एक बड़ी विचित्र परिस्थिति दिखलायी पड़ रही है। एक ओर मानव विद्या, कला, धन, वैभव, शक्ति के उच्चतम शिखर पर पहुँच रहा है, वायु, जल, विद्युत, सूर्य सबको अपने नियंत्रण में कर रहा है, और दूसरी तरफ उसे उतनी शाँति भी प्राप्त नहीं है जितनी एक जंगली मनुष्य को प्राप्त है। एक दिन वह हाइड्रोजन बम के विस्फोट से ‘रेडियो एक्टिविटी’ का घातक असर होने की बात सुनकर घबड़ाता है, तो दूसरे दिन इन्फ्लुएंजा के प्रकोप से व्याकुल होकर हाय-तोबा करता दिखलाई पड़ता है। यद्यपि सभी मनुष्य रात-दिन सुख पाने की चेष्टा करते रहते हैं, पर बदले में उनको प्रायः दुःख ही प्राप्त होता है, अथवा वे दुःखी दिखलाई पड़ते हैं। इसका कोई विशेष कारण अवश्य होना चाहिये, और विचार करने से यही जान पड़ता है कि आज कल मनुष्य साँसारिक सम्पदा को ही सुख का एक मात्र साधन समझ बैठे हैं, और उसी को प्राप्त करने के लिये चारों तरफ दौड़ते रहते हैं। हर एक आदमी चाहता है कि मैं अधिक से अधिक सम्पदा इकट्ठी करके रख लूँ जिससे किसी प्रकार का अभाव सता न सके। पर चूँकि दूसरे मनुष्य भी ऐसी ही चेष्टा करते हैं इसलिये स्वभावतः उनमें संघर्ष हो जाता है और उनको कठिनाइयाँ, कष्ट सहन करने पड़ते हैं। जो दशा व्यक्तियों की है, वही छोटे-बड़े तमाम राष्ट्रों की भी है। वे भी संसार के सब पदार्थों और सम्पत्ति पर अपना प्रभुत्व अथवा अधिकार चाहते हैं, जिसके फल से उनमें भी वैमनस्य और संघर्ष की आग भड़कती है जिसके फल से करोड़ों मनुष्यों को संकटग्रस्त होना पड़ता है।
उदाहरण के लिये अमेरिका को देखिये। वह संसार में सबसे अधिक धन-धान्य और प्राकृतिक सम्पत्ति से सम्पन्न है। पर वह रूस को अपना प्रतिद्वन्दी समझता है और इस कारण सुख-शान्ति का उपयोग करने के बजाय बेचैन बना रहता है। इसलिए यह स्पष्ट जान पड़ता है कि मनुष्य को धन-धान्य और सम्पत्ति से वास्तविक सुख नहीं मिल सकता। इन पदार्थों को सुख के साधनों में गिना अवश्य जा सकता है, पर जब तक मनुष्य के मन में शान्ति नहीं है- मन पर नियंत्रण नहीं है, तब तक सुख के पाने की आशा निरर्थक ही है। सुख का प्रधान आधार मानसिक शान्ति पर है। यदि मन में अशान्ति रही तो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ भोग सामग्री भी सुख नहीं दे सकती। जैसा गोस्वामी जी ने अयोध्या काण्ड में कहा है-
भोग रोग सम भूषण भारु। यम यातना सरिस संसारु॥
तब केवल यह विचार करना रह गया कि मन किन कारणों से अशान्त हो जाता है। भारतीय ऋषियों ने इसका प्रधान कारण इच्छाओं को बतलाया है। मन में एक इच्छा उत्पन्न होती है और मनुष्य उसकी पूर्ति के लिये उद्योग करता है। उसके पूरी होने के पहले ही दूसरी इच्छा उत्पन्न हो जाती है। जैसा कि एक शेखचिल्ली की कहानी में बताया गया है कि वह किस प्रकार एक मुर्गी खरीदने का विचार करके हाथी खरीदने और राजा बनने की इच्छा करने लग गया। इसी प्रकार मनुष्य की एक छोटी इच्छा पूरी होती है, तो उससे बड़ी इच्छा पैदा हो जाती है। दूसरी के पूरी होने पर तीसरी और भी बड़ी उसका स्थान ग्रहण कर लेती है। यही क्रम जीवन भर लगा रहता है और इस प्रकार इच्छाओं की पूर्ति करने के लिये मनुष्य सदा व्यस्त बना रहता है। इसलिये जो व्यक्ति सुख की खोज करता है उसे इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना चाहिये। तब इच्छायें अपनी परिस्थिति और आवश्यकता के अनुकूल ही रहेंगी तभी मनुष्य का मन शान्ति प्राप्त कर सकता है और तभी उसे सच्चा सुख प्राप्त हो सकता है।
(श्री एडाल्फ जुस्ट)
पिछले कुछ सौ वर्षों योरोप में भौतिकवाद का जोर बढ़ रहा है और उसने इस लहर को समस्त संसार में फैला दिया है। आज हमको अपने देश के भी अधिकाँश लोगों में जो भोगवाद, फैशनपरस्ती की बढ़ी हुई प्रवृत्ति दिखलायी पड़ती है उसका मूल कारण योरोप के उपर्युक्त सिद्धान्तों का ही प्रभाव है। पर जब भोगवाद के हानिकारक परिणाम दिखलाई पड़ने लगे तो योरोप के ही अनेक लोग उसके विरुद्ध हो गये और उन्होंने ‘प्रकृतिवाद’ का नारा लगाया। इस लेख के लेखक इन्हीं विचारों के एक व्यक्ति हैं और उन्होंने ‘प्रकृति की ओर लौटो’ नामक पुस्तक लिखी है। इसमें भौतिकवाद के विरोध और संसार में फैले हुए कष्टों के सम्बन्ध में निम्नलिखित दलीलें दी हैं :-
(1) आरम्भ में मनुष्य रोग, द्वेष, दुःख, दारिद्रय से मुक्त था। न वह पापी था, न रोगी। वह विशुद्ध था और ईश्वरीय तेज उसमें विद्यमान था।
(2) वह अपने कसूर से पतित हुआ। वह अपनी अयोग्यता से उन्नति न कर सका, उल्टा उसने अपराधों की वृद्धि की, जिससे उसे रोग, शोक, दुःख, दरिद्र ने आ घेरा। विषय-वासना से उत्पन्न हुई गुलामी से उसकी दुर्गति हो गई।
(3) विज्ञान बेदम है। भूकम्प आने के पहले पशु-पक्षी भाग जाते हैं, पर मनुष्य को खबर नहीं होती। विज्ञानवादियों का कमीशन भी एक बार कुछ खबर न पा सका और भूकम्प आ गया।
(4) बीमारी पाप है। यदि संसार में पाप न हो, तो बीमारी भी न हो। यह मानी हुई बात है कि मानसिक विकार, खुदगर्जी, अभिमान, ईर्ष्या, द्वेष, अनुदारता और क्रोध आदि का भयंकर असर शरीर पर पड़ता है।
(5) मनुष्य के पापों का असर समस्त प्रकृति को दूषित कर देता है। मनुष्य ने उन्नति के नाम पर प्रकृति को बिगाड़ दिया है। जंगलों को काटकर, वायु को दुर्गन्धित करके और शिकार खेलकर सृष्टि को अस्वाभाविक बना दिया है।
(6) क्या कभी किसी ने विचार किया है कि हम क्यों जीते हैं, हमारे जीवन का क्या उद्देश्य है, हम क्यों मरते हैं, संसार का मुख्य प्रयोजन क्या है और परलोक क्या है?
(7) कला-कौशल और व्यापार ने उपरोक्त सब बातों का ध्यान भुला दिया है। नवीन आविष्कारों ने संसार को उलट दिया है। मनुष्य की दौड़-धूप इतनी बढ़ गयी है कि हम उसे चिन्ताजनक अशान्ति मान सकते हैं। व्यापार ने समस्त संसार में एक ऐसी लड़ाई उत्पन्न कर दी है, जैसी आज तक नहीं हुई। व्यापारी रेलों, साइकिलों और मोटरों द्वारा शहर-शहर, पहाड़-पहाड़, नदी-नदी मारे-मारे फिरते हैं। यहाँ से साधन काम नहीं देते वहाँ हवाई जहाजों द्वारा जाते हैं। इनको कहीं सुख नहीं। कौन ऐसा व्यापारी है जो बीमार और अशक्त नहीं?
(8) कुदरत और सभ्यता दोनों परस्पर विरोधी हैं, जो कभी एक नहीं हो सकते। प्राचीन काल में मिश्र, वैविलन, फिनीशिया, यूनान और रोम ने सभ्यता का विस्तार किया, पर आज उनका कहीं पता नहीं है। आज अनेक श्रमजीवी कारखानों के धुँए और खतरनाक यन्त्रों से अपना आरोग्य और स्वतंत्रता खो रहे हैं।
(9) ऊँची जातियों, हाकिमों और पूँजीपतियों ने अपनी शक्ति से निर्बल जातियों को कुचल डाला है। मानसिक पाप से प्रकृति पर धक्का लगता है।
(10) यदि मनुष्य के लिये पृथ्वी पर चलने की अपेक्षा हवा में उड़ना उत्तम होता तो उसके पंख अवश्य होते।
(11) बहुतों का ख्याल है कि मनुष्य प्रकृति की ओर कभी नहीं लौट सकता। वह बुद्धिबल से प्रकृति तक पहुँच सकता है। किन्तु मालूम नहीं ये लोग बुद्धिबल किसको कहते हैं। मनुष्य तो प्रकृति को छोड़ कर बुद्धिवाद में चला गया, अब वह बुद्धिवाद के द्वारा प्रकृति में कैसे आ सकता है? यह प्रवृत्ति मनुष्य को कभी सुखी, निरोग और मृत्युंजय नहीं बना सकती।
(12) सभ्यता ने इसके पूर्व ऐसी उन्नति कभी नहीं की। इसकी भी एक प्रतिक्रिया होगी जो या तो इस सभ्यता को नष्ट कर देगी या इसे प्रकृति और परमेश्वर तक पहुँचा देगी।
(13) मनुष्य प्रकृति को अपना गुलाम बनाकर सुख चाहता है, परन्तु वह इस मार्ग से दुःखों की ओर ही जा रहा है, क्योंकि उसने ईश्वरीय सृष्टि-नियमों को भंग किया है।
(14) डार्विन के विकास-सिद्धान्त से उच्छृंखलता बढ़ी है और मनुष्य- जाति की बड़ी हानि हुई है। इस सिद्धान्त से मनुष्य-जाति की आबरू बहुत कम हो गई।
(15) भौतिक और आध्यात्मिक सिद्धान्त में बड़ा अन्तर है। दोनों परस्पर विरोधी हैं।
(16) जीवन-संग्राम, धीरे-धीरे कम हो जायेगा। परन्तु यह तब तक नष्ट नहीं हो सकता जब तक कि भौतिक उन्नति का नाश न हो जाय और आध्यात्मिक जीवन फिर से आरम्भ न हो।
(17) जिसे पुनः ईश्वर-प्राप्ति पर विश्वास होता है वह मनुष्य भौतिक उन्नति के तंग रास्ते से निकलकर परमेश्वर के प्रकाशमय मार्ग पर आ जाता है। यही सच्चा विज्ञान है। ऐसा करने से उसमें नवजीवन तथा बल की वृद्धि होती है और अन्त में वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।
इसलिये लौटो-लौटो-प्रकृति की ओर लौटो। नीचे लिखे नियमों पर आचरण करो। तभी भगवान तुम पर कृपा करेंगे और तुम कष्टों से छुटकारा पा सकोगे।
(1) मनुष्य फलाहारी है। मेवा और फल इसके लिये महान लाभकारी हैं। उसके पचाने वाले यन्त्रों की बनावट फल पचाने के लिए है। दूध, दही और मक्खन खाना उत्तम है।
(2) यद्यपि हम हमेशा नंगे नहीं रह सकते, तो भी शरीर का बहुत बड़ा भाग खुला रह सकता है। खुले पैर बिना जूता पहने घर में और बाहर फिरना बहुत लाभकारी है। स्त्री और पुरुष दोनों को चाहिये कि नंगे सिर घूमने की आदत डालें। दुःख के साथ कहना पड़ता है कि हमारे पुरुष और स्त्री वर्ग दोनों इस कमबख्त फैशन की दयाजनक गुलामी में फँस गये हैं।
