अहम् ब्रह्मास्मि

(श्री रघुवीरशरण ‘मित्र’)

प्रार्थना


अहम् ब्रह्मास्मि (Kavita)

आग बनकर तप रहा हूँ, नीर बन कर बह रहा हूँ। मैं स्वयं से पूछता हूँ, मैं स्वयं से कह रहा हूँ।

जिंदगी क्या है जगत में? धार है, पतवार भी है, प्यार की सीमा कहाँ है? पार है मझधार भी है, स्नेह क्यों ज्वाला उगलता? आँसुओं से बुझ न जाए- आग पानी से न बुझती,क्योंकि दोनों मिल न पाए,

आग बनकर तप रहा हूँ, नीर बन कर बह रहा हूँ। तृप्ति कब मुझको मिलेगी? जब न होगी चाह बाकी, पथ स्वयं किस दिन बनूँगा? जब न होगी राह बाकी, दीप जल-जल बुझ रहा क्यों? स्नेह रिस-रिस के जल रहा है-

क्यों हिमालय गल रहा है?क्योंकि आँसू ढल रहा है, मैं स्वयं दृढ़तर हिमालय, मैं नदी बन बह रहा हूँ। जन्म पर हंसता मरण क्यों? प्रश्न हल होता न मेरा, इस लचकती डाल पर है, किस लिए जग का बसेरा ?

इसलिए विश्वास की अर्थी उठाए चल रहा हूँ- मैं चिता बन कर न जलता, दीप बन कर जल रहा हूँ, मैं स्वयं पूजा बना हूँ, मैं स्वयं ही पुज रहा हूँ।


धर्म का सच्चा स्वरूप

(श्री बुद्धदेवजी)

जिस प्रकार सूर्य उदय हुआ है या नहीं-यह बात किसी को बतानी नहीं पड़ती, उससे उत्पन्न होने वाली गर्मी और प्रकाश स्वयं इस बात का परिचय दे देते हैं कि सूर्योदय हो गया है। इसी तरह किसी धर्मात्मा मनुष्य का परिचय यह कह कर नहीं दिया जाता कि वह मनुष्य धर्मात्मा है- क्योंकि उसने सौ मालायें राम नाम की जपी हैं या हजार बार गायत्री मंत्र का उच्चारण किया है, या वह नित्य वेद, पुराणों का पाठ करता है। कोई मनुष्य धर्मात्मा है या नहीं, इसका पता उस के आस-पास रहने वालों के प्रति उसके व्यवहार से अपने आप लग जाता है। अगर उस का प्रभाव अपने चारों ओर रहने वाले व्यक्तियों पर सुखदायक पड़ता है और उसके कारण उनके दुखों का मोचन होता है तो उसका धर्मात्मा होना स्वयं ही सिद्ध हो जाता है। किसी भी व्यक्ति का धर्मात्मा होना उसके जप-तप और पूजापाठ से नहीं नापा जा सकता।

लैम्प में प्रकाश है या नहीं इसकी परीक्षा हम इस बात से नहीं कर सकते कि उस में पूरा तेल भरा है या नहीं। लैम्प के प्रकाश का माप केवल इस बात से हो सकता है कि उसके चारों ओर का अन्धकार दूर हुआ है या नहीं। सूर्य बिना तेल-बाती के भी प्रकाशमान है, और बुझा हुआ दीपक तेल-बाती के होते हुये भी प्रकाशहीन है। इसी तरह कुछ मनुष्य पूजापाठ के बिना भी धर्मात्मा हैं, वे सूर्यवत् हैं। और अन्य कितने ही मनुष्य पूजापाठ करते रहने पर भी धर्महीन हैं, वे पाखण्डी हैं। परंतु साधारण मनुष्यों को लैम्प के समान प्रकाश उत्पन्न करने के लिए पूजापाठ रूपी तेल-बत्ती की आवश्यकता रहती है। जो मनुष्य साधारण होते हुए भी पूजापाठ तथा सत्संग से हीन हैं उनका दिया भी बुझा रहता है। जिस मुहल्ले में तुम रहते हो यदि उसकी नालियाँ दुर्गन्धयुक्त हैं और चारों ओर कीचड़ सड़ रहा है, मच्छरों के झुण्ड उड़ते रहते हैं, लोग मैले-कुचैले अनपढ़, रोगों के मारे और निर्धनता के सतायें हुये हैं, और तुम इन अवस्थाओं के सुधार के लिए कुछ नहीं कर रहे हो तो तुमको धर्मात्मा कहलाने का कोई अधिकार नहीं है। फिर चाहे तुम कितनी भी लम्बी समाधि लगाते हो, कितना भी भजन कीर्तन करते हो, कितने भी घण्टे घड़ियाल बजाते हो, और कितनी भी सामग्री हवन में फूँक देते हो, तो भी तुम धर्मात्मा नहीं हो। संसार में आज तक जितने भी महात्मा धर्म प्रचार करने आये वह इसी संवेदना-भाईचारे की भावना का प्रकाश तुम्हारे दिये-बाती में जलाने आये थे। पादरी लोग जब ईसा मसीह के सम्बन्ध में कहते हैं कि उसने अन्धों को आँखें दीं, बहरों को कान दिये, लूले-लँगड़ों को हाथ-पैर दिये तो वह उस महात्मा के कारनामों का ठीक रूप से वर्णन नहीं करते। हम कहते हैं कि संसार के सभी महात्माओं ने अन्धों को आँखें दीं, बहरों को कान दिये, लूले-लँगड़ों को हाथ, पैर दिये। पर इस अभागे संसार ने काम, क्रोध, मोह, लोभ, आलस्य, प्रमाद आदि के घोर विष से अपने आप को अन्धा, बहरा, लूला-लँगड़ा बना डाला। जिस समय हम इन महात्मा लोगों की प्रेरणा से अपने चारों ओर बसे मनुष्यों के प्रति संवेदना का अनुभव करते हैं, और उनकी बिगड़ी हुयी हालत को सुधारने के लिए भरसक चेष्टा करते हैं, उस समय हमारी खोई हुई आँखें वापिस मिल जाती हैं, हमारे बहरे कान सुनने लग जाते हैं और हमारे कटे हुये हाथ-पैर फिर से हरे हो जाते हैं। बस जहाँ अपने चारों ओर की शोचनीय अवस्था को सुखमय दशा में परिवर्तन करने की भावना मौजूद है, वहीं धर्म है। यही धर्म का सच्चा स्वरूप है ।


तत्वज्ञान का मानव जीवन में उपयोग

(महात्मा एपिक्टेरस)

तत्वज्ञान अथवा दार्शनिकता का भाव अपने जीवन में उत्पन्न करना एक महत्व का कार्य है। जीने को तो सभी जीते हैं और मूर्ख लोग तो अज्ञान के राज्य में रह कर प्रायः चैन का जीवन भी व्यतीत कर लेते हैं, पर संसार को भली-भाँति समझ-बूझकर उसके प्रभाव से मुक्त रहना तत्वज्ञानियों का ही काम है। वे ही संसार के भले-बुरे कामों को एक दर्शक की भाँति देखते हुए अपने निजी सिद्धान्तों के अनुसार जीवन निर्वाह कर सकते हैं। तत्वज्ञान का अभ्यास मनुष्य किस प्रकार कर सकता है, इस सम्बन्ध में रोम निवासी दार्शनिक एपिक्टेरस-जो अब से 1900 वर्ष पूर्व हुये थे,-के उपदेश बहुत स्पष्ट और व्यावहारिक हैं। उनका परिचय नीचे दिया जाता है।

जो लोग शिक्षित हैं और चतुर नहीं है वे पहले-पहल जब कोई विद्या सीखना आरम्भ करते हैं तो उन्हें वह बहुत कठिन जान पड़ती है। किन्तु उस विद्या के द्वारा जो सामग्री तैयार होती है उसकी आवश्यकता तथा लाभ लोगों को तुरन्त मालूम हो जाते हैं। कोई चमार जिस समय जूता बनाता है उस समय यदि कोई आदमी वहाँ खड़ा होकर उसका काम देखे तो वह सुखकर नहीं जान पड़ेगा, पर जूता जब तैयार हो जाता है तो बड़े काम की चीज होता है और देखने में भी वह बुरा नहीं जान पड़ता। इसी प्रकार बढ़ई का काम भी खड़े-खड़े देखने से बड़ा कष्टकर जान पड़ता है, पर काम के पूरा हो जाने पर उसकी उपयोगिता तत्काल ही प्रतीत हो जाती है। संगीत शिक्षा का उदाहरण तो इस सम्बंध में और भी स्पष्ट है। संगीत शिक्षा का आरम्भिक अभ्यास सुनना बड़ा खराब-सा लगता है किंतु भली प्रकार से सीख लेने पर संगीत किसे अच्छा नहीं लगता? अशिक्षित व्यक्ति भी उसकी मधुरता से प्रभावित हो जाता है। इसी प्रकार जो लोग तत्व-ज्ञान सीखते हैं उनका भी एक विशेष उद्देश्य होता है। इसके लिए हमको समस्त बाहरी घटनाओं के साथ अपनी इच्छा को इस प्रकार मिलाना होगा जिसमें हमारी इच्छा के विरुद्ध कोई घटना न हो जाय, अथवा हम जो इच्छा करें उसके सिवा और कोई घटना न हो। इसी शिक्षा और साधना के फल से तत्वज्ञानी जिस वस्तु की इच्छा करते हैं उसे ही प्राप्त करते हैं और जिसकी इच्छा नहीं करते उसका त्याग कर सकते हैं। इस प्रकार वे बिना कष्ट, भय और उद्वेग के जीवन व्यतीत करते हैं। यही तत्वज्ञानियों का काम है। अब आप प्रश्न कर सकते हैं कि यह कार्य किस उपाय से सिद्ध किया जा सकता है।

बढ़ई जो बढ़ईगिरी जानता है वह उसे सीखनी पड़ती है। इसी प्रकार मल्लाह नाव का कार्य सीख कर ही जान सकता है। तत्वज्ञानी के सम्बन्ध में यही बात घटती है। हम विद्वान हों, तत्वज्ञानी हों, क्या यह इच्छा करने से हो सकता है? नहीं, उसके लिए भी एक विशेष प्रकार की शिक्षा चाहिए,- साधना चाहिये।

तत्वज्ञानी लोग कहते हैं कि सबसे पहले जानना चाहिए कि ईश्वर हैं और वह सभी पदार्थों का निरीक्षण करते हैं। क्या कार्य, क्या विचार, क्या कामना कुछ भी उससे छिपाया नहीं जा सकता। इसके बाद यह जानना होगा कि देवताओं का क्या स्वभाव है? देवताओं की प्रकृति जैसी निश्चित होगी, यथासाध्य उनकी सेवा और अर्चना करके भक्त लोग उनके अनुरूप होने की चेष्टा करेंगे। यदि देवता सत्यनिष्ठ हो तो उनको सत्य का आचरण करने वाला होना होगा; यदि वह शुभंकर हों तो भक्तों को भी शुभंकर होना होगा; यदि वह महानुभाव हो तो लोगों को भी महानुभाव होना होगा। इस प्रकार देवताओं के समकक्ष होने की चेष्टा करनी होगी, उसी प्रकार की बातें कहनी होंगी, वैसे ही कार्य करने होंगे। तत्वज्ञान की शिक्षा के लिए पहली शर्त यह है कि हम उसके सिद्धान्तों के वास्तविक तात्पर्य को समझें। मान लो आप धन, मान, आयु सब दृष्टियों से एक बड़े आदमी हैं। आपको धन, ऐश्वर्य, संतान, दास दासियाँ सभी प्राप्त हैं। राज्य में भी आपका सम्मान है और आप एक ऊँचे पद पर आसीन हैं। तो भी हम कह सकते है कि जिन वस्तुओं की आपको आवश्यकता है उनमें से कोई आपके पास नहीं हैं, और जो हैं वे सब नीचे दर्जे की हैं। ईश्वर क्या है,-मनुष्य क्या है,-अच्छा किसे कहते हैं,-बुरा किसे कहते हैं इनमें से कुछ भी आप नहीं जानते। हम यहाँ तक कह सकते हैं कि आप अपने आपको भी नहीं जानते। संभव है कि ऐसा कहने से तुमको बुरा लगे, तुम अपना अपमान समझो। पर विचार करके देखिये कि हमारे कथन में क्या बुराई है? एक कुरूप मनुष्य के सामने आइना रखने से क्या उसकी बुराई होती है? एक चिकित्सक अगर रोगी से कहे “बाबू, क्या तुम समझते हो कि तुमको रोग नहीं हुआ है मैं देखता हूँ कि तुम्हें तेज ज्वर है। आज कुछ भोजन मत करना-केवल जल पीकर रहना।” इस प्रकार बात सुनकर कोई रोगी चिकित्सक से यह नहीं कहता कि “तुमने मेरा अपमान किया है।” किंतु यदि किसी से कहा जाय कि “तुम्हारे कार्य अज्ञानता सूचक हैं, तुम्हारी पसंद की बातें नीचे दर्जे की हैं, तुम्हारे विचार और मत खोखले और मिथ्या हैं” तो वह तुरन्त कह उठेगा कि ‘इसने मेरा अपमान किया है।’

किसी बड़े मेले में लोग जिस प्रकार से कार्य करते हैं, हम लोग भी संसार में ठीक उसी प्रकार से कार्य किया करते हैं। मेले में गाय, भैंस आदि बिक्री के लिये लाई जाती हैं। अधिकाँश मनुष्यों में से भी कोई खरीदने के लिए आता है और कोई बेचने के लिए। केवल मेला देखने कम लोग आया करते हैं। किस लिये मेला स्थापित हुआ, कौन इसका स्थापनकर्ता है, उसमें क्या-क्या काम किस विधि से होते हैं, इन सब बातों को जानने के लिये बहुत ही कम लोग आते हैं। यह संसार रूपी मेला भी ऐसा ही होता है। गाय, भैंस आदि की तरह अनेक तो केवल घास-दाना खाने में ही व्यस्त रहते हैं। जो लोग संसार में केवल धन-ऐश्वर्य का ही भोग करते हैं वे केवल गाय-भैंस की तरह घास दाना ही नहीं खाते तो और क्या? केवल दर्शन का सुख प्राप्त करने बहुत कम लोग आते हैं। संसार क्या पदार्थ है, संसार का कर्ता कौन है, यह तत्व जानने के लिए बहुत ही कम लोग उत्सुक होते हैं।

कोई एक छोटा सा राज्य, कोई एक सामान्य घर, मालिक के बिना, रक्षक के बिना एक क्षण भी कायम नहीं रह सकता। तब क्या इतनी बड़ी सृष्टि आकस्मिक घटना समूह द्वारा ऐसे उत्तम, सुव्यवस्थित रूप से परिचालित हो सकती है? इस लिये मानना पड़ता है कि जगत का एक कर्ता अवश्य है। किन्तु उनका रूप कैसा है। किस प्रकार वह शासन करते हैं, हम लोग क्या पदार्थ हैं, किस उद्देश्य से हम लोग उत्पन्न किये गये हैं, ईश्वर के साथ हम लोगों का कोई संपर्क है या नहीं इन सब बातों को समझे बिना संसार में मनुष्य का आना मेले में आने वाली गाय-भैंसों के समान ही है।

जो थोड़े से लोग इन सब तत्वों की खोजबीन में लगे रहते हैं, साधारण लोग उनकी हँसी उड़ाते हैं। मेले में भी यदि गाय-भैंसों में शक्ति होती तो वे भी कोरे दर्शकों का इसी प्रकार उपहास करतीं। वे निश्चय ही कहतीं कि ‘इन मूर्खों ने यहाँ आकर यदि घास-दाना का उपभोग नहीं किया, तो यहाँ आने से इनको लाभ ही क्या हुआ?’ संसार के भोगों में फँसे हुये साधारण मनुष्यों और तत्वज्ञानी में यही अन्तर है।


राम-चरित्र की महानता और उसकी शिक्षाएँ

(श्री एस. बी. वर्मा)

रामायण हिन्दू-संस्कृति का परिचायक एक अपूर्व ग्रंथ है। यद्यपि रामायण की जो पुस्तकें आजकल हमको मिलती हैं वे दो-ढाई हजार वर्ष से पुरानी नहीं हैं तो भी उनमें प्राचीन हिन्दू-समाज की मान-मर्यादा और विशेषताओं का अच्छा परिचय मिलता है।

भारतीय समाज का सबसे प्राचीन चित्र ऋग्वेद में मिलता है। उसमें आर्य और अनार्यों के संघर्ष की कथाएँ भरी पड़ी हैं। प्रत्यक्ष और अलंकारिक भाषा में उसमें अनेक युद्धों का वर्णन आया है। ब्राह्मण-ग्रंथों के निर्माण काल तक आर्य और अनार्य घुल-मिल गये थे। उत्तर भारत के अनार्यों पर आर्य सभ्यता की छाप पूरी तरह पड़ चुकी थी, पर दक्षिणी भारत अभी तक अछूता था। वहाँ बहुत दूर-दूर पर आर्यों ने अपने उपनिवेश स्थापित किये थे, पर उनकी शक्ति अधिक नहीं थी, और उनको वहाँ के मूल निवासियों तथा विदेशियों के विरोध का मुकाबला भी करना पड़ रहा था। आर्य-जाति के बड़े नेता और संचालक स्वभावतः ही अपनी संस्कृति को दक्षिण में फैलाने के लिए व्याकुल थे और यही राम-रावण युद्ध का मूल था।

राजा दशरथ के राज्य-काल में उत्तर-भारत में राष्ट्रीयता लुप्तप्राय थी। वहाँ की राजनीतिक स्थिति बहुत डाँवाडोल थी । कोई ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं था जो सब छोटे-छोटे बिखरे हुए राज्यों को एक सूत्र में ग्रथित करके एक संगठित राष्ट्र का रूप देता। ब्राह्मणों में भी राज्य की लालसा उत्पन्न हो गयी थी और वे परशुराम जी के नेतृत्व में जगह-जगह क्षत्रियों का संहार करके राज्याधिकार पाने में सफल हुए थे। उस समय उत्तर भारत में आर्यों के दो ही राज्य ऐसे थे जो कुछ शक्ति रखते थे-एक कोसल और दूसरा मिथिला। जिस प्रकार मुसलमानों के भारत आक्रमण काल में, हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति का ह्रास देखते हुए भी, आपस के मनोमालिन्य और स्वार्थ के कारण, हिन्दू नरेश एक सूत्र में नहीं बँध सके , उसी प्रकार एक ओर परशुराम की संहार भावना और दूसरी ओर अनार्यों के उपद्रवों को देखते हुए भी कोसल और मिथिला के राज्य एक सूत्र में न बँध सके थे। इसी मनोमालिन्य का परिणाम था कि सीता स्वयंवर के लिए कोसल नरेश को सम्भवतः निमंत्रण नहीं मिला था।

विश्वामित्र जन्मता क्षत्री थे और अपने समय के बहुज्ञ, दूरदर्शी और अनुभवी राजनीतिज्ञ थे। वे समझते थे कि राष्ट्र का वास्तविक हित तभी सम्भव है जब ब्राह्मबल और क्षात्रबल का उचित रीति से समन्वय किया जा सकेगा। अतएव, वे ऐसे ही सुअवसर की खोज में थे। उन्होंने ब्राह्मबल के अधिष्ठाता वसिष्ठ और क्षात्रबल से मंडित श्रीराम में ऐसे समन्वय का आभास पाया। सीता-स्वयंवर ने मिथिला और कोसल को एक सूत्र में बाँधने का सुयोग दिया। विश्वामित्र ने इस सुयोग से लाभ उठाया। वे राक्षसों (अनार्यों)से यज्ञ की रक्षा करने के नाम पर राम-लक्ष्मण को अपने साथ लिवा ले गये और ठीक मौके पर मिथिलापुर जा पहुँचे।

आर्य-अनार्य संघर्ष

साम्राज्यवादी और कूटनीतिज्ञ रावण भी बहुत समय से दक्षिण-भारत को अपने साम्राज्य का अंग बनाने की चेष्टा कर रहा था। भारत के आर्य-राजाओं की आपसी फूट और एकता की कमी को देखकर इस समय वह भी अपनी चाल चल रहा था। उसने उन अनार्यों को, जो अपनी कट्टरता के कारण आर्यों में घुलने-मिलने को तैयार न हुये थे और गहन जंगलों तथा पहाड़ों में भागकर अपनी जातीयता की रक्षा कर रहे थे, आर्यों के विरुद्ध भड़का रखा था कि वे ऋषियों द्वारा संचालित शिक्षा संस्थाओं, तपोवनों में तोड़ फोड़ की कार्यवाहियां जारी रखें। जिस प्रकार आज कल भारत-विभाजन हो जाने पर भी पाकिस्तानी मुसलमान भारतीय-सीमा के निकट रहने वाले भारतीयों पर आक्रमण किया करते हैं, उसी प्रकार अनार्यों के छापामार भी तपोवन वासी ऋषियों और ब्रह्मचारी छात्रों को तरह-तरह से सताया करते थे। विश्वामित्र ने राम को नये-नये अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी। राम भी अनार्यों की नेतृ ताड़का को मारने और उसके दल को नष्ट करने में सफल हुये। उसके बाद राम ने सुबाहु तथा मारीच के नेतृत्व में छापा मारने वाले दूसरे दल का विध्वंस किया और मारीच को सुदूर दक्षिण की ओर खदेड़ दिया।

इधर विश्वामित्र की कूटनीति के फलस्वरूप, निमंत्रित न होते हुए भी, राम ने सीता-स्वयंवर में जाकर अपना-प्रबल-पराक्रम दिखलाया-अत्यंत कठोर शिव-धनुष को तोड़कर अद्भुत शारीरिक शक्ति का परिचय दिया। इस प्रकार सीता से विवाह होने पर दो बड़े राजकुल-एकता के सूत्र में बंध गये। इनके परस्पर सम्बद्ध हो जाने से उत्तर भारत में आर्य-संगठन का श्री गणेश हुआ।

लंकापति रावण भी, जो भौतिक विज्ञान में पारंगत होने के कारण वायु-विमान तैयार करा चुका था, मिथिला पति को स्नेह सूत्र में बाँधने के अभिप्राय से सीता-स्वयंवर में आया था। किन्तु जब उसने देखा कि दूसरा पराक्रमी अनार्य योद्धा वाणासुर भी उसी उद्देश्य से आया है, तो उसने सोचा कि आर्यों के आगे अनार्य नरेशों का इस प्रकार आपस में लड़कर शक्तिहीन बन जाना उचित नहीं। अतएव यह स्वयं भी हट गया और वाणासुर को भी वहाँ से हटा ले गया।

क्षत्रियों की यह बढ़ती हुई शक्ति परशुराम को सहन न हुई। वे राम को नीचा दिखाने के लिए कटिबद्ध हो गये। किंतु जब उन्हें राम की वीरता और प्रतिभा का परिचय भली-भाँति मिल गया और उन्होंने जान लिया कि आर्य-राष्ट्र का कल्याण राम द्वारा ही हो सकता है, तब वे अपनी शक्ति और गौरव का अवसान काल समझकर, राजनीतिक क्षेत्र से एक बारगी अलग होकर, जंगल में तप करने चले गये।

इन घटनाओं के फलस्वरूप विश्वामित्र ने उत्तर भारत की स्थिति को सर्वथा निरापद अनुभव किया और इस अवसर को दक्षिण में आर्य सभ्यता तथा आर्य संस्कृति फैलाने के लिए विशेष अनुकूल समझा। राम के वन-गमन की घटना का कारण अनेक आलोचकों ने घरेलू राजनैतिक षडयंत्र बतलाया है, पर दूसरी श्रेणी के आलोचकों को उसमें कोई गहरा उद्देश्य जान पड़ता है। श्रीराम की योग्यता और शक्ति को देखकर आर्य जाति के प्रधान नेताओं को यह विश्वास हो चुका था कि वे ही दक्षिण भारत को आर्य-सभ्यता का अनुयायी बना सकते हैं। इसलिए उन सबने मिलकर, जिसमें पंजाब तक के आर्य नेताओं, ऋषि तथा मुनियों का भी हाथ था, इस योजना को कार्यान्वित कराया। यह इससे भी ज्ञात होता है कि भारद्वाज ऋषि ने भी भरत से कहा था कि ”रामचंद के वन जाने का अंत बड़ा सुखकारी होगा।” (अयो. 92-30)

