मुझे होलिका चली जलाने, स्वयं भस्म हो गयी अभागिन। स्वयं काल का ग्रास बन गई, मुझको खाने वाली बाघिन।
जिस दिन जगत् मारने मुझको भर कर लाया विष का प्याला। उस दिन मुझ में अमर नशा बन झूम उठा जीवन मतवाला।
अमर अनल पक्षी हूँ मैं तो, मुझको मरने का क्या भय है? मेरी राख जी उठी फिर से, होता जग को क्यों विस्मय है?
मेरे अंग वायु के, इनको काट सकेगा कोई, बोलो? मैं तो पानी की धारा हूँ, सुदृढ़ पर्वतों छाती, खोलो।
मेरे उर में झाँक-झाँक कर देखो तुम अपनी तसवीरें। बालू के कण-कण में अंकित गिरि मालाओं की तकदीरें।
अपने बंदी-गृह में मुझको पकड़-जकड़ कर रखने वाले। बाहर देखो, मग्न पड़े हैं, वे लोहे से निर्मित ताले।
मेरी लाश गाड़ने को जब कब्र खोदने चली कुदाली, बोली भूमि,’यहाँ तो जालिम को लाने की इच्छा पाली।’
मेरा जीवन जग के कण-कण में व्यापक है मुझको मारे। इतनी जान किसी में है क्या, आँखें खोल, अरे हत्यारे।
मेरी एक-एक लोहू की बूँद, अमर जीवन का प्याला। भोले, मेरी छाती में तुम छेद रहे हो अपना भाला।
(स्वामी रामतीर्थ)
धार्मिक वाद-विवाद और झगड़े जो होते हैं, वे नकद धर्म पर नहीं होते। नकद धर्म वह है, जो मरने के बाद नहीं, किन्तु वर्तमान जीवन से सम्बन्ध रखता है। उधार धर्म अंधविश्वास पर निर्भर होता है। उधार धर्म कहने के लिए और नकद धर्म करने के लिए। धर्म के उस भाग पर जो नकद धर्म सहमत है— “सत्य बोलना, विद्याध्ययन करना और उसे आचरण में लाना, स्वार्थ से रहित होना, दूसरे के धन आदि को देखकर अपना चित्त न बिगाड़ना, संसार के लालच और धमकियों के जादू में आकर अपने वास्तविक स्वरूप को न भूलना, दृढ़ चित्त और स्थिर स्वभाव का होना, इत्यादि-इत्यादि।” इस नकद धर्म पर कभी दो मत नहीं हो सकते। उधार के दावे वाद-विवाद करने में प्रीति रखने वाले लोगों को सौंप कर स्वयं वर्त्तमान कर्त्तव्य-नकद धर्म पर चलने वाले ही उन्नति करते और वैभव पाते हैं।
भारतवर्ष और अमेरिका में क्या भेद है? वहाँ दिन है तो यहाँ रात, भारतवासी बाजार में बांई ओर चलते हैं वहाँ दांई ओर, पूजा सत्कार के समय यहाँ जूता उतारते हैं, वहाँ टोपी। यहाँ परिवार में पुरुषों का राज्य है, वहाँ नारियों का, यहाँ यह शिकायत है कि विधवा ही विधवा है, उस देश में कुमारी ही कुमारी अधिक हैं, इस देश में जो पुस्तक लिखी जाती है, वह पहले के विद्वानों के प्रमाणों से भरी न हो तो उसका कुछ सम्मान नहीं होता, उस देश में पुस्तक की सारी बातें नवीन न हों तो उसकी कोई कद्र नहीं। यहाँ किसी को कोई लाभदायक बातें मालूम हो जाएं तो उसे छिपा कर रखते हैं, वहाँ उसे छापेखानों द्वारा प्रकाशित कर देते हैं। यहाँ रूढ़ियों की उपासना अधिक है, वहाँ नकद धर्म बहुत है।
जब राम जापान को जा रहा था तो जहाज पर अमेरिका का एक वृद्ध प्रोफेसर मित्र बन गया। वह रूसी भाषा पढ़ रहा था। पूछने पर मालूम हुआ वह ग्यारह भाषाएं पहले से भी जानता है। उससे पूछा गया- इस उम्र में नवीन भाषा क्यों सीखते हो? उसने उत्तर दिया- मैं भूगर्भ शास्त्र का प्रोफेसर हूँ। रूसी भाषा में भूगर्भ शास्त्र की एक अनोखी पुस्तक लिखी गई है। यदि मैं उसका अनुवाद कर सकूँगा तो मेरे देशवासियों को अत्यन्त लाभ पहुँचेगा, इसलिए रूसी भाषा पढ़ता हूँ। राम ने कहा- अब तुम मौत के निकट हो। अब क्या पढ़ते हो? ईश्वर सेवा करो। अनुवाद करने में क्या धरा है? उसने उत्तर दिया- ‘लोक सेवा ही ईश्वर सेवा है। इसके साथ यदि यह भी मान लिया जाय कि इस काम को करते-करते मुझे नरक में भी जाना पड़े तो मैं जाऊँगा। इसकी कुछ परवाह नहीं। अगर मुझे घोर नरक में दुःख मिलते हैं, तो हजार जान से भी कबूल है, यदि हमारे भाइयों को इससे और लाभ मिल जाय? इस जीवन में सेवा के आनन्द का अधिकार, मैं मौत के उस पार के डर से नहीं छोड़ सकता।
यही नकद धर्म है। भगवद् गीता में बड़ी सुन्दरता से आज्ञा दी है- कर्म तो करते ही जाओ, परन्तु फल पर दृष्टि मत रखो।
एक मनुष्य बाग लगाता था। किसी ने पूछा बूढ़े मियाँ! क्या करते हो? तुम क्या इसके फल खाओगे? एक पाँव तो तुम्हारा पहले ही कब्र में है।
माली ने उत्तर दिया- औरों ने बोया था हमने खाया। हम बोयेंगे, दूसरे खायेंगे।
इसी प्रकार संसार का काम चलता है। जितने महापुरुष हो गये हैं- राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, ईसा, मुहम्मद इत्यादि क्या इन महापुरुषों ने उन वृक्षों का फल स्वयं खाया था, जिसे वे बो गये थे? कदापि नहीं। इन महापुरुषों ने तो केवल अपने शरीरों को मानो खाद बना दिया, फल कहाँ खाये? जिन वृक्षों का फल शताब्दियों के बाद लोग आज खा रहे हैं, वे उन ऋषियों की खाक से उत्पन्न हुए हैं। यह सिद्धान्त ही धर्म का वास्तविक प्राण है।
(श्री स्वामी शिवानन्द सरस्वती)
प्राचीन काल की बात है प्रह्लाद दैत्य ने अपने सुन्दर तेज के द्वारा इन्द्र से उसका राज्य छीन लिया था। तीनों लोक का राज्य उसके हाथ में आ गया था। इन्द्र ने बृहस्पति जी को पकड़ा और कहा- हे महानुभाव कृपया करके बताइये कि किस वस्तु के द्वारा आनन्द प्राप्त हो सकता है। बृहस्पति जी ने उत्तर दिया कि- ज्ञान सबसे बड़ा आनन्द का द्वार है। परन्तु इन्द्र को इससे सन्तोष न हुआ। वह तो प्रह्लाद से अपना त्रिलोकों का राज्य चाहता था। फिर उसने पूछा कि क्या इससे बढ़कर कोई वस्तु है। बृहस्पति ने उत्तर दिया- पुत्र इससे भी बढ़ कर है, परन्तु वह तुम्हें भगवान् जो शुक्राचार्य हैं और जो असुरों के पुरोहित है बतायेंगे। इसलिए हे अमरावती के राजा! तुम उनके पास जाओ।
इन्द्र उनके पास गया और उनसे भी वही प्रश्न पूछा। शुक्राचार्य ने भी ब्रह्मज्ञान को सर्वश्रेष्ठ बताया। परन्तु इससे भी इन्द्र संतुष्ट न हुए। वह तो धन और ऐश्वर्य को चाहता था। इन्द्र ने कहा- क्या इससे भी बड़ी कोई चीज है। शुक्राचार्य ने कहा कि हाँ है। इसका पता तुम्हें प्रह्लाद, असुरों के राजा से लगेगा।
इन्द्र एक ब्राह्मण के भेष में प्रह्लाद के पास गया और वही प्रश्न पूछा जो कि उसने बृहस्पति और शुक्राचार्य से पूछा था। प्रह्लाद ने कहा कि समय नहीं है क्योंकि सारा समय तीनों लोकों के राज्य करने में व्यतीत हो जाता है। इसलिए मैं तुम्हें कुछ शिक्षा नहीं दे सकता। ब्राह्मण ने कहा कि वह उनके खाली समय की प्रतीक्षा करेगा और जब वह कहेंगे तभी उनसे शिक्षा लेगा। उसने प्रह्लाद के महल बहुत समय तक एक आज्ञाकारी शिष्य की तरह उनकी प्रतीक्षा की और जो कुछ प्रह्लाद कहते थे वह बड़ी सावधानी से करता था।
एक दिन फिर ब्राह्मण ने पूछा कि महाराज किस प्रकार या किस गुण के कारण आप को तीनों लोकों का राज्य मिला।
प्रह्लाद ने उत्तर दिया हे द्विज! मुझे अपने राज्य का कण मात्र भी अभिमान नहीं है। परन्तु मैं जो शुक्राचार्य ने कहा है, उसका पालन करता हूँ और उनके अनुसार चलता हूँ। उन्हें मेरे ऊपर विश्वास है क्योंकि मैंने क्रोध पर विजय प्राप्त कर ली है। मैं माता-पिता, बड़ों की सेवा करता हूँ। मेरे पास कोई बुराई नहीं है। मैंने अपनी आत्मा पर विजय प्राप्त कर ली। सब इन्द्रियाँ मेरे वश में हैं। द्विज मुझे परामर्श देते हैं। मैं उनके द्वारा अमृत पान करता हूँ। वह शिक्षा जो कि उनके मुखारविन्द से निकलती है मनुष्य को अमर कर देती है। यही वह बुद्धि है जो कि मनुष्य को बड़ा बनाती है।
ब्राह्मण ने बड़े प्रेम तथा भक्ति से सब कुछ सुना।
प्रह्लाद उसकी भक्ति से बड़े प्रसन्न हुए और उससे वर माँगने के लिए कहा।
ब्राह्मण ने कहा महाराज मुझे दान में अपना “शील” दे दो। प्रह्लाद को ब्राह्मण की इस प्रार्थना पर बड़ा आश्चर्य हुआ। परन्तु अपने प्रण के अनुसार उन्होंने अपना शील उसे दे दिया।
अब प्रह्लाद द्विविधा में पड़ गये। एक तेज की मूर्ति उनके शरीर से निकली। प्रह्लाद ने पूछा कि तुम कौन हो। उसने कहा कि मैं तुम्हारा शील हूँ। तुमने मुझे छोड़ दिया है। अब मैं ब्राह्मण के शरीर में निवास करूंगा। इतना कहते ही वह आकृति विलीन हो गई।
उस आकृति के अन्तर्ध्यान होते ही दूसरी तेजमई मूर्ति उनके सामने आई प्रह्लाद ने पूछा- तुम कौन हो। उसने उत्तर दिया- मैं धर्म हूँ।
मैं शील के साथ ही निवास करता हूँ। इसलिए मुझे उनका अनुसरण करना है।
तीसरी आकृति उनके सामने आई। प्रह्लाद ने फिर पूछा कि- तुम कौन हो। उसने कहा- मैं सत्य हूँ, मैं धर्म का अनुगामी हूँ। जहाँ धर्म है वही मैं हूँ। उसने भी प्रह्लाद के शरीर का त्याग कर दिया और ब्राह्मण के शरीर में प्रवेश किया। फिर वृत्ति उनके शरीर से प्रकट हुई उसने कहा- जहाँ सत्य है वहीं मैं हूँ। फिर एक घोर आवाज के साथ नई आकृति निकली, उसने कहा- मैं बल हूँ। जहाँ वृत्ति है वहीं मेरा वास है।
फिर एक तेजमई देवी प्रगट हुई उसने कहा मैं श्री हूँ जहाँ यह सब शक्तियाँ रहती हैं वहीं पर मैं भी वास करती हूँ।
प्रह्लाद ने देवी से पूछा- “ हे! सफलता की देवी’ यह ब्राह्मण कौन है। श्री ने उत्तर दिया- यह ब्राह्मण नहीं था, यह ब्राह्मण इन्द्र था। उसने धूर्तता से तुम्हारे से तीनों लोकों का ऐश्वर्य लूट लिया है। जब आपने अपना शील छोड़ दिया तो इसका अर्थ यह है कि आपने अपना धर्म, सत्य, वृत्ति, बल सभी कुछ दे दिया क्योंकि हम सब का जड़ शील है। इसलिए ‘शील’ की वृद्धि करनी चाहिए।
(प्रो. रामचरण जी महेन्द्र एम.ए.)
यदि आप रात्रि में दस बजे सोकर प्रातः सात बजे उठते हैं तो एक बार जरा पाँच बजे भी उठकर देखिए। अर्थात् व्यर्थ की निद्रा एवं आलस्य से दो घंटे बचा लीजिए। चालीस वर्ष की आयु तक भी यदि आप सात बजे के स्थान पर पाँच बजे उठते रहें तो निश्चय जानिए दो घंटे के इस साधारण से अन्तर से आपकी आयु के दस वर्ष और जीने के लिए मिल जायेंगे।
नित्य प्रति हमारा कितना जीवन व्यर्थ के कार्यों, गपशप, निद्रा तथा आलस्य में अनजाने ही विनष्ट हो जाता है, हम कभी इसकी गिनती नहीं करते। आजकल आप जिससे कोई कार्य करने को कहें, वही कहेगा, ‘जी, अवकाश नहीं मिलता। काम का इतना आधिक्य है कि दम मारने की फुरसत नहीं है। प्रातः से साँय तक गधे की तरह जुते रहते हैं कि स्वाध्याय, भजन, कीर्तन, पूजन, सद्ग्रन्थावलोकन इत्यादि के लिए समय ही नहीं बचता।’
इन्हीं महोदय के जीवन के क्षणों का यदि लेखा-जोखा तैयार किया जाय तो उसमें कई घंटे आत्म-सुधार एवं व्यक्तित्व के विकास के हेतु निकल सकते हैं। आठ घंटे जीविका के साधन जुटाने तथा सात घंटे निद्रा-आराम इत्यादि के निकाल देने पर भी नौ घंटे शेष रहते हैं। इसमें से एक-दो घंटा मनोरंजन, व्यायाम, टहलने इत्यादि के लिए निकाल देने पर छः घंटे का समय ऐसा शेष रहता है जिसमें मनुष्य परिश्रम कर पर्याप्त आत्म-विकास कर सकता है, कहीं से कहीं पहुँच सकता है।
यदि हम सतर्कता पूर्वक यह ध्यान रक्खें कि हमारा जीवन व्यर्थ के कार्यों या आलस्य में नष्ट हो रहा है और हम उसका उचित सदुपयोग कर सकते हैं तो निश्चय जानिए हमें अनेक उपयोगी कार्यों के लिए खुला समय प्राप्त हो सकता है।
आज के मनुष्य का एक प्रधान शत्रु-आलस्य है तनिक सा कार्य करने पर ही वह ऐसी मनोभावना बना लेता है कि ‘अब मैं थक गया हूँ, मैंने बहुत काम कर लिया है। अब थोड़ी देर विश्राम या मनोरंजन कर लूँ।’ ऐसी मानसिक निर्बलता का विचार मन में आते ही वह शय्या पर लेट जाता है अथवा सिनेमा में जा पहुँचता है या सैर को निकल जाता है और मित्र-मण्डली में व्यर्थ की गपशप करता है।
यदि आधुनिक मानव अपनी कुशाग्रता, तीव्रता, कुशलता और विकास का घमंड करता है तो उसे यह भी स्मरण रखना चाहिए कि समय की इतनी बरबादी पहले कभी नहीं की गयी। कठोर एकाग्रता वाले कार्यों से वह दूर भागता है। विद्यार्थी-समुदाय कठिन और गम्भीर विषयों से भागते हैं। यह भी आलस्य-जन्य विकार का एक रूप है। वे श्रम कम करते हैं, विश्राम और मनोरंजन अधिक चाहते हैं। स्कूल-कालेज में पाँच घंटे रहेंगे तो उसकी चर्चा सर्वत्र करते फिरेंगे, किन्तु उन्नीस घंटे जो समय नष्ट करेंगे, उसका कहीं जिक्र तक न करेंगे। यह जीवन का अपव्यय है।
व्यापारियों को लीजिये। बड़े-बड़े शहरों के उन दुकानदारों को छोड़ दीजिये, जो वास्तव में व्यस्त हैं। अधिकाँश व्यापारी बैठे रहते हैं और चाहें तो सोकर समय नष्ट करने के स्थान पर कोई पुस्तक पढ़ सकते हैं और ज्ञान-वर्धन कर सकते हैं, रात्रि-स्कूलों में सम्मिलित हो सकते हैं, मन्दिरों में पूजन-भजन के लिए जा सकते हैं, सत्संग-स्वाध्याय कर सकते हैं। प्राइवेट परीक्षाओं में बैठ सकते हैं। निरर्थक कार्यों-जैसे व्यर्थ की गपशप, मित्रों के साथ इधर-उधर घूमना-फिरना, सिनेमा, अधिक सोना, देर से जागना, हाथ-पर-हाथ धरे बैठे रहना- से बच सकते हैं।
दिन-रात के चौबीस घंटे रोज बीतते हैं, आगे भी बीतते जायेंगे। असंख्य व्यक्तियों के जीवन बीतते जाते हैं। यदि हम मन में दृढ़तापूर्वक यह ठान लें कि हमें अपने दिन से सबसे अधिक लाभ उठाना है, प्रत्येक क्षण का सर्वाधिक सुन्दर तरीके से उपयोग करना है तो कई गुना लाभ उठा सकते हैं।
जो व्यक्ति अपनी आय का प्रारम्भिक बजट बना कर खर्च करता है, वह प्रत्येक रुपये, इकन्नी और पैसे से अधिकतम लाभ निकालता है। इसी प्रकार दैनिक कार्यक्रम बनाकर समय को व्यय करने वाला जीवन के प्रत्येक क्षण का अधिकतम लाभ उठाता है और आत्म-विकास करता है।
प्रत्येक क्षण जो आप व्यय करते हैं, अन्तिम रूप से व्यय कर डालते हैं, वह वापस लौटकर आने वाला नहीं है। जब मृत्यु समीप आती है तो हमें जीवन के दो चार क्षणों का ही बड़ा मूल्य लगता है। यदि हम विवेकपूर्ण रीति से अपने उत्तरदायित्व और जिम्मेदारियों को धीरे-धीरे समाप्त करते चलें तो हम जीवन में इतना कार्य कर सकते हैं कि हमें उस पर गर्व हो।
क्या आप ‘जौन जेक रूसो’ नामक विद्वान के जीवन के सदुपयोग की कहानी जानते हैं। वह कहार का कार्य करते-करते फालतू समय के परिश्रम से विद्वान बना था। दिन भर रोटी के लिए परिश्रम करता और रात्रि में पढ़ता था। एक व्यक्ति ने उससे पूछा- ‘आपने किस स्कूल से शिक्षा पायी है?’ रूसो ने कहा-’मैंने विपत्ति की पाठशाला में सब कुछ सीखा है।’ यह कहार दिन-भर सख्त मेहनत की रोटी कमाता और बचे हुए समय में पढ़कर धुरन्धर शास्त्रकार हुआ है। हम भी यह कर सकते हैं।
समय के अपव्यय के पश्चात् भाव, विचार, वासना, उत्तेजना आदि अनेक रूपों से जीवन का अपव्यय किया करते हैं। दुर्भाव न केवल दूसरों के लिये हानिकर है वरन् ‘स्वयं’ हमें बड़ी हानि पहुँचा जाते हैं। एक बार का किया हुआ क्रोध दूसरों पर तो बाद में प्रभाव डालता है, पहले तो हमारे रक्त को विषैला और स्वभाव को चिड़चिड़ा बना डालता है पाचन-क्रिया को शिथिल कर डालता है, बहुत देर तक सम्पूर्ण शरीर थरथराता रहता है। यदि हम वासना को नियंत्रण में रखकर वीर्य संचय करें, तो जीवन में जीवाणुओं, पौरुष, बल की, बुद्धि की, वृद्धि हो सकती है। व्यर्थ जो वीर्य नष्ट किया जाता है, वह जीवन का अपव्यय ही है।
घृणित विचार, क्षणिक, उत्तेजना, आवेश हमारी जीवनी शक्ति के अपव्यय के अनेक रूप हैं। जिस प्रकार काले धुएँ से मकान काला पड़ जाता है, उसी प्रकार स्वार्थ, हिंसा, ईर्ष्या, द्वेष, मद, मत्सर के कुत्सित विचारों से मनो मन्दिर काला पड़ जाता है। हमें चाहिए कि इन घातक मनोविकारों से अपने को सदा सुरक्षित रक्खें। गंदे, ओछे विचार रखने वाले व्यक्ति से बचते रहें। वासना को उत्तेजित करने वाले स्थानों पर कदापि न जायं, गन्दा साहित्य कदापि न पढ़े। अभय पदार्थों का उपयोग सर्वथा त्याग दें।
शान्त चित्त से बैठकर ब्रह्म-चिन्तन, प्रार्थना, पूजा इत्यादि नियमपूर्वक किया करें, आत्मा के गुणों का विकास करें। सच्चे आध्यात्मिक व्यक्ति में प्रेम, ईमानदारी, सत्यता, दया, श्रद्धा, भक्ति और उत्साह आदि स्थाई रूप से होने चाहिए। दीर्घकालीन अभ्यास तथा सतत शुभचिंतन एवं सत्संग से इन दिव्य गुणों की अभिवृद्धि होती है।
अपने जीवन का सदुपयोग कीजिए। स्वयं विकसित होइये तथा दूसरों को अपनी सेवा, प्रेम, ज्ञान से आत्म-पथ पर अग्रसर कीजिए। दूसरों को देने से आपके ज्ञान की संचित पूँजी में अभिवृद्धि होती है।
हमारे जीवन का उद्देश्य भगवत्प्राप्ति या मुक्ति है। परमेश्वर बीजरूप से हमारे अन्तरात्मा में स्थित हैं। हृदय को राग, द्वेष आदि मानसिक शत्रुओं, सांसारिक प्रपंचों, व्यर्थ के वितंडावाद, उद्वेगकारक बातों से बचाकर ईश्वर-चिन्तन में लगाना चाहिए। दैनिक जीवन का उत्तरदायित्व पूर्ण करने के उपरान्त भी हममें से प्रायः सभी ईश्वर को प्राप्त कर ब्रह्मानन्द लूट सकते हैं।
एषा बुद्धिमताँ बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति माऽमृतम्॥
मानव की कुशलता, बुद्धिमत्ता साँसारिक क्षणिक नश्वर भोगों के एकत्रित करने में न होकर अविनाशी और अमृत-स्वरूप ब्रह्म की प्राप्ति में है।
सब ओर से समय बचाइए; व्यर्थ के कार्यों में जीवन जैसी अमूल्य निधि को नष्ट न कीजिए, वरन् उच्च चिन्तन, मनन, ईशपूजन में लगाइए, सदैव परोपकार में निरत रहिए। दूसरों की सेवा, सहायता एवं उपकार से हम परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं।
(स्वामी विवेकानन्द)
हमें यह विदित है कि हिन्दू जाति कभी भी धन के पीछे नहीं पड़ी। धन उन्हें खूब प्राप्त हुआ यह बात अलग है- अनेकों राष्ट्रों से कहीं अधिक धन-पर हिन्दू जाति धन के पीछे तो कभी भी न लगी। युगों तक भारत शक्तिशाली बना रहा, पर तो भी शक्ति उस का आदर्श नहीं बनी। कभी उसने अपनी शक्ति का उपयोग अपने देश के बाहर या किसी पर विजय प्राप्त करने में नहीं किया, कभी साम्राज्य शाही की यश-लोलुपता का वह शिकार नहीं हुआ, धन और शक्ति उस जाति की कभी भी प्रेरणा न बन सकी।
तो फिर? उसका मार्ग उचित था या अनुचित- यह प्रश्न प्रस्तुत नहीं है- वरन् बात यह है कि यही एक ऐसा राष्ट्र है, मानव वंशों में यही एक ऐसी जाति है, जिसने श्रद्धापूर्वक सदैव यही विश्वास किया कि यह जीवन वास्तविक नहीं-यह जीवन सत्य नहीं। सत्य तो परमात्मा है, वास्तविक तो प्रभु हैं और इसलिए दुःख और सुख में उसी से हमारी लगन बढ़े। अपने ह्रास के इतिहास में भी उसने धर्म को प्रथम स्थान दिया है। हिन्दू का खाना धार्मिक, पीना धार्मिक, उसकी नींद धार्मिक, उसकी चाल-ढाल धार्मिक, उस के विवाहादि धार्मिक, यहाँ तक कि उसकी चोरी करने की प्रेरणा भी धार्मिक है।
अन्यत्र भी देखा है क्या आपने ऐसा देश? आपको यदि जरूरत है एक डाकू के गिरोह की, तो उसके नेता को आप देखें-कैसे वह एक धार्मिक तत्व लेकर उसका प्रचार करता है, उसकी कुछ खोखली सी आध्यात्मिक पृष्ठ भूमि रचता है और फिर उद्घोष करता है कि परमात्मा तक पहुँचने का यही सुस्पष्ट और शीघ्रगामी मार्ग है। तब उसके अनुचर बन जाते हैं- अन्यथा नहीं। इसका बस एक ही कारण है और यह है कि इस जाति की सजीवता, इस देश की प्रेरणा धर्म है और क्योंकि धर्म पर अभी आघात नहीं हुआ, यह जाति जीवित है, यह देश निष्प्राण नहीं है।
एक हिन्दू यदि किसी व्यक्ति या राष्ट्र को सहायता पहुँचाना चाहता है तो वह पूर्ण निरपेक्ष, सम्पूर्ण निःस्वार्थ बनकर ही अग्रसर होगा। मैंने दिया और बस बात खत्म हो गयी वहीं। मुझ से चली गयी दूर- मेरा दिमाग, मेरी शक्ति, मेरा सर्वस्व, अथवा जो कुछ भी दे सकूँ वह सब कुछ दे दिया सब खत्म किया यह है उसका स्वाभाविक धर्म।
