हे देवी, वेदों की माता तुम भूमा भी कहलाती हो।
तुम विन्ध्यवासिनी चामुँडा चंडी दुर्गा बन जाती हो॥
हे आदि शक्ति तुम अलख निरंजन हो जग की पालन कर्त्ता।
भय शोक क्लेश विध्वंसक हो दुख दारिद्र दैन्य सकल हर्त्ता॥
ब्रह्म रूपिणी प्रणत पालिनी जग की धात्री श्री जगदम्बा।
भवभय तारिणि सब सघ हारिणि, अविनाशी अमले श्री अम्बा॥
तुम ही माँ शची स्वधा स्वाहा ब्रह्माणी सीता राधा हो।
सतरूपा कमला रुद्राणी बन कर हरती जग बाधा हो॥
तुम कामधेनु सत्चित् आनंद गंगा प्रणव महा महिमे।
सविता की शाश्वती शक्ति हो सावित्री शोभा गुण गरिमे॥
सब वेद शास्त्र उपनिषद् ग्रन्थ, रामायण महाभारत और गीता।
हो ऋषि मुनि योगीजन द्वारा सब स्मृतियों की तुम निर्माता॥
गो सुर मुनि मानव रक्षा हित तुम अष्टसिद्धि बन कर आई।
संहार असुरता का करने तुम काली बन कर किलकाई॥
भारत की केवल नहीं माता सारे जग की तुम संस्कृति हो।
सामाजिक आत्मिक वैयक्तिक बाधा दलने की युक्ति हो॥
जिसने तुमको जिस भाँति जपा माँ वैसा ही फल पाया है।
मन की अभिलाषा पूरी हुई मिट गई दुःखों की छाया है॥
हम दीन हीन शिशु हैं तेरे सामर्थ्यवती तुम हो माता।
शरणागत का उद्धार करो जय भव बंधन हर्त्री माता॥
(श्री रूपरामशर्मा, धगवाँ)
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(श्री सी.टी. वेणुगोपाल)
आज विश्व जिन संघर्षशील परिस्थितियों से गुजर रहा है और स्वार्थों की अन्ध लीकपर मानव आदर्शों की जिस प्रकार बलि दी जा रही है, उसे देखकर प्रत्येक आत्मचेता और शान्ति के उपासक को इस बात का अनुभव हो रहा है कि वर्तमान भौतिक विश्व का मन और सत्य प्राण की निष्ठा से दूर महानाश की ओर तीव्रता से अग्रसर हो रहा है। सम्पूर्ण समाज राष्ट्र और संसार लिप्सा तथा लालच के मद से व्यग्र अन्धकार की चादर में आत्मा के सत्य बोध को छिपाता चल रहा है। दूसरे पर हावी होना, बिना प्रयत्न अधिकार की माँग करना और बराबर असंतोष की अग्नि में जलते रहना आज के मनुष्य का चारित्रिक गुण बन गया है। झूठे भौतिक ज्ञान की चकाचौंध ने मनुष्य को अन्तश्चेतना से दूर फेंक दिया है और कार्य करण के वैज्ञानिक अनुसंधानों ने उसे एकाँत अनुभव के प्रेरक स्वरों से विमुख कर दिया है। यही कारण है कि व्यक्ति अपने भीतर, अपने परिवार की परिधि में, अपने राष्ट्र की इकाई और अन्तर विश्व के साथ हर क्षण, हर पग अभाव और असंतोष का अनुभव करता, हर प्रकार का अनाचार तथा पाप, बिना संकोच बिना रोक केवल संहारिक शक्तियों के अहंबल से करता जा रहा है। विश्व इस रोग से जितना आज पीड़ित है संभवतः अपने पुराने दिनों में कभी न रहा होगा क्योंकि प्राचीन स्वप्नद्रष्टा महर्षियों ने वस्तु से अधिक विचार की और, बाह्य संचरण से अधिक अन्त संचरण तथा अन्तर्ध्वनि को स्थान दिया था।
समय-परिवर्तन की ही देन है कि औद्योगिक क्रान्ति के साथ जमाने ने करवट ली और बड़ी आशा तथा विश्वास के साथ साधन सम्पन्न होते मनुष्य के नेत्र खुले-उसने सोचा, इसी भौतिक सुख की प्राप्ति में वह सम्पूर्ण सुख की प्राप्ति कर लेगा, किन्तु उसकी इस अवस्था पर निरन्तर संहार होने लगा। महायुद्धों की भयंकर विभीषिकाओं ने उसके सुख-स्वप्न की स्वर्णाभा को महानाश का द्योतक बताया। कारण स्पष्ट है। इस अंधाधुँध सुख-सामग्री के संग्रह के पीछे मनुष्य समाज का केवल निम्नकोटि का स्वार्थ है और जहाँ स्वार्थ से मिलती है, वहां भयावह नर-संहार भी अनिवार्य होता है, ऐसा इतिहास और पुराने अनुभवों से सिद्ध है।
तो आखिर इस परिस्थिति में मनुष्य के आत्म-गौरव उसके शाश्वत सत्य आदर्शों की रक्षा कैसे हो? युगीन आदर्शों के प्रवर्तक रामकृष्ण, ईसा, मुहम्मद और महामानव ‘बापू’ की वाणी कैसे साकार एवं सार्थक हो आदर्श की बात करना, धर्म की चर्चा करना और आत्मान्वेषण का संकेत करना तो अब केवल और ढोंग की संज्ञा पाकर परित्यक्त कर दिया जाता है। फिर क्या दवा है इस महानाश के बुनियादी रोग की, जिसकी जड़ें मनुष्य की धमनियों का रस चूस कर दिनोंदिन तथा दृढ़ सशक्त होती जा रही हैं। कितना भला होता यदि मनुष्य केवल वस्तुओं और प्राकृतिक शक्ति सम्पन्न वस्तुओं के अन्वेषण और विश्लेषण में ही खोया न रहता। महान् आवश्यकता इस बात की है कि वह अपने मन का, अपनी भाव-दृष्टि और अगोचर स्वरों का विश्लेषण कर सही मार्ग-दर्शन कर पाता। महात्माओं ने हर युग में अपने मन की प्रयोगशाला में यह सत्य पाया है कि अपनी भावनाओं की ईमानदारी से की गयी समीक्षा सदा सही मार्गदर्शित है, उसे अन्धकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मरण से अमरता की ओर ले चलती है। यह उसकी अमर उत्कण्ठा रही है, जिसके स्वरों की संवेदना का अमर श्लोक यों है-
‘असतो मा सद्गमय।’ ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय।’ ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय।’
यदि मनुष्य-समाज उन प्रयोगों का आदर्श एक बार पुनः अपना पाता, तो मुझे विश्वास है कि विश्व की राक्षसी जिज्ञासा को शाँति तथा सत्य का निर्देश मिलता। मैं-केवल कहने के लिये बात कही जाय इसलिए ही ऊँचे आदर्श की बात करना प्रधान नहीं मानता। मेरे सम्मुख आज भी इसी युग की-थोड़े दिनों पूर्व घटने वाली दो ऐसी घटनाएं हैं जिनके प्रकाश में यदि मेरे उक्त कथन का विवेचन किया जाय, तो शायद संदेह और भ्रम का भली प्रकार निवारण हो जाय।
पहली घटना एक ऐसी महिला से सम्बन्धित है, जो बहुत बड़ी विज्ञानवेत्ता विदुषी और अध्ययन शीला है। हर वस्तु को, हर कारण तथा उसके परिणाम को वह बराबर ज्ञान के पलड़ों पर तौला करती थी। उसकी दृष्टि में आत्मा नाम की कोई शक्ति न थी, जिससे कभी प्रेरक वाणी या ध्वनि निकलती हो। उसकी विद्वत्ता ने उसे नास्तिक बना दिया था और वह सोचने लगी थी कि प्रकृति का संचालन प्रकृति की संघर्षशील द्वन्द्वात्मक शक्तियों मात्र से हो रहा है, इसके पीछे कोई प्रेरणा या प्रकाश ऐसा नहीं है, जो मनुष्य की पहुँच के बाहर हो। संयोग की बात थी कि इस महिला का पारिवारिक जीवन अतिशय कलहपूर्ण हो उठा था कुछ कारण वश उसकी छोटी बहिन और उसके पति उससे बुरी तरह रुष्ट हो गये थे जब भी उसने इन लोगों को प्रसन्न करने का प्रयत्न किया था, बराबर असफल रही। इस प्रकार की असफलता से उसकी निराशा बढ़ती गयी और धीरे-धीरे उसको विश्वास हो गया था कि अब भावी जीवन में कभी भी यह पारिवारिक कलह दूर न हो पायेगा। इस विदुषी को एक वृद्धा का सहवास मिला, जिसने उससे कहा, तुम एक बार अपना अहं छोड़कर मौन में विश्वास करो और नित्य-प्रति केवल आधे घंटे की मौन-साधना आरम्भ करो और साधना के इन क्षणों में अच्छी भावनाओं की ओर उन्मुख रहो। उस तर्कपूर्ण महिला की बुद्धि में पहले यह बात घुसी ही नहीं और उसने इस कार्य को केवल उपहास और व्यंग के साथ टाल दिया, किन्तु जब उसका मन इस कलह-पीड़ा से अतिशय उत्पीड़ित हो उठा और वह इसके निवारण के कुछ निमित्त कुछ भी करने को तत्पर हुई, तो उसने वृद्धा के आग्रह और आदेश पर मौन-व्रत धारण किया। कुछ दिनों तक उसने नित्य घंटे भर मौन रक्खा और फिर वृद्धा के पास जाकर कहा- ‘बूढ़ी माँ! मुझे इन दिनों केवल एक ही बात बार-बार परेशान करती रही कि मैं एक बार अपनी बहिन को सन्तुष्ट करने का और प्रयास करूं, किंतु मुझे तो यह विश्वास है कि मेरा फिर बहिन के पास जाना केवल निरर्थक ही नहीं आत्म-सम्मान के विरुद्ध भी होगा।’ वृद्धा स्त्री ने साँत्वना के स्वर में कहा- यदि तुम्हारे मौन का यही आदेश है तो तुम फिर एक बार वहाँ तक अवश्य जाओ-शायद तुम्हें महान परिवर्तन दिखायी पड़े।’ यह आदेश युवती को ठीक नहीं जान पड़ा। उसने सोचा समय और अर्थ यह सब फिर क्यों व्यर्थ लगाया जाय, कई बार जाकर देख चुकी हूँ कि कोई परिणाम नहीं निकलता। वृद्धा के कहने पर ही वह किसी प्रकार तैयार हुई और लम्बी यात्रा के बाद जब वह अपनी बहिन के यहाँ पहुँची तो देखा नौकर मकान में ताले लगा रहा था। नौकर ने उससे बताया कि उसकी मालकिन अपने पति के साथ बड़ी बहिन के यहाँ जा रही है। इस उत्तर से उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और जब उसका अपनी छोटी बहिन से साक्षात्कार हुआ, तो बहिन तथा बहिन के पति ने बहुत विनम्र होकर क्षमा-याचना करते कहा- ‘हमसे बड़ा अपराध हुआ और सचमुच हमने आपके साथ यह बहुत बड़ा अन्याय किया जो आपको बराबर दुखी करते आये और इतने दिनों तक सम्बन्ध विहीन रखा।’
यह कहानी नहीं ‘एक सच्ची घटना है’ जिसने मेरे विश्वास को बड़ा बल दिया है और मुझे उस बूढ़ी माँ का यह कथन भूलता नहीं जो उसने विज्ञान की प्रकाण्ड पण्डिता युवती से कहा था- ‘बेटी! मौन ने तुम्हारे मन की एकाग्रता को जो बल दिया था और तुम्हारी उन क्षणों की शान्त सत्यनिष्ठा का जो प्रभाव था, उसने तुम्हारे क्रुद्ध सम्बन्धियों और बिछुड़े परिवार वालों के विचार में ऐसा महत्तम परिवर्तन उपस्थित किया।’
दूसरी घटना ब्रह्मा की पहाड़ियों में बसी बुद्ध धर्मावलम्बी नागरिकों की एक बस्ती से सम्बन्धित है, जहाँ कुछ दिनों पूर्व दिन-दहाड़े चोरियाँ होने लगी थीं और दिनों दिन अनाचार बढ़ने लगा था। एक बार वहाँ ऐसा हुआ कि एक किसान की गाय किसी ने चुरा ली और हजार ढूँढ़ने पर भी उसका पता न लगा। दुखी होकर उस किसान ने बस्ती भरके लोगों से निवेदन किया और सबकी पंचायत जुटी। उस गाँव के धर्मगुरु ने सभी एकत्र लोगों से कहा- ‘कोई किसी को दोष न दे। इससे केवल कटुता बढ़ेगी, अपने दोष की तह तक हम न पहुँच पायेंगे और जहाँ कटुता होती है वहाँ सत्य का दर्शन नहीं होता इसलिए सब लोग मौन रक्खें और एक घंटे के सामूहिक मौन में सभी यह सोचें कि हमारी बस्ती का कल्याण कैसे होगा?
इस घण्टे भर के मौन का परिणाम यह था कि उन्हीं किसानों की मण्डली से एक नौजवान स्वयं सिर नीचा किये खड़ा हो गया और उसने अपने अपराध की स्वीकृति के साथ बताया कि ‘मैंने गाय चुराई है और मुझे बड़ा दुःख है कि उसका माँस मैंने बेच डाला है। अब उसका मूल्य देने को मैं तैयार हूँ।’ उस आत्म स्वीकृति का पूरा बस्ती के वासियों पर अलौकिक प्रभाव पड़ा। क्रमशः इस मौन के प्रयोग से उस बस्ती का कलुष मिट गया और अब वहाँ जिस शान्ति तथा सुव्यवस्था का दर्शन होता है, उससे हमें महान शिक्षा और मानव की अन्तर्भूत आदर्श कल्पनाओं की सही स्वीकृति का सापेक्ष उदाहरण मिलता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि अनाचार की ओर बढ़ते हुए आज के जमाने का मनुष्य यदि अहं और ढोंग त्यागकर परस्पर मिल-जुल कर मौन-मन से कष्ट का वास्तविक कारण ढूँढ़े और उसके निवारण का सही रूप में प्रयास करे तो सच्चे सुख की प्राप्ति दुर्लभ नहीं है। व्यक्ति के लिये इस मौन का इतना महान महत्व है कि यदि वह नित्य नियम से मौन का थोड़ा अभ्यास करे तो वह अपने भीतरी तत्वों का अन्वेषण और विश्लेषण करने में पूरी तरह सफल हो सकता है। उसके लिए उसे न तो बहुत तर्क-वितर्क करना है और न हठयोग की आवश्यकता है। केवल शाँतचित्त, सुन्दर, भावनाओं के संग्रह से उसे ऐसा प्रकाश प्राप्त होगा, जिसकी ज्योति से उसका जीवन-मार्ग ज्योर्तिमय हो उठेगा और अपने अभीष्ट की प्राप्ति में उसे सफलता दृष्टिगत होगी।
(प्रो. अवधूत, गोरेगाँव)
“प्रत्येकमस्ति चिच्छक्तिर्जीव शक्ति स्वरूपिणी।”
“प्रत्येक जीव में चैतन्य शक्ति (आत्मा की अनन्त और अपार शक्ति) वर्तमान है।”
शक्ति से ही मनुष्य पहले धर्म प्राप्त करता है, पुनः उसी से अर्थ सिद्ध करते हुए पुण्य संचय करके कामनाओं की पूर्ति करने में समर्थ होता है, अन्त में इसी शक्ति से पूर्ण त्याग एवं ज्ञान के द्वारा मोक्ष पा जाता है।
अपनी शक्ति के प्रवाह का समुचित प्रयोग करना ही पुरुषार्थ है। इस प्रकार शक्ति सम्पन्नता को स्वार्थ सिद्धि के विरुद्ध दूसरों के हित में लगाते रहना ही उन्नति पथ पर बढ़ते जाना है।
शक्ति की कहीं किसी से भीख नहीं माँगनी है, यह तो सबको स्वतः प्राप्त है। किंतु, जब तक ज्ञान, विवेक का उदय नहीं होता, तब तक देह द्वारा निरर्थक क्रिया करते हुए, प्राणों की निरर्थक चेष्टा पर ध्यान न देते हुए एवं इन्द्रियों द्वारा व्यर्थ व्यापार फैलाते हुए अथवा मन द्वारा प्रपंचमय विचारों को स्थान देते हुए और उनका मनन करते हुए, इसी प्रकार बुद्धि द्वारा असद्भावनाओं को सत्य मानते हुए मानव अपने जीवन में सुलभ शक्ति का दुरुपयोग करता रहता है।
कदाचित् हमारा वर्तमान जीवन सद्गुणों और सद्भावों से रहित है, तो हम शक्ति के सदुपयोग से किसी भी प्रकार के अभाव को दूर कर तुच्छ से महान हो सकते हैं।
देह, प्राण, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के द्वारा दुरुपयोगित शक्ति का सदुपयोग होने के लिये ही पूजा--पाठ, कीर्तन, जप-तप और ध्यान आदि अनेकों साधनों का आश्रय लेना पड़ता है।
जिस प्रकार हमारा यह भौतिक शरीर-क्षेत्र इसी भूलोक के द्रव्यों का बना हुआ है। उसी प्रकार हमारे प्राणमय मनोमय और विज्ञानमय क्षेत्र उत्तरोत्तर सूक्ष्मातिसूक्ष्म लोकों के द्वारा निर्मित है। प्रत्येक क्षेत्र में भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्ति है और अपने-2 लोकों की द्रव्य-शक्ति को लेकर प्रत्येक क्षेत्र क्रियाशील हो रहे हैं। जिस क्षेत्र में क्रिया की प्रधानता रहती है, वही क्षेत्र विशेष-शक्ति सम्पन्न होता है।
स्थूल क्षेत्र में संग्रहित शक्ति के द्वारा स्थूल कर्म भली प्रकार सिद्ध होते रहते हैं। प्राणमय सूक्ष्म क्षेत्र में प्राण शक्ति के द्वारा विविध विषय वासनाओं तथा कामनाओं की पूर्ति होती रहती है। इसी प्रकार मनोमय क्षेत्र में केन्द्रित शक्ति के द्वारा विविध भाव एवं इच्छा एवं संकल्प की सिद्धि होती है। इससे भी ऊपर विज्ञानमय क्षेत्र में विकसित शक्ति के योग से अद्भुत प्रतिभा-युक्त ज्ञान का प्रकाश होता है। इसी ज्ञानलोक में परमार्थ का पथिक अपनी बिखरती हुई बहिर्मुख शक्ति को अन्तर्मुख करते हुए अपने परम लक्ष्य की ओर अग्रसर होने में समर्थ होता है।
जिस प्रकार भौतिक-भवन को दूसरे रूप में बदलने के लिए उचित सम्पत्ति की आवश्यकता है, उसी प्रकार इच्छित रूप में अपने भाग्य-भवन को बदलने के लिए भी शक्ति और पुण्य रूपी सम्पत्ति की आवश्यकता है। तप के द्वारा शक्ति और सेवा के द्वारा पुण्य रूपी सम्पत्ति की आवश्यकता है।
तप के द्वारा शक्ति और सेवा के द्वारा पुण्य रूपी सम्पत्ति प्राप्त होती है।
शक्ति के दुरुपयोग से दुर्भाग्य और सदुपयोग से सौभाग्य की प्राप्ति होती है।
साँसारिक स्वार्थ को ही सिद्ध करते रहना शक्ति का दुरुपयोग है लेकिन परोपकार करते हुए अपना परमार्थ सिद्ध कर लेना शक्ति का सदुपयोग है। संसार में आसक्त रहना शक्ति का दुरुपयोग है और त्याग के द्वारा ज्ञान तथा भक्ति में अनुरक्त होना शक्ति का सदुपयोग है। अहंकारपूर्वक अपनी शक्ति से किसी को गिरा देना शक्ति का दुरुपयोग है और गिरे हुओं को सरल भाव से तत्परता पूर्वक उठा लेना शक्ति का सदुपयोग है।
संयम-साधना के द्वारा शक्ति का विचार करने के लिए शक्ति के समुचित सदुपयोग की सिद्धि के लिए ही मन्दिरों में, तीर्थस्थानों में, शक्ति-पीठों में, वनों-उपवनों में समयानुसार जाने की प्रक्रिया हमारे देश में चली आ रही है। ऐसे पावन-स्थानों में अपने अन्तः क्षेत्रों के भीतर की सुप्त-शक्ति सहज प्रयास से ही जागृत हो जाती है।
हम सबको ध्यान देकर निरीक्षण करते रहना चाहिए कि शक्ति का किसी भी क्रिया, चेष्टा, भाव एवं विचार के द्वारा दुरुपयोग हो रहा है अथवा सदुपयोग।
इस प्रकार हम अपनी प्राप्त-शक्ति की अधिकाधिक वृद्धि कर सकते हैं। शुद्ध सात्विक आहार और विषय-संयम से शारीरिक उन्नति होती है। सद्व्यवहार एवं सद्गुण विकास से मानसिक उन्नति होती है। सन्त-सद्गुरु समागम के द्वारा प्राप्त ज्ञान से बौद्धिक उन्नति होती है और निष्काम-प्रेम एवं सत्य-स्वरूप के ध्यान से आत्मोन्नति होती है।
हमें सर्वप्रथम सन्तों के सत्संग की सर्वोपरि आवश्यकता है, जिससे हम विवेक की दृष्टि प्राप्त करें तदंतर हम आत्म-संयम की साधना धारण करें, क्योंकि बुद्धिमतापूर्वक आत्म-संयम से ही शक्ति सम्पन्न होकर आनन्द और शान्ति के परमधाम की प्राप्ति की जा सकती है।
प्रत्येक क्षेत्र में शक्ति की प्राप्ति एवं निर्बलता का अभाव ही मानवी-उत्थान अथवा शक्ति का सदुपयोग है। जब हम भय की जगह निर्भय होकर प्रत्येक कठिनाई को परास्त करने में समर्थ हो जायें और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते ही चले जायें तथा जब हमें सदा शक्ति की महती कृपा का अनुभव होने लगे, तब हम शक्ति का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति के रूप में अपने आप को पाकर धन्य हो जायेंगे।
(श्री अगरचन्द जी नाहटा)
आवश्यकताओं की पूर्ति न होना और धन को अत्यधिक महत्व मिलना-ये दोनों अनैतिकता के प्रधान कारण हैं। ‘अभाव से स्वभाव नष्ट’ और ‘मरता क्या न करता’ -ये कहावतें इसी दीर्घकालीन अनुभव को व्यक्त करती हैं। विपत्ति के समय भी नीति में दृढ़ रहने वाले विरले ही होते हैं, ऐसे व्यक्तियों को ही आदर्श पुरुष बताकर धार्मिक ग्रन्थों में उनका गुणगान करते हुए जनता को वैसे बनने की प्रेरणा की गयी है।
अनैतिकता का जो दूसरा कारण है- वह तो सर्वथा हेय है। मध्ययुग में धन को बहुत महत्व दिया गया। समाज में सर्वाधिक प्रतिष्ठा उसी को मिली जिसके पास अधिक संग्रह है। विद्वानों एवं गुणीजनों का निर्वाह भी उन्हीं के द्वारा होने से विद्वान की प्रतिष्ठा फीकी पड़ गयी। मुद्रा के द्वारा वस्तुओं के लेने-देने का व्यवहार बढ़ने पर सब आवश्यकताओं की पूर्ति का माध्यम मुद्रा बन गयी। फलतः उसके अधिकाधिक संग्रह का प्रयत्न होना स्वभाविक था। ज्यों-ज्यों लाभ होता जाता है, मनुष्य का लोभ उसी अनुपात से बढ़ता जाता है, और उस लोभ तथा तृष्णा के कारण मानव नीति-अनीति का विचार भूलकर, जिस किसी भी प्रकार से हो मुद्रा एवं अन्यान्य वस्तुओं के अधिकाधिक संग्रह में जुट जाता है। इस वृत्ति के परिवार के लिए तत्व-चिन्तकों ने संतोष को ही परम सुख का कारण तथा जीवन के लिए आवश्यक बतलाया है, क्योंकि तृष्णा का कहीं अन्त नहीं, वह द्रौपदी के चीर की भाँति बढ़ती ही चली जाती है।
जीवन के प्रत्येक व्यवहार में स्वार्थवश अनैतिकता घुस गयी है। भारत में इस कलुषित वृत्ति को हटाने के लिये बड़े-बड़े धर्मग्रन्थों का निर्माण हुआ। विधि, नियम बनाये गये। हजारों कथाओं का निर्माण किया गया। धर्म प्रचारकों ने जोरों से धार्मिक या नैतिक नियमों को प्रचारित किया। फलतः दया, परोपकार, स्वधर्मपालन-दृढ़ता, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, संतोषी-संयमित जीवन के अनेक आदर्श दृष्टाँत मिलते हैं। उनको बतलाकर इन गुणों के अधिकाधिक विकास पर जोर दिया गया है। इसी प्रकार आश्रमों की व्यवस्था द्वारा मनुष्य के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयत्न किया गया।
लाखों व्यक्तियों ने संन्यास ग्रहण कर पूर्णतया नियमबद्ध तथा धार्मिक जीवन बिताना प्रारम्भ किया। इसी से भारतवर्ष आध्यात्मिक एवं धर्म प्रधान देश कहा गया है, पर धर्मों में नित्य नये सम्प्रदाय खड़े होने लगे। उनमें पारस्परिक संघर्ष प्रारम्भ हो गया। नैतिक नियमों के प्रचार में शिथिलता आने लगी और धर्म के नाम से हिंसा, छल-कपट आदि अनैतिक कार्य भी होने लगे। इससे जन-जीवन में सद्गुणों की प्रतिष्ठा कम हो गयी तथा वे दुर्गुण और अधिक पनपने लगे। युद्ध कालीन स्थिति ने अनैतिकता को बहुत बड़ा बल दिया, जिसका परिणाम आज प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा रहा है। स्वराज्य मिला तो अवश्य-पर नियन्त्रित कठोर शासन के अभाव में अनीति और भी बढ़ गयी तथा दिनोंदिन उसकी मात्रा बढ़ती ही जा रही है घटने का कोई असर अभी दिखलायी नहीं देता।
भारत में आज सर्वतोमुखी अनीति बढ़ रही है। पहले लोग व्यापारियों को अधिक दोष देते थे पर अब तो कोई बचा हुआ नहीं रहा। ‘कुएँ भाँग पड़ी’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। सरकारी किसी भी विभाग में चले जाइये, सर्वत्र घूसखोरी का बोल-बाला है। पैसे की मोहिनी ने सब पर जादू फेर दिया है कोई विरला ही बचा होगा। रेलवे-विभाग को देखिये, अदालतों को देखिये, सप्लाई-विभाग में जाइये, पुलिस तो सदा की बदनाम है। इस प्रकार प्रायः सभी कर्मचारी घूस के आदि हो गये हैं। कहीं माल भेजना हो तो बिना पैसे दिये गाड़ी नहीं मिलती और पैसे देने पर असम्भव कार्य सम्भव तथा तत्काल हो जाते हैं। कानून या नियम के भरोसे बैठे ही रहिये कचहरी में रजिस्ट्री ऑफिस में जाइये, पद-पद पर चपरासी और क्लर्क तक सभी का टैक्स चुकाइये, जैसे बँधा-बँधाया पड़ा है-बोलने की आवश्यकता नहीं। पैसा देते हैं तो दस्तावेज की तुरन्त रजिस्ट्री हो जाती है, नहीं तो कोई-न-कोई नुक्स निकालकर रख दिया जाता है क्योंकि वे ऐसा न करें तो उनको भेंट दे कौन? हरेक व्यक्ति अपने-अपने काम में रास्ता निकालने की होशियारी या अक्लमन्दी रखता ही है। सेलटैक्स में, जाइये चाहे इन्कम टैक्स में, ट्रेजरी में चाहे एकाउन्ट ऑफिस में, किसी भी विभाग में जाइये सर्वत्र घूसखोरी और अनीति का साम्राज्य है। अब तो किसान और मजदूर भी उनकी देखा-देखी अनीति सीख गये हैं। और तो और भीख माँगकर खाने वाले भी ठगी और धोखा करते नजर आते हैं उसी के कुछ उदाहरण प्रस्तुत लेख में उपस्थित किये जा रहे हैं :-