राम स्वभाव से ही उदार और सहृदय थे। अतएव वनवासी होकर उन्होंने सबसे बड़ा कार्य यही किया कि वे आर्य-ऋषियों और अनार्य-हरिजनों के बीच सम्बन्ध स्थापित कराने में समर्थ हुए। नीचातिनीच स्त्री, पुरुषों ने भी उनकी आत्मीयता के वशी होकर उनको अपना हितैषी मान लिया। उन्होंने 13 वर्ष तक सुदूर दक्षिण में गोदावरी के तट पर निवास किया और अपनी उदारता, वीरता एवं संस्कृति से किरात, निषाद, वानर, भालू, गिद्ध आदि अनेकानेक अनार्य जातियों पर अपने सद्व्यवहार का अमिट प्रभाव डाला। परिणाम स्वरूप वे उनकी ओर इस प्रकार खिंच गये कि चौदह वर्ष के वनवास में सिर्फ उन्हीं अनार्य राजाओं और नेताओं की सहायता से उन्होंने महा पराक्रमी बालि और अनार्य-कुल सम्राट रावण को पराजित किया, और आर्य-सभ्यता की पताका सदा के लिए दक्षिण भारत में गाड़ दी ।

रावण की कूटनीति

अनार्य-शिरोमणि महाबाहु रावण के पराजय के बिना ऋषि, मुनियों और गुरुकुलों की रक्षा संभव नहीं थी। साथ ही आर्य-सभ्यता तथा आर्य-संस्कृति का कायम रखना भी असंभव था। अतएव अयोध्या के निकट चित्रकूट के रमणीक जंगल में निवास करने के बदले, राम ने सुदूर दक्षिण में गोदावरी के तट पर निवास किया। इस स्थान के निवास के कारण उनका संपर्क ऋषि अगस्त्य से हो गया। अगस्त्य जी दक्षिण प्रवासी आर्य लोगों के सबसे बड़े नेता और विज्ञान के जानकार थे। उन्होंने राम को रावण आदि अनार्य राजाओं के कुचक्रों से परिचित कराया और उनका सामना करने के लिए अनेक नये-नये अस्त्र-शस्त्र भी दिये। ताड़का, सुबाहु आदि के वध के कारण रावण भी राम की वीरता से परिचित था। राम के पंचवटी निवास और उनके प्रति अनार्यों की बढ़ती हुई श्रद्धा को वह अपने मार्ग में कंटक समझने लगा तथा भविष्य के लिए शंकित हो गया। उसने राम की गतिविधि का पता लगाने के लिए अपने जासूस भेजे। उनमें शूर्पणखा प्रमुख थी। वह रावण की बहिन लगती थी और प्रसिद्ध सुन्दरी थी। प्रथम योरोपीय महायुद्ध की जासूस महिला ‘माताहरी’ की तरह वह अपने सौंदर्य का अमोघ अस्त्र राम और लक्ष्मण पर चलाना चाहती थी किंतु सफल न हो सकी। पहले वो राम के पास गयी, पर वे उसके चक्कर में न आये। हताश होकर वह लक्ष्मण के पास गयी, पर वे भी उसके फन्दे में न फँसे। उसका उद्देश्य समझकर और उसे बहुत खतरनाक जानकर उन्होंने उसकी नाक काट ली।

रावण को जब अपनी बहिन की दुर्दशा का समाचार मिला, तो एक ओर अपनी मर्यादा और प्रतिष्ठ बनाये रखने के लिए तथा दूसरी ओर राम की शक्ति की जाँच करने के लिए उसने पराक्रमी खरदूषण से राम पर आक्रमण करने को कहा। खरदूषण ने अनार्यों का एक सुदृढ़ राज्य वर्तमान बम्बई इलाके में समुद्र के किनारे स्थापित कर रखा था। राम ने अपने सहकारियों की सहायता से उन सबको अनायास नष्ट कर डाला। तब रावण को बड़ी घबड़ाहट हुई । वह पंचवटी आकर उनसे युद्ध करना नहीं चाहता था, क्योंकि इसमें आवागमन की बड़ी कठिनाइयाँ थीं। वह चाहता था कि ये लंका में ही आकर उससे लड़ें। इसी उद्देश्य से वह राम, लक्ष्मण की अनुपस्थिति में आकर सीता को हर कर ले गया।

राम, सीता की खोज में लक्ष्मण के साथ निकल पड़े। वे सीता की करुण कहानी कहकर गिद्ध, बानर आदि जातियों को अपने प्रेम-बंधन में बाँधने में सफल हुए। राम का उद्देश्य साम्राज्य-विस्तार नहीं था, किन्तु दक्षिण भारत में आर्यों की स्थिति को निरापद बनाना तथा आर्य संस्कृति का फैलाना ही उनका लक्ष्य था। चतुर राजनीतिज्ञ होने के कारण ये बात उन्होंने तुरंत समझ ली कि अनार्यों का सामना करने के लिए सैकड़ों कोस दूर उत्तर भारत से सेनाएँ नहीं लायी जा सकतीं। वरन् अनार्यों की सहायता से ही यह कार्य सम्भव हो सकता है। अतएव जब उन्होंने सुग्रीव से मित्रता करके बालि का वध किया तो राज्य और धन से निर्लिप्त रहकर जहाँ एक ओर सुग्रीव को राज्य सौंपा, वहाँ बालितनय अंगद को युवराज बनाकर दोनों दलों को एक साथ प्रेम पाश में बाँधा। इसी का फल था कि अनेक अनार्य राजाओं ने अनार्यकुल भूषण रावण को युद्ध में पराजित करने में राम की सहायता की।

बालि रावण का परम मित्र था । बालि को मारकर राम केवल अपना मार्ग-कंटक ही दूर करने में समर्थ न हुये, किंतु वानर जाति की सम्मिलित शक्ति की सहायता पाने में भी सफल हुये। सुग्रीव की सहायता से राम ने अनेक दूतों को लंका का सुगम मार्ग और रावण की सैनिक स्थिति का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के उद्देश्य से लंका भेजा। इसी बीच में आस-पास की अनेक अनार्य जातियों से मेल-मिलाप कर उन्होंने बहुत बड़ी सेना का संगठन भी कर लिया।

लंका पहुँचने पर उन्होंने रावण की रण नीति का भेद जानने के लिए, उसके कुछ साथियों को फोड़ने का प्रयत्न किया। इसमें वे सफल हुये और रावण के भाई विभीषण को राज्याधिकार दिलाने का वचन देकर अपना सहायक बना लिया। अनेक विद्वानों का मत है कि रावण के बुरे व्यवहार से असंतुष्ट होकर विभीषण स्वयं राम की शरण में आया था। कुछ भी हो यदि राम को विभीषण द्वारा रावण के गुप्त अस्त्र-शस्त्रों का भेद मालूम न होता तो लंका को जीत सकना कदाचित् ही संभव होता।

राम की अनुपम महानता

रावण जैसे वैभवशाली सम्राट पर विजय पाकर भी राम ने अपना कोई स्वार्थ नहीं साधा। जो कुछ माल, खजाना, अमूल्य वस्त्र, आभूषण, रत्न आदि लंका से मिले वे सब अनार्य सिपाहियों को ही बाँट दिये गये। उनके इस निस्वार्थ भाव का यह परिणाम हुआ कि अनार्यों की श्रद्धा, भक्ति उनके प्रति दृढ़ और स्थाई हो गयी तथा उन पर आर्य-सभ्यता की अमिट छाप पड़ गयी। वे लंका का राज्य विभीषण को सौंप कर सीता और लक्ष्मण के साथ, अयोध्या वापस आये और अनार्यों के प्रतिनिधि के रूप में हनुमान को राजदूत की तरह अपनी सभा में ऐसे प्रेम और सम्मान से रखा कि वे उनके दासानुदास बन गये।

राम सर्व गुण सम्पन्न, श्रेष्ठ, धर्मशील और नीतिज्ञ थे। दक्षिण भारत की यह साँस्कृतिक विजय उनकी अक्षय कीर्ति थी। इसी कारण आगामी युग की जनता उनको अवतार मानकर पूजने लगी।


अपने आप का स्वामी बन कर रहिये!

(श्री रामचरण महेन्द्र)

[1]

अपने आप का स्वामी बन कर रहिए ! आप कहेंगे, “हम तो स्वयं अपने स्वामी हैं ही; फिर आपका क्या तात्पर्य है?”

यदि आप अपनी इंद्रियों, मानसिक विकारों और अन्तर्द्वंद्वों के वश में हैं ; यदि मन के झकोरों में बह जाते हैं ; यदि आपको नाना क्षुद्र प्रलोभन नाच नचाया करते हैं और आप इनके वश में हैं, तो वास्तव में आप स्वामी नहीं, गुलाम ही हैं। अनियंत्रित इन्द्रियों की दासता ऐसी है, जैसे कठपुतली में बन्धे हुए सूक्ष्म तन्तु। जिधर को तन्तु हिले, उधर ही को कठपुतली ने हाथ पाँव हिलाए। स्वयं कठपुतली का कोई अस्तित्व नहीं है। उसी प्रकार इंद्रियों के दास का क्या ठिकाना!

मनुष्य के जीवन का पूरा विकास .गलत स्थानों, .गलत विचारों और .गलत दृष्टिकोणों से मन और शरीर को बचाकर उचित मार्ग पर आरुढ़ कराने से होता है। यदि इन्द्रियों को बेलगाम, यों ही जिधर चाहें चलने के लिए, छोड़ दिया जाए, तो निश्चय जानिए, ये आपको ऐसे गड्ढे में ले जाकर पटकेंगी, जहाँ से उठना असम्भव हो जायेगा। इसलिए भारतीय संस्कृति के संयम को विशेष महत्ता प्रदान की गई है।

मनुष्य की वासनाएँ अनन्त हैं ; इच्छाओं की कोई गिनती नहीं, तृष्णाओं की संख्या उतनी ही है जितने आकाश में सितारे। एक वासना, एक इच्छा या एक तृष्णा के पूर्ण होते ही दस नई तृष्णाओं का जन्म हो जाता है। इस प्रकार कामनाओं और नित नई आवश्यकताओं का मोह-बन्धन लगातार हमें बाँधे रहता है। हम साँसारिक भोग-विलास के हर दम दास बने रहते हैं; इच्छाओं के प्रपंच में जकड़े हुए हैं।

एक विद्वान ने सत्य ही लिया है, “दुनिया को मत बाँधो, अपने को बाँध लो।” अपनी इन्द्रियों को वश में कर लो तुम विजयी कहलाओगे।

अपनी इन्द्रियों की रखवाली वैसे ही करो, जैसे एक कर्तव्यनिष्ठ सिपाही खजाने के दरवाजे की रक्षा करता है। यदि चोरों को अवसर मिलेगा तो इन्हीं दरवाजों से घुसकर सारा खजाना खाली कर देंगे।

इसलिए खबरदार! दरवाजों पर गफलत न होने देना। इन्द्रियों पर पाप का अधिकार न होने पाये, अन्यथा धर्म, नीति, चरित्र, पुण्य, कीर्ति , यश, प्रतिष्ठा का खजाना खाली हो जायेगा।

मन में संयम से स्वर्ग मिलता है; किन्तु अनियंत्रित इन्द्रियाँ तो नरक की ओर ले दौड़ती हैं। क्या तुम नहीं जानते कि उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घ जीवन, दिव्य बुद्धि और साँसारिक सम्पदाएँ इन्द्रिय-निग्रह से ही मिलते हैं। जिसने अपने ऊपर काबू पा लिया है, वह हर परिस्थिति में पर्वत की तरह दृढ़ और स्थिर रह सकता है।

संयम वह गुण है जिस पर भारतीय संस्कृति टिकी है। हम एक संयमी जाति हैं। हमारे यहाँ संयम का बड़ा व्यापक प्रयोग है।

हमें चाहिए कि खान-पान, वाणी, विचार, चिंतन, सर्वत्र ही आत्मसंयम का प्रयोग करें। हमारा मन जब फालतू, व्यर्थ के अनीतिकर चिंतन में फँसता है, तो हमको उस पर कठोर नियंत्रण करना चाहिए ; जब क्षुद्र अनुराग, मोह, शंका आदि मनोविकारों के बंधन में बंधता है, तब उसका निग्रह करना चाहिए, जब दूसरों की खराबियों की थोथी आलोचना में फँसता है, तब उसे संयम पूर्वक रोकना चाहिए।

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दैनिक जीवन में ही संयम का आत्मशिक्षण और अभ्यास होना चाहिए। यदि हम समझें कि दो-चार दिन के साधारण से अभ्यास से यह कार्य हो जायेगा, तो यह हमारी भूल है। संयम का क्षेत्र अति विस्तृत है। प्रत्येक मोर्चे पर संयम का अभ्यास आवश्यक है।

मान लीजिए, आपके मन में स्वादिष्ट भोजन की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। आप पहले अपना दैनिक भोजन करते हैं। उसके बाद कुछ दूध रबड़ी खाते हैं। फिर मिठाई सामने आ जाती है तो आप उस ओर आकृष्ट हो जाते हैं और स्वास्थ्य की कुछ परवाह न कर अनाप-शनाप मिठाई खा जाते हैं। यह असंयम आपके स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला और आत्मिक पतन का द्योतक है। अनियंत्रित जिह्वा वाले व्यक्ति कभी जीवन का आनन्द नहीं ले पाते। अति भोजन का परिणाम अधिक आलस्य और अहितकर चिंतन है। इन्द्रियों की और भी उत्तेजित करने और विकारों को बढ़ाने का साधन है।

आप किसी मादक द्रव्य-मद्य, भंग, सिगरेट, गाँजा, चाय, काफी के बंधन में बंध गये हैं तो इनके बिना आपको शून्यता प्रतीत होती है। अतः, समझ लीजिए कि आपके चरित्र में संयम की कमी है।

आप के नेत्र घृणास्पद, वासना से भीगे दृश्यों को देखने को दौड़ते हैं। बड़े वेग से सिनेमा के चलचित्रों, नृत्यों, नग्न मानव शरीरों की ओर आकृष्ट होते हैं, तो यह मन की दुर्बलता के चिन्ह हैं।

आपके कान संगीत (प्रायः उत्तेजक निन्द्य गाने) की ओर भागते हैं, अपने वास्तविक उद्देश्य पर मन एकाग्र न कर आप उस सस्ते संगीत की ओर खिंच जाते हैं, तो आप बंधन में पड़ गए हैं।

आप को जहाँ बोलना चाहिए, वहाँ आप बोलते नहीं। जहाँ नहीं बोलना चाहिए, वहाँ निरन्तर बकवास करते हैं; भटक जाते हैं; आवेश में आ जाते हैं; अपशब्दों तक का उच्चारण कर बैठते हैं और सबके बुरे बनते हैं। इस अवसर पर भी आपको आत्मसंयम से ही लाभ हो सकता है।

साँझ से ही आप बिस्तर पकड़ लेते हैं और दस घंटे निद्रा या तन्द्रा में पड़े रहते हैं। मध्याह्न को भी भोजन के पश्चात् एक दो घंटे सो जाते हैं। निद्रा से ही पीछा नहीं छूटता। सारे दिन निद्रा ही सताया करती है। यदि अमर्यादित निद्रा हो, तो मनुष्य कैसे कुछ ठोस कार्य कर सकता है? अधिक भोजन का फल अधिक निद्रा, अधिक निद्रा का अर्थ आलस्य, और आलस्य का अर्थ आध्यात्मिक पतन और सर्वनाश है।

यदि संयम न हो, और हमारे कार्य ऊपर लिखे तरीकों से ही चलते रहें, तो मनुष्य समग्र जीवन खान-पान, व्यर्थ चिंतन, दोष दर्शन, इन्द्रिय-पूर्ति और निद्रा में ही समाप्त कर दे। पर ऐसा नहीं होता। ईश्वर ने हमें एक ऐसी शक्ति दी है, जिसे विवेक कहते हैं। यह विवेक हमें मर्यादा, नियम-बंधन और नाप तोल कर चलना सिखाता है। विवेक होने पर हम स्वयं अपने मन के द्रष्टा बन जाते हैं। अपने मन के व्यापार की अच्छाई- बुराई देखते हैं। निरुपयोगी और फालतू क्रियाओं का निरीक्षण करते हैं।

भीष्म एवं युधिष्ठिर के संवाद में से यह भाग विचारणीय है-

“आत्मा नदी संयमतोयपूर्णा ज्ञानं हृदः शीलदया तटानि। तस्यावगाहं कुरुपाण्डुपुत्र न वारिणा शुध्यति चाँतरात्मा ॥”

“हे धर्मराज, तुम ऐसी नदी में स्नान करो, जिसमें आत्मा शुद्ध हो जाय। आत्मा रूप नदी में संयम रूप जल भरा हुआ है, ज्ञान रूपी गहराई है। शीलता और दया रूपी दोनों किनारे हैं। जल से आत्मा की शुद्धि नहीं हो सकती। “

तमोगुण अर्थात् प्रमाद, आलस्य, मोह, निद्रा, वासना, शिथिलता-आदि से मुक्ति के लिए केवल संयम के अभ्यास की आवश्यकता है। विषयों के ध्यान अथवा चिंतन से उसमें आसक्ति हो जाती है, उस आसक्ति से उसकी प्राप्ति की इच्छा होती है; और तमोगुण के इच्छित फल मिलने से सर्वनाश हो जाता है। अतः चौबीसों घंटों अपने आपको नियमों में बाँधना चाहिए।

नियम-बंधन एक मानसिक बंधन है। जब आप मन में यह दृढ़ निश्चय करते हैं कि अमुक नियमों से रहेंगे या अमुक-अमुक नियमों का जीवन में पालन करेंगे, तो आप मन ही मन एक गुप्त शक्ति से अपने जीवन और कार्यों को बँधा हुआ पाते हैं। नियमों के पालन का निश्चय ही एक साधन है। इसमें प्रारम्भ में मन और शरीर को कुछ कठिनाई अवश्य पड़ती है, पर बार-बार नियमों का पालन करने से मन का नियंत्रण हो जाता है।

नियम हमें संयम की शिक्षा देने वाले अमूल्य अंकुश हैं, जो हमें उच्च प्रकार के साँस्कृतिक जीवन की ओर ऊँचा उठाते हैं। नियम की जंजीरों में बंध कर मनुष्य व्यर्थ के निरुपयोगी कार्यों से छूट जाता है। मन व्यर्थ की क्रियाओं से बच जाता है। मन की स्वतन्त्रता की एक विशेष सीमा निर्धारित हो जाती है। इसकी मर्यादा के बाहर जाते ही हम चौंक जाते हैं। गुप्त मन हमें नियमोल्लंघन करने पर प्रताड़ित करता है। वस्तुतः, हम फिर मन की लगाम को खींचकर उसकी निर्बाध स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा देते हैं।

नियमों में बंध कर मनुष्य की शक्ति का विकास होता है। व्यर्थ-चिंतन, व्यर्थ के कार्य और इन्द्रियों के प्रलोभनों से बचकर आहार-विहार में संयम लाने से मनुष्य का शरीर श्रमी, बुद्धि विवेकवती और मन शक्तिशाली बनता है। जितेन्द्रियता व्यक्ति के निर्माण में सर्वाधिक महत्व रखती है।

प्रकृति अपने नियम नहीं छोड़ती। इस संसार की प्रत्येक गति कुछ गुप्त नियमों के अनुसार चल रही है। ऋतुओं का आना-जाना, वृक्षों के फल-फूल, पत्तियों का उद्भव; जीव विज्ञान के नाना कार्य, भौतिक विज्ञान के अनेक नियमों पर चल रहे हैं। सृष्टि अपने नियम नहीं छोड़ती। समस्त विज्ञान हमें नियमों का महत्व स्पष्ट कर रहे हैं। फिर, मनुष्य अपने नियमों को छोड़कर कैसे उन्नति कर सकता है? मनुष्य की अपरिमित शक्ति समस्त मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक नियमों के पालन में ही हो सकती है।

उदाहरण के लिए शारीरिक नियमों को ही ले लीजिए। शरीर एक पेचीदा यंत्र है। पर्याप्त श्रम, नियमित तथा संतुलित भोजन, मनोरंजन, आठ घंटे की गहरी निश्चिन्त निद्रा, पर्याप्त आराम, प्रसन्नता आदि आवश्यक हैं। यदि इनमें से किसी भी नियम को भंग कर लिया जाता है, तो जीवन अव्यवस्थित हो जाता है। फलतः, रोग और शारीरिक कष्ट उत्पन्न हो जाते हैं। यही कारण है कि सजा के डर से, कोई भी शारीरिक नियमों का उल्लंघन नहीं कर पाते। मानसिक और बौद्धिक नियमों का अनेक बार अतिक्रमण होता है और मन का संतुलन नष्ट हो जाता है। अतः, अपने आप को कठोर नियमों के बंधन में बाँधे रखिए। इससे आप की सभी शक्तियाँ बढ़ती रहेंगी और अपव्यय न होगा। नियम टूटते ही संयम नष्ट हो जाता है और शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।


नारियाँ ही हमारे समाज को उच्च पद पर आसीन करायेंगी।

(श्री शिवदत्त जी ज्ञानी)

किसी भी जाति की सभ्यता को नापने के जो अनेक तरीके हैं उनमें ‘स्त्रियों की स्थिति ‘ भी एक विशेष स्थान रखती है। संसार में प्राचीन काल में तो स्त्रियों की स्थिति अनेक देशों में गुलामों के तुल्य थी और अब भी अनेक स्थानों में वही दशा देखी जा सकती है। अन्य देशों में से कोई उसको केवल विलास की चीज समझकर चैन की बंशी बजाता है, और कोई उसे खिलौना की तरह समझ कर खिलवाड़ ही करता रहता है। पर प्राचीन भारत में स्त्रियों का इतना उच्च स्थान था कि वे पूजा के योग्य समझी जाती थीं। प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों का जैसा सम्मान किया जाता था और उनको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जितना महत्व मिला हुआ था उसका उदाहरण संसार भर में कहीं नहीं मिलता।

भारतीय संस्कृति में स्त्री व पुरुष दोनों को एक गाड़ी के दो पहियों की तरह माना गया था। दोनों पहिए साथ-साथ और बराबर चलेंगे तभी जीवन रूपी गाड़ी भली प्रकार अग्रसर हो सकती है। इसी दृष्टि से स्त्री को पुरुष की अर्धांगिनी कहा गया था। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि “पत्नी पुरुष की आत्मा का आधा भाग है। इसलिए जब तक पुरुष पत्नी को प्राप्त नहीं कर लेता तब तक प्रजोत्पादन न होने से वह अपूर्ण रहता है।” महाभारत के आदि पर्व (74 -40) में लिखा है “भार्या पुरुष का आधा भाग व उसका श्रेष्ठतम मित्र है। वही त्रिवर्ग की जड़ है और वही तारने वाली है।” मनु भगवान ने तो स्पष्टतः ही कह दिया है कि “जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ देवता रहते हैं।” इस व्यवस्था में इस बात की आशंका नहीं थी कि पुरुष अपनी शक्ति का घमण्ड करके स्त्री पर अपना अधिकार दिखला सके। जबकि स्त्री उसी का आधा अंग है तब अधिकार का प्रश्न ही नहीं उठ सकता। वे दोनों ही बराबर हैसियत रखते हैं। स्त्री व पुरुष एक ही पारिवारिक जीवन के दो विभिन्न पहलू हैं। पारिवारिक जीवन में दो प्रकार की जिम्मेदारियां रहती हैं। एक घर के भीतर की और दूसरे घर के बाहर की। इनमें एक का संचालन विशेषतः स्त्री द्वारा होता है और दूसरा पुरुष द्वारा । पारिवारिक अभ्युदय के लिये दोनों पहलुओं का सुचारु रूप से संचालन होना आवश्यक है। यदि दो में से किसी एक में कमी रही तो जीवन दुखमय हो जाता है।