(श्री आनन्द टीका पट्टी)
यद्यपि पाँचों ऋण समान रूप से सारी मानव जाति पर हैं, फिर भी इस को ठीक-ठीक पहचान कर जिस प्रकार हिन्दू जाति ने इसे पंच महायज्ञ के रूप में चुकाने का प्रयत्न किया, वह संसार के किसी भी धर्म और सम्प्रदाय ने नहीं किया अतः यह, इस धर्म में एक विशेष दृष्टि, कर्म और प्रसाधन है।
प्रारम्भ में खेती−बाड़ी, भोजन, वस्त्र, मकान, सहन कल मशीन आदि हमारी आवश्यकताओं एवं सुविधाओं की कोई वस्तु नहीं थी। हमारे पूर्वजों ने कठिन परिश्रमों द्वारा बड़ी-बड़ी मुसीबतों को झेलकर पृथ्वी और समाज को इस रूप तक पहुँचाया है, जैसा हम आज इसे पा रहे हैं। यदि उन लोगों ने ऐसा नहीं किया होता तो न हमें आज की सुख सुविधाएं ही मिली होतीं और न हमारा इतना विकास ही हुआ होता। इसके लिए हमें अपने पूर्वजों का ऋणी होना आवश्यक है। इसे ही हिंदू धर्म में पितृऋण कहा है। पितृऋण केवल व्यक्ति के बाप-दादों तक सीमित नहीं है। हिंदू लोग पितृ-तर्पण करते समय ऋषि, मुनि, देव, पितर, आदिकों का आह्वान करते हैं।
मनुष्य केवल स्थूल भूत शरीर नहीं है। अनेक सूक्ष्म और सूक्ष्मतर तत्वों के समुदाय से मनुष्य बना है। स्थूल के बाद सूक्ष्म स्तरों की अनेक शक्तियाँ मनुष्य को अपना विकास करने में सहायता पहुँचाती है, उसे ही देवता कहा जाता है इन्हीं के उपकारों से लाभाँवित होने का निर्देश करते हुए भगवान ने गीता में कहा है-
सध्यज्ञाः प्रजाः सृष्टवा पुरो वाचप्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोड स्त्विष्ट कामधुक्॥ देवा भावयतानेन ते देवा भाव यन्तु चः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परम वाप्स्यथ। इष्ट न्भोगाह्लि वो देवा दास्यन्ते यज्ञ भाविताः। तै दर्त्ता न प्रदायैभ्यो यो भुंक्ते स्तेन एव सः॥
अर्थ- पुरातन काल में प्रजापति ने यज्ञ के साथ प्रजाओं (मनुष्यों) की रचना करके कहा- इसी (यज्ञ) के द्वारा तुम लोगों की उन्नति होगी, यह (यज्ञ) ही तुम्हारे लिए कामधेनु होगा। इस (यज्ञ) के द्वारा तुम लोग देवगणों का पोषण करो और देवगण तुम लोगों का पालन करें। इस भाँति परस्पर पालन करते हुए तुम लोग श्रेय की प्राप्ति कर सकोगे। यज्ञ से भावित देवगण तुम्हारे लिए इष्ट भोग की सामग्री प्रदान करेंगे और उन की प्रदान की हुई सामग्री जो उन्हें बिना दिये ही भोग करते हैं निश्चय ही चोर हैं।
देवों के द्वारा मनुष्यों को जो इष्टभोग प्राप्त कराते हैं उस ऋण को चुकाने के लिए भी यज्ञादि कर्म करना आवश्यक और उचित ही है।
देव शक्ति के द्वारा मनुष्यों को इष्ट परमार्थ प्राप्त करने में जो सहायता मिलती है, उसे ‘स्थूल आँखों और बुद्धियों’ द्वारा नहीं देखा जा सकता। एकाग्रता और योगलब्ध दृष्टि से यह स्पष्टतया देखा जा सकता है।
मानव विकास में सर्वश्रेष्ठ ऋषियों, मुनियों, आत्म ज्ञानियों से प्राप्त होती है ये ऋषिगण स्थूल शरीर में वास करते हुए मनुष्यों के आत्मविकास, कल्याण, ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति के लिए जितना प्रयत्न करते हैं, इस शरीर को छोड़ने के उपरान्त भी अनेकों ऋषि दया द्रवित होकर उच्च लोकों के आनंद भोग का त्याग कर नीचे उतर आते हैं, और अज्ञानी भ्राँत, दुःखी मानव जाति को उत्थान कराते हैं व इससे मुक्त कराने का प्रयत्न करते रहते हैं। दूसरों की सहायता से साधारण तथा मनुष्य ब्रह्मतत्त्व की उपलब्धि कर पाता है। इस महाऋण को चुकाने के लिए प्रयत्न करना मनुष्य का महान कर्त्तव्य है।
भौतिक जीवन में सुख, लाभ, उन्नति करने में प्रत्यक्ष ही अनेकों प्राणियों से हमें भिन्न-भिन्न सहायता, सहयोग एवं रंजन प्राप्त होते हैं। इन ऋणों को चुकाना भी मनुष्य का विशेष कर्त्तव्य है, क्योंकि इन प्राणियों के द्वारा जो भी सहायता हमें मिलती है, उसमें इनकी कुछ कामना नहीं रही होती है।
पांचवीं प्रत्यक्ष सहायता एक मनुष्य दूसरे की स्वभावतया, स्वार्थ वश, ममता और उपशक्ति से, प्रेम के कारण करते रहते हैं। इस ऋण को चुकाने के लिए भी हमें कुछ विशेष कर्त्तव्यों का पालन करना चाहिए।
इस भाँति प्रधान तथा पाँच प्रधान ऋण प्रत्येक मनुष्य जाति पर जिसका हिन्दू शास्त्रों में या महर्षियों द्वारा स्पष्ट निर्धारण किया गया है। इन पाँचों ऋणों को उच्च अनुक्रम से ऐसे रखते है-
1- ऋषि ऋण, 2- देव ऋण, 3- पितृ ऋण, 4- सर्वभूत ऋण और 5- नृ ऋण।
इन पाँचों ऋणों को चुकाने के लिए पाँच महायज्ञ करने का विधान है।
1- ब्रह्म यज्ञ 2- देव यज्ञ 3- पितृ तर्पण 4- भूतयज्ञ और 5- नृ यज्ञ।
1- ब्रह्म यज्ञ
ऋषियों ने हमारा जो महान उपकार किया है। उस को चुकाने के लिए हमें दो प्रक्रियाएं करनी पड़ती हैं और दोनों के द्वारा व्यक्ति, आत्म ज्ञान, ब्रह्म, सर्व ज्ञान प्राप्त करता है।
(क) ऋषियों ने मार्ग आत्म कल्याण के लिए बताया है, उसका स्वाध्याय, श्रवण, कथन एवं मनन करना।
(ख) निदिध्यासन द्वारा, उन मार्गों को अनुभवगम्य बनाकर उसे प्रकाशित करना। ऐसा करने से ऋषि ऋण सम्पूर्णतया चुक जाता है तथा चुकाने वाला स्वयं ऋषि बन जाता है।
2- देव ऋण
अग्नि प्रज्वलित कर विशिष्ट मन्त्रों एवं विभिन्न पुष्टि, शक्तिकारी पदार्थों से आहुति प्रदान करना ही देव यज्ञ है। इससे देवगण सन्तुष्ट होकर मनुष्यों को अपनी उच्च शक्ति से ऐसी ऐसी सहायताएं प्रदान करते हैं जो मनुष्य अपने निजी पुरुषार्थों, प्रयत्नों और विचारों के द्वारा भी नहीं कर सकते यद्यपि देवों को सन्तुष्ट करने के लिए हम शुद्ध भाव से अनेकों विध प्रक्रियाओं सहित उन्हें हवि प्रदान करते हैं, पर इनका कई गुणा अधिक लाभ उलट कर हम करने वालों को ही प्राप्त हो जाता है।
3- पितृ तर्पण
जिन आत्माओं ने मनुष्य जाति की सुख सम्पत्ति की समृद्धि के लिए अनेकों प्रयत्न किये थे तथा अपने सम्बन्धित व्यक्तियों के हित के लिए प्रयत्न किये थे, वे आत्माएँ चाहे ब्रह्माण्ड के किसी भी लोक में निवास करती हों, हम उन्हें जल-तिलादि से तर्पण कर भाव सहित तृप्त करने का प्रयत्न करते हैं। हमारी श्रद्धा से अर्पित तर्पण द्वारा उनको अवश्य ही तृप्ति मिलती है और देवताओं की भाँति पितृ गण भी अपनी शक्ति से मानव को सुखी समृद्ध उन्नत होने में सहायता प्रदान करते हैं। इस भाँति पितृ तर्पण करने की सेवा करके उलट कर हम स्वयं ही उन्नति करने में सहायता प्राप्त करते हैं।
व्यक्ति, देश, समाज और विश्व के सुख और कल्याण के लिए उद्योग करने वालों की सेवा और सम्मान करना भी पितृ तर्पण ही है। दोनों मिलकर ही पूरा पितृ तर्पण है।
4- भूत यज्ञ
इस यज्ञ के दो रूप हैं। एक तो हम प्रत्यक्ष तथा जिन पशु-पक्षी, प्राणियों से सहायता लेते हैं, उनके खाने, रहने आदि की सुव्यवस्था रखकर उन्हें सुखी रखना। दूसरा भूलोक एवं भुवलोक से सम्बन्धित अनेक प्राणी जो अनेक प्रकार अभावों, कष्टों से त्राण पाने के लिए मनुष्य की सहायता की अपेक्षा करते हैं। उन्हें गार्हपत्याग्नि में आहुति प्रदान कर हम अपने सत्संकल्पों से लाभ पहुँचाते हैं, इस भाँति उन दुःखी असहाय प्राणियों को सहायता देकर हम स्वयं पुण्य या कल्याण के भागीदार बनते हैं।
5- नृ यज्ञ
मनुष्य ईश्वरीय सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। यदि मनुष्य अकेला ही रहे तो वह पशु से कुछ विशेष शायद ही हो सके। अतः यह स्पष्ट है कि प्रत्येक मनुष्य ज्ञात या अज्ञात रूप से एक दूसरे की सहायता लेकर ही आत्म विकास करता है। इसीलिए प्रत्येक समर्थ योग्य मनुष्य को प्रतिदिन किसी प्रकार की सहायता, सेवा, भलाई कर देना ही नृ यज्ञ है। जीवन धारण में भोजन का महत्वपूर्ण स्थान है इसीलिए किन्हीं अचानक आए मनुष्यों का देव की भाँति पूजा अर्चना-सेवा करके उसे भोजनादि से सुख पहुँचाना (अतिथि सेवा) एक महायज्ञ है। ऐसा संयोग उपस्थित नहीं होने पर अपनी तैयार रसोई किसी अनपेक्षित व्यक्ति जिससे अपना कोई स्वार्थ नहीं-को खिलाना भी नृ यज्ञ ही है।
जब तक हिंदू जाति में ये पाँचों महायज्ञ होते रहे तब तक उनके जीवन का उत्कर्ष होता रहा। इसका परित्याग ही इसके पतन, दुःख, कष्ट एवं पराधीनता के कारण बने। आज इसे ग्रहण कर पुनः उत्थान साधित किया जा सकता है।
(श्री लक्ष्मी नारायण जी बृहस्पति)
कर्म संयोग से पुरुष एक नारी को और नारी एक पुरुष को जो कि भिन्न-2 जीवात्माएँ हैं, अपना मानकर परस्पर बन्धन में बँधते हैं तथा इस माने हुए बन्धन के ही कारण संयोग-वियोग में सुखी-दुःखी होते रहते हैं।
स्त्री, पुरुष के पारस्परिक संयोग ऋणानुबन्ध से सम्बद्ध कोई जीवात्मा जब शरीर धारण करता है, तब पुरुष और स्त्री उसे अपना पुत्र मानते हुए गर्वित होते हैं।
यदि पुरुष से पूछा जाय कि तुमने पुत्र के शरीर को किस प्रकार बनाया? तब वह मौन हो जायगा लेकिन नारी इस बात को लेकर बोल उठेगी कि मैंने नौ मास गर्भ में रक्खा, अमुक-अमुक कष्ट उठाये, इतने दिन दूध पिलाया, पाल-पोसकर मैंने ही तो इसे इतना बड़ा किया है।
उस माता से यदि पूछा जाय कि अच्छा बताओ, तुमने अपने उदर में किस क्रम से पुत्र शरीर की रचना की है? भोजन करते हुए किन यन्त्रों के द्वारा, किस प्रकार के अन्न से तुमने बालकों के लिए दूध बनाया है?
तब माता का गर्व करने वाली नारी भी चुप हो जायगी। विवेक दृष्टि से कोई भी स्पष्ट देख सकता है कि वास्तव में स्त्री के उदर में जीवात्मा के शरीर को बनाने वाली स्वयं वह स्त्री नहीं वरन् कोई अदृश्य शक्ति है। वही सब के शरीरों की सच्ची जननी है और परमात्मा ही जीवात्मा के सच्चे पिता हैं।
यहाँ के माने हुए पिता जीवात्मा को नहीं बनाते, न यहाँ की भाव द्वारा मानी हुई माता शरीर को बनाती है।
यह भौतिक जगत लीलामय की लीला पूर्ति के लिये मायात्मक भाव की मानी हुई नीति-रीति है!
जिस समझ से आप माता, पिता, बन्धु भगिनी अथवा स्त्री इत्यादि को अपना मानते हैं, वह आपके हृदय से उत्पन्न माना हुआ भाव-मात्र है। बाल्यकाल से ही इस मान्यता का प्रारम्भ होता है फिर यही मान्यता का भाव दृढ़ हो जाता है और यथार्थ ज्ञान हुए बिना नहीं छूटता।
दूसरों के सुख-दुःख से अपने को जो सुख-दुःख प्रतीत होता है, वह केवल उन्हें अपना मानने से ही होता है।
थोड़ा विचार कीजिए! आप जिन निकटवर्ती व्यक्तियों को अपना मानकर उनके अभिमानी बनते हैं, वे सभी आप ही की तरह अपनी वासनाओं के अनुसार प्रारब्ध कर्म से परतंत्र होकर भोग करने के लिए अपने कर्मों का हिसाब किसी को देने या किसी से लेने के लिये शरीर धारण करने वाले जीवात्मा हैं।
जिस जीवात्मा के प्रति एवं जिस पदार्थ के प्रति जितना ही अपनत्व का भाव होता है उतना ही उसमें रागासक्ति का बन्धन होता है।
जिन पर अपना स्वतंत्र अधिकार नहीं है, उन्हें अपना मान लेना और अपने आप को भूले रहना यही समस्त दोषों का मूल है।
आप कितने ही प्रकार के जप, तप और व्रतादि साधनों का आश्रय लें किन्तु, जब तक आप में अज्ञान जनित सम्बन्ध सक्ति एवं पदार्थाभिमान रूपी दोष रहेंगे तब तक आप दुःख से मुक्त नहीं हो सकते।
इसलिए ऐसा कुछ प्रयत्न कीजिये कि आपको अपने वास्तविक सम्बन्धी का ज्ञान सुलभ हो सके। उसी के बल से आप कहीं भी माने हुए सुखों में, व्यक्तियों में, पदार्थों में आसक्त न रहकर सभी ओर से पूर्ण हो विरक्त हो जायेंगे और तभी अनायास ही सारे दुःखों का अन्त हो जायेगा।
यदि आपको साँसारिक पदार्थों और सम्बन्धियों को अपना मानते हुए ही सुख प्रतीत होता है तो परमानन्द स्वरूप परात्पर परमेश्वर को ही अपना मानो, क्योंकि यथार्थ विवेक न होने के कारण अपने संतोष सुख के लिए आपको मानने वालों के संग से ही मानने की आदत पड़ गई है।
आपका मन अपनी आदत के अनुसार स्थूल जगत के विषयों में सुख मानकर ही सुखद पदार्थों के प्रति मोहासक्त हो रहा है। ऐसी दशा में तो यही ठीक है कि परम शान्ति स्वरूप परमात्मा को अपना माना जाय, जिससे साँसारिक पदार्थों के प्रति ममता का बन्धन टूट सके। यहाँ पर आपको स्मरण रखना होगा कि जिस प्रकार संसार के माने हुए सुख और सुखद सम्बन्ध स्थिर नहीं है उसी प्रकार माने हुए परमेश्वर से मिलने वाली, मानी हुई शान्ति भी वास्तविक परम-शाँति नहीं है।
वह परम-शाँति तो परमात्म स्वरूप के और अपने सम्बन्ध को तत्वतः जान लेने पर ही प्राप्त होती है।
अतः आपका सम्बन्धी केवल आपको और परमात्मा के सम्बन्ध को प्रकाशित कर देने वाला अद्वितीय तत्व-ज्ञान है। जिसको जानकर आप सार्वभौम-सेवा-पथ के पथिक बनकर, उन्नति की चरम सीमा पर प्रतिष्ठित होकर, परम-शान्ति स्वरूप सच्चिदानंद-धन परमेश्वर को अपने वास्तविक सम्बन्धी को प्राप्त करने के अधिकारी बनकर कृतकृत्य हो सकते हैं।
(आचार्य श्री शिवकुमार शास्त्री)
भगवान् विष्णु प्रसिद्ध वैदिक देव तो हैं ही, वे लोक में भी बहुत प्रसिद्ध हैं। वे सृष्टि स्थित और संहार इन तीन कर्मों के कारण ब्रह्मा, विष्णु, महेश नामों से कहे जाते हैं। गुणभेद एवं रुचि भेद को लेकर देवताओं के विषय में हिंदू संस्कृति ने जितना वैज्ञानिक प्रकार अपनाया है, आज तक सारे विश्व की संस्कृतियों ने उतना विचार तक नहीं किया है। भारतीय संस्कृति त्रिगुणात्मक प्रकृति को लेकर चलती है और वह अंतिम लक्ष्य रखती है- एक अद्वितीय तत्व, जिसे आत्मा कहते हैं। शरीर का संचालन करने वाली इन्द्रियों एवं अन्तःकरण की अनियंत्रित, अमर्यादित, दूषित वृत्तियों की रुकावट के लिए शास्त्रों ने उपासना, दैवी शक्ति की आराधना, मनुष्य की मनुष्यता के साथ उसे अविनाशी पद पाने के लिए लोगों के समक्ष रखी है। सारे प्राणी अपने-2 कर्मों के अनुसार सुख-दुःखादि का उपभोग करते हैं। अपनी-अपनी वासनाओं के अनुसार सारे प्राणी सात्विक, राजस, तामस भेद से विविध होते हैं। उनके कल्याण के लिए शास्त्रों ने उपासनाएँ भी वैसी ही रखी हैं- ‘यजन्ते सात्विका देवान् यक्षरक्षाँसि राजसाः’ कहकर श्री भगवान ने सात्विक पुरुषों को देवोपासक बतलाया है। ‘यथाभिमतध्यानाद्वा’ कहकर महर्षि पतंजलि ने चित्त शुद्ध के लिए देवताओं की उपासना अपनी रुचि के अनुसार आवश्यक बतलायी है।
देवताओं में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही सर्वशक्तिमान एवं श्रेष्ठ हैं। सृष्टि, स्थिति संहार कार्यों में अभेद रूप से सर्वाधिकारी होते हुए भी विष्णु प्रसिद्ध रूप से स्थिति के अधिकारी बतलाये गये हैं। स्थिति, रक्षा सत्वगुण का कार्य है, अतः एक परमतत्व होते हुए भी वे सत्वगुण के अधिष्ठाता हैं। सृष्टि की स्थितिसत्ता करने के कारण उनका सत्व गुण के आश्रय होना युक्ति युक्त भी है। वेद, उपनिषद्, पुराण, महाभारत आदि शास्त्रों में उनका, उनके कर्मों का, उनकी उपासना का सम्मानपूर्वक विविध उल्लेख है। पाठकों के समक्ष उनके विषय कुछ उदाहरण हम यहाँ दे रहे हैं।
“सुष्ट च पात्यनुयुगं यावत्कल्पविकल्पना। सत्वभृद्भगवान्विष्णुरप्रमेयपराक्रमः॥” (विष्णुपुराण 2-62) कहकर सत्वगुण विशिष्ट भगवान विष्णु सृष्टि का प्रलयपर्यन्त पालन करते हैं यह बतलाया गया है। वेदों में श्री विष्णु की महिमा गायी गयी है। “विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्यः सखा॥” अर्थात् पुरुषों! श्री विष्णु के सृष्टि-स्थिति-संहार आदि कर्मों को देखो, समझो। उन्होंने ही अपने पराक्रम से अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, इन्द्र आदि को अपने-अपने कार्यों में प्रमाद रहित होकर नियुक्त किया है। वे श्री विष्णु वृत्र आदि असुरों के विनाश में देवराज इन्द्र के मित्र हैं। वेदान्तशास्त्र के पारंगत विद्वान आकाश में व्याप्त नेत्र की भाँति अथवा सूर्य मण्डल के रूप में विद्यमान उन विष्णु के परम आनन्दस्वरूप पद का साक्षात्कार करते हैं -’तद्विणोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततप्त।’ (यजु. 6। 4-5)। श्री विष्णु ने वामन अवतार धारण कर इस विश्व का क्रमण (माप) कर लिया अर्थात् अग्नि, वायु, सूर्यरूप से भूमि, अन्तरिक्ष एवं स्वर्ग, इन तीनों में चरणन्यास किया। सब प्राणियों में व्याप्त विष्णु का शुद्ध रूप धूलिमय बालुकामय प्रदेश में रखे पैर की भाँति अज्ञानी पुरुषों की बुद्धि से परे है- ‘इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढ़मस्य। पाँसुरे स्वाहा॥’ (यजु. 5। 15)
जिस विष्णु ने पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग आदि लोकों की रचना की है और जिसने ऊपर वाले स्वर्ग को धारण किया है, अग्नि, वायु, सूर्यरूप से तीनों लोकों का आक्रमण करने वाला अर्थात् व्याप्त तीव्रगति वाला अथवा महात्मा लोग जिसके गुणों का गान करते हैं, उस विष्णु के कार्यों का मैं वर्णन करता हूँ - “विष्णोर्नुकं वीर्याणि प्रवोच यः पार्थिवानि विममे रजोसि। यो अस्कभायदुत्तरं सघस्थं विचक्रमाणस्त्रेधोरु- गायो निष्णवेत्वा॥” सर्वथा शुद्ध नृसिंह आदि रूप से भयंकर, पृथ्वी में मत्स्य, कच्छप आदि रूप से गतिशील, वेदवाणी अथवा शरीर में आत्मा के रूप से स्थित होने वाले विष्णु हैं। जिस विष्णु भगवान के विशालतापूर्वक तीन पैरों के रखने में ही सारे विश्व निवास कर रहे हैं, उस अद्भुत विक्रमशाली विष्णु की हम लोग स्तुति करते हैं- “प्रतद्विष्णु स्तवते वीर्येण मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठः। यस्योरुपु त्रियु विक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानि विश्वा।” (यजु. 5। 20)। इस मन्त्र के अन्य अर्थ भी सम्भव हैं, पर वे सब विष्णुपरक ही हैं। जगत के रक्षक अविनाशी श्री विष्णु ने अग्नि, वायु, सूर्यनामक तीन चरणन्यास किये हैं। इन तीन चरणों के रखने से ही वे धर्मों की रक्षा करते हैं पुण्यकर्मों का पालन करते हैं- “त्रीणि पदा विचक्रमे विष्णुगोपा अदाभ्यः। अतो धर्माणि धारयन्॥” कामनारहित, सावधान, मेधावी, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण लोग उस यज्ञ पुरुष विष्णु के उत्तम ब्रह्मरूपी पद को प्रदीप्त करते हैं अर्थात् उसे पाने का निरन्तर उद्योग करते हैं- “तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवाँसः समिन्धते। विष्णोर्यत्परमं पदम॥”(यजु. 34।43।44)। इन मंत्रों में भगवान विष्णु को सत्त्वगुण विशिष्ट, रक्षक एवं ब्रह्मस्वरूप बतलाया गया है। ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में विष्णु के विषय में बहुत मंत्र हैं, जिनमें उनकी विविध महिमाओं का उल्लेख प्राप्त होता है। अधिक जिज्ञासु जनों को उन्हें देखना चाहिए। वेदभगवान विष्णु को ‘विष्णुर्गोपा अदाभ्यः’ कहकर रक्षक बतलाते हैं।