(3) सोने के लिये घास और लकड़ी के बने हुए सादे झोंपड़े ही उत्तम हैं। ये झोंपड़े खुली वायु में जहाँ सघन वृक्षावली और काफी रोशनी हो, बनाने चाहिएं। जमीन पर घास बिछाकर अथवा रेतीली मिट्टी (बालू) बिछाकर सोना उत्तम है। मिट्टी के स्नान से दाह और पुराने रोग भी शाँत हो जाते हैं।
(4) बिजली की रोशनी आँख के लिये महा हानिकारक है।
(5) जहाँ जंगल नहीं वहाँ बड़े-बड़े बगीचे लगाकर जंगल बना लेना चाहिये। मनुष्य जब फल खाने लगेगा तो बगीचों के जंगल हो जायेंगे, जहाँ पशुओं को चारा मिलेगा और मनुष्य को फल।
(6) विषय-भोग तभी होना चाहिये जब प्रकृति आज्ञा दे।
(7) कातना- बुनना, सीना और अन्य गृहस्थी के आवश्यक पदार्थ सब घर में ही तैयार कर लेना चाहिए। विलास की चीजें और साज-सामान एक दम हटा देना चाहिये।
(8) यह मानी हुई बात है कि सादगी ही सत्यता का चिन्ह है।
(9) पशुओं का पालन अच्छी तरह करना चाहिये, क्योंकि उनसे सवारी, माल ढोना, दूध और खेती सम्बन्धी अनेक काम लिये जाते हैं। पशुओं को ताजा, शुद्ध चारा देना चाहिये। जिन घोड़ों को घास की बजाय दाना अधिक दिया जाता है वे बीमार हो जाते हैं। घोड़े की पूँछ वगैरह भी न काटनी चाहिये।
(10) कृत्रिम खाद से उत्पन्न किया गया अन्न, रोगी होता है। यहाँ (विलायत) के रसोईदार अपने देश का गेहूँ अधिक पसन्द नहीं करते। गन्दी खाद से उत्पन्न को तो पशु पसन्द नहीं करते। यही हाल कृत्रिम फलों का समझना चाहिये।
इस तरह यदि मनुष्य भौतिकवाद को त्यागकर परमात्मा और प्रकृति की ओर फिरे तो आपसे आप सामाजिक असमानता मिट जाय और सबको परिश्रम करने का समान रूप से अवसर मिले। मनुष्य शुद्ध हो जाय, निरोग जो जाय, बलवान और प्रतिभावान हो जाय। संसार से बैर, ईर्ष्या, द्वेष चले जायें और हिंसा का सदा के लिये अन्त हो जाय।
नौकरी प्राप्त हुई
श्री श्यामसुन्दर त्रिपाठी चिलौला (उन्नाव) से लिखते हैं कि मैं बहुत दिनों से नौकरी के लिये परेशान था। जहाँ भी जाता था निराशा ही दृष्टिगोचर होती। मैं सब तरफ से निराश हो चला, तब चिलौला के गायत्री शाखा- संचालक श्री रामपालसिंहजी की प्रेरणा से मैंने गायत्री माता का आँचल पकड़ा। एक महीना भी नहीं हुआ था कि 30 सितम्बर सन् 50 को मैं एक ऐसे कम्पीटीशन में बैठ गया जिसमें सफलता की आशा नाम मात्र को ही थी। पर जो आदमी लिये गये उनमें अपना नाम देखकर मैं आश्चर्य-चकित रह गया।
मोटर दुर्घटना से प्राण-रक्षा
श्री सुधाराम महाजन बिलासपुर से लिखते हैं कि गत मास कार्यवश रायपुर से कबर्धा जाने को ‘बस’ में सवार हुआ। शायद भावी दुर्घटना की पूर्व सूचना मुझे अव्यक्त रूप से हो रही थी, इससे रामपुर के ‘वेटिंग रूम’ में ही मैंने चालीसा के पाँच पाठ कर डाले। मोटर में भी मानसिक जप चल रहा था। लगभग 14 मील निकल जाने पर अचानक मोटर का अगला चक्का टूटकर अलग जा गिरा। हमारी गाड़ी बगल के खड्डे की ओर बढ़ चली और सभी यात्रियों की आँखों के आगे अंधेरा छा गया। ड्राइवर ने कुशलता से ब्रेक लगाई और किसी भी यात्री को तनिक भी धक्का न लगते हुए गाड़ी सड़क के किनारे ऐसे रुक गई मानों किसी ने टेक लगाकर खड़ी कर दी हो। ईश्वर का नाम लेते हुए सभी यात्री उतर पड़े। लोग कह रहे थे कि गाड़ी में कोई नेक आदमी जरूर है, जिसके कारण सब बाल-बाल बच गये।
यज्ञ में अज्ञात व्यक्ति से सहायता मिली
मेरवी (सौराष्ट्र) से एक गायत्री उपासक लिखते हैं कि श्रावण मास में गायत्री जी की आरती के समय यज्ञ करने वाले श्री करुणाशंकर भाई के मस्तक पर प्रकाश की किरणें दिखलाई पड़ने लगीं, जिससे सभी उपस्थित जनों को आश्चर्य हुआ। दूसरे दिन प्रातः काल के समय एक बारह वर्ष का लड़का 50/- का चेक मोरवी बैंक के ऊपर करुणाशंकर भाई के नाम का दे गया। पर देने वाले का कोई नाम न था। इस 50/- से नवरात्रि में यज्ञ कर दिया गया। उस समय भी उनके मस्तक पर प्रकाश की किरणें दिखलाई पड़ीं। यह सब माता की कृपा का चमत्कार ही है।
बीमारी दूर हो गयी
जिला रायपुर (मध्यप्रदेश) के एक सज्जन लिखते हैं कि ता. 20 सितम्बर को मैं रायगढ़ के छातादेई नाम के मौजा में गया था और लोगों को गायत्री-जप का उपदेश दे रहा था। कुछ लोगों ने कहा कि पास ही के मकान में 5 आदमी बहुत अधिक बीमार पड़े हैं। अगर तुम उनको अपने मन्त्र से आराम कर दो तो हमारा सब गाँव गायत्री का जप करेगा। इस पर मैंने उस घर में एक अनुष्ठान सवा लाख का आरम्भ किया और तीन दिन के भीतर सब अच्छे हो गये। इससे वहाँ की जनता पर बड़ा प्रभाव पड़ है और सब जप करने लगे हैं।
ट्रैक्टर से जान बच गई
डेरापुर (कानपुर) से श्री सतीशचन्द्र लिखते हैं कि इसी नवरात्रि में जबकि मेरा 24000 का अनुष्ठान चल रहा था, एक दिन मैं खेत ट्रैक्टर चलाने गया और भूल से नेकर आदि न पहिन कर धोती ही पहने रहा। न मालूम कैसे धोती का एक अंश साइलैंसर पर पहुँच गया और उसमें भयंकर आग लग गई। मुझे गर्मी जान पड़ी पर मैं उस तरफ ध्यान न देकर खेत जोतता रहा। पर जब एक दम लौ उठी तो मैं घबराकर चलते ट्रैक्टर से कूद कर अलग खड़ा हो गया। उसी समय आग अपने आप बुझ गयी। पर ट्रैक्टर चलता जा रहा था, मैं दौड़ा पर एक झाँखर से टकराकर गिर पड़ा, जिससे बहुत से काँटे मेरे बदन में लग गये। पर इस ओर ध्यान न देकर मैं उठा और दौड़कर उसका स्विच बन्द किया। कितनी भीषण दुर्घटना हो जाती यदि मैं ट्रैक्टर को रोक न पाता दस हजार रुपये का ट्रैक्टर और मैं वहीं पर समाप्त हो जाते। माता ने हमें सब तरह से बचा लिया। मेरे शरीर पर पाँच-सात छाली के अतिरिक्त कोई हानि नहीं हुई।
चुनाव में सफलता मिली
श्री. कृष्णाकुमारीजी छिबरामऊ फर्रुखाबाद से लिखती हैं कि यहाँ के गायत्री-उपासक डॉ. जगदीश्वर दयाल स्थानीय बोर्ड की चेयरमैनी के लिये खड़े हुए थे। उनके मुकाबले में एक नामी रईस श्री राधेगोविन्दजी गुप्त खड़े थे। दोनों तरफ से बड़ा प्रचार हुआ, पर विरोधी उम्मीदवार के साधनों और खर्च को देखते हुए डॉक्टर साहब की आशा बहुत कम थी। जब चुनाव के केवल 16 घण्टे शेष रह गये और सब लोग निराशा का भाव प्रकट करने लगे तो मैंने संकल्प करके विधिपूर्वक जप करना आरम्भ कर दिया। माता बड़ी दयामयी हैं, उनकी कृपा से सब विघ्न-बाधाओं को पार करके डॉक्टर साहब चेयरमैनी के चुनाव में विजयी हो गये।
पुत्र का विवाह हो गया
श्री गोविन्ददास भार्गव, दिगौड़ा (टीकमगढ़) से लिखते हैं कि “जबसे मैंने गायत्री माता की शरण ली है मेरी कितनी ही मनोकामनायें पूरी होती जाती हैं। मैंने दिल में सोचा कि पुत्र की शादी इस वर्ष हो जानी चाहिये सो माता की कृपा से निर्विघ्न पूरी हो गई।”
ओलों से फसल की रक्षा हुई
श्री ब्रजबल्लभ जी, दिगौड़ा से लिखते हैं कि इस बार जब हमारे गाँव की फसल तैयार हो चुकी थी, ऐसे काले-काले बादल उठे कि हम सबका हृदय काँप उठा, क्योंकि ऐसे समय ओला पड़ने की पूरी आशंका रहती है। उस समय हम सब सत्संग में बैठे थे। हमने वहीं माता से प्रार्थना की कि ‘रक्षा करो’। माता ने प्रार्थना सुन ली माता कृपा न करती जो सैकड़ों किसानों का सर्वनाश हो जाता।
प्रेत बाधा दूर हो गई
भवानीशंकर पाठक सठई (छतरपुर) बुन्देलखंड से लिखते हैं कि “मेरी छोटी 2 वर्ष की बच्ची को कोई प्रेतात्मा कष्ट देती थी जिससे वह चिल्ला उठती थी और बहुत परेशान थी। जब वैद्य को दिखलाया तो उन्होंने कहा यह गायत्री-मंत्रों से अच्छी होगी। श्री शिवप्रसाद शर्मा ने गायत्री मन्त्र से झाड़ दिया तो दूसरे दिन वह बिलकुल निरोग हो गई।”
बुरे विचार बदल गये
श्री निरंजनकुमार पटेल, (महेसाना, गुजरात) से लिखते हैं कि आजकल के नवयुवकों की तरह मेरे विचार भी बहुत दूषित थे और पराई बहिन बेटियों की तरफ कुविचार और कुदृष्टि की भावना रखता था। पर जब मथुरा जाकर पूज्य आचार्यजी के आज्ञानुसार सवा लाख का अनुष्ठान किया तो मेरे विचारों में बड़ा अन्तर पड़ गया और हृदय की भावनायें बहुत शुद्ध हो गईं। इस अनुष्ठान के बाद मुझे जो आन्तरिक आनन्द प्राप्त हुआ उसका वर्णन मैं नहीं कर सकता।
रक्त-पित्त रोग से छुटकारा मिला
श्री जगदीश्वरप्रसाद भट्ट अध्यापक (पाला, मैहर, बुन्देलखण्ड) से लिखते हैं कि मई 1957 में मुझे रक्त-पित्त रोग का बड़े जोरों से दौरा हुआ। रक्त-स्राव अधिक मात्रा में होने से मैं एकदम निर्बल हो गया। मेरी दशा देखकर घर के सब लोग घबड़ाने लगे। पर मैंने उनको धीरज बंधाया और गायत्री-उपासना करने को कहा। इस पर सब बच्चे और स्त्री गायत्री जप करने लगे। माता की कृपा से एक सप्ताह के भीतर ही मेरा रोग पूर्णतया शाँत होकर इस संकट से छुटकारा मिला।
घर की हालत सुधर गई
श्री. यच.यू. नारायणराव बी.ए. साहित्यरत्न (रामानिया रोड, मैसूर) से लिखते हैं कि गत चैत्र में मैंने सहस्र गायत्री हवन किया था और शंकर जयन्ती पर 24 लाख का पुरश्चरण किया था। इसके फल से सब कामों में मुझे सफलता मिली है। मैं साहित्यरत्न परीक्षा में उत्तीर्ण हो गया, मेरी नौकरी भी लग गई। इस प्रकार माता अपने भक्त की सब तरह से सहायता करती हैं।