स्त्री-पुरुष के एक साथ रहने से ही पारिवारिक जीवन का श्री गणेश होता है। ज्यों-ज्यों संतान वृद्धि होती है, या अन्य प्रकार से परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़ने लगती है, त्यों-त्यों उसका आन्तरिक जीवन भी विकसित होने लगता है। इस जीवन का सम्बन्ध पूर्णतया स्त्री से ही रहता है। प्राचीन समाज में उसे ही परिवार के छोटे-बड़े सब सदस्यों की चिंता करनी पड़ती थी। उसे अपने घर को साफ सुथरा रखना, भोजन की व्यवस्था करना और अतिथि-संस्कार के उत्तरदायित्व को पूरा करना पड़ता था। उसे अपनी संतान का पालन पोषण करके उन्हें योग्य नागरिक बनाने का प्रयत्न भी करना पड़ता था। इसी लिये उसे गृहिणी के पद पर सुशोभित किया गया था। महाभारत के शाँति पर्व (144-66) में लिखा है “घर, घर नहीं है, वरन् गृहिणी ही घर कही जाती है।” प्राचीन सामाजिक जीवन में गृहिणी-पद अत्यन्त महत्वपूर्ण था, क्योंकि उस समय पारिवारिक जीवन स्वावलम्बन के सिद्धान्त पर स्थित था। इस लिये स्त्री के ऊपर लिखे कार्यों के अतिरिक्त सूत कातने, कपड़ा बुनने, गाय दुहने, खेती सम्बन्धित कार्यों की जिम्मेवारी भी उठानी पड़ती थी। यदि स्त्री घर के सब कार्यों की जिम्मेवारी अपने ऊपर न उठाये तो स्पष्ट है कि पुरुष को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

गृहिणी पद के अतिरिक्त प्रकृति ने स्त्री को मातृ-पद के योग्य भी बनाया है। ‘माता’ शब्द तो पारिवारिक जीवन के लिये मानो अमृत का भण्डार है। माता, परिवार के लिए त्याग, तप और प्रेम की त्रिवेणी ही है। माता और पुत्र का जो प्रेम परस्पर रहता है, उसी से पारिवारिक जीवन अधिक सुखी बनता है। माता समाज-सेवा के ऊँचे से ऊँचे आदर्शों की साक्षात् मूर्ति ही है। अपने बच्चों को पालने-पोसने में वह सब कष्टों को हँस-हँस कर झेलती है। प्राचीन भारत में माता की महिमा सबसे अधिक बतलायी गयी थी और सूत्र तथा स्मृति ग्रंथों में इस सम्बन्ध में, बहुत कुछ लिखा गया है।

स्त्री को उपरोक्त दो पदों के अतिरिक्त एक और पद प्राप्त था और वह था पुरुष की सहचरी का। गृहिणी और माता की जिम्मेदारियों से उनका जीवन नीरस न हो जाय, और घर के बाहरी झंझटों में फँस कर उसके पति का भी जीवन कटु न हो जाय, इस लिये वह अपने पति की सहचरी बनकर उसे जीवन-सौख्य का आनन्द प्रदान करती थी। प्रकृति ने उसे जो सौंदर्य और माधुर्य दिया है, उसे वह अपने प्रयत्नों से -शृंगार आदि से- ललित कला में परिणत करके जीवन के दुःखों को भुलाने में समर्थ होती थी। उसका सौंदर्य और माधुर्ययुक्त प्रेम, जो उसके अंग-अंग से टपकता था, उसके पति की दिन भर की चिंताओं और झंझटों को दूर करने में समर्थ होता था। विवाह के समय जो वेद मंत्र पढ़े जाते थे, उनमें स्त्री के गृहिणी, माता और सहचरी के पदों का उल्लेख है। ये भाव पहले से ही वधू के मन पर अंकित कर दिये जाते थे, जिससे नये जीवन में प्रवेश करने के पहले वे अपनी जिम्मेदारियों को भली प्रकार समझ ले। विवाह स्त्री और पुरुष को एक आजीवन बन्धन में बाँध देता था।

प्राचीन भारत की स्त्रियाँ माता, गृहिणी आदि के उत्तरदायित्व का अच्छी तरह निर्वाह करती थीं। बालक के गर्भ में आते ही मातृत्व की जिम्मेदारियाँ शुरू हो जाती थीं। माता अपने दूध के साथ उत्तम-उत्तम आदर्शों का पान भी बालक को करा देती थीं। ध्रुव, प्रह्लाद, राम, कृष्ण आदि विभूतियों का बहुत कुछ गौरव उनकी बालपन में माता द्वारा शिक्षा को ही था। तारा, कौशल्या, मन्दोदरी, सीता, द्रौपदी आदि के गृहस्थ जीवन की सफलता का कारण गृहिणी के कर्तव्यों का वास्तविक रूप से पालन करना ही था। संयुक्त परिवार प्रथा में तो गृहिणी का उत्तर दायित्व और भी बढ़ जाता है। विद्याध्ययन आदि क्षेत्रों में भी प्राचीन स्त्रियों ने कम उन्नति नहीं की थी। वैदिक मंत्रों की रचियता, दार्शनिक, कवि, गणितज्ञ आदि के रूप में प्राचीन भारत की अनेकों स्त्रियों के नाम अभी तक अमर हैं। विश्ववारा आत्रेयी (ऋग. 5/28), अपाला आत्रेयी (ऋग. 8/80/91), घोषा काक्षीवती (ऋग. 10/39/40) सिकता निवावरीः यमी वैवस्वती आदि वैदिक ऋषि-महिलाओं के नाम आज भी ऋग्वेद में मौजूद हैं। दर्शन-शास्त्र के इतिहास में गार्गी व मैत्रेयी के नाम प्रसिद्ध हैं। शारीरिक शक्ति व वीरता के क्षेत्र में कैकेयी आदि ने गौरव प्राप्त किया था। सीता ने राम के साथ जंगल-जंगल में भटक कर पति प्रेम का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण उपस्थित किया। सावित्री, सीता, मन्दोदरी, द्रौपदी आदि सती महिलायें मानी गयी हैं।

भारतीय स्त्रियों में आज भी अपनी इन पूर्वज देवियों का कुछ प्रभाव पाया जाता है। इस गिरी हुई हालत में भी उनमें जो, तप, त्याग, प्रतिनिष्ठा आदि के भाव भरे हैं, वे अन्यत्र कहीं नहीं पाये जाते। स्त्रियों ने ही प्राचीन आदर्शों को बहुत कुछ सँभाल रखा है, यद्यपि पुरुषों के एक बड़े हिस्से ने उनको त्याग दिया है। यदि हम अपने कर्तव्यों का सच्चे भाव से पालन करने लगें तो भारतीय नारियाँ पुनः भारतीय-समाज को पुनः सर्वोच्च पद पर आसीन करा सकती हैं।


व्यक्तित्व और स्वास्थ्य

(सुश्री लीलारानी)

व्यक्तित्व एक ऐसा विषय है जिसकी ठीक-ठीक परिभाषा कर सकना बड़ा कठिन है। वैसे तो व्यक्तित्व का आशय अपने को जानना है, यह कार्य बड़ा कठिन है, क्योंकि आध्यात्मिक भाषा में अपने को जानना तब तक कदापि संभव नहीं जब तक हम ईश्वर को न जान लें।

पर साधारण भाषा में व्यक्तित्व का अर्थ वह प्रभाव है जो हम प्रायः दूसरों पर डाला करते हैं। कुछ लोग इसका अर्थ ऊपरी वेष भूषा, शारीरिक गठन और व्यवहार कुशलता से लेते हैं। यह सच है कि भारी भरकम और रौबीली आकृति के व्यक्ति अनेक लोगों पर शीघ्र प्रभाव डाल देते हैं। इसी प्रकार बढ़िया और उपयुक्त पोशाक तथा वेष भूषा वाले भी उसके द्वारा सर्व साधारण में प्रभाव जमा लेते हैं।

पर ये ऊपरी बातें व्यक्तित्व को बढ़ाने के साधन होते हुए भी उसकी मूल आधार नहीं मानी जा सकतीं। व्यक्तित्व आन्तरिक वस्तु है। जैसे हमारे मानसिक विचार और प्रवृत्तियाँ होंगी, वैसा ही प्रभाव हमारी बाहरी आकृति पर भी पड़ेगा। बड़े-बड़े महात्मा देखने में बिल्कुल साधारण आकृति के हुए हैं, कितने ही तो अंधे और अपाहिज भी हो गये हैं, पर उनके विचारों और आत्मा के आकर्षण से लोग सदैव उनकी तरफ खिंचे चले आते थे। महात्मा गाँधी इस युग के सबसे महान व्यक्ति हुए हैं, जिनका प्रभाव संसार के बड़े से बड़े वैभवशाली और विद्वान लोगों पर भी तुरन्त पड़ता था, पर वे न तो आकृति से रौबदार थे और वस्त्रों के नाम पर तो एक खद्दर की लँगोटी ही उनके शरीर पर रहती थी।

यों तो प्रकृति ने सभी मनुष्यों को उन्नति की ओर अग्रसर होने की क्षमता दी है और स्वभाव से उसे बली, वीर्यवान तथा शारीरिक सौंदर्य से युक्त बनाया है। जहाँ कमजोरी, बीमारी, विकृतता है, वहाँ खोज करने से पता चलेगा कि व्यक्तित्व के विकास में कोई बाधा अवश्य पड़ती है। शारीरिक, मानसिक, भौतिक और सामाजिक कुरीतियों के कारण व्यक्तित्व के स्वाभाविक विकास में बाधा पड़ जाती है और मनुष्य एक मशीन की तरह खाता, पीता, और शारीरिक या मानसिक मजदूरी करता हुआ समय से बहुत पहले ही जीवन-यात्रा को समाप्त कर देता है।

इस दृष्टि से व्यक्तित्व का बहुत कुछ सम्बन्ध उत्तम स्वास्थ्य से है। जिसका आन्तरिक और बाह्य स्वास्थ्य ठीक दशा में रहता है वह सदैव प्रसन्न रहता है। जीवन में निरन्तर उत्साह, आनन्द और संतोष की लहरें अनुभव करता रहता है। ऐसे मनुष्य की दूसरों से बड़ी जल्दी मित्रता हो जाती है और वे उसका आदर करते हैं। स्वच्छ वर्ण, चमकीली आँखें, लचकीली देह, सब तरह के कार्य करने की स्फूर्ति स्वास्थ्य के बाहरी लक्षण हैं। निष्कपट भाव, दृढ़ता, उल्लास आदि मानसिक लक्षण हैं जो बराबर व्यवहार में प्रकट होते रहते हैं।

स्वास्थ्य की कमी से व्यक्तित्व का भी अभाव हो जाता है। अनेक व्यक्ति बिना किसी रोग के स्वभाव से ही थके माँदे से रहते हैं और उनके चेहरे से उदासीनता टपका करती है। उनमें न तो उत्साह होता है, न शक्ति। जीवन के ऊँचे संवेगों का उन्हें परिचय नहीं होता और न वे सत्प्रेरणा को समझते है। ऐसे मनुष्यों के सब दिन एक समान होते हैं। भविष्य का सुख उनके लिये नहीं होता। ऐसे मनुष्यों का जीवन प्रायः निरर्थक और कभी-कभी निःसहाय हो जाता है।

निस्सन्देह व्यक्तित्व के विकास में उत्तम स्वास्थ्य का बड़ा हाथ रहता है। हम स्वयं अपने स्वामी हैं। अपने स्वास्थ्य को उत्तम रखना, प्रसन्नता से रहना, प्रभावशाली जीवन बिताना हमारे अपने ही हाथ में है। यदि हम इनसे वंचित रहते हैं तो यह हमारा दोष है।


समाज के उत्थान और पतन का उत्तरदायित्व ब्राह्मणों पर है।

(श्री रामकुमार शर्मा, कोटा)

महाभारत के शाँति पर्व (अध्याय 189) में महर्षि भारद्वाज ने भृगु ऋषि से पूछा-”हे द्विजोत्तम, ब्राह्मण कैसे होते हैं? क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कैसे होते हैं?” भृगु ने उत्तर दिया- “ब्राह्मण वही है जो यथा विधि सुसंस्कृत, पवित्र, वेदाध्ययन शील, सत्कर्मान्वित सदाचारी, विद्याव्यसनी, गुरुप्रिय, सत्य परायण हो। जिसमें सत्य, दान, अद्रोह (मैत्री), अक्रूरता, लज्जा, क्षमा, और तप है, वही ब्राह्मण है।” फिर शूद्र का लक्षण बतलाते हुये वे कहते हैं- “जो नित्य सब प्रकार की वस्तुएँ खाता है, जो अपवित्र है, जो सब तरह के कर्म करता है, जो वेद त्याग कर आचार हीन हो गया है, वही शूद्र है।” आगे चलकर महर्षि कहते हैं-”जन्म जात शूद्र यदि चरित्रवान और सुसंस्कृत हो तो वह शूद्र नहीं रहता और यदि उपर्युक्त लक्षण जन्मना ब्राह्मण में न हो तो वह ब्राह्मण नहीं रहता।”

इस प्रकार एक जमाना था जबकि हम ब्राह्मण मनुष्य-समाज में सर्वोपरि माने जाते थे। देवता तक हमारा मुँह ताकते थे और तीनों लोक में हमारी धाक जमी थी। हम आकाश में उड़ते थे, समुद्र के तल को छानते थे और पहाड़ों को भी हिला देते थे। समस्त संसार में हमारा आदर होता था और देश-विदेशों में हम गुरु मान कर पूजे जाते थे। हम अन्धकार में प्रकाश करते थे, सोते हुओं को जगाते थे, प्राणहीनों में जीवन डाल देते थे। हम बिगड़ों को बना देते थे, गिरे हुओं को उठाते थे, भूले हुओं को राह पर लाते थे। किसी भी धूर्त या चालाक व्यक्ति को हमारे आत्मबल के सामने पेश नहीं पड़ती थी। छोटे बड़े सभी लोग हमारी कृपा-कटाक्ष के लिए लालायित रहते थे।

पर ये सब गुजरे जमाने की बातें हैं। आज तो कोई इन पर विश्वास करने को भी तैयार नहीं। इतना ही नहीं इनका कहने वाला आज पागल समझा जायेगा। आज हमारा आचरण और रहन-सहन ऐसा बदल गया है कि हम स्वयं अपने को नहीं पहिचान सकते। लोग कहते हैं कि जमाना बदल गया है, दैव ही हम से रूठा है और इसीलिये हमारी ऐसी बुरी हालत हो रही। पर ये सब बातें मन को समझाने और अपने दोष पर पर्दा डालने वाली हैं, वास्तव में न दैव ही हमारे प्रतिकूल है और न हमारा भाग्य ही लौट गया है। हम जो कुछ भोग रहे हैं। वह सब हमारी करतूतों का ही परिणाम है। आज हमारे मुखिया कहलाने वालों की ही मति उल्टी नहीं हो गयी है, वरन् कर्मठ व्यक्ति भी उल्टे मार्ग पर चल रहे हैं। आजकल वीरता और साहस इसी में रह गया है कि अपने ही भाइयों की जड़ खोदी जाय, उन्हीं के साथ जूतम पैजार की जाय। हम अपने ही सगे-सम्बन्धियों का पेट काटकर अपना पेट भर रहे हैं, अपने पड़ोसियों का घर जलाकर अपने घर में रोशनी कर रहे हैं। धनवानों की तो बात ही मत पूछो, उनको अपना पेट भरने से ही फुरसत नहीं, चाहे उनके छोटे भाई भूखों मर जायें। संडे-मुसंडे डंडे के बल से भले ही माल वसूल कर लें, पर सीधे-सादे और भले आदमियों को वे किसी प्रकार की सहायता नहीं दे सकते।

यह तो सभी जानते हैं कि भारतवर्ष के पतन और उसकी दुर्दशा का कारण आपस की फूट ही रहा है। पर जब चारों वर्णों के नेता-सिरमौर-ब्राह्मणों में ही फूट घुस गयी तो फिर कल्याण की आशा कहाँ से की जा सकती थी। वास्तव में ब्राह्मणों में स्वार्थ-परता का भाव उत्पन्न हो जाने से ही देश को यह दिन देखना पड़ा। अन्यथा वे अगर अपने त्याग और तपस्या के व्रत पर कायम रहते तो हर तरह के विघ्न बाधाओं के होते हुए भी देश को नीचे गिरने से बचा सकते थे। अब भी यदि हम अपना और समाज का उत्थान करना चाहते हैं तो उसके लिए आत्म-बलिदान के प्राचीन भाव को ही जागृत करना पड़ेगा।


विचारों की अमोघ शक्ति और उसका सदुपयोग

(श्री एक जिज्ञासु)

संसार में उन्नति के अनेक मार्ग हैं। वर्तमान समय में लोगों ने भौतिक साधनों को ही सब प्रकार की उन्नति का मूल समझ लिया है। इन लोगों का ख्याल है कि पास में बहुत सा पैसा रहने से, अच्छा मकान, बढ़िया वस्त्र, स्वादिष्ट भोजन सामग्री, आज्ञाकारी नौकर चाकर होने से हम सुखी हो सकते हैं और किसी भी साँसारिक क्षेत्र में उन्नति कर सकते हैं। पर वे लोग यह विचार नहीं करते कि उन्नति और अवनति का वास्तविक आधार इन बाहरी चीजों में नहीं है वरन् हमारे मानसिक विचारों में है। मानसिक विचारों की रेखायें चाहे कैसी भी धुँधली क्यों न हों वे ही हमारे जीवन के व्यापारों का संचालन करती हैं। हमारे अन्तःकरण के संस्कार ही हमको ऊँचे चढ़ाते हैं, या पतन के गर्त में गिराते हैं। अपने आन्तरिक विचारों के प्रभाव से ही हम बाह्य जगत में शुभ या अशुभ परिस्थितियों के शिकार बनते हैं और तद्नुकूल दुख या सुख पाते हैं। हमारे विचार ही वास्तव में हमारे जीवन के निर्माणकर्ता हैं। फिर भी अनेक मनुष्य इस सचाई पर ध्यान न देकर दूसरे व्यक्ति को या दूसरे पदार्थों को दोषी ठहराते हैं। वे अपनी त्रुटियों और अभावों के कारण अपने अंदर खोजने के बजाय बाहर ही खोजते रहते हैं और दुनिया की अथवा भगवान की शिकायत करते रहते हैं। हम देखते हैं कि अनेक मनुष्य बड़े विद्वान और पंडित समझे जाते हैं, पर उनका मन किस क्षण क्या विचार करेगा, इसका उनको जरा भी ध्यान नहीं रहता। और न वे अपनी कही हुई बातों पर स्वयं चल सकने की सामर्थ्य रखते हैं। इसी प्रकार अनेक बड़े-बड़े धनवान हैं जिनके पास वैभव शाली व्यक्तियों के समान शान-शौकत और आराम के सब साधन हैं, पर वे प्रायः असंतुष्ट ही दिखलायी पड़ते हैं। इसके विपरीत ऐसे भी पुरुष हैं जिनको बहुत थोड़े साधन प्राप्त हैं पर वे चाहे जैसे प्रतिकूल वातावरण में रहें, चाहे कैसी प्रतिकूल परिस्थिति में पड़ जायें, कैसी भी अशाँति का संकट का सामना क्यों न करना पड़े, पर वे अपने विचारों को जरा भी दुर्बल नहीं पड़ने देते। अपनी आँतरिक सामर्थ्य के द्वारा वे अपने भीतर से प्रकाश उत्पन्न करते हैं और प्रकाश वाली स्थिति में रहते हैं। बाहर का वातावरण चाहे कैसा भी खराब या प्रतिकूल क्यों न हो, वे उस ओर निगाह भी नहीं डालते और निरंतर प्रसन्नता में ही रमते हैं।

इस प्रकार के पुरुषों ने अपने विचारों को ठीक मार्ग पर चलाने, उनको अवसर के अनुकूल बदल सकने की कुँजी प्राप्त कर ली है। इसके प्रभाव से दुख उनको स्पर्श भी नहीं कर सकता। इस प्रकार के मनुष्य दूसरों में भी विश्वास उत्पन्न कर देते हैं। वे पराजय से कभी नहीं डरते; निंदा, आलोचना, टीका-टिप्पणी से कभी कर्तव्यच्युत नहीं होते और न उत्तरदायित्व से भागते हैं।

यदि तुम जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहते हो तो उसके लिए सब से अधिक आवश्यक बात यह है कि अपनी स्वतंत्रता, अपने व्यक्तित्व, अपनी दृढ़ता का इस प्रकार विकास करो कि लोगों के बीच रहते हुए तुम अपने अस्तित्व का अन्त न कर दो, किन्तु अविचलित होकर अपने विचारों पर स्थिर रहो। दूसरे मनुष्य तुम्हारी गुत्थियों को नहीं सुलझा सकते, तुम्हारे प्रश्नों का निर्णय नहीं कर सकते, तुम्हारे ध्येय का निश्चय नहीं कर सकते। अपनी समस्याओं को तुम स्वयं ही हल कर सकते हो, तुम्हारे सुख, सफलता, कल्याण, सब का आधार तुम्हारे विचारों के बल पर निर्भर है। विचारों का बल ही तुम्हारी आँतरिक शक्ति का आधार है। अगर तुम दृढ़ विचार और निश्चय वाले न होगे तो तुम्हारी जीवन-नौका अपने लक्ष्य पर पहुँचने के बजाय लहरों में इधर-उधर डोलती रहेगी।

विचारों का प्रभाव केवल हमारे मस्तिष्क अथवा हृदय में ही सीमित नहीं रहता, वरन् शरीर के प्रत्येक हिस्से, एक-एक अणु में उनका असर काम करता है। वर्तमान समय के कितने ही शरीर शास्त्रियों ने खोज करके निर्णय किया है कि जो भूरे रंग का पदार्थ मस्तिष्क में है, वही अँगुली के एक पोरवा तक में भी पाया जाता है। इससे हम यह निर्णय कर सकते हैं कि हमारा दिमाग ही नहीं वरन् सारा शरीर ही विचारों के निर्माण में अप्रत्यक्ष भाग लेता है।

जिस प्रकार शक्तिशाली, ऊर्ध्वगामी विचारों से मनुष्य बलवान, प्रगतिशील, प्रभाव युक्त बनता है उसी प्रकार विरोधी विचारों से मनुष्य की दशा एक दम बिगड़ जाती है, वह बीमार पड़ जाता है, मर तक जाता है। आप लोगों ने भूत-प्रेतों के ऐसे किस्से अवश्य सुने होंगे जिनमें कितने ही हट्टे-कट्टे व्यक्ति सिर्फ काल्पनिक भय सामने आने से कुछ मिनटों में ही मर गये। यह विचारों की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मानस शास्त्र का यह निश्चित सिद्धाँत है कि जिस वस्तु का निरंतर ध्यान किया जाता है वह प्रत्यक्ष में भी दिखलाई देती है। तुम जिस अच्छी या बुरी स्थिति का सदैव चिन्तन करते रहोगे, वह एक दिन तुम्हारे सामने अवश्य आयेगी। एक नवयुवक जो सब तरह मजबूत था और जिसे किसी प्रकार का रोग न था, किसी भ्रम वश यह समझने लग गया कि मैं अधिक समय नहीं जी सकता। उसकी यह धारणा ऐसी पक्की हो गई कि वह रात दिन इसी मृत्यु के विचार में डूबा रहता और वास्तव में कुछ ही महीनों में वह मर गया। जो व्यक्ति सारे दिन दुःख, शोक, असहायता के विचारों में ही लगे रहते हैं और दुःखमय स्थिति का ही चिंतन किया करते हैं, वे दीन, दुखी और दरिद्रावस्था को प्राप्त होकर बड़ी बुरी दशा में अपने जीवन का अन्त करते हैं।