श्रीमद्भागवत, विष्णुपुराण, महाभारत आदि में तो श्री विष्णु की इतनी महिमा वर्णित है कि जिसका संक्षिप्त उल्लेख तक सम्भव नहीं है। ‘सत्त्वं विशुद्धं क्षयते भवान् स्धितौ शरीरिणाँ श्रेय उपायनं वपुः’(गर्भस्तुति) कहकर ‘शरीरधारियों को कल्याण देने वाले सत्त्वगुणविशिष्ट विशुद्ध शरीर को आप स्थितिकाल में धारण करते हैं’ ऐसा कहा गया है। ‘देवक्याँ देवरुपिण्याँ विष्णुः सर्वगुहाशयः’ यहाँ देवरूपिणी भगवती देवकी में सबके हृदय में रहने वाले श्री विष्णु का ही प्रादुर्भाव बतलाया गया है। ‘मूलं हि विष्णुर्देवानाँ यत्र धर्मः सनातनः’ कहकर उन्हें सनातनधर्म का आधार एवं देवताओं का परमाश्रय बतलाकर उनकी विशिष्टता स्पष्ट कही गयी है। नारायण, बैकुण्ठ, हरि, अधोक्षज, गोविन्द, गरुड़ध्वज, कृष्ण, हृषीकेश, पद्मनाभ, मुकुन्द आदि नाम श्री विष्णु के ही हैं। निर्गुण भी परब्रह्म सृष्टि, स्थिति, संहार की इच्छा से सर्वशक्तिमान होने के कारण सत्त्व, रज, तम गुणों का आश्रय लेता है। श्री विष्णु ने ही सूकरावतार धारण कर हिरण्याक्ष का वध करके पार्थिव शक्ति का उद्धार किया है। इन्होंने ही ‘हरि’ नाम से गजेन्द्र को संकट से छुड़ाया है। महर्षि कर्दम से देवहूति में कलि नाम से उत्पन्न होकर माता को शुद्ध ज्ञान देकर साँख्य शास्त्र का विस्तार किया है। दत्त एवं सनकादि रूप से श्री विष्णु ने ही योगियों की गति प्रदर्शित की है। धर्म से दक्षपुत्री मूर्ति में नर-नारायण रूप से उत्पन्न होकर जो आज भी तप में परायण हैं मोहित करने के लिए आयी हुई अप्सराओं को जिन्होंने शान्त भाव से उर्वशी अप्सरा देकर लौट जाने का आदेश दिया। भक्त प्रह्लाद के रक्षार्थ दैत्यराज हिरण्यकश्यप के वध के लिए उन्होंने नृसिंह रूप धारण किया। उन्होंने ही वामनावतार में बलि से समस्त लोकों का राज्य छीनकर इन्द्र को दिया। धन्वन्तरि, ऋषभ, परशुराम, मत्स्य रूप धारण कर विविध लीलाएं करने वाले ये ही हैं। इक्ष्वाकुवंश में श्री राम के रूप में अवतार लेकर वानर सेना के साथ इन्होंने ही रावण जैसे अत्याचारी दुर्दान्त राक्षसराज को परास्त किया। श्री बलराम एवं श्री कृष्ण के रूप में अनेक दुष्टों का वध करने वाले, पाण्डवों को विजय देने वाले, अलौकिक कर्म करने वाले, अर्जुन को गीता का ज्ञान देने वाले, धर्मरक्षार्थ अवतीर्ण ये ही विष्णु हैं। वेदवृक्ष का विभाग करने वाले वेदव्यास, देवद्रोही पुरुषों को वैदिक मार्ग से पाखण्ड से प्रवृत्त होते देख उन्हें विभिन्न विचित्र उपदेशों से मोहित करने वाले बुद्ध आदि के रूप में अवतीर्ण ये विष्णु ही तो हैं। ‘विष्णोर्माया भगवती यथा सम्मोहित जगत्’ यह सम्पूर्ण विश्व उन्हीं की माया से मोहित हो रहा है॥
संक्षेप से श्रीविष्णु के विषय को सामने रखकर अब हम उनके वाहन श्री गरुड़ के विषय में पाठकों का ध्यान आकृष्ट कर रहे हैं। भारतीय संस्कृति ने देवताओं के कार्यों के अनुसार ही उनके वाहनों की वैज्ञानिक सत्य-कल्पना की है। वेदमय गरुड़ पर आसीन चक्रधारी श्री हरि गजेन्द्र के पास पहुँचे- “छन्दोमयेन गरुड़ेन समुह्यमानश्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः” (भागवत) श्री गरुड़ के कंधे पर हाथ रखे श्री भगवान से पृथु बोले- ‘पदास्पृशन्तं क्षितिमंस उन्नते विन्यस्तहस्ताग्रमुरंगविद्विषः।’ वेदस्वरूप गरुड़ भगवान विष्णु को वहन करते हैं- ‘त्रिबृद् वेदः सुपर्णाख्यो यज्ञं वहति पूरुषम्’ (श्रीमद्भागवत 10।11।19)। ‘पद्मपुराण’ आदि में भी गरुड़ को श्री विष्णु का वाहन बतलाया गया है। ‘अथो दिव्यः स सुपर्णों गरुत्मान्’ ऋग्वेद के इस मन्त्र का अभिप्राय भी यही है। यह ऊपर बतलाया जा चुका है कि श्री विष्णु ब्रह्माण्ड का पालन करने वाले हैं। रक्षा में आने वाली बाधाओं तथा विघ्नों को उन्हें हटाना होता है। दूषित वासनाओं वाली, देहात्मवाद मानकर केवल अपना ही स्वार्थ देखने वाली, मिथ्या अभिमानी, दूसरों को दुःख देने में सुख मानने वाली, हिंसा, असत्य, इन्द्रिय-परायणता में रुचि रखने वाली आसुरी शक्ति से साधु वृत्ति वाले, सर्वहित परायण महात्माओं की रक्षा उनका प्रमुख कार्य है। “परित्राणाय साधूनाँ विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥” (गीता) की घोषणा करने वाले, जगत में अव्यवस्था एवं लूटपाट, अनाचार, व्यभिचार, असत्य, नास्तिकता, स्वेच्छाचार को फैलाने वाले दूषित कीटाणुओं का विनाश, जगत की व्यवस्था एवं शान्ति के लिए परम आवश्यक है। भगवान विष्णु के इसी कार्य का सर्वत्र उल्लेख है। ‘गृ निगरणे ‘ धातु से सिद्ध गरुड़ शब्द वस्तुतः दूषित जीवों के निगलने वाले अर्थ में प्रयुक्त हो सकता है। वेदमय पक्षों से सम्पन्न यह गरुड़ जहाँ वेदोक्त कर्म-ज्ञानरूपी वायु का संचार करता है। वहाँ वह अपने तीक्ष्ण पैरों से बड़े-बड़े दुष्ट जीवों का भी विनाश कर देता है। ‘नागान्तको विष्णु रथः सुपर्णः पन्नगाशनः’ गरुड़ के इन नामों में जहाँ उन्हें वेदमय पक्ष होने के कारण सुपर्ण, विष्णु वाहन होने से ‘विष्णुरथ’ कहा गया है, वहाँ उन्हें ‘नागान्तक’ एवं ‘पन्नगाशन’ भी कहा गया है। कुटिल गति वाले विषधर जीवों को पन्नग, सर्प आदि कहा जाता है। हृदय में विष रखने वाले कुटिल स्वभाव वाले जीवों से क्या कभी सृष्टि का कल्याण सम्भव है? ऐसे जीव संसार की सुव्यवस्था एवं शान्ति में बाधक हैं। यही समझकर महात्मा प्रह्लाद ने ‘मोदेत साधुरपि बृश्चिक सर्पहत्या’ कहा है। दूसरों को पीड़ा देना ही धर्म मानने वाले जीवों का विनाश आवश्यक ही नहीं लोक कल्याणकारी भी है। दूषित वासनाओं तथा संस्कारों, आचार-विचारों को हटाकर शुद्ध वासनाओं, आचार-विचारों की रक्षा इसका मुख्य प्रयोजन है, अतः विषैले सर्प के समान साँसारिक विषयों में दौड़ लगाने से ही संसार में शान्ति संभव नहीं है। विषयविष के वासनारूपी दाँतों को तोड़ दो ‘विषयान विषवत् त्यज’ का यही तात्पर्य है। विषयों के अमर्यादित उपभोग में विष भरा हुआ है। उसमें शरीर की भी रक्षा संभव नहीं, शरीरी आत्मा की तो क्या बात? विषयविष एवं इन्द्रियादि का जितना आवश्यक तथा कम सम्बन्ध होगा, मनुष्य उतना ही बहिर्मुखी वृत्तियों से रहित एवं अन्तर्मुख होकर आसक्तियों से रहित हो जायेगा। विषयासक्ति का स्वार्थ न होने से उसकी सारी प्रवृत्तियाँ कल्याणमय होंगी। ‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्’ का उपदेश तब उसके त्यागमय जीवन से चरितार्थ होगा। विषयासक्ति रूपी विष हट जाने पर प्राणी शाँत एवं स्वस्थ हो जाता है। साँसारिक विषयों को समझने के बदले वह अपने को समझ जाता है। महात्मा गरुड़ उन विषय, रूपी कुटिल गति सर्पों के नाशक हैं, भक्षण करने वाले हैं स्पष्ट है कि वाहन श्री गरुड़ के द्वारा किये जा रहे कार्य से श्री विष्णु के कार्यों में समता है। उन्हें भी क्या सृष्टि की रक्षा में विषैले जीवों का हटाना आवश्यक नहीं? अतः श्री गरुड़ का भगवान विष्णु का वाहन होना सर्वथा युक्तिसंगत है।
उपासना में इस दृष्टिकोण को लेकर ही चलने से कल्याण हो सकता है। संक्षेप से यह विषय पाठको के समक्ष उपस्थित किया गया है। आवश्यकता होने पर विस्तृत विचार प्रस्तुत किये जा सकते हैं। गरुड़वाहन श्री भगवान विष्णु हम सब की रक्षा करें। ‘विष्णुगोपा अदाभ्यः।’ भगवान विष्णु की प्रसन्नता तथा सद्बुद्धि वैभव आदि की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन अपने अपने वर्णधर्म का पालन करते हुए ऋग्वेद अथवा यजुर्वेद के सहस्रशीर्षा आदि मंत्रों वाले पुरुषसूक्त तथा श्री विष्णु -सहस्रनाम का पाठ परम कल्याणकारी है। पाठक इसका अनुभव करें। रक्षा एवं संहार में ही शस्त्र धारण की आवश्यकता है। श्रीविष्णु के द्वारा कौस्तुभ, श्रीवत्स, विविधगुणशालिनी वनमाला, वेदमय पादाम्बर, धर्म-आदि से युक्त ज्ञान कमल तथा ओजबल आदि से युक्त गदा, जलतत्व, शंख, अग्नितत्व, सुदर्शन, तमोमय खड्ग, कालरूपी शाँर्ग धनुष तथा कर्ममय बाणों को धारण उन्हें स्थिति, सृष्टिरक्षा का अधिकारी बतला रहा है। वेद−शास्त्रों के गूढ़ रहस्यपूर्ण विषय या सत्य कही गयी घटनाएँ सामान्य बुद्धि द्वारा दुर्ज्ञेय हैं। भगवान विष्णु की कृपा से ही उनका ज्ञान सम्भव है। -सिद्धाँत
(श्रीमती ऐनी बेसेन्ट)
महान धर्मों में से जिस सर्वप्रथम धर्म का विवेचन करना है, वह कभी तो ‘हिन्दू धर्म’ के नाम से जाना जाता है, कभी ब्राह्मण धर्म के नाम से।
जिसे आधुनिक समय में हम हिन्दू कहते हैं, किन्तु प्राचीन समय में जिसे सदैव आर्य कहा जाता था- उत्तर भारत के आर्यावर्त्त नामक प्रान्त में आकर बसा और वहीं क्रमशः उस निर्दिष्ट दिशा में विकास पाता रहा, जो कि इस के मनु एवं उसके सहकारी महर्षियों ने इसके लिए निर्धारित की थी। इस प्रथम परिवार को हम समग्र जाति के आदर्श का पूर्ण प्रतिरूप पाते हैं, जो कुछ पूर्ण रूप से पुनरुत्पन्न किया जाना चाहिए, वह उसमें पूर्ण रूप से अभिव्यक्त था और उस अभिव्यक्ति की पूर्णता का श्रेय उन्हें ही था जिन पर वे प्रारम्भिक संस्कार अंकित किये गये थे।
प्रारम्भिक घटनाओं को आध्यात्म योग के प्रकाश में दिव्य दृष्टि द्वारा देखने पर हम पाते हैं कि आर्य जाति के प्रारम्भिक काल में उत्पन्न जीवात्माएँ विविध एवं विभिन्न प्रकार की थीं। शासक और विधायक के रूप में मनु सबके अध्यक्ष थे; फिर वे जीवन्मुक्त प्राचीन भारत के ऋषि जो कि जनता के शिक्षक एवं पथ प्रदर्शक थे। उनसे नीचे बहुत बड़ी संख्या में वे आत्मायें जन्म ले रहीं थीं जो पूर्व लोकों में पहले से ही नैतिक, बौद्धिक तथा आध्यात्मिक उन्नति पर थीं और उच्च श्रेणी को प्राप्त कर चुकीं थीं, उनके नीचे वे अल्प वयस्क जीवात्माएं थीं, जिन्हें अभी बहुत विकास करना शेष था। अन्त में कुछ जीवात्माएं वे थीं, जिनका विकास काल तो अपेक्षाकृत बहुत अल्प था, किन्तु उस अल्प काल में ही जिन्होंने चतुर्थ जाति के लिए निर्दिष्ट विकास को पार कर लिया था और जो मनुष्य जाति के उस विशाल विभाग के सबसे सफल सदस्य थे। वे विविध प्रकार के लोग सर्वग्राही धर्म, दर्शन, विज्ञान एवं नीति के संस्कारों को ग्रहण करने की क्षमता रखते थे एवं एक आदर्श रूप बन कर अपने-अपने अल्प विकसित उत्तराधिकारियों को यह परम्परा प्रदान कर सकते थे कि एक आर्य को किस आदर्श का अनुशासन करना चाहिए। उन्हें धर्म, नीति विज्ञान, दर्शन एवं व्यवहार धर्म के संरक्षक बनने के योग्य बनाया गया था अतः वे आर्य जाति के लिए निर्दिष्ट विकास के निर्दोष प्रतीक थे।
इस प्राचीन जाति को प्रदत्त धर्म का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि इस धर्म में विकास की विविध श्रेणियों में स्थित सम्पूर्ण मानव जाति के लिए शिक्षण विद्यमान है और यह धर्म मनुष्य के न केवल आध्यात्मिक एवं बौद्धिक जीवन का ही पथ-प्रदर्शक वरंच यह उसके राष्ट्रीय एवं पारिवारिक जीवन के सहयोगियों के साथ भी सब प्रकार के सम्बन्ध व्यवहारों की शिक्षा देता है। यह सम्पूर्ण सभ्यता ही धर्म प्राण है। मनुष्य जीवन का कोई भी अंग इसमें भौतिक या धर्मनिरपेक्ष नहीं माना गया।
हिन्दू धर्म को आप कभी न समझ सकेंगे जब तक कि आप यह न जान लें कि यह धर्म व्यवस्था उन आध्यात्म योगी ऋषियों द्वारा आयोजित की गयी थी, जिन्हें अदृश्य जगत का प्रत्यक्ष ज्ञान था। अदृश्य जगत के सत्यों पर आधारित व्यवस्था का अनुशीलन करवा कर लोगों को इस के ज्ञान की प्राप्ति के योग्य बनाना ही उन्हें अभीष्ट था। इस धर्म के मूलाधार को जान लेने पर ही इसके विविध विभागों का परिशीलन कर सकेंगे।
हिन्दू धर्म में हमें मानवीय ज्ञान और अज्ञान के विविध तारतम्य के अनुसार ही विधि-विधान, अनुष्ठान, संस्कार तथा प्रतिमाएं आदि उपासना के अगणित रूप मिलते हैं, किन्तु उन सभी का उद्देश्य प्रेम को दिखा देना, भक्ति को प्रेरणा देना एवं उपासना को फलवती बनाना ही है। इन साधनों द्वारा क्रमशः उन्नति करते हुए मनुष्य उस विश्वेश्वर के परम स्वरूप की कल्पना तक उस सर्वोच्च ईश्वर की धारणा तक पहुँचते हैं, ईश्वर की धारणा तक पहुँच जाने पर फिर चाहे वे उसकी उपासना विष्णु स्वरूप में करें या उनके किसी अवतार के रूप में अथवा उस पर गोपयोगी ज्ञान के अधिष्ठाता शिव के रूप में ही करें, परन्तु इन अगणित व्यक्त रूपों के मूलाधार उस एक ब्रह्म की धारणा तक पहुँच जाते हैं।
अब हमें यह देखना है कि आत्मा के व्यक्तिगत जीवन में यह शिक्षा किस प्रकार प्रयुक्त होती थी? इस व्यक्तिगत जीवन को हिन्दू धर्म में चातुवर्ण्य व्यवस्था के रूप से चार विशद श्रेणियों में विभक्त किया गया है जिनमें आत्मा के क्रम विकास की सुव्यवस्था है। हिन्दू धर्म में तो आर्य जाति की आदर्श नीति के रूप में इसे राष्ट्र का एक सामाजिक अंग ही बना दिया था, किन्तु जीवात्मा का विकास चाहे कहीं भी हो, उसे इन चार श्रेणियों में से यद्यपि बाह्य जन्मों में नहीं, किन्तु आँतरिक सत्यों में होकर जाना ही पड़ता है। हिन्दू धर्म का निर्माण बाह्य रूपों के पर्याय से आन्तरिक उन्नति का प्रतिनिधित्व करने के लिये ही हुआ था, ताकि मनुष्य इन बाह्य चित्रों को देख आध्यात्मिक सत्यों को सीख लें।
चातुवर्ण्य व्यवस्था में निम्नतम श्रेणी शूद्र की थी, जिसके लिए आज्ञाकारिता एवं सेवा के कर्त्तव्य के अतिरिक्त और कोई धर्म नहीं था। तत्पश्चात् वैश्य की श्रेणी थी जिसमें अर्थ प्राप्ति एवं इसके संग्रह के लिए आज्ञा एवं प्रोत्साहन था, ताकि जीवात्मा अर्थ के परिग्रह में भी निःस्वार्थता की शिक्षा को प्राप्त करें। सेवा कार्यों में धन का सदुपयोग करना ही इस जाति की निर्दिष्ट शिक्षा है। तीसरी श्रेणी क्षत्रियों की रखी गयी थी, जिसमें जीवन को केवल भौतिक भलाइयों से ही पूर्ण नहीं बनाना वरन् सम्पूर्ण जीवन को त्याग का ही स्वरूप बना देना है। और अन्त में ब्राह्मण वर्ग आता है, जिस में किसी भी अनित्य वस्तु में- उसे आकर्षित करने की शक्ति रहती, और जो जीवात्मा का अन्तिम जन्म होता है इन चारों वर्गों में जन्म लेकर इनके द्वारा प्राप्त होने वाली शिक्षा को ग्रहण कर लेने पर इन सब से परे संन्यासी का पद आता है, जिस का कोई वर्ग नहीं, जिस के लिए किसी अनुष्ठान, यज्ञ-योग, संस्कार आदि की आवश्यकता नहीं रहती और जो किसी भी अनित्य वस्तु का परिग्रह नहीं करता। यह संन्यासी देहाभिमानी व्यक्तित्व से इतना पूर्ण रूपेण निर्लिप्त होता है कि लोग उस का अभिवादन भी ‘नमो नारायणाय’ कह कर ही करते हैं अर्थात् उस के बाह्य रूप को नहीं उस के अन्तस्थ नारायण को ही नमन करते हैं।
पृथ्वी पर का भौतिक जीवन चार आश्रमों में विभक्त है। प्रथम है विद्यार्थी जीवन जिस में उसे मानो नवीन शरीर में उन सब गुणों का पुनर्प्रयोग करना है जो कि उसे शूद्र वर्ग के अंतर्गत अपने पूर्व विकास काल में सीखने पड़े थे अर्थात् आज्ञाकारिता, अनुशासन, श्रद्धा, ब्रह्मचर्य, उद्योग और अपने से बड़ों के प्रति कर्त्तव्य परायणता। यह व्यक्तिगत जीवन की प्रथम श्रेणी है। तब दूसरी श्रेणी आती है दाम्पत्य जीवन की, एक नागरिक के रूप में, पति के रूप में, परिवार के स्वामी के रूप में मनुष्य के जीवन की, जो कि राज्य और गृह दोनों के प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करता है। यह दूसरी श्रेणी गृहस्थाश्रम गृहस्थों की है, जो कि निःस्वार्थ धर्म का शिक्षालय है और धर्म से पूर्णतया ओत-प्रोत है। यहाँ उसे देव, पितर, ऋषि, मनुष्य और पशुओं को अर्पण करते हुए नित्य पंचयज्ञ करना होता है और इस प्रकार वह अपने नित्य धर्म का पालन करते हुए निःस्वार्थ दान का अभ्यास करता है। इस प्रकार दृश्य और अदृश्य सभी के ऋण से मुक्त हुआ जाता था। इसके अतिरिक्त जीवन के साँस्कृतिक विकास को लक्षित कर विशेष अनुष्ठानों अर्थात् संस्कारों का विधान था। बालक के जन्म के पूर्व के जीवन से संबंधित पुँस वनादि संस्कार, जन्मकाल के जात कर्मादि संस्कार, विवाह संस्कार, मृत्यु के समय के दाहादि संस्कार एवं परलोक तक जीवात्मा का अनुसरण करते हुए मृत्यु के पश्चात किये जाने वाले श्राद्धादि संस्कार इन सब की रचना एक आध्यात्मिक ढांचे के अंतर्गत ही हुई।
दाम्पत्य जीवन का श्रेष्ठतम आदर्श संसार को हिन्दू धर्म ने ही दिया है, जिस में पति-पत्नी का संयोग शारीरिक कामनाओं के कारण नहीं, अपितु आत्मिक संबन्ध द्वारा माना जाता है और आध्यात्मिक विकास एवं उन्नति के लिए ही वे लोग विवाह के अटूट बंधन में सम्बद्ध होते हैं। पुरुष बहुत से अनुष्ठानों को पत्नी के बिना नहीं कर सकता पत्नी, पति की जो कि पति के साथ-साथ उसका गुरु भी है शिष्या मानी जाती है पारिवारिक जीवन में पिता-पुत्र, माता-पुत्र, भाई-बहिन के सुन्दर सम्बन्धों को देखिए, सभी की रचना सावधानी और विवेकपूर्वक की गयी है, जिनमें लक्ष्य सर्वदा एक ही रहा है, मनुष्य के भीतर अंकुरित होते हुए आध्यात्मिक प्रेम को विकसित करना है।
(श्री भगवती देवी शर्मा- धर्मपत्नी आचार्य जी- मथुरा)
तपोनिष्ठ वेदमूर्ति श्री आचार्य जी के सान्निध्य में निरंतर रहने के कारण, उनकी मनोदिशा और कार्यों की गतिविधि की मुझे स्वभावतः आवश्यक जानकारी रहती ही है। सवा वर्ष के पिछले विशद गायत्री महायज्ञ रूपी मंगलाचरण और इस वर्ष को ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूपी शिलान्यास करने के साथ वे देशव्यापी साँस्कृतिक पुनरुत्थान का महान कार्य करने के लिए पूरी शक्ति के साथ तत्पर हो रहे हैं। उनका व्रत घर-घर में भारतीय संस्कृति का अलख जगाने और प्रत्येक भारतीय को उच्च दृष्टिकोण के आधार पर अपने विचारों और कार्यों का निर्माण करने की प्रेरणा देने का है। गायत्री परिवार का संगठन वे इसी दृष्टि से कर रहे हैं।
आचार्य जी जो प्रेरणा एवं शिक्षा देने का कार्य करेंगे वह कम से कम किशोर आयु के व्यक्तियों से आरम्भ होगा क्योंकि छोटी आयु के बालक उनके गम्भीर दार्शनिक विचारों को समझ नहीं सकते। इस प्रकार उनके विचारों से महिलाएं भी समुचित प्रेरणा प्राप्त न कर सकेंगी। क्योंकि वे स्वयं यह मानते हैं कि स्त्रियों और पुरुषों के कार्य क्षेत्र भिन्न-भिन्न है। इसलिए वे महिलाओं में कार्य करने से स्वयं भी बचते रहते हैं।
स्कूली शिक्षा पाँच वर्ष से प्रारम्भ होती है, पर संस्कृति का अधिकाँश शिक्षण तब तक पूर्ण हो चुका होता है। बालक की हड्डियाँ पिता के अंश से और माँस, रक्त, नस, नाड़ी, दिल, दिमाग सब कुछ माता के रक्त से बनता है। बालक के शरीर में कठोर हड्डियों के अतिरिक्त और जो कुछ कोमल है वह प्रायः माता के शरीर से ही कटकर बना हुआ एक हिस्सा है। माता के गुण, कर्म, स्वभाव जैसे होते हैं बालक प्रायः वैसी ही चेतनाओं एवं शक्तियों से भरा रहता है। जन्म होने के बाद वैज्ञानिकों के मतानुसार बालक जितना कुछ प्रभाव एवं शिक्षण माता द्वारा अपने मनःक्षेत्र में पाँच वर्ष की आयु तक भर लेता है फिर जीवन भर उतना ग्रहण नहीं कर पाता। स्कूलों में पढ़ाई होती है, शिक्षा दी जाती है पर संस्कारों का कार्य तो बालक के गर्भ धारण से लेकर पाँच वर्ष की आयु तक पचहत्तर प्रतिशत पूर्ण हो चुकता है।
आचार्य जी घर-घर में भारतीय संस्कृति का अलख जगाने और घर-घर में सुसंस्कृत नररत्न एवं महापुरुष पैदा करने की महान प्रक्रिया में संलग्न हो रहे हैं। उनके तपोबल और असाधारण पुरुषार्थ को देखते हुए किसी भी कार्य में असफलता की बात तो मैं नहीं सोचती- पर एक संदेह मन में निरन्तर बना रहता है कि जब तक नारी जाति पिछड़ी रहेगी, उसे सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न नहीं किया जायेगा तब तक उसके रक्त माँस से बने हुए बालकों में कैसे उन्नत संस्कार आवेंगे? और कैसे वह असंस्कृत नारी अपनी संतान पर पाँच वर्ष की आयु तक आशाजनक संस्कार डाल सकेगी? यदि पचहत्तर फीसदी मानसिक निर्माण अव्यवस्थित परिस्थितियों में, अयोग्य शिक्षक माता द्वारा पूरा हो गया, तो फिर शेष पच्चीस फीसदी मानसिक निर्माण यदि गुरुजनों द्वारा पूरा कर भी लिया गया तो उसका परिणाम आशाजनक किस प्रकार हो सकेगा?