गेहूँ की फसल अतिउत्तम हुई
महाशय लक्खीरामजी मलेसा (गुड़गाँवा) से लिखते हैं कि मैंने गत वर्ष खेत तैयार करके मुकाबले के लिये गेहूँ बोया और माता से सफलता की प्रार्थना की। जबकि और किसी के खेत में 2 मन से 4 मन प्रति एकड़ पैदावार हुई मेरे खेतों में बिना खाद के 5 मन से 8 मन तक गेहूँ उत्पन्न हुये।
कालस्वरूप सर्प से बचा
श्री. बजरंगसिंह, शाखामंत्री (रेउरी, सीतापुर) से लिखते हैं कि मैं घर के भीतर माता की सेवा पूजा में लगा था, इधर बाहर एक काला नाग सोने के तखत पर चढ़कर बिस्तर के भीतर जा बैठा मेरे छोटे भाई की स्त्री टट्टी को जा रही थी उसने देख लिया। इससे बिस्तर को लौट कर उसे मार दिया गया। माता की कृपा के बिना ऐसे छिपे काल से कौन रक्षा कर सकता था।
मृत्यु से रक्षा और घर जलने से बचा
सन्तबक्ससिंह अमीन, रेउरी (सीतापुर) लिखते हैं कि मैं रुपया वसूल करने बाहर गया था वापसी के वक्त मेरे शत्रुओं ने रुपया लेने की गरज से कुछ बदमाश लगा दिये। पर माता की दया उन्हीं में से एक बदमाश ने स्वयं पुलिस में जाकर इत्तला कर दी और सबको गिरफ्तार करा दिया। इसी प्रकार मेरे घर को जलाने की गरज से एक दुश्मन ने आग लगाने की चेष्टा की, पर उसी समय हवा का रुख बदल जाने से स्वयं उसका और दूसरे का घर जल गये और मेरा घर बच गया।
परीक्षा और नौकरी में सफलता
श्रीमती सरस्वतीदेवी (विजनौर) से लिखती हैं कि उनके पुत्र विश्वेन्द्रभूषण बीमार हो जाने पर भी बी.एस-सी. में फर्स्ट क्लास में पास हो गया और दूसरे रवीन्द्रभूषण बी.टी. में पास होकर तुरन्त नौकरी पा गये। ये दोनों माता की उपासना कर रहे थे। जिसने माता की शरण ली, वह अवश्य सफल हुआ यह मेरा अनुभव है।
18 साल बाद पुत्र का जन्म हुआ
श्री धुन्दीसिंह शर्मा (बड़ेसरा, अलीगढ़) से लिखते हैं कि हमारे यहाँ के श्री हुन्डीलाल टेलर मास्टर ‘अखण्ड-ज्योति’ का गायत्री अंक पढ़ने से गायत्री-उपासना में संलग्न हुये थे। 1955 की चैत्र
(हिमालय निवासी त्रिकालदर्शी परमसिद्ध महात्मा विशुद्धानन्दजी महाराज द्वारा भेजे हुए एक सन्देश का साराँश)
गायत्री तपोभूमि द्वारा आयोजित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान भारतभूमि में गत पाँच हजार वर्षों में हुए सभी अनुष्ठानों से अधिक महत्वपूर्ण है। महाभारत के बाद इतना बड़ा एवं इतना शक्तिशाली आयोजन और कोई नहीं हुआ। इतनी शक्तिशाली साधन-व्यवस्था यदि कोई साधक अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए कर ले तो वह इस विश्व-ब्रह्माण्ड में सर्वोच्च पद पर पहुँच सकता है। परन्तु चूँकि यह अनुष्ठान विश्व-कल्याण के लिए, विश्व-व्यापी त्रासों और विपत्तियों को हटाने के लिए किया गया है, इसलिए उस उद्देश्य की पूर्ति होनी भी निश्चित है। इस अनुष्ठान के फलस्वरूप भारतभूमि आगामी कुसमय में से अपने अस्तित्व की रक्षा कर सकेगी और उस ऊँची स्थिति को पहुँच सकेगी जो आज किसी भी देश को प्राप्त नहीं है। भारत को विशेष रूप से इस अनुष्ठान से उत्पन्न महत्वपूर्ण लाभों का रसास्वादन प्राप्त होगा।
आसुरी शक्तियाँ ऐसे दिव्य अनुष्ठानों के प्रभाव से नष्ट होती हैं, पर नष्ट होते समय वे अपने नष्ट करने वाले पर प्रत्याक्रमण अवश्य करती हैं। बन्दूक में भरी हुई बारूद को जब घोड़ा दबाकर चलाया जाता है तो वह घोर गर्जना करती हुई धू-धाँय की आवाज करती है और पीछे की ओर चलाने वाले में ऐसा धक्का मारती है कि यदि चलाने वाला बेखबर हो तो वह औंधे मुँह गिर सकता है और उसकी हड्डी-पसली टूट सकती है। ताँत्रिक अनुष्ठान करने वालों को प्रायः अनेक भयों और प्रलोभनों के बीच में गुजरना पड़ता है, यदि वे फिसल जाएं या डर जाएं तो वे भयंकर विपत्ति में पड़ सकते हैं। उन्हें जीवन से भी हाथ धोना पड़ सकता है। चाहे ताँत्रिक हो या वैदिक शक्ति-तन्त्र को जब भी छेड़ा जायेगा तो उसकी प्रतिरोधी प्रक्रिया भी अवश्य होगी। प्राचीन काल में वैदिक अनुष्ठान करने वाले साधकों को भी यह कठिनाई बराबर सामने आती रही है। विश्वामित्र ऋषि एक बहुत बड़ा अनुष्ठान कर रहे थे- उससे आसुरी तत्व नष्ट होने और दैवी तत्वों के प्रबल होने की संभावना थी, फलस्वरूप प्रतिरोधी असुर शक्तियाँ अपनी आत्म-रक्षा के लिए कटिबद्ध हो गई और उन्होंने अपनी जान को हथेली पर रखकर विश्वामित्र का आयोजन असफल करने की ठान ठानी। ताड़का, मारीच, सुबाहु आदि असुरों ने प्रत्यक्ष संघर्षात्मक मोर्चा संभाला और नानाविधि उपद्रव खड़े करके उस महान् अनुष्ठान को नष्ट करने पर कमर कस ली। विश्वामित्र घबरा गये और उन्हें अन्ततः दशरथजी के द्वार पर अपनी रक्षा की पुकार करने जाना पड़ा, क्योंकि यदि विश्वामित्रजी स्वयं क्रोध करते, असुरों से लड़ते या शाप देते तो उनके अनुष्ठान से उत्पन्न शक्ति उसी प्रतिरोध में समाप्त हो जाती। असुर तो मर जाते पर उनका उद्देश्य विश्वामित्र की शक्ति को नष्ट कर देना पूरा हो जाता। इसी कठिनाई से बचने के लिए विश्वामित्रजी राम-लक्ष्मण को बुलाकर लाये थे।
गायत्री तपोभूमि द्वारा संचालित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान, त्रेता में विश्वामित्र द्वारा आयोजित अनुष्ठान से कम महत्वपूर्ण नहीं है, त्रेता में उस अनुष्ठान में एक देशीय, एक क्षेत्रीय विशेषताएं थीं और इस युग की स्थिति के अनुसार इस अनुष्ठान में विशाल जनसमूह द्वारा सुगठित 24 करोड़ जप, 24 लक्ष आहुतियाँ, 24 लक्ष मन्त्र-लेखन, 24 लक्ष पाठ का विधान है। दोनों ही अनुष्ठानों का मूल आधार गायत्री महामन्त्र रहा है। गायत्री महामन्त्र के ऋषि विश्वामित्र हैं। उन्होंने अपने जीवन में गायत्री का ही अनुसन्धान किया था, वही उनके प्रयोगों का एकमात्र माध्यम था। तपोभूमि में भी वैसी ही पुनरावृत्ति हो रही है। रावण काल में असुरता एक देशीय थी इसलिए विश्वामित्र का अनुष्ठान भी एक देशीय था। अब असुरता विश्व-व्यापी है, उसका विकास लंका जैसी किसी नगरी में सीमित न होकर जन-मानस में व्यापक हो गया है। ऐसी दशा में उसके निवारण के लिए विशाल जन समूह के द्वारा सुयोजित ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान जैसी प्रक्रिया ही उपयुक्त हो सकती है।
असुरता विरोधी इतने बड़े अभियान द्वारा जो दिव्य शक्ति उत्पन्न की जा रही है, उसकी विरोधी प्रतिक्रिया का उत्पन्न होना स्वाभाविक है। असुरता अपने आपका नष्ट होना चुपचाप सहन कर ले और अपने शत्रु से कुछ बदला न ले ऐसा नहीं हो सकता। हमें स्पष्ट दीख रहा है कि अगले वर्ष इस ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के संयोजक श्री आचार्यजी के ऊपर आसुरी तत्वों का कोई बड़ा आक्रमण होगा। जो अनुष्ठान उन्होंने आरम्भ किया है वह अत्यधिक विशाल है। 24 करोड़ जप और 24 लक्ष आहुतियाँ प्रतिदिन होना कोई सामान्य कार्य नहीं है। जब छोटे-छोटे 24 हजार और सवा लक्ष के अनुष्ठानों के लिए असुरता से संरक्षण की आवश्यकता पड़ती है तो इतने विशाल अनुष्ठान के विरोध में तो असुरता निश्चय ही उठेगी। सिंह और सर्प जिस प्रकार अपने छेड़ने वाले के ऊपर झपटते हैं उसी प्रकार इस महा-अभियान के प्रतिरोध में भी असुरता फुफकार कर उठेगी।
आचार्यजी आध्यात्मिक तत्व ज्ञान के पारदर्शी मनीषी हैं, वे इस तथ्य को अवश्य जानते होंगे। दो वर्ष पूर्व उन्होंने सवा वर्ष में 125 करोड़ जप और 25 लाख आहुतियों के हवन का आयोजन किया था, उसमें जो प्रतिरोधी तत्व उत्पन्न हुए थे उनसे अपनी रक्षा करने के लिए उन्हें एक-एक माला सुरक्षा के लिए जपने वाले 24 हजार संरक्षक नियुक्त करने पड़े थे। तब यह आयोजन पार पड़ा था। उस पिछले अनुष्ठान की अपेक्षा यह वर्तमान अनुष्ठान लगभग 100 गुना बड़ा है। इस दृष्टि से असुरता का आक्रमण भी उन पर सौ गुना अधिक हो सकता है। उससे बचने के लिए सौ गुने सुरक्षा प्रयत्नों की भी आवश्यकता है। जब विश्वामित्र जैसे ऋषि को अपने निजी प्रयत्न अपर्याप्त मानकर राजा दशरथ के द्वार पर सुरक्षा-व्यवस्था के लिए जाना पड़ा तो आचार्य जी अपनी सुरक्षा अपने तपोबल से आप कर लेंगे यह मानना एक बड़ी भूल ही होगी। दो वर्ष पूर्व वाले विशाल गायत्री महायज्ञ के लिए 24 हजार संरक्षक नियुक्त करना और उससे 100 गुने बड़े यज्ञानुष्ठान को अरक्षित छोड़ देना किसी भी प्रकार उचित नहीं है।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान धीरे-धीरे विकसित हो रहा है। गत वर्ष 24 लाख जप और 24 हजार आहुतियाँ प्रतिदिन का संकल्प था। अब वह सवा करोड़, सवा लाख का चल रहा है। अगले वर्ष 24 करोड़ जप, 24 लक्ष आहुतियों का हो जायेगा। तब उसका पूर्ण परिपक्व काल होगा। असुरता भी अपने आक्रमणकारी अस्त्र-शस्त्र उसी क्रम से संभाल रही है। आगामी वर्ष हमें अपनी सूक्ष्म दृष्टि से स्पष्ट दीखता है कि आचार्यजी पर असुरता के अनेक आक्रमण होंगे। जिनमें से कुछ इस प्रकार के हो सकते हैं :-