इस प्रकार अनिष्टकारी विचार दूसरों के द्वारा भी हमारे मन में उत्पन्न किये जा सकते हैं। जब किसी व्यक्ति से कुछ अधिक समय बाद मिलने पर उसके मित्र या सम्बंधी यह कहते हैं कि तुम तो बड़े कमजोर या बीमार से दिखायी पड़ते हो तो अनेक निर्बल विचारों के व्यक्तियों पर उसका बुरा प्रभाव पड़ता है। कल्पना शक्ति के प्रभाव का एक उदाहरण लंदन मेडिकल जर्नल में छपा था कि इंग्लैण्ड के एक नगर के किसी रईस ने एक दिन डॉक्टर को बुलाकर अपनी शारीरिक अवस्था की जाँच करने को कहा। उसने बतलाया कि मुझे आजकल बड़ी घबराहट और बेचैनी रहती है और जरा सा काम करने में मैं बेहद थकान का अनुभव करने लगता हूँ। डॉक्टर उसकी जाँच करके चला गया और कह गया कि मैं रोग का सब वृत्तांत और चिकित्सा कल लिखकर भेज दूँगा। दूसरे दिन जब डॉक्टर का पत्र आया तो उसमें लिखा था, तुम्हारा बायाँ फेफड़ा बिल्कुल नष्ट हो गया है, तुम्हारे हृदय की शक्ति क्षीण हो गयी है। तुम्हारा जीवन कुछ ही सप्ताह का है, इस लिये अपने घर की जो कुछ व्यवस्था तुम करना चाहते हो शीघ्र कर डालो। इन शब्दों को पढ़कर रईस ऐसा घबड़ा गया कि उसके शरीर से पसीना छूटने लगा, उसका सर्वांग शिथिल हो गया, श्वाँस लेने में तकलीफ होने लगी और वह एक दम मरणासन्न सा होकर बिस्तर पर पड़ गया। नौकर उसकी ऐसी बुरी हालत देखकर डॉक्टर के पास दौड़ा गया। डॉक्टर ने आकर देखा कि वह बोल भी नहीं सकता और छाती की तरफ अँगुली से इशारा कर रहा है। डॉक्टर को भी एकाएक उसकी दशा में ऐसा परिवर्तन देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। पर उसी समय उसकी निगाह पलंग के पास पड़े पत्र पर पड़ी और उसे पढ़ते ही वह सारा रहस्य और साथ ही अपनी भयंकर भूल को समझ गया। वास्तव में वह पत्र उसने एक दूसरे मरीज के लिए लिखा था, जिसकी हालत बहुत शोचनीय थी। पर गलती से उसने उस रईस के लिफाफे में रख दिया। जब डॉक्टर ने उसे अपनी गलती बतलाई और रईस को उसके नीरोग होने का विश्वास दिलाया तब कहीं जाकर वह बिस्तर से उठा और थोड़ी देर बाद उसकी हालत ठीक हो गयी।

इस उदाहरण से स्पष्ट जान पड़ता है कि विचारों की शक्ति बहुत बड़ी होती है और उसके द्वारा हम अपनी भलाई या बुराई दोनों ही बहुत अधिक परिमाण में कर सकते हैं। इसलिये विचारों को वशीभूत रखना और ऊर्ध्वगामी बनाये रखना ही हमारा कर्तव्य है।

हम पर जो दुख आते हैं, वे हमारे ही पसंद किये होते हैं। वे हमारे कर्मों के फल हैं। वे हमारे स्वभाव के ही अंग हैं। साठ साल तक जेल में रहने के बाद जब एक चीन निवासी को, नये बादशाह के राज्याभिषेक के उपलक्ष में जेल से छोड़ दिया गया तो वह चिल्ला उठा-अब मैं कहाँ जाऊँ? मैं तो कहीं नहीं जा सकता। मुझे तो उसी भयानक अँधेरी कोठरी में चूहों के पास जाने दो। मैं यह उजाला नहीं सह सकता। और उसने प्रार्थना की कि या तो मुझे मार डालो या फिर मुझे जेल में ही भेज दो। उसकी प्रार्थना के अनुसार वह फिर जेल में बंद कर दिया। सब मनुष्य की हालत ठीक ऐसी ही है। चाहे कोई भी दुख हो, उसे पकड़ने के लिए हम जी तोड़कर दौड़ लगाते हैं और उससे छुटकारा पाने के लिए बिल्कुल रजामन्द नहीं होते।

(स्वामी विवेकानंद)


मनुष्य अपने भाग्य का आप ही मालिक है।

(श्री गोपाल दामोदर तामसकर)

भारतवर्ष में आप कहीं भी चले जायें और कैसे भी लोगों में पहुँच जायें आपको भाग्य की बात अवश्य सुनाई पड़ेगी। ‘भाग्य में बदा है वही होगा’-’दाने-दाने पर मुहर है’-ऐसी अनेकों उक्तियाँ आप को छोटे-बड़े लोगों के मुख से सुनने को मिल सकती हैं। पर क्या यह भाग्य की सर्वशक्तिमानता पूर्णतया सत्य है? क्या हमारे प्रयत्नों से कुछ नहीं हो सकता? क्या प्रत्येक व्यक्ति का और प्रत्येक राष्ट्र का प्रारब्ध हमेशा के लिए बन गया है?

उपर्युक्त प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमको मनुष्य के मन के विश्वास पर दृष्टि डालना आवश्यक है। पहले पहल नवजात शिशु प्रकृति के अधीन रहता है। प्राकृतिक नियमानुसार उसे जो कुछ प्रेरणा होती है उसी प्रकार उसका आचरण रहता है। भूख लगने से कष्ट होने के कारण वह रोता है। पहले-पहल स्तन मुँह में डालते ही वह दूध पीने नहीं लगता, उसे कुछ सिखलाना पड़ता है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि वह समझ-बूझ कर ऐसा करता है। यह एक भीतरी प्रवृत्ति (अन्तः प्रवृत्ति) का कार्य है-विचार की क्रिया उसमें कुछ नहीं होती। जो कुछ प्रेरणा होती है वह सब प्राकृतिक रहती है। बालक की निजी प्रेरणा कुछ भी नहीं होती। पर बार-बार के अनुभव से वह ज्ञान प्राप्त कर लेता है और स्तन के पीने से उसकी भूख मिटेगी इसे समझ लेता है। इसी प्रकार आस-पास की अनेक वस्तुओं के अनुभव से उसका ज्ञान-भण्डार बढ़ता रहता है। इसी ज्ञान से हमारे भीतर एक प्रेरणा शक्ति बढ़ने लगती है और उसी के द्वारा हम सब प्रकार के कार्य करने में समर्थ होते हैं।

पर इस आधार पर यह कहना कि मनुष्य में केवल प्रकृतिजन्य अथवा परिस्थितिजन्य ज्ञान ही पाया जाता है और उसमें स्वतंत्र प्रेरणा शक्ति बिल्कुल नहीं होती, ठीक नहीं है। यदि ऐसा होता तो बहुधा समान परिस्थिति में रहकर दो बालकों या दो सगे भाइयों में ज्ञान और नीति का बहुत अधिक भेद क्यों हो जाता? एक मनुष्य प्रतिकूल परिस्थिति में पैदा होने पर भी विद्वान हो जाता है; और दूसरा पढ़ने-लिखने की समस्त अनुकूल परिस्थिति रहने पर भी मूर्ख बना रहता है। क्या यह परिस्थिति अथवा प्राकृतिक रूप से ही होता है? बहुत से मनुष्य एक मनुष्य को भी काबू नहीं रख सकते, पर कितने ही मनुष्य विद्या न रहने पर भी सैंकड़ों को अधिकार में रख सकते हैं। इस प्रकार के प्रश्नों पर विचार करने से यह मानना पड़ता है कि मनुष्य में स्वतंत्र प्रेरणा शक्ति, इच्छा शक्ति या आत्म प्रवृत्ति भी होती है जिसके द्वारा वह प्राकृतिक वातावरण पर विजय पाकर विशेष कार्य करके दिखला सकता है।

इसी समस्या पर जब हम अध्यात्म दृष्टि से विचार करते हैं तो प्रत्येक धर्म के उपदेशों का यही सार मालूम पड़ता है कि इस दृश्य जगत के परे जो अनन्त-तत्व है उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करो। आप चाहे किसी भी मजहब के अनुयायी हों, आपको इतना तो अवश्य मानना होगा कि हमको कोई उच्च स्थिति प्राप्त करनी है। अब यह उच्च स्थिति कैसे प्राप्त हो? क्या परमेश्वर कुछ मनुष्यों पर दया करके सब कुछ देता है और कुछ के प्रति क्रूर बन जाता है? ऐसा कहना तो परमेश्वर को हीन बनाना है। इसलिये यही मानना पड़ेगा कि हमारे कर्म ही हमको सुख-दुख देते हैं। इसलिये यह सिद्धाँत सर्वत्र माना जाता है कि जो कुछ करोगे वैसा पाओगे-जैसा बोओगे वैसा काटोगे। अर्थात् कर्म करना हमारे अधिकार में अवश्य है। यदि कर्मों के करने में तुम्हारी स्वतंत्र प्रवृत्ति नहीं है, तो कर्म भी तुम्हारा नहीं होगा और कर्म तुम्हारा नहीं है तो उसका फल भी तुम्हारा न होगा। ऐसी दशा में किसी की सद्गति या बुरी गति का कोई प्रश्न हो नहीं सकता। इस दृष्टि से स्वतंत्र आत्म-प्रवृत्ति के न मानने से सभी धर्मों के अध्यात्म शास्त्र निकम्मे हो जायेंगे। अगर सदाचरण द्वारा सद्गति का सिद्धाँत मानना है तो आत्म प्रवृत्ति, स्वतन्त्र प्रेरणा, स्वतन्त्र इच्छा शक्ति आदि का अस्तित्व स्वीकार करना ही पड़ेगा।

दुनिया की ओर देखने से भी यही प्रतीत होता है कि लोग अपने प्रयत्नों द्वारा उन्नति करते जा रहे हैं। प्रकृति के नियमों को समझ कर, उनका ज्ञान प्राप्त करके, उसे अपने काबू में कैसे ला सकेंगे, सभी भौतिक शास्त्र इसी उद्देश्य की पूर्ति में लगे हैं। हम सर्वथा प्रकृति के इशारे पर नहीं चलते। जिधर भाग्य ले जाय उधर ही जाने को सभी लोग तैयार नहीं रहते। हम अपनी ओर से सब प्रकार के प्रयत्न किया ही करते हैं। इस प्रकार हम अपने आचरण में आत्म-स्वातन्त्र्य का अस्तित्व अवश्य मानते आये हैं, इसमें त्रुटि इतनी ही जान पड़ती है किसी कारण वश हम उसका उपयोग नहीं करते। समाज में आलसी, निकम्मे और भाग्यवादी मनुष्य भी बहुत बड़ी संख्या में मौजूद हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अपना उद्धार वे स्वयं ही कर सकते हैं। साधारण व्यवहार में कोई उन्हें दोषी न कहे, पर तात्विक दृष्टि से वे अपने कर्मों के कारण दोषी अवश्य हैं। प्रकृति के अधीन हो जाना और प्रयत्न से मुख मोड़ लेना कभी योग्य नहीं समझा जा सकता।

जब कोई भयंकर परिस्थिति हमारे सामने होती है, अथवा जीवन भर इस सृष्टि की अंधकारमय बातें ही दिखलाई पड़ती हैं तो मामूली लोग अपना साहस खो बैठते हैं, और उस परिस्थिति की तरफ से आँखें फेर लेते हैं। अथवा वे रात दिन निराश रहते और भय का अनुभव करते रहते हैं। ऐसी परिस्थिति में अपनी रक्षा या परिस्थिति को बदलने के लिए जो प्रयत्न करना चाहिए वह उनके साहस से परे है। पर वीर या सत्साहसी लोगों का मार्ग अलग होता है। उन्हें जो बातें अग्राह्य, इच्छा के विपरीत या हानिकारक जान पड़ती हैं, उनसे वे तनिक भी भयभीत नहीं होते और अपने निश्चित कार्यक्रम पर ज्यों के त्यों डटे रहते हैं। संसार ऐसे मनुष्यों की पूजा और चाह करता है वे ऐसी कठिन परिस्थितियों में भी मन को शाँत और स्थिर रखने का जो प्रयास करते हैं, उसी से उनके कार्य और महत्व को नापा जाता है। ऐसा आदमी अपने मार्ग में आने वाली इन भयंकर बाधाओं को भूलने अथवा उनकी तरफ से निगाह हटा लेने का प्रयत्न नहीं करता वरन् वह उनका सामना करता है। इस प्रकार वह प्रकृति या भाग्य के अधीन हो जाने के बजाए जीवन पर प्रभुत्व पा लेता है। तब वह इस दुनिया में सम्मान की निगाह से देखा जाने लगता है और अन्य लोग उससे कुछ शिक्षा ग्रहण करने लगते हैं पर जिन्हें अपने जीवन को खतरे में डालने से डर लगता है अथवा जो खतरे की बातों का विचार नहीं कर सकते, उनसे कोई कुछ आशा नहीं रखता और न कोई उनकी परवाह करता है। हम लोगों के जीवन के व्यवहार के लिए खतरा उठाने की आवश्यकता तो ज्यादा नहीं, पर धर्म के लिए खतरे में पड़ने का अवसर प्रायः आ जाता है। जिस प्रकार दूसरे की हिम्मत देखकर हममें हिम्मत आती है उसी प्रकार दूसरे की श्रद्धा देखकर हममें श्रद्धा उत्पन्न होती है।

साराँश यह कि प्रयत्न करने से आत्म-प्रवृत्ति इतनी बढ़ सकती है, कि मनुष्य अपने जीवन का सुधार करके दूसरे के जीवन का भी सुधार कर सकता है। आत्म-प्रवृत्ति अथवा स्वतंत्र प्रेरणा शक्ति के बिना हमारा उन्नति के शिखर पर चढ़ सकना असंभव है। केवल ज्ञान से सफलता नहीं मिल सकती, पर उसके साथ आत्म-प्रवृत्ति अथवा कर्म का भी सहयोग होना आवश्यक है।


जीवन का उद्देश्य कैसे सफल हो?

(श्री आर. एस. मिश्रा)

प्रत्येक व्यक्ति संसार में आकर सफलता और सुयश की अभिलाषा किया करता है। अन्यथा जो लोग किसी प्रकार पेट भर कर जीवन के दिन पूरे कर लेते हैं उनमें और पशु, पक्षियों के जीवन में कोई विशेष अंतर नहीं समझा जाता। पर जीवन की सफलता तब तक सम्भव नहीं जब तक हम अपना एक विशेष उद्देश्य न बना लें और उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ व्यावहारिक सिद्धाँत निश्चित न कर लें।

प्राचीन और अर्वाचीन विद्वानों ने मानवीय अभिलाषाओं पर विचार करके उनकी सफलता के लिए पाँच बातें आवश्यक बतलाई हैं-(1) सुस्पष्ट आदर्श (2) दृढ़ अभिलाषा (3) विश्वासप्रद आशायें (4)अटल संकल्प (5)संतुलित क्षतिपूर्ति।

इन पाँचों भावनाओं की यदि हम सर्व साधारण के समझने योग्य व्याख्या करना चाहें तो हम कहेंगे कि यदि तुम किसी खास लक्ष्य तक पहुँचना चाहते हो तो (1) तुम्हें इस बात का ठीक-ठाक ज्ञान होना चाहिए कि तुम्हारी इच्छा का यथार्थ रूप क्या है? (2) तुम्हारी इच्छा हार्दिक हो और उसे पूरा करने के लिए तुम्हारे हृदय में सच्ची लगन हो। (3) तुम्हारे अन्तर में यह विश्वास और आशा भी हो कि वह इच्छा अवश्य पूरी हो जायेगी (4)तुम्हारा संकल्प पक्का हो जिससे तुम सदैव उसके लिए प्रयत्न करते रहो। (5)यदि आवश्यकता पड़े तो उसे प्राप्त करने के लिए तुम उसका मूल्य चुकाने-किसी प्रकार का त्याग करने को भी तैयार हो।

सुस्पष्ट आदर्श का अर्थ अपनी भावनाओं का यथार्थ रूप में व्यक्त होना है। तुम्हारे आदर्श की मूर्ति तुम्हारे दिमाग में, मन में साफ-साफ मौजूद हो। ऐसा सुस्पष्ट, आदर्श उसी समय प्राप्त हो सकता है जब कि लक्ष्य, आदर्श, उद्देश्य, उसका प्रारम्भ, विकास और प्राप्ति अपनी आशाओं, आकाँक्षाओं और अभिलाषाओं आदि सभी बातों की सुनिश्चित रूप-रेखा तुम्हारे सामने मौजूद हो। तुम्हारे मानसिक नेत्रों के सामने तुम्हारा लक्ष्य अथवा ध्येय ऐसे स्थूल रूप में दिखायी पड़ता हो कि अपनी कल्पना के हाथों से उसे छू सको। उसकी एक-एक भाव-भंगिमा, उसकी एक-एक रेखा तुम्हारे नेत्रों को सजीव दिखलाई पड़ती हो। जितना ही तुम्हारा आदर्श का ज्ञान यथार्थ होगा, जितने ही उज्ज्वल रूप से तुम्हारी भावनायें मूर्तिवती होंगी उतना ही तुम्हारी कार्य-प्रणाली भी शक्तिशाली होगी और उतने ही वेग से तुम उसकी सफलता के लिए अपनी समस्त शक्तियों को केन्द्रित कर सकोगे।

सुस्पष्ट आदर्श का हम जितना भी महत्व समझें वह कम ही है। क्योंकि अगर उपर्युक्त चार बातों में से शेष चार को पूरा कर भी लें, पर हमारा लक्ष्य अथवा ध्येय ही हमारे सामने स्पष्ट नहीं है तो हम कभी सफलता के दर्शन नहीं कर सकते। कितने ही लोग जो जन्म भर बड़े-बड़े उद्योग, प्रयत्न करते रहते हैं, लक्ष्य के अस्पष्ट या अस्थिर होने के कारण कुछ नहीं कर पाते। ऐसा व्यक्ति उस मनुष्य के समान है जो अपने निर्दिष्ट स्थान, उसके मार्ग और यात्रा के विवरण की जानकारी किये बिना ही यात्रा आरम्भ कर देता है। वह नहीं जानता कि किधर जा रहा है, पर मन में सोचता है कि मैं अपने गन्तव्य स्थान की ओर जा रहा हूँ। या वह ऐसे मनुष्य के समान है जो बिना निशाना लगाये ही बन्दूक छोड़ देता है और फिर भी आशा करता है कि गोली लक्ष्य पर लग ही जायेगी। या वह ऐसे मनुष्य के समान है जो मकान का ढाँचा बनवाना आरम्भ कर देता है बिना यह सोचे समझे कि उस मकान में कितने कमरे होंगे और उसकी लम्बाई-चौड़ाई क्या होगी?

अब तक मनुष्यों ने उसी वस्तु को पाने में सफलता पाई है जिसका यथार्थ चित्र उसके दिमाग में अंकित हो चुका है। हर एक कार्य जिसके करने में मनुष्य सफल हुआ है, वही होता है जो पहले उसके मानस-पट पर प्रत्यक्ष हो चुका होता है और इस प्रत्यक्षीकरण से उसकी इच्छा शक्ति को प्रोत्साहन मिला है। जितने उज्ज्वलतर रूप में वह अपने कार्य को अपने भीतरी नेत्रों के सामने मूर्तिमान करता है, उतना ही शक्तिमान और स्थायी उसका कार्य होता है। जो मनुष्य अपनी अभिलाषाओं के शिखर पर चढ़ना चाहता है, उसके लिये केवल यही आवश्यक नहीं है कि उसके सामने एक उत्तम आदर्श हो वरन् यह भी अनिवार्य है कि वह आदर्श सुस्पष्ट रूप से प्रत्यक्ष भी हो। उसके सामने एक अस्पष्ट-सा विचार भर न हो जिसे वह वास्तविकता में परिवर्तित करना चाहता है। वरन् उसके सामने वे सुस्पष्ट भाव और विवरण हों जिनका वह स्थूल रूप से प्रकटीकरण चाहता है।

बहुत से मनुष्य सुस्पष्ट आदर्श की योजना अपने सम्मुख रखने में असमर्थ होते हैं, क्योंकि उनके मन में तरह-तरह की परस्पर-विरोधी इच्छायें संघर्ष किया करती हैं। वे मनुष्य, जो आज एक वस्तु की कामना करते हैं और कल दूसरी की, संभवतः दोनों में से एक भी नहीं पाते। उनके हृदय में इतनी अधिक इच्छायें होती हैं कि वे स्वयं निश्चित नहीं कर पाते कि वे किस वस्तु की कामना सबसे अधिक करते हैं। इस लिए उनके सामने कभी अपने आदर्श की सुस्पष्ट रूपरेखा नहीं आ पाती, जो प्रत्येक वस्तु की प्राप्ति के लिए पहली आवश्यक शर्त है।

दृढ़ अभिलाषा का अर्थ किसी भी कार्य में दृढ़ रूप से लगातार डटे रहना है। दृढ़तापूर्वक लगातार प्रयत्न करते रहने से समस्त आशायें, अभिलाषायें, इच्छायें, कामनायें-सभी की पूर्ति होती है और हृदय को भी संतोष होता है। अभिलाषा इतनी तीव्र होनी चाहिए कि जैसे मरमुख मनुष्य खाने को दौड़ता है, या जैसे प्यासा मनुष्य पानी के लिए लालायित रहता है, या जैसे पानी में डूबता मनुष्य वायु के लिए व्याकुल रहता है, या माँ अपने बच्चे की कुशल के लिए आकुल होती है। जब तुम्हारी इच्छा इतनी तीव्र होगी, तभी दृढ़ अभिलाषा का तुम्हारे मन में उदय होगा।

बहुत कम लोग जानते हैं कि बलवती कामना क्या वस्तु है। वे चाहे अपने मन में समझते हों और कहते भी हों कि उन्हें बलवती कामना है, पर वास्तव में उनकी कामना में तनिक भी बल नहीं होता। अभी उन्होंने उतनी तीव्रता से कामना करना नहीं सीखा है जैसा कि भूख की भीषण ज्वाला या पानी के लिये तड़पने वाले में होती है। कामना की यह तीव्रता ऐसे वेग से मानव में जागृत होती है कि उसकी तृप्ति के बिना वह रह ही नहीं सकता। ऐसे व्यक्तियों की अभिलाषाओं की अग्नि तीव्रता से जलती है और उसकी आहुति के लिए वे कहीं से भी सामग्री प्राप्त कर लेते हैं। जो कोई इस तीव्र ज्वाला का अवरोध करता है वह इस अग्नि के लिए समिधा बन जाता है या कम से झुलस तो जाता ही है। जिस व्यक्ति की ऐसी दृढ़ अभिलाषा होती है उसकी संकल्प शक्ति भी बड़ी प्रबल होती है, जिसके सम्मुख कोई कार्य असंभव नहीं रहता। उसमें आशा और विश्वास का भाव भी हद दर्जे का होता है क्योंकि वह यह कल्पना ही नहीं कर सकता कि उसकी कामना अपूर्ण रह जायेगी। ऐसी बलवती कामना और दृढ़ विश्वास एक मूलभूत एक आदिम शक्ति है, जिसके द्वारा ही आज तक सब बड़े-बड़े कार्य सम्पन्न किये गये हैं। यह सत्य है कि ऐसी बलवती कामना वाले व्यक्ति प्रायः महत्वाकाँक्षी होते हैं और उनके कारण प्रायः संसार में महान संग्राम और विप्लवों की उत्पत्ति हुई है, पर श्रेष्ठ कार्यों के लिये, परोपकार के लिये, कष्टों से पीड़ित जन समुदाय के उद्धार के लिये भी बलवती कामना की आवश्यकता है। आज तक जितने संसार के उद्धारक, समाज सुधारक, दूसरों का हित करने वाले हुए हैं, उन सभी में श्रेष्ठ कामना की तीव्र अग्नि मौजूद थी और उसी के प्रभाव से वे प्रलोभनों पर विजय प्राप्त करके अपना नाम अमर कर गये। इसलिए स्वार्थ या परमार्थ का कोई भी महान कार्य आप सम्पन्न करना चाहें उसके लिये सुस्पष्ट आदर्श, दृढ़ अभिलाषा और आँतरिक विश्वास का होना अनिवार्य है।