धार्मिक शिक्षा की जनता को निश्चय ही आवश्यकता है, भारतीय संस्कृति के आधार पर उसे नैतिक दृष्टिकोण, आदर्श एवं विचार व्यवहार रखने के लिए जन साधारण को प्रेरित करना एक सराहनीय प्रयत्न है। पर अज्ञानान्धकार में डूबी हुई माताओं मनोभूमि, में जब कुछ सुधार न हो तब उनकी संतान भी मानसिक एवं आत्मिक दृष्टि से पिछड़ी हुई ही रहेगी, चाहे स्कूली शिक्षा द्वारा उसे पढ़ा-लिखा कर कितना ही तथाकथित डिग्री धारी विद्वान क्यों न बना दिया जाय। धार्मिक शिक्षा सुनने, समझने, ग्रहण करने और उसे हृदयंगम करने के लिए भी व्यक्ति में कुछ जन्मजात संस्कार होने चाहिए, अन्यथा कितने ही उच्च कोटि के प्रवचन दिये जायं, वे जन्मजात संस्कारों से विहीन व्यक्ति- उनकी उपेक्षा ही करेंगे। इस कान से सुनकर उस कान निकाल देंगे।
इस कठिनाई को मैंने परम पूज्य आचार्य जी के सामने कई बार रखा, वे गंभीरतापूर्वक इस तथ्य को स्वीकार करते हैं, पर स्त्री जाति को सच्ची शिक्षा देने की आवश्यकता को पूरा करने में अपनी विवशता बताते हैं। कहते हैं- स्त्रियों में कार्य करने का उत्तरदायित्व इतना पवित्र एवं गुरुतर है कि उसको पुरुष नहीं, देवियाँ ही अपने कन्धे पर उठा सकती हैं। पुरुषों के इस क्षेत्र में प्रवेश करने से लाभ की अपेक्षा हानि की अधिक संभावना है। आचार्य जी पुरुष हैं वे मूलतः पुरुषों की दृष्टि से पुरुषों में जागृति करके उनके द्वारा अपने-अपने घरों में नारियों के उत्थान की बात सोचते हैं। मेरा विचार है कि यह मार्ग बहुत लम्बा है। यदि हमें वस्तुतः भारत भूमि को सुसंस्कृत देव भूमि बनाना है, तो नारी जाति को सुसंस्कृत बनाने के लिए पुरुषों से भी पहले स्थान देने की आवश्यकता है। बहुत दिनों के विचार विनिमय के बाद अब देव तुल्य आचार्य जी की अनुमति एवं आशीर्वाद लेकर इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए कुछ कार्य करने के लिए मैंने कदम उठाया है। अपनी अयोग्यता को देखते हुए निःसंदेह यह मेरा एक दुस्साहस ही है, पर उद्देश्य की पवित्रता कार्य की महानता तथा सत्कार्यों में प्राप्त होने वाले माता के अनुग्रह, का विश्वास एक उत्साह प्रदान करता है, इसी बल बूते पर यह कदम उठा रही हूँ।
यों स्त्री शिक्षा के लिए आज अनेक स्कूल मौजूद हैं, पर उनमें लड़कों की भाँति लड़कियों को भी वही शिक्षा दी जाती है जो नौकरी मिलने के अतिरिक्त जीवन की और कोई समस्या हल नहीं करती। लड़के इस शिक्षा को पाकर बेकारी के निराशाजनक गर्त में गिरते और लड़कियाँ फैशन परस्ती, शान शौकत, श्रम करने को हठी समझना, उच्छृंखलता, आदि बुराइयाँ सीखकर पारिवारिक जीवन में बहुधा असफल रहती देखी गयी हैं। जिस प्रकार पुरुषों के लिए जीवन की समस्याओं को हल करने वाली शिक्षा की जरूरत है उसी प्रकार नारी को भी वह शिक्षा चाहिए जिसे प्राप्त कर वह अपना, अपने परिवार का, बच्चों का जीवन प्रसन्नता, सद्भावना, सम्पन्नता, निरोगता एवं सुख शान्ति से परिपूर्ण बना सके। नौकरी क्लर्की के लिए ही जो बातें उपयुक्त हो सकतीं है उन्हें पढ़कर व्यर्थ समय बर्बाद करने और मस्तिष्क पर अनावश्यक वजन डालने के स्थान पर वे चुने हुए विषय पढ़ाये जायें जो नारी जीवन में नित्य प्रति उपस्थित होते रहने वाली समस्याओं का हल खोजने में सहायक हो सकें। ऐसी साँस्कृतिक सुशिक्षा से संपन्न नारियाँ ही अपने पतियों की सच्ची सहधर्मिणी- सास ससुर की आज्ञाकारिणी, कुल वधू- ननद, देवरानी, जिठानियों के लिए- देवर, जेठों के लिए- गृह लक्ष्मी, और संतान के लिए- सच्ची माताएं सिद्ध हो सकती हैं। पति कुल और पिता कुल दोनों के लिए वे उज्ज्वल तारिकाएं ही राष्ट्रनिर्माण की आधार शिलाएं होंगी, इन्हीं के द्वारा यदि देश को आगे बढ़ना होगा तो बढ़ेगा। सच्चरित्रता, महानता, नैतिकता, वीरता, पुरुषार्थ की लहर जब भी उत्पन्न होनी होगी, नारी जाति के अन्तःकरण से ही उसका स्त्रोत फूटेगा।
वह सच्ची स्त्री शिक्षा जिसके द्वारा नारी की अन्तरात्मा जागृत हो -उसके गुण, कर्म स्वभाव में नारी के महान आदर्श झिलमिला उठें, आज कहीं दिखाई नहीं पड़ती। उसका आरम्भ किया जाना चाहिए। यह शुभ कार्य गायत्री परिवार से ही क्यों न आरंभ हो? यह सोच कर एक ऐसा विद्यालय चलाने की बात सोची गई है जिसमें-
1- कन्याओं के लिए नारी जीवन की विभिन्न समस्याओं को हल करने वाला- सरकारी पाठ्यक्रमों से सर्वथा भिन्न- ऐसा शिक्षण क्रम रहे, जिसे उत्तीर्ण करके जाने वाली कन्याएं अपने गृहस्थ जीवन में आनन्द, उल्लास, संतोष, व्यवस्था, प्रेम, सहयोग, किफायत, सादगी, धार्मिकता की सरिता बहाती हुई एक सफल गृहणी के रूप में प्रवेश करें। घरेलू अर्थशास्त्र, गृह-व्यवस्था, परस्पर सद्-व्यवहार, स्वास्थ्य-रक्षा, चिकित्सा, वस्त्रों की सिलाई, धुलाई, रंगाई, घर को सर्वांगीण सुन्दर बनाना, सादगी का सौंदर्य, ऐतिहासिक कथा, कहानियाँ कहना, गृहस्थ कर्त्तव्य, संतान का निर्माण आदि विषयों का समावेश हो।
2- वयस्क स्त्रियों के लिए समय-समय पर थोड़े-थोड़े समय की शिक्षा के लिए उपरोक्त विषयों पर शिक्षण शिविर होते रहें, जिनमें नियमित पाठ्यक्रम से तो नहीं, पर परस्पर विचार-विनिमय के रूप में वे सभी बातें समझाई जायं, जिन्हें एक आदर्श नारी के लिए जानना जरूरी है। इन शिविरों में आई हुई शिक्षार्थियों के जीवन में वर्तमान काल में उपस्थिति विभिन्न समस्याओं को हल करने के लिए उन्हें अलग-अलग शिक्षण दिया जाय। उनकी अस्वस्थता आदि में चिकित्सा द्वारा प्रत्यक्ष सहायता भी करने की व्यवस्था जैसी आवश्यक बातें भी सम्मिलित रहें।
इन दोनों वर्गों की शिक्षा का नियमित विस्तृत और व्यवस्थित कार्यक्रम पीछे बनेगा, अभी तो उस की रूपरेखा तैयार की गई है। इस शिक्षण क्रम को पहले गायत्री परिवार के सदस्यों की नारियों-कन्याओं के लिए प्रारंभ किया जायेगा। पर एक मोटी बात यह है कि जिस प्रकार कोई माता अपनी छाती के समीप रखकर उन्हें आवश्यक शिक्षण केवल वाणी से ही नहीं व्यवहार और क्रिया द्वारा भी देती है वैसी ही पद्धति यहाँ भी अपनाई जायगी।
मैं नारी उत्थान के कार्य को करने के लिए अपने जीवन के शेष क्षणों को लगा देना चाहती हूँ। परम पूज्य आचार्य जी के मिशन के एक महत्वपूर्ण अंग की पूर्ति करने के लिए इन दिनों मेरी अन्तरात्मा में एक असाधारण उत्साह का काम कर रहा है। इधर कई दिनों से जागृत और स्वप्न में मुझे आगामी कार्यक्रम के यही दृश्य दीखते रहते हैं कि परिवार की सहस्रों नारियाँ समय-समय पर अपनी कठिनाइयों और कमियों को दूर करने के लिए यहाँ उसी प्रकार आया करेंगी जैसे लड़कियाँ ससुराल में कुछ दिनों के लिए अपने पिता-माता के घर-मोह मनाती हुई आती हैं। यहाँ से वापिस जाने पर वे यहाँ से कुछ विशेष महत्वपूर्ण वस्तु उसी प्रकार ले कर जाया करेंगी जैसे कन्याएं अपनी माता से विदा होते समय कुछ विदाई भी लेकर जाती हैं।
कोई बड़ा कालेज खोलने का अभी मेरा विचार नहीं है, कोई विशाल भवन भी बनाने की योजना नहीं है। अखण्ड-ज्योति प्रेस वाले घीया मंडी के घर में इतनी गुंजाइश है कि यहाँ 20-25 महिलाएं रह सकें और शिक्षण प्राप्त करने के लिए जो रहती और आती जाती रहें।
इस कार्य के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है वह है -अध्यापिकाओं की। यों नौकरी के लिए हजारों नर-नारी मारे-मारे फिरते हैं। एक आवश्यकता छपाते ही सैकड़ों हजारों अर्जियाँ अध्यापिका की नौकरी प्राप्त करने की अभिलाषिनियों की आ जावेंगी, पर उनसे वह कार्य किसी भी प्रकार पूरा न हो सकेगा, जो करने का इस योजना का उद्देश्य है। दूसरों की आत्मा पर प्रभाव डालने के लिए उन्हें ऊँचा उठाने के लिए एक विशेष आत्मबल सम्पन्न आत्माएं चाहिए। इन्हीं की मुझे तलाश है। जिनके पीछे पारिवारिक उत्तरदायित्व न हों, परिवार के किन्हीं आश्रितों को कमा कर खिलाना न हो, स्वयं भी शौक-मौज के साथ मनमाना खर्च करने की इच्छा न हो, कुछ घण्टे नौकरी की बेगार टालने की मनोवृत्ति न होकर अपना आपा इस महान सेवायज्ञ में खपा देने की इच्छा हो, भावी जीवन में ब्रह्मचर्य व्रत लेकर रहना हो, वे ही अध्यापिकाएं मेरे कन्धे से कन्धा मिला कर काम कर सकेंगी। ऐसी आत्माएं सहयोगिनियाँ कहाँ से मिलें- आज मुझे इसी की सबसे बड़ी चिंता है।
यों समय-समय पर, आदर्श पर अड़ जाने वाली एवं विशेष परिस्थितियों के सामने आ जाने पर भारी कष्ट सहने वाली नारियों के अवाक् कर देने वाले वृत्तांत बहुधा सामने आते रहते हैं। कुछ ही दिन पूर्व स्नेहलता नामक लड़की ने दहेज के अभाव में दुखी पिता-माता को घोर चिंताओं से छुटाने और दहेज में सब कुछ चला जाने पर छोटे-भाई बहिनों के निर्वाह तथा शिक्षण में आने वाली अड़चन को दूर करने के लिए, अपने शरीर में आग लगाकर रोमाँचकारी आत्महत्या की थीं। ऐसी कई वीरव्रती लड़कियों के वृत्तांत भी मुझे मालूम हैं जिन्होंने दहेज के राक्षस से अपने परिवार को चबाये जाने से बचाने के लिए आजीवन अविवाहित रहने का व्रत लिया और अपना निश्चय बदलने के लिए सब के समझाने पर भी टस से मस न हुई। संतान न होने, काली कलूटी, अस्वस्थता या ऐसे ही किसी अपराध में पतियों द्वारा परित्यक्ताएं तथा विधवाएं भी अनेक प्रकार के उत्पीड़न त्रास और अपमान सहती हुई एक निस्पृह संत जैसा तपस्वी जीवन व्यतीत कर देती हैं।
इस प्रकार की आत्माएं यदि नारी जाति की साँस्कृतिक सेवा के इस महान मिशन के लिए अपना जीवन लगाने को तत्पर हो जावें तो निस्संदेह वे अपने मानव जीवन को सब प्रकार धन्य बना सकती हैं। विवाहित जीवन में एक आकर्षण है- सही, पर परमार्थ के लिए आत्म-त्याग करने में और सेवा व्रत धारण करने में भी जो अलौकिक आनन्द है उसे भी मामूली नहीं समझना चाहिए। कई बार कई महिलाएं इस प्रकार का सेवा व्रत लेना चाहती हैं तो उनके घर वाले इसमें अपनी हेठी बदनामी जैसी बात सोचते हैं। यह अपडर मानसिक दुर्बलता मात्र है। मीरा के द्वारा जो धर्म सेवा हुई उसमें भले ही उसके पिताकुल या पतिकुल के लोगों को अपनी हेठी लगी हो पर सच्चाई यह है इससे दोनों कुलों को श्रेय ही मिला। शुभकार्य के लिए, सदुद्देश्य के लिए उठाया हुआ कोई कदम कभी भी बदनामी का कारण हो नहीं सकता।
उपरोक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिये अभी ऐसी महिलाओं की जरूरत है जो काम चलाऊ शिक्षा प्राप्त हों, परिश्रमी हों, भविष्य में ब्रह्मचर्य से रहें तथा नारी जाति की साँस्कृतिक सेवा का व्रत धारण करें। उन्हें निर्धारित अध्यापन की योग्यता प्राप्त करने के लिये विशेष रूप से शिक्षित करने का यहाँ प्रबंध किया जायेगा। जब कई महिलाएं शिक्षा देने के योग्य हो जाएंगी तभी विद्यालय आरम्भ कर दिया जायगा। इस कार्य के लिए वे ही महिलाएं ली जायेंगी जिनके ऊपर बच्चों की जिम्मेदारी न हो। उनके भोजन, वस्त्र, निवास, पुस्तक, शिक्षण आदि की सभी आवश्यक व्यवस्था की जायेगी, पर नौकरी जैसी कोई वस्तु देकर उनके त्याग और तप का मूल्य घटाया न जायेगा।
जिन गृहों में ऐसी सेवाव्रती, शीलवान शिक्षित देवियाँ हैं, जिनके परमार्थ में लगने पर भी गृह-व्यवस्था बिगड़ती नहीं, उन गृहस्वामियों से प्रार्थना है कि इच्छुक देवियों को इस पुनीत कार्य से वंचित न करें। मैं यह विश्वास दिलाती हूँ कि उनके शील का, सुरक्षा का, मान मर्यादा का, सुख-सुविधा का, उन्नति का, वैसा ही ध्यान रखूँगी जैसा कोई माता अपनी बच्चियों का रख सकती है।
विचारशील परिजनों से प्रार्थना है कि नारी जाति की साँस्कृतिक सेवा के इस महान मिशन को सफल बनाने के लिए सक्रिय सहयोग करें। शिक्षा क्षेत्र में जानकारी रखने वाले सज्जन- (अ) कन्याओं की पाँच वर्ष की, (ब) वयस्क स्त्रियों की तीन मास की, (स) सेवा व्रती अध्यापिकाओं की शिक्षा एवं विद्यालय की व्यवस्था सम्बन्धी अपने सुझाव भेजें। अपने घरों की नारियों तथा कन्याओं को शिक्षा के लिए मथुरा भेजने की सम्भावना पर विचार करें। अध्यापन कार्य के लिए सेवाव्रत ले सकने वाली महिलाएं खोजने, उन्हें प्रोत्साहित करने तथा उनके घर वालों को स्वीकृति देने के लिए तैयार करें। केन्द्रीय विद्यालय चल पड़ने पर देश भर में उसकी शाखाएं फैल सकती हैं और उनके द्वारा युग परिवर्तनकारी कार्य हो सकता है। इस पुनीत कार्य में सहयोग देने के लिए परिवार की सभी स्वजनों को मैं पुनःपुनः सादर आमंत्रित करती हूँ।
(श्री चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य)
यह एक गम्भीर बात है कि आजकल हम ईश्वर को भूलते जा रहे हैं। यही विचार कार्यालय ने उस समय व्यक्त किये थे जब विज्ञान की आशातीत उन्नति और नये-नये उपनिवेशी साम्राज्य के फैलाव ने पश्चिम के साम्राज्यवादी देशों को मदाँध कर दिया था। पश्चिम राष्ट्र उस समय ईश्वर को भूलते जा रहे थे और भौतिकवाद के अनन्य भक्त बन गये। उपनिवेशी साम्राज्य अब लगभग समाप्त ही हो गया है और विज्ञान भी अपनी उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँच चुका है और इससे पश्चिमी राष्ट्रों की आँखें खुल गई हैं और ईश्वर के प्रति भक्ति की एक नई लहर पुनः पैदा हो गई है। कार्यालय का उक्त कथन आज भारत पर लागू हो रहा है। ईश्वर की शक्ति को भुलाकर मानव के उत्कर्ष के लिए उठाया गया कोई कदम सफल नहीं हो सकता।
किसी भी राष्ट्र की उन्नति चरित्र पर भी उतनी ही निर्भर करती है जितनी कि दिमाग और शारीरिक शक्ति पर। पर मैं चाहता हूँ कि विचारशील व्यक्ति इस तथ्य पर मनन करें, इसकी सत्यता स्वयं ही स्पष्ट हो जायगी। मेरे विचार में तो राष्ट्रोन्नति में दिमाग और शारीरिक शक्ति की अपेक्षा चरित्र का स्थान कहीं ज्यादा ऊँचा है। शारीरिक शक्ति एवं दिमाग शासन चलाने एवं बाहरी आक्रमणों से देश की रक्षा के लिए निस्संदेह ही आवश्यक है, लेकिन चरित्र तो पहली चीज है, जो व्यक्तियों के प्रतिदिन एक दूसरे से व्यवहार करने में प्रयोग आता है और जिसके बिना किसी भी प्रकार की उन्नति एवं उत्थान संभव ही नहीं है। चरित्र तो भूमि है जिस पर दूसरी चीजें पैदा होती हैं और यदि चरित्र ही दोषपूर्ण है तो किसी उन्नति की आशा करना ही व्यर्थ है। व्यक्तियों को ईमानदार, वचन का पक्का, एक दूसरे के प्रति उदार हृदय होना चाहिए। उन्हें अपने कर्त्तव्यों के प्रति सदैव जागरुक रहना चाहिए और व्यक्तिगत स्वार्थों की अपेक्षा सामाजिक की ओर अधिक ध्यान देना चाहिए। इन आदर्शों के बिना सामाजिक प्रगति कतई संभव नहीं है। सिर्फ शिक्षा प्राप्त कर लेने से ही चरित्र निर्माण नहीं हो जाता। आजकल के वातावरण को देखते हुए भारत का भविष्य अन्धकारमय ही दिखाई देता है। शिक्षा के क्षेत्र से निकलते ही आजकल के नवयुवक धन कमाने के पीछे बुरी तरह पड़ जाते हैं। यहाँ तक कि अपने आदर्शों को भी भुला देते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी के नेतृत्व में अहिंसात्मक तरीके से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद भारत की प्राचीन संस्कृति व अपनी परम्पराओं को भुलाते हुए ये जीवन के प्रति इतना गलत दृष्टिकोण भी अपना सकते हैं। इस तथ्य से कोई भी विचारशील व्यक्ति इंकार नहीं कर सकता कि आजकल शिक्षित नवयुवकों में कर्त्तव्य के प्रति जागरुकता की भावना की अत्यन्त ही कमी है और उनमें कर्त्तव्य के प्रति लगन पैदा करने की आज परम आवश्यकता है। भौतिकवाद की ओर उनके झुकाव को आध्यात्मवाद की और मोड़ना अत्यन्त ही आवश्यक है। और इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए शिक्षा सम्बन्धी नीति में परिवर्तन और सुधार निताँत आवश्यक है।
यदि हम सभ्य देशों के प्राचीन इतिहास को देखें तो हमें ज्ञात हो जायगा कि उनकी उन्नति एवं विकास में धर्म के माध्यम से ही चरित्र निर्माण संभव है, जिस पर राष्ट्रोन्नति निर्भर करती है।
सभी विचारशील व्यक्ति इस तथ्य की सत्यता को महसूस करते हैं लेकिन यह अत्यन्त ही खेद का विषय है कि इस दिशा में कोई सक्रिय कदम नहीं उठाये जा रहे हैं। नवयुवकों में धार्मिक एवं सामाजिक प्रवृत्तियों को पनपाने के लिए हमारे द्वारा कोई प्रयत्न नहीं किया जा रहा है और जब इनके अभाव में अनुशासन हीनता की भावना नवयुवकों के अपरिपक्व दिमाग में विकसित होने लगती है तो हम सारा दोष नवयुवकों पर ही मढ़ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं। क्या इसमें हमारी कोई भी जिम्मेदारी नहीं है? हमारे ही नहीं वरन् सारे सभ्य राष्ट्रों के प्राचीन पुरुष हमेशा यह समझते थे कि इस सृष्टि का संचालन सर्वसाधन सम्पन्न एवं अमर शक्ति ‘चाहे उसे परमात्मा कहिये या और कुछ’ द्वारा किया जाता है और उस अमर शक्ति के मनन से ही उनमें इतनी क्षमता आ जाती थी वे दूसरों का मार्ग दर्शन कर सकें। लेकिन आजकल वातावरण बिल्कुल ही बदल गया है और उसके लिये हम ही दोषी हैं। यह वातावरण, जिसमें धर्म के लिये कोई स्थान नहीं है, चरित्र निर्माण में अत्यन्त ही बाधक है।
ब्रिटेन में, जो वैज्ञानिक खोज की प्रगति में किसी अन्य राष्ट्र से पीछे नहीं, अथवा जो धर्मान्धता के विरुद्ध संघर्ष में किसी से पीछे नहीं, वहाँ पर भी स्कूलों में चाहे उन्हें सरकारी सहायता मिलती हो या नहीं, बालकों को धार्मिक शिक्षा दी जाती है। जब तक कि बालक के पिता की ओर से कोई आपत्ति न की जाय तब तक स्कूलों में आयोजित नित्य की धार्मिक पूजा व प्रवचन में बालकों को भाग लेना पड़ता है। निजी स्कूलों में भी धार्मिक शिक्षा की सुविधाएं हैं, लेकिन देहात के स्कूलों में तो ईसाई धर्म की विधिवत शिक्षा दी जाती है। इंग्लैण्ड व वेल्स में एक तिहाई स्कूल प्राइवेट हैं। स्कूलों के गिर्जों में भाग लेना व धार्मिक शिक्षा ग्रहण करना स्कूली जीवन का एक आवश्यक अंग है। मैंने स्कूलों का यह सब विवरण सरकारी प्रकाशन के आधार पर ही दिया है।
भारत में हम धर्म के नाम से एक प्रकार से डरते से हैं। हमने निष्पक्षता का उच्च आदर्श बनाया तो है लेकिन हम उस पर जब अमल करने को बैठते हैं तो उसका नकारात्मक स्वरूप सामने रख लेते हैं। यह रवैया शायद हमारे पुराने हिन्दू मुस्लिम विवाह के संघर्ष तथा समानता में हमारी अटूट निष्ठ का परिणाम है। लेकिन यह समय है कि हम इस व्यर्थ के भय को दूर कर दें और विश्वास की सक्रिय नीति को अपनायें।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने हमें बताया था कि सारे धर्म हमारी श्रद्धा के पात्र हैं और उनके आदर्श एक से ही हैं। प्रत्येक धर्म के विकसित होने से विभिन्न सम्प्रदायों के समर्थकों के बीच एक दूसरे को समझने की भावना जागृत होगी। शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य नवयुवकों में कर्त्तव्य के प्रति जागरुकता की भावना पैदा करना है और विभिन्न धर्मों के विकास से इस उद्देश्य की प्राप्ति में काफी सहायता मिलेगी।
राष्ट्र के विकास कार्यों की सफलता हमारे चरित्र पर निर्भर करती है। विकास कार्यों के प्रति हमें अपने कर्त्तव्य को पूर्णतया निभाना है, व्यक्तिगत स्वार्थों के बजाय राष्ट्र के हित को दृष्टि में रखना है और कार्य को पूरी जिम्मेदारी से निभाना है। स्कूलों में धार्मिक शिक्षा को बन्द करके क्या ये अच्छाइयाँ नवयुवकों में पैदा की जा सकती हैं? धर्म के बिना चरित्र निर्माण संभव नहीं है। धर्म से आत्मा को प्रेरणा मिलती है। यदि बुद्ध को यह मान लिया जाय कि वे एक साधारण व्यक्ति थे तो बौद्ध धर्म में कुछ नहीं रह जायगा। पैगम्बर, गौतमबुद्ध, जीसस क्राइस्ट आदि महान आत्मा थे और उन्हें ईश्वर से प्रेरणा प्राप्त थी। यदि धार्मिक उपदेशों को ईश्वरीय प्रेरणा से अलग समझा जाय तो उनमें कुछ तथ्य नहीं रह जाता है। इसी प्रेरणा से चरित्र निर्माण हो सकता है।
यदि हम यह नहीं चाहते कि हमारा राष्ट्रीय चरित्र तेजी से गिरता चला जाय, तो यह नितान्त आवश्यक है कि धार्मिक मान्यताओं के वातावरण में नवयुवकों को शिक्षा दी जाय। जिससे उनका आध्यात्मवाद की ओर ज्यादा झुकाव हो और वे सारे गुण एवं विशेषताएं पूर्ण हो सकें, जो राष्ट्र के निर्माण के लिए जरूरी हैं।
विज्ञान जो कुछ समय पहले धर्म का प्रतिद्वन्द्वी प्रतीत होता था, अब धर्म का सबसे बड़ा सहायक सिद्ध हो रहा है। उच्चस्तरीय विज्ञान उतना ही आध्यात्मिक है, जितने कि हमारे उपनिषद् आदि। अतः विज्ञान की प्रगति भी धार्मिक वृत्तियों के विकास में योग ही देगी।
ईश्वर को भुलाकर मानव का विकास संभव नहीं है। अतएव धार्मिक मान्यताओं की शिक्षा को स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा का एक अभिन्न अंग बना दिया जाना चाहिए और तभी हमारे शिक्षित नवयुवक एवं नवयुवतियों का चरित्र इतना सुदृढ़ हो सकेगा कि एक सुखद एवं समृद्ध राष्ट्र का निर्माण किया जा सके।
(श्री सीताराम जी एडवोकेट, आगरा)
यद्यपि बुद्धि शब्द बहुत साधारण सा शब्द है और प्रायः हमारी दैनिक बोलचाल में प्रयोग होता है परन्तु बहुत कम व्यक्ति ऐसे हैं, जो इसके वास्तविक महत्व को समझते हों और उसके विकास का प्रयत्न करते हों। बुद्धि मानव मात्र की निधि है। परमेश्वर की ओर से मानव को मिली एक अद्भुत और अनोखी देन है। बुद्धि मानव जीवन का गौरव है तथा उसके कल्याण और सफलता की कुँजी है। संसार के किसी भी व्यापार, व्यवसाय या विज्ञान की और देखिये सर्वत्र मानव शरीर का नहीं, मानव बुद्धि का ही चमत्कार व मूल्य है।