1- उनके अब तब पूर्ण स्वस्थ रहने वाले शरीर में कोई आकस्मिक कठिन रोग उत्पन्न हो जाय।
2- किसी वाहन दुर्घटना से उनके शरीर को भारी क्षति पहुँचे।
3- किसी मनुष्य द्वारा उनके शरीर को क्षति पहुँचायी जाये।
4- किन्हीं व्यक्तियों की बुद्धि या वाणी पर असुरता बैठकर उनसे अनुष्ठान की निन्दा कराये और उससे अनुष्ठान में लगे हुए व्यक्ति डर जाएं या उदासीन हो जाएं।
5- इस अनुष्ठान में संलग्न साथियों, सदस्यों और साधकों पर आलस्य एवं उदासीनता छा जाय और वे संकल्पित साधना की उपेक्षा करने लगें।
6- तपोभूमि एवं आचार्यजी के सम्बन्ध में कोई लोकापवाद खड़ा हो जाय।
7- सहयोगियों का सहयोग शिथिल हो जाय।
8- कोई आकस्मिक कल्पनातीत बाधा खड़ी हो जाय।
प्राचीन युगों में असुरता अपने विरोधी पर सीधे आक्रमण करती थी। तीर तलवार से अपने विरोधी का शरीर नष्ट करती थी, पर इस युग में लुक-छिप कर छलपूर्ण, भेद भरे, षड्यन्त्रों की प्रधानता रहती है। छल, कपट, प्रपंच, धोखा, विश्वासघात, बनावट एवं षड्यन्त्र इस युग के प्रधान अस्त्र हैं। असुरता किन्हीं व्यक्तियों की बुद्धि में अपनी माया प्रवेश करके इन्हीं शस्त्रों से आक्रमण कराती है और अपने निशाने को आसानी से छेद लेती है।
यों आचार्यजी कच्ची मिट्टी के बने नहीं हैं। उनकी नस-नाड़ियाँ फौलाद की हैं, उन्हें तोड़ सकना हंसी खेल नहीं है। विगत तीस वर्षों से उन्होंने अपने को घनघोर तपस्याओं में तपा-तपाकर अष्टधातु बना लिया है। जिन कमजोरियों पर शत्रु हमला करता है, उन्हें उन्होंने पहले से ही ठोक-पीटकर काफी मजबूत बना लिया है। गिराने वाली वस्तुओं में वासना और तृष्णा-कंचन और कामिनी प्रधान हैं। इन दोनों पहलुओं को उन्होंने पूरी तरह परिपक्व कर लिया है। अपनी जीवन भर की कमाई हुई तथा पूर्वजों की छोड़ी हुई सम्पत्ति का एक-एक पैसा उन्होंने इस मिशन के लिए अर्पण कर दिया है। उनकी धर्म-पत्नी माता भगवतीदेवी ने अपने शरीर के आभूषणों की एक-एक कील माता के चरणों में अर्पण करके एक सतयुगी उदाहरण उपस्थित किया है। जौ की रोटी और नमक छाछ को अपना प्रधान भोजन और तन ढकने भर के लिए खादी के टुकड़े पहनने का व्रत लेकर धन-लोभ को एक प्रकार से इन दोनों ने अपने से हजारों कोस दूर कर दिया है।
यही बात वासना के सम्बन्ध में है। आचार्यजी का दाम्पत्य जीवन यों आरम्भ से ही साधनापूर्ण रहा है, पर गत पाँच वर्षों से तो यह दोनों स्त्री-पुरुष गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी एक दूसरे को माता-पिता जैसी दृष्टि से ही देखते हैं। आचार्यजी माता भगवतीदेवी को माताजी कहते हैं और माताजी की दृष्टि में आचार्यजी पिताजी हैं। आपस में जिनके इतने उच्च भाव हैं, वे दूसरे नर-नारियों के प्रति अत्यन्त उत्कृष्ट भावना ही रख सकते हैं। ऐसे दैवी जीवन में वैसे पतन की कोई संभावना नहीं है, जैसी सामान्य लोगों में होती है। असुरता इन्हीं दो छेदों में प्रवेश करके किसी ऋषि को तपविहीन करती है। चरित्र रूपी किले के इन दो प्रधान फाटकों पर आचार्य जी ने पहले ही इस्पात के फाटक जड़ दिये हैं। हिमालय जैसे उदार हृदय और मानसरोवर से निर्मल इन आत्माओं में वह विष बीज निश्चित रूप से कहीं नहीं है जो इतने बड़े अनुष्ठानों के संयोजकों और संचालकों को झुकाकर उस योजना को नष्ट-भ्रष्ट करा देते हैं। आचार्यजी असंख्यों को पार करने वाले अनुभवी मल्लाह हैं, वे अपने जीवन की बाजी लगाकर प्रारम्भ किए इस महान् अनुष्ठान की विफलता में अपनी किसी कमजोरी को कारण न बनने देंगे, इस सम्बन्ध में हम सब पूर्ण निश्चिन्त रह सकते हैं। वे महान् पैदा हुए हैं, महानता के साथ जी रहे हैं और उनका अन्त भी महान् ही होगा।
काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, मद, मत्सर, शोषण, अनीति, अन्याय, छल, कपट आदि अनेक कारण मनुष्य के सामान्य जीवन में ऐसे होते हैं, जिससे अनेक व्यक्ति उनके शत्रु हो जाते हैं। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के संचालकों में एक भी दुर्गुण ऐसा नहीं है, जिनके कारण असुरता को उन पर आक्रमण करने का मौका मिले। पर असुरता को बहाना तो कोई ढूंढ़ना ही पड़ेगा। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को असफल बनाने के दो ही निमित्त हो सकते हैं- (1) आचार्यजी का शरीर नष्ट या अशक्त हो जाय और उसकी स्थान पूर्ति के लिए और कोई वैसी ही तेजस्वी आत्मा आगे न आये, (2) जो साथी सहयोगी उनका साथ देते हैं वे उदासीन, विलग या प्रतिकूल हो जावें। इन दो ही स्थितियों में संकल्पित जप, हवन, पाठ, लेखन आदि पूरा न होने पर यह महा-अभियान निष्फल किया जा सकता है।
गीता के प्रथम अध्याय के 11वें श्लोक में दुर्योधन ने अपनी सेना के महारथियों को सावधान करते हुए कहा-
अयनेषु व सर्वेषु यथा भाग मवस्थिता। भीष्मयेवाभि रक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥
अर्थ- “इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह रहते हुए आप लोग सबके साथ ही निस्सन्देह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें।” इस अभिवचन में दुर्योधन ने भीष्म पितामह का महत्व सबसे अधिक बताया और अपनी सफलता के लिए उनके शरीर की रक्षा करने के निमित्त अपने सैनिकों और सेनापतियों को बड़ी सावधानी के साथ नियुक्त किया।
जिन देशों में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आविष्कार होते हैं, उन प्रधान आविष्कारों में लगे हुए वैज्ञानिकों की सुरक्षा उस देश की सरकार पूरी सावधानी से करती है। पुराने समय के राजा लोग ब्राह्मणों और तपस्वियों की सुरक्षा में ही अपनी शक्ति सुरक्षित समझ कर उनकी रक्षा प्राण-प्रण से करते थे। आज विश्व-शान्ति के लिए आरम्भ किया गया इस युग का महानतम अनुष्ठान- जिस पर कि संसार का भला-बुरा बहुत कुछ निर्भर है- असफल न हो जावे ऐसा प्रयत्न करना चाहिए; इसका उत्तरदायित्व अब किसी राजा या शक्तिशाली व्यक्ति पर नहीं, वरन् गायत्री- परिवार के सदस्यों पर है। उन्हें यह पूरा ध्यान रखना होगा कि आसुरी शक्तियाँ हमारे भीष्म पितामह के व्यक्ति को किसी प्रकार की आँच न पहुँचाने पावें। अगले वर्ष उन्हें यहाँ-वहाँ यज्ञ- सम्मेलनों में बुलाना या घुमाना भी जहाँ तक हो
सके नहीं ही करना चाहिये ताकि उनका शरीर अस्वस्थता या दुर्घटना होने के अवसरों से बच सके। उनके हिमगिरि जैसे उज्ज्वल व्यक्तित्व पर कीचड़ उछालने परिवार में उदासीनता, भेद-बुद्धि, मतिभ्रम एवं अश्रद्धा उत्पन्न करने की कोई छद्म प्रक्रियायें चल सकती हैं, इनकी वास्तविकता को समझने के लिये परिजनों में सतर्क बुद्धि रहनी चाहिये।
संकल्प बहुत बड़ा है, 24 करोड़ जप एवं 24 लक्ष आहुतियाँ रोज करने के लिए गायत्री परिवार का संगठन और भी बढ़ाने, मजबूत करने एवं गतिशील बनाने की आवश्यकता है। इसके लिए अगले वर्ष हर सदस्य को, हर साधक को, हर परिजन को कुछ अधिक त्याग करने, कुछ अधिक उत्साह दिखाने एवं कुछ अधिक परिश्रम करने की आवश्यकता है।
अन्त में एक बार आचार्य जी से भी पुनः कहना है कि वे प्रत्येक साधक को एक माला अधिक जप एक वर्ष तक अनुष्ठान की निर्विघ्न सफलता के लिए करने को कहें। सन् 58 में ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान पर नाना विधि आक्रमण होंगे। उस बहुत बड़ी खाई को पार करना है अन्यथा इतना विशाल आयोजन, इतना महान प्रयत्न विफल हो सकता है और उस विफलता का दुष्परिणाम सारी मनुष्य जाति को भोगना पड़ेगा।
सब अपना ध्यान आचार्यजी की सुरक्षा तथा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की प्रगति पर पूरी सावधानी के साथ रखें। सन् 58 के लिए गायत्री-परिवार को यह एक बहुत महत्वपूर्ण चेतावनी है।
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
प्रसन्नता की बात यह है कि गायत्री-परिवार के सभी सदस्य ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान को सफल बनाने में लगे हुए हैं। गत नवरात्रि में देश भर में जिस उत्साह से सामूहिक यज्ञानुष्ठान हुए उस प्रगति को देखकर प्रत्येक धर्म-प्रेमी के अन्तःकरण में सन्तोष होना स्वाभाविक है। यह उत्साह माता स्वयं ही साधकों के मन में भर रहीं हैं। कारण यह है कि ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की विशालता इतनी बड़ी है कि सभी परिजन यदि तत्परतापूर्वक अपना कर्तव्य पालन न करें तो इस अभूतपूर्व संकल्प की पूर्ति ही सम्भव नहीं। माता इस महा-अभियान को असफल नहीं रहने देना चाहती, इसलिए जिन उपासकों पर वे सच्चा स्नेह करती हैं उन्हें वे शिथिल, उदासीन, आलस्यग्रस्त एवं उपेक्षावृत्ति का बनने नहीं देतीं। उनके अन्तःकरण में अवश्य ही प्रकाश, प्रेरणा, प्रगति एवं पवित्रता की ज्योति जलाती रहती हैं जिसके उजाले में साधक को अपना कर्तव्य स्पष्ट दिखाई देता रहता है और वह श्रेय-पथ पर जीवन की किसी कठिनाई की परवाह न करता हुआ श्रमपूर्वक आगे बढ़ता चलता है।