भारतवर्ष में भिक्षावृत्ति साधु-संन्यासी के जीवन निर्वाह के लिए आदर्श वृत्ति थी। वे लोग वस्तुओं के संग्रह एवं उन्हें उपभोग के योग्य बनाने की खटपट में नहीं पड़ते थे क्योंकि इससे उनकी साधना एवं उपदेश आदि लोक कल्याण की प्रवृत्तियों में बाधा उपस्थित होती थी। वे शरीर को, जब भी आवश्यकता हुई, मधुकरी-वृत्ति से इधर-उधर से कुछ गृहस्थों के यहाँ जाकर थोड़ा-थोड़ा आहार वस्त्रादि लेकर अपना काम चला लेते थे। गृहस्थ भी अहोभाग्य समझकर बड़े चाव तथा भाव से उन्हें देते थे और इसमें वस्तु का साफल्य मानते थे। अर्थात् उक्त भिक्षावृत्ति दोनों के लिए लाभदायक सिद्ध होती थी। पर वह तब तक ही आदर्श रही या रह सकती है जब तक भिक्षु आवश्यकता से अधिक संग्रह की ओर न झुके। भिक्षु पेट में समाये इतना ही आहार ले। सुबह की भिक्षा को संध्या के लिये भी संग्रह न करे। संन्यासी के अतिरिक्त अन्य भिक्षुक जो अन्धे, लूले, लंगड़े, अनाथ अर्थात् काम करने में असक्त होते, वे भी भिक्षा माँगकर जीवन निर्वाह करते। लोग उन्हें दया-करुणा की भावना से देते। अतः संन्यासी भिक्षु को श्रद्धा से एवं अशक्त भिक्षुओं को करुणा से देने वाला भी लाभ में रहता तथा लेने वाले का भी निर्वाह हो जाता। पर जब कई लोगों ने भिक्षावृत्ति को कमाई का या धन संग्रह का साधन (पेशा) ही मान लिया और उसके द्वारा संग्रह करना प्रारम्भ किया, तब इसमें सहज ही अनैतिकता का प्रवेश हो गया, जनता की भावना भी बदल गयी और उभय दृष्टि से वह लाभ के बदले हानिकारक सिद्ध होने लगी।
आवश्यकता वश किसी से कोई चीज माँगकर जीवन-निर्वाह करना भिक्षा है। प्राचीन काल की भिक्षा-वृत्ति सात्विक थी। उसमें लेने वाला साधक अपने सहायक-शरीर को टिकाये रखने मात्र के लिए ही लेता और देने वाला श्रद्धा भाव से देता। अतः दोनों में सात्विकता थी।
भारत में मध्य काल में कई लोगों का तो देने वालों का कुछ काम करके अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वरूप उनसे कुछ द्रव्य या वस्तुएँ लेने का पेशा हो गया था। यह विशुद्ध वृत्ति तो नहीं थी पर कुछ-न-कुछ काम करके लेने से वह निभाने योग्य रही। जैसे ब्राह्मण लोग क्रिया काण्डादि अनुष्ठान कराते। इनका जीवन निर्वाह यजमानी पर चलता। राजपुरोहित भी इसी श्रेणी के थे। कुल गुरु अपने यजमानों के वंशों के इतिहासादि लिखने का धंधा करके दान पाते थे। चारण, भाट एवं विद्वान अपनी कविता से राजाओं को प्रसन्न कर दान और सत्कार पाते थे। इसमें दाता को भावना का लाभ तो नहीं मिलता पर कर्त्तव्य का पालन होता है। ऐसा माँगना और देना राजसी कहा जाता है। नाना प्रकार के काम करके याचना करने वालों की माँग को व्यवसायिक भिक्षा कह सकते हैं।
तीसरी श्रेणी तामसी भिक्षा की है, जिसमें दाता को बाध्य होकर देना पड़ता है। लेने वाला ऐसी परिस्थिति पैदा कर दे कि उसकी माँग पूरी की जाय। क्रोध से और लोक-लाज के भय से लिया और दिया हुआ दान तामसी है। ऐसा दान और भिक्षा दोनों के लिये हानिकारक है। भिक्षा जहाँ तक आवश्यकता की पूर्ति तक सीमित हो, उसमें छल-कपट या संग्रह वृत्ति न हो और दान जहाँ तक सद्भावना एवं कर्त्तव्य समझ कर दिया जाता हो वहीं तक ठीक कहा जा सकता है। इसके विपरीत असंग्रह वृत्ति से न लिया हुआ या कर्त्तव्य बुद्धि से न दिया दान अनैतिक है, समाज का पतन करने वाला है।
इधर कई वर्षों से भिक्षा वृत्ति में अनैतिकता खूब बढ़ रही है। बहुत बार तो यह घृणित व्यवसाय सा नजर आता है। अतः अब लोगों में धार्मिक या करुणा की भावना का बहुत बड़ा ह्रास हो गया है, जो स्वभाविक ही है। इधर महंगाई के जमाने में अपना निर्वाह भी दुष्कर उधर श्रम करके कमा खा सकने वाले हट्टे-कट्टे जवान स्त्री-पुरुष भिक्षा को ही अपना धंधा बना लें तो मानव-हृदय का आन्दोलित होना स्वाभाविक है। आज तो भिक्षुओं को, जहाँ जाते हैं दुत्कार मिलती हैं। कहा जाता है कि ‘मजदूरी करके पेट क्यों नहीं भरते? क्या तुम श्रम करने के लायक नहीं हो? अपंग हो, अन्धे, लूले, लंगड़े हो?’ आज भिखमंगों की अनीति के किस्से जगह-जगह देखने-सुनने को मिलते हैं। भिक्षा के नाम से वे धोखा देते हैं। दो चार अनुभूत घटनाएं बतलाऊँ-
जिन्होंने भिक्षा के बहाने धोखा देने का धंधा स्वीकार किया है, वे अपनी ऐसी दयनीय स्थिति उपस्थित करते हैं कि एक बार तो उनके दुःख-दर्द से हृदय भी पिघल जाता है। कोई आकर कहते हैं कि ‘हम शरणार्थी हैं। अमुक स्थानों के रहने वाले हैं। बहुत ही दयनीय स्थिति हो जाने से सब छोड़-छाड़कर इधर आने को बाध्य हुए हैं। हमारे अमुक को मार डाला गया, धनादि वस्तुएं लूट ली गई, क्या करें? पेट भरने के लिये माँगना पड़ता है।’ वे भिक्षा की कला में बड़े निपुण होते हैं। ऐसा पार्ट अदा करते हैं कि अविश्वास सहज नहीं होता। वे सब भाषा एवं धूर्तता की कलाएँ जानते हैं। जैनों के पास माँगेंगे तो अपने को जैन बतलायेंगे, वैष्णव के सामने वैष्णव। जिस प्रकार से जिस व्यक्ति को पटाया जा सकता है वैसे ही उससे बताते हैं। इस पेशे में बड़ी ही निपुण कई बहिनें मैंने देखीं। दो-तीन बार उनसे काम पड़ा। वे अंग्रेजी, गुजराती, हिंदी आदि कई भाषाएँ जानती हैं। अपने को जैन बतलाती हैं। किसी सज्जन को प्रभावित कर उससे सहायता देने के लिए विज्ञप्ति-पत्र दिखाकर घर-घर से चन्दा वसूल करती हैं। आप चार आना देना चाहते हैं तो वे आठ आना देने को मजबूर कर देती हैं। ऐसी करुणाजनक स्थिति शब्दों से व्यक्त करती हैं कि दिल पसीजे बिना नहीं रह सकता।
कई पुरुष और स्त्री यह कहकर माँगते हुए नजर आते हैं कि हमारे अमुक को बच्चा हुआ है, उस बच्चे और माता के लिए सामान तथा पैसा इकट्ठा करते हैं या कई तो हमारे अमुक मर गया है, कफ़न आदि के लिए पैसा या वस्त्रादि चाहिए, ऐसे झूठे फरेबों से पैसा इकट्ठा करते हैं।
कलकत्ता आदि कई शहरों में कई व्यक्ति मैले-फटे थोड़े से चिथड़े लपेटे हुए सड़कों में दौड़ते-पीटते, चीत्कार करते हुए माँगते नजर आते हैं। सुना गया है कि उनमें अधिकाँश ने तो पैसे माँगने के लिए ही अपने हाथ-पैरों को विकृत कर डाला है। कई गुँडे लोगों ने इधर-उधर से अनाथ बच्चों को लाकर उनकी ऐसी दयनीय स्थिति कर दी है और उनसे कमाई करने का धंधा कराने के भी संवाद मिले हैं। ऐसे भिखमंगों में से कइयों के पास तो हजारों रुपये हैं पर वे अब इस वृत्ति के ऐसे अभ्यस्त हो गये हैं कि सुबह से शाम तक यही करते रहते हैं। इस धंधे को वे छोड़ नहीं पाते।
अभी कुछ दिन पहले की एक घटना सुनिये। मैं कलकत्ते से बीकानेर जा रहा था। रास्ते में एक व्यक्ति मध्यवर्ती स्टेशन पर आया और बोला कि ‘हम बड़ी मुसीबत में हैं हमारे टिकट खो गये या यहीं तक के टिकट के पैसे पास हैं अतिरिक्त पैसे खो गये हैं। हमें जाना अमुक जगह है सहायता कीजिये।’ ऐसी स्थिति में मानव-सुलभ दया आना स्वभाविक ही है। हमारे पास वालो ने कहा ‘कुछ नहीं जी, ढोंगी है, इसका यही धंधा है, क्योंकि हम इसी प्रकार पहले धोखा खा चुके हैं और ऐसी घटनायें सुन चुके हैं।’ मुझे और अन्य एक पास में बैठे हुए व्यक्ति को यह व्यक्ति भी वैसा ही ठग होगा यह जंचा नहीं अतः उसने जितने पैसे माँगे थे हम दोनों ने उसे दे दिये वह उन्हें लेकर दूसरे डिब्बे में घुस कर वहाँ भी ठीक वही माँग करने लगा, तब मेरे पास वाले व्यक्ति से नहीं रहा गया उठ कर उसके पास तत्काल गये और दुत्कारते हुए उससे पैसा वापस ले आये और उससे कहा कि ‘जितने पैसे तुम्हें आवश्यक थे, हमने पूरे के पूरे दे दिये, फिर भी तुम दूसरों से टिकट के पैसे की माँग करते ही रहे, तो मालूम होता है तुमने यही कमाई खोल रखी है।’
प्रश्न पैसे का नहीं है। मुझे यह देख बड़ा दुख हुआ कि ऐसे ठग व्यक्तियों के कारण ही वास्तविक आवश्यकता वालों के लिए भी द्वार बन्द हो जाते हैं। लोग सभी को ढोंगी समझने लग जाते हैं। सच्चे जरूरतमंद या सहायता योग्य व्यक्ति भी ऐसे धोखा देने वालों के कारण कष्ट उठाते हैं तथा सहायता से वंचित रह जाते हैं। इसलिए सरकार को भिक्षावृत्ति प्रतिबन्धक कानून बनाना पड़ रहा है। कैसी दयनीय स्थिति है? अनैतिकता का कितना बोल-बाला हो गया है? जीवन के हर क्षेत्र में उसने कितने लम्बे पैर पसार दिये हैं। न मालूम कैसे और कब उसका अन्त होगा। भिक्षावृत्ति जैसा सात्विक कर्म भी इन ठगों के कारण गर्हित हो गया है।
इस दूषित वृत्ति का नाश हो, लोगों का नैतिक स्तर ऊँचा हो, इसके लिये प्रयत्न किया जाना चाहिए तथा ऐसे लोगों को विविध उद्योगों की शिक्षा दी जानी चाहिये और कुछ नये उद्योग-धंधे या काम चालू कर उनमें इनको लगाना चाहिए। आशा है विचारशील व्यक्ति इस अनैतिकता को शीघ्र समाप्त करने के उपायों को सोचेंगे तथा व्यक्त करेंगे और सरकार भी उन्हें अपना कर देश के नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने का भरसक प्रयत्न करेगी।
(श्री परिपूर्णानन्द जी वर्मा)
गृहस्थ जीवन में तथा लोकाचार के लिए निःसन्देह धन की नितान्त आवश्यकता है, विशेष कर आज के युग में पर मानव जीवन का सबसे बड़ा शत्रु धन ही है यह स्वीकार करना होगा। ईसा मसीह ने गलत नहीं लिखा है कि धनी का स्वर्ग में प्रवेश पाना असम्भव है।’ इसका अर्थ केवल यही है कि धन मनुष्य को इतना अंधा कर देता है कि वह संसार के सभी कर्त्तव्यों से गिर जाता है। धन का इसी में महत्व है कि वह लोक सेवा में व्यय हो। नहीं तो, धन के समान अनर्थकारी और कुछ भी नहीं है। श्रीमद्भागवत में कहा है-
स्तेयं हिंसानृतं दम्भः कामः क्रोधः स्मयो मदः। भेदोः वैरमविश्वासः संस्पर्धा व्यसनानि च॥
एते पश्चदशानर्था र्ह्यथमूला मता नृणाम्। तस्मादनर्थमर्थाख्यं श्रेयोऽर्थी दूरतस्त्यजेत्॥
(11/23/18-19)
‘(धन) से ही मनुष्यों में ये पंद्रह अनर्थ उत्पन्न होते हैं -चोरी, हिंसा, झूठ, दम्भ, काम, क्रोध, गर्व मद, भेदबुद्धि, बैर, अविश्वास, स्पर्धा, लम्पटता, जुआ और शराब। इसलिए कल्याण कामी पुरुष को ‘अर्थ’ नामधारी अनर्थ को दूर से ही त्याग देना चाहिए।
फारसी कहावत है कि ‘संसार में एक स्त्री बनाकर यानी विवाह कर आदमी संसार भर की स्त्री बन जाता है’ अर्थात् गृहस्थ जीवन में उसे सब का आश्रित या पराधीन बनकर चलना पड़ता है। यदि संसार में धन नामक पदार्थ न होता तो हमारा जीवन कैसा होता? आखिर जीवन का लक्ष्य क्या है? हम सब अपने को सुखी बनाना चाहते हैं, सुख भोगना चाहते हैं। पर सुख की अनेक प्रकार की व्याख्या हो सकती है। उसके अनेक अर्थ लगाये जा सकते हैं। आज की सभ्यता की चमक-दमक में सुख की बड़ी विचित्र व्याख्याएँ निकलती चली आ रही हैं। पर विलास और भोग की प्रतिक्रिया भी होती है। आज बड़े-बड़े विचारक यह सोचने लगे हैं कि सुख की परिभाषा बदलनी चाहिए। उसकी वास्तविकता को समझना चाहिए। बर्ट टेलर ने अभी कुछ ही महीने पूर्व ‘सुख का अधिकार’ नामक बड़ी रोचक तथा महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है। उनका कथन है कि-
‘आज संसार में बहुत ही कम लोग सुखी कहे जा सकते हैं। भूतकाल में हमारा जीवन केवल रोटी कमाने में बीता। अब हमको समाज में अपना स्थान कमाने में बिताना चाहिए। केवल धन और समृद्धि ही जीवन का लक्ष्य नहीं होना चाहिये। लक्ष्य होना चाहिये कभी भी दुखी न रहना। हरेक के जीवन में सबसे महान प्रेरणा यह होनी चाहिए कि हमारा जीवन प्रकृति के अधिक से अधिक निकट हो और तर्क तथा बुद्धि से दूर न हो। हमको अपने जीवन में काम करने का आदर्श समझ लेना चाहिये। यह आदर्श पेट का धंधा नहीं, सेवा होनी चाहिये। सर्वकल्याण, समाज-सेवा सामाजिक जीवन तथा शिक्षा ही हमारा कार्यक्षेत्र हो। हमको ऐसे युग की कल्पना करनी चाहिए, जब हमारा जीवन केवल जीविका-उपार्जन न रह जाय। जीवन केवल अर्थ शास्त्र या प्रतिस्पर्द्धा की वस्तु न रह जाय। व्यापार के नियम बदल जायं। एक काम के अनेक करने वाले हों और अनेक व्यक्ति एक ही काम को अपना सकें। मालिक और नौकर, काम करने के घंटों की झिक-झिक दूर हो। मनुष्य केवल मनुष्य ही नहीं है, उसकी आत्मा भी है, उसका देवता भी है, उसका इहलोक और परलोक भी है।
धन की इस दुनिया में, चकाचौंध के उस जमाने में जब कि सभ्यता का एकमात्र लक्ष्य केवल पैसा कमाना है, ऐसी आवाज उठाना एक बड़ी भारी बात है और इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अब लोग धन की मर्यादा से ऊबकर हमारी आर्य-सभ्यता की प्राचीन तथा सतयुगी मर्यादा की ओर मुड़ रहे हैं। उन्हें ऐसा लगने लगा है कि यह सब आडम्बर मिथ्या है। धन ही विपत्ति की जड़ है, इसी से संसार का सब विग्रह प्रारम्भ होता है और वर्गवाद, साम्यवाद या साम्राज्यवाद का उपद्रव खड़ा हो जाता है। न धन की घुड़दौड़ रहे और न यह सब विपत्तियाँ खड़ी हों। न बाँस रहे, न बाँसुरी बजे।
भीतर देखो
बर्ट टेलर ने सच लिखा है कि-
‘जीवन ही हमारा सबसे बड़ा शिक्षक है। उसका उपदेश ही हमारे साँसारिक जीवन के लिए पर्याप्त होगा। वह हमें ऐसी बातें बतलाता है, जिसे हमारे शिक्षक नहीं जानते। इसलिए सब कुछ छोड़कर जरा अपने जीवन को ही पढ़िये। हमें अपने को जानना चाहिए। अपने पड़ोसियों को जानना चाहिए। मानवी प्रतिक्रिया का ज्ञान होना चाहिए और हमें कुछ जानने की आवश्यकता ही क्या है। जरा हमको बहुत बड़े-बड़े लोगों के दिल के भीतर की बातें तथा उनका भीतरी जीवन देखने दीजिए ताकि हम उनको पहचान सकें। तब हम राजनीतिज्ञों की कलाबाजियाँ और राजनीतिज्ञों की चालबाजियाँ समझ सकेंगे। हमको धूर्तता, महत्वाकाँक्षा तथा कामना की असलियत समझ लेने दो। बतलाइये तो, कि हम किस पर भरोसा करें और कैसे करें। हमें तो यह सिखलाइये कि सच को पहचानें और अपने साथ अपने कामों के साथ सचाई बरतने लगें। यह हमें सिखलाइये कि दूसरों के प्रति दुर्भाव न रक्खें। हमें चिन्ताशीलता के भयंकर दुःख से बचना सिखाइये। रात-दिन ऊहापोह तथा सोच-विचार में पड़े रहना बंद हो। शायद तभी हम सुख को पहचान सकें, जान सकें और उसको अपना सकेंगे। जीवन क्षणभंगुर है, जवानी कल की बात मालूम होती है। जवानी सिनेमा-भवन, क्लब तथा खेल-कूद में बीत गयी, बुढ़ापा सिर पर है। अब उसका दुःख आ पहुँचा। युवक को सदाचारी तथा संयमी होना चाहिए। उसे गुरुजनों का आदर करना चाहिये। यदि हम अपने तथा दूसरे के हृदय के भीतर बैठकर यह सब समझ जाय, तो हमारा जीवन कितना सुखी हो जायेगा। पर आज हम ऐसा नहीं करते हैं। वह क्यों? इसका कारण धन की विपत्ति है। धन की दुनिया में निर्धन का व्यक्तित्व समाप्त हो जाता है। जब तक अपने व्यक्तित्व के विकास का अवसर न मिले आदमी सुखी नहीं हो सकता। न्यूयार्क नगर के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक श्री हेनरी सी. लिंकन अभी हाल में ही लिखा था कि यह सभ्यता व्यक्तित्व के विकास को रोकती है, बिना उसके विकसित हुए सुख नहीं मिल सकता। सुख वह इत्र है, जिसे दूसरों को लगाने से पहले अपने को लगाना आवश्यक होता है। यह इत्र तभी बनता है जब हम अपने हर एक कार्य को दूसरे की सहायता के भाव से करें। हमें चाहे अपनी इच्छाओं का दमन ही क्यों ना करना पड़े। पर हमें दूसरे के सुख का आदर करना पड़ेगा, हेनरी सी. लिंकन आगे चल कर लिखते हैं कि सुख का सबसे बड़ा साधन निस्वार्थ सेवा है। उन्होंने एक अमेरिकन सिपाही की गत महायुद्ध काल की घटना लिखी है। वह सिपाही पेरिस गया था वहाँ का सुख भोगने के लिए वहाँ पर उसे सबसे अधिक आनन्द एक वृद्धा स्त्री का सामान ढोने में मिला। लिंक की सलाह है कि ‘परिवार तथा समाज को सुखी बनाने के लिए आत्म-त्याग तथा आत्म-बल सदैव आवश्यक है। बिना इसके न कोई स्वयं सुखी रह सकता है और न सुखी कर सकता है।’
समय का दुरुपयोग
व्यापक दुःख का एक प्रबल कारण समय का दुरुपयोग है। चौबीस घंटे का दिन रात कैसे बिताया जाय ये भी हम भूल गये हैं। कैरिनरुन (द्मड्डह्द्बठ्ठ क्रशशठ्ठ) नामक विद्वान प्रोफेसर ने छह महीने पूर्व एक लेख में लिखा था कि ‘ऐसे बहुत कम लोग मिलेंगे जो सचमुच में आनन्द-पूर्वक जीवन बिताते हों।’ या तो हम बीते हुए काल की अपनी भूलों पर पश्चाताप करते रहते हैं या आने वाले कल की समस्याओं की चिंता में रत रहते हैं। वर्तमान में क्षणिक विश्राम का जो अवसर मिला उसे हम खो देते हैं। आखिर हरेक के भाग्य में एक दिन के 24 घंटे ही होते हैं। यदि आप इनका सदुपयोग सीख जायं तो थकावट तथा शिथिलता के विपरीत उत्साह तथा सुख का जीवन हो सकता है। यदि अपने 24 घंटे का सदुपयोग किया जाय तो हरेक काम के लिए समय निकल सकता है। जो व्यक्ति समय पर काम करता है उसका काम समय पर होता है। जो कहता है कि ‘अमुक काम के लिये समय नहीं मिलता’ वह झूठ बोलता है। जो नयी सभ्यता की प्रसादी स्वरूप हर समय घबराया हड़बड़ाया तथा भाग-दौड़ में रहता है, उसे असली कामकाजी मत समझो। जिस व्यक्ति ने रात्रि के समय आने वाले कल का कार्यक्रम नहीं बना लिया तथा जिसने बिस्तरे से उठते समय आँखें मूँदकर भगवान का ध्यान नहीं किया उसका दिन कभी ठीक से न बीतेगा। बिस्तर से जो कूदकर उठता है वह वैसी ही मूर्खता करता है जैसी कि मोटरगाड़ी चलाने वाला तीसरे गियर में गाड़ी ‘स्टार्ट’ करने में करता है। झटके से गाड़ी खराब हो जाती है। आँख खुलते ही कूद पड़ने वाला व्यक्ति शरीर की मशीन घिस डालता है। इस प्रकार श्री कैरिन रुन ने आधुनिक सभ्यता की जल्दबाजी की कड़ी भर्त्सना की है।
विपत्ति की जड़
संसार में रुपये के सबसे बड़े उपासक यहूदी समझे जाते हैं। पर यहूदी समाज में भी अब धन के विरुद्ध जेहाद शुरू हो गया है, ‘यरुशलम मित्र संघ’ की ओर से ‘चूज’ यानी (ष्टद्धशशह्यद्ग) पसन्द कर लो शीर्षक नामक एक पुस्तक प्रकाशित हुई है, जिसका लक्ष्य है-‘तुम ईश्वर तथा शैतान दोनों की एक साथ उपासना नहीं कर सकते।’ इसके लेखक श्री आर्थर ई. जोन्स के सुन्दर विचार मैं पाठकों की भेंट कर रहा हूँ। जोन्स साहब का कहना है कि ‘न जाने किस कु-घड़ी में रुपया-पैसा संसार में आया, जिसने आज हमारे ऊपर ऐसा अधिकार कर लिया है कि हम उसके अंग बन गये हैं। शायद इसका जन्म उसी दिन हुआ जब आदम और हौवा अदके उद्यान में फल के लालच में पड़ गये। ईसा से 2000 वर्ष पहले बैबीलन में सम्राट हम्मुरावी का शासन था। उस समय तक रुपये का पूरा राज्य स्थापित हो चुका था। पट्टा, बंधक, सूद, कानूनी महत्त्व, कोष बटोरना, संचय आदि इसके सभी उपयोग सबके ध्यान में आ गये थे, प्रचलित थे। अब्राहम ने रुपया देकर कुछ जमीन खरीदी और उसकी लिखा-पढ़ी ठीक आज जैसी हुई। रुपया बैबीलन में ईश्वर बन गया और आज तक वह इस संसार में बना हुआ है। आज की दुनिया असली ईश्वर को भूल गयी है, वह केवल ‘रुपया भगवान’ को जानती है-
यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः।
2- सर्वे गुणाः काश्चनमाश्रयन्ति।
श्री जोन्स कहते हैं-
‘यदि मैं यह कहूँ कि संसार की समृद्धि में सबसे बड़ी बाधा धन यानी रुपया है, तो पुराने लोग सकपका उठेंगे। किन्तु आज संसार में जो भी कुछ पीड़ा है, वह इसी नीच देवता के कारण है। खाद्य-सामग्री का संकट, रोग-व्याधि-सबका कारण यही है। चूँकि सभी सुख की वस्तुएँ इसी से प्राप्त की जा सकती हैं, इसीलिए संसार में इतना कष्ट है। जितना समय उपभोग की सामग्री के उत्पादन में लगता है, उससे कई गुना अधिक समय उन वस्तुओं के विक्रय के दाँव पेंच में लगता है। व्यापार की दुनिया में ऐसे करोड़ों नर-नारी व्यस्त हैं, जो उत्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं करते।
विपत्ति यह है कि आदमी एक दूसरे को प्यार नहीं करते। यदि अपनाने की स्वार्थी भावना के स्थान पर प्रतिदान की भावना हो जाय तो हरेक वस्तु का आर्थिक महत्व समाप्त हो जाय। आज लाखों आदमी हिसाब-किताब, बही-खाते के काम में परेशान हैं और लाखों आदमी फौज, पल्टन या पुलिस में केवल इसलिए नियुक्त हैं कि बही खाते वालों की तथा उनके कोष की रक्षा करें। जेल तथा पुलिस की आवश्यकता रुपये की दुनिया में होती है। यदि यही लोग स्वयं उत्पादन के काम में लग जायं तथा अपनी उत्पत्ति का आर्थिक मूल्य न प्राप्त कर शारीरिक सुख ही प्राप्त कर सकें, तो संसार कितना सुखमय हो जायगा। आज संसार में अटूट सम्पत्ति उच्च अट्टालिकाओं में, बैंक तथा बीमा कम्पनियों के भवनों में, सेना, पुलिस, जेल तथा रक्षकों के दल में लगी हुई है। यदि इतनी सम्पत्ति और उसका बढ़ता हुआ मायाजाल संसार का पेट भरने में खर्च होता तो आज की दुनिया कैसी होती। अस्पतालों में लाखों नर-नारियाँ रुपये की मार से या अभाव से बीमार पड़े हैं तथा लाखों नर-नारियाँ धन के लिए जेल काट रहे हैं। प्रायः हर परिवार में इसका झगड़ा है। मालिक तथा नौकर में इसका झगड़ा है। यदि धन की मर्यादा न होती तो यह संसार कितना मर्यादित हो जाता।’
जोन्स फिर लिखते हैं-
‘सर टॉमस ह्वाइट ने लिखा था कि ‘अमेरिका को स्वर्ग का अपच हो गया है। पैसे के कारण संसार में वर्गवाद आदि का संकट आ गया है। आज जितनी उत्पत्ति होती है, उसका पैसों में मूल्य समाप्त कर दीजिए तो संसार का कायापलट हो जायगा, कोई भूखा रहेगा न नंगा। आज हरेक काम पैसे से होता है, कोई किसी के घर का दरवाजा भी बिन पैसे लिए बंद न करेगा। माता-पिता तथा संतान के बीच पैसे का सम्बन्ध है। पिता चाहता है कि लड़के कमाएं, लड़की बोझ न बने। आज हरेक व्यक्ति सोचता है कि पैसा एक अनिवार्य वस्तु है इसलिए पैसे कि अंधी दुनिया इसका निरादर नहीं कर सकती। पर कौन नहीं जानता कि जितना पैसा बढ़ता है उतना ही परिश्रम पश्चाताप तथा परेशानी बढ़ती है, धन से आत्मा सुखी नहीं हो सकती।’