प्रायः कहा जाता है कि बुद्धि तो पशु, पक्षी आदि शरीरों में भी होती है, फिर इसे मानव ही की विशेषता क्यों मानी जावे। यह सत्य है कि अन्य योनियों में भी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयास करने की शक्ति है, परन्तु उस शक्ति को बुद्धि का नाम देना उचित न होगा, और यदि उसे बुद्धि मान भी लें तो वह केवल भोग बुद्धि है। मानव के पास जो बुद्धि है वह है निश्चय करने की शक्ति, जिसे दूसरे शब्दों में विवेक कहते हैं। इसीलिए तो कहते हैं कि ‘विवेक युक्त जीवन ही मानव जीवन है और विवेक हीन जीवन पशु जीवन है।’
गीता की विशेषता यह है कि वह कोरे सिद्धान्तों का ही प्रतिपादन नहीं करती बल्कि सिद्धाँत के साथ साधन भी बताती है। साधन रहित व्यक्ति को तो गीता अयुक्त अर्थात् बिना युक्ति वाला कहती है। अतः स्थित प्रज्ञ के लक्षण बतलाते हुए भगवान ने अर्जुन को निमित्त बना कर मानव कल्याण के लिए एक बड़ा सुन्दर साधन बुद्धि को स्थिर करने का भी बतला दिया और वह यह कि जब कोई व्यक्ति सब ओर से अपनी इन्द्रियों को उनके विषयों से समेट लेता है। दूसरे शब्दों में, मन सहित इन्द्रियों को अपने वश में करके उनके विषयों को जब भोगता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है। इसी को इन्द्रिय संयम कहते हैं।
बुद्धि योग प्राप्त करने का यह इन्द्रिय संयम रूपी साधन गीता ज्ञान सागर में छिपा हुआ नहीं बल्कि ऊपर तैरता हुआ अनमोल रत्न है। परन्तु प्रश्न यह उठता है कि इसे पकड़ा कैसे जाय अर्थात् गृहस्थ जीवन में इसे कैसे काम में लाया जावे। आधुनिक युग में महात्मा गाँधी ने इसे बड़ी कुशलता से पकड़ा था और उसे पकड़ने की युक्ति भी बतलाई थी। विनोबा जी और उनके बहुत से अनुयायी इस समय भी इसको पकड़े हुए हैं। यह पकड़ है “अस्वाद व्रत”। संसार के महापुरुषों के जीवनों का यदि आप बारीकी से अध्ययन करेंगे तो आप पायेंगे कि उनकी महानता का रहस्य उनके इसी अस्वाद व्रत में छिपा हुआ था। इन्द्रिय संयम की यह सबसे प्रथम, सबसे सरल और सबसे सफल सीढ़ी है। रसना इन्द्रि पर विजय प्राप्त कर लेने पर शेष सब इन्द्रियाँ स्वतः ही पराजित हो जाती हैं।
अस्वाद का अर्थ है स्वाद का गुलाम न होना। अस्वाद का यह अर्थ नहीं कि हम संसार के भोग्य पदार्थों का सेवन न करें, या षट रसों का पान न करें या जिह्वा की रस ज्ञान की शक्ति को खो दें। अस्वाद व्रत ऐसा नहीं कहता। वह तो कहता है कि शरीर के पोषण, स्वास्थ्य तथा रक्षा के लिए जिन-जिन पदार्थों की आवश्यकता हो उनका पान करो परन्तु केवल जीभ के चोंचले पूरा करने के लिए किसी वस्तु का पान न करो, दूसरे स्पष्ट शब्दों में जिह्वा के गुलाम न बनो। उसके ऊपर सदैव अपना स्वामित्व कायम रखो। ऐसे रहो कि वह तुम्हारे आदेश पर चले। ऐसा न हो कि तुम ही उसके संकेत पर नाचने लगो। विनोबा जी के सुन्दर शब्दों में जीभ की स्थिति चम्मच जैसी हो जानी चाहिए। “चम्मच से चाहे हलुआ परोसों, चाहे दाल-भात, उसे उसका कोई सुख-दुख नहीं।”
हनुमान जी के भक्तों ने बहुत बार कथा सुनी होगी कि एक दफा विभीषण भगवान राम के पास आये और कहने लगे कि “प्रभु” लौकिक तथा पारलौकिक सफलता का साधन क्या है? भगवान ने कहा कि यह तो बड़ा सरल प्रश्न है, इसको तो हमको हनुमान जी से ही पूछ लेना चाहिए था और यह कहकर उन्हें हनुमान जी के पास भेज दिया। विभीषण ने जब हनुमान जी के पास जाकर इसी प्रश्न को पूछा तो उन्होंने कोई उत्तर तो नहीं दिया पर अपने हाथ से अपनी जीभ को पकड़ कर बैठ गये। विभीषण के कई बार कहने पर भी जब हनुमान कुछ न बोले तो विभीषण नाराज होकर भगवान के पास फिर वापिस गये और बोले कि ‘भगवन् आपने मुझे कहाँ भेज दिया।’ भगवान ने कहा कि क्या हनुमान जी ने तुम्हारे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया। विभीषण बोले कि प्रभु वह क्या उत्तर देंगे। मैंने उनसे कई बार पूछा पर उन्होंने कोई उत्तर तो दिया नहीं बल्कि अपने हाथ से अपनी जीभ पकड़ कर बैठ गये। भगवान बोले विभीषण, हनुमान जी ने सब कुछ तो बतला दिया और क्या कहते? तुम्हारे प्रश्न का केवल यही उत्तर है कि अपनी जीभ को अपने वश में रखो। यही लौकिक और पारलौकिक सफलता का सबसे सुन्दर साधन है।
श्री महादेव गोविन्द रानाडे के जीवन की एक घटना इस अस्वाद व्रत के सही रूप को समझने में हमें बड़ी मदद देगी। कहते हैं कि एक दिन उनके किसी मित्र ने उनके यहाँ कुछ बहुत सुन्दर आम भेंट में भेजे। उनकी चतुर पत्नी ने उनमें से एक आम को धोकर, ठण्डा करके, बनाकर एक तश्तरी में उनके सामने रखा। रानाडे ने उसमें से एक दो टुकड़े खा कर आम की प्रशंसा करते हुए वह तश्तरी अपनी पत्नी को वापिस कर दी और कहा कि यह आम अब तुम खाना और बच्चों को देना। पत्नी ने उत्तर दिया कि उसके और बच्चों के लिए तो और आम है तो रानाडे बोले कि फिर नौकरों को दे देना। पत्नी बोली कि नौकरों के लिए भी और आम हैं, आप सब खा लीजिए। जब इस पर भी रानाडे आम खाने को तैयार न हुए तो पत्नी ने कहा कि क्या आम अच्छे नहीं हैं? रानाडे बोले कि मैंने अपने जीवन में इससे पहले इतने स्वादिष्ट आम कभी खाये नहीं तो पत्नी ने पूछा “आपका स्वास्थ्य तो ठीक है?” रानाडे बोला मेरा स्वास्थ्य आज इतना सुन्दर है कि कभी रहा नहीं। तब पत्नी ने कहा कि आप भी अजब बात कर रहे हैं आम को भी बड़ा स्वादिष्ट बताते हैं स्वास्थ्य को भी सुन्दर बताते हैं फिर भी कहते हैं कि अब और न खाऊँगा। रानाडे हँसे और बोले कि आम बहुत सुन्दर तथा स्वादिष्ट हैं इसीलिए अब और न खाऊँगा। ऐसा मैं क्यों कर रहा हूँ उसका कारण सुनो। बात यह है कि बचपन में जब मैं बम्बई में पढ़ता था, तब मेरे पड़ोस में एक महिला रहती थी। वह पहले एक धनी घराने की सदस्या रह चुकी थी परन्तु भाग्य के फेर से अब उसके पास वह धन नहीं था पर इतनी आय थी कि वह और उसका लड़का दोनों भली प्रकार भोजन कर सकें और अपना निर्वाह कर सकें। वह महिला बड़ी दुःखी रहती और प्रायः रोया करती थी। एक दिन मैंने जाकर जब उससे उसके दुख का कारण पूछा तो उसने अपना पहला वैभव बतलाते हुए कहा कि मेरे दुख का कारण मेरी जीभ का चटोरापन है, बहुत समझाती हूँ फिर भी दुखी रहती हूँ। जिस जमाने में मैं स्वादिष्ट पदार्थ खाती थी प्रायः रोगी रहा करती थी। औषधियों की दासी बनी हुई थी। अब जब से वह पदार्थ नहीं मिलते बिल्कुल स्वस्थ रहती हूँ, किसी औषधि की शरण नहीं लेनी पड़ती। इसे बहुत समझाती हूँ अब नाना प्रकार के साग, अचार, मुरब्बे, सोंठ, चटनी, रायते, मिठाइयों और पकवानों के दिन गये। अब उनका स्मरण करने से कोई फायदा नहीं फिर भी जीभ मानती नहीं है और मेरा बेटा रूखी-सूखी खाकर पेट भर लेता है और आनन्दित रहता है क्योंकि उसने वह दिन देखे नहीं। वह जिह्वा का गुलाम नहीं हुआ है परन्तु मेरा दो दिन साग बनाये बिना पेट नहीं भरता। रानाडे ने कहा कि जबसे मैंने उस महिला की बात सुनी और उसकी वह दशा देखी तभी से मैंने यह नियम बना लिया कि जीभ जिस पदार्थ को पसन्द करे उसे बहुत थोड़ा खाना। जीभ के वश में न होना। क्योंकि यह आम जीभ को बहुत अच्छा लगा इसीलिए मैं अब और नहीं खाऊँगा।
किसी वस्तु के खाने से पहले अपने आप से प्रश्न कीजिए कि उस समय उस वस्तु का खाना आपके लिए आवश्यक है या नहीं, अथवा उस वस्तु के खाये बिना आप रह सकते हैं या नहीं, यदि उत्तर मिले कि नहीं रह सकते तो उस वस्तु को अवश्य खाइए अन्यथा नहीं।
इस साधन को अपनाने में आपको शारीरिक आर्थिक या सामयिक किसी प्रकार की भी हानि नहीं होगी। इसके विपरीत इन तीनों दिशाओं में भी आपको लाभ ही लाभ होगा। “भोग और स्वाद का आनन्द तो पशु भी लेते हैं” और आपको भी इनका आनन्द लेते न जाने कितना समय बीत गया अब त्याग और अस्वाद का आनन्द भी देख लीजिए।
यदि किसी समय आपको इस कल्याण मार्ग को अपनाने की प्रेरणा मिले तो आप सबसे प्रथम भोजन में से खोआ, मैदा और बेसन से बनी हुई चीजों का त्याग कर दीजिए। यदि आपकी परमार्थिक या धार्मिक जीवन की ओर रुचि न भी हो तब भी इस साधन को अपनाने में आपके स्वास्थ्य को बड़ा लाभ पहुँचेगा। पढ़े-लिखे व्यक्तियों में आजकल जितने रोग हैं उन सबके पीछे उपरोक्त वस्तुओं की भोजन में प्रबलता होना ही मुख्य कारण है।
अस्वाद व्रत द्वारा इन्द्रिय संयम रूपी साधन पर चलने का यदि आपने प्रयास किया और निरन्तर अभ्यास करते रहे तो आप अवश्य बुद्धि योग के द्वारा ज्ञान, भक्ति या कर्म किसी से भी योग करके सच्चा सुख और शाँति प्राप्त करते हुए अपने वास्तविक सत्यं, शिवं, सुन्दरम् स्वरूप को प्राप्त हो जायेंगे।
(श्री स्वामी शरणानन्द जी)
शारीरिक हित की दृष्टि से आहार-विहार में संयम तथा दैनिक कार्यों में स्वावलम्बन। मानव शरीर बड़े ही महत्व की वस्तु है, क्योंकि इस तन से ही प्राणी साधना में प्रवृत्त होकर अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कर कृत-कृत्य हो सकता है। अतः ऐसे अनुपम शरीर के हित के लिए आहार-विहार में संयम करना अनिवार्य है। किन्तु, असावधानी के कारण प्राणी हित की दृष्टि को त्याग कर सुख की दृष्टि अपनाता है, अर्थात् आहार-विहार में विलासी तथा असंयमी हो जाता है। इसका परिणाम बड़ा ही भयंकर तथा दुःखद सिद्ध होता है; क्योंकि अहितकर चेष्टाओं में प्रवृत्त होना जीवन का अनादर है, प्रकृति का विरोध है और पौरुषेय विधान का उल्लंघन है। इतना ही नहीं, प्राणी सुख-दुःख के पाश में आबद्ध होकर अपने को दीन-हीन बना लेता है और साधन-युक्त जीवन से वंचित हो जाता है, जो वास्तव में पशुता है। आहार का सम्बन्ध प्राण अर्थात् जीवन-शक्ति से है और विहार का सम्बन्ध मन इन्द्रिय आदि से है। प्राण-शक्ति का क्षय अथवा अभाव होने पर मन इन्द्रियादि सभी अपने कर्त्तव्य से च्युत हो जाते हैं, जिससे प्राणी अपने अभीष्ट को प्राप्त नहीं कर पाता। इस दृष्टि से जीवन-शक्ति का सुरक्षित रखना तथा उसका सद्व्यय करना अत्यन्त आवश्यक है।
जीवन-शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए आहार अर्थात् भोजन-विज्ञान पर यथेष्ट विचार करना चाहिए और जिस आहार से शारीरिक हित हो, उसी का सेवन करना चाहिए।
आहार बहुधा तीन प्रकार के होते हैं। 1- हितकर 2- रुचिकर 3- सुखकर। हितकर आहार सदैव करना चाहिए, रुचिकर कोई एक वस्तु होनी चाहिए और सुखकर कभी-कभी लेना चाहिये। हितकर भोजन वही है जिसमें अधिक से अधिक प्राकृतिक तथा सात्विकता हो- जैसे स्वस्थ गौ का धारोष्ण दुग्ध और गेहूँ, जौ, चावल, मूँगफली एवं पत्ती वाले शाक इत्यादि। रुचिकर तथा सुखकर भोजन में इतना अन्तर है कि रुचि शरीर की आवश्यकतानुसार यथासमय वह रसों में से किसी रस विशेष की हुआ करती है, वस्तु की नहीं और सुखकर भोजन में स्वाद की प्रधानता होने के कारण किसी वस्तु विशेष का आग्रह रहता है, केवल रस का नहीं। रुचिकर भोजन में प्रधानता रस की होती है, स्वाद की नहीं, यद्यपि स्वाद रुचिकर में ही आता है किन्तु तृष्णा पूर्वक भोजन करने से रस का बोध हो नहीं पाता और केवल वस्तु तथा स्वाद में प्रवृत्त दृढ़ हो जाती है, जो अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति का कारण है। आसक्तिपूर्वक भोजन करने का स्वभाव केवल इस कारण बन जाता है कि प्राणी भोजन में ही जीवन-बुद्धि कर लेते हैं जो वास्तव में प्रमाद हैं। भोजन वास्तव में यज्ञ है, उपभोग नहीं। इस दृष्टि से भोजन से उन्हीं वस्तुओं को लेना चाहिए जिनसे प्राण-देवता की यथावत पूजा-सेवा हो सके अर्थात् प्राण-शक्ति सुरक्षित रह सके। यज्ञ में उन्हीं वस्तुओं का उपयोग होता है अर्थात् आहुति दी जाती है। जो हितकर हों और हित उन्हीं वस्तुओं से होता है जो स्वभाव से सात्विक हों।
भोजन कब और कैसे करना चाहिए- इसकी जानकारी भी आवश्यक है। स्वास्थ्य की दृष्टि से दिन के दूसरे पहर में और रात्रि के प्रथम पहर में ही भोजन कर लेना चाहिए। भोजन शाँत तथा प्रसन्न चित्त से चबा-चबाकर करना चाहिए, जिससे मुँह का रोला रस पर्याप्त मात्रा में मिल जाय, इस सम्बन्ध में किसी-किसी ने तो यहाँ तक कह दिया है कि भोज्य पदार्थों को पीओ और पेय पदार्थों को खाओ, अर्थात् भोज्य पदार्थों को इतना चबाओ कि वह तरल बन जाय। भोजन की मात्रा न तो अधिक हो, न कम। भोजन उतनी ही मात्रा में करना चाहिये जिससे पेट का भान न हो। पेट का भान न्यून या अधिक आहार करने पर ही होता है। और ये दोनों स्थितियाँ अप्राकृतिक हैं। कुछ न कुछ शारीरिक श्रम किये बिना भोजन करना अहितकर है, अतएव कुछ श्रम करने के पश्चात ही भोजन करना चाहिए। भोजन की उत्पत्ति तथा उसके पचाने का सम्बन्ध सूर्य से है। इसी कारण दिन के दूसरे पहर के भीतर और रात्रि के प्रथम पहर में भोजन करना हितकर होता है। भोजन उन्हीं लोगों का बनाया हुआ स्वास्थ्यकर होता है जिनमें कर्म, विचार तथा स्नेह की एकता हो। भोजन करते समय इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि अपने समीप कोई ऐसा प्राणी तो नहीं जिसने भोजन न किया हो। जहाँ तक हो सके यथाशक्ति बाँटकर ही भोजन करना चाहिए। भोजन बनाते तथा बनवाते समय इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि बनाए हुए भोजन में से दूसरों को भी देना है। केवल अपने लिए ही भोजन बनाना अथवा बनवाना उचित नहीं है, क्योंकि प्रत्येक प्राणी ने उस अवस्था में भी भोजन किया है जब कि वह स्वयं नहीं बना सकता था। इस निर्विवाद सत्य का सदैव आदर करना चाहिए। स्मरण रहे कि हमें जो कुछ मिला है वह किसी की देन है। अतएव देने के योग्य होने पर देकर ही भोजन करना चाहिए।
विहार, मन इन्द्रिय आदि का भोजन है। इस सम्बन्ध में भी यथेष्ट ध्यान रखना अनिवार्य है। मन, इन्द्रिय आदि में उत्पन्न हुये वेग को दबाना अथवा अमर्यादित ढंग से पूरा करना उचित नहीं है। जो वेग उत्पन्न हो उसको नियमानुकूल साधन-बुद्धि से पूरा करना चाहिए। वेग छिपे हुए राग का परिणाम है। जिस राग को विवेक-पूर्वक नहीं मिटा पाते उसकी वास्तविकता का अनुभव करने के लिए नियमित एवं धर्मानुकूल प्रवृत्ति अनिवार्य है। तथा प्रत्येक प्रवृत्ति के अन्त में स्वाभाविक निवृत्ति को अपना कर मन एवं इन्द्रिय आदि को स्वस्थ तथा शाँत करना चाहिए, क्योंकि प्रवृत्ति के अन्त में मन, इन्द्रिय आदि के शाँत तथा स्थिर होने पर ही आवश्यक शक्ति का विकास होता है-जो उन्नति का मूल है।
छींक, प्यास, भूख, निद्रा एवं मलमूत्र-त्याग इत्यादि शारीरिक वेगों का यथासमय तुरन्त निकास करना ही स्वास्थ्यकर है। कामवेग के सम्बन्ध की बात पर भी विचार करना आवश्यक है। मनोविज्ञान की दृष्टि से काम का वेग शरीर के अन्य सभी वेगों से बलवान तथा प्रधान है। जब तक सर्व इन्द्रियों का ब्रह्मचर्य सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक काम पर विजयी होना सम्भव नहीं। शरीर की सत्यता तथा सुन्दरता एवं इन्द्रियजन्य ज्ञान का सद्भाव जब तक रहता है, तब तक काम का अन्त नहीं हो पाता। अतः काम पर विजयी होने के लिए शरीर की वास्तविकता का यथेष्ट ज्ञान तथा अपने अभीष्ट में अत्यन्त प्रियता जागृत होना अनिवार्य है, कारण कि लक्ष्य की प्रियता का रस सभी इच्छाओं को खाकर तीव्र लालसा उत्पन्न करता है, जो काम का अन्त करने में समर्थ है। किसी आस्तिक का कथन है कि राम की लालसा काम को खा कर राम से अभिन्न कर देती है। इसके अतिरिक्त जहाँ तक हो सभी व्यक्तिगत कार्य अपने आप कर लेना चाहिए किसी अन्य की सहायता उस समय तक न ली जाय जब तक कोई विवशता न आ जाय, कारण कि स्वयं अपना काम अपने आप न करने से श्रम के महत्व का अनादर होता है जिससे प्राणी आलसी और विलासी बन जाता है, इससे अर्थ का महत्व बढ़ता है। जो प्राणों में संग्रह की भावना उत्पन्न करता है, इससे उसमें मिथ्याभिमान आ जाता है और समाज में दरिद्रता की वृद्धि होती है। अतः स्वावलम्बन को अपना कर ही समाज की दरिद्रता का अपहरण तथा अपने को आलस्य, अभिमान एवं विलासिता से मुक्त किया जा सकता है।
(सन्त टी. एल. वास्वानी)
‘ब्रह्मचर्य’ शब्द ‘ब्रह्म+चर्य’ के संयोग से बना है। इसका शब्दार्थ है ‘ब्रह्म में विचरण करना।’ अच्छा यह ‘ब्रह्म’ क्या है? इसका मौलिक अर्थ क्या है? इसका अर्थ है ‘सृजनी शक्ति, उत्पादिका शक्ति’ जो कि सृष्टि के विकास से मूल में है। ब्रह्म यही विकास या वृद्धि का तत्व है। ब्रह्म विश्व-प्राण है, उत्पादक शक्ति है। अतः ब्रह्मचर्य अर्थ मैं करता हूँ- “उत्पादिका शक्ति के साथ साहचर्य या सहयोग।” ईश्वर की उत्पादिका शक्ति ईश्वरीय शक्ति का एक अंश तुम में भी है। वह अनन्त तुम्हारे भीतर है। अनन्त उत्पादक शक्ति तुम्हारे भीतर है। उसी के साथ सहयोग करना ब्रह्मचर्य का पालन करना है।
ब्रह्मचर्य का विश्लेषण करने पर तीन तत्व मिलते हैं-
1- आत्मसंयम- ब्रह्मचर्य यथार्थ में शक्ति संयम ही है।
2- सादगी- भोजन, वेश तथा जीवन के प्रत्येक अंग में, दैनिक जीवन की हर एक बात में सादगी इसी की युवकों को जरूरत है। जो लोग जरूरतों के बढ़ाने ही को सभ्यता का अर्थ समझते हैं, उनसे मैं सहमत नहीं, सच्ची सभ्यता सादगी में है, न कि संग्रह में।
3- विचारशक्ति- ब्रह्मचर्य एक आन्तरिक शक्ति है। विचार शक्ति का विकास किस प्रकार हो सकता है, सादगी का जीवन किस प्रकार आचरण में लाया जा सकता है, तथा आत्मसंयम या आत्मशक्ति किस प्रकार बढ़ सकती है इन बातों के विवेचन का समय आज नहीं। कुछ ऐसे साधन और अभ्यास हैं, जिन्हें ब्रह्मचर्य भाव की वृद्धि के लिए पालन करना आवश्यक है। आज मैं उन पर भी विचार न करूंगा।
जितना ही अधिक मैं सोचता हूँ, मुझे स्पष्ट होता जाता है कि प्राचीन और आधुनिक में जो बड़ा भारी भेद है, वह है ब्रह्मचर्य और भोग का। वर्तमान आदर्शों के आन्तरिक महत्व को मैं नहीं भुलाता। आजकल के वैज्ञानिक विवेचन, आलोचनात्मक भाव तथा राजनीतिक स्वतंत्रता की भावनाओं का मैं अनादर नहीं करता, किन्तु आधुनिक सभ्यता की इन आन्तरिक और गूढ़तर भावनाओं पर हमारी शालाओं में आजकल जोर नहीं दिया जाता। वहाँ तो आधुनिक सभ्यता के ऊपरी पहलू और गलत भावनाओं और दुर्गुणों ही पर दृष्टि रखी जाती है। नवयुवक भोग के पीछे दौड़ रहे हैं। वे भूल जाते हैं कि सभ्यता का अर्थ जरूरतों की बढ़ती या कामनाओं का संग्रह नहीं, किन्तु उनकी सादगी है। वे नहीं समझते कि मनुष्यता का नियम आत्मभोग नहीं, किन्तु आत्मसंयम है। प्राचीन भारत ने यह अनुभव किया था कि मनुष्य भोग विलासी जानवर नहीं, किन्तु वह एक दिव्य पुरुष है, जो कि आत्मसंयम और आत्म-तपस्या के द्वारा अपनी दिव्य मनुष्यता का अनुभव प्राप्त करना चाहता है। प्राचीन आदर्श ब्रह्मचर्य था, वर्तमान आदर्श बहुतों की दृष्टि में भोगचर्य जान पड़ता है। वे आरामतलबी और विलासिता चाहते हैं, पर हिन्दू-शास्त्रों के अनुसार तपस्या ही सभ्यता और सृष्टि की आधारशिला है।
ईश्वर के साथ साहचर्य
किन्तु तपस्या और संन्यास में बहुत अन्तर है। सच्चे ब्रह्मचारी और संन्यासी इन दोनों में भेद है। प्राचीन ग्रन्थ बारबार यही कहते हैं कि ईश्वर आनन्द रूप है। यह विश्व उसी सनातन आनन्द का व्यक्त रूप है। एक उपनिषद् में एक कथा आती है, उसमें कहा गया है कि एक ब्रह्मचारी गुरु के पास जाता है और पूछता है- “गुरु जी! मुझे बताइए ब्रह्म क्या है?” कथा लम्बी है, किन्तु उसका तात्पर्य संक्षेप में कहा जा सकता है। ब्रह्मचारी के प्रश्न के उत्तर में गुरु उसे अनेक ध्यान के साधन बतलाता है। इसके बाद विद्यार्थी गुरु के पास आकर कहता है- “गुरु जी! अब मुझे समझ पड़ा कि ब्रह्म आनन्द रूप है।” सचमुच ईश्वर आनन्द रूप है और विश्व उसी आनन्द का व्यक्त स्वरूप है। सच्चे ब्रह्मचारी को सब कुछ त्यागने की जरूरत नहीं। उसके हृदय में मनुष्य मात्र के प्रति महान प्रेम है। अपने देश तथा अपने देशवासियों के ही लिए नहीं, बल्कि प्राणी मात्र के प्रति प्रगाढ़ प्रेम है।
पूर्ण उन्नतावस्था में ब्रह्मचर्य ब्रह्म के साथ साहचर्य मात्र है। ईश्वर की उत्पादिका शक्ति के साथ सहयोग है। सच्चे ब्रह्मचारी का जीवन धन्य है। किन शब्दों में उसका वर्णन किया जाय? ब्रह्मचारी हर जगह ईश्वर का अस्तित्व अनुभव करता है, उसे विचार, आकाँक्षा और कर्म में अनुभव करता है। ब्रह्मचारी ईश्वर के साथ चलता-फिरता है, ब्रह्मचारी का हृदय आनन्द से ओत-प्रोत होता है, किंतु याद रहे, यह आनन्द इन्द्रिय सुख से बहुत परे है। इन्द्रिय सुख और चीज है, आनन्द आत्मा से सम्बन्ध रखता है। इसी आनन्द से सेवा और कष्ट सहन की शक्ति उत्पन्न होती है। इसी आनन्द से जीवन को सौंदर्यमय करने और निर्माण करने की शक्ति आती है। आनन्द ही जीवन की निर्माण करने वाली शक्ति है। राष्ट्र-निर्माण के लिए ब्रह्मचर्य की-पवित्रता, आत्म-संयम तथा तपस्या की आवश्यकता है।
तपस्वी या राजनीतिज्ञ?