इसके विपरीत जिनके ऊपर कुसंस्कारों का भारी दबाव है उनके अन्तःप्रदेश में छिपा हुआ तमोगुण मन में उपेक्षा, उदासीनता, आलस्य और अश्रद्धा भर देता है। फलस्वरूप वे प्रतिदिन दस-पाँच मिनट उपासना में लगाने जैसे सामान्य संकल्प को भी छोड़ बैठते हैं। सामूहिक सत्संग और आयोजनों में जाने का महत्व नहीं समझ पाते और धर्म-फेरी जैसी सच्ची तीर्थ-यात्रा में, सभी प्रदक्षिणा परिक्रमा में अपनी हेठी, तौहीन, बेइज्जती समझते हैं। ऐसी उलटी बुद्धि की प्रधानता मनुष्य की आत्मिक हीनावस्था एवं प्रगति अवरुद्धता का चिन्ह है। समझना चाहिये माता ने इनकी आन्तरिक गन्दगी देखकर अपनी शरण में नहीं लिया। जिसे वे प्यार करती हैं उसे और कोई वस्तु चाहे दें चाहे न दें पर एक चीज निश्चित रूप से देती हैं- सन्मार्ग की प्रेरणा। यह दैवी प्रेरणा जिसे प्राप्त होती है वह सत्कर्म करने में, श्रेय-पथ पर चलने में कभी आलस्य एवं उपेक्षा नहीं करता। गायत्री-परिवार के अधिक सदस्य ऐसे ही है जिन्हें प्रकाश और प्रेरणा प्राप्त है। गत नवरात्रि में विभिन्न स्थानों पर हुए सामूहिक आयोजनों ने यह बात भली प्रकार सिद्ध कर दी है। कुछ ऐसे भी सदस्य हैं जो मनोभूमि बहुत नीची होते हुए भी किसी उत्साह में सदस्यता-फार्म भर बैठे हैं और अब प्रतिदिन कुछ मिनट साधना में लगाने की बात सामने आती है तो उस संकल्प से पीछे हटते हैं। यह कूड़ा-करकट धीरे-धीरे निकलता जा रहा है। नैष्ठिक साधकों की, आध्यात्म-प्रेमियों की सेवा-शृंखला के द्वारा ही ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान जैसे महान कार्यों की पूर्ति में कुछ योग मिलने की आशा भी की जा सकती है।
ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अपने प्रारम्भिक एवं माध्यमिक स्तर को पूरा कर चुका, अब उसका उच्चतर स्तर सन् 1958 से प्रारम्भ होता है। गत वर्ष सन 57 के आरम्भ में प्रतिदिन केवल 24 लक्ष जप एवं 24 हजार आहुति करने का संकल्प था। अगले दो स्तर उस समय प्रकट नहीं किये थे ताकि कार्य की अत्यधिक विशालता को देखकर लोग घबरा न जावें दूसरी बात यह भी थी कि आरम्भ में गायत्री- उपासकों का संगठन भी छोटा ही था इसलिये बहुत बड़ा संकल्प उस स्थिति में पूरा होना सम्भव भी न था प्रथम स्तर के उस संकल्प की पूर्ति गत गायत्री जयन्ती तक हो गई। इसके बाद दूसरा स्तर प्रारम्भ हुआ। अब सवा करोड़ जप एवं सवा लक्ष आहुति का दूसरा स्तर चल रहा है। इसकी पूर्ति लगभग पूर्ण हो चली है। अब तीसरा स्तर 1 जनवरी सन 58 तदनुसार पौष सुदी 11 सं. 2014 से प्रारम्भ होता है। इसमें 24 करोड़ जप एवं 24 लक्ष आहुतियाँ नित्य होती हैं। 24 लक्ष पाठ और लेखन भी साथ-साथ चलना है। यह कार्य अब की अपेक्षा बीस गुना अधिक भारी है। इसलिये इसकी पूर्ति के लिए बीस गुना प्रयत्न भी करना होगा। इसके लिए समय और शक्ति हर सच्चे गायत्री उपासक को लगानी पड़ेगी। अधूरे श्रम और ढीले प्रयत्नों से संकल्प की पूर्ति न हो सकेगी। इसके लिए समुचित त्याग भावना और कर्तव्य परायणता का परिचय उपासकों को देना होगा।
हम अनेक बार कह चुके हैं कि यह समय व्यक्तिगत लाभ कमाने का नहीं है। जो लोग इस असुरता से तमसाच्छन्न वातावरण में स्वर्ग और मुक्ति का लक्ष पूर्ण करने की बात सोचते हैं वे भारी गलती पर हैं। इन दिनों सूक्ष्म वायु-मण्डल इतना विषाक्त है कि आत्मा का परमात्मा में तन्मय होकर समाधि सुख का रसास्वादन तो दूर, साधारण रीति से चित्त का एकाग्र होना, भजन में मन लगाना भी कठिन है। यही बात ऋद्धि-सिद्धियों के सम्बन्ध में है। अन्न, जल, आहार, विहार, विचार एवं समुचित साधनों के बिना ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ भी नहीं आ सकती। इस प्रकार इन तीनों वैयक्तिक आत्म-लाभ की दृष्टि से साधना रत मनुष्य अभीष्ट उद्देश्य प्राप्त नहीं कर सकते। धन, सन्तान आदि बढ़ाने का जिन्हें लोभ है, या जो ऐसे ही लौकिक लाभों के लिए जप-तप करते हैं वे भी भूलते हैं कि यदि आगामी विकट समय अपनी घनघोर घटाओं के साथ बरस पड़ा तो संचित धन-सम्पत्ति धूलि-मिट्टी से भी गई बीती व्यर्थ की चीज बन जायेगी। दूसरे आगामी युग समता का आ रहा है। रोटी कपड़ा और जीवन की आवश्यक वस्तुओं के उपभोग के अतिरिक्त व्यक्तिगत धन-संग्रह की कोई गुँजाइश न रहेगी। ऐसी दशा में धन बढ़ाने के लिए यह मूल्यवान क्षण बर्बाद करना बेकार ही है।
जो लोग पूजा, उपासना, साधना, जप, तप, धर्म एवं आध्यात्म की शक्ति एवं उपयोगिता पर विश्वास करते हैं उनके लिए इस समय की सर्वोत्तम साधना यही हो सकती है कि अन्तरिक्ष में फैले हुए विषाक्त आसुरी वातावरण को शान्त करने एवं दिव्य विचारधारा को फैलाने के लिए धर्म-प्रसार की साधना में लग जावें। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में साधना और लोक शिक्षा दोनों ही कार्य-क्रम सन्निहित हैं। इस साधना में स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही एक साथ सधते हैं। इस श्रेय पथ पर अनेक व्यक्तियों को लगाते हुए सूक्ष्म वातावरण को शुद्ध करने की अनुष्ठानात्मक प्रक्रिया से संसार की जड़-चेतन आत्माओं पर छाई हुई विपत्ति घटती है, इस परमार्थ से असंख्यों का अन्धकारमय भविष्य प्रकाशवान बनता है। ऐसे शुभ कार्य में संलग्न होना इतना बड़ा परमार्थ है कि उसका कर्त्ता भारी पुण्य फल का अधिकारी हो जाता है। यह पुण्य फल किसी भी बड़े से बड़े, व्यक्तिगत लाभ के लिए किये गये जप-तप से रत्ती भर भी कम नहीं बैठता। इस प्रकार केवल व्यक्तिगत भौतिक या आध्यात्मिक लाभ के लिए की हुई साधना की अपेक्षा इस सामूहिक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान में स्व-पर कल्याण का दूना लाभ है। वातावरण की प्रतिकूलता से जहाँ व्यक्तिगत साधनाओं की सफलता संदिग्ध है वहाँ विश्वशान्ति की सामूहिक साधनाओं की सफलता भी सुनिश्चित है।
हर गायत्री-उपासक से, आध्यात्म-प्रेमी से हमारा आग्रहपूर्वक अनुरोध है कि विश्वशान्ति की अमृत निर्झरणी लाने और संसार के अन्धकारमय भविष्य को आशामय प्रकाश में बदल देने के इस कार्य-क्रम में अपनी शक्ति को अब की अपेक्षा कुछ और भी अधिक लगाना शुरू कर दें। सन् 57 का कार्यक्रम लगभग पूरा हो चला। अब सन् 58 का कार्यक्रम हाथ में लेना है। इस वर्ष (1) अधिक गायत्री सदस्य बनाने, (2) नई शाखायें बनाने, (3) वर्तमान सदस्यों के पास जा-जाकर उनके आलस्य एवं अवसाद को दूर करने, (4) साप्ताहिक सत्संगों की शिथिलता दूर करके उसमें सदस्यों को बुला-बुलाकर लाने, (5) छोटे-बड़े सामूहिक आयोजन, यज्ञ-सम्मेलन, उत्सव आदि करते रहने, (6) इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अपने जैसे और दो-चार उत्साही व्यक्ति साथ लेकर प्रचार के लिए धर्म-फेरी करने जाने आदि के कार्यक्रम उत्साहपूर्वक चलते रहने चाहिये। गत वर्ष भी यह कार्यक्रम थे, इस वर्ष उनमें अधिक उत्साह एवं तत्परता दिखाई जानी चाहिये। शाखा-संचालकों का विशेष रूप से कर्तव्य है कि वे पंगु धर्म को कन्धा देकर शिथिल सदस्यों को सक्रिय बनायें।
इस वर्ष सन् 58 में दो नये विशेष कार्यक्रम सामने रखने हैं। (1) ब्रह्म भोज, (2) संरक्षण। छोटे-छोटे शुभ कार्यों के अन्त में ब्रह्म भोज कराने की प्रथा भारत के धार्मिक जगत में सनातन काल से चली आती है। इतना बड़ा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान बिना ब्रह्म-भोज के पूरा नहीं हो सकता, प्राचीन काल में ज्ञान प्रसार, धर्म-शिक्षा का कार्य ब्राह्मण करते थे। उस समय पुस्तकें, प्रेस, पत्रिका, पत्र-व्यवहार आदि के साधन न थे अतएव वह कार्य धर्म-प्रचारक ब्राह्मणों द्वारा होता था। जनता को सन्मार्ग पर लाने और संसार में धार्मिकता स्थिर रखने का कार्य, ब्राह्मण लोग अपने उज्ज्वल चरित्र, आदर्श, त्याग एवं अन्तरात्मा से निकले हुए विवेकपूर्ण प्रवचनों के द्वारा सम्पन्न करते थे। अब वह कार्य ब्राह्मणों ने लगभग छोड़ दिया है। आजीविका को प्रधान माध्यम मानकर कुछ ब्राह्मण कथा-वार्ता, संस्कार, कर्मकाण्ड, पूजा, अनुष्ठान आदि करते-कराते हैं, उसमें वैश्य वृत्ति ही प्रधान रहती है। परम निस्वार्थ एवं निर्लोभ भाव से अपना पवित्र कर्तव्य मानकर जो निरन्तर धर्म-प्रचार में लगा रहता है, और परिग्रह छोड़कर जो अपनी आजीविका पूर्णतया जनता की इच्छा पर छोड़ देता है वही ब्राह्मण है। पूर्णकाल में ऐसे ब्राह्मण धर्म के प्राण माने जाते थे। उन्हें भोजन, वस्त्र, पात्र तथा आवश्यक खर्च के लिए दक्षिणा देकर जनता अपनी धर्मनिष्ठा का परिचय देती थी। “ब्रह्म-भोज” का सामान्य रूप “ब्राह्मण-भोजन” बन गया था। सचमुच उस काल के ब्राह्मण ब्रह्म स्वरूप ही थे। उन्हें भोजन कराना ईश्वर को भोजन कराने के सदृश ही पुण्य फलदायक था।