हमने आर्थर ई. जोन्स के विचारों का बड़े संक्षेप में उदाहरण किया है, अधिक लिख कर इस लेख का विस्तार भी नहीं बढ़ाना है। संसार से पैसा एकदम उठ जाय ऐसी सम्भावना नहीं प्रतीत होती। पर पैसे का विकास उसकी महत्ता तथा उसका राज्य रोका अवश्य जा सकता है। इसके लिए हमको अपना मोह तोड़ना होगा, स्वार्थ के स्थान पर परमार्थ, समृद्धि के झूठे सपने के स्थान पर त्याग तथा भाग्य के स्थान पर भगवान की शरण लेनी होगी। नहीं तो आज की हाय-हाय हमारे जीवन का सुख नष्ट कर चुकी है, अब हमारी आत्मा को भी नष्ट करने वाली है। हमें सब कुछ खोकर भी अपनी आत्मा को बचाना है।
(श्री लक्ष्मी नारायण जी बृहस्पति)
सदा भवानी दाहिनी, सन्मुख रहे गणेश। पाँच देव रक्षा करें, ब्रह्मा विष्णु महेश॥
ब्रह्मा -
भगवान के नाभि कमल से चतुर्मुख ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। शरीर के अन्यान्य अंगों में से नाभि के साथ सृष्टि कार्य का सम्बन्ध अधिक है, इसलिए परमात्मा की नाभि से सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजी का उत्पन्न होना विज्ञान सिद्ध है। कमल अव्यक्त से व्यक्त अभिर्मुखी प्रकृति का रूप है और उसी से ब्रह्मा की उत्पत्ति होती है। ब्रह्मा जी प्रकृति के अंतर्गत राजसिक भाव पर अधिष्ठान करते हैं, इसलिए ब्रह्माजी का रंग लाल है, क्योंकि रजोगुण का रंग लाल है।
‘अजामेकाँ लोहितशुक्ल कृष्णाम्’
-(श्वेताश्वतर उपनिषद्)
त्रिगुणमयी प्रकृति लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्ण है। रजोगुण लोहित, सतोगुण शुक्ल और तमोगुण कृष्णवर्ण है। समष्टि-अन्तःकरण ब्रह्माजी का शरीर और उनके चार मुख माने गये हैं क्योंकि- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- ये अन्तःकरण के चार अंग हैं। क्रिया काल में ज्ञान की अप्रधानता रहने पर भी ज्ञान की सहायता बिना क्रिया ठीक-ठीक नहीं चल सकती है। इसलिए नीर-क्षीर विवेकी हँस को ब्रह्माजी का वाहन माना गया है।
ब्रह्माजी की मूर्ति की ओर देखने से, उसमें निहित सूक्ष्म व स्थूल भावों पर विचार कर देखने से पता लग जायेगा कि प्रकृति के राजसिक भाव की लीला के अनुसार ही ब्रह्माजी की मूर्ति-कल्पना की गई है।
विष्णु -
शास्त्रों में शेषशायी भगवान विष्णु का ध्यान इस प्रकार किया गया है कि-
ध्यायन्ति दुग्धादि भुजंग भोगे,
शयानमाधं कमलासहायम्।
प्रफुल्लनेत्रोत्पलमंजनाभ, चतुर्मुखेनाश्रितनाभिएद्मम्॥
आम्नायगं त्रिचरणं घननीलमुद्यच्छ्रावत्स
कौस्तुभगदाम्बुजशंहृचक्रम्।
हृपुण्डरीकनिलय जगदेकमूलमालोकयन्ति,
कृतिनः पुरुषं पुराणम्॥
अर्थात्- भगवान क्षीर सागर में शेषनाग पर सोये हुए हैं, लक्ष्मी रूपिणी प्रकृति उनकी पाद सेवा कर रही है, उनके नाभिकमल से चतुर्मुखी ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई है। उनका रंग घननील है, उनके गलदेश में कौस्तुभ मणि विभूषित माला है, उनके चार हाथ हैं। जिसमें शंख, चक्र, गदा और पद्यं सुशोभित है-वे जगत के आदि कारण तथा भक्तजन हृत्सरोज विहारी हैं।
इनके ध्यान तथा इनकी भावमयी मूर्ति में तन्मयता प्राप्त करने से भक्त का भव-भ्रम दूर होता है।
क्षीर का अनन्त समुद्र सृष्टि उत्पत्तिकारी अनन्त संस्कार समुद्र है जिसको ‘कारणवारि’ करके भी शास्त्र में वर्णन किया है। ‘कारणवारि’ जन्म न होकर, संसारोत्पत्ति के कारण अनन्त संस्कार है।
संस्कारों को क्षीर इसलिए कहा गया है कि क्षीर की तरह इनमें उत्पत्ति और स्थिति विधान की शक्ति विद्यमान है। ये सब संस्कार प्रलय के गर्भ में विलीन जीवों के समष्टि संस्कार हैं।
अनन्त नाश अथवा शेषनाग अनन्त आकाश का रूप है जिसके ऊपर भगवान विष्णु शयन करते हैं।
शेष भगवान् की सहस्रफन महाकाश की सर्वव्यापकता प्रतिपादन करती हैं, क्योंकि शास्त्र में ‘सहस्य’ शब्द अनन्तना-वाचक है।
आकाश ही सबसे सूक्ष्म भूत है, उसकी व्यापकता से ही ब्रह्म की व्यापकता अनुभव होती है और उससे परे ही परम-पुरुष का भाव है इस कारण महाकाश रूपी अनन्त शय्या पर भगवान सोये हुए हैं।
लक्ष्मी अर्थात् प्रकृति उनकी पाद सेवा कर रही है। इस भाव में प्रकृति के साथ भगवान का सम्बन्ध बताया गया है। प्रकृति रूपी माया परमेश्वर की दासी बन कर उनके अधीन होकर उनकी प्रेरणा के अनुसार सृष्टि, स्थिति, प्रलयकारनी है।
इसी दासी भाव को दिखाने के अर्थ में शेषशायी भगवान की पादसेविका रूप से माया की मूर्ति बनाई गई है।
भगवान के शरीर का रंग घननील है। आकाश का रंग नील है। निराकार ब्रह्म का शरीर निर्देश करते समय शास्त्र में उनको आकाश शरीर कहा है, क्योंकि सर्वव्यापक अति सूक्ष्म आकाश के साथ ही उनके रूप की कुछ तुलना हो सकती है।
अतः आकाश शरीर ब्रह्म का रंग नीला होना विज्ञान सिद्ध है।
भगवान के गलदेश में कौस्तुभ मणि विभूषित माला है। उन्होंने गीता में कहा है-
मनः परतरं नान्यत् किंचिदरित्र धनंजय। मचि सर्वमिद प्रोक्तं सूत्रे मणिगणा इव॥
भगवान की सत्ता को छोड़ कर कोई भी जीव पृथक् नहीं रह सकता, समस्त जीव सूत्र में मणियों की तरह परमात्मा में ही ग्रथित हैं। सारे जीव मणि हैं, परमात्मा सारे जीवों में विराजमान सूत्र है।
गले में माला की तरह जीव भगवान में ही स्थित है। इसी भाव को बताने के लिए उनके गले में माला है।
उक्त माला की मणियों के बीच में उज्जलतम कौस्तुभमणि नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, स्वभाव, कूटस्थ चैतन्य है।
ज्ञान रूप तथा मुक्त स्वरूप होने से ही कूटस्थ रूपी कौस्तुभ की इतनी ज्योति है। माला की अन्यान्य मणियाँ जीवात्मा और कौस्तुभ कूटस्थ चैतन्य है।
यही कौस्तुभ और मणि से युक्त माला का भाव है।
भगवान के चार हाथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष रूपी चतुर्वर्ग के प्रदान करने वाले हैं।
शंख, चक्र, गदा और पद्म एक भी इसी चतुर्वर्ग के परिचायक हैं।
शेषशायी भगवान् विष्णु के साथ सर्व शक्तिमान जगन्माता द्वारा जेविह तत्वातीत और जीव को चतुर्वर्ग फल देने वाले भगवान का सम्बन्ध रहने से उनके भावों में चित्त विलीन करके भक्त लोग शीघ्र ही प्रकृति को प्राप्त कर सकते हैं।
शिव -
योगशास्त्र में देवाधिदेव महादेव जी का रूप जो वर्णन किया गया है, वह इस प्रकार है-
ध्यायेन्नित्य महेशं रजतगिरिनिमं चरुचन्द्राऽतंसम्। रत्नाकल्पोज्ज्वलाँगं परशुसृगवराऽभीतिहस्त्रं प्रसन्नम्॥
पद्मासीनं समन्तात स्तुतवमरनणैर्ध्याघ्र कृतिंवसानम्। विश्व द्यं विश्ववीजं निखिलभयहरं पंचवक्वं त्रिनेत्रम्॥
भगवान शिव के इस ध्यान में वे चाँदी के पर्वत के समान श्वेतवर्ण तथा चन्द्रकला से भूषित हैं।
वे उज्ज्वल, प्रसन्नचित्त तथा चतुर्हस्त में परशु, मृग, वर और अभय के धारण करने वाले हैं।
व्याघ्रचर्म के पहनने वाले देवाधिदेव परमात्मा सभी देवताओं के आराध्य हैं और संसार के आदि कारण भवभयनाशी पंचमुख तथा त्रिनेत्र हैं।
शिवजी का यह भाव सृष्टि स्थिति प्रलयकारी ईश्वर का भाव है जो सृष्टि के साथ ही साथ जीव को आत्यंतिक प्रलय के द्वारा भवभयनाशी मुक्ति पर प्रदान भी करते हैं।
इस शिव रूप परमात्मा के तमोगुणमय संहार भाव को धारण करने से रुद्रमूर्ति भी प्रकट होती है जो प्रलय के समय समस्त ब्रह्माण्ड का नाश करती है।
अतः शिवरूप में एक शाँतिमय ईश्वर भाव और दूसरा संहारकारी रुद्र भाव विराजमान है।
प्रकृति का समस्त विलास उन्हीं की कृपा से उनके अन्दर प्रकाशमान है। इसीलिए उनके शरीर का रंग श्वेत हैं। क्योंकि जहाँ प्राकृतिक समस्त वर्णों का विकास होता है वहाँ श्वेतवर्ण ही होता है।
उनका पंचमुख स्वरूप प्राकृतिक पंचतत्वों का रूप है, जिसके विलास के द्वारा अपूर्व शोभामय ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति होती है, इसीलिए शिवजी के पंचमुखों का हास्य ही प्रकृति की ब्रह्माण्ड विकासमयी दिव्य छटा है।
उनके दो नेत्र पृथ्वी के तथा आकाश के हैं, तृतीय नेत्र अथवा ज्ञानाग्नि है। क्योंकि सूर्यात्मा बुद्धि का अधिदैव है, इसलिए इसी ज्ञाननेत्र के द्वारा मदनभस्म हुआ था।
चतुर्थ ज्योति का स्थान चन्द्रकला है, जो ज्योति का भी आधार और मन का भी अधिदैव होने से संसार का प्रकाशक है।
उनके ईश्वर भावों में ‘त्रिशूल’ त्रिगुण का रूप है, जिसके ऊपर विश्वरूपी वाराणसी स्थित है। जब तक शिव की सत्ता त्रिगुणमयी प्रकृति के भीतर प्रकट रहेगी, तब तक वाराणसी का नाश नहीं हो सकता।
शिवजी के चारों हाथों में परशुमृगवराभीतिमुक्ता के द्वारा चतुर्वर्ग फल-दान शक्ति सूचित की गई है। यथा- जिस हस्त में मृग है, उसी हस्त में अर्थात् सकल मनोरथ पूर्णकारी मृगमुद्रा है।
जिस हस्त में वर है, उसी में धर्म है, क्योंकि धर्म के वरणीय सुख की प्राप्ति असम्भव है और जिस हस्त में अभय है, उसी हस्त में मोक्ष है क्योंकि बिना मोक्ष के आत्यान्त्रिक भयनाश अथवा भवभय-नाश नहीं हो सकता।
शिवजी के अन्य दो भाव और हैं, जिनमें से एक में प्राकृतिक-प्रलय और दूसरे में आत्यन्तिक-प्रलय अर्थात् मुक्ति का भाव बताया गया है।
इस भाव में शिवजी त्रिशूलधारी, भुजंगभूषण भस्मविभूषित, श्मशानवासी, कपालमस्त्री, श्वेतकाय, हरिप्रिय, व्याघ्राम्बरधारी तथा भिखारी हैं।
शिवजी के ये सब रूप प्राकृतिक-प्रलय तथा आत्यन्तिक प्रलय के भावानुसार प्रकट होते हैं। जिस समय एक ब्रह्माण्ड का नाश हो जाता है, वही प्राकृतिक या महाप्रलय का काल होता है।
उस समय ईश्वर की तामसिक शक्ति रुद्ररूप या कालरूप धारण करके संसार को नष्ट कर देती है। द्वितीय अर्थात् आत्यन्तिक-प्रलय मुक्ति को कहते हैं, जिस समय जीव ब्रह्म में विलीन होकर पृथक सत्ता को छोड़ देता है। इस प्रलय के साथ महाकालरूपी परमात्मा का सम्बन्ध रहता है-यह भी शिवजी का एक भाव है।
शिवजी का त्रिशूल सृष्टि नाशकारी रुद्रभाव में अदृष्ट का चिह्न है।
जो सर्वथा अबाधित, सर्वनाशकारी और अति प्रबल पराक्रान्त है, जिसके तेज से समस्त संसार को प्रलय काल में काल के गर्भ में निमग्न होना पड़ता है, परन्तु शिवजी के मुक्तिप्रदाता महाकाल भाव में यही त्रिशूल आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःख रूपी ‘त्रिविध शूल’ का रूप है, क्योंकि इन्हीं त्रिविध शूलों के द्वारा पीड़ित होकर ही जीव मुक्ति के लिये महाकाल रूपी शिवजी की शरण लेता है।
आध्यात्मिक, आधिदैविक व आधिभौतिक- इन तीनों प्रकार के दुःखों के द्वारा पीड़ित होकर ही जीव त्रिविध-दुःख-नाशक मुक्ति के लिए जिज्ञासा करता है।
रुद्रभाव में भुजंगभूषण, भस्मलेपक, श्मशानवास, अस्थिमाला, नरकपाल आदि नाश का रूप प्रकाश करने वाला है।
जब रुद्र के द्वारा संसार का नाश होता है जो उनका अलंकार सोने-चाँदी से निर्मित न होकर अत्यन्त तमोगुणी और प्राणनाशकारी सर्प ही होना चाहिए इसलिए, रुद्रमूर्ति भुजंगभूषण है तथा यह भी इसमें दूसरा भाव है कि सर्प जैसा क्रूर तथा हिंस्र जीव भी काल के द्वारा वशीभूत रहता है। जिससे काल की सर्व ग्रासकारी अमोघगति सिद्ध होती है।
प्रलय काल में समस्त संसार का नाश होकर भस्म ही शेष रह जाता है तथा प्रत्येक जीव का अन्तिम परिणाम भस्म ही है तथा इसी परिणाम के कर्त्ता रुद्रजी हैं, इसीलिए उनका शरीर भस्म-भूषित है, चन्दन चर्चित नहीं है।
समस्त संसार को नष्ट करके श्मशान बनाने वाले रुद्रजी के लिए श्मशानवास विज्ञान सिद्ध होगा, अट्टालिकावास विज्ञान विरुद्ध होगा, इसीलिए रुद्र श्मशानवासी है।
अब इन सब वर्णनों के साथ महाकालरूपी मुक्ति प्रदाता शिवजी का क्या सम्बन्ध है? आओ, इस पर हम कुछ विचार करें।
महाकाल में अपनी सत्ता को विलीन करके जीव जिस समय मुक्ति पद प्राप्त करता है, उस समय उसकी द्वन्द्व बहुल प्रकृति शाँत हो जाने से धर्म, अधर्म, पाप-पुण्य, सत्वगुण-तमोगुण आदि समस्त विरुद्ध वृत्तियाँ उसमें लय होकर एकाकार भाव को प्राप्त हो जाती हैं।
इसकी सूचना के लिए महाकाल भुजंग-भूषण हैं अर्थात् महाकाल की प्रकृति में प्रबल तमोगुण का रूप सर्प भी अपनी हिंसावृत्ति को भूलकर सत्त्वगुण के साथ शोभायमान है।
“जगदम्बा गृहिणी और कुबेर उनका भण्डारी होने पर भी महाकाल रूपी शिवजी का श्मशानवास भस्मविभूषण भिक्षापात्र हस्त में लेकर भिक्षार्थ पर्यटन, त्याग और वैराग्य भाव की सूचना करता है क्योंकि त्याग तथा वैराग्य का ही सम्बन्ध मुक्ति के साथ है।
समस्त संसार की विभूति को छोड़ कर जो मुमुक्षु भिक्षापात्र हाथ में लेकर संन्यासी बन सकते हैं, वे ही मुक्ति के अधिकारी हो सकते हैं और महाकाल के प्रिय बन सकते हैं।
कालरूप रुद्र व्याघ्राम्बरधारी हैं, परन्तु महाकाल दिग्वसन या नग्न है। चाहे कितना ही बलशाली जीव हो, काल सभी को ग्रास करता है और सभी की खाल खींचकर उसे मृत्यु के ग्रास में डालता है, इसी भाव के प्रकाश करने के अर्थ रुद्र व्याघ्राम्बरधारी हैं, क्योंकि हिंस्र-पशुओं में शेर सब से बलवान है, परन्तु उसकी भी खाल खींचकर रुद्र अपना वस्त्र बनाया है।
अन्य वेश में महाकाल के शरीर में कोई वस्त्र नहीं है, जिसका यह तात्पर्य है कि महाकाल रूपी परमात्मा देशकाल के द्वारा अपरिच्छिन्न और अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड में सर्वव्यापक है। जो वस्तु असीम और सर्वव्यापक है उसे वस्त्र के द्वारा ससीम और आवृत नहीं कर सकते। इसलिए महाकाल दिग्वसन हैं परन्तु काल का सम्बन्ध एक-एक ब्रह्माण्ड के साथ रहने के कारण काल की सीमा ब्रह्माण्ड की आयु के द्वारा परिच्छिन्न है, इसलिए कालरूप रुद्र वस्त्र पहना करते हैं।
महाकाल का तृतीय नेत्र ज्ञाननेत्र है। इसलिए उसकी स्थिति कूटस्थ चैतन्य के स्थान के ऊपर ललाट में है।
ज्ञान नेत्र का स्वरूप बताने के लिए ही उसी नेत्र के द्वारा मदन दहन का वृत्तांत शास्त्र में प्रसिद्ध किया गया है। यही ज्ञानस्वरूप शिवजी का तृतीय नेत्र है।
शिवजी पृथ्वी तत्व के अधीश्वर हैं, इसलिए पृथ्वी तत्व की सर्वश्रेष्ठ विकास भूमि हिमालय का सर्वोच्च शिखर कैलाश शिवजी का स्थान है।
शिवजी का वाहन वृषभ ‘धर्म’ का रूप है, क्योंकि धर्म का ही आश्रय करके संसार में शिवराजा के द्वारा समस्त कार्य होता है।
पशु जाति में सत्वगुण का पूर्ण विकास गौ में ही है और सत्वगुण की पूर्णता में ही धर्म का पूर्ण विकास है। इसलिए शिवजी का वाहन वृषभ है।
यही सब प्रकृति लीला मूलक भावों के अनुसार सगुण शिवोपासना परायण-भक्त की सहायता के लिए शिवजी की मूर्ति का रहस्य है।
दुर्गा -
शक्ति के, माता भवानी के विभिन्न रूपों में देवी का रूप ‘दुर्गा’ माना गया है-
“महिषासुर रूप तमोगुण को सिंह रूपी रजोगुण ने परास्त किया है। ऐसे सिंह के ऊपर आरोहण की हुई सिंहवाहिनी माता दुर्गा हैं जो कि शुद्ध सत्त्वगुणमयी ब्रह्मरूपिणी सर्वव्यापिनी और दशदिग्रुपी दस हस्तों में शस्त्र धारण पूर्वक पूर्ण शक्ति शालिनी हैं।”
उनके एक ओर बुद्धि के अधिष्ठाता गणपति तथा धन की अधिष्ठात्री लक्ष्मीदेवी और दूसरी ओर बल के अधिष्ठाता कार्तिकेय तथा विद्या की अधिष्ठात्री सरस्वती विद्यमान हैं अतः बुद्धि, धन, विद्या और बल संयुक्त सर्वशक्तिमयी सगुण ब्रह्मरूपिणी दुर्गादेवी ‘जग जननी महामाया’ है।
प्रकृति की अनन्त शोभा, अनन्त विलास और दिगन्तव्यापिनी अनन्त शक्ति के अनुसार ही उनकी मूर्ति बनाई जाती है। संसार की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के विधानांतर्गत दश महाविद्या आदि अनेक भावों में उनका रूप वर्णन ध्यान और पूजा होती है।
विष्णु के प्रधान सात भेद, शिवरूप के प्रधान पाँच भेद और शक्ति रूप के प्रधान 24 भेद तन्त्रों में कहे गये हैं, जिनमें से दस प्रधान भेद “दशामहाविद्या” कहलाते हैं।
उक्त दशमहाविद्याओं में काली, भवानी रूप प्रथम है। काल के साथ सम्बन्ध होने से तथा आदि स्वरूपा होने से “आद्या-काली” माता-भवानी का नाम है।
काली सबकी आदि, अनादि रूपिणी और समस्त संसार की सृष्टि-स्थिति-प्रलयकारिणी हैं।
निराकार और साकार भेद से उनका ध्यान द्विविध है। उनके रूप-रहित स्वरूप का ध्यान योगी लोग समाधि अवस्था में करते हैं वह स्थूल इंद्रियों से अगम्य, वाक्य और मन के अतीत, अव्यक्त, सर्वव्यापी और अनिर्देश्य है।
इस प्रकार के निराकार स्वरूप का ध्यान अति कठिन होने से मन धारणा और शीघ्र अभीष्ट सिद्धि के लिए सूक्ष्म ध्यान में अधिकार प्राप्ति के अर्थ स्थूल ध्यान का विधान किया गया है।
जिस प्रकार श्वेत, पीत आदि सभी वर्ण कृष्ण वर्ण में लय हो जाते हैं, उसी प्रकार महाशक्ति रूपिणी काली के गर्भ में सभी जीव लय प्राप्त होते हैं-इसी भाव को प्रकट करने के लिए काली का वर्ण कृष्ण निरूपित किया गया है।
नित्या, कालरूपी, अव्यया और शिवात्मारूपिणी माता के अमृत रूप होने से सुधाधार चन्द्रमा का चिह्न ललाट में रक्खा गया है।
शशि, सूर्य और अग्नि रूपी त्रिनेत्र के द्वारा प्रकृतिमाता विश्व का निरीक्षण करती है- इसलिए उनके तीन नेत्र हैं।
समस्त जीव को काली ग्रास करती है और कालदन्त से चर्वण करती है इसलिए ग्रस्त जीवों की रक्तराशि ही उनका वस्त्ररूप है।
समय-समय पर विपत्तियों से जीवों की रक्षा तथा सकल कार्य-प्रेरणा के कारण वर और अभय उनके हस्त में है।
रजोगुण से उत्पन्न विश्व को आवृत करके विराजमान रहती हैं, इसलिए माता रक्त पद्मासनास्था करके वर्णित की गई हैं।
मोहमयी मदिरा को पान करके काल नृत्य करता और चिन्मयी माता साक्षीरूप से काल की लीला को देखकर हास्य करती हैं यही उनके हास्यमय मुख विकास का कारण है।
इस प्रकार के साधारण अधिकारी के कल्याण के लिए गुणों के अनुसार जगजननी प्रकृति की विविध रूप कल्पना की गई है।
संसार का मायाजाल ही उनका केशपाश है, जो महामाया के पृष्ठ पर सुशोभित रहता है। केश समूह चंचल है इसलिए मायामुग्ध जीव सदा ही चंचल और परिणाम स्वभाव हैं। पक्षान्तर में मुक्तात्मागण माया में बन्द और चंचल न होकर स्थिर रहते हैं-इसलिये आद्या शक्ति मुक्त पुरुषों के लिए मुक्तकेशी अर्थात् मुक्तबन्धना है।
इस प्रकार देवी मूर्ति के और भी अनेक भावों पर विचार किया जा सकता है।
अतः यह सिद्धि होता है कि ‘भवानी’ का विश्व रूप-गुण-क्रियानुसार अनन्त भावों का ही विकास मात्र है।
गणेश -
शास्त्रों में गणपति को ब्रह्माण्ड के सात्विक सुबुद्धि राज्य पर अधिष्ठाता देवता कहा गया है। गणपति परमात्मा के बुद्धि रूप हैं, सूर्य-चक्षुरूप हैं, शिव आत्मारूप और आद्या-प्रकृति जगदम्बा शक्ति रूप हैं। गणेश भगवान का शरीर स्थूल है, मुख गजेन्द्र का है उदर विशाल है, आकृति खर्व है, जिनके गण्डस्थल से मदधारा प्रवाहित हो रही है और भ्रमरगण गन्धलोम से चंचल हो कर गण्डस्थल में एकत्रित हो रहे हैं, जिन्होंने अपने दन्तों के आघात से शत्रुओं को विदीर्ण करके उनके रुधिर से सिन्दूर शोभा को धारण किया है और उनका स्वरूप समस्त कर्मों में सिद्धि प्रदान करने वाला है।
गणेशजी का लम्बोदर स्वरूप सुबुद्धि की गंभीरता का सूचक है। द्वैतभाव में प्रपंच का विस्तार है, गाम्भीर्य नहीं और सुबुद्धि परिणामी अद्वैतभाव में प्रपंच का विस्तार नहीं, किंतु भाव की गम्भीरता अवश्य है, यही लम्बोदर होने का तात्पर्य है।
गजेन्द्रवहन का मदस्राव सुबुद्धि मथित ज्ञानामृत है, जिसके पान करने के लिए “मुमुक्षु मधुकर” सदा ही व्यग्र रहते हैं।
सुबुद्धि की सहायता से सकल कार्य सिद्ध होते हैं, इसलिये गणेशजी सिद्धिदाता के रूप में प्रसिद्ध हैं।
गणेशजी सुबुद्धि के साकार स्वरूप हैं तो उनका वाहन मूषक कुतर्क का रूप है। जिस प्रकार किसी वस्तु का मूल्य और आवश्यकता न समझकर सभी को काट देना मूषक का स्वभाव है, उसी प्रकार कुतर्की का भी स्वभाव यह है कि किसी विज्ञान अथवा उसकी गंभीरता आदि को न समझकर सब का खण्डन कर देवे।
इसलिये सुबुद्धि के देवता गणेशजी के वाहन रूप में मूषक रूपी कुबुद्धि को दिखाया गया है।
प्रज्ञा-बुद्धि तर्क के द्वारा नहीं प्राप्त होती। जो चिंता से अतीत भाव समूह हैं उन्हें तर्क के द्वारा प्राप्त करने की स्पर्द्धा नहीं करनी चाहिये। इस प्रकार विचार तथा शास्त्र प्रमाण द्वारा जितनी सुबुद्धि सुलभ श्रद्धा, भक्ति आदि वृद्धिगत होती है, उतनी ही चित्त में से तर्क बुद्धि कम होती जाती है। इसलिये-
सुबुद्धि के संचालक गणेश भगवान जितने वृहत्काय हैं, कुतर्क रूपी मूषक भी उतना ही क्षुद्रकाय है।
यही सब प्रकृति लीला जनित भावानुसार गणपति-भगवान के रूप वर्णन का तात्पर्य है।
(श्री रामनाथ वेदालंकार, एम.ए. गुरुकुल काँगड़ी)
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
अर्थ- (सवितुः) सविता देव का (तत्) वह प्रकाश (वरेण्यम्) वरणीय है, चाहने योग्य है। (देवस्य) सविता देव के (भर्गः) उस प्रकाश को (धीमहि) हम ध्यान करें धारण करें। (यः) जो वह प्रकाश (नः धियः) हमारी बुद्धियों को (प्रचोदयात्) प्रेरित कर देवे-स्फुरित कर देवे।
युगों से आर्य जाति मूल यन्त्र के रूप में जिसकी उपासना करती चली आई है, वह यह पवित्र गायत्री मन्त्र है। शास्त्रों ने इसके जप का बहुत माहात्म्य गाया है। इसे सब वेदों का सार माना गया है। किन्तु इसके अन्दर वह क्या उच्च भाव है, जिसके कारण इसे सर्वोपरि स्थान प्राप्त हुआ है?