हम भारत का फिर से किस प्रकार निर्माण कर सकते हैं? यह प्रश्न मुझसे देश के भिन्न-भिन्न हिस्से में नवयुवकों ने पूछा है हम लोगों में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं, कुछ वयोवृद्ध राजनीतिज्ञ ऐसे भी हैं जो समझते हैं कि- ब्रिटिश सरकार से टुकड़ों या सुधारों की याचना कर नवीन भारत बनाया जा सकता है। मैं ऐसे लोगों में से नहीं। कुछ लोग हैं, जिन्हें शाही कमीशनों, कौन्सिल की बहसों और पार्लियामेंट के कागजों पर विश्वास है, किन्तु मेरा विश्वास दूसरा ही है। मेरी दृढ़ धारणा है कि यदि नवीन भारत का निर्माण हो सकता है, तो केवल तपस्या से। नवीन राष्ट्र को तपस्वी ही बनायेंगे, न कि राजनीतिक लोग। वह भारत जो कि विश्व को महान संदेश सुनायेगा, वह भारत जो कि आगे चलकर जगत को सेवक बनाने वाला है-वह सच्चा स्वतंत्र भारत-ब्रह्मचर्य से उत्पन्न हुई शक्ति, पवित्रता, ज्ञान और तपस्या से ही पैदा हुए बल के ही द्वारा निर्मित होगा, न कि कौंसिल की स्पीचों या पार्लियामेंट के भाषणों से।
इसलिए अन्त में आपसे मैं केवल यही कहना चाहता हूँ कि तपस्या की शक्ति का विकास करो। प्राचीन ग्रंथ बतलाते हैं कि तपस्या ही से विश्व का निर्माण हुआ। हम पढ़ते हैं कि आरम्भ में कुछ भी नहीं था। तब उस महान विश्वात्मा परमात्मा ने तप किया और उसी से सब लोगों की उत्पत्ति हुई। इसी प्रकार की तपस्या ही से नवीन राष्ट्र की उत्पत्ति होगी। तुम लोग जो कि नवयुवक हो, यदि इसी तपस्या या ब्रह्मचर्य की भावना को दृढ़ करो, तो उस स्वतन्त्र भारत, नवीन भारत का दिन अधिक दूर नहीं है। तपस्या, आत्मत्याग, आत्मसंयम और ब्रह्मचर्य यही राष्ट्रीय उन्नति के मूल मंत्र हैं। एक छोटी सी कहानी जो मुझे बहुत रुचती है। वह कहानी एक बालिका की है। उसके देश पर शत्रुओं ने चढ़ाई की है। देश-रक्षा के लिए बहुत से लोग युद्ध-क्षेत्र की ओर जा रहे हैं। वह थोड़ी सी अवस्था की नन्हीं सी बालिका देव-मन्दिर में आकर प्रार्थना करती है- “मेरे प्रभु, मेरे स्वामी, मुझे बलिदान के रूप में ग्रहण करो।” वह अपने देश की अनिवार्य आवश्यकताओं की सूचनाएँ पढ़ती है। वह अपनी माता के पास जाकर कहती है- “माता, मैं जा रही हूँ, मुझे अपना आशीष दो।” माँ पूछती है- “जा कहाँ रही है बेटी?” बालिका कहती है- “मैं अपने देश की करुण अवस्था की सूचनाएँ पढ़ती हूँ। मेरे बहुत से देशवासी युद्धभूमि पर घायल पड़े हुए हैं। मुझे घायलों की चिकित्सा करनी कुछ-कुछ आती है, इसलिए मैं वहीं जाकर सेवा करना चाहती हूँ। मुझे आशीर्वाद दो।” माता कहती है- “तू मेरी इकलौती लड़की है, तू ही मेरे जीवन की ज्योति, आँखों का तारा है अभी तू लड़की है। मैं उस दिन की प्रतीक्षा करती हूँ, जब तेरा ब्याह होगा और तू आनन्द से रहेगी, कहीं एक-आध गोली तेरी छाती को पार कर गई तो मेरी सब आशाओं पर पानी फिर जायेगा, इसलिए लड़ाई में मत जा बेटी!” लड़की कहती है- “अम्मा! तू मुझसे सुख और आराम की बातें करती है, किन्तु मैंने बार-बार अपने प्रभु परमात्मा से यही प्रार्थना की है कि मुझे बलिदान रूप से स्वीकार करो। मैं अपनी प्रतिज्ञा का अवश्य पालन करूंगी और अब जाती हूँ आशीष दो।” इस उच्चात्मा बालिका की माँ अपनी आँखों में आँसू और हृदय में प्रेम भर कहती है- “तू ने ठीक ही प्रार्थना की है, और तू अपनी प्रतिज्ञा को पूरी कर, प्यारी बच्ची, तू अवश्य जा, मेरी असीस तेरी रक्षा करेगी।”
वह बालिका रणभूमि में जाती है, और उस लड़की का स्मरण करते हुए मेरे मन में आता है कि भारत में कितने ऐसे युवक हैं, जो यह प्रार्थना करें कि हे नाथ! मुझे बलिदान के रूप में ग्रहण करो। विश्वास रखो कि नवीन भारत बातों, लम्बी सभाओं और कागजी प्रस्तावों से नहीं बनेगा। नवीन भारत उन्हीं ब्रह्मचारियों और तपस्वियों के दलों के द्वारा बनेगा, जिनके हृदय में यह मूक आकाँक्षा यह मौन प्रार्थना होगी- “हे नाथ, मुझे बलिदान रूप से ग्रहण करो।”
आज भारत को ऐसे ही नवयुवकों की आवश्यकता है। दरिद्रता की चादर ओढ़े और भारत के नव निर्माण की आकाँक्षा से भरे हुए वे देश में इधर से उधर घूमते फिरेंगे। गाँव-गाँव में वे जायेंगे और मूर्ख जनता को भारत और उसके प्राचीन ऋषियों का दिव्य सन्देश सुनावेंगे। सचमुच धन्य होंगे वे नवयुवक, क्योंकि उन्हीं को प्रभु भारत के भाग्य-निर्माण के साधन बनायेंगे और वे ही माता के मन्दिर के निर्माणकर्ता बनेंगे।
(श्री आचार्य शिव पूजन सिंह कुशवाहा)
सूर्य किरण से नाना प्रकार के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। वाष्प स्नान से जो लाभ होता है वही लाभ धूप स्नान से होता है। धूप स्नान से रोम कूप खुल जाते हैं और शरीर से पर्याप्त मात्रा में पसीना निकलता है और शरीर के अन्दर का दूषित पदार्थ गल कर बाहर निकल जाता है। जिससे स्वास्थ्य सुधर जाता है।
जिन गायों को बाहर धूप में घूमने नहीं दिया जाता है और सारे दिन घर में ही रख कर खिलाया-पिलाया जाता है, उनके दुग्ध में विटामिन डी विशेष मात्रा में नहीं पाया जाता है।
उदय काल का सूर्य निखिल विश्व का प्राण है। प्राणःप्रजानामुदयत्येष सूर्यः प्राणोपनिषद् 1/8 सूर्य प्रजाओं का प्राण बन कर उदय होता है।
अथर्ववेद में सूर्य किरणों से रोग दूर करने की चर्चा है। अथर्ववेद काँड 1 सूक्त 22 में-
अनुसूर्यमुदयताँ हृदयोतो हरिमा चते। गौ रोहितस्य वर्णन तेन त्वा परिद्धयसि॥ 1॥
अर्थ- हे रोगाक्राँत व्यक्ति। तेरा हृदय धड़कन, हृदयदाह आदि रोग और पाँडुरोग सूर्य के उदय होने के साथ ही नष्ट हो जायं। सूर्य के लाल रंग वाले उदयकाल के सूर्य के उस उदय कालिक रंग से भरपूर करते हैं।
इस मंत्र में सूर्य की रक्त वर्ण की किरणों को हृदय रोग के नाश करने के लिए प्रयोग करने का उपदेश है। सूर्य किरण चिकित्सा के अनुसार कामला और हृदयरोग के रोगी को सूर्य की किरणों में रखे लाल काँच के पात्र में रखे जल को पिलाने का उपदेश है।
“परित्वा रोहितेर्वर्णेदीर्घायुत्वाय दम्पत्ति। यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्॥ 2॥
अर्थ- हे पाँडुरोग से पीड़ित व्यक्ति। दीर्घायु प्राप्त कराने के लिए तेरे चारों ओर सूर्य की किरणों से लाल प्रकाश युक्त आवरणों में तुझे रखते हैं जिससे यह तू रोगी पाप के फलस्वरूप रोग रहित हो जाय और जिससे तू पाँडुरोग से भी मुक्त हो जाय।
ऐसे रोगियों को नारंगी, सन्तरे, सेब, अंगूर आदि फलों को खिलाने तथा गुलाबी रंग के पुष्पों से विनोद कराना भी अच्छा है।
या रोहिणी दैवत्या गावो या उत रोहिणीः। रुपं रुपं वयोवयस्तामिष्ट्रवा परिदध्यसि॥ 3॥
अर्थ- जो देव, प्रकाश सूर्य की प्रातःकालीन रक्त वर्ण की किरणें हैं और जो लाल वर्ण की कपिला गायें हैं या उगने वाली औषधियाँ हैं उनके भीतर विद्यमान कान्तिजनक चमक को और दीर्घायु जनक उन द्वारा तुझको सब प्रकार से परिपुष्ट करते हैं।
हृदयरोग के सम्बन्ध में वाव्यटूट अष्ठग संग्रह हृदय रोग निदान अ. 5 में लिखते हैं, पाँच प्रकार का हृदय रोग होता है वातज, पितज, कफज, त्रिदोषज और कृमियों से। इनके भिन्न-2 लक्षण प्रकट होते हैं। इसी प्रकार पाँडुरोग का एक विकृत रूप हलीमक है। उसमें शरीर हरा, नीला, पीला हो जाता है। उसके सिर में चक्कर, प्यास, निद्रानाश, अजीर्ण और ज्वर आदि दोष अधिक हो जाते हैं। इनकी चिकित्सा में रोहिणी और हारिद्रव और गौक्षीर का प्रयोग दर्शाया गया है। रोहित रोहिणी, रोपणाका, यह एक ही वर्ग प्रतीत होता है। हारिद्रव हल्दी और इसके समान अन्य गाँठ वाली औषधियों का ग्रहण है। शुक भी एक वृक्ष वर्ग का वाचक है।
अथर्ववेद काण्ड 6, सूक्त 83 में गंडमाला रोग को सूर्य से चिकित्सा करने का वर्णन है।
अपचितः प्रपतत सुपर्णों वसतेरिव। सूर्यः कृणोतु भेषजं चन्द्रमा वो पोच्छतु॥
(अथर्व. 6। 83।1)
अर्थ- हे गंडमाला ग्रन्थियों। घोंसले से उड़ जाने वाले पक्षी के समान शीघ्र दूर हो जाओ। सूर्य चिकित्सा करे अथवा चन्द्रमा इनको दूर करे।
यहाँ सूर्य की किरणों से गंडमाला की चिकित्सा करने का उपदेश है। नीले रंग की बोतल से रक्त विकार के विस्फोटक दूर होते हैं। यही प्रभाव चंद्रालोक का भी है। रात में चन्द्रातप में पड़े जल से प्रातः विस्फोटकों को धोने से उनकी जलन शान्ति होती है और विष नाश होता है।
एन्येका एयेन्येका कृष्णे का रोहिणी वेद। सर्वासामग्रभं नामावीरपूनीरपेतन॥
(अथर्व. 6। 83। 2)
अर्थ- गंडमालाओं में से एक हल्की लाल श्वेत रंग की स्फोटमाला होती है, दूसरी श्वेत फुँसी होती है। तीसरी एक काली फुँसियों वाली होती है। और दो प्रकार की लाल रंग की होती है उनको क्रम से ऐनी, श्येनी, कृष्णा और रोहिणी नाम से कहा जाता है। इन सबका शल्य क्रिया के द्वारा जल द्रव पदार्थ निकालता हूँ। पुरुष का जीवन नाश किये बिना ही दूर हो जाओ।
असूतिका रामायणयऽपचित प्रपतिष्यति। ग्लोरितः प्र प्रतिष्यति स गलुन्तो नशिष्यति ॥
(अथर्व. 6।83।3)
अर्थ- पीव उत्पन्न न करने वाली गंडमाला, रक्तनाड़ियों के मर्म स्थान में होने वाली, ऐसी गंडमाला भी पूर्वोक्त उपचार से विनाश हो जायेगी। इस स्थान से व्रण की पीड़ा भी विनाश हो जायेगी।
वीहि स्वामाहुतिं जुषाणो मनसा स्वाहा यदिदं जुहोमि। (अथर्व. 6।83।4)
अर्थ- अपने खाने-पीने योग्य भाग को मन से पसन्द करता हुआ सहर्ष खा, जो यह सूर्य किरणों से प्रभावित जल, दूध, अन्नादि पदार्थ मैं देता हूँ।
सं ते शीष्णः कपालानि हृदयस्य च यो विधुः। उद्यन्नादित्य रश्मिमिः शीर्ष्णो रोगमनीनशोंग भेदमशीशमः।
(अथर्व. 9।8।22)
अर्थ- हे रोगी तेरे सिर के कपाल सम्बन्धी रोग और हृदय की जो विशेष प्रकार की पीड़ा थी वह अब शाँत हो गई है। हे सूर्य! तू उदय होता हुआ ही अपनी किरणों से सिर के रोग को नाश करता है और शरीर के अंगों को तोड़ने वाली तीव्र वेदना को भी शाँत कर देता है।
इस प्रकार समस्त रोगों को सूर्य उदय होता हुआ अपनी किरणों से दूर करता है।
धूप स्नान करते समय रोगी का शरीर नग्न होना चाहिए। जब सूर्य की किरणें त्वचा पर पड़ती है तो उससे विशेष लाभ होता है। सिर को सदैव धूप लगने से बचाना चाहिए। छाजन(एक्जिमा) रोग में धूप स्नान से बहुत लाभ होता है। यदि शरीर का कोई प्रधान अंग निर्बल हो गया हो, तो धूप स्नान से उन्हें लाभ होता है। कुछ रोगों में धूप स्नान मना भी है यथा सभी प्रकार के ज्वर में।
इस तरह से वेदों में नैसर्गिक सूर्य क्रिया चिकित्सा का स्पष्ट वर्णन है।
(श्री परिपूर्णानन्द जी वर्मा)
बिना नेता के समाज नहीं होता और नेता के लिए समाज का होना आवश्यक है। जब से सभ्यता पनपी, मानव समाज से लेकर पशु तथा कीट पतंग समाज में भी नेता की रचना हुई, जन समूह को या पशु-पक्षी समूह को पेट तथा गृहस्थी की झंझट में इतना अवकाश नहीं रहता कि वह अपना ठीक से नियंत्रण कर सके तथा अपने सामाजिक जीवन का संचालन कर सके- यह कार्य समूचे समाज की ओर से उसका एक अग्रणी या नेता करता है। अपने स्वभावसिद्ध गुणों से तथा अपने में उपयोगिता के कारण पूजनीय होता है। वास्तव में वह ‘गणपति’ होता है, पर गणपति बनने के लिए, ‘गणानाँ त्वा गणपतिः’ होने के लिए उसमें कई गुणों का समुच्चय होना चाहिए। गणपति वही हो सकता है, जो हाथी के ऐसे बड़े-बड़े कान रखता हो, जिससे संसार का सब कुछ उसके कानों को सुनायी दे जाय। उसके नेत्र इतने छोटे हों कि संसार का ऐब बहुत कम देखे, पेट इतना बड़ा हो कि सब कुछ सुन-समझकर पेट में रख ले। चूहे की चाल चले यानी बहुत सावधानी से चारों तरफ की थाह लेकर तब बड़ी शीघ्रता से चले, फिर रुक जाय, इतनी सावधानी से जीवन बिताने वाले के दोनों हाथों में, लड्डू होता है। सूँड़ से फूँक-फूँक कर वह कदम रखता है- यह है गणपति का गुण। सब कार्यों का आरम्भ करने में गणपति का पूजन करने से सभी विघ्नों का नाश होता है और उस गणपति की कृपा से सब काम सिद्ध होते हैं उसका आदर्श मानकर चलने से हर एक मनुष्य का कल्याण होता है।
इस प्राचीन गणपति को हमारे शास्त्रों ने ‘नेता’ कहा है। नेता बड़ा पुराना शब्द है, आज का नहीं है। किन्तु जिस समय शब्द बना था, उस समय प्रायः राजा तथा पुरोहित ही नेता होता था। अब तो जिस गली-कूचे में, जिस कंकड़-पत्थर को उठा लीजिये, वही नेता होगा। वर्षा में मेंढक की बाढ़ आती है, प्रजातंत्र में नेता की बाढ़ आ गयी है, हमारे देश में स्वराज्य हो गया, पर हम स्वराज्य का सुख नहीं भोग पाते हैं। इसका कारण है कि हमारा नेता हमको चैन से बैठने नहीं देता। जहाँ समस्या नहीं है, वहाँ पर वह कोई न कोई समस्या उत्पन्न कर देगा। यदि हम लेशमात्र भी सुख की साँस लेना चाहेंगे तो वह नयी-नयी उलझनें पैदा कर देगा।
एक बात और भी है- देश का तथा समाज का उत्थान नेता पर निर्भर करता है। नेता यदि पथभ्रष्ट हुआ तो देश भी पतन की ओर अग्रसर हो जाता है, इसलिए और किसी विचार से नहीं तो अपनी रक्षा के विचार से ही, हमको बहुत छानबीन कर अपना नेता चुनना होगा। आज की हमारी बहुत सी परेशानियों की जड़ हमारा गलत नेता भी हो सकता है।
पर, साधारण जन समूह के पास न तो अवकाश है और न इतनी बुद्धि है कि वह भले-बुरे की पहचान कर सके। मामूली कहावत है-
गुरु कीजै जानकर। पानी पीजै छानकर।
पर नेता कैसे किया या बनाया जाता है? इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन है। पश्चिम की विचारधारा में इसकी अनेक व्याख्याएँ की गयी हैं, पर वे प्रायः सभी बहुत ही भौतिक तथा साँसारिक हैं। नेताओं की भौतिकता तथा साँसारिकता ही विश्व के वर्तमान संकट का एक प्रधान कारण है। यदि मानव कुछ अधिक आध्यात्मिक तथा असाँसारिक हो सकता तो वह संसार के ऊहापोह के मायाजाल में गला फँसाकर सिसक-सिसक कर मरता नहीं। नश्वर चीजें मनुष्य के दिल को खा जाती हैं और अन्तरात्मा को अन्धा कर देती हैं। जीवन का सुख चिंताओं में समझा जाता है। दिल या हृदय की आवश्यकता पार्थिव कसक या विनाशकारी प्रेम तक सीमित है-
राम गया, रौनके हयात गयी। दिल गया, सारी कायनात गयी॥
पर, जीवन इसके ऊपर उठकर है। जीवन उसका है जो यह समझता है कि-
तुम जिसे दिल खयाल करते हो। वह शबिस्ता-सा खिलौना था॥
मनुष्य के साँसारिक जीवन का उद्देश्य है सुख। सुख की प्राप्ति सम्पत्ति से होती। सम्पत्ति का हेतु क्या है? कारण क्या है?
प्रभावः शुचिता मैत्री त्यागः सत्यं कृतज्ञता। श्रुतिः शीलं दमश्चेति गुणाः सम्पत्तिहेतवः ॥
अर्थात् प्रभाव, पवित्रता, मित्रता, त्याग, सत्य दूसरे का उपकार मानकर उसको स्मरण रखना, शास्त्र तथा शील सम्पन्न होना और बाहर-भीतर की इन्द्रियों को जीत लेना- ये गुण सम्पत्ति के कारण हैं-हेतु हैं।
इसलिए नेता वही है, जो हमें इन गुणों को सिखलावे, जो हमारे मन-वचन में ऐसी भावना भर दे कि हम इन गुणों का प्रतिपादन-सम्पादन करें। पर ऐसी शिक्षा देना भी साधारण बात नहीं है कौन ऐसी शिक्षा दे सकता है? नेता। प्रश्न फिर आता कि ‘नेता कौन है या किसे मानना चाहिए।’
इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए हमको आज से दो हजार साल पीछे लौट चलना होगा उस समय की भारतीय संस्कृति ने बहुत सोच-समझकर नेता की व्याख्या की थी। नेता का अर्थ निश्चित किया था नेता शब्द का निर्माण किया था जो व्यक्ति नीति का पालन करे तथा चलावे, वह नेता होगा। नयन करने वाली चीज का नाम नीति है यानी सम्यक् रूप से सुमार्ग में चलाने वाली वस्तु का नाम नीति है “कामन्दकीय नीतिसारः” के दूसरे सर्ग के सोलहवें श्लोक में लिखा है- ‘नयनान्नीतिरु च्यते’।
नीति को जानने वाला नेता होता है दण्ड भी देता है और जो लोग पथभ्रष्ट होते हैं, उनको सजा देना भी उसका कर्त्तव्य है। नीति का पालन कराने के लिए कठोर अनुशासन की आवश्यकता होती है। जिस राजनीतिक दल में से अनुशासन उठ गया तथा अवज्ञा करने वालों के लिए दण्ड का विधान बहुत है, उस राजनीतिक दल का भविष्य उज्ज्वल नहीं कहा जा सकता। जो अपनी नीति को अनुशासन पूर्वक नहीं मनवा सकता, वह नेता नहीं बन सकता। इसलिए कौटिल्य के अर्थशास्त्र के बारे में लिखा हुआ ग्रन्थ ‘कामन्दकीय नीतिसारः’ जो कि कौटिल्य के अर्थशास्त्र का सार है, नेता का गुण बतलाता है-
दण्डनीतिर्यदा सम्यं नेतारमधितिष्ठति। तथा विद्याविदः शेषा विद्याः सम्यगुपासते॥
(सर्ग 2, श्लोक 9)
अर्थात् जब दण्डनीति भली प्रकार से नेता में स्थिर रहती है, तब वह विद्या को जानने वाला सम्पूर्ण शेष विद्याओं को प्राप्त होता है।
हिटलर हो या मुसोलिनी, स्टालिन हो या ट्रमन, हमारे देश के नेता वर्ग भी, जिसमें अनुशासन करने की क्षमता नहीं, वह और किसी गुण से सम्पन्न न होगा। अतएव वह नेता नहीं बन सकता। शासन की विभक्ति का ही नाम अनुशासन है। कौटिल्य अर्थशास्त्र के अट्ठाइसवें प्रकरण के दसवें अध्याय में लिखा है। ‘शासने शासनमित्याचक्षते।’
यानी किसी भी तरह की राजा की लिखित आज्ञा या प्रतिज्ञा शासन कहलाता है। अतएव नेता का आदेश शासन हुआ। जो इस आदेश को नहीं मान सकता या मना सकता, वह न तो नेता हो सकता है और न अनुयायी।
नीति को चलाने वाला तथा अनुशासन करने वाला, ऐसा नेता कौन हो सकता है? इसकी बड़ी सुन्दर व्याख्या कामन्दकीय नीतिसार में ही देखिए-
बाग्मी प्रगल्भः स्मृतिमानुदग्रा बलवान् वशी। नेता दण्डस्य निपुणः कृतशिल्पः सुविग्रहः ॥
(सर्ग 4, श्लोक 15)
यानी उदार, शास्त्र सम्मत बोलने वाला वाग्मी, स्मृतिमान, बड़ा बलवान, जितेन्द्रिय, शिक्षक, दण्ड योग करने वाला, चतुर, शिल्पविद्या में निपुण तथा अच्छे शरीर वाला नेता होता है।
इन्हीं गुणों का राजा होना चाहिए। इन्हीं गुणों का नेता होना चाहिए। पर आज यदि हम आँख उठाकर देखें तो हमको विरले ही ऐसे राजा, शासक व नेता नजर आयेंगे। ऐसे गुण वाले का हमारी दृष्टि से ओझल हो जाना ही हमारे अकल्याण का कारण है।
ईसा से 479 वर्ष पूर्व, प्रसिद्ध चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस की 63 वें वर्ष की उम्र में मृत्यु हुई थी। अपने सचेत जीवन का प्रत्येक क्षण इस महापुरुष ने सबको सत्पिता, सन्माता, सुपुत्र, सुपुत्री तथा सन्मित्र बनने की शिक्षा देने में बिताया था। ऐसा महापुरुष समाज के नेता का जिक्र कैसे भूल सकता था। अतएव उन्होंने अपनी पुस्तक या लेखों में नेता का गुण बतलाया है। वे लिखते हैं-
‘जो दूरदर्शी नहीं है, वह निकट की पहेलियों में भी कष्ट उठायेगा। वही आदर्श पुरुष है, जो काम की कठिनाइयों को दूर करने का पहले ख्याल करता है, उसकी सफलता की बात पीछे सोचता है। प्राचीन काल में आदमी आत्मोन्नति के लिए शिक्षा प्राप्त करते थे। आज के लोग दूसरों से प्रशंसा प्राप्त करने के लिए शिक्षा प्राप्त करते हैं। जो आदमी सच्चा है, ठोस है, सीधे रास्ते चलता है तथा दूसरों की बातें सुनकर मन में उसकी समीक्षा करता है, वही व्यक्ति देश में समाज में तथा परिवार में उच्च स्थान प्राप्त कर सकता है तथा अगुआ बन सकता है।’
कन्फ्यूशियस ने आज के 2300 वर्ष पहले जो बात कही थी, उसे कोई कैसे काट सकता है? कौन कह सकता है कि मानव के लिए ऊपर लिखी व्याख्या के अतिरिक्त किसी अन्य प्रकार का नेता चाहिए। कठिनाई यही है कि हम शास्त्र द्वारा प्रमाणित नेता को खोजते नहीं, तलाश नहीं करते या यदि हमें मिलता भी है तो उसकी कद्र नहीं करते। जैसा समाज होता है वैसा ही नेता भी पैदा होता है। जिसे सच्चे नेता की आवश्यकता हो उसे अपना स्तर भी ऊँचा करना होगा। अपना दूषण भी दूर करना होगा। तभी हमको असली सुख तथा शान्ति देने-दिलाने वाला नेता प्राप्त होगा या यदि प्राप्त है तो उससे सुख प्राप्त होगा।
(श्री सत्य भक्त जी)
शिक्षा बड़ा व्यापक विषय है। दुर्भाग्यवश वर्तमान समय में हम शिक्षा का अर्थ किसी स्कूल या कालेज में जाकर विभिन्न विषयों की दस-पाँच या बीस-तीस पुस्तकें अध्यापकों से पढ़ लेना ही समझते हैं। जिस व्यक्ति ने इस नियत पाठ्यक्रम के अनुसार जितनी अधिक पुस्तकें पढ़ी हैं और जितनी ऊँची परीक्षाएं पास की हैं वह हमारी दृष्टि में उतना ही अधिक शिक्षित या विद्वान है। आजकल लोगों का यही खयाल है कि जो व्यक्ति अक्षरों से परिचित नहीं है और एक या कई भाषाओं को लिखने-पढ़ने की योग्यता नहीं रखता वह शिक्षित कदापि नहीं कहला सकता।
पर इन विचारों में सत्य का अंश बहुत ही कम है। यह सत्य है कि इस जमाने में विभिन्न प्रकार के विषयों की जानकारी प्राप्त करने की सबसे सरल और सुविधाजनक मार्ग पुस्तकों का पठन-पाठन ही बन गया है, पर यह कल्पना करना कि शिक्षित होने का केवल यही एक मार्ग है, ठीक नहीं है। ऐसे ही विचारों वाले व्यक्ति प्राचीन भारतवासियों को, जिनमें लिखने-पढ़ने के अभ्यासी थोड़े ही थे, शिक्षित मानने में संकोच किया करते हैं।
वास्तव में शिक्षा का संपर्क स्कूली पठन-पाठन से ज्यादा नहीं है। और जिसे सुशिक्षा कहा जाता है वह तो दूसरी ही चीज है। आज कल दुनिया की निगाह में शिक्षा का मुख्य लक्षण कोई अच्छी सी नौकरी कर सकना अथवा किसी अन्य बड़े समझे जाने वाले पेशे के द्वारा जीविकोपार्जन करना समझा जाता है। क्योंकि इन सभी कामों में लिखना-पढ़ना अनिवार्य होता है इसलिए आजकल इन कामों में सफल होने वाले व्यक्ति ही शिक्षित समझे जाते हैं।
यही सब से बड़ा अंतर प्राचीन और अर्वाचीन शिक्षा प्रणाली में है। उस समय कागज, कलम और पुस्तकें लेकर पढ़ने-लिखने का अभ्यास करने के बजाय विद्यार्थी का चरित्र गठन करना और जीवन संग्रह में उसे अपना और दूसरों का हित कर सकने योग्य बनाना शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था। दूसरा उद्देश्य यह था कि मनुष्य को केवल भौतिकता की तरफ दृष्टि रखने वाला न बनाकर वह उसके जीवन को आध्यात्मिकता की तरफ मोड़ती थी। क्योंकि जो व्यक्ति दूसरे व्यक्तियों को अपने समान समझकर उनके हित-अनहित का ध्यान न रखेगा वह समाज के लिए कभी श्रेष्ठ नागरिक सिद्ध न होगा। जो स्वार्थी व्यक्ति भौतिक लाभों को ही सब कुछ समझकर अपनी बुद्धि का उपयोग अपने लिए अधिक से अधिक सामग्री प्राप्त करने और दूसरों को उससे वंचित रखने में करता है वह प्राचीन आदर्श की कसौटी पर निस्संदेह एक पढ़ा-लिखा मूर्ख है। उसे सुशिक्षित कहना शिक्षा का अपमान करना है।
प्राचीन भारत में शिक्षा की व्यवस्था के लिए गुरुकुल प्रणाली का विकास किया गया था। एक-एक ऋषि, महर्षि सैकड़ों, हजारों विद्यार्थियों को अपने यहाँ रख कर जीवन की आवश्यकीय शिक्षा प्रदान करते थे। उस समय कागज का आविष्कार नहीं हुआ था, इसलिए पुस्तकों द्वारा शिक्षा देने वाला प्रश्न ही नहीं उठता था। उस समय सब प्रकार की शिक्षा मौखिक या व्यवहारिक रूप में ही दी जाती थी। इसलिए उस समय के विद्यार्थी जो कुछ पढ़ते थे उसे जन्म भर के लिए स्मरण शक्ति द्वारा सुरक्षित बना लेते थे। आजकल के समान इम्तिहान समाप्त होते ही पुस्तकों से नाता तोड़ लेने और पढ़े हुए विषयों में से तीन चौथाई को कुछ ही महीनों में भुला देने वाली शिक्षा प्रणाली उस समय न थी।
उस समय गुरुकुलों में जो कुछ शिक्षा दी जाती थी वह पूर्णरूप से व्यवहारिक होती थी। सबसे पहले विद्यार्थी को स्वावलम्बन का पाठ पढ़ाया जाता था, जिससे वह अपने आगामी जीवन में कहीं भी और कैसी भी परिस्थिति में अपने पैरों पर खड़ा हो सकता था। पच्चीस वर्ष की आयु तक पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन कराके उसके शरीर को फौलाद की तरह सुदृढ़ बना दिया जाता था। गाँवों के बाहर या जंगल के वातावरण में रहने से उसका स्वास्थ्य और सहनशक्ति इतनी मजबूत हो जाती थी कि वह प्रायः रोग और बीमारियों के आक्रमण से सुरक्षित रहता था। गुरु और गुरुकुल के आवश्यक कार्यों में उसे पूरा भाग लेना पड़ता था। कृष्ण जैसे राजवंशीय छात्र को भी गुरु के लिए जंगल से लकड़ियाँ इकट्ठी करके लानी पड़ती थीं। गायों को चराना और उनकी देखभाल करना भी विद्यार्थियों के जिम्मे था और यह एक काफी बड़ा काम था, क्योंकि उस समय एक-एक ऋषि के यहाँ हजारों गायें रहती थीं और समय-समय पर वे हजारों गायें राजाओं और श्री मानों से दान में मिल जाती थीं। गुरु की अधिक से अधिक सेवा करना और उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन करना ही विद्यार्थी का परम कर्त्तव्य माना जाता था और गुरु भी उसे अपनी संतान की तरह मान कर उसके कल्याण की सदैव चेष्टा किया करते थे। इसके विपरीत जब हम आज कल स्कूल और कालेजों के लड़कों को प्रायः अपने शिक्षकों की हँसी उड़ाते, उनके विषयों में अपमानजनक बातें कहते और कभी-कभी तो सचमुच उनको मारते पीटते देखते हैं तो हमारी आँखें लज्जा से झुक जाती हैं और हम प्रार्थना करते हैं कि भगवान ऐसी शिक्षा से बचाये रखें।