जनसंख्या की समस्या और वैदिक समाज

(श्री रघुनन्दन जी शर्मा)

वर्तमान समय में संसार के सामने एक बहुत बड़ी समस्या जन-संख्या की है। प्राचीन काल की अपेक्षा शाँति का विस्तार होने, नवीन आविष्कारों द्वारा अनेक संहारक महामारियों का उच्छेद कर देने और रहन-सहन की सुविधाओं के बढ़ जाने से संसार की जन संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है और सौ वर्ष के भीतर ही लगभग दुगुनी हो गयी है। संसार के बड़े-बड़े विचारक इस अवस्था को देखकर चिंतित होते हैं और कहते हैं कि यदि जन संख्या की वृद्धि की ऐसी ही गति बनी रहेगी तो लोगों को शीघ्र ही रहने और खाने-पीने का ठिकाना नहीं रहेगा। इस लिये अनेक वर्षों से विद्वान लोग जन-संख्या को नियंत्रण में रखने की विधियाँ निकाल रहे हैं, पर अभी तक कोई सफल सिद्ध नहीं हुई है।

भारतीय विचारकों ने प्राचीन समय में ही इस समस्या पर विचार किया था। उनका मत था कि संतानोत्पत्ति का कोई एक स्थायी नियम नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि राष्ट्र की परिस्थितियाँ और आवश्यकताएँ समय-समय पर बदला करती हैं और उन्हीं के अनुकूल आचरण समाज को करना आवश्यक होता है। जिस समय समाज और राष्ट्र में शाँति रहती है उस समय मोक्षमार्मियों के अतिरिक्त शेष समस्त समाज को मृत्यु के परिणाम से संतानोत्पत्ति की आवश्यकता रहती है। परन्तु जिस समय युद्ध जारी हो जाता है अथवा समाप्त हो जाता है तो बहु संख्यक कार्यक्षम पुरुषों के मारे जाने से संतान की आवश्यकता बेहद बढ़ जाती है। इसी तरह जिस समय सुख-शाँति के कारण जन संख्या अधिक बढ़ जाती है उस समय संतान कम पैदा करने की आवश्यकता हो जाती है। ऐसी दशा में इच्छानुसार अधिक संतान उत्पन्न करने, या कम संतान करने, या बिल्कुल ही संतान बंद कर देने की शक्ति उसी जाति या व्यक्ति में हो सकती है जिसकी शिक्षा की दीवार अखण्ड-ब्रह्मचर्य व्रत की नींव पर उठाई गई हो। आर्यों ने अपनी इमारत की दीवार अखण्ड ब्रह्मचर्य पर ही खड़ी की थी। वैदिक सभ्यता के अनुसार ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के पिचहत्तर वर्ष तो अखण्ड ब्रह्मचर्य की अवस्था में बिताने का विधान किया ही गया था। गृहस्थ आश्रम के शेष 25 वर्षों में भी अधिक रति से बचने के लिए यज्ञोपवीत संस्कार के संस्कार के समय से ही सन्ध्योपासन, प्राणायाम, शृंगार वर्जन, सादगी, तपस्वी जीवन और मोक्षमार्ग का ध्येय बतलाकर अमोघ वीर्य होने का उपदेश दिया गया है। क्योंकि संतति निरोध की शक्ति अमोघ वीर्य पुरुष में ही हो सकती है और वही आवश्यकतानुसार एक, दो अथवा दस संतान उत्पन्न करना एक दम बन्द भी कर सकता है। आर्य-सभ्यता के इतिहास में इस प्रकार प्रजा को उत्पन्न करने के तीन सिद्धान्त हैं और तीनों के ही प्रमाण मिलते हैं।

पहिला प्रमाण उन व्यक्तियों का मिलता है जो जन्म से ही आत्मज्ञान की ओर झुके रहते हैं और मोक्ष साधन में लग जाते हैं। वे कभी संतान की इच्छा नहीं करते। बृहदारण्यक उपनिषद् में लिखा है कि “पूर्व विद्वानाँ प्रजा न कामयन्ते कि प्रजया करिष्यामः अर्थात्-पहले समय के विद्वान संतान की कामना नहीं करते थे, वे कहते थे कि प्रजा को बढ़ा कर क्या करेंगे?” ऐसे आजीवन ब्रह्मचारी इस देश में हजारों, लाखों हो चुके हैं। मनुस्मृति में लिखा है :-

अनेकानि सहस्राणि कुमार ब्रह्मचारिणाम। दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुल सन्ततिम॥

अर्थात्-हजारों ब्राह्मण ब्रह्मचारी बिना संतति के कुमार अवस्था से ही मोक्षगामी हो गये। इससे यही नहीं मान लेना चाहिए कि पूर्व काल में पुरुष ही इस तरह से ब्रह्मचर्य से रहते थे, प्रत्युत उस समय कन्याएँ भी कुमारी रह कर और आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करके मोक्ष गामिनी होती थीं। महाभारत में लोमश ऋषि युधिष्ठिर से कहते हैं-

“इसी स्थान पर शाँडिल्य ऋषि की कन्या घृतिवती ने आजन्म ब्रह्मचारिणी रहकर और विद्वानों से आदर पाकर मोक्ष लाभ किया था। (शल्य पर्व अ. 54) वहीं पर अध्याय 49 में भी लिखा है कि भारद्वाज की पुत्री श्रुतावती ने भी आजन्म ब्रह्मचर्य व्रत पालन किया था।” इतना ही नहीं याज्ञवलक्य और मैत्रेयी ने विवाह करके भी संतान उत्पन्न नहीं की। इसलिये जो लोग विवाह के समय वधू को दश पुत्र होने का आशीर्वाद सुनकर यह समझते हैं कि प्राचीन आर्य संतान के पीछे दीवाने दीवाने फिरते थे, वे गलती पर हैं। वेदों में तो स्पष्ट कह दिया गया है कि ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत अर्थात् तपस्वी विद्वान आजीवन ब्रह्मचर्य-बल से ही मृत्यु को मारकर मोक्ष प्राप्त करते हैं। परन्तु यह महाव्रत सब के वश का नहीं है। साधारण मनुष्य तो संतान की इच्छा करते ही हैं। इन प्रमाणों के अनुसार सन्तान उत्पन्न करने से दो प्रकार के लाभ हैं। एक तो संतान से गृहस्थाश्रम कायम रहता है जिसके आधार पर समस्त मनुष्य समाज जीविका प्राप्त करता है। दूसरा लाभ यह है कि वीर्य में पड़े हुए जीव बाहर आकर आत्मोन्नति का अवसर पाते हैं। इस लिये यह आवश्यक है कि योग्य पुरुष एक-दो सन्तान अवश्य उत्पन्न करे, और शिक्षा-दीक्षा द्वारा उनको सुयोग्य नागरिक बनाकर समाज के ऋण से उऋण हों। इसलिए साधारण समय में धर्म शास्त्रों में आर्यों को एक ही पुत्र उत्पन्न करना श्रेष्ठ बतलाया है। मनुस्मृति (9-106 व 107) में कहा गया है-

ज्येष्ठेन जातमात्रेण पुत्री भवति मानवः। स एव धर्मजः पुत्रः कामजानितरान्विदुः ॥

अर्थात् “प्रथम पुत्र के उत्पन्न होते ही मनुष्य पुत्र वाला हो जाता है, अतः ज्येष्ठ पुत्र ही धर्मज है और दूसरे सब कामज हैं। वेद भी आज्ञा देते हैं कि मनुष्य को बहुत संतान उत्पन्न नहीं करना चाहिए। ऋग्वेद (1-164-32)में लिखा है कि बहुप्रजा निऋतिका विशेष अर्थात् बहुत संतान वालों को बहुत दुःख उठाना पड़ता है।”

किंतु कभी-कभी आवश्यकता पड़ने पर अनेक संतानों के उत्पन्न करने की आवश्यकता पड़ती है, इस लिये तीसरे प्रकार का विधान भी बनाया गया है। दीर्घकालीन युद्धों के समय अथवा युद्ध समाप्त हो जाने पर अनेक बार राष्ट्र युवा पुरुषों से शून्य हो जाता है। महाभारत के समय देश की ऐसी स्थिति हो गई थी, और सन 1914 में योरोपीय महासमर के समय वहाँ के कई देशों में भी ऐसी ही दशा देखने में आई थी। ऐसे समय में एक-एक पुरुष द्वारा अनेक विवाह करके अथवा नियोग करके भी अनेक सन्तानों को उत्पन्न करना देश के लिए हितकर बतलाया गया है। ऐसी विपत्ति के समय इस लिये वेद में दशास्याँ पुत्रानाधेहि अर्थात् दश पुत्र के उत्पन्न करने की प्रार्थना की गयी है। इस प्रकार वैदिक सभ्यता में सन्तानोत्पत्ति के तीन सिद्धाँत स्थिर किये गये हैं जिनके अनुसार समाज की आवश्यकतानुसार कम या ज्यादा बच्चे उत्पन्न करने की सहमति दी गई है। पर इस तरह इच्छानुसार संतान वही व्यक्ति उत्पन्न कर सकता है जो अमोघवीर्य है। यह शक्ति प्राचीन आर्यों ने ही खास तौर पर उत्पन्न की थी और इसके द्वारा काम-शक्ति पर पूरा काबू पा लिया था। अमोघवीर्य पुरुष वही है जब चाहे कितनी भी सन्तान उत्पन्न कर सके और जब न चाहे तब सन्तान उत्पन्न करना बिल्कुल बंद कर दे। यह उद्देश्य आजकल संतान-निरोध के नकली साधनों से पूरा नहीं हो सकता, क्योंकि प्रकृति के विरुद्ध होने के कारण उनसे अनेकों भयंकर परिणाम निकलते हैं। अमोघवीर्यत्त्व प्राप्त करने के लिये तो मनुष्य को शृंगार वर्जित, सादा, तपस्वी और मोक्षाभिमुख जीवन व्यतीत करना पड़ता है। इसके विपरीत आज कल के वैज्ञानिक शृंगार और वासना को तो नये-नये साधनों द्वारा बढ़ाते चले जा रहे हैं और कृत्रिम उपायों से संतान निरोध करना चाहते हैं जो एक असम्भव बात है। जब तक काम वासना का निरोध नहीं किया जायगा तब तक जन-संख्या की वृद्धि की समस्या हल नहीं हो सकती।


सिनेमा नैतिक पतन का प्रचारक है।

(श्री किशोरीलाल मशरु वाला)

सिनेमा मनोरंजन के साथ लोक शिक्षण का एक कीमती साधन तो बन सकता है, परन्तु आज जिस तरह सिनेमा फूला-फला और फैला है, वह तो शराब से भी ज्यादा बुराई फैला रहा है,- इस कथन में तनिक भी अतिशयोक्ति नहीं है। कुछ वर्ष पहले मेरे इन विचारों को सुनकर एक बन्धु को शंका उत्पन्न हुई। उन्होंने लिखा कि क्या आप ‘तुकाराम’ जैसे धार्मिक चित्रपट को भी भिन्न श्रेणी का नहीं मान सकते। उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि मैं उसे देखकर इस विषय में अपने विचारों की परीक्षा कर लूँ। इसके कुछ समय बाद मैं बम्बई गया और वहाँ उस समय ‘तुकाराम’ की धूम मची हुई थी। घर के बच्चे तो सिनेमा पर मुग्ध थे ही। वे इस आशा से मुझसे उक्त चित्रपट देखने का आग्रह करने लगे कि अगर मैं एकाध बार सिनेमा हो आऊं तो उनका सिनेमा-प्रेम सर्वथा अक्षम्य न माना जायेगा। वर्षों से मैंने सिनेमा न देखा था और बोलने वाली फिल्म में विज्ञान की कौन सी करामात काम करती है, इस बात को जानने का कुछ कौतूहल मन में था। इन सब बातों के अतिरिक्त उक्त मित्र ने तथा घर के बच्चों ने तुकाराम को निर्दोषिता का जो प्रमाण पत्र दे रखा था उसकी सचाई का पता लगाने की भी इच्छा हुई। इस लिये मैं उसे देखने गया। मेरी निगाह में तुकाराम जैसा फिल्म भी विष रहित नहीं है। उसमें विष को धर्म के अनुपान के साथ मिला दिया जाता है। इस लिए एक दृष्टि से वह खुल्लमखुल्ला अनीति का प्रचार करने वाले चित्रों से भी ज्यादा हानिकारक है।

पहली बात तो यह है कि ऐसे धार्मिक या ऐतिहासिक माने जाने वाले चित्र झूठे जीवन चरित्र तथा झूठा इतिहास उपस्थित करते हैं। उदाहरण के लिए इस चित्र में तुकाराम के प्रतिपक्षी के रूप में सालोमाल वेश्या का जैसा चित्रण किया गया है और तुकाराम के जीवन की प्रत्येक घटना के साथ उसका जैसा मेल दिखाया गया है, वह बिल्कुल बनावटी है। तुकाराम के वास्तविक जीवन चरित्र को न जानने वाले भोले दर्शक उसी को जीवन का सच्चा वर्णन समझ लेने की भूल करते हैं, और वास्तविक तुकाराम के बदले अपने दिमाग में एक काल्पनिक तुकाराम को स्थान देते हैं। सिनेमा वालों ने एक तुकाराम का ही नहीं तुलसीदास, कबीरदास आदि सभी संत महात्माओं के चरित्र को इसी प्रकार तोड़ा मरोड़ा है।

इतिहास को इस प्रकार तोड़ने-मरोड़ने का एक मात्र उद्देश्य धन कमाना है। सिनेमा की अधिकाँश कमाई घटिया दर्जे के मनोरंजन से रीझने वाले लोगों से होती है। बिना उन्हें रिझाये सिनेमा वालों का काम चलता ही नहीं। अतएव उन्हें संतुष्ट करने वाले दृश्य उन्हें देने ही पड़ते हैं। तुकाराम के चरित्र की अकेली सात्विक और भक्तिपूर्ण बातों में उनको क्या मजा आ सकता है। इसके लिए रंगभूमि पर सालोमाल का वीभत्स वेश्या जीवन खड़ा किया गया है, और तुकाराम के अमृत के साथ उसमें वेश्या जीवन का उतना ही विष भी घोला गया है।

हम यह कह सकते हैं कि कामोद्दीपन, चोरी और हत्या की कला- ये सिनेमा के स्थायी अंग हैं। शराबी, शराब का नशा उतरने पर भला मानस बन सकता है, लेकिन सिनेमा के पर्दे पर दिखाये जाने वाले वीभत्स दृश्य बालकों और तरुणों के मन पर जो संस्कार डालते हैं, उनका प्रभाव उनके समस्त जीवन को बर्बाद करने की शक्ति रखता है। लेकिन पढ़ी लिखी जनता भी अगर ऐसे ही दृश्यों की भूखी हो, तो इसका क्या उपाय? युवक और युवतियों को नाच अच्छे लगते हैं, शृंगार प्रधान चित्रों और कहानियों में वे आनन्द का अनुभव करते हैं, इस लिये वे तो देखने जायेंगे ही अगर देखने नहीं गये तो रेडियो के सामने बैठकर उनके गीत सुनेंगे।

विद्यालयों में सिनेमा का-सा नाच या गाना सिखाना बुरा नहीं समझा जाता। ऐसी दशा में जो लोग खुद यह सब देखने जाते हैं, सिखाते हैं, वे अपने बच्चों को किस मुँह से कह सकते हैं कि वह उनके देखने लायक नहीं हैं।

जिस प्रकार कानून का बंधन हो या न हो, अपना सुरक्षा चाहने वाले को शराब का त्याग करना उचित है, उसी तरह सिनेमा का त्याग भी आवश्यक है।


ढोंगी ‘महापुरुषों’ की काली करतूतों से बचिये।

(श्री भारतीय योगी)

भारतवर्ष अपने आध्यात्मिक ज्ञान के लिए प्रसिद्ध है। आज से नहीं हजारों वर्ष से यहाँ के साधु और ज्ञानी देश और विदेशों में सम्मान के पात्र रहे हैं। सिकन्दर जैसे दिग्विजयी सम्राट ने भी यहाँ के नंगे फकीरों के सामने मस्तक झुकाया था। इस युग में भी स्वामी दयानंद, विवेकानंद, रामतीर्थ आदि ने भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान का उत्कर्ष दिखाकर दूर-दूर के भूखण्डों में उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाई है। यही कारण है कि इस देश की अनपढ़ और अज्ञानी जनता ही नहीं वरन् बड़े-बड़े समझदार और विद्वान व्यक्ति भी आध्यात्मिकता का नाम सुनकर सहज ही उस तरफ आकर्षित हो जाते हैं और अध्यात्मज्ञानी कहलाने वाले व्यक्तियों को श्रद्धा तथा भक्ति की भावना से देखते हैं।

पर समय के प्रभाव से भारतीय अध्यात्म में बहुत परिवर्तन हो गया है और उसमें तपस्वी व्यक्तियों के बजाए स्वार्थी और ढोंगी व्यक्ति बहुत बड़ी मात्रा में घुस गये हैं। हमारे कहने का आशय यह नहीं कि ऐसा आजकल ही होने लगा है। और पहले जमाने में सभी साधु वेशधारी महात्मा थे। हम मानते हैं कि साधुवेश धारियों में वास्तविक महात्माओं की संख्या सदैव बहुत थोड़ी रही है। तो भी जहाँ तक हम समझ सकते हैं, पहले इन साधारण साधुओं का उद्देश्य पेट भरने तक ही सीमित रहता था और उनकी प्रतिष्ठा भी मात्र को ही होती थी। पर आजकल जिस प्रकार अन्य अनेक विषयों में मनुष्यों ने ज्ञान-विज्ञान का प्रयोग कर नकली चीजों का रूप असली चीजों से बढ़कर बना दिया है, उसी प्रकार आध्यात्मिकता के क्षेत्र में भी ढोंगी लोग सच्चे लोगों से आगे बढ़ गये हैं और तरह-तरह के दुष्कर्म करके धार्मिकता और आध्यात्मिकता का नाम बदनाम कर रहे हैं। इन दिनों प्रायः ऐसे ढोंगी और ठगने वाले महापुरुषों की करतूतें पत्रों में छपा करती हैं। पर वे लोग भी इतने चालाक हो गये हैं, और जनता इतनी ज्यादा अंधविश्वासी है कि बार-बार भण्डाफोड़ होने पर भी लोगों की आँखें नहीं खुलतीं और इन लोगों का यह गंदा व्यापार निरंतर बढ़ता चला जा रहा है। इस सम्बंध में पिछले दिनों जो घटनाएं इधर-उधर हमारे पढ़ने में आयी हैं उनमें से दो-एक उदाहरण स्वरूप यहाँ देते हैं। एक पत्र लेखक ने अपनी राम कहानी इस प्रकार लिखी है-

‘एक महापुरुष’ जो कीर्तन करते-करते बेहोश होकर गिर पड़ते हैं, भक्ति के आवेश में आकर नेत्रों से आँसुओं की धारा बहाने लगते हैं। इन बातों से प्रभावित होकर मैं पढ़ना—लिखना छोड़कर उनका शिष्य बन गया और साथ रहने लगा। पर पीछे उनके चरित्र देखकर हृदय को बड़ा धक्का लगा। वे जहाँ जाते हैं बड़े-बड़े लोगों के यहाँ ठहरते हैं। व्याख्यान तो खूब झाड़ते ही हैं और साथ ही महापुरुष कहकर अपनी ओर संकेत करते हैं। बेचारे लोगों की भावना तो यही है कि ये साक्षात श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतार हैं। मेरी भी ऐसी ही भावना थी। परन्तु जब मैं उनके अत्यंत निकट रहने लगा तो उनके सब चरित्र मेरे दिमाग में भर गये। वेष-भूषा तो पूर्ण गृहस्थों का सा था ही और विलासिता की भी पराकाष्ठा थी। दिन में सौ-सौ पान, खूब तम्बाकू पीना तथा सुँदर और निर्दोष सुकुमारियों का सतीत्व नष्ट करना। और यह हाल मैंने प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देखा, तब उनका साथ छोड़कर भाग निकला। तीन मास बाद पत्र-व्यवहार किया। वे एक नगर के किसी बड़े एडवोकेट के यहाँ ठहरे थे। मैंने यही लिखा कि ‘श्री महाप्रभुजी आदि संतों का न यह आदेश है, न उनका आचरण ही ऐसा था’। गोसांई जी भी यही कह गये हैं कि -


भोग रोग

राम चरन पंकज अनुरागे। ते सब भोग रोग सब त्यागे॥

राम चरन पंकज अनुसरहीं। विषय भोग बस करहिं कि तिनहीं॥

रमा विलास राम अनुरागी। तजत वमन इव नर बड़भागी॥

जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब विषय विलास विरागा॥

उन ‘महापुरुष जी’ ने उत्तर में लिखा- “धर्म व्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणाँ च साहसम। तेजीयसो न दोषाय वन्हेः सर्वभुजो यथा॥”

“मैं समर्थ हूँ, मुझे कोई दोष या पाप नहीं”।

उनके प्रभावशाली विद्वतापूर्ण व्याख्यान पर बड़े-बड़े लोग मुग्ध होकर उन्हें अपने यहाँ ठहराते हैं, और उनका यही कार्य है कि भोली-भाली कुंवारियों के साथ दुराचार करना, यही कह कर कि तुम्हारी कामवासना को नष्ट करके तुम्हें भगवान का अनुभव कराऊँगा। अनभिज्ञ बालिकाएं क्या समझें। वह फँस जाती हैं उनकी प्रभावशाली बातों में। उनका यह अत्याचार सभी पर चल रहा है। बड़े-बड़े लोगों के यहाँ ठहरते हैं। उन बेचारों को इन सब बातों के देखने और समझने का समय भी नहीं मिलता।

उपर्युक्त पत्र में वर्णित आरोप बहुत गम्भीर हैं, पर इसकी सत्यता में हमको कोई संदेह नहीं। क्योंकि ऐसे अनेक महापुरुषों की करतूतों का हाल हम आये दिन सुनते और पढ़ते रहते हैं। पर इस सबके लिए हम किसको दोष दें। ये ढोंग रचाने वाले पापी तो प्रत्यक्ष ही दोषी हैं, पर जो लोग उनकी अनेक दूषित करतूतों को सुनकर भी उनका सम्मान करते हैं वे कम दोषी नहीं हैं। यह कहने की तो आवश्यकता ही नहीं कि ऐसे लोग छिपे हुए गुण्डे और ठग होते हैं जो स्वार्थ-साधन का अच्छा मौका देखकर धार्मिक क्षेत्र में घुस जाते हैं। वे न पाप, पुण्य को मानते हैं और न ही उनके हृदय में इन बातों का ख्याल है। उनका उद्देश्य तो धन कमाना और मौज उड़ाना है। उनसे बचने का उद्योग करना उन लोगों का काम है जिनको वे अपना शिकार बनाते हैं। अगर वे मूर्खतावश या भ्रम में पड़कर ऐसे दुष्टों को सम्मान योग्य समझते हैं और उनको अपने घरों में घुसाने में भी शंका नहीं करते, तो अन्य लोग क्या कर सकते हैं? पर उनको इतना अवश्य समझ लेना चाहिए कि ज्ञान की बड़ी-बड़ी बातें करना, आँसू बहाना, नाचना, मूर्छित होकर गिर पड़ना, आँखें मूँद कर समाधि सी लगा लेना, शास्त्रों की विलक्षण व्याख्या करना आदि बातों से ही कोई संत या महात्मा नहीं हो जाता। सिनेमा में अभिनय करने वाले ऐक्टर व्यास, शुक्रदेव, शंकराचार्य, बुद्ध, चैतन्य आदि का मनोमुग्धकारी अभिनय कर लेते हैं, पर इससे वे महात्मा या महापुरुष नहीं हो जाते। वे किसी को ठगते भी नहीं। पर जो वासना के गुलाम धूर्त लोग साधु, महात्मा का स्वाँग बनाकर जनता के धन, धर्म, सदाचार पर आक्रमण करते हैं वे तो बड़े ही भयंकर हैं, और उनसे सदैव सावधान रहने में ही भलाई है।