मन्त्र का देवता सविता है। सविता शब्द ‘षूं प्राणिगर्भविमोचने’ या ‘षू प्रेरणे’ धातुओं से सिद्ध होता है ‘षूं’ धातु से बनाने पर- “यः सूते चराचर जगद् उत्पादयति से सविता”- जो चराचर जगत् को उत्पन्न करता है वह सविता है। ‘षू’ धातु से बनाने पर- यः सुवति प्रेरयति सर्वान् स सविता’ -जो सकल जनों को शुभ प्रेरणा करता है वह सविता है। इन योगार्थों के अनुसार चराचर को उत्पन्न करने वाले तथा सब के मनों में शुभ प्रेरणा करने वाले भगवान सविता हैं। प्रकृति में सूर्य को सविता कहते हैं। सूर्य स्वयं प्रकाशमान तथा दूसरों के लिए प्रकाश को प्रेरित करने वाला है। उसी प्रकार सविता प्रभु भी स्वयं प्रकाश के पुँज हैं तथा सब मनुष्यों के प्रति अपने उस प्रकाश को प्रेरित करने वाले हैं।
सविता का यह स्वरूप देखने के पश्चात् अब मन्त्र के भाव पर आते हैं। मन्त्र के तीन भाग किये जा सकते हैं। तीन ही इसके चरण हैं एक-एक चरण में एक-एक भाग आ जाता है। प्रथम चरण है- “तत् सवितुर्वरेण्यम्।” भक्त पृथ्वी में, अन्तरिक्ष में, द्युलोक में, अग्नि में, विद्युत में, सूर्य में, सर्वत्र अपने भगवान सविता के तेज और प्रकाश की झाँकी पाकर उस पर मुग्ध हो कर कह उठता है-अहा! देखो, सविता प्रभु की ज्योति कैसी वरणीय है। जो एक बार इसकी झाँकी पा ले, वह इस पर लट्टू होकर आनन्द से नाचने लगे। जो एक बार दर्शन इसके कर ले, फिर वह इसे पाने के लिए लालायित हो उठे। सचमुच सविता की ज्योति ऐसी ही उज्ज्वल है। उपनिषद्कार उसकी ज्योति की महिमा का गान करते हुए कहते हैं-
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारक
नेमा विद्युतो भाँति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनु भाति सर्व
तस्य भासा सर्वमिदं? विभाति॥
-कठ, मुण्डक, श्वेताश्वतर,
अर्थात् ‘ऐसी दिव्य उसकी ज्योति है कि उसके आगे-सूर्य, चाँद, तारे सब फीके पड़ जाते हैं। बिजली की चमक उसके आगे कुछ नहीं, अग्नि की तो बात ही क्या! उसी ज्योति के पुँज में से थोड़ी सी ज्योति लेकर ये सब चमक रहे हैं। उसी ज्योति के लिए इस गायत्री मन्त्र में भक्त कह रहा है कि उस सविता की ज्योति बड़ी स्पृहणीय है। यह बिल्कुल स्वाभाविक है कि जब कोई व्यक्ति किसी अद्भुत वस्तु को देखता है या उसके विषय में सुनता है तब एक दम उसके मुख से उस वस्तु की स्तुति निकल पड़ती है। वैसे ही उपासक भगवान की दिव्य ज्योति को देख कर उसकी स्तुति कर रहा है कि उस सविता की ज्योति वरणीय है अर्थात् ऐसी है कि उसे देख कर सब कोई चाहेगा कि यह ज्योति मुझे भी मिल जाये।
स्तुति के अनन्तर प्रार्थना की बारी आती है। मनुष्य जिसकी स्तुति करता है उसे फिर अपने लिए माँगता है। इसलिए सविता के प्रकाश की स्तुति के उपरान्त भक्त कह पड़ता है- ‘भर्गो देवस्य धीमहि’ अर्थात् सविता के जिस प्रकाश की ऐसी प्रशंसा है उसका हम ध्यान करते हैं, हम चाहते हैं कि वह प्रकाश हमारे अंदर भी स्थित हो जाय। उसके दिव्य आलोक से हमारा हृदय जगमगा उठे।
मंत्र का तीसरा भाग है- “धियो यो नः प्रचोदयात्।” सविता के प्रकाश को हम अपने अन्दर क्यों धारण करना चाहते हैं? इस कारण कि वह आकर हमारी बुद्धि को प्रेरित कर देवे। हमारी बुद्धि प्रसुप्त पड़ी है, सविता प्रभु का प्रकाश आकर उसे जगा देगा और क्रिया में प्रेरित कर देगा, जैसे कि सविता सूर्य का प्रकाश प्रातःकाल आकर सोये हुए प्राणियों को जगा देता और कर्मों में प्रवृत्ति कर देता है। हमारे हृदयों में प्रकाशक व प्रेरक सविता का उदय हो जाने पर हमारी बुद्धि के आगे एक उजाला खिल उठेगा, जिस उजाले में वह गहन से गहन विषयों का विवेचन कर सकेगा। हमारे आगे से अज्ञान का अन्धेरा मिट जायेगा और ज्ञान-प्रकाश से हमारा अन्तःकरण आलोकित हो उठेगा। जैसे निष्क्रिय पड़ी हुई किसी मशीन को कारीगर आकर प्रेरणा दे देता है, फिर वह चल पड़ती है और नयी-नयी वस्तुएँ उस मशीन से बन कर निकलती हैं वैसे ही निष्क्रिय सी हुई हमारी बुद्धि को सविता का प्रकाश आ कर एक प्रेरणा दे देगा, उस प्रेरणा को पाकर हमारी बुद्धि नवीन-नवीन कल्पनाओं और नवीन-नवीन विज्ञानों की सृष्टि करने में और हमें आध्यात्म-मार्ग पर चलाने में समर्थ हो सकेगी। सविता के प्रकाश की किरण को पाकर हमारी बुद्धि कुण्ठित व किंकर्त्तव्यविमूढ़ नहीं रहेगी किन्तु कुशाग्र तथा विवेक की ज्योति से आभासित व स्फुरित हो उठेगी।
यह इस गायत्री मन्त्र का भाव है। इसके तीन चरणों में क्रमशः प्रभु के तेज की स्तुति, प्रार्थना और उपासना का वर्णन है। मन्त्र का जो संक्षिप्त सा आशय यहाँ वर्णित किया गया है उससे पाठक कल्पना कर सकते हैं कि इस मन्त्र को इतना अधिक गौरवास्पद स्थान क्यों प्राप्त हुआ है और क्यों यह समस्त आर्य जाति का मूलमन्त्र बना है। यह है- ‘बुद्धि की स्फुरणा’ का गीत। हमने अपने मूलमन्त्र में उत्तमोत्तम स्वादिष्ट भोजन नहीं माँगे, असीम धन-दौलत नहीं माँगी, स्त्री-पुत्र-परिजन नहीं माँगे। हमने माँगी है-‘दिव्य प्रकाश से जगमगाती हुई बुद्धि।’ यद्यपि अन्य अनेक वेदमन्त्रों में ऐसी प्रार्थनाएँ हैं कि हमें उत्तमोत्तम भोजन मिले, भरपूर ऐश्वर्य मिले, सौ वर्ष की आयु मिले, स्त्री-पुत्र-परिजन मिलें, पर अपने मूलमन्त्र में हमने इन वस्तुओं को नहीं माँगा है। हमारी मूल माँग है-‘बुद्धि की स्फुरणा।’ बुद्धि का झरना हमारे अन्दर झर पड़े तो बुद्धि के बल से अन्य सब ऐश्वर्यों को हम सहज में उपलब्ध कर सकते हैं। बुद्धि की स्फूर्ति हो गई, मानो सब कुछ मिल गया। किसी भी स्तर पर खड़े हुए मानव के लिए बुद्धि का आगे की दिशा में स्फूर्ति होना आवश्यक है। अन्यथा वह उन्नति नहीं कर सकता। संसार में अनेक मानवों की यह अवस्था होती है कि अपने जीवन के मध्य में वे जिस सीढ़ी पर खड़े होते हैं, जीवन के अन्त तक उसी सीढ़ी पर खड़े रहते हैं। बिल्कुल भी ऊपर नहीं चढ़ पाते। इसका कारण यही है कि ऊर्ध्वारोहण के लिए उनकी बुद्धि प्रेरणा और स्फुरणा नहीं पाती।
आओ, हम सब मिल कर सविता प्रभु से उसके दिव्य प्रकाश की याचना करें, प्रकाश आकर हमारी बुद्धियों को प्रकाशित, उद्भासित, तीक्ष्ण, सजग, सक्रिय तथा ऊर्ध्व दिशा में दौड़ने वाला कर देवे। ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ ‘धियो यो नः प्रचोदयात्॥’
(प्रो. रामचरण महेन्द्र एम.ए.)
हिन्दू धर्म में तीन शक्तियों लक्ष्मी, सरस्वती तथा दुर्गा में गुप्त रूप से धन, ज्ञान और शारीरिक शक्ति की साधना करने का गुप्त संकेत छिपा हुआ है। हिन्दू धर्म में शक्ति का बड़ा महत्व है। कमजोर व्यक्ति को मुक्ति नहीं मिलती। जब तक साधक शक्तिवान न बने, तब तक उसकी मुक्ति नहीं हो सकती। शक्तिवान का ही संसार में आदर होता है। शक्ति की इतनी उपयोगिता देखकर ही हमारे यहाँ शक्ति धर्म तक की स्थापना हुई है। शक्ति की देवी को महत्व प्रदान करने के लिए उसके नाना नाम धरे गये- दुर्गा, देवी, चण्डी, काली, भवानी- उसे असुरों को पराजित करने वाली देवी माना। वह धर्म की स्थापना के लिए युद्ध करती और अत्याचार, अन्याय, विलास और कामुकता का विनाश करती है। तात्पर्य यह है कि इन सब रूपों के विधान में शक्ति के नाना रूपों का महत्व जनता के हृदय तक पहुँचाया गया। एक युग था जब भारतवासी सुशिक्षित थे और इन प्रतीकों का अर्थ समझते थे। खेद है कि अब इनके गुप्त भेद विस्मृत हो गए हैं और केवल मिथ्या पूजा की थोथी भावना मात्र शेष रह गयी है। फिर भी इससे शक्ति का महत्व स्पष्ट हो जाता है।
बलवान बनो! शक्ति की पूजा करो। जब हम यह सलाह देते हैं, तो हमारा गुप्त मन्तव्य यह होता है कि दुर्बल मत बनो। कमजोर मत बनो! जिधर से कमजोरी आती है, उधर ध्यान दो और निर्बलता को दूर भगाओ। अपने शरीर, मन, आत्मा में शक्ति भर लो।
संसार में अनेक पाप हैं। आप गौ को मार देते हैं, तो गौ हत्या का जघन्य पाप आपके सिर पर पड़ता है, किसी बच्चे को मार देते हैं, तो बाल हत्या के अपराधी होते हैं, किसी ब्राह्मण का वध कर डालते हैं, तो ब्रह्महत्या का पाप लगता है। इसी प्रकार हम शास्त्रों में अन्य भी अनेक पापों का उल्लेख है, कि सब से बड़ा पाप दुर्बलता है।
कमजोर होना मनुष्य का सबसे बड़ा पाप है। इसका कारण यह है कि दुर्बलता के साथ अन्य समस्त पाप एक-एक कर मनुष्य के चरित्र में प्रविष्ट हो जाते हैं। दुर्बलता सब प्रकार के पापों की अवश्य जननी है।
यदि आप दुर्बल हैं, शरीर में कृशकाय और मन में साहस विहीन हैं, तो अपने या अपने परिवार-पड़ौस इत्यादि पर किए गये अत्याचार को नहीं रोक सकते, न उसके विरुद्ध आवाज ही उठा सकते हैं।
पातकी वह है, जो अत्याचार सहता है, क्योंकि उस की कमजोरी देखकर ही दूसरे को उस पर जुल्म करने की दुष्प्रवृत्ति आती है।
मनुष्यों! दुर्बलता से बचो! दुर्बलता में एक ऐसी गुप्त आकर्षण शक्ति है, जो अत्याचारी को दूर से खींचकर आपके ऊपर अत्याचार कराने के लिए आमन्त्रित करती है। मजबूत तो हमेशा ऐसे कायर की तलाश में रहता है। वह प्रतीक्षा देखता रहता है कि कब अवसर मिले और कब मैं अपना आतंक जमाऊँ। दूसरे शब्दों में यदि आप निर्बल न रहें, तो अत्याचार करने का प्रलोभन ही न हो, बेइंसाफी को पनपने का अवसर ही प्राप्त न हो। जहाँ प्रकाश नहीं होता, वहाँ अन्धकार अपना आसन जमाता है। इसी प्रकार जहाँ निर्बलता, अशिक्षा, कमजोरी होती है, वहीं पर अत्याचार और अन्याय पनपता है।
शक्ति ऐसा तत्त्व है, जो प्रत्येक क्षेत्र में अपना अद्भुत प्रकाश दिखाता है, संसार को चमत्कृत कर देता है। व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य, योग्यता- चाहे किसी क्षेत्र में आप शक्ति का उपार्जन प्रारम्भ कर दें। आप प्रतिभावान बन जायेंगे।
एक विद्वान के वे वचन अक्षर सत्य हैं- “शक्ति विद्युत धारा में ही बल है कि वह मृतक व्यक्ति समाज की नसों में प्राण संचार करे और मुक्त एवं सतेज बनाये।
शक्ति एक तत्त्व है, जिसका आह्वान करके जीवन के विभिन्न विभागों में भरा जा सकता है और उसी अंग में तेज और सौंदर्य का दर्शन किया जा सकता है। शरीर में शक्ति का आविर्भाव होने पर देह जैसी चमकदार, हथौड़े जैसी गठी हुई, चन्दन जैसी सुगंधित एवं अष्टधातु-सी निरोग बन जाती है। बलवान शरीर का सौंदर्य देखते ही बनता है। में शक्ति का उदय होने पर साधारण मनुष्य कोलम्बस, लेनिन, गाँधी, सन्यतसेन जैसा बन जाते हैं और ईसा, बुद्ध, राम, कृष्ण, मुहम्मद के समान असाधारण कार्य अपने मामूली शरीरों द्वारा ही करके दिखा देते हैं। बुद्धि का बल महान है। तनिक से बौद्धिक-बल की चिनगारी बड़े-बड़े तत्त्व ज्ञानों की रचना करती है और वर्तमान युग में वैज्ञानिक आविष्कारों की भाँति चमत्कारिक वस्तुओं में अनेकानेक वस्तुएँ निर्माण कर डालती हैं। अधिक बल का थोड़ा सा प्रसाद हमारे आस-पास चकाचौंध उत्पन्न कर देता है। आत्मा की मुक्ति भी ज्ञान, शक्ति एवं साधना से होती आई है। अकर्मण्य और निर्बल मन वाला व्यक्ति आत्मोद्धार नहीं कर सकता। तात्पर्य यह है कि ‘लौकिक और पारलौकिक सब प्रकार के दुःख द्वन्द्वों से छुटकारा पाने के लिए शक्ति की ही उपासना करनी पड़ेगी।’
शक्तिवान बनिये। जीवन के हर क्षेत्र में लोग पुकार-पुकारकर आपको शक्ति अर्पित करने की सलाह दे रहे हैं। जो जिस मात्रा में शक्ति प्राप्त कर लेता है, वह उतना ही समुन्नत समझा जाता है। उन्नति का रहस्य शक्ति संचय का ही मार्ग है।
भगवान शंकराचार्य के ये वचन स्मरण रखिये, ‘शक्ति के बिना (अर्थात् बलवान बने बिना) शिव का स्पन्दन नहीं होता। शिव की उन्नति देह की सहायता से होती है, वैसे ही शिव-तत्त्व का स्पन्दन शक्ति द्वारा होता है। यदि भक्ति के बिना ईश्वर नहीं, तो शक्ति के बिना शिव नहीं मिलते-अर्थात् कल्याण का मार्ग पास नहीं होता। ब्रह्मप्राप्ति में-आत्मिक उन्नति में भगवती आद्य-शक्ति की सहायता आवश्यक है।
मित्रों, आपके शरीर में, मन में, आत्मा में उच्च कोटि की शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। सतत् परिश्रम से इनका विकास कीजिए। ये अतीव आवश्यक हैं, ये आपकी वैयक्तिक संपत्तियां हैं। पर इनके अतिरिक्त दो शक्तियाँ और हैं, जिनकी आपको विशेष आवश्यकता है (1) अर्थ शक्ति (2) संगठन शक्ति। हम जिस युग में रह रहे हैं वह रुपये-पैसे का युग है। पैसे के बल से समस्त उन्नति के साधन सुख समृद्धि इस भूलोक में मिल सकती है। संगठन-बल में गजब की ताकत है। आज जो प्रान्त, जो देश संगठित है वही शक्तिशाली है। एक-एक मिलकर मोटी मजबूत रस्सी बनती है। एक-एक बूंद से तालाब बनता है, एक-एक पैसे के संग्रह मनुष्य संपत्तिवान बनता है, एक-एक व्यक्ति का बल संगठित होकर ग्यारह मनुष्यों का बल बन जाता है। अतः सच्चे दिल से सच्चे कामों के लिए सदुद्देश्यों की प्राप्ति के लिए संगठित हो जाइए। मित्रताएँ कायम कीजिए और जितने अधिक व्यक्तियों से सम्भव हो एकता, मेल या संपर्क स्थापित कीजिए। बस आप उसी अनुपात में शक्तिशाली बन जायेंगे। मेल से एक ऐसा केन्द्र स्थापित होता है जिसमें सब एक दूसरे को सेवा-सहयोग और सहायता देते हैं। इस पारस्परिक आदान-प्रदान से मनुष्य की शक्ति बहुत बढ़ जाती है।
‘आचार्य श्रीरामशर्मा जी’ के ये शब्द बहुमूल्य हैं, जो व्यक्ति विशेष दिशा में महत्व प्राप्त करना चाहते हैं, उन्हें चाहिए कि अपने इच्छित मार्ग के लिए, शक्ति सम्पादन करें। सच्ची लगन और निरंतर प्रयत्न-यही दो महान साधनाएं हैं, जिनसे भगवती शक्ति को प्रसन्न करके उनसे इच्छित वरदान प्राप्त किया जा सकता है। आपने अपना जो भी जीवनोद्देश्य बनाया है उसे पूरा करने में जी-जान से जुट जाइए। सोते-जागते उसी के सम्बन्ध में सोच विचार करते रहिए और आगे का मार्ग तलाश करते रहिए। परिश्रम! परिश्रम!! घोर परिश्रम!!! आपकी आदत में शामिल होना चाहिए। स्मरण रखिये अपना कोई भी मनोरथ क्यों न हो, वह शक्ति द्वारा ही पूर्ण हो सकता है। इधर-उधर बगलें झाँकने से कुछ नहीं हो सकता।
वेदों ने शक्ति उपार्जन का दिव्य सन्देश दिया था, जो आज भी इस भारत भूमि के कण-कण से गुँजरित हो रहा है।
यजुर्वेद में कहा गया है, “क्षिपो मृजन्ति” अर्थात् पुरुषार्थी लोग ही पवित्र होते हैं और पवित्र कार्य करते हैं।
“स्थिरै रंगैस्तुष्टुवाँसः“
अर्थात् बलवान अवयवों द्वारा ही ईश्वर की उपासना करेंगे।
“आराष्ट्रे राजन्यः सूर इसव्यो अति व्याधि महारथो जायताम्”
अर्थात्- हमारे राष्ट्र में शूरलोक उत्तम प्रभावशाली वीर बनें।
“उग्राय तवसे सु वृत्ति प्रेरय”
श्रेष्ठ बल के लिए उत्तम भाषण और उत्तम कर्म करो।
“आप्नुहि श्रेयाँ समति सम काम”
“हे मनुष्य अपने समान लोगों में आगे बढ़ और श्रेय को प्राप्त कर।”
‘असश्चतः शतधरा अभिश्रियः’
“सतत् परिश्रम करने वाले को सैंकड़ों प्रवाहों से यश प्राप्त होता है।”
दृते दृंह माँ, ज्योक्ते संदृशि जीव्यासम्। ज्याक्ते संदृशि जीव्यासम्॥”
“हे समर्थ परम दृढ़ परमेश्वर! मुझे दृढ़ बना दे, जिससे मैं तेरे संदर्शन में, तेरी ठीक दृष्टि में चिरकाल तक जीता रहूँ। तेरे सम्यक् दर्शन में दीर्घ आयु तक जीता रहूँ।”
अन्त में एक बार फिर हम आपको यही सलाह देंगे कि इस संसार में आप जहाँ हो, जिस परिस्थिति में हो, जीवन के किसी क्षेत्र में अग्रसर हो रहे हो, शक्ति अर्जन कीजिए। इस संसार में दुर्बलता सबसे बड़ा महाघोर पाप है। दुर्बल को सब कोई दबाते हैं। कमजोर सर्वत्र नारकीय यंत्रणाएँ भोगते देखे जाते हैं।”
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः”
यह आत्मा निर्बलों को प्राप्त नहीं होता।
(श्री रामचन्द्र टण्डन)
पालि श्लोक को गाथा कहते हैं। थेरगाथा और थेरीगाथा दोनों संग्रहों के स्वर स्वभावतः भिन्न हैं। भिक्खुओं की गाथाओं में गहन आँतरिक खोज है। भिक्खुनियों की गाथाओं में एक विशेष मृदुता और आत्म-समर्पण है। जहाँ तक इनकी काव्यात्मक उत्कृष्टता का प्रश्न है। डॉ. वितनीर्ज ने कहा था कि ऋग्वेद की ऋचाओं से लेकर कालिदास और अमरु के गीत काव्यों तक इस समस्त प्रसार में अपनी शक्ति और सौंदर्य में, यह गीत किसी रचना से नीचे न पड़ेंगे।
विशेषकर थेरीगाथा में रचयित्रियों की वैयक्तिकता फूट पड़ती हैं। उसमें जीवन के चित्रण स्पष्ट हैं। थेरीगाथा से हम जान पाते हैं कि किस प्रकार दुख से पीड़ित और अभिभूत होकर स्त्रियाँ संघ के प्रति आकर्षित होती थीं। कभी-कभी अधम वृत्तियों में अनुरक्त स्त्रियाँ अपने जीवनयापन से खिन्न हो वृद्ध, धाम व संघ की शरण में जाती थीं। इन सभी ने अपने पूर्व और बाद के जीवन के अन्तर का अपनी गाथाओं में चित्रण किया है।
भिक्खुनियों के उद्गार
थेरीगाथा में 522 गाथाएं आई हैं। इनकी रचने वाली 73 भिक्खुनियाँ हैं। ये सभी भिक्खुनियाँ बुद्ध भगवान की शिष्याएं थीं। महाराज शुद्धोदन की मृत्यु के अनन्तर, बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द के आग्रह से अपनी विमाता महाप्रजापति गौतमी को धम्म में प्रव्रजित किया था और उन्हें भिक्खुनी बनने की अनुमति दी थी। गौतमी के साथ पाँच सौ और स्त्रियाँ भी प्रव्रजित हुई थीं। कालाँतर में भिक्खुनियों का एक अलग संघ ही बन गया और अनेक कुलों और जीवन के विभिन्न स्तरों की स्त्रियों ने इस संघ में स्थान पाया। इन्हीं में से 73 भिक्खुनियों ने आत्मानुभव के अपने उद्गारों को गीतबद्ध किया, जिनका संग्रह थेरीगाथा के रूप में हमें प्राप्त है।
बौद्ध पिटकों में, सुत्तपिटक के अंतर्गत एक निकाय है, जो सुद्दकनिकाय कहलाता है। इस निकाय में 15 विभिन्न ग्रंथ हैं, जिसमें एक थेरीगाथा है। थेरीगाथा की एक टीका, पाँचवीं सदी ईस्वी की है, जो परमात्थदीपिनी के नाम से प्रसिद्ध है। इसमें प्रत्येक भिक्खुनी के जीवन वृत्त के साथ उसकी गाथी का संबन्ध मिलाया गया है और उन विशेष परिस्थितियों का वर्णन किया गया है, जिनमें ये उद्गार निकले थे।
आइए, इन गाथाओं में से कुछ का रसास्वादन करें :-
‘चन्द्र, सूर्य, अग्नि, अनेक देवताओं की मैं अर्चना-पूजा करती थी।’
नदी जल में अवगाहन करती थी।
मैंने शिकार का मुँडन किया, धरती पर शयन छोड़ा, रात्रि का भोजन त्याग दिया और तरह-तरह के व्रतों का पालन करती रही, फिर भी विजय-वासना जगाए रखने के लिए और काया को आकर्षक बनाने के लिए मैं अपने शरीर को आभूषणों से सजाए रखती थी और उस पर सुगंधित लेप लगाती थी।
जब देह का वास्तविक रूप मैंने पहचाना, तब घर-बार छोड़ कर मैं प्रव्रजिता हुई। भोग कामना में अब मेरी रति पूर्णतया नष्ट हो गई। मेरे सभी बन्धन टूटे।
‘कामनाएं नष्ट हुई, मन को परम शाँति मिली।’
ये उद्गार हैं, नन्दुत्तरा के, जो कुरुराज्य के एक ब्राह्मण वंश में जन्मी थी और जिसने शिल्प और विज्ञान की शिक्षा प्राप्त की थी। इसकी वाग्मिता विख्यात थी, किन्तु बुद्ध के प्रमुख शिष्य महामोदगालान से शास्त्रार्थ में हारकर ये धम्म प्रवर्जित हुई।
एक दूसरी भिक्खुनी, पटाचारा के उद्गार देखिए :-
‘धरती को हल से जोत कर लोग उसमें बीज रोपते हैं, स्त्री तथा बाल बच्चों का पालन करते हुए वे धन कमाते है।
मैं साधिका होकर, निर्वाण कैसे न प्राप्त करती? मैं जो शीलयुक्त और शास्ता की सेविका हूँ, और प्रमादहीन, अचंचल तथा विनयपूर्ण हूँ। एक बार पैर धोने पर मैंने देखा कि बहाया हुआ जल ऊपर से नीचे जा रहा है। मैंने अपना चित्त समाधि में लगाया। दीपक लेकर, मैं फिर बिहार के एक कक्ष में गई, प्रकाश में शय्या पर बैठी और दीपक की लौ पर ध्यान करने लगी। फिर दीपक की बत्ती को सुई के सहारे नीची करने लगी कि दीप बुझ गया। दीपक ने निर्वाण प्राप्त किया। मेरी तृष्णा की लौ भी सदा के लिए बुझ गई।
पटाचारा श्रावस्ती के एक सेठ की पुत्री थी, जो आचारभ्रष्ट होकर अनेक कष्टों को झेलकर भगवान बुद्ध की शरण में आई थी और जिसे भगवान ने धर्मोपदेश दिया था जिससे उसके चित्त को शान्ति मिली थी।
पटाचार की भिक्खुनी शिष्याएं बहुत सी हुई, जो विभिन्न कुलों की थी। सभी ने पारिवारिक जीवन का भोग किया था, किन्तु उन्हें संतान का वियोग का दुःख उठाना पड़ा था। एक भिक्खुनी पर पटाचार के उपदेश का क्या प्रभाव पड़ा था, उसकी झलक इस गीत में मिलती है :-
‘वह किस रास्ते आया और कहाँ गया?’