आज वैसे ब्राह्मण ढूंढ़े नहीं मिलते, देश भर में उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक मिलेगी। जो ब्राह्मण-कर्म को एक व्यवसाय के रूप में करते हैं या जो केवल ब्राह्मण वंश में उत्पन्न होने मात्र के कारण ब्राह्मण कहलाते हैं, उन्हें भोजन कराने से किसी आध्यात्मिक, धार्मिक या परमार्थिक उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। ऐसी दशा में हमें ब्रह्म-भोज के तत्व ज्ञान को समझकर विवेकपूर्वक इस मार्ग पर अग्रसर होना होगा। ज्ञानदान-ब्रह्मदान ही आज सच्चा ब्रह्म-भोज है। अन्न-दान से ब्रह्मदान का पुण्य हजार गुना माना गया है। भोजन कराने से कुछ घंटे भूख शान्त होती है, लेकिन थोड़ी ही देर में वह भोजन टट्टी बनकर निकल जाता है। परन्तु ज्ञानदान ब्रह्म-दान द्वारा आत्मा को जो अमृत पिलाया गया उसकी एक बूँद भी भली प्रकार पड़ जाय तो वह सीप में स्वाति बूँद पड़ने की तरह बहुमूल्य मोती बन जाने का उदाहरण सामने आ जाता है। कार्य किसी समय में ब्राह्मण का मुख करता वही कार्य इस युग में सत्साहित्य के द्वारा पूर्ण होता है। तपोभूमि द्वारा गायत्री साहित्य के निर्माण का ही यह प्रभाव है कि इतना बड़ा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान चल रहा है और सारे भारतवर्ष में वेद जननी का जय जयकार हो रहा है। यह कार्य उस समय हजार दो हजार ब्राह्मण मिलकर भी कठिनाई से कर सकते थे। इन दिनों किसी को यदि सच्चा ब्रह्मास्त्र करना है तो वह सत्साहित्य द्वारा ही संभव है। वे ही साधन ब्राह्मणत्व के प्रतीक हैं, जो जनता में धार्मिक मनोवृत्ति पैदा करते हैं। ऐसे साधनों सत्साहित्य का प्रसार सर्वश्रेष्ठ उपाय है, यही इस युग का सच्चा ब्रह्म-भोज माना जा सकता है।
गत वर्ष ब्रह्म-भोज के लिए एक छोटी साधना गायत्री चालीसा वितरण था। यह बहुत ही अच्छा उपाय था कि केवल मात्र 6 रु. में 240 गायत्री चालीसा प्राप्त करके धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों में वितरण किये जाएं और यदि वे लोग निरन्तर पाठ करना दूर केवल एक बार ही पढ़कर फेंक दें और 240 पाठ कर लें तो भी वितरणकर्ता को 240 पाठ का एक अनुष्ठान कराने का पुण्य फल प्राप्त होता। यदि कहीं उन चालीसा प्राप्त करने वालों में से आधे-चौथाई भी नियमित पाठ करने लगें तो उस पुण्य का एक भाग उन्हें निरन्तर प्राप्त होता रहे। शुभ और अशुभ कार्य के लिए प्रेरणा देकर किसी को भले-बुरे मार्ग पर चला देने से उस प्रेरणा देने वाले को, उस कर्म पथिक के पुण्य-पाप का दसवां भाग प्राप्त होता है। शिष्य के, यजमान के पुण्य-पाप का दसवां अंश पुरोहित या यजमान को प्राप्त होता है, क्योंकि अन्तःकरण जो किसी कार्य का मूल हेतु है, जहाँ से आती है वस्तुतः श्रेय उसी का है। शरीर तो कार्य भर करता है, उसे करने की उमंग तो भीतर से ही आती है, उस उमंग को जो पैदा करता है वस्तुतः श्रेयाधिकारी वही है। पूर्व काल में सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाले ब्राह्मणों को सबसे बड़े पुण्यात्मा-भूलोक के दाता-भूसुर इसी कारण समझा जाता था।
अब उस मूर्च्छित ब्राह्मण परम्परा को पुनः जीवित जागृत करने का कार्य-हजारों वर्षों से भूखे ब्राह्मणत्व को विवेकपूर्ण भोजन कराने का कार्य गायत्री-परिवार को करना है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत इस कार्य की महत्वपूर्ण पूर्ति इस वर्ष सन 58 में हम लोगों को करनी है। करना यह है कि इस वर्ष हम सभी गायत्री परिजन प्रत्येक रविवार को उपवास करेंगे। उस उपवास से बचा हुआ परम विवेक धर्म-श्रद्धा मिश्रित अन्न ब्रह्म-भोज में लगाकर सन् 58 के 52 रविवारों के उपवास का व्रत हम सभी परिजनों को लेना है। उस दिन फलाहार, दूध, बिना नमक का भोजन कुछ ग्रहण करें न करें यह अपनी श्रद्धा का विषय है पर यह अनिवार्य होना चाहिये कि जितने मूल्य का भोजन साधारण दिनों में करते हैं, उतने पैसे ब्रह्म-भोज के लिए निकाल लिये जाएं। यह पैसे भोजन की अपेक्षा अधिकतम चाहे जितने हो सकते हैं, इस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है वरन् शुभ कार्य में अधिक योग के लिए प्रसन्नता होती है, पर वह पैसे एक दिन के भोजन के मूल्य की अपेक्षा कम न होने चाहिए।
यह उपवास द्वारा पेट काटकर बचाया हुआ परम श्रद्धा सम्मिश्रित अन्न ही ब्रह्म-भोज के लिए उपयुक्त हो सकता है। कुधान्य खाकर ब्राह्मण की आत्मा मर जाती है, इसलिये उसे सात्विक और श्रद्धान्वित श्रम उपार्जित धान्य खिलाने का ही शास्त्रों में विधान है। आज तो केवल छूतछात की रूढ़िमात्र पुज रही है। प्राचीन काल में ब्राह्मण कुधान्य, असात्विक भोजन से बचने के लिए स्वपाकी होते थे- भोजन करने से पूर्व उस अन्न की बहुत जाँच-पड़ताल करते थे। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के ब्रह्म-भोज में मिठाई पकवान नहीं-साधक के भूखे रहकर बचाये हुए अन्न के दाने उपेक्षित हैं।
हर साधक इन पैसों को बचाकर बहुत संभाल कर रखेगा। इनका उपयोग गायत्री माता और यज्ञ पिता के लुप्तप्राय ज्ञान और सम्मान को पुनर्जीवित करने में करेगा। इन्हीं पैसों से अनेक आत्माओं को स्वर्गीय तत्व ज्ञान का रसास्वादन करने का दिव्य प्रसाद वितरण किया जायेगा। तपोभूमि द्वारा अखंड-ज्योति का एक “ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अंक” छापा जायेगा, जो दो वर्ष पूर्व छपे गायत्री ज्ञानाँक की तरह होगा। इसकी लागत तीन आने से कम न आवेगी। इन अंकों को कम से कम 24 की संख्या में हर उपासक को वितरण करना है। दूर-दूर प्रदेशों में अपने स्वजन, सम्बन्धी, प्रेमी, परिजन, मित्र, शुभेच्छु जिनके कल्याण की कामना हो, उन तक यह अंक पहुँचाना है। इस प्रकार 24 आत्माओं में ब्राह्मणत्व जागृत करने का सद्ज्ञान के अभाव में गायत्री-उपासना से विमुख आत्माओं को उद्बोधन-दिव्य प्रसाद देने का ब्रह्म-भोज निश्चित रूप से अत्यन्त ही महान पुण्य होगा। यदि इन 24 ‘ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अंक’ का प्रसाद ग्रहण करने वालों में से एक भी व्यक्ति साधना-पथ पर अग्रसर हुआ तो उस वितरणकर्ता दानी का पुण्य-हजार मनुष्यों को लड्डू, कचौड़ी खिलाने की अपेक्षा निश्चित रूप से कहीं अधिक हो गया।
दूसरा कार्य इसी उपवास अर्जित अन्न से यह होगा कि वह उपासक अपने घर में एक गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित करेगा। इन 52 सप्ताहों में 52 पुस्तकें गायत्री ज्ञान सम्बन्धी तपोभूमि छाप रही है। इनका मूल्य लागत मात्र चार आना प्रति पुस्तक होगा। 52 सप्ताहों में 52 पुस्तकों का एक सर्वांगपूर्ण गायत्री पुस्तकालय घर में बन जायेगा। वह देवालय जिनमें हजारों रुपया लगते हैं और केवल देवता की मूर्ति स्थापित होती है, इस गायत्री ज्ञान से परिपूर्ण ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकते। इन अत्यन्त सस्ती, परम सुन्दर, चित्ताकर्षक टाइटल समेत छपी लागत मात्र मूल्य की पुस्तकों को खरीदने में चार आना प्रति सप्ताह के हिसाब से केवल मात्र 13) लगेंगे। पर उनके द्वारा चिरकाल तक घर भर के, पड़ोस के तथा सम्बन्ध रिश्तेदारी के अनेक लोग लाभ उठाते रहेंगे। इन पुस्तकों को मंगाकर घर में रख लेने से ही काम न चलेगा-उस उपवासकर्ता तपस्वी- ज्ञान मन्दिर-निर्माता को ऐसे व्यक्ति भी ढूंढ़ने पड़ेंगे जो उस साहित्य को बिना मूल्य पढ़ने के लिए तैयार हो जावें।
उपवास अर्जित अन्न से नव-निर्माण गायत्री साहित्य खरीद लेने की प्रक्रिया ‘ब्रह्म-दान’ तो हो गई पर ‘ब्रह्म-भोज’ नहीं हुई। ‘ब्रह्म-भोज’ उसकी संज्ञा उस समय होगी, जब उस साहित्य को लोगों के मस्तिष्कों में प्रवेश करा दिया जायेगा। यह अश्रद्धा का युग है। इसमें लोग आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-कल्याण की बात सुनना पसन्द नहीं करते। वासना और तृष्णा से किसी को इधर ध्यान देने की फुरसत नहीं। ऐसी अश्रद्धा एवं अज्ञानता भरी परिस्थितियों में किसी की रुचि ऐसा साहित्य पढ़ने के लिये तैयार कर लेना साधारण नहीं असाधारण काम है। जिन्हें अपने यहाँ गायत्री ज्ञान मन्दिर-गायत्री पुस्तकालय बनाना हो, उनका कर्तव्य है कि अपने आस-पास ऐसे लोग ढूंढ़ें जो किसी प्रकार उस साहित्य को पढ़ने को तैयार हो जावें। कुनैन की कड़वी गोली खिलाकर दुःख दूर करने वाली शुभ-चिन्तक माता को जिस प्रकार कुनैन खिलाते समय अज्ञानी बालकों की खुशामद करनी पड़ती है- बहकाना-फुसलाना पड़ता है, लगभग वैसा ही काम गायत्री ज्ञान मन्दिर के संस्थापकों का अपने मित्रों को इस साहित्य को पढ़ने के लिए तैयार करने का भी है। संकल्पित एक वर्ष में- सन् 58 के बारह महीनों में कम से कम 12 व्यक्ति आसानी से ढूंढ़े जा सकते हैं। उनके यहाँ जाकर इन पुस्तकों का महत्व समझाकर एक पुस्तक पढ़ने के लिए देकर, पढ़ लें तब उनके यहाँ से वापिस लेने जाकर-साप्ताहिक छुट्टी के दिन उसे आपसी विचार-विनिमय सत्संग के लिए आमंत्रित कर-निरन्तर यह प्रयत्न करना चाहिए कि उस व्यक्ति पर कुछ आध्यात्मिक प्रभाव पड़े, उसकी आत्मा में केवल क्षत्रियत्व, वैश्यत्व, शूद्रत्व ही प्रबल न रहे वरन् ब्राह्मणत्व भी जागृत हो।