समाज-सेवा की भावना वाले नवयुवकों का भी कर्तव्य है कि वे संगठन बनाकर ऐसे धूर्तों से भोले और मूर्ख लोगों की रक्षा करें। कुछ वर्ष पहले तक हमारा देश पराधीन था और देश के उच्च आदर्श वाले नवयुवक उसे स्वाधीन कराने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा देते थे। अब देश की राजनैतिक दशा बदल गयी है और हमको राजनैतिक आन्दोलन में कष्ट सहन अथवा बलिदान की कोई खास जरूरत नहीं जान पड़ती। पर सामाजिक क्षेत्र में ऐसी हजारों समस्याएं हैं जिनके सुधार के लिए हम परिश्रम और आत्मत्याग करके बहुत बड़े यश और पुण्य के भागी बन सकते हैं। इस प्रकार के धूर्त लोग प्रायः सरकारी कानूनों के फंदे में नहीं आते,क्योंकि जिसको वे ठगते हैं या भ्रष्ट करते हैं उनको पहले ही अपना अंध भक्त बना लेते हैं। दूसरी बात ये भी है कि जो ‘बड़े आदमी’ इनके भक्त बनते हैं वे स्वयं और उनका परिवार भी प्रायः आचार की दृष्टि से भ्रष्ट होता है, और प्रकट में ‘धर्म’ का ढोंग करने पर भी स्वच्छंद काम-क्रीड़ा को बुरा नहीं समझते। कुछ भी हो ऐसे धूर्तों का प्रतिकार करना समाज हितैषियों का कर्तव्य है और आवश्यकता है कि जनता को उनके विषय में स्पष्ट शब्दों में सचेत किया जाए और निर्भय होकर उनकी करतूतों का भण्डा फोड़ सबके सामने किया जाए।


यज्ञ का मुख्य उद्देश्य लोक कल्याण ही है।

(श्री प्रेम नारायण)

‘यज्ञ’ शब्द का अर्थ व्याकरण के अनुसार ‘संगति और दान से देव पूजा करना’ होता है। देवता का अर्थ भी स्वर्ग में बैठे हुए किन्हीं देवों से नहीं है, पर पृथ्वी पर ही जो श्रेष्ठ व्यक्ति हैं उनसे ही इसका तात्पर्य होता है। इस प्रकार यज्ञ का आश्रय श्रेष्ठ व्यक्तियों के सहयोग और सम्मेलन से जन-समाज के कल्याणकारी कार्यों की योजना और उनका सम्पादन करना ही माना जा सकता है।

शास्त्रों में यज्ञ चार प्रकार के कहे गये हैं-

1-स्वाध्याय-यज्ञ (अर्थात् विद्या और ज्ञान प्रदायक शास्त्रों का पठन-पाठन)

2-जप-यज्ञ(सत्य ज्ञान के प्रदाता ग्रंथों का बार-बार पाठ करना और परमात्मा का नाम बारम्बार उच्चारण करना)

3-कर्म-यज्ञ (कर्मकाण्ड सम्बंधी यज्ञ अथवा वे सब परोपकार के कर्म जिनसे प्राणियों का कल्याण हो)

4-मानस-यज्ञ अर्थात् मन को वश में करना, योग साधन आदि।

इन चार तरह की यज्ञों की विधियों में पशु-बलि, दान आदि की कुरीति कहीं भी नहीं मिलती। वरन् इनका आधार “परोपकाराय सताँ विभूतयः” के उच्च आदर्श पर प्रतिष्ठित है। अब यदि पंच महायज्ञों पर भी विचार किया जाता है तो उनमें भी इस प्रकार की किसी दूषित प्रथा का चिन्ह नहीं मिलता। पाँच महायज्ञों का विवरण इस प्रकार है-

1-ब्रह्मयज्ञ-इसके प्रयोग से जीवात्मा सब शक्तियों के

भण्डार परमात्मा के संयोग से अपने को शक्तिशाली बनाता है, जिससे जगत की सेवा में समर्थ हो सके। वैसे तो ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ-सभी प्रतिदिन ब्रह्म-यज्ञ करते हैं, पर ये मुख्य रूप से संन्यासियों का कर्तव्य है। संन्यासी का एक मात्र उद्देश्य ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना ही होता है, और वह ब्रह्मयज्ञ के द्वारा जगत का अशेष उपकार कर सकता है।

2-देवयज्ञ-इसका मुख्य अंग अग्निहोत्र है, इससे वायु, जलवृष्टि, पृथ्वी और अनेक भौतिक पदार्थों की शुद्धि होती है। शुद्ध वायु मण्डल से सभी सत्पुरुषों तथा अन्य प्राणियों को भी लाभ पहुँचता है। इस प्रकार देवयज्ञ का करना परोपकार का और जनता की सेवा का कार्य है।

3-पितृयज्ञ-मनुष्य के कर्तव्य केवल अपने जन्म देने वाले माता-पिता की ही सेवा सुश्रूषा करना नहीं वरन्, अपने सभी पूर्वजों, निकट सम्बंधियों और देश के सच्चे जन-सेवकों की सेवा करना भी है। इस प्रकार देवयज्ञ का वास्तविक उद्देश्य देश को समृद्धिशाली बनाने का है, क्योंकि कोई भी जाति या राष्ट्र उस समय तक उन्नति नहीं कर सकता जब तक उसके ज्ञानी और माननीय पुरुष पूज्य न हों।

4-भूतयज्ञ- पतित, नीची श्रेणी के व्यक्ति, दीन, हीन, अपाहिज लोगों तथा पशु, पक्षी तथा अन्य छोटे जीवों पर करुणा का भाव रखकर उनकी सहायता करना। इसमें गीता के ‘दुख तप्तानाँ प्राणि नामार्ति नासनम्’ की भावना निहित है। इससे व्यक्तियों और समाज में अहिंसा की वृद्धि होती है और सहानुभूति का उदय होता है।

5-अतिथि यज्ञ-अतिथि से तात्पर्य विशेष रूप से उन ज्ञानी महात्माओं से है जो परोपकार के लिए सदुपदेश देते हुए देश में भ्रमण करते रहते हैं। ऐसे पूज्य पुरुष जब अकस्मात द्वार पर आ जायें तो यथाशक्ति उनका सम्मान करना गृहस्थ का कर्तव्य बतलाया गया है।

इस विवेचन से हम इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि सर्व साधारण के लाभार्थ जो कार्य परोपकार बुद्धि से किया जाता है वही ‘यज्ञ’ है और उसका आचरण करना सभी सज्जन पुरुषों का कर्तव्य है।


हमारा लोक राज कैसे सफल हो सकता है?

(श्री संतराम जी)

गंगा जब गंगोत्री से निकलती है तो उसका जल बहुत निर्मल रहता है। ज्यों-ज्यों वह आगे बढ़ती है उसके पानी में धूल, मिट्टी का अंश बढ़ता जाता है। और वह गंदला हो जाता है। इसी प्रकार बहुत प्राचीन समय में मनुष्य-समाज आज की अपेक्षा बहुत निर्मल था। उसमें लड़ाई, झगड़े, मार-काट, चोरी-डकैती, झूठ, अन्याय आदि दोष बहुत कम थे। उस समय मनुष्यों की संख्या कम थी और भूमि, जंगल आदि जीवन निर्वाह के साधन अधिक थे। इसलिए लोग प्रायः सुख शाँति से रहते थे। उनको लड़ने-झगड़ने की आवश्यकता भी बहुत कम पड़ती थी। उस समय न कोई राजा था न पुलिस और सेना थी। न्यायालय और जेलखाने भी न थे। लोगों में लोभ कम था और उनमें प्रकृतिजन्य सात्विक भाव पाया जाता था। उस युग में सब मनुष्य काम करते थे और उनको खाने को मिलता था।

धीरे-धीरे जब जनसंख्या बढ़ने लगी तो खाने-पीने तथा पहनने और ओढ़ने की वस्तुओं को प्राप्त करने में कठिनाई होने लगी। मनुष्यों की प्रकृति में भेदभाव बढ़ा। वे धन, धरती और स्त्रियों के लिए आपस में लड़ने लगे। सबल, निर्बलों को सताने लगे। तब लोगों को समूह बनाकर रहने और सम्मिलित होकर अपनी रक्षा करने की आवश्यकता पड़ी। समूह का एक नेता या मुखिया नियत किया जाता था। इस मुखिया या कुलपति की आज्ञा का पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना पड़ता था। यदि एक समूह का कोई व्यक्ति या दल दूसरे समूह के किसी सदस्य पर आक्रमण करता था तो सब मिलकर उसकी रक्षा करते थे।

इस प्रकार समूहों में आपस में युद्ध होने लगे और देश में अशाँति फैलने लगी। इस अशाँति को रोकने के लिए अनेक समूह मिलकर अपना एक शासक या राजा चुनने लगे। इसका कार्य अपनी प्रजा के आपसी झगड़ों को मिटाना और बाहरी शत्रुओं से अपने देश की रक्षा करना होता था। प्रजा पर राजा का प्रभाव और आतंक जमाने के लिए तरह-तरह के किस्से गढ़े जाने लगे। ये कहा गया कि राजा ईश्वर का रूप होता है, उसके प्रति द्रोह करना या किसी प्रकार की हानि पहुँचाने का प्रयत्न करना महापाप है। राज्य प्रबंध चलाने के लिए राजा, मंत्री, अधिकारी और सेना रखता था। इसके खर्च के लिए वह प्रजा से कर वसूल करता था। आरम्भ में तो इस प्रथा से देश में सुख शाँति की वृद्धि हुई और प्रजा निष्कंटक भाव से अपना काम करने की सुविधा पा सकी। पर कुछ समय बाद ही कई बड़े दोष उत्पन्न हो गये। एक तो सबसे योग्य व्यक्ति को ही राजा चुनने में कई प्रकार के विघ्न पड़ने लगे। अनेक व्यक्ति जो शासन के गुण तो बहुत कम रखते थे, पर स्वभाव से युद्ध प्रिय और दुर्धर्ष होते थे राजा बन जाते थे और प्रजा पर अत्याचार करके अपने पद पर जमे रहने का प्रयत्न करते थे। दूसरी बात यह हुई कि शीघ्र ही राजा चुनने की प्रथा का अंत हो गया और राज पद वंश परम्परागत बन गया। राजा के मरने पर उसका पुत्र ही राजा बनाया जाने लगा चाहे वह कैसा ही अयोग्य क्यों न हो। एक और बड़ा दोष इस प्रथा में यह था कि जिस व्यक्ति को राजा बनाया जाता था या जो वंश-परम्परा से राजा बन जाता था, वह यद्यपि अन्य साधारण मनुष्यों की तरह ही गुण दोष युक्त होता था। पर वह राज सत्ता को पाकर अपने को सबसे श्रेष्ठ और ईश्वर का प्रतिनिधि समझकर अहंकार करने लगता था। दूसरे लोग अकारण ही अपने को निकृष्ट और राजा का दास समझने लगते थे। इससे उनकी मनोवृत्ति सदा दबे रहने की हो जाती थी और उनका स्वाभिमान का भाव कुचल दिया जाता था। राजा और उसके वंशज कुछ भी काम न करके प्रजा की गाढ़ी कमाई पर गुलछर्रे उड़ाते थे। वे सैंकड़ों स्त्रियाँ रखते थे और ऐश आराम में पड़कर अपना कर्तव्य भी भुला देते थे।

संसार में ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हो जाने से समझदार लोग राजा के विरुद्ध हो गये और प्रजा तंत्रात्मक शासन प्रणाली का उदय हुआ। इस प्रणाली का आधार सब लोगों में समता, बराबरी और स्वतंत्रता की भावना होती है। इसमें किसी व्यक्ति को उसके जन्म के कारण ऊँचा या नीचा नहीं माना जाता। इसमें प्रत्येक व्यक्ति के प्राणों का मूल्य एक समान समझा जाता है। प्रजातंत्र में एक व्यक्ति को स्वतंत्र और दूसरे व्यक्ति को उसका दास नहीं समझा जाता। उसमें मनुष्यता के नाते सब मनुष्य समान माने जाते है और सबके अधिकार भी समान होते हैं। प्रजातंत्र या लोकराज की परिभाषा संक्षेप में यह है कि- “जनता का राज्य, जनता द्वारा और जनता के लिए राज।” इसमें शासन का अधिकार जनता के ही हाथ में रहता है। इसमें सभी मनुष्यों को ऐसे कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता होती है जिनसे दूसरों की स्वतंत्रता में बाधा न आये। “आप जीओ और दूसरे को जीने दो।” यह आदर्श नियम ही उत्तम प्रजातंत्र सिद्धाँत का मूल मंत्र होता है।

ऐसे लोक-राज्य और एक राजा के राज्य में बड़ा अंतर होता है। एक तंत्र वाले राजाओं की प्रजा परावलम्बी और प्रत्येक बात में दूसरों का मुँह ताकने वाली बन जाती है। वह अपनी रक्षा तथा सुख सुविधा का सारा दायित्व राजा पर छोड़कर आप पराधीन हो जाती है। नगर में गंदगी फैल रही हो, डाकू, चोर लोगों को तंग कर रहे हों, जंगली जानवर लोगों की हानि कर रहे हों, गाँव में स्कूल या अस्पताल के न होने से लोगों को असुविधा झेलनी पड़ती हो, समय से पानी न बरसे या अतिवृष्टि से फसल तबाह हो जाये, कोई महामारी फैल जाये-साराँश किसी भी प्रकार की आपत्ति सर पर आ पड़ने पर प्रजा उसके प्रतिकार का कोई उपाय नहीं कर सकती। वह अपने हाथ-पैर हिलाने में असमर्थ हो जाती है। अधिक से अधिक पीठ पीछे राजा को कोसने लगती है।

इसके विपरीत लोक-राज का प्रत्येक नागरिक देश के अपयश को अपना अपयश तथा देश के सुयश को अपना सुयश समझने का अधिकार रखता है। वह अपना राजा आप होता है, इसलिए वह अपने कष्टों को आप दूर करने का प्रयत्न करता है। किसी प्रकार का अन्याय, अत्याचार होने पर चुपचाप उसे सहन नहीं करता रहता वरन् अकेला ही या सामूहिक रूप से उसके विरुद्ध आवाज उठाता है-उसके प्रतिकार की चेष्टा करता है।

ये सत्य है कि सहस्रों वर्षों की दासता और अनेक प्रकार की सामाजिक बुराइयों के कारण भारतीय जनता में चरित्र-बल का अभाव सा हो गया है। इसलिए लोक राज को पाकर भी वह उससे समुचित लाभ नहीं उठा सकती। इतना ही नहीं अनेकों मूर्ख और निकम्मे व्यक्ति तो अभी राजतंत्र के ही गुण गाते हैं। यहाँ की जनता के चरित्र को ऊँचा उठाने और लोकराज को सच्चे अर्थ में स्थापित करने के लिए अभी अनेकों त्यागी और तपस्वी लोकसेवकों की आवश्यकता है। तभी हमारा लोकराज सार्थक हो सकेगा।


विज्ञान की वर्तमान गति और उसका भविष्य

(श्री जय प्रकाश एम.ए.)

मनुष्य के बौद्धिक विकास में विज्ञान का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। उसने मनुष्य की चेतना को बहुत आगे बढ़ाया है और उसे प्रकृति पर विजय पाने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली बना दिया है। परन्तु जहाँ यह लाभ हुआ है वहाँ एक बड़ी हानि भी यह हुई है कि पिछले दो सौ वर्षों की आँशिक सफलता ने मनुष्य को विक्षिप्त सा बना भी दिया है, और वह अपने आप को भूल कर गुमराह हो रहा है। कहाँ तो मनुष्य की भावना ये थी कि “आप मैं आत्म-रूप हूँ, ज्योति स्वरूप हूं, मैं कदापि जड़ पंच भूत नहीं हूँ” और कहाँ अब बड़े-बड़े विद्वान अपने को कार्बन, कैल्शियम, फास्फोरस आदि जड़ पदार्थों से बना एक चलता-फिरता पुतला मानते हैं, जो किसी भी समय टूट-फूटकर खत्म हो सकता है। इसमें संदेह नहीं कि इस समय विज्ञान विकास के उस काल से गुजर रहा है जब बहुत सम्भव है कि अपनी संयत प्रौढ़ता के सहारे विकास के उच्चतम शिखर पर चढ़ जाये या फिर डर है कि उच्छृंखलता के उन्माद में आत्महत्या न कर डाले। अगर ऐसा हुआ तो उसके आधार पर टिकी हुई और वर्तमान सभ्यता भी नष्ट हो जायेगी। वास्तव में इस समय मनुष्य के सामने यह समस्या उपस्थित है कि क्या आधुनिक विज्ञान विकास का अंतिम लक्ष्य है, अथवा उसकी बौद्धिक प्रगति के मार्ग में एक बड़ा कदम है जिसका अंतिम उद्देश्य एक महान आध्यात्मिक चेतना है। इन परस्पर विरोधी दो धारणाओं के कारण वैज्ञानिकों में बड़ा मतभेद उपस्थित हो गया है। एक दल जिसे विज्ञान की क्षमता पर संदेह नहीं है, विश्वास करता है कि विज्ञान ने अपने को सर्वशक्तिशाली सिद्ध कर दिया है। निर्माण के रूप में न सही, पर संहार के रूप में वह अवश्य सर्वोपरि हो गया है। ऐसे वैज्ञानिकों को भय है कि यदि विज्ञान की वर्तमान गति शिथिल न हुई तो सृष्टि का नाश अवश्यम्भावी है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. ग्रीनहैड का कथन है कि विज्ञान के उन्नति के साथ हम ऐसे स्थान पर जा पहुँचे हैं जहाँ हम अपनी बर्बादी सहज में कर सकते हैं। इसी प्रकार एटम शक्ति के आविष्कारक प्रो.आइन्स्टीन ने कहा था कि अगर युद्ध के लिए वैज्ञानिक शस्त्रों का प्रयोग न रोका गया तो सृष्टि का नाश हो जायेगा। इस प्रकार की भयंकर सम्भावनाओं के कारण वैज्ञानिकों का यह दल विज्ञान से किसी प्रकार का कल्याणकारी फल मिलने की आशा नहीं करता और उनके मतानुसार विज्ञान का भविष्य बड़ा अंधकारमय है।

पर दूसरे दल की धारणा भिन्न प्रकार की है। उनका कहना है कि हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि विज्ञान हमारी सभ्यता और संस्कृति का विध्वंस करने की शक्ति रखता है। उनके मतानुसार विज्ञान के उत्कर्ष तथा संहार-शक्ति का जो चित्रण किया जाता है वह अतिशयोक्तिपूर्ण है। ऐसे वैज्ञानिकों का सिद्धाँत है कि अभी तो मनुष्य ने ज्ञान-विज्ञान के भवन की प्रथम सीढ़ी पर ही कदम रखा है। आगे चलकर वह मनुष्य को बहुत ऊँचा चढ़ायेगा। इसलिए विज्ञान से डरना और उसकी प्रगति को रोकने का विचार करना बुद्धिमत्ता नहीं है।

पर दूसरे दल के वैज्ञानिकों का ये भी मत है कि विज्ञान और दर्शन की प्रगति में समन्वय का भाव रखना आवश्यक है। वास्तव में दर्शन को छोड़ देने से विज्ञान का कोई अस्तित्व नहीं रहता क्योंकि विज्ञान में जो चेतना है उसका मूलाधार दर्शन ही है। दर्शन का ये मौलिक सिद्धाँत है। संसृति में जो कुछ है वह कदापि निरर्थक नहीं है। यद्यपि बहुत से वैज्ञानिक इस सत्य को मानने से इनकार करते हैं, पर अपने व्यावहारिक कार्य क्षेत्र में वे उसी के अनुसार आचरण करते हैं। प्रसिद्ध दार्शनिक बर्ट्रेण्ड रसल का ये कथन सर्वथा सत्य है कि विज्ञान का उत्कर्ष अंत में अपनी सीमा पर पहुँच जायेगा और मनुष्य के आगामी विकास के लिए मार्ग बना देगा। उस समय वैज्ञानिक इस तथ्य को भलीभाँति समझ जायेंगे कि विज्ञान की भौतिक प्रवृत्ति अपने ही लिए विनाशक है। उस समय विज्ञान की जो पर्यालोचना होगी उससे एक महान उद्देश्य की प्राप्ति होगी और विश्व की अनेकता में होकर एकता की स्थापना होगी। अनैक्य और अव्यवस्था से छटपटाती आत्माओं से अध्यात्म और ऐक्य अथवा समष्टि का मार्ग मिलेगा और उसी में वे शाँति प्राप्त कर सकेंगे।

वास्तव में यदि विज्ञान विकास के मार्ग पर अग्रसर होता हुआ अपने इसी आदर्श पर स्थित रहता है तो उसे डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम जानते हैं कि विकास की धारा का प्रवाह अर्धचैतन्य (इन्फ्रारैशनल) से चैतन्य (रैशनल) की ओर होता है और फिर चैतन्य (रैशनल) से अपर चैतन्य (‘सुप्रा-रैशनल’) की ओर अग्रसर होता है। विज्ञान अर्ध चैतन्य और अपर चैतन्य के बीच की कड़ी है। वर्तमान समय में वह एकाँगी और अपूर्ण है, जिसके लिए उसे सदोष माना जाता है। हमारी आँखें विज्ञान के चमत्कारों को देखकर अवश्य ही चकाचौंध हो जाती हैं और हम सोचने लगते हैं कि विज्ञान ही विकास का अंतिम गन्तव्य स्थान है। हमको यह ध्यान नहीं आता कि विज्ञान अपूर्ण है तो मानव का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता। विज्ञान का आरम्भ तो संदेह और घटना से होता है पर सृष्टि या संसृति एक घटना नहीं है, वरन् उसका एक उद्देश्य है। मनुष्य में जो चैतन्य है वह निरर्थक नहीं है। यदि हम मनुष्य के चैतन्य और उसके सूक्ष्म विकास का निरीक्षण करें तो ज्ञात होगा कि अपूर्णता का भाव ही उसके अब तक के विकास का मूलाधार है। मनुष्य को अपने मौजूदा चैतन्य से संतोष नहीं मिलता, क्योंकि उसमें उसे अपूर्णता की अनुभूति होती रहती है और ये अनुभूति ही उसे निरंतर आगे बढ़ने और पूर्णता के लिए प्रयत्न करने को प्रेरणा देती रहती है।

ये स्पष्ट है कि विज्ञान मनुष्य के चैतन्य का एक स्टेज है। उससे प्रतीत होता है कि मनुष्य विकास की ओर निरंतर अग्रसर हो रहा है और पूर्णता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इस समय ये एक ऐसे मोड़ पर पहुँच गया है जो विकास की प्रतिक्रिया के परिणाम स्वरूप बड़ा खतरनाक जान पड़ता है। यहाँ पर अगर वह भयभीत हो गया अथवा व्यक्तिगत स्वार्थपरता की भावना का विकृति रूप जोर पकड़ता गया तो वे अपने ही हाथों अपना सर्वनाश कर सकता है। इसलिए विज्ञान की प्रगति को रोकने की आवश्यकता नहीं है, पर उसे अनियंत्रित होने से रोका जाए तथा कुछ व्यक्तियों के स्वार्थ साधन की पूर्ति का साधन भी न बनने दिया जाए। आज इसी व्यक्तिगत स्वार्थ और प्रतिद्वन्द्विता के कारण विज्ञान ही नहीं मानव जाति का भविष्य अंधकारमय जान पड़ता है। क्योंकि अगर दो-एक देशों की महत्वाकाँक्षा इसी प्रकार जोर पकड़ती गयी और वे विज्ञान की शक्ति का प्रयोग करके विनाशकारी आयुधों को बनाते रहे तो उसके फल से नाशलीला पूर्ण वेग से आरम्भ हो सकेगी और वह कहाँ जाकर रुकेगी इसकी भविष्यवाणी कोई नहीं कर सकता। अधिक नहीं तो सौ-पचास वर्षों के लिए तो वह मानवीय-प्रगति की गति को अवश्य अवरुद्ध कर देगी, और दुनिया में ऐसे अभूतपूर्व युग का आविर्भाव करेगी जिसका अनुभव मानव जाति ने कभी नहीं किया। तो भी हम आशा करते हैं कि महान राष्ट्रों के कर्णधार इतनी बड़ी गलती न करेंगे। अनेक मानव हितैषी आत्माएँ इस समय भी इस महाविपत्ति को टालने के लिए अकथनीय परिश्रम कर रही हैं। उनके प्रभाव से सम्भव है लोगों की आँखें खुल जायें और विज्ञान का दुरुपयोग बंद होकर वह वास्तव में मानव कल्याण के लिए ही प्रयुक्त किया जाने लगे। इसमें संदेह नहीं कि विज्ञान के आगे कुछ है वही अध्यात्म है। मनुष्य के विकास का अंतिम लक्ष्य उसी विकास को प्राप्त कर लेना है। हो सकता है कि विज्ञान और उसके युग का मनुष्य कुछ समय तक अपने चमत्कारों से मोहित रहे, पर वह समय दूर नहीं है जब अध्यात्म का प्रकाश उनके मार्ग को प्रकाशित कर देगा।