“जब तू इतना भी नहीं जानती, तो बेटा-बेटा कहकर उसके लिए क्यों रोती है, जो तेरे पास चार दिन रहा। वह किस रास्ते आया और कहाँ गया? तू इसे जाने भी तो क्यों रोए? आना जाना तो प्राणियों का स्वभाव है। बिना बताए वह आया, बिना पूछे वह चला गया। चार दिन ठहर कर वह चला गया।
एक मार्ग से वह आया, दूसरे से चला गया। यह प्राणी का धर्म है, फिर शोक क्यों?
पुत्र शोक का जो काँटा मुझ दुःखिनी के अन्तस्तल में चुभा हुआ था, वह आज निकल गया। आज मेरा हृदय शाँत है। मैं परिनिवृत्त हुई।”
महाप्रजापति गौतमी
और अब स्वयं महाप्रजापति गौतमी के उद्गार देखिए, जो भगवान बुद्ध की माता मायादेवी की सबसे छोटी बहन थी। दोनों राजा शुद्धोदन को ब्याही थी। बुद्ध के जन्म के सात दिन बाद मायादेवी की मृत्यु हो गई महाप्रजापति गौतमी ने ही उनका पालन किया। शुद्धोदन की मृत्यु पर महाप्रजापति गौतमी ने संसार त्याग करने की इच्छा प्रकट की, किन्तु भगवान ने इनकी अनुमति उन्हें नहीं दी। बाद में उन्हें कुछ ओर शाक्य स्त्रियों के साथ धर्म प्रव्रजित होने की आज्ञा दी और इस प्रकार भिक्खनियों का एक अलग संघ ही बना। भगवान बुद्ध के प्रति गहरी आस्था महाप्रजापति गौतमी की गाथाओं में प्रकट होती हैं। यहाँ एक अंश दिया जाता है :-
“हे बुद्ध, हे वीर, हे प्राणियों में श्रेष्ठ, मैं तेरे आगे सिर झुकाती हूँ। तूने मेरा और कितने ही प्राणियों का दुःख से उद्धार किया है। यथार्थ ज्ञान न जानती हुई मैं संसार-चक्र में घूमती रही। मैंने उन भगवानर बुद्ध के दर्शन किए। यह मेरा अन्तिम शरीर है। “
कृशा गौतमी
कृशा गौतमी की कथा तो बहुत ही प्रसिद्ध है। श्रास्वती के एक निर्धन कुल में इसका जन्म हुआ था। नाम गौतमी था और बहुत ही दुबली होने के कारण यह कृशा गौतमी कहलाई। इसका पुत्र जाता रहा। शोक के उन्माद में मृत को गोद में लेकर गरीब घर-घर जाकर कहती मेरे बच्चे की दवा दो। किसी ने दया कर उसे भगवान बुद्ध के पास जाने को कहा और मार्ग दिखा दिया। वहाँ पहुँच कर उसने कहा-भगवान मेरे बच्चे को दवा दो। भगवान बोले नगर में जाकर किसी ऐसे घर से मुट्ठी भर सरसों ले आओ, जहाँ मृत्यु नहीं हुई हो। जो आज्ञा कह कर वह गई। घर-घर भटकी। कौन घर ऐसा था जहाँ मृत्यु न हुई हो कृशा को ज्ञान हुआ लौट कर उसने भगवान बुद्ध से कहा, भन्ते, अब सरसों पाने का प्रयोजन नहीं रहा। मुझे प्रव्रज्या दें। अपनी शरण में लें। कृशा गौतमी की गाथा का एक अंश इस प्रकार है-
“हतभाग्य नारी जन्म-जन्माँतर में तूने अपरिमित दुःख उठाया है, हजारों जन्मों में तूने आंसुओं की अजस्र धारा बहाई है।
न जाने कितनी बार तूने अपने पुत्रों के माँसों को श्मशान में बनैले पशुओं द्वारा खाये जाते देखा है।
तेरा सब कुछ लुट गया है, पति ने भी तुझे छोड़ दिया।
यह महान आश्चर्य है, इस अवस्था में इस समय मृत्यु से परे हूँ। मैंने अमृत पा लिया है, निर्वाण का मैंने साक्षात्कार किया है। मैंने धर्म के दर्पण में अपना मुँह देखा है।
अम्बपाली की कथा
अम्बपाली की कथा कम प्रसिद्ध नहीं। इसका जन्म वैशाली के राजोपवन में एक आम वृक्ष के नीचे हुआ था, इसी से यह अम्बपाली कहलाई। यह परम सुन्दरी थी और वैशाली के राजकुमारों में उससे विवाह करने की स्पर्द्धा थी। अपने जीवन के अन्तिम दिनों में जब भगवान बुद्ध वैशाली गए, तो अम्बपाली के ही उपवन में ठहरे। अम्बपाली ने उन्हें भोजन के लिये निमंत्रित किया और तदन्तर उनसे उपदेश ग्रहण किया। अम्बपाली ने उपवन बुद्ध-संघ को दान कर दिया और कुछ समय बाद अपने प्रव्रजित पुत्र विमल कोंडन्य से उपदेश लेकर प्रव्रज्या ग्रहण की। जब उस ने अपने जर्जर होते शरीर को देखा तो उसे बुद्ध-वचन की सत्यता जंची। उसे शरीर की अनित्यता का ज्ञान हुआ। उसकी गाथा के कुछ अंश देखिए-
“किसी समय, मेरे केश काले भौंरे के रंग के थे और उसके अगले भाग घुँघराले थे।
वह जरावस्था में अब सन जैसे हो गए हैं। सत्यवादी के वचन व्यर्थ नहीं होते। कभी मेरा सिर सुवासित और सोने के आभूषणों से सुसज्जित रहता था, जरावस्था में आज झुर्रियों से भर गया है।
सत्यवादी के वचन व्यर्थ नहीं जाते। जीर्ण-शीर्ण घर की भाँति यह जराग्रस्त शरीर अपने आप नष्ट हो जायेगा।
सत्यवादी के वचन कभी व्यर्थ नहीं जाते।
सुमेधा का उद्गार
सुमेधा मंतावती की राजपुत्री थी। माता-पिता ने उपयुक्त वर चुना किन्तु उसने कहा, “मुझे घर बसाने से क्या तात्पर्य? मैं तो प्रव्रजित होऊँगी। अन्त में उसने अपना हठ रखा। उसकी गाथा के कुछ अंश ये हैं -
“सुमेधा के पिता ने कहा-
रानी बन कर तू प्रचुर धन और ऐश्वर्य का भोग कर। तू तरुणी है, जीवन के सुख का उपभोग कर। सब कुछ तेरे अधिकार में है। स्वामी का वरण कर।
सुमेधा ने उत्तर दिया- यह नहीं सम्भव है पिताजी। बार-बार जन्म लेने में क्या सार है?
मैं प्रव्रज्या ही लूँगी या प्राण त्याग करूंगी, यही एकमात्र मेरा वरण है। जब अमृत प्रत्यक्ष हो तब क्या कोई विषयों की ज्वाला में दहन होना पसन्द करेगा!
यह निर्वाण अजर है, अमर है। यहाँ शोक नहीं शत्रु नहीं, विघ्न नहीं। यह अचल है “भयहीन है, संतापहीन है।”
इस प्रकार बौद्ध भिक्खुनियों ने अपने उद्गारों द्वारा न केवल अपने समय के, वरन् सभी आने वाले काल के जन समाज का उद्बोधन किया है।
(स्व. लाला हरदयाल जी)
व्यक्ति को जिस प्रकार अपना जीवन-सूत्र अक्षुण्ण रखने के लिए भोजन, जल और वायु की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार अपने ज्ञानतंतुओं को और अधिक विकसित करने के हेतु अपना बौद्धिक दृष्टिकोण व्यापक बनाने के लिए ज्ञानार्जन की भी आवश्यकता पड़ती है। मनुष्य को दो अत्यन्त महत्वपूर्ण निधियाँ मिली हैं- एक तो मस्तिष्क और दूसरी सामाजिक भावना। मस्तिष्क और सामाजिक भावना का मानवीय विकास के इतिहास में प्रमुख स्थान है। मस्तिष्क की महिमा का तो कहना ही क्या है! मनुष्य इसी की बदौलत पशु वर्ग से ऊँचा और उन्नतिशील माना जाता है। गिद्ध, चींटी, कुत्ते आदि के ज्ञान-तंतु मनुष्य से अधिक सजग होते है, परन्तु उनका मस्तिष्क मनुष्य के मस्तिष्क की समता नहीं कर सकता। मनुष्य की-सी प्रखर बुद्धि उनके पास कहाँ।
परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य यह जान कर ही सन्तोष कर ले कि उसका मस्तिष्क तो संसार के अन्य जीवों की अपेक्षा अधिक विकसित एवं पूर्ण है। इसलिए उसे बिना अधिक ज्ञान प्राप्त किये ही संसार के निम्न वर्गों पर शासन करने का अधिकार मिल गया। जिस व्यक्ति का मस्तिष्क आलस के वशीभूत होकर दिन व दिन गुँठित होता जाता है वह धीरे-धीरे पशु श्रेणी का ही गिना जाने लगता है। वह स्वयं अपने लिए भारस्वरूप होकर दूसरों के लिए भी अखरने वाला प्राणी बन जाता है। उससे किसी को किसी प्रकार की आशा नहीं होती और वह समाज द्वारा उसी प्रकार की उपेक्षा-पूर्वक अलग हटा दिया जाता है, जिस प्रकार एक स्पन्दनहीन जीव।
विश्व में अवतरित होने का अर्थ है, अधिकाधिक ज्ञानार्जन करके विश्व का कल्याण करना। मनुष्य को तो होश सम्हालते ही ज्ञान की खोज में निकल पड़ना चाहिए। जीवन-यापन के लिए वैसे तो किसी भी विशेष कला में पारंगत हो लेना निताँत आवश्यक है, परन्तु बौद्धिक विकास के बिना जीवन प्रत्येक दृष्टि से असंतोष-जनक और अपरिपूर्ण रह जाता है और ऐसे मनुष्य को समाज में वह आदर नहीं प्राप्त हो पाता, जिसका वह इच्छुक रहता है। वास्तव में ज्ञान ही सत्य है। सत्य के दर्शन होने पर ही आत्मा को पूर्णत्व प्राप्त होता है। मनुष्य का यह सबसे बड़ा कर्त्तव्य है कि वह अपने आपको ऐसे वातावरण में संलग्न रखे, जिसमें उसे सर्वत्र ज्ञान मालाओं के ही दर्शन हों।
ज्ञान और बौद्धिक संस्कृति आपके लिए विविध प्रकार के फल देने वाले हैं। यदि आप इनके अर्जन में, इनकी साधना में तल्लीन हैं, तो आपको न तो अन्धविश्वास ही पथ-भ्रष्ट कर सकेंगे और न आप राजनीति अथवा धर्म के क्षेत्रों में झूठी नेतागीरी के बहकावे में आयेंगे। आपको ज्ञानरूपी सत्य की खोज करते-करते अपने सच्चे कर्त्तव्य का भान हो जायेगा और आप इसकी पूर्ति में लग जायेंगे। यदि आप चाहते हैं कि स्वार्थांध पुरोहितों, मुल्लाओं या पादरियों से बचें, यदि आप शोषण पर आधारित योजनाओं के चंगुल में फंसने से बचना चाहते हैं तो राजनीति और धर्म के विषयों में खुली आँख से काम लें। खुली आँख की ज्योति आपको तभी प्राप्त होगी जब मस्तिष्क भली-भाँति पुष्ट एवं परिपक्व होगा। क्या ऐसी कल्याणमयी ज्योति की उपलब्धि के अभिलाषी आप नहीं हैं? अधिकांश पुरुष तथा महिलाएँ आज की ध्वजा फहराने वालों और राजनीति का झण्डा ऊँचा करने वालों के भार से कुचल-से रहे हैं। ये गरीब प्राणी उन पतंगों की भाँति हैं, जिनकी डोर धर्माधिकारियों और राजनीतिज्ञों के हाथ में है। दुर्भाग्यवश विज्ञान, इतिहास, अर्थशास्त्र तथा अन्य शास्त्रों का ज्ञान न होने के कारण, ज्ञान-चक्षुओं के मूँदे रहने के कारण धर्माधिकारी और राजनीतिज्ञ इन्हें पीसते रहते हैं। इनकी अधिकाँश कठिनाइयाँ इनकी भयंकर अज्ञानता के कारण हैं और बची-खुची इनके अहंभाव के कारण। अज्ञानी होते हुये भी ये अकड़कर चलना चाहते हैं, पर ठोकर पर ठोकर लगती है और अन्त में गिर जाते हैं। परिणामस्वरूप अंतर्चक्षु खुलते हैं और साफ सुथरा मार्ग सामने आ जाता है।
आपको अपने ज्ञान की वृद्धि करने के लिए विशाल क्षेत्र उपलब्ध है। हाँ, इधर-उधर न भटक कर दत्तचित्त होकर आपको वैज्ञानिक ढंग से कार्य करना है और समय के प्रत्येक क्षण का पूर्ण उपयोग करना है। अपने दैनिक कार्यों से छुट्टी पाकर आप अधिक से अधिक समय लिखने-पढ़ने और सुनने-सुनाने में लगाएँ। जिस प्रकार आप दिन भर में कई बार खाने-पीने के आदि हैं, उसी प्रकार आप अध्ययन करने के अधिकाधिक नवीनताओं के जानने के आदि हो जायं।
बहुधा कुछ लोगों की आदत होती है कि पढ़ते तो पर्याप्त हैं, पर स्मरण कम रखते हैं, यहाँ तक कि कुछ समय के बाद पहले का पढ़ा हुआ भूल जाते हैं। प्राप्त की हुई ताजगी के स्थान पर फिर अज्ञानरूपी बासीपन आ जाता है। इससे बचने का उपाय उतना ही आवश्यक है जितना कि खाये हुए भोजन को भली-भाँति पचा लेना। रस ही न बनेगा तो पुष्टता कैसे आ सकती है? जो कुछ पढ़ें उसे बराबर दोहराते रहें।
आप जहाँ कहीं भी हों, आप के पास एक डायरी होनी आवश्यक है, जिससे आप देखी-सुनी हुई नई चीजों, पढ़ी हुई नई पुस्तकों, मिले हुए नए व्यक्तियों आदि का संक्षिप्त-संकेतात्मक विवरण रखें। अवसर आने पर आप देखेंगे कि ये विवरण आपकी कितनी सेवा करते हैं।
बाजारों में आपको बहुत से ऐसे पुस्तक विक्रेता मिलेंगे, जो पुरानी किताबें बेचा करते हैं। उनके पास आप अवश्य जाइए और कुछ न कुछ अवश्य खरीदिए। यह कहना ठीक नहीं कि आपके पास पुस्तकों के लिए पैसा नहीं। विभिन्न विषयों पर आप उत्तमोत्तम पुस्तकें खरीद कर लाइए। इसके लिए आप अपनी आमदनी का एक निश्चित भाग पुस्तक कोष के रूप में अलग रख दीजिए और कुछ न कुछ प्रतिमास अवश्य खरीदिए। ये पुस्तकें आपको घर पर एक भव्य पुस्तकालय स्थापित कर लेने में अमूल्य सहायता देंगी। आपको अपने पुस्तकालय पर गर्व होगा। पुस्तकों को खरीदने का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि आप उन्हें महज सजाने के विचार से घर ले जायं और दूसरों को उनकी बढ़ती हुई संख्या से आतंकित करें। पुस्तकों का संचयन रोब जमाने का साधन नहीं, बल्कि उनमें भरे हुए रस को निचोड़ कर पी जाने व पचा लेने का तात्पर्य रखता है।
आपको क्या पढ़ना है इसकी योजना अथवा रूपरेखा महीनों एवं वर्षों पहले बना लें तो यह आप की दूरदर्शिता ही होगी। यह न सोचिए कि पता नहीं भविष्य में कब क्या हो जाय- कौन-कौन सी कठिनाइयाँ आगे बढ़ने के समय उठ खड़ी हों दृढ़ संकल्प के साथ अनवरत परिश्रम करते हुए अग्रसर होते जाइये, आपकी विजय होगी।
स्वाध्याय के बिना किसी भी व्यक्ति का विकास होना असम्भव है, परन्तु दूसरों के अध्ययन का लाभ उठाना तो उससे भी अधिक उपयोगी तथा आवश्यक है। अपने पास-पड़ोस की साहित्य एवं साँस्कृतिक संस्थाओं और गोष्ठियों की सदस्यता स्वीकार कीजिए और वहाँ नियम बनवाइये कि बारी-बारी से प्रत्येक सदस्य अपनी मौलिक कृति या पढ़ी हुई नवीन पुस्तक का साराँश लाकर पढ़ें। पुस्तकों के साराँशों में मूल पुस्तक के उत्तम-उत्तम अंश भी कहीं-कहीं उद्धृत किए जाने चाहिए। इस प्रकार का सामुदायिक अध्ययन आप के लिए बड़ा उपयोगी सिद्ध होगा।
आपको ज्ञान की प्रत्येक शाखा पर चढ़ना है। इसमें जल्दी करें। जीवन के क्षण थोड़े हैं, अन्यथा यही कहना पड़ेगा कि हम तो कुछ जान लेने के पहले ही बूढ़े हो गये। प्रसिद्ध इतिहासकार जे.आर. ग्रीन ने लिखा है, “मैं जानता हूँ कि मेरे पीछे लोग मेरे विषय में क्या कहेंगे! वे कहेंगे कि वह सीखते-सीखते मरा।” आप भी इन शब्दों के अधिकारी क्यों नहीं बनते?