प्राचीन शिक्षा पद्धति की एक बड़ी विशेषता सामाजिक समानता का प्रचार भी था। गुरुकुलों में विद्यार्थियों को हद दर्जे की सादगी से रहना पड़ता था जिससे गरीब अमीर का अन्तर शिक्षाकाल में तो समाप्त ही हो जाता था। ब्रह्मचर्य के पालन के उद्देश्य से विद्यार्थियों को सब प्रकार की तड़क-भड़क की पोशाक, तेल-फुलेल, सुगन्धित उबटन तथा शृंगार सामग्री से दूर रहना पड़ता था। भोजन के लिए गाँव के किसी गृहस्थ के यहाँ से भिक्षा माँग कर लाना ब्रह्मचारियों के लिए नियम रखा गया था। इससे एक ओर जहाँ विद्यार्थी के हृदय में नम्रता तथा विनय का भाव उत्पन्न होता था वहाँ दूसरी ओर वह अपने को समाज का ऋणी और उसका एक अंग समझने लगता था और भविष्य में समाज सेवा करना उसका कर्त्तव्य हो जाता था। इस प्रकार के वातावरण में नितान्त गरीब बालक भी उच्च शिक्षा सहज में प्राप्त कर सकते थे। कृष्ण और सुदामा तथा राजा द्रुपद तथा द्रोणाचार्य का एक साथ मित्र रूप में शिक्षा प्राप्त करना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। वर्तमान शिक्षा प्रणाली इस दृष्टि से बड़ी ही दूषित हो गई है। कालेजों की शिक्षा तो इतनी खर्चीली हो गई है और वहाँ के ज्यादातर छात्र ऐसे बने-ठने तथा फैशन के पुतले रहते हैं कि किसी गरीब घर के लड़के का वहाँ पहुँच सकना ही असम्भव होता है। अगर ऐसा कोई विद्यार्थी किसी की सहायता से अथवा स्वयं ट्यूशन आदि करके वहाँ पढ़ने के लिए पहुँच भी गया तो उसे सदा नीचा देखना पड़ता है।
कुछ व्यक्ति प्राचीन शिक्षा पद्धति में यह दोष बतलाते हैं कि उसका क्षेत्र बहुत संकुचित था और उस समय के विद्यार्थियों का दृष्टिकोण उतना व्यापक न बन पाता था जितना कि आजकल। हम यह मान सकते हैं कि प्राचीन समय में शिक्षा का स्वरूप मुख्यतया धार्मिक ही होता था और अधिकाँश विद्यार्थी पूजा-पाठ, स्तुति तथा कुछ कर्मकाण्ड सम्बन्धी बातों के अतिरिक्त अन्य विषयों का ज्ञान कदाचित ही प्राप्त करते थे। और यह भी सच है कि उस समय शिक्षा-संस्थाओं में प्रवेश करने वाले विद्यार्थियों की संख्या समस्त आबादी के अनुपात से बहुत अल्प होती थी। पर उस समय की सामाजिक अवस्था और व्यवस्था ही आजकल से सर्वथा भिन्न थी और उस समय का समाज मुख्य रूप से कृषि प्रधान था। खेती-बाड़ी का काम करने वालों के लिए साहित्य और विज्ञान की शिक्षा तो आजकल भी सुलभ नहीं है और गाँवों की 90 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या निरक्षर ही है। उस समय उद्योग धन्धे भी हाथ की कारीगरी के रूप में किये जाते थे और उनका उद्देश्य विशेषतः किसानों की आवश्यकता की वस्तुएँ बनाना ही था। बड़े-बड़े नगरों की संख्या कम थी और वैदेशिक व्यापार बहुत सीमित रूप में किया जाता था। फिर उस समय शिक्षा का उद्देश्य केवल किताबी शिक्षा ग्रहण करके कोई उपाधि प्राप्त कर लेना नहीं था, वरन् प्रत्येक को उसकी जीवन की आवश्यकताओं के अनुरूप शिक्षा दी जाती थी। जैसे ब्राह्मण के पुत्र को कर्मकाण्ड की शिक्षा, क्षत्रिय पुत्र को शस्त्र-संचालन तथा राजनीति की शिक्षा, वैश्य को विविध प्रकार के उद्योग धन्धों तथा व्यापार की शिक्षा आदि। शूद्रों का एक बड़ा भाग मेहनत मजदूरी के साधारण कामों में लगा रहता होगा। ऐसी अवस्था में पढ़ने-लिखने का प्रचार कम रहा हो या उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति इने-गिने ही देखने में आते हों तो कोई आश्चर्य नहीं।
पर यह ख्याल करना कि धार्मिक क्रिया-कलाप के सिवा देश में किसी अन्य विषय की शिक्षा का प्रचार ही न था, अज्ञान का द्योतक है। छान्दोग्य उपनिषद् में एक स्थान पर सनत्कुमार के पूछने पर नारद ऋषि ने कहा था- “हे भगवान मैंने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, इतिहास, पुराण, वेदों के अर्थ विधायक ग्रन्थ, पितृविद्या, राशिविद्या, देवविद्या, निधि विद्या, पाकोवाक्य विद्या, एकायनविद्या, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्र विद्या, सर्प देव जन विद्याओं का अध्ययन किया है।” हमारे प्राचीन साहित्य में चौदह विद्याओं और चौंसठ कलाओं का जिक्र जगह-जगह पाया जाता है। इन विद्याओं और कलाओं में जीवन की अनेक आवश्यक और उसे सुसभ्य तथा सुसंस्कृत बनाने की बातों का समावेश हो जाता है। अस्त्र-शस्त्र संचालन, संगीत, वैद्यक, ज्योतिष, चित्रकारी, मूर्ति बनाना, गृह निर्माण, वस्त्र-कला, आभूषण और सुगन्धित पदार्थों का बनाना आदि कितने ही विषयों में उस समय के भारत वासियों ने अपूर्व उन्नति की थी। ये सब कार्य बिना समुचित शिक्षा के यथोचित रूप में किये जा सकें यह संभव नहीं। यद्यपि काल प्रभाव से प्राचीन चिह्नों का हजारों वर्ष तक कायम रह सकना असंभव है, तो भी दो ढाई हजार वर्ष पुरानी अजंता, एलोरा आदि गुफाओं में जो अद्भुत मूर्तियों और चित्रकारी के नमूने मिलते हैं और प्राचीन समय की जो दस-पाँच महाविशाल इमारतें अभी दक्षिण और उत्तर भारत में पाई जाती हैं उनसे यह प्रकट होता है कि उस समय तक हमारे देश में इन विद्याओं का विकास उच्च कोटि तक पहुँच गया था। इस प्रकार का विकास तभी संभव हो सकता है जब कि देश में अच्छी शिक्षा संस्थाएँ हजार पाँच सौ वर्ष तक स्थित रह कर कार्य कर चुकीं हों या शिक्षा देने की कोई और नियमित व्यवस्था निरन्तर प्रचलित रह चुकी हो।
रह गया शिक्षा का बहुत अधिक विस्तार या घर-घर में उसका फैल जाना यह एक दृष्टि से अच्छा भी है और दूसरी दृष्टि से इसमें बहुत सी खराबियाँ भी हैं। आजकल तो हमको शिक्षा और विद्या के सार्वजनिक प्रचार का, खास कर स्कूलों और कालेजों में पढ़कर निकलने वाली विद्यार्थियों की अगणित सेना का परिणाम बेकारी और अनीति की वृद्धि ही दिखलाई पड़ रहा है। यह सच है कि आजकल शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों की संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती जाती है, पर साथ ही यह शिक्षा अधिकाँश में खोखली है। उसके द्वारा मनुष्य कार्यक्षम और सुयोग्य बनने की बजाय चालाक और दिखावट पसंद बन रहे हैं। साथ ही परीक्षा पास कर लेने को विद्या और शिक्षा की कसौटी बना देने से किसी भी कार्य को सम्पन्न करने की वास्तविक योग्यता का ह्रास हो रहा है। इस समय चारों तरफ दिखलाई पड़ने वाली भीषण बेकारी की समस्या का वास्तविक कारण यही है कि विद्यार्थियों को केवल किताबी शिक्षा देकर उनमें शिक्षित होने का अभिमान तो उत्पन्न कर दिया जाता है, पर किसी लोकोपयोगी कार्य को परिश्रम, सच्चाई और बुद्धिमत्तापूर्वक करने की सामर्थ्य उनमें पैदा नहीं की जाती।
इस तरह दोनों पहलुओं पर विचार करने से हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि प्राचीन शिक्षा पद्धति देश और काल की वर्तमान बदली हुई दशा में जैसी की तैसी-फल दायक नहीं हो सकती और न अब ऋषियों के निजी गुरुकुलों की स्थापना हो सकना संभव है। अब एक लंगोटी या धोती पहने, मूँड मुड़ाये भोजन के लिए भिक्षा वृत्ति अंगीकार करने वाले विद्यार्थी की कल्पना भी हास्योत्पादक मानी जायगी। अब शिक्षा की व्यवस्था देश की सरकार ने अपने हाथ में ले ली है और अन्य किसी के पास इतने साधन होने असंभव हैं कि वह इतनी बड़ी जनसंख्या के लिए शिक्षा की समुचित व्यवस्था कर सके। इसलिए वर्तमान स्कूलों तथा कालेजों का सर्वथा उच्छेद हो सकना तो संभव नहीं पर उनका रूपांतर होना अत्यन्त आवश्यक है और उनमें प्राचीन शिक्षा पद्धति की उपयोगी बातों का समावेश करने से बहुत अधिक लाभ उठाया जा सकता है।
इस दृष्टि से सब से पहली बात तो हम यही समझते हैं कि शिक्षा पद्धति में कोरी जानकारी की अपेक्षा गुणों का महत्व अधिक होना चाहिए। प्राचीन काल के विद्यार्थियों के पास चाहे आजकल के स्कूली लड़के-लड़कियों की तरह पुस्तकों और कापियों के ढेर नहीं लगे रहते थे और न उनमें से प्रत्येक को भूगोल और इतिहास से लेकर विज्ञान के आविष्कारों तक की पाठ्य पुस्तकें पढ़नी पड़ती थीं, पर उस समय जो कुछ सिखलाया जाता था वह जीवन भर के लिए उपयोगी होता था और उसे ऐसा पक्का कर दिया जाता था कि मनुष्य उसे कभी भूल नहीं सकता था। हम नहीं समझते कि दुनिया भर की बातों की जबानी जानकारी प्राप्त कर लेने की चेष्टा करना, पर व्यवहारिक कार्य के नाम पर शून्य होना कहाँ की बुद्धिमत्ता है।
दूसरी बात है वर्तमान समय की परीक्षाओं और डिग्रियाँ दिये जाने की प्रणाली। संभव है आरम्भ में इससे कुछ लाभ हुआ हो पर आजकल तो इसका स्वरूप अत्यन्त विकृत तथा भ्रष्ट हो गया। छल, कपट, बेईमानी, रिश्वत आदि किसी भी साधन से परीक्षोत्तीर्ण होने का प्रमाणपत्र प्राप्त कर लेना ही इस समय अधिकाँश विद्यार्थियों का लक्ष्य दिखलाई पड़ता है। इससे शिक्षा का मूल्य घटता जाता है और बी. ए., एम. ए. पास व्यक्ति चपरासी तक की नौकरी करते दिखलाई पड़ते हैं। इस प्रकार की झूठी सनदों के बजाय प्राचीन काल के छात्र शिक्षा समाप्त कर लेने पर कोई महत्व का कार्य करके दिखलाते थे और उसके द्वारा अपनी योग्यता का प्रमाण देते थे। वैदिक और पौराणिक काल में गुरुदक्षिणा की प्रणाली एक सीमा तक इस उद्देश्य की पूर्ति करने वाली थी। विश्वामित्र ने अपने शिष्य गालव से आठ सौ श्यामकर्ण घोड़ों की माँग की थी, और द्रोणाचार्य ने अर्जुन को राजा द्रुपद को पकड़ लाने का आदेश दिया था। अब समय आ गया है कि परीक्षाओं की मौजूदा प्रणाली को कतई बन्द कर दिया जाय, और उसके स्थान में ऐसे तरीके का प्रयोग किया जाय जिससे विद्यार्थियों की वास्तविक योग्यता की जाँच हो सके और उनको तदनुरूप कामों में ही नियुक्त किया जा सके।
सबसे महान त्रुटि वर्तमान शिक्षा प्रणाली में यह है कि यह विद्यार्थियों के चरित्र का निर्माण करने के बजाय उसका नाश कर देती है और नवयुवकों को जीवन के आरम्भ से ही काम, क्रोध, लोभ, मद, मत्सर आदि का दास बना देती है। इसी का परिणाम है कि जब बीस-पच्चीस वर्ष की आयु में आजकल के विद्यार्थी बी. ए., एम. ए. के डिग्रियाँ, लेकर जीवन-क्षेत्र में प्रवेश करते हैं तो वे प्रायः निर्बल, निस्तेज और अनेक प्रकार की आधि-व्याधि के शिकार दिखलाई पड़ते हैं। प्राचीन समय के छात्र चौबीस पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करके और हर तरह के कठोर जीवन को सहन करके पूर्ण शक्ति और उत्साह के साथ जीवन-संग्राम में पदार्पण करते थे और आत्म-विश्वास के साथ प्रत्येक परिस्थिति का सामना करने को प्रस्तुत रहते थे। यही दोनों प्रणालियों का सर्वप्रधान अन्तर है और उपरोक्त उद्देश्य को सम्मुख रखकर ही हमको अपनी शिक्षा-पद्धति का पुनः निर्माण करना चाहिए।
तपोभूमि वृत्तान्त
गायत्री तपोभूमि में दैनिक यज्ञ तथा साँस्कृतिक विद्यालय में कार्यक्रम बड़े आनन्दपूर्वक चल रहा है। प्रातः 6 से 8॥ बजे तक यज्ञ होता है। जिसमें गायत्री मंत्र तथा वेद परायण क्रम के अतिरिक्त 40 प्रकार के अन्य शक्तिशाली यज्ञों की क्रियात्मक शिक्षा दी जाती है।
संगीत अध्यापक छात्रों को हारमोनियम, तबला, ढोलक, चिमटा, मँजीरा, इकतारा, खंजरी, बैंजो आदि बाजों पर धार्मिक गान वाद्य सिखाने का पूरा-पूरा प्रयत्न करते हैं। छात्रों ने इस दिशा में प्रगति भी की है। होम्योपैथी तथा आयुर्वेद के ज्ञाता द्वारा चिकित्सा कक्षा नियमित रूप से चलाई जाती है। संस्कृत भाषा और यज्ञोपवीत आदि षोडश संस्कार कराने की शिक्षा प्रातः यज्ञ समाप्त होते ही आरम्भ कर दी जाती है। सामूहिक जप, कीर्तन, मंदिर की पूजा आरती, सत्संग आदि के क्रम यथावत चलते रहते हैं।
गीता तथा रामायण की कथा एवं भाषण प्रवचनों की कक्षाएं भी शीघ्र ही आरम्भ की जाने वाली है। बिजनौर के आत्मदानी वकील श्री. अशर्फीलाल अपना घरबार व्यवसाय छोड़कर 1 मार्च से तपोभूमि में स्थायी रूप से सेवा करने आ रहे हैं। उनके आते ही भाषण प्रवचनों की शिक्षा तपोभूमि में आरम्भ हो जावेगी।
आचार्य जी की धर्मपत्नी माता भगवती देवी जी कन्या गुरुकुल चलाने की योजना में व्यस्त हैं। उन का एक लेख भी इस अंक में जा रहा है। वे शिक्षित सहयोगिनियों की आवश्यकता अनुभव कर रही हैं। यदि उनकी यह आवश्यकता पूर्ण हो गई तो महिलाओं की यहाँ एक दूसरी तपोभूमि एवं साँस्कृतिक विद्यापीठ चल पड़ेगी और नर-नारी दोनों क्षेत्रों में धार्मिक प्रेरणा का सत्प्रयत्न आरम्भ हो जायगा।
मालवा प्रान्तीय महायज्ञ
ता. 13,14,15 जनवरी को चचोर (मन्दसोर) में खात्याखेड़ी महावीर स्थान पर मालवा प्रान्तीय गायत्री महायज्ञ बड़े ही आनन्दपूर्वक रूप से संपन्न हुआ। 25 कुण्डों की विशाल यज्ञशालाओं में पाँच लाख आहुतियाँ दी गई हैं। यज्ञशाला, सभामण्डप, भोजनशाला सभी की सजावट बड़े सुन्दर ढंग से की गई थी। जेनरेटर से बिजली उत्पन्न करके इस सुनसान जंगल में बसे हुए गायत्री नगर को दिवाली जैसे प्रकाश से जगमग कर दिया गया था। बाहर से आये हुए आगन्तुकों के ठहरने के लिए फूस की सुन्दर कुटिया बनाई गई थी। कुछ तम्बू भी थे। मेले जैसा बाजार भर गया था। दूर-दूर गाँवों से लगभग 15 हजार जनता प्रातःकाल आ जाती थी और यज्ञ के दर्शन तथा प्रवचन सुनने के बाद शाम को जाती। अतिथियों तथा दूर से आने वाले सभी सज्जनों के लिए निःशुल्क भोजन की समुचित व्यवस्था थी। लगभग 100 मन बूँदी (मिठाई) का प्रसाद वितरण किया गया। मथुरा से आचार्य जी, स्वामी प्रेमानन्द जी, कुँ. नत्थासिंह जी तथा अन्यान्य स्थानों से बड़े-2 विद्वान व्याख्यान दाता पधारे थे। वैद्य कन्हैयालाल जी मिश्र ने मथुरा पूर्णाहुति के अवसर पर इस मालवा प्रान्तीय यज्ञ का संकल्प किया था, वह चचोर तथा अन्यान्य ग्रामों के श्रद्धावान सत्पुरुषों के सहयोग से पूर्ण सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। इस यज्ञ से इस प्रान्त में धार्मिक भावनाओं की असाधारण जागृति हुई है। लोगों ने ऐसा धार्मिक दृश्य अपने जीवन भर में नहीं देखा था। सैकड़ों नर-नारी गायत्री उपासना करने तथा धार्मिक जीवन बनाने के लिए तत्पर हो रहे हैं। लगभग 180 नर-नारियों ने यज्ञ में मन्त्र दीक्षा ली तथा यज्ञोपवीत संस्कार कराये।
इस यज्ञ के बाद अब उस क्षेत्र में गायत्री उपासक बनाने तथा गायत्री परिवार की शाखाएं स्थापित करने का कार्य पूरे उत्साह से किया जाने को है।
-राम किशन शर्मा
इस मास निम्नलिखित स्थानों पर गायत्री परिवार की शाखाएं स्थापित हुई हैं।
सिरसी (खीरी), महबूबाबाद (बारंगल), बंजरिया (खीरी), शेखनपुरवा (लखीमपुर खीरी), रनायल (शाजापुर), इमलिया (बिजनौर), रेउरी (सीतापुर), चाँचौड़ा (गुना), लखनपुर (दरभंगा), पलासी (पुर्णिया), बाय (सीकर), बिजनौर (उ.प्र.), हरगनपुर (बिजनौर), लसुडिया (शाजापुर), लामटा (बालाघाट), फुलवरिया (चम्पारन), कैमोर (जबलपुर), फल्यापुर (निमाड़), कनगेटी (मन्दसौर), चितई (अल्मोड़ा), सालेचौका रोड (नरसिंहपुर), कोटवाडा (निमाड़) ध्रागंध्रा (सौराष्ट्र), प्रमोदकुँज घुमनी (बहरायच), ललितपुर (झाँसी), छींच (बाँसवाड़ा), पतरा (कानपुर), बोरलाय (निमाड़), माँदला (होशंगाबाद), टीकमगढ़ (वि.प्र.), हरीगढ़ (झालावाड़), मंझिया (हरदोई), लश्कर (ग्वालियर), विक्रमपुर (बरेली), दलेतनगर (बरेली), सुन्दरी (बरेली), कोटा (राज.), राजपुर (निमाड़), जयपुर (राज.) नरयावली (सागर), बरहकुम्भा (पुर्णियाँ), बेसंडी (फतेहपुर), कनवास (कोटा), खुसरुपुर (पटना), नानपारा (बहरायच), गोगी (गुलवर्गा), डोडै (संथाल परगना), आकेली (मेडता सिटी), बागोद (निमाड़), मऊनाथ भंजन (आजमगढ़), पलसापारा (कालाहाँडी), नगला महासिंह (आगरा), चाँपा (बिलासपुर), मियाड़ा (कोटा), मच्छर गाँवा बाजार (चम्पारन), हसनापुर (खीरी), पिठौरा कलाँ (पीलीभीत), डूँडलोद (जयपुर), देवरी (विलासपुर), अरौल (कानपुर), ईसानगर (खीरी लखीमपुर), सीलवासा (सूरत), अहमदाबाद (गुजरात), सरसीवाँ (रायपुर)।
शाखाओं को सूचना
ता. 20 जनवरी को अबतक की स्थापित सभी शाखाओं को परिपत्रों का एक पार्सल भेजा गया है। जिसमें (1) “शाखाओं के लिए आवश्यक प्रेरणाएं” की एक विज्ञप्ति (2) ‘मासिक रिपोर्ट’ के चार फार्म, (3) ‘आज की सर्वोपरि आवश्यकता’ शीर्षक परिपत्र सदस्यों की संख्या जितने (4) ‘महिलाओं की साँस्कृतिक शिक्षा’ लेख विचारशील सज्जनों के लिए, भेजे गये हैं। यह पार्सल अब तक सभी शाखाओं में पहुँच चुके होंगे और उनका यथावत उपयोग हुआ होगा ऐसी आशा है। यदि डाक की गड़बड़ी में किसी शाखा का पार्सल न पहुँचा हो तो तुरन्त सूचना देकर वह सब फिर मँगा लें।
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वृहद् यज्ञों के लिए असाधारण उत्साह
असुरता से लड़ने और देवत्व को विजयी बनाने के लिए धर्म प्रेमी आत्माओं में इन दिनों उत्साह लहरें मार रहा है। सामूहिक बड़े-बड़े यज्ञों की तैयारी में कितने ही सत्पुरुष अपने-अपने क्षेत्रों में जुटे हुए हैं। इन्हीं दिनों कई बड़े-बड़े यज्ञों की योजना सुनिश्चित हो चुकी है।
1- बसन्त पंचमी के अवसर पर पलायथा (राजस्थान) में 9 कुण्डों का यज्ञ, ता. 4, 5, 6 फरवरी को होगा।
2- पीपलदा (कोटा) में माघसुदी 15 के अवसर पर 25 कुण्डों का विशालकाय यज्ञ होगा, कार्यकर्ता गण व्यवस्था में दिन−रात एक कर रहे हैं।
3- माकडौन (उज्जैन) में 25 कुण्डों का गायत्री यज्ञ चैत्र सुदी 15 को होगा। तैयारियाँ की जा रही हैं।
4- शामगढ़ के श्री स्वामी सच्चिदानन्द जी महाराज वैशाख की सोमवती अमावस्या को 25 कुण्डों का यज्ञ आयोजन कर रहे हैं।
धुरट (जालौन), साँगौद (राजस्थान), पटुवा (खीरी), आरंग (रायपुर), बड़ेसरा (अलीगढ़), बरेली, शाहजहाँपुर, मोरबी (गुजरात) आदि कितने ही स्थानों में बड़े-बड़े यज्ञ होने निश्चित हैं। इनकी तारीखें ही तय होनी बाकी हैं।
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देव दर्शन का अलभ्य लाभ
श्री विष्णु दत्त जी, दरियागंज दिल्ली अपने पुरश्चरण काल में हुए अनुभवों को लिखते हैं- कुछ दिनों लगातार उपासना के बाद प्रथम बार मुझे भृकुटी के मध्य में प्रकाश का दर्शन हुआ प्रथम दीपक जैसा, पुनः बिंदु सी ज्योति हो गयी। फिर तो नित्य रंग-बिरंगे-प्रकाश, सूर्य, चन्द्र, अनन्त दिव्य प्रकाश दिखाई देते रहे। कभी कृष्ण, विष्णु, शिव एवं सूर्य देव साक्षात से दीख पड़ते- कभी बड़े-बड़े सुन्दर महल, मन्दिर, हंस, बैल, हाथी, घोड़े भी दिखाई दिये। कई बार हृदय देश में अत्यन्त चमकीला प्रकाश भी देखा। कई दिन तो कुछ मित्रों के सामने दीवाल पर एक उज्ज्वल प्रकाश आकर स्थिर हो गया। वे लोग देखकर आश्चर्य चकित थे।
दुर्व्यसन छूटे
श्री भैयालाल रघुवंशी अध्यापक वी.टी. कालेज भोपाल लिखते हैं- मैं गायत्री उपासना करते अवश्य ही धीरे-धीरे अनेकों दुर्गुणों एवं दुर्व्यसनों से मुक्त हो गया, पर बीस वर्षों से बीड़ी तम्बाकू पीने की बुरी लत को नहीं छोड़ सका। हार मानकर मैंने अपने गुरुदेव से इसके लिए प्रार्थना की। उनका उत्तर आते ही अन्दर से पवित्र शक्ति उमड़-उमड़कर मेरे इस बुरी लत के उठे हुए वेग को रोक देती है। मुझे आश्चर्य होता है कि पत्र में क्या जादू था जो आज माता ने मेरे अन्दर रोक सकने की शक्ति उड़ेल दी है। मुझे लगता हैं- माता का प्रत्यक्ष स्वरूप ही गुरुदेव हैं। यही हमारी श्रद्धा है।
बुरे दिन फिर गये
श्री लालमणि शर्मा, हापुड़ (मेरठ) अपना अनुभव लिखते हैं- एक सज्जन बारह वर्ष से एक महाजन के झूठे मुकदमें के फेर में पड़े हुए थे। उसकी दुकान और मकान सभी जब्त करा लिए गये थे। अन्त में अकिंचन बन कर गायत्री माता की शरण में आया। उसने सवा लाख गायत्री अनुष्ठान का संकल्प दिया। अनुष्ठान पूरा होते ही उसके इतने दिन से चलने वाले मुकदमें में विचित्र परिवर्तन और विस्मय के दृश्य उपस्थित हुए। पहले का न्याय कर्त्ता बदल गया और इस तारीख को इस उपासक के वकील ने विरोधी के वकील जिसकी फीस 4000) रु. थी, ऐसे प्रश्न पूछे कि वह स्तब्ध रह गया कोई उत्तर नहीं दे सका। यह माता की ही कृपा थी जो उसे इतने दिन बाद मुकदमे में जय मिली और उसकी दुकान एवं मकान सहित उसके भाड़े भी विरोधी को देने पड़े।
62 वर्ष की आयु में पुत्र जन्म
श्री केदारनाथ तिवारी, तरौंदा, इटारसी लिखते हैं- मैं श्रद्धापूर्वक गायत्री जप तथा एक बार गायत्री चालीसा का पाठ कर रहा हूँ- विशेष कर तब से, जब से तीन लड़की होने के बाद सन्तान होना बन्द सा हो गया। एक बार मेरी लड़की दुलारीबाई ने भी तपोभूमि आकर गुरुदेव से भाई देने की प्रार्थना की। इसके बाद ही माता की कृपा से 62 वर्ष की उम्र में कार्तिक बड़ी द्वादशी को मेरे घर में प्रातः ही पुत्र के जन्म से आनन्द का प्रकाश छा गया। मुझे तो गुरुदेव की याद करने से माता की छवि देखने को मिलती है और माता की याद से गुरुदेव का क्या रहस्य है यह तो माता ही जाने।
तोप के गोले से भी न मरा
श्री रामकुमार शर्मा, कनवास (कोटा) माता की शक्ति के बारे में लिखते हैं- दीपावली के दूसरे दिन राजस्थान में बैल पूजा का उत्सव खूब धूम-धाम से मनाया जाता है। इस उल्लास में पटाखे बन्दूक और गाड़ी में बाँध कर छोटी तोपें भी छोड़ी जाती हैं, मैं उस उत्सव में शामिल होने जा रहा था। एक जगह गाड़ी में बंधे तोप में 10-12 मुट्ठी बारूद भरकर उसमें बत्ती जलायी जा चुकी थी, बत्ती जलाने वाले आग लगा कर वहाँ से दूर हो गये थे। मैं तोप से करीब तीन हाथ फासले पर अनजाने चला गया था- मुझे देखते ही मेरे परिचित हटने की ध्वनि में चिल्ला उठे तब तक तोप छूट चुका मुझे जोर का धक्का लगा। सिर घूम गया। दिल घड़-घड़ करने लगा। मैं बैठ गया पर माता की याद करना नहीं भूला। सभी मेरी रक्षा हो जाने पर आश्चर्य चकित थे। मुझे उस धक्के के सिवाय और कोई भी चोट नहीं पहुँची थी।
भूत भाग गया
श्री विश्वनाथ पाण्डेय, दानापुर (पटना)लिखते हैं कि मैं एक बार अपनी छोटी बहिन के यहाँ आरा गया था। वहाँ उस पर प्रेत का आक्रमण हुआ करता था उस दिन भी हुआ। उसकी सास ने कहा- बेटा! सुना है तुम गायत्री जपते हो, सो जरा अपनी बहन को जाकर देखो। मैंने जाकर देखा वह बेहोश सी पड़ी थी। मैंने गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित जल के छींटे मारे। वह झूमने लगी- कुछ देर बाद अपने होश में आ गई। शाम को फिर आक्रमण हुआ। तब मैंने अपने बड़े भाई को, जो निष्ठावान गायत्री उपासक हैं, उन्हें बुला लाने के लिए एक आदमी को रानापुर भेजा। खबर मिलते ही यज्ञ भस्म लिए यथाशीघ्र आये। उनके आने पर वह आक्रमित दशा में थीं। उन्होंने भस्म लगाकर अभिमंत्रित अच्छतों के छींटे मारे। अच्छत लगते ही वह मूर्च्छित हो गयी। फिर होश में आ गयी। उनके ससुर ने डाक्टरों से हिस्टीरिया रोग कह कर बहुत इलाज कराये थे- पर कभी आराम नहीं हुआ। भाई जी के द्वारा आक्रमण दूर होने पर फिर कभी भूत लौट कर नहीं आया। अब वह पूरी स्वस्थ है।
मुकदमे में जीत
पं. लक्ष्मी चन्द तिवारी, लखाली, माता की करुणा का वर्णन करते हैं- मेरे पास जीविका का एक मात्र साधन थोड़ी सी जमीन है। एक धनी आदमी ने पता नहीं किस आधार उस पर अधिकार पाने की पावी कर दी। मुकदमा चलते हुए चार महीने बीत गये। सभी को पैसे वाले के पक्ष में अदालत के फैसले का विश्वास था। हम लोग एक मात्र गायत्री भरोसा था रट लगा रहे थे। फैसला सुनाने के दिन हम लोगों का चूल्हा तक न जला, पर माता की कृपा से न्यायपूर्ण फैसला ही हुआ। जमीन हमारी रह गयी। धन्य हो माँ!