Quotation

सत्य बोलना, सब प्राणियों को एक जैसा समझना, इंद्रियों को वश में रखना, ईर्ष्या द्वेष से बचना, क्षमा, शील, लज्जा, दूसरे को कष्ट न देना, दुष्कर्मों से अलग रहना, ईश्वर भक्ति, मन की पवित्रता, साहस, विद्या-ये तेरह सत्य धर्म के लक्षण हैं। इन्हीं का पालन सबसे उत्तम धर्म है।

-भीष्म पितामह

जो अपने को तुच्छ समझता है वह केवल अपना ही मूल्य नहीं घटाता, किंतु समस्त मानव जाति को अपमानित करता है।

-रविन्द्रनाथ ठाकुर

मनोव्यथा जब असह्य और अपार हो जाती है, जब उसे कहीं त्राण नहीं मिलता, जब वह रुदन और क्रंदन की गोद में भी आश्रय नहीं पाता, तो वह संगीत के आश्रय में चली जाती है।

-प्रेमचंद

शुद्ध बुद्धि से किये गये स्वार्थहीन काम ही यज्ञ कहलाते हैं।

-लोकमान्य तिलक

दूसरों की बुद्धि पर ही चलने वाले मूर्ख होते हैं । नई व पुरानी बातों की परीक्षा करके जो चलते हैं वे बुद्धिमान कहलाते हैं।

-महाकवि कालीदास


अ. भा. गायत्री परिवार सम्मेलनपूर्ण सफलता एवं उत्साहवर्धक वातावरण में सम्पन्न

(एक प्रत्यक्षदर्शी)

गायत्री तपोभूमि में यह मास बड़ा महत्वपूर्ण कार्यक्रम सम्पादित करते हुए व्यतीत हुआ। ता. 12 मई से 12 जून तक एक मास का साँस्कृतिक शिक्षण शिविर बड़े उत्साह वर्धक वातावरण में चलता रहा। भारत के विभिन्न प्रान्तों से लगभग 50 व्यक्ति आ गये थे, जिन्होंने इस एक मास में भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया और उसके अनुसार अपने व्यक्तिगत जीवन को ढालने तथा अपने समीपवर्ती क्षेत्र में उस विचारधारा को प्रसारित करने का प्रण किया। सफल शिक्षा प्राप्त करने वालों को प्रमाण पत्र दिये गये। अ.भा.गायत्री परिवार सम्मेलन ता.7 से 12 जून तक, छह दिनों में सम्पन्न हुआ। देश की कोने-कोने में फैली हुई गायत्री परिवार की शाखाओं के लगभग पाँच सौ प्रतिनिधि आये थे। अब तक के कार्य की गतिविधि तथा भावी कार्यक्रम की रूपरेखा पर पूरे छहों दिन गम्भीर विचार विनिमय होता रहा। आज-कल रिवाज चल पड़ा है कि जिस सभा, सम्मेलन में अनेक प्रकार के, अनेक विचार धाराओं के, अनेक व्यक्तियों द्वारा, अनेक भजन भाषण हों, वही उत्सव सफल माना जाता है, पर यहाँ वह बात नहीं रखी गयी थी। साल भर के बिछुड़े हुए गायत्री परिजनों ने अपनी समस्याएं आचार्य जी के सामने उपस्थित कीं और आचार्य जी ने अपना हृदय खोलकर परिजनों के सामने रखा। इस प्रकार के आदान-प्रदान में जो स्वर्गीय सुख सभी को मिला उस आनन्द का वर्णन हो सकना कठिन है।

प्रातः काल 4 बजे घंटी बजते ही सब लोग सोकर उठ बैठते थे। शौच, स्नान से निवृत्त होकर 5 बजे जप पर बैठ जाते थे। 6 बजे से 100 कुण्डों की यज्ञ शालाओं में हवन आरम्भ होता था। 100 कुण्डों पर 500 उपासक पीले दुपट्टा डाले हुए जब यज्ञ करते थे और वेद मंत्रों की ध्वनि से आकाश गुँजायमान हो जाता था, उस दृश्य को देखकर सतयुग के ऋषि आश्रमों का दृश्य आँखों के आगे खड़ा हो जाता था। 8 बजे तक यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात सम्मेलन की कार्यवाही आरम्भ होती जो 10 बजे तक चलती । इसके उपराँत सब लोग एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते। दाल चावल, रोटी शाक का परम सात्विक भोजन, अपने ही परिवार के नर-नारियों द्वारा बनाया हुआ, उन्हीं के द्वारा परोसा हुआ, ऐसा मधुर और संस्कारित लगता था कि उस अन्न की सात्विक मस्ती साधकों के मन पर सारे दिन छाई रहती। काश, पूड़ी पकवान की छूतछात मानने वाले संकीर्ण विचारों वाले लोग इस सामूहिक परमसात्विक पारिवारिक भोजन के महत्व को समझ पावें तो उन्हें अपनी संकुचित मनोवृत्ति को छोड़ने में जरा भी देर न लगे। भोजन करने के बाद लोग स्वाध्याय करते रहते फिर 3 से 6 बजे तक सम्मेलन की कार्यवाही आरम्भ हो जाती। आचार्य जी का प्रवचन नित्य ही होता, इसके पश्चात अन्य परिजन अपने अपने विचार प्रकट करते। 6 बजे ये सम्मेलन समाप्त होने के पश्चात शौच, स्नान, आरती, कीर्तन, भोजन का कार्यक्रम चलता। रात को परिजन परस्पर विचार विनिमय करते रहते और दस बजे चटाइयों पर सो जाते, रात्रि में मेजिक लालटेन तथा सिनेमा के चित्र भी दिखाये गये। मथुरा, वृंदावन की सामूहिक तीर्थ यात्रा भी हुई। इस प्रकार गृहस्थ के जंजालों में साल भर तक थकाने वाला परिश्रम करने के उपराँत छह दिन के लिए जो लोग यहाँ आ सके उन्होंने अपने आपको धन्य माना। पृथ्वी पर स्वर्ग का अनुभव किया, नई प्रेरणा, चेतना और जीवनी शक्ति प्राप्ति की तथा अपने भाग्य को बार-बार सराहा।

छह दिनों में बहुत ही महत्व की मंत्रणाएं हुईं। सभी लोगों ने गत वर्ष में 20 हजार गायत्री परिवार के सदस्य बनने और 700 शाखाएं स्थापित करने पर हर्ष प्रकट किया और निश्चय किया कि इस संख्या को तीव्र गति से बढ़ाने के लिए पूरे मनोयोग से काम करेंगे। ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के अंतर्गत जो इन दिनों 24 लक्ष जप, 24 हजार पाठ, 24 हजार लेखन, 24 हजार आहुतियों का दैनिक कार्यक्रम देश भर में चल रहा है उसे पाँच गुना बढ़ा दिया जाय अर्थात् प्रतिदिन 1 करोड़ जप, 1 लाख पाठ, 1 लाख लेखन एवं 1 लाख आहुतियों का हवन दैनिक होता रहे। पारिवारिक वर्तमान सभी सदस्यों को मिलकर इस संकल्प की पूर्ति में जुट जाना चाहिए ताकि पाँच गुना जो कार्य कंधों पर आ गया है उसे पूरा किया जा सके। सदस्यों की संख्या भी इस वर्ष पाँच गुनी नहीं तो दूनी अवश्य होनी चाहिए।

इस संगठनात्मक प्रक्रिया के पूर्ण होने पर जो संघ शक्ति उत्पन्न होगी उसका उपयोग आध्यात्मिक साधना के अतिरिक्त मानवता, संस्कृति, धर्म, नैतिकता एवं समाज सुधार के कार्यक्रमों में किया जायेगा। देवताओं के आगे पशुबलि, दहेज, बाल-विवाह, वृद्ध-विवाह, बहु-विवाह, नशेबाजी, जुआ, मृतभोज, पर्दाप्रथा आदि सामाजिक बुराइयों को दूर करने और शिक्षा, सहयोग, सफाई, धर्मचर्चा आदि की सत्प्रवृत्ति को बढ़ाने के लिए रचनात्मक कार्य हाथ में लिया जायेगा। ऐसे व्रतधारी सक्रिय सदस्यों की संख्या हर शाखा में अधिक से अधिक होनी चाहिए जो नित्य नियमित रूप से कुछ समय लोक सेवा के लिए दिया करें। यह व्रतधारी सदस्य ही साँस्कृतिक पुनरुत्थान योजना के प्रधान स्तम्भ माने जायेंगे क्योंकि उनके श्रमदान के ऊपर ही सद्-विचारों के प्रचार का आधार रहेगा। यह व्रतधारी सदस्य हर रविवार को व्रत रखेंगे और उपवास में बचाया हुआ अन्न सद्ज्ञान प्रसार के लिए व्यय किया करेंगे।

तपोभूमि की ओर से अत्यंत सस्ता साहित्य छापा जायेगा जो नैतिकता, मानवता, कर्तव्यपरायणता, संस्कृति संयम, सेवा भावना, सहयोग, मातृभाव आदि गुणों के विकसित करने में सहायक हो। व्रतधारी सदस्य इस साहित्य को मंगाते रहेंगे और अपने घर में पुस्तकालय की तरह उसे स्थापित करके प्रतिदिन एक व्यक्ति को पढ़ाने या सुनाने का प्रयत्न किया करेंगे। सप्ताह में छह दिन यह चलता फिरता पुस्तकालय घर-घर पुस्तकें पहुँचाने और वापिस लाने का काम करेगा और सातवें दिन उन पढ़ने वालों की मीटिंग हुआ करेगी जिस पर पढ़े हुए विषयों पर विचार विनिमय हुआ करेगा। यह साप्ताहिक सत्संग गायत्री जप-पाठ, कीर्तन, हवन आदि कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न होंगे। इस प्रकार प्रत्येक व्रतधारी छह नये सदस्यों का साँस्कृतिक अध्यापक होगा। इसे उपाध्याय कहा जाया करेगा। जिनने शिक्षा प्राप्त की है वे भी कुछ समय में स्वयं अध्यापक बनेंगे और वे भी नये शिक्षार्थी बनाएंगे। इस प्रकार यह शृंखला फैलती हुई सारे देश में घर-घर, जन-जन के मन-मन में भारतीय धर्म और संस्कृति का संदेश पहुँचाने का सफल कार्यक्रम सम्पन्न कर सकेगी। यह संस्कृति विश्व विद्यालय अपने व्रतधारी उपाध्यायों की सहायता से अत्यन्त व्यापक क्षेत्र में मानवता को उज्ज्वल करने वाले सद्गुणों को प्रशाँत करते हुए युग निर्माण की एक महान भूमिका का सम्पादन कर सकेगा।

अ.भ. गायत्री परिवार को जहाँ मानवता की सेवा के लिए सद्-विचारों को फैलाना है वहाँ अपने आप भी सुसंगठित एवं अत्यंत घनिष्ठ आत्मीयता से ओतप्रोत होना है। यदि कोई परिजन अपना कच्चा परिवार असहाय छोड़कर मर जाय तो 20 हजार सदस्य एक-एक पैसा भी दे दें तो उसकी भारी सहायता कर सकते हैं। इसी प्रकार अपने परिवार के लोग अपनी जाति के गायत्री परिजनों में ही विवाह शादी करें तो दहेज की समस्या ही न उठे। साथ ही सुसंस्कृति विचार धारा के वर-वधू से उत्पन्न हुई संतान भी शुभ संस्कार ही लेकर पैदा होगी, ऐसे बालक निश्चित रूप से नर रत्न एवं महापुरुष हो सकते हैं। गायत्री परिवार के समस्त बालकों की शिक्षा पूर्ण निःशुल्क रूप से एक ही स्थान पर हो। महिलाओं को एवं बच्चों को सुसंस्कृत बनाने के लिए समय-समय पर उनके नगरों में शिक्षण शिविर किये जाया करें। परिजनों की उत्तम चिकित्सा के लिए कोई केन्द्रीय चिकित्सालय रहे, आदि बातें ऐसी हैं जो परिवार का आँतरिक संगठन मजबूत बनाने में बहुत सहायक हो सकती हैं।

उपरोक्त बातों पर सम्मेलन में उपस्थित सभी प्रतिनिधियों ने बहुत गंभीरता पूर्वक विचार किया और निश्चय किया कि संगठन को एक आदर्श मानव परिवार के रूप में बनाया जाय। यह इस युग का एक महान प्रयोग एवं परीक्षण होगा कि बिना किसी भौतिक स्वार्थ के भी नैतिकता, मानवता, संस्कृति एवं आध्यात्मिकता के आधार पर भी विचारशील मानव प्राणी एक दूसरे की सेवा सहायता करता हुआ कितनी सुख शाँति का अनुभव कर सकता है।

प्रतिनिधियों ने निश्चय किया कि नई शाखाएं स्थापित करने, नये सदस्य बनाने के साथ-साथ पुराने सदस्यों में नई प्रेरणा का संचार करेंगे कि अब व्रतधारी बनने का समय आ गया। केवल एक दो माला जप लेने मात्र से गायत्री परिवार में सम्मिलित होने का उद्देश्य पूरा होने वाला नहीं है। उसे प्राप्त करने के लिए व्रतधारी गौरव के उपयुक्त (1) आत्मचेतना के लिए आदर्श की प्रेरणा देने वाला स्वाध्याय (2) प्रतिदिन धर्म सेवा के लिए कुछ समय लगाना तथा (3) रविवार को उपवास करके बचाया हुआ अन्न सद्ज्ञान प्रसार के लिए लगाना, यह तीन जिम्मेदारियाँ भी कंधे पर उठाना आवश्यक है। उपस्थित लोगों में से अधिकाँश ने अपने व्रतधारी प्रतिज्ञा पत्र सम्मेलन में ही भर दिये और अपनी शाखाओं में से और भी ऐसे ही सजीव सदस्य ढूँढ़ने का निश्चय किया।

गत वर्ष स्थान-स्थान पर बहुत बड़ी संख्या में गायत्री यज्ञ और साँस्कृतिक सम्मेलन बड़े उत्साह पूर्वक हुए। इस बात पर संतोष प्रकट करते हुए अगले वर्ष यह शृंखला और भी उत्साह के साथ चलाने का निश्चय किया गया। साथ ही यह भी मान लिया गया कि आचार्य जी को अगले वर्ष देश व्यापी संगठन सूत्र के संचालन, आवश्यक मार्ग दर्शन, एवं यज्ञ आदि सूक्ष्म विद्याओं की शोध करने के लिए मथुरा ही छोड़ा जाय। यह ठीक है कि परिवार में सर्वत्र उनके लिए असाधारण श्रद्धा और आत्मीयता होने के कारण सभी यज्ञों और सम्मेलनों में उनके बुलाने की माँग रहती है, पर उनके दुर्बल स्वास्थ्य तथा अखिल भारत वर्षीय और अन्य दायित्वों को देखते हुए हर जगह बुलाने का आग्रह न किया जाए, उन्हें केवल वहीं बुलाया जाय जहाँ अत्यधिक आवश्यकता एवं उपयोगिता हो तथा सवारी का ऐसा समुचित प्रबंध हो जिससे उनके स्वास्थ्य पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

गत एक वर्ष से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों को शिक्षा की पूर्णता के प्रमाण पत्र दिये गये और निश्चय किया गया कि इस वर्ष ऐसे ही लोग संस्कृति शिक्षा में प्रवृत्त किये जाएं जिनकी परिस्थिति एवं मनोभूमि आगे चलकर धर्म प्रचार में पूरी तरह लगने की है। इस वर्ष तपोभूमि में अधिकाँश ऐसे व्यक्ति रहेंगे जो स्थिर बुद्धि से साधनात्मक जीवन व्यतीत करने के इच्छुक हैं। ऐसे लोगों को भोजन, वस्त्र आदि की निर्वाह व्यवस्था तपोभूमि करेगी। चालीस वर्ष से अधिक आयु के लोग ही इस दृष्टि से उपयुक्त होते हैं ऐसा अनुभव किया गया।

अखण्ड ज्योति में अब तक गायत्री परिवार के वे समाचार छपते हैं जिनमें सामूहिक जप, हवन, सम्मेलन आदि की चर्चा रहती है। अब ऐसे समाचार भी रहा करेंगे जिनमें परिवार के किसी व्यक्ति ने कोई ऐसा सत्कार्य, आदर्श, एवं अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किया हो जिससे दूसरे लोगों को भी श्रेष्ठता का उदाहरण उपस्थित करने की प्रेरणा मिले। गायत्री परिवार में बड़े आदमी (अमीर) भले ही न हों पर बढ़िया आदमी (महापुरुष) तो इस भण्डार में रत्न राशि की तरह जगमगाते ही रहने चाहिएं। माता से धन दौलत, बेटा, पोता माँगने वाले भिखमंगों की अपेक्षा अब ऐसे उदार सपूतों को प्रकाश में आना है जो माता की आत्मा को शाँति देने वाले आदर्श सत्कार्य कर दिखाने की श्रेष्ठता प्रकट कर सकें।

इस प्रकार अनेक महत्वपूर्ण विचार और कार्यों के साथ-साथ यह सम्मेलन बड़े ही उत्साह वर्धक वातावरण में समाप्त हुआ। विदाई के समय हर सदस्य की आँखों से वियोग जन्य प्रेमाश्रु बह रहे थे। आचार्य जी बहती आँखों और रुंधे कंठ से बड़ी कठिनाई से ही अंतिम भाषण पूरा कर सके। सम्मेलन संख्या और भीड़ की दृष्टि से छोटा था परंतु देश भर से जिस उच्च स्तर के लोग आये और उनने जो निश्चय किये इस दृष्टि से वह पूर्ण सफल रहा। प्रति वर्ष इन्हीं दिनों गायत्री जयन्ती के अवसर पर ऐसा ही एक सम्मेलन भविष्य में भी किया जाता रहेगा। सम्मेलन का दीक्षाँत भाषण श्री लक्ष्मीरमण जी आचार्य मंत्री उत्तर प्रदेशीय सरकार के द्वारा सम्पन्न हुआ। एक दिन महिला सम्मेलन भी रखा गया जिसमें नारी समस्या पर बड़े ही मार्मिक विचार प्रकट किये गये।


धर्म-प्रेमियों के सराहनीय प्रयत्न

ध्राँगध्रा (गुजरात) में स्थानीय शाखा के सब सदस्यों ने मिलकर महादेव जी के मंदिर में 24 हजार जप किया और 24 सौ आहुतियों का हवन किया। पूजन, आरती, चालीसा पाठ भी किया गया और प्रसाद बाँटा गया।

-हीरालाल दलपतराम मेहता

जूना बिलासपुर (म.प्र.) में ता. 25 मई को श्री विद्या प्रसाद मिश्रा आरंग से पधारे। स्थानीय गायत्री परिवार उन्हें स्टेशन पर लेने गया। उनके निरीक्षण में स्थानीय यज्ञ बड़ी धूमधाम और सफलता के साथ सम्पन्न हो गया।

-चीनाराम पोद्दार

ई.एस.डी. मंदिर (बंगाल) की शाखा में साप्ताहिक सत्संग नियमपूर्वक होता है। इसके फल स्वरूप अनेक व्यक्तियों ने माँस , मदिरा, वेश्यागमन, बीड़ी, सिगरेट आदि दुर्व्यसनों को त्याग दिया है।

-राम प्रसाद मिश्रा

मोरवी (सौराष्ट्र) में साधकों ने 24 हजार जप, 24 सौ चालीसा पाठ और 24 सौ मंत्र लेखन का अनुष्ठान किया।

-करुणा शंकर जगजीवनदास जानी

गनेशगंज (टीकमगढ़) में गणेश देव के मंदिर की प्रतिष्ठ के उपलक्ष्य में जेठ शु. 3 व 4 को 24 हजार गायत्री का जप कराया गया। 24 हजार आहुतियों का हवन, 108 चालीसा पाठ, भजन, कीर्तन आदि समस्त प्रोग्राम बड़े उत्साह के साथ सम्पन्न किया गया।

दिगौड़ा शाखा के मंत्री श्री बैजनाथ सिकोनिया तथा श्री बहादुर सिंह जी पधारे। गायत्री माता तथा आचार्य जी के चित्र वितरण किये गये।

-जगतराम पेस्तार

माकड़ोन (उज्जैन) में ता. 8 जून को 13 सदस्यों ने 24-24 हजार का जप पूरा करने के उपलक्ष्य में हवन किया जिसके आचार्य कोमल प्रसाद जी थे।

-सीताराम बड़िया

विलासपुर (म.प्र.) के गायत्री परिवार ने गायत्री-जयन्ती का पुण्य पर्व बड़े समारोह पूर्वक मनाया। 24 घंटे अखण्ड ज्योति जलती रही। 24 उपासकों ने 24-24 माला का जप किया।

-सुधाराम महाजन

राजपुर (म.प्र.) में गायत्री-जयंती पर गायत्री मंदिर में माता का जुलूस नगर में निकाला गया जिसमें जनता ने भी सहयोग दिया। लौटने पर श्री बालकृष्ण जी शुक्ल ने माता की महिमा पर व्याख्यान दिया तथा गायत्री-चालीसा वितरण किये गये।

-मंत्री, शाखा सभा

भैरोंपुर (होशंगाबाद)में गायत्री जप तथा यज्ञ और हवन का कार्यक्रम सफलतापूर्वक चलता रहता है। इस वर्ष 5 लाख मंत्र-जाप हुआ।

-माँगीलाल गर्ग

रामावरण (दक्षिण भारत) में गायत्री जयंती के उपलक्ष्य में उपासकों ने सामूहिक जप व हवन किया जिसमें गाँव वालों ने भी बड़े उत्साह से भाग लिया।

-अमृतलाल

तनोडिया (शाजापुर म.प्र.) में दो सामूहिक हवन हरी सिंह जी व डॉ. एल.पी. आनंद के यहाँ हुये।

-मुन्ना लाल कर्मयोगी।

मिर्जापुर (कोटा) में जेष्ठ सुदी 9-10 को गायत्री यज्ञ समारोहपूर्वक सम्पन्न हो गया। वाराँ से पं. श्री कृष्णजी आदि गायत्री प्रतिमा का जुलूस निकाला गया।

-सुदर्शन गुप्त

काँकणपुर (गुजरात) में गायत्री जयंती पर माता जी का षोडशोपचार पूजन किया गया और प्रत्येक सदस्य ने एक हजार जप किया। एक सदस्य श्री गोविन्दलाल जी ने 24 लक्ष का महापुरश्चरण शुरू किया है।

-रणछोड़लाल शुकुल

चिलियानौला (अल्मोड़ा) में ता. 7 जून को गायत्री जयंती का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया गया। प्रातः 4 बजे से संध्या तक कार्यक्रम चलता रहा जिसमें अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने भाग लिया।

-बदरीदत्त

सुसनेर (जि. शाजापुर)में गायत्री महायज्ञ के पश्चात 22 हवन सानंद हो चुके हैं। साधक संख्या निरन्तर बढ़ती जा रही है। पं. नारायण उपाध्याय तथा राम गोपाल जी विशेष सहयोग दे रहे हैं।

-नंदकिशोर

जासलपुर (म.प्र.) में गायत्री परिवार के सदस्यों ने 9 दिन तक सामूहिक जप, हवन और चालीसा पाठ का कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ किया।

-पु. आ.