बौद्धिक संस्कृति के विकास के रास्ते में दो रुकावटें हैं। पहली यह कि बहुत से लोग धनोपार्जन के पीछे इस प्रकार हाथ धोकर पड़ते हैं कि उन कामों में कोई दिलचस्पी नहीं रह जाती, जिनसे उन्हें कुछ आर्थिक लाभ न हो। वे ऐसे कामों को निरर्थक और मूर्खों के योग्य समझते हैं। उनकी समझ में ज्ञान-वृद्धि भौतिक उन्नति का साधनमात्र ही है। व्यक्तिगत बौद्धिक विकास का उनके लिए विशेष मूल्य नहीं भौतिक उन्नति की यह मान्यता समाज के सभी वर्गों में बुरी तरह फैली है। अमीर-गरीब सभी इस रोग से ग्रसित हैं।
ऐसे लोगों से मेरा कहना है कि उन्होंने चित्र का चमकीला पहलू देखना ही पसन्द किया है। वे पैसा चाहे पले, पर ईश्वर प्रदत्त अमूल्य निधि अर्थात् मस्तिष्क की शक्ति का ह्रास कर रहे हैं। बौद्धिक विकास के लिए उनकी यह उपेक्षा यह उदासीनता बहुत बड़ा अभिशाप है, उन्हें जान लेना चाहिए कि बौद्धिक विकास की साधना करने से दो प्रमुख समस्याएँ हल हो जाती हैं। एक तो व्यक्तिगत विकास के लिए बहुत बड़ा साधन हाथ लग जाता है और दूसरे समाज की सेवा करने की परम क्षमता प्राप्त हो जाती है।
हाँ, यहाँ एक चेतावनी दे देनी आवश्यक है। ज्ञान-वृद्धि करने के बाद कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे का अहित न करे! यदि आप अपने अगाध ज्ञान के बल पर अपने साथी-नागरिकों को चूसने लगें, तो आप कर्त्तव्यच्युत और पथ-भ्रष्ट प्राणी कहे जायेंगे। पूँजीवादी वर्ग में इस रोग का कीड़ा इस गहराई से घुस गया है कि आपको भी इसका घुसा रहना प्राकृतिक या व्यावहारिक लगने लगता है और आप इसका विरोध न करके उल्टे उसी कीड़े की मारणशक्ति के शिकार हो जाते हैं। प्रकृति ने आपको मस्तिष्क के रूप में ऐसी शक्ति दी है कि आप सोच सकते हैं समझ सकते हैं प्रयोग में ला सकते हैं, खोज सकते हैं, ईजाद कर सकते हैं और अन्त में वो आनन्द प्राप्त कर सकते हैं, जो प्राकृतिक नियम के पालन करने के पश्चात स्वतः प्राप्त होता है। ज्ञान की वृद्धि करने वाले व्यक्तियों के आनन्द का अन्दाजा नहीं लगाया जा सकता। उसका सच्चा रस उन्हें ही मिलता है। सुख सम्पन्न होकर जीवन व्यतीत करने में तो आनन्द है ही, परन्तु सफलता है अधिक से अधिक जानने में।
दूसरी रुकावट यह है कि कुछ व्यक्ति, जिन्हें किसी एक विषय का कुछ ज्ञान होता है दूसरे विषयों पर व उनके जानने वालों पर व अनेक प्रकार के लाँछन लगाते हैं। कुछ धर्मवेत्ताओं की मान्यता है कि मनुष्य केवल दो भूतों से बना है- शरीर व आत्मा। बुद्धि को एकदम भूल ही गये। उनके समर्थक शरीर रक्षा करते हैं और मृत्यु के पश्चात आत्मा को संतोष मिले, ऐसे उपाय भी करते रहते हैं, पर दिमाग की ओर उनका ध्यान नहीं जाता।
अनेक महापुरुष यही उपदेश देकर चले गये कि भूखे को खिलाओ, रोगी की परिचर्या करो, और अपराधियों को शुद्ध कर लो। उन्होंने अज्ञानी को शिक्षा देने और वैज्ञानिक पद्धति से ज्ञानार्जन करने की बात कभी उठायी ही नहीं।
इस प्रकार आप अपना सर्वांगीण विकास करने पर कटिबद्ध हो जायं। यही सत्य है, यही शिव है यही सुन्दर है। अतएव अपने ज्ञान के दायरे को विस्तृत बनाने का प्रयास कीजिए। आपके सामने का क्षेत्र विशाल है, व्यापक है, आपके समक्ष महाकूप है, जिसके तल में से अजस्र धारा वाले निर्झर प्रवाहित हो रहे हैं। क्या आप में इतना अदम्य उत्साह और सच्ची लगन है कि आप अपनी बाल्टी भर-भर कर इस महाकूप का अमृत पान करके कृतकृत्य हैं।
(प्रो. श्री रघुनाथ लवानियाँ एम. ए.)
बन्धन से मुक्ति ही विद्याध्ययन का मूल उद्देश्य ही दैहिक, दैविक तथा भौतिक तापों का अन्त तथा शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक संतुलित विकास विद्या से ही सम्भव है। विद्या से अमृतत्त्व की उपलब्धि और अविद्या से सब प्रकार के बंधनों की प्राप्ति होती है। पुरुषार्थ चतुष्टय को अधिगत करने के लिए त्रिकालदर्शी ऋषियों ने विद्या को सर्वप्रथम स्थान दे उसके महत्व का दर्शन कराया। “अविद्या नेत पतनोन्मुख समस्त विघातक प्रवृत्तियों से परिचित रहते हुए विद्या जनित समस्त उन्मुखी प्रकृतियों की ओर प्रेरित करते रहने के लिए जो चिरकालिक है, उसी को शिक्षा कहा जाता है। इस सत्र की सफलता तथा पूर्ण समाप्ति पर ही हमारी सर्वांगपूर्ण उन्नति और उत्कर्ष अवलंबित है। तथा इसकी सफलता का आधारभूत है हमारी शिक्षा प्रणाली।
आज हमारे विद्यार्थी, विद्यादाता तथा कृतविद्य आदि अनेक प्रकार के दुःखों और बन्धनों से जकड़े हुए हैं। इसका दोष विद्या को नहीं, अपितु शिक्षा प्रणाली को ही है। विद्योपार्जन के ‘विद्या ददाति विनयम्’ आदि जो गुण हैं, वे खोजने पर भी अप्राप्य हैं। इसके विपरीत आधुनिक शिक्षा से जनित अनेक अवयव निश्चय ही बिना प्रयास मिल जाते हैं। सर्वांग उन्नति का प्रश्न तो दूर रहा, एकाँगी उन्नतिपूर्ण जनों से मिलना भी असम्भव सा है। मनुष्य अपनी इस परम्परा को बनाये हुए केवल नमूने मात्र रह गये हैं। स्वास्थ्य तथा नैतिक पतन की तो पराकाष्ठा ही छा गई है। इस दीन दशा के दो कारण स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं-प्रथम कुछ अत्यंत आवश्यक विषयों का पाठ्यक्रम में अभाव और दूसरा धन की अनन्य रूप से उपासना। सर्वसाधारण का पढ़ना तो असंभव सा ही है। विद्या संस्कार कराने के पूर्व ही सैंकड़ों रुपयों का होना आवश्यक है। पग-पग पर धन की कमी प्रतीत होती है। अध्ययन का स्तर निम्न से निम्नतर होता जा रहा है। व्यवहारिक विषयों के अभाव तथा विदेशी शिक्षा ने निताँत रूपेण पंगु बना दिया है। यही उद्देश्य टी.वी. मैकाले आदि इस शिक्षा की नींव डालने वालों का भी था। भृत्य कर्म जो सबसे नीच माना जाता था, आज उसे ही प्राप्त करना हमारा उद्देश्य बन गया है। दूसरी ओर हमारी संस्कृत पाठशाला तथा गुरुकुल और महामहिम पण्डित मण्डली है। इन संस्थाओं में व्यवहारिक तथा वर्तमान युग में उपयोगिता विषयों का विद्यार्थियों को अध्ययन कराना यहाँ तक की अन्य देशी तथा विदेशी भाषाओं का ज्ञान करना कराना भी उन्हें अपमान और गुरुता में न्यूनता का द्योतक ज्ञात होता है। विशुद्ध संस्कृत शिक्षित पण्डितगण आधुनिक भावधारा को ग्रहण करने में विमुख तथा असमर्थ हो रहा है। वर्तमान जगत की विचित्र भावधारा, चिन्तनधारा और कर्मधारा का साधारण परिचय प्राप्त करने में भी समर्थ नहीं है। शास्त्रज्ञों का यह असामर्थ्य उतना ही देश के लिए अकल्याणकारी है, जितना कि एक निताँत भौतिकवादी पश्चिमोपासना की आज का संस्कृत का छात्र जहाँ कालेज के स्टूडेंट को हर तरह से अनुकरण करने को तैयार रहता है, वहाँ पर उसकी निर्भयता या उद्दण्डता तक नहीं पहुँच पाता। वह संकोच शील है, परन्तु इतना की उसका यह गुण, अवगुण बन जाता है। इसका कारण घुटे-घुटे से वातावरण में रहने से उसका विकसित न होना ही है। इसके अतिरिक्त पाठ्यक्रम में ऐक्य का अभाव और विभिन्न बोर्डों द्वारा परीक्षा प्रणाली भी एक भारी दोष है। दोनों प्रकार की वर्तमान शिक्षाप्रणाली अत्यंत खर्चीली व्यवहार-शून्य, अकर्मण्य, असंस्कृत, निराशावादी, द्वेष, कलहकारिणी और पतनोन्मुख बना देने वाली है।
बाह्य देशों की प्रणालियों के अनुकरण से हमें अपनी आत्मा का हनन तथा प्राचीन गौरव से हाथ धोने पड़ेंगे। अपने अतीत की ओर देखने से निराशा का कोई कारण नहीं रहता। प्राचीन शिक्षा प्रणाली सर्वांगपूर्ण उपादेय तथा व्यवहार्य थी। जितनी वह तब श्रेयस थी उतनी ही आज भी है। हमारे तत्कालीन गौरव और उन्नति के यश गाने वाला देशी तथा विदेशी इतिहास है, चाहे वह अपूर्ण ही क्यों न हो। गुरुकुल तथा ब्रह्मचर्याश्रमों के एक स्नातक को हम सर्वांगीण शिक्षित सर्वसामर्थ्य-सम्पन्न तथा एक उद्देश्य लेकर आते हुए पाते हैं। भारतीय मनीषियों, ऋषि, मुनि, तपस्वियों ने एक ओर जहाँ मनुष्य की नैतिक और आध्यात्मिक जीवन की चरम सीमा की सार्थकता से सम्पादित अनेक नखरों का सृजन किया और अनेक धर्मशास्त्री, मोक्षशास्त्री, योगशास्त्री दर्शनशास्त्री आदि पैदा कर भारत को देवों के लिए अभीप्सित बनाया, वहाँ दूसरी ओर लोककल्याणकारी ऐहिक अभ्युदय साधक जैसे अनेक जड़ वैज्ञानिक राष्ट्रनीति-ज्ञाता, वैद्य, युद्ध विद्या, विशारद, कृषि, शिल्प, कला, वाणिज्य, गौ-महिष, अश्व हन्ति आदि के पालन की विद्या, भूगोल भूगर्भ, जल विद्या आदि के ज्ञाता विविध विद्वानों के पैदा करने में भी पीछे नहीं रहे। मौर्य और गुप्त कालीन भारत के स्वर्ण युग के प्रमाण तो अभी प्रत्यक्ष हैं। तक्षशिला नालन्दा, विक्रमशिला आदि के भग्नावशेष कैसे भी वज्र हृदय को पिघलाने में समर्थ हैं। विभिन्न विषयों की सम्पूर्ण शिक्षा के केन्द्र इन्हीं में चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ और कौमारजीव शल्य चिकित्सक (सर्जन) अध्यापक थे। विदेशी भी बिना यहाँ अध्ययन किये अपनी विद्या को अपूर्ण जानते थे। देश और जाति के बन्धनों से मुक्त शिक्षा दी जाती थी।
देश की स्वतंत्रता तथा हिन्दी को राष्ट्र भाषा की घोषणा के साथ शिक्षा के माध्यम का प्रश्न ही समाप्त हो जाता है। अब केवल प्रश्न है सुसंगठित, सुदृढ़, सुसंविहित तथा सुचारु शिक्षा प्रणाली का। इसी क्षेत्र में क्राँतिकारी परिवर्तन करने हैं। सभी शिक्षण संस्थाओं का एकीकरण कर प्राचीन प्रणाली की रूप रेखाओं पर चलाना है। सभी गुरुकुलों ब्रह्मचर्याश्रमों और वर्तमान विद्यापीठों को एक ही सूत्र में पिरो देना है। विभिन्न विद्यालयों में शिक्षित विद्यार्थियों में कोई अन्तर न रहे। जब देश जाति धर्म और सबका उद्देश्य भी एक (देश की सर्वांग उन्नति) है, तो साधनों की आधारभूत संस्थाएं ही बिखरी दशा में क्यों रहें। सबका एक संविधान, एक पाठ्यक्रम संचालन के एक से नियम और एक ही अधिकारी वर्ग द्वारा संचालित विद्यालय देश के कोने-कोने और प्रान्तों के प्रमुख-प्रमुख स्थानों पर स्थापित हों। बिना किसी देश जाति के बन्धन के छात्रों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षण हो। प्राचीन काल की भाँति कुलपति ही सबका प्रबन्ध कर्त्ता हो और आर्थिक सहायता सरकार द्वारा दी जावे जो कि जनता से शिक्षण-कर के रूप में प्राप्त की जावे।
हमें किसी भी मूल्य पर आध्यात्मिक गुरु का पद नहीं त्यागना है। इसके लिए अत्यन्त क्लिष्ट और मृत भाषा होने पर भी संस्कृत पढ़नी पड़ेगी। हमें स्वयं जीवित रहने के लिए उसमें भी जीवन संचार करना पढ़ेगा। भारत की जातीय साधना और सभ्यता के साथ संस्कृत का नित्य अविच्छेद्य और प्राणगत सम्बन्ध है। “संस्कृत भाषा भारतीय प्राण की शब्दमयी मूर्ति है।” अतः एक श्रेणी विशेष तक संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य हो। विभिन्न भौतिक और आध्यात्मिक शास्त्रों के अतिरिक्त व्यवहारोपयोगी विषयों का सन्निवेश पाठ्यक्रम में अवश्य ही रहे। संसार के साथ अपनी गति रखने के लिए, विचारों को समझने के लिए विदेशी भाषा का ज्ञान भी आवश्यक है। विज्ञान दर्शन और साहित्य की उच्च कक्षाओं में आँगल तथा जर्मन भाषा अनिवार्य होना विषय विशेष के साथ भी आवश्यक है। (जैसे विज्ञान के छात्रों के लिए जर्मन भाषा का वि. वि. में) शिक्षा के क्षेत्र में सर्वत्र साधारण ज्ञान की भित्ति के ऊपर ही विशेष ज्ञान की प्रतिष्ठा होनी चाहिए।
प्रत्येक व्यक्ति को विज्ञान के स्थूल सिद्धाँतों का परिचय, नीति, धर्मनीति से सम्बन्धित विभिन्न धाराओं का सूक्ष्मज्ञान तथा गणित शास्त्र से सामान्य परिचय रखना अत्यावश्यक है। इन विषयों का साधारण ज्ञान न होने पर वर्तमान युग में शिक्षाप्राप्त सभ्य पुरुष कहलाने का अधिकारी नहीं होता। इस प्रकार शिक्षित युवक सर्व-दृष्टि से पूर्ण और भारत का प्रतीक होगा। उसके हृदय में भारत के अतीत का, नेत्रों में वर्तमान का और मस्तिष्क में भविष्य का दर्शन होगा।
अन्त में एक नम्र निवेदन अपनी जनसेवी सरकार से है यद्यपि प्रत्येक कार्य के लिए सरकार से प्रार्थना करना मौर्ख्य, हास्यास्पद तथा व्यर्थ है। उसके समक्ष सैकड़ों समस्याएँ और सहस्रों योजनाएँ हैं, परन्तु जब तक यह शिक्षा-योजना कार्य रूप में सरकार द्वारा परिणत नहीं होती, तब तक जो संस्थाएँ इस आदर्श प्राचीन प्रणाली को अपनाए हुए हैं उन्हें अनेक प्रकार की सहायता देकर उत्साहित करें। तथा जो धनी सहृदय सज्जन इस कार्य में धन देकर सहायता दें, उनके उस दान दिये हुए धन पर ‘आयकर’ न लगावें तथा प्रचार कार्य द्वारा अन्य मनुष्यों से दान देने की अपील करें। इस प्रकार सरकार को भी अधिक कठिनाई या विवशता का सामना नहीं करना पड़ेगा और कार्य भी चलता रहेगा।
माँ सरस्वती वह दिन शीघ्र ही दिखाने की कृपा करे, जब हमारे देश के गुरु और शिष्य पुनः साथ बैठकर प्रार्थना करें -
“ॐ सहनाववतु, सहनौभुनक्तु, सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विना वधीतमस्तु मा विद्विषाव है॥
कठ.।
(श्री बाबा राघव दास जी)
धूम्रपान भारतीय समाज की अपनी चीज नहीं है, वह विदेशियों की नकल है। तम्बाकू अमेरिका से भारत में आया और आज उसके लिये वह काल बन गया है। भारतीय समाज अग्नि-पूजक समाज है। ब्रह्मचर्यावस्था में हवन की अग्नि, विवाह की अग्नि और अन्य में चिता की अग्नि के साथ हमारा जीवन संलग्न है। आज दुर्भाग्य से हमारे यहाँ कुछ लोगों ने धूम्रपान की अग्नि को जगाना शुरू कर दिया है। पारसी तथा सिख भाई अग्निपूजक होने के नाते धूम्रपान से बहुत परहेज करते हैं। पर हम तो ब्रह्मज्ञान की बातें करते-करते इतने उदार हो गये हैं कि धूम्रपान में अग्नि का अपमान होता है, इस बात को भी भूल गए हैं। रूस के संत-साहित्यकार महात्मा टॉलस्टाय महोदय ने अपने एक निबन्ध में ‘मनुष्य धूम्रपान क्यों कर करता है।’ इसकी चर्चा करते हुए लिखा कि जब मनुष्य विवेक के विरुद्ध आचरण करता है तब उसका मन उसको खाने लगता है। विवेक उसमें उद्विग्नता पैदा करता है, एक बेचैनी पैदा करता है और उस बेचैनी से बचने के लिए मनुष्य मूर्खतावश धूम्रपान करता है। यह भी एक नशा है जो विवेक को खो देता है। इस पर उन्होंने एक उदाहरण दिया है-
एक मनुष्य था, जो अपने शत्रु को मार डालने के लिए पिस्तौल लेकर रात्रि के समय उसके पास पहुँचा। शत्रु सोया था। उसका वह निरपराध चेहरा देखकर उसे मरने वाले के मन में विवेक पैदा हुआ कि ‘इस निरपराध को मैं क्यों मारूं।’ विचार करते-करते वह धीरे-धीरे वहाँ से हट आया। गैलरी में खड़े हुए कुछ ही मिनटों के बाद उसने सिगरेट निकाली, उसको सुलगाया और दो कश लगाये। इससे उसका विवेक नष्ट हो गया वह चट से भीतर गया और उस सोये हुए मनुष्य को उसने पिस्तौल से मार दिया। उसको उस समय यह भान ही नहीं रहा कि वह सोया है, निरपराध है। इससे स्पष्ट होता है कि धूम्रपान विवेक को दबाने का काम करता है। आज यह धूम्रपान अपनी बुलंदी पर है। बम्बई जैसे 36 लाख की जन-संख्या वाले नगर में 18 करोड़ रुपयों की बीड़ी, सिगरेट, सिगार लोग प्रतिवर्ष पीते हैं। बीड़ी वाले एक सेठ ने अपने बयान में बताया है कि इन पाँच वर्षों में बीड़ी का प्रचार पाँच गुना बढ़ गया है।
हम लोगों ने एक गाँव की जाँच की तो मालूम हुआ कि साल भर में जहाँ दो हजार रुपये का कपड़ा खरीदा जाता है वहाँ पान, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू आदि ग्यारह हजार रुपयों के खरीदे जाते हैं।
गुजरात के एक गाँव में देखा चार हजार की आबादी है और 32 बीड़ी की दुकानें हैं। पिछले दस वर्षों पूर्व वहाँ एक भी क्षय रोग का बीमार नहीं था, पर जबसे बीड़ी का प्रचार बढ़ा, तबसे पिछले 10 वर्षों में प्रतिवर्ष करीब 2,25 आदमी तपेदिक से बीमार पड़ते हैं और उनमें औसतन दस आदमी इस रोग से मर जाते हैं।
भारत सरकार की स्वास्थ्य-मंत्रिणी महोदया ने कहा कि जो आँकड़े मिले हैं, उससे मालूम होता है कि भारत में 25 लाख रोगी हैं। पर वस्तुतः इनकी संख्या इससे भी अधिक है। हम समझते हैं कि वह 36 लाख के करीब अर्थात् प्रति सौ मनुष्यों में एक मनुष्य क्षय रोग का शिकार बना हुआ है। इस रोग के अनेक कारणों में गुजरात के गाँव के अनुभव से धूम्रपान भी एक बड़ा कारण हो सकता है। आज धूम्रपान का बोलबाला है। सरकार उसका बड़ा लिहाज करती है। इसी से उस पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है।
दिन हो चाहे रात, बाजार हो या हाट, श्मशान हो या घाट, स्त्री हो या बच्चे सभी जगह इसका प्रवेश है। जब चाहे, जहाँ चाहे, जैसे चाहे धूम्रपान प्रचारक जा बकते हैं, लाउडस्पीकर नाच आदि द्वारा प्रचार कर सकते हैं। पर हमारा स्वास्थ्य विभाग या सरकार कुछ बोलने तथा रोक-टोक करने का साहस नहीं कर सकती है। लाडला महकमा है, यह कुछ बड़े-बड़े लोगों का, तभी तो इसे इतनी खुली छूट-रियायत दी जा रही है। दो-दो साल के बच्चों को हम बीड़ी पीते देखते हुए और घर-घर तपेदिक भी खैरात करते हुए देख रहे हैं। इससे सहज मन में आता है कि यह युग धूम्रपान का है। वह राजा है और उसके सामने बलशाली सरकार भी नतमस्तक है। इधर यह हालत है और उधर यही स्वास्थ्य-विभाग तपेदिक के एक-एक आने के सील प्रतिवर्ष बेचकर तपेदिक-क्षय रोग को रोकने का प्रयत्न करती है। पहले आग लगायी जाती है और बाद को दौड़कर पानी डालकर उसको रोकने का प्रयत्न किया जाता है कितना परिहास है हमारे स्वास्थ्य का।
जब मैंने लोकसभा के कुछ सदस्यों से इनके बारे में प्रश्न उठाने के लिए कहा तो उन्होंने अपनी लाचारी जाहिर की। वे प्रश्न उठायेंगे या नहीं, इसे तो भगवान जाने। पर मैं उसको जनता-जनार्दन के आधार से उठाना चाहता हूँ और अपने इष्ट देवता से हाथ जोड़कर पूछना चाहता हूँ कि धूम्रपान द्वारा भारतीय अपने राष्ट्र का मुँह जलाकर ही रहेगा या उससे उसको कभी छुटकारा भी मिलेगा।
हमारे देश के मुँह में आग लगाने का काम मरने के बाद श्मशान में पुत्र करता है। वह अग्नि लेकर के चलता है सबके साथ और चिता की तैयारी पूर्ण हो जाने पर अपने पिता के मुँह पर अग्नि रखता है, पर इस में ये धूम्रपान वाले पुत्र का काम स्वयं कर जीते जी अपने मुँह में अग्नि लगाकर पिता तथा पुत्र दोनों बन जाने का काम करते हैं। यह है इस समय की विशेषता। भगवान उस जीवित शव को बुद्धि दें, कि वह एक ही साथ एक ही समय पिता-पुत्र बनकर भारतीय समाज को अपमानित न करे।
इस प्रकार धूम्रपान विवेक का क्षय ही नहीं कर रहा बल्कि शरीर क्षय कर भारती राष्ट्र को यह सोचने के लिए विवश कर रहा है कि यदि उसे जिंदा रहना है, तो मुझसे बचो, नहीं तो, तुम्हारी इच्छा!