गायत्री ज्ञान मन्दिर को- चार आने वाली नवनिर्मित 52 पुस्तकों को- एक प्रकार से ब्रह्म विद्यालय का पाठ्य-क्रम कहा जा सकता है। सह ब्रह्म विद्यालय भले ही एक बड़ी इमारत में न हों-भले ही एक जगह हजारों लड़के लाइन-लाइन पढ़ते दिखाई न दें- भले ही वेतन भोगी अनेकों प्रोफेसर इसमें नियुक्त न हों, पर इसके द्वारा जो कार्य होने वाला है उस राष्ट्र और संस्कृति की काया पलट करने वाला ही सिद्ध होगा। उपवास से बचाने वाला तपस्वी, अपने घर में उस अन्न से गायत्री ज्ञान मन्दिर स्थापित करके, अपना बहुमूल्य समय लोगों को उस साहित्य को पढ़ने के लिए तत्पर करने में खर्च करेगा तो उसे ब्रह्म विद्यालय का अध्यापक-उपाध्याय कहना सर्वथा उपयुक्त ही होगा। वे सभी उपवासकर्ता तपस्वी जो ज्ञान मन्दिर स्थापित करने और प्रतिदिन थोड़ा समय उस साहित्य को किसी को पढ़ाने के लिए लगावेंगे तो वह कार्य देखने में कितना ही छोटा क्यों न दीखे, वस्तुतः प्राचीनकाल के धर्म प्रचारक ब्राह्मणों, उपाध्यायों जैसा ही होगा। गायत्री परिवार के सदस्यों को अब यह कार्यभार अपने कन्धे पर उठाना होगा और लाखों-करोड़ों नर-नारियों को गायत्री माता, यज्ञ पिता की महत्ता से परिचित कराके उन्हें उस सत्कर्म में प्रवृत्त करना होगा, जिससे उनका- समस्त समाज का-सारे संसार का- विश्व ब्रह्माण्ड का कल्याण हो। विश्व-शान्ति का यही मार्ग है। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत 24 लक्ष आत्माओं को ब्रह्म-भोज कराना है, वह (1) गायत्री ज्ञान मन्दिरों के आधार पर चलने वाले ब्रह्म विद्यालयों द्वारा (2) अखण्ड-ज्योति के ‘ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान अंक’ के वितरण द्वारा ही पूरा होगा। जिस प्रकार आवश्यकता पड़ने पर-शत्रु का आक्रमण होने पर देश के हर समर्थ पुरुष को सैनिक बनना होता है। उसी प्रकार इस समय व्यापक अधार्मिकता से लड़ने के लिए हम सबको ब्रह्म कर्म में प्रवृत्त होना होगा।
सन् 58 के दो विशेष कार्यक्रमों में एक कार्य ‘ब्रह्म-भोज’ और दूसरा ‘संरक्षण’ है। त्रिकालदर्शी परम तपस्वी, चिरकाल से प्रचंड तपस्या में संलग्न महात्मा श्री विशुद्धानन्द जी महाराज के भेजे हुए सन्देश का साराँश इसी अंक में अन्यत्र छपा है। उनका एक-एक शब्द तथ्यपूर्ण है। इतना विशाल एवं प्रचण्ड अनुष्ठान इस युग में दूसरा नहीं हुआ, इसकी प्रतिक्रिया अवश्य होगी, असुरता, प्रत्याक्रमण न करे ऐसा नहीं हो सकता। इसलिए ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान की तथा उसके संचालक व्यक्तियों की सुरक्षा का ध्यान रखा जाना आवश्यक है। गफलत में रहने से असुरता का कोई आक्रमण सब किये कराये को चौपट कर सकता है। हमें अपनी उतनी चिन्ता नहीं है, जितनी संकल्पित लक्ष की पूर्ति की है। सन 58 में 1 माला प्रतिदिन इस सुरक्षा के लिए प्रत्येक साधक को अधिक बढ़ा देनी चाहिये, जिससे आवश्यकता पड़ने पर एक की जगह सहस्रों दिखाई पड़ें। तभी हमारी आत्मा को अपने परिवार की सच्ची आत्मीयता का सन्तोष प्राप्त होगा। दोनों ही कार्य-ब्रह्म-भोज और संरक्षण- अगले वर्ष के लिए हम सबके परम पावन कर्तव्य हैं। इन नई जिम्मेदारियों से डर कर कोई परिजन पीछे न हटेंगे ऐसी हमें आशा है।
जावद (म.प्र.) में प्रति सप्ताह यज्ञ और हवन का कार्यक्रम चालू है। दीपावली पर वेदमाता की सामूहिक आरती रात के 9 बजे के बाद की गई व प्रसाद वितरण किया गया। 24 अक्टूबर को अन्नकूटोत्सव मनाया गया, जिसमें सब सदस्यों ने सामूहिक भोजन किया।
-बद्रीलाल नागता
बिलासपुर (म.प्र.) में श्री आनन्दभाई सोनी ने नवरात्रि के अवसर पर सवालक्ष गायत्री जप का अनुष्ठान किया, जिसकी पूर्णाहुति ता. 28 अक्टूबर को गायत्री शाखा के संचालक श्री सुधाराम महाजन व चीनारामजी पोद्दार आदि के निरीक्षण में बड़े समारोह से दी गई। हवन में अन्य सैंकड़ों दर्शकों ने भाग लिया और प्रसाद पाया। बिलासपुर शाखा की तरफ से सवा करोड़ जप व सवालक्ष आहुतियों के यज्ञ करने का विचार किया जा रहा है।
-मंत्री, गायत्री शाखा
गरोठ (म.प्र.) की शाखा के सहयोग से बरडया अमरा ग्राम में श्री रामचन्द्र गुप्त हैडमास्टर के यहाँ सामूहिक हवन किया गया। दो सज्जनों का यज्ञोपवीत संस्कार भी किया गया। यज्ञ का आयोजन, अति उत्तम व सफल रहा। मा. 10 नवम्बर को भी श्री बद्रीलालजी के स्थान पर दो हवन कुण्डों का यज्ञ किया गया व शाखा स्थापित की गई।
-एस.एन. शर्मा
सीमेंट फैक्ट्री (सवाइ माधोपुर राजस्थान) में नवरात्रि के अवसर पर श्री रामनारायणजी वर्मा ने 24 हजार जप व अनुष्ठान किया और श्री हंसराज जुनेजा तथा रूपसिंहजी ने चालीसा पाठ किया। ता. 2 अक्टूबर को बड़े समारोह व गाजे-बाजे के साथ श्री शान्तानन्दजी की अध्यक्षता में 4 हजार आहुतियों का हवन किया गया। 240 चालीसा वितरण किये गये व 5 नये सदस्य बनाये गये।
-मन्त्री, गायत्री-उपासक मण्डल
रामगंज मण्डी (कोटा) में नवरात्रि के अवसर पर अखण्ड रामायण पाठ किया गया व कई सदस्यों ने 24-24 हजार का अनुष्ठान किया। दशमी के दिन 1680 आहुतियों का हवन व आरती की गई। गाँव में जुलूस निकाला गया। इस आयोजन में श्री भँवरलालजी शर्मा ने विशेष उद्योग किया जो सराहनीय है।
-बसन्तीलाल शर्मा
पुष्कर क्षेत्र (अजमेर) में कार्तिक बदी 12 रविवार से 24 लाख का महापुरश्चरण आरम्भ किया गया है। इस कार्य का संचालन सेठ वंशीलाल रामनारायण शंकरलाल राठी के द्वारा होगा। इस सत्कार्य की प्रेरणा देने का श्रेय तपोमूर्ति ब्रह्मचारी कान्तानन्दजी को है।
-एक गायत्री-प्रेमी
महोबा (उ.प्र.) में कार्तिक बदी 13-14 को महिलाओं की अखण्ड रामायण हुई और अमावस्या को महिलाओं का सामूहिक यज्ञ हुआ। इससे उत्साहित होकर “श्री गायत्री महिला-मण्डल” की स्थापना की गई है जिसका कार्यक्रम प्रति रविवार को हुआ करेगा।
-मन्त्री, गायत्री शाखा
रलीयाणा (सौराष्ट्र) में गुजराज के नवीन वर्ष के उपलक्ष में ग्राम की जनता के साथ गायत्री माता की आरती बड़े समारोह से की गई।
-मन्त्री, श्री गायत्री मण्डल
नियाना (वाराँ जि. कोटा) में पं. श्रीकृष्णजी की प्रेरणा से ता. 4 से 7 नवम्बर तक 21 कुण्डों का विशाल गायत्री यज्ञ किया गया, जिसमें गायत्री तपोभूमि (मथुरा) के ब्रह्मचारी कृपाशंकर त्रिपाठी ने स्वामी प्रेमानन्दजी के प्रभावशाली भाषण प्रतिदिन होते रहे। जलसे में लगभग 6000 जनता ने भाग लिया। श्री रामनाथ जी दीगोदिया व रंगलालजी पटेल ने सराहनीय कार्य व परिश्रम किया और इस प्रकार जनता को गायत्री जप व यज्ञ करने के लिए उत्साहित किया गया। ब्रह्म-भोज में 6 हजार व्यक्ति सम्मिलित थे। प्रसाद में पुस्तकें वितरण की गई।
-शान्तिलाल पटवारी एवं रामेश्वर
इन्दौर (म.भा.) में ता. 3 नवम्बर को 1600 आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया, जिसमें पर्याप्त संख्या में गायत्री-प्रेमियों ने भाग लिया।
-सत्यनारायण तिवारी
बम्हनी बाजार (बिलासपुर) में दुर्गावती के मन्दिर पर नवरात्रि का जप व हवन किया गया। दशमी को अखण्ड कीर्तन भी हुआ। इस बीच अखण्ड रामायण का पाठ हुआ और अखण्ड-ज्योति जलती रही। यज्ञ कार्य पं. रामनारायनजी दुबे ने कराया और जप में श्री गणेशप्रसादजी अवस्थी ने भाग लिया। अवस्थीजी के ही विशेष प्रयास से दुर्गादेवी पर पशु-बलि की प्रथा का अन्त हो सका है।
ता. 15 अक्टूबर को आरम्भ से ही श्री विद्याप्रसाद जी मिश्र व शिवकुमारजी शर्मा, चाँपा शाखा से मुकुन्दनारायणजी और अन्य 11 शाखाओं के मन्त्रीगण भी एकत्रित हुए थे। राम-जानकी के मन्दिर के पास मिश्रजी का प्रवचन हुआ जिसमें यज्ञ का महात्म्य समझाया गया और आरंग में होने वाले प्रान्तीय गायत्री महायज्ञ को सफल बनाने के सम्बन्ध में परामर्श किया गया।
-मोहनलाल गुप्ता
मुर्थर (पो. अहारन जिला आगरा) में शान्ति-सदन एक सुरम्य स्थल है जहाँ 60 वर्षों से प्रत्येक अमावस्या को नियमित रूप से यज्ञ हो रहा है और स्थानीय जनता उसमें भाग लेती रहती है। इसके संस्थापक स्व. वासदुवजी थे जो एक कर्मनिष्ठ प्रकाण्ड पंडित थे। वर्तमान समय में उनके पुत्र श्री देवेन्द्रदेवजी शास्त्री इस कार्य का संचालन कर रहे हैं। गत चैत मास में यह आश्रम ‘गायत्री’ तपोभूमि की शाखा के रूप में घोषित कर दिया गया है और श्रद्धेय आचार्य श्रीरामजी शर्मा के उपदेशानुसार सदस्य बनाये जा रहे हैं। इस समय तक 24 सदस्य हैं जो नित्यप्रति दस माला का जप करते हैं। इनका शताँश यज्ञ अमावस्या को होता है।
-लक्ष्मीशरण शर्मा
दिगौड़ा (टीकमगढ़) में चन्द्र-ग्रहण के अवसर पर 7 नवम्बर को अम्बिकाजी के स्थान पर 24 घण्टे का अखण्ड-कीर्तन, 24 हजार जप व 240 चालीसा पाठ किये गये। एक हजार आहुतियों का हवन किया गया। प्रीति-भोज में 100 व्यक्तियों ने भाग लिया, जिसमें श्री अर्जुनसिंह ने विशेष ध्यान दिया। शाखा गणेश गंज के मन्त्री श्रीजगतराम पस्तोर तथा शाखा कदवाँ के श्री रामसेवन वटैरिया भी सम्मिलित थे। गायत्री-साहित्य वितरण किया गया।