माकड़ौन (म.प्र.) के गायत्री उपासना चैत्र की नवरात्रि के अवसर पर प्रति वर्ष माता का मेला भरवाने का निश्चय किया है। इस प्रकार ताराचंद जी पालीवाल तथा अन्य कई ने प्रति वर्ष गायत्री महायज्ञ का भी निश्चय किया है। 55 सदस्यों ने 24-24 हजार का अनुष्ठान का संकल्प किया है।

-कोमल प्रसाद

दिगौड़ा (टीकमगढ़) की शाखा द्वारा घंटे का अखण्ड कीर्तन व 24 हजार गायत्री मंत्र का पाठ ग्राम खरोई में किया गया। गायत्री चालीसा के 108 पाठ भी किए गए।

-वैजनाथ प्रसाद

तूँगा (जयपुर) में एक सामूहिक उपनयन संस्कार सम्पन्न हुआ जिसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीनों वर्णों के 22 लड़कों ने यज्ञोपवीत धारण किये। गायत्री महापुरश्चरण और हवन भी किया गया। इस आयोजन को सफल बनाने में श्री मोहन जी सारस्वत ने तन, मन , धन से सहयोग दिया।

-गोपीवल्लभ

हस्बा (फतेहपुर) में गायत्री जयंती का उत्सव बड़े विशाल रूप में मनाया गया जिसमें फतेहपुर आदि के अनेक विद्वानों तथा महात्माओं के भाषणों से उत्साह की अपूर्व लहर दौड़ गई।

-रामावतार

जगेली (पूर्नियाँ) में प्रथम तो अतिवृष्टि से तथा फिर अनावृष्टि के कारण फसल की दशा बड़ी ही खराब हो गयी थी और किसानों में त्राहि-त्राहि मची थी। इस महाविपत्ति से छुटकारा पाने के लिए स्थानीय गायत्री भक्तों ने श्री 108 रामठाकुर के स्थान पर यज्ञ किया। ग्राम के अधिकाँश व्यक्तियों ने एक समय का भोजन त्याग कर उस में भाग लिया। इसके फल से बहुत अच्छी वर्षा हुई और समस्त जनता में गायत्री माता का प्रभाव छा गया।

-मोतीलाल गोस्वामी

खरखौदा (मेरठ)में माता का बहुत बड़ा मेला हुआ जिसमें गायत्री यज्ञ भी किया गया। आरती, प्रसाद आदि सब कार्य धूम-धाम से सम्पन्न हुआ। यहाँ के पास ही मोदीनगर के इलाके में देवी जी का मेला होता है जिसमें अभी तक बहुसंख्यक बकरे काटे जाते थे, पर अब वहाँ भी पशुहिंसा बंद करके गायत्री यज्ञ होने लगा है।

-वैद्य जयप्रकाश ‘गौतम’

पलाकसेर (बुलंदशहर) में स्वामी ब्रह्मस्वरूप द्वारा आयोजित सवालक्ष आहुतियों का महायज्ञ समस्त धार्मिक जनता के सहयोग से सफलता पूर्वक सम्पन्न हो गया। 28 मई को जल यात्रा हुई। सभी महिलाएं पीले वस्त्र धारण करके गीत गा रही थीं। ता. 2 जून को पूर्णाहुति हुई जिसमें आ.भा.गायत्री परिवार के कुलपति पं. श्रीराम शर्मा भी पधारे। नित्य 5 दिन तक धार्मिक सिनेमा भी चलता रहा।

-हरी शंकर गौड़

टेलको (टाटानगर) में ता. 9 जून को गायत्री जयंती मनाई गयी । चार घंटे तक यज्ञ होकर 6480 आहुतियाँ डाली गयीं। एक सौ गायत्री चालीसा का वितरण किया गया। सब सदस्यों ने सम्मिलित रूप से कीर्तन भी किया।

-नगद नारायण शर्मा

शाहदरा (दिल्ली) में श्रीराधेश्याम के यहाँ पुत्रोत्पत्ति की खुशी में 24 सौ आहुतियों का हवन किया गया। यह पुत्र दश वर्ष बाद गायत्री आराधना के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ है।

-एक जानकार

बाराँ (कोटा) में गायत्री जयंती के अवसर पर 24 हजार आहुतियों का यज्ञ उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुआ। इस इलाके में और 4-5 यज्ञ शीघ्र ही किये जाने की व्यवस्था की गयी है।

मानपुर (इंदौर) में ज्येष्ठी नवरात्रि के अवसर पर सामूहिक लघु अनुष्ठान किया गया। नित्य लगभग 80 व्यक्ति यज्ञ में सम्मिलित होते हैं।

-हरिश्चंद्र मीतल

बकानी (झालावाड़) के गुरुकुल में 24 व्यक्तियों द्वारा 1 लाख 97 हजार सामूहिक जप और 2400 आहुतियों का हवन किया गया।

-भँवरलाल शर्मा

अजीतगढ़ (सीकर) की गायत्री शाखा ने कार्तिक वदी 2 से कार्तिक वदी 6 तक 21 हवन कुण्डों का यज्ञ करने का आयोजन किया है।

-जगदीशनारायण भारद्वाज

सागौनभाड़ी (कालाहाँडी) में गायत्री जयंती के दिन 47 सदस्यों ने सामूहिक जप व यज्ञ किया। ब्रह्मभोज के उपराँत प्रभावशाली भाषण भी हुए। गायत्री उपासना की महिमा पर प्रकाश डाला गया। इस वर्ष में सागौनभाड़ी की शाखा में 31 लाख जप व 25 हजार मंत्र लेखन हुआ।

-श्री कृष्ण जोशी

बागोद (निमाड़) में लक्ष्मण प्रसाद वर्मा के यहाँ पाँच सौ आहुतियों का हवन किया गया। पीपलझर ग्राम में नवीन शाखा खोली गयी। शीघ्र ही सामूहिक यज्ञ की योजना बनाई जा रही है।

-रतनलाल सक्सेना

जरीयागढ़ (खूँटी, राँची) में 5 दिन का यज्ञ किया गया जिसमें 108 माला गायत्री मंत्र से हवन किया गया। पाँचों दिन अखण्ड कीर्तन हुआ।

-देवेन्द्रनाथ साहु

महोवा (हमीरपुर) में बिहारी जी के मंदिर में गायत्री यज्ञ विधि पूर्वक किया गया। परिवार के सदस्यों के अतिरिक्त जनता भी उपस्थित थी। महिलाओं ने अधिक संख्या में भाग लिया।

-प्रेमचंद्र अग्रवाल

रोहीशाला (सौराष्ट्र) में गायत्री जयन्ती के अवसर पर दस हजार आहुतियों का भी यज्ञ श्री वनमाली रुगनाथ के सहयोग से किया गया। गाँव की समस्त जनता दर्शनार्थ एकत्रित हुई थी। अंत में प्रसाद बाँटा गया और परिवार के सब सदस्यों ने सहयोग किया।

-मंत्री शाखा सभा

बिजौली (फतेहपुर) में गाँव के बाहर देव स्थान पर सामूहिक यज्ञ हुआ। गाँव की करीब 100 कन्याओं को भोजन कराया गया।

-राम सनेही वर्मा

ग्राम मेड़की (शाजापुर) में श्री मीराबाई के प्रयत्न से गायत्री परिवार की शाखा स्थापित की गयी। चार सौ आहुतियों का हवन किया गया। कन्या व ब्राह्मण को भोजन भी कराया गया।

-कोमल प्रसाद शर्मा

नागपुर में श्री दुबेजी द्वारा प्रेरित होकर पाँडे जी के स्थान पर 27 सौ आहुतियों का यज्ञ पुत्र के यज्ञोपवीत के उपलक्ष्य में किया गया। गायत्री शाखा के नये सदस्य बनाये गये।


गायत्री उपासना के अनुभव

शीघ्र ही वेतन वृद्धि हो गई

रामगंज मंडी (कोटा) से श्रीमती कृष्णा देवी सूचित करती हैं-मेरे पतिदेव को केवल 70 रुपये प्रतिमाह मिलते थे, इतने कम वेतन में घर का खर्च भी भली भाँति नहीं चल पाता था। अचानक मुझे एक गायत्री उपासक ने वेदमाता की उपासना के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने उनकी सद्प्रेरणा से चैत्र की नवरात्रि में ही सर्व प्रथम एक लघु अनुष्ठान किया। इसी मध्य में मात्रा की विशेष कृपा से मेरे पतिदेव का वेतन 150 रुपये हो गया। माता के इस चमत्कार को कोटि-कोटि नमस्कार है।

ओला-वृष्टि से गाँव की रक्षा हुई

पलायथा (कोटा) से श्री गोपाल लाल जी लिखते हैं-श्रद्धेय आचार्य जी की प्रेरणा से 4 फरवरी से 6 फरवरी तक एक सामूहिक आयोजन किया गया था। इसके कुछ समय उपराँत ही भारी ओलों की वृष्टि ने ग्राम के चारों ओर हाहाकार मचा दिया। परंतु माता के अनुग्रह से इस ग्राम में कुछ भी हानि नहीं हुई। ग्राम के सभी नर-नारियों की इस समय से माता पर अटूट श्रद्धा है। ये सभी लोग वात्सल्यमयी माता की करुणा के आभारी हैं।

पेट का दर्द गायब हो गया

सिरगिटी (विलासपुर) के राम नारायण लाल गुप्ता माता के वात्सल्य के विषय में सूचित करते हैं-गतवर्ष से मेरे पेट में सदैव ही पीड़ा होती थी। इस रोग की काफी चिकित्सा कराई पर किसी भी प्रकार रोग निवारण नहीं हुआ। एक दिन अचानक ही अखण्ड ज्योति पत्रिका की एक प्रति मुझे प्राप्त हो गयी। इसी की प्रेरणा से मैंने गायत्री उपासना तथा हवन प्रारम्भ किया। इसके कुछ समय उपराँत मेरे पेट का दर्द बिल्कुल ठीक हो गया। ऐसी वात्सल्यमयी माँ के अनुग्रह का सदैव आभारी रहूँगा।

मोतियाबिंद समाप्त हुआ।

दिगौड़ा (टीकमगढ़) के वृजवल्लभ संज्ञा लिखते हैं- मेरी माता के एक नेत्र में 12 वर्ष से मोतियाबिंद था, इससे काफी परेशान थी। इसी मध्य में अचानक ही माता जी को आधासीसी का दर्द प्रारम्भ हो गया और दूसरी आँख भी जाती रही। लगभग सभी अनुभवी डाक्टरों ने चिकित्सा की परंतु लाभ कुछ नहीं हुआ। इसी बीच माता की कृपा से अखण्ड ज्योति का एक अंक प्राप्त हो गया। इसी के अनुसार मैंने क्वार की नवरात्रि में एक लघु अनुष्ठान किया । इसी समय माता जी की आँखों में अचानक ही ज्योति आ गयी। मैं और माता जी दोनों सदैव वेद माता गायत्री की कृपा के ऋणी हैं। मेरी तथा माता जी की उपासना नियमित रूप से चल रही है।

हवन कुण्ड से बिना जले बाहर निकल आये

दिगौड़ा (टीकमगढ़) से श्री गोविंद दास भार्गव सूचित करते हैं-श्री ब्रह्मचारी की प्रेरणा से ललितपुर जिला झाँसी में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया गया। यज्ञ की पूर्णाहुति बड़े उत्साह पूर्वक हुई। पूर्णाहुति के उपराँत सभी नर नारी अपने-अपने घर वापिस जाने लगे। इसी बीच में अचानक ही एक कुत्ता हवन कुण्ड में आ गिरा। यह दुर्घटना देखकर सभी लोग परेशान थे। परंतु एक पंडित जी साहस पूर्वक हवन कुण्ड में सीढ़ी लगाकर गये, तत्काल उन्होंने उस कुत्ते को बाहर निकाला। कुत्ता एवं पंडित जी पूर्ण सुरक्षित थे। यह दृश्य देखकर सभी लोग वेद माता की दया देखकर प्रसन्न चित्त थे। वह कुत्ता आज कल ब्रह्मचारी जी के साथ ही रहता है। माता का ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव देखकर सभी जन समूह प्रभावित हुआ।

कठिन बीमारी से मुक्ति पाई

सिलवस्सा (सूरत) के श्री इंद्रबदन शुक्ला लिखते हैं-मैं सन् 54 में अचानक ही बीमार पड़ा था। मुझे पूज्य आचार्य जी का परिचय पहले से ही प्राप्त था। मैंने शीघ्र ही आचार्य जी के नाम एक पत्र लिखा, पूज्य आचार्य जी ने लिखा कि माता की उपासना करो-रक्षा कवच भेज रहे हैं, इसे धारण कर लें। मैंने ऐसा ही किया। कुछ समय उपराँत स्वास्थ्य में आशातीत सुधार हुआ। मैंने और भी अधिक निष्ठापूर्वक माता की उपासना की। कुछ ही समय में मैं बिल्कुल स्वस्थ हो गया। इसके पश्चात मथुरा विशद् गायत्री महायज्ञ में भी जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। यहाँ से मैं इतना प्रभावित हो गया हूँ कि अब आत्म कल्याण का प्रयत्न करते हुए जन कल्याण के लिए भी सतत् प्रयत्नशील रह कर वेद माता का अधिक से अधिक प्रचार कर रहा हूँ। यह मुझ पर माता की ही महान अनुकम्पा है।

पेचिश से छुटकारा मिला

पयागपुर (बहरायच)से श्री मुन्नालाल जी सूचित करते हैं-मुझे काफी समय से पेचिश के दस्त हो रहे थे। धीरे-धीरे स्थिति गम्भीर ही होती गयी। सभी अनुभवी वैद्यों एवं डाक्टरों से चिकित्सा कराई परंतु दस्तों की दशा निरंतर बढ़ती ही गयी। सभी लोग मेरी हालत देखकर चिन्तित थे। ऐसे आपत्ति के समय में मैंने माता एवं यज्ञ भगवान का स्मरण किया और थोड़ी सी यज्ञ भस्म का सेवन किया। कुछ समय उपराँत ही यकायक मेरे स्वास्थ्य में सुधार होने लगा। लगभग 8-10 दिन में पूर्ण स्वस्थ हो गया। मैं सदैव ही वेद माता की वात्सल्यता का कृतज्ञ हूँ।

प्रेत बाधा दूर हुई

दानापुर कैंट (पटना) के श्री त्रियुगी नारायण केसरी लिखते हैं-मेरे यहाँ एक जमींदार के लड़के को सदैव ही कभी-कभी प्रेत आकर परेशान करता था। कभी-कभी तो ऐसा प्रतीत होता था कि उसका जीवन भी खतरे में है। ऐसी दशा देखकर मुझे भी बड़ी दया आई। एक दिन अचानक ही यह घटना मेरे ही समक्ष हो गयी। मैंने तत्काल ही गायत्री मंत्र अभिमंत्रित कर जल का छींटा मारा एवं थोड़ा सा जल पिला भी दिया। अब वह प्रेत बाधा सदा के लिए दूर हो गयी है।

स्थायी नौकरी और पुत्र प्राप्ति

धरोला (शाजापुर) से श्री हनुमान प्रसाद शर्मा माता की वात्सल्यता के विषय में सूचित करते हैं-बहुत समय से नौकरी के लिए परेशान था, परंतु सफलता नहीं मिली। इसी मध्य में अचानक ही एक गायत्री-उपासक ने मुझे गायत्री-उपासना करने के लिए प्रोत्साहित किया। मैंने तुरंत ही साधना प्रारम्भ कर दी। कुछ समय उपराँत ही आशातीत सफलता प्राप्त हुई अर्थात् अस्थायी नौकरी मिल गयी। मैं नियमित साधना करता ही रहा। इसके फलस्वरूप मेरी नौकरी स्थायी हो गयी। इसके अतिरिक्त मेरी धर्म पत्नी को कोई संतान नहीं होती थी। मेरी यह भी कामना पूरी हो गयी। ऐसी वात्सल्यमयी माता का मैं सदैव ही कृतज्ञ रहूँगा।

विविध समाचार

कोटा में गायत्री उपासकों द्वारा बड़े यज्ञ का आयोजन किया गया, जोकि बड़े उत्साह पूर्वक सम्पन्न हुआ। इस समय नवीन गायत्री उपासक भी काफी संख्या में बनाये गये। इस यज्ञ में श्रीकृष्ण जी बाराँ वाले का प्रयत्न सराहनीय था। श्री सुदर्शन सिंह जी ने आर्थिक सहयोग दिया।

-एक दर्शक

झबुआ (म.प्र.)यहाँ श्री जगन्नाथ सिंह के नेतृत्व में अनेक अनुष्ठान की पूर्णाहुति हुयी। यद्यपि यह व्यक्तिगत कार्यक्रम था , परंतु दर्शकों में उत्साह था। गायत्री उपासकों ने आगामी कार्यक्रम के विषय में भी विचार-विमर्श किया।

-मनोहर सिंह सिसौदिया

लोदी (राजस्थान) के सभी गायत्री उपासकों ने गायत्री जयंती के पुनीत पर्व पर बड़ी धूम-धाम से यज्ञ व अनुष्ठानों का आयोजन किया। यज्ञ बड़े ही उत्साहपूर्वक समाप्त हुआ। श्री सालिग एवं श्री जय नारायण जी बी.ए. के प्रवचन भी हुए।

-अम्बालाल थानवी

करावल (ग्वालियर) में गायत्री जयंती बड़े उत्साहपूर्वक मनाई गयी। लगभग चार सौ ग्रामवासी कीर्तन करते हुए ग्राम में घूमे। स्थान-स्थान पर आरती हुई तथा प्रसाद वितरण भी हुआ। इस समय की शोभा दर्शनीय थी।

-राम स्वरूप शर्मा

राजापुर (बाराबंकी) में आषाढ़ सुदी त्रयोदशी को यज्ञ होना निश्चित हुआ है। पूर्णाहुति पूर्णिमा को होगी।

-मनोहर लाल दीक्षित

कराहल (ग्वालियर) में जिले की सभी गायत्री परिवार की शाखाओं का 6-7-8 अक्टूबर को सम्मेलन किया जायेगा। इसी समय पर 9 कुण्डों पर तीन दिन यज्ञ भी होगा। इस क्षेत्र के सभी उपासकों को हम सादर आमंत्रित करते हैं।

-प्रसादी लाल शर्मा

शामगढ़ (मनसौर) में श्री स्वामी सच्चिदानंदजी महाराज के आश्रम पर गायत्री महायज्ञ समारोह पूर्वक 9 कुण्डों की यज्ञशाला में सम्पन्न हुआ। गायत्री मंदिर में माता की बड़ी भव्य प्रतिमा की प्रतिष्ठ की गयी। मथुरा से आचार्य जी तथा स्वामी प्रेमानंदजी भी पधारे थे।

-रामकिशन शर्मा

मेड़की (शाजापुर)-परम पूज्य श्रीराम शर्मा आचार्य जी की सद्प्रेरणा से यहाँ भी 9 कुण्डों पर यज्ञ का आयोजन किया जायेगा। इसका उद्घाटन करने के लिए तपोनिष्ठ आचार्य जी पधार रहे हैं। समीपवर्ती क्षेत्र के गायत्री उपासकों को सादर निमंत्रित किया जाता है। यज्ञ में पधारने वाले सज्जनों को कार्यक्रम के प्रारम्भ होने से पूर्व ही सूचना दे देनी चाहिए।

-चम्पालाल शर्मा, पटैल

साधकों को सुविधा

जो साधक स्थिर चित्त से 24 लक्ष गायत्री अनुष्ठान करना चाहें तपोभूमि में उनके रहने तथा भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था कर दी जायेगी। आने के इच्छुक सौम्य प्रकृति एवं स्थिर बुद्धि के साधक पत्र व्यवहार कर लें।


शान्ति-दूत


शान्ति-दूत (Kavita)

रणभेरी बन्द करो, अब मेरी धरती पर,

संहारों के ये गीत न गाए जाएँगे,

तलवारें अब लोहू से नहीं नहाएँगी-

बे-मौसम नन्हें फूल नहीं मुरझाएँगे।

छाया विनाश का यह जो घना-अँधेरा है,

रवि के अँगारों में इस को जलना होगा,

जीवन की लता फली-फूली लहराएगी-

पतझर के पैरों को पीछे हटना होगा।

विध्वंस! और अपनी ताकत अजमा देखो,

सोने वालों पर वार किया, क्या वार किया!

इतना आभार मानते हैं हम भी तेरा,

तेरी चोटों ने बहुत बड़ा उपकार किया,

हम एक-दो नहीं, आज एशिया के जवान-

दुनिया भर का विष पी जाने को मचले हैं,

सिर कफ़न बाँध कर, शीश हथेली पर ले कर,

अपना पावन-परचम लहराने निकले हैं।

आ बैठे ठंडी साँसों में उन्चास पवन,

नयनों में धधक उठी पौरुष की ज्वाला है,

सोए अरमानों ने आकाश छू लिया है-

वाणी में पाँचजन्य का घोष निराला है।

अँगारों पर धर चरण चले हैं दीवाने,

है कौन एशिया का जो शीश झुकाएगा?

कारवाँ शांति के दूतों का घर से निकला,

मंजिल से पहले कदम नहीं लौटाएगा।

धरती ने करवट बदली, डोला आसमान,

सम्हलो, सम्हलो, भूगोल बदलने वाला है,

खौलने लगा है हिन्द महासागर का जल,

मन्थन से कोई रत्न निकलने वाला है।

गंगा की लहरों में यह कैसी सिकुड़न है!

गिरिराज-हिमाचल ने क्यों शीश उठाया है?

इतिहास खुल गए हैं किसकी अगवानी में?

कारवाँ शाँति के दूतों का बढ़ आया है।

घंटे बजते हैं सोमनाथ के मन्दिर के,

ऐलोर-अजन्ता की प्रतिमाएँ बोल रहीं,

कारवाँ शाँति के दूतों का बढ़ आया है,

बाधाएँ खुद अपनी जड़-गाँठें खोल रहीं।

कारवाँ शाँति के दूतों का यह नया,

हम ने दुनिया को सदा राह दिखलाई,

जीवन की जय के गीत सदा हम,

पीढ़ियाँ जिसे अब तक दुहराती आँयी।

वह सत्य, कर्म की महिमा, गीता का नारा,

‘वसुधा कुटुम्ब’ है, हर मनुष्य से प्यार करो,

धरती के नक्षत्रों! अँधियारे पर टूटो,

मिट जाओ, पर मानवता का शृंगार करो।

अभियान बुद्ध का, शाँति-अहिंसा का

एशिया न केवल, विश्व झुका जिसके आंडडडड

गाँधी, जिसकी वाणी की तुलना नहीं

क्या कहूँ! काल का दर्प थका जिसके अंडडडडड

नेहरू के फौलादी हाथों का यह मशाल,

रोशनी दे रही है जग के अँधियारे को,

हिंसा के मेघों! लील नहीं पाओगे अब,

जगमगा रहे मानव के भाग्य-सितारे को।

यह कोटि-कोटि बलिदानी वीरों का प्रंडडडडडड

इतिहासों की कालिख धो देने आयंडडडडडड

एशिया, शाँति का दूत एशिया, ध्वंस

बूढ़े-युग का शृंगार, जवानी लाया है।

दुनिया देखे, खूनी-एटम से टकराने-

हम ‘पंचशील’ की सुदृढ़ ढाल लेकर आए,

निश्चय के दृढ़ हाथों में बाधा के पहाड़,

समता के बल पर हम सब आज उठा लाए।

कैसा विरोध? कैसी विपदाएँ? कैसा गं

यह गीत शाँति का जग भर को गाना होगा,

सौ कवच भेदकर भी विनाश के आज,

अलका को धरती पर उतार लाना होगा।

*समाप्त*

(श्री आनन्द मिश्र)