(सन्त विनोबा भावे)
मैं मानता हूँ कि भारत की सभ्यता की यह माँग है कि हिंदुस्तान में गौरक्षा होनी ही चाहिए। अगर हम हिंदुस्तान में गौरक्षा नहीं कर सके, तो आजादी के कोई मानी ही नहीं होते। यह बात मैंने प्लानिंग कमीशन के सामने भी स्पष्ट शब्दों में कही थी। परन्तु आज हम जिस हालत में हैं और हरेक राज्य की सरकार जब इस विषय पर सोच रही है, उस हालत में उपवास आरम्भ करना मैंने अच्छा नहीं माना। हिंदुस्तान में आज कई तरह के असंतोष हैं यह मैं जानता हूँ। परन्तु सबका इलाज एक ही है। जनमत तैयार करना चाहिए और सबसे काम लेना चाहिये। आज देश के सामने कई समस्याएँ हैं। एक साथ सभी समस्या पर नहीं सोचा जा सकता। इसलिए एक-एक समस्या पर ही हम सोच सकेंगे। परन्तु मैंने कहा है कि हिंदुस्तान में गौरक्षा होनी चाहिये। अगर गौरक्षा नहीं होती, तो कहना होगा कि हमने अपनी आजादी खोयी और उसकी सुगन्ध गंवायी।
कुछ लोगों का आजकल एक गलत ख्याल हो गया है। हिंदुस्तान में आज सैक्यूलर स्टेट की बात चली है। वह अच्छी बात है, गलत नहीं। हमारी सभ्यता में ही बात है कि जो राज्य चलेगा, वह सब धर्मों की समान रक्षा करेगा। अशोक के जमाने में भी खुद अशोक बौद्ध था, परन्तु प्रजा तीन धर्मों में (हिंदु, बौद्ध और जैन) बँटी हुई थी लेकिन तीनों की समान इज्जत होती थी और तीनों की समान रक्षा होती थी। इसलिए हम अशोक का इतना आदर करते हैं और हमने उसी का चिह्न अपने राज्य के लिए लिया है। सैक्यूलर स्टेट तो अच्छा ही है। उसका गौरक्षा के साथ कोई विरोध नहीं। अगर ऐसा होता कि आज हिंदुस्तान में जितने धर्म हैं उनमें से एक धर्म कहता है कि गाय को मारना पाप है और दूसरा धर्म कहता है कि गाय का कत्ल करना पुण्य है, तो सरकार कहती कि ‘इस तरह दो धर्मों में विरोध है, तो दोनों को अपने-अपने मत के अनुसार चलने की इजाजत होनी चाहिए, इसलिये सरकार इस बारे में कुछ नहीं कर सकती।’ परन्तु आज ऐसी बात नहीं है। मैंने कुरान और बाइबिल का गहराई और अत्यंत प्रेम के साथ अध्ययन किया है। और जिस तरह मैंने वेदों का चिन्तन किया है, उसी तरह कुरान और बाइबिल का भी किया है। इसलिए मैं मुसलमान और ईसाइयों की ओर से उनका प्रतिनिधि बनकर कहता हूँ कि उन दोनों धर्मों में ऐसी कोई बात नहीं है कि गाय का बलिदान हो। उन धर्मों में बलिदान की बात तो है। वैसे हिंदु-धर्मों में भी है। परन्तु गाय का ही बलिदान होना चाहिए, ऐसी कोई बात उन धर्मों में नहीं है। और इस्लाम की तो यह आज्ञा है कि अपने पड़ोसी की भावनाओं का खयाल रखा जाय। इसलिए मैं कहता हूँ कि हमारे सैक्यूलर स्टेट में गौरक्षा होनी चाहिए। परन्तु आजकल कुछ लोगों को हिंदु कहलाने में भी झिझक मालूम होती है। यह बात गलत है। मैं तो कहता हूँ कि हरेक हिंदू अच्छा हिंदू बने, हरेक मुसलमान अच्छा मुसलमान बने और हरेक ईसाई अच्छा ईसाई बने। और यहाँ पर सब धर्मों का एक शुभ संगीत चले। एक दूसरे की उपासना से एक दूसरे को पुष्टि मिले। और सब मिलकर भगवान का गुणगान करें। भगवान के अनन्त नाम और अनन्त गुण हैं। जब एक मामूली शहर में पहुँचने के लिए कई रास्ते होते हैं, तो भगवान के पास पहुँचने के भी असंख्य रास्ते हो सकते हैं। इसलिए हर कोई अपने-अपने मार्ग से भगवान के पास पहुँचने की कोशिश करें। जिससे हिंदु न सिर्फ अच्छे हिंदु बनेंगे बल्कि अच्छे मानव भी बनेंगे। मुसलमान न सिर्फ अच्छे मुसलमान बनेंगे बल्कि अच्छे मानव भी बनेंगे, ईसाई न सिर्फ अच्छे ईसाई बनेंगे, बल्कि अच्छे मानव भी बनेंगे। इसलिये सब अपने-अपने धर्मों की एकाग्रता और निष्ठा से उपासना करें, यही मैं चाहता हूँ। इससे हमारे देश में एक मधुर स्नेहमय जीवन बनेगा। इसलिए हिंदुओं को हिंदु कहलाने में लज्जा नहीं मालूम होनी चाहिये बल्कि उनको निष्ठा से हिंदु-धर्म की उपासना करनी चाहिये।
मैं जानता हूँ कि सैंट्रल गवर्नमेंट की गौरक्षा के प्रति सहानुभूति है। परन्तु वह कहती है कि यह स्टेट गवर्नमेंट का काम है। मैं जिस प्रान्त में रहता हूँ, उस मध्यप्रदेश में गौरक्षा कानून बना है। वह कानून कैसा बना है वह मैंने नहीं देखा। यहाँ बिहार में भी एक कानून बनने जा रहा है। मैंने उस बिल को देखा है। उससे मेरा समाधान नहीं हुआ है। उसमें गाय और गाय के बछड़ों की रक्षा की ही बात है। यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ की इस तरह गाय और बैल में फर्क क्यों किया जा रहा है। परन्तु मैंने सुना है कि हमारे संविधान में गौरक्षा की जो कलम है, उसके मुताबिक गाय और गाय के बछड़ों की रक्षा ही जिम्मेदारी मानी गयी है। बैल की जिम्मेदारी नहीं मानी गयी है। संविधान के बारे में कुछ कहने का मैं अधिकारी नहीं हूँ। उसके जो माहिर हैं, वे वकील लोग ही उसके बारे में कहेंगे। परन्तु मैं कहना चाहता हूँ कि संविधान का यह अर्थ मैं नहीं मानता हूँ। आपने केवल आर्थिक खयाल से गाय की जिम्मेवारी उठायी है या इस ख्याल से उठायी है कि वह भारतीय सभ्यता की एक माँग है। अगर केवल आर्थिक खयाल हो, तो गाय की जिम्मेवारी मत उठाओ, क्योंकि अर्थशास्त्र की दृष्टि से लूली-लँगड़ी और कमजोर गायों की रक्षा करना गलत माना गया है। अर्थशास्त्र एकाक्ष है। वह कहता है कि कमजोर गाय बैलों को मारो, तो उत्तम गाय-बैलों की रक्षा होगी। अगर ऐसी बात है तो फिर आप कमजोर गायों की रक्षा कि जिम्मेदारी क्यों उठाते हैं? इसलिए न कि वह भारतीय सभ्यता की माँग है? अगर ऐसा समझते हों तो बैलों की रक्षा की भी जिम्मेवारी उठाओ।
गाय और बैल दोनों मिलकर गौ कहा जाता है। दोनों में फर्क नहीं है। वेदों में गाय के लिए ‘अघ्न्या’ और बैल को ‘अघ्न्य’ कहा गया है। इस शब्द का मतलब है कि जिसको मारना नहीं। इस तरह यहाँ की सभ्यताएं गाय और बैल दोनों की रक्षा की जिम्मेवारी उठायी है। इसलिए मैं चाहता हूँ कि ऐसेम्बली में हमारे जो भाई हैं, वे उस बिल में संशोधन करें और बैल की भी जिम्मेवारी उठायें। अगर यहाँ की सभ्यता का ख्याल करते हो, तो यह करना होगा। और केवल अर्थशास्त्र की दृष्टि से सोचते हो, तो कमजोर गायों की जिम्मेवारी भी मत उठाओ। साफ कहो की हम गरीब हैं, हम कमजोर गाय-बैलों की जिम्मेवारी नहीं उठा सकते। परन्तु कुछ संस्कृति का ख्याल करते हो, तो फिर केवल गाय की जिम्मेवारी क्यों उठायी? गाय और बैल दोनों की जिम्मेवारी उठाना, यह एक हिंदुस्तान का समाजवाद है। पाश्चात्य देशों के समाजवाद से हमारे लोग एक कदम आगे बढ़े हैं। उनका समाजवाद मानता है कि हर एक मनुष्य की रक्षा होनी चाहिए। लेकिन भारतीय समाजवाद में मानवों ने गाय को भी अपने परिवार में दाखिल किया है। हाँ, उसके अनुसार हम बर्ताव नहीं करते। फिर गौ का आदर करते हैं। परन्तु उसकी सेवा का जैसा काम परदेश में चलता है, वैसा यहाँ नहीं चलता फिर भी हमारे मन में उसके लिए आदर है। और जिस तरह हम अपने घर के बूढ़े लोगों की रक्षा करते हैं उसी तरह गाय-बैलों को भी हमने अपने परिवार में दाखिल कर लिया है। उन दोनों का हम पूरा उपयोग लेंगे, दूध लेंगे, उनके गोबर का उपयोग करेंगे, मरने पर उनके चमड़े का उपयोग करेंगे, परन्तु उन्हें सहज मृत्यु मरने देंगे। यह बात यहाँ के समाजवाद ने मानी है। लेकिन उसके साथ हमें वैज्ञानिक बुद्धि भी रखनी चाहिये। सिर्फ गाय की पूजा करने से काम नहीं होगा। गोसदन खोलना चाहिए, कमजोर गायों कि रक्षा के लिए व्यापारियों और श्रीमान लोगों को मदद करनी चाहिए।
मैंने जो भूदान का काम उठाया है, उसमें गौरक्षा भी अन्तहित है। परन्तु मेरी यह वृत्ति है कि ‘एक ही साधे सब सधे।’ यह काम ऐसा है कि इससे सारे समाज का परिवर्तन होगा, तो उसमें गाय की भी रक्षा हो जायगी। दूसरे देश के लोग हमें पूछ सकते हैं कि आप सिर्फ गायों की ही रक्षा क्यों करते हैं दूसरे जानवर की क्यों नहीं करते इस पर मैं कहना चाहता हूँ कि हमने परमेश्वर की जिम्मेवारी नहीं उठायी है। हमने अपनी मर्यादा मान ली है। हम गाय-बैलों का उपयोग करते हैं, इसलिए उनकी रक्षा की जिम्मेवारी हमने मान ली है। आजकल जो ट्रैक्टर की बात चलती है, उसे मैं पसन्द नहीं करता। उससे गौरक्षा नहीं हो सकती। पड़ती जमीन तोड़ने के लिए ट्रैक्टर का उपयोग हो सकता है परन्तु सामान्य खेती के काम में उसका उपयोग करना यानि गौ-हत्या ही करना होगा।
(श्री हरिभाऊ उपाध्याय)
यदि तेरी आत्मा प्रतिष्ठा की प्यासी है, यदि तेरे कानों को प्रशंसा के उद्गारों से सुख होता है, तो जिस धूलि से-भौतिक पदार्थों से-तेरा पिंड बना है, उससे ऊपर उठ और उच्च तथा प्रशंसनीय वस्तु को अपना लक्ष्य बना।
इस वट-वृक्ष को देख, जिसकी शाखाएं अब आकाश तक फैल गयी हैं। यह किसी दिन पृथ्वी के गर्भ में एक छोटे से जीव के रूप में था।
प्रतिस्पर्धियों को बुरे और नीच उपायों से दबाने की इच्छा से घृणा कर, उनसे श्रेष्ठ बनकर ही अपने को ऊपर उठाने का प्रयत्न कर, जिससे तुझे इस लड़ाई में यदि सफलता न मिले, तो सम्मान अवश्य प्राप्त हो।
दबाए जाने पर भी ताड़ के पेड़ की तरह ऊँचा उठता चला जा, और आकाश में विहार करने वाले गरुड़ की तरह ऊँची उड़ान भरता हुआ भगवान भुवन-भास्कर के तेज पर भी अपनी दृष्टि रोपता है।
वह रात को स्वप्न में महान पुरुषों के आदर्शों को देखता और दिन-भर बड़े हर्ष के साथ उसका अनुसरण करता है।
वह बड़े-बड़े मंसूबे बाँधता और प्रसन्नता पूर्वक उनको पूर्ण करता है। इससे उसकी कीर्ति चारों ओर छा जाती है।
परन्तु मत्सरी मनुष्य का हृदय नेकी और कटुता से भरा रहता है। उसकी जबान जहर उगलती है, वह अपने सहवासी के उत्कर्ष को देख कर बेचैन हो जाता है।
स्वयं उसके हृदय में भलाई के प्रति प्रेम नहीं होता, इसलिए उसे यह विश्वास बना रहता है कि और लोग भी मेरी ही तरह हैं।
जो उससे आगे बढ़ते हैं, उन्हें वह समझता है कि कुछ नहीं हैं। उनके समस्त कार्यों को वह सबके सामने बड़े भद्दे रूप में पेश करता है।
वह हमेशा दूसरों के बुरे कामों की ताक में रहता है, परन्तु मनुष्य का अति द्वेष उसका पीछा नहीं छोड़ता और वह स्वयं मकड़ी की तरह अपने ही बनाये जालों में फँस जाता है।
गायत्री तपोभूमि -
गायत्री तपोभूमि का कार्य यथावत बड़े शान्तिपूर्ण एवं सुव्यवस्थित ढंग से चल रहा है। चारों वेदों का परायण यज्ञ यथाक्रम चलता है। इस मास ऋग्वेद जारी है। साँस्कृतिक विद्यालय का शिक्षण का क्रम यथावत् है। एक भजनोपदेशक जो शरीर से स्वस्थ एवं व्यायाम में रुचि रखने वाला हो तपोभूमि में संगीत, प्रवचन, व्यायाम आदि सिखाने के लिए नियुक्त करना है। तथा एक संस्कृत तथा आयुर्वेद जानने वाले सुधरी विचारधारा के पण्डित की आवश्यकता है, जो सज्जन यह कार्य करना चाहे, अपनी योग्यता तथा परिचय लिखकर वेतन के सम्बन्ध में पत्र व्यवहार कर लें।
साँस्कृतिक शिक्षा के लिए अनेक ऐसी महिलाओं के पत्र आ रहे हैं जो शेष जीवन में ब्रह्मचारिणी रह कर विद्याध्ययन, साधना एवं धर्म सेवा के पुनीत कार्य में लगाना चाहती है। इनके संबंध में अभी कुछ निर्णय नहीं किया गया है, पर ऐसा सोचा जा रहा है कि- श्रीमती भगवती देवी (माता जी) की संरक्षता में ऐसा महिला विद्यालय पुरुषों के स्थान से भिन्न व्यवस्था में रहें। महिलाओं और पुरुषों का कार्य क्षेत्र तथा शिक्षण पूर्णतया पृथक है, इसलिए पृथक व्यवस्था समुचित रूप से बन सकी तो इस दिशा में कदम बढ़ाया जायेगा। जिस प्रकार तपोभूमि में प्रायः सभी विद्यार्थियों एवं साधकों की भोजन-वस्त्र व्यवस्था निःशुल्क रहती है, उसी प्रकार इन महिला धर्म सेविकाओं को भी रखने का विचार है। जो महिलाएँ इस प्रकार की शिक्षा के लिए इच्छुक हों अपने नाम नोट करा दें ताकि समय आने पर उन्हें प्राथमिकता दी जा सके।
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इस वर्ष की साधना
इस वर्ष सूक्ष्म-वातावरण में जो अनुपयुक्त तत्व प्रचुरमात्रा में फैले हुए हैं उनके कारण तीव्र साधना एवं तपश्चर्या में साधकों का मन न लगेगा। बहुधा साधनाएं अधूरी रहेंगी। इसलिए इस वर्ष व्यक्तिगत-एकाँकी नहीं, गायत्री परिवार के सदस्यों को सामूहिक साधनाओं पर ही बल देना चाहिए। सन् 57 के लिए निर्धारित अष्टसूत्री संकल्प जिसमें नित्य 24 लक्ष गायत्री जप, 24 हजार गायत्री चालीसा पाठ, 24 हजार मंत्र लेखन, 24 हजार आहुतियाँ मुख्य हैं, पूरा करने के लिए सामुदायिक आयोजनों की व्यवस्था पर अधिक जोर देना चाहिए। गायत्री परिवार की शाखाएं बनाकर वह कार्य संगठित रूप से सरलतापूर्वक हो सकता है। गायत्री उपासकों की मनोदिशा इस वर्ष यही संगठित साधन करने में लगानी चाहिए।
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शाखाओं के समाचार
विलासपुर (बम्हनी बाजार) में-अक्षय नवमी के शुभ पर्व पर सैकड़ों गायत्री उपासकों ने वनभोज का उत्सव, सिद्धेश्वरनाथ के वन निकुँजों में हंसदा नदी के पुनीत तट पर मनाया। यहाँ गायत्री माता की पूजा-अर्चना के बाद आरती एवं संकीर्तन हुआ। फिर साँस्कृतिक उत्थान और विश्व कल्याण में गायत्री उपासना का स्थान-इस विषय पर भाव पूर्ण भाषण हुए।
-मोहन लाल गुप्ता
सोनपुर के गायत्री उपासकों ने मिल कर गंगा के तट पर खूब उत्साह से गीता-रामायण समारोह मनाया और जनता को साँस्कृतिक भाव एवं विचारों को अपनाने के लिए अनुकूल प्रेरणा प्रदान की।
-डॉ. गोवर्धन
लखनऊ के गायत्री परिवार ने रविवार को एकत्रित होकर उपासना के उपराँत सामूहिक रूप से हवन किया तथा साँस्कृतिक उत्थान करने के लिए सत्संकल्प लिया।
-मदन मोहन शुक्ल
वानप्रस्थाश्रम पवई में (बम्बई) सूर्य ग्रहण के अवसर पर भगवान कृष्ण के वचनानुसार- ‘गुण कर्म विभागशः’ के आधार पर विशाल सामूहिक यज्ञ हुआ, जिसमें अत्यन्त उल्लास और उत्साह से नर-नारियों ने भाग लिया।
-श्रीधर नारायण पराँजपे
उमरिया (शहडोल) में गायत्री परिवार की ओर से अति उत्साह से यज्ञ कार्य सम्पन्न किया गया। जनता ने प्रेमपूर्वक उसमें सहयोग दिया।
-रामकुमार त्रिपाठी
मकड़ोन (उज्जैन) गायत्री परिवार ने सवालक्ष की जप संख्या पूरी करके विशाल रूप में यज्ञ करने का संकल्प किया है। योजना पूर्ण करने का प्रयत्न हो रहा है। -धूलजी पटेल
वासन (महेसाना) में गायत्री परिवार की ओर से दो यज्ञ सुसम्पन्न हुए।
-साँकलेश्वर पी. पुरोहित
सागोनवाड़ी (काला हाँडी) में सवा पाँच लाख गायत्री जप पूरा कर सामूहिक रूप से सवा पाँच हजार की आहुति दी गयी। जनता की साँस्कृतिक भावना और प्रेम दर्शनीय था।
-विनायक प्रसाद शर्मा
पूर्णिमा के पुनीत अवसर पर भुसावल के गायत्री परिवार की ओर से सहारोह पूर्वक यज्ञ सम्पन्न।
-वेद भूषण भटनागर
नया मन्दिर, जीरापुर (म.प्र.) में गीता जयंती के पावन अवसर पर अखण्ड पारायण, प्रार्थना के उपरान्त यज्ञ सम्पन्न किया गया। इसके उपरान्त विश्व के कल्याण के लिए सन्तगणों के सदुपदेश हुए।
-रामचन्द्र शर्मा
गायत्री तपोभूमि मथुरा के निर्देश और प्रेरणा से मैसूर में गायत्री यज्ञ सम्पन्न करके तर्पण-मार्जन एवं ब्रह्मभोज हुआ। वातावरण के सात्विक प्रभाव से जनता ओत-प्रोत हो रही थी।
-एच.वी. नारायण राव
रीनोक (सिक्किम) में शिव मन्दिर तथा श्री दमयन्ती देवी के निवास स्थान पर यज्ञ मण्डप निर्मित कर खूब समारो से 4000 आहुतियों का यज्ञ पूर्णिमा के अवसर पर हुआ। कुमारी कन्याओं ने उपवास पूर्वक यज्ञ में आहुतियाँ प्रदान कीं तथा सारे समारोहों को सफल बनाने में आवश्यक सहयोग दिया।
-वृन्दा देवी प्रधान
नागपुर के गायत्री परिवार की ओर से योगाभ्यासी महात्मा श्री जनार्दन जी का गायत्री विज्ञान पर भाषण देने का आयोजन हुआ। श्रोतागणों ने अति शाँति से सुन कर गायत्री उपासना करने की प्रेरणा ग्रहण की तथा सम्मिलित रूप से शुक्लपक्ष के रविवार को गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया गया।
-रजनी कान्त
सटई (छतरपुर) में प्रति रविवार को संध्या समय गायत्री की ओर से आयोजन होता है, जिसमें धर्म एवं नीति पूर्ण आचरण करने-फैलाने की प्रेरणा दी जाती है। अन्य सम्प्रदाय वाले भी इसमें भ्रातृत्व भाव से सम्मिलित होते हैं। -शिव प्रसाद शर्मा
जमशेदपुर के गायत्री परिवार ने कार्तिक पूर्णिमा में खूब उत्साह से 2400 आहुतियों का सामूहिक यज्ञ किया। यज्ञ से फैले सात्विक प्रभाव से सभी पुलकित हो रहे थे। -रामराज पाण्डेय
माता की कृपा से सवालक्ष जप पूरा होकर खूब समारोह पूर्वक कल्याण में यज्ञ हुआ। यज्ञ के उपरान्त कई महान आत्माओं के सम्भाषण के बाद प्रसाद वितरण करके लगभग एक सहस्र व्यक्तियों का ब्रह्म-भोज सुसम्पन्न हुआ।
-मोरेश्वर वामन ढ़ोसर
मर्दसा (बुलन्द शहर) में गायत्री परिवार की ओर से दो बार कार्तिक एवं मार्ग-शीर्ष पूर्णिमा में सामूहिक गायत्री यज्ञ हुआ, जिसमें स्थानीय जनता ने बड़े प्रेम से भाग लिया।
-हृदय प्रकाश
बरेली के गौरीशंकर मन्दिर गुलाब नगर में प्रति गुरुवार 1200 आहुतियों का गायत्री यज्ञ नियमित रूप से होता रहता है। साँस्कृतिक भाव के साथ गायत्री उपासकों की संख्या भी बढ़ रही है।
-यशोदानन्दन अग्निहोत्री
सूर्य ग्रहण के अवसर पर व्यावर गायत्री परिवार की ओर से विभिन्न धर्म कृत्यों के साथ 1100 आहुतियों का गायत्री यज्ञ सम्पन्न हुआ।
-घीसूलाल बंसल
जोवट गायत्री परिवार ने सम्मिलित रूप से सूर्य ग्रहण के पुनीत अवसर पर जप एवं 2500 आहुतियों का यज्ञ सम्पन्न किया।
-चन्द्रशेखर चतुर्वेदी
भिलाड़ियाँ कलाँ (होशंगावाद) में श्री नर्वदा प्रसाद पाठक के यहाँ गायत्री परिवार की ओर से सामूहिक यज्ञ हुआ। भविष्य में 24 लाख का सामूहिक पुरश्चरण पूर्ण कर विशाल यज्ञ करने की आयोजना हो रही है। -गुलाब सिंह रघुवंशी
आसिकपुर (मुँगेर) में 18 से 26 नवम्बर तक सुसज्जित यज्ञ मण्डप में विशाल गायत्री यज्ञ सम्पन्न हुआ। सभी ऋत्विजों की भोजन व्यवस्था एवं सभी दर्शकों में प्रसाद वितरण व्यवस्थित रूप से किया गया।
-राजपति प्रसाद
वागली में गायत्री परिवार की ओर से सुव्यवस्थित रूप से यज्ञ सम्पन्न किया गया, जिसमें ब्रह्मसमाज ने अति प्रसन्नता से भाग लिया।
-रामचन्द्र व्यास
आरंग में मार्ग शीर्ष के प्रारम्भ से पुरुष सूक्त का पाठ करने का क्रम चलाते हुए पूर्णिमा में सांगोपांग हवन सम्पन्न किया गया।
-विद्या प्रसाद मिश्रा
मार्गशीर्ष अमावस्या में सूर्य ग्रहण के अवसर पर खामगाँव के सभी गायत्री उपासकों ने सामूहिक रूप में 25000 गायत्री मन्त्रों से साँगोपाँग सस्वर उच्चारण पूर्वक आहुति प्रदान की। घी और शाकल्य की मात्रा जनता की श्रद्धा से पर्याप्त मात्रा में एकत्रित हो रही थी।
-जय नारायण ब्रह्मचारी
खूँटी में गायत्री उपासकों ने अति-उत्साहपूर्वक सम्मिलित रूप से लगभग एक हजार आहुतियों का गायत्री यज्ञ सम्पन्न किया। परिवार के प्रयत्न से जनता में साँस्कृतिक-चेतना बढ़ रही है।
-बनवारी लाल
उदईपुर चपुन्ना (इटावा) के आस-पास ग्रामों में 24 यज्ञ कराये गये थे। उनकी सम्मिलित पूर्णाहुति ता.15-16-17 दिसम्बर को बड़े आनन्द और समारोहपूर्वक पाँच कुण्डों की यज्ञशाला में हो गई। मथुरा से श्री आचार्य जी, स्वामी प्रेमानन्द जी तथा श्री नत्थासिंह पधारे थे। जिस भूमि पर यज्ञ हुआ था उस खेत को श्री पातीराम जी ने गायत्री माता को अर्पण कर दिया है। यह स्थान पक्की सड़क से बिल्कुल सटा होने के कारण बड़े मौके का है। यहाँ एक सुन्दर गायत्री आश्रम बनाने का विचार हो रहा है।
-विश्वेश्वर दयाल दुबे
करवाड, पीपलदा (राजस्थान) में माघ सुदी 13, 14, 15, को 25 कुण्डों की यज्ञ शाला में एक विशाल यज्ञ करने का निश्चय हुआ है, इसके लिए 501 रु. श्री नंदलाल जी ने दिये हैं, जनता से भी सहयोग प्राप्त किया जा रहा है। तैयारी में संयोजक सज्जन उत्साह पूर्वक जुट गये हैं।
नई शाखाओं की स्थापना
गायत्री शाखाओं की स्थापना हमारे ऋषियों की अमर संस्कृत का ज्ञापक है। भारत के हृदय में अविरल रूप से उसके प्रति श्रद्धा की धारा बहती रही है, इसीलिए जगह-जगह गायत्री परिवारों का संगठन क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। इस मास की नयी स्थापित शाखाओं के नाम दिये जा रहे हैं।
फतहपुर सीकरी (आगरा), खेरालु (महेसाना), इटैलिया (हमीरपुर), शमशपुर (कोटा), हाथरस (अलीगढ़), सुकेत (कोटा), बागडोद (गुजरात), दन्या (अलमोड़ा), बसन्तपुर (अलमोड़ा), कल्ली (सीतापुर), निगोही (शाहजहाँपुर), बड़ोखर बुजुर्ग (बाँदा), महेश्वर (निमाड़), नंदापुर (फतेहपुर), कलेनापुर (कानपुर), नवागाँव (लखीमपुर), बहरायच (उ.प्र.) करसरा (सतना), राजापुर (खीरी), सोनपुर (दरभंगा), अतर्रा (हमीरपुर), मेरीगंज (पुर्णियाँ), मनैतापुर (बस्ती), बाँदा (उ.प्र.), बेथर (उन्नाव), रावतपुर (उन्नाव), मौदहा (हमीरपुर), गोरखमढ़ी (सौराष्ट्र), हसनपुर (मुरादाबाद), रिसिया (बहरायच), देवास (म.प्र.), सोनीवाड़ा (पाटण) कोतसा (शहडोल), उरई (जालौन), अमरावती (बरार), मेरमाचाह (कोटा), ओखापोर्ट (काठियावाड़), मेवा नगला (अलीगढ़), भगौनापुर (फतेहपुर), जगदल (24 परगना), राजोद (धार), अनूपशहर (बुलन्दशहर), झालावाड़ (राजस्थान), बहेड़ी (बरेली), बेगुर्ले (रत्नागिरी), जिटफिरी (हमीरपुर), रायपुर (खीरी लखीमपुर), खरियार (कालाहाँडी), रायगढ़ (म.प्र.)