-बैजनाथप्रसाद सौनकिया
गरोठ (म.प्र.) के समीप शंखोद्धार के मेले में चन्योर वालों के पाँच कुण्डों में हवन किया गया। गरोठ के 40 गायत्री-उपासकों व प्रतिष्ठित लोगों ने भाग लिया। सामूहिक जप, कीर्तन, चालीसा पाठ और भजन रात भर होते रहे। हवन में 100 पुरुषों और 20 माताओं ने भाग लिया। ब्रह्म-भोज भी किया गया।
-हरीराम
गोलवा, हरीगढ़, पनवाड़, दहीखेड़ा की शाखाओं का निरीक्षण किया गया। इन सबकी सदस्य-संख्या संतोषजनक है और कार्यक्रम साधारण रूप से रहा है। गोलवा में श्री जगदीशप्रसाद जी के प्रयत्न से पशुबलि बन्द कराने में सफलता प्राप्त हुई। दहीखेड़ा के नैष्ठिक सदस्य श्री सुन्दरलालजी के यहाँ दुकान से चोरी हो गई। पर गायत्री माता का आश्रय लेने से सारा माल दूसरे ही दिन बरामद हो गया।
-नाथूलाल शर्मा
नवाबगंज (बरेली) में गायत्री-परिवार द्वारा आयोजित 24 लक्ष जप तथा 9 कुण्डों में सवा लक्ष आहुति का विशाल यज्ञ समारोहपूर्वक सम्पन्न हो गया। तपोभूमि मथुरा से स्वामी ब्रह्मस्वरूपजी व पं. ज्वालाप्रसादजी ने पहले से पधार कर यज्ञ कार्य सम्पन्न कराया। 26 अक्टूबर को तपोभूमि के संचालक पं. श्रीराम शर्मा व स्वामी प्रेमानन्दजी पधारे जिनका स्वागत बरेली जंक्शन पर श्री चमनलाल सूरी ने किया। नवाबगंज में आपका जुलूस अत्यन्त विशाल और बहुत ही दर्शनीय था। यज्ञ को सफल बनाने में श्री श्याममनोहर कपूर, श्री रामनारायण मेहरोत्रा, पं. भगवानस्वरूप शुक्ल, श्रीमती चमेलीदेवी पाठक, श्री सीताराम मिश्र, श्री रामस्वरूप अवस्थी, श्री जमुनाप्रसाद, श्री घासीराम, श्री मंगलदत्त त्रिपाठी, कु. कुसुम मेहरोत्रा आदि महानुभावों ने पूर्ण सहयोग व परिश्रम किया। 151/-का गायत्री-साहित्य बाँटा गया।
-रामभिलाष त्रिपाठी
हड़हा (हरदोई) में अशुभ ग्रहों की शाँति के लिए रामायण का पाठ व सामूहिक गायत्री मन्त्र द्वारा यज्ञ हुआ। 24 हजार का एक पुरश्चरण भी किया गया। कन्याओं को भोजन कराया गया।
-रामाश्रय त्रिपाठी
निगोही (शाहजहाँपुर) में पं. तोताराम मिश्र के यहाँ 5 हजार आहुतियों का सामूहिक हवन किया गया, जिसमें उपासकों और दर्शकों का उत्साह प्रशंसनीय था। कन्याओं और ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। इसी प्रकार ग्राम इजरापुर में श्री मोहनलालजी के यहाँ यज्ञ कराया गया जिसमें बहुसंख्यक ग्रामवासियों ने भाग लिया। ब्रह्म-भोज कराया गया।
-नत्थूलाल (यज्ञदेव) शर्मा
कानपुर के हरीहरनाथ शास्त्री नगर में श्री राधेश्यामजी शर्मा के निवास-स्थान पर सामूहिक यज्ञ सम्पन्न हुआ जिसमें 35 सदस्यों ने भाग लिया। प्रसाद वितरण किया गया और सब सदस्यों का फोटो खींचा गया।
- अयोध्या प्रसाद दीक्षित
भावनगर (सौराष्ट्र) में कार्तिक सुदी 10 को श्री जादवजी शिवजी ठक्कर के गायत्री भवन में चार मास से चल रहे गायत्री-महायज्ञ की पूर्णाहुति हुई। सौराष्ट्र की अनेक शाखाओं के सदस्य वहाँ आये थे। मथुरा से आचार्यजी भी पधारे थे। नगर के प्रायः सभी सम्भ्रान्त सज्जन उस पूर्णाहुति का यज्ञ-प्रसाद लेने आये। आयोजन सब प्रकार सफल रहा।
-वी.पी. जोशी
क्ढार (एटा) में श्री शंकरलालजी वैद्य के यहाँ 5 कुण्डों का गायत्री यज्ञ बहुत ही सफल रहा। गाँव की जनता ने पूरे उत्साह से भाग लिया। आगे यहाँ 51 कुण्डों का बड़ा यज्ञ होने की तैयारी हो रही है।
-चुन्नीलाल मन्त्री
जिरौली (अलीगढ़) में श्री महात्मा यज्ञानन्दजी महाराज की धर्मशाला पर 9 कुण्डों में सवा लक्ष आहुतियों का यज्ञ बहुत ही सफल रहा। आस-पास से सभी गाँवों की जनता भारी संख्या में आई थी। मथुरा से आचार्यजी तथा माताजी भी पधारी थीं। हाथी पर उनका जुलूस निकाला गया। स्वामी ब्रह्मस्वरूप जी तथा ज्वालाप्रसादजी आचार्य ने यज्ञ-कार्य सम्पन्न कराया।
- केदारनाथ गुप्त
चन्दन पुखरिया, राठ (हमीरपुर) में ता. 24, 15, 16 दिसम्बर को गायत्री महायज्ञ होगा।
-रघुबरदयाल शर्मा
मझोला (नैनीताल) 7, 8 दिसम्बर को 5 कुण्डों की यज्ञशाला में गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया गया है।
-लक्ष्मणसिंह मनराल
खेड़ा (बुलढाला) में श्रीकिसन बाघमारे और पुण्डलीक पटील के प्रयत्न से कार्तिक सुदी 15 को जप व हवन का आयोजन सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
-मन्त्री गायत्री शाखा
छिदगाँव स्टेशन (सिवनी) में चन्द्रग्रहण के अवसर पर 24 घण्टे का रामायण का परायण व हवन किया गया, जिसमें समस्त जनता ने सप्रेम भाग लिया।
-ठाकुर सुन्दरलाल वट्टी
जिला बरेली, बदायूँ, पीलीभीत, शाहजहाँपुर, हरदोई, मुरादाबाद, अलीगढ़, बुलन्दशहर, सीतापुर, रामपुर, नैनीताल, खीरी लखीमपुर व लखनऊ के शाखा मन्त्रियों की जो मीटिंग 10 नवम्बर को बरेली में आयोजित की गई थी वह सफलतापूर्वक हो गई। इसमें ‘उपकेन्द्रीय गायत्री-परिवार’ के नाम से संगठन बनाया गया है जिसका कार्य इन जिलों में गायत्री-परिवार’ और यज्ञों के कार्य को सुसंगठित रूप में अग्रसर करना होगा। पदाधिकारियों में श्री चमनलाल सूरी सभापति, श्री मदनमोहन शुक्ल उपसभापति, श्री रामभिलाष त्रिपाठी मन्त्री, श्री लक्ष्मण सिंहजी मनराल उपमन्त्री, श्री महावीरप्रसादजी गुप्त कोषाध्यक्ष, श्री लक्ष्मीनारायणजी मेहरोत्रा उपकोषाध्यक्ष, श्री गायत्रीप्रसाद निरीक्षक चुने गये।
-चमनलाल सूरी
करसरा (मैहर, म.प्र.) में 9 सदस्यों द्वारा रामचरित मानस का अखण्ड पाठ किया गया व 5009 आहुतियों का हवन किया गया। 5 सदस्यों ने नमक त्याग कर 24 हजार का अनुष्ठान किया।
-जगदीशप्रसाद भट्ट
खपरिया (सिवनी मालवा, म.प्र.) में गाडरिया ग्राम के पटैल श्री हरनारायणजी के यहाँ सामूहिक यज्ञ किया गया जिसमें सिवनी, खपरिया, भिलड़िया, राजेरा, कोठरा, पगढाल, चतरखेड़ा, निरखी आदि स्थानों के गायत्री प्रेमी सदस्यों ने भाग लिया। 24 हजार आहुतियाँ डाली गयीं तथा आरती और प्रसाद वितरण किया गया। अधिकाँश सदस्य दस-दस मील चलकर इस समारोह में सम्मिलित हुए, जो उनके उत्साह का परिचायक है।
-रामगोपाल तिवारी
नंदुरा (बरार) में 24 हजार आहुतियों के गायत्री महायज्ञ का आयोजन किया है। -रामेश्वरदयाल शर्मा
डबरा (म.प्र.) में ता. 14 नवम्बर को श्री रामरतन नाकेदार और 16 को श्री ओम्प्रकाशजी के स्थानों पर सामूहिक गायत्री-यज्ञ किये गये। दिसम्बर के प्रथम सप्ताह में महायज्ञ का आयोजन किया गया है।
-जमुनाप्रसाद
पिटोल में चन्द्रग्रहण के अवसर पर श्री त्रिपाठीजी व सीसोदियाजी की ओर से रामायण का परायण और दौलतरामजी नागर के उत्साह से लघु अनुष्ठान व सामूहिक यज्ञ का कार्यक्रम सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ।
-गेंदालाल वर्मा
मणिनगर नं. 8, अमदाबाद में 101 यज्ञ-कुण्डों का विशाल गायत्री महायज्ञ होगा समस्त गायत्री-भक्तों को उसमें सप्रेम निमन्त्रित किया जाता है। यज्ञ की तिथियाँ शीघ्र ही सूचित की जायेंगी।
-मिश्रीलाल कन्हैयालाल जोशी
सटई (छतरपुर म.प्र.) में गायत्री उपासकों ने नवरात्रि के अवसर पर पूर्ण श्रद्धा और उत्साह के साथ जप व हवन का कार्यक्रम पूरा किया। ग्राम की जनता ने भी सहयोग दिया।
-शिवप्रसाद पाठक
अटरु (कोटा) में 5 कुण्डों में 24 हजार आहुतियों का सामूहिक गायत्री महायज्ञ सफलतापूर्वक हो गया। श्री शम्भुसिंहजी व स्वामी ओमारानन्दजी के प्रभावशाली प्रवचन हुए पं. छोटेलालजी ने धार्मिक सिनेमा का प्रदर्शन किया। पूर्णाहुति में 4-5 हजार जनता ने भाग लिया।
-मोहनचन्द्र पारीक
सीसवाली (कोटा) में साप्ताहिक आयोजन समारोह व उत्साह से हो रहे हैं। ता. को माँगीलालजी गोठानियाँ, ता. जी व्यास के यहाँ सामूहिक आयोजन हवन भी निरन्तर होती है।
अहमदाबाद की मणिनगर बस्ती में साढ़े बारह लाख जप व 6 हजार चालीसा पाठ का सामूहिक अनुष्ठान बड़े समारोह से हुआ। काफी जप किया गया।
-मिश्रीलाल कन्हैयालाल
सागर (म.प्र.) में नवरात्रि का यज्ञ बड़े धूमधाम से हुआ। यज्ञशाला की सजावट देखने योग्य थी। लाउडस्पीकर से समारोह का प्रसार किया गया। 25 कन्याओं को भोजन कराया गया। हवन के लिए स्थान श्री कन्छेदीलाल ने दिया था।
-अयोध्या प्रसाद
तलवाड़ा (धार) में कार्तिक सुदी 5 से बाल्मीकीय रामायण का प्रवचन कराया गया। दिन तक 48 हजार आहुतियों का विशाल हवन कराया गया। पूर्णाहुति, ब्राह्मण-भोज व दर्शकों का भोजन 13 को सम्पन्न हुआ। यज्ञ कार्य श्री प्रभाशंकरजी पाठक द्वारा सम्पन्न हुआ।
-रामलाल
सागोनभाड़ी (उड़ीसा) में चंद्रग्रहण के अवसर पर जप व हवन का आयोजन किया गया।
-विनायक
बोरदा (झालावाड़) में सामूहिक किया गया जिसमें कई सदस्यों ने भाग लिया।
चमत्कार को नमस्कार
गायत्री परिवार के जो उत्साही सदस्य हवन के कार्यक्रम में अपना समय और सहयोग कर संस्था के कार्य को अग्रसर कर रहे हैं। कुछ के चित्र इस अंक में दिये जा रहे हैं। इस प्रकार जो अपने अमूल्य समय को इसमें लगा रहे हैं वे निस्सन्देह प्रशंसा के योग्य हैं।
*समाप्त*