सूने घर में कमल फूल खिला
श्री गोविन्द प्रसाद चाँचौड़ा (म.भा.) अपनी कृपा उपलब्धि का वर्णन करते हैं-
संतान के अभाव में सब सुख होते हुए हमारा घर श्मशान सा था। सन्तान होती भी थी तो अकाल मृत्यु की गोद में चली जाती। इस बार हम लोगों ने धर्मपत्नी सहित खूब प्रेम से माता की उपासना प्रारम्भ कर दी। कुछ दिनों में सपने में माता ने दर्शन दिया बाद में पत्नी के गर्भवती होने की जानकारी मिली। हमारी उपासना अजस्र चलती रही। एक दिन सपने में माता ने कहा- तुम बड़े चिन्तित थे- लो यह फूल। इतना कहकर कमल का फूल मेरे हाथ में देकर माता तिरोहित हो गयीं। उसके पाँचवें दिन कमल सा प्रफुल्लित पुत्र उत्पन्न हुआ। जो माता की छाया में संरक्षित घर को प्रकाशित कर रहा है।
उदर रोग से मुक्ति
श्री पद्मसिंह गुप्ता, रीडर टोंक जब मैं कोटा दौरे पर गया हुआ था। तब मैंने एक सज्जन के पास गायत्री-ज्ञानाँक देखा। तभी से मैंने नित्य नियमित रूप से दस मालायें गायत्री जप का नियम बना लिया और उसका पालन हृदय से करने लगा। पिछले दो वर्ष से मैं उदर रोग से पीड़ित था और हजारों रुपये डॉक्टर और वैद्यों में व्यय कर चुका था। यहाँ तक कि उक्त बीमारी के कारण जीवन भार स्वरूप प्रतीत होता था। अभी गायत्री जप प्रारम्भ किये केवल दो ही मास हुये थे कि रोग कुछ कम हो गया। एक रुपये से बारह आना दर्द कम महसूस होने लगा। वास्तव में मेरे लिए तो गायत्री जप एक रामबाण औषधि ही सिद्ध हुआ। इससे मुझे अब पूर्ण रूप से रोग मुक्त हो जाने का विश्वास हो गया है। मैं गायत्री माता का कि तना आभारी हूँ।
बिजनौर में गायत्री परिवार का कार्य सराहनीय ढंग से चल रहा है। पतस्विनी विद्यावती जी तथा मगनदेवी जी का कार्य विशेष रूप से सराहनीय है। गायत्री यज्ञशाला पर, तीस-तीस, 40-40 की संख्या में महिलाएं जब एक साथ आसन लगाकर जप करती हैं तो वहाँ ऋषि आश्रमों का दृश्य सामने आ जाता है। मथुरा पूर्णाहुति के बाद से अब तक बिजनौर में तीन, गंगातट पर दो, इस प्रकार यहाँ पाँच बड़े-बड़े सामुदायिक यज्ञ हो चुके हैं। जिनमें लाखों आहुतियों का हवन हुआ और कम से कम 1500 ऐसे ऋत्विजों ने भाग लिया जिनने कई-कई अनुष्ठान, पूर्ण विधि-विधान के साथ किये थे। पहला यज्ञ पाँच दिन, दूसरा तीन दिन, तीसरा 4 दिन चला। यज्ञ के दिनों में प्रातः 5 बजे से 7 बजे तक माइक्रोफोन पर वेद पाठ की ध्वनि और हवन के समय गायत्री मंत्र के सामूहिक उच्चारण से शहर का वातावरण ही बदला सा जान पड़ता था। दोपहर कथा, सत्संग और रात्रि में कीर्तन रहता था। हवन के पश्चात परिक्रमा में इतनी भीड़ होती थी कि मथुरा की पूर्णाहुति का दूसरा दृश्य मालूम होता था।
इन दिनों यज्ञशाला में हर रविवार को 2 हजार आहुतियों का सामूहिक हवन होता है। गायत्री परिवार की 92 व्यक्तियों की छः शाखाएं बिजनौर बन चुकी है। प्रयत्न भी जारी है, उत्साह और परिश्रम से सच्चा प्रयत्न किया जाय तो हर जगह ऐसी ही सफलता मिल सकती है। -अशर्फीलाल मुख्तार
गायत्री कुटीर (जासलपुर) के सदस्यों ने आगामी गायत्री जयंती के अवसर पर एक बड़ा सामूहिक यज्ञ करने का निश्चय किया है। ब्राह्मण अनुष्ठान में सहयोग देने के लिए सभी सदस्य शक्ति भर प्रयत्न कर रहे हैं। -पुरुषोत्तम आत्माराम साखरे
पारडी (सौराष्ट्र) में 24 लक्ष जप तथा एक लक्ष आहुतियों का हवन का आयोजन हो रहा है। हवन की तिथियाँ फरवरी के अंत में रहेंगी। यज्ञ के साथ-साथ वैदिक धर्म परिषद तथा संस्कृत भाषा का सम्मेलन भी होगा। -मंत्री गायत्री महायज्ञ समिति
खेरालु (गुजरात) में श्री महालक्ष्मी मंदिर पर बड़े उत्साहपूर्वक गायत्री महायज्ञ हुआ। जिसमें विसनगर तथा मेहसाना तक से गायत्री उपासक आये थे। यज्ञशाला में शोभा सजावट देखते ही बनती थी। 70 ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। अब चाणस्मा और पाटन में भी यज्ञों की तैयारी हो रही हैं।
-श्यामशंकर नाथालाल त्रिवेदी
कोंच (जालौन) में नाथूराम अवस्थी के स्थान पर गायत्री परिवार का एक अच्छा यज्ञ हुआ। धार्मिक प्रवचनों के बाद होली के अवसर पर एक बड़ा यज्ञ करने के सम्बंध में महत्वपूर्ण मंत्रणा की गयी।
-श्यामलाल पहारिया
पलासी, पूर्णिया में 24 हजार आहुतियों का हवन बड़े आनंदपूर्वक ता. 14, 15, 16 दिसम्बर को हुआ। ग्रामीणों का सहयोग प्रशंसनीय था। वाणी विलास विद्यालय के प्रधानाध्यापक पं. उमाकाँत मिश्र तथा छात्रों का उत्साह बड़ा अभिनंदनीय रहा। यहाँ से प्रेरणा प्राप्त करके अन्य ग्रामों में भी गायत्री परिवार बनने वाले हैं। -खुशीनाथ शर्मा
गत अमावस्या को भद्रपुर (फतेहपुर) के गायत्री उपासकों द्वारा एक वृहद यज्ञ हुआ। साथ ही अखंड रामायण पाठ, अखण्ड घृत दीप, प्रवचन आदि के द्वारा परम सात्विक वातावरण दृष्टिगोचर हो रहा था।
-रामाश्रय वर्मा एम.ए.
आरंग (रायपुर) की शाखा में संकल्प किया कि ब्रह्मस्त्र अनुष्ठान की पूर्ति के लिए शाखा सदस्य एक वर्ष तक प्रतिदिन 24 हजार जप, 24 गायत्री चालीसा पाठ, 600 मंत्र लेखन तथा 24 आहुतियों का हवन किया करेंगे। -विद्या प्रसाद मिश्र
कोलमी रैकोवा में वर्णे नदी के किनारे गाय अनुष्ठान की पूर्ति के उपलक्ष में पौष वदी 30 हवन तथा माघवदी को 1 ब्रह्मभोज हुआ। आमंत्रित सज्जनों को गायत्री साहित्य भेंट किया गया। -रोहिणी प्रसाद शुक्ल
मिर्जापुर (राजस्थान) में फागुन बदी 13, 14,- 30 को 24 हजार आहुतियों का एक वृहद यज्ञ होने जा रहा है। तैयारियाँ जोरों से हो रही है।
-श्रीकृष्ण शर्मा वाराँ
मंझिया (हरदोई) में बसंत पंचमी को एक बड़े सामूहिक यज्ञ की व्यवस्था की गई है। शाखा के सदस्य बढ़ाये जा रहे हैं।
-शिवराम दीक्षित
मच्छर गाँवा (चम्पारन) के सदस्यों की एक महत्वपूर्ण बैठक रानी कृष्ण राज कुमारी के यहाँ हुई, जिसमें गायत्री परिवार के संगठन कार्य को आगे बढ़ाने और अधिक मजबूत करने के लिए सभी सदस्यों ने प्रतिज्ञा की। -सीताराम गुप्त
गायत्री मंत्रों के द्वारा एक सामूहिक यज्ञ करके इंदौर में गुरव ब्राह्मण नवयुवक मंडल की स्थापना की गई। सभी सदस्यों के लिए गायत्री उपासना का एक आवश्यक नियम रखा गया है। -सदाशिव शर्मा
डभोड़ा (मेहसाना) के अज्ञान ग्रस्त आदिवासियों के क्षेत्र में 24 हजार आहुतियों का एक यज्ञ तीन दिन में बड़े ही आनंद व उत्साहवर्धक वातावरण में 1 जनवरी को सम्पन्न हुआ। पूरे गाँव की जनता सब काम छोड़कर इस आयोजन को सफल बनाने में लग गयी। तीन मन मिठाई का प्रसाद बाँटा गया। -हरिप्रसाद रविशंकर जानी
मुसावल की गायत्री शाखा के द्वारा हर पूर्णिमा को एक हजार आहुतियों का हवन तथा गायत्री सहस्र का पाठ होता है। रविवार को सत्संग क्रम उत्साहपूर्वक है। -माधव कौतिक ढ़ाके
पलायथा (राजस्थान) में 9 हवन कुण्डों की यज्ञ शाला में ता. 4, 5, 6 फरवरी को एक वृहद यज्ञ होगा। मथुरा से आचार्य जी तथा अनेक विद्वान पहुँचेंगे। आगन्तुकों के निवास भोजन आदि के लिए समुचित व्यवस्था की गयी है। -राम रत्न शर्मा पंचोली
गत महीने यहाँ गायत्री पुस्तकालय की भी स्थापना हुई, जिसमें समस्त गायत्री साहित्य मंगाया गया तथा अन्य धार्मिक पुस्तकें संग्रह की जा रही हैं। फिलहाल काम चलाकर साहित्य प्राप्त हो चुका है। स्थानीय प्रतापेश्वर मंदिर के जीर्णोद्धार के लिए चंदा करके उस स्थान को बहुत सुँदर बना दिया गया है।
-बैजनाथ प्रसाद सौनकिया
सुसनेर शाखा के सदस्यों में इन दिनों अच्छा उत्साह है। चैत्र सुदी 15 या बैशाख वदी 30 को एक बड़ा यज्ञ करने के लिए प्रयत्न हो रहा है। आस-पास के गाँवों में और भी शाखाएं स्थापित होने की शीघ्र संभावना है। -नंद किशोर शर्मा
मकर संक्रान्ति के अवसर पर विजौली (फतेहपुर) के गायत्री उपासकों ने मिल कर एक अनुष्ठान पूर्ण किया। चौ. गजराज सिंह के स्थान पर सामूहिक हवन हुआ। श्रीकाँत जी मौर्य का यज्ञोपवीत भी इस अवसर पर हुआ।
-रामसनेही वर्मा
गायत्री परिवार बहेड़ी ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर 26 जनवरी को एक सामूहिक हवन करने का निश्चय किया है। धार्मिक प्रवृत्ति के अधिक लोगों को इसमें सम्मिलित करने का प्रयत्न किया जा रहा है।
-भागीरथी गुप्त
चाँपा (बिहार) की शाखा ने सामूहिक हवन पर बहुत जोर दिया है। प्रति रविवार को अच्छा हवन होता है, जिसमें बहुत लोग भाग लेते हैं।
-पुनीराम वैद्य
सतना की शाखा के रविवासरीय सत्संगों में 3 घंटे का कार्यक्रम रहता है। हवन, सामूहिक गायत्री जप, चालीसा पाठ, संगीत, पूजा, आरती में धर्म प्रेमी सदस्य श्रद्धापूर्वक भाग लेते हैं। -राधा रमन मिश्र
लघु अनुष्ठान तथा गायत्री यज्ञ का कार्यक्रम इस बार महूडिया में रखा गया। प्रत्येक अमावस्या को यही क्रम पृथक-पृथक स्थानों पर रहता है।
-नंद लाल शर्मा
बावगंज (बरेली) में प्रत्येक शुक्रवार को सामूहिक सत्संग एवं प्रत्येक पूर्णिमा को लय पर हवन होता है। पं. रामाभिलाष शास्त्री द्वारा संकल्पित 24 लक्ष मंत्र जप एवं चालीसा पाठ का क्रम उत्साहपूर्वक चल रहा है। गत मास सुन्दरी, विक्रमपुर, दलेल नगर, कचनारा में गायत्री परिवार की कई शाखाएं तडडडडड की गई जिनमें क्रमशः सर्व श्री चन्द्र प्रकाश वार, चतुर्भुज गंगवार, शिवदयाल गंगवार, विद्याराम गंगवार का सहयोग बड़ा सराहनीय।
-श्याम मनोहर कपूर
कलुआ (बरेली) में गत मास एक अच्छा सामूहिक यज्ञ हुआ जिसे सफल बनाने में श्री प्रताप नेश्वरनाथ शुक्ल एवं श्री नानकचन्द टण्डन ने शेष सहयोग दिया।
-बामूराम शर्मा
श्री शान्तवनजी मिस्त्री गुजरात प्रान्त में सवा करोड़ मंत्र लेखन कराने का संकल्प लेकर इस क्षेत्र में बड़े उत्साहपूर्वक कार्य संलग्न हैं। अब तक कई लाख मंत्र लिखे जा चुके हैं। कुछ दिन पूर्व सरढव में एक कुण्डी यज्ञ हुआ, जो सात दिन तक चलता।
-योगेन्द्रनाथ ब्रह्मचारी
कुल्हार में माघ सुदी 12 को अखण्ड गायत्री जप, यज्ञ तथा कन्याओं का ब्रह्म-भोज रखा गया है।
-रामसहाय तिवारी
हसवा (फतेहपुर) में गायत्री परिवार द्वारा सामूहिक हवन हुआ। संध्या समय कीर्तन प्रवचन हुआ। समस्त सदस्यों द्वारा मंत्र लेखन आरम्भ कर दिया गया है। -रामावतार शर्मा
रानी मूँड़ा (काला हाँडी) उड़ीसा में पौष सुदी को सामूहिक गायत्री जप तथा हवन हुआ। और प्रवचनों का भी आयोजन था।
-हरिकृष्ण शर्मा
गायत्री परिवार कानपुर का कार्यक्रम शान्त और सुव्यवस्थित रीति से चल रहा है। छठवां यज्ञ वद नगर में पं. सूर्यकुमार पाण्डेय के यहाँ, सातवाँ आर्य नगर में श्री जे.डी. कपूर के यहाँ, आठवाँ खलासी लाइन में पं. अयोध्याप्रसाद दीक्षित के यहाँ, नौवाँ यज्ञ पाँच नम्बर गुमटी पर श्री मुरारी लालजीपुरी- एजेन्ट स्टेट बैंक के यहाँ, बड़े आनन्द पूर्वक हुआ। दसवाँ रेलवे काटर्स जूही में पं. बाँकेलाल शर्मा के यहाँ होने की तैयारी हो रही है। सभी यज्ञों में अनेकों भद्र नर-नारी श्रद्धापूर्वक सम्मिलित होते हैं।
-अयोध्याप्रसाद दीक्षित
मालेगाँव (नासिक) में साप्ताहिक सत्संगों में बड़ा उत्साह रहता है। दो हजार आहुतियों तथा 40 गायत्री चालीसा का पाठ हर सप्ताह होता है। नैष्ठिक उपासकों की संख्या भी बढ़ती ही जा रही है।
-माँगी लाल पुखराज दायमा
उचावद निमाड़ में मकर संक्रान्ति के अवसर पर 5 कुण्डों की यज्ञशाला में 24 हजार आहुतियों का हवन बड़े आनन्दपूर्वक सम्पन्न हुआ। श्री राजा भारऊ केशरे तथा अन्य ग्रामीण वासियों का सहयोग देखते ही बनता था। लगभग एक हजार व्यक्ति उपस्थित थे। बाहर के गाँवों से करीब 50 साधक आये थे। गाजे-बाजे के साथ हुई नगर फेरी में सभी को बड़ा उत्साह था। यज्ञ विधि पं. व्यंकटेश शर्मा खलघाट तथा पं. वंशीधर शास्त्री महेश्वर ने कराई। बोरलाय तथा पाडल्या में भी उत्साहवर्धक यज्ञ हो चुके हैं।
-व्यंकटेश शर्मा
बिजौली (कानपुर) में 24 हजार आहुतियों का एक बड़ा यज्ञ बसन्त पंचमी को होना निश्चित हुआ है। तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी है।
-र.स.
साँगोद (राजस्थान) में जेठ वदी 2, 3, 4 तदनुसार ता. 16, 17, 18 मई को 9 कुण्डों का हवन होगा, जिसमें 24 लक्ष जप तथा सवा लाख आहुतियों का हवन होगा।
-बद्रीप्रसाद पंचौली
धुरट (जालौन) में ता. 10, 11, 12, 13, 14 को 6 कुण्डों को एक विशाल यज्ञ होने जा रहा है।
-शिवचरणलाल
माँ, तेरे अरुणिम अधरों ने जगती को जीवन-दान दिया।
तेरे चुम्बन से प्राण मिले जग ने तेरा स्तन-पान किया॥
हे महालक्ष्मी, जीवन का संचित सुख दिया भुवन में भर।
पहनाया खिला-पिला सुख से सन्तानों को सुखमय कर-कर॥
माँ सरस्वती, थपकी दे दे तुमने अपनी लोरी गायी।
सम्पूर्ण ज्ञान-बल विद्या की वीणा तुमने ही झनकायी॥
गौरी, तुमने ममता द्वारा जग-शिशु को पाला, बड़ा किया।
तुमने ही इसको वाणी दी उँगली दे-देकर खड़ा किया॥
माँ अन्नपूर्णा, गोदी भर सुख से जग बालक खिला-खिला।
धोया मुख अन्न-प्राश करना धूसर तन पर, कर फिरा-फिरा॥
माँ अनसूया, तेरी गोदी रो-रो कर खेले जग-त्राता।
तेरी गोदी में कौशल्या, हँस-हँस कर राम छिपक जाता॥
यशमयी यशोदा, श्याम विचर तेरी गोदी में सो जाता।
विकराल क्रुद्ध वह परशुराम कर दूध पान चुप हो जाता॥
गौतमी महामाया तूने जग को करुणा का गान दिया।
अपने छोटे से चुम्बन से अपवर्ग-स्वर्ग का मान दिया॥
हे दैत्यनाशिनी, उतरी तू हो भयंकरा, हो विकराला।
देवी, काली, चामुण्डा बन दानव-दल सौंहड़ कर डाला॥
सुत कसे कमर मुँह में लगाम दो-दो तलवार घुमाती थी।
लक्ष्मीबाई तू दैत्यों पर पल-पल बिजली बरसाती थी॥
हे कर्मवती, तेरी असि भी मेवाड़ मध्य झंकार रही।
नीला, तेरी छुरियाँ अब तक नागिन बनकर फुफकार रही॥
जीते-जी काट दिया सिर को धर दिया और असि पर पानी।
तू किरणमयी, तू पद्मा है, तू वीर-प्रिया हाँडी रानी॥
सावित्री, तेरे तप ने ही यम को भी यहाँ छकाया था।
सीता वन-वन में विचरी थी पतिव्रता धर्म निभाया था॥
तेरी साीडडडडड की धारी पर रच गया महाभारता पूरा।
अपना कुन्तल अपराध देख तू भभक उठी बनकर शूरा॥
दशरथ के सँग कैकेयी बन तू दानव दल में अर्राइ।
देवी, तेरे की वाणी में दानव-दल हुए धराशायी॥
तेरी महिमा ममता में है करुणा में है सेवा में है।
दे आत्म-समर्पण की बल्ली तू भव-सागर खेवा में है॥
(श्री शंकरलाल शर्मा, एम.ए., एल.टी)
*समाप्त*