पकड़ी हटख बसंत (बलिया), खानपुर (झालावाड़), चतरखेड़ा (होशंगाबाद), धामपुर (बिजनौर), टनायल (शाजापुर), सिवनीं मालवा (होशंगाबाद), बलरामपुर (गोण्डा), केराकत (जौनपुर), नरबल (शाजापुर), लालास (नागोर)।
गायत्री आन्दोलन के फलस्वरूप देश भर में धार्मिक और साँस्कृतिक सामूहिक चेतना का आशाजनक एवं उत्साह वर्धक विकास हो रहा है। धार्मिक विचारधारा के लोग नैतिकता एवं मानवीय मण्डलियों को बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक प्रकार के आयोजन स्थान-स्थान पर कर रहे हैं। गायत्री परिवार के संगठन बनाये जा रहे हैं। जहाँ अभी तक संगठन नहीं बन पाए हैं, वहाँ के लोग भी इस युग के लिए ‘संघ शक्ति’ की सर्वोपरि उपयोगिता को समझ कर परिवार की शाखा स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक लगभग 350 शाखाएं बन चुकी हैं। आगे इनकी संख्या तेजी से बढ़ेगी।
गायत्री आन्दोलन के फलस्वरूप देश भर में धार्मिक और साँस्कृतिक सामूहिक चेतना का आशाजनक एवं उत्साह वर्धक विकास हो रहा है। धार्मिक विचारधारा के लोग नैतिकता एवं मानवीय मण्डलियों को बढ़ाने के उद्देश्य से अनेक प्रकार के आयोजन स्थान-स्थान पर कर रहे हैं। गायत्री परिवार के संगठन बनाये जा रहे हैं। जहाँ अभी तक संगठन नहीं बन पाए हैं, वहाँ के लोग भी इस युग के लिए ‘संघ शक्ति’ की सर्वोपरि उपयोगिता को समझ कर परिवार की शाखा स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील हैं। अब तक लगभग 350 शाखाएं बन चुकी हैं। आगे इनकी संख्या तेजी से बढ़ेगी।
मालवा प्रान्तीय गायत्री यज्ञ
मालवा प्राँतीय गायत्री उपासकों की ओर से प्राकृतिक मनोरम दृश्यों से परिपूर्ण खात्पाखेड़ी महावीर जी के स्थान पर मौ. चचोर (मंदसौर) में पच्चीस कुण्डों की यज्ञशाला में पाँच लाख आहुतियों का हवन पूर्ण करने का आयोजन दिनाँक 14, 15, 16 जनवरी को आयोजित किया गया है। मालवा प्रान्तीय गायत्री उपासकों का एक महत्वपूर्ण सम्मेलन भी इस अवसर पर होगा। गायत्री परिवार के समस्त सदस्यों से निवेदन है कि इसमें भाग लेकर आयोजन को सफल बनाने की कृपा करें।
-वैद्य कन्हैयालाल पाण्डेय
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राजस्थान प्रान्तीय यज्ञ रामगंज मंडी (कोटा) में आशा से अधिक सफल हुआ। लगभग 30 हजार जनता इस विशाल कार्य धार्मिक अनुष्ठान को देखने के लिए सुदूर स्थानों से आई थी। 101 हवन कुण्डों की यज्ञशाला इतने सुन्दर ढंग से बनाई और सजाई गई थी कि देखते-देखते आँखें तृप्त नहीं होती थीं। विशाल व्याख्यान पण्डाल में महिलाओं और पुरुषों के लिए पृथक-पृथक कक्ष थे। गेट बहुत ही सुन्दर एवं कलापूर्ण ढंग से सजाये गये थे। समय-समय पर नौबत, नफीरी तथा बैंड बाजे बजते रहते थे।
ता. 9 दिसम्बर को आचार्य जी पधारे तो मोटर में बैंड बाजों के साथ उनका जुलूस निकाला गया। नगर भर में आरती पुष्पमाला आदि से उनका स्वागत हुआ। ता. 10 प्रातःकाल शास्त्रोक्त रीति से वेदमंत्रों की तुमुल ध्वनि के साथ यज्ञ कार्य आरम्भ हुआ। पीले दुपट्टे धारण किये सहस्रों नर-नारी हवन कुण्डों पर बैठे हुए बड़े ही शोभायमान लगते थे।
हवन प्रायः 12 बजे समाप्त होता था। मध्याह्नोत्तर तथा रात्रि में प्रवचन होते थे। ता. 12 को महिला सम्मेलन हुआ। माता दौपदी देवी, माता भगवती देवी तथा रामगंज मंडी की सुप्रतिष्ठित कई महिलाओं के नारी जागरण पर धड़े धार्मिक भाषण हुए। अखण्ड-ज्योति के सहायक संपादक प्रो. रामचरण महेन्द्र एम. ए., आगरा के प्रसिद्ध धार्मिक विद्वान पं. मुक्ट बिहारीलाल शुक्ला बी.ए., एल.एल.बी., स्वामी प्रेमानन्द जी, कुँ. नत्थासिंह जी प्रवचन करने बाहर से पधारे थे। झाँसी के श्री शास्त्री जी महाराज गुरुकुल बकानी के संस्थापक श्री स्वामी जी तथा रामयणी सत कौशल जी के भी प्रवचन हुए। स्वागताध्यक्ष श्री सत्यपाल जी त्यागी ने अपने दो दिनों के संक्षिप्त किंतु मार्मिक भाषण में बड़ी ठोस बातें कहीं। श्री शंभूसिंह हाडा ने इस यज्ञ के आयोजन के कारणों पर प्रकाश डाला। तीनों दिनों आचार्य जी के भी विद्वत्तापूर्ण भाषण हुए।
गायत्री तपोभूमि मथुरा की पूर्णाहुति के समय का बम्बई के श्री डूँगरशी भाई द्वारा तैयार किया हुआ रंगीन फिल्म जब पंडाल में सिनेमा द्वारा दिखाया गया, तब हजारों नर-नारियों की भीड़ उसे देखकर रोमाँचित हो गई। बड़ा प्रभाव पड़ा। उस समय सभी लोग इस प्रकार के फिल्म माध्यम द्वारा साँस्कृतिक प्रचार की बड़े आयोजन के साथ व्यवस्था बनाने की आवश्यकता अनुभव कर रहे थे। यह आयोजन बहुत सफल रहा।
पूर्णाहुति का दृश्य देखने ही योग्य था। जनता का विशाल समुद्र सर्वत्र उमड़ा पड़ रहा था। व्यवस्था के लिए कोटा जिले के उच्च सरकारी अफसर तथा पुलिस सुपरिण्डेण्डेण्ट अपनी कुमक के साथ व्यवस्था को संभालने में लगे हुए थे। स्वयं-सेवकों ने दिन-रात एक करके इतने बड़े जन समुद्र को अनुशासित और नियंत्रित रखने में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त की। यह संचालक समिति के सदस्य यों तो छः छः महीने से कार्यरत थे पर यज्ञ के कुछ दिन पूर्व से वे यज्ञशाला में ही अपना डेरा डाले पड़े रहे। कार्यकर्ताओं के अथक परिश्रम और अटूट श्रद्धा का ही फल था कि इतना विशाल आयोजन ऐसी शाँति एवं सफलता के साथ पूर्ण हो सका।
सभी आगंतुकों के लिए ठहरने एवं भोजन की समुचित व्यवस्था थी। पूर्णाहुति के बाद गायत्री माता तथा यज्ञ भगवान के चिन्नों का तथा आचार्य जी का जुलूस निकाला गया। -महेन्द्र नाथ भार्गव
सच्ची श्रद्धा से गायत्री उपासना करने वालों को समय-समय पर अनेक प्रकार के बड़े उत्साह वर्धक आध्यात्मिक एवं भौतिक अनुभव होते हैं। उपासक समय-समय पर उनकी सूचना तपोभूमि में भेजते हैं। इन अनुभवों का सार आगे से इन पृष्ठों में देते रहेंगे। गायत्री उपासना के मार्ग में हुए अपने अनुभवों का सार भेजते रहने की उपासकों से प्रार्थना है।
नास्तिक से आस्तिक बना
श्री सत्य प्रकाश जी कुल श्रेष्ठ, सिकन्दरपुर, भाण्डेर अपनी जीवन दिशा बदलने का वर्णन करते हैं-कालेज की शिक्षा ने मुझे पूरा नास्तिक बना लिया था। पूजा-उपासना तो दूर-ईश्वर के आस्तित्व तक में, मेरा विश्वास नहीं रह गया था।
एक स्वजन गायत्री उपासक का अनुभव सुनकर मैंने प्रयोग रूप में गायत्री जपना प्रारम्भ किया। एक लघु अनुष्ठान कर डाला। रात को स्वप्न में एक तेजोमयी कुमारिका ने मुझे आदेश दिया-तदुपरान्त मैंने विधिपूर्वक सवालक्ष का अनुष्ठान पूरा किया। इसके बाद तो अनेकों भविष्य में घटने वाली संभावनाओं को मैं स्वप्नादि द्वारा जान लेने लगा। एक बार घर में डकैती होने का स्वप्न देखा। दो चार दिन बाद पिताजी के पत्र में स्वप्न देखी घटना का वर्णन पढ़ने को मिला। ऐसी अनेकों घटनाएं मेरे जीवन में घटती ही जा रही हैं।
विद्या लाभ का अवसर मिला
श्री शिवनन्दन कश्यप, लश्कर से अपनी सफलता के विषय में लिखते हैं। 1952 में प्राइवेट रूप में बी.ए. की परीक्षा देनी चाही, ज्ञासन की ओर से ऐसी परीक्षा देने की आज्ञा नहीं दी जा रही थी, पर समय आने पर अनायास मुझे आज्ञा मिल गयी और परीक्षा भी दे दी। योग्यता या अध्ययन की कमी के कारण मुझे असफल होने का भय हो रहा था। जिस माता की (गायत्री माता) उपासना कर रहा था सदा उनसे प्रार्थना किया करता। एक दिन स्वप्न में आश्वासन मिला-तुम दूसरे दर्जे में पास हो और यही चरितार्थ हुआ।
निराशा में आशा
श्री ध्रुवराम शर्मा, अठगाँव जराखर (हमौरपुर) अपना गायत्री उपासना के प्रति खिंचने का कारण लिखते हैं- मेरा भाई विश्वनाथ दसवीं श्रेणी में पढ़ रहा था। उसकी योग्यता से जरा भी उत्तीर्ण होने की आशा नहीं थी, इसलिए उसके पास होने के लिए मैंने गायत्री उपासना प्रारम्भ की और वह अच्छी तरह उत्तीर्ण हो गया। तभी से मेरी आँख खुली और नियमित रूप से मैं गायत्री उपासना करने लग गया हूँ।
पेशाब का खून बन्द हुआ
श्री नीलम भटनागर, भूसावल, माता की कृपा का वर्णन करती हुई लिखती हैं- मेरे पति का स्वास्थ्य दिनों-दिन गिरता ही जा रहा था। एक दिन मैंने उनसे इसका कारण पूछा। उन्होंने कहा- पेशाब से खून जाता है, इसी से दुर्बलता बढ़ती जा रही है। मुझे तो गायत्री माता का पूरा भरोसा था। तुरन्त ही मैंने गायत्री मंत्र से जल अभिमंत्रित कर उन्हें पिला दिया। उसी के बाद खून जाना बन्द ही हो गया। पीछे रही-सही जलन भी कुछ दिन तक अभिमंत्रित जल पीते रहने से छूट गया।
अनेक व्याधियों से छुटकारा
श्री सालिगराम पाण्डेय, मऊरानीपुर अपने जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव लिखते हैं। मैं सत्रह वर्ष से लकवे एवं बारह वर्ष दमा रोग से कष्ट भोग रहा था।
सन्तान के भाग्य से भी वंचित था। एक उपासक बन्धु की राय से सवालक्ष का अनुष्ठान किया। आश्चर्य से सभी ने देखा जो दमा अनेक इलाजों में भी दूर नहीं हुआ था वह केवल माता की उपासना से ही नष्ट हो गया। इसके बाद मुझे एक पुत्री रत्न की भी प्राप्ति हुई, जिसका नाम श्रद्धा से गायत्री ही रखा। गायत्री तपोभूमि में होने वाले यज्ञ की भागीदारी के लिए मैं भी जप करता था। तीन महीने जप करने के बाद अनायास ही लकवे ने भी मेरे शरीर से विदाई ले ली। आज मैं युगों का पीड़ित-सुखी जीवन का आनन्द ले रहा हूँ। इससे अधिक और माता की क्या कृपा हो सकती है।
दस वर्ष बाद सन्तान
श्रीराम कृष्णा डोंगरे, कटनी (जबलपुर) माता के प्रति अपनी कृतज्ञता का प्रकाश करते हैं- वर्षों के दाम्पत्य जीवन के बाद भी जब संतान के दर्शन नहीं हुए तो मेरा पत्नी सहित सारा परिवार एवं कुटुम्बीजन निराश थे, पर मेरी आस्था अचल बनी रही। अन्त में माता की करुणा फूटी और घर में पुत्र रत्न को देख कर सभी प्रसन्नता से उत्फुल्ल हो उठे।
स्कालर शिप मिली
श्री द्विजेन्द्र प्रसाद शर्मा, पाली (पटना) अपनी गायत्री उपासना के लाभों का वर्णन करते हैं :- मैं नित्य टूटे-फूटे रूप से गायत्री जप लिया करता था। विद्यालय में स्कॉलर शिप की दरखास्तें पड़ रही थीं, मैं अयोग्य तो था ही, फिर भी दरखास्तें दे दिया करता था। जब वह रुपया आया तो स्वयं मुझे अपना नाम देख कर आर्श्चय हुआ और माता की कृपा की याद से परिप्लुत हो रहा था। अब पढ़ने और गायत्री उपासना में मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी। इस बार की परीक्षा देने के बाद मेरे सहपाठी मेरी खिल्ली उड़ाते-कहते तुम अपनी श्रेणी में सबसे ऊँचा नम्बर पाओगे। आज परीक्षा फल निकलने वाला था। स्कूल जाते ही मेरे सहपाठीगण हँसी उड़ाने के लिए मेरी ओर जुट गये-उसी समय नम्बर सुनाने का अवसर आया। मेरे सहित सभी को मेरा प्रथम नम्बर से पास होना विस्मित कर रहा था।
सन्तोषजनक स्थिति प्राप्त
श्री चन्द्रकान्त गुप्ता, बैकुण्ठपुर (सरगुजा) अपनी गायत्री उपासना के अनुभव का वर्णन करती हैं :-
मेरे अभिभावक मेरे लिए अच्छे वर की तलाश में परेशान थे, पर मैं माता के प्रति विश्वास कर निश्चिंत थी। उन लोगों की परेशानी मैं देख कर लज्जित और पीड़ित हो जाती। अन्त में मैंने एक लघु अनुष्ठान इसके लिए कर लिया। फिर अनायास जैसे, एक सुशिक्षित एवं सम्पन्न वर मिल गये।
मेरे गाँव में लड़कियों को मिड्ल से आगे पढ़ाने की कोई प्रवृत्ति नहीं दीखती। मैं मिड्ल पास कर माता से प्रार्थना करती रही-फलतः मेरी आगे की पढ़ाई के लिए परिवार वालों ने जबलपुर में व्यवस्था कर दी।
खोया लड़का मिला
श्री हरदयालू जी श्रीवास्तव, गोहाँड़ (हमीरपुर) माता की दयालुता का वर्णन करते कहते हैं- मेरा ज्येष्ठ पुत्र घर से बैरागी बनकर चुपचाप निकल गया। 15 महीने उसकी खोज करते बीत गये-कहीं पता न चला। सब तरफ से निराश हो कर मैंने एक मात्र गायत्री माता का श्लोक पकड़ लिया। सोलहवें मास में अचानक ही उसका पूरा पता हमें मिला, पता मिलते ही हम कुछ सज्जनों के साथ वहाँ गये। उसने लौटना स्वीकार कर लिया। गेरुआ वस्त्र छोड़ कर गृहस्थ के रूप में हमारे साथ आकर रहने लगा। हमारे प्रयत्न और आशा से अधिक सफलता मिलने का कारण एकमात्र माता की ही कृपा है।
वात व्याधि से छुटकारा
श्री जगन्नाथ मिश्र बीहट (मुँगेर) सूचित करते हैं- 1953 में मुझे बात व्याधि की (पीड़ा ) का अनुभव हुआ। पहले तो परवाह नहीं की। रोग बढ़ने पर लाचार होकर दवा खाना शुरू किया। फायदा नहीं होते देख एक सिविल सर्जन के विचारानुसार एक माह तक सुई और दवा के फेर में रहा, पर विशेष फायदा नहीं रहा। अन्ततः मेरी हालत इतनी दयनीय हो गयी कि उठना-बैठना तक बन्द सा हो गया। फिर पटना जाकर बिजली द्वारा चिकित्सा करायी, कुछ लाभ हुआ पर फिर ज्यों की त्यों हालत हो गयी। इस बार सब ओर से निराश होकर नौ दिनों में विधिपूर्वक छत्तीस हजार जप पूरा किया। चौथे दिन लाभ होना शुरू हुआ। अनुष्ठान समाप्त होते-होते रोग भी ऐसे समाप्त हो गया मानों कभी हुआ ही न था।
दुर्घटना से प्राण रक्षा
श्री राजवंशजी, मसौढ़ी-पटना, माता के वात्सल्य का वर्णन करते हैं-
हमारे अनेकों सन्तान मरे हुए पैदा हुए और कुछ ने दुनिया को एक बार देख कर सदा के लिए आँखें बन्द कर लीं। व्यथा से सन्तप्त हम सभी माता की प्रार्थना करते रहते थे। इस बार 17 फरवरी 56 के मध्याह्न में अस्पताल में मेरी धर्मपत्नी ने माता की कृपा से संरक्षित पुत्र रत्न प्रसव किया। हम लोग उल्लसित हो उठे। अस्पताल से डिस्चार्ज होने पर चाची जी के साथ बच्चे सहित उसकी माँ गाड़ी पर घर जा रही थी कि एक दूसरी गाड़ी जोरों से टकरा गयी। वह गाड़ी उलटकर टूट-फूट गयी। मैंने समझ लिया यह बच्चा भी गया- पर माता ने गाड़ी उलटने के समय ही जच्चा-बच्चा सहित हमारी चाची को करीब 6 फीट दूर फेंक दिया। हल्की सी चोट लगी और सभी तरह से सुरक्षा में हम साक्षात माता की कृपा का दर्शन कर गदगद हो रहे थे।
सूनी गोद भर गई
श्री इंदिरा देवी शुक्ला, भरारी (बिलासपुर) लिखती हैं- सुसम्पन्न परिवार में मेरा विवाह हुआ था संतान बिना घर सूना-सूना लगता था। दो बार संतान हो-हो कर मर गयी। तीसरी बार जब मैं गर्भवती थी, मेरे पतिदेव की एक गायत्री उपासक से भेंट हो गयी। वे हमारे लिए देवदूत ही थे। उनके कहे अनुसार हम दोनों ने गायत्री जप करना प्रारम्भ किया। माता का कृपा-रस पीकर पुष्ट चिरंजीव पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आज उस निश्चिंत संरक्षण में विकास पा रहा है। माता धन्य हैं!
टाइफ़ाइड दूर हुआ
लेडी डॉ. श्री दमयन्ती, गोरे गाँव अपना अनुभव वर्णन करती हैं- एक बार डिस्पेंसरी का काम करते हुए सिर दर्द से फटने लगा। कर्त्तव्य पूरा कर घर आयी। दर्द के साथ जाड़ा भी बढ़ता जा रहा था, पर मैंने अपनी साँध्य उपासना पूरी कर ही ली। तपोभूमि के यज्ञ भस्म से थोड़ी सी शान्ति हुई पर पीड़ा बनी रही। अन्दर से ध्वनी हुई। टाइफ़ाइड! चौबीस घण्टे में टाइफ़ाइड का निर्णय कोई डॉक्टर स्वीकार नहीं कर सकता, पर मैंने अपनी बुद्धि से अन्तर के आदेश को अधिक महत्व दिया और टाइफ़ाइड की प्रसिद्ध ऐडियोपेथी गोली खाना आरम्भ किया। दूसरे दिन शाम को तीन दस्त आए-जो संपूर्णतः टाइफ़ाइड के लक्षणों को प्रमाणित करते थे। उसके बाद भयंकर बुखार का आक्रमण हुआ। मुझे सारे वस्त्र फेंक कर भाग जाने का वेग उठता। श्री अवधूत ने ज्वर शाँति के लिए सफलता पूर्वक जप प्रारम्भ किया। 20 माला जपते-जपते ज्वर घट कर 101 हो गया। मेरे ध्यान में सरसों देखने में आया फिर गुरगुल एवं सरसों से हवन करने पर बुखार ठीक हो गया। इस प्रकार औषध के पराजय के बाद भी माता की कृपा की विजय हुई।
(श्री स्वामी शरणानंद जी)
यद्यपि किसी का कर्त्तव्य ही किसी का अधिकार और किसी का अधिकार ही किसी का कर्त्तव्य होता है पर दूसरे के कर्त्तव्य को अपना अधिकार मान जाने पर अधिकार लालसा की वृद्धि हो जाती है। यदि किसी कारण उसकी पूर्ति न हुई हो तो क्षोभ तथा क्रोध आदि विकार उत्पन्न होने लगते हैं, जिससे धन द्वारा निर्मित सौंदर्य नष्ट हो जाता है। अतः यह निर्विवाद सिद्ध है कि दूसरे के कर्त्तव्य को अपना अधिकार मानना उचित नहीं है, पर दूसरे के अधिकार को अपना कर्त्तव्य मानना तो सर्वथा अनिवार्य है, क्योंकि कर्त्तव्य परायणता से उत्तरोत्तर विकास ही होता है।
क्रोध तथा क्षोभ आदि विकारों से मन में मलिनता, हृदय में अशुद्धि, बुद्धि में अविवेक आ जाता है, जो पतन का मूल है। अतएव प्राप्त सौंदर्य को सुरक्षित रखने के लिए क्षोभ रहित होना अत्यन्त आवश्यक है। क्षोभ का उदय होते ही धीरता, वीरता और गंभीरता क्षीण हो जाती है, जिससे अनेक निर्बलताएँ अपने आप आ जाती हैं।
गुणों का अभिमान दोषों का मूल है, कारण कि वास्तविक निर्दोषिता भी गुणों से अतीत है। यदि वाणी अपने प्रति होने वाले सद्व्यवहार को करने वाले की उदारता न मान कर अपना गुण मान लेगा तो गुण में आबद्ध हो जायगा और दूसरे की उदारता का आदर न कर पायेगा, जिससे उसकी हृदय शीलता विकसित न हो सकेगी।
हृदयशीलता के बिना सरसता नीरसता में और मधुरता कटुता में बदल जाती है, जिससे परस्पर स्नेह की वृद्धि नहीं हो पाती। इतना ही नहीं, कालान्तर में गुण दोषों में बदलने लगते हैं, क्योंकि गुणों का उपयोग करने से सीमित अहंभाव तथा परिच्छिन्नता दृढ़ होती है और परिच्छिन्नता दृढ़ होने से वासनाओं का उदय होने लगता है, जो ह्रास का मूल है।
प्रत्येक गुण के उपभोग में किसी न किसी अंश में दोष विद्यमान रहते हैं। इतना ही नहीं, उपभोग स्वयं एक बड़ा दोष है, क्योंकि उपभोग के रस में आबद्ध प्राणी एकता को सुरक्षित नहीं रख पाता। उसके जीवन में अनेक प्रकार के भेद उत्पन्न हो जाते हैं, जो भय के मूल हैं। यह नियम है कि भयभीत प्राणी ही दूसरों को भय देता है। भयरहित हुए बिना अभिन्नता आ नहीं सकती। अभिन्नता के बिना वासनाओं का अन्त संभव नहीं है और निर्वासन के बिना निर्वैरता, समता, मुदिता आदि दिव्य गुण उत्पन्न ही नहीं होते-जो मानव की माँग है। जो बल दूसरों की निर्बलता को दूर नहीं कर सकता वह वास्तव में बल ही नहीं है। बल के द्वारा निर्बलों पर विजयी होना अपने बल को दूषित करना है, क्योंकि पराजित होने पर एक गहरी वेदना उत्पन्न होती है और विजयी होने पर अभिमान आ जाता है। अभिमान प्रमाद को और वेदना जागृति को उत्पन्न करती है। प्रमाद से शक्तिहीनता का और जागृति से उत्तरोत्तर शक्ति का संचय होने लगता है और फिर पारस्परिक संघर्ष उत्पन्न हो जाता है, जो पराजित को विजयी और विजयी को पराजित करता रहता है।
यदि किसी की निर्बलता को अपना बल न माना जाय तो निराभिमानता स्वतः आ जाती है। निराभिमानता आ जाने पर आपस में एकता का संचार होने लगता है और बल निर्बलों की सेवा में लग जाता है, जिससे निर्बलता तथा बल का अभिमान मिट कर वास्तविक सफलता आ जाती है, जो सभी को प्रिय है।
अभी दो क्षण हुए साथी, उषा ने गान गया था।
अभी दो पल हुए पंथी, सवेरा मुस्कराया था॥
अचानक बादलों ने आ, तिमिर से शून्य भर डाला,
समझ कर निशि न सो जाना, अभी मैं पथ दिखाता हूँ।
नई आवाज देता हूँ। नई मंजिल बनाता हूँ॥
कदम अपने मिलाओ तुम। शहीदों के रुधिर से जो खिले हैं फूल उपवन में।
तुम्हें सौगन्ध है उनकी, न हिम्मत हारना मन में॥
गिराने दो इन्हें गोले, चलाने दो इन्हें तोपें-
अँधेरा रह नहीं सकता, मशालें मैं जलाता हूँ, नई आवाज देता हूँ।
नई मंजिल बनाता हूँ॥
कदम अपने मिलाओ तुम। सिसकती झोपड़ी को मौत ने मरघट बनाया है।
यहाँ इन्सानियत को बेकफन जाता जलाया है॥
तुम्हें सौगन्ध यौवन की, पसारो प्यार का अंचल-
मरण को भी पिला जीवन, चिताएँ मैं बुझाता हूँ।
नई आवाज देता हूँ।
नई मंजिल बनाता हूँ॥
कदम अपने मिलाओ तुम।
नया अभियान है माँझी, नया विश्वास तो लेलो।
बढ़ा तूफान में नौका गरजती आँधियाँ झेलो॥
तुम्हें सौगन्ध लहरों की, झुका पाएँ न चट्टानें-
सुनो मंझधार से जयगीत मैं तुमको सुनाता हूँ।
नई आवाज देता हूँ।
नई मंजिल बनाता हूँ॥
कदम अपने मिलाओ तुम।
-हिन्दुस्तान
(श्री रामगोपाल शर्मा ‘दिनेश’)
*समाप